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Prabhod Chandrodya Natak

Swami, Paramanand · 2009/09

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विज्ञापन । 'म-40- विदित हो कि शान्तरसमधान गौणतया शृगारादि अखिलरसोंसे संयुक्त अध्यात्मविद्या विरोधि नानापाखण्डमके सिद्धांतोंको उच्छिन्न करताहुआ सस्कृतमें मबोधचन्द्रोदय नामा नाटक इस धरामण्डलमें सर्वोपरि वर्तमानहै सो सस्कृतमें अतिकठिन होनेसे भाषाके आभिज्ञजनोंको दुर्विज्ञेय जानकर कवि गुलाबसिहनीने तिसका भाषामें दोहा सवैया कवित्त सोरठों करके अनुवाद कियाहै- इस नाटकमे मायः वेदांतका सर्वस्व सन्निविष्टहै और इसमें ऐसी सुगमरीतिसे ब्रह्मात्म्यैक्यत्वका मतिपादन कियाहै कि, मन्दवैराग्यवाले पुरुषभी इस ग्रन्थके विचारसे अध्यात्मतत्त्वका लाभ करसकतेहै-यद्यपि उक्त कविनीकी भाषा बहुत सुगम और साधारण पुरुषोंकोभी समुझन योग्यहै-तथापि-कहीं कही स्थलविषे विषयको अतिकठिन होनेसे गुरोंक बिना स्वय समुझना अशक्यहै ऐसा जानकर और अधि- कारीजनोंको विचारपूर्वक इसग्रन्थके अवलोकनसे बोधोत्पत्तिके अर्थ श्रीसाधुबलाके निवासी परमदयालु पण्डित गुरुप्रसादनीने इसग्रन्थको शुद्ध करके तथा इसके नीच बडे परिश्रमसे श्रुति स्मृति पुराण वचनोंको उद्धृत करके तथा तिनका अर्थ अतिसुगम रीतिसै दर्शायकर संस्कृत प्रबोधचन्द्रोदयनाटकके अनुसार सक्षिप्ताक्षरी टिप्पणीरूपसे प्रगट करके तथा पण्डितजीने इसटिप्पणीसहित ग्रन्थको तयार करके निन श्रीगुरुश्री १०८ मान् परमहंस- परमानन्दजीके चरणपङ्कजोमें समर्पणकिया आगे दयार्णव श्रीगुरुदेवजीने अपने अनुग्रहसे अधिकारीजों के कल्याणार्थ और धर्मार्थ वाटनेके अर्थ मुद्रित करवायाहै-अब आशा है कि इस ग्रन्थमतिपाद्यविषयके मनन करनेसे अधिकारी जन आवरण शक्तिविशिष्ट अज्ञाननिवृत्ति- पूर्वक परमानन्दकी माप्तिरूप जीवन्मुक्तिके मुखका अनुभव करतेहुए पण्डितजीके परिश्रम- को सफलकरेंगे इति शम्- .

.. नाटकपात्र. दम्भ, अहंकार. मन सूत्रधार नाटकआचार्य. महामोह विवेकानु. नटी तिसकीपनी. चार्वाक मोहकामित्र. विवेक प्रधाननायक. काम, कोध, लोभ, ये महामोहक वनीर हैं मति तिसकीपनी. वस्तुविचार विवेककिकर. संकल्पात्मक सन्तोष तिसकासहचर. दिगंबर, भिक्षु, ये बुद्ध जैनादि मनके पुरुष उपनिषद्स्वामी क्षपणक, कपालिक पर्वतक है भवोधउदय पुरुषपुत्र. मिथ्याहष्टि मोहपनी. श्रद्धा सात्विकी,राजसी, ताममाश्म. शांति विवेकभगिनी. विभ्रमावती तिसकीसावी करुणा शांतिकीसखी. रति कामपत्नी. मैत्री श्रद्धासखी. हिंसा कोधपत्नी. विष्णुभक्ति उपनिषत्सखी. तृष्णा लोभपती. उपनिषद् वेदांतशास्त्र. वटु शिष्य, सरस्वती विष्णुभक्तिकोसखी पुरुष,दौवारिक. क्षमा विवेकदासी. वैराग्य, निदिध्यासन, संकल्प मनके पुत्र. मन परिपार्धक, पुरुष, ये दूसरेहै. सारथी, प्रतिहारी

SANIA 111 LIBRARY
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Tal
श्री १०८ स्वामी परमानन्दजी
उदासीन द्वारकावाले.
SHRI
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भी सन्नति
कालय
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- श्रीगणेशाय नमः । ॐ तत्सब्रह्मणे नमः। अथ श्रीमत्कवि गुलाबसिंह कृत- प्रबोधचन्द्रोदय नाटक भाषा प्रारम्भः - . दोहा। गौरीपुत्र गणेशपद, वन्दों वारंवार ॥ कार्य कीजिये सिद्ध मम, देह सुवुद्धि उदार ॥१॥ जाके नाम प्रतापते, जलपर शैल तराहि ।। वह रघुनायक दासके, सदा बसै मनमाहिं ॥२॥ गुरुनानक गोविन्द गुरु, जासम और न कोइ । अभिवन्दन पदकमल तिन, जोर सदा कर दोइ ॥३॥ भारत भूमिपुनीत पद, तपोज्ञान अवतार ॥ मानसिंह गुरुको नमो, तारण करुणासार॥ ४॥ नराज छन्द । प्रवोधचन्द्र नाटकं, सुवोध ग्रन्थ मैं करों। अलंव साधु संगको, विचार चित्तमें धरों। सुनै पढे सु जे जना, निवार मोह बन्धना ॥ लहै अपार मोक्षको, टुटै समस्त फन्धना ॥५॥ सवैया। भूपन बोध सुवोध नहीं अति कौतुक माहिं रहें लपटाए । बोध विना जगमोक्ष कहां इम संतसमै मुखवेदै अलाए । (१) अन्यकी निर्विन समाप्ति रूप । (२) आदि अन्तके ग्रहणसैं दशों बाद- शाहोंका-मद्दण करना । (३)ऋते ज्ञानान मुक्तिः । ज्ञानादेवतुकैवल्यम् । इत्यादिवेद ॥

(२) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं० १] अंतसमै यम दीनकरे तिन हेर महा करुणारस आए। बोध उपावन हेत सुनो नरनाहनके इह ग्रन्थ वनाए।॥ ६॥ भानुमरीचि सुनीर समं पुनि जा अज्ञान जगत्त बनायो। वायु अकाश सुपावक नीर मही पुनि लोक सुतीन उपायो। जाहिं पिखेरजुसापजिमें जगफेरसभोतिनमाहि विलायो । उज्वलआतमवोधमहाहमआनंदसों उरमाहि धियायो॥७॥ प्रत्यज्योति सनातनजोजग व्यापरही सभमाहिंसुहाई॥ रिदशांतविपेअतिभासतहै कृतसंयमकोजिहआनन्दताई ।। विधुचूडनिरोधसुवायुभलेब्रह्मरन्ध्रहतेअतिऊँचचलाई ॥ हगतीसरब्याजसुभालविषेशिवसंयमवंतसुआपदिखाई॥८॥ दोहा। कीरतिवरमा नाम जिह, भूपति वडो रसाल ॥ ताहिसभामें विमलमति, आहि प्रधानगुपाल ॥९॥ वर्प एक नाटक तहां, भयो सुसभामंझार ॥ जाको हेरसुज्ञानलहि, भये भूप भवपार ॥१०॥ याकों सुने जु कानमें, नीके चीत्तलगाइ।। आसुरसंपति दूर तज, वेगज्ञान बहु पाइ ॥ ११ ॥ सूत्रधार उवाच स्वपत्नी प्रति ॥ सवैया। बहुवातनको कछु कामनहीं अव आयसुमोहिंगुपालदई ।। सभभूपति जांमुकुटामणिके पदपंकज आरती आनिकई ।। (१) अविद्या तत्कार्यमलरहितस्वमकाशरूप । (२) सेवते हैं अर्थात् उपासते हैं। (३) अनृत जडं दुःखरूपअहंकारादिकोंसे प्रतिकूलहोयकर अर्थात् सत्यज्ञानानन्दादिरूपकर नोगकाशे सो कहिये प्रत्यक् सोई होवै ज्योतिकहिये प्रकाशरूप सोकहिये प्रत्यज्योति॥ , + [अं० १] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (३) - प्रवलारिसमूहमहीपनके उरपाटनको नरसिंहमई ॥ वलभूपतिसिंधुधसीधरनी इन फेर वराहउधारलई ॥१२॥ दिगनारविलासनिकाननमें जिहकीरतिके श्रुतिटंक वनाए । सभदिग्गजंकानसुतालवडेविधताहिंसफालनपौनउपाए ॥ तिहसंगमिले अतिनाचत है भवताहिप्रताप सुज्वालबढाए॥ तिन आपगुपाल सुएहकह्यो वहुनाटक भूपति देहु दिखाए१३ दोहा। सहज सुहृदस्वभाव यह, कीरतिवरमा भूप ॥ ताहित उदम थोकियो, दिग्जयपरमअनूप ॥१४॥ ताव्यापारअंत्रतभयो, परमानन्दहमार ॥ विविधविपयरसपरसकर, भये मनोजविकार ॥१५॥ ताव्यापारदूषितमनो, वासर दये विताय ॥ कृतकृत्यभये सुआजहम, भूपतिराजदिवाय॥१६॥ सवैया। प्रसिद्ध अमातनभूपतिकेसुविपक्षवलीनृप मारगिराए ॥ रक्षपालकरीसगलीधरणी पुनियाहि किसीसंह छत्रफिराये।। सुपयोनिधिमेखलयाहधराशिर भूपनके इनराज ठराए ॥ रस शांतं प्रयोग निवेदनकै जग आपविनोदकरे इमभाए।।१७॥ (१) दिग्गोंके कानोरूपातालोंकर उत्पन्नभया जो बहुत पवन । (२) तिसपवनके साथ वृद्धिको प्राप्तहोयकर संसारमें प्रवृत्तहोरहाहै प्रतापरूपअनिनिसका। (३) गोपाल । (४)शत्रु । (५) शांतरसहै प्रधानजिसमे ऐसाजोनाट्यानुकरण तिसके निवेदन कहिये मनावनेकरकै ॥

(४) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं.१] me-Aaon- कवित्त। प्रवोधचन्द्रनाटकं सुआहिनटतोहिढिग, कृष्णमिश्रआपजोईपूरववनायोहै ॥ कीरतिवरमके समीप सोई नाटकरो, हेरनको भूपतिको मन उमगायोहै। सुनो सूत्रधार तुमप्रगटविचारकरो, सभाहूसमेतरिदेकौतकमुहायोहै ।। सुनिकै गुपालवाक सूत्रधारचारवाक, नाटककेहेत निजनारिको बुलायोहै ॥ १८॥ नेपथ्यकीओर तिनहेरके पुकारकह्यो, आर्येसुआउ इत तवी नटी आईहै ।। आर्य सुकौन काज मोहिको बुलायो आज, कीजिये सुकाज अव वेर क्योंलगाईहै। सूत्रधार ताहिको उचार पुनिएहु कह्यो, आर्ये अजान नाहि जाहितबुलाईहै ।। १९॥ नाटकप्रबोधचन्द्र चन्द्रमासमानजग, दीजिये दिखाई यों गुपालमन आयोहै ।। भूपति विपुलवल सोईतू अरण्यजान, पावक प्रतापवनसंगते वढायोहै । ताहिकी सुज्वाल तीन भौनमें विसाल बढी, कीरतिको पुंज लोकतीनहूं में गायोहै ॥ (१) नाटककाआचार्य ! (२) नेपथ्यनामकनातकाहै ॥ ३ [अं०१] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (६) लीनेचन्द्रहास प्रतिकूलनृपनासकर, जीतिके गुपालसुनरेशढिगआयोहै। सामराज राजकोभिषेक जिन फेर जग। कीरति वरमदेवमालमें करायोहै ॥२०॥ सवैया। रणरंगमहीपिसताशनिआ अवलौं नरमुंडनताल बजावै ॥ अलिकैकचपिंगकपोललटीसुपिशाचनियांतिहनृत्यदिखावै ।। करिकुंभमृदंगनपौन वली धसि नाद अनेक सुपीठसुनावै।। इहभाँति सुनो नटनीजगमें रणरंगमही अवलौं यशगावै२१॥ रस शांत प्रसन्न विनोदनके हित हेनटनी सुगुपाल बुलाये। अव याहि सभा वहुनाटकजो धर स्वांग भले हम देहिदिखाये नटनी तब एह कह्योभरताहित स्वांगन मानवलेहु मगाये। इह आहि अचंभ वड़ोमनमें, सुन आर्य एहुगुपालसुभाये २२ निजप्राक्रमकै रणरंगमही जिन मंडल भूपनके सुभगाए ॥ पुनिकानलौंतानकठोरधनुरणमंडलमें शरओघचलाए- ॥ तिन वाणनकै अरिखेतविषे सुतुरंगनके बहु पुंज गिराये ॥ निज आयुधधारमहीधरसे गजकोटिनकोटि सुभूमिरुलाए२३ पैदलसैन सुक्षीरनिधी भुजमंदरघात सुव्याकुलकीनी ॥ श्रुतसैनपयोनिधिको मथिकेवलभाविजयलक्ष्मीजिनलीनी॥ जिनके रणकी मुनिबूंदसमै अवलौं जसकीरतिगाहि नवीनी॥ रसशांतविपतिनकीमतिआर्य्यमोहिकहोकिहभाँतिसुभीनी२४ (१) चक्रवर्तीराज । (२) गण्डस्थल । (३) कर्णसेनराजा। (४) समरविजयलक्ष्मी ॥

HEADHARAN (६) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं॰] सूत्रधार उवाच स्वपत्नीमति-- दोहा। ब्रह्मणज्योतिस्वभावते, समस्वरूप जगआहि ।। कारणपाइ विकारभज, पुनि निज रूप समाहि ॥२५॥ नृपकुल प्रलय कृशानुसम, चेदिपती जगआहि ॥ चन्द्रवंशनृपरांजको, दूरकियोपुनिताहि ॥ २६ ॥ चन्द्रवंशनृपराजहित, उद्यम कियो गुपाल । मार विरोधी थिरकियो, राज गुपाल रसाल ॥२७॥ सवैया। कल्पांतप्रभंजनक्षोभभयोसरितापतिज्यों सवशैलदवाए । कृतकार्य फेर गहे थिरता निजवेलकी भीतरआय ठराए । भगवंतके अंशजयेनरजे सभ भूतनकेहित प्रेम वढाए । नरमंडन ले अवतार मही कृतकार्यते रस शांति लगाए।॥२८॥ भृगुनन्दनरामकोभामनीपेखसुवाहुजवारइकीसखपाए ॥ नृपशोणितनीर सुमांसर्वसावहु पंकमई तटनी भटनाए । नृपनारि कुमार सुबूढनलौं करुणाविन धारकुठार चलाए । धरभार उतार उखार कुलं नृप शांति भये तपमाहि लगाए२९ दोहा। परशुराम जिम आहि यह, कृतकार्य गोपाल । परम शांतिनिष्ठा भजी, रसमें वडो रसाल ॥ ३०॥ (१) चेदिदेशाधिपति रानाकर्णसेन । (२) कीर्तिवर्मा राजाके राज्यको। (३.) भवतार स्वरूप । (४) अस्थिगतमांस ॥ - [अं॰] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (७) 1 - जीत विवेक सुमोह जिम, बोधउदै जगकीन । जीत करण बलराज तिम, कीरति वरमा दीन ॥३१॥ अथ नेपथ्ये कलकला शब्द । सवैया। बीच कनातकेवात सुनीसुमनोजवलीयह काननमाहीं ॥ कोपभरे मुख एहुकही नटनीचसुवोलतयोंमुखमाहीं ॥ जीवतहीं हमरे जगमें तुम मोहकि हार कहें जनमाहीं ॥ पोपि शिलूषविवेकहिकी जड मूल उखारदयो भवमाहीं॥३२॥ सुनबातशिलूषडरयो मनमें पुनि संभ्रमहेर सुनारि अलायो। रतिकंठभुजा घनपीनकुचालहि संगरोमांच अनंग सुआयो। जगमादन सोभ अपार बनीमदघूमतनयनचले अलसायो। अब भागचले इह ठौरहिते सुनिकै ममवाकमनोषुनशायो ३३ इमभाख तजीरंगभूमितिनो तव आय मनोज प्रवेशकयो । अलिकै कच नील कपोल लटीरतिकंठविषे हँस हाथदयो। हगकंज चढाइ उठाइभुजा रतिनाथ महा उर क्रोध छयो । भृत्ताऽधम पापि सुजीवतमें रति नाहि विवेक सुकौनभयो ३४ तवलौं मनमाहिं विवेक रहे सभ आगमते उपजो इह जोई।। जबलौं नहिं नीलसरोरुहिसें हगनारिकटाक्षलगे सरकोई॥ नृप जीत तजे नवखंडमही घरनारि भजें कर जोर सुदोई।। चतुराननलौं जगमाहिं पिखे दृगनारि अजीत नहीं भटहोई३५ (१) नयाधम ॥

(८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०१] धौल जहाँ गृह उचवने गजदंतनमंच सुसेजसवारी ॥ मध्यविराजत चंद्रकलासम वारिजनन सुनूतननारी ॥ भूषन चंपकहार घने तनुचन्दन कुंकुमगंध उदारी ॥ चंदउदै तम दूरभये निशिमाहिं खिरीसुमनोजकी वारी॥३६॥ इह आयुध मोहि जयंत सदा इन धारमलेजगआहिवलीको। इन होवत कौन विवेक अहै पुनिबोधउदै नहहोत कलीको।। जनऔरनकीजगकौन कथा धृतसंयम जोजन जाइ गलीको। दृगकंज फिरायपिखे युवतीचितयोंतरफैजन मीनथलीको३७ रतिरुवाच। दोहा। __आर्यपुत्र सुअतिवली, भा मुनी अनेक ॥ महामोहभूपालको, याजग शत्रु विवेक ॥ ३८ ॥ काम उवाच । सवैया। तवनारि सुभावते संकभई प्रतिपक्षनते हमनाहिंडरें। पिखयद्यपिफूलशरासन औसरमैं करभीतरआपधरें । जन तदपि आयसुमोहिं उलंघ मुहूरत धीरज नाहिं धरें। सुनवामउरू सुरदैत्यसमै जगभीतरहै वस मोहि करें॥३९॥ दोहा। जानत काम ननारि कछु, शृङ्गीऋपिवन माहि॥ मोसरचीत्तभ्रमाइयो, गयोभूपगृहमाहिं ॥४०॥ (१) नयका हेतु। (२) शत्रुओंसै ॥ - ma- [अं.१] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (९) - ताकी कथा संक्षेपते, कहोंसुनो चितलाइ ॥ वामउरू संसामिटे, तोहिं निखल डरजाइ॥४१॥ चौपाई। लोमपाद इक भूपति भारा । जाकोयश सवभौन मँझारा॥ दशरथको वहु मीत कहीजे । जाको हेर अमंगल छीजे ॥४२॥ ताके देशको बहु विस्तारा । वर्षा होइ न ताहि मझारा ॥ ताकी प्रजा दुखी सभऐसी।तपत अल्पजल मछलीजैसी४॥ विप्रेजोतिकी भूप बुलाए । वर्षा होइ सुकौन उपाए ॥ विप्रन वहुविधिकीनविचारा। भूपतिको इह भाँति उचारा॥४४॥ शृङ्गीऋपिवन भीतर जोई । आइ इहाँ तब वर्षा होई ॥ वहनिरपेक्ष महामुनिज्ञानी ।आवै किहप्रकार रजधानी॥४५॥ लेन न ताको कोई जावै । शापअमिते सभ डर पावै ॥ तब तिन वारवधू सवुलाई । दानमानकर पास विठाई ॥४६॥ शृङ्गीऋपिवनजाहि अगारा। ताको लियावो नगर मझारा ॥ सुनकर वारवधू अकुलानी ।शाप अग्निते अति डरपानी॥४७॥ पर भूपतिकी आयसु जोई। मेटि न सके कदाचित सोई ।। तव तिन एक उपायसुकीनो। नौकावांध स्थंडलकीनो ॥४८॥ तामै रंभापुंज जराए। लाडूकरणपूरफललाए कहूं जलेबी कहूं अपूपा । कहूं सुबूंदी रची अनूपा ॥ १९॥ ॥ (१) ज्योतिषी। (२) मृत्तिकाकाथडा । (३) घेवर ।

(१०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०१) दोहा। क्रितम बेल तामै रची, फूल पात बहु भाइ । लाचीदाणेकी तहां, रची सुदाख वनाइ ॥५०॥ चौपाई। याविधधारअडंबर बाला ।गई तहांजहँ विपिन विशाला।। मुनिआश्रमते किंचित दूरा । नौका थापी नीर गरूरा ॥५१॥ षोडशबरसनकी बहु बाला । गई तहां जहँ मनी विसाला ॥ लाडू करणपूर फल जेते। पात पलाश धरे समतेते ॥१२॥ शृङ्गीऋषि तह नैन मिलाए। ध्याननिष्ठ मुखवेद अलाए । पगनूपुरधुनि सनी सुजवहीं । नैनउघारे मुनिवर तवहीं ॥५३॥ मुनि उर जानवन्दना धारी । अरघपादहित लियायो वारी।। गणिकातब मख एह बखाने । हम ऋषिवर नहिं छुहे सआने५४ थाफो नीर नचरण पखारो। हमरे तपवनफल मख डारो॥ करणपूर अरु लाडूखाए । शृङ्गीऋषिके मनविगसाए॥१५॥ खाइ जिलेवी लाचीदाण । अहोस्वाद मनिमखोबरखाने । मिलकर गणिकागायन करें । मुनिवर जाने वेद उच्चरें॥५६॥ तुमरे मुखसरोज मकरंदा । वेदधुनी उर जने अनंदा ॥ पद क्रम जटाअपूर्वथारी। आप पढाई जोमुखचारी ॥१७॥ याविधिनिरखतामुखओरा । ज्योंनिशचिते सुचन्दचकोरा ॥ अहो हमारे भाग सुनए । यह मुनि ब्रह्मलोकते अए।।५८॥ (१)करीहुई। (२) पदकमजटा वैदिक मन्त्रोंके उच्चारण विशेषका नामहै ॥

[अं० १] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (११) याके बलकल ऐसे सोहै । तडितपुंज जनमें मनमोहै ॥ बनफलमिष्टमधुररधुनिवेदा मनकोनिखिलमिटावैखेदा॥१९॥ सुंदर शीशजटा अतिकारी। मनोविरंचि स्वहाथसँवारी ॥ तपको तेज भालमें दमकै । किरणासहितमनोशशिचमकै६० हेमजनेऊ याके अंगा। स्वर्गफूल सोभे सरबंगा ॥ अहोपिताफलहित बनगए । याके दरशन ताहि न भए॥६॥ ऋषिआगमनऔसरकोजान। वारवधू तह कियो पयान ॥ वहुआईनौकाकेपाही मुनिवर आयोआश्रममाही॥१२॥ शृङ्गीऋषि सुतआइ निहारा । रंचककरे न वेद उचारा ॥ अग्निहोत्रकी अग्नि सुजोई । नाहि जगाई निशिकोसोई॥६॥ वारबधू जिहपंथ पधारी। दृष्टि तहाँ शृङ्गीऋषि धारी॥ पूछयो पिता कहां मति गई । पढे नवेद नहीं कृतकई ॥ ६४॥ शृङ्गीऋषि तब बैन उचारे । पिताहुते कछु भाग हमारे ॥ ब्रह्मलोकते मुनिवर आए । नाहिसमश्रूमुख निरमाए ॥६५॥ ताको रूप निहायो जोई। अवलौ चीत चितारों सोई॥ कोमल बलकल तनमेंसोहैं । दोदो शृंग उरन मन मोहैं ६६॥ शीशजटाकोमलअतिश्यामा। भाल तिलक हाटकढिगदामा॥ नाककरणमें छिद्र सुकीने । स्वर्गफूल तामें गुहिदीने ॥६॥ नयनसरोज दयारसभीने । सच सुधा श्रम करे सुखीने ॥ मेरीओर कृपाकर निरखे। प्रेमडोर मानो मनकरखे ॥६८॥ याविधि वेद सुकीन उचारा । सुनिकर हो सुचीत्त हमारा ॥ ऐसे शृङ्गीऋषिहिअलायो। पितालख्योअबलाभरमायो ६९ (१) मुखके वाल ॥ -- (१२) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०१] शृङ्गीऋषि बहुभाँति डराए । हेसुत ऋषि नाहि राक्षसआए । ताके गीत सुनी नहिं काना । नातर तेरे हरहैं प्राना ॥ ७० ॥ याविधि मुनिवर बहुत डराए । पर शृङ्गी बहुरूप ध्याए । मुनिवर भये प्रातपुनिकार गयो जवैवहुविपिनविशाला७१ तवपुनिगणिकाझुंडसुआयो । शृङ्गीऋषिपिखमोलझुकायो । तुम अपने तप विपिनमझारी। मोहि लेचालोकरुणाधारी७२॥ तब संगचल्यो सुनिवर ऐसे। प्राणनसंग जीव जग जैसे ॥ नैनकटाक्ष सुछविहिकपोला निरखभयोऋषिकोमनलोला७३ ताकी मंदगती झुनकारा । सुनिसुनिऋषिमनभजेविकारा॥ नौकाभीतर . बैठो जवही । पहुँतो लोमपादपुरतवही॥७॥ मुनिवर नगर जवै पगधारा । वरषा भई सुतहाँ अपारा ॥ यहविधि तपकोजाहि प्रभाऊ । अवलाऽधीनभयो मुनिराऊ७५ शांता भूपतिदुहिता जोई। ताहि वरी पुर भीतर सोई ॥ याकी कथा बहुतविस्तारा । कहांलगे मम करोंउचारा।।७६॥ दोहा। मानवकी गनती कहां, देवनमैं प्रधान ।। त्यागे धर्म क्षणेकमें, रंच लगावो बान ॥ ७७॥ सवैया। गौतमनारि सुजारसुरेश्वरजाइ भयो सर मोहिचलायो । वेदपठे च तुरानन जो रतिके हितसो दुहिता प्रति धायो । (१) उपपति । (२) आत्मतनया शतरूपा ॥

[अ०१] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (१३) इंदु भेजीगुरुकी अबला बुद्धसो सुतताहिके बीच उपायो॥ कौन अपंथन पांउधरे जगमोसरजाहिको चीतभ्रमायो७८॥ दोहा। याविधिके अबलाहने, तपी बडे बलवान ॥ गुलावसिंह वैरागको, करें मूढ भिमान ॥ ७९ ॥ रति रुवाच ॥ सवैया। सत आर्य यद्यपि तूंमुजमैं जगजीतनको वल आपधरें । जग होइसहायक जाहिवली पुनितां आरिते बलवंत डरें। सुनिये यमंआदिक आठ वजीरविवेकसहायक वेदररें ॥ वहु जंग उपाय करें सुनियो इहते उरमैं हम नीतडरें ॥८॥ काम उवाच ॥ सवैया। भामिनि रायविवेकहिकयमआदिक आठ अमात सुनाये ।। तेरणरंगमहीपहिले हमने सबठौरनठौर दबाए कौन अहै जगभीतरसोहम जीवत ताहिको नाम अलाये ॥ वामउरू तज चिंतसदा तुमक्योंमनमै अरिते डरपाय।।८॥ दोहा। कोपं आगारीरहे जो, कौन अहिंसानार ॥ ब्रह्मचर्यको मैं सुनो, क्षणमहि डारों मार ।। ८२ ॥ (१) गुरु बृहस्पतिकी स्त्रीको चन्द्रमा सेवताभया । (२) यमनियमाऽऽसन प्राणायाममत्याहार धारणा ध्यानसमाधि । (३) क्रोध । (४) पर प्राणिोक्यो- गानुकूल व्यापारका नाम हिंसा ताका अभाव आहिंसा । (५) आठपकारके मैथुनका त्याग ब्रह्मचर्यह ॥

(१४) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०१] . लोभ जवै करमै धरे, चन्द्रहास बलधार॥ सत्य असतेय अपरिग्रह, भामनि मुएनिहार ॥ ८३ ॥ सवैया। यमनमसुआसनप्राणयमं प्रत्याहारवलीजगध्यानअलाये ।। धारणा और समाधिसुनो चितहोइ इकाग्रतौ उपजाये ॥ चितभीतर रंच विकारकरौं इनको जडमूल सुदेहु उठाये ॥ इन जीतनहेतु रची अबला यमनेम तवै हमरे वशआए।।८४॥ दूरविलोकन नारिनिको अरु ताहि संभापन दूर रहे ॥ हास विलास सुकेल अलिंगन नाहि इकंत सुवात कहे ।। जन संयमवंत कहावतजे तजसौधतपोवन जाइवहे ।। चित्तमाहि चितारत जो युवती क्षणमैं मनताहि विकारगहे८६॥ मोह अमातसुमात्सरंमद दंभ तथा पुन लोभ अलाए । फारयमादि वजीर लये वहिकान इकंत सुमंत्रदिढाए । मोहमहीप अधर्म वजीर यमादिक गोप लगे तिनपाए ॥ जोयमनेम करे जगमैं, हरिके हित नाहिसुलोक दिखाए ८६॥ रति रुवाच॥ दोहा। शमदम और विवेकलौ, कामक्रोधमदमान ।। मैं सुनियो निजकानमैं, एको जनम अस्थान ॥८७॥ (१) पर द्रब्यके हरणकी इच्छा का नाम लोभ है। (२) ययार्थभाषण का नाम सत्य है। (३) चोरोके अभावका नामअस्तेयहै। (४)खोटे प्रतिग्रहके अभावका नाम अपरिग्रह है । (५) घूतादिक्रीडा । (६) मन्दर। (७) पर गुणोंमे ईर्षा और मद कहिये मनका गर्व ॥

[अं०१]
प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
(१५)
काम उवाच ॥
सवैया।
उत्पत्तिकोस्थानसएकअहे मनसोजगभीतर तातअलाया॥
हम हैं पुन भ्रात विमात सुनो वहुगोपप्रकार बने अबगाया।
सुन पूर्व ईश्वर संग कीयो, निजनारिवखानत ताहिं सुमाया
जिनते उत्पत्ति भई हमरीमननाम वही सुत ताहि उपाया८८
मन तीनहु लोकसुआपरचे पुन ताहि विषे कुल दोइ उपाई।
मन एक प्रवृत्तिकहे पतिनी सुनिवृत्ति तथाजग दूसरि गाई॥
मोह प्रधान प्रवृत्ति रची कुल तीनहु लोकनमाहिं फिलाई ॥
सुविवेकप्रधान निवृत्तिजनीकुलसो विरलीजगमाहि चलाई८९
रति रुवाच ॥
सवैया।
सुत आय जो इहभांति अहे जगभीतर एक सुताततुमारा।
किह कारण वैरभयो तुमरो धुजमीनकरो ममएहु उचारा ॥
तिह भ्रातनमें इहभात सुवैरन मोहि सुन्यो यह कानमझारा।।
कविसिंहगुलाव कहे रति नाहसुनो रतिवरको कारणभारा९०॥
काम उवाच ॥
सवैया।
जे इक आमिषते निपजे तिन वैर प्रसिद्ध को जगमाही ॥
भूमिनिमित्त लरे कुरुपांडव भूप खपे जिनके रणमाही।
(१) दूसरी माता ॥
३

(१६)
प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
[ अं.१]
भारत खंडकी नूतन नारि भई विधवा जिन संगरमाही॥
होवतहीं यह बात आई कछु नाहि भई सुनई भवमाहीं॥९॥
हमरे मनतात सुपूर्वएरतितीन लोकसुआप वनाए ।
हम अतिवल्लभ तात हिके इहते हम तीनहुलोक दवाए।
शम औ दम और विवेक पिता वलहीन पिखे वनवास पठाए।।
अबते अघवंत उपायका पितभ्रातनमूलसु देहु उठाए॥९२॥
रति रुवाच ॥
सवैया।
सुतआर्यक्यों पुनि पापइसो मति हीनकरेंवहुसंगतुमारे ।
उर द्वेष बध्यो तिनके अतिहीं इहभांति चहें जगपापकरा।।
अथवा इह कौनउपाय सुनोधुजमीन तुमे मनमाहि विचारे॥
इहभांति सुने रतिवाकजवै तव बोलउठे रतिप्राणपियारे॥९३॥
काम उवाच ॥
दोहा।
भामिनि गूढ सुवीजइक, है पुन कह्यो नजाइ ॥
रति रुवाच ॥
आर्यसुतक्यों नाकहें, मोको तूं प्रगटाइ ॥ ९४ ॥
काम उवाच ॥
दोहा।
रति तूं नारिसुभावते, भीरू अतिडरपाइ ॥
वैपापी दारुणकर्म, तोपै कह्यो नजाइ ॥ ९५॥

(अं०१] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१७) काम उवाच ॥ रति रुवाच ॥ दोहा। आर्यसुत सोकौन वहु, कैसोकरम कमाइः॥ विनभाखे थल मीनसम, मेरो चित्त तरफाइ ॥९६॥ सवैया। भामनि नाहिडरें उरमैं हतं आशविवेक सुआश ठराई। याकुलमैं निसकालसमाविद्योजिह नाम सुराक्षसी काई । लेवहिगी अवतार सही उरभीतर नाहिं दया कछु राई ॥ होवतसत्य भविष्यकथा जनकी श्रुति याजग एहु अलाई९७ रति रुवाच ॥ दोहा। हा धिग हमरे कुलविणे, पिसताशीसुमहान॥ उपजेगी उर कंपहै, चलदलपत्रसमान ॥९८॥ काम उवाच ॥ . दोहा। भामनि क्यों उर कंपहै, लोककहें यह बात ॥ जनमु राक्षसी होइगो, निश्चेनहिं बख्यत ॥ ९९ ॥ रति रुवाच ॥ दोहा। नाथ बखानो एहु तुम, जो उपजे पुन सोइ । याजगमैं अवतारलै, कामकरेगीकोई ॥ १०॥ (१) नष्ट होवे आशा जिसकी (२) ब्रह्मसाक्षात्कार औ क्रूर कर्मके करणेते राक्षसी कहीहै (३) पुरुषोंकी वार्ताहै निश्चय नहीं ।

(१८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं॰] काम उवाच॥ . सवैया। भामिनियों सुनिये जगमैं इहवाकअहै विधिब्रह्म अलाया ॥ पुस असंगकहें जिहको तिहनारि अहे जगभीतर माया। नाहिं छुहे तिह संग कवी मनै वल्लभ ताहिंविषे सुत जाया। तां उपरंत सुनो गजगामनि नाथइहे पुनलोक बनाया१०१॥ दोहा। कन्या ताते होइगी, विद्यानाम कहाइ । तातमात पुन भातकुल, लए सकल वहुखाइ।। १०२।। कवि रुवाच ॥ दोहा। त्रास कंप रतिको भयो, वोली अतिभय आहि ॥ भरताके गलसों मिली, आर्यसुत परिपाहि ॥ १०३॥ सवैया। रतिसंगमकोसुखआहिजोईमुखस्वागतिकैपुनकामदिखाए । तनमाहि मनोजरुमंचभये युगतारेक नैननकै तरलाए ॥ घनपीनपयोधर नारि मिले शिवके रिपुतौ मनमैं हरषाए। मणिगुंजत कंकण हाथविषेरतिकंठभुजामनमें विगसाए१०४॥ (१) भसङ्गोह्य पुरुषः । इतिश्रुतेः। (२) शंकाः-पुरुषके साथ संवन्ध रहित हुई, माया मनको कैसे उत्पन्न करेगी । समाधानः-पुरुषके साथ संबंध रहित हुई भी माया मनको उत्पन्न करे है दृष्टान्तः-जैसे चुम्बकपाषाणके साथ लोहशिलाकाका संवन्ध नहीं भी है तौ भी चुम्बककी क्रियाके पीछे क्रिया करे है यह लोकमें प्रसिद्धहै तैसे पुरुषके साथ संबन्ध रहित हुई भी माया इच्छामात्रसैं मनको उत्पन्न करेहै-काहेत (अघटितघटना- पटीयसीमाया) है याते माया सभकछु बन सके है। (३) मनने। (४) मनमें माप्त (५) नयनोंके दो तारे श्यामतरकहिये अति चंचल लगाय दीये ॥ PL [अ०१] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (१९) काम उवाच ॥ सवैया। तव संगममोद जने मनमैं, अरुमोहमहा उ(मैं उपजाए । इमभाष मनोज प्रमोदवढे रतिको दृढ कंठ सुफेर लगाए । हम जीवत कौन वली जगमें पुन आत्मविद्याजो उपजाए। जग कौन विवेककोनाउलएरतिभीरुकहोतुमक्योंडरपाए १०५ रति रुवाच ॥ दोहा। विद्याकन्या राक्षसी, ताउत्पत्ति जोइ ।। तुमरे वैरी जगतमें, किहविधि चाहै सोइ ॥ १०६॥ काम उवाच ॥ सवैया। सार्दुहिता श्रुतिनारिविषे, खलराय विवेकप्रिये उपजाए । संगप्रबोध शशी पुन भ्रात, सुहंसगते तिहमाहि उपाए । ताउत्पत्तिविषे पतिनी सुशमादिक आपसहाइक आए। ते उपवासकरें तपसाधृत उद्यमतीरथदेव मनाए ॥१०७॥ रति रुवाच ॥ दोहा। आत्मनाशक विद्या, ता उत्पत्ति जोइ ।। काहिसराहै दुष्टमति, शंका पापन होइ ॥ १०८॥ (१) विषयांतरके विस्मरणको उत्पन्नकरताहै। (२) अनावृत ब्रह्माकारान्त.- करणवृत्तिरूपाकन्यानाम विद्या । (३) अनावृतब्रह्माकारान्तःकरणवृत्युपहितचैतन्यरूप- भबोधचन्द्रमा भ्राता ॥

(२०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०१] काम उवाच ॥ सवैया । रतिजे कुलनाश प्रवृत्तिभये, वहुपापकरें नहिं पापडराए । मुख नीतं मलीन रहेतिनको, उपजे निजतात सुआतमघाए । बलि पावकधूम सुमेघभयो फिर धूंमधुजंहन आप खपाए। कुलकंटक आहिविवेक सुनोनितपापकरेनहिं रंच लजाए १०९ (अथ नेपथ्ये कलकलाशब्द) विवेक उवाच ॥ सवैया। आहिदुरातमकामकलंक सुतूंधरमातम आप अलाए । तेअघवंत सुपापकरें इम भाष अघी हमको सुठराए ॥ नाहिलयो मन तातमतो जिम मूढ मनोज सुनो चितलाए ॥ तातभयो सुतमोह अधीन सुमारग वेदको दूर भुलाए॥११०॥ कार्य औ अकार्यको गुरु जोन पिखे उरमें गरवाए। वेदविरुद्ध सुपंथविषे मनके मदकै जब पांउ टिकाए । ताहिं त्याग सुवेद कहे मनुस्मृतिमैं पुन एहुबताए । बीच पुरानन व्यासकहे ऋषिपूर्वले पुनएहु अलाए॥११॥ दोहा। पिता गुरू मत त्यागकर, बडभागी प्रहलाद ॥ मुक्तिपाइ वन्धनतजे, हरिकेसेवसुपाद ॥ ११२॥ (१) अग्नि । (२) मन। (३) श्लोक-गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याऽकार्य मजानतः । उत्पथ प्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते ॥ अर्थयहः-जोगुरु अहंकारादिकदो- षोंकरकै उन्मत्तभावकू प्राप्तभयाहै तथा जो शास्त्रकरणेयोग्य अर्थकू तथा शास्त्रनिषिद्ध अकरणेयोग्य अर्थकू जाणतानहीं तथा शास्त्रनिषिद्ध मार्गमें मवृत्तहोवहै ऐसे गुरुका शिष्यने परित्याग करणा॥ 04 .

