Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Anu Vart Ki Aur Bhag 2

Nagraj Ji · 2010/12

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

प्राचाय भी तुमसी भषप्त समारोह के मभिनन्दन में
अणुव्रत की ओर
द्वितीय भाग
भूमिका
मुनि श्री नगराजजो
सम्पादक
मुनि श्री महेमकुमारनी 'प्रपम'
प्रवल सम्पादक
श्री सोहनलाल बाफरणा
उपमंत्री प्रमुखत समिति रिस्ती
१९६१
आत्माराम एण्ड संस
काश्मोरो गेट, दित्सी ६

ANOVRAT KI OIL
by
Sloni Shri Vahtpuutumar 'Pratham
Re.2.00
(मी र श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा कसाता मारम्प से प्राप्य)
प्रकाशक
प्रमसाम पुरी चालक
प्रात्माराम एण्ड मस
काश्मीरी मेर, रिमी
यातायें
होग बास, मई बिस्ती
रास्ता
जयपुर
माही मेट, वामावर
देमपपुस
मेरठ
विपपिचासय पेषणीगा
मृम्प दोपए
प्रथम स्क: १९६१
मा
मएम सहि प्रेस,
कमनारसर शिम्मी
TORT ATYA MAN & ron, PELTH

भूमिका भाव मे मममम या इमार वर्ष पूर्व भगवान् श्री महावीर ने भारतवर्ष पूी अंचल से पांच प्ररणुमतों का सन्देष रिया पा । गौतम गुट मे सयमम उसी सुग में पौर सी पचन से पसीन का सन्देश दिया था। ये सन्देश पूर्व से बनकर माखमप की परिश्रमी सीमामों में ही नही टाराए, अपितु कामान्तर के के समु पार भी पहुंच गए । प्ररणुप्रत-आन्दोलन का घोष मारत के पश्चिमी पंचम राजस्थाम में महर्षि भूम्प प्राचार्य भी तुमसी के मुख से उठा और देश की सुविस्तृत सीमामों तक पहुचा। पूर्व के मोमों मे माना महावीर पर दुख का नही सन्देच परिचम से प्रतिप्यनित होकर पुम हमारे कानों में पा है तो उत्तर पार मिण के लोगों ने माना भारतवर्ष ऐसे मूरों को सरा से ही पैरा करता दाबामती हुई समार की पूरी को भारपार रखते हैं। मायोजन के साप सबमा अपनत पुस। उसकी पर्चा झोपड़ियों में बसी पोर मोसमा तपा निभान-समार्मों में भी पसी । ससे बनवा का सहयोग मिना पौर पननेतामों मानी। देस के प्रामीण इस मोर पश्मि हए वो देश के रिचारक मोर साहित्यकार मी। पान्दोतन की अन्तिम परीक्षा मुरिजोगी मोगों में हुई पौर मापहा मरा उनए। 'मणुवत की पोर पान्दोमन का पाए प्रतिबिम मही पर उसके मातर का प्रतिविम है। यह ऐसे मैसकों की सचिनी से पावित पाए जिनकी पनी लि स्पून को मेवकर पम्तर को पार करने । में समर्प है। परपुपत-पारामन एक विचार-मन्ति । मह प्रत्येक निर्मामा प्रामिम मिचार्ग में देखता है । गित गाए पपी में प्रणुपद-पाम्दोलन मे रेप में पा दिया पायी भाविक पनेवर के स्म में महीला पा पता पौर मबह होत-बाप र मसाना विषय ही बन समता है। यह प्रमू निमाम है गोमोदि कारि सोमों के मन से प्रमुख हुपा है।मार निर्माण कार्परप में परिणत होपा भी टिमोचर हो हा। मैतिकता पम्प प्रयासम में प्राण है सिमेनों में मा पाई मोबना पायोप में मापारामह पौर पामा भौर पनारमा स्थानों में मा पाविम्वा पर का मामे ताने मै परपुस्त-प्रान्दोलन देम में प्रामा निपम स्थान रखता है। ऐसे अभियान भी देश में प्रनिमार्य प्रपंधा पी बो केवम मैतिक प्रमुखको ही अपना प्येय बमार मा बसे। भगुषत पानोमन में इस प्रपेया को पर्याप्त रूप से पूरा किया है। मुनि महम मुमारजी 'प्रथम' में प्रार्ण विचार-मुपवानों को एक सूत्र में पिरोकर एक गमय पर बना दिया है। रिचार एक स्वामी सम्मति होते है। उहें मंगर पिसी मुरक्षित मरूपा में रख दिया गाता है वो ये मुग-युप के लिए प्रेरणा-सीप हो पाने ।। मुनि महमारगी ने प्रणुश्व-भादोसन के प्रभार प्रसार में यात मारे भौमिक कार्य हिये। साहित्यमेशप भी पान्दोलन को माम्मा पिसाने में उनकी मूभापौर उमरा पम पपूष है। एक युप पा पर माहिरपसारो पानोपन म साम्प्रदायिक पम्प पानी पीन पार प्रभाव नहीं लगता था। मुनि महेमामारी में प्रान्ति पीस उपवार पोस्टाने के लिए साहिपका पाकारों तथा प्रम्प शिपारम्पतिय मम्प हारा । पर्नर मुरिम्नत पाए । उमड़ी प्रापंपों का गुनिगम्म ममाधान रिया पोरर्गपादोलन मति प्रभारित किया। पित्ती पवार, समागम पार नमकता को गार्मोन पे। प्रपा में पाने पूप पापा पार पूरी बरामी परवाह नहीं की। परमाने में परबारे पर पूमकर पान-सम्पराको गहनि मा पपनाया यह मर्यपा मान पार गरे भारप- सारमा परिवार पा। मादर पौर विरमार को नमस्प से समम सने पाहा पति इममें मम हो गया। उसी पोम्पका, मामा-निप्य कोरेपार पर मोम पुष होवे । एक बार पूमते-फिरले मुमतिर रिचारक और माहित्पार पी मेगामारगी पर पाये। मगदुमारी में पूमा--पार पाप पिये माहिपमा पर मालम्पपर।मुनि मान्द्रामाग्मी ने स्मित मात्र में उनर दिया--प्रापमा नम्बर साता है। नेमामारबी में कहा- पापी कार्यक्षमता के प्रति मेरे मन में ईर्ष्या होती है। काम में भी ऐसा कर्मभ्य होता। ऐस ही एक प्रसंग पर काफा कामेमरर ने महा-पाप मेरे घर पर माए इममे जैन सापुपों के प्रति मेरी पावनी । मेरा प्रब तक का अनुभव यही पा कि मैन साधु सबको अपने यहाँ ही गुमाफर नुण होते है। प्रस्तु,उनके पवितम सम्पर्क कटु पौर मपुर संम्मरणों का एक सम्मा मौरा है और किसी दिन या प्रमुपत इतिहास का एक प्रेरणापर मप्पाय बनेगा। तमननर मुनि मोहनमाममी 'साम' पारि पौर भी प्रने मुनियों नम बेग में कार्य किया पौर कर रहे हैं। इस कार्य-सैमी का परिणाम हुमा कि परगुतत-पादोसन बहुत पीघ्र ही देम क पुसिजीबी सोगों की लेमिनी पौर बागी का विषय बना । पिछपे वो मुनि माहटमारगी 'प्रथम' हस्तलिखित 'प-म्पोनि' पत्रिका पा कलात्मक रग से मम्पारन पराए। उन्होंने दो प्रगुणा विक्षेपार भी निकाने । 'परसुवन पी भार म पपिरीम सेर पे ही है मो उक्त विमपाकों मे मिए गए हैतमा पुछ पम्य भी। कुम मिलाकर 3 निबन्धों का या सकतम मरगुजन माहिम म पीपर्थर पौर जन-मानम के मिए एकनिक पाप होगा ऐसी पापा । निम्मी -मनि मगराय

No text on this page.

सम्पादकीय साहित्य मनुष्य की नियम सम्पत्ति है। साहित्य ही भूत को वर्तमान स पार पर्तमान को मविप्प स पोरता है। सहस्रो वर्ष पूर्व मनुप्प म यो मोषा मनुप्प को पिरासन ने स्प में मिमता है और भाग मनुप्य पो सोचता है पर माहिस्प के माध्यम म मान बासी पीसी की विरासत बनता है । एक युप पद मी वा सब मनुष्य मिबन पा भारी नहीं पा । तब मुखम्ब परम्परा से ही प्रपना ज्ञान प्रममी पीढ़ी को देता पा। साहित्य की यह पारा नाना सों में हर एक युग में बहठी ही रही है और मनुष्य इसमे उपाठ होता ही पाते। प्रसुस्त-माम्योतन एक मैतिम प्रवाह है। रक्त का संचार पैम हर एक बमान में पायस्पक हाताहै नविकता का संचार मी जीवन के हर बसाय पौर युग हर चरण में पपेमित है । साहित्य ही उस मैतिक विपत्का पारक तत्व है। पशुपत की पोर' से मोर्मों को नैतिक प्रेरणाएं ही नहीं मिलेंगी बह एक मुम की स्थिति का म्पौरा भी युग-पम में बता पगा। चिन्तन पौर मनन की इष्टिम भी उमसे पाठकों को बहुत सामग्री उपसम्म होमी । पराप्रत माहिस्प पब तक पर्याप्त समृर हो पुरा है। अनेकों विवेचनात्मक पुस्तः प्रकाप में मा मुझ पर यह सम्मान अपने प्रकार का है। एक ही कति में देमके अनेकानक विचारकों के विचार इसकी प्रपनी निमपता है। परापता पर पब तक मेहस्प में जितना मिया मया है यह समय इस मकान में नहीं मा सका। डिन् मुनियों ने मेडप में जितना मिया उसका स्पताण कमन ईबों में प्रान योग है। सर विद्वानों ने मा पर ता लिहा है उसमें से भी प्रस्तुत संरतम में पुन हुए मेस ही लिए मा मरे है। कुछ पण बनामों मापणों को भी संपृहीत कर तेवों का सपोरिया ममाता मर्षमावारण के लिए उनके सम्मुनत मम्बधी विचार मा मुसम एसकें।

मणुगत की भोर मेन रेषम नाबादि के ही नहीं मिये गए।
उनम नमस चिमन भी प्रस्तुत किया गया है। ऐमा मना है पाचार्य पी
तुमीका पह पार्प उनमेग पब एक ममार-पन काप मे एक
यम की उगम पापा भी ना यही है कि पाने यह पाप परेमा रेप में
मोडमाही मना पार तासात तबीमा मनोपियों के पिता का विषय होकर
प्रस्तुत पुलक मणुल-माम्बोमन के इतिहास समझी सर्पनिक पृष्ठभूमि
भगान ममान समा में उपयोपिता भारि विविष पाहमुपों पर काम गमती
मरापमान पा किसान माननी एक ही प्राधार में ममा मापनी पर
उसमी गमनाने ऐना हान नही दिया । म संग्रह को रो मार्गों में विमा
परला है।
उप निवास प्राधान, मन उमम पापन के नाम पर बगमा
पार पा है। सम्मान में मोनिदानको मुरक्षित रमन मोरपिम
परिवन नही दिया गया। नियम मिन ममर गित मा सही काम
पीन करन पर मोनिषिकापमान पर ना मन उस उम्पेस में भी पुम्मक
पोवाना गरा
पापा श्री तुममी पारा पाकर तो तय हूं लिनु
समिप मामी गौग्यामर मुझे मुनि पी मगगरी मतान मार्य
पनन निमना है। मृमि भी भागोपण रिता मोर नत रोनों पी
के लिाम में महपिए यानपीन है। पान की प्राकरिणा में मला
मम्पवान मोप पाहै। प्रस्तुत पर भी उनो मार्मन नागरिणाम।।
१ पन ११
मिति गरम
मया बागा रिम्पो
अनि माम 'धम

अनुक्रम ६ ७ प्रयुत प्रसाम्प्रायिक माम्बोसन -भी बयप्रशासनाण्पण मानवता को महान् सेवा उपराष्ट्रपति ग. सर्वपल्ली राबापणन् माधुनिक युप का प्रायोजन -पीयू माई देसाई तात्कालीन भममत्री भारत सरकार प्रमुखता का प्रर्प गतिक व्यवहार -गहरेकपा मेहताब तात्कामीन राम्पपास गई ए धाम्बोजनकी सफलता श्रीमती रामेश्वरी महम राष्ट्र सस्कृति का नब निर्माण -श्री पुस्पोत्तमबास भाग १३ भरको नारायण बनाने का भरस मिमेप -कविवर थी बामपण सर्मा 'मबीन एकापाणकारी योजना ---श्री जगजीवनराम रेल मन्त्री भारत सरकार १६ प्रमुखत मामूमि में एक यानोस --मी हरिमार उपाध्याय वित्तमन्त्री रामस्थान २२ पह हताहत कीन पाएगा? -श्री विष्णु प्रमाकर अनुक्ता बर्म और कम का समापय भी मोपीनाय 'मन पम्पल, जन सम्पर्क समिति रिस्ती राष्ट्र-सम्मपन में प्रमुखत का योय -पी रुप्पचा विचामकार सम्पारक 'सम्पा नब निर्माण और नतिकता --श्री रामनाम बर्मा बन सम्पर्क अधिकारी बिस्मौ प्रभासन 18 १२ मान पार -श्री यमपास वैन सम्मारक, 'चीवन-साहित्य' ४ प्राम-भूमि भापौतम मा.सामनाप माहापौर, रित्तो नपर-नियम १ विक मुस्यों की पापापम्ता -श्री सरसपियोगी पन सम्पर्क अधिकारी अजमेर १ हावार और प्रतिष्ता का प्रामानन --पी धोभावाम गुप्त सहसम्पारक शिमुस्ताम' परिम-गठन की एक तस्वीर -पीमती सुषेण कसमानी प्रमर्मभी, उत्तर-प्रदेश १ रता समातिसम्पाता का संपम पमुक्त -पी पमनाप पुफ उपसम्पारक हिगुस्तान ६२ मगु से महान् की पीर -स्वामी प्रेमपुरी बी ६५ प्रतिक पुनर्वापरण -प्ण मेहजार तात्पनीम राम्मपान बम्ब महिमा मतियों का एकीकरण -प्रो. भरणेपद पर मदन शिवविधामय " प्रपत पापबम -यो. प्रसाद बिजयीय एम ए .. ए समाज निर्माण प्रभूत्रत सा स्थान -भीमश्याम सिवान्तानकार . पमा चारपना है --श्री पपान न सम्पारस जीवन-साहित्य' ८४ मावार्य हुनती का परत पामोतन -पी पुणे महमम्पास 'नवजीवन' पबमक -पी रिपमा राम मम्मार जैन पप ११ निक प्रवृत्तियों में प्रवत

प्रपतका सामागरण
-श्री गोपीमाप भमन'
प्रध्यक्ष बन सम्पर्क समिति विस्मी २५
बान्ता माचको परम प्रापश्यता श्रीगणषय मिणामकार
सम्पावा 'सम्पदा
विश्व-पातिका महापस प्रमुवात
---श्री रामेपर 'प्रशान्त १.४
अनुष्ठी संरकी मार
-पीसम्माचा बैन १०७
मत और प्रेम-राम्प
-पी यमबहादुरनाम भीवास्तव
'साहित्याचाय ११०
मात्म-निरीकका प्रबसर
-पी रामकृष्ण 'भारती' ११६
ममुक्त मोर समाब
-पी रमेपकुमार 'पीस' १२१
मनुष्यों का मर्मम्म
-श्री पीनमा साहित्यरस्न १२५
मत पामोला
यो र प्रसार सिंहबी ए १२१
पहिसक समाग्रपना का मण
-श्री यमपान जैन
सम्पारक 'बीवन साहित्य' ११५

No text on this page.

१ अपावत मसाम्प्रदायिक प्रान्दोलन -बीयप्रसायनारायण मोमों के लिए यह प्राश्चर्य का विषय होमा कि मेरे जैसा व्यमित निस प्रकार भून मटक कर राजनीति से सर्वोदय प प्रावत से माम्मास्मिक मेन में मा गमा। मेरे जीवन के तीन पहस है-एक पब में हिंसा और साम्पमापी विचारों में विस्वास करता पा दूसरा मोकतन्त्रात्मक समारवारी का पोर पन्त मैं बोला नि मेरे समावस्या के समय तक पहुंचन में मिए पे तरीके अपित नही तो सर्वोरम पार प्रयुक्त से पम्यारम-पम को ही सरित मागे मानकर इस भोर सम पया है। इस तरह मने प्रपमे वरीपरमे है, मकिन मेरा सम्म मही है। प्राचार्य भी सुनसी के नेतृत्व में दो मंगमकारी कार्य होगा। उसके साम में तम्मय है और मेरी बोध भी पक्ति है, उस इस पुष्प कार्य में जमाने को तत्पर है। वर्तमान समय में सम्पूर्ण पिक में प्रमाना का प्रचार धामा है। मनुष्य का मैतिक पतन तीन मति से पा रहा है। ऐसी स्थिति में परि भारों पोर नतिक माध्यात्मिक घटाया हमा है चाहे कितनी भी सम्मी- मम्मी योजनाएं भान स्पों न बनाई पाए बोगरे कारखाने रमों म बोसे पाएं, मातारीखेती पारियों में कई गाए; अब निप्पस होने पाते है। यदि मानवता का विकास नहीं हुमा को ऐसी परिस्पिति में सर्वनाम ही होने माना है। सपासविक युग में परिम्परित पीपन में सस्तिक र सामाधिप धर्म का प्रतिणन नही होता है हो विशनारा सारा सर्वनाश होने पाता है और इस उप मानन का अस्तित्व है इस एपी में रह पाएगा। भाव को सामने पन्नोर पहपने भी पहले मानव बनने की २ प्रदात को पार मावापता है। इसके लिए प्रपेमा इस बात की है कि सन रमिक पीरम- म्पबहार में सामागिता के प्रामार पर पर्म कसा मैत्री मैतिकता और प्राप्पारिमाता की प्रतिष्ठा हो । या कार्य पर्म का है जिसे धर्म-गुट सरा पिया करते हैं परस्तुपैयक्तिक परे में हो सामारिफ पायरे में नहीं । पार सामाजिक जीवन का धर्म से सम्मल हो ऐसा दिखाई नहीं परवा । माधुनिक पुग में पक्तिमत सापना के युग में हमारे देश में एक महापुरप (पत्रिीगी) पाया जिसने सस्तात्रता संग्राम को प्राप्मारिमा प पिया पर्म-प्रचार को सामूहिक म दिया। इस प्रकार उसने सामूहिक प्राप्यात्मिक सापना के द्वारा समाबको पाये बढ़ाया। हमारे देश में पस्वियों की कमी नहीं रही है। पान मौ मनिक सापु-सन्त अपना पहा या कमरामों में एकातिक सापना परते मिनी पर समान लिए उनका माम महीं। ये पाहे पपने में स्तिने भी महान क्यों न हो मपि च सपार प्रयोजन नहीं तो मेरा भी उनसे कोई प्रपोजन नहीं है। ऐसे एकातिक साधना में रख उपस्थियों के पाप-प्रदातु भक्त कमी-कमी तो महो ताते है कि प्रथा पर्यत पर तपस्या करने वाले प्रमुक सन्त की उपम्या के प्रभाष से हमारा रेप स्तम हुमा है । हुपा होगा पर मुझे तो ऐसी प्रतालिमही होती। म तो भगवान परपस मार्ग को समास-सामाण लिए मार मानता पर न्होंने निरषय स्पिा किमाने तब तक सरम प्रोध नहीं गा पर यहाँ सनी मानों का प्रदेस नही होता । या सापूरित निर्वाण मोर माप की प्राना पी। मेरा भी यही नप है कि सबके उठे रिमा पक के रखने से पापाग नहीं हम माना है। भगवान महावीर में मिपों को हैपी बनाकर पीरमात्र के लिए यह पायोधन पनापा। उनका कहना पाकर मारे मानस समार का विकास नहीं होता Gar किसी पीर में समताभ मिन सम्पी भागाधियों का पान हो इसके लिए ग्रहोति परना सब कुछ म्योप्पर पर दिया । स्वामी षिकानारा पाहरण भी हमारे सामने है। उनके लिए कोरमी मुष-मुगिनी कमी की - प्रमुना प्रसाम्प्रयायिक प्रामोनम भेकिन समाने सामाजिक जीवन में प्रपेशमिया मौर सोपों को सामूहिक सामना की पोर नग्मुख किया। पापीनीस विधा में एक नई परम्परा कायम की। उन्होंने सामूहिक प्राध्यात्मिा का पाठ किया। इस पाम्पारिक सान्ति का पर्व यह है कि पाठक सारे मानव-समार का उपार नहीं हो पाता तब तक वयक्तिक मोम माम्त नहीं होगा। मागीली भैरे लिए पावर्स समिए है कि पहमि परमात्मा की खोर मानव-समार में की पौर उसे ऊपर उठाया। पार के प्रम्पकारपूर्ण सूम में सन्त रिमोबा पार पाचार्य तुमसी ये दो बीपक सपान को एकाए प्रदान कर है। जीवन-विकास की दिशा में पाचार्यप्रगर एस धोषकर पे दिनोबा भी सोष कर रहे है कि पर्म से भीग से कैसे बोड़ा जाए, किस प्रकार सामूहिक कार्यकम मागे एका पाए? यह कोई मासान सलाम प्ररपुत्रय पार सोम इन प्रश्नों में से दो उत्तर है। ये परनीतिक या माणिक स्तरों पर नहीं, बस्कितिक स्तरों पर मामयता को उसने और पिकसित करम म मगे है। लके रुप परिणाम भी निकले हैं। पचपि उनके परिणाम महा माप्टिमोचर हो है, पर में ऐसे कारों की तुसना प्राइसपर्य के छोटे-छोटे भापों से करता है। भिस तरह से इसे मर रिवाईते उससे भी कहीं अधिक समुद्र पर ये एपे पो है । उसी तरह पान पछे कार्यों के परिराम पर से माहे छोटे प्रतीत होवे हों पर मनि नीचे गाणा पसर गमा हुमा है । इन धिरे हुए परिणाम पी पीरे-धीरे सामने पाते, पर मके मकास में भाने में समम समता है। कुछ मोग परपुश्ती बने फुध में भूवान सम्पति-दान मारि लिया पर इनका प्रभाव उन पागों से सही रूप में मही प्रांम पा सकता पर्योकि उसका दोन प्रक मोमों में काम करता है और एकसमी प्रपिके पार पर उसका मगर पल्लवित पार पृप्पित होता है, मगरप्टियन होता है। भार समाज की पसना है कि उसमें प्रेम समता, सहकार व म्याय की मधुबनी पीर प्रधानता होती और मह सोपण-विहीन होमा। इस मम्मी प्राप्ति मतो हिंसा से सम्भर है-सा किम में पारणाही को मिटाकर भी सान्ति नहीं और मह कानून से ही प्राप्त किया था सम्वा । बिसका कि प्रयोप समारवादी संस्थानों के द्वारा लिप में हुपा पार भारत में हो पाई। इन तरीनों से इस मक्य की प्राप्ति इमलिए सम्भव नहीं हुई कि उनसे समार पौर संस्थाए बदली पष्ट्रीपकरण हा पर तब भी मारर्स समान का सप पारर्म ही बना रहा। प्रब सारे संसार में यह अनुमर किया जाने नमा है कि मानव मुशार पौर माननीय सुपार-विकास के माय की प्राप्ति बाम परितो बता पा गाठून में नहीं हो सस्ती । समके लिए महारमा नापी विनोबा भावार्य भी पुनसी का पर हो रही उपाय है। पार पावपाता इस पात की कि इस प्रकार की गिवनी भी पारा १ परि एक हो पाएं वो रेप में महान कार्य हो पाया है। सत्य प्रेम मत्मिा पारिवत्त को भरपुवठ के मून है, उनकी प्रतिष्ठा समौ मत या पर्म के साधु सम्तों में की है। पासत तत्व बम विनोरा या पापा भी तुलसी के ही माहाँ मोम पाहे मिस मत को मानते हो पर ये समझे कि पीपन की माली कुबमार्यमाम माविक मूमों की पटरियों पर पाती है। इससे मुक्त हो पाने परमह ऐसीबाई में बा मिरेपी बाई से धान का पैमानिक परमोल भी पास नही रिमा सका। विमान के प्रातुर्माण से ही धर्म के सम्बरम में अनेक प्रान्तियों का विकास हुआ है । मानव के लिए बह एक जाती है, जिसने मानव समार को समाप के कमार पर मा पड़ा किया। इसके उत्तर में पण इस बात की है कि पार पम्पात्म गो मानव पीवन से पिyाए पीपन में समरत किन गाएं। इससे विमान का पिनासकारी सप मी कापाए- रारीही पायेगा। प्रापुरत-पान्योलम पसाम्प्रदायिक मौर सार्वभौम है। यह पाहे रिस नाम में पसे । हमें काम हे मानवार सा नामकरण परे पो पो र रिया पाए, नाम पही होगा। इसलिए प्रपंता यह है कि प्राचाय पी तुलसी पारा प्रति प्रति अपुत्पाद इस पर को समम रप और टोबार पीपन में

मनात प्रसाम्प्रापिक प्रादोमम
1
मनुकरण करें, साप ही उसके प्रापार पर अपने व्यवसाय उघीय र पन्ध में एसे
ठोस कदम यएं, जिनसे बन-जीवन को मी प्ररणा मिल सके। धर्म केस
माम मेने अपनपकार करने पर मस्तक भुनाने से नहीं होता भपितु माघरगों
में परिसक्षित होता है।

२ मामवसा की महान् सेवा -सरायपनि ग. सर्वपल्ली रापासप्पन् पार मोर्यो में यो नैतिक पतन हो रहा है उसे देखकर मेरेदम में एक म्पपा परा हो बाती है। लोग बात हिंसा की करते है पर समय प्राते ही हिंसा करने को तैयार हो पाते हैं। परशुधव-मान्दोमन की बपों से में घिर-परिचित है। मामयता के परिमाण में यह महान् योग दे रहा है। पहिसा सत्य प्रचार्य जपचर्य व परिपह-येही ऐसे सार्वमीम तप्य जिमपर सारा संसार टिका हुआ है। पंचधीम भी इसमें समा जाते हैं। पशुपत-पादोनम इन्हीं पार तयों को प्रयु से प्रारम्भ कर महान में परिपत करना चाहता है। या मानवता की महान् मेगा है। बन-बम में पहिसा सत्या प्रसार हो इसमे पाकर में कोई सेवा मही मानता। भासवर्ष पर्म प्रधान रेरा पा पर पाम तो भारतवासियों के विचारों में पास्विरय पार पाचार में पूम नास्तिकर उपतय होता है। पार तो मोगों की पर स्थिति है जिसका परिषय विष्णु पुराण में अपिर्यो में इस प्रकार दिया पा-पन-सा तो हमारे पपेप पर्मों का हेतु पसरण ही हमारे पीरम म्पबहार पी पर कातु, मूग-पारण हमारे विनस्व का हेतु है पौर बेम पारण ही हमारे पापमपा हेतु है।

माधुनिक युग का माम्दोलन सात्वामीन मममंत्री भी रूपमाईसाई सस्प हिंसा मैनपर्म का मूल सक्ष्य बिग्मुर पर मान का जीवन भौतिक बकापार में से गुगर रहा है । मत प्राय सत्म पहिंसा से अधिक मपरिग्रह पर बम देन की पानश्यकता है। परि प्रपरिग्रह को मेकर पान्दोमन किया गया तो सरप पहिसा अपने पाप प्रा पापे । माग भसत्य और हिंसा मोहए । इमका मूप कारण परिप्रह। पक्ति संग्रहसीन है मठ संग्रह के लिए यह सब कुछ कर मेवा है। भगवान् महावीर यदि प्रार पैदा होवे पौर में पानुनिक युग की पिमूति के स में रपवेश करते तो मैं समझता है कि वर्तमान के मौतिक पान को सामने रखकर उपदेश । प्रभीप्रमी में रखिए का दौरा करके माया है। मैंने कहा पा-मार्स बुरा नहीं था । यह तो भीवन को सुखी बनान पाया पा। पर माग यदि पर पैदा होता तो यह भी पुनिया को पहिसा पाही यस्ता दिलाता । इसी तर मगवान् महावीर या बैरिकों के वेद या प्रम्म कार्ड भी सम्प्रदाय सब मुगानुन बमे और इसी कारण बनसापारग ने उनसे विचारों का अनुममम किया । प्रनत-माम्दोमन को भी अपने विचारों को नसी रूप में रमना पाहिए जिससे सर्वसापारण के दिन पर रे प्रसर कर सकें। यह पुची की रात है कि सा किया भी पाता है। मयुपत-पान्योलन माधुनिक युम का मनपर्म ही तो है। तिल और माम्मात्मिक जीवन स होने मे सब समस्पाएं हम हो सकती है। प्रत्रत-पाचोमन नैविक और पाप्यारिमा पाचन निर्माणमा प्रेरणा मोत है। वैसे संसार कमी दोप-विमुक्त नहीं रहा पार न रहेमा ही पर उसमें सन्तुनन पो रहना ही चाहिए । इसके लिए सभी प्रये प्रादमी प्रयत्नपील हो प्रपतरो मोर पे।। पान क्या नही है सब सिर्फ सन्तुसन मारी। पात, पित्त कफ के प्रमन्तुमम से परीर में बीमारियां पैदा हो जाती पौर पर तक सन्तुनिव नहीं होते उसमें धन कुध कमर पती ही है। पर परीर में उन पोपों को निकालने की मक्ति होती है। यह दोपपूछ तत्वों को मम-मूल के गरिए बाहर निकामता यता है। इधी तह भार के समान में युगायों को निकालते एने की सक्ति होनी चाहिए । समाग मदि पुराइयों को स्थान नही देगा तो अपने प्राप मिट जायेगी। पार हमारी संसति पाश्चात्य संस्कृति प्रभावित है। यूरोपीय मभ्यता के प्रमास में मोम पापिया गए है। उपके सरपुणों को अपनाने की उनमें शक्ति नही पर पुणों को सार ही अपना लिया जाता है। ऐसे समय में प्रणुपत पान्दोलन के द्वारा बो प्रयास किया पा पा है, में उसका स्वागत करता हूँ। पापौर भुपी पी पाठदि उसमें कतई साम्प्रायिक मही है।

४ प्रणवतों का प्रप नतिक व्यवहार - हरेपण मेहताब तरकालीम राज्यपाल, बम्बई मुनि भी मगरागी ने मसीम अनुकर मुझे भणुवत-ग्राम्दोमन ममी भांति परिचित किया जिसकी स्फुट पाएं प वर्षों मे में मुन रहा बा । यह पायोमन बावन के समस्त पहनुपर्षों में नैतिकता एवं परित का प्रस्न निर्माण करने मामा है । मह किसी सम्प्रराम मिथप की भूमिका पर पापारित नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को मैतिक पापरण करना चाहिए, फिर बह पाहे कोई भी रों म हो और उसने अपने पोवनयापन के लिए कोई भी पपाय क्यों न अपनाया हो ? यही प्रणुपत-पाम्पोसन का ।। बीवन में प्रन्तिम सफलता प्राप्त करने का मैतिक प्रापरण हो मापरप है। कुछ सीमा तक यह प्रथम होता है कि मनैतिकता (भूटेग) को किसी माने में सफलता प्राप्त होती है परन्तु समा स्म से नैतिकता की उन्धी विषम होती. बप कि किसी पक्ति के पास इसके लिए पापम्पा शिस प्राप्त हो। पार के इस मामुनिक युग में बलि मनुप्प ने पास्मा से अपना सम्पर्क दो दिया है और अपने ही ग्रह के प्रभाव से निर्मित उम्मनों + पापे से निम्मने के लिए एपटाता है इस प्रकार का कोई भी मान्दोमन को मार्य-दक का पापार देता है उसका प्रत्यन्त स्थापत है। प्रयुक्त मी धी इष्टि भिमपनीर है। यदि इस मान्दीनन से प्रत्य संस्था म मी स्त्री पौर पुस्प प्रमाक्ति हो सके तो इससे मानवता की बहुत बड़ी मेमा होगी। इस मदत की पोर प्रकार के पादासन को प्रपिक संस्था में मानने मामे हों ऐसा न तो रेस्य होना पाहिए पौर म ऐसे समय भी प्रावस्यकता है। ऐसी प्रवृत्तियों का तत्त पुण में होता है म कि संस्पा में । मेरी प्रार्थना है कि वहाँ का प्यान पीपन में सफलता प्राप्त करने के लिए मैतिक पाचरण के प्रति पापित हो।

५ प्रान्दोलन को सफलता -~-श्रीमतो रामेमरी महक साधु-सन्तों की परम्परा हमारे देश में पमी माती ही है। सीमाम्प से मारत की पुप्प भूमि बड़े-बड़े सन्त्रों को बम्म देती रही है और मार भी मनेक उम्मकोटि के सन्त विद्यमान है। हमारे रेस में समाज के मैतिक स्वर को सपा छाने पर उसे पुनीत मनाने में सम्तों का बहुत बड़ा हाप रहा है । उनके उप कपा-मार्ता पार प्रबार से स्त्री-पुरों को मार जीवन बिताने का प्रोत्साहन पौर प्रपनी गलतियों व पुरादों को पूर करने की प्रेरणा मिलती है । भागकम भरपी पढ़े-लिले मोर्मो की सामों में भरा नहीं रही है। चमका प्रमुख कारण यह है कि बहों में सामुत्ति को एक पेशा बना लिया है। केवल मपर्वा वस्त्र पहनकर ही ये सामु बन पात है । इसीसे सापुपों की पास बाठी पी है। फिर भी कहीं-कहीं ऐसे सत मिम गाते हैं जिनमें संसार के परोपकार की परम्प पक्ति रहती है। खेतारनों के एक ऐसे ही संत पापार्य थी तुमसी है मो प्रयुक्त के माम से एक पवित्र मान्योतन बसा रहे है । मि सन्देह यह पन्या पीर हम को पवित्र मरले बासा प्रायोजन | मिसे सम मागों को सम्माई के साथ अपनाना पाहिए। हमारे समान में भ्रष्टाचार दिन प्रतिदिन बह रहा है। मचाई पौर ईमानदारी का मन घट रहा है। गाय पपार्कों में दूसरी वस्तुएं मिमाना पोर बागरी सबोरी म्पभिचार सबहीबारी । इस माम्दोलन के परिप, मोर्मों को समझाया पौर बताया बाता है कि इन बुरेकमा पो भो । इस प्रकार के पश्त की और लिए स्त्री-पुरषों की समाएं की जाती है। प्राचार्य भी के शिष्य पर-पर मार भोयों मे पन मेते रामदपर पर अपने काम मिपा पार मी प्रकार उन प्रणपती मार B नैतिक समुराव में सपा है। रिती भी लोग साधार कार ने माना ही हमारे समाज के उत्थान के मिए नामकारी इस मान्दोसम का फरना-पूतना पार गला भारती है।

