Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Praman Manjari Granthank -iv
Front matter
तार्किकचूडामणि-सर्वदेव - विरचिता
प्रमाणमञ्जरी
[बलभद्गमिश्र-अद्वयारण्ययोगि-धामनभट्ट-पिरचित व्याख्यानय समन्विता]
संपादनकर्ता
पं. पट्टाभिराम शास्त्री, विद्यासागर
प्रकाशन कर्ता
राजस्थान राज्याशानुसार
संचालक, राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिर
जयपुर (राजस्थान)
*
विश्रामान्द २०१०
मूल्य ४-०-०
[सित
मुदक- लक्ष्मीबाई नारायण चौधरी, निर्णयसागर प्रेस,
२६-२८ कोलमाट स्ट्रीर, पंचई. २.,
राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला गणी। कवि । 'संस्कृत-प्राकृत साहित्य श्रेणि' के अन्तर्गत जो अन्य प्रेसोंमें छप रहे हैं उनकी नामावलि १ त्रिपुराभारती लघुस्तव-कर्ता सिद्धसारस्वत लघुपण्डित । २ बालशिक्षा व्याकरण-कर्ता ठकुर संग्रामसिंह । ३ करुणामृतप्रपा-कर्ता महाकवि ठकुर सोमेश्वर देव । ४ पदार्थरलमञ्जूपा-कर्ता पं. कृष्णमित्र । ५ शकुनप्रदीप-कर्ता पं. लावण्यशर्मा । ६ उक्तिरलाकर-कर्ता पं. साधुसुन्दर ७ प्राकृतानन्द (प्राकृत व्याकरण)-कर्ता पं. रघुनाथ ८ ईश्वरविलासकान्य-कर्ता पं. कृष्णभट्ट । ९ महर्पिकुलवैभव-कर्ता पं. मधुसूदन ओझा विद्यावाचस्पति । १० चक्रपाणिविजयकाव्य-कर्ता पं. लक्ष्मीधर भट्ट। ११ काव्यप्रकाशसंकेत- कर्ता भट्ट सोमेश्वर । १२ प्रमाणमञ्जरी (वृत्तित्रयोपेता)-मूलकर्ता सर्वदेवाचार्य । १३ वृत्तिदीपिका-कर्ता मौनि कृष्णभट्ट । १४ तर्कसंग्रह फक्किका- कर्ता पं. क्षमाकल्याण गणी । १५ राजविनोद काव्य-कर्ता कवि उदयराज । १६ यंत्रराजरचना-कर्ता महाराजा सवाई जयसिंह । १७ कारकसंवन्धोद्योत- कर्ता पं. रभसनन्दी। १८ शृंगारहारावलि-कर्ता श्रीहर्प कवि १९ कृष्णगीतिकाव्यानि-कर्ता कवि सोमनाथ । २० नृत्तसंग्रह-अज्ञात कवि कर्तृक । २१ नृत्यरनकोश-कर्ता राजाधिराजू कुंभकर्णदेव । २२ नन्दोपाख्यान- अज्ञातविद्वत्कर्तृक । २३ चान्द्रव्याकरण-कर्ता महावैय्याकरण चन्द्रगोमी। २४ शब्दरत्नप्रदीप - अज्ञातकर्तृक । २५ रलकोश २६ कविकौस्तुभ-कर्ता पं. रघुनाथ मनोहर । २७ मणिपरीक्षादि-प्रकरणानि अज्ञातकर्तृक २८ सामुद्रकम् २९ शतकत्रयम्-कर्ता भर्तृहरि । ३० वसन्तविलास- अज्ञातकर्तृक। " " किञ्चित् प्रास्ताविक * सर्वदेवाचार्य प्रणीत प्रमाणमञ्जरी नामक प्रस्तुत ग्रन्थ वैशेषिक दर्शनका एक प्रमाणभूत और प्राचीन प्रकरण ग्रन्थ है। इस ग्रन्थका मूलमात्र ही अभी तक प्रकाशमें आया है, लेकिन व्याख्यादिके साथ यह कहींसे प्रकाशित नहीं हुआ । आधुनिक विद्वानोंको तो इस अन्यका परिचय भी शायद नहीं है । राजस्थान, मध्यभारत एवं गुजरातके प्राचीन पुस्तक भण्डारोंमें इस प्रन्यकी अनेक हस्तलिखिन प्रतियां प्राप्त होती हैं और इस पर रची हुई भिन्न भिन्न विद्वानों की व्याख्याएँ आदि मी यत्रतत्र उपलब्ध होती हैं। इससे ज्ञात होता है कि प्राचीन कालमें, राजस्थानमें इस प्रन्यके पठन-पाठन और अध्ययन-अध्यापन आदिका यथेष्ट प्रचार रहा है । कोई १२ वर्ष पहले बंबईके निर्णयसागर प्रेसने इस प्रन्थका मूलमात्र छाए कर प्रकट किया था, जिसे देख कर इसकी व्याख्या गैरहके विषयमें कुछ जानकारी प्राप्त करनेकी हमें इच्छा हुई । सन् १९४३ के प्रारंभ में जेसलमेरके ज्ञान भण्डारोंका निरीक्षण करनेका हमें प्रसङ्ग प्राप्त हुआ उस समय वहाँके एक ज्ञान भण्डारमें बलभदमिश्रकी व्याख्याघाली इसकी १ इन बलभद्रमित्रने केशव मिश्रकी तर्कभाषापरभी तर्कमापा प्रकाशिका नामक संक्षिप्त परंतु मुन्दर व्याख्या बनाई है जिसकी एक प्रति पूनाके भाडारकररीसर्च इन्स्टीट्यूट में संरक्षित, राजकीय मन्य संग्रहमें, मुर- क्षित है । इस व्याख्या के आद्यन्त पद्य इस प्रकार हैं मादि-विष्णुदासतनूजेन बलभद्रेण तन्यते । ध्यात्वा विष्णुपदाम्भोज सकभाषाप्रकाशिका । मन्त-विष्णुदासतनूजेन माध्वीपुत्रेण यत्नतः । अकारि बलभद्रेण तकमायाप्रकाशिका ।। इन बलभद्र मिश्रका समयनिर्णायक कोई विशिष्ट आधार अभी तक ज्ञात नहीं हुआ है । परंतु भावनगरके जैन शान भण्डारमें प्रस्तुत प्रमाणमझरी व्याख्याकी एक प्रति हमारे देखने में आई है उसका लिपिकाल आदि इस प्रकार लिखा हुआ है। संवत् १६६७ वर्षे भादवासुदि । दिने घार सोमे प्रती पूरी कीधी । मोठ ज्ञातीय पंच्या भवान मुत पेच्या मेघजी। इस पक्तिसे इतना तो निम्धित ज्ञात हो रहा है कि वि. सं. १६६७ के पहले ही बलभद्र मिश्र कमी हो गये हैं। इसके पूर्वकी समयमर्यादा का विचार करने पर, यह भी निमित रूपसे कहा जा सकता है कि तर्कभाषाके फर्ता पं. केशवमिश्रके बाद ही बलभद्र मिश्र हुए है। केशवमित्रका समय, विद्वानाने प्रायः ईखी १३.० के कुछ पूर्ववती अनुमानित किया है। क्यों कि तर्कभाषाके पहले टीमकर चिनभा है जो इखीकी १४ वी शताब्दी के पूर्वा में हुए हैं। दूसरी ओर केशवमिश्रने अपने अन्य प्रसिद्ध महानैयायिक गंगेशके विचारोंका भनुमरण किया है, अतः गंगेशके बाद ही फेशमिश्नका होना सिद्ध होता है। गंगेशोपाध्यायका समय विद्वानोंने ई. स. ११५.. १२.. के लगभग अनुमानित किया है। अतः इस तरह ई. स. १२००-१३०. के बीच में केशमिश्रका होना मानना संगत लगना है। हमारा अनुमान है कि प्रमाणमभरी और तर्फभाषाके टीकाकार ये वलभद्र मित्र वे ही हैं जो तर्कभाशकी एक सरी व्याख्या करनेवाले गोवर्धन मियके पिता थे। गोवर्दन मिने अपनी तर्कभाषाप्रकाश नामक व्याख्या में अपना परिचय इस प्रकार दिया है- - किञ्चित् प्रास्ताविक एक प्राचीन सुन्दर हस्तलिखित प्रति हमें देखनेको मिली। हमने उसकी प्रतिलिपि करवा ली । खोज करने पर, पूना, बडौदा, बंबई, बीकानेर, भावनगर, पाटन, अहमदाबाद आदि स्थानोंके प्राचीन ग्रन्थोंके संग्रहोंमें भी इस ग्रन्थकी अन्यान्य टीकाएँ और उनकी अनेक प्रतियाँ ज्ञात हुई। राजस्थान सरकारने, हमारी प्रेरणासे प्रेरित हो कर, सन् १९५० में, जब राजस्थान पुरातत्व मन्दिरकी स्थापनाका शुभ संकल्प किया और प्रारंभमें इस मन्दिरके संचालनका भार हमारे ही ऊपर रखना निश्चित किया गया, तब हमने प्रथम ही वर्षमें इस संस्थाकी भोरसे प्रकाशित किये जानेवाले, जिन प्रन्थोंका चुनाव किया उनमें प्रस्तुत प्रमाणमञ्जरीको भी स्थान दिया और इसके संपादनका कार्य, पण्डितप्रवर विद्यासागर श्रीपट्टाभिरामजी शास्त्री (जो उस समय जयपुरके महाराजा संस्कृत कॉलेजके प्रधानाचार्य के पद पर अधिष्ठित थे) को सौंपा । पण्डितवर्य श्रीपट्टाभिरामजी शास्त्री मीमांसादर्शनके एक प्रौढ विद्वान् है और आपने इतःपूर्व अनेक उच्चकोटिके प्रन्थोंका संपादन संशोधन आदि कार्य वडी निपुणताके साथ किया है । वर्तमानमें आप कलकत्ता युनिवर्सिटीके संस्कृत-विभागमें प्राध्यापकके पद पर नियुक्त हैं। शास्त्रीजीने प्रस्तुत प्रन्यका संपादन वडी योग्यता और सावधानताके साय किया है जिसके लिये हम इनके प्रति अपना हार्दिक कृतज्ञभाव प्रकट करते हैं और चाहते हैं कि भविष्यमें भी आप इसी तरह ऐसे ही किसी अन्य महत्त्वके अन्यका संपादन-संशोधन कर, इस राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला की शोभावृद्धि करनेमें हमारे सहभागी बनें । यतर्कभाषामनुभाषले म गोवर्द्धनस्तककथामु धीरः । तेनानण्येन सुधांशुगौरी कोर्तिगुरूणाममृताधिकाऽस्तु । विजयश्रीतनुजन्मा गोवर्धन इति श्रुतः । वानुमापा तनुते विविच्य गुरुनिर्मितिम् ॥ श्रीविश्वनाथानुजपानामानुजो गरीयान बलभद्गजन्मा । सनोति सौनधिगत्य सर्वान् श्रीपानाभाद् विदुषो विनोदम् । -देखो श्रीरामकृष्ण गोपालभाडारकरकी, सन् १८८२-८३ की संस्कृतसाहित्यको खोजविषयक रिपोर्ट- पुस्तक, पृ. २१३. पलभद्रमिश्र और गोवर्द्धन मिश्र-दोनोंकी रचनाशैली प्रायः समान मालम देती है । बलभद्रने अपनी तर्कभाषाप्रकाशिकाके अन्तमें जिस प्रकार अपने पिता और माताका नाम निर्देश किया है उसी प्रकार गोवर्द्धन , मित्रने भी अपनी माता और पिताका नामनिर्देश किया है। संभव है कि इस विषयक माधारभूत प्रन्योंकी विशेष रूप से धानवीन करनेपर, उनमेंसे कुछ विशिष्ट प्रकाश प्राप्त हो सके। [इन पंक्तियोंका मुद्राक्षर संयोजन हो जाने वाद, राजस्थान पुरातत्त्वमन्दिरके संग्रहके लिये प्राचीन प्रन्योंका संचयन करनेवाले पाटणनिवासी पं. अमृतलाल मोहनलालने बलमद्र मिश्रकी तर्कभाषा प्रकाशिका च्याख्या की एक विशेष प्राचीन प्रति हमें उपस्थित की जो वि. सं. १६०५ की लिखी हुई है। इस प्रतिके अन्तमें लिपिकारने अपना परिचय दिया है। श्रीमधिपाठीविष्णुदासतमय-धीमबलभद्र विरचिता तर्कभाषाप्रकाशिका समाप्ता ॥ संवत् १६०५ चैत्र शु. दि. ९ सोमे । भ• हरिनाथमुन नाकरेण । लिपितमिदं तर्कभाषायाः टिप्पणकं ।। शुभं भवतु ॥ इस प्रतिकी स्थिति देखनेसे ज्ञात होता है कि यह किसी विशेष प्राचीन कालीन प्रति परसे प्रतिलिपिके रूपमें तैयार की गई है । अतः इसके आधारसे वलभद्रका समय वि. सं १६०० के पूर्वका तो स्वतः सिद्ध है।
३ किञ्चित् प्रास्ताविक प्रस्तुत प्रकाशनमें सर्वदेवसूरिकी मूलकृति प्रमाणामञ्जरी और उसपर लिखी गई ३ मिन्न भिन्न व्याख्याएं सम्मिलित की गई हैं। व्याख्याओंकी विशिष्टता आदिके विषयमें संपादक- पण्डितवर्यने, अपने प्रास्ताविक वक्तव्यमें संक्षेपमें यथायोग्य समुल्लेख किया है । अन्यकार सर्वदेवके समय आदिके विषयमें कोई निश्चित वृत्त ज्ञात नहीं होता है। शास्त्रीजीने अनुमानतः विक्रमकी १४ वीं शताब्दीमें उनके होनेकी कल्पना की है। परंतु हमारा अनुमान है कि सर्वदेव कुछ विशेष प्राचीनकालीन हैं । प्रमाणमञ्जरीकी रचनाशैली विशेष प्राचीन पद्धतिकी है। शिवादित्यकी समपदार्थी और रार्थदेवसूरिकी प्रमाणमारी ये दोनों वैशेषिक दर्शनके विशिष्ट एवं समकोटिके प्रकरण अन्य हैं जिनमें वैशेपिक सूत्रमें प्रतिपादित ६ पदार्पोके बदले ७ पदार्थो का सर्वप्रथम प्रतिपादन किया गया मालूम देता है । प्रमाणमारीकी सबसे प्राचीन हस्तलिखित प्रति कास्मीरमें डॉ. व्युहलरको प्राप्त हुई थी जिसको उनने ११ वों शताब्दीमें लिखी हुई बतलाई है। इस तरह जब ११ वीं शताब्दीमें लिखी हुई प्रमाणमञ्जरीकी प्रति मिलती है तो फिर इसकी रचना कम से कम इससे पूर्व तो अवश्य ही हुई सिद्ध होती है । सो हमारे अनुमानसे १० वीं शताब्दीके अन्तमें इसका प्रणयन होना संभव है। मालूम देता है कि ग्रन्थकार काश्मीर देशका निवासी है और इसलिये इसकी कृतिका प्रचार कुछ समयके बाद, धीरे धीरे हुआ है । सबसे पहले प्रमाणमञ्जरीका उल्लेख जिसमें मिला है वह है न्यायपरिशुद्धि नामक अन्य, जिसका प्रणयन वेंकटनाथ वेदान्ताचार्यने किया है। वेंकटनायका समय सिस्तान्द १२६७-६९ निश्चित रूपसे ज्ञात हुआ है। इस प्रन्थमें वेंकटनाथने एक स्थानपर हेला- भासोंकी चर्चा के प्रकरणमें- श्रीमहाविद्या-मानमनोहर-प्रमाणमअपादिपठितवानुमानस्यापि तथास्वम् । (देखो, न्यायपरिशुद्धि, चौखम्यानन्यापलिमें प्रकाशित, पृ. १४४) इस प्रकार महाविद्या, मानमनोहर के साथ प्रमाणमञ्जरीका उल्लेख किया । इसके टीकाकार श्रीनिवासाचार्य, जो प्रायः प्रत्यकारके ही शिष्य समझे जानेवाले और अतः उनके समकालीन ही माने जानेवाले, ने अपनी 'न्यायसार' नामक टीकामें, इस पंक्तिकी टीका करते हुए लिखा है कि 'श्रीमहाविद्या-मानमनोहर-प्रमाणमरीति मन्यनामधेयानि । (देखो, वही पुस्तक, वहीं पृष्ठ) इससे स्पष्ट है कि यह प्रमाणमञ्जरी प्रकरण अन्य विक्रमकी १५ वीं शताब्दीके पूर्व ही यथेष्ट सुदूर दक्षिण तक प्रसिद्ध हो चुका था। इसी तरह प्रत्यमूप भगवान् अथवा प्रत्यक्- खरूप भगवान् नामक ग्रन्यकार, जो विक्रमको १४ वीं शताब्दिके उत्तरार्द्ध और १५ वीं के पूर्वार्द्धके बीचमें हो गये ज्ञात होते हैं, उनने भी चित्सुखाचार्य रचिन तत्त्वप्रदीपिका नामक १ देखो, डॉ. न्युहलाकी साक्ष्मीरमें की गई शोज विषयकी रिपोर्ट, पृ. २६ तथा डॉ. वेडालका बनाया हुआ ब्रिटिश म्युजिअमके संस्कृत प्रन्योंका सचिपत्र (पेटेलॉग) पृ. १३८, न. ३३५, और इन्डिया ऑफिसके सरस्त अंथोंका सूचिपन्न, पृ. ६६६, ने, २९७५ विशेष जानने के लिये, टोकियो (जापान) के सोनोशु कॉलेज प्रो.ह. उद की लिखी हुई दशपदक अनुगम रूप 'वैशेषिक फिलॉसॉफी' नामक पुस्तक, पृ. १२६. (पादटिप्पणी) किश्चित् प्रास्ताविक प्रन्थ पर नयनप्रसादिनी नामक जो व्याख्या लिखी है उसमें दर्शनशास्रोंके प्रणेता जिन अनेकानेक प्रन्यकारों के और उनके ग्रन्योंके नाम निर्दिष्ट किये हैं उन नामोंमें सर्वदेव और उनके रचित प्रमाणमञ्जरी ग्रन्थका मी नाम उल्लिखित है । इसलिये प्रस्तुत मन्य उस समयके ग्रन्थकारोंमें सुज्ञात रहा है इसमें कोई संदेह नहीं है। जैन संप्रदायमें मी प्राचीन कालमें इस ग्रन्थका पठन-पाठन विशेष रूपसे रहा है यह तो इसकी जो अनेकानेक प्राचीन प्रतियां विशेष रूपसे जैन ग्रन्थ भण्डारोंमें ही उपलब्ध होती है उसीसे सिद्ध है । अकबर बादशाहके जैन गुरु सुप्रसिद्ध आचार्य हीरविजय सूरिके प्रधान शिष्य विजयसेन सूरिने जिन शैव दर्शनके मुख्य मुख्य प्रन्योंका अध्ययन-मनन किया था उनकी नामावलि, उनके जीवनचरितखरूप संस्कृत महाकाव्य विजयप्रशस्ति में दी गई है। उसमें तर्कभाषा, सप्तपदार्थी, वरदराजी आदि प्रकरण ग्रन्योंके साथ इस प्रमाणमञ्जरी का भी नामनिर्देश किया हुआ है । यथा- तकंभापा-सक्षपदार्थी वरदराजी-प्रमाणमञ्जरी-प्रशस्तपादभाष्य-कणादरहस्यादयः शशधर-मणि- कण्ठ-कुसुमाञ्जलि-किरणावलि-पर्दमान-तत्वचिन्तामणिपर्यन्ताः शैवप्रमाणशास्त्राणि । (विजयप्रशस्ति महाकाव्य, सर्ग १, पद्य ९ की टीका) ऐसा मालूम देता है कि अन्नभट्ट रचित तर्कसंग्रह नामक इसी विषयके नवीन प्रकरण प्रन्धकी अधिक सरल और सुबोध रचना होनेके बाद उसके पठन-पाठन का प्रचार बहुत अधिक बढा और प्रमाणमञ्जरी जैसे प्राचीन शैलीके प्रन्थका अध्ययन विलुप्तसा हो गया। और इस कारणसे न्याय -वैशेषिक दर्शनके साहित्यके अभ्यासियों और विवेचकोंको प्रायः इस ग्रन्थके अस्तित्वका मी ज्ञान नहीं मालूम दे रहा है। इस वस्तुस्थितिका विचार कर, हमने प्रस्तुत ग्रन्थको राजस्थान सरकार द्वारा आयोजित, इस अभिनव 'राजस्थान पुरातन ग्रन्धमाला' में प्रकट करनेका प्रथम वर्षके प्रारंभिक कार्यक्रममें ही निश्चय किया था। इस प्रन्यमालाका प्रधान उद्देश्य संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश एवं प्राचीन देशभाषामें अथित ऐसे अनेकानेक ग्रन्थोंका उद्धार कर प्रकाशमें लानेका है, जो प्रायः विद्वत्समाजके लिये अलब्ध - अज्ञात - अश्रुतपूर्व से हैं और जो विशेष करके राजस्थानके अपरिचित एवं उपेक्षित स्थानोंमें नष्ट-भ्रष्ट दशाको प्राप्त हो कर, कालके कुटिल विवरमें सदाके लिये विलीन हो जानेकी परिस्थितिमें पहुंचे हुए हैं । राजस्थान सरकारका यह सत्प्रयत्न भारतीय साहित्य और संस्कृति के अनुयायी और उपासकोंके लिये अतीव अभिनन्दनीय है । हमारा प्रयत्न है कि भारत के सर्वांगीण विकासक्रमकी जो पञ्चवर्षीय योजना बनी है उसीके अन्तर्गत राजस्थान सरकारकी यह साहित्यिक समुद्धारकी सुयोजना भी एक आदर्शरूप कार्य बने । वैशाख शुका ३, सं. २०१०. भारतीय विद्या भवन, चंबई जिनविजय मुनि १ देखो, महाविद्याविडम्बन नामक ग्रन्थ (गायकवाड प्राच्यमन्थमाला) की प्रस्तावना, पृ. २३ की पादटिप्पणी।
॥श्री॥ सम्पादकीयं किञ्चित् अधुना येयं श्रीसर्वदेवसूरिविरचिता प्रमाणमञ्जरी टीकात्रयसमलवृत्ता मुद्राप्य प्रकाशं नीयते, सा केवलमूलसूत्रस्वरूपा सप्तत्रिंशदधिककोनविंशतिशततमे (१९३७ सन्) ईसवीये धL मुम्बम्यां जगति लब्धप्रतिष्ठे निर्णयसागरमुद्रणालये प्रथम मुद्रिता । साम्प्रतमिमो टीकात्रयेण सह परिष्कृत्य सम्पादयितुं राजस्थानीयपुरातत्वमन्दिरप्रवर्तकैः पुरातत्वाचार्यश्रीमजिनविजयमुनिमहोदपैनियुक्तोऽहं शोभनेऽस्मिन् कार्ये प्रावर्तिपि । अन्यस्यास्य शोमा परिवर्द्धयितुं शुद्धांथ पाठान सनिवेशयितुं नेकविधान्यादर्शपुस्तकानि प्राचीनान्यासार । तत्र- (अ) पुण्यपत्तनस्साहिश्रुताद् भाण्डारफरपुस्तकागारात् ( Bhandarkar Institute) माप्तमेकं हस्तलिखितमतिप्राचीनं पुस्तकम् 'क' संहितम् । (आ) तस्मादेव प्राप्तमन्यत्तादृशं पुस्तकम् 'ख' संज्ञितम् । (इ) उपाध्यायपदविभूषितेन साहित्यजैनन्यायाचार्येण श्रीविनयसागरमुनिमहोदयेन दत्चमेक प्राचीनतम पुस्तकर 'ग' संज्ञितम् । (ई) तेनैव महोदयेन प्रदत्तमन्यपुस्तकं पत्रत्रयात्मकमतिसूक्ष्माक्षरैलिखितं 'घ' संज्ञितम् । (उ) बीकानेरत आसादितमेकं पुस्तक 'ड' संज्ञितम् । (ऊ) मुम्बय्यां मुद्रित पुस्तकमिति मूलपुस्तकानि पट् । (३) पुण्यपत्तनस्थपुस्तकागारादेव प्राप्तं बलम टीकापुस्तकमेकम् 'च' संज्ञितम् । (ऋ) जयपुरस्थपुरातत्त्वमन्दिरसञ्चालकैः श्रीमुनिमहोदयैः प्रत्तमेकं बलभद्टीका- पुस्तकम् 'छ' संज्ञितम् । (ल) पुण्यपत्तनतः प्राप्ते श्रीमदद्वयारण्यटीकापुस्तके वे 'ज''' संज्ञिते । (१) श्रीविनयसागरमहोदयद्वारा प्रासमध्यारण्यटीकापुस्तकम् 'ट' संज्ञितम् । (ऐ) बीकानेरतो लब्धमद्वयारण्यटीकापुस्तकम् 'छ' संज्ञितम् । (ओ) पुण्यपत्तनतः प्राइमेकं वामनभट्टविरचितटीकापुस्तकमिति सप्त टीकापुस्तकानि । एषु मलपुस्तकानि सर्वाण्येव प्रायशुद्धानि स्पाक्षराणि च । व्याख्यापुस्तकेषु बलभद्र- टीकापुस्तकद्वयं प्रायोऽशुद्धम् विपमाक्षरञ्च । अद्वयारण्यपुस्तकानि प्रायशुद्धान्येव । वामनभटीका- पुस्तकचाशुद्धप्रायम् । एवमिमानि पुस्तकान्यवलम्य अन्योऽयं टीकात्रयोऐतो वैशेषिवनये प्रवि- विषणां पालानामुपकाराय प्रकाश नार - १ सम्पादकीयं किञ्चित् 'काणादं पाणिनीयञ्च सर्वशाखोपकारकम्' इत्यभियुक्तोक्त्या काणादनयस्य सर्वशास्त्रोपकार- कत्वे न कस्यापि विप्रतिपत्तिः । तत्र सूत्राणां प्रशस्तपादभाप्यस्यान्येपाञ्चोदयनप्रभृतिभिर्विद्वत्तल्ल- जैरिचितानां ग्रन्यानां दुरधिगमत्यात्तार्किकचक्रचूडामणिः ' श्रीसर्वदेवः दुरूहविपयानोकहसङ्घ- लेऽस्मिन् काणादकान्तारे सुखेन वालानां प्रवेशसिद्धयेऽतिसरलया शैल्या ग्रन्थमिमं प्रणिनाय । अयञ्च सर्वदेवः ईसवीयचतुर्दशशताब्यामासीदिति विमर्शकैरनुमीयते । अस्मिन् ग्रन्थे। कणादा- भिमतानां सर्वेषां पदार्थानां लक्षणं विभागश्च सविशेषं निरूपयन् सर्वदेवः शास्त्रे विद्यमानं काठिन्यं दूरोचकारेति न वक्तव्यं मया । ग्रन्थस्यास्य टीकासु विलोक्यमानासु स्पष्टमिदं प्रतीयते-यदत्रैक. मप्यक्षरं न वृथा प्रयुक्तं सर्वदेवेनेति । अस्य ग्रन्यस्य तिस्रष्टीकास्सन्ति । ताः क्रमेण तार्किकशिरोमणिभिः श्रीमदद्वयारण्य -बल- भद्र-वामनभट्टैविरचिताः । इमाश्च टीकाः अल्पीयस्यप्यस्मिन् अन्थे विद्यमानं प्रौढिमानमवद्योतयन्ति । तिसृष्वपि टीकासु मूले प्रयुक्तानां पदानां प्रयोजनविचारो विदुषां मनांसि रञ्जयेदित्यत्र न कोऽपि संशयः । व्याख्यासहितस्यास्याध्ययनेनाध्यापनेन वा न केवलमध्येतृणां विन्त्वघ्यापकानामपि पदार्थविवेचनशैली परिवर्द्धत इत्यत्र किमु वक्तव्यम् । इदमेबैकं तादृशं शास्त्रम् , यच्च साकं पदार्थ. ज्ञानेन पदार्थविवेचनचातुरीमपि जनयति । यश्च युक्त्या तत्त्वं परिशीलयति स एव परमार्थतस्त- स्वमवगच्छतीति न मया वक्तव्यम् । 'म हि प्रतिज्ञामात्रेण वस्तुसिद्धिः' इति प्राचीनानां यौक्तिक- शास्त्रनिर्माणे इयान् प्रयासः । पदार्थतत्त्वस्य सत्यपि शन्दसमधिगम्यत्वे युच्या तर्केण वा तत्समधि- गन्तुं लोकानां दृश्यते खारसिकी प्रवृत्तिः । अत इदं यौक्तिक शास्त्रं प्रवर्तितं प्राचीनैः । अमुमेवार्थ द्रढयति "श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' इत्यत्र 'मन्तव्य' पदं प्रयुञ्जाना भगवती श्रुतिरपि । एवमस्मिन् महाफले शास्ने बालानां सुखेन प्रवेशसिद्धये श्रीसर्वदेवेन लेखनी व्यापारिता । अल्प- कायस्यास्य अन्यस्य महत्त्वं संवीक्ष्य तस्य कलेवरं परिवर्द्धयितुं श्रीमदद्वयारण्यप्रभृतयस्तार्किकशि- रोमणयो हृदयगमाष्टीका अररचन्निति धन्योऽयं संस्कृतसमाजः, विशेषतश्च तार्किकसमाजः । टीकाकर्तृणां पौर्वापर्ये समये च विमृश्यमाने ममेदं प्रतिभाति- यद्वलभद्रमिश्रः केचित्' अत्र केचित् इति केचन' इत्येवं तत्र तत्र मतान्यनूय खण्डपति । इमानि च मतानि अद्वयारण्य- वामनभटीकयोस्समुपलभ्यन्ते । अतो बलभद्रस्तृतीयकोटौ निवेष्टुमर्हति । वामनभस्त प्रायोऽद्ध- यारण्यटीकामेवानुवर्तते । इयांस्तु विशेष:-अयारण्यटीका विस्तृता, वामनभहस्य तु तस्या एय सझेपररूपा टीकेति । तत्रापि वामनभट्टः- शाके वाणगजत्रिचन्द्रगणिते वर्षे (१३८५) सुभानौ झुमे' इति समयं ग्रन्थस्यान्ते निर्दिशन् स्वस्य ईसवीयपञ्चदशशताब्दीमध्यवर्तित्वं कथयति । एवञ्चा- द्वयारण्यः प्रथमः, वामनभट्टो द्वितीयः, बलभद्रस्तु तृतीयः, सिध्यतीत्येतदेवात्र वक्तुं पार्यते, विशेषतस्तु निर्णये विमर्शका एवं प्रमाणमिति । अत्युत्तमत्यास्य प्रन्यस्य प्रकाशनमत्यावश्यकगिति मन्वाना राजस्थानीयपुरातत्वमन्दिरसंपति- टापकास्तसञ्चालनकर्मण्यहोरानं निरताः प्राचीन ग्रन्थप्रकाशने तदन्वेपणे च सुलब्धप्रतिष्ठाः श्रीमुनि- जिनविजयमहोदया मामस्मिन् शोभने कर्मणि न्ययूयुजन् इति तानहं कोटिशो धन्यवादपरम्पराभिः सम्पादकीय किञ्चित् परिपूर्यामि । नेकविधानां पुरातत्यावशेषाणामाकरे राजस्थानमहाराज्ये तत्र तत्र निलीनानां संख्या- तीतानां प्रन्यरत्नानां परिष्करणं प्रकाशनञ्च येषां समुद्बोधनेन यै राज्यमशि-सचिवप्रभृतिभिर्यदारब्धं तेभ्यस्सर्वथायमधमर्गरसंस्कृतसमाजः । एवमेव ते तानि तानि सन्यरत्नानि परिष्कृत्य सर्वत्र विसम- राभिस्तप्रभाभिः भगवती भारती भारतभुवश्च सर्वा समुद्दीपयेयुरित्याशसे । अस्य च प्रन्यस्यादर्शपुस्तकैरतिजंदिलाक्षरैस्सह संवादनादिकार्येषु खनियमानुराधयापि नितान्तमुपकृतवते जैनन्यायसाहित्याचार्याय उपाध्यायपदविभूषिताय श्रीविनयसागरमुनिमहोदयाय हार्दिकान् धन्यवादान् बितरामि । एवं संशोधनपाण्डुलिपिसम्पादनादिकार्ये मदन्तेशसिना मीमांसाचार्येण साहित्यरत्नेन च श्रीमदनलालशर्मणा मण्डनमिश्रापरनामधेयेन जयपुरमहाराज- संस्कृतकॉलेजाध्यापकेन चिरायुषा सुबहु परिश्रान्तमुपकृतञ्चेति तमाशीर्वचोमिः पूरयामि । अस्य ग्रन्थस्य शोभा परिवर्द्धयितुं साधुपाठानामभावेन जनितं क्लेशश्च दूरीकर्तुं बहुमूल्या- न्यादर्शपुस्तकानि सदयं प्रेषितवन्यो हैयङ्गवीनहृदयेभ्यः पुण्यपत्तनस्थ भाण्डारकरपुस्तकागारमन्नि- (सेक्रेटरी) महोदयेभ्यश्शतशो धन्यवादान् संवितीर्यान्ते सर्वानेव विपश्चिदपश्चिमान् सम्प्रार्थये- यत्सावधानेन मनसा शोधितेऽप्यस्मिन् अन्थे मनुष्यमात्रमुलभा अशुद्धयोऽवश्य भवेयुः, ता अपरि- गणय्य यदि कश्चन गुणलवस्त्याचहि तद्रहणेन मामनुगृहीयुरिति । . पलिकाता. १२-१२-१९५२ वि(जनवशंवदः पहाभिरामशास्त्री विद्यासागरः प्रमाणमञ्जर्या विषयसूची पृष्ठम् विषयाः . ५५ # १६ स्मृतिनिरूपणम् ७. ७२ विपयाः पृष्ठम् मालम् , परिमाणलक्षणं दिमागच पदार्थलक्षणे दिमागच ३ 'पृथावलक्षण सदिमागच. પર द्रव्यलक्षणं पद्विभाग ५ संयोगलक्षणप्रमाणविभागाः पृथिधीलक्षणं तद्विभाग ६ विभागलक्षणप्रमाणविमागाः परमाणुलक्षणम् ७ परस्यापरस्ययोर्टक्षण प्रमाण : पृथिवीपरमाणुः शुकर ८ भुद्धिः द्विभागः, अविद्याग्मिका युद्धिव पार्थिवयशुकम् ९ विद्यामिका थुद्धिः, सविकल्पकत्रुद्धिन शरीरसामान्यलक्षणम् १० निर्विकल्पक्युद्धिः पार्थिवशरीरं तद्विभाग १२ टेरिकीवुद्धिः, मन्वयध्यतिरेकनिरूपण . ६३ भयोनिजशरीरानुमानम् १३ हेवामासलक्षण सद्विभाग, इन्द्रियसामान्यलक्षणम् शब्दायांपत्यनुपलब्धीनामन्तभावविधारः ६७ पार्थिवमिन्द्रियं विपयाच जललक्षणं तद्विभागः, जलीयशरीरम् इन्द्रिय " तेजोलक्षणं तद्विभाग मुखदुःसनिरूपणम् मयनेन्द्रिये प्रमाणम् इच्छा तद्विभागो देपश्च प्रयलस्तद्विभागश्च तमसोऽन्यस्वनिरूपणम् २२ गुरुत्वलक्षणं तद्विभागश्च घायुलक्षणं तद्विमागश्च २३ द्रवत्वलक्षणं तद्विमागच पायोः प्रत्यक्षवाप्रत्यक्षत्वविचार: भाकाशनिरूपणम् नेहलक्षणम् , तस्य यावद्ग्यमावित्वं च भाकाशस्य नित्यत्वम् २८ संस्कारलक्षणं तद्विभागस्तत्र वेगश्च स्थितिस्थापक: मावना च काललक्षणं वन प्रमाण दिग्लक्षण तत्र प्रमाणन ३१ धर्माधी दिकालयोस्समुचित्यप्रमाणम् ३२ शब्दलक्षणं तस्यानित्यत्वं गुणत्वच दिकालयोस्सर्वकार्यनिमित्तत्वम्, सर्पगतत्वज्ञ ३३ शब्दस्य नित्यरवशा सत्परिवारश्च मात्मनिरूपणं तद्विभागश्च ईश्वरज्ञानादेस्सर्वव्यापित्वम् कर्मणो लक्षणं तस्य प्रत्यक्षरवश्व जीवैकत्वनिरासः, तस्य सर्वगतत्वञ्च कर्मणोऽसमवायिकारणत्वामावशका, मनोलक्षणं सत्र प्रमाण तत्परिहारश्च ९२ गुणलक्षणं तद्विभागश्व सामान्यलक्षणम् तत्र प्रमाणञ्च रूपरसगन्धस्पः ५. सामान्यस्थावस्तुस्वशक्षा तस्परिहारः, रूपादीनां विमागः, तेषां यावद्न्यमावित्वश्च ४२ परसामान्यमपरसामान्य भयावद्रग्यभाविनो गुणाः ५३ विशेषनिरूपणम् ९९ सत्यालक्षणे तद्विभागच ४५. समवायनिरूपणम् द्विस्वसिदिः, द्विस्वस्तापावग्यमाविवश ४६ ममावलक्षणं तद्विभापश्च 10 संख्याया यावद्रग्यमावित्वे प्रमाणम् ४९ मोक्षा, छत्र प्रमाणञ्च . ७८ ८० ८१ . । - ८९ ३. शब्दरिमागः ९० ५० ९४ . ८ १.१ म तार्किकचूडामणि -श्रीसर्वदेव - विरचिता प्रमाणमञ्जरी . कासारतीरसरसीमहमाददानः शुभं भ्रमद्भमरमध्यमियेन्दुबिम्बम् । द्वैमातुरश्विरतरं भवतस्स पायात्', सजातनिर्मलजलप्रतिबद्धना ॥१॥ श्रीवलभद्रविरचिता टीका (ब. टी.] , नत्वा हरिपदं मत्वा गुरोरथं प्रयलतः । प्रमाणमञ्जरीटीका वलभद्रेण तन्यते ॥१॥ निर्विन्यपरिसमाप्तिकामनया कृतं 'मङ्गलं.. शिष्यशिक्षायै निवभाति- कासारेति । द्वैमातुरः द्वे मातरौ अस्य स तथा गणेशः भवतः श्रोतृन चिरं पाया, से विनसंहारकत्वेन यतः. प्रसिद्धः । स्तुतिरूपं मङ्गलमाचरति-सजातेति ।' एतावता हर्षविशिष्टतया स्मृता देवता फलं ददातीति चोतितम् । सजातम् अभिनवम् । यद्वा सञ्जातं चन्दनादिना संस्कृतम्, एतादृशं यजलं तबारब्धं नर्म क्रीडा येन । जल- क्रीडायां यदुचितं तदाह-कासारेति । कानां जलानाम् आसारः आगमनं यत्र स कासारः तडागः । यद्वा ईपदांसारः कासार अल्पसरः, अल्पसरसि एतनीरसमीपजातं यत्सरसीरुहं कमलम् । कीदृशम् ? शुभ्रम् । पुनः कीदृशम् ? अमद्भमरमध्यं मध्ये भ्रमरेणाकान्तम् । आददानः शुण्डादण्डेनाकर्षन् । आदधान इति पाठे विभ्रदित्यर्थः । भ्रमत् कम्पमान, यद्वा भ्रमद्धमरमध्यमित्येकमेय पदम्, भ्रमत्तियाविशेषविशिष्टो अमरो यत्र तद्भमन्द्रमरं तादृशं मध्यं यस्य तत्तथा । केचित्तु ध्यानरूपमेव मङ्गलं 'शिष्यायोपदिष्टमपमानवलेन उत्प्रेक्षालेन वा ध्यानान्तरमाह-इन्दुविम्वमिवैत्याहुः । एतापता गगने नाव्यासक्तो विघ्नराजः करेण शशिमण्डलं कपन ध्येय इति भावः । केचित्तु ध्यानं यद्यपि मङ्गलं न भवति, तथापि प्रायश्चित्तवदुरितनिवर्तकं भवतीत्याहुः । श्रीमदतयारण्यविरचिता टीका [अ. टी. हेरम्ब संहर विमो तरसान्तरायवर्ग न भर्गवनयात्र तवोपचारः। यद्विभमूलखननाय विषाणहस्तः सन्तर्कितोऽसि भगवन् खयमुद्यतस्त्वम् ॥ "१ नम्मति ख. २ च यत्रत इनि च. ३ अन्थेति मानि छ. ४ यस्खेति छ. ६ अल्पसर इति नाति छ. • तत्तीरे समीपे इति छ. ८ एक पदमिति छ. ५ कारत्वेनेति छ. १०छलेनेति घ.
* . प्रमाणमक्षरी दम्य- अद्वयानुभवाचार्यपरिचर्याविधायिना । 'प्रमाणमसरीव्याख्या मुनिना.सम्प्रणीयते.॥२॥ से श्रीमानयारण्यस्सुखबोधाय धीमताम् । प्रमाणमञ्जरीटीका सन्ददर्भ नवामिमाम् ॥ ३॥ विद्यारम्भे मङ्गलमाचरणीयम् , "स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः" इत्यादिवैदिकमङ्गला- च्छिष्टैरनुष्ठितलाचं नास्ति तेपाममङ्गलमिति देवतानुस्मृतिलक्षणक्रियाजनितधर्मस्य "सारम्मा हि दोपेण धूमेनामिरिवावृताः" इति शाम्यसिद्धारम्भदोपनिर्वतकत्वात् "धर्मेण पापमप-. नुदति" इति श्रुतेश्च । ततस्सप्रमाणकत्वात्सप्रयोजनत्वाच ग्रन्थारम्भे, मङ्गलमाचरति- कासारेति । द्वैमातुर इत्यत्रै मातृशब्दगतस्य ऋ इति स्वरस्य अणि प्रत्यये उरि (उदि?). त्यादेशविधानात् योर्मानोरपत्य गजाननस्तद्वैमातुर इति पदं निष्पद्यते, उरणीय- नुस्मरणात् । द्वैमातुरो गणेशः भवतः श्रोतन् चिरतरं कालं पायात् रक्षतीत्, “स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात्" इति श्रोतॄन् प्रत्याशी श्रुतेश्च । स प्रसिद्धो यस्माद्विनेम्यस्त्राणहेतुत्वेन- देवतापि हृष्टाकारणानुस्मृता कार्यकरीतियोतयितुमाह-सजातेति । सातमभिनवं संस्कृतं. चन्दनादिना, विमलं यद्गङ्गाजलं तस्मिन् प्रतिवद्धम् अन्वारब्धं नर्म क्रीडा येन स तया । जलक्रीडोचितव्यापारमाह-कासारेति । कासारः कानां जलानामासंरणमागमनं यत्र.,स तडागः कासार इत्युच्यते मानसादिसमाह्वयः । तस्य तीरसमीपथं सरसीरुहं कमलम् । तच शुनं पाण्डुरं भ्रमरमध्यं मध्ये अमरेणाकान्तम् आददांनः ओहरन् आकर्षन् शुण्डादण्डेन तेन भ्रमत्कम्पमानम् । एवमेकं ध्यानमुक्त्वोपमानच्छलेन ध्यानान्तरमाह-इन्दुविम्बमि- वेति । गगने कासारवयेणाङ्कमण्डलद्विराजमानमित्यर्थः । नमसि नाट्य सक्तः चन्द्रमण्डलं करेणाकर्पन ध्येयो विघ्नराज इत्यर्थाच्छात्रेभ्यो ध्यानोपदेशोऽपि ग्रन्थप्रचारणे निर्विमत्वाय । श्रीवामनभट्टविरचिता भावदीपिकाव्याख्या [वा. टी.] पुरन्दरदलनेत्ररतनीराजनीकृतम् । वन्दे लम्बोदरोदारपदद्वन्द्वसरोरुहम् ॥ १ ॥ भट्टवामनसंज्ञेन तुलसीकृष्णसूनुना । प्रमाणमञ्जरीव्याख्या क्रियते भावदीपिका ॥२॥ विशिष्टशिष्टाचारप्रमाणकं ारीप्सितप्रन्यस्यालिफारिसमाप्रिपोजनपविशिष्टदेवतमुस्मादि। पूर्वकमाशीलक्षणं मङ्गलमाचरति-कासारेति । चन्दनादिसंस्कृतानाविलजलजातखेलो गण- पतिः । सितमन्तभ्रमविरेफम् । अत एवणाङ्कबिम्बमिव जलाशयतीरपुण्डरीकं गृह्णन् भवतश्चिरतरं पाठ्यतु । अनेन दृष्टा चिन्तिता देवता कार्यकरीति इष्टप्रदत्वं सूचितम् । १ पद्यमिदं ज. स. पुस्तकयोनास्ति. २ विनिवर्तकेति ज. ट. ३ चेति नास्ति ज.ट. स्वादिति ज. ट. ५ इत्यत्रेति नाम्नि ज. ट. ६ शब्दस्येति ज.. ७ द्वे मातरी यस्य सं द्विमावर इति ज., द्वे मातरौ यस्य गजाननस्य तदपत्यत्वात्स द्वैमातुर इति ट. ८ मन्विति नास्ति ज.ट. ९ यावदिति . १. रक्षतादिति नास्ति ट. ११ कर्तृत्वेनेति ज. ट. १२ महादीनि ज. ट. १३ कासार इति नास्ति झ. १४ इनीति नास्ति ज, ट. १५ भाहरनिति नास्ति ज. १७ कासारवणेति श. ट. १८ मण्डलमिवेति १९ संसक्तमित्येव झ. १ 14 . ४प्रमाण- १६ सेनेति नास्ति झ.
निरूपणम्] टीकात्रयोपेता अभिवन्ध विधोरर्द्धधारिणञ्च कणवतम् । प्रमाणमञ्जरी सर्वदेवेन क्रियते मया ॥२॥ [व. टी. ] बहुतरविशनिवारणाय विद्याधिष्ठातारमीश्वरम् एतच्छास्त्रप्रणेतृकणादमुनिश्च नमन् अभिधेयं निर्दिशति-अभिवन्येति । प्रमाणं प्रकृतं शास्त्रम् । तत् पादप- स्थानीयम् । तस्पेयं मञ्जरी वल्लरी अभिनयपल्लवस्थानीयेति भावः । [अः टी.] इदानीं विद्याधिपतिमीश्वर प्रवर्तनीयविद्याखातच्याय कणादमुनिश्च तदीयशास्त्र- 'सारोद्धाराचतुरप्रक्रियायां वाक्चेतसोरस्खलनार्थ प्रणमन् यदुंदिश्य मङ्गलाचरणं कृतं तन्निर्दि- शति-अभिवन्द्येति । विधुश्चन्द्रः । प्रमाणं तर्कशास्त्रम् । तच्च बुद्धिस्थ काणादम् । तस्य मञ्जरी वल्लरी - कंपपादपन्यानीवाससाभिनयपाहाँलागी प्रक्रियेत्यर्थः । ननु किमत्र प्रतिपाद्यम् ? भागाभाषपदापी चत्-गीनामा गताना, तत्रापि प्रमाणादिभावागाय- पदार्थवर्णनं दृश्यते युतः । सत्यम्; तथापि पडेव भावाः, द्वे एव प्रमाणे इत्यादि महत्तरा- बान्तरभेदेनापुनरर्थता । अन्यथैकस्मिंस्तत्रे स्वमंतशुद्ध्यर्थं सर्वतत्रार्थोपन्यासादन्यानारम्भ- 'प्रसङ्गात्, तदनारम्मे च सर्व खतवमेवेति पूर्वपक्षसिद्धान्तभेदेनार्द्ध प्राधमद्धमग्रीह्य- मित्यर्द्धजरतीयन्यायेनाप्रामाण्यप्रसङ्गादेकमपि तत्र भारभ्येत । अतो वैशेषिकतधारम्भसिद्धौ तत्प्रकरणारम्मोऽपि निश्चलः । [था. टी.] 'ईश्वराज्ज्ञानमिच्छेनु' इत्यादिस्मृतेरीश्वरस्यापि विद्याप्राप्तावतिशयगत्वावगमातं नमन् कणा- दशास्त्रप्रकरणं चिकीर्घराचार्यस्तच्छास्त्रप्रणेतारं कणादनामानश्च मुनि नमन् चिकीर्पितं प्रतिजा- नाति-अभिवन्द्येति । विधुश्चन्द्रः । अर्द्धशब्दश्चात्र कलामात्रवाची... ...त्युक्त्वा क्रियमाणस्य निर्दोषत्वं सूचितम् । प्रमाणमञ्जरीति प्रथिनाम । निश्चीयन्तेऽर्या अनेनेति प्रमाणमिति प्रमाणशब्द- प्रतिपाद्यस्य बुद्धिस्थकणादशास्त्रस्य कल्पपादपत्वेनाभिमतस्याभिनवप्रवालशाखास्थानीयेयं कृतिरिति प्रन्यकृदाशयः । अनेन श्रोतृप्रवृत्यङ्गभूतमेतद्वन्यावान्तरविपयादिकमपि सूचितम्-सपदार्थ 'तदानतत्कामादि + (पदार्थलक्षणं तद्विभागच) अभिधेयः पदार्थः। स भावाभावभेदेन द्विधौ पूर्वो विधिविषयः । स पोढा, द्रव्यादिभेदेन। ५ मध इति मु. २ शदेव. इति. मु.पा. ३ निवर्तनायेति च. ४ वल्लरीति नास्ति छ, ५ यदर्थमिति ज. ट. ६ कृतमिति नास्ति ज. ट. ७ पदार्थों इति नाति झ. ८ यत इति नास्तिम. ९ मेदादगतार्थतेति ज. ट. १० त्याज्यामिति झ. "नारभेत इति झ. १२ निक्षित इति ८. १३ रेभाव इति ख. १४ भेदादिति क. ख. १५ वैधा इति ख, १६ पूर्व इति ख.
४ " प्रमाणमञ्जरी [द्रव्य- [व. टी.] विशेपलक्षणानि कतुं पदार्थसामान्यलक्षणमाह-अभिधेय इति अभिधा शब्दः, तच्छक्तिर्वा, तद्विपयत्वं पदार्थलक्षणम् । तेन नोभिधापदवैयर्थ्यम् । यद्वा नेदं लक्षणम् , व्यावृत्त्यभावान्, किन्तु पदार्थपदप्रवृत्तिनिमित्तम् । प्रवृत्तिनिमित्ते च वैयर्थ्य न दोप इति भावः । उद्देशस्तु पदार्थपदेन द्योतितो हृदिस्यो बोध्य इति । विशेषविभाग- माह-स इति । पूर्व इति । भावरूपः । स इति । विधिविपय इत्यर्थः । तथा च. भावत्वं भावत्वप्रकारकप्रमाविपयत्वं वा भावलक्षणे सुचितं भवति । [अ.टी.] अत्र काणादोक्ताः पदार्थाः सामान्य विशेपरूपाभ्यां संक्षेपतो घालवुद्धिव्युत्सादनाय लक्षणप्रमाणारूढा निरूप्यन्ते । ततः पदार्थसामान्यलक्षणं तावदाह-अभिधेय इति । अभिधाशब्दः तद्विषयोऽभिधेय इति' लक्षणम्,। पदार्थ इति लक्ष्यनिर्देशः । पर्यायत्वेऽपि : लक्ष्यलक्षणभावो दृष्टः । प्रमाणमनुभूतिः, खं छिद्रमित्यादौ, ततोऽभिधेयपदार्थयोः पर्यायत्वात् न लक्ष्यलक्षणमाव इति नाशङ्कनीयम् । नाना निर्देश उद्देशः। स च पदार्थानाम- निर्देशनात्र लक्षणे सङ्गृहीतः । लक्षणञ्चासाधारणरूपनिर्देशः । ननु वन्ध्यांपुत्र इत्यादि- शब्दाभिधेयत्वेऽपि पदार्थत्वं नास्त्रीत्यतिव्याप्तिर्वन्ध्यापुत्रादौ । पदार्थो हि भावाभावात्मक प्रमाणसिद्ध आश्रीयते । न च बन्ध्यापुत्रादौ प्रमाणमस्ति । मैवम् ; प्रमाणशास्त्रे प्रमेयत्व- सहचरितस्यैवाभिधेयत्वस्य विवक्षितत्वात् । एतज्ज्ञांपनायैव प्रमाणमञ्जरीति संज्ञोक्ता । तस्य , च वन्ध्यापुत्रादावभावान्नातिव्यासिरित्यादिन्यायप्रमाणाभ्यामवस्थापनं परीक्षा । प्रकार- भेदकथनं विभाग इति चतुर्धा निरूपणम् । ततो विभागमाह-स भावाभावभेदादिति। सशब्दः पदार्थपरामर्शी, प्रमाणेनानुभवनादभावोऽपि भावशब्देनाभिघातुं शक्यते । ततः कथमयं विभाग इत्याशङ्कानिरासार्थ भावलक्षणमाह-पूर्व इति । अनपूर्वकश्शब्दो विधिः । यथा द्रव्यं गुण इत्यादि । नास्तीति, शब्दमात्रम्, येनाभावोऽस्तीत्यभावस्थापि विधिविषयत्वादतिव्याप्तिराशयेत । अभावस्य प्रतियोगिभावनिरूपणापेक्षत्वात्तमुपेक्ष्य भावस्य विभागमाह-स पोटेति । 'द्रव्यगुणकर्मसामान्य विशेषसमवायाः पट् पदार्थाः'. इत्याचार्यवचनेऽपि पदार्थशब्दस्तदेकदेशभूतभावविषयः । तथा च लीलावतीकारः- भावत्वाधिष्ठितास्सर्वाः प्रत्येक व्यक्तयो मताः । द्रव्यादिपदविच्छेदमेलकेन विवर्जिताः ।। इति । ततो न सूत्रादिविरुद्धोऽयं भावविभागः । विषयत्वमेवान लक्षणम् । अत्रैवकारः प्रमापदव्यवच्छेदक इत्यधिकं च. २ नाभिधेयवैयर्यमिति छ. ३ प्रवृत्तिनिमित्तमिति नास्ति छ. ६ स इतीति नास्ति छ. ५ भासमानवैशिष्ट्यप्रतियोगित्वं प्रका. रत्वम् विशेषणविशेष्याम्यां युक्तं वैशिष्ट्यमिति 'च' पुस्तकटिप्पणी. ६ तति झ. ७ एतदिति ज.द. ८ मास्थीयत इति ज. द. ९ चोतनायैवेति ज. ट. १० व्यवस्थेति ज.. ११ द्रव्यगुण इति झ. १२ मतिन्याप्तिमाराङ्केत इति ज. १३ भावविभागमिति ट. "१४ कार इति नास्ति ज. ट.
५ निरूपणम्] टीकात्रयोपेता [चा. टी. अत्र काणादोक्तं पदार्थतत्वं प्रतिपिपादयिपुराचार्यों विना सामान्यलक्षणं विशेपलक्षणा- प्रवृत्तेर्लक्ष्यनिर्देशेनैवोद्देशं मन्यानः पदार्थसामान्यलक्षणं तावदाह-अभिधेय-इति । अभिधीयते प्रतिपाद्यतेऽर्योऽनेनेति अभिधा वाक्यात्मकः पदात्मकशब्दो वा । तेन प्रतिपाद्यः, तस्य विषयोऽ: भिधेय इति । ननु खपुष्पमिति शब्देन खपुष्पमभिधीयते । न च तत्र पदार्थत्वम् । तेनातिव्याप्ति- रुद्धृता । अयमर्थःखपुष्पमिति वाक्येन खसंसृष्टं पुष्पं प्रतिपाद्यते । नच तत्प्रमाणगोचरो येन लक्ष्यकोटिनिविष्टं भवेत् । ननु मा भवतुं प्रमाणगोचरः, न हि प्रमाणगोचरः पदार्थ इति लक्षणम् । किन्तर्हि ? अभिधेय इति (न च वाच्यम्) पद्यते गम्यतेऽर्थोऽनेनेति पदं प्रमा- गम् , तपार्यों विषय इति पदार्थशब्दव्युत्पत्तेरेव प्रमाणगोचरलस्य पदार्थस्वरूपत्वेन वा पदार्थ- शब्दप्रवृत्तिनिमित्तेन वावश्यं वक्तव्यत्यात् । न चैतदस्ति; तया च स्पष्टैवातिव्याप्तिरिति । उच्यते-विप्रहवाक्यं विना खपुष्पमिति समासवाक्यात्संसर्गाप्रतीतेविग्रहसहकारितद्वोधकं वाच्यम्, यतस्समासश्च विप्रहार्ये (प्रमाणम् ), प्रमाणमन्तरेण च लतापुप्पस्य खसंसर्गाग्रहात् खे पुष्पमिति विग्रहायोगाच्च पुष्पं मारतीत्यसन्ताभावबोधकविग्रहार्थे समासोऽङ्गीकर्तव्य-.........सर्थवो- धकविग्रहवाक्यार्थे चन्द्राननसमाप्तवत् । तथा च खपुष्पमिति वाक्यस्य खे पुष्पात्यन्ताभाव इत्यर्या- घधारणात्तस्य च पदार्थत्वान्नातिन्याशिः। ननु तहि से पुष्पं नास्तीति निषेधानुपपत्तिरिति चेत्-न; गृहीताययवार्थस्य पुंसः समासादाजपुरुषादिवसामान्यतो दृष्टेन प्रतकसंसर्गप्रतीतिनिषेधार्थवादस्य निपेधवाक्यस्येति । यद्वा चन्द्राननवाक्यार्थकथनार्थ चन्द्र इवाननमिति विप्रयाक्यवत् समस्तख- पुष्पवाक्यार्थकथनार्थ खे पुष्पं नास्तीति विग्रहवाक्यमेतदिति न कश्चिदोपशङ्कापकाशः । नाप्य- व्यातिः, यस्य कस्यापि पदार्थस्य शब्दगोचरत्वादेव । असम्भवस्तु असम्भावित एवेति सर्व सुस्थम् । अत्र प्रयोगे कर्तव्ये भ्रमविषयो दृष्टान्तः, तस्य यस्मिल्लौकिकपरीक्षिणां बुद्धिसाम्य दृष्टान्त इति दृष्टं तल्लक्षणीयत्वात् । न च धमिहेतुदृष्टान्ताः प्रामाणिका इति प्रमाणविषयस्यैव दृष्टान्तत्वम्, तस्य सन्दिग्धे न्यायप्रवृत्तिरिति प्रायिकत्वाद, अङ्गीकृत्येदमिह लक्षणत्वेन व्युत्पादितम् । वस्तुतस्तु साधर्म्यमेव, इतरयोक्तरीत्या केवलान्यायिभङ्गप्रसगो दुर्निवार इति । नअर्थानुल्लखयोगिसापेक्षत्वादभावभुपेक्ष्य भावं विभजते-स पोटेति । विभागो नाम-उद्दिष्ट- स्येयत्तया कथनम् । (द्रव्यलक्षणं तद्विभागश्च) तत्र समयायिकारणं द्रव्यम् । तन्नवधा, पृथिव्यादिभेदेन । वि. टी.] तत्रेति । कारणत्वं गुणादापतिप्रसक्तमिति तद्वारणाय समवायीति । जाति- समकायित्वं गुणादावपीति कारणत्वमुक्तम् । यद्यपि रूपं यत्किञ्चित्समयायि यत्किश्चि- कारणच, तथापि स्वसमवेतकारित्वमित्यर्थः । संसमवायिकारणत्वयोग्यतान विवक्षिता, तेन प्रथमे क्षणे घटादौ.नातिव्याप्तिः । स्वेति नास्ति . २ इति च.
६ . . प्रमाणमअरी [द्रव्य [अ. टी.] द्रव्यादिभेदेन पड्डियो भावपदार्थ इति विमागं कुर्वतैव द्रव्यादेरुद्देशः कृतः। ततो यथोद्देशलक्षणमाह-तत्रेति । यद्यपि तत्रेत्यनुक्तावपि द्रव्यलक्षणं न दुप्यति, अव्याप्त्य- भावात् । तथापीतरेपां द्रव्याश्रितत्वेन द्रव्यस्स प्राधान्यद्योतनार्य तत्रेत्युक्तम् । यद्यपि प्रथम द्रव्यनामग्रहणेन तस्य प्राधान्यं योतितम् , तथापि तेन्नैकान्तिकम् , 'प्रमाणप्रमेय.' इत्यादि- सूत्रे प्रमेयं प्रति गुणमूतस्य प्रमाणस्य प्रथमं ग्रहणात् । कार्यस्य समवायो भवन् यत्रैव मवति तत्समवायिकारणम्, तहव्यम्। एतेनोत्सनमाने द्रव्ये कार्यकारणयोर्नियतपूर्वोत्तर- क्षणवर्तित्वात्कार्यसमवायाभावेनाव्याप्त्याशङ्का निरस्ता, । न च गुणादेरपि संख्यागुण. समवायिकारणत्वादतिव्याप्तिः, उमयसम्प्रतिपत्त्यभावात् । न चायाधिततम्यवहारेण सम्प्रति- पत्तिः, दूपणवादिनो वेदान्यादेरपि तत्प्रसङ्गेन द्वैतापातात् । अत्र च निमित्तासमवायि- कारणगुणादिव्यवच्छेदार्थ समवायिपदम् । परकीयलक्षणे दूपणानुसन्धानेन खलक्षणे सम्प्रतिपत्ति सम्पायैव व्यवच्छेदक्रमो द्रष्टव्यः । यथा स्वतत्रं द्रव्यमिति द्रव्यलक्षणे स्वातत्र्य- मनाश्रयत्वं चेत्कार्यद्रव्येऽव्याप्तिः । आश्योपलम्मनिरपेक्षोपलम्भश्चेद्गन्धादावतिव्याप्तिरिति पिते समवायिकारणं द्रव्यमिति लक्षणे सम्प्रतिपत्त्यापादनम् । एतेन गुणाश्रयो द्रव्यमित्यपि लक्षणं निर्दुष्टतया व्याख्यातम् । [वा. टी.] समवायिकारणमित्यत्र खसम्मवेतकार्योत्पादकमिति विवक्षितम् । तेन समवायि च तत्कारणं च समवायिनः कारणं समवायिकारणमिति विकल्पाम्यां यातिव्याप्तिस्सा परिहता भवति । . । (पृथिवीलक्षणं तद्विभागश्च) तत्र गन्धवती पृथिवी । सा द्वेधा, पृथिव्यादिभेदेन । [व. टी.] गन्धवतीति। यद्यपि प्रथमे क्षणे गन्धो नास्तीत्यव्याप्तिः, तथापि गन्धात्यन्ता- भावविरोधिमत्वं विवक्षितम् । स च विरोधी गन्धतत्प्रागभावतत्प्रध्वंसरूपः । तदन्यत- मत्वं च न गन्धात्यन्ताभाव इति नातिव्याप्तिः । यद्वा गन्धात्यन्ताभावानधिकरणमेव लक्षणम् । न च गन्धात्यन्ताभावेऽतिव्याप्तिः, गन्धात्यन्ताभावे गन्धो नास्तीति प्रतीति- चलेन गन्धात्यन्ताभावे गन्धात्यन्ताभावस सत्वात् । अन्यथा तत्र गन्धतत्यानमावादि- वर्तेत । यत्र यदत्यन्ताभावो नास्ति तत्र तद्विरोध्यस्ति इत्यतिव्याप्तिः । स च गन्धात्य:- न्ताभावे गन्धात्यन्ताभावोऽधिकरणस्वरूपो वा, वैधम्यं वा अभावान्तरमेव वा इत्यन्य- देतदिति दिक् । यद्यपि सुरभ्यसुरभिकपालारब्धे घटे गन्धतत्प्रागभावतत्प्रध्वंसा न सन्ति, तथापि गन्धयोग्यता विवक्षिता, सा च पृथिवीत्वमेव । . * १ भयो इति ट. २ तलैकमिति श. ३ प्रमाणस्येति नास्ति झ. ४ तत उत्पति ज... ५ द्वैतवादादिति ज. ट. ६ गुणनेति झ. ७ प्रतिपायवेति ८, सम्भाव्यवेति ज. ८ द्रव्येति नास्ति ९ द्रष्येष्विति ज. ट. १०दुपयतीति ट. ११ कारणलक्षण इति १२ पीति नाति ज.ट. १३ स्वरूप इति प. ज.८.
७ निरूपणम्] टीकाश्योपेता [अ. टी.) पृथिव्यप्तेजोवावाकाशकालदिगात्ममनोभेदेन द्रव्यपदार्थो नवप्रकार इति विभागो- देशोक्तत्वात्क्रमेण लक्षणमाह-तत्र गन्धवतीति । सजातीयविजातीयव्यवच्छेदो लक्षण- प्रयोजनमिति केचित् । तत्र पृथिव्यादिलक्षणे द्रव्यत्वेन सजातीयव्यवच्छेदसम्भवेऽपि जात्यादेविलक्षणजात्यमावेन विजातीयत्वाभावाद्यवच्छेदाभावप्रसङ्गः स्यात् । तस्मादेतत्सरि- त्यागेन व्यवहार सिद्धिवा लक्षणप्रयोजनमित्युदयनाचार्याः ! अत्र •चे प्रयोजनान्तरानुक्ते- बूंद्धोक्तं फलमेव ग्राह्यम् । तथा च लक्ष्यादितरमात्रव्यवच्छेदो लक्षणप्रयोजनं भवेत् । एवं चे गन्धवत्वस पृथिवीतरमात्रावृत्तेः पृथिवीलक्षणं युक्तम् । विमतं पृथिवीति व्यवहर्तव्यम्, गन्धवत्वात् , व्यतिरेकेण जलादिवदिति व्यवहारसिद्धिः प्रयोजनम् ।' [वा. टी.] गन्धवतीत्यन्न गन्धमानं विवक्षितम् , न सुरभ्यादि । तेन नाव्याप्तिरिति द्रष्टव्यम् । ननु पृथिव्या अनित्यत्वे वनाशेनैव नारोऽवयवानवस्थानादवघेरभावात्, ततश्च मेरुसर्पपयोस्तुल्य- परिमाणत्वापत्तिः । तेन विनैव नाशेऽवयरवसेऽपि कार्यकारणत्वं स्यात् । नित्यत्वेऽनुपलब्धिवाधा, प्रमाणभावश्चेत्यत आह-सा द्वेधा इति । (परमाणुलक्षणम्) पूर्वा परमाणुरूपा। क्रियावान्नित्यः परमाणुरिति सामान्यलक्षणम् । (व. टी.] नित्य इति। आकाशादावतिन्याप्तिवारणाय क्रियावानिति घटादावतिव्याप्ति- वारणाय नित्य इति । मनोऽपि परमाणुरिति नातिव्याप्तिः। यदि मनोव्यावृत्तपरमाणो- लक्षणम् , तदा द्रव्यारम्भप्रयोजिका क्रिया विवक्षितेति नातिन्याप्तिः । [अ. टी.] परमाणोः किं लक्षणमित्यत आह-क्रियावानिति घटादिव्यवच्छेदार्थ नित्य- पदम् । आत्मादिव्यवच्छेदार्थ क्रियावानिति । ननु मनस्यतिव्यापकमेतत् । न च मनोऽपि परमाणुरेव, मूर्तले सति ,सदी स्पर्शशून्यं मनं इति वक्ष्यमाणमनोलक्षणे स्पर्शशून्यपदेन परमाणुव्यावर्तनात् । पाकावस्थायां क्षणैस्पर्शशून्यपार्थिवा व्यवच्छेदाय "सदेति विशेषणाच । न च लक्ष्यव्यवच्छेदो युक्त इति । उच्यते-क्रियावानिति द्रव्यारम्भकर्वस्य क्रियावत्त्वप्रयुक्तस्य विवक्षितत्वान्मनसि च तदभावान्नातिव्याप्तिः । हवा. टी.] परमाणुरूपेत्यनेन महत्त्वाभावादनुपलब्धिबाधस्तदयधिनानवस्थादोपश्च परिहलो भवति । प्रमाण चामत एव वक्ष्यति । आकाशनिवारणार्थ क्रियेति । म्यणुकनिवारणार्थ नित्य इति । नन्विदं पृथिवीपरमाणुलक्षणम् ? परमाणुसामान्यलक्षणं वा! आयेऽतिव्यापकम् , द्वितीये प्रमाणामायुः । १ भावप्रसङ्ग इति श. २ सिद्धिरेवेति द. ३ चेति नास्ति ज. ४ वृद्धोक्तमेव युक्तमिति ज. १.५ चेति नास्ति ज. ६ वृत्ताविति श. ७ फलमितिम. प्रयोजनमिति नास्ति. ९लक्षणमत इति ज. स. १० व्युदासार्थमिति ज. स. ११ सर्वदेति ज. स. स. १२ मस्पर्शवदिति ट. .. १३ क्षणमिति ट. १४ अणुरेति श. १५ सर्वदेति द. १६ भारम्भकतपयुक्तस्य कियावत्वस्येति श.