[अं॰] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (२१) , कवित्त। तात जो हमारो सुहंकारके अधीन भयो, कार्य अकार्य न रंचक विचारियो । जगतको पतिजो परमात्मासु तात निज, ताहिको सुबाध जगशृंखलमें डारियो॥ मोहमदमान निसदिन सनमानकर, छोडिनो सुदूरबंध दृढ विसतारियो । ऐसो मन तात जोईहतएनदोषकोई, कोहमत्यागनहिं ताहिमतो धारियो ॥ ११३॥ सवैया। इहऔसर कामविलोकनकै रतिकेप्रतिएहु सुवाकअलायो। हमरे कुलमें सुप्रधानवडो मति संगिमिल्योसुविवेक हिआयो। गजगामनि आवतहै इतऔर चले मृगके पतिज्योंहुलसायो । शिवज्योंतुहिनाचलकीतन्या, मतिसंगमिले इहभांतिसुहायो। दोहा। रागादिक जिन वसकिये, कीरतिवंत उदार॥ उर अतिकोप्यो मानधन, मनोनिरादर धार ॥ ११५॥ सवैया। तन दूवर एहुविवेक पिखोरतिचित्त कठोरमहादुःखदाई। कलपीमतिमाहि सुयोंलसकै तुहिनाचलज्योंशशि देतदिखाई इहकारणते हम योग्यनहीं इहठौर निवासचले सुपलाई। रतिसंग मनोज सुभागगए, मतिसंग विवेक बरे तिहआई११६ (१) रागादिरूपकालस ॥

(२२) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं.१] विवेकभूपति रुवाच ॥ दोहा। सुनेप्यारी कानतव, कामवडेमददैन । हमैवखाने पापकृत, दुष्टात्मयहमैन ॥ ११७ ॥ मति रुवाच ॥ दोहा। आर्यसुतनिजदोषको, जानतनाहिं सुकोइ ।। दोपवखाने औरको, मूढ जगतके लोइ ॥ ११८ ॥ राजोवाच ॥ सवैया। चितआनंदनीतनिरजनजो जगनायकजाहिसुआगमगाए । मदकामहंकारपरायणने तिनको जगभीतर वन्धन पाए । अतिदीनदशा तिनकी सुकरीपुन सुकृतवंतसु आप कहाए। हम ताहि छुडावनमाहि.लगेअघवंत अहो खल मोहि अलाए।। मति रुवाच ॥ सवैया। सुत आर्य जो परमात्महे सहजानंद सुंदरवेद उचारे ।। वहुनित्यप्रकाश महाराविसों सुत्रभौननमाहि सुजाहि प्रचारे॥ इहभांति सुनोपरमेश्वरमैं किहभांति इने तिनवन्धन डारे। दुःखसिंधुपरात्मडारदयो किम ताहितजे गुणआपउदारे१२०, राजोवाच ॥ सवैया। अतिधैर्यवंत उदारवडो उरसत्य सदा गुणसिंधु सुगाए। स्वाच्छसदा उरनीतवसे सुमहालक्ष्मी सिर छत्र झुलाए । 1 [अं०१1 प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (२३) मति धैर्यशील तजेक्षणमें सुनभामिनि नारि न जाहिभ्रमायो।। अब औरकी बात कहाकहिये निजनारिपरात्म आप भुलायो। माति रुवाच ॥ सवैया। सुतआर्य जो तमहोइ बडोरविकोनहि छादसकै पुन सोई॥ तिम आत्म नित्यप्रकाशमहा जिनकैसमदूसर और न कोई।। सुखसागर नीत उजागरहै अज्ञान कहो किहभांति सुहोई।। अब दूरकरो करुणाकरकै इहशंक बडी उरअंतर पोई ॥१२२॥ राजोवाच॥ अनंगशेखरछन्द। विनाविचार सिद्धए प्रसिद्धवारयोषिता, समान नाममायाविलोसिनीबखानिए । मणिसफाटकंयथासुदेवऊजलोमृषा, सुहावभावकैतथाप्रवंचनासुठानिए । ताहिके सुसंगते असंगताजु देवकी, स्वरूपसिद्ध नित्यहै मनाक नाहिं हानिए । तथापि गाँढसंगके प्रसंगविक्रिया भई, छुटीसुधीरता तबै अधीरता सुजानिए ॥ १२३॥ मति रुवाच ॥ दोहा । कारण कौन सुभाषिए, जाकर करे विकार ।। पुरुषपुरातनसोवधू, जाको चरित अपार ॥१२४॥ (१) नाम अनिर्वचनीयहै । (२).क्रीडादिविलासोंकेकरनेवाली । (३) मिथ्याहाव- भावकरके असत्यपदार्थोंको सत्यरूपदिखावतीहुयी पुरुषोको वंचनकरती ( ठगती) है। (४) अत्यत सगसे विकार माप्तभया ।।

(२४)
प्रवोधचंद्रोदय नाटक।
[अं॰]
।
4
राजो वाच॥
दोहा।
माया कारण कार्जको, चाहितनाहिंसुकोइ ।।
नारी जान पिशाचनी, यही सुभाव सुहोइ ।। १२५ ।।
सवैया।
मोहतहै कवहूं अवला मदसोंसु विडंवन फेरकरे ।।
कवहूं पुन ताडत है अवला कवहूं हँसके पुन अंकभरे ॥
सुविखादकरे कवहूं कवहूं अतिदीन मनोरिद माहिवरे ।।
हगवामकटाक्षनकै अवला कहुकौनहकौननचीतहरे ॥१२६||
दोहा।
है कछुकारण कौन पति, कहों सुनों अव सोइ ।
दुराचार इन चित वियो, कन्यो विचार सुकोइ।।१२७॥
मायावाच ॥
सवैया।
अव जोवन मोहि विलाइगयोपुन देव पुरातनहै जरठायो।
अव मोहि विषेरस आहिकहारस वेमुखजोवनमैं नरसायो ।
अव और उपाय वने नकछू मन पूत बने अव राज दिवायो।
इहमातमतो सुविचारमनेमन पूत तवैनिजतात मिलायो१२८
नवद्वारनके पुर ताहि रचे मन आप सुनो तिनबीच वसाए।
इकरूपहुतो परमात्मजो वहुभांतिनकै पुरमाहि फसाए ॥
सुकरे मनकार्य आपजितेपरमात्मके पुनमाहि ठराए ॥
सुजपाकुसममणिमाहियथाहनश्वेतगुणगुणलालदिखाए १२९
(१) कार्य । (२) इस प्रकार मनने माताके मतको विचारकर तथा मनरूपपुत्र तात
परमेश्वरके साथ अभेद संबन्धवाला होकर ॥

[अं॰] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (२५) ܫ मतिरुवाच॥ दोहा। आर्यसुत यालोकमैं, जैसी मात प्रवीन ॥ ताको सुत तैसो भयो, कहो देव कतकीन ।।१३०॥ राजोवाच ॥ सवैया। तवचीतको पूत हंकार बडोनेपिता परमात्मकोजगगायो॥ अतितोतलवैनगयो ढिगजो हसके परमात्म कंठ लगायो। तव भूलगयो परमात्म आप भवमोहभयो इम आप अलायो। इह तात इहै मममात अहै इहखेत इहे सुकलित्र सुहायो१३॥ यहपुत्र सुमित्र अरात बडो पुन याव सुधा वलं आहि हमारे॥ गज अश्वपशू यह कोर्श अहे पुनएहसुहृदसुबन्धु पियारे । चितको फुरणों जिहभांति भयो तिमदेव परात्मआपन धारे॥ अज्ञान मई बहु नींद भई स्वमा बहु भांतिन भांति निहारे १३२ मति रुवाच ॥ दोहा । आर्यसुत परमेश्वर, दीरघनौंद विकार। वोध जनम किह भांति पुन, होवे मोहि उचार ॥१३३॥ कवि रुवाच ॥ दोहा । सुनत विवेकमहीपको, लाज भई उरभार । कीन अधोमुख तासमैं, धरणीओर निहार ॥१३४॥ (१) मन । (२)पौत्रा। (३) सेना । (५) खजाना । (५) मबोध ॥ - - . (२६) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं॰] मति रुवाच ॥ दोहा । आर्यसुत किहहेतते, गुरुतरलज्जातोहि ॥ नम्रसुकंधर तेभई, भाषो कारण मोहि ॥ १३५॥ राजोवाच ॥ दोहा। नारिनको वह ईर्षा, होवत जगतमझार ।। साऽपराध जन आप पिख, कहों नतोहि उचार ॥१३६॥ मति रुवाच ॥ दोहा । रसप्रवृत्तिकै धर्महित, करे कछू पति प्राण ॥ बहुऔर जगयोषिता, करे काज तिहहान ।।१३७॥ राजोवाच ॥ दोहां। मति प्यारी इक औरहै, मानन मेरी नार॥ उपनिषत सुनामबखानिए, सुंदररूपउदार ॥ १३८॥ चौपाई। वहुदिनकी विछरीहै प्यारी । मोहि असूया दुःख उर भारी ।। शमदम जो अनुकूलह होई । तौउपनिषत संगममहोई॥१३९॥ हेमति तूं जगविष निवारे । एक महूरत मोन सुधारे ॥ जाग्रत स्वप्न सुखोपतविलाई। मैं प्रवोधसुत लेहुउपाई॥१४॥ (२) दूसरीस्त्रीके संगसेंअपनेको अपराधसहित देखकर । (२) पतिके मनवांछितकार्य। (३)स्त्रियोंको ईर्षाकृत जोकोपहै ताका नाममान है तिसमानवालीका नाम माननहै ॥ MS [अं॰] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (२७) ---- दोहा। उपजतही प्रबोधसुत, करे वन्ध सभहान ॥ वन्धनमुक्ति विराजही, परमात्म भगवान ॥१४१॥ सवैया। सुत आय॑जो प्रभको दृढवंधन, दृढग्रन्थि महादुःखदाई ॥ ताअवला तव संगमते सुतबोधभये बहु वन्ध मिटाई ॥ पति नीतभजो तिनसंगमको अव वेगिमिलो किमवेर लगाई। सुतआर्यनीतरमोतिनसोंममचीतप्रसन्नभयोहुलसाई॥१४२॥ राजोवाच ॥ सवैया। भामनि जो यह वातिभई तव सिद्धमनोरथआज हमारे॥ हैजगआदि सुएक विभू परमात्मजा श्रुतिपुंज उचारे । ताहि करे वहुखंडजिनोपुरदेहनमे बहु बन्धन डारे ॥ चिदईशदयोमृतकापदहाअवतेईवनेजगभीतरमारे ।।१४३॥ कवित्त। ब्रह्मकेजोंभेदकहैंखेदकअनेकविधि, प्राणअंतप्राश्चित ताहि करवाइये ॥ विद्यासरूप प्राश्चितयों अनूपहोइ, जीवब्रह्म एकता सु तवी मोक्ष गाइये। कार्यके सिद्धहित शांति औ दमादिजेई, ताहताह तीरथमै वेगसु पठाइये। (१) प्राणाका नाशरूप । (२) ब्रह्माद्वैतसाक्षात्काररूप । (३) प्रबोधकी उत्पत्तिरूप ॥

(२८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं॰] - ऐसेमतिमान. मति पति तौवखानकर, गएभौनऔरपिखजाहिसुखपाइये ॥ १४४ ॥ सवैया। मतिसंग विवेक विचारकियो जगभीतरजोजनकोसुखदाई ।। जिहसों समजीवकी वन्धमिटे परमात्मसंग सुवेग मिलाई ।। तपसातटतीरथजोगभजे उपजे सुतबोध बडो जसदाई ।। कविसिंहगुलाबसु एहकथा प्रथमै यह अंक निरंतरगाई१४५॥ दोहा। गुलाबसिंह मतिपति मतो, जानमोहभूपाल । दंभकलादिक पठेगो, तीरथहनन बिसाल || १४६॥ इति श्रीमन्मानसिंहचरणशिक्षितगुलाबसिंहविरचिते मबोधचन्द्रोदयनाटके मथमोऽकः समाप्तः ॥ १॥ इति श्रीमदुदासीनवर्य परमानंद शिष्य गुरुप्रसादविरचिता प्रबोधचंद्रोदय नाटक मथमांकटिप्पणिका समाप्ता ॥ १ ॥ - , ॐ श्रीगणेशाय नमः। श्रीगुरुभ्यो नमः। अथ द्वितीयोङ्कप्रारंभः॥२॥ दोहा । असुर विदारे जाहि जग, देवनकियो उधार॥ तारघुनायक विमल पद, वन्दों वारंवार ॥१॥ सवैया। तव दंभको स्वांग भयो अतिसुंदरजाहिपिखेजगशीशनिवाए। करसैननहीं समुझावतहै सभपेखत राजसभा महिआए । मुख एहुकही महा मोहवली सिरहाथधरे जगमाहि पठाए । सुत दंभ अमातन संगबिचार विवेक कियो बहु होननपाए२॥ महोमोह उवाच ॥ सवैया। इह विवेक विचारकियो सुप्रबोध बलीसुतलेहि उपाए। ताहिनिमित्त सुतीरथमै, शम औदम आप विवेक पठाए । है हमरे कुलनाशनिमत्त इहै जगमाहि विरंचिवनाए । तुम होइ सुचेत उपायकरो जिहते इह नाशनिमत्त मिटाए॥३॥ तिन तीरथमाहि वनारसजो बहु मोक्षनिमित्त विरंचिवनाई। शिवकी नगरी सुतदंभवरो सुकरो तुम जाइके एहुउपाई ॥ (१) विषयोंमें अत्यंत आसक्तिका हेतु,जो अहंमम आभिमान है ताका नाम महामोहहै ॥

(३०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक । [०२ चहूं आश्रमकी कल्याणमिटे जिहते नह मोक्ष सुहोवनपाई॥ वस मोहि बनारस एहुकही सभस्वामीकह्यो सुकोममआईट दम्भ उवाच ॥ दोहा। जाहि निवास सुमैकरों, सुनो तिनोकी गाथ। मनमथके उत्सवभनें, लोक निवावें माथ॥५॥ कवित्त। बारवधू भौननिसबसमदपानहास, कामके कलोलनिसों जामिनी बिताइ है। चाँदिनीसुरात मनमत्थके हुलासभए, नारिनके संगसु अनंगसुख पाइहै। नाइ प्रातकाल मले अक्षत लगाइ भाल, धूरत सुबडो सबलोगनि रिझाइहै। दीपत सर्वज्ञ पुन तापसी ब्रह्मज्ञयह, हव्यवाहहोमहम कदीनचुकाइहै ॥ ६॥ दोहा। योंदिनमें वचत जगत, निसमैं रसकरसाल ॥ महामोह भूपालको, मैं कृतकीन बिसाल ॥७॥ कवि रुवाच ॥ दोहा। धाम वनारस गंगतट, बैठे दम्भ उदार ॥ कोइक आवत देखिकर, बोले वचन विचार ॥८॥ (१)आपने महान्पनेकी सिद्धि वास्ते लोकोंके समीप आपणेंकू अत्यत धर्मात्माप- ले करफै जो मसिद्ध करणा है ताका नाम दम्भ है । (२) निरंतर हमारा अग्निहोत्र है ॥

[अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (३१) दम्भउवाच ॥ सवैया। कौन उलंघ भगीरथिको इत आवतहै सरितातटमाही ॥ ज्वाल मनोअभिमानहकी जन तीनहु लोक असे मुखमाही। वाक कहे इहभांति मनो सुदवावतहै सभको जगमाही ॥ बुद्धि वडी दमकै उरमैं सभको उपहास करे मनमाही॥९॥ कवित्त। राढा जो प्रसिद्ध देश दक्षणकलेश हर, तिन होते आयो यह ऐसे मनआइहै ॥ आर्यअहंकार सुहमारो तहां नीतबसे, समाचार लेहु कछु मोहिको सुनाइहै ।। ऐसे मन दंभ सुविचार नीके करे तब, आयो सुहंकार चाल हंससी सुहाइहै ।। अहोबहुमूरख जगत यह छायो सभ, ऐसे सुहंकार मुख वैनन अलाइहै ॥ १० ॥ भटपाद मतको नजानत अजानलोक, नाहि प्रभाकरको मरम पछानई ॥ तोतांतिकगंभीर मत धीरनहीं पारलैहे, सालँकको ततज्ञान कोई नहीं जानई ।। (१) मीमांसकभट्टपाद-देहादिकोंसे भिन्न जडचेतनरूप आत्मा मानेहै । (२) पूर्वमीमांसाफा एकदेशी प्रभाकर-देहादिकोंसे भिन्न ज्ञानगुण विशिष्ट हुआ आत्मा चेतन मानेहै । (३) कौमारिल शास्त्र के तत्त्वको नहीं जानते । (४) शारिकनामग्रन्थके तत्त्वज्ञान कहिये सिद्धांतको अर्थात् शांतत मुनिके मतमें वासुदेवही प्रथम प्रकृतिरूपही तत्त्व है ताके शानसे शून्य है ॥

(३२) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अ०२ . 1 वेदव्यास वाकपति कपिलकणादमत, और जो महोदधिको मत कवि भानई ॥ महोवृत्तिना निहारे पुन ब्रह्मकोविचार, कहा नाम नरपशु सभ ऐसे हमजानई ॥११॥ एहँ जो पेखये महानमान बोझभरे अति, महापशु बुद्धिकछु अरथकी नाइहै ॥ कटिमैं पीतांबर अडंबतोखूवकरै, सामवेद धुनि पुन ऊँचे सुर गाइहै । पूछिये जु वात तु रिसात मन क्रोधभये, फेरफेर मूढ वेदपाठ न सुनाइहै ।। वेमुख आचार श्रुतिचारको विचारकहा, जीव काके हेत मूढ वेदन वहाइहै ॥ १२॥ औरठौर गयो पुन कौतुक सुनयो पिख, वोलियो हंकार सुगुलाब पहिचानिये ॥ नामतो सन्यास माग भिक्षा विलास करें, यही जतीनाम लोक माहितो बखानिये। ३ - (१) वेदव्यासका वेदांतमत तथा वाचस्पतिका मत औ कपिलकृत सांख्यशाल का मत तथा कणादकृत (न्यायशास्त्र) का मत तथा महोदधि कहिये शेषमणीत भाष्यकामत । (२) पाशुपत शास्त्र संहिता नही देखी तौ ब्रह्मका विचार सूक्ष्म होनेते अति कठिन है । (३) सर्व मनुष्यरूप पशु है सो शास्त्रमेंभी कहा है। श्लोक-आहारनिद्राभयमैथुनानि, सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् ॥ ज्ञानं नराणामधिको विशेषो, ज्ञानेन हीनाः पशुभिःसमानाः ॥ इति ॥ इन सर्वमतोंका अर्थ विस्तारभयसे लिखा नही (४) शुद्ध वेदपाठी ब्राह्मण । (५) भिक्षामात्रवास्ते यतीपणेको ग्रहण किया हैनहीं मुक्तिके वास्ते ॥ । .

1 [अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (३३) . - मूंड तो मुडाए नाम पंडित कहाए कछु, ज्ञानहूं न पाए करवेदभाष्यठानिये ॥ की हैं व्याकुल विदांतके प्रकरणसभ, आवतहै हास मुहि यहि सुनि वानिये ॥ १३॥ प्रत्यक्षते विरुध अरथ भाषत वेदांत सभ, एकही अखंड ब्रह्म दूसरो नगायोहै । ऐसे जो विदांतशास्त्र मानतप्रमाण मृढ, बौद्धनके ग्रन्थनमैं प्राध कौन आयोहै। सेवरा सन्यास वौद्ध ग्रन्थ औ विदांत एक, भिन्नभिन्न नामइक छलके चलायोहै। तिनहूंके संग पुन बोले महापाप चढें, ऐसै मुख भाष पांउआगे सुउठायोहै ॥१४॥ एही शैवं पाशुपत आगम सुशैव रति, रासभसमानतन भसम लगाइहै । पशुहै अदंड लोकमाहिं सुपखंड करें, इनसों प्रभाष नर नरक सुजाइहै । शैव पाशुपतके निहारे होइ पाप अति, पेखिये सुनाहि इन ऐसे बुद्धि गाइहै ।। गुलाब सिंह देखिकै हंकारकी बिसाल छवि, लोगनिके पुंज पुन आगेही पलाइहै ॥ १५॥ (१) नहीं मनको मुण्डाया पण्डित कहाते हैं परन्तु पण्डित नहीं है । (२)प्रत्यक्षादिममा सिद्ध जो अर्थ है तिससे विरुद्ध अर्थके कहनेवाले वेदांत शास्त्र यादिप्रमाणरूपकर मानतेहे तो बोधके ग्रन्थों में क्या अपराध है अर्थात् तिनोंकोभी प्रमाणरूप मान्या चाहिये यह तात्पर्य है। (३) शैव मधान पाशुपत व्रत है जिन उपासकोंको तिनका नाम शैव पाशुपत है ।। - - + ३ (३४) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२] औरठौर गयो पुन पेखिमुछकानो अति, अहो वकध्यान पटऊजल सुहाइहै ।। गंगनीर धारतट शीतलसिलासवार, प्रोक्ष प्रोक्ष आप कुश आसन विछाइहै। लए अक्षमाल मुख मंत्रतो विसाल जपें, अंगुलकमाहिं कुशमुद्रे सुवनाइहै ।। एही दंभवंत धनवंतनिके वित्त हरें, बीच मंत्र न्यासकर अंगुली हलाइहै ॥ १६॥ सवैया। हंकार तवैपुन पांइ उठाइचल्यो मछकाय पिखेजनआना ॥ है कर माहिं त्रिदंडधरे मख छूत बकै सुलदे अभिमाना ।। द्वैतसुनाहि गहै उरमैं घुन नाहि अद्वैतको रंच पछाना ।। पंथे उभै इह भ्रष्ट भयेभनिआश्रम और पिखेमछकाना१७॥ किहको इह आश्रम पावन है ढिग द्वारन ऊच सुवंस गडाए॥ सुमनो तिन ऊपर नाचतहैं सित अंवर पुंज हजार तनाए । इतहै कृष्णाजिन,यूप शिला इतते चमसा बहुभांति सुहाए। इत मूसल और सऊपलहै इत केसरकुंभ सुचीत वनाए।॥१८॥ धृतहोम सुगंध सुधूम वडो तिन श्यामसभोनभमंडलकीनो। यह गंगसमीपसुआश्रमहै पिख मोहि सभो श्रम होवत खीनो ग्रहमध्य वडोधरमात्मको तिनको यह आश्रम आहिनवीनो सुभलोयह आश्रमपावनहैदिनदोइ सुतीननिवास सुखीनो। (१) रुद्राक्ष माला । (२) द्वैताद्वैत उभै । (३) काले मृगकी त्वचा-यूप थंभा-चमसा यज्ञपात्रविशेष ॥

[अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (३५) . दोहा। ऐसे धार हँकार उर, वन्योचहै तिहमाहि ।। पुरुप निहायो एक तिह, रूप सुनीजे ताहि ॥२०॥ सवैया। सुंदलांछततांतनु सुंदरहै, पुन भाल विपे घसि चन्दनलाए। भुज औ उदरे उर कंठ उरू पुन ओठन चन्दनटीक बनाए। हग जानु कपोल सुपीठविषे चिविकेबहु चन्दनटीक सुहाए। कुश चंडकटे कर काननमैं सुमनो यह दंभइ सोचमकाए२१ सुभले अब याहिसमीप चलों इमधार चले मन सूप घनेरे।। ढिगजाइ उठाइ भलेकरको मुख एहुकही कल्याण सुतेरे ॥ पुन दंभ हूँकार कीयो मुखते इमवारतहै नहि आउ सुनेरे ।। इतनेमहि आइगए बटुवालक वामन वाकसुनो तुममेरे।।२२॥ दूरहि ठाढरहो द्विज जू इह आश्रमकी गति तोहि नजानी। पादपछालन आप करो करभीतरऊ जल लेहु सुपानी ।। तो इमआश्रम पांउधरो इम कोन बरो बटु एहबखानी ॥ क्रोधभयो सुहंकारवड़ोइहभांति सुनीवटुकी जवबानी॥२३॥ हंकार उवाच ॥ सवैया। हाविधिकौन कुदेशअए जिहदेशन याविध लोक बसैहै ।। कोविदलोक प्रसिद्ध बडे हमसें जिनदेशन आतिथऐहै । (१) मृत्तिकाके विंदुकर चिह्नित है शरीर निसका । (२) शिखा । (३) दम्भका शिष्य। (४) आपणे अनिष्टकरणे विषे तथा परके अनिष्ट करणे विषे प्रवृत्ति करावणेहारा जो अभिज्वलनरूप अंतःकरणकी वृत्ति विशेष है ताका नाम अहंकार है ।

। (३६) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२] आसन पाद जलं अर्गा तिनके हित नाग्रही पुन लैहै ।।. नाहिछुहे जल मंडलको हम और सुदेशहि जाइ वसैहै।।२४॥ कवि रुवाच ।। दोहा। करकी सैनी दंभकर, कीनो ताअस्वास॥ इह जनावत थिररहो, काहेभये उदास ॥२५॥ सवैया। | तब वोलमुखोवटु एहकहीगुर याविधिते द्विजकीनवखाना॥ भयो तव आगम दूरहिते हम ना कुलशीलसुतोहि पछाना ।। सुनि यह बात हंकार बली मुखभाषत है उरमैं खुनसाना॥ हमरोकुल शील परीक्षनकैअवलायकमूढ सुतोहि प्रमाना २६ दोहा। सुन मूर्ख अवतैं कहों, गौड प्रसिद्ध सुदेश ।। राढापुरी प्रसिद्ध है, पेखत हरे कलेश ॥२७॥ कबित्त। भूरश्रेष्ठनाम पुन ताहिमै प्रसिद्धधाम, ताहिपति तात मम लोकमैं बखानेहैं। ताहिके जुपूत, सुपूतऔ कुलीन बडे, देशनप्रसिद्ध लोकलोकमाहि जानेहै ।। तिनमे विवेक विनय धैर्य अचार शील, प्रगट उदार मम कोविद प्रभानेहै । (१) धीरज ॥ , T 1 1 [अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (३७) सोई हमआए विधिलोककिधोनएभये, भयोसु अचंभ जनमोहि नपछानेहै ॥२८॥ दोहा। सुनत वात पुन दंभयह, बटुकी ओर निहार ।। सैननहीं समुझाइयो, देहु पाद हितवार ॥२९॥ सवैया । ताम्रघटी बटुले करमैं पुन उज्जलवारि सुपूर लियायो । ताम्रघटी करले भगवंत करो पदक्षालन एहुअलायो । हंकार कहो हम रोंवकरें, जगकाहूंको नाहिबने सुदुखायो। धोइकिपांउ सुआश्रममें बरनेहितताहि सुपांउ उठायो॥३०॥ दंभ तबै पुन दंतचवाइ चढाइ धुंए मुख एहु अलाए । दूरहि पांइ गडायरहो द्विजमूढकहाढिग आवत धाए ॥ तेतन स्वेतकी विंदुसुनो पसरें इतते उत वायुचलाए ॥ ब्रह्मण्य अपूर्व एहु पिखी सुहंकार करो मनमै खुनसाए॥३१॥ दोहा। बहुर बटुमुख बोलियो, ब्रह्मण्यइ सोही होहि ।। उत्तम द्विजयालोकमैं, कवकब पेखे तोहि ॥३२॥ सवैया। भवभारतखंड महीप जिते पदपंकजं नाहि छुहें डरपाए। पदकजसिंहासन भूतलकेढिगआनसभेनिजमोल झुकाए । (१) दम्भने दन्तोंको दवाय भूको चढाकर वटु बालकके प्रति देखा तब वटुने अहं- कारके प्रति कहा । (२) दम्भके चरणकमलको ॥ ॥

- . (३८) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२ मुकटामणिकी सुमरीचिनकै पद वारजआरती दीपजगाए। इनके ढिगजाइ निशंक सुनो मतिभूलगई द्विजतूं खुनसाए३३॥ दोहा। सुन हंकार सुमनविषे, कीनो इहै विचार ।। मनो सुयाही देशमें, दंभ लयो अवतार॥३४॥ भवतु तथा इह आसने, मैं अव करों निवास ।। उरूनिवावेताहिने, आसनबैठनआस ॥३५॥ मैवं मैवं बोलबटु, . ऊचे कीन प्रकाश ॥ आराधपाद आसनइहै, और नकरे निवास ॥३६॥ सवैया। तब बोल हंकार सुएहुकही मनभीतरकोप भयो अतिगाढा। दक्षिणदेश प्रसिद्ध वडो तिह भीतर शुद्धपुरी इक राढो । सुनहोतिनमाहि प्रसिद्धवध्योगुरुके कुलवासकोअतिपाढा हमजोनहिं आसनलायकहैं कहु सँगुरु कौन ब्रह्मडते काढा३७ सुनमूर्ख कान भले धरियो इक औरप्रसिद्ध कहौं तव वाता॥ द्विजकोविद लोकप्रसिद्धबडेसुबरीतिनकी दुहिताविष्याता॥ कुलउजलजानिमरालनकी तिनके सम नाहिं अहेमममाता तिसते हम लोकनमांहि वडे हमरे सम नाहिं अहेमम ताता३८. ममसालँकमित्र सुमातुलकी दुहिता इक और भलीजगगाई।। तिनकेव्यभिचारकीझूठकथा शठलोकननेजगमाहिं अलाई।। तिनके निजमाहिसंबंधपिखे मतिताहिसमे अतिमेखुनसाई। निज नारि मनोगत जीषिणमें सुमूढबटू घर नाहि टिकाई ३९ (१) रश्मिकरकै (२) गुरु । (३) कन्या । (४) श्यालक (श्याला) ॥

[अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (३९) सुनिके यह बात सुदंभ वली मनभीतरसों अतिसै खुनसाने॥ द्विज तूंनिजऊजलता अपनीजगभीतरयाविधिमोहिवखाने।। सुन मोहि महात्मलोकनमैं द्विजरायसु तोहि नरंच पछाने॥ कछु आहि अपूर्ष उजलता ममभीतरसोचतुरानन जान॥४०॥ हम एकसमेविधलोक गए मुनि मो पिख आसनते सुउठाये। इहठौर वसो मुनिवृंद कहें बहु आसन नाहमरे मनभाए । विधि आपसुगंदकरी मुखते पुन गोवरसोंनिजजानुलिपाए॥ करजोर भलीविधि आदरकै तिनऊपर मोहिविरंचि वैठाये ४१ दोहा। बहुर हंकार सुवोलिया, दांभिक ब्राह्मणजान॥ कह विरंच पुन नर कहां, कीनो झूठबखान ॥४२॥ अथवा यह द्विजदंभहै, ताहीकीन उचार ॥ ऐसे मने विचारकर, भयो क्रोध हंकार ॥४३॥ सवैया। कौन सुरेश्वरको विधिहै, ऋपिकौन सुनो किहते उपजाए। मेतपको फल जानत नासुन बामन तूं मनमे गरबाए ॥ कोटिमुरेश्वर विरंचिमुनीपद पंकज मोहि परे डरपाए । रिषिकी उत्पत्तिकी भूमिकही सुपुराननमाहि सुनो मनलाए४४ (१) शपथकरी (२) इंद्र अहिल्यागामिहोनेते कछु नही तथा ब्रह्मा स्वकन्यागामी होनेते सोभि कछु नही (३) यद्यपि पुराणोंमें ऋषियोंकी जन्मभूमि उक्तरीतिसे कही है। तथापि अहकारको आसुरी सपतमें होनेकर गर्वसे तथा अपनी सामर्थ्यके जनावने अर्थ सर्व ऋषियोंको नीचस्त्रीयोंसे जन्मरूप हेतुकर निकृष्टता (न्यूनता ) सूचन करीहै ताको सुनके आस्तिकपुरुषने कुतर्क नहींकरना काहेते, जैसें प्रपंचकी उत्पत्तिसेंलेकर प्रलयपर्यंत इद्रादि देवता परमेश्वरने संसारमर्यादार्थ स्थापन कन्येहै तैसे व्यास वसिष्ठादि महानऋषिभी- १ म (४०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२] ऋषिश्रृंग मृगी कुशकौशिकऔगजनीहस्तामल उपजाए। वारवधू सुबसिष्ठ जए दुहिता पुन झीवरव्यास' उपाए । शशिनारिविषे रिपिगोतमजेपुन मांडवमें डकिते निकसाए।। तन्या सुचंडाल पराशर जूंरिषिऔर मतंग मतंग निजाए ४६॥ तब दंभ विलोक अनंद भयो, यह आर्य सोहि पितामहआए।। नाम हंकार कहें जिनको, इन पेखनते मनमे विगसाए ॥ आर्य लोभकोमैं सुतहों, मम दंभकहें तव लागतपाए । हंकारधरियो सिर हाथ तवै, सुतदीरघआयुवडेसुखपाए॥४६॥ सवैया। द्वापरअंत सुमोहि पिखेतव वालहुते तव अंग मलाने । काल वितीत भयो वहुतो सुत याजेगमें हम हैं सुवुढाने ॥ नैनन मंद सुडीठ भई इहिकारणते सुत नाहि पछाने ।। आज अनंद भयो पिखते सभ अंगनमो तुम होचिलकाने४७॥ -परमेश्वरने संसारमर्यादार्थ स्थापनकीयेहै इसीवासत अनेक जन्मकर्मोंकरके लोगोंको अपनेअपने धर्ममें नियुक्तकरैहै तथा आपभी आचरण करेंहैं परन्तु तिनजन्मकर्मादिकोंकरके आत्मज्ञानका वाध होवैनहीं तथा मोक्षभी अवश्यहोवैहै याअभिप्रायवाला व्यासभगवान्का सूत्रहै तथाचसूत्र:-(यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणां) अर्थ यहः-सृष्टिके आदिका- लविषे जगव्यवहारके चलावणेवास्ते परमेश्वरने स्थापनकन्ये जे इंद्रादिदेवता तथा वसिष्ठ भृगु नारदादिक अधिकारी पुरुषहै तिनअधिकारीपुरुषोंकू जितनैकालपर्यंत सोअधिकारहोवै है तितनै कालपर्यंत तिनोकी स्थिति होवैहै औ मध्यकालविष - किसी वर शापके वशते तिनअधिकारीपुरुषोंकू जन्मांतरकी प्राप्तिहुएभी आत्मज्ञानका बाधहोवैनही तथा ताअधि- कारकी समाप्तिकालविषे तिनोंकू मोक्षभी अवश्य होवैहै इति) इससूत्रप्रमाणसें महान्त्र- पियोंका जन्मकर्म संसारमर्यादार्थ होनेते अहंकारकृत निकृष्टता (न्यूनता) नहीहै; किंतु, उत्कृष्टता (अधिकता ) है यह तात्पर्यार्थहै ।।

[अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
(४१)
तव आहि कुमारसुजूठ बडो कहुआनंदसों जगभीतर सोई॥
तब दम्भ कह्यो इह ठौर बसें बिन ताहि नमें जगजीवन होई।।
तव मात पिता तृष्णापुन लोभकहो सुखसोंजगभीतर दोई।।
पुन दम्भ कह्यो महामोहकी आयसु पाइ बसें इह ठौरसुओई४८
आपकहो किहकारणते इह ठऔर प्रसाद कियो तुम आए ।।
हंकार कह्यो सुतमोह महीपको गोप संदेश सुहै हम ल्याए ।
चाहत ताहि विवेक हते निज कान सुने सभ लोक अलाए।
ताविरतांत सुनावनके हित आवनमोहि भयो समुझाए॥४९॥
तब दम्भ कह्यो सुखसंग अए तव पेखनते मम देह सिरानी।
मोह महीप सुआइ इहाँ सुरलोकहिते जन एहु बखानी॥
मोह महीप शिरोमणि जू शिवकी नगरी सुठई रजधानी॥
सभलोक कहें मुखपंकजमें मम आप सुनी यह बात सुकानीः
हंकार करो किहकारणतें बहु लोकपती इह ठौर बसाए ।
दम्भ कह्यो इहि कारण है सुविवेक कहूं जग होन न पाए ।
वोध उदे यह भूमि बनारस वेद पुरोण इहै मुखगाए ।
कुलनाशकबोध निवारणको इह ठौर निवाससुमोहिठहराए५१
हंकार डरे सुनिबात इहै शिवके पुर बोध सुकौन मिटाए ।
तिन ठौर बसें सब जीव जितेसुखसों शिव ताहिके बन्धछुड़ाए
(१) तथाचाथर्वणश्रुतिः-मुमूर्षोर्दक्षणे कर्णे यस्य कस्यापि वा स्वयम् ॥ उपदेक्ष्यसि
तं मंत्र स मुक्तो भविता शिव। (२) तच्च ज्ञानं भवेत्पुसां सम्यक्काशीनिषेवणात् ॥
अर्थ यहः श्रीरामचन्दनी कहतेहैः-हे शिव जिसकिसी मरणइच्छु पुरुषके कर्णमे स्वयं
(आपही) तिस मंत्र (तारक) का उपदेश करोगे सो पुरुष तारकमत्रोपदेशजन्य ज्ञानद्वारा
मुक्त होवैगा ॥.१ ॥ ब्रह्मात्म्यैक्यलक्षण जो ज्ञान सो पुरुषोंको सम्यक् काशीके सेवनसे
हावैगा ॥ २ ॥

(४२) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२] अंतसमैं करुणाकरके सभ कानन तारक मंत्र सुनाए। सभ पाप मिटे शिव पेखनतें क्षणभीतर जीवन बोध उपाए५२ तवदम्भ कह्यो इह वात सही पर होवतना समजीव मझारा॥ तिनको नहिवोधकदाचितहैजिनके उरकामसुक्रोधविकारा॥ (१) श्रुतिः । देहान्ते देवस्तारकमुपदिशति स्मृतिरपि-ममूर्षो मणिकर्ण्यन्तरधोदक- निवासिनः ॥ अहं दिशामि ते मंत्रं तारकं ब्रह्मसंज्ञकम् ॥ अर्थ यहः-देहान्तकालमें महादे- वनी तारकमंत्रका उपदेश करतेहैं ॥ तथा महादेवजी कहतेहैं:-हे प्राणी मणिकर्णिकाके अन्तर अर्ध जलमे निवासकरनेवाले अर्थात् आधेशरीरको जलमें रखनेवाले तथा मरणकी इच्छावाले तुमको मै ब्रह्मसंज्ञक तारकमंत्रका उपदेश करताहूं इति ॥ इस कहनेकर यह अर्थ सिद्धभया कि काशीम मरण जन्तु मात्रको साधारणतया मुक्तिका हेतु है यह अहं- कारने दम्भके प्रति कहा-तारकमंत्रका अर्थयह है:-संसारसे भयभीत पुरुषोंको जो तारे (मुक्तकर) सो तारक मंत्र कहियेहै। (२) तव दम्भने अहंकारप्रति कहा येवार्तासत्यहै परन्तु भारत औ पुराणमे यह लिखा श्लोक-यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयुतम् ॥ विद्या तपश्च कीर्निश्च सतीर्थफलम- श्रुते ॥ १॥ अदाम्भिको निरालंबो लघ्वाहारो नितेद्रियः ॥ विमुक्तःसर्वसंगैर्यःसतीर्थफल मश्रुते ॥ २ ॥ अर्थ यहः-जिसके हाथ तथा चरण निषिद्धक्रियारहितहैं तथा जिसको तीर्थ माहात्यका ज्ञानहै औ कृच्छ्रचान्द्रायणादि तपसहित है तथा निष्पापकीर्तिवाला है सो तीर्थमहात्म्योक्त फलको प्राप्त होवैहै ॥ १॥ जो पुरुष दम्भरहितहै तथा आश्रयरहित है तथा अल्पाहारी है तथा इद्रियनित है औ सर्वसंगसैं रहित है सो तीर्थमाहात्म्योक्त फलको प्राप्त होवै है ॥ २ ॥ यद्यपि भारतपुराणमें ऐसे लिखाहै तथापि श्लोक-नाविमुक्तो मृतः कश्चिन्नरक याति किल्बिषी ॥ ममानुग्रहमासाद्य गच्छत्येव परां गतिम् ॥ १॥ वाराणस्यां स्थितो यो व कामरोषरतः सदा ॥ योनि प्रय्यापि पैशाचीवर्षाणामयुतत्रयम् ॥२॥ पुनस्त- त्रैवनिवसञ्जानं प्रामोत्यनुत्तमम् ॥ तेन ज्ञानेन संपन्नो मोक्षं मामोत्यनुत्तमम् ॥ ३ ॥ अर्थ यहः-महादेवजी कहतेहैः-अविमुक्तसंज्ञक काशीक्षेत्रमें मराहुआपुरुष पापी भी है तौभी नरकको प्राप्त होवै नही कितु मेरे अनुग्रहकू प्राप्तहायकर परमगति (मोक्ष) को ही प्राप्त होवैहै ॥ १ ॥ तथा जो पुरुष काशीम स्थितहुआ सदाकामक्रोधादिकोंमेंही भीतिवाला है पुरुष तीनअयुत (३००००) तीसहजारवर्षपर्यंत पैशाचयोनिको प्राप्त होयकर ॥२॥ पुनः तिसकाशीमें वसताहुआ अनुत्तमज्ञानको प्राप्त होवै है तथा तिसज्ञानकर संपन्नहुआ अनुत्तममोक्षकोही प्राप्त होवैहै ॥ ३ ॥ अयुतप्रमाण पैशाचयोनिको प्राप्त होवैहै याकाभाव- . से .

[अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (४३) जिनकेकर पाद मनोबस है, तपकीरतिसोजगहै उजियारा।। वहुतीरथको फलपावतहै, यह भारत और पुरानउचारा॥५३॥ दोहा। वेत्रपाणि आए तवै, कंचुक पाग अनूप ॥ नागरजन आए सुनो, महामोह जगभूप ॥५४॥ सवैया। चन्दनके छिणकावकरोमणि फाटक हेम सुबेद बनावो ॥ जलयंत्र सभै ग्रहखोलिदिजे तिनभीतर कुंकुमगंध मिलावो।। सभ द्वारन बन्धनवारकरो गजमोतिनहारलडी लटकावो। शक सरासन चित्रधुजासभसौधनकसिरमाहि झुलावो॥१५॥ कबित्त। फेर दंभकह्यो महाराज हैसमीप आए, चलिये अगारी सनमान अति कीजिए। कह्यो है हंकार तुम भलोही उचारकियो, हूंजीए तयार सुउपायनकोदीजिए। जाइके उपायन सुपायनके माहि धरी, जोरकर कह्यो यों वनारस पिखीजिए। आए महामोह भूप पुरमैं प्रवेशकियो, विविध विभूति प्रवारसो सुहीजिए ॥५६॥ यह है:-काशीमें मरेहुए पुरुषको भैरवीयातनासै पापका फल थोडेकालमें भोगाया जावैहै, औ काशीसे बाहरमरे पुरुषकोयमयातनासें पापका फल चिरकालमें भोगाया जावैहै यह विशे- पता है औ (नाविमुत्तोमृतः) इस श्लोकमें (ममानुग्रहमासाद्य) इस पदकरभी ज्ञानप्रदान रूपानुग्रहका ग्रहण है, यात (जानादेवतुकैवल्यम्) इत्यादिश्रुतियोंसभी विरोध होवै नही इति । (१) चोला । (२) भेट । S H न . - (४४) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२] महामोह भूपसु अनूप पिख हसै अति, अहोजडबुद्धि सभलोक वौरानेहै। लोक परलोकमाहि भोक्ताअनूपसुख, देहते विभिन्न मूढआत्मा वखानेहै ।। आकाश तरुफूल नविसाल फलआश, करें कहो नभफलहूंको स्वाद किनजानेहै ।। भयेखोटे पंडितपखंड सुचलाए जग, वोलसुकपोल लोगसगरे ठगानेहै ।। ५७ ॥ जोई जग नाहिताहि वस्तुको सुआहिकहें, भयेहै वचालवाक मृषावेद मानई ॥ चारवाकनके वाक सत्य ताहिको असत्यकहें, भये मूढलोग ताहि निंदाको बखानई ॥ अहो तत्व सारको विचार तुमआपकरो, काटे तनशीश गवाही ओर ठानई॥ तनते न्यारो जोपधारे जीवपिखे कोई, तबी तनु भिन्न यह आत्मसु जानई ॥२८॥ लोगनिको वंचपुनवंचो निज आत्मको, शीतजलनाइवृत आत्मतपाइ है ॥ नाक मुख पाद पान देह हैं समान सभ, मनमै न आइ कर्म वर्णको वताइहै। आपनी पराई नारि संपदा बताई श्रुति, नाहि हम जाने सठ भेदको अलाइ है। - . ।

[अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (४५) नारि धन भोग पुन पापकोविभाग यह, आपनो परायो बलहीन मुख गाइ है ॥१९॥ आत्मा शरीर यह धीर चारवाक कहै, आगम प्रमाण एकताहिको सुलेखिये ।। भूमि जल तेज वायु तत्वसो वताइदए, जाहि मै प्रमाणसु प्रत्यक्ष एकपेखिये ॥ नारिनको भोग और द्रव्यको संयोग जोई, यही पुरुषार्थ न और कछू देखिये ॥ चेतन सुभूत होई नाहि परलोक कोई, मोक्षविनमृत और दूसरो नपेखिये ॥६॥ कबित्त। यही मनधार मुख वुद्धनेउचारकीयो, उत्तमसिद्धांत चारवाकको पढायोहै। चारवाक शिष्यनपर शिष्यन पढाइ सभ, यही सुसिद्धांत लोकभीतर चलायो है ॥ ऐसे सुन चारवाक चारवाकशिष्यलिये, पेखत समाज राजसभामाहि आयो है। शिष्यको बुलाय समुझाय बात एहुकही, दंडनीति विद्या और कछु गायोहै ।। ६१॥ (१) पुरुषार्थहीन कहतेहै। (२) अर्थकामौ परमपुरुषार्थों न धर्मो नापिमोक्षः। अर्थ यह है-धन तथा काम दोनोहिं परमपुरुषार्थ है चारवाकके मतमें न धर्महै न मोक्ष है। (३) देहपातही मोक्ष है । (४) राजनीतिही विद्याहै । 1 (४६) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२] - शिष्य उवाच । दोहा। वेदत्रयी गुरुईशकृत, विद्या कहें उदार ।। वेदनसों को जजन, पाए स्वरग अपार ।। ६२॥ चारवाक उवाच । . सवैया । धूरतको परलाप सुनो यह वेदत्रयीजगमाहि वखानी ॥ याचक यग सुद्रव्य विनाशक ए स्वरलोक जिवावत प्रानी॥ तौ वहु दाह दहे द्रुमजे फल भूरलहैं बहुरीति समानी ॥ है नकळू सुकपोलकही धनवंचनके हित एह कहानी॥६३॥ कृतश्राद्ध ईहा मृतजीवनको पुनजो परलोकविषे तृप्ताये ।। जलगंगदए तवही जगमैं कुरुजांगलखेतनको विगसाए । मृतदीपशिषा बहुतेलदीये विनंपावक सोग्रहमैनिकसाए। कृतबियो तनकैजगलोगठगेमुखएहुकहे विधिवेदवताए॥६॥ शिष्य उवाच ॥ सवैया । गुरुखान सुपान हिप्राणप्रिया सुखसो पुरुषार्थ आपअलाए। । इहतो पुन तीरथकार जिते किहकारण भोगनते डरपाए ॥ जग सूखतजे वनजाइ वसे, तप दीरघसो निजदेह तपाए। जगभोगनत्याग सुयोगमजे सुखडेत इहैविधिआगमगाए६५॥ (१) वश्वकका अनर्थवचनयवेद तीनो है । (२) ऋत्विजः यज्ञ, होमादि-द्रव्य पुरोडाशादि-आणि यजमान। (३) निर्वाण । (४) बहानेको करके वा वञ्चनप्रकार करके। (५) ग्रन्थकार ॥ . Gane .

[अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (४७) चारवाक उवाच ॥ सोरठा। धूरत कीन प्रलाप, आगमनाम सुताधरे । आशामोदक थाप, मूर्ख तृप्तसुहोवई ॥६६॥ सवैया। हग दीरघ अंजनशाम खिरेजन नील सरोरुह हैविगसाए । नवनाग नवनाग कलाअलिकै अलिसीसुकपोलसुहाए। कह ताहि अलंगनसे जनमैं कह पावक पंच सुदेहतपाए । कह विजन भीष अहार कहां उपवासनकै सठ देह सुकाए६७॥ शिष्य उवाच ॥ चौपाई। हे गुरुग्रंथकार हैं जेते । ऐसै वचन वखाने तेते ॥ दुःखविमिश्रत सुख संसारा । ताते ताको करोप्रहारा ॥ ६८ ॥ कवि रुवाच ॥ दोहा । सुनत शिष्यकी बातको, हसे सुबालक जान ॥ चारवाक पुन युक्तिसों, आगे करे बखान ॥ ६९ ॥ सवैया । दुःखसंग मिले जगके सुख जेवहि दूरतजो इहभांति बखाने । ते निरखुद्धि महापशु हैं हम जीवन के परतारक जाने । '. सितंदुल जे, तुखसंग मिले तिह नाहि तजे जनजेंसुरज्ञाने। इहभांति लोकायत वाकसुने महामोहबली मनमैं विगसाने७० (१) वञ्चक । (२)श्चत। (३) देवज्ञानी ॥ चारवाक उवाच ॥

(४८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक! [ अं०२] महामोह उवाच स्वपत्नीप्रति । सवैया। माननि काननमाहि सुनो यह वाक प्रमाण महासुखदाई। माहि निदाघमनो वरषा तिमकाननको सुख शीतलताई ॥ सानंद ताहि विलोकनकै नृपमोह वली इह बात अलाई॥ | आहि लोकायतसज्जनमें इन वाकनकै उरमें हरपाई ॥७१॥ दोहा। तिह औसर आयो तवै, चारवाक प्रधान ॥ पेखि समीप सुजाइकै, कीनो एहु वखान ॥७२॥ चारवाक उवाच ॥ चौपाई। जयजय महाराजजगकारण । तुम त्रिभुवनके हो प्रतिपारण ॥ चारवाकपद करे प्रणाम । सेवक सदा पछानो नाम ॥७३॥ महामोह उवाच । चौपाई। चारवाक सुखसों तुम आए। वहुत कालकै दरसन पाए ॥ सतयुग त्रेता भये वितीत । तुमरी-सारन पाई मीत ॥७४॥ द्वापर अंतभई कछु सारे । कीटभदेस बसतहैं प्यारे ॥ बैठो ईहा समीप हमारे । समाचार कछु करो उचारे ॥७॥ (१) ग्रीष्मऋतु । (२) पृथ्वी अप् तेन वायु इन चारोंको जो माने तिसकानाम चारवाकहै ।। । ॥ - . 4 [अॅ०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (४९) चारवाक उवाच । चौपाई। समाचार सुनिए सभदेव । प्रभुकोउनिखिल वतावो भेव ।। पश्चिम देश बसे सुखधाम । साष्टांग कलि कीन प्रणाम ॥७॥ महामोह उवाच । चौपाई। चारवाक मम करो वखान । सबविधि है कलिको कल्यान ।। मम प्रतापमै अति अनुरागी। कलियुग है जगमैं बड़भागी ७७॥ चारवाक उवाच । ॥ चौपाई। तव प्रसाद सवविध कल्यान । तेजवंत जैसे भगवान कीनेकाज करन नाहिं रहै । तव पदमूल दरसको चहै ॥७८॥ तुमरे वाक सु सिरपर धारे। दुटनके तिनमूल उखारे ॥ तुम प्रसाद मुदित अति भयो। दरसन सुंदर अतिहरषयो॥७९॥ दोहा । धन्य कलि तव दासहै, करे तुमारे काज ॥ तव पद पंकज वंदना, करे जगतके राज॥८॥ महामोह उवाच । दोहा। चारवाक अतिमित्र मम, मोको करो उचार ॥ कौन कौन कार्यकरे, कलियुग जगतमझार ॥८१॥ १) दोपाद । दोजानु । दोहस्त । हृदय । शिर ॥ १ (६०) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२] - पथदूर तजे 4 चारवाक उवाच । सवैया। वेदनके सुयथेष्टं चेष्टमै नरपागे ॥ आज वैरागकी कौन कथा त्रिणलोष्ठं कंचनसें जनलागे ॥ ना कलिना हम कारणहैं, प्रभुके प्रताप भये वडभागे ॥ . जो धनवंत महंत महाजन तेरतिनाहकि पांउ परागे ।। ८२॥ दिशिउत्तर औ पुनपश्चिममै यह वेदनई कलि दूर निवारी ॥ दिशि दक्षिण पर्व वेदत्रयी तनपालनकेहित हैं द्विजधारी॥ सम औदमकी तह कौनकथा जिह देवसमान भईग्रहनारी॥ अवकाज संपूर्ण सिद्धभये, सुविवेकहिकी जड मूलउषारी८३॥ चौपाई। अग्निहोत्र पुन वेद विसाला । औरत्रिदंड भसम पुनभाला ॥ बलमतिहीनजीवकाकारण । घरे बृहस्पतिकीन उचारण||८४॥ जीवनहित जन वेदविचारे । ताते कारज भये हमारे ॥ कुरुक्षेत्रादि तीरथके माही। प्रवोध उदे स्वप्नेहूं नाही॥ ८५॥ महामोह उवाच ॥ चौपाई चारवाक कलिमहा प्रवीन । मम हित भुजबल धरे नवीन ॥ ताभुजदंडकाज मम सरे । तीरथबडे व्यर्थ तिनकरे ॥८६॥ अव मोको निह चिंताभई । तीरथवोध संक उर गई ॥ ग्रहमाहि नारि सुतनके संगा। कहाहोइ तह वोधप्रसंगा॥ ८७॥ (१) परस्त्रीगमन मद्यपानादिरूप अविहित चेष्टामें नर प्राप्तहै। (२) मृतका पिण्ड । (३) मन काय । वाणिरूप ॥

[अं०.२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (६१) चारवाक उवाच ॥ दोहा। तव पदपंकजको लिखी, कलियुग पातीआप ॥ याको आप बचाइये, राजन रविप्रताप ॥८८॥ चौपाई। याविधिसुन्योभूपति जबही । पातीलगो बचावन तबही ॥ वाचक कहे सुनो जगभूपा । कलियुगपाती लिखी अनूपा ८९॥ कलियुग उवाच ॥ दोहा। तव बसकीनो निखलजग, सुरनरमुनीमहान ॥ कलियुग पद बन्दनकरे, महामोह भगवान ॥ ९ ॥ समाचार सभदेशको, सुनो जगतसिरताज ॥ तव प्रताप तव दासजग, एहु करे सभकाज ॥९१॥ छप्पयछन्द ॥ जग तजेनमायामोहनाम अतीत कहावै ॥ घरमैं लेहिकुंसीद भीष पुन मागन जावै ॥ रैनकरें रसभोग दिने तन भसमलगावैं ॥ आपकरें सभपाप और को धर्म बतावै॥ इहभांतिअतीतसुमै करे नखशिषलौअभिमानअति- उर निसबासर दमडाचहैं कबहूंन होवैरामरति ॥९२॥ हरिकोपंथ सुदूर पंथ, बहु आपचलावै ॥ रही फकीरी दूर मांगपुर पेटअघावै॥ (१)व्याज ॥

- (६२) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अ०२ कह इकंत बनवास संगवहु हुँदैभवा३ ।। सवै निरंतर रातिदिने पुन ध्यानलगावै॥ पुनधनमद मसीमलानमुख भूपसौध पुरपौलपर ॥ धनलिपसों व्याकुलमहा शरमापतिसभरहेपर ॥१३॥ नीतिनिपुण नहिभूपन्याय मन उक्तविचारें ॥ निजप्रजापर दंडकाज भवभीतर सारें। राजधर्मकी स्मृतिभूपननैन निहारें। पनिाशक्त निरंतरधर्म न चीत सुधारें। जग प्रावंडवाक पुराणविन, वैठन्यायभूपतिकरें। राजाधिराजमहामोह प्रभुभद्र सदापश्चमधरें। ९४॥ भयो उपद्रव एक सुनो नीके मनलाई । बहुनाम नारायणमाहि प्रतीत सुजनकोआई ॥ कहूंकहूं मनलाइ महाजन प्रेमलगाई। प्रातिभनें हरिनाम नैनते नीद-मिटाई ।। यह हरिभक्ति सुवीज प्रभुजनखोटे उरपरधरें। यहभूपआवाचनकहिसकोंतवमूलगुप्तक्रिर्तनकरें ॥९॥ चारवाकसभ और वातप्रभु मुखो बखाने ॥ महाराज नहिजूठगहैं उरसत्य पछाने । - एक पापिनी नारि भई वहु मंत्र सुजाने । यह नाम नारायण दुष्ट ताहिके संग मिलाने ॥ 1. , (१) ढुंदभीवाना । (२) श्याही। (३) देहली। (४) मद्यपान । (५) पुराण कहिये पुरातन तथा न्यायके वेत्ता नो पाङिवाक कहिये वकीलहैं तिनसे विना राने बैठकर न्यायकरतेहैं यह भावहै । (६) नाश ।

T [अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (६३) प्रभुअपराधनीतें डरें महायोगिनी प्रबलअति ॥ जगचारवाकके वचन सुनि, करो उपाय सुयथामति९६ महामोह उवाच॥ छप्पयछन्द। अब कलिकी मतिबोरानी यों हम जानिओ॥ लघु नाम नारायणमात्र जिन डरमानिओ ।। इह राजसूयकोकरणो याजग भानिओ॥ अश्वमेध मख मौलको जगहानिओ॥ इह ब्रह्महत्या मातबध परपतिनी गुरुदाररति ॥ अवकरेंनिडरजगमांहिजनडरनाम नारायणभयोकत कुबुद्धिमंत्रि रुवाच ॥ छप्पय। नाम नारायण महादुष्ट भूपति जगगायो। अजामेल इकबार लयो तिन बंध मिटायो। गनिकातें पददासीतां मनतें मतलायो॥ नामदुष्ट तिह मिल्यो सुतिह वैकुंठ पठायो। सुगजपति व्याकुल बारइक नाम नारायणलयो जब। राजाधिराज महामोह प्रभुताहि छडायो विष्णुतब॥९८॥ महामोह उवाच ॥ नाम कुबुद्धि तेरो बडो सुबुद्धि पछाने । जननी नाम कुबुद्धि धयो मृतते डरमाने । तेयह निखल सुवचनमोहि प्रति सत्यबखाने । नाम नारायण नीच चहे जगमरोहाने । १) गाली प्रदानहै ॥ . . . .

. (५४) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२] अबताहि बिनासनहेत कछु होइ उपाय सुप्रगटकार ।। कुत्सत विपारप्रभुनिखलजन पठोभनें कहनामहरि ९९ धनी धर्म धन दान न रंचक मनमैं आने ॥ निरधन भजे न नाम दानहित उद्यम ठाने । धार फकीरीमेस मूढ़ कृतार्थ माने । विनुसंतोष श्वानवृत्ति आप उत्तमकर जाने । इह.तरुणअवस्थामाहि जनतजे विषे सुउपरति अति ॥ पुनि उभैभ्रष्ट जरठापने धनसुतदारा विषेरति ॥१०॥ कवि रुवाच ॥ दोहा । याअवसर इकआइयो, पत्रहस्त नरआन ॥ महामोहभूपालको, जयजयकीन वखान ॥१०॥ उत्तर दिशाते आइयो, अनाचार प्रतिहार ।। यह प्रभुपत्रपठाइयो, लीजे आपविचार ।। १०२ ।। सुनकर पत्र सुपठनहित, प्रेन्योताहि सुआन ।। वहुपातीपठनंलगो, सुनो प्रभु देकान ॥ १०३ ॥ -RAL ! अनाचार उवाच ॥ ' छप्पय छन्द। उत्तरके सभ लोक करे, मैशिलापरायण ॥ समुझे ईशनतत्त्ववकै, मुखसैल नारायण ॥ नारिधर्मतेहीनभई बहुधा गिरडाइण ॥ कहांधरमकीकथारसें, व्यभिचार रसाइण ॥ (१) पोटा... (२) अनाचारसूबेका दूत ॥ Auto- [.अं०२] -- प्रबोधचंद्रोदय नाटक। प्रभइत उत्तरदेशते, अनाचार बन्दनकरें। यम अचौरता विनाप्रभ, भद्र सदामनमें धरें॥१०॥ चारवाक उवाच ॥ . चौपाई। और सुएक बेनती अहे । चारवाक संकत नहिकहे ॥ तुम भवपतिसभकेसिरदारा । तुमरेरचे निखल संसारा॥१०॥ महामोह उवाच ॥ कौनबनती नहींसंकावो । चारवाक तुम प्रगट सुनावो ॥ तुम मेरे अतिसै हितकारी । तुमको कहाभयो डर भारी १०६ चारवाक उवाच ॥ चौपाई। विष्णुभक्ति नाम इकहैये । महाप्रभाव योगिनी पैये ॥ कलियुगविरणप्रचारसुकीनी। तदपि अहै वलबुद्धि प्रवीनी१०७ ताऽनुग्रह नर वंस उदारे। हमसेंकीटनासकेनिहारे देव सदा रहीयो सवधाना। विष्णुभक्तिहै येवलवाना ॥१०८ एकवार जहँ पाद टिकावे । मरे न मूलन -बहुरपलावे ॥ ताहि विराग तहां मुविवेका । सनेसने दिढबाँधेटेका ॥१०९॥ कवि रुवाच ॥ महामोह यह सुनियोजवही । अतिभय भयो सुमनमै तबही ।। मनहींमै यह गटीसुहोई । महाप्रभाव योगिनी सोई ११०॥ (१) तिसविष्णुभक्तिकर अनुग्रीतहै बस जिसका ऐसे उदारपुरुषको हमारेजैसकीट देखिनहींसक्ते तो साक्षातविष्णुभक्तिकेभक्तको देखनातौ दूरहै यह भावहै ।। - प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२] 1 , दोहा। सदा द्वेष हमसों करे, मारी मरेन सोइ ।। सनेसने हमको हने, महापापिनी जोइ ।। १११॥ दोहा। महामोह यों मन डरयो, प्रगट कहे कछु और ।। गुलावसिंह योंहीभने, मान तजे सिरमौर ।। ११२॥ महामोह उवाच ॥ कावत्ता कहां भई संक निसंक चारखाककहो कामक्रोधआदिवीर ताहिको निवारहैं। कामके भयेविकार भक्तिको विचार कहाँ होइगीनउदेकहूं बेदयों उचारहैं । वैरीहोइ छोटोतौ मोटोकर जाने बुद्धिजामत बबूलकोसुमूलते उपार॥ जीवनकेहेत वलबुद्धिके निकेतजेई ' भूपति सचेतसु उपाइको बिचारहैं ।।११३॥ दोहा। लघुअरिअवसर पाइक, दुःखदाइक अवनीस॥ अहिकंटक पगमै गडे, पीडादे नखसीस ॥ ११४॥ (१) सर्पकाकांटा ॥ . .

[अं०२ प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (६७) - कवि रुवाच ॥ चौपाई। महामोह तब ऊच पुकारा । हैरेको मम, भवन द्वारा ॥ द्वारपाल इतने चलि आया। आज्ञाकरो देव जगराया॥११॥ महामोह उवाच॥ चौपाई। काम क्रोध लोभमद मतसर । सूर नही जिनके को समसर ॥ तिनको आयसुयोंममदीजे । विष्णुभक्तिको हिंसनकीजे११६॥ द्वारपाल तब शीश निवाए । ज्योंप्रभुकहो करोतिमजाए ॥ इमकहि द्वारपाल जबगयो। पत्रहस्त नरआवत भयो॥११७॥ पत्रीहार उवाच ॥ चौपाई। उतकल देशहिते हम आए । प्रभुपदपंकजपास' पठाए ॥ तहपुरुषोत्तैमको अस्थाना । सागरतट जहहै मदमाना११८॥ यहहै वनारस जह जगराया । जाकोकुल बहु भांति सुहाया। कीन प्रवेशन लाइ सबेरा । दूरहिते तिन भूपति हेरा ११९॥ यह भूपति कछु मंत्र बिचारे । चारवाकसो बैठ किनारे ॥ चलों समीप सुपत्र दिखाऊ । कारज बेगनबेर लगाऊ।।१२०॥ गयो समीप सुंपत्र दिखायो । जयजय शब्द सुमुखो अलायो। मदमानपद चंद चकोरे । पत्रलिख्यो पढियो प्रभुमोरे१२१ सुनिकरमोहभयोनिजलीना । है कछु दुःकर भयो मलीना ।। चारवाकप्रति एहु अलाई । अव नहिवने सुबेर लगाई१२२॥ (१.) उडीआदेश। (२) जगन्नाथस्वामी। (३) अपनेस्वरूपमेमू सा होयगया ॥ or . -- - - . (२८) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२J जातै कारजहोइ नहानी । चारवाक रहियो सवधानी ॥ चारवाकमुख तथा अलाई । गयो वेग भूपति सिरनाई १२३॥ दोहा। महामोह तव पत्रको, वैठ पढ़ावे आप ॥ गुलावसिंह याजगतमैं, जिहछायो प्रताप ॥ १२ ॥ मदमान उवाच ॥ छपप्य छन्द। स्वस्ति बनारसधाम विषे पदपंकज सुहाए। जीत सदा ब्रह्मंडपरे सुरनरमुनिपाए । सदाऽधीन धनवंत द्वेषिगनवनहिपठाए । अडिग सिंहासनवैठ शीसपर छत्र फिराए । राजाधिराज महामोहपद मदमान वंदनकरें। प्रभु इत पुरुषोत्तम आयतनभद्र सदामनमें धरें।।१२६॥ और बेनती नाथ सुनो नीके मनलाई ॥ श्रद्धामातसमेत शांतिदूति सुबुलाई ॥ दयोविवेक सुमान श्रुतिके पासपठाई। ज्योत्योंकरो संवोध मोहि सँगदेहु मिलाई। प्रभु वहदिनरैन संवोधकर जिंह किंह विधढिगआनहै । बल इतपुरुषोत्तमआयतनपत्रपठे मदमानहै ॥१२६॥ और कहें विरतांत नाथ नीके मनधारो॥ काम सहित जो धरमकहूं कहिहोतन्यारो॥ विराग विवेक सुगूढ मनो कछु मंत्र दृढायो।। कहूंकहूं हरिहेतहोत हमहूं लखपायो॥ (१) बुलायकर ॥ - . ..

[अं०२ प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (५९) ३ 1 यामैप्रंमाण प्रभु आपतुम जानेभले मनमाहिधरो॥ प्रभु जिहविध मिटेअरातिगनसोउपायशीघरकरो १२७ महामोह उवाच ॥ छप्पय छन्द। महामूढ वहुभये शांतिते जिन डरकीनो। कहांहोइगी शांतिभयोजग कार्यलीनो। ब्रह्मा निसदिन करे पुनःपुन जगतनवीनो ॥ दक्षमखविनाशक शंभु रहे गौरी सुखभीनो ॥ कमलोकपोलमकरीलिखतउर हरिपयोनिधिशैनकर ॥ पुन और जगतके जीवमैंशांतिकहाकहहोइडर ॥१२८॥ महामोह उवाच पुरुषप्रति ॥ सवैया। जालम जाह सिताबअबै ममकामको एहु संदेसह दीजे ॥ धर्मविहीनभयो हमसों इनको क्षणनाहि बिसाहु सुकीजे ॥ जिहभांति भजेनमतो हरिको तिमयाहिमले दृढवंधगहीजे॥ मूल इहै दृढ याहि गहो बस याहिभये नकछू ममछीजे १२९ दोहा। भूपमौलमणि जो कहो, देवकरों वह जाइ । ऐसै पुरुषबखानकै, गयो बेग सिरनाइ ॥ १३०॥ (१) अर्थयहः-अन्तःकरणमेंमहामोह तथाधर्मदोनोरहतेहैं याते धर्मकी निष्का- मताकेज्ञानमें आपप्रमाणहो अर्थात् आपजानतेहो । (२) लक्ष्मीके कपोलकहिये गण्डस्थलमें मकरीकहिये मत्स्यकी आकृतिकीन्याई पत्रलेखा (रेखा)कार चिह्नतहै उरस्थल- जिसको ऐसाजोहार । (३) दूत विनाविचारसें कार्यकरनेवालेका नामजाल्महै ॥ PA म , .

. 4 (६०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अ०.२] चौपाई। महामोह पुन चिंतनकरहै। कौनउपाय शांति जगमरहै ॥ अथवा और उपाइन कैयै । असंतनसंग सुवोलमंगैयै १३३॥ क्रोधलोभलो मम भट जेते। वेगवुलयै • सगलेतेते ॥ जिम भुकहें वने तिमकयो । ऐसेभाष पुरुष इक गयो॥३३२॥ दोहा। क्रोधलोम दोनों तवै, आए सभामझार ।। गुलाबसिंहनृपवंदपद, लागेकरन उचार ॥ १३३॥ क्रोधउवाच ॥ सवैया। प्रभु मोहिसुनीयहवात कहें, तुम्हरे सँगशांति विरोधकमाए। श्रधा हरिकी पुन भक्ति तथा, तिनकी यह दोनभई सुसहाए।। ममजीवत शांतिकी वाति कहां.यहचाहतीतीनहुप्राणगवाए।। भुजकोवल नाथ कहांकहिये,कछुभाषतहो सुसुनो मनलाए। अंधकरों हगवंतनको हगवंतनको श्रुतिवंतनकोंवधरोंकरडारों। धृतवंतनकोंसुअधीरकरों, पुन चातरकी मति दूर निवारों। हितकार्य नाहिपिखे कवही, जिनकै उर भीतरमै पगधारों। हितआत्मको नसुनेकवहीपन्यो, जितनोक्षणमाहि विसारो।। लोभ उवाच ॥ सवैया। जिनके सिरऊपर हाथधरों तिनकी सुदशा सुन मीत बतावै॥ सुमनोरथकी सरिता परकूलहि नाहि कदाचित तेनर पावै॥ 2 L - १ 4 .

- तिनपर कृपासु ऐसीकरियो। ब्रह्मांडलापनहतामन भार, | तृष्णे जांउर चरन टिकेहें शांतिकहा जगतेनर ARAT (१) वार्ता । (२) वृत्रासुर । (३) विश्वामित्र । येस [अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (६१) तिनके उर अंतरशांति कहां,नरजोधनको दिनरैनहि ध्यावै।। अबक्रोधसखे सुनियेसुकहों जिह भांतिनतेधनमैमनलावै ॥ इह मत्तगयंद सुझूलतहमम एहुतुरंगम भौनसुहाए। लिखपत्र सुभूपतिमोहिदयो, धनल्यावोंऔर बंगालहिजाए। इहगांउदयेकछुऔरकहे नरजे इह भांति सुचीतचध्याए । तिनके उरशांतिकीकौनकथां, इमचिंततही जगमाहिबुढाए। क्रोध उवाच ॥ मोहि प्रभाव सुमीत सुनोममसंगहते जन एहुकमाए ॥ तुष्टाद्विजपूत हने मघवा शिव शीश बिरंचिकेकाटबगाए । वाहजमारसुश्रोणतमैभृगुनंदनआपभलीविधनाए । सुवासिष्ठमुनीश्वरके सुतजे मुनिकौशिक आपसुताम्हिताए। दोहा। विद्याकीरतिवंत पुन, सदाचार दातार ।। मेपदके प्रताप नर, क्षणमै भजे विकार ॥ १३९ ॥ लोभ उवाच ॥ चौपाई। तृश्ने आउवेग इतओरा । मेरो बैनसुनो श्रुतभोरा ॥ तृभावैठ समीप उचारे । आज्ञाकरो सुप्राणप्यारे ॥१४॥ लोभ कहे सुनप्राणप्यारी । क्षेत्रग्राम पुन नगरउदारी। पुर अरु दीप भूमिको चहे। आशापाश जिनके मनगहे . -- 1 .

(६२) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं॰] Add - तृष्णोवाच ॥ दोहा। आर्यसुतमै आपहीं, सदाचहों सभभौन ॥ अवआयसु तुमरीभई, मम तृप्तावै कौन ॥ १४३॥ ब्रह्मांडकोटको पाइ नरमें उर संगति होइ ।। मेरो उदर नपूरई, तामहि शांति नकोइ ।। १४४॥ क्रोध उवाच ॥ चौपाई। हिंसेआउ तूंइत मम ओरा । भाषत.वैन सुनो तुममोरा ॥ इतनेमे हिंसाढिग आई । आर्यसुत मम देहुवताई १४५॥ तूंमम धर्मचारणीनार । यहतव संगतिको उपकार । मातपितादिक वधहै जोई । करें सुषेन डरें नहिकोई।।१४६॥ सवैया। कौन पिसाचनी मात अहे पुन कौन सुमकंड तात हमारे॥ भ्रातसमे ममकीट समा, अव वाधव पुंज वने सभमारे ॥ जात जये खलहै सभही, इमवोलतहैं जनकीस पुकारे।। मीज दोङकर क्रोधवली,कविसिंहगुलावसु एहुउचारे॥१४॥ नराज छन्द। सुगर्भलौंइनेकुलं समस्तआज मारहों। युवासुवाल वृद्धलौ, नएकको उवारहों। (१) मेरे वचनके करनेवाली । (२) तेरे संगतिसें नीवको यह उपकार होनाचाहिये । (३) मकडनाम पक्षवालेनीवविशेषकाहै तथापि शाचकाहै तथा पाखंडी- काह तथा कंजर (वेश्यासंबन्धी पुरुष ) का है यह मसंगसैं नान लेना । (४) नितने- उत्पन्नभयेहैं। -AAPK - .

[अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (६३) - . . समस्तभूमिके विषे नयाहिकोठराइहै ।। सुक्रोधज्वाल नैनकी, विरामतो सुपाइहै ॥ १४८॥ कवि रुवाच ॥ दोहा। हिंसा तृष्णा क्रोध पुन, लोभ मिले यह चार ॥ जाइ समीप सुमोहके, जयजय कीन उचार ॥ १४९ ॥ महामोह उवाच ॥ दोहा। श्रद्धापुत्रि शांतिहै, हमसंग वैरकमाइ॥ तुम तिह ल्यावो वांधिक, आयसु मेरी पाइ ॥१५॥ श्रद्धापुत्रीबंधहित, गए माननृप बैन । गुलाबसिंह साचीकहे, भयो अखाडेचैन ॥ १५१॥ चौपाई। महामोह पुनकीन विचारी। श्रद्धापुत्री शांति बिचारी ॥ तानिग्रहको और उपाइ । सोमेरे उर भास्यो आइ॥१५२॥ शांतिमातश्रद्धाहै जोई ।रहेपरतंतर सदा सुसोई ॥ उपनिषतविषे श्रद्धा नरजेती। प्रथम हटैयेसगली तेती॥१५३॥ मातवियुक्त जबै बहु होई । मरे शांति क्षणभीतरसोई ॥ श्रद्धाबेग हटावनकाज हटावनकाज ।मिथ्यादृष्टि बुलैये आज।।१५४॥ इतउत भूपति दृष्टिपसारी । विभ्रमवती सुताहिनिहारी ॥ विभ्रमवती प्यारी जैये । मिथ्यादृष्टिसुबोललिये१५५॥ (१)माधीन ॥

. (६४) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२J . विभ्रमावत्युवाच ॥ देवकरीजो आयसुमोको । मिथ्यादृष्टिमिलावों तोको । । इमकहि त्याग आखाडोगई । मिथ्यादृष्टिसहित पुन अई १५६॥ अथ प्रश्नउत्तर मिथ्यादृष्टिविभ्रमवतीका ॥ मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ चौपाई। पेषेबहुदिनभये वितीत । निकटिजात लाजत मम चीत ॥ महाराज उपलंभनकरे ।ताते चीत सखी ममडरे॥१५७॥ विभ्रमावत्युवाच ॥ सखी तोहिमुखकंज निहारे । तोभूपति निज आप सँभारे ॥ तूं वाको है अतिसै प्यारी । ताते डरोन चीत मझारी १५८॥ मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ सखीअलीकसुभागहमारा । काहेको तें बहुत उचारा ॥ भूपति मोमै चीत नधरई । तुं ममकाहि वडंबन करई १५९॥ विभ्रमावत्युवाच ॥ सखी अलीक सुभाग हमारे । अवही तूं निजनैन निहारे ॥ तेरो तनु जव भूप निहारे। तोमै रमैं न और चितारे १६०॥ और सखी इक वातिउचारों । घूमतनैनसु तोहि निहारों ॥ कारण कौन न निद्रा कीनी । घूमतनैनसखीरसभीनी॥१६॥ मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ एकपतीकी जो बहुप्यारी । तिनके नींद न नैनमझारी-॥ मोको संगललोक जग गहें। नीद नैनमम किहविधिलहें१६२ 1 -- I । . .

[अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (६५) , विभ्रमवत्युवाच ॥ दोहा। सखी प्यारी लोक वहु, मोकों करो उचार॥ जे तोकों निशिदिन भजे, जासो करें प्यार ॥ १६३॥ मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ चौपाई। सखी मोह मम नाह पछानो। काम क्रोध लोभ पुन जानो ॥ अथवा सुनो तत्त्व निजसार । एक एक कहि करोंउचार॥१६॥ याकुलभीतर जेनृप जाए। मोहिबिषे सगले मन लाए ॥ बालक बृद्ध युवा पुनि जेई । मोविनरहे न निशिदिन तेई १६५ कवि रुवाच ॥ दोहा। काम क्रोध पुनि लोभ यह, गुलाबसिंह मदमान ॥ तनमै आत्मदृष्टि विन, होत नहीं पहिचान ॥१६६॥ विभ्रमवत्युवाच ॥ चौपाई। कामहिकी रति परमप्यारी। हिंसा क्रोधकी सुनी सुनारी ॥ तृष्णा लोभहिकी जग गैहै । याविध नारि सुऔर वतैहै।।१६७॥ दोहा। तूंसभके पतिसों रमहि, इहै वतावो मोहि ॥ तेचुपकी क्यों होइरही, करे न ईर्षा तोहि ॥ १६८॥ (१) शरीरमे आत्मबुद्धिविना इनकी प्रतीति होवै नहीं कितु शरीरमें आत्मबुद्धिसे ही इनकी प्रतीति होवैहै ॥

(६६) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२] 7 प -- Arane मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ चौपाई। कैसे सखी ईर्षा करई । मोहि विन प्राणनते क्षण धरई ।। रति हिंसा तृष्णालौं जेती । मेरो भलो मनावें तेती ।। १६९॥ कवि रुवाच॥ दोहा। मिथ्यादृष्टि सुमरे जव, गुलाव सिंह इम जान । हिंसा तृष्णा आदिलै, होइ सगल पुन हान।। १७०॥ विभ्रमवती उवाच ॥ चौपाइ। याहिते सखी मोहि वखानी । तोसम सुभग न दूसरी रानी ॥ तोहि सुभाग जवै वहु लहे । ते गतिरूपप्रसादहि चहे॥१७॥ सवैया । सखि औरकहों निशिनींदविनाजुगनैन सरोजसुतेंअकुलाए।। युगनूपरकी धुनि चीतहरे परभूमिविष पदते खिंसलाए । गजगामनि तूं गति मंद चले उर चाहतहैं निजनाह रिझाए। इह लक्षण जो तव नाह पिखे डरहों उर संककरें खुनसाए१७२ मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ सवैया। सखि काहेतेसंकमई तुमको हम नाहिकीआयसमेंसुखपाए। इक और कहोंसुनमोहि अली जिहतेसगलोडरतोहिमिटाए। (१) मिथ्या जो देहद्रियां अन्तःकरण इनमें जो दृष्टि कहिये इनमें जो आत्माका नादात्म्याभिमान मरे कहिये निवृत्तहार जन तव । (२) स्वस्थानसे भ्रष्टहोतेहैं । - 1 [अं०२] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (६७) युवती मुख चंद निहारतहीं नरचित्तचकोर महा हरपाए । दृगकंजफिराइ पिखे युवती कहितांगतिजो नरता खुनसाए।। दोहा। इम भापत दोनों चली, आवत मोह निहार ।। देवी मिथ्याष्टियहि, ऐसे कीन उचार ॥ १७४॥ सवैया। कदलीसमजंघ विरंचि रची, पुनफूलनमाल सुकंठसुहाए । कर चंचलचीर उभारत है, कुचमंडल चन्दन लेपलगाए । जनु नीलसरोज वनीअँखियाँ, पिख दीर्घमें मनको तृप्ताए। कर डोलत कंकण वोलतहैं, धुनि नूपरकामसिखीहरपाए १७५ मुख चन्दसरोज मनो अँखियाँ दुतिदाडमदतनहेर लजाई। जग कामनिदाघतपेजनजे हगसिंचसुधातिनताप मिटाई ।। नभचन्द कलाजन भूमिआई इन पेखनते मनमें विगसाई॥ सुगुलावपिखमधुमूरतिसी मलमूत्रता नहिदेत दिखाई॥१७६॥ विभ्रमवत्युवाच ॥ दोहा। यहमहामोह सुप्राणपति, तूं अति प्यारी नारि ॥ चलो समीप प्रसन्नकर, भाष्यो मान हमार ॥ ३७७॥ सुनिके मिथ्याटितव, जाइ समीप निहार ॥ महामोह महाराजप्रति, जयजय कीनउचार ॥ १७८॥ (१) उठावतीहै । (२) ग्रीष्मऋतु । , . ter (६८). प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२] महामोह उवाच ॥ दोहा। पीनउरू कुच अंकमिल, कीजे मोहि निहाल ॥ हरणाक्षि शिवशिवाकी, शोभा हरोविसाल ॥ १७९॥ हसी सुमिथ्यादृष्टि तव, मिली सुभुजा पसार ।। महामोह सुखताहिको, निजसुखकरे उचार ॥ १८० ॥ अहोप्यारी संग तव, लयो रसायन सार । जराइकाग्रमेटि पुन, यौवन भयो उदार ॥ १८१ ।। सवैया । पूर्वजो नव जोवनमें, सुमनोजविकार भयो बलकारी ॥ चीत मत्थेउर आनंदथे सभ औरपदार्थ थे सुखकारी चीत इकागर ताजरठापनते सुखचन्दअमी सुनिवारी ॥ संगमते नवजोवनमें, अव फेर भयोतव प्रेम उदारी।। १८२॥ कवि रुवाच ॥ दोहा। तरनापन तज विषय सुख, बहु दिन भजे मुरार ।। जरठापनविन भागसठ, युवती मदनविकार ॥ १८३॥ मिथ्यादृष्टि रुवाच॥ , सवैया। महाराज कहों इकवात सुनो जिह ऊपरहोत कृपाल पियो। जग पूरन ताहि मनोरथहै कछु चाहत नावहु औरवियो ।। (१) याकाभावयहहैः-उमा महादेवकी न्याई हम तुम दोनो निर्वाध निर्भय स्थितहों ।।

[अं०२] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (६९) नवजोवनते संग मोहि लयो विनसेवनते किह काम जियो।। करुआयसुवेगकरों भरताममजाहि निमित्तसुयादकियो १८४ महामोह उवाच ।। तोहि चितारतहैं निशिवासर वामउरू सुनि मोहि प्यारी॥ माहिदिवार यथा पुतली तिमनीत वसो मम चीत मझारी।। चीतविपे तव प्रेम रहो मम नीतखिरे सुमनोजकी वारी ।। सुन मिथ्याष्टिप्रसन्नभई, सुप्रसादकियो मुख एहु उचारी १८५ महामोह उवाच ॥ दोहा। औरकहों दासी सुता, श्रद्धा शांति सुजान ।। दूतीभई विवेककी, पत्र लिखे मदमान ॥ १८६॥ उपनिपत विवेक मिलापहित, भई कुट्टणी सोइ ॥ जिहविध होइ मिलाप नहिं, करो उपाय सुसोइ ॥१८७॥ एक उपाय सुमैकहों, वही करो मनधार । श्रद्धा जो उपनिपतकी, सो अव देहु निवार ॥ १८८॥ अकुलीनी प्रतिकूल मम, श्रद्धा पापिन नारि ॥ केशनते गहि ताहिको, देहु पखंड मतडारि ॥ १८९ ॥ मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ चौपाई। याहिकाजकी चिंत न कीजे । मम वचननते भयो पिखीजे ॥ मेरा वचन सुने जव रंडी। तजे वेदपथ भजे पखंडी ॥ १९॥ (१) जीवना । (२) मेरी दासीकी सुता यह गाली प्रदान है । (३) स्त्रीपुरुषके मिलाप करावनेवालीका नाम कुट्टनी है। (४) नियामकरहित ॥ ।

1 (७०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०२] मेरो जीवन जवलग होई । बसै पखंड ग्रहते पदधोई ॥ मिथ्याधर्म मिथ्यामुक्ति । मिथ्यावेद मिथ्यायुक्ति ॥ १९१ ॥ दोहा । याविधि मेरो वचन सुनि, तजे वेदपथसोई॥ जनवेदन श्रद्धा मिटे, कहि उपनिपदमै होइ ॥ १९२॥ सवैया। जह खाननपाननतीसुखहै वहु मोक्ष कहो कतआवत कामा।। परलोक नहीं सुखहोइ कहां उलटे सुत नारि तजावत धामा।। जगबंचनके हित व्योतेरची जन धूरत वेद घरे तिह नामा॥ श्रद्धासुन यों पथ वेद तजे सुपखंडनके वसवै वहुवामा १९३॥ महामोह उवाच ॥ चौपाई। ऐसे करें पिआरी जवही । मेरो इष्ट सिद्धजग तबही ।। इम कहि प्रेम भयो अधिकाई।मुखचूम्यो गहिकंठ लगाई।।१९४॥ मिथ्यादृष्टि रुवाच ॥ चौपाई। भूपति यह नहिं रीति सुहहै । मेरो चीत सुबहुत लजैहै ।। महामोह तब कीन उचारा। धस्योबनेअब वास अगारा॥१९॥ दोहा। ऐसै मुखो वखानके, गयो अखांडो त्याग ।। पिख भूपति विसमै भयो, गुलाबसिंह वडभाग ॥१९६॥ (१) तव पद दासी। (२) प्रकार वा ठगी वा बनावट। (३)वञ्चकोंने। (४) वान्छितअर्थ ॥ 1 ३ - [अं०२] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (७१) दोहा। करुणा सखीसमेत पुन, शांति सुशील उदार ॥ जैहै श्रद्धाशोधहित, जगसम पंथमझार ॥ १९७॥ इति श्रीमन्मानसिंह चरण शिक्षित गुलाबसिंह विरचिते प्रबोधचन्द्रोदय नाटके द्वितीयोइः समाप्तः ॥ २ ॥ इति श्रीमदासीनवर्य्य परमानंद शिष्य गुरुमसादविरचिता प्रबोधचंद्रोदय नाटक द्वितियांऽकटिप्पणिका समाप्ता ॥ २ ॥ 2 ॐ श्रीगणेशाय नमः। अथ तृतीयोङ्कप्रारंभः ॥३॥ दोहा। माया जिह जग मोहियो, बहु कुपंथ भरमाइ॥ वहु रघुनायक दासके, होवै नीत सहाइ ॥१॥ जिहविध कलियुग फैलियो, सकल भ्रमायो लोइ॥ गुलावसिंहनृप सभामें, प्रगट दिखावत सोइ ॥२॥ सवैया। ते इहभांति गए जवहीं तव शांति तथा करुणा तहँ आई ।। ऊँच बुलावतहै जननी मम उत्तर देड्ड कहा मम माई ॥ शांति सुनयनननीर बहै कहँ मात गई नहिं देत दिखाई॥ तो विन जीवन मोहि कहांअव प्राण तजों सुलगे दुखदाई॥३॥ मृगरंजतकाननप्रीतिहुती जल शैलनमें तवप्रीति नई ॥ आति पावन थानन प्रीति हुती तपसा तनमैं लवलीनभई ।। जिम भौनचंडालन गौकपिला तिममात पखंडनहाथ गई। अव जीवनमातको होत कहांतनडारइहायमधामगई ॥१॥ विन मोहि पिखेनहिनावतथी अरुनाहिकछू जननीमुखपाए। नहिसोवत मोहिविना कवहीं नहिमोहिविनापथमाहि सिधाए (१) जैसे सर्वगौओंके मध्यमें कपिला गौ उत्तमहै; तैसे शांत्यादिकोंके मध्यमें श्रद्धा उत्तमहै ॥

, - [अं०३] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (७३) श्रद्धाबिन मोहिपिखे मरती, नहिं एक महूरत प्राण रहाए । अव तांबिनजीवन मोहि विडंबन, प्राणबने यमधाम सिधाए करुणे सजनी अव शांति मरे, जग तूं मम देहु चितासुबनाई। अब मोहि विलंब सुहातनहीं, तन देहु हुताशनमांहि जलाई। जनचित्त निवासतजोसजनी, तहँजाउँ जहांसुगई मम माई॥ सुनशांति विलापमहाकरुणा, हगनीर बह्यो सुलईगललाई॥ करुणोवाच ॥ सवैया । सजनी इह भांति कहे मुख अक्षर,ज्वाल मनोसुदैवानलकी। तन प्राण विलातठरातनहीं उरमोहि भयोमछलीथलकी ।। सुमहूरत प्राण धरो न मरो मुखकंज प्रसन्न नहो हलकी ॥ अव सोध लहे जगमें श्रद्धा, न मुई कछुवात भई कलिकी॥ इत औउत पुन अरण्यपिखेमुनिआश्रमजेसुतपोवनमाहीं॥ तटगोमतिकै यमुना तटमें कि बसी सुभगीरथिकेतटमाहीं॥ कदाचित मोहमहीप डरी, छपिजाइ बसी गिरि कंदरमाहीं।। कुरुजांगलकै मखसालनमें श्रद्धा कहूं जाइबसी जगमाही ८ शांति रुवाच ॥ दोहा । सखी निहारेगी कहां, श्रद्धा कथा न लेश ॥ मैंकुरुक्षेत्र सुगोमती, औरपिखे सभदेश ॥९॥ (१) मोहि पिसे विन श्रद्धा मरती, इस कहनेकर श्रद्धा शांतिकी व्याप्ति मतीत होवैहै अर्थात् जहां श्रद्धाहै तहां शांतिहै। (२) अग्नि । (३) वनकी अग्नि । (४) कलिका विडंबन है॥

(७४) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३] , C सवैया। सरितातटमें बहुभांति पिखे तपसी जिनमाहि अनेकसुहाए। पुन मोहि मीमांसकधाम पिखे चमंसाकर यूपसुथान वनाए पुन आश्रम चार निहाररहीदिनकोटिनकोटन जातगिनाए। नाहवात सुनी कहूं काननमें श्रद्धासजनी किहठौरवसाए१० करुणोवाच ॥ चौपाई। सखीकहों श्रद्धाहै जोई । पखंडनके वसपरे नसोई ॥ जे अतिपुण्यवती जगनारी। ते यों विपति न लहे प्यारी ॥११॥ शांति रुवाच ॥ दोहा। सखीकहों इकवात सुन, जो धाता प्रतिकूल। कहो असंभव कौनगति, वेसभ अपदामूल ॥ १२॥ सवैया। जनकात्मजा गृह रावणके सुबसी दुःखभांति अनेकभरे ॥ वस दानव वेदत्रयी सुभई तिनजाइ रसातल वासकरे ॥ पुन गंधर्वकी दुहिता पतिदैत्य हरी सुमदालस रूपवरे ॥ विधिवासभयेजगमें सजनी कहुआपदकौननशीशधरे॥१३. (१) पात्र विशेष । (२) कार्याऽसिद्धिमें क्या आश्चर्यहै । । (३) सीता । (४) मदालसा नामक कन्या पातालकेतु नामक दैत्यने हरली यह गाथा तुलसीदास कृतरामायण, तथा श्रीमद्भागवतमें प्रसिद्धहै इसप्रकार श्रद्धाका पाखण्डोके हस्तमें जानेका देवही मूलहै वेदवाह्यकानाम पाखण्डहै । - , [अं०३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (७५) दोहा । ताते चलें पखंड ग्रह श्रद्धा तहां जिहोइ ।। करुणाको सुचलु सखी, इमकहि चाली दोइ ॥ १४ ॥ सवैया। करुणा तह अप्रबिलोक डरी सजनी मम राक्षसनैन निहारे।। पुनिशांति कह्यो कहि राक्षसहै करुणातबपीठहिपीठउचारे। मलपंक गिरे मुखदंतनते तनमें दुरगंध भयानक भारे ॥ मुक्ताकटिकच्छ मलीन महा इहमूंडपिसंग सुझंड खिलारे१६॥ दोहा। पूंछ सिखंडसुकरविषे, आवतहै इतओर ।। नैन निहार न मैं सकों, चित्त डरतहै मोर ॥१६॥ शांतिकह्यो राक्षसनहीं, पुर्दैगलहै बलहीन ॥ करुणा कहे सुकौन पुन, ऐसो परम मलीन ॥ १७॥ शांति कह्यो सुपिशाच यह, ऐसे मेमन आइ॥ करुणा कहे पिशाचनहि, बहु निसमें प्रगटाइ ॥ १८॥ सूर्य आहि आकाशमें, किरणप्रकाशे लोइ ।। ऐसेसमै पिशाचका, कहिअवकाश सुहोइ ॥ १९ ॥ शांति कह्योसुपिशाचनहिं, तो यह पापी आहि ॥ निकस्यो अवही नरकते, आवतहै पथमाहि ॥२०॥ (१) खुलावस्त्र कटिमें कच्छाहै लगाया है। (२) मस्तकमें भूसररंगकी जटा सरीखी। (३) मोरछल । (४) (पुद्गलं वपुरात्मनः) अर्थयहः-आत्माके शरीरका नाम पुद्गलहै यह कोषमें कहाहै, याते बलहीन कोई पुरुष है । ।

. (७६) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३]. बहुरोशांति विचारकर, अव मैंलखियोनृतांत ॥ महामोह पठयो अयो, यह जग जैन सिद्धांत ॥२१॥ याको दर्शन दूर तज, यह अति पतित मलीन।। ऐसे शांति बखान के, फिर चाली मुखदीन ॥२२॥ करुणोवाच ॥ दोहा । सखीमहूरत थिररहो, श्रद्धा लेहि निहार ॥ यही पखंडी भाखिये, मत या भवनमझार ॥२३॥ गुलाब सिंह इम भाषकर, दोनों खरी इकांत ॥ तव नृप सभा प्रवेशकर, वोल्यो जैन सिद्धांत ॥२४॥ नमोनमो अहैतपथ, जे जन चले उदार ॥ भुक्तिमुक्ति दोनोंलहै, मैं अव करों उचार ॥२५॥ कवित्त। नव है द्वार तन भौनके मझार पुन, आत्मा प्रकाशदीप ताहिमें सुहाई है। जैन वरभाख्यो सिद्धांतसुइकांत यह, गहे जनजोई जगसूख मोष पाइहै। अरे सुन श्रावक सुवाकमें वखानो तुम, मलमय प्रमाणुते सुदेह उपजाइहै। मूढनर शुद्धकरें शीतजल शीशधरें, होवत न शुद्ध जलकोटन नवाइहै ॥२६॥ (१) दिगम्बर सिद्धान्तशास्त्र। (२) दीपक दृष्टान्तसे आत्मापरिच्छिन्नपरिमाण (३) व्यभिचार रहितहै अर्थात् निर्दोषहै। (४) शिष्य ॥ वाला हुवा। -

[अं०३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
(७७)
दोहा।
आत्म विमल स्वभाव है, रिषिसेवा तिहज्ञान ।।
रिषि सेवाकैसीकहो, सुनहोकरों वखान ॥२७॥
सवैया।
दूरिहिते पदपंकजको अभिवन्दनशीश निवाइ करो ॥
भोजन जो मिष्टान्न महा नित ताहि जिवावहु जोरकरो ॥
घरभीतर जो रिषि वासकरे, मनमै नहि रंचक रोष धरो॥
गोपडतोमत खोलिकह्यो इहभांति करो भवसिंधुतरो॥२८॥
पुनि नेपथ्य ओर बिलोकि कह्यो श्रद्धे इतआउ कहां चिरलाए
करुणातिहशांतिनिहारतथी, इनपेखत कोन कनात हलाए।
श्रद्धा तह आइ समाजवरी पुन जैनसमान सुवेस बनाए ।
कहि आयसुमोहि सुवेगिकरों,सुनशांतिदुःखी सुभईमुरझाए२८
क्षपणक उवाच ॥
दोहा।
स्रावग निखिल कुटंबको, श्रद्धे तूं गहि आज।।
कबहुं महूरत नातजी, सिद्धहोइ मम काज ॥३०॥
दोहा।
जो आयसु सोईकरों, राजकुलीन महान ।।
इम कहि निकसै वै दोऊ, करुणाशांति बखान ॥३१॥
करुणोवाच ॥
दोहा।
सखी प्यारी धीरधर, काहेतूं डरपाइ ॥
नाममात्र श्रद्धा कहैं, है कछु और बलाइ ॥३२॥

Matecoran 1 1 है (७८) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३]. चौपाई अहिंसा देवी मोहिं सुनाई । पखंडधाम श्रद्धा इक आई ॥ परवहु अंवातेहै आन । तामस श्रद्धा कहै वखान ॥३३॥ दोहा। ताते श्रद्धा तामसी, यह तूं क्यों डर पाइ ॥ ऐसै करुणा भाखियो, अव पुन शांतिअलाइ ॥३४॥ शांति रुवाच ॥ चौपाई। सावधान सजनी मैं होई । जैसें कहें बातिहै सोई ॥ यह अतिदुराचारणी ये। अंवा सदाचार रातिपै ये॥३५॥ यह दुर दर्शनरूपं मलीनी । अंवा प्रियदरशन-सुखभीनी ।। ऐसो रूप ताहि नहि होई । संसा मनमें करो न कोई ॥३६॥ अंबा याके वस नहिं होई। जो तूं कहें बात है सोई॥ चलें अगारी सौगत धामा। तहाँ मिलै जो बहुअभिरामा ३७ यों कहि चलीअगारीजवहा । भिक्षुक एक निहायो तवहीं॥ पुस्तक हाथविष दर्शायो ।वौद्धसिद्धांत सभामहिआयो३८ भिक्षुक उवाच ॥ चौपाई। क्षणभंगुर सकल पदार्थ हैये । है भीतरवाहर समपैये ।। अहे निरात्ममाहि ज्ञान दर्पणसम मुख होवै भान॥३९॥ (१) बुद्धशास्त्राभिमानिदेवता। (२) घटादिकविषय बुद्धिमें कल्पितहोनेते अन्तरवर्तिहुएभी भ्रांतिसे बाहरको न्याई प्रतीत हावै- है । अहे निगममाहिं ज्ञान ॥ दर्पणसममुख होवैभान ॥ याका अन्वय यहहैः-ज्ञानमाहिनिरात्मअहै अर्थात् ज्ञान कहिये बुद्धिरूपआत्मामें प्रवृत्तिविज्ञानधारारूप अनात्मस्थितहै सो आत्मख्यातिसेंबाह्यमतीत होवहै जैसे ग्रीवा स्थितमुखदर्पणमैं भासे है तैसे ।।

[अं०३]. प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (७९) सो वहुज्ञान वासना हीन । फुरे विषय विनु लखैप्रवीन ॥ यों कहि पोथी आगे धरी । शीशनिवाइप्रकरमाकरी॥४०॥ अहो साधु यह धर्म सुहायो । जो निजमुखते बुद्ध बतायो । यामैं सुखमोक्ष जगदोई । खेदविना जनपावै सोई ॥११॥ सेवकके निज भौनमझारे। सुंदरवास सुमाहि चुवारे ॥ मनअनुकूल बनककी नारी । वहुविध भोजन धरेसवारी४२॥ कोमलसेज सुवणक विछाए । जोर दोऊ कर देइबैठाए ॥ श्रद्धासहित उपासक जेते । युवतीसहित भजे पदतेते॥४३ दोहा। अंगराग तनलाइकै, वणक मनोहरनारि ॥ भजे निशाशशिऊजली, पद निजपाणि मझार ॥४४॥ करुणोवाच ॥ सवैया। सजनी यह कौन सुआहिइहा तनुतालसमान सुजाहिलंबायो। सुपिसंगकषाय धरे तन अंवर सूक्ष्मजो धरमै लटकायो। पुन भाल सुकिंचित मुंडतहै किपिखो कचमूलहुते उखडायो। द्रुमछालं विसालसुनाल धरी नयती यह जान परे रसकायो॥ शांति रुवाच॥ दोहा। बौद्धागम सजनी इहै, भिक्षुक रूपबनाइ ॥ वंचतहै सभलोकको, यों मेरे मनआइ ॥ ४६॥ (१) कुडमचन्दनादिलेप । (२) लाल तया सुगन्धीवाले वस्त्रधारणकोये हैं ॥ - ५ (८०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३] भिक्षुक उवाच ॥ दोहा। यंतीउपासक औरसम, सुनो सुनिजनिज कान ।। वाक सुधारस वंधहर, कहे सुगत भगवान ॥४७॥ योंकहि पुस्तक लीनकर, खोलि नवायो शीश ॥ गुलावसिंह पेखत सभे, राजसमाजमहीश॥४८॥ दिव्यनैनसभकी पिखो, गति शुभाशुभ दोइ ॥ क्षणभंगुरसभ भावहैं, थिर नहिं आतमकोई ॥१९॥ सवैया। इमजानत जो सभमोहजितोनिजदारन औरअगारनमाही। भिक्षुकजो घरमाहि रमे तब द्वेप न रंचकरो मनमाही॥ मन कोमलतो इहभांति मिटे पुन नेपथ्यपेखि कह्योमुखमाही॥ श्रद्धे इतआउ बिलंबकहा सुप्रवेशकियो श्रद्धाक्षणमाही ५० श्रद्धोवाच ॥ दोहा। देव करो आयसु प्रगट, करों कौन अब काज। मै क्षणमें सोईकरों, तुम सभके सिरताज ॥५१॥. भिक्षुक उवाच ॥ दोहा। भिक्षुक सेवक सकलजे, ताको गहि निजहाथ ।। मोहिमतेअतिथिरकरो, सभे निवावे माथ॥५२॥ (१) यती नाम साधु तथा सेवक । (२) पदार्थ । (३) बुद्धिस्थितिरहित है ॥ . - [अं०३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (८१) श्रद्धोवाच ॥ जो आयसु सोईकरों, ऐस बखाने बैन । निकसि चले वै सभाते,शांतिनिहारे नैन ॥५३॥ शांति रुवाच॥ सजनी यहभी तामसी, श्रद्धा जानी मोहि ॥ करुणा कह्यो सुवहै, भली पछानी तोहि ॥५४॥ याअवसर क्षपणक अये, लाबो डीलमुहाइ। भिक्षुक जातो हेरकै, ऊचेलयो बुलाइ ॥५५॥ रेभिक्षुक इतआउ तुम, कछु पूछो अब तोहिं ।। तेरी मेधा मैं पिखों, प्रगट बखानो मोहि ॥५६॥ सुनि भिक्षुक पुनि कोपियो, भाषेवचनकठोर।। हापापी मलपंकघर, लेहि परीक्षा मोर ॥१७॥ क्षपणक कहे सुक्रोध तज, करो बेगि अतिरोध ॥ शास्त्रगति कछु पूँछहों, काहेकरो सुक्रोध ॥ ५८॥ भिक्षुक उवाच ॥ क्षपणक तूं कछु जानहै, शास्त्रकथा उदार ।। भवतु प्रतीत पूछो सुअब, भाखों क्रोधनिवार ॥१९॥ चौपाई। क्षणभंगुर तव मतआत्मअहै । काहिनिमित्त व्रत्ततुमगहै । याको उत्तर प्रथम उचारो ।क्षणक आत्मा किहबिधितारो६० (१) अरेक्षपणक शास्त्रमपिवेत्सि । भवतुप्रतिक्षामस्तावत् उपमृत्यकिपृच्छसि ॥ यह संस्कृतका पाठहै अर्थ यहः भवतु कहिये जैसा तू जानताहै तैसा जाणो परंतु मैंभी तेरी परीक्षा करताहूं ऐसे कहिकर भिक्षुक क्षपणकके समीप जायकर कहनेलगा कहुं क्या पूछता है क्रोधरहित होय कर मै तेरेको उत्तर कहताहूं यह दोहाका भावहै ।। क्षपणक उवाच ॥ ६ (८०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३] N भिक्षुक उवाच ॥ दोहा। यतीउपासक औरसम, सुनो सुनिजनिज कान ॥ वाक सुधारस वंधहर, कहे सुगत भगवान ॥४७॥ योंकहि पुस्तक लीनकर, खोलि नवायो शीश ॥ . गुलावसिंह पेखत सभे, राजसमाजमहीश ॥१८॥ दिव्यननसभकी पिखो, गतिं शुभाशुभ दोइ ॥ क्षणभंगुरसभ भावहैं, थिर नहिं आतमकोइ ॥१९॥ सवैया। इमजानत जो सभमोहजितोनिजदारन औरअगारनमाही। भिक्षुकजो घरमाहि रमे तव द्वेप न रंचकरो मनमाही॥ मन कोमलतो इहभांति मिटे पुन नेपथ्यपेखि कह्योमुखमाही। श्रद्धे इतआउ विलंवकहा सुप्रवेशकियो श्रद्धाक्षणमाही ५० श्रद्धोवाच ॥ दोहा। देव करो आयसु प्रगट, करों कौन अव काज ।। मै क्षणमें सोईकरों, तुम सभके सिरताज ॥५१॥ भिक्षुक उवाच ॥ दोहा। भिक्षुक सेवक सकलजे, ताको गहि निजहाथ ।। मोहिमतअतिथिरकरो, सम्मे निवावे माथ ।। ५२॥ (१) यती नाम साधु तथा सेवक । (२) पदार्थ । (३) बुद्धिस्थितिरहित है ॥ -- - [अं०३] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (८१) , श्रद्धोवाच ॥ जो आयसु सोईकरों, ऐस बखाने बैन । निकसि चले वै सभाते, शांतिनिहारे नैन ॥५३॥ शांति रुवाच ॥ सजनी यहभी तामसी, श्रद्धा जानी मोहि ॥ करुणा कह्यो सुऎवहै, भली पछानी तोहि ॥५४॥ याअवसर क्षपणक अये, लाबो डीलमुहाइ । भिक्षुक जातो हेरकै, ऊचेलयो बुलाइ ॥५५॥ रेभिक्षुक इतआउ तुम, कछु पूछो अब तोहि ॥ तेरी मेधा मैं पिखों, प्रगट बखानो मोहि ॥५६॥ सुनि भिक्षुक पुनि कोपियो, भाषेवचनकठोर। हापापी मलपंकधर, लेहि परीक्षा मोर ॥१७॥ क्षपणक कहे सुक्रोध तज, करो बेगि अतिरोध ।। शास्त्रगति कछु पूँछहों, काहेकरो सुक्रोध ॥ ५८॥ भिक्षुक उवाच ॥ क्षपणक तूं कछु जानहै, शास्त्रकथा उदार ॥ भवतु प्रतीत पूछो सुअब, भाखों क्रोधनिवार ॥१९॥ चौपाई। क्षणभंगुर तव मतआत्मअहै । काहिनिमित्त व्रत्ततुमगहै । याको उत्तर प्रथम उचारो।क्षणक आत्मा किहविधितारो६० (१) अरेक्षपणक शास्त्रमपिवेसि । भवतुपतिक्षामस्तावत् उपमृत्यकिपृच्छसि ॥ यह संस्कृतका पाठहै अर्थ यहः भवतु कहिये जैसा तू मानताहै तैसा जाणो परंतु मैंभी तेरी परीक्षा करताहूं ऐसे कहिकर भिक्षुक क्षपणकके समीप जायकर कहनेलगा कहुं क्या पूछता हैकोधरहित होय कर मै तेरेको उत्तर कहताहू यह दोहाका भावहै ।। क्षपणक उवाच ॥ ६ (८२) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३] भिक्षुक उवाच ॥ अरे अरे अव करों वखान । मेरो मतो सुनो निजकान॥ विज्ञानलक्षण आत्महै जोई । रहे संतानमरेक्षण सोई॥६॥ दोहा। अस्मंतपंक्तिपरो पुनः, कश्चितज्ञान सुहोइ । नष्टवासना ऊजलो, मुक्ति लहेगो सोइ ।। ६२ ।। क्षपणक उवाच ॥ चौपाई। सुन मूर्ख जन्मान्तरमाही । जो आत्मको मुक्ति लहाही ॥ तो अव नष्टकलेवर थारा कौनलाभको तव उपकारा॥६॥ पूछों और सुनो मनलायो । किन तव ऐसो धर्म वतायो । ननु सर्वज्ञ बुद्धहै जोई । ताहि कहो यह धर्म सुसोई६४ दोहा। बुद्ध भयो सर्वज्ञजो, कैसे जान्यो तोहि ।। याको उत्तर होय जों, प्रगट वखानो मोहि ॥६५॥ भिक्षुक उवाच ॥ चापाइ। बुद्ध वनायो आगम जोई। तामैं कह्यो सर्वज्ञ सुसोई॥ तातें तां सर्वज्ञ सुजाने -1 वुद्धवाकयह प्रगट वखाने॥६६॥ • (१) अस्मतपंक्तिकहिये विज्ञानसंततिमें विज्ञानपरंपरामें कश्चित्कहिय कोई विज्ञान- लक्षणपुरुष माप्तज्ञानवाला तथा ऊनल -तथा वासनारहित हुआ सोई मुक्तिको पावेगा। (२) यदि मन्वन्तर (कालान्तर) में कोई आत्मा मुक्तिको पावेगा तौ अव तेरे शरीरके नष्ट होयां तुमको लाभ उपकार करेगा न कछुभी करेगा यह चौपाईका भावहै || 4 H [अं० ३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (८३) क्षपणक उवाच ॥ सवैया। बुद्धवाकनते सर्वज्ञ सुबुद्ध जबै, रिजुबुद्धिसु.ताहि पछाने । तो सर्वज्ञ सुमोहिलखो जगमैं, सबभूत भविष्यत जाने ॥ पितरपितामह सातकुलीलग, तूं मम दासनही ममछाने । सुनके यहबात दिगंवरकी,पुनि भिक्षुक चीत्त वडे खुनसाने६७ भिक्षुक उवाच ॥ दोहा। हा पिशाचपापी बडे, मोको कहे सुदास ॥ दंतपंकघर मलन अति, बुरीसुतें तनवास ॥ ६८ ॥ क्षपणक उवाच ॥ , चौपाई। रे बिहार दासोक पियारे । यह इक मम दृष्टांत उचारे । कोपनतूं मनभीतर आन । तेरो हित अब करोबखान॥६९॥ दोहा। बुद्धअनुसासन दूरतज, अर्हतमतो सुधार । मोहि दिगंबरपदलहो, देहु सुबसन उतार ॥ ७० ॥ भिक्षुक उवाच ॥ चौपाई। हा पापी तूं भयो सुनष्ट । औरन नाशचहें अतिदुष्ट । मनो मशान पिसाचहि आयो।योत्तवदेख लोक डरपायो॥ (१) वेश्याके भर्ता यह हमने दृष्टांत कहाहै ॥

(८४) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३] लोकनिंदत जो वड भागी । अपनो राजसूख बहुत्यागी ॥ तेरो वेस पिसाच सुजोई । कौनचहे भवभीतर सोई॥७२॥ दोहा। अर्हत नहिं सर्वज्ञथो, धर्म कहे किह सोइ । तो विनश्रद्धा ताहि मत, कहो सुकांको होइ ॥७३ ॥ 4 क्षपणक उवाच॥ चौपाई। ग्रहनक्षत्र सकल सोजाने । चंद्र रविको ग्रहण बखाने ॥ नष्ट लाभ पुन भावीज्ञान । पाछे भई सु करे वखान ॥७॥ गणनामहि अंतर नहिरहे । अतीन्द्रियवस्तुज्ञान बहुकहे ।। तातेहै सर्वज्ञ अहैत । ऐसें माने जे जगसंत ॥७५॥ कवि रुवाच ॥ दोहा। सुन भिक्षुक अतिशयहँस्यो, भूपति सभामझार ॥ गुलाबसिंहगति औरही, लागो करन उचार ॥७६॥ भिक्षुक उवाच ॥ चौपाई। अनादिकालका ज्योतिषजोई। अतीन्द्रियज्ञान कहेसवकोई॥ तापरतारक तुम जग भये । कष्टवत शिरपर धरलये॥७॥ और कहों इककरो वखान । तव मतजीवशरीर प्रमाण ॥ विनासंबंध त्रिलोकीज्ञान ।ताको किहविध होइसुभान७८॥ (१) अर्हत तो सर्वज्ञ था नही तिसने धर्म किसमकार कहा सो कहिये। (२) वञ्चक। (३) विज्ञानरूप ॥ . .

[अं०३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (८५) कुंभोपहित दीपकह जोई । यद्यपि शिपा वडीतिह होई ।। ग्रहमैं अहे पदार्थ जेते । कवी प्रकाश सके नहिंतते॥७९॥ ताते अहैतदर्शने जोई। उभे सुलोक विरोधी सोई ॥ सौगतदर्शन अतिसुखकारे । वहु हम सुंदरनयन निहारे ॥८॥ शांति रुवाच ॥ दोहा। सजनी श्रद्धा नहिंइहां, चलें ठोर अव आन । करुणा कह्यो सुएवकर, आगे कियो पयान ॥ ८१॥ शांतिसु आगे देखकर, वोली वचनउदार ॥ सामासद्धांत सुयह खडो, आगे सखीनिहार ॥ ८२॥ भवतु तथा करुणाकह्यो, चलें समीप सुयाहि ॥ मतश्रद्धा तह होइ पुन, अवलो पेखीनाहिं ॥ ८३॥ तवै कपालकरूपधर, सोमंसिद्धांत प्रवेश । कीनो सभामझार तह, जहकीरतिवरम नरेश ॥८४॥ सवैया। नरहाडनकी गल मालधरी, शंवदंतनके श्रुतिकुंडलछाएँ । भुज अंगदहाडनके सुधरे, निशको सुमशाननमाहि वसाए । मजन छारविपे सुकरे, तनमें, सुमशानकी छार लगाए । आतिभीपन आहि अकारवडो,नरमुंडकपाल सुभोजन पाए८५ (१) शास्त्र । (२) उमाके साथ जोहोवै सो कहिये सोमसिद्धांतशास्त्र । (३) मुडदाके ।

(८६) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३] कपालक-उवाच ॥ दोहा। f योगांजनसों मैं पिखों, जोकछु जगतमझार ॥ भिन्नाभिन्न सो ईशते, लीनो जगत निहार ॥८६॥ कवि-रुवाच ॥ क्षपणक ताहि बिलोकिकर, भिक्षुक कीन उचार ।। एहु कपालक बृतीनंर, पूछे ताहि बिचार॥ ८७॥ क्षपणक भिक्षुक पूछियों, ताहि समीप सुजाइ । कपालकरे नरमूंडधर, हमे सुदेह बताइ ।। ८८॥ हमरे उर संशयभयो, धर्मसुते मत कौन ॥ तबै कपालक बोलियो, महा अमंगल भौन।। ८९ ॥ कपालक उवाच॥ . कवित्त। सुन क्षपणक अब तोहिको बखानकरों, सुनके हमारो धर्म चित्तमाहि धारिये ॥ भालके कपाल यह चरबी बिसाललगी, मांसकी अहूतीगहि पांवक सुडारिये॥ भूसुर कपाल डारमदरा बिसाल पुन, कीजे मुखपान इम वृतको उपारिये ॥ काट नरमुंड हम भैरवसुझुंड भनें, श्रोणतकी धार पांव भैरवपपारिये ॥९॥ (१) जगद परस्पर भिन्न है ईश्वरसे 'आभिन्न है। । (२) वेषधारी (३) समूह ॥ . 1 - 14 - [अं.३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (८७) सुनकै सुभिक्षुक दवाइ दोऊकानलए, क्षपणक ओर पुन ऐसोतो अलायोहै। सुनो बुद्ध बुद्धवंत संतहो महंत वडे, दारुण सुधर्म कपालक बतायोहै। क्षपणक ताहिको पुकार जनमाहि कह्यो, घोरपापकारी किने याहिको ठगायोहै। गुलाबसिंह सुनत कपालक कराल अति, कीने हगलाल मनमाहि खुनसायोहै ।। ९१॥ T कपालक उवाच ॥ कवित्त। 1 - - - मुंडत सुमुंडरे चंडाल मेषपापीवडे, बडेही पखंडी शिर केसन पुटाइहै ॥ लोकनके ठागरे सुभागते पलाइगए, शिवको महानपथ ताहिमैं नआइहै। चतुर्दश भौनजोई क्षणमैं उपाइलए, करे प्रतिपाल पुन क्षणमैं खपाइहै। वेदांतके सिद्धांतमैं प्रसिद्ध प्रभाव जाहि, पूरन भवानीपति लोग वेद गाइहै ॥ ९२॥ ताहिको सुमतलयो जाहिको प्रभावनयो, धर्मको महात्म सुनैनदेखि लीजिए। विष्णु दिजेश औ सुरेश आदिवडेदेव, नैनके निहारो कहोईहा आनदीजिए। (१) जैसे वैष्णवमतमें हेविष्णो हेविष्णोऐसे वैष्णव उच्चारण करतेहै तैसे बुद्धक मतमें बौद्ध भी हेबुद्ध हेबुद्ध ऐसे उच्चारण करतेहैं । ।

" (८८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक) [अं०३] . नभरविचन्दऔनक्षत्रकेकदंबजिते, कहो याहिगतेधरवैठेहीरुकीजिए। कहो नरनागर सुभूमिजले पूरदियों, कहो क्षणभीतर सुतोयसभ पीजिये ॥ ९३॥ - क्षपणक उवाच ॥ प F सुनरे कपालक सुभईमति वालक, सुमानवको मूंड तव करमै उठायोहै ॥ काहूं इंद्रजालक सुमायाको दिखाइ तव, मोह मन लयो उर तोहको भ्रमायोहै ।। ऐसे सुन कान सुकपालक मलान अति, दाबि दोऊकान मनमाहि खुनसायौहै ॥ इंद्रजालवत भगवंतको सुमूढकहें, तीनलोक जाहि क्षण एकमै बनायोहै ॥ ९४॥ तोहि दुष्टात्मता सुमोहिते नसहीजाइ, काढिके सुखग अव करमै उठाइहों। कालकरवालसों उतार भाल तेरो अव, कंठ तव नालते सुलोहूकोचुआइहों।। डमरू बजाइ पुन भूतकिलकाय संग, काट तव मूंड मुभवानीको चढाइहों। श्रोणतकी धार छुटे फेन अरु बूंद उठे, पेखि मुखहसे शिवपतनी रिझाइहों॥ ९५।। (१) महादेव ॥ .

[अं०३] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (८९) दोहा। ऐसे मुखो उचारकै, लीनोखगनिकार ।। क्षपणक पिख उर भयभयो, लागो करन उचार॥९६॥ क्षपणक उवाच। दोहा। अहिंसा परम सुधर्महै, महाभाग इमजान ॥ वन्यो सुभिक्षुक अंकमैं, ऐसे मुखो वखान ॥ ९७ ॥ तब भिक्षुक कपालकको, वारन कीनो आप। महाभाग भैरव भक्त, क्षपणकहै निहपाप ॥९८॥ कौतुककथानिमित्त अव, हनो न याके प्राण ॥ कपालक ऐसे सुनतही, कीनोखगमियान ॥ ९९॥ क्षपणक स्वस्त सुहोइकर, बहुर पुछे विख्यात॥ महाभाग यद्यपि कु, तदपि पूछों वात ॥ १० ॥ कह्यो कपालकपूछ अब, क्षपणक प्रश्न सुकीन । मैं सुनियो तुमरो धर्म, अहे सुपरम प्रवीन ॥ १०१॥ कैसे तव मत सूखहै, कैसे मोक्ष तुहार ।। मैं उरमें संशयभयो, नीके करो उचार ॥ १०२॥ कपालक उवाच ॥ चौपाइ। विषयविना सुख कहूं न पेखे। आनंद वोध विषयमै लेखै ॥ ताते विपयभोगहै जोई ।वहीसूख कछु और नहोई॥१०३॥ (१) सुखानुभव ॥

- (९०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३] आत्मस्थित मोक्ष बखाने । ते पशुबुद्धि सुमहा अजाने ॥ उपलअवस्था वहुजगअहै । बुद्धिवंत-तिह किह विधचहै।।१०४ अपनीवयकी जो अनुरूपा। युवती मिले सोमोक्ष अनूपा ॥ यापर संमत तोहि दिपाऊं । तेरो सवसंदेह मिटाऊं ॥१०५॥ पारवती प्रतिरूप नवीना । तासंगरहे सदा सुखभीना ।। चन्द्रचूड शिव मुक्तिभनीजे ।क्रीडाकरें दरस दुःखछीजे॥१०६ भिक्षुक उवाच ॥ दोहा। श्रद्धालायक नाअहे, महाभाग यह रीत ॥ विषयरागः बीत्यो नहीं, मुक्ति कहा तिह मीत ॥१०७॥ क्षपणक उवाच । 1 . " दोहा। अरेकपालक रोपतजि, पूछों वात प्रसिद्ध ॥ अर्धशरीरी मुक्तिपुन, यह मत सकलअशुद्ध ।। १०८॥ सुनत कपालक मनविषे, कीनो इहे विचार ॥ याके अंतः करणमैं, अहे अश्रद्धाभार ||१०९॥ निजमतंश्रद्धा आज पुन, लीजे बेगबुलाइ ।। मुखोंबखान्यो प्रगट तिन, श्रद्धे तूं इतआइ॥ ११०॥ तष आई श्रद्धा तहां, रूप कपालक धार ॥ करुणाताको हेरकर, कीनो शांतिउचार ॥१११॥ (१) सुखानुभवसे रहित ने जीवकी स्थिति मुक्ति मानतेहैं । । (२) दृष्टांत । (३) पार्वतीके सदृश स्त्रीके साथ जो क्रीडाकर्ताहै सो मुक्त कहाजावैहै ऐसे महादेवजी कहतेहै अर्थात् उमासहित महादेवके उपासकोंको सरूपामुक्तिकी प्राप्तिहोतीहै यहतात्पर्यार्थहै। (४) अर्धेगीकी माप्तिही तिनके मतमें मुक्तिहै सो पूर्वकहा भी है अपनीव: यकीनोअनुरूपा ॥ युवती मिळेसो मोक्षअनूपाइति ॥ .