राष्ट व सस्कति का नव निर्माण -पी पुष्योत्तमात मार्ग इम समार में पाहा शानिक मुम भाप याना बना पा रहा है यहाँ हम यह नहीं पाहन कि अपने जीवन का बहुमूल्य समय प्राप्पाश्मिता की पोर करन करें। भारतीय संस्कृति पर्वा स्याप प्रमान रही है पौर देगासियों का प्रावरण मी पा रहा है। चिराम तक गीवित रहने मामे माहपि-महारमाओं न मी मही कहा कि मानव मात्र का प्रावरण प्रन्याहा । पशुपों के समान प्रापरण न हो। से यह संसार मुख पौर पदगुण मनाई और मुर्गा बालों की खान है। हम दूप मेन गुकानों पर मात्र है। मगर हम म होत हो तुम को पुन मते पार पानी को स्माप देते । इसीलिए मंमार के ममम मुगों को मने लिए हम महा- परणीय बनना चाहिए। परमारमा म मिस सष्टि की रचना की है वही मनाई के साप दुई मी परा हो गई है। मेफिन पाचार्य श्री तुनमी बसों क साप पर हम गान मको ६ कि हमें प्रपन जीवन में पौन-मा मार्ग प्रपनाना पाहिए। अगर हमें मारप बनना है वो सदुपदेगा मा ही भाचरण करना चाहिए । प्रगर हमें अपने ममार पर मसति काकस्पाय करना है वो भाचार्य मी तुलसी के मार्ग पर चमना चाहिए। हम अपने पीवन में पणुबन बारा प्रमेमनेक मारे कार्य व सुपार कर सकते हैं। बारा हम अपने जीवन को रिकामोन्मुख व परापरणीय बना मरते हैं। मानव जीवन के पाण के लिए पंच महावतों रा पामम काला पावस्या पापाय पी तुनमी के उन मयों को मैं भूत नहीं सकता रिभा पौर सिमाम मामकर ही हम समान को वम्नति के मार्ग पर प्रहार कर मरते।

पमुमत की पोर प्रौपचारिकता में पापकर एमपा । सिमान्त या मानवे -मारमा पमर है ममान किसी के प्रति भी बुनुप्मा दे भाव क्यों रखे बा ? मरि इस प्रकार घुब स्प में हमापविनास होता तो हम भौपचारिकता में क्यों कर ममे होने पर हम से हमारा दुर्भाग्य है कि अपने पूर्वगों के पाये सिमान्त को निकास सत्य समझए मी उगे अपने गौवन में उतार नहीं पाते। ऐसी स्पिति में प्रमावत-पामोसन को मरण के लिए एक उपयोगी मान्दोमन मानता है। प्रणवत पादौतम के सिवान्ती र पामए बिना सामागित मार यीयता सम्मत नहीं हो सका है। पही कारण है कि ऐसे पालोमनों की पाठकी महत्ता पौर उपपोगिता है। भारत में विदने भी धर्म पैग हुए, सनो अनुसार यहा केबस मुद्दे पन-पाठन मा धान कोही महचा नहीं समान को हीन नहीं मानता पर निस मान के पीपीवन नहीं रहतान में पार्षता मही। राप म एक चम्मच शहर पापा पर नई, पुस्से से मार-पीने हो गये। पहा मान पीवन में कहा उतरा। रिसने बानपावत तत्वों को पत्र पाप पखारा ही नही माने में माती है। किसी पारापास्त से पूपी जान क्या है मार हरेमानरि-भव-सम्पन्न बनो यही शामोपातमा है पर भारठीपनपि में अन्तर है। पानी प्राचार्योपासना, पौष मात्मनिया समषिपता कान की सन्नी मुंपा। पतएप परिको युधियब-संपन्नता माम ही पोपमा प्टि में यह जान नहीं है महान पसुपत-पारोलन पारन में ममान मार बर्तन को गसमा पाहा। इसलिए यह भारतीय समाज के लिए एक पापा पानीमन है। भौतिक विकासमयी पपिसिरियां भार मिस मोटि पर पीईहर उस काटि वा पाने में पाने पितनी प्रतानिया और सहलामिया मदी HAN और पाम्पानि विशव पामोनन पी पपना समय मैगार मह प्रपति परमामय मौतर पमप मत्सर पार मोह मानव सई पसे निकालने में समय तो मवेपाही पर हमें सही माना हैमर में मारापपल को यह मान विकास देता है। सपमुष मनु-पादोषन कर दो नापपस बनाने का प्रथम पएस निरोप है।

मरकोनारायन बनाने का भरण निक्षेप मानजीवन में तपस्या और सिविता का सुधार करने मामा एक सबस उपम है। सात वर्ष पूर्व प्राचार्य श्री तुमसी ने इस मान्दोमन रोयम दिरा बिसरे कारण हमारे परिवार वीमन में एक बम विसाईदी हमारी जीवनमारा नैतिक जागरण की मोर प्रवाहित हुई। इस महती कृपा के लिए हम सब उनके भौतिक पवानों की चकाचौप में सम्भव है कि लोग प्रपरिग्रह की भारतीय परम्परा को स्वीकार न करें, परन्तु जीवन की वास्तविकता इसी पर टिकी हुई है। पान का समान प्रतिसंचय की भित्ति पर पापारित है और ऐसी स्थिति में किसी भी भारी की मापना मसम्मष नहीं तो कम से कम कठिन पमस्म है । क्योहि पब तक संचय या परिसह की भावना सीमित है तब तक पह गिनाएपरिणी नहीं परन्तु अब यह सीमा को नाप बात है तो यह समाग पौर राष्ट्र के लिए ही नहीं पस्कि समस्त मानवता के लिए पात सिय होती है। म्पत्ति को समाप की इकाई मानकर पाचार्य भी तुमती मारा जीवन में पारम-परिष्का, पपरिपह एवं संयम का पाठ पढ़ामा सभापी मण्डनीय है मौर इस प्रकार व्यक्तिवाद से समागवार की मोर परेंगे तब भाषण में ऐसे साम्पबाव का गम होपा भो नैतिकतों पर पापारित होने के कारण प्रसार में पतुननीय र प्रवितीय सिस होगा। मुझे यह जानकर अस्पताल होता कि हमारे देश में एसे कमीने पारमी भी है मो इस प्रकार के सबमहिनाम प्रान्दोगनों व कार्यक्रमों पा भी निरोप करो। किन्तु उन व्यक्तिों को पाव रखना चाहिए, प्राचार्य तुमसी पौर विनोबा माने जैसे महापुरुप इस धरा परपारबार पंदा नहीं हमि । हम परयम्त कमीने पार नीच हेपि यदि उनसे शाम न मेते हुए प्रामोषना की मिमी पोपी वृतिको प्रामामे । मरि मे धन्त चाहे वो एकान्त में कर भी पानी मात्म सामना में नप सकते हैं क्योंकि इनमें पग-पिता है। पर हिमालय से कम्पा- कुमारी तक पैदम पूमते हए वो हमारा योपन पर ए में हम पिरोप का उपहार ? मुझसे कुछ एक प्पपिन का सरते तुम बहुत प्रमाण हो ।

पमुक्त की पोर पोम ही नियमित हर बाते हो। परन्तु एक सम्म व्यक्ति यह पप से कर पता है गोमारी पूषा पापौर मार के स्थान है साहे कोई अपवित्र बमाने का मनपिकार प्रयास को ? को बीपन-प्ररणा के महान् पस्तम महिंसात्मक भौर विक पापति के सूत्रधार है उनके प्रति हमारा यह पर्षण । मुझे नहीं लगता इनमे कौनसा मनुप्रय महा पगाता है ? प्राचार्य श्री तुलसी पाने प्रति की गई पानोपनामी का स्पष्टीकरण करते पर प्रतिकार नहीं कले यी समके पस्तित मनुस्म है। इस प्रकार की प्यामों में समान का भापमान प्हमा चाहिए। ऐसा मानों को प्रहिसा प्रेम का प्रसारमा पाहिए कि मालोचना की पौडी पृत्ति से इन परपस्पों की कोई पठि मही होपी क्योंकि ये तो योगास म्प पर इनकी मिरा करके कोई का पातेगा। मनापरतो ऐसी दुणालों को प्रभाव पातामही इसमें मामा कोही पनि।

द एफ कल्याणकारी योजना --ौअपनीयमपप रेल मंत्री, मात सरकार पाम पुनिया में पाया प्रामा है। पाऐं मार प्रविया का बोतवाना है। ऐसी स्थिति में पीपन के मूल्यों को बरसने के लिए समार का पक्ति पसुपती बनकर मैतिकता की पोर प्रम मा परे है। यह एक पस्याणकारी मोबना है । मेरे एक मित्र वर्ष में हवारों सयों का काम करो, मेगिम पाहते हैं कि कमटेक्स में से पुषसए पर पायें। मोग सोमवे पौर समम ए पी पन तिम्वा की पोर कमाते है । एक समय मा पर बोचरे पानी राणा भी एक पापारस सम्पासा के मापे सिर मुगावे में। मेकिन माग हमारी प्रवृत्ति मदस गई है। किसी सम्मासी में प्रगर भौतिक परामों को प्राप्त करने की सक्ति हो तो भार नोम के चरणों में भर पाते है । हम सम्पासी की इम्बत से मगर उसके पास बमलार हो बम बनाने की करामात हो पिस्तू महा विकता का उपदेस रिमा पाता हो होप नही पास तामहीं फटम्ते माहे रे बनलिमिए अपने प्रारा होम करो। मोम मापान र मूठ बोमना पाप । परन्तु यहाँ स्वार्थ का समाप्त पाया बहो पा सराम पाया कि मही रे पहर एक मसत बात सिखने से रस पार सए मिम सरते पहा पाप पार पन तिकता का ईमान मही रहता । यह इस की बात है या इस पर्मदीपास्तिता का एम ममापद है। पर भार उस मोर भी मुरिए, पिन देों को हम पर्म-अपान महीही। पागाकर मोगों को प्रापर्य होगा कि यूरोप पीर प्रमेरिका में कोई प्रारमी हा नहीं मिमेमा मोष में पानी मिनाया हो।हमारे यहाँ का एपिया प्रगती पोर रिसायत गटरी पास करने के लिए पया। विधार्थी होटलों में नहीं पत परिवारों में रहते है।बह एक मामे के परिवार में ठहराया।एर दिन माने को गाकी रससे पाने मपी कि पार १. पोग दूर की पविक मायरमस्या है जिसके लिए पहनी हरानी रिचार्मी शोना नसके लिए सनी पवाया! इम में १. पोप पानी सम दो। यह गीहई मपने पिता के पास गई और काले ममी-पितानी ! यह सा भयंकर पक्ति मोएप में पानी मिलाने की बाव पका है। पिता उसकी मात मुनते ही हिनुस्तानी से पाकर बोलामा हम पोडे से माम लिए पके स्मास्य को वियागोमाको तुरन्त पर से निकाल दिया गया। सरेप का मामा भी विताका पितमा प्याम रखता है। हम बोरनाग के लिए देश स्वास्य को दिवाने से नहीं हिल विवाद। यह सी मैतिकवाद। इमरा पहरण हमारे पदा के एक मुसलमानमिषका है यो विहार एसम्ममी के सदस्य है। बी. ए पास पर बेकार।एक मारी पनी पहा-यही स्वोस में पीव होता है पर अपने महा से पीकीपरीष फरोज किया करें।ईदिन पीका पापार करत है। एक बार उनको कलकत्ता एक पातिए मे पूछा कि पत्तको क्या नाम पता है ? उनको बो योग-बहुत माम पता था साफ-साफ बना दिया तो उस माइतिए ने कहा तुम पास मापार गे । पम्होंने बताया की में सांप की परीकी पिनापट करने हैताम पषित होता है। पाकाने मगे सांप की नाही भाई। तार की बी में क्या विप नहीं होता। हम बागार से जो पाकर पाठे समें बाब मेस पुपर, साप न पाने दिन-दिन की पबिमा हस्ती मिलाने पाने मोग है पो गोपनी धर्मपालाएं बनाते . यमै के नाम से बारे परे पौरन वे पर महारिक पद में शिमी पर्व विश्वामिना पाप करत हारेर पनप पारमी तिनी विपापी बात सौप सपने पिनो सिए एमपते पर्प- कपाधापार पारिचारमी समर्ने मार तिनी मतिरामी महानता है। पर सन् १९४० में दिमापन गया बामा समरवीरों पर पदोलबास एएम पाई परीकी एकस्पाएकारी योजना इमा। यहाँ हमें चाकमेट का अपन मिसा । म उसकी मावस्यकता नही भी। एक मोटर ग्राइपर महिमा मेयर मिनिस्ट्री की यहां भाया करती थी। मैने उस महिसा से कहा कि यह पामेट का मन माप मे मीनिए, पापके काम पाएपा । यह बोसी-मेरा पन मना हमा।इसका मैं क्या कस्मी ? मने कहा-पमा पर मै बलों के लिए दो मेगाइए । बह पहने नमी उन सबका सन बना हुपा है । भार मापको भाकनेट की मावस्यकता नही है वो मन फार कर फें। जितना बाफमट च बाएपा यह विरेनों में भेवकर हम मुद्रा प्राप्त महिन हमारे यहाँ गया होता? यदि रेम में किसी वस्तु पर कन्ट्रोल हा पाए पो बड़े से बड़ा मारमी मौ यह प्रमल करता है कि घर में अपर सात व्यक्ति वो भी पक्तियों के कारगर्ने । सलिए हमें अपने बीवन के मूस्यों को पहलमा होला । भाग हम अपने पारस से गिर गए हैं और दूसरे देशों के मोम जीवन के सन्चे पापर्म पी पोर पाते बने जा रहे है। हम भौतिक वस्तुओं को जितना महरपरे हे महम केवल हमारे मास्मिक बक्ति भौतिक माप का भी कारण बनेपा । प्रस्तु, हमें अपने बीवन का पुरस्माकन करमा है।

अणुव्रत मरभूमि में एक गस-स्रोत -श्री हरिम पाप्पाम वित्तमंत्री रामपाल पर तक मनुष्य का जीवन प्रों के ममीन नहीं होता, उसमें तेजस्विता मही पाती सतोमुख नहीं पाते। महरिमी पिसाईती है। प्रत मानव को पर्सयम है बचाए रखने का सामना परि म्यक्ति अपने जीवन को स्टोर करतो उसमें वो पमिा पाईयों पाई है वो उसे पता ममते देर नहीं मरठी कि उससे पतों का पाचन हुमा है। प्राचार्य श्री पुसमी पारा प्रति प्रणबत पाम्दोमन बता का पानीतम है। पीपम-म्पबहार को मुर पौर सात्विकता का नया मोड़ देने का प्रान्दोसन है । नाना प्रकार दुखों से प्रपीरित मानवता के लिए यह शान्तिदायी उपम है । मार के मानव-जीवन की मरमूमि में बह एक बसमोत । मैं वो क्या संसार का बड़े से व्यक्ति यह मामेमा दिपार संसार में इसकी गहत बड़ी पावश्यकता है। मार विभिन्न धर्मों के भापायी पौर सन्तों का भी पाप्मान पोपमपाएकारीश्रमों की पोर मामे नपा पर प्राचार्य पी तुमसी में वो पूर्व इस परिष-युविधा प्रान्दोमन को किया पर दूसरे इसकी पर्वा तक नहीं करवे रे । महमास्तम में बड़े गौरव की बात है। मनुषद-भादोमन के कार्य के साप वम भारतवर्ष में ही नहीं मसार सोम हम ऐसी मेरी माम्यता है। पार मारा च एक मपर स्टेट, प्रयासकारी सम्प है। या तो हम नोर्मों सपाईयो परकार में माप मेरे पितोमों को सगे पाण की पोर से पाएं इम पास्तव में प्राचार्य पीतूनसी के लिये १२ २१ मावत. मरमूमि में एक पत-मोत हमारे इस माप का सी मगन के मात्र प्राग मा बामपन मब मोयों का ननसे प्रेग्ण मेनी है। प्रणुपत-पाम्दोमन मावना पौर प्रेम सिखाता है। सदभावना भोर प्रेम की गती कीमत है। माए दिन के मगरे मिटाने को मोग ग्यायामयों करपार पटपटाते है। ग्याप मिमपा है। एक को मन्ताप पौर दूसरे को प्रसन्वोप होना सहन है। पसन्तुष्ट और पाग बहता है कभी प्रासत में जाता है । मुप्रीमकोट के मगर तो उसके लिए कोई रास्ता नहीं। यह सप है, पहा मी गो ग्यास मिमता है, उससे दोनों को सन्तोप नहीं होता। पर प्रम पार सदभावना मे एसा होता है-दोनो को सम्ताप मिमता, भाई माई में मया है। एक भाई प्रेम म दूसरे भाई को कहा कि मा कृष तुम ते मो। मुझे कुछ नहीं मेना है, मैं घर छोकर पमा पारगा। नो क्या माह सम्भर है दूसरा भाई उमे ऐमा परने देगा। कभी मरन देगा। यह प्रम और समावना का प्रमार है। माय बिसरे पक्ष में उम पान का बह परिमारी पार पर मैं म्याम मे प्रम मोर मद्भावना की कीमत ज्यादा प्पस्वियों से मिलकर समान बनता है, इसलिए मनुष्य की उन्नति और अवनति ममार की उम्नदि तपा प्रमति है। वा गिम बात का भूमकर बम ममारकी सेना कापौर उम्मति पारिचार रखते है हवा में उपपित की तरह ममाग भी कृघ निपर्मों के प्रपौन रहकर ही अपनी उन्नति और विसरता र सम्मानपत मिपर्मों और प्रशामियों का भी प्रयास मनुप्य न समान पर पाया है। परन्तु माथि नियम पार प्रगामी गिरी हो और मस्ति पम्प हाँ तो भागको मुबार कर पन्या परिणाम मा ममता है। इसके विपरीत पर प्यक्ति विमा हपाहापौर निपम प्रपाती प्राधी तो उससे अदा परिणाम निकलना महमा काटिन होता है। निमम और प्रणाती का प्रणेता भी तो पादिर व्यक्तिरे। पर यति तप से प्रपान " ऐसा होप भी प्रतिभा पीपन समारको मपित म हो नो फिर अमरा पक्विर बांध में मिरमा हो जाता है। प्रमुगुबग-मान्दोमन गो बार महान् परेप है उनसे देवन म निप्पण मप्रतकी पोर हो जाता है कि पति का परम सीमा तक पहुंचाकर ससफो समान पा समष्टि को पपित करने का पूरा पापामन है । यह पाम्वोमन नन महापुप्पो के वाय प्रचलित हुमा है शिमला मम्प्रराम एक तरह से निवृति का हानी है । माधुनिक पुर में प्राचार्य तुलसी न समारमं पहले पति हिनि निवृत्तिमारी मुनि पार सन्चो की मन-म्याग पी धर्म की प्रवृत्ति में माने का सन्तप्रयत्न किया है। मरी समझ निवृत्ति को स्तन वस्तु ही यह प्रकृषि की पूएकमात्र है । सनि । बीबम का धर्म है। निवृत्ति की भावना प्रवृत्ति करनी पाहिए, यह उसका है। बम प्रवृत्ति सेकासारी पोर सम्पन्न बन ती है और वन निवृत्ति प्रकर्मम्म र मानसी हो गयी है। वनवा पर पोर मापकारस्पा म उस समय तक रिया मा समता सम्पत्ति रसके परे पर्मान मिटम हो पाता है। समिति की मावना से प्रति सो भी सान म्यामाणिक प म गेप ए पाती है। वैदिक धर्म में विसको बीचम-मुनिम या बिस्वा बह पाममा पो स्पिति है। पाराम पम्पापुम्ब प्रति पौर यह भी पाशतर भवानी मानला गागो।। मनुष्य मार्ग के पीप इतना प्रत्या हो मग स्मार-सिदि मा भी मी माप उम नही सूमना। एम प य क्मा की प्रवृत्तिमा माती पर पार स्नेह, रमा सहयोग गान्ति की भावनाएं उसके पास पाती है। इस बीमारी को प्राचार्य पीतुनती ने पची सरह समम निया। पोर उसको दूर करण का पी उपाप मोरे पौधा समें प्रयुपत-पायोसन एक मुम्म उपाय है। यह सीरम परिवर्तन करन का प्रपल है। बीवन गरिपतन के लिए रिचार-रिन पाया है। जिन्हों। प्राचार्य पी तुलसी प्रथम मुन पा मान है कि पाना तुमही मिर-रिको गाकर मार पापन-परिवर्तन ला पासे अपरम्पासित पौर मारेपन पर नहीं। बपि पे रोनों रम गो पाम भरपूर है। यह गरी पापरतिको पिना। शिवारात में जीवतिय पोहा रहुल प्रपने पाया जाता है। परनुमायापी तभी एकरवाई परजीपणमाकायाम भी रोमामा रित

प्रमुबक माभूमि में एक बार मौत
बाय । विचार और मावना के परिवर्तन की सफलता र सार्थकता पीसन-परि
बर्तन में है।
में प्रणुपत-पान्दोमन को इस महान् परिवर्तन का एक मा साधम मानता
पौर मुझे विश्वास है कि प्राचार्य मी तुमसी जैसे महान् पक्ति का परिणम
मको सफम बनाए बिना न ऐगा।

यह हसाहस कौन पियेगा? -पी विष्णुप्रमापर पार संसार में एक विषिष मात देखने में माती है। हम पुपम्पों के गिस रेखामुर सपाम की बर्मा मुमते थे बह प्रान प्रत्यम विनाईहा है। एक मोर मनुप्य विज्ञान की प्रगति के नाम पर विनाशकारी यनों की बोर में पागम हो पा है इमरी पार नही मानब उनसे प्राण पाने के उपाय मोचने में परयापम मे कम वा इनका उपयोग अपने कास्पानिए परना बाहवा है विनाश के लिए नहीं। एक माप पणा पार सहयोप + मार्ग पर बमता हमा मानव मारगेमा पया। वैसे अनन्न गपित कीबोर में यह पमान होकर पान्ति की पुकार लगाया है। देवामुर-मनाम म गा म्पिति पर की पर सायर मे लाइन का सम्म मा पा रही स्पिति मार रिसाईली है । अमृत की मोर में म उमो हाप में हमाहत ही पा पया। इस मा इसके पनि-राहम परापरपस्त। मेकिन पकर का बड़ी पता नहीं मग पायाने पिम दिन रम नौमाठ का पय होगा और समी पासम्म मानवता माण पा सोपी और तभी अमृत का सरप हामा उमते पहमे नहीं। पारा मान स्थिति को मममता म हो सी बात नहीं बल्कि ऐसा मासूम हाता है कि प्रारा प्रत्येक प्राणी इस स्थिति को मममहापौर कर की योर में पागम है। मेरिन पुस-युप में अन्तर होता है। देवानर संग्राम के समय पर प्रारपीमा की रपार सने म समर्ष मोरे पिन पार मोहनाहन। यह किमी एक करकेप का नहीं । उमके मिरा सौगर की गति सनम को पाने भीतर प्राणपरनी होगी । हुन म २१ पाइलाइन कौन पिमैगा? मनीपो इस तथ्य को समझ पे है और अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार प्रपल में भी भगे है। पार इस सान्ति पार पक्षान्ति के संपर्ष के नीचे एक भार संभ है।पह इम्से ममग हो यह बात नहीं पति इसीका परिणाम है। वह है-पापार का संघर्ष । हमें ऐसा नमता है कि वो समाज में रहता है। उसका मुख्य ध्येय मपनी सेवा करना नहीं बलि समाष की सेवा करना । समाजकी सेवा में से उसकी अपनी सेना है। मापपण ही तो नर पर्षात् मानक के पदर पो है। उनकी सेवा करने के लिए मनुष्य की सेवा प्रावश्यक मोर मनुष्य की देवा के लिए स्मार्प का स्याम परम प्रामस्या है। इस एक बात को समझ मेने पर दुराचार पोर प्रप्टाचार का कही प्रश्न ही नहीं पता। मेनिया पात पितनी सरलता से कही गई,श्या पास्तव में उतनी सरम ? मिनोगा भाष पक्तिपत मिपित की भावना को समाप्त करने के लिए मान पाम्दोलन का संचालन कर दे। मानते है कि भूमि की पिरिपत्र मियने पे काम पूरा नहीं होता, कारणाने और मकानों की मिलकियत भी समाप्त होनी चाहिए। हम तो यह कहेंगे कि मिरास एक भावना की मिनस्पित ही समाप्त होनी चाहिए। समान में ऐसे परिवर्तन लाने के लिए कई मार्ग है। एक माई दिनोबारा --में परिवर्तन लाना चाहता है। प्रथम हरप-परिबर्तम, फिर मोदन-परिपतन और कार में समान में परिवर्तन माना जाता है। इस तरह से गिरिप परिमन, हिरा सार मेरे मन में है। इसीसे मिमता-चुनता एक मार्ग प्राचार्म पी तुलसी का भी समान में परिवतन मामा बाले-पणुवतारा प्रशुवत या है ? परमाणु बम के पौर पन्य निम पम्द्रमा पुग में उनका मूल्य क्या है 1 मफिन उनका कहना है कि पति पनि प्रविमा कर सेवा है कि यह सियत मही मेगा सा पूसरे के सान ऐसे काम नहीं करेसा को समाप को हानि पहुंचाने वाने! तो निसन्देह समार को प्रगति पप पर पाये से पाएमा।हमारा मिजार पनही उपयोगिता पार पनुपयोगिता पर फारा देने पर मना नहीं है जितना म बात को 1 कीमोर २८ ममझने का कि वास्तव म क्या काम इतना मासान है जितना हम समझते हैं। इसकी पोपमा रही प्रासपास ही है। पहरी होकर समाज के अन्तसस्पी पावाल में तो नही उतर नासपता ऐसा है दिपकहीं पौराया मनुष्य मान दुराचारी हो गया है। यह मुल पाहता है ! सुरिया और सुरक्षा पाहता है और उसी के प्रयल में बह दूसरों को सोता है पर इसरों पर माम्मरप करता है । सब ऐसा ही है और परिणाम यह होता है कि चारों पोर पुल पर पारमण ही रिवाई रेता है। शान्ति की पुकार केवल हवा में ए बाती है। पुरबार या किसी भी संघर्ष के बाद मनुष्य मापरसहीन क्यों हो जाता है? पाकभी हमने सोचा किया सब इसमिए होता है कि उसका अपने में विश्वास नहीं पता। अपने में विकास न रहने का पर्व है कि मानवता में रिस्मास लो बैठता है । एक पटना मुझे. या प्राती है। युट बार एक बहुत यो मधिकारी मन्दन गए । हाईकमिश्नरपवर में उनसे मिलने परे। मामिहावा है पहोंने पपना कोट और टोप उतारकर बाहरी टॉम रिपा। उमौ ममम अन्दर से एक सम्बन पाये थे। प्रेर। गोंने उस भारतीय भाई से कहा कि भाप में पामे जैसी स्थिति मही एप।। पाप अपना कोट प्रपन साथ मदर मे पाय । पायर कोई उठाकर लगाए। पर उस मालम की बात है यहां की मामारी पहावत बनकर ही। मेति यह स्वाभाविक ही है। पुरा परिस्थिति में मनुष्य को पा र रन पर पिन कर दिया जो बह करमा नहीं हमारे सभी मित मौर प्रष्टाचार का जो इतना पोरबह श्या इसलिए है कि ऐसा पाना मनुष्य का समाव । क्या यह इसलिए नही है कि मनुप्पोमा परने के लिए परिस्पितियों द्वारा मगर र रिवा पया। हमायसिनाम है मिनुप्प ऐना नहीं पाता। हमाराम परिसित देव Iमरी मालि स्थिति मोम है। एक मम्मे वर्ष के बार उसने रचनयता ग! और पपेमारत मर्यात् रसलीन मानि होने पर भी परे २६ पद हलाहम कौन पियेपा ? काम नमकर राम देखने परे है। इन सब कारणों से यह बीवन की पह गुम देख है। यदि हम रसे फिरसे अपने पापको पा मेने में मदद करना चाहते 1ो हमें पा पर चोर करनी होगी। हमें एस पोर हो उसकी मौलिक पारस्यमयामों की प्रति साबम उपमान कराने होपे दूसरी पोर उसे अपनी माध्यारिमा सक्ति की मार मी रिसानी होगी। यह सुभ मरण है कि हमारे देश में दोनों भोर से प्रयत्न हो रहा है। भारत सरकार अनेक उपोगों से भारत की प्राषिक स्पिति को सूर करने का प्रयल कर रही है। मोदी के प्रयल प्रमी घोटे ममते हों लेकिन उनका परिणाम मगर महा होने माना है। उसी के साथ एक दूसरा प्रयत्न मी हमारे रेख में हो पा है। यह हमारे सान्तों द्वारा। विनोबा उनमें एक है भाचार्य हुनसी उनमें दूसरे । भाचार्य तुलसी मनुष्य को याद दिलाने में प्रपस्मश्रीत है उसकी पाप्यारिमा परम्परा पया है और उसके पास पितमी धपित है? उसे न शक्ति को मना नहीं है। प्रमोममों से बचने के लिए प्रतिमा करवाते पार इन प्रविज्ञापों का नाम है, अणुपत । बहुत से लोगों का इस प्रणाली से मतभेद हो सकता है लेकिन इसमें कोई सन्य नहीं कि प्रसुवत पान्दोमन एक ऐषा पानोसन है, जिसमें असीम सक्ति नरी हुई है पौर देस की प्रायोगिक पौर शामिक प्रमति के साथ-साथ उसका होना पापप्त्यक है। ऐसे पान्दोमनों के प्रमाण में विज्ञान शिव को मष्ट कर देया । रिझान में यति है, विधा नहीं । पिसा के लिए पास्म-धान पावरफा है। मेफिन कमी-कभी मन में एक धन्वा उत्पन्न होता है कि पया धाप के समान में उन मश्तियाँको, भो भविष्य में प्रप्टाचार से बचने की प्रतिक्षा मेते प्रप्टापारीन मान मिया पाएगा। हमारे सामने एक उदाहरण है। स्वक्यता प्राप्ति क बार एक प्रतिक मन में महभावना उत्पन्न हुई कि अब सारेण स्पन्न हो गया है पब से सिम नहीं मनी पाहिए । नबन मपनी प्रतिमा की अपने अफसरों को भी सूचना रे। यही नहीं उसने यह भी बताया कि किस तर से सरकार का सपा म बावा या है और किस तरह से रसके विनाम के परिकारी रिश्वत मेते और उसने भी मिमग . मोर होकर एक मार रिणत मी दी। मषिकारियों ने रसकी किसी भी सम्बकी पोर प्यान नही पिया बस एक बात पती कि मने हो एक गर सही सपने पिरत सोनी पार इसी बात पर उसको मस्ति कर दिया मना । कानूनी रटि से मा सब ठीक ही हपा हो मेशिन व संधर में क्या इसी पिके सहारे पता रासदेवा या पापा कालसी तय मुगतना होगा। मुझे प्रविट सो पपन्यासकार रास्तोकी के एक पान का बाप मार पाण-मन अपने पोरन में एक ही पाप किया है कि मैंने अपने पाप म्वीकार कर लिए है। क्या भारत में इसी तप के व्यक्तियों की गिनती बहानी होगी। मनी पिक्षसे दिलों 'मिती माफ मैन को फोटो अपनी पमेरिका की ओर से हमी, उसमें बहुत सुन्दर बाप थे। पर के लिए किसी में बहुत ही मुगर मिला था। उसका पर्व पाकिहमें ऐसे पावापीयों की भारतको न्याय करने माने किन हमे म्यामी हो कि मनुष्य भी कमजोरियों को ही भूम बारें । पाय पाचन को पा से समझ मेना। म्याप पापा नहीं होता उसका रेप अनुप्प को मारना है। अनी हम प्रयोग की प्रस्पा में समिए निरषय से यो उपमहापा पास मेनियर पान्दोमन मनुष्य बोए हुए प्रात्मा को पना मोमिममह बहुत ही भीम पर हमारा मारिपाटि से भी विकसित दो जापपा रहम एक सुषणसमें विपत्तिार में अपना स्वाम प्रण कर सकेंपे। हम यह पान-मार करने और मिमिए कहते है। शिरपपिकाप रेगों में एक मौलिक हो मनुर को उनत करने का जस प्रपल कर पी सेधित पहल पपूरी को पूर्ण करने पामी परित पाम्पारिमा मौर मह भौमाप मारतोरी प्राप्त इस पश्चि कोमोन निकालने में पापा मिनोग पार पापा तुमीमारेषा कर। पषत पान्दोलन का एक और नाम पारमा माग सुम्पर। पास ती नवम में ही एक मारे पास मनिस पान्दोलन मेरा पता पीर पापामापीठोमा मुमधर्म की सीमापाको माग मह इलाइन फोन पिमेमा ? पर भारत के दूसरे पोलिसिस मुसलमान ईसाई प्रादि के बहुत पाठ मा गए है । प्रत्येक क्षेत्र में उनके प्रनुमामी है। यह ग सुम सक्स है मार भारत की परम्परा बसुन मुटुम्बकम्' का समन्त प्रमाण है। ममे ही इन मा माों का तुरस्त परिणाम म निको मेकिन यह इमारी परम्परा को बीमित रतन बानी है।

