Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Hindi Kavya Vivechana

Dr.indra Nath Madan · 2011/01

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Front matter

हिंदी मूषण परीक्षा की सहायक पुस्तकें
,
रस और अलकार
(ले०-श्रीयुत रामबहोरी शुक्ल, एम ए,
साहित्यरत्न
प्रोफेसर, कोंस कालेज, बनारस)
इस पुस्तक में रस और अलकार का कठिन विषय बडोही
सरलता-पूर्वक समझाया गया है । प्रत्येक अलकार का लक्षण,
उदाहरण तथा अलकारों के आपस के भेद समझाने में विद्वान्
लेखक बहुत सफल हुए हैं। सभी उदाहरण प्राजक्ल की खड़ी
बोली की कविता से दिए गए हैं, जिससे विद्यार्थी बड़ी आसानी
से उन्हें समझ सकते हैं । इसको पढ़ कर हिन्दी भूपण के विद्या-
थियों को और कोई पुस्तक पढने की आवश्यकता नहीं रहती।
मूल्य III) मात्र ।
पिगल परिचय
-
(ले०-५० रामबहोरी शुश, एम ए साहित्यरत्न, कीस कालेज, बनारस)
इसमें "अलुकार प्रवेशिका' के सत्र छन्दों के लक्षण उसी छन्द
मे देकर उसके उदाहरण खूब समझाकर दिये गये हैं, जिससे
विद्यार्थी बहुत आसानी से छन्दशास्त्र को समझ सकते हैं
मु०/-)
हिंदी भवन, अनारकली, लाहौर

हिन्दी काव्य विवेचना लेखक- डा० इन्द्रनाय मदन एम० ए० पी० एच०डी० प्रोफेसर, दयालसिंह कालेज लाहौर दूसरा मस्करण जून १६१० मूल्प }}}-188 प्रकाशक- श्री विश्व-साहित्य ग्रन्थमाला चन्द्रगुप्त विद्यालकार हस्पताल रोड, लाहौर मुद्रक- - ला० रामभेजा कपूर मालिक लाहौर आर्ट प्रेस, १६, अनारकली लाहौर।

तीन बातें इस पुस्तक मे पाठको के लिये हिन्दी कविता का श्रादि काल से लेकर आधुनिक काल तक का परिचय दिया गया है । ऐमा करने के लिये कविता को चार बारामों में बाटा गया है। इनमें तीन-चीर, रहस्य और वैष्णव-धाराए नो हिन्दी कविता में पुरानी हैं। निराशा-भावों से भरी हुई कविता कुछ नवीन-सी है । इन चारों धाराओं के विकास का वर्णन करते हुए इनकी आलोचना सीधी और सरल भाषा में करने का यत्न किया है । परन्तु यह हिन्दी कविता का इतिहास नहीं है । कवियो और उनकी पुस्तकों के रचना काल पर कम ध्यान दिया गया है। प्रयास इस बात का किया है कि हिन्दी के रसिक अपनी कविता के विविध रूपोस परिचित होकर इसका प्रधिक रमास्वादन कर सकें। इन धाराओं फे विकास का वर्णन करते हुए देश और काल का प्रभाव भी बताया है। आजकल समालोचना में इस बात पर अधिक ध्यान दिया जाता है कि कविता अथवा साहित्य को सामाजिक विकास की दृष्टि से देखा जाय । इस पुस्तक में तीन विशेप बातें हैं। सब से पहले हिन्दी कविता को कालों में विभक्त नहीं किया, परन्तु -

धारामों मे यह शैली पाठको को कविता का परिचय देने के लिये
अधिक सुगम समझी गई है । दूमरे सामाजिक दशा का कविना
और कवियों पर जो गहरा प्रभाव पड़ा, उसका वर्णन किया गया
है। तीसरे कहने के ढग को मरल और मनोरञ्जक बनाने का पूर।
यत्न किया गया है। नये पाठकों के लिये यह आवश्यक
। अन
क्वल वे ही न्याय कर सकते हैं कि यह प्रयास कहा वक
मफल है।
३१ अगस्त १९३८
इन्द्रनाथ मदन
मसूरी
है
दूसरी बार
यह पुस्तक दूसरी बार छप रही है । इसमें कुछ परिवर्तन किये
गये हैं। भाषा को और भी माजा गया है, ताकि नये पाठकों के
लिये रोचक बन सके । मुझे खुशी होगी अगर मेरी पुस्तक को
पढने वाले अपनी कडी से कडी आलोचना से मुझे सूचित
करेंगे 1 इस के लिये मैं उनका श्राभारी रहूगा।
३१ मई, १६४०
इन्द्रनाथ मदन
}
कृष्णनगर, लाहौर।

विपय-सूची पृष्ठ ह १२ १० १३ १५ १६ सख्या वीर सरिता १ वीर कविना का पहला युग २ राजनीतिक कारण ३ सामाजिक कारण ४ वीर सविता के रूप , पृथ्वीरान रासो ६ बीसलदेन रासो ७ मारहसण्ड ८ वीर कविता का दूमरा युग है महाकवि भूपण १० भूपण का प्रभाव ११ वीर कविता का तीसरा युग २२ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र १३ राय देवीप्रसाद 'पूर्ण' १४ श्री मैथिलीशरण गुप्त १५ चीर कविता का चौथा युग १६ श्री मासनलाल चतुर्वेदी १७ श्री मियाराम शरण गुप्त २८ श्री बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' १६ श्री रामनरेश त्रिपाठी रहरय बाद २० सामाजिक स्थिति ०१ निराकार उपासना २२ रहस्यवाद का मूल २३ कपीर २४ गुरु नानक २५ रहस्यवाद में परिवर्तन २६ जायसी २१ २ २६ ३२ ३५ ३५ ३५ ३७ ३६ ४२ ४४ (६) ४६ ५६ ७० ७३ ७७ २७ अन्य सूफी कवि २८ आधुनिक रहम्यवादी कविता २६ जयशकर प्रसाद ३० प्रसाद की 'फामायनी' ३१ युगान्तरकारी पन्त ३२ सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' ३३ महादेवी वर्मा ३४ अन्य रहस्यवादी कवि वैष्णववाद ३५ राम-भक्ति ३६ गोस्वामी तुलसीदास ३७ 'विनय पत्रिका ३८ 'रामचरित मानस' ३६ मैथिलीशरण गुप्त ४० कृष्ण भक्ति ४१ मीराबाई ४२ सूरदास ४३ सूरसागर ४४ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ४५ अयोध्यासिंह उपाध्याय निराशावाद ४६ सामाजिक परिस्थिति ४७ ४८ रामेश्वरी देवी 'चकोरी' ४६ हृदयनारायण पाण्डेय 'हृदेयश' ५० भगवती चरण वर्मा ५१ लिरिक कविता तारा पाण्डे ६५ ६५ ६७ १०४ १०६ १०८ १११ हिन्दी काव्य विवेचना वीर कविता वीर कविता का पहला युग कविता मदा देश ओर काल के अनुसार बदलती रहती है। हिन्दी म सबसे पहला वीर गाथा-काल है। इस काल की कनिता वीररस प्रधान है । इसके विशेष कारण हैं । सरसे पहला कारण यह है कि भारत वर्ष कपि-प्रधान देश रहा है । यहा पर साधारण लोगों का निर्वाह खेती-बाडी पर होता था। ये लोग पमीना बहाते थे, हल जोनते थे और कठिन परिश्रम करके रोटी कमाते थे। समाज में इनके सिगाय एक श्रेणी और भी थी जो इन लोगा की आडे समय में रक्षा करती थी। यह योद्धाओं की श्रेणी थी । उन्हे परिश्रम बहुत कम करना पड़ता था, जर कभी युद्ध होता था, फेवल तभी उन्हें काम करने का अब- सर मिलता था । 'अवकाश के समय ये लोग या इनक राजा कविता आदि से अपना मनोरजन किया करते थे । इनके लिये राजपूतो की सभाओं में चारण या भाट हुआ करते थे, ज कविता लिखकर अपने अनदाताओं का यश गान किया करते थे। ये लोग अपने स्वतत्र भावों को नहीं प्रकट कर सक्ते थे, परन्तु इनका काम यह था कि राजपूत राजाओं का यश वर्णन - 4 - हिन्दी काव्य विवेचना फरें, उनकी लडाइयों का विस्तार से उल्लेस करे । आजकल भी इस प्रकार के चारण भाट गावो में भटकते फिरते मिलते हैं, मगर भाय इनकी श्रेणी धीरे-धीरे लुम हो रही है। क्योंकि इनके अन्नदाता । भी नये समाजिक विधान क कारण लुप्त हो रहे हैं। इस प्रकार वीर-कविता क लिखे जाने का सबसे बडा कारण उस ममय की मामाजिक वनावट है। कृषि-युग में वीर-कविता का होना एक प्रावश्यक बात थी। राजनीतिक कारण इस के साथ वीर कविता लिसे जाने के और भी कई कारण है। उस समय की राजनीतिक स्थिति बडी सराव थी। वह युग हलचल और अशान्ति का युग था । भारतवर्ष फे सिन्ध आदि प्रान्तो पर अरय लोग पहले से ही आक्रमण कर चुके थे। धीरे-धीरे मुमलमान अपना प्रभाव देश के और शान्तों पर भी जमाने लगे। दिल्ली, मुलतान, अजमेर, लाहोर आदि नगरों पर मुमलमानों की विजय का झडा फहराने लगा। महमूद गानवी ने भी इसी युग में भारतवर्ष पर सत्रह प्राकमण किये थे। और इन आक्मयों में सोमनाथ के प्रसिद्ध मदिर को भी तोडा था । शाहबुद्दीन मुहम्मद गौरी ने भी इसी काल में हिन्दुस्तान पर विजय पाने का यत्न पिया था । इस तरह बाहर से हमला करने वालो का एक ताँता-सा बंध गया । यहा के रहने वाले राजपूत राजाओं को अाक्रमणकारियो से लोहा लेना पडा । इस परिस्थिति मे ऐसी कविता की आवश्यकता थी जो योद्धाश्रो और साधारण वीर कविता ११ मनुष्यों के हृदय में वीर-रस के भाव उत्पन्न कर सक और उनको शत्रुओं के साथ लडने को उत्साहित कर सके। वीर-कविता की उत्पत्ति और विकास का यह दूसरा कारण है। सामाजिक कारण राजनीतिक हलचल के इस युग में सामाजिक अवस्था भी बहुत बुरी थी । इन दिनो यौद्ध धर्म का पतन हो चुका था और वैदिक धर्म शक्तिशाली बन रहा था। देश इन दो दलोंमे बँटा हुआ था। जब से गुप्त माम्राज्य का अन्त हुआ था, तब से देश के अनेक छोटे-छोटे टुकडे बन गये थे। सारे दश को एक तार मे बाधने के लिये किमी ने सफल यत्र नहीं किया । धर्म क नाम पर कलह होते थे । गैति-रिवाज के नाम पर सिर फूट जाते थे। स्वयवरों में राजपूत लोग अपने बल को प्रकट करना माधारण बात समझने ये कभी कभी तो अपना मन बहलाने के लिये अकारण युद्ध छेड देते थे। इस तरह विक्रम की नवीं, दसों और ग्यारवीं शताब्दियो में समाज की बडी शोचनीय दशा थी । इसको सुधारने फ लिये वीररस की कविता की आवश्यकता थी। अन देख लिया कि हिन्दी के आदि युग में जो वोर-रस की फपिता मिलती है, इसके तीन प्रधान कारण ठहरे । सबसे पहले यह कृपि युग था और कृपि युग में राजा प्रधान था। राजा का यश- गान करना कवियो का धर्म था, दूसरा कारण यह है कि यह युद्धों का युग था । राजपूतो को बाहर से हमला करने वालों का सामना करना पड़ता था। मुकाबला करने के लिये वीर-पुस्पोकी आवश्यकता ।