प्रमाणमारी [द्रव्य- [अ. टी.] द्रव्यादिभेदेन पड्डियो भावपदार्थ इति विमागं कुर्वतैव द्रव्यादेरुद्देशः कृतः । • ततो यथोद्देशलक्षणमाह-तत्रेति । यद्यपि तत्सनुक्तावपि द्रव्यलक्षणं न दुप्यति, अध्यात्य- भावात् । तथापीतरेषां द्रव्याश्रितत्वेन द्रव्यस्स प्राधान्यद्योतनाथ तनेत्युक्तम् । यद्यपि प्रथम द्रव्यनामग्रहणेन तस्य प्राधान्यं धोतितम् , तथापि तेनैकान्तिकम्, 'प्रमाणप्रमेयः' इत्यादि- सूत्रे प्रमेयं प्रति गुणभूतस्य प्रमाणस प्रथमं ग्रहणात् । कार्यस्य समवायो मवन् यत्रैव भवति तत्समवायिकारणम् , तद्रव्यम्.। एतेनोत्पन्नमाने द्रव्ये कार्यकारणयोर्नियतपूर्वोत्तर- क्षणवर्तित्वात्कार्यसमवायाभावेनाव्याप्त्याशङ्का निरस्ता. । न च गुणादेरपि संख्यागुण- समवायिकारणत्वादतिव्याप्तिः, उभयसम्प्रतिपत्त्यभावात् । न चावाधिततम्यवहारेण सम्प्रति- पत्तिः, दूषणवादिनो वेदान्त्यादेरपि तत्प्रसङ्गेन द्वैतापातात् । अत्र च निमित्तासमवायि- कारणगुणादिव्यवच्छेदार्थ समवायिपदम् । परकीयलक्षणे दूषणानुसन्धानेन स्खलक्षणे सम्प्रतिपत्ति सम्पाद्यैव व्यवच्छेदक्रमो द्रष्टव्यः । यथा स्वतत्रं द्रव्यमिति द्रव्यलक्षणे स्वातत्र्य- , मनाश्रयत्वं चेत्कार्यद्रव्येऽव्याप्तिः। आश्रयोपलम्मनिरपेक्षोपलम्भश्चेद्गन्धादावतिव्याप्तिरिति पिते समवायिकारणं द्रव्यमिति लक्षणे सम्प्रतिपत्त्यापादनम् । एतेन गुणाश्रयो द्रव्यमित्येपि लक्षणं निर्दुष्टतया व्याख्यातम् । [चा. टी.] समवायिकारणमित्यत्र खसमवेतकार्योत्पादकमिति विवक्षितम् । तेन समवायि च तत्कारणं च समवायिनः कारणं समत्रायिकारणमिति विकल्पाम्यां यातिव्याप्तिस्सा परिहता भवति । . , (पृथिवीलक्षणं तद्विभागश्च ) तत्र गन्धवती पृथिवी । सा द्वेधा, पृथिव्यादिभेदेन । "ब. टी.] गन्धवतीति। यद्यपि प्रथमे क्षणे गन्धो नास्तीत्यव्याप्तिः, तथापि गन्धात्यन्ता- भावविरोधिमलं विवक्षितम् । स च विरोधी गन्धतत्यागभावतत्प्रध्वंसरूपः । तदन्यत- मत्वं च न गन्धात्यन्ताभाव इति नातिव्याप्तिः । यद्वा गन्धात्यन्ताभावानधिकरणमेव लक्षणम् । न च गन्धात्सन्ताभावेऽतिव्याप्तिः, गन्धात्यन्ताभावे गन्धो नास्तीति प्रतीति- पलेन गन्धात्यन्ताभावे गन्धात्यन्ताभावस्य सत्वात् । अन्यथा तत्र गन्धतत्प्रागभावादि- वर्तत । यत्र यदत्यन्ताभावो नास्ति तत्र तद्विरोध्यस्ति इत्यतिव्याप्तिः । स च गन्धात्य:- न्ताभावे गन्धात्यन्ताभावोऽधिकरणस्वरूपो वा, वैधम्यं वा अभावान्तरमेव वा इत्यन्य- देतदिति दिक् । यद्यपि सुरभ्यसुरभिकपालारब्धे घटे गन्धतत्यागभावतत्प्रध्वंसा न सन्ति, तथापि गन्धयोग्यता विवक्षिता, सा च पृथिवीत्यमेव । का । १ भयो इति र. २ तवैकमिति इ. ३ प्रमाणस्येति नास्ति झ. ४ तत उत्पनेति ज... ५ द्वैतवादादिति ज. स. ६ गुणेनेति श. ७ प्रतिपाद्यवेति ८, सम्भाव्यैवेति ज. ८ व्यति मास्ति ९ दृष्येष्विति ज. स. १० दुपयनीति ट. ११ कारणलक्षण इति १२ पीति नाति ज.. पवरूप इति च.
. ७ निरूपणम्] टीकाश्योपेता [अ.टी.] पृथिव्यपेजोवावाकाशकालदिगाल्ममनोमेदेन द्रव्यपदार्थो नवप्रकार इति विभागो- देशोतवालमेण लक्षणमाह-तत्र गन्धवतीति :--- प्रयोजनमिति केचित् । तत्र पृथिव्यादिलक्षणे जात्यादेविलक्षणजात्यभावेन विजातीयत्वाभावायवच्छेदाभावप्रसङ्गः स्यात् । तस्मादेतत्परि- त्यागेन व्यवहारसिद्धिवा लक्षणप्रयोजनमित्युदयनाचार्याः । अत्र चे प्रयोजनान्तरानुक्ते- वृद्धोक्तं फलमेव ग्राह्यम् । तथा च लक्ष्यादितरमात्रव्यवच्छेदो लक्षणप्रयोजनं भवेत् । एवं चै गन्धवत्त्वस पृथिवीतरमात्रावृत्तेः पृथिवीलक्षणं युक्तम्। विमतं पृथिवीति व्यवहर्तव्यम् , गन्धवत्त्वात्, व्यतिरेकेण जलादिवदिति व्यवहारसिद्धिः प्रयोजनम् । वा. टी.] गन्धवतीत्यत्र गन्धमानं विवक्षितम्, न सुरम्यादि । तेन नाव्याप्तिरिति द्रष्टव्यम् । ननु पृथिव्या अनित्यत्वेऽवयवनाशेनैव नाशेऽवयवानवस्थानादवघेरभावाद, ततश्च मेरुसर्पपयोस्तुल्य- परिमाणत्वापत्तिः । तेन विनैव नाशेऽवयवध्वंसेऽपि कार्यकारणत्वं स्यात् । नित्यत्वेऽनुपलब्धिबाधा, प्रमाणभावश्चेत्यत आह-सा देधा.इति । * . (परमाणुलक्षणम्) पूर्वा परमाणुरूपा । क्रियावान्नित्यः परमाणुरिति सामान्यलक्षणम् । वि.टी.] नित्य इति । आकाशादावतिव्याप्तिवारणाय क्रियावानिति। घटादावतिव्याप्ति- वारणाय नित्य इति । मनोऽपि परमाणुरिति नातिव्याप्तिः। यदि मनोव्यावृत्तपरमाणो-' लक्षणम् , तदा द्रव्यारम्भप्रयोजिका क्रिया विवक्षितेति नातिव्याप्तिः। [अ. टी.] परमाणोः किं लक्षणमित्यत आह-क्रियावानिति घटादिव्यवच्छेदार्थ नित्य- पदम् । आमादिव्यच्छेदार्थ क्रियावानिति। ननु मनस्यतिव्यापकमेतत् । न च मनोऽपि परमाणुरेव, मूर्तत्वे सति सदी स्पर्शशून्यं मनं इति वक्ष्यमाणमनोलक्षणे स्पर्शशून्यपदेन परमाणुच्यावर्तनात् । पाकावस्थायां क्षणैस्पर्शशून्यपार्थिवाणुव्यवच्छेदाय सदेति विशेषणाच । न च लक्ष्यव्यवच्छेद्रो युक्त इति । उच्यते-क्रियावानिति द्रव्यारम्भकत्स्य क्रियावत्त्वप्रयुक्तस विवक्षितत्वान्मनसि च तदभावान्नातिन्यातिः । : बा. टी.] परमाणुरूपेत्यनेन महत्त्वाभावादनुपलब्धियाधस्तदवधिनानवस्थादोषश्च परिहतो भवति । प्रमाण चामत एव वक्ष्यति । आकाशनिवारणार्थ क्रियेति । अणुकनिधारणा नित्य इति । नन्विदं पृथिवीपरमाणुलक्षणम् ! परमाणुसामान्यलक्षणं वा ? आयेऽतिव्यापकम् , द्वितीये प्रमाणाभावः। 'भावसङ्ग इति . सिद्धिरेवेति ट. ३ चोते नास्ति ज. ५ वृद्धोक्तमेव युक्तमिति ज. ८.५ चेति नास्ति ज. ६ वृत्ताविति श. • फलमिति झ. प्रयोजनमिति नास्ति. लक्षणमत इति ज... १० व्युंदासार्थमिति ज. स. ११ सर्वदेति ज. 2. झ. १२ भस्पर्शवदिति ट.. १३ क्षणमिति ट, १४ अणुकेति स. १५ सर्वदेति ट. १६ भारम्भकत्वप्रयुक्तस्य क्रियावत्वस्येति श.
८ +2 + में प्रमाणमअरी [द्रव्य अत 'आह-इतीति। न च प्रयोजनाभावः, (तद्विशेषपरप्रक्षेपेक्ष्य ? तत्तद्विशेषपदप्रक्षेपस्य) तत्तद्विशेपमपेक्ष्य तत्तत्परमाण्वादिलक्षणबोधस्य प्रयोजनस्य विवक्ष्यमाणत्वादिति । (पृथिवीपरमाणुलक्षणम्) परमाणुर्गन्धवान् पार्थिवः। उत्तरा द्वेधा-नित्यसमवेता, अन्यथा चेति। • [व. टी.] पृथिवीपरमाणुलक्षणमाह-गन्धवानिति । जलादिपरमाण्यादावतिव्याप्तिवार- णाय गन्धवानित्युक्तम् । घटादायतिव्याप्तिवारणाय परमाणुरिति। यणुकेऽतिव्याप्ति- 'वारणाय परमेतियणकमपि यत्किश्चिदपेक्षया परमं भवति, इत्यतिव्याप्तिवारणाया- णुत्वमुक्तम् । उत्तरेति । अनित्येत्यर्थः । अन्यथेति । अनित्यसमवेतेत्यर्थः, न तु नित्या- समवतेति तदर्थः । अन्यथा अनित्यपृथिवीविभागे परमाणोरपि सङ्ग्रहापत्तिः । * [अ.टी.] परमाणुत्वे सति गन्धवान् यः, स पार्थिवः परमाणुरिति विशेषलक्षणमाह-परमा- णुरिति । पार्थिवद्यणुकादिव्यवच्छेदार्थ परमाणुपदम् । सलिलादिपरमाणुव्यवच्छेदार्थ गन्धवानिति । उत्तरी अनित्या पृथिवी-। अन्यथा अनित्यसमवेतेत्यर्थः । [वा. टी.] घटातिव्याप्तिधारणाय परमाणुरिति । तेजोऽणुनिवारणाय गन्धवानिति । (व्याकलक्षणम्) पूर्वा घणुकम्। स्पर्शवन्नित्यसमवेतं ह्यणुकमिति सामान्यलक्षणम् । [ब. टी.] पूर्वी नित्यसमवेता । क्रियावदिति । शब्दादावतिव्याप्तिवारणाय क्रिया- वदिति। घटादौ तद्दोपभङ्गाय नित्यसमवेतमिति । नित्यकालादिसम्बद्धं घटादि भवत्येवेति पुनरप्यतिव्याप्तिं भञ्जयितुं नित्यसमवेतमिति निजगदै । न च निष्क्रि- यनष्टयणुकेऽव्यासिः, क्रियापन्नित्यसमवेतवृत्तिद्रव्यविभाजकोपोधिमत्त्वस्य विवक्षि- तत्वात् । न च क्रियावदिति , व्यर्थम् , तपादेयत्वात्.। न च घटादावतिव्याप्तिः, परमाणुसमवेतद्रव्यमानस विवक्षितत्वात् । [.टी. आद्या निससमवेतो घणुकमित्यंत्राणुकशब्दो न घ्यणुकवाची, द्वाभ्यामणुकाम्या- मारब्धमिति. व्युत्पत्त्या यथा व्यणुकमित्यत्र येन ज्यणुकवठ्यणुकमनित्यसमवेतमाशयेत । नच त्यणुकं परमाणुत्रयारब्धमिच्छन्ति काणादाः । तथा सति साक्षात् त्र्यणुकारम्भसम्भवेन घ्यणुकोपक्रमारम्भभङ्गप्रसङ्गात् । न च त्र्यणुकवद् व्यणुकं ट्यणुकारब्धं सम्भवति । अतोऽ- यमणुशन्दः परमाणुवाचीति परमाणुद्वयारब्धव्यणुकस्स नित्यसमवेतत्वं युक्तम् । नित्यसमवे:- 'परमाणुरित्यधिकं क. स. २ मणुके इति छ. ३ भणुकमपीति छ. ४ अन्यथेति नास्ति च. ५ पार्थिवपरमेति श. ६ व्यवच्छेदायेति स. ₹.. ७ व्युदासायेति ज. ट. ८ सम्बद्धो घटादिरिति घ. ९ द्रव्य स्वस्पेत्ति छ. १० अणुशब्द इति ज...... अणुभ्यामिति ज. द. १२ मणुकमिति नास्ति द.। .१३ नित्येत्यारभ्य युक्तमित्यन्त 'नास्ति झ. A १ F निरूपणम् ] टीकानयोपेता "तसामान्यादेर्युदासीय स्पर्शवादित्युक्तम् । स्पर्शवत्परमाणुव्युदासाय समवेतपदम् । स्पर्शत्त्ववे सत्यनित्यसमजूतथ्य[कनिरासाथै नित्यपदम् । [वा. टी.] स्पर्शवदिति । घटेऽतिव्याप्तिवारणाय नित्येति । पर्शनिवारणाय स्पर्शवदिति। परमाणुनिवारणाय समवेतमिति । घटतेजोऽणुकनिवारणाय पदद्वयम् । * - (पार्थिवयणुकलक्षणम्) गन्धवद्यणुकं पॉविध्यणुकम् । पृथिवीत्वं नित्यसमवेतवृत्ति, घट- पटवृत्तिजातित्वात् सत्तावदिति परमाणुध्यणुकयोस्सिद्धिः। [ब. टी.) यत्तु निष्क्रिययणकमेव न सम्भवति, अन्यथा तेन घणुकेन समं गगनादेस्स- योगाभावापत्या सर्वमूर्तसंयोगित्वलक्षणविभुत्वानापत्तेरिति, तना संयोगजसंयोगेन विभुत्वोपपत्तेः। गन्धवदिति । जलादियणुकेऽतिव्यासिवारणाय गन्धवदिति। घटादावति- न्यासिभङ्गाय घणुकमिति । परमाणावतिव्यासिकारणाय द्वीति । न च सुरम्यसुरमि- परमावादावच्यातिः, गन्धयोग्यताया विवक्षितत्वात् । परमाणुघणुकयोः प्रमाणमाह- पृथिवीत्वमिति । वृत्तिमदेताबदुव्यमानेऽर्थान्तरम् । समवेतवृत्तीत्युच्यमानेऽपि तथा । तदर्थमुक्तम्-नित्येति । नित्यकालादिसम्बद्धे घटादौ पृथिवीत्वं वर्तत एवेत्यर्थः । तद्वा- रणाय समवेतेति । नित्यसमवेतवृत्तीत्यर्थः । तेन परमाणुधणुकवृत्तित्वसिद्धिः । यद्वा यनित्यं तत्पक्षधर्मताबलेन पृथिवीत्वाधिकरणमेव सिध्यतीति भावः । नित्यमिति वक्तव्येऽर्थान्तरम् । नित्यसमवेतम्, एतौरदिति वक्तव्ये परमाणुमात्रस्य सिद्धिर, तदर्थ विशिष्टमुक्तम् । घटपदपदे घटत्वपटत्वयोर्व्यभिचावारणाय । घंटपटान्यतरत्वे व्यभि चोरवारणाय जातित्वादिति । सत्ता नित्यसमवेते शब्दादौ वर्तत इति दृष्टान्तसिद्धिः । न च द्रव्यत्वे व्यभिचारः। तस्य पक्षसमत्वात् । [अ. टी.) ननु प्रमाणमन्तरेण कथं परमाण्वादिसिद्धिः? लक्षणमात्रेण वस्तुसिद्धौ केनचिल्ल- क्षणेन वन्ध्यापुत्रादेरपि सिद्धिस्यात् । अथ लक्षणं केवलव्यतिरेकी हेतुः । स च वन्ध्या- पुत्रोदौ न, धादिप्रमित्यभावात् , तर्हि धादिममिती लक्षणप्रवृत्तिरिति तत्र प्रमाणं बाध्यमित्यौह-पृथिवीत्वमिति । पृथिवीत्वस्यानित्यतत्वादिसमवेतपटादिवृत्तित्वेन .: १ व्यवच्छेदायेलि ज. ट. २ युक्तमिति ८. ३ व्यणुकादीति ज. दे. ४ इदं पदं नान्तिःस, पुस्तके. ५ वृत्तीति नास्ति क. ख. पुस्तकयोः. ६ इतीति नास्ति मु. पुस्तके, ७ संयोगत्वापत्येति छ. ८ परमाण्या- रघवणुक इति च. ९ पदमिदं नास्ति च, पुस्तके. १० एतावनीति छ. भगायेति च.. १२/घटस्ये व्यभिचारवारणाय पटेति । पटवे व्यभिचारवारणाय घटेति । घटपटहिरवे व्यभिचारवारणाय वृत्तीति . इति छ. १३ नित्याकारोति च. १४ व्यभिचारस्वस्पेति छ .१५सचेति नास्ति ज.ट. १६ लक्षणे इति . १७ मत आहेति जाट, प्रमाण० २.
[द्रव्य प्रमाणमसरी सिद्धसाधनताव्युदासार्थ नित्येत्युक्तम् । पृथिवीत्वं नित्यसमवेतमित्युक्ते यद्यपि नित्य- पृथिवीसिद्धौ परमाणुसिद्धिस्स्यात् , तथापि न व्यणुकसिद्धिरिति तस्मै सिध्यर्थं वृत्तिपदम् । जातिवादित्युक्ते मनस्लादौ व्यभिचारस्स्यादत उक्तम्-घटपटेति । घटजातिवादित्युक्ते घटें, एवं पटजातिवादित्युक्ते पटत्वे व्यभिचारस्स्यादत उक्तम्-घटपटजातित्वादिति। सत्तावन्नित्ये नित्यसमवेते च पृथिवीत्वस्य वृत्तौ तदुर्मयं सिध्येत्, परमाणुब्यणुकतयैव सिध्यति । पृथिव्या निरतिशयाणुत्येनैव निरवयवद्रव्यतयात्मवन्नित्यत्वं, माणुकस्स च नित्य- समवेतत्वं, परमाणोश्य क्रियावत्वं, खसमवेतद्रव्यारम्भकत्वात् । ततो यथोक्तयणुकपर- मावोः सिद्धिः । । [वा. टी.] पृथिवीत्वमिति । तन्तुसमवेतपटवृत्तित्वेने सिद्धसाधनतानिवारणाय नित्येति । व्यणुकसिध्यै समवेतेति । घटस्यपटत्वनिवृत्तये घटपटेति । असिद्धिनिवारणाय जातीति । दृष्टान्ते च नित्याकाशसमवेतशब्दवृत्तित्वेन साध्यसिद्धिः । पुक्षे च तदनुपपत्त्याभिमतसाध्यसि- द्विरिति । शरीरादिसंज्ञा च पृथिवीत्वेन परापरभावानिरूपणाम शरीरत्वादिर्जातिनिबन्धना, किन्तर्हि ! तत्तल्लक्षणोपाधिकेति मन्तव्यम् । - (शरीरसामान्यलक्षणम्) उत्तरा त्रेधा-शरीरादिभेदेन । स्पर्शवदिन्द्रियसंयुक्तमेव भोगसा- धनम् अन्त्यावयवि शरीरमिति सामान्यलक्षणम् । [ब.टी.] उत्तरेति । अनित्यसमवेतेत्यर्थः । स्पर्शनि! भोगेति । भोगः सुखदुःखान्यतरसाक्षात्कार इति । -: :::: शरीरेऽव्याप्तिवारकत्वात् । तस्य शरीरस्य केवलपापारब्धतया सुखानवच्छेदकत्वात् । न च 'दुःखसाक्षात्कारसाधनं दुःखसाधनमित्येवास्तु, इतरपदवैयर्थ्यमिति वाच्यम् । खागें * शरीरे तस्याव्याप्तिवारकत्वात् , तस्स केवलपुण्यारब्धतया दुःखानवच्छेदकत्वात् । ननु मरणस दुःखाविनाभूतत्वेन स्वर्गिशरीरमपि दुःखजनकं भवत्येवेति चेनः सुखजनके परिमाणभेदोद्भिन्नैशरीरे दुःखमजनयित्वैव नष्टे तस विशेषणसाव्याप्तिवारकत्वात् । यत्तु मरणदशायामपि खर्गिणो न दुःखम् , .१ म्युदासायेति ज. स. २ सिद्धिरिति नास्ति ट. ३ ससिध्यर्थमिति ज.र. ४ मारमस्वे मनस्त्वे चेति ट. ,५ घ्यभिचारस्स्यादित्यधिक श...६ चेत्यधिकं च. पुस्तके. ७ भन्यावयवीतिः नास्ति क. ख. पुस्तकयो... नारकेति च. ९ मुखदुःखेति च. १० इतरवैधय॑मिति छ। तस्य स्वयिनि , घ. १२ सुखेति च. १३ पदमिदं नास्ति छ. पुस्तके. १४ छ, १५ भेदादिति च, . निरूपणम्] टीकारयोपेता 'यन्न दुःखेन, सम्भिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम् । अभिलापोपनीतं यत्तत्सुखं स्वापदास्पदम् ॥ इत्यादेरुकत्यादिति तन्ना तंत्र मरणकालीनदुःखातिरिक्तदुःखासम्भेदस्योक्तत्वात् । न च मरणं दुःखाविनाभूतमेवेति तत्राव्याप्तौ स्वर्गिमरणातिरिक्तमरणमेव गृह्यतामिति वाच्यम् । सामान्यव्याप्ती वाक्यमन्तरेण सङ्कोचे मानाभावात् । न च 'पन्न दुःखेन सम्भिन्नम् इत्येव तत्र सङ्कोचकम् , अन्यथा भवद्भिरपि कर्तव्ये सङ्कोचे विनिगमनाविरह इति वाच्यम् । स्वर्गे मरणदशायो दुःखस्य पुराणादिसिद्धत्वात् । न च ते नराः सुखमृत्यप इत्यनेन सह विरोध इति वाच्यम्, तस्याल्पकालच्योपदुःखपूर्वकमरणतात्पर्यकत्वात् । न चैवं सुखान्तमुक्तिमङ्गप्रसङ्गः, इष्टापत्तेः । तदुपपादितमम्माभिः द्रव्यप्रकाशप्रकाशे । आत्मन्यतिव्याप्तिवारणाय स्पर्शयदिति । न च शरीरावयवे लक्षणमतिव्यापकमिति वाच्यम् , स्पर्शवत्पदेनान्त्यावयविन उक्तत्वात् । न च घटेऽतिव्यामिः, तस्य भोगाज- नकत्वात् , भोगसाधनपदेन भोगापच्छेदकत्वसोक्तत्वाद्वा । न चेन्द्रियसंयुक्तमेवेति भोगस वैयर्थ्यमिति वाच्यम्, तस्योपरञ्जकत्वात् । अन्ये तु भोगसाधनमित्युक्त चक्षुरादावतिव्याप्तिस्वात् , तदर्थमिन्द्रियसंयुक्तमिति वायम् । घटादावतिव्यासिवारणायैरकारः । तस्य स्मृत्यादिविषपतापनस्यापि भोगसा- धनतयारधारणार्थो. नास्तीति नातिव्याप्तिः, मनससंयुक्तसात्मनो भोगसाधनस व्यव. च्छेदार्थ स्पर्शवदिति व्याचक्षुः । तमा इन्द्रियादीनां भोगजनकतया पदवैयर्थ्यात्, प्राणवायुशरीरावयवकरचरणा- दापतिव्याप्तिश्च । ननु पूर्वव्याख्यानेऽपि लक्षणमिदं मृतशरीरव्यापकम्, अव्यापकञ्च नृसिंहशरीर इति चेत् न, आत्मविशेषगुणजनकमनस्संयोगवईयन्त्यावयविमात्रवृति- जातिमत्वं शरीरत्वमित्यस्य विवक्षितत्वात् । व्याख्यातश्चैतत् द्रव्योपायोपाये । · : - * यसुख न दुःखेन सम्मिन्नम्-दुःखमिश्र न भवति, में च मन्तम्-शत्रुकृतापहारादिशकारहितम् । मनन्तरम् भविधि सन्ततं वादियावकालभोग्यम्, भमिलायोपनीतम्-अयमानपेशाभिलापमानो- पनीतविषयम्, सन्सुखं स्व.पदास्पद स्वपिदवाच्यं भवतीत्यर्थः । सांसारिकसुखवैलक्षपयमनेन प्रदर्शितमिति बोध्यम् । इयं स्मृतिरिति विज्ञानमिक्षकः । पान्तु परिमलादिषु प्रामाणिकग्रन्थेषु श्रुतित्वेन व्यवहाराद- पादरूपा अतिरिति वयं मन्यामहे । . , तनि नास्ति च पुस्तके. २ सोचस्यामानकत्वादिति छ. ३ तरसुखमेवेति च, १ भपीति'नास्ति च. •५ व्याप्तीति च. ६ अवग्छेदकस्पेति च. शक्षुरादिष्विति घ, ८ पदमिदं नास्ति च, १२ भोगाजनकेति १. पदमिदं नास्ति च. 11 नसिंहादीति च. १२ संयोगवदन्त्यति छ.
,, प्रमाणमञ्जरी [द्रव्य सिद्धसाधनताव्युदासाथै नित्ययुक्तम् । पृथिवीत्वं नित्यसमवेतमित्युक्ते यद्यपि नित्य- पृथिवीसिद्धौ परमाणुसिद्धिस्स्यात्, तथापि न व्यणुकसिद्धिरिति तस्य सिध्यर्थं वृत्तिपदम् । जातिवादित्युक्ते मनस्त्वादी व्यभिचारस्स्यादत उक्तम्-घटपटेति 1 घटजातिवादित्युक्ते घटत्वे, एवं पटनातित्वोदित्युक्ते पटत्वे व्यभिचारस्थादत उक्तम्-घटपटजातित्वादिति। सत्तावन्नित्ये नित्यसमवेते च पृथिवीत्वस्य वृत्तौ तदुर्मयं सिध्येत्, परमाणुवणुकतयैव सिध्यति । पृथिव्या निरतिशयाणुत्वेनैव निरवयवद्रव्यतयात्मवन्नित्यत्वं, व्यणुकस्य च नित्य- समवेतत्वं, परमाणोश्च कियावत्वं, खसमवेतद्रव्यारम्भकत्वात् । ततो यथोक्तब्यणुकपर- मावोः सिद्धिः।। हवा. टी.] 'पृथिवीत्वमिति । तन्तुसमवेतपटवृत्तिवेनं सिद्धसाधनतानिवारणाय नित्येति । व्यणुकसिध्यै समवेतेति । घटत्यपटत्वनिवृत्तये घटपटेति । असिद्धिनिवारणाय जातीति । दृष्टान्ते च नित्याकाशसमवेतशब्दवृत्तित्वेन साध्यसिद्धिः । पक्षे च तदनुपपत्याभिमतसाध्यसि- द्विरिति । शरीरादिसंज्ञा च पृथिवीवेन परापरभावानिरूपणान शरीरत्वादिर्जातिनिबन्धना, किन्तर्हि ! तत्तल्लक्षणोपाधिकेति मन्तव्यम् । (शरीरसामान्यलक्षणम् ) उत्तरा त्रेधा-शरीरादिभेदेन । स्पर्शवदिन्द्रियसंयुक्तमेव भोगसा- धनम् अन्त्यावयवि शरीरमिति सामान्यलक्षणम् । बि. टी. उत्तरेति । अनित्यसमवेतेत्यर्थः । स्पर्शवदिति । दण्डादावतिव्याप्तिवारणाय भोगेति । भोगः सुखदुःखान्यतरसाक्षात्कार इति । दुःखपदं व्यर्थमिति चेन नारकीय- शरीरेऽव्याप्तिवारकत्वात् । तस्य शरीरस केवलपापारब्धतया सुखानवच्छेदकत्वात् । न च 'दुःखसाक्षात्कारसाधनं दुःखसाधनमित्येवास्तु, इतरपदवैपर्थ्यमिति वाच्यम् । खार्गे शरीरे तस्याव्याप्तिवारकत्वात् , तस्य केवलपुण्यारब्धतया दुःखानवच्छेदकत्वात् । ननु मरणस्य दुःखाविनाभूतत्वेन स्वर्गिशरीरमपि दुःखजनकं भवत्येवेति चेन्नसुसजनके परिमाणभेदोद्भिशरीरे दुःखमजनयित्वैव नष्टे तस विशेषणसाव्याप्तिवारकत्वात् । यत्तु मरणदशायामपि स्वर्गिणो न दुःखम् , युदासायेति ज. ट.* २ सिद्धिरिति नास्ति द. ३ तत्मिय मिति ज.ट. ४ मारमस्वे मनस्त्वे धेति ट. ,५ व्यभिचारस्स्यादिस्यधिक श... ६ चेत्यधिकं प. पुस्तके. ७ अन्त्यावयवीतिः नास्ति क. स. पुस्तकयो:., नारकेति घ. ९.सुखदुःखेति च. १० इतरधर्ममिनि छ..1 तस्य स्वयिति , १२ सुखेति च. १३ पदमिदं नाखि छ. पुस्खके. १४ जनकेनेति छ. ५ भेदानिधेति च.
निरूपणम् टीकाप्रयोपेता 'यन्न दुःखेन सम्मिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम् । अभिलापोपनीतं यत्तत्सुखं वापदास्पदम् ॥ इत्यादेरुक्तत्वादिति तन्नः तत्र मरणकालीनदुःखातिरिकदुःखासम्भेदस्योक्तत्वात् । न च मरणं दुःखाविनाभूतमेवेति तनाव्याप्ती स्वर्गिमरणातिरिक्तमरणमेव गृह्यतामिति वाच्यम् । सामान्यन्याप्तौ वाक्यमन्तरेण सङ्कोचे मानाभावात् । न च 'यन दुःखेन सस्मिन्नम् इत्येव तत्र सङ्कोचकम् , अन्यथा भवद्भिरपि कर्तव्ये सङ्कोचे विनिगमनाविरह इति वाच्यम् । खर्गे मरणदशायां दुःखस्स पुराणादिसिद्धत्वात् । न च ते नराः सुखमृत्यय इत्यनेन सह विरोध इति वाच्यम्, तसाल्पकालव्योपकदुःखपूर्वकमरणतात्पर्यकत्वात् । न चैवं सुखान्तमुक्तिभङ्गाप्रसङ्गः, इष्टापत्तेः । तदुपपादितभस्माभिः द्रव्यप्रकाशप्रकाशे । आत्मन्यतिव्यासिवारणाय स्पर्शवदिति । न च शरीराव्यवे लक्षणमतिव्यापकमिति वाच्यम् , स्पर्शवत्पदेनान्त्यावयंविन उक्तत्वात् । न च घटेऽतिव्याप्तिः, तस्स भोगाज- नकत्वाद, भोगसाधनपदेन भोगावच्छेदकत्वखोक्तत्वाद्वा । न चेन्द्रियसंयुक्तमेवेति भोगस वैयर्थ्यमिति वाच्यम् , तसोपरञ्जकत्वात् । अन्वे तु भोगसाधनमित्युक्ते :- वाय॑म् । घटादावतिव्याप्तिवारणायैव. . धनतयावधारणार्थो. नास्तीति नातिव्याप्ति:, मनस्संयुक्तस्यात्मनो भोगसाधनस्थ व्यव- च्छेदार्थ स्पर्शवदिति व्याचक्षुः। वनः इन्द्रियादीनां भोगजनकतया पदयात, प्राणवायुशरीरावयवकरचरणा- दावतिव्याप्तिश्च । ननु पूर्वव्याख्यानेऽपि लक्षणमिदं मृतशरीरव्यापकम् , अव्यापकञ्च नृसिंहशरीरं इति चेतना आत्मविशेषगुणजनकमनस्संयोगवदैत्यन्त्यावयविमात्रवृत्ति- जातिमत्वं शरीरत्वमित्यस विवक्षितत्वात् । व्याख्यातश्चैतत् द्रव्योपायोपाये। . * परमुख न दुःखेन सस्मितम्-दुःखमिश्र न भवति, न च प्रस्तम्-शत्रुतापहारादिशारहितम् , मनन्तरम् अविच्छिर सन्तत वर्षादियावत्कालभोग्यम्, अभिलायोपनीतम्-मयमानपेक्षामिलापमानो- पनीतविषयम्, तम्सुखं स्व.पदास्पदं स्वर्गपदवाच्यं भवतीत्यर्थः । सांसारिकसुखवलक्षणयमनेन प्रदर्शितमिति योध्यम् । इयं स्मृतिरिति विज्ञानभिश्वः । परन्तु परिमलादिषु प्रामाणिकप्रन्येषु श्रुतिरवेन व्यवहारादर्भ- पादरूपा भुतिरिति वयं मन्यामहे । . तंति नास्ति च पुस्तके. २ मशेषस्यामानकवादिति छ. ३ तरसुखमेवेति च. भपीति'नाति प. .५ च्यातीति च. ६ अवरछेदकस्येति च. ७ चक्षुरादिविति घ, ८ पदमिदं नास्ति च.१९ भोगाजनकेति घ... पदमिदं नास्ति च. 11 सिंहादीति च. १२ संयोगवदन्त्यति छ, A प्रमाणमक्षरी [अ. टी.] भोगसाधनं शरीरमित्युक्ते चक्षुरादिप्वतिघ्याप्तिः। तस्मात् इन्द्रियसंयुक्तमिति पदम् । चक्षुरादिसंयुक्तघटादिविषयव्युदासार्थम् एवेत्युक्तम् । विपयाणां स्मृत्पादिगोचर- त्वेनापि भोगसाधनानामवधारणार्थो नास्ति । मनसेन्द्रियेण संयुक्तस्यैवात्मनो भोगसाधनस्य व्यवच्छेदाय स्पर्शयदित्युक्तम् । [वी. टी. ] स्पर्शवदिति। ईशेच्छादिनिवारणाय इन्द्रियसंयुक्तमिति । भ्रमादिनिवारणाय एवेति । स्मृतिगोचरत्वेनापि तस्य भोगकारणत्वात्ततो व्यावृत्तिः। कालादिनिवारणाय स्पर्शवदिति । चक्षुरादावतिव्यापकत्वात्तदतिरिक्त सतीति वाच्यम् । यद्वा स्पर्शवद्रोगसाधनमिन्द्रियमित्येक लक्षणम् । द्वितीय . (प्रताद्यार्थः !) भोगस्साध्यते नि पाद्यतेऽनेनेति भोगसाधनम्, भोगजन- कामादिसंयोगाधिकरणमित्यर्थः । अर्श आदिभ्योऽजिति पाणिनीयस्मरणात् । आममनोनिवृत्पर्य स्पर्शवदिति । घटादिनिवृत्तये भोगेति । द्वितीयम्-इन्द्रियैस्संयुक्तमिन्द्रियसंयुक्तम् । संयोगवान पतनप्रतिबन्धकः, केशमस्तकसंयोगवत् । ततश्चेन्द्रियाणामधिकरणमित्यर्थः । एवञ्च न घटादावत्ति- व्याप्तिः । एवकारस्तु वार्थे । तेजश्शरीरघटनिवृत्तये पदद्वयम् । ... . 1 (पार्थिवशरीरं तद्विभागथ) गन्धवच्छरीरं पार्थिव शरीरम् । खसमवेतसुखदुःखान्यतरसाक्षा- कारो भोगः । तेंवैधा-योनिजायोनिजभेदेन । पूर्वमस्मदादीनां प्रत्यक्ष- सिद्धम् । उत्तरच द्वेधा-प्रकृष्टधर्मजम् अन्यथा चेति । [वि.टी.] विशेषलक्षणमाह-गन्धवदिति । अत्र गन्धयोग्यता विवक्षिता, तेन न सुर- म्यसुरभ्यवयवारब्धेऽव्याप्तिः । जलीयशरीरेऽतिव्याप्तिवारणाय गन्धयदिति । घटादा- पतिव्याप्तिवारणाय शरीरमिति । शरीरलक्षणे प्रविष्टो भोग एव क इत्यत आह- खेति । ईश्वरसाक्षात्कारस्य भोगंधारणाय स्खेति । असदादिसुखमीश्वरसम्बद्धं केन- चित्सम्बन्धेन भवत्येवेत्यत उक्तम्-समयेतेति । साक्षात्समवेतेत्यर्थः । साक्षात्सम्बन्ध- तो वचने विषयतासम्बन्धेनास्मत्सुखमीश्वरसम्बद्धं भवत्येवेत्यत उक्तम्-समवेतेति आत्मत्वादिसाक्षात्कारस भोगवारणाय सुखेति । सुखसाक्षात्कारत्वं दुःससाक्षा- काराव्यापकम् । दुःखसाक्षात्कारत्वन्तु सुखसाक्षात्काराव्यापकम् । एतत्समुचितसाक्षा- त्कारत्वमसम्मावि, अत उक्तम्-अन्यतरेति । . स्वात्तस्मादिति ज. ट. २ संयुक्तेष्टादीति ज. ट. * पा. सू. ५. २. १२७. ३ पार्थिवश- रीरमिनि ख, पदमिदं नास्ति क पुस्तके. ४ भोगार्थ इति क. स. ५ तद्विविधमिति क. ६ योनिजभेदेनेति ख. . पूर्यमिति स. ८ चेनि नाम्नि स. मुद्रितपुस्तकयो.. ९ धम्र्मेति स. १०, ११ भोगत्येति च १२ सुखसाक्षात्कारत्वं दुःखसाक्षात्कारत्वं दुःखसाक्षात्कारल्यापर्क दुःखसाक्षात्कार व्यापकमित्यशुद्ध पाठः च पुस्तके. १३ असम्भव इत्यत इति च. ।
निरूपणम्] टीकापयोपेता .। अन्ये तु-एकोत्पत्त्यनन्तरमपरं यत्रोत्पन्नं तत्र विनश्यदवस्थाविनश्यदवसद्वय- विषयक एकस्साक्षात्कारस्सम्भवतीत्याहुः । अन्ये तु-आदौ सुखमनन्तरं तज्ज्ञानम् , अनन्तरं दुःखम्, तदनन्तरं जायमानेन दुःखसाक्षात्कारेण द्वयमपि विषयीक्रियते । चतुर्थादिक्षणवृत्तित्वं सुखादेः स्वीक्रियत एवे. त्याहुः । (अत्र) लौकिकसाक्षात्कारो विवक्षितः, तेन न ज्ञानोपनीतसुखसाक्षात्कारा- दिर्मोगा! केचित्तु सविकल्पकं साक्षात्कारं गृह्णन्ति । तेन न सुखनिर्विकल्पकस भोगता। अन्ये तु तेनिर्विकल्पस्यापि भोगत्वं वदन्ति । [अ. टी.] कस्तर्हि भोगों यत्साधनं शरीरमत आह-खसमवेतेति । धैटसाक्षात्कारव्यव- च्छेदार्थ सुखादिपदम् । योगिनामीश्वरस्य च परसमवेतसुखादिसाक्षात्कारे व्यवच्छेदार्थ खसमवेतेत्युक्तम् । विनश्यदविनश्यदवस्थसुखदुःखयोर्युगपत्साक्षात्कारादन्यतरग्रहण- मुपलक्षणार्थम् । [वा. टी.] स्वसमवेतेति । घटसाक्षात्कारनिवृत्तये दुःखेति । सुखसाक्षात्कारेऽतिव्याप्ति- परिहाराय सुखेति । उभयोरेकसाक्षात्कारे द्वये चातिन्याप्तिरत आह-अन्यतरेति । अन्यतर- स्वञ्च सुखदुःखान्यत्वात्यन्ताभावाश्रयत्वम् । तथा च साक्षात्कारसम्भवान्नैकत्राव्याप्तिः । ईशस्य सुखसाक्षात्कारेऽतिव्यातिपरिहाराय स्वसमवेतेति । (अयोनिजशरीरानुमानम् ) पार्थिवाः परमाणवः पारम्पर्येण कदाचित्मकृष्टधर्मजायोनिजशरी- रोरम्भकाः, स्पर्शवत्परमाणुत्वात्, उदकपरमाणुवदिति अयोनिजशरी-. रसिद्धिः । दुःखभूयस्त्वादधर्मजमुत्तरं शरीरं मशकादीनाम् । प्रत्यक्षसिद्धं तस्यायोनिजत्वम् । [ब. टी. आगमसिद्धेऽपि प्रकृएधर्मजायोनिजशरीरेऽनुमानमाह-पार्थिवा इति। अंशतः सिद्धसाधनवारणाय पार्थिवा इति । घटादीनां बाधवारणाय परमाणव, इति । अजनितशरीरनएब्धयुकेन वाधवारणाय परमेति । पार्थिवपदेन मनसा बाधारणेऽपि साक्षाच्छरीरारम्भकल्वे बाधादाह-पारम्पयेणेति । सर्वदा शरीरारम्भकत्वे बाधा- दाह-कदाचिदिति। मशकादिशरीरारम्भकत्वेनार्थान्तरवारणाय प्रकृप्टेति । प्रकृष्ट; धर्मजयोनिजशरीरेणार्थान्तरवारणाय .अयोनिजेति । उत्तमसुखजनकविपयजनकत्वेना- र्थान्तरवारणाय शारीरेति । मनसि व्यभिचारवारणाय स्पर्शवदिति । घटे व्यभिचा.. वारणाय अणुत्वादिति । शरीरानारम्भबणुकव्यभिचारवारणाय, परमेति । उदकेति । उदकपरमाणोरागमसिद्धं शरीरारम्भकत्वम् । १ द्रव्यमपीति छ. २ सदिति नास्ति च पुस्तके. ३ घटादीति ज. ट. ४ भोगव्यवच्छेदायेति • ज. . ५ भारम्भकास्पशेति मु. (अधम्मति स. • शरीरमिति नास्ति ख पुस्तके. ९ वारणमपीति ध. १० भनारम्भयपेति घ. ११ उदवेति नास्ति च पुस्तके, १२ भारग्मकत्वादिति छ, - 1', ८ प्रमाणमिति च ܕ -- 3 प्रमाणमसरी [अ. टी.] भोगसाधनं शरीरमित्युक्ते चक्षुरादिष्वतिव्याप्तिः। तस्मात् इन्द्रियसंयुक्तमिति पदम् । चक्षुरादिसंयुक्तपटादिविषयव्युदासार्थम् एवेत्युक्तम् । विषयाणां स्मृत्यादिगोचर- त्वेनापि भोगसाधनानामवधारणार्थो नास्ति । मनसेन्द्रियेण संयुक्तस्यैवात्मनो भोगसाधनस्य व्यवच्छेदाय स्पर्शवदित्युक्तम् । . [या. टी. ] स्पर्शवदिति। ईशेच्छादिनिवारणाय इन्द्रियसंयुक्तमिति । भ्रमादिनिवारणाय एवेति । स्मृतिगोचरत्वेनापि तस्य भोगकारणत्वात्ततो व्यावृत्तिः । कालादिनिवारणाय स्पर्शवदिति। चक्षुरादावतिव्यापकत्वात्तदतिरिक्त सतीति वाच्यम् । यद्वा स्पर्शवद्भोगसाधनमिन्द्रियमित्येकं लक्षणम्।' द्वितीय (अतावार्थः) भोगस्साध्यते निष्पाद्यतेऽनेनेति भोगसाधनम्, भोगजन- कात्मादिसंयोगाधिकरणमित्यर्थः । अर्श आदिभ्योऽजिति पाणिनीयस्मरणात् । आत्ममनोनिवृत्यर्थ स्पर्शवदिति । घटादिनिवृत्तये भोगेति । द्वितीयम्-इन्द्रियैस्संयुक्तमिन्द्रियसंयुक्तम् । संयोगश्चात्र पतनप्रतिबन्धकः, केशमस्तकसंयोगवत् । ततश्चेन्द्रियाणामधिकरणमित्यर्थः । एवञ्च न घटादावति- व्यातिः । एक्कारस्तु वार्थे । तेजश्शरीरघटनिवृत्तये पदद्वयम् । ( पार्थिवशरीरं तद्विभागश्च) गन्धवच्छरीरं पार्थिव शरीरम् । स्वसमवेतसुखदुःखान्यतरसाक्षा- कारो भोगैः। तेंवैधा-योनिजायोनिजभेदेन । पूर्वमनदादीनां प्रत्यक्ष- सिद्धम् । उत्तरच द्वेधा-प्रकृष्टधर्मजम् अन्यथा चेति । [व.टी.] विशेपलक्षणमाह-गन्धवदिति । अत्र गन्धयोग्यता विवक्षिता, तेन न सुर- भ्यसुरम्यवयवारब्धेऽव्याप्तिः । जलीयशरीरेऽतिव्याप्तिवारणाय गन्धवादिति । घटादा- वतिव्याप्तिवारणाय शरीरमिति । शरीरलक्षणे प्रविष्टो भोग एव क इत्यत आह- खेति । ईश्वरसाक्षात्कारस्य भोगवारणाय स्खेति । असदादिसुखमीश्वरसम्बद्धं केन: चित्सम्बन्धेन भवत्येवेत्यत उक्तम्-समवेतेति । साक्षात्समवेतेत्यर्थः । साक्षात्सम्बन्ध- तो वचने विषयतासम्बन्धेनास्मत्सुखमीश्वरसम्बद्धं भवत्येवेत्यत उक्तम्-समवेतेति । आत्मत्वादिसाक्षात्कारस्य भोगवारणाय सुखेति । सुखसाक्षात्कारत्वं दुःखसाक्षा- त्काराच्यापकम् । दुःखसाक्षात्कारत्वन्तु सुखसाक्षात्काराव्यापकम् । एतत्समुचितसाक्षा- स्कारत्वमसम्भवि, अत उक्तम्-अन्यतरेति । . स्वात्तस्मादिति ज. ट. २ मंयुकेष्टादीति ज. द. पा. सू. ५.२. १२७. ३ पार्थिवश. रीरमिति ख, पदमिदं नाम्नि क पुस्तके. ४ भोगार्थ इति क. स. ५ सद्विविधमिति क. ६ योनिजभेदेनेति ख. • पूर्यमिति ख. ८ घेति - नास्ति ख. मुद्रितपुस्तकयोः. ९धर्मेनि ख. १०, " भोगस्वेति च १२ सुखसाक्षात्कार दुःण्यसाक्षात्कारचं दुःश्वसाक्षा व्यापकं दुःखसाक्षात्कार व्यापकमित्यशुद्ध पाठः च पुस्तके. १३मसम्भव इत्यत इति च. * निरूपणम्] टीकापयोपेता अन्ये तु-एकोत्पत्त्यनन्तरमपरं यत्रोत्पन्नं तत्र विनश्यदवस्थाविनश्यदवस्यद्वय- विषयक एकस्साक्षात्कारस्सम्भवतीत्याहुः । अन्ये तु-आदौ सुखमनन्तरं तज्ज्ञानम् , अनन्तरं दुःखम् , तदनन्तरं जायमानेन दुःखसाक्षात्कारेण यमपि विषयीक्रियते । चतुर्थादिक्षणवृत्तित्वं मुखादे खीक्रियत एवे- त्याहुः । (अत्र) लौकिकसाक्षात्कारो विवक्षितः, तेन न ज्ञानोपनीतसुखसाक्षात्कारा- दिर्भागः केचित्तु सविकल्पकं साक्षात्कारं गृह्णन्ति । तेन न सुखनिर्विकल्पफस भोगता। अन्ये तु निर्विकल्पस्यापि भोगत्वं वदन्ति । [अ. टी.] कस्तर्हि भोगो यत्साधनं शरीरमत आह-खसमवेतेति । धैटसाक्षात्कारव्यव. च्छेदार्थ सुखादिपदम् । योगिनामीश्वरस्य च परसमवेतसुखादिसाक्षात्कारे व्यवच्छेदार्थ खसमवेतेत्युक्तम् । विनश्यदविनश्यदवस्थसुखदुःखयोर्युगपत्साक्षात्कारादन्यतरग्रहण मुपलक्षणार्थम् । हवा. टी.] स्वसमवेतेति । घटसाक्षात्कारनिवृत्तये दुःखेति । सुखसाक्षात्कारेऽतिव्याप्ति- परिहाराष्ट्र सुखेति । उभयोरेकसाक्षात्कारे द्वये चातिव्याप्तिरत आह-अन्यतरेति । अन्यतर- स्वञ्च सुखदुःखान्यत्वात्यन्ताभावाश्रयत्वम् । तथा च साक्षात्कारसम्भवा कराव्याप्तिः । ईशस्य सुखसाक्षात्कारेऽतिव्याप्तिपरिहाराय स्वसमवेतेति। । (अयोनिजशरीरानुमानम् ) पार्थिवाः परमाणवः पारम्पर्येणं कदाचित्प्रकृष्टधर्मजायोनिजशरी- रोरम्भकाः, स्पर्शवत्परमाणुत्वात्, उदकपरमाणुवदिति अयोनिजशरी: रसिद्धिः। दुःखभूयस्त्वादधर्मजमुत्तरं शरीरं मशकादीनाम् । प्रत्यक्षसिद्ध तस्यायोनिजत्वम् । [ब. टी.] आगमसिद्धेऽपि प्रकृष्टधर्मजायोनिजशरीरेऽनुमानमाह-पार्थिवा इति। अंग्नता सिद्धसाधनवारणाय पार्थिवा इति । घटादीनां वाधवारणाय परमाणवः इति । अजनितशरीरनरायणुकेन बाधवारणाय परमेति । पार्थिवसदेन मनसा बाधारणऽपि साक्षाच्छरीरारम्भकत्वे वाधादाह-पारम्पर्येनेति । सर्वदा शरीरारम्भकत्वे बाषा- दाह-कदाचिदिति । मशकादिशरीरारम्भकत्वेनार्यान्तरवारणाय प्रकृष्टेति । प्रकृष्ट- धर्मजयोनिजशरीरेणार्थान्तरवारणाय अयोनिजेति । उत्तमसुखजनकविषयजनकत्वेना- र्थान्तरवारणाय शरीरेति । मनसि व्यभिचाखारणाय स्पर्शवदिति । घटे व्यभिचा: रवारणाय अणुत्वादिति । शरीरानारम्भन्यणुकन्यभिचारवारमाय परमेति । उदकेति । उदकपरमाणोरागमसिद्धं शरीरारम्भकत्वम् । १ द्रव्यमपीति छ. २ सदिनि नान्ति च पुस्तके घटादीनि ज... ४ मोगन्यवच्छेदानि ज. ट. ५ भारम्भकास्पशंति मु. (अधम्मति स. शरीरमिनि नाति म पुरुके. ९ वारणमयीति च. १० भनारम्भद्यति च. 1 उति नानि च पुस्तके, ११ भारग्मचादिनि छ, छ ८ प्रमाणमञ्जरी [द्रव्य. [म. टी.],प्रकृष्टधर्मजायोनिजशरीरं द्रौपधादेरागमसिद्धम् अनुमानतोऽपि तसिद्धिरित्याइ-, पार्थिवा इति । परमाणूनां साक्षाच्छरीरारम्भकत्वं नास्तीति बाघस्स्यात् । अत उक्तम्-- पारम्पर्येणेति । व्यणुकादिक्रमेणेत्यर्थः । तदपि सर्वदा नास्तीति स एव दोष इत्यत आइ-कदाचिदिति । अयोनिजमशकादिशरीरारम्मकत्वेन सिद्धसाधनतान्युदासाथै मकृष्टधर्मजेत्युक्तम् । परमाणुत्वं निरतिशयाशुपरिमाणवत्वं, तन्मनसि, व्यमिचरतीति स्पर्शवत्पदम् । उदकपरमाणूनामेताइग्देहारम्मकत्वम् “अदोऽम्मः परेण दिवम्" इत्या- द्यागमसिद्धं द्रष्टव्यम् । था. टी. यत्तु मतम्–दाहक्लेदादिदर्शनेन पाश्चभौतिक, शरीरमिति, तन्नः पश्चानां भूतानां समयायिकारणत्वे समत्रायिकारणगता गुणाः कार्ये गुणानारमन्त इति न्यायाच्छीतोष्णत्वायनेक- विरुद्धधर्माधिकरणत्वेन वस्तुभेदः प्रसन्येत । तत्तद्गुणाभिव्यज्यमानानां परस्परपरिहारेण स्थितानां पृथिवीत्वादीनामेकत्र समावेशे जातिसङ्करथ । तस्मात्तानि निमित्तान्येवेति न पाश्चभौतिकन्वमिति तदे- तन्मनसि निधाय प्रतिज्ञायां पार्थिवा इति पदम् । पारम्पर्येण अणुकादिक्रमेणेत्यर्थः । अन्यया नष्टेऽवयविनि अवयवदर्शनं न स्यात् । साक्षादण्यारब्धत्वेऽप्रत्यक्षतञ्च, सततारम्भे प्रलयानुपपत्तिः, तन्निराकरोति-कदाचिदिति । सिद्धसाधनपरिहाराय शरीरेति । योनिजारम्भकावेन सिद्ध- साधनपरिहाराय अयोनिजेति । अयोनिजमशकादिशरीरारम्भेण सिद्धसाधनपरिहाराय प्रकृष्टेति । पाकावस्थाणुनिरासाय स्पर्शवदिति । घटनिवृत्तये परमाणुत्वादिति । . (इन्द्रियसामान्यलक्षणम्) पडणमप्रत्यक्षं साक्षात्कारप्रतीतिसाधनमिति सामान्यलक्षणम् । वि. टी.] पडणमिति । शरीरादावतिव्याप्तिवारणाय अप्रत्यक्षमिति । साक्षात्त्वं जातिः, न विन्द्रियजन्यत्वम् । तेन न व्यर्थता, न वात्माश्रयः । प्रतीतिपदं देषमेव, तेन साक्षाचाधिकरणसाघनमित्यर्थः । इदन्तु विशेषणं परमाण्वादावतिव्याप्तिवारणाय । कालादापतिव्याप्तिवारणाप पहुणमिति । गुणविभाजकोपाधिमत्वेन पडूणमित्यर्थ इति यत् तत्रेश्वरात्मन्यतिव्याक्षिः । न च पडेय गुणा इति विवक्षितम् , ईश्वरे चाष्टौ गुणा इति नातिव्याप्तिः, तदा प्राणादावव्याप्तेः यत्तु पट्सहयात्वं विवक्षितमिति तन्नी आकाश- दिगीश्वरेषु प्राणवायुसंहितेष्वतिव्याप्तेः । न चेन्द्रियेत्वेन रूपेण पट्त्वं विवक्षितमिति वाच्यम्; आत्माश्रयात्, प्रकारान्तरस्य वक्तुमशक्यत्वाच । तस्मात् पड्गुणमिति स्वरूपक- थनमात्रम् । तस्मात्यालादावतिव्याप्तिवारणाय प्रकृतज्ञानकारणीभूतशरीरनिष्ठसंयोगा- पेवेति प. इस्यत माहेति स. २ दोषोऽत इनि ज. ट. १ न देयमेवेति च. ४ ध्यातेरिति च. ५ प्राणादा.. सवति च. माकाशकालेति च. ८ वायुद्धयेति च. ९ द्विस्वेनेति च.
- A निरूपणम् ] टीकाश्योपेता श्रयत्वं विपक्षितम् । न च प्राणवायारतिव्याप्तिः, अप्रत्यक्षपदेन त्वग्ग्राह्यगुणावस्वराहित्यस्य विवक्षितत्वात् । न चात्मन्यतिव्याप्तिः । न चाप्रत्यक्षपदेन लौकिकात्यासत्या मनोग्राह्य- गुणवत्वराहित्यं विवक्षितम् , शरीरप्राणवाय्यादावतिन्याप्तेः। न चाप्रत्यक्षपदेन मनोग्रा- ह्यगुणवत्वराहित्ये सति त्वग्राह्यगुणवत्वराहित्यं विवक्षितम् , परिमाणगोचरसाक्षात्म- तीतिसाधनेन्द्रियावयवेऽतिव्याप्तेः । न चेन्द्रियावयवसंयोगस्य विपयावयवादिनिष्ठस्स परिमाणग्रहं प्रति कारणतैव नास्ति, दूरे ? तथापि शरीरनिष्ठेन्द्रियसंयोगस्थाजनकतर वजनकत्वात् । अत्राहः-शन्देतरोद्भूतविशेषगुणानाश्रयत्वे सति ज्ञानकारणमनस्संयोगा- श्रयत्वस्य स्मृत्यजनकज्ञानकारणमनस्संयोगाश्रयत्वस्य वेन्द्रियत्वस्य विवक्षितत्वानोक्त- दोष इति । [अ. टी.] अनुमानादिव्यवच्छेदार्थमिन्द्रियलक्षणे साक्षात्कारपदम् । आत्मादिव्यवच्छे दार्थम् अप्रत्यक्षपदम् । धर्मादिव्यवच्छेदार्थ शरीरसंयुक्तपदं द्रष्टव्यम् , कालान्यत्वश्च । पड्गुणं पदसंख्याकं तचेन्द्रियमिति शेपः । षड्गुणमिति पदस्य लक्षणान्तर्गतत्वेनैवारष्टैं- कालादिव्यवच्छेदान्न पदान्तराध्याहारः । वा, टी.] षड्गुणमिति । घटसाधननिवृत्त्यर्थं प्रतीतीति । लिङ्गनिवृत्त्यर्थ साक्षात्कारेति । इन्द्रियार्थसन्निकर्पनिवृत्तये शरीरसंयुक्तमिति । साधनशब्दस्य करणपर्यायवान कालादावतिव्याप्तिः । पड्गुणपदं विभागपरम् । अप्रत्यक्षपदं खरूपपरम् .. अप्रत्यक्षावश्चात्र योगजधर्माजन्यसाक्षात्कारा- विषयत्वम्, नेन्द्रियजन्यज्ञानाविपयत्यम् आत्माश्रयापरिति । यद्वा पड्गुणमप्रत्यक्षमिति लक्षणा- न्तरम् । तस्यार्थः-आकाशनिवृत्तये पगुणमिति । पट्मकारकमित्यर्थः । तत्वञ्चानुवृत्तधर्मापेक्षया न घ्यावृत्तेन धर्मेण । तेन नैकैकाव्याप्तिः । अनुवृत्तेनेन्द्रियस्वरूपेण धर्मेण घडिधत्वानुपायात् । इन्द्रियार्थसनिकर्षनिवृत्तये-अप्रत्यक्षेति । अप्रत्यक्षत्पश्चात्र न विद्यते प्रत्यक्ष साक्षात्कारविषयो घटादिसमवायिकारणतया निरूपकत्वेन वा यस्य तत्तथेति सर्व सुस्थम् । . * + १ पदमिदं नाति प पुस्तकें. ३ सनीत्यारभ्य राहित्यमित्यन्त नाति च पुस्तके. ३ परिमाणागो. घरेति च. ४ सम्भवोपपत्तेरिति च. *शब्देवरे ये उद्भूतविशेषगुणाः सदनाप्रयस्वे सति, जानकारणीभूनो यो मनस्संयोगः, सदाश्रयत्व- मित्यर्थः । भारमादावतिम्यातिनिरासाय सत्यन्तम् । श्रोनेन्दियेऽध्यातिवारणाय शब्देतरेति । प्राणादाय . व्यासिवारणाय उभूनेति । शब्देतरोभूतगुणं संयोगमादायासम्भवधारणाय विशेषेति । कालादावतिध्याप्ति वारणाय विशेष्यदलम् । विशेष्यगतज्ञानकारणेत्यपि तद्वारणाय । फालादावुभूतरूपाभावचाक्षुष प्रति घनस्संयुफविशेषणतामा सरिकपतया सदटकचक्षुस्संयोगस्यापि हेतुस्वेन तन्नातिध्यातिवारणाय मनः पदम्। ५भारमन्यवेति ज. ट. ६ पदसंख्यमिति ज. ट. ७ भदृष्टादीति हा.
१६ प्रमाणमारी [द्रव्य (पार्थिवमिन्द्रियं तत्प्रमाणश्च ) गन्धव दिन्द्रियं घाणम् । तत्र प्रमाणम्-पार्थिवाः परमाणवः पार- म्पर्येणेन्द्रियारम्भकाः, स्पर्शवत्परमाणुत्वात् , तेजःपरमाणुवदिति । [व. टी.] गन्धवदिति । घटादावतिव्याप्तिं वारयितुम् इन्द्रियमिति । रसनादाव- तिव्याप्तिवारणाय गन्धयदिति । पार्थिचा इति । मनसि वाधवारणाय जलपरमाणौ सिद्धसाधनवारणाय च पार्थिवा इति । घटादौ वाधवारणाय अर्णव इति । अणुके बाधवारणाय परमेति । साक्षादारम्भकत्वे वाधवारणाय पारम्पयेणेति । घटादिजन- कत्वेनार्थान्तरवारणाय इन्द्रियेति । मनोधणुकघटेपु व्यभिचारवारणाय क्रमेण हेतुवि- शेषणानि । तेजः परमाणोरिन्द्रियारम्भकत्वमागमिकम् । [अ. टी.] तेजःपरमाणूनामिन्द्रियारम्भकत्वम् “स एतास्तेजोमात्राः समन्याददानः" इत्या- गमसिद्ध द्रव्यम् । [वा. टी.] गन्धवदिति । पार्थिवेन्द्रियमिति शेषः पृथिवीप्रकरणे पार्थिवत्वेनैव तत्तत्परमाण्यादीनां प्रतिपादनात्प्रकृते तेनैव प्रतिपादनमुचितम् । ननु घाणमिति विशेषणेन च तत्प्रकरणबलाज्ञातुं शक्यमिति शङ्कयम्, 'शाब्दी ह्याकाङ्क्षा शब्देनैव पूर्यत' इति न्यायादिति तल्किमत आह--घ्राणमिति । पर्यायत्वेन बोधयितुं शक्यत्वेऽपि प्राणपदेन जिघ्रति गन्धमिति व्युत्पत्या गन्धप्राहकत्वमुक्तम् । ततश्च यस्य भूतस्य यदिन्द्रियं तत् तस्य विशेषगुणग्राहकमिति सूचितम् । (विपयलक्षणं, पार्थिव विषयश्च) . स्पर्शवान् शरीरेन्द्रियव्यतिरिक्त कार्यजातो विपय इति सामान्य- लक्षणम्। गन्धवान विषयः पार्थिवो विषयः। स चेष्टकादिः प्रत्यक्षसिद्धः। सा चतुर्दशगुणवती। एवमुत्तरत्र सामान्यलक्षणानुवृत्तौ पदान्तरानुगमेन तत्तत्परमाण्वादीनां लक्षणानि भवन्ति । [व. टी. ] स्पर्शवानिति । गुणकर्मादावतिव्याप्तिवारणाय स्पर्शवानिति । शरीरेन्द्रिययोरतिव्याप्तिवारणाय व्यतिरिक्त इत्यन्तम् । परमावादावतिव्याप्तिभङ्गाय जात इति । उत्पन्न इत्यर्थः । ध्यणुकेऽतिव्याप्तिवारणाय कार्यजात इत्युक्तम् । कार्य- समवेत इत्यर्थः । अत्र शरीरादिव्यतिरिक्त एव विषयो लक्ष्या । गन्धवानिति । जलादिविषयेऽतिव्याप्तिवारणाय गन्धवानिति । पार्थिव शरीरादावतिव्याप्तिवारणाय विषय इति । एवमिति । सामान्यलक्षणं परमाणुत्वादिकम् , पदान्तरं स्नेहवत्यादिकम् । तथाच लेवान् परमाणुः जलपरमाणुरित्यादिलक्षणानि ज्ञेयानीत्यर्थः । ..१ तत्र प्रमाणमिति नास्ति ख पुस्तके. २ भणय इत्यारम्य पाधधारणायेत्यन्तं नाम्ति च पुस्तके. ३ शेयमिति ज.. ५ स्पर्शवरिति ख. ५ अतिरिक्तकार्येति स. ६स चेनि नास्ति क. ख. पुस्तकयोः. ० इटकादि-प्रत्यक्षेति ख. मु. ८ अनुगमने इति क. ९ पहिरियं नास्ति छ. पुस्तके. १. फायजात इति प.
