Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Shri Jain Siddhant-savadhyaymala

Doshi Ratan Ji · 2011/01

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वो खरतरगच्छीय शान मन्दिर, जयपुर ।। णमोऽत्यु ण तस्स समणस्म भगरओ महावीरस्म ॥ श्री जैन १ आ(७ । सिद्धान्त-स्वाध्यायमाली ॥ सिरि-उत्तरज्झयण-सुत्त विणयसुय पढमं अज्झयण जोगा विप्पमुकस्म, अणगारस्म मिक्सुणो। विणय पाउफरिम्मामि, आणुपुन्धि सृपोह मे ॥१॥ णानिदेसकरे, गुरूणमुनगायकारए। इगियागारसपन्ने, से विणीए ति बुचई ॥२। णाऽनिद्देसकरे, गुरूणमणुमायकारए । पडिणीए असयुद्धे, अविणीए ति उच्चई ।। ३ । हा सुणी पडफण्णी, निकसिन्जई मनमो। एस दुरम्सीलपटिणीए, मुहरी निकसिन्नई ।।। णकृण्डग चहत्ताण, विट्ठ भुजह सूयरे । एव सील चहत्ताण, दुस्सीले रमई मिए ।। ५ ।। णिया भार साणस्स, सूयरम्म नरम्प य । विणए ठमेज अप्पाणमिच्छन्तो हियमप्पणो ॥६॥ म्हा विणयमेसिज्जा, सील पडिलमेजए । उद्धपुत्त नियागट्ठी, न निकसिन्जड हुई ।। ७ । मन्ते सियाऽमुहरी, बुद्धाण अन्तिए सया। अट्टजुत्ताणि सिक्सिज्जा, निरट्ठाणि उ बजए॥८॥ णुसासिओ न कुप्पिज्जा, सति सेविज पण्डिए। खुडेहिं सह ससम्गि, हास कीड च रजए ॥९॥ रय चण्डालिय कासी, नहुय मा य आलये। कालेष य अहिलिता, तो झाडल एगगो ॥१०॥ हिच चण्डालिय कहु, न निण्हविज कयाड वि। कड कडे ति भासेजा, अकड नो पढे ति य ॥११॥ गलियस्सेव क्स, यणमिन्छे पुणो पुणो । स व दट्ठमाडण्णे, पाचग परिजए ॥१॥ अणासपा धूलपया कुसीला, मिउपि चण्ड परिन्ति सीमा । चित्ताणुया लहु दक्पोरेया, पसायए ते टु दुगमयपि ॥ पुट्ठो नागरे किचि, पुट्ठो पानालिय गए । कोह अमञ्च कुवेना, धारेजा पियमप्पिय ॥ १४ ॥ प्पा चेर दमेय गो, अप्पा हु सल दुद्दमो । अप्पा दन्तो सुही होट, अस्मि लोए पात्य य ॥१५॥ र मे अप्पा दन्तो, सजमेण तवेण य । माह परेहि दम्मतो, यधणेहिं बहेहि य ॥ १६ ॥ टिणीय च उद्धाण, पाया अदुव कम्मुणा। आगीवा जड ना रहम्से, नेर कुना कयाइ वि ॥ १७ ॥ । पक्सओ न पुरओ, नेर किचाण पिट्टओ। न जुजे अरुणा उरु, सयणे नो पटिस्सुणे ॥ १८ ॥ र पल्हस्थिय कुन्जा, परवपिण्ड च सजए । पाए पमारिए वावि, न चिह गुरुणन्तिए ।॥ ११ ॥ नायरिएहि वाहितो, तुसिणीओ न क्याहवि । पमायपही नियागट्ठी, उपचिट्टे गुरु मया ॥ २० ॥ - vvv (२) श्रीजनसिद्धान्त-खाध्यायमाला पालचन्ते लवन्ते वा, न निसीएज्ज कयाइवि। चहऊणमासणं धीरो, जओजत्तं पडिस्मुणे ॥ २१ ॥ पासणगओन पुच्छेजा,नेत्र सेज्जागओकया।आगम्मुक्कुडुओ सन्तो, पुच्छिना पंजलीउडो ।। २२ ॥ एवं विणयजुत्तस्स, सुत्तं अत्थं च तदुभयं । पुच्छमाणस्स सीसस्स, वागरिज जहासुयं ।। २३ ॥ सं परिहरे भिक्खू, न य ओहारिणिं चए । भासादोसं परिहरे, मायं च बजए सया ॥ २४ ॥ लवेज पुट्ठो सावज, न निरहुं न मम्मयं । अप्पणट्ठा परट्ठा वा, उभयस्सन्तरेण वा ।। २५ मरेसु अगारेसु, सन्धीसु य महापहे। एगो एगथिए सद्धिं, नेव चिट्टे न संलवे ।। २६ ॥ नं मे बुद्धाऽणुसासन्ति, सीपण फरुसेण वा । मम लाहो त्ति पेहाए, पयओ तं पडिम्सुणे ॥ २७ ॥ प्रणुसासणमोवायं, दुक्कडस्स य चोयणं । हियं तं मण्णई पण्णो, वेसं होइ असागुणो ।। २८ ॥ हेयं विगयभया बुद्धा, फरसंपि अणुसासणं । वेसं तं होइ मूढाणं, खन्तिसोहिकरं पयं ॥ २९ ॥ प्रासणे उवचिडेजा, अणुच्चे अकुए थिरे । अघपुट्ठाई निरुवाई, निसीएजप्पकुक्कुए ॥ ३० ॥ कालेण निक्खमे भिक्खू, कालेण य पडिकमे । अकालं च विवन्जित्ता, काले कालं ममायरे ॥ ३१ ॥ रिवाडीए न चिडेजा, भिक्खू दत्तेसणं चरे (पडिस्वेण एसित्ता, मियं कालेण भक्खए ।। ३२ ॥ नाइदूरमणासन्ने, नाऽनेसि चक्खुफासओ । एगो चिटेज भत्तहा, लंघित्ता तं नाऽइक्कमे ।। ३३ ।। नाइउच्चे न नीए वा, नासन्ने नाइदूरओ। फासुयं परकडं पिण्डं, पडिगाहेज संजए ।। ३४ ॥ अप्पपाणेऽप्पवीयम्मि, पडिछन्नम्मि संवुढे । समयं संजए मुंजे, जयं अपरिसाडियं ।। ३५ ।। सुकडित्ति सुपक्कित्ति, सुच्छिन्न सुहडे मडे । सुणिटिए मुलद्धित्ति, सावज वजए मुणी ।। ३६ ।। स्मए पण्डिए सासं, हयं भदं व वाहए। बालं सम्मइ सासंतो, गलियस्मं व वाहए ।। ३७ ॥ खड्या मे चवेडा मे, अक्कोसा य वहा य मे । कल्लाणमणुसासन्तो, पावदिट्टित्ति मन्नई ॥ ३८ ॥ पुत्तो मे भाय नाइ त्ति, साहू कल्याण मन्नई। पावदिट्ठि उ अप्पाणं, सासं दासु त्ति मन्नई ॥ ३९ ॥ न कोवए आयरियं, अप्पाणंपि न कोवए । बुद्धोवघाई न सिया, न सिया तोत्तगवेसए ॥ ४० ॥ आयरियं कुवियं नचा, पत्तिएण पसायए। विझवेज पंजलीउडो, वएज न पुणोत्ति य ।। ४१ ।। घम्मजियं च ववहारं, बुद्धेहायरियं सया। तमायरन्तो ववहारं, गरहं नाभिगळई ।। ४२ ॥ मणोगयं वकगयं, जाणित्तायरियस्स उ। तं परिगिज्झ वायाए, कम्मुणा उबवायए । ४३ ।। वित्ते अचोइए निचं, खिप्पं हवइ सुचोइए। जहोवइटुं सुकर, किच्चाई कुबई गया ।। ४४ ॥ नचा नमइ मेहावी, लोए कित्ती से जायए। हवई किच्चाणं सरण, भूयाणं जगई जहा ।। ४६ ।। पुज्जा जस्स पसीयन्ति, संबुद्धा पुनसंथुया । पसन्ना लाभइस्संति, विउलं अट्टियं मुयं ॥ ४६ ॥ स पुजसत्थे सुविणीयसंसए, मणोरई चिट्टइ कम्मसंपया। तबोसमायारिसमाहिसंवुडे, महर्जुई पंच वयाई पालिया । स देवगंधव्यमणुस्सपूइए, चइत्तु देहं मलपंकपुव्वयं । सिद्धे वा हवइ सामए, देवे वा अप्परए महिड्ढीए । त्ति वेमि ! इअ विणयसुयं नाम पढमं अज्झयणं समत्तं ।। -- ॥ ४७ ।। ॥४८ ॥ -- श्रीउत्तराययनमंत्र-प्रथमाध्ययनम् ANNA mvww ॥ अह दुइअ परिसहज्झयण ॥ . । . सुय मे आउस-तेण भगवया एवमक्खाय । इह सल बावीस परीमहा समणेण भगवया महा वीरेण कासवेण पवेडया । जे मिक्स् सोचा नच्चा जिचा अमिभ्य भिक्सायरियाए परिचयन्त पुट्टो नो निण्होजा ।। कयरे ते खलु चापीस परीमहा समणेणं भगवया महावीरेण कासवेण पवे इया, जे भिक्खू सोचा नच्चा जिच्चा अभिभूय भिक्पायरियाए परिन्वयतो पुट्टो नो निण्डवेजा। इमे ते खलु बालीम परीसहा समणेण भगाया महावीरेण कासवेण परेडया, जे भिक्ख मोचा नव जिन्ना अभिभूय भिक्सायरियाए परिव्ययतो पुट्टो नो निण्हवेज्जा, तनहा-दिगिछापरीसहे १ पिवा मापरीमहे २ सीयपरीसहे ३ उसिणपरीमहे ४ दसमसयपरीसहे ५ अचेलपरीसहे ६ अरडपरीमहे । इत्यीपरीमहे ८ चरियापरीमहे ९ निसीहियापरीसहे १० सेजापरीसहे ११ अकोसपरीसहे १२ वह परीसहे १३ जायणापरीमहे १४ अलाभपरीसहे १५ रोगपरीसहे १६ तणफासपरीसहे १७ जलप रीसहे १८ सकारपुरकारपरीसहे २१. पन्नापरीसहे २० अन्नाणपरीसहे २१ दसणपरीसहे २२ ॥ परीसहाण पविभत्ती, कासवेण पइया । त मे उदाहरिस्सामि, आणुपुब्धि सुणेह मे ॥१॥ दिगिछापरिगए देहे, तपस्सी भिक्खू थामन । न छिदे न छिदावए, न पए न पयावए ॥२॥ कालीपनगसकासे, किसे धमणिसतए । मायन्ने असणपाणस्स, अदीणमणसो चरे ॥३ तो पुट्ठो पिनासाए, दोगुच्छी लज्जसजए । सीओदग न सेविज्जा, वियडम्सेसण चरे ॥४॥ छिन्नावाएमु पंथेसु, आउरे सुपिपासिए। परिसुक्खमुहाऽदीणे, त तितिक्खे परीमह ॥ ५॥ चरत विरय लूह, सीय फुसह एगया। नाइवेल मुणी गच्छे, सोचाण जिणसामण || ६ | न मे निवारण अत्थि, उवित्ताण न विजई। अह तु अग्गि सेवामि, इड भिक्खू न चितए ।। ७ । उसिण परियारेण, परिदाहेण तजिए। धिंसु वा परियारेण, साय नो परिदेवए ॥८॥ उण्डाहितत्ते मेहावी, सिणाण नो वि पत्थए। गाय नो परिसिंजा, न वीएज्जा य अप्पय ॥९॥ पुट्टो य दसमसएहिं, समरे व महामुणी। नागो सगामसीसे पा, सूरो अभिहणे पर ।। १०॥ न मतसे न वारेज्जा, मण पि न पओसए। उवहे न हणे पाणे, भुजते ममसोणिय ।। ११ परिजुण्णेहि यत्थेहि, होक्सामितिअचेल । अदुना सचेले होक्सामि, इइ भिक्य न चिंता ।। १२ । एगयाऽचेलए होड, सचेले आवि एगया। एय धम्म हिय नन्चा, नाणी नो परिदेवए । १३ । गामाणुगाम रीयत, अणगार अकिंचण | अरई अणुप्पवेसेज्जा, त तितिक्खे परीसह ॥ १४ ॥ अरइ पिडओ किच्चा, विरए आयरक्खिए । धम्मारामे निरारम्भे, उनसन्ते मुणी चरे ॥ १५ ॥ मङ्गो एस मणूमाण, जाओलोगम्मिइथिओ।जस्म एया परिनाया, सुकडं तस्स मामण्ण ॥ १६ । एपमादाय मेहावी, पङ्कभूया उ इपिओ। नो ताहिं विणिहम्मेजा, चरेजत्तगरेमए ॥ १७ ॥ एग व चरे लादे, अभिभूय परीसहे। गामे वा नगरे वापि, निगमे वा रायहाणिए ॥ १८॥ अममाणे चरें भिक्खू , नेर कुन्जा परिगह । असमत्ते गिहत्येहि, अणिएओ परिचए ॥ १९ ॥ मुसाणे सुन्नगारे वा, रुक्समूले व एगओ । अकुक्कुओ निसीएज्जा, न य विचामए पर ॥ २० ॥ . , J (१) श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला स्थि से चिट्ठमाणस्स, उवसग्गाभिधारए । संकाभीओ न गच्छेज्जा, उद्वित्ता अन्नमासणं ॥ २१ ॥ उच्चावयाहिं सेजाहिं, तबस्सी भिक्खू थामवं । नाइवेलं बिहम्मेजा, पावदिट्टी विहम्मई ।। २२ ॥ इरिक्कुवस्सयं लधु, कल्लाणमदुवा पावयं । किमेगराइ करिस्सइ, एवं तत्थऽहियासए ॥ २३ ॥ अकोसेजा परे भिस्, न तेसिं पडिसंजले । सरिसो होइ बालाणं, तम्हा भिक्व न संजले ॥ २४ ॥ सोचाणं फरुसा भासा, दारुणा गामकण्टगा । तुसिणीओ उवेहेना, न ताओ मणसीकरे ॥ २५ ॥ इओ न संजले भिक्खू, मणपि न पओसए। तितिक्खं परमं नचा, भिकन्वृ धम्मं समायगे ॥ २६॥ समणं संजयं दंतं, हणिज्जा कोइ कत्थई । नत्थि जीवम्स नामुत्ति, एवं पेहेज संजए ॥ २७ ॥ हुक्करं खलु भो निचं, अणगारस्म भिक्खुणो। सव्वं से जाइयं होड, नत्थि किंचि अजाइयं ॥ २८ ॥ गोयरग्गपविट्ठस्म, पाणी नो मुग्पसारए । मुओ अगाग्वामुत्ति, इइ भिक्खु न चिनए ॥ २९ ॥ परेसु घासमेसेंजा, भोयणे परिणिहिए। लद्धे पिण्डे अलद्धे वा, नाणुतप्पेज पंडिए ॥ ३० ॥ अजेवाहं न लभामि, अवि लाभो सुए सिया। जो एवं पडिसंचिक्खे, अलाभो तं न तज्जए ॥ ३१ ॥ नचा उप्पइयं दुक्खं, वेयणाए दुट्टिए। अदीणो थावए पन्नं, पुट्ठो तत्थडहियासए ॥३२॥ इन्छं नाभिनंदेजा संचिक्खत्तगवेसए । एवं खु तस्स सामण्णं, जं न कुज्जा न कारवे ॥ ३३ ॥ अचेलगस्स लूहस्त, संजयस्म तवस्सिगो। तणेसु सयमाणस्म, हुजा गायविराणा ॥ ३४ ॥ आयेवम्स निवाएण, थउला हवइ वेयणा । एवं नचा न मेचंति, तंतुज तणतजिया ॥ ३५ ॥ किलिन्नगाए मेहावी, पंकेण व रएण वा। विंसु वा परियावेण, सायं नो परिदेवए ।। ३६ ।। देएज निजरापेही, आरियं धम्मणुत्तरं । जाव सरीरभेउत्ति, जल्लं कारण धारण अभिवायणमभुट्टाणं, सामी कुजा निमंतणं । जे ताई पडि सेवन्ति, न तेसिं पीहए मुणी ।। ३८ ॥ अणुकसाई अप्पिच्छे, अनाएसी अलोलुए। रसेमु नाणुगिज्ञज्जा, नाणुतप्पेज पन्नवं ।। ३९ ।। से नूणं मए पुज्वं. कम्माऽणाणफला कडा । जेणाहं नाभिजाणामि, पुट्ठो केणइ कण्हुई ॥ ४० ॥ अह पच्छा उइजन्ति, कम्माऽणाणफला कडा । एवमस्सासि अप्पाणं, नचा कम्मविवागयं ॥४१ ।। निरङ्कगम्मि विरओ, मेहुणाओ सुमंबुडो। जो सक्खं नाभिजाणामि, धम्मं कल्लाणपावर्ग ॥ ४२ ॥ वोयहाणमादाय, पडिमं पडिवजओ। एवं पि विहरओ मे, छउमं न नियट्टई ॥ ४३ ॥ नत्थि नूणं परे लोए, इड्ढी वावि तवस्सिणो। अदुवा वंचिओमित्ति, इइ भिक्खू न चिंतए ॥ ४४ ॥ अभू जिणा अस्थि जिणा, अदुवावि भविस्सई । मुसं ते एवमाहंसु, इइ भिक्खू न चितए ॥ ४५ ॥ एए परीसहा सव्वे, कासवेण निवेइया । जे मिक्खू न विहम्मेज्जा, पुट्ठो केणइ कण्हुई ॥ ४६॥ त्ति वेमि ।। इअ दुइ परिसहज्झयणं समत्तं ॥ २॥ - --

श्रीउत्तराध्ययनस्त्र-तृतीयाध्ययनम्
॥ अह तडचाउरंगिज्ज अज्झयणं ।।
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चचारि परमगाणि दुल्लहाणीह जन्तुणो । माणुमत्त सुई मदा, मजमम्मि य चीरिय ।। "
समावन्ना'ण ससारे, नाणागोतासु जाइसु । कम्मा नाणाविहा कटु, पुढो विस्समिया पया ।। २
एगपा देवलोपमु, नरएसु वि एगया। एगया आसुरे काय, अहाकम्मेहि गई ॥३
एगया सत्तिओ होइ, तओ चण्डालक्कसो । तओकीडपयगो य, तो कुन्थुपिवालिया ।।
एवमावडजोणीसु, पाणिणो कम्मकिलिमा। न निविजन्ति ससारे, मनद्वेषु व बत्तिया ॥ ५
कम्मसरोहिं सम्मूढा, दुक्खिया बहुवेपणा । अमाणुमा जोणीसु, 'विणिहम्मन्ति पाणिणो ॥ ६
क्म्माण तु पहाणाए, आणुपुम्नी कयाइ उ। जीरा सोहिमणुप्पता, आययति मणुस्मय ॥ ७
माणुस्स विग्गह लधु, सुई धम्मस्म दुल्लहा । ज सोचा पडिवजन्ति, तव सतिमहिमय ॥ ८
आइच सवण लघु, सदा परमदुल्घहा। सोचा नेआउय मग, बहवे परिभस्मई ॥९
सुइ च लघु सद्ध च, वीरिय पुण दलह । रहवे रोयमाणावि, नो य ण पडिवज्जए ॥१०
माणुमत्तमि आयाओ, जो धम्म सुच्च मद्दहे । तपस्सी वीरिय लधु, सखुढे निन्धुपरे रय ॥१॥
सोही खजूय भूयस्म, धम्मो मुद्धस्म चिहई । निधाण परम जाद, घयसिनिम्न पावए । २०
विगिंध कम्मुणो हेउ, जस सचिणु खतिए । पाटव मरीर हिना, उदह पक्कम दिस ॥ १३
चिमालसेहि सीरेहि, जक्खा उत्तरउतरा । महासुका व दिपता, मन्नता अपुगोचर ।। १४
अप्पिया देवकामाण, कामरूवविउत्रिणो। उद कप्पसु चिट्ठति पुब्बारासपया बहु ॥ १५
तत्थ ठिच्चा जहाठाण, जक्खा आउखपे चुपा। उ ति माणुम जोणि, से दसगेमिनायए ॥१६
खित्त व हिरण्ण च, पमवो दामपोरुस । चत्तारि कामखघाणि नन्य मे उवबजा ॥ १७
मित्तव नाइव होइ, उच्चागोए य वष्णव | अपायके महापन, अमिनाए जमो वः ॥१८
भुच्चा माणूस्मए मोष, अप्पडिरूवे अहाउयं । पुष विशुद्धसद्धम्मे, कोल बोहितुझिया ।। १९
पउरम दुल्लह नच्चा, सजम पडिवजिया । तबमा धुपकाम से, सिदे हवह मामए । २०
त्ति बेमि ॥ ४अ तइय अजमायण समत्त ।।
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॥ अह चउत्यं अमंखयं अज्झयणं ।।
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। असग्वय जीविय मा पमायए, जरोरणीयस्म ह नरिथ ताण ।
एव विपाणाहि जणे पमत्ते कन्नु विहिमा अजिया गिहिति ॥ १ ॥
जे पावकम्मेहि घण ममा, ममाययती अमर गद्दाय ।
पहाय ते पामपहिए नर, वेराणबद्धा नस्य उविति ।। २ ॥
तेगे जा सधिमुह गहीए, माम्मणा किन्या पावकारी।
एवं पया पेरुच इह ब लोए, कहाण कम्माण न मुक्त अन्थि ॥ ३ ॥

१८) श्रीजैनसिद्धान्न-स्वाध्यायमाला (- -- पावरं जंगम चेक, धणं घण्ण उपक्खरं । पच्चमाणम्प कम्में हिं, नालं दुक्खाउ मोयणे ॥ ६ ॥ अमत्थं मचओ गव्यं, दिस्य पाणे पियायए । न हणे पाणिणी पाणे, भयवेगओ उवरए ॥ ७॥ आदाणं नरयं दिम्म नायएज्ज नणामवि । दोगुञ्छी अप्पणो पाए, दिन्नं भुंजेज भोयणं ॥ ८ ॥ इहमेगे उ मन्नन्नि, अपञ्चकवाय पावगे। आयरियं विदित्ताण, मन्बदुकवा विमुबह ।। ९ ॥ मणता अकरेन्ता य, बन्ध मोक्खपण्णिणो । वायाविरियमेत्तेतं, समासासेन्ति अप्पयं॥१०॥ ने चित्तातायए भामा, को विज्ञाणुमायणं । विसन्ना पावफम्मेदि, बाला पंडियमाणिणो ॥ ११॥ ने केह सरीरे सत्ता, वण्ण रुवे य मन्चसी। मणमा कायवकेणं, मचे ते दुक्खसंभवा ॥ १२ ॥ प्रावन्ना दीहमद्धाण, संमारम्मि अणनए । तम्हा गवदिसं पस्सं, अप्पमत्तो परिवए ।। १३ ।। हिया उड्ढमादाय, नायकग्वे कयाइदि। पुचकम्मक्खयहाए, इमं देहमुद्दाहरे ॥ १४ ॥ विविच्च कम्पणो हेडं. कालखी परिव्यए । मायं पिंडस्म पाणम्म, कडं लद्धण भक्खए ।। १५ ॥ पन्निहिं च न कुवेजा, लेवमायए मंजए । पक्खीपत्त ममादाय, निग्वेक्वो परिव्बए ।। १० ।। एयणासमिओ लज्जू, गामे अणियओ चरे । अप्पमत्तो पपत्तहिं, पिण्डवायं गवेसर ।। १७ ।। ( से उदाहु अणुनरनाणी अणुत्तरदंमी अणुचरनाणदमणघरे अग्हा नायपुत्ते भगवं वैमालिए विद्यालिए इअ खुड्डागनियंठिजं छह अज्झयणं समत्तं ॥ ६ ॥ ।। अह एलयं सत्तमं अज्झयणं । हाऽऽएसं ममुहिम्म, कोइ पोसेज्ज एलयं । ओयणं जवसं देज्जा, पोसेन्जावि मयङ्गणे ॥ ५ ॥ तुओ स पुढे परिवृढे, जायमेष महोदरे! पीणिए विउले देहे, आएसं परिकंखए ।। ।। जाव न एजड आएसो, ताव जीवइ सेऽही । अह पतम्मि आएसे, सीसं छेत्तूण मुज्जह ॥ ३ ॥ जहा खलु से उसमे, आएमाए ममीहिए। एवं वाले अंहम्मिटे, ईहा निरयाउयं ।। ४ ॥ हिंसे बाले मुमाबाई, अद्धाणमि विलोचए । अन्नदत्तहरे तेणे, माई कं नु हरे सढे ॥ ५ ॥ इन्थीविसयगिद्ध य, महारंभपरिग्गहे । भुंजमाणे सुरं मंसं, परिवृढे परंदमे ॥5॥ अयकक्करभोर्ड य, तुंडिल्ले चियलोहिए । आउयं नरए कंखे, जहाऽऽसं व एलए ॥ ७ ॥ आसणं मयण जाणं, वित्त कामाणि य भुजिया । दुस्साहडं घणं हिचा, बहुं संचिणिया रयं ।। ८॥ तओ कम्मगुरू जंतू , पञ्चूप्पन्नपरायणे। अए व्च आगया कंखे, मरणतम्मि सोयह ॥ ९ ॥ तओ आउपरिचखीणे, चुनदेहा विहिसगा। आसुरीयं दिसं वाला, गन्ति अवमा तमं ।।१०।। जहा कागिणिए हेउ, महम्सं हाए नरो। अपत्थं अम्बगं मोचा, राया रज्जं तु द्वारए ॥ ११ ॥ एवं माणुस्मगा कामा, देवकामाण अन्तिए । सहस्सगुणिया भुज्जो, आउं कामा य दिम्बिया ॥१२॥ अणेगवामानउया, जा मा पन्नवओ ठिई। जाई जीयन्ति दुम्मेहा, ऊण वाससयाउए । ' जहा य तिन्नि वणिया मूल घेतूण निग्गया। एगोऽत्य लहए लाभ एगो मूलेण आगओ ॥१४॥ एगो मूलं पि हारित्ता, आगो तत्थ वाणियो । ववहारे उत्रमा एमा, एतं धम्मे वियाह ॥५॥ भवे मूलं, लाभो देवगई भवे । मूलच्छेएण जीवाण नरगतिरिक्खत्तणं धुवं ॥ १६ ॥ ॥

श्रीउत्तराध्ययनसूत्र-सप्तमाध्ययनम् तओ जिए सह होड, दुविह दोग्गड़ गए। दुल्लहा तस्म उम्मम्गा, अदाए सहरादवि ।। १८ । एवं जिय सपेहाए, तुल्लिया वाल च पण्डिय । मृलिय ते पवेसन्ति, माणुसि जोणिमेन्ति जे ॥१९॥ वेमायाहिं सिक्साहिं, जे नरा गिहिसुब्बया। उवेन्ति माणुस जोणिं, कम्मसच्चा हु पाणिणो ॥ २० ॥ जेसिं तु पिउला सिक्सा, मलिय ते अइन्छिया। सीलगन्ता सपीसेमा, अदीणा जन्ति देवय ॥ २१ ॥ एवमद्दीणव भिक्सु, आगारि च रियाणिया। कहण्णु जिचमेलिक्स, जिच्चमाणे न सविटे ॥ २२ ॥ जहा कुसग्गे उदग, ममुद्देण मम मिणे । एव माणुस्सगा कामा, देवकामाण अतिए ॥ २३ । कुसग्गमेत्ता इमे कामा, सन्निरुद्वम्मि आउए। कम्म हेउ पुगकाउ, जोगरसेम न सविदे ॥ २४ ॥ इह कामाणियहम्म, अत्तट्टे अरज्झई। सोचा नेयाउय मग्ग, ज भुज्नो परिभस्सई ॥ २५ ॥ इह कामणियहस्स, अन्ढे नायरझई । पृडदेहनिरोहेण, भवे देवि ति मे सुय ॥ २६ । इड्ढी जुई जस्सो वण्णो, आउ सुहमणुत्तर । भुज्जो जत्य मणुस्सेसु, तत्य से उवरजई ॥ २७ ॥ चालस्स पस्स वालत्त, अहम्म पडिवलिया। चिच्चा धम्म अहम्मिटे, नरए उपवजई ॥२८॥ धीरम्म पस्स धीरत्त मचधमाणुरत्तिणो । चिचा अपम्म धम्मिटे, देवेसु उपवजई ॥ २९ । तुलियाण चालभान, अमाल चेन पडिए । चडऊण वालभान, जगाल सेवई मुणि ॥ ३० । त्ति बेमि ॥ अ पलय-ज्अयण समत्त ॥ ७॥ . ॥ अह काविलिय अहम अज्झयण ॥ अमुवे अमामयम्मि, समारम्मि दक्सपउराए । कि नाम होज त कम्मय. जेणार दोग्गड न गरेजा ॥१॥ विजहित्तु पुव्यसजोय, न सिणेह कहिचि कुन्चेजा। असिणेहसिणेहकरेहि, दोमपजोसेहि मुचए भिक्ख् ॥ २॥ तो नाणदमणममग्गो, हियनिस्सेसाय सनजीराण । तेसि निमोरपणद्वाए, भामई मुणिरो विगयमोहो ॥३॥ सच गय कलह च, पिप्पजहे तहाविह मित्र । सव्वेसु कामजाएसु, पाममाणो न लिप्पई ताई ॥ ४॥ भोगामिमटोमरिमन्ने, हियनिस्सेयसद्धियोचत्थे । वाले य मन्दिए मूढे, वज्झई मच्छिया र सैलम्मि ॥ ५ ॥ दुप्परिचया इमे कामा, नो सुजहा अपीरपुरीमेहिं । अह मन्ति मुच्चया माह, जे तरन्ति अतर पणिया वा ॥६॥ ममणामु एगे ग्यमाणा, पाणयह मिया अयाणन्ता । मन्दा निरय गच्छन्ति, पाला पारियाहिं दिट्टीहि ॥ ७ ॥ न हु पाणयह अणुजाणे, मुच्चेञ्ज कयाड सव्यदुक्साण । - ४~ श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला पाणे य नाइवाएजा, से समीइ ति बुचई ताई। तओ से पावयं कम्मं, निजाइ उदगं व थलाओ ॥ ९ ॥ जगनिस्सिएहिं भृएहि, तसनामेहिं थावरहिं च । नो तेंसिमारमे दंई, मणसा वायसा कायमा चेव ॥ १० ॥ मुद्देसणाओ नचाणं, तत्थ ठवेज भिक्खू अप्पाणं । जायाए घासमेसेजा, रसगिद्धे न सिया भिक्खाए ॥ ११ ॥ पन्ताणि चेव सेवेजा, मीयपिंडं पुराणकुम्मामं । अदु वकसं पुलागं बा, जवणट्ठाए निवेसए मंधु ॥ १२ ॥ जे लक्षणं च सुविणं, अङ्गविजं च जे पउनन्ति । न हु ते समणा वृचन्ति, एवं आयरिएहिं अक्खायं ॥ १३ ॥ इहजीवियं अणियमेत्ता, पमहा समाहिजोएहिं । ते कामभोगरसगिद्धा, उचवजन्ति आसुरे काए ॥ १४ ॥ तत्तो वि य उव्वहिता, संसारं बहु अणुपरियडन्ति । बहुकम्मलेचलित्ताणं, वोही होइ सुदुल्हा नेसि ॥ १५ ॥ कसिणंपि जो इमं लोयं, पडिपुण्णं दलेज इक्कम्स । तेणावि से न संतुस्से, इइ दुप्परए इमे आया ॥ १६ ॥ जहा लाहो तहा लोहो, लाहा लोहो पबढ़ई । दोमासकर्य कन्ज, कोडीए वि न निट्टियं ।। १७ ।। नो रक्खसीसु गिझज्जा, गंडवच्छामु उणेगचित्ताम् । जाओ पुरिसं पलोमित्ता, खेल्लन्ति जहा व दासेहिं ॥ १९ ।। नारीमु नोवगिज्झेजा, इन्थी विष्पजहे अणागारे । धम्मं च पेसल नचा, तत्थ ठवेज भिक्खू अप्पाणं ।। १९ ॥ इअ एस धम्मे अक्खाए. कविलेणं च विमुद्धपन्नेणं । तरिहिन्ति जे उ काहिन्ति, तेहिं आराहिया दुवे लोग ॥ २० ॥ त्ति वेमि || इअ काविलीय अट्टम अज्झयण समत्तं ॥ ८ ॥ ॥ अह नवसं नमिपव्वजा अज्झयण ॥ चइऊण देवलोगाओ, उचवन्नो माणुमम्मि लोगम्मि । उवसन्तमोहणिलो, सरई पोराणियं जाई ॥ १ ॥ जाई सरित्तु भयवं, महसंबुद्धो अणुत्तरे धम्मे। पुत्तं ठवेत्तु रज्जे, अभिणिक्खमई नमी राया ॥२॥ से देवलोगसरिसे, अन्तेउरवरगओ बरे भोए । भुजितु नमी राया, बुद्धो भोगे परिचयई ॥ ३ ॥ मिहिलं सपुरजणवयं,बलमारोहं च परियणं सव्वा चिच्चाअभिनिखन्तो एगन्तमहिड्ढीओ भयवं ॥ ४ ॥ + श्रीउत्तराययनसूत्र-नवमाध्ययनम् . . - . अन्भुट्टिय रायरिसि, पयजाठाणमुत्तम । सको माहणरुवेण, इम चयणमब्बनी ॥६॥ किण्णु भो अज मिहिला, कोलाहलगसकुला! सुन्यन्ति दारुणा सद्दा, पासामु गिहेच य ॥७॥ एयमट्ठ निमामित्ता, हेजकारणचोइओ। तओ नमी रायरिसी, देविन्दो इणमन्नवी ॥ ८॥ मिहिलाए चेइए अच्छे, सीयच्छाप मणोरमे। पत्तपुप्फफलोवेए, बहूण बहुगुणे सया ॥९॥ वारण हीरमाणम्मि, चेइयम्मि मणोरमे। दुहिया असरणा अत्ता, एए कन्दन्ति भो सगा ॥ १० ॥ एयम निमामित्ता, हेऊकारणचोडओ । तओ नमि रायरिसिं, देविन्दो इणमघवी ॥ ११ ॥ एम अग्गी य नाऊ य, एन डझड मन्दिर। भयर अन्तेउर तेण, कीम ण नारपेक्सह ॥ १२ ॥ एयमह निमामित्ता हेऊकारणचोडओ। तओ नमी रायरिसी, देविन्दो डणमब्यवी ॥ १३ ॥ सुहवसामो जीवामो जेसि मोनत्थि किचण । मिहिलाए इज्डमाणीण, न मे डझड किचण ॥ १४ ॥ चत्तपुत्तफलत्तम्स, निनागारस्म मिक्खूणो। पिय न विज्जई किचि, अप्पिय पि न विजई ॥१५॥ बहुगु मुणिणो भद्द, अणगारम्म भिक्खुणो। मचओ विप्पमुकस्म, एगन्तमणुपमओ ॥ १६ ॥ एयमट्ट निमामित्ता, हेऊमारणचोडओ। तओ नमी रायरिसी देविन्दो इणमध्यवी ॥ १७ ॥ पागार काग्डताण, गोपुरट्टालगाणि च । उस्सलगमयग्घीओ, तओ गन्छसि सत्तिया ॥१८॥ एयमह निमामित्ता, इऊकारणचोडओ। तओ नमी रायरिमी, देविन्दो इणमब्बनी ॥ १९ ॥ सद्ध नगर किचा, तवसवरमग्गल । सन्ति निरणपागार, वीगुत्त दुप्पयसय ॥ २० ॥ घणु परकम किच्चा, जीन च इरिय मया। घिड च केयण किच्चा, सच्चेण पलिमन्थए ॥ २१ ।। तरनारायजुत्तेण, मित्तूण कम्मकचुय । मुणी विजयसगामो, भावाओ परिमुचए ॥ २२ ॥ एयमह निमामित्ता, हैऊकारणचोडओ। तओ नमि रायरिमि, देविन्दो इणभननी ॥ २३ ॥ पामाए कारहत्ताण, नद्धमाणगिहाणि य । वालग्गपोइयाओ य, वओ गन्छसि सत्तिया ॥ २४ ॥ एयम निमामित्ता, हेऊकारणचोडओ। तओ नमी रायरिसी, देविन्दो इणमञ्चवी ।। २ ।। समय खलु सो कुणई, जो मग्गे कुणई घर। जत्येन गन्तुमिन्छेना, तत्थ कुव्वेज मासय ॥ २६ ॥ एयमह निमामिचा, हेऊकारणचोडओ । तओ नर्मि रायरिसिं, देविन्दो इणमन्नवी ॥ २७ ॥ आमोमे लोमहारे य, गटिमेण् य तकरे । नगरस्स खेम काऊण, तओ गन्छसि सचिया ॥ २८॥ एयम? निमामित्ता, हेजकारणचोडओ। तओ नमी रायरिसी, देविन्दो इणमननी ॥ २९ ॥ अमड तु मणुस्सेहिं, मिन्छा दडो पजुर्जई । अकारिणोऽस्थ वज्झन्ति, मुच्चई कारओ जणो॥३०॥ एयमट्ट निमामित्ता, हेऊकारणचोइओ। तमो नमि रायरिसिं, देविन्दो हणमचनी ॥ ३१ ॥ जे केड पत्थिवा तुज्झ, नानमन्ति नराहिवा। वसे ते ठारडत्ताण, तओ गच्छसि सत्तिया ॥ ३२ ॥ रायमट्ठ निमामित्ता, हेजकारणचोइओ । तओ नमी रायरिसी, देविंदो इणमन्बवी ॥३३॥ जो महम्स सहस्साण, सगामे दुजए जिणे । एग जिणेज अप्पाण, एस से परमो जओ ॥ ३४ ॥ अप्पणामेव जुज्झाहि, किं ते जुझेण वज्झओ। अप्पणामेरमप्पाण, जडत्ता मुहमेहए ॥ ३० ।। पचिन्दियाणि कोह, माण माय तहेव लोह चा दुजय चेव अप्पाण,मय अप्पे जिए जिय ।। ३६ ।। एयम निसामिचा, हेजकारणचोडओ । तओ नमि रायरिसिं, देविन्दो इणमब्बवी ।। ३७ ॥

- . . (१२) श्रीजैन सिद्धान्त-स्वाध्यायमाला. एयमदृ निसामित्ता, हेऊकारणचोइओ। तओ नमी गयरिसी, देविन्दो इणमब्यवी ।। ३९ ।। जो सहस्सं सहस्साणं, मासे मासे गवं दए । तस्स वि संजमो सेओ, अदिन्तस्स वि किंचण ॥ ४०॥ एयमझु निसामित्ता, हेजकारणचोइओ । तओ नर्मि रायरिसिं, देविन्दो इणमची ॥४ घोरासमं चइत्ताणं, अन्नं पत्थेसि आसमं । इहेब पोसहरओ, भवाहिवा मणुयाहिवा ॥ ४२ } एयमढ निसामित्ता, हेऊकारणचोइओ। तओ नमी गयरिसिं, देविन्दो इणमयबी ॥ ४३ ।। मासे मासे तु जो बालो, कुसग्गेण तु भुंजए। न सो नक्सायधम्मस्म, कलं अग्घा सोलमि ॥ ४४ एयमह निसामित्ता, हेजकारणचोइओ, तओ नर्मि गयरिसिं, दविन्दो इणमन्ववी ।। १५ ।। हिरणं सुवणं मणिमुत्तं, कंसं दृसं च वाहणं । कोसं बड्ढावइत्ताणं, नो गच्छमि ग्यत्तिया ॥ १६ ॥ एयमहूँ निसामित्ता, हेजकारणचोइओ। तो नमी रायरिसिं, दविंदो इणमञ्चबी ॥ ४७ ।। सुवण्णरुपस्स उ पव्यया भवे, सिया हु केलामममा असंखया । नरस्स लुद्धस्स न तेहिं किंचि, इच्छा र आगासममा अणन्तिया ।। ॥४८॥ पुढवी साली जवा चेव, हिरण्णं पसुमिस्सह । पडिपुण्णं नालमेगस्म, इड विजा तवं चरे ।। ४९ ॥ एयमझु निमामित्ता, हेजकारणचोइओ। तओ नमि रायरिमि, देविन्दो इणमन्यवी ॥ ५० ॥ अच्छेरयममुए, भोए चयसि पत्थिया । असन्ते कामे पत्थेसि, सकप्पेण विहम्मसि ॥ ५१॥ एयमहूँ निसामित्ता, हेजकारणचोडओ । तओ नमी रायरिमी, देविन्दो इणमञ्चवी ।। ५२ ॥ सल्लं कामा विसं कामा, कासा आसोविसोवमा | कामे पत्थेमाणा, अकामा जन्ति दोग्गई ॥ ५३ ।। अहे वयन्ति कोहेणं, माणेणं अहमा गई । माया गई पडिग्याओ, लोभाओ दुहओ भयं ।। ५४ ।। अवरझिजण माहणरूचं, विउव्धिऊण इन्दत्ती बन्दइ अभिन्युणन्तो, इमाहि महुगहि बग्गृहि ॥ ५५ ॥ अहो ते निजिओ कोहो, अहो माणो पराजिओ। अहो निरकिया माया, अहोलोभो बसीकओ ॥५६॥ अहो ते अन्नवं साहु, अहो ते साहु महवं । अहो ते उत्तमा खन्ती, अहो ते मुत्ति उत्तमा ।। ५७ ॥ इहं सि उत्तमो भन्ते, पच्छा होहिसि उत्तमो । लोगुत्तमुत्तमं ठाणं, सिद्धिं गच्छसि नीरओ ।। ५८ ॥ एवं अभियुणन्तो, रायरिसिं उत्तमाए सद्धाए। पयाहिणं करेन्तो, पुणो पुणो बन्दई सक्को ॥ ५९ ॥ तो बन्दिमण पाए, चक्रंकुसलक्खयो मुणिवरस्स । आगासेणुप्पइओ, ललियचलकुंडलतिरीडी ।। ६० ।। नमी नमेइ अप्पाणं, सक्ख सकेण चोइओ। चइरुण गेहं च वेदेही, सामण्यो पज्जुवडिओ || एवं करेन्ति संबुद्धा, पंडिया पवियक्वणा । विणियद्दन्ति भोगेसु, जहा से नमी रायरिसि ॥ ६२ ॥ त्ति वेमि ।। इअ नमिपवजा समत्ता ॥ । ..

श्री उत्तराध्ययनमूत्र-दममाध्ययनम् wn vowww ॥ अह ट्मपत्तय दसम अल्झयणं । जाउ, मपार्टय, य दुमपत्तए पटुयए जहा, निवडड गटगणाण अचए । एर मणुयाण जीविय, ममय गोयम मा पमाया ॥१॥ सुमग्गे जह मोगविन्दुए, योन चिइ लम्ममाण एर मणुयाण जीरिय, मगर गोयम मा पमायण ॥२॥ हह इत्तरियम्मि जीविया बहुपचरायण । निगाह रय पुर कट, ममय गोयम मा पमायण ॥ ३॥ दह गा माणुसे भर, चिरकाले नि मपाणिण । गाढा 7 विधाग कम्मुणो, समय गोरम मा पमा ॥४॥ पुढनिकायमगओ, उपोम जीनो मरमे । पाल सपाइय, समय गोयम मा पमाया ॥५॥ आउफायमगओ, मोम जीयो उ सपने। काल ममय गोपम मा पमायण ॥६॥ तेउपायमहगो, गोम जीयो मरमे। पार मगाईय ममय गोयम मा पमायण ॥ ७ ॥ गाउपाइयमहगो, उदोम जीरो य गरसे । पाल समाइय, ममयं गोयम मा पमायण ॥ ८॥ यणमहशयमहगो, घोम जीवो उ मरमे। कारमणन्तदुग्न्तय गमय गोयम मा पमायण ||० ॥ डन्दियायमडगओ, उपोम जीयो उ माने। फार ममिन्नमग्निय, ममय गोयम मा पमाया ॥ १० ॥ नेन्दियायमागो गाम जीरो उ काल मगिन्नमनिष, ममय गोयम मा पमाया ॥ ११ ॥ घउतिनियकायमगो, उमओम जीयो उ गरम । फार ममिनमानिय, गमग गोयम मा पमाया ॥ १०॥ पचिन्दियकायमगलो. गोग पीयो उ समे। मममरगाणे, गोयम मा पमायण ॥१३॥ दी नेगए यमागतो मोम उपोय नम: मासे। मगर गमप गोयम मा पमाया ॥ १४॥ ण भाममा ममत महाराज सम्मेल। मरमे। , श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला लखूण वि माणुमतण, आरिशतं पुणरावि दुल्हं । विगलिन्दियया हु दीसई, समयं गोयम मा पमायण ।। १६ ।। लघृण वि आयरित्तणं, अहीणपंचेन्दियया हु दहा विगलिन्दियया हु दीसई. समयं गोयम मा एमायए ॥ १७ ॥ अहीणपंचेन्दियत्तं पि से लहे, उत्तमध धम्ममुई हु दुलहा। कुतित्थिनिवेमए जणे, समयं गोयम मा पमायाए ॥ १८ ॥ लघृण चि उत्तमं मुई, सहहणा पुणरावि दुल्हा । मिच्छत्तनिवेसए जणे, समयं गोयम मा पमाया ।। १९ ॥ धम्म पि हु सहन्तया, दहया कारण 'फासया । इह कामगुणेहि मुच्छिया, समयं गोयम मा पमाया ॥ २० ॥ परिजूगड ते सरीरयं, कसा पण्डस्या हवन्ति ते । से सोयवले य हाय, समयं गोयम मा पमायाए ॥ २१ ॥ परिज़रइ ते सरीरयं, केसा पण्डग्या हवन्ति ते । से चक्खुबले य हायई, समयं गोयम मा पमायए ॥ २२ ।। परिज़रह ते सरीरयं, कमा पण्डरया हवन्ति ने । से घाणवले य हायई, यमयं गोयम मा पमायए ।। २३ ।। परिजाइ ते सरीन्य, कमा पण्डग्या हवन्ति ने। से जिभवले य हायई, समयं गायम मा पमायण ॥ २४ ॥ परिज़रड ते सरीरयं. केया पण्डरया हवन्ति ने। से फासवले य हायई, समय गोयम मा पमायए । ०५ ॥ परिजग्इ ते सरीरयं, केसा पण्डरया हवन्ति ते । से सव्यवले य हायई, समयं गोयम मा पमायए ।। २६ ।। अरई गण्डं विमूहया, आयंका विविहा फुगन्ति ते । विहडइ विद्धंसइ ते सरीरयं, समयं गोयम मा पमायए ।॥ २७ ॥ वोच्छिन्द सिणेहमप्पणो, कुमुयं सारइयं व पाणियं । से सव्वसिणेहवजिए, समयं गोयम मा पमायए ॥ २८ ॥ चिच्चाण धणं च भारियं, पच्चइओ हि सि अणगारियं । मा वन्तं पुणो वि आइए, समयं गोयम मा पमायए ।। २९ ।। अवउडिझय मित्तवन्धवं, विउलं चेव धणोहसंचयं । मा तं विउयं गवेसए, समयं गोयम मा पमायए ॥ ३०॥ न हु जिणे अज दिस्मई. बहुमए दिस्सइ मग्गदेसिए । संपइ नेयाउए पहे, समयं गोयम मा पमायए ॥ ३१ ॥ अवरोद्रिय काटा, पई..ओइण्णो. सि. पहं महालयं । ---

श्रीउत्तरा ययनमूत्र-दसमाध्ययनम्
(१५)
AN
M
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गच्छसि मग्ग विसोहिया, ममय गोयम मा पमायए ॥ ३२ ॥
अगले जह भारवाहए, मा मग्गे विममे वगाहिया ।
पच्छा पच्छाणुतापण, ममय गोयम मा पमायए ॥ ३३॥
तिण्णो हु सि अण्णा मह, किं पुण चिट्ठसि तीरमागओ।
अमितुर पार गमित्तए, ममय गोयम मा पमायए ॥ ३४ ॥
अकलेवरसेणि उस्सिया, सिद्धि गोयम लोय गन्छसि ।
खेम च सिन अणुत्तर, समय गोयम मा पमायए ॥ ३५ ॥
बुद्धे परिनि बुडे चरे, गामगए नगरे व सजए।
सन्तीमग्ग च वृहए, ममय गोयम मा पमायए ॥ ३६ ॥
बुद्धस्म निमम्म भासिय, सुफहियमट्टपओसोहिय ।
राग दोस च छिन्दिया, सिद्धिगड गए गोयमे ॥ ३७ ॥
त्ति वेमि ॥ इअ दुमपत्तय समत्त ॥ १० ॥
M
॥ अह वहुस्सुयपुज्ज एगारस अज्झयणं ।
सजोगा विप्पमुक्कम्म, अणगारस्स मिक्खुणो। आयार पाउकरिस्सामि, आणुपुब्धि सुणेह मे ॥ १ ॥
ने यावि होड निविजे, यद्वे युद्धे अणिग्गहे अमिक्सण उल्लयई, जविणीए अबहुस्मुए ॥०॥
अह पचहि ठाणेहि, जेहि सिक्सा न लब्भई । यम्भा कोहा पमाएण, रोगेणालस्मपण य ॥३॥
अह अहहिं ठाणेहिं, सिक्सासीलि त्ति वुच्चई । अहस्सिरे सया दन्ते, न य मम्ममुदाहरे ॥ ४ ॥
नासीले न विसीले न सिया अइलोलुए । अकोहणे सचरण, सिक्सासीलि त्ति बुचई ॥७॥
अह चोडमहिं ठाणेहि, पट्टमाणे उ सजए। अविणीप बुच्चई सो उ, निवाण च न गन्छड ।। ६ ।।
अभिक्खण कोही हयड, परध च पकुव्बई । मेत्तिज्जमाणो उमड, सुय लभृणमजई ॥ ७ ॥
अवि पानपरिक्खेवी, अवि मिनेमु कुप्पई । सुप्पियस्सावि मित्तस्म, रहे भामड पाय ॥८॥
पइण्णमाई दुहिले, यद्धे लुद्ध अणिग्गहे । असविभागी अवियत्ते, अविणीए ति बुच्चई ॥९॥
अह पन्नरसहि ठाणेहि, सुविणीए ति बुचई । नीयारत्ती अचवले, अमाई अकुऊहले ॥१०॥
अप्प च अहिक्खिबई, पवन्ध च न कुबई । मेत्तिनमाणो भयई, सुय ला न मजई ॥ ११ ॥
न य पावपरिक्खेवी, न य मित्तम कुप्पई । अप्पियस्सावि मित्तस्म, रहे क्ल्लाण भासई ॥ १२ ॥
कलहडमरवजिए बुद्धे अभिजाइए । हिरिम पडिसलीणे, सुविणीए ति बुचई ॥ १३ ॥
वसे गुरुकुले निश्च, जोगव उवहाणव । पियकरे पियवाई, से सिक्स लधुमरिहई ।।१४।।
जहा सखम्मि पय, निहिय दुहओ वि विरायड । एव बहुस्सुए भिक्खू, धम्मो कित्तीतहासुय ॥ १५ ॥
जहा से कम्बोयाण, आइण्णे क्न्थए सिया । आसे जवेण' पपरे, एव हबह बहुस्सुए ॥ १६ ॥
जहादण्णसमारते. मरे दृढपरकमे । उभओ नन्दिघोसेण, एव हाइ बहुस्सुए ॥ १७ ॥

. श्रीजनसिद्धान्त-खाध्यायमाला. हा से तिक्खसिंगे, जायसन्धे विगयई । बसई जूहाहिबई, एवं हवड बहुम्मार ॥ १९ ॥ हा से तिखटाटे, उदग्गे दुप्पहंगा । सीहे मियाण पवर, गवं हवह बहुम्ला ॥ २० ॥ हा से वासुदेवे, गंखचकगयाधरे । अप्पडियाले जोहे, एवं हवह बहम्मद ॥ २१ ॥ हा से चाउग्न्ने, चकवट्टीमहिड्डिा । चोहमग्यगाहिबई, एवं हबद बहुम्मा ॥ २२ ॥ हा से सहारसभावे, वज्ञपाणी पुरन्दरे । मंक देवाहिबई. एवं वइ बहुम्ला ॥२॥ हा से निमिरविद्धंसे, उचिट्टाने दिवायां । जलन्त इव नाण, एवं हवद बदम्गए ।। २४ ।। हा से उडवई नन्द, नवनपग्विागिण । पडिपुणणे पुगणमानीए, गचं हबद बदलाए ॥ २५ ॥ हा से समाझ्याणं, काटागारे सुरभिषण । नागाधनपडिपुणग. गवं यद वहम्नुए ॥ २६ ॥ हा मा दुमाण पत्रग, जम्बु नाम गुदगणा । अगाडिगाम देवरल एनं हा बहरमुए ) २७ ॥ हा सा नईण पवग, मलिला मागरंगमा । मीया नीलबन्न पहा, एवं बहरमा ।। २८ !! हा से नगाण पबर, सुमहं मन्द गिर्ग। नागोमहिपनलिए, एवं वह बहुगुण ।। २० ।। हा ने सयंभुगमण, उदही अन्सभोदार । नाणारयणपडिप्रणे. एवं हवट बहुम्लए ।। ३० ॥ समृदगम्भीग्समा दुगयया, अचकिया कणह दुष्पमया । मुयल पुण्णा विचलम्प नादणो. ग्यवितु कम्मं गदानमं गया म्हा सुयमहिहिना, उनमट्टगवेगए। जेणप्पाणं परं चैव, सिद्धि मंपाउणेन्नामि ॥ ३२ ॥ त्ति येमि ॥ इअ बहुस्नुयपुनं ममत्तं ।। ११ ।। %D . ॥ अह हरिएसिज्जं चारहं अज्झयणं ।। बागकुलसंभृओ, गुणुत्तरधरो मुणी, इरिएमबलो नाम, आसि भिकाय जिडन्दिओ ॥ १ ॥ रिएसणभासाए, उच्चारममिईमु य । जो आयाणनिम्खेवे, संजओ सुसमाहिओ ॥ २ ॥ पणगुत्तो वयगुत्तो, कायगुत्तो जिइन्दिओ । भित्रबट्टा चम्मइज्जम्मि, जन्नबाडे उबहिओ ॥३॥ पासिऊणं एजन्तं. तवेण परिसोसियं । पन्तोवहिउवगरणं, उवहमन्ति अगारिया ॥ ४ नाईमयपडिथट्टा, हिंसगा अजिइन्दिया । अवम्भचारिणो बाला, इमं वयणमन्बी ॥ ५ ॥ कवरे आगछइ दित्तस्वे, काले विगगले फोकनासे ओमचलए पमृपियायभृए, कन्दमं परिवरिय कण्ठे ॥ ६ ॥ को रे तुम इय अदमणिन्ने, काए व आमाइहमागओमि । ओमचेलया पंमुपियायभूया, गच्छकावलाहिं किमिहिं टिओ सि ।। ७ ।। जक्खे तहिं तिन्दुयरक्खचासी, अणुक्रम्पओ तस्य महामुणिस्म । पच्छायइत्ता नियगं सरीरं, इमाई वयणाइमुदाहरित्था ।। ८ ॥ समणो अहं संजओ, बम्भयारी, विरोधणपयणपरिग्गहाओ। परप्पवित्तस्स उ भिक्खकाले, अन्नस्स अट्टा इहमागओमि ॥ ९॥ वियरिजइ सज्जइ भुर्जई, अन्नं पभूयं भवयाणमेयं ।

- - श्रीउत्तराध्ययनमून-द्वादशमाध्ययनम जाणेह मे जायणजीविणु नि, सेमावमेस लभउ एस्सी ॥१०॥ उवरखड भोयण माहणाण, अत्तट्ठिय सिद्धमिहगपक्स । नऊ वय एरिसमन्नपाण, दाहामु तुझ किमिह ठिओ सि ।। ११ ।। थलेस वीया बान्ति कासगा, तहेर निन्ने सु य आससाए । एयाए सद्धाए दलाह मज्झ, आराहए पुण्णमिण खु खित्त ॥ १२ ॥ खेत्ताणि अम्ह विडयाणिलोप,जहि पकिण्णा विरहन्ति पुण्णा । जे माहणा जाइ विजोरवया, ताड तु खेत्ताइ सुपेमलाइ ॥१॥ कोहोय माणो य नहो य जेसि, मोस अदत्त च परिग्गहच । ते माहणा जाइविनाविणा, ताड तु खेत्ताइ मृपामयाड ॥ १४ ॥ तुम्मेत्य भो मारधन गिरीण, अट्ठ न जाणेह अहिज्ज वेए । उच्चापयाड मुणिणो चरन्ति, ताड तु खेत्ताड सुपेमलाइ ॥१०॥ अज्झारयाण पडिकूलमासी, पमामसे कि तु मगासि अम्ह । अवि एय विणम्मउ अन्नपाण, न यण दाहामु तुम नियण्ठा ॥ १६ ॥ समिहि मज्झ सुममाहियम्म, गुत्तीहि गुत्तम्म जिइन्दियस्म । जड़ मे न ताहित्य अहेमणिन्न, किमान जन्माण लहित्य लाह ॥ ७॥ के एत्य सत्ता उसजोडयाचा, अझावया चा मह खण्डिएहि । एय दण्डेण फलपण हन्ता, कण्ठम्मि घेत्तृण ग्वलेज जोण ॥ १८ ॥ अज्झारयाण वयण मुणेत्ता, उद्धाइया तत्थ बहकुमारा । दण्डेहि वित्तेहि क्सेहि चेत्र, समागया त इसि तालयन्ति ॥ १९ ॥ रन्नो तर्हि कोमलियस्स धृया, भद्दतिनामेण अणिन्दियगी । त पासिया सजय हम्ममाण, युद्ध कुमार परिनियवेड ॥ २०॥ देवाभिओगेण निओडण्ण, दिन्ना मुरना मणमा न भाया । नरिन्ददेवि दभिन्दिएण, जेणम्हि पता इसिणा म एमो ॥ २१ ॥ प्रमो हुमो उग्गतनो महप्पा, जितिन्टिओसजओरम्भया । जो मे तयानेन्द्रह दिन्नमाणि, पिउणा मय कोमलिण्ण रन्ना 100॥ महाजमो एम महाणुभागो, पोग्यओ घोरपरयमो य । मा ण्य हीलेद्द नहीणिज, मा मचे नेण्ण मे निहहेना ॥ २३ ॥ पयाइ तीमे ग्यणा: मोचा, पत्तीट भाइ महासियाड । इसिम्म वेयारडियट्ठयाल जक्सा उमा सिणिवाग्यन्ति ॥ २४ ॥ ने योग्रूना ठिय अन्तलिफ्वेऽमुग तहि त जण तालयन्ति । ते मिन्नटेहे महिर मन्त, पासित्तु भा दृणमाङ मुन्नो ॥ २० ॥ गिरि नहेर्हि पणह, मन्तेहि पायह। जायनेय पाहि हणह, जे भिस्यु अवमन्नह ॥ ६ ॥ . अग - श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला आसीविसो उग्गतको गहेसी, घोरव्यो परकमो य । अगणिं वपस्सन्द पयंगसेणा, जे भिस्यं भत्तकाले वदेह ।। २७ !! सीसेण एवं सरणं उबेह, समागया सन्यजणेण तुम्मे । जइ इच्छह जीवियं वाधणं वा, लोगपि एसो कुविओ डहेमा ।। २८ ॥ अबहेडिय पिट्टिसउत्तमंगे, पसारिया बाहु अकमचेहे । निज्लेरियच्छे तहिरं वमन्ते, उद्धमुहे निग्गयजीहनेत ।। २९ ।। ते पासिया खण्डियकथए, विमणो विसण्णो अह माहणो सो । इसिं पसाएह मभारियाओ, हीलं च निन्दं च खमाह भन्ते ॥ ३०॥ वालेहि मूढेहि अयाणएहि, जं हीलिया तस्स न्वमाह भन्ते । महप्पसाया इसिणो हवन्ति, न हु मुणी कोवपरा हवन्ति ॥ ३१ ॥ पुचि च इण्डिं च अणागयं च, मणप्पदोसोन मे अत्यि कोइ । जक्खा हु वेयावडियं करेन्ति, तम्हा हु एए निया कुमारा ।। ३२ ।। अत्थं च यम्मं च वियाणमाणा, तुम्भं न वि कुप्पह भृहपन्ना । तुम्भं तु पाप मरणं उवेमो, ममागया सबजोण अम्हे ॥ ३३ ॥ अचेमु ते महामाग, न ते किंचि न अचिमो। भुंजाहि मालिम कृर, नाणावंजणसंजुयं ॥ ३४ ॥ इमं च मे अस्थि पभूयमन्नं, तं भुजम् अम्ह अणुग्गहट्ठा । बाई ति पडिच्छइ मनपाणं, मासस्स ऊ पारणए महप्पा ।। ३५ ।। तहियं गन्धोदयपुप्फवासं, दिव्या तर्हि बसुहारा य बुट्टा । पहयाओ दुन्दुहीओ सुरेंहिं, आगासे जहो दाणं च घुटुं ।। ३३ !! सक्खं खु दीसइ तयोविसेसो. न दीमई जाइविसेस कोई । सोबागपुत्तं, हरिएससाई, जस्सेरिमा इड्डि महाणुभागा ।। ३७ ।। किं माहणा जोइसमारभन्ता, उदएण सोहि बहिया विमगह । जं मग्गहा वाहिरियं विसोहिं, न तं सुदृढ़ कुसला वयन्ति ॥ ३८ ॥ कुसं च जूचं तणकट्ठमींग, सायं च पायं उदगं फुसन्ता । पाणाइ भूयाइ विहेडयन्ता, भुजो वि मन्दा पगरेह पावं ।। ३९ ।। कहं च रे भिक्खु वयं जयामो, पावाइ कम्माइ पुणोल्लयामो । अक्खाहि णे संजय जक्सपूहया, कहं मुजटुं कुसला वयन्ति ॥ ४० ॥ छजीवकाए असमारभन्ता, मोसं अदत्तं च असेवमाणा। परिग्गहं इत्थिो माणमायं, एयं परिन्नाय चरन्ति दन्ता ।। ४१ ।। सुसंवुडा पंचहिं संवगहि, इह जीवियं अणवखमाणा। बोसट्टकाइ सुइचत्तदेहा, महाजय जयइ जन्नसिटुं ॥ ४२ ॥ के ते जोई के व ने जोइठाणे, का ते मुया किं व ते कारिसंगं ।

(१९) श्रीउत्तरा ययनसूत्र-द्वादशमाध्ययनम् एहा य ते कयरा सन्ति मिक्खू, कयरेण होमेण हुणासि जोड ।। ४३ ॥ तवो जोई जीवो जोइठाण, जोगा मुया सरीर कारिसग । कम्मेहा सजमजोगसन्ती, होम हुणामि इसिण पसत्य ॥ १४ ॥ के ते हरए के य ते सन्तितित्थे, कहिं सिणाओ व रय जहासि । आइक्स णे सजय जक्सपूइया, इच्छामो नाउ भवओ सगासे ॥ ४५ ॥ धम्मे हरए पम्मे सन्तितित्थे, अणाविले अत्तपसन्नटेसे । जहि सिणाओ विमलो विसुद्धो, मुसीडभूओ पजहामि दोस ॥ ४६ ।। एय सिणाण कुसठेहि दिव, महासिणाण इसिण पमत्थ । जहि सिणाया विमला विसुद्धा, महारिसी उत्तम ठाण पत्त ।। ४७ ।। त्ति बेमि ॥ इअ हरिएसिज्ज समत्त ॥ १२ ॥ " ॥ अह चित्तसम्भूइज्ज तेरहम अज्झयणं । बाईपराजइओखलु, गमिनियाण तु हत्यिणपुरम्मिा चुलणीए गम्भदत्तो, उवपन्नो पउग्गुमाओ ॥१॥ कम्पिल्लेसम्भृओ, चित्तो पुणजाओ पुरमत्तालम्मिा सेटिकुलम्मि विसाले, धम्म मोऊण पन्चइओ ॥२॥ कम्पिल्लम्मिय नयरे, समागयादो विचितसम्भूया। सहदुक्सफलविवाग,कन्ति वे एकमेक्स्प्त ॥३॥ चक्चट्टी महिडटीओ, चम्भदत्तो महायसो। मायर बहुमाणेण, इम वयणमवन्धी ॥ ४ ॥ आसीम मायरो दोबि, अन्नमन्नवसाणुगा। अन्नमन्नमणूरत्ता, अन्नमन्नहिएसिणो ॥५॥ दासा दसणे आसीमु, मिया कालिंजरे नगे। हसा मयगतीरे, सोवागा कासिभूमिए ॥६॥ देवा य देवलोगम्मि, आसि अम्हे महिढीया। इमा नो छविया जाई, अन्नमन्नेण जा विणा ।। ७ ॥ कम्मा नियाणपयडा, तुमे राय विचिन्तिया । तेसिं फलविनागेण, पिप्पओगमुवागया ॥ ८ ॥ सबसोयप्पगडा, कम्मा मए पुरा क्डा । ते अन्न परिभुजामो, किं तु चित्तेवि से तहा ॥९॥ सच्च सुचिष्ण सफल नगण, कडाण कम्माण न मोक्ख अत्थि । अत्यहि कामेहि य उत्चमेहि, आया मम पुण्णफलोववेए ॥१०॥ जाणाहि सभ्य महाणुभाग, महिड्ढीय पुण्णफलोववेय । चित्त पि जाणाहि वहेव राय, इड्ढी जुई तस्स वियप्भूया ॥ ११ ॥ महत्थरूवा वयणप्पभूया, गाहाणुगीया नरसघमज्झे । ज भिक्सुणी सील्गुणोववेया, वह जयन्ते सुमणो मि जाओ ।।१२।। उधोया महु को य पम्मे, पवेइया आवमहा य रम्मा । रम गिह चिरा घणप्भूय, चित्त धणभूय, पमाहि पचाल्गुणोबवेय ॥ १३॥ न हि गीएहि य वाहएहि, नारीजणाहिं परियारयन्तो। भुजाहि भोगाइ इमाइ भिक्खू, मम रोयई प वजहु दुख ॥ १४ ॥ " भारा, सम्वे श्रीजैनसिद्धान्त - स्वाध्यायमाला. तं पुच्चने हेण कयाणुरागं, नगहिर कामगुणेसु गिद्धं । धम्मस्सिओ तस्स हियाणुपेही, चित्तो इम बयणमुदाहरिन्था ॥ १५ ॥ सव्यं विलवियं गीयं, सव्वं नर्स्ट विडम्बियं । सव्ने आमरणा कामा दुहावदा ॥ १६ ॥ बालाभिरामेनु दुहावहेमु, न तं सुहं कामगुणेसु रायं । विरत्तकामाण तवोहणाणं, मिक्खुणे सीलगुणे रयाणं ॥ १७ ॥ नरिंद जाई अहमा नगणं, सोवागजाई दुहओ गयाणं । जहिं वयं समजणस्स, वेस्सी, वसी य सोवागनिवेसणेमु ॥ १८ ॥ तीसे य जाईइ उ पावियाए, वुच्छाम्नु मोवागनिवेसणसु । सचस्प लोगम्स दुगंछणिज्जा, इहं तु कम्माड पुरे कडाई ।। १९ ।। सो दाणि सिं गय महाणुभागो, महिड्डी पुण्णफलोववेओ। चात्तु भोगाइ असासयाई, आदाणहेउं अभिणिक्खमाहि ॥ २० ॥ इह जीविए राय अमासयम्मि, धणियं तु पुण्णाइ अकुव्यमाणो । से सोयई मच्चुमुहोवणीए, धम्म अंकाऊण परंसि लोए ॥ २१ ॥ जहेह सीहो व मियं गहाय, मच्च नरं नेइ हु अन्तकाले । न तस्म माया व पिया व भाया, कालम्मि तम्मंसहरा भवन्ति ।। २२ ॥ न तस्स दुक्खं विभयन्ति, नाइओ, न मित्तवग्गा न सुयान बंधवा । एक्को सयं पचणुहोइ दुक्खं, कत्तारमेव अणुजाइ कम्मं ।। २३ ।। चेचा दुपयं च चप्पयं च, खेत्तं गिहं गधन्नं च सव्यं । सकम्मवीओ अवसो पयाड, परं भवं सुंदर पावगं वा ॥ २४ ।। तं एक तुच्छसरीरगं से, चिईगयं दहिय उ पावगेणं । मज्जा य पुत्तावि य नायओ य, दायरमन्नं अणुसंकमन्ति ॥ २५ ॥ ज्वणिजई जीवियमप्पमायं. घण्णं जग हरइ नरस्स राय । पंचालराया वयणं सुणाहि, मा कामि कम्माइ महालयाई ॥ २६ ॥ अहं पि जाणामि जहेह साहू, जं मे तुमं साहमि बक्कमेयं । भोगा इमे संगकरा हवन्ति, जे दुजया अजो अम्हारिसेंहिं ॥ २७ ॥ हत्थिणपुरम्मि चित्ता, दट्टणं नरवई महिड्ढीयं । कामभोगेसु गिद्रेणं, नियाणमसुहं कडं ॥ २८ ॥ तस्स मे अपडिकन्तस्स, इमं एयारिसं फल । जाणमाणो वि जं धम्मं, कामभोगेसु मुच्छिओ ॥ २९ ॥ नागो जहा पंकजलावसन्नो, दट्ठ थलं नाभिसमेइ तीरं । एवं वयं कामगुणेमु गिद्धा, न भिक्खुणो मग्गमणुब्बयामो ॥ ३० ॥ अच्चेइ कालो तरन्ति राइओ, न यावि भोगा पुरिसाण निचा । - प mharww Arune श्रीउत्तराध्ययनसून-निंदशमध्ययनम् उविच्च भोगा पुरिस चयन्ति, दुम जहा सीणफल-व पक्खी ॥३१ ।। जड त मि भोगे चडउ जसतो, अञ्जाइ कम्माड करेहि राय । यम्मे ठिजो सच्चपयाणुफम्पी, तो होहिसि देवो इओ निउची ॥३२॥ न तुज्झ भोगे चडऊण युद्धी, गिद्धो सि आरम्भपरिग्गहेसु। मोह कओ एत्तिउ विप्पला, गच्छामि गय आनन्तिओ सि ॥ ३३ ॥ पचालराया नि य चम्भदृत्तो, साहुस्स तस्स धयण अफाउं । अणुत्तरे भुजिय कामभोम, जणुत्तरे सो नरए पविट्ठो ॥ ३४ ॥ चित्तो नि कामेहि विरत्तकामो, अदग्गचारित्ततमो महसी । अणुचर सजम पालइत्ता, अणुचरं सिद्धिगई गओ ॥ ३५ ॥ त्ति बेमि ।। इअ चित्तसम्भूहज समत्त ।। . ॥ अह उसुयारिज चोदहम अज्झयणं ॥ देवा भवित्ताण पुरे भवम्मी, केई घुया एगविमाणवासी । पुरे पुराणे उसुयारनामे, साए समिद्धे सुरलोगरम्मे ॥ १ ॥ सकम्मसेसेण पुराकएण, कुलेसुदग्गेसु य ते पसूया। निविण्णससारभया जहाय, जिणिदमग्ग सरण पनन्ना ॥ २॥ पुमत्तमागम्म कुमार दो वी, पुरोहिओ तस्स जसा य पत्ती । विसालफित्ती य तहोसुयारो, रायत्य देवी कमलावई य ॥ ३ ॥ जाईजरामन्चुभयाभिभूया, वहिविहाराभिनिविचित्ता। समारचकस्म विमोक्सणट्ठा, दट्टण ते कामगुणे विरचा ॥४॥ पियपुत्तगा दोन्नि वि माहणस्स, सकम्मसीलस्स पुरोहियस्स । सरितु पोराणिय तत्थ जाइ, तहा भुचिण्णं वनसजमं च ।। ५ ॥ ते कामभोगेसु असन्जमाणा, जाणुस्सएम ने यावि दिया। मोक्खामिकसी अभिजायसड्डा, ताय उवागम्म इम उदाहु ॥६॥ अमासय दल इम विहार, बहुअन्तराय न य हीयमाउ । तम्हा गिहिसि न रइ लहामो, आमन्तयामो चरिस्सामु मोण ॥ ७ ॥ अह तायगो तत्थ मुणीण तेसिं, तबस्स वाघायकर वयासी । इमं वय वेयविओ नयन्ति, जहा न होई अमुयाण लोगो ।।८।। अहिज्ज वेए परिविस्स विप्पे, पुत्ते परिप्प गिहसि जाया । भोघाण भोए सह इत्थियाहिं, आरण्णगा होह मुणो पसत्या ।।९।। सोयरिंगणा आयगुणिन्धाणेणं, मोहाणिला पनलणाहिएण | -- .