१० हिन्दी काव्य विवेचना करें, उनकी लडाइयों का विस्तार से उल्लेस करे । आजकल इस प्रकार के चारण भाट गावों में भटकते फिरत मिलते हैं, भय इनकी श्रेणी धीरे-धीरे लुम हो रही है। क्योंकि इनके अन्नदा भी नये समाजिक विधान के कारण लुप्त हो रहे हैं । इस प्रक वीर-कविता क लिखे जाने का मबसे घडा कारगा उम ममय । मामाजिक वनावट है। कृषि-युग मे वीर-कविता का होना ए आवश्यक यात थी। राजनीतिक कारण इम के साथ वीर कविता लिसे जाने के और भी कई कार उस समय की राजनीतिक स्थिति चडी सराव थी वद युग हलचल और अशान्ति फा युग था । भारतव फे मिन्ध आदि प्रान्तों पर अरय लोग पहले से ही प्राममा कर चुके थे। धीरे-धीरे मुसलमान अपना प्रभाव देश के श्री प्रान्तों पर भी जमाने लगे। दिल्ली, मुलतान, अजमेर, लाहौर नगरों पर मुसलमानों की विजय का झडा फहरान लगा। महमू गजनवी ने भी इसी युग में भारतवर्ष पर सत्रह आक्रमण किये थे और इन प्रारमणों में सोमनाथ के प्रसिद्ध मदिर को भी तोड था । शाहबुद्दीन मुहम्मद गौरी ने भी इसी काल में हिन्दस्तान प विजय पाने का यत्न किया था । इस तरह बाहर से हमला करने वालो का एक तांता-सा बँध गया । यहा के रहने वाले राजपूत राजाओं को प्राक्रमणकारियो से लोहा लेना पड़ा। इस परिस्थिति में ऐसी कविता की आवश्यक्ता थी जो योद्धाओं और साधारण वीर कविता हुश्रा "पृथ्वाराजरासो" है । यह एक विशाल ग्रन्थ है । इमकी सनसे बड़ी उपयोगिता यह है कि यह उस समय की मामाजिक दशा का चित्र है। इसमें युद्धों की प्रधानता है । ये युद्ध गजा पृथ्वीराज ने लडे थे। सब से प्रधान बात यह है कि "पृथ्वीराज रासो" में घटनाएँ एक दूसरे से कम सम्बन्ध रखती हैं। इनका तार बार-बार टूट जाता है । कहानी कहने का ढग या युद्धो का वर्णन ढीला पड जाता है। इस वीर-काव्य मे युद्धो के वर्णन के साथ साथ शृङ्गार रस का भी काफी समावेश है। वीर और शृङ्गार रस साथ-साथ चलते हैं। यह होना आवश्यक भी है । वीर योद्धा जब सप्राम क बाद विश्राम करते हैं, तो उनकी रुचि शृङ्गार की ही ओर जाती है। यह सिद्ध बात है कि उनको लड़ने के लिए प्रेम की आवश्यक्ता होती है। रासो-५०० पृष्ठों का विशाल ग्रन्थ है। इसमे ७० के लगभग अध्याय हैं। यह हिंदी कविता का प्रथम महाकाव्य माना जाता है। वीर-गाथा युग की वह सब से महत्त्वपूर्ण रचना है । इमकी श्राज- फल जितनी भी प्रतियाँ मिलती हैं उनमे परस्पर आकाश-पाताल का अन्तर है। इसके रचयिता चन्द कवि महाराज पृथ्वीराज फ समकालीन, उनके राजकवि और ससा मान जाते हैं। इसकी प्राचीनता के विषय म बडा विवाद है और ठीक तरह से नहीं रहा जा सकता कि इससी ग्चना किस ममय हुई । वीमनदेव रामो वीर-गीतों मे मय से प्रसिद्ध पुस्तर 'वीमलदेव रामो है। इसमें फुटकर पद्या की अधिकता है। अशान्ति र उस युग में लम्बी-लम्बी -- १२ हिन्दी कान्य विवेचना थी और पुरुषो को वीर बनाने के लिये ऐसी कविताकी आवश्यकता थी। तीसरे सामाजिक दशा इतनी शोचनीय थी कि उमको सुधारने के लिये वीर रस की कविता लिखी गई । जाति में फूट को दूर करना कवियो का अगर प्रधान आदर्श नहीं था, तो गौण तो अवश्य ही था । उनका प्रमुख श्रादर्श अपने राजाओं की काल्पनिक गाथाओं को भी गाना था, जिससे राजा लोग अपने आश्रित कवियों या भाटों पर प्रसन्न रह सकें । यह वीर-रस की कविता का पहला रूप था। इस काल की कविता में राजा का यश प्रधान अङ्ग है और जाति का हित गौण अङ्ग है। प्रथम युग की वीर कविता के रूप इस समय की वीर-गाथा की कविता दो रूपों में मिलती है- एक तो प्रबन्ध-काव्य के रूप में और दूसरे वीर-गीतो के रूप में प्रबन्ध काव्य की सब से पहली रचना दलपति मिश्र का "खुमान- गसो" है । कहा जाता है कि इस मे चितोड के दूसरे खुमान के युद्ध का वर्णन है । ये युद्ध विक्रम की नवी और दसवीं शताब्दी में हुए थे। इस समय इस पुस्तक की जो प्रतिया मिलती है, उनमें महाराणा प्रतापसिंह कक के युद्धों का वर्णन है । सम्भव है यह वाद की मिलावट हो। इसलिये निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि यह पुस्तक फिन वर्षों में लिखी गई है । इसके रचना काल को निश्चिन करने के लिये अभी गोज की आवश्यकता है। पृथ्वीराज रासो प्रबन्ध-कान्य की दूसरी प्रसिद्ध पुस्तक चन्द कवि का लिसा वीर कविता १५ - समकालीन और कन्नौज के राजा जयचन्द का मिन्न था। इस पुस्तक में आल्हा और उदयसिंह नाम के क्षत्रियों के कारनामे फुटकर पद्यों में अमित हैं । इमलिये इसको वीर-गीत के नाम से पुकारा जाता है। ये प्रयन्ध-काव्य और वीर-गीत वीर-कविता के पहिले उत्थान को सूचित करते हैं। वीर कविता का दूसरा युग इस काल के बाद देश का शासन मुसलमानो के हाथ में जाकर स्थिर हो गया। मुगल बादशाहों ने हलचल और अशान्ति के स्थान पर एक बढ साम्राज्य स्थापित कर लिया। भारत-निवासियों ने इस बात को स्वीकार-सा कर लिया कि मुगल सम्राट भारतवर्ष पर शासन करेंगे। उनके लिये एक वादशाह और दूसरे वादशाह में कोई भेद न रहा । यही बात महात्मा तुलसीदास ने मन्थराके मुस से 'कोउ नृप होय हमें का हानी" कहला कर, उस समय क भावों को प्रकट किया था । लोग एक प्रकार से नींद की हालत में अपने यापको गये। देश मुगल शासकों की फूट नीति में फँस फर अपनी स्थिति पर सन्तोष कर बैठा। अक्वर, जहागीर और शाहजहाँ का समय शान्ति का समय था । मेवाड की भूमि को छोड बाकी सब जगह शान्ति स्थापित हो चुकी थी। इसलिये वीर- कविता भी शात होगई। तलवार की आवश्यकता नहीं रही। जनता ने भक्ति भावों की आवश्यक्ता अनुभर की। कविता राज दरारों से निकल कर साधारण लोगो की चीज़ बन गई। यह दशा अधिक समय तक स्थिर न रह सकी । औरंगजेब के धार्मिक कट्टरपन ने दक्षिण हिन्दी काव्य विवेचना । गाथात्रों का लिखा जाना न तो बहुत सम्भवथा और न स्वाभाविक । इसलिए अधिकतर वीर-गीतों का ही निर्माण हुआ। ये गीत वीर भावों को उभारने के लिए और योद्धाओं को वीर-गति की प्राप्ति के लिए ललचाने की दृष्टि से उपयोगी ये । इसके साथ-साथ राज सभाओं में सरदारों का गुगा-गान करने के लिये भी काम में आते थे । “वीसलदेव रासो" का रचयिता नाल्ह नामक कवि था। यह अपने आश्रय-दाता वीसलदेव का समकालीन और राजकवि था। इस प्रथ में युद्ध आदि का वर्णन नहीं है, परन्तु इसमे जेसल- मेर की राजकन्या राजमती से वीसलदेव के विवाह और विवाह के पाद अपनी स्त्री से रूठकर उडीसा चले जाने का वर्णन है । अनेक वर्षों के बाद राजमती के सन्देश भेजने पर उसफ लौटने और लोटकर अपने कुटुम्बियो से मिलने का वर्णन है। वर्तमान समय मे इसे एक प्रेम-गाथा भी माना जा सकता है। परन्तु इस में वीरों के सरल हृदय की व्यञ्जना होने से यह वीर-गीत ही कहलाता है। आल्हखण्ड आल्ह खण्ड वीर-गीतों की दूसरी पुस्तक है। अनेक लोग इसे पृथ्वीराज रासो का एक सण्ड ही मानते हैं। रायबहादुर श्यामसुन्दरदास का कहना है कि इसे एक स्वतन्त्र प्रथ मानना चाहिये। क्योंकि इस वीर-गीत में न तो महाराज पृथ्वीराज के चरित्र की प्रधानता है और न ही उसके वीर कामो की प्रशसा है। आप के मतानुसार यह प्रथ पुराने रूप में जघनिक का लिसा हुपा था, जो परिमाल के दरबार में रहता था। परिमाल पृथ्वीराज का वीर कविता समकालीन और कन्नौज के राजा जयचन्द का मित्र था। इस पुस्तक मे आल्हा और उदयसिंह नाम य क्षत्रियों के कारनामे फुटकर पद्यों में अक्ति हैं। इमलिये इसको वीर-गीत के नाम से पुकारा जाता है । ये प्रबन्ध-काव्य और वीर-गीत वीर-कविता के पहिले उत्थान को सूचित्त करते हैं। वीर कविता का दूसरा युग इस काल के बाद दश का शासन मुसलमानों के हाथ में जाकर स्थिर हो गया। मुगल बादशाहो ने हलचल और अशान्ति के स्थान पर एक न्द साम्राज्य स्थापित कर लिया। भारत-निवासियों ने इस बात को स्वीकार-सा कर लिया कि मुगल सम्राट भारतवर्ष पर शासन करेंगे। उनक लिये एक बादशाह और दूसरे बादशाह में कोई भेद न रहा । यही वात महात्मा तुलसीदास न मन्थराके मुख से "कोउ नृप होय हमे का हानी" पहला कर, उस समय प भावों को प्रक्ट किया था । लोग एक प्रकार से नींद की हालत में अपन आपको भूल गये । देश मुगल शासकों की कूट-नीति में फंस कर अपनी स्थिति पर सन्तोप फर बैठा। अस्थर, जहागीर और शाहजहाँ का ममय शान्ति का समय था। मेवाड की भूमि को छोड बाकी सब जगह शान्ति स्थापित हो चुकी थी। इसलिये वीर- कविता भी शात होगई। तलवार की आवश्यक्ता नहीं रही। जनता ने भक्ति-भानों की आवश्यक्ता अनुभव की। कविना राज दरबारों से निकल कर माधारण लोगों की चीज़ वनगई। यह दशा अधिक समय तक स्थिर न रह सकी । औरंगजेब के धार्मिक कट्टरपन ने दक्षिण । ।

हिन्दी काव्य विवेचना मे मरहठों की शक्ति को और पजाब में सिक्खों की शक्ति को जगा दिया। तलवार का मुकाबला तलवार से होने लगा। छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविन्दसिंह और छत्रसाल रणभूमि में उत्तर आये । इस नई जागृति का मूल कारण धर्म-भावना थी। हिन्दी कविता में फिर से वीर-भावों का सञ्चार होने लगा। यह वीर-कविता का दूसरा उत्थान था । महाकवि भूपण महाकवि भूपण इस काल के प्रतिनिधि कवि हैं। आप शिवाजी के राजकवि थे । श्राप की वाणी हिन्दू जाति की वाणी है। आप प्रारम्भ से ही वीर और तीखे स्वभाव के पुरुष थे। कहा जाता है कि युवावस्था में यह बिल्कुल निकम्मे थे । न यह कुछ करते थे, न ही कुछ कमाते थे । केवल राना पीना ही जानते थे । इनके बडे भाई चिन्तामणि राजकवि थे और इस बात का उनकी भावज को वडा गर्व था । एक दिन जब यह भोजन करने बैठे तो इन्होने अपनी भावज से नमक माँगा। वह इनके निठल्लेपन पर सीझ उठी और चिढकर उसने ताना दिया, "क्या नमक कमाकर भी लाते हो या फेवल मॉगना ही आता है ?" भूपण का स्वभाव इतना तेज़ था कि आप उसी दम भोजन छोडकर घर से चल दिये । सुनते हैं कि भूषण ने श्रोरगजेन के राजदरबार मे राजकवि पद फे उम्मीदवार बनकर सम्राट को कविता सुनने क लिए कहा । जब बादशाह ने स्वीकार कर लिया तो कहने लगे, "महाराज | अपने हाथ धो लीजिए।" इस बेतुकी बात को सुनकर औरगजेर चकित .

वीर कविता हो गया। उसने पूछा, “यह किस लिये ?" उत्तर मिला, 'यह इस लिए कि महाराज मेरी कविता सुनते सुनते अवश्य ही अपने हाथ अपनी मूबों पर ले जायेंगे और मालूम नहीं कि ये हाथ इस ममय पवित्र हैं या नहीं ?" इस तरह भूषण को अपनी वीर-रस भरी कविता पर विश्वास था । एक और बात भी इनक जीवन में प्रसिद्ध है, जो इसी विश्वास को सूचित करती है। औरगजेन से बिगड कर आप शिवाजी के पास रहने के लिए रवाना हुए। राजधानी में सायकाल को पहुँचे । थककर भवानी के मन्दिर की सीढियो पर जा बैठ । एक भद्र पुरुप से भेंट हुई । उसने आने का कारण पूछा और कहा कि आप अपनी कविता सुनायें । इसके बाद वह शिवाजी से भेंट कग देगे। भूपण ने कवित्त सुनाया और वह उस भद्रपुम्प को इतना पसन्द आया कि पति को वह सत्रह बार दुहगना पडा । इस तरह आपकी कविता लोक- प्रिय थी। शिवाजी हिन्दू जाति का रक्षक था। भूपण कवि ने उनका यश-गान करके हिन्द जाति को जागृत करना चाहा। आपका विचार था कि अगर शिवाजी न होते तो सब हिन्दुओ को इस्लाम स्वीकार करना पड़ता। उस समय मुसलमान दवालयों को तोड़-तोड कर गिरा रहे थे। राव और राणा सब डर के मारे भाग रहे थे। स्वय पार्वती और गणेश औरगजेब का दसकर अपने-अपने स्थान में दुधक गये थे। काशी का प्रभाव नष्ट होगया था । मथुरा में मस्जिदें प्रताप , हिन्दी काव्य विवेचना बन गई थीं। साराश यह कि हिन्दू शक्तिया खतरे में थीं । उस समय- मजि चतुरग वोर रग मे तुरग चढि, सरजा सिवाजी जग जीवन चलत है। भूपन भनत नाद विहद नगारन के, नदी-नद मद गैबरन के रलत है ।। शिवाजी और औरगज़ेर का खूब मुकाबला हुआ। मुगल बादशाह के हाथियों को शिवाजी के सिंह के ममान वीर योद्धाओं ने फाड डाला- उतै पातसाह के गजन उह छूटे, उमडि घुमडि मतवारे घन कारे हैं। इतै सिवराजजू के छूटे सिंहराजौ, विदारे कुम्भ करिन के चिरत भारे हैं। भूपण कवि औरगजेब के प्रति अपनी बड़ी घृणा प्रकट करते हैं। क्योंकि मुगल बादशाह ने "अपने मगे भाई दारा को आगरे के किले के चौक में गढवा दिया। बूढ़े जीवित बाप को मरा मानकर उसका राज-छन छीन लिया और किले में चन्द कर दिया ।" इस तरह आपकी कविता मुसलमानो के प्रति विरोध के भावों को प्रकट करती है। इसके विपरीत आप वीर शिवाजी की प्रशसा फ पुल वाँधते हैं-"इन्हीं के भय के कारण मुगल घराने की बेगमें जो सुन्दर महलों में रहती थीं वह अब भयानक पर्वतों में छिपी रहती हैं। जो पहले मिठाई ।

-
वीर कविता
२६
खाती थी, वह श्रय गाजर मूली पर निर्वाह करती हैं
तीन र भोजन करने वाली बेगम अब येरल र साकर
ही गुजारा करती हैं ।" वीर शिवाजी का भातफ चारो ओर
छा गया है। औरगजेब उसफे मुकाबले में कुछ नहीं है।
अन्य वीर कवि
इस प्रकार भूपए की कविता में जातीय-भावना की पद-पद
पर झलक है। बीर-गाथा काल पे इस दूमरे उत्थान में हम
शुद्ध वीर-रस की कविता पात हैं। इस काल के तीन प्रमुख
कवि है-भूपण, लाल और सूदन । भूषण ने "सिवराज
भूपणा," " "शिवानी" और "छत्रसाल" पुस्तकें लिखी हैं।
इनमें से "सिवराज-भूषण" मर से बड़ा प्रन्थ है । सूदन की
कविता में वह जातीयता की फडक नहीं है जो भूषण और
लाल में है । इमफ सिवाय सूदन ने जगह-जगह पर अस्त्र-शस्त्रों
फा वर्णन देकर कविता को नीरस बना दिया है। आपका
"सुजान चरित्र" सूरजमल की वीरता का वर्णन करता है। इसमें
चीर-रस तो भरा है, परन्तु यह जाति को उभारने के लिये कोई
विशेष सहायता नहीं देता। पिवर लाल की कविता में सब
गुण हैं और दोय कम हैं पर अापक छन्दों में नीरसता आजाती
है। इन तीन प्रमुख कवियो के अतिरिक्त गुरु गोचि-सिंह जहाँ
पर वीर योद्धा थे वहाँ पर वीर-रस की कविता भी करते थे।
श्राप सिक्यो अन्तिम और दसवें गुरु थे। महावीर के रूप में
आपने अपनी कविता में तलवार, युद्ध और वीर-पुरुषों का अच्छी

टोल॥
पग्ग।
हिन्दी काव्य विवेचना
तरह यश गाया है । एक जगह श्राप लिसते हैं-
जिते वीर रुम । तिते अन्न जुन्झ ।।
मिते खेत भाजे । तिते अन्त लाजे ॥
तुटे देह बर्म । छुटी हाथ चमै ।।
कहूँ खेत सोल । गिरे सूर
कहूँ मुच्छ मुक्स । कहूँ शस्त्र सक्ख ॥
कहूँ खोल सग्ग । कहूँ परम
इम प्रकार के वोर-भावो को जगाकर आपने हिन्दू जाति की
रक्षा की और हिन्दी कविता की सेवा की । इन सब वीर कवियाँ
की कविता मे एक प्रकार का खुरदरापन है। तलवार और युद्ध
की कविता मे कोमल और मृदु भाव सम्भा नहीं होते।
चीर कविता का तीसरा युग
मुगल-शासन के अवमान के बाद अग्रेजी राज्य की स्थापना
होने लगी। अग्रेजो ने अपनी शक्ति धीरे-धीरे बढा ली
जिससे हिन्दू समाज और भी चकित हो गया। अभी पहली
पराधीनता को वह भूला ही नहीं था कि एक और प्रभावशाली
जाति ने उस पर विजय पा लिया । अग्रेजो और मुगलों की विजय
मे एक बड़ा भारी भेद है । जो काम मुसलमान तलवार से न ले
सक, वही काम अग्रेजो ने अपनी शिक्षा-प्रणाली से लिया।
धीरे-धीरे लोग अपने पूर्वजो को घृणा की -ष्टि से देखने लगे।
यह हिन्दू-सस्कृति की पराजय थी जो कि तलवार की पराजय से
गहरी वन पड़ी। औरगजेब क काल में अगर मन्दिर और
.