अणुव्रत मम और कम का समम्वय ----पीपीपीमाचप्रमा मम्मत, बन सम्पर्क समिति रिस्ती मसार की बात-सी ममस्याएं धर्म पार कम को प्रमम-प्रतम सममाने त पैरा हुई है। पान हम बते है कि मदिरा पौर मस्त्रियों में मामी भी मार रहती है परन्तु हमारे सामूहिर बीवम पर इसका कोई प्रभाव मही पावा। पूजा करती या भगवान् से अपने पार्कों के लिए भमा याचना करती परन्तु मदिरों मे नियनपर या समम मिपा कि भगवान की बात तो भपवान् के साप मार दुनिया की बात पुनिया साप । इसी भूत के कारण पर्म बदनाम हो हाहै। सजे धर्म का दम्बत्व हो हमारे सारे जीवन ताप है। मवान् मन्दिर में भी देखते मार दुकान पर मी। बस इतनी-सी बातबिसे मममम पीर पीवन में धारण करने की मावस्यकता है। अयुबव-पान्दोमन हमारे दैनिक पीवन से सम्पन्न रखता है। हमें पार गार यह मार रिनाता है कि हमें प्रदरखने की बड़ी पास है। मैं मानता हरिइसके निपम कटिन है परन्तु पठिन तो ऐसी मारी बातें होती ही। पदि एक साधारण-सी पास मप जाए तो उसे निकासमे में भी होता फिर पर पर रिकार भरा हो तो उसे निकालने में तो कठिमाईमपश्यही होपी। परन्तु ऐमे पार भी हमारे रंग में बो इम बेहना को सापाते। मोममहते कि हमारे चारों तरफोमानी मैकमा रम पार एन-कपर पप्परहार है तो हम इनसे हेवी इमरा सोपा-मा उत्तर यह हैरियर पनि मने पारा मनुष्य में पाती है। बिना पही १२ प्रपत्रा:पम प्रौरकममा समन्वय हो सस्वा मार इसी प्रकार धर्म के बिना कम नहीं हो सकता। कर्म का मूमा पारधर्म है पौरपर्म का पोतकर्म । पामा पार समझ मेने की है कि प्रारम्भ में चिनी ठिनाई होती है उखनी पम्पस्त होने के पश्चात् महीं रहती। प्रकृति का या सापारण नियम है हिपभ्यास के साप-साप सहनशीलता बहती पाती है। इसलिए पहली मंजिस पर पो कठिनाइयो की गम्भीर होती है प्रामे बसकर साधारण रह पाती है। यह बात पर तक पहुंचती है। प्रपन यह उठता है कि मुल और पानन्द । कहाँ ? यदि यह मा पस्तुओं में है तब तो किसी प्रकार इन बाप बस्तुर्मों को प्राप्त कर मेमा ही प्पेय हो सकता है परन्तु यदि उसका स्थान मनुष्य के बस में है तो फिर बास बस्तुयों के पीप दौडमा पोर मन केन प्रकारेण उन्हें प्राप्त करने का साहस परना बीपन का मय नहीं रह पाता । युवत- प्रागोमन मनुष्य को जीवन का पचा नम बताता है। मदि हम अपनी माकोनाएं सीमित र वो हमारा पीयन निममग्र सकता है और हम 'मा मम कस्पस्सिरनम् के पुनीत पार पर बम सकते है पौर परि अपनी बासनामों को तुमी टरे दी गाए तो फिर हमें दूसरों के अधिकार पर परस्प मापा मारना पड़ेगा। अपनी वासमाएं पटापो पीवन को नियम बनामो, दूसरों के परिकारों का विचार रखो इन गातों में प्रयुक्त पान्दोमन के भून सिमान्त पा पाते हैं। साम्पसार यो ध मार-काट केरा प्रषवा तानाशाही पग्य केरला पाहता है मणुवत-पादोमन उस कार्य की पूर्ति मनुष्य की स्पेश्या से पाहता है। साम्परार रमपमों को बनाने में रेप या समारकी उन्नति मामा पहा हमारी सभ्यता से उसमा फराब सप्ट हो जाता है। मोम की भूत करणे पो हाम्ममात्र के सिमान्तों को तो रेखते हैं, परन्तु सानों को नहीं लवे । सापनों को सिरान्तों से पृषक नहीं किया जा सकवा। यही कारण है कि पणुनव-मानोलन में साबों पर भी उतना ही बस दिमा पया मितना कि मिसातों पर। मार्थ सपा की स्पापना प्रारम-संपमाप ही हो सकती है ।मणुपत मनुव्रत को और में इसका सन्देश है। हमको गौ हमारी भारतीय सभ्यता में हैं। यो काम रागनीतिक दलों से नहीं हो सकता यह भूरान पौर प्रणुमत से भावोमनों है हो सकता है। पिरितोकिइम मियों पर पमने पामे बतमान अवस्था में दो पोरे ही मनुष्य हा समते, परन्तु वातावरण पर्पोज्यों सभ्य होता जाएगा यो यो प्रश्नपारिपापी मठिनाइया कम होती गाएंगी। भविष्य मन्पकार मर नहीं। यह मेरा मिषय है। मैं मानता कि धर्म और कर्म के बीच मो एक चाईबन गईरो गाएपी और एक दिन यह शिवाय मनुप्य पातिकाय स्प में परिणत कोगी कि जो पम है ही है।पम का विरोध साम्पबार मे गिम भूस म किया है पर उसी वर्तमान विकत परस्पा है। परात-पाग्दोलनमा भानामनाम भूम पवार ही नही बरल बह उसे र भी कर सपता है।

राष्ट्र वन्लयनमें भगुव्रत का योग -पोषण धिामकार सम्पारक, सम्परा किसी देश की उम्नति के लिए यह मावस्यक है कि उसकी पतुमुनी उन्नति हो । म किसी रेस ने रामनतिक स्वामीनता मार उन्नति के लिए प्रयत्न किया है तम करम एक रिपा में ही प्रपल नही हुमा है। पिपानी मे पर सावनय-मुख प्रारम्भ किया उससे पहले समर्थ रामदास अपनी सरोमक पापी में जनता म सामाजिक मीर सास्कृतिकवाति का प्रचार प्रारम्भ कर एके पे। पंसार में सिक्यों में राजनैतिक सम्परवान से पहले उनके पुर अमृतमयी किन्तु प्रमावमाती पाणी में पार्मिक सांसति पीर सामाजिक जाति का मूनमान बनवा के हाय तक पहुंचा पुके थे । नदौन भारत के स्वावगम्य मागमन से पूष रामा राममोहन राय और अपि पाना सामायिक मौर सांसविक पेतना सम्न कर केप। टी के पुननिर्माण के समय छमासमवातुई रानतिक पक्ति प्रहण कसे ही सामाजिक और सास्तविक मावना में उत्साहपूर्वक मग ममा । पफमानिस्तान या माय मुस्लिम देणे की पाइति बम राजनैतिक गापूति तक सीमित न पी सामाणिपुरीतियों का निवारण पौर विखा-प्रसार भी उसके निक्षेप प्रग रहे । सारोच यह है कि किसी च की उन्नति के लिए बस एक दोष में एकोपी उन्नति बहुत सफल नही होगी। सभी दोनों में सामीण सम्नति मापायक होती है। माना प्रारमा के प्रसास की परि उपेक्षा करपी बाए तो यह उम्नति स्वामी मही पसाठी। पापीनवा प्राप्ति के बार मारत को गिन पम्भीर समस्यायों का सामना करमा पाने पर प्रकार की नी । देव के नेवाओं में प्रत्यात पै और साहस प्रपती और समका समापान को प्रमान किया। परसाबिरों का पुनर्गम, मान- संघट का निवारण प्रोपोषिक प्रारपरका पा पिभिन्न मौतिक प्रमाणे की पूर्ति के लिए समस्त देय पंचम व पोरनार्यों के नाम से प्रपालपीन हो उठा। ल र प्रवृत्तियो का परिक्षाम भी सम्वोपमा प्रष्ट हो रहा है। इसकी समान ताएं सनी प्रत्याशिनका रस्मेयरमे प्रायया नहीं। परपुर सफलतामों के होने इए भी रेस के नेता पौर विचारक या पनुषाकरहे। कि हमारी गति और भीर हो सस्तीपी परि हमारे तिक सांसतिक पौर घासारिक परिवारात पाहावापाठी विपि प्रौर रोप का पापराया है रेमो र सापों का विकास हो पयापार रणीय पाप मापी है कि इस साल-माप विपरित का विकास नहीं हो पा है। हमारा पीय पति परिवारों को धम्पति में पिता मा पा है। सामु वापिकमोवनापों और सामाजिक विकासकायों में जिस सम्बत परिपकी पोआ है, उसकी नागरिकों में कमी है।एर पग्य सोमम्मी ने इन पत्तियों मक कहापालिम तो सपोनों पीपकरण की ममता की परपना पाइ परिवार पर सरकारी कर्मचारियों पर नारिको कामतिक परिव ऊंचार होना उनमें ईमानरीकी भावना पैशन होती, पराग्योग सन नहीं हो पन्द्र पार भार हमाति मष्टि से मनातार कमबोर होलीमा दी है। उौरे पाप पोरना मरे धमों में मुझे फिर पहा मावि स्वाधीनता मारा करने के बार हमारी प्टिही राम म।पैसा ही पार हमारा एकमात्र माय हो पपा है नवा मोर माया- मिता का पान नीतिगार मे पाहै। उपम सारली पार पार हमने पूर होना है। मनही तामाषिक मोरनामों परमात परिक बात माण हमारी मह इष्टिमाती है पपरा पूरोपोप दिमा-पीया पोरयमानमेवा स्वाधीनता प्राप्तिरबारसस्पिटाविसमा परगयामों की पूर्ति में पटने तषित हो पए सामाधि पर स्तर आले की मोर गई समय मिना पार पापा सामान पा।

राप-वामपन में प्रमुखतों का योप मी जयप्रकागानारायस के सम्मों में 'जीवन-स्तर को उन्नत करने की राक्षसा मारना ने हमें ना अभिमुट कर लिया कि हम मैटिक और मसिहतिक रन्नति को सुस गए। समति के नाम से पार विस कमा ममीत पार माय को प्रपामता दी पा रही है ग मैतिक बरातन को जमा करने के बजाय घायर मिरा ही ही है। ऐसे समय पाचार्य मी तुमसी का मरम्मत-पान्दोसन पाशा की एक नई पिरस के सम में हमारे सामने पाया है। प्राचार्य पी तुलसी के अणुव्रत-मान्दोसनका फिमी सम्प्रशय या धर्म विशेष से सम्मन्य महाँ है ।का सम्बन्ध तो मानव-वर्म में है। यह पान्दोलन पहा एक मागरिक व्यक्तिगत जीवन को बचा करता है वह परिवारिक सामा निक और राष्ट्रीय परिण कागत पेपरातल पर मे गाने माना है। इस भरपुवत-प्रान्दोमन का मध्य बावि बर्स देग और मम्प्रदाय का मेर भाव म रसठे हुए मनुष्य मात्रको मारम-संयम की पोर प्रवृत्त करना है। पाचार्य पी तुलसी के पर्दो में 'पशुपत-पायोमन जीवन की प्राम्पारिमा और मैतिक सिंचाई के लिए पोरना है। इसका सम सामायिक पार गमनैतिक उन्नति से प्राधिक म्यापक। यह माम्यात्मिक उन्नति है परन्तु रगती यह पापा मिक सम्नति समार से देणग्य नहीं सिखाती । यह तो माटोमुखी रानति है। इसमें अपना हित य इसरों का हिव भी सम्मिलित है। विभिन्न प्ररगुपन रेप केमिम्न-मिन मेनों में कार्य करने वाले मागरिकों पारिमा और नैतिक पीरन कोही पानहीं करने के प्रपने भाषिका कार्य को भी एमे म्यारिफ पौर उपयोगी निरंपरेतेबिनमे समस्त णान वम विक पपतन लंबा होता है, किन्तु मागरिक को समस्त के लिए भपिक उपयोगी पपिक समर्प और पति पासवान् बना देते है। एक मापारण मागरिक के लिए निरपराण प्राणी की संकसूर्वक हिंसा मरने प्रारमहरया न करने पर पान न करने समपारी चीरन प्यतीत करणे उपयाम करने और पाम म साने मारित नहीं कि रम्नवि कारकहाँ विमी को प्रस्प प न मानने, किसी भी हिमाम दस में सम्मिसितम होने और पपीनस्प कमवारी या मगार मे भारीगाम मेने व्यापार में ममतोममरने नाममागीन करने 4- ३३ प्रचुपक्षीमोर मिप्या पिशापन न करने पर स्वाब पोम पाषषयको समाचार या टिप्पणी प्रभापित करने चोरवागारी या बिना टिकट रेनयामा न करने पर किसी महारारिसबीर मिसावट न करमे पारि केबीसियों व सामानिक पौर णीम टि से अपराब वृत्ति को कम करने में सहायक होंग । सपाई निषाद प्रमेय में कोई ठहरा करने पर मादि परमन भाप मेने पुपा पण पोड़ने एक पत्नी के होते हुए मप मियाम करने पपीमनगारम करन पापित हमारे समारोपापा बनाम पार पोपित माग बार की स्पारना के लिए दुप प्रत बहुत महत्वपूर्ण है। प्रतिवर्ष सौ पर से पधिपगम मेमे सरकारीहरीरीनकरने पम्म ठाण मिपतरों से पपिक प्यार न मने पौर मनाहीत पूजी दौर पर एक बात से अधिक पए न रणने के प्रवासी उहपत है। इन तिषित तो स यह स्पष्ट हो पाता है कि भरपुरत-पान्दोमन कितना पाप कितना उपयोगी है और पण के सभी पदापौर परिणयों को मि तप प्रभावित कर सकता है। पार के मौरिकादी पुप में प्रय माप उलठि की और में मन्य देशों पारसारमा पाहता है यह पावरहिम प्रांगीण उन्नति पापारभूत पूममा नतिए भौर सामाजिक परिणी उपेसा महीपर। इस गोगा रहम को मौवि सम्मति करगे यह पाचमी मोर पौरपरपापी रोपी। सरप परिष पार एमव पिार से पुरत नापरिकही किसी देशको स्वम्प पर समानु माद है । प्राणु-मागोमन के विभिन्न प्रम सी विणा में परम महापापिय हो । सामानि और मनिपेतना के विमा योम मारमा गतिही इमाएगीसमर प्रहको सम्मत निए प्रणुपत परम मावश्यात. रामापा गमो में 'पार मारा पीबारमा सौगामा है पामगारापान है। पापागोमन हमें पारप बस की पोर मे पाएगा।

नव निर्माण पोर मैतिकता -भी रामजान पर्मा बनसम्पर्क प्रपिफारी विस्मी प्रशासन स्पा मारत के नव निर्माण में ये समी मामन प्रयोग में साए मा गह। यो वर्तमान शानिए युग में हमें प्राप्त है। देश भर में समृद्धि के लिए प्रावस्यकतानुसार पोटी-बड़ी योजनाए थम रही।।कुन भिमार हम मौतिक प्रगति की भोर मा ऐ है । यह कहा था सकता है कि अमर कोई मामस्मिक विपत्ति म मा पड़े तो दस वर्ष में देश की काया पमट पाएगी। शिक्षा स्वासप्प पानी, बिजनी मकान नीपिका इस्पारि जीवन की सभी मुस्म सुविधाएं मिसी मणि पंध में पन नामरिकों को मिह पापी । यह पाकर भी पा हमें वह बहुमूल्य बस्तु प्राप्त हो सकेगी बिसे मम या प्रारमा का सन्तोप कहते हैं। अपर से देखने में ऐसा मासूम होता है कि यह मन कोई पानिक मान पौर इसका सम्बन्ध मर्म या पम्यात्मबाद से है। वास्तव में ऐसा नहीं है। मामतौर से हम धर्म और दर्शन को अपने प्रतिदिन के बीवन मे पुष्प प्रमग मानते है। अगर हमारी यह धारणा वा मानमी पाए पो पो प्रश्न मन कर उप्रपा है उसका धर्म क्या प्रमारमवार से सम्पप नहीं रहता पौर यदि यह माना जाए जमारि मेरी राप में मानना चाहिए किधर्म और दधन हमारे प्रतिषिन के पोषण प्रभाह मे को पसग बस्तु नहीं है वो मुझे यह कहने में कोई सरोष नही कि यह प्र म नि सन्देह हमारे धर्म से सम्मपित है। किन्तु धर्म का प्रम मनहब या मम्प्रदाय नहीं। हमें धर्म का मोतिक प्रर्प समझना होगा और यह प्यपरायणता । कर्म परमे के लिए पूछ परस्पा प्रनुमत की भोर पौर मर्यादा मावस्यक है। यही परस्पा मोर मारा हर समाप का पापार होती है। सब तो यासि मानब समाव का यही प्रापार है। इस व्यवस्मा पार मारा पीधे रो तरह की सक्ति होती है। एक राम्य का निमम मार विवान दूसरी मतिमता । राम्य का नियम मार विधान भी रेप, कात पार समार के अनुरूम बनाया जाता है और नैतिकता पर भी मानारित होता है किन्तु कमी पौर कहीं इसका अपवाद भी हो सकता है। किताबी समयानुसार परमवी-परमती एती है किन्तु नैतिकतार मून मिसान्त कभी नहीं बरसता। पया संसार में कभी कोई ऐसा समय मा सकेगा बर मानव समार में सस्य महिसा प्रेम सेवा स्याम और तपस्या का मूस्य महे' या तो हो समता और हो रहा है कि मानवता के इन सिमान्तों का मूल्य तुप मोनों की प्टि में परता-वाताए। या मी हो ममतापौर हो पा कि गगों के जीवन में इन सिताम्तों का या मंतिकता का प्रभाव हो पाए, किन्तु इनका मूम्म कम नहीं हो सकता।बोकि रोपनी तो सरा रोपनी ही ऐसी। बह पर नही बन सकती। रोमनी का भयावही ती पवेरा होता है। अब प्रश्न यह है कि मतिपता का हमारे प्रतिदिम जीवन से पया सम्बन्ध है ! इसका उत्तर मन ही स्पष्ट है। हमारे पावन मौर काया कोई भी घेत हो पर, पार, बाजार, बेत कारलाना इत्पारिहर महहमत मासा की पातीकिन किसी न किसी प्रकार नियमवर होकर मुबार स से काम करें। मानरारी दले। किसी को पानामार हानि म पीपा । स्वार्थ सिविनरें बस्ति इमरों पी महायता पौर मेगा रें। हमी को मरपिचार पौर मरापार पहते है और यही नैतिकता है। मारे समान मा राष्ट्र के प्रांग में मंदिरतापी पायायाता पौर मीमा पाती है। पालिकामा मेष निवना गया होगा रमी के अनुसार काम ले पाले में सामर्थ भी चाहिए और उतनी ही परिकारलता भी पारिए। यो क्षेत्र में काम करने पासा भून करे या मर्यादा मगरदो रसा परिणाम रस रोग में मम्बन्धित ममी के लिए निए एप होता है। नमी तो यह बात मिनों में ममारामृत ।

बर-निमासमार मैतिकता होता है, उन्हें हम नैतिकता की कसौटी पर सस्ती से परसते हैं। परन्तु हमें इस मूम में महीं एमा पाहिए कि वहां राममत्ता या पन सम्पन्नवा हो देवस बहीं मैतिकता की प्रापस्यकताया कि मसिम्ता यम माधु-सन्तों की सम्पत्ति है और बनसाधारण को मंतिकता का पालन करने की परख नहीं। परसत्ता समान के हित पौर कप्पास के लिए होती है मार पन-सक्ति भी वो इसीलिए मगर सब पामते है कि दोनों पक्तियों मनुष्य को मविकता से हटाने में सहायक होती है। इसमें मिमी का कोई दोप नहीं। इन परिवों का स्वभाव ही ऐसा है किन्तु हम सौभाग्य से मोफत पारमक राम्प पौर समाज में ए रहे। वही जनता को बनार्दन माना गया है। जनता माम है देश के मागरिकों के समापा। तो ऐसे समार में प्रत्येक नागरिक पर यह उत्तरदायित्व पा जाता है कि वह स्वय मतिमता पा पामन करे शेफि इसी हालत में पहरायकारपलाने गासों को ठीक मार्ग पर यम मिए पाप्य कर सकता है। रागनीति इस लेख का पिपप नहीं किन्तु वर्तमान युप में प्रौर वह भी सोक्तपारमक समाग में देश और समाज की बर्षा करने ममय राजनीतिको म पूना सम्भव नहीं। पहरी प्टि से रेखिए तो यमनीति भी हमारे जीवन का एक प्रावस्या पर बन पा है। मान नागरिकता का प्रपिकार पौर मोफतल में मत ही राजनैतिक धमित का पापार है। इसका यह प्रर्ष मतरातापों में दो गुण पौर प्रथमुरण होये प्राय यही गुण और प्रबण उनके प्रतिनिधियों में भी होपे। तो यह मानायक है मातामों यानी नागरिकों में अतिता का संचार हो। मैतिकता का प्रतिदिन के बीवन से सम्बन्ध सममने के लिए रोगमर्रा की समस्यापों पर प्टि राम मेना काफी है। पार हम यह माम शिकापत मुमठे है कि सरकारी पमचारी महनत पार ठेगी से काम नहीं करने । मरसारी महकमों में रिबत बनती है । म्यापारी वर्ग इमानगरी नहीं बनता। माने पीने की वस्तुपों में मिमाषट होती है। पाइयो तक मुर नहीं मिलती। मगर पर्म अपना काम पूरा नहीं करता। करवानेशर मगारों का प्रपिर गये है ४२ प्रमुख मोर और उनके हित का पूरा ध्यान नहीं रखते। विवाधियों पर प्रप्यापों में पिटनाका सम्बब नहीं रहा है। अनुशासन सब यह कमजोर हो रहा है इस्पादि । एदी सम दुपयों के फलस्वरूप पा मो पिकापत बस पका ही किएकता और राष्ट्रीयता की भावना मन्द पड़ती पा रही है। हम सब शिप्रयता पौर बुराइयों की बामें केवल एक ही बात है ना है मैतिकता की कमी याप्रमाद। चाहे पनिक परिष हा पाहे सामारिए या पीय परिष हो इसका पापार कबर नैतिकता है। राम पिए पो पर्म किसी सम्प्रराम ST माम नहीं। पम ऐमी लम्परपपलता का माम है जो मैतिकता पर भामारित हो। अमर हम सब पानी-अपनी पमह अपना काम नियमानुसार, मगन पौर परिपम से करें और परस्पर म्यवहार में शिष्टतात ईमानरारी से काम से और समाज की मयादा का पासन करें तो यही हमारी नैतिकता होगी। मानव ममार में धर्म को यम्प्रराय का रूप दे दिया है। इससिए संसार में विभिन्न धर्म और मत मतान्तर है 18 पारों मार मीनार सदय हो गया है जो एक दूसरे पहराता है। मेशिन मंतिकता सब धर्मों की जान है। इसमें मिमी पर्म या मम्प्राय कामरे से कोई काष मा0 1 इसमें एक पर का पूसरे राप स भी टकराप मही। मैतिकता पा पमार से दूर हो पौर रामार विमिम पंपों में मेसिकता का संचार हो न प्राना तर प्रासान नहीं। हम मपनी समस्यामास विनी समता सेलिमेपण कर मते है इतनी मुममता है उनका उपाय मई पर पानापारण यह हमारे मापन पर मौसमी भक्ति जितनी ठी है राप रग्नपी पक्ति रतनी देर नही । हमारे पवन पार कर्म मै गा मन्तर है। इस पनर मी पर मा पल पलामविस्ताको सविरेना है। नैपिता एमी वीर जिस प्रकार यम य नही अनुसरण से होना पाहिलातरे पागों में रही महामुमार प्रतिष्ठा प्रचार करन के पार मार रही यसपमर मी हो सरवाह मिले पीरन में विश्वा की प्रासम्म मात्र मोर नापीका में मिलाएर होती नब निर्माण और नैतिकता है। इसीलिए उनकी बात का पमिक मूस्य होता है। प्रणुवत-पन्दोमम पा नेतृत्व और सचामम करने मामे मुनियनों में से कुछ के सम्म में में पाया है। उनके त्याममय बीवन से पसा भी होती है और प्रेरणा भी मिमवी है । मैं उनका अनुकरण परले में प्रपन प्रापको मसमर्प पाता है।मायर हमारे समान में पकि सारे मानव समान में मेरे मैसे असमर्ष मोग ही पनिक है किन्तु मेरा विश्वास है कि प्रणुव्रत से हमें नैतिकता मा बो सन्वेग मिलता है उसे यथायोग्य ग्रहण करमा पार अपनी शक्ति के अनुसार प्रतिदिन के जीवन में पटाने का यन करना असम्भव या बहुत कटिन नहीं। हम पासमान तक तटन की पाक्ति नहीं रखते तो म सही इसका यह पर्ष तो नहीं कि हम ग प नियमकर मूमि + स्तर तक पहेपन का पस्न भी न करें। हमारे राष्ट्रका नव निमाण हमसे दूसरी रपनामा योगनामों के माम एक ऐसी योजना की भी मांग रहा है जिससे हम सबमें और हमारे समान में नैतिकता का संचार हो परना हम एमा समार पना नगे जिममें समृधि तो होगी सन्ताप पौर शान्ति नहीं।

भूवान पोर प्रणुव्रत
-पो परापालन
सम्पाव
बीवन साहित्य
पीठा में कहा गया कि इस संसार में वर-वार्म की हानि होती है,
कोई पर मारा है सरन्तर को कोई महापुस्प रत्पन्न होता है और धर्म
पिरोपी तत्तों को दररे इस 10 को मकर से मुक्त कर देता है। पुर
महावीर, ईमा पुहम्मद पारि पर पीकपन की पुष्टि करते है और मापी का
समारण पो हम लोगों के सामने एमाम तारा।
मनुष्य के प्रमरो प्रकार की प्रतियां होती है- और प्रसर । सर
पत्तियों के हाराहकोक हितकारी कार्य करता है, पसर के माप सोक-विपातक।
पर सतिया प्रषिक पक्तिवामिनी हो जाती तो ससार नमा रिसाई देने
ममता किन पत्तियां बोर पका पाती है वो या पुनिया न बन
पठली।
मते पुरेसा या पापनारि काम से बना पाया है पीर मामे भी चमता
हेपा।
मात पाप्यात्मिक रेप पा है। एक समय था जब यह अपने दोपों का
पन करणे गरजेप्रमाल रखा पाएसरों को रोपाइपने
स्पान पर रहता था-
बराबरौताकोय।

F भूपान पोर पपुपत बो रितमोगा मापता, मुमसा पुरा नकोय ॥ भनगा 'मो सम कौन हित तम कामी ? सेकिन पश्चिमी सभ्यता का प्रताप कहिये या युग के विपरीत प्रभाव की पहिमा पार मानर की प्टि पहिर्मुखी हो गई है। उसे दूसरों की माप का तित वार रिसाई देता है मौर मपने बड़े से बड़े होप को देखने का तो उसे मकार ही नहीं है । भौतिकवा में यह इतमा लिप्त हो गया है कि सम्पमापन सम्पन्गान और सम्पग् परिष को एकदम मूल गया है । यह पार्हकार, महत्वाकांक्षा की पूर्ति तपा प्रभाव के विस्तार के लिए दिन-भर भटमाता है पर या एक पी पादमी पपनी बाती पर एप पर मह सकता है कि उठे सी शान्ति और सम्मा सुब मिलता है ? राष्ट्रों की मालाकांक्षा के परिणामस्मरस हम से यहादुर और उनके प्राए मीपण मिस देव के हैं। पाप फिर तीसरे गुट के पापम मितिर पर मारावे रिबारे प्रारिमादि से पौरमा होकर प्रत्येक राष्ट्र प्रपनी मुरमा पौर विस्तार के लिए भर्यकर से भयंकर भस्मों का पारिफार भार निर्माण कर रहा है। भरणुबम पोर हागिन मम तो पोता माम पानी पाकिबक जितने सापन सेमरको सबवे राष्ट्र बीबमोग कर निकाल हे साए पाम्ति स्थापित करना चाहते हैं। प्रपुषम के फासप हिपिमा में हजारों निरीह परिवों का हनन होता है जो मा रहें इस बात का संयोप है कि उनके एक ही बम से दुनिया पास रही। पार हम सब एफ संकट मत से युगर ऐहो है, यह दुनिया भमाई पर टिकी है । भार पार दुनिया का मस्तित्व पारो भाममा पाहिए कि मलाई पमी का नाम ऐप नहीं हुई। पर पार हो वा पोर हिंशाका जीसथामा पिनाई रेता है, मनुष्य पार धमारमा पिसमाप्टिमोगर होता प्रयत की पौर है यह सब इस बात का पोता है कि मानम-समार और राष्ट्र की प्रसाद पृत्तियो मपिक बमबती हो उठी है। दुनिया पर पाये सर को दूर करने के लिए पनेक धातिवादी प्रयलशीम है। पार से तीन वर्ष पूर्व विष साम्तिमादियों का पानि निकेतन मार सेवा प्राम में सम्मेलन हुमाया। बहुत से देशों के पान्तिवारी व्यक्तियों मे उसमें माप मियाना। पहिरा कान्ति के लिए पर दो पर पौर रहे एक है 'भूदान पर जिसके प्रवर्तक पाचार्य विनोबा भावे ।। पार से जगमन रो वर्ष पूर्व उन्होंने इस प्राम्दोतन का मूत्रपात किमा पाम पान्दोलन र बहू मामूरा पाक्षिक एवं सामायिक विषमताओं को पूरपरके उन मूस्यों को स्थापित कला पाहते हैं, जिनसे यह विश्व एक टुम् की भांति जीवन-यापन करे। एक पक्ति का मुमपुर परे पक्ति का मुखएप बने को रिखी का पोपणन करे, सबको अपने विकास का समान प्ररसर पार यमान मुरिमा मिर्ने पार पमप्टि के हित में परिवरित सन्निहिवासक्षेप में विनोबानी इस परिसका शान्ति रेरा गापानी के 'रामराग्य' सण को मूतमा मा बाहवे ।। पा एम्यूम पर भूमि एका र पेपर तक मगमय १• हमार मीत पेपन पर दुपौर २२ साप एस पि हें मिन युकी है पर पना कहना है कि भूमि एकजकर मेने मान से मेरे पास पूतिनही हा पाती। मैं समानकापा हो परत देना चाहता है। पहया भी कहते है मिस्वापी परि बन दर होमा पर मानव अन्दर प्रारिमा यस पत्सान होगा। इसीसे वह प्रत्येक व्यक्ति से पाप करते है, अपने दोपों को खो पररम का प्रपल से पोर इस प्रकार पुर बनकर घमार पौर राष्ट्र की सेवा में दुरगामो। मरान पापी भूमिमा पौरखने में माविक मपटी मेदिन पहराई से देणे पो पता बनेका दिपीपल के प्रत्येक पंप पकti इमपरंपर परी' का रिपे भाचार्य तुमतीपणी के पारिपा । लिोगन पर मानि पापि पशुपन-मानीनन ममी रेसम्पानी नही मरान मोर सुरत बना है पानि उसकी बड़ी-बी सम्भावनाएं है। उसकी भूमिका निमुख पाप्यात्मिक है। पाणीवन की पावनता पर जोर देता है। तमकी प्टि में सारी गुणामों की गा मानव का प्रपना पकार, सिप्सा महत्वासमा पारस्परिक मेर भाग, या रेप पारि है। प्रा उमका प्रयल है कि मामय पपने पोपों को रेने पौर स्पेण्यापूर्वक उन्हें पूर करे । उसने गिस संघ की स्मापना की है उसका वार मानस-मात्र के मिए सोस दिया है । यो पीवन-सुपिके नियों का पामन करता है, यह उसका सवस्य बन सकता है भले ही यह किमी भी पाति पवना पम का प्रमुगामी हो। दूसरे मह किसी को भी पर-बार धोन्म की प्रेरणा महीं करता। वह कहता है कि तुम यहाँ भी हा पपग को दोप मुक्त बनाने का प्रयत्न करो। यो पा तुम्हारे हाप में है, से पुणों से बनामो। पशुपती संघ के प्रकर्व प्राचार्य तुमसी तपा उनके अनुपासी पा से विभिन्न मार्यों में परिभ्रमण करके इस माम्पोमन को मापक बनान का प्रयत्न कर भरगुबती सब के चार महान गाय है- १-जाति, वर्ष देश और धर्म का मेव-भाव न रखते हुए मानव-मात्र को सराचार की पोर प्राप्ट करना। २-मनुप्यों को पहिसा सरय पौर्य ब्रह्मचर्य और परिषद पारि तत्वों की उपासना का बती बनाना । -पाप्यारिमकता के प्रचारारा गृहस्प-बीवन के गतिक स्तरको रंगा करला। ४-पहिंसा के प्रचार साप विष-मंत्री रवि-सान्ति का प्रसार करना। गेश्य पुम पर पावरपाता इस बात की है कि उनका पामन विवेकपूबा किया पाए । हम गगनते नित्येक धर्म के मूम सिवान्त पम्पे होते, मेरिन कायाम्पर में मोग उनकी स्प्रिट को भूम पाते है और पारिस में उनका पानन करने मयते । परीर को यका मेते है, मारमा फूट पाती है। इसलिए हम करते कि या गपों की पूर्ति विषपूण होती पहनी चाहिए। एवं किन दोनों पादानों की भूमि पर हाल हुए भी रानों की

प्रभाव मेमोर
मृत मावनाएं एक है। इससे मी अपिल पानम की बात यह है कि दोनों के
प्रमको तो पाये महापुरुष है । इसमें पीया मे मामी है पिरों की
उठा है और दोनों ही कठोर पोरम के पम्पासी है।
हमे मिला है कि इन रोनों पान्दोमनों का स्वरलि-प्रतिदिन प्रपरता
गाएमा पौर नसोकहित होमा।

मास्म शुद्धि का मान्दोलन -मा. पामगार महापौर विस्ती पर निगम मनुष्यो के मन पोर पात्मा को पति करने वाले पप्पुषत-मान्दोधन के प्रमस्त म्यास्पाकार मुनि यी मपरायसी पार हमारे पौष पारे है। यह हमारे मिए प्रत्यन्त सौभाम्प की बात है। भारतवर्ष सरा से ही सन्तोष महास्माों की भूमि रहा है और यहाँ पर भौतिक मूयों की अपेक्षा पारंपारिमक मूपों का महत्व पविक या है। सोह पौर पपिरमास के इस पुप में नही मौतिक सूरियामों के लिए खेसार पामत वर्ष माय मी पान्ति पौरमत्रीका रास्ता रिखाने माता प्रकाप स्तम्भ सिर हो रहा है। पनी प्राप्यात्मिक सम्पति को पुर्षों से हमें विरासत में मिल रही है के कारण ही यह स्थान बन रहा है। दुर्भाम्प की बात यह है किसरे विश्व युर के पार हमारा मैतिक स्तर ममी तप से नीचे मिरखा बा रहा है। पर्ष-प्राप्ति की हो मे पापार-यमों में मनैतिकता को जन्म दिया है । मौविवार को मावस्मकता से पधिक प्रमय मिता है। किन्तु हमें यह मार रखना होगा कि भौतिक सुरिणामों की प्राप्ति हमारे जीवन का म्येप नहीं है। रोसव से पारिमा पान्ति कमी नहीं मिल मातो है।माभी मिल सकती है पकि हमारी पारमा में यह सम्बोर हो पाएमा किसने हमारे पतय्य का पालन मन्धी तप से कर लिया है। पिता महारमा गांधी मे हमें यह सिपापा कि परि तुम भासत सुब पाहते हो तो यह पावश्यक हो जाता है कि साम्प के साथ सापन भी पुर होना चाहिए । रोमा । सभेष प्रार हमें प्राचार्य दुनसी, पाचार्य विनोगा पौर प्रमुखत कोपोर मुनि मी मनपरी जैसे सन्तों के उपदेश में मित पहा । यो कि हमारे पत्नान के लिए भरपन्त प्रपेक्षित है। सच्ची महानता के लिए बस की पवित्रता पति पापक है। मनुष्य के हरूप में सो पपु-वृत्ति को दूर करना है हप की परिषता का कार्य है। इस दुरी पुत्ति के साथ मतत पर करने की पापापाता है। हमारे प्रशासन में भी गत सारी पुरायो पुस मई। प्रशासन भी हमारे राष्ट्रीय गीपन का एक अंग प्रत हमारा यही गाम्य होना चाहिए कि हम पुरखा पार कार्य-समता को प्रशासन में सि प्रकार मा सकें। मुझे इस बात में तनिक भी सन्दरमही है कि पार मुनि श्री नगरानगी के प्रपन से हमें गत साम मिमेका पौर हमारे दिम पौर विमान को संपमित करने लिए पारस्यक बम और हिम्मत का संबम प्राण होपा। माग ही साप सरप की सापना के बास्तविक प्रर्प में हम किस प्रकार हमारे बापुमों की सेवा करमस लिए प्रेरणा भी मिलेगी।