श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला - पुरोहियं तं कमसोऽणुणिन्तं. निमंतयन्तं च सुए धणेणं । जहकर्म कामगुणेहि चेत्र, कुमारगा ने पसंमिक्ख वकं ।। ११ ।। या अहीया न भवन्ति ताणं, भुत्ता दिया निन्ति तमं तमेणं । जाया य पुत्ता न हवन्ति ताणं, को णाम ते अणुमन्नेज एयं ।। १२ ।। खणमेत्तमोक्खा बहुकालदुक्खा,पगामदुक्खा अणिगामसोग्वा । संसारमोकावस्स विपक्वभूया,खाणी अणत्थाण उ कामभोगा ।। १३ ।। परिचयन्ते अणियत्तकामे, अहो य राओ परितप्पमाण। अन्नप्पमत्ते धणमेसमाणे, पप्पोति मच्चु पुरिसे जरं च ॥ १४ ॥ इमं च मे अस्थि इमं च नथि, इमं च मे किच इमं अकिचं । तं एवमेयं लालप्पमाणं, हरा हरति त्ति कहं पमाए ।। १५ ।। धणं पभूयं सह इत्थियाहिं, सयणा तहा कायगुणा पगामा । तवं कए तप्पइ जस्स लोगो, तं सच साहीणमिमेव तुम्भं ॥ १६ ॥ धणेण किं धम्मघुराहिगारे, सयोण वा कामगुणेहि चेत्र । समणा भविस्सामु गुणोहधारी,कहिविहारा अभिगम्म भिक्खं ।। १७ ।। जहा य अग्गी अरणी असन्तो, खीरे वयं तेहमहा तिलेसु । एमेव ताया सरीरंमि सत्ता, संमुच्छइ नासइ नावचिट्टे ।। १८ ॥ नो इन्दियग्गेझत्तमुत्तभावा, अमुत्तभावा वि य होइ निचो। अज्झत्थहे निययस्त बन्धो, संसारहेडं च वयन्ति बन्धं ॥ १९ ॥ जहा वयं धम्म अजाणमाणा, पावं पुरा कम्ममकासि मोहा । ओलभमाणा परिरक्खयन्ता, तं नेव भुनो वि समायरामो ॥ २० ॥ अन्भाहयम्मि लोगम्मि, सव्वओ परिवारिए। अमोहाहि पडन्तीहिं, गिर्हसि न रई लभे ॥ २१ ॥ केण अन्माहओ लोगो. केण वा परिवारिओ। का वा अमोहा वुत्ता, जाया चिन्तावरो चिन्ताबरो हुमे || २२ ॥ मच्चुणाऽन्भाहओ लोगो, जराए परिवारिओ। एवं ताय विजाणह ।। २३ ।। जा बचइ रयणी, न सा पडिनियतई। अफला जन्ति राइओ ! २४ ॥ न सा पडिनियत्तई। धम्म च कुणमाणस्स, संफला जन्ति राइओ ।। २५ ॥ दुहओ सम्मत्तसंजुया । पच्छा जाया गमिस्सामो, मिसभाणा कुले कुले ॥ २३ ॥ , अमोहा रयणी वुत्ता, जा अहम्मं कुणमाणस्म, जा जा चह रयणी, एगओ संवसित्तार्ण, - An- Panama mmaurane । श्रीउत्तरा ययनसूत्र-चोद्दमाध्ययनम् (२३) णो जाणे न मरिम्मामि, मो हु कसे मुए सिया ॥ २७ ॥ अजेब धम्म पडिनन्नयामो, जहिं पवना न पुणब्भनामो । 'अणागय नेव य अत्ति फिची, मद्धासमणे विणहत्तु राग ॥ २८ ॥ पहीणपुत्तस्म हुनस्थि पासो,वामिट्टि भिस्सायरियाड कालो। साहाहि रुक्सो लहई ममाहि, छिन्नाहि साहाहि तमेव ठाणु ॥ २९ ॥ पसाविहूणोच्चजहर पक्सी, भिचविणो व्य रणे नरिन्दो । विवनमारो वणिओ न पोप, पहीणपुत्तो मि तही अद्दपि ॥ ३० ॥ सुसमिया कामगुणे मे ते, सपिण्डिया अग्गरसप्पभूया । भुजामु ता कामगुगे पगाम, पच्छा गमिस्मामु पहाणमग्ग ॥ ३१ ॥ भुत्ता रसा भोइ जहाडणे वओ न जीवियट्ठा पजहामि भोए । लाम अलाभ चसुह च दुक्स,मचिक्पमाणो चरिस्सामि मोण ॥३२॥ माहू तुम सोयरियाग सम्भरे, जुणोन हमो पडिसोचगामी। भुजाहि भोगाइ मए समाण, दुरस सुभिक्सापरियाविहारो ॥ ३३ ॥ जहा य भोई तणुय भुयगो, निम्मोयणिं हिच पलेड मुत्तो। एमए जाया पयन्ति भोए, ते ह कह नाणुगमिम्समेको ।। ३४ ॥ छिन्दित्तु जाल अमल व रोहिया, मच्छा जहा कामगुणे पहाय । घोरेयसीला तवसा उदारा, धीरा हु भिक्साचरिय चान्ति ॥ ३५ ॥ नहेच कुचा सयडक मन्ता, तयाणि जालाणि दलित्त हसा। पलेन्ति पुत्ता य पई य मज्य ते ह कह नाणुगमिस्ममेका ।। ३६ ॥ पुगेहिय त समय मदार, सोचाऽभिनिसम्म पहाय भोए । कुडम्बमार विउलुत्तम च, राय, अभिक्स ममुदाय देसी । ३७॥ चन्तासी पुरिमो राय, न मो होह मो होड पससिओ। माहणेण परिचत्त, धण आदाउमिच्छसि ।। ३८॥ सव्य जग ना तुह, मय वावि धण सर पि ते अपजत, नेर ताणाय त तर ॥ ३९ ॥ मरिहिसि राय जया तया पा, मणोरमे कामगुणे विहाय । एकोहु धम्मो नरदेव ताण, न विलई अन्नमिहेह किंचि ॥४०॥ नाह रमे पक्सिणि पजरेगा, सनाणछिन्ना चरिम्मामि मोण । अकिंचणा उज्जुस्टा निरामिमा, परिग्गहारम्भनिय तटोमा ।।११।। दवम्गिणा जहा गणे, उज्यमाणेमु जन्तुमु । जन्ने सत्ता पमोयन्ति, गगहोमस गया ॥ ४२ ॥ एवमेव य मूढा, कामभोगेसु मुठिया । इज्झमाण न जुमामो, रागद्दोमग्गिणा जग ॥ ४ ॥ भोगे भोचा वमिना य, लदुभूषविहारिणो। आमोयमाणा गन्छन्ति, दिया कामकमा इव ॥ १४ ॥ - भवे। ,

Armwar
(२४)
श्रीजैन सिद्धान्त-स्वाध्यायमाला.
सामिसं कुललं दिस्स, वज्झमाणं निरामिसं । आमिसं सचमुजिना, विभिमागि निगमिमा ॥ १६ ॥
गिद्धोवमा उ नचाणं, कामे संमायणे । उग्गो सुगणपाय अ, मंकमाणी नणं च ॥ १७ ॥
नागो व्य बन्धणं छित्ता, अप्पणो वमहिं वए । पयं पच्छ महागयं. उनुपारि नि में सुयं ।। १८ ॥
चहत्ता विउलं रज, कामभोगे य दुयए। निश्चिगय निगमिमा, निना निष्परिगहा ॥ ११ ॥
धम्मं धम्म वियाणिता, चेचा कामगुणे वर्ग । नवं पगिसकपायं. घोरं बोएम.मा ।। ५० ॥
एवं ते कमसो बुद्धा, सव्वे धम्मपरायणा । जम्ममन्चुभबिग्गा, दक्पानगवे मिणा ।। ५१ ।।
सासणे विगयमोहाणं, पुन्यि भावणभाविया । अचिगणव कालण, दक्यम्पन्न मुवागया ॥ ५२ ।।
राया सह देवीए, माहणो य पुरोहियो । माढणी दारगा चेत्र, पञ्चे ने पििनचुट ।। ५३ ।।
त्ति वेमि ॥ इअ उसुधारिनं समत्तं ॥ १४ ॥
॥ अह सभिवस्व पंचदहं अज्झयणं ।
मोणं चरिस्तामि समिव धम्म, महिए उन्जुकट नियागछिन ।
संथ अहिज अकामकामे. अन्नायासी परिवाए नगि ॥ १ ॥
राओवरयं चरेज लाहे. विगा वेयविधायकिया।
पन्ने अभिभूय सव्वदंसी जे, कम्हिचि न मुन्छिा स भिग्य ॥ ॥
अधोमवहं वित्त धीरे, मुणी चरं लाटे निगमाय मुंगे।
अबग्गमणे असंपट्टि, जे कसिणं अहियाना स मिया ॥३॥
पन्तं सयगासणं महत्ता, मीउग्हं विविहं च समनगं ।
अवंग्गमणे असंपहिले, जे कमिणं अहियामा ग भिनन्य ॥ ४ ॥
नो सकइमिच्छई न पुयं, नो वि य बन्दणगं कुश्री परमं ।
से संजए मुखए तवम्सी, सहिए आयगवेसा अभिवरा ॥५॥
जेण पुण जहाइ जीवियं, मोहं वा कमिण नियन्छई ।
नरनारिं पजहे सया तबस्सी, न य कोहलं उवेइ स भिक्य ॥ ६ ॥
छिन्नं सरं भोमन्तलिक्सं, सुमिणं लक्वणदण्डवत्थुविज ।
अंगवियारं सरस्स विजयं, जे विजाहिं न जीवइ स भिस्य ॥७॥
मन्तं मूलं विविहं वैजचिन्तं, घमणविरेयणधृमणेचमिणाणं
आउरे सरणं तिगिच्छियं च, तं परिन्नाय परिवए स भिक्ख ॥ ८॥
खत्तियगणउग्गरायपुत्ता, माहणभोड्य विविहा य सिप्पिणो ।
नो तेसिं वयइ सिलोगपूर्य, तं परिन्नाय परिवए स भिक्ख ॥ ९ ॥
गिहिणो जे पचहएण दिट्ठा, अप्पवइएण व संथुया हविज्ञा ।
तेर्सि इयलोइयफलहा, जो संथवं न करेइ स भिक्खू ॥ १० ॥

श्रीउत्तराध्ययनसूत्र-पचदशमध्ययनम् (२५) AmAMMA . अदए पडिसेहिए नियण्ठे, जे तत्य न पउस्सई स भिक्खू ॥ ११ ॥ जकिचि आहारसाणजाय, विविह साइमसाइम परेसिं लध्धु । जो त तिविहेण नाणुकम्पे, मणवयकायसुसजुडे स भिक्खु ॥ १२ ॥ आयामगं चेव जण च, सीय सोवीरजवोदग च । न हीलए पिण्ड नीरस तु, पन्तकुलाइ परिवए स भिक्खू ॥ १३ ॥ सहा विविहा भवन्ति लोए, दिशा माणुस्सगा तिरिच्छा। भीमा भयमेरवा उराला, सोचा न विहिजई म भिक्खू ॥ १४ ॥ वाद विविहं ममिचलोए, सहिए खेयाणुखए य कोवियप्पा । पन्ने अभिभूय मबदमी, उनसन्ते अविहडिए स मिक्खू ॥ १५ ॥ अविसप्पजीवी अगिहे अमित्ते, जिइन्दिए सबओ विप्पमुके । अणुक्साई लॉअप्पभक्सी, चेचा गिह एगचरे स भिक्खू ॥ १६ ॥ त्ति बेमि ॥ इअ सभिक्खुय समत्त ।। १५ ॥ ॥ अह वम्भचेरसमाहिठाणाणाम सोलसम अज्झयण ॥ मुय मे आउम-तेण भगवया एवमक्साय । इह सल थेरेहिं भगवन्नेहिं दम घम्भचेग्समाहिठाणा पभत्ता, जे भिक्खू सोचा निसम्म सजमबहुले समरबहुले समाहिबहुले गुत्ते गुत्तिन्दिए गुत्वम्भ- यारी मया अप्पमत्ते विहरेजा । कयरे खलु ते येरेहिं भगर तेहिं दस यम्भचेरसमाहिठाणा पनत्ता, जे मिक्खू सोचा निसम्म मजमपहले ममाहिनले गुत्ते गुत्तिन्दिए गुत्तयम्भयारी मया अप्पमत्ते निहोला ।। इमे सलु ते थेरेहिं भगवन्तेहिं टस चम्भचेरठाणा पन्नत्ता, जे भिक्खू सोच्चा निसम्म सजमबहुले समरबहुले ममाहिबहुले गुत्त गुत्तिन्दिए गुत्तमम्मयारी सया अप्पमत्ते विहरेजा नजहा विवित्ताइ सयणामणाड सेपित्ता हवह से निग्गन्थे। नो इत्थीपसुपण्डगसमत्ताइ मयणामणाइ सेपित्ता हवह से निग्गन्थे । त कहमिति चे । आयरियाह । निग्गन्यस्म सलु इत्थिपसुपण्डगसमत्ताइ सय- णामणाइ सेनमाणस्स यम्भयारिस्स सम्भचेरे मझा चा कसा ना निडगिच्छा वा समुप्पजिजा, भेद वा लभेजा, उम्माय ना पाउणिजा, दीलकालिप वा रोगायक हवेजा, केलिपन्नताओ धम्माओ भसेज । तम्हा नो इत्थिपसुपण्डगममत्ताइ सयणापणाड सेपित्ता पड से निग्गन्ये ॥ १॥नो हत्यिण कह कहित्ता हड से निग्गन्थे । त कहमिति चे आयरियाह । निग्गन्यम्म सलु इस्त्रीण कह कमाणस्स कम्भयारिस्स बम्भचेरे ममा ना कसा वा पिडगन्छा पा ममुप्पजिजा, मेद वा लभेजा, उम्माय वा पाउणिजा, दीहकालिय या रोगायक हवेजा, केवल्पिन्नताओ धम्माओ भ- सेना । तम्हा नो इत्थीण कह कहेला ॥२॥ नो इत्थीण मद्धि मनिसेजागए निहरिता हाइ से निग्गन्थे । त कहमिति चे। आयरिया। निग्ग थम्म सलु इत्थीहि सद्धि मन्निमेनागयस्स मम्मयारिम्स यम्भचेरे मका या कसा वा गिडगिच्छा ना समुप्पजिन्ना, भेद या लमेन्ना उम्माय ना पाउणिज्ञा दीदकालिया.गाय हवेना. केवरिपनत्तानो गम्यायो अमेलासम्हाल- .

- .. ܗܝ श्रीजेनसिद्धान्त-खाध्यायमाला 'नो निग्गंथे इत्थीहिं सद्धिं सन्निसेन्जागए विहरेजा ॥३॥ नो इत्थीण इन्दियाई मणोहराई मणो- रमाई आलोहत्ता निझाइत्ता हवाइ से निग्गन्थे । तं कहमिति चे आयरियाह । निग्गन्थस्स खलु हत्थीण इन्दियाई मणोहराई मणोरमाई आलोएमाणस निझायमाणस्स यम्भयारिम्स चम्भचेरे संका वा कंखा वा विइगिच्छा वा समुप्पजिजा, भेदं वा लभेजा, उम्मायं चा पाउणिजा. दीह- कालियं वा रोगायकं हवेजा, कंवलिपन्नताओ धम्माओ भंसेजा । तम्हा खलु नो निग्गन्ये इत्योणं इन्दियाई मणोहराई मणोरमाई आलोएन्ज निझाएजा ॥ ४ ॥ नो इत्थीगं कुइन्तरंसि वा दृम- न्तरंसि वा भित्तन्तरंमि वा कूड़यसई वा रुझ्यस वा गीयसई वा हसियसह वा धणियमदं वा कन्दियसदं वा विलवियसई वा सुणेत्ता हवइ से निग्गन्थे । तं कहमिति चे । आयरियाह । निग्ग- न्यस्स खलु इत्थीणं जुइन्तरंसि व दूसन्तरंसि वा मित्तन्तरंसि या कूडयसई वा त्यसई वा गीयसई वा हसियसई वा थणियमइंचा कन्दिय मह वा विलवियसई वा सुणेमाणस्स बम्भवारिस बम्भचेरे संका वा कंखा वा विहगिन्छा वा समुप्पजिजा, भेदं वा लभेजा, उम्मायं वा पाउणिजा, दीहका- लियं वा रोगायक हवेजा केवलिपन्नत्ताओ धम्माओ भंसेजा । तम्हा खलु नो निग्गन्थे इत्थीणं कुडन्तरंसि बा दूसन्तरंसि या भित्तन्तरंसि वा कूइयसई वा कइयसई वा गीयसई वा हसियमई वा थणियसह वा क्रन्दियसई वा बिलवियसई वा मुलेमाणे विहरेजा ।। ५॥ नो निग्गन्थे पुवरयं पुवकीलियं अणुसरित्ता हवइ से निग्गन्थे तं कहमिति चे । आयरियाह । निम्गन्थस्स खलु पुवरयं पुवकीलियं अणुमरमाणस्म बम्भयारिस्स बम्भचेरे संका वा कंखा वा विइगिच्छा वा ममृप्पजिजा, भेदं वा लभेजा, उम्मायं वा पाउणिजा. दीडकालियं वा रोगायंक इवेजा, केवलिपन्नत्ताओ धम्मा- ओ भंसेजा । तम्हा खल नो निग्गण्थे पुवरयं पुछकीलियं अणुसरंजा ।। ६ ।। नो पणीयं आहार आहरित्ता हबइ से निग्गन्थे । तं कहमिति चे । आयरियाह । निग्गन्यम्न खलु पणीयं आहारं आहारेमाणस्य यम्भयारिस्म चम्मचरे संका वा कंखा वा विइगिच्छा वा समुप्पजिजा, भेदं वा लभेजा, उम्मायं वा पाउणिज्जा, ढीहकालियं वा रोगायकं हवेजा, केवलिपन्नत्ताओ धम्माओ भंसज्जा । तम्हा खलु नो निग्गन्थे पणीय आहारं आहारेजा ॥ ७ ॥ नो अइमायाए पाणभोयणं आहारता हबइ से निग्गन्थे । तं कहमिति चे । आयरियाह | निग्गन्थस्स खलु अइमायाए पाण- भोयणं आहारेमाणस्स चम्भयारिस्स बम्भचेरे संका वा कंखा वा विइगिच्छा वा समुप्पजिजा, भेदं वा लभेजा, उम्मायं वा पाउणिज्जा, दीलकालियं वा रोगायक हवेजा, कवलिपन्नत्ताओ धम्माओ भंसेज्जा । तम्हा खलु नो निग्गन्थे अइमायाए पाणभोयणं आहारज्जा ।। ८ ।। नो विभू- साणुवादी हवड़ से निग्गन्थे । तं कहमिति चे आयरियाह । विभूसावत्तिय विभूसियसरीरे इन्धि-, जणस अभिलसणिज हवइ तओ णं इत्थिजणेणं अमिलसिजमाणस्स बम्भचेरे संका वा कंखा वा विइगिच्छा वा ममुप्पजिजा, भेदं वा लभेजा, उम्मायं वा पाउणिज्जा, दीहकालिय वा रोगायक हवेजा, केवलिपन्नत्ताओ धम्माओ भंसेजा। तम्हा खलु नो निग्गन्थे विभूसाणुवादी हविजा श्रीउत्तगध्ययनसूत्र-सोलमाध्ययनम् (२७) , . लिपन्नचाओ धम्माओ भमेला। तम्हा गलु नो महरूवरमगन्धकासाणुनादी भनेजा मे निग्गन्थे। दसमे चम्मचेरममाहिठाणे हवा ॥ १०॥ भवन्ति इत्य सिलोगा तजहा- ज विवित्तमणाइण, रहिये इत्थि जणेण य सम्भचेरम रक्सट्टा, आलयं तु निवेसए ॥१॥ मणपल्हायजणी, कामगगविपट्टणी। नम्मचेररओ भिक्खू, बीकह तु विवजए ॥ २॥ सम च सथव थीहि, माह च अभिक्षण । सम्भचेरओ भिक्यू, निचसो परियजए।॥ ३ ॥ अगपञ्चगमठाण, चारुल्लवियपहिय । गम्भचेरओ यीण, चक्युगिज्झ विजए॥ ४॥ कूड़य म्टय गीय, इसिय थणियफन्दिय । सम्भचेररओ थीण, सोयगेझ विपनए ॥५॥ हास किड रड दप्प, महमावित्तासियाणि य । वम्भचेररओ थीण नाणुचिन्ते कयाड वि ॥६॥ पणीय भत्तपाण तु, सिप्प भयविवडण । सम्भचेररओ मिक्य, निचसो परिवजए ॥ ७ ॥ धम्मलद्ध मिय काले, जत्तत्थ पणिहाणय । नाइमत्त तु भुजेजा, यम्भचेररओ मया ॥ ८ ॥ विभूमं परिसनेजा, मरीपरिमण्डण । चम्भचेररओ मिक्खू, सिंगारस्थ न धारए ॥९॥ सहे स्वै य गन्धे य, रसे फासे तहेवय । पचविहे कामगुणे, निचसो परिसजए ॥ १० ॥ आलओ बीजणाउण्णो, धीम्हा य मणोरमा । मथनो चेन नारीण, तामि इन्दियदरिमण ॥ ११ ॥ कइय रुहय गीय, हासभुत्तामियाणि य । पणीय भत्तपाण च, अडमार पाणभोयण ॥ १२ ॥ गचभूसणमिट्ट च, कामभोगा य दुनया। नरस्मत्तगवेमिस्म, विम तालउड जहा ।। १३ । दुजए कामभोगे य, निचसो परिवजए । समाथाणाणि महाणि, पन्नेजा पणिहाणव ॥ १४ ॥ घम्मारामरते चरे मिक्खू, धिइमं धम्ममारही । धम्मारामरते दन्ते, चम्मचेरसमाहिए ॥ १५ ॥ देवदाणनगन्यवा, जक्खरपससकिन्नरा । यम्भयारिं नममन्ति, दुवर जे करन्ति त ॥ १६ । पस घम्मे धुवे निचे, सामए जिणदेमिए । सिद्वा सिझन्ति चाणेण, सिज्झिम्सन्ति तहापरे ।। १७ । त्ति वेमि ॥ इअ वम्मचेरममाहिठाणा ममत्ता ॥ १६ ॥ ॥ अह पावसमणिज्ज सत्तदह अज्झयणं । जे के उ पवह नियण्टे, धम्म सुणित्ता विणओरसन्ने । सुदुलह लहिउ बोहिलाम, विहरेज पच्छा य जहासुह तु ॥१॥ मेला दटा पारणम्मि अस्थि, उप्पज्जई भोतु नहेव पाउ । जाणामि ज वहई आसु ति, कि नाम रहामि मुएण भन्ते ॥ २ ॥ जे केई पमाण, निगमीले पगाममो । भोचा पंघा मुह मुबह, पारसमणि ति घुचई ।। ३ । आयरियठवन्धपहि, मृय विणय च गाहिए । ते चेत्र निमई गाले, पावसमणि ति युचर्ड ।। ४ । आयरिपउवउमाणण, सम्म न पडितप्पड । अपडिपुगप धद्दे पारसमणि ति उचई ॥५॥ सम्मइमाणो पाणाणि, वीयाणि हरियाणि य असजए सजयमन्नमाणी, पारसमणि चि पुचई ॥६॥ संधार फलग पीड, निसेज पायफम्पल । अप्पमञ्जियमारहह, पारममणि त्ति युञ्चई ॥ ७ ॥ दरवस्स चई, पमत्ते य अभिरवण । जयणे य चण्डे य, पारसमणि चि बुचर्ड 101 -----

((२८)
श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला.
सापडिलहेइ पमत्ते, पउज्झइ पायकम्बलं । पडिलेहा अणाउत्ते, पावगमणि ति बुचई ॥ ९ ॥
गिपडिलेहेइ पमत्ते, से किंचि हु निसामिया । गुरुपारिभावए निचं, पावममणि त्ति बुच्चई ॥१०॥
नावंहुमाई पमुहरे, थद्धे लुद्धे अणिग्गहे। असंविभागी अवियत्ते, पावममणि त्ति बुच्चई ।। ११ ॥
चविवादं च डदीरेइ, अहम्मे अत्तपन्नहा । बुग्गहे कलहे रत्ते, पावसमणि त्ति बुचई ।। १२ ।।
धअथिगसणे कुकुइए, जत्थ तन्थ निसीयई । आसणम्मि अगाउत्ते, पावसमणि ति युबई ।। १३ ।।
एसमक्सपाए सुबई, सेजं न पडिलेहइ । संथारए अणारत्ते, पावसमणि त्ति वुबई ॥ १४ ॥
सदुदहीविगईओ, आहारेइ अभिक्खणं । अरए य तबोकम्मे, पावसमणि त्ति वुचई ।। १५ ।।
राअत्यन्तम्मि य सूरम्मि, आहारेइ अभिक्षणं । चोइओ प डचोएड, पारसमणि ति चुचई ॥ १६॥
आयरियपरिचाई, परपासण्डसंवए । गाणगणिए दुभूए, पावसमणि नि बुचई ॥ १७ ॥
सय गेहं परिचज, परंगहंसि वावरे । निमित्तण य वबहरइ, पावसमणि त्ति बुचई ॥ १८ ॥
सन्नाड पिण्डं जेमेइ, नेच्छई सामुद्राणिय | गिहिनिसेनं च बाहेइ, पावसमणि त्ति बुचई ।। १९ ॥
एयारिसे पंचकुसीलसुबुडे, स्वधरे मुणिपवराण हेडिमे ।
अयंसि लोए विसमेव गरहिए, न से इहं नेव परन्थ लोए ॥ २० ॥
जे वजए एए सया उ दोसे, से सुपए होइ मुणीण मज्झे ।
अयसि लोए अमय व पूइए, आराहए लोमिण तहा परं ।। २१ ॥
॥ ति वेमि ।। इअ पावसमणिशं समत्तं ॥ १७ ॥
"
,
॥ अह संजइज्ज अढारहमं अज्झयणं ।।
कम्पिल्ले नयरे राया, उदिण्णवलवाहणे । नामेणं संजए नाम, मिगढ़ उपणिग्गए ॥१॥
हयाणीए गयाणीए, रयाणीए तहेव य । पायताणीए महया, सहओ परिवारिए ॥ २ ॥
मिए छुहित्ता हयगओ, कम्पिल्लुजाण केसरे । भीए सन्ते मिए तत्थ, बहेइ रसमुच्छिए ॥ ३ ॥
अह केसरम्मि उजाणे, अणगारे तवोधणे । सज्झायज्माणसंजुत्ते, धम्मज्झाणं झियायइ ॥ ४ ॥
अप्फोवमण्डस्मि, भायइ क्ख वियासवे । तस्मागए मिगं पासं, बहेइ मे नगहिवे ॥ ५ ॥
अह आसगओ राया, खिप्पमागम्म सो तहिं । हए मिए उ पासित्ता. अणगारं नत्थ पासई ॥६॥
अह राया तत्थ सम्भन्तो, अणगारो मणा हो । मए उ मन्दपुण्गेणं, रसगिद्धग धन्नुगा ॥ ७ ॥
'आसं विसजइत्ताणं, अणगारस्स सो निवो । विगएण बन्दा पाए, भग एत्थ मे खमे । ८ ॥
अह मोणेण सो भग्गवं, अणगारे झाणमस्सिए । रायाण न पडिमन्तेइ, तओ राया भवदुओ।। ९ ॥
संजओ आहमम्मीति, भगवं वाहराहि मे । कुद्धे तेएण अणगारे, डहेज नरकोडिओ ।। १० ।।
अभओ पत्थिवा तुम्भं, अभयदाया भवाहि य । अणिचे जीवलोगम्मि, किं हिमाए पसजसी ॥ ११॥
जया सर्व परिचज, गन्तवमवसस्स ते । अणिचेजीवलोगम्मि, कि रजम्मि पसजसी ॥ १२ ॥
जीवियं चेव रूवं च, विज्जुसंपाय चंचलं । जत्थ तं मुझसी रायं पेञ्चत्थं नावल्यमे ॥ १३ ॥

varam . . . श्रीउत्तराध्ययनसूत्र-अट्ठदश्चमाध्ययनम् (२९), नीहन्ति मय पुत्ता, पितर परमदुक्सिया | पितरो वि तहा पुत्ते, बन्धू राय तव चरे ॥ १५ ॥ तओ तेणजिए दवे, दारे य परिरक्विए। कीलन्तिञ्ने नरा राय, हहतुट्ठमलकिया ॥ १६ ॥ तेणावि ज कय कम्म, सुहं वा जइ वा दुह । कम्मुणा तेण सजुत्तो, गच्छई उ पर भव ॥ १७ ।। | सोजण तस्स सो धम्म, अणगारस्स अन्तिए । महया सवेगनिवेद, समावन्नो नराहियो ॥१८॥ । सजओ चहउ रन, निक्खन्तो जिणसासणे । गद्दमालिस्स भगवओ, अणगारस्म अन्तिए ॥ १९ ॥ चिचा रह पडए, सचिए परिभासह | जहा ते दीमई रूब, पसन ते महा मणो । २०॥ किं नामे कि गोत्त, कस्मट्ठाए व माहणे। कह पडियरसी बुद्धे, कह विणीए ति बुचसी ॥ २१ ॥ मजओ नाम नामेण, तहा गोतेण गोयमो। गद्दभाली ममायरिया. विजाचरणपारगा ॥ २२ ॥ किरिय अकिरिय विणय, णनाणच महामुणी। एएहि चउहि गणेहिं, मेयन्ने कि पभामई ॥ २३ ॥ इह पाउकरे युद्धे, नायए परिणिव्वुए । विजाचरणसपन्ने, सच्चे सच्चपरकमे ॥ २४ ।। पडन्ति नरए चोरे, जे नरा पावकारिणो | दिव च गइ गच्छन्ति, चरित्ता धम्ममारिय ॥ २५॥ मायावुइयमेय तु मुसाभासा निरत्थिया । सजममाणो वि अह, चमामि इरियामि य ॥ २६ ॥ सोए विडय मज्य, मिच्छादिट्ठी अणारिया। विजमाणे परे लोए, मम्म जाणामि अप्पग ॥ २७ ॥ अहसासि महापाणे, जुइम परिससओवमे । जा सा पालिमहापाली, दिवा परिमसओवमा ॥ २८ ॥ से चुए बम्भलोगाओ, माणुस्स भवमागए। अप्पणो य परेसिं च, आउ जाणे जहा तहा ॥ २९ ॥ । नाणारह च छन्द च, पविजेज सजए । अणट्ठा जे य सवत्था, इयविजामणुसचरे ॥ ३० ॥ पडिकमामि पसिणाण, परमतेहिं वा पुणो । अहो पट्ठिए अहोराय, इइ विज्जा तव चरे ॥ ३१ ॥ ज च मे पुच्छसी काले, सम मुद्धेण चेयसा। ताइ पाउकरे चुद्धे त नाण जिणसासणे ॥ ३२ ॥ । किरिय च रोपई धीरे, अफिरिय परिसज्जए। दिवीए दिट्ठीसम्पन्ने, धम्म चरसु दुचर ॥ ३३ ॥ ण्य पुण्णपय सोचा, अत्यधम्मोबमोहिय । भरहो वि भारह वास, चेचा कामाइ पवए ॥ ३४ ॥ सगरो वि सागरन्त, मरहनास नराहियो । इस्सरिय केवल हिच्चा, दयाइ परिनिव्वुडे ॥ ३५ ॥ चइचा भारह वाम, चवट्टी महिड्डियो। पवनमन्भुवगओ, मघन नाम महाजसो ।। ३६ ॥ सणकुमारो मणुस्मिन्दो चक्काट्टी महिडिओ। पुत्त रजे ठवेऊण, सो वि राया तव चरे ॥ ३७॥ चइत्ता मारह वास, चकनट्टी महिड्डिओ। सन्ती सन्तिकर लोग, पत्तो गडमणुत्तर ॥ ३८ ॥ इक्खागरायवसभो, कुन्यू नाम नरिसरो। विक्सायफित्ती भगव पत्तो गहमणुत्तर ॥ ३९ ॥ सागरन्त चहत्ताण, भरह नरवरीसरो। अरो य अरय पत्तो, पत्तो गइमणुत्तर ॥ ४० ॥ चइत्ता भारह नाम, चइत्ता बलवाहण | चइत्ता उत्तमे भोप महापग्मे तव चरे ॥४१॥ एगच्छत्त पमाहिता, महि माणनिमरणो । हरिसेणो मसुस्मिन्दो, पत्तो गरमणुत्तर ॥ ४२ ॥ अनिओ रायपहस्सहि मुपरिचाई, दम चरे। जयनामो जिणक्साय, पत्तो गहमणुत्तर ।। ४३ ।। दसण्णरज मुदिय, चहत्ताण मुणी चरे। दसण्णमद्दो निस्सन्तो, सम्स मक्कण चोडओ ॥४४॥ नमी नमेइ अप्पाण, मक्स मक्केण चोडओ। चइऊण गेह बडदेही, मामण्णे पज्जुनहिओ ॥ ४५ ॥ करकण्ड कलिंगेसु, पचालेमु य दुम्मुहो । नमी राया चौदहेसु, गन्धारेमु य नगई ।। ४६ ।। एए नरिन्दरमभा, निक्यन्ता जिणमागणे । पुत्ने गज ठण, मामण्णे पन्जुपट्टिया ॥४७॥ .

श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला । वीररायवसभो, चइत्ताण मुणी चरे। उदायणो पवइओ, पत्तो गइमणुत्तरं ।। ४८॥ हेव कासीराया, सेओसच्चपरक्कमे । कामभोगे परिचन्ज, पहणे कम्ममहावणं ।। ४९ ॥ हेब विजओ राया, अणडाकित्ति पथए । रजं तु गुणसमिद्धं, पयहित्तु महाजसो ॥ ५० ॥ हेवुग्गं तवं किच्चा, अवविखत्तेण चेयसा । महन्बलो रायरिसी, आदाय सिरसा सिरि ।। ५१ ।। हं धीरो अहेऊहिं, उम्मत्तो व महिं चरे । एए विसेसमादाय, सूरा दढपरकमा ॥ ५२ ।। चन्तनियाणखमा, सच्चा मे भासिया बई । अतरिंसु तरन्तेगे, तरिस्सन्ति अणागया ।। ५३ ।। हिं धीरे अहेऊहिं अत्ताणं परियावसे। सबसंगविनिम्मुक्के, सिद्धे भवइ नीरए ॥ ५४ ॥ त्ति वेमि ।। इअ संजइज समत्तं ॥ १८ ॥ ॥ ॥ मियापुत्तीयं एगूणवीसइमं अज्झयणं । ग्गीवे नयरे रम्मे, काणणुजाणसोहिए । राया बलभद्दि त्ति, मिया तस्सग्गमाहिसी ॥ १॥ सिं पुत्ते वलसिरी, मियापुत्ते ति विस्सुए । अम्मापिऊण दइए, जुवराया दमीसरे ॥ २ ॥ न्दणे सो उ पासाए, कीलए सह इस्थिहिं । देवोदोगुन्दगे चेव, निच्चं मुइयमाणसो ॥३॥ णिरयणकोद्दिमतले, पासायालोयणढिओ । आलोएइ नगरस्स, चउक्क त्तियचच्चरे ॥ ४ ॥ हि तत्थ अइच्छन्तं, पासई समणसंजयं । तवनियमसंजमधरं, सीलड्ढे गुणआगरं ॥ ५ ॥ हेहई मियापुत्ते, दिट्ठीए अणिमिसाए उ । कहिं मन्ने रिसं रूवं, दिट्ठपुई मए पुरा ॥ ६ ॥ हुस्स दरियणे तस्स, अज्झवसाणम्मि सोहणे। मोहं गयस्स सन्तस्स, जाईसरणं समुप्पन्नं ।। ७ ।। आईसरणे समुप्पन्ने, मियापुत्ते महिड्डिए । सरई पोराणियं जाई, सामण्णं च पुरा कयं ॥ ८ ॥ वेसएहि अग्ज्जन्तो, रज्जन्तो. संजमम्मि य । अम्मापियरमुवागम्म, इमं क्यणमव्ववी ॥ ९ ॥ मुयाणि मे पंच महब्बयाणि, नरएस दुक्खं च तिरिक्खजोणिसु । निविण्णकामो मि महण्णवाउ, अणुजाणह पच्वइस्सामि अम्मो ॥ १० ॥ हम्म ताय मए भोगा, भुत्ता विसफलोवमा । पच्छा कडुयविवागा, अणुवन्धदुहावहा ।। ११ ।। मं सरीरं अणिचं, असुइ असुइसंभवं । असासयावासमिण. दुक्खकेसाण भायणं ॥ १२ ॥ सासए सरीरम्मि, रई नोबलभामहं । पच्छा पुरा व चइयव्वे, फेणबुब्यसन्निभे ॥ १३ ।। गणुमत्ते असारम्मि, बाहीरोगाण आलए। जरामरणपत्थम्मि, खणंपि न रमामहं ॥ १४ ॥ सम्मं दुक्खं जरा दुक्खं, रोगाणि मरणाणि य । अहो दुक्खो हुसंसारो, जत्थ कीसन्ति जन्तवो ॥ १५ ॥ वेत्तं वत्युं हिरण्णं च. पुत्तदारं च बन्धया । चइत्ताणं हम देहं, गन्तवमवसस्स मे ।। १६ ।। ह किम्पागफलाण, परिणामो न सुन्दरो। एवं भुत्ताण भोगाणं, परिणामो न सुन्दरो ॥ १७ ॥ मद्धाणं जो महंतं तु, अप्पाहेओ पवाई । गच्छन्तो सो दुही होइ, छुहातण्हाए पीडिओ ॥ १८ ॥ एवं धम्म अकाऊणं, जो गच्छइ परं भवं । गच्छन्तो सो सुही होड, वाहीरोगेहिं पीडिओ ॥ १९ ।।

श्रीउत्तराययनमन्त्र-सोलमाध्ययनम् (३१) . " एव धम्म पि काऊण, जो गच्छड पर भव । गन्छन्तो सो मुही होड, अप्पकम्मे अवेयणे ॥ २१ ॥ जहा गेहे पलितम्मि, तस्स गेहम्स जो पह। सारभण्डाणि नीणेड, असार अवउज्झड ॥ २२ ॥ एव लोए पलित्तम्मि, जराए मरणेण य । अप्पाण तारहस्सामि, तुन्भेहि अणुमन्निनो ॥२३॥ त विन्तम्मापियरो, सामण्ण पुत्त दुचर । गुणाण तु महस्माइ, धारेयवाइ भिस्सुणा ।। २४॥ समया मवभूएसु, मत्तुमिचेसु ना जगे । पाणाटवायविरई, जापजीनाए दुधर ॥ २५ ॥ निश्चकालप्पमत्तेण, मुमापायविवजण । भासियव्य हिय मच, निचाउत्तेण दुवर ॥ २६ ॥ दन्तमोहणमाइम्म, अदत्तस्म विरजण । जणवनेसणिजस्स, गिहण्णा अवि 'दुर ॥ २७॥ विरह असम्भचरस्म, कामभोगरन्नुणा । कामभोगरन्नुणा। उग्ग महत्वयं बम्भ, धारयव सुदुक्र ॥२८॥ धणधनपेमवग्गेसु, परिग्गहविवजण । मबारम्भपरिचाओ, निम्ममच मुदुघर ॥ २९॥ चउब्धि वि आहारे, राईमोयणबजणा। मनिहोसचओ चेन, वज्जेयवो सुधर ॥ ३०॥ उहा तण्हा य सीउण्ड दसममगवेयणा | अकोमा दुक्ससेजा य, नणफामा जलमेर य ॥ ३१ ॥ तालणा तज्जणा चेन, वय धपरीमहा । दुक्ख मिक्सायरिया, जायणा य अलाभया ।। ३२ ॥ कालोया जा इमा वित्ती, केसलोओ य दारणो। दुक्स सम्भवय धोर, धारेउ य महप्पणो ॥ ३३ ॥ मुहोडओ तुम पुत्ता, मुकुमालो मुमजिओ। न हु सी पभू तुम पुत्ता, मामण्णमणुपालिया ॥ ३४ ॥ जावजीनमविस्मामो. गुणाण तु महन्भरो। गुरु उ लोहमारव, जो पुत्ता होड दुबहो ॥ ३५ ॥ आगासे गगमोउ छ, पडियोउ व दुत्तरो । पाहाहि मागरो चेव, तरिया गुणोदही ॥ ३६॥ वालुया कालो चेर, निरस्माए उ सजमे । असिधारागमण चेव, दुक्कर चरिउ तवो ॥ ३७ ।। । अही वेगन्तदिट्टीए, चरित्ते पुत्त दुक्कर । जवा लोहमया चैव, चावयचा मुदुबर ।। ३८ ॥ जहा अग्गिसिहा दित्ता, पाउ होड मुदुवरा। एहा दुवर करेउ जे, तारपणे समणतण ॥ ३९ ॥ जहा दुक्म भरेउ जे, होड वायरस कोत्थलो । तहा दुक्स करेउ जे, कीवेण समणतण ॥ ४० ॥ जहा तुलाए तोलेउ, दुवरो मन्दरो गिरी। तहा निहुयनीसक, दुक्कर ममणतण ।। ४१ ॥ जहा भुयाहि तरिउ, दुफर ग्यणायरो। तहा अणुसन्तेण, दुवर दमसागरो ।। ४२॥ भुज मागुम्मए मोगे, पचलमपणए तुम । मुत्तमोगी तओजाया, पच्छा धम्म चरिस्समि ॥४३॥ मोरह अम्मापियरो, एपमेय जहा फुड । इह लोए निप्पियासस्म, नस्थि किचिचि दुकर ॥४४॥ मारीग्माणमा चेत्र, चैयणाओ द्धन तसो। मा मोढाओ मीमाओ, अमइ दुक्समयाणी य ॥ ४५ ॥ जरामरणान्तार, चाउग्न्त भयागरे । मए सोढाणि भीमाणि, जम्माणि मरणाणि य ॥४६॥ जहा इह अगणी उण्हो, एत्तोऽणन्तगुणे तहिं । नरभु वेयणा उण्डा, अस्माया वेडया मए ॥ १७ ॥ इम इह सीय, एत्तोऽणन्तगुणे तहिं । नरएस या सीया, अस्सया चेहगा मग ॥४८॥ बन्दन्तो दुसुम्मीसु, उहपाओ अहोसिगे । हुयासणे जगन्तम्मि, पपयुद्धो अण तसो ॥ ४९ ॥ महादग्गिसकासे, मरम्मि वाग्बालए। कढम्बवालुयाए य, दहपुन्बो अणन्तमो।" ५०॥ रमन्तो कन्दरम्भीसु, उट्ट यो अबन्धयो । कररत्नकराईहिं छिन्नपुन्यो अणन्तमो ।। ५१ ॥ भइतिक्वाण्टगाइण्णे, हुगे सिम्बलिपायवे । खेविय पामबद्धण, कट्टोमहाहिं दुकर ।। ५२॥ महासत्तेसु उवा, आरमन्तो सुमेव । पीडिओ मि माम्मेहि, पारकम्मोअणतसो ।। ५३ ॥ " . . - (३२) श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला. कूचन्ती कोलमुणएहिं, सामेहि सवलेहि य । फाडिओ फालिओ छिन्नो, विपुग्न्तो अणेगसो ।। ५४ ॥ असीहि अवसिवण्णाहिं, भल्लेहिं पट्टिसेहि य । छिन्नोमिन्नो विमिन्नो य, ओइण्णो पावकम्मुणा ॥ ५५ ॥ अनसे लोहरहे जुत्तो, जलन्ते समिलाजुए। चोइओ तोत्तजुत्तेहि, रोझो या जह पाडिओ ॥ ५६ ।। हुयासणे जलन्तरिम, चियासु महिसो विव । दड्डो पको य अबसो, पावकम्मेहि पाविओ ॥ ५७ ॥ वला संडासतुण्डेहि, लोहतुण्डेहिं पक्खिहि । विलुत्तो विलवन्तो हं, ढंकगिद्धेहिष्णन्तसो ॥ ५८ ॥ तहाकिलन्तोधावन्तो, पत्तो वेयगणिं नदि । जलं पाहिं ति चिन्तन्तो, खुरधाराहि विवाइओ ।। ५९ ।। उण्हामितत्तो संपत्तो, असिपत्तं महावणं । असिपत्तेहिं पडन्तेहि, छिन्नपुचो अणेगसो ॥ ६ ॥ मुम्गगेहिं मुसंढीहि, स्लेहिं सुमलेहि य । गया संभग्गगत्तेहिं, पत्तं दुक्खं अणन्तसो ॥ ६१ ।। खुरेहिं तिक्खधारेहि, छुरियाहि कप्पणीहि या कप्पिओ फालिओ छिन्नो, उछित्तोय अणेगसो ।। ६२ ॥ पासेहिं कूडजालेहि. मिओ या अवसो अहं । वाहिओ बद्धद्धो वा, वह चेव विवाइयो ।। ६३ ।। गलेहि मगरजालेहि, मच्छो वा अवसो अहं । उल्लिओ फालिओ गहिओ, मारिणो य अणन्तसो ।। ६४ ॥ वीदसएहि जालेहिं, लेप्पाहि सउणो विव । गहिओ लग्गो बद्धो य, मारिओ य अणन्तसो ॥ ६५ ।। कुहाडफरसुमाईहि, बड्डईहिं दुमो विव । कुहिओ फालिओ छिन्नो, तच्छिओ य अगन्तसो ।। ६६ ॥ चवेडमुढिमाईहिं, कुमारेहि अयं पित्र । ताडिओ कुटिओ भिन्नो, चुणिओ य अणन्तसो ।। ६७ ।। तत्ताई तम्बलोहाइं, तउयाइ सीसयाणि य । पाइओ कलकलन्ताई, आरमन्तो मुभैरवं ।। ६८ ॥ तुहं पियाई मंसाई, खएडाइं सोलगाणि य । साविओ मिममसाई, अग्गिवण्णाइगसो ॥ २९ ॥ तुहं पिया सुग सीह, मेरओ य महूणि य । पाइओ मि जलन्तीओ, वयाओ महिराणि य ।। ७० ॥ निच्च भीएण तत्थेण, दुहिएण वहिएण य । परमा दुहसंबद्धा, वेयणा वेदिता मए ।। ७१ ।। तिवचण्डप्पगाढाओ, घोराओ अड्दुस्सहा । महन्भयाओ भीमाओ, नगएसु वेदिता मए ॥ ७२ ।। जारिसा माणुसे लोए, ताया दीसन्ति वेयणा । एत्तो अणन्तगुणिया, नरएसु दुक्खवेयणा ।। ७३ ।। सबभवेसु अस्साया, वेयणा वेदिता मए । निमेसन्तरमित्तं पि, जं साता नत्थि वेयणा ।। ७४॥ तं विन्तम्मापियरो, छन्देणं पुत्त पदया। नवरं पुण सामण्णे, दुक्खं निप्पडिकम्मया ।। ७५ ॥ सो वेइ अम्मापियरो, एवमेयं जहा फुडं पडिकम्मं को कुणई, अरणे मियपक्खिणं ।। ७६ ॥ एगभूए अरण्णे व, जहा उ चरई मिगे । एवं धम्म चरिस्सामि, संजमेण तवेण य ॥ ७७ ॥ जया मिगस्स आर्यको, महारण्णम्मि जायई। अञ्चन्तं रुक्खमूलम्मि, को णं ताहे तिगिच्छई ॥ ७८ ॥ को वा से ओसहं देइ, को वा से पुच्छई सुहं । को से भत्तं च पाणं वा, आहरित्तु पणामए ॥ ७९ ॥ जया से सुही होइ, तया गच्छद गोयरं । भत्तपाणस्स अट्ठाए, वल्लगखि मराणि य ।। ८० ॥. खाइत्ता दाणियं पाउं, बल्लरेहिं सरेहि य । मिगचारिय चरित्ताणं. गर्छई मिगचारियं ।। ८१ ॥ एवं समुडिओ मिक्खू, एवमेव अणेगए | मिगचारियं चरित्ताणं, उड्डे पक्कमई दिसं ॥ ८२ ॥ जहा मिगे एगे अणेगचारी, अणेगवासे धुवगोयरे य । एवं मुणी गोयरियं पविडे, नो हीलए नोत्रिय खिसएजा ॥ मिगचारियं चरिस्सामि, एवं पुत्ता जहासुहं | अम्मापिईहिऽणुन्नाओ, जहाइ उवहिं तहा ॥ ८४ ॥ मियचारियं चरिस्सामि सबक्सविमोक्खणिं । तुम्भेहिं अभणुनाओ, गच्छ पुत्त जहामहं ॥ ८५ ॥ , . " श्रीउत्तराध्ययनसूत्र-एगूनविशमाध्ययनम् (३३) एव सो अम्मापियरो, अणुमाणिताण बहुविह । ममच छिन्दई ताहे, महानागो व कचुयं ॥ ८६ ॥ इड्डी नि च मित्ते य, पुत्तदार च नायओ। रेणुय न पडे लग्ग, निध्धुत्ताण निग्गओ ।। ८७ ॥ पचमहत्वयजुत्तो, पंचहि समिओ तिगुत्तिगुत्तोय। सन्भिन्तरवाहिरओ, तबोकम्मसि उज्जुओ ।। ८८ ॥ निम्ममो निरहकारो, निस्सगो चत्तगारयो । समो य सबभूएम, तसेसु थावरेसु य ॥ ८९ ॥ लाभालामे सुहे दुक्खे, जीलिए मरणे तहा | समो निन्दापससासु, तहा माणावमाणओ ॥ ९० ॥ गारवेसु कसाएसु, दण्डसल्लभएसु य । नियत्तो हामसोगाओ, अनियाणो अनन्धणो ॥ ९१ ॥ अणिस्मिओ इह लोए, परलोए अणिस्सिओ। वासीचन्दणकप्पो य, असणे अणसणे तहा ॥ १२ ॥ अप्पमत्थेहि दारेहि, सबओ पिहियामवे । अन्झप्पज्झाणजोगेहिं, पसत्थदमसासणे ॥ ९३ ॥ एव नाणेण चरणेण, दसणेण तवैण य । भावणाहि य मुद्धाह, सम्म भावेत्तु अप्पय ।। ९४ ॥ बहुयाणि उ वासाणि, सामण्णमणुपालिया । मासिएण उ भत्तेण, सिद्धिं पत्तो अणुत्तर ॥ ९५॥ एन करन्ति सउद्धा, पण्डिया पवियक्सणा । रिणिअन्ति भोगेसु, मियापुत्ते जहारिसी ॥ ९६ ॥ महापभारस्म महाजसस्स, मियापुत्तस्स निसम्म भासिय । तवप्पहाण चरिय च उत्तम, गहप्पहाण च तिलोगविस्सुत ।। ॥ ९७॥ रियाणिया दुक्खविनद्धण धण, ममत्तवन्ध च मयाभयावह । सुहावह धम्मधुर अणुत्तर, धारेज निवाणगुणावहं मह ।। ॥९८॥ त्ति बेमि ॥ इस मियापुत्तीय समत्त ॥ १९ ॥ . । , ॥ अह महोनियण्ठिज्ज वीसइमं अज्झयणं । सिद्धाण नमो फिचा, सजयाण च भावओ। अत्थधम्मगड तच अणुसद्धिं सुणेह मे ॥१॥ पभूयरायणो राया, सेणिओ मगहाहिनो। विहारजत्त निजाओ, मण्डिकुछिसि चेहए ॥२॥ नाणादुमलयाइण्ण, नाणापक्सिनिसेविय । नाणाकुसुमसछन्न, उजाण नन्दणोवम ॥३॥ तत्य सो पासई माहु, सजयं सुममाहिय । निसन्नं रुक्समूलम्मि, सुकुमालं सुहोइयं ॥ ४ ॥ तस्स रूव तु पासित्ता, राइणो तम्मि सजए । अञ्चन्तदरमो आसी, अउलो रुखविम्हओ ॥५॥ अहोवण्णो अहो रून, अहो अञ्जस्स सोमया। अहो सन्ती अहो मुत्ती, अहो भोगे असंजया ॥ ६ ॥ तस्स पाए उ पन्दिचा, काऊण य पयाहिण । नाइदरमणासन्ने, पंजली पडिपुच्छई ॥७॥ तरुणो सि अञ्जो पबइओ, भोगकालम्मि सजया। उवडिओसि सामण्णे, एयमह सुणेमि वा ॥ ८ ॥ अणाहोमि महाराय, नाहो मज्झ न विजई । अणुकम्पग सहि वावि, कचि नामिममेमह ॥९॥ तओ मो पहसिओ राया, सेणि ओ मगहाहियो। एवं ते इड्डिमन्तम्स, कहं नाहो न विजई ॥१०॥ होमि नाही भयताण, भोगे भुजाहि सजया। मित्तनाईपरिवुडो माणुस्स ख सुदुल्लह ॥ ॥ अपणा विहो सि, सेणिया ममहाहियाप्पणा अणाही सन्तो, क स नाहो भविससि १२, एवं वुत्तो नरिन्दो सो, सुसमन्तो सुविम्हिओ। वयण अस्सुयपुन्य माहुणा गिम्हरन्निओ।। ५३ 1 श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला रिसे मम्पयग्गम्मि, सबकामसमप्पिए । कहं अणाहो भवड, मा हु भन्ते मुसं वए ॥ १५ ॥ 'तुम जाणे अणाहम्स, अत्थं पोत्थं च पत्थिवा । जहाअणाहो भवई. सणाहो वा नराहिया ॥ १६ ॥ णेह मे महाराय, अक्खित्तेण चेयसा । जहा अणाहो भवई, जहा मेयं पत्तियं ॥ १७ ॥ सम्वी नाम नयरी, पुराण पुरभेयणी । तत्थ आसी पिया मज्म, पभूयधणमंचओ ॥ १८ ॥ ढमे वए महाराय. अउला मे अच्छिवे यणा । अहोन्था विउलो डाहो, सवगत्तेसु पत्थिया ।। १९ ॥ त्थं जहा परमतिक्खं, सरीरविवरन्तरे । आवीलिज अरी कुट्टो, एवं मे अच्छिवेयणा ॥ २० ॥ तेयं मे अन्तरिच्छं च, उत्तमंग च पीडई । इन्दासणिममा घोरा, वेयणा परमदारुणा ।। २१ ।। बटिया मे आयरिया, विजामन्तति गिच्छया । अधीया सत्थकुसला, मन्तमूलविमारया ॥ २२ ॥ मे तिगिच्छ कुवन्ति, चाउप्पायं जहाहियं । न य दुक्खा विमोयन्ति, एसा मज्झ अणाहया ।। २३ ।। या मे सवसारंपि, दिजाहि मम कारणा । न य दुक्खा विमोएइ, एसा मज्म अणाया ॥ २४ ॥ या य मे महाराय, पुत्तसोगदुहटिगा। न य दुक्खा विमोएड, एमा मज्झ अणाहया ॥ २५ ॥ यरो मे महाराय, सगा जेट्टकणिढगा। न य दुक्खा विमोयन्ति, एसा मज्झ अणाहया ॥ २६ ॥ इणीओ मे महाराय, सगा जेट्टकणिडगा। न य दुक्खा विमोयन्ति, एमा मज्झ अणाहया ।' २७ ।। रिया मे महागय, अणुरत्ता अणुवया । अंसुपुण्णेहिं नयणेहि, उरं मे परिसिंचई ॥ २८ ॥ नं च पाणं पहाणं च, गन्धमल्लविलेवणं । मए नायमणायं वा, मा वाला नेव भुंजई ॥ २९ ।। 'ण पि मे महाराय, पासाओ मे न फिट्टई। न य दुक्खा विमोएइ. एसा मज्झ अणाहया ॥ ३० ॥ ओ हं एवमाहंसु, दुक्खमा हु पुणो पुणो । वेयणा अणुभविडं जे, संसारम्मि अणन्तए ॥ ३१ ॥ इं च जइ मुच्चेजा, वेयणा विउला इओ। खन्तो दन्तो निगरम्भो, पवए अणगारियं ॥ ३२ ॥ वं च चिन्तउत्ताणं, पसुत्तो मि नराहिवा । परियत्तन्तीए राईए, वेयणा मे खयं गया ॥ ३३ ॥ ओ कल्ले पमायम्मि, आपुच्छित्ताण बन्धवे । खन्तो दन्तो निरारम्भो. पवइओऽणगारियं । ३४ ॥ । हं नाहो जाओ, अप्पणो य परस्स य । सो सिं चेव भूयाणं, तसाण थावराण य ॥ ३५ ॥ प्पा नई वेयरणी, अप्पा मे कूडसामली । अप्पा कामदुहा घेणू , अप्पा मे नन्दणं वणं ।। ३६ ॥ [प्पा कत्ता विकत्ता य, दुक्खाण य सुहाण य । अप्पा मित्तममित्तं च, दुप्पट्ठियसुपट्टिओ ॥ ३७ ॥ इमा हु अन्ना वि अणाहया निवा, तमेगचित्तो निहुओ सुणेहि । नियण्ठधम्म लहीयाण ची जहा, सीयन्ति एगे वहुकायरा नरा ॥ ३८ ॥ जो पवइत्ताण महत्वयाई, सम्मं च नो फासयई पमाया। अनिग्गहप्पा य रसेसु गिद्धे, न मूलओ छिन्नइ बन्धणं से ॥ ३९ ।। आउत्तया जस्स न अस्थि काइ, इरियाए भासाए तहेसणाए । आयाणनिक्खेवढुगंछणाए, न धीरजायं अणुजाइ मग्गं ॥ ४० ॥ चिरं पि से मुण्डमई भवित्ता. अथिरवए तवनियमेहि भट्टे । चिरं पि अप्पाण किलेसइत्ता. न पारए होइ हु संपराए ॥४१॥ , .

www श्रीउत्तराभ्ययनसूत्र-विममाध्ययनम् कुसीललिंग इह धारडत्ता, इसिज्झय जीविय चूहहत्ता। असजए सजयलप्पमाणे, विणिग्यायमागच्छइ से चिरपि ।। ४३ ॥ विस तु पीय जह कालकूड, हणाइ सत्थ जह कुग्गहीयं । एसो वि धम्मो विसओनरन्नो, हणाह वेयाल इवाविवनो ॥ ४४ ॥ जे लक्षण सुविण पञ्जमाणे, निमित्तकोमहलसपगाढे । कुहेडविजामवहारजीवी, न गच्छई सरण सम्मि काले ॥४५॥ तम तमेणेव उसे असीले, सया दुही विप्परियामुवेइ । सघावई नरगतिरिक्खजोणि, मोण विराहेत्तु असाहुरूवे ।। ४६ ।। उद्देसिय कीयगड नियाग, न मुच्चई कि च अणेसणिज्ज । अग्गी विवा समक्सी भवित्ता, इचोचुए गच्छड कटु पाव ।। ४७॥ न त अरी कठछेत्ता करेइ, ज से करे अप्पणिया दुरप्पया। से नाहह मच्चुमुह तु पत्ते, पच्छामितावेण दयाविहणो ॥ ४८ ॥ निरहिया नग्गरुई उ तस्स, जे उचमट्ट विवजासमेड । इमे विसे नत्थि परे विलोण, दुहओ विसे भिजइ तत्थ लोए ॥ ४९ ।। एमेव हा छन्दकुसीलरूवे, मग्ग विराहेत्तु जिणुत्तमाण । कुररी विद्या भोगरसाणुगिद्धा, निरसोया परियासमेइ ॥ ५० ॥ सोचाण मेहावि मुभासिय इम, अणुसासण नाणगुणोववेय । मग कुसीलाण जहाय सच, महानियण्ठाण पए पहेण ॥ ५१ ।। । चरित्तमायारगुणन्निए तओ, अणुत्तर मजम पालियाण । निरासवे सखवियाण कम्म, उवेइ ठाण विउलुत्तम धुप ॥५२॥ एबुग्गदन्ते वि महातवोधणे, महामुणी महापडन्ने महायसे । महानिष्ठिनमिण महासुय, से कहेई महया वित्थरेण ॥ ५३ ।। तुट्ठो इणमुदाहु कयजली। अणाहत्त जहाभूय, मुटु उवदसिय ॥ ०४॥ तुज्झ सुलद्ध खु मणुस्स जम्म, लामासुलद्धा य तुमे महेसी। तुम्भे मणाहा य समन्धवा य, ज मे ठिया मग्गे जिणुत्तमाण ॥ ५५॥ त नाहो अणाहाण, सहभूयाण मजया। खामेमि ते महाभाग, इच्छामि अणुमासिउ ।। ५६ ।। पुच्छिऊण मए तुन्म, आणनिग्धाओ जो को। निमन्तिया य भोगेहि, त म मरिसेहि मे। ०७॥ एव युणित्ताण म रायसीहो, अणगारसीह परमाइ भत्तीए । सओरोहो सपरियणो सन्धयो,धम्माणुरत्तो विमलेण चेयसा ।। ५८ ॥ . " य सेणिओ राया, - (३३) श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला. अभिवन्दिऊण सिरसा, अइयाओ नराहियो ।। ५९ ।। इयरो वि गुणसमिद्धो, तिगुत्तिगुत्तो तिदण्डविरओ य । बिहा इव विप्पमुक्को, विहाइ बमुहं विगयमोहो ॥ ६० ॥ त्ति बेमि ॥ इअ महानियण्ठिजं समत्तं ।। ॥ अह समुद्दपालीयं एगवीसइमं अज्झयणं ॥ चम्पाए पालिए नाम, सावए आसि बाणिए। महावीरस्म भगवी, सीसे सो उ महप्पणी ॥ १ ॥ निग्गन्ध पावयणे, साबए से वि कोविए । पोएण चत्रहरन्ते, पिहुण्डं नगरमानए ॥ २ ॥ पिहुण्डे क्वहन्तस्स, वाणिओ देइ धूयरं । तं ससत्तं पड़गिझ, सदेसमह पत्थिओ ॥ ३॥ अह पालियस्स घरिणी, समुहम्मि पसबई । अह बालए तहिं जाए, समुद्दपालि त्ति नामए ॥ ४ ॥ खमेण आगए चम्पं, सावए वाणिए घरं । संबड्डई तस्स घरे, दारए से मुहोइए ॥ ५ ॥ पावत्तरी कलाओ य, सिक्खई नीइकोविए । जोवणेण य संपन्ने, मुरूवे पियदसणे ।।।।। तस्स रुपवई भन्ज, पिया आणेइ सविणि । पासाए कीलए रम्मे, देवो दोगुन्दओ जहा ॥ ७ ॥ अह अन्नया कयाई. पासायालोयणे ठिओ। वज्झमण्डणसोभाग, वझं पासइ बज्झगं ॥ ८ ॥ पासिऊण संवेग, समुद्दपालो इणमब्यबी | अहोऽसुमाण कम्माण, निजाण पावगं इमं ।। ९ ।। संबुद्धो सो तहिं भगवं, परमसंवेमागओ। आपुच्छमापियरो, पचए अणगारियं ॥१०॥ जहित्तु ऽसग्गन्थमहाकिलेसं, महन्तमोहं कसिणं भयावहं । परियायधम्म चमिरोयएजा, बयाणि सीलाणि परीसहे य ।। ११ ॥ अहिंससच्चं च अनेणगं च, तत्तो य वम्भं अपरिग्गहं च । पडिवजियापंचमहत्वयाणि, चरिज धम्मं जिणदेसियं विदू ॥ १२ ॥ सोहिं भूएहिं दयानुकम्पी, सन्तिक्खमे संजमवम्भयारी । सावजजोग परिखजयन्तो, चरिज भिक्खू सुसमाहिइन्दिए ॥ १३ ॥ कालेण कालं विहरेज रहे, बलावलं जाणिय अप्पणो य । सीहो व सद्देण न सन्तसेजा, वयजोग सुच्चा न असच्चमाहु ॥ १४ ॥ उचेहमाणो उ परिवएजा, पियमप्पियं सब तितिक्खएन्जा। न सब सवस्थ ऽभिरोयएजा, न यावि पूर्य गरहं च संजए ॥ १५ ॥ अणंगच्छन्दामिह माणवेहि, जे भावओ संपगरेइ भिक्खू । भयभेरवा तत्थ उइन्ति मीमा, दिवा मणुस्सा अदुवा तिरिच्छा ॥ १६ ॥ परीसहा दुचिसहा अणेगे, सीयन्ति जत्था बहुकायरा नरा। से तत्थ पत्ते न बहिन्ज भिक्खू, संगामसीसे इव नागराया ॥ १७ ॥ सीओसिणादसमसाय फासा, आयका विवहा फुसन्ति दहं । - We have, AWAN wn~ wwwaranwww ver OJ . . श्रीउत्तराध्ययनसूत्र-एगरिसमाध्ययनम् पहाय राग च तहेव दोस, मोह च मिक्खू सतत वियक्षणो। मेरु व वारण अकम्पमाणो, परीसहे आयगुत्ते सहेजा ॥१९॥ अणुन्नए नावणए महेसी, न यावि पुय गरह च सजए । स उज्जभाव पडिवन, सजए, निन्वाणमग्ग विरए उवेइ ॥ २० ॥ अरहरइसहे पहीणमथवे, विरए आयहिए पहाण । परमट्ठपाहिं चिट्ठई, छिन्नसोए अममे अकिचणे ॥२१॥ पिवित्तलयणाइ भएन ताई, निरोनलेवाइ अमथडाइ । इसीहि चिण्णाइ महायसेहि, कारण फासेज परीसहाइ ॥ २२ ॥ सन्नाणनाणोवगए महेसी. अणुत्तर चरिउ धम्मसचय । अणुत्तरे नाणवरे जससी, ओभासई सरिए वन्तलिक्खे ॥ २३ ॥ - दुविह खवेऊण य पुग्णपाव, निरगणे सबओ विप्पमुक्के । तरित्ता समुद्द व महाभवोर, ममुद्दपाले अपुणागम गए ॥ २४ ॥ त्ति वेमि ॥ इअ समुद्दपालीय समत्त ।। ॥ अह रइनेमिज वावीसइम अज्झयण ॥ सोरियपुरम्मि नयरे, आसि राया महिड्डिए । वसुदेवु ति नामेण, रायलक्खणसजुए ।। १ ।। तम्म भजा दुवे आसी, रोहिणी देवई तहा । तासिं दोण्ह दुचे पुत्ता इट्टा रामकेसवा ॥२॥ सोरियपुरम्मि नयरे, आसि राया महिड्डिए । समुद्दविजए नाम, रायलक्खणसजुए ॥ ३ ॥ तस्स मज्जा सिवा नाम, तीसे पुत्तो महायसो। भगर अरिहनेमि त्ति, लोगनाहे दमीमरे ॥४॥ सो ऽरिद्वनेमिनामो उ, लक्खणस्मरसजुओ । अट्ठसहस्सलक्सणधरो, गोयमो कालगच्छची ॥ ५॥ बजरिसहसघयणो, समचउरसो असोयरो । तस्स रायमईकन्न, भज जायइ केसवो ॥६॥ यह सा रायनरकना, मुसीला चारुपेहणी । सबलक्खणसपन्ना, विज्जुमोयामणिप्पभा ॥७॥ अहाह जणओ तीसे, वासुदेव महिड्डिय । इहागच्छउकुमारो, जा से क्न्न ददामि ह ॥ ८॥ सबोसहीहिं पहविओ, कयकोउयमगलो। दिवजुयलपरिहिओ, आभरणेहिं विभूसिओ ॥९॥ मच च गन्धहत्थि, वासुदेवस्स जेदुग। आरूढो सोहए अहिप, सिरे चूडामणि जहा ॥१०॥ अह ऊसिएण छत्तेण, चामराहि य सोहिए । दसारचकण य सो, महओ परिनारिओ ॥ ११॥ चउरगिणीए सेणाए, रड्याए जहवम | तुरियाण सन्निनाएण, दिव्वेण गगण फुसे ॥ १२ ॥ एयारिमाए इड्डीए, जुत्तीए उत्तमाइ य । निपगाओ भरणाओ, निआओ चण्डिपुगनो ॥ १३ ॥ जह सो वत्य निजन्तो, दिग्स पाणे भयदुए । वाडेहिं पजरहिं च, मनिरुद्ध सुदुक्सिए ॥ १४ ॥ जीवियन्त तु सम्पत्ते, मसट्टा भक्वियबए । पासेत्ता से महापन्ने, मारहिं इणमब्यवी ॥ १५॥ कस्स अट्ठा इमे पाणा, एए सर्वे सुहेसिणो । वाडेहिं पजरेहि च, मन्निरद्धा य अच्छहि ॥ १६॥ अर मारही तो भणइ.ए_महा.उ पाणियो। तर विवाहक.मि. मोयावेज बहजण ॥ १७ ॥ .