वीर कविता २१ - मूर्तियाँ तोडी गई तो अग्रेजी शासन-काल में इनकी आवश्यकता ही नहीं रही। अब ऐसे कवियों की जरूरत हुई जो इस मिटती हुई हिन्दू-सस्कृति का फिर से उद्धार कर सके। भारतेन्दु हश्चिन्द्र सत्र से पहले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने इस काम को अपने हाथ मे लिया। आपने कवि के और जाति-सुधारक के रूप में देश की दशा को ठीक करने का भरसक यन्न किया । इस समय पुराने और नये विचारों में मघर्ष हो रहा था। दोनों दलो के लोग अपनी-अपनी हठ पर अड़े थे। एक पक्ष दूसरे को नास्तिक, क्रिस्तान और भ्रष्ट कहा रहा था तो दूसरा उन्हें अन्ध-विश्वासी की पदवी दे रहा था । भारतेन्दु ने दोनो के मिलाने के लिये उपदेश दिया। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों के विरोध मे लेस और कवितायें लिसी, विधवा विवाह, समुद्र यात्रा श्रादि के पक्ष मे लिसा। लडकियो की शिक्षा के लिये आपने उद्योग झ्यिा । यहा तक की परीक्षा में पास होने वाली लड़कियों को उत्साह देने के लिये वह उन्हें बनारसी साडिया पुरस्कार में देते थे। राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने के लिये हरिश्चन्द्रजी ने हिन्दीको राष्ट्र-भाषा बनाना चाहा । इसके लिये उन्होंने खूर आँसू बहाये। लोगों को जगाने के लिये मन्दश दिया और लिखा- जागो जागो रे भाई। सोक्त निसि बस गँवाई । जागो जागो रे भाई ॥ निशि को कौन कहे दिन वीत्यो काल राति चल आई॥

२२
हिन्दी काव्य विवेचना
देख परत नहिं हित अनहित कछु पर बैरि बस आई ।।
निज उद्धार पन्य नहिं सूमत सीम धुनत पछताई ॥
इस तरह पुरानी वीर रस की कविता अपनी तलवारों
की मनकार और युद्ध के कोलाहल को छोडकर आँसुओं में
परिणत हो गई । कवि ने देश के पुराने गौरव को जमाने का
यत्न किया, क्योंकि देश की परिस्थिति ऐसी ही थी । लोग
हिन्दू सभ्यता से मुँह मोड रहे थे। इससे कुछ समय पहले
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भी वैदिक-सभ्यता को पुनर्जीवित
करने के लिये आर्य समाज की स्थापना की थी। बगाल में
राजा राममोहनराय ने इमी काम को हाथ में लेकर
ब्रह्म-समाज को चलाया। अनेक समाज-सुधारक कर्म क्षेत्र मे
आर्य सभ्यता को बचाने के लिये श्रा उतरे। इन लोगों का
सदेश केवल हिन्दू समाज तक परिमित था । इस लिये भारतेन्दु की
कविता मे मुमलमानो क प्रति वही विरोध क भाव मिलते हैं जो
भूपण आदि कवियों ने अपनी कविता मे प्रकट किये थे। धीरे २
इस प्रकार के भाव आगे आने वाली राष्ट्रीय कविता से लुप्न
हो गये । भारतेन्दु-युग की वीर-कविता का सन्देश बिवरे हुए
हिन्दू जाति के लोगों को मिलाना है और पुराने गौरव को
जगाना है।
राय देवी प्रसाद "पूर्ण"
राय देवी प्रसाद "पूर्ण" ने अपनी "भारत-वाक्य"
नामक कविता मे इन्ही भावो को प्रकट किया है-

वीर कविता
लक्ष्मी दीजै लोक में मान दीजै,
विद्या दीजै सभ्य सन्तान दीजै ।
है है स्वामी प्रार्थना कान कीजै,
कीजै कीजै देश कल्याण कीजै
सुमति सुखद दीजै फूट को लोग त्यागें
कुमति हग्न कीजै द्वेष के भाव भागें ।।
तजि कुसमय निद्रा चित्त सो चित्त जागै
विपम कुपथ त्यागै नीति के पन्थ लागे ।।
इस प्रकार क पद जो "स्फुट" नाम की कविता में मिलते हैं,
काव्य की दृष्टि से सुन्दर नहीं हैं, क्योकि इन मे
पदेश की मात्रा अधिक और स्पष्ट है। फिर भी यह उस समय
की वीर-कविता की धारा को निर्दिष्ट करते हैं और बताते हैं कि
ह धारा तब किस ओर बह रही थी। इसी तरह कवि श्रीघर
ठिक "भारत सुत" कविता में छात्रो को देश-सेवा के लिये
प्रत करते हैं। आप कहते हैं कि नवयुवक ही देश की आशा हैं।
श्री मैथिलीशरण गुप्त
प्राचीन गौरव को जगाने वाले प्रमुख कवि श्री मैथिलीशरण
प्त है। हिन्दी कविता मे थापने एक युगान्तर-सा पैदा कर
दया है। जब समाज अपने पुराने आदर्शों को भूल रहा था
नो आपने "भारत भारती" पुस्तक लिस कर उन आदर्शों को
फर से जगान का सफल यत्न किया । यह पुस्तक हिन्दी कविता
में अपना विशेष स्थान रसती है। इसके तीन खण्ड हैं—पहले
।

.
२४
हिन्दी काव्य विवेचना
खण्ड में भारतवर्ष के अतीत गौरव का वर्णन किया है और
बतलाया है कि पूर्वजों ने कविता, नाटक, कला, विज्ञान और
धर्म आदि में कितनी उन्नति की थी । भूतकाल एक तरह
का स्वर्ण-युग था । दूसरे सण्ड मे आधुनिक शोचनीय दशा
का वर्णन किया है। देश की गरीबी, बीमारी, अविद्या का
करुण चित्र पींचा है। तीसरे सण्ड में कवि ने उस सुनहले
भविष्य का वर्णन किया है, जिसके लिये जाति को भरसक यत्न
करना चाहिये । प्रचार की दृष्टि से पुस्तक अधिक सफल रही है।
यहाँ तक कि इसके अनेक सस्करण छप चुक हैं। कविता की
दृष्टि से आधुनिक पाठक को वह इतनी सुन्दर नहीं जान
पडती। 'स्वदेश सगीत" आपकी राष्ट्रीय कविताओं का सग्रह है।
इस पुस्तक में कवि जातीय भावो को लॉप कर दश और
राष्ट्र
के
गीत गाता है । 'मेरा देश', 'भारत का महा', 'भारत की जय'
आदि मे वह इन्हीं भावो को प्रकट करते हैं। “आह्वान" में वह
लिखते हैं
धन अन्धकार में ज्योति जगा जा, आ जा,
भूले भटकों को पार लगा जा, श्रा जा।
निज प्रेम-पुण्य में हम पnा जा, आ जा,
मरने तक का भय दूर भगा जा, आ जा।
सब साम्य भार से रहें रङ्क क्या राजा।
श्रा जा, आ जा, ओ महाशक्ति, मॉ, आ जा?
इस तरह के राष्ट्रीय भाव गुप्त जी की कविता में कहीं-कही

। चीर फविता २५ मिलते हैं। अधिकतर आपने हिन्दू समाज और संस्कृति को जगा- ने का सम्ल्प किया है। यह प्रादर्श आपक लगभग सभी प्रन्थों में मिलता है । “वैतालिक", "हिन्दू", "गुरुकुल" और "अनघ" इन चारों प्रन्यों का क्षेत्र हिन्दू ममाज तक ही सीमित है । "साकेत" प्रापका महाकाव्य है । इसमे भी "रामायण" या "रामचरित मान- स" फी कथा को लेकर नवीन ढग से समाज के आदर्श को बडी बोली में पेश किया है। इस तरह भारतेन्दु हरिश्च द्र ने हिन्दी कविता में जो युगान्तर उपस्थित किया, उसी के फलस्वरूप सडी वोली का प्रचार हुआ। देश को ऐसी भाषा की प्रावश्यकता थी जिसे यहुत से प्रान्तो के लोग समझ सके। भारतेन्दु से पहले कविता प्राय प्रजमापा और अवधी में लिसी जाती थी। मगर 'प्राम लोगों की वह भापा न रही। इनया स्थान सडी बोली न ले लिया। इस क्षेत्र में गुम जी सर्वप्रिय कवि हैं। गडी बोली के फाय की प्रगति को श्राप से घडी सहायता मिली है। आप जैसे कवियो फे सडी बोली मे आ जाने से नवीन फवियों को हम भाषा में लिसने का काफी उत्साह मिला है। महाकवि गुप्त का हिन्दी कविता में श्रमर स्थान है। एक तो आपने फिर से समाज की मर्यादा को स्थापन करने का यन किया है । यह मर्यादा अप्रेजी सभ्यता में आने से अस्तव्यस्त हो रही थी। बिसरे आदर्शों को एक स्थान पर सगठित किया है और इनका अनुसरण करने के लिए लोगो को सन्दश दिया है। दूसरे सडी बोली को स्थिर रूप दकर इसको कविता की भाषा के योग्य बनाया है। । ma ०६ हिन्दी काव्य विवेचना चीर कविता का चौथा युग धीरे-धीरे देश की परिस्थिति बदलती गई और लोग अनुभव करने लगे कि भारतवर्ष में केवल हिन्दू ही नहीं वसते, परतु मुसल- मान भी निवास करते हैं। उनके प्रति विरोध का भाव तो गुप्त जी की कविता में मिट गया था। इसके बाद वीर-रस की कविता ने एक और मार्ग पकडा । यह करिता केवल हिंदू जाति के हित के लिये नहीं थी, परतु मारे देश के हित के लिये थी। राष्ट्र का विकास इतना हो गया था कि जाति-हित को देश-हित के लिये बलिदान करना पडा। नई प्रकार की जो कविता लिसी जाने लगी, उस पर गाधीजी और काग्रेसके श्रादर्शी का गहरा प्रभाव पडा । इसमे उपदेश कम था और अनुभूति अधिक थी। कानपुर के राष्ट्रीयपन्न 'प्रताप ने नवीन कवियो को विशेष उत्साह दिया। इस पत्र ने राष्ट्रीय रंग में रंगी हुई रचनायो को प्रकाशित किया । इस प्रकार की कविता लिखने वालों में श्री माखनलाल चतुर्वेदी, श्री सियारामशरण गुप्त, श्री बालकृष्ण शर्मा "नवीन", श्री हितपी" और श्री"सनेही" आदि कवियों के नाम आते हैं । इनकी कविताओं में राष्ट्रीय विचारों की प्रधानता अवश्य रही है श्री माखनलाल चतुर्वेदी श्री माखनलाल चतुर्वेदी कविता मे अपना नाम “एक भारतीय आत्मा" रखते हैं। वे सचमुच एक भारतीय श्रात्मा है, जिनकी कविता में राष्ट्रीय भावो की एक विशेप मलक मिलती है। इनकी वीर-कविता पुरानी वीर-कवितासे अलग और अनोसी है। आपके वीर कविता लिये वीर वह है जो शत्रुओं को नाश करने के लिये अपने जीवन का बलिदान कर सके। शत्रु पर विजय पाने के लिये अपना बलिदान करना प्रावश्यक है। उसका मारना पाप है । यह आधुनिक गान्धीयुग का सन्देश है । महात्मा गाधी ने अहिंसा के आदर्श के अनुसार लोगों के दिल मे नये वीरता के भाव भर दिये हैं। इन विचारों का चतुर्नेदी जी की कविता पर काफी प्रभाव पड़ा है। आपकी कविता में देश की गरीवी और उसकी उलझनों का प्रचल उद्वेग है । एक कर्म-परायण कवि होत हुए आपने लोगों को फर्म पर बलिदान होने का सन्देह दिया है। एक फूल की अभिलाषा का वर्णन करत हुए आप कहते है। चाह नहीं, मै सुरबाला के गहनों मे Dथा जाऊँ। चाह नहीं, प्रेमी-माला मे बिय प्यारी को ललचाऊँ ।। चाह नहीं, सम्राटो के शन पर हे हरि डाला जाऊँ, चाह नहीं, देवों के सिर पर चहूँ, भाग्य पर इठलाऊँ। मुझे तोड़ लेना वनमाली । उस पथ मे देना तुम फेक , मातृभूमि पर शीश चढाने । जिस पथ जावे वीर अनेक । इस कविता में विशेषता केवल यही है कि कवि ने साधारण- सी बात को प्राधुनिक रंग में रंग कर अनोसा बना दिया है। वीरता के भावो को सोत रूप से प्रस्ट किया है । इनमे एक नई तरह की मौलिक्ता और भावुकता है । किस तरह कवि ने मातृभूमि पर शीश चढाने वाले वीर लोगो का मार स्थिा है। ये लोग आज कल के देवता है, ऐसा कवि का मत है। इसी तरह "सिपाही" हिन्दी काव्य विवेचना कविता को पढकर हृदय बॉसों उछल पडता हैं। शरीर में वीर-रस का सञ्चार होता है, "बलिदान" में कर्म के आदर्श की प्रशसा की है। "आराधना" में यही भाव प्रकट किये गये हैं। कहते हैं 'लो, सुनो-'सफलता' आ रही है किन्तु मृत्यु के साथ है। चस, उठो कर्म करने लगो, जीत तुम्हारे हाथ है। आपकी अधिकाश कवितायें राष्ट्रीय भावों से ओतप्रोत हैं। इस प्रकार की रचनायें "प्रभा", 'प्रताप' और 'कर्मवीर' आदि पत्रों में प्रकाशित होती रही हैं, जिनके कारण आप नवीन युग के प्रतिनिधि कवियो में माने गये हैं श्री सियाराम शरण गुप्त श्री सियारामशरण गुप्त की कविताये भी राष्ट्रीय भावों से लाबालब भरी हुई हैं। जिस समय देश मे वीर-रस का स्रोत बह रहा हो, फवि भी उसके साथ बहते हैं । गान्धी-युग में कवि समुदाय भारत को जगाने में लगा हुआ था। इस समय श्री मैथिली शरण जैसे कवि अतीत गौरवका गुण-गान गा रहे थे और वर्तमान अधोगति का एक करुण चित्र खींच रहे थे और भविष्य को सुनहला बनाने का उपदेश दे रहे थे। उसी समय उनके भाई श्री सियारामशरण गुप्त ने 'मौर्य विजय" वीर-रस प्रधान का की रचना की। इसमें चन्द्रगुप्त मौर्य और यूनानी सेनापरि सेल्यूकस के युद्ध का वर्णन है । कहानी बडी छोटी-सी है, परन् ।

२६ वीर कविता इसके प्राधार पर कवि ने अपने वीर-भावों की धारा को प्रवाहित फिया है। ये छलकते हुए भाव हृदय को उत्साह देते हैं और उत्ते. जित करते हैं। कवि का "अनाथ"नामक छोटा-सा काव्य फ्रुणा रस फे भावों से भरपूर है । इसमे एक दरिद्र और अनाथ बालक के जीवन का वर्णन है। यह बालक भारत की गरीबी को प्रमाणित फरता है। इस प्रकार की रचनाओं मे "आत्मोत्सर्ग" आपकी प्रधान रचना है । यह काव्य स्वर्गीय गणेशशकर विद्यार्थी की याद में लिखा गया था । स्वर्गीय गणेशशकर उन महापुरुपो मे से थे, जिन्होंने सेवा-भाव से प्रेरित होकर अपना जीवन बलिदान कर दिया था। जब इन का दहान्त हुआ था तो महात्मा गान्धी ने आपके सम्बन्ध में लिखा था-"आज वह तब से कहीं अधिक सच्चे रूप में जीवित हैं।" "एक फूल फी चाह"मे अछूतों के मन्दिर प्रवेश विषय को लेकर आपने एक भाव-पूर्ण कहानी लिखी है। कवि की राष्ट्रीय रचनाये अधिकतर कहानियों के आधार पर लिखी गई हैं। इनमें वर्णन की मात्रा अधिक है । भावों की कम। श्री माखनलाल की कविता में इसका विपरीत भावों की मार्मिकता अधिक है। श्री बालकृष्ण शर्मा "नवीन" श्री बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' की कविताओं में वीरता के भाव छल-छला कर याहिर आते हैं, उनमे एक अनोखी मादकता है, उन्माद है और पीडा है। आप हलचल, उथलपुथल और क्रन्ति के पुजारी हैं। आपकी कामना है कि इस ससार को

३०
हिन्दी काव्य विवेचना
तोडफोड कर अपने हृदय के अनुसार एक नया ससार
बनाया जाय । यह भाव तो हर एक कवि के मन में उठते हैं।
वे चाहते हैं कि इस नीरस, निर्जीव ससार के स्थान पर एक
ऐसे ममार की रचना होनी चाहिए, जिसमे सुख हो, प्रेम हो,
अथवा जीवन हो, वे ऐसा समार कविता में बनाने का यत्न भी
करते हैं, मगर वह क्षण-भगुर होता है। श्री "नवीन" अपनी
प्रसिद्ध "विप्लव-गायन" कविता में इस संसार को मिटाने की
एक तीन और भीपण कल्पना करते हैं। आप चाहते हैं कि इस
छल और कपट से भरी हुई दुनिया का नाश हो जाय । आप
इसम सब नियम और बन्धन तोड डालना चाहते हैं। इस
मतवालेपन में आप यहाँ तक ही नहीं रुकते । क्वल इस ससार का
प्रलय ही नहीं चाहते,बल्कि आकाश का प्रलय भी चाहते हैं। तारों
फे टूक-टूक हो जाने, श्राकाश का वक्षस्थल फट जाने, माता के
अमृतमय दूध
के
कालकूट हो जाने, ऑसो का पानी शोणित
की बूंद हो जाने और आकाश में प्रलय की गर्जन पैदा होने
की आप क्रान्तिकारी करपना करते हैं । बस, इस कविता का
यही प्रधान गुण है । श्राप लिखते हैं
कवि, कुछ ऐसी तान सुना प्रो.-
जिससे उथल-पुथल मच जाए।
एक हिलोर इधर से आए--एक हिलोर उधर आए,
प्रणो के लाले पड़ जाएँ, त्राहि-त्राहि रव नभ में छाए,
नाश और सत्यानाशो का, युराधार जग मे छा जाए,