मैतिक मूल्यों को प्रावश्यकता -मोहरस बियोगी बमसम्पर्क अधिकारी प्रजमेर प्राव पिमित पूंजीवापी व सामन्तवारी मुप में प्रतिम मूम्पो की उपेक्षा नहीं की जा सकती। महानता का सुप समाप्त हा एका । भाग का सुप मम शक्ति का है। मणु में ही बिसुकापन परमा मौर प्रणु र मपटन में ही पक्ति का उदय रेखना युम का सस्प है। सामान्य बन की इकाई में यो सरप राजनीतिक रचता शानिक अपमी प्रयोगमामा में नमी मरय का अनुसन्मान करता है। ऐसे युप में प्रनिवार्य ही पा कि नैतिक रप्टि में कई रिधान परगुपयों का पस्प राटित करता। यही काय भाचार्य श्री तुमची पर है। मेरा रममे मिलने का मौभाप्प मार और भरमेर रोनों ही स्वों पर हुमा पा पोर मने उनके दर्शन के महत्व को नमी समय ममम मिपा पा पर मेरा मनमे मापातार हुमा । प्रान हिमामय महान है परमा महा पम्मू-शक्ति परती प्रपतम्मित है जो उमे चारों पोर मे पाम्पादित कप है। पीम मै गए-मार परे संमार को तडू पहात द' । एप नाम की स्तुति स्या कम है ? पंप ममा 'मण-गक्ति ही तो है मगर को साइर है। बुटिमान् परवे-मा सबप या पा हो र पस्प काही पाणकरला पाहिए । म्पायगाथा - मापक परीमो मायर मा। प्रसाप्प को मापने बामे के कार्य को पुस्माइम ही पहा मायेपा। वसम भी पपिक एरिवारमा स्थिति मामाम्प मोरमानम की है। पादप के गौरी शिखर नहीं पहुंच साठा परमीम-मत्व की प्रषियाकारण गर्नेदार भी नहीं ममता । ममाय मैं ममी धर्म,कमा संसानि पौर इतिहास राम २२ प्रमुमत की मोर - पही बर्ष है वो मौतिक संबो मे पिस कर भी उपरोक्त मूस्यों की पा करता रहा है। मार के युग में इन मुस्यों की रक्षा करना कितना कमि है इसे यही असम सकते है रिहोंने जीवन में भी महान पादपों के सपने है। भाग का युग वर्ग-संपर्ष का है। स्वामी सेपक पति-पली गुरु-शिष्य प्रारिसमी वर्मा में रहा पहमे कार्य प्रा स्नेह और विश्वास से पहठा पा पार निरन्तर नपर की भूमिका परिमामा पारों मोर परिकारों को मापातीपापी हैपौर स्तम्पों के प्रति प्माम नही गा है। पुल काटने के सामानिक मूल्यों में सम-पुपम उपस्थित हो गई है और इसका प्रभाव विक मूल्यों पर भी पा है। परिवार में जिन्होंने सब प्राने को 'पुष्प की पामा' कहा है, यह मावोसने तनी है । समानाधिकारी मापे र पीपक सापता यह किसीगुएप म समानता का प्रश्नही मी सा । पोलो का रोष पनम पाना है। दोनों की पूर्णता अपने अपने पदों में पूस बनने में है । नरमी पुस्म पन नमन है पौर म पुस्पलीमों में किसी एक का प्रपनी सीमाओं का पतिमा करके दूसरा स्माण करता यमय पपी के लिए महितकर होगा। भार पट्टी दो पालिया पुरष न पा है और पुष्प लिया । पर पारिवारिक स्थिति यह हो वो राष्ट्र का निर्माण से हो सकता है? पुरु मार सिप्प के समतों को वागिरे। यपि यह महा पाता है--नि दुरोपमभान पर हममें से शिवने ऐम है बाइस सत्य को समो? पार को मिला दी जाती है यह म्यागरिक पति पर है।परिसामन गों सपे एर्ष कर भी महा नासम्ध मौर तमिमा मन एक भी रियापीरपापित नही कर सके और टेमोगुणी प्रेमपद, प्रसार विराना मार रिम्स विडिपन कर मोटापुरचिम्म की परम्परा का शिमा निर्वाह सामाजिक जीवन में कम पाना गा पा है पसी अनुरूप में दरस्पते मानस में मिल माती मा पो। पान का साम स्विारीन है। उनमें पनुगरको सिमना सीए माना पड़ा निमा माना एकीपरस्नु, बोरो पाहिनि सपान दुरसा महम प्रतिमाओं सरगौनरी रामदार ऐमी महापलिया मा गत सा पाव मंतिक मूल्यों की पायाar है वो पापको मुस्सधिप्प परपरा को पृमीवित करता होमा । यदि भाप इस मस्य को समझना बा तो पेय सीम गाम्तिनिकेतन में गायें । ममी वस्तु पापको रामापा परमाईम र योपीराब प्ररपिन पापों में मिमेयौ । पोपीगादी युगुतों में नया इप परम्परा की परेमना है? मही विमुर भारतीय पनि है बिसे हम पुन प्रारम्भ दरमा रोमा। मरना हम ऐमा न कर मक हम मदप ऐसे मेपाली हामरों को न पा मम जिनके मम्मुख यमुमा के बोबो सिंहासन पुगे । सामीसेरक के सम्मन्म को मीगिए । 4 महामानम कहाँ गए, जो एक भार मामिकमा नमक का सेमे पर इमचा के लिए उनके बन बाते पे पान मानवकम और निरन्तर कम तमा रनावामिद परिणामों में विश्वास करता है। परिणामत भार बह मन्त्रारत हो गया है और उसके सामने जीवन- विश्वास का एक ही सिगम्त है निरन्तर पाय में वृद्धि और उसक अनुम्प प्पय के तमपट में सरे । रिपमित पूंजीवादी मभ्यता में निगमा प्रग सप हपा है उसी मात्रा में मो-मन मानना स हमारे मामने । यो निरन्धर सपर्प करता है और पेट की विपम गामानों में मरता रहता है। महार स स्वामित्व उठ गया है और राज्य म स्वामित्त में लिया है। यह केसीयार की स्पिति कापौर में पसपी इस तो ममापापी गा परन्तु मने सपने पकिवादी जीवन में यह पाना कि मनुष्य की नैफ-निपत पर जितना पर मिया जाता है पाना ही पनित हो पाता है। पर मनुष्य को अपर उदानाठोरमा विनाम माना होगा। समान से ही ममान की उत्पत्ति है। प्रपा प्रम रसम्म नहीं कर मानी और प्रेम में प्रशानी हो सकती। रोगों पिरोपी पर। ममार-परम्या महमारी पाधि पर प्राधित रही बम विशेष प्रणामा विमान की पहा समापार से पना माना है?षो मनुष्य भरको बा मया मापानेको भी सा बारेमा। एमीमिमै ममारोसमी पाकिपिपारा प्रया दिएबाम दया समा पसा प्रेम प्रारिरात पप दिम हैरो मारबीवन में महत्वपूण मूस्यों से निर्माण परम में मायापारी पुर्नविष्य परपरा में निर्गदी कमी मनुवार वह संमोव के पत्र में तानसेन को देने में असमर्थ हो, को काम्पलेष मे तुलसी-सा महाल कपि भी मही र सकी है। ऐसे ही विकास में भारतीय-रमन परम्मपन पाचार्य श्री सुमसी के ल में एक ऐसे सन्त को हमारे बीच में गाई यो साय की परम्परा में विश्वास रखता है। वृष्णी सरपर समाहा है यह परिसस्पना न पोरवासी हिनासर से निकली ईमान की माएं यह ममामा है जो इस बिपी में स्मान नहीं कर सका है। पृथ्वी सत्य से समीप मर्मे सप तो माप्पम हमा परबमा कौन है? यह प्रान नौल मही है कि मारमाती येम में कर्म के समर भी नाम्पता हप पीरिक पियों में इसीलिए सत्य से पक्ति का प्रदेश पिया और भक्ति की प्रतिमा तो म मानी। महापो पण पुरि पति बापए बही है जो महानता का अनुप्रया है मार पवित्र है। मा रिगुट टिक पाता है काली का सोलगपाई पीर पुस्प की मर्यापार गति हो रही है ऐसे मापस पात में यदि पुत्री की सा रोये मही होपनी दो फिर गप्पीको साप कौन सा है ? मुफे पार पपरिपके पी मूकमा मनुवारले ममय मा मंगलापरण मैंने मिसा था, मह एक पाही पा । पृषी ममी है उम पनाम ए पो पाती है। उममी स्तुति तत्प संप्रम प्रीत साप तपरपा रोपा ही माया निवाते मम्मियोति परा हो नि पान । विनी गत वृत्ति-प्पी नाम से दी है और सत्य की प्रतिमा है। पणा मंगम है पौर मपम पर TE तपस्यामि सविन ही परसाना राब होने पर ही मान पी ग्लति है पर इसकी हामि तिर भावना का पम्बिहोर जमाना अनिवार्य है। मही महायतों की जाना है। इसीने नमार में महतास दोष हाता है। ति कर - पही तर यो महानगपा है पर लिने एमेयोन महता मैतिक मूमों को पासपमा तक पहुंच सकते हैं ? इसलिए भाषा मी तुलसी साय विवाों ने पांवों की रचना की। भरणुगत मुष्टि के मूस पाधार है बिन पर सारे मतिक सपन-पास्त्र का पिलान्यास छिया पया है। पब पापा भी नमी से मेरी मसुम्तों के सम्बाय में पर्या हुई उन उन्होंने बताया कि सपने पासा मणुवत है-अपने को दिन में एक बार रचना । पितमा स्पट प्रौर मरत दर्शन है। "inor thyrlf महात्मा सुकरात कायम है। 'पातम पहियामे' गोरख सापु पुकार पुकार कर कह ऐ है। सारा हान परम शान है पौर सारे मान की प्रारमा म मय है। पारमा के पहचान के परमाद सृष्टि रसमय हो पाती है। पीरन प्रयोजनमय बन जावा है। सभी बुरा एफ से नहीं हो सकते । पारम-वर्मन का सिद्धान्त भी ऐसा ही मनोमय है ।वन से मानपी शान से गिराम की विराप से पानम्दनी गैर मानन्द स पहे की उत्पत्तिही पो मनहर माप है मिसे पाचार्य भी तुमसी ने 'पान्ति' और 'तुष्टि' का स्प पिया । मौर मौतों में निर्माण तथा बेतान्तियों ने 'मानन्द'केप में स्वीकार किया है। पणुवत-पान्योमन की दूसरी विसपता यह है कि वह व्यक्ति पर पुष न तारकर उमे ही सुनने का प्रषिकार देता है। किसी प्राचीन धर्म की पुस्तक को उनकर रों पाप देखेमे कि सारा पमं निपेमारमा है। घायद ही कोई व्यक्ति ऐशाहो बोरनकी दृष्टि में पापी न हो। 'पाप' का यह सतत पर्जन हम कामप्यमय बनाता है। परघुवत-पागेसन हमें ही चुनने का अधिकार देता है पौर प्रत्येक पक्ति में हिक-अहित पी सम्म संश स्वीकारण हुए उस प्रमागील प्राणी बनाता है। स्पष्ट है विकता के इन से प्रमुस्प सिमान्तों की पोर भरपत पान्दोमन की रिपोर यही इम प्राम्दोमन की विशेषता है।

सदाचार मोर नतिकताका मान्दोसन -श्री गोमातात पुप्त सहसम्पारखगुस्तान परावार पीर मतिमया की मारपस्या को प्रत्येक युग में स्वोभर पिया गया है। दुनिया के प्रायः सभी धर्मों मे मानव-यातिको समाचार पोरनतिष्ठा पी पिटा दी है। सदाचार पौर नैतिकता की भागारपिता पर ही पनि का रिफाप पौर समाज का मारण हो सकता है। भार सागर पौर विश्वा बन रोम पर पए है। इसलिए एनिपा में पाहि पाहि मभी है। पति और राष्ट्र पपने सौमित पौर मुा स्थानों को पूति में पस्त हैं। दूसरों हितावित का रिकारकरम की उन्हें पारसता प्रतीत नहीं होती। अपने स्मार्गकी पूर्ति के लिए पाहे मे रचित-अनुदित मति पविक धागों उपयोग करने में कोई शेष मही मिमा पाता । इसीलिए बार में ममाति है पता पाव विमाग है और प्ररारम्वा है। मानानाति विनायर परजीहै। /परिस्पितिरों को देखते हए मानव-समागमोतिस्ता पीर साधार की मोर करने की जिवनी पारयस्ता पार रतनी पहमे नीमही है। परबार स्तिमा पना हो प्रताप की उतनी ही अपि पावापरता पदुमय की पाती है। पितु सदाचार पोरनतिष्ठा भी ग्रह सरन नहीं है। वह मोटों से भरी राह है। उस पर बम के लिए परम्स की मारस्यरता होगी स्पाय पौर निरान करता होपा पार हर सापट माले कारीमार होना पोगा। पर दुनिया का प्रारी रिया में पर हाईदो नही मार्ग को पाने के लिए हिम्मान और तपस की बात होती है।

बदाबार पोरनहिनताना प्रारोलन दुनिया में हमेशा प्रमाई मोर मुराई में सपप होता पाया है। मम्त में गीत मकई की होती है। बुराई की पत्तियो मनुष्य को पतन की पोर मे पाठी है किन्तु मनुष्य सर्वमामी है यह दुराई की गलियों में मरता है और प्रवाई की मोर गाने की कोसिस करता है । यम बरत इस बात की होती है कि उसर बीवर विपी हुई और सोई हुई अभ्याइयों की पक्तियों को पमाया गाए; उसके रिकको बापत रमाबाए तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य पणा म बने मातिवात् पौर सराचारी नबने । तेपपम्प के वर्तमान पाचार्य पी तुमसीबी महापस मे जो प्रमुबव-मान्दामन शुरू किया, मैं उसे नैतिकमा पार समाचार की स्थापना काही प्रान्दोमन मानता है। मैं पाहता कि यह प्रान्दोमन निकम प्रपिक म्यापक बन पौर मोपॉजीवन में सपाचार और नैतिकता को मनिकाय म्पान प्रदान कर। पसुपती बनने के लिए जो नियम निर्धारित किए गए हैं प्रिपामक है। ये एपदयों का निरेप करते हूँ। मेरो प्टि में ये को नहीं है। ममा बसमान निम्न स्वर कोसते हुए रे में प्रतीत हो सकत है, किन्तु मास्तर में कामही है। एक अन्य मापरिककोन निपोका पालन करना ही पशि पोरपामारी करमा रिस्वत सेनामा देना पापों में मिमावट करना और म्यापार में प्रम्प प्रभार से बेइमानी करता पहिव सामायिक पराब पीरहन प्रपयों को करन मामा को भी मामी भमा पादमी कहमान का अधिकारी नारी हो माता । म परगप राम्म नियम के द्वारा मीणनीय अगए मए। मी प्रकार विरेसी परमों को न पहनन अस्पृश्यता का प्रमय र पन पराम पौर पम्प पदापों का सेवन न करने यबम्बी प्रा भी पुप पप की पायापाताको प्रकर। स्वदेगी अमृया निवारण मार मारदम्प-निपेय को राष्ट्र पिता महात्मा पापी में भी अपने रचनात्मक कार्यत्रम में प्रमुख स्थान दिपा पा। मस्पुरतों में सरेपी बरनों सम्बन्धी नियम को थोड़ा और भापक बनाने की पारस्मरता महसूस होती है। यह यस बों की मौमित नहीं पना चाहिए और उसमें बारी भी उस्मैव स्मिा माये तो ग्यारा प्रधा होगा। पुमपान की बीमारी ने हमारे समान में दुरी तह प्रसार पाया है। पशुपतीक लिए पान निषेप काम विपप से समाप करवा भूमपातरिम सम्यता प्रमुखत को मोर की निपामी मान लिया गया है मैं प्रसभ्यता का ही प्रतीक मानता है। मरपुषत-पाम्दोमन का मैं इसमिए मी स्वागत करवाई कियह हमारे समान म म्याण प्रने सामायिक सदियों मार कुरीतियों पर प्रहार करता है। पर विवाह ग विवाह पाम विवाह जैसी सामाजिक कुप्रपामों का पंत होना ही पाहिए । इसी प्रकारोबीममबारों भोर मृतक भोगों में भाग न मना रहेका प्रवर्मन न करता पम्वे पीत न पाना बेदमा नुरुप में माय म मेना प्राविण्याची मरना सामायिक मपप्यप को रोकने के लिए बरी है और सामायिक मस्कारिता मिए भी भावदपक है पापिक विषमता मानव जाति के लिए एक प्रमिसाप सिम हो रही है। पाने बामे मुग म एक पोर प्रत्यपिक गरीबी और दूसरी मोर मस्पषिक प्रमारीको माम नहीं किया गाण्पा । परशुवती को अपने परिपह की एक सीमा निर्धारित परली पाहिए यह विचार म्यापत योप्प है। यह पापित समामवा की दिशा में मेधापूर उमया हुमा एकदम होगा। प्राय ही परिणही यह मीमा मौन होनी चाहिए, जो प्रष्ट हास्यास्सर प्रतीत हो । सारपी और मंबन मनुष्य के जीवन को निमन बनाये और मनुष्यता के मुणों के विकाम में महापकहामे। प्राणुक्त पानामन में उमके प्रवताको मष्तिीय स्थान रिया मया है। वहीं उमरेका पौर नियंना एक प्राचार्य माते सनके प्रति का पता है, उसने इस माम्दोमन को पोपण और बम मिलता है।

-
चरित्र गठन को एक तस्वीर
-~-श्रीमती सुमेता कपमानो
भम मंत्री उत्तरप्रदेश
गांधीनी का कहना था—म के होय पुरु हा मेबापरामरण हो ।
पपराम्प का भी ऐसा ही पर्व परम पे । जीवनमर इसके लिए बेष्टा करते
खापार हमारे देश का सराग्य प्राप्त है परमा सम हो रहा है उसस
उरमा साम मही दिलना होना चाहिए । करोगों स्पों का मन हो रहा है।
अपे- मानों पर लोग अपन भाई मतीयों को रख रहे हैं। यान की बात
, हर महकमे म भार सिवनमोरी भोरवागारी है। देगी वहीरी
याजना ममत राम्ने पर जा रही है मुस्क म यह गत बी पापि है । इसका
मममी कारण है मपरिणता का प्रम पतन ।
पापीनी बाहो प उसको भेना में दो मोग हो । निर्मोम और निर्भय
नरम्य को स-ससे हासिम करने के ये हिमायती नहीं पाये कहा-
गम्य भी तरफ मचाई पर मिानदारी के साथ रवाना होपे पनी
मम्म होगा
इस पारा मुस्तकी प्रालिका मा ऐ६ उसकी बुनियाद को पाय
करना होगा । उसका जरिया-सदाचार, मरिमा । पर अफसोम यही है
किको कौन?
यही प्रमानवाभिाचार्य श्री तुलसी गिमा पीवन सम्पारम-साधना
पोर मरन पाई इस पोर प्ररणारे पे । सम्त मछमी बीनको भ्रम।
गमत। मोपों में परिष-मुपार की पिउनासी पाप पाता है ? पिना
परिपके मुग नही बन मस्ता परमात परकर गापानी हममें भखे थे।
-
।
१६

प्रमुपतको मोर नपर्म में सदियों से पोष पनों श्री परम्परा है।ये प्रत हर धर्म की दुनियार है। यह पिसी एक धर्म की पीर नहीं है। गर्म में महत्व की बात मह है कि प्रम-प्रमप स्वर सोमों के लिए सापना का प्रमय-समप स्म बताया पया है । पो सारे संसार से निर्मित होकर पते है उनके लिए मतों का ऊंचा रूप है और पो जीवन को सम्पूर्णतया पार्मिक नहीं बना मन्ते उनके मिए पतों का मध्यम प है। छोटे-मोटे नियम मेकर अपने जीवन को पच्छा बना सकते है। यह बड़ा मुमर बग्गारा है। इम मोपों को संसारी मोगों को परता बताने के लिए भरपुबत-पाम्रोनम प्राचार्य पी तुमची की बहुए की देन है। इतिहास में प्रमम-प्रमप ममाने में प्रमग-अलग ना होती है । मूम रूप में बात एक है, पर रसमा म्पास्पा के रूप की जमाने के प्रमुमार माय होती है। प्रमुपत-पान्दोलन पार केबमाने में परिमा पारितों को पापहारिफम्स में पेस करता है। जैसे महिमा का पर्व है- रिमी पीव को न मारना । पापाय श्री तुससी ने पपनी मानिकता के अनुरुप पणुमतों में यो नियम रखा है कि हत्या र तोर-मोरया गरम रखने वाले पिसी रम या मरवा पा सरस्प नहीं बनना पोर न सो ऐम कारों में भाग रोना' पाह नियम पार के मोक्तानीय पुम के लिए कितना प्रमुम्म पोर ताम कारी है। इसी ठप एक दूसरा नियम । सिौ मी प्यक्ति को प्रस्पृस्य नहीं मानना । दुनिया में मर पपवर । पोडसी में कोई किमी को मीचा पो सममे-इन समानता की भावना को बहुत बड़ी प्रेरणा यह बत देता है। पार पता कि समय का उफाना पाचार्य भी प्रॉमा पारिधर्म सिवान्तों की प्राणुषत पान्दोमन के रूप में भी जीवनोपयोगी प्पाग्यारी है मते गमता का पता उपकार होगा। हम मुरली मनाई चाहते है पर हो नहीं पी पोंकि ऐप में परिष गहन पी पी होती पा रही है। प्राचार्य श्री तुमसी ने प्रणुजन पाम्दोसन के मप में मरने सामने परिष-मटन की एक तस्वीर रसी है। भारत पिप्प सराइन बात में हामिद एक पार्मिक देय है दनिया मेरि रास्ता साने पाता रेग है। पिन पो प्रमोम की बात परिक पठन की एक प्राबोर है कि भाप हमारे देश में नैतिकता की कमी नगरपापी है। पर अमेरिका मईपी पर हरे रामाम्पा मिएन सामी निमिसानन्द में मुन्नवाया कि अमेरिका हिन्दुस्तान को पर्म नीति और पवन का देस मानता है पर दुधको गाव कि हमारे मौरबान धर्म और सुन की बात तक नहीं मान बोहमारे पदी प्रसनी पीर है प्रमकी देन है। धर्म और पान की बातों को वो हम एक बार प्रसप र पापारण म छे विकला और पार्मिकता की पो विधाएं हमको भी ये नहीं मामते पार नसा बीवन बनाने की कोधित करते है। अणुव्रत-पान्योलम कामो काम पन हा रससे मुझे हर पली है। म बाइवी इसके प्रचार का लोगों पर पसर पोरे पपने संगलों में से सपनाएं । इस पादोहन के पाद पति व समूह में पाने चाहिए।

Tr
प्रतीभोर
नही हो गाना गा गारगत रहता है। परपुरक-माग्योमन मनुपरको भाग
बमा ही एक मही अनुमान है। प्रापती होने के साथ-साप पति
पनि सपा सामूहिक समस्याएं हर हिरोहित हो पाती। मुनि भी
मगरावगी केही प्रमों में बत मानस का परम सम्स तपाबीपन -
लम मर्यात है। मास्मानुशासम प्रती पौरनी-पापलामो शनि
में art-fमय पापा समामामहे--प्रद हमारा संसार को
मित्र की दृष्टि से देव। सर भगवान् रहा है कि यदि ममुप्प भपको
गृपमा पर विजय प्राप्त करने को मह हा दुर्ग एवं पिपणो को पीठ
माना है। बपि माह पायोजन समय में यह कामाए कि पर
मसामिकागममा मिषोई दो एकही प्याम में एसरस करके प्रमुख
किया गया है को प्रतिश्योक्किमही होगी।
सभामा निसिन काले लिए प्रापेक स्म-कमिव बही मानी
मासिस्प निर्धारित होता ही प्रदेश कार्यात सरकारी htt
मरगाय-प्रत्यक प्रिम ए प्रत्येक स्थान में भनुमची स पार बाम
गामिपणे रिपो एक ममियों से पानीका निपाए पोर मने
मामन से एक मिश्रा की भावना मात करें । मेय रे मी मय है
पसमाचोमन को नामाणे सन कमिर सर पर इसका
प्रकार या पाए । म नि मारि संग एवं अपार मा धिणा की
पारमा हमी।

२० अणु से महान् की पोर प्रपनी -बामो प्रेमपुरीकी मानव महत्पारांक्षी है प्रगतिशील प्राणी है। यह ऐच काम की सीमा में भी परे पहुंचने का साहस रसता है। प्रपनी म्पष्टिको समष्टि में समाविष्ट करने पर तुना हुपा हवा है अपने पिम्दुमाव को मानम्वसिंधु में बरसा कर एक पर देने के लिए वापर होता है अपने प्रात्त को महत्व में मिमा रेने के लिए मातुर पता है पौर मपनी इस भातुरता को पात करने के लिए अनेक सापनों को अपनाया है। उनमें प्रमुख सापन है-प्रणप्रत। भारतीय प्रों की मारमा फिमी दुरामह या पत्यषा के कारण मही बनी है किन्तु पनुमबमम्म मौमिक सिधान्त पर पापारिख । मानबीम मान्मा का प्रारही मात्र की प्रारमा के साप ऐपयानुमय ही प्राविर्तीय परशु प्रादि प्रों की मामार-धमा है। रिसे परपुता का अनुभव होता है यही महत्वाकानी हो सकता है। प्रणवा के अनुभव से अपनी ममता का प्रसस्तोप उत्पन्न होता है और यही महता की भाकीता को उत्तेगित कर देता है। पाठक समुता का प्रसस्तोप नही होता तब तक महत्ता की पाकामा का गीपन यो कर हो सकता है? ममपि नहीं हो समता। पहिसारि भएप्रय विकास के लिए मादारपुरि परमावापर है। तुराक पा प्रमान मन पर पतास ही पड़ता है मत हिसामय प्राहार का बर्मन पनि पाय है। यह प्रारमीयता होती है वह हिसा नही होती प्रत्युत प्रेम होता है। अपने घरीर के अंगों में पारमीया है वो किती पन से किमी प्रेम में हिसा तो क्या पतामही होता प्रत्युत्त प्रापेक में परस्पर पनिप्प प्रेम ही होता है। प्रप्या पंग एमरे के लिए सहयोप मेगा एवं सहायता करने में प्रस्तुत पा प्रमातीमोर है । यो महिनारि स-मरीर में पतिप्रिय पहिचारि कोरि गहती गाएनी से से उठा पर भी ध्यापक हावा पाएमा । परीरहे अदम्प में उम्र से हिरारा में गिरी से मानरमान में पार मामपमान में मागोमात्र में परिवार की प्रतिप्य हो-सपी पोंकि भारत माते प्राणी मान में प्रारमीयता हाने पर प्रेम पर होही पापा और प्रेम में पर-कसर पारिम होने कारण पहियामाप सरम प्रस्टम पारि मी पनायास ही मा पारे। मणुस्ती परपराबी होता है। अपनी प्रस्पुष्टि को समय माती पनामाकरण-से पट-बट में पट-पट से लिप-पग में और पिणा-पिण से ब्रह्माननााप में व्याप्त एकही पात्मदेव केम परतायो प्रारमरेर 'प्रेमपुरी नायक सम्पाची परेन निधने पाना पर पानही पाक मामक पाठक-मालिका परीसरदरेम को पासा बनेगा। वो बोलने माना है, मुनने माता भी होपो रेवा, मेवा भी नही है। गो कार पहार पऐसतापरे मुप में जर भोगन भी बही कप्ता है। सा मचा है। को रोकने माता मकोई रोक पालाम किसी का परसान पोरम पिसी भरार का कोषास ना ही मंगल प्रेमी प्रेम है। मितनी महती प्रमाण है पर पड़ी महत्ता की चोटी है, पथमि भी पही है। प्रपती को अपने प्रति एमरों काम की पेमा इण्मति मपणे कम्प का मान परिस होण, अपने परिकारी प्रोमा पूरा परिकार का पान मयि तपा पम्पूर्ण पता है।बह समझना किसे कामेरी दिला (सनि) कोठो मुझे पता होती है से ही मैं जिनकी हिमा कमा सम्हें श्री पोहा होपो हो। से मेरे लिए कोरिपा प्रताप माप को पत्रिय मला। म पी परि पिसी सिए पर या पुरोमा हो ग भी गादी मोरा-मका भार मे मामी कहाँ पीर रिमो मागने मनसा, पार्मणामको निमी को मिमी प्रमर की हानि पचाना पौरहो frमोमिए पाप पा परियारलगा।' अणुमती संत पागने मई रेस राम पात सिधार हो मे पा रमात भर .

. पप से महान् को मोर रहकर महावत होता पा मार्यमाम बन जाता है। पग्मवत का अनुष्ठान पिसी प्राविमौनिक या प्राविधिक माम की नियत में नहीं करना चाहिए, मकार वा मम्मान भी नाममा में प्रममा अनादर या अपमान के भय से भी नहीं होना चाहिए, किन्तु जीवन के एक प्रविमाग्म प्रेम के स में सतत पोर स्वाभाविक होते रहना चाहिए । पत के बिना पा होम पो रहा ही म गाए, पर गोपन मे भी प्रिय बन पाए, एमी निया से प्रगपत का पापरण बराबर करते रामा पाहिए । परावती में ऐसा पभिमान नहीं होता कि मैं प्रती है। प्रमिमान हाते ही जन 'प्रत' म एकर मिथ्यापार में परिणत हो गाता है। उसमें पास्तविकता नहीं रह पाती दिनारा-मात्र रह राता है पति दम्माचार या पासण का म्म भार मेवा है। प्रगुप्त के अभिमान से उसकी महत्ता सिट नहीं होती। जिसमें महत्ता होती है उममें अभिमान नहीं हता। प्रन क साप अपनी एकता करके बतहीनों से अपने को येष्ठ मानने का नाम पमिमान है। पभिमान के कारण जिनमें व्रत का प्रभाव या कमी रेसने मै पाती है, उनको तुच समझ कर उनसे पणा होने नमती पौर मिसम पपने से अधिक प्रत-निष्ठा मरर पाती। उनको पमपी मानकर उनसे ईर्ष्या होने मगती है। परमा ाि प्रारि पहिण प्रमति देगी सम्पत्ति की पिरोपी मामुरी मम्परा है मुतरा सपा स्याम्प है। पो सम्मा पनी है, रमको रिसी से पणा ईर्ष्या या विप नहीं होता। पह पो सगीर निर्जीव सब में सममाष से विरापमान पपने पारमदेष केपन करता हमा सबसे अपने समान प्रेम करता है। परपुरती की यही महत्ता है कि उसका बीपम परसे के लिए एकर ब्रह्मग मर के मिय हो गाता है। अपने स्मार्च को सर्पि में सम्मिलित किए रहना है । भगवती नि मानव होता हुमा विश्वाठीत भी होता है। यह किसी भी प्रकार मेरमावर बिना ही संसार की सहमरी मा में संमण होता प्रा भी पम्वर से एकदम महंग पता है । परमदयानिपान परमात्मा की प्रसीम दया से हम प्राप्त महावा में पदार्पण करनेमिए भाम्पसानी बनें।

२१ नैतिक पुनर्जागरण --रा.हरोहण मेहवाब तालासीम सम्पपाम, बया माप्यारिमा और मानवतावादी दृष्टिकोण प्रनाविकाम से हमारी सनातन सति परमरगत मूलाधार रहे हैं। बीवन में संयम पर विश्वा युग- पुर्गो स इमारी सोसतिक विरासत रही है। परत पुगों की वासवा-सम्पनिया एवं तिीय महाममा वनित पभावो की प्रतिक्रिया स्सस्स भाग हमारे बीवन में मीधि का स्थान मनीति मे में लिया है। माप-जीवन में मात्र पोर पनैतिच्या एर मतपम ने पुस-मानवता की गोंको तिनाबोक्सा एवं निरररिया १-पही मार के रिचारक के सामने सबसे महत्वपूर्ख प्रान है । नीति-वर समान में पौबन + मठिक पुननिर्माण प्रश्न कितना महत्वपूर्ण k-पह किसीमे सिपा मही है। इस दृष्टिकोण से परपुषत-माम्सोनम के बाप रेप के विभिन्न पापों में विट मर गाति कामो कार्य किया जा पाईमा पप में परम पुनीत होने के साथ हो पाप स्तुरप पार भनुपरणीय श्री मोति सही पमपम काही इमरा नाम है । मन पर निपल पस्तिरय विरामीसी।मन पर का पान की पात से रामा बर्मो में कही गई है। मपर मेरा अपना पेमा विशाम हैयह बात कहने में जितनी हरम है पादारित पीरन में इस पर पमन पर सम्मा पवनारी तुम्ह है। मगर सरा पर्प पर करार महीपणापा पाना पाहिए मिलि प्रपनी पोर से मनिपात्रता प्रयास पला ही पोरो मारमनियवसमाप १८ मक्षिक पुनगिरण में पो म्पस्तित्व का सारा विकास ही पवस्व हो पाएगा विसका नतीजा मह होगा कि कोई भी धमाव पापप्त सन्ने प्रम्पुण्य का सप्न भी नहीं देख सकेमा । पर्सयम से सदा नभए समता पार प्रमापार ही पैरा हो । मत किसी भी पति समाष मा पट्र का विकास उसके प्रसपम से नहीं संपम से ही सम्मर हो सकेगा। दूसरी मोर मन पर काबू पामे के लिए व्यक्ति यपि सरप्ट हकर सवा प्रयास करता हे दोमन पर पूर्वत नियवता न पा सपने की स्थिति में भी कम से कम पक्ति के जीवन में विश्वा का प्रादुर्माण तो पसरिष स से होपा हो। वीर दृष्टि के कारण पापिता बापू अपने जीवन काम म सर मा नियन्त्रण पर रिप बम देते रहे। उनका प्रपनर बीवन पूर्णक मुसपमित पा एर्ष बन रन के जीवन को सुसमित र नैतितामय बना देने का उनका सप्न बा । यह मानकर मुझे परम प्रसन्नता है कि परपुषत-पायो मन भी भरने मूम में मन के निवन्त्रम्म पर ही पाचारित है क्योंकि इन पर्यो (अनुवा) की स्वीकृति ही पति की मुभा है कि भीमन के निर्यात पापारों में से पक्ति ने पाक्ति पनी वृत्तियों का संगोपन पिया जो मन पर निएपण पाए बिना पम्भव नी प्रत बन-बीवन के गतिक मम्पुश्य के लिए उत्प्रेरित पौर प्रात्म-नियमण की भापार भूमि पर विकसित यह मान्दोमन अपने लक्ष्य पक पाले में निस्सोमपम होगा। अम्मान्तरबार में मेरी प्रदर प्रास्था है। मैं इस मार को एक सराय की मावि ही मानता है। पिछने पीरन क संचित पुष्प कमों से मिली मानमता का परि हम प्रसंवमिद एवं प्रतिषवामम बना र यों ही स्पर्प का हो पपनी पसरवृत्तियों अनित कर्मों का पम निश्चित रूप से भगमे सम्म में मोपने लिए उत्तरदायी होते हैं। परि परम्पति सब इस प्रश्न पर मतक परि मुझसे कोई पुरा कर्म न हो पाए वो पपने पाप पर काफी रुपम प्राप्त र सम्वाहै। बस्तुब मपम और पावरम की परित्रता परमान मार पोरया सब-स देशसभीनों में विषेप बम दिया। मर परिषमी सम्पता से प्रिमिव पारा पिक्षित-नमुपाम पास्म-मयम के मालको स्वीकार करने को पार नही पोरि सम रिपारtrate मनुबनी पोर इस जन्म मे कोई माम सम्भव नही मम प्रामतीर मे म्यक्ति की मारिमा और प्राप्यारिमा उम्नतिका माध्यम माना जाता है। मगर इनर साप ही धर्म महारे पति की भौतिक उम्मति की भी गरमी सम्भावमा रहती है। सत्पप्रिय व्यक्ति समार में सवा पार की दृष्टि से ही रेखा गाता है। इसी प्रकार पार पनतिक युग में भी उसी दुकान पर सबमे रमादा पाहाबन प्रेरणा से गाते है यहाँ माव और म्यापा रिक मौनि सबके लिए समान स स एक होती है। पिता महारमा गांधी ने तो इस सम्बन्ध में व्यावहारिक प्रयोग करके स्पष्ट रूप से यह सिट भी कर रिसाया है कि सामारिक उन्नति के लिए भी धर्म की संपम की रिमुगाचार की मितान्त अपेक्षा एनी है। महिमा सरप पौर्ष मैतिस्ता मैत्री पारि निपिसम पवितको विकसित करने में सहायक होते है और साथ ही मापन तियानों परपनने बामाको नामारिक सत्र में मापौर मम्मान तमा पापिक टम्मनि भी हामिम हाती है। हमारा पर्नतिक प स स्थान हो गया। मपर यहाँ तक पीवम में नैतिकतामा प्रश्न है मार मी हम पर्ननिरता और प्रसयम की मुनामी से अपने पापो मुक्त नहीं कर पाए है। पपनी इमी कमोरीपारण हमारे देय मालना पर पतन हमा। पिप से प्यान देने की बात यह है कि के दम प्रपतन में मिमी मी पति या परका हाथ नहीं प्रत्युत मनिरता से मिर पाने माण ही रंग इतना पमित हुमा । परन्तु इस प्रब पवन के साबर भी प्रपे मारनपानी हाय में प्रश्न पम पौर सहि प्रति परम्परा सपनी पारिप ग्राम्बा मान है और सीमापापा यह मुफम पिपनी ममम्न पमरारिपार गरमी मार भारती सिर में मम्मान कौटि मला पाना है। हमारे रंग पी महिकोई मग सीमारी है तो वह यह है कि भारत मामी करपे एक मनपौर प्राणी पदमा एक प्रमेरोषन शिान् हमारा मन स्पिनिमा सिनेषण से हुए विना सीपहा है कि भारतीय पन-मानम मेरो मन नाम पस!-(१)म्पलिममरा मन गोय मैतिक पुनर्मापरण सिवान्तों की प्रापर्म परिमपना मेकर ममता है। (२) भी का मन्तरंग मम मोनोरन के पानहारिक कार्य-क्षेत्र में सिदान्तों पौर मावों को ताक पर रस्पर बहुत ही नीचे उतर कर कार्य करता है। पाते हम बड़ी-बड़ी करने पर परि व्यावहारिक बीवन का मही प्रपनोफन किया गाए तो पता चमेगा कि हमारे कार्य कितने पोरे होते है। यदि भारत को विश्व के लिए कोई नया सन्देस देना है पो उमर और नीचे के मन के इस बिभेद को पूरकरमा होपा। पर्म पौर प्रधर्म का म्यावहारिक प्रर्प यही है कि परिहम बिना किसी दूसरे भ्यरिस के हितों को बाधा पहुंचाए अपनी प्रमति कसे है तो हम धर्म पौर मैतिकता के अनुकूल माने पाएंगे । ममा परिहम अपनी प्रगति में दूसरों के हितों पर कुठायपात करो है वोहम धर्म और नैतिकता के सब स्पीठ सिवान्तों के सिवाफ पड़ेंगे। अपनी स्माधीनता प्राप्ति के प्रपम प्रमात से ही मारत सी पापार पर सामाजिक नैतिकता समापित परने के लिए रुसकस्म है पंचवीस में पमित सह-अस्तित्व के सिद्धान्त की भावनात्मक पापार-भूमि यही है कि ए इसरे ण के विकास में बिना किसी प्रकार का प्यपान या पामा उत्पन्न ए प्रपनी प्रगति के लिए सतत सपेट रहकर पागे माता पाए। ममारिकमैतिकता के क्षेत्र में जिस प्रकार हमारे देश में विस्म को एक बहुत ही देन पी है उसी प्रकार हमें पति की मैतिकता को ऊपर उठा कर बीवन में सम्धी मानवता का संचार करना है। पान की गिरी हुई नैतिकता में हमारे उत्पान का सही रास्ता यही है कि हम सपा सभष्ट रहकर बीवन से बुराइयों को दूर करते रहें। पक्ति-म्पत्ति के जीवन के इस प्रकार नैतिकवामय बनने से उसका ममूरे समान पर फस्याणकारी प्रसर होगा। बीवन-सुधि के लिए पतापा पपा प्रभवों का यह भविषता मूमा पान्दोलन पन-जीवन के मैतिक नत्लान म बहुत ही वामप्रद सिट होमा। ऐसी ही बनोत्पानमारी प्रवृत्तियों ारा समान में एक नया मानमवापारी प्टिकोण प्रादुर्भूत होमा गिमके सुफ्त मम मन-मन बीवन में अनैतिकता के स्थान पर मैतिकता का संचार होपा। मिमी मनिष्ट पिम्तन पी अपेक्षा 'सरे माणि पश्यन्तु' का म्यापक बीरन वर्गा हमारी भारतीय संस्कृति का सनातन सन्देस रहा है।