1 निरूपणम्] टीकापयोपेता अ. टी.] आत्मादेः शरीरादिव्यतिरिक्तत्वेऽपि विषयत्वामावादत उक्तम् स्पर्शवानिति। व्यणुकव्यवच्छेदार्थ कार्यजात इति । स्पर्शवत्वे सति शरीरेन्द्रियव्यतिरिक्तपरमाणुव्य- बच्छेदाथै जात इत्युक्तम् । कार्यजातो विषय इत्युक्ते हस्तादिक्रियायां व्यभिचारस्थादत उक्तम् स्पर्शवानिति । एवमपि शरीरादौ व्यभिचारस्स्यादत उक्तम् शरीरेत्यादि । गन्धरूपरसस्पर्शा गुणाः, संख्यादयः क्षितः परापरगुरुत्वानि द्रववेगौ चतुर्दश 1. यदुक्तं गन्धवान् परमाणुः पार्थिवः स' इत्यादि तदन्यत्रापि ज्ञेयमित्यते आह-एवमिति । सेहवान् यः परमाणुरुदकपरमाणुरित्यादिप्रकारेण पदानुगमात्तलक्षणानि द्रष्टव्यानि । - था. टी..] स्पर्शवानिति । परमाणुनिवृत्तये जात इति । णुकनिवृत्त्यर्थ कार्येति। कार्या: नात: . कार्यजातः । पटरूपेऽतिव्याप्तिपरिहाराय , स्पर्शवानिति । शरीरादावतियातिपरिहाराय तव्यतिरिक्त इति । द्रव्यत्वसिद्धये गुणानाह-सेति । द्रयवेगगुरुत्यक्ष रूपायैकादशावधीति चतुर्दश गुणाः । यथा गन्धवान् परमाणुः पार्थिवः परमाणुः, तथा नेहवान् परमाणुराप्यः परमा- शुरित्याह-एवमिति। (जललक्षणम् तद्विभागश्च ), लेहवदम्भः । नित्यमनित्यश्चेति । पूर्व परमाणुरूपम्। उत्तरं द्वेषा- नित्यसमवेतम् अन्यथा चेति । पूर्व घणुकम् । अवं नित्यसमवेतवृत्ति, सरित्समुद्रजातित्वात् सत्तावदिति परमाणुव्यणुकयोस्सिद्धिः । उत्तरं शरीरादिभेदेन त्रेधा। .। (जलीयशरीरे प्रमाणम्) शरीरे प्रमाणम्-आप्याः परमाणवः पारम्पर्यण शरीरारम्भकार, स्पर्शवत्परमाणुत्वात्, पृथिवीपरमाणुवदिति । तव शुक्रशोणितसन्निपा- तनिरपेक्षम्, आप्यकार्यत्वात् करकादिवदिति। तत् प्रकृष्टादृष्टजम्, अयो- निजशरीरत्वात्, मशकादिशरीरवत् । सुखभूयस्त्वान्नाधर्मजम् ।। (जलीयेन्द्रियं तत्र प्रमाणच) लेहवदिन्द्रियं रसनम् । आप्या परमाणवः पारम्पयेणेन्द्रियार- म्भकाः। स्पर्शवत्परमाणुत्वात्, तेज:परमाणुवदिति तत्र प्रमाणम् उत्तरो विषयः सरिदौदिः । रूपादिचतुर्दशगुणवत् । । इत्युक्तमिति ज. ट. २ पदद्वपनि नानि । पुटर. ३ सलीज. पार्थिव पानागु. रिति श. ५ हस्याहेति ज.द. पदमिद नाति २८टको देने नानि इ. ८. पुनको . इतीति मास्ति क. प. पुस्तायो.. . समित काटेक. रूद्रा . मन्दनिवेन्ट- मिति ख..." पार्थिवपरमाशुवादिति स. १रद करबदलेगकरम्मत मुखेति क. १५ पदमिदं नास्ति क. स. पुनकोस. एमरस. प्रमाण.३ । प्रमाणमारी 1 [व. टी.] सरिदिति । सरित्वसमुद्रत्वयोर्व्यभिचारवारणाय जातीति । जातेस्सरि- समुद्रयोतिर्विवक्षिता । सरित्समुद्रनिष्ठद्वित्वान्यतरत्वादी व्यभिचारवारणाय जाति- त्वादिति। साध्यकृत्यं तदर्थश्च पूर्ववत् । ! आप्या इति । अत्रानुमाने यद्यपि न पार्थिवपरमाणुदृष्टान्तः तस्य पारम्पर्येण शरीरारम्भकत्वे साध्ये जलपरमाणोदृष्टान्तीकृतत्वात् , अन्योन्याश्रयात् , तथापि पृथिवी- परमाणोः प्रकृष्टधर्मजायोनिजत्वे साध्ये 'जलपरमाणुर्दृष्टान्तः । अदृशंसाध्यवत्त्वसांगम- सिद्धत्वात् । पृथिवीपरमाणोः पुनः शरीरारम्भकत्वमा प्रकारान्तरेण जलपरमाणुदृष्टान्त- निरपेक्षेणैव सिद्धमिति तदृष्टान्तेन जलपरमाणौ शरीरारम्भकत्वमानं साध्यते, यत्पक्ष- धर्मतावलादयोनिजत्वं सिध्यतीत्यन्यदेतदिति दिक् । पक्षधर्मतापललभ्यमर्थ प्रकारा- न्तरतया साधयति-तचेति।कार्यत्वमानं योनिजे व्यभिचारि, अत आप्येति । आप्यत्वम- स्वाधिकरणत्वं जलपरमाणौ व्यभिचारि । तत्र शुक्रशोणितसन्निपातं विना जायमानत्वा- भावात् , अत उक्तम्-कार्यत्वादिति । अवाधिकरणसमवेतत्वादित्यर्थः । वर्पोपला: करकाः । प्रकृष्टेति । उद्देश्यसिध्यर्थ प्रकृष्टेति । प्रकृष्टपरमाणुत्वादिजत्वेनार्थान्तर- वारणाय अष्टेति । योनिजशरीरे व्यभिचारवारणाय अयोनिजेति । योनि विना जायमानघटादौ व्यभिचारपारणाय शरीरत्वादिति । ननु दृष्टान्त इव प्रकृष्टाधर्मजवं पक्षेपि सिध्यत्वित्यत आह-सुखेति । यद्यपि मरणकालीनदुःखजनकाधर्मजन्यत्वमस्ति, तथापि प्रकृष्टाधर्मजत्वं नास्तीत्यर्थः। [अ. टी.] ऐवं पृथिवीं निरूप्य जलं निरूपयति-लेहेति अनित्यसमवेतसमुंद्रादौ प्रवृत्ते- सिद्धत्वेन सिद्धसाधनताव्युदासार्थ नित्यसमयेतेत्युक्तम् । अत्रापि सरित्समुद्रत्वजासोः प्रत्येक व्यमिचारवारणाय सरित्समुद्रजातित्वादित्युक्तम् ।। आप्याः परमाणव इति पार्थिवानुमानवव्याकर्तव्यम् । पार्थिववदाप्यमपि शरीरं योनिजायोनिजमिति मन्वानं प्रत्याह-तचेति । करको वर्षांपलः । ननु प्रकृष्टादृष्टजन्यत्वेऽ- योनिजत्वं प्रयोजकम् , तदव गमवलक्षणं प्रयोजकत्वं व्याप्त्यमावान्नास्तीति तबाह, अथवा योनिजत्वेनाभीष्टतरलाम इत्साह-प्रकृष्टादृष्टजमिति । दृष्टान्ते प्रकृष्टमष्टमधर्माख्यम्, प्रकृते तु न तयेत्याह-तत्सुखभूयस्त्वादिति । । । । १५ उत्तरः शरीरेन्द्रियव्यतिरिक्तः ।। गन्धं विहाय लेहयुक्ताः पूर्वोक्ता, एव : चतुर्दश गुणाः। 4+ -- द्विस्येति मानिछ. २ यदिनि नाम्निच. ३ इति दिगिति नाम्नि छ. ५ प्रकारवयति च. ५'पदमिदं माम्ति घ पुस्तके. ६ इतः पदयप नानि च पुस्तक.७ इवाप्रवटेति प. ८ नेति नास्ति । पुस्तके. ९ एवमिति नाम्नि झ, १० भनित्यावयवेनि ज... "समुद्रादविप्रवृत्तरिति र समुंद्रादायाम- तेरिनि र, १२ माष्टजस्ये इति ज. स. पदमिदं मान्ति स. ममीलाम हतिज, मीरा- ठरलार्म इति १.१.१५ संयुक्ता इति स..
निरूपणम् टीकापयोपेता 1 [वा. टी.] गुरुम्बसाधादग्भो निरूपयतिः- स्नेहवदिति । सट्टहासाधारणगुणविशेषः नेह', तदधिकरणमित्यर्थः । न च द्रवत्वेनैव सतहो भविष्यतीति वाच्यम् , द्रवीभूतानामपि करकादीनाम- सवाहकत्वाद । गुणत्वञ्च सातिशयादवगन्तव्यम्, ततो नासम्भवाद्याशङ्का । योनिजत्वमपाकरोति-- 'तञ्चेति । अत्राप्यादित्येव हेतु, कार्यपदन्तु व्यर्थम् । न चात्र चेतनानधिष्ठितत्वमुपाधि , मशकादि- शरीरेषु साध्याव्याते । गन्धहीनाः स्नेहयुता. सलिलस्याप्यमी गुणा मता इति । - " -" है (तेजोलक्षणं तद्विभाग) अगुरुत्वेसति रूपवत्तेजातन्नित्यानित्यभेदावधा।आद्यं परमाणुः । उत्तरं द्वेधा-नित्यंसमवेतम् अन्यथा चेति । आयं यणुकम् । तेजस्त्वं नित्यसमवेतवृत्ति दीपसुवर्णजातित्वात् , सत्तावदिति परमाणुयणुकयो- स्सिद्धिः । नासिद्धं साधनम् । तेजस्त्वं सुवर्णवृत्ति दीपाणुजातित्वात्, सत्तावदिति साधनात् । उत्तरं शरीरादिभेदेन नेधा । पूर्वत्र प्रमाणम्-- तेजसा परमाणवः पारम्पर्येण शरीरारम्भकाः, स्पर्शवत्परमाणत्वात्, पृथिवीपरमाणुवदिति शेरीरसिद्धिः । तदयोनिजमेव, तेजाकार्यत्वा- हीपर्वदिति। [ब. टी.] तेजस्त्वमिति । दीपश्चाणुश्च तद्वत्तिजातित्वादित्यर्थः । अणुत्वे व्यभिचार- वारणाय दीपेति । दीपत्वे व्यभिचारवारणाय अपियति । अणुदीपान्यतरत्वे व्यमि- चारवारणाय जातित्वादिति । यद्वा दीपस्थाणुतदृतिजातित्वादित्यर्थः । न चाप्रयोजको हेतुः, सुवर्णस्य ( तेजसथ तेजस्सा)धकयुक्तीनामन्यत्र सुलभत्वाद । [अ.टी. पृथिव्युदकयो रूपवतोर्व्यवच्छेदार्थम् अगुरुत्ये सतीत्युक्तम् । वाग्वादिव्यव- च्छदार्थ रूपवत्पदम् । ननु तेजस्वस स्वर्णजातित्वासम्प्रतिपत्तविशेषगुणासिद्धोऽयं हेतुरिति तत्राह-नासिद्धं साधनमिति । अणुजातिवादित्युक्ते पृथिवीत्वादौ व्यभिचार- स्थादत उक्तम् दीपाणुजातित्वादिति । दीपारम्भका अणवो दीपाणवः । ननु तेजस्वं घंटवृत्ति, उक्तहेतुदृष्टान्ताभ्यामित्यतिप्रसङ्गः । मैवम् ; सुवर्णे शोध्यमाने तेजस्सारत्वस प्रत्य- क्षत्ववदटस्यं तदभावेनाप्रयोजकत्वादिति । तैजसमपि शरीरं नानेकविधमाप्यवदित्याह- तदयोनिजमेवेति । नन्वदितिकश्यपाभ्यां तैजसत्वेनाभिमतादित्यादि जन्ममरणविरुद्धमे- तत्, मैवम् ; मधुविद्यादौ देवतानां सूर्यमण्डलस्थामृतोपजीविनीनां रुद्राणामेबैको मूत्वेत्या- दिना मातृपितृसम्बन्धमन्तरेण जन्मश्रवणात्, श्रुत्यादिविरोधे च पुराणप्रामाण्यानुपपत्तेः । रादिति नास्ति मु. २ नित्यानित्यसमवायादिति क. ग. ३ पूर्ववदिति घ. ४ कदाचिग्रीति '५ पदमिदं नास्ति क. ग. पुस्तकयो, ६ वायुस्व इति छ. भयमिति नाति ज... पुनकयो.. नासिद्धसायनमिति स. ९ नैवमिति ज.. १० तेजसारब्धावस्पेति ट. "इतीति नातिन.. पुस्तकयो.. * छान्दोग्ये मधुविद्या द्रष्टव्या । १२ श्रुत्या विरोधे इति ज...। जैमिनिना प्रपनतृतीया धिकरणे श्रुतिविरुद्धानां स्मृतीनों पुराणानाशाप्रामाण्यं साधितम् । + ग. .
२० - : प्रमाणमारी F. [दय (वा. टी.] रूपित्वसाधात्तेजो निरूपयति-अगुरुत्वे सतीति । घटनिवृचये अगुरुत्व इति। आकाशनिवृत्तये रूपयदिति । ननु सुवर्णादेनैमिचिन्द्रवत्वेन घृतादिवत्पार्थिवावासिद्धरसिद्धो हेतुरित्याशङ्कय नैमित्तिकदवावं तर्धेव पार्थिवत्वं नियमयेद, यदि गन्धवत्तासहकृता भवेत् । ये हि यजाता यन्नियामका धर्माः ते हि तत्समानाधिकृता दृष्टाः । यथा शीतोष्णादयः । न चैतप्रकृते प्रादेशिकत्वादस्येति मत्वाह-नासिद्धमिति । न हि प्रतिज्ञामात्रेणार्थसिद्धिरिति तत्र प्रमाणमाह- तेजस्त्वमिति । पृथिवीत्लनिवारणाय दीपेति । दीपत्वनिवारणाय अग्विति । अणुत्वनिवारणार्थ जातीति । अणवश्व दीपारम्भका एव । , (नयनेन्द्रिये प्रमाणम् ) नयनाख्येन्द्रिये प्रमाणम्-आलोकात्यन्ताभावे जायमानो रूपसा- क्षात्कारस्तेजाकारणका, रूपसाक्षात्कारत्वात्, सत्यालोके जायमानरूप- साक्षात्कारवत् । तद्गोलकस्यं नयनोन्मीलने सत्येवोपलब्धेः आलोकाज्ञान तम इत्याश्रयासिद्धिरिति चेत्-न; विधिमुखेन खातंत्र्येण कृष्णाफारेण यहीरूपवत्तया प्रतीते। [व. टी.] आलोकात्यन्ताभावेति । प्रदीपादिजन्यत्वेनार्थान्तरवारणाय सप्तम्यन्तम् । आलोकोन्योन्याभावस्थले आलोकादिजन्यत्वेनार्थान्तरवारणाय अत्यन्तेति । एवं घट- त्वात्यन्ताभावस्थले सौरालोकादिजन्यत्वेनार्थान्तरवारणाय आलोकेति । आलोक- सामान्यात्यन्ताभाव इत्यर्थः । आलोका उद्भूतरूपवत्तेजः, उद्धृतरूपयन्महातेजो वा । तेन स्वमते चक्षुरादितेजस्सत्वेऽपि नाश्रयासिद्धिः । ईश्वरसाक्षात्कारस्य पेक्षत्वेनांशतो बाधस्स्याचद्वारणाय जायमान इति । रससाक्षात्कारे, माधवारणाय स्पेति। रूपानुमितौ बाधवारणाय साक्षात्कार इति। न च ज्ञानोपनीवरूपविषयकमानस- साक्षात्कारमादाय बाधः, वदतिरिक्तत्वेन पक्षस्य विशेषणात् । उद्देश्यसिद्धये तेज इति। रसादिसाक्षात्कारे व्यभिचारवारणाय रूपेति । रूपानुमिवी च्यभिचारवारणाय साक्षा- त्कारत्वमुक्तम् । ज्ञानादिप्रत्यासत्यजन्यरूपसाक्षात्कारत्वं हेतुः।न्यायमतमवष्टभ्यालो- काधिकरणे जायमानो रूपसाक्षात्कारः पक्ष इति केचित् । तेषां मते जायमानत्वादि. विशेषणमुद्देश्यसिद्धये । तचेजः कुत्रेत्यत आह-तद्गोलकस्थमिति। हेतुमाह-नयनेति। नयनपदं गोलकाभिधायि । एतावता नयनविस्फारणमपि गोलकस्थतेजसः सहकारीति भावः । नयनगतिप्रतिबन्धकाभावतया तदुपयोगितया वा तदुपयोगः । आलोकाज्ञा- नमिति । तथाच तमसो द्रव्यत्वाभावेन किंगतरूपसाक्षात्कारः पक्ष इत्यर्थः । भट्टमंता. श्रयणेन प्राभाकरमतर्मुपमर्दयति-विधीति । भार्वतया प्रतीयमानत्वादित्येको हेतुः । उपलभ्यत इति मु. २मस्यन्वाभावेति छ. ३ उद्भूतानभिभूवरूपेति छ. ४ इति धादिनी मा इति छ.५ प्रत्यक्षायेनेति छ. ६मालोकाभावेति च. गोलकपरमिनि च. ८ उपदरीपतीति छ. ९भावरूपयवयेति च.
निरूपणम्] टीकानयोपेता भावत्वभ्रमगोचरेभावे । व्यभिचारी, भापत्यप्रकारकप्रमाविपयत्वमन्यतरासिद्धम् , भावत्वप्रकारकाप्रमाविषयत्वे विरुद्धमत आह-खातव्येणेति । ननु स्वातव्यं किम् ? प्रतियोग्यनपेक्षनिरूपणत्वचेत सिद्धिः । विशेषणत्वेनाप्रतीयमानत्वं यदि, तदाप्य- सिद्धिः । अन्धकारवद्भूतलमिति प्रतीतौ तस्स विशेषणत्वात् । भूतले घटाभार इति प्रतीतिविपयेऽभावे व्यभिचारश्च एवं स्वातव्यं विशेष्यत्वमित्यापि परास्तम् । नच स्वातत्र्य- मन्याविपयक्तीतिविपयकत्वम्, अन्यविषयकप्रतीत्यविषयकत्वं चा, सिद्धेः अन्धकारा- दीनामप्यन्धकारत्वगोचरप्रतीतिविषयत्वात् । न चासमवेतत्वं विशेष्यत्वम्, भावत्ववा- दिनो नयेऽसिद्धरित्यते आह-कृष्णाकारणेति । नीलत्वेन प्रतीयमानत्वादित्यर्थः । तथाच तमो नामारः, भारो वा द्रव्यं वा, नीलत्वात् नीलपटवदिति प्रयोगार्थः । आलो- फज्ञानाभाववान्तर, बाह्यपदार्थरूपतया प्रेतीतिर्न स्यात् । अस्ति च तत्प्रतीतिरित्याह- पहीरूपयत्तयेति ।। [अ. टी.] नयनाख्यं तैजसमिन्द्रियम् । तत्र प्रमाणम् आलोकेत्यादि । सौरायालोका- भावेऽपि" दीपाद्यालोकजन्यो रूपसाक्षात्कारस्सिद्धोऽस्तीत्यत उक्तम्-अत्यन्ताभावेति। स्पर्शादिसाक्षाकारे व्यभिचारवारणाय रूपपदम् । कुनत्यं रूपपदं साक्षाद्भवतीति तनाह- तदोलकस्थमिति । अतिसामीप्यान्नयनरूपोपलब्धिर्न युक्ता । अथ नीलं रूपं तमोगत- मुपलभ्यते । मैवम् ; तस्य भावत्वासम्प्रतिपत्तेः । तदाह-आलोकाज्ञानमिति । अथवा तस्य नेत्रेन्द्रियस्सालोकवगोलकादन्यत्र वृत्ति प्रतिपेपति-तगोलकस्थमिति । अनुमान: माक्षिपति-आलोकाज्ञानमिति । पक्षीकृतरूपसाक्षात्कारस्यासिद्धत्वादानयासिद्धिः ॥ तमप्रतीतेरविप्रतीतेलक्षण्यान्नाभावलं तमस इत्याह-न विधिमुखेनेति । तमो ध्वान्तमित्यत्र नभुल्लेखामावादटामाव इत्यादिवप्रतियोगिपारतच्यामावाच । नीलं तम इति कृष्णाकारप्रतीतेनीपटादिप्रतीतिवत्तस्वीबहिर्मुखत्वाच । [वा.टी.] आलोकेति । अपवरकान्तवरालोकाभावे रूपग्रहणस्य सौराद्यालोककारणत्वेन सिद्ध- साधनतापरिहाराय अत्यन्तेति । सर्वालोकाभात्र इत्यर्थः । आलोकात्यन्ताभाव इति विषय- सामनी, स्पर्शदिसाक्षाकारनिराकरणाय रूपेति । युक्तयोगिपरमाणुसाक्षात्कारनिराकरणाय, अमत्या द्रष्टव्यम् । किं निष्ठं तर्हि तत्तेज इत्यत आह-तदिति । नयनोन्मीलनेति । नयनसम्बन्धि पक्षमोक्षेप इति यावत् । उपलब्धेः रूपादिप्रकाशादित्यर्थः । अन्न कश्चिदाक्षिपति-आलोका- ज्ञानमिति । आलोकज्ञानामाव इत्यर्थः । आश्रयासिद्धिरिति । पक्षीकृतरूपसाक्षात्कारस्य तत्रा, प्रकारकामेति घ. २ इत भारम्य विरुद्धमित्यन्तं नास्ति छ. ३ इह भूतल इनि च.. स्वसि वेरिति छ. ५नसमयेवरखे सतीति च. ६अमावस्वेति च. ७ इत्यर्थ इत्यधिकं घ. ८ पटवदिति च. ९पदार्थतयेति च. "प्रतीतिरिति च. "तत्र चेति ज... धतीति ज... १५ पक्षीकृतस्येति ज, पक्षीभूतस्येति द. १५ इति चेअत्यधिक ट. १६ प्रतीतिरक्षण्यादिति पदमिदं नास्ति ट १७ कृष्णाकारेति नाति स. १८ पटादीनि ज.द. १९ तस्स बहिरिति श. - १२ अपीते नास्ति १३ नि २२ प्रमाणमजरी भावादिति मारः । दूपयति-नेति । तमो यदि ज्ञानाभायः स्यांचर्हि भावत्वेन प्रतियोगिज्ञाननिरपेक्षेग नीलरूपत्वेन ज्ञानाभावस्य चान्तरत्वादहिष्देन च-या 'प्रतीतिस्सा न भवेत्।। अस्ति च तत्वेन प्रतीतिरित्यर्थः । . तमसोऽद्रव्यत्वनिरूपणम् )-- अंत एव नालोकाभावस्तमः । आलोकाभावस्तम इति वदतोऽपि मते आरोपितनीलरूपमतीतेस्सत्त्वान्नाश्रयासिद्धिः। न द्रव्यं तमः, अस. सेवालोके चक्षुपा प्रतीयमानत्वात् , आलोकाभाववदिति प्रमाणोपपत्ते। कृष्णरूपं तमो द्रव्यमिति बदतो मते रूपप्रतीतेः सत्वान्नाश्रयासिद्धिः। तदतिरिक्तो भौमादिः विपयः । रूपायेकादशंगुणवत् । [व. टी.] अत एवेति । भावत्वादिसाधकयुक्तरेवेत्यर्थः । अभावत्ववादिमतेऽप्याश्र- यासिद्धि परिहरति-आलोकाभावस्तम इति । नन्वेवं भट्टमताङ्गीकारेण कणभुम्भ- तावलम्बिनोऽप्यपसिद्धान्त इत्यंत आह-तमो न व्यमिति । घटादौ व्यभिचारवार- णाय असत्येवालोक इति । पुनरप्यालोकनिरपेक्षत्वग्जन्यग्रहविषये घटादौ व्यभिचार- वारणाय चक्षुपेति । अस्मदादिचक्षुपेत्यर्थः । तेनालोकनिरपेक्षमार्जारादिचक्षुह्यत्वेऽपि न व्यभिचारः । यद्वा मार्जादिगोलकसम्बद्धसामर्थ्यवशात् तदेकचक्षुर्मात्रसहकारि तेजोड स्त्येवेति चोध्यम् । यत्राप्यौपधादिलेपं कृत्वा तस्करा वस्तु पश्यन्ति, तत्राप्यौपघलेपेन तेजोऽन्तराकर्षणमेवेति पर्यालोचनीयम् । द्रव्यत्यवादिमते सुतरां नाश्रयासिद्धिरित्युक्त- मेवेत्याह-इति वदत इति । अ.टी.] वैईलोऽन्धकारो विरलोऽन्धकार इति तारतम्यप्रतीतेश्याभावप्रतीतेश्य तद्वैलक्षण्यं प्रसिद्धम् । ततो नालोकग्रहणाभावस्तमः, किन्तु घटादिवद्भावरूपमेव, तमुपसिद्धान्त इत्यत आह-आलोकाभाव इति । आलोकामावस्तम इति मैते न तावदालोकाज्ञानं तम इति विशेषः । तर्हि कथं रूपसाक्षात्कारलक्षणमिलाम इत्यत आह आरोपितेति । आलोका- भावे स्मर्यमाण" नीलरूपारोपखीकाराद्रपप्रतीतिमिलामो विधिमुखप्रतीत्याद्युपपत्तिश्च । सिद्धे हमावत्वे तमस आलोकामावत्वं वाच्यम् । तदेव कुत इत्यत आह-असत्येवेति। तमो न भावरूपमालोकनिरपेक्षचक्षुद्यत्वात्, यथालोकामाव इत्यनुमानम् । तमो ने द्रव्यमिति पाठे सष्टमद्रव्यत्वेनामावत्वम् । ततो न खमत आश्रयासिद्धिः। परमते तु तदमाव उक्त एवेसाह-कृष्णरूपमिति । मौमं तेजो वन्हिः । आदिशब्दादाकरजादि। पूर्वोक्तचतुर्दशगुणमध्ये खेहरसँगुरुत्ववर्जमेकादश गुणाः । मालोकामावस्तमः । भालोकामावस्तमो न द्रव्यमिति घदत इति मु. २ नीलेति नास्तिक. स. ग. घ. पुसकेपु. ३न तमो द्रव्यामिति मु. ४ भावत्वसाधकेति 'च. ५तमसो भावरूपवानीकारेणेति ६ अपीति नास्ति च पुस्तके.. बहुल इति ट. ८ पदमिदं नास्ति पुस्तके..९ मतेऽपीति ज.. इति शेष इति ज. ट. ११ सदेतदिति ट. १२वस्वेति स. .
निरूपणम् ] टीकानयोता हवा. टी. ननु भवत्पक्षेऽपि नाझं धारयतीलाह-अत एवेति । अत एवोक्तदूषणसाम्यादेव । तथा चाभावे रूपं भवति । तत्राश्रयासिद्धिं तावत्परिहरति-आलोकेति । अपिरेवाओं नजन्वितः । आलोकाभावस्तम इति वदतो मते नैवाश्रयासिद्धिरित्यन्वयः। हेतुमाह-आरोपितेति । विशेषादर्शन- सधीचीन सामान्यदर्शनमारोपे निमित्तम् । तत्प्रकृतेऽप्यस्तीति न किश्चिदनुपपन्नम् । अनेन खमते कृष्णाकारप्रतीतेयुपपत्तिसूचिता । प्रतिवादिनस्तु आरोपाभावात्कृष्णप्रतीतिर्न भवत्येवेति भावः । विधिमुखमप्यसिद्धम् । न हि तत्राप्रयोग इत्येवंविधः, अन्ततिनअर्थेनापि पदेन प्रयोगसम्भवात् । प्रलयादिशब्दवत्वातन्त्र्यमप्यसिद्धम्, आलोकग्रहणे सत्येव तमोग्रहणात्, अन्यथा जात्यन्धस्य तमोबुद्धिप्रसंशदिति । खमतदााथ परमतं प्रतिक्षिपति-न द्रव्यमिति । असत्येवालोक इति । सत्यालोकाभाव इति यावत् । मतान्तरेणाश्रयासिद्धि परिहरति-कृष्णरूपमिति । अस्मिन् मते आलोकात्यन्ताभाव इति भावंसप्तमी । संगन्धगुरुत्वहीनास्त एवं गुणाः । - 12 .. (वायुलक्षणं तद्विभागश्च) रूपासहचरितस्पर्शवान वायुः। स नित्यानित्यभेदेन द्वेधा । पूर्वः पर- माणुः। उत्तरो द्वेधा-नित्यसमवेतोऽन्यथा चेति । आद्यो घणुकम् । वायुत्वं नित्यसमवेतवृत्ति, स्पर्शवतद्रव्यत्वावान्तरजातित्वात् पृथिवीत्ववदिति परमाणुध्यणुकयोस्सिद्धिः । उत्तरइशरीरादिभेदेन त्रिधा भिद्यते । चाय- वीया, परमाणवः - पारम्पर्यण शरीरारम्भका स्पर्शवत्परमाणुत्वात् पृथिवीपरमाणुवदिति शरीरसिद्धिः। तदयोनिज वायुकार्यत्वात् त्वगिन्द्रि- यवत् इति । वायवीयाः परमाणयः पारम्पर्येणेन्द्रियारम्भका स्पर्शव- परमाणुत्वात् " तेज परमाणुवदिति त्वगिन्द्रियसिद्धिः । तदन्यो विपयः। [ब.टी.] रूपासहचतेरिति ! घटादापतिव्याप्तिधारणाय रूपासहचरितेति । आकाशादापतिव्याप्तिवारणाय स्पर्शयानिति । रूपात्सन्ताभावाधिकरणत्वे सति स्पर्शा- त्यन्ताभावानधिकरण वायुरित्यर्थः । स्पर्शवदिति । घटसोरदन्यतरत्वे व्यभिचार• वारणाय जातित्वादिति । घटत्वे व्यभिचारवारणाय द्रव्यत्वावान्तरेति । द्रव्य- स्वसाक्षाद्याप्येत्यर्थः । पृथिवीत्वसाक्षाद्याप्यं घटत्वं भवत्येवेत्यत आह-द्रव्यत्वेति। आत्मत्वे व्यभिचारवारणाय स्पर्शवदिति । घटजेलद्वित्वे व्यभिचारवारणाय जातिप- दार्थान्तर्गतनित्यत्वभागः । विशेषत्वादिना रूपेण द्रव्यलसाक्षाद्याप्यविशेषादौ व्यभिचार- " नित्यानित्यमेदमित इति क. २ गतरवे सतीति मु.३ उत्तरखेंधा शरीरादिभेदेनेति मु: ५ वायु- परमाणव इति क, ख, ग, घ, ५ कदाचिछरीरेति ग. ६ तेजःपरमाणुवादिति मु. ७ वायुशरीरेति ग. पायुस्खादिति ख, घ, मु. ९कड़ाचिदिति ग, १० रूपादाविति च. "पटेति इ. १२ घटस्थूलजलेति प.
२४ । प्रमाणमबरी वारणाय जातिपदार्थान्तर्गतानेकत्यभागः । प्रतिज्ञातार्थविचार: पूर्ववत् । वायुकार्यत्वा- दिति । अयोनिजत्वं योनि विना जायमानत्वम् । तेन वायुपरमाणी व्यभिचारवारणाय कार्यत्वादितिः। [अं.टी. पृथिव्यादिव्यवच्छेदार्थ रूपासहचरितेति पदम् । जातित्वमवान्तरजाति- लच घटत्वादौ व्यमिचरतीति व्यत्वपदम् । मनस्त्वात्मत्वयोर्यभिचारवारणाय स्पर्श- वद्गतेति । स्पर्शवगतत्वादित्युक्ते परमाणुगुणादौ व्यभिचारस्स्यादत उक्त स्पर्शवद्गत- जातित्वादिति । एतावत्युक्ते घटत्वादौ व्यभिचारस्यादत उक्तम्-द्रव्यत्वेति । वंगिन्द्रियमेव कुतस्सिद्धम् ? तबाह-वायवीया इति । इन्द्रियस्स मध्यमपरिमाणत्वेन घणुकाघारम्मपूर्वकत्वात् पारम्पर्येणेत्युक्तम् । तदन्यः शरीरेन्द्रियव्यतिरिक्तो वाय: वीयो विपयः। [था. टी.] स्पर्शवत्वादिसाधाद्वायु लक्षयति-रूपेति । घटनिवृत्तये रूपेति । आकाशनिवृत्तये स्पर्शति । घटत्वादिनिवृत्तये द्रव्येति । मनस्त्वादिपरिहाराय स्पर्शवद्गतेति । 3 - - (वायोः प्रत्यक्षत्वाप्रत्यक्षत्वविचारः) Fi त्वगिन्द्रियम् अरूपिद्रव्यग्राहकम् , अरूपित्ये सति द्रव्यग्राहकेन्द्रि- यत्वात् मनोव दिति चीयोः प्रत्यक्षत्वसिद्धिरिति चेत्-न; मूर्तत्वे 'सति सर्वदास्पर्शवत्त्वस्योपाधित्वात् । विप्रतिपन्नो वायुरप्रत्यक्षः वायुत्वात् त्वगिन्द्रियवत् । स्पर्शादि नवगुणवान् । वि. टी.] त्वगिन्द्रियमिति । मनसा सिद्धसाधनवारणाय चक्षुषा वाधवारणाय च स्वगिति । शरीरसहजावरणभूतायां त्वचि अर्थान्तरत्वभङ्गाय इन्द्रियमिति । अरूपि. द्रव्यग्राहकत्वन्तु न रूपिद्रव्यग्राहकलविरहः, त्वचो घटग्राहकत्वेन पाधात् , घायुग्राह- कत्वासिद्धेश्च । किन्तु अरुपि यद्व्यं तद्राहकत्वमित्यर्थः । आकाशादौ त्वक्पुरस्कार्यगुणा- मावेनाग्राहकवसिद्धी पक्षधर्मतावलेन वायुप्राहकत्वसिद्धिः। घटादिग्राहकत्वेनार्थान्तरवार- णाय अरूपीति । रूपात्यन्ताभाववदित्यर्थः । स्पर्शग्राहकत्वेनार्थान्तरवारणाय द्रव्येति। अरूपिद्रव्यानुमापकत्वेनान्तिरवारणाय ग्राहकत्वं विषयजन्यत्यावच्छिन्नप्रत्यक्षजनकत्वं साध्यम् । चक्षुपि व्यभिचारयारणाय अरूपित्वेति । 'श्रोत्रे व्यभिचारवारणाय द्रव्यग्राहकेति'। अनुमानविधया रूपित्वे सति द्रव्यग्राहक श्रोत्रं भवति । न १ गताधारगतानेकेति च. २ प्यपोहायमिति .. ३ चरितपदमिति ज... ५ ध्यपदमिति 2. ५ उकेपीति ज...-६ वायुप्रत्यक्षरवेति ख, ग, घ. स्पर्शशून्यत्वस्येति ग, मु.. . अर्थान्तरमा ९ पटादीति प ... भावेन माइकरपासिदाविति प. 1.रूपिम्पप्रमागभारत रूपिदण्यप्रहकारणं भवतीत्यधिक च पुस्तके येति । च.
निरूपणम्] टीकाश्योपेता चोक्तरूपं साध्यं तत्र, अत आह-इन्द्रियत्वादिति । द्रव्यप्रत्यक्षजनकत्वादित्यर्थः । इन्द्रियत्वपुरस्कारो विवक्षित इति वा । तेन ने कालादावुक्तासाधारण्यघटितसाध्या- भावेऽपि व्यभिचारः । मूर्तत्व इति । मनसि साध्यमस्ति, मूर्तत्वे सति सर्वदा स्पर्शशून्यत्वमुपाधिश्वास्ति । पक्षे च साधनवति नास्तीति साधनाल्याएका पक्षेऽपि प्रथमक्षणे स्पर्शशून्यत्वमस्तीति साधनव्यापकतानिराकरणाय सर्वदेत्युक्तम् । सर्वदा स्पर्शशून्यत्वं गुणादौ, न च साध्यमिति समव्याप्तिमङ्गभङ्गाय सत्यन्तम् । कालादौ परि- माणवस्वे सति सर्वदा स्पर्शशून्यत्वमस्ति, न च साध्यमिति दोषतादवस्थ्यदुस्थितायै मूर्तत्वमवच्छिन्नपरिमाणत्वरूपमुक्तम् । खमतमाह-विप्रतिपन्न इति । अत्रानुकूलतकों बहिर्द्रव्यप्रत्यक्षताप्रयोजकोद्भूतरूपत्वादुत्थाप्यो बोध्यः । ननु शरीराधारम्भकत्वानु- मानेषु पृथिवीपरमाण्वादिपक्षकेष्वंशतो वाधः, घारम्भकपरमाणूनां शरीराधनारम्भ- कत्वादिति चेत्-न तेपामपि गरीराधारम्भणयोग्यताया अनुभूतरूपाद्युत्पत्तिदशायां घाणारम्भणोपपत्तेः । न चोद्भूतरूपादिजलपरमाण्वादिना कथमनुभूतरूपादिरसनाधा- रम्भ इति वाच्यम् । तप्तकटाहतैलतेज इव निमित्तभेदवशेन विजातीयारम्भकत्वस्यापि खीकारात् । यद्वा सर्वेऽपि परमाणवोऽनुद्भूतरूपा एव निमित्तमेदवशेन विजातीयारम्भकाः, यद्वा पृथिवीत्वं शरीरारम्भकवृत्ति स्पर्शववृत्तिद्रव्यत्वसाक्षायाप्यजातित्वादित्यनुमाने तात्पर्यमिति दिक् । [म. टी.] स केन गृह्यत इत्यपेक्षायां पूर्वपक्षं तावदाह-त्वगिन्द्रियमिति । घटादि- ग्राहकत्वेन सिद्धसाधनताव्यवच्छेदार्थम् अरूपिपदम् । स्पर्शग्राहकत्वेनोक्तदोपव्युदासार्थ द्रव्यपदम् । प्राणादौ व्यभिचारवारणाय द्रव्यग्राहकेति पदम् । चक्षुपा व्यभिचार- वारणार्थम् अरूपित्वे सतीत्युक्तम् । अरूपित्लादित्युक्ते रूपादौ व्यभिचारः, तत इन्द्रि- यत्वादित्युक्तम् । अरूपीन्द्रियवादित्युक्तेश्रो व्यभिचारस्स्यात्ततो द्रव्यग्राहकेत्युक्तम्। अरूपिले सति द्रव्यग्राहकत्यादित्युक्त चक्षुरायनुमाने व्यभिचारस्स्यात्तते इन्द्रियपदम् । सोपीधिकोऽयं हेतुरन्यथासिद्ध इति परिहरति-नेति । गुणादेरस्पर्शवत्वेऽप्यरूपिद्रव्यग्राह- कत्वाभावात्साघ्याव्यापकलं मा भूदिति मूर्तत्वे सतीत्युक्तम् । मूर्तत्वादित्युक्ते पक्षेऽपि सद्भावेन साधनव्यापकता स्वात्तेनास्पर्शवत्वग्रहणम् । अथवा मूर्तत्वेऽपि चक्षुरादाबुक्त- साध्यामावादेतदुक्तम् । ननु शब्दसारूपिद्रव्यग्राहकत्वेऽपि मूर्तले सत्यस्पर्शवत्वाभावेन साध्याव्यापकत्वं सात् । साधनाव्यापकत्वे सति साध्यसमव्यापकोषाधिः । मैवम् ; ग्राहकशब्देन साक्षात्कारजनकत्वस्य विवक्षितत्वात् । मूर्सत्वे सति स्पर्शशून्यत्वं पाकावस्थायां , नेति नाति पुस्तके. असाधारणाघटितेति च. ३ मनुकूलस्तर्क इति च, ५ घटादीनि च. ५ मारग्मोपपत्सेरिति च. ६ सैलस्थति च. अनुभूता एवेति च. ८ सशेववृत्तीति नास्ति च पुस्तके. ९ साधनवेति ज, र."निरासायमिति ज, ट." श्रोति ज, ट. १२ मत इति 'ज, ट. ५ सोपा वितरिति ट. 18मसामन्यापकत्वमिति ज, द.
२६ प्रमाणमरी [अन्य पार्थिवाणुपु विद्यते, न च साध्यम् । ततो न समव्यामिलाम इत्यत उक्तम्-सदेति । परपक्ष प्रतिक्षिप्य खपक्ष प्रमाणमाह-विमंतिपन्न इति । विप्रतिपन्नो विपयरूपः । स्पर्शसंख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वयेगास्या नव गुणाः। [वा. टी.] घटादिना सिद्धसाधनवारणाय अस्पीति । पर्से सिद्धसाधनवारणाय द्रव्येति । श्रोत्रेऽतिव्याप्तिपरिहागय द्रव्यग्राहकेति । चक्षुप्यनिव्याप्तिपरिहाराय अरूपिग्राहकेति । लिङ्गेऽतिव्याप्तिपरिहाराय इन्द्रियेति । साधनव्याप्तिपरिहाराय स्पोति । आकाशादी साच्याव्या- प्तिपरिहाराय मूर्तत्व इति । पाकावस्थपरमाणुनिवृत्तये सदेति । यत्राव्यवहितद्रव्यप्रत्यक्षत्वं तत्र तद्गतसंख्यादीनामपि प्रत्यक्षत्वमिति व्याप्तैर्निरवचत्वात्मकृते च तदभावान प्रत्यक्षत्वमिति बाधकस्त- कोऽप्यनुसन्वेयः । स्पर्शादिसंस्कारान्ता नव गुणाः । (आकाश निरूपणम् ) शब्दयदाकाशम् । तत्र प्रमाणम्-शब्दोऽप्टद्रव्यातिरिक्तसमवेतः, सत्त्वे सति श्रोत्रग्राह्यत्वात् , शब्दत्ववदिति । विप्रतिपन्नाः शब्दाः श्रूय- माणशब्दाश्रयाश्रयाः शब्दत्वात्, श्रूयमाणशब्दवत् ईत्येकत्वसिद्धिः । [ब. टी.] शब्द इति । पृथिव्यादिसमवेतत्वेनार्थान्तरवारणाय अतिरिक्तान्तम् । पृथिव्याद्यप्यतिरिक्तं भवत्येवेत्यत उक्तम् द्रव्येति । बाधवारणाय अप्टेति । गुणादि- सम्बन्धत्वेनार्थान्तरवारणाय समवेत इति । प्रतियोगिनिविष्टत्या व्येति न व्यर्थम् । रूपे व्यभिचारवारणाय श्रोत्रपाद्यत्वादिति । शब्दघसादौ व्यभिचारवारणाय सत्त्य इति । भावत्व इत्यर्थः । अत्र पक्षधर्मतावलादष्टद्र (व्यत्वा व्या)तिरिक्त द्रव्यत्वं सिध्यति। दृष्टान्ते शब्दत्वेष्टद्रव्यातिरिक्तशब्दवृत्तित्वम् । अत्र पृथिवीत्वादिरूपेणाप्टो द्रव्याण्युभय- बादिसिद्धानि ग्राह्याणि । तेनाष्टघटायतिरिक्तपटादिवृचित्वेन नार्थान्तरम् । न या गगनस्य यत्किञ्चिदष्टद्रव्यनिवेशितंतया वाघः। ननु यथा नानारूपाणां नानाधिकरणानि, तथा शब्दानामपि नानाधिकरणता सादित्यत आह-विप्रतिपन्ना इति । ननु सर्वशब्द- सैकाधिकरणत्वेऽग्रहप्रसङ्ग इति चेत्-न; कर्णशकुल्यवच्छिन्ननभसा तगृहस्वीकारात् । यद्वा नभोमात्रं श्रोत्रं सर्वेपामेकमेव । न चातिप्रसङ्गा, शब्दकारणीभूतवायुसंयोगस्य कर्णशय्कुलीनिष्ठस्य शब्दसाक्षात्कारजनने श्रोत्रसहकारित्वात् । प्रथमपक्षे पक्षोऽपि एतत्क. कारमिनो योध्यः, तेन स शब्दः केनचिच्छ्यत एव, निष्प्राणिकस्य प्रदेशस वक्तुमश- क्यत्वात् । एवमेकेनापि कयाचित्प्रत्यासत्या सर्वशब्दः श्रूयत इत्याश्रयासिद्धिारिती । १ पदमिदं नास्ति र पुस्तके. २ भावनायेगेति झ. ३ शब्दवदिति मु. ४ इति शब्दवं सिद्धमिति मु, इत्येकत्वं सस्य सिद्धमिति क. ५ पृथिव्याद्यष्टानिरिक्तमिति च. ६ सम्बन्धेनेति च. न्येति न प्यथैमिनि नास्ति च पुस्तके. ९ निवेशितयेनि घ. १० एकयेति च, १७वादिकृता म प्रथमपक्षे इति च पुस्तके " ८ घटातिरित्तेति च.
२७ निरूपणम्] टीकात्रयोपेता मेरीशब्दो मया श्रुत इति धीस्तु मेरीजन्यशब्दप्रयोज्यशब्दविपयकत्वविपया । यधि- रस्य तु शब्दग्रहो न भवति, तदुपग्राहकादृष्टाभावात् । श्रूयमाणशब्दातिरिक्ता इति पक्षार्थः । श्रूयमाणशब्देनांशतः सिद्धसाधनवारणाय श्रूयमाणातिरिक्ता इत्युक्तम् । रूपा- दिना शब्दत्वेन च बाधभङ्गाय शब्दा इति । श्रूयमाणशब्दस्य य आश्रयस्य आश्रयो येपां त इत्यर्थः । अर्थान्तरवारणाय श्रूयमाणेति। मया श्रूयमाणोऽयं ककारः तदधिकर- णवृत्तय इत्यर्थः । न च ते ते शब्दाः तत्तदाकारावृत्तपस्सन्त एतत्ककाराश्रयाभिन्नाकाशे वर्तन्तामिति वाच्यम्, गौरवात् , तेषां ग्रहापत्तेश्च । (१) खसाश्रयत्वे आश्रयाश्रयत्वे शब्दाश्रयाश्रयत्वे चार्थान्तरवारणाय श्रूयमाणेति । [अ.टी.] शब्दस्य समवेतत्त्वसाधनेऽपद्रव्यान्यतमद्रव्याश्रयत्वेन सिद्धसाधनता चाधो वा स्थादत उक्तम् अष्टद्रव्यातिरिक्तति । अष्टद्रव्यव्यतिरिक्तत्वमानसाधने स्फुटा सिद्धसाध- नता, ततः समवेतपदम् । सत्वादित्युक्ते रूपादौ व्यभिचारस्स्यादतः श्रोग्राह्यत्वादि- त्युक्तम् । श्रोत्रग्राह्यत्वादित्युक्ते शब्दान्योन्यामाये व्यभिचारस्सोंदतः सत्त्वे सतीति । सत्त्वशब्देन भावत्वं विवक्षितम् । ननु शब्दानामनेकत्वेन रूपाँधाश्रयघटादिवदाकाशानेकत्वं प्रासम्, तनाह-विप्रतिपन्ना इति । एकशब्दश्रवणकालेऽभूयमाणाश्शब्दाः विप्रतिपन्नाः । शब्दाश्रया इत्युक्ते शब्दानां शब्दाश्रयत्वाभावेन वाधस्सादत उक्तम् शब्दाश्रयाश्रयां इति । तथापि तेषी यो भिन्न आश्रयस्तदाश्रयस्वे सिद्धसाधनता, तत्परिहारार्थ श्रूयमा. णेति । अतस्सर्वशब्दानामेकाश्रयाश्रितत्वादाकाशैकलं सिद्धम् । [वा. टी.] परिशिष्टं भूतं स्पष्टयति-शब्दवदिति । भारत्वे सति शब्दात्यन्ताभायाधिकरणमि- सर्थः । सिद्धसाधननिवृत्तये अपद्रव्यातिरिक्तेति । एतच्चानुमान सामान्यरूपत्वेन सोपाधिकमिति पदान्तरप्रक्षेपोक्षेपाभ्यां व्याख्येयम् । तद्यथा-शब्दोऽष्टदव्यातिरिक्तद्रव्यसमवेतः, गुणत्वे सति श्रोत्रप्राह्यत्वात् , व्यतिरेके शब्दत्ववति न चाप्रसिद्धविशेषणत्वम् (8) शब्दस्य तावत्कर्मत्वासह- चरितसामान्यैकसमवायित्वेन गुणवं प्रसिद्धम् , गुणवेनाश्रयस्यावश्यम्भावात्पार्थिवाणुगुणानां याव- व्यभाविवेन वा श्रोत्रप्राह्यत्वेन या स्पर्शवदनाश्रयत्वाद्विशेषगुणत्वेन कालायसमवेतत्वानियतवावेन्द्रि- यग्राह्यत्वेनात्माश्रयत्वानुपपत्तेरतिरिक्तस्य सामान्यतः प्रसिद्धत्वादिति । विशेषगुणत्वञ्च सामान्याश्रयत्वे सति । नियतबाबैकेन्द्रियग्राह्यत्यान्मन्तव्यम् । शब्दाभावनिवृत्तये गुणत्वेति । रूपनिवृत्तये श्रोनेति । भूतत्वात्प्राप्तमनेकत्वं वारयति-विप्रतिपन्ना इति । विप्रतिपन्नाः श्रूयमाणेतराः । भिन्नाश्रयत्वेन सिद्धसाधनतापरिहाराय श्रयमाणेति । बाधनिवारणार्थम् आश्रयेति । ८ . । इत्यर्थ इति घ. २ इत भारम्य धूपमाणेतीति पर्यन्तं व्यतिक्रमः पसीनां समुपलभ्यते व पुस्तके ३ माश्रयत्वेति द. ४ पदमिदं नास्ति पुस्तके. ५ मत उत्तमिति ज, द. ६ स्पाश्रयति ८. तेषां शन्दानामिति ज, र. ८न सिद्धसाधनवा इत्यत उमिति ज, ट.
. प्रमाणमक्षरी [ध्य. (आकाशस्य नित्यत्वम्) आकाशं नित्यम् , असमवेतभावत्वात्, समवायवदिति नियंत्वं सिद्धम् । तदेवेन्द्रियं श्रोत्रं नाम, शब्दोपलब्धितेन्द्रियकरणिका रूपशब्दयोरन्यतरसाक्षात्कारत्याद्रूपसाक्षात्कारवत् इति पारिशेप्या- सिद्धम् । परिशेपस्तु-विमतिपन्नाः शरीरावयवा नयनादयश्च तद्राहका न भवन्ति, कार्यत्वावटचदिति । न कालादयस्तद्वाहकाः, अजसंयोगनिरा- करणात् । शब्दादिपगुणकम् । [य. टी.] असदादियायेन्द्रियग्राह्यगुणाधारत्वेन प्रसक्तमनित्यत्वं वारयितुं नित्यवं साथ- यति-आकाशमिति । घटादौ व्यभिचारवारणाय असमवेतेति । प्रागभावे व्यमि- चारवारणाय भावत्वादिति । न चाकाशत्वमिन्द्रियारम्भकत्ति भूतलावृत्तिद्रव्यवि- भोजकत्यादित्यत आह-तदेवेति । लाघवादेकमेवाकाशं कर्णशप्कुल्यवच्छेदेनेन्द्रिय- मनुमानत्वप्रयोजकमित्यर्थः । तत्रानुमानं प्रमाणयति-शब्दोपलब्धिरिति । रूपाद्युप- लन्धौ सिद्धसाधनवारणाय शब्देति । जन्यशब्दसाक्षात्कार इत्यर्थः । मनसान्ति. रवारणाय भूतेति । शरीरादिनार्थान्तरवारणाय इन्द्रियेति । असाधारणकारणत्वेनो. द्देश्यसिद्धये कारणेति । रूपसाक्षात्कारत्वादित्येतावन्मात्रोक्तावसिद्धिः। शब्दसाक्षात्कार- स्वादित्युक्तौ च साधनवैकल्यम् । साक्षात्कारतामात्रोक्तो सुखादिसाक्षात्कारे व्यभिचारः। अतो विशिष्टो हेतुः । रूपाद्यनुमितौ व्यभिचारवारणाय साक्षात्कारत्वमुक्तम् । साक्षा- स्कारस्य पक्षे हेतौ दृष्टान्ते च लौकिकत्वमपि विशेषणम् । ननु शब्दसाक्षात्कारत्वमेव हेतुरस्तु केवलव्यतिरेकीति चेत्-न केवलव्यतिरेकमनङ्गीकुर्वाणं प्रत्येतस्योक्तत्वादिति । न चासिद्धिवारकं विशेषणमिदम् , अखण्डाभावत्वात् । ननु तावता तदिन्द्रियमाकाशमेव कथमित्यत आह-पारिशेप्यादिति । परिशेपमाह-विप्रतिपन्ना इति । तद्राहका न भवन्ति शब्दग्राहका न भवन्तीत्यर्थः । रूपादिग्राहकत्वेन वाधवारणाय तदिति । लौकिकात्यासत्या तद्राहकेन्द्रियाणि ने भवन्तीत्यर्थः । अजेति । संयुक्तसमवायेन हि कालादिना सवाः, न चाकाशेन तस्स संयोगोऽस्तीत्यर्थः । [अ. टी.] अस्मदादिपायेन्द्रियग्राह्यगुणाधारत्वेन घटादिवदाकाशसनित्यतामाशयाप- वदति-आकाशमिति । घटादौ व्यभिचारवारणार्थम् असमवेतपदम् । प्रागभावे तस्य व्यवच्छेदार्थ भावत्वोक्तिः । प्रत्यनुमानवाधितमनुमानमनित्यत्वं न साधयतीत्यर्थः । पृथिव्यादिभूतत्वादाकाशस्पेन्द्रियारम्भकत्व प्राप्त ते यावर्तयति-तदेवेति । तत् आकाशमेव १वस्य नित्यत्वमिति का इत्येवं तस्य नित्यत्वमिति ग, घ, २ परिशेषादिति मु. ३ चेति नास्ति मु. ५ विभाजकोपाधिमत्यादिति च. ६ अपीति नास्ति च पुस्खके. . 'वावदिन्द्रियमिति च.. परिदोपादिति छ. ९ चेति छ. १० भाकातस्यापीति ८.१ प्रागमावस्येति ज. १२ तदिति नाति ज, 2. पुस्तकयो.. मबितिच.
निरूपणम्] टीकारयोपता श्रोत्राख्यमिन्द्रियं पारिशेष्यात्सिद्धमित्यन्वयः। परिशेषानुग्राह्यमनुमानमाह-शब्दोपल- धिरिति । शब्दोपलब्धिमनस्करणिका सा भवतीति सिद्धसाधनता, तत उक्तम् भूतेति । साक्षात्कारत्वादित्युक्ते आत्मसुखादिसाक्षात्कारे व्यभिचारस्स्यादत उक्तम् । रूपशब्द- योरन्यतरेति । अनयोरन्यतरत्वञ्चासिद्धमिति साक्षात्कारग्रहणम् । शब्दसाक्षात्कार- त्खादित्युक्ते न तावदन्वयः । सुखादिसाक्षात्कारे यद्यपि व्यतिरेकोऽस्ति, तथापि केवलव्य- तिरकेऽसन्तुष्ट प्रतीदं द्रष्टव्यम् । इदानी परिशेपमाह-परिशेषस्त्विति । विमतिपन्नाः श्रोत्रव्यतिरिक्ताः । सन्तु तर्हि कालादयस्संयुक्तसमवायेन, शब्दोपलब्धिहेतवस्तत्राह-न कालादय इति । शरीरकालादीनां ग्राहकत्वमारोप्यायं परिशेपो द्रष्टव्यः । अजानां कालादीनां मियः संयोगस निराकरिष्यमाणत्वात् संयुक्तसमवायोऽत्र न युक्तः । रहसन्तु चक्षुरादिव्यापारे सत्यपि बधिरस्य शब्दसाक्षात्काराभावादिन्द्रियान्तरसिद्धौ श्रोत्रसिद्धिरिति। पञ्च संख्यादयः शब्दश्चेति पड्गुणाः । {या. टी.] नन्याकाशस्यैकत्वे सजातीयाकाशाभावात्तस्मिन्नटे पुनरुत्पत्यभावाच्छब्दस्यानुत्पत्तिरेव स्यात् । उत्पत्ती वान्यधर्मतेत्यत आह.-- -आकाशमिति । घटेऽभावे चातिव्याप्तिपरिहाराय विशेषणद्वयम् । भूतत्वे चेन्द्रियारम्भकरवे प्राप्ते आह-तदेयेन्द्रियं सिद्धमित्यन्तेन । नमसत्समवायिकारणस्यकत्यादेवेन्द्रियलक्षणकार्यव्यस्यारम्भसम्भवादन्यस्य चाभावात्तत्तद्भोगनिय- तादयविशेषोपनिबद्धकर्णशष्कुल्यवच्छिन्नं नम एव श्रोत्रदेशमिन्द्रियव्यपदेशं लभत इति परिशेषा- सिद्धमित्यन्धयः । ननु भूतत्वेऽपि शरीरानपेक्षावदिन्द्रियस्यापेक्षाभावादनारम्भस्य सुवचत्वाल्किमिति परिशेपापेक्षा इत्यत आह-इतीति । इति प्रमाणेनेन्द्रियस्यावश्यापेक्षणीयत्वादित्यर्थः । तदेवाह- शब्दोपलब्धिरिति । मनसा सिद्धसाधनपरिहाराय भूतेति । सुखसाक्षात्कारेऽतिव्याप्तिपरि- हाराय रूपेति । असिद्धिपरिहाराय शब्देति । पुनरपि तां परिहर्तुम् अन्यतरेति । कालादय एवं शब्दप्राहका भविष्यन्तीत्याशङ्कय कालादय आकाशसमवेतं शब्दं गृह्णन्तः संयुक्तसमवायेन गृहीयुर्घटस्पमित्र चक्षुः । न चैतदुपपद्यते, यतः कालाकाशयोरमूर्तत्वेन मूर्तमानसमवेतकर्म- णोऽसम्भवेन तजन्यसंयोगासम्भवानित्यसंयोगस्य च निराकृतत्वात् । तथा च प्रयोगःकालादयो न तद्राहकाः, तदसम्बद्धत्वात् , रूपवदिति मत्वाहन कालादय इति । शब्दोपलब्धैर्भूतेन्द्रिय जन्यत्वसाधनानन्तरं शरीराजन्यत्यनिराकरणं मन्दशशानिरासार्थमिति सन्तोष्टव्यम् । शन्दः संख्यादिपञ्चकन। * (काललक्षणं, तत्र प्रमाणञ्च) विवक्षितपरत्वासमवाय्याश्रयत्वे सति सर्वगतः कालः। विप्रति- पन्नं मनो विधाक्षतपरत्वासमवाव्याश्रयसंयुक्तं द्रव्यत्वात, आत्मवदिति सन्न प्रमाणम् । १ पदमिदं नालिज, द. पुस्तकयो, २ सन्दग्राहकस्यामिति ज. ३प्रयुछ इति र.
- ' प्रमाणमञ्जरी [द्रव्य- य.टी. विवक्षितेति । विवक्षितं दिकृतभिन्नं यत्परत्वं तदसमवायिकारणाश्रयत्वे सति सर्वगतो व्यापकः काल इत्यर्थः । आकाशादावतिव्याप्ति भजयितुं सत्यन्तम् । पिण्डेऽतिव्याप्तिभङ्गाय सर्वगतत्वं विशेषणम् । दिश्यतिव्याप्तिभंगाय विवक्षितेति । शब्दासमयायिकारणाश्रये गगनेऽतिव्याप्तिभॉय परत्वेति । परत्वनिमित्तकारणादृष्टा- द्याश्रये आत्मन्यतिव्याप्तिं भञ्जयितुम् असमवायीति । विप्रतिपन्नमिति । शरी रादिमूर्तासंयुक्तमित्यर्थः । विप्रतिपनत्वरूपपक्षतावच्छेदकधर्मावच्छेदेन साध्य सिध्यत् कालमादायैव सिध्यति, अन्यथा पिण्डसंयुक्तत्वेनान्तिरत्वात् । रूपादौ वाधवारयाय मन इति। आकाशसंयुक्तत्वेनार्थान्तरं वारयितुम् आश्रयान्तम् । दिशान्तिरवारणाय विवक्षितेति । शब्दासमवायिकारणसंयोगाश्रयगगनादिनार्थान्तरवारणाय पर- त्वेति । परत्वनिमित्तादृष्टादिवदात्मनार्थान्तरवारणाय असमयायीति । तादृश- पिण्डसंयुक्तत्वेनात्मनि साध्यसिद्धिः । अनेदं बोध्यम्-परत्वापरत्वे न यावद्रव्यभाविनी, किन्त्वपक्षावुद्धिविशेषजन्ये । तन्नाशादिनाश्ये चोत्पन्नेन परत्वेन ज्येष्ठांदिव्यवहारः। यद्वा-बहुतरतपनपरिस्पन्दान्तरि- तजन्मत्वादिनायं व्यवहारः । न च तेनैव परत्वादिव्यवहारोपपत्ती किं परत्वादिनेति वाच्यम् । एतस्य विचारस विस्तरभयेनावानवसरः, दुस्थानत्वात् । [अ. टी.] क्रमप्राप्त कालं निरूपयति-विवक्षितेति। विवक्षितं परत्वं खंज्येष्ठत्वमपरस्यापि कनिष्ठत्वस्सोपलक्षणम् , तस्य यदसमवायिकारणम् । आदित्यपरिस्पन्दा अहोरात्रलक्षणा आदित्यसमवेतास्तावत्तन्यूनत्वाधिक्यकृते विवक्षिते परत्वापरत्वे । तत्र देवदत्तादिपिण्ड- संयुक्तं सत् यदादित्यसंयोगि पिण्डानामादित्यगतक्रियोपनायकं तस्य यः पिण्डसंयोगः, सोऽयमसमैवायिकारणत्वेन विवक्षितः, तदाश्रयस्स काल इत्युक्ते संयोगस्यानेकाश्रयत्वारिप- ण्डानामपि कालत्वं स्यात् । अत ठक्तम् सर्वगत इति । सर्वगतत्वमाकाशात्मेश्वरेषु विद्यत इति तब्यवच्छेदोर्थम् असमवाय्याश्रयत्वे सतीत्युक्तम् । एवमपि संयोगास- मवाय्याश्रयत्वेन तेष्वेव व्यभिचारस्स्यादत उक्तम् परत्वेति । दिशि व्यभिचारवारणाय विवक्षितपदम् । विमतिपन्नं शरीरादि । मूर्तासंयुक्तमाश्रयसंयुक्तमसमवाय्याश्रयसंयुक्त- श्वेत्युक्ते सुखाद्यसमवायिमनस्संयोगानयात्मसंयुक्तत्वेन सिद्धसापनत्व सादत उक्तम् पर- त्वेति । परत्वासमवाय्याश्रयदिक्संयुक्तत्वेन सिद्धसाधनताव्युदासाथ विवक्षितपदम् । आत्मा विवक्षितपरत्वासमवाय्याश्रयपिण्डसंयुक्तः । मनसोऽपि पिण्डसंयोगेन सिद्धसाधनलं नाशकनीयम् , विप्रतिपन्नपदेन व्युदासात् । १ धारयिनुमिति च. २ सर्वगतेति च. ३, ४ वारणायेति घ. ५ अतिच्याशिवारणायेति च. भर्यान्तरं स्थादिति च. ७ इनः पशिवयं च पुस्तके नाम्नि. ८ भदृष्टादीनि छ.९ दुस्स्थरवादिति च.१. स्वेति भाति ज, ८. पुस्तकयोः. ३१ गतेति नाति र पुस्तके. १२ भसमवायिस्वेनेनि ज, ट. १३ विवक्षितस्स पसदेति ज. १४ जात्याकाशेति ज, ट. १५ व्यवच्छेदायेति ज, र. १६ संयोगाश्रयत्वेनेति ज, द. १७ षतः पररवग्रहणमिति ज, ट. १८ धारणामिति ज, ट. १९ समवाम्याश्रयेनि श. म. २१ ग्युदासायेति ज, ट. २२ नाशयमिति अ, 2. २० साधनतेति निरूपणम् ] टीकापयोपेत्ता [वा.टी.] अचेतनला(हणादि द्विगादि) भेद भिन्नत्वाच कालमाकलयते--विरक्षितेति । विवक्षितं नियतं यत्परत्वं तदसमवायिकारणमादित्यपरिस्पन्दोषनायकवि द्रव्यपिण्डसंयोगस्तदाश्रयस्तदधिकर- गम् । पिण्डेऽतिच्यातिपरिहाराय सर्वति। सर्वगतावञ्च युगपत्सर्वमूर्तसंयोगित्वम् । आकाशनिराकरणाय असमवायीति । तथाप्यसमवायिशब्दवत्वेन तत्रैवातिव्यामिपरिहाराय परत्वेति । दिश्यतिव्या- प्तिपरिहाराय विवक्षितेति। विमतिपत्रं शरीरसंयुक्तमित्यर्थः । न चाप्रसिद्धविशेषणत्वम् । तथाहै-- अस्ति तद्गुरुतरतपनपरिस्पन्दान्तरिते स्थविरादिपिण्डे परत्वादिव्यवहारः । तत्परत्वञ्च तपनपरिस्प- न्दप्रकर्पजम् , तदन्वयव्यतिरेकानुविधायित्वात्, तन्तुपटवत् । तेपाञ्च तपनवर्तितेन स्वतःपिण्डा- सम्बन्धत्वादाश्रयस्यापि प्रादेशिकत्वेन पृथिव्यादिवत्तत्सम्बन्धाजनकत्वादात्ममनसोश्व विशेषगुणाधा- रत्वात्तदनुपपत्तेर्दिशोऽप्यादित्यादिसंयोगोपनायकत्वेनैवावगमापिण्डादित्यपरिस्पन्दसम्बन्धापादकस्य कस्यचिद्विभुनो द्रव्यस्यान्यतस्सिद्धत्वादिति । तथाच मानम्---तपनपरिस्पन्दा द्रव्यद्वारेण स्थावि- रादिपिण्डसम्बद्धाः; स्वतोऽसम्बद्धत्त्रे सति तरसम्बद्धत्वात् , पटगतमहारजतरागवदिति । पिण्डा- हित्यपरिस्पन्दानां संयुक्तसमवायलक्षणप्रत्यासत्तिरवधेया । संख्यादिपञ्चकमेपः । (दिग्लक्षणम् तत्र प्रमाणञ्च) अनियतपरत्वासमवाय्याश्रयत्वे संति सर्वगता दिक् । विप्रतिपन्न मनोऽनियतपरत्वासमवाय्याश्रयसंयुक्तम्, द्रव्यत्वादात्मवदिति तत्र प्रमाणम्। ब. टी.] अनियतेति । आश्रयत्वमसमवाय्याश्रयत्वञ्च गगनादौ गतमतः परत्वेति। आत्मन्यगतये असमवायीति । कॉलत्वेऽनतिप्रसक्तये अनियतेति । अनियतत्पश्च कालकृतपरत्वादिव्यावृत्तदिकृतपरत्वादिनिठो जातिविशेषः । यद्वा महुतरतपनपरिस्प- न्दान्तरितजन्यत्यादि यत् तद्बुद्धिजन्यत्वं संयुक्तसंयोगभूयस्त्वादि तदुद्धिजन्यत्वं वा । पिण्डेऽतिव्याप्तिभङ्गाय सर्वगतेति । विमंतिपन्नमिति । दिक्साधकानुमानेनियतपदं कालसंयुक्तत्वेनार्थान्तरवारणाय साध्ये विवक्षितपदचे , तदानियतत्वमेव तदर्थः । कचि- दक्विक्षितमपि पाठः । तदविवक्षितं परत्वं कालकृतं तद्भिन्नत्यमित्यर्थः । शेष पूर्ववत् । [अ. टी.] अनियतं न ज्यैठेयादिवद्यावन्यमावि । अनियतपदं कालव्यवच्छेदीय । इतरत्पूर्ववलक्षणेऽनुमानेऽपि । कालसंयुक्तत्वेन सिद्धसाधनताब्युदासार्थमनियतपदम् । [वा. दी.] विशेषगुणशून्यत्वाधापकत्याच दिशं विशदयति-अनियतेति । कालनिराकरणाप अनियतेति । अस्त्येक मूर्तमधिं कृत्या मूर्तान्तरे परत्यादिन्यवहारः । तत्परत्वादेरन्यनिमित्तास- म्भवात् प्रमात्रपेक्षया तत्तदेशादिसंयोगो निमित्तम् । तस्य चानुपसकान्तस्य तन्नेति तदुपसान्तस्य १ सतीति नास्ति स पुस्तके. २,३ पाश्रपरवे इति च. ४ काले इति च. ५ यदिनि नानि च पुसके ६ सहयन्यत्यमिति च, ७ धारणायेति च ८ पदमिदं नाति च, पुखके. ९ घेदनियत्तेति .. 1. मविवक्षितेति च. " कालकृतमिवमिति घ. ज्येष्ठरवादीति ट. १३ पपरददामिति कर * - प्रमाणमारी चानेति () तदुपसकामकं विभुद्रव्यं वाच्यम् ! सब दिक् । न च कालेनार्यान्तरम्, तस्य क्रिया- निवन्धन एव व्यवहारे सामर्थ्यावगमादिति । (दिक्कालयोस्समुच्चित्य प्रमाणम् ) मनसा असंयुक्तं मनः सर्वदा विशेषगुणरहितद्रव्यद्वयसंयुक्तम् , द्रव्यत्वादात्मवैदिति दिकालयोः प्रमाणम् । अत्र द्रव्यद्वये कल्पितेऽन्यत्र तेनैव व्यवहारसिद्धः, अनेककल्पनायां प्रमाणाभाः । दिकाली द्रव्य: त्वावान्तरजातिरहितौ बुध्यनाधारत्वे सति सर्वगतत्वादाकाशवदित्येकत्वं सिद्धम् । [ब. टी.] उभयत्र प्रमाणमाह-मनसेति । मनसि मनोद्वयसंयुक्तत्वेनार्थान्तरभङ्गार्य मनसा असंयुक्तमिति । आकाशादिसंयुक्तत्वेनाश्रयासिद्धिवारर्णाय मनसेति । साक्षान्मनसा यत्र संयुक्तमित्यर्थः । तेन परम्परया मनसि मनस्संयुक्तत्वेनापि नाश्रया- सिद्धिः । रूपादौ वाधवारणाय मन इति । संयुक्तत्वे द्वयसंयुक्तत्वे द्रव्यद्वयसंयुक्तत्वेच साध्येऽर्थान्तरम् , गुणरहितेत्यायुक्तौ बाधः, अतो विशेषेति । प्रथमक्षणे घटपटा- दिरपि गुणरहितः । एवमुक्तौ खण्डप्रलये च जीवव्योमनी विशेषगुणरहिते, अतः सर्व- देति । औपाधिक एवं दिकालयोर्भेदः, न साहजिक इत्याह-अत्रेति । एकत्वे प्रमाणमाह-दिकालाविति । जातिरहितत्वं द्रव्यान्तरजातिरहितत्वं द्रव्यत्वावान्तर- धर्मरहितत्वच बाधितम् , अतो विशिष्टसाध्यकीर्तनम् । आत्मनि व्यभिचारमाय सत्यन्तम् । घटादौ व्यभिचारभङ्गाय विशेष्यभागः। म. टी.] एकैकत्र प्रमाणमुक्त्वोभयत्राप्याह-मनसेति । सर्वदा विशेषगुणरहितमनोऽ. न्तरसंयुक्तत्वेन सिद्धसाधनताव्युदासार्थम् मनसाऽसंयुक्तं मनः पक्षः । गुणरहितद्रव्य- संयुक्तमित्युक्ते वाधस्स्यादतो विशेषपदम् । प्रलये तादृशजीवव्योमसंयुक्तत्वेन सिद्धसाध- नताव्युदासीथे सर्वदेति पदम् । नन्वत्र कल्पेऽन्यौ दिकालौ, अन्यत्र कल्पेऽन्यौ, ततो. ऽन्यत्रान्यावित्यानन्त्यं प्राप्तम् , कल्पभेदेन वा व्यवहारभेदेन वा व्यवहारानन्त्येन वा तद्धे- वोस्तयोस्तत्स्यादत आह-अत्रेति। एकत्वे तर्हि किं प्रमाणम्, तदाह-दिकालाविति। जातिरहितौ द्रव्यत्वजातिरहितौ चेत्युक्त बाधस्स्यादतोऽवान्तरजौतिपदम् । घटत्वाद्यवान्तरजा- तिरहितत्वेन सिद्धसाधनताब्युदासार्थ द्रव्यत्वविशेषणम् । आत्मनि व्यभिचारवारणाय युध्यनाधारत्वे सतीत्युक्तम् । घटादौ तेव्यभिचारवारणाय सर्वगतत्वादित्युक्तम् । १ भाकाशवदित्यधिकं ग, घ. २ द्वितय इति क. ३ अनन्तेति क, ख, ग, घ. प्रमागाभावादिति क. ५वारणायेति च. सिदिस्तद्वारणायेति घ. ७ परम्परायामिति च. ८ पदमिदं नास्ति च पुस्तके. ९प्रयमे इति च... घटादिरपीति घ. राहित्यं दव्यत्वनातिराहित्यञ्च याधितमिति घ. १२ वारणायेति १.५ भाव इति प. १४ प्रमाणमाहेति . १५ यदेति स. १६ व्यद्वयसंयुक्तरवे इति झ, द्रष्यमित्युके इति ट. १७ धारणार्थमिति ज, ट. १८ इत्युक्तमिति ज, ट. १९ ततोऽपीति ट. २० इतः पदधतुष्टयं नासिज, . पुस्तकयो:. २. जातीति नास्ति ज, २. पुस्तकयोः. २२ निवारणायेति ज, . ..