चीर फविता ३१ यरसे भाग, जलद जल जाए, भस्मसात् भूधर हो जाएँ, नभ का वक्षस्थल फट आए, नारे टूक-टूक हो आएँ, कवि कुछ ऐसी तान मुनाओ-- जिमसे उथल-पुथल मच जाए। इस प्रकार का भीपण वेग, हृदय की धडान, स्वाधीनता और जीवन की जागृति श्रापके 'पराजयगीत' में भी है। उथल- पुथल 'प्रापके जीवन का आदर्श है, इसको बार-बार अपनी कविता में प्रकट करते हैं। भी रामनरेश त्रिपाठी श्री रामनरेश त्रिपाठी भी राष्ट्रीय स्थूल के प्रमुख कपियों में है। आप पर महात्मा गाधी के अहिंसाराद का विशेष प्रभाव पड़ा है। आप की कविताओं में स्थाओ के रूप में इस श्रादर्श को भली प्रकार दिखाया गया है। "मिलन" में क्या इस प्रकार है-एक नवयुवक और नवयुवती "अपने दश की स्वाधीनता के लिये लडे । नवयुवक के पिता जाते समय अपने पुत्र के नाम वलिदान का सन्देश छोड गये। वह कारी अन्याय से दुखी थे। सयोगवश नरयुवक और नवयुवती को एक दूसरे से अलग होना पड़ा। एक बार एक साधु ने उनको नदी में डूबने से बचाया। माधु ने नवयुवक को देश की सेवा करने के लिये सन्देश दिया। नवयुवनी भी एक गरीब किसान को करण दशा से प्रेरित होकर देश-सेवा में लग गई। उसने अनुभव किया कि देश सेवा ही जीवन को शान्ति दे सस्ती स्वय ३२ हिन्दी काव्य विवेचना है। इन दोनों ने अन्यायों के साथ युद्ध किया और लोगों का मला किया। इस तरह कवि ने कहानी के रूप में देश-सेवा के आदर्श को अपनाया है। इसी तरह "पथिक" में कवि ने सेवा और प्रेम में संघर्ष दिखाने का यन्न किया है । एक तरफ़ सेवा है और दूसरी तरफ़ प्रेम है । दोनों में सग्राम बराबर जारी है। सेना की प्रेम पर विजय होती है। आपका विचार है कि जीवन का आदर्श सेवा ही हो सकता है । प्रेम का स्थान इसके नीचे है। "पथिक" की कहानी में नायक देहात मे चकर लगाता है और अनुभव करता है कि किसानों में असीम गरीबी है और भूस है। इसके लिये राज्य अपराधी है। कुछ समय के बाद नायक को असन्तोष फैलाने के अपराध मे पक्ड लिया जाता है और उसे प्राणदण्ड दिया जाता है। जब उसकी पत्नीको पता लगता है तो वह वहाँ पर पहुँच जाती है । वह विप का प्याला, जो उसके पति को दिया जाना था, स्वय पी जाती है। लोग स्त्री के बलिदान पर चकित हो जाते हैं। राजा के अधिकारी तब नायक के पुत्र के वध के लिये आज्ञा देते हैं, मगर नायक शान्त है । वह सच्चा सत्याग्रही है, महात्मा गान्धी का पूरा भक्त है। इसी तरह "म्वप्न" में श्री त्रिपाठी ने इसी देश-सेवा के आदर्श को कथा के रूप मे विक्रमित किया है । विषय वही पुराना है । एक तरफ प्रेम है । दूसरी तरफ सेवा । मालूम पड़ता है यह कवि के अपने जीवन की समस्या है । कथा नायक पारिवारिक सुखों ।

वीर कविता
में लिप्त है । एक दिन उसको ज्ञान होता है कि उसको देश की सेवा
करनी चाहिये, मिमकने के बाद वह यही निश्चय करता है।
देश पर शत्रुओं का हमला होता है और लोग इस को रोकने के
लिये फौज़ में भरती होते हैं। माताये अपने बच्चो को रण में
जाने के लिये प्रेरित करती हैं और कहती हैं-
माँ ने कहा-दूध की मेरे
लज्जा रसना रण में है सुत
x
x
इन बचनो से गूंज रहे थे
जिनक अत्रय अन्तस्तल
ग्राम ग्राम से निकल-निकल कर
ऐसे युवक चले दल के दल.
और
यहिने कहती थी-हे भाई ।
वैरी का अभिमान चूर्ण कर
विनयी योद्धा व
बानक मे
इसी राह होकर जाना पर
हम गायेगी गीत विजय के
और
लाना वरसा कर
बहनो को आनन्दित करना
हर्ष हमारा सुना सुना पर

हिन्दी काव्य विवेचना है । इन दोनो ने अन्यायों के साथ युद्ध किया और लोगों का मला किया। इस तरह कवि ने कहानी के रूप में देश-सेवा के आदर्श को अपनाया है। इसी तरह “पथिक" में कवि ने सेवा और प्रेम में सघर्ष दिखाने का यत्र किया है । एक तरफ़ सेवा है और दूसरी तरफ प्रेम है । दोनो में सप्राम बराबर जारी है। सेवा की प्रेम पर विजय होती है। श्रापका विचार है कि जीवन का आदर्श सेवा ही हो सकता है । प्रेम का स्थान इसके नीचे है। "पथिक" की कहानी मे नायक देहात मे चक्कर लगाता है और अनुभव करता है कि किसानों में असीम गरीबी है और भूस है। इसके लिये राज्य अपराधी है। कुछ समय के बाद नायक को असन्तोप फैलाने के अपराध में पकड लिया जाता है और उसे प्राणदण्ड दिया जाता है। जब उसकी पत्नीको पता लगता है तो वह वहाँ पर पहुँच जाती है। वह विप का प्याला, जो उसके पति को दिया जाना था, स्वय पी जाती है। लोग स्त्री के बलिदान पर चकित हो जाते हैं। राजा के अधिकारी तव नायक के पुत्र के वध के लिये आज्ञा देते हैं, मगर नायक शान्त है । वह सच्चा सत्याग्रही है, महात्मा गान्धी का पूरा भक्त है। इसी तरह "स्वप्न" में श्री त्रिपाठी ने इसी देश सेवा के श्रादर्श को कथा के रूप में विकसित किया है। विपय वही पुराना है। एक तरफ प्रेम है । दूसरी तरफ सेवा । मालूम पडता है यह कवि के अपने जीवन की समस्या है। कथा नायक पारिवारिक सुखों

वीर कविता
में लिप्त है । एक दिन उसको शान होता है कि उसको देश की सेवा
करनी चाहिये, झिमफने के बाद वह यही निश्चय करता है ।
दश पर शत्रुओं का हमला होता है और लोग इस को रोकने के
लिये फौज में भरती होते हैं। मातायें अपने पचों को रण में
जाने फ लिये प्रेरित करती है और कहती हैं-
माँ ने कहा-दूध की मेरे
लज्जा रसना रण में है सुत ।
x
x
x
इन वचनों से गूंज रहे थे
जिनक श्ररया अन्तस्तल
ग्राम प्राम से निकल-निकल कर
ऐसे युवक चले दल के दल
यानक में
यहिने कइती थी-है भाई ।
वैरी का अभिमान चूर्ण कर
विजयी योद्धा क
इमी राह होकर जाना पर
हम गायेगी गीत विजय के
फुल
और
लाजा बरसा कर
बहनो को आनन्दित करना
हर्प हमारा सुना सुना कर

३४
हिन्दी काव्य विवेचना
इन भावो से प्रेरित होकर नायक की पत्री आदर की
पोशाक पहन फर अपने पति को समाम में सम्मिलित होने के
लिये उदबोधित करती है। उसके पति की विजय होती है और
इस बात का पीछे पता चलता है कि "नवयुवक" उसकी पत्नी ही
थी। इन तीनो काव्यों में कमि ने महात्मा गान्धी फ असहयोग
आन्दोलन की झलक दिखाई है। यह वीर-कविता की अन्तिम
मज़िल है। वीर कविता की धारा चन्द युग. भूपण-युग, भारतेन्दु
युग, गुप्त-युग, और गान्वी-युग से यहती हुई यहा पर श्राफर
विश्राम करती है । इससे आगे इसका क्या रूप होगा, अभी ठीक
निश्चित नहीं हो सकता। कुछ फुटकर कवितायें जो आज कल
लिखी जा रही है, साम्यवाद फ विचारों को प्रकट करती है।
उनका विषय देहात है, किसानो की गरीबी है, उनकी भूस
और तडप है और अमीरो का विलासपूर्ण जीवन है ।

रहल्यवाद
31
-
रहस्यवाद
सामाजिक स्थिति
जन मुसलमानो ने इस दश में स्थिर रूप से अपने पाँव जमा
लिये, तर इनक फकीर जनता मे इग्लाम धर्म का प्रचार करने
लगे । उनका विचार था कि हिन्दू जाति छोटे छोटे टुकडों में
बॅटी हुई है। लोग अलग-अलग देवी देवताओं की पूजा करत हैं ।
समाज मे छोटी जाति के लोगो को घृणा की दृष्टि से देखा
जाता है। इसलिये वह अपने धर्म का सुगमता से प्रचार कर
सकेंगे । मुसलमान एक इश्वर को मानते थे। उनके समाज में
ऊँच-नीच का कोई भाव नहीं था। वे जाति-भेद से मुक्त थे। धीरे-
धीरे बातो का प्रभाव हिन्दू समाज पर पड़ने लगा। इससे पहले
शकराचार्य ने अपने मायावाद को फैलान का भरसक यन्न किया।
इनका मायावाद जो इस ससार को माया बतला कर एक ब्रह्म
की सत्ता ही मानता था, श्राम लोगो क लिये नीरस साबित
हुआ । साधरण लोग इतनी गहरी ज्ञान की बातो को नहीं समझ
सकते थे। उनको ऐसे विश्वासों की या मत की पारश्यकता थी
जो उनके लिये सुगम और सरल हो । इमलिये शकर का माया-
वाद मुसलमान फकीरो के प्रचार को रोकने के लिये काफी
-
नया।
निराकार उपासना
शकर के विचारों को रामानन्द न सुगम रूप दिया ।

हिन्दी काव्य विवेचना राम को निराकार ब्रह्म का रूप देकर उपासना का आदर्श बनाया और लोगो के दिलों में इस निराकार ईश्वर की भक्ति के लिये भाव पैदा किये । सारे देश में धूमकर रामानन्द ने लोगो को यह बताने का यत्न लिया कि राम की आसों में सब लोग वरावर हैं, उसके दरबार में कोई जाति-भेद नहीं । वह लोग जो जीवन से निराश होते जाते थे, इन भावों को पाकर फिर से एक नई जीवन-शक्ति का अनुभव करने लगे । रामानन्द का आन्दोलन मुसलमान सूफ़ियों के प्रचार को रोकने के लिये सफल रहा। अगर वह एक ईश्वर का प्रचार करते थे, तो राम भी ब्रह्म का एक निराकार रूप थे। अगर इस्लाम में कोई जाति-भेद नहीं था, तो राम के लिये भी सब बराबर थे । अगर देवी-देवता सोमनाथ के मन्दिर तोडे जाने पर पुजारियों की सहायता न कर सके थे, तो शक्तिशाली राम लोगों का आश्रय बन गए । देश की इस परिस्थिति में निर्गुणवाद का प्रारम्भ हुआ। इस निराकार राम के प्रति उपासना करने वालो में से कबीर प्रमुख सन्त कवि थे । कहा जाता है कि आपका जन्म एक जुलाहे के घर हुआ था । जुलाहे नीच जाति के समझे जाते थे । परन्तु रामानन्द के आन्दोलन से हरेक के लिये भक्ति मार्ग सुल गया । इनके शिष्यो में से नामदेव दर्जी, रैदास चमार दादू दयाल धुनियाँ और कबीर जुलाहा ये । स्त्रियों की पदवी भी स्त्री होने के कारण नीच न रही। पुरुषों के समान वे भी भक्ति की अधिकारिणी बन गई । रामानन्द के शिष्यों में रहस्यवाद से दो त्रिया भी थीं। एक पद्माती और दूसरी सुरमरी । इस तरह देश में एक नये जीवन का सचार होने लगा। कबीर के पीछे सन्तो फी एक याढ सी आ गई। जिन्होंने अनेक मत चलाये। इन सब पर थोडा बहुन फवीर का प्रभार पडा । सर सन्तों ने नाम, शब्द, गुरु आदि की महिमा गाई। मूर्ति पूजा आदि का विरोध किया, जाति-पाति फे भेद भाव हटाने का प्रयत्न किया। रहस्यवाद का मूल इन सन्त कवियो की उपासना निराफार उपामना थी । इन की वाणी में अपने उपासक के प्रति जो सक्त मिलते हैं, वे केवल श्रामास फे रूप में मिलते हैं। वे बिल्कुल स्पष्ट नहीं हैं। उनके अगोचर और अस्पष्ट होने के कारण वे रहस्यमय प्रतीत होते हैं, इसलिये उनकी कविता रहम्य सी बन जाती है और इस कविता की धारा को रहस्यवाद कहते हैं। इसके मूल में एक अज्ञात शक्ति की जिज्ञासा काम करती है। कवि अनुभव करता है कि इस ससार को चलाने वाली एक शक्ति है। इस शक्ति का क्या स्वभाव है, क्या प्रकृति है, इसका कभी-कभी वह अनुभव तो कर लेता है, परन्तु स्पष्ट वर्णन नहीं कर सकता। इसलिये अपनी कविता में वह इस शक्ति को सपत या इशारे से प्रकट करता है। कबीर ने एक जगह स्पष्ट कहा है कि इस शक्ति का अनुभव उस गुड की मिठास के समान है, जिस को गूंगा वर्णन नहीं कर सकता । यही रहस्यवाद का मूल है। इसी को कधीर अपनी वाणी में बार-बार वर्णन करता है- ४० हिन्दी काव्य विवेचना नाम रटा तो क्या हुआ जो अतर है हेत । पति वरता पति को भजै मुम से नाम न लेत ।। इस तरह के सीधे और गहरे रहस्य भावों को अपनी अटप- वाणी में प्रकट करते हुए कबीर साहब हिन्दू और मुसलमानों = अपना कट्टरपन दूर करने के लिये कहते हैं। उनके लिए समान के रीति रिवाज निराकार को पाने के मार्ग में रुकावट हैं । ये वध मनुप्यके हृदय पर एक मायाजाल विछा देते हैं। श्रादमी वास्तविक निराकार की उपासना को भूल जाता है और इन बन्धनों को आदर्श मान लेता है। उसके लिये ये दीवार का काम देते हैं, जिस परे उसकी ष्टि कभी जाती ही नहीं । भला फवीर जैसे सन्त कनि इन बन्धनों को कैसे सह सकते थे। आपने स्पष्ट तौर पर प्राह्मण और मुल्लाओं को, जो धर्म के रक्षक बने हुए थे, बुरी तरह फटकारा । इनके उपदेशो ने उनको और भी अधिक चिढा दिया आपने मूर्ति-पूजा के विरुद्ध कठोर वाणी मे इस तरह लिखा. पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजू पहार । ताते यह चकी भली पीस साय ससार । नमाज पढ़ने वाले मुल्लाओं को चुरा-भला कहा, बाग देने वालों के विरोध में लिसा, इस तरह उपवास, तिलक आदि सामाजिक आडम्बरो का खोखलापन बतलाते हुए अपने लोगों रहस्यवाद को अनुभव कगने का यत्न किया कि इनसे निराकार नहीं मिल सकता। राम तो हृदय मे रमते हैं, इसके लिये मन की माला फेरने की आवश्यकता है, काठ की नहीं। इस तरह कनीर ने हिंदू और मुलमानों को मिलाने की कोशिश की। आपने एक ऐसे मत की नींव डालनी चाही, जिसे दोनों दलो के लोग स्वीकार कर सकें। इस मत को कबीर पन्थ भी कहते हैं, जिसको मानने वाले कुछ लोग मिलते हैं। किन्तु इसका प्रचार अधिक न हो सका, क्योकि हिन्दुओं को एक मुमलमान से उपदेश लेना प्रिय न था। इसका कारण एक और भी था कि हिन्दुओं के लिये अपने पौराणिक देवी-देवताओं को छोडना एक असम्भव-सी बात थी। मुसलमानों में भी इनके मत का प्रचार न हो सका, क्योंकि इन्होंने कई हिन्दू सिद्धान्तों को अपनाया । परिणाम यह हुआ कि कबीर साहब ने दोनों दलो के लोगों पर आक्रमण किया और उनके धर्मग्रन्थों को भला बुरा कहा, परन्तु इनके चेलों में हिन्दू और मुसलमान दोनों थे। कहते हैं कि जब इनका देहान्त हुआ तो मुसलमानो ने इनके शरीर को दफन करना चाहा और हिन्दुओं ने जलाना। दोनों दलो में झगडा होता रहा। आखिर जब इनके शरीर से फफन उतारा गया तो वहा फूलों का एक ढेर पाया गया। आधे फूल मुस- लमान चेले ले गये और श्राधे हिंदू । एक ढेर को जला कर उसकी रास पर समाधि बनाई गई, जो अब तक है। दूसरे को दफना कर कर बनाई गई । जिस पर मुसलमान कनीर-पन्थी आजकल प्रतिवर्ष एकत्रित होते हैं। इस तरह हिन्दी कविता के प्रमुख रह-