V , ह (३८) श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला सोजण तस्स बयणं, वहुपाणिविणासणं । चिन्तेह से महापन्नो, साणुकोसे जिए हिऊ ।। १८ ॥ जड़ मज्झ कारणा एए, हम्मन्ति सुबहू जिया । न मे पयं तु निम्सेसं, परलोगे भविस्सई ।। १९ ॥ सो कुण्डलाण जुयलं, मुत्तगं च महायसो। आभरणाणि य सहाणि, साहिम्स पणामए ॥ २० मण परिणामे य कए, देवा य जहोइयं ममोइण्णा । सबड्डीइ सपरिमा. निक्खमणं तस्म काउंजे ॥ २१ ॥ देवमणुस्सपरिवुडो सीयारयणं तओसमारूढो, निक्सिमय वाग्गाओ, रेवयम्मिटिओ भगवं ।। २२ ॥ उज्जाणं संपत्तो, ओइण्णो उत्तमाउ सीयाओ। साहस्सीह परिवुडो, मह निक्खमई उशित्ताहि ।। २३ ।। अह से सुगन्धगन्धीए, तुरियं मउकुंचिए। सयमेव भुंचई केस, पंचमुट्ठीहि ममाहिओ ॥ २४ ॥ पावासुदेवो य णं भणइ, लुत्तकेसं जिइन्दियं । इच्छिरियमणोरहं तुरियं, पावसू तं दमीसरा ॥ २५ ॥ 'नाणेणं दंसणेणं च, चरित्तेण तहेब य । खत्तीए मुत्तीए, बड्डमाणो भवाहि य ॥ २६ ॥ वएवं ते रामकेसवा, दसारा य वह जणा। अरिहणेमि वन्दित्ता, अमिगया दारगापुरिं ॥ २७ ॥ लि सोऊण रायकन्ना, पवनं सा जिणस्स उ । नीहासा य निराणन्दा, सोगेण उ समुत्थिया ॥ २८ ॥ अराईमई विनिन्तेइ, धिरत्थु मम जीवियं । जा ह तेण परिचत्ता, सेयं पबइडं मम ॥ २९ ।। अह मा भमरसन्निभे, कुंञ्चफणगसाहिए । सयमेव लुचई केसें, धिहमन्ता ववरिसया ॥ ३० ॥ यव वासुदेवो य णं भणड, लुत्तकेसं जिइन्दियं । संमारमागरं बोरं, तर कन्ने लहुं लहुं ॥ ३१ ॥ नय सा पव्वइया सन्ती, पवावेसी तहिं पहुं मयणं परियणं चेव, सीलवन्ता बहुस्सुया ॥ ३२ ॥ सेज गिरि रेवतयं जन्ती, वासेणुला उ अन्तरा। वासन्ते अन्धयारम्मि, अन्तो लयणम्स सा टिया ।। ३३ । । संचीवराई विसारन्ती, जहा जाय त्ति पासिया। रहनेमी भग्गचित्तो, पच्छा दिट्ठो य तीइ वि ॥ ३४ ॥ मीया य सा तहिं दटु, एगन्ते संजयं तयं । वाहाहिं कार संगोप्फं, वेवमाणी निमीयई ।। ३९ । अह सो वि रायपुत्तो, समुहविजयंगओ। भीयं पवेवियं दटुं, इमं वकं उदाहरे ।। ३६ । रहनेमी अहं भद्दे, सुरूवे चारुमासिणी । ममं भयाहि सुयणु, न ते पीला भविस्सई ।। ३७ । एहि ता भुजिमो भोण, माणुस्सं खुसुदुल्हं । भुत्तभोगी पुणो पच्छा, जिणमग्गं चरिस्समो ॥ ३८ । दटुण रहनेमि तं, भग्गुजोयपराजियं । राईमई असम्भन्ता, अप्पाणं संवरे तहिं ।। ३९ । अह सा रायवरकन्ना, सुहिया नियमबए । जाई कुलं च सीलं च, रक्खमाणी तयं वए ।। ४० । जइ सि रूवेण वेसमणो, ललिएण नलकुबरो। नहा वि ते न इच्छामि, जइ सि सक्वं पुरंदरो ॥ ४१ । धिरत्थु तेऽजसोकामी, जो तं जीवियकारणा । वन्त इच्छसि आवाउं, सेयं ते मरणं भवे ॥ ४२ । अहं च भोगरायस्स, तं च सि अन्धगवहिणो। मा कुले गन्धणा होमो, संजमं निहुओ चर ॥ ४३ जइ त काहिसि भावं, जा जा दच्छसि नारिओ। वायाद्धो व हढो, अद्विअप्पा भविस्ससि ॥ ४४ ॥ गोवालो भण्डवालो वा, जहा तद्दवणिस्सरो। एवं अणिस्सरो तं पि, सामणम्स भविस्ससि ॥ ४५ ॥ तीसे सो वयणं सोचा, संययाए सुभासियं । अंकुसेण जहा नागो, धम्मे संपडिबाइओ ।। ४६ ॥ मणगुत्तो वायगुत्तो, कायगुत्तो जिइन्दिए । सामण्णं निच्चलं फासे, जावजी दढवओ ।। ४७ ॥ उग्गं तवं चरित्ताणं, जाया दोणि वि केवली। सवं कम्मं खवित्ताण, सिद्धिं पत्ता अणुत्तरं ।। ४८ ।। ६ करेन्ति संवृद्धा, पण्डिया पवियक्खणा। विणियन्ति भोगेसु, जहा सो पुरिसोत्तमो ।। ४९ ॥