. पनपत प्रोर सम्व-पुषे शान मार एस पुस्तक से क्या मतलब यो मानर-मोरन में सुसम्म नहीं सकती और सब बोलती नहीं है। सन्न महोदय के पद को मारपूल है। अब तो निर्माप है, मते ही हलमें मपाप गाल मय हो । मान पुस्तकामय श्री मनमारियों को पोमास ही है, पर कोई प्रापवान् पनि गर्ने परमे पीवन में पारण नहीं करता है। पेन-पों में ठीक ही काम पपा -'म पो शमि बिना शार्षिक पुरुषों के पारण में ही धर्म पीषित पता है। बात पर्म विपरीभाषएम का पास्मों का माँ। रतन सरापारी पक्ति ही धर्म को प्राणाम् पार सनी बना देता है। दीपा में मिट्टी के बार भारत परती का नाम नहीं है. मितु दीप्ति ज्योति पौर प्रमाणुस्त हाल से। उसका पम्पित है। प्राम-रहीम वीप पर्वमा निरक। प्रम्यरमपीरतीहिकका समापन पर्म केवल ऐसे होने पाहिये पोशन-मामाग्य आप मापरण में मापे पा म। मम नारिक पोर पारमारिकामी प्रकार के तत्वों का पूरा समन्वय हीमा बाहिपे। प्रारधिमा बम मिळात बम प्रामारिमाम्गारवौगिल ठर या रसात के सरप ही होगा जिले समय में पतार में * दास कोई, *म सार। पठन को पाया नहीं पात पाना प्रति परिप बम मौरिसको पार सममें प्राम्मास्मिता पुट न हो बह रमानी पाम्ति देने वाला नहीं हो माया । ऐमा व पीसीयाँ । पारण र निर्णय प्रेरणासूप और रवि दो बारपा। पर बाल रापा स्मरण रमनी पाहिले किमिगी नौ मार का निर्माण स्वत सीपों पर मही या या माना। भाम्पास्मिाडा पोर मागिता के विकास मुक्त सम्मिमा रे पापार रकममान का भान ना हो सt पीठा पर सम्पाप पर्मस्प नापी महतो भया कपमुमार इस धर्म का २२ पहिंसक शक्तियों का एकीकरण -प्रो. गणपत मोर, मम्मम पि बिषय मंमार में दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं। एक ये वो अपने मानम को गन्दोलित करने वाले विचारों को निर्मीतापूर्वक विस्त के सामने प्रस्तुत करते पौर बनमत तथा परम्परागत सदियों की चिन्ता बिये बिना अपने जीवन में उन विचारों को मानने का प्रमरल रखे हैं। दूसरे प्रकार के ये पक्ति होते है-बिनके मानस में ऐसी ही उठती है पर ये हिमोर सामाधिक भय कामों का प्रारम-विश्वास की कमी के कारण बाहर नहीं पा पाती। मानस की रीवारों से टकरा कर समके वम में या ठती है और धीरे-धीरे समय प्रवाह में इन हिमोरों का उज्ना भी समाप्त हो पाता है। बौशिक पौर सामायिक बसवायु की पारा में ऐसे पक्ति अनिच्छा से गाव नमे पाते है । इसका अभिप्राय यह नहीं है कि उनकी पेतना भो मई है उनकी नियम- दुखि कटित हो पर समका चिन्तन म पया है पर प्रारम-विपनाम की कमी के कारण यह सब कुछ पपंग हो गया है। जब इस उपरोक्त विचार के प्रकारा में पूरोपीय देखों पर प्टिपात करते है तो हमें विश्वास होता है कि मुख-मी पौर मोतिषतामारी मूरोप के बामवीय मानस के तत में पहिमक पक्तियों की एक ठरत बारा बह रही है । यूरोप मामाम्प प्पनियों में मह पारा पान्त-मी तगती है पौरमाहर मे रखने पर ममता से प्रत्येक व्यक्ति बिनाए की प्रवृत्तियों पौर मापनों के समर्थन एवं विकास में समा हुआ है। यह एक समष्टिमत मि है पर इम चित्र का प्पष्टिपत पहन इसमे कम भिन्न है। इस चिप में पनेक सार्या सरनारमा प्रमुफ्त की मोर भविष्य में भी प्राणुगत-पाम्दोमन सी पनोत्पानकारी मैतिक प्रवृत्तियों रा बन-जन मानस में मैतिकता का पापिौष कर हमें अपनी इसी विरासत पर मामे बारसमस्या-संकुम युपकी पिपमताओं को सुमकर पिसको समुषित बार्म-दर्षनरैना।

२२ महिंसक शक्तियों का एकीकरण -श्री. गायत्त गीर, तम्मन विश्व विपापप ममार में दो प्रकार के म्यक्ति हो । एक रेपो अपने मानम को नित करने माने विचारों को निर्मातापूर्वक विश्व के माममे प्रस्तुत परत है पर मनमत वा परम्परापत परियों की चिता किये बिना अपने जीवन में उन विचारों को गमने का प्रपल करते हैं। मरे प्रकार के व्यक्ति होते -सिमडे मानम में एमी ही हिमोरे उठती है पर ये हिमोर सामाजिक मग सकार्पोपा पारम-विश्वास की कमी के कारण बाहर नहीं भा पातीं। मानस की रीवारों में टकरा पर उपके तम में पा बनी है और मीरे-धीरे समय के माह में स हिलोरों का उठना भी समाप्त हो पाता है। याठिक और सामाजिक बनवाम की पारा में एसे म्परित पनिया मे बहते पौ बाते है। इसका प्रमिग्राम या नहीं है कि उनकी चेतना बो गई, उनकी गिरे बुधि टिन हो गई है उनका पिम्वन एक गया है, पर पारम-विश्वास की कमी के कारण यह मब कध प्रर्पन हो गया है। मग हम उपरोक्त विचार के प्रभाव में यूरोपीय रेगों पर टिपात करो तो हमें विश्वास होता है कि पुर-अमी पौर मौतिकतावारी पूराप माननीय मानस के बस में प्रहिमक शक्तियों की एक तरल पारा यह ही है। यूरोप के सामान्य म्पनियों में यह पारा गाय-मी नमती है पर बाएर मेरेमने पर समता से प्रत्येक पक्ति बिना की प्रवृत्तियों और मामयों के समर्थन एवं विकाम में मया हुपा है। यह एक मष्टिमात कि है पर हम किरा इसमे एप भिन्न है ।इम चित्र में अनेक माया सम्मारक परिपत पात्र . ममत्रत की पीर मानवीय और अहिंसात्मर है। सरपर्य यह है कि पूरोप में अनेक पहिसक मक्तियां विसरी हुई है । ऐमी घसंस्थाएं ये-सोसायटी माफ फेमस (सेस) पीस फोन पूनियन महोफ पाई. पी. एस. पी. प्रादि । ऐसी अनेक सरकाएं यूरोप में विभिन्न रूपों में पान्तिकारी काम कर पी । म संस्थानों से समषित मोर्यो म ही अहिंसा पीर साम्ति के प्रति महप नगाव मही परम् यहाँ के पाम तोपों में भी प्राप्ति मौर पहिसा में गारी निष्ठा है । पासा कि में कार कह पुकाई प्रारम-विश्वास की कमी और बाबुमास की मीपणवा केपारण उनकी ये भावनाए प्रकाश मे महीं पा पाती । पार की सबसे बड़ी पारस्पना है रेस-विदेश की प्रहिंसक शक्तियों की एक्वा पिसका प्राचार विशवबरपुत्त पान्ति पार पन्तर्राष्ट्रीय समारना हो।रो मर्प पहने बर्मनी में पान्तिमारियो की सत्यापही यात्रा, सयुक्त पए पमेरिका में रम भपके रिस परिमारमा पान्दोमन रपिल पीनी पहिसारमा साई मत वर्ष इगमा में पी• पी पूरा प्रायोपित पलुबम फैक्ट्री के सामने विधान प्रार्थन पारि पनेर पटनाए इममा जीपम्त प्रमाण है कि परिमक शक्तियां प्रबम हो रही परन्तु यह पर्याप्त नहीं है। सबसे गमावश्यम्वाई-एक हिमकवायुमणम का निमाम् । मोर्मों की मुप्त मानवीय हितो को सपाना और उससे मासिक मामोमन को बम ना सिरका शाम्तिमारी साप्ताहिक पीस पूर' निर्मा- कला म पहिंगा ममनाद करणा है और अपने निर्मीक मेमों में परागम पुर मौर पनिवास मेनिक मेरा का स्वर से निरोप पर रहा है। पनिवार्य मनिक मया बिगप में कई पुरुषों को यन यात्राएं भी करनी पड़ी। भारत और पिटेगों की पहिसः पतियों में पारस्परिक सम्पई मात्र प्पा है। प्राचार्य श्री तुमसी हारा प्रतिन पद्धत प्रागमन मेवात भारत मिए जीनरी प्रपितु मारे विरमिए एमा प्राण है और हम पालोमन को दिगो पामे पाने मिरान मस्वामों व्यक्तियों सिानों से सम्पर्क पापितमा पाराया। समय पूर मही । समिति बिभिन्न माना में सिगरी पहिमा गरिन इम मानोसन में ममाहित होगाएगी। पनिम्म रपानो मे रिमटिमाते हुए रोपः प्राम हो उसे देम और पास हिसक सस्तियों का एकीकरण की सीमानों को तोड़ कर शान्ति प्रेम सदभावना बन्युत्त और महिमा की मामौरपी प्रवाहित होमी जिसमें दुर विषमता अयादि अनैतिकता एवं पीडाक भिशाप सरा के लिए यह पाएये । मार हमारा सबसे बड़ा कसम्म हैस पीया की भागीरथी को धरती पर माना इन बीपकों को एक स्थान पर मान का प्रयत्न करना और विश्व विसरे मामों में साम्तिमापी पाबुओं से प्रारमीयता स्मापिठ करना।

२३ अणुव्रत या मवम -प्रो. प्रमचम विजयीय एम.ए. पार का विदय एक पोहे पर तापहो से से विपरीत दिशामों में रामार्म पापे है एक पूषीवार-साम्पबार का दूसरा माविकमार-पाप्मारम पार कर । एक का समाम्प जीवन रे गहिर्गत मूपों से है वो दूसरे का अन्तरंप भूस्यों में । इस सष्टि को पार गीरार और साम्पबार तपा मोतिकमार और मप्पारमगार के बीच चुनाव करना है। प्रस्तुत मेब में हमारा मम्मन पामे प्रश्न से न होकर गत दूसरे प्रश्न से ही है। हम मनुवर के युप से घसकर सहनों वर्षों के सौपाम को पार कर हुए भार पभुतुम तामा पहुँचे है। जिस प्रकार पार का ममानिक तत्व को चोरी-सोरते 'चमु या एटम' तक पाच पमा है उसी प्रकार हमारे प्राचीन तत्त्वरी ममुप्प के पन्तरपण करते हुए 'पारम' तक पहुंचे थे। मैं 'ऐटम' पौर 'भारम' में कोई पन्तर नही मानता-रपोर माव दोनों पी एप्टि में । पम्प मौदिरो वो इसलिए गोंकि प्रसंगी का वर्ष ए हिन्दी में 'म का उपाप भी देखा है और उसी मापापा मार एम' हिन्दी में है तथा 'म मा । मारीष्टि से इमलिए मीकि एक (ण्टम) मौनिक तत्व भूम सपा मम्तरमकामा पम्मेपण है तो इमरा(पारमा)मानवीय वयक मूम तथा सम्वरम सपकापर्यन । गुण की रष्टि से भी दोनों में समानता रोनों में ही मूठमवा भर पता म्पापरता एवं मक्तिमत्ता है। दोनों होगी प्राप्ति में हमारी पति बाहर से भौगर की मोर होती है। एटम तक पहुँचने के लिए अनिवारणमीम्प मे चमार एम-मर रो पार करते हुए उसके प्रनिहित अन्तिम प्रत पता ईपना होता मी प्रसार मारमा तक ।

प्रमुखत या प्रमबम पहुंचने के लिए शरीर से धमकर इनियों बुद्धि और पपकोहों के स्तर पीसे हुए पवना परता है और बितने हम किसी पार्द की सूक्ष्मदा की पोर माने है उतनी ही पापकता पौर पक्ति की प्राप्ति माती पाती है। विशाम मौर अम्पारम दोनों ही शास्त्र इसके प्रमारप है। मन्तर एखना ही है कि यहाँ 'एटम' केन गुणों का प्रमोगात्मक प हम फेगस प्राव ही देख पाये । यहाँ पारमा की सूक्ष्मता प्यापकता एवं पक्तिमत्ता को हमारे महर्षि पौर तत्त-तिक पार से सहमों वर्ष पूर्व पात प्रौर भनुमत कर के थे। इसीलिए कहा गया किमह 'पणोरणीपान्' होते हुए भी 'महतोमहायान् है। भगवान् कृष्ण ने भी पारमा की सूम्मता एवं पाए प्रमाव-मूम्यता में निहित उसफी प्रक्ति को पहचान कर ही रहा था कि- म बिन्ति परमारिए नैन एति पाए। पोरपन्यापो, पोषयति मात ॥ में पारमा की पाप्ति पर उसकी भक्ति का प्रमाण उसकी प्रमावधीमता में मानता हूँ। पारमा नितमी ही पुर-गुरम्प में होती है उसकी प्यापर प्रमापपीसता रखनी ही बा पाती है। क्या कारण है कि राम की पारमा पाय भी पर-पर में अपना प्रभाव घोगन में समर्थ? मा कारण है गांधीजी के नमे उपवास पर उन मोर्यो रे हाय भी पिनि कभी उन्हें ऐसा नपा मम्बिएँ मस्तिों और मिरगाबरों में जाकर उनकी दीमासु के मिए प्रार्थना करते ऐठ्वे में। निषय ही यह उनकी प्रारम-शक्ति का प्रभाष पा। महारमागों के पामे हिंसक पमुषों के भी पालतू बन पाने की जो बातें मुनी जाती है, मके पीघे मी सी पारिमा शक्ति का चमत्कार है। से तो यह प्रारम-सपिल प्रत्येक में। पर पर यह प्रमाात मा परिकसित भवस्था में निपिस पती है तो उसका प्रभाव नहीं दिखलाई पड़ता। उसे सम्यि बनाने के लिए मिमी म पिसी रूप में गापना की पावरपया होती है से ही मैंने किममुक्ति को प्रभाष स देने के लिए उसे एक विशिष्ट जानुत एवं बियाणीम स्थिति में सममि करता पाता है।

प्रपन्त को मोर 1 इसी प्रकार मनु कितना सम्म पराय पर मस्तिगामी होता है इम पार के पुन में स्पष्ट करने की मावश्परता नहीं 1 विनाश के पत्र में राम पावक प्रयाप हम रेब पुके पोर निर्माण के क्षत्र में उसके सदुपयोप की मम्भावना इम पानते है । तर प्रश्न या उत्पन्न होता है कि उस 'पारम-गति पौर पर 'एटम-क्ति में या अन्तर मन्तर पार पह यह है कि यह प्रारम-रान्ति के दुपयोग की कोई सम्मान नहीं हो सकी एटम-भक्ति का दुरुपयोग एम पानी मातो के पास है और उसके पापक प्रयोग परिमार्मो की गाली देने के लिए स्यात् हममें में कोई नहे। रस्तुत भार का हाल सर्गनियमही है यह जीवन मार मरण का प्रण है। हम बया बाले- मामीमिकौर सार्वजनिक प्रारम-दायापरवा 'पीपीपौर पीने । एटम बम के स्वामियों को यह भी सोचना होगा किया रनमें से किमीमा भी मारनिक हत्या करने का परिकार है ! भार तो नवता है कि परिषम नम्पूर्व परीर पात निपात हो पुसौर मिस पी मर-नस में प्रवेष करना भारदा। एक स्थान पर गोग उसलाई उसे पीर-पार उसकी मगम पट्टी पो पाती है कि दूसरे कान पर उमर पाता है। पाथिर पर कार्य पिरित्या परत पसेपी । इसके पूर्व रि यह रिपात रमत विश्व कप तक पर पाये सिरे सर्वाङ्गीण पोष की पायant पर परमानु पनों पौर नन बमों के रिपले तत्तों में मने एप इसे नही र मबते। मक लिए परिषरको एक मेगा मा यही पर पेट में विकार उत्पन्न हाने पर पुटिलिये भारतीय तण मिया रते हैं। परोपा हो है, भारत का पाड़ना पौर सरितारों एवं समारनामापण । विपकी भी परि निरोप होता है तो एमे परमाणु पौर गगन धर्मों की पोरकर मानौमिक मम गिम पार समारनामों को पनाना हापा । यही मत है। रापीको साधना होता है या पारा -ौरन पा मस्तु खिको भी सौपना दामा कि वह क्या पाहमा -प्रगुल या २४ नये समाम निर्माण में अणुव्रत का स्थान -पौ नानाप सिधान्तानकार पर्म के समक्षण किये गये है। सभी अपनी जगह सापक है। पर एक कमण बो प्रत्यन्त व्यापक सर्वया निरिधार पर सर्वमान्य है बह--'य मार्यवे म पर्म बोपारण किया जाये यही धर्म है, प्रदि यो भाषरण में माया गाये यही पम का सन्ना सम्म । जिस धर्म को रैनिक म्पबहार में नहीं माया गाता यो केवन सन-प्रन्यों मोर शास्त्रों में ही बाप है, वह बुद्धि तर्क और मस्तिष्क की उहापोप का विषय हो सकता है पर दैनिक जीवन का नही। बर्म बीवन में पुस्तक में नहीं एक बार एक सम्त के पास एक उत्साही धर्म-मधारक पया। अपनी धर्म पुस्तक भेंट करता हुमा मोसा से परिये भापको बहुत मान प्राप्त होगा। मन्त बजे पहुंचे हुए पक्ति मे। उन्होंने पहले पुस्तक को मूंगा पौर फिर काम के साप ममामा। धर्म-प्रचारक सम्वनी की इन पेप्टानों को देख मन में सोचने मपा यह सा मूरपति? मानकी मगर इस पवितीय पुस्तक को पड़ने के बदमे यह उसे सून हा पोर कान के साप ममा रा है। पर बार मुन्दर विस्यपी पुस्तक को धर्म प्रचारक के हापमापस करते हुए सम्त बोले- 'पुस्तक देखने में ग सुन्दर है पर इसमें कोई मुगाव महापौर यह बोमती मी महीं है। पर्म-प्रचारक-पुस्तक में मना सी मुमन्य भार मी बोमने की पारित ? या तो मनुपम मान का पगार है।

. ममुमत की भोर सन्व-मुझे मानक भार उस पुस्तक से क्या मतलब यो मानवीयत में पन्न नहीं पैरा करती पौर सम मोमवी नहीं है। सन्त महोएर के गम को पारपूर्णपो निषि, ममे ही इनमें प्रगाव बान मरा हो । मे मार पुस्तकालय की पलमारियों को पोषाही' भाई प्राण्या म्पति नन्हें अपने पीरन में पारण नहीं करता है। पैननान्यो में ठीक हो गया है-'न पयों पामिनिका पार्मिक पुष्पों में भाषण में ही धर्म जीवित रहता है। वस्तुत पर्म पिपपारा पारो कामहीं। रतम मापारी पक्ति ही धर्म को प्रालयाम् पार पर बना देते है। सपा में मिट्टी के पार पौर निवती का नाम नहीं है किन्तु प्ति मोति और प्रभारयुक्त होने में ही उसका पतित प्राप-विहान पर हर्षमा निरक है। प्रम्पारमौरतोषिकासमवर पत्त ऐसे होने चाहिये शेषन-मामाग्य बारा मावरम में मामे मा । धनमे मीकि और पारलौकियोमा प्रसार हलो का पूरा समय होना चाहिये। पमर सिमीप रेमिबाट वम पाप्यास्मिम्माराफिक सर यह उस तारा सापही होगा जिसके सम्मान में बाल सारमें मेरही कम है- * बड़े बन में वापर। न हो पाया नहीं रह पाना प्रति मरि पर्म का सौरिस हो और ममें भाम्यारिमन्ना की पुरम हो पर यह स्पापी मान्ति र मासा मी हो माना। एना पर पीपीपीपों का करारम र निर्णय प्रणाम्प और मिस हो पारेमा। मर मात मा स्मरण रखनी चाहिए कि फिलीपी ममानिएमसीपी पर नहीं पिया पा माला। पाम्यात्मिाना और सोधिनावित तरा मुक्ति पुरा मम्मिमण भामार पर ही ममारा मान पाहो माता है। पौवा मरचम म्यापमपाय परप पाने मालो भपात के अनुसार गर्म पा नमे ममाम निर्माण में प्रमुश्त का स्थान पोड़ी मात्रा में भी किया हुमा पातम महान संन्ट से रमा करने गाना होता है। मित बीपन में प्रभात प्राचार्य पी तुमसीनी बारा प्रावित भरपुवठ में मापारिमक और मौलिक पर्म उत्तों का सङ्गिीए पार सुरम्प समन्वय है। ये सिखान्त नये है ऐसी बात नहीं है। धर्म के तत्व पार सम्म पापत हो होते। पर उनका प्रयोग रेप काम पौर परिस्थिति के अनुसार महापुम्पों के गम्भीर चिन्तन के फलस्वरम सराहरण के लिये गोपीगी ने एनीति में सत्याग्रह पम्प का प्रयोग किया। इसके बारा उन्होंने सिप में पेमा भरभुत चमत्कार किया कि भारत के इतिहास की विधा ही मरत मई। पर क्या 'वस्य' और 'पापसम्म भारतीय वर्मन में पहले नहीं है? क्या इन पों का माविष्कार मामाची ने किया ? नहीं पर प्राय पर इन रोगों का समन्वय पौर इसके पीपे अपने सम्पूर्ण जीवन के सत्य पहिया परीक्षणों का बस-पाहतो गांधीजी की ही देन पी पौर सीने पर एक एम में प्रणुबम में भी भभिक पप पर किया । इसी प्रकार प्रणुवत' में निदिष्ट पाच त कोई मये मही। पर उमरे प्रपोप की विविधाबार्य भी तुमसीगी के पम्भीर चिन्तन मोर रात पीवन के मसम्म नई इन प्रणुदतों में से एक पस्तेय को ही में । पान के प्रप्टा पार कदापार पोर दुराचार पूण समान में एक नागरिक का यह प्रत सेना कि बह मस्तेम-मृति पारण करेमा बो ये पा प्रमोभन पाने पर भी किसी साप पम पट प्रापाप पा पाहार महीं करेमा-क्या समूचे बातावरण में विपत् गति के साप एक पनिषपनीय महर पैरा मही कर रेमा ? पार हम देखते है कि पग-पम पर मापारी-पादक पौर एकानदार सरीददार एक दूसरे को मूर्ष पनाने और यमने का प्रयत्न करत है। हम पता कोनिक पीवन में पौर घोटी-छोटी बातों में मने में पारबागगरी रिपत भूठे दित बनाने पूरा न कर भी नाम न करन भने सटिकोर कर पुट्टियां मने पारि प्रारपिशित पहे माने मान लिया पिकपटपूर्ण महार भत्ता भी पनुमती पर एसने इस प्रत के पालन से पापा के अपने हाय में शामितमोर पप्ट्रीय जीवन में उम्सनवीय वा पायेगी। पाव में एक मुष्प पत पाहिसा भी है। सपूर्ण विष का वायुपात पार दिया और प्रतिदिया के पात-प्रतिपात से पिपात | सम्पवाभिमानी राष्ट्र प्रापपावर पम्पों के निर्माण में हो सका है। मासकी प्रारी मार मन्दनको १० मिनट में भूमियाद करने वाले गम भापुष तयार हो पये मो १६ में पापान में मानामाही पार हिरोपिमा नबसमय मणों में का पुना परिद सहारा है। पार तर्णय विश्वपुर की भूपिका समारोहीबी प्रसिप विकास थी पॉप रमेस मम्मों में एक्रम असमाहारीमार मानताका मन्द करने गामा होगा। महतो हे सामूहिक विवाह पविगत हिसा भी प्टि मीमानों को मात्र पुरीबत पाहार को ही में अपनी पाम को पूरा करने के लिए मानम पार भसम्म मू पौर नि पापी और कौर सर्वनों की हवा प्रति मिनिट पर या है। विमान सिपिरमा सौन्दर्य पार गृह-मोमा स्यादि पा में रिस पाने बानी हिंसा इमसे असम । मन्पों की पार मोरे पर भारतको ही में। यह कितने पहिसा के परम पठी पारिनो मापता को मारने का मिजप रियापमुपासी बनने का पार करने पानी भाग पी कोपमी सरपर मुसमपामा पपुनगा को सापा मेरे ममेनपाम में नहीं पा रही है। पाश्रीजीपापम्त मार प पर मरीजों को मगधी एसममले पाती दोरीभारतकी साम्प्य मंपिलो रामारी पार पम्य घरमाको पानिनपर प्रति पिया मालागरे नि भोग्न में पन्नी मात्रा को कम को मान मल्प पौरपाको मपिरान रिया माये गए माईगाने पापम सिरे भापौर मनी नया पुनर्वापासन निवे तालाब पार मरे प्रागन रिपे पाएँ । मानीको पाकर वापा पाये पर कारपोपोर मुरीमा माम भये समार-निर्माण में प्रभुत का स्माम मोगन का अंग बनामा बाये । प्रनगी गायनाम से माय गौ-रस्पा प्रषिक हो रही है। स्कूलों की पुस्तकों में और सहयों के प्रोणार्मों द्वारा मांस बनान पौर जाने की विधि का मोरों से प्रचार हो रहा है। गहरों में मोम की पूजा पर ही है और सुपर-पुतियों में माम माग्प मधपान पीर पूमपान तीनों का निरन्तर प्रचार हो । रिमादि पार्मिक समारोहों में भी सामिष मोगी निरामिप भागियों की प्रपेशा अधिक होने है। इस प्रकार के ताममि पर स्वास्थ्य-माप पाहार का परिणाम या है ? रेषा में हत्माकापाषा बोरी म्पमित्राप दुराचार पीर पपहरण की अनियन्त्रित वृत्ति । केवल रिस्मी में ही १६४६ की हत्यामों से १६४५ में पाठ दुनी अधिक पाएं हुई है और कई इत्यापों म भातकों का अभी तक पता नहीं भये समाजदीमीव इस पृष्ठभूमि में पाचाय पी तुमसीसी के मरगुक्त का एक माप पहिसा- बत फेबम ताकि टि से ही कितना बान्तिकारी है। पापवी को कम मे प्रम प्रपने पाहार-पवहार में तो अबस्य ही हिंसा से प्राप्त होने वाम पाहार का त्याग करना होगा। इमरा उमके शारीरिक सामाजिक और मास्मिट ममूने पीपल पर प्रभाप पोमा । इस प्रकार पणुपत मान्दोसन' मार के भारत के पतनो मुस समार का एकमात्र उसारकर पप प्रपर्म है। इसमें राष्ट्रीय बीवन को एक नूतम स्वास्थ्य कर और उम्पंगामी विधा में प्रप्रसर करने की प्रथम पाक्तिम समतोमुखी उम्नति के प्रेरक परामन-पान्दोसन प्रातः प्राचार्य श्री तुसमीती महाराज को भगवान पिप्पु पुल परान र राष्ट्र की एकमात्र यही कामना।