हिन्दी काव्य विवेचना
स्यवादी कवि का अन्त हुआ । इसका प्रभाव आने वाले सन्तों
और आधुनिक छायावादी कवियो पर काफी गहरा पड़ा है।
गुरु नानक
निराकार की उपासना करने वाले गुरु नानक रहस्यवादी सन्त
सिख-सम्प्रदाय के प्रथम गुरु थे। आपने पजाब में इस मत को
चलाया। उस समय इस प्रान्त में इस्लाम धर्म और हिन्दू धर्म के
सघर्ष के कारण अशान्ति फैलने का भय था। गुरु नानक
उसे दूर करने का सफल यत्न किया । आपने अपनी मधुर
वाणी से इन दोनों दलों के विचारों को मिलाने का यत्न किया।
फवीर के उपदेशों का उन पर विशेप प्रभाव पड़ा था। उनके अन्य
साहब में कबीर की वाणी मिलती है। यह कबीर साहब की तरह
अधिक पण्डित नहीं थे। केवल अनुभवी सन्त थे। इनकी वाणी
इनकी आत्मा की वाणी थी। जिसका प्रभाव सीधा लोगों के
हृदयों पर पड़ा । आप कबीर साहब की तरह निराकार ईश्वर के
उपासक थे। उस रहस्यमय शक्ति की सोज में सदा भजन
करते रहते थे। आपने भक्ति-भाव मे उमड कर अपने हृदय के
प्रभाव से लोगो को इस मत पर चलाया और कहा कि इस छोटे
से जीवन में वह जितना भजन कर लें, थोडा है। बाकी सब वस्तुएँ
मिद जायँगी, मगर नाम पाकी रह जायगा-
सुमरन करले मेरे मना।
तेरि बीति जात उमर हरि नाम विना।
कूप नीर विनु, धेनु छीर विनु, मदिर दीप बिना।
,
-

रहस्यवाद
जैसे तरुवर फल विन होना तैसे प्राणी हरिनाम बिना ॥
देह नैन विन, रैन चन्द बिन, धरती मेह विना ।
जैसे पडित वेद विहीना तैसे प्राणी हरिनाम बिना ।।
काम, क्रोध, मद, लोभ निहारी छाँड दे अब सन्त जना ।
कहे 'नानकशा' सुन भगवता या जग मे नहिं कोई अपना ।
इस प्रकार के सन्त कवियों ने समाज पर दो भारी उपकार
कए। एक तो इन्होने हिन्दू और मुमलमानों को मिलाने का
पत्न किया। इन्होंने उपदेश दिया कि परमेश्वर एक है। फेवल
अज्ञानवश हम उसको अलग-अलग मान लेते हैं। धार्मिक झगडे
अकारथ हैं, सब मार्ग एक ही स्थान को जाते हैं । इस प्रकार इन्होंने
उस रहस्यमय शक्ति की एकता स्थापित की। दूसरा उपकार उन्होंने
जो समाज पर किया वह यह कि उन्होंने दलित जातियों को उठाया
और उनको देश-भापा मे उपदेश दिया। इससे पहले सब शिक्षा
सस्कृत भाषा में हुआ करती थी। यह पण्डितों की भाषा थी।
सन्त कवियों ने पहली बार लोगों की भाषा को अपनाया और
अपने रहस्यवाद के भावों को सीधी, सरल और अशिक्षित भाषा
में साधारण लोगों तक पहुँचाया । इससे नीची जातियों में एक
प्रकार की जागृति पैदा हो गई।
रहस्यवाद में परिवर्तन
कवीर आदि सन्त कवियों की वाणी खुरदरी थी। इस
में ब्रह्म की निराकार उपासना का उपदेश दिया गया था। यह
CE

हिन्दी काव्य विवेचना कुछ लोगों के लिये नीरस था । इसमें ज्ञान अधिक था, परन्तु हृदय की कोमलता कम थी। वह ज्ञान राम और रहीम को एक ठहराकर दोनों धर्मों का मेल कराने में कुछ सफल तो था, परन्तु वह लोगों के हृदय को स्पर्श नहीं करता था। धर्म के क्षेत्र में एकता को स्थापित तो करता था, परन्तु व्यवहारिक जीवन की एकता के लिये प्रेम के भाव अधिक उपयोगी हो सकते थे । ज्ञान लोगों के दिलों को नहीं मिला सकता था। इसके साथ पुराणों की जो निंदा निराकारी रहस्यवादी सन्तो ने की, वह कुछ समय के बाद जनता को रुचिकर न हुई। लोगों ने अपने जीवन में प्रेम के अभाव को अनुभव किया। उस समय मलिक मुहम्मद जायसी ने 'पद्मावत' काव्य लिखकर इस आवश्यकताको पूरा किया। आप एक सूफ़ी कवि थे। सूफी ईश्वर को निराकार तो मानता है, परतु उसको एक अनन्त प्रेम का भण्डार भी पाता है। इन सूफी कवियों की परपरा देर से चली आ रही थी, परन्तु इनमें जायसी ही प्रमुख कवि थे। ' पद्मावत 'पद्मावत' जायसी का प्रसिद्ध काव्य है। इसमें प्रेम की जो [पीर घतलाई गई है, वह लौकिक और अलौकिक दोनों ही दृष्टि से अनूठी बन पडी है । कथा अति सरल है। सिंहल राजा की पुत्री पद्मावती ने एक तोता पाल रखा है। किसी कारण तोता वहां से भाग जाता है, एक बहेलिया उसको पकड कर एक

रहस्यवाद
ब्राह्मण के पास बेच देता है । ब्राह्मण उसे चित्तौड के राजा
रत्नसेन के पास वेच देता है । एक दिन रत्नसेन की रानी
नागमती ने उस वाचाल तोते से अपने रूप गुण के बारे में पूछा।
खोते ने पद्मावती के रूप गुण की बहुत प्रससा की । रानी को
क्रोध आया और उसने अपनी नौकरानी को, तोते को मार डालने
की आज्ञा दी । पर उसने राजा के भय तोत को छिपा रखा।
राजा पे लौटने पर तोता उसके पास लाया गया और उसने
सारा हाल कह डाला । पद्मावती के रूप और गुण की प्रशसा
सुन कर राजा उससे व्यथित हो गया और उसकी सोज मे चल
पड़ा। कवि ने उसके विरह-भावो को बडी सुन्दरता और
कोमलता के साथ प्रकट किया है । राजा को राह दिखाने वाला
तोता था और सहायता करने वाले सोलह हजार कुमार थे।
जिन्होने योगियो का रूप बनाया हुआ था । सिंहल देश
पहुच कर ये लोग शिव-मन्दिर में योग साधने लगे । तोता
पद्मावती के पास पहुँचा ! पद्मावती सारा हाल सुन कर दुसी हो
गई । वह उसी मन्दिर में पूजा के लिये आई । रत्नसेन बेसुध हो
गया। जब उसे होश आया तन पद्मावती वहाँ से चल दी थी। उस
ने सदश भेजा कि गढ को विजय कगे । सुनह हो जाने पर
योगियों ने दुर्ग घेर लिया। शिवाजी की सहायता हुई । अन्त में
दोनो का विवाह होगया और वे थोडे दिनोंके बाद अपने देश लौट
आये। यह काव्य की प्रधान कहानी है। आयसी ने
मुसलमान
कवि
होते हुए हिन्दू राजा और रानी की कहानी को लेकर अपने
।

। हिन्दी काव्य विवेचना सूफी भावों को प्रकट किया है, इस कहानी में पद्मावती आदर्श है। रनसेन इस श्रादर्श की खोज में है । तोता उसका साधन है, जिसकी सहायता से वह अपने आदर्श को पा लेता है। सूफी कवियों ने आध्यात्मिक आदर्श को स्त्री के रूप में बतलाया है। वैष्णव कवि, जिनकी आगे चल कर चर्चा की जायगी, इस आदर्श को पुरुष के रूप में बतलाते हैं। उनके लिये कृष्ण आदर्श है। उसको सोजने वाली गोपिया है, परन्तु पद्मावती को सोजने वाला राजा रत्नसेन है। इन दोनों में यह भारी भेद है। अन्य सूफी कवि इस तरह की कहानियों को लेकर जायसी से पहले कुतबन, चौर, मञ्मन श्रादि सूफी कवियों ने रहस्यवादी काव्य लिखे हैं। कुतबन के 'मृगावती' नामक काव्य में एक सरल कथा को लेकर सूफी या रहस्यवादी भावों की छाप लगाई गई है ।मृगावती की कथा इस प्रकार है । गनपतिदेव के पुत्र राजकुमार के लिये राजकुमारी मृगावती श्रादर्श है । मृगावती उडने की विद्या जानती है। इसके कारण वह एक दिन उड जाती है। राजकुमार व्यथित हो जाते हैं और उसकी खोज में निकल पड़ते हैं। बीच में श्राप एक स्त्री की राक्षस के हाथों से रक्षा करते हैं । उसका पिता उसे राजकुमार को सौप देता है । अन्त में मृगावती से भी मिलन होता है। वह दोनों रानियों से विवाह कर घर लौटते हैं। एक दिन राजा हाथी से गिर कर मर जाता है । रानियाँ उसके साथ सती रहस्यवादी हो जाती है। कवि ने इस कथा मे बताने की कोशिश की है कि स्वर्गीय प्रेम का मार्ग कितना कठिन है, इसके लिये कितने त्याग की आवश्यकता है । इस कथा का प्रेम सासारिक नहीं है, परन्तु ईश्वरीय है। इस प्रेम मे रहस्य के भावो का सुन्दर आभास हुआ है। इसी तरह मज्मन कवि ने भी एक भारतीय कथा को लेकर सूफी भाव प्रकट किये हैं। इन सत्र में प्रेम-मार्ग के कष्ट और त्याग आदि का वर्णन कर, अज्ञात को पाने में जो कष्ट होते हैं, उनका भली प्रलार आभास कराया है । इन सब की भापा भी प्राय एक सी है । यह भाषा अवध प्रान्त की है। सब सूफी कवियों ने दोहों, चौपाइयों में अपने प्रन्यो की रचना की है । इन सब का प्रेम ईश्वर के प्रति है। परन्तु ईश्वर तो निराकार है और निर्गुण है। उसका आभास देने के लिये सूफी कवियो को इन कहानियो की सहायता लेनी पड़ी है। इनके रहस्यवाद और कबीर के रहस्यवाद मे मेद यह है कि कबीर आदि सन्तो का रहस्यवाद ज्ञान प्रधान है, अथवा वै निराकार को पाने के लिये ज्ञान को ही साधन बनाते हैं। उपासना उनके लिये गौण है । इसलिये उनका रहस्यगद कविता के लिये उतना उपयोगी नहीं है। ज्ञान नीरस होता है, परन्तु कविता रस चाहती है । इधर जायसी आदि का रहस्यवाद प्रेम-प्रधान है। प्रेम म मधुरता और कोमलता होती है। इस प्रकार के भाव कविता में लिये अधिक उपयोगी होते हैं । इसलिये रहस्यवाद की दृष्टि से जायसी की कविता अधिक सफल बन पड़ी है।

हिन्दी काव्य विवेचना आधुनिक रहस्यवादी कविता आधुनिक रहस्यवाद पर उपनिषदों और कवीर श्रादि सन्तों का गहरा प्रभाव है। पुराने भावों को एक नया रूप देकर सब से पहले बगाल के महा-कवि श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपनी अमर कविता में रहस्यवाद की झलक दिसाई है । आप चाहे हिन्दी भाषा के कवि नहीं हैं, परन्तु आपकी कविता का हिन्दी कवियों पर काफी असर पड़ा है। यहा तक कि कुछ कवियो ने तो केवल नकल मात्र ही की है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर को अब गीताञ्जलि पर नोबेल पुरस्कार मिला, तो भारत के साहित्यिक ससार में एक प्रकार की हलचल-सी मचगई। छोटे-मोटे कवियो ने श्रापकी नकल करनी प्रारम्भ करदी। उन्होंने समझा कि ऐसा करने से शायद वे भी नोवेल पुरस्कार के भागी बन सकेंगे। क्रमश. हिन्दी कविता मे रहस्यवाद की एक प्रकार की बाढ-सा आगई । कोई इसको छायावाद के नाम से पुकारने लगे, कोई प्रकृतिवाद के नाम से । समालोचकों में इन बातो के सम्बंध में पर अच्छा वाद- विवाद हुआ। धीरे-धीरे कवि अनुभव करने लगे कि यह सब अका- रथ था । कविता में असली बात जीवन का गहरा अनुभव ही है । यह अनुभत्र श्री ठाकुर की कविता में विद्यमान है । इसके लिये महाकवि ने कठिक साधना की है, जिसका हिन्दी के अनेक रहस्य- वादी कवियों में अभाव है। महाकवि ने उपनिषदो और कबीर आदि सन्त कवियों की कविता का अध्ययन किया है ।

रहस्यवाद ४६ आपने कबीर की एक सौ सासियों का अंग्रेजी में सुन्दर अनुवाद किया है। आजकल की रहस्यवाद की कविता का एक कारण तो यह है कि यह भाव पुराने हैं। दूसरे अाजकल शहरों में बसने से कवियों की दृष्टि प्रकृति के सुन्दर दृश्यो की ओर अधिक आकर्पित होने लगी है । शहर का जीवन बनावटी है, शहर के लोग सीधे और सरल नहीं हैं । यहाँ पर मशीना का धुआँ है, सड़कों पर घूल है, मकान वन्द हैं, अाकाश और तारों के कभी-कभी दर्शन होते हैं। इन बातों के कारण मनुष्य अपनी आत्मा को बन्द-सा पाता है। उसको विकसित करने के लिये वह प्रकृति की ओर भागता है, इस काम में कविता सहायता देती है। आजकल के कार भी इस कामना को पूरा करने के लिये प्रकृति के सुन्दर और कोमल दृश्यों का वर्णन कर लोगों के दिलो को शान्ति देते हैं। इन दृश्यों में वह परोक्ष शक्ति का भी अनुभव करते हैं, जिसका श्रामास कबीर आदि सन्तों ने सीधे और सादे ढग पर कराया है। जयशकर प्रसाद -- आधुनिक कवियों में इस प्रकार की कविता करने वाले स्वर्गीय जयशकर 'प्रसाद' का नाम मन से पहले प्राता है। आप आजकल को सभ्यता का भली प्रकार विरोध करते हैं । "फानन कुसुम, जो उनकी पहली रचना है, वह यताते हैं कि मनुष्य इस लम्बे ससार-मार्ग मे वेग के साथ चले ही जा रहे हैं। वे विश्राम को

५०
पिक पुज
हिन्दी काव्य विवेचना
नहीं जानते । वे प्रकृति के सौन्दर्य पर ध्यान नहीं देते ।
उनसे कवि कहता है-
कुसुम-वाहना प्रकृति मनोज्ञ वसत है ,
मलयज मारुत प्रेम भरा छविवन्त है।
खिली कुसुम की कली अलीगण घूमते ,
मदमाते
मजरी चूमते ।
किन्तु तुम्हे विश्राम कहा है नाम को,
केवल मोहित हुए लोभ से काम को।
ग्रीष्मासन है बिछा तुम्हारे हृदय मे,
कुसुमाकर पर ध्यान नहीं इस समय में।
इस पद में कवि ने सुन्दरता के साथ वर्णन किया है कि चारों
ओर वसन्त का राज्य है, स्नेह से भरा मलय-समीर बह रहा है।
कुसुमों के आसपास भौरे घूम रहे हैं। कोयल मस्त होकर
मजरी का स्वाद ले रही है, किन्तु मनुष्य को अपने लोभ और
काम से कहा विश्राम ? उसके हृदय में वसन्त की जगह पर
प्रीष्म है, क्योकि वह फूलों की सुन्दरता पर ध्यान नहीं देता।
आगे चलकर थके हुए पथिक से कवि अनुरोध करता है कि मार्ग
पर चलने का जो पागलपन उसमें है, उसे त्याग दे और बैठकर
देखे कि सौन्दर्य सर्वत्र विखारा हुया है। यही कवि प्रसाद के
जीवन की कुंजी है। यही भाव कवि ने वार-वार 'प्रेम पथिक'
'करुणालय' और 'मरना' में प्रकट किये हैं।