श्रीउत्तगययनसूत्र-तेनिममाध्ययनम् (३९)। ॥ अह केसिगोयमिज तेवीसइमं अन्झयण ॥ - जिणे पासि ति नामेण, अरा लोगटओ । सयुद्धप्पा य सम्यन्न, वम्मतित्थयरे जिणे ॥१॥ तस्म लोगपदीस्म, आसि सीसे महायसे । केसी कुमारसमणे, विजाचरणपारगे ॥२॥ ओहिनाणसुए युद्धे, मीमसघममाउले । गामाणुगाम रीयन्ते, मात्थि पुग्मागण् ॥ ३ ॥ तिन्दुय नाम उजाण, तस्मि नगरमण्डले । फासुए सिज्जसथारे, तत्थ पासमुनागण ॥ ४ ॥ अह तेणेन कालेण वम्मतित्थयरे जिणे | भगन बद्धमाणि ति, सबलोगम्मि विस्सुए ॥ ५ ॥ तस्स लोगपदीपस्स आसि सीसे महायम । भगन गोयमे नाम, पिज्जाचरणपारए ॥६॥ पारसगनिऊ उद्ध, सीमसधममाउले । गामाणुगाम रीयन्ते, से रि मानस्थिमागए ॥७॥ कोहग नाम उजाण, तम्मी नगरमण्डले । फासुए सिजसथारे, नत्य पातमुवागए ।। ८॥ कमी कुमारसमणे, गोयमे य महायसे । उभभो चि तत्य विहरिसु, अल्लीणा मुममाहिया ।। ९ ।। उमओ मीससघाण, सजयाण तरस्मिण, । तन्थ चिन्ता समुप्पन्ना, गुणवन्ताण ताइण ।। १० ।। कैरिमो वा इमो धम्मो, इमो धम्मोव कैरिसो । आयारधम्म पणिही, उमा वा मा र केरिमी ॥ ११ ॥ चाउज्जामो य जो सम्मो, जो इमोपचसिरिवओ । देसिओवद्यमाणेण, पामेण य ममामुणी ॥ १२ ॥ अचेली य जो धम्मो, जो :मो सतरुत्तगे। एगरजपपन्नाण, निमेमे कि नु कारण ॥ १३ ॥ अह ते तत्थ सीसाण, विन्नाय परितकिय । ममागमे कयमई, उमओ केसिगोयमा ॥ १४ ॥ गोयमे पडिरून नू, सीससघसमाउले । जेहूँ कुलमवेक्खन्तो, तिन्दुयं रणमागओ ॥ १५ ॥ केमी कुमारसमणे, गोयम टिम्ममागय । पडिरून पडिपत्तिं मम्म सपडिबाई ॥१६॥ पलाल फासुय तत्य, पंचम कुसतणाणि य । गोयमम्म निमेज्जाए, सिप्प समणामए ॥ १७ ॥ केसी कुमारसमणे, गोयमे य महायसे । उभओ निमण्णा सोहन्ति, चन्दसूरसमप्पभा ॥१८॥ ममागया वह तत्य, पासण्डाकोउगा मिया। गिहत्याण चणेगाओ, माहस्मीओ समागया ॥ १९ ॥ देवदाणवगन्धवा, जम्परक्खमकिन्नरा । अविस्माण च भूयाण, आसी तत्थ समागमो ॥ २० ॥ पुच्छामि ने महाभाग, केमी गोयममचवी । तओ केसिं उवण्त तु, गोयमो इणमब्बी ॥२१॥ पुच्छ भन्ते अहिच्छ ते, रेसि गोयमम नवी । तओ केसी अणुनाए, गोयम इणमन्नवी ।।२०।। चाउामोय जो धम्मो, जो इमोपंचसिक्सिओ। टेसिओ नद्धमाणेण, पासेण य महामुणी ॥ २३ ॥ 'एगाजपपन्नाण, विसेसे किं तु शरण । उम्मे दुविहे मेहापी, कह विपञ्चओ न ते ॥ २४ ॥ तओ केसि बुमन्त तु, गोयमो इ मन्नगी । पना ममिक्खए धम्मतत्त तत्तरिणिन्छि ॥ २ ॥ पुरिमा उज्जुजडा उ, फनडाय पच्छिमा। पज्झिमा उज्जुपना उ, नेण धम्मे दुहाकए ॥ ६ ॥ पुरिमाण दुविमोझोउ, चरिमाण दुरणुपालओ। कप्पो मज्झिमगाण तु, मृविमोझो सुपालओ ॥२७॥ साहु गोयम पन्ना ते, छिन्नो मे समओ टमो। अन्नो वि ममओ मझ, न मे कहम गोयमा ॥२८॥ अचेलगो य जो पम्मो, जो इमो मन्तरुत्तरो। टेसिओ नद्धमाणेण, पासेण य महाजमा || २९॥ . .

~~~ - " . (४०) श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला. केसिमेवं बुवाणं तु, गोयमो इणमब्यबी । विन्नाणेण समागम्म, धम्मसाहणमिच्छियं ॥ ३१ ॥ यच्चयत्थं च लोगस्स, नाणाविहविगप्पणं । जत्तत्थं गणहत्थं च, लोगे लिंगपओयणं ॥ ३२॥ अह भवे पइन्ना उ, मोक्खसमयसाहणा | नाणं च दंसणं चेत्र, चरित्तं चेव निच्छए ॥ ३३ ॥ साहु गोयम पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो। अन्नो वि संमओ ममं, तं मे कहसु गोयमा ॥ ३४ ॥ अपोगाणं सहस्साणं, मझे चिट्ठसि गोयमा। ते य ते अहिगच्छन्ति, कह ने निजिया तुमे ॥ ३५ ॥ एगे जिए जिया पंच, पंच जिए जिया दस | इसहा उ जिणित्ताणं, सबमनु जिणामहं ।। ३६ ॥ सत्तू य इइ के वुत्ते, केसी गोयम मचवी । तओ केसि युवतं तु. गोयमो इणमब्बी ॥ ३७ ।। एगप्पा अजिए सत्तु, कमाया इन्दियाणि य । ते जिणिनु जहानायं, विहरामि अहं मुणी ॥ ३८ ॥ साहु गोयम पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो, अन्नो वि मंसओ मज्जं, तं मे कहसु गोयमा ॥ ९ ॥ दीसन्ति यहवे लोए, पासबद्धा सरीरिणो । मुकापामो लहुभुओ, कहं विहरिसी मुणी ॥ ४०॥ ते पासे सबसो चित्ता, निइन्तूण यायो । मुक्कपासो लहुन्भुओ, कई विहगमि अहं मृणी ॥ ११ ॥ पासा य इइ के वुत्ता, केसी गोयममधवी । केसिमेवं बुवंतं तु, गोयमो इणमचवी ।। ४२ रागद्दोसादओ तिवा, नेहपामा भयकग । ते छिन्दित्ता जहानायं, विहगमि जहकमं ॥ ४३ ।। साहु गोयम पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो। अन्नो वि संसो मझ, तं मे कहसु गोयमा ॥४४ ॥ अन्तोहिययसंभूया, लया चिट्ठइ गोयमा । फलेड विसभक्खीणि, सा उ अझरिया कई ॥ ४५ ॥ तं लयं सबसो छित्ता, उद्धरित्ता ममूलियं । विहरामि जहानायं. मुको मि विसभक्खणं ॥४६॥ लया य इइ का वुत्ता, केसी गोयममब्रवी । केसिमेवं बुवंतं तु, गोयमो इणमब्बवी ॥ १७ ॥ भवतण्हा लया बुत्ता, भीमा भीमफलोदया। तमुद्धिचा जहानायं, विहगमि जहामुहं ॥ ४८॥ साहु गोयम पन्नाते, छिन्नो, मे संपओ इमो। अन्नो वि संसओ मध्यं, तं मे कहमु गोयमा ॥ ४९ ॥ संपजलिया घोरा, अग्गी चिट्ठइ गोयमा । जे उहन्ति सरीरत्थे, कहं विज्झाविया तुम ॥ ५० ॥ महामेहप्पसूयायो, गिज्झ वारि जलुत्तमं । सिंचामि समयं देहं. सित्ता नो व उहन्ति मे ॥ ११ ॥ अग्गी य इ के वुत्ता, केसी गोयममन्नबी । केसिमेवं युवंतं तु. गोयमो इणमचवी ॥ ५२ ।। कसाया अग्गिणो वुत्ता, सुयसीलतवा जल । मुयधारामिहया सन्ता, मिन्ना हुन डहन्ति मे ॥ ५३॥ साहु गोयम पन्ना ते, छिन्नो मे संमओ। अन्नो वि संसओ मनं, तं मे कहसु गोयमा ।। ५४ ।। अयं साहसिओ भीमो, दुहस्सो परिघावई । जंसि गोयममारूडो, कहं तेण न हीरसि ॥ ५५ ॥ धावन्तं निगिण्हामि, सुयरस्सीसमाहियं । न मे गच्छइ उम्मग्गं, मग्गं च पडिवलई ॥ ५६ ॥ नासे य इइ के वुत्ते, केसी गोयममन्त्रवी। केसिमेवं युवतं तु, गोयमो इणमब्बबी ।। ५७ ॥ 'गो साहसिओ भीमो, दुहस्सोपरिधावई। तं सम्मं तु निगिण्हामि, धम्मसिक्खाइ कन्थगं ॥ ५८ ॥ राहु गोयम पन्ना ते, छिन्नो मे संमओ इमो। अन्नो वि संसओ मज्झं, तं मे कहसु गोयमा ॥ ५५ ॥ प्पहा बहवो लोए, जेहिं नासन्ति जन्तुणो । अद्धाणे कह बट्टन्ते, तं न नाससि गोयमा ।। ६० ॥ य मग्गेण गच्छन्ति, जे य उम्मग्गपट्ठियाते मवे वेड्या मज, तो न नस्सामहं मुणी ।। ६१ ॥ गे य इह के वुत्ते, केसी गोयममबवी । केसिमेवं बुवंतं तु, गोयमो इणमन्त्रवी ॥ ६२ ॥ तीजास्तेनादसमसादियानामावयं पशिामुहान, एस,मो हि उत्तमे ॥ ६३ ॥ . . Stay-matyार जगरनाल. ny . , - . . . श्रीउत्तराध्ययनमत्र-तेविसमाध्ययनम् साहु गोयम पन्ना ते, छिन्नो मे ससओ इमो। अन्नो वि ससओ मज्झ, त मे कहसु गोयमा ।। ६४ ॥ महाउदगवेगेण, बुज्झमाणाण पाणिण । सरण गई पइट्ठा य, दीर के मन्नसी मुणी ।। ६५ ।। अस्थि पगो महादीवो, वारिमज्झे महालओ । महाउदगवेगस्स, गई तत्थ न विजई ।। ६६ ।। दीवे य इड के बुत्ते, केसी गोयममन्नवी। केसिमेव युनत तु, गोयमो इणमब्बवी ।। ६७ ॥ जरामरणवेगेण, उज्झमाणाण पाणिण | धम्मो दीवो पट्टा य, गई सरणमुत्तम ॥ ६८ ।। साहु गोयम पन्ना ते, छिन्नो मे समओ इमो। अन्नो वि ससओ मज्झ, त मे कहसुगोयमा ।। ६९।। अण्णासि महोहसि, नाना विपरिघाई। जसि गोयममारूढो, कह पार गमिस्ससि ।। ७० ।' जाउ सस्माविणी नाना,नसापारम्स गामिणी। जानिरस्साविणीनाना,माउ पारस्स गामिणी ।। ७१ ॥ नाना य इड का युत्ता, केसी गोयममन्ची । केसिमेव बुवत तु, गोयमो इणमब्बवी ॥७२॥ सरीरमाहु नार ति, जीवे बुच्चड नाविओ। ससारो अण्णगो युत्तो, ज तरति महेसिणो ।। ७३ ॥ साहु गोयम पन्ना ते, छिन्नो मे समओ इमो। अन्नो वि ससओ मज्झ, त मे कहमु गोयमा ॥ ७४ ॥ अन्धयारे तमे घोर, चिट्ठन्ति पाणिणो नह । को करिस्मइ उज्जोय, सबलोयम्मि पाणिण ॥ ७५ ॥ उग्गओ विमलो भाणू, सबलोयपभकरो। सो करिम्सह उज्जोय, मबलोयम्मि पाणिण ।। ७६ ॥ भाणू य हुड के वुत्ते, केसी गोयममन्यवी। केसिमेव बुवत तु, गोयमो इणमन्नवी ॥ ७७ ॥ उग्गओ खीणमसारो, सबन्न जिणभक्सरो । सो करिस्मा उज्जोय, सबलोयम्मि पाणिण ॥ ७८ ॥ साहु गोयम पन्ना ते, छिन्नो मे ससओ इमो। अन्नो वि ससओ मज्झ, त मे कहसु गोयमा ।। ७९ ॥ सारीरमाणसे दुक्खे, वज्झमाणाण पाणिण । खेम सिरमणानाह, ठाण किं मन्नसी मुणी ॥ ८० ॥ अत्थि एग धुवठाण, लोगग्गम्मि दुरारुह । जत्थ नत्थि जरा मच्चू, वाहिणो वेयणा तहा ॥ ८१ ॥ ठाणे य इके उत्ते, केसी गोयममन्वनी। वेसिमेव वुवत तु, गोयमो इणमन्नवी ।। ८२ ।। निवाण ति अवाह ति, सिद्धी लोगग्गमेव य । खेम सिर अणाबाह, ज चरति महेसियो ।। ८३ ॥ त ठाण सासयं वास, लोयग्गम्मि दुरारुह । ज सपत्ता न सोयन्ति, भनोहन्तकरा मुणी ।। ८४ ॥ साहु गोयम पन्ना ते, छिन्नो मे ससओ इमो । नमो ते समयातीत, सन्यमुत्तमहोयही ॥ ८५ ॥ एव तु ससए छिन्ने, केसी घोरपरकमे । अभिनन्दित्ता सिरमा, गोमय तु महायस ॥ ८६ ॥ पचमह वयधम्म, पडिवजह भावओ। पुरिमस्स पच्छिमम्मि, मग्गे तत्थ सुहावह ॥ १७ ॥ केसीगोयमओ निच, तम्मि आमि समागमे । सुयमीलममुकमो, महत्थत्यविणिन्छओ। ८८ ।। तोमिया परिसा सवा, सम्मग्ग समुवट्ठिया । सयुया ते पसीयत्तु, भयव केमिगोयमे ॥ ८९ ।। त्ति वेमि ॥ केसिगोयमित समत्त ॥ २३ ॥ - . , श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला ॥ अह समिईओ चउवीसइमं अज्झयणं । चे + and मोअट्ट पवयणमायाओ, समिई गुत्ती तहेव य । पंचत्र य समिईओ, नओ गुत्तीड आहीया ॥ १ ॥ गं इरियाभासेसणादापणे, उचारे मसिई दय । मणगुत्ती वयगुत्ती, कायगुत्ती य अट्टमा ।। २ ॥ एएयाओ अट्ठ समिईओ, समासेण वियाहिया । दुवालसंगं जिणवाय, मायं जत्य र पवयणं ॥ ३ ॥ इआलम्बणेण कालेण. मग्गण जयणाय य । चउकारणपरिसुद्धं, संजए. इरियं लिए ॥ ४ ॥ अतत्थ आलम्बणं नणं दंसणं चरणं तहा । काले य दिवसे वृत्त, मन्गे उप्पयाजिए ॥५॥ यादवो खेत्तओ चेव, कालो भावभो तहा । जायणा चउबिहा बुत्ता, तं मे कित्तयओ सुण ॥ ६ ॥ दव्यओ चक्षुसा पहे, जुगमित्तं च खेत्तो । कालओ जाव रीइजा, उपउत्ते य भावो ॥ ७ ॥ नइन्दियत्थे विवज्जित्ता, समायं चेव पञ्चहा । नम्मुत्ती तप्पुरकारे, उवउत्त रियं रिए ॥ ८ ॥ कोहे माणे य मायाए, लोमे य उपउनया। हासे भए मोहरिए, विकहासु नच य ॥ ९ ॥ दएयाई अट्ठ ठाणाई, परिवजित्तु संजए । असावजं मियं काले, भासं भामिज पनवं ।। १० ।। नागवेसणाए गहणे य, परिभोगेसणाय य । आहारोवहिसजाय, एए तिन्नि विमोहए ॥११॥ गग्गमु'पायणं पढमे, वीए सोहेज एयणं । परिभोयम्मि चउर्व, विमोहेज जयं जई ॥ १२ ॥ ओहोवहोवग्गहियं, भण्डगं दुविहं मुणी । गिण्हन्तो निश्खिवन्तो वा, पउंजेज इमं विहिं ।। १३ ॥ चक्खुमा पडिले हित्त, पमजज जयं जई ! अइए निक्खिवेजा बा, दहओ वि समिए सया ॥ १४ ॥ उच्चारं पायवणं, खलं सिंघाणजल्लियं । आहारं उबहिं देहं , अन्नं वावि तहाविहं ॥ १५ ॥ अणावायमसंलोए, अणोवाए चेव होइ संलोए | आवायमसंलोए, आवाए चैव संलोए ॥ १६ ॥ अणावायमसंलोए, परस्सणुवघाइए । ममे अझुसिरे यावि, अचिरकालकयम्मि य ।। १७ ।। विस्थिण्णे दूरमोगाढे, नासन्ने विलवजिए। तसपाणवीयरहिए, उच्चाराईणि बोमिरे ॥ १८ ॥ ए याओ पञ्च समिईओ, समासेण वियाहिया। एनो य तओ गुत्तीओ, बोच्छामि अणुपुचसो ॥ १९ ॥ मंगम्भसमारम्भे, आरम्भे य तहेब य । चउत्थी अमञ्चमोसा य, मणगुत्तीओ चउबिहा ।। २० ॥ संगम्भसमारम्भे. आरम्भे य तहेत्र य । मणं पयत्तमाणं तु, नियतंज जयं जई ।। २१ ॥ सच्चा नहेब मोसा य, सचमोसा तहेव य । चउत्थी अमञ्चमोसा य, वइगुत्ती चरविहा ॥ २२ ॥ संरम्भसमारम्भे, आरम्भे य तहेव य । वयं पवत्तमाणं तु, नियतंज जयं जई ॥ २३ ॥ ठाणे निसीयणे चेव, तहेव य तुयट्टणे । उल्लंघणपलंधणे, इन्द्रियाण य जुजणे ॥ २४ ॥ मरम्भममारम्भे, आरम्भम्मि नदेव य । कायं पचत्तमाणं तु, नियत्तज जयं जई ॥२५॥ एयाओ पञ्च समिईओ, चरणस्स य पवत्तणे । गुत्ती नियत्त गे वुत्ता, असुमत्येसु सहसा ॥ २६ ॥ एमा पवयणमाया, जे सम्मं आयरे मुणी। खिप्पं सबसंसारा, विप्पमुच्चइ पण्डिए ।। २७ त्ति वेमि || इअ समिईओ समत्ताओ and 1

श्रीउत्तरा ययनसूत-पश्चरिममाध्ययनम्
(४३)
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॥ अह जन्नइज्ज पञ्चवीसइम अज्झयण ।
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माहणकुलमभृओ, आसि विप्पो महायमो । जायाई जमजन्नम्मि, जयघोसि त्ति नामजो ॥१॥
इन्दियग्गामनिग्गाही, मग्गगामी महामुणी । गामाणुग्गाम रीयते, पत्ते चाणारमिं पुरिं ॥२॥
बाणारसीए चहिया, उजागम्मि मणोरमे। फामुए सेजसथारे, तस्य वाममुवागए ।।३।।
। अह तेणेव कालेण, पुरीए तत्य माहणे । विजयघोसि त्ति नामेण, जन्न जयड पेयपी ॥४॥
अह से तत्य अणगारे, मासक्समणपारणे । विजयघोसस्म जन्नम्मि, मिक्समहा उपहिए ॥८॥
समुवट्ठिय तहिं सन्त, जायगोपडिशेहिए!नहु दाहामि ते भिक्स, भिकम्बू जायाहि अन्नओ ॥६॥
जे य वेयविऊ विप्पा, जन्नट्ठा य जे दिया। जोग्मगविऊ जे य, जे य यम्माण पारगा।' ७ ॥
जे समस्या समुद्धत्तु, परमप्पाणमेन य । तेमि अन्नमणिंटेय, भो भिक्खू मवकामिय ॥ ८ ॥
सो तन्थ एष पडिसिद्धो, जायगेण महामुणी। न नि रुट्ठो न नि तुट्ठो, उत्तिमट्ठगवेमओ ॥९॥
नन्नट्ठ पाणदेउ ना, नवि निवाहणाय वा । तेसिं विमोक्सणहाए, इण वयणमव्यवी ॥ १० ॥
ननि जाणसि वेयमुह, नवि जन्माण ज मुह । नक्खत्ताण मुह ज च, ज च धम्माण चा मुह ॥ ११ ॥
जे समन्या ममुदत्त, परमप्पाणमेव य । न ते तुम वियाणासि, अह जाणासि तो भण ॥ १२ ॥
तस्मक्खेत्रपमोरस तु, अनयन्तो तहि दिओ। मपरिसी पजली होउ, पुच्छई त महामुणिं ।। २३ ॥
वेयाण च मुह हि, हि जन्माण ज मुह । नक्सत्ताण मुह गृहि, वृहि धम्माण ना मुह ॥ १४ ॥
(जे समत्था ममुद्धत्तु, परमप्पाणमेव य। एय मे ससय मद, सार महसु अच्छिओ ॥ १५ ॥
अग्गिहुत्तमुहा वेया, अन्नट्ठी वैयमा मुह । नक्खत्ताण मुह चन्दो, वम्माण कामवो मुह ॥ १६ ॥
जहा चन्द गहाईया, चिहती पजलीउडा । वन्दमाणा नममन्ता, उत्तम मतहारिणो ॥ १७ ॥
अजाणगा जन्नाई, विजामाहणसपया । गूढा सज्झायतवमा, भामच्छन्ना इवग्गिणो ॥ १८ ॥
नो लोए यम्भणो जुत्तो, अग्गीव महिओ जहा । सया कुसलसदिहूँ, न य म माहण ॥ १९ ॥
जो न मञ्जड आगन्तु, पवयन्तो न मोयड । रमड अन्जायणम्मि, व वय वम माहण ॥२०॥
जायस्व जहाम, निद्धन्तमलपानग। रागदोसभयाईय, त वय म माहण ॥ ११ ॥
तास्सिय फिम ठन्त अमचियममसोणिय । सुवय पत्तनिवाण, त य म माहण ॥ २२॥
तमपाणे वियाणेत्ता, सगहेण य यावरे । जो न हिंमड तिविहेण, त वय म माइण ॥१३॥
कोहा वा जड वा हासा, लोहावा जइ वा भया। मुस न वर्ड जो उ, त य म माहण ॥ २४ ॥
चित्तमन्तमचित्त ना, अप्प वा जड वा बहु । न गिण्हाड अदत्त जे, त वय म मादण ॥ १५ ॥
बिमाणुसतेरिन्छ, जो न सेवह मेहुण | मगसा सयवकेण, त य म माहण ॥ २६ ॥
जहा पोम जले जाय, नोनलिप्पड वारिणा । एर अलित्त समेहि, त य म माहण ।। २७ ॥
अलोलुय मुहाजीति, अणगार अकिंचण । असमत्त गिह थेसु, त वय धूम माहण ।।२८॥
जहिना पुसजोग नाइसगे य बन्धवे । जो न सज्जड भोगेसु, त य म माहण ॥ २९ ॥

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“४४)
श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला.
वि मुण्डिएण समणी, न ओंकारेण वम्भणो । न झुणी रण्णावामणं, कुसुचीरेण तावमो ।। ३१ ।।
नगए समणो होइ बम्भचेरेण यम्मणो । नाणण उ मुणी होट, नवेण होई तावसो ॥ ३२ ॥
मुणा बम्भणो होइ, कम्मुणा होइ खत्तिओ । वइमो कम्मुणा होइ, मुद्दो हबई कम्मुणा ।। ३३ ॥
र पाउकर बुद्धे, जहिं होइ सिणायो । महकम्मविणिम्मुकं, तं वयं वृम माहणं ॥ ३४ ॥
| गुणसमाउना. जे भवन्ति दिउत्तमा । ते समत्था उ उद्धत्तुं, परमपाणमेव य ॥ ३५ ॥
| तु संसए छिन्न, विजयघोसे य माहणे । समुदाय तयं तं तु, जयघोसं महामुणिं ।। ३६ ॥
य विजययोसे, इणमुदाहु कयंजली | माहणनं जहाभूयं, मुठ्ठ मे उबदसियं । ३७ ॥
मे जया जन्नाणं, तुम्भे वैयविऊ विऊ ! जोइसंगविऊ तुम, तुम्मे धम्माण पारगा ।। ३८ ॥
मे समत्था उद्धृत्तुं, परमप्पाणमेव य । नमणुग्गहं करेहम्हं, मिकावणं मिस्बु उत्तमा ॥ ३९. ।।
कज मध्य मिक्खेण, खिप्पं निक्वमन दिया। मा भमिहिसि भयावह, यो संसारसागरे ।। १० ।।
यो होइ भोगेसु. अमोगी नोवलिप्पई । भोगी भमइ संमारे, अभोगी विष्पमुचई 11 ४२ ।।
यो सुक्खो य दो छुढा, गोलया मट्टियामया। दो वि आवडिया कुटे, जो उन्हो सोऽन्य लग्गई ॥ ४२ ॥
लग्गन्ति दुम्मेहा, जे नरा कामलालसा । विगत्ता उ न लग्गन्ति, जहा ने मुस्खगोला || ४३ ॥
से विजयघोमे, जयघोसम्म अन्तिए । अणगारस्म निस्वन्तो, धम्मं सोचा अणुत्तरं ॥ १४ ॥
बित्ता पुत्रकामाई, संजमेण तवेण य । जयघोसविजययोमा, सिद्ध पत्ता अणुत्तरं ॥ ४५ ॥
त्ति बेमि ।। इअ जन्नज समत्तं ॥ २५ ॥
॥ अह सामायारीछटीलइमं अज्झायणं ॥
मायारिं पवक्खामि, सबदुवखविमोक्खणि ! जे चरित्ताण निग्गन्था, तिण्णा संसारसागरं ।। १ ।।
मा आवस्मिया नाम, विझ्या य निसीहिया । आपुच्छणा य तइया, चउत्थी पडिपुच्छणा ॥ २ ॥
मी छन्दणा नाम, इच्छाकारो य छहओ। सत्तमो मिच्छकारो य, तहकारो य अट्ठमो ॥३॥
मुट्ठाणं च नवम, दसमी उपसंपदा। एसा दसंगा माहणं, सामायारी पवेड्या ।। ४ ॥
रणे आवस्सियं कूजा, ठाणे कुज निसीहियं । आपुच्छणं सयंकरणे, परकरणे पडिपुच्छणं ॥५॥
दणा दबजाएणं, इच्छाकारो य सारणे | मिच्छाकारो य निन्दाए, तहकारो पडिस्मुए ॥ ६ ॥
भुट्ठाणं गुरूपूया, अच्छणे उपसंपदा । एवं दुपंचसंजुत्ता, सामायारी पवेड्या ॥ ७ ॥
वल्लम्मि चउठभाए, आइञ्चम्मि समुहिए। भण्डयं पडिलेहित्ता, वन्दित्ता य तओ गुरुं ॥ ८ ॥
छज्ज पंजलीउडो, किं काय मए इह । इच्छं निओइडं भन्ते, वेयावच्चे व सज्झाए ॥ ९ ॥
विच्चे निउत्तेण, कायई अगिलायओ। सज्झाए वा निउत्तेण, सबदुक्खविमोक्खणे ॥ १० ॥
सस्स चउरो भागे, मिक्ख कुजा वियक्खणो। तओ उत्तरगुणे कुन्जा, दिणभागेमु चउसु वि ॥ ११ ॥
पोरिसि सज्झायं,बीयं झाणं झियायई । तझ्याग मिक्खायरिय, पुणो चउत्थीइ सज्झायं ॥ १२ ॥

४- . , श्रीउत्तराभ्ययनसूत्र-छनिसमाध्ययनम् (४५) आमाटरहुलपक्खे, भद्दवए क्रत्तिए य पोसे य । फरगुणवाइसाहेस य, योद्धबा ओमरत्ताओं ॥ १८ ॥ जेट्ठामूळे आमाटमावणो, उहि अगुलेहि पडिलेहा। अहहिं वीयतम्मि, तइए दम अट्टहिं चउत्थे ॥ १६ ॥ रति पि चउगे मागे, मिक्खू कुजा वियक्खणो। तओ उत्तरगुणे कुजा, राडभाएसु चउसु वि ॥ १७ ॥ पढम पोरिसि सज्झाय, नीय झाण झियायई। तहसाए निदमोक्सतु'चउत्थी भुजो वि मज्झाय ॥ १८॥ ज ने जयारति, नक्सत्त तम्मि नहचउभाए। सपत्ते विरमेजा, सज्झाय पओमकालम्मि ।। १९ ।। तम्मेव य नक्सत्ते, गयणचउभागमानसेमम्मि । रत्तियपि काल, पडिलेहित्ता'मुणी 'कुा ।। २० ॥ पुविलम्मि चउम्भाए, पडिले हिताण भण्डय। गुरु पन्दित्तु सज्झा यकुजा दुक्सविमोकावण ॥ २१ ॥ पोरिसीए चउभाए, वन्दित्ताण तओ गुरु । अपडिवमित्ता कालस्म, भायण पडिलेहए ॥ २२ ॥ मुहपोति पडिलेहित्ता, पडिलेज गोच्छग । गोच्छगलइयगुलिओ, वत्थाइ पडिलेहए ॥ २३ ॥ जुट्ट थिर अतुरिय, पुवं ता त्यमेव पडिलेहे । तो विडय पप्फोडे, तडय च पुणो पमजिज ॥२४॥ अणचाविय अमलिय, अणाणुगन्धिममोमलिं चेर। छप्पुरिमा नरसोडा, पाणीपाणिविसोहणं ।। २५ ॥ आग्भडा मम्म द्दा, वजेयत्वा य मोमलोतदया। पप्फोडणा चउत्थी, विक्सित्ता वेइया छट्ठी ॥ २६ । पसिढिलपलम्लोला,एगा मोमाअणेगरूपधुणा। कुणइपमाणिपमाय,सकियगणणोनग कुन्जा ॥ २७ ॥ अणूणारित्तपडिलेहा, अविच्चामा तहेर य । पढम पय पसत्य, सेसाणि य अप्पसन्थाइ ॥ २८ ॥ पटिलेहण कुणन्तो, मिहो कह कुणड जणायकहना।देड व पञ्च क्याण, वाण्इ सय पडिन्छ वा ।। २९ । पुढी आउदाए, तक पज-रणस्मट-तमाण । पडिलेहणापमत्तो, छह पि विराहओ होड ॥ ३० पुढवी आउछाए, तेऊ पाऊ वणम्मड-तमाण । पडिलेहणाआउत्तो, छह सग्क्सओ होड ॥ ३१ । तडया पोरिसीए, भत्त पण गसए । छह अन्नयराए, कारणम्मि समुहिए ॥ ३२ । चेयण वैयापच्चे, इरियट्टाप य सजमट्ठाए-। तह पाणवत्तियाए, छट्ठ पुण धम्मचिन्ताए ॥ ३३ । निग्गन्थो धिहमन्तो, निग्गन्धी विन करेन उहि चेर।थाणेहि ट इमेहिं, अणवमणाडसे होड ।। ३४ आयके उपमग्गे, तितिकावया यम्भचेरगुत्तीसु । पाणिदया तमहेउ, सरीरमोरे यणट्ठाए ॥ ३५ । अपसेस भएडग गिज्म, चक्सुसा पडिलेहए । परमद्धजोयणाओ, विहार विहरए मुणो ॥ ३६ चउत्थीप पोरिसीए, निक्सिवित्ताण भायण | सज्झाय तो कुजा, मद्यभापविभागण ॥ ३७ । पोरिसीए चउन्माए, वन्दित्ताण तओ गुरु । पडिक्वमित्ता कालस्म, सेञ्ज तु पडिलेहए ॥ ३४ ॥ पामरणुचारभूमि च, पडिलेहिज जय जई । काउस्मग तओ कुन्ना, मवदुक्सानिमोक्खण ॥ ३९ । देवसिय च अईयार, चिन्तिजा अणुपुवसो ! नाणे य दसणे चेर, चरित्तम्मि तहेर य॥४० रियकाउस्सग्गो, चन्दित्ताण तओ गुरु । टेसिय तु अईयार, आलोण्ज जहकम्म ।। ४१ पडिमिनु निस्सल्लो, वन्दित्ताण तओ गुरु । काउम्मग्ग तओ कुजा, मवदुक्सनिमोक्सण ॥ २ पारियफाउस्मग्गो, पन्दित्ताण 'तओ गुरु । थुइमगल च काऊण काल सपडिलेहए ॥ ४३ पढम पोरिसि सज्झाय, वितिय झाण झियाय। तइयाए निदमोरस तु, मज्झाय तु चउत्थिए । ४४ पोरिसीए चात्यीए, काल तु पडिलेहिया | मज्झाय तु तओ कुन्ना, अमोहेन्तो असजए ॥ ४५ पोरिसीए चभाए, चन्दिऊण तो गुरु ! पटिकमितु कालस्म, काल तु पडिलेहए ।। ४६ । आ गए कायमोस्मग्गे, महदुस्पविमोरसणे | उस्मग्ग नओ कुन्ना महनक्सविमोक्सण ।। २७ । , - ~ NA ४६) श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला PorwA इयं च अईयरं, चिन्तिन अणुपुरसो । नाणंमि दसणंमि य, चरित्तमि तवंमि य ॥४८॥ रियकाउस्सग्गो, वन्दित्ताण तओ गुरुं । राइयं तु अईयारं, आलोएन जहकम्मं ।। ४९ ॥ डिक्कमित्तु निस्सल्लो, वन्दित्ताण तओ गुरुं । काउस्मग्गं तो कुजा, सबदुक्यणं ।। ५० ॥ के तवं पडिवजामि, एवं तत्य विचिन्तए । काउम्सग्गं तु पारिता, वन्दई य तओ गुरुं ।। ५१ ॥ परियकाउस्सग्गो, वन्दित्ताण तओ गुरुं । तवं तु पडिवजेजा, कुन्ना सिद्धाण संघवं ।। ५२ ।। सा सामायारी, ममासेण वियाहिया । जं चरित्ता बह जीवा, तिण्णा संसारसागरं ।। ५३ ।। ति देमि ॥ इअ सामायारी ममत्ता ॥ २० ॥ , ॥ अह खलुकिजं सत्तवीसइमं अन्झयणं । शेरे गणहरे गग्गे, मुणी आसि विसारए | आइण्णे गणिभावम्मि, समाहि पडिसंधाप ॥ १ ॥ वहणे बहमाणस्स. कन्तरं अइवत्तई । जोगे वहमाणस्स, संसारो अइवत्तई ॥ २॥ खलंके जो उ जोएड, विहम्माणो किलिस्सई । असमाहि ज वेएइ, तोत्तओ से य भन्नई ॥ ३॥ एग डसइ पुच्छम्मि, एगं विन्धइ भिक्खणं । एगो भंजइ समिल, एगो उपहडिओ॥ ४ ॥ एगो पडइ पासेणं, निवेसइ निवजई । उक्नुहइ उफिडड़, सढे बालगवी वए ॥ ५॥ माई सुद्धेण पडइ, कुद्धे गच्छे पडिप्पहं । मयलक्खेण चिट्टई, वेगेण य पदामई ॥६॥ छिन्नाले छिन्दई सेलिं, दुदन्तो भंजए जुगं । सेवि य सुस्सुयाहत्ता, उज्जहित्ता पलायए ॥ ७ ॥ खलुका जारिसा जोवा, दुस्सीसा विह तारिसा जोइया धम्मजाणम्भि, भजन्ती घिदुबला ॥८॥ इड्डीगारविए एगे, एगेऽस्थ रसगारवे । सायागारविए एगे, एगे मुचिरकोहणे ॥ ९ ॥ मिक्खालसिए एगे, एगे ओमाणभीरुए । थद्धे एगे आणुसामम्मी, हेअहिं कारणेहि य ॥ १० ॥ मो वि अन्तरभासिल्लो, दोसमेव पकुबई । आयरियणं तु वयणं, पडिक्लेइमिक्खणं ।। ११ ॥ न सा ममं वियाणाइ; न य सा मज्ञ दाहिई । निग्गया होहिई मन्ने, सह अन्नोत्थ वच्चर ॥ १२ ॥ पेतिया पलिउंचन्ति, ते परियन्ति, ममन्तओ। रायवेटिं च मनन्ता, करेन्ति मिउडि मुहे ॥ १३ ॥ वाइया संगहिया चेव, भत्तपाणेण पोसिया । जायपक्खा जहा हंसा, पक्कमन्ति दिसो दिसि ।। १४ ॥ अह सारही विचिन्तेइ, खलंकेहिं समागओ। किं मझ दुलूसीसेहिं, अप्पा मे अवसीयई ॥ १५ ॥ जारिसा मम सीसाओ, तारिसा गलिगद्दहा । गलिगदहे जहित्ताणं, दहें पगिहई तवं ॥ १६ ॥ मिउमद्दयसंपन्नो, गम्भीरो सुसमाहियो । विहरइ महिं महप्पा, सीलभूएण अप्पणं ॥ १७ ॥ त्ति बेमि ॥ खलंकिजं समत्तं ।। २७ ।।

AMMA HA ANAN - , श्रीउत्तराध्ययनसूत्र-अट्ठाविसमाध्ययनम् (२७) ॥ अह मोक्खग्गगई अट्ठावीसइमं अन्झयण ॥ मोक्वमग्गगइ तच, सुणेह जिणभासिय । चउकारणसजुत्त, नाणदसणलक्खणं ।। १॥ नाण च दमण चेव, चरित्त च तो वहा । एस मग्गु ति पन्नचो, जिणेहिं वरदसिहि ॥ २ ॥ नाण च दसण चैव, चरित्त च तमो तहा । एयमग्गमणुप्पत्ता, जीना गच्छन्ति सोग्गड़ ॥ ३ ॥ तत्य पचविह नाण, मुय आमिनियोहिय । ओहिनाण तु तहय, मणनाण च केल ॥ ४ ॥ एप पचविह नाण, दवाण य गुणाण य । पजाण य सवेसिं, नाण नाणीहि दसिय ॥ ५ ॥ गुणाणमासओ दव, एगदवस्मिया गुणा । लक्षण पनवाण तु अभओ अस्मिया भवे ।। ६ ।। धम्मो अहम्मो आगास, कालो पुग्गल जन्तवो । एम लोगो त्ति पन्नत्तो, जिणेहिं बरदसिहि ॥ ७॥ धम्मो आम्मो आगाम, दव इविकमाहिय । अणन्ताणि य दवाणि, कालो, पुग्गलजन्तोवो ॥ ८ ॥ गइलक्षणो उ धम्मो, अहम्मो ठाणलक्मणो । भायण सव्वद वीण, नह ओगाहलक्खण ॥९॥ वत्तणालक्सणो कालो, जी उवओगलक्सणो । नाणेण दसणेण च, सुहेण य दुहेण य ॥ १०॥ नाण च दमणं चेव, चरित्त च तवो तहा । बीरिय अपओगो य, एय जीवस्म लक्षण ॥ ११ ॥ महन्धयार-उञ्जोओ, पहा छाया तवे इ वा । वण्णरसगन्धफामा, पुग्गलाण तु लक्सण ॥ १२॥ एगत्त च पुहत्त च, सेखा सठाणमेव य । सजोगा य विभागा य, पनवाण तु लक्खण ॥ १३ ॥ जीवाजीरा य बन्धो य, पुण्ण पावामना तहा । सबरो निजरा मोक्यो, सन्तेए तहिया नव ॥ १४ ॥ तहियाण तु मावाण, सम्भावे उचएमण । भावेण सद्दहन्तस्स, सम्मत्त त वियाहिय ।। १५ ।। निमग्गुवएसरई, आणरुई मुत्त वीयरुइमेव । अभिगम वित्थाररुई, किरिया संसंव धम्मरुई ॥ १६ ॥ भूयत्थेणाहिगया, जीजीवा य पुण्णपाव च । सहसम्मुहयासवसवरो य रोएइ उ निम्मग्गो ॥ १७ ॥ जो जिणदिटे भावे, चउबिहे महहाइ सयमेव । एमेव नन्नह त्ति य, स निमग्गरह ति नायबो ॥ १८ ॥ एए चेव उ भावे, उवढे जो परेण मद्दई । उमत्येण जिणेण व, उवएसरुइ ति नायवो ॥ १९ ॥ रागो दोसो मोहो, अन्नाण जस्स अवगय होइ । आगाए रोएतो, सो वलु आणाई नाम ॥२०॥ जो सुत्तमहिजन्तो, सुण्ण ओगाहई उ सम्मत्त । अगेण बहिरेण , सो मुत्तरुइ त्ति नायवो ॥ २१ ॥ एगेण अणेगाइ, पयाड जो पसरई उ मम्मत्त । उदए व तेल्लविन्द्, सो चीयरड त्ति नायद्यो ।। २२ ॥ सो होड अभिगमरुई, सुयनाण जेण अत्यओ दिट्ठ। एकारस अगड, पडण्णग दिहिचाओ य ॥३॥ दवाण सबभावा, सवपमाणेहि जम्म उवलद्धा । सबाहि नयविहीहिं, वित्धारस्ह ति नायवो ॥ २४ ॥ दमणनाणचरिने, तपविणए सबममिडगुचीसु जोकिरियामावरई, मोसल किरियाई नाम ॥२०॥ अणमिग्गहियकुदिट्ठी सखेवरूह ति होड नायबो। अविसाग्ओपपयणे,अणभिंगहिओ य मेसेसु ॥ २६ ॥ जो अधिकायधम्म,सुधम्म खलुचरिचधम्मच। सदृह जिणामिड़िय,यो धम्मइति नायड़ो ।। २७॥ परमत्यसथवो वा, सुदिट्ठपरमत्यसेवण या वि । वाचनकुटसणवत्रणा, य मम्मत्तसदहणा ।। २८॥ नत्यि चरित्त सम्मत्तविहग, दमणे उ भडयद । सम्मत्तचरित्ताउँ, जुगव पुव व समत्त ॥ २९ ॥ नाढमणिस्म नाण, नाणेण विणा न हुन्ति चरणगुणा । अगुणिम्म नत्थि मोक्खो. नथि अमोरवस्म निर्माण -~ 1301 (४८) श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला. निस्संकिय-निकंखिय निचितिच्छा असूढदिट्ठीय । उववृह थिरीकरणे, वच्छल पभावणे अट्ट ।। ३१ ।। सामाइस्थ पढम, ओवट्ठावणं भये वीयं । परिहारविसुद्धीय, सहुमं तह संपगयं च ॥३२॥ अफसायमहत्वाय, छउमथत्स्स जिणस्स वा । एव चयरित्तकर, चारितं होइ आहियं ।। ३ ।। तवो य दुविहो वुत्तो, वाहिरमन्तरो तहा। बाहिरो छबिहो चुत्तो, एमबमातरो तबो ४ ॥ नाणेण जाणई भावे. दसणेण य सहहे। चरित्तण निगिण्हाइ, नवेण पग्मुिझई ।। ३५ ॥ खवेत्ता 'युवकमाइ, संजमेण तवेण य । मन्वयम्दपहीणहा. पकमन्ति महेसिणो ॥ ३६ ॥ त्ति बेमि ॥ इअ मोक्खमग्गगई समत्ता ।। २८ ॥ -- । अह सम्मत्तपरकम एगूगतीसइमं अज्झयप । मुये मे आउन-तण भगवया एवमकवायं । इह खलु मम्मत्तपरकमे नाम अजयण समगण भगवया महावीरेणं कासवेणं पवेइए, जं सम्मं महहित्ता पतियाइत्ता गेयत्त फासित्ता पालइत्ता ती- रेत्ता कित्तइत्ता सोहइत्ता आगहित्ता आणाए अणुपालहत्त बहवे जीवा सिझन्ति बुझन्ति मुञ्चन्ति परिनिहायन्ति सन्दुक्खाणमन्तं करन्ति । तम्स णं अयम एवमाहिजइ, तंजहा-संवेगे १ निवा २ थम्ममद्धा ३ गुरुसाहम्मियसुरसूमणया ४ आलोयणया ५ निन्दणया ६ गरिहणया ७ सामाइए ८ चउच्चीसत्थवे ९ चन्दणे १० पडिक.मणे ११ काउस्मग्गे १२ पञ्चस्वाणे.१३ श्रवधुईमंगले १४ कालपडिलेणया १५ पायच्छित्तकरणे १६.खमावयवया १७ सदाए १८ वायणया १९ पडिपु- न्छणया २० पडियट्टणया २१ अणुप्पेहा २२ धमकहा २३ मुयस्म आगहणया २४ एगग्गमण- संनिवेसणया २५ संजमे २६ तवे २७ बोदाणे २८ मुहसाए २९ अपडिबडया ३० विवित्तमयणा- सणसेवणया ३१ विणियट्टणया ३२ संभोगपञ्चक्खाणे ३३ उबहिपञ्चक्खाणे ३४ आहारपञ्चक्याणे ३५ कसायपञ्चरवाणे ३६ जोगपञ्चक्खाणे ३७ सरीरपञ्चक्खाणे ३८ महायपञ्चक्याणे ३९ भत्तप- 'चक्खाणे ४० सम्भावपञ्चश्खाणे ४१ पडिवणया ४२ वेयावच्चे ४३ सदगुणसंपुग्णया ४४ वीय- रागया ४५ सन्ती ४६ मुत्ती ४७ मद्दव ४८ अजवे ४० भावसच्चे ५० करणसच ५१ जोगसच्चे मणगुत्तया ५३ वयगुत्तया ५४ कायगुत्तया ५५ मणसमाधारणया ५६ वयसमाधारणया ५७.का- यसमाधारणया ५८ नाणसंपन्नया ५९ दसणसंपन्नया ६० चरित्तसंपन्नया ६१ मोइन्द्रियनिग्गहे.६२ चक्खिन्दियनिग्गहे ६३ पाणिन्दियनिग्गहे ६४ जिभिन्दियनिग्गहे ६५ फासिन्दियनिग्गहे.६६ कोहविलए ६७ माणविजए ६८ मायाविजए ६९ लोहविजए ७० पंजदोसमिच्छादसणविजए ७१. सेलेसी ७२ अकम्मया ।। ७३ ॥ संवेगेणं भन्ते जीवे किं जणयइ। संवेगणं अणुत्तरं धम्मसद्धं जणयइ । अणुत्तराए धम्मसद्धाए मंवेगं हवमागच्छइ अणन्ताणुवन्धिकोहमाणमायालोमे खवेइ । कम्मं न वन्धइ । तप्पञ्चयं च णं मिच्छत्तविसोहिं काऊण दंसणाराहए भनइ । दसणविसोहीए य णं विमुद्धाए अन्लेगइए तेणेव ।

vvv श्रीउत्तराध्ययनसूत्र-एगणतीममाध्ययनम् (४९) भन्ते जीवे किं जणयइ। निवदेण दिवमाणुमतेरिन्छएसु कामभोगेसु निवेय हबमागच्छेह सबविसएसु विरञ्जड | महविमएसु विरज्जमाणे आरम्भपरिचाय करेड। आरम्भपरिचाय करेमाणे ससारमग्ग वोच्छिन्दड, सिद्धिमग्ग पडिनने य भवड ||२|| धम्मसद्धाए ण भन्ते जीवे कि जणयड | धम्मसद्धाए णमायामोक्खेसु रनमाणे विरज्जइ। जागारधम्म ण चयड । अणगारिए ण जीवे मारीरमाणसाण दुक्साण छैयणमेयणमजोगाईण बोन्द्रय रेड अव्यागाह च सुह निव्यत्तेड ॥ ३ ॥ गुरुमाहम्मिय- सुस्मुमणाए ण विणयपडिपत्तिं जणयह । विणयपडिपन्ने य ण जीवे अणाचासायणमीले नेरडयतिरि- क्खजोणियमणुम्सदेनदुग्गईओ निरुम्मड । चण्णसजलणभत्तिबहुमाणयाए मणुस्सदेवगईओ निबन्धइ, सिद्धिं सोग्गड च विसोहेइ । पमत्थाइ च ण विणयामूलाइ सबकजाइ साहेड अन्न य यहवे जीवे विणिइत्ता भाइ ॥४। आलोयणाए णभन्ते जीवे कि जणयड । आलोयणाए ण मायानियाणमिच्छा दसणमल्लाण मोक्समग्गविग्धाण अणतससारबन्धणाण उद्धरण करेइ। उज्जुभाव च जणयइ । उज्जु. भावपडिाने य ण जीवे जपाई इत्थीवेयनपुमगवेय च न वन्धइ । पुवनद्ध च ण निजरेड ॥ ८ ॥ निन्दणयाए ण भन्ते जीवे किं जणयड । निन्दणयाए ण पच्छाणुताव जणयड । पच्छाणुतावेण विर जमाणे करणगुणसेटिं पडिवजा । करणगुणसेढीपडिग्ने य ण अणगारे मोहणिज्न कम्म उग्घाए॥६॥ गरहणयाए ण भत जीवे किं जणयइ। गरहणयाए अपुरेकार जणयइ । अपुरेचारगए ण जीवे अप्प- सत्येहितो जोगेहिंतोनियत्तेड,पसत्ये य पडिगजड । पसत्थजोगपडिवन्ने यण अणगारे अणन्तघाइपजवे खवेड |मामाइएण भन्ते जीवे कि जणगड । मामाइएण सावजजोगविरड जणयहचउन्नीस- थएण भन्ते जीवे कि जणयह । च० दमणविमोहिं जणयड।९। वन्दणएण भन्ते जीवे किं जणयइ । वनीयागोय कम्मसवेड। उच्चागोय कम्म निरन्धड सोहग्ग च ण अपडिहिय आणाफल निवत्तेड । दाहिणभार च ण जणयह ॥१०॥ पडिक्कमणेण भन्ते जीवे किं जणयड । प० नयछिद्दाणि पिढेइ । पिहियवयछिदे पुण जीवे निरुद्धासवे असबलचरिचे अहम पवयणमायासु उवउत्ते अपुहत्ते सुप्पणि- हिदिए विहरड ॥ ११ ॥ काउसग्गेण भन्ते जीरे कि जणयइ । का० तीयपडप्पन्न पायच्छित्त विसोइड | पिसुद्धपायन्छित्त य जीवे नि यहियए ओहरिभरु ग्व भारवहे पसत्यज्झाणोजगए मुह सुहेण विहरइ ।। १२ । पञ्चक्खाणेण भन्ते जीवे किं जणयह । ५० आसरदाराइ निरुम्भइ । पञ्च- क्खाणेण इन्छानिरोह जणयइ । इच्छानिरोह गए य ण जीवे मवदन्वेसु निणीयतण्हे सीडभूए वि- हरइ ॥ १३ ॥ थपथुडमगलेण मन्ते जीवे कि जणयह । य० नाणदसणचरित्तगोहिलाभ जणयइ । नाणदसणचरित्तवोहिलामसपन्ने य ण जीवे अन्तकिरिय कप्पनिमाणोवयत्तिग आराहण आराहे ॥ १४ ॥ कालपडिहणयाए ण मन्ते जीवे कि जणयड । का० नाणानरणिज कम्म खवेड ॥ १५ ॥ पायच्छित्तमरणेण भन्ते जीरे किं जणयह। पा० पापविमोहिं जणयइ, निरहयारे वावि भाइ । सम्म च ण पायच्छित्त पडिवजमाणे मग्ग च मग्गफल च विमोहेड, आयार च आयारफल च आराहेह ॥ १६ ॥ समारणयाए ण मन्ते जीवे कि जणयइ । स० पल्हायणभाव जणयड । पल्हायणभावमु. गए य मन्चपाणभ्यजीचमचेसु-मेत्तीभावमुप्पाएड । मेत्तीमानमुवगए यादि जीरे भावविसोहि कारण निभए मवह ॥१७॥ सज्झाएण भन्ते जीवे कि जणयइ । स० नाणावरणिन कम्म खवेड ॥ १८॥ वायणाए ण मन्ते जीवे कि जणयड । वा० निजर जणयह सुयस्स य अणासायणाए .

~ AN .. - (५०) श्रीजैन सिद्धान्त-खाध्यायमाला बट्टए । मुयसअणासायणाए वट्टमाणे तित्थधम्म अवलम्बइ । तित्थधम्म अलम्बमाण महानिजरे महापञ्जवसाणे भवइ ॥ १९॥ पडिपुच्छणयाए णं भन्ते जीव किं जणयइ । प० मुत्तन्यतःमयाई विसोहेइ । कंखामोहणिज्नं कम्मं वोच्छिन्दः ॥२०॥ परियट्टणाए णं भन्ते जीवे किं जणयह । प० जणाई जगयइ, बंजणलाद्धं च उपाएह ॥२१॥ अणुप्पहाए णं मन्ते जीये कि जणयह । अपाङ- पवजाओ सत्तकम्मपगडीओ घणियवन्धणबद्धाओ सिढिलबन्धणलद्धाओ पकन्छ । दाहकालट्टियानो हस्सकालटिई आसी पकरेइ । तिवाणुभावाओ मन्दाणुभावाओ पोइ । (बहुपएगग्गाओ अप्पपाएम- गानो पकोड) आउयं च णं कम्मं सिया बन्धड, सिया नो बन्धइ । असावेयणिज्नं च णं कम्मं नो मुजो भुजो उचचिणाइ । अणाइयं च णं अणवदग्गं दीहमदं चारनं संमारकन्तारं खिप्पामेव वीइ- बमइ ॥२२॥ धम्मकहाए णं भन्ते जीवे किं जणयह । घ. निजरं जणयह । धम्मकहाए णं पत्रयणं भावेइ । पश्यणपभावेणं जीवे आगमेसस्स भदत्ताए कम्मं निबन्धह । २३॥ सुयस्स आराहणयाग गं भन्ने जीवे किं जणयइ । सु० अन्नाण खवह न य संकिलिम्मइ ॥ २४ ॥ एगग्गमणसंनिवेमण पाए णं भन्ते जीवे किं जणयइ । १० चित्तनिगेहं करेइ ।। २५ ।। संजमएणं भन्ते जीवे कि जण- यइ । १० अणण्हयत्तं जणयह ॥ २६ ॥ तवेणं भन्त जीवे कि जण यह ।। नवेण बोदाणं जणयह । २७ ।। बोदाणेणं भन्ते जीवे कि जणयइ | बो० अकिरियं जणयह । अकिरियाए भवित्ता नओ [च्छा सिज्मइ, बुज्झइ मुच्चइ परिनिहायइ सबढुक्खाणमन्तं करेह ॥ २८ ॥ मुहसाएणं भन्ते जीवे के जणयइ । सु० अणुस्मुयत्तं जणयइ । अणुस्याए णं जीवे अणुकम्पए अणुभ विगयमोगे वरितमोहणिन्नं कम्म खवेइ ।। २९ ।। अप्पडिबद्धयाए णं भन्ते जीवे कि जण यइ । अ० निम्मंग नणयइ । निस्संगत्तणं जीव एगे पगग्गचित्ते दिया य राओ य अमन्जमाणे अप्पडिबढे यावि वेहग्इ ।। ३० ॥ विवित्तसयणायणयाए णं भन्ते जीवे कि जणयइ । वि० चरित्तगुत्ति जणयह । परित्तगुत्त य पंण जीवे विवित्ताहारे ढढचरित्त एगन्तरए मोक्खभावपडिबन्ने अढविहकम्मगंटिं नि- जग्इ ॥३१॥ विनियट्याए णं भन्ते जीव किं जणयइ । वि० पावकम्माणं अकरणयाए अन्भुटेइ । वनद्धाण य निजरणयाए तं नियत्तेइ । तओ पच्छा चाउरन्तं संसारकन्तारं वीइबयइ ॥ ३२ ॥ सं- मोगपञ्चक्खाणेणं भन्ते जीवे किं जणयह । मं० आलम्वणाई खवेइ । निगलम्बणम्स य आयडिया रोगा भवन्ति । सएणं लाभेण संमुस्सइ, परलाभ नो आमादेड, परलाभ नो तक, नो पीहेर, नो त्थेइ, नो अभिलसइ । परलाभ अणस्सायमाणे अतकमाणे अपीहमाणे अपत्येमाणे अणमिलसमाणे (चं सुहसेज उववसंपजित्ता ण विहरइ ॥ ३ ॥ वहिपच्चक्खाणेणं भन्ते जीवे कि जणयः । उ० अपलिमन्थं जणयइ । निस्वहिए णं जीवे निकखी वहिमन्तरेण य न संकिलिस्सई ॥३४|| आहा- पञ्चकवाणेणं भन्ने जीये कि जणयइ । आ० जीवियासंसप्पओगं वोच्छिन्दइ । जीवियासमप्पओगं वोच्छिन्दित्ता जीवे आहारमन्तरेणं न संकिलिस्सइ ॥ ३५ ॥ कसायपचक्खाणेणं भन्ते जी किं नणयइ । क० बीयरागभावं जणयह । बीयरागभावपडियन्ने वि य णं जीवे समसुहदुक्वे भवइ ॥ ३६ ॥ जोगपञ्चक्खाणेणं भन्ने जीवे कि जणयइ । जो० अजोगत्तं जणयह अजोगे णं जीवे नवं कम्मं न बन्धह, पुत्रद्धं निजरेइ ।। ३७ ॥ सरीम्पचक्खाणेणं भन्ते जीवे कि जणयइ । स० सिद्धा- H Av श्रीउत्तराध्ययनस्व-एगणतीसमाध्ययनम् (५१) सहायपञ्चक्खाणेण भन्ते जीरे कि जणयड । म० एगीमान जणयड । एगीभावभूए वि य ण जीवे एगत्त भानेमाणे अप्पझझे अप्पफलहे अप्पम्माए अप्पतुमतुमे सजमबहुले सरबहुले ममाहिए यावि भरड ॥३९॥ भत्तपञ्चरखाणेण भन्ते जीरे फि जणयड । भ० अणेगाड भरसयाड निरुम्भह ॥४॥ सम्भाषपञ्चक्साणेण भन्ते जीवे किंजणयड म० अनियहि जणयड। अनियहिपडियने य अणगारे चत्तारि केलिकम्मसे खवेड तजहा-प्रेयणिन्न आउय नाम गोय। तओ पच्छा सिझड युज्झइ मुच्चह सबदुक्साणमत करेड ॥ ४१ ॥ पडिरूपणयाए ण भन्ते जीने किं जणयह । प० लापविय जण- यह । लघुभूए ण जी अप्पमत्ते पागडलिंगे पमयलिंगे विसुद्धसम्मत्ते सत्तममिडसमत्चे सबपाणभू- यजीवसत्तम वीममणिजस्वे अप्पडिलेहे जिइन्दिए विउलतनममिडमसन्नागए यावि भवइ ।। ४२॥ वेयापचेण भन्ते जीरे किं जणयड । वे तित्थयरनामगोत्त कम्म निरन्वड ॥ ४३ ॥ सवगुणसप- नयाए ण भन्ते जीवे किं जणयह । स० अपुणरावत्तिं पत्तए य ण जीरे मारीग्माणमाण दुक्साण नो भागी भनइ ॥ ४०॥ वीयरागया ण भन्ते जीने कि जणयह । धी. नेहाणुगन्धणाणि तण्हा- णुपन्धणाणि य योन्छिन्दड, मणुन्नामणुनेसु महफरिमरूपरमगन्धम चेव विरज्जड़ ॥ ४५ ॥ स तीए ण भन्ते जी कि जणयह ० ख० परीसहे जिणड ॥४६॥ मुत्तीए ण भन्ते जीरे कि जणयह । मु० अकिंचण जणयड । अकिचणे य जीने जत्थलोलाण अपत्थणिजो भाड ॥ ४७ ॥ अन्जवयाए ण भन्ते जीवे कि जणयह । अ० काउन्जुयय भावुज्जुयय भासुज्जुयय अविसंमायण जणयइ । अ विसमायणमपनयाए ण जीवे धम्मम्म आगहए भनड ॥४८॥ महवयाए ण भन्ते जीवे किंजणयइ । म० अणुस्सियत्त जणयह । अणुस्मियत्तेण जीने मिउमद्दवसपन्ने अट्ठ मयहाणाइ निट्ठामेड ॥ ४९ ।। मारमच्चेण भन्ते जीरे कि जणयह । भा० भागनिसोहिं जणयह । भाररिमोहिए वट्टमाणे जीने अ रहन्तपन्नत्तम धम्मस्स आराहणयाए अप्मुढेइ । अरहन्तपन्नत्तस्म धम्मस्म आराहणयाए अभुद्वित्ता परलोगधम्मस्म जाराहए भाइ ।। ५०॥ करणमच्चेण भन्ते जीने कि जणयह । २० करणसत्ति जणयह । करणमचे गट्टमाणे जीने जहा पाई तहा कारी यावि भव ॥ ०१ ॥ जोग मच्चेण मन्ते जीर किं जणयड । जो जोग विमोहेइ ॥५०॥ मणगुत्तयाए णभन्ते जीने कि जणयड म० जीने एगग्ग जणयड । एगग्गचित्ते ण जीरे मणगुते सजमाराहए भवड ।। ५३ ।। जयगुत्तयाए ण भन्ते जीचे किं जणयड। ० निवियार जणयह। निवियारे ण जीरे बडगुत्ते अज्झप्पजोगमाहणजुत्ते यानि विहरड ॥ ५४ ।। कायगुत्तयाए ण भन्त जीवे कि जणयड । का० मवर जणयड | सवरेण कायगुत्ते पुणो पानासनिगेह करेह ॥ ५५ ॥ मणममाहारणयाए ण भन्ते जीरे कि जणयड । म० एगग्ग • जगयड । एगग्ग जणहत्ता नाणपञ्जवे जणयड । नाणपज बणडत्ता मम्मत्त विमोहड मिच्छत च निलरेड ॥ ५३॥ ययममाहारणयाए भन्ते जीवे कि जणयड । २०यममाहारणदमणपनो विमो- हेड । चयमाहारणमणपज्जवे वियोहित्ता सुलहनोहियत्त निहत्तेट, दुल्लहयोहियत्त निजरेड ।। ५७॥ कायममाहारणयाए ण मन्ते जीव किं जणयड। फा० चरित्तपञ्जवे रिसोहेड। चरित्तपञ्जरे विमोहित्ता अदक्सायचरित्त विमोहंड । अहसायचरित्त रिमोहेत्ता चत्तारि केवलिकम्ममे गवेइ । तओ पच्छा सिझड वुअड मुच्चड परिनिवाइ सबहुक्माणमन्त कोड ॥ ५८ ।। नाणमपन्नयाए ण मन्ते जीरे किं नगर ना० जीवे मद्दभावाहिगुम जणयह । नाणमपन्ने जीरे चार तेममाररन्तारे न विणम्मड।

(५२) श्रीजैन सिद्धान्त-स्वाध्यायमाला, जहा सूई ससुत्ता न विणस्सइ तहा जीव ससुत्ते संसारे न विणम्सइ, नाणविणयतवचरित्तजोगे संपा- उणइ, ससमयपरसमयविसारए य असंघायणि भवइ ।। ५९ ॥ देसणसंपन्नयाए भने जीव कि जणयइ । ५० भवामिच्छत्तयणं करेइ न विज्झायड । परं अविझाएमाणे अणुत्तरेणं नाणदंगण अप्पाणं संजोएमाण सम्म मात्रमाणे विहरइ ।। ६० }} चरित्तसंपन्त्रयाए णं भंते जीव किं जणयह ! १० सेलेसीभावं जणयह । सेलेसि पडियने य अणगारे चत्तारि वलिकम्मसे सवेट । तओ पच्छा सिज्मइ बुझह मुच्चइ परिनिबायह सबदुक्खाणमन्तं करेह ।। ६१ ॥ सोइन्दियनिग्गहेण भन्ते जीवे किं जगयइ । सो मणुनमणुनेसु सद्देसु सगदोयनिगहं जणयह, तप्पचइयं कम्मं न बन्धह, पृथ- बद्धं च निजरेइ ।। ६२ ११ चक्खिन्दियनिग्गहेणं भन्ते जीये कि जणयइ । च० मणुनामशुन्नेस स्बेमु रागदोसनिगह जणयह, तप्पञ्चयं कम्मं न बन्यद, पुरद्धं च निजह ॥ ३॥ पाणि- न्दियनिग्गहेणं भन्ते जीवे कि जणयह । घा० मणुनामणुनसु गन्धेसु रागदोसनिग्गई जणयह, तप्पचयं कर्म न बन्धइ, पुचबर्दू च निजरे ॥ ६४ ॥ जिम्मिन्दियनिन्गणं भन्ते जीव कि जणयइ । जि० मणुन्नामणुन्नेसु रसेसु रागदोपनिग्गहं अणुयह, तप्पञ्चइयं कम्मं न बन्धह, पुवबद्ध च निञ्जरेइ ।। ६५ ।। फासिन्दियनिगहेणं भन्ते जीचे कि जणयड ! फा० वणुनामणुनसु फासेस रागदोपनिग्गहं जणयड, तप्पञ्चइयं कर्म न बन्धइ, पुत्रद्धं च निञ्जरेइ ।। ६६ । कोहविजपणं भन्ते जी कि जयड ! को सन्ति जणय. कोहवेयणिज कम्म न बन्धइ, पुधबद्धं च निजरेड ।।६।। माणविजएणं भन्ते जीवे कि जणयह ! मा० महत्र जणयइ, मायावेयणिज्न कम्मे न बन्धइ, पुवरद्धं च निजरेइ ।। ६८ } मायाविजएणं भन्ते नीचे कि जणयइ । मा० अजर्व जणयइ, मारायणिलं कम्मं न बन्धइ, पुत्रद्धं च निजरेइ ।। ३९ ॥ लोमविजपणं भन्ते जी कि जणयह । लो० संतोस जणयह, लोभवेयणिज कम्मं न बन्धड, पुच्चलद्धं च निजरेइ ॥७० ॥ पिजदोसमिच्छादसणविजएणं भन्ते जीवे कि जणयइ । पि० नाणदसणचरित्ताराहणयाए अमुट्टेड। अविहस्स कम्मरस कम्म- गण्ठिविमोषणयाए तपढमयाए जहाणुपुबीए अहवीसइविहं मोहणिज कम्मं उग्याएइ, पञ्चविह नाणावरणिनं, नवविहं देसणावरणिनं, पंचविहं अन्तराई, एए तिन्नि वि कम्मसे संबंइ । तओ पच्छा अणुत्तरं कसिणं पडिपुत्गं निराबरण दितिमरं विमुद्धं लोगालोगप्पभा केवलवरनाणदसणं समुप्पाडेइ । जाब सजोगी भवइ, ताव ईरियावहिये कम्मं निबन्ध मुहफरिस दुसमयठिश्यं । तं पढमसमए बद्धं, विइयसमए वेइयं, तझ्यसमए निजिण, तंबद्धं पुष्टुं उदीरियं वेइयं निमिण सेयाले य अकम्मयाच भवइ ॥७॥ अह आउयं पालत्ताअन्तोमुहुत्सद्वायसेसाए जोगनिरोहं करेमाणे मुहुमकिरियं अपडिवाईसुक्कझाण झायमाणे तप्पढमयाए मणजोगं निरंभइ अयजोगं निरंभइ,कापजोग निरंभइ, आणपाणुनिरोहं करेइ, ईसि पंचरहस्सक्खरुचारणट्ठाए य णं अणगारे समुच्छिन्नकिरियं अ- नियट्टिसुक्कझाण झियायमाणे वेयणिजं आउय नामंगोतं च एए चत्तारि कम्मसे जुगवं खड़ा७२।। तओ ओरालियनेयकम्माई सत्बाहि विष्पजणाहिं विप्पजहिचा उज्जुसेढिपत्ते अफुसमाणगई उड्डे एग- समएणं अविगहेणं तत्थ गन्ता सागारोवउत्ते सिझइ बुज्झइ जाव अंतं करेइ ६ ७३ ॥ एस खलु सम्मत्तपरकम्मरस अज्झयणस्स अट्टे समणेणं भगवया वहावीरेणं आपविए पनबिए पविए देसिए उवदंसिए । ७१ ॥ ति वेमि । इअ सम्मत्तपरकमे समत्ते ॥ २९ ॥ - "

श्रीउत्तराध्ययनमन-तीसमाध्ययनम्
(५३)
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॥ अह तवमग्ग तीसइम अज्झयण ॥
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जहा उ पारग कम्म, रागदोसम्मज्जिय । सनेड तवसा भिवर, तमेगागमणो सुण ॥१॥
पाणियहमुमावायाअत्तमेहुणपरिग्गहा विरओ। राईभोयणविरओ, जीवो भयइ अणासवो ॥ २॥
पंचसमिओ तिगुचो, अमाओ जिन्दिओ। अगारनो य निस्सल्लो, जीवो होइ अणासवो ॥३॥
एएसिं तु विच्चासे, रागदोससमन्जिय । सवेड उ जहा मिक्खू, तमेगग्गमणो सुण ॥ ४ ॥
जहा महातलायस्स, सन्निर द्वे जलागमे । उस्सिचणाए तरणाए, कमेणं सोसणा भवे ॥५॥
एर तु सजयस्सावि, पारकम्मनिरासवे । भनकोडीसचिय कम्म, तवसा निजरिजह ॥ ६ ॥
सो तमो दुविहो जुत्तो, नाहिरम्भन्तरो तहा । बाहिरो छविहो वुत्तो, एवमब्भन्तगे तवो ॥७॥
अणमणमणोयरिया,भिक्सायरिया य रसपरिचाओ। कायकिलेसोसलीणयाय वज्झो तवो होइ ॥ ८॥
इत्तरिय मरणकाला य, अणसणा दुविहा भवे । इत्तरिय सावकखा, निरवकंखा उ बिडजिया ॥ ९ ॥
जो सो इतरियतवो, सो समासेण छविहो । सेढितयो पयरतनो, घणो य तह होड वग्गो य ॥१०॥
तत्तो य वग्गग्गो, पचमो छडओ पप्णतयो। मणपिछयचित्तत्यो, नायवो होड इतरिओ ॥ ११ ॥
जा सा अणमणा मग्णे दुविहा सा वि पियाहिया। सवियारमवियारा, कायचिट्ठ पई भवे ॥ १२ ॥
अहना सपरिकम्मा, अपरिकम्मा य आहिया। नीहारिमनीहारी, आहारच्डेओ दोस वि ॥ १३ ॥
ओमोयरण पचहा, समासेण चियायि । दबओ खेत्तकालेण, भावेण पज्जवेहि य ॥ १४॥
जो जस्स उ आहारो, तत्तो जोम तु जो करे । जहन्नेणेगसित्थाई, एन दवेण ऊ भवे ॥ १५ ॥
गामे नगरे तह रायहाणिनिगमे य आगरे पल्ली । खेडे कब्बडदोणमुपट्टणमडम्बसंवाहे ॥ १६ ॥
आममपए विहारे, सन्निवेसे ममायघोसे य । थलिसेणाए-धारे, सत्ये संवट्टकोट्टे य ॥ १७ ॥
वाडेस व रच्छाम , परेसु ना एवमित्तिय सत्त। कप्पई उ एवमाई, एस खेत्तेण ऊ भवे ॥ १८ ॥
पेडा य अद्धपंडा, गोमुत्तिपयगवीहिया चेव । सम्पुकारट्टाययगन्तुंपनागया छट्ठा ॥ १९ ॥
दिनसम्म पोस्सीणं, चउण्हपि उ जत्तिओ भने कालो। एष चरमाणोखलु कालोमाण मुणेयच ॥ २० ॥
अहवा तयाए पोरिसीए उणाड घासमेसन्तो। चउभागृणाए वा, एच कारण ऊ भवे ॥२१॥
इत्थी वा परिसो वा, अलकिओ वानलक्विओवारि। अन्नयरवयत्यो वा, अन्नयरण व चन्धेण ॥ २२ ॥
अन्नेण विसेसेण, चण्णण भावमणुमुयन्ते उ । एच चरमाणो खलु, भागोमाण मुणेयच ॥ २३ ॥
दिवे खेत्ते काले, मानम्मि य आहिया उजे भाना। एएहि ओमचरओ, पजपचरओ भवे मिक्खू ॥ २४ ॥
अविहगोयरग्ग तु, तहा सचेव एसणा। अभिग्गहा य जे अन्ने, मिक्सायरियमाहिया ॥२५॥
सीरदहिसप्पिमाई, पणीयं पाणभोयण | परिनजण रमाण तु, भणियं रसविवजण ॥२६॥
टाणा वीरामणाईया, जीवस्स उ मुहावहा । उग्गा जहा धरिजन्ति, कायकिलेस तमाहियं ॥ २७ ॥
एगन्तमणावाए, इत्थीपमुविवञ्जिए। सयणामणसेनणया, विचिचसयणासण ॥ २८ ॥
एसो माहिरगतको, समासेण वियाहिओ। अभिन्तर तव एतो, च्यामि अणुपुचसो । २९ ।।
पागन्धित विप्राओ. वेगानमंतच मज्यायो। आग च.रिजमममो.सो.अमितरोतो.॥30॥

~~ २५४) श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला लोयणारिहाईयं, पायच्छित्तं तु दसविहं । जं भिक्व वहई मम्म, पायच्छित्तं तमाहियं ॥ ३१ ॥ मुट्ठाणं अंजलिकरणं, तहेवासणदायणं । गुरुभत्तिभावसुस्ममा, विणओ एम वियाहिओ ॥ ३२ ।। वरिखमाईए, वेयावच्चम्मि दमविह। आसेवणं जहागाम, वयावचं तमाहियं ॥ ३ ॥ यणा पुच्छणा चेव, तहेव परियट्टणा। अणुप्पेहा धम्मकहा, अन्नाओ पञ्चहा भवे ||३४|| हरुदाणि वजित्ता, आएन्जा सुसमाहिए। धम्ममुक्काई आणाई. झाणं न तु चुहावण ॥ ५ ॥ यणामणठाणे वा, जे उ भिषा न बाबरे । कायस्म विउस्मगो, छट्टो नो परिकित्तिभो॥१६ वं तवं तु दुविहं, जे सम्मं आयर मुणी । सो खिप्पं महमंमाग. विप्पमुचड पण्डिओ ॥ ७ ॥ त्ति वेसि ॥ इअ तवमग्गं ममत्तं ।। ३० ।। ॥ अह चरणविही एगतीसइमं अज्झयणं ।। ग्णविहिं पचक्खामि, जीवस्म उ सुहावहं । जं चरित्ता वह जीवा, तिण्णा मंसारसागरं ॥ १ ॥ गओ विरई कुजा, एगओ य पवत्तणं । असंजमे नियति च, संजमे य पवनणं ॥ २ ॥ गदोसे य दो पावे, पावकम्मपवत्तणे । जे भिक्खू संभई निच, से न अच्छह मण्डले ॥ ३ ॥ ण्डणं गारवाणं च, सल्लाणं च तिरं तियं । जे भिक्खु चयई निचं, से न अन्छड़ मण्डले ॥ ४ ॥ दवे य जे उबसग्गे, नहा तेरिच्छमाणुसे । जे भिक्खू सहई जयई, मे न अच्छद मण्डले ॥ ५ ॥ गहाकमायसन्नाणं, झाणाणं च दुयं तहा। जे बजई निन, से न अच्छह मण्डले ॥ ६ ॥ एसु इन्दियत्थेसु, समिईसु किरियासु य । जे भिक्खु जयई निच्चं, से न अच्छइ मण्डले ॥ ७ ॥ सामु छसु काएमु, छक्के आहारकारणे । जे भिवृ जयई निचं, से न अच्छड़ मण्डले ॥ ८ ॥ रेण्डोग्गहपडिमासु, भयट्ठाणेमु मत्तम् । जे भिक्खू जयई निचं, से न अच्छइ मण्डले ॥ ९ ॥ देसु बम्मगुत्तीसु, मिक्खुधम्मम्मि दमविहे। जे भिक्खु 'जयई निचं, से न अच्छह मण्डले ॥ १०॥ वासगाणं पडिमासु, भिक्खूणं पडिमासु या जे भिकाय जयई निचं, से न अच्छइ मण्डले ॥ ११ ॥ केरियासु भयगामेसु, परमाहम्मिएमु य । जे मिक्खू जयई निचं, सं न अच्छड़ मण्डले ॥ १२ ॥ हासोलसएहि, तहा असंजम्मि य । जे भिक्खू जयई निचं, से न अच्छइ मण्डले ॥ १३ ॥ म्भम्मि नायझणेस, ठाणसु य समाहिए । जे भिक्यू जयइ निचं, से न अच्छड़ मण्डले ॥ १४ ॥ गवीसाऐ मबले, बावीसाए परीसहे । जे भिक्खू जयई निचं, से न अच्छइ मण्डले ॥ १५ ॥ वीसाइ सूयगडे, स्वाहिएसु सुरेसु अ । जे भिक्खू जयई निचं, से न अच्छइ मण्डले ॥ १६ ॥ णुवीसभावणासु, उसेसु दसाइणं । जे भिक्खू जयई निचं, से न अच्छह मण्डले ॥ १७ ॥ रणगारगुणेहिं च, पगप्पम्मि तहेब य । जे भिक्खू जयई निचं, से न अच्छद मण्डले ॥ १८ ॥ यमुयपसंगसु, मोहठाणेमु चेव य । जे भिक्खु जयह निचं, से न अच्छइ मण्डले ॥ ११ ॥ सेद्धाइगुणजोगेसु, तेत्तीसासायणासु य । जे भिक्खु जयई निचं, से न अच्छइ मण्डले ॥ २० ॥ य एएमु ठाणेसु, जे भिक्खू जयई सया । खिप्पं सो सवसंसारा, विप्पमुच्चइ पण्डियो ॥ २१ ॥ - श्रीउत्तगययनमत्र-चतीममाध्ययनम् ANVARANA. ॥ अह पमायहाणं बत्तीसहम अज्झयणं ॥ अचन्तकालम्म सम्लगस्स मधस्स दुक्सस्स उ जो पमोक्खो। त भासओ मे पढिपुग्णचित्ता, सुणेह एगन्तहियं हियत्य ॥ १॥ नाणस्स मवम पगामणाए, अन्नाणमोहस्म विरजणाए । गगस्म दोसम्म य ससएण, एगन्तमोक्स समुवेड मोक्खं ॥२॥ तम्सेम मग्गो गुरुविद्धसेना, विरजणा पालजणस्स दूरा। मज्झायएगन्तनिसेरणा य, सुत्नत्थसचिन्तणया घिई य ॥ ३ ॥ आहारमिन्रे मियमेमणिन. महायमिच्छे निउणत्यबुद्धि। नि केयमिन्टेज विवेगजोग्ग, ममाहिकामे ममणे तपस्सी ॥४॥ न य लमेजा निउण महय, गुणाहिय या गुणो सम वा। एक्को वि पाड बिजयन्ततो, विहरेज कामे असज्जमाणो ॥५॥ जहा य अएडप्पभवा वलागा, अण्डं पालागप्पभव जहा य । पमेन मोहाययण सु तण्हा, पोह च तण्हाययण वयन्ति ॥ ६ ॥ रागो य दोसो विय कम्मबीयं, कम्म च मोहप्पभव वयन्ति । कम्म च जाइमरणस्म मल, दुक्स च जाईमरण वयन्ति ॥ ७ ॥ दुक्स हय जस्स न होड मोहो, मोहो हओजस्स न होड नहा। तण्हा हया जम्मन होड लोहो, लोहो हओ जस्म न किचणा ॥८॥ गग च दोस च तहेर मोह, उद्धत्तु कामेण ममूलजाल । जे जे उमाया पडिरन्जियवा, ते फिनहम्मामि अहाणुपुति ॥ ९ ॥ ग्मा पगाम न निसेवियवा, पाय रमा दित्तिकग नराण । दित्त च कामा ममभिवन्ति, दुम जहा माउफलं व पक्खो ॥१०॥ जहा दागी परिन्धणे वणे, ममारुओ नोवमम उवेड । विन्दियग्गी वि पगामभोरणो,न सम्भयारिस्म हियायि कम्सई ॥११॥ , वि वित्तसेवामणजन्तियाण, ओमामणाण दमिडन्दियाण । न रागमत्तु धरिमेड चित्त, पराइओ गहिरिवोमहहिं ॥१॥ जहा विरालावमहम्म मूले, न ममगाण वसही पमन्या । पमेव इत्पीनिलयस्म मामे, न यम्भयारिम्म म्यमो निवामो ॥ १३ ॥ न स्वलावण्णविलामगाम, न जपियइगियपेहिय था। इत्थीण चित्तसि निवेमहत्ता, टट्टुं वयम्से समणे ताम्सी ॥ १४ ॥ अदसण चेव अपत्थण च, अचिन्तण घेय अकिवण च । इसीनणम्मारियज्माणगग, हिय सपा नम्भव रयाण ॥ १५ ॥ - ,

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श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला.
कामं तु देवीहि विभृसियाहिं, न चाड्या योभइडं तिगुत्ता ।
तहा वि एगन्तहियं ति नचा, विवित्तचासो मुणिणं पमन्यो ।। १६ ।।
मोक्खाभिकखिस्स उमाणवस्य,संसारभीररस ठियरस धम्म ।
नेयारिसं दुत्तरमस्थि लोए, जहिस्थिओ बालमणोहराओ ॥ १७ ॥
एए य संगे समइक्वमित्ता, सुदुत्तरा चैव भवन्ति सेना ।
जहा महासागरमुत्तरित्ता, नई भवे अवि गङ्गासमाणा ॥ १८ ॥
कामाणुगिद्धिप्पभवं खु दुक्खं, सबस्स लोगस्स सदेवगस्त ।
जे काइयं माणसियं च किंचि, तस्सन्तगं गच्छड वीयरागी ।। १९ ।।
जहा य किम्पागफला माग्मा, रसेण वण्णण य भुज माणा ।
ते खुड्डए जीविय पञ्चमाणा, एओवमा कामगुणा विवागे ॥ २० ॥
जे इन्दियाणं विसया मणुन्ना, न तेमु भावं निसिरे कयाइ ।
न यामणुन्नेसु मणं पि कुना, समाहिकामे समण नबसा ।। २१ ।।
चाखुस्स चक् गहणं वयन्ति, तं रागहेउं तु मणुन्नमाहु ।
तं दोसहे अमणुन्नमाहु, समो य जो तमु स वीयरागो ।। २२ ।।
रुवस्स चक्खु गहणं वयन्ति, चरखुम्स स्वं गहणं वयन्ति ।
रागस्स हेउं समणुन्नमाहु, दोसस्स हे अमणुन्नमाह ॥ २६ ॥
रूवेसु जो गेहिमुवेइ तिवं, अकालियं पावड़ से विणामं ।
रागाउरे से जह वा पयंग, आलोयलोले समुवेइ मच्चुं ॥ २४ ॥
जे याचि दोसं समुवेइ निई, तसिवखणे से उ उबेइ दुक्खें ।
दुहन्तदोसेण सएण जन्तू. न किञ्चि स्वं अवरज्झई से ॥ २५ ॥
एगन्तरत्ते रुहरंसि रूवे, अतालिसे से कुणई पओस ।
दुक्खस्स सम्पीलमुवेइ वाले, न लिप्पई तण मुणी विगगा ॥ २६ ॥
रुवाणुगासाणुगए य जीये, चराचरे हिसह तेणरूवे ।
चित्तेहि ते परितावेइ बाले, पीलेइ अत्तगुरू किलि ॥ २७ ॥
रूवाणुवाएण परिग्गहेण, उपायणे रक्खणसन्निओगे।
वए विओगे य कहं सुहं से, वए सम्भोगकाले य अतित्तलामे ॥ २८ ॥
रूवे अतित्ते य परिगहम्मि, सत्तोवसत्तो न उवेइ तुहि ।
अतुहिदोसेण दुही परस्स, लोभाविले आययई अदत्तं ॥ २९ ॥
तहाभिभूयस्स अदत्तहारिणो, रूवे अतितस्स परिग्गहे य ।
मायामुसं बड्डइ लोभदोसा, तस्थावि दुक्खा विमुच्चई से ॥ ३० ॥
मोसस्स पच्छा य पुरत्थओ य, पयोगकाले य दुही दुरन्ते ।
एवं अदत्ताणि समाययन्तो, सवै अतितो दुहिओ अणिस्सो ॥ ३१ ॥

APNIArmy , , श्रीउत्तरा ययनसूत्र-घतीममाध्ययनम् (५७) तत्योपभोगे वि फिसदुक्स, निवत्तई जस्स करण दुक्स ॥ ३२ ॥ एमेव रूपम्मि गओ पओस, उवेड दुक्सोहपरपराओ । पदुद्दचित्तो य चिणाड कम्म, ज से पुणो होड दुह विनागे ॥ ३३ ॥ रूले विरतो मणुओ विसोगो, एएण दुक्खोहपरपरेण । न लिप्पए भरमज्ने विसन्तो, जलेण वा पोक्सरिणीपलास ॥ ३४ ॥ मोयस्स सद्द गहण वयन्ति, त रागहेउ तु मणुन्नमाहु । व दोमहेउ अमणुन्नमाहु, ममो य जो तेसु स वीयरागो ॥ ३५ ॥ सदस्स सोय गहण वयन्ति, सोयस्म सद्द गहण ययन्ति । रागस्स हेउ समणुन्नमाहु, दोसस्म हेउ जमणुन्नमाहु ॥ ३६॥ सद्देसु जो गेहिमुड तिव, अकालिय पावड से विणास । रागारे हरिणमिगे व मुद्धे सद्दे अतित्ते समुवेड मच्चु ।। ३७ ॥ जे यानि दोस ममुवेड तिव, वसि क्सणे से उ उवेइ दुक्स । दुहन्तदोसेण सएण जन्तू, न किञ्चि सद्द अरुज्झई से ॥ ३८॥ एगन्तरत्ते रुहरसि सद्दे, प्रतालिसे से कुणई पओस । दुक्सस्म सम्पीलमुवेड पाले, न लिप्पई तेण मुणी विरागो ॥ ३९ ॥ सद्दाणुगासाणुगए य जीवे, चराचरे हिंसहऽणेगरुवे । चित्तहि ते परितावेड पाले, पीलेड अतद्वगुरू फिलिट्ठ ॥ ४० ॥ सद्दाणुनाण्ण परिग्गहेण, उप्पायणे रक्सगसनिओगे। वए विओगे य कह सुहं से, सभोगकाले य अतित्तलामे ॥४१॥ सद्दे अतिते य परिग्गहम्मि, सत्तोवसचो न उवह तुहि । अतुट्टिदोसेण दुही परस्स, लोभाविले आययई अदत्त ॥ ४२ ॥ तपहाभिभूयस्म पदत्तहारिणो, सदे अतित्तस्स परिग्गडे य । मायामुस बड्डइ लोभदोमा, तस्थावि दुक्सा न विमुच्चई से ॥ ४३ ॥ मोसस्स पच्छा य पुरस्थओय, पओगकाले य दुही दुरन्ते । एव अदत्वाणि समाययन्तो, सद्दे अतितो दुहिओ अणिस्सो ।। ४४ ॥ मदाणुरत्तस्स नरस्म एप, कत्तो सुह होन कयाइ किचि । तत्थोपभोगे वि फिलेमदुक्स, निवत्तई जस्म कएण दुक्ख ॥ ४५ ॥ एमेर सद्दम्मि गओ पओस, उवेइ दुक्खोहपरपराओ। पदुद्दचित्तो य चिणाड कमा, ज से पुणो होड दुह विवागे ॥ ४६॥ सद्दे विरत्तो मणुगो विसोगो, एएण दुक्योहपरपरेण । न लिप्पए भवमोविस तो, नरेण वा पोक्करिणीपलाम |॥ १७ ॥ पाणस्स गन्धं गहण वयन्ति, त राअहेउ तु मणुन्नमाहु । .......ोमटे अम्णनमार...समोर जो तेस. वीनरामो॥४८॥.... - - श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला गन्धस्स घाणं गहणं वयन्ति, घाणस्स गन्धं गहणं वयन्ति । रागस्स हेडं समणुन्नमाहु, दोमरस हेडं अमणुन्नमाहु ।। ४९ ॥ गन्धेम जो गेहिमुवेइ तिई, अकालियं पाचह से विणासं । रागाउरे ओसहगन्धगिद्धे, मापे विलाओ विव निक्खमंते ॥५०॥ जे यावि दोसं समुवेइ तिवं, तंसिक्खणे से उ उवेइ दुक्खं । दुदन्तदोसेण सएण जन्तू, न किंचि गन्धं अवरुझई से ॥ ५१ ॥ एगन्तरचे रुहरंसि गन्वे, अतालिसे से कुगई पओसं । दुक्खस्स संपीलमुवेइ वाले, न लिप्पई तेण मुणी विरागो ।। ५२ ।। गन्धाणुगासाणुगए य जीवे, चराचरे हिंसइऽणेगरूवे । चित्तेहि ते परिताड बाले, पीले अत्तगुरू क्रिलिट्टे ॥ ५३ ॥ गन्धाणुवाएण परिग्गहेण, उप्पायणे रस्खणसन्निओगे। चए विओगे य कहं सुहं से, संमोगकाले य अतित्तलाभे ॥ ५४ ॥ गन्धे अतिते य परिगहस्मि, मत्तोचमत्तो न उवे तुहि । अतुविदोसेण दुही परस्स, लोभाबिले आययई अदत्तं ।। ५५ ॥ तण्हाभिभूयस्स अदत्तहारिणो, गन्धे अतित्तस्स परिग्गहे य । मायामुसं बड्डइ लोभदोसा, तत्थावि दुक्खा न विमुचई से ॥ ५६ ॥ मोसस्स पच्छाय पुरत्थओ य, पओगकाले य दुही दुरन्ते ।। एवं अदत्ताणि समाययन्तो, गन्धे अतित्तो दुहिओअणिस्सो ॥ ५७ ।। गन्धाणुरत्तस्स नरस्स एवं, कत्तो सुहं होज कयाइ किंचि । तत्थोत्रभोगे वि किलेसदुक्खें, निवतई जस्स करण दुक्रवं ॥ ५८ ॥ एमेव गन्धम्मि गओ पओसं, उवेइ दुक्खोहपरंपराओ। पदुद्दचित्तो य चिणाइ कम्मं, जं से पुणो होइ दुहं विवागे ॥ ५० ॥ गन्वे विरत्तो मणुओ विसोगो, एएण दुक्खोहपरंपरेण । न लिप्पई भवमझे वि सन्तो जलेण वा पोक्खरिणीपलासं ॥ ६० ॥ जिभाए रसं गहणं वयन्ति, तं रागहेडं तु मणुन्नमाहु । तं दोसहेउं अमणुन्नमाहु, समो य जो तेमु स वीयरागो ।। ६१ ॥ रसस्स जिम्भं गणं वयंति, जिन्माए रसं गहणं वयन्ति । गगस्स हेडे समणुन्नमाहु, दोसस्स हेडं अमणुन्नमाहु ।। ६२ ।। रसेसु जो गहिमुवेइ तिवं, अकालियं पावइ से विणासं । गगाउरे बडिमविभिन्नकाए, मच्छे जहा आमिसभोगसिद्धे ॥ ६३ ।। जे यावि दोसं समुवेड तिवं, तंसिक्खणे से उ उवेइ दुक्खं । दुद्दन्तदोसेण सएण जन्तू , न किंचि रसं अवरुज्झई सें ॥ ६४ ॥ 7 (१९ ~~ 7nd . श्रीउत्तराध्ययनसूत्र-वतीसमाध्ययनम् दुक्सस्म मपीलमुवेड पाले, न लिप्पई तेण मुणी निरागो।। ६० ।। रसाणुगासाणुगए य जीवे, चराचरेहिमडणेगरूवे । चिंत्तेहि ते परिताह वाले, पीलेड अत्तद्वगुरू फिलट्टे ।। ६६ ।। रसाणुवाएण' परिग्गहेण, उप्पायणे रक्सणसन्निओगे। पए निओगे य कह मुह से, सभोगकाले य अतिचलामे ।। ६७ ।। रसे अतिते य परिग्गहम्मि, सत्तोसत्तो न उवेड तुहि । अतुढिदोसेण दुही परस्स, लोभाविले आययई अदत्त ॥ ६८ ॥ तण्हाभिभूयस्म अदत्तहारिणो, रसे अदत्तस्स परिग्गहे य । मायामुम बड्डा लोभटोमा, तत्थावि दुक्सान विमुच्चई से ।। ६९ ।। मोमस्स पच्छा य पुरत्थओय, पओगकाले य दुही दुरन्ते । एव अदत्ताणि समाययन्तो, रसे अतित्तो दुहिओ अणिस्सो ॥ ७० ॥ रसाणुरत्तस्म नरस्स एन, कत्तो सुह होज कयाइ किंचि । तत्थोवभोगे वि फिलेसदुक्स, निवतई जस्म कएण दुक्स ।। ७१ ।। एमेव रसम्मि गओ पओस, उवेइ दुक्योहपरपराओ। पदुट्ठचित्तोय चिणाड कम्म, जसे पुणो होइ दुह निवागे ॥ ७२ ॥ रसे विरत्तो मणुओ विसोगो, एएण दुक्सोहपरपरेण । न लिप्पई भरमझे वि सन्तो, जलेण वा पोक्खरिणीपलास ॥ ७३ ।। कायस्म फाम गहण नयन्ति, त रागहेउ तु मणुन्नमाहु'। त दोमहेउ अमणुन्नमाहु, ममो य जो तेस स वीयरागो।। ७४ ।। फासस्म काय गण वयन्ति, कायस्स फास गहण धयति । गगस्म हेउ समणुन्नमाह दोसस्म हेउ अमणुन्नमाहु ।। ७५ ॥ फासेस जो गेहिमुवेड तिव, अकालिय पानड से विणास । रागाउरे सीयजलाप्रसन्ने, गाहग्गहीए महिसे चिवन्ने ।। ७६ ॥ जे यानि दोस समुवेड तिच, तसि क्खणे से उ उवेड दुक्यं । दुइन्तदोसेण सरण जतू, न किंचि फास अवरुज्झई से || ७७ ॥ एगन्तरत्त रुहरसि फासे, आतालिसे स कुणई पओस । दुक्सस्म मपीलमुवेड पाले, न लिप्पई तेण मुणी विगगो ॥ ७८ ॥ फासाणुगासाणुगए य जीवे, चराचरे हिंसडणेगरूवे । चिचेहि ते परिताड पाले, पीलेड अचट्टगुरुकिलिह ॥ ७९ ॥ फासाणुवाएण परिग्गडूण, उप्पायणे रक्खणसन्निओगे । व विओगे यह मुह से, समोगकाले य अतित्तलामे ॥ ८ ॥ फासे अतिचे य परिग्गहम्मि, मचोवमचो न उवे तुहि । - wwwvvNIvar Vvvv. . श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमालो. तण्हाभिभूयस्स अदत्तहारिणो,फासे अतित्तस्स परिग्गहे य । मायासं वड्डइ लोभदोसा, तत्थावि दुक्खा न विमुचई से 11 ८२ ।। मोसस्स पच्छा य पुरत्थओय, पोगकाले य दुही दुरन्ते । एवं अदत्ताणि समाययन्तो,फासे अतितो दुहिओ अणिस्मो ॥ ८ ॥ फासाणुरत्तस्स नरस्स एवं, कत्तो मुहं होज कयाइ किंचि । तत्थोवभोगे वि किलेसदुक्खं, निवतई जस्स करण दुग्वं ॥ ८४ ॥ एमेव फासम्मि गओ पओस, उइ दुक्खोहपरंपराओ । पदुदृचित्तो य चिणाह कम्म, जं से पुणो होइ दुहं विवाग ।। ८५ ॥ फासे विरत्तो मणुओ विसोगो, एएण दुक्खोहपरंपरेण । नलिप्पई भवमझे वि सन्तो, जलेण वा पोक्खरिणीपलाम ।। ८६ ।। मणस्स भावं गहणं वयन्ति, तं गगहेडं तु मणुनमाहु । तं दोसहेडं अमणुन्नमाह, समो य जो तेसु स बीयरागो ॥ ८७ ॥ भावस्स मणं गणं वयन्ति, मणस्स भावं गहणं वयन्ति । रागस्स हे समणुन्नमाहु, दोसस्स हे अमणुन्नमाहु ॥ ८८ ॥ भावेसु जो गेहिमुवेइ तिवं, अकालियं पावइ से विणामं । रागाउरे कामगुणेसु गिद्धे, करेणुमग्गावहिए गजे वा ।। ८९ ॥ जे यावि दोसं समुवेइ तिवं, तंसिक्खणे से उ उवेइ इक्वं । दुद्दन्तदोसेण सएण जन्तू , न किंचि भावं अवरुज्यई से ॥ ९०॥ एगन्तरत्ते रुइरेसि भावे, अतालिसे से कुणई पओसं । दुक्खस्स संपीलमुवेइ वाले, न लिप्पई तेण मुणी विरागो ॥ ९१॥ भावाणुगासाणुगए य नीचे, चराचरे हिंसणगरूवे । चित्तेहि ते परितावेइ वाले, पीलेइ अत्तायुरू किलिडे ॥ १२ ।। भावाणुवाएण परिग्गहेण, उप्पायणे रक्षणसन्निओगे। वए विओगे य कहं सुहं से, संभोगकाले य अतित्तलामे ॥ ९३ ॥ भावे अतित्ते य परिग्गहम्मि, सत्तोवसत्तो न उवेइ तर्हि अतुहिदोसेण दुही परस्स, लोभाविले आययई अदत्तं ॥ १४ ॥ तण्हाभिभूयस्स अदत्तहारिणो, भावे अतित्तस्स परिग्गहे य । मायामुसं बड्डइ लोभदोसा, तत्थावि दुक्खा न विमुच्चई से ॥ ९५ ॥ मोसस्स पच्छाय पुरत्थओ य, पओगकाले य दुही दुरन्ते । एवं अदत्ताणि समाययन्तो, भावे अतित्तोदुहिओ अणिस्सो ।। ९६ ।। भावाणुरत्तस्स नरस्स एवं, कलो सुहं होज कयाइ किंचि । तस्थोचभोगे वि किलेसदुवखं, निवतई जम्स कएण दुक्खं ।। ९७ ॥

vvvvvvvvv श्रीउत्तराध्ययनसत्र-वतीसमाध्ययनम् पदुद्दचित्तोय चिणाड कम्म, ज से पुणो होइ दुहं विवागे ॥ ९८ ॥ भावे विरत्तो मणुओ विसोगो, एएण दुक्सोहपरपरेण । न लिप्पई भवमझे वि सन्तो, जलेण वा पोक्सरिणी पलास ॥ ९९ ॥ एविन्दियत्थाय मणस्म अत्या.दुक्सस्म हेउ मणुयस्स रागिणो । ते चेरथोर पि कयाइ दुक्स, न वीयरागस्स करेन्ति किचि ॥१०॥ न कामभोगा ससय उवेन्ति, न यावि भोगा विगइ उवेन्ति । जे तप्पओसी य परिग्गही य, सो तेमु मोहा विगइ उवेइ ॥ १०१ ।। कोह च माण च तहेव माय, लोह दुगुच्छ अग्ड रह च । हास भय सोगपुमिथिवेय, नपुसवेय विविहे य भावे ॥ १०२ ।। आवजई एवमणेगरूवे, एविहे कामगुणेसु मत्तो । अन्ने य एयप्पभवे विसेस, कारुण्णदाणे हिरिमे वहस्से ॥१०३ ॥ कण न इच्छिज्ज सहायलिन्छ, पच्छाणुतावे न तयप्पभाव । एव वियारे अमियप्पयारे, आरजई इन्दियचोरयस्से ॥१०४ ॥ तओ से जायन्ति पओयणाड, निमिजिउ मोहमहण्णाम्मि । सहेसिणो दुक्सविणोयणट्ठा, तप्पञ्चय उजमए य रागी ॥ १०५ ॥ विरजमाणस्म य इन्दियत्था, सद्दाइया तावड्यप्पगारा । न तस्स सवे वि मणुनय वा, निवत्तयन्ती अमणुन्नय वा ॥ १०६ ॥ एव ससंकप्पविकप्पणासु, सजायई समयमुपट्टियस्स । अत्थे असकप्पयओ तओ से, पहीयए कामगुणेसु तण्हा ॥ १०७ ॥ स वीयरागो कयसबकिचो, खवेइ नाणावरण सणेण । दमणमावरेड, ज चतराय परेइ कम्म ।। १०८ ।। सद तओ जाणइ पासए य, अमोहणे होड निरन्तराए । अणासवे झाणसमाहिजुत्ते, आउक्सए मोक्समुवेइ मुद्धे ॥१०९ ।। सो तस्स सघरस दुहस्स मुफो, ज वाहई सयय जन्तुमेय । दीहामय विप्पमुको पसत्यो, तो होइ अचन्तसुही कयत्यो ।। ११० ॥ अणाइकालप्पभवस्स एसो, सबस्स दुक्खस्स पमोक्समग्गो। वियाहिओ ज समुविच ससा, कमेण अचन्तसुही भान्ति ॥ १११॥ त्ति बेमि ॥ इअ पमायहाण समत्त ॥ ३२ ॥ - - तदेव ज

(६२)
श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला.
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॥ अह कम्मप्पयडी तेत्तीसइस अज्झयणं ।।
अटुं कम्माई चोच्छामि. आणुपुचि जहाकौ । जेहिं बडो अयं जीवो, संसारे परिवट्टई ॥१॥
नाणस्सावगणिनं, दंझणावरणं तहा। वेयणिकं तहा मोहं, आरकम्मं तब य ॥ २ ॥
नामकम्मं च गोयं च, अन्तरायं तदेव य । एवमेयाइ कम्माई, अहेव उ यमासओ ॥ ३ ॥
नाणावरणं पञ्चविह, सुयं आभिणित्रोहियं । ओहिनाणं च तयं, मणनाणं च केवलं ॥ ४ ॥
निदा तहेब पयला, निहानिदा पयलपयला य । ततो यथीणगिट्टी उ, पंचमा होइ नायबा ॥५॥
चक्खुमचक्खूओहिस्स, दसणे केवले य आवरण | एवं तु नवविगप्पं, नायव दसणावरणं ॥३॥
वेयणीयपि य दुविहं, सायममाहिय च अहियं । सायस्म उ यह भेया, एमेव असायस्स वि ॥ ७ ॥
मोहणिज्जंपि च दुविहं, दंगणे चरणे नहा । दंगणे निविहं वृत्तं, चरण दुविहं भवे ॥ ८ ॥
मम्मत्तं चेव मिच्छत्तं, सम्मामिच्छत्तमेव य। एयाओ तिन्नि पयडीओ, मोहणिजस्म दमणे ॥ ९ ॥
चरित्तमोहणं कम्म, दुविहं तं वियाहियं कसायमोहणिज्नं तु, नोकसायं नद्देव य ॥ १० ॥
सोलसविहभेएण, कम्मं तु कसायजं । सत्तविहं नवविहं बा, कम्मं च नोकसायजं ॥ ११ ॥
नेरइयतिरिक्खाडं, मणुस्साउं तहेब य । देवाउयं चउत्थं तु, आई कम्मं चरविहं ॥ १२ ॥
नाम कम्मं तु दुविहं, सुहममुहं च आहिये । सुभस्म उ वह भेया, एमेव अमुहम्म वि ॥ १३ ॥
गोयं कम्मं दुविहं, उचं नीयं च आहियं । उचं अहविहं होइ, एवं नीवं पि आहियं ॥ १४ ॥
दाणे लामे य भोगे य, उवभोगे वीरिए तहा । पञ्चविहमन्तराय, समासेण वियाहियं ॥ १५॥
एयाओ मूलपयडीओ, उत्तगओ य आहिया । पएसग्गं खत्तकाले य, भावं च उनरं सुण ॥ १६ ॥
मवेसिं चेत्र कम्माणं, पएसग्गमणन्तगं | गणिठयसत्ताईये, अन्तो सिद्धाण आहियं ॥ १७ ॥
सबजीवाण कम्मं तु, संगहे छदिमागयं । सकेस वि पएसेसु, सवं सव्वेण बद्धगं ॥ १८ ॥
उदहीसरिसनामाण, तीसई कोडिकोडिओ । उक्कोसिय टिई होइ, अन्तोमुहत्तं जहनिया ॥ १९ ॥
आवरणिजाण दुण्हंपि, वेयाणिज्जे तहेव य । अन्तराए य कम्मम्मि, ठिई एमा वियाहिया ॥ २० ॥
उदहोमरिमनामाण, सत्तर कोडिकोडीओ । मोहणिजम्स उ कोसा, अ तोमुहत्तं जहनिया |॥ २१ ॥
तेत्तीम सागरोवमा, उक्कोसेण वियाहिया । ठिई उ आउकम्मस्स, अन्तोमुहुत्वं जहनिया ॥ २२ ॥
उदहीमरिमनामाण, वीसई कोडिकोडीओ । नामगोत्ताणं उकोसा, अट्ठ मुहुत्ता जहन्निया ।। २३ ।।
सिद्धाणणन्तभागो य, अणुभागा बन्ति छ । सव्वेमु वि पएमग्गं, सबजीवे अइच्छियं ॥ २४ ॥
वम्हा एएसि कम्माणं, अणु भागा वियाणिया । एएसि संवरे चेव, खवणे य जए वहो ।। २५ ॥
त्ति वेमि ॥ इअ कम्मप्पयडी समत्ता ॥ ३३ ॥

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श्रीउत्तरा ययनसूत्र-चोचीसमाध्ययनम्
॥ अह लेसज्झयण चोत्तीसइम अज्झयण ॥
लेसज्झयण परक्सामि, आणुपुचि जहक्म । उहंपि कम्म लेमाण, अणुभावे सुहेण मे ।। १ ।।।
नामाइ वण्णरसगन्धफासपरिणामर क्सणं । ठाण ठिइ गड चाउ, लेमाण तु सुमेह मे ॥ २ ॥
किण्हा नीला य काय, तेऊ पम्हा तहेर य । मुक्लेसा य छट्ठा य, नामाड तु जहकम ॥ ३॥
जीमूयनिक्सकासा, गवलरिडगमन्निभा। सजणनयणनिभा, फिण्डलेमा उ पण्णाभो॥४॥
नीलामोगमकासा, चामपिच्छममप्पमा। वेरुलियनिद्वमंशमा, नीललेसा उ पण्णओ ॥ ५॥
अयमोपुप्फमकामा, कोइलच्छदमन्निभा । सुयतुण्डपईपनिभा, काउलेमा उ पण्णओ ॥ ६॥
हिंगुलघाउमकामा, तणाडच्चसन्निभा। सुयतुण्डपईवनिभा, तेऊलेमा उ पण्णओ ॥ ७ ॥
हरियालमेयसकागा, हलिदाभेयममप्पभा सणासणकुमुमनिभा पम्हलेसा उ घण्णओ ॥ ८ ॥
ससककृन्दमकामा, खीरपूरसमप्पभा। रयणहारसकामा, सुक्लेसा उ पण्पाओ॥९॥
जह रडुयतुम्बगरसो, निम्नरसो कडुयरोहिणिग्सो चा।
एतो नि अणन्तगुणो, रसो य किण्हाए नायवो ॥ १० ॥
जह तिगडुयस्स य रसो, तिक्सो जह हरिथपिप्पलीए वा ।
एतो नि अणन्तगुणो, रसो उ नीलाए नायव्यो ॥ ११ ॥
जह परिणअम्बगरसो, तुवरफविट्ठस्स वानि जारिसओ ।
एत्तो नि अणन्तगुणो, रसो उ काऊण नायव्यो ॥ १२ ॥
जह परिणयम्बगरमी, पककविट्ठस्स गावि जारिसओ।
एतो वि अणन्तगुणो, रसो उ तेऊण नाययो॥ १३ ॥
वरवारुणीए वारसो, विविहाण आसवाण जारिसओ।
महुमेरयस्म व रसो, पत्तो पम्हाए परएण ।। १४ ।
सज्जृमृद्दियरसो, सीररसो खडसकरसो वा । एत्तो वि अणतगुणो,रमो उ मुक्काए नायवो ॥ १५ ॥
जह गोमडस्मगधो सुणगमडस्म र जहा अहिमटरमाएत्तो विअणतगुणो,लेमाण जप्पपत्याण ।।१६।।
नह मुरहिकुसुमगधो,गधवासाण पिम्ममाणाण। एत्तो वि अणतगुणो, पसत्यलेमाण तिण्ह पि ॥ १७॥
जह करगयस्म फासो, गोजिमाए य मागपत्ताण । एत्तो वि जणनगुणो, लेयाण अप्पहत्याण ॥ १८ ॥
जह यूरस्म र फासो,नाणीयस्म व सिरीमकुसुमाण) एत्तो वि जणतगुणो,पसत्थलेमाण तिण्हपि ॥ १९ ॥
तिविहोवनाविहोवा, सत्तावीसडनिदेवसीओगा। दुमओ तेयालोचा, लेमाण होड परिणामो ॥२०॥
पचासबप्पपत्तो, तीहिं अमुत्तो छसु अविरओ या तिवारभपरिणओ, सुडो माहसिओनरो ॥२॥
निद्धन्यसपरिणामो, निस्ममो अनिइन्दिओ। एयजोगसमाउचो, किण्हलेम तु परिणमे ॥ २२ ॥
इस्मा अमरिस चतो, अपिञ्चमाया अहीरिय । गेही पोसे य सडे, पमत्त रसलोलुए ॥ २३ ॥
सायगवेसए य आरम्भाओ अविरओ,सुड्डो साहस्मिो नरो। एयजोगममाउत्तो,नीललेम तु परिणमे २४
यके वकममायारे, नियहिठे अणुज्जुए। पलिउचगओरहिए, मिच्छदिट्ठी अणारिए ॥ २ ॥

"MALA , ॥ श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला (६४) नीयावती अचवले, अमाई अकुऊहले । विणीयविणए दन्ते, जोगवं उपहाणवं ॥ २७ ॥ पियधम्मे दृढधम्मेऽवजभीरू हिएसए। एयजोगसमाउत्तो, तेउल्लेस तु परिणमे ॥ २८ ॥ पयणुकोहमाणे य, मायालोमे य पयणुए । पसन्तचित्ते दन्तप्पा, जोगवं उवहाणवं ॥ २९ ॥ तहा पयणुचाई य, उवसन्ते जिइन्दिए। एयजोगसमाउत्तो, पम्हलेसं तु परिणमे ॥ ३० ॥ अडरुद्दाणि वजित्ता, धम्मसुक्काणि झायए। पसन्तचित्ते दन्तप्पा, समिए गुत्ते य गुत्तिसु ।। ३१ ।। सरागे वीयरागे चा, उबसन्ते जिइन्दिए। एयजोगसमाउत्तो, सुकलेसं तु परिणम ॥ ३२॥ असंखिजाणोसप्पिणीण, उस्सप्पिणीण जे समया। संखाईया लोगा. लेमाण हवन्ति ठाणाई ।। ३३ ।। मुहुत्तद्धं तु जहन्ना, तेत्तीसा सागरा मुहुत्तहिया। उकोसा होइ टिई, नायचा किण्हलेसाए ॥ ३४ ॥ मुहुत्तद्धं तु जहन्ना,दस उदही पलियमसंखभागभहिया। उक्कोसा होइ ठिई, नारवा नीललेसाए ॥ ३५ ॥ महत्तद्धं तु जहन्ना,तिण्णुदही पलियमसंखभागमभहिया।उकोसा होइ ठिई,नायबा काउलेसाए॥३६॥ मुहुसद्धं तु जहन्ना,दोण्णुदही पलियमसंखभागमभहिया।उक्कोसा होइ टिई,नायव्वा तेउलेसाए ।। ३७ ॥ मुहुत्तद्धं तु जहन्ना, दस होन्ति य सागरा मुहुत्तहिय । उक्कोसा होइ लिई, नायबा पम्हलेसाए ॥ ३८ ॥ मुहुत्तद्धं तु जहन्ना, तेत्तीसं सागग मुहुत्तहिया । उक्कोसा होइ टिई, नायबा सुक्कलेसाए ॥ ३९ ॥ एसा खलु लेसाणं, ओहेण ठिई वणिया होइ । चउमु चि गईसु एत्तो, लेसाण ठिई तु बोच्छामि ॥ ४० ॥ दस वाससहस्साई, काऊए ठिई जहन्निया होइ । तिण्णुदही पलिओवम, असंखभागच उक्कोसा ।। ४१ ॥ तिण्णुदही पलिओवमसंखभागो जहन्नण नीलठिई।दसउदही पलिओवमअसंखभागंच उसोमा ॥ ४२ ॥ दसउदही पलिओवमअसंखभगं जहन्निया होइ । तेत्तीससागराई उक्कोसा, होइ किण्हाए लेसए ॥ ४३ ।। एसा नेरहयाणं, लेसाण ठिई उ वण्णिा होइ । तेण परं बोच्छामि, तिरियमणुस्साण देवाणं ।। ४४ ।। । अन्तोमुहुत्तमद्धं, लेलाण जहिं जहिं जाउ । तिरियाण नराणं वा, वजित्ता केवलं लेसं ॥ ४५ ॥ मुहुत्तद्धं तु जहन्ना उकोसा होइ पुचकोडीओ । नवहि बरिसेहि ऊणा, नायवा कसुलेसाए ॥ ४६ ।। एसा तिरियनराणं, लेसाण ठिई उ वणिया होइ । तेण परं चोच्छामि, लेसाण ठिईड देवाण । ४७ ॥ दस वाससहस्सइं, किण्हाए ठिई जहनिया होइ । पलियमसंखिन्ज इमो, उक्कोसो होइ किण्हाए ।। ४८॥ जा किण्हाए ठिई खलु, उक्कोसा सा उ समयमभहिया । जहन्नेणं नीलाए, पलियमसंखं च उक्कोसो ॥ ४९ ॥ जा नीसाए ठिई खलु, उक्कोसा सा उ समयमभहिया । पलियमसंखं च उक्कोसा ।। ५० ॥ तेण परं बोच्छामि, तेऊलेसा जहा सुरगाणं । भवणवइयाणमन्तरजोइसवेमाणियाणं च ।। ५१ ।। पलिओवमं जहन्न, उकोसा सागरा उ दुग्नंहिआ । पलियमसंखेजेणं, होइ भागेण तेऊए । ५२ ।। दस वाससहस्साई, तेराए ठिई जहनिया होइ। दुन्नुदही पलिओवमयसंखभागं च उक्कोसा ॥ ५३ ।। जा तेंऊण ठिई खलु, उकोसा साउ समयमभहिया । जदनेणं पम्हाए, दर उ मुहताहियाह उनोसा ॥ ५४॥ जहन्नण काऊए, , mannN -- श्रीउत्तरा ययनसूत्र-चोत्तीसमाध्ययनम् जा पम्हाए ठिई खल,उकोसासा उ समयमभहिया। जहन्नेण सुक्काए, तेत्तीस मुहुत्तमम्भहिया ॥ ५ ॥ किण्हा नीला फाऊ, तिन्नि वि एयाओअहमलेमाओ। एयाहि तिहिवि जीवो, दुग्गइ उववजई ।। ५६ ॥ तेऊ पम्हा मुक्का, तिन्निवि एयानो धम्मलेमाओ। एयाहि तिहिवि जीवो, मुग्गड उपवजई ।। ५७ ।। लेसाहिं सञ्चाहि, पढमे समयमि परिणया हिं तु ।नहु करसड उपवाओ, परे भवे अस्थि जीनस्म ॥ ५८ ॥ लेसाहिं सवाहि, चरिमे समयमि परिणयाहिं तु नहु कस्मड उपमाओ. परे भवे होड जीवस्म ॥ ५९ । अन्तमुहुत्तम्मि गए अन्नमुहुचम्मि सेमए चेव । लेमाहि परिणयाहिं, जीपागच्छन्ति परलोय ॥६०॥ तम्हा एयासि लेमाण,आणुभावे वियाणिया।अप्पसत्थाओ जित्ता, पमत्थाओऽहिहिए मुणि ॥ ६१ ॥ त्ति बेमि ।। इअ लेसज्झयण समत्त ॥ ३४ ॥ ॥ अह अणगारज्झयण णाम पचतीसइमं अज्झयण ॥ मुहेण मे एगग्गमणा, मग्ग बद्धेहि दसिय । जमायरन्तो भिक्खू, दुक्साणन्त करे भवे ॥१॥ गिहनास परिचज, पपजामस्सिए मुणी । इमे सगे वियाणिज, जेहिं सज्जन्ति माणमा ॥२॥ तहेय हिंस अलिय, चोन असम्भसेवण । इच्छाकाम च लोभ च, सजओ परिवजए ॥ २ ॥ मणोहर चिचधर, मल्लधूवेण वासिय । सकराड पण्डुरुल्लोच, मणसावि न पत्थए ॥४॥ इन्द्रियाणि उ भिक्खुम्स, तारिमम्मि उस्सए । दुकराड निवारेउ, कामरागवियड्ढणे ॥ ५ ॥ सुसाणे सुनगारे वा, रुक्समूले व इक्कओ। पडरिके परकडे वा, वास तत्थाभिरोयए ॥ ६ ॥ । फासुयम्मि अणानाह, इत्थीहि अणभिदुए। तत्थ मरुप्पए वासं, मिक्सू परमसजए ॥७॥ न सय गिहाड कुविना, णेच अन्नेहिं कारए । गिहकम्मममारम्भे, भूयाण टिस्सए वहो ॥ ८॥ तमाण थारराण च, हुमाण वादगण य । तम्हा गिहसमारम्भ, मजओ परिवजए ॥ ९ ॥ तहेब भत्तपाणेसु, पयणे पयारणेसु य । पाणभूयदयट्ठाए, न पए न पयारए ॥१०॥ जलधन्ननिस्सिया जीना, पुढवीकट्ठनिस्मिया । हमन्ति भत्तपाणेसु, तम्हा भिक्खू न पयाए ॥११॥ विसप्पे मवओ धारे, बहुपाणिविणामणे । नत्यि जोडसमे सत्थे, तम्हा जोड न दीवए ॥ १२ हिग्ण्ण जायन्य च, मणमा वि न पत्थए । समलेठ्ठकवणे मिक्खू , विगए कयविकए ॥ १३ । किणन्तो कडओहोह,विक्णिन्तोय चाणिणो। कयविक्कयम्मि वहन्तो, मिक्सून भवड तारिसो॥ १४ ॥ मिक्खियवन केयव, भिक्खुणा भिक्खवचिणा। कयविकओ महादोसो, भिक्सत्ती सुहावहा ।। १५ । समुयाण उछमेसिना, जहामुत्तमणिन्दिय । लामालाभम्मि सतुडे पिण्ड गाय चरे मुणी ॥ १६ । अलोले न रसे गिद्धे, जिन्भादन्ते अमुन्छिए । न रमट्ठाए भुजिजा, जाणट्ठाए महामुणी ॥ १७ ॥ अचण रयण चेर, चन्दण पूयण तहा । इड्डीमकारसम्माण, मणमा वि न पन्थए ॥ १८ ॥ सुक्कझाण झियाना, अणियाणे अकिंचणे। वोमट्टकाए विहरेजा, जान कालस्स पजओ ।। १९ ।। निज्जूहिऊण आहार, कालघम्मे उवट्ठिए । जहिऊण माणुस दोन्दि, पद दुक्से विमुच्चई ।। २० । निम्ममे निरहकारे, वीयरागो अणासवो । मपचो केवल नाण, सासय परिणियुए ॥ २१ ॥ त्ति बेमि ॥ इअ अणगारज्झयण समत्त ॥ ३५ ॥ ,

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श्रीउत्तराध्ययनसूत्र-छतीसमाध्ययनम् रसओ कडए जे उ, भटए से उ वण्णओ । गन्यओ फासओ चेव, भडए सठाणओवि य ॥ ३१ ॥ रसओ कमाप जे उ, भडए से उ वण्णओ। गधओ फामओ चेन, भइए मठाणओवि य ।। ३२ ।। रसओ अम्पिले जे उ भइए से उ वण्णओ। गन्धो फासओ चेन, भइए मठाण मोवि य ॥ ३३ ॥ रसओ महुरए जे उ, भहए से उ मण्णजो । गन्धओ फासओ चेर, भहए सठाणओवि य ॥ ३४ ॥ फामओ कक्सडे जे उ, भहए से उ पण्णओ। गन्धओ रमओ चेर. भइए मठाणोति य ॥ ३५ ॥ फासओ भडए जे उ, भडए से उ वण्णओ । गन्धो रसओ चेत्र, भडए सठाणओचि य ॥३६॥ फासए गुरुए जे उ, भडए से उ अण्णओ। गन्धओ रसओ चेव, भइए सठाणओवि य ॥ ३७॥ फामओ लहुए जे उ, भइए से उ वण्णओ । गन्धओ रसओ चेर, भइए मठाणोवि य ॥ १८॥ फासए सीयए जे उ, भइए से उ पण्णओ । गन्धओ रसओ चेन, भइए मठाणओवि य ॥ ३९ ॥ फामओ उण्हए जे उ, भडए से उ पण्णओ। गन्धओ रसो चेव, भहप मठाणओनि य ॥४०॥ फामी निदए जे उ, भडए से उ अण्णओ | गन्धो रमओ चेर, भडप सटाणओपि य ॥४१॥ फासओ लुक्सए जे उ, भडए से उ पण्णओ। गन्धओरसओ चेन, भइए सटाणओपि य ।। १२ ।। परिमण्डलमठाणे, भइए से उ पण्णओ । गन्धो रसओ चेव, भह से फामओपि य ।। ४३ ।।, मठाणजो भवे वट्टे, भडए से उ चण्णओ । गवओ रसओ चेर, भडए से फासओवि य ॥४४॥ मठाणओ भवे तसे, भइए से उ वण्णओ । गन्धओ रसओ चेव, भडए से फासओवि य ॥४॥ सठाणओ जे चउरसे, भइए से उ वण्णओ । गन्धओ रमओ चेन, भडए से फासओपि य ॥ १६ ॥ (जे आययसठाणे, भहए से घण्णओ। गन्धओ रसओ चेर, भडए से फासलोनि य ॥१७॥ एसा अजीपविभत्ती, ममासेण वियाहिया । इत्तो जीवविभर्ति, पुन्छामि अणुपुत्वसो। ४८॥ समारत्था य सिद्धा य, दुनिहा जीना रियाहिया सिद्धाणेगविहा उत्ता, त मे कियतओ मुण ॥ ४९ ॥ इत्थो पुरिससद्धा य, तहेव य नपुसगा। सलिंगे अन्नलिंगे य, गिहिलिंगे तहेव य ॥ ५० ॥ उकोसोगाहणाए य, जहन्नमज्झिमाड य | उड्ड अहे तिरिय च, समुदम्मि जलम्मि य ।। ५१॥ टस य नपुसएसु वीस इत्थियासु य । पुरिसेसु य अट्ठमय, समएणेगेण सिज्झई ।। ५२ ।। चत्तारि य गिहलिंगे, अन्नलिंगे दसेव य । सालिंगेण अट्ठसय, समएगेण सिज्झई ।। ५३ ॥ उक्कोसोगाहणाए य, सिज्झन्ते जुगवं दुचे । चत्तारि जहन्नाए, मज्झे अटठुत्तर सय ॥ ५४॥ चउमट्ठलोए य दुवे समुद्दे, तओ जळे वीसमहे तहेर य । मप च अठ्ठत्तर तिरियलोए, ममणेगेण सिन्झई पुत्र ॥ - यहिं पडिहया सिद्धा, कहिं सिद्धा पइडिया। कहिं गोन्दि, चडत्ताण, कत्थ गन्तूण सिझई ।। ५६ ॥ आलोए पडिहया सिद्धा, लोयग्गे य पइट्ठिया । इह योन्दि चहत्ताण, तत्य ग तूण सिज्झई ।। ५७॥ भारसहिं जोयणेहिं, सबढस्सुपरि भवे । ईसिपन्भारनामा, पुटवी छत्तसठिया ॥८॥ पणयालमयसहस्सा, जोयणाण तु आयया। तावडय चैव वित्यिण्णा,तिग्गुणोतस्सेर परिमणो ।। ५९ ॥ अट्ठजोयणबाहुला, मा मज्मम्मि वियाहिया। परिहायन्ती चरिम ने, मन्छिपत्ताउ तणुयरी ॥ ६ ॥ अज्जुणमुपण्णगमई, सा पुडबी निम्मला महावेण । ,

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- in- । . - श्रीउत्तराध्ययनयत्र-छतीसमाध्ययनम् म् (६९) दुरिहा वणम्मईजीवा, सुहमा गायरा तहा ! पजचमपत्रचा, एउमेर दुहा पुणो ॥ ९ ॥ बायरा जे उ पज्जत्ता, दुविहा ते वियाहिया। साहारणसरीरा य, पत्तेगा य तहेव य ॥ ९४ ॥ पत्तेगमरीराओऽणेगहा ते पफित्तिया। रुक्सा गुच्छा य गुम्मा य, लया वल्ली तणा तहा ॥ ९५ ॥' चलया पहगा कुहणा, जलरुहा ओसही तहा । हरियकाया नोधवा, पत्तेगाड वियाहिया ।। ९६ ॥ साहारणसरीराओऽणेगहा ते पकित्तिया। आलए मृलए चेन, सिंगवेरे तहेव य ॥ ९७ ॥ हरिलीसिरिली सस्मिरिली, जावई केयरन्दली । पलण्डुलमणकन्दे य, कन्दली य कुडुपए ॥९८ ॥ लोहिणीह य थीहू य, कुहगा य तहेव य । कन्दे य नजकन्दे य, कन्दे सूरणए तहा ॥ ९९ ॥ सस्मकणी य बोधवा, सीहकण्णी तहेव य । मुसुण्डी य हलिदा, य णेगहा एवमायओ ॥ १०० ।। एगविहमणाणत्ता, मृहुमा तत्थ वियाहिया सुहमा सबलोगम्मि, लोगदेसे य बायरा ॥ १०१ ।। सतइ पप्पणाईया, अपजासियावि य । टिड पद्धच साईया, सपञ्जवसियावि य ॥१०॥ दम चेव सहस्माइ, वासाणुकोसिया पणगाण । पणफर्डण आउ, अन्तोमुहुत्त जहनिया ॥ १०३ ।। अणन्तकालमुक्कोस, अन्तीमहुत्त जहन्नय । कायठिई पणगाण, त काय तु अमुचओ ॥ १०४ ॥ असखकालमुबोस, अन्तोमुहत्त जहन्नय । विजदम्मि मए काए, पणगजीवाण अन्तर ॥ १०५ ।। एएसिं पणओ चेन, गन्धओ रमफासओ । सठाणदेसओ वानि, विहाणाइ महस्ससो ॥ १०६ ।। इच्चेए थारा तिविहा, समामेण वियाहिया। इत्तो उ तसे तिनिहे, बुच्छामि अणुपुत्वसो ॥ १०७ ॥ तेऊ वाऊ य बोधवा, उराला य तमा तहा । इच्चेए तसा तिनिहा, तेसिं भेए सुणेह मे ॥ १०८ ॥ । दुविधा तेऊजीवा उ, मुहुमा बायरा तहा। पजत्तमपज्जत्ता, एसमेए दुहा पुणो ॥ १०९ ॥ बायरा जे उ पजत्ताणेगहा ते वियाहिया। इगाले मुम्मुरे अगणी. अचिजाला तहेव य ॥ ११० ॥ । उक्का पिज्ज य गोधवा णेगहा एवमायओ। एगविहमणाणत्ता, मुहुमा ते वियाहिया ॥ १११॥ मुहमा मवलोगम्मि, लोगटेसे य पायरा । इत्तो कालविभाग तु तेमि वुच्छ चउदिह ॥ ११२ ।। सतह पप्पणाईया, अपञ्जवसियानि या ठिई पञ्च साइया, मपञ्चवसियापि य ॥ ११३ ॥ तिपणेष अहोरत्ता, उक्कोसेण वियाहिया । आरठिई तेऊण, अन्तोमुत्त जहन्निया ॥ ११ ॥ अमसकालमुक्कोस, अन्तोमुहुत जहन्नय । कापठिई तेऊण, त काय तु अमुचओ ॥ ११ ॥ अणन्तकालमुक्कोस, अन्तोमुहुत्त जहन्नय । विजढम्मि मए काए, तेजजीवाण अन्तर ॥ ११६ ।। । एएसिं पण्णओ चेन, गन्धओ रसफासओ। सठाणटेसओ वावि, रिहाणाइ महस्ममो ॥ १७ ॥ दुनिहा गाउजीना उ, सुहुमा यायग तहा । पज्जत्तमपजचा, एवमेए दुहा पुणो ॥ ११८ ॥ वायरा जे र पन्नत्ता, पञ्चहा ते परित्तिया। उपलिया मण्डलिया, घणगुजासुद्धमाया य ॥ ११९ ॥ : सवगनाया यणेगहा एपमायओ। एगविहमणाणचा, मुहमा तत्थ वियाहिया ॥ १२० ।। सुहुमा सबलोगम्मि, एगदेसे य वायरा । इचो कालविभाग तु, तेसिं गुच्छ चउबिह ।। १२१ ॥ सन्तइ पप्पणाईया, अपनवसियावि य । ठिड पडच्च माईया, सपजासियानि य ॥ १२ ॥ तिषणेच महस्साइ, वासाणुकोसिया भवे । आउठिई काऊण, अन्तोमुहत्त जहन्निया ।। १२३ ॥ अससकालमुकोस, अन्तोमुत्त जहनय । झापरिर्ड वाकाण, च काय तु अनुचो । १२४ ।। --

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(६८)
श्रीजेनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला
(७०)
-एएसि वण्णओ चेव, गन्धओ रसफामओ । संठाणदेसी बावि, विहाणाई सहस्मयो ।। १२६ ॥
संखककुंदसंकाउराला तसा जे उ, चउहा ते पकिसिया । बेइन्दिय-तेहन्दिय चरो पंचिन्दिया चेव ।। १२७ ॥
जोयणस्स उ बेइन्दिया उ जे जीवा, दुविहा ते पकित्तिया । पन्जनमपन्नता, नेमि मेए मुह में ।। १२८ ॥
तत्थ सिद्धा मनकिमिणो सोमंगला चेव, अलसा माइवाया। वासीमुहा य मिप्पिया, गंख मंग्वणगा नहा ।। १२ ।।
उस्सेहो जेसिंघल्लोयाणुहृया चेव, तहेव य वगडगा । जलुगा जालगा चेत्र, चन्दणा य नव य ॥ १३० ॥
एगत्तेण साईइ वेइन्दिया एएऽणेगहा एयमायओ। लोगेगदर ने मंच, न सवत्थ वियाहिया ।। १३१ ।।
अरूविणो जीवसंतई पप्पणाईया, अपज्जवसियावि य । टिहं पहुंच गाईया, गपजवनियावि य ॥ १३२ ।।
लोगेगदेसे ते बासाई बारसा चेव, उक्कोसेण वियाहिया । बेइन्द्रियआउठिई अन्नामुहनं जहन्निया ।। १३३ ॥
संसारत्था उ जेसंखिज्जकालमुक्कोस, अन्तोमहत्तं जहन्नयं । बेहन्दियकायठिई, तं कायं तु अ{चओ ॥ १४ ॥
पुढवी आउजीअणन्तकालमुक्कोसं. अन्तोमृहुत्तं जहन्नयं । बदन्दियजीवाणं, अन्तर च वियाहियं ।। १३५ ।।
दुविह पुढवीर्जएएसिं चण्णओ चेब, गन्धओ रसफासी । संठाणदेमओ यावि, विहाणाई महम्ममो ॥ १६॥
वायरा जे उ तेइन्दिया उजे जीवा, दुविहा ते पकित्तिया । पजत्तमपन्जत्ता, नमि भए मुह मे ॥ १३७ ॥
किण्हा नीला कुन्थुपिवीलिउडुंसा, उक्कलदेहिया तहा । नपहारकट्टहारा य, मालग पनहारगा ।। १३८ ।।
कप्पासट्टिम्मि जायन्ति, दुगा नउममिंजगा। सदावरी य गुम्भी य, बोधवा इन्दगाट्या ।। १३९ ॥
इन्दगोवगमाईयाणेगहा एवमायओ। लोगेगदगे मई, न सबन्ध वियाहिया ॥ १४० ॥
संतई पप्पणाईया, अपज्जवसियावि य । ठिई पडुन साईया, मपन्जवमियापि य ॥ १४१ ॥
एगूणपण्णहोरत्ता, उक्कोसेण वियाहिया । नइन्दियआउटिड, अन्तोमुहृत्तं जहनिया ॥ १४२ ।।
गोमेज्जए य रुसंखिज्जकालमुक्कोसं, अन्तोमुहु जहन्नयं । नेइन्दियकायटिई, तं कायं 7 अमुचओ ॥ १४३ ॥
चन्दण गेरुय :अणन्तकालमुक्कोसं, अन्तोमुहुत्तं जहन्नयं । तइन्दियजीवाणं, अन्तोमुहुत्तं जहन्निया ।। १४४ ॥
एए खरपुढवी'एएसिं वण्णओ चेव, गन्धओ ग्सफासओ। संठाणदेसओ वावि. विहाणाई सहम्सजो ।। १४५ ।।
सुहुमा सबलो चउरिन्दिया उ जे जीवा, दुविहा ते पकित्तिया। पज्जत्तमपन्जत्ता, तसि भेष सुणेह मे ।। १४६॥
संतई पप्णाई अन्धिया पोत्तिया चेव, मच्छिया मसगा तहा। भमरे कीडपयंगे य, टिंकृण कंकणे तहा ।। ६४७ ॥
बावीससहस्सा कुक्कुडे भिरीडी य, नन्दावत्ते य विन्छुए । टोले भिगारी य, वियडी अच्छिवेयए ॥ १४८ ॥
असंखकालेमुव
अच्छिले माहए अच्छिरोडए, विचित्त चित्तपत्तए ।
अणन्तकालमु
उहिनलिया जलकारी य, नीया तन्तवयाइया ।।
एएसिं वण्णअइय चउरिन्दिया, एएऽणेगहा एवमायो । लोगेगदे से ते सत्वे, न सबन्ध वियाहिया ॥ १५० ॥
दुविहा आऊसंतई पप्पणाईया, अपज्जवसिया वि य । ठिई पडुच्च साईया, सपज्जवसिया वि य ॥ १५१ ।।
वायरा जे उ छच्चेव मासाऊ, उक्कोसेण चियाहिया । चउरिन्दिदयआउठिई, अन्तोमुहृत्तं जहन्निया ॥ १५२ ।।
एगविहमणाणसंखिज्जकालमुक्कोस, अन्तोमुहुत्तं जहन्नयं । चउरिन्दियकायठिई, तं कायं तु अमुंचओ ॥ १५३ ॥
सन्तई पप्पण अणन्तकालमुक्कोस, अन्तोमुहुत्तं जहन्नयं । चउरिन्दियजीवाणं, अन्तरं च वियाहियं ।। १५४ ।।
सत्तेव सहस्र एएसिं चण्णओ चेब, गन्धओ रसफासओ । संठाणदेसओ वावि, विहाणाई सहस्ससो ॥ १५५ ।।
असंखकालमुक पंचिन्दिया उजे जीवा,चउबिहा ते वियाहिया । नेरड्यतिरिक्खा य, मणुया देवा य आहिया ॥ १५६ ॥
॥ १४९॥

viver - श्रीउत्तरा ययनसूत्र-छत्तीसमाध्ययनम् (७१) पकामा मामा, तमा तमतमा तहा। डइ नेस्टया एए, सत्तहा परिकित्तिया ॥ १५८ ।। लोगस्म एगटेमम्मि, ते मवे उ वियाहिया। एत्तो कालविभाग तु, बोन्र तेमि चउविह ॥ १५९ ॥ सतह पप्पणाईया, अपज्जवसियावि य । ठिड पडुच्च साइया, मपज्जनसियानि य ॥ १६०॥ सागरोनममेग तु, उक्कोसेण वियाहिया। पढमाए जहन्नेण, दसनामसहस्सिया ॥ १६१ ।।। तिण्णेन सागरा ऊ, उकोसेण वियाहिया। दोचाण जहन्नेण, एग तु सागरोनम ॥ १६॥ मत्तेर सागरा ऊ, उचोसेण विगाहिया । चउत्पीए जहन्नेण, तिण्णेर मागरोनमा ॥१६३ ।। दस मागरोनमा ऊ, उकोसेण वियाहिया। चउत्पीए जहन्नेण, सचेन मागरोनमा ॥ १६४ ॥ सत्तरस मागरा ऊ, उक्कोसेण वियाहिया । चउत्थी जहन्नेण, सत्तेन नागरोगमा ।। १६० ॥ बाबीम सागरा ऊ, उक्कोसेण नियाहिया। उट्ठीए जहन्नेण, मत्तरम सागरोपमा ॥ १६६ ॥ तेतीस मागरा ऊ, उक्कोसेण रियाहिया । सत्तमाए जहन्नेण, पानीस सागरोपमा ।। १६७ ।। जा चेन य आयठिई, नेरइयाण नियाहिया । सा तेसिं कायठिई, जहन्नुकोसिया भवे ॥ १८ ॥ अणन्तशालमुक्कोम, अतोमुहुत्त जहन्नय । विजढम्मि सए काए, नेरइयाण अन्तर ॥ १९ ॥ एएसिं पण्णओ चेन, गन्धओ रसफासओ। सठाणदेसओ वावि, निहाणाइ सहस्ससो ॥ १७० ॥ पचिन्दियतिरिक्खाओ, दुविा ते वियाहिया। ममुच्छिमतिरिक्साओ, गभवन्तिया तहा ।। ॥ १७१ ॥ दुविहा ते भवे तिविहा, जलयराथलयरा तहा। नहयरा य चोपडा, तेसि मेए सुणेह मे ॥ १७२ ॥ - मच्छा य कच्छभा य, गाहा य मगरा तहा । मुसुमारा य मोधवा, पचहा जलहराहिया ॥ १७३ ॥ लोएगदेसे ते सवे, न सवण्य वियाहिया। एत्तो कालविभाग तु, वोच्छ तेसिं चउविह ॥ १७४ ॥ सतह पप्पणाईया, अपज्जवसिया वि य । ठिड पडुच्च साईया, सपज्जवसिया वि य ॥ १७५ ॥ एगा य पुचकोडी, उकोसेण वियाहिया। आउठिर्ड जलयराण, अन्तोमुहुत्त जहनिया ॥ १७६ ।। पुवकोटिपुहत्त तु, उक्कोसेण पियाहिया । कायट्टिई जलयराण, अतोमुहुत्त जहन्नय ॥ १७७ ।। अणन्तकालमुक्कोस, अन्तोमुहुत्त जहन्नय । विजढम्मि सए काए, जमयगण अन्तर ।। १७८ ॥ चउप्पया य परिसप्पा, दुविहा यलयरा भवे । चउप्पया चउविहा, ते मे कियनओ सुण ॥ १७९ ॥ ग्गसुरा दुखुरा चेच, गण्डीपयसणहप्पया। हयमाडगोणमाइगयमाइसीहमाइणो ॥ १८० ॥ भुओरगपरिसप्पा य, परिसप्पा दुविहा भवे । गोहाई गहिमाई य, एवेकाणेगहा भवे ॥ १८१ ॥ लोएगदेसे ते सव्वे, न मबत्थ वियाहिया। एत्तो कालविभाग तु, वोम्छ तेसिं चरचिह ॥ १८२ ।। सतह पप्पणाईया, अपञ्जवसियावि य | ठिर्ड पटच साईया, सपज पसियानि य ॥ १८३ ॥ पलिओनमाड तिण्णि उ, उक्कोसेण वियाहिया। आउठिई यलपराण, अन्नोमुहत्तजहनिया ॥ १८४॥ पुच्चकोडिपुहत्तेण, अन्तीमुहुत्त जहनिया | कायठिई थलयराण, अन्तर सिम मरे ॥ १८५ ॥ कालमणन्तमुक्कोस, अन्तोमुहुत्त जहन्नय । विजढम्मि सए काए, यलयराण तु जतर ॥ १८६ ।। . , .

। . (७२) श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला. संतई पप्पणाईया, अपज्जवसियाचि य । ठिई पहुच साईया, सपज्जवसियावि य ।। १८९ ।। लिओवमस्स भागो, असंखञ्जइमो भवे । आउठिई खहयगणं, अन्तोमुहत्तं जहन्निया ।। १९०॥ असंखभाग पलियस्स, उक्कोसण उ साहिया। पुचकोडीपुहाणं, अन्तोमुहुत्तं जहन्निया ।। १९१ ।। ठेई सहयराणं, अन्तरे नेसिमे भवे । कालं अणन्तकोसं, मुकोसं, अन्तोमुहुत्तं, जहन्नयं ॥ १९॥ एसिं वण्णओ चेव, गन्धओ रसफासओ। संटाणदेसओ वावि, बिहाणाई सहरससो ॥ १९ ॥ पणुया दुविहभेया उ, ने मे कित्तयओ मुण । समुच्छिमा य मणुया, गमकान्तिया तहा ॥ १९४ ।। भवन्तिया जे उ, तिविहा ते वियाहिया । कम्मअकम्मभृमा य, अन्तरद्दीवया तहा ।। १९५ ।। निरस तीमविहा, सेया अहवीमई। संखा उ कम्मसो तेसिं. इइ एसा वियहिया ॥ १० ॥ मुच्छिमाण एसेव, मेओ होइ वियाहिओ। लोगस्म पगमम्मि, ते सव्वे वि चियाहिया ।। १९७ ॥ तई पप्पणाईया, अपज्जवसियावि य । ठिई पञ्च माईया. सपज्जवसियावि य ॥ १९८ ॥ लिओवमाउ तिण्णवि, असंखेजइमो भवे । आउद्दिई मणुयणं, अन्तोमुहृत्तं जन्निया ।। १५० ।। लिओचमाई तिण्णि उ, उकोसेण उ साहिया । पुच्चकोडिपुहत्तेण, अन्तोमुहुत्तं जहन्निया ।। २०० ॥ कायठिई मणुयाणं, अन्तरं तेसिमं भवे । अणन्तकालमुक्कोस, अन्तोमुत्तं जहन्नयं ।। २०१॥ एसि, वण्णओ चेव, गन्धओ रमफासो । संठाणदेमश्रो वावि. विहाणाई सहस्ससो । २०२ ।। वा चरबिहा वुत्ता, ते मे कित्तयओ गुण । भोमिन्जवाणमन्तग्जोइसवैमाणिया तहा ।। २०३॥ सहा उ भवणवासी, अट्टहा वणचारिणो ! पंचविहा जोइसिया, दविहा माणिया तहा ।। २०४॥ असुरा नागमुवण्णा, विज्जू अग्गी वियाहिया । दीयोदहिदिसा वाया, धणिया भवणवासिणो । ॥ २०॥ पिसायभूया जक्खा य, वरूसा किनरा किंपुरिसा । महोरगा य गन्धवा, अट्टविहा वाणमन्तग ।। ॥ २०६॥ चन्दा सरा य नक्खत्ता, गहा तागगणा तहा। ठिया विचारिणो चेव, पंचहा जोइसालया ।। ॥ २०७॥ 'माणिया उजे देवा, दुविहा ते वियाहिया। कप्पोरगा य वोधबा, कप्पाईया तहेव य ॥ २०८॥ प्पोबग्गा वारसहा, सोहम्मीसाणगा तहा। सणं कुमाग्माहिन्दवम्भलोगा य सन्तगा ॥ २०९ ।। हासुका सहस्सारा, आणया पाणया तहा । आरणा अच्चुया चेव, इइ कप्पोवगा मुरा ।। २१० ॥ प्पाईया उजे देवा, दुविहा ते वियाहिया। गेविजाणुत्तरा चेब, गेविजा नवविहातहि ॥ २११ ।। हिमा हेहिमा चेव, देहिमा मज्झिमा तहा। हेडिमा उपरिमा वेव, मनिमा हेट्ठिमा तहा ।। २१२ ।। मज्झिमा मञ्जिमा चेच, मल्झिमा उवरिमा तहा । उवरिमा हेहिमा चेच, उवरिमा मझिमा तहा ॥ वरिमा उवरिमा चेव, इय गेविजगा मुरा। विजया वेजयन्ता य, जयन्ता अपराजिया ॥ २१४ ॥ वत्थसिद्धगा चेव, पंचहाणुत्तरा सुरा । इय वैमाणिया एएडणेगहा एवमायओ ॥ २१५ ।। गिस्स एगदेसम्मि, ते सवेवि वियाहिया । इचो कालविभागं त. व तेसिं चउनिहं ॥ २१६ ।। , ।। २१३॥

- . . . श्रीउत्तराध्ययनसूत्र-छतीसमाध्ययनम् (७३) साहीय सागर एक्क, उक्कोसेण लिई भवे । भोमैज्ञाण जहन्नेण, दसमासमहस्मिया ॥ १८ ॥ परिओरममेग तु, उक्कोसेण ठिई भवे । वन्तरण जहन्नेण, दमनाससहस्मिया ॥२॥ पलिओवममेग तु. चामलक्वेण माहिय । पलिओरमट्ठभागो, जोहसेसु जहन्निया ॥ २२:पा दो चैत्र मागराइ उकोसेण रियाहिया। सोहम्मम्मि जहन्नण, एग च पलिओवम || ०२६ ।। सागरा साहिया दुनि, उक्कोसेण वियाहिया । ईसाणम्मि जनण, माहिय पलिओवम ॥ २२ ॥ सागराणि य सत्ता उक्कोसेण ठिई भरें । सणकुमारे जहन्नण, दुन्नि उ मागरोवमा ॥३॥ माहिया मागरा मत्त, उकोसेण ठिई भवे । माहिन्दम्मि जहन्नेण, माहिया दुन्नि सागरा || २०४॥ दम चा मागराइ, उक्कोमेण ठिई भवे । सम्भलोए जहन्नण, गत्त ऊ सागरोनमा ।। २२५ ॥ चउदम मागगड, उक्कोसेण ठिई भवे । लन्तगम्मि जहन्नण, दम उ सागरोनमा ॥ २२६ ।। सत्तरस मागराड, उक्कोसेण ठिई भवे । महासके जहन्नेण, चोदस सागरोपमा ।। २२७ ॥ अट्ठारम सागराः, उक्कोसेण ठिई भवे । सहस्पारम्मि जह नेण, सत्तरस मागरोतमा ॥ २८॥ सागरा अउणवीस तु, उक्कोसेण ठिई भवे । आणयम्मि जहन्नेण, अट्ठारम सागरोवमा ।। - २९ ।। वीस तु सागराइ, उक्कोसेण ठिई भवे । पाणयम्मि जहन्नेण, मागरा अणवीमई ॥ २३० ।। मागरा इक्कीम तु, उक्कोसेण टिर्ड भवे । आरणम्मि जहन्नेण, वीमई सागरोपमा ॥ २३१॥ नापीम मागराड, उक्कोसेण ठिई भवे । अन्चुयम्मि जहन्नेण, मागरा डकवीसई ।। २०२ ।। तेवीम सागराड, उकोसेण ठिई भवे । पढमम्मि जहन्नेण, यावीम सागरोपमा ॥ २:३॥ चनीम सागराइ, उछोसेण राठई भवे । विइयम्मि जहन्नेण, तेवीम सागरोपमा ॥ २३४ ।। ४. पणवीम सागराइ, उक्कोसेण ठिई भवे । तइय जहन्नेण चउवीस सागरोनमा ॥ २३५ ।। छवीस मागराड, उकोसेण ठिई भवे । चउत्थाम्म जहन्नेण, मागग पणुपीमई ।। २३६ ।। स गग मत्तवीम तु, उक्कोसेण ठिई मवे । पञ्चमम्मि जहन्नण, मागरा उ उनीमई ।। २३७ ॥ सागरा अहवीस तु, उक्कोसेण टिड भवे । छम्मि जान्नण, सागरा सत्तीमई ।। २३८ । सागरा अग्णतीस न उकोसेण ठिड भव । मचमम्मि नहनेण, सागरा अट्ठवीमई ॥ २३० ।। तीम तु सागराइ, उकोसेण ठिई भवे । अट्टमम्मि जहन्नेण, सागग अउणतीमई ॥ ५ ॥ मागग इयतीम तु, उक्कोसेण ठिई नवे । नामम्मि जहन्नेण, तीमई मागरोधमा ।। २४१ ॥ तेत्तीमा सागराइ उकोसेण ठिई भवे । चउसुपि विजयाईसु, जहन्नणेकतीमई ।। २८० ॥ अजहन्नमणुकोसा, तेत्तीम मागरोपमा । महानिमाणे माहे, टिई एमा नियाहिया ॥४॥ जा चा उ आउठि, दमाण तु नियाहिया । सा तसि कायठिी, जहन्नमुकोसिया गवे ॥ ४ ॥ अणन्तकालमुफोस, अन्तोमुहुत्त जहन्नय । जिम्मि मए पाए दबाण इज अ तर ॥ १५ ॥ एएमि पण्णो चेन, गन्धओ रसफामओ। मठाणदमओ पारि, विहाणाइ महम्ममो ॥ २५६ ॥ ममारत्याय सिद्धा य, इरजीना रियाहिया। रूपिणो चावी य, अजीमा दुहिहागि य ॥ १७ ॥ इय जीवमजीवे य, मोचा सद्दहिऊण य । महनयाणमणुमए, रमेन सजमे मुणी ॥ १८ ॥ तओ बहणि नामाणि, मामग्णमणुपालिप । इमेण कम्मजोगण, अप्पाण मलिह मुणी ॥ ४९ ।। पारसेन उ यामाइ, सलेटुकोसिया भवे । मबर रमझिमिया छम्मामा य अहनिया ॥ २५० ।। - (७४) श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला. पढये वासचटक्कम्मि, विगई-निज्जहण करे । बिईए वासचउक्चम्मि. विविनं तु तव चरे ।। २५१ ॥ एगन्तरमायाम, कटु संबच्छरे दुवे । तओ संवच्छरद्धं तु, नाइविगटुं तवं चरे ।। २०२।। तओ संवच्छरद्धं तु, विगिट्ट तु नवं चरे । परिमियं चेत्र आयाम, तम्मि मंवच्छरे करे ।। २५३ ॥ कोडी सहियमायाम, कटु, संबच्छरे सुणी । मासद्धमासिएणं तु, आहारण तवं चरे ।। २५४ ॥ कन्दप्पमामिओगं च, किचिसियं मोहमासुरुत्तं च । एयाउ दुग्गईओ, मरणम्मि विराहिया होन्ति ।। मिन्छादमणरत्ता, मनियाणा उ हिंसगा । इय जे मरन्ति जीवा, नेमिं पुण दुल्लहा चोही ।। ०५६ ।। सम्मइंसणरत्ता, अनियाणा सुक्कलेसमोगाढा । इयजे मरन्ति जीवा, तेसिं सुलहा भवेवोही ।। २५७ ॥ मिच्छादसणरत्ता, सनियाणाकण्हलेसमोगाढा । इय जे मरन्ति जीवा, तेसिं पुण दुलहा वोही ।। 11 २५८॥ जिणवयणे अणुरत्ता,जिणवयणं कन्ति भावेण। अमलाअमङ्किलिहा, होन्ति परित्तसंमारी ।। २५९ ।। बालमरणाणि बहुसो, अकाममग्णाणि चेव य बहणि । मरिहन्ति ते वराया, जिणवयणं जे न जाणन्ति ।। ।। २६० ॥ बहुआगमचिन्नाणा, समाहिउप्पायगा य गुणगाही। एएणं कारणेणं, अरिहा आलोयण सोउं ।। २६१॥ कन्दप्पकुक्कुयाई, तह सीलसहावहमणविगहाइ । विम्हावेन्तोवि परं, कन्दप्पं भावणं कुणइ ।। २६२ ॥ मन्ताजोगं काउं, भूईकम्मं च जे पउंजन्ति । साय-रस-इड्डिहेडं. अभिओगं भावणं कुणइ ॥ २६३ ।। नाणस्म केवलीणं, धम्मायरियस्स सङ्गसाहुणं । माई अवण्णवाई, किचिमियं भावणं कुणइ ।। २६४ । । अणुबद्धगेसपसरो, तह य निमित्तम्मि होइ पडिसेवी।एएहि कारणहिं, आमुरियं भावणं कुणड ॥ २६५ ।। मत्थगणं विसभरवणं च जलणं च जलपवेसोय । अणायारभण्डसेवा, जम्मणमरणाणि बंधन्ति ।। ॥२६६॥ इय पारकरे युद्ध, नायए परिनिचुए। छत्तीसं उत्तरल्याए, भवसिद्धीयसंवुडे ॥ २७ ॥ त्ति वेमि || जीवाजीव विभत्ती ममत्ता ॥ ६ ॥ । इअ उत्तरज्झयण सुत्तं समत्तं ।।

।। णमो समणस्स भगाओ महावीरम्स ।। ॥ सिरि-दसवेआलियं-सुत्तं ॥ - ॥ दुमपुफ्फिया पढम अज्झयणं । धम्मो मगलमुक्टि, अहिंसा सजमो तयो । देवा वि त नमसति, जस्म धम्मे सया मणो ॥ १ ॥ जहा दुमस्म पुप्फसु, भमरो आवियह रस ! ण य पुप्फ किलामेड, सो अ पीणेड अप्पय ॥२॥ एमेण समणा मुत्ता, जे लोए सति साहुणो। बिहगमा र पुप्फेसु, दाणमत्तेसणे रया ॥३॥ पर च वित्ति लम्भामो, ण य कोड उपहम्मड । अहागडेस रीयते, पुप्फेम भमरा जहा ॥ ४॥ मडगा (का) ग्ममा युद्धा, जे भनति अणिस्मिया । नाणपिडरया दता, नेण युवति साहुणो ॥५॥ त्ति वेमि ॥ दुमपुफिया पहमममयण ममत्त ।। ॥ अह सामण्णपुव्वय दुइअ अज्झयण ॥ कह नु वुजा सामण्ण, जो कामे न निवारए । पए पण विसीअतो, सफप्पस्स वस गओ ।।१। वस्यगधमलकार, इत्थीओ सयणाणि य। अच्छटा जे न भुजति, न से चाड ति युच्चड ॥२॥ जे य स्ते पिए भोए, लदै वि पिट्टि बुबइ । माहीणे चयड मोए, मेहु चाड ति बुचड ॥ ३ । ममाइ पेहाइ परिचयतो, सिया मणो निम्सरई बहिद्धा । न सा मह नोवि अह वि तीसे, डच्चेर ताओ विणटन राग ।। ॥४॥ आपापयाही चय मोगमल्ल, कामे कमाहि कमिय सु दुक्स । छिंदाहि दोस विणएज्ज राग, एव मुही होहिसि सपराए । पक्सटे जलिय जोइ, धूमकेल दुरासय । नेन्उति तय भोतं, कुले जाया अघगणे ।। ६ । घिरत्यु तेऽजमोकामी, जो त जीवियकारणा । चन इच्छसि आवेउ, सेय ते मरण भवे ॥ ७ अह च भोगगयम्स त चासि अंधगविहिणो । मा फुले गधणा होमो, सनम निहुओं चर ।।८ जहन काहिसि भाव, जाजा दिन्छसि नारिओ।वायाविदो व हडो,अद्विअप्पा भविम्ममि ।।९| तीमे मो वयण सोचा, सजयाइ सुभासिय । अनुसेण जहा नागो, धम्मे सपडिवाहओ ॥१०॥ एव करति सबुद्धा, पडिया पवियस्वणा । विणियति भोगेस, जहा से परिमृत्तमो ॥११॥ त्ति बेमि अ मामण्णवप नाम अजायण ममत्त ॥२॥ ॥५॥ " , श्रीजैन सिद्धान्त-स्वाध्यायमाला ॥ अह खुड्यायारकहा तइमं अज्झयणं । जमे मुद्विअप्पागं, विप्पमुक्काण ताण । तेसिमेयमणाइगण, निग्गंधाण महेसिणं ॥१॥ हैसिय कीयगड, नियागममिहडाणि य । राइभत्ते सिणापो य, गंधमले य बोयणे ॥ २ ॥ निही गिहिमत्ते य, रायपिडे किमिच्छए । संवाहणा दंतपहोयणाय, संपुच्छणा देहपलोयणाय ।। ३ ॥ बहावए य नालीए, छत्तस्स य धारणहाए । तेगिच्छं पाहणापाय, समारंभं च जोहणो ॥ ४॥ सेन्जायरपिंड च, आसंदीपलियंकए। गिहतरनिसिज्जा य. गायस्वट्टणाणि य ॥ ५ ॥ गहिणो वेआवडियं, जा य आजीववत्तिया। तत्तानिच्युड भोउत्तं, आउरस्सग्णाणि य ॥ ६ ॥ लए सिंगवेरे य, उच्छुखंडे अनिव्वुडे । कंद मुले य सञ्चित्त, फले बीए य आमए ।। ७ ।। पोपच्चले सिंघवे लोणे, रोमालोणे य आमए । समुद्दे पंखारे य, कालालोणे य आमप ॥ ८ ॥ पुवणे त्ति घमणे य, वत्थीकम्भविरेयणे । अंजणे दंतवणे य, गाय-मंगविभूसणे ॥ ९ ॥ संवमेयमणाइन्न; निग्गंथाण महेसिणं । संजमम्मि अ जुत्ताण, लहुभ्यविहारिणं ।। १० ।। पंचासत्रपरिणाया, तिगुत्ता छमु संजया । पंचनिग्गहणा धीग, निग्गंथा उज्जुदंसिणो ॥ ११ ॥ भायावयंति गिम्हेसु, हेमंतेसु अवाउडा । वासासु पडिसलीणा, सञ्जया मुममाहिया ॥ १२ ॥ रीसहरिऊदंता, अमोहा जिइंदिया। सबदुक्खपहीणट्ठा. पक्कमन्ति महेसिणो ॥१३॥ कराई करित्ताणं, दुस्महाइ सहित्तु य । केइत्थ देवलोएस, कंइ सिज्झन्ति नीरया ॥ १४ ॥ अचित्ता पुवकम्माई, सज्जमेण तवेण य । सिद्धिभग्गमणुप्पत्ता, ताइणो परिणिचुडे ।। || १५ ॥ त्ति बेमि ॥ इअ खुद्रुवायारका नाम तइयमगयणं । . ." - ॥ अह छन्नीवणियानामं चउत्थं अन्झयणं । मुझं मे आउसनेणं भगवया एवमक्खायं, इह खलु छन्जीवणिया नामज्ययणं समणणं भग- या महावीरेणं कासवेणं पवेइया सुअक्खाया सुपनत्ता सेअं मे अहिनिलं अल्झयणं धम्मपण्णत्ती १॥ कयरा खलु साछज्जीवणिया नामझयणं समणेण भगवया महावीरेण कासवेणं पवेड्या अक्खाया मुपन्नत्ता से मे अहिन्जिङ अझयणं धम्मपण्णत्ती ॥ २॥ उमा खलु सा छजीवणिया नामज्झयणं समणेणं भगवया महावीरेण कामवेणं पवेड्या सुअक्खाया सुपन्नत्ता सेयं मे अहिन्जिट अज्झयणं धम्मपन्नत्ती ॥ तंजहा--पुढविकाइया १, आउकाइया २. तेउकाइया ३, वाउकाइया ४, गणस्सइकाइया ५, तसकाइया ६ ! पुढवी चित्तमंतमक्खाया अणेगजीया पुढोसत्ता अन्नत्य सस्थप- रिगएणं । आज चित्तमंतमक्खाया अगेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्थ सत्थपरिणएणं । वाम चित्तमंत- मक्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्थ सत्थपरिणएणं । वाऊ चित्तमतमक्खाया अणेगजीश पुढो- सत्ता अन्नत्थपरिणएणं । वणस्सई चित्तमंतमक्खाया अणेगजीवा.. पुढोसत्ता अन्नत्थ सत्थपरिणएणं. जहा-अग्गवीया, मूलवीया, पोरवीया, संधधीया, वीयरुहा, समुच्छिमा, तणलया, मस्सइका- इया, सवीया चित्तमंतमक्खाया अगजीया पुढोसत्ता अन्नत्थ सत्यपरिणएणं । से जे घुग इमे , " , - श्रीदसवैकालिकसूत्र-चतुर्थाध्ययनम् अणेगे बहवे तसा पाणा, तजहा-अडया, पोयया, जराउया, रसया, ससेइमा, समुच्छिमा उब्भिया उपवाडया, जेमि केसिंचि पाणाण, अभिक्त, पडिक्त, सकुचिय, पसारिय, रुय, भत, तसिया, पलाइय आगडगडविनाया, जे अकीडपयगा, जा य कुथुपिपीलिया, सो वेइदिया, सो तेइदिया, सहे चउरिदिया, सवे पचिंदिया, सवे तिरिक्सजोणिया, सवे नेरइया, सो मणुआ, सवे देवा, सबे पाणा, परमाहम्मिा, एसो खलु उट्ठो जीवनिकाओ तमकाओ त्ति पवुच्चड । इच्चेसिं छण्ड जीपनि कायाण चेन सय दड समारभिज्ना, नेवन्नेहि दड समारभाविजा, दड ममारभन्ते वि अन्ने न ममणुजाणामि, जानजीवाए तिचिह तिविहेण मणेण वायाए कारण न करेमि न कारवेमि करतपि अन्न न ममणुजाणामि । तस्म मते पडिकमामि निन्दामि गरिहामि अप्पाण योमरामि ।। पढमे मन्ते ! महबए पाणाडवायाओ वेरमण ! सब भन्ते ! पाणाडवाय-पञ्चक्सामि । से सुहुम वा, बायर बा, तस वा, थावर वा, नेर सय पाणे अडवाइजा, नेऽन्नेहिं पाणे अइवायाविजा पाणे अमायन्तेऽवि अन्ने न ममणुजाणामि, जावज्जीवाए तिचिह तिविदेण मणेण वायाए कारण न रेमि न कारवेमि करतपि अन्न न समणुजाणामि, तस्स भते ! पडिक्मामि निन्दामि गरिहामि अप्पाण वोमरामि । पढमे भन्ने ! महबए उवडिओ मि सबाओ पाणाइवायाआ वेरमण ॥१॥ अहापरे दुचे भन्ते ! महत्वए मुसावायाओ वेरमण । सब भन्ते ! मुसावाय पचक्सामि । से कोहा था, लोहा वा, मया ना, हासा वा, नेव सय मुस वइजा, नेवन्नेहिं मुसं वायाविजा, मुस वयन्ते वि अन्न न समणुजाणामि जायजीवाए तिविह तिविहेण मणेण वायाए काएण न करेमि न कारवेमि करतपि अन्न न समणुजाणामि तस्म भन्ते ! पडिकमामि निन्दामि गरिहामि अप्पाण वोमरामि । दुच्चे भ ते ! महब्बए उवडिओ मि सबाओ मुसावायाओ वेरमण ॥ २ ॥ अहावरे तच्चे भन्ते ! महत्वए अदिन्नादाणाओ वेरमण । मच भन्ते । अदिन्नादाण पञ्चक्यामि । से गामे वा, नगरे वा, रणे वा, अप्प वा, बहु ना, अणु वा, धूल वा, चित्तमत वा, अचित्तमत पा, नेर सय अदिन्न गिहिवा, नेवन्नेहिं अदिन्न गिहाविना, अदिन्न गिण्हन्ते वि अन्ने न सम गुजाणामि जापजीपाए तिविह तिविहेण मणेण बायाए कारण न करेमि न कारवेमि करतपि अन्न न समणुजाणामि । तस्म भन्ते ! पडिकमामि निन्दामि गरिहामि अप्पाण चोसरामि । तच्चे भन्ते ! महबए उपढिओ मि सबाओ अदिन्नादाणाओ वेरमण ॥ ३ ॥ अहावरे चउत्थे भन्ते ! महबए मेहुणाओ वेरमण | सब भन्ते । पचक्खामि । से दिवं वा, माणुस वा. तिरिक्खजोणिय वा, नेव सयं मेहुण सेविजा, नेवन्नेहिं मेहुणं सेवाविजा, मेहुण सेवन्ते वि अन्ने न समणुजाणामि जावजीवरए तिविह तिविहेण मणेण वायाए कारण न करेमि न कार वेमि करतपि अन्न न समणुजाणामि । तस्स मन्ते ! पडिक्कमामि निन्दामि गरिहामि अप्पाणं वोमरामि । चउत्थे भन्ते ! महबए ववडिओ मि सबाओ मेहुणाओ चेरमण ॥ ४ ॥ अहावरे पञ्चमे भन्ते ! महब्बए परिग्गहाओ वेग्मण । सह मते ! परिग्गह पञ्चमवामि । मे " फुमंत वा, आवीलतं वा, पवीलतं वा, असाखोडतं वा, पक्खोडतं वा, आयावन्तं वा, पयावन्तं वा पे अन्न न समशुजाणामि । तस्स भन्न ! पडिकमामि निन्दामि गरिहामि अप्पाणं वोसरामि ॥२॥ । वा, सुत्त वा, जागरमाणे वा, से अगणिं वा, इंगाल वा, मुम्मुरं वा, अचिं , जाल बा, अन्यायं वा, सुद्धागणि वा, उक्क बा, न रजिज्जा, न घट्टिला, न भिदिजा, न उजा- (७८) श्रीजनसिद्धान्त-खाध्यायमाला. नेवन्नेहिं परिग्गह परिगिण्हन्ते वि अन्ने न समणुज्जाणिज्ञा जावजीवाण तिविहं तिविणं मयेणं वायाए कापणं न करेमि न कारवमि करंतपि अन्नं समणुजाणामि, तस्स भन्ते ! पडिकमामि निन्दामि गरिहामि अप्पाणं बोसरामि। पञ्चमे भन्ते ! महत्याए उबहिओ मि सव्वाओं परिग्गहायो वरमण ॥५॥ अहावरे छ8 भन्ते ! वए राइमोश्रणानी बग्मणं । मव्यं भन्ते ! राइभोयणं पचवामि । से असणं वा, पाणं वा, साइम वा. साइमं वा । नेव सयं राई अँजिन्ना, नेव गई भुजिजा, नेवन्नहि राई मुंजाविजा, तई भुंजतेऽवि अन्ते न समजाणामि जायजीवाए तिविहं निविदेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कारवेमि कम्तपि अन्नं न ममणजाणात्रि । नम्स भन्ते! पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं बोसिरामि | छ? भन! बए उवडिओ मि सब्याओ गइभोषणाओ वेग्मण ॥६॥ इच्चेयाई पंचमहत्वयाई राइभोअणवेरमणछहार्ड अत्तिहियद्वियाए उपसंपजित्ता णं विहरामि ।। से भिक्खु बा, भिक्खुणी वा, मंजयविरयपडिहयपञ्चकन्यायपावकम्म, दिया था, राओ वा एगओ वा, परिसागओ बा, मुत्त बा, जागग्माण वा, से पुढविं वा, मिनि वा, सिलं वा, लेन्द्र वा, पमग्क्वं वा कायं, ससरक्ख वा बत्थं, हन्थण वा, पापण वा, कडेण किलिंचेण वा, अंगुलियाए, वा, मिलागाए वा, सिलागहत्येण वा न आलिहिता, न विलिहिज्जा, न घटिजा, न मिंदिजा, अन्नं न आलिहाविञ्जा. न बिलिहाविजा, न घटाविजा, न मिंदाविना. अन्नं आलिहतं वा, विलि. हेतं चा, घटतं वा, मिदंत वा न समणुजाणिज्जा जावजीवाए तिविहं तिविहणं मणेणं चायाए कारण न करेमि न कारचेमि कग्नं पि अन्नं न समणुजाणामि तस्म। भंते ! पडिकमामि उिंदामि गरिहामि अप्पाणं होसरामि ।। १॥ से भिक्खू वा, भिक्खुणी वा संजयविरयपडिहयपञ्चक्खायपावकम्मे, दिआ वा, राओ बा, एगओ चा, परिसागओ वा, मुत्ते वा, जागरमाणे वा, से उदगं वा, ओसं वा, हिमं वा, महियं वा, करग वा, हरिगणुगं बा, सुद्धोदगं बा, उदउ वा बन्थं, ससिणिद्धं वा कार्य, ससिणिद्धं वा वत्थं न प्रामुमिजा, न संफुसिञ्जा, न आवीलिज्जा, न पीलिजा, न अक्खोडिजा, न पक्खोडिजा, न आयाविजा, न पयाविज्जा, अन्ने न आमुसाबिजा, न संफुसाविजा, न आवीलाविजा, न पवीला- वेजा, न अक्खोविजा, न पक्खोडाविजा, न आयाविजा, न पयाविजा, अन्नं आमुसंत वा, न समणुजाणिज्जा, जावज्जीवाए, तिविहं तित्रिदेणं मण वायाएकाएक न करेमि न कारवेमि करत से भिक्ट वा, भिक्खुणी बा, संजयचित्यपडिहयपचक्खायपाबकम्मे, दिआ वा, रात्री वा कब्जा, न पन्नालिजा, न निवाविजा, अन्न न उन्जाविता, न घटाविजा, न भिंदाविजा, न , -- , श्रीदमबैकालिकमूत्र-चतुर्थाध्ययनम् (७९) , उजालाविना, न पजालाविजा, न निवाविजा, अन्न उजन्त वा, पहत वा, भिदत वा, उज्जालत वा, पज्जालत वा, निपावत ना, न ममणुजाणिज्जा जानब्जीपाए तिमिह तिनिहेण मणेण वायाए कारण न कमि न कारवेमि करत पि जन्न न समणुजाणामि । तम्म मन्ते ! पडिक्मामि निन्दामि गरिहामि अप्पाण गोसरामि ॥ ॥ से भिस चा, भिक्सुणी ना, सञ्जयनिरयपदिहयपञ्चसायपारकम्मे, दिआ वा, राओ ना। एगओ ना, परिसागओ ना, सुत्ते वा, जागरमाणे वा, ने सिएण वा, विङयणेण वा, तालियटेण चा, पत्तण वा, पत्तभगेण वा, साहाए वा, साहामगेण II, पिहुणेण वा, पिहुणलत्येण चा, चेलेण पा, चेलमन्नण ना, हत्थेण ना, मुद्देण वा, जप्पणो ना काय, बाहिर वा नि पुग्गल न फुमिज्जा, न वीएज्जा, अन्न न फुमानिज्जा, न वीजानिज्जा, अन्न फूमत चा, वीअत पा न समणुजाणिज्जा जा वज्जीनाए तिविह तिनिहेण मणेण वायाए कारण न करेमि न कारवेमि करतपि अन्न न ममणुजा णामि । तस्म भन्ते' पडिकमामि निन्दामि गरिहामि अप्पाण वोमरामि ॥४॥ मे भिक्यू वा, भिक्षुणी वा, सजयविरयपडिहयपञ्चक्सायपानकम्मे, दिआ वा, राओ वा एगलो पा, परिसागओ वा, सुत्ते ना, जागरमाण वा, से वीएसु वा, वीयपडडेसु वा, रूटेसु वा भटपडढेसु वा, जाएसु वा, जायपडद्वेमु वा, हरिएसु हरियपडद्देसु ना, छिन्नेसु ना, ठिन्नेसु वा छिन्नपडडेसु वा, सचिरोसु वा, सचित्तकोलपडिनिस्सिएसु वा न गच्लेज्जा, न चिट्ठज्जा, न निसी इज्जा, न तुअहिज्जा, अन्न न गच्छाविज्जा, नचिट्ठानिज्जा, न निसीआनिज्जा, न तुअट्टानिज्जा अन्न गच्छत वा, चिट्ठत वा, निसीअत ना, तुयदृत वा न समजामि जारज्जीपाए तिविह निनि हेण मणेण वायाए कारण न करेमि न कारवेमि करत पि अन्न न ममणुजाणामि । तस्म भन्ते पडिकमामि निदामि गरिहामि अप्पाण वोसरामि ॥७॥ से भिक्खू वा, भिक्खुणी वा, मजयविरयपडिहयपञ्चक्सायपानकम्मे, दिआ चा, राओ वा एगओ ना, परिसागओ ना सुत्ते ना, जागरमाणे या, से कीड वा, पयग ना, कुशु ना, पिपीलिर चा, हत्थसि वा, पायसि ना, बाहुसि वा, उरुसि वा, उदरसि वा, सीससि वा, त्यसि वा, पडि ग्गहसि वा, स्पलसि धा, पायपुच्छणसि ना, रयहरणसि वा, गुच्छगसि वा, उडगसि ना दडगा बा, पीढगसि वा, फलगसि वा, सथारगसि चा, अन्नयरसि वा तहप्पगारे उचगरणजाए तओ सजया मेव पडिलेहिय पडिलेहिय पमज्जिअ एगतमाणिज्ना, नो ण सघायमारज्जिज्जा ॥६॥ अजय चरमाणो अ, पाणभूयाइ हिंसह । नन्या पारय कम्म, त से होड कड्डअ फल ॥ १। अजय चिट्ठमाणो अ, पाणभूयाड हिंसइ । बघड पावय कम्म, त से होड . कडुअ फल ॥२॥ अजय आसमाणो अ, पाणभूयाड हिलइ । बन्धड पापय कम्म, त से होड कडुअ फल ॥ ३ ! अजय सयमाणो अ, पाणभूयाइ हिंसड | उघड पारय कम्म, त से होड का फल ।। ४ । अजय भुजमाणो अ, पाणभ्याइ हिंमड । अधड पारय कम्म, त मे होड कइअ फल ।। ५ । अजय भाममाणो अ, पाणभूयाड हिंमड । यह पावय कम्प, त से होड कडुअ फल ।।६। , 2-८०) १ श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला कहं चरे कहं चिढ़े, कहमाए कहं सए। कहं भुंजन्तो भासंतो, पावकम्मं न बंधह ॥ ७॥ जयं चरे जयं चिट्टे, जयमासे जयं सए । जयं मुंजन्तो भासंतो, पावकम्मं न बंधइ ॥ ८ ॥ ।' सबभूयप्पभूयस्त, सम्म भ्याइ पासओ। पिहिआसवस्स दंतस्स, पावकम्मं न बंधह ॥९ की पढमं नाणं तओ दया, एवं चिट्ठइ सबसंजए। अन्नाणी किं काही, किंवा नाही सेयपावगं ।। १०॥ एसोचा जाणइ कल्लाणं, सोचा जाणइ पावगं । उभयं पि जाणइ सोचा, जं सेयं तं समायरे ॥ ११ ॥ जो जीवे वि न याणा, अजीवे वि न याण जीवाजीवे अयाणंतो, कहं मो नाहीइ संजमं ।। १२ ॥ जो जीवे वियाणेइ, अजीवे वि वियाणइ । जीवाजी वियाणतो, सो हु नाही मंजमं ॥ १३ ॥ जय जीवमजीवे य, दोवि एए वियाणइ । तया गई बहुविहं, सई जीवाण जाणड ॥ १४ ॥ वजया गई बहुविहं. सहजीवाण जाणइ । तथा पुण्णं च पावं च, बंधं मुक्यं च जाणइ ॥ १५ ॥ जया पुण्णं च पावं च, बंधं मुक्खं च जाणइ । तया निबिदए भोए, जे दिव्ने जे य माणुसे ॥ १६ ॥ य जया निविदए भोए, जे दिवे जे य माणुसे । तया चयइ संजोगं, सम्मिन्तरं बाहिरं ॥ १७ ॥ जया चयइ संजोगं, सम्भितरं वाहिरं। नया मुंडे भवित्ताणं, पदइए अणगारियं ।। १८ ॥ व जया मुंडे भवित्ताणं, पवइए अणगारियं । तया संवरमुकि, धम्मं फासे अणुत्तरं ॥ १९ ॥ ह जया संवरमुक्लुि, धम्मं फासे अणुत्तरं । तया धुगइ कम्मरयं, अचोहिकलसं कडं ॥ २० ॥ इं जया धुणइ कम्मरयं, अबोहिकलुसं कडं । तया सब्यत्तगं नाणं, दसणं चाभिगच्छद ॥ २१ ॥ त जया सव्वत्तगं नाणं, दसणं चाभिगच्छड़ । तया लोगमलोगं च, जिणो जाणइ केली ॥ २२ ॥ जया लोगमलोगं च, जिणो जाणइ केवली । तया जोगे निलंभित्ता, सेलेसि पडिराइ ।। २३ ॥ जया जोगे निलंभित्ता, सेलेसिं पडिवजइ । तया कम्मं सविचाणं, सिद्धिं गच्छद नीरओ ॥ २४ ॥ जया कम्म खवित्ताणं, सिद्धिं गच्छइ नीरओ। तया लोगमत्थथत्यो, सिद्धो हवह सासओ ॥ २५ ॥ मुह सायगस्त समणस्स, सायाउलगस्स निगामसाइस्स । उच्छोलणापहोअस्स, दुल्लहा सुगई तारिसगस्स ॥ २६ ॥ तवोगुणपहाणस्स, उज्जुमइ खन्तिसंजमरयस्स । परीसहे जिणंतस्स, सुलहा सुगई तारिसगस्स ॥ २७ ॥ पच्छा वि ते पयाया, खिप्पं गच्छंति अमरभवणाई । जेसिं पिओ तबो संजमो अ, खती अ वभचरं च ॥ २८ ॥ इच्चेयं छज्जीवणि, सम्मदिट्ठी सया जए। दुल्लहं लहित्तु सामण्णं, कम्मुणा न विराहिलासि ॥ २९ ॥ त्ति बेमि ॥ इअ छज्जीवणिआ णामं चउत्थं अज्मयणं समत्तं ॥४॥ 1 श्रीदमबैकालिकसूत्र-पश्चमाध्ययनम् ॥ अह पिंडेसणा णाम पचमज्झयण ॥ संपत्ते भिक्खकालम्मि, असमतो अमुच्छिओ । इमेण कमजोगण, भत्तपाणं गवेमए ॥१॥ से गामे वा नगरे वा, गोअरग्गगो मुणी । चरे मदमणुविग्गो, अवक्खित्तेण वेअसा ॥ २ पुरओ जुगमायाए, पेहमाणो महिं चरे। राजतो चीअहरियाइ, पाणे अदगमहि ॥३ ओवाय विसम खाणु, विजल परिवजए । सकमेण न गच्छिजा, विजमाणे परकमे ॥ ४ पवडते व से तत्थ, पक्खलते व सजए। हिंसेज पाणभूयाइ, तसे अदुव थावरे ॥ ५ तम्हा तेण न गच्छिन्ना, सजए सुसमाहिए। सइ अण्णेण मग्गेण, जयमेव परकमे ॥६ इगाले छारिय रासिं, तुमरासिं च गोमय | समरक्खेहिं पाएहिं, सजओ त नइक्मे ।।७। न चरेज चासे चासते, महियाए पडनिए। महावाए व वायते, तिरीच्छसपाइमेसु वा ।।८। न चरेज वेमसामते, चमचेरवसाणुए। बभयारिस्स दतस्स, होजा तत्थ विसोहिआ ॥९॥ अणाययणे चरतस्स, ससग्गीए अमिक्खए । होन्ज वयाण पीला, सामणम्मि अ ससओ ॥ १० तम्हा एअ विआणित्ता, दोम दुग्गइनड्डण । वजए वेससामन्त, मुणी एगतमस्सिप ॥ ११ । साण सूडअ गाविं, दित्त गोण हय गय । सडिब्म कवेह जुद्ध, दूरओ परिवज्जए ।। १२ । अणुन्नए नावणए, अप्पहिढे अगाउले । इदिआइ जहाभाग, दमडत्ता मुणी चरे ॥१३॥ दवदवस्स न गच्छेना, भाममाणो अगोचरे। हसन्तो नाभिगच्छेना, कुल उच्चापय सया ॥ १४ । आलोअ थिग्गल दार, सघि दगभवणाणि । चरन्तो न विणिज्झाए, सकट्ठाण विवजए ॥ १५ ॥ रनो गिहवईण च, रहस्मारविक्खयाण य । सफिलेमकर ठाण, दूरओ परिवजए ॥ १६ । पडिकुट्ट कुलं न पविसे, मामग परिवञ्जए। अचियत्त कुल न पविसे, चियत्त पविसे कुल । १७ । साणीपागारपिहिअ, अप्पणा नागपगुरे । कवाड नो पणुल्लिना, उग्गहसि अणाइआ ॥ १८ । गोअरग्गपविट्ठो अ, बच्चमुत्त न धारए । ओगास फासुअ नचा, अणुन्नविय बोसिरे ।। १९ । णीय दुवार तमस, कुट्ठग परिवजए। अचक्खुनिसओ जत्थ, पाणा दुप्पडिलेहगा ॥ २० । जत्थ पुष्फाड वीआइ, विप्पडन्नाड पोहए । अहुणोवलित उल्ल, दठ्ठण परिवज ॥ २१ ॥ एलग दाग्ग साण, वन्छग वा वि कुट्ठए । उल्लघिा न पनिसे, विउहिताण व सजए ॥ २२ ॥ अससत्त पलोडजा, नाइदूरावलोअए । उप्फुल्ल न पिणिज्झाण, नियट्टिन्न अयपिरो ॥ २३ ॥ अभूमि न गरडेजा, गोअरग्गगओ मुणी। कुलस्स भूमि जाणिता, मिअ भूमि परकमे ।। २४ । तत्येव पडिटेहिज्जा, भूमिमागविलक्षणो। सिणाणस्म य वचस्स, सलोग परिवजए ॥ २५ ॥ दगमट्टिअआयाणे, वीआणि हरिआणि अ । परिवज्जतो चिहिजा, सविंदिअसमाहिए ॥२६॥ तत्थ से चिट्टमाणस्स, आहारे पाणमोअण । अकप्पिअन इच्छिज्जा, पडिगाहिज कपि ॥२७॥ आहारन्ती सिआ तत्थ, परिसाडिज भोअण । दितिअ पडिआटक्से, न मे पप्पड तारिस ॥२८॥ समद्दमाणी पाणाणि, वीआणि हरिआणि अ । असजमकर नन्चा, तारिसिं परिवजए ॥ २९ । साह निक्विवित्ता पा. सचित्त धद्रियाणि य । तर समणदाप, उदग सपणल्लिया ॥३०॥ " - , - श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला. १२) गाहइत्ता चलइत्ता, आहारे पाणभोअणं । दितिअं पडियाइस्व, न मे कप्पड़ तारिसं ॥३१॥ रेकम्मेण हत्थेण, दवीए भायणेण बा | दिति पडिआइक्खे, न मे कप्पड़ तातिसं ॥ १२ ॥ वं उदउल्ले ससिणिद्धे, ससरवखे मट्टिआओस । हरिआले हिंगुलए, मणोसिला अंजणे लोणे ॥ ३३ ॥ रुअवन्निअसेडिअ, सोरद्विअपिट्ठकुक्कुमकए अ । उकिट्ठमसंसह, संसट्ठ चेव चोटुञ्चे ॥ ३४ ॥ संसद्वेण हत्थेण, दबीए भायणेण वा । दिनमाणं न इच्छिता, पच्छाकम्मं जहिं भवे ॥ ३५ ॥ सडेण य हत्थेण, दम्चीए भायणेण वा । दिजमाण पडिच्छिजा, जं नत्थेसणियं भवे ॥ ३६ ।। एहं तु मुंजमाणाणं, एगो तत्थ निमंतए । दिज्जमाण न इच्छिन्ना, छंद से पडिलेहए ।। ३७ ।। ण्हं भुंजमाणाणं, दो वि तत्थ निमंतए । दिज्जमाण पडिच्छिन्ना, जं तन्ये सणियं भवे ॥ १८ ॥ विणीए उवण्यान्थं, विविहं पाणभोअणं । भुंजमाण विवक्जिमा, भुत्तसग पडिच्छए ॥ ३९ ॥ सेआ य समणट्ठाए, गुम्विणी कालमासिणी । उडिआ वा निसीइजा, निसन्ना वा पुणुहुए ॥ ४० ॥ i भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पि। दिति पडिआइक्से, न मे कापद तारिस ।। ४१ ।। पणगं पिज्जमाणी, दारगं वा कुमारिणे । तं निक्खिवित्तु गेअंनं, आहारे पाणभोयणं ।। ४२ ।। भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पियं । दितिअं पडिआइक्य, न मे कप्पह तारिसं ॥ ४ ॥ भवे भत्तपाणं तु, कप्पकप्पम्मि संकियं । दिति पडिआइक्खे, न मे कापड नारिमं ॥ १४ ॥ हगवारेण पिहि, नीसाए पीढएण वा । लोटेण वा विलेवेण, सिलेसेण वा केणइ ॥ ४० ॥ तं च उभिदिआ दिजा, समणट्ठा एव दावए । दितिअं पडिआइक्वे, न मे कप्पट नारिस ।। ४६ ॥ असणं पाणगं बावि, खाइमं माइमं तहा। जं जाणिज्जा मुणिज्ज वा, दाणट्ठा पगडं इमं ॥ ४७ ॥ तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पिरं । दिति पडिआइक्वे, न मे कप्पड़ नारिमं ॥ १८ ॥ असणं पाणगं वावि, खाइमं साइमं तहा । जं जाणिजा सुणिजा वा, पुण्णट्ठा पगडं उमं ।। ४९ ॥ तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पि । दिति पडिआइक्वे, न में कप्पइ तारिस ।। ५० ॥ असणं पाणगं वावि, खाइमं साइमं तहा । जं जाणिज्जा मुणिजा वा, वणिमट्ठा पगडं इमं ॥ ५१ ॥ तं भवे भत्तपाणं तु. संजयाण अकप्पियं । दिति पडिआइक्वे, न मे कप्पइ तारिस ।। ५२॥ असणं पाणगं वावि, खाइमं माइमं तहा । जं जाणिज्ज सुणिज्जा वा, ममणहा पगडं इमं ॥ ५३॥ तं भवे भत्तपाणं तु, मंजयाण अप्पिो । दिति पडिआइक्खे, न मे कप्पइ तारिमं ।। ५४ ॥ उद्देसियं कीयगडं, पूइकम्मं च आहडं। अझोअरपामिचं, मीसजायं विवज्जए ॥ ५५ ॥ उग्गमं से अ पुच्छिज्जा, कस्मट्ठा केण वा कड। सुच्चा निस्संकियं सुद्धं, पडिगाहिज संजए ॥ ५६ ॥ असणं पाणगं वावि, खाइमं साइमं तहा । पुप्फेसु हुज उम्मीम, वीएमु हरिएसु वा ॥ ५० ॥ तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पि। दितिय पडिआइक्वे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ ५८ ॥ असणं पाणगं वावि, खाइमं साइमं तहा । उद्गम्मि हुन्ज निक्वित्तं, उत्तिंगपणगेम वा ।। ५९ ॥ नं भवे भत्तपाणं तु, मंजयाण अक्रप्पिों। दितिअं पडि आइक्खे, नमे कप्पड़-तारिसं ॥ ६ ॥ असणं , पाणगं बावि, खाइमं साइमं तहा । उम्मि (अगणिग्मि) होज निस्वित्तं, तं च संघट्टिा दए । . - , त सबाव वियाहया।३पा.

MMVAAMAN , . श्रीदमवैकालिकसूत्र-पञ्चमाध्ययनम् (८३) त भवे भत्तपाण तु, सजयाण अप्पिा । दितिअ पडिआउखे, न मे कप्पड तारिम ।। ६२ ।।, एव उस्सिविया ओमकिया. उनालिआ पन्नालिआ निवाविया । उस्मिचिया निस्मिचिया, उवत्तिया (उच्वत्तिया)ओवारिया दा ॥ त भवे भत्तपाण तु, मजयाण अफप्पिन । दितिअ पडि आइक्वे, न मे कम्पइ तारिम ॥ ६४ ॥ हुन्ज हि सिल वावि, इट्टाल नात्रि एगया ! ठविअ मक्रमहाए, त च हुज चलाचल ॥६५॥ न तेण भिक्खूगच्छिज्जा, दिट्ठो तत्थ अमजमो । गभीर मुसिर चेव, सबिदिअ ममाहिय ।। ६६ ।। निस्सेणिं फलग पीढ, उम्सरित्ता ण मारहे। मच कील च पासाय, समणटा एर दावए ॥ ६७ ॥ दुरूहमाणी पनाडेजा, (पडिवजा) हत्य पाय व लूमए । पुढवीजीवे वि हिंसेजा, जे अ तनिस्सिआ जगे। ॥ ६८ ॥ एआरिसे महादोसे, जाणिऊण महेसिणो। तम्हा मालोहड भिक्स,न पडिगिण्हसि सजया ॥ ६९ ।। कट मूल परब ना, आम छिन्न च मन्निर । तुनाग सिंगवेर च, आमग परिगन्जए ॥ ७० ॥ तहेब मत्तुचुन्नाड, कोलतुन्नाई आवणे । मक्कुलिं फालिज पूअ, अन्न ना नि तहानिह ।। ५१ ॥ विकायमाणं पमढ, रण परिफासि । दितिअ पडिआइक्खे, न मे कप्पड तारिस ॥ ७॥ बहेअडिअ पुपाल, अणिमिम । बहुकटय । अत्थिय तिंदुय विलं. उच्छुपड र सिंबलिं ॥ ३ ॥ अप्पे सिआ भोअणजाए, बहुझिय धम्मिए (य)। दितिअ पडियाइक्वे, न मे अप्पड तारिस ॥ ॥ ७४ ॥ तहेवुच्चावय पाण, अदुवा नारधोअण । मसे'म चाउलोढग, अहणारोग निवजए ॥ ५ ॥ ( जाजाणेजा चिरावाआ, मइए दसणण वा, पडिपुस्ऊिण सुच्चा बा, ज च निस्सकिय भवे ।। ७६ ॥ अजीर पडिणय नचा, पढिगाहिज सजए । अह मक्रिय भनिजा, आमादत्ताण रोअए ॥ ७ ॥ थोषमामायणट्ठाए, हत्थगम्मि दलाहि मे । मामे अच्चविल पूअ, नाण तिण्ह विणित्तए ॥ ७८ ॥ त च अञ्चक्लि पूज, नाण तिण्हविणित्तए । दितिम पडिआइक्वे, न मे कम्पह तारिस ॥ ७९ ॥ त च हुला अकामेण, विमणेण पडिच्छि। त अप्पणा न पिदे । नो वि चन्नम्स दावए ।। ८०.॥ एगतमवकमित्ता, अचित्त पडिलेहिआ। जय पडिद्वविजा, परिठ्ठप्प पडिक्कमे ॥ ८१॥ सिया अ गोअरग्गओ इच्छिन्ना परिभुत्नुअ । कुट्ठग मित्तिमूल चा, पडिदेहिताण फासुअ ।। ८२ ॥ अणुनवित्तु मेहावी, पडिच्छिन्नम्मि सयुडे । हत्यग मपमजित्ता, तत्थ मुजिज मजए ।। ८३ ॥ तत्थ से भुनमाणस्म, अद्विअ कटओ सिआ। तणकट्टगकर वि, अन्न गावि नहाविह ॥ ८४ ॥ त उक्सिवितु न निक्सिवे, आसण्ण न छट्ठए। हत्येण त गहेऊण, एगतमनक्कमे ॥८॥ एगंतमनकमिचा अचित्त पडिलेहिआ। जय परिठ्ठपिना, परिट्ठप्प पटिक्कमे ॥ ८६॥ सिआ आभिक्खूडन्छिञ्जा, सिञ्जमागम्म भुत्तुअ । सपिंडपायमागम्म, उड्डअ पडिलेहिआ ॥ ८७॥ विणएण परिसिचा, सगासे गुरूणो मुणी। इरियानहियमाययाय, आगओ अ पडिक मे ॥ ८८ ॥ जामोइत्ताण नीसेम, अडआर च जहक्म । गमणागसणे चेन, भत्ते पाणे च मज़ए ।। ८९ ॥ उज्जुप्पनो अणुविग्गो, अवक्खित्वेण चेअसा 1 आलोप गुरुसगासे, ज जहा गहिय भवे ॥..॥ न मम्ममालोडअ हुन्ना, पुद्धि पन्छा र ज कड। पुणो पडिकमे तस्म, गोमट्ठो चिंता हम ॥२१॥ " 1 44 myN ~.." AAMAN . श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला (८४) अहो जिणेहिं असावज्जा, विती साहण देसिआ। मुस्खमाहणहेउस्स, साहुदेहस्म धारणा ॥ ९२ ।। णमुक्कारेण पारित्ता, करित्ता जिणसंथचं । सज्मायं पट्टवित्ताणं, वीसमेज खणं मुणी ।। ९३ ॥ वीससंतो इमं चिंते. हियमटुं लाभमडिओ। मे अणुगहं कुञ्जा, साह हुञ्जामि तारिओ ॥ १४ ॥ साहवो तो चिअत्तेणं, निमंतिज जहकमं । जइ तत्थ केह इच्छिज्जा, तेहिं सद्धिं तु मुंजए ॥ ९५ ।। अह कोइ न इच्छिन्ना, तो भुजिज एकाओ।आलोए भायणे साह. जयं अपरिसाडिअं॥९६ ।। तित्तगं च कडुअंच, कसायं अविलं च महुरं लवणं वा । एयलद्धमन्नत्यपउत्तं, महु घयं व अँजिज संजए । ॥ १७ ॥ ' असं विरसं वावि, सूइअं वा असूइअं। उल्लं वा जइ वा मुकं, मंथुकुम्मासमोअणं ॥ ९८ ॥ । उप्पण्णं नाइहीलिजा, अप्पं वा बहु फासुअं । मुहालद्धं मुहाजीवी, भुजिजा दोसवजिअं ॥ ९९ ॥ : दुल्लहाओ मुहादाई, मुहाजीबी, वि दुल्लहा । मुहादाई मुहाजीवी, दो वि गच्छंनि सुग्गई ॥१०॥ ॥ इपिंडेसणाए पढमो उद्देसो समत्तो । पडिग्गहं संलिहिताणं, लेवमायाइ संजए। दुगंधं वा, सह मुंजे न छहए ॥१॥ सेजा निसीहियाए, अमावन्नो अगोचरे । अयावयट्ठा भुच्चाणं, जइ नेणं न संथरे ॥ २॥ तओ कारणमुप्पण्णे, भत्तपाणं गवेसए । विहिणा पुत्वउत्तेग, इमेणं उत्तरेण य ॥ ३ ॥ कालेण निक्खमे मिक्खू , कालेण य पडिक मे । अकालं च विवन्जित्ता (जा), काले कालं समायरे ॥ अकाले चरिसि भिक्खू , कालं न पडिलेहिसि । अप्पाणं च किलामेसि, सन्निवेसं च गरिहासि ।। ॥ ५॥ सइ काले चरे भिक्खू , कुजा पुरिसकारि। अलाभोति न सोजा, तबो त्ति अहियासए ॥ ६ ॥ तहेवुच्चावया पाणा, भत्तट्ठाए समागया। तं उज्जुझं न गच्छिज्जा, जयमेव परक्कमे ॥ ७ ॥ गोअरग्गपविट्ठो अ, न निसीइज कत्थई । कहं च न पबंधिजा, चिद्वित्ताण व संजए ।। ८ ॥ अग्गलं फलिहं दारं, कवाडं वा वि संजए । अवलंविआ न चिडिजा, गोअरग्गओ मुणो ॥ ९ ॥ समणं माहणं वावि, किविणं वा वणीमगं । उपसंकमंतं भत्तट्ठा, पाणटाए व संजए ॥ १० ॥ तमइक्कमित्तु न पविसे, न चिट्टे चक्खुगोअरे । एगंतमवक्कमित्ता, तत्थ चिहिज संजए ॥ ११ ॥ वणीमगरस वा तस्स, दायगस्सुमयस्स वा। अप्पत्ति सिआहुजा, लहुत्तं पवयणस्स वा ।। १२ ॥ पडिसेहिए व दिने वा, तओ तम्मि नियत्तिए। उवसंकमिज भत्तट्ठा, पाणट्ठाए व संजए ॥ १३ ॥ उप्पलं परमं वावि, कुमुअं वा मगदंतिअं । अन्नं वा पुप्फमचितं, तं च संलुचिआ दए ॥ १४ ॥ तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पिअं । दिति पडिआइक्खे, न मे कप्पड़ तारिस ॥ १५ ॥ उप्पल परमं वावि, कुमुअं वा मगदंति । अन्नं वा पुष्फपचित्तं, तं च सम्मदिआ दए ॥ १६, तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पि। दितिअं पडिआइक्खं, न मे कप्पड़ तारिसं ।। १७ ।। सालुअं वा विरालि, कुमुझं उप्पलनालियं । मुणालिअंसासवनालियं, उच्छुखंडं अनिव्वुई ॥१८॥ वा पवालं, रुक्खस्स तणगस्स चा। अन्नरस वा वि हरियस्य. miram ||१०॥ , -nam Mirrammawww - - श्रीदसवैकालिकात्र-पश्चमाध्ययनम् (८५ तरुणिम वा डिवाडि, आमिअ मञ्जिय सय । दितिअ पडिआइक्से, न मे कप्पइ तारिस २० । तहा कोलमणुस्सिन, वेलु कामबनालिअ । तिलपप्पडग नीम, आमग परिचनाए ॥ २१ ॥ तहेव चाउल पिठ्ठ, विअड तत्तनिव्वुड । तिलपिट्ठपइपिन्नाग, आमग परिवजए ॥ २२ ॥ ऋविट्ठ माउलिंग च, मूलग मूलगतिभ, आम अमत्यपरिणय मणसा वि न पत्थए ॥ २३ ॥ इन फलमणि, वीचमणि जाणि । विहेलग पियाल च, आमग परिजए ॥ २४ ॥ पमुआण चरे मिक्ख् कुलमुच्चावय सया । नीय कुलमडकम्म, ऊसढ नाभिवारए ॥२५॥ अदीणो वित्तिमेसिजा, न विसीएज पडिए । अमुणम्मि भोअणम्मि मायण्णे एमणार ।। २६ बहु परपर अत्यि निविह साइमसाइम | न तत्थ पडिओ कृप्पे इच्छा दिज परो नवा ॥ २७ ॥ तयणामणवत्य वा, भत्त पाण च मजए । अदितस्म न कुपिज्जा, पञ्चक्से वि अ दीमओ ॥ २८ ॥ त्थिा पुरिस वावि, डहर वा महल्लग । वदमाण न जाइजा, नो अण फरस व ॥ २९॥ ने न वदे न से कुप्पे, वदिओ न समुक्से । एवमन्नेसमाणस्म, मामण्णमणुचिट्ठह ॥ ३० ॥ सेवा पगडओ लधु लोमेण विणिगृहइ। मामेय दाइय सत, दट्टण मयमायण ॥ ३१ ॥ चट्ठा गुरुओ लुद्धो, बहु पार पकुवइ । दुत्तोसओ अ से (सो) होइ,निवाण च न गच्छइ ॥ २ ॥ सेवा एगडओ लन्धु, विविह पाणमोअणं । महग भद्दग भुचा, विपन विरसमाहरे ॥ ३३ ॥ वाणतु ता इमे समणा, आययही अय मुणी। सतृट्ठो सेपए पत, लहवित्ती सुतोमओ ॥ ३४ ॥ यणट्ठा जमोकामी, माणममाणकामए । बहु पमबई पान, मायामल च कुबड ।' ३५ ॥ उर मा मेरग वावि, अन्न वा मजग रम | समक्स न पिये मिक्स् जस मारक्समप्पणो ॥ ३६ ।। पेयए एगओ तेणो, न मे कोई विआणड । तस्म पस्मह दोसाइ, नियडिं च मुणेह मे ॥ ३७ ।। कई मुडिआ तम्म, मायामोस च भिक्खूणो । अयसो अनिबाण, मयय च अमाहुआ ।। ३८ ॥ नेचुबिग्गो जहा तेणो, अत्तकम्मेहिं दुम्मई । तारिमो मग्णने वि न आराहेड मवर ।। ३९ ॥ वायरिए नाराहेड, समणे आवी तारिसो। गिहत्या वि ण गरिहति, जेण जाणति तारिम ॥ २० ॥ स तु अभुप्पेही, गुणाण च विवजए । तारिमो मरणते वि, ण आराहेड समर ॥ ११ ॥ व कुबइ मेहावी, पणीअ वजए रस । मन्नप्पमायविरओ, तबस्सी अइउफमो ॥ ४२।। स्म पस्मह कलाण. अणेगमा पूरअ । विउल अत्यसजुत्त, कित्तडम्स मुणेह मे ॥ ४ ॥ इस तु गुणप्पेही, अगुणाण च विजए (ओ)। तारिमो मरणते वि, आराहेड सबर ॥ ४ ॥ भापरि आराहेड, समणे आवि तारिसो । गिहत्था विण पूयति, नेम जाणति तारिस ॥ १५ ॥ नेणे ययतेणे, रुवतेणे, अ जे नरे। आयारभावतेणे अ, यूड देनकिवित ॥ १६ ॥ घृण पि देवत्त, उवपन्नो देवविधिमे । नत्यारि से न याणाड किं मे विचा हम फल ॥ ७ ॥ पनो पि से चहत्ताण, ल मड पलम्सग । नरग तिरिक्सजोणि ना, वोही जत्थ मुदुल्लहा ।। १८ ॥ अ च दोस दट्टण, नायपुत्तेण भामि । अणुमाय पि मेहावी, मायामोम मिनलए ॥ ११ ॥ सिक्सिकण मिक्समणमोहि, सजयाण युद्धाण मगासे । तत्थ मिक्स् मुप्पणिहिदिए, तिबलजगुणव विग्जिासि ॥५०॥त्ति वेमि|| अ पिंडेमणा यीओ उद्देमो॥ पचमायण ममत्त ॥ . - - ६) श्रीजनसिद्धान्त-खाध्यायमाला ॥ अह छ धस्सत्यज्ञामन्झयणं । - * १ गणदंसणसंपन्नं, संजमे अ तवे रयं । गणिमागमसंपन्न, उजाणम्मि समोमढं ।। १ याओ रायमचा य, माहणा अदुव खत्तिा। पुन्छति निहुअप्पाणो, कहं मे आयारगोयरो ॥ २ ॥ सिं सो निहुओ दंतो, सवभूअसुहावहो, सिक्खाएमु समाउत्तो, आयकवह विअक्वणो ॥ ३ ॥ दि धम्मत्थकामाणं, निग्गंथाणं सुणेह मे | आयारगोअरं भीमं, गयलं दुरहिट्टिकं ॥ ४ ॥ नत्थ एरिस वुत्तं, जं लोए परमदुच्चरं । विउलट्टाणभाइरस, न भृशं न भविस्मह ॥ ५ ॥ खुड्गविअत्ताणं, वाहिआणं च जे गुणा । अक्खंडफुडिआ कायदा, नं सुणह जहा तदा ॥ ६ ॥ स अट्ट य ठाणाई, जाइं बालोअवरज्झइ । तन्थ अन्नयरे ठाणे, निग्गंताओ भस्सइ ।। 'यछकं कायछकं, अकप्पो गिहिभायणं । पलियंकनिस सि] जा य, सिणाणं सोहवज्जणं ॥ ८ ॥ त्थिमं पढमं ठाणं, महावीरेण देसि। अहिंसा निउणा दिट्ठा, सबभृएसु संजमो ॥ ९ ॥ नाति लोए पाणा, तसा अदुव थावरा । ते जाणमजाणं वा, न हणे णो विधायए ॥ १० ॥ वे जीवा वि इच्छंति, जीविरं न मरिज्जिडं। तम्हा पाणिवहं घोरं, निग्गंथा बज्जयंतिणं ॥ ११ ॥ नप्पणट्ठा परट्ठा वा, कोहा वा जइ वा भया। हिंसग न मुसं वृआ, नोवि अन्नं वयावए ॥ १२॥ सावाओ य लोगम्मि, सबसाहहिं गरिहिओ। भविस्साओ य भृआणं, तम्हा मोसं विवज्जए ॥ १३ ॥ चत्तमंतमचित्तं वा, अप्प वा जड़ वा बहुं । दंतसोहणमित्तं पि, उग्गहंसि अजाइया ॥ १४ ॥ i अप्पणा न गिण्हंति, नो वि गिण्हावए पर। अन्नं वा गिण्हमाणं पि, नाणुजाणंनि संजया ।। १५ ।। अबंभचरिअं घोरं, पभायं दुरहिडिअं । नायरंति मुणी लोए. भेआयणवजिणो ।। १६ ॥ मूलमेयमहम्मस्म, महादोमममुस्सयं । तम्हा मेहुणसंगग्गं, निग्गंथा वजयंनि णं ॥ १७ ॥ विडमुम्भेइमं लोणं, तिल्लं सपि फाणि । न ते सन्निहिमिन्छंति, नायपुत्तवओरया ।। १८ ॥ लोहस्सेसणुफासे, मन्ने अन्नयगमवि । जे सिया सन्निहिं कामे, गिही पवइए न से ॥ १९ ॥ जं पि वत्थं च पायं वा, कंवलं पायपुंछणं । तं पि संजमलजट्ठा, धारंति परिहरंति अ॥ २० ॥ न सो परिग्गहो वुत्तो, नायपुत्तण ताइणा । मुच्छा परिग्गहो वुत्तो, इह वृत्तं महेसिणा ।। २१ ॥ सत्वत्थुवहिणा बुद्धा, संरक्षणपरिग्गहे अवि अप्पणोऽवि देहम्मि, नायरंति ममाइयं ।। २२ ॥ अहो निचं तवो कम्म, सवयुद्धेहिं वन्नि । जा य लज्जासमा वित्ती, एगभत्तं च भोअणं ॥ २३ ॥ संति मे सुहुमा पाणा, तसा अदुव थावरा । जाई राओ उपासंतो, कहमेसणि चरे ॥ २४ ।। उदउल्लं वीअसंसत्तं, पाणा निवडिया महिं । दिआ ताई विवजिजा, राओ एत्थ कहं चरे ।। २५ ।। एअंच दोसं दट्टणं, नायपुत्तण भासियं । सहाहारं न भुजति, निग्गंथा राइमोअणं ॥ २६ ॥ पुढविकायं न हिसंति, मणसावयसा कायसा। तिविहेण करणजोएण, संजया सुसमाहिआ ॥ २७ ॥ पुढविकायं विहिसंतो, हिंसई उ तयस्मिए । तसे अ विविहे पाणे, चक्खुसे अ अचक्खसे ॥ २८ ॥ तम्हा एअ विआणित्ता, दोसं दुग्गहवढणं । पुढविकायसमारंभ, जावज्जीवाए बजए ॥ २१ ॥ , nwar . . श्रीदमकालिकसूत्र-पष्ठमाध्ययनम् आउकाय विहिंमतो, हिंसई तयस्सिए । तसे अ विविहे पाणे, चक्खुसे अ अचम्खुसे ॥ ३१ ॥ तम्हा एअ विआणित्ता, दोम दुग्गडगडण । आउकायसमारभ, जावजीवाए वजए ।। ३२ ।। जायते न इच्छति पावग जलउत्तए । तिक्समनयर सत्थ, सबओ वि दुरासय ॥ ३३ ।। पाईण पडिण वापि, उड्ड अणुदिमामनि । अहे दाहिणिओ गा वि दहे उत्तरओ वि अ॥ ३४ ।। भूआणमेममाघाओ हवनाहो न मसओ। त पईयपयापट्ठा, सजा किंचि नारमे ॥ ३५ ॥ । तम्हा एयवियाणित्ता, दोम दुग्गडबडण । तेउपायसमारभ, जावजीवाए वजए ॥ ३६ ॥ अणिलरस समारभ, बुद्धा मनति तारिस । मावजबहुल चेअ, नेअ ताईहिं सेविअ ॥ ३७॥ तालिअटेण पत्तेण, साहाविहुअणेण वा। न ते वीइउमिच्छति, बीआवेऊण वा पर ।। ३८॥ 'ज पि वत्थ व (च) पाय या, कपल पायपुडण न ते वायमुईरति, जय परिहरति अ॥ ३९ ॥ तम्हा एअ विआणित्ता, दोम दुग्गडमड्डण । नाउकायसमारभ, जारज्जीपाए वजए ॥ ४०॥ अणस्सइ न हिंसति, मणसा वयसा कायसा । विविहेण करणजोएण, सजया सुसमाहिआ॥ ४१ ।। चणस्मड विहिसतो, हिंसइ उ तयस्सिए । तसे अ विनिहे पाणे, चक्खुसे अ अचक्खुसे ।। ४२ ॥ तम्हा एय वियाणित्ता, दोस दुग्गइवडण । चणस्मड समारंभ, जायज्जीवाए वज्जए ॥ ४३ ।। तसकाय न हिंसति, मणसा पयसा कायमा। तिविहेण करणजोएण, सजया सुसमाहिआ ॥ ४४ ।। तसकाय विहिंसतो, हिंसई उ तयस्सिए । तसे अनिविहे पाणे, चक्खुसे अ अचक्खुसे ॥ ४५ ॥ नम्हा एअ विआणित्ता, दोस दुग्गइवड्डण । तमकायसमारम, जाज्जीवाए [६] वज्जए ॥ ४६॥ जाइ चत्तारि मुज्जाइ, इसिणा हारमाइणि । ताड तु विवज्जतो, सजम अणुपालए ॥ ४७॥ पिंड सिज्ज च वत्थ च, चउत्थ पायमेव य । अप्पिअन इन्छिज्जा, पडिगाहिज्ज कप्पि ॥ ८ ॥ जे नियाग ममायति, कीअमुद्दोसिआहड । वह ते ममणुजाणति, इअ उ (बु)त्त महेसिणा ।। ४९॥ तम्हा असणपाणाइ, कीयमुद्देसियाहड । रज्जयति ठिअप्पाणो, निग्गथा धम्मजीरिणो ॥ ७० ॥ कसेस कमपाएस कुडभोएसु वा पुणो । भुजतो असणपाणाड, आयरा परिभस्सह ।। ५१ ॥ सीओदग ममारभे, मत्तधोअणछडणे जाह छनति भूआइ, दिट्ठो तत्य असजमो ।। ५०॥ पच्छायम्म पुरेकम्म, सिआ तय न कप्पइ । एअमट्ठ न भुजति, निग्गधा गिहिभायणे ॥५॥ आसदीपलिअम, मचमासालएसु वा । अणायरिअमञ्जाण, आसइत्त सहत्तु वा ॥ ५० ॥ नासदीपलिअक्सु, न निसिजा न पीढए । निग्गथा पडिलेहाए, युद्धत्तमहिटगा ।। ५५ ॥ गमीरविजया एए, पाणा दुप्पडिलेहगा! आसदी पलिअको अ, एयम विवजिआ ॥ ५६ ।। गोअरम्गपविट्ठस्म, निसिञ्जा जस्म कप्पइ । इमेणिसमणायार, आवजह अबोहिअ ॥ ५७ ॥ विवत्ती बमचेरस्म, पाणाण च वहे वहो । वणीमगपडिग्याओ, पडिकोहो अणगारिण ॥ ५८ ।। अगुची चमचेरस्स, इत्थीओ वा वि सकण । बुसीलवट्ठण, गण, दूरओ परिसजए ॥ ५० ॥ तिहमन्नयरागस्म, निसिज्जा जस्स कप्पड़ । जराए अमिभूअम्स, वाहिअस्स तवस्मिणो ॥ ३०॥ बाहियो वा अरोगी वा, सिणाण जो उ पत्थए । वुक्तो होड आयारो, जढो हवा सजमो ॥ ६१ ।। सतिमे सहमा पाणा. घसाम मिलगास अाले अमित सिणायतो. विदेणापिलाया ॥२॥ . 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श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला.
यमाला.
सिणाणं अदुवा ककं, लुद्धं पउमगाणि अ। गायस्सुबट्टणट्ठाए, नायरंति कयाइ वि ॥ ६४ ॥
नगिणस्स बावि मुंडस्स, दीहरोमनहसिणो। मेहुणाओ उवसंतस्स, किं विभूसाय कारिकं ॥६५॥
विभूसावति भिक्खू , कम्मं बंधइ चिकणं । संसारसायरे घोरे, जेणं पडइ दुरुत्तरे ॥ ६६ ।।
विभूसावति चेअं, बुद्धा मन्नंनि तारिसं । सावज बहुलं चेअं, नेयं ताईहि सेविअं ।। ६७ ॥
खति अप्पाणममोहदंसिणो, तवे रया संजम अजवे गुणे ।
धुणंति पाबाइ, पुरेकडाई नवाई पाबाई न ते करंति ।। ||६८ ॥
सओवसंता अममा अकिंचणा, सविजविजाणुगया जसंसिणो ।
उउप्पसन्ने विमले व चदिमा । सिद्धि विमाणाइ उवेति (वयंति) ताइणो । ६९ ॥
त्ति वेमि ।। इअ छठें धस्मत्यकामज्झयणं समत्तं ॥ ६ ॥
॥ अह सुबकसुद्धी णास सत्तमं अज्झयणं ॥
चउण्हं खलु भासाणं, परिसंखाय पन्नवं । दुण्हं तु विणयं सिक्खे, दा न भासिज्ज सबमो। १ ।।
जा अ सच्चा अवत्तवा, सच्चामोसा अजा मुसा । जा अ बुद्धहिं नाइन्ना, न तं भामिज पन्नवं ॥ २ ॥
असचमोसं सच्चं च, अणवज्जमककसं। समुप्पेहमसंदिद्धं गिरं भासिज्ज पनवं ।। ३ ।।
एयं च अट्ठमन्नं वा, जंतु नामेइ सासयं । स भासं सचमोसं च पि तं (पि) धीरो विवज्जए ॥४॥
वितहं पि तहामुत्ति, जं गिरं भासओ नरो । वम्हा मो पुट्ठो पावेणं, किं पुण जो मुसं वए ॥ ५ ॥
तम्हा गच्छामो वक्खामो, अमुगं वा णे भविस्सइ ।
अहं वा णं करिम्सामि, एसो वा णं करिस्सइ ।।
एवमाइ उ जा भासा, एसकालम्मि मेकिआ। संपयाइअमढे वा, तं पि धीरो विवज्जए ॥ ७॥
अईअम्मि अ कालम्मि, पच्चुप्पण्णमणागए । जम तु न जाणिज्जा, एवमेअं ति नो वए ।। ८ ।।
अईअम्मि अ कालम्मि, पच्चुप्पण्णमणागए । जत्थ संका भवे तं तु, एवमेअं तु नो वए ।। ९ ।।
अईअम्मि य कालम्मि, पच्चुप्पणमणागए । निस्संकिअं भवे ज तु, एवमेअं तु निहिसे ।। १० ।।
तहेब फरुसा भासा, गुरुभूओवघाइणी । सच्चा वि सा न वत्तवा, जओ पावस्स आगमो ।' ११ ।।
तहेव काणं काण त्ति, पंडगं पंडगति वा । वाहिअंवा वि रोगि ति, तेणं चोरे त्ति नो वए ॥ १२ ॥
एएणन्नेण अद्वेणं, परो जेणुबहम्मइ । आयारभावदोसन्नू, न तं भासिज्ज पण्णवं ।। १३ ।।
तहेब होले गोलि त्ति, साणे वा वसुलि त्ति अ। दमए दुहए वा वि, नेवं भासिज्ज पण्णवं ।। १४ ॥
अडिजए पज्जिए वा वि, अम्मो माउस्सिम त्ति अ ।
पिउस्सिए भायणिज्ज त्ति, धूए णत्तुणिअ त्ति अ॥
॥ १५ ॥
हले हलित्ति अनि त्ति, भट्टे -मामिणि गोमिणि ।
होले गोले बसुलि ति, इत्थिों नेवमालवे ।।
॥ १६॥

(८९) ~ view . श्रीदसर्वकालिकसूत्र-सप्तमाध्ययनम् अजए पज्जएवा वि, वप्पो चुल्लपिउत्ति । माउलो माइणिज ति, पुत्ते णतुणिम ति अ॥ १८ ॥ हे भो! हलित्ति अन्नित्ति, भट्टा सामि अगोमिाहोला गोल वमुलिचि, पुरिस नेवमालवे ॥१९॥ नामधिज्जेण ण चूआ, परिगुत्तेण वा पुणो। जहारिहमभिगिज्झ, आलविज लविन वा ॥ २० ॥ पचिंदिआण पाणाण, एस इत्थी अय पुम !जाव ण नो निजाणिजा, तार जाइ ति आलवे ॥ २१ ॥ वहेव मणुम एसु, पक्खि वा वि मरीसिन । थूले पमेडले वझे, पाइमि त्ति अ नो वए ॥ २२ ॥ परिवुड्डे ति ण वृआ, वूआ अविए त्ति ज । सजाए पीणिए गावि महागय त्ति आलवे ॥ २३ ॥ तहेन गाओ दुयाओ, दम्मा गोरहग चि । वाहिमा रहजोगि त्ति, नेर भासिन्न पण्णन ॥ २४ ॥ जुव गवि त्ति ण आ, घेणु रमदय ति अरहस्से महल्लए वा वि. वए सवहाणि ति अ॥ २० ॥ तहेर गतुमुजाण, पदयाणि वणाणि अ। रुक्सा महल पेहाए, नेव भासिज पण्णा ॥ २६ ॥ अल पामायसमाण, तोरणाणि गिहाणि अ। फलिहग्गलनावाण, अल उदगदोणिण ॥ २७॥ पीढए चगवेरे अ, नगले मडय सिआ। जतलट्ठी व नामी वा, गडिआ अल सिआ ॥ २८ ॥ आमण मयण जाण, हुज्जा वा किचुवस्म। भूओवधाइणि भास, नेत्र भासिज पण्णन ॥ २९ ॥ तहेर गतुमुन्नाण, पदयाणि रणाणि अ । स्क्सा महल पेहाए, एन मासिन पणन ॥ ३०॥ जाइमता इमे रुस्सा, दीहट्टा महालया। पयायसाला विडिमा, रए दरिसणि ति अ॥ ३१ ॥ तहा फलाड पाड, पायसन्जाड नो वए। वेलोहयाई टालाइ, हिमाह चि नो नए ॥३०॥ अमयडा इमे अगा, यहनिबडिमा फला । पहज बहुमभूमा, भूअरून ति वा पुणो ॥ ३३ ॥ हेमोमहीओ पकाओ, नीलिआओ छवीह। लाइमा भञ्जिमाउत्ति, पिहुसज्ज त्ति नो वए ॥ ३४ ॥ इन्दा बहुसभूआ, घिरा ओमढा वि अ । गम्भिआओ पमुआओ, समाराउ ति आलवे ॥ ३५ ॥ तहेर ससडि नचा, किच मज ति नो नए । सेपाग यावि वझि ति, मुतिस्थि ति अ आरगा। ११३६॥ ससडि ससडि यूआ, पणिअट्ठ त्ति तेणग | बहुममानि तित्थाणि, आरगाण विआगरे ॥ ॥३७॥ तहा नईओ पुग्णाओ, कायतिज ति नो वए । नारहिं तारिमाउ ति, पाणिपिज त्ति नो ए ! ॥ ३८ ॥ बटुवाहडा अगाहा, बहुसलिलुप्पिलोदगा। बहुवित्थडोटगा जावि, एव भासिन पण्णव ॥ ३९ ॥ तहेव सायन्त्र जोग, परम्मा ज निहिअ । कीरमाण ति वा नचा, सामज न लवे मुणी ।। ४० ॥ मुरडि चि मुपफि त्ति, मुच्छिन्ने सुहडे मडे । मुनिट्ठिए सुरवित्ति, मापन यजए मुणी । ४१ ।। पयत्तपछि चि व पफमारवे, पयनडिन्न चि - छिन्नमालवे । पयनलाहित्ति य कम्मदेउस, पहारगाडि चि व गाटमारवे ।। ॥४२॥ समृधाम परग्य वा, अउल नत्यि परिम । अविफिसमयत्तद अचिमत्त चेत्र नो पए ॥४॥ सहम वइस्मामि, महमेअति नो नए । अणुवीह मब महत्थ, एर भामिज पण्णर || ४४ ॥ मुफोन वा मुविधीय अफिन फिलमेव वा। डम गिण्ह इम मुच, पणिण नो विभागरे ।।५।। , , , - श्रीजैन सिद्धान्त-खाध्यायमाला दुअप्पग्धे वा गहन्ये वा, कए वा विक्कए वि वा । पडिअढे समुप्पन्न, अणवजं विआगरे ॥ ४६॥ बातहेवासंजयं धीरो, आस एहि करहि वा। सयंचिट्ट बाहित्ति, नेवं भासिज पण्णवं ॥४७॥ उनहबे इमे असाहू, लोए वुचंति साहुणो । न लवे असाई साहुत्ति, साहुं साहुत्ति आलवे ।। ४८ ॥ अंनाणदसणसंपन्नं, संजमे अ तवे रयं । एवं गुणसमाउत्तं, संजय साहुमालवे ॥ ४९ ॥ देवाणं मणुआणं च, तिरिमाणं च बुग्गहे । अमुगाणं जओ होउ, मा वा होउत्ति नो वए ॥ ५० ॥ बाओ वुटुं व सीउण्हं, खेमं धायं सिवं ति वा । कया णु हुज एयाणि, मा वा होउ ति नो वए ।। ५१ ॥ तहेव मेहं व नहं व मणवं, न देवदेव त्ति गिरं वइजा। समुच्छिए उन्नए वा पओए, वहज वा बुट्ट चलाहय त्ति ।। ५२ ।। अंतलिक्स त्ति णं वृआ, गुज्झाणुचरित्र ति अ। रिद्धिमंत नरं दिस्स, दिस्स, रिद्धिमंतं ति आलवे ।। ५३ ॥ तहे सावजणुमोअणी गिरा, य परोवघायणी। से कोहलोह भय हास माणवो, न हासमाणो विगिरं वला ॥ ५४ ॥ सुवक्कसुद्धि समुपेहिआ मुणी, गिरं च दुटुं परिवज्जए सया। मिअं अनुढे अणुवीइ भासए, सयाण मज्झे लहई पसंसणं ।। ५५ ।। भासाइ दोसे अ गुणे अजाणिआ,तीसेअ दुट्टे परिवजए सया । छम् संजए सामणिए सया जए, वइज्ज बुद्धे हिअमाणुलो ।। ५६ ॥ परिक्खभासी मुसमाहिइंदिए, चउकसायावगए अणिस्सिए । निधुणे धुत्तमलं पुरेकडं, आराहए लोगमणि तहा परं ।। ५७ ।। त्ति वेमि ।। इअ सुवक्कसुद्धीनामं सत्तमं अज्झयणं समत्तं ॥ ७ ॥ जा .

श्रीदमवैकालिकसूत्र-अट्ठमाध्ययनम् murnnrvinvan. ॥ अह आयारयणिही अट्टममज्झयण ॥ - , " आयारपणिहिं ला, जहा नायव मिक्खुणा । त में उदाहरिस्सामि, आणुपुर्वि सुणेह मे ॥१॥ पुढनिदगअगणिमारुअ, तणरुक्खस्स पीयगा ! तसा अ पाणा जीर ति, इड बुत्त महेसिणा ॥२॥ तेसिं अच्छणजोएण, निच होअब्धय सिआ। मणसा कायवक्केण, एर हबह सजए ॥३॥ पुढनि मिति सिल लेलु, नेव भिंदे न सलिहे । तिविहेण करणजोएण, सजए सुममाहिए ॥४॥ सुद्धपुढनीं न निसीए, ससरक्खम्मि अ आसणे। पमजित्तु निसीडजा, जाडत्ता जस्स उग्गह ।। ५। सीओदग न सेविजा, सिलावुट्ट हिमाणि अ । उसिणोदन तत्तफामुअ, पडिगाहिज सजए ।। ६ । उदउल्ल अप्पणो काय, नेर पुछे न सलिहे। समुप्पेह वहाभूअ, नो ण सघट्टए मुणी ॥ ७ ॥ इगाल अगणि अचिं, अलाय वा सजोड। न उजिन्ना न घट्टिज्जा, नो ण निद्यावए मुणी ॥ ८ ॥ तालिमटेण पत्तेण, साहाए विडयोण पा। न वीडज्ज अप्पणो काय, वाहिर वा वि पुग्गल ॥९॥ तणरुक्स न छिदिज्जा, फल मूल च कस्मइ । आमग विविह नीअ, मणमा वि ण पत्थए ॥ १० ॥ गहणेसु न चिहिज्जा, वीएसु हरिएसु वा । उदगम्मि तहा निच, उत्तिंगपणगेसु वा ॥ ११ ॥ तसे पाणे न हिंसिज्जा, वाया अदुव कम्मुणा । उपरओ सबभूएसु, पासेज्ज विविह जग ॥ १२ ॥ अट्ट सुहमाड पेहाए, जाइ जाणित्तु सजए | दयाहिगारी भूएस, आस चिट्ठ सएहि वा ॥ १३ ॥ कयराइ अट्ट सुहुमाइ, जाइ पुच्छिज्ज मजए। इमाड ताइ मेहावी, आइक्सिज्ज विअक्खणो ॥ १४ ॥ सिणेह पुप्फसुहुम च, पाणुलिंग एहेव य । पणग पीअ हरिज च, अंडसुहुम च अट्ठम ।। १५ ।। एवमेआणि जाणित्ता, सबभावेण सजए । अप्पमत्तो जए निच, सविंदिअसमाहिए ॥ १६ ॥ धुव च पडि हिज्जा, जोगमा पायकवल । सिज्जमुच्चारभूमि च, सथार अदुवासण ॥१७॥ उच्चार पासवण, खेल सिंघाणजल्लिभ । फासुअ पडिलेहित्ता, परिहाविज्ज सजए ॥ १८ ॥ पपिमित्तु परागार, पाणट्ठा भोअणस्स ना । जय चिट्टे मिअ भासे, न य रुवेसु मण करे ॥ १९ ॥ नहु सुणेड कणेहिं, बहु अच्छीहि पिच्छइ । न य दिट्ट सुअ सय भिक्खू अक्खाउमरिहह ।। २० ।। मुअ ना जड वा दिव, न लविजोरघाइअ । न य केण उपाएण, गिहिजोग समायरे ॥ २१ ॥ निहाण रसनीज्जद, मदग पावग ति वा । पुट्ठो वानि अपुट्टो वा, लाभालाभ न निहिसे ॥ २२॥ न य भोअणम्मि गिद्धो, चरे उछ अयपिरो। अफासुअ न मुजीज्जा, कीअमुदे सिआइड' ।। २३ ।। मनिहीं च न कुन्निज्जा, अणुमाय पि सजए । भुहाजीची असनद्धे, हविज जगनिस्सिए ।। २४ ।। 'लहवित्ति सृसतुढे, अपिच्छे सुहरे मिआ । आसुरत्त न मच्छिज्जा, सुचा ण निणयामण ।। २५ ॥ कण्णसुक्खेहिं सद्देहि, प्रेम नामिनि वेमए । दारुण कक्स फास, कारण अहिआमए ॥ २६ ॥ शुह पिनास दुस्सिज्न, सीउण्ह अरड भय । आहिआसे अवहिओ देहद स महाक ।। २७॥ अस्थ गयम्मि आइन्चे, पुरस्था अ अणुग्गए । आहारभाउअ सच, मणसा पिण पत्थए ॥ २८ ॥ अतितिणे अचाले, अप्पभामी, मिआमणे । हरिज उअ दते, योर लधु न रिमण ॥ २० ॥ न बाहिर परिभवे अत्ताण न ममकसे । मअलामे न मस्निाना. जा तरिम ाि ॥ 3.॥ .

M ~~~~ N - स श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला, अद्धा जाणमजाणं वा, कटु आहम्मि पर्य। संवरे खिप्पमप्पाणं, बीअं तं न समायरे ॥ ३१ ॥ बापणायारं परकम्म, नेव गृहे न निण्हवे । सुई सया वियड भावे, असंमत्ते जिइदिए । ३२ ।। अमोहं अयणं कुज्जा, आयरीअस्स महप्पणो । तं परिगिझ वायाए, कम्मुणा उबवायए ॥३३ ।। तेअंमधुवं जीविअं नच्चा, सिद्धिमग्गं विआणिआ। विणिअट्टिज मोगेम, आई परिमिअमप्पणो ॥ ३४ ॥ वलं थामं च पेहाण, सद्धामारुग्ममप्पणो । खित्तं कालं च विनाय, तहप्पाणं निजुजए ॥ ३५ ॥ जरा जाव न पीडेइ, बाही जाव न बड्डइ । जाविदिआ न हायंति, ताव धम्म समायरे ॥ ३६ ॥ कोहं माणं च मायं च, लोभं च पावपट्टणं । बमे चत्तारि दोसे उ, इच्छंनो हिअमप्पणो ।। ३७ ॥ कोहो पीई पणासेड, माणो विणयनासणो । माया मित्ताणि नासेड़, लोभो मबविणायणो ॥ ३८॥ उवसमेण हणे कोहं, माणं मदवया जिणे। मायम जवभावेण, लोभ संतोसओ जिणे ।। ३९ ।। कोहो अ माणो अ अणिग्गहीआ, माया अ लोभो अ पवड्डमाणा ! चत्तारि एए करिणा कसाया, सिंचंति मूलाइ पुणभवस्य ।। ॥१०॥ रायणिएसु विणयं पउंजे, धुवसीलयं राययं न हाबइजा । कुम्मुच अल्लीण पलीणगुत्तो, परकामिना नवसंजमिम ॥ ॥४१॥ निदं च न बहु मन्निज्जा, सुप्पहासं विवज्जए। मिहो कहाहे न रमे, मझायम्मि रओ मया ॥ १२ ॥ जोगं च समणधम्मम्मि, जुजे अनलसो धुवं । जुत्तो अ ममणधम्मम्मि, अट्ठ लहइ णणुत्तरं ॥ ४३ ॥ इहलोगपारत्तहि, जेणं गच्छइ सुग्गई । बहुस्सु पन्जुवासिज्जा, पुच्छिजस्थविणिच् ॥ ४४ ॥ हत्थं पायं च कायं च, पणिहाय जिइदिए । अल्लीणगुत्तो निसिए, मगासे गुमणो मुणी ॥ ४५ ॥ न पक्खओ न पुरओ, नेव किचाण पिट्ठओ। न य ज समासिज्ज, चिट्ठिजा गुरुणतिए ॥ ४६ ॥ अपुच्छिओ न भासिज्जा, भासमाणस्स अंबरा। पिट्टिमसं न साइजना, मायामोसं विवजए ॥ ४७ ॥ अप्पत्ति जेण सिआ, आसु कुप्पिज्ज वा परो। सव्यसो तं न भासिज्जा, भासं अहिअगामिणि || ॥४८॥ दिदं मिअं असंदिद्ध, पडिपुन्नं विअं जिअं । अयंपिरमणुविग्गं, भासं निसिर अत्तवं ॥ ४२ ॥ आयारपन्नत्तिथरं, दिडिवायमहिज्जगं। चायविक्खलिअं नचा, न तं उबहसे मुणी ॥ ५० ॥ नक्खत्तं मुमिण जोग, निमित्तं मंतमेसज । गिहिणो तं न आइक्खे, भूआहिगरणं पयं ।। ५१ ।। अन्नई पगडं लयर्ण, भइन्जा सयणासणं । उच्चारभूमिसंपन्न, इत्थीपसु विवज्जिअं ॥ ५२ ॥ विवित्ता अ भवे सिज्जा, नारीणे न लवे कह। गिहिसंथवं न कुज्जा, कुज्जा साहूहि संथवं ।। ५३ ।। जहा कुक्कुडपोअस्स, निचं कुललओ भयं | एवं खु बंभयारिस्स, इत्याविग्गही भयं ।। ५४ ॥ चित्तमित्ति न निज्झाए, नारिं वा सअलंकिनी भक्खरं पिव दट्टणं, दिहिं पडिमसमाहरे ॥ ५५ ॥ हत्थपायपडिच्छिन्नं, कन्ननासविगप्पिअं । अवि वासमयं नारिं, बंभवारि विवजए ॥ ५६ ॥ विभूसा इत्थिसंसग्गी, पणीअं रसभोअणं । नरस्सत्तगवेसिस्स, विसं तालउडं जहा ॥ ५७ अंगपञ्चंगसंठाणं, चारुल्लविअप्पेहि। इत्थीण तं न गिज्झाए, कामरागविचट्टणं ।। ५८ ॥

(९३४ . श्रीदसर्वकालिकसूत्र-अट्टमाध्ययनम् पोग्गलाण परिणाम, तेर्सि नच्चा जहा तहा। विणीअतिव्हो विहरे, सीईभूएण अप्पणा ।। ६० । जाड सद्धाइ निक्सतो, परिआयट्ठाणमुत्तम । तमेर अणुपालिज्जा, गुणे आयरियसमए ॥६१॥ तर चिम मंजमजोगय च, सज्झायजोग च सया अहिट्ठ ए। सूरे व सेणाइ सम्मत्तमाउहे, अलमप्पणो होड अल परेसिं ।। ६२ ॥ सज्झायसुज्झाणरयस्म ताहणो, अपानभावस्म तवे रयस्स । विसुज्झई ज सि मल पुरेकड, समीरिज रप्पमल 1 जोडणा ॥ ३३ ॥ से ठारिसे दुक्खमहे जिइदिए, सुएण जुत्ते अममे अकिंचणे। विरायई कम्मघणम्मि अवगए, कसिणभपुडावगमे व चदिम ॥ ६४ ॥ त्ति वेमि॥ दअ आयारपणिही णाम अहममायण ममत्त ॥८॥ ॥ अह विणयसमाही णाम नवममज्झयण ॥ थभा व कोहा व मयप्पमाया, गुरुरमगासे विणय न सिस्खे । सो चैव उ तस्स अभूइभावो, फल व कीअस्म वहाय होड ॥१॥ जे आवि मदि ति गुरु विइचा, डहरे डमे अप्पसुए ति नचा । हीलति मिच्छ पडिबजमाणा, करति आसायण ते गुरुण ॥ २ ॥ पगईए मदा वि भवति पगे, डहरा नि अजे सुद्धोववेआ। आयारमता गुणसुद्विअप्पा, जे हीलिआ सिहिरिव भास कुजा ॥ ३॥ जे आवि नाग डहर ति नचा, आसायए से अहिआय होइ । एवारियअ पि हु हीलयतो, निअच्छई आइपह सु मढो (द) ॥ ४ ॥ आसीविसो वावि पर मुट्ठो, कि जीरनामाउ पर न कुआ। आयरिआया पुण अप्पसन्ना, अयोहिआमायण नत्थि मुक्सो॥५॥ जोपासग जलिअमववमिजा, आसीविस वा वि दुकोपहना। जो वा विस सायड जीविअट्ठी, एसोरमामायणगा गुरूण ।। ६॥ सिाहु से पाग्य नो डहिज्जा,आसीविसो वा विओन भक्से । सिआ विम हालहल न मारे, न आवि मुक्सो गुरुहीलणाए ॥ ७ ॥ जो पबय सिरमा भिनुमिके, मुत्त च सीह पडिगोहडना । जो पा दए सचिअग्गे पहार, एमोरमासायणया गुरुण ॥ ८॥ सिआ हु सीसण गिरि पिर्मिदे,सिया हु सीहो कृषिओन भक्से। सिआ न मिदिजव सत्तिअग्ग, न आवि मुक्यो गुरहीलमाए ॥९॥ आयरिअपाया पुण अप्पमन्ना,अयोहियामायण नत्यि पुस्यो। तम्हा अणापाहमुहामिकती, गुरप्पमायामिमहो मिला ॥१०॥ जहाहिअग्गी अलण .. नमसे , - ranAmA M roo wwwww श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला. एवायरिअं उवचिङ्जा, अणतनाणोवगओ वि संतो ॥ ११॥ जस्संतिए धम्मपयाइ सिक्खे, तस्संतिए वेणइयं पउंजे । सकारए सिरसा पंजलीओ, कायग्गिरा भो सणसा अनिच्च ॥ १२ ॥ लज्जा दया संजमवंभचेर, कल्लाणभागिस्स विसोहिठाणं । जे मे गुरू सययमणुसासयंति, तेहिं गुरू सययं पूजयामि ।। १३ ।। जहा निसंते तवणचिमाली, पभासई केवलभारहं तु । एवायरिओ सुअसीलबुद्धिए, विरायई मुरमज्ने व इंदो ।। १४ ॥ जहा ससी कोमुइजोगजुत्तो, नक्खत्ततारागणपरिवुडप्पा । खे सोहई विमले अन्भमुक्के, एवं गणी सोहइ भिक्खुमुझे ॥ १५ ॥ महागरा आयरिआ महेसी, समाहिजोगे सुअसीलबुद्धिए । संपाविउकामे अणुत्तराई, आराहए तोसइ धम्मकामी ॥ १६ ॥ मुच्चा ण मेहावी सुभासिआई, मुस्सूसए आयरिअप्पमत्तो। आराहइत्ताण गुण अणेगे, से पावई सिद्धिमणुत्तरं त्ति बेमि ॥ १७ ॥ ॥ इअ विणयसमाहिझयणे पढमो उसो ममत्तो ॥ Pics - - . . मूलाउ संघप्पभवो दुमस्स, खंधाउ पच्छा समुविति साहा । साहप्पसाहा विरुहंति पत्ता, तओसि (से)पुप्फ च फल रसोअ ।। ॥१॥ म्मस्स विणओ, मूलं परमो अ से मुक्खो, जेण कित्तिं सुअं सिद्धं, नीसेसं चाभिगच्छह ॥ २ ॥ चंडे मिए थद्धे, दुवाई नियडी मढे । बुज्झइ से अविणीअप्पा, कटु सोअगयं जहा ॥ ३ पम्मि जो उवाएणं, चोइओ कुप्पड़ नरो । दिव्यं सो सिरिमिनंति, दंडेण पडिसेहिए ॥ ४ ॥ अविणीअप्पा, उवयमा दया गया। दीसंति दुहमेहंता, आभिओगमुवट्टिा ॥५॥ सुविणीअप्पा, उपवझा हया गया। दीसति सुहमेहता, इड्डेि पत्ता महायसा ॥ ६ ॥ अविणीअप्पा, लोगम्मि नरनारिओ । दीर्मति दुहमेहंता, छाया । विगलिंदिआ ॥ ७ ॥ स्थपरिज्जुन्ना, असम्भवयणेहि अ । कलुणा विवन्नछंदा, खुप्पिवासपरिग्गया ॥ ८ ॥ । खुविणीअप्पा, लोगसि नरनारिओ । दासंति सुहमेहंता, इडिं पत्ता महायसा ॥९॥ अविणीअप्पा, देवा जस्खा अ गुज्मगा । दीसंति दुहमहंता, आमिओगमुवट्टिा । न सुविणीअप्पा, देवा जक्या अ गुज्झगा । दीसंति हमेहता, इड्डि पत्ता महायसा ॥ ११ ॥ मायरिअचम्झायाणं, मुस्मूसावयणं करे। तेसिं सिक्खा पवड्दति, जलसित्ता इव पायवा ॥ १२ ॥ जणहा परछा बा, सिप्पा णेउणिआणि अ । गिहिणो उपभोगट्ठा, इहलोगस्स कारणा ॥ १३ ॥ 1 बंधं वहं घोरं, परिआवं च दारुणं । सिक्खमाणा निअच्छंति, जुत्ता ते ललिइदिआ ॥ १४ ॥ पचे तं गुरु पूअंति, तस्म सिप्पस्स कारणा । सकारंति नमसंति, तुहा निर्देसवत्तिणो ॥ १५ ॥ इपुण जे सुअग्गाही, अणनहिअकामए । आयरिआ जं वर भिक्खु, तम्हा तं नाइवत्तए ॥ १६ ॥ ॥

-- - --- श्रीदमकालिकसूत्र-नवमाध्ययनम् नीम सिज्ज गइ ठाण, नीमच आसणाणि आनीमच पाए वदिना, नीअकुज्जा अ अनलिं॥ १७ ॥ सघट्टइचा काएण, तहा उवहिणामवि । समेह अवराह मे, वडज न पुणु चि अ॥१८॥ दुमाओ वा पओएण, चोडओ वहइ रह । एव दुयुद्धि फिचाण, वुत्तो वुत्तो पकुवइ ॥ १९ ॥ आलवते लवते वा, न निसिनाए पडिस्सुणे । मुत्तूण आसण धीरो, सुस्साए पडिस्मणे ॥२०॥ काल छदोषपार च, पडिलेहिताण देउहि । तेण तेण उवाएण, त त मपडियायए ॥ २१ ॥ विवनि अविणीअम्स, संपत्ती विणिअस्म य । जस्सेय दुहओ नाय, सिक्स से अभिगच्छइ ॥ २२ ॥ जे आवि चडे मइहड्डिगारवे, पिमुणे नरे साहसडीणपेसणे । अदिधम्मे विणए अकोचिए,असपिभागी न हु तम्स मुक्सो ॥ ॥ २३ ॥ निद्देसविची पुण जे गुरुण, सुअत्यधम्मा निणयम्मि कोविआ। तरितु ते ओधमिण दुरुत्तर, सवित्त कम्म गहमुत्तम गया ।। ॥२४॥ त्ति घेमि इअ विणयसमाहिणामायणे वीओ उद्देसो ममत्तो।। - । . आयरिम(अ)जम्गिमिपाहिअग्गी, मुम्सुममाणोपडिजागरिजा । आलोदअ इगिजमेन नचा, जो छदमाराहयई स पुज्जो ॥१॥ आयारमट्ठा विणय पउजे, सुस्मममाणो परिगिज्झ वक । जहोनइट्ट अमिक्समाणो, गुरु च नासायड जे स पुज्जो ॥२॥ रायणिएमु विणय पउने डहरा वि अ जे परिआयजिट्ठा । नीअतणे चट्टड सचबई, ओगायव सक्करे म पुजो ॥३॥ अन्नायउछ चरई विसुद्ध, जपणट्टया समुआण च निच । अल अ नो परिव इना, लधु न विकत्यई स पुज्जो ॥ ४ ॥ सथारसिजामणभत्तपाणे, अपिच्छया अइलामे नि सते । जो एवमप्पाणभितीमडब्जा, सतोमपाहन्नरए स पुज्जो ॥ ५ ॥ मया सहेर आमाइ कटया, अओमया उन्हया नरेण । अणासए जो उ महिन्ज स्टप, पर्टम कन्नमर स पुजो॥॥ महत्तदुवा उ हाति कठया, अओमया ते वि तओ मुउद्धरा । पायादुरुचाणि दुद्धराणि, वैराणुनीणि मरभयाणि ॥ ७ ॥ ममाश्यना वयणाभिगाया, कनगया दृम्मणि जाणति । धम्मु ति किचा परम गमरे, जिलिए जो महई म पुजो ॥ ८॥ अपण्णवाय च परम्मुदस्म, परम्पओ पटिणी च भाम । जोहारणिं अप्पिसारणिं च, भाम न भामिन्न मया म पुनो ।। ९ ।। अलोरए अरहरा अमाई, अपिमृणे जारि अाणवित्ती। नो मायग्नो विन माविअप्पा, अमोउदष्ट न या न पुलो ॥ १० ॥ .

श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला ~~~ ~~~ गुणेहि साह अगुणेहिऽसाहू, गिहाहि साहू गुण मुंचऽसाहू । विआणिआ अप्पगमप्पएणं, जो रागदोसेहि समो स पुज्जो ॥ ११ ॥ तहेव डहरं च महल्लगं वा, इत्थी घुमं पदइअं गिहिं वा । नो हीलए नो वि अखिंसज्जा थंभं च कोहं च चए पुज्जो ॥ १२ ॥ जे माणिआ सयययं माणयंति, जत्तेण कन्नं व निवेसयंति । ते माणए माणरिहे तवस्सी, जिइंदिए सच्चरए स पुज्जो ॥१३॥ तेसिं गुरुणं गुणसायराणं, सुचाण मेहावि सुभासिआई। चरे मुणी पंचरण तिगुत्तो, चउक्कसायावगए स पुज्जो ॥ १४ ॥ गुरुमिह सययं पडिगरिअ मुणी,जिणमयनिउणे अभिगमकुसले । धुणि रयमलं पुरेकडं, भामुरमउलं गई वइ ( गय ) ॥ १५ ॥ त्ति बेमि ।। इअ विणयसमाहीए तइओ उहेसो समत्तो ॥ सुअं मे आउसं-तेणं भगवथा एवमक्खायं । इह खलु थेरेहिं भगवंतेहिं चत्तारि विणयसमा- हिठाणा पन्नत्ता । कयरे खलु ते थेरेहिं भगवतेहिं चत्तारि विणयसमाहिट्ठाणा पन्नत्ता । इमे खलु ते थेरेहिं भगवंतेहिं चत्तारि विणयसमाहिट्ठाणा पन्नत्ता । तंजहा-विणयसमाही, सुअसमाही, तवस- माही, आयारसमाही । “विणऐ सुए अ तवे, आयारे निच पंडिआ। अभिरामयंति अप्पाणं, जे भवंति जिइंदिआ" चउबिहा खलु विणयसमाही भवइ । तंजहा-अणुसासिजतो, सुस्सूसइ । सम्म पडिवज्जइ । वयमाराहइ । न य भवइ अत्तसंपग्गहिए। चउत्थं पयं भवइ । भवइ अ इत्थ सिलोगो।। "पहेइ हिसाणुसासणं, सुस्सूसइ तं च पुणो अहिहिए । न य माणमएण मजइ, विणयसमाहिआ- ययहिए" ॥ २ ॥ चउबिहा खलु सुअसगाही भवइ । तंजहा-सुअं मे मविस्सइ त्ति अज्झाइअव्वं भवइ । एगग्गचित्तो भविस्सामि त्ति अज्झाइअवयं भवइ । अप्पाणं ठावइस्सामि त्ति अज्झाइअवयं भवइ । ठिओ परं ठावइस्सामि त्ति अज्झाइअवयं भवइ । चउत्थं पयं भवइ । भवड अ इत्थ सिलोगो।। "नाणमेगग्गचित्तो अ, ठिओ अ ठावइ परं । सुआणि अ अहिजित्ता, रओ सुअसाहिए" ॥३॥ चउबिहा खलु तवसमाही भवइ । तंजहा-नो इहलोगट्टयाए तवमहिडिजा, नो परलोगट्टयाए तब- महिडिजा, नो कित्तिवन्नसद्दसिलोगट्ठाए तवमहिडिजा, नन्नत्य निजरट्टयाए तवमहिद्विज्जा। चउत्थं पयं भवइ । भवइ अ इत्थ सिलोगो || "विविहगुणतवोरए, निचं भवइ थिरासए निजर- ट्ठए । तवसा धुणइ पुराणपावगं, जुत्तो सया तबसमाहिए"॥ ४ ॥ चउनिहा खलु आयारसमाही भवइ । तंजहा-नो इहलोगट्टयाए आयारमहिडिज्जा, नो नो परलोगट्टयाए आयारमहिहि न, नो केत्तिवन्नसद्दसिलोगट्टयाए आयारमहिडिजा, नन्नत्थ आरहंतेहिं हेऊहिं आयारमहिद्विजा । चउत्थं इयं भवइ । भवइ अ इत्थ सिलोगो । “जिणवयणरए अतिंतणे, पडिपुन्नाययमाययट्ठिए । आयार- माहिसंवुडे, भवइ अ दंते भावसंघए ॥ ४ ॥ अभिगम चउरो समाहिओ, सुविसुद्धो सुसमाहिअ- पणो । विउलहिअं सुद्दावहं पणो. कवर शो "पखेममप्पणो ॥ ६॥ जाइमरणाओ मुच्चइ इत्थत्थं

श्रीदमकालिकसूत्र-दममाध्ययनम्
(९७)
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च चएड सबसो । सिद्धे वा हाइ सासए, देवे या अप्परए महिड्डिए ॥ ७ ॥
त्ति वेमि ॥ इअ विणयममाही नाम चउत्यो उद्देमो नवममज्झयण समत्त ॥९॥
॥ अह भिक्खू नाम दसममज्झयण ॥
तिक्सम्ममाणाइ अयुद्धपयणे, निच चित्तसमाहिओ हविज्जा ।
इत्थीण वस न आवि गच्छे, वत नो पडिआरड जे स भिक्ख् ॥१॥
पुढ िन सणे न सणाए, सीओदग न पिए न पिपाए ।
अगणि सत्य जहा मुनिसिअ, त न जले न जलावए जे म भिखू ॥ २ ॥
अनिलेण न वीए न बीयावए, हरियाणि न छिंढे न छिंदारए ।
नीआणि मया विनज्जयंतो, मचित्त नाहारए जे स मिक्खू ॥ ३ ॥
वहण तसथावराण होइ, पुढवितणक्ट्ठनिस्सिाण ।
तम्हा उसिम न भुजे नो वि, पए न पयावर जे स भिक्खू ॥ ४ ॥
रोटअ नायपुत्वयणे, अत्तममे मनिज छप्पि कार ।
पच य फासे मडव्वयाइ, पंचामवसपरे जे स भिक्खू ॥५॥
चत्तारि बमे मया कसाए, धुनजोगी हरिज उद्धनयणे ।
अहणे निजायरूपरयए, गिहिजोग परिरजए जे स मिक्बू ॥ ६ ॥
सम्मदिट्ठी मया अमृढे, अत्यि हु नाणे तवे सजमे अ |
तपसा धुणइ पुराणपाग, मणयकायमसवुडे जे म भिक्यू ।। ७ ।।
तहेव असण पाणग वा, विविह साहमसाइम लभित्ता ।
होही अट्ठो सुए परे वा, त न निहे न निहारए जे म भिक्स्यू ॥ ८॥
तहेव असण पाणग वा, विविह साइममादम लभित्ता।
छदिअ साहम्मिाण भुजे, मुचा मज्झायरए जे म भिक्खू ॥ ९ ॥
न य युग्गहिअ कह कहिल्ला, न य कुप्पे निहुइदिए पसते ।
सजमधुवजोगजुचे, उपसते उपहेडए जे स भिक्ख् ॥ १० ॥
जो गहड हु गामकटए, अक्कोमपहारतजणाओ अ।
भयमेरवसहसप्पहासे, ममसुदुक्ससहे अजे स भिस्ए । ११ ।।
पडिम पडिजिआ समाणे, नो भायए भयभेरगाइ दिस्म ।
विविगुणतमोरए अनिच्च, न सरीर चाभिरुपए जे सभिक्खू ॥ १२ ॥
अमड पोसिट्टचत्तदेहे, अबुट्टे न हए सिए था।
पुढविसमे मुणी इविजा-अनिआणे अकोउदृष्टे जे म भिक्ए ।। १३ ।।
अमिभूा कारण परीमहाइ, ममृद्धरे जाइपहाउ अप्पय ।
विउत्तु जाईमरण महन्मय, तवे रण सामणि जे स भिक्खू ॥ १४ ॥

श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला.
-९८)
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हत्थसंजए पायसंजए, वायसंजए संजइंदिए।
अज्झप्परए सुसमाहिअप्पा, सुत्तत्थं च विआणइ जे स भिक्खू ।। १५॥
उबहिम्मि अमुच्छिए अगिद्धे, अन्नायउंछं पुलनिप्पुलाए ।
कयविक्कयसन्निहिओ विरए, सत्संगावगए अ जे स भिक्खू ॥ १६ ॥
अलोल(लोभिक्खू न रसेसु गिज्ञ,उंछ चरे जीविअनाभिकंसी ।
इडूि च सकारण पूअणं च, चए ठिअप्पा आणिहे जे स भिक्खू ॥ १७ ॥
न परं वइजासि अयं कुसीले, जेणं च कुप्पिज न तं वइजा ।
जाणिअ पत्ते पुन्नपावं अत्ताणं न समुझसे जे स भिक्खू ॥ १८ ॥
जाइमत्ते न य रूवमत्ते, न लाभमत्ते न सुएण मत्ते ।
मयाणि सहाणि विवजइत्ता, धम्मज्झाणरए जे स भिक्खू ।। १९ ।।
पवेअए अञ्जपयं महामुणी, धम्मे ठिओ ठावयइ परं पि ।
निक्सम्म बजिज कुसीललिंग,न आबि हासं कुहए जेस भिक्खू ।। २० ।।
तं देहवासं असुई अमासयं, सया चए निचहिअद्विअप्पा ।
छिदित्तु जाइमरणस्स बंधणं, उवेइ भिक्खू अपुणागमं गई ॥ २१ ॥
त्ति वेमि ॥ इअ सिक्खु नामं दसमझयणं समत्तं ।।
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॥ अह रइवका पढमा चूलिआ ॥
इह खलु भो पञ्चइएण उप्पण्णदुक्खेणं संजमे अरइसमावन्नचित्तेणं ओहाणुप्पेहिणा अणोहाइएणं
चेव हयरस्सिगर्यकुसपोयपडागाभूआई इमाई अवारस ठाणाई सम्मं संपडिलेहिअबाई भवंति। तंजहा
हं भो! दुस्समाइ दुप्पजीवी ॥१॥ लहुसगा इत्तरिआ गिहीणं कामभोगा ॥ २ ॥ भुज्जो अ साय-
बहुला मणुस्सा ॥ ३ ॥ इमे अ मे दुक्खे न चिरकालोवट्ठाइ भविस्सइ ॥ ४ ॥ ओमजणपुरकारे
॥५॥ वंतस्स य पडिआयणं ॥ ६ ॥ अहरगइवासोवसंपया ॥ ७ ॥ दुल्लहे खलु भो! गिहीणं धम्मे
गिहिवासमझे वसंताणं |८|| आयंके से वहाय होइ ।।९॥ संकप्पे से वहाय होई ॥१०॥ सोवक्केसे
गिहवासे, निरुबक्केसे परिआए ॥ ११ ॥ बंधे गिहवासे, मुक्खे परिआए ।।१२।। सावजे गिहवासे,
अणवज्जे परिआए ॥ १३ ॥ बहुसाहारणा गिहोणं कामभोगा ॥ १४ ॥ पत्ते पुन्नभावं ॥ १५ ॥
अणिचे खलु भो! मणुआण जीविए कुसग्गजलविंदुचंचले ॥१६॥बहुं च खलु भो! पावं कम्मं पगडं
॥ १७ ॥ पावाणं च खलु भो ! कडाणं कम्माणं पुत्विं दुचिन्नाणं दुप्पडिकंताणं वेइत्ता मुक्खो नत्थि
अवेइत्ता तवसा वा झोसइत्ता ॥ १८ ॥ अट्टारसमं पयं भवइ, भवइ अ इत्थ सिलोगो-
जया य चयई धम्म, अणजो भोगकारणा। से तत्थ मुच्छिए चाले, आयई नाववुझई ।। १ ।।
जया ओहाविओ होइ, इंदो वा पडिओ छमं । सबधम्मपरिभट्ठो, स पच्छा परितप्पइ ।। २ ।।
जया अवंदिमो होइ, पच्छा होइ अवंदिमो। देवया व चुआ ठाणा, स पच्छा परितप्पड़ ॥ ३ ॥

. श्रीदमकालिकास्त्र-दसमाध्ययनम् जया अ माणिमो होइ, पच्छाहोइ अमाणिमो । सिट्ठिव कबडे छूढो, स पन्छा परितप्पह ॥५॥ जया अ धेरओ होड, समक्तजवणो। मच्छुछ गलिं गलिचा, स पच्छा परितप्पइ ॥ ६ ॥ जया अ कुकुडुवस्म, कुततीहिं विहम्मड । हत्यी व बघणे बद्धो, स पन्छा परितप्पइ ॥ ७ ॥ पुतदारपरिकिन्नो, मोहसताणसतओ। पकोसन्नो जहा नागो, स पच्छा परितप्पड़ ॥ ८॥ अज्ज आह गणी हुतो, भाविअप्पा बहुम्सुओ । जड हरमतो परिआए, सामने जिणदेसिए ॥९॥ देवलोगसमाणो अ, परिआओ महेसिण । स्याण, अरयाण च, महानरयसारिमो॥१० अमरोवम जाणिअ सुक्खमुत्तम, स्याण परिआए तहाग्याण । निरओचम जाणि दुक्खमुत्तम, रमिज तम्हा परिआयपडिए ॥ ११ ॥ धम्माउ भट्ट सिरिओववेय, जन्नग्गि विज्झायमिवप्पते । हीलति ण दुविहिअ कुसीला, दाढदिअ घोरविस व नाग ॥ १२ ॥ इहेब धम्मो अयसो अकित्ती, दुनामधिज्ज च पिहुज्जगम्मि। चुअस्स धम्माउ अहम्मसेविणो, सभिन्न वित्तस्मय हिट्टओ गई ॥ १३ ॥ अजित्तु भोगाइ पमज्झ चेअसा, तहाविह कटु असजम बहु । गहच गच्छे अणहिज्झिम दुह, बोही असे नो सुलहा पुणो पुणो ॥ १४ ॥ इमस्स ता नेरहअस्म जतुणो, दुहोवणीअस्स किलेसरत्तिणो । पलिओवम झिज्जह सागरोतम, फिमग पुण मज्झ इम मणोदुह ॥१५॥ न मे चिर दुक्खमिण भविस्मड, अमामया मोगपिवाम जतुणो । न चे सरीरेण इमेण निस्सह, अविस्मई नीविअपञ्जवेण मे ॥ १६ ॥ जस्सेवमप्पा उ हविज निच्छिओ, चइल देह न हु धम्मसामण । त तारिम नो पहलिंति इदिआ, उर्विति वाया व मुदसण गिरिं ॥ १७ ॥ इच्चेव सपस्सिम गुद्धिम नरो आय उवाय विविह विआणिआ। कारण वाया अदु माणसेण तिगुत्तिगुत्तो जिणायणमहिद्विजासि ॥१८॥ त्ति वेमि ।। अरइयका पढमा चूला समत्ता ॥१॥ ।। अह विवित्तचरिया बीआ चूलिआ॥ चूलिअ तु पवक्पामि, सुअ केवलिभासिअ । ज सुणित्तु सूपुष्णाण, धम्मे उप्पजए मई ।। १ अणुसोअपट्ठिए बहुजणम्मि परिसोअलद्धलक्खेण । पडिसोअमेर अप्पा, टायचो होउफामेण || अणुसोभसुहोलोओ,पडिसोओ आसनो सुविहिआणाअणुसोओससारो,पडिमोओ तस्म उत्तारो ।। तम्हा आयारपरकमेण समरममाहिबहुलेण । चरिआ गुणा अनियमा अ, हुति माहूण दट्ठा ।। अणिमासो समुआणचरिआ, अन्नायउछ पयरिखया अ। अप्पोतही क्लहविजनणा अ, विहारचरिआ इसिण पमत्था ॥ ७ ॥ आइन्नओ माणविवज्जणा अ, जोमन्नदिवाइडभत्तपाणे ।

श्री खरतरगच्छय ज्ञान मन्दिर, जयपुर श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला -~ JNIV . संसहकप्पेण चरिज भिक्खू, तज्जायसंसह जई जइजा ।। ६ ।। अमज्जमंसासि अमच्छरीआ, अभिरवणं निधिगई गया अ। अमिक्खणं काउस्सग्गकारी, सज्झायजोग पयओ हविजा ॥ ७॥ न पडिन्नविजा सयणासणाई, सिजं निसिज्ज तह भत्तपाणं । गामे कुले वा नगरे व देसे, ममतभावं न कहिं पि कुन्जा ।। ८ ।। गिहिणो वेआवडिअं न कुज्जा, अभिवायणं बंदणपूअणं वा । असंकिलिडेहि समं वसिज्जा, मुणी चरित्तरस जओ न हाणी ॥ ९ ॥ न या लभेजा निउणं सहायं, गुणाहिरं वा गुणओ समं वा । इक्को वि पाबाई विवजयंतो, विहरिज कामेसु असज्जमाणो ॥ १० ॥ संबच्छरं वा वि परं पमाणं, वीरं च वासं न तहिं बसिज्जा। सुत्तस्स मग्गेण चरिन्जभिक्ख, सुतस्म अत्थो जह आणवेइ ॥ ११ ॥ जो पुवरत्तावररत्तकाले, संपिक्खाए अप्पगमप्पएणं । कि मे कडं किं च मे किच्चसेस, किं सकणिजं न समायरामि ।। १२ ॥ किं म परा पासइ किंच अप्पा, किं वाहं खलिअं न विवजयामि । इच्चेव सम्म अणुपासमाणो, अणागयं नो पडिबंध कुज्जा ।। १३ ।। जत्थेव पासे कइ दुप्पउत्तं, कारण वाया अदु माणसेण । तत्थेव धीरो पडिसाहरिज्जा, आइन्नओ खिप्पमित्र क्खलीणं ।। १४ ।। जस्सेरिसा जोग जिंइदिअस्स, धिईमओ सप्पुरिसस्स निच । तमाहु लोए पडिबुद्धजीवी, सो जीअइ संजमजीविएणं ॥ १५ ॥ अप्पा खलु सययं रविवअव्यो, सबिदिएहिं सुसमाहिएहिं । अरस्खिओ जाइपहं उवेइ, सुरक्खिओ सम्बदहाण मुच्चइ ।॥ १६ ॥ त्ति वेमि || इअ विवित्तचरिआ वीआ चूला समत्ता । , ॥ इअ दसवेआलिअं सुत्तं समत्तं ॥

न । श्रीमद्देनऋद्धिगणिक्षमाश्रमणप्रणीत ॥ श्री नन्दीसूत्र मूलपाठः । जयह जग जीप जोणी वियाणओ। जगगुरू जगाणदो ॥ जगणाहो जगांध, जयह जगप्पि यामहोमयर ॥१॥ जयह सुआण पभयो । तित्थयराण अपच्छिमो जयइ ।। जयड गुरूलोगाण जयइ महप्पा महावीरो ॥ ॥ भद्द सब जगज्जोयगस्स । भद्द जिणम्स वीरस्स ॥ भद्द सुरासुरनम सियम्स । मद्द धुयरयस्स ॥३॥ गुणभरणगहण | सुयग्यण भरियदसणनिमुद्धरत्थागा सघ नग भ६ ते । अखड चारित्तपागारा ॥ ४॥ सजम तच तुमारयस्म । नमो मम्मत्त पारियल्लस्म । अप्पडिचकस्स जओ होउ सया मयचकस्स ॥ ५ ॥ भद्द सील पडागृसियस्म । तर नियम तुरर जुत्तस्म ॥ सघरहस्स भगवओ । मज्झाय सुनदियोमस्स ॥ ६ ॥ कम्मरय जलोह विणिग्गयम्स सुयरयण दीहनालस्स ।। पच महत्वय यिरकन्नियस्स । गुणकेमगलम्स ॥ ७ ॥ मारग जण महुआ परिवुडस्म । जिण सूर तेय युद्धस्म ॥ मघपउमस्स भद्द । ममण गण सहम्म पत्तस्म ॥ ८॥ त सजम मयलउण । अकिरिय राहुमुह दुद्धरिसनिञ्च ! जय मघ चद । निम्मल सम्मत्त विसुद्ध जो पहागा ॥ ९ ॥ पर तित्थिय गह पह नासगस्म | तबतेय दित्त लेमस्म ॥ नाणु जोयस्म जाए मद्द दम सघ सूरस्म ॥१०॥ भद्द घिड वेला परिगयस्म । मज्झाय जोग मगरस्स ॥ अक्सोहस्म भग वओ । मघ समुहस्स रुदम्स ॥ ११ ॥ मम्म हमण पर पहर दढ रुढ गाढावगाढ पेढस्स ॥ धम्म चररयण मडिय चामीयर मेहलागस्म ॥ १२ ॥ निय मूसिय क्णय सिलायलुजल जलत चित्ता डस्स ।। नदण वण मणहर सुरभि सील गधु मायस्म ॥ १३ ॥ जीनदया सुनर कद रुदरिय मुणियर मइद उन्नस्म ।। हेउ सय धाउ पगलत रयणदित्तोसहि गुहम्स ॥ ४॥ सनर पर जल पग लिय उन्झर पविराय माणहारस्म । साग जण पउर रसन मोर ननत कुहरम्स ॥१५॥ विणय नय पर मूणिर फरत पिज्जुञ्जलत सिहरस्म । तिनिह गुण सप्प रुसग फलभर कुसुमाउल पणस्म ॥ १६ ॥ नाण वर रयण टिप्पत कन वेरुलिय मिल चूलस्म ॥ वदामि विणय पणओ सर महामदर गिरिस्स ॥ १७ ॥ गुण रयणुजल कडय सील सुगधि तम मडिउदेस ॥ सुयनारम गसिहर सघ महामदर घटे ।। १८ ।। नगर रह चछ पउमे चंदे सूरे समुद्द मेरुम्मि ॥ जो उनमि- जह सयय त मघगुणायर उदे ॥ १९॥ नटे उमम अजिय समत्र ममिनदण मुमड सुप्पा सुपास।।