निरूपणम्] टीकात्रयोपेता {वा. टी.] मनोऽन्सरसंयुक्तत्वेन सिद्धसाधनतापरिहाराय मनसाऽसंयुक्तमिति । सिद्धसाधन- तापरिहाराय गुणरहितेति । बाधनिवारणाय विशेपेति । प्रलयावस्थात्माकाशसंयुक्तत्वेन सिद्धसाधनतापरिहाराय सर्वदेति । एकेनैव परत्यादिव्यवहारोपपत्तौ बहुत्वकल्पनं गौरवग्रस्तमस- देवेत्याह-अत्रेति । ननु किमिति प्रमाणाभावः, दिगादि द्रव्यत्वव्याप्यजातिसजातीयप्रतियोगिक- भेदवत्, अशब्दद्रव्यत्वात् , घटवत् । तथाच पृथिवीत्वादीनामसम्भवादिक्त्वादिसिद्धावनेकत्व- सिद्धिः । न च गौरवपराहतिः, प्रामाणिकेऽर्थे गौरवस्यादोषत्वात् । तथा चाहः- प्रमाणयन्त्यदृष्टानि कल्प्यानि सुवहून्यपि । बालाग्रशतभागोऽपि न कल्प्यो निष्प्रमाणकः ।। इति । तर संस्कारबत्त्वेन सोपाधिकत्वात् । ननु मा भूदनेकत्वम्, एकत्वे किं मानमत आह -दिकाला- विति । द्रव्यत्वेति । द्रव्यत्वव्याप्यत्यावच्छिन्ना यावती जातिव्यक्तिस्तदत्यन्ताभाववन्ताविध्यर्थः । एतेन सिद्धसाधनता परिहता भवति । दिगाधनन्तत्वत्रादिना दिक्त्वादेरपि द्रव्यत्वव्याप्यत्वाशीका- रात् । वाधनिवारणाय अवान्तरेति । घटत्यादिरहितत्वेन सिद्धसाधनतापरिहाराय द्रव्यत्वेति । आत्मनिवारणाय बुद्धीति । घटनिवारणाय सर्वेति । ननु भवतूतजातिरहितत्वम् , एकत्यस्य कुतोऽ- सिद्धिः । न हि तदेवैकन्यम् , नापि तदनुपपत्या तदविनामावेन वा तत्सिद्धिः, गुणादिषु व्यभिचा- रादित्याशङ्कयाह-इतीति । अस्मादेव प्रमाणादित्यर्थः । अयमाशयः-~-इह हि द्रव्यप्रकरणा- व्येति पदं लभ्यते । तथा च द्रव्यस्य सतो दिगादेरुक्तजातिरहितत्वं तर्येव स्यात् यदि व्यक्त्यैक्यं भवेत् । अन्यथा तुल्यत्वादीनां जातिबाधकानामसम्भवादुक्तजातिसत्वमेव स्यात् , न तद्रहितत्यमिति । यद्वा द्रव्यत्वे सयुक्तजातिरहितत्वमेकत्वेनाविनाभूतमाकाशे दृष्टमित्यनयोरप्येकत्वमापादयतीत्याह- इतीति । एतन्मानसाधितादस्मादेव धर्मादित्यर्थः । तथाच दिगायेकत्वाधिकरणम्, द्रव्यत्वे सत्युक्तजातिरहितत्वादाकाशवदिस्यकत्वसिद्धिरित्यर्थः । न च विशेषगुणत्यमुपाधिः, विशेषपदस्य पक्षमात्र यावर्तकत्वेन पक्षेतरत्यादिति । दिकालयोस्सर्वकार्यनिमित्तत्वं सर्वगतत्वञ्च) विप्रतिपन्नं सर्व कार्य दिकालकार्यम् , कार्यत्वात् , सम्प्रतिपन्नवदिति तयोरसर्वकार्यनिमित्तत्वम्। आकाशकालदिशः सर्वगताः, मनोव्यति- रिक्तत्वे सत्यस्पर्शद्रव्यत्वात्, आत्मवदिति सर्वगतत्वम् । संख्यादि- पञ्चगुणवत्वं कालदिशोः। (व. टी.] दिकालयोस्सर्वनिमित्तत्वं साधयति-विप्रतिपन्नमिति । दिकालसमवेता- तिरिक्त कार्यमित्यर्थः । इदन्तु विशेषणं यन्मते पक्षातिरिक्तस्यैव दृष्टान्तता, तन्मते दृष्टान्ता- सिद्धिवारणाय । सर्वोत्पत्तिमनिमित्ततासिद्धये सर्वमिति । व्योमादी बाधवारणाय + सम्प्रतिपयकार्यवदिति क. २ असंस्पर्शति मुद्रितपुस्तकपाठान्तरम्. ६ सिद्धमित्यधिक ग. ४ मादेति नास्ति च पुस्तके प्रमाण-५ . प्रमाणमञ्जरी कार्यमिति । पूर्वमाका सर्वशब्दाश्रयत्वेन व्यापकत्वं सचितम् । दिपालयोश्च सर्वग- तत्वं लक्षणया सचितम् । तत्साधयति-आकाशेति । मनसि व्यभिचारभङ्गाय सत्य- न्तम् । घटादी व्यभिचारवारणाय अस्पर्शवदिति । गुणादी व्यभिचारवारणाय द्रव्यत्वादिति । सर्वदा स्पर्शरहितत्वं चोध्यम् । [अ. टी.] दिकालयोस्समानधर्मत्वनिरूपणप्रसङ्गात्समानधर्मान्तरमाइ-विप्रतिपन्न- मिति। परत्वापराव्यतिरिक्तं सर्वगतत्वं दिवाललक्षणे प्रक्षिप्तम् । तत्र प्रमाणमसम्भवपरि- हारार्थमाह-आकाशेति । आकाशस्यापि सर्वशब्दाश्रयत्वेन सर्वगतत्वस्य सूचितत्वा- साधनं युक्तम् । द्रव्यत्वं पृथिच्यादौ व्यभिचरति, अतः अस्पर्शपदम् । मनस्यस्पर्शद्र- व्यत्वेऽपि न सर्वगतत्वमित्यत आह-मनोन्यतिरिक्तत्वे सतीति । मनोव्यतिरिक्त सर्शशून्ये क्रियादौ व्यभिचारनिरासार्थ द्रव्यग्रहणम् । [वा. टी.] इह जात इदानी जात इति व्यपदेशात्तयोः सर्वकार्यनिमित्तत्वमाह-विप्रति- पन्नमिति । खसमवेतसंयोगादिकार्यातिरिक्तत्वं विप्रतिपन्नशब्दार्थः । सिद्धसाधनतापरिहाराय दिक्कालेति । मूत्वासंयोगाउनुपसङ्कामत्वमत आह-आकाशेति । समानन्यायत्वादाकाश. स्यापि ग्रहणम् । मनस्यतिव्याप्तिपरिहाराय मन इति । घटनिवारणाय अस्पर्शचदिति । रूपेड- तिव्याप्तिपरिहाराय द्रव्येति । संख्यादिपश्चकमेव । (आत्मनिरूपणम् तद्विभागश्च) बुद्धयाश्रय आत्मा । स द्वेधा-ईशानीशभेदात् । पूर्वत्र प्रमाणम्- आत्मत्वं नित्यंविशेषगुणवद्वृत्ति, आत्मजातित्वात्, सत्तावदिति। ईशज्ञानं नित्यम्, अनन्तकार्यहेतुत्वात् , कालयदिति तज्ज्ञानं नित्यम् । विप्रतिपनं सर्व कार्य विवक्षितज्ञानम् , कार्यत्वात् , सम्पतिपन्नवदित्यनन्तहेतुत्वं सिद्धम् । वि. टी.] आत्मत्वमिति । वृत्तिमत्त्वे गुणवदृत्तिमत्त्वे विशेषगुणवद्धृत्तिमत्वे वार्थान्तरे व्यभिचारधारणाय नित्येति । नित्यपरिमाणपद्धत्तित्वनार्थान्तरभङ्गाय विशेपेति । नित्यो यो विशेषपदार्थः तद्वृत्तित्वेनार्थान्तरवारणाय गुणेति । पृथिवीत्यादौ व्यभिचार- वारणाय आत्मेति । आत्मपत्तिद्वित्वान्यतरत्वादी व्यभिचारवारणाय जातिवा- दिति । न च संसार्यात्मत्वे व्यभिचारः, तसाजातित्वात् । जातित्वेऽपि वा तद्भिन्नत्वेन हेतुविशेषणात् । अपर्यवसानवृत्त्या ईश्वरज्ञानस्य नित्यत्वं प्राप्तम् । अधुना विशेषतस्साध- यति-ईश्वरज्ञानमिति । जीवज्ञाने वाधवारणाय ईशेति । ईशसंयोगे बाधवारणाय ज्ञानमिति । अदृष्टे व्यभिचारवारणाय अनन्तेति । न चादृष्टस्य सर्वोत्पत्तिमन्नि- १ सर्वेति नास्ति च पुस्तके. २ चेति नास्ति च पुस्तके. ३ लक्षणयोरिति छ. ४ स्वाद्यतिरिक्तमिति ज, ट. ५ कालादीति ज, ८. ६ इतीति ज, ट. ७ उक्तमिति ज, हा. ८ भेदनेवि ग. ९ नित्यसमवेतेति १० सर्वकार्यमिति मु. ११ जन्यमिति ग. १२ अन्तरवारणायेति च. १३ वृत्तिमस्ये घेति च. १४ वृत्तित्वान्यतरति च. घ.
३५ - निरूपणम्] कायोपेता मित्तस्यात्तदवस्थो दोप इति वाच्यम् । एकैकादृष्टस्य सर्वकार्याहेतुत्वादिति । प्रत्येका- वृत्तिश्च धर्मो न समुदायवृत्तिरिति न्यायात, साधनवैकल्यपरिहाराय कार्येति । न हि कालोऽनन्तपदार्थपतितनित्यवर्गजनकः । यत्किञ्चित्कार्यजनके घटादौ व्यभिचार- वारणाय अनन्तेति । कालबदिति । कालो द्रव्यं दृष्टान्तः, न तु कालोपाधिः एकैककालोपाधिः, समस्तकार्याजनकत्वात् । विप्रतिपन्नमिति । अस्मदादिकठक- मित्यर्थः । नित्ये बाधवारणाय कार्यमिति । उद्देश्यसिद्धये ईश्वर इति । तथैव ज्ञाने- ति । सम्पतिपन्नवदिति । क्षित्यादिवदित्यर्थः । न च दृष्टान्तासिद्धिः, क्षित्यादिक सकतृकं कार्यत्वात् घटवदित्यायनुमानेनेवरज्ञानजन्यतस्य सिद्धिः । एवञ्चानन्तकार्य- हेतुत्वादिति पूर्वोक्तो हेतु सिद्धः। अन्ये तु विप्रतिपन्न कार्यम् अङ्करादि विवक्षितज्ञानर्ज, खोपादानगोचरापरोक्षज्ञानजं सम्प्रतिपन्न कार्य घटादीत्याहुः । तेषां मते घटादिकार्य ईश्वरज्ञानजन्यत्वं मानान्तरेण सेत्स्थतीति निष्कपः । [अ. टी. आत्मत्वस्यानित्यविशेषगुणवद्वृत्तित्वं सिद्धमित्यत उक्तम् नित्येति । नित्यवृत्ति नित्यविशेषवद्वृत्तीति चोक्तौ तथेति गुणग्रहणम् । पृथिव्यादिजातौ व्यभिचारवारणाय आत्मग्रहणम् । “यथाकारी यथाचारी" इत्याद्यागमादात्मबहुत्वं सिद्धमित्यात्मत्वधर्म- सिद्धिः । अपर्यवसानवेत्त्येशज्ञानस्य नित्यत्वं सिद्धम् , साक्षादपि तत्साधयति-ईशज्ञान- मिति । कर्मव्यक्तीनां कार्यहेतुत्वेऽप्येकस्यानन्तकार्यहेतुत्वाभावादनन्तपदेन तत्र व्यभिचार- निरास इति प्रयोगात्तस्येशज्ञानस्य नित्यत्वं सिद्धमित्याह-इति तज्ज्ञानमिति । हेतोरसिद्धिनिरासार्थ साधनमाह-विप्रतिपन्नमिति। विप्रतिपन्नं कार्यमङ्करादि विवक्षितम् । खोपादानसाक्षात्काररूपज्ञानं तजन्य, सम्प्रतिपन्नं कार्य घटादि, तत्कुलालादेस्तदुपादानमू- दादिसाक्षात्कारजन्यम् । जीवानामकुरादिनिमित्तकारणानुष्ठेयधर्मादिज्ञानेन परम्परयाङ्करादे- जन्यत्वेन सिद्धसाधनताव्युदासार्थम् विवक्षितेति । {वा. टी. विभुत्वसाधादात्मानं चिन्तयति-बुद्धीति । बुद्ध्याश्रयत्वं बुझ्याश्रयत्वासन्ताभावा- नधिकरणल्वम् । तेन मुक्तात्मनि नातिव्यातिः । घटनिवारणाय बुद्धीति । असम्भवनिवृत्तये आश्रय इति । सिद्धसाधनतापरिहाराय नित्येति । विशेषगुणश्चात्र ज्ञानादिः । ईशज्ञानस्य ज्ञानत्यादेयनित्यत्वे 'मोहे रिपत्वं सापपति-ईशेति यात्रापरित्या मिपरिहाराय असन्सेन्ति। अनन्तशब्दश्च सर्वशब्दार्थः । ननु तर्हि हेत्वसिद्धिः, अस्मदादिज्ञानजन्यस्य घटादेस्तदजनकल्या- दत आह-विप्रतिपन्नमिति । अस्मदादिज्ञानजन्यघटादिविप्रतिपनशब्दार्थः । विवक्षितज्ञानमीश- ज्ञानम्, सम्प्रतिपन्नत्वात् , घणुकादिवत् । यथा अणुकस्योपादानकारणसाक्षात्कृतत्वेनेशज्ञानस्य यणुकादिनिमित्तत्वम्, तथा घटादेरपीति नासिद्धिः। * १ कार्य हेतुत्वाभावादिनि च. २ प्रत्येकवृत्तिरिति च. ३ इत्यर्थ इति नाति ध पुस्तके. वन- भ्यत्वसिद्वेरिति च. ५ हेतुस्सिद्ध इनि झ. ६ चोक्ते इनि ज, ट. ७ अपनोदनार्थमिति ज, . ८ धमति ज, द. ५ वृत्तिरवारज्ञानस्पति इ. १० एकस्येति नास्ति पुस्तके. "तत्र ज्ञान मिनि . १२ कार्यमिति नास्ति झ, ट. पुस्तकयो:, १३ पदमित्यधिक जाद.
प्रमाणमञ्जरी [द्रव्यः (ईश्वरज्ञानादेस्सर्वाश्रयव्यापित्वे प्रमाणम् ) तज्ज्ञानमाश्रयव्यापि, नित्यगुणत्वात् परमाणुरूपचदिति तज्ज्ञान- स्याश्रयव्यापित्वं सिद्धम् । अत एव तदिच्छाप्रयत्नावाश्रयव्यापिनी । उत्तरत्र प्रमाणम्-भोगः कचिदाश्रितः, गुणत्वात्, रूपवदिति। नै कार्याणि तद्वन्ति, कार्यत्वाद्धटवदिति । न श्रोत्रादि तद्वत्, कारणत्वाद्दण्डवत् । भोगो गुणः, अनित्यत्वे सत्यचाक्षुपप्रत्यक्षत्वाद्गन्धवदिति हेतुसिद्धिः । [य. टी.] तज्ज्ञानमिति । ईश्वरज्ञानमित्यर्थः । आश्रयनिष्ठत्वमात्रे सांध्ये सिद्धसा- धनमतो व्यापीति । समवायसम्बन्धेन घटाद्यव्यापित्वात् वाधवारणाय आश्रयेति। सर्वमिन् काले खसमवायीत्यर्थः । एतावता व्यापकस्य व्यापकत्वं सकलकार्योपादानाव- गाहकत्वमिति दूपणमपास्तम् । नित्येति । नित्यश्चासौ गुणश्चेति कर्मधारयः । संयोगादौ व्यभिचारवारणाय गुणत्वादिति । विशेषपदं नास्त्येवेति न व्यर्थता । अन्ये तु जीवा- काशेतरनित्यनिष्ठमाकाशप्रयोज्यविशेषगुणत्वादिति हेतुं वर्णयन्ति । पृथिवीपरमाणुरूपं न दृष्टान्तः, सर्वकाले स्वाश्रयव्यापकत्वाभावात् । यद्यपीश्वरज्ञानस्य नित्यत्वं पूर्वमेव सिद्धम् , तथापि सर्वकाले स्वाश्रयव्यापकत्वमिहोद्देश्यमिति कृत्वा तादृशसाध्यमुक्तम् । केचित्तु स्वाश्रयव्यापकत्वमात्रमत्र साध्यमित्याहुः । अत एव नित्यगुणत्वादेवं । उत्तरत्र अनी- शात्मनि । कार्याणि शरीरतदवयवाः, अन्यत्र विवादाभावात् । कारणोद्भूतत्वादित्यर्थः । तेन खमते नात्मनि व्यभिचारः। मनो न तद्वत् , इन्द्रियत्वात् चक्षुर्वदित्युपरि बोध्यम् । पूर्वहेतोरसिद्धि वारयितुं भोगस्य गुणत्वं साधयति-भोग इति । रसत्वादौ व्यभिचार वारयितुं सत्यन्तम् । घटादौ व्यभिचारभङ्गाय त्वादन्तम् । अतीन्द्रिये गुणभिन्ने व्यभि- चारभङ्गाय प्रत्यक्षत्वे सतीति देयम् । [अ.टी.] तस्य परिच्छिन्नस्सानन्तकार्योपादानावगाहकत्वं प्रदीपप्रभावन्न सम्भवतीति तत्राह- तज्ज्ञानमिति । अनित्ये संयोगादौ व्यभिचारवारणाय नित्यपदम् । ईश्वरेच्छाप्रयत्नाव- प्याश्रयव्यापिनौ, नित्यगुणत्वात् जलपरमाणुरूपवदित्वपि प्रयोक्तव्यमित्याह-अतएवेति। अनीशात्मनि प्रमाणमाह-उत्तरत्रेति । भोगः पूर्वोक्तभोगः । शरीरधर्म इत्येके लोका- यताः । इन्द्रियाश्रय इत्यन्ये । तदुभयं क्रमेण निरस्यति न कार्याणीति । करणान्तरस्वी- कारेऽनवस्थानाच्छोत्रादेरेव करणत्वेन नासिद्धो हेतुर्गुणत्वादिति पूर्व हेतोरसिद्धि" परिहरति- भोग इति । चाक्षुषप्रत्यक्षगम्ये घटादौ व्यभिचारवारणीय अचाक्षुपपदम् । आत्मनि 'जलपरमाण्विति घ. २ प्रयनावपीति मु. ३ तत्र नेति ग. ४ श्रोत्रादीनि तद्वन्तीति क, ५ निष्टमात्रे इति च. ६ सम्बन्धिन इति छ. ७ स्वसमायिव्यापीति च. ८ तस्य घ्यापकत्वमिति च. ९ एपेनि मालि च पुस्तके. १० ध्यमिचारं वारयितुमिनि घ. १ प्रेति नास्ति ज, 2 पुस्तकयोः, माणुवदिनि श, १३ करणन्वे घेति ज, करणत्वेन चेति द. १७ हेतोराश्रयेति द. १५ वारणार्थमिति ज, द. १२ पर- निरूपणम् ] टीकानयोपेता व्यभिचारधारणार्थम् अनित्यत्वे सतीत्युक्तम् । अनित्यत्वे सत्यचाक्षुपनक्षत्रादिगतिकर्मणि व्यभिचारवारणार्थम् प्रत्यक्षपदम् । [वा. टी.] ननु परिच्छिन्नवात्तस्य तदनन्तकार्योपादानसाक्षात्कृतत्वं न सम्भवतीत्यत आह- तज्ज्ञानमिति । संयोगनिवारणाय नित्येति । अत एव नित्यगुणत्वादेवेत्यर्थः । नन्वाविद्यको जीवपरमात्मभेदो न तु पारमार्थिकः । परमात्मनश्च सिद्धत्वाचर्या प्रमाणोतिरित्याशय शुद्धचैतन्य- रूपे ब्रह्मण्यविद्यायोगाजीवाश्रयत्वे चेतरेतराश्यापातातात्विक एवं भेद इत्याशयवान् तत्र प्रमाणमाह- उत्तरत्रेति । अत्र भोगपदेन भुज्यत इति भोग इति व्युत्पत्त्या सुखं दुःखं वा विवक्षितम् । नोक्तलक्षणो भोगः, तदुक्तावितरेतराश्रयापत्तेः । तथा हि-सिद्धेऽनीशज्ञाने तनिष्टसुखादिसाक्षा- स्काररूपभोगसिद्धिः । तसिद्धौ च तदाश्रयत्वेनानीशज्ञानसिद्धिरिति । कृशोऽहम्, स्थूलोऽहमिति' प्रत्ययाच्छरीरादेरात्मत्वमाशय निराचष्टे-न कार्याणीति । कार्याणीति शरीरतदवयवाः । विपक्षे च शरीरादेराश्रयस्य नटत्वेन जन्मान्तरानुभूतसंस्काराभावेन तजन्यस्मृतेरयोगादुत्पन्नस्य शिशोः स्तन्ये प्रवृत्तिरेव न स्यात् इति वाधकरतर्कः । सामानाधिकरण्यप्रत्ययस्तु ममेदं शरीरमिति भेदग्राहिणा प्रमाणभूतेन प्रत्ययेन बाधित इत्यप्रमाणम् । काणोऽहं बधिरोऽहमित्यादिप्रत्ययात्कार्यत्वहेतोरप्रयो- जकत्वमाशङ्कमान इन्द्रियाण्येवात्मेति मन्यते । तं प्रत्याह-न श्रोत्रादीति । तत्त्वे वा य एवाहं रूपमद्राक्षम्, स एवाई गन्धं जिघ्रामि इत्यैक्यावलम्बः प्रत्ययो न भवेत् । रूपगन्धप्राहकयोभिन्न- स्वादित्यर्थः । घटेऽतिब्यातिपरिहाराय अचाक्षुषेति । आत्मनिवारणाय अनित्येति । (जीवैकत्वनिरासः, जीवस्य सर्वगतत्वञ्च) अस्मदाद्यात्मा द्रव्यत्वावान्तरजातिमान्, चतुर्दशगुणवत्वात्, उदकवत् ; आत्मशब्दोऽनेकवाचकः, आत्मवाचकत्वात्, तेच्छन्दवदिति नानात्वं सिद्धम् । मच्छरीरेतरैमूर्तीनि मदात्मयुझिं, मूर्तत्वान्मच्छरीर- यदिति सर्वगतत्वं तस्य। ईशोऽपि सर्वगतः, आत्मत्वाद्देहियत् । स नित्या, सर्वगतत्वात् कालवत् । स बुद्धयादिचतुर्दशगुणवान् । [च. टी. जीवकत्ववादिनं प्रत्याह-अस्मदादीति। ईश्वरे भागासार्द्ध वारयितुम् अस्मदादीति। तावता जीवपक्षः। द्रव्यत्वादिनार्थान्तरवारणाय द्रव्यत्वावान्तरेति। ज्ञानयत्वेनार्थान्तरभङ्गाय जातीति । आकाशे व्यभिचारभेशाय चतुर्दशेति । चतु- र्दशगुणविभाजकोपाध्याधाराधारत्वादित्यर्थः । तेन चतुर्दशसंयोगवत्याकाशे न व्यभि- चारः । चतुर्दशत्वं दशत्वाघटितसंख्या, तेन न चतुर्भागवैयर्थ्यम् । यद्यपि य एव चतु- निरासार्थमिति ज, ट. २ अचाक्षुपीति ज, अचाक्षुप इति ट, १ ममावायेति ज, ट, ४ मादा. दोत्यारभ्य उदकवदित्यन्ता पतिनास्ति घ पुस्तके. ५ तदिति नास्ति ध पुस्तके. ६ सिद्धमिति नाति ख, ग, घ, मु. पुस्तके पु. ७ इतराणीनि ख, ग. सदात्मेति ख, मु. ९ संयुक्षीनि क, ख. १० वदिति इति क, स. 11,१२ वारणायेति च.
. ३८ प्रमाणमारी [द्रव्य र्दश गुणा आत्मनि त एव न पयसीति शब्दसाम्येऽपि न पक्षदृष्टान्तयोरेकहेतुता, तथापि चतुर्दशशब्दवाच्यत्वानुगतीकृतगुणविभाजकोपाध्याधाराधारत्वं हेतुः । यद्यपि संस्कार- शून्यसं पयसोन दृष्टान्तता चतुर्दशगुणवत्ताभावात्, तथापि हेतुमत्य आपो दृष्टान्तः। केचि- चारम्भकतापने जले वेगनियमात् तदारम्भकेऽपि वेगनियम इत्याहुः । घटाकाशादिशब्दे वाधसिद्धसाधनवारणाय आत्मेति । एकमात्रवाचकत्वेनार्थान्तरवारणाय अनेकेति । लक्षणया शरीराधनेकप्रतिपादकत्वेऽपि न तत्रात्मशब्दस्य शक्तिः । एवमाकाशशब्दस्य शक्तिर्भूताकाश एव । चिदाकाशादौ लक्षणया प्रयोगः । यद्वा एकप्रवृत्तिनिमित्तपुरस्कारे- णानेकधावाचकत्वं साध्यम् । आकाशादिशब्दे व्यभिचारवारणाय आत्मेति । लक्षण- यामप्रतिपादके गगनशब्दे व्यभिचारवारणाय वाचकत्वादिति न चात्मवाचके एत- दादि व्यभिचारः, तस्याप्यनेकवाचकत्वात् । बुद्धिस्थत्वस्य प्रयोगोपाधित्वादेकमात्र- प्रयोगः । न चैतदात्मत्वपुरस्कारेणैतदात्मशन्दे हेतुर्व्यभिचारीति वाच्यम् । एतस्य वाक्य- त्वेनावाचकत्वात् । देवदत्तादिशब्दः शरीरवाचको नात्मवाचक इति न व्यभिचारः । पूर्वानु- माने तात्पर्याद्वा । आत्मनो वाचकत्वं साधयति-मदिति । दृष्टान्तासिद्धिवारणाय शरी- रेतरेति पक्षविशेषणम् । आश्रयासिद्धिभङ्गाय मदिति । मदतिरिक्तं ममापि शरीरं भवतीति व्यर्थविशेषणतावारणाय मच्छरीरेतराणीति निजगदे । गुणादौ वाधवारणाय मूर्तानीति । कालादौ वाधवारणाय मूर्तत्वशरीरनिवेशितैपरिच्छिन्नत्वभागः । परि- माणयोगित्वं कालादौ व्यभिचारि तदर्थमविच्छिपरिमाणयोगित्वलक्षणं मूर्तत्वं हेतुः। सजीव इत्यर्थः। एवञ्चेदं काचित्कत्वाभिप्रायम् । यद्वा चतुर्दशगुणवद्वृत्तिद्रव्यविभाजको- पाधिमानित्यर्थः। [अ. टी.] अनीशात्मन्यकत्वं मन्यमानं प्रत्याह-अस्मदाधात्मेति । सत्तावान्तरद्रव्य- स्वजातिमत्त्वेन सिद्धसाधनताब्युदासी) द्रव्यत्वावान्तरसदम् । आकाशादौ व्यभिचार- वारणार्थ चतुर्दशपदम् । प्रयोगान्तरमाह-आत्मशब्द इति । अत्र जीवविषय आत्म- शब्दो विवक्षितः । साधारणश्चेनीवेश्वरवाचकत्वेन सिद्धसाधनता स्यात् । कालादिवाचकश- ब्दैर्व्यभिचारवारणार्थम् आत्मवाचकत्वादित्युक्तम् । देहादिव्यतिरिक्तोऽप्यात्मा अणुरिति केचित् । केचिंच मध्यमपरिमाण इति वदन्ति । तयुदासार्थमाह-मच्छरीरेति । मच्छरीरं मदात्मसंयोगि सिद्धमिति इतरग्रहणम् । आत्मान्तरैसंह संयोगौलि सिद्धानीति मदात्मग्रहणम् । ईशात्मापि न परिच्छिन्न इत्याह-स नित्य इति । एवं देशतः कालतथ्य १ यधपीति नास्ति ७ पुलके. २ शुद्धस्येति छ. ३ पशिरिय च पुस्तके नाम्ति. ४ अनेकया- चकत्वमिति च. ५ मादीति नास्ति च पुस्तके. ६ आमेति नाम्ति च पुस्तके. ७ मनायेति च. मरठरीरति च. ९ निविष्टेति च. १० मविनिति छ. " हेतुकृतमिति छ. १२ प्युदाप्तायेति ज,2. ३ वारणायेति ज, ट. १४ पाचति नास्ति न पुस्तके. १५ प्युदासार्थमिति ज, ट. १६ सहेति नाति व पुस्तके. १७ माझीवि नालि र पुस्तके. *रामानुजीयाः, जैनाः.
३९ निरूपणम्] टीकाप्रयोपेता परिच्छेदशून्य आत्मेति यत्र कुत्रचिद्देशे काले च कर्मकृतो मोगस्सगच्छत इति मोर्गस्य तदाश्रितत्वं निश्शङ्कम् । संख्यादयः पञ्चसामान्यगुणाः, बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेपप्रयत्नधर्मा- धर्मभावनाच नव विशेषगुणा इति चतुर्दश । विा. टी.] परमात्मवजीवस्याप्पैक्ये सुखादिव्यवस्थानुपपत्तिमाशल भेदं साधयति-अस्मदा- दीति । आत्ममात्रपक्षीकारे सिद्धसाधनता । ईशानीशभेदेनावान्तरजातिसम्भवादीशे चतुर्दश- गुणासम्भवेन भागासिद्धता च । तन्निरासार्थ प्रतिज्ञायाम् अस्मदादिपदम् । सिद्धसाधनपरिहाराय अवान्तरेति । द्रव्यत्वेन ता परिहतुं द्रव्येति । आकाशनिवारणाय चतुर्दशेति । जातिद्वारा भेदं संसाध्य साक्षाद्भेदं साधयति-आत्मशब्द इति । बहुशब्दवाचक इत्यर्थः । अन्यथेशानीश- वाचकत्वेन सिद्धसाधनता स्यादिति । कालादिशब्दनिवृत्तये आत्मेति । अनुकूलप्रतिकूलवातव्या- घ्रादिचलनानामदृष्टजन्यत्वात्तस्य चामसमवेतत्वेन खतोऽसम्बन्धाश्रयव्यापिपरिच्छिन्नत्वे तदनु पपत्तिरित्याशझ्याश्रयद्वारा सम्बन्धं धयितुं ब्यापकत्वं साधयति-मच्छरीरेतराणीति । तच- दात्मसंयुक्तत्वेन सिद्धसाधनतापरिहाराय मदिति । क्रमेण संयोगे, सिद्धसाधनतापरिहाराय युग- पदिति द्रष्टव्यम् । ईशस्य परिच्छिन्नावे सर्वनिमित्तानुपपत्तिमाशझ्याह-ईशोऽपीति । आत्मनो नित्यत्वे आमुष्मिकालभोगासम्भवेन कृतहानिरकृताभ्यागमश्चेत्याशझ्याह-स नित्य इति । संख्या- दिपञ्चगुणसहिता बुद्धयादयो नव गुणाः । (मनोलक्षणम् , तत्र प्रमाणच) मृर्तत्वे सति सर्वदा स्पर्शशून्यं मनः । सुखादिज्ञानमिन्द्रियजम्, अनित्यज्ञानत्वात् रूपज्ञानवदिति तत्र प्रमाणम् । मनोऽणु, आत्मसंयो. गित्वे सति निरवयवत्वात्, परमाणुवदिति भूर्तत्वं तस्य सिद्धम् । अजसं- योगनिराकरणात् न सर्वगतेन व्यभिचारः । तत्संख्यायष्टगुणकम् । इति प्रमाणमञ्जर्या द्रव्यपदार्थः। (व. टी.] मूर्तत्वे सतीति । कालादावतिव्याति वारयितुं सत्यन्तम् । घटादावति- च्याप्तिधारणाय विशेष्यभागः । प्रथमक्षणे पटादावेवातिन्यासिवारणाय सर्वदेति । सुखेति । लौकिक सुखसाक्षात्कार इत्यर्थः । अनुमितो वाधवारणाय साक्षात्कार इति । अलौकिकसुखसाक्षात्कारे चक्षुरादिजन्ये पाधवारणाय लौकिकेति । रूपादिसाक्षात्का. रेन्तरवारणाय सुखेति । इन्द्रियत्वेनेन्द्रियजन्यत्वमुद्देश्यसिद्धये साप्यम् । अनित्य- साक्षात्कारत्वादित्यर्थः । ईश्वरज्ञाने व्यभिचारवारणाप अनित्येति । कालादा व्यमि- चारवारणाय सत्यन्तम् । घटादौ व्यभिचारवारणाय विशेष्यमागः। इति प्रमाणमअरीव्याख्याने द्रव्यपदार्धस्समाप्तः । जय देशे इति ज, ट. २ पदमि नानि र पुल. ३ मनोगप्पमित्यधिक प पुमरे. ४ पदार्य उक्त इति मु. ५ प्रथमे इति प. ६ पदमिदं नास्ति प पुखो..इति दप्यपदापं इति . - ४० [गुण- प्रमाणमलरी [अ. टी.] सर्वदा सर्शशून्ये कालादी व्यभिचारवारणीय मूर्तत्वे सतीत्युक्तम् । घटादि- व्यवच्छेदोर्य स्पर्शशून्यपदम् । पाकादी क्षणं स्पर्शशून्यपार्थिवपरमाणुव्यवच्छेदाय सदेत्युक्तम् । ईशज्ञाने व्यभिचारव्युदासाय अनित्येति । मूर्तत्वे सतीति विशेषणं साथ- यति-मन इति । निरवयवक्रियादी व्यभिचारनिसार्थम् संयोगिपदम् । एवमपि घटा- दिसंयोगिनि व्योमादौ व्यभिचारस्स्सादत उक्तम् आत्मेति । आत्मसंयोगिघटादि- व्युदासाय निरवयवपदम् । अजसंयोगपक्षे आत्मसंयोगिले सति निरवयवलं व्योमाँदी व्यमिचरतीत्यत आह-अजेति । सर्वगतेन व्योमादिना । संख्यादयः पञ्च परवापरत्व- वेगा अष्टौ। इति प्रमाणमञ्जरीटिप्पणेऽद्वयारण्ययोगि- विरचिते द्रव्यपदार्थस्समाप्तः। [वा. टी.] परिशिष्टं द्रव्यं निरूपयति-मूर्तत्व इति । आकाशेऽतिव्याप्तिपरिहाराय मूर्तेति । घटेऽतिन्याप्तिपरिहाराय स्पर्शेति। पाकावस्थपरमाणुनिवारणाय सदेति । नन्धिदमसम्भवि लक्ष- णम्, मनस एवासिद्धेः । न चेन्द्रियार्थसान्निध्येऽपि कदाचिदेव ज्ञायमानं ज्ञानं कारणं सम्पादयि- प्यति, तच्च मन इति वाच्यम् । अदृष्टेनार्थान्तरत्वात् । अत आह-सुखज्ञानमिति । इन्द्रिय- जम् इन्द्रियकारणम् । ईशज्ञानेऽतिव्याप्तिपरिहाराय अनित्येति । ज्ञानश्चात्र साक्षात्कारः । तेन न लिङ्गजन्ये व्यभिचारः । ततश्चादृष्टस्य सामग्र्यसम्पादकत्वान्न पृथकारणतेत्यर्थः । ये विन्द्रि- यजमितीन्द्रियकारणकमिति व्याचक्षते, तन्मते रूपादिज्ञानस्य पक्षीकारेऽपि साध्यसिद्धेः सुखज्ञान- पक्षत्वानुपपत्तिः । न च तत्र चक्षुरादिनान्तिरता, तत्रास्य कारणत्वेनोपजीव्यत्वादिति । ननु मनसो विमुत्वे आत्मन इव तत्तदिन्द्रियसम्बद्धार्यानां युगपसंयोगात्सर्वज्ञानोत्पत्तिः । मध्यमत्वे चानित्यत्वं मानमित्याशयवान् अणुत्वं साधयति-मन इति । दिशि घटे चातिव्याप्तिपरिहाराय विशेषणद्वयम् । संख्यादयोऽष्टौ गुणाः । इति प्रमाणमञ्जरीव्याख्यायां भावदीपिकाख्यायां द्रव्यपदार्थः । , (गुणलक्षणं तद्विभागश्च) कर्मान्यत्वे सति सामान्यैकाश्रयो गुणः । सं रूपादिभेदेन चतुर्विंशतिधा। [व. टी. ] कर्मान्यत्वे सतीति । कर्मण्यतिव्याप्तिवारणाय सत्यन्तम् । सामान्या- दापतिव्याप्तिवारणाय आश्रय इत्युक्तम् । समवायीत्यर्थः । विशेपेऽतिव्याप्तिवारणाय सामान्येति । सामान्यसमवायीत्यर्थः । सामान्यसमवायः सामान्येऽप्यस्ति, अत: सामान्यनिरूपितस्समवायो ग्राह्यः । स च द्रव्येऽप्यस्ति, तदर्थम् एकपदम् । १ धारणार्थमिति ज,ट. २ घ्यवच्छेदायेति ज, ट. ३ व्युदासार्थमिति ज, निरासार्थमिति टा ४ निरासायेति ज, ट. ५ पदमिदं नास्ति न पुस्तके. ६ इति प्रमाणमञ्जरीटिप्पणे द्रव्यपदार्थ इति ज, 2. ७ स इति नाखि ख, मु. पुस्तकयो.. + ६ ... निरूपणम् टीपौत्रयोपेता ४१. [अ. टी.) एवं नवप्रकार द्रव्यं निरूप्य गुणं निरूपयति-कर्मान्यत्वे सतीति । सामा- न्यादिव्यवच्छेदीया सामान्याश्रय इत्युक्तम् । आश्रया समैवायी । द्रव्यव्युदासाय एकेति । द्रव्यस्स विशेपं प्रत्यप्याश्रयत्वान्न सामान्यैकाश्रयत्वम् । ताधर्मव्यवच्छेदाय कर्मान्यत्वपदम् । सामान्येन सहक आश्रयो यस्य स सामान्यकामय इति) कुतो न व्युत्पाद्यते ? उच्यते-तथा सति व्यणुकादिद्रव्ये व्यभिचारादेवं व्याख्या । रूपरसगन्ध. स्पर्शसंख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविमागपरत्वापरत्वबुद्धिसुखदुःखेच्छाउपप्रयतगुरुत्वद्वत्व- स्नेहसंस्कारधर्माधर्मशब्दाचतुर्विशतिर्गुणाः। .[वा. टी.] सर्वदव्यदृत्तित्वात्सामान्याधारत्याच गुणं निरूपयति-कर्मान्यत्वे :सतीति । प्रमेय स्वादिधर्माश्रये सामान्याश्नये व्यभिचारपरिहाराय सामान्येति। कर्मणि व्यभिचारपरिहाराय कमेति। कर्मन्यत्यश्च कर्मन्यानविकरणत्वम् ..., तेनोक्षेपणादन्यस्मिन् अपक्षेपणे नातिव्याप्तिः । द्रव्येति- च्याप्तिपरिहाराय एकेति । न च प्रमेयत्वाद्याश्रयत्वेनासम्भवः): आश्रयत्वेन. समवायित्वस्य वियः क्षितत्वात् । उत्पन्नमात्रे द्रव्येऽतिव्याप्तिपरिहाराय सदेति द्रष्टव्यम् । (रूपरसुगन्धस्पर्शाः)". नयनकग्रौद्यजातिमद्रूपम् । रसनैकनाथजातिमान रस घाणेकर ग्राह्यजातिमान् गन्धः । स्पर्शनैकग्राह्यजातिमान् स्पर्शः। ब. टी. ] नयनेति । सामान्यादापतिव्याप्तिभङ्गाय ज़ातिमदिति । सरोऽतिन्या- सिवारणाय नयनेति । घटादावतिव्याप्तिवारणाय एकेति । नयनकेन्द्रियग्राशत्वमात्र, ग्रहे रूपत्वरूपध्वंसादावतिन्याप्तिः, प्रभायां द्रव्ये वातिव्याप्तिःनपनैकग्राह्यविनष्टघटादार; तिव्याप्तिव, अतीन्द्रियरूपेऽव्याप्तिश्चेति दूपणानिरासाय जातीति। प्रभात्वस्य जातिवपझे प्रभान्यत्वे सतीति विशेषणीयम् । यद्वा प्रभा न चाक्षुपीति, योध्यम् । रूपप्रमान्यतर- स्वमादाय प्रभायामतिन्याप्तिवारणाय जातीति । रसनेति । अतीन्द्रियरसेव्याप्ति, वारणाय जातिमानिति । रसैनग्राघरसवति द्रव्येऽतिव्यासिकारणाय जातीत्युक्तम् । धर्मपदपरिहारेण चक्षुहरूपत्यादिमत्यतिव्याप्तिवारणाय रसनेति । सनग्रामगुणत्वा दिमत्यतिव्याप्तिवारणाय एकेति । जातिपदार्थस्स यावान भागो न व्यर्थस्तावान् ग्रायः। [अ. टी.2 जातिमतां रसादीनां व्यवच्छेदाय नयनमायेत्युक्तम् । घटादिव्यवच्छेदाय एकपदम् । नयनैकग्राचं रूपमित्युक्ते परमाण्वादिरूपेऽच्याप्तिस्मादत उक्तम् नयनकग्रा. घजातिमदिति । एवं रसादिलक्षणेऽपि । रसनधिसत्ताजातिमद्रव्यादिव्युदासाय एक- पदम् । गुणत्वजातिमद्रादिव्युदासीयच तत् । 1 सतप्रकारमिति द.. २ यवम्वार्थमिति ब,. र समयायनेति श... वासोति ५ इन्दिपमानि मु. . नपनकमायेति च, • रसनमा इति प.:. जातिपदापरामाधार भागो न म्यर्यस्वाभावाच मान इत्यादा पादाए पुस्तक ९ प्युदासायनि न ....यापयमिति , .. रूपरिवति,.२ रसनमाणति ज.. पसासायति न:, .. प्रमाग.
४२. प्रमाणमञ्जरी गुण- [वा. टी.] नयनेति । रसेऽतिव्याप्तिपरिहाराय नयनेति । नयनग्राह्यसत्ताजातिमति. घटादा चतिन्याप्तिपरिहाराय एकेति । रूपत्वेऽतिव्यातिपरिहाराय जातीति । एवमन्यत्रापि । , . (रूपादीनामवान्तरविभागः, तेषां याबद्रव्यंभावित्वञ्च) एते यावद्व्यभाव्ययावद्रव्यभाविभेदविधा। पार्थिवपरमाणोरन्यत्र याबद्रव्यभाविनः, प्रत्यक्षद्रव्ये प्रत्यक्षतस्तथा सिद्धिः। घणुकादिपु रूपा- दयो यायव्यभाविनः, कार्यरूपादित्वात् घंटरूपादिवदिति । सलिलादि- परमाणुरूपादयो यावद्व्यभाविनः, सलिलादिरूपादित्वात् सम्पति- पन्नवदिति। [ब. टी.] एते रूपादयः। पीलपाकवादिमते घटरूपादेरपाकजत्वाद्यापद्रव्यभावित्वात् । प्रत्यक्षतः तर्कोपहितादित्यर्थः । घणुकादिग्वित्यादिपदेन प्राणादिपरिग्रहः । यावदिति । स्वाश्रयसमानकालीनध्वंसाप्रतियोगिन इत्यर्थः । पृथिवीपरमाणुनिष्ठरूपादौ व्यभिचारवारणाय कार्यनिष्टेति। "संयोगादौ व्यभिचारवारणाय रूपादित्वादिति। रूपत्वात् रसत्वादित्यादि पृथगेव हेतुः । यत्पटादिरूपं वादिद्वयमते यावन्यभावि, तह- शान्तयति-पैटरूपादिवदिति । सलिलादीत्यनुमाने आदिपदेन तेजाप्रभृतिपरिग्रहः । परमाणुपदमुद्देश्यसिद्धये । रूपादय इत्यादिपदेन रसादेः परिग्रहः, न तु संयोगादेः। अत्र यत्परमाणौ यो विशेषगुणः स तत्र पक्षः । यद्वा सलिलादिपरमाणविशेषगुणवत्वेन पक्षता । तेन तेजःपरमाणौ रसाधभावे वायुपरमाणुषु स्पर्शमात्रसत्वे त्वाश्रयासिद्धिः परास्ता । तेन न वा बाधः पृथिवीपरमाणुरूपादौ व्यभिचारवारणाय सलिलादीति। संयोगादौ व्यभिचारवारणाय रूपादित्वादिति । सम्प्रतिपन्नं जलरूपम् । [अ. टी.] रूपादीनामवान्तरविभागमाह-एत इति । परमाणुपाकादिक्रियायां घटादिगत- रूपादयो यावद्रव्यमाविनः । के तईयावद्रव्यमाविनः पार्थिवपरमाणनामिति विभाग विशदयति-पार्थिवेति । उभयत्र प्रमाणमाह-प्रत्यक्षद्रव्य इत्यादिना । पार्थिवगुणादौ व्यभिशरब्युदासीय कार्यरूपांदित्वादित्युक्तम् । ..भेदेनेति ग, घ., २ परमाणुभ्य इति क. ३ पार्थिवपरमाणूनां रूपादयो यावद्रव्यभाविन इति 1. पदमिदं नास्ति मु. ५ सिद्ध इति ख, ग, सिद्धा इति क. '६ पदमिदं नास्तिक, ग, घ पुस्तषु. कार्यनिष्टरूपादिस्वादिति यलमदोस्तः पाठः ८ घटादीति ग, पटादीति य, पटेति ख. ९ मादिपद नास्ति घ पुस्तके. १० परमाणावेव रूपादेः पाक इति ये धन्ति ते पीलुपाकवादिनो वैशेपिकाः, तेषां मत इत्यर्थः। तेहि-अवधविनावष्टब्धेष्ववययेषु पाको न सम्भवति, किन्तु तेजस्संयोगेनावयविपु विनष्टेपु स्वतन्त्रेषु परमाणुष्वेव पाक मनन्तरं पकपरमाणुसंयोगात्मणुकादिक्रमेण महावयविपर्यन्तोत्पत्तिः, घह्रिसूक्ष्मावयवानो विजानीयवेगाधीनक्रिमापारपूर्धन्यूहनाशः न्यूहान्तरोत्पत्तिश्चेत्यमिप्रयन्ति । "बससंयोगादाविति च. १२ पदमिदं नास्ति च पुस्तके. ५ परमाणुगुणेनि छ, १५ स्थल जलरूपमिति च. १६ वर्हि तु इति 2.10 पार्थिवाणूनामिति ज, ट.' 16 पार्थिवाणुरूपादाविति ज, . १९वारणायेति ज, ट. २० रूपादित्युकमिति .. . १५पारप्रक्रियायाम मिति ज,.
. निरूपणम्] टीकात्रयोपेता (वा. टी. व्यणुकादिन्विति । कार्येत्यत्र पष्ठीसमासः । सेन न पार्थिवपरमाणुरूपादौ व्यभि- चारः । कर्मण्यतिव्याप्तिपरिहारार्थ रूपेति । सलिलेति । सिद्धसाधनपरिहाराय प्रतिज्ञायां परमाणु. पदम् । पार्थिवपरमाणुरूपेऽतिव्याप्तिपरिहाराय सलिलादीति । असिद्धिपरिहारार्थ रूपादीति । ,...(अयाबद्रव्यभाविनी गुणाः) पार्थिवपरमाणुष्वयाचव्यभाविनः । तत्र प्रमाणम्-पार्थिवपरमाणी सति रूपादयो निवर्तन्ते, अनित्यत्वात् , सम्मतिपन्नवत् इति । पार्थिवं मणुकम् अनित्यविशेषगुणवत्समवेतं, पार्थिवकार्यत्यात्, घटवदिति ,ना- सिद्धं साधनम् । हुतवहनियंहावलीढे महीखण्डे पूर्वरूपतिलक्षणरूपादि- दर्शनात्तत्रैवं तयो कल्पने सति नातिप्रसङ्ग इति तकः । तत्र पार्थिव- परमाणुरग्निसंयोगासमवायिकारणविशेषगुणान् , अनित्यविशेषगुणवत्वे सेति नित्यभूतत्वात्, आकाशवदिति पाकजत्वं तेषां सिद्धम् । [ब. टी: सतीति । उद्देश्यसिद्धये सत्यन्तम् । अनित्यत्यात् घंसप्रतियोगित्वादि- त्यर्थः । चेत्थं घटादिरूपादीनामप्ययावव्यभावित्यसिद्धिः, पक्षधर्मवाचलेन प्रकते खाश्रयसमानकालीनध्वंसंप्रतियोगित्वसिद्धिः, अयाबद्रव्यमावित्वसिद्धिरूपत्वात् । ननु परमाणुरूपत्वादिना नित्यत्वमेव तस्येत्यत आह-पार्थिवं ह्यणुकमिति । घटादौ सिद्ध- साधनवारणाय पृथिवीपरमाणौ च बाधवारणाय पार्थिवेति । अणुकशन्देन परमाणु- रप्युच्यत इत्यवो द्वीत्युक्तम् । यद्वा अणुकशब्दो रूढः। अनित्यपदं विशेषपदन सिद्धसाधनवारणाय । अनित्यविशेषः प्रागभावादि । तद्वत्समवेवत्वेनार्थान्तरवारणाय गुणेति। अनित्यविशेषगुणपद्धटादिसम्बन्धत्वेनार्थान्तरवारणाप समवेतत्वमुक्तम् । पाधवारणाय(१)वस्तुनित्यत्वसाधकमनुमानं वा (या? चा) पारजस्वायुपा(ध्यामि. हित ? ध्युपहत) मिति भावः। न त्वीदृशानुमानेन जलादिपरमाणुरूपादीनामप्य. नित्यत्वप्रसङ्ग इत्यत आह-हुतवहेति। कार्यगतविजातीयरूपादिदर्शनमेव कारणगत- विजातीयरूपादौ तत्रमिति भावः । एमर्थमनुमानेन साधयति-पार्थिवपरमाणु- रिति । अकादौ वाधवारणाय अणुरिति । अणुके वाधवारणाय परमेति । जलादि- परमाणौ वाधवारणाप पार्थिवेति । आश्रयत्वे गुणाश्रयत्वे विशेषगुणाश्रयत्वे चार्या- न्तरमतः अग्निसंयोगासमवायिकारणकेत्युक्तम् । अभियावरूपाग्निसंयोगासमवा- यिकारणकाश्रयाश्रयत्वेनार्थान्तरवारणाय गुणेति । अमिसंयोगासमवायिकारणको यो नियति नानि र पुमसके. हेमेनि मु. ३ रूपादीनि क. तपति प, ग, घ, मु. ५ वस्त्राकट्ये सनीति मु, वति नातिक पुस्तके.सर्फ इति नाति स मुदितपस्यो.. नास्ति क पुस्तके. गुणाश्रय लिग,. ९मपीति मु. .नित्यावारिनि प. "अदिति छ. १२ शानियेति ए. ५ गुणवतो पाहीति छ. १४ एवमिति ७. १५ प्यान प. विदारेनि नापि पुमो. १. भमित्रानेनि ए. १८५ इति नाति प पुनके..
प्रमाणमरी: विभागासदाश्रयत्वेनार्थान्तरवारणाय विशेपेति यद्वा अग्निसेंयुक्तवायुपरमाण्यादिना सहापार्थिवपरमाणोरमिसंयोगासमवायिकारणकसंयोगवत्वेनार्थान्तरंवारणाय'..विशेष- पदम् अदृष्टयदात्मसंयोगादिनितरूपादिमत्वेन सिद्धसाधनतावारणाय अनीति ।। अग्निसंयोगासमवायिकारणकविशेपः विभागादिरेव सादतो गुणेति । जलादिपरमाणी व्यभिचारवारणाय सत्यन्तम् । अनित्यस्संयोगादिरस्त्येवेति व्यभिचारतादवस्थ्यवारणाय सत्यन्तान्तर्गतो विशेपभागः। अनित्यविशेपसंयोगादिरस्त्येवेत्यत आह-सत्यन्ते गुणवचम् ( घटादौ व्यभिचारवारणाय नित्येतिआत्मनि व्यभिचारवारणाय भूत- स्वादिति। आकाशवदिति यो वंशादौ अनिसंयोगे चटपटाशब्दो जायते तमादाय साध्यसनम् । मा. टी. पाधियां गुणा रूपादयो ........ नित्यत्वमसिमित्यत आह-पार्थिव मनि:::::::::: ताव्युदासांय अनित्यपदम् । अपाकजत्योपाध्युपहत पूर्वमामासानुमानमिति मार्वः । नन्वा- प्यघणुकादेरप्येवं साधनसम्भवाजलादिपरमाणूनामनित्यरूपादिप्रसङ्ग इत्यत आइ-हुत- वहेति । आप्यादिकार्ये विलक्षणरूपादिदर्शनसानुकूलस्याभावात् नातिप्रसंङ्गः। यथा शुक्ल पटः शुक्लतन्त्वारब्धः, एवं लोहितो महीपिण्डस्ताकारणारब्ध इति परम्परया परमाणूनों पार्कजं लौहित्यमुक्तम् । तदनुमानारूढं करोति-पार्थिवेति । अग्निसंयोगोऽसमवायि- १५. , पार्थिवाणोरनङ्गीकारेण वाधः सादतः अग्निपदम् । भूतत्वादित्युक्ते आप्यब्यणुकादौ व्यभि- चारस्वादत उक्त नित्येति । 'जलादिपरमाणुपु व्यभिचारवारणाय अनित्यविशेषगुणवत्वे सतीत्युक्तम् । तेषां लोहितरूपादीनाम् । वा. टी. पार्थिवमिति । सिद्धसाधनपरिहारार्थम् अनित्येति । अनित्यगुणसंयोगादिम- परमाणुदयसमवेतत्वेन सिद्धसाधनपरिहाराय विशेपेति । आप्यघणुकेऽतिव्याप्तिपरिहाराय पार्थिवेति । सिद्दे हेतौ पाकजत्वं साधयति-हुतवहेल्यादिना सिद्धमित्यन्तेन । तत्र तथा सति इस भारम्य मन्तरवारणायेत्यन्तो, भागलुटितः छ पुलके, २ जनिवस्वे इति छ. ३ एतदनन्तरम् असमयायिसिद्धये असमवायीति । ममिनिष्टस्य संयोगानिरिकस्यासमवायित्वसिद्धिवारणाय असमवायीति पाठ उपलम्यते घ पुस्तके. ४ इत भारभ्य नित्येति इत्यन्तो भागो नास्ति छ पुस्तके.'५ संयोगाचटपटेति च. ६ पार्थिवाण्विति । १. सलाण्विनि, ज, ट. ८पदामिद नास्ति र पुस्तके, ९ गुणसमयेतेति श. युदामार्थमिति बाट न्याय इनि ट. १२ अभावादन च भावाति ज, समाधान दभावाग्लेति ट! १३ चाइग्रेण्यारन्ध इति ट...१४ पार्थिवपरमाणुरिति ज, ८.१५ व्युदासायेत्यारभ्य स्थादित्यन्तो भागो भाम्ति इस पुस्तके.. १६ निरासाय भनीतिज, द. १७ याघव्युदासायेति ज, ट.
* निरूपणम्] टीकामयोपेता साधितेऽनित्यावे, एवं कल्पने कल्प्यतेऽनेनेति कल्पनमनुमानम्, तस्मिन् क्रियमाणे नातिप्रसस इत्यन्वयः । तदाह-पार्थिवेति । सिद्धसाधनतापरिहाराय अग्निसंयोगेति । आप्यययुकेऽति- च्यातिपरिहाराय नित्येति । आप्याणौ व्यभिचारपरिहाराय अनित्येति । घटेऽतिन्यातिपरिहाराय नित्येति । आमिनि व्यभिचारवारणाय भूतेति । ततिप्रसङ्ग एक, आध्यानामपि तथा साधयितुं शक्यत्वादत आह-हुतवहेति । अयमाशयः-अनलसमाकुलपृथिव्यवयवपूर्वरूपपरावृत्या रूपान्तर- दर्शनात्कार्यवैलक्षण्येन कारणवैलक्षण्यानुमानस्य रक्तपटदर्शनेन रकतन्तुवत्सप्रसरत्वात्परम्परया परमाणूनामपि तथा.साधनानातिप्रसङ्ग इति । नन्वन्याक्यविन्येशमिसंयोगात् पूर्वरूपनाशे संपो- गान्तरेण पुनरन्योत्पत्तौ नेयं कल्पनेति चेन; तदा नष्टेऽत्रयविन्यययवरूपे रूपान्तरदर्शनं न स्याद, -तञ्चास्तीत्याह-खण्ड इतिः। (संख्यालक्षणम् तद्विभागच) गुणत्वावान्तरजात्या ध्यणुकपरिमाणासमवायिकारणसजातीया संख्या सा द्वेधा-अयावन्यभावियावदव्यभाविभेदेन । घ. टी.1.गुणत्वावान्तरेति । व्यणुकपरिमाणस्यासमवायिकारणं परमाणुद्वित्वम् , तस्य गुणत्वापान्तरजातिपुरस्कारेण सजातीया संख्येत्यर्थः । सत्या द्वित्वसजातीयरुपादाव- तिव्याप्तिभङ्गाय अवान्तरेति । गुणत्वेन द्वित्वसजातीयरुपादावतिव्याप्तिवारणाय गुणत्वेति । रूपद्वित्वान्यतरत्वादिना रूपादावतिव्याप्तिमङ्गाय जायेति । जातिपदेन समवेतो धर्म इह गृहीतस्तेन न नित्यपदव्यर्थता । गुणत्यावान्तरजाती रूपत्वादिरत उक्तं मणुकेत्यादि । घटपरिमाणासमयायिकारणसजातीये परिमाणेऽतिव्याप्त्यभावाय न्यणु- केति । घणुकासमवायिकारणसंयोगसजातीयसंयोगेऽतिव्याप्तिमार्य परिमाणेदि। यणुकपरिमापो निमित्तकारणज्ञानादिसजातीयेऽतिव्याप्तिवारणाय असमवायोति । सो द्वैधा-अयाबद्रव्यभावियाबद्रव्यमाविभेदादिति पाठः । याक्ट्रव्यभाव्ययाबद्र- ध्यभाविभेदादिति पाठेऽपि अयावन्यभाविन एवं पूर्वनिर्देशो योध्यः । अल्पसर- त्यातु याबद्रव्यभाविनः पूर्वः पाठः । । [अ. टी. सजातीया संख्येत्युक्ते ईश्वरज्ञानादिना निमितकारणेन सजातीयसंयोगादिना व्य- संयोगायसमायिकारणसजातीयक्रियाविश- तूलादिपरिमाणविशेषासमवायिकारणप्रशिधिला. वयवसंयोगादौ व्यभिचारसारणाय घणुकादम् । तथापि गुणखसत्त्वाम्या अणुरुपरिमाणा- समवायिकारणसजातीयरूपादौ व्यमिरिवारणाय गुणत्यावान्तरजात्येत्युक्तम् । अनेक द्रव्यमायो यस तदनेकद्रव्यम्, तादृशमसमवायिकारणं यस्य तदनेकद्रव्यासमवायिकारणम् । भेदादितिक, ग, ग, प. २ वारणायेति प. निरामानि च १ दिवादिनेनि प. ५ नियमेनि. निरामायेति प..ममायाति प. ८ भपीति मानि च पुनी. परवाना सपघावामिनि न, . "निरामामिनिट. १२ पारणामिनि .. म्यामिति, " प्यमिपारम्पादय उमामिनि ज, र. १५ भाप्रपम्नमिनि ज, र. १३मण- -- प्रमाणमञ्जरी. [गुण- या. टी.] गुणत्वेति । कालादिनिवृत्तये असमवायीतिः। रूपनिवृत्तये परिमाणेति । परिमाणनिवृत्तये व्यणुकेति । घटादिसंख्यायामव्याप्तिनिवृत्तये सजातीयेति । सत्तया सजातीये घटेऽतिव्याप्तिपरिहाराय अवान्तरेति । अवान्तरजात्या गुणत्वेन सजातीये गन्धेऽतिव्याप्ति- परिहाराय गुणत्वेति । तथाच संख्यात्यवती संख्येत्युक्तं भवति । एवं परिमाणादिलक्षणेऽप्यवग- . न्तव्यम् । (द्वित्वंसंख्यासिद्धिः, तस्या अयावद्रव्यभावित्वञ्च ) 'पूर्वत्र प्रमाणम्-परिमाणत्वं, संयोगातिरिक्तानेकद्रव्यासमवायिका- रणवृत्ति, परिमाणजातित्वात्, सत्तावदिति। परमाणुपरिमाणम् ; असम- वायिकारणं न भवति, नित्यपरिमाणत्वात्, आकाशपरिमाणवदिति परपक्षव्युदासः। द्वित्वम् , अयावद्व्यभावि, अनेकगुणत्वात् , संयोगव- दिति । द्वित्वसामान्यं, घुद्धिजवृत्ति, द्वित्वजातित्यात्, संत्तावदिति बुद्धिजत्वम् । व. टी. परिमाणत्वमिति अनेकं द्रव्यं समवायि यस्य तदसमवायिकारणं यस्य तत्र वर्तत इत्यर्थः । एतावता यणुकपरिमाणस्यासमवायिकारणं परिमाणं न भवति, किन्तु द्वित्वसंख्येति सिद्धम् । संयोगातिरिक्तवृत्तित्वे सिद्धसाधनता, संयोगातिरिक्तासमवायि- कारणकवृत्तित्वेऽपि सिद्धसाधनता, अनेकद्रव्येन्तु पिण्डापयवसंयोगः, तदसमवायिकारण- कवृत्तित्वेऽपि सिद्धसाधनता, संयोगातिरिक्तानेकद्रव्यवृत्तित्वे बाधः, अतो विशिष्टसाध्य- निर्देशः। कालत्वे व्यभिचारवारणाय जातित्वादिति। दिक्कालवृत्तित्वे व्यभिचारवारणाय जातिनिवेशित्वभागः। विशेपे व्यभिचारवारणाय अनेकसमवेतत्वभागः। घटत्वे व्यभिचारवारणाय परिमाणेति। सत्तायां विभागजविभागपत्तित्वेन साध्यसिद्धिः। ननु परमाणुपरिमाणमेव च घणुकपरिमाणासमवायिकारणमित्यत आह-परमाण्विति। कपालादिपरिमाणे वाधवारणाय परमाण्विति । उद्देश्यसिद्धये परमेति । घणुकपरि- माणस्याप्यसमवायिकारणत्वाभावात् परमाणु समवायिकारणमित्युक्ते सिद्धसाधनम् । परमाणुनिष्ठं नासमवायिकारणमित्युक्ते तद्रूपादौ याधः, विशेषादौ सिद्धसाधनश्च । न कारणमित्युक्ते याघः, तस्य योगिज्ञानादिजनकत्वात् , अखण्डाभावे वैयर्थ्याभावाच । उद्देश्यसिध्यर्थत्वाचं न समवायिकारणमित्युक्ते सिद्धसाधनम् । परमपरिमाणस्य पक्षी- करणे गगनपरिमाणादौ सिद्धसाधनमतः अपिवति । उद्देश्यसिद्धये च तत् । अनित्य- चिजातिवादिति मु. २ द्रव्यगुणस्वादिति मु. ३ पदमिदं नास्ति मुद्रिवपुस्तके. एवाव. तेत्यारम्य द्विश्वसंख्येत्यन्तो भागः नास्ति छ पुस्तके. ५ द्रम्यस्थलेति घ. ६ कारणति नास्तिष पुसके. • एनदनन्तरं च पुस्तके पाठ एवमुपलभ्यते--अनेकद्रय सणुकादि, सरसमायिकारणकत्तिस्वेऽपि सिद्ध साधनता इति । ८ पशिरियं नाम्नि छ पुम्न के. ९ घेति नास्ति च पुस्तके... यस्येति छ.. पक्षाकारे इति छ.