रहस्यवाद
"प्रसाद की कामायनी
'कामायनी' आपकी काव्य-धाराकी चरम सीमा है । रहस्यवाद
की कविता में यह एक घटना है । इस काव्य को सरल करने के
लिये इसकी कहानी यो जान लेना आवश्यक है। साधारण
कहानी फेवल इतनी ही है. कामायनी का नायक 'मनु'
महाप्रलय के बाद बच जाता है। वह अनुभव करता है कि
देवताओं की सभ्यता का पतन हो गया है । मनु चिन्तित है।
एकान्त में उसका मन घबराता है । इसी समय काम गोत्र की
चाला कामायनी से उसका परिचय होता है । कामायनी उसके
पास रहने लगती है। वह मनु के हृदय म मानवीय सस्कारों की
जड डालना चाहती है। मनु के पुराने देव सस्कार फिर जाग
उठते हैं। वह शिफार फरते, यज्ञ करते और बलि चढाते हैं।
कामायनी उसके बाद माता बनती है। उसकी ममता प्राणियों
चट जाती है, पर मनु चाहते हैं कि यह किसी और से स्नेह न
परे। इस स्पर्धा और अहकार फ कारण मनु का मन चचल हो
जाता है। वह भाग सडे होते हैं । सारस्वत देश में उसकी भेट
बहा की रानी इडा से होती है । इडा देवों की बहन है । इडा को
ऐसे आदमी की खोज थी जो उसफ उजडते हुए देश को सँभाल
सफे। मनु शासन-कार्य को सम्भालने के लिये उद्यत हो जाते
। राज्य खूब बढ़ता है। परन्तु मनु को इतना अधिकार पाने
पर भी शान्ति नहीं है। उसका मन इडा की ओर धार-बार
.
है

हिन्दी काव्य विवेचना दौडता हैं। आप उस पर भी अधिकार चाहते हैं । इस पर देवता कुपित हो जाते हैं। और प्रजा विद्रोह कर देती है। युद्ध में घायल हो जाते हैं और येहोश पड़े रहते हैं। इसकी सूचना कामायनी को अपने स्वप्न में मिलती है। वह वहा पहुच कर अपनी सेवा से मनु को होश मे लाती है। मनु का स्नेह फिर से उसकी ओर उमडता है । इसके बाद कामायनी अपने पुत्र को इडा के हाथ सौंप देती है और उससे लोगों का कल्याण करने के लिये कहती है। स्वय फिर मनु की सोज में चल देती है। एक पर्वत की घाटी में उनसे भेंट होती है । मनु को जो अपनी भूलों को समझ चुका है, ससार के विविध रूपों का दर्शन कराती है। चलते-चलते वे एक समतल स्थान पर पहुँच जाते हैं। यही मानसरोवर और कैलाश है, यहा पर मनु को ज्ञान होता है, उसके भेदों और शकाओं का क्षय होता है, उसे आनन्द का अनुभव होता है । यही इस कथा का सार है। इसी आनन्द को पाना जीवन का आदर्श है । मनु मानव-समाज का प्रतिनिधि है । अपनी अनेक उलझनों से सग्राम करता हुआ आगे चढता है, गिरता है और फिर उठता है । वह अशान्त है। उसकी जीवन-यात्रा जारी है। अन्त में समता को पाकर उसके जीवन का शोक शान्त हो जाता है। उसका जीवन एक नदी के समान है, जो कोलाहल करती हुई सागर को पाकर शान्त हो जाती है सागर में एक प्रकार की समता है। यही समता जीवन का आदर्श है। कवि का अनुभव है कि जीवन के सघर्प और . .

रहस्यवाद ५३ दुःख का कारण फेवल एक है । वह ससार में वस्तुओं के अपन- अपने स्थान पर न होने के कारण है। अगर वे अपने-अपने स्थान पर हों तो जीवन आनन्दमय हो जाता है। हम इन सव वस्तुओं को तिरली दृष्टि से और रंगीन रूपों मे देखते हैं। भावो के आवेश में आकर हम उनकी वास्तविकता भूल जात हैं। अगर हममें मनु की तरह समता पाजाय, तो इन वस्तुओं से वैरागियों की तरह न तो भागने की आवश्यकता है, न ससारियों की तरह चिपटने की आवश्यकता है, यही इस महाकाव्य का सन्देश है। इसमें उपनिषदों के सन्देश को कवि ने अपनी वाणी में प्रकट किया है। यही कवि प्रसाद का आधुनिक रहस्यवाद की कविता को महादान है। कवि ने अपने अनेकों गीतों में प्रकृति का सौंदर्य, हृदय का विपाद और ऑसों के आँसुओं का वर्णन किया है। इन सब में असली रहस्यवाद का अश इतना नहीं है, जितना इसमें जीवन की पीडा, हृदय की आशा, निराशा और विकलता है । "आँसू" में कवि, जीवन फे रसमय अतीत को याद करता है, उसके अभाव में रोता है, पर रोकर जीवन का अन्त नहीं कर देता । इसके विपरीति रोदन को जीत कर मन को आशा देने का प्रयास करता है । जब अतीत की याद आती है तो कहता है- जीवन की जटिल समस्या, घही जटा-सी कैसी। , -

५४
हिन्दी काव्य विवेचना
सडती है धूल हृदय मे,
किसकी विभूति हैं ऐसी?
और आँसूओं को अपने जीवन का सगी बतलाता हुआ
कवि वर्णन करता है-
तुम सत्य रहे चिर सुन्दर,
मेरे इस मिथ्या जग के ।
थे केवल जीवन-सगी,
कल्याण कलित इस मग के।
इसके बाद रोकर जब कवि अपने हृदय को हल्का पाता है
तो आशा के भाव प्रकट करता है और कहता है-
पतझड था, झाड सडे थे,
सूखी सी फुलवारी में।
किसलय नव कुसुम बिछाकर,
आये तुम इस क्यारी मे।
इस तरह धीरे-धीरे आशा की झलक कवि के जीवन में
बार-बार आने लगी। जीवन के विपाद और दुःस के साथ
समाम कर कवि कामायनी के मनु की तरह उस समता का
अनुभव करता है जिससे सारा ससार आनन्दमय प्रतीत होने
लगता है । यहीं उसकी कविता की महानता और रहस्य है।
युगान्तरकारी पन्त
श्री सुमित्रानन्दन पन्त ने रहस्यवाद की कविता में अनेक
समालोचकों के मतानुसार एक युगान्तर-सा पैदा कर दिया है।

रहस्यवाद ५५ पन्त का रहस्यवाद अधिकतर प्रकृति के सुन्दर दृश्यों तक सीमित रहता है । पन्त पर्वतीय होने के कारण नदी, नालों, पहाडों, बादलों किरणो आदि का अनुपम वर्णन करते हैं। इनमें सूक्ष्म रूप से उस परोक्ष शक्ति का भी आभास करा देते हैं, परन्तु सौन्दर्य के पुजारी प्रकृति के सैल में अपने आपको इतना भूल जाते हैं कि इसको खिलाने वाली शक्ति उनकी आँखों से प्राय, अोझल हो जाती है। आप बादल आदि में अपने आपको भूल जाते हैं । फूलों की सुगन्ध आपको मस्त कर देती है, सरिता का सगीत श्रापको मुग्ध कर देता है । प्रकृति की रमणीयता से चकित होकर आप उसी का वर्णन करने लग जाते हैं। इसलिये इनकी कविता को छायावाद के नाम से पुकारा गया है। इनमें फेवल प्रकृति के दृश्यों की रमणीयता नहीं बल्कि शब्दों की कोमलता और मृदुलता भी है । श्राप सदा ऐसे शब्दों की खोज में रहते हैं, जिनमे मधुरता भरी हो और सगीत हो। आप पूरा प्रया करते हैं कि कविता में कठोर शब्द न आ जायें । कविता करते समय इनका काम उस चित्रकार के समान है, जो कभी-कभी भावों का परित्याग कर चित्र को विविध रगों से सजाने का काम कर जाता है। उसमे बनावटी-पन तो आ जाता है, परन्तु चित्र आँखों को भला लगता है। इसी तरह पन्त की कविता में कभी-कभी स्वाभाविकता का परित्याग हो जाता है, यही कारण है कि इनकी कविता में भावों का वेग कम है और कोमलता अधिक है। इसी सयम के कारण आग धीरे-धीरे

५८
हिन्दी काव्य विवेचना
कल्पना में है कसकती वेदना ।
अश्रु में जीता सिसकता गान है,
शून्य आहो में सुरीले छन्द हैं,
मधुर लय काक्या कहीं अवसान है।
आप सारे ससार में इस मधुर लय का आभास पाते हैं,
कल्पना में वेदना पाते हैं और आँसुमो में सिसकता हुआ
गीत सुनते हैं। श्री सुमिननन्दन पन्त आँखों के और कानों
फे कवि हैं। रग और सगीत इनकी कविता का आदर्श है,
सौन्दर्य के आप पुजारी हैं। कहते तो हैं कि इस सगीत और
सोन्दर्य का अवसान नहीं है, परन्तु साथ यह भी अनुभव करते
हैं कि ये अस्थिर हैं। जन इनका रस-पान करते-करते अति हो
नाती है तो कवि अपने हृदय में एक वेदना-सी अनुभव करते हैं।
यह वेदना तब पैदा होती है जब मनुष्य किसी बात की,
विशेष
कर भावों की, अति को अनुभव करता है । इसके बाद उसके मन
में एक उदाम भाव पैदा हो जाता है । श्री सुमित्रानन्दन की
कविता में भी यही उदासी का भाव छाया हुआ प्रतीत होता
है। यह उदासी अति मधुर और कोमल होती है। इस में
कठोरपन नहीं होता। श्री पन्त इस तरह प्रकृति की रमणीयता
को प्रकट करते हुए कभी-कभी उस परोक्ष शक्ति का आभास
कराते
जीवन की मीठी वेदना और मृदु विपाद को वर्णन
करते हैं । परन्तु चार-बार इन्हीं भावो का वर्णन करने से इनकी

रहस्यवाद
५६
कविता में विषय की समानता आ जाती है, जिससे वह फीकी
पड़ जाती है। इन सब के होते हुए आप आधुनिक रहस्यवाद या
छायावाद के प्रमुख कवि हैं।
सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"
रहस्यवाद के तीसरे कवि श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' है।
आपने वगाल में रहकर गाली साहित्य का काझी अध्ययन
किया है। स्वामी रामकृष्ण परमहस और स्वामी विवेकानन्द
के विचारों पर गहरी दृष्टि डाली है। इसलिये इनके लेसों और
कविना में वेदान्त की स्पष्ट झलक मिलती है । आपने आत्मा
और परमात्मा का अटूट सम्बन्ध, जीवन की अमारता,
ससार की मोह माया श्रादि प्राचीन विचारों को भी
मौलिकता का रूप दिया है। "तुम और मैं" कविता में यह अटूट
सम्बन्ध प्रकट कर इसको एक गम्भीर रहस्यवादी कविता बना
दिया है। आप लिसते हैं-
तुम दिनकर के खर किरण-जाल मैं सरसिज की मुस्कान,
तुम वर्षों के बीते रियोग, मैं हूँ पिछली पहचान ।
तुम योग और मैं सिद्धि,
तुम हो रागानुग निश्छल तप,
मैं शुचिता सरल समृद्धि ।
तुम मृदु मानस के भाव और मैं मनोरजिनी भापा,
तुम नदनवन-धन-विटप और में सुख शीतल-तल शासा।
।

हिन्दी काव्य विवेचना
इस तरह वह आगे चल कर कहते हैं कि ईश्वर प्राण है और जीर
काया है। वह पथ है और जीव रेणु है। कविता इस प्रकार
की उपमाओं से दबी हुई-सी मालूम होती है। इनमें विचार के
मात्रा अधिक है और भावो की कम । इसलिये आपको दार्शनिन
रहस्यवादी कवि भी कहा गया है। विचारों को गम्भीरता अघिय
होने के कारण आप साधारण पाठको की पहुँच के बाहर हैं
भाषा की क्लिष्टता के कारण भी आपको समझने में कठिनत
होती है । 'फुटकर' कविता मे हम इसी क्लिष्ट पदावली का दृष्टान
पाते हैं। कहीं-कहीं आपकी पदावली सरल
और
सुगम
भी होतं
है। जिस तरह 'खेवो' कविता में रहस्यवादी भावो को प्रक
करते हुए आप कहते हैं-
डोलती नाव, प्रखर है धार,
सँभालो, जीवन-खेवन हार ।
तिर-तिर फिर-फिर
प्रवल तरगों में
घिरती है,
डोले पग जल पर
डगमग
फिरती है।
टूट गई पतवार, जीवन खेवनहार ।
इस कविता में खेवनहार को सम्बोधन करके कविने अपने म
के भावों को सरल भाषा में प्रकट क्यिा है। आपकी रहस्यवार
डगमग
-

-
रहस्यवाद
६१
कवितायें एक गम्भीर प्रवाह में बह रही हैं। 'परिमल' की
प्रार्थना है-
जग को ज्योतिर्मय कर दो,
प्रिय कोमलपद-गामिनि । मद उतर
जीवन मृत-तरु-तृण गुल्मों की पृथ्वी पर
हँस हँम नित पथ आलोकित कर
नूतन जीवन भर दो,
जग को आलोकित कर दो।
गीतों में ससार की आसारता को कवि ने गम्भीर शब्दों में
वर्णन किया है। आप लिखते हैं कि अन्त में सर की एक-सी
गति होती है। व्याकुल होने की कोई आवश्यकता नहीं। जितने
ससार में पाए सब चले गये, चाहे वे चुरे थे या भले थे। जितनी
चिन्ताएँ और बाधायें आती हैं, पाये । मनुष्य का हृदय अन्धा हैं
इसी तरह मदा चला जाता है । इस तरह ससार में बँधे हुओ को
कवि सन्देश देता है कि सब को अन्त पथ का पथिक बनना
पडता है। बडी बडी अभिलापाये काल-चक्र से पिस जाती हैं।
इम तरह 'पारस' कविता में श्राप लिखते हैं कि जीवन की विजय
में ही पराज्य हैं-
जीवन की विजय, सर पराजय
चिर अतीत-आशा, सुस सत्र मय
सत्र मे तुम, तुम में सब तन्मय,
कर स्पर्श-रहित और क्या है ? अपलक असार ।
मेरे जीवन पर यौवन बन के बहार

हिन्दी काव्य विवेचना यहा पर 'तुम' का प्रयोजन उस अनन्त ज्योति से है जो प्रति पल हमारे जीवन को आलोकित करती है । "सब में तुम, तुम मे सब तन्मय " से उसी शक्ति का परिचय होता है । इस तरह "निराला" की कविता में रहस्यवाद और छायावाद की पुट है। कवि प्रकृति में अनन्त की सोज करता रहता है । कभी- कभी इसी मे लीन भी हो जाता है। यह वगाली कविता का प्रभाव है। कवि ने स्वय लिखा है कि उस पर बगाली के आधुनिक अमर साहित्य का काफी प्रभाव पड़ा है। इसलिये आपकी शैली में कभी-कभी बगालीपन की झलक मिलती है । इसी प्रभाव के कारण आपने हिन्दी कविता में 'मुक्त छन्द' को प्रारम्भ किया। आप की कविता की भापा जटिल है, परन्तु आपके गीतों में अधिक सरलता है । इसलिए कि गीत गाई जाने वाली वस्तु है, यदि गायक इनको गा नहीं सकता तो गीतों की प्रधान उपयो- गिता जाती रहती है । इन गीतो में जीवन की गहरी वेदना है, भाव हैं, अलकारों की सजावट है, सगीत और मधुरता है। "निराला" जी के गीतों का स्थान आपकी रहस्यवादी कविताओं से ऊँचा रहेगा। महादेवी वर्मा श्रीमती महादेवी वर्मा छायावाद या रहस्यवाद की एक प्रमुख कवियित्री है । "रश्मि" की भूमिका में श्राप लिखती है-- मनुष्य, का जीवन, चक्र की तरह -घूमता रहा है । स्वच्छन्द - रहस्यवाद घूमते-घूमते थक कर वह अपने लिये सहल मन्धनों को पैदा कर लेता है और फिर बन्धनों से ऊब उनको तोडने में अपनी सारी शक्तियों लगा देता है ।" प्राप आगे चल कर कहती हैं कि मनुष्य सुख को अपेला भोगना चाहता है, परन्तु दुस सब को बाँट कर । वह चाहती हैं कि विश्व-वेदना में अपनी वेदना को इस प्रकार मिलादे जिस प्रकार एक जलबिन्दु समुद्र में मिल भाता है। श्रीमती वर्मा पचपन से भगवान बुद्ध के प्रति अनुराग रसती हैं। बुद्ध भगवान् इस ससार को दुस-सागर समझते थे। इस लिये श्रीमती वर्मा की कविता में निराशा की झलक का होना स्वाभाविक है। दुस क्याहै ? उसका जीवन और कविता से क्या सम्बन्ध है ? इन सर पर आपने अपने भाव प्रकट किये हैं। दुख को अपनाना पापक जीवन का आदर्श है। आपका अनुमर है कि असीम दुस का अन्तिम परिणाम आनन्द होता है। दुख की हिलोरों में सुस का अनुभव होता है । "नीहार" और "रश्मि" की रचनाओं में दुसवाद की भावना इतनी अधिक है कि ऐसा जान पडता है कि कवियित्री इस पार्श को पाने के लिये व्याकुल हैं। 'गीत' नामक कविता में इस बात की भनक है कि हमारा जीवन एक वीणा के समान है । इस बीया से मधुर संगीत को पैदा करना वादफ के हाथ में है । यह अज्ञात बजाने वाला हमारे अनजान में कितनी ही बार आकर इस वीणा से कभी वेसुरी और कभी मधुर मकार वहा जाता है । यह कभी विश्व-सगीत में ।