~~~~~~ 1/14 vvvvvvvvvvv १०२) श्रीजैन सिद्धान्त-स्वाध्यायमाला. ससि पुप्फदंत सीयल सिजसं वासुपुजं च ॥ २० ॥ विमल सणंत य धम्म सन्ति कुंथु अरं च मल्लिं च ॥ मुनिसुहय नमिनेमि पास तह बद्धमाणं च ।। २१ ।। पढमस्थि इंदभृह बीए पुणहोई अग्गिभू- इत्ति । तईए य वाउभूई तओ वियत्ते सुहम्मेय ॥ २२ ॥ मंडिअ मोरिय पुत्ते अकंपिऐ चेव अयल भायाय॥ मे यज्जेय पहासेय गणहरा हुंति वीरस्स ॥ २३ ।। निव्वुह पह सामणयं जयइ सया सब भाव देसणय।। कु समय मय नासणयं जिणिंदवर वीर सासणयं ॥२४॥ सुहम्मं अग्गिवेमाणं जंबू- नामं च कासवं पभवं ।। कचायणं वंदे बच्छं सिजभवं तहा ॥ २५ ॥ जसमई तुंगियं बंदे संभृयं वेव माढरं ।। भद्दबाहुं च पाइन्नं थूलभदं च गोयमं ॥ २६ ॥ ऐलावचसगोत्तं वदामि महागिरि सुहत्थि च ॥ तत्तो कोसियगोत्तं बहुलस्स सरिवयं चन्दे ॥ २७ ॥ हाग्यि गुत्वं साई च चंदिमो हारियं च सामज । बन्दे कोसिय गोत्तं संडिल्लं अज जीयधरं ।। २८ ॥ तिसमुहखायकित्ति दीन समुद्देसु गहिय पेयालं 11 वंदे अज समुदं अक्खुमिय समुद्दगंभीरं ॥ २९ ॥ भणगं करगं झरगं पभावगं णाणदसण गुणाणं ।। चंदामि अज मंगुं सुय सागर पारगं धीरं ॥३०॥ वंदामि अज धम्म तत्तो वंदे य भ६ गुत्तं च ॥ तत्तोय अन्ज बहरं तव नियम गुणेहि वइरं समं ।। ३१ ॥ बंदामि अन्न रक्खिय खमणे रक्खिय चारित्त सबस्से ।। ग्यण करडंग भूओ अणुओगो जेहिं ।। ३२ ॥ नाणम्मि दसण म्मिय तव विणए णिच काल मुज्जुत्तं ।। अजं नंदिलखमण सिरमा वंदे पमन्त्रमणं ॥ ३३ ॥ वट्टर वायगवंसो जलचसो अज नागहाणं ।। वागरण करण भंगिय कम्मपयडी पहाणाणं ॥३॥ जचजण धाउ समप्पहाण मुद्दिय कुवलय निहाण || वढउ वायगवंसो रेवइनक्खत्त नामाणं ॥३०॥ अयलपुरा णिक्खते कालियसुय आणुओगिए धीरे ॥ भद्दीवगसीहे वायगपय मुत्तमं पत्ते । ३६॥ जेसिं इमो अणु ओगो पयरइ अन्नाविअड्डढभरहम्मि ॥ बहु नयर निग्गय जसे ते वंदे संदिलाय. रिए ॥ ३७ ॥ तत्तो हिमवन्त महंत विक्कमे धिइ परकम मणंते ! सन्याय मतधर हिमवने चंदि- मो सिरसा ॥ ३८ ॥ कालिय सुय अणु ओगस धारए धारए 4 गुन्वाणं । हिमवंत खमा ममणे चंदे णागज्जुणायरिये ।। ३९ ।। मिउमय संपन्ने आणुपुबिण पत्ते ॥ ओहमुय समायारे नाज्जुण वायए बंदे ।। ४० ॥ गोविंदाणं पि नमो अधुओश विल धारिणि दाणं ॥ णिचं खंति दयाणं पत्रणे दुल्लभि दाणं ।। ४६ ॥ तत्तो य भूयदिन्न निचं तव संजमे अनिविण्णं ।। पंडिय जण सामण्णं बंदामो संजम विहिण्णु ॥ ४२ ॥ करकणगतविय चंपग विमउलवर कमल गम्भ सरिवन्ने ।। भविय जणहिययदइए दयागुण विसारए धीरे॥४३॥ अड्ड भरहप्पहाणे बहुविह सज्झाय सुमुणिय पहाणे । अणुओगिय पर वसभे नाइल कुल वंसनंदिकरे ॥४४॥ भूयहियअपगम्भे वंदेऽहं भूयदिन्न मायरिए ॥ भवभय बुच्छेय करे सीसे नागजुण रिसीणं ॥४५॥ सुमुणिय निच्चा निच सुमुणिय सुत्तत्थ धारयं वन्दे ।। सम्भावुभावणया तत्थं लोहिचणामाणं ।। ४६ ।। अत्थ महत्थ- क्खाणिं सुसमण वक्खाण कहण निवाणि॥ पयईए महुरवाणि पयओ पणमामि दूसगणि ।। ४७ ।। तव नियम सच्च संजम विणयजब खंति मद्दवरयाणं ।। सील गुणगद्दियाणं अणुओग जुगप्पहाणाणं ॥४८॥ मुकुमाल कोमल तले तेसिं पणमामि लक्खण पसत्थे पाए पावयणीणं पडिच्छ सय एहि पणि वइए ।। ४९ ॥ जे अन्ने भगवन्ते कालिय सुय आणु ओगिए धीरे ।। ते पणमिऊण सिरसा नलागतमोय ..... रापा || श्री'नन्दीसूत्र मूलपाठः ॥ ११.३१ ~ - इति । AN २ -- - ५ ९ . सेल-घण, कुडग, चालणि, परिपूर्णग, हम. महिम, मेसे य, ममग, जल्ग, निराली जाहग, गो मेरी आमीरी ॥ ५१॥ "सा समासओ तिविहा पन्नता वजहा जाणिया, अनाणिया, दुधियड्डा" जाणिया जहा सौर मिर, जहा इसा जे घुट्टन्ति हह गुरगुण समिद्धा दोसे य विवञ्जति त जाणमु जाणिय परिस ॥५२॥ अजाणिया जहा-जा होड पगडमहुरा मियछापय सीह कुक्कुडय भू । रयणमिव असठविया अजाणिया माभवे परिसा ।। ५३ ॥ दुखियड्डा जह-नय कस्या निम्माओ न य पुच्छइ परिभवस दोसेण । वत्यिवनायपुण्णो फुट्टह गामिल्लयवियडो दुवियडो ।। ५४ ।। (सून) नाण पत्रविहं पन्नत वजहा-आमिणि बोहियनाण सुयनाण, ओहिनाण, मणपञ्जननाण, केलनाण ॥ १॥ त समामा दुविह पण्णत, तजहा-पचक्ख च परोक्ख च ॥ सू० २ ॥ से कि तं पञ्चक्स ? पचक्स दुविहर ण्णत्त, तजहा इदियपच्चक्स । नोडदियपञ्चक्स च ॥ सू० ३ ।। से कि त इदिय पचक्सर इढिय पनक्स पश्चविह पण्णच, तजहा-सो इदियपचक्य । चरिंसदिय पचक्स । घाणिदिय पचक्ख जिभिदिय पचक्स । फासिंदिय पञ्चक्ख । सेतं इदियपचास ।। सू० ४ ॥ से किं तं नोहदियप चक्स ? नोइदियपञ्चक्स तिविह पण्णत्त तजहा-ओहिनाण पञ्चक्ख । मणपज्जवनाण पचक्स । केवलनाण पञ्चक्स ॥५॥ से किं तं मोहिनाण पञ्चक्स ? ओहिनाण पञ्चक्स दुविह पण्णच तजहा-भरपञ्चायच सा ओवममिय च ॥ ६ ॥ से किं त भरपञ्चडय ? भरपञ्चहय दुण्ड, तनहा- देवाणय नेरहयाणय ॥ ७॥ से कि त सा ओवममिय? म्बा ओवममय दुण्ह, तजहा-मणूमाण य पचंदिय तिरिक्स जोणियाण य । को हेज खाओग्ममिय' साओवसमिय तयारणि नाण कम्माण उदिणाण खएण अणुदिण्णाण उसमेण ओहिनाण गमुप्पजह ॥ सू०८॥ अहवा पडिवनस्म अणगारम्म ओहिनाण समुप्पजइ तं समासओ छविह पण्णत्त, तजदा-आणुगामि" अणाणुगामिय, बढमाणय, हीयमाणय, पडिवाइय, अपडिवाइग ॥६॥से किंत , आणुगामिग ओहिनाण दुविह पण्णच, तजहा-अतगग च मझगग च । से किं तं अतगण अतगय तिविह पण्णत तजहा पुरओ अतगय? मग्गओ अतगय। पामओ अतगय मे कित. • अतगय? पुरओ अतगय-से जहा नामए केड पुरिसे उतना चहुलिय मा अलाय मणि चा पईन वा जोइ वा पुरओ काउ पणुल्लमाणे २ गोला, से त पुरओ अगय । से कि मग्गो अवगय ' भग्गओ अतगय से जहानामए के पुरिसे उक्क मा चइलिय या अलायें मणि वा पत्र वा जोड मा मग्गो काउ अशुलड्ढेमाणे गच्छिमा, मे त अवगय । मे कि पामओ अवगय पामओ अतगय मेजहानामए के पुरिसे उक वाचइलिय या अलाय काम वापर्डन वा जोड वा पामओ सर परिरहढे 'माणे रंगच्छिन्नी मे त पामओ अगय में २ ४ ५ ६ AN -Arvv W ११०४) श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला णि वा पईचं वा जोई वा मत्थए काउं समुबह माणे २ गच्छिजा सेतं मझगयं । अंतगयस्स राज्झगयस्स य को पइविसेसो । पुरओ अंतगएणं ओहि नाणेण पुरओ चेव संखिजाणि वा असंखे- आणि वा जोयणाई जाणइ पासह मग्गओ अंतगएणं ओहिनाणेणं मग्गओ चेव संखिजाणि वा असं- खिजाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ । पासओ अंतगएणं ओहिनाणेणं पासओ चेव संखिजाणि या असंखिजाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ । मज्जगएणं ओहिनाणेणं महओ समंता संखिजाणि वा असंखिज्जाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ । से तं आणुगामियं ओहिनाणं ॥ १० ॥ से किं तं अणा- गुगामियं ओहिनाणं अणाणु गामियं ओहिनाणं से जहानामए केइ पुरिसे एगं महंतं जोइट्टाणं काउं उस्सेव जोइटाणस्स परिपेरं तेहिं परिपेरंतेहिं, परिघोले माणे परिघोलेमाण तमेव जोइट्ठाणं पासह, अन्नत्यगए न जाणइ न पासइ एवामेव अणाणुगामियं ओहिनाणं जत्थेव समुप्पन्नइ तन्थेव संखे- जाणि वा असंखेजाणि वा संवद्धाणि वा असंबद्धाणि वा जोयणाई जाणइ पामह; अन्नन्थगएण पासइ, से तं अणाणुगामियं ओहिनाणं ॥ ११ ॥ से किं तं बढमाणयं ओहिनाणं ? बढमाणयं ओहिनाणं पसत्थेसु अज्झवसायवाणेसु वड्डमाणस्म बमाण चरित्तस्म । विमुज्जमाणम्स विमृज्झ- 'माण चरित्तस्स । सबओ समंता ओहि बड्डइ--- . जावड़आ तिसमयाहारगस्स मुहुमस्म पणगजीवस्स ॥ ओगाहणा जहन्ना ओहीखितं जहन्न ; ॥ ५५ ॥ सब बहु अगणि जीवा निरंतर जत्तियं भरिज्नंसु ॥ खित्तं सबदिसागं परमोही खेत्तनि. देहो :। ५६ ।" अंगुलमावलियाणं भाग मसंखिज दोसु मंखिज्जा | अंगुलमावलियंतो आवलिया गुल पुहुत्तं ॥ ५७ ॥ हत्थम्मि मुहुत्ततो, दिवसंतो गाउयम्मि बोद्धव्यो । जोयण दिवसपुहुत्तं, संतो पन्नवीसाओ || ५८ । भरहम्मि अद्धमासो, जम्बुद्दीवम्मि साहिआ मासा ॥ वामं च [णुय लोए, वासपुहुत्तं च रुयगम्मि ॥५९ ।। संखिज्जम्मि उ काले, दीयममुद्दावि हुंति संग्विना।। कालम्मि असंखिज्जे, दीवसमुद्दा उ भइयव्वा ।। ६० ।। काले चउण्हवुड्डी, कालो भइयव्यु नित्त ड्डीए । वुड्डीए पत्रपज्जय, भइयत्वा खित्तकाला उ ।। ६१ ।। सुहुमो य होइ कालो, नत्तो नहुम- रिं हवइ खितं अंगुल सेढी मित्ते, ओसप्पिणिओ असंखिज्जा ।। ६२ ।। से तं वड्डमाणयं ओहिनाणं ॥ १२ ॥ से किं तं हीयमाणयं ओहिनाणं ? हीयमाणयं ओहिनाणं अप्पसत्येहिं अज्झवसायट्ठा- हिं वड्डमाणस्स वड्डमाणचरित्तस्स संकिलिस्स माणस्स संकिलिस्समाणचरित्तम्स सबओ समन्ता कोही परिहायइ से तं हीयमाणयं ओहिनाणं ॥ १३॥ से किं तं पडिबाड ओहिनाणं ? पडिवाइ मोहिनाणं जहणणं अंगुलस्स असंखिजय भागं वा संखिजय भागं वा बालग्गं वा वालग्ग पुहत्तं IT लिक्खं वा लिक्खपुहुत्तं वा, जूयं वा जूयंपुहुत्तं वा, जयं वा जब पुहुत्तं वा । अंगुलं वा अंगुल- हुत्तं वा । पायं वा पायपुहुत्तं वा । विहत्थि वा विहत्थि पुहुत्तं वा । रयणि वा रयणि पहुत्तं वा। च्छि कुच्छिाहुत्तं बा, धणुं वा धणुपहुतं वा । गाउअंबा गाउयपुहुत्तं वा । जो यण वा जोयणं हुत्तं वा । जोअणसयं वा जोयणसय पुहुत्तं वा जोयण सहस्सं चा जो यणसहस्स पुहुत्तं वा । जो. पणलक्खं वा जोयणलक्ख पुहुत्तं वा । जोयणकोडिं वा जोयणकोडाकोडि पुहुत्तं वा। जोयणकोडा- रोहिं ना.जोयणकोदाकोटि प्रदत्तं वा. जो अणमंखिज्ज वा जो अणमंखिज पहत्तं वा जो अणु व -MH-~- - . ॥ श्री नन्दीसूत्र मूलपाठ ।। (१०५ अमखेना जो अणअसखेजपुहत्तया ।] उक्नोसेण लोग वा पासि ताण पडिबडल्ला । से त पडिया ओहिनाण ॥ १४ ॥ से कि त अपडिगाड ओहिनाण । अपडिमाह ओहिनाणजेण अलोगस्म पर मवि आगासपएस जाणड पासह तेण पर अपडिगाइ ओहिनाण । सेत्त अपडिनाइ ओहिनाण ॥१५ त ममासओ चउबिह पण्णत्त, तजहा दवओ, सित्तओ, कालओ, भानओ। तत्थ दब ओ ण ओहि नाणी जहन्नेण अणताइ रूविदयाइ जाणड पामड उक्कोसेण सबाड रूविदवाड जाणड पासह सिच ओण ओहिनाणी जहन्नेण अगुलम्म असखिजय भाग जाणह पासड, उक्कोसेण अमसि ज्वाइ अलोरे लोगप्पमाण मित्ताह सडाड जाणड पासड, कालओ ण ओहिनाणी जहन्नण आरलियाए अससिज्जर भाग जाणड पासह, उक्कोसेण अससिज्जाओ उस्सप्पिणीओ अवसप्पिणीओ अर्डय मणागय च कार जाणड, पासड भारओ ण ओहिनाणी जहन्नण अणते भावे जाणह पासइ, उक्कसेणवि अणते भार जाणड पासड । सब भावाण मणत भाग भावे जाणड पामइ ।। १६॥ ओही भरपच्चडओ गुणपच्च इओ य वण्णिओ दुविहो । तस्स य वह विगप्पा दन्चे खित्ते य कालेय । नेरडयदेवतित्थकरा र ओहिस्समाहिरा हुति । पासति सचओ सलु सेमा देसेण पासति । से त्त ओहिनाणपञ्चक्स से विं त मणपज्जवनाण ? मणपज्जवनाणे ण भते ! किं मणुस्साण उप्पज्जह अमणुस्माण १ गोयमा। मणुस्माण नो अमणुस्साण० १ जहमणुस्माण कि समुच्छिममणुस्माण गम्भवतिय मणुस्साण गोयमा ? नोसमुन्छिममणुम्माण उपञ्जई गम्भवतियमणुम्माण । जडगम्भवक्वतियमणुस्साण वि कम्मभूमिय गम्भवतिय मणुस्साण, अम्मभूमिय गम्भवतिय मणुस्साण, अन्तरदीगगम्भव कतिय मणुस्साण, गोयमा ? कम्मभूमिय गन्भक्कतियमणुस्माण नो अकम्मभूमिय गन्भनकतिय मणुस्माण, नो अन्तरदीरंग गम्भ वतियमणुम्माण जड कम्मभूमियगम्भकतियमणुस्साण, वि ससिजरामाउयकम्मभूमिय गम्भवक्कतियमणुस्साण असखिजवासाउयकम्मभूमिय गभरकतिय मणु स्साण ? गोयमा? मसज्जनामाउय कम्मभूमिय मभनवतिय मणुस्माण, नो अमखेज वासाउय कम्मभूमिय मणुस्साण। जइ सम्वेज वासाउय कम्मभूमिय गम्भपकतिय मणुस्साण, कि पजत्तग ससे जवामाउयकम्मभूमिय गम्भवतिय मणुस्माण,अपञ्जचग सखेन्ज नामाउय कम्मभूमिय गम्भवकतिय मणुस्माण १ गोयमा! पञ्जत्तग ससेज नामाउय कम्मभूमिय गम्भनवतिय मणुस्साण,नो अपज्जत्तग मसेज वामाउय कम्मभृमिय गम्भवकतिय मणुस्साण । जड पन्नत्तग सखेज नासाउय कम्म मिय गम्भनक्कतिय मणुस्माण किं सम्मदिट्टि पज्जत्तग सखेज्ज वासाउय कम्मभूमिय गन्भपक्क तिय मणुस्साण, मिन्छदिट्टि पज्जत्तग सखेज्जवासाउथ कम्मभूमिय गम्भवतिय मणुम्साण, स. म्मामिच्छदिट्टि पज्जत्तग मखेज्ज वामाउय कम्मभूमिय गन्भवतिय मणुस्माण ? गोयमा मम्म द्दिष्टि पज्जत्तग सखेज्जानामाउय कम्मभूमिय गम्भवक्वतिय मणुस्साण नो मिच्छद्दिष्टि पज्जत्ता ससेज्न नामाउय कम्मभूमिय गम्भवतिय मणुस्माण, नो सम्मामिन्छद्दिहि पज्जत्तग सखेज धासाध्य कम्मभूमिय गम्भकतिय मणुम्साण जड मम्मदिहिपज्जत्तग ममेज पामाउय कम्म मिय गम्भवकतिय मणुस्माण कि मजय सम्मद्दिष्टि पज्जत्तग मसेज्ज वासाउय रम्मभूमिय गम्भ- वक्कतिय मणुस्माण, असजय सम्मद्दिट्टि पज्जत्तग सखेज्न गासाउय कम्मभूमिय गम्भवतिय मणम्साण । सजया सजय मम्मदिदि पज्जत्तम मररोज्ज आमालय कम्ममिय नियm. , JJM N ~~~~~~ vM ६) श्रीजेनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला ग? गोयमा ! संजय सम्मद्दिष्टि पज्जत्तग संखेज वासाउय कम्मभूमिय गमवकंतिय मणु- गं, नो असंजय सम्मदिष्टि पज्जत्तग संखेज्ज वासाउय कम्मभूमिय गम्भवकंतिय मणुस्साणं । संजयासंनय सम्मदिट्टि पज्जत्तग संखेज्जवासाच्य कम्मभूमिय गम्भवकंतिय मणुम्साणं । जह य सम्मदिट्ठि पज्जत्तग संखेज्ज वासाउय कम्मभूमिय गव्भवतिय मणुस्साणं किं पमत्त संजय दिद्वि पज्जत्तग संखेज वासाउय कम्मभूमिय गम्भवतिय मणुस्साणं, अपमत्त संजय सम्मदिद्धि तत्तग संखेज वासाउय कम्मभूमिय गम्भवकंतिय मणुस्साण ? गोयमा ! अपमत्तसंजय सम्मदिति जत्तग संखेज वासाउय कम्मभूमिय गम्भवकंतिय मणुस्साणं, नो पमत्त सञ्जय सम्मदिहि उत्तग संखेज्ज वासाउय कम्मभूमिय गम्भवतिय मणुस्साणं । जइ अपमत्त संजय सम्मद्दिडि नत्तग संखेज वासाउय कम्मभृमिय गम्भवतिय मणुस्साणं,किं इड्डीपत्त अपमत्त संजय सम्मदिद्वि उत्तग संखेज्ज वामाउय कम्मभूमिय गम्भवभूतिय मणुम्साणं अणिड्डीपत्त अपमत्त संजय सम्म- हे पज्जत्तग संखेज वासाउय कम्मभूमिय गन्भवतिय मणुस्साण ? गोयमा! इड्डीपत्तअपमत्त य सम्मदिट्टि पज्जत्तग संखेज्ज वासाउय कम्मभूमिय गम्भवकंतिय मणुस्साणं, नो अणिड्डीपत्त मत्तसंजयसम्मदिहि पज्जत्तग संखेज्ज चासाउय कम्मभूमिय मणुस्साणं । मणपज्जवनाणं सम- जइ ।। सू० ॥ १७ ॥ तं च दुविहं उप्पज्जइ तंजहा उज्जुमई य विउलमई य तं समासओ विहं पन्नत्तं तंजहा-दहओ, खित्तओ, कालओ, भावओ। नत्थ दवोणं उज्जुमई अणंने अणंत सिए खंधे जाणड पामइ, तं चेव विउलमई अमहियंतराए विउलतगए विसुद्धतराए वितिमिर- ए जाणइ पासइ । खित्तओणं उज्जुमई यजहन्नणं अंगुलस्स असंखेजय भागं उक्कोमेणं अहे व इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए उबरिमहेडिल्ले खुटुग पयरे उड्ढे जाव जोड़सम उपरिमवले, रेयं जाव अन्तोमणुस्णुम्सखित्ते अड्डाइजेसु दीवसमद्देमु पन्नग्स्ससु कम्मभूमिसु तीसाए अम्म- मेसु छपन्नाए अन्तरदीवगेसु सन्निपंचेंदियाणं पञ्जत्तयाणं मणोगए भावे जाणइ पामइ तं चैव उलमई अड्डाईजेहिमंगुलेहिं अमहियत्तरं विउलतरं विसुद्धतर वितिमिरतराग खेत्तं जाणइ पासइ । लओ णं उज्जुमई जहन्नेणं पलिओवमम्म असंखिज्जयभागं उक्कोसेण वि पलिओवमस्म असंखि- यभागं अतीयमणागयं वा कालं जाणइ पास। तं चेव विउलमई अमहियतराग विउलतरागं युद्धतरागं वितिमिरतरागं जाणइ पायइ । भावओ णं उज्जुमई अणते भावे जाणइ पासइ, सब- वाणं अणतभागं जाणइ पासइ । तं चेव विउलमई अमहियनगगं विउलतरागं विसुद्धतगगं वि- मिरतरागं जाणइ पासइ । मणपज्जवनाणं पुण जणमणपरिचिंतियत्थपागडणं। माणुमखित्तनिबद्ध पिच्चइयं चरित्तवओ ॥ ६५ ॥ से तं मणपज्जवनाण सू० ॥ १८ ॥ से कितं कंवलनाण ? लनाणं दुविहं पन्नत्त, तंजहा-भवत्थ केवलनाणं च सिद्ध केवलनाणं च । से किं तं भवत्यकेवल- गं ? भवत्थकेबलनाणं दुविहं पणतं, तंजहा-सजोगिभवन्थ केवलनाणं च अजोगिमवत्थकेवलनाण । से किं तं सजोगिभवत्थकेवलनाणं ? सजोगिभवत्थकेवलनाणं दुविहं पण्णतं, तंजहा-पढम यसजोगिभवत्थ, केवलनाणं च अपढम समय सजोगिभवत्थकेवलनाणं च, अहवा, चरमसमयस. गिभवत्थकेवलनाणं च अचरमसमयसजोगिभवत्थकेवलनाणं च, से तं सजोगिभवत्थकेवलनाणं । के तं अजोगिभवत्थकेवलनाणं ? अजोगिभवत्थकेवलनाणं विपन्नत जहा-पदमसयअजोगि-. M ॥ श्री नन्दीमत्र मूलपाठ. ॥ A AA . २ - भवस्थालनाण च अपढमममयअजोगिभनत्थकेवलनाण च अहना चरमसमयअजोगिमनत्थरल- नाण च अचरमममयअजोगिभवत्यकेवलनाण च, से त्त अजोगिभवत्यफेसनाण, से च भनस्थके- चलनाण ॥ सू० ॥ १९ ॥ से कि त सिद्धकेलनाण? सिद्धकेलनाण दुविह पण्णत्त, तजहा-अण- तरसिद्धकेवलनाण च परपरसिद्ध केवलनाण च ।। सू० ॥ २० ॥ से कि त अणवरसिद्ध केवलनाण? अणतरसिद्धकेवलनाण पन्नासविह पण्णच, तजहा-तित्थसिद्धा १, अतित्थसिद्धा २, तित्थयरसिद्धा ३, अतित्थयरसिद्धा४ , मयबुद्धसिद्धा ५, पोययुद्धसिद्धा ६, उद्धनोहियसिद्धा, ७ इरियलिंगसिद्धा ८, पुरिसलिंगसिद्धा ९, नपुमगलिंगसिद्धा १०, सलिंगसिद्धा ११, अन्नलिंगसिद्धा १२, गिहिलिंग सिद्धा १३, एगसिद्धा १८, अणेगसिद्धा १५, से च अणतरसिद्धकेलनाण || मू० ॥ २१ ॥ से किं त परपरसिद्धकेलनाण' परपरसिद्धकेवलनाण अणेगविह पण्णा, तजहा-अपढमसमयमिद्धा, दुम- मयसिद्धा, तिसमयसिद्धा, चउममयसिद्धा, जान दमममयसिद्धा, ससिज्जममयसिद्धा, अससिज्जस- मयसिद्धा, अणतममयसिद्धा, से च परपरसिद्धफेवलनाण, से 7 सिद्धकेलनाण ॥ त समासओ चउदिह पण्णच, तजहा-दवओ, सित्तओ, कालओ, भावओ। तस्य दबओ ण केरलनाणी सबद- बाह जाणड पामइ । सित्तओ ण केवलनाणी सद सित जाणड यासह । कालोण केवलनाणी मब। काल जाणड पासह | भापओ ण केलनाणी सव्वे भावे जाणड पासइ । मह सबदवपरिणाम, मावपिण्णत्तिकारणमणत । सासय मप्पडियाड, पगविह केवल नाण ॥६६॥ १० ॥ २२ ॥ केन- लनाणेणऽत्ये नाउ जे तस्य पण्णवणजोगे । ते भामड ति ययरो, नटजोगसुय हवद सेस ।। ६७ ॥ से च केलनाण, स रा नोडदियपञ्चक्स से च पञ्चम्सनाण ।। सू० ॥ २३ ॥ से कि त परोक्स- ताण १ परोस्सनाण दुविह पन्नत, तजहा--माभिणिमोहियनाणपरोक्स च, सुयनाण परोक्म च, नत्थ आभिणिवोहियनाण तत्थ सुयनाण, जत्थ मुयनाण तत्थाभिणिनोहियनाण, दोऽवि ण्याड अण्णमण्णमणगयाइ, तहवि पूण इत्थ आयरिया नाणच पण्णरयति-अभिनिबुझइति आभिणिोहि- पनाण, सुणेडत्ति सुय,महपुब्ब जेण सुय, न मई सुयपुलिया ॥ सू० ॥ २४ ॥ अविसेंसिया मई, मइनाण च महअन्नाण च । रिसेसिया सम्मदिहिस्स मई महनाण मिन्छद्दिविस्म मई महणन्नाण । अनिसेसिय मुय मुयनाण च मृयअन्नाण च । विमेसिय सुय सम्महिहिस्स सुय सुयनाण, मिच्छ- दिहिस्स सुय सुयअन्नाण ॥ सू० २५ ॥ से किं त आभणिमोहियनाण' आभिणियोहियनाण दुविह पण्णत्त, तजहा-सुयनिस्सिय च, अस्मयनिस्मिय च। से म्ति अम्सुयनिस्सिय १ लस्सुयनि- स्सिय चउबिह पण्णत्त, तजहा-उत्पत्तिया १ वेणइया २, कम्मया ३, परिणामिया ४ । बुद्धि चउचिहा पता पचमा नोनलम्मड ॥ ६८ ।। सू० ॥ २६ ॥ पुचमदिट्ठमस्मुयमवेदय, तस्वणवि- सुद्धगहियत्या । अन्याहयफलजोगा, उद्धि उप्पचिया नाम ॥ ६९ ॥ भरहसिल ' पणिय २ स्क्स सुडग ४ पड सरह काय ७ उच्चारे ८१ गय ९ घयण १० गोल १९ गमे १२, खुड्डग १० मगि १४ यि १५ पइ १६ पुचे १७ ॥ ७० ॥ भरह १ मिल • मिंट ३ कुक्कुड 8, तिल ५ वालय ६ रत्यि ७ अगड ८ गणसडे ९ । पायस १० अइया ११ पत्ते १२, गाडहिला १३ पच पिअरो य १४ ॥ ७१ ॥ महुसित्य १८ मुद्दि १९ अफे २०, य नाणए २१ भिम्स २० चेहगनिदायो,२३ सिकाला २४...य अस्थससे २५ इत्थी य, मह ६.मयमुहम्मे २७॥ ७२..।। १ .