पसग चा रसना है सम्मारक, श्रीम-साहित्य चमार इतिहास में पाम तक कोई भी युग ऐसा नही पौवा विसमें बस सत्पुस्य ही एप हो और न कोई ऐसा पुर ही मिमता है पिस रन पुन ही हुए है। सभी युरों में भमे-पुरे, दोनों प्रकार के पक्ति पापे पर है पामे पाईपौर मापे भी पापे गाठे परे। यह भी है कि हर युग में ऐसे मेव-मनीपीए, जिन्होंने अपने मौत पीवन मौर रात पाणी पंतप्त पक्तियों को सन्द मुख और स्थापी मान्ति का मार्ग दिखाया है। जिस प्रहार मिम्तिा प्रहर के पहन प्रकार गौर करने के लिए पार प्राधमा होणार सी प्रकार मानव-वीरम मनुष निगरमा नीतिनिय पत्तियों पौर शनियों का प्रादुर्भाव हमारवा है। परकर परिवागावा और क्या होता है यह रि से जन्म मेता या नही पारि-मारि परम सताते है और उनके उपर विभिन्न मोमोस विमिन प्रसर है। पो हो, लेकिन एक रात में समापौर मह यह कि पारसी साप दुनिया की कोई भी भौतिक पस्तु मही पाली एप गुप यही गाता है। of महान् परि गर । मोह-माया मे मिप्य प्रालियो बवानी देते हुए बोहो मुन्दर र पा- 'समठ पाप पायेमा परमार रमेगा बंगारा। नौ मार को एक पम्प परि मरे में समरसत पिया है- 'प्राण पाहिर दुनिया से से मया गया। CY A मू। पत्ता ऊंचा रखना पे रोगों हार माती बाहर कफन है मिले। प्रश्न उठता है कि जब अपने साथ कुछ भी नहीं माना तो पारमी मोह मामा में इतना पर्यो सता है और प्रकारण मयों इतनी धीना-ममटी करता है? उत्तर स्पष्ट है । इसलिये कि उममें यह प्रकार है कि मैं बुध प्रौर महत्ता काला है कि यह मौरबह अपने अधिकार में मे पार की सारी पापिया की पाये ही रा पत्तियां पहंकार मौर स्था । एक तीसरी वृत्ति पार है गो पापियों की प्रति को सतत प्रम्बनित रमने में पी का काम करती है मौरबह है-पग-कीति की मूठी नामसा । एनिया का मारा सेल इन्हीं तीन कृतियों के बनवून पाममा बा रहा है। इन तीनों के हाप में पक्ति फसवमी बना रात-दिन नाच या है। कभी बह रामा का पार्ट पाता है तो कभी रंक का कभी पट्टहाम करके ईमता है तो कभी हा मारफर पेण है। कोई पूछ सकता है कि ममे भारमी ! या सप्टि प्रनारिकात से पमी पाई मागे भी पमती हेपी। प्रापिर यह टिकी मिम पापार पर है? पुणे की मीर पर वो कोई भी इमारत देर तक नही नही रह सकती। प्रश्न गिबहुम ठीक है। रत्तर है-दुनिया बुराइयों पर नहीं ममाप्यों पर टिकी है। कौन नही मानता मिणापा मोदती है प्रेम उमे जमात मसन्तोष म्पत्ति की पांचों पर पट्टी गोषवाई सन्दीप रमे रिवेक मे पाये गाने की प्रेरणा देता। भोग भीने पहरे में सफलता है, मंयम उंगाई पर मे गाता है मूठ कापर बनाता है सरप भारमा का विकाम करता है हिमा और के बोर मोती है, पहिमा प्रेम की वाटिका ममाती है। हर व्यक्ति के माये दो राम्रो है-- एक रमातम में श्रमाने माता पौर दूसरा है मौरीपार पी पोटी पर पड़ाने पाना । जो पिपर पायेमा पैसा ही पस पापेगा। एक मूर्नपा । उसके पास कुछ भूमि पी । उममें उमम यूम के बीचबाप पौर स्पना करने मगा कि एक दिन प्रामरे पे उमगे पोर उमे मीठे-मीर फम माने को मिमये । उम मूब पी मोनि पार पपिराा मोप रमातप्त मात मेमोर - मार्ग पर पत कर मौरीहर पारी पर पहुंचने की पापा मना है। मी कारण है कि हमारा तिर सामाधि एवं राष्ट्रीय जीवन मान मोपा हो गया है। हमारी पानों पर स्वार्थ का पर्दा पा गया है पर पर मी पर सवार बनताकाईनोई नैतिक शक्ति प्रादुर्भूत होती है-- माहे यह पुर महावीर मा नापी विनोबा वा तुमसी किसी भीम में हो। पार की पारी को दरमिप को मवयम हार गर्ने भारत विचार का मपमा महत्वपूण स्थान है। रमा मुस गेम जीवन का परिघोषनामा है। पाक्ति को सब छ कर हरि भजन की गात नही कहता उसका प्रेमपूर्ण पात्रह है कि महर है बह पहीं पे पर अपने जीवन मारा को प्रतिकता से दूर ले भार एसा प्रमाल करे रिसते असे दुनिया में भटकना न पो मुप पौर शान्ति का पनुमर हो। जिस प्रकार विनोचा के नाम पान्दोमन सीधे त प्रेमी सक्ति है ग्वी प्रचार प्रणुात-पाम्दोमन पीपे भी प्रमाही माह है। पार पनि पार पुदीएर र सिर से परस्पर जप रहे हैं मार मानवता मानय पी पोट भागों में कपए ही है। क्यों ? इतिए किमान मानक मानर नही पा है। पारितिबरिन नहीं बनने की है। मामला हा सपय एक भारी ऐवा तो दुनिया एप चापेपी । हप तनुस एपमा है । अन्तम हो गरी मताई पपड़ा रा रपमा है। पाण-पादोना में रामरामानय नामक तल से महर्ण मानापौर मिपा उन पर धमला है। भुयारही प्रसनता होती है कि प्रत विर तरोतर म्यापोवा या एा है पौर सत्यों पश्चिमी मोर मातपिठहो । रीपना है कि परिवार पर-पर पहुंच पार हमारे वीपन को पार-माप बनाने में सफल हो। 1 पापाय तुलसी का प्रणुक्त मान्दोसम -~~ो पुप्पे सहसम्पाट-अपनीवन, मन प्रदुषत-मामोरत हमारे देश के लिए पान नपा या प्ररिरित प्रभियान नहीं है। मारम्भ में भय मरे कुप मित्रों में प्रणुमत की पर्यापसी हो तुम ऐमा सगा कि यह माम प्राधिक पस्यों के इस पर-पुस की देन होगी। किन्तु सब तो यह है कि प्रमण संम्फति में इसका उस्तकास्पमा पर किया गया है। मानार्य तुससी पूर्व यह बात किसी के मस्तिक में मी प्राई कि प्रतों को मेपर कोई सफल प्रायोजन पनामा पा सकता है अपना सार्वनिक क्प से उनके प्रसार के हेतु मुम्पपस्थित पमिपान बनाया जा सकता है। पार तो पाचार्य तुसडी के मगमग ५. साथ-सामिया पार हगारों अनुयापी इम मान्दोमन के सदोमुती प्रसार के लिए टिबर है। कुप मित्रों में यह भी विचार प्रकट किया कि वो पमी महान है फिर रमके पहले प्रस्तु विशेषण सपामा मनुचित है। सरसरी तौर से सूनन पर पाव सी ममत्री है किन्तु वनिक स कर विचार करने पर विपण मी उप पौमिठा पर पाश्म मान पापित हो गाता है । माषान के लिए कृप पर तो मैं भीमह समता पा कि मैंने प्रषिक प्रग्या यह समय कि स्वयं प्राचार्य तुलनी के पास पाकर इस समय में उनके विचार प्राप्त एि पाएँ । प्राचार्य श्री दुतसी के सामीप्य में प्राने समा रनके एप प्रवचनों में सस्पिन हन पासूपयमर प्राण हुमा । प्रणुगत का गोकायाम बनके पाय इपा मह मवमुष प्राय की पीपित मानवता के मिए परदाम है। पर्म-गों के रायरे में हो पा प्रवाहमा पापाप भी में एक मोकौरकारिणी गगिरी मामी 40 t मत सी मोर - मगीरप पानोपाती पर उतार माये हो। समय साहित्य में प्रयुक्त पांच बताये गये। बो पहिता मुस्प मौर्य, असपर्य पार पपरिपा के नाम से विषयात सापना की प्रारम्भिक विवि में इन्हें पाव कपा मुनि प्रस्था हा पाते-पाते पन्हें पार महारत की संका बीम। माप तुममा में सर्वसामान्य के लिए इन प्रतों को पुनत म्यबहारिक बनाने के मार ही सम्परागत सीमामों के बयान से उन्मुक्त कर दिया है। उनके सिर से कोई भी पति भारम-विकास के किसी भी प्रकार सम्पाप में मही पापा पा सकता । अमुमत का मुनापार पीवन को प्राठि की पोर उसमे लिए मकसदरमा है। सापार का संयम के लिए कोई भी पीपा निश्चित करने पर यह एक मिए म्परहारिक तो इसरे लिए पप्पारित, एक सिए सरम तो पूवरे के लिए दिन है। निस प्रकार प्रयास के प्रारम्भ में कोई मन नही मनासा मा सम्मा उसी प्रकार प्रपति की स्पाई परमी को मन्तिम सीमा नही समा जा सकती क्योंकि मापना की कटिन कठिन मीमा भी निमी के लिए परन हो सकती है। विकास का प्रारम मा समाप्ति प्रमानुसार पाने का सक्रिय संगम है। मामले प्रसौम की मोरगाने का मठ अपार । प्राचार्य ममी के अनुसार वापना को पुरपाई की हनीपणा पाहिए, पौगिक सिमान्तों को निर्धारिता नहीं। भाचार्य एमसी के मतानुसार प्रभुत नाम से की माता मैं माना नहीं, बलि परिणापी महामिता है। मा सम पोप्टोर में रखी पर भी मही गुण रहते है, यो मापात पा में । प्राय पुरे में पारागीय पुणों से युक्त पार बिगान पुन की रिवारों से घिरकर भी वही पापाग है। पोय पापा रिनारी प्रोमा समाप की परेमा मही। प्रश्न यह रामपा या पानी कोई पनि भवन में रोशित होरही भाषी प्रगति 1 पुने। प्राचार्य तुमगी ऐगा पोई भाग महो। यो पनुमार पाल पारमन्मुपारी ! मनाप में न होने पीमहीपति रिली मी पर्म मामाप्रशय की सीमा में धर्म रितु उसे अपने प्राचार्य तुलसी का प्रपत-माबोलन पौवन के नेतिक परातम को उठाना होमा । मयानन्त मानवठा को मिर्मीक बीवन बिताने के लिए मय से मागना नहीं होगा बस्कि मंयमपूर्वक सामना करना होगा। प्रत संयम को सुव्यवस्थित प्रमति देना ही भररावत-पान्दोमन का मूमापार है। परयुक्त की बीवनपर्मा संयम का अमिक प्रभ्यास भोर भरगुप्त का प्रा पारमावलोकन है। पारम-विकास में दो कमी महसूस मही होती हो उसे घर करने के लिए असमनवामों के पोष से मुमर पर सपना को प्राप्त करना होता है। हो प्रयत्न में ईमानदारी भमय अपेक्षित है। मन प्रस्न किया कि ऐसा व्यक्ति जो धरान पेस्त या एसी ही अन्य वस्तु के रेचने का पेसा करता है या भणपत में उसे भी दो स्पाम है ? मुझे रतर मिता कि यह बेचने के लिए बाध्य है किन्तु पीने या लाने के लिए तो उसन बावा नहीं है। पासप उपमोम न करले मे सेपम को गहण कर माता है। प्रमुखत का गरेप माप की पोर र मुख होकर पत्तना है। उग्युन पपिक माय से कितनी से रपयों न हो यदि ठीकरिता में बन रहा है सक्यो समीप पायेगा ही किन्तु निमुन मनुप्प नाय के हितने ही ममीप पमना भारम्भ करे,बह पो दर ही होता बापेमा । महत्व पथ पर पापे या पीण होने का नहीं है अपितु उरमुख मार विमुख होमे का। पाचार्य तुमसी पार उनके संरके समी सापु पैदल चमत है। एक नगर से दूसरे नमर के बीच कितने मोग निवास करते है उन माझे पाम पौर प्रामवासियों तक भी तो पहुंचना है गएँ । के एक पैर मखनऊ में रम कर दूसरा परक्सकते में नहीं रखना चाहते । वे दो मार्म में पाने वाले जीव-वन्तुओं की पतिपिपिपी भी उपसानी से हुए घोर घोटे रगों स पापे गाना बाहर है पीर पYषत-पादोत्तन भी तो छोटी रोटी सौदियों में हो ऊपर रखा है। भगुव्रव-पारोमन में एफसवा पोर एक म्यवस्था माने के लिए मपनि कुप पिपि पिपान भी है किन्तु उन मुबमें सहरी अनुगमन प्रथा पारमानुनामन ही पपि माग्म-विकास को प्रारम-नियत्रण ही मागे सरेगा। एक प्रम में प्राचार्य जी में गह-मम पनाममपी मापना स E. मपुरत पोर हरीन म्यक्तियों हारा परणीय अनुशासन की कितनी उपेक्षा होती है, सब मोपमा पों में पाते ही हैं। पार परीक्षाएं पुलिस के पहरे में होने की नौबत पापा फिर भी प्रप्यापकों को मप ममा पता है कि कोई पनधिक कार्य से रोके भाने मामा असन्तुष्ट विद्यार्थी पुन मौकरे। इसको हम विपापियों का विपा प्रम मा मा त्रिी पीनन की चूट-मार। इस देश में एक वर्ग या गम मोम दोर निराकरण के लिए इमरे वर्म या दलको पातोपमा नही करणे, बस्ति ससा के लिए पाती-यमौर करते है पहा मोम स्पर्म और धर्म प्राप्ति की मरविणा में दोबापान की पापणा करणे है पूना प्रविप्प्रर्य करणे किन्तु हेर-सिप्सा कारण समान में विपापत पावावरण उपस्थित करते हैं। एक पम्प प्रवप में माचार्य मी ना कि यह पावोसन एम्पाभित या पूगी-पापित नहीं है,म हो सकेगा पौर , यह पिसी सम्प्रदाय विशेष पर प्रतिनिपिरत करता है। मावो परिण-पम का एक प्राप्मारिमा पलिवान है पौर पन-जन मिए । राष्ट्रपति ग. रायमार, पए स्पा पर प्रान्दोसन प्रति पमा प्रारले हुए कहा कि मुझे मबम प्रषि प्रसन्नता को इस बात की किस पदोनन में मायनि: प म मिया है। पमना ! पब मोनों में ये भाषनाए महीं पपE या कोई सामापिस पान्दोमन है। इन माम्दोमन TF मानिक काही सो मुनहो भविष्य का मतिक प्रवृत्तियों में मणूक्त -पी रिपमास सका सम्पारन जगत प्राणीमात्र में मुसपी रम्घा पाई जाती है और हर एक मुस-प्राप्ति का प्रयत्न करता है पर सुख की पा रस उसकी प्राप्ति के लिए प्रयत्न करम मासों में से बहुत कम मोग सुची पाय गावे है। इसमे यह प्रतीत होता है कि मुख प्राप्ति के मार्ग में मून हो ही है तमी दया पार प्रयत्नों के बावजूद भी बहुत कम मोग मुवी है । सुसी बनने के पो मात्र है। एक तो अपने मुख के लिए दूसरे को भी न बनाना और दूसरा अपने मुख के लिए दूसरे मुख की परवाह न करना । दूसरे कोप होता हो तो भी उसे परमपन पापमा मुसी न बनाना । एक में सबके प्रति समता का पबहार है इमर म प्रपन पौर मपनों के प्रति पारमीयता और इमर यो अपने मही है उनके प्रति पराया पन पपा दूसरे मार्ग में सबके प्रति समता और प्रात्मीयता का पहार है। पामा मार्ग पबहारिसों का मामरा सताका। म्परहारिफ माप ऐसा मानार ही पामते है कि प्रश्न मापको मुसी बनाना हो वा मरों का घोपस पिप रिना सम्मा नहीं। हम जिवन अधिक सोगों के परिपमानाम उठाएंगे रखने की प्रपिर मुखी होमे। इसके परिपमा पषित से प्रपिक साम उसने का सापन है-सम्पति।बर मिनी पपिए एकत्र होगी, हम उतने ही पपिर मुखी ही । इममिए पहेनिम माय में पोंभ हो सम्पति एकापी पाये । रम एका परन में इमरे का गोपरण हो या तुस भागने में दूसरे परिपपा प्रपहरण करना पोवा मह भी किया गाये । इममें मुस-प्राप्तिका सापन मम्पति माना बाग जर रिमन ६२ मातो पोर सगुणों के विकास को मुर का साधन मानते है। प्रदेश विधारसो मानियो तपा सम्सों में मुजरे पापनस्म ससुणों की सोर की पौर प्यक्ति वा समूह के सुबके सिप बिन पनि मागुम्मों का प्रमुख स्थान रिपारे पासा सत्प प्रमेय पपरिया पार पापर्य । सभी मेन मुम्मों को मामय पौरन वषा मानवी समार के येम लिए भावस्था मामा है। इनके बनेर माना जाति में समा म्याप मान्ति मौर विकास के लिए समान मौका मिल नहीं सकता। समीप बाने तथा विचार दामे यही चाहते हैं कि एक एसा पुम पाए निमम पान्ति सब समता पाय और सभी को विकास करने का समान मौका मिते । पर ऐसी स्पिधि माहिए जिस मार्प को पण करें कौनसा सान काम में माए, इसमें पामिना सपा विचारकों में मठमेर हो सकता है पर संत पार मानी तो यही कहते है पिनुमर का रासमा समौका पपनाना ही है मग्नि पार्मिक माने गानों में सम्तों के लिए पार हो गए भी पीपर में उनके बताये ए मार्ग से मुली बना पा एफेमा एमी निप्य का प्रभाव पापा पाता है। सन्तों को नमस्कार करेंगे उनकी पूजा कर कसरी पप-जयकार मनाएंगे पर पनमो मूग बसने में सम्माण है ऐमा नही पारपे । महापूजा प्रा नमस्कार पार पारर परपित करने में परमाण है पार इममे हमारे पाप धुम पाएंगे हम मुखी बन जाएँ ऐसा मानकर मामयी सरों को अपनाना परमी बामदे । इन पालो पानठे किरा पसेको का परिणाम प्रापमो हम पाह भी है, पर ममा पास करना नहीं पाते । मणुरत-पादोसान भूपाल मारोमन वा महार गरिमामोसन मारि मारपी नए पपामा रिये बिमा-गन् पीपन महार में नारे बिना भेप नहीं होमा रम निप्या रागृत करने वाम पामोमन ।। निने भी मानसपुण! पनार बीनपर्यापमा लिा एम नपा नमार मुगी नही बर माना। प्राणुन में रम ने मम मिना पानम मगर रनले पामम पर पाप पोपहा गरा।

मैतिक प्रवृत्तियों में प्रमुखत प्ररपुक्त मान्दोलन में कई विधारकों को पता नपता है, पर मम्प्रदाय रिप का सम पर उसके संबामक एक विक्षिप्ट सम्प्रदाय के प्राचार्य ।। पोतुसमागणीमी म मयुषत-माम्दोलन को म्यापक स देकर पानी उबर भावमा प्रकट की है। कहते है कि याति सिंग सम्प्रदाय मा पर्म का मेव न रबर यह मानव भाति के लिए है मौर मणुवतियों के लिए यो नियम बनाये है, सम्पापक है। फिर मी कामियों को पंका है कि उनका ममेटी माता का चोमा हो पर मान्तर में संकुषितता-साम्प्रदायिकता है। हमारी मर्म माम्यता यह है कि मनुष्य पौर यह भी ऐसा म्पपित को अपनी जिम्मपारी को समझकर एर मापक भान्दोमन पा रहा है परिका पम्मी होगा तो उसका दम्म प्रकट हुए बिना नहीं प सकता । इसलिए है पो सम कर रहे है गरि रपित पौर पम्पा हो वा उनका माप विमा पाए पौर सनरा पतिमापक बनाने में हम योग। उनम कोई ऐसी बात हो कि यह प्रमोम्म हो तो हम उन्हें र करने में भी साधन बन सम्से है। फिर पाचाप दुनमी एक सन्त है । सन्त की सापना से रे प्रपरिचित हमि ऐसा नही कहा जा सकता 12 बापन मम्प्रय या अपने धर्म के प्रचार लिए परि इस प्रान्सलर को पानाने का प्रपल पे तो निश्चित ही प्रपनी मारना में पापे नहीं पा सकते । पर हमारा जोप उनके साप मन पाया हमें पेमा ही ममा कि सम्त है पीर सापना का पूरा ध्यान रस र साप पानी बरखते है। इस बात को प्राची तप से जानते है कि मतिष्ठा परप्पन पा सम्प्रदाय का मोर सापमा में पाया पौरपयोगका काम करना पाहते है उसको मीमार करने बामा है। इसलिए उनका प्रपल है कि यह पादोतम मानव साति में सद्गुणों की वृदिल बाता म्पारक बने पौर सारे देश में पलने वासे भूरान मारनगरि मणुपत-पाम्दोमन एफ इसरे के पूरक बन कर मारत में ही मही मानर मात्र के लिए कस्याणकारी सिर हाँ नपा मानव विस मुरकी लोर में पता राम्ने गा रहा है यहाँ से मुरारी राम्ते ममे पौर मुधी बने । हमारी माममा प्रामों से मारना है कि हम भारतीय पागोमतों मनुष्य को मोर - में इसलिए योग र रिपरिपात मंसार का मातमम मियामी हिंसा मा माग करने के लिए मेहमापे की समसे धमार को बचाया नहीं गामाया ।इसनिए पति समार णमा मानव भाति के कस्पास के लिए भारतीय परि मामी पौर सन्तों ने मो काम मुफ किये है, पाणे गाने में मतियोग इस नीर्मो पायोमनों संचालकों की भूमिका भिम्नत्रिम है। पापा नियोगामी मार है दारतापनी मानी है और प्राचार्य तुमसायमीमी संपनी । पथपि तीनों मिर्गप एक ही स्थान पर मो है, पर भूमिरा में पम्वर राने के कारण करने के निम्नमिन हाये है। पिनोवानी सपनों में भागनो पन करते हैं। अमितों का दुर उनकी बस्ति बार है। समिए पिके पास नहीं है से थे, गिम पास ले मंगा है उसे देने को कहते है पर वे ममप कईस मपम रोपांद रिमी प्रारी प्रपेक्षा न रप कर ममामरस मार से देने का है। सन की ये रेने पासा पदभार में नहीं बता पोर मेने माना पीन महीं बस्ता । भूपन सम्पत्ति रान यमबान पीपरामपापीया का विधान परमा पाइका(पौर पर ऐसी मारमा प्रकट करमा पाकिमे ममान है पोषण मिट पापे माग मा माग पुरमी की नए हैं पिर मरने पर करें। मूदाम द्वारा माल सगुगों का विकास आपापी मानवीय महार में दो प्रतिपाई है- की बड़ी-सी तो पौरा कर पाने पाकिमा भीमबहार में ऐसा ही माम- महार दिना पमना नहीं रहे परने अनुमान एक ही पद रहरमानो हार मान के पनुमा पुप्त होने मेरे मातर माति को पर गरत रास्ते पर ले रेगर न कि पनाना भारत बनाने पर माता पाए पनि रविण परिसरा, पर्य, प्रेम, यमुना सरि मनुमो पर हो नमार पगार पान अनुप्प में जामानिमारको पानाम पाए पर मारन सिक प्रवृत्तियों में प्रमुखत प्पबहार मुरबमाफर मानव मपना विकास करे। ग्यों-ज्यों पीबन पर हागा मानव पौर समाजका कम्पारण होमा। पुनसीगणीगी समता के लिए स्पाम पौर संपम को अपनाने को कहते है। पहिमा या समता का पामन संयम के मिना मन नहीं । इसलिए मनुष्य सयम पौर श्याग की मोर रहे, यह प्रावश्यक है। यह कुछ न कुष पोग ही क्यों न ओ, पर पेमस करे, निश्चय करे कि मेरा साम्म प्राणीमान मति सम भावना है, उस पोर पड़ने के लिए में कम से कम इतना तो फस्मा ही।इसम समता संयम और स्याग के प्रति निमा बकर इस मार्ग से अपनी प्रक्निक मनुसार प्रागे बढ़ने का निर्देश है । जिसके जीवन में समता का अनुप्यन होगा पह पक्ति प्रसस्य, पोषण परिमा तपा प्राह्मचर्य को कैसे प्रेयस्कर मान सस्ता है। उमे इस काम में बहना है और यह पषु से प्रारम्भ कर यहाँ तकग, ऐसी पोता है। ये प्रवत कि चमको गोप की समता की पौर काम गहाना है इसलिए संयम और प्यार को बीवन में मापौर पर म्यक्ति अपना पार समान दोनों का थेय पापता है। इसमें संग्रह को स्पान न होने से पोपस पाप ही माप कम हो पाया है और परिणाम यही प्रातापा विनोबा मारनापनी भाना चाहते है।

सध्या मानवण
---श्री मोपीमाप प्रमा
प्रध्यम-काम कम्पमिति, रिस्तो
बताय हुमा तो बटवारे के साप और दूसरे महापुर की समा
। एमी गा में यों कहना चाहिए कि सतपता मैतिक
वहार भाई। कहा गया है कि पुर में उतना पापा
शिसना कि मानवता का होता है। प्रसंगी में तो हारत ही
प्रेम में सब कुप धक। भारतबो सिपाही पामे महापुर
समाप देशों में होकर माये २ अम्होंने पार में हिर
तावरण का पोपा बहुत पश्चिमी रम दिया । दूसरे महापुर
पौर मी पहरा हो गया। पोरवागारी भी दूसरे महापुर
मतिक पतन में परि जप कहर ए भी तो यह र
किरदी। पुरकी नियमित हिसा से भी बरवर विमान
मित हिंसा की । उसका विवरण रेकर परिण पन्नों को
पाता।
पिर महात्मा पोपी की पान मैने बामी मारित मापीगी
के पवार हिला का पबम ता का परम सेवा
f+ गापारी को समेह या पसी प्रकार हिमू-मुरिमम रंगा
पारसियों में मालिनीहनों में और पा
पनि में प्राचार्य पी तुममी में मन् १६ मे पणुपत-यारोमन
पार नापीनी मे महापाकि मस्याह पुगनी पीर पवा
पी गुनमी ने भी कहा कि मामुपत प्रापीन पर पैसे
१

1 अपुगत का सम्मा मामरण महात्मा गांधी ने सत्पापा को या सामूहिक स विमा उसी प्रकार प्रापार्म पी तुससी ारा प्रणुषों को मया सरिया पया है। महापती होना तो सबके बस की बात महाँ कोकि उसके नियम बहुत पनि है परन्तु अपना पपने समान प्रौर न यहाँ कि समस्त मानव जाति का उलान पाइने गाना परि मोड़ा साहस करे तो प्रणुपती तो बन सकता है। बात यह है हिपीरन को हम किस दृष्टि से देखते हैं। यदि उसका मल्प सापो पीपी पौर मौर करो है परि मनुप्प बस बिना पूछ का पम् । यपि भाविक- बार सत्य है वो फिर मैतिक विचार हमारे लिए भौतिक नहीं रहते। मौविक पार में भी कई म है। एक तो यह को पाकिका मठ है-- 'यावर बायेत् सुख बोदेव, प्रर्ष हत्वा पृतं पित्' पार भयो त पिरे' के स्थान पर 'सुर्य पियेत् होना चाहिए । दूमा पबह है जिसमें पुष नपुभ पारम-त्याग का पंस दो है, परन्तु सत्य पौर पहिया को समार-निर्माण का मूत पापार नही माना पया । पपुवती के लिए सस्य मौर महिसा को सपान का मूमापार मानना मावस्याहै। इसी परिसह भी मा जाता है कि परिसह पौर हिसा की सीमाएं मिमवी हिंसा का रूप भी प्रसरय की भोर मुगम से मृण्म हो सकता है। पये पाए पाना प्पाज सेने माता ममि मदिरा से कितना ही पदेन करता हो पार कितना ही सारा जीवन म्पटीत कला हो परन्तु मा अणुवती नहीं हो सरण । पदि कोई म के गानों को पार्वतों पर रकम रेकर अपने पापको पणुपती पमरे वो बह टीकमही । फ्तर में बम रिवन मेवा ही प्रप्यापार ही बपि सात पये में रत रापऐ काम करना भी प्यार है। पत' गो म्यापारी समचारी मगर या मसारी मौकर इस मामोसन में प्राते उगबहुत समम नमार प्रामा पाहिए । प्रमुग्न-मामीमन को भी पार नही यठरा पा महरमा मापी मचारह माम्दोलन को पापिन में मरापही पाताने पाले दोनों में पर

No text on this page.

२६
अणुवस ग्राम की परम प्रापश्यस्ता
-पी रुपमा विणकार
सम्पारक सम्परा
परमुवती संप मते ही हमें अपरिचित अनुन या मबंपा नगीन प्रतीत
होता हो किन्तु मस्तुत यह न तो कोई नवीन बस्तु है पीर न प्रमुत । समप
ममय पर इस म्पबम्बा का प्रचार पहमे भी थिमा गया है और पान भी देश या
पम्प रेनों में विभिन्न पो म किन्या गा पा । मुम्य स्प में मैं मरगुबती मप
के गप्प सममा हूँ-
त्याप पीर संपमपूर्वक जीवन ।
२
भतिकता एवं मनापार से मुक्ति ।
मानब जीवन के रो पहसू होते है-मामायिक मौर निगी--पक्तियत ।
भारत के प्राचीन इपिर्यों में रोनों काम्प बताये । पौष सन्तोष तपस्या
प्याम और प्रसिपाम पांच नियम है। इन नियमों या पों मा रहएम निगी-
पक्तिगत पीपन की उम्नति करना है। पे पापों नियम मामय की उम्मति में
प्रधान सहायक होते हैं। इसमें ममेह नहीं मिनु स्मृतिकार भगवान् मम
१
'पमान मेवेत सतत निरय नियमान् ।
पनाम्यतम्य प्रति मिपमान देशमा मनम्।'
(प.तो. २०४)
इममा भाव यह है कि यमौ पा पामन निःप करें, केरम नियों माना।
गो मनुष्य कैरन नियमों का पामन करता है पाँ की उसेमा कर देता है

No text on this page.

मत मानकी परम प्रारभ्याम्ता मम इन यमोंपामन के लिए समाग मा मरकार को अधिक कठार बनना परता है । पुसकान में पा-पों पडामा प्रभावबाला गया सोंपों सरकारें रापन म कन्ट्रोम के नियम बनाती गई। इन नियमों का मुस्पत' यही चाय पाहिबीवन की पनिवार्य पारस्यकलाएं हर एक नापरिक पूर्ण कर सके। इसीलिए भारत के प्रधानमन्त्री पौर निम्नस्तर के एक पवित के मिरा रापन पी ममान मात्रा नियत की गई। कपड़ा मिट्टी का रोस पीनी पारि के लिए भी माभाएं नियत पर री मई तापि कुष मोग उममे मंत्रित ही न रह पाए । यह रामन मा कन्टोम केवल भारत में ही नहीं बनाया गया । अन्य रेपों में भी देश की प्रसाधारण स्थिति को रेनकर कुछ नियन्त्रण समाये गये थे। समय रंगर में रोटी पाय तम्बाकू मार पीनी या कपड़ेगी मात्रा न बम नियत ही कररी गईबी पस्कि कापी बटा भी गई थी। पीर पोसीपी मांग अधिक थी। मम्पन्न मोम पैसे के बम पर पधिमपी मे में तो गरीर की हामत रयनीय हो गाए, इमतिय मरकार का प्रषिप्तम मात्रा नियत करती पी जिममे भषिककोई मम । पुरपार भी ईसनाकी मरफार न पपना नियस भ्यापारमाने तपा मम्यात म्यापार को कम करने के लिए अनेक प्रकार के कठोर बबन नमाय । माल पहा तयार ना पा परम्तु इसनेमागार म कम रिकता मा रिगों में निर्यात गाना मा क्योंकि गरको गिरमी मा की पावरपम्ता पी। सना की जनता उन वस्तुओं के बिना पो तक काय बनाती रही। पर भी एप मीमा ना प्रपरिप या प्रापन है। प्रान यह हो महता है कि यह सरल पान पर मरफार कालोम या राम हो म्परस्पा कर ही देती है तब प्रावन की पावरपस्ता क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट मिमी सर मनुष्य में मा स्पागनी सामाजिक माषमा उत्तम नहीं जो उसे स्वयं प्रपरिपहरे सिर प्रति बरे। गमरमचारी स्वयं कमोरियों के पुतमे । उनकी समयोगियों में मोग अनुचित नाम मते ! पौर नियम सम्पन परते। पर-रफ भय मेरे बचने की परस्पा कर मेते हैं। परिणाम यह होगा पिणेम रापनपी पति पिपिम पौर नाम हो पाती है। रार-नियम इस पो नहीं बहमता ६ इममिः -

No text on this page.

प्रयुक्त प्रारकी परम प्रारम्यता सूत्रपावर प्राचार्य पी एससी के प्रणबत का दूसरा पर्प परिण सम्पन्मी नैतिकता है। देश के स्वामीन होने के बाद तो हम प्राषिक समस्याओं को सुनने में और एकरम अमीर बनने की धुन में भूम ममे है कि देश का मैतिक पारिभिर पतन निस बी से हो रहा है यह राष्ट्र को पुरंत निस्तेज और निर्माय बना देगा । प्राप्यारिमकता या नैतिकता का सितिम समार में से नोप होता ना रहा है। पापय सरकार प्रतिकता की मोर ध्यान देना अपने पम्प से बाहर समझती है । इसीलिए में मापार्य पी तुमसी के चरित्र सम्बन्धी प्रतों को बहुत मपिक महत्तताई। मैतिक उत्तान पी रिस नई भूमिका का ये है उस पर पतकर भात प्रपने पारण की रक्षा कर सकेमा पम्पमा हमाप भारत मारत न रहेमा ।बर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका बन पाएपा पा फांस बन जाएगा यहाँ पैसा या वासना तपा मोपमय जीवन ही मार है। मण्बत कभी-कभी कटोर पार मस्यबहारिक पोचते है, किन्तु सन्चाई यह है कि प्राचार्य तुलसी परिस्थिति पर मानव की कमगोरी को अनुभव करते हुए काफी अपवार भी रखते गये है। वर्तमान प्रणबत परम मीमा नहीं तो वम उस विण की पोर मे गाने के लिए प्रथम सोपान का काम फले। जिसकी मोर हमारे पापाय पार अपि मुनि ने माना पाहते हैं। मंगलमय भगवान् इस पानोलन को सफल करने के लिए पनता में भावना उन्न करे, मेरी उनके निकट यी प्रार्थना है।

विश्व-शाति का महापम प्रणुव्रत
पाव समूग रिम पुर पौरास्ति मरण पर जीवन की।
मममम ए और मे कर दूसरे पोरा पण पर
मेष माताएं समुत्री सम्मता को मरण रिलाने के लिए पत्नयात प्रतीमा।
संस्कृति मौर सम्पाहार त्या पार पम्म में ममता
पी पाने में प्रमालपोत है। सागरी मातारानी
मुवीट थे। अतरित की समक्षा से भाग परमने का भय बन
मातापित किए है।
शिर युग की यारहवा और रोधिमा-भागामारी
हरसा मानताबीपन लए बड़ी नौती मिरको दुरी।
मौर रात परतीनीवन-सी बानीको फोहर मामा मात्र पर पर
Eिसान रित समय भने पोरे पास को गोपी में मेकर रखी
को निहायता उस समय पुरसमा मे मीनिच ही माना।
भूम-पमाना एक करो गोंगा भार र प्यान के लिए पेठने भामा
गिम पर मास में धान्तिरी ममहारिलीस स्पान पर पा
पाक रेमता है तो रोटी पोर मर घिन की पालना
बमिली रिस ममप भूतों की मापार सुनती है तो जापित दी भरा
कोरगा पाना मी पुरसंस्कृति सम्पर पाना मनी कोर
परगमवारि बौनियारी पूरा सहा परि में
पारस्थित है। बाबा राष्ट्र शामिरी का मरन
।

। सिर-याम्ति का महायर पञ्षत परब-कों के निर्माण में है। इस प्रकार मानवता की हत्या की नित-नई पोबनाए निमित होती पा रही है। वैसे वो सभी राष्ट्र एक स्पर से सीकार कर के कितीसरा पर विश्व के पिनास का कारण होगा कि फिर भी पुरकी समस्पा का इन माम तक पसनामों के पर्भ में पड़ा सिसक का है। इन सबका एक पका कारण है-मातिकमारी प्टिकोण । र राष्ट्र यही समझता है कि उसका प्टिकोण सही है और दूसरे का पमत । यही कारण कि हर राष्ट्रवप अपनी ही बात मनवाने का मन करता है और फिर उसमें सफल न होने पर दूसरे काप बन बैठता है। फमत रेप परता माता है अपन-अपने पक्ष के गुये का निर्माण होता है और उसके लिए भी या राष्ट्र प्रो पद को हम कर पाने पर प्रयाम करता है, कर भी पाता है। सरका पूत कारण है-पप्पारमवार पर भौतिवाद की गिरय । ऐसे पनैतिकता की भोर पाले मुग में सरा-मा से मारत तिस्ता का सन्रेम वा भामा । भार फिर इसी देम से विश्व शान्ति का भोप मूगाई। मनुपात-पारोशन प्यक्ति से कर समान समान से मकर राय और राष्ट्र देकर सुष्टि भर में तिस्ता केविर मोने में निम्न बिसरा विस कार व्यक्ति निर्मम होपर एसके किसी को किसी का भय महो। कोई किसी को भपाठ करे मभी भापत में मित्र हो सभी का बीमा पारितम्य हो। भौतिवादी दृष्किोण है पुर से मरने का भय है इसलिए पुस्न हो' पापारिमक पष्टिकोण है-'पुर मानवता का हमारा मनतिक मसिए मह महो। पामे दृष्टिकोण में परि एष पष्ट प्रपनी पुरमा (अपनी दृष्टि में) करतातो पुट मोर पाम्ति का रस लिए कोई महत्व नहीं किन्तु मरे एप्टिकोरम में अपनी सुरता म प्रश्न ही नही रटवा । प्रान स्टता है मतिमता पारबह पिर-सावी होता है। यही कारण है किबह सन्ना समाधान भी है। पान हमारे देश के हजारों कार्यकर्ता युम प्रवर्तक महान् वार्मनिक पाचाप भी तुममी पारा पोषित मरणुपत-पामोनन में पुट पाप महान् पपुवत कि मुनिपी नमरामसी पिस्पात पतापपानी मुनि श्री महेमरमारनी मे सन्तों का जीवन निगम बनों में पता न होरर मारतीय

No text on this page.