[अं०३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (९१) सखी रजोगुणकीसुता, श्रद्धा याहि पछान ।। गुलावसिंहकवि रूप तिह, आगे करे वखान॥ ११२॥ सवैया। नील सरोज विलोल महाग मांग संधूर सुपूर बनाई ।। सुंदर भूपण आहि घने नर हाडनकी गलमाल सुहाई।। पीननितंव सुपीनकुचाकटि मध्यम आननचन्द लजाई । आइ प्रदक्षण ताहि दई कहिस्वामिन् आयसुदेड वताई।।११३ हैअभिमान वडो इनको अव भिक्षुकको गहिलेहु पियारी॥ योसुनवात कपालककी हँस भिक्षुक अंकमिली भुजडारी॥ भिक्षुक सानद अंकलई तन रोमखडे सुजगे शिवओरी ॥ सुअहोमुख याहि कपालनिका हम धनभयेइमवात उचारी। पीन पयोधर नारि कबूं जिनके मतना मम अंक छुहाई ॥ भूलपिखों तव मारकरें अरु दोपजनावत ग्रन्थ सुनाई। 'श्रावग औ तिनग्रन्थनको शतवार धिकारवडे दुःखदाई ॥ आजकपालनिपीनकुचाछुहि मोदवढे सुवडीसुखदाई।।११५ सुअहो शुभपुण्यकपालकके जिनके मतयाविधकोसुखपैये।। सुअहो यह सोमसिद्धांत वडो, जिनके सम और नदूसरहै ये।। पुन है यह धर्म अचंभवडो, वडभाग सुनो सुकहामुख गये।। अवमै दृढश्रावगपंथ तजे, कबहूं तिनके मत भूल नजैये ११६ परमेश्वरको यह सोमसिद्धांत, सुतांहिविषे अव मैं चलआयो। अव तूं गुरुशिप्यसु मोहि पिखोगुरु सीपदिजे सुपरेंतव पायो।। पिख ताहि दिगंवर कोपभये, सुकपालनिसों तव अंगछुहायो। शठभिक्षुकदूरचलो अतिदूषतक्यों मम आवतहैंनिकटायो११७ (१)कामदेव ॥ , .

(९२) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३. दोहा। तव भिक्षुक क्षपणक कयो, वच्यो पापविसाल।। याहि कपालनिसंगसुख, कहां तुम्हारे भाल ॥ ११८॥ चौपाई। तव भिक्षुक पुन एहु उचारी । क्षपणकको गहुवेगप्यारी ॥ क्षपणकअंग मिली गलोले । भये रुमंचसु क्षपणक वोले।।११९ सवैया। सुअहो सुन श्रावगश्राक्गजूसुकपाल निसंग वडोसुखदाई।। अतिसुंदर देह सनेह वढे, मुहिफेरमिलो भुजदंड लंबाई सुन श्रावगसूख महानभयो, यह अमृतकी सुविरंचि वनाई। अव जाइ इकंतरमोतिनसों,इम गूढतिने मनमाहि ठराई॥१२० घनपीनपयोधरसोभिन तूं,मृगशावकभीत सुनैन तिहारे । सुकपाल निजोममसंगरमे, तव श्रावगको डरुनाहि हमारे।।। सुकपालक आगमधनअहो, जिनभीतर मोक्षसुसूखअपारे॥. सुकपालक आज अचार्यतूं, हम दासमये तव पादजुहारे १२१ दोहा। भैरवके अनुसारने, शिक्षा दीजे मोहि ।। मैसम पंथ निहारया, पूरण पेखे तोहि ॥ १२२ ॥ कह्यो कपालक दोनको, वैठो मो ढिग आइ॥ तव क्षपणक भिक्षुक तथा, वैठे मोल झुकाइ॥ १२३॥ कपालक भांजन हाथलै, बैठो लाईध्यान ॥ श्रद्धा तवै कपालनी, ल्याई सुरा महान ॥ १२४॥ (१) महाभैरवशास्त्रानुसारी ॥ .

[अं०३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (९३) सवैया। भगवंत महंत बडे जगसंत, सुमैमदसों यह पूर्णकीयो । तबनैन उघार बिलोकि भलीबिध,आपकपालकसोमद पीयो कछु शेषरह्यो मदभांजन मैं, तिनभिक्षुक और दिगंबरदीयो। यह पावन अमृतपानकरो,सबबंधतजोसुखसोंसुतजीयो१२६ तथाच तंत्रे॥ पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा, यावत् पतति न भूतले ॥ उत्थाय च पुनः पीत्वा, पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १ ॥ सवैया। भवभेषज है पशु पाशकटे, मदपानसु भैरव आप बतायो। इत ते मनमाहिं विचार करें, सुदिगंबर योंमुखमाहिंअलायो। हमरे मतमै मदपाननहीं, सुअर्हतगुरुमुहि आप छुडायो॥ किहभांति कपालक जूठपिवों,मदिराइहभांतिसुभिक्षुकगायो। सुकपालक पेख कह्यो श्रद्धे, सुविचारकरें मनमें सकुचाए । अवलौंमतियाहि मलीन अहे, पशुंभावनही इनके सुमिटाए।। हमरे मुख.संग सुदोष अपावन, याहि सुरा मनमाहिं ठराए। अवतूंमुखंआसवपूरणकै, इन देहु सुराजु इनेभ्रम जाए १२७॥ सुसदा शुचि नारिनको मुखहै, इहभांत कहें कवि वेदवीयो॥ श्रद्धा सुकपालक जोरदोऊ कर, नाथ कहो सुबनै अबकीयो। मदभांजन लै मुखपानकरे, पुनशेप सुभिक्षुककै कर दीयो। मुहिआजप्रसादमहानभयो,इमभाषसुभिक्षुकसोमदपीयो१२८ . (१) मूर्खता। (२) अपने मुखमें मदिरा पवित्रकरकै। (३)(स्त्रीमुखं तु सदा शुचिः) ऐसे कहाहै परंतु तहां अपने स्त्रीकामुख शुचिहै यह कथन है परस्त्रीके मुखका निषेध है. पापका जनकहोनोते ॥

(९४) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३ सुअहे यह आसंव गंधवडी, मुखपानकरे मनमे विगसाई ॥ नहिं बारवधूसंग पानकरे, मुखगंध सरोजसमान सुहाई ।। सुकपालिनिके मुख गन्धमिली, अवपीवसुरासभर्मेसुधआई सुर सांच सुधा उर चाहतहैं,अब मोहि त्रिलोकिस देत दिखाई . क्षपणक उवाच ॥ . S - Ame - दोहा। रेभिक्षुक मतपीव सभ, भयो प्रसादसु तोहि ॥ याहि कपालिनि जूठमद, देहु कृपाकर मोहि ॥ १३०॥ तब भिक्षुक मद चखकर, दीनो क्षपणकहाथ ॥ पीवत प्रसन्न सुहोइ मन, बोल्यो झोक मुमाथ॥१३॥ सवैया। सुअहो मदस्वाद महांमधुरो, सुअहो मदगंध बडी सुखदाई। चिरबेमुखयासुखते सुरह्यो, सुअर्हतकरी मोहि भूरिठगाई.॥ सुन भिक्षुक मेहग घूमतहैं, सभ अंगनमै उपजीअलसाई॥ अबसैनकरों पुन भिक्षुकतौ,अबऐंव करोमुखबात अलाई १३२ सवैया। वहु दोन तहां तब सोइ रहै, सुकपालक योंमुखमाहि उचारे॥ पिख एहु कपालिनिदोनोपर, विनमोलभये अव दास हमारे।। अव नाचकरेंतब दोऊन, पिख ताहि दिगंबर नैन उघारे।। भिक्षुकरै गुरुसंगकपालिनि,नाचतपेख महामत्तवारे॥१३॥ (१) मदिरा ॥ 4 -- .

[अॅ०३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (९५) सवैया। इनके संग आउ सुनाचकरें, कहि भिक्षुक ऐंवकरें बिगसाए। मदघूमत नैन सुनाचकरें, थिर्वके पदयों मुखमाहि सुगाए। घनपीनपयोधर चन्दमुखी,मृगनैनकपालिनितोहिलजाए। कविसिंहगुलाव लहें गतियों, जिनके उरमैं महामोह भ्रमाए१३४ कवि रुवाच ॥ सवैया। जिनके मनमैं हरिध्यान नहीं, शुभपंथनते मिटजावहिगे। तजि संयमनेम असंकरहें, जगभीतर सिद्ध कहावहिंगे । तज पंथ सनातन माहि कलू, मन बांछत पंथचलावहिंगे॥ जग फैलेगो इहभाँति कलू शुभसंत अनादर पावहिगे ॥१३५॥ भिक्षुक उवाच ॥ दोहा। अद्भुत आगम एहहै, कहे कपालक जोइ ॥ बिनकलेश जिहमतविणे, अभिमत सिद्ध सुहोइ॥ १३६॥ कपालक उवाच ॥ दोहा। क्या अद्भुततातै पिखी, और पिखो अब सोइ॥ बांछित विषय सुभोगिये, बहुर सिद्ध सभहोइ ॥१३७॥ दोहा। अणमा महिमा आदिजे, अष्टसिद्धि प्रधान ॥ तेसम यांमतमैं.लहे, बिनाखेद पहिचान ॥ १३८॥ (१)भूमिमें पद स्खलितहोतेहैं नाम गिरतेहै । (२) ये आठसिद्धि महासिद्धि कहीनावैहै ॥

(९६) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३] वर्श आकर्पण मोहणी, और परमाथनिजान ॥ परक्षोभन उच्चाटन, प्राकृतसिद्ध पछान ॥ १३९॥ योगविघन यह तज्ञको, चहें नाहितिहधीर ॥ परअनषंगकआइहै, सो मतो गंभीर ॥१४० ॥ क्षपणक उवाच ॥ - चौपाई अलेकवालि यायों सुखगायो । क्षपणक वहुर विचार सुआयो॥ अथवा अले अचालेभाले । अपॉलपलाकम.अहे सुथाले ३४१ सवैया। पिख भिक्षुक ताहि हसे मुखमै,मुकपालकके प्रति एहुउचारे।। मदरा बहुपानकरी तपसी, मतिभूलगई सुभये मतिवारे ॥ मुखवाकसु.व्याकुल एहुभयो, मदकोउनमादसु देहु निवारे॥ सुन भिक्षुक वातकपालकतौ, मुखभीतरतेसुतंबूलनिकारे१४२ मुखसीत तंबूलकपालकजो, सुदिगंवरको निजहाथ दयो । मदको मद दूरभयो क्षणमें, धरशीस तंबूल चवाइ लयो ॥ कर जोर गयो गुरुकेढिगते, मन भीतरसो सवधान भयो। गुरु पूरणतें पदकंजलहे, इक पूँछत तोहि संदेशनयो।।१४३॥ (१) वशकहिये मंत्रोषधियोंकरकही अन्यको क्शकरना १ आकर्षण कहिये मंत्रोषधियोंकरही दूसरेको अपने पास बँचिलेना । २ मोहन कहिये मंत्रोषधियोंकरकै पुरुषको भ्रांतिकी उत्पत्ति करनी ३ परमाथिन कहिये मंत्रोषधियोंकरकै परकै मनको धीकोन्याई मथनकरना अथवा सकलज्ञानका नाशकरना ४ प्रक्षोभण कहिये मंत्रोषधियों करकै पुरुषके चित्तको विशेष क्षोभकरना ५ उच्चाटनकहिये मंत्रोषधियोंकरकै स्वस्थानसे पुरुषको भ्रष्टकरना ६ इत्यादिक माकृतसिद्धि कहीनापैहैं । सोअर्थरे प्राप्तहोवहैं । २) अरे कापालिक । (३) अरे आचार्य । (४) थाले नाम थारे मस्तकमें अथवा थारे तुमारा अपाल कहिये अपार पलाकम काहय पराक्रमह । - - कपालक उवाच ॥ क्षपणक उवाच ॥ [अं०३] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (९७) जिमते मदिरा मम चीतहरे, गहिवेगसु भैरवके मतलयाए । यह सिद्धि वडी निजनैनपिखी, तिम और कहों कछुहैनरपाए॥ युवती सुमनोहरपेख जवै, गुरुजो तव सेवक चीत लुभाए॥ बहुआनसको किनहीजगमें, इहसंक वडीगुरुदेहुमिटाए १४४ दोहा। पूछत कहा विशेष पुन, सकल बखानो तोहि ॥ विद्यावल सभको हरों, ढील नलागत मोहि ।। १४५॥ विद्याधरी सुरंगना, सर्प यक्षनी नारि ॥ तीनभवन मनभावती, ल्यावों भौनमझार ॥ १४६॥ चौपाई। मैं ज्योतिप पडियो वहुवारा । कीन गणत मम एहु निहारा ।। हम सभ महामोहके दासा । धर्मपंथ सभकरें विनासा१४७॥ चौपाई। आयुपमान यथातव जान्यो । साँच अहै नहिंझूठ वखान्यो। क्षपणक कह्यो भूपको काज । करें विचार भले कछु आज१४८ कपालक कह्यो कौनवहुकाज । क्षपणक कहें वतावहु आज ॥ शांतिसुता श्रद्धा है जोई। भूप कही गहिल्यावो सोई१४९॥ कपालक कहे सुकरोउचारि । दासी सुता कहावहुनारि ॥ विद्यावल मैं अवै दिखाऊताको वेगकेश गहिल्याऊ१५०॥ क्षपणक तब धरपटा सुआगे। लेकर नीपुन गणन सुलागे ॥ शांति तवै पुन कीन वखान । करुणासखी सुनो देकान१५१॥ (१)शातिहै सुता जिसकी ऐसी जो श्रद्धा वा शांतिकहिये सत्वगुणकी सुता कहिये कन्या ऐसी या श्रद्धाहै। (२) गालीमदानहै । (३) सिलेट । (४) पत्थरकीकल्म ॥ कपालक उवाच ॥

(९८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०३] यह हतआशसुकरें विचार । मम माताको नाम उचार ॥ होइ इकागर सुनो प्यारी । करुणा कह्योसुभली उचारी१५२ दोहा। ते दोनों ठाढी तहां, चीत इकागर धार।। कर गणती क्षपणक तबै, लागो करण उचार॥१५॥ चौपाई। नहिंजल नहिंथल नाहि पहारन।श्रद्धा नांहि सुमाहि पतारन । विष्णुभक्तिके संग मिलाइ। बसीमहात्मजनउरजाइ १५४ करुणा सानंद कीन उचार । भलाभया सजनी सुनीसार॥ श्रद्धा विष्णुभक्तिके पास । वसे महात्म उरसुखरास१५५ सुनिकर शांति हर्ष उर भयो । बहुर कपालकवचनअलयो। कामबिहीन धर्म पुन जोई। क्षपणक कहो कहा अवसोई॥ क्षपणक अंकमालविसतारी । गणतीकर पुन कीन उचारी॥ जल थल गिर पताल सोनाहीं। अहे महात्मके उरमाहीं१५७ कपालकसुनत विखादहि भयो । मोहमहीप कष्ट अतिभयो । देवी विष्णुभक्ति है जोई। सभसिद्धिनिकी मूल सुसोई॥ शांतिसुता श्रद्धाहै श्रद्धाहै जोई । ताहिसमीप बसी अब सोई॥ कामविमुक्त धर्म तह जब हीं। बसेअनर्थ होइहमतवहीं१५९ विवेकभूपके कार्य जते । यद्यपि सिद्ध होइगे तेते ॥ तदपि महामोहको 'काज । करें होइ जेतो कछुआज१६० 'जाके लौन बहुतदिन खाए । ताहित मरे जगत जसपाए। तातें प्राण जाहिं तो जैये। स्वामिकाज बललायसुकैये ॥ (१ निष्कामधर्म ॥ . , -- [अ०३] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (९९) महाभैरवी विद्या सार । अबी पठै येहोइ नबार ॥ श्रद्धाधर्म उभै हरिल्यावे । महात्मजनहु कुपंथ चलावै १६२ दोहा। महामोहअनुचर सभै, गए अखाडो त्याग । गुलाबसिंह अबशांति पुन, भाषतहै बडभाग ॥ १६३॥ मम माताके हरनहित, हताशन आश सुकीन ॥ विष्णुभक्तिको जाइ अब, कहिये सखी प्रवीन ॥१६॥ इमकहि करुणा शांति पुन, भई सुअंतरध्यान ।। कीरतिवरमा देव पिख, भयो शुभाशुभ ज्ञान ॥१६५ दोहा। विष्णुभक्ति आगे सुनो, श्रद्धा रक्षा कीन। विवेकसमीप पठाइगी, होइ सकल अरिखीन ॥१६६॥ इति श्रीमन्मानसिंहचरणशिक्षित गुलाबसिंह विरचिते प्रबोधचन्द्रोदयनाटके पाखडविडंबनो नाम तृतीयोऽकः समाप्तः ॥ ३ ॥ (१) महाभैरवीविद्या कहनेकर, कपटउपाय तिनोने रचा। (२) हताशन, कहिये नष्ट होवै आशा निनोंकी सो कहिये हताशन ॥ इति श्रीमदुदासीनवर्य परमानंद शिष्य गुरुप्रसादविरचिता प्रबोधचंद्रोदयनाटक तृतीयांऽकटिप्पणिका समाप्ता ॥ ३ ॥ . . - asant auk vih

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ॐ श्रीगणेशायनमः।
अथ चतुर्थोङ्कप्रारंभः॥४॥
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दोहा।
पेखत जांतज मोहको, लहे प्रवोध उदार ॥
सीतावर वरकल्पद्धम, वसे सुचित्तमझार॥१॥
कीरति वरमा देवकी, आई सभामझार ॥
मैत्री रूप निहारके, मिटे सुनिखल विकार ॥२॥
सवैया।
हंग नीलसरोरुह शोभतहैं, अलिकै कचनील कपोल सुहाई।
मुखचन्द अनन्द करे उरको, गतिमंद मनोजन चीत चुराई ।।
कटिसूक्ष्म पीन नितंब कुचा, हगलाजवडीनिरखै सुखदाई॥
कविसिंह गुलाव निहार सभा, नृपकीरति वरमाकी विगसाई३.
मैञ्युवाच ॥
चौपाई।
मुदिता मोप्रति कीन बखान । मैं सुनियो सजनी निज कान॥
महाभैरवी धरणिगिराई । श्रद्धा विष्णुभक्तिसु वचाई॥४॥
है उत्कंठा चीतमझारी । किहविध पेखो सखी पियारी॥
ऐसे मैत्री भाष्यो जवहीं । प्रवेशकीयोश्रद्धातिहतवहीं॥५||
श्रद्धोवाच ॥
दोहा।
मै उर मै अतिडर भयो, काँपत मोहि शरीर ।।
महाभैरवी मै पिखी, धारत ना उरधीर ॥६॥

14654 NA [अं॰] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। सवैया। 1406 घोर महा बिकराल बडी, नरमूंड कपालेनं कुंडल पाए, ॥ बिजुछटा तनकी द्युति है, दृगपेखनते जनु ज्वाल बाएँ ॥ कच पिंगसुदाडहि चन्दकला, तिनभीतर दीरघजीभ हलाए।। समरंभदला तन कंपतमें, जनु नैन पिखो इमचीत डराए ७॥ दोहा। मैत्री मनहि विचारकर, लागी करन बखान श्रद्धा व्याकुल अतिभई, होवत ना कछु भान ॥८॥ चौपाई। एहु पियारी सखी हमारी । संभ्रमरिदेसुभई दुःखारी ॥ कदलीदलतन कंपत सारा । कछु मनभीतर करत विचारा ९॥ याके सनमुख मै अवआई। लखै नमोहि नशुद्ध सुकाई ॥ याको मै अब वेग बुलाऊ । पूछो जाहि संदेह मिटाऊ ॥१०॥ LISH मैञ्युवाच ॥ दोहा। हेश्रद्धे प्यारी सखी, कहागयो मन तोहि ॥ मैं तेरे आगे खडी, नाहिनिहारत मोहि ॥ ११ ॥ श्रद्धा ताहि विलोकि पुन, लांबो लीन श्वास। सखीप्यारी मै डरी, आउ हमारे पास ॥१२॥ (१) अनलज्वालाको छोडतीहै । (२) केशकपिशरगवाहै ॥ 16 " , , [अं॰] (१०२) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। चौपाई। कालनिशासम वदन कराला। मैं ताभीतर ग्रसी विहाला- याहि जनमविषे पुनप्यारी । तोहिपिष्योममभाग उदारी१३।। मैत्री सखीस अंग मिलीजे। मेरे दुख दूर सभ- कीजे ॥ तव मैत्री पुन अंग मिलानी। श्रद्धालाइ गले विगसानी॥१४॥ मैत्र्युवाच ॥ चौपाई। महाघोर दरशन है जाहि । विष्णुभक्ति पुन डाटयो ताहि ॥ महाभैरवी विपति मलीन कहो सखी तिन करम सुकीन॥१५॥ श्रद्धोवाच ॥ सुनसजनी मै करों बखान । जैसे वाजपरे बलवान ॥ एकहाथमै कच गहिलीने । दूसर धर्मगह्यो दुःख दीने॥१६॥ लेकरदोनो गगन उडानी । मनो गीझ लेमांस पलानी ॥ मैत्री सुन उरमाहि डराई । हा धृग हा धृग मुखो अलाई १७॥ भई मूरछा तनमै भारी। श्रद्धा बहुरों कीन उचारी ॥ सखीप्यारी डरूं नहि करो। तुम नीके उर धीरज धरो॥१८॥ मैत्री तवै धीर उर धार । श्रद्धे सखी सुकरो उचार ॥ श्रद्धा बहुरों कीन बखान । सुनो सखी नीके देकान ॥१९॥ मैअतिआरत दीन पुकारी । विष्णुभक्ति उर दया सुधारी॥ टेढीदृष्टि निहायो जबहीं। गिरी भैरवी धरमै तबहीं॥२०॥ वज्रपातजिम शैल गिराई । जरजरअंग गिरी तिमआई ॥ विष्णुभक्ति उर वसे हमारे । गुलाबसिंह सेवक प्रतिपारे॥२१॥ (१) एकहाथसे मेरेको केशोंसे गहिलिया । (२) दूसरे हाथसे निष्कामधर्मको ।। , A 1 [अं०४] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (१०३) मैत्र्युवाच । दोहा। भलाभया जीवत सखी,आज निहारियो तोहि ॥ मनो मृगी शरदूलमुख, छुटी बहुर कहुमोहि ॥२२॥ श्रद्धोवाच ॥ चौपाई। देवी विष्णुभक्ति उर भारी । भई क्रोधमुख एहु उचारी ॥ महामोह दुष्टात्म जोई। हनो समूल रहे नहि सोई॥२३॥ मोहि अविज्ञा ताहि कराई । श्रद्धा केशनते · सुफराई ॥ ऐसेकहि मुहि कियो वखान। श्रद्धे वेगम करो पियान ॥२४॥ बहुर विवेकसमीप सुजाई । काम क्रोध मोह दुखदाई ॥ तिनजीतनहित सैनमिलाइ। हुइ वैरागसु तोहि सहाइ ॥२५॥ दोहा। प्राणायाम सुसंगमिल, मैं आवों ततकाल । कृपा करों तवसैनपर, करो सुजंग विसाल ॥२६॥ चौपाई। ऋतंभरादि प्रज्ञा हैजेती। शमदमादि सगली मिलतेती॥ प्रबोधपूतहित देव मनाए । कव विवेकउपनिषत मिलाए२७॥ दोहा। तातें तूं उपनिषत संग, मिल विवेकसुत मोर। ममआय सुप्रबोधसुत, होवेगो ग्रह तोर॥२८॥ (१) व्याघ्रमुखसे। (२) महाभैरवीसे मेरा तिरस्कार करायाहै । (३) (ऋतं सत्यं भरति बिभर्ति सा ऋतभरा प्रज्ञा ) अर्थयह-ऋतकहिये सत्य अर्थकू जो धारणक- रनेवाली वृत्तिहै ताका नाम ऋतभरा प्रज्ञाहै ।।

- - . (१०४) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०४] चौपाई। मैत्रीमैं विवेक ढिगजाऊ। विष्णुभक्ति संदेश सुनाऊ ॥ बासर तूं किहभांति बिताए। कौनकौनआचरन कमाए॥२९॥ मैन्युवाच ॥ दोहा। विष्णुभक्तिकीआज्ञया, चार वहिन हम नीत ॥ विवेक काजके सिद्धहित, वसे महात्म चीत ॥ ३०॥ चौपाई। महात्मजन जगभीतर जेते । याविध वर ते सगले तेते। सुखियनमैं जनमें उरधरें । दुःखियनमैं करुणा उरकरें३१॥ पुनवंतमै मुदिता धरें । दुष्टनमाहि धरें। दुष्टनमाहि उपेक्षा करें। योंकर रागद्वेष कलषाई। मिटे निजात्मकी सुमलाई ॥३२॥ दोहा। मैत्री करुणा मुदिता, और उपेक्षा जान ।। चार बहिन हम जीवकी, करें सकल मलहान ॥३३॥ चली प्यारी सखी तूं, महाराजके पास ॥ कहां निहारे भूपको,मोहि करो प्रकास ॥ ३४॥ (१) तथाच सूत्रं ( मैत्री करुणा मुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्याऽपुण्यविषयाणां भावनातः चित्तप्रसादनम्) अर्थयह-सुखी दुःखी पुण्यात्मा पापात्मा पुरुपोंविषयक यथाक्रमसे मित्रता दया मुदिता उपेक्षा इनधर्मोंकी भावनाके अनुष्ठानसे चित्तको प्रसन्नकहिये निर्मलकरे अर्थात् ने पुरुषसुखीहैं तिनमें मैत्रीकी भावना करे जे दुःखीहैं उनपर कृपाकी भावना करे जे पुण्यशीलमाणी है उनमें मुदिताकी भावनाकरे जे पापाचारहैं उनमें उपेक्षाकी भावनाकरें अर्थात् उनक सङ्गउदासीनभावसें वर्ते, इस प्रकार धर्मोकी भावनासें (चिन्तनसें.) चित्तके रागदेषादिक मल दूरहावै हैं इति ।। I 1 - . -- PR-MT [अ०४] प्रबोधंचद्रोदय नाटक। (१०५) . श्रद्धोवाच ॥ चौपाई। विष्णुभक्ति देवीहै जोई। कहीठौर सुनिये अब सोई ॥ राढा नाम देश इक गाए। महापुनीत जहां बनछाये ॥३५॥ दोहा। तिह उत्तरतट गंगके, चक्रतीरथ महान ॥ मनो विधाता गंगश्रुत, रचे तटंक सुजान ॥३६॥ चौपाई। तहां विवेक वसे वडभागी। मीमांसामै जिनकी मतिलागी ॥ किवेंकिवें धारे निजपाना । भये व्याकुलचीत महाना ॥३७॥ धमनी व्याप्ततां तनुभयो । उपनिषत संगहित तप निरमयो । परशुरामसम धार सुटेक । करे तपस्या तहां विवेक ॥ ३८ ॥ दोहा। कह मैत्री अब जाहि तूं, श्रद्धे वेर नहोइ । विष्णुभक्ति जो मम कह्यो, कर नियोगहै सोइ ॥३९॥' इमकहि दोनो चली तव, श्रद्धामैत्री जान ॥ अपने अपने पंथमै, बन्दनकर भगवान ॥४०॥ चौपाई। श्रद्धा जायबिवेक निहारा । धमनी व्याप्ततांतनुसारा ॥ तातजीत अरिमुखो अलायो। पिख विवेक पदमोलझुकायो४१ श्रद्धा कर गहि लयो उठाइ । पूछो कुशलनैन जलजाइ । विष्णुभक्ति मुख कीनवखान । सुनोपूत नीके दे कान॥४२॥ (१) करणफूल। (२) नाडी । , ..

(१०६) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०४] कामक्रोध पुन मोह अराती । करो पूत इनको तुम घाती॥ सुन विवेक मुख एहु उचारी। हनोअरातिसहायतुमारी॥४॥ याअवसर इक मंत्री आयो । नामसुवुद्धि रूप मन भायो । मंत्री आइ सुवन्दन कीनो । भूपविवेकसु आदर दीनो४४॥ समाचार सभ भूप सुनायो । सुन मंत्री मनमें हरषायो । देव करो तुम बेग उपाइ । जीते निखल अरातीजाइ४६॥ दोहा। सभामाहि उरहरप अति, अए विवेकसुराय ।। जा पदकंज प्रतापते, निखल शोक मिटिजाइ ॥४६॥ सवैया। सूर्यसों तनु शोभतहै, भुजदंड मनो ब्रह्मंड दवाए ॥ नैन सरोज मनोज हने, सुप्रताप दशोंदिशमै चमकाए । धरणीसम धैर्यहै उरमै, मुखमैघनश्रावणसों गरजाए । भूप निहारसमेतसभा, कविसिंह गुलाव बडे हरषाए॥४७॥ राजोवाच ॥ दोहा। हापापी महामोह शठ, हने महांजन तोहि ॥ मै तेंप्राण निकारहों, विष्णुभक्ति कहि मोहि॥४८॥ चौपाई। शांति अनंतमहिमा उजागर । चिदानंद अमृत सुखसागर ॥ मगनभयो तामै इकवारा । वहुनरचहे न सुखसंसारा॥४९॥ (१) विष्णुभक्तिका ॥ t ~ द E [अं०४] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१०७) मृगतृष्णा जलहै निहसार । याविधको सागर संसार ॥ मूरख ताहिकरे अचमान । केचित ताहि करे मुखपान५०॥ दोहा। करअवगाहनरमे तिह, अरध उरध पुनजाइ । गुलाबसिंह विनबोध जग, सदा परमदुःखपाइ॥५१॥ चौपाई। अथवा यह चक्रसंसार । महामोह तिह प्रेरनहार ॥ ताको मूल अवोध विचायो।तत्वबोधकर बने निवायो॥५२॥ दोहा । ईशअराधन बीजते, उपजे तत्व सुबोध ॥ ताबिन और उपाइ नहि, हम देख्योअति सोध ॥५३॥ चौपाई। पुनवंत जे करे उपाइ । करें देवता ताहि सहाइ ॥ ऐसे तत्व विवेकी कहें। जनके सर्वसंदेह सुदहें ॥ ५४॥ विष्णुभक्तिममआयसुकीनी। श्रद्धा आनि मोहि कहिदीनी ॥ कामादिक जीतन . उपाइ । करोसिताब सुवारनलाइ ॥५६॥ मैभी करो सहाय तथारी । यों हरिभक्ति सुकीन उचारी ॥ वस्तु विचार अहे जगजोई । काम जिने क्षणभीतर सोई॥५६॥ ताते ताको बेग बुलैये । तांजीतनहित ताहि पढ़ये ॥ वेत्रवती अब बेगम जाई । ल्यावो वस्तु विचार बुलाई॥५॥ (१)श्लोक-मायः सुकृतिनामर्थे देवा यान्ति सहायताम् ॥ अपन्यानं तुगच्छन्त सो- दरोपि विमुञ्चति ।। अर्थ यहः-पुण्यात्मा पुरुषोंके अर्थ देवताभी मायःकर सहायताको कर- तेहैं परंतु कुमार्गगमनकरतेहुए पुरुषको सोदरकहियेसाथ उत्पन्नधाताभी त्यागकरदेवे है। 4 .

- . (१०८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०४] प्रतिहारी तव वेगसिधाई । देव कह्यो सुकरों अवजाई ।। वस्तुविचार संग प्रतिहारी। आई वेगसु सभामझारी॥५८॥ वस्तुविचार उवाच ॥ छप्पयछन्द॥ विनसुंदरतनु सुंदर पापी मदन दिखाए । करे वंचना जगतलोकको नरकि लिजाए ॥ अथवा सभदुःखमूल दुष्टमैल्योविचारी॥ महामोह जह अहे जगतमै वडो विकारी ।। पुन जिहविध मोहनिलाज सठ जनउरको भ्रमनाकरे ॥ संगमदनमिल दुष्ट यह अव सोप्रकार जनमनधरे॥१९॥ सवैया। यह कामनि कुंचतहै अलिका,गकंजपिखेजन चीत चुराए । घन पीन उतंग पयोधर,मुखचन्द मनोसुविरंचि बनाए । इहभांति सराहकरे जन मूरख, जांउर तीर अनंग लगाए । मलमूत्र सुहाडतुचा पुतली, युवती खलमोह सुयों दरसाए६०॥ वस्तु विचार करे नर जो, तिहको युवती इमदेत दिखाई। मलमांसकी चिकडसंग बिरंच,सुहाडनकी पुतलीसुवनाई ।। मुख थूक सुनाकमै सीढभरी, निसवासरनयननगीड वहाई।। दुरगंध मलीन सुनारि मनो, खिरकी यमधाम बिरंच लगाई६१ सवैया। रमणी रमणी नह रंचकहै, गुण औरनकै रमणी दरसाए मुक्ताहलहारसुहेमतटकह, कुंकमचन्दनलेप लगाए ॥ (१) रमणी कहिये स्त्री रमणी नह कहिये सुंदर नहीं है किंतु और गुणोंके आरोपसे सुंदर देखनेमैं आतीहै सो गुणकौन हैं। (२) करणफूल ॥ , [अं०४] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१०९) - बहु फूलनकी गलमाल धरे, पुन पाट दुकूल शरीर सुहाए । गति मंद हरे मननारि नही,नरकाऽग्निचंडशिषा चमकाए६२॥ जिह भूषन नारिनके झनकार, सुने मनहेरनको अकुलाए। विनभाग तिसे सुबिपत्ति परे,कनके हितसो पुन काननजाए। मलिनांवर सूपधरे सिरपै, पिठरी पुनश्यामकरे लटकाए । निश आवत हेर वजारविषे,कविसिंह गुलावनकोउ लुभाए ६३ दोहा । पापी काम चंडाल तूं, जो उर करें मलान॥ तौ व्याकुल जन होतहै, ऐसे करे बखान ॥६॥ सवैया। यह कामनि मोहि चितारतहै,पुन चन्दमुखीसुअनंद निहारे। हगनीलसरोजसुपीन कुचा,सुअलिंगनके हित उदम धारे॥ सठे कौनचहे तव कौनपिखे, युवतीमलहाड सुमांस बिकारे ॥ सुपुमान अमूरति चेतनजो, तव हेरत मूढ नही तवसारे॥६६॥ प्रतिहाग्युवाच ॥ सवैया। इत आवड हेवडभागसुनो, तब दोन चले पगवेग उठाए । इह राजनकोअधिराजविवेक,समीप चलोतुम बेर मिटाए। तब जाइ समीप विचार कह्यो, जय देवनदेव बडे सुखदाए॥ करुणाकरके इतओर पिखो, यह वस्तुविचारलगे तव पाए६६ (१) शिलाउंच्छ । (२)स्त्री हाडमांसका विकार होनेकर जड है, तिसमें इच्छादिकसंभवनही तथापि स्त्रीमें जो पुमान् पुरुष अमूर्तचेतनहै सो तेरेको देखता है रे मूठ तेरेमें सार कछु नहीं यह भावहै । +

(११०) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०.४]
सवैया।
सुविवेक को यहठौर निवास,करोश्रम आपन दूर निवारो।।
वस्तुविचार सुबैठगयो, पुन जोर दोङकर कीन उचारो।
यह किंकरदेव समीपअयो, करुणाकरके कछु आय सुधारो॥
सुविवेक कह्यो महामोहके संग, सुहोवतहै जगजंग हमारो६७॥
सवैया।
मोहवली सुपताकनमै, प्रथमै सिरदार सुकाम बनायो ।
ताप्रतिवीर सुसैननमै, हमरे मनमै इक तूं जग आयो ।
मम धनविचारकह्यो सुखते,भट कोटिनमै प्रभु मोहि बुलायो।
मार करों सभखंड मनोजह, जंबुकपुंज सुखाइ अघायो ६८॥
राजोवाच ॥
दोहा।
वस्तुविचार उदार, अति शस्त्रविद्या कौन ॥
जाकर हने मनोज रण, मोहि वतावो तौन ॥ ६९ ।।
विस्तुविचार उवाच ॥
दोहा।
अहो पंचसर हाथमै, फूलनको धनु आहि ॥
तांजीतनहित शस्त्रकी, ग्रहण अपेक्षा नाहि ।।७०॥
सवैया।
गढ देह मनोजके द्वारजिते, दृढ रोक करों तिह व्याकुल भारी॥
निजराखनहेत चिते अवला पुन, दूरहितेजु पिखे बहुनारी।।
तब मै परिणामसुदूषकहों, मलमूतभरीसु दिखावहु सारी॥
इहभांति मनोजकरोंबलखीण,सुलेवहुतां क्षणभीतरमारी.७१॥
(१) शरीररूपकिलके भीतर कामके आनेजानेकेलिये इंद्रियरूपी द्वार
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[अ०४] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१११) दोहा। १ . साधुसाधु भूपति कह्यो, वोल्यो बहुर विचार ।। जिहविध जीतों कामअरि, राजन सुनो प्रकार ॥७२॥ सवैया। पावनहै सरिता जगमै, घन कानन तीरविष अतिछाए ॥ कोमल सैल सिलातल है, गिरिवास इकंत महासुख दाए । जोसेमवाक व्यासकथा, सत्संगतिभाग बड़े जनपाए । तौकहि नारि मलीनहरे मन, और मनोज कहा उपजाए।।७३॥ कामको आयुध एक प्रधान इहै अवला जगभीतर गायो। ताहि जिते पुन कामसहायक, उदम होवहिगो विफलायो॥ भंग करों जब कामसहायक, तो यह प्राणतजे दुखदायो॥ कामसहायक जेजगमै, तिहनाम कहों सुसुनो मनलायो।।७४॥ चन्द सुचन्दन धौलचिपा, मधुपावली गुंजतफूल सुहाई ॥ वागवसंत मयूर पिको पुन, श्यामघटा घन घोर लगाई ॥ मंद सुगंध कदंब प्रभंजन, और शृङ्गारजु कामसहाई ॥ नारि जिती तबजीतलए, सभ नाहिपिखों इनमैबलराई॥७९॥ दोहा। अति विलंब नकीजिये, सुनो जगतके राय ॥ आयसुमोको दीजिये, हनो काम रण जाय॥७६॥ सवैया। •सार असार विचार सिलीमुख, मैसुदशो दिशमाहि पसारे॥ सैन मौं आरिमंडलकी, सुवने प्रभुके अब कारज सारे ॥ (१) व्यासप्रणीत, शांतिके प्रतिपादिक वाक्यहै तथा सत्सङ्गति । (२) रात्रि । । .

. . (११२) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं."४] कुरुसैन विमंथ्यसखा हरिके, जिम सिन्धुपती रणभीतरमारे। कामकलंक हनोतिमही, प्रभुआयसुदेहुनलाइ सुवारे।।७७॥ सवैया। परनारिरमे अपवाद धनो, सिर दंडसहे यमलोक गहेगो । निजनारिमिले अनुकूल कहां, कछुदोपसुने उरमाहि दहेगो॥ विनपूत महादुख चीतदहे, खलपूतभये भवधार वहेगो । निपजे दुहिता घरमाहि धनी,धननाहिमिले दुख लाज गहेगी। याविध नारिनको सुखजो, क्षणएक भजे दुःख देवत भारी।। नारिन संगमते जन मूरख, घोरसंसार बहे बहु बारी ॥ धृगहै तिनको कछु पाइ विवेकजु,प्रीतिकरें पुननारमझारी॥ कविसिंह गुलावनहीनरते जग,साचकहों बहु नारि विगारी७९ सुनभूप विवेक प्रसन्नभयो, मुख भीतर यों तिन कीन उचारी॥ पटका कटिभीतर बैंचकसो, सभ आयुधवीर सुलेहु सभारी॥ अब शत्रु सुजीतनहेतु चढो, सुकरे शिव आप सहाय तथारी।। वस्तुविचार कह्योजिम आयसुदुंदभवाइचढे वलधारी॥८॥ तब भूपति फेर विचारकह्यो, सुन वेत्रवती सुभले मनलाए । अब क्रोधके जीतनहेतु सुपावन, एक क्षमा तुमलेहु वुलाए। प्रतिहारनि फेरकह्यो विनवेर, करों प्रभुजो मुखमाहिं अलाए। वहुजाइ सिताब अई क्षणमै, सुक्षमा पुनआपनसाथ लवाए।।८॥ सवैया। अतिसुंदर चीतगंभीर बडी, दृगलाजभरे धर ओर निहारे । इहभांति लसे मुखमंडलतांनभकातक चन्दकला सभ धारे॥ (१) अर्जुन । (२) जयद्रथ । (३) कन्या । (४) दुपटा ।

[अं०४] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (११३) - अतिपावन दीरघ हेर कविजन, सिंच सुधा उरताप निवारे ॥ इहभांतिक्षमासभलोकपिखी, अवआपक्षमा मुखमाहि उचारे ८२ क्षमोवाच ॥ कवित्त । क्रोध अंधकारके विकार उर भये अति, भृकुटी चढाइ खल फीके सुख वोलई ।। नैनकरे लाल सुविसाल होठ डसे अति, जरे अंगअंग सुभुजंग विषघोलई ॥ धीर जे गंभीरनीर सागरसमान अति, भजे न विकार नहिरंच उर डोलई ।। क्षमावंत संत भगवंतके महंत जन, वोले मधुबैन जन अमी झकझोलई ॥८३ ॥ खेद न जवानको न शीसको महानदुःख, चत्तको न ताप नहि देह दुःख पाइहै ।। हिंसादिदोष बिन क्रोधको निफोट हनो, क्षमा मेरो नाम जग मेरो जस गाइहै ।। ऐसैतु अलाइ पुन दोनही समीपजाइ, कहे प्रतिहारी क्षमा और समुझाइहै ॥ यही देवदेव सुविवेक भूप भारी अति, चालिये समीप सखी पेखि हरषाइहै ॥ ८४ ॥ दोहा। क्षमा समीप सुजाइ पुन, जयजय देव उचार ॥ यह दासी आई क्षमा, वन्दों पाद तिहार ॥ ८५॥ (१) अत्यन्त ॥ A .