। निरूपणम्] टीकात्रयोपेता परिमाणे व्यभिचारवारणाय नित्येति । नित्यरूपादौ व्यभिचारवारणाय परिमाणत्वा- दिति । परमाणुपरिमाणस्य कारणत्वे घणुकेष्णुतरत्वप्रसङ्गा, कपालापेक्षया घटे महत्त- रत्ववत् । द्वित्वमिति । द्रव्यभावित्वे सिद्धसाधनस्वमतः अयावदिति । अयाबद्भा- वीत्युक्ते यत्किञ्चिद्यापावित्वसत्वाद्वाधः । यत्किञ्चिदयावद्भाविसत्त्वात् सिद्धसाधनञ्च । तंदर्थ द्रव्यपदं खायपरम् । अनेकगुणत्वात् अनेकाश्रयगुणवादित्यर्थः । परिमा- जादौ व्यभिचारवारणाय अनेकेति । जाती व्यभिचारवारणाय गुणत्वादिति । यद्यपि सर्व द्वित्वं नायाबद्रव्यमावि, ईश्वरापेक्षावुद्धिद्वित्वादेर्यटादिनाशेनापि नाश- सम्भवात तथापि अयावद्रव्यमाविजातीयत्वं तत्राप्यस्त्येवेति भावः । न च घटरूपेऽ- पीत्थमयावव्यभावित्वं स्यात् । अयावन्यभाविपार्थिवपरमाणुरूपसजातीयत्वादिति वाच्यम् । अवयविवृत्त्ययावन्यभाविसजातीयत्वस्य गुणत्वन्याप्यजात्या विवक्षितत्वात् । शन्दे सुखादौ चातादृशमेवायाबद्रव्यमावित्वमित्यवगन्तव्यम् । न चैकत्वेऽतिप्रसङ्गः, गुणत्वव्याप॑व्याप्यजातरुक्तत्वात् । यद्वा व्यासज्यवृत्तीनां व्यासज्यवृत्तित्वमेवायाबद्रव्य- भावित्वमित्यर्थः । अयावद्रव्यता विजातीयत्वे सति व्यासज्यवृत्तित्वमेव वा । न च जाती: यत्वाद्वयर्थ्यम्, अयापद्रव्यभाविपदार्थस्य याबद्रव्यभावित्वघटिततया वक्तव्यत्वात् , प्रवृत्तिनिमिते वैयर्थ्याभावात् । शब्दसुखपृथिवीपरमाणुरूपादीनान्तु खाश्रयसमानकालीन- ध्वंसप्रतियोगित्वमेवायाबद्रव्यमाविस्वम् । न च घटादिरूपेऽतिप्रसक्तिः, तस्य स्वाश्रयसमा- नकालीनप्रागभावप्रतियोगित्वेऽपि तत्समानकालीनध्वंसप्रतियोगित्वाभावात् । यद्वा याट्वि- स्वमाश्रयनाशजन्यध्वंसप्रतियोगि तद्भिन्नः पक्षः। हेतुरपि तद्भिन्नत्वेन योध्यः । एवं ताशसंयोगादिभिन्नत्वेनापि विशेष्यः । तेन न बाधव्यभिचारी । उपहितानुपहितभेदेन' हेतुसाध्ययोर्भेद' इति साध्यवैशिष्टयम् । यद्वा एकवात्यन्तामागोऽन्यत्रीन्योन्यामारो निवेशनीय इति भेदः । तावता प्रथमो हेतुः याबद्रव्यभाविद्वित्वादिपृथक्त्वादिसंयोग- विभागभिन्नानेकवेत्तिगुणत्वाँदित्येवंरूपः । द्वितीयस्तु यापद्रव्यमाविभिन्नत्वादित्येवं हेतुः । यदि च साध्यं यावद्रव्यभाविवरहित्यं, यदि वा साध्यं यावद्रव्यमाविभिमत्वं सदा द्वितीयो हेतुः यावद्रव्यमावित्वराहित्यम् । अनित्यमनेकवृचिगुणत्वं न देयमेव । द्वित्वसामान्यमिति । द्वित्वमात्रवृत्तिसामान्यमित्यर्थः । असाधारणयुद्धिजन्यवृश्चित्वं साध्यम् । तेन नेश्वरबुद्धिजन्यवृत्तित्वेनार्थान्तरम् । आत्मादौ पापवारणाय पक्ष द्वित्वेति । उद्देश्यसिद्धये पक्षे धर्मपदं विहाय सामान्यपदम् । पक्षातिरिक्ते नमो. द्वित्वान्यतरत्वादौ सन्दिग्धव्यभिचारवारणाय जातित्वादिति । यद्वा धुद्धिजन्यसम- वेतस्वं साध्यम् । तेनेदृशान्यतरत्यादौ निवितव्यभिचारवारणाय जातिल्यादिति ।। साधनेति छ, भाविश्वादिति च. मन्येति प. १ व्यायाम्याप्येति प. ५ इत्यर्थ इति मास्ति च पुलके, मिनस्वेनायाभ्य इति इ. न सायावैशिष्ट्यमिति प. लभपरप्रेति प. ९ वृचिरवेति च. १. स्वादीत्येवमिति छ. "मि सदा द्वितीयो हेता, साम्पमाविष्याहित्यम्, ममेकगुणवं न देयमेवेति व पुसम्पाट र भारमावादाशित , ५वीयबुद्धिजसमवेतसमिति प. " - ३ प्रमाणमअरी [गुण, पक्षेऽपि सामान्यपदमेतद्वित्वादौ याघवारणाय आत्मादौ व्यभिचारचारणाय द्वित्वेति। बुद्धिजेच्छावृत्तित्वेन सत्ताया दृष्टान्तता । अन्ये त्वपेक्षायुद्धिजवृत्तित्वं साध्यम् । न च च्याप्यत्वासिद्धिः, परत्वादेरपेक्षायुद्धिजन्यत्वसिद्धित्वाभिप्रायेण दृष्टान्तसिद्धिः। न चेश्वरापेक्षाबुद्धिजन्यवृत्तित्वेनार्थान्तरम् , अपेक्षावृद्धित्वेन तद्बुद्धिजन्यवृत्तित्वस्याप्यु- द्देश्यत्वात् । न चाननुगमः, अपेक्षावृद्धिप्रतिपाद्यत्वेनानुगमादित्याहुः । न च संख्या त्वेव्यभिचारः, तस्य पक्षसमत्वात् । {अ. टी.] परिमाणत्वं तदृत्तीत्युक्ते तादृशतूलपरिमाणवृत्तित्वेन सिद्धसाधनता स्यात्ता युदासांय संयोगातिरिक्तेति । संयोगातिरिक्तवृत्तीत्युक्ते परिमाणवृत्तित्वेन सिद्धसाधनता स्थादत उक्तम् अनेकद्रव्येति । संयोगातिरिक्तानेकद्रव्यवृत्तीत्युक्तेऽपि बाधस्स्यात्, परिमाणस्य नियतैकद्रव्यवृत्तित्वादत आह-असमयायिकारणेति । संयोगातिरिक्तासम- वायिकारणवृत्तीत्युक्तेऽपि : स्थूलतन्तुपरिमाणासमवायिकारणकपटपरिमाणवृत्तित्वेन सिद्ध- साधनता स्यादत उक्तम् अनेकद्रव्येति । परिमाणत्वं तावत्परिमाणमात्रवृत्ति । तत्र. संयोगपरिमाणाभ्यामन्यदसमवायिकारणं परिमाणस्यानेकद्रव्यद्वित्वादिसंख्यैव सङ्गच्छत इति परिमाणत्वेने तदारब्धपरिमाणवृत्तित्वेन संख्यासिद्धिः । सत्तायाः संयोगातिरिक्तानेक; द्रव्यविमागासमवायिकारणकविभागवृत्तदृष्टान्तसिद्धिः । ननु व्यणुकपरिमाणासमवायिकारणं परमाणुगत द्वित्वसंख्येत्युक्तम् । तत्र परमाणुपरिमाणस्येव तपादिवत्कारणत्वसम्भवादत आह-परमाणुपरिमाणमिति । समवायिकारणं न भवतीति सिद्धसाधनता, व्यवहारे निमित्तकारणश्च भवतीति बोधस्स्यात् , तदुभयभ्युदासाय असमवायिकारणग्रहणम् । तन्त्वादि- परिमाणे व्यभिचारवारणाय नित्यपरिमाणत्वादित्युक्तम् । तूलपरिमाणस ,विजातीया- प्रशिथिलावयवसंयोगादुत्पत्तिदर्शनात्संख्यातोऽपि, समानपरिमाणतन्वारन्धे पटे परिमाण- विशेषोदयावलोकनाच । परमाणुद्वित्वस व्यकपरिमाणकारणत्वे सम्भवति, न नित्यपरि- माणकारणकत्वकल्पना युक्तेति भावः । एवं द्वित्वं प्रसाध्य तस्यायावद्रव्यमौवित्वं साध- यति-द्वित्वमिति । रूपादौ व्यभिचारवारणाय अनेकपदम् । द्वित्वचापेक्षावुद्धिजन्य- मिति तस्य साधनमाह-द्वित्वसामान्यमिति। संयोगत्वादौ व्यभिचारवारणाय द्वित्व- जातित्वादित्युक्तम् । सत्ताया बुद्धिजन्य इच्छादौ वृत्तिरिति दृष्यन्तसिद्धिः। [वा. टी.] परिमाणत्वमिति । परिमाणासमवायिकारणकपरिमाणवृत्तित्वेन सिद्धसाधनताप- रिहाराय अनेकद्रव्येति । अनेक द्रव्यमाश्रयत्वेन यस्य तत्तथा तदसमायिकारणं यस्येति विग्रहः ।। प्रशियिलाययरसंयोगासमनायिकारणकलपिण्डपरिमाणवृत्तित्वेन सिद्धसाधनतापरिहाराय संयोगा- तिरिक्तति, रूपत्वेऽतिव्याप्तिपरिहाराय परिमाणेति । संयोगातिरिकानेकद्रव्यपदाम्यां संयोग- भामरवादाविति च. २ वृद्धिगरवासीति छ. १ तथा प्युदासायेति जा. मास्ति ज. ५सोति मास्ति पुस्तके. ६ घृत्तित्व इति जद. ७ गता इति ज. मास्ति र पुस्तके. ९ स्यादिति नास्ति ज, ट पुस्तकयो.. १०.कारण न भवतीत्युक्तमिति ज, र, भार• पटे इति न, १२ परिमाणे कारणस्वमिति र. १३ वृत्तित्वमिति स. १४ प्युदासापेति ट.. - ५ माति ८परमाण्विति निरूपणम्। टीकापयोपेता ४५ परिमाणनिरासे परिशेपात् द्विलमसमवायिकारणमिति द्वित्वसंख्यासिद्धिः । दृष्टान्ते च विभागजवि- भागवृत्तित्वेन सिद्धिः । अनित्यपरिमाणेऽतिव्याप्तिपरिहाराय नित्येति । रूपेऽतिव्याप्तिपरिहाराय अनेकेति । रूपत्वेऽतिव्याप्तिपरिहाराय द्वित्वेति । दृष्टान्ते च सुखादिवृत्तित्वेन सिद्धिः । द्वित्यबुद्धिजत्वञ्चैवम् -- आदाविन्द्रियसम्बन्धादेकमिति सामान्यतो बुद्धिर्भवति । तन एकमिदमिदमेक मित्येकल्ययुगलविषयापेक्षाबुद्धिर्भवति, ततो द्वित्योत्पत्तिः । तत्र द्वे द्रव्ये समायिकारणम्, तदेकरवेऽसमयायिकारणम् , अपेक्षाबुद्धिनिमित्तकारणमिति ! तदाहः- आदायिन्द्रिय सन्निकर्षघटनादेकत्वसामान्यधी- रेकत्वोभयगोचरा मतिरतो द्वित्वं ततो जायते । द्वित्वस्य प्रमितिस्ततोऽपि परतो द्वित्यंप्रमानन्तरं द्वे द्रव्ये इति धीरियं निगदिता द्वित्वोदयप्रक्रिया ॥ इति । (संख्याया यावद्रव्यभावित्वे प्रमाणम् ) उत्तरत्र प्रमाणम्-संख्यात्वं याबद्रव्यभावित्ति, द्वित्वत्रित्वना तित्वात्, सत्तावदिति, तदेवकत्वम् । संख्या गुणः, सामांन्यकाश्रयत्वे सति अकर्मत्वात् , रूपयदिति परपक्षव्युदासः। एवंभूतायास्संख्यायाः पदार्थान्तरत्ये स्वीकृते रूपमपि पदार्थान्तरं भवेत् । [ब. टी.] संख्यात्वमिति । उद्देश्यसिद्धये यावदिति । यावद्धाश्रयमाविवृत्ती- त्यर्थः । तेनाकाशादिसमानकालीनध्वंसप्रतियोगित्वेऽपि घटायेकत्वस न क्षतिः। संयो. गत्वादी व्यभिचारभङ्गाय दित्वत्रित्वेति । संयोगादि द्रव्यनाशानश्यति । तस्याप्य. यावद्रव्यभावित्वं यथा तथोक्तमयस्तात् । द्वित्वत्वे नित्यत्वै व्यभिचारवारणायैतदुभय- वृत्तित्वमुक्तम् । एतदुभयान्यतरत्वादी व्यभिचारवारणाय (जातिपदम् ?) जातिपदार्थस व्यर्थत्वमङ्गार्य () । गुणत्वं साधयति-संख्येति । सामान्यादौ व्यभिचारपारणाप सामान्येति । घटे व्यभिचारवारणाय एकेति । कर्मणि व्यभिचारवारणाय कर्मान्य त्वादिति। जातिमात्रसमचायित्वे सति कर्मभिन्नत्वादिति समुदायार्थः । धर्ममास समवायित्वं द्रव्येऽप्यस्ति । धर्ममानसम्बन्धित्वन्त्वसिद्धमतो विशिष्टो हेतुः विपक्षे बाधकमाह-एवमिति। [अ. टी.] उत्तरन यावद्रव्यमाविसंख्यायाम् । संयोगत्वादौ व्यभिचारयुंदासाय द्वित्यत्रित्वजातित्यादित्युक्तम् । यावाव्यमायिनी च संख्या एकत्येसंज्ञेत्साह-तदे- वेति । संख्याया गुणवे सिद्धे सर्वमेतद्युक्तं स्यात्तदेव कुत इत्यत आइ-संख्या गुण चीति नाचि पखके. २ कोन्यावादिति पलदेवोतः पाटा १ मझ्या गुण इस्यधिक ग, प. पुस्तकयो... मारणायेति च. ६ जानिपदासापभयमाग इति प. मासमवामित्वमिति च. निरासायेति ज, -- . ५ नाशायनि प. ९संण्यति. प्रमाण.७ ५० प्रमाणमसरी [गुण- इति । अकर्मत्वादित्युक्ते सामान्यादौ द्रव्ये च व्यभिचारस्स्थादत उक्तम् सामान्यैका- श्रयत्वे सतीति । एवं गुणत्वान्न संख्यायाः पदार्थान्तरत्वम् , अन्यथातिप्रसङ्गादि- त्याह-एवंभूताया इति। [वा. टी.] द्वित्वे त्रित्वे व्यभिचारनिरासाय द्वित्वत्रित्वे इति । संख्यायाः पदार्थान्तरत्वं निषेधति-संख्या गुण इति । सामान्येऽतिव्याप्तिपरिहाराय सामान्याश्रय इति । द्रव्येऽति. व्याप्तिपरिहाराय एकेति । कर्मण्यतिव्याप्तिपरिहाराय अकर्मत्वादिति । कर्मत्वानाधिकरणत्वादि- त्यर्थः । यस्तु गुणादिषु संख्यान्यवहारस्स एकाश्रयसमायिनिमित्त इति । * (परिमाणलक्षणं तद्विभागश्च) गुणत्वावान्तरजात्या पृथक्त्वान्याप्रत्यक्षात्मगतयावद्व्यभाविस- जातीयं परिमाणम् । आत्मा पृथक्त्वान्याप्रत्यक्षयावद्व्यभाविगुण. वान्, सर्वगतत्वात् , दिग्वत् । सर्व द्रव्यं, परिमाणाधिकरणं, द्रव्यत्वा- दात्मवदिति। तचतुर्विधम्-अणुमहद्दीर्घहखभेदात् । घणुकेऽणुत्वमङ्गी- कृत्य हस्खत्वं निराकुर्वाणं प्रति इदमनुमानम्-घणुकम्, अणुपरिमाणाति- रिक्तपरिमाणाधिकरणं, कार्यद्रव्यत्वात् , पटवदिति । दीर्घत्वमनदीकुर्वाणं प्रति इदमनुमानम्-पंटो महत्त्वव्यतिरिक्तपरिमाणाधिकरणं, कार्यद्रव्य- स्वात्, घणुकवदिति। [व. टी.] गुणत्वावान्तरेति । सजातीयत्वमानं घटादापतिप्रसङ्गि, अत उक्तं गुण- त्वेति । गुणत्वजात्या गुणत्वावान्तरजात्या सजातीयं गुणमानं भवति, अत उक्तम् आत्म- गतेति । सुखादौ गतमत आह-अप्रत्यक्षेति । पृथक्त्वे गतमत आह-पृथक्त्वान्येति। संयोगादौ गतमत आह-यावव्यभावीति । आत्मैकत्वं तु प्रत्यक्षमेव । आत्मपदेनैव गुरुत्वादिवारणम् । आत्मनि तादृशं गुणं साधयति-आत्मेति । पृथक्त्वेनार्थान्तरवारणाय पृथक्त्वान्येति। एकत्वेनार्थान्तरवारणाय अप्रत्यक्षेति । संयोगादिनार्थान्तरवारणाय यावव्यभावीति । विशेषेणार्थान्तरभङ्गाय गुणेति । दिशि तादृशो गुण एकत्वम् । आत्मेकत्वाप्रत्यक्षत्वपक्षे आत्मैकत्वान्येति विशेषणीयम् । आत्मनि प्रसाध्यान्यत्र तं गुणं साधयति-सर्वमिति । आत्मातिरिक्तं सर्वमित्यर्थः । गुणे वाधवारणाय द्रव्यमिति । आत्मनि सिद्धसाधनवारणाय आत्मान्यत्वम् । उद्देश्यसिद्धये सर्वमिति । यन्मतेना- शतः सिद्धसाधनं दोपस्तन्मते आत्मातिरिक्त न देयम् । अधिकरणत्वं सिद्धमेवातः परिमाणेति । घणुफमिति । परमाणानान्तरभङ्गाय द्वीति । अणुत्वेनार्थान्तर- माधये इति 2. २ एकपृथति मु. ३ घट इति ख. ४ उक्तमिति मास्ति च पुस्तके. ५ गुणचसजावीयरूपादारतिमसगमनाप भवान्तरेति । गुगमात्रमिति घ, ६ पहिरियं त्रुटिता , पुसके वारणायेति च. ८ प्रत्यक्षाध्यक इति स. ९ मारमान्येति च. १.रिपत्वं नेति च. .
निरूपणम् टीकापयोपेता वारणाय अतिरिक्तान्तम् । वाधवारणाय अपिवति । अणुद्रव्येऽतिरिक्तमणुपरिमाण भवत्येवेत्यत उक्तम् अतिरिक्तविशेषणम् परिमाणेति । रूपादिनार्थान्तरमायाति- रिक्तत्वविशेष्यं परिमाणेति । यन्मते परमाणोन हरांत्वं तन्मते व्यभिचारभङ्गाय कार्येति । द्रव्येतरमिन् व्यभिचारभदाय द्रव्यत्वादिति। घेट इति । कुवश्चिद तिरिक्त परिमाणं महत्त्वमप्यत उक्तम् महत्त्वेति । महत्त्वेनार्थान्तरवारणाय व्यतिरिक्तान्तम्। रूपादिनार्थान्तरवारणाय परिमाणेति । यन्मते आकाशे महत्चातिरिक्तं परिमाण नास्ति तन्मते कार्येति । सन्दिग्धव्यभिचारधारणाय वा तत् । रूपादौ व्यभिचार- वारणाय त्वादन्तम्। (अ.टी.] सजातीयपरिमाणमित्युक्ते द्रव्यादौ व्यभिचारस्स्यादतो गुणत्वावान्तरजाये- त्युक्तम् । एवमपि संयोगादौ व्यभिचारोऽत उक्तम् यावदव्यभावीति । घटरूपादि- सजातीयरूपान्तरव्यवच्छेदार्थम् आत्मगतेति पदम् । तथाप्यात्मगतैकत्वे व्यभिचारोऽत: अप्रत्यक्षपदम् । तर्हि तद्गतपृथक्त्वेऽतिव्याप्तिः खाँदैतः पृथक्त्वान्येत्युक्तम् । पृथक्त्वान्याप्रत्यक्षात्मगतयाबद्रव्यमाविसजातीयं परिमाणमित्युक्तेऽपि गुणवेनाभिमतात्मगत: परिमाणेन सह सत्तया सजातीयद्रव्यादौ व्यभिचारस्स्यादतो गुणत्वजात्येत्युक्तम् । गुणवजात्या सजातीयव्यवच्छेदार्थम् अवान्तरपदम् । आत्मनि ताहग्गुणसिद्धौ तत्सना- तीयं परिमाणं सिध्येत् । तत्सिद्धिरेव कुत इत्यत आह-आत्मेति । आत्मनो बुध्यादिगुण- वत्वस सिद्धत्वात् यावद्रव्यभाविपदम् । एकत्वैकश्यक्त्वाभ्यां सिद्धसाधनताव्युदासाय पृथक्त्वान्याप्रत्यक्षेत्युक्तम् । दिशि यथोक्तो गुण एकत्वम् । आत्मनि पृथक्त्वान्योऽ- प्रत्यक्षो यावद्रव्यभावी गुणः परिमाणमेव । इदानीं गुणत्वावान्तरजात्या तत्सजातीयमन्य- त्रापि साधयति-सर्वमिति । आत्मातिरिक्तं सर्वमित्यर्थः । एकदेशिमतमपाकरोति-ध्यणुक इत्यादिना । परमाणुषु मनसि च व्यभिचारवारणीय कार्य विशेषणम् । आकाशादिषु मह- त्वातिरिक्तपरिमाणाभावात् कार्येति पदम् । कर्मादौ व्यभिचारवारणाय द्रव्यपदम् । [वा, टी.] गुणत्वेति । रूपेऽतिव्याप्तिपरिहाराय आत्मेति । आमैकन्वेऽतिन्याप्तिपरिहाराय अप्रत्यक्षेति । आत्मैकपृथक्त्वेऽतिव्याप्तिपरिहाराय पृथक्त्वान्येति । संयोगेऽतिव्यातिपरिहाराय यावव्येति । घटादिपरिमाणेऽव्याप्तिनिरासाय सजातीयेति । सजातीयासजातीये घटेऽतिन्या- प्तिपरिहाराय अवान्तरेति । रूपेऽतियाप्तिपरिहाराय गुणत्वेति । ननु घटादिवरूपस्वैव परि- माणत्वादसम्भवमिदं लक्षणमिति चेन स्वरूपोपलब्धावपि हस्तवितस्त्लादिविशेषानुपलम्भात् । अतोऽतिरिकं वाच्यम् । अस्ति च तस्त्र प्रमाणमित्याह-आत्मेति । संयोगेन सिद्धसाधनतापरि- वारणायेति च. २ दव्यत्वमिनि छ. ३, ४ चारगायति ध. ५ पट इति नानि च पुस कुतधियनीति च. भगायेति च, ८ स्वादन इति . ५ गतपदमिति ज, ट. 1. मामैकरव इति ज. "स्वादयोऽमयोप्युसमिनि ज, र. १२ मतियाक्षिः, सव इनिज, मतियाप्तिः सपिरासाप वदतेति. २लक्ष्यस्येनेति , ट. १४ रूपादिन्यदेति ज, र. १५ थारगामिनि , 2..१६कार्य-. दम्पत्पादित्युक्तमिति अ, कार्ययुन्ममिति . १० पद्धिरिय मावि , पुस्तकयोः [पुर्ण ममाणमारी हाराय यावरव्येति । संख्यया सिद्धसाधनतापरिहाराय अप्रत्यक्षेति । पृथक्त्वेन सिद्धसाधन तापरिहाराय पृथक्त्वान्येति । दृष्टान्ते च संख्यया सिद्धिः । पक्षे च तस्या अप्रत्यक्षपदेन निरा. साइनुपपल्या परिमाणसिद्धिः । प्यणुकमिति । सिद्धसाधनतापरिहाराय अणुपरिमाणेति । परमाणौ व्यभिचारपरिहाराय कार्येति । + , (पृथक्त्वलक्षणं तद्विभागय) संख्यातिरिक्तदिकालगतात्यन्तसजातीयं पृथक्त्वम् । तद्वेधा-अया- पदव्यभावियावद्न्यभाविभेदात् । तत्र प्रमाणम्-कालः संख्यातिरिक्त दिग्गतगुणवान , द्रव्यत्वात्, पटवदिति अयायव्यभाविपृथक्त्व- सिद्धिः पृथक्त्वसामान्यम् , अस्मदादिबुद्धिजवृत्ति, पृथक्त्वजातित्वात्, सत्तापदिति बुद्धिजत्वं सिद्धम् । तत्सामान्य कारणगुणपूर्ववृत्ति, पृथ. क्त्वजातित्वात्, सत्तीयदिति । तत्सामान्यं यावद्रव्यभाविवृत्ति, द्विपृथक्त्यत्रिपृथक्त्वजातित्वात्, सत्तावदित्येकपृथक्त्वसिद्धिः। [ब. टी.] संख्यातिरिक्तेति । घटादापतिव्याप्तिकारणाय अत्यन्तेति । गुणत्वा- वान्तरजात्येत्यर्थः । संख्यायामतिव्यातिवारणाय संख्यातिरिक्तेति । रुपादावति- च्याति वारयितुं दिकालगतेति । दिकालमात्रगतत्वं तदर्थः । तेन न संयोगादापति- च्याप्तिः । दिपक्षेणैकं लक्षणम्, कालपक्षेणैकं लक्षणम् । परिमाणातिरिक्तत्वमपि विशेषणं देयम् । यद्वा दिकालयोरुभयोर्गतत्वं विवक्षितम् , तेन परिमाणव्यवच्छेदः । दिकालगतद्वित्वसजातीयसंख्यायामतिव्याप्तिवारणाय अतिरिक्तान्तम् । काल इति । परिमाणेनार्थान्तरवारणाय दिग्गतेति । जात्यार्थान्तरवारणाय गुणेति । द्वित्वादिना- र्थान्तरवारणाय अतिरिक्तान्तम् । पृथक्त्वेति । ईश्वरबुद्धिजवृत्तित्त्वेनार्थान्तरभङ्गाप अस्मदादीति । अदृष्टद्वारासदादियुद्धिजवृत्तित्वेनार्थान्तरवारणायादृष्टाद्वारकत्वं विशे- पणमूह्यम् । इदं विशेषणं द्वित्वादिस्थलेऽपियोध्यम् । नचैकपृथक्त्वे व्यभिचारः, पृथक्त्वा- व्याप्यपृथक्त्ववृत्तिजातित्वस्य हेतुत्वात् । एकपृथक्त्वं साधयति-तत्सामान्यमिति। पृथक्त्वमित्यर्थः । स्वसमवायिकारणनिष्ठपूर्ववृत्तीत्यर्थः । यद्यपि पृथक्त्वद्वयजन्यद्वि- पृथक्त्ववृत्तित्वेऽपि जनकीभूतैकपृथक्त्वं सिव्यत्येव, तथापि पृथक्त्वजन्यमप्येकष्टथक्त्वं सिध्यतु इत्यभिप्रायेणेदशसाध्यनिर्देशः। न च कपालपृथक्त्वघटपृथक्त्वाम्यां जनितद्विपृथ- क्वचित्वेनार्थान्तरम् , कारणगुणपूर्वकस्साव्यासज्यवृत्तित्वेनेति विशेषणात् । न वा च्या- सज्यवृत्तित्वमेव साध्यतामिति वाच्यम् , उद्देश्यसिध्यर्थ विशेषणस्योपाचत्वात् । अत एवापेक्षाबुद्धिपूर्वकवृत्तित्वेनादृष्टपूर्वकवृत्तित्वेन चार्थान्तरम् । मनस्त्वादौ व्यभिचार- १ घटवदिति क. २ इत मारम्य जातिरवादित्यन्तो मागो नास्ति क पुस्तके. ३ द्विपृथक्त्वनिप. यरवेति मास्ति ग, घ पुस्तकयो.. १ भमायेति च. ५, ६ प्रक्षेपेणेति क. ८ पृयकावावृत्तीति छ. १० सिस्वेनेति नाति छ. अतिरिकमपीति छ. ११साध्यमिति. ९ जत्वमपीति छ.
निरूपणम् ] टीकामयोपेता चारणाप पृथक्त्येति । घटपटनिष्ठद्विपृथक्त्याकाशान्यतरत्वे व्यभिचारपारगाय जाति- त्वादिति । पृथक्त्वसमवेतधर्मत्वादित्यर्थः । न च द्विपृथक्त्वे व्यभिचारः, गुणत्वव्या- प्याव्याप्यपृथक्त्ववृत्तिजातेरुतत्वात् । सत्तायां ताशरूपादिवृत्तित्वेन साध्यसिद्धिः । द्विपृथक्त्वत्रिएक्वेति विशेषणे द्विपृथक्त्वत्रिपृथक्त्वयोर्व्यभिचारवारणायैतदुभयवृत्ति- परे । विश्थक्त्वत्रिपृथक्त्यान्यतरत्वे व्यभिचारयारणाय जातित्वमुक्तम् । [अ. टी.] रूपादिसजातीये व्यभिचावारणार्थ दिग्गतेत्युक्तम् । तथापि दिकाल्योरेकै- कवृत्तिपरिमाणसजातीयपरिमाणेऽतिव्याप्तिरत उक्तम् दिकालगतेति । उभयगतत्व- मेकन्यक्तेर्विवक्षितम् , तर्हि दिकालगतद्वित्वसंख्यया सजातीयसंख्यायामतिव्याप्तिरत उक्तम् संख्यातिरिक्तति । अत्यन्तपदेन सत्तागुणत्वाम्यां सजातीयद्रव्यगुणेकर्मव्यवच्छेदः । कालो गुणवानित्युक्त परिमाणवत्वेन सिद्धसाधनता, अत उक्तं दिग्गतेति । द्वित्वसंख्या तथा भवतीति तद्वत्त्वेनोक्तदोषव्युदासार्थ संख्यातिरिक्तपदम् । अयावद्रव्यमाविधि- पृथक्त्वसिद्धिरित्यर्थः । अस्याप्यपेक्षायुद्धिजन्यत्वं द्वित्ववदभिप्रेतं, तत्साधयति-पृथक्त्व. सामान्यमिति । ईरबुद्धिनवृचित्वेन सिद्धसाधनताब्युदासार्थम् अस्मदादिपदम् । घटादिगतद्विपृथक्त्वसारसदादिबुद्धिजत्वमपि द्वित्वषदनेन सिद्धम् । इदानी याबद्रव्यमावि. पृथक्वं साधयति-तत्सामान्यमिति । अपेक्षावृद्धिलक्षणगुणपूर्वहिपृथक्त्वादिवृत्तित्वेन सिद्धसाधनताब्युदासाथै कारणपदम् । कारणय समवायि विवक्षितम् । नित्यगतैकपृय- क्वस कारणगुणपूर्वकत्वामावेऽपि न घाधा, धादिगतेकपृथक्त्वस्सान विवक्षितत्वात् । [ या, टी.] संख्येति । कालगतं पृथक्त्वमिन्युक्त कालघटसंयोगेऽतिव्याप्तिस्तदर्थ दिगिति । दिवृत्तित्वे सति कालवृत्तीत्यर्थः । दिलेऽतिल्याप्तिपरिहाराय संख्यातिरिक्तति । धादिपृथक्त्वेऽ. ज्यातिनिरासाय सजातीयेति । घटेऽतिव्यातिपरिहाराय अत्यन्तेति । गुणत्वावान्तरजात्यर्थः । काल इति । द्वित्वेन सिद्धसाधनतापरिहाराय संख्यातिरिकेति । दृष्टान्ते संयोगेन सिद्धिः । पसे चामिभुत्वेन तस्यानुपपत्तौ द्विपृथक्त्वसिद्धिः । ईशबुद्धिजन्यवृत्तित्वेन सिद्धसाधनतापरिहाराय अस्मदादीति । रूपत्वेऽतिव्यातिपरिहाराय पृथक्त्येति । दृष्टान्ते विलादिवृतित्वेन सिदिः । तत्सामान्यमिति । अपेक्षाबुद्धिगुणपूर्यद्विपृथक्त्वचिवेन सिद्धसाधनतापरिहाराप कारणेति । कारणञ्च समवापिकारणम् , तस्य गुण आरम्भकत्वेन यस तत्तथेति । (संयोगलक्षणं, तत्र प्रमाणम् , तद्विभागश्च ) गुणत्वावान्तरजात्या द्रव्यासमयायिकारणसजातीयः संयोगः । तत्र प्रमाणम्-संयोगपदं सद्राच्यम्, वाचकत्वात् , स्खलक्षणपदयादिति निरासायतिर नियरचत्रियस्येति । पृथपस्यान्यतरस्व व्यभिचारवारणाय जानिय मुक्तम् । दिपरस्पमिवारवारणाय विपृथपरवेनि । विपश्य म्पमिवारपारणाप दियस्पेनि इति प. दिकालेति जाट, ४ सातिद. ५ काविशेषेनि वर, श्वरेत्यारम्प अपेक्षेगनो भागो नाति ४ पुखके. का प्रमाणमञ्जरी [गुण- परिशेपात् 'संयोगसिद्धिः। स त्रिविधः-अन्यतरकर्मजोभयकर्मजसंयोग- जभेदात् । तत्रोभयं प्रसिद्धम् । तृतीये प्रमाणम्-संयोगत्वं संयोगासम- वायिकारणवृत्ति, संयोगवृत्तिजातित्वात् , सत्तापदिति । विप्रतिपन्ना आत्मादयः, आकाशेन न संयुज्यन्ते, सर्वगतत्वात्, आकाशवदिति अजसंयोगासिद्धिः । अयाबद्रव्यभावित्वं तस्य प्रसिद्धम् । व. टी.] गुणत्वावान्तरेति। संयोगरूपान्यतरत्वादिना संयोगसजातीयरूपादापति- व्यामिनिरासाय जातित्वमुक्तम् । रूपासमवायिकारणरूपसजातीयेऽतिव्याप्तिमारणाय द्रव्येति । तनिमित्तकारणासजातीये ज्ञानादावतिच्यातिवारणाय 'असमवायीति । संयोगपदमिति ।घटादिपदेऽर्थान्तरवारणाय संयोगेति । संयोगरूपेऽर्थे वाधवारणाय पदमिति । संयोगे त्वयाखण्डलात्पदत्वम् । यद्वा तदन्तर्गता प्रकृतिः पक्षः । सद्वस्तु वाच्यं यस्येति साध्यार्थः । विभागाभावादिवाचकत्वेनार्थान्तरवारणाय सदिति । यद्वा सत्ताजातिरहित (१) सिध्यर्थान्तरवारणाय सदिति । न चाभावपदे व्यभिचारः, उभयवादिसिद्धासद्वाचकभिन्नवाचकत्वस्य हेतुत्वात् । यद्वा वाचकत्वमा साध्यम् , सत्पदन्तु पक्षधर्मताबललभ्यार्थकथनाय | स्खलक्षणपदेन घटादिपदमुच्यते । परिशेपा- दिति । अन्यद्वाच्यं न सम्भवति, यद्वाच्यं संयोग इत्यर्थः । अन्ये तु स्वस्स संयोग- पदस्य यलक्षणं यत्पदं इदं संयोगपदमिति वाचकशब्दः तद्वदित्यर्थ इत्याहुः । संयोग- त्वमिति । सकारणवृत्तित्वेऽर्थान्तरम् , असमवायिकारणईत्तित्वेऽपि तथेत्यत आह- संयोगेति । संयोगकारणकवृत्तित्वसाधने दिक्संयोगादृष्टवदात्मसंयोगजन्यसंयोगवृत्ति- त्वेनार्थान्तरमतः असमवायीति । स्नेहत्वे व्यभिचारभङ्गीय संयोगेति । अन्यतर- कर्मजन्यतावच्छेदकजाती व्यभिचारवारणाय जातिपदं गुणत्वव्याप्याव्याप्यजातिपरम् । घटादिवृत्तित्वेन सत्तायां साध्यसिद्धिः। संयोगसमवेतल्यादिति क्वचित्पाठस्समीचीन एव, अन्यथा जातिपदार्थान्तर्गतानेरवृत्तित्वादिभागस्य वैयर्थ्यापत्तेः । नन्वजसंयोगस्यै सत्त्वात् कथं संयोगवैविध्यमत आह-विप्रतिपन्ना इति। आकाशनिरूपितसंयोगवन्तो न भवन्तीति साध्यार्थः । घटादिसंयोगवत्वेन वाधवारणाय आकाशेति । आकाशनिरूपितसुसादिमत्त्वेन बाधधारणाय संयोगेति । (न संयुज्यन्त इति !) आकाशजनितज्ञानजन्यं सुसम्, आकाशजनितं द्वित्वमात्मनीति प्रतीतायाकाशस्य निरू- पकत्वाद । वस्तुतस्तु नित्यसंयोगसिद्धा तुल्यन्यायेन विभागस्यापि तादृशस सिद्धिप्र- सक्त्या एकदा विरुद्धद्वयसमावेशापतिरेव दोपः । पदमिदं नास्तिक, ग, घ पुखोपु. २ एतदनन्तरम्-सत्तायां गुगग्वेन च सजानीयरूपादावनि. प्याशिवारणाय गुणावापान्तरेति इति पारश्च पुनरं. कारपारेनि छ. ५ विभागो भावादिरपीति छ. ६ संख्यारेति छ. ७ वृत्तिग्यनेनि छ, ८ कारणति डा. ९ धारणायेनि घ. १० तिरयेन नेति छ. " संयोगसबादिति घ. १२ संयोगवा पानि छ. ३ इत भारभ्य विमा. गनिरूपगममाप्तिपर्यन्त पुस्तके पड्कयो प्यत्ययाः श्रुटिताच यतेने। च पुनके सत्यप्य शुद्धियाहुल्ये कथ. शिपापस्सशिवेशिता ५संयोगस्येति च. ।
निरूपणम्] टीकानयोपेता [अ. टी.] कारणसजातीयस्संयोग इत्युक्तौ समवायिनिमित्तकारणसजातीये द्रव्यादौ व्यभिचारस्थादत उक्तम् असमवापीति । तर्हि रूपाद्यसमवायिकारणसजातीयरूपादौ व्यभिचारस्स्यादतो द्रव्यपदम् । तथापि सत्तादिना द्रच्यासमवायिकारणसजातीयद्रव्या- दाववातिव्याप्तिस्ततोगुणत्यावान्तरजात्येत्युक्तम् । सद्वस्तु वाच्यं यस तत् सद्वाच्यम्। स्वशब्देन संयोगपदं तलक्षणमिदं संयोगपदमिति वाचकरशब्दो वाच्यान्तरासम्भवात्सरि- शेषासंयोग एवं वाच्य इत्यर्थः । पक्षिणः साणुसंयोगोऽन्यरतकर्मजः, मलमेपादेः परस्परसंयोग उभयकर्मजः प्रत्यक्षसिद्धः । संयोगलं कर्मासमवाधिकारणकसंयोगवृत्ति सिद्धमते 'उक्तम् संयोगेति । समवेतलं रूपादौ व्यभिचरतीति संयोगसमवेत- त्वादित्युक्तम् । संयोगजातित्वादिति पाठेऽपि तत्र च आत्मत्वादौ च जातिवं व्यमि- चरतीति संयोगपदम् । जलायुरूपादिवृत्तिसत्तायाः संयोगासमवायिकारणकद्रव्यवृति- खेन दृष्टान्तसिद्धिः । अजसंयोगोऽपि कैश्विदिष्यते, ततः कथं त्रिविध एव संयोग इत्सत आइ-विप्रतिपन्ना इति । आत्मादयो घटादिभिः संयुज्यन्त इति वाधव्युदासार्य आका- शेनेत्युक्तम् । संयोगश्चायावद्रव्यभावीष्ट इति तत्र प्रमाणमाह-अयायव्यभावीति । वा. टी.] गुणत्वेति । कर्मण्यतिव्याप्तिपरिहाराय द्रव्येति । घटपटसंयोगेऽव्याप्तिनिरासाय सजातीयेति । घटेऽतिव्याप्तिपरिहाराय अवान्तरेति । रूपेऽतिव्यातिपरिहाराय गुणवेति । सत् विद्यमानं वाच्यं यस्येति विप्रः । स्खलक्षणपदवत् स्वरूपपदवदित्यर्थः । पर्यवसिताच्ये रूपादीनामसम्भवादिदमनेन संयुक्तमिति व्यवहारदर्शनात् संयोग एवास्य याव्यमित्याह---इतीति। संयोगत्वमिति कर्मासमवायिकारणसंयोगवृत्तित्वेन सिद्धसाधनतापरिहाराय संयोगेति । रूप- त्वेऽतिव्याप्तिपरिहाराय संयोगेति । नन्वनुपपनो विभागः, चतुर्थस्य नित्यसंयोगस्य सम्भवादत माह-विमतिपन्ना इति । बाधधारणाय आकाशेति । न चाकाशे आकाशनिरूप्यभेदराहि- समुपाधिः, व्यतिरेके क्रियावस्त्रस्योगाधिन्चादिति । (विभागलक्षणं, तत्र प्रमाणम्, तहिभागश्च) संयोगविरोधी गुणो विभागः। तत्र प्रमाणम्-आकाशः संयोगा- तिरिक्तकर्मजगुणाधारः, द्रव्यत्वात्, शरीरथदिति । विप्रतिपनं सर्व द्रव्यं विभागवत्, द्रव्यत्वात्, आकाशयत् । स द्विविधः-कर्मजविभागजभे- दात् । आद्यो द्वेधा-अन्यतरकर्मजोभयकर्मजभेदात्। तत्र प्रमाणम्-विभा: गत्वम् एकानेककर्मासमयायिकारणवृत्ति विभागजातित्वात् सत्ताबदिति कर्मजविभागसिद्धिः। विभागत्वम् अर्मजवृत्ति, विभागवृत्तिजातित्वात् के इतिज, ८, २व्यभिधारमा टिकट, माय इति । संयोगवमिति R. ५ इतिज । संयोगदमिति श ०पटादिमिरिति ट. पुनासामिति ज. ९ मार्गति मावि ज, पुस्तायोः १. मागामिनि करा, प. कम्य सादयन्त नातिक, प पुनायो। ८ प्रमाणमसरी सत्तावदिति । विभागजविभागसिद्धिस्तु परिशेपात् । विभागत्वं विभा- गासमवायिकारणवृत्ति, विभागवृत्तिजातित्वात् , सत्तावदिति मानम् । बि. टी.] संयोगेति । ज्वंसेऽतिच्याप्तिवारणाय गुण इति । रूपादापतिव्याप्तिभदाय विरोध्यन्तम् । विभागविरोधिनि संयोगेऽतिव्याप्तिवारणाय संयोगेति । अदृष्टादा- पतिव्यातिवारणायासाधारणविरोधित्यमुक्तम् । ननु यस्मिन् काले विभागस्तस्मिन् काले संयोगः, एवं दैशिकमपि सामानाधिकरण्यं विनदयदवस्थसंयोगेन विभागस्यास्तीति चेद- नः निर्यनिवर्चकभावलक्षणविरोधस्योक्तत्वात् । न च गुणपदवैयर्थ्यम् , संयोगध्वंसस्य संयोगनिवृत्तिरूपतया संयोगनिवर्तकत्वामावादेवातिप्रसङ्गाभावादिति वाच्यम् । गुणपद- स्थासाधारणगुणपरतयादृष्टोदावतिव्याप्तिवारकत्यात् । यद्वा विभागत्वजाती लक्षणं योध्यम् । आकाश इति । संयोगेनार्थान्तरवारणाय संयोगातिरिक्तेति । शब्दादि- नार्थान्तरवारणाय कर्मजेति । अदृष्टद्वारा तीर्थगमनादिजनितशब्दत्यनार्थान्तरवारणा- यादृष्टाद्वारकत्वं विशेपणं बोध्यम् । गुणत्वेन विभागसिध्यर्थ गुणपदम् । शरीरे कर्मजगुणो वेगः, कालादीनां पक्षसमत्वात् । विप्रतिपन्नमिति । आकाशातिरिक्तमित्यर्थः । विभागत्वमिति । विभागजविभागवृत्तित्वेनान्तिरवारणाय कर्मेति । उद्देश्यसिध्य- र्थम् एकानेकेति । यदप्युभयकर्मजन्यं तदप्येककर्मजन्यमित्यर्थान्तरमिति चेत्-न; एक- मात्रेत्युक्ते यदप्येकेन कर्मणा जन्यं तदपि मूर्तकर्मणा जन्यत एवेति बाध इति तद्वारणाय उद्देश्यसिद्धये या समवायीति । ताशसंयोगवृत्तित्वेन दृष्टान्तसिद्धिः । विभागजन्य- तावच्छेदकजातौ व्यभिचारवारणाय गुणत्वव्याप्यजात्यव्याप्यत्वं विशेपणं चोध्यम् । एवमुत्तरत्रापि क्रियाजन्यविभागपत्तिजाती व्यभिचारवारणाय गुणत्वव्याप्यजात्यव्या- प्यत्वं विशेषणं वोध्यम् । विभागत्वमित्यपि क्रियासमवायिकारणकभिन्नवृत्तित्वं साध्यम् । तीन्यदेवासमयायिकारणमित्यत आह-विभागजविभागसिद्विस्त्विति । परि- शेपात् कर्माजन्यविभागैस्स विभागातिरिक्तासमवायिकारणाजन्यत्यादित्यर्थः । अन्यथा कथं वंशदलयोः परस्परविभागे तयोराकाशेन विभागस्यात् । क्रियाया वंशदलद्वयवि- भागजननेनैवोपक्षीणत्वात् । कर्मणः सजातीयकार्यजनने विरम्पच्यापाराभावाच विशेष- तोऽनुमानमाह-विभागत्वमिति । कर्मजन्यतावच्छेदकभिन्न विभागवृत्तिजातित्वा- दित्यर्थः । विभागजशब्दवृत्तित्वेन दृष्टान्तसिद्धिः । असमायिपदमुद्देश्यसिद्धये । केचित्तु धनुर्गुणविभागजन्यचाणकर्मणि सत्तासन्चात् दृष्टान्तसिद्धिरित्याहुः, तन्नः कर्मणो विभागा- समवायिकारणकत्वस्य राधान्तविरुद्धत्वात् , अयौक्तिकत्वाचेति दिछ । किन्तु नोदना तत्रासमयायिकारणमिति पर्यालोचनीयम् । अपरविशेपणप्रयोजनं स्फुटम् । १तु इति नाति क, ग, घ, मु पुस्तषु २ चानुमानमिति क, प्रमाणमिति मु. ३ असाधार• जायासाधारणेति च. ४ निवाति नाति घ पुस्तके. ५ मष्याधिष्टानादाविति च. ६संयोगेन्यारम्य पशिद्वय माम्ति , पुम्न के. ७ समतेति च.८ पूर्वकर्मणेति च. ९ विमागमारेति च,१०,११ पदमिद नानि च पुस्तके. १२ सचादिति नास्ति च पुस्तके.
निरूपणम्] टीकात्रयोपता [अ. टी.] रूपादिगुणब्युदासाथ संयोगविरोधीत्युक्तम् । संयोगप्रध्वंसादिव्युदासाय गुणपदम् । कर्मजपदं संयोगजसंयोगांधारत्वेन सिद्धसाधनतानिरासार्थम् । शरीरस्य संयो- गातिरिक्तः कर्मजो गुणो वेगः । कर्म असमयायिकारणं यस्येति विग्रहः । सिद्धसाधनताव्यव- च्छेदार्थम् एकानेकपदम् । रूपत्वादौ व्यभिचारवारणाय विभागजातित्वादित्युक्तम् । कथं तर्हि विभागजविमागसिद्धिरित्यत आह-विभागजेति विशदलयोमिथो विभागे सैति नमसापि तयोविभागो जायते, स न वंशदलक्रियाजन्यः, तस्या दलविभागजननेनैवोपक्षीण- खात्, परिशेपाद्विमागजन्य इत्यर्थः । साक्षात्ममाणमाह-विभागत्वमिति । धनुर्गुण- विमागजन्यवाणकर्मणि सत्तावर्तिदृष्टान्तलामः। हवा. टी.] संयोगेति । रूपेऽतिव्याप्तिपरिहाराय विरोधीति । सुखेऽतिव्याप्तिपरिहाराय संयोगेति । संयोगाभावेऽतिव्याप्तिपरिहाराय गुण इति । यत्तु संयोगधंस एव विभाग इति मतम् तन्न आश्रयध्वंसात्संयोगध्वंसे विभागयुध्यभावाद्वर्तमानयोसंयोगनाशस्य विभाग सापधित्वेन व्यवहारवाधप्रसङ्गात् । अतोऽतिरिक्त एव विभाग इत्याशयास्तत्र प्रमाणमाह-आकाश इति । द्रव्यत्वेन सिद्धसाधनतापरिहाराय गुण इति । संख्यया सिद्धसाधनतापरिहाराय कर्मजेति । संयोगेन सिद्धसाधनलापरिहाराय संयोगातिरिक्तति । संयोगातिरिक्तकमजक्रियाधारत्वसाधने बाधः, तन्निरासाय गुणाधार इति । दृष्टान्ते वेगेन सिद्धिः । विभागत्वमिति । विभागासम- चायिकारणकविभागवृत्तित्वेन सिद्धसाधनतापरिहाराय एकेति। एकगतमनेकगतं कर्म असम- चायिकारणं यस्यति । यहा एककर्मासमवायिकारणवृत्ति । अनेन कमीसमवायिकारणवृत्तीति साध्यभेदेन प्रमाणद्वयं द्रष्टव्यम् । दृष्टान्ते च संयोगादिवृत्तित्वेन सिद्धिः । विभागत्वमिति । कर्मजवृत्तित्वेन सिद्धसाधनतापरिहाराय प्रतिज्ञायाम् अकारः। संयोगवेन सिद्धसाधनतापरिहा- राय विभागेति 1 रूपादिवृत्तित्वेन दृष्टान्तसिद्धिः । साक्षाप्रमाणे च विभागासमवायिकारणशब्द- वृत्तिलेन दृष्टान्तसिद्धिः। (परत्वापरत्वयोर्लक्षणं प्रमाणञ्च ) परव्यवहारे यद्विशेषणतया निमित्तं तत्परत्वम् । अपरव्यवहारे यद्विशेषणतया निमित्तं तदपरत्वम् । तत्र प्रमाणम्-घटोऽस्मदादिबुदि- जैकद्रव्यजातीयवान्, अनेकविशेपगुणसमवापिकारणत्वात्, आत्मयत् । विप्रतिपन्नं परत्यादिसंयोगासमयाधिकारणकम् , असदादिबुद्धिजैकद्रव्य- त्यात्, सुखादिवदिति परिशेपात् कालपिण्डसंयोगासमवापिकारणत्वं सिद्धमनयोः। स्यवदार्थमिनिज, ट. २संयोगगुति 2. र सवाति नानि जर इमम्पो:. .मम. सोऽपीति . ५पारिशेप्यदिति R. ६ रोरिति ज, ट. • पारिरीयाविपदपारपोसः पाठः, प्रमाण.८ प्रमाणमबरी (गुण- [च. टी.1 परेति । ईश्वरज्ञानादायतिव्याप्तिमझाय विशेपणतयेति । व्यवहार्यसम- वायितयेत्यर्थः । द्वयादिव्यवहारकारणे द्वित्वादावतिव्याप्तिधारणाय परेति । परंप्रति परत्वं न कारणम् इत्यसम्भववारणाय व्यवहार इति । व्यवहारोज्न ज्ञानम् । शब्दादिप्रयो. गरूपस्य तस्य विषयाजन्यत्वात् । यहा निमित्तं प्रयोजकम् । अत एव नातीन्द्रियपरत्वा- दावव्याप्तिः । यद्वा विशेषणतयाऽसाधारणतयेत्यर्थः । घट इति । रूपादिनार्थान्तर- वारणाय बुद्धिजेति । ईश्वरबुद्धिजेन तेनैवार्थान्तरवारणाय अस्मदादीति' । द्वित्वा. दिनार्थान्तरवारणाय एकद्रव्येति । ईश्वरबुद्धिजनितपरत्वादिकसाध्ये चिपये वेशयित(3) जातीयेति । काले व्यभिचारवारणाय विशेपेति । आकाशे वद्वारणाय अनेकेति । कालादौ व्यभिचारयारणाय समवायीति । आत्मन्यम्मदादिबुद्धिजन्यमुखादिमत्त्वेन साध्यसिद्धिः । दिकालजन्यत्वेऽनुमानमाह-विप्रतिपन्नमिति । अदृष्टवदात्मसंयोगे- नार्थान्तरवारणाय असमवायीति । यथादृष्टचदात्मसंयोगो नासमवायिकारणं तथा अपश्चितमन्यत्र । उद्देश्यसिद्धये संयोगेति । विप्रतिपन्नलं जातिविशेपवैशिष्ट्यम् , न तु दिक्कृतभिन्नत्वम् , प्रतियोग्यप्रसिद्धः । परिमाणे व्यभिचारवारणाय बुद्धिजेति । तथापि तत्रैव व्यभिचारवारणाय अस्मदादीति । यद्यप्यदृष्टद्वारास्मदादियुद्धिजत्वमस्ति, तथापि अदृष्टाद्वारकेति विशेषणीयम् । द्वित्वादी व्यभिचारवारणाय एकद्रव्येति । एकमात्रनिष्ठत्वादित्यर्थः । दिक्कालयोस्तादृशासमयायिकारणकत्वेन करणत्वं सिद्धमित्य- भिप्रायेणाह-परिशेपादिति । यथाकाशादिसंयोगो नासमवायिकारणं परत्वापरत्वयोः, तथा विशदमन्यत्र । [अ. टी.] परापरव्यवहारकारणेश्वरप्रयत्नादावतिव्याप्तिनिरासाथ विशेपणतयेत्युक्तम् । विशेषणतया व्यवहार्यनिमित्त॑तयेत्यर्थः । अस्मदादिबुद्धिजन्यं यदेकस्मिन्नेव वर्तते तजाती- यवान् घट इति प्रतिज्ञा । घटस्यैकद्रव्यवृत्तिरूपादिजातीयत्वेन सिद्धसाधनता स्यादत उक्तम् बुद्धिजेति। तथापीश्वरबुद्धिजरूपादिमत्त्वेनोक्तदोपः स्यादतः अस्मदादिग्रहणम् ।' कालादौ व्यभिचारवारणाय विशेषगुणपदम् । आकाशे तन्निरासाय अनेकपदम् । आत्म- न्यस्मदादिबुद्धिजं सुखादि, तथापि तयोर्दिकालजले कि मानमित्याह-विप्रतिपन्नमिति । परत्वादेरसमवायिकारणान्तरानङ्गीकाराद्वाधव्युदासा संयोगपदम् । एकद्रव्ये रूपादौ च्यमिचारवारणायें अस्मदादिवुद्धिजग्रहणम् । सुखादिकमात्ममनस्संयोगासमवायिकारण- कम् । तत्र द्रव्यान्तरसंयोगस्य परत्वादिना सहान्वयव्यतिरेकयोरमावेने दिकालसंयोगस्य च तद्भावात्परिशेषात् स एव कारणमित्याह-पारिशेप्यादिति । पिण्डः शरीरं, दिवस- मासादिना परत्वापरत्वे कालसंयोगपूर्वके । यद्यपि दिवसादिशब्दवाच्याः परिस्पन्दा आदि- , वारणायेति घ. २ इत मारभ्य पतिद्वयं नाति छ पुस्तके. ३ मिलत्वे इति घ. ४ सत्तु इति छ. ५ मिमितत्वमिति छ. ६ शादीति मातिच. ७ गुणतयेति ह. लष्टतयेति ज,. घर्तत इति ज, ट. १० जातीयवस्वेनेति ज, ८, ११ गुण इति नास्ति 2. १२ जन्यत्व इति ज. १३ रूप. स्वादाविति द. १४ धारणार्थमिति ज, र. १५ मभावादिति ज, र. १६भत्र ज्ञ पुस्तके पड्डयो व्यत्यस्ता ९ च्ये निरूपणम्] टीकात्रयोपेता त्यसमवेताः, तथापि आदित्यसंयुक्तकालस पिण्डसंयोगस्तदुपनायकत्वात् । पिण्डे परत्वा- दिहेतुस्तया । यद्यपि परिमाणदण्डादिसंयोगा देशविशेषसमवेताः, तथापि दिक्संयोगो देश- पिण्डाभ्यामविशिष्ट इति पिण्डदेशसंयोगोपनायकत्वेन परत्लादिहेतुः । तदुक्तम्-'क्रियोप- नायकः कालः संयोगोपनायकत्वात्' इति । [वा. टी.] परेति । अयं पर इति व्यवहारे यद्यवहार्यव्यावकत्वेन निमित्तं तत्परत्वमिति । व्यवहार्यनिवृत्तये विशेपणतयेति । एवमपरत्वस्यापि । घट इति । संयोगसजातीयत्वेन सिद्ध- साधनतापरिहाराय एकद्रव्येति । एकं द्रव्यमाश्रयत्वेन यस्येति रूपसजातीयत्वेन सिद्धसाधनता- परिहाराय बुद्धिजेति । ईशबुद्धिजेन सिद्धसाधनतापरिहाराय अस्मदादीति । जातीयपदन्तु नार्थवत् । सामान्येऽतिव्यातिपरिहाराय समवायीति । दिइयतिव्याप्तिपरिहाराय विशेषगुणेति । आकाशनिवृत्तये अनेकेति । सुखादिना दृष्टान्तलामः । सिद्धसाधनतापरिहाराय संयोगेति । रूपादिनिवृत्तये बुद्धिजेति । ईशधुद्धिजे तस्मिन् अतिव्यातिपरिहाराय अस्मदादीति । (बुद्धलक्षणं तद्विभागश्च) अर्थायग्रहो बुद्धिः। सा द्वेधा-नित्यानित्यभेदात् । पूर्वी भगवतो महेश्वरस्य । सा परीक्षिता आत्मप्रकरणे । उत्तरा अनीशानां मानस- मत्यक्षसिद्धा। (अविद्यात्मिका बुद्धिः) सा द्वेधा-अविद्याविद्याभेदात् । योधिता अविद्या । सा दूधा-निश्च- यानिश्चयभेदात् । तत्र पूर्वो विपर्ययः । तत्र प्रमाणम्-विवादास्पदं रजत- धीविषयः, रजतेच्छुप्रवृत्तिविपयत्वात् , हगतरजतपत् । उत्तरःसंशयः । इदम् आहोखिन्नम् इति व्यवहारो व्यवहार्यज्ञानपूर्वका, व्यवहारत्यात्, सम्प्रतिपनवदिति तत्र प्रमाणम् । अनध्यपसायस्येहान्तर्भावः, विपर्यये । [व. टी.1 अर्थति। यद्यप्यावग्रहो घुद्धिः तदा पर्यायत्वान्न लक्षणवाक्यता, तथाप्यन्या- प्रवणार्थनिष्ठविषयताप्रतियोगित्वं बुद्धित्वम्, अन्यानधीनविषयत्वमिति यावत् । द्रव्या- दयस्तु परतत्रविषयत्ववन्त इति नातिव्याप्तिः । यद्वा अर्थावग्रह इत्यनेन ज्ञानपदवाच्यत्वं लक्ष्यतावच्छेदकत्वमुक्तम् । युद्धिरित्यनेन बुद्धित्वं लक्षणम् , अर्धपदन्तु ज्ञानातिरिक्ता- योधनपरम् । बाधितेति । याधितार्थत्यर्थः । अनिश्चयः संगैयः। पूर्वोत्राधिताओं पदमिदं नाति र पुनके. २ इत मारभ्य तदुतमित्यतः पूर्वो मागो नाखि पुमो ५ पदमिई नास्ति प पुसके. ४ रियाविग्रेति क, ग, घ, निस्सारम्य साधा एवं नास्ति पुन. ५ राशिका ६ विवादास्यासितमिति ग, घ, पिवादपद रजवपीपदमितिक, रा, रजतादिथिलि ग, ८ सत्पाजतेति रा, मु. ९ दमिति ग, प. 1.प्यपहारपहिनिक गदपरिग्यानि घ. .२ इत्य इस्पधिप उसके. धीरिति क.
" . प्रमाणमसरी [गुण- निश्चयः। विवादपदं शुक्त्यादिप्रवृत्तिजनकरजतत्यप्रकारक्यानविषयत्वं साध्यम् । तेन सर्व रजतमित्याहार्यज्ञानेन नार्थान्तरम् । सर्व रजतमिति वारसिको भ्रमः सम्भवत्येव, न; तत्सम्भवेऽपि तज्ज्ञानं न प्रवर्तकं, रजतत्वेन यस्य कय ज्ञानस्य प्राप्सत्यात् । एवञ्च या व्यक्तिः न प्रवर्तकरजतयुद्धिविपया, तत्र व्यभिचारचारणाय रजतेच्छुपदम् । नच रजतेच्छाविषयत्वमेव हेतुरस्तु, यथोक्तविशेप्यविशेषणमाये वैयाभावात् । ने शुक्तिरजतेति समूहालम्बनमादायवार्थान्तरं प्रवृत्तिविषयांशे रजतत्ववैशिष्टयावगाहिज्ञान- विषयत्वस्य साध्यत्वात् । इदमाहोखिन्नैवमिति व्यवहारः पक्षा, व्यवहार्यज्ञानमागच्छत्य- क्षधर्मतावलादेकधर्मिगततया विरुद्धनानाधर्मावगाहि सिध्यति । तदेव संशयः । ईश्व- रज्ञानपूर्वकत्वेनार्थान्तरवारणाय व्यवहार्येति । न हीश्वरज्ञानं विरुद्धकोटिरूपव्यवहा- यविषयक, तस्स भ्रान्तस्यापत्तेः । व्यवहार्यपूर्वकत्वमाने साध्ये याधः, व्यवहार्यस्य व्यव- हाराजनकत्वात् , उद्देश्यासिद्धिश्चेत्यत आह-ज्ञानेति । घटादिव्यवहारे सिद्धसाधनमतः आहोखिन्नैवमिति । इहेति । उत्कटकोटिकसंशयान्तर्भाव इत्यर्थः । किंसंज्ञकोऽयं वृक्ष इत्याधनध्यवसायस्य बाधितसंज्ञाविषयत्वांशे भ्रमत्वमिति बोध्यम् । स्वमस्येति । कस्यचिद्विरुद्धोभयकोटिकस्य स्वमस्य संशयेऽन्तीय इति केचित् । परे तु समत्वं निश्व- यत्वव्याप्यमित्याहुः । स्वमत्वसंशयत्वे मानसत्यच्याप्ये । एवं संशयत्वं चाक्षुपानुमित्या. दावपीति केचित् । [अ. टी.] अर्थस्य शब्दादेरवग्रहः स्फुरणं बुद्धिः । ज्ञानातिरिक्तार्थसङ्ग्रहाय अर्थपदम् । वाधिता अपहतविषया बुद्धिरविद्या । विवादपदं शुक्त्यादि । घटार्थिनः प्रवृत्ति- विपये रजतबुध्यनालम्बने व्यभिचारवारणाय रजतादिपदम् । नन्वनध्यवसायः स्वपश्चा- विद्यामेदौ किमिति नोच्येते ? तबाह-अनध्यवसायश्चेति । किंसंज्ञकोऽयं वृक्ष इत्याधनध्यवसायस्यानिश्चयात्मकत्वेऽपि बाधाभावात् कथमविद्यात्मकत्वमिति चेदुच्यते- संज्ञाविशेषस्यानिश्चयदशायां देशादिभेदेनानेकधा स्फुरतो व्यवस्थितैकसंज्ञानिश्चयेन कोट्य- न्तरस्यापहारादविद्यात्वं न दुप्यति । स्वप्नस्य जाग्रबोधेन वाधादविद्यालं स्फुटमेव । न च निद्रादुष्टमनोजन्यज्ञानं स्वप्न इति लक्षणं भेदकम् , प्रतीन्द्रियदोपभेदादविद्याभेदप्रसङ्गात् । [वा. टी.] अर्थेति । अवग्रहणम् ग्रहः, ज्ञानमिति यावत् । अर्थशून्यवदिति निरासाय अर्थ- पदम् । मानसेति । जानामीति मनोजन्यापरोक्षप्रत्यये सिद्ध इत्यर्थः । पाधिता अपहतविप येत्यर्थः । यन्मतम्--इदं रजतमिति पुरोवर्तिग्रहणदेशान्तरस्थस्मरणात्मकं ज्ञानद्वयम् (न!) विशिष्टमेकं विपर्ययाख्यं ज्ञानम् , प्रमाणाभावादिति तद्रूपयति-विवादपदमिति । शुक्त्यादी- त्यर्थः । घटेऽतिव्याप्तिपरिहाराय रजतेच्छिति । अतो यदरजते रजतबुद्धिस्सैव विपर्यय इति । इदमिति पुरोवर्ति, एवमाहोखिदिति स्थाणुरस्यान्नेति, स्थाणोरन्यः पुरुपो वेत्यर्थः । व्यवहार्यो भागे इति च. २ न चैतदिति समूहति छ. ३ विषयवसाध्येति च. ४ इदमाहोखिदिति ५ संशयं तत्रवेनि छ. ६ मानसत्वे इति उ. ७ भतद्गतेति ८. विवादास्पदमिति झ. ९ घटादीनि ट. १० रजतादित्सुपदामिति ज, ट. ११ यस्येति ज, . १२ जानत्वे याध इति ट.
निरूपणम्] टीकापयोपेता स्थाणुपुरुपौ । अतो यदनेककोटियोतकमानश्चयात्मकं ज्ञानं स एव संशयः । अनवगतसंज्ञकोऽन- वधारणरूपोऽनुभवोऽनध्यवराय उस्कटैक्कोटिकस्सन्देह ऊहः । एतयोरनवधारणत्याविशेपायुक्त- संशयानतिक्रमः, मिथ्यावधारणामकत्वावमस्य विपर्ययानतिक्रमः । * (विद्यात्मिका बुद्धिः) अबाधिता धीर्विया । सा द्वेधा-प्रमितिरन्यथा चेति । सम्यगनु- भूतिः प्रमितिः । सा द्वेधा-प्रत्यक्षा इतरा चेति । तत्रापरोक्षा सा प्रत्यक्षा, परोक्षासेतरा चेति । पूर्वा द्वेधा-कृष्टधर्मजेतरभेदात् । पूर्वा योगिप्रत्यक्षा। तत्र प्रमाणम्-धर्मः कस्यचित्प्रत्यक्षः, प्रमेयत्वात्, वासोवदितियस्य स प्रत्यक्षः स योगी। उत्तरा अमदादीनां प्रत्यक्षा। (सविकल्पकबुद्धिा) सा प्रकारान्तरेण वधा-सविकल्पकनिर्विकल्पकभेदात् । विशिष्ट- विषयं सविकल्पकम् । तत्र प्रमाणम्-सविकल्पिका बुद्धिः प्रेमा, स्मृति- व्यतिरिक्तत्वे सति अबाधितबुद्धित्वात् , निर्विकल्पकवत् इति । [4. टी. अन्यथाचेति । स्मृतिरित्यर्थः । धर्म इति । वाधवारणाय कस्यचि. दिति । सामान्यज्ञानमत्यासत्यजन्मजन्यप्रत्यक्षविपयत्वं साध्यम् । अनुमित्यादिमतास्मः दीदिनार्थान्तरवारणाय प्रत्यक्षत्वमुक्तम् । विषयत्वादित्येव हेतुः । आकाशादौ न व्यभि- चारतस्य पक्षसमत्वात् । विशिष्टेति । विशिष्टविषयकमित्यर्थः । तेन विशिष्टपदार्थ विशेषणादिघटितत्वेन न व्यर्थता । तत्र प्रमाणमिति । अत्र यथार्यानुभवत्वं साध्यम् । स्मृतौ व्यभिचारवारणाय सत्यन्तम् । भ्रमे व्यभिचारवारणाय अबाधितेति । अवाधि- तार्थकबुद्धित्वादित्यर्थः । न त्ववाधिता चासौ बुद्धिश्वेत्यर्थः । श्रमस्यापि स्वरूपेणावा- धिततया व्यभिचारापत्तेः । इच्छादौ व्यभिचारवारणाय धुद्धित्वादिति । न च साध्य समतया हेत्वसिद्धिः, संवादिप्रवृत्तिजनकत्वादिना हेतुसिद्धः । न च साध्यवैशिष्टयम् , प्रकृते हेतुसाध्यपोभिन्नरूपत्वात् । [अ. टी.] अन्यथा चेति । स्मृतिरित्यर्थः । कस्तहिं योगीत्यत आह-यस्येति गौरः कुण्डली ब्राह्मणोऽयं गच्छतीत्यादि सविकल्पकम् कथमस प्रमाणत्वम् ? तत्राह-तत्म- माणमिति । विपर्यासादौ व्यभिचारवारणार्थमयाधितत्वादित्युक्तम् । अवाधितार्थे व्यमि- चारवारणाय बुद्धिपदम् । अबाधितबुद्धिवं स्मृतौ व्यभिचरतीति स्मृतिव्यतिरिक्तत्वे सतीत्युक्तम् । । सेनि नाति मुद्रितपुस्तके. २ पूर्यमिति घ. ३ प्रवक्षमिति क, रा, ग, घ. पदमिर नादि क, स. पुस्तकयोः, ५ दासीदिनि के, सामान्यवदिनि ग. सरत्या यस सति ग, घ. प्रत्यक्ष- ८ पदअयं नास्तिक, घ, पुसक्योः, ममेत्यनन्तरं ज्ञानं प्रमाणमित्यधिक ग पुनले ९ प्रत्यक्षमित्यधिक मु. १० ममदादीनामिति छ. "म्पादारिति ए. १२ सिद्धिरिनि प. मित्यधिक मु.