अणुवती सप पो मसक -पीभवमीण न भौतिकवाद बनाम पारम्पर के पेड़ों म फसकर मानर मान दिन प्रतिदिन चिन्तामों से नाम पापिया से म्याकुमवा उपायों से हिमादिक उप श्रम के बवाय नई पत में गिरता जा रहा है। न्याय पसीमित बनाएकी है। समपरस्ती पपीभूत होने स मानवता का पप से भोप-सा हो रहा है। मामसा प्रमोमन का प्रवाह नित्य प्रसारणा मिए पाया है। परिण नीति मयम पार पाप के प्रमार में सही पल मे बिमम हो बान पर भूम-भुनया में समान में फट जाने से मानब नातिन भार पपना बहुत को दिया है । भने की नीतिका मापार पर इसमें मा प्रपना रिकाम पौर ममा समभ किम भास्तव में पा तक मागीय सिमान्तों की राय में मनुभूषि मही हाती काम पधाएं नियन्त्रित नहीं हामी । संयममूनक मारमा का यो पपने बीपन पप में प्रवन नही हुमा यहाँ बास्तविक मानवता का प्रस्पुरम कहा ' दुनिया में पान विज्ञान के नये नये प्रयोगों के गुस्सपोम से नित्य नये गुणा हाए । मावों की सम्पत्ति पथ में मुटाईबा ही है। पर सभा निशान पास्तव में है ग्रोवन्ताम समता में सहिपता में पौर म्यादा महेो सवाल पौर सयम से प्रसर प्रवाह में पिसमें पहिसा निहित है। पुनिया के समम पार निवनी भी पायमाही समस्याएं । उन मबके दुष्परिणामो काम कारण है- मनविनता पाने पारमोबासी । मगर म्पबहारिकमा में पामिरता मीनिमार मपति पापुर होगा पागरिक मीति में प्रामाणिकता होठी म्पति-पत्रि में भाव होता एमपीय सेत्रों में ईमानगरी मधग होते हो ममा त

No text on this page.

प्रभातो संपकी समान के व्यक्ति को प्रयुक्तों के नियमो की मरता में पुराने का पूरा पनि कार। देश में पड़ी हुई मनतिष्ठा गितसोरी, प्रप्रामाणिकता पारि जो मिटाकर बन-बन के हरम में नैतिकता का संबनाप करने से दो विष शान्ति सम्भव है प्रन्यया नही। मम ही विज्ञान के मसीन चमकारों से दुनिया प्रभावित होकर यबाम पर परि शान्ति की पुन प्रतिष्ठा कली हैसा हमें नतिक पादौतन में सक्रिय बनना ही होमा पार सीमें हमारा पौर प्रष्ट्र का भमा है।

No text on this page.

मनुपात और प्रेम राग्य हो । प्रहर महामाता की सबसे प्रोटी इकाई और पिस्नायी वस्तु मणही। चिनका सम्स प्रणाम है। मथुपम में जिन परपुपों का सन्निवेष होता है मिश्रित प्रग्नु है । प्रणु को गानिक युधि मोर मन से समझने के प्रयास में है मकि साप, मन भाषि मुनि पौरानिक मारमा पौर हाय की भूपिम्प पापी प्रम थे समम भार समझाने के प्रयास महै। पैमानिका ने किारी समका ही विकास किया है कि भाषाप भी मसी न ममता के समक्ष प्रस्न के स्याणकारी स्वाप प्रयोगात्मक परीक्षण प्रदान परपुरत माम्दोलन प्रमी अपनी प्रारम्भिक अवस्था में ही है। इसीलिप उसके भविष्य का मसीमान्ति हरयमम कर ससके भविष्य का पम्प मममसर रमतादे पाप दस पर मरते पने का साइम मारण करना हामा । मापारण पनता प्रभी भग्नुधव की मम्भावनामों का पालन नहीं कर परेगी। पापरों को सस्पसियान करते समस्त मानवता को माने विकास के पथ पर बहाना हो होमा । इस महान कार्य का उतरदायित्व सापकों पर ही है। जनता पूरी पति के साथ प्रश्न का चिन्तन करल + लिए तत्काल परस्पा में ममम । उसकी पक्तियां पिमापीमा के प्रभाव में प्रमुप्ठ, उभपाना ही पशुपत का प्पेप। पार पिया का पोपभाष सो तो है हो पर यो कुपपिमा है भी, उसका प्रवाह भी एस्टी विणा में है। प्रारकी सिता पम्पारम-पिरोपी विनासकारी मधोपनीय है । प्रारपिता पर्प मिशती है। उसे प्रेम स्नेह सापना त योग रन भग्यारम पर पिपास नहीं। अभी दो प्रस्तुश्त परिप्य भी परपना प्रस्तुत कर ऐ है, सम्मन है दुध वापिक विमाों का तम पर विमाम हीन हो पापे, पर बिन गरीर के भीतर प्रारमा भोर एस नाम की कोई मनौतिकी रिपस्तु रिदमान होपी गेंता हमारे दिल पर पुष पिबार फरला स्मामाषिकही होगा। जीवन में मासी शान है जो पर्म के क्षेत्र में साप का होता है। पतकी म्यामारमा परिमारा पुषन पारसे प्रपना सरप पारगारमेनी

No text on this page.

प्रवत और प्रेमराम की अमृतमयी पारा का प्रांतों के बारे पामी के रूप में कस्यापी पति के परणों में समर्पित करके अपने-अपने (मानवी हत्या के प्रयास में किये गये) पापों का प्रायश्चित्तहरमे । माप्रती सापना के बल पर मृत्युभ्यमी हो सकेमा। वह अन्तर्यामी भी बनेगा । भरणुव्रत मा व्रती मानव परिस्थितियों का रास नही परिस्थितियों का सामी होपा । उसका मानम्-तत्त्व इतना पवित्र मौर निर्मम होगा कि उसके मानस-पटस पर स्वयं अपने बीवन की भषिप्य सम्बाबी तपा प्रामामी विश्व सम्मामी सामूहिक समस्पाों के मास्पारमा उत्तर सत स्वलिपि में पक्ति हो पायमे। पाति को सामूहिक प से पौर म्यक्ति को उसके सीमित बीवन के क्षेत्र में विषमतामों निराणामों पार मारियों से मुक्त करने की रिसा में। मणुषत पानीमन एकवी शक्ति ही प्रमारिपत होगा। या सामाजिक पा रावर्गतिक पपा पार्मिक पर्तमान समय में सभी मान्यताएं पुरानी पर गई ।। नन पर सरि मादिता का प्रावरण पा गया है। प्रणवत उनको हार एक सय पौर सक्तिशाली मानर समान की स्थापना के प्रयास में जमा है। यदि प्रमुपत की रिमा पिमी विधेप कारणों से पवमन हुई तो यह निषित नसा ही है कि मानम-समाग पूर्णतया विवसताकेपनों से मुक्त हो जायेमा। मस्तुपत कहता है कि दूसरों के हित-सापन के सिए स्वयं तपस्या करो। इस दिशा में बह सर्वोदय की इस कपसमा से बहुत प्रामे है कि सबका उपम हो यही हमारी कामना पौर प्रयास है। जब भतुत की रस्पनाए सासार होगी तो वर्तमान पी पत्रिका माम्यवाएं समाप्त हो जायेंगी जातिपाति पस्तित्व झे नहीं ऐसे सामारिक परपावरों को गहिक प्रथा भावरण में अब रंकार नही पा पा सकेगा। गृहस्थ जीवन मा प्रत्यय सदस्य एक दूसरे से प्परहार करते समय विषयवा के पावन से भषया पावस्याहारी पापिया से पाम्प न होमा। अधिनीय पौर प्रपोम्प ठपा पनियमित प्राणियों के संरपए- मार से पृषी सत मुक्त हो जायेमी पोंकि उस समय हमाप तय सम्मति रसायन भमानाम-नामनामी पूर्ति या परपु पी संरया में उत्तरोत्तर पनि १२४ भरतकामोर करना ही नही होगा। सब हमारी मारण होगीमा भयोपों से एक मोम मार नुमा सम्मा प्रगुती मारमा भरिप्प में हमें इतनी मक्ति प्रयास करेपी किमा पासपी प्रतीमा मृत्यु का भी करनी पोगी। हम बिना पम-यपहार किये हा, मौत पर बैठे हुए अपने प्रारमीय मिन दी भावनापी से परिपिस हो की। मुरगाम्वि महामारी बुकात की संभावनाएं समाप्त हो पाएंगी। हम अपन सी पक्तिगत प्रकृति से भी मनमिम, फिर विधान वि-पापी प्रतिस्पको समम सकने का प्रयास निम्न होहोपा समान पावस बोरिवानिक, प्रति वास्तविक रस्म को समझ सकेगा यह प्रमामा मही कठिन परस्प है। प्रकृति को समन के लिए मेरस मस्तिष पोहामो समस्त मायनाक भान सामनस्य होना भी पनविर्य है। मागुन विष्य में समार से पोपए पौर हिया को समम मिटाने के मन मे है। भारत के प्रत्येक मरस्म को भमे ही यह वर्तमान पारमा प्रबार पिसी भोगापरा पा रिमी भी बप पन्तर्गत यामहा उम मार ही पपना या पर बना मना है उसे प्रतिमा करनी है कि हमारी मनी प्रारी महेमान ति सामग्री पिप्प निर्माण के लिए स्पागकारी भविष्य निर्माण करने के मिय हम अपने मान का सरंस म्पादार पसियान करने लिए मरेप प्रान पता होगा। हिंसा-मुान ममार निर्माण में जो गिना प्रषित महमोम रेपा रवनी ही प्रपिर सरी कौनि भगिप्प बिगारी रिहास में स्प पति हो पायेगी। अभी को पल्यूमिरी पार की पी है। इस ममी तापमों को उसके लिए हर प्रकार का मूम्प पुराने में हेत मग परतुन एना ही पारिप । मुमारलाहीक हमारी गा प्राचीन पार पासम्म पस्पा है मीको पृषी पर परतरित कर स्पापित करना हमारा माप है। दो सैदानिक दृष्टि ३ किमी परगुती कामरे पापुरती मे समान ही पानी की दुनियारी मापमा में पपात अन्तर श्री for freभी पाहा तो भएमा र महीरिया में से मानो करारापोम माप अपने-मरने पर पर प्रमुखत पोर प्रेमराम्प ११२ - पमते हए परीक्षण के सारा प्राप्त मस्य को मापार करते हुए तपा अपने मनुमों को अपने जीवन की कमीटी पर पुष्ट करते हुए निरन्तर पामे बाने पना चाहिये। मेर के प्रम्त में हम फिर एक बार प्रान प्रारमीय सम्मों म साना पारते रिप्रेम-राम्प ही हमारा समय है।म उमझे पिए पीडी नमा मनग्म तक प्रमरन करते रहेंगे। प्रेमराम्य ही हमें प्रमरत प्रबाम र मोया। प्रगुवन मावनापौर प्रेम राग्य मम्म । इमी बर्तमान रोगी भोर मन्तप्त मामब ममार के स्याणकारी गुड मार का निर्माण व विकाम होमा । पामूम सामाजिक क्रान्ति ही इसका एक उपाय है। मापन की मापना ना मोदय की भावना दोनों के प्रयत्न इम बिपरितनानी मात ।। मन म्पति की पवित्रता के लिए बन का अनुष्ठान करें मानवीय पम्पाग्ग के लिए पणुमान को प्रशमित ।

पी रामहमद भारती ३ प्रास्म मिरोक्षण का प्रयसर एम. ए.,बी.. पिणावापत पणुपती-मय की स्थापना सारा प्राचार्य मी तुलसी में समय की माप पापकरके मानव-समारमिए एक महान निर्माण कार्य पिया है। पापीवी मापने जीवन-काम में सर्वोपय विचारवाया बो प्रचार किया उसकी पापपरता उनके पतिरामपापात् और भी अधिक हा ग्री। पांधीजीदेष के विमानन विषय पे हिन्दू मुस्मिम एकता के लिए ये गिरवर प्रयत्नपीन हे ठरा पगनीतिको पम पर ही एम पप मानकर पम प। उनके वीवम पाएक-एक कार्यक्रम पापारिममतापी विमान भित्ति पर पापारिवा। मानवता तया भारतीयता के प्रतीक रनर राम राम्प दीपस्सना एक पापम्पपीकसना दी। गांधीजी पहिमा तथा सत्य के मारी। रम पापम में मात साये प्रार्पमा का रापारण हाता था। उसमें ग्याप प्रती पर एम बी प्रतिमा की जाती पी पौर म्याप पहन प्रसार ~पहिसा मत्प मस्तेय पपपर्य पमा परीर-पम पसार एवं भय-सर्जन सर्व-प-ममानस सेपी-पा भावना सपा ममता। हम उस्त म्यारहातोंदा प्रापार भारतीय मम मियों पर है। और पर्म तयारधर्म में भीमगर पापमा बम रिपा पया है। frतीय महापुर परिणाम मनार में पतिमा का पिता बाता- पण फैरपा तो प्रथम महापुर के ममप में भी यह मारना सौयों में माहिरा प्रपम महापुरपापा मम्मी तपासाका मावस्यमी पारम-निरीमर का प्रयासर बात का साक्षी है। पापारी वर्ग प्रबमर की प्रतीक्षा में रहता है। विपीय महा पुर के प्रबसर पर वो पस्तुएं एकाएक गत मंहगी हो गई। बस्तुमों के मार पौर पौमुने होमए । सए का मूल्य मिर गया। लोगों की क्रय-क्ति गिरती गई। म्यापारी वर्ग तपा ठेकेदार वर्ग में कमाने की प्रवृत्ति तथा प्रबसरगाविता के वर्णन इए । वस्तुएं तया प्रश्न सामग्री वामार से धीरे धीरे छिपने मगी तपा सटोरियों मे परम-अपन पोराम मरने प्रारम्भ कर दिए। मरकारों को परिस्थिति से ठग माकर नियन्त्रण (फष्ट्रोस) का पापम मेमा पस। को भी पस्तु सरकारी नियन्त्रण में पाठी बह पीनही मण्डी से मृप्त हो पाती । भन्न सामग्री उपा रमिक प्रमोप की वस्तुएं मिमम्बित मूस्य पर मिमनी कठिन हो मा । मघम वर्ग के लिए बीवन-यापम को विकट समस्या हो गई। प्रन्याधी तपाइप मिमना कनि हो पमा। भूमफनी के वेनों का प्रभार पापमा । गाम पा प्राम उसी ममम की उस्मेवनीय पटना है। कुछ वर्षों तक पोरवारी पा बोलबाला हा। मार भी पोरपामारी पनप गी है। बात-बात में प्रमत्य की परण मेना मोगों का रनि कार्य बन पया है । माग्पीगो की पुकार मा सोनों पर इतना प्रभार नही पा पनि रामनीनिकायों में उनमे हए । पार्मिक क्षेत्र में स्तोर करमा रपित माही ममतो भी उनाने महिनापी पोर मनवा का पयाप्त प्यान बीपा। मतपता प्राप्ति के पाचार देश में प्रनलिका के पनपने को बहुल क्षेम मिम मया । पर-नोमुपता तथा सार्प की भावना मय मौर रिपाई देने ममी । पल तर गिम होगो ने रेगपी समानता केमिप अपना सब पुप मुटाया पा उनमें मे पषिश्वर पार पबमर पाने पर पानी मेवामा का अधिकाधिक पुरस्कार पाने के गुरु एने पसे । इस पारम्परिक हो में काम नया प्रय मरपामों में पैसे पामों का नामी मरस्यों का पोर मचाने वालों का सपा मारे समाने पनों का प्रमुख याने मपा पार पाम भार वर्षों में प्रारपा या हो मी मिनिबीवन में बिना भू बिना रिबन तवा मिना पोरवागारी कार्यपालमा कठिन हो मया है। पापार्प पीतुममी न यह सर तुपमा तपा नुमा पौर उनके मन में कफी प्रगतीपोर उपाप-पुनम हुई। प्रतिक मातावरस मनपा चिन्न ए सपा उन्होंने अपने पतप्प तपा उत्तरापिचर पान पर प्रपन पनुपापियों तथा मुनियों में विचार का प्रस्तुत पिया पार उनका पही रिपार पामे पसकर प्रणुपती मंच नापा पान्दोलन केप में मनता के सम्मुख पाया । गन बारगार पर्पो में नविषारपारामो कर भारत तथा अन्य देशों में काफी प्रतिया हुई। ममा नेता पार की परिस्थिति मे पम्प रितु सभी पपन पाएको परि म्बितियों में समापा या विषम पावें है। पापीनी कसिरान के पापा हुए सर्वोत्य सम्मेलनों मनी प्रतिभागों में मीरमापरिस्थितियों सपा मधों पा रस्नेय पिमता है। राष्ट्रपति ग. परेप्रमा- तपा मापर्व रिमाया मारे पास पाचार्य भी तुपमी की भेंटरों में भी इसी पापना के रपान मिलते है। पन पार पो म प्रगुपकी पारसने भी परिनिए उन सभी अप मदम्पा नपा पाराशिममम पिपान नियमारमिपम मा रही प्रना धारामा पाशाम तपा मारिएप पर माफी मन्पन मिा। पर मानवापा मापन रे मनम्बर में बने पापाव भपने चिन अनुमोवामान सपा समरिया उमस यह स्पष्ट पना बसता प्रिपात रिपारपारामा निरमर प्रचारप्रणमार्म भागापाए.पा प्रमा मन सरितमानमा परिमितियों पा मामला परना हामा । पम्न सिप निरि।

मारम निरीभरा का प्रपतर वर्ग की महत्वपूर्ण समस्या है। इसका समाधान मौ मणुबती संच उपस्थित करखा। सब प्रपने प्रतियों तथा सापडों से यह प्रापा करता है कि निक पीपन में बोर-बागारी सियत प्रसस्य भारि का त्याग करना है। मारवाड़ी समान धन-संचप प्यापार की बोरखागारी मावि के लिए बहुत बदनाम है। माधाम पी के अनुयायियों का का माप यही समार है। प्राचार्यश्री पौर उनके साधु म साणी-वर्ग की प्रेरणा से इस समार में नब चेतना का उदय हो रहा है। भागमता इस बात की है किपर मामृति उत्पम्न की गाए। मानव निर्माण के काम नैतिकता का प्रपनामा पाए। हमें पश्चिमी सम्पत्ता की तरक-भरक तपा भोर बिलासपीवम को घोड़ना होगा मारमझान की पार प्रप्रसर होना होगा। पीवन-निर्माण ठपा जीवन-स्तर को भा उठाने के लिए भावपमम्ता इस बात की है कि प्रारम निर्माण को मोर भाव का माम-समार मप्रसर हो। पापायी तुममी के घरों में-मात्म-निर्माण के बिना न तो माम्ति मिम सकती है पोर न सही पप में जीवन का स्तर चा उठता है। मानव-समान के लिए निर्माण यह प्रावस्यक है कि समारता प्रत्येक बम- प्यापारी वर्ग शिक्षक वर्ग महिला वर्ग मेवा बर्ग शासक वर्ग कर्मचारी, मगर बर्म तमा नगपुर और दामा-सभी में यह भावना मर दीपाए । में शिक्षा की वर्तमान पति को बदलना होगा। नरपुषकों से बहती हुई मास्तिन्वा तपा माविमार की भावना को देगक रचनात्मक कार्य में समाना होपा । महिमा वर्ग में जागृति उत्पन्न करती होपी। समारपी कुरीतियों को एटाना होमा । ये सभी कार्य प्रत्यन्त महत्वपूर्ण है। इनके मिए म पनिष्ठ मूक सेबरों तपा सापनों की प्रापरताहा हमारा मौमाम्य हैरिभाषाय पी तुलसी के नतृत्व म क साथ-साप्पियों मा एक-एक पण मी मारना के प्रचार में मपठा है। नया जीवन मयम का भीवन है। इन पापुपों पौर याधियों म पनेकवि है मेयर है प्रतिमावान् प्पाम्पाता है, पानिए विद्वान है सपा निप्पवान् । कार्यगीम मापुर। इनके होडे हुए ममुवती संप तमा रमा माग्दोमन मी हा नहीं मरना। पापयमा है दम मार्पणम पर पममे भी।

१२. पातीमोर प्रासारित प्राणुवतियों का सामों के लिए रिशेप रूप से प्रारम निरीक्षण पारित है। हमें वर्ष भर कामना-पोसा मेना है। हममें से जिन्होंने त लिया है प्रपा मिहोने सापना की है उन्हें मो हुई प्रतिज्ञामों को स्मरण पोहए अपने भीतर यह विचार करता रहा तक अपने रस्य पीर जीवन में पालन के स्मिारमा बौरम में पफम इप। संप पौर मायोप्सम की समता सरस्पों की मम्मा पर निर्भर नहीं करती अपितु उनके पत्तिगत पीयम के त्याग तपा पार पर पहले से ही पानी वा सकती है। हम निराशावादी नहीं है। पार मारा ममार भौतिकवादी विचारणारा से मेहस्व हो रहा है। यापित प्रगनिधीन राष्ट्रों की प्रमानारत की पोर पाधापूर्ण मि से रेप । मारत को अपने उत्तरायित्व का प्यान करते हुए फिर से प्राचीन सम्पाठा पा संस्कृति की पोर मुामा होपा । भाषा ही नही विरणाम है कि प्रत्येक प्राणी पावर पर पारम-नए तमा प्रारम चिन्तन भी पोर मप होगा । पावरप्वाइन पान्दोलनको परम्पर पापा की। इसके लिए कटिय परिभम परमा होमा और अपने जीवन को पेमा बगर हीपा किस पर बिना रहे हमारे पाचन मा प्रमार पो। यह हमारे लिए पमानामपरीसा में हम मन ऐमी मेरी हारिफ कामना है।

अणुक्त पौर समान श्री रमेशमार श्रोत युम ने परपट मौ है यमीन फटी सदियो उसमें समा पई । ममात्र का पुर-पुम पुराना पड़ा गमा चौबटा परमय उठा। प्राचीन मापी म्यवस्पापों के सिचाफ मनुष्य में एक प्राशर हो पिशोह प्रारम्भ कर दिया । मानब ने सोचा मिलगी लिमे हुए चुनाव की तरह महकने ममी है। मुख पेपर्य भोग-विलास, सब पारमी सारा पर नाचने सब। परिवर्तन नेम नमसमे का प्रभाव प्रारमी नि पार दिमाम पर पुरी तरह पा गया । पारमी नरपकी पीर में कमर पसार मोड़ने के लिए तैयार हो गया । जमाने के पामते हुए रवैये में रसे बताया कि माय उमाने के अनुसार न बसने गामा इम्म न इन्सान मही पानबर भारपार एक गेम है बम एक कोसमा । मूठ है । म मूठ, कपट पोबा, मिणामपात सब गायर सब उचित है। दुनिया में कोई बीच पाप नहीं । मपमान पादमी का प्रम मात्र है भोगे की पम्पमा है। भगवाम भार "म्यान है रमका पैसा है. उसको पुरि है।म्मान अपनी पति और मामर्प के बस पर मनमुष भगवान की तरह पुगाने लगा । समका नरकी पमन रिमाम बमाने की राह में मारा बधो पीसह पुताचे भरले नमा पौर हसी पौर मांस का बना रम्मान सचमुष ही भगवान नाम की पीर को मिस पर गुर भपधाम बन बठा । भगवान कोसी से हटा कर दुद उसने स्पान पर बैठने तैयारी करने ममा । रमने पर अपन पापको टटोमाता प्रममम प्रिया दि रसी बुधि इस पुनिया के मुकाबले में एक नई दुनिया बना मेने कम्पप देखने नपी है मिसरे मिए पर पाम पर मए पाद मौर मूरा उमामा । यह हवा १२२ प्रभुप्रती बोर पह गरमी या प्रकृति सब बस पर भएप से नए साये में रान कर पहर दुनिया में मार करेगा और उसका इमानी दिमाग र सूरत से वियप को प्रपमे करयों में रात को सपफ उठा । विज्ञान सी.मरसुत पत्रिका पानिप्कार परफमा फूमा नही ममाया । यह उसका प्रथम प्रपल पा जिसमें उसने अपनी सारी गरिएको मना दिया पा। मादमी की वापस से दूनी चौगुनी पम्पनी छतिया बटोर पर उसने ममीन पेसी एक ना पीर का भाविकार श्या । ससार उसका यह कतिमा भौचकी मिनाहों से रेसवा ए मया । कान्हमारे पादमियी का काम एक मशीन करने मपी। हमापे मारमी बरोजगार हो पए । साओं पारमिया के मुंह की पटी का कौर ग्रीन लिया। को स्त्रियों के माप का सिनर पुष गया। पादमी पानी पिमय पर मुकराया । उसने सौगा कि निरिक्त ही मना पौर निम्मी की एक बहुत बड़ी बागी उमके हाम में पा गई है। यह जीत उसी प्रभूपूर्व पीत मन यह पह मी समम सका कि इन्तान होकर उमस एम्सानियत का पता पोर रिया है। पुरका पर भर कर हमार्गे इम्सानी को उनने ऐटी ८ एक-एक दुको के मिए मोहवार बना रिया है। पिजप मप में दुत प्रभाभिमान में पूर सान दम्मान बीमा काम पासप स्पिनि मही देन मा । मन फिर परा झिया कि परकी र दिर यह मानी पति रारसिमा रिसापया 1 पनीता सिी हाप में साने पानी निगदी और मौत को बह पाने हप की रजतती बना कर पेसा पोर मामरा प्रयोग “एटनाम मार हाछोरन वर्मी कम्प में हमारी मिया पौर नगंगता से रमने पारमी की गिननी से पिसा परमा पुरया। मामों की मांगों पर परमरणाहुपा ताम पापे चपा । पर पाबारे पर पैसा का माप प्रषित ममा तर मानी यह पुरमा न ऐग ममा। मारपी से देगा कि यह उसी गारवाई मीन ही मी सीमापारण बन गई है। पर एटमस पार गरिन पन शिनी नलाना में दूमा एम्मानों के प्राणों के माप भर मम मानती ही नाम पर सीरी शिनी से भी नहन प्रमुपद पर समान १२३ नहस कर गसने की क्षमता रखते है तो प्रादमी अपने ही भस्म से पाहत अपनी ही निगम से परागित पार पपन ही र सदुधी पात्मा के उस परम की पीस मधुर माह में एक पान बैठ सकने को म्याकुप्त हो उठा। यह पुन उसी मशात पक्ति सिर की प्रार मुमने मगा जिसको कृष दिन पहले अपनी विजय के नशे में उसने उपेक्षा सर फेंक दिया पा। पादमी अपमे वर्तमान जीवन से प्राण पाने का घपटा उठा। जून देसफर पर उसका दूनहीमा मही उमस भून पड़ने की बजाय भय से गसने मगा । तो उसे दून की कीमत मासूम होने मी। यह पहिंसा का मामय मेने को दौर पर। उसने देखा कि पम्मान का एप परम पौर हिंसा से नही बस्ति पहिसा और स्नेह मे जीता या सकता है तो वह अपनी भूम पर पापात्ताप के प्रामू बहाने लगा। ऐधर्म व मोग बिमास न या समरे सुन्दर घरीर को सोचना शास्तिहीन पोर मोरा बना रिया पार पसमय में ही उसे मौत की खाई में खेत रिया तो उसे सम्पग्लिना पोर नतिरता की कीमत मामूम होने मगी। पर उसन पा--औरत की बाप कमनीयता एक मिपा-मुठा भूटा हनिम सौन्दर्य मात्र है ता पाहवय के वास्तविक सौन्दर्य की प्राप्ति के लिए निकम हा उठा । मित प्रसीमित इन्यामों का विस्फोटीकरण पर उसकी गागोदने मगा ठो उमे ग्रह सीमित करने की फिर हार हुई। इम्मान बाध पारावर पाप पारमा की पवित्रता समठबापन करलेको तावमा हो उठा। बह समझ गया पिर किया पया उसम मपनी शक्तियों का दम्म केबल एर उसको मटन भी उसका यह पर्व भूम पा ज्ञापमा या नहीं। उसका प्रस्तिरण इस समार में एम पीटी फेबराबर भी नहीं है। उसमी यह सब गारिया उसके लिए सामोपामिर बेटी है तो यह पर्म पीप जयकार पर सपा । पारमी मास्तिम मान्तिरामे मगा। पम धागारन में उन माम मैना मारपEिT मानता पाप जो पुप समय पहपे उगकी पगारपाना पर प्रहामना मसिनो पमा बा पारे पीर पुन प्रपनी स्वामामि भवापा म मान समा। परनु १.. मर्प की गुमामी दधिमी सम्यता तया उगरी मी निर्मित परमारामों ने उसे प्रबरकी पोर १२४ प्र.पर से इतना मार दिया पाकिया पसंम्पेरण पानी रम स्थिति में मही नोट पाया। पार बम र प्रतिसत म्पषित ही ऐसे हवा पपनी सामायिक अवस्था में मा पाए हैं। प्रतिगत अभी भी उसी पनान और पम्पकार के भूकमया में पसार पाट ए है। माग भी बिना प्रौर परवारी का पर अपनाए हुए हैं जिनके बार उनकी जिन्दगी पारिरी सांस छोड़ देगी। पीता में पौरपण मे पहा कि 'पप्पी पर जब सब मी पर्म का नाश होता पौर पमुर प्रतिपरित ने ममते है तो मैं स्वयं कोई न कोई प्रबनार कर पृप्पी पर माताई मोर इस प्रकर्म पीर पाप के प्रग्यकार को मिटाता है।" नमी प्रकार भारत के प्रबर्दक पाचार्य श्रीतुममी का भागिर्भार मानवता समौ पिरो सामाविक मरम्पा में मामे को मा है। परमुक्त पायोमन रा पार तो बह मौनों के हाय में शाम पीर बोगको मपाम बना है। उसमेवारों गानों पक्ति भार उचित मार्म पा है और हमारों का यह प्रराम स्तम्म बनकर पा उन्हें उनके मानदी भोर गरेत पर रहा है। मप महिमा मान मावना तपस्मा अगुवन म्पी दराफर, विरें गार म्मान इम्मान म एकर पता बन जाता है और मनुष्य अपनी कृत्रिमताको पासमाविक वस्पा में मा जाना है। माने पापमे माहत एमान सत-विसन हापुस । दुनी और प्रमाणि होर पार यह पान्ति पार मायापार में मटर रहा है और मनुषतमी अमाप पार मी उगी मसन की ममाणिलिए मोतकर पी है। एमके पार फिर मान का प्रा होमा। प्रभार मस्प पहिमा, मापमा पौर करपा पप परमार पप निरिट पान पर पार मोमा।