. हिन्दी काव्य विवेचना मिल कर उस से एक हो जाती है और कभी वेसुरी हो कर उससे अलग। इसी तरह "श्राशा" में वह अपने भाव प्रकट करती हैं कि सीमित जीवन का असीम-से सयोग होते ही उससे एक ऐसा प्रवाह वहेगा जो सारे जगत को सगीतमय कर देगा । जिसे आज हम दुरस का सागर समझते हैं, उसी मे तन सुख के अनेक बुलवुले उठने लगेंगे । दुस की रेखायें जो आज धुंधलो-सी लग रही है, इंद्रधनुष के रंग में रंगी जायगी। "पहचान" में आप लिग्मती हैं कि मनुष्य का परिचय देना एक प्रकार से असम्भव बात है। वह कहा से आता हैं, कहाँ जाने वाला है, उससे श्रादि और अन्त का क्या कारण है, इन सब प्रश्नों का उत्तर कौन दे सकता है । मनुष्य का जीवन अनन्तकाल में एक बुलबुले के समान बनता और बिगडता है । जिस प्रकार बुलबुला समुद्र का इतिहास और अपने बनने-बिगडने कारण नहीं जानता, उसी प्रकार मनुष्य अपने जीवन पर एक चकित चितवन डालकर अपनी अज्ञानता प्रकट करता है । "निभृत मिलन" का भाव यह है कि जिस प्रकार मिट्टी के जड दीपक का हम अग्नि से सयोग कर उसे सजीव और प्रकाशमय बना देते हैं । उसी प्रकार कोई चुपचाप आकर जड मे चेतना डाल कर उसे सजीव और प्रकाशित कर जाता है । जड और चेतन का यही मिलन जीवन का कारण है। "मैं और तू" में कवियित्री ने रहस्यपाद के भावों को सुन्दर उपमाओं से प्रकट किया है । आपका कहना है कि सीमित और असीम में वैसा ही सम्बन्ध है जैसा चन्द्रमा और उसकी रश्मि में, जो पृथ्वी

तट को
रहस्यवाद
छूकर
उसी मे लौट जाती है, समुद्र और उसको लहर में, जो
छूकर उसी में मिल जाती है, वसन्त और उसकी
श्री में, जो उसके साथ आती-जाती है, नीर और स्वप्न में
जो उसी में वनती और गिडती है। इसी प्रकार के रहस्यवादी
भावों को आप नीचे दी हुई सुन्दर पक्तियों में भी प्रकट
करती है-
बीन भी हूँ मैं तुम्हारी, रागिनी भी हूँ।
नीद थी मेरी अचल निप्पद् कण-कण मे,
प्रथम जागृति की जगत के प्रथम स्पन्दन मे,
प्रलय में मेरा पता, पद-चिट्ट जीवन में,
शाप हूँ जो वन गया वरदान बन्धन में,
कूल भी हूँ, कूलहीन प्रवाहिनी भी हूँ।
"नीहार" में, जो 'प्राप का पहला सग्रह है, श्राप निराशा और
सूनेपन के भाव प्रकट करती हैं। "अतिथि से" मे कहती हैं-
पहली-सी झवार नहीं है
और नहीं वह मादक राग,
अतिथि । किन्तु सुनत जाओ
टूटे तारों का कमया विहागर
युवावस्था में इन भाषा का अनुभव करना स्वाभाविक है।
"मेरा राज्य" में मूनेपन के भाव को सुन्दर शन्दों में चित्रित
किया है-
।
-

हिन्दी काव्य विवेचना
अपने इस सूनेपन की
मैं हूँ रानी मतवाली,
प्राणों का दीप जलाकर
करती रहती दीवाली ।
"अधिकार" में भी इसी प्रकार के निराशा के भाव मिलते हैं--
वे मुस्काते फूल, नहीं-
जिनको आता है मुरझाना ।
वे तारों के दीप नहीं-
जिनको भाता है बुझ जाना ,
अन्त में आपका कहना है कि "क्या भ्रमरों का लोक मिलेगा,
तेरी करुणा का उपहार" ? इसलिये अपने देव से वह मिलने का
अधिकार चाहती हैं । "मुरझाया फूल" में आप एक 'कुसुम' का
इतिहास वर्णन करती हैं कि किस तरह एक दिन वह एक कली
था। किस तरह समीर ने उसको थपकियाँ देकर खिलाया, चन्द्र
की किरणों ने उसको हँसाया, मधुप ने लोरियाँ गाकर उसे सुलाया।
अब उसका अन्त क्या है ? वह धरा पर बिसरा हुआ सो रहा
है । न उसमे कोमलता है, न गन्ध है । उसको कोई चाहने वाला
नहीं। यही मनुष्य के जीवन का अन्त है । "नीहार" के लगभग
सभी गीतों में महादेवी ने जीवन की असारता, उसके सूनेपन
और उसकी निष्पलता को गाया है। इस पुस्तक में आशा की
रेखा बहुत धीमी है। यह रेखा आपके अगले साह "रश्मि" में
'दिखाई देती है। आशा की रश्मि धीरे-धीरे उनके जीवन और

रहस्यवाद
६५
कविता के घुधलेपन से चमक उठती है । इन कविताओं का
सार पहले दिया गया है, जिनम कवियित्री अपने जीवन को अनन्त
जीवन से एक कर देना चाहती है। इसके लिये विकल है, जब
वह अनुभव करती है कि उसका जीवन विश्व-जीवन का एक
अश है तो सुस पाती है । यही भाव क्बीर आदि सन्त कवियों
ने अपने युग में प्रकट किये हैं। "नीहार" में दुरस का अनुभव
है। "रश्मि" में इस दुख पर विजय पाने की विधि है, वह यह
कि मनुष्य अपने दुस से निकल कर विश्व की करुया को
समझे, अपने जीवन के सगीत को सुन कर विश्व-सगीत में
लीन हो जाय, अपने आपको प्यार करने के स्थान पर विश्व
से प्रेम करे । यही "रश्मि" की कविताओं का सार है।
"नीरजा" आपका तीसरा सग्रह है। इसमे आपने
जीवन की आशा को प्रकट किया है। आप निराशामओ से
दवी नहीं। इनसे सग्राम बराबर जारी रहा। दुख का अनुभव
करते हुए आपके भावों में एक पवित्रता-सी आ गई है। जब
दुख होता है तो इसके दो प्रभाव पड़ सकते हैं या तो जीवन में
कटुना श्रा जाती है या मधुरता । महादेवी की कविता में मधुरता
श्रा रही है। सुन्दर प्रकृति की फिरणों, मादलों, तारों, फूलों
श्रादि में विचर फर महादेवी मनुष्य के जीवन के लिये एक
नया सन्देश लाती हैं। आप एक कविता में लिखनी हैं कि मेरा
जीवन वही पुरानी कहानी है जिसको बादलों ने, फलियों ने
कई बार सुनाया है। ये बादल पाशा का सन्देश लाते हैं, मुपा

हिन्दी काव्य विरेचना बरसाते हैं। इसमे घुलमिल जाना जीवन का सन्देश है। इस तरह दुखवाद की कविता सुखवाद में बदल जाती है। श्री निर्मल जी का मत है कि “सान्ध्य-गोत" (चोथा कविता-सप्रह) आपकी सर्वश्रेष्ठ रचना है । गीतों का इतना सुन्दर सग्रह किसी भी कवि का नहीं है । श्रीमती वर्मा के मन-मोहक गीत प्राणों में जीवन देने वाले हैं। ये गीत हिन्दी-ससार के अनुभूति-प्रधान काव्य के लिये नई चीज हैं । इन गीतों की लोक-प्रियता इसी से मिद्ध है कि पिछले वर्ष और आज भी जितने गीत लिखे जा रहे हैं, उन पर श्रीमती वर्मा के गीतो का पूरा प्रभाव जान पड़ता है । वही बन्द, वही भाव और लगभग वैसी ही भाषा है। अन्य रहस्यवादी कवि श्री जगन्नाथ प्रसाद "मिलिन्द" छायावाद के प्रसिद्ध कवियों मे से हैं। आपकी पहली कविताओं में प्रकृति के सौन्दर्य का परिचय मिलता है। तव फूल, फली, उपवन, भ्रमर आदि विषयों पर आपने कवितायें लिसी हैं। उन में सरसता और मधुरता अधिक है । इसके बाद आपने रहस्य के पर्दे को खोल कर उसके दर्शन कराने का प्रयत्न किया है । कवि अनन्त को प्रकृति के भीतर हँसते हुए देसता है और सुख-दुस के पार बसने वाले आनन्द की कामना करता है। कविताओं में प्रानन्द की झलक और विचारों की गहराई है । एक अन्धा गायक 'तीन कलाकार" में कहता है- .

रहस्यवाद + कहता है- सहसा कभी नाच उठती है आते ही प्रियतम की याद- सेंजरी पर उँगलियाँ, ताने, ओठों पर आहाद। + निभुवन का पालो तुम्हारे अन्तर में भर जाता है अत बाहरी जग में तुमको तिमिर शेष रह जाता है। इस कविता में मूक चित्रकार उसी मुवन नायक की भाषा मौन तुम्हारी है भाषा, तुम रगीन विश्व के राजा नीरव जगती की भाशा । और यधिर कवि कहता है- जग फे फलुपित कोलाहल में सदा सुरक्षित है "सुन्दर" भ्रवणों पर पट डाल, हृदय छिपा रखा प्रियतम का स्वर । इस प्रकार कितनी ही कविताओं मे कवि रहस्यवादी भावों की झलक मिलती है । एक स्थान पर आप एक ऐसे महा- संगीत की कामना करते हैं जिसके स्वर में जीवन की छोटी-छोटी

हिन्दी काव्य विवेचना
तानें लीन होजायें । अपने हृदय में और नयनों में आप एक अमर
सौन्दर्य को बसाने की साधना कहते हैं । श्राप कहते हैं-
प्राणों की वीणा पर छेडो
ऐसा एक महा सगीत,
लीन तुच्छ ताने जीवन की
हो जिसके व्यापक स्वर में।
एक अमर सौदर्य वसादो
मेरे नयनों में, उर में।
क्षणिक रूप के कण सोजावें
जिस की छवि के सागर में!
क्षुद्र कामनायें मैं अपनी
जिस में लय करदूँ सारी,
ऐसा महानुराग जगादो
मगलमय । इस अन्तर में।
ये विचार श्रीमती महादेवी के विचारो से बिलकुल मिलते हैं।
भाव तो पुराने हैं, लेकिन कहने का ढग अपना है । रहस्यवाद की
कविता मे बार-बार इसी प्रकार के भाव मिलते हैं। कवियों के इन
भावों के कहने की शैली अलग-अलग है।
श्री मोहनलाल महतो का नाम भी रहस्यवाद के कवियों में
आता है । आप अपने आप को रवीन्द्रनाथ ठाकुर का शिष्य मानते
हैं। इनकी कविता में अपने गुरु के रहस्यवादी भावों की झलक
मिलती है। "निर्माल्य", "कल्पना" और "एकतारा" आपकी
-

- रहस्यवाद कविताओं के सप्रद हैं। 'एतारा' में रहस्यवाद की अधिक झलक है, परन्तु यामी दोनों में भी इसका प्रभाव नहीं है । 'माया' कविता में पाप लिसते हैं- जान पडा में धुंधला बादल यन कर उडता जाता हूँ, तेरे मधुर तान में अपनी तान मिला कुछ गाता हूँ। इतने मे तू न जाने क्या बोल उठा ? विस्मित-सा हो मैं भी आँचे सोल उठा। तुझे नहीं फिर पाया, कैसी अद्भुत माया इसी तरह सरिता का जीवन-सगीत क्या है, वह कहती है कि मैं "अन्तहीन सागर में मिलकर एक दिन सागर ही हो जाऊँगी।" एक और अविता में कवि गायक को चुप रहने के लिये अनुरोध करता है और कहता है कि तुम्हारा गाना निष्फल है, क्योंकि मुक्त गगन में वीणा की कैसी सुन्दर झङ्कार गूंज रही है। एक और स्थान पर फवि कहता है कि इस ससार-समुद्र में जीवन एक जीर्ण नौका है। उसे अमात देश की ओर जाना है, किन्तु नौका इतनी दुर्वल है कि उसका पार लगना कठिन है। लहरों में उसकी क्या दशा होगी यह उसकी गति पर निर्भर है । इस प्रकार के भाव श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता में पई स्थानों पर मिलत है। इन सब रहस्यवादी कषियों मे दो बातें पाई जाती हैं। सबसे पहले ये कवि स अज्ञात, अगोचर और अनन्त की झलक पाने श्री शक्ति रसते हैं । इस शक्ति का अनुभव वे प्रकृति के विविध

हिन्दी काव्य विवेचना
रूपो में पाते हैं। इसकी सुन्दर वस्तुओं का बसान करते हुए वह
इसी शक्ति का आभास कराते हैं। इन कवियों में दूसरी बात यह
है कि ये जीवन की अलग-अलग और बिखरी हुई वस्तुओं में
एकता का अनुभव करते हैं। इन कवियो का विचार है कि जीवन
का स्रोत एक है, चाहे यह विविध रगों में प्रकट होता है । ये
दोनों भाव रहस्यवाद की कविता में आदिकाल से चले आरहे हैं।
इनको अनेक कवियो ने अपने अनुभव और शक्ति के अनुसार
प्रकट करने का यत्न किया है। हिन्दी कविता में कबीर से लेकर
वर्तमान काल तक रहस्यवाद की एक अटूट धारा बहती आ रही
है । जिसका वर्णन ऊपर किया गया है। अलग-अलग कवियों
का इस धारा को जितना दान है, उसका भी उल्लेख किया गया है
कबीर आदि सन्त कवियों का रहस्यवाद ज्ञान प्रधान था,
को साधन बनाकर निराकर को पाने का यत्न करते थे। जायसी
आदि सूफी कवियों का रहस्यवाद प्रेम-प्रधान था। वह निराकार
को प्रेम का अनन्त भडार समझते थे। आजकल के रहस्यवादी
कवियों का रहस्यवाद सौन्दर्य-प्रधान है। ये कवि सौदर्य को
साधन बनाकर उस शक्ति का अनुभव करते हैं।
(३)
वैष्णव वाद या भक्तिवाद
राम-भक्ति
कवीर आदि सन्त कवियों ने राम को निराकार का रूप
दिया। साधारण लोगों के लिये यह जटिल बात थी कि वे निराकार
वे ज्ञान
।

वैष्णववाद की उपासना कर सकें। इसके अतिरिक्त उनक लिए अपने पुरायो के साकार देवताओं का परित्याग करना भी कठिन बात थी। अगर सन्त कवियों ने राम को निर्गुण मान कर वेदान्ती होने का परिचय दिया, तो तुलसीदास ने साधारण लोगों क लिये राम को सगुण मान कर अपने भक्ति-भाव का परिचय दिया । यह राम वाल्मीकि की रामायण में एक शक्तिशाली राजा के रूप चित्रित किये गये थे। रामायण में इनको ईश्वर का अवतार नहीं माना गया था । धीरे-धीरे यही राम भगवान विष्णु के अवतार माने जाने लगे। उनकी उपासना होने लगी। राम-भक्ति का वैकास होता गया । इसलिये इस भक्ति की कविता को वैष्णनवाद का नाम दिया जाता है । इस सप्रदाय के लोगो के लिए सर प्रसार सिया-राम-मय हो गया। गोस्वामी तुलसीदास गोस्वामी तुलसीदास राम-भक्ति शाखा के प्रमुख कवि थे । यापने स्वामी रामानन्द के उपदेशो को ग्रहण किया और राम की उपासना का प्रचार किया । तुलसीदास युक्तप्रान्त क बाँदा जिले में राजापुर गाव के निवासी 4 | इनक पिता का नाम यात्माराम और माता का नाम हुलसी था । कहा आता है कि बचपन में ही आप माता-पिता से अलग हो गये थे । इस अवस्था में प्राश्रयहीन होकर इधर उधर घूमने-फिरने का उल्लेस तुलसी- दास की रचनाओं में मिलता है । इस समय उनको अपने गुरु वाना नरहरि से रामचरित सुनने का अवसर मिला । गोस्वामी ७४ हिन्दी काव्य विवेचना तुलसीदास के भक्त और कवि बनने का कारण बडा विचित्र है। कहा जाता है कि विवाह के बाद एक बार इनकी स्त्री अपने मायके चली गई । श्राप घोर वर्षा म अपनी सुसराल पहुँचे । वहाँ स्त्री ने इनको यहुत फटकारा और कहा अगर वह इतनी भक्ति राम की करे तो मुक्ति मिल जाय । इस घटना ने आपक हृदय पर गहरा प्रभाव डाला । यदि ये कटु शब्द उनकी स्त्री न कहती तो आज हमारे पास हिन्दी का जगमगाता रत्न 'रामचरित मानस न होता । स्त्री से विरक्त होकर तुलसीदास साधु बन गये और देश का विस्तृत भ्रमण किया । अन्त में काशी में आकर 'रामचरित मानस' लिखने बैठे। इसको आपने अढाई वर्ष में समाप्त किया। 'रामचरित मानस' का ससार एक आदर्श ससार है । इसमे राम आदर्श पुत्र हैं, आदर्श राजा है, सीता आदर्श पत्नी है, कौशल्या 'प्रादर्श माता है, भरत और लक्ष्मण श्रादर्श भाई हैं, हनुमान आदर्श सेवक हैं। इस ससार को बिगाडने वाली केवल एक शक्ति है । मन्थरा इम ससार को एक बार ऐसा हिला देती है कि यह ससार फिर से अपने पुराने आदर्श को नहीं पाता । इस महा- काव्य का लोगो पर गहरा प्रभाव पडा । उस समय हिन्दू समाज बिसरा हुआ था । उसको एक सूत्र में बाँधना कठिन काम था । जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, कवीर और जायसी आदि कवियों ने हिन्दुओं और मुसलमानों को मिलाने का भरसक यत्न किया, परन्तु वह वे अधिक सफल न हो सके । जो काम वे न कर सके, उसको तुलसीदास ने 'रामचरित मानस' लिख कर किया।