++ " - श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला. णसमत्था, तिबग्गसुत्तत्थगहियपेयाला । उभओलोगफलवई, विणयसमुत्था हवइ बुद्धी निमित्त १ अत्थसत्थे य २. लेहे ३ गणिए य कूब ५ अस्से ६ य | गद्दम ७ लक्षण अगए १० रहिए ११ य गणिया १२ य ।। ७४ । सीया साडी दीह, च तणं अवस- चस्स १३ निव्योदए १४ य गोणे, घोडगपडणं च रुक्खाओ १५ ।। ७५ ।। उवओग- कम्मपसंगपरिघोलणविसाला । साहुक्कारफलबई, कम्मसमुत्था हबइ चुद्धी ॥ ७६ ।। हेर. करिसए २, कोलिय : डोवे ४ य मुत्ति ५ घय ६ पवार ७ तुन्नाए ८ बड्डइय ९ पूयह ११ चित्तकारे १२ य ।। ७७ ।। अणुमाणहेउदिलुतमाहिया वयविवागपरिणामा । हिय- लबई, बुद्धी परिणामिया नाम || ७८ ॥ अभए १ सिद्धि कुमारे ३, देवी ४ उदिओदए ५. साहू य नंदिसेणे ६. धणदत्त ७ सावग । अमचे ९ ।। ७९ ।। खमए १० अमच्च- चाणक्के १२ चेव थूलभद्दे १३ य। नासिकसुंदरिनंदे १४ बहरे परिणामिया बुद्धी ।।८।। १६ आमंडे १७, मणी १८ य सप्पे १९ य खरिंग २० भिंदे २१ । परिणामिययु- माई उदाहरणा ।। ८१ ॥ सेत्तं अम्सुयनिस्मियं । से किं तं सुयनिस्सियं ? सुयनिस्सियं पण्णत्तं, तंजहा-उग्गः १ ईहा २ अवाओ धारणा ४ ॥ मु० ॥ २६ ॥ मे किं तं दुविहे यण्णचे, तंजहा-अत्युग्गहे य बंजणुग्गहे य, 1 सू० ॥ २७ ॥ मे किं तं ? बंजणुग्गहं चरबिहे पण्णत्ते. तंजहा-सोइदियवजणुग्गहे, घाणिदियवंजणुग्गहे यवंजणुग्गहे फासिंदिग्यंजणुग्गहे, से सं बंजणुग्गहे ॥ सु० ॥ ॥ २८ ॥ से कि ग्गहे ? अत्थुम्गहे छबिहे पणत्ते, तंजहा-सोइंदियअन्धुग्गहे, चक्खिदियअन्युग्गहे, अन्थुग्गहे, जिभिदियअत्थुग्गहे, फासिंदियअत्थुग्गहे, नोइंदियअत्थुग्गहे ।। मू० ॥ । तस्स णं इमे एगडिया नाणाघोसा नाणावंजणा पंच नामधिज्जा भवंति, तंजहा- , उवधारणया. सवणया, अवलंबणया, मेहा, से तं उग्गहे ।। मू० ॥ ३० ॥ से कि तं बेहा पण्णत्ता, तंजहा-सोइंदियईहा, चक्खिदियईहा, घाणिढियईहा, जिभिदियईहा, फा- T, नोइंदियइहा, तीसेणं इमे एगडिया नाणाघोसा नाणा बंजणा पंच नामधिञ्जा भवंति, भोगणया, मग्गणया, गवेसणया, चिंता, वीमंसा, से तं ईहा ।। मू० ॥ ३१ ॥ से कि ? अवाए छविहे पण्णत्ते, तंजहा-सोइंदियअवाए, चविखदियअवाए, पाणिदियमवाए यअवाए, फासिदियअवाए, नोइंदियअवाए, तस्स णं इमे एगट्ठिया नाणाघोसा नाणावंजणा धिज्जा भवन्ति, तंजहा-आउट्टणया, पचाउणया, अवाए, बुट्टी, विण्णाणे, से तं सू० ३२ ॥ से किं तं धारणा ? धारणा छबिहा पण्णत्ता, तंजहा-सोइंदियधारणा, च- वारणा, पाणिदियधारणा, जिभिदियधारणा, फासिंदियधारणा, नोइंदियधारणा, तीसे ण या नाणाघोसा नाणाजणा पंच नामधिजा भवंति, तंजहा-धरणा, धारणा, ठवणा. पहट्टा. तं धारणा ।। सू० ।। ३३ ॥ उग्गहे इक्कसमइए, अंतोमुहुत्तिया ईहा, अंतोमुहुत्तिए अवा [ संखेज वा कालं असंखेज वा कालं ॥ मू० ॥ ३४ ॥ एवं अट्ठावीसइविहस्स आभि- नाणस्स बंजणुग्गहस्स परूवणं करिस्सामि पडिबोहगदिद्रुतेण मल्लगदिटुंतेण । से किं तं दिटुंणं? पडिबोहगदिट्टतेणसे जहानामए केइ पुरिसे कंचि परिसं सुत्तं पडिबोहिल्ला.