१ + (११४) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०४] सवैया । सुक्षमा इहठौर निवासकरो पुन, बैठ क्षमा यह वात प्रकासी॥ प्रभु आयुसु देहु विलंवकहा, जिहहेतु बुलाइलई यह दासी। सुक्षमे यह संगरमाहि दुरात्म, क्रोध वडो सुभपंथ विनासी। भट औरनको मुखजोरतहै, सुक्षमे अबताहि करोतुम नासी ८६॥ क्षमोवाच ॥ दोहा। देव अनुग्रह पाइतव, महामोह रणनास ॥ मै सुकरो क्षण एकमै, कहा क्रोध तिह दास ॥ ८७॥ सवैया। इह वेदन पाठ सुयज्ञतपो पुन, और जिते नर पुंन सवारे ॥ विनकारण वैरकरे दुष्टात्म, क्रोध सभो शुभपंथ निवारे ।। सम लोह सुदेहतपावतहै पुन, लैननते जन आगि निकारे।। तिह क्रोधको मै इहभांति हनो,दुरगामहिषासुरज्यों रणमारे८८ दोहा। बहुर बिवेक बखानियो, क्षमे सुने हम कान ॥ जांउपाय क्रोधहि जने, बहु मम प्रगट वखान ॥ ८९॥ सवैया। सुक्षमा कहि देव सुनो मनमै, नर क्रोधकरेतब मौन गहीजे॥ वहि गारिवके मुखभीतरजो, पुन तांप्रति कोमलवाकभनीजे॥ जुधिकारकरे परे तिहपांइ आपद, पेख महा करुणाउरकीजे।। तनताडनमै हरपै उरमै, कृतपूर्वपाप सुमेअव खोजे-॥ ९ ॥ , [अं॰] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। । (११५) इहभांति विचारकरे निसवासर, ताहि सुक्रोध नहीं उपजाए। तव भूपशवासकही मुखते, सुक्षमे तव भाख्योसाच उपाए॥ सुनदेव जितेजव क्रोध वली, तव हिंसनपारुषमान बसाए। समजीतलए नहिं फेरलरें, इनकीभुज नावल देतदिखाए।।९१॥ दोहा। कह्यो बिवेक प्यानकर, रणमै शत्रु संहार ॥ सात्विक संपति देवियां, करें सहाय तथार ॥९२॥ क्षमा सुआयसु सीसधर, गई सुशंखवजाइ । राजा प्रतिहारी कह्यो, लेहु संतोष बुलाइ ॥ ९३ ॥ महामोहभट लोभजो, ताको मारे सोइ ।। तांविन प्रतिहारी सुनो, और उपाव न कोइ॥ ९४ ॥ जो आयसु सोईकरों, प्रतिहारी इम जाइ ।। ले संतोषको संग पुन, कीन प्रवेश सुआइ ॥ ९५ ॥ चित्त चितार सन्तोष पुन, दयारसीले नैन ॥ गुलाबसिंह बहुबोलियो, सुनो ताहिके बैन ॥ ९६॥ सन्तोष उवाच ॥ सवैया । फल काननमांहि अनेक मिलें,बिनखेद सदा तरुहैं सुखदाई। पुन नीर जहांतहं पूर रह्यो, अतिशीतल पुंन नदी मधुराई। मृदुसुंदर पल्लवसेज वने, बिजनावन आप समीर झुलाई ॥ जनहा धनवंतनद्वारनमै, कृपण पुन खेद सहैं बहु जाई ॥१७॥ (१) हिंसा, कठोरवचन वा कटुवचन मान वा प्रभुता अधीन होवैहै । ।

(११६) प्रबोदचंद्रोदय नाटक। [अं०४]
जन मूरख ना मम चीतधरें, अतिमोहभये सठ देह तपाए ।
वहुवार अरंभ भये भगना, जग फेर करे पशु नाहि लजाए।
जिमकालरनीरभ्रमे हरणा, इतते उत सूरख त्यों जगधाए ।
विन मोहिप्रसादन आशमिटे, हतवज्रसमान धनोविललाए९८
कवित्त ।
लोभ अंधकार हग याविध विकारभजे,
पांउ धन और कछु एतो अव पायोहै ।।
एतो थाप रापों एतो व्याजमै चलाऊं आगे,
मे पिता पितामेपुन याविध वढायोहै ।।
ऐसै धनध्यानकरे कालकी नसारपरे,
आश सुपिसाची पुन याविध रसायोहे ॥
बिनही सन्तोष जग लहे घनो दोष पुन,
गहे काल मूंड जाने लोक सुख पायोहै ।। ९९ ॥
सवैया।
धन एक उपाइकरै नलहें, पुन एक बडे सुउपाइ मिलाए ।
जुमिलाइ धरे धनभौन विपे, विनभाग सुभोगविना विनसाए।
तुल्य वियोग उभै धनकोघर, आइगयो वहु चित्त तपाए।
याजगमाहि सन्तोष विना,कवि सिंहगुलावनको तृप्ताए१००॥
केश सुधौले भये शिरके, सुजरा जगसापिन डंक लगाए।
तदपिमूट चहे धनको, सुख हेतु कवीनहि रामको ध्याए ।
(१)संयोग वियोग।

[अं०४] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (११७) बोधसुनीर अबोधजनी रज, लोभ भले जगमाहि मिटाए। सन्तोष रसामृत सिंधुविषे पुन, देवकीसुख पूरणपाए १०१॥ प्रतिहाप्युवाच ॥ दोहा। एहु स्वामी भूपहै, चलो सुयाके पास ॥ जाय सन्तोप समीप पुन, जयजयकीन प्रकास १०२॥ इहु सन्तोष प्रणाम प्रभु, करे सुचरण तिहार ॥ भूपति कह्यो समीप इह, बैठो आउ हमार ॥ १०३॥ कवि रुवाच ॥ बरनो रूपसन्तोषको, बैठो सभामझार ।। सीतावर वर मैं चहों, वसो सुचित्तमझार ।। १०४॥ सवैया। चित गंभीर मनोनिधि नीर, शरीर महाद्युति सोहतहै ॥ हग सिंच सुधारस शांतिकरे, इहभांति चहूंदिश जोहतहै ॥ निज दौरदलै अरिमंडलको, भवमंडलमैं यश सोहतहै ।। कविसिंहगुलाब पिखे इहभांति, मनो सभके मन मोहतहै१०५ दोहा। बहुर सन्तोष वखान्यो, आज्ञा देहु सुमोहि ।। सूपति को प्रसंग सभ, नाहि सुछानोतोहि ॥१०६॥ बेगबनारस जाहुअब, लोभहनो बलधार ॥ कह्यो सन्तोष सुकरोअव, जो प्रभुकरोउचार।। १०७॥ (१) ज्ञानरूपी जलकरके अज्ञान बहुललोभकर उत्पन्न रजोगुणको धोयकर ॥ .

. 1 1 - (११८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०४] सवैया। मानव देव सुदैतसमै, जिह जीतलए जगभीतर सारे ॥ तापसमंडल विप्र हने, बहुभांतिनके पद संगल डारे ॥ तां खललोभको मैं इहभांति, हनो पुन संगर भूमिमझारे । दाशरथीरघुवीरबलीजिह, भांतिसुरावणराक्षसमारे ॥ १०८॥ चौपाई। ऐसबखान सन्तोप सुगयो। और एक नर आवत भयो । देव विजयहित मंगलजेते । सभैमिलाइ लियाए तेते ॥१०९॥ दोहा। तरुण ज्योतिषि आइ कर, कहे महूरत सार।। प्रस्थान भले अब कीजिये, विजयमहूरत धार॥११०॥ भूपति पुरुष बखान्यो, सैनापती बुलाइ । कहु प्रस्थान अब कीजिये, शिवसुतपाद मनाइ१११॥ कहो सारथी जाइ अब, संग्रामक रथ आन ॥ कृतमंगल रथ बैठकर, बेग सुकरें पयान ॥ ११२॥ सवैया। भूपकि आयमु जाइकही, सरदारनसों नहबेर लगाई ॥ सूत स्यंदन वेगअने रथ, भूपचढे सुगणेश मनाई ॥ ताहिसमै सरदार सभैचढ, वाहनसैन अशेष चलाई ॥ धुनिकुंदभकीजरजल्लभयो, सुप्रलेघनजानगरजेनभआई११३ मत्तगयंदन कोर सजी, भ्रमरावलीगंडनमाहि सुहाई ॥ जान सपक्ष चले गिरिपुंज सुबेग बडो अवनी गजछाई ॥ (१) कन्यादर्शनध्यादि । (२) संग्राममे योग्य ॥ , [अं॰] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । ( ११९) कांचनके झुलवार लसें, गजश्याम भली उपमा मनआई ॥ दामनिपुंज सुसंगमनो, निस भादवकी घटहैं उमडाई ११४॥ श्वेतवरूथ सुऊच बडे, धनसारदसें रथपुंज सुहाए । वेग प्रभंजन जीत तजे, इहभांति तुरंगम स्यन्दन लाए ॥ ते रणरंगमही अति धावत, ता उपमा कवि कौन बताए । धावनमै मन एक बली, कविसिंहगुलाब सुहेर लजाए११५॥ सवैना। पैदलके बहु पुंज चले, रणमै सभके उमगे मनहै ॥ फैटनमै यमदाड कसी, सणखोलसंजोह सजे तनहै ॥ कुंत सुदीरघहै करमै सुगुलाब कछू उपमा भनहै ॥ जान दिगंतर भूरखिरे, यह नीलसरो जनके बनहैं। ११६॥ कोटन कोट सुबीर बली पुन, माहि तुरंग अरूढ भयेहै ॥ मानहु भूमिनपाइ छुहे, नभमें हरिबाहन कोटिधएहै ॥ थर थल्लभयो दिगमंडलमैं, कर बीजुछटा करवार लएहै ॥ यों चतुरंगन सैन चली, सभके तनमै अति रूप नएहै ११७ मध्यविराजत भूपतिको रथ, मानहु मेरुइसो चमकाए । वाजि खुरागर चंबत भूमि, सुले रथमाहि अकाश उडाए॥ योधुनि होवतहै रथकी जनु, खीरनिधी हरि फेर मथाए धूरिकीपुंज अकाशचढे, पथऊर्ध्वकै रवि मंडल छाए॥११८॥ (१) झूल । (२) उच्छाड। (३) शरदऋतुके बादलसें । (४) प्यादोंके । (५) कटिवस्त्रमे कटारी कसीहै। (६) टोपसहित कवच । (७) नेना। (८) दि शायोंके अतर ॥

( १२०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०४] सूत उवाच ॥ 2 कवित्त । राजनके राई सुनजीकआई एहु पिखो, शिवकी वनारस सुदेत यों दिखाई है। नीरयंत्रधार सुफुहारे जहँ अपार छुटे, पावनी बनारसकी भूमि सुसुहाई है ।। सौधनके शीश जन रचे जगदीश तह, कांचन वनाइ लिपलेप चमकाई है। जाहिकी अपार छवि हेर छवि छीनभई, कहि सुगुलावचन्द किरणन लजाईहै ॥ ११९ ॥ सवैया । धौल पिखो ग्रह ऊच वने, जनुसारदमेघनपुंज सुहाए । वीच पताक सुऊच लसे, मुम्मनो तडतागनकै चमकाए । है सुकलाकृत वारजपुंज, सुगुंजततां मधुपावलि आए । गंधकरें उदगार मुखो, मकरंदभयोझडसूर छपाए ।। १२०॥ फूल खिरे मुचुफेर पिखो, यह पावन भूमिसमीप सुहाई ॥ एहु पिखो धुन छाइ मही, तरुपुंज किधो घटहैं उमडाई ।। मारुत जाइ मुठौरविपे, जन पूजत शंभुप्रेम वढाई ॥ गाँवत फूल चढाक्तहै सुनिवावत वन्दतशीश निवाई।।१२१॥ (१) मन्दिरोंके शिखर । (२) सुफेद । (३)मुक्तामाणके किये ! (४) वायुके म्बन्धकर जो वृक्षाका शब्द है तिसगन्दकर वायु मानो गावत कहिये शिक्का जाप करे है और अपन आपसे जो वृक्षोंस फूल गिरतेहै सोई मानो शिवनीको वायु फूल चटावताहै औ निवावत कहिये वृक्षाको अपने बलसें वायु भूमिम सर्ग करावेहै निस वहानेकर मानो शिवजीको वायु बन्दना करहै ।

[अं०४] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (१२१) " आरंद्रगंगको नीर करे पुन फूलपराग सुगंध चढाए । गुंजत वीच सुभ्रंग फिरें, मिसताहि मनो शिवगीत सुनाए । तरुलंवलता अति नाचतहैं, सुमनोभुजदंडनभाव दिखाए । सारस हंस चकोर धुनी मिस, वायुमनो शिवपाठ सुनाए १२२॥ दोहा । पिख अनंद भूपति भयो, लागो करन उचार ।। यह शिवनगरी पावनी, मुक्तिकरे संसार ॥ १२३ ॥ सवैया । तम हरिद दूरकरे क्षणमै, पुन आनंद आत्ममै उपजाए । विधुमोलपुरीमन अँचतहै, सुमनो पदं मोक्षहि ज्ञान लजाए। जिह ठौरविषे यह गंगभले, अति वनभई इहभांति सुहाए।। जन हासकरे यह चन्दकला सुकिधोंधर मोतिनहार सुपाए १२४ सोरठा। रथते उतर सुसूत, दई प्रकरमाभूपकी। पिख विवेक पुरुहूत, दीरघ आयुविसालमति ॥१२॥ सवैया। गंगक तीर सुधीर महामति, मंदरऊच सुमेर सुहाए । आदिनारायण केशवको, यह पावन थान महात्म गाए । भूप निहार अनंदभयो, मुखभीतरते यह वाक अलाए । क्षेत्रकुआत्म एहसुनो, सुपुराविद पंडित मोहि बताए॥१२६॥ (१) गगाकेनीरसेस्नानकरके । (२) तालस्वरतानादि। (३) स्तोत्रपाठ अन्य सुगम है । (४) हृदयगततम । (५) काशी मानो मोक्षका पद कहिये कारण है (६) क्षेत्रमेहिमाके जाननेवाले व्यासादिकोने पूर्व हमको क्षेत्राभिमानिदेवता केशव भगवान् कहाहै ॥

(१२२) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं॰] दोहा। याहिठौर तज देहको, मिले परात्मजाइ॥ पुंनवंत जन लोकमैं, लहैं मरण इह आइ ॥ १२७॥ सूत उवाच॥ 44 am-A--- दोहा। कामक्रोध पुन लोभलौ, भूपति हमे निहार ॥ देखो दूर पलातहैं, ज्योंकातर असिधार ॥ १२८॥ भूपति कह्यो प्रसाद हरि, सर्वसिद्धि जगहोइ ।। कर प्रवेश भगवानके, मैं वन्दो पद दोइ ॥ १२९ ॥ स्थते उतर प्रवेशकर, भूपति भले निहार ।। भगवनभक्त कलेशहर, जयजय सदा तिहार ॥ १३०॥ विवेक उवाच ॥ भुजंगप्रयात छन्द। सुरंचक्रचूडामणीदीपजागे॥ करे आरती पादकंजं सभागे। नखं जोतिशोभा लसे हेमपीठे॥ मनो कोटिखद्योत चांदे सुदीठे ॥ १३१॥ भैवं द्वैतसंभ्रांतिसंतानिताए। तुमे द्वैत सेटो करो वोधछाए। क्षमामंडलो धार संभार पीने। लगी दाड कोटी गिरी चूरकीने ॥ १३२॥ (१) काशीक्षेत्रमें। (२) सुरभण्डल । (३) कोटखद्योतहीस्ववर्णविदुकी न्याईदेखीतेहै । (४) संसारभेद भ्रांतिकी परंपराकर जो संतप्त है भक्तजन ।।

[अं॰] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१२३) 1 वलीयागमाही करे रूप भारी ॥ पदोंसाथ मापी त्रिलोकी सुसारी॥ भुजादंडआगे गिरं छत्रलीने ॥ बलारातिको मान कीनो सुखीने ॥ १३३॥ सतगोकुलंत्राणकारी दयाले ॥ टरीअंववरपा करे गोपपाले॥ सुरारातिभामासुसुंधूरशीशं ॥ सुसंध्याभ्रकांतं हसे देवईशं ॥ १३४॥ तिने दूरकारी मनो मारतंडं । कहे कोविदा ईशतेदौरदंडं ॥ सुदैत्येंद्रवख्यातटी पाटनारी॥ नखंश्रेणकानाथतेरी उचारी ॥ १३५॥ त्रिलोकीरिपूकैटभो कंठकाठं । कटे चक्रधारा करे भूमिमाँठं ।। फुरे ज्योतिरुल्का भुजादामतेजं ॥ करेखीरशैनं सजे शेषसेजं ॥ १३६॥ सदा शंभुप्यारे महातेजधारी॥ भुजादंडसंभ्रांतिशैलं मुरारी ।। मथे खीरसिंधं भ्रमे बाहुपीने ॥ भयेलांछनं ताहिवीचंनवीने ॥ १३७।। (१) इंद्र। (२) हिरण्यकशिपु । (३) कैटभदैत्यका स्थूल कंठ । (४) भूमिको एक रस किया। (५) प्रज्वलतज्योति । (६) भुनारूप दण्डेकर भरमताजो है मन्दराचल । (७) चिह्न ॥ , न - (१२४) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०४] सुमोतीफलोदारहारं सुहाए॥ प्रभा कंठमध्ये सकेको बताए । महामोहछेदी दिजेवोधनार्थ ।। नमो देवपादं दोऊजोर हाथं ॥ १३८ ॥ दोहा। आदिनारायण दीनवर, भये प्रसन्न उदार। बोध वली सुत होइगो, भूपति भौन तिहार ॥ १३९॥ मंदरनिकस विवेक पुन, पिख इम कीन प्रकास ॥ यह नीको स्थान है, ईहा करेंनिवास ॥१४॥ कवि रुवाच ॥ दोहा। सभासमेत सुएहु जव, पखी भूपतिरीत ॥ कीरतिवरमा देव तब, भयो इकागर चीत ।। १४१ ॥ उपजेगो वैराग मन, आइ सस्वती दयाल ।। वोधकरे मनको भले, बैहै कथा विशाल ।। १४२॥ इति श्रीमन्मानसिंह चरण शिक्षित गुलाबसिंह विरचिते प्रबोधचन्द्रोदय नाटके चतुर्थोङ्कः समाप्तः ॥ P इति श्रीमदुदासीनवर्य परमानद शिष्य गुरुमसादविरचिता प्रबोधचंद्रोदय नाटक चतुर्थोऽकटिप्पणिका समाप्ता ॥ ४ ॥ - ॐ श्रीगणेशाय नमः। अथ पञ्चमोऽङ्कप्रारंभः ॥५॥ दोहा । पदप्रसाद रघुनाथके, लहे वोध मतिमान ॥ हने मोहवलवानको, तिह बन्दो भगवान ॥१॥ कीरतिवरमाभूपके, देखत सभामझार ॥ श्रद्धा कीन प्रवेश तव, लागी करन उचार ॥२॥ श्रद्धोवाच ॥ सवैया। प्रसिद्ध सुपंथ अहे जगमै, यह जातिकुवैर वडो दुःखदाई ॥ क्रोध दवानलते जुवढी, क्षणमै सगली कुलजाहि पपाई ॥ ज्यों वनवांससंघ रसनते, पुनपावककाननखेहरलाई ॥ तिमहींग्रह वाधवक्रोधजले, दुखमूरभयो हगतेजलजाई॥३॥ दुःखदेखनअंकलिखेबिधिमाल,सुआजपिखेनहिजातमिटाए मम सोदरवन्धु हते रणमै, तन भूमिरुले किहठौर सिधाए॥ दुरवारण दारुण शोक महां, अतिपावकमें उर भूर जलाए। सुविवेककी मेह अनेक परे, क्षणपावकशोकनलाटवुझाए॥ सागर शैल मही सरिता, सभअंतकअंतसमे सुखपाए । तौ त्रिणजीरणसें तनुमैं, जन कोविदको भवमै पत्याए । (१) वेदबोधितफलका अवश्य भावित्व निश्चयका नाम श्रद्धाहै, ।। . L (१२६) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०५] यद्यपि यों सुविचारकरों, पुन तदपि शोक विवेक दवाए। दीरघ शोककी ज्वाल वढे, विधहा उर अंतरमोहिजलाए। यद्यपि करस्वभावहुते, मम भ्रात चले कुपंथनमाही ।। काम सुक्रोध तथा मदमान मुए सगले रणमंडल माही। तदपि दुःख कटे उरको, अरु देह सुकावत मैं जगमाही। शोक दवानलज्वाल लगी मम अंतरआत्मकाननमाही॥६॥ चौपाई करकै मनकेमाहि विचार । श्रद्धा बहुरों कीन उचार ।। विष्णुभक्ति उर परमदयाल । एसो मोप्रति कह्यो विसाल॥७॥ विष्णुभक्ति रुवाच ॥ शंकरछन्द। इहठौर संगर होइगो भट करेंगे कुलनास । मैहरसाकों पापनहि मनमोहि भयो उदास ॥ अव छोडिके वनारसी मैं सालग्रामसु जांउ।। भगवानके स्थान वसकर काल ताहि वितांउ.॥८॥ दोहा। श्रद्धे युध वृरतांत सभ, करीनिवेदन आइ ॥ सो मै सगलो ताहिढिग, करों निवेदन जाइ॥९॥ भुजंगप्रयातछन्द। तहांवेगश्रद्धासुनीकेसिधाई। पिखेतीरथं गंडकापावनाई॥ जहां आप देवो सदा वास धारे । सुसंसासिंधु जनं पारतारे॥१०॥ ARRAIMARusuARORAK: ITS . AMALA [अं०५] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१२७) करी वन्दना ठौरनीके निहारी॥ इही विष्णुभक्ति जनं मोक्षकारी ॥ मिली शांतिसंगं कछू सोविचारे॥ चलों यासमीपं कहों सर्वसारे ॥ ११ ॥ दोहा। विष्णुभक्ति अरु शांति पुन, वरीसभामहि आइ ।। विष्णुभक्तिको कहेगी, शांतिसुकछु सुनाइ ।। ३२ ॥ शांति रुवाच ॥ दोहा । देवी तोकों मै पिखों, चिंताकुल उरमाहि ॥ विष्णुभक्ति मोको कहो, कौनहेतु मनमाहि ॥ १३॥ विष्णुभक्ति रुवाच ॥ सवैया। वत्से सुवनारसमांहि महारण होवत मोहविवेकहिकेरो॥ जिहठौर सुबीर अनेकमरे सुमनो यमराजकरे सुनिबेरो॥ तहि मोहबलीसहि वालविवेक मिरे रणमैं बहुभांति घनेरो॥ नहिजानत तांगति कौनभई इहकारणते उर कंपत मेरो॥१४॥ दोहा। कह्यो शांतिकहचिंतहै, तोहिकृपा जवहोइ ।। तव विवेक जीते सही, मै जानो यहलोइ ॥ १५ ॥ (१) वृतान्त । (२) इंद्रियनिग्रहका नाम शांति है। (३) जडाऽनृताहकारा दिकोंसे रहित सत्यज्ञानानन्दाऽकारप्रत्यक्चेतनकू विषयकरनेवाली जाअन्तः करणकी वृत्ति है ताकानाम विष्णुभक्ति है ॥

(१२८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०५] । दोहा । यद्यपि वत्से ऐंवहै, संतनको कल्यान । जापतहै अनुमानते, तदपि संक महान ॥ १६ ॥ अबलौ श्रद्धा नहिअई, समाचारले पाहि ॥ यांते पुत्री मनविपे, वड़ो संदेह सुआहि ॥ १७॥ ताहिसमे श्रद्धा अई, लागी करन उचार ।। विष्णुभक्ति मोकोमिलो, पुत्री सुजापसार ॥ १८॥ विष्णुभक्ति श्रद्धा कह्यो, सुखसों आई माइ॥ श्रद्धा कह्यो प्रसाद तव, कह कलेश जनपाइ ॥ १९॥ कह्यो शांति कर जोरकै, अंव नमो पद थार ॥ श्रद्धा कह्यो सुगलमिलो, पुत्री भुजापसार ॥२०॥ शांति मिली गलमैं तवै, भयो अनंदनृतांत ।। विष्णुभक्ति बोली तबै, श्रद्धे कहहु वृतांत ॥२१॥ देवीतेंप्रतिकूलको, जोकछु लायकहोइ॥ सोवृतांत ऊहांभयो, और नजानो कोइ ।।२२।। विष्णुभक्ति पुन तिहकह्यो, मोकोकहि विसतार ॥ गुलावसिंह श्रद्धा तहा, लागी करन उचार ॥ २३॥ श्रद्धोवाच ॥ सवैया। भागवती सुनतूंजवही, तह केशवमंदरते निकसाई ॥ प्रातभयो फुन ताहिसमै, रश्मीरविकोमलजोनिसराई । इंदभ भेरि निशानवजे, सुप्रलयघनकी धुनि जाहिलजाई।- वीरसुसिंहसमानगजे, वर तीमुखंकातरकेपियराई ॥२४॥. (१)जाणीताहै ॥ " 1 [अं०५] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। ( १२९) खुरवाजिनऔरथनेमिदली, धरचूरणधूरअकाशउडाई ॥ धर जान विरंचिसुलोकचली, नहि जानपरे रविलीनछपाई। गज कुंभसंधूर सुभूर सजे, तिनकी इहभांति सुकोरवनाई ॥ जनसांझसमैदिगपश्चमते, यहलालघटाउमडीअधिकाई २५॥ कवित्त । अपनी पराई मिल आई सैन दोऊजव, गजैवीर ऐसे जन प्रलयघन आएहैं ।। भेदके सुवेलेमानो लोकनके सुखेदहित, पश्चमसु पूर्वके सिंधु उछलाएहैं। राजनकेराय सुविवेक योंठराइ मन, दरसननैयायिकको दूतकै पठाएहैं।। जैसे रामचन्दसुतवालिके पठाए तिन, जाइ महामोहकों सुवाक योसुनाएहैं ॥२६॥ सवैया। तजके हरिमंदिरसंतरिदे, सरितातट पावनकानन सारे ॥ तुम जाइ मलेच्छनमाहि वसो,इहभांति सुरायविवेक उचारे॥ नहि जो पुन धार कृपाणहते समअंग गिरें धरमाहि तुमारे॥ तब जंबुक श्रोणत पानकरें पलं गीझचरेरणभूमिमझारे॥२७॥ विष्णुभक्ति रुवाच ॥ दोहा । मात प्यारी शशिमुखी, मृगनैनी बलिहार ।। तिहते वहुरो क्याभयो, मोको करो उचार ॥२८॥ (१) पंक्ति । (२) कीनारे। (३) शास्त्र । (४) मास ॥

। (१३०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०५] 1 श्रद्धोवाच ॥ सवैया। पुन मोहमहीप सुन्योजबही, बिकुटीभ्रुकुटीखलताहि चढाई।। अति क्रूर सुक्रोध महानभयो, हग लालकरे इहबात अलाई ।। सुविवेककरे दुष्टात्मताफल, याहिपिखे इमदूत सुनाई। रणहेत पखंडको आगमजो, खल मोह वली तव दीनपठाई२९ छप्पयछन्द। याअवसर पुन आपनी सैन अगारी आई॥ श्रीसरस्वतीपमहाथशशिकांतसुहाई।। वेद वेदांग पुराण धर्म पुन शास्त्र सुजेते । भारतलौ इतिहास संगमिल आए तेते ॥ पिखतां प्रताप अरिसैनबल गयो निखल सकुचाइ अति ।। सुन ज्यों अतिपावन धारपिख दिब्यधुनी जग पापंगति॥३०॥ विष्णुभक्ति रुवाच ॥ दोहा। मात प्यारी शशीमुखी, मृगनैनी बलिहार॥ तिसते वहुरों क्याभयो, मोको करो उचार ॥३१॥ श्रद्धोवाच॥ तव देवी आगमजिते, वैष्णवसूर्यआदि । गये सरस्वतीपास सम, पूर शंषधुनि नाद ॥३२॥ (१) ऋग्, साम, यजु, अथर्वण, ये चारवेद ॥ आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद, अथर्ववेद, ये चार उपवेद ॥ शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्दो, ज्योतिष, ये षट् वेदके अंग है ॥ नारदपश्चरात्र, रुद्रयामलादिक, ये आगम हैं । मत्स्यमार्कण्डेयादि अष्टादश पुराण हैं । मन्वादि अष्टादश स्मृति ये धर्मशास्त्र हैं ॥ r ।

[अं०५] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (१३१) - विष्णुभक्ति रुवाच ॥ मात प्यारी शशीमुखी, मृगनैनी बलिहार ।। तिसते बहुरो क्याभयो, मोको करो उचार ॥३३॥ श्रद्धोवाच ॥ कबित्त। सांख्य औ न्याय सुकणादकृत भाष्य पुन, आगम अनेक सुमीमांसा संगलियाईहै ।। युक्ति अपार मानो भुजाही हजारफरें, दिशाको मिटाइतम जंगहुलसाईंहै । धर्मेंदुआनन सुबेदत्रयी संग मनो, तीननैनहूं सोंकात्यायनी सुहाईहै । सरस्वतीके आगे प्रगटानी सुसहायइत, बिजुरी अनेकजनु आई चमकाईहै ॥३४॥ शांति रुवाच ॥ दोहा। स्वभावविरोधी आगम, तरक तथा पुन जान ॥ मिले कथं रणहेत सभ, माता करो बखान ॥३५॥ श्रद्धोवाच ॥ सानवंशते जेभये, लरे परस्पर सोइ । जो परसों पुन रणपरे, संगति ताकी होइ ॥३६॥ तिमहम वेदप्रसूत सभ,कछु विरोध निजमाहि॥ बेदसुरक्षणहेत पुन, सभ इकत्र होइजाहि ॥३७॥ (१) ये सारे मीमांसाके विशेषण हैं । (२) धर्म वेदाऽर्थसोई भया इन्दु (चन्द्रमा) तदव है मुख निसका। (३) तीनवेद है नेत्रनिसके। (४) यथा कुरुपांडव ॥ LURANCH (१३२) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०६] नास्तिकपक्ष निषेधहित, संगतभई हमार ॥ आगममाहि विरोधनहि, कीनो तत्त्वविचार ॥ ३८॥ शांतिअनंत सुज्योतिजो, अद्वैअजवल एक ॥ मायाके बहु संगमिल, भासे रूप अनेक ॥ ३९॥ नानाआगमपंथ बहु,एक जनावत ईश ॥ ज्यों बहुनदीप्रवाह जल, मिले जाइ वारीश॥४०॥ विष्णुभक्ति रुवाच ॥ मात प्यारी शशिमुखी, मृगनैनी वलिहार ।। तिसते बहुरों क्याभयो, मोको करो उचार ॥४१॥ श्रद्धोवाच॥ सवैया। तब युध आरंभ भयो दुहूंते, रण आपसमै करि कुंभमिलाए॥ सुतुरंगमसंग तुरंग जुरे, रथसंग रथी सुप्रहार लगाए । सरपुंज पदाति चलाइ इसे, जनतोयद रोषभरे वरषाए। अतियुध भयानक भूर भयो, डर कातरवीर महांहरषाए॥४२॥ तह श्रोणतकीसुभई तटनी, बहुभूत पिसाच सुकंक सुहाए सरदार तुरंग मतंग बडे, जगदीश मनो तन सैल बनाए । सिर छत्र सुहंस समान फिरे, सितपागसुफेनमनो चमकाए। अतिबीर वली तह नभये, पिख कातरतां उरमै दहलाए४॥ चौपाई। याविध दारुण भयो संग्राम । पखंडागम इम कीन सुकाम ॥ लोकायतको तंत्र . सुजोई। कीनो सैन अगारी सोई॥४४॥ परस्परं दोनोदल जुटे । मुए लोकायत प्राण सुछुटे॥ बहुर पखंडागमहै . जोई। भये निर्मूल सगल तिहसोई ४५॥ , [अं०५] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१३३) सोमसिद्धांत कपालक जोई । सत्य आगम पिख भाग्यो सोई॥ सत्यआगम इहुआइ वखानी। सुनोताहिकीसाची बानी॥४६॥ मदभवभेपज करें वखान । ते मतिमंद सुमहा अजान ॥ मनुस्मृतिलौ आगम जेते । सुने नमूढनकाननतेते॥४७॥ तथाचस्मृतिः-सुरां पीत्वा द्विजो मोहादग्निवर्णी सुरां पिबेत् । तेन निर्दग्ध कायस्तु मुच्यते किल्विपात्ततः॥१॥ चौपाई। सत्य आगम प्रवाह वहाए । सौगत काशीछोडि पलाए । परोसीक औ सिंधुगंधारे । अंग वंग पुन मगध पधारे ४८॥ मलेच्छप्राय कलिंगादिक जेई। तामै जाइ वसे पुन तेई ॥ और पखंड दिगंवर जेते । गये पंचालदेशको तेते॥४९॥ मालव और अभीर अनिरता । सागर मारूदेश त्रिगरता ॥ विचरे तामै गूढ स्वभाए । मंदरसेवक द्वारवनाए ॥५०॥ नास्तकतर्क अहै पुन जेती । दलीमीमांसा पाइन तेती॥ तां अनुपथ मै वही सिद्धाई । जहां पखंड दुरे जगजाई ५१॥ विष्णुभक्तिरुवाच॥ दोहा। मात प्यारी शशिमुखी, मृगनैनी वलिहार ॥ तिसतें बहुरो क्याभयो, मोको करो उचार॥५२॥ (१)मनुस्मृति, अर्थ यहः-दिनकहिये ब्राह्मण रागसें वा प्रमादसें सुरापानकरके अभिवर्णवाली सुराका पानकरे तिस सुरापानकरके दग्ध शरीर हूआ तिसपापसें छुटिजावेहै । (२) ये सर्वदेशोके नामहें।।

+ (१३४) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०५] - RA श्रद्धोवाच ॥ चौपाई। बहुरों वस्तुविचार उदारे । काम वली रणभीतर मारे । क्षमा क्रोधगहिके सप छान्यो। हिंसादिकको मूल उखायो५३ सन्तोषलोभकोई उरण माग्यो।ज्योंरघुपति दशकंठ संहान्यो। त्रिष्णा चोरी मिथ्यावैन । परिग्रहसहित उडाएगैन ॥५४॥ अनसूया मत्सर जिती, नीके शंखवजाइ ।। परउत्कर्षहिभावना, मदको दीन खपाइ ॥५५॥ विष्णुभक्ति रुवाच ॥ दोहा। भलाभया अरिंगन मूए, संगरभूमिमझार ॥ महामोहबृतांतजो, मोको करो उचार ॥५६॥ श्रद्धोवाच ॥ दोहा । योगउपसरगनसंग पुन, महामोह खलजोइ ।। लीनभयो कहि कंदरे, जापतनाही सोइ ॥१७॥ विष्णुभक्ति रुवाच ॥ चौपाई। मोह अनरथहि कारण जोई। रहियो सेषयह भली नहोई॥ पुरुष विवेकी जोसुरज्ञान । जोचाहे अपनी कल्यान५८॥ (१) योगविनसंग। (२) देवज्ञानी ॥ 4 74 . [अं॰] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (१३५) दोहा। अग्नि ऋण अरु शत्रुको, देवे मूल उपार ।। रहे सेप काहुसमै, बहुर देहि दुखभार ॥१९॥ चौपाई। मनको समाचार है जोई। श्रद्धा कहो प्रगट मोहि सोई॥ श्रद्धा लागी करन वखान । विष्णुभक्ति सुनिये देकान६०॥ सूएपूत अरु पोते सारे । भयो दूखमन चीतमझारे । शोकवेगमन भूरि वहायो।जीवनत्यागसुतिहठहिरायो६१ विष्णुभक्ति मुखमै मुसकानी । वहुरों याविध कीन बखानी ।। जो मनमरे सुजगतमझारे । तो सभ कार्य होहि हमारे ६२॥ पुरुष सनातनहै जगजोई। परमानंद सुपावे सोई॥ परदुष्टात्म मनहै जोई। जीवनत्याग कहांतिन होई ६३ श्रद्धा बहुर सुकीन बखान । विष्णुभक्तिमें भाख्यो मान ।। वोध उदेहित तूं दृढहोई । बेगमरे मनरहे नकोई ॥ ६४॥ विष्णुभक्ति कर अंगीकार । बहुरोलागी करन उचार ।। वैरागउत्पतिहेत योंकीजे । व्याससरस्वती तहां पठीजे६५ दोहा । भई सुअंतरध्यान वहु, ऐसै मुखो अलाइ ॥ मनसंकल्पसु दोन पुन, बरे सभामहि आइ-॥६६॥ (१) सो शास्त्रमेंभी कहाहैः-अत्यादरपरो विद्रानीहमानः स्थिरां श्रियम् । अमेः शेष बाणाच्छेष शत्रोः शेष नशेषयेत् ॥ अर्थयहः-अत्यंत आदरयुक्त विद्वान् निश्चलसं- पत्ति इच्छाकरताहुआ अग्निकेशेषकू ऋणकेशेषकू शत्रुकेशेषकू अवशेष नछोडे अर्थाव तिसतिस समयमें दूरकरे । (२) व्यासमणीतवाणी । (३) विष्णुभक्ति तथा श्रद्धा । -

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I
(१३६)
प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
[अं०५]
सवैया।
मन नैननते अतिनीर बहे, पुन मुंड धुने मुख एहु अलाई।।
कहि पूत गए तज मोहि ईहां, इकवारसु देवहु फेर दिखाई।
कहि राग गयो कहि द्वेषगयो, मदमानमुए कछुसारनपाई।।
मम अंगनमें दुःखआगिवले, इकबारमिलोगलभीतर आई६७
इहठौरनवृद्धजहाजकोऊ मम, शोकसमुंद्रहिते गहि तारे॥
सुअसूयतेआदिसभे दुहिता, किहठौरंगई नअहे कछुसारे॥
तृष्णादिकजे सुतनारिहुती, किहभांतिमुई सभलोकमझारे॥
बिनभागमुमें दुखभूरभये, इकवारमुए सवबन्धु हमारे॥६८॥
अब ब्याकुल मेउर भूरभयो, विष पावक जानलगी उर आए।
अति दूखभयो तनुछीदतहै, दुःखशोकदवानल देह जलाए ।
मम आज विवेक सुलोपभयो सुतमोह महाउरमाहि बढाए।
अब जीवनमें जग दूरभयो, तनतापबडो उरमोहि तपाए ६९
दोहा।
यों नृपसभामझार मन, भई मूरछा भार ॥
आइसंकल्प सुतिहकह्यो, राजन देह संभार ॥ ७० ॥
सावधानमन होइ पुन, वोल्यो यो मुखमाहि ॥
कहां प्रवृति सुनारि मम, देत दिलासा नाहि ॥ ७१॥
सुन संकल्प हग नीर अति, लागो करन उचार ॥
देवप्रवृतिसुकहा अब, ढूढों जगतमझार ॥७२॥
कुटंव शोकदवदाहिसों, दग्धरिदे अतिहोइ ।।
खेह उडी तनकी सुनो, मुई जगतमै सोइ ॥७३॥