मणुवों का पुनगम ---श्री शीला साहित्पन नीति वियक मौर वाचार बीवन प्रहपी बीबन सकारानिये पर मानव समाज में भने तवा विषमता मोर घोपण रत्पीड़न की मारमा मोर विमिसाल में पानाती है तब हमारे देश के अषि-महपि ए साधु-सन्त उन्र करने लिए वत्त चिदम करते हैं पार ये अपने बिन्धन की सहायता से समस्यापों मा समामान र मानसमार को नई दिशा की मोर नवरित करखे हैं। मनाया पार तत्ती प्रषि मुनियों की परम्पप अपने देश में मान्य रूप से सतत त काम को परवी पा रही है। मार भी कर रही है। जीवन के प्रति भोपबादी दृष्टिकोण उच्रेषवादी सप्टिकोण है और पहयोपण भावना पर मापारित है । जब मनुष्प एसरों की मुस-सुरिमा का ग्माय-मन्याय का धर्म पपर्म का निधार फाकर रेहका साधक बन जाता तब उसके भीतर पमे मामी पारमा मपुप्त हो जाती है और वह पार भूत पा दम्प मा मैटर का उपासम्बनहर परम शुर महम् रे पापन-मोपण को ही पपना मदय बना मेवा। फिर समार में सीमा माटी भीर मामा-बापीरे बाताबरण के कारण पोर पसन्तोप पा पाता है। मनुष्य-मनुष्य को भाई-भाई को अपना दुश्मन समझने सपना है पर यह पसार मरमपद प्रतीव होने लगा है। ऐसी ही अपस्मा में पुराने सत्पीका पाचरण पार सरापर सपायी सिरान्तों का पुनर्मम्ममा करता है। भारत ने दासता के पुम में ही हमारे भाषि-महर्षिों में महापुरुप पौर महारमा अपने माम-मंपन केशारा पलों का साशासारपला प्रारम्भ पररिया पार परमहंस पी पमरे बारी-बारी से हित इस्माम पार प्रमुखत भी पोर १२१ ईमाइयत का प्रयास करके मभी बी के मीना पहुए एस का उपोष पल हुए पापा-ममी धर्मोपा मममय होना चाहिए । उयम विपि पर्मों मी उपासना-गति पीर उसके तत्वों का मटम्म युमिम मितेपम्म करके समी पर्मों के प्रति प्रतिबुद्धि और भतापा मार गया। उनकी यह बम भारताप सोही मही गित को बहुत पसरी देन घो। परमता के उस युग में पर हिन्दु मुस्मिम मनस्पा माराया गाहा पा परमहंम रामायण की यह भावना मनी मम्प पुगीन पारिवारिता पौर कट्टरता पर मानवता की विषय पी। पौरनर माये मागिदा पनि सामने भारत की सवलता । प्रम मोग पा पृमीमो मप बनाने का पपी स्वीकरण मा रेश्य ही प्रमार या। उन्होंने पम्मी को स्वर्ग बनाने की पसना पी। उमनि हमें बनमाया निमन्स या मनपी सीमा से बुटिकेबरे से ऊपर उठो। तुम पाप्यात्मिाता पापनमन करते हुए दुम्मिर मे कार उठारापमानमा निर्माण करो। उनरा पाना बा कि अंगमा या रम्य में पीब पीपस दिपा मामम बी उसनम ही मानम में पनि मानमा विकास होगा। प्रतिमानम " स्तर पर पापकर मनुष्य को पासमाने-मममममे पीजस्तनही पगापेगी किहम सब माई माईममुप्प-मनुप्प ममान ! समी एक उस समय मह इस सम्पका स्वर्व अपने जीवन में साक्षात्कार करेपा। मामापरणस्त इस मरप को अपने परिप से प्रतिपणा पार तब पेवनारे सर पर उतरने पासा पति मानव-यो मीरने या शबानपा महामानपदप मामर नाही परिषदेत पर पति मानगरे सर पर पापाहमा मगमानव होमा समार मेरा | पुणीमा स्वर्गाररण परेमा। पपीमो मर्ग बनाने पीपेप्टा में मीन ऐना रनरोप और पारपरिकवरता पापर्य पमन हो पाया। राग से मार ठार तरप बुरि पारम-पिम्मेषण करते हुए हम भार भूमि पर रिसर लि मन में यह मनुष्य गमार-मेगा में उतरेगा भी दुनिया के रुप में विस्तार होगा। मी मनुष्य की मामूहिट मुक्ति का मार्ग अपन होगा। समस्त मारमापों को भरने पति में पानमा पले हुए मनुष्य मपुत्रों का पुनर्जन्म १२० पागरिक युखों का पाविक के हारा नहीं मानवता के बारा पमन करण का मार्ग प्रसस्त करने पाने और पूणा विप एक पता को जगमीपन की निमानी बवमाने माने महात्मा माग्भी का प्रादुर्भाव हमा। उन्होंने बताया कि अहिंसा मत्य प्रस्तेय पपरिग्रह मौर मचर्य को बीवन में उतारना होगा। प्रतिपक्षी की तोपों के कार पहिसा पक्तियों स पियस प्राप्त करनी पड़ेगी। बीरता मारने में नहीं भरने में भी नहीं, अपने मन को परा में परम में पौर प्रपन तपापित विरोधी एप को जीतने में है। महात्मा गान्धी में सत्याग्रह का प्रवर्तन किया-वीरता को नये स में उपस्थित किया। इन्ही महापुरुषों * सापना मात्र पर बमकर मारत मा हुमा । भारत विसको परप्रीम.का मारा दिया। सरपमेर बयने का सपोप-मुनापा।- मंसार में उसकी कीति म्याप्त हुई। विक्रम विष को ना मानबता पा मग मिना। मह सब होते ए भी देश में विपमता पौर मनैतिकता का वातावरण चरम सीमा पर पार पहा बा। प्रनतिमता क बातावरण में रोमगाने की भूमि समस्या विष्ट होपमी पी पार रेप को पपने ही भीतर प्रनिनिता का साममा करमा पा पापा। देश की मबारित स्तमा खतरे में पी। ठेगाने म भीतर भीतर असम्तोप की पाग पाक पीपी । इस पृपभूमि पर मन्त दिनोगा पा भापमन हुमा । देश में इस घोर से रस घोर तक मार की महर गाप्ठ हो उठी। सब भूमि मोपाम की' का नारा गुण ग्ठा । मूदान सम्पतिवान पुति रान और पीवनदान के मर-मए गोप सुनाई पड़ने सगे। मता-ममा रागनीति के मान पर मोमीतिमा माविर्भावामा। फिर भी बावाबरण निराश पाईपी। पनतिमताबामामा। पन मनुष्य की पठी ममिप समय पाम मगा पा । येन पेम प्रकारेण मुम सुपिपा पार सत्ता-सम्पत्ति को जाने में नोम नम पए के रिहोंने कभी अपमान् महावीर की पालो पुनी थी, चिन्हनि मौतम पुरा पदेश सुना पा पौर महो रामप्स परमहंस माविर पौर महामा गाधी हे शिवार पूज प्रमातीमोर असमय मौर्य और स्पानियों पयस्वामितिय पर सोईसों की पस्वियों की तरह र सेवाम्बर वेपपापी मुनियों की टोली भाचार्य नुमती मेतृत्व में संयम अनुपीयाम्' पपपोप करती हुई सतरी मोपों ने विस्मर विपरित नौ से इन पंच महावठी मुनियों को सराएकी संस्था में मही मा पासो भी संस्था में मैन मुनियों एवं साथियों की टीनिया मुष्पट्टी पाये मोहरण प्रोर सिपा-बार मिए बम मिया मांग की है। गे मुझे भिमा पर पुमे नहीं चाहिए, मुझे सम्मान भी महीबारोप बमकारका पोम पुगना मी मन्या नहीं समझता । परे परनों । मुझे पीली कौम को पूत की मामा मो नदी पाहिए। में तो सिर्ष तुमारे उपयों aftart हुम्हारे प्रभात की मिटा मापने पाया है। सो, भर दो मेरी रोमी और मह मिमा मते सपम अन्तराति से भरी हुई थी पा उसी प्रारठी.गकी पानं भोगन पार मोर प्यासे की प्रति पानी पर पुस्ति से पमा उनी से मोटरों की सारी को रेसार उम्मीदवार पति पौर से शान-पोको पारमन्त सिमोस की पाल पाणी httpर पारीयों की पविभपने रब की पारा सनी या मयुरनों का पुनम पाईपम गनु नोरमा काम। हीरों में पाव से हावर्ष पहले मराठा मोर मापा मगोपनिमा मारमा पुप पी गुप सी प्रकार समता सगुन तिराधिकापुर पा भोनगम का मुना और समस्ती माविका पुकारापान मोग- पाटिलों की पह कपुरभी पास ममा पारिभाषा रणाये उस युग में भी श्या कोलाहल गुलाब पापा पा~मा भार मुमा पाई। पर में निरतामापोसाता है और मात्र Mitute मे पार पाएदेश की जनता ममता मति पर पाना र परम और परमार को एप में और रिप अनुनतों का पुनम १२२ दुनिया पिम्स के कगारे पर पड़ी है। एक माटी-सी पिनमारी मी इस परमाणु बम स्पी गणतान में पाकर प्राणियम का महार कर सकती है। पार पयत में मार पौर प्रतिमोप का पातामरण म्याप्त है पीर मोग भगवान् महावीर की 'मिति मे मग्न भएम, ये मगमन पर प्रात् ममी पीरों के प्रति मेरी मनी भावना है रिमीमे मेरी पता नहीं है, इस बासी को भूतते पाहै। उपर्युगत पातावरण में ठीक ममप पर प्राषिरय-अनौचित्य की समत माधना में तीन पंच महावों का पासन इले माने अपनान् महातीर के मनुयायी पेनाचार्य पी तुमसी के मैतृत्व में प्रगुणों का पुनर्गम हुमा है। परापतों के मियाम्प इतने पुष्ट पौर इतने शक्तिपानी है कि पिछपे शाहगार के पानी-पानी से भी अनिष्ट नहीं हुए। महाकापफी माती पर पार रोपरचो होने बाते मनर सरीर में पावर ये पार्थो मियान्त पठि को 'मोरमीमान् महतो महीयान् को परिमा से मारगाम्बित करने माने है । इनसा नपोप हमें मानस मर्म कोमाहतपय युप में सुनाई पाहा है या पूर्णिमा का पार हमारे करि मेखकों के लिए पाबत की पाठी की नए मामूम पाने मगा पा र चमता हा सूरज तवे में निकमी हुई मास-मात ऐटियों की तरह प्रतीत होने मगा पा पार पा माकाग के प्रश्नपत्रों में भी जाकर हम गोरी सिको पाक दिखमाई पड़मेमगे पेपर यह मुगाई पाने सपा पाकिधर्म पफीम है सारे संसार का इतिहास बनेन्मपर्व का इतिहास है और ममस्त कलाए, समी पुरपार्ष सूषा तिपा पक्ति ममता के भीतर विपी हुकुम्यों की प्रती। उस समय राम पपौर मुणों से रहित पमपप्प झील की तरह माग रहित निर्मम एप बाम पाचार्य तुसमी के मानम में पो परतुवों के द्वारा पीपन रेमीटर पपाति में ज्योति पाने का मापूण मानना को मा मुक्ति पर पर मे पमने का पारा उगवा मानव की उप-यात्रा का प्रतीक है। मिस माम्नि महारारा उसयन प्रयास महामेन पार मगपापिपनि हिकमार के युग में न तोंरा पोष सना पा समी प्रसार पार माग्न फिर में महापौर १२८ स समर पोरों पौरस्यामिों परस्पान के शिविर पर सरसों की पत्तियो की तरह बेर सेताम्मर तेरापम्पी मुरियों की टोती पापा दुनमी के मेतृत्व में संयम पनु बीरमम् कारकोप करती हुई सतरी। मोपों मे विस्मर- रिस्पारित नेत्रों से इन पंचमहादती मुनियों को देखा। एकमो सस्या में नही सारे पड़ सौ की सरया में पैन मुनिरों एवं वापियों की रोमियो गुपट्टी बाये रोहण प्रौर मिजा-पार लिए उनसे मिसा माप ही है। रो मुझे धिमा रो न मुझे नहीं चाहिए, मुझे सम्मान मौ नही पाहिए. मोर पपकारमा उपोप मुनना भी मना नहीं समझता। परे पपनों । मुपे फूल पोतो कौन बनी माता भी नहीं चाहिए । म दो सितुम्हारे दुर्गवणे की सिता की तुम्हारे प्रमारों की मिशा मापने पाया हू। सो मर रो मेरी मोही। मौर या मिना मेरे समय पम्वयोति से भरीर उनकी मारी रसी प्रसारपसाठी भूमी पापोगन पामर और प्यासे पी पांडे पानी पीकर दृप्ति से पर उठी है-से पोटरों की कवारों को रेबार उम्मीरवार कीमा पार सेरान-पों को पाकर सन्त बिनोरा बीमारमारती तपासे अपत से परकर पाई हई गोपों को मार पपनेपोको पार ती है। परमाणुओं का पुनरंम्म यही संयम पानु शरीरमम् का पुनसम्म । वीरों ने पार से मारोपर पहने महारतों पौर पनों का मोरया पा। वह युप भी एप इसी प्रकार स्थापना का युग पारिपार-गति का पुग पा मोररावा पुरवा मोर सापम्ती रितासितारा युम पाापार मोप पारियों की सए रस पुप में मौ रमेवाचारों में पिरोंरा हररंप मचा रखा पारिवारपायरों की पहर से रस युग में भी ऐसा कोसाहम मुनाई पा रहा पा-सा मार मुनाई पापा। मारपुर में नारितामा दोतराता मोप राममा मेमन्न, रिलासिशामर में मराब होकर बनतारेपरेप की पनवा न केवल एक भान्वि पर पामरा है पति पशुपम पर परमाणु बम को हाप में कर अणुव्रत-पान्दोलन -भीमसार सिह बी. ए. पापूनिक पुग में भौतिकमारी मम्यता मामाग्य हो मर्माधिक गतिमानी है। हमारा दृष्टिकोण ही मौतिक हो गया है और हम संसार की सभी वस्तुओं का मुस्यांकन भी इसी मानर मे करने तप गए हैं। समार का राम मगत सराही नसन रप्टिगोचर हो या है। मानब में विज्ञान के बस से मनकवि प्राप्त की है पौर पर मास सपा म्पान पर पी हमारा प्राषिपस्य स्थापित हो ममापिषम का निर्माण इमा । संसार की माने पूर्णम मौर पमम चोटी एवरेस्ट पर हमारी नियय यता महरा रही है। हम पायु में ना नकले है। पानी के बप को पीर पर अपनी ममीप्ट मिति र समये। मानों हमारी गोगों की पूरी पर निश्मी हुई गाणी का पण कर मोमिनु पपरे पन्तर्मन भी प्रस्था से अनभित्र है। यहां एक बार ही हपा पोर प्रणान्ति है कोताहम मा हुपा है किन्तु राम पर सोचने के लिए समय हमारे पास नहीं है ।इमका मूम का दिन मानव-ममाम के पास मस्तिष्क पोप्रोकरहरप या पारमा नाम से वही नी रह गई है। हम मिय परोकनमापार पर पौरपदीनना को ही मनुष्य की मानता का परिचायक मानानपुट प्रमान्ति पाठ मनापार म्पभिकार और नामनातून मामय पामरिकम्पहारों मे पति की मानपमा कराह उठी पौर पर सेवाग पाहिए, परमपा मानर अपनी सीमा पर प्रतिमा कर भारत बन पायेगा परि समार की रची-पी पाम्नि भी भस्मीभूत हो पायी। पमा सिरा मानर पार दो रिमार्यों में पटपर एमविएपन पर गत पर पौर रसार में सामय दिनानिमित माती पोर पर वापी सून रहा है। ठीपंपरों की परम्परा को जीवित रहने वाले बन मुनि पान कर रहे है-पयुक्तों न पावन पखे हए माता की प्रोर बसो । समी पीप तुम्हारे मित्र है। तुम्हारे पा तुम्हारे बाहर नहीं, तुम्हारे भीतर हो तुम्हारी पनतिकता में रिसोरी में परिपद में मार मारपर्म में पि है। तुम रटो तुम गापो इन पार्यो को-काम-ए मद मोम मोर परिणा को भीत कर तुम विनयी बनो । तुम पानी बेवन हो। तुम पुपों (परमाणुों) के समूह से निर्मित इस पर भीतरमा प्रपनी पन्तयत्मा की पावार को पुनो। तुम पागो पौर रे दो मेरी मोना में मपने उम्र्यसनों का रान । मे रहें सपना दुगा। तुम इन्हें मग्म-सम्मान्तरों से होते मा । इनके बोमनीपेचमते रहते थे हो । पम्हें योगद ही तुम्हारी पारमा हती होकर मर रोमी । तुम महान् हो। अपनी महामता को पहचान कर तुम बास्तविक नाम बनो।

अणुवस मान्दोलन -भोगग्सार सिंहदी. ए. माधुनिक युग में भौतिकवारी मम्यता का मामाग्य ही मर्यापित पतिमानी है। हमारा रप्टिकोप ही भौतिक हो गया है और हम संसार की समी बस्तुर्षों का मुस्परिन मी इमी मानरम मे करन लग गए । समार का बाप भगत बराही मूतन प्टिपोचर हो रहा है। मानब ने पिशाम बम मे पमक बिमय प्राप्त की है और अब कास ना पान पर भी हमारा प्राधिपत्य स्पापित हो गया है। प्रमुबम का निर्माण हुमा । संसार की मरमे दुर्गम पौर पगम पोटी एवरेस्ट पर हमारी विनय पताका महरा रही है। हम बायु में वा गाने । पानी के पक्ष को बीर कर अपनी प्रमीप्ट मिहिर मरते है। मानों-मारों कोपों की पूरी पर मिची हुईमाणीका धारण कर सकते है। अपमे पन्तर्गत मी परस्मा मे अनभित है। यहाँ एक बहुत ही हमपम मोर प्रमान्ति है कोताहस मबाहुपा है, किन्तु उस पर सोने के लिए समय हमारे पाम मही है।मा मूम कारण है कि इस मानव-ममान के पास मस्तिक को धोकर हरय या मारमा नाम भी बीमही रह गई है। हम निर्णय पर है गुप्फन मापार पर रायहीनता को ही मनुष्य को महानता का परिवापर मान में इस पुर प्रमान्ति कपात प्रमापार, परिवार पौर सवााप मानव रे पापरिक पबहारों में प्यक्ति की मानपता काही पौर पर से पाए चाहिए, पम्पपा मानब अपनी सीमापा पनिप्रमण कर दामन बन पायगा पार ममारकी रची-युगी पानि भी मम्मीन हो गएगी। मगर पिका मानव पारोधिमापों में बरकर एक मंपिस्वम पर गत पर पौर रसपान में मो पिरब-भागिता ११२ प्रयुक्त को पौर भवीर परिणम कर रहा है। किन्तु यह तो एक मुनिश्चित सस्प है कि मनुष्य शान्तिप्रिय भीय है पौर पर यह पुरी विभीपिका से परस्पर काप पठा है। मनुष्य ने मानव की वृत्ति का परिचय प्राप्त कर मिया है और अब उसकी खी वृत्ति प्रबम हो पा है। मानवी सी मानसा की अभियंजमा भाणके पिभिल सिर पापोतनों में भी हो रही है। मनुप्प पापिर पशु नहीं है, इसमें विचारने की पक्ति है और इसी पम्भौर चिन्तन के फलस्वस्म संसार के मनीषियों पर पितों मैतिक पुनर्पठन पशुपत मौर सोदय पारि मान्दोनों का सूमपात किया है। इसी मुग में बापू हए और इसी देस में पुर पौर महाबीर से सों का माविर्भार हुआ । मब सारा मिस इन माम् पारमार्मों की विचारपाय से प्रभावित हमा है तो भारत में इसकी मार का प्रस्फुटित होना कोई पस्यामाविक नहीं। मारपर्पस विरोधी सत्ता का मत हो पया । ससतमता का मणिम प्रमात हुमा । समीपम में मवीन मापापों का संचार प्रा। किन्तु पाच यह पामा का पाषा म्हनाया-सा गा पा । नियम की मारमा है पन-बीवन में प्रथम होतीबा ही है। पाखिर ऐसा क्यों ? कि समाज में पटिम मिपमवाए। पार एक पर एक समस्या हमारे सामने मुंह बामे सर्परा पी पती है। समार में धोपाका पन्त करना समा पिस में साम्ति की स्थापना करना पाव के मानव का प्रमुख मय है । उसकी उपमणि केतु ही हम सत्प्रयत्न करते पा मार प्रारम-विश्वास सार प्रसर हो तो सफलता हमारे पैर मेनी। व्यतिरेवान से प्राप्पारिममता पौर मनिपता का तिरादित हो पाना ही परोक्त पाम्बामनों का बम्मदाता है। मनुष्य पान पुचीपर्यो ? भूमि उसने मनुष्य पर विलास कामा पोर रिया है। इस मारण है कि हममें सवा- चार बरसे मनाचा, सत्य पाने प्रसर ईमानदारी के पहले येईमानी पौर मनाई की पमहर्गा मा पा है। प्रत्येक म्पत्ति निपेपामारंप से घोषता है। यहाँ ना हो पुर्ण यह चो, वह बेईमान । कोई भी पापर कभी यह नहीं सोचना कि सर्य उममें रितन मा परे पर है। यदि पारम-पर्मन और मगुपत माम्दोलन पास्मासोबन करें वो पकिन को पटा पो कि हाई पौर किचना मिरा हुमा है । राष्ट्रीय बीवन में सत्य और अहिंसा की भावना के समान में ही रामराग्य के स्थान को मूर्चस्म धारण नहीं करने दिया। भारत की भूमि पार्शनिकों और चिन्तों की भूमि ही है । इसे बगपुर बनने का सौभाग्य प्राप्त और सास्कृतिक क्षणों में इस देश ने सराविण का मतृत्व किया है। बैन-धर्म का मी शिम-रम में एक विषिष्ट स्माम है तपा पामिक इतिहाम एवं राष्ट्रीय निर्माण में इसने महत्वपूर्ण योग दिया है। मन ताम्बर तेरापपी संप्रदायक के प्राचार्य श्री तुमसीमपी में भी मिल के समम एक मबीन पनि प्रस्तुन पिया है और माममता को एक नया मार्ग रिताया है । परमुबती संघ की स्थापना उनके गम्भीर पप्पमन पात्विक बीपन तमा ठोस अनुभव का परिणाम है। याबीवन-मुसि पान्दोमन का प्रवर्तक संग नाम में प्रति मा किम काम में प्रति महान है। इसका गप्प सामान्य मानस मैतिक स्तरको बना उसे पापविन्या के मर्त से निकाम कर महामानव के पद पर मासीन करना है । संघ रिचार प्रहर प्रमविशीस तपा पूर्णत प्राविमारी । सम्भवत पहमी बार एक पार्मिक संस्पाहारा ऐसे सप का मूत्रपात हमा है जो साम्प्रदायिकता की संकी परिधि से सर्वपा मुमत पीर करि-मिहीन है। इसका सार किमी भी मनुष्य के लिये उग्मुक्त मौर उसके विकास हेतु उसका परा पमिनग्यन लिया जा रहा है। मंपनियम मपके सब नियमों की संख्या वो पौरासी, पिस्त मुम्पत इसके पापही भाम है-पहिना सरप प्रचौर्य वयं पौर परिपह। इन पांच तत्वों की उपासना का ही मक्स्पों को प्रती बनमा परवापासीको स्पष्ट पा मुमम बनाने हेतु इनके इतने मेर कर लिए पए। पर परि इन सम्पार्यो एकरनियमों रा प्रबमोरम करतो स्पष्ट हो जाएगा कि पिटने म्यापर पौर राण- निर्माण में रिवना सहयोग रेने पाने । महिमा पप्पाप का परिणा नियम Fिirसी भी पक्षित को पस्पृश्य मानकर उसमा तिरस्कार करना। महिमा का इना भूाम पविण गाया पामाम्प दुटिपी पहप परे है।

प्रगत को प्रो किसी को विरसार करने की भावना को भी हिंसा की पोटि में परिपरिणत करने मामा विना महान् हो सकता है इसका अनुमान तो म्बत तगी पाता है। परि सपने देश में इस भावना का पूर्ण प्रचार पाए तो पुमा प्रका मेद सम्मा से मिट पाएगा पौर हम कार्य में गामन हस्तसपी काई भामस्मता ही नही ए पाएपी। ऐसे विचार मषि प्रचलित हो तो पुप दिन मोते शिस दुर्यटना का सामना सन्त रिनोवा को कमर में करना पड़ा मायर सी बात एकरम नही होठी पौर मापसी भदभाव तपा नातिवार का एवं उच्च-नीचा मेरमार ही मिट पया होता । इसी तरए सत्सव मम्याम का पात्रको नियम किसी पति से भूठा अव या रस्तावेज नसिबमाना । इस नियम का पालन म होने के कारस ही समाज के कितने सस्य बनी है मिसारी हो गए और एक मुरादगानी की बारिखने मनुमों को सजाई का बामन पोर भूठ की परण मेनी परी। फिर कार्य के मम्मा का पांव नियम है किसी पौर में मिसावटपरया मरतो को पसनी बताकर मरेषना। मरि व्यापारियों में सभी इस पर सबस्प बम पाएं और हम मियम का पामन करने तग बाएं तो पा निश्चित है कि सरकार पर्ष परिभम पर पाएपी पीर समी मामरिकों के स्वास्थ्य की रमा होगी। व्यापारी भी मारम-मानि पिता पीर प्रम्याम्प मस्ट पप गाएपा। इस तरह न मिपमा म म्पमित और समान दोनों की रमा हस्तीचौर राष्ट्र मानी बहुत कस्साए ऐता है। बापर्यत का पाच नियम है-एक पाली के होते दूसरा विकार मकला। इस नियम का परि पामम पिमा पाए तो समाज की धमेको पुतियां दूर हो माएकी । म येमेन पाहा प्रश्न या मगरका में भारी कर मुफ मारी पीवन पर करने की समस्या । इसमें एक अपवार भी दिया गया। कि मरिमली सहर्ष पाहा वेती हो वा पुस्प दूसरी पारी भी कर सरता है। इससे यह स्पष्ट मामूप पाता है कि नियमों को पपासाम्म मुपम पौर म्याबहारिक बनाने की रेप्य की पहै। पाप परिम्पर में प्रपरिणत का प्यापा नियम शिपिट एक परिपत तरीकों है मौकरो, बाइसेन्स पारि मगमत-मायोजन प्राप्त करना। यह नियम स्पष्टत घोपित कर या है कि वर्तमान समाज जो निम्न मनोवृत्तियों को प्रोर मेस्थापक का प्यान पूर्णत प्राार है। उन्होंने समार की समस्पार्मों का मम्मीर मध्ययम किया है। इस प्रकार सपके सभी नियम समायरों में अंकित किए जाने योम्म । पौर प्रतिम प्रषिक मानवता के पुजारी मरि इसे प्रारमसात् करत तो मसार में एक महत्वपूर्ण परिपतन हो पाए। संसार को बी इषमी हुई पौर राहती हुई मानवता इस संप में कान्ति प्राप्त कर सके । कि इसका एकमात्र लक्ष्य मानवमात्र को प्राम्पारिमा जीवन की पोर प्रवृत कर सन्चे मुसको पहिचान भरा बना है। इस संप का भविष्य उम्म्मम रीस पाता है क्योंकि यह एक महान् मन्त द्वारा निस्वार्थ भाव से संचासित पार की मस्वस्थ गरनी न पोर नबन्दी से मुक्त है। इसमें म किसी रेस मा विरम का प्रश्न है न किसी जाति पा धर्म का एकाधिपस्प है। मार विश्व के पुष्प पोर मारी मा की दृषिम समान है और इसके सदस्म बन सरते है। पाहे कोई हिगुहा या मुसलमान पारसी हो या रिस्तान सभी सब करण में मा मपनी बालात और लगा मानवता का कायाकस्स कर सकते है। इसी प्यापरस्त से प्रभावित हा पूरोप और एशिया उपा मग्य महादेशों के विठकों म इमकी मूरि भूरि प्रगमा पी और सभी इसकी मफसवा को शुभकामना करते है। भाचाय पी सुनसीमणी ने दिम्मी अधिवेशन में इसे सप्प बताया पा कि इस संप का संचाता में इसका पर्प यह मही कि मग मी ही मम्प्रदाय । मोम इसरे मपप्रमुख रोपे । ममप्ट पिरित होता है रि गमतल के अधिकारों पर पूरा प्यार रिया गया है पामोई भी ध्यानमा विचार ममें मम्मिनित नहीं पिया पपाई। महिमामों का भी मामानापिकार रिया मयासपा मी संप पी समस्या बन पर समार का पस्माग पर मानी है। पपम राष्ट्रपति ग• परेम्दप्रसाद ने मो इम पान्दोमनी पावापरता को महम्म पियामा इसकी प्रगति की शुभकामना की है। प्रपानमन्त्री श्री मेहरू भी पाचार्य पी से मिलकर बहुत प्रभावित ए पे पौर सन्न निीरा ने पो इस पाम्दोमा को परमावापा बताया तपा मानसमस्याणा प्रताठ माना है। इन प्रमुफ्त की मोर महे चित्त की ना तो दूर पी सामाम्म सामायिक म्यक्ति भी इसी मोर पषिक प्राकृष्ट हुए और सदस्यों की सेम्मा में उत्तरोत्तर पनि होती जा रही है। किसी भी शुभ कार्य को प्रारम्भ करते समय गाव ही पोहे तोपों का ही उसमें सिपास बमता है। राहाताप कांग्रेस विहास या भूरान या ने तो पर्थशास्त्र में एक मुठन प्रम्पाय जोर दिया है जबकि प्रारम्म म मोग इसकी सफलता में बहुत कम विम्यास करते थे। । समस्या तो है कि इस पवित्र पान्दोमन और माम्बसारी सरेप को यम-वन के पास पहुंचापा से पाए। ऐसे पानोमन के लिए यह समय परिपाय है किन्तु उसे प्यापक बनान के हेतु पूर्व प्रचार टपा वपर्युक्त वाता- परण केतु सम-सम्मई की पपेमा है। इस कार्य में पशुपतियों को संव बिमोगा के मार्य पर निवारमा पाहिए धना उपादेय होने पर उसको पपमाना चाहिए । किया वह इस मावों में नहीं पाते प्रत्येक मोपड़ीवापामास माही पहर बाठी तब तक कार्य पूर्स नही हो सकता पौर नय से संच दूर भी य बापेमा । भारत की प्रात्मा दूर रहाव के मानों में बनती है। उसे पकाना होमा और उन पक्तियों को माप पर माना होना बिभागके पर पौर पिरास्त पातावरण निर्मन बी मा से विषामित कर चम्टी गए पर सपा दिया। समाचार पो समामा रियो पारि की बहामना मेरे पर भी पास्तविक पनमम्पई समय नहीं हो पाता। इसका पो यही मावि प्रागुवतियों की टोनियो परम भूम-पून कर रेप और विरेपचा और मांगों में पार सम प्रचार करें और पंचके एच एक ऐसे भी पास बनाए गाएं जो अपना माप जीवन इसके प्रचार में मपाले को संन्यापूर्वक प्रस्तुत ये मोर मी गेस्म की उपनामि होगी। मानव ममाव पार भोर पतितो रस बहती गुस्सों पर पसुपो से भी पूरा है। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रात्म-सन सिरान्त दो परनाना पाहिए या पबासाप्प मनसा बाचा कर्मणा इस गुपवस्थाको

प्रदस्त प्रायोजन
पर नैतिकता का प्रसार किया पाए तपा अध्यात्म को प्रपपरिया मा मात्र
मही मार्ग है, जिससे विषमताएं मिट सकती है समस्यामों का प्रस्ताहा गरमा
है पौर विश्व-सान्ति की स्थापना हो सकती है। मनुष्य का परिण ही गए
है। बिना उसके स्तर को कंधा किए समार पौर का निर्माण पराभर है।
पयुक्त पान्दोलन नारायण की मानवता को मुबारा जा सपना परिणत
निर्माण किया जा सकता । मत में कपा-
रक्षित और मरित मानवता
रठे, करे अपना उत्कर्ष ।
ध्यापक हो जन-जनके मन में
जबपुन का प्रयुक्त पार।

अहिंसर समाज-रचना का स्वप्न -भी यमपास म सम्पारक औपन हाहित्य भारत-पादासन मति मेरी काफी समय स मप है और पापा भी तुमसी के सम्माई में भी गरमा एमाह। मुम रमके प्रमूस्योपोग भी मुममे को मिले है। पिधते इतिहास के पृष्ठों को सोमकर रेखा पाए तो मात होपा मि प्रकार के नैतिक मानोमन ममय-समय पर होते है। मपम भपमान श्री महावीर न नैतिकम्तिमा मूमपाव किया। इसके पश्चात् ममबार र पौर महात्मा गांधी इसको गाया। प्राचार्य बिनोगगरपाचार्य तुमसी पास से ही महापुष्प है गिमारे संसार की विषमतामों को मगर उनम इसके लिए अपना काम साया है। समय-समय पर ऐसे महापुरुषों का काम होता ही पड़ता है जो मानर का पप प्रवर्पन रहे है। मनुष्य के जो मानव-जीवन पापा है बहसले मुख धाष्टिी प्राप्ति बास्तविक मार्ग निकालनेमिए है। योग महापुरपो रे मरम मीणामा नही रिम्मान कराया है। उनमें एकही विचारणारा प्रसुरितहोती-जीवन में तो मुखर पानि माने का सही मार्म क्या है? स्वार्षद प्रमोमन मा समबन सही रास्ता नहीं पाग संयम में सामना ही पौरनोत्पान का सही रास्ता है। एक पगर पीरम य परिवार समात्री सारी निवार्मों से मुठोकर पापमपी मीर मेता है। उसके विपरीत एक नवपति सेठ, मोमवणातीय पूरीपति पाराम से गों पर सेटे रहने पर भी चिन्तामों में उसमें पता है और नीर नहीं पाता । पहनानसामों पुन सन में भी बाम्बवा एता।।

महतक समावना का सप्न मर्योपावन को चिन्ता उसके पुन की तए मपी हुई है। यह प्रान की स्थिति है। अपर महागीर पीर दुर पैसे से दुनिया ही जन-मानस की सेवा करमा पाहते तो मा नहीं कर सकत पे? क्या उनके पास पैसे की कमी पी? महीं मगर मानब में मानवता का संचार करने का कार्य पैसे के बल पर नहीं होता। उसके लिए त्याग पाहिए, तप साधना चाहिए। उन्हेंमि परपाट माग परिवार सब मुरघोस बन में निवास म्मिा कारण यही कि उनका यह प्रात्मो स्थान का सही माप पा । सत्य र हिंसा के वास्तविक दृष्टिकोण से इन्होंने ममार को एक चितना ही नई पायतिरी कि पैम से भौतिक-मुसमी प्राप्ति होगीपारिमा मुह की नहीं। स्पराग्प के बाद यहां विषमतामों का प्रचार हुमा । प्रतिकता मामा उपचार, मूठप कपट प्रादि प्रसम्पहारों का प्रकोप हमा। मानवता मे मानव से पासों दूर किनारा कर मिया । सत्यप हिंसा पापीगी के साप ही मिमीन हो गए, ऐसा महसूस किया । प्राचार्य मी तुमसी को इस स्पिति का अनुभव हमा । रमके हरप को बी टेस पहुची । महान् पुरषों का धम्म मैतिक कान्ति के लिए ही हुमा करता है। उनाने सामा वर्तमान पुग की विपमतामों के भातावरण में मैतिक क्रान्ति के लिए कोई सरम माम मोरना चाहिए, रिसको प्रत्येक व्यक्ति सरमता से अपनाकर पपने जीवन के निर्माग में सहयोगी बने । इसी पूप्टिकोप से पार से समभग . प पूर्व मह मनिस बान्ति म पारोमन-परपुक्त-माम्दोमन प्रारम्म यिा पया। इसमें पोटे-छोटे प्रती का उम्सेप दिया पया है। मानव यदि महापों का पालन नहीं कर समता तो परपुषतों का तो पाप्सन पवाय परे। एपदम मदि महम की कंपी मंजिस पर नहीं पहप स तो रो पार सीदी ही पाने का प्रयास करें। प्रपाम की मसौटी पर बसे गाने पर ही प्रतिमा माग मम्मर इस प्रकार पायोमन रा मुमपात हुपा । पीरे-धीरे इममा विरामकममा पार इतना बड़ा दिपार सारे देश की बमवा में इस प्रकार की मारनामों का प्रायस्प हमा। देश के सभी मामों में इम नहि पागेसन पा सागत मम्। तारे मेता, विकास साहित्यकार पत्रकार भादि विषिष्ट पस्सियों को ऐमे मातोपोर - रिचार परकर बरी हौ प्रसम्नता हुई। मामयता निर्माण के लिए यह मनाम विचार ! और अपर प्रत्यक व्यक्ति इसे अपनाने का मुनरपाम्ति मा सो माम सरलता से प्राप्त हो जाए। इसका प्रथम अधिवेशन निम्मी मेंमा।सैकों की हार में पक्तिको हए और इस गैविक प्रान्दोमन में रपयन में अपनी स्वीकृति दी। बाद में गोषपुर र राणापास भी मुझे बाने सौभाग्य मिना । बी बीसवाईम मी रोष पयुवती बनने कमाकर पाए। इस माम्दोमन में पारों पर कोई महत्व नही है। देखना यह है कि कितने व्यक्तियों न इस माम्बोमन स प्रमाधिन होकर अपने जीवन को मरना है । मुझे तो इस माम्दोमन के नियमों से की प्रेरणा मिली है। वास्तव में पायोमन जीवन को सहरिया रेकर मानव पो मामे बढ़ने की प्ररणा देता है। परबत-मादरोमम यह नहीं कहता कि पर-बार छोड़ो सम्यासी बन पायो या दुनिया में पनहीं है। वह कहता है, परिम्यापारी वो प्यापार में प्रामा- रिएकता सच्चाई ईमानदारी से। पाने में कुछ भिमा-मी मामून होपी मदरबार में प्रारम-सोप मिनेपा। मत इस उप म्पति स्वयं मुगरे । प्पक्ति मुबार से ही समाज, सरद-मुबार सम्भव है। कवन बोपी गये झरने से क्या होने वाला है। इस प्राचीनन प्रति समीपतियों की पि पी और पनी मी पाहिए। यह पाम्दोचन जित ती यति से मामे हा है, परि यही प्रम पावो धीम ही देम पष्ट्र में मेदिक अति पा प्रमुख पूर्णपण स्थापित कर सकेगा। मेरी तो एकही मारणा ही है कि योभी म्यक्ति इम माम्बोमन में पाय निप्टापा हो पौरमहराई के साथ चिन्तन मनन प्रम्पयन परोपकामों को सीमित रखें। वर्तमान समाज की मान्यतामों को परमाने में योन। सीन ही यह मान्दोमन पिरम्यापी होमा मौर मानव में वो मानवता की कमाई यह रिवाई नहीं रेपी । अहिंसक समाग रचना सण मी मीन ही साकार होमोपा । ऐमा मैप विश्वाम है।

No text on this page.

Anu Vart Ki Aur Bhag 2

Author
Nagraj Ji
Title
Anu Vart Ki Aur Bhag 2
File name
Anu Vart Ki Aur Bhag 2
Text
OCR done
Citation
1962
Published
2010/12
Publisher
Delhi,aatmaram Amd Sans
Language
Sanskrit
Pages
154
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514854
Barcode
4990010022530.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
024L3ZMaVvO
Download PDF

Anu Vart Ki Aur Bhag 2