(१०९/ wwww wwwn . ॥ श्री नन्दीस्त्र मूलपाठ. ॥ अमुगा अमुगत्ति- तत्थ चोयगे पन्नवयं एव वयासी-किं एगसमयपविट्ठा पुग्गला गहणमागच्छति । दुममयपविट्ठा पुग्गला गहणमागन्छति? जाव दससमयपविट्ठा पुग्गला गहणमागच्छति ? सखिज्ज समयपविट्ठा पुग्गला गहणमागच्छति', असखिऊ समयपविट्ठा पुग्गला गहणमागग्छति ?, ए. वयत चोयग पण्णए एस यासी-नो एगसमयपविट्ठा पुग्गला गहणमागच्छति, नो दुसमयपविट्ठ पुग्गला गहणमागच्छति, जाव नो दससमयपविट्ठा पुग्गला गहणमागच्छति, नो सखिज्जसमयप विट्ठा पुग्गला गहणमागच्छति, असपिज्जसमयपविट्ठा पुग्गला गहणमागच्छति, से रा पडिवोहग दिद्रुतेण । से किं त मल्लगदिट्टतेण? मल्लगदिट्ठतेण से जहानामए केड पुरिसे आवागसीमा मल्लग गहाय तत्थेग उदगनिंदु परसेविज्जा, से नटे, अण्णेऽवि पक्सिचे सेऽवि न?, एवं पक्सि पमाणेसु पक्विप्पमाणेसु होही से उदगबिंदू जे ण त मल्लग रावेहि शि, होही से उदगनिंदू, जे " तसि मल्लगसि ठाहिति, होही से उदगानंदू जे ण त मल्लग भरिहित, होही से उदगनिंदु, जे ण र मग पाहेहिति, एनामेन पक्सिप्पमाणेहि पक्सिप्पमाणेहिं अणतेहिं पुग्गलेहि जाहे त बजण पूप्रिय होइ, ताहेहुति करड नो चेव ण जाणइ के वेस सद्दाइ ? तमो ईह परिमई, तओजाणई अ मुगे एम सद्दड, तओ जपाय परिसइ तमो मे उनगय हरड, तओ धारण परिसड, तओण धारई ससिज्ज वा काल, अससिज्ज ना काल, से जहानामए के पुरसे अवच सद्द मुणिज्जा, तेण सदोरि उग्गहिए, नो चेत्र ण जाणह के वेम महार, तओ ईह पनिमह तओ जाणड अमुगे एस मद्द, तजो अमआय परिसइ, तो से उवगय हबह, तओ वारण परिसड, तओ ण धारेड ससेज्ज वा काल अ सरोज ना काल । से जहानामए केड पुरिसे अवत्त रून पासिज्जा तण रूपति डग्गहिए, नो चेक ण जाणड के वेम स्पत्ति, तओ टहपरियड तओ जाणड अमुगे एम रूवे, तओ अपाय पत्रिमड, तओ से उजगय हवा. तओ वारण परिमट, तनो ण पारड सरखेज वा काल, अससेज वा काल । से जहानामए के पुरिमे अव्यत्त गध जग्घाहा तण गधत्ति उग्गहिए, नो चेन ण जाणड के वेम गोनि, तमो ईह पनिमह, तओ जाणड अमुगे एम गधे, तो अपाय परिसर, तओ से उपगय हमड तओ धारण परिमड, तओ ण धारेह मवेन वा काल अमखेज ना काल । से जहानामए- केड पुरिमे अन्यत्त रस आमाइजा तेण रमोत्ति उग्गहिण, नो चेव ण जाणड के बेस रमेत्ति, तओ ईह परिसइ, तओ जाणड अमुगे एस रसे, तओ अवाय परिमा, तओ से उवगय दवड, तओ धारण परिमड, तओ ण घारेड मसिज ना काल अमसिज्ज ना काल । से जहानामए के पुरिसे अध्यत्त फाम पडिमोडला तेण फासेत्ति उग्गहिए, नो चेरण जाणड क स फामओत्ति, तओ ईह परिमड, तओ जाणट अमुगे एम फामे, तओ अपाय पत्रिसद, तजो से उहगय हवड, तओ धारण परिसड, तओ ण धारेड मसेज वा पाल अमसेज ना काल । से जहानामए बेड पुरिसे अव्यत्त मूमिण पामिजा तेण सुमिगेत्ति उग्गहिए नो चेव ण जाणड के वेम सुमिणेत्ति, तओह पपिमह, तमो जाणड अमुगे एम मुमिणे, नओ जमाय परिमड, तओ मे जगय हाड, तओ धारण पनिमइ, तओ ण धारेड सखेज्न पा काल, अससेन वा काल, से त मल्लादिट्टनेण ॥ १०३५ ।। त ममामओ चउचिह पण्णत्त, तजहा दव्यओ, सित्तलो, कालओ, भारलो, तत्थ दओ ण आ- शिणिोदियनाणी आएसेण सब्बाइ दवाड जाणद न.पामइ.1 वेत्तओपा आभिणियोदियनाणी . . . - , - श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला. इसेण सव्वं खेत्तं जाणइ न पासड़। कालोणं आभिणियोहियनाणी आपसेणं सव्यं काले जाणार रासइ । भावओ णं आभिणियोहियनाणी आएमेणं सब्चे भाचे जाणइ, न पामह । उग्गह ईहाञ्चाओ, य धारणा एव तुति चत्तारि । आभिणियोहियनाणम्य भयवन्य समासेणं २॥ * अस्थाणं उग्गणम्मि उग्गहो तह वियालणे ईहा । वयसायम्मि अत्राओ, धरणं पुण धारण है ।। ८३ ॥ उग्गह इकं समयं, ईहावाया मुहृत्तमद्धं तु । कालमसंसं संबं. च धारणा होई व्वा ।। ८४ ॥ पुढे सुणेइ सई, स्वं पुण पासह अपुढे तु । गंध सं च फासं च, बट्टपुट विया- ।। ८५ ।। भासासमसेढीओ, सई जं मुणड मीसियं सुणइ । वीसेढी पुण मुई, मुणेइ नियमा पाए ।। ८६ ।। ईहा अपोह वीमंसा, मग्गणा य गवेमणा। सन्ना सई मई पन्ना. मव्वं आमि. रोहियं ।। ८७ ॥ से तं आभिणियोहियनाणपरोक्खं, से तं यइनाणं । मु० ॥ ६ ॥ से किं तं मुयनाणपरो- ? सुयनाणपरोक्खं चोदसविहं पण्णत्तं तंजहा-अक्वग्मुयं १ अणक्खरमुयं २ सण्णिसुयं ३ ण्णिसुयं ४ सम्ममुयं ५ मिञ्चसुयं ६ साइयं ७ अणाइयं ८ सपज्जवसिय ९ अपज्जवसिय १० यं ११ अगमियं १२ अंगपविटु १३ अणंगपविट्ठ १४ ॥१०३७॥ मे किं तं अक्खरसुगं? अक्ख- तिविहं पणत्तं तंजहा-सन्नक्खरं वंजणक्खरं, लद्धिअक्खरं । से किं तं मन्नक्खरं ? सन्नावरं वरस्स संठाणागिई, से तं सन्नखरं । से किं तं बंजणलवश्वरं ? बंजणक्खरंअक्वरस्स बंजणा- बो, से तं वंजणक्खरं । से किं तं लद्विअक्षरं ? लडिअक्खरं अक्खरलड़ियस्स लद्धिअक्खरं पजइ, तंजहा-सोइंदिय सद्धिअक्खरं, चक्खिदिय लद्धिअक्खरं, वाणिदिय लसिक्खरं, रस- त्य लद्धिअक्खरं, फासिदिय लद्धिअक्खरं, नोइदिय लदिअक्खरं, स च लदिअम्बरं, से तं बरसुयं ।। से किं तं अणक्खरसुयं ? अणक्खसुयं अणेगविहं पण्णत्तं, तंजहा-ऊससिय नीससियं, छुढं खासियं च छीयं च । निस्सिवियमणुसार, अणक्खरं छलियाईयं ।। ८८ ॥ से तं अणक्खरस्यं ।। सू० ३८ ॥ से किं तं सण्णिसुयं? सण्णिसुयं तिविहं पण्ण, तंजहा- इओवरसेणं, हेजवएसेणं, दिहिवाओवएसेणं । से कि तं कालिओवएसणं ? कालिओवएसेणं । अत्थि ईहा, अबोहो, मग्गणा. गवेसणा, चिंता, वीमंसा, सेणं सण्णीति लभइ । जस्सणं व ईहा, अबोहो, मग्गणा, गवेसणा, चिंता, वीमंसा, से णं असण्णीति लगभइ, से कालिओ- घेणं । से किं तं हेऊयएसेणं ? हेवएसेणं जस्सणं अत्थि अभिसंधारणपुछिया करणसत्ती से णं ति लभइ । जस्स णं नस्थि अभिसंधारणपुब्धिया करणसत्ती से णं असण्णीति लन्मइ, से नं एसेणं । से किं तं दिहिवाओचएसेणं ? दिद्विवाओवएसेणं सण्णिमुयस्स खओवसमेणं सम्णी इ, असण्णिसुयस्स खओवसमेण असण्णी लभड़, से दिहिवाओवएसेणं, से सण्णिसुर्य, i असण्णिसुयं ॥ मू० ॥ ३९ ॥ से किं तं सम्मसुयं ? सम्मसुयं 5 इमं अरहंतेहिं भगवंतेहिं गणनाणदसणधरेहिं तेलुक्कानिरिक्खयमहियपूइएहिं तीयपडुप्पण्णमणागयजाणएहिं सवण्णूहि दरिसीहिं पणीयं दुवालसंगं गणिपिडगं, तंजहा-आयारो १ सूयगडो २ ठाणं ३ समवाओ अस्थाणं उग्गणं, च उगई तह वियालणं ईई । ववसायं च अवाय पण पुण धारणं विति ॥ १॥ . " - . ॥ श्री नन्दीसूत्र मूलपाठ' ॥ (१११) ४ विवाहपण्णत्ती ५ नायाधम्मकहाओ उजामगदसाओ ७ अतगडदसाओ अतगडदसाओ ८ अ । गुत्तरोवाइयदसाओ ९ पण्हायागरणाड १० विवागमुय ३१ दिहिभाओ १२, इच्चेय दुवालसग गणिपिडग चोद्दसपुन्विस्म सम्मसुय, अभिण्णदसपुब्धिस्म सम्ममुय, तेण पर मिष्णेसु भयणा, से। न मम्मसुय ॥ मू०॥ ४० ॥ मे कि त मिच्छासुय ? मिच्छासुगज हम अण्णाणिहि मिच्छादि- द्विएहिं मन्छदमुद्धिमडविगप्पिय, तजहा-भारह, रामायण, मीमासुरुक्स, कोडिल्लग, सगड- भदियाओ, सोड (घोडग) मुह, कप्पासिय, नागसुहुम, कणगसत्तरी, वइसेसिंग, बुद्धयण, रासिय, काविलिय, लोगायय, सहितत, माढर, पुराण, वागरण, भागनग, पागजली पुस्मदे- य, लेह, गणिग, सउणरुप नाडयाइ, अहवा बारचरिफलाओ, चत्तारि य वेंया सगोनगा, एयाड मिच्छदिविस्म मिन्उत्तपरिग्गहियाइ मिच्छासुय ण्याइ चेव सम्मदिढिम्म सम्मत्त- ररिग्गहियाइ सम्मसुय, अहवा मिच्छदिविस्मवि एयाह चेव सम्मसुय, क्म्दा ? सम्मत्तहेउत्तणओ। जम्हा ते मिन्छदिट्ठिया तेहिं चेन समाहिं चोइया समाणा के सपक्वदिट्टीओ चयति,से न मिच्छा वृय ।। सू० ॥ ४१ ।। से कि त माइय सपज्जनसिय, अणाइय अपज्जवसिय च ? इच्चेश्य दुवालसग गणि पिडग युच्छित्तिनयट्ठयाए साइप सपनवसिय अवुच्छित्तिनयट्टयाए अणाहय अपन्नासिय, त समासओ चउविह पण्णत्त, तजहा-दवओ, सित्तओ, कालो, भारओ, तत्थ दबोण सम्मसुय एग पुरिस पडुच्च साइय सपज्जवसिय, नहवे पुरिसे य पडुच्च अणाहय अपज्जासिय, खेत्तओ ण पच भरहाइ पचेरवयाइ पडुच्च साहय सपज्जनसिय, पच महाविदेहाइ पडुच्च अणाइय अपज्जवसिय, कालओ ण उस्सप्पिणि ओमप्पिणिं च पडुच्च साडय सपज्जासिय, नो उस्मप्पिणि नो ओसप्पिणिं । च पहच्च अगाइय अपज्जासिय, भारओ ण जे जया जिणपन्नचा भावा आपत्रिज्जति, पण्णविज्जति, । परविज्जति, दसिज्जति, निदसिजति, उपदसिज्जति, ते तया भावे पडुच्च साइय मपज्जनसिय खा- । ओवसमिय पुण भाव पडुच्च अणाइय अपज्जनसिय, अहवा भरसिद्धियम्स सुय साडय मपज्जवमिय च, अभवसिद्धियस्म सुय अणाइय अपञ्जवमिय च, सहागासपएसम्ग सहागासपएसेहिं अणतगुणिय पज्जयक्सर निष्फज्जइ, सहजीवाणपि य ण अक्सरस्स अणतभागो,निच्चुग्याडियो जड पुण सोऽवि आवरिजा तेण जीनो अजीरा पाविज्जा,- "सुटुवि मेहममुदण, होड पभा चदपुराण" मे च साइय सपनवसिय, से त अणाइय अपजासिय ॥ सू० ॥ ४२ ॥ से कि त गमिय ? गमिग दिहिवाओ, से कि त अगमिय अगमिय कालिय सुय, से त गमिय, से त अगमिग । अहना न समासओ दुविह पण्णच, तजहा-अगपविठ्ठ, अग बाहिर च । से किंत अगनाहिर ? अगनाहिर दुविद्य पण्णत्त, तजहा-आपस्सय च, आरम्सयवहरित्त च । से किं त आरस्सय? आपस्मय छबिह पण्णच, तजहा-सामाइय, चवीसत्थओ, वदणय, पडिक्मण, काउस्सगो, पचक्साण, से च आरस्मय । से कि त आवस्मयवहरित ? आवस्मयचडरित्त दुविह पण्णन, तजहा-कालिग च, उदालिय चासे किं त उकालिय २ अणेगनिह पण्णा, तजहा-दसवेयालिग, कप्पियाकप्पिा, चुलकप्पमुग, महाकप्पसुय, उववाइय, रायपसेणिग, जीवाभिगमो, पण्णवणा, महापण्णवणा, पमायप्पमाय, नदी, अणुओगदाराड, देविंदत्यओ, तदुलचेयालिय, चदाविज्झय, सूरपग्णत्ती, पोरि- सिमण्डल, मण्डलपवेसो. रिजाचरणनिणिच्छओ गणिविजा..झाणविभत्ती. मरणनिमत्ती आयवि.. --- - 1 - , . . - m vvvvv - T .- ण(११२) श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला. सोही, वीयरागसुयं, संछेहणासुथ, विहारकप्पो, चरणविही, आउरपच्चक्खाणं, महापचक्खाणं, एचमाइ से चे उकालियं । से कि तं कालियं? कालियां अणेगविहं पण्ण, तंजहा-उत्तुरमयणाई, दसाओ, कप्पो, ववहागे, निसीहं, महानिसीह, इसिभासियाई, जम्बूदीवपन्नत्ती, दीवमा गम्पन्नत्ती, चंदप- पन्नत्ती, खुद्धिया विमाणपविभत्तोमहल्लिया विमाणपविमती, अंगचूलिया, बग्गलिया, विवाह- लिया, अरुणोववाए, वरुणोववाए, गरुलोववाएं, धरणोत्रवाए, वेममणोववाए. वेलंधरोववाए, देविं. दोवधाए, णट्ठाणसुए, समुट्ठाणसुए, नागपरियावलियाओ, निरयावलियाओ कप्पियाओ, कम्पवाड. सियाओ, पुफियाओ, पुप्फचूलियाओ, वण्हीदसाओ, आसीविमभावणाण, दिद्विविमभावणाणं, सुमिण भावणणं महासुमिणभावणाणं, तेयग्गिनिसग्गाणं, एकमाइयाई चउरासीई पइन्नगसहम्साई भगवओ अरहओ उसहसामिस्स आइतित्थयम्स, नहा संखिज्जाई पइन्नगमहस्माई मज्झिमगाणं जिणवराणं, चोद्दस पइन्नगमहस्साई भगवओ बढमाणसामिस्स. अबहा. जस्म जत्तिया सीसा उत्पत्तियाए, वेणइयाए कम्मयाए, पारिणामियाण, चरबिहाए चुदीप उबवेया नम्म तशियाई पइण्णगसहस्साई, पोयबुद्धावि तशिया चेत्र, मे च कालियं, ये आवम्सयाइग्निं, से गं अणं- गपविहं ।। सू० ॥ ४३ ।। से किं तं अंगपविहं ? अंगप विहं दुबालमवि पण्णत्तं, नंजहा-आयागे १ सूयगडो २ ठाणं ३ समवाओ ४ विवाहपन्नत्ती ' नायाधम्मकहाओ ६ उवासदसाओ " अंग- डदसाओ ८ अणुत्तरोवबाइयदमाओ ९ पण्हावागग्णाई १० विवागसुयं ११ दिहिवाओ १ ॥ मू० ४४ ।। से किं तं आयारे ? आयारे णं समणाणं निग्गंथाणं आयागोयरविणयवेणइयसिखामाया- अभासाचरणकरणजायामायावित्तीओ आघविनि, से समा मओ पंचविहे पण्णचे, तंजहा-नाणा. यारे दसणायारे, चरित्तायारे, तवायारे, बीरियायारे. आयारेणं परित्ता बायणा, संखजा, अणुयोग- दारा, संखिजा वेटा, संखेजा सिलोगा. संखिजाओ निन्जुत्तीओ.संग्विजाओ संगहणीओ. मंखिजाना पडिबत्तीओ, से गं अंगठ्ठयाए पढमे अंगे, दो मुयक्वंधा, पणबीम अन्झयणा, पंचासीड़ उद्देगण- काला, पंचासीइ समुद्देसणकाला, अट्ठारस पयमहस्साई पयग्गेणं, संखिजा अक्वग, अणना गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सामयकडनिवद्धनिकाइया जिणपण्णता भावा आघ- विजंति पन्नविज्जति, परुविजंति, दंसिन्जंति, निर्देसिज्जंति. उवदंसिज्जति. से एवं आया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरणकरणपरूवणा आपविजइ, से आयारे ? ॥ मू० ॥ ४५ ।। से किं तं सूयगडे ? सूयगडे णं लोए सूइज्जइ, अलोए मूइजइ, लोयालोए मूहन्नड़, जीवा मूइज्जति, अजीवा सूइज्जंति, जीवाजीचा सूइजंति, ससमए मजद, परसमए सूइजइ, ससमयपरसमए सूइज्जइ, सूयगड णं असीयस्स किरियाबाइसयस, चउरासीइए अकिरियावाईणं, मत्तट्ठीर अण्णाणीयवा- ईणं, बत्तीसाए वेणइयत्राईणं, तिहं तेसहाणं पासंडियसयाणं वृहं किन्चा मसमए ठाविजइ, सूय. गडे णं परित्ता वायणा, संखिज्जा, आओगदाग, संखेजा वेढा, संखेजा सिलोगा, संखिजाओ निज्जुत्तीओ, संखिजाओ संगहणीओ, संखिज्जाओ पडियत्तीओ, से णं अंगट्टयाए विइए अंगे, दो सुयक्वंधा, तेवीसं अज्झयणा, तित्तीसं उद्देमणकाला, तित्तीसं समुद्देसणकाला. छत्तीसं पयमहस्साई पयग्गेणं, संखिजा, अक्खरा, अणता गमा, अणंता पन्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासय- कडनिवद्भनिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आधविज्जति, पणविजंति. परुविज्जति. दंसिज्जति. निदं- -- TUI ar ।। श्री नन्दी मूलपाठ ॥ rowwwman क , - %3A - - सिन्जति, उपदसिजति, से एन आया, एक नाया, एव विण्णाया, एव चरणकरणपरूवणा आप विजड, से व सुपाडे - ॥ सू० ॥ ४६॥ से कि त ठाणे ? ठायो ग जीवा ठाविनति, अजीर ठाविनति, जीनाजीमा ठाविञ्जति, मममए ठाविजड, परसमए ठाविजड, ससमयपरसमएठाविजा लोएटाविनड, अलोए ठोविज्लड, लोयालो ठाविलड । ठाणे ण रका, कडा, मेला, सिहरिणी पम्भारा, कुडाइ, गुहाओ, आगरा, दहा, नईओ, आधविचति । ठाणे ण गाड्याए एगुत्तरियार पृड्डीए दशहाणगनिमड्डियाण भागाण पत्रणा आधपिजड ठाणे ण परित्ता कायणा, सखेना अणु ओगदारा, सखेजा वेढा, सखेजा सिलोगा, सखेझाओ निज्जुत्तीओ, ससेजाओ सगहणीओ सम्पेजाओ पडिवत्तीओ से ण अगट्टयाए तडए अंगे, पगे सुयक्सो, दमअज्ञयणा एगीस उद्देस नकाला, एकवीस ममुद्देसणकाला, पापचारि पयमहम्मा पयग्गेण, सखेजा जक्सग, अणचा गमा अणना पजवा, परित्ता तमा, अणता थारग, सासयकडनिननिकाइया जिणपन्नत्ता भावा आध निति, पन्नायजति, परिजनि दसिन्नति, निदसिन्जति उपदसिज्जति । से एर आया, एवं नाया एम विणाया एव चरणरणपरूवणा आपविजड, से त ठाणे ३ ॥ सू० ॥ ४७ ११ से फितं सर बाग? ममायण जीमा ममासिजति, अजीरा ममासिजति, जीजीपा समासिजति, सममा समासिज', परममए ममासिजड, मसमयपरममा समामिजा, लोग समासिजड, अलोए ममामिन सोयालोए ममामिजड। ममगाए ण एगाइयाण गुत्तरियाण ठाणमयविड़ियाण भाषाण परूषण आघविजह, दुनालमरिहस्म य गणिपिढगस्म पल्लमगे ममासिन्नड, समायस्प ण परित्ता गायणा समिजा अणुओगटारा, ससिज्जा वेढा, मसिआ मिलोगा, मसिजाओ, निज्जुत्तीओ, मसिना मगहणीओ, मसिनाओ पडिनतीनो, से ण अगट्ठयाएचउत्ये अगे, पगे मुयक्तधे, एगे अज्य यणे, एगे उद्देमणकाटे, एगे समुद्देसणकोले, एगे चोयाटे मयसहम्से पयग्गेण, सरोजा अपर अणता गमा, अणता पजपा, परित्ता तमा, अणता यानग, माश्यकडनिगद्धनिकाडया जिणपण्णत भागा आधविन्नति, पण्णविज्जति, परिजति, दसिजति, निदसिज्नति, उपद सिजति से ए आया,ए। नाया, एप निणाया, एर चरणकरणपस्मणा आपपिजडा से च ममनाए ४ सू०॥४८॥ से कि त विवाहे' निगाहे ण जीरा विआहिनति, अजीरा विआहिज्नति, जीवाजीया पिाहिजति ससमए विआहिज्जति, परसमए निमाहिजति, ससमएपरममए रिआहिनति, लोग त्रिआहिजति अलोए विहिजति, लोयालोर तिआहि नति, विवाहस्मग परित्ता गायणा, ससिजा अणुओग दाग ससिजा वेढा, ससिजा सिलोगा, मसिजाओ निज्जुत्तीजो, मसिजाओ मगहणीओ, सरिस जाओ पडिरतीओ, से ण अगट्टयाए पचमे अगे, एगे यक्सो, एगे साइरेगे अज्झयणसए, दर उद्देमगामहम्माट समुद्देमगसहम्साह, उत्तीय नागरणमदस्माह, दो लक्सा अट्ठासीड पयमहरुमा पयन्गेण, मसिजा अक्सरा, अणता गमा, अणता पज्जवा, परित्ता तमा, अणता धारग मामय करनिबद्धनिकाया जिणपण्याचा भावा आररिज्जति, पण्णपिज्जति, परुजिति, दसिज्जति निदमिमाति, उपदमिज्जति, से ए आया, एक नाया, एप मिणाया, एव चरणरणपरूनण आपविजड, से त्त विनाहे ५ ॥ सु०॥४९॥ से किं त नायाधम्माहाओ ? नायवम्मकहासु प नायाण नगराइ उजाणार चेडयाइ प्रणमडाह, समोसरणार, रायाणो. अम्मापियरो, धम्मायरिया - - " . - - - - - - - P4 wwvvvvv - " , सिज्जंति, निर्देसिज्जति, उवदंसिज्जंति; से एवं आया, एवं नाया, एवं विन्नाया, एवं चरणकरण- ११४) श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला. मकहाओ, इहलोडयपग्लोइया इडिविसेसा, भोगपरिचाया, पञ्चज्जाओ, परिआया, मुयपरिग्गहा, वहाणाई, सलेहणाओ, भत्तपञ्चक्खाणाई, पाओवगमणाई, देवलोगगमणाई, मृकुलपचायाईओ, गगोहिलामा, अंतकिरियाओ य आघविज्जति, दस धम्मकहाणं वग्गा, तत्थ णं एगमेगाए धम्म- हाए पंच पंच अक्खाइयासयाई, एगमेगाए अक्खाइयाए पंच पंच उवाक्खाइया सयाई एगमेगाए बक्खाइयाए पंच पंच अक्खाइयउवक्खाइयासयाई एवामेव मपुवावरेण अधुढाओ कहाणगको- ओ हवंतित्ति समक्लायं । नायाधम्मकहाणं परित्ता बायणा, संखिज्जा अणुओगदारा, संखिज्जा ढा, संखिज्जा सिलोगा, संखिजाओ निज्जुत्तीओ संगहणीओ, संखिज्जाओ पडिवत्तीओ । से गं गट्टयाए छढे अंगे, दो सुयक्खंधा, एगृणवीसं अज्झयणा, एगृणवीसं समुहसणकाला, संखेज्जा यसहस्सा पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सयकडनिबद्धनिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविनंति परूविज्जति दंसिज्जति दसिज्जति उवदंसिज्जति, से एवं आया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरणकरणपत्रणा आ- विज्जड़, से तं नायाधम्मकहाओ ६॥ मू० ॥ ५० ॥ से किं तं उबालगदमाओ ? उवामगदमा हणं समणोवासयाणं नगगई, उजाणाई, चेन्याई. वणसंडाई, समोसरणाइ, रायाणो, अम्मापिवरो, पायरिया. धम्मकहाओ इहलोइयपरलोइया इद्धिविससा, भोगपरिचाया, पवजाओ, परि- नागा, सुयपरिग्गहा. तबोवहागाई सीलव्यगुणवेरमणपञ्चक्वाणपोसहोववासपडियज्जणया, पडि- ओ, उपसग्गा, संलेहणाओ, भत्तपञ्चमबाणाई. पाओवगमणाई, देवलोगगमणाई, सुकूलपच्चाईओ, णयोहिलामा, अंतकिरियाओ आघविज्जति; उदासगदमाण परिता वायणा, संखेज्जा अणुओग- तारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, मंखेज्जाओ निजुत्तीओ संखेजाओ संगहणीओ, संखे- जाओ पडिवत्तीओ ! से गं अंगठ्ठयाए सत्तमे अंगे, पगे, एग सुयक्खंत्रे, दस अध्झनणा, दस देसणकाला, दस ममुद्देसणकाला संखेजा पयमहम्सा पयग्गेणं संखेजा अक्खरा. अणंता गमा, नणंता पजवा, परित्ता तसा अणंता थावग, सासयकडनिबद्धनिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आय- सेजति पन्नविजंति परूविजंति दंसिर्जति, निर्देसिजति, उपदसिजंति, से एवं आया, एवं नाया, तवं विन्नाया, एवं चरणकरणपत्रणा आपविजड़ से उवासगदसाओ ७ ॥ सू० ॥ ५१ ॥ तं तं अंतगडदसाओ ? अंतगडदसासु णं अंतगडाणं नगराई उजाणाई, चेहयाई, वणसंडाई, समो- परणाई, रायाणो, अम्मापियरो, धम्मायरिया, महाओ, इहलोडयपरलोइया इडिविसेमा, भोग- रिचागा, पञ्चजाओ परिआगा, सुयपरिगहा बोबहाणाई, संव्हणाओ, भत्तपञ्चक्खाणाई. पाओ- गमणाई, अंतकिरियाओ, आपविजति; अंतगडदसासु ण परिता बायणा, संखिजा अणुओगदारा, खेज्जा वेढा, संखेजा सिलोगा, मखेजाओ निजुत्तीओ, संखेजाओ संगहणी, संखेजाओ पडिब- होओ से णं अंगडयाए अहमे अंगे, एगे सुवक्वंध, अवमा अव उद्देसणकाला, अट्ठ समुद्देसण- बाला संखेजा पयसहस्सा पयग्गेणं; संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पजवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासयकडनिबद्धनिकाइया जिणपण्णता भावा आधविनंति, पन्नविनंति परूविजंति, E. रूवणा आवविजह से त अंतगडदसाओ ८ ।। सू० ॥ ५२ ॥ से किं तं पा Ui đY , + . . परिचा . " . ॥ श्री नन्दीसूत्र मूलपाठः ।। (११५) अणुचरोक्वाइपदसामु ण अणुचरोववाइयाण नगराड, उजाणाइ, चेहयाई, वणसडाइ, समोसरणाड, रायाणो, अम्मापियरो, धम्मायरिया, धम्मकहाओ, इहलोइयपरलोइया इष्टिविसेसा, भोगपरिचागा, पञ्चजाओ, परिआगा, सुयपरिग्गहा, तपोवहाणाइ, पडिमाओ, उपसग्गा, सलेहणाओ, भचपञ्चवसा- णाइ पाओगमणाह, अणुचरोषवाइय ति अवत्ती, सुकुलपचायाईओ, पुणवोहिलामा, अतकिरि-1 याओ, पापविनंति, अणुत्तरोववाइयदसासु ण परित्ता वायणा, सखेज्जा अणुओगदारा, सखेज्जा वेढा, सखेजा सिलोगा, मखेजाओ निज्जुत्तीओ, सखेजाओ सगहणीओ, ससेजाओ पडिवत्तीओ, से ण अगट्टयाए नवमे अगे, एंगे सुयक्वो, तिन्नि जग्गा, तिन्नि उद्देसणकाला, तिनि समुद्देसण- काला, मसेन्जाड पयसहस्साड पयग्गेण ससेना अक्सरा, अणता गमा, अणता पज्जना, तमा, अणता थावरा, मासयकडनिवद्धनिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आधविज्जति, पण्णविज्जति, परूविज्जति, दसिज्जति, निदसिज्जति, उपदसिज्जति, से एस आया, एर नाया, एवं विण्णाया, एम चरणकरणपरूवणा आघनिज्जड, से अणुचरोपाडयदमाओ९ ।। सू० ॥ ५३॥ से किते पाहायागरणाइ ? पहावागरणेसु ण अछुत्तर पसिणय, अट्ठत्तर अपसिणमय अठ्ठत्तर पसिणापसि- णसय, तनहा-अगुट्ठपसिणाइ बाहुपसिणाइ, अद्दागपमिणाह, अन्नेविविचित्ता विज्जाडमया, नाग- सुवणेहिं सद्धिं दिवा सपाया आघविज्जति, पण्डानागरणाण परित्ता वायणा, सरखेजा अणुओगदारा, सरोज्जा वेढा, ससेज्जा सिलोगा, ससेज्जाओ निज्जुत्तीओ, सखेन्जाओ मगहणीओ, मसेज्जाओ पडिवत्तीओ, से ण अगट्ठयाए दममे अगे एगे सुयक्सधे, पणयालीम अज्झयणा, पणयालीस उद्दे- सणकाला, पणयालीस ममुद्देसणकाला, मसज्जाइ पयसहस्माइ पयग्गेणेण, ससेज्जा अक्सरा, अ णतागमा, अणता पज्जना, परित्ता तमा, अणता यानरा, सामयकडनिनद्धनिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघपिज्जति, पण्णविज्जति, परुविज्जति, दसिज्जति, निदसिज्जति, उपदसिज्जति, से एव आया, एष नाया, एव विरणाया, एव चरणकरणरूनणा आपपिज्जा, से च पण्हावागरणाइ १० ॥ सू० ॥ ५४ ॥ से किं त पिनागसुय ? विवागसुए ण मुफडदुक्कडाण कम्माण फलविवागे आप पिज्जड, तत्य ण दस दुहवियागा दस सहविवागा । से कि त दुहविभागा ? दुहनिवागेसु ण दुह विवागाण नगराइ, उज्जाणाइ, वणमडाइ, चेइयाइ, समोसरणाड, रायाणो, अम्मापियरो, धम्माय रिया, धम्मकहाओ, इहलोडयपरलोडया इडिपिसोसा, निरयमणाड, ससारभरपरचा दुहपरपराओ दुकुलपञ्चायाइओ, दुल्लहवोहियत्त, आपविज्जर, से च दुहविभागा। से किं त सुहविभागा? सुह विवागेम ण सुहविवागाण नगराड, उज्जणाइ, रणसडाइ चेहयाइ, समोसरणाड, रायाणो, अम्मा' पियरो, धम्मायरिया, धम्मकहाओ, इहलोइयपरलोडया इडिपिसेमा, भोगपरिचागा, पहजाओ परियागा, सुयपरिग्गहा, तमोरहाणाइ, सलेहणाओ, भत्तपच्चक्साणाह, पाओनगमणाइ, टेबलोग गमणाड, सुहपरपराओ, सुकुलपञ्चायाईओ, पुणगोहिलामा, जतकिरियाओ, आवविज्जति । विवा मसुयस्य ण परित्ता नायणा, मसेज्जा अणुओगदारा, मसेज्ला वेढा मसेज्जा मिलोगा, मखेजा निजचीओ, मखिज्जाओ मगहणीओ, ससिजाओ पडिपत्तीओ । से ण अगट्टयाण इकारसमे अगे दो सुयक्खधा, बीस अज्झयणा, वीस उद्देसणकाला, वीस ममुद्देमणकाला, मसिनाइ पयमहस्सा पयग्गेण, सखेचा अश्वरा, अणता गमा, अणता पळवा, परित्ता तसा. अणता थारा, सासयक . . . . , १ vvv unwwwxyvvvvv से श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला, (११६) निगद्धनिकाइया जिणपण्णचा भावा आपविजंति. पन्नविनंति, परूविज्जति, दंसिअंति, निदसि- जंति, से एवं आया, एवं नाया, एवं विन्नाया, एवं चरणकरणपत्रणा आघविजइ, से विवा- सुयं ११ ।। मू० ॥ ५५ ॥ से किं तं दिट्टिवाए ? दिहिवाएणं सबभावपवणा आवविजह, 'मासओ पंचविहे पण्णत्ते, तंजहा-परिकम्मे १ सुनाई २ पुहगए : अणुओगे ४ चूलिया ५ । से * परिकम्मे ? परिकम्मे सुचबिहे पण्णते, तंजहा-सिद्धसेणिया परिकम्मे । मणुस्ससणियापरि उम्मे २ पुटुसेणिया-परिकम्मे ३ ओगाढसेणियापरिकम्मे ४ वर्मपन्ज मेणियापरिकम्मे ५ विष्प- हणसेणियापरिकम्मे ६ चुयाचुयसेणियापरिकम्मे ७1 से किं तं सिट सेणियापरिकम्म? सिद्धसणि- परिकम्मे चउमबिहे पण्णते, तंजहा-मउगापयाई १ एगट्टियपयाई २ अट्ठपयाई ३ पाढोआगा- ययाई ४ केउभ्यं ५ रासिबद्धं ६ एगगुणं ७ दुगुणं ८ तिगुणं ९ के यूयं १, पडिग्गही ११ सारपडिग्गहो १२ नंदावनं १३ सिट्टावत्तं १४, से चं सिद्धसेणियापरिकम्मे ? 1 से कि तं मणु- मसेणियापरिकम्मे? अणुस्ससेणियापरिकम्मे चउद्दमविहे पण्णचे, तंजहा-माउयापयाई १ एगट्टिय- वाई २ अट्ठपयाई ३ पाढोआगासपयाई ४ कउभ्यं ५ गसिवढे ६ एगगुणं ७ दुगुणं ८ तिगृणं १ केभूय १० पडिग्गहो ११ संमारपडिग्गहो १२ बंदाय १३ मणुस्सावत् १४ मे मणुरस- तेणियापरिकम्मे २। से किं तं पुट्ठसेणियापरिकम्म? पुट्ठमेणियापरिकम्मे इक्कारमविहे पण्णचे, तंजहा पाढोआगासपयाई १ केभूयं २ रासवद्धं : एगगुणं ४ दुगुणं ५ तिगुणं ६ केउमयं ७ पडिग्गहो संसारपडिग्गहो १ नंदावर १० पुट्ठावत् ११, से शं पुडसेणियापरिकम्मे ३१ ले किं तं ओगाव- सणियापरिकम्मे ? ओगाढमेणियापरिकम्मे इक्कारसविहे पण्णचे तंजहा-पाढोआगासपयाई १ केउ- भूयं, रामबद्धं ३ एगगुणं ४ दुगुणं ५ तिगुणं ६ केउभृयं ७ पडिग्गहो ८ मंसारपडिग्गहो ९ नंदा व १० ओगाढावनं ११, से श ओगाढसेणियापरिकरमे ४ । मे किं तं उक्संपजणसेणियापरिक- म्म ! उवसंपञ्जणसेणिया परिकम्मे इक्कारस विहे पणते, तंजहा--पाओआगामपयाई : कउभृयं २ रासिबद्धं ३ एगगुणं ४ दुगुणं ५ तिगुणं ६ केभूयं ७ पडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो १ नंदावत १० उपसंपन्जणवत्तं १:, से वं उपसंपजणसेणियापरिकम्मे ५। से किं तं विप्पजहणसेणियापरि- कम्मे ? विष्यजहणसेणियापरिकम्मे इसारस विहे पण्णत्ते, जहा-पाढोआगासपयाई १ केउभृय र शसिबर्दू एगगुणं ४ दुगुणं ५ तिगुणं ६ केभ्यं ७ पडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ नंदावन १० विप्पजहणावत्तं ११, से त विप्पजहणसेणियापरिकम्मे ६ । से किं तं चुयाचुयसेणियापरिक- म्मे ? चुयाचुयसेणियापरिकम्मे इक्कारसबिहे पन्नत्ते, तंजहा-पाडोआगासपयाई १ केहभृयं २ रासिव३ एगगुणं ४ दुगुणं ५ तिगुणं ६ केभूयं ७ पडिग्गहो ट संसारपडिग्गहो ९ नंदावते १० चुयाचुयवत्तं ११. से तं चुयाचुयसेणियापरिकम्मे ८ । छ चउक्कनइयाई. सत्न तेरासिवाई से परिकम्मे १ । स किं तं सुत्ताई बावीसं पन्नत्ताई, तंजहा-उज्जुसुये १ परिणयापरिणयं २ हुभंगियं ३ बिजयचरियं ४ अणंतरं ५ परंपरं ६ मामाणं 9 संजूहं ८ संभिण्णं ९ आहवायं १० वित्थियावतं ११ नंदावनं १२ बहुलं १३ पुढापुढे १४ वियावचं १५ एवंभूयं १६ दुयावत्तं १७ तमाण पयं १८ सममिरूढं १९ सबओभदं २० पस्सासं २१ दुप्पडिग्गहं २२, इच्चेइयाई बावीसं ताई छिनच्छेयनइयाणि ससमयमुत्तपरिवाडीप; इचेइयाई बाबीसं सत्ताह अच्छिन्नलेसनमा .. - ॥ श्री नन्दीमत्र मूलपाठः॥ (११५ आजीवियसुत्तपरिवाडीए, उच्चेइयाड बावीस सुताइ तिगणइयाणि तेरासिय सुत्तपरिवाडीए, इच्चे या चापीस मुत्ताइ चउकनइयाणि मसमयसुत्तपरिनाडीए, एवामेव मपृच्चारण अट्टासीई सुत्त भवतित्ति मकवाय, से च मुत्ताइ । से कि त पुन्चगए? पुगए चउद्दसविहे पण्णत्ते, तजहा- उप्पायपुल्च १ अग्गाणीय २ वीरिय ३ अत्थिनत्यिप्पवाय ४ नाणप्पवाय ५ सच्चप्पावाय ६ आर प्पवाय ७ कम्मप्पपाय ८ पञ्चक्वाणप्पवाय (पञ्चक्खाण) ९ विज्वणुप्पनाय १० अपय १ पाणाऊ १२ फिरियाविसाल १३ लोकनिंदुमार १४ । उप्पायपुवम्म ण दम पत्यू, चत्तारि चूलि यानत्थू पण्णत्ता । अग्गाणीयपुत्वम्स ण चोदम वत्यू, दुगालस चूलियानत्यू पण्णत्ता । बीरियपुर पं अट्ठ वत्यू अट्ट चूलियावत्यू पण्णत्ता। अत्थिनत्थिप्पवायपुवस्स ण अट्ठारम वत्यू, दस चूलिय वत्यू पण्णत्ता । नाणप्पायपुवम्म ण नारम प्रत्यू पण्णत्ता | सच्चप्पनायपुवस्म ण दोणिवत्यूपण्य चा। आयप्पनायपुरस्म ण सोलम वत्थू पण्णत्ता । कम्मप्पपायपुवस ण तीस वत्थू पण्णत्ता । पर क्खाणपुवम्म ण पीस वन्य पण्णत्ता । विज्ञाणुप्पायपुवस्म ण पन्नरस वत्यू पण्णता अवझपुवर ण वारस पत्यू पण्णत्ता । पाणाउपुवस्म ण तेरस वत्यू पण्णचा । किरियाविमाल पुवस्म ण ती वत्यू पण्णत्ता । लोकनिदुमारपुवम्स ण पणुवीस वत्थू पण्णत्ता, गाहा- दम ' चोदम २ अट्ट ३ इटारसेन ४ वारम ५ दुरे ६ य वत्थूणि । सोलस ७ तीस ८ वीर ९, पन्नरम १० अणुप्पवायम्मि ॥ ८९ ।। चारम इकारममे, पारसमे तेरसेव प्रत्यूणि । तीसा पुण तेरसमे, चोइसमे पण्णीसाओ ॥९० चत्तारि १ दुवालस २ अट्ठ ३ चेनदस ४ चेव चुल्लमत्यूणि । आइलण चउण्ह, चूलिया नत्थि ॥९१ से त्त पुवगए ।से किं त अणुओगे ? अणुओगे दुविहे पण्णत्ते, तजहा-मूलपढमाणुओगे, गडिया णुओगे य । से किं त मूलपढमाणुओगे ? मूलपढमाणुओगे ण अरहताण भगताण पुत्वभना, गमणाड, आउ, चपणाड, जम्मणाणि अभिमेया रायवरसिरीओ, पवनाओ, तरा य उग्गा, केलन णुप्पयाओ, तित्थपनत्तणाणि य, सीमा, गणहरा, अजपत्तिणीओ सघस्स चरविहम्म जच परिमाण जिणमणपन्नपओहिनाणी, मम्मत्तसुयनाणिणो य वाई अणुत्तरगईय, उत्तरवेउ, चिणो य मुणिणो जत्तिया सिद्धा, सिद्धिपहो ज- देसिओ, जचिर च काल, पोआपगया जे जहिं जत्तियाड भत्ताइ अणस णाप रेडत्ता अतगडे मुणिरुत्तमे, तिमिरओघ विप्पमुके मुक्समूहमणुत्तर च पत्ते, एवमन्ने य एवमा भाषा मूलपढमाणुओगे कहिया, से त्त मूलपढमाणुओगे से कि त गडियाणुओगे ? गडियाणुओं कुलगग्गडियाओ, तित्ययरगडियाओ, चकाट्टिगडियाओ, दसारगडियाओ, बलदेवगडियाओ वासुदेवगडियाओ, गणधग्गडियाओ, भद्दनाहुगडियाओ, तनोकम्मगडियाओ, हरिवसगडियाअ उस्मप्पिणीगडियाओ, ओसप्पिणीगटियाओ, चिरतरगडियाओ अमरनरतिरियनिरयगडगमणवि विहपरियट्टणेसु एवमाइयाओ गडियाओ आघविज्जति, पण्णविन्जति से श गडियाणुओगे, मे ५ अणुओगे ४ । से कि त चूलियाओ? आइल्याण चउण्ह पुत्वग्ण, चूलिया सेसाइ पुवाइ अचूलियाइ से त चलियाओ। दिविनायस्म ण परित्ता वायणा, सखेजा अणुओगदारा, सखेजा वेढा. सखेज . . , - Vvvvv . , - - -११८) श्रीजनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला. लोगा संखेजाओ पडिवचीओ संखिजाओ निज्जुत्तीओ, संखेजाओ संगहणीओ से णं अंगट्ठयाए रसमे अंगे, एगे सुयक्वंवे, चोइस पुवाई, संखेज्जा बत्थू, संखेजा चूलवत्यू, संखेजा पाहुडा, खेजापहुडपाहुडा, संखेजाओ पाहुडियाओ, संखेन्नाओ पाहुडपाहुडियाओ, संखेजाई पयसद- गाई पयग्गंणं, संखेजा अश्वग, अणंता गमा, अणंता पजवा. परित्ता तसा अणंता थावरा, सा- यकडनिवद्धनिकाइया जिणपन्नत्ता भावा आपविजंति, पण्ण विजंति, परुविनंति, दंसिज्जति, दसिज्जति, उपदंसिज्जति । से एवं आया, एवं नाया एवं विण्णाया, एवं चरणकरणपरत्रणा घिविज्जति, से तं दिट्ठिवाए १२ ।। सू०५६ ।। इच्चेइयंमि दुवालसंगे गणिपिडगे अर्णता भावा पंता अभावा, अणंता हेऊ, अणंता अहेऊ, अणंता कारणा, अणंता अकारणा, अणंता जीवा णंतता अजीवा अणंता भवसिद्धिया अणंता अभवसिद्धिया अणंता सिद्धा, अणंता असिद्धा पण्णत्ता- भावमभावा हेऊमहेउ, कारणमकारणे चेव । जीवाजीवा भवियमभविया सिद्धा असिद्धा ॥ ९२ ॥ इच्चेइयं दुवालसंग कणिपिडगं तीए काले अणंता जीवा आणाए विराहित्ता चाउरतं संसारकं- रिं अणुपरियट्टिम इचेइयं दुवालसंग गणिपिडगं पडुप्पण्णकाले परित्ता जीवा आणाए विराहित्ता उरतं संसारकंतारं अणुपरियति । इच्चेइयं दुबालसंग गणिपिडगं अणागए काले अणंता जीवा [पणाए विराहित्ता चाउरत संसारकतारं अणुपरियहिस्सति । इच्चइयं दुवालसंगं गणिपिडगं तीए ले अणंता जीवा आणाए आराहित्ता चाउरतं संसारकंतारं वीईवइंस । इच्चेइयं दुवालसंगं गणि- पडगं पडुप्पणकाले परिता जीवा आणाए आराहित्ता चरंतं संसारहंतारं वीईवयंति । इच्चेइयं बालसंगं गणिपिडगं अणागए काले अणंता जीवा आणाए आराहित्ता चाउरतं संसारकंतारं वीईव- स्संति । इच्चइयं दुवालसंगं गणिपिडिगं न कयाइ नासी, न कयाइ न भवइ, न कयाइ न भवि- सइ, भुविं च, भवई य, भविस्सइ य, धुवे, नियए, सासए, अक्खए अबए, अवहिए, निच्चे । से हानामए पंचत्थिकाए न कयाइनासी न कयाइ नत्थि, न कयाइ न भविस्सह, भूविं च, भवई , भविस्सइ, य, धुवे, नियए, सासए, अक्खए, अबए, अबट्टिए, निच्चे, एवामेव दुवालसंग णिपिडगं न कयाइ नासी, न कयाइ नथि, न कयाइ न भविस्सइ, भुर्वि च, भवड् य, भविस्सइ i, धुवे, नियए, मासए, अक्खए, अबए, अवहिए, निच्चे । से समासो चउबिहे पण्णते, जहा-दचओ, खिराओ, कालओ, भावओ। तत्थ दव्यओ णं सुयनाणी उघउ सबदव्वाइं जाणइ 'सइ, खिरओ णं सुयनाणी उवउचे सव्वं खेत्तं जाणइ पासइ, कालओ णं सुयनाणी उवउत्चे सवं सं जाणइ पासइ, भावओ ण मुयनाणी उपउत्चे सव्वे भावे जाणइ पासइ ।। सू० ५७ ॥ अक्खर संन्नी सम्म, साइयं खलु सपञ्जवसियं च । गमियं अंगपविट्ठ, सत्तवि एए सपडिर- सा ॥ ९३ ॥ आगमसत्थग्गहणं, जं बुद्धिगुणेहिं अट्ठहिं दिटुं । विति सुयनाणलंभ, तं पुबविसा. पा धीरा ॥९४ ॥ . . -