[अं॰]
प्रबोधचंद्रोदय नाटक।
(१३७)
मन उवाच॥
चौपाई।
हाप्यारी किह ठौर सिधाई । भयो दूरख मोको अधिकाई ।।
स्वप्नेभी मोहिसंग पियारी। हमेनहोती रंच न्यारी॥७४॥
आज भागविन दूर सिधाई। जीवनमोहि भयो दुःखदाई ।।
तदपि जीवो पापी भार । गिरियो मूरछा धरनमझार ७५
संकल्प उवाच॥
राजन सावधान अतिहूजे । होनीमाहि विषादन कीजे ।।
भयो स्वस्तमनदेह संभार। कहे संकल्पहको सुउचार ।। ७६॥
मन उवाच ॥
चौपाई।
सुत अरुदारवियोगसुजोई। जाहिभयो दुःख जानत सोई ।।
अव जीवनकी चाहन मोकों। मरोंवेग इमभाषततोकों॥७७॥
दोहा।
चिता वनावो वेग अब, करोंसु अनल प्रवेश ॥
शोक अनल दुःख दाहजो, मेटोसकलकलेश ॥ ७८॥
याविध व्याकुलमनभयो, पायो बहुत कलेश ॥
तबै सरस्वती आइ पुन, कीनो सभाप्रवेश ॥ ७९ ॥
सवैया।
श्वेतदुकूल धरे तनमै, मुख सारदचन्दसमान सुहाए ।
कर एकविषे सभ आगमहै, पुन एकविषे मणिमाल फिराए ।
पुन दोनविपै अभैवरदान, महाभुजसुंदर चार सुहाए ।
वैन मयूषन आत्मको, तम दूरकरे उरताप मिटाए ॥८॥

(१३८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं॰] LA , 4 सरस्वती उवाच ॥ चौपाई। विष्णुभक्ति मोको सुपठायो । सखी सरस्वती मन दुख पायो। संतानवियोगभयोदुःखभारी। करोजाइ तिह बोध उदारी॥८॥ मनको जिहविध होइ बैराग । तसो यतनकरो बडभाग ।। सोमै अव मनकी ढिगजावों। तहाँजाइ वैरागउ पावों ।। ८२॥ गई सरस्वतीमनढिगआकुल। कह्यो पूत क्यों भयो व्याकुल पूर्वहीते लख्यो प्रभाव । सभेअनित्य अहै जगभाव ॥८॥ अध्ययनकीयेतेंनिखलइतिहास। भारतलौ समकथा प्रकास। कलपशतायु अहे जगजोई । मरे अंत चतुरानन सोई॥८४॥ इंद्रलौ सुर असुर सुजेते । मरें अंतको सगले तेते ॥ मनुआदिकमुनि मही समुंदा । नष्टकरे क्षण कोट मुकुंदा॥८॥ अहो मोह काते तव भयो। जाते बडो शोक उरछयो। नष्टशरीर नष्ट जब होई । कोविद शोककरे नह कोई ८६॥ भाव अनित्य सदा उर धारो । नित्यअनित्य सुवस्तु निहारो॥ नित्य अनित्य विवेकी जोई। शोकवेग तिह छुहे न कोई ८७॥ तथाच श्रुतिः ॥ एकमेवे यदा ब्रह्म सत्यमन्यद्विकल्पितम् ।। को मोहस्तत्र कःशोक एकत्वमनुपश्यतः॥२॥ ग (१)जलदी। (२) अर्थ यहः-जहाँ अखण्डादितीयब्रह्मही सत्य है औ बझसें भिन्न सर्व विकल्पित है नाम अनिर्वचनी है इसप्रकार एकत्वकू नाम परमार्थकू जानतेहुये जीवनमुक्तिको तहाँ कौनमोह है कौन शोक है न कोई मोह है न कोई शोक है मोहा- ऽभावात् शोकोपि नास्तीत्यर्थः॥

[अं॰]
प्रवोधचंद्रोदय नाटक ।
(१३९)
मन उवाच ॥
दोहा।
शोक वेग दूषतभयो, देवी चीत हमार ॥
लहे विवेक सुठौर नहि, मेरे चीतमझार ॥८८॥
सरस्वती उवाच ॥
चौपाई।
पूत सनेह दोषहैं भारी। जाते होइ अनरथ विकारी ॥
विषवलीवीजन सम जानो। करे कलेश अंतको मानो८९॥
सुत अरु नारी प्यारे जान । कीजे तहाँ सनेह महान ॥
बज्र अनि जाके उर अंतर । उपजे वेगदूषके अंकुर ॥९॥
दोहा।
ताते शोक अनेक द्रुम, उपजे जगतमझार ॥
दूष अनल तनदाहकर, करे चीतको छार ॥९१॥
मन उवाच ॥
-
दोहा।
देवी यदपि ऐंबहै, तदपि शोक सुभार ।।
मेउर अंतरको दहे, सकौनप्राणसुधार ॥९२॥
सरस्वती तें पदकंज जो, जीवनको सुखदैन ।
भलाभया प्राणांतमे, सो पेखे निजनैन ॥ ९३॥
सरस्वती उवाच ॥
दोहा।
यह इक और अकाज सुत, चाहतहै वसमोह ।।
जो आत्म निज हननको, कीनो निश्चे तोह ॥ ९४॥

(१४०). प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०५] चौपाई। काम सुलोभादिक सुत जेते । अति अपकारी जानो तेते ॥ इनहित संचो कीजे जोई। करे अनरथ अंतकोसोई ९५॥ संचेहित जन अतिदुःखपाए । कामलोम बहुपाप कमाए । लोभ जबै उरमै हुलसाए । नदी अनेक सुगहन तराए ९६॥ अतिऊचे पुन सैल चढाए । कानन घोरमाहि भरमाए । | धनमदमलनकुर मुख राजे । खडो कराए तिह दरवाजे९७॥ भने कुर भूपति मदभीने । हाथजुराइ करावत दीने ॥ यों अपकारी तें सुत जेते । ताहित लहें कलेश सुएते ९८॥ मन उवाच ॥ चौपाइ। है योंही ज्यो मुखो बखाने । तदपि मे दुख और न जाने। तिनके ललत वोल रिदहारी। चिरंकाल रिदमाहि चितारी९९ मनोप्राणको होइ विछेदा। याविध मै पावों उर खेदा॥ याविध सुनि मनकी दुखवानी।कहे सरस्वती सुखोभवानी१०० सरस्वती उवाच ॥ दोहा। ममैताकी जन वासना, प्रेमसहित दृढहोई ।। तिहमूलक अतिमोहवस, दुःखपावत जन लोई॥३०॥ ग्रहकुकटको खाइ मन, जव मंजारग्रह आइ॥ ममताके वस होइ तव, दूखघनो जन पाइ॥ १०२॥ (१)तुमको दुखदाई । (२) मदीयत्वाऽभिमानका नाम ममता है तिसकी जावासना कहिये सर्वदा काल वर्तणा सोई है मूल काहिहै कारणनिसका महामोहका तिसमहामोहके बस यहदोहाका तात्सयार्थ है। (३) मुरगा ॥ + .

[अ०५] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१४१) ममता सून सुग्रह चटका, औ मूसाखाइ विडाल ॥ बिनसनेह दुख नाहि सुत, होवत हर्प विसाल॥ १०३॥ सर्वअनरथसुवीज सुत, ममताही जगजान ।। तां छेदनके माहि पुन, करो यतन मतीमान ॥१०४॥ मन उवाच ॥ चौपाई। मेतनते सुतथे उपजाए । कुकटमूसासम किम गाए । ताको नास जने दुःखभार । कहे सरस्वती बहुर विचार१०५ सरस्वती उवाच ॥ चौपाई। यातनते यूका उपजाए । औ व्रणकृमी नहिजात गिनाए। यतन सहित ताको नरघाए । दूख न रंचक मनमै पाए१०६॥ यूका कृमि सुत होइ समान । एकनको उर जान संतान ॥ महामोह एकनमै धार । मुए मूढ दुख लहे अपार १०७ मन उवाच ॥ चौपाई। तम अज्ञान ग्रन्थहै जोई। दुहउछेद जानो मैसोई॥ सरस्वती तूं सर्वज्ञ उदार । लोकनमै जस आहितुमार१०८ निरंतर कीनो दृढ अभ्यास । सनेह सूतजीवनको फास ॥ जाते फास इहै तुटिजाइ । देवी कहो सुमोहि उपाइ १०९॥

(१४२) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं॰] सरस्वती उवाच ॥ चौपाई। भाव अनित्यसु उरमै धारो। प्रथम उपावसु यही निहारो॥ बिधिसमागम अहेसु जोई । विजुलीचमतकारसम होई ११० दोहा। ऐसे उरमै धारतूं , करो सुदृढ अभ्यास ॥ होहु सुखी सुतलोकमै, कटे मोहकी फास ॥११॥ मन उवाच ॥ MARAN । , दोहा। देवी तोहिप्रसादतें, नष्टभयो मम मोह ॥ पर उरमाहि संदेह इक, पूछतहो अब तोह ।। ११२॥ तव मुखचन्दमरीचते, सुधाझरे उपदेश । क्षालत मैं उर मलन थुन, हरहै शोक कलेश।। ११३॥ शोक सुमूल प्रहारको औपध जो जगहोइ ।। तापत मैं उरमलनको, मात वतावो सोइ॥ ११४॥ सरस्वती उवाच॥ चौपाई। कहें मुनिश्वर सर्व विचार । मरैमभेदते शोकप्रहार ॥ ताहि निवारण औषध इहै। चिंता उरसैमूल नगहै।। ११५॥ दोहा। कह्यो तुमारो ससत्यहै, परचिंता है दुर वार ॥ चिंता चित्त डुला इहै, ज्योंजलइंदुब्यार ॥ ११६॥ (१) पदार्थ । (२) कतर्व्य उपदेशका नाम विधि है। (३) मर्मभेद कहिये दुःखके करनेवाले जे शोकप्रहार है ॥ मन उवाच॥

---- - [अं०५] प्रबाधचंद्रोदय नाटक। (१४३) सरस्वती उवाच ॥ चिंता चित विकारसुत, देवे बहुत कलेश॥ काहूं शांतिसुविपे मै, कीजे ताहि निवेश ॥ ११७॥ मन उवाच ॥ तुम प्रसन्न अति होइ उर, मोको देहु बताइ । ताको ध्यानसु मै धरो, दुखपुंज मिटजाई ।। ११८ ॥ सरस्वती उवाच ॥ दोहा। हे सुत यहअतिगोपहै, करेजु वन्धनमोप ॥ पर आरतउपदेशमैं, कहेन आगम दोष ॥ ११९ ॥ सवैया। नव नीरद श्यामविसालमहा, उरहार भुजासुकियूर सुहाए। मकराकृत कुंडल काननमै जुगनैनसरोज मनो विगसाए। जनमाहि निदाघसुसीत सरोवर, वेद सदा जिह ब्रह्मवताए । हरिध्याव सदामनतूं उरमै, निज सूखलहैं दुखपुंज मिटाए१२० सुनके मन दीरघस्वास लयो करजोर दोऊपदशीशझुकायो। भवभेषजमात सुतोहिकह्योभवसिंधुवह्योतबमोहि बचायो। करुणारस नैनविसाल द्रवे, पुनसारस्वतीगह हाथ उठायो। सुतलाइकतूंउपदेशहिकी, अवनीठभयोइममेमनआयो१२१॥ चौपाई। हेसुत औरप्रकारह कहों। तव 'संसारमोह सभ दहों ।। जेतोमोह सुजामै होई । अंतजने तेतो दुख सोई॥ १२२ ॥ (१) शांति विषय कहिये गोकमोहादि रहित ब्रह्मविषयमें ।

(१४४) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०५] पितातने वाधव पति भाई । काल जवै गहि शीशलिजाई॥ तव मूरखजनअतिदुख पावै। खोहिसिरोरुह धूडरुलावै ॥१२३॥ ताडे उर हगते जलवहैं। पेख विवेकी यों उर कहें। यह संसार बडो दुखदाई । यामै चीत गडोमतराई ॥१२॥ दृढवैरागसुजांउर होई । समसुख लहे आपमै सोई ॥ सरस्वती इम जवै अलायो। ताहीक्षणवैरागसु आयो । १२५ ॥ वैराग उवाच ।। सवैया। हाविधि एक विडंवकयो, जिहते समलोक सुतोहि ठगाए। एनवनीलसुनीरजपे सैलपांतदलंसम देहवनाए । श्रोणत मांस सुमेद वसा, तिनऊपरते तुच अंवर छाए । कैकरुणावसनात्रवायसचीलव्याघरजातसुखाए ॥ १२६॥ दोहा। सर्वओर श्रोणत मिल्यो, आमिखपिंड निहार ।। परे सुवायस चील वहु, कोकरसके निवार ।। १२७॥ सवैया। ताहि निवारण नसभो, पुन औरसलेषम भांजन भारी ।। निकसै अरु नाहि संभार सुपोचि उत्तारी॥ कह्यो तुमारो सस्को, वहिनाहि निहारसके तव नारी॥ चिंता चित्त डुला इरे, सठजानतनाहिइहैकछुसारी१२८ (१) पदार्थ। (२) कतर्व्यउपपतिसका जो पांत कहिये अग्रभाग पेसलकहिये दुःखके करनेवाले ने शोकप्रहार है ।। म , T - [अं०.५] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (१४५) चौपाई। लोल दोले सम भोग सुहाए । जरा प्रणाम भये दुखदाए । विपदाको यह गेह पछानो।धनकोनास परमदुखमानो१२९ जितेलोक सभदेवहि शोक । अवला अहे अनरथन ओक । याहि. घोरसंकटपथमाही । हाहाजीव अज्ञलपटाही॥१३०॥ योभाषत वैराग सुआयो । सारस्वती तव वैन अलायो । हेसुत आयो यह वैराग । आदरकरोतिह बडभाग १३१ कहांपूत मन एहु उचायो । वैरागसमीप सुतिह अनुसायो तातचरण अब तें दरसाए । यह वैरागसु लागत पाए १३२॥ मन उवाच ॥ जन्मसमे तब दरसन पाए । फेर पूतकहु कहां सिद्धाए । मेरे कंठ मिलो मत पिआरे । मिले वैराग सुभुजापसारे १३३ तब मन याविध बैन अलायो । तैं पेखत मम शोक पलायो॥ वैराग बहुर मनको योंकहै। कहा शोकको अवसर अहै१३४ ज्यों पथभीतर पथक मिलाए । समापाइ पुन बीछुरजाए। ज्यों त्रिणकाठसु नदीप्रवाहा । कवीमिले कबहोहि दुराहा१३५ ज्यों जलबूंद मेघकी धारा। यथा जहाजसु सिंधुमझारा ।। पिता मातसुत बंधु सुदारा । मिल बिछुरेयाजगतमझारा१३६ याको होइ वियोग सुजवहीं शोकनलए विवेकी तबहीं। ईहा जगतकी गतिहै जोई। कोटनमाहि लखै नर कोई१३७ पूर्वहुतो तात नर जोई। मरकर भयो पूत सुत सोई॥ पूत तातहित पिंड कराए । तात पूत कहिगो दखिलाए१३८ (१) डोला वा हिंडोला । (२) राही । (३)संयोगजोहे सो वियोगजन्यही है। - १० (१४६) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं॰] दोहा। तोहि पिता महिं मुएको, भये वरप सुत तीन ॥ हम भूमंडलमै वसैं, वहु भये अमरपुर लीन ॥ १३९ ॥ चौपाई। कवहूं मर पर लोक सिधाए । कवहूं ग्रह भीतर उपजाए ॥ बिनगतिजाने मूरख रोवै । विवैकी शोक नरंचक जोवै१४० ऐसे वचन सुने मन जवहीं । भयो अनंद चीतमें तवहीं ।। सारस्वती जैसे यह कहै । सत्य वात एवंही अहै ॥१४॥ अबमैनीके लयो निहार। जूठो अहै सगल संसार । नबजोबन नारी है जेई । मधुकरसहित खिरे दुमतेई१४२॥ फूल मालती बहुत सुगंध । पसरे जह तह पौन सनबंध ।। सृगतृष्णासायर जल जैसै भयो विवेक पिखोअब तैसै१४३ बहुर सरस्वती करुणा वान । मन प्रति लागी करन बखान ।। यद्यपि यों तव भयो सुभान । तदपि वत्स कह्यो मममान १४४ गिरही एक महूरत 'वीर । विनआश्रम नहोवै धीर । ताते अहे निवृतिसुजोई। धर्मचारणी कीजे सोई॥१४॥ जैसै मंगलकरइ सनान । फूलमाल सिरऊपर ठान ॥ मले कपूरकुंकमपट भीने। बाजे संग अनेक सुलीने १४६॥ व्याही तब प्रवृति सुनारि । त्यानिवृति कर अंगीकारि ॥ शिषासूत्र अब तजो बिसाल । होइ दिगंबरकै मृगछाल १४७॥ (१) तथा च ब्रह्मोपनिषच्छ्रुतिः ॥ सशिखंवपनं कृत्वा बहिः सूत्रं त्यजेद्बुधः ॥ यद- क्षरं परं ब्रह्म तत्सूत्रमिति धारयेत् ॥ १ ॥ सूचनात्सूत्रमित्याहुः सूत्रं नाम परं पदम् । तत्सूत्रं विदितं येन स विमो वेदपारगः ॥ २ ॥ अर्थ यहः-सन्यासेच्छु बुद्धिमान पुरुष [अं०५] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१४७) संतनसंग सो भले बिचार । वसो इकांतसु विपिनमझार ॥ वन नवनीलसरोज सुलोचन ।गहोनिवृतिहोयभवमोचन१४८ लाजसहित मन करे उचार । देवी कहहुसु अंगीकार ॥ बहुर सरस्वति करे अलाप । मनके निखल मिटावैताप१४९ दोहा। समदम सतसंतोषलौ, उपजे पूत तुम्हार ।। सेवा तेरी वैकरे, सगलेदुःख निवारं ॥ १५० ॥ चौपाई। यम अरु नेमआदिकहै जेते । तोहि वजीर होहिंगे तेते ॥ ब्रह्मचर्य जो अहे महान । मंत्र कहेगो तेंढिगआन १५१॥ दोहा। विबेक उपनिषत संगमिल, यौवराज सुखसार ॥ तोहिअनुग्रहते लहे, शांतिपूत उरधार ॥ १५२॥ मैत्रीआदिक चार यह, बहिनि मनोमलहार।। विष्णुभक्ति तोपै पठी, आदर इने सुधार ॥ १५३॥ सरस्वती आय सुजो करो, घरीशीश मम सोइ ।। योंकहि शीश झुकाइयो, गहे चरन कर दोइ ॥ १५४॥ आयुष मत सादरपिखो, यह संगत-सुखकार ।। यम नेम आसन सहित,प्राणायाम सुधार ॥ १५५ ॥ -शिखासहित मुंडन करवायके बाहरले सूत्रका त्याग करे जो अक्षर परब्रह्मरूपि सूत्रहै तिस सूत्रको धारणकरे काहेते; सूचनसे परब्रह्महीं सूत्रहै ऐसे कहतेहैं इसलीये सूत्रनाम परम पदका है सो सूत्र जान्याहै जिसने ऐसा जो विम सो वेदपारगामि होताहै भर्थात् वेदके तात्पर्यको जाननेवाला होताहै ॥ १ ॥ २ ॥ युवरानकर्मका नाम यौवरानहै सो युवराजकर्म यहहै अपने जीतेही राज्याभिषेकको देना । 1 , (१४८) प्रबोधचंद्रोदय नाटका [अं॰] M MAA दीरचायु इनसंग तुम, अवै लहो सुखसार ।। सामराज निजलोकमै, नीके करो उदार ।। १५६॥ तोहि इकाग्रहुंभये, जीवं लहे सुखसार । तब चंचलता संग वस, पाए वहुतं विकार ॥ १८७॥ सागरवीचीभेदते, ज्यों रवि नाना होइ ।। बुद्धिवृत्ति वस जीव बहु, भयो परात्म सोइ ।। १५८॥ वृतां सकल संकोचकर, वत्स तू सनीधार ॥ सहिजानंदसु आत्मा, लहेस्प निजसार ।। १५९॥ चौपाई। ग्यातीवंधु जिते रणमारे। प्रेतपतिके भौन सिधारे।। जलतिलांजुली ताको दीजे । देवनदीमै मजन कीजे १६०॥ सुन मन नैन न नीर वहायो । बहुरो याविध वैन अलायो। जोकछु आयुसु अहे तिहारी। करों सकल सिरपरधारी।। दोहा । सारस्वती मन भाखि, योतजी रंगप्रवृति ॥ कीरतिवरमा देव तव, गहीचीत निरवृति।।१६२।। (१) परमात्मभावको भाम होवे। (२) षट्विकार । (३)सो परमात्मा इदिवृत्तियाके अधीन होयकर नानानीवरूपर्ने प्रतीत होते है नया च अति. ॥ एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । एकथा बहुधा चैव दृश्यते नलचन्द्रवद ॥ मर्थ यहः-एकहीं भूतात्मा (परमात्मा) भूतभूतमें स्थित हुआ तथा एकप्रकारका हुआभी जलमें चन्द्रमाको न्याई बहुतप्रकारका देखानावहै इति । (४)नाटकमवृत्ति ।। अर m [अं०५] प्रबोधचंद्रादय नाटक। (१४९) . - - - । । सोरठा। जनहै पूत प्रवोध, उपनिषतसु.विवेक मिल ॥ साधन वडो निरोध, जीवनमुक्तिसु होइगी ॥ १६३॥ इति श्रीमन्मानसिंहचरणशिक्षित गुलाबसिंह विरचिते प्रबोधचन्द्रोदयनाटके वैराग्यो नाम पञ्चमोऽकः समाप्तः ॥ ५ ॥ (१) यह षष्ठमअङ्कका बीनहै ॥ इति श्रीमदुदासीनवर्य्य परमानंदशिष्य गुरुमसादविरचिता प्रबोधचंद्रोदयनाटक पञ्चमांऽकटिप्पणिका समाप्ता ॥ ५ ॥ - RevvvR - ॐश्रीगणेशाय नमः। AAMILIEWS अथ षष्ठोङ्कः प्रारंभः ॥६॥ DORE दोहा । याउपरंत सुहोयगी, जीवनमुक्ति रसाल ॥ सभामाहिं प्रवेशतव, कीनो शांति विसाल ॥१॥ शांति रुवाच ॥ चौपाई। नृप विवेक इम मोहि अलायो। समाचार शांतितें पायो । मन सुत कामादिकथे जेई । मुए महारणभीतर तेई ॥२॥ मोह विलीन वैराग्य उपाए । पंचकलेश सुदूर मिटाए । मन प्रशांतिकी संगति धार । ततवोध नरकरे विचार ॥३॥ तुम उपनिषदपास अवजावो । आदरकर तिहममढिगल्यावो॥ योंकहि शांति सुजबै पधारी । श्रद्धा आवत ताहि निहारी॥४॥ हरषहेर इम शांति उचारे । यहश्रद्धा कछुमंत्र विचारे॥ इही ओर यह आवत नीकी। सुनो भला अवयाके जीकी|| (१) जीवन्मुक्तिका लक्षणः-श्रवणादिकोंकरकै उत्पन्न भयाहै ब्रह्मसाक्षात्कार जिसकू तिस ब्रह्मवेत्ताकू जानीवत् अवस्थाविषे कर्तृत्वभोक्तृत्वादिरूपसर्ववन्धप्रतीतिकी निवृत्ति है ताकानाम जीवन्मुक्ति है । (२)(अविद्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः) मिथ्याज्ञान का नाम अविद्या है, १ वुद्धि तथा आत्माके ऐक्याध्यासका नाम अम्मिता है, २ विषयकी इच्छाका नाम राग है, ३ साधनसहितदुःखमे अपोतिद्वेष है ४ मरणसें भयकानाम अभिनिवेश है ५ ॥ AAHARASTRA 1 -- [अं०६] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। (१५१) - दोहा। श्रद्धा तवै प्रवेशकर, कीनो इहै विचार ॥ नैनसुधा पूरतभये, भूपतिकुलहि निहार ॥६॥ जहोदुष्टनीकेहने, पूजेसंतसमादि । वशेअनुजीवीसेव्यहे, स्वामिदेव अनादि ॥७॥ शांतिकहे अंवा सुनो, कौन सुमंत्र विचार ।। करेचीतकहिलैचली, मोको करो उचार ॥८॥ श्रद्धोवाच ॥ दोहा। मैं विवेककेढिग चली, पठीपुरुप मतिमान ।। पुरपविवेक मिलाओगी, मंत्र इहै उरठान ॥९॥ शांति रुवाच ॥ दोहा । कहो युरुपको कौनविध, मनसों वरतन आहि ॥ काराग्रह वांधेविपे, ज्योंवरते नरनाहि ।।१०॥ कहो पुरुपहीं करेगो, सामराज जगमाहि ।। अहेशांति इंउहीं सुनो, ज्योंसमुझे मनमाहि ॥ ११ ॥ कैसै मायामाहि अव, देव अनुग्रह आहि ॥ निग्रह यों कहिवोरह्यो, कहें अनुग्रह काहि ॥ १२॥ (१) राजकुलको। (२) राजकुलमें मोहादिक । (३) वशकहिये शमादि कर्णेकर अनुजीवीकहिये ईश्वरके अनुपश्चात् है जीवना निनोंका सो कहिये क्शअनुजीवी ऐसै जे जीवह तिन जीवोंकर स्वामीदेवअनादि सेव्य है नाम पूज्यहै। (४) श्रद्धा कहतीहै हेशाति निग्रह ऐसा तेरेको कहना रहाथा, (उचितथा) परतु अनुग्रहऐसै कैसाकहती है काहेते ॥ .

. १५२) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०६] देवमाहि माया अहे, सर्वअनरथनवीज ॥ ताको निग्रह भलेकर, कियोचहे निरवीज ॥ १३ ॥ शांति रुवाच ॥ काराग्रहमै डारमन, माया निग्रहकीन । कहो काहिमै अवअहे, भूपतिको उरलीन ॥ १४॥ श्रद्धोवाच ॥ दोहा। नित्य अनित्य विचारमै, सदा चितपरवाहि ॥ इह अमुत्र वैराग्यजो, वही सुहृद सुआहि ॥ १५॥ मंत्री अहे यमनेमही, सम दम सखा सुजान ।। मैत्री करुणादिक सभे, यही ग्रहदासी मान ॥१६॥ है मुक्तेच्छा सहचरी, भये पुरुष बलवंत ॥ ममता मोह संकल्पसह, हने कृपा भगवंत ॥१७॥ शांति रुवाच ॥ दोहा। कहो स्वामी पुरुषकी, धर्मकर्मफलमाहि ।। किहिविध अहे प्रवृतिअव, मै समुझों मनमाहि ॥ १८॥ श्रद्धोवाच ॥ सोरठा। जादिन भयो वैराग्य, पुत्रीलेदिन ताहिते॥ इह अमुत्र फलत्याग, स्वामीधारे ताहिते ॥ १९॥ (१) सहकारी है। (२) सखीहै। (३) अर्थ यहः-जीवरूपस्वामी पुरु- षकी धर्म रूपकर्मके फलमें प्रवृत्ति किसप्रकारकोहै यहकहो ॥ - । 4 - " । T [अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१५३) दोहा। पापनके फल नरकतें, जैसै डरपै नीत ॥ त्योंही सुखहै पुनफल, स्वरगभयो भयभीत ॥२०॥ सुकृतको फल भोगसुख, मिले कदाचित् जोइ ।। करै गिलानि सुउरविषे, अधिक नमाने सोइ ॥२१॥ प्रत्यक्प्रवण पिखपुरुषको, सफल आपनिरधार ।। धर्म आपही होइयो, सनै स्थल व्यापार ॥२२॥ शांतिरुवाच॥ दोहा। जे उपसरंगसुसंगलै, भयो लीन खल मोह ॥' कहो वृतांत सुताहिको, जननी पूछो तोहि ॥ २३ ॥ श्रद्धोवाच ॥ दोहा। मधुमत्तविद्यासहित पुनि, पठे मोह उपसरग ॥ लोभनिमित सुपुरुषको, दिखलाए बहुस्वरग ॥२४॥ जो तिनमाहि आसक्त पुन, पुरुष कदाचित होइ॥ तौ विवेक उपनिषतको, स्मरनकरे न कोइ ॥२५॥ शांतिरुवाच ॥ दोहा। मात प्यारी शशिमुखी, मृगनैनी बलहार ॥ तिसते बहुरो क्यांभयो, मोको करो उचार ॥२६॥ (१) स्वामीपुरुषको आत्मैकनिष्ठाकू देखकर सोधर्म कीयाहै वैराग्यरूप' फलजिसने ऐसा अपने आपकू मानकर स्वयं आपही व्यापारसे रहित होताभया । (२),योगविन्न । (३) काचित् सिद्धि ॥ H 7 1 ३ . । ३ (१६४) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०६] श्रद्धोवाच ॥ चौपाई। तव उपसर्ग पुरुष ढिगगए । कौतुक एक करत पुन भये ॥ इंद्रजालकी विद्या जोई। लोभहेत दिखलाई सोई॥२७॥ दोहा। निखलसिद्धि प्रगटी तहा, पिखी पुरुष मनलाइ । गुलावसिंह प्रभावतहि, नीके देत सुनाइ ॥ २८ ॥ सवैया। शतयोजनते सभवातसुने, पुन नीरनपै विन नाववलाए । विन ध्येनकिये सभ वेदपुराण, सुभारतलौ इतिहाससुआए। बिनछन्दपढे सुभछन्दनकै, भवमंडलमै सवकाव्य बनाए । सुजराउजरेसुरथानपिखे, समलोकनको रुचिप्रेर चलाए २९॥ दृढभीतनते निकसे क्षणमै, तनु मेरुसमान सुभूर वनाए । तनुकंटकपै समतूल रहे, क्षणमै रविमंडलमाहि सुजाए । इहभांति निहारत देवनजू, ढिगआनभलेपद मोल झुकाए। इहठौर स्वामिन वासकरो, दुखद्वंदसभै अब तोहि मिटाए ३० दोहा। ईहा जन्म नमृतहै, यह अतिसुंदर देश ॥ ईहावैठ कलोलकर, मनके हरो कलेश॥३१॥ दोहा। विद्याधरी अप्सरा, विविध सुग्ध सुरनार ॥ ते पदवन्दनकरतहैं, हाथ उपाइनधार ॥३२॥ (१) कोई सुदर रूपवाली इंद्रजालिक विद्यानाम अविद्यमानार्थका प्रकाशरूप विद्या। (२)खी या वा मोहनरूप ॥ ।

- - 1 [अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१५५) सवैया। याहिपिखो तुम सुंदरता, मदमत्तविलोचन रूप अपारे । दीरघ वारज गंधमिली, अलकै ' कचधुंधरवंत सुकारे । पीनपयोधर रंभउरूकमलानन अंजननैन 'सवारे॥ दाडमसीरदपांतिवनी, समदामनि हासहरे तमभारे ॥३३॥ हाटककी सिकेता धरनी, पुन इंद्रसी नीलमणि धनलाई ॥ एवनपांति नृतांतखिरी, वहुफूल सुगंध चहूंदिश छाई ।। गुंजत एमधुपावलिया, 'मनवावलियासुमनोजचलाई। संग विलासीन केलकरो, तपसा तव पुंनफले अवआई॥३४॥ शांति रुवाच ॥' दोहा। मात प्यारी शशिमुखी, मृगनैनी वलिहार ।। तिसते बहुरों क्याभयो, मोको करो उचार ॥३५॥ दोहा। र . , श्रद्धों वाच ॥ । - , - 1 r J 1 -- । सुन उपसर्गनवाकको, कीनो पुरुष उचार ॥ अतिसुंदर यह भोगसुख, मोमन वाढियो प्यार॥३६॥ संकल्पकियो उत्साहमन, स्वामीपुरुष उदार ॥ योंमतिसुन उर खेदगहि, करे सुशांति उचार ॥ ३७॥ शांति रुवाच॥ दोहा। हाधिग हादुख कष्टअति, भई बडी अवहान ॥ . पुनरपि जगफासीविपे, पो सुपुरुष महान ॥ ३८॥ (१) केला । (२)रेती ॥ - । - .

(१५६) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०६] . मात प्यारी शशिमुखी, मृगनैनी बलिहार । तिसते वहुरो क्याभयो, मोको करो उचार ॥३९॥ श्रद्धोवाच॥ चौपाई। तव तांमीत पुरुष इकसार । तर्कनाम तिहकरें उचार ॥ क्रोधभरे दृग ताहि सुलाल । मनो समीर सखो सुविसाल४ तिन उपसर्गन ओर निहार । वहुरपुरुषको कीन उचार ।। यह अस्थानी देव सुजेते । विधनकरें तुमको प्रतितेते४१॥ यावचननकेमाही। मीत कदाचित कीजे नाही। थानअभिमानी देव सुजेते । है अतिधूरत वंचक तेते ॥४२॥ विषयँवडसपिंडीको डारे। मीनसमान निरखलजन मारे ॥ भोगनकी चिंता दुखआग । डारे तोहि नलखे अभाग४।। सवैया। एह अतिसुंदर नारि जितीनरकाऽग्निकी सुशिषा पहिचानो। ताहिकि संगमते दुःखजोवहु वारलयो कहितोहि भुलानो। तेंतप दीरघ नीतकरे, समलोक वखानत तोहि स्यानो । भोगनपावकते हटियो, दुःखनाहिभरो सुकह्यो मम मानो४४॥ भवसागरतारणयोग्य जहोजसुतें चिरकालहिते अव पायो। मदमत्तविलोचननारि दिखाइ सुचाहतहैं सुरतोहि छुडायो। (१) सत् असत् विचारका नाम तर्कहै । (२) अग्नि । (३) मधुमत्तसिद्धि अभिमानी देवते । (४) विषयरूप मांसयुक्तकांटा । (५) मनुष्यशरीर ॥ - - [अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१६७) अवछोडि जहाजअंगारनदी सुचहेंकिम आत्म आप वहायो। इह सीष सुनो समपीकमलीनसुभोगनहेर कहा हुलसायो४५ डार पटवर अंबरधार दिगंबर जाबन वास कएहै। माहि अरण्य करें तपदीरघ, भोगमहानल पारभएहै । नाम महामुनि जाहि कहें, अरु कांपत भूपतिपाइ पएहै ।। नारि सुघूमनघेरविषे, पर फेर रसातलमाहि गएहै ॥ ४६॥ बहुवारभयो नरनारि तुही, इहबार कहांसु अघाइ रहेगो॥ अव याहिजहाजते पांउखिसे, भवसागरधारसु फेर वहेगो।। अव हाथ अलंवत मोक्षअहै, इह औसर मीत न फेर लहेगो॥ कविसिंहगुलाब नमानत जो, नरकाऽग्निमै बहुदुख सहेगो४७ शांति रुवाच ॥ दोहा । मात प्यारी शशिमुखी, मृगनैनीवलिहार ॥ तिसते बहुरो क्याभयो, मोको करो उचार॥ १८॥ श्रद्धोवाच ॥ दोहा । तव तांवचनन कानधर, विषय नस्वस्ति उचार ।। मधुमत्तविद्यामोह तज, भयो वैराग उदार ॥४९॥ सवैया। भोगनके दुख चीत चितार, सुशीशधुन्यो मनताहि उठायो॥ आज महादुखसिंधुविषे, परतो मम मीत सुतोहि बचायो। फेर भजों नहि भोग कबी, इह मीतसुनोतवसाचबतायो। इमभाषभले हगलाजबढी,भरअंक भले सुसखागललायो५० (१)विषमहै विषयमवाह जिसका ।।

And- - --- ------- (१५८) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अं०६] P शांति रुवाच॥ चौपाई। भलाभया बहुपुरुष उदार। भयो विरक्त कटे दुःखभार । तूं अव मातसु कहां सिद्धाई। मोको नीके देहु वताई ॥ ११॥ श्रद्धोवाच ॥ दोहा। पुरुष पठाई मै चली, हेरन आज विवेक ॥ जावों भूपविवेकढिग, मेटिसु विधन अनेक ॥५२॥ शांति रुवाच ॥ चौपाई। मोकोवी . पुन रायविवेक । पढ्यो सुकारज भाषो एक ॥ उपनिषतलियावनहेत पठाई ।चले सुवेग विलंव मिटाई॥५३॥ कवि रुवाच ॥ दोहा। विवेक उपनिषत समीपवहि, श्रद्धा शांति उदार ।। गई जवै बहुपुरुष पुन, आए सभामझार ॥५४॥ करविचार उर हर्ष अति, लागो करन उचार । गुलाबसिंह बहुवाकपुन, सुनो साध उरधार ।। ६५॥ ATTA पुरुष उवाच॥ . - दोहा। अहो महातम है बडो, विष्णुभक्तिको लोइ ।। जाप्रसादवन्धनमिटे, मुक्तिजीव जग होइ ॥५६॥ - [अं०.६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१६९) , सवैया । जिहमाहि कलेश बडीलहरी, सुभयानक जाहिके पंथ अपारा॥ सुत मीत कलत्र सुवंधु सखा,मकराग्रह ग्रन्थ बडे सुबिकारा॥ निजक्रोध महावडवानलहै, तृष्णानिजनागनिरूपसुकारा॥ हरिकी भक्ती पदकंजप्रसाद तयो भवसागरमैं अजभारा॥१७॥ दोहा। तर्क वडो मम मीतहै, होयो मोहि सहाइ॥ पावक भोग करालते, लीनो मोहि वचाइ ॥२८॥ कवि रुवाच ॥ दोहा। उपनिषत शांति दोनो तबै, कीनो सभाप्रवेश ॥ कीरतिवरमा मोलमणि, वैठो जहाँ नरेश ॥१९॥ शांति रुवाच॥ दोहा। चलो सखी सुविवेकका, बदन निहारो आज ॥ भाग तुमारे जागया होहि सभे तव काज ॥६॥ उपनिषदुवाच ॥ दोहा। सखी स्वामी निरदई, जाहि त्याग्यो मोहि ।। ताको मुख किहविध पिखों तूं मनभीतरजोहि ॥६॥ (१) यहां रूपकालकार है ॥

(१६०) प्रवोधचंद्रोदय नाटक। [अॅ०६] 1 शांति रुवाच ॥ दोहा। देवी स्वामी परोथो, परम विपदके माहि ॥ इहविध एहु उलाहनो, तूं भाषतहै ताहि ।। ६२॥ उपनिषदुवाच॥ सखी न देखी दुरदशा, मोपर वीती जोइ ॥ जाकर ऐसै तूंकहैं, सुनो वखानो सोइ ॥६३॥ चित्रपदाछन्द । भुजदंडतोडिकुपंडितामणिकंठकीबहुफोर ।। करकाढिकंकणलीतियाकररहीमैवहुशोर ॥ चूडामणिममशीशतकटिदीनवहुतकलेस ।। समद्रोपतीकेशांतिमेरेबैंचियातिनकेस ॥ ६॥ कुछ अरथ मेरो औरथो, बहु करहै औरप्रकार ॥ जीवकाके हेत मूरख तोडिफोडि उचार ।। अर्थको सुअनरथमा देहि वहु संताप ॥ बहुभांति मैं दुखपाइयो नहिडरें ते सठपाप ॥६५॥ (१) कुत्सित पण्डतोंने मेरे मनन तथा निदिध्यास न रूपदो भुजादंड तोड डारेहैं तहां ब्रह्मरूप विषयसे भिन्न विषयका नो मनन है तथा निदिध्यासन है सोई भुनाओंका तोडना है, धारणा ध्यान समाधिरूप कंठकी मणिहै सोभी ब्रह्मरूप विषयसें भिन्न विष- यका धारणा ध्यान समाधि करनाही तिसका फोडना है-उपक्रम उपसंहारादि रूप जे वेदांततात्पर्य के षट् लिंग हैं, सोई भये कङ्कण तिनकोभी वेदांततात्पर्यकू छोड़िकर अन्या- थेकेतात्पर्यपर लगावना यही तिनका लैना है-चूडामणि कहिये शिरभूषणकीन्याई आत्म स्वरूप तिसका जो विपीत निश्चय है यही शिरसें काटदेनाहै-केश कहिये वेदांतभाग (उपनिष भाग ) तिसको जो अन्यार्थपर लगाना सोई केशोंका बैंचना है द्रोपतिवत् । यह छन्दूका तात्पर्य है ॥

[अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक । (१६१) । दुरविदग्ध अनेक मोको मिलेलोक मलीन । विवेकपतिविन जान मोको चहें दासीकीन ।। कैचित कहें जग सत तूं सुखकरो इह प्रकास ॥ कैचित कहैं मतदैतमै उपनिपत तूं कर वास ॥६६॥ इककहें जीवपरेशको है भेद एहु बखान ॥ इंक कहें भेदाऽभेदको उपनिषत तूं उर मान । इह भांतिव्याकुल मै करी नहिलखै मूरखवात ।। ज्यों दुष्टकौरवसभामै भई द्रौपदी विष्यात ॥ ६७॥ शांतिरुवाच॥ चित्रपदाछन्द। महामोहके अपराधते तैं लह्यो है दुख सोइ । देवको अपराध नाही होनहारी होइ । मोह मन उपजाइ कामसुपुरुषको गहि लीन ॥ डार विषयआरण्यमै सुविवेक दूरहिकीन ॥ ६८॥ कुलनारिके यहधर्म देवी रच्यो भगवान संपद सुआपदमै सदा बहुचहे निजपति प्रान ॥ अव आउ दर्शनदेहु नीके मिष्टपियाप्रतिबोल ॥ अव फले तोहि मनोरथा सभहते द्वेषी टोलि॥ ६९॥ उपनिषदुवाच ॥ दोहा। पुत्री गीता यों कह्यो, मोहि इकंत विठाइ ।। स्वामी भरता पुरुपको, करो तोप अबजाइ ॥ ७० ॥ (१) दुष्टबुद्धि । (२) साख्यमतवाले । (३) मीमांसक । (४) नैयायिक । (५) त्रिदण्डी । (६) उपनिषत् अर्थको प्रतिपादिकताकर वा उपनिषत्सकाशतें उत्पचिहोनेकर गीताको उपनिषत्का पुत्रिपणा है । . ११ --- (१६२) प्रबोधचंद्रोदय नाटक । [अं०६] प्रवोधपूत तवे होइगो, वन्धनदये निवार । परस्वामीप्रति कहनते, आवत लाज सुभार ॥७॥ शांतिरुवाच ॥ दोहा। विष्णुभक्ति सुविवेकको, कीनो इहै उचार ॥ पेखो स्वामी पुरुष अव, काहेकरें विचार ॥७२॥ उपनिषत करो ज्योंकहितहै, सोइकरों वडभाग ।। गुलाबसिंह दोनो तवी गई अखाडो त्याग ॥७३॥ तब विवेकराजा सुनो, श्रद्धासहित सुहाइ । मोहपटलको दूरकर, बोसभामहि आइ॥७४ ॥ विवेक उवाच ॥ दोहा। श्रद्धे शांति सुगई है, उपनिषतनिहारनकाज॥ किहबिध प्यारी को पिखों, मोहि वखानोआज ।।७५ ॥ देवसुआय सुथारीया, गई शीस परमान । विष्णुभक्ति पुन शांतिको, कीनो एहु बखान ॥७६ ॥ मंदरनाम सुसैलमै, है हरिको अस्थान॥ तह गीताके निकट बहु, बसत तर्क डरमान ॥ ७७॥ विवेक उवाच ॥ तर्कविद्याते कहो, कैसै तिह डरभार ।। श्रद्धोवाच । देव उपनिषत करेगी, तोको एह उचार ।।७८॥ अब तुम चलो समीप प्रभु,लेवो पुरुष निहार॥ वैठ इकंत सुध्यायहै, तोहि आगमन उदार ।। ७९॥ । - - [अं०६] प्रवोधचंद्रोदय नाटक । (१६३) तव विवेकढिगजाइकै, कीनो पुरुष प्रणाम ॥ कह्यो पुरुप तव एहु सुत, कीनो भलो न काम ॥८॥ ज्ञानवृद्ध तुम हो वडे, हमको पितासमान ॥ यही अर्थ ऋषिदेवता, पूर्व कीन वषान ॥८॥ चौपाई एकसमे आपदके मारे । भूले निगम देव ऋपि सारे ॥ तिनको एक वाल थो जोई। तीर सरस्वती बसियोसोई ॥८२॥ दोहा। दधीचऋपीसर पूतवहु, जन्यो सरस्वतीमाहि ॥ नाम सारस्वत ताहिको, धयो जगतकेमाहि ॥ ८३ ॥ चौपाई। मात सरस्वती तिह प्रतिपाल । रहे कंठ तिहवेद बिसाल ॥ तवते समापाइ ऋपिजेते । पूछे परस्पर वेदसुतेते ॥८४॥ जब तिन कंठन किने निहारे । तवते वालक पास पधारे ।। कह्यो वालको वेद पढ़ये । कह्यो वाल पूत सुनलै ये॥८॥ (१) श्रुति.-प्रजापतिब्रह्मा देवान् सृष्ट्वा केनचित्रिमित्तेनाज्ञानिनो भूयासुरिति देवागणाप । तदनन्तर ताननुगृह्णन् देवानामन्योन्यं पितृत्वं पुत्रत्वं च ददौ ॥ अर्थ यहः-मनाका पति ब्रह्माजी सबदेवताओको रचिकर तथा कोई कार्यरूप निमि- तकर अजानि होवो इसमकार देवताओको शाप देतेभये तिसके अनन्तर तिनोंपर अनुग्रह करतेहुए ब्रह्माजी देवताओको परस्पर पितापणा तथा पुत्रपणा देतेभये । इस- श्रुतिकर देवते धर्ममार्गमें नष्टसज्ञावाले होतेभये, पुत्रोंसे वेद पूछिकर पुत्रसंज्ञाको माप्तभये इसकहनेकर ज्ञानवृद्धको पितारूपिता दिखाई, यह संक्षेपार्थ है ऋषिमसंग आगे कहिते हैं। (२) नारदादि । 1 - (१६४) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०६] मेरे शिष्य होहुगे जवही । वेदपढावो तुमको तवही । क्रोधभरे उरमै ऋषिसारे । तब ब्रह्माके पास पधारे॥८६॥ देवदधीच पूतहै जोई । हम अतिवृद्ध वाल अतिसोई॥ वेदपढनहित हम ढिगगए। पूतपूतकार मुखो अलए॥८७॥ दोहा। मेर होवो शिष्य जव, तभी पढावों वेद । यो सुन वालकवैन प्रभु, मनमें वढ्यो सुखेद ॥८८॥ चौपाई। तब चतुरानन बैन बखाने । विद्यावृद्ध वृद्ध सुर माने । तुम अतिवाल वृद्ध सोकहिये। होयशिष्य विद्याको लहिये८९॥ दोहा। यों चतुरानन बैन सुन, गए ऋषीसर सर्व ।। दधीच पूतके शिष्यवहु, भये मिटाइ सुगरव ॥ ९० ॥ चौपाई। तातें तुमहो पितासमान। यों विवेकप्रति पुरुष बखान ।। हमपर ऐसी दया सुकीजै । सगलो मोह दूरकरदीजै ॥९१ ॥ याअवसरपुनशांतिसुआई। उपनिषत सुताके संग सुहाई ॥ शांति पुरुषकोकीन उचार। उपनिषतकरे पदवंदन थार ॥१२॥ शांतिन ऐसै करो बखान । उपनिषत अहै मममात समान ॥ ततवोधको दए उपाइ । तातें हम इन लागे पाई ॥१३॥ (१) देवते मानतेहे ॥

[अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१६५) दोहा। माता औ उपनिषतमै, बडो अंतरो जान ॥ वहुदृढबन्धनको करे, यह करे बन्ध सभहान ॥ ९४॥ पुन उपनिषत विवेकपिख, अभिवन्दन तिहधार ॥ वैठी किंचत दूर तिह, पूछत पुरुष विचार ॥ ९५ ॥ कहो अंब एते दिवस, कहि कहि करे वितीत ॥ उपनिषत वखाने पुरुपको, सुनो इलागार चीत ॥ ९६॥ चौपाई। मठमझार पुन शून अगार । मूरखजनकी संगतधार ।। आपददिन इहभांति विताए । कहांकहो मै अतिदुःखपाए९७ दोहा। कह्यो पुरुप वहिततकछु, जानतथे पुन तोहि ॥ उपनिषत कह्यो कहिजानहै, सगल व्यांपे मोहि ॥९८॥ चौपाई ते निजइच्छाके अनुसार । मेरो अरथ सुकरें उचार ॥ अरथ विचारविना इंउ कलपैं । वेडागणज्यों वाणी जल.९९ परको ठाग द्रब्य तिह हरें। याहित मोहि विचारण करें। मै उपनिषत मोक्षको कारण । पेट हेत सठ करें सुधारण १०० दोहा। पुरुपकह्यो सुन मात पुन, मोप्रति करो उचार ।। किहविध बासरतेंविते, भाखो सगल विचार || १०३।। (१) मेरे पीछे लग गए । (२) द्रवणागण कहिये जैसे द्राविडदेशस्थपुरोषोंकी भाषाको सुनकर कल्पना करतेहै तबत् वाणी कहतेभये । वा द्रवणागण कहिये मेंडकोंका " समुदाय ॥

- (१६६) प्रबोधचंद्रोदय नाटक । [अं०६] . 1 दोहा। घुरुषप्रश्न उपनिषत सुन, लागी करन वखान ।। गुलावसिंह वहिवाक पुन, साधधरो निजकान।।१०२॥ उपनिषदुवाच ॥ चौपाई। ता मै चली बडोपथ जहां । देखी यज्ञविद्या तहां। इत कृष्णाजिन अग्निजलाई । इत समधाघृत जूपसुहाई१०३ स्रोआलौ समभांजन हाथ । इष्टिंपशु मख सोम सुसाथ ॥ कर्मकांडकी पद्धति जोई। नीके मुखो अलाए सोई १०४ तव मै मनमै कीन विचारा। एहु धरे बहु पुस्तक भारा ॥ एक छु ततपछाने ततपछाने मेरा । कोदिन ईहा करों वसेरा१०६॥ तव मै ताढिग शीशु झुकायो । तिन मोको पुन एहु अलायो । कहु कल्याणी वांछतसार । तबमै तिनसों कीन उचार१०६ मै अनाथ दूर मम नाह। तोहि समीप वसनकी चाह ॥ तव तिन मोको एहु वखानी। कौनकाजतूंकरेंकल्याणी१०७ तव मैं कह्यो जुपुरुष उदार । ताको रूप सुकरों उचार ।। जाते विश्वउदे यह होई । जामै रहे लीन पुन सोई१०८॥ जाकभास निखलजग भासे। सहजानंदसु ज्योति प्रकासे ॥ शांति निरंतर अरूपा। निरावयवसुअसंगअनूपा१०९ (१)कालेमृगको चर्म । (२) नुवा-उपभृध्रुवाइत्यादि पात्र । (३) दर्शपूर्णमास इष्टि तथा दृढपशु तथा मखयाग तथा सोमअमिष्टोम तथा पद्धति इति कर्तव्यता क्रम । (४) श्लोक-यस्माद्विश्वमुदेति यत्र रमते, यस्मिन्पुनर्लीयते भासा यस्य जगद्विभाति सहजानन्दोज्वलं- यन्महः । शान्तं शाश्वतमक्रियं यमपुनर्भावाय भूतेश्वर द्वैतध्वां- तमपास्य यान्ति कृतिनः, प्रस्तौमि तं पुरुषम् ॥ १॥ इसश्लोकका अर्थ मूलमें लिखाहै, ॥ 5 4 - , [अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१६७) द्वैत अंधेरो दूर मिटाइ । जामै मिले मुमोक्षी जाइ । तत्वज्ञानते पावे मोक्ष । पुरुष पुरातन है निरदोष११० यहि पुरुष उर ब्रह्म पछानो । ब्रह्म न यांते भिन्न सुमानो। विनाज्ञान भासे पुन भेद । ज्ञान जनावे ब्रह्म अभेद १११ ऐसै बचन सुमेउरधार । यज्ञविद्या कीन उचार ॥ निखलक्रियाको करता जोई। कैसै पुरुष ब्रह्म पुनहोई११२॥ क्रिया भवफासीपर हरे ।ज्ञाननमुक्तिसु काहूं करे। बेदकहें निजकर्म सुकरे। जौलौ जीवै नहिपर हरे ११३॥ दोहा। तात तेग्रह रापणे, सरेन मेरो काज ॥ पर तदपि तूं ऐंवकर, ज्योमम भाखों आज ॥ ११४॥ करताऔ पुन भोक्ता, पुरुष सुअहे विसाल । ऐसै निसवासर कहो, वसोसु किंचतकाल ॥ ११५॥ यामैंकहो सुकोन तव, लागत याजग दोष ॥ योसुन राय विवेक पुन, बोल्यो धार सुरोष ॥ ११६॥ चौपाई। अहो मखनकोधूम सुकारा । यज्ञविद्याके नैन मझारा ॥ तांकर मलनदृष्टि बहुभई । यों कुतर्क यांत निरमई११७॥ यज्ञविद्या है 'निरबुद्ध । ईश्वर पुरुष अकरता शुद्ध । चुंबक मणि ज्यों निहचल अहै । तासमीप लोहाकृत गहै११८॥ त्यों ईश्वरकी संगतपाइ । माया लेवे निखल उपाइ । अज्ञान जनत वन्धनहै जोई। कैसैं कर्म निवारें सोई।।११९॥ (१) श्रुतिः-( कुर्वत्रेवेह कर्माणि, जिजीविषेच्छतप्समाः)अर्थयहः-इस कर्माधिका- रभृलोकमें अग्निहोत्रादि कौंकू कर्ताहूआही सौवर्षपर्यत जीवनेकी इच्छा करे । (२.) ईश्वर भौ पुरुषजीवात्मा । - 1 L - (१६८) प्रबोदचंद्रोदय नाटक। [अं०६] तमज्यों तमको दूर नकरे । त्यों नही कर्म सुबन्धनहरे ॥ तांत यज्ञविद्या है जोई । सम्यक अर्थ नजाने सोई१२० दोहा। लीने अंधेरो भवन तम, करेसुजव प्रकास ॥ तब बिनज्ञान सुकर्मते, होवै बन्धननास ॥ १२१॥ विन आत्मके ज्ञानते, मुक्तिपंथ नहि आन॥ ऐसे बदनसरोजते, करे सुवेदंवखान ।। १२२॥ कह्यो पुरुष उपनिषतको, बहुरों कहो विचार ।। यज्ञविद्या तोहिको, कैसै कीन उचार ॥ १२३ ॥ उपनिपदुवाच ॥ चौपाई। यज्ञविद्या बहुर विचार । मोको याविध कीन उचार ॥ सखी सुतेरी संगति जोई। हमरे शिष्य बिगारे सोई १२४ दोहा। फल अनित्य सोजानकै, करेन सादर करम ॥ तेरी संगति पाइके, जाने निखल सुभरम ॥ १२५ ॥ तातें वांछतदेशको, करो गमन ततकाल ॥ तव मैं ताको छोडिकर, चाली बहुर उताल ॥ १२६॥ कर्मकांडकी सहचरी, पिखी मीमांसा जाइ ।। बहु प्रकार भाषे कर्म, बहु अधिकारी पाइ ॥१२७॥ तामै कह्यो समीप तव, बसोंसु किंचतकाल ॥ तब उन कह्यो सुकर्ममुहि, भाषो सखी बिसाल ॥१२८ (१) अन्धेरकेर ग्रस्त ग्रह। (२) ऋतेज्ञानानमुतिः । ज्ञानादेव तु कैवल्यम् । नान्यः पन्थाविद्यतऽयनाय इत्यादिवेद ॥

[अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। ( १६९) चौपाई। तब मै कह्यो पुरुषको रूप । मै भाखोंगी परम अनूप ॥ निज शिष्यनको बदन निहार। बहुर मीमांसा कीन उचार१२९ फलउपभोग योग्यहै जोई । पुरुष बखानेगी यह सोई॥ करो कर्म इम ताहि उचारियो। तवतांशिष्यअनुमोदनधारियो तब तांशिष्य एकथो जोई। मीमांसाकोरिद अंगम सोई॥ नाम कुमारलस्वामी वाको । करविचारतिनभाख्योताको । करम निफल उपभोगता.जोई। उपनिषत कहे नहआत्मसोई ।। किंतु कहे अकरता सोई ।भुक्ता नाहिकदाचित होई १३२ ऐसै आत्म रूप सुजोई। करम उपयोग्य करे नह सोई॥ बहुरो बोल्यो अपर विचार ।ज्योंहै त्यों ममकरो उचार १३३ पुरुषदोइ जगभीतर गाए । एक जीव इक ईश वताए । मोह अंधेरे जीव दवायो । ईश्वरसकल सुसाक्षीगायो१३४ वांछे करमफल जीव सुजेते। ईश्वर देवे ताको तेते ॥ जीव करममें है अधिकारी । ईशअकरताबेदचारी१३५॥ कल्पतवन्ध जीवमै अहै । नित्यमुक्ति परमेश्वर कहै ॥ सुन विवेक भूपति हरखाने । साधुसाधु मुखमाहि बखाने । होवै भले सुदीरघ आयो । जाने याविध अर्थ अलायो दोन सपेरण बेदमै गाए । रहें इकठे सखा वताए॥१३७॥ (१) यस्मादिश्वमुदेति, इस पूर्वोक्त श्लोककर पुरुषका रूप कहा। (२) साधुसाधु इसप्रकार स्वीकार किया। (३) (दासुपर्णा सयुजा सखाया, समान वृक्षं परिषस्वजाते तपोरन्यः पिप्पलं स्वा दत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।। अर्थयहः-दो पक्षी जीवात्मा परमात्मा सो कैसे हैं साथ रहिनेवाले हैं तथा परस्पर अनुकूल है, तथा एक, शरीररूप वृक्षकू आलिङ्गन (स्वीकार,) करतेहैं तिन दोनोमें एक जो जीव है सोस्वादु ( पक्क) कर्मके फलकू भोगताहै और अन्य जो परमात्मा है सो तिस कर्मफलकू नहीभोक्ताहूआ प्रकाशता है नाम साक्षिरूप होयकर देखताहै ।।

(१७०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०६] समान वृक्षमै कीन सुवासा । एक खाइ फल एक उदासा॥ बहुर पुरुष उपनिपत अलयो । कहो मात तहबहुरसुभयो १३८ सुन शिष्यनको एहु विचार । मिमांसा मोप्रति कीनु उचार।। जह इच्छा तह कीजैगौन । लायक नाहि हमारे भौन १३९ मीमांसाते मैचली अगारी। तर्कविद्या और निहारी॥ बहुते शिष्य सुसंग सुहाए । सेवत ताहिं निरंतर पाए१४०॥ धनकी इच्छा मनमै धार । बैठी भूपति सभामझार ॥ जलप वितंडावादै बिसाला । छैलनिग्रहवहुकरेकराला १४१ सांख्यविद्या बहुर निहारी । वैठी लांबी भुजा पसारी ॥ पुरुषनको वहुभेद बखाने । ततनकी गणना उर ठाने१४२ कहे प्रकृतिसु जगत उपाये । महदादिक क्रमभाख सुनाए। बहुर पतंजलविद्या देखी। पुरुष भेदबहुकहे विसेखी१४३ मैसभ हनके निकटि सुगई। भाष्यो ईहावासहित अई॥ तब तिन करो सुकरमअलाइ। मैपुन वही सुदयो वताइ१४४ ईश्वर निखल सुजगत उपाए । पुरुष नाम पुन वही कहाए । क्रोधयुक्त तामै इक भई । फुरेहोठयों वात अलई १४५॥ (१) (उभयपक्षस्थापनवती विजिगीषुकथा जल्पः) अर्थयहः-वादी प्रतिवादी इन दोनोपक्षोके स्थापन करनेहारी ऐसी जा परस्परजीतनकी इच्छावान् वादी प्रतिवादी दोनों- की प्रश्नउत्तररूप कथाहै ताका नाम जल्पहै। (२) (स्वपक्षस्थापनहींना विजिगीषु- कथा वितंडा) अर्थ यहः-आपणे पक्षके स्थापन रहित ऐसी जा जीतणेंकी इच्छावाले पुरुषोंको परस्परकथा है ताका नाम वितंडाहै। (३) (तत्वबुभुत्सोः कथा वादः) अर्थ यहः-तत्ववस्तुके बोधनकी इच्छावाले पुरुषोकी जापरस्परमश्नउत्तररूप कथाहै ताका नाम वादहै। (४) (अर्थान्तरेण प्रयुक्तस्य शब्दस्यार्थान्तरवर्णनं छलम् ) अर्थ यहः-अन्य- अभिप्रायसें कथनकियेहुए शब्दके अन्यअर्थक वर्णनका नाम छलहै । (५) सत्वरजतम- गुणकी समअवस्थाका नाम प्रकृतिहै ता प्रकृतिसे महत्तत्व, महत्तत्वसे अहंकार अहंकारसे पञ्चतन्मात्रा, पञ्चतन्मात्रासें पञ्चभूत, औ दश इंद्रियये षोडस विकार तथा पुरुष जीवात्मा ये पचीस तत्वहै । (६) नानापुरुष (जीवात्मा) मानेहैं ।

[अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। (१७१) कौन बलाय कहांते आई। जाने ऐसी वात अलाई।। ऐसी बुद्धि तुमारी यातें धक्केखातफिरतहै ताते॥१४६॥ हापापिनि ईश्वरहैं जोई। किहबिध जगत् उपावै सोई॥ एक कहें प्रधान उपायो। एके कहें प्रमाणुजायो।।१४७॥ योंसुन रायविवेक सुजोई । लागो करण उचारण सोई ।। तरकविद्यालो सम . जेती । दुष्टबुद्धि जानी सभतेती १४८ कार्य अहै निखलजग जेतो। ईश्वर सगल उपायो तेतो ।। एतीबाति नजानत जेई । हैं अति मूर्ख जगमै तेई१४९॥ प्रधान प्रमाणुलौ समजेते । कल्पत अहै सगल पुन तेते॥ भूमि नीर अरु पावक पवना। कलपत सगल स्वप्नपुरभौना॥ गन्धर्वनगर पुन इंन्द्र सुजाल। तांसम जान असत बिसाल ॥ सीपरूप ज्यों रज्जु भुजंगा ब्रह्मअज्ञानजन्योजगअंगा१५१ दोहा। ब्रह्मज्ञानके उदेते, होवतहै पुन लीन । ज्यों जागेते होतहै, स्वप्न सगल भ्रम खीन ॥ १२ ॥ चौपाई। विकारसंक तिहभीतर जोई । मूढमति उर कल्पी सोई शांति सदा वहिज्योति प्रकासी। नित्यप्रकास सदाअबिनासी॥ जगत गन्धर्व नगर सुउपाए। रंचंकनाहि बिकार सुपाए । नीलमेघ अरु धूल अपारा । नभमै करे नरंच विकारा॥१५४ चौपाई। संदेहदवानल चीतमंझारी । अमृत सिंचं विवेक निवारी। मेरो चीतसु अतिहरषयो ।भलो बिचारबिवेक अलयो१५५ (१) सांख्यी । (२) नैयायिक ॥ पुरुष उवाच ॥ - । - (१७२) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०६] दोहा । पुरुष कयो उपनिषतको, बहुरों करो प्रकास ।। तरकविद्या पासतें, कैसै भई उदास ।। १५६॥ उपनिषदुवाच ॥ सर्वभईते क्रोध मन, ऐसे कीन वखान ।। कहे जीवकी मुक्ति यह, सकलविश्वकर हान॥ १६७॥ तातें नास्तकपंथको, एअब करे उचार ॥ केसन” याको गहो, करो भलीविध मार ॥ १५८॥ चौपाई। पुरुष नारायण ईश्वर जोई। तव मै चीत चितायो सोई॥ कह्यो पुरुष ईश्वरहै कोई तव करुणाकर जानो सोइ १९९ उपनिषत्कयो जो आपनजाने। ताको उत्तर कौन बखाने । हरपसंयुक्त पुरुष पुन कहे। किहविध मेपरमेश्वर अहै१६० उपनिषतकह्यो परमेश्वर जोई। तोतेभिन्न नही पुन सोई।। तूं परमेश्वरते नहीं न्यारो। ऐसै सदा चीत निरधारो १६१ दोहा। माया अहै अनादि जो, ताकी संगति पाइ ॥ जल सूर्य प्रतिबिंबज्यों, भेदवंत दिखलाइ ॥ १६२॥ बहुरो पुरुष विवेक प्रति, को जोर कर दोइ ॥ भगवन अर्थ उपनिषत्को, कह्योन निश्वेहोंइ॥ १६३॥ चौपाई। मै अवच्छिन्न भिन्न पुन जोई। जरामरण धरमा पुन सोई॥ नित्यअनंद चिदात्म गाए। परंब्रह्म मम रूप बताए १६४॥ (१) शरीरा वच्छिन्न। (२) उपनिषत् ॥ H PanamaAGO [अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। ( १७३ कह्यो विवेक पदार्थज्ञान । अबलग तोहिभयो नहि भान।। पदार्थज्ञान उपावसु जोई कह्योपुरुषअव भाषोसोई१६५ कयो विवेक सुनो मनलाई । तोको देहु उपाइ बताई ॥ तत्वंपदके अर्थ भनीजे । एकवाच्यपुनलक्षकहीजे १६६ वाच्य अभिन्न कदाचित नाही । लक्षमाहि विरोधसु नाही। लक्ष चिदात्म है ये जोई । सो मैंयों उर चितवोसोई१६७ निखल उपाधिसु दूर निवारो। बहुरो तत अर्थ निरधारो ॥ तत्वमसि यों भाखे वेद । तातें निखल मिटावे भेद१६८ निखलद्वैतको दूर निवारो। चिदानंद उर आत्म धारो॥ बहुर पुरुप उपनिषत अलयो ।तिहउपरंत कहोक्याभयो१६९ उपनिषदुवाच ॥ दोहा। तवते सर्व सुदुष्टमति, मोहि फरनकेकाज ॥ दौरीचारों ओरते, मैंतब चाली भाज॥ १७०॥ सीतापति रघुवंशमणि, रामशील यशभौन ॥ जिह दंडकवनमै गए, तिह मैकीनो गौन ॥ १७१।। तिह मंदर परवतविषे, मधुसूदन असथान॥ -ताहिनिकट जोदशामें, भई सुकरों वखान ॥१७२॥ चौपाई। किनहूँमै भुजदंड प्रहारे । तोडि मणि करकंकण तारे।। चूडामणि शीशते लीनो बैंचे केशबहुतदुःख दीनो१७३ (१)केईकपण्डतोंने. सधिविभक्तिरूप जो भेरेभुजदण्डहै सो तोडहारेहैं तथा कंठकी मणिस्थानी अहंग्रह उपासनाहै सो फोडडारीहै अर्थात् बैंचकर मतीक उपासनामे स्थापन करें, औ करके कंकणस्थानापन्न निष्कामकर्म तथा विधिहै इनदोनोको हरणकरे है और चूडामणीस्थानापन्न जो तत्वमस्यादिमहावाक्यहे तिनको मतवादियोंने शीशकी न्याई प्रधान 1 - (१७४) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०६]. दुरविदग्ध बहुता बनमाही। दासीकरन सुमेरचाही ॥ विछुरी मम विवेकते जान ।बहुविधमेदुःखदयोअजान:५४ कह्यो पुरुष बहुरोंभयो जोई। मोको सगल सुनावो सोई।। कहि उपनिषत सुनो मनलाई । तब मेरे हरि भये सहाई १७५ तब मधुसूदनके असथान । निकसे पुरुष परमवलवान ॥ लेकरगदा सगलतेडानी । तब मोको वहिछाडि पलानी॥ राजोवाच॥ दोहा । भागविहीन विमूढजे, करेंते अपमान । सहे न उरमै रंच वहु, जगसाक्षी भगवान॥ १७७॥ पुरुष उवाच ॥ वैदुष्टादशदिश गयी, दंडक विपनमझार॥ तवते कौन सुविधभई, मोको करो उचार ॥ १७८॥ उपनिषदुवाच ॥ चौपाई। गीताके आश्रमकीओरा । दौरी मै उर डो सुमोरा ॥ नूपर टूटिपरी पथमाही । वरी जाय आश्रमकेमाही१७९ तव गीता दुहिता मम प्यारी । पेखिकझोआई महतारी॥ मातमातयों मुखो अलायो । मैपदपंकजशीशु झुकायो१८० -मुझ उपनिषद्से लीयाहै अर्थात् अंशअंशी, विकारविकारी, कार्यकारण, प्रकाश्यप्रकाशक, भाधेयआधार, उपासकउपास्यादिक भान् (ज्ञान) कर अखंड अर्थका खंडन कियाहै तथा अवांतरवाक्यरूपी केग तिनवादियोंने मेरे खैचेहै भाव यहहैः-(सत्यं ज्ञानमनंत ब्रह्म) इसअवांतरवास्यमें सताजातिमानीहै तथा ज्ञानादिक गुणमानतेहैं इति । १) चरणभूषण । (२) मेरे चरणों में शिर निवाया ॥

। । [अं०६] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। ( १७६) भलीभांति मुहि अंकमिलाइ । हेमपीठमै ल्यो बैठाइ ।। भयो वृत्तांत निखल तिनजान्यो।बहुर सुमोकोएहुबखान्यो३८१ दोहा। मात डरो नहि चीतमें, तेरो कर अपमान । दुष्ट यथेष्टमें रमेंजे, ताहि हने भगवान ॥ १८२॥ . चौपाई। श्रीपति योंमुख आप वखाने । दुष्टसुजे उपनिषत नमाने। क्रूर नराधम हैं जग जेते । असुरयोनिमेंडरों तेते॥१८३॥ सुनकर पुरुष अनंद तब भयो । यो मुखमाहि सुबैन अलयो। सुन्यो अर्थमै . पूर्व जोई । उपनिषत करावत निश्चे सोंई ॥ कवि रुवाच ॥ दोहा। श्रवण मनन पूर्णभयो, निखलं संदेह निवार ॥ निदध्यासनकी चाह उर, भई सुपुरुष उदार ॥ १८५॥ चौपाई। याअवसर निदध्यासन आयो । बैठ सभामै एहु अलायो॥ विष्णुभक्तिने मोहि पठायो । तातै मै ईहाचल आयो१८६॥ गूढ हमारो आसय जोई ।उपनिषत विवेकप्रतिभाखोसोई दोनोको यहबात प्रकास । पुरुषमाहि तूंकरी निवास १८७ (१)गीतामें कहाहैः-तानह द्विषतः दूरान्संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यनस्रमशुभाना- सुरीष्वेवयोनिषु ॥ अर्थयहः हेअर्जुन-देषकरणेहारे तथा क्रूर तथा नरोंविषेअधम तथा निरंतर अशुभकाँकू करणेहारे ऐसे तिन आसुरसाकृतिपुरुषोंकू मै परमेश्वर अत्यन्त क्रूर व्यावसादिक योनियाविषे ही गेरताहूं। (२) श्रवणनामाद्वैते ब्रह्मण्युपनिषदांता- पर्यावधारणम् । मनन नाम युक्तिभिरनुचिन्तनम् । निदिध्यासन नाम विजातीयपत्यय- तिरस्कारेण सजातीयमत्ययमवाहीकरणम् ॥ . -- , । 4 1 + -- म है (३७६) प्रवाषचंद्रोदय नाटक। [अं०६ बहुर विलोकसु एहु वखानी। यह वैठी उपनिपत सुरानी। पुरुप विवेकसंग सुहाए । चलो नजीक सुदेहु सुनाए १८८ एसवखाननिकट बहुगयो । उपनिषतसमीपसुवाक अलयो देवी विष्णुभक्ति जोई ताहि वखान्योसुनिये सोई १८९ संकल्पयोनि देवता सारी। यह नीकेमे आप निहारी।। उपनिपतसंगी तूं अव भई । कन्या तेउरमै निरमई॥१९॥ और प्रबोधचन्द्र सुत जान । मेरो कह्यो सुसत्य पछान । रसुभावजु कन्या अहै। उपजीनिखलसंवन्धी दहै १९१. ब्रह्मविद्या कन्या जोई। मनमैं करो संचारण सोई॥ संकर्षणविद्याको उरधार । मनके उदर कन्या डार १९२॥ प्रवोधचन्द्र पूत पुन जोई । पुरुषसमर्पणकीजे सोई॥ विवेकसहित तूं मेरे पास उपनिषत करो अव सहजनिवास दोहा। विष्णुभक्ति जोभाप्यो, सोईकरोंन और ॥ योंकहि संग विवेकके, गई इकंत सुठौर ।। १९४।। निदध्यासन तव पुरुषक, कीनो आन प्रवेश ।। धन्यो पुरुष उर ध्यान तब, जाकर हरे कलेश १९५ ।। नेपथ्यमाहि प्रवेशकर, दोनो नयन मिलाइ ॥ अद्भुतरूपध्याय उर, बोल्यो सहज सुभाइ ॥ १९६॥ (१) संकल्पमात्रतेउत्पतिहै जिनोकी न मधुनसे तथा चश्रुतिः-(ब्रह्म वा इदमम आसीत् ) इहासं आरंभकरके (इसर्वमभवत् ) ईहांपर्यंतसकल्पप्रभवत्व दिखायाहै बृह- दारण्यकमें इसप्रकारमै योगसामार्यजन्यध्यानसे जान्या । (२) विवेककेसंकल्पसें । (६) जगत्का नाशक होनेते कूरसुभाववाली है। (४) आत्मसाक्षात्कार रूपा । ५) योगकर आकर्षणरूप । (६) निरतिशय ब्रह्मप्रकाशक । - rammarwaemon- ३ . - • [अं०६] प्रबोधचंद्रोदय नाटक। ( १७७) मन वक्षस्थल फोरकै, कन्या भई प्रकास ॥ सहत समग्री मोहको, कीनो एक ग्रास ॥ १९७॥ तडता समदमकी महां, दिशको तिमर मिटाइ। अंतरध्यानक्षणमै भई, ऐसोरूप दिखाइ ॥ १९८ ।। यह प्रवोधशशि उपज्यो, ताको भ्रात विसाल ॥ सभाप्रवेश प्रबोध तव, कीनो वाहूंकाल ॥ १९९ ॥ कहांगयो किनभयो भव, लीनभयो ततकाल॥ जाउपजेते भयो यों, सोमै बोध बिसाल ॥२०॥ परकरमदेपिखभाष्यो, यहहै पुरुष उदार॥ चलों समीप सु याहिके, करों सुपाद जुहार ॥२०१॥ जाइसमीप सुपुरुपके, भगवनमुखो उचार ॥ हौं प्रबोधउपनिषत सुत, बन्दो पाद तिहार ॥२०२॥ पुरुष विलोक आनंदउर, हेसुत परम अनूप ॥ मिलोसु मेरे अंकमें, कीजे शीतल रूप ॥२०३।। मिल्यो प्रबोध सुपुरुषको, शीतलचन्द उदार ॥ पुरुष अनंद सुहोय उर, लागो करन उचार ॥२०४॥ अहो तिमर पट फाटियो, भयो प्रभात अनूप॥ निखलकलेश बिनाशया, पायो परम सरूप ।।२०५॥ मोह अंधेरै बिनाशकर, नींद विकल्प सुमार ॥ वोधशशि यह ऊपजो, जाकी प्रभा अपार ॥२०६॥ - - । - . सवैया। - आज परात्म पूरन जो, वहि पूरन रूप सुदेत दिखाई। वन्धन जो सभ दूरभये, रविसी उरअंतर उजलताई ॥ (१)-(ससारराज्यपगमा दोषः प्रातः क्षणो मतः ) अर्थयहः-ससाररूपी रात्रीके जानेसे बोधही मातःक्षण मान्याहै। (२) अज्ञान । (३) भ्रमही निंद्रा है ।। .

(१७८) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०६] आज कृतार्थभूरभये सुमिटी निजआत्मकी कलखाई ॥ बोधकरे सभकाजसंपूरन, पूत सुपूतभये सुखदाई ॥२०७॥ दोहा। श्रद्धा मति विवेक पुन, शांति यमादिक धार ।। सर्वात्मप्रभविश्न जो, सोहम भए उदार ॥ २०८॥. हरिकी भक्तिप्रसादते, भए कृतार्थ रूप ।। बन्धन सगल मिटाइया, पाए ज्ञान अनूप ॥२०९॥ बैठ इकंत सुमोन गहि, मनकर कीनो ध्यान ॥ शांतिभयो भय शोकहन, भयो मोह सभहान ।।२१०॥ यांप्रबोधहित भवनतजि, भवें भवारण्यमाहिं ।। ताकोपाइ सुमुनिभयो, मैं निजभवन सुमाहिं ॥२१॥ विष्णुभक्ति आई तवै, उरमै हरप अपार ॥ आइ समीप सुपुरुषके, कीनो एहु उचार॥२१२ ॥ बहुतकालकर फले जग, मोहि मनोरथ आज॥ शांतिअराति सुतवपिखों, भये सगल मम काज॥२१३ पुरुष कह्यो तब कृपाते, कोफल दुहकर आहि ।। ऐसै मुखो अलाइकर, पयो सुचरननमाह ॥२१४ ॥ दोहा। विष्णुभक्ति सुउठाय तिह, कीनो एहु उचार ॥ पूतकहो प्रयकाजकछु, पुन मैं करों तिहार ॥२१॥ पुरुप कह्यो अब याहिते, परे नप्यारे काज ।। जीत अराति विवैकनृप, भयो कृतार्थ आज ॥२१६॥ (१)श्रद्धा गुरुवेदवाक्ययोर्विश्वासः,-विवेकमतिर्नित्यानित्यवस्तुविवेकविषया-शा- वासन्यम्-यमश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ 7 (१७९) [अं०६] प्रवोधचंद्रोदय नाटक। रुजविहीन आनंदपद,थाप्यो ताहि सुमोहि ॥ विष्णुभक्तिपदवन्दना, करेकाज सभ तोहि ॥२१७॥ सवैया। यद्यपि पूर्ण आहि मनोरथ तदपि मात सुएहु वरे॥ रुचिके अनुसार करें वरषा, घनभूपति भूमिसुपालकरे ॥ तेंकरुणाकर लोक महात्म, आत्मको तमं दूरहरें। भवसागरधार विषेममता, गहि वोधजहाजसुपार परें॥२१८॥ दोहा। प्रत्यक्तत्व निज आत्मा, कीरति वरमाभूप ॥ मनोवृत्ति सभनाटकै, कोविदल अनूप ॥२१९॥ सवैया। यह नाटकहे रसुभूपतिके उरमाहि सुभाऽसुभ-ज्ञानभयो । तजिया जगमाहि कुपंथ वडो शुभपंथमहीपति चीतलयो। बिसमाय रह्यो उरभीतर सो सुशिलूपनको बहु दानदयो । बहुनाटकहैं भवमंडलमें नरनाहनको यह नाटनयो॥२२०॥ दोहा। कहनेको यह नाटहै, दरपन अहै अचार । पावै पावन मोक्षको, कीने याहि विचार ॥२२१॥ गौरी जननी लोकमें, राया जनक महान ।। गुलाबसिंह सुत ताहिके, नाटक कीन वखान।।२२२॥ कीरति पूरनलोकमै, पूरण परमानंद ॥ पूरन पददातारप्रभु, वन्दौ श्रीरघुनंद ।। २२३ ॥ (१) अन्तः करणमे जो अज्ञान ॥ . 1 - " (१८०) प्रबोधचंद्रोदय नाटक। [अं०६] जिह अज्ञान निवारयो, दीनो मोक्ष अपार ।। मानसिंह गुरुचरनको, बन्दौ वारंवार ॥ २२४ ॥ शंकरछन्द। रंस वेर्दै औ वर्स चन्द संवत लोक भीतर जान॥ नभमास भृगु पुन वासरे दशमी वदी पहिचान ॥ गुरु मानसिंह पदारविंद अलंबना उरठान । कुरुक्षेत्र प्राचीकूलतट यह कीन ग्रन्थ वखान ॥२२५॥ श्लोक। शुद्धाशुद्धञ्च संशोध्य गुढार्थाश्च प्रकाशिताः॥ अविशिष्टामशुद्धिञ्च शोधयन्तु मनीषिणः॥१॥ गुरोः कृपां समासाद्य रचयित्वा सुटिप्पणीम् ।। मया गुरुप्रसादेन गुरोः पादे समर्पिता ॥२॥ इति श्रीमन्मानसिंह शिक्षित गुलाबसिह विरचिते भबोधचन्द्रोदय नाटके षष्ठोङ्गः समाप्तः ॥६॥ SENSORSRESCRESCRIEREREAS RESEASOGACREDERER6F इन्दुस्कन्दाङ्कचन्द्रेऽब्दे द्वादश्यां श्रावणे तिथौ ।। वनखण्डिप्रसादाख्यात्सम्पूर्णा टिप्पणी शुभा ॥ १ ॥ - GHBHOSSFUGUPOSBHOJUPOPOSSIBSEBIOPOPUSSAUGUST ) अर्थ यहः-इसग्रन्थमें शुद्धाशुद्धका शोधन करके गूढअर्थोका प्रकाश कियाहै श (बाकी ) रहीहुई अशुद्धिको बुद्धिमान् पुरुष स्वय शोधलेवे ॥ १॥ १५. कृपाको माप्त होयकर मैं गुरुपसादने सुंदरटिप्पणिका निर्माणकरके श्रीगु- चरणोमें समर्पित कियीहै ॥२॥ इतिश्री १०८ मत्परमानन्दोदासीन शिष्यगुरुमसादविरचिता प्रबोधचन्द्रो- दयनाटकटिप्पणिका समासा ॥ १॥ इति शम् । 1 * 1 है

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Prabhod Chandrodya Natak

Author
Swami, Paramanand
Title
Prabhod Chandrodya Natak
File name
Prabhod Chandrodya Natak
Text
OCR done
Citation
1905
Published
2009/09
Publisher
Bombay, Venkateshvar Steam Press
Language
Sanskrit
Pages
188
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
344173
Barcode
99999990234053.00
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