{गुण प्रमाणमसरी [ था. टी.] इन्द्रियंजत्यमपरोक्षशब्दार्थः । धर्म इति । प्रत्यक्षत्वचानेन्द्रियजन्यज्ञानविषयत्वम् । तेन नेश्वरेण सिद्धसाधनता । निर्विकल्पकनिवृत्तये विशिष्टेति । विपर्ययनिवृत्तये अवाधितेति । स्मृतिनिवृत्तये स्मृतीति । सविकल्पकलादेवास्य प्राप्त विपर्ययवदप्रामाण्यमपाकरोति-तत्प्रमा- णमिति । कुत इत्यत आह-सविकल्पकेति । सविकल्पिका बुद्धिरविसंवादिनी घटादिबुद्धिः । तेन न भागासिद्धिरिति । (निर्विकल्पकबुद्धिः) वस्तुस्वरूपमात्रावभासो निर्विकल्पकम् । ज्ञानानां सविकल्पकत्वा- दृष्टान्तासिद्धिरिति चेत्-न; प्रमाणोपपत्तेः । सर्वे विकल्पा ज्ञानव्यावृत्त- जातिमन्तः, जातिमत्वात् , पदवत् । (ब. टी.] यस्त्विति । यद्यपि मात्रपदेनावस्तु न व्यवच्छेचं, तस्याप्रतीतेः। न च वैशिष्ट्यं व्यावत्यं, तस्यापि वस्तुत्वात् , व्यक्तित्वाच; तथापि वैशिष्यानवगाहित्वं निर्वि- कल्पकलक्षणम् । सर्व इति । अनुमिती यत्किश्चिज्ज्ञानव्यावृत्तजातिरनुमितिस्वमित्य- र्थान्तरवारणाय सर्व इति। ज्ञानव्यावृत्ता जातिः सविकल्पकत्वं सेत्स्सतीति भावः । न च निर्विकल्पकसविकल्पकरूपनरसिंहाकारज्ञाने सविकल्पकत्वस्याच्याप्यवृत्तित्वं प्रसङ्गः) । यद्वा घटोऽयमित्यादिशानस वैशिष्टवावगाहितया सर्वाशे सविकल्पकत्वस्वीकारात् । यद्वा जातिपदं धर्ममात्रपरम् । घटादिव्यावृत्तज्ञानत्वादिजात्यर्थान्तरवारणाय ज्ञानेति । ज्ञान- निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगिधर्मवन्तः । स सविकल्पका इति समुदापार्थः । केचिनु ज्ञान गोचरजातिमत्वं साध्यमित्याहुः । तत्र जातिगोचरज्ञानस्य सविकल्पस्यैव साध्यापत्तेः। धर्मवत्वसाध्यपक्षे धर्मवत्वं हेतुः, जातिमलसाध्यपक्षे जातिमत्वं हेतुः । सविकल्पत्वं न जातिरित्येव पक्षः । अत एव सैद्धान्तिके ध्वनिनिर्विकल्पकसिद्धौ प्रत्यक्षत्वसविकल्पक स्खयोर्न साकर्यम् । अ. टी.] लक्षिते निर्विकल्पके प्रमाणामावेन सर्वज्ञानानां सविकल्पकत्वे दृष्टान्ताभाव इति शकते-ज्ञानानामिति । प्रमाणाभावोऽसिद्ध इति प्रत्याह-नेति। विकल्पाः सविकल्प- ज्ञानानि । ज्ञानव्यावृत्ता या जातिस्तद्वन्त इति साध्यम् , तच ज्ञानार्थयोीतिगोचरम् । प्रत्यक्ष ज्ञानं निर्विकल्पकम् । उक्तञ्च भट्टपादैरपि- मुद्गमापतिलादौ च यत्र भेदो न गृह्यते । तत्रैकवुद्धिनिह्या जातिरिन्द्रियगोचरा ॥ इति । आपातजस्य वस्तुखरूपमात्रप्रत्ययस्य प्राणिमात्र प्रत्यक्षवाय । यद्वा ज्ञानव्यावृत्ताः कस्मि- विज्ञाने वर्तमाना जातिस्तद्वन्तो विकल्या इति साध्यम् । सत्तादिमत्वेन सिद्धसाधनतानि- रासार्थ ज्ञानव्यावृत्तपदम् । १ घस्त्विनि नास्ति ग, घ पुस्तकयोः. २ सविकल्पवेति मास्त्रि छ पुस्तके. ३ सविकल्पकस्येति प. १ सिध्यापत्तेरिति ध. ५ हेतुरिति नास्ति च, ६ श्लोकचार्दिके. ७ घ्युदासायमिति ज, ट.
निरूपणम् टीकात्रयोपेता [वा. टी.] आक्षिपति-ज्ञानानामिति । तथाचाह- न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यदशब्दानुगमाइते। अनुविद्धमित्र ज्ञानं सर्वशब्देन जन्यते ॥ इति । तन्निराकरोति-सर्व इति । विकल्पाः सविकल्पज्ञानानि । कुतश्विद्यावृत्ता या जातिस्तद्वन्तीत्यर्थः । गुणवेन सिद्धसाधनलापरिहाराय ज्ञानेति । तत्र ज्ञानवादीनामनुवृत्तत्ववादिकल्पकत्वमेव ब्यावृत्तं वाच्यम् । ततो व्यावृत्तं तनिर्विकल्पकामित्यर्थः । पटवादिना दृष्टान्तलामः । तथा चाहुः--- अस्ति ह्यालोचनं ज्ञानं प्रथम निर्विकल्पकम् । वालमूकादिविज्ञानसदर्श शुद्धवस्तुजम् ।। इति । (लैङ्गिकी बुद्धिः, अन्वयव्यतिरेकनिरूपणश्च ) उत्तरा लैङ्गिकी । लिङ्ग पुनः साध्याच्यभिचारित्वे सति पक्षधर्म- तांवत् । तद्वधा भिद्यते-अन्वयव्यतिरेकभेदात् । यस्य साध्येन साहचर्य- नियमस्तदन्वयि । तविधा-सति विपक्षे असति च । पूर्वमन्वयव्यतिरेकि। तद्यथा-निनदोनित्यः, कृतकत्यात्, यदेवं तदेवम् , यथा घंटा, तथा चेदं तस्मात्तथा । यत्पुनरनित्यं न भवति तत्पुनः कृतकमपि न भवति, यथा- काशम्, में चेदं न तथा, तस्मान्न च न तथा । उत्तरं केवलान्वयि । यथा स्थितिस्थापका प्रत्यक्षा, प्रमेयत्वात् , यदेवं तदेवं, यथा पृथिवी, तथा च प्रकृतं, तस्मात्तथा । असति सपक्षे यस्य साध्याभावेनाभावनियमस्तव्य- तिरैकि । सर्व कार्य सर्ववित्कर्टकम् , कार्यत्वात् न यदेवं न तदेवम्, यथा परमाणुः, न चेदं न तथा, तस्मान्न तथेति । व. टी.] उत्तरा परोक्षा । लिङ्गमिति । व्याप्यत्वासिद्धेऽतिव्याप्तिधारणाय प्रकृत- साध्याव्यभिचारित्वमुक्तम् । आश्रयासिद्ध स्वरूपासिद्धे चातिव्याप्तिनिरासाय पक्षधर्म- सावदित्युक्तम् । साध्येनेति । केवलव्यतिरेकिण्यतिव्याप्तिभङ्गाय साध्यनेति । व्यभिचारिण्यतिव्याप्तिभङ्गाय नियमग्रहणम् । असति सपक्ष इति । अन्वयव्यति रेकिण्यतिव्यातिभङ्गाय असति सपक्ष इत्युक्तम् । विरुद्धव्यतिरेकिण्यतिन्याप्तिपारणाय नियमपदम्। सर्वमिति। आकाशादीनां पक्षत्वे वाघधारणाप कार्यमिति । अन्वये दृष्टान्ताभावं बोधयितुं सर्वकार्यस पक्षत्वसूचनाय समिति। किर्मिज्ञानयाधारणायो- द्देश्यसिद्धये च सर्वविदिति । कर्तुत्वेन तत्तिद्धये च करकेति । पक्षधर्म इति क, स्वा, प. २ रप इति क, ग, घ. ३ पुनरिति मास्ति क. ४ मतपेई संसार भवतीति क. ५ साभ्यामाभापति क; साध्यामाचे साधनाभाव इति प. पथा समिति भादाचित्करमादिति मु. नदं तथा तमासति क. ९पारणायेति च. वारणायेति च. ५ उक्तमिति नास्ति घ. १४ प्रहणमिनि ध. १५अवयव पति छ. कप्रिंतिक १.१,१२ प्रमाणमबरी [अ. टी.] उत्तरा परीक्षा प्रमितिः । असिद्धच्युदासार्थ पक्षधर्मापदम् । अनेकान्त- वारणाय साध्येत्यादि । केवलव्यतिरेकिव्युदासाय साध्येनेति पदम् । नित्यत्वसाध्ये- नामूर्तत्वस्य साहचर्यमानं विद्यते, न तु तलिङ्गत्वमतो नियमग्रहणम् । निनदः शब्दः । साध्याभावेऽमावनियमोऽन्वयव्यतिरेकिणोऽप्यस्ति । तेनोक्तम् असति सपक्ष इति । कर्तृमात्रपूर्वकत्वेन सिद्धसाधनताब्युदासाय सर्वविद्वहणम् । [वा. टी. ] लिङ्गं पुनरिति । असिद्धनिवारणाय पक्षधर्मवदिति । अनेकान्तिकनिवारणाय साध्येति । साध्यव्यभिचारित्वञ्च साध्यनिरूप्यन्याप्तिमत्वम् । साध्यव्याप्यत्वमिति यावत् । न च केवलव्यतिरेकिण्यव्याप्तिः, तत्रापि कादाचित्कत्वं सर्वविस्कर्तृकत्वव्याप्य, तदत्यन्ताभावनियतात्यन्ता- माववत्यात्, यद्यदत्यन्तामावनियतात्यन्ताभाववत् तत्तस्य व्याप्यम् । यथा वन्हिमत्वात्यन्तामावनि- यतात्यन्ताभाववभूमवत्वं चन्हिमत्वव्याप्यमिति साध्यव्याप्यत्वानुमानादिति । व्यतिरेकिनिरासाय साध्येति । अनैकान्तिकनिरासाय नियममहणम् । अन्वयव्यतिरेकिनिरासाय अन्वयीति । . , , (हेत्वाभासलक्षणम्, तद्विभागश्च) लिङ्गलक्षणरहिता लिङ्गाभिमानविपया लिङ्गामासाः। ते चासिद्धवि- रुद्धानकान्तिकासाधारणवाधितविपयसत्प्रतिपक्षभेदात् पट्प्रकाराः । पक्षधर्मतयाज्ञातोऽसिद्धः। यथा शब्दो नित्यः, चाक्षुपत्वात् । पक्षविपक्ष- योरेव वर्तमानो विमद्धः। यथा शब्दोऽनित्यः, श्रोत्रग्राह्यत्वात् । पंक्षत्रय- वृत्तिरनक्रान्तिकः। यथा शब्दोऽनिलः, प्रमेयत्वात्। संपैक्षविपक्षव्या- वृत्तः पक्षे वर्तमानोऽसाधारणः। यथा पृथिवी नित्या, गन्धवत्वात् प्रमा- णविरोधी बाधितविषयः कालात्ययापदिष्टः। यथा अनुष्णोऽग्निः, प्रमेय- त्वात् । समवलविरुद्धहेतुद्रयसमावेशः सत्प्रतिपक्षः । यथा शब्दो नित्यः श्रोत्रग्राह्यत्वादित्युक्ते, ने नित्यः, सामान्यवत्वे सत्यसदादिवा:- न्द्रियग्राह्यत्वात् इति पोढा न्यूढः । शेपं भाष्ये। [वि. टी.] लिङ्गलक्षणे व्यावसैलिङ्गाभासदानाय तल्लक्षणमाह-लिङ्गेति । सल्लिङ्गेति- व्याप्तिवारणाय रहिता इत्यन्तम् । प्रत्यक्षाभासादावतिव्याप्तिवारणाय विपया इत्यन्तम् । लिङ्गत्वेन ज्ञानगोचरा इत्यर्थः, न तु भ्रमगोचरा इत्यर्थः। अन्यथा रहितान्तस चैया- पत्तेः। लिङ्गत्वमवाधितासत्प्रतिपक्षव्याप्तपक्षधर्मत्वम् । केचित्तु रहितान्तविपयान्तयो- व्याख्यानव्याख्येयभावं वर्णयन्ति । पक्षधर्मतयेति । व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मतयेत्यर्थः । व्याप्यत्वासिद्धेऽव्याप्तिभङ्गायें व्याप्तिविशिष्टेत्युक्तम् । स्वरूपासिद्ध आश्रयासिद्धे चाव्याप्तिनिरासाय पक्षवृत्तित्यैनाज्ञातेति । केवलव्यतिरेकिण्यतिव्याप्तिनिरासाय च १ मपरा प्रमितिरिति झ. २ पक्षधर्मस्वेनेति श. ३साधनाभाये इति 2. १ त उक्तमिति ना.५ हेतुर्विद्ध इति मु. ६ पक्षविपक्षसपक्षत्रयेति मु. ७. सपत्यारभ्य प्रमेयस्यादित्यन्तो मागो मास्ति ग पुस्तके. ८ पदमिदं नास्ति भ पुस्तके. ९स नेति ग, घ. १० धारणायेति च.
निरूपणम्] टीकारयोपेता पक्षधर्मतयेति । एवञ्च सद्धेतुरपि व्यासिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानदशायामसिद्धः । असद्धे- तुरपि च तज्ज्ञानदशायां नासिद्ध इत्यालोचनीयम् । उदाहरति-शब्द इति । इदं स्वरू- पासिद्धाप्यत्वासिद्धथोदाहरणम् । काञ्चनमयोऽयमद्रिः अग्निमान् , धूमवत्वादित्यादि तु विशेषणाभावादिना आश्रयासिद्धरुदाहरणम् । पक्षविपक्षयोरेवेति । पक्षादिनिक- वृत्तावतिच्याप्तिवारणाय एवेति । वस्तुतस्तु साध्यासहचरितो हेतुविरुद्धः । अत एव जलं गन्धवत् जलत्वादित्यादेस्सङ्ग्रहः । अन्ये तु स्वरूपासिद्ध केवल विपक्षगामिन्यति- घ्याप्तिधारणाय पक्षग्रहणम् । अनैकान्तिकेऽतिच्याप्तिवारणाय एवकार! केवलपक्षे.वर्त- मानेऽतिव्याप्तिधारमाय विपक्षग्रहणम् । जलं गन्धवत् जलवाद इत्यादौ न विरुद्धते- स्याहुः। अन्ये तु पक्षातिरिक्त गृहीतसहचार एव वा विरुद्ध इत्याहुः। पक्षत्रयेति । स्वरू- पासिद्धऽतिव्याप्तिधारणाय पक्षवृत्तित्वमुक्तम् । विपक्षाच्यावृत्तसद्धेतावतिच्यातिवारणाय विपक्षवृत्तित्वमुक्तम् । विरुद्धेऽतिव्याप्तिं वारयितुं सपक्षवृत्तित्वमुक्तम् । सप- क्षेति । विपक्षाच्याहत्ते सद्धतावतिच्याप्तिवारणाय सपक्षव्यावृत्तत्वम् , विपक्षगते. तिव्याप्तिवारणाय विपक्षव्यावृत्तत्वम् । शब्द आकाशगुणः रूपत्वादित्यादिस्वरूपासि; द्धेऽतिव्याप्तिमाय पक्ष इति। न चैवमेवकारवैयर्थ्यम्, तदर्थमेव व्यावृत्तान्तेनोक्त- स्यात् । प्रमाणेति । समयलप्रमाणप्रसिद्धेऽतिव्याप्तिवारणाय प्रमाणेत्युक्तम् । अधिका- माणयोधितसाध्यविपर्ययकत्वं लक्षणं बोध्यम् । प्रमाणाभासविरुद्ध प्रतिव्याप्तिवारणाय प्रमाणेत्युक्तम् । समवलेति । अधिकवलहीनवलयोहेंलोः परस्परं प्रतिक्षेप्यप्रतिक्षेप कभावापन्नयोरतिव्याप्तिवारणाय समयलेति । बलं च्यातिपक्षधर्मता ! यद्यपि वास्तवं समवलत्वं प्रतिरोधेन सम्भवति, तथापि समबलत्वेन ज्ञायमानत्वं विवक्षितम् । नदीतीरे पश्च फलानि सन्ति, नदीतीरे पञ्च फलानि न सन्तीत्यादिविरुदवाक्येऽतिव्यातिवार- णाय हेतुत्वमुक्तम् । हेत्वाभासतानि हकस सत्प्रतिपक्षत्वस्य हेतावेव सीकारान् । अविरुद्धहेतुद्वयेऽतिव्यासिवारणाय विरुद्धति । द्रव्यत्यादिना समाने व्याप्यत्यादिना या समाने हेतापतिव्याप्तिभङ्गाय पलेति। विरुद्धयोहतुवाक्ययोरतिव्याप्तिधारणाय द्वये- त्युक्तम् । घटादौ व्यभिचारधारणाय श्रोति । शब्दत्वं दृष्टान्तः । न च शब्दमागभावे व्यभिचारस, शन्दनित्यत्ववादिमते तदभावात् । न च सन्दिन्थे व्यभिचारः, भावत्य- विशेषणस्य देयत्वात् । न च व्यर्थविशेषणत्वशङ्का, एतद्विशेषणमन्तरेणैव व्यभिचारास्फ- तिदशायां सत्प्रतिपक्षखीकारान् । अत एव सत्प्रतिपक्षस्यानित्यदोपता, व्यभिचारस्मृती तदखीकारात् । जाती व्यभिचारवारणाय सत्यन्तम् । समवेतधर्मत्वं तदर्थः । योगिनाये परमाण्यादी व्यभिचारवारणाय अस्मदादीति । अमदादियदं लौकिकात्यासचिजत्य- इत्यदयोध्यमिति घ. ३ काधनीयोऽयामिनि प. ३ पदमि मालि. ५ भापति च. ५ पदमिदं नास्ति च. ६ विपशासित्यमिनि च. रिपक्षाघारगयमित च. इतः पश्यतुटप नामि घ, ९ धारणायोनि व. १. व्यावृत्तवनेनि च. प्रतिस्दै इनि प. १२ पलप्रमाणेनि प. ३ मप्र. माणेनिध. " हेतु वेति घ. ५ व्यवहार इनिघ. १६ पमिधारानीति प. ० पदाति छ. प्रमाग."
+ प्रमाणमञ्जरी [गुण परम्, विपर्यजत्वावच्छिन्नपरं वा । तेनास्मदादिसामान्यप्रत्यासत्तिजन्यग्रहविषये पर- मावादी न व्यभिचारः। आत्मनि व्यभिचारनिराऊतये बायेति । याह्यशरीरग्राह्य तत्रै व व्यभिचारवारणाय इन्द्रियेति । पोदेति । पहिधा लिङ्गाभासा इत्यर्थः । भाप्ये प्रशस्तपोदभाष्ये। [अ. टी.] लिङ्गलक्षणे व्यवच्छेद्यलिङ्गामासज्ञानीय तलक्षणमाह-लिङ्गलक्षणेति । अभिमानः प्रत्ययविशेपः । सद्धेतुव्यभिचारवारणाय लिङ्गलक्षणरहिता इत्युक्तम् । प्रत्यक्षामासादिव्यवच्छेदाय लिङ्काभिमानविपय इति । अज्ञातोऽसिद्ध इत्युक्ते सप- क्षादिधर्मत्वेनाज्ञातस्याप्यसिद्धलं स्यादत उक्तम् पक्षधर्मतयेति । सद्धेतुव्यभिचार- वारणीय विपक्षग्रहणम् । अनिबंशब्दो विभुत्वादित्यादेः केवलविपक्षगामिनो व्युदासीय पक्षग्रहणम् । अनैकान्तिकव्युदासीय "चैवकारः । अनित्यत्वे शब्दस्य साध्यमाने श्रोत्रपाद्यत्वं विपक्षे शब्दत्वे शब्दे च पक्षे वर्तते, नान्यत्रेति विरुद्धता । विरुद्धादिव्युदा- साय पक्षत्रयग्रहणम् । विरूद्धादिव्युदासीय विपक्षव्यावृत्त इत्युक्तम् । अन्वयव्यति रेकिव्युदासाय सपक्षव्यावृत्त इति । सत्यपि सपक्षे सपक्षाब्यावृत्तत्वस्य विवक्षितत्वान्न केवलव्यतिरेकिण्यतिव्याप्तिः । प्रमाणामासविरोधस्सद्धेतोरपि सम्भवति, ततस्तत्रातिव्याति- निरासार्थ प्रमाणविरोधीत्युक्तम्। बाधितविपय इति कालात्ययापदिष्टसंज्ञा । आत्मा नित्सा, सत्त्वे सत्यकारणकत्वात् निरवयवद्रव्यत्वाचेत्सविरुद्धहेतुसमावेशव्यवच्छेदाय विरुद्ध- पदम् । अनित्यश्शब्दः, कृतकत्वात् ; नित्यशब्दः, निरवयवत्वात् इति विरुद्धहेतुसमा वेशव्यवच्छेदाय समवलग्रहणम् । श्रोत्रग्राह्यलेन नित्यत्वे शब्दत्वं दृष्टान्तः । अनुमान- योगीन्द्रियाम्यां ग्राह्यपरमाण्वादिषु व्यभिचारवारणीय अस्मदादीन्द्रियग्राह्यत्यादि- त्युक्तम् । अस्मदादिमनोग्राह्य आत्मनि व्यभिचारवारणाय घाद्यपदम् । सामान्यादौ तनिरासाय सामान्यवत्वे सतीत्युक्तम् । इति पोढा पड्डियो लिङ्गामास इति पूर्वेणा- न्वयः । असिद्धादिभेदविशेषा दृष्टान्ततदाभासोध किमिति नोच्यन्त इति तत्राह-शेपं भाष्य इति । सङ्ग्रहाधिकारान्नात्र विशेषविस्तारोक्तिः । प्रशस्त्रमाप्याद्युक्तौ साक्षाद्रष्ट- व्येत्यर्थः। [वा. टी.] सपक्षेऽनैकान्तिकनिरासाय विपक्षव्यावृत्त इति । अन्वयव्यतिरेकिनिरासाय सपक्ष इति । भूनित्या शशविषाणोल्लिखितत्वादिस्यत्रातिव्याप्तिपरिहाराय पक्षेति । भूनिया नित्यरूपवत्वादिति भागासिद्धिनिरासाय एवेति । पक्षन्याप्तिश्चैवकारार्थः । पूर्वप्रमाणविरुद्धन - " १जन्यस्येति च. २ निराहतयेति च. ३ पदमिदं नास्ति च. ४ पादेति नास्ति छ. ५ ज्ञापनायेति ६ लिङ्गेनि इति श. ७ म्यारयमिति ज, ट. ८ व्यवच्छेदायेति ज, 2. ९ प्युदासायमिति ज, व्यवच्छेदार्थमिति ८, १० घेति भास्ति ज, ८ पुस्तकयोः. १ प्यच्छेदार्थमिति ज, ट. १२, १३व्यवच्छे- दायेति ज, ट. १४ इत्युक्तमिति ट. १५ कार्यत्वादिति ज, ट. १६ धारणार्थमिनि ज, ट. १७ मादकत्वादिति १८ भनेकान्तप्युदासार्यमिति ज, व्यवच्छेदार्थमिति ट. १९निरासार्थमिति ज, ट. २० भाभासाद. यति ज, ट. .
निरूपणम् टीकामयोपेती बाधितविषयत्वं न सम्भवतीति प्रमाणविरोधाद्वैत्त्वन्तरनिवृत्तये विरुद्धति । व्यूहः प्रपञ्चः । ननु खरूपासिद्धादीनामपि सत्यात्कयमेषामेव प्रदर्शनमत आह-शेपमिति । भाप्यं प्रशस्तपादभा- ध्यम् । सङ्गहाधिकारान्नात्रोक्तिः। (शब्दार्थापत्त्यनुपलब्धीनामन्तवः) वाक्याद्वाक्यार्थधीः, असन्निहतविपयेऽभावधी असतोगेहे जीवतो चहिस्सत्वबुद्धिरनुमितिः, प्रत्यक्षतरममितित्वात्, सम्मतिपत्नयदिति । सन्निहितविषयेऽभावममा प्रत्यक्षा, अनुमित्यन्यममात्वात् , सम्प्रतिपन्न- चदित्यन्तर्भावः। शेपं भाप्ये । [वि. टी. शब्दमनुपलब्धिमर्थापत्तिश्च पराभिमतं मानान्तरमनुमानेऽन्तर्भावयितुमनुमा- नमाह-वाक्यादिति। एतावता पराभिमता शाब्दी बुद्धिः पक्षीकृता । शाब्दयुद्धित्वेन न पक्षता । अनुमानान्तर्भाववादिमते (१) शाब्दत्वजारभावात् । अवो वाक्यजत्राक्पार्थ- गोचरधीत्वेन पक्षता । वाक्यजन्यत्वन्तूभयवादिमतेऽप्यस्ति । तदनुमान विधया शब्द- विधया वेत्यत्र परं चित्रादः। यद्यपि न्यायमते वाक्यत्वं (न)जनकतावच्छेदकं, तथाप्य- न्वयाविरोधिपदत्यादिना वाक्यमेव जनकत्वमिति तत्वम् । यद्यपि नैयायिकमतेऽप्य- नुमानविधया वाक्यजन्या धीरस्त्येवेति तामादाय सिद्धसाधनम्, तथापि विवादपदं ताराधी पक्षः। यद्यपि वाक्यजन्या तत्र न वर्णावगाहिनी श्रोत्रधीः प्रत्यक्षेऽन्वर्भ- वति, तथापि तजन्या वाक्यार्थधीरनुमितावान्तर्भवतीति भावः। पदजनिते पदार्थस्मृति- जनितवाक्यार्थधीः काचित् मानर्सबोधेऽन्तर्भवतीति योध्यम् । असन्निहितेति। अस- निहितेन विशेषणेन सन्निहिताभावयुद्धेः प्रत्यक्षान्तर्भावस्मचितः । अनुपलब्धेरन्त - वोऽभावेति विशेषणेन मासः । अर्थापत्तिमन्तभावयति-असत इति । गृहेऽसतोजीश्तो देवदत्तादेः पहिस्सत्त्वयुद्धिरित्यर्थः । गृहेऽवर्तमानस्य बहिस्सत्वयुद्धिः प्रमा न भवत्यतो गृहासत्वमुक्तम् । तादृशस्य मृतस्य बहिस्सत्वबुद्धिःप्रमा न भवत्यतो जीयत इति। ईदृशस्य गेहयुद्धिः प्रमा न भवत्यतो पहिरिति । यक्षस्सर्वत्र यथार्थानुमको प्रहार प्रत्यक्ष व्यभिचारवारणाय अप्रत्यक्षेति । असिद्धिव्यभिचारयो रणाय इतरेति। विपर्यये व्यभिचारवारणाय प्रमितित्वादिति । साध्यमप्यनुमितिप्रमावमुद्देश्यम् । सम्प्रतिपन्नवत् अनुमितिप्रमादित्यर्थः । असनिहितविशेषणेन सूचितमनुमानमाह- सन्निहितेति । अभावविपर्यये वाधवारणाय प्रमेति। सनिकांसोभयवादिमतेऽभाव- ज्ञानजनकत्वेऽपि खरूपसदनुपलब्धिजप्रमापक्षः । अर्थजन्यत्वमात्रे साध्येऽर्थान्तरमतः, । सस्येति नाति क पुलके, सरवदिति ग, प. २ मप्रत्यति बलदेवपा प्रत्यक्षजेतिक, ग, प.४ पास्यचन्यति च. ५ तजन्यधी/स्वार्थपीरिति घ. ५ सोधेपोति ध, पामि मातिध. ८त भारम्य अत इत्यस्तो भागो नास्ति । पुख .
प्रमाणमअरी प्रत्यक्षत्वं साधितम् । अनुमिती व्यभिचारबारणाय अनुमितीति । विपर्यये व्यभिचार- वारणाय प्रमितित्वम् ।। . [म. टी.] तथापि परोक्षा प्रमितिलनिक्येवेति भवतां नियमो न सम्भवति शब्दादिप्रमिति- सम्भवादित्यत आह-वाक्यादिति । असन्निहितविपये प्रत्यक्षागोचरेत्यर्थः । जीवतो गृहे चासतो वहिस्सत्वबुद्धिरित्यापत्तिमपि पक्षीकरोति-असत इति । प्रत्यक्षामिती व्यभिचा- वारणाय प्रत्यक्षतरपदम् । ननु यद्यप्यागमार्थापत्योरनुमानेऽन्तर्भावोऽगावस्य पुनस्सन्निहित- विषय इह भूतले घयभाव इति प्रामाण्याङ्गीकारात्कथमनुमानेऽन्तर्भाव इत्यत आह-सन्नि- हितविपयेति । अनुमिती व्यभिचारव्युदासार्थं तदन्यपदम् । सम्पतिपन्नवत् प्रत्यक्ष- प्रमावदित्यर्थः । तथापि प्रत्यक्षानुमाने द्वे एव प्रमाणे कथम् ? उपमानादिसम्भवादित्यत आह- शेपं भाप्य इति । प्रत्यक्षतरप्रमितित्वमनुमानान्तर्भावगमकमुपमित्यादौ यद्यपि तुल्यम् , तथाप्यधिकमन्यत्र द्रष्टव्यमिति भावः । एवं विद्यायाः अमितिलक्षणो भेदः अपश्चितः । 1 [वा. टी.] ननु शाब्यादिप्रमितीनामपि सम्भवात् वैविध्यमसङ्गतमत आह-वाक्यादिति । • प्रत्यक्षप्रमानिवृत्तये प्रत्यक्षेति । अयमाशयः-वाक्यं हि स्वार्थ संसर्ग(मर्यादया ?) बोधयल्लिङ्गखरूपे- णैवानुसन्धीयमानमविनाभाववलेनैव बोधयति । तथाहि-देवदत्त गामभ्यानयेत्यत्रैतानि पदानि खस्मारितार्थसंसर्गज्ञानपूर्वकाणि, विशिष्ट पदत्वात् , सम्प्रतिपन्नवदिति लिङ्गरूपेणावगतेन वाक्येन संस. गंवोधः क्रियत इति युक्तं शब्दजन्यप्रमितेरनुमितित्वम् । अर्थापत्तिरप्यनुपपद्यमानार्थदर्शनादुपपा- दके बुद्धिः, साध्यनुमानमेवाविनाभावसम्भवात् । तद्यथा विमतो देवदत्तः बहिस्सन् (जात्रवाहे ! जीवन् गृहे) असत्वात् यदेवं तदेवं यथाहमिति युक्तं तत्प्रमितेरप्यनुमितित्वम् । अनुपलब्धि- जन्यया प्रमया त्रैविध्यं परिहरति-सन्निहितेति । प्रत्यक्षर्मिप्रतियोगिकामावविषयेति यावत् । अनुमित्यन्येति । न चेन्द्रियाभावयोस्सम्बन्धामावादनध्यक्षत्वमिति वाच्यम् । पञ्चविधसम्बन्धान्य तमसम्बन्धसम्बद्धपदार्थविशेषणविशेष्यभावत्वसम्भवादिति । समाधभावस्वागमादिनेति तथाप्युप- मानसम्मवान्न द्वैविध्योपपत्तिरत आह-शेपमिति । अतिदेशवाक्यार्थ (स्मणाचतः ! स्मरणाच) पुंसो यद्गोपिण्डे गोसदृशोऽयमिति ज्ञानं तत्प्रत्यक्षमेव नोपमानम् । संज्ञासंक्षिप्रमितिस्तु वाक्यफल- मिति सूक्तं वैविध्यम् । (स्मृतिनिरूपणम्) उत्तरा स्मृतिः। सा अप्रमा, स्वविपये प्रत्यक्षानुमानान्यत्वात् इति सिद्धा धुंद्विः। [ब. टी.] उत्तरा अविवेत्यर्थः । यद्यपि व्यधिकरणप्रकारकत्यरूपमविद्यात्वं सर्वत्र स्मृतौ न सम्भवति, यथार्थानुभवजनितस्मृतयथार्थत्यात् , तथाप्यनुभवत्यराहित्यप्रयुक्त- विषये च भूनल इति र; विषय एवं भूतल इनि ज.' २ वारणायेति ज, अनुमितिभ्युदासार्थमिति स.' ३ मसम्भपादत इति ज, १. ४ भनुमितीति ज, ८, ५ भावान मिति र. ६ अनुमित्यन्यममारवादिति मु. ७ विधेति क ख भविद्येति मु. S -- * * LA निरूपणम् टीकाप्रयोऐता यथार्थानुभवत्वराहित्यरूपाप्रमावसत्यान दोपः । स्वविपय इति साध्यविशेषणमुद्दे- श्यसिद्धये । प्रत्यक्षानुमित्योयभिचारवारणाय प्रत्यक्षानुमानेत्यन्यत्वविशेषणम् । [अ.टी. स्मृतिलक्षणं द्वितीयं प्रपञ्चयति-उत्तरेति। तस्याः प्रमान्यत्वे प्रमाणमाह-साम- मेति । स्मृतेरपि कार्यतया स्वकारणसंस्कारलिङ्गतया प्रमाणत्वाद्वाधव्युदासार्थ खविपये इत्युक्तम् । प्रत्यक्षान्यत्वमनुमानेऽनुमानान्यत्वच प्रत्यक्षे व्यभिचरति, अत उभयान्यत्वग्रहणम्। [वा. टी.] साऽप्रमेति।स्मृतेः कार्यतया स्वकारणे संस्कार लिङ्गत्वेन प्रामाण्यात् वाधनिवारणाय स्वे विपये इति । अनुमितो प्रत्यक्षे च व्यभिचारपरिहाराय पदद्वयम् । न च साधनविकलत्व- विपर्ययस्येन्द्रियसनिकव्याप्तलिङ्गजन्यत्वाभावेन साधनस्स तत्र वर्तमानत्वादिति । नच तत्वज्ञानादेव प्रमात्वं साधनीयम्, खतोऽनिवधारणात् । तदाहुः-- तत्र यत्पूर्व विज्ञानं तस्य प्रामाण्यमिष्यते । तदुपस्थापनेनैव स्मृतेस्स्थाचरितार्थता ।। इति युक्तमप्रमात्वम् । (सुखदुःखयोनिरूपणम्) यस्मिन्ननुभूयमाने तत्साधनेष्वभिप्यङ्गः तत्सुखम् । यस्मिन्ननुभूयमाने तत्साधने' द्वेषः तदुःखम् । ते बुद्धिजे, तदन्व- यव्यतिरेकानुविधायित्वात्, यदेवं तदेवं यथा घटः, तथा च प्रकृतम् तस्मात्तथा। [ब. टी.] यस्मिन्निति। अनुभ्यमानमा घटादावतिव्याप्तमतः तत्साधनेष्वभिर्ववत इति । एवमपि पुण्ये गतं, सुखसाधनतया ज्ञायमानस्य पुण्यस साधने यागादौ ? विद्या- दर्शनादिति चेत्-न; अन्यसाधनतया ज्ञायमाने यसिन् भावे येन रूपेण ज्ञातेऽन्यत्रेच्छा तद्भूपाक्रान्तसुखमित्यर्थात् । अतएव (1) दुम्साभावेनापि सुखत्वनमगोचरतापने चन्दनादापतिव्यातिः। यस्मिन्निति । अन्यसाधनव्या ज्ञायमाने यस्मिन् येन रूपेण ज्ञाते तत्साधने द्वेपसरूपाक्रान्तं दुःखमित्यर्थः । तेन दुःखत्वभ्रमगोचरतापने पापादौ नातिन्याप्तिः । नदन्वयेति । स्वतर्जतदन्वयव्यतिरेकानुविधायित्वादित्यर्थः । तेनान्यथासिद्ध व्यमिः चारवारणम्। J. टी. अभिष्वङ्गः अनुरागः। यस्मिन्ननुभूयमाने खसमवेततयेति पूरणीयम् । अन्यया वर्णनीह्यादावनुभूयमाने तत्साधनेषु वाणिज्यकर्षणादिष्वभिष्वङ्गदर्शनादतिन्याप्तिः स्यात् । एवं २ कारणे संस्कार इति ज, द. ३ तत्साधनेम्वनुयाः तत्समयेश इत्यधिक मुदितपुस्तके. '४५ समवेत इत्यधिक मुद्रितल के. ५ ममिद्वेष इति ५. ६ मनुषङ्ग इति ए.' अन्यन्नेति नास्ति च पुस्तके, ८ मूर्तस्वामिति छ. १ मुवर्गेनिज, द, स्वेति नास्ति द. .
७० - + प्रमाणमसरी [गुण- दुःखलक्षणेपूधम् । तयोरिष्टानिष्टबुद्धिजन्यत्वस्वीकाराचत्र प्रमाणमाह-ते. बुद्विज इति । अनुविधानमनुवर्तनम् । [था. टी.] यस्मिन्निति । आत्मनिवारणाय तत्साधनेति । अभिष्वङ्गः अनुरागः । सगा. दिनिवृत्तये आत्मसमवेतेति द्रष्टव्यम् । एवं दुःखस्यापि सत्यां सगादिबुद्धी सुखादि भवति नान्यथेति तदन्वयव्यतिरेकानुविधायित्वम् । (इच्छा तद्विभागो द्वेपश्च) प्रार्थना इच्छा। सा द्वेधा-नित्यानित्यभेदेन । महेश्वरस्य नित्या, ईशविशेषगुणत्वात् तदुद्विवदिति । विप्रतिपन्नानि कार्याणि ईशेच्छाज- न्यानि, कार्यत्वात्, सम्प्रतिपन्नवदिति । सर्वोत्पत्तिनिमित्तत्वमीशे- च्छायाः। अनित्या अनीशानाम् , अनीशविशेषगुणत्वात् , तद्बुद्विवदिति । रोपो द्वेपः । सोऽनित्यः, जीवविशेपगुणत्वात् , तद्बुद्धिवत् । वुद्धिजत्वं तदन्वयव्यतिरेकानुविधायित्वादिति । [व. टी.] प्रार्थनेति । प्रार्थनापदवाच्यम् इच्छात्वजातिमदित्यर्थः । घटरूपादो व्यभिचारवारणाय ईशेति । ईशसंयोगे व्यभिचारवारणाय विशेपेति । असदादी- च्छायां वाधवारणाय महेश्वरस्येति । महेश्वरसंयोगादौ व्यभिचारवारणाय इच्छेति। विप्रतिपन्नानीति । अङ्कुरादी पक्षधर्मतावलानित्येच्छाजन्यत्वसिध्यनन्तरं घटादिकं कार्य पक्षीकृत्य नित्येच्छाजन्यत्वं साध्यते । अङ्कुरादिसम्प्रतिपन्नो दृष्टान्तः । अडेरादौ सिद्धसाधनवारणाय विप्रतिपन्नानीति । ईशमात्रकर्टकभिन्नानीत्यर्थः । आकाशादौ बाधवारणाय कार्याणीति । अर्थान्तरवारणाय. ईशेति । ईश्वरयुध्यार्थान्तरवारणाय इच्छेति । [अ.टी.] जीवविशेषगुणषु शब्दादिषु च व्यभिचारवारणार्थम् ईशेति । ईशेच्छैव कुतसिद्धा, तस्यास्सर्वोसतिनिमित्तत्वञ्च कुत इत्यत आह-विमतिपन्नानीति । अङ्कुरादीनीत्यर्थः। इच्छा- जन्यानीशेच्छाजन्यानीति च द्विविधप्रयोगो ज्ञेयः। प्रथमप्रयोगानित्येच्छासिद्धौ पूर्वत्र दृष्य- न्तीकृतपटीदेनित्येश्वरेच्छाजन्यत्वमपुरादिवत्साध्यम् । नित्यपरिमाणादौ व्यभिचारवारणार्थ विशेपपदम् । ईशादिविशेपगुणेष्वनैकान्तिकव्युदासाय जीवपदम् । [आ. टी.] इदं भूयादिति प्रार्थनाशब्दार्थः । रोपो द्वेप इत्यत्र पर्यायत्वेऽपि प्रसिद्धत्वाप्रसिद्ध. स्वाभ्यां लक्ष्यलक्षणभायो युक्तः, खं छिद्रमितिवा। । । घीपदिवि ख, ग, प. २ दोप इति मु. ३ तदिति नाति क पुस्तके. ४ इमारम्प सद्विशेष- गुगवाहद्विवदित्यन्तो भागो नास्ति मुद्रिय पुस्तके. . ५ बाधवारणायेति ष. ६ इह यान्त इति च •शपदमिति ज, र. ८ उत्पत्तिमदिति ट. १९ द्वेधेति ज, द. १० घटादीतिज, घरादाविति ट : .
निरूपणम्] टीकानयोपेता (प्रयत्नः तद्विभागश्च) गुणत्वाधान्तरजात्या बुद्धीच्छान्येश्वरविशेषगुणगततत्सामान्या- धारः प्रयत्नः । सोऽस्मदादीनां प्रत्यक्षः । ईशस्य तु पुरुषत्वात्सिद्धः। स नित्यानित्यभेदावधा। नित्यस्सर्वज्ञस्य तद्विशेषगुणत्वा१द्धिवत् । अनित्यो द्वेधा-इच्छावपान्यतरपूर्वको जीवनपूर्वकश्चेति । पूर्वो मानसप्रत्यक्षसिद्धः, उत्तरोऽनुमानसिद्धः सुर्युप्तप्राणक्रिया अस्मदादिप्रयतजा प्राणक्रियात्वात् जाग्रता प्राणक्रियावदिति। वि. टी.] गुणत्वावान्तरेति । सामान्यादापतिव्याप्तिवारणाय सामान्येति । घटादारतिव्याप्तिवारणाय गुणगतेति । संख्यादावतिव्याप्तिवारणाय विशेपेति । रुपादावतिव्याप्तिवारणाय ईश्वरेति । बुद्धीच्छयोरतिव्याप्तिवारणाय बुद्धीच्छान्पेति। सत्तामादायातिप्रसङ्गवारणाय अवान्तरेति । गुणत्वमादायातिव्याप्तिधारणाय गुण- त्वेति । रूपप्रयत्नान्यतरत्वादिनातिप्रसक्तिनिरासाय सामान्येति । इच्छाद्वेषेति । इच्छापूर्वको द्वैपपूर्वकथेत्यर्थः । द्वेषपूर्वकस्तु प्रयतो न नव्यमते सिद्धः । जीवनेति । जीव्यतेऽनेनेति जीवनमदृष्टम् । सुपुप्तमाणक्रियेति । जलादिक्रियायां वाधवारणाय प्राणेति । प्राणे यांधवारणाय क्रियेति । प्राणायामे सिद्धसाधनवारणाय सुयुत्तेति । सुपुप्तशरीरक्रियायां स्पर्शनवद्वेगवल्लोष्ठादिसंयोगजन्यायां वाधवारणाय प्राणेति । ईश्व. प्रयतेनार्थान्तरवारणाय अस्मदादीति । अस्मदादिगतत्वेनार्थान्तरवारणाय प्रय- तति । अष्टाद्वारकायतजन्यत्वं समुदायार्थः । तेन नादृपद्वारकप्रयत्नजन्यत्वेनार्था- न्तरम् । क्रियात्वं पतनादौ व्यभिचारि, तदर्थ प्राणक्रियात्वं हेतूकतम् । प्राणत्वं साध- नविकलमत उक्तं क्रियात्वम् । प्राणक्रियाविशेपो हेतुरतो न प्राणवाय्वादिसंयोगजन्य- प्राणक्रियायां व्यभिचारस । पक्षेऽपि स एव, तेन नांशतो पाधः । '[अ. टी.] सामान्याधारः प्रयत इत्युक्ते द्रव्यकर्मणोरतिव्यातिः स्यादत उक्तं गुण- गतेति। संफोगा अनिवारपारणाप विशेषादम् । सामापनिम्बारिशुहसार ईश- पदम् । तर्हि ज्ञानेच्छयोर्व्यभिचारस्स्यात्ततो बुद्धीच्छान्येत्युक्तम् । युद्धीच्छान्येश्वर- विशेषगुणगतसत्तागुणत्वलक्षणसामान्याधारे द्रव्यादौ गुणाने चातिव्याप्तिनिरासार्थ गुण- त्वावान्तरजात्येत्युक्तम् ! 'किं तदनुमानमित्यंत आह-सुपुप्तप्राणक्रियेति । ईश- प्रयत्नजन्यत्वेन सिद्धसाधनताव्युदासार्थम् । असदादिपदम्। क्रियात्वं मेघगत्यादौ व्यभि- चरतीत्यत उक्तं माणक्रियात्वादिति । जानीयेति घ. २ तदिति नाति ख, ग, घ, ३ प्रत्यक्षसिद्ध इति घ. तु इति नास्ति ख, ग, घ. ५धीवदिति ख, ग, घ. ६ सुक्षेति स, प. • भगायेति . समतिध्यापनेति ज, ट. ९ किमिति मालिट पुस्तके १० इतीति नाति पुस्तके.
७२ प्रमाणमरी | [गुण- [या. टी.] गुणत्वेति । संयोगेऽतिव्याप्तिपरिहाराय विशेपेति । गन्धेऽतित्र्याप्तिपरिहाराय ईश्वरेति । ज्ञानेन्छ्योरतिव्याप्तिपरिहाराय बुद्धीच्छान्येति । जीवप्रयत्नेऽव्याप्तिनिरासाय तद्गत- सामान्येति । घटेऽनिव्याप्तिपरिहाराय गुणत्वेति । रूपनिवारणाय अवान्तरेति । जीवन प्राणधारणम् । , (गुरुत्वलक्षणं तत्र प्रमाणञ्च ) आग्रपतनासमवायिकारणात्यन्तसजातीयं गुरुत्वम् । तत्र प्रमा- णम्-प्रथम पतनम् , असमवायिकारणपूर्वकम्, क्रियात्वात् , सम्पति- पन्नवदिति । परिशेपाद्गुरुत्यसिद्धिः। द्रुतं सर्पिः, यावदव्यभाव्यतीन्द्रिय- वत्, चतुर्दशगुणवत्वात् बहुविशेषगुणवत्त्वाच, आत्मवैदिति मानद्वयम् । तनान्यस्यासम्भवात् । घटगुरुत्वं यावद्रव्य भावि, अक्रियाजन्यत्वे सति अबुद्धिजेन्यत्वे सति घटसमवेतत्वात्, घटरूपवत् । सर्वत्र गुरुत्वं याव- व्यभावि, गुरुत्वात्, घटगुरुत्ववदिति साधनीयम् । अत एव कारणगुण- पूर्वकत्वं तदृष्टान्तेन साधनीयम् । घटगुरुत्वमप्रत्यक्षं, गुरुत्वात्, परमाणु- गुरुत्ववत् । स्व. टी.] आयेति । द्वितीयपतनासमवायिकारणे प्रथमपतनजन्यवेगेऽतिव्यातिवार- गाय आयेति । नोदनजन्याधकर्मासमवायिकारणे नोदनेऽतिव्यासिवारणाय पत- नेति । यत्रापि नोदनादिना फलसंयोगाभावो भवति, तत्रापि पतनस्य (न?) नोद- नासमवायिकारणता | नोदनस संयोगध्वंसजनकपतनभिन्नकर्मजननेनैवोपक्षीणवाद । अतएव संयोगवसेनोपंक्षीणनोदनजन्यकर्मादिना पतनासमवायिकारणपतनात्यन्तस- जातीयत्वं गुरुत्वे सम्भवति (?) तदर्थ कारणेति । कालादौ गतमत आह-अस- मवायीति । सत्तादिना सजातीये घटादायतिव्याप्तिवारणाय अत्यन्तेति । तेन गुणत्वव्याप्यजात्या साजात्यं प्राप्तम् । अत एव पतनासमवायिकारणनिष्ठान्यतरत्वादिमति रूपादौ नातिव्याप्तिः। पतनत्वं गुरुत्वप्रयोज्यो जातिविशेषः, न त्वघसंयोगफलंक्रिया- त्वम् । सूर्यकरकर्मणि तदसमवायिकारणे वा पवनलक्षणस्य गुरुत्पलक्षणस्य च नातिप्र- सक्यापत्तिः, न वादृष्टवदात्मसंयोगेऽतिव्याप्तिः, तस्य पतननिमित्तत्वेऽपि तदसमवायि- कारणत्वाभावात् । अजनितपतनके नष्टगुरुत्वेऽव्याप्तिमारणाय सजातीयत्वमुक्तम् । प्रथममिति। प्रथमशरक्रियादापर्थान्तरवारणाय पतनमिति। द्वितीयादिपतनेऽर्थान्तर- वारणाय प्रथममिति। अदृष्टादिनार्थान्तरवारणाय असमवायीति। परिशेपादिति । १ भाद्यपतन मिति स, ग, घ, प्रथमपतनमिति क. ३घेति नास्ति क, स, घ पुस्खोपु; वा इति ग. बारमयदिनि नाम्ति घ पुस्तके. ४ पटेति घ. ६ कारणपूर्वकमिति ग, कारणगुणपूर्यकमिति क ७ जन्यमत इनि छ. ८ उपक्षीण नोदनगन्य फर्मापि न पतनेति छ. ५ कार- कक्रियारवेनेति च. १०क्रिययैवेति च. , ५ जावे सतीति ध.
- , - . निरूपणम् टीकाश्योपेवा ७३. अन्यथा गुरुत्वोत्कण पतनोत्कों न स्यादिति भावः । द्रुतमिति । रूपादिनार्थान्तरनार- णाय अतीन्द्रियेति। आकाशवृत्तद्वित्वेनार्थान्तरवारणाय यावदिति।नच गगननिरू- पिततिनिष्टसंयोगेनार्थान्तरं, तस्यापि यावद्रव्यभावित्वाभावात् , व्याप्यवृत्तित्वविशेष. णस्य देयत्वाद्वा । न च स्थितस्थापनार्थान्तरम् , तद्भिन्नत्वेन विशेषणात् । न च द्रुतपदचैय- र्थ्यम्, द्रुतसपिष्टुन प्रतीतेरुद्देश्यत्वात् । प्रत्यक्षतेजसि व्यभिचारवारपाय चतुर्दशेति। प्रमेयत्वादिचतुर्दशधर्मवति तत्रैव व्यभिचारबारगाय गुणेति। तेजति व्यभिचारंवारणाय घहिति। अनेकगुणवति तत्रैव व्यभिचारवारणाय विशेपेति। उक्तसाध्यविशेषणं साध- यति घटेति । उद्देश्यसिद्धये घटेति । द्वित्वादौ वाधवारणाय रूपादौ सिद्धसाधनवारणाय च गुरुत्वमिति। उद्देश्यसिद्धये यावदिति । खाश्रयसमानकालीनध्वंसप्रतियोगी- त्यर्थः । रूपप्रागभावे व्यभिचारवारणाय असमवेतत्वादिति । शब्द व्यभिचारवार- गाय घटेति। घटद्वित्वे व्यभिचारवारणस्य अवुद्धिजत्वे इति । असाधारणधुद्धिजत्व- निषधे सतीत्यर्थः । तेन नासिद्धिः । संयोगादिपु व्यभिचारवारणाय अक्रियाजत्वे सतीति । संयोगादिभिन्नत्वे सतीत्यर्थः। तेन न संयोगजसंयोगादौ व्यभिचारः ने या वेगे। अन्ये तु अक्रियाजत्वे सति संयोगजसंयोगादिभिन्नत्वे सतीत्याहुः। परे तु अकि- पाजत्वं क्रियाप्रयोज्यभिन्नत्वं, संयोगजसंयोगादिः क्रियाप्रयोज्य एवैति न तर. व्यभिचारो न पा वेग इत्याहुः । साधनीयं याय द्रव्यमावित्वमिति शेषः । अत एवेति। घटसमवेतत्वे सति याबद्रव्यभावित्वादित्यर्थः । तदृष्टान्तेन घटरूपदृष्टान्तेन। तहि तद्वत् किं तत्प्रत्यक्षम् ? नेत्याह-~घटेति । परमाणुगुरुत्वे सिद्धसाधनवारणाय घटेति । घटनिष्ठाकाशसंयोगादौ सिद्धसाधनवारणाय घटरूपादौ च वाधवारणाय गुरुत्वमिति । गुरुत्वादित्यर्थः । [अ. टी.] सजातीयं गुरुत्वमित्युक्ते कालादौ व्यभिचारवारणार्थम्-असमयायिकार- णेत्युक्तम् । तर्हि सत्तया समवायिकारणसजातीये द्रव्येऽतिव्यासिस्स्सादत उक्तम् अत्य. न्तेति । तथापि संयोगादौ व्यभिचारस्स्यादत उक्तं पतनेति । एवमप्युत्तरपतनासम- याविकारणात्यन्तसजालीये प्रथमपतनोत्यसंस्कारेऽतिव्यासिस्स्सादत उलम् आद्यपदम् । जातमाननष्टगुरुत्वेऽव्यातिनिरासार्थ सजातीयपदम् । सम्प्रतिपन्नमुत्तरं पतनम् । प्रयोगा- न्तरमाह-दुनं सपिरिति । अतीन्द्रियवदित्युक्ते कालादिसंयोगवत्वेन सिद्धसाधनाता सादत उक्तम् यावद्व्यभावीति । यावद्रव्यमावि युक्तमित्युक्ते रूपादिमत्वेन सिद्ध- साधनता अंत उक्तम् अतीन्द्रिययदिति । स्थितस्थापकान्यत्व विवक्षितत्वान्न तेन सिद्धसाधनता । गुणवत्वादित्युक्ते तेजोविकारे स्थूलसुवर्णे व्यभिचारस्स्सादत उक्तम् १, २ निराकृतय इति प. ३ इतः पदप्रयं नाति घ पुस्तके. ४ सतीति नास्ति घ, ५, ६ पदवयं नाति च पुस्तके. ७ भाविवादेवति च. ८ भादाविति छ. ९ परमिदं नास्तिज, र पुमायो। १० द्रव्यगुरूत्येति ज. "तत इति ज, द. १२ भन्यत्वं दायमिति न. . प्रमाण.१.
: गुण- प्रमाणमक्षरी चतुर्दशेति । रूपस्पर्शविशेषगुणद्वयवति स्थूलतेजसि व्यभिचारवारणाय बहुपदम् । द्रवीभूतसपिपि तादृशं गुणान्तरं स्थान गुरुत्वमिति तत्राह-तत्रेति । प्रकारान्तरेणोक्तं साध्यविशेषणं साधयति-घटगुरुत्वमिति । समवेतत्वादित्युक्ते शब्दबुध्यादौ व्यभि- चारस्स्यादतो घटपदम् । घटसमवेतद्वित्वादावनैकान्तिकत्वब्युदासाय बुद्धिजलविशेषणम् । अबुद्धिजन्यत्वे सति घटसमवेतसंयोगादिना व्यभिचारवारणायाक्रियाजन्यत्वविशेषणम् । घटसमवेतसंयोगजसंयोगविमागजविभागाभ्यां व्यभिचारवारणाय तदन्यत्वविशेषणमपि द्रष्टव्यम् । तथाप्यन्यत्र कथं तस्य यावद्रव्यमावित्यसिद्धिस्तत्राह-सर्वत्रेति । सापनीयं यावद्रव्यमावित्वमिति शेषः । घटादिगुरुत्वस्य किं कारणं तदाह-अत एवेति । अत एव घटसमवेतत्वे सति याबद्रव्यमावित्वादेवेत्यर्थः । तदृष्टान्तेन घटरूपनिदर्शनेनेत्यर्थः । तर्हि रूपवत्प्रत्यक्षमपि किं गुरुत्वं, तबाह-घटगुरुत्वमिति । वा. टी. आयेति । रूपनिवारणाय पतनेति । वेगनिवारणाय आयेति । उत्पननष्टगुरु- त्वेऽतिव्याप्तिनिवारणाय सजातीयमिति । घनिवृत्तये अत्यन्तेति । संयोगनिवृत्तये एक- त्तीति द्रष्टव्यम् । न च लघुन्याभावस्यैव गुरुत्वादसम्भवादलक्षणमिति वाच्यम् । तथावे कारणा- पेक्षया कार्ये सति शेषस्तदुपालम्भो न स्यादतिशयस्य भावधर्मत्वादतोऽतिरिक्तमेव गुरुत्वमित्या- शयवांस्तत्र प्रमाणमाह-तत्रेति । स्पष्टम् । द्रुतं द्रवशीलमुदकम् । सर्पिर्धतम् । अन्यथा तादृश- पदवैयर्यादिति । दिक्संयोगेन सिद्धसाधनपरिहाराय यावद्रव्येति । सुवर्णादौ व्यभिचारपरिहा- राय चतुर्दशेति । गुरुत्वानङ्गीकारे चतुर्दशगुणवत्वस्य हेतोरसिद्धिमाशङ्कय हेत्वन्तरमाह-बहु- विशेषगुणवत्वादेति । आकाशवारणार्थ बहुपदम् । स्थितिस्थापकान्यत्वञ्च द्रष्टव्यम् । दृष्टान्ते एकपृथक्त्वादिनासिद्धि (परिहाराय !) यावद्रव्यभावित्वं साधयति-घटेति । द्वित्लनिवारणाय अबुद्धीति । संयोगनिवारणाय अक्रियेति । तथापि संयोगजसंयोगविभागजविभागनिवारणाय तदन्यस्वमुपादेयम् । अतएवेति । अक्रियाजन्यत्यादेव । तदृष्टान्तेन घटरूपदृष्टान्तेनेत्यर्थः । गुरुत्वस्पर्शनगम्यत्वं निराकरोति-घटगुरुत्वमिति । न चाश्रयाप्रत्यक्षत्वमुपाधिः, धर्मादौ साध्या- व्याप्तः । अतिप्रसङ्गस्तु प्रत्यक्षादिबाधेन परिहरणीय इति । (द्रवत्वलक्षणं तद्विभागश्च आद्यस्यन्दनासमवायिकारणात्यन्तसजातीयं द्रयत्वम् । तद्वेधा- नित्यानित्यभेदेन । सलिलपरमाणुपु नित्यम् । तत्र प्रमाणम्-सलिलवणुकं यावव्यभाविद्रयत्ववत्समवायिकार्य,कार्यत्वे सति सलिलत्वात् ,सम्पति- पन्नसलिलयत्। पार्थिवतैजसपरमाणुपु द्रवत्वमनित्यम् , असलिलद्रवत्वात्, १ स्थूले इति श. २ द्रवीकृति 2. ३ जत्ये सतीति ज, ट. ४ भङ्गायनि ज. नास्ति घ पुस्तके, ६ तश्चेति मु. • भेदादिति मु. पूर्वनि क. .९ समयायिकारणकमिति ग, कारणमिति ख, कारणकार्यमिति मु. 1. सलिलातिरिसादयस्यादिति ग. ५ अत्यन्तेनि ८ , निरूपणम् ] टीकारयोपता सम्प्रतिपन्नवदितीतरसिद्धिः । पार्थिवाः परमाणको रूपादिचतुष्टयातिरि- ताग्निसंयोगजैकद्रव्यगुण योगिनः, अनित्यविशेषगुणवत्वे सति नित्यभूत- त्वात्, आकाशवदिति परिशेपादनिसंयोगजत्वं द्रवत्वस्य सिद्धम् । तेजःपरमाणुपु द्रवत्वम् अग्निसंयोगजम् , उदकानधिकरणत्वे सति पर- माणुद्रवत्वात् , पार्थिवपरमाणुद्रवत्ववदिति । [ब. टी. आयेति । द्वितीयस्यन्दनासमवायिकारणे वेगेऽतिव्यानिवारणाय आद्येति । नोदनादावतिव्याप्तिनिरासाय स्पन्दनेति। अदृष्टादावतिव्याप्तिवारणाय असमवा- योति । सत्वे तत्सजातीये घटादावतिव्याप्तिवारणाय अत्यन्तेति । गुणत्वसाक्षाद्याप्य- जात्यासाजात्यं विवक्षितम् । तेन रूपदव्यत्वान्यतरत्वेन तत्सजातीये रूपादौ नातिव्याप्तिः । अजनितस्यन्दनके द्रवत्वेऽच्याप्तिवारणाय सजातीयत्वमुक्तम् । सलिलमणुकमिति । घटादियणुके बाधवारणाय सलिलेति । सलिलपरमाणौ वाधवारणाय ध्यणुकमिति । उद्देश्यसिद्धये यावद्व्यभावीति । रूपादिनार्थान्तरभङ्गाय द्रवत्वेति । तादृशद्रवत्व- वत्वमात्रसाधने नित्यं द्रवत्वं नायात्यतो द्रवत्ववत्समवायिकार्यत्वमुक्तम् । जलशरीरवणु- कस्य द्रवत्ववत्पार्थिवपरमाणूपष्टम्भकत्वसम्भवेनार्थान्तरवारणाय समवायीति । परमाणी व्यभिचारयारणाय सत्यन्तम् । घटादी व्यभिचारचारणाय पश्चम्यन्तम् । सम्प्रति- ‘पन्नवदिति । स्थलजलवदित्यर्थः। प्रकृते पक्षधर्मतावलायत्वस्य नित्यत्वसिद्धिः । सम्प्रतिपनवदिति । घृतंद्रवत्ववदित्यर्थः। असलिलेति । संलिलपरमाणुद्रव्यत्वे व्यभिचारवारणाय असलिलेति । असलिलनिष्ठत्वादिति वक्तव्ये आकाशायकत्वे व्यभिचारः, तदर्थ द्रवत्वत्वादित्युक्तम्। जलपरमाणुत्वे वाधवारणाय पार्थिवा इति । उभयत्र तत्सिद्धये उभयग्रहः । घृततेद्यणुकादिव्यत्वे सिद्धसाधनमरणाय परमाणुवित्युक्तम् । परमाणुनिष्कत्वादी बाधवारणाय तनिष्ठत्वादी च सिद्धसाधन- धारणाय द्रवत्वमुक्तम् । पार्थिवेति । घटादौ बाधवारणाय अणव इति । घणुके वाधवारणाय परमेति । जलादिपरमाणो बाधवारणाय पार्थिवेति । रूपादिनार्थान्तर- वारणाय अतिरिक्तान्तम् । "परिमाणेनार्थान्तरवारणाय जन्यत्वमुक्तम् । दैशिक- परत्वादिनार्थान्तरवारणाय अग्निसंयोगेति । अदृष्टवदात्मसंयोगेनार्थान्तरवारणाय अमीति । उद्देश्यसिद्धये संयोगेति । यद्वा यथोक्तविशेषणविशेष्यभावेन वैयर्थ्यम्, अग्निसंयोगजैविभागनार्थान्तरवारणाय एकद्रव्येति । अव्यासज्यवृत्तित्वं तदर्थः । रूप- ध्वंसेनार्थान्तरवारणाय गुणेति । यद्वा संयोगजसंयोगेनार्थान्तरवारणाय एकद्रव्येति । १ अग्नीति नास्ति घ. २ परमाणुद्रवत्यमिति मु. ३ द्रवत्वान्यपाभिवेति स. ४ धारणायेति च. ६ नव्यान्यतरत्वेनेति च. ७ वत्वमात्रेति च. ८ सलिटेति च. ९ घृतेति मास्ति छ पुस्तके. १० सलिलेति नास्ति छ पुस्तके. ११ द्रवत्वेनेति च. १२ तदिति नानि च पुस्तके. १३ जलपरमाणाविति च. १४ परिमाणादिनेति व. १५ इत्युक्तमिति च. १६ परियं नास्ति छ पुस्तके, १७ संयोगजन्येति च. ५सस्वेनेति छ.