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१२०) श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला. AWAL wwwwwwnny * उषवाई सूत्तं - - . ( वावीस गाथा ) 'कहिं पडिहया सिद्धा? कहिं सिद्धा पइट्टिया? । कहिं बोंदि चहत्ता णं, कन्थ गंतूण सिज्माई ॥ १ ॥ अलोग पडिहया सिद्धा, लोयग्गे य पडिहिया । इहबोंदि चइता णं, तत्थ गंतूण सिज्मई ? ।। २ ।। जं संठाणं तु इहं भवं चयं तस्स चरिमसमयंमि । आसी य पएमवणं तं संठाणं तहिं तस्स ॥ ३ ॥ दीहं वा हस्सं वा जं चरिमभवे हवेज संठाणं । तत्तो तिभागहीणं सिद्धाणोगाहणा भणिया ॥ ४ ॥ तिणि सया तेत्तीसाधणुत्तिभागो य होइ वोधना। एसा खलु सिद्धाणं उक्कोसोगाहणा भणिया ॥५॥ चत्तारि य रयणीओ रयणिति भागूणिया य बोधचा। एसा ग्यलु सिद्धाणं मझिमओगाहणा भणिया ॥६॥ एका य होइ रयणी साहीवा अंगुलाइ कट्ठ भवे । एमा खलु सिद्धाण जहण्णओगाहणा भणिया ।। ७ ॥ ओगाहमाए सिद्धा भवत्तिमागेण होइ परिहीणा । संठाणमणिथंथं जरामरणविप्पमुकाणं ।। ८ ।। जत्थ य एगोसिद्धो तत्थ अणंता भवक्खयविमुक्का । अण्णोण्णसमोगाढा पुट्ठा सव्वे य लोगंते ॥ ९ ॥ फुसइ अणते सिद्धे सब्चपएसेहि णियमसा सिद्धो । ते वि असंखेजागुणा देसपएसेहिं जे पुट्टा ॥१०॥ असरीरा जीवघणा उचउत्ता दसणे य णाणे य । सागारमणागारं लक्खणमेयं तु सिद्धाणं ॥ ११ ॥ केवलणाणुवउत्ता जाणंहि सव्वभावगुणभावे । पासंति सचओ खलु केवलदिट्टीअणताहि ॥ १२ ॥ णवि अत्थि माणुसाणं तं सोक्खं णविय सबदेवाणं । जं सिद्धाणं सोखं अब्बावाहं उबयाण।।१३।। जं देवाणं सोक्खं सव्वद्धापिंडियं अणंतगुणं । ण य पावइ मुत्तिमुहं णताहिं वग्गवग्गूहि ॥ १४ ॥ सिद्धस्स सुहो रासो सव्वद्धापिंडिओ जइ हवेजा । सोणतवग्गभइओ सव्यागासे ण माएज्जा ॥१५|| जह णाम कोइ मिच्छो णगरगुणे बहुविहे वियाणंतो। ण चएइ परिकडे उपमाए तहिं असंतीए॥१६॥ इय सिद्धाणं सोक्खं अणोवमंणत्थि तस्स ओवम्म । किंचि विसेसेणेत्तो ओवम्ममि गं सुगह वोच्छ।॥१७॥ जह सब्बकामगुणियं पुरिसो भोत्तूण भोयणं कोई । तण्हाछहाविमुको अच्छेज जहा अमियतितो॥१८॥ इय सबकालतित्ता अतुलं निव्याणमुवगया सिद्धा । सासयमव्याबाहं चिटुंति मुही सुहं पत्ता॥१९॥ सिद्धत्ति य कुद्धत्ति य पारगयत्ति य परंपरगयत्ति । उम्मुक्ककम्मकवया अजरा अमरा असंगा य॥२०॥ णिच्छिण्णसव्वदुक्खा जाइजरामरणबंधणविमुक्का । अव्यावाहं सुक्खं अणुहोंती सामयं सिद्धा॥२१॥ अतुलसुहसागरगया अब्धावाहं अणोवमं पत्ता । सधमणागयमद्धं चिट्ठति सुहं पत्ता ॥ २२ ।। ॥ उववाइ उवंगं समन्तं ॥

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१२२ श्रीजेनसिद्धान्त-साध्यायमाला. .. बहुजणस्सवि य णं भंते ! सुबाहुकुमारे इढे ५ सोमे ४ साहुजणस्पवि य णं भंते ! मुबाहुकुमारे इ8 ५ जाव सुरूवे । मुबाहुणा भंते ! कुमारणं इमा एयारूवा उगला माणुस्सरिद्धी किण्णा लद्धा ? किण्णा पत्ता? किण्णा अभिसमन्नागया ? के वा एम आसी पुत्रभवे ? एवं खलु गोयमा ! तेणं कालेणं तेणं समएणं इहेच जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे हथियाउरे णामं णगरे होत्था रिद्ध० तत्थ गं हस्थिणाउरे णगरे सुमुहे नाम गाहावई परिवसइ अड्डे० तेणं कालेणं तेणं समएणं धम्मघोसा णाम यंग जातिसंपन्ना जाव पंचहिं समणसएहिं साद्ध संपरिचुडा पुयाणुपुचि चरमाणा गामाणुगाम दुइ जमाणा जेणेव हत्थिणाउरे णगरे जेणेव सहसंववणे उजाणे तेणेव उबागच्छइ उवागन्छित्ता अहा- रडिस्वं उग्गहं उग्गिहित्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावमाणा विहगति । तेणं कालेणं तेणं समएणं धम्मघोसाणं थेराणं अंतेवासी सुदत्ते णामं अणगारे उगले जाव लेस्से मासं मासेणं खममाणे विह ति नए णं से सुदत्ते अणगारे मासक्खमणपारणगंसि पढमाए पोरिसीए मज्झायं करेति जहा गोयमसामी तहेब धम्मघोसे (सुधम्म) थेरे आपुच्छति जाव अडमाणे सुमुहरस गाहावतिरस गेहे अणुपविढे तए णं से सुमुह गाहावती सुदत्तं अणगारं एजमाण पासति २ त्ता हतुढे आसणातो अन्मुढेति २ त्ता पायपीढाओ पचोरुहति २ त्ता पाउयाओ ओमयति २ त्ता एगासाडियं उत्तरासंग करेति २ ता सुदत्तं अणगारं सत्तट्ट पयाई अणुगच्छति २ त्ता तिकबुत्तो आयाहिणपयाहिण करेंड २ त्ता बंदति णमंसति ५ त्ता जेणव भत्तघरे तेणेव उवागच्छति २ ता स्यहत्येणं विउलेणं असण- पाणग्याइमसाइमेणं पडिलामेम्मामीति तुट्टे पडिलामेमाणवि तुट्टे पडिलाभिएवि तुटे । तते णं तस्म सुमुहस्स गाहावइस्स तेणं दब्बसुद्धणं दायगसुद्धणं पडिगाहगसुद्धेणं तिविहेण तिकरणसुद्धणं सुदत्त । अणगारे पडिलाभिए समाणे संसार परित्तीकए मणुस्साउए निबद्धे गेहसि य से इमाई पंच दिवाई पाउन्भूयाई तंजहा- - चमुहारा बुड्डा १ दसद्धवन्ने कुसुम निवातित २ चेलुक्खेब कए । आयाओ देवदुंदुहीओ ४ अंतरावि य ण आगासंसि अहो दाणमहो दाणं घुढे य ५ । हत्थिणाउरे नयरे सिंघाडग जाव पहेमू बहुजणो अन्नमनस्स एवमाइक्खइ ४-धण्णे ण देवाणुप्पिया ! सुमुहे गाहावई सुकयपुन्ने कयलक्खण सुलद्धे णं मणुस्सजम्मे सुकयरिद्धी य जाब तं धन्न णं देवाणुप्पिया! मुमुहे गाहावई । तते णं से सुमुहे गाहावई वहुई वाससयाई आउयं पालइना कालमास काल किच्चा इहेव हथिसीसे एगरे अदीणमत्तुस्स रन्नो धारिणीए देवीए कुच्छिसि पुत्तनाए उववन्ने । तते णं सा धारिणी देवी सय- णिजसि सुत्तजागरा ओहीरमाणी २ सीहं पामति सेसं तं चेव जाव उप्पि पासाए विहरति तं एवं खलु गोयमा! सुबाहुणा इमा एयास्वा माणुस्सरिद्धी लद्धा पत्ता अभिसमन्नागया पभृ णं भंते ! मुबाहुकुमारं देवाणुप्पियाणं अंतिए मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारिय पव्वइत्तए ? हंता पम् । तते ण से भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं बंदति नममति २ ना संजमेणं तबमा अप्पाणं भावेमाणे विहरति । तते णं से समणे भगवं महावीरे अन्नया कयाई हस्थिसीसाओ जगराओ पुप्फकरंडाओ उआणामो कयवणमालपियस्स जवखस्स जक्खाययणाओ पडिणिक्खमति २ ता बहिया जणत्रयः ?

श्रीसुखविपाक-मूत्रम् । १२ on WM विहार विहरति । तते ण से सुबाहुकुमारे समणोवासए जाते अभिगयजीवाजीचे जाव पडिलामेमाणे पिहरेति । तते ण से सुबाहुकुमारे अन्नया कयाइ चाउद्दसट्टमुद्दिट्टपुण्णमासिणीसु जेणेव पोसहसाल तेणेव रवागच्छति २ ता पोसहमाल पमञ्जति • ता उच्चारपासवणभूमि पडिलेहति २ चा दम सथार सथरेइ २ ता दम्भसयार दुरुहइ २ ता अट्ठमभत्त पगिण्हह । चा पोसहसालाए पोसहित अट्टममचिए पोसह पडिजागरमाण विहरति । तए ण तस्स सुगहुस्स कुमारस्स पुन्चरत्तापरत्तकाल समयसि धम्मजागरिय जागरमाणरस मे एयारूचे अध्झथिए ५ समुप्पन्ने धण्णा ण ते गामागरणग जार मन्निसा जन्य ण समणे भगवं महावीरे जार विहरति, धन्ना ण तेराईसरतलबर० जेप ममणस्म भगाओ महावीरस्म अतिए मुडा जार पच्चयति, धन्ना ण ते राईसरतलवर जेप समणस्स भगवओ महावीरस्स अतिए पचाणुयाय जाव गिहिधम्म पडिवज्जति, धन्ना ण ते राईस जाव जे ण समणस्स भगाओ महावीरस्स अतिग धम्म सुणेति, त जति ण समणे भगव महावी पुब्बाणुपछि चरमाणे गामाणुगाम दूइजमाणे इहमागच्छिज्जा जाव विहरजा तते ण अह समणस भगनओ महावीरस्स अतिए मुडे भवित्ता जाव पधएज्जा । तते ण समणे भगव महावीरे सुबाहुस कुमारस्म इम इयारूव अज्झत्थिय जाव चियाणित्ता पुष्वाणुपुचि जाव दुइज्जमाणे जेणेव हस्थि सीसे णगरे जेणर पुप्फकरडे उजाणे जेणेन कयवणमालपियस्म जक्वस्स जक्खाययणे तेणे उवागच्छड २ सा अहापडिरून उगह उगिगिहना सजमेण तवसा अप्पाण भावेमाणे विहरी परिमा गया निग्गया । तते ण तस्म सुवाहुस्स कुमारस्स त महया जहा पढम तहा निग्गओ धम्म कहिओ परिमा राया पडिगया । तते ण से सुबाहुकुमारे ममणस्स भगवओ महावीरस्स अति। धम्म मोचा निसम्म हट्ट तुट्ट जहा मेह तहा अम्मापियरो आपुच्छति, णिक्खमणाभिसेओ उहे. जाव अणगार जाते ईरियाममिए जाव वमयारी, ततेण मे सुपाहु अणगारे समणस्स भगवन महागीरस्म तहारूलाण थेराण अतिए मामाइयमाइयाड एकारस अणाइ अहिजति २ चा व चउत्थछट्ठम० तवोविहाणेहिं अप्पाण भावित्ता वहट वामाइ सामनपरियाग पाउणिचा मासिया महणाए अपाण झूसित्ता सष्टिं भचाड अगसणाए उदित्ता आलोइयपडिकते समाडिपत्ते कालमार काल किच्चा सोहम्मे कप्पे देवनाए उवपन्ने, से ण ततो देवलोगाओ आउक्खएण भगक्खएण ठिड़ क्सएण अणतर चय चइना माणुस्स विगह लमिहिति २ चा केवल मोहिं बुझिहिति २ त तहारूवाण थेराण अतिए मुडे जार पधइस्मति, से ण तत्थ रहूइ यासाइ सामण्ण परियाग्ग पाउ णिहिति आलोडयपडिक्ते ममाहिपत्ते काल करिहिति सणकृमारे कप्पे देवताए उनवअिहिति, र ण तओ देवलोगाओ माणुस्स पयजा वमलोए ततो माणुस्स महासुफे ततो माणुस्स आणते दे ततो माणुस्म ततो आरणे दवे ततो माणुस्स सन्चहसिद्ध, से ण ततो अणतर उन्वहिता महाविदे। चासे जाव अड्डाइ जहा दढपडन्ने सिज्झिहिति जाव एव सल जबू! समणेण नाव मपत्तेप सुहविनागाण पढमस्म अज्झयणस्म अयमढे पन्नचे अन्झमयण समच ॥ १ ॥ वितियस्म ण उक्खेवो-एव खलु जम्बू । तेण कालेण तेण समएण उसभपूरे णगरे धूमकरड १२४ श्रीजैन सिद्धान्त-स्वाध्यायमाला. - Vvvvv पणे धन्नो जक्खो धणावहो राया सरस्सई देवी सुमिणदसणं कहणं जम्मण पालत्तण कालाओ य धणे पाणिग्गहणं दाओ पासाद० भोगा य जहा सुवाहुस्स, नवरं भद्दनंदी कुमारे सिरिदेवीपा- खाणं पंचसया सामी समोसरण सावगधम्म पुब्बभवपुच्छा महाविदेहे वासे पुंडरीकिणी णगरी नयते कुमार जुगवाह तित्थयरे पडिलाभिए माणुस्साउए निबद्धे इहं उप्पन्ने, सेसं जहा सुबाहुस्स 1 महाविदेहे वासे सिज्झिहिति चुज्झिहिति मुचिहिति परिनियाहिति सचदुक्खाणमंतं करहिति वितियं अज्झयणं समत्तं ॥ २ ॥ तचस्म उस्खेवी-वीरपुरं णगरं मणोरमं उजाणं वीरकण्हे नक्खे मित्ते राया सिरि देवी गए कुमारे बलसिरिपामोक्खा पंचसयकन्ना सामी समोसरण पुच्चभवपुच्छा उसुयारे नयरे भदत्ते गाहाबई पुप्फदत्ते अणगारे पडिलाभिए मणुस्साउए निबद्ध इह उप्पन्ने जाच महाविदेहे । सिज्झिहिति ५ ।। तइयं अज्झयणं समत्तं ॥३॥ चोत्यस्स उक्लेवो-विजयपुरं णगरं गंदणवणं [मणोरमं] उज्जाणं असोगो जस्खो वासवदने T कण्हा देवी सुवासवे कुमारे भद्दापामोक्खा णं पंचसया जाव पुव्यभवे कोसंबी णगरी धणपाले T वेसणभद्दे अणगारे पडिलाभिए इह जाब सिद्धे ।' चोत्थं अज्झयणं समत्तं ।। ४ ॥ पंचमस्स उखेवओ-सोगंधिया णगरी नीलासोए उजाणे सुकालो जक्खो अप्पडिहओ ।। सुकन्ना देवी महचंदे कुमारे तस्स अरहदत्ता भारिया जिणदासो पुत्तो तित्ययरागमणं जिण- पुत्रभवो मज्झमिया णगरी मेहरहो राया सुधम्मे अणगारे पडिलाभिए जात्र सिद्धे ॥ पंचमं अज्झयणं समत्तं ।। ५ ।। छहस्स उक्खेवओ-कणगपुरं णगरं सेयासोयं उजाणं वीरभद्दो जक्खो पियचंदो राया रहा देवी वेसमणे कुमारे जुवराया सिरिदेवी पामोक्खा पंचसया कन्ना पाणिग्गहणं तित्थयरागमणं वती युवरायपुत्ते जाव पुव्वभवो मणिवया नगरी मित्तो राया संभृतिविजए अणगारे पडिलाभिते व सिद्धे ॥ छ? अज्झयणं समत्तं ॥ ६ ॥ सत्तमस्स उस्खेवो-महापुरं णगरं रत्तासोगं उजाणं रत्तपाओ जक्खो बले राया सुभद्दा देवी ब्बले कुमारे रत्तवईपामोक्खाओ पंचसयाकन्ना पाणिग्गहणं तित्थयरागमणं जाव पुन्वभवो णेपुरं णगरं णागदत्ते गाहावती इन्ददत्ते अणगारे पडिलाभिते जाव सिद्धे ॥ सत्तम झयणं समत्तं ॥ ७॥ अट्ठमस उक्खेवो-सुघोसं नगरं देवरमणं उजाणं वीरसेणो जक्खो अन्जुण्णो राया तत्तवती मी भद्दनंदी कुमारे सिरिदेवीपामोक्खा पंचसया जाय पुन्वभवे महाघोसें णगरे धम्मघोसे गाहावती मसीहे अणगारे पडिलाभिए जाव सिद्धे ॥ अट्ठमं अज्अयण समत्तं ।। ८ ।। णवमस्स उक्खेवो-चंपा णगरी पुन्नभद्दे उजाणे पुन्नभद्दो जक्खो दत्ते राया रत्तवई देवी चंदे कुमारे जुवराया सिरिकंतापामोक्खा णं पंच सया कन्ना जाव पुब्बभवो तिगिच्छी गगरी श्रीसुखविपाक-सूत्रम् N . जियसत्तू राया धम्मवीरिए अणगारे पडिलाभिए जार सिद्ध ॥ नवम अझयण समच ॥ ९ ॥ जति ण दसमस्स उक्खेवो-एव सलु जबू! तेण कालेण तेण समएण साएय नाम नयर होत्था उत्तरकुमउजाणे पाममिओ जक्खो मित्तनदी राया सिरिकता देवी वरदत्ते कुमारे वरसेणापामोक्सा ण पचदेवीमया वित्थयरागमण सावरगधम पुग्धभयो पुच्छा सत्तदुवार नगरे विमलवाहणे राया, धम्मरुई अणगारे पडिलामिए ससार परित्तीकए मणुस्याउए निबद्धे इह उप्पन्ने सेस जहा सुगाहुस्स कुमारस्म चिंता जाव पवजा कप्पतरिओ जार सबट्टसिद्ध ततो महाविदेहे जहा दढपहनो जार सिज्झिहिति बुझिहिति मुचिहिति परि निमाहिति सन्चदुसापामत करेहिति ॥ एव खलु जवू ! ममणेण भगवया महावीरेण जाप सपत्तेप्रा मुहविभागाण दममस्म अज्झयणस्म अयम? पत्र, सेव भते ! सेव भते । मुहविवागा ॥ दसम अझपण ममत्त ।। २० ।। नमो सुयदेवाए-विवागसुयस्स दो सुयक्सधा दुहविवागो य मुहविवागो य, तत्थ दुहविवागे अज्झयणा दस एकसरगा दससुचेन दिवसेसु उद्दिसिज्जति, एव सुइविधागो वि सेस जहा आयारस्स ।। इति एकारसम अग समच ।। ॥ इअ सुखविपाकसुत्त समत्तम् ।। ॥ सूत्रकृलागसूत्रे वीरस्तुत्यारय पष्टमध्ययनं ।। पुच्छिरसु ण समणा माहणा य, अगारिणो या परतित्थिआ य । से केइ गतहिय धम्माहु, अणेलिम साहु ममिक्सयाए ॥१॥ कह च णाण कह दसण से, सील कह नायसुतस्स आसी!। जाणासि ण भिक्षु जहातहण, अहासुत हि जहा णिसत ॥ २॥ खेयन्नए से कुमलापन्ने (ले मदेसी) अणतनाणीय अण तदसी। जससिणो चक्खुपहे ठिपस्म, जाणाहि धम्म च घिड च पेहि ॥ ३॥ उड्ड अहेय तिरिय दिसामु, तमा य जे थावर जे य पाणा । से णिचणिचेहि ममिरस पन्ने, दीवे व धम्म समिय उदाहु ॥ ४ }} से सबदसी अभिभूयनाणी, णिरामगधे घिडम ठितप्पा । अणुत्तरे सव्वजगसि विन्न, गया अतीते अमए अणाऊ ॥५॥ से भूदृपण्णे अणिएअचारी, ओहतर धीरे अणतचक्खू । अणुचर तप्पति मरिए बा, बहरोयणिंदे व तम पगासे ॥६॥ अणुत्तर धम्ममिण जिणाण, णेया मुणी कासव आसुपन्ने । डदेव देवाण महाणुभावे, महस्मणता दिवि ण विसिट्टे ॥ ७॥ से पनया अक्सयमागरे वा, महोदही बावि अणतपारे । अगाइले वा अकसाइ मुक, मकर देगहिवई जुईम ॥ ८॥ .

श्रीजैनसिद्धान्त-खाध्यायमाला. से बीरिणणं पडिपुन्नवीरिए, सुदंसणे चा णगसबसेहे। सुगलए वासिमुदागर से, बिरायए णेगगुणोववेए ॥ १ ॥ सयं सहस्साण उ जोयणाणं, तिकंडगे पंडगवेजयंने ! से जोयणे णवणवते सहस्से. उधुस्सितो हे महस्समेगं ।। १० ।। पुढे णभे चिदुइ भूमिवहिए, जं सूरिया अणुपग्विष्यति । से हेमबन्ने बहुनंदणे य, जंसी रतिं वेदयती महिंदा ॥ ११ ॥ से पत्रए सहमहप्पगासे, विरायती कंचणमट्टयन्ने । अणुत्तरे गिरिसु य पबदुग्गे, गिरीवरे से जलिराव भोमं ।। १२ ।। महीइ मछमि ठिते णगिंद, पन्नायते मूरिय मुद्धलेसे । एवं सिरीए उ स भृरिवन्ने, मणोरमे जोयड़ अचिमाली ।। १३ ।। मुदंसणस्सेव जसो गिरिस्म, पवुच्चई महतो पव्ययस्म । पुतोवमे समणे नायधुत्त, जातीजसोदंसणनाणसीले ॥ १४ ॥ गिरीवरे वा निसहाऽऽययाण, रुपए व सट्टे वलयायताणं । तोक्मे से जगभृइपन्ने, मुणीण मज्झ तमुदाहु पन्ने ॥ १५ ॥ अणुत्तरं धम्ममुईग्इत्ता, अणुत्तरं झाणवरं लियाई । मुसुक्कसुकं अपगंडसुक, संखिएगंतवदातमुकं ॥ १६॥ अणुत्तरगं परमं महेसी, असेसम्म स विसोहहत्ता । सिद्धि गते साइमणंतपत्ते, नाणेण सीलेण य दंसणेण ॥ १७ ॥ रुक्खेसु णाते जह सामली वा, जर्मि रतिं वेययती सुवन्ना । वणसु वा णंदणमाहु सेहूं, जाणेण सीलेण य भृतिपन्न ॥ १८ ॥ थपियं व सद्दाण अणुत्तरे उ, चंदो व नाराण महाणुभावे । गंधेसु वा चदणमाहु सेहूं, एवं मुणीण अपडिन्नमाहु ॥ १९ ॥ जहा सर्यभृ उदहीण सेढे, नागेमु वा धरणिंदमाङ सेडे । खोओदए वा रस वेजयंते, तोवहाणे मुणिवेजयंते ॥ २० ॥ हत्थीसु एरावणमाहु णाए, सीहो मिगाण सलिलाण गंगा । पक्खीसु वा गरुले वेणुदेवो, निव्वाणवादीणिह णायपुत्ते ॥ २१ ॥ जोहेसु गाए जह वीससेणे, पुप्फेसु वा जह अरविंदमाहु। खत्तीण सेढे जह दंतवक्के, इसीण सढे तह बद्धमाणे ॥ २२ ॥ दाणाण सेहूं अभयप्पयाण, सच्चेसु वा - अणवजं वयंति । तवेझ वा उत्तम बंभचेरं, लोगुत्तमे समणे नायपुत्ते ॥ २३ ।। ठिईण सेंटा लवसत्तमा वा, सभा सुहम्मा वा सभाण सेट्ठा । , .

श्रीमुसविपाक-मूत्रम् १२॥ AADARANNY निबाणसेट्ठा जह सबधम्मा, ण णायपुत्ता परमत्यि नाणी ॥ २४ ॥ पुढोनमे धुणड विगयगेहि, न सण्णिहिं कुम्वति आसुपन्ने । तरिउ समुद्द व महाभवोध, भयकरे पीर अणतचक्बू ॥ २५ ॥ कोह च माण च तहेन माय, लोम चउत्थ अज्झत्थदोसा । एआणि ता अरहा महेसी, ण कुचई पावण पारवेड ॥ २६॥ किरियाकिरिय चेणयाणु चाय, अण्णाणियाण पडियच ठाण । से सम्बवाय इति वेयइत्ता, उवहिप सजमदीहराय ।। २७ ।। से चारिया इत्थी सराडभत्त, उवहाणव दुक्सखयट्टयाए । लोग विदित्ता आर पर च, सन पभू वारिय सव्ववार ॥ २८ ॥ सोचा य धम्म अरहतभासिय, समाहित अदृपदोवसुद्ध । त मदहाणा य जणा अणाऊ, इदा व देवाहिव आगमिस्सति ॥ २९ ॥ ॥ इति श्रीवीरस्तुत्याख्य पष्टमध्ययनम् ।। " ॥ मोक्षमार्गनामक एकादशाध्ययनम् ॥ त मग्ग गुत्तर मुद्ध, सन्चदुवसविमोक्सण । जाणासि ण जहा भिक्खु, त णो वृहि महामुणी ॥२ , कयरे मग्गे अक्साप, माहोण मईमता! ज मग्ग उज्जु पापित्ता ओह तरति दुत्तर ॥१ जह णो केइ पुच्छिज्जा, देवा अदुन माणुमा । तेसिं तु कयर मग्ग, आइक्खेन? कहाहि णो ॥ ३ जड वो केइ पुच्छिज्जा, देवा सदुव माणुसा । तेसिम पडिसाहिज्जा, मग्गसार सुणेह मे ॥ ४ अणुपुढोण महाघोर कासरण पव्वेडय, । जमादाय इओ पुल्च, ममुद्द ववहारिणो ॥ ५ अतरिम तरतेगे, तरिस्सति अणागया। त सोचा पडिरक्सामि, जतत्रो त सुणेह मे ॥६ पुढवीजीवा पुढो सना, आउजी तहागणी ! वाउजीवा पुढो सत्ता, तणरुक्सा सवीयगा ॥७ अहावरा तमा पणा, एक छक्काय आहिया । एतापए जीवाण, णारे कोइ विजई ॥ सव्याहिं अणुजुत्तीहि, मतिम पडिलेहिया । मजे अकतदुक्सा य, अतो सव्वे न हिंसया ॥ ९ एय सु णाणिओ मार, ज न हिंमति कचण । अहिंमा समय चेन, पतात विजाणिया ॥ १० उड्ड अहे य तिरिय, जे केड तसथारा । सम्वत्थ विरतिं विजा, सति निजाणमाहिय ॥ ११ पभू दोसे निराश्चिा, ण विरुज्झेज केणइ । मणसा उपसा चेन, कायसा चैव अतसो ॥१२ सजुडे से महापन्न, धीरे दमण चरे। एसणासमिए णिश, जयते अणेसण || १३ भूयाइ च समारभ, तमुदिसा य ज क्ड । तारिस तु ण गिण्हेजा, अन्नपाण सुसज ॥ १४ पूईकम्म न सेविजा एस यम्मे सीमओ । ज किचि अभिकसेन्ना, सव्यसो त न कप्पए ॥१५ हणत णाणु नाणेजा, आयगुत्ते जीइदिए । ठाणाइ सति मड्डीण, गामेम नगरेस चा ॥ १६ तहा गिर समारम्भ, अत्यि पुण्णति एगे वए । अहवा गत्थि पुण्णति, एव मेय महम्भय ॥ १७ ॥ - , श्रीजैनसिद्धान्त-स्वाध्यायमाला. aur णया य जे पाणा, हम्मति तसथावग । तेमिं सारक्खणहाए, तम्हा अस्थिति को वए ॥१८॥ सिं तं उवाप्पंति, अन्नपाणं, तहाविहं । तेमि लामंतगयंति, तम्हा णस्थिति णो वए ।। १९ । जो य दाणं पसंसंति, बहमिच्छंति पाणिणं । जे च णं पडिमंहति. वित्तिच्छेयं करंति ते ॥ २० ॥ ओवि ने ण भासंति, अस्थि वा नन्थि वा पुणो। आयं रयस्म हेच्चा णं निचाणं पाउणति ते॥२॥ नव्याणं परमं बुद्धा, णखत्ताण व चंदिमा । तम्हा मदा जए दंते, निवाणं संधग मुणी ॥ २२ । ज्झमाणण पाणाणं, किचंताण सकम्मुणा । आवाति माहु नं दीवं, पनिट्ठसा पश्चई ॥ २३ ॥ यगुत्ते सया दंते. छिन्नसोए अणामवे । जे धम्म मुद्धमक्खानि, पडिपुन्नमणेलिमं ॥२४॥ मेव अविजाणंता, अबुद्धा बुद्धमाणिणो । बुद्धा मोति य मन्नता, अंन एते ममाहिए ॥ २५ ॥ । य बीओदगं चेत्र तमुहिस्सा य जं कडं । भोचा माणं झियायति, अखेयन्ना(अ)ममाहिया २०॥ हा ढंका य कंका य, कुलला मग्गुका सिही । मच्छेगणं झियायंति. झाणं ने कलुनाघमं ॥ ५७ एवं तु समणा एगे, मिच्छविट्ठी अणारिया । विमएमण प्रियायंति, कंका वा कलुनाहमा ॥ २८ ॥ युद्धं मग्गं विराहित्ता, इहमेगे उ दुम्मती । उम्मग्गगता दुक्खं, घायमेसंति तं तहा ।। २२ । नहा आसाविणिं नावं जाइअंधो दुरूहिया । इच्छई पारमागंतुं. अंतग य विमीयति ॥ ३० । एवं तु समणा एगे, मिच्छदिट्टी अणारिया । मोयं कसिणमावन्ना. आगंतरो महाभयं ॥३१॥ मं च धम्ममादाय, कासवेण पंवदितं । तरे मोयं महाघोरं, अत्तनाए परिजए ॥ ३२ ॥ रए गामधमेहि, जे केई जगई जगा । तसिं अत्तुवमायाग, थाम कुच्वं परिवए ॥ ३१ ॥ प्रहमाणं च मायं च, तं परिन्नाय पंडिए । मव्यमेयं णिराकिचा, णिव्याणं संधए मुणी ॥ ३४ ॥ संधए साहुधस्मं च, पावधम्मं गिराकरे । उपहाणवीरिए भिक्य. कोहं माणं ण पत्थए ॥ ३५ ॥ ने य बुद्धा अतिककता, जे य बुढा अणागया । संति नसिं पट्टाणं, भूयाणां जगती जहा ।। ३६ । प्रह णं वयमावन्नं, फासा उच्चावयाफुगे । ण तेसु विणिहणेना, वारण व महागिरि ।। ६७) चुडे से महापन्ने, धीरे दत्तेसणं चरे । निबुड सलमाखी, एवं (य) क्वलिणोमयं ॥ ८ ॥ ॥ इति सोक्षमार्गनामकं एकादशमध्ययनम् ।। , - सुभापित केटलीक गाथानो संग्रह. पंचमहव्ययमुबमुलं,समणामणाइलख्खा दुमुञ्चीनं वेरविगमणपजवसाणं,मध्यममुद्दमोहदधी तित्या। तित्थंकरहिंसु देसियमग्ग, नरगतिरि छवियज्झियमग्गं । सबंपवित सुनिम्मियसारं. सिद्धिविमाणं अवगुयदारं ॥ २ देवनरिंदनमंसियपूटयं, सबजगुत्तममंगलमगं। उधम्सिंगुणनायगमेगं, मोक्खपहस्सवडिंसगभूयं ।३ (प्रश्नन्याकरणसूत्रे संवरद्वारे) धम्मारामेचरेभिक्खू । पिइमं धम्मसारही। धम्मा रामेश्यादंते । भचेरसमाहिए । ४॥

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Shri Jain Siddhant-savadhyaymala

Author
Doshi Ratan Ji
Title
Shri Jain Siddhant-savadhyaymala
File name
Shri Jain Siddhant-savadhyaymala
Text
OCR done
Citation
1962
Published
2011/01
Publisher
Sailana., Shri A. Bha. Sadhumargi Jain Sanskriti Rakshk
Language
Sanskrit
Pages
128
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
446027
Barcode
99999990027878.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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VMLT id
03DuIAdbRcV
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