" प्रमाणमरी गुण. अनिसंयोगजक्रियाश्रयत्वेनार्थान्तरवारणाय गुणेति । जलपरमाणी व्यभिचारपारणाय सत्यन्तम् । विशेषपदं विनय व्यभिचारः । अनित्यविशेषपदन्त्यसम्मति, विशेषपदा- यस नित्यत्वात् । यदि विगेपपदेन पदार्थविशेष उच्यत, तदाप्यनित्यगुणवत्वमादाय स एव व्यभिचारः। आत्मनि व्यभिचारमाय भूतत्वादिति । यद्यपि विपयनयामिसं- योगजन्यज्ञानाश्रयत्वमात्मन्येव, तथापि यहिसंयोगासमवायिकारणत्वघटितं पहिसं- योगासाधारणकारणत्वयटिनं या साध्यं तत्र नास्ति, तेन विशेषणेन विना व्यभिचार- स्स्थादेव । गुणपदस्य कृत्यदगायां गुणध्वंसेनान्तरवारणाय द्वितीर्यसाध्यमादायोक्तम् । प्रथम या साध्ये उक्तं कृत्यान्तरं बोध्यम् । घटादी व्यभिचारवारणाय नियेति। वंशादावनिसंयोगंजचटचटाशब्दमादाय वाचास्य दृष्टान्तता । तैजसेति । द्रवत्वमात्रप- क्षत्वे घृतादिद्रवत्वे बाधः । तेजसद्रवत्वपक्षीकरण तेजसम्यणुकादिद्रयत्वे पाधः । तेजसपर- माणुनिष्टरूपादेरपि पक्ष बाधः । अतो विशिष्टस पक्षताजन्यत्वमानसाधने सिद्धसाधनं, संयोगजन्यत्वसाधनेऽदृष्टवदात्मसंयोगेनार्थान्तरम्, अतः अग्नीत्यादि । असमवापिका- रणत्वसिद्धये संयोगेति । उदकमनधिकरणं यस्य तत्वे सतीत्यर्थः । जलद्रवत्वे व्यभि- चारवारणाय सत्यन्तम् । अणुकादिव्यत्वे व्यभिचारवारणाय परमाण्विति । [अ. टी.] स्यन्दनं सवर्ण क्षरणं तत्कारणं सजातीयं द्रवत्वमित्युक्ते ईश्वरप्रयत्नादावति- च्याप्तिस्यादतः असमवायिपदम् । तथापि सत्तादिना तत्सजातीयसंयोगादी व्यभिचार- स्स्सादतः अत्यन्तपदम् । उत्तरस्यन्दनासमवायिकारणे पूर्वस्यन्दनोत्यसंस्कार व्यभिचारवा- रणार्थम् आद्यपदम् । सद्यःशुष्कं द्रवत्वं क्षरणकारणं न भवतीत्यच्यातिनिरासार्थ सजा- तीयग्रहणम् । अयावद्रव्यमाविद्रवत्ववत्समवेतत्वेन सिद्धसाधनता मा भूदित्यत उत्तम् यावद्रव्येति । सम्प्रतिपन्नः स्थूलो जलावयवी । अनित्ये प्रमाणमाह-पार्थिवेति । सम्प्रतिपन्नं सुवर्णकाष्ठादिद्रवत्वं काष्ठानिसंयोगजद्रवत्वस्य प्रत्यक्षेत्वेऽग्निपरमाणुपु तस्स किं गमक तदाह-पार्थिवाः परमाणव इति । अग्निसंयोगजक्रियायोगिवेन सिद्धसा. धनतावारणाय गुणपदम् । तर्हि संयोगजसंयोगाश्रयत्वेन सिद्धसाधनता स्यादत एकद्रव्य. पदम् । तीग्निसंयोगजरूपायाश्रयत्वेन सिद्धसाधनता, तत उक्तं रूपादिचतुष्टया- तिरिक्तेति । भूतत्वादित्युक्ते सलिलब्यणुकादौ व्यभिचारवारणार्थ नित्यपदम् । सहि सलिलादिपरमाणुपु व्यभिचारस्तत उक्तम् अनित्यविशेषगुणवत्वे सतीति। एतावत्युक्ते आत्मनि व्यभिचारस्स्यादत उक्तं नित्यभूतत्वादिति । द्रवत्वादित्युक्ते सलिलव्यणुका- दिद्रवले व्यभिचारस्स्यादत उक्तं परमाणुत्वादिति । एतावत्युक्ते सलिलपरमाणुद्रवत्वे व्यभिचारस्स्सादत उक्तम् उदकानधिकरणत्वे सतीति । द्रवस्वादित्युक्ते तैलादिद्रवत्वे , सत्वेनेति च. २विशेषयत्वमिति च. ३ लम्यत इति च. तथापीति च. टितमिति च. ६ नाम्तीनि इनि च.७ उत्पनेति छ. दिलीन नास्ति च पुस्तो. ९ प्रथमसाधनेति १० संयोगजन्येति च. १३ जलेनि छ. १३ द्रयस्वमिति । प्रत्यक्षेति झ. १४ काष्टादिष्वामीति ८. १५ प्रत्यक्षत्वेऽपीते ज, ट. १६ सलिलादाविति ट. ५कारणघ. ८ "कीरशस्येति च, निरूपणम्] टीकामयोपेता व्यभिचारस्स्यादतः परमाणुग्रहणम् । तैलादिपरमाणुद्रवले व्यभिचारवारणाय तदन्यत्वे सतीति द्रव्यम् । हवा. टी.] आधेति । रपनिवारणार्थ स्यन्दनेति । द्वितीयम्यन्दनजनकप्रथमस्यन्दननिधार- णार्थम् आद्येति । उत्पन्ननष्टद्रवत्वेऽव्यासिनिवारणाय सजातीयेति । घटनिवारणाय अत्य- न्तेति । संयोगनिवारणाय एकवृत्तीति द्रष्टव्यम् । सलिलध्यणुकमिति । सिद्धसाधनतापरि- हाराय यावद्रव्यभावीति । आप्यपरमाणुनिरासाय कार्यत्व इति । सुखादिनिवृत्त्ययं सलि- लेति । पार्थिवा इति । सामान्यादिना सिद्धसाधनतापरिहाराय गुण इति । संयोगेन सिद्ध- साधननापरिहाराय एकद्रव्येति । संख्यादिना सिद्धसाधनतापरिहाराय अग्निसंयोगजेति । रूपादिनिवृत्तये रूपादिचतुष्टयव्यतिरिक्तेति । आप्यधणुकनिवृत्तये नित्येति । सलिलागुनि- वृत्तये अनित्यविशेषगुणवत्वे सतीति । आमनिवारणाय भूतत्वादिति । शब्दादिना दृष्टान्त- लामः । सलिलाणुनिवृत्तये उदकानधिकरणत्वे सतीति । (स्नेहलक्षणम् , तस्य यावद्व्यभावित्वञ्च) घनोपलगतद्वीन्द्रियग्राह्यविशेषगुणात्यन्तसजातीयः हः । सेंच यायव्यभावी, अम्मोविशेषगुणत्वात्, रूपयत् । परगतविशेषान- पेक्षया पृथिव्यादीनामन्योन्यव्यवच्छेदको गुणो विशेषगुणः। घ. टी.] घनेति । धनो मेघः, तदुपलः करकः यद्वा धनः प्रतिबद्धसांसिद्धिकद्रवत्यः । सांसिद्धिकद्रवत्वेऽतिव्याप्तिधारणाय गतान्तम् । रूपादायतिव्याप्तिवारणाय द्वीन्द्रि- येति । लिङ्गद्वयादिग्राह्यरूपादिकेऽतिव्यातिवारणाय इन्द्रियेति । एवमपि रूपादापति- ब्यासिवारणायेन्द्रियगतं द्वित्वमुक्तम् । संख्यादापतिव्याप्तिवारणाय विशेपेति । एवं पदार्थविशेपे संख्यादानेवातिव्याप्तिवारणाय गुणेति । अग्राह्ये सेहेऽव्याप्तिारणाय सजातीयत्त्वमुक्तम् । गुणात्वादिना तत्सजातीये रूपादारतिव्याशिवारणाय अत्यन्तेति । गुणस्वसाक्षाद्याप्यजात्या साजात्यमुक्तम् । गुणल्वव्याप्यजात्यव्याप्यस्लेहरूपान्यतरत्वा- दिना कृत्या, रूपादावतिव्याप्तिवारणाय जात्या साजात्यमुरुम् । सेहत्वं जातिलक्ष्य- नापच्छेदिका । स चेति । द्वित्यादौ व्यभिचारवारणाय विशेपेति । शब्दादौ व्यभिचा- वारणाय अम्भ इति । गुणपदकृत्यं पूर्ववत् । ननु स्नेहलक्षणे विशेषगुणेति यदुक्तं, तर्दसत्। सहस्सैकमानेन्द्रियग्राह्मजातिमत्याभावात् । अतोऽन्यादृशं विशेषगुणवं निर्वक्ति परगतेति। परत्वमपि मूर्तममूर्तादन्यतो भेदयति । अतः अन्योन्येति। परत्वं न पृथिवीं जलाझेदयति, परत्वस विपक्षे जलादावपि सत्वात् । पाकजरूपसमानाधिकरणपरत्वं भेद- यत्येव । अतस्तृतीयान्तम् । यन्मते व्यर्थविशेषणस्यापि व्यवच्छेदकता, तन्मत इदम् । पहिरियं नास्तिज, श पुस्तकयो..२ यहिरिन्द्रियेनि मु. ३ समानजातीय इनि घ. ४ चेनि नास्ति क. ५ विवक्षितमिति च. ६ असहसमिनि च. ७ पदमिदं नाम्नि छ पुस्तके. ८ व्यवच्छेदकतेति मतमिनि ए. + । प्रमाणमसरी [गुण- अत एवैतदेकत्यादी नातिव्याप्तिः, तस्स परगतैकत्वरूपविशेषापेक्षत्वात् । पृथिवीत्वादा- वतिव्याप्तिवारणाय गुणपदम् । यत्तु ह्रखत्वादेः परगतदीर्घत्वादिविशेषापेक्षया व्यव- च्छेदकत्वाचवातिव्याप्तिवारणाय तृतीयान्तेति, तन्न अन्योन्यत्वादिनैव तब्धवच्छेदात् । हखत्वस्य जलपरमाण्वादिविपक्षगतत्वात् , आकाशापेक्षया परत्वस्य, मूर्तापेक्षया शब्दस्य वान्योन्यव्यवच्छेदकत्वात् परत्वेऽतिव्याप्तिरतः पृथिव्यादीनामित्युक्तम् एतेनेकक- द्रव्यविभाजकोपाध्याक्रान्तव्यवच्छेदकता प्राप्ता । अधिकं वर्द्धमानप्रकाशे बोध्यम् । [अ. टी.] गुणसजातीयस्लेह इत्युक्ते सत्तादिना गुणसजातीये द्रव्यादौ व्यभिचारस्स्यादत उक्तम् अत्यन्तेति । संख्यादौ व्यभिचारवारणार्थ विशेषपदम् । शब्दबुध्यादौ व्यभि- चारनिरासार्थ धनोपलगतेत्युक्तम् । पनो मेघः, तदुपलः करकः । धनोपलगतविशेष- गुणात्यन्तसजातीयस्नेह इत्युक्ते रूपादौ व्यभिचारस्स्सादत उक्तम् द्वीन्द्रियग्राह्येति । स्नेहस्य चक्षुःस्पर्शनाभ्यां गृह्यमाणत्वाहीन्द्रियग्राह्यत्वम् । द्वीन्द्रियग्राह्यविशेषगुणात्यन्तसजा- तीयस्नेह इत्युक्ते सांसिद्धिकद्रवत्वे व्यभिचारस्स्यादतो घनोपलगतेत्युक्तम् । शब्दादौ व्यभिचारवारणार्थम् अम्भोविशेषगुणत्वादित्युक्तम् । ननु कोऽसौ विशेषगुण इत्यत आह-परगतेति । पृथिव्यादीनां गुणो विशेषगुण इत्युक्ते संख्यादावतिव्याप्तिः स्यादत उक्तम् अन्योन्यव्यवच्छेदक इति । तर्हि हस्खत्वादौ व्यभिचारस्स्यादतः परगतविशेषानपेक्षतयेत्युक्तम् । हखादेः परगतदीर्घत्वादिविशेषापेक्षया व्यवच्छे- दकत्वानोक्तदोपः । पृथिव्यादीनामन्योन्यव्यवच्छेदकाः पृथिवीत्वादयोऽपि भवन्तीति तब्यवच्छेदार्थ गुणपदम् । [वा. टी.] घनोपलेति । संयोगनिवारणाय विशेपेति । रूपनिवारणाय द्वीन्द्रियग्राह्येति । सलिलंदवत्यनिवृत्तये धनोपलगतेति । धनोपलः करकः । (स्नेहे ?) अत्र्याप्तिनिरसाय सजातीय इति । घटनिरासाय अत्यन्तेति । परगतेति । संयोगनिरासाय अन्योन्येति । सामान्यनिरासाय गुण इति । हसत्वनिरासाय परगतेति । (संस्कारलक्षणम्, तद्विभागः तत्र वेगश्च ) गुणत्यावान्तरजात्या बेगसजातीयः संस्कारः। स त्रेधा-वेगादि- भेदेन । मियासमवायिकारणैकद्रव्यात्यन्तसजातीयो वेगः । गत्वं क्रियासमवायिकारणैकद्रव्यसमानाधिकरणं, स्पर्शचनातित्वात् , सत्ताव- दिति बेगसिद्धिः । स द्विविधः-वेगजः क्रियाजश्चेति । वेगत्वं वेगासम- वायिकारणवृत्ति, वेगजातित्वात्, सत्तावदिति वेगजवेगसिद्धिः । वेगत्वं कर्मासमवायिकारणवृत्ति, वेगजातित्वात् सत्तापदिति कर्मजवेगसिद्धिः। १विशेषगनिति च. २ पहिरियं नास्ति छ पुस्तके. ३ येति क. ४ दीपयमिति क, ख, ग, घ. ५ इंधेनि क, ग. .
निरूपणम् टीकात्रयोपतो (ब. टी.] गुणत्वेति । गुणत्वेन रूपेण वेगसजातीये रूपादायतिव्याप्तिधारणाय गुणत्वावान्तरेत्युतम् । वेगरूपान्यतरत्यादिना रूपादारतिव्याप्तियारणाय जात्ये- त्युक्तम् । रूपादायतिव्याप्तिवारणाय वेगेति । भावनास्थितिस्थायकयोरव्याप्तिधारणाय सजातीयेति । न चास्माश्रयः, संस्कारत्वेन लक्ष्यत्वात् , वेगत्वेन लक्षणप्रवेशात् , येन रूपेण लक्ष्यता तेन रूपेण लक्ष्यस्य लक्षणशरीरे प्रवेशे आत्माश्रयात् । क्रियेति । सजातीयरूपमपि .. .....यत्किञ्चिदसमवायिकारणसजातीयं रूपमपि (2) अतः क्रियेति । क्रियानिमित्तकारणसजातीयेऽदृष्टादापतिव्यानिवारणाय असमवायीति । गुणत्यादिना सजातीये रूपादापतिच्याशिवारणाय तान्तम् । अजनितकर्मक वैगेऽच्याप्ति- वारणाय सजातीयत्वम् । नोदनादावतिव्याप्तिवारणाय एकद्रव्येति । अनेन लक्षणेन, वेगवं जातिरेव लक्षणत्वेन (न?) सूच्यते । यद्वा गुरुत्वादिभिन्नत्ये सतीति देयम् । यद्वा स्पन्दनपतनभिन्ना क्रिया विवक्षिता । तेन (न) गुरुत्वादारतिव्याप्तिः। यद्वा तदेकद्रव्यं सौरतेजोनिष्ठत्वेन विवक्षणीयम् । यद्वा क्रिया असमयायिकारण यस्येति बहुव्रीहिः। सूर्य- क्रियाजनितरूपादारतिव्याप्तिवारणाय असमवायीति । संयोगादिनार्थान्तरवारणाय एकद्रव्येति । आत्मत्वे व्यभिचारवारणाय स्पर्शवदिति । वेगरहिते घटे व्यभिचार- वारणाय जातित्वादिति । तादृशगुरुत्वसामानाधिकरण्येन सत्तायां साध्यसिद्धिः । धैगज इति । वेगवतः कपालादिनारब्धे घटादौ वेगजवेगो योध्यः। कर्मासमवायि- कारणवृत्तित्वेनार्थान्तरवारणाय वेगेति । उद्देश्यसिद्धये असमवायीति । घटत्यादी व्यभिचारवारणाय वेगेति । वेगासमवायिकारणत्वरहितवेगवृत्तिता । वेगत्यादौ व्यभि- चारवारणाय जातित्वादिति । सत्तायां वेगजन्यकर्मवृत्तित्वेन साध्यसिद्धिः । कर्मति । वेगजन्यवेगवृत्तित्वेनार्थान्तरवारणाय कर्मति । उद्देश्यसिद्धये असमवायीति । घटत्यादौ व्यभिचारवारणाय वेगेति । वेगासमवायिकारणकवेगत्वे व्यभिचारवारणाय जातित्वादिति । ननु वेगे वेगासमवायिकारणकत्वावच्छेदकमसमवायिकारणतावच्छेद- कश्च जातिद्वयमस्ति । तथा चानुमानद्वये व्यभिचार इति चेत्र तत्रोपाध्योरेत्र कारणकत्वा- वच्छेदकत्वे जात्योर्मानाभावात् । वेगजन्यत्वकर्मजन्यत्वावच्छिन्नेति विशेषणमिति वेग- त्याच्याप्यवेगवृत्तिजातित्वस्य हेतुत्वाद्वा । - [ अ. टी.] सत्तादिना वेगसजातीयत्वं द्रव्यादेरप्यस्तीति गुणत्वावान्तरजाये- त्युक्तम् । वेगः स्थितिस्थापको भावना चेति नेधा संस्कारः । क्रिया प्रत्यसमवायिकारण- मिति विग्रहः । क्रियासमवायिकारणजातीयो वेग इत्युक्ते "संयोगे व्यभिचारः सादत 1 गुणवेगसजातीयेति घ, २ इत्युक्तमिति थ. ३ इत भारभ्य तेन रूपेणेत्यन्तो भागो नानि च पुस्तके. ४ अपीत्यनन्तरम् अतोऽत्यन्नान्तम् इति च, ५ कारमेति नाम्नि छ पुलके. ६ तरसभानीय इति पतनक्रियामिजभियेति च. ८ इत भारम्य पदिय नाम्नि घ पुस्तके. ९ घटत्वादीति छ. १० कारणरवेति च 11 कारणतायछेदकस्व इति स. १२'वेगेल्यारम्य विशेषणमितीयत नाम्नि छ पुन, १ सरवादिनेत्ति श. १४ कारणं यस्य स इति 2. १५ संयोगादाविति ज, . .
26 गुण- - प्रमाणिमझरी एकद्रव्यपदम् । क्रियासमवायिकारणकैकद्रव्यगात्रनिष्ठेन वेगेन सत्तागुणत्वान्यां सजातीय- रूपादौ व्यभिचारवारणाय अत्यन्तपदम् । गुरुत्वान्यत्वे संतीति ज्ञेयम् । दीपवे सत्येक- द्रव्यसमानाधिकरणमित्युक्ते रूपादिसमानाधिकरणत्वेन सिद्धसाधनता स्यादतः क्रिया- समवायिकारणपदम् । संयोगादिना समानाधिकरणत्वेन सिद्धसाधनताव्युदासार्थमेक- द्रव्यपदम् । जातित्वमात्मत्वे व्यभिचरतीति स्पर्शवत्पदम् । एवं प्रमाणवलादेवंविध- गुणसामानाधिकरण्ये दीपत्वस्य सिद्धे दीपोऽगुरुः पतनाधारत्वात्सम्मतवदिति गुरुत्वसामा- नाधिकरण्यप्रतिषेधे परिशेपाढेगसिद्धिः । सत्ताया गुरुत्वासमवायिकारणकपतनकियां प्रत्यसमवायिकारणगुरुत्वसमानाधिकरणबेनोक्तसाध्यवत्ता वेगो वेगवद्भिः पूर्वपूर्वजलावय- विभिरारभ्यमाणेषु कारणवेगपूर्वको ज्ञातव्यः । सत्ताया वेगजन्यक्रियाविशेषवृत्तित्वेन साध्य- वा । रूपादौ व्यभिचारवारणार्थ वेगजातित्यादित्युक्तम् । [वा. टी.] गुणत्वेति । घटनिवृत्तये अवान्तरेति । रूपनिवृत्तये गुणत्वेति । संयोगनिवृ. तये एकद्रव्येति । परन्वनिवृत्तये क्रियेति । क्रियया असमवायिकारणमिति विग्रहः । अव्याप्ति- निवारणाय सजातीयेति । घटनिवृत्तये अत्यन्तेति । येगत्वेनेत्यर्थः । आत्मनिवृत्तये स्पर्शव. दिति । पतनक्रिया समवायैकद्रव्यगुरुत्वसामानाधिकरण्येन दृष्टान्तसिद्धिः । घटनिवृत्तये वेगेति । वेगासमवायिकारणकर्मवृत्तित्वेन दृष्टान्तलामः । X * (स्थितिस्थापकः भावना च) यायव्यभावी संस्कारः स्थितिस्थापकः । सुघर्ण यावद्व्यभावि, अतीन्द्रियवद्धनावयत्वात् , सूचीवदिति तैत्सिद्धिः। संस्कारः पुरुपगुणो भावना । संस्कारत्वं पुरुपगुणवृत्ति,"स्थितिस्था : पकवेगजातित्वात् सत्तावदिति भावनासिद्धिः। [य. टी.] यावदिति । वेगभावनयोरतिव्याप्तिधारणाय व्यन्तम् । रूपादावतिव्या- सिभङ्गाय संस्कारत्वमुक्तम् । सुवर्णमिति । आकाशद्वित्वतत्संयोगादिनार्थान्तरवा- रणाय व्यन्तम् । रूपादिनार्थान्तरवारणाय वदन्तम् । द्रव्यत्यमानमत्र हेतुः । तेन न व्यर्थता। येगादावतिव्यामिवारणाय पुरुषेति । सुखादावतिन्यासिनिरासाय संस्कार इति । संस्कारत्वमिति । वेगादिवृत्तित्वेनार्थान्तरवारणाय पुरुपगुणेति। घटत्वे वारणार्थमिति . १ सतीति नास्ति श, .. ३ दीपस्वमेव दन्येति ज, ट. ४ एवमित्यारम्प गसिद्धिरित्यन्तं नाम्नि ट पुस्तके. ५ सम्प्रतिपसवदित्ययं इति ज, ट पुस्तकयोष्टिप्पणी. ६ पदमिदं नास्ति ज, ट. पुस्तकयो.. ७, ९ साध्यवस्यमिति रटान्तसिद्धिरित ट, ८ पूर्वपूर्वतरेति ट. १० रूपरवादाविनि ८. " भाविसंस्कार इति मु. १२ स्थितेति क, ख, ग. १३ तादिति गाम्ति ग, घ पुस्तकयोः. १४ स्थिति १५ धारणायेति च. ६ इतः पदनाय मान्ति च पुस्तके. १७ सूच्या गुरत्येन साध्यवत्ता संस्कार इत्यधिक च पुस्तके. काग.
निरूपणम्] टीकात्रयोपेता व्यभिचारवारणाय वेगेति । वेगत्वे व्यभिचारवारणाय स्थितिस्थापकेति । स्थिति- स्थापकत्वे व्यभिचारवारणाय वेगेति। वेगस्थितिस्थापकान्यतरले व्यभिचारवारणाय जातित्वादिति । सुखादिवृत्तित्वेन सत्तायां साध्यसिद्धिः। [अ. टी. ] यावद्रव्यमावी रूपादिरपि भवतीति संस्कारपदम् । वेगभावनयोयवच्छेदार्थ यावच्यभावीति । सुवर्णमतीन्द्रियवदित्युक्ते गगनादिसंयोगवत्वेन सिद्धसाधनता सादतो यावद्व्यभाविग्रहणम् । यावद्रव्यमावि रूपादिमत्वेन सिद्धसाधनताव्युदासार्थम् अतीन्द्रिययदित्युक्तम् । सूच्या गुरुत्वयोगात्साध्यवर्चा । पुरुषगुणो मापनेत्युक्ते बुध्यादावतिन्याप्तिः स्यादतस्संस्कारपदम् । वेगस्थितस्थापकयोर्व्यवच्छेदार्थ पुरुपगुणे- त्युक्तम् । स्थितस्थापकत्ववेगत्वयोरेकैकत्र व्यभिचारवारणार्थ स्थितस्थापकवेग- जातिवादित्युक्तम्। (वा. टी.] वेगनिवृत्तये यावद्रव्येति । रूपनिवृत्तये संस्कार इति । सुवर्णमिति । ननु धनावयवत्वं किं गुर्वषयवन्यम् ? निविडाश्यवत्वम् चा आधे हेत्वसिद्धिः । न हि तेजसि गुर्ववयव- त्वमस्ति । द्वितीयेऽपि किंबहवयत्वम् ? अन्यद्वा ! आये प्रभायामनैकान्तः, बहुपदवैयर्थ्यच व्यावीभावात् । द्वितीयेऽसम्भवः, निस्पयितुमशक्यत्वात् । किञ्च सूच्यातैजसत्वेनोक्तगुणाभावात् दृष्टान्तोऽपि साध्यविकल इत्यसझलमिदमनुमानमिति चेत्-न; धनवं नाम द्वत्वयोग्यत्वेऽपि घनोपलवदनुद्भूतद्रवत्वम्, तपाभूता अवयवा यस्येति तत्तथा, तस्य भाषस्तत्वं तस्मात् । तथाचेदमुकं भवति-द्रयावयवत्वयोग्यश्वस्यादिति । न च सूचीवदिति दृष्टान्तोऽपि साध्यविकलः । सूचीनाम सूक्ष्मस्तीक्ष्णश्शलाकापरपर्यायो द्रव्यविशेषः । स च लोहविकारवत्पार्थिवद्रव्यविशेषविका- रोऽपि सम्भवतीति स एवास्तु दृष्टान्त इति सर्व सुस्थम् । दिक्संयोगनिवृत्तये याबद्रव्यभावीति । रूपनिवृत्तये अतीन्द्रियचदिति (१) । रूपनिवृत्तये पुरुषेति । सुखनिवारणाय संस्कार इति। संस्कारत्वमिति। घटत्वानिवृत्तये वेगेति। विगत्वनिवृत्तये स्थितस्थापकेति। स्थितस्थापकनिवृत्तये वेगेति । इदं हि पुरुपगुणवृत्ति तदा भवेत् यदि कोऽपि संस्कारभेदः पुरुषगुणस्स्यादिति भावनासिद्धिः। दृष्टान्ते बुध्यादिवृत्तित्वेन सिद्धिः । । (धर्माधौं) अंतीन्द्रियः पुरुषैकवृत्तिः सुखहेतुर्धर्मः । अतीन्द्रियः पुरुपैकवृत्तिःखहेतुरधर्मः। तत्र प्रमाणम्-विमतं मूर्त- द्रव्यचलनं पुरुपगुणकारित, क्रियात्वात् , कलेवरचलनवदिति । रूपादेरपि सम्भवतीति ज.२ इति प्रान्तसिद्धिरित्यधिक द पुलके. ३, ५, ५ स्थितीति ट. प्रमाण-११ . . ८२ प्रमाणमअरी गुण - वि. टी.] अतीन्द्रिय इति । गुरुत्वेऽतिव्याप्तिवारणाय सुखहेतुरिति । आत्मम- नस्संयोगेऽतिव्याप्तिधारणाय पुरुपैकवृत्तिरिति । अतएव विपये नातिव्यातिः। विष- यसाक्षात्कारेऽतिव्याप्तिवारणाय अतीन्द्रिय इति । सुखासाधारणकारणत्वं धर्मत्वं वा. धर्मस्य लक्षणान्तरमूद्यम्। दुःखहेतुरिति । इदं विशेषणं भावनादावतिव्याप्तिनिरासाय । द्वेपसाक्षात्कारे तिव्याप्तिनिरासाय अतीन्द्रिय इति । अतीन्द्रियविपये ज्ञायमानतया दुःखहेतावतिया- तिनिरासाय पुरुपवृत्तित्वम् । आत्ममनरसंयोगैतिव्यासिनिरासाय एकति । दुःखा- साधारणकारणत्वं वाधर्मत्वमिति लक्षणान्तरमूबम् । विमतमिति । स्पर्शवद्वेगबहव्य- संयोगाद्यजन्यञ्चलनमित्यर्थः । अत एव न पक्षे द्रव्यपवैयर्थ्यम् । न वा मूर्तपदधैयर्थ्यम् । प्रयत्नासाधारणकारणकत्वरहितचलनस्यैव पक्षत्वात् । ईश्वरगुणकारित्वेनार्थान्तरवारणाय पुरुपपदं जीवपरम् । प्रयतकारितत्वेन कलेवरचलनस्स दृष्टान्तता । [अ.टी. ] अतीन्द्रियो धर्म इत्युक्ते गुरुत्वादौ व्यभिचारस्स्यात् अतः पुरुषपदम् । आरममनस्संयोगेऽतिव्याप्तिनिरासार्थम् एकपदम् । आत्मनिष्ठसंस्कारे व्यमिरिवारणाय सुखहेतुरित्युक्तम् । सुखहेतुकदलीफलादिव्यवच्छेदार्थ पुरुपवृत्तिपदम् । तथापीष्टवस्तुसाक्षात्कारे व्यभिचास्स्यादत उक्तम् अतीन्द्रिय इति । धर्मेऽतिव्यातिनिरासाय दुःखहेतुपदम् । धनिष्टवस्तुतत्साक्षारकारयोावर्तनाय पुरुपवृत्त्यतीन्द्रियपदे । मूर्तद्रव्य वायादि । तस्यानुकूल्यप्रातकूल्यायो चलनम् । ईशगुणकारितत्वेने सिद्धसाधनताब्युदासाय पुरुप- पदम् । शरीरचलनं पुरुपगुणप्रयत्नकारितम् । [वा. टी.] अतीन्द्रिय इति । आत्ममनस्संयोगनिवारणाय पुरुपैकवृत्तिरिति । प्रयत्ननिवार- णाप अतीन्द्रिय इति । भावनानिवारणाय सुखहेतुरिति । धर्मनिवारणाय दुःखेति । विमतमिति । ईशगुणकारितत्वेन सिद्धसाधननिवृत्तये पुरुषेति । पुरुपश्चात्र क्षेत्रज्ञः । दृष्टान्ते प्रयतेन सिद्धिः। पक्षेऽनुपपत्यादृष्टसिद्धिः । (शब्दलक्षणम्, तस्यानित्यत्वं गुणत्वञ्च) श्रोत्रैकग्राघजातिमान् शब्दः । सोऽनित्या, महाभूतविशेषगुण- त्वात् , घंटरूपयदित्यनित्यत्वसिद्विस्तस्य । शब्दो गुणः कर्मान्यत्वे सति सामान्येकाश्रयत्वात् रूपवदिति नासिद्धो हेतुः। १ धारणायेति च. २ जायमानेनि घ .३ उक्तमिति च. ४ कारणवमधर्मति छ. ५इव: पवयं नास्ति छ पुस्तके, ६ पदमिति र, ७.मूनत्वं पावादीति ट. स्थलनमिति क्ष. १० पटेति मु. ॥ तस्येति नाति क सके. ९त्येचेति ट. .
निरूपणम्] टीकाप्रयोपेता • वि. टी.] श्रोत्रेति । चक्षुर्मात्रग्राह्यजातिमति रूपेऽतिव्यातिवारणाय श्रोति । श्रोत्रग्राह्यगुणत्वादिमति रूपादावतिव्याप्तिवारणाय एकेति । श्रोत्रग्राह्यशब्दपति गगने- तिच्याप्तिवारणाय जातिपदम् । श्रोत्रनाये शब्देऽव्यामिवारणाय जातिमानिति । स इति.। जलपरमाणुरूपे व्यभिचारवारणाय महेति । ईश्वरज्ञाने व्यभिचारवारणाय भूतेति। नित्यपरिमाणे व्यभिचारवारणाय विशेपेति । शब्द इति । कर्मणि व्यभि- चारवारणाय सत्यन्तम् । सामान्यादौ व्यभिचारवारणाय सामान्याश्रयत्वम् । द्रव्ये व्यभिचारनिरासाय एकति समयायसम्बन्धेन जातिमानाश्रयत्वमिति विशेष्यार्थः। तेन सम्बन्धान्तरेणाभिधेयत्वादिसत्वेऽपि न क्षतिः । नासिद्ध इति । महाभूतविशेष- गुणत्वादिति हेतु सिद्ध इत्यर्थः । शब्दस विशेषगुणत्वमनुमानान्तरसिद्धमेव । : [अ. टी.] द्रव्यादिव्यवच्छेदार्थ श्रीनग्राधजातिमानित्युक्तम् । श्रोत्रमाद्यसत्ता- योगी द्रव्यादिरपि, अत एकपदम् । विशेषगुणत्वादियुक्त ईश्वरप्रयत्नादौ व्यभिचार- स्स्यादतो "महाभूतपदम् । महाभूतशब्दोऽत्यन्तोद्भूतत्वमैन्द्रियकत्वं द्योतयतीति न जलपरमाण्वादिविशेषगुणेषु व्यभिचार इति द्रष्टव्यम् । ननु शब्दस गुणत्वमेवासिद्धम् , दूरत एव विशेषगुणत्वम् । तत्राह-गब्दो गुण इति । सामान्यादौ व्यभिचारवारणाय सामान्याश्रयत्वादित्युक्तम् । तर्हि द्रव्ये व्यभिचारस्स्यादत उक्तम् एकेति । तथापि कर्मणि व्यभिचारस्यौदतः कर्मान्यत्वपर्दम् । विा. टी.] श्रोत्रेति । रूपनिवृत्तये श्रोत्रग्राह्येति । श्रोत्रप्राह्यसत्ताजातिमति घटेऽतिव्याप्ति- परिहाराय एफेति । शब्दत्वनिवृत्तये जातीति । सोऽनित्य इति । गगनपरिमाणनिवृत्तये विशेप इति । आप्याणुरूपनिवृत्तये महाभूतेति । महाभूतं महत्त्वाधिकारं भूतमित्यर्थः । ननु गुणत्वमेवासिद्धं दूरे विशेषगुणवमत आह-शब्दो गुण इति । स्पष्टम् । विशेषगुणत्यञ्च निय. मेनाश्रयोपलम्भमन्तरेणोपलम्यमानत्वाद्रष्टव्यम् । * (शब्दस्य नित्यत्वशङ्का तत्परिहारश्च) शम्यो निवः, अपाजनित्यशूनविझोपएणत्याल, सलिलप्रमाण- रूपयदिव्यन्वयव्यतिरेकिणा सत्प्रतिपक्ष इति चेत्-न; अस्य दृपणस्य पचनीयत्वाभावादपसिद्धान्तात् । किञ्च कोऽयं व्यतिरेकोऽस्य हेतोः। कि विपक्षेऽभावोऽन्यो चा? नायः, अपसिद्धान्तप्रसङ्गात् । अन्यश्चेद्विविच्य वाच्यः। दृश्ये प्रतियोगिनि हेती मर्यमाणे विपक्षोपलम्भः, ततो व्या- त्तिरिति चेत्-न; अनुभूयमाने तम्मिन् विपक्षे पश्यतोऽयं हेतुर्न स्यात् । अनुमानान्तरादिति च, २ योगिना याद्यपीति ज,t. ३शदोरपनो भूतत्वमिति श. ४ यार- पार्थमिति ज, द. ५ इत्यत इति ज, .. ६ धन्यरचे सतीनि विशेषणमिनिट. ७ पचनानि मु. ८ मपसिद्धान्त इति क. ९ किति मासिक पुस्तके देतोरिति ध, ममाणमञ्जरी [गुण- ततोऽननुभूयमाने तसिन् विपक्षोपलम्भः, ततो व्यावृत्तिरिति चेत्-न; प्रमेयत्वादीनां गर्मकत्वप्रसङ्गादनैकान्तिकोच्छेदमसङ्गात्, अनुमितानु- मानोच्छेदमसङ्गाच ततो व्यतिरेकासिद्धि विपक्षे हेतुविशेषणे चे दूपण- मिदमूह्यम् । तस्मात्पूर्वी हेतुरेव । शन्दस्य द्रव्यत्वसाधकं प्रमाणमप्रमा णम् । निरवयवेन्द्रियग्राह्यत्वं साक्षादिन्द्रियसम्बन्धेन मतीयमानत्वच व्यर्थविशेपणं मन्तव्यम्। .[व. टी. शब्द इति । वर्णात्मकश्शब्द इत्यर्थः । तेन न ध्वनिमादाय वाघः। वर्ण- पदवाच्य रूपमादाय बाधं वारयितुं शब्दपदम् । पृथिवीपरमाणुरूपादौ व्यभिचारखा रणाय अपाकजेति । नित्यभूतनिष्ठद्वित्यादौ व्यभिचारवारणाय विशेपेति । घटादि- रूपादौ व्यभिचारवारणाय नित्येति । मुखादी व्यभिचारवारणाय भूतेति। नित्यस्य भूतस्य गुणः, न तु निस्यो गुणः, तथा सति साध्यावैशिष्ट्यापातात् । वचनीयत्वेति । भवदनुमानं यद्यधिकलं तर्षबाधकमेव । यदि न्यूनवलं तदा पाध्यमेव । समक्लता तु वक्तुमशक्या । अस्मदनुमानेऽनुकूलतर्कसोपलम्भः । शब्दो नष्टः कोलाहल इत्यादिप्रती- तिर्न सादिति प्रेसङ्गलक्षणस्य विद्यमानत्वेनाधिकवलत्वात् । भवदनुमानस्सानुकूलतर्का- भावात् । प्रतिकूलतर्कत्वे हीनवलत्वात् प्रतिपक्षत्वाभिमतदूपणस वचनानहत्वादित्यर्थः । ननु हीनवलेन सत्प्रतिपक्षतात्वमित्यत आह अपसिद्धान्तादिति । यद्वा सत्प्रतिप- क्षमनङ्गीकुर्वाणं प्रत्याह अस्येति । ननु मदर्शने यद्यपि सत्प्रतिपक्षी दोपत्वेन न प्रतिपादितस्तथापि, अधुना मयैवोद्भाव्यत इत्यत आह अपसिद्धान्तादिति । यद्वा वया शब्दस्य द्रव्यत्वमङ्गीक्रियते न तु गुणत्वमित्यन्यतरासिद्धेन कथं सत्प्रतिपक्षानु- मानमित्यत आह अस्येति । ननु मयैवेदानी गुणत्वं स्वीकार्य शब्दस्येति चेत्-न; अपसिद्धान्तादिति । यद्वा न तु शब्दस्य धारया नित्यधारया नित्यत्वं त्वया यद्यपि मन्यते, तथापि न ध्वंसाप्रतियोगित्वलक्षणं नित्यत्वमित्याह अस्येति । ननु मया मन्यत एवं धंसप्रतियोगित्वलक्षणं नित्यत्वमिति चेत्-म; अपसिद्धान्तादिति। नन्वहं धंसाप्रतियोगित्यवादी शब्दस गुणत्ववादी च, सत्प्रतिपक्षस दूपणत्ववादी च । ममापि हेतौ यदि शब्दो नित्यो न स्याचर्हि स एवायं गकार इति प्रत्यभिज्ञायमानो न खादित्यनुकूलतर्कोऽस्तीत्यत आह किञ्चेति । अन्वयव्यतिरेकी भवतोक्तस्तन्त्र को यायं व्यतिरेक इत्यर्थः । अन्यो वेति । अधिकरणतज्ज्ञानधर्म्यतत्कालसम्बन्धपृथ- क्वान्यतम इत्यर्थः । अपसिद्धान्तेति । भवतो मतेऽतिरिक्तसाभावसाभावादिति भावः । यत्तु पार्थिवपरमाणुनिष्टानादिश्यामिकायां पाकजन्यायां पाकनिवायां साध्या- भावसत्वेऽपि हेत्वभावाभावायतिरेकस्योपसंहर्तुमशक्यत्वात्, व्याप्तिग्रहार्थश्च तत्र हेत्वभा- : मेयेति क, ग, घ. २ जनवरवेनि मु. ३ भनेकान्तिफरवेति मु. ४ प्रसदालेति मु. ५ चेति नाति क. ६ अप्रमाणमिति नास्ति ग. ७ सम्बन्धत्वमिति क. ८ सदेति च. ९ भादीति नास्ति च. १० मलिष्ट- प्रसनेति च. १ इतीति नास्ति च पुस्तके. १२ विषयो नैति च. " निरूपणम्] टीकाप्रयोपेता पाङ्गीकारेऽपसिद्धान्तादित्यर्थ इति, सन्नः पृथिवीपरमाणुनिष्ठानादिश्यामिकायां पाकाज- न्यायां प्रमाणाभावात् , तस्या अनादिभावत्वे नाशानुपपत्तेश्च । न च तत्र समानाधिकरणं रूपान्तरंमसमवायिकारणमिति वाच्यम् । रूपस्य स्वसमानाधिकरणरूपाजनकत्वनियमात् । तस्माधत्किञ्चिदेतत् । विविच्येति । स च विविच्य वक्तुमशक्य इत्यर्थः । प्रतियोगिनि बुद्धिस्थेऽधिकरणज्ञानमभाव इति मतमादाय शकते दृश्ये इति । दृश्यप्रमाणयोग्यो यः प्रतियोगिरूपो हेतुः तस्मिन् स्मर्यमाणे यद्विपक्षज्ञानं तदेवं विपक्षे, हेतोरभाव इत्यर्थः । संसर्गाभावस्तु योग्यप्रतियोगिक एष योग्य इति कृत्वा दृश्य इत्युक्तम् । यद्यप्यपाकज- नित्यभूतविशेषगुणत्वमतीन्द्रियं, तथापि प्रकृतप्रतियोगिनः प्रामाणिकत्वद्योतनाय दृश्य इत्युक्तम् । अप्रमितप्रतियोगिकस्साभावात् । यद्वा स्मरणं प्रति पूर्वज्ञानं कारणं तन्यतिरे- कैग कथं हेतोः स्मर्यमाणत्वमित्यत उक्तवान् दृश्य इति । पूर्वज्ञात इत्यर्थः । हेतो. रज्ञानदशायां विपक्षोपलम्भस्य हेत्वभावत्वं वारयितुं स्मर्यमाण इति । केवलस्य स्मर्य- माणस हेतोहेंत्वभावत्वं चारयितुं विपक्षेति । केवलहेती सर्यमायो ज्ञायमाने च विपक्षे हेत्वभावत्वं वारयितुं उपलम्भ इति । ननु विपक्षस्य हेत्वभावत्वे को दोप इति" चेत्-न पटे हेत्वभाव इत्याधाराधेयभावप्रतीत्यभावप्रसङ्गः । न चौपचारिक आधाराधेय- भाव इति वाच्यम् । मुख्यत्वे सम्भवति तदयोगात् । हेतौ मर्यमाणत्वविशेषणप्रयोज- भावमानं व्ययहियेत नाहि व्यपहर्तव्यज्ञाने भावः । दूपयति अननुभूयमान इति । पश्यत इति । हेतुमनुभवतः प्रमातुरथवा हेतुमनुभवतः प्रमावर प्रति सद्धेतुनं सात् । अयं निगर्वः । स्मर्यमाण इति । विशेषगमहिना हेतोरनुभूयमानत्वदशायां विपक्षेऽभावाभावात् व्यभिचारप्रसङ्ग इति । विपक्ष पश्यत इति पाठे तस्मिन् हेतावि- त्यर्थः । तत इति । पूर्वदूषणपरिहारार्थ पर्युदासलक्षणया अनुभूयमानसदृशे ज्ञायमान इति यावदित्यर्थः । एँवं हेतोरनुभवदशायामपि हेतुत्वाभावः प्राप्तः । ममेयत्वादी- नामिति । अनित्यत्वादिसाधकप्रमेयत्वादिहेतूनां व्यभिचारिणामपि ज्ञानदशायां विपक्षेऽभावप्रसङ्गेन सद्धेतुत्यप्रसङ्गायभिचारोच्छेदप्रसङ्गादित्यर्थः । ननु भवतु व्यभिचा- रोच्छेदप्रसङ्ग इत्यत आह-अनुमितेति । उपधिनानुमितेन व्यभिचारेणासाधकतानु- मानोच्छेदप्रसङ्गादित्यर्थः । केवलान्वयित्वभङ्गप्रसङ्गोऽपि दोपो बोध्यः । ननु केवला- न्वयित्वं प्रतियोग्यधिकरणभिन्नाधिकरणासन्ताभावाप्रतियोगित्वं, तच्चाक्षतमेव । न च, व्यभिचारोच्छेदोऽपि, स्वस्याविद्यमानत्वेऽपि साध्यात्यन्ताभाववद्गामित्वस्य सत्वादिति चेद-मैवम् भवतः प्रसङ्गामावयोरेकावच्छेदेनैकत्र वृत्तौ विरोधस्याप्युच्छेदापत्तिः, गोत्वाश्चत्वविरोधस्याप्युच्छेदापत्तः । गोत्वाचत्वविरोधस्स गोत्याश्वत्वसमानाधिकरणगो. रूपान्तरसमवायीति च. २ नत्र विपक्ष इति च, '३ सति वदिति च. ध्यवाहियते इति.च. ५ अपेक्षामाव'इति छ. ६ प्रत्ययमिति च, ७ एयमित्यारभ्य प्रसङ्गादित्यर्थ इत्यन्तो भागो नास्ति छ. एकवृत्ताविति च, ९ पोरिनि च.
- -- प्रमाणमञ्जरी [[गुण- त्याश्वत्यात्यन्ताभावनिष्ठप्रतियोगिनिरूपितविरोधोपजीवकत्यादिति दिक.. उपसंहरति तत इति । स्वदर्शनमाश्रित्य भवता व्यभिचारादिदोपग्रासेन व्यतिरेको निरूपयितुं न शक्यत इत्यर्थः । ननु प्रतियोगिनि बुद्धिस्थे केवलाधिकरणज्ञानमभावः, नच, प्रमेयत्वा- धिकरणं केवलं भवति । तथाच न व्यभिचाराधुच्छेद इत्यत आहं विपक्ष इति । कैवल्यं हि हेतुमदधिकरणमिन्नाधिकरणत्वं विपक्षस्य वाच्यम् । एवञ्च भेदनिरूपिततया हेतुरूपे विशेषणे देये इदमेव नित्यत्वसाधकभवदनुमानस प्रतिकूलतर्कानुकूलतर्कामा- वाभ्यां न्यूनबलत्वलक्षणं दूपणं बोध्यमित्यर्थः । स्वहेतोः सद्धेतुत्वमुपसंहरति तस्मा- दिति । दूपणस्य परिहृतत्वात् । पूर्व एव शब्दानित्यत्वसाधक एव सहेतुरित्यर्थः । अन्ये तु-तत इत्युपलम्भविशिष्टाद्विपक्षाद्याइत्तिः हेतोस्स व्यतिरेकः । नानुभूयमान इति । अनुभूयमाने विपक्षेऽधिकरणे हेतुं पश्यतोऽयमन्वयव्यतिरेकी हेतुर्न स्यात्, व्यतिरेकासम्भवात् । अयं दोपस्तु यथा कदाचित् घटवत्तया प्रमिते भूतले घटाभावः प्रमा, तथा हेतुमत्तया प्रमिते विपक्षे हेत्वभावः अमेति यदि विवक्षितं, तदा योध्यः । ननु यत्र कचित्प्रमितस्य हेतोः प्रमिते विपक्षेऽभावो वाच्य इत्यत आह ततोऽननुभू- यमान इति । यतो विपक्षनिष्ठतया हेतोरनुभूयमानत्वे वक्तव्ये उक्तदोपः, अतो विर्ष- क्षानिष्ठतयानुभूयमाने तस्मिन् हेती केवल विपक्षोपलम्भस्सर्चकाले । ततो व्यावृत्तिहेतो- व्यतिरेक इत्यर्थः । यत्र हेतुर्वर्तते तदत्तित्वावच्छिन्नो हेतुस्समारोप्य निपिध्यत इत्यभि- मतं तत्राह नेति । अनित्यत्वादिसाघेकप्रमेयत्वस्य सपक्षवृत्तित्वावच्छिन्नस्य विपक्ष आरो: पपूर्वकनिषेधावगमसम्भवेन व्यभिचाराभावप्रसङ्गादित्यर्थः । किञ्च यत्र प्रतिज्ञाद्यन्यतः मावयवज्ञानेन हेतोरवगतिः, तत्र वाचनिकविपक्षोपलम्भाभावादुक्तरूपव्यतिरेकासिद्धी अनुमितानुमानं न स्यादित्याह अनुमितेति । यद्वा व्यतिरेकानिरूपणादेवानुमितानुमा;. नोच्छेदप्रसङ्गो बोध्या, गुरुमतेऽभावासम्भवात् । नन्वेवमभावखण्डनेऽतिप्रसक्तिरित्यत आह विपक्ष इति । मुख्यो दोपो व्यतिरेकासम्भव एव । इदन्तु दूषणं. विपक्षे हेतु- विशेषणे सत्यूद्यमिति ब्याचक्रुः, तेन्मन्दम् ; उदक्षरत्वात्, सपक्षवृत्तित्वावच्छिन्नेत्यादेर- ध्याहाराच । शब्दस्येति । निरवयवेन्द्रियग्राह्यत्वं यच्छब्दस्य द्रव्यत्वसाधकं प्रमाणम् , यच साक्षादिन्द्रियसम्बन्धेन प्रमाणम्, तदप्रमाणम् । तथा हि-निरक्यवेन्द्रियग्राह्यत्वं सुखादी व्यभिचारि, द्वितीयं साधनं ध्वनौ तत्यागभावादौ च व्यभिचारि, गुणत्वसाध- नेन विरुद्धश्च । यदि निरवयवेन्द्रियग्राह्यस्वे सति साक्षादिन्द्रियसम्बन्धेन प्रतीयमानत्वं मिलितं हेतुः, तदा व्यर्थविशेषणत्वं बोध्यम् । रूपादौ व्यभिचारवारणाय निरवयवेति । निरवयव आत्मा तजन्यग्रहविपयरूपादौ व्यभिचारवारणाय इन्द्रियेति । न च मनो- ग्राह्यरूपादौ तदवस्थो व्यभिचारः, लौकिकात्यासत्या निरवयवेन्द्रियग्राह्यत्वस्य विवक्षि- तत्वात् । द्वितीयहेतौ रूपादौ व्यभिचारवारणाय साक्षादिति । अनुमानेन साक्षात्स- २ निरूपकवयेति च. ३ हेतोरनुभूयमानेनि छ. ४ विपक्षनिष्टतयेति छ. . वक्तव्यमिति च. ५ तोति च.
। निरूपणम् ] टीकात्रयोपेता म्बन्धेन प्रतीयमाने रूपादौ व्यभिचारवारणाय इन्द्रियेति । अत्रापि लौकिकात्यारा- तिर्योध्या। धर्मधर्मिणोरभेदवादिमते साक्षात्पदस्थापि व्यर्थता बोध्या । .[अ. टी. तथापि शन्दानित्यत्वानुमानं नः युक्तमिति शकते-शब्दो नित्य इति । विशेपर्गुणत्वादित्युक्ते बुध्यादौ व्यभिचारस्यादत उक्तम् भूतपदम् । घटरूपादौ व्यभिचार- वारणार्य नित्यपदम् । नित्यभूतविशेषगुणवादित्युक्तेऽपि पार्थिवपरमाणुरूपादौ व्यमि- चारस्ततः अपाकजपदम् । प्रतिपक्षानुमानस दौर्बल्यान्मैवमित्याह नास्येति । स्वयू- ध्यापसिद्धान्तापादकत्वादवचनीयोऽयं प्रयोग इत्यर्थः । तथापि निर्दुष्टप्रयोगविरोधे कथं पूर्वस सद्धेतुत्वं तबाह-कोऽयं व्यतिरेक इति । यत्रानित्यत्वं तत्रापाकजनित्यभूतविशे- वगुणवं नास्तीति व्यतिरेकस शब्दानित्यत्ववादिना वक्तुमशक्यत्वात् । नित्सवाङ्गीकारेऽपि पार्थिवपरमाणुगतानादिश्यामत्वे पाकजेनिवर्य साध्याभावेऽपि साधनमावाव्यतिरेकाभावात् गुरुमंते चाभावाभावात् व्यतिरेकार्थ तदङ्गीकारेऽपसिद्धान्तापातान्नाय इत्याह नाद्य इति । अन्यस्य व्यक्तिरेकसाप्रसिद्धत्वान्नान्योऽपि युक्त इत्याह अन्यथेदिति । परैः प्रकारान्तरं.. सम्पादयति दृश्ये प्रतियोगिनीति । दृश्ये प्रमाणदर्शनयोग्ये हेतुलक्षणप्रतियोगिनि स्मर्यमाणे सति यो विपक्षोपलम्भस्तद्विशिष्टाद्विपक्षाततो या व्यावृत्तिहेतोः स व्यतिरेकः । प्रमाणयोग्यस्य हेतोः प्रमाणयोग्यविपक्षाध्यावृत्तिहतोयतिरेक इति संक्षेपः। अत्र । वक्तव्यम्-किं यथा भूतले प्रमाणदृष्टस्य घदस्य कदाचिदभावग्रहः तथा विपक्षे प्रमाणगृहीतस्य हेतोस्तत्रामावः प्रमा? किं वा गगने प्रमाणगृहीतस्य सूर्यादे माव- भाववदन्यत्र प्रमितस्य हेतोरभावग्रहो विपक्षे तत्र न प्रथम इत्याह-नानुभूयमान इति। प्रमीयमाणे विपक्षे पश्यतो हेतुमिति शेषः । अभावासम्भवादयमन्वयव्यतिरेकी हेतुर्न स्यात् । द्वितीयमुत्यापयति-ततोऽननुभूयमान इति ।' यतोऽनुभूयमानवे उक्तदोपस्ततोऽ. नंनुभूयमाने तस्मिन् हेतौ केवलं विपक्षोपलम्मः सर्वकालं ततो व्यावृत्तिहतोयतिरेक इत्यर्थः । तत्रापि. वक्तव्यम्-यत्र हेतुर्वर्तते, तेन सहैव विपक्षे समारोपनिषेधाभ्यां ध्यावृत्त्यवगमः, यथा भूतले सह नमसा चन्द्रोऽयमिति समारोपनिषेधाभ्यां तदभावावगतिः । किमेवधे- तमाह-न मेयत्वादीनामिति । विपक्षे सपक्षम्रान्तौ तनिषेधे प्रमेयत्वादिहेतोरुक्तव्य- तिरेकसम्मवेन गमकत्वम् । ततः शब्दानित्यत्वादिसाधने प्रमेयत्वादिदेतोरनेकान्तिकहेत्वा.. भासत्वोच्छेदप्रसङ्ग इति भावः । किश्च यत्र प्रतिज्ञायन्यतमावयवदर्शनादनुमानमूह्यते, तत्र याचनिकविपक्षोपलम्भाभावादुक्कय्यतिरेकासिद्धावनुमितानुमानभास्स्यादित्साह अनुमि- तेति । अथवा व्यतिरेकानिरूपणादेवानकोन्तानुमानोच्छेदो द्रष्टव्यः, गुरुमते घ्यावृत्तेरस १ गुणस्वादिति श. २ मिति नास्तिज, ट पुस्तकयोः. ३ यूथ्यस्येति ज, ट. १ गतादि- श्यामस्य इति १.५ पाकनिवार्येति ज, पाकानिरस्येति द. ७ यथास्थितमपि भ्रान्त्या पर इति ट. ८ त इति नाति पुस्तके. ९ महणमिति ट. १० परपक्ष इति र. ज, ८. १२ मन्वष्यनिरेकाभ्यामित्यधिक र पुमके, ५ यप्रेयमिति ट. १४ भासोर देति स. १५ भनेका न्वानुमितानुमानैति ३. Pr साधनाभावादिति झ. 11 केवलति प्रमाणमारी . [गुण म्भवात् । नन्वेनं व्यतिरेकिखण्डनेऽतिप्रसङ्ग इत्यत आह विपक्ष इति । मुख्यं दूपर्ण शब्दनित्यत्ववादिनो गुरुमते च न व्यतिरेकलाम इति पूर्वमेवोक्तम् । इदन्तु विपक्षे हेतु विशेषणे विपक्षोपलम्भस्ततो.व्यावृत्तिरित्येवं सति दूपणमूह्यम् । बुद्धिविस्फारणाय च प्रसि- द्धव्यतिरेकापलापासम्भवादिति भावः । यस्मात्प्रतिपक्षहेतुर्न सम्भवति स्वयूथ्यानुसारेण, न च शब्दनित्यत्वमतानुसारेण । अयं प्रयोगो युक्तः, गुरुमते व्यतिरेकानिरूपणात् । भाट्टैश- ब्दस्य गुणत्वानङ्गीकारेणान्यतरासिद्धत्वात् , वर्णात्मकाा ये शब्दाः नित्यास्सर्वगताच ते । स्वयं द्रव्यतया ते हि न गुणाः कस्यचिन्मताः ।। इत्युक्तत्वाच । अत उपसंहरति तस्मादिति । हेतुरेव सद्धतुरेवेत्यर्थः । शन्दस गुणत्वे प्रमाणस्य दर्शितत्वात्तद्विरुद्धं द्रव्यत्वसाधनं साधनामास इत्याह शब्दस्येति । नित्यः शब्दो निरवयवेन्द्रियग्राह्यत्वादात्मवदिति नित्यत्वप्रमाणं सुखादौ व्यभिचरति ।.,शब्दो द्रव्यं साक्षादिन्द्रियसम्बन्धेन प्रतीयमानत्वाद्धंटवदिति द्रव्यत्वसाधनम् । एतच गुणत्वसा- धनविरुद्धम् । एवं शन्दस्य नित्यत्वद्रव्यत्वसाधकप्रयोगद्वये दूपणम् । ग्रन्थकारस्तु शब्दो द्रव्यं निरवयवेन्द्रियग्राह्यत्वे सति साक्षादिन्द्रियसम्बन्धेन प्रतीयमानत्वादित्येकं हेतुं कृत्वा निरवयवेन्द्रियग्राह्यविशेषणस्य वैयर्यमाह-निरवयव इति । लिङ्गसम्बन्धेन प्रतीय- मानपरमाणुरूपादौ व्यभिचारवारणार्थमिन्द्रियपदम् । घटरूपादौ व्यभिचारवारणार्थ साक्षात्पदम् । एवमुक्त व्यभिचाराभावाद्यर्थ विशेषणम् । द्रव्यत्वे प्रयोगद्वये च निरवयवे. न्द्रियग्राह्यत्वं रूपादौ व्यभिचारावारकत्वाबर्थ विशेषणम् । गुणगुणिनोमेिदवादे रूपादे- द्रव्यत्वसम्भवात्साक्षादिति विशेषणम् । विपक्षाव्यावर्तकत्वाव्यर्थ कथञ्चिद्रष्टव्यम् । [वा. टी.] शब्द इति । संयोगनिवारणाय विशेपेति । सुखनिवृत्तये भूतेति निवारणाय नित्येति। पार्थिवपरमाणुरूपनिवृत्तये अपाकजेति । दूषयति नास्येति । हेतोर्विशेषणासिद्धत्वात् । दृश्यते हि वाताग्निसंयोगेनापि शब्दोत्पत्तिरिति । किञ्च कोऽयमित्याशङ्कते- किं नैयायिकः कश्चित् ? गुरुपक्षी वा ? नाद्य इत्याह अपसिद्धान्तेति । द्वितीयवेत्तत्राह कोs- यमिति । अपसिद्धान्तेति । स्वरूपातिरिकामावस्यानङ्गीकारादिति भावः । द्वितीय आह- अन्यश्चेदिति... । दृश्य इति । प्रमाणयोग्ये हेतौ प्रतियोगिनि स्मर्यमाणे यः प्रमाणयोग्य विपक्षोपलम्भः स तस्य हेतोः, ततो विपक्षे व्यतिरेक इति यावत् । तत्र किं हेतुसहितस्य विपक्षस्यो- पलम्भः, तद्रहितस्य वा! नाद्य इत्याह अनुभूयेति । हेतुमिति शेषः । प्रतीयमाने विपक्षे तत्र हेतुं पश्यतोऽनुभवत्रतोऽयम् अन्वयव्यतिरेकी हेतुर्न स्यादिति योजना । द्वितीयमनुवदति अनन· भूयमान इति । तत्रापि वक्तव्यम्-किं विपक्षे हेतौ सत्येव तदननुभवः ? असति वा नाप इत्याह मेयत्वादीनामपीति । अस्ति हि मेयत्वादीनामपि विपक्षेऽननुभवः, अनुभवकारणाभावाद्वा, १ मुख्यं हीति ट. २ शब्दानित्यरवेति ज, ट. ३ विस्मारणायेति .. ५नित्यस्ये इति इ. ६प्राशरवस्यति ट. ७, ८ घ्युदासाथैमिति ज, . ५ नित्यत्वप्रयोगेति द. १० भेदादेवेति ट. घट- वणी मनतिज,ट.
९० • [कर्म- प्रमाणमक्षरी ष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वेन शब्दत्वान्पूनवृत्तित्याभावात् । यद्वा गुणत्वव्याप्यजात्यच्या- प्यशब्दवृत्तिजातित्वस्य हेतुत्वात् । सत्तासंयोगासमवायिकारणके घटादावस्तीति दृष्टा- न्तसिद्धिः । द्वितीयसाध्येऑन्तरवारणाय विभागेति । विभागस्थासमयायिकारणत्व- सिद्धये असमवायोति द्वितीयहेतुः । पूर्ववद्विवक्षणीयविभागजविमागवृत्तित्वेन दृष्टा- न्ससिद्धिः । गुणत्वावान्तरेति । शब्दस गुणवजात्या सजातीयससंयोगादिः । तज्ज- न्यवृत्तित्वेनार्थान्तरवारणार्थ गुणत्वावान्तरेति । शब्दसंयोगान्यतरत्वेन सजातीय- संयोगजन्यवृत्तित्वेनार्थान्तरं वारयितुं जात्या साजात्यमुक्तम् । हेतुः पूर्ववत् । रूपादि- जन्यवृत्तित्वेन दृष्टान्तसङ्गतिः। इति प्रमाणमञ्जरीव्याख्याने गुणपदार्थस्समासः । [अ. टी.] संयोगजो विभागजशब्दजश्वेति निविधः शब्दः । संयोगोऽसमवायिकारणं यस्पेति विग्रहः । रूपादौ व्यभिचारखारणाय शब्दजातित्यादित्युक्तम् । सत्तायाः सजातीयद्रव्यारम्यवृत्तित्वेन सिद्धसाधनताब्युदासार्थम् अयान्तरजात्येत्युक्तम् । गुणत्वजात्या सजातीयसंयोगारन्यवृत्तित्वेन सिद्धसाधनतायुदासार्थ गुणत्यावान्तर- जात्येत्युक्तम् । इति प्रमाणमञ्जरीटिप्पणेऽद्वयारण्ययोगिविरचिते गुणपदार्थः । (कर्मणो लक्षणं तस्य प्रत्यक्षत्वश्च ) एकद्रव्यविभागासमवायिकारणसजातीयं कर्म । तत् प्रत्यक्षं, प्रमे यत्वात् , घटव दिति तस्य प्रत्यक्षत्वम् । घटकर्म, अस्मदादिप्रत्यक्षं, गुणा- न्यत्वे सति घटसमवेतत्वात्, सत्तावदित्यस्मदादिप्रत्यक्षम् । व. टी.एकेति। अव्यासज्यवृत्तिविभागासमवायिकारणकृत्यपरसामान्यपत्कर्मत्यर्थः । विभागासमवायिकारणे विभागेऽतिव्याप्तिवारणाय एकद्रव्येति । रूपादावतिच्याप्ति वारयितुं विभागेति । द्रव्येऽतिव्याप्तिभङ्गाय असमयायीति । सत्तामादाय तदोपं वारयितुम् अपरेति । विभागघटान्यतरत्नादिकमादाय दोपं वारयितुं सामान्येति । न च गुणत्वमादाय रूपादापतिव्याप्तिः, गुणत्वेतरजातरुक्तत्वात् । यद्वा विभागासम- वायिकारणतावच्छेदकजातिमदित्यर्थः । न चाविनश्यदवस्थकर्मत्वमसमयायिकारणताव. च्छेदकम् , तच न सामान्य मित्यसम्भव इति वाच्यम्, किञ्चिद्विशेषणवहिनजातेरेवा- योपाधित्वात् । अन्यतरत्यादिकन्तु नावच्छेदकं, गौरवात् अतिप्रसङ्गाय । वस्तुतस्तु- वृत्तित्वस्येति च. २ घटादारपीति च. ३ पदमिदं नास्ति च पुखके. ५ स्पादिवृत्तिस्येनेति । ५ रूपरवादाविति ज, . ६ वारणार्थमिति न, ट. ७ सत्येति , द. निरासार्थमिति ज, ह. ९ टिप्पणके इति ट. १० कारणजातीयमिति ख, गुरुत्वाम्मस्व इति स, ग, घ. १२ प्रत्यक्षरमिति मु. १३ वृत्तिसत्तासाझाबाप्याररेति घ. १४ मारणायेति च.
"निरामायेति ए. प्रारत इति ज्ञानविषयावमिति सशत्वेक्षिक सामानामन्यादाविति निरूपणम्] टीकामयोपेता एकद्भव्यविभागासमवायिकारणतावच्छेदस्वत्कर्म इत्येव लक्षणार्थः । न न न्यर्थता । न व विनश्यदेवस्थकर्मणि अविनश्यवस्थकर्मस्वस विभागासमाविकारशतावच्छेदकस्सा भावाव्याप्तिरिति वाच्यम् । अविनश्यदयस्थतादशायां तत्रापि तत्सत्वात् । पहा एक- द्रव्यं यद्विमागासमवाधिकारणं तदतिपदार्थविभाजकोपाधिमत् कर्मत्यर्थः । एकद्रव्य कर्मेति वक्तव्ये परिमायादापतिप्रसक्ति, सन्निरसाय(१)परविशेषणम् ! यतु फेलाच- दुक्तम्-फेवलसंयोगजनके कर्मण्यन्यानिवारणाय सजातीयपदमिति, सन्न। संयोगजनसे कर्मणि विभागजनकत्वस्यावश्यकत्वात् सेयोगस पूर्वदेशविभागोत्तरकालीनत्वात् । नदिति। कमेत्यर्थः । न च परमाण्यादौ व्यभिचार, तत्रायलौकिकप्रत्यक्षादिविपयत्यस प्रत्यक्षविपपमानव या माध्यत्वात् । अतएवामदादिप्रत्यक्षमग्ने साधयिष्यति । रिएए- त्खादित्येव हेतुः, न तु प्रमाविषयत्वं हेत:, व्यर्थविशेषणत्वात् । यता-ज्ञानं द्वारीवत्स साक्षासम्बन्धन पारर्तमानमेव हेतुः । यता-उद्देश्यसिद्धये प्रत्यक्षप्रमाविषयत्व साध्यम् , सेनासद्वैशिष्ट्ये व्यभिचारधारणाय प्रमाविषयलं हेतुः । ननु लौक्तिमत्यक्षविपयत्वं न सिद्धमत आह, घटकर्मति । अर्थान्तरवारणाय अस्मदादीति । नन्यस्मदादिना प्रमेय स्वादिना गृह्यत एवेत्यान्तरमिति चेत्ना लौकिकप्रत्यक्षविषयत्वस्य साध्यत्वात् । अत्य- शत्वं जातिरिति न व्यर्थतानि विन्द्रियजन्यज्ञानता, येनेन्द्रियजन्यत्वभागगर्च सात् । यद्वा-लौकिकज्ञानविषयत्वमेव साध्यम् । यहा-अलौकिकात्यासत्यजन्यजन्यज्ञान - विषयत्वे साध्येऽनुमित्यादिनार्थान्तरं सार, तदर्थे प्रत्यक्षविशेषणम् । यच्चात्ममनरसं- योगेन लौकिक्सत्यासत्यानुमित्यादिर्जन्यत एवेति प्रत्यक्षत्यविशेषणमिति, सभा एए- मप्पलौकिरात्यक्षेपार्थान्तराराताल, तस्याप्यात्ममनासंयोगजन्यत्यान् । तस्माद्रायेणैव लौकिकसानकों लौकिकसान्निात्वेन फारणम् । तेनानुमित्यादौ न लौकिकता । यद्वा- इन्द्रियत्वेनेन्द्रियनि-पितसंयोगादिः, तथानमित्यादौ मनस्त्वेन मनोनिरुपितकारण संयोगः । गुरुत्वादौ व्यभिचार वारयितुं गुणान्यत्वे सतीति विशेषणम् । परमाणु- 'समवेतविशेषादौ दोपनिरासार्थ घटेति । साक्षात्समयायो विवक्षितः । तेन संयुक्तसमः, पायेन घटसमवेते विशेषादौ न व्यभिचार । घटनिष्ठपरमाणत्वात्पन्नामावादी व्यभि- चारपारण संसदेतविशेषणेन । अत्र प्रत्यक्षयोग्यता साध्या, वेनाप्रत्यक्षविशिष्टकर्मणि न वाघः । एवं पटफर्मादायपि सापम् । गुणान्यत्वे सति पटसमवेतत्यादिहेतुः । प्रत्यक्ष निष्ठकर्ममात्रपक्षीकरणे, विशेषान्यत्वे सति गुणान्यत्वे सात प्रत्यक्षसमवेतत्वादितः । अ.टी. निमिाकारणसजातीयेश्वरप्रयत्नादावृतिव्यासिनि सार्थम् असमयायिपदम् । घटरूपायसमवायिकारणतन्तुरूपादिव्यवच्छेदार्थ विभागपदम् । विभागासमयायिकारण- विभागनिरासार्थम् एकद्रव्यपदम् । एकमेव द्रव्यमाश्रयो यस तदेकद्रव्यम् । कर्मयुक्त नसंयोगवति ।. २ विएस्पेवि इ. ३ प्रत्यक्षवमिति प. घतमान हामावति च, १. १० समवेतत्येति प्रविष्टविध, १२ पुरासायमिति निरूपणम्] टीकानयोपेता म्भकत्वेन सफलकारणरूपसामम्पभावादिति भावः । विकल्पेति । वक्ष्यमाणविकल्पेन सम्भवत्पक्षय क्षणिकत्वस्थानुपपत्तेरित्यर्थः । व्यावृत्ताविति । तत्र सचमस्ति क्षणिक- त्वच नास्तीति व्यभिचारादित्यर्थः ।। ननु व्यावृत्तिरपोहो : मैया न मन्यते, किन्तु भावान्तरमेव से इति शङ्कते अथेति । व्यावृत्तावसत्यामिति । सकलसाध्यसाधनसशाहकन्याइनिरूपधर्मामा- वादिति भावःवस्तुतस्तु हेतुमति कचित्क्षणिकत्वं व्यावर्तते न था ? आघमाह व्याय- ताविति । द्वितीयं शङ्कते अथेति । समाधत्ते व्यावृत्तावसत्यामिति । क्षणिकयं हि क्षणमात्रावस्थायित्वमानपदार्थोऽस्तु स्वपूर्वोत्तरक्षणयोर्भावस्य व्यावृत्तिः । व्यावृत्य- नङ्गीकारे तखटितक्षपिकत्वस्य वक्तुमशक्यत्वेन व्याप्तिग्रहवैधु क्षणिकत्यसाधनत्याभि- मतानुमानस्याभावप्रसङ्गादित्यर्थः । किञ्च व्यावृत्त्यनङ्गीकारे भवदभिमतव्यतिरकव्यासि- भङ्गसङ्गः । भावभिन्ननित्याभावस स्वीकृतस परित्यागेऽपसिद्धान्तमाह अपसिद्धा- न्तेति । ननु भवत्वतिरिक्ता व्यावृत्तिरिति चेत्-न तदा भवदभिमतनित्यव्यावृत्तावेय व्यभिचारात्, क्षणिकत्वाभाषाधिकरणसैव सैर्य स्वीकारापत्तश्च । साध्याप्रसिध्या व्याप्ति- ग्राहकप्रमाणाभावत्वेनेव चरमशब्द एव साध्यप्रसिद्धिरिति वाच्यम् । तस्यापि स्थिरता- ङ्गीकारात् । न च क्षणिकत्वाप्रसिध्या कथं क्षणिकत्वनिषेध इति वाच्यम् । घटः स्वाव्य- वहितोत्तरक्षणवर्तिध्वंसप्रतियोगी नेति निषेधशरीरस्वीकारात् । घटाव्यरहितोत्तरक्षणपति- सप्रतियोगित्वस प्रतियोगिनो घट .......प्राइनटे वस्तुनि सिद्धः । सम्प्रतिपन्न- वदिति । सम्प्रतिपन्ना व्यावृत्तिः, स्वशब्देन कर्मणे उक्तत्वेन कर्मोत्तरक्षो वर्तमानो भावो वा सम्प्रतिपन्न इति;निगर्वः । इति कर्मपदार्थः। [अ. टी. कर्मणोऽसमवायिकारणत्वमुक्तं, तदाक्षिपति यत्सदिति। सन्तश्चामी भावा इति । द्रव्यादीनामपि क्षणिकत्वेन कारणत्वमाक्षिप्तम् । लन्धसत्ताकानां कारणानां मेलने सामग्री, ततः कार्यजननमित्यनेकक्षणस्थित्यपेक्षणात् । क्षणीभूते कारणत्वासम्भव इत्यर्थः । क्षणिकत्वे लक्षणसाध्यानिर्वचनान्मैवमित्याह नेति । क्षणे भवतीति क्षणेमतः । तत्सम्भ- यात् क्षणावस्थानसम्भवादित्यर्थः । च्यावृत्तिरपोहशब्दार्थभूतः, तस्य च व्याप्तिग्रहाध- क्रियाहेतुत्वात्सत्त्वमिति युक्ता तत्रानकान्तिकता। अथ भावान्तरमेव भावान्तरापोहा, ततो नोक्तो दोष इति शङ्कते अथेति । इट- हान्यां परिहरति न व्यावृत्ताविति । स्वलक्षणं सर्वतो व्यावृत्तमसाधारणं भावरूपम् । अनुमानाभावे तत्प्रमेयत्वेनेटक्षणिकत्वहानिरित्यर्थः । भावाद्भिन्नस्य नित्यस्खाभावस्य स्वीकृत- भारम्मकस्ये सति क्षणिकायेन मालकारणसम्बन्ध रूपेनि छ. २ चेति नास्ति च पुन. ३ मयेति नान्ति र सेति च. ५ पहिरियं नास्ति च पुस्तके, ६ प्रसङ्ग इलि नास्ति च पुस्तके. पदमिदं नाति च पुस्तके. ८ सिदिरिति च. ९ सम्मतिपति घ. १० पदद्वयं नास्ति च पुस्तके ११क्षगिस्त्य इति ट. १२ भवति विश्तीति ८.३ भावान्तरति नास्ति क्ष. १४ मध्यसमिति ८५ स्वरूपमिति च, . १६ पदमिदं नास्ति पुसके. । ..
९२ प्रमाणमसरी नित्यपरिमाणेऽतिन्यासिः सादतः असमवायिकारणपदम्। कारणरूपादिविभागपद- व्यवच्छेध पूर्ववत् । केवलसंयोगजनके कर्मण्यतिव्याप्तिनिरासाथ सजातीयपदम् । नत्र किं प्रमाणम् ? प्रत्यक्षं कुतः ? इत्यत आह तत्प्रत्यक्षमिति। तदृष्ट्यदिवद्योगिप्रत्यक्षगम्य- मेवेत्यत आह घटकर्मति । परमाण्वादिसमवेतेपु विशेपे व्यभिचारवारणार्थ घंटपदम् । घटसमवेतगुरुत्वादौ व्यभिचारवारणार्थ गुणान्यत्वे सतीत्युक्तम् । [वा. टी.] गुणनिरूपणानन्तरं सामान्याधारतया कर्म लक्षयति-एकद्रव्येति । आधविभाग- निराकरणाय एकद्रव्येति । विनश्यदवस्थकर्मण्यव्याप्तिनिराकरणाय सजातीयमिति । सजातीयत्वं जात्येति न घटादारतिव्याप्तिः । तथाच कर्मत्ययोगि कर्मेत्युक्तं भवति । घटकर्मेति । गुस्त्वेऽति- व्याप्तिपरिहाराय गुणान्यत्वे सतीति । ततो यचलतीति यत्प्रत्ययालम्बन तत्कर्मेति सिद्धम् । pour * - - (कर्मणोऽसमवायिकारणत्वाभावशङ्का तत्समाधानश्च) यत् सत्, तत्क्षणिकम् , यथा जलधरः । सन्तश्चामी, भावा इति क्षणद्वयस्थित्यभावादारम्भकत्वानुपपत्तिः कर्मण इति चेत्-न विकल्पानु- पपत्तेः। तथाहि-क्षणे भवः क्षणिका, तस्य भावः क्षणिकत्वम् ? किंवा क्षणादूर्ध्वं न तिष्ठतीति क्षणिका, तस्य भावः क्षणिकत्वम् ! आये कल्पे सिद्धसाधनम्, स्थायित्वपक्षेऽपि तत्सम्भवात्। न द्वितीयः, व्यावृत्ता- चनकान्तात्। अथ भावाद्भिन्ना व्यावृत्तिर्नास्तीति चेत्-न; च्यावृत्तावसत्यां खल- क्षणानां क्षणिकत्वेनाविनाभावस्याशक्यग्रहत्वादभ्युपगतस्यानुमानस्या- सम्भवमसङ्गादपसिद्धान्तप्रसङ्गाच। तस्मात् सत्त्वं न क्षणिकत्वे प्रमाणम् । स्थायित्वे तु विप्रतिपन्नं कर्म, स्वोत्पत्तिक्षणेतरक्षणस्यं, सत्त्वात् , सम्प्र- तिपन्नवदिति। "इति तार्किकभट्टकसरिसर्वदेवम् रिविरचितायां प्रमाणमञ्जयाँ कर्मपदार्थस्समातः । [य. टी.] कर्मणः कारणान्तरेऽसम्बद्धसोक्तासमवायिकारणलमाक्षिपति-यदितिः । एतस्य मते उदाहरणसहित उपनय इत्यस्यपद्वयम् । सत्त्वमर्थक्रियाकारित्वम्, जनक त्वमिति यावत् । सन्तश्चेत्युच्या द्रव्यादीनामपि क्षणिकत्वेन कारणत्वमाक्षिप्तम् | आर- १ ध्यवच्छेदार्थ विमागपदमिति द. २ गम्येति नास्ति झ पुस्तके. ३ पदमिर्द नाम्ति ज, ८ पुस्तकयोः। "गुरवान्यरव इति द. ५ तथा सिमिति क. ६ अपीति नाति क पुस्तके. ७ मभावप्रसनादिति ख, ग, घ. क्षणिकरवे न साधनमिति मु, न प्यावृत्तावसत्यां स्वलक्षणाना क्षणिक्त्वे प्रमाणमिति घ. ९ प्रमाणमिति १०क्षणादन्यक्षणस्थमिति मु, क्षणेतरक्षणे सदिति क. ११इति कर्मपदार्थ इति क, ख, ग, घ. -- मु. १२सरवान्विति च.
निरूपणम्] टीकानयोपेता म्भकत्वेन सकलकारणरूपसामध्यभावादिति भावः । विकल्पेति । वक्ष्यमाणविकल्पेन सम्भवत्पक्षस्य क्षणिकत्वस्थानुपपत्तेरित्यर्थः । व्यावृत्ताविति । तत्र सचमस्ति क्षणिक- त्वच नास्तीति व्यभिचारादित्यर्थः ।। ननु व्यावृत्तिरपोहो मैया न मन्यते, किन्तु भारान्तरमेव से इति शङ्कते अथेति । व्यावृत्तावसत्यामिति । संकलसाध्यसाधनसाहकव्यावृत्तिरूपधर्मामा- वादिति भावः । वस्तुतस्तु हेतुमति कचित्क्षणिकत्वं व्यावर्तते न घा? आघमाह व्याय- त्ताविति । द्वितीयं शङ्कते अथेति । समाधत्ते व्यावृत्तावसत्यामिति । क्षेणिकावं हि क्षणमात्रावस्थायित्वमानपदार्थोऽस्तु खपूर्वोत्तरक्षणयोर्भावस व्यावृत्तिः । व्यावृत्य- नङ्गीकारे तद्धटितक्षणिकत्वस्य वक्तुमशक्यत्वेन व्याप्तिग्रहवैधुर्ये क्षणिकत्वसाधनत्याभि- मतानुमानसाभावप्रसङ्गादित्यर्थः । किञ्च च्यात्यनङ्गीकारे भवदभिमतव्यतिरेकव्याप्ति- भङ्गप्रसङ्गः । भावभिन्ननित्याभावस स्वीकृतस परित्यागेऽपसिद्धान्तमाह अपसिद्धा- न्तेति । ननु भवत्वतिरिक्ता च्यातिरिति चेत्-न तदा भवदभिमतनित्यव्यावृत्तावर व्यभिचारात्, क्षणिकवाभावाधिकरणस्यैव स्थैर्य स्वीकारापत्तश्च । साध्याप्रसिध्या व्याप्ति- ग्राहकप्रमाणाभावत्वेनेव चरमशब्द एप साध्यप्रसिद्धिरिति वाच्यम् । तथापि स्थिरत्वा- ङ्गीकारात् । न च क्षणिकत्वाप्रसिध्या कथं क्षणिकत्वनिषेध इति वाच्यम् । घटः खाव्य- 20 पेधशरीरस्वीकारात् । घटाव्यवहितोत्तरक्षणवर्ति- .......प्राइनटे वस्तुनि सिद्धेः । सम्पतिपन्न- यदिति । सम्प्रतिपमा च्यात्तिः, स्वशब्देन कर्मणे उक्तत्वेन फर्मोचरक्षणे वर्तमानो भावो वा सम्प्रतिपन्न इति निगर्वः । इति कर्मपदार्थः। [अ. टी. कर्मणोऽसमवायिकारणत्वमुक्तं, तदाक्षिपति यत्सदिति। सन्तश्चामी भाषा इति । द्रव्यादीनामपि क्षणिकत्वेन कारणत्यमाक्षिप्तम् । लन्धसत्ताकानां कारणानां मेलने सामग्री, ततः कार्यजननमित्यनेकक्षणस्थित्यपेक्षणात् । क्षणीभूते कारणत्वासम्भव इत्यर्थः । क्षणिकले लक्षणसाध्यानिर्वचनान्मैवमित्याह नेति । क्षणे भवतीति क्षणेभयः । तत्सम्भ- चात् क्षणावस्थानसम्भवादित्यर्थः । व्यावृत्तिरपोहान्दार्थभूतः, तम्य च च्यामिग्रहार्थ- क्रियाहेतुत्वात्सत्त्वमिति युक्ता तत्रानकान्तिकता। अर्थ भावान्तरमेव भावान्तरापोहा, ततो नोक्तो दोप इति शझते अथेति । इष्टः हान्या परिहरति न च्यावृत्ताविति । सलक्षणं सर्वतो व्यावृत्तमसाधारणं मावरुपम् । अनुमानाभावे तत्प्रमेयत्वेनेष्टक्षणिकत्यहानिरित्यर्थः । भावादिनस्य निर्वसामावस सीहत- भारम्मकन्ये सति क्षणिकत्येन सालारणमाया रूनि छ. ऐनि नाति पुन मति मान्ति छ. सेति च, ५ पद्धिरिय नानि च पुन प्रसर नि नाति पुन पमिदं मानि घ पुस्तके. सिद्धिरिति च, ९ सम्प्रतिपत्ति थ, १० पदार्य गान्ति ध पुन । हनिमय इनिर, १२ मति निष्टमीति ८. ३ भागन्तानि नास्ति . मायामिनिट. १५ समिनि , 2. १५ पदमिदं नाति पुस्तके .
प्रमाणमञ्जरी [सामान्य खात्तत्यागायुक्त इत्याह अपसिद्धान्तेति । सत्त्वं हेतुत्वेनोपन्यस्तम् । स्थायित्वे वाक्य प्रमाणं तदाह स्थायित्वे त्विति । सम्प्रतिपन्ना व्यावृत्तिः, स्वशब्देन कर्मणो विवक्षित- त्वात्तदुत्पत्त्यनन्तरक्षणभावी भावो वा सम्प्रतिपन्नः । इति प्रमाणमञ्जरीटिप्पणेऽद्धयारण्ययोगिविरचिते कर्मपदार्थः । [या. टी.] शकते यत्सदिति । क्षणद्वयस्थित्यभावादिति उत्पत्तिक्षणादन्यलक्षणस्थि- तेरभावादित्यर्थः । किंवा क्षणादिति । उत्पत्तिक्षणादित्यर्थः । सिद्धसाधनयोक्त्या एवंविधं क्षणिकत्वमनारम्भे प्रयोजकमिति 'सूचितम् । व्यावृत्तिरपोहरूपं सामान्यम् । अनैकान्तिकतां परिहरति अथेति । भिन्नत्यत्र नित्येति शेपः। एवं घदतानुमानमभ्युपगतं न वा ? नाय इत्याह व्यावृत्ताविति । खलक्षणं भावस्वरूपम् । न द्वितीय इत्याह अपसिद्धान्तेति । सिद्धसाधन- तापरिहाराय खोत्पत्तीति । तस्मान्न लक्षणा इति कर्मसम्भव इत्युपसंहारो द्रष्टव्यः । इति प्रमाणमारीटीकायां कर्मपदार्थः । (सामान्यलक्षणम् तन प्रमाणञ्च) नित्यमनुगतं सामान्यम् । तत्र प्रमाणं प्रत्यक्षम् । अथैतत्कल्पना. ज्ञानमिति चेत्-न; कल्पनात्वस्य विकल्पानुपपत्तेः। तथाहि किं-निर्षिपयत्वं कल्पनात्वम् ? किं वॉशब्दसंपृक्तार्थप्रतिभासकत्वम् ? आहोस्वित्स्मरणान- न्तरभावित्वम् ? इति।नाद्या; इदमित्यवाधितधीविषयत्वात्।नापि द्वितीय, अर्थ शब्दाभावात् । भावे चार्थस्य श्रोत्रपरिच्छेद्यत्वं स्यात् । शब्दस्य चाश्रोत्रेन्द्रियग्राह्यत्वं प्रसज्येत । न तृतीया, इन्द्रियसन्निकर्षानुविधायिनो घाघस्या स्मृत्यनन्तरभावित्वेऽपि विरोधाभावात् । रूपस्मरणजननानन्तर- मुपजातस्य रससाक्षात्कारस्याभ्युपगतप्रामाण्यस्याप्रामाण्यमसङ्गाचा सा- मान्यानभ्युपगमे लिङ्गलिङ्गिनोरविनाभावस्य दुर्ज्ञानत्वात् अनुमानस्यानु- ठानं न स्यात् । धूमधूमध्वजानामनन्तानामुपसङ्ग्राहकाभावात् । [ब. टी.] नित्यमिति । बहुत्वादापतिव्याप्तिभङ्गाय नित्यमिति । अत्तिपदार्थेड- तिप्रसक्तिभङ्गाय अनुगतमिति । न च विशेपादावतिव्याप्तिः, अनेकवृत्तित्वस्यानुगत. शब्दार्थत्वात् । न चात्यन्ताभावादावतिव्याप्तिः, अनेकसमवेतत्वसोक्तत्वात् । नाद्य इति । विपये गोत्वरूपे बाधाभावात् । विषयं विनैव जायमानत्वरूपकल्पनात्वं नास्तीत्यर्थः। अर्थ इति । रूपादिवदर्थशब्दाभावाद न शब्दसम्पृक्तार्थविषयकत्वलक्षणं कल्पना- स्वमित्यर्थः । भावे चेति । शब्दग्राहकेनैव तत्सम्पृक्तार्थग्रहणे घटादेरापि श्रोत्रग्रायता सादित्यर्थः । शब्दसम्पृक्तस च चक्षुरादिग्राह्यत्वे शब्दस्यापि तत्स्यादित्याह शब्द- १च युक्त इति ट. २ टिप्पणा इति ट. ३ एतदिति नाम्नि क पुस्तके, " पदमिदं नाम्नि क पुस्तके. ५ येति नाम्नि क पुस्तके. ६ सर्वस्येति क. इन्द्रियेति नास्ति स, ग, घ पुस्तधु. ८बपीति नास्ति क पुस्तके, ९ भूमेति नास्तिक पुत्र. १० भनेकेति नाखि घ पुस्तके... सद्विति घ.
निरूपणम्] टीकात्रयोपेता स्पेति । यद्वा शब्दसम्पृक्तशब्देन यद्यभेदः शब्दार्थयोरुक्त इति द्वितीयः पक्ष उक्तस्त- बाह अर्थ इति । शब्दाभावात् शब्दभेदाभावादित्यर्थः । भावे चेति । शब्दामेद इत्यर्थः । अर्थाग्रहे शब्दोऽपि श्रोत्रेण न गृह्येत, तयोरमेदादित्या शब्दस्येति । यदि शब्दसम्पृक्तत्वमर्थस शब्दवाच्यं तदा तस्याबाधितस्योपनीतस्य चक्षुरादिना ग्रहेऽपि न ग्रहस्य कल्पनात्वमित्युपरि बोध्यम् । यदि शब्दनिरूपितो बाधितस्सम्बन्धो घटादौ भासते तदा भ्रम एवेति बोध्यम् । तृतीयं पक्षमास्कन्दयन्नाह नेति । पोषस गोलपि- पयकस्य स्मृत्यनन्तरं भवतीत्येतावन्मात्रेण कल्पनात्वेऽतिप्रसक्तमाह रूपेति । कल्प- नात्वस्य वक्तुमशक्यत्वे सामान्यमङ्गीकार्यमित्यधस्तनग्रन्थेनोक्तम् । सम्प्रत्यनङ्गीकारे दोपमाह सामान्यानभ्युपगम इति । तत्र हेतुः धूमधूमध्वजानामिति सामान्य- लक्षणानीकारे सकलधूमव्यक्ती बहुवरसाध्यव्यक्तिव्याप्यत्वाग्रहे नियतधूमावशयनुमान न स्मादित्यर्थः। [अ. टी.] मनुगतं सामान्यमित्युक्ते संयोगादावतिव्यासिस्स्यात् अतः नित्यपदम् । नित्येड- ननुगतेऽन्ये विशेषादौ तयदासाय अनुगतपदम् । अनुगतत्वैमनेकसमवेतलम् । गौगौ- रित्यायनुगतप्रत्ययरूपं प्रत्यक्षमुक्तम् , तदाक्षिपति अथेति । कल्पनाज्ञानत्वादस्साप्रामाण्यं वाच्यम्, तदयुक्तम् तदनिरूपणादित्याह नेति । इदं गोत्वमित्यादिप्रत्ययस्य वाघामावान निर्विषयत्वपक्षो युक्तः । रूपादिसम्पृक्तवदटादीनां शब्दसम्मुक्तलं नास्तीति । ततो न द्वितीयः । विपक्षे दण्डमाह भाव इति । शब्दग्राहकेणैव शन्दसम्पृक्तार्यग्रहणे श्रोत्र- ग्राह्यत्वं घटादेरपि सात् । यदि च शब्दसम्पृक्तस्यापि चक्षुरादिग्राह्यत्वं तर्हि शब्दसापि तत्स्यादित्याह शन्देस्येति । बोधस गोत्वप्रत्ययस्वेत्यर्थः । किश्च स्मृत्यनन्तरमारित्व- मात्रेण सामान्यप्रत्ययस्य कल्पनालेऽतिप्रसङ्गस्यादित्साह रूपस्मरणेति । अतस्सामान्य- प्रत्ययस्य कल्पनात्वानिरूपणासामान्यमङ्गीकार्यम् । अनङ्गीकारे दोपाच तदङ्गीकार्यमित्साह सामान्यानभ्युपगम इति । अनुष्ठान प्रयोगः । उपसबाहकस सामान्य- धर्मस व्यतिरेकेऽनन्तव्यक्तीनामन्वयव्यतिरेकव्याप्योजीतुमशस्यत्वान्न तत्पूर्वकानुमान- प्रवृतिस्थादित्यर्थः। [वा. टी.] पदार्थत्रयवृत्तित्वात्सम्बध्यमानाकाहित्याच सामान्य निरूपपति नित्यमिति। आकाशनिराकरणाय अनुगतमिति । अनुगतमनेकसमवायि । संयोगादिनिराकरणाय नित्यमिति । सनेति । इदं सदिदं सदिति गौगरित्यनुवृत्तप्रत्यय एव माननित्यर्थः । आशिपति अधेतदिति। इदं सदिदं सदित्यादि ज्ञानमित्यर्थः। शब्दसम्मकत्वं नाम शदात्मतत्वम् । इदनित्यस्सा- यमर्थः-इदं सदित्यादिज्ञानस्सावाधितवेन पिपपत्वात् विषयो पिपते यस ततिपय तस मारसं, पायरयमिति प. २ योभ्य इति छ. ३ विषयोति प. १ मनुगः मनोनयनेनि र, पान मालि र पुखहे. ५ सप्तति द. (संयुनत्यमिति झ. सम्हरसादिनि श. पादमगाया. पीति 2. ९ सदस्य पति ज, र... अमारे इति , 2.
प्रमाणमक्षरी [सामान्य तस्मात् सविषयत्वादिल्यर्थ । विपर्ययनिरासाय अबाधिते युक्तम् । अर्थे शब्दाभावादिति । अर्थस्य शब्दामा लाभारादित्यर्थ । तथावे दोपमाह भावे चेति । अश्रोत्रग्राह्यत्व श्रोन्येन्द्रिय- माह्यत्वम् । अर्थस्य तत्तदिद्रियग्राह्यत्वात्तदात्मकनादिद सदिति प्रत्ययस्येत्यर्थ । विरोधे चातिप्रसङ्ग इत्साह रूपेति । तस्य प्रामाण्यमेव नेत्यत आह अभ्युपगतेति । प्रसङ्गाचेत्यस्यानन्तर तस्मात्क- पनानानुपपत्तिरिति प्रन्यमहारो द्रष्टव्य । दृपणान्तरमाह सामान्येति। * (सामान्यस्यावस्तुत्वशवा तत्समाधानञ्च) अथ मतम्-वस्तुभूतं सामान्यं नास्ति । तथाप्यतयावृत्तस्सामा- न्यस्य विद्यमानत्वात् । तदुपसभाकादनुमान प्रवर्तत इति चेत्-न; तद्या- वृत्तरवस्तुत्यादुपसारकोभायात् । तस्माद्वस्तुभूतं सामान्यमङ्गीकर्तव्यम् । [व टी ] अतद्यावृत्तेरिति । अधूमव्यात्तेरवद्विव्यावृत्तेरित्यर्थः । वस्तुन एवं हनादेः पुष्पादिसद्धाहकन्यदर्शनाचन मते च व्यावृत्तरेव वस्तुत्वान्नोपसद्धाहत्व- मित्याह नेति । वस्तुतस्तु धूमोऽयमित्यादिबुद्धौ धृमत्वादिकमेवासण्डं प्रतीयते, तेनातव्यावृत्तिः । किञ्च धूमव्यावृत्तिरित्यत्रापि धूमत्वं (किम् ? यद्यधूमव्यावृत्तिरेव तदोन्मत्तमलापः । धूमत्वं) सामान्यश्चे परमतस्वीकार इत्यलमतिपल्लवेन । [अ टी] तथापि त्वदभिमत सामान्य न सिध्यतीति शङ्कते अथ मतमिति । धूम- सामान्य नाम अधूमपदार्थव्यावृत्ति । अग्निसामान्य नाम अनग्निपदार्थव्यावृत्तिः । तयो. रतब्धावृत्योरविनामावादनुमान प्रवर्तते । तेन भावरूपसामान्यापेक्षा जास्तीत्यर्थः। वस्तु भूतस्पेव सूनादे. पुष्पादिसदाहकत्वदर्शनाब्यावृत्तेश्यावस्तुत्वान्नोपसन्दाहकत्वमित्याह नेति । [या टी] विमित्यनुमानभन । अतब्द्यावृत्तेसामान्यस्याङ्गीपारात् । धूमवत्व नाम अधूमधा- वृत्ति , अग्निमान वा अनग्निमद्यावृत्ति । तदविनाभावादनुमान वर्तत इत्याशङ्कते अथ मतमिति । परिहरति नेति । वस्तुभूतस्येव सूत्रादे पुष्पाद्युपसङ्ग्राहकवदर्शनाद्यावृत्तरवस्तु वानोपसभाह क यमित्यर्थ । फरितमाह तस्मादिति । - N (परसामान्यमपरसामान्यञ्च, तन प्रमाणञ्च) तत् परमपरश्च । तत्र पर सत्ता, त्रिवर्गान्तर्गतत्वात् । अंपर द्रव्य- त्वादि, अर पविषयत्वात् । तत्र प्रमाणम्-कर्म शायलेयसजातीय, कार्य- त्वात्, बाहुलेयवदिति । कार्यगुणः कर्मव्यावृत्तजातिमान्, कार्यत्वात्, तुरंगवदिति कर्मत्वसिद्धिः। कर्म गुणव्यावृत्तजातिमंत्, कार्यत्वात् , देवा- १ सामान्यमेवेति क २ तथापि पदिति घ ३ उपसङ्ग्राहकायेति का ग ५ अङ्गीकार्य मिति ग, ५ ५ धूमेत्यारम्य यदात्य तो भागो नास्ति छ पुस्तके ६ परमिति नास्ति ग, घ ७३त पदप्रय नाति नातमानिात स, घ २ग, घ पुस्तापु , . निरूपणम्] टीकात्रयोपेता लयवदिति कर्मत्वसिद्धिःकालो गुणव्यावृत्तजातिमान् , द्रव्यत्वात्, गोव- दिति द्रव्यत्वसिद्धिः। विप्रतिपन्नाः पृथिव्यप्तेजोवायवः कालव्यावृत्तजाति- मन्तः, स्पर्शवत्वादोदिति पृथिवीत्वादिसिद्धिः । आत्मा द्रव्यत्वावान्तर- जातिमान, चतुर्दशगुणवत्वात्, उदकवदित्यात्मत्वसिद्धिः। मनो द्रव्य- त्वावान्तरजातिमत्, ज्ञानासमवायिकारणाश्रयत्वादात्मवदिति मन- स्त्वसिद्धि। कार्यरूपं रसादिव्यावृत्तजातिमत् कार्यत्वाद्गोवदिति रूपत्व- सिद्धिः। एवं सर्वत्र रसादिववगन्तव्यम्, उत्क्षेपणादिषु च। इति तार्किकचक्रचूडामणिसर्वदेवम रिविरचिताया प्रमाणमञ्जयां सामान्यपदार्थस्समाप्तः। [व. टी.] त्रिवर्गति । द्रव्यादित्रयवृत्तिवादित्यर्थः । कर्मेति । शायलेयः शवलवर्णो गौ, तद्वृत्तिजातिमानित्यर्थः। प्रमेयवादिनार्थान्तरवारणाय जातीति । कर्ममात्रजात्यार्थान्तरवारणाय शायलेयेति । गोत्वादेः कर्मणि बाधात् पक्षधर्मता- बलात्सत्तासिद्धिः । बाहुलेयः वर्णविशेषविशिष्टो गोपिण्डः । वन्ध्यागोपिण्ड इति केचित् । गुणत्वेऽपरसामान्ये प्रमाणमाह कार्येति । नित्ये गुणे पक्षभागासिद्धि- वारणाय कार्यपदम् । कर्मणो वाधवारणाय द्रव्ये च सिद्धसाधनवारणाय गुण इत्यु- क्तम् । सर्नया सिद्धसाधनवारणाय व्यावृत्तान्तम् । सामान्यादिव्यावृत्तया सचया पुनरप्यर्थान्तरवारणाय कर्मेत्युक्तम् । उपाधिना केनचिदर्थान्तरमुन्मूलयितुं जाती- त्युक्तम् । द्रव्यत्वादिना गुणं परम्परासम्बन्धेनार्थान्तरतादयस्थ्यनिराकृतये मतुपा साक्षात्सम्बन्ध उक्तः । न च द्रव्यत्वस्य परम्परासम्बन्धेन कर्मण्यपि धृत्तित्वेन व्याय- तान्तविशेषणेनैव प्रयोजनस सिद्धत्वात् किं सम्बन्धस साक्षाचविरक्षयेति वाच्यम् । आत्मवृतित्वगुणे आत्मत्वसम्बन्धित्वेनार्थान्तरवारणाय साक्षाचस्स विवक्षितत्वात् । न चात्मत्वं परम्परासम्बन्धेन कर्मसम्बद्धमिति च्यात्रचत्वैविशेषणेनैककार्यस्य सिद्धत्वापु- नरपि विवक्षाधिकेति वाव्यम् । कर्मचित्रपटकपरम्परासम्बन्धभिन्नात्मसम्बन्धस सुखाद होः दसव्यावृत्तिनिर्वाहिकायासमत्वेनान्तिरतादवस्थ्पदास्थ्यनिवारकत्वेन विवक्षाया विद्वन्मनीपाचमत्कारगोचरत्वाद, अन्यथा किमपि कुतोऽपि व्यावृत्तं न स्यात् । गुणत्वसमवायरूपोद्देश्यसिद्धये साक्षात्सम्बन्धस समवायरूपस मतुपोक्तत्वाच । भारत्वे सति कर्मत्वशून्यकार्यत्वहेतुरिति न कर्मणि नसे व व्यभिचारः । कर्मपक्षकानु- मानेऽप्येवम् । काल इति सत्यार्थान्तरवारणाय । व्यावृत्तमित्यादि पूर्ववत् । द्रव्य- + गोवदिति नाति प पुस्तके. २ रूपावादीति मु. ३साध्यमिति मु. ४ इति सामान्यपदार्थ इति कस, ग, घ. ५ जातिमदिति छ. पदमिदं नास्ति पुस्तके घंसकर्मग इति च. ८ ससायामिति ६.९ उक इति नास्ति च पुस्तके. स्वेति नास्ति च पुस १३ विवक्षानति च, यामिनि घ. १५ दोपेति च, १५ पातान्तामिति ब. प्रमाग-१३ . प्रमाणमरी [सामान्य त्वात् गुणवत्वादित्यर्थः । यद्वा द्रव्यपदप्रवृत्तिनिमित्तत्वेन हेतुता, तस्य जातित्वे हि विवादा, न तु धर्मत्व इति भावः । ननु कालादिमात्रवृत्तिात्यार्थान्तरमिति चेत- घटादिः गुणव्यावृत्चे कालवृत्तिजातिमान् संयोगवत्वात् कालयदित्यर्थान्तरकारणात् । विप्रतिपन्ना इति । अत्र परस्परव्यावृत्तत्वविशेषणम् । तेन नोमयवृत्त्येकं जात्यार्थान्त- रम् । तत्तत्स्पर्शवत्योपाधिनार्थान्तरपारणाय जातीति । एकैकवृत्तिकालादिवृत्तिजात्या- र्थान्तरभङ्गाय व्यावृत्तान्तम् । घटत्यादिनार्थान्तरनिरासाय विप्रतिपन्ना इति । चिप्रतिपत्तिविपयत्वावच्छेदनका जातिस्सिध्यतीति भावः। युक्त्यन्तरेण पृथिवीत्वादि- साधनं ग्रन्थान्तर उयम् । यथा च चतुर्माननिष्ठका जातिन सिध्यति तथा तत्रैव बोध्यम् । आत्मेति । संसार्यात्मेत्यर्थः । तेन न भागाँसिद्धिः, ईश्वरस्याप्टगुणवत्वात् । उपाधिना- र्थान्तरवारणाय जातीति । सत्तयार्थान्तरवारणाय अवान्तरेति। द्रव्यत्वेनार्थान्तर- वारणाय द्रव्यत्वेति । तेन द्रव्यत्वन्यूनवृत्तिजातिमानित्यर्थः । आकाशादौ व्यभिचार- निरासाय चतुर्दशेति । गुणविभाजकोपाधिना विजातीयचतुर्दशत्वसंख्यावच्छिन्नधर्म- चत्वादिति हेत्वर्थः । तेन चतुर्दशैविभागवति गगनादौ न व्यभिचारः। चतुर्दशशब्दवा- च्यत्वेन गुणा गृहीताः । तेनान्ये चतुर्दश पक्षे, अन्ये च दृष्टान्त इत्यसिद्धिर्न । ज्ञाना- दिमत्वेनेश्वरेऽपि तजातिसिद्धिः । यद्वात्ममात्रपक्षीकरणेऽटगुणादिमत्वं हेतुः । न च प्रथमहेतौ चतुर्दशत्वं व्यर्थम् , तस्य सप्तत्वाधघटितत्वात् । ज्ञानेति। श्रोत्रे ज्ञानकारण- मनस्संयोगवति व्यभिचारवारणाय असमवायीति । शब्दासमवायिकारणपति गगने व्यभिचारवारणाय ज्ञानेति । गुणत्वव्याप्यजातिं साधयति कार्यमिति । नित्यरूपे भागासिद्धिचारणाय कार्येति । घटादिनार्थान्तरवारणाय धंसे रसादौ च पावारणाय रूपमिति । रसादिव्यावृत्तभावकार्यत्वं हेतुः । आदिपदेनेतरे गुणा ग्राह्याः । कर्म- व्यावृत्तजातेगुणस्यैव सिद्धत्वात् । आदिपदेन द्रव्यग्रहे दृष्टान्तासिद्धिस्स्यात् । उपाधिना- र्थान्तरवारणाय जातित्वमुक्तम् । रसव्यावृत्तजातिमत् गन्धव्यावृतजातिमदित्यादि पृथगेव साध्यम् । यद्वा रसव्यावृत्तो गन्धरूपनिष्ठो(वा? मा) सिध्यतु इत्येकमेव साध्यम् । न चादिपदेन कर्माग्रहणे रसन्याहत्तरूपकर्मनिष्ठजातिसाध्यापत्तिः, सदाकारप्रतीते: सत्त्यैवोपपत्तेः, रूपकर्ममात्रनिष्ठविलक्षणानुगतप्रतीतेरभावाद , भावे वा रूपकर्मान्यवर स्वेनैव तदुपपत्तेः, तादृशजातेरनुभवसिद्धत्वात् । एवमिति । कार्यरसः रूपादिव्यावृत्त- जातिमान कार्यत्वात् गोवत् । उत्क्षेपणम् अपक्षेपणादिव्यावृत्तजातिमद् कार्यत्यागोवदि- त्याद्यनुमानं कर्मत्वावान्तरजातिसाधकं बोध्यम् । अपक्षेपणादिभिन्नसमवेतधर्मवत्वं वाप- क्षेपणादिव्यावृत्तजातिसाधने हेतुः। इति सामान्यम् । , धर्मे इति ध. २ जास्यादिनेति च. ३ वारणायेति च. ५मनायेति प. .६ वारणायेति च. ७ संयोगादिवदिति च. ८ सिध्यापतिरिति प. ९ पदार्थ इति च. - विभागेति च.
९९ निरूपणम्] टीकात्रयोपेतर [अ. टी.) त्रिवर्गो द्रव्यगुणकर्माख्यः, तदन्तर्गतत्वं तद्वेतित्वम् । शायलेयः शमल- वों गौः । कर्मव्यक्तीनां परस्परसजातीयत्वेन सिद्धसाधनताव्युदासार्थ शायलेय- सजातीयमित्युक्तम् । तत्सजातीयत्वच कर्मणो न गोत्वादिनेत्यतिरिक्तसत्तासिद्धिः । अपरसामान्ये तर्हि किं प्रमाणम् १ तदाह कार्यगुण इति । सत्ताजातिमत्वेन सिद्धसाधन- ताब्युदासार्थ कर्मव्यावृत्तपदम् । गुणे द्रव्यत्वासम्मवात्कर्मणो व्यावृत्ता जातिर्गुणत्वमेव। कार्यत्वचात्र कर्मायन्यत्वविशेषितं हेतुत्वेन द्रष्टव्यम् । कर्मणोऽपि सत्ताजातिमत्वेन सिद्ध- साधनताव्युदौसाय गुणव्यावृत्तपदम् । तथापि द्रव्यत्वे किं प्रमाणं तदाह काल इति । द्रव्यत्वात् गुणवत्वादित्यर्थः । इदानीं द्रव्यत्वावान्तरजातिं साधयति विप्रतिपन्न इति । व्यावृत्तासाधारणजातिः, तद्वन्तः । द्रव्यत्वजातिमत्वेन सिद्धसाधनताव्युदासार्थ द्रव्यत्वा- वान्तरपदम् । शब्दस्सासमवायिकारणाश्रये व्योमादौ व्यभिचारवारणार्थ ज्ञानपदम् । रसो रूपादिव्यावृत्तजातिमानित्यादिप्रयोगो" रसादिपु, ततो गुणत्वावान्तरजातिसिद्धिः । एवं कर्मत्वावान्तरजातिरपि साध्येत्याह उत्क्षेपणादिपु चेति । उरक्षेपणमपक्षेपणादिव्यावृत्त. जाति(मत् , जाति १) मत्वात् गोदित्यादिप्रयोगः । इति प्रमाणमलरीटिपणेऽद्धयारण्ययोगिविरचिते सामान्यपदार्थः । [वा. टी.] अन बहुवृत्तिवन्यूनवृत्तित्वोपाधिप्रयुक्त्या द्विविधमेव सामान्यमित्याह तच्चेति । ननूपाधिद्वयस्यैका सम्भवात्परापरमपि स्यादिति न वाच्यम् । तयावेऽनन्तोपाधिकल्पनया निव- नियमो न स्यादिति द्वैविध्यमेव युक्तमिति । कर्मेति । कर्मान्तरेण सिद्धसाधनतापरिहाराय शावलेयेति । शवलवर्णस्थापत्य शाबलेयः । स्त्रीभ्यो ढक् । तज्जातीयत्व कर्मणो न गोत्यादिनेव्य- तिरिक्ता जातिस्सिद्धा। सा च सत्तेति । शेपं स्पष्टम् । इति सामान्यनिरूपणम् । " * (विशेष निरूपणम् ) निस्सामान्य एकेनैव समवायी विशेषः । तत्र प्रमाणम्-मनो मनोड- न्तरव्यावृत्तनिस्सामान्यसमवायि, द्रव्यत्वात्, र, गोवदिति । नित्या आका- शादयो विशेपवन्तः नित्यद्रव्यत्वात् मनोवदिति । स नित्यः सत्वे सति जातिशून्यत्वात्सत्तापदिति। इति तार्किकचक्रचूडामणिसर्वदेवसूरिविरचितायां प्रमाणमञ्जयाँ विशेषपदार्थस्समाप्तः। १ तद्वतित्वमिति ट. २व्यपरदायेति ग, ट. ३पाम्दापसमवायीनि ८, शम्दाममयानि ज. ४ प्रयोगादिति १. ५ गोत्यपशि. रिहनिट ७ पमिदं मामि क, प पुनामयोः, बातीति नामि पु, सामाnिn, १६ति विशेष पदार्थ इति कप, ग, म.
१०० प्रमाणमारी [विशेष- [. टी.] निस्सामान्य इति । गुणादावतिव्याप्तिभङ्गाय निस्सामान्य इति । सामान्येऽतिव्याप्तिवारणाय एकेति । एकमात्रसमवायीत्यर्थः । सम्बन्धविशेपेणैकमात्र- समवायित्वं विवक्षितम् । तेन परमाणुविशेषस्य कालादौ वृत्तावपि नासम्भवः । सम्य- न्धाविशेषेण परमाणुमात्रवृत्ती पाकजरूपादिध्वंसेऽतिव्यातिवारणाय समवायीति । मनोऽन्तरेति । समवायीत्युक्ते गुणेनार्थान्तरम् , अत उक्तं निस्सामान्येति । सामा- न्येनार्थान्तरवारणाय मनोऽन्तरल्यावृत्तेति । बाधवारणाय अन्तरेति । घटव्यावृत्त- मनस्त्वेनार्थान्तरवारणाय मन इति। मनोनिष्ठात्ममनस्संयोगध्वंसेनार्थान्तरवारणाय समवायीति । अनुमानन्तु-आकाशादि मनोव्यावृत्तनिस्सामान्यसमवायि मनोभिन्न- द्रव्यत्वात् घटवदित्यादि बोध्यम् । हेतुस्तु मनोऽन्तरव्यावृत्तद्रव्यत्वं, तेन न मनोऽन्तरे व्यभिचारः । सामान्यादौ च न व्यभिचारः । इदानीं विशेषत्वेन रूपेणाकाशादौ विशेपं साध्यति नित्या इति । आकाशादय इत्यादिपदेन परमाण्वादिपरिग्रहः । घटादिपरि- ग्रहे बाधभङ्गाय नित्या इत्युक्तम् । नित्यगुणादिपरिग्रहेण वाधवारणायाकाशादिपरिग्रहेण द्रव्यं गृहीतम् । तथा च नित्यद्व्याणि मनोव्यतिरिक्तनित्यद्रव्याणि वा पक्षः । घटादौ व्यभिचारभङ्गाय नित्येति । नित्यपरमाण्यादौ व्यभिचारवारणाय द्रव्यत्वविशेषणम् । अन्ये तु पक्षे नित्यग्रहणे नित्यद्रव्यैकवृत्तित्वसूचनायेत्याहुः । तत्र पक्षविशेषणकृत्यस्यों- क्तत्वात् । स इति । प्रागभावे व्यभिचारवारणाय सत्यन्तम् । भावत्वे सतीति तदर्थः । घटादौ व्यभिचारवारणाय विशेष्यभागः । अन्यनिरूपितसमवापरहितत्वादिति तदर्थः । इति विशेषपदार्थः। [अ. टी.] समायी विशेष इत्युक्ते संयोगादावतिव्यासिस्स्सादत एकेनेत्युक्तम् । अनेक- समवायिन एकसमवायित्वमप्यस्तीति स एव दोपस्स्यादत एवेत्युक्तम् । एकेनैव समवायिरूपादिव्यवच्छेदाय निस्सामान्यत्वविशेषणं द्रष्टव्यम् । मनसो निस्सामान्यमन- स्त्वादिसमवायित्वेन सिद्धसाधनताव्युदासायं मनोऽन्तरन्यावृत्तेत्युक्तम् । मनोऽ- न्तरव्यावृत्तसमवायीत्युक्ते परिमाणसमवायित्वेन सिद्धसाधनता स्यादतो निस्सामान्य पदम् । तथाप्याकाशादिषु कथं विशेषसिद्धिरत आह नित्या इति । नित्यद्रव्यैकवृतित्व- सूचनार्थ नित्यग्रहणम् । तन्नित्यत्वं तर्हि कथं तबाह स नित्य इति । जातिशून्यत्वादि- त्युक्ते प्रागमावे व्यभिचारस्स्यादत उक्तम् सत्त्वे सतीति । इति प्रमाणमक्षरीटिप्पणेऽद्वयारण्ययोगिविरचिते विशेषपदार्थः । ( या. टी.] मम्बन्धिनिरूपणेनाकाहितत्वाविशेष विशदयाने निस्सामान्य इति । संयोगनिरा- करणाय एकेनेति। सामान्यनिराकरणाय निस्सामान्य इति। अनेक समवेतं यत्तदेकसमवेत २ सम्बन्धविदोषणति प. ३ इतः पद्मयं नास्ति । पुलके. " मनायेति च. ५ सनीपर्प इति प. ६ पदार्यनिरुपणमिति च. रामवामिने इति . ९ युवासार्पमिति ज, ट...टिप्पणके इति र समवायीत्रीनि झ.
१०१ निरूपणम्] टीकापयोपेता 30007 भवत्येवेति पुनरपि सामान्येऽतिप्रसतदर्थम् एवेति । न च विशेषाभावाल्लक्षणासम्भवः, सामान्य तस्तसिद्धेः । अस्ति तावदस्माकं गोघटादिषु व्यावृत्तप्रत्ययानिमित्तप्रसिद्धिः, तथायोगिन तुल्याकृतिगुणादिषु परमाण्वादिषु व्यावृत्तप्रत्ययानिमितं वाच्यम् । न च विशेषाणामिव स्वत एवं व्यावृत्तप्रत्ययजनकल्यं तेषाम् , जात्यादिरहितत्वेनात्यन्तविलक्षणत्वात्तथात्वं युक्तम् , अन्यथा विशेष- लमेव न स्यात् । प्रकृते च जालादिना सारूप्याद्यावृत्तीनिमित्तेन भवितव्यं, यनिमित्तं स एव विशेष इत्याशयवांस्तत्र प्रमाणमाह तन्नेति। गुणसमवायित्वेन सिद्धसाधनतापरिहाराय निस्सामान्येति। मनस्वेन तां परिहरति मनोऽन्तरव्यावृत्तमिति । दृधान्तसिद्धावन्यत्रापि विशेष साधयति नित्या इति । घटनिवृत्तये नित्येति । विशेषाणामनित्यत्वप्रलयावस्थायां साकर्यप्रसारस्यादित्या- शयवानित्यत्वं साधयति स नित्य इति । प्रागभावनिवृत्तये सत्त्व इति। इति विशेषपदार्थः। , (समवायनिरूपणम्) नित्यस्सम्बन्धस्समवायः सत्तासम्बन्धान्निवर्तते जातित्वाद्गोत्वव दिति। तंत्र प्रमाणम्-समवायोऽस्मदाद्यमत्यक्षः, परमाणुसम्बन्धत्वात्तत्सं- योगवत्। स नित्या, सत्वे संत्यसमवेतत्वात्, परमाणुषत् । विवादमापन्नाः समवायप्रत्ययाः देवदत्तसमवायप्रत्ययेनाभिन्नविषया:, समैवायप्रत्यय त्वात्, सम्प्रतिपन्नसमवायमत्ययवदिति समवाय्येकत्वसिद्धि इति तार्किकचूडामणिसर्वदेवसूरिविरचितायां प्रमाणमार्या समवायपदार्थस्समाप्तः। बि. टी. नित्य इति । आत्मादायतिव्याप्तिधारणाय सम्बन्ध इति । संयोगेऽति- व्याप्तिवारणाय नित्य इति । सामान्यविशेषान्यत्वे सति निस्सामान्यभावत्वं तलक्षण- मूद्यम् । अतः शक्त्यादिरूपे नित्ये सम्बन्धे नातिव्याप्तिः । सत्तेति । सत्ताजातिरि- त्यर्थः । तेन स्वरूपसत्तायाः समवाये वर्तमानत्वेऽपि न बाधः । निवृत्तिमाचे वक्तव्ये 'सामान्यादिनिवृत्यार्थान्तरम्, अतः सम्बन्धादित्युक्तम् । द्विहसम्बन्धानिपतन इत्यर्थः । संयोगत्वादिस्तु पक्षसम इति न व्यभिचारः । सत्तायाः संयोगानिवृत्त्यसम्मवे पक्षधर्मतावलात्समवायसिद्धिः । यद्वा जातिमात्रं पक्षः । वैशेपिकराधान्ते समवायाप्रत्य- क्षत्वं साधयति समवाय इति । घटपटसंयोगे व्यभिचारवारणाय परमाणुनिष्ठत्वं विशेषणम् । पृथिवीत्वादौ व्यभिचारवारणाय सम्बन्धलोक्तिः । अणुसम्बन्धत्यादित्येय हेतुः तेन न परमपदवैयर्थ्यम् । लक्षणासम्भवं परिहतुं नित्यत्वं साधपति सदि नास्ति क, ख, ग पुस्तकेषु, परमाणुसंयोगवदिति घ. २ सति समयेतत्वादिति घ. सम- वायत्वादिति स. ४ इति समवायपदार्थ इति क, सः इति प्रवीणतार्किकसर्यदेवरिप्रणोतायाम् इति ग, इति सर्वदेवरिप्रणीतायामिति घ, ५ पहिरियं नास्ति पुसके. ६ संयोगनिवृत्तीति ध.
'प्रमाणमक्षरी [समवाय स इति । प्रागमा व्यभिचारवारणाय भावत्वे सतीत्युक्तम् । घटादौ व्यभि- चारभङ्गाय विशेष्यभागः। असम्बन्धत्वादित्युक्तौ दृष्टान्तासिद्धिः स्वस्वरूपासिद्धिच साताम् । अत उक्तम् असमवेतत्वादिति । सिद्धान्तभूतं समवायैकत्वं साधयति विवादमिति । पक्षसाध्ययोः प्रत्ययपदं वाधादिवारणाय, समवायस्य निर्विपयत्वात् । सविषया इत्युक्तेऽर्थान्तरम् , अभिन्नविपया इत्युक्तेऽपि । प्रत्ययेनेत्यायुक्तेऽपि घटादि- प्रत्ययेनाभिन्नविपर्यत्वादवाधश्च । देवदत्तेति । विशेषणपरिहारे पक्षीभूतसमवायप्रत्य- येनाभिन्नविषयत्वसिध्या सिद्धसाधनं स्यात् , तद्वारणाय देवदत्तेति विशेषणम् । अभाव- प्रत्यये व्यभिचारभङ्गाय समवायेति । साधनकल्यपरिहाराय प्रत्ययत्वादिति । सम्प्रतिपन्नेति । देवदत्तसमवायप्रत्ययवदित्यर्थः । यद्वा घटकपालसमवायातिरिक्ता: समवायाः घटकपालसमवायादभिन्नाः समवायत्वात् , घटकपालसमवायवत् इति तर्कस्तु लाघवाख्यः । द्रव्यादाविहाकारानुमतप्रतीत्यभावप्रसङ्गश्च योध्यः । अतो नाप्रयोज- कता, सम्बन्धिभेदेन बहुत्वोपचारः । इति समवायः। [अ. टी.] संयोगव्यवच्छेदाय नित्यपदम् । आत्मादिव्युदासाय सम्बन्धपदम् । संयोगे सत्ताया वर्तमानत्वात्ततो निवृत्त्यसम्भवात्तद्विलक्षणसमवायसिद्धिः । अस्मदादिप्रत्यक्षः समवाय इति मतं व्युदस्सति समवाय इति । घटादिसंयोगव्युदासांय परमाणुसम्बन्ध- स्वादित्युक्तम् । लक्षणांशभूतं नित्यत्वं साधयति स नित्य इति । असमवेते प्रागभावे व्यभिचारो मा भूदिति सत्त्वे सतीत्युक्तम् । घटादौ व्यभिचारवारणार्थम् असमवेतत्व- पदम् । समवायस्सैकत्वमभिमतं साधयति विवादमिति। देवदत्तसमवायप्रत्ययादन्ये सम- वायप्रत्ययाः पक्षः । स्वखसमवायप्रत्ययाभिन्नविषयत्वेन सिद्धसाधनताब्युदासाय देवदत्त- पदम् । घटादिप्रत्यये व्यभिचारवारणाय समवायप्रत्ययत्वादित्युक्तम् । इति प्रमाणमञ्जरीटिप्पणेऽद्वयारण्ययोगिविरचिते समवायपदार्थः । [वा. टी.] निरूपिते सम्बन्धिनि सम्बन्धं निरूपयति नित्य इति । संयोगनिराकरणाय नित्य इति । आकाशनिराकरणाय सम्बन्ध इति । सत्तेति । विशेषादिव्यावृत्तत्वेन सिद्धसा- धनतापरिहाराय सम्बन्धादिति । यतत्सम्बन्धाद्यावृत्तसम्बन्धस्समवाय इति । न च तादात्म्ये- नार्थान्तरता, विरुद्धयोस्तादात्म्यासम्भवादिति । घटपटसम्बन्धनिवृत्तये परमाणुपदम् । समवाया- नित्यत्वे आकाशपरिमाणादेरसम्बद्धस्यैवावस्थानं स्यात् । तच्च सिद्धान्तविरुद्धमिति नित्यत्वं साधयति स नित्य इति । सम्बन्धत्वादेवास्य प्राप्तमनेकत्वं वारयति विवादमापन्ना इति। देवदत्तसम- वायप्रत्ययादन्यस्समवायप्रत्ययः । विवादपदशब्दार्थ घटादिप्रत्ययनिवारणाय समवायेति । मेदप्रत्ययस्तु ख्यादिव्यनकभेदनिमिच इति ज्ञेयम् । इति समवायः। विषयत्वाभावादापति च. २ वारणायेति च. ३ प्रत्ययेति नास्ति च पुस्तके. ४ यथेति च. ५ पदार्थ इति घ. ६ व्यावतेति ज, ४. यवस्छेदायेति ज, ट. ८ टिप्पणक इति 2.
" + निरूपणम्] टीकानयोपेता (अभावलक्षणं तद्विभागश्च ) भावनिपेधोऽभावः। स द्वेधा-जन्योऽजन्यश्च । प्रथमः प्रध्वंसः। उत्तरोद्वेधा-विनाशी अन्यथा चेति । आद्यः प्रागभावः। उत्तरो द्वेधा-स- मानाधिकरणनिषेधः अन्यथा चेति। पूर्व इतरेतराभावः। उत्तरोऽत्यन्ता- भावः। नात्र प्राभाकरं प्रति प्रमाणमभिधानीयम् । निद्रामरणनिर्वाणा- ङ्गीकारात् । धिपणानिर्वाणं हि निद्रा। उपनिबन्धकाइष्टक्षयात् कलेवर- वियोगो मरणम् । निखिलात्मविशेषगुणविलयो निर्वाणम् । अथ कथयसि त्वम्-प्रतियोगिनि ज्ञायमाने केवलाधिकरणोपलम्भ एव निद्रेति चेत्-'मैवं वोच: विकल्पानुपपत्तेः । श्यस्य प्रतियोगिनो विज्ञानं किं सुप्तस्य ? किंवा यस्य कस्यचित् ? आये विकल्पे सुप्तः प्रतिवुद्धस्स्यात् । न द्वितीयः, परनरगतसंवित्तेः परेनरेण प्रत्यक्षेण ज्ञातुमशक्यत्वात् । परस्य यथाकथञ्चित् तत्र ज्ञानमस्तीति चेत्-न; परमाणुगुणानां यथाकथं- श्चिदवगतानां निषेधप्रसङ्गात् । तस्मादभावोऽङ्गीकर्तव्यः । (ब. टी.] भावेति । यद्यपि पर्यायेण न लक्षणम्, अन्यथा घटः कलश इत्यायुक्त्या निवृत्तस्यात् । भावपदवैयर्थ्यच, तथाप्यभावत्वमखण्डमेव लक्षणम् । अन्यस्तु निष्प्रति- योगिको भावो न सम्भवतीति सूचयितुं भावपदं दत्तमित्याह । परे त्वभावनिषेधे घटादावतिव्याप्ति चारयितुं भावेत्युक्तमित्याहुः । समानाधिकरणेति । समानाधि- करणजातीय निषेध इत्यर्थः । साजात्यन्तु अभावविभाजकोपाधिना । तेनावृत्तिपदार्था- न्योन्याभावस्य नासङ्ग्रहः । अयमयं न भवतीत्यादिप्रतीत्या विषयीक्रियमाण इति वार्थः। अन्यथा चेति । स्ववृत्यवच्छेदेन वन्यधिकरण इत्यर्थः । तेन कालभेदेन घटसमाना- धिकरणस्य घटात्यन्ताभावस्य नासह इति भावः न च प्रागभाषध्वंसयोरति- व्यासिः, प्रतियोगिकाले वर्तमानत्वे सतीति विशेषणात् । अन्ये तु संसर्गाभाव- मादायाप्यखण्डा एवेत्याहुः । न चाकाशात्यन्ताभावायसग्रहः, तस्स घृत्यसिद्धेरिति वाच्यम् । तस्यापि तादृशव्यधिकरणजातीयत्वात् । धिपणेति । महारा(ध दि)प्रयो- ज्ययुध्यभावे निद्रामुपुतिय॑घहियत इति भावः । यद्धा सुपुप्तिः पुरीततिदेशे मनसोजस्थानम् । एवञ्च ज्ञानाभावात्सुपुप्तिर्भिनैवेति बोध्यम् । तथा च धिपणा- निर्वाणसमापनं सुपुतिरित्यर्थो योध्यः । न तु ज्ञानाभावः केवलाधिकरणमेवेत्यत आह उपनिवन्धकेति । उपनिबन्धकत्वं शरीरादिना सह सम्बन्धरूपत्वं शरीरादि- जनकत्वं वा । क्षयो ध्वंसरूपोऽभावः खीकृतः । कलेवरस्य विलयो ध्वंस एव स्वीकता। सामानाधिकरण्येति सं. २ हीति नाखि ग घ, पुसकयोः, ३ फयं श्ये इति मु. . मैवमोच इति सु. ५ श्यप्रतियोगिन इति क. ६ पदमिदं नास्ति ख, ५ पुस्तकयो प्रबुद इति कम, २. • परवरवतीति झ. ९ परपरणेवि मु. १० भादवाइयोऽपीति प. "समये इति. + १०४ प्रमाणमञ्जरी [अमाव यदि जीवनध्वंसो मरणं तदाप्यभावस्वीकारः । कृष्णादिशरीरवियोगोऽपि मरणं स्थादतः पञ्चम्यन्तम् । स्वनिष्ठादृष्टक्षयादित्यर्थः । तेन न जीवादृटक्षयप्रयोज्यमगर- कलेवरध्वंसो मरणमिति बोध्यम् । अपरे तु-उपनिवन्धकादृष्टक्षय एव मरणमिति निज- गदुः । ननु सोऽप्यधिकरणात्मेत्यत आह निखिलेति । यत्किञ्चिविशेषगुणवृत्तः संसा- रितादशायां वर्तमानत्वेनातिव्याप्ति वारयितुं निखिलेत्युक्तम् । रूपादिध्वंसस्य मुक्तित्वं वारयितुम् आत्मेति । आत्ममनस्संयोगादिध्वंसस मुक्तित्वापत्या मनःप्रवृत्तेरपि मुक्तत्वापातं वारयितुं विशेषेति । गुणाभावमात्रं न मुक्तिरित्यत उक्तम् विलय इति । ध्वंस इत्यर्थः । इदन्तु परमतसिद्धं लक्षणमिति कृत्वा दोषो नेह विचार्यते । न चार्य विलयोऽधिकरणात्मा, मुक्तेरजन्यत्वापातेनापुरुषार्थत्वापातात् । पररहस्समुद्घाटयति अथेति । दृश्य इत्यनेन प्रतियोगिनः प्रामाणिकत्वमा सूचयितुम् , यद्वा योग्या- भावस्य योग्यतानिहाय दृश्य इत्युक्तम् । प्रतियोगिविशिष्टस्साधिकरणस्याभावत्वं चारयितुं केवलेति निजगदे । प्रतियोग्यज्ञानदशायामभारव्यवहारं वारयितुं ज्ञायमान इत्युक्तम् । अधिकरणस्वरूपसत्तादशायामभावव्यवहारातिप्रसक्तिवारणाय उपलम्भ इत्युक्तम् । अधिकरणेत्युपरखकम् । यद्वा अप्रकृताधिकरणेऽभावव्यवहारं पारयितुम् अधिकरणपदं प्रकृताधिकरणपरम् । सुप्त इति । तथा च निद्रामङ्गप्रसङ्ग इति निगर्वः । प्रतियोगिज्ञाने सति ज्ञानाभावादिति । परस्येति । लिङ्गादिनेत्यर्थः । तथा च प्रतियोगिज्ञानघटिताधिकरणोपलम्भरूपो भावः प्रत्यक्षो न सादिति भावः । प्रतियोगिनोप्रत्यक्षत्वे प्रतियोगिलैङ्गिकज्ञानादिना भावव्यवहारेऽतिप्रसक्तिमाह नेति । वस्तुतस्तु-अभावमन्तरेण कैवल्यमेव निरूपयितुं न शक्यमित्यन्यत्र प्रपञ्चः । [अ. टी.] निष्प्रतियोगिकनिषेधासम्भवात् भावनिपेध इत्युक्तम् । विनाशी प्रागभावः। अन्यथा नित्यः । समानाधिकरणोऽयं न भवतीति निषेधः । ननु प्रामाकरा अभावं न मन्वते, तान् प्रति प्रमाणं वाच्यम्, तत्राह-नानेति । निद्राद्यङ्गीकारे कथममावाङ्गीकार इत्यत आह धिपणेत्यादि । धिषणा बुद्धिः । निर्वाणं प्रध्वंसः । उपनिवन्धक देहारम्भ- कम् । एकदेशेनात्मविशेषगुणलियः संसारदशायामप्यस्तीति निखिलपदम् । तदीयं रहस्यमुत्यापयति अथेति । ज्ञायमाने स्मर्यमाणे दुःखाँदिविशिष्टाधिकरणोपलम्भे दुःखाभाव- व्यवहारप्रसङ्गवारणार्थ केवलपदम् । तस्मर्यमाणेऽपि प्रतियोगिन्यभावव्यवहारः प्रसक्तस्त- आइ-(अयेति १) । प्रतियोगिनि ज्ञायमान इत्युक्तं तर्कवलेन दूपयति मैवं चोच इति । यदि सुप्तस प्रतियोगिविज्ञानं तर्हि स स्वमेऽपि प्रबुद्धस्स्यादतो नाधः कल्पः । धिपणानिर्वाण हि. निद्रा । ततस्सा प्रतियोगिभूता बुद्धिः, सा च परस्य प्रत्यक्षा न भवति । तथापि यथाकयधिज्ज्ञायत इति शकते परस्येति । यथाकथञ्चिलिङ्गेनेत्यर्थः । तथाप्यधिकरण- स्वीकृत इति च.. २ क्षयादि इति च. ३ बादिति नास्ति च पुस्तके, ५ इतः पदघवष्टयं नास्ति व पुस्तके, ५भावामावादिति छ. ६ विषय इति र. दुःखाविशिति 2. ८ वसमिति नास्ति र पुस्तके...
निरूपणम्] टीकाश्योपेता स्थाप्रत्यक्षत्वात्प्रतियोगिविपयलैङ्गिकज्ञानमात्रेण तनिषेधव्यवहारेऽतिप्रसङ्ग इत्याह नेति । अभावानङ्गीकारे केवलशब्दार्थ एव दुर्निरूप इति न लिङ्गनापि केवलाधिकरणोपलम्म इति मावः । निगमयति तस्मादिति । हवा. टी] प्रतियोगिभावनिरूपणानन्तरमभा निरूपयति भावेति । अभावनिषेधेऽतिव्या- ध्याप्तिपरिहाराय भावेति । समानाधिकरणनिषेधो नाम तादात्म्यनिषेधः । धिषणानिर्वाण चाक्षुषा. दिज्ञानाभावः 1 उपनिवन्धकं देहप्रमाणादिसम्बन्धघटकम् । कलेवरविलयो नाम देहस्य प्राणा- देवियोगः । कियद्विशेषगुणविलयः संसारदशायामप्यस्तीति निखिलेत्युक्तम् । प्रमाणयोग्ये बुध्यादावनुभूयमाने आममात्रोपसम्म एव निद्रादिरिति खयमेव तन्मतमाशङ्कते अथेति । परिहरति मैवमिति । विज्ञानमिसन प्रलक्षं विवक्षितमानुमानिक वा? तनायं द्विषा विकल्प्य दूपयति आद्य इत्यादिना । द्वितीयं शकते अथेति। आनुमानिकज्ञानमात्रेणाधिकरणावगती तनिषेधेऽतिग्रस इति दूपयति नेति । परमाणुग्विति शेषः । उपसंहरति तस्मादिति । . (मोक्षे प्रमाणम्) तत्रापि मोक्षेप्रमाणम्-आत्मा कदाचिदशेषविशेषगुणशून्यः, अनि- त्यविशेषगुणत्वात् , पार्थिवपरमाणुवदिति । नाकाशे व्यभिचार, तथापि तथा साधनात्। इति तार्किकचक्रचूडामणिसर्वदेवविरचिता प्रमाणमजाम् अभावपदार्थसमाप्तः । ॥ इति प्रमाणमञ्जरी समाप्ता। (4. टी.] स्वाभिमते मोक्षे प्रमाणमाह आत्मेति । जलपरमाणी व्यभिचारवारणाय विशेपेति । विशेषपदार्थस्य ध्वंसो नास्त्येव । विशेषपदेन धर्मविशेषग्रहयो जलपरमाणी व्यभिचारः, तत्रापि संयोगादीनां सत्वात् । विशेषपदेनैव विशेषगुणग्रहणणे फलवोन विशेषः । पाधवारणाय कदाचिदिति । परिमाणादेरध्वंसात् बाधवारणाय विशेषेति। यत्किचिद्विशेषगुणध्वंसेनार्थान्तरवारणाय अशेपेति । आत्मा संसार्यात्मा । गुणपदा- दानेऽशेषस्य धर्मविशेषस्य परिमायादेः ध्वंसासम्मयादाधस्सातदर्थ गुणपदम् । यद्यपि पार्थिवपरमाणुन घन्ता, पक्षसमत्वाद, तथाप्यनुमानान्तरे तात्पर्यमवगमनीयम् । तथेति । आकारण पक्षसमत्वात् उक्तरूपसाध्यवत्वसाधनादित्यर्थः । न हि पक्षे पक्ष- समे चा प्यपिणार शत नामा यस्तुतस्तु हेतुमत्या निश्चिते साध्यवतया सन्दिग्धेने Pain. a गोमति र तापि मोमप्रमाणमिति घ. ३ गुणवादिति , गुणा. स्थादिति ग, म, . तामियारिणति क, म्या इति श्रीमशाकिच्दामणिसर्षदेति । इति तार्किकत्सर्वदेवपूर मातेति प. ५ परमि मातो. प्रमाण ܝܕ १०६ प्रमाणमञ्जरी [अमाव सन्दिग्धव्यभिचारः । च्यातिग्रहेणानुमितेरेव तद्विरहे तत एवानुमितिविरहात न तादृशः सन्दिग्धव्यभिचारो दोपः, किन्तु साध्याभाववत्तया निश्चिते हेतुमत्तया सन्दिग्धे सन्दि- ग्धव्यभिचारो दोप इति पर्यालोचनीयमिति । यन्मिथवलभद्रेण निरटझीह किश्चन । वच्छोधयन्तु सुधियस्सारासारविवेचकाः ।। इति श्रीविष्णुदासत्रिपाठितनूजमाचीपुत्रमिश्रश्रीवलभद्- 'कृता प्रमाणमञ्जरीटीका समाता ॥ [अ. टी.] स्वाभिमते निर्वाणे प्रमाणमाह तत्रापीति । बाधब्युदासाथ कदाचित्पदम् । जलादिपरमाणुपु व्यभिचारवारणार्थम् अनित्यविशेपगुणत्वादित्युक्तम् । पाके पार्थिव- परमाणुनामुक्तसाध्यवत्वम् । अथवा क्रमण एक्त्यङ्गीकारादत्यन्तोच्छेद एव, पार्थिवाणु- विशेषगुणानां पुनः प्राणिभोगार्थ सृष्टयनारम्भात् । आकाशेज्नैकान्तिकत्वमाशझपादनाकाश इति । सपक्षत्वान्न व्यभिचार इत्यर्थः । प्रमाणमञ्जरीव्याख्या समासेन विनिर्मिता । संविदारण्यतुष्ट्यर्थमद्वयारण्ययोगिना ॥ इति प्रमाणमञ्जरीटिप्पणेऽद्वयारण्ययोगिविरचितेऽभावपदार्थस्समाप्तः । घा. टी] ननु मोक्षखरूपे वादिना विप्रतिपत्तरेवंविध एवं मोक्ष इत्येतस्मिन्नर्थे किं प्रमाणमत आह तत्रेति । तस्मिनित्यर्थः । नान्यस्मिन्मानमिल्यपि सूचितम् । सिद्धसाधनपरिहाराय अनित्येति। तत्र चागमः-"अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः" इति। आकाशे व्यभिचारमाशल्य .परिहरति नाकाश इति । सपक्षत्वादिति भावः। शाके बाणगजत्रिचन्द्रगणिते वर्षे सुभानौ शुमे देशे धाडपदाङ्किते धृतवति श्रीपमनामे विभी। लक्ष्मीशानि......तुलसीकृष्णाङ्गभूातनो- याख्याकोविदभवामन इमां लक्ष्मीपतिप्रीतये॥ टीकेयं न भवेप्रीसै मत्सरग्रस्तचेतसाम् । तथापि सुजनानन्ददायिनी कल्पना चिरम् ।। इति वामनभद्दविरचितायां प्रमाणामारीटीकायां अमावपदार्थस्समाप्तः । ॥ समाधोऽयं ग्रन्थः॥ ९ पदमिदं नाति व पुस्तके. २ पुनः प्राणीमि नाति र पुरके ३ पमिदै नालिट पुस्तके.