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७६ हिन्दी काव्य विवेचना फिरता था कि राम के नाम पर कोई मेरे हाथ का भोजन साकर मुझे हत्या से छुडा दे । गोस्वामी के कानों में यह आवाज़ पड़ी। आपने राम नाम के नाते उसे बुलाया और बडे प्रेम से अपने साथ भोजन कराया । यह जान कर काशी के ब्रह्माणो ने बडा कोलाहल मचाया । जब गोस्वामी जी से पूछा गया तो आपन उत्तर दिया कि राम नाम का प्रभाव ही ऐसा है । पडित-समाज भला यह वात क्यो मानने वाला था। उन्होंने कहा, 'यदि इस हत्यारे के हाथ से विश्वनाथ का नन्दी सा ले तो हम माने कि यह हत्या से मुक्त हो गया' । सव के देखते-देखते राम नाम के पवित्र प्रभाव से पत्थर के नन्दी ने उसके हाथ से सा लिया । अब पडितों की ऑखें खुलीं । सब लोग भगवान का भजन करने लगे । इस पर कलि वहुत चिढा । गोस्वामी ने इससे दुसी होकर हनुमान के प्रागे अपने सारे दुख को रोया और कहा कि वह यह पत्रिका रघुनाथ की सेवा मे ले जायें। इसी पर गोस्वामी ने 'विनय पत्रिका' लिखी । यही इस पत्रिका का प्रयोजन है। इस मे वार-बार राम के भजन को गाया है और अपने आप को दीन बतलाया है । आप लिखते हैं, "मैं बुरा भला जो कुछ भी हूँ, वह आपका ही हूँ। मैं आप से झूठ क्यों कहने चला । आप तो घट-घट की जानते हैं। आपसे छिपा ही क्या है। मैं कर्म, वचन और हृदय से यह कहता हूँ कि मैं आपका हूँ।" एक और स्थान पर लिखते हैं कि मैं राम का सेवक हूँ। आपने मेरा नाम राम-चोला रखा है, मेरी नौकरी क्या है ? यही कि ।

पर परलोक । वघ्यावाद दिन भर राम का नाम लेता रहूँ, जो अच्छी तरह रखेंगे तो बेका रोटी कपडा लूगा । यह इम लोक की बात है, में मुक्ति गिल आएगी। इसी भार को एक और स्थान पर श्राप इस तरह प्रकट करते हैं कि राम गरीयो को निहाल कर देत है। उसी का नाम वेद पुराण सभी गाते हैं। ध्रुव, प्रह्लाद, विभीपणा, सुमीव, जटायु श्रादि को राम ने मोक्ष दिया । यह श्राप ही का काम था । इस तरह विनय पत्रिका में राम नाम का भजन क्यिा है। इन पों मे सगीत अधिक है, कविता के भार कम है। भक्ति का रस होने से ये भजन देहात में गाये जाते हैं। इसी के कारण इनका जन साधारण में इतना अधिक प्रचार हुआ है। रामचरित मानस कविता की दृष्टि से 'रामचरित मानस' अधिक सफल है । यह महाकाव्य ससार के महाकाव्यों में अपना एक अमर म्यान रसता है, एसा समालोचकों का मत है। 'रामचरित मानस' में समाज के एक आदर्श परिवार का चित्रण किया गया है। इसमें इतने भानों को प्रकट किया गया है कि जिनका एक काज्य में पाना कठिन बात है। इसके विशाल ससार मे अनेक चरित्र हैं, अनेक भाव है अनेक वर्णन हैं और अनेक रस हैं। हर एक रस का वर्णन करने में महा- करि सफल हुए हैं। कौशल्या और दशग्य के रोने में करुण-रस है, लक्ष्मण के चरित्र और रावण क साथ युद्ध के वर्णनों मे वीर-रस है, हनुमान चरित्र में वात्सल्य है, स्तुओं के वर्णन में शृगार है, रामचन्द्र के लक्ष्मण को समझाने में शान्ति-रस, युद्ध के वर्णन में हिन्दी काव्य विवेचना रौद्र-रस है। इस तरह 'रामचरित मानस' मे सब रसों का वर्णन है, अलङ्कारों की तो भरमार है । तुलसीदास अलवार और छन्द- शास्त्र के पूरे पण्डित थे। कबीर आदि सन्तों की तरह अनपढ नहीं थे । अर्थालकार, शब्दालकार और इनके भिन्न-भिन्न भेदो पर आपका पूरा अधिकार था । अवधी भाषामे इस काव्य को लिखकर आपने इस भापा को अमर स्थान दे दिया है। आपकी चौपाइयाँ हिन्दी कविता में अपना विशेष स्थान रखती हैं। इनका इतना सफल प्रयोग और किसी कवि ने नहीं किया। 'रामचरित मानस' कविता और भक्ति दोनों की दृष्टि से वैष्णव कविता की एक अमर रचना है। मैथिलीशरण गुप्त तुलसीदास के बाद रामचरित को इतने विशद रूप में और किसी कवि ने अकित नहीं किया। परन्तु मैथिलीशरण गुप्त ने 'सास्त' लिसकर रामायण की कथा को सडी बोली में उपस्थित किया है। इस काव्य मे रामचरित का गान इतना अधिक नहीं किया गया, जितना लक्ष्मण और उर्मिला का । लक्ष्मणादि की तुलसीदास ने प्राय उपेक्षा ही की है। गुप्त जी ने लक्ष्मण और उर्मिला के चरित्रों को प्रधान बना कर 'सास्त' को एक नवीनता प्रदान की है। आपने इसलिये इसका नाम भी रामचरित मानस नहीं रसा । 'साकेत' नाम रसने से उनका अभिप्राय यह है कि पहले तो राम का चरित्र प्रधान नहीं है और दूसरे कवि सब चरित्रों -- वैष्णववाद ७६ के सातनगरी में एक वरावर दर्शन कर सकते हैं। यद्यपि 'साफेत' फे नायक लक्ष्मण हैं, फिर भी रामचन्द्र और सीता का उसमें अपना स्थान है। रामचरित मानस मे तुलसीदास ने रामचन्द्र को ब्रह्म और सीता को माया माना है, भक्त कवि ने उनको मोक्ष पाने का एक साधन बनाया है। आपके सामने मोक्ष का प्रश्न भी प्रधान था। 'साकेत' में यह बात नहीं है । यहा फनि मुक्त के प्रभ को लेकर नहीं चलता है । स्वय 'सात' के रामचन्द्र का कहना है कि वह भूमि पर स्वर्ग का सदेश लेफर नहीं पाये। परन्तु भूमि ही को स्वर्ग यनाने आये हैं। तुलसीदास और गुप्त के सामाजिक दृष्टि- कोण में यही भेद है तुलसीदास के समय में लोग अपने-अपने मोक्ष पर अधिक ध्यान देत थे। आजकल लोग सामाजिक मुक्ति चाहते है। एक आदमी को मोक्ष मिलने से समाज का फल्याण नहीं हो सकता । इन दोनों काव्यों में यह एक भारी भेद है। 'साकेत' के रामचन्द्र गौण होते हुए भी अपनी प्रभुता की वाणी मे कहते हैं कि वह इस भूमि पर सुग्व देने और दुख झेलने आये हैं। यह उनकी लीला है, अथवा नाटक है, जिसे श्राप मदा से खेलत आये है । लक्ष्मण फ चरित्र को प्रधानता देने से 'साकेत' में एक दोष या गया है। कवि को उर्मिला के चरित्र को भी अधिक स्थान देना पड़ा। इसक नवें सर्ग में उर्मिला एक करण भाषा में अपने दुस को रोती है। पति के वन चले जाने पर उर्मिला अपनी व्यथा को प्रकट करती है । 'साक्त' के बाकी सर्गों की भाषा अलग है, हैं, परन्तु यह मिला की व्यथा का छन्द अलग है, भाव अलग - हिन्दी काव्य विवेचना सर्ग काव्य से भिन्न प्रतीत होता है। कथा के विकास में यह एक विचित्रता है । यहाँ प्राकर कथानक ठहर जाता है । सम्भर है कि यह आजकल की लिरिक कविता का कनि पर प्रभार हो। इस करिता में कवि हृदय क भावो को अधिक प्रकट करता है। प्रबन्ध कविता मे हदय के भाव इतने प्रधान नहीं होते । इसमें घटना या कथा का विकास प्रधान होता है । क्योकि प्राधुनिक काल में लिरिक कविता की एक वाढसी आगई है, इमलिये कनि इसके प्रभाव से बिल्कुल मुक्त नहीं हैं। उर्मिला के मुख से इस प्रकार क भाव कवि प्रवन्ध-काव्य मे प्रकट कर ही देता है । महात्मा गाधी ने इसी पर आपत्ति की है और आपकी पालोचना उचिन भी हैं। कवि गुप्त ने इस श्रापत्ति का उत्तर देनेके लिये एक वक्तव्य भी दिया था, परतु आपका दृष्टि- कोण ठीक नहीं जान पडता । इस दोप के होते हुए भी 'साकेत' हिंदी कविता में एक महत्त्वपूर्ण रचना हैं । कवि को इस काव्य पर मगलाप्रसाद पारितोपिक भी मिल चुका है। अाजकल वैष्णव कविता बहुत कम लिखी जाती है। धीरे-धीरे इसका विलोप हो रहा है। भक्ति-भाव जनता के लिये इतने रुचिकर नहीं रहे हैं। इसके विशेष कारण हैं, जिनका निराशावाद की कविता में उल्लेख किया जायगा। कृष्ण-भक्ति तरह वाल्मीकि रामायण में राम फेवल एक के रूप में आते हैं और अवतार नहीं बने, इस वैष्णववाद महाभारत के पहिले पर्चा में अवतार नहीं बने । धीरे-धीरे कृष्ण राम की तरह अवतार बन गये । जनता इनको भगवान मानने लगी। आप भगवदगीता में अवतार रोकर ससार का भार उतारने के लिये और इस भूमि पर अपनी लीला करन के लिये आये । पर गीता में कृष्ण केवल एक मम्प्रदाय ये नहीं हैं, आप सब जगत का और मय सम्प्रदायो का कल्याण करने वाले हैं । जो जिस भाव से उनकी भक्ति करेगा, उसी भाव स श्राप उसको मिलेंगे। उसक बाद भागवत पुराण मे, जो कृष्ण चरित्र का एक महामन्य है, आपकी भक्ति स्थिर हो गई । कृष्ण-भक्ति के अनेक सम्प्रदाय चल पडे, जिनमें भगवान के विविध रूपो की उपासना होने लगी। क्योंकि कृष्ण विष्णु क अवतार थे, इस लिये आपकी भक्ति में जो कविता लिसी गई है, वह वैष्णववाद की दूसरी शाया है। पहली शाखा राम-भक्ति की शाखा है । इस कविता के प्रचलित होने के कारण वही है जो राम-भक्ति की शासा के थे। इस पर भागवत पुराण का सब से गहरा प्रभाव है । इस पुराण की यदि अश्लील बातो को छोड़ दिया जाय तो उससे बढकर रसमय पुस्तके ससार में बहुत कम होंगी। मीरापाई कृष्ण-भक्ति के प्रमुख कवियों मे मीरा का नाम अमर है। श्रापकी कविता में एक प्रकार की ऐसी टीस है, जो अन्य कवियों में नहीं मिलती । इस प्रकार की गहरी वेदना जो आपक प्रसिद्ध पद “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई । आदि में, ५ । हिन्दी काव्य विवेचना इनरु पदो में मधुर संगीत है, भावो की तन्मयता हैं, वेदना है, हृदय की सरलता और भोलापन हे । आपका गुजराती साहित्य मे भी एक विशेष स्थान है। सूरदास मीरा के बाद हिन्दी के अमर कवि महात्मा सूरदास का उदय हुआ। इनकी मरल वाणी से लोगो के सूग्वे हुए हृदयो में प्राशा के अकुर पनप पडे | उस समय जनता मुगलों के कारण दुसी थी। दुस मे भगवान को याद आ जाना एक स्माभाविक वात थी। पीडित जनता भगवान की भक्ति में अपने दुसो को मुलाने लगी । सूरदास ने 'सूरसागर' को लिस कर लोगों के लिये एक भक्ति का प्रवाह बहा दिया । इस पुस्तक के सम्बन्ध में कहा जाता है कि इस में मवा लास पदों का संग्रह था। अब तक 'सूरसागर' की जो प्रतिया मिलती हैं, उनमें हजार से अधिक पद नही मिलते । यही रायबहादुर श्यामसुन्दर- दास का मत है । इसकी कविता का विषय कृष्ण की बाल-लीला से लेकर मथुरा जाने तक फुटकर पद्यो में अकित किया गया है। सभी पद गाये जा सकते हैं। इन पदों की भापा मधुर, सुकुमार और सगीतमयी है। कठोर और खुरदरे भावों का इसमें प्रभाव है। 'सूरसागर' की कोमलता उसका विशेष गुण हैं। सूरसागर 'सूरसागर' की कथा कृष्ण के जन्म से प्रारम्भ होती है। उस काल की बाल-लीलाओं का जो विशद वर्णन सूरदास ने - वष्णववाद किया है, वह और किसी फनि ने नहीं किया । अपने पुत्र के मुख्य को देखकर यशोदा फूली नहीं समाती । वह अभिलापा करती है कि वह एक दिन उसे माँ कहकर पुकारगा। इसको कवि ने सुन्दर शब्दों में प्रकट किया है- सुत-मुस देसि जमोदा फूली । हरपित देसि दूध की तुली, प्रेम मगन तन की सुधि भूली। वाहिर ते तय नद बुलाए, दसो धो सुन्दर सुखदाई । तरफ तनक-सी दूध-दंतुलियाँ, दरग नैन सफल करौ श्राई ।। श्रानंद-सहित महर तव आये, मुख चितवन दोउ नैन अघाई। मूर, म्याम किलकत द्विज देखे, मनो कमल पर बिज्जु जमाई ।। धीरे-धीरे चालक आकाश फ चन्द्रमा को पान के लिये रोता है। कहता है "मैया, मुझे यह चाँद ला दो।" जब किसी तरह हठ को नहीं छोडना तो यशोदा एक थाली में पानी भर कर चाँद फे प्रतिबिम्ब को दिखला देती है । पर अब कृष्ण कुछ बड़े हो गये हैं। माँ पानी में चाँद दिग्पाकर अब उसे धोसा नहीं द सकती । अब वह आकाश के चाँद को लेने का हठ करते हैं और कहते हैं, 'मैया, वह पास ही तो हैं । मैं उसे उछल कर पकड लूगा । तुम यों ही मुझे यहका दिया करती हो। मैं समझ गया, तुम्हारे लाड प्यार को । अब मैं तुम्हारे धोखे में आने का नहीं।" इन शब्दों में कितना स्नेह है और बालक के भोलेपन का कितना सजीव वर्णन है । सूरदास कहते हैं-

हिन्दी काव्य विवेचना
लैही री माँ, चदा लहोगी।
कहा करो जलपुट-भीतर को, बाहर व्योकि गहोगी ।
यह तो झलमलात झकझोरत कैसे कै जु चहोगी।
वह तो निकट निकट ही दीसत, परज्यो हो न रहोगी।
तुम्हरो प्रेम प्रगट मैं जानत, बौराए न वहांगी।
सूर, स्याम कहै कर गहि ल्याऊँ ससि-तन-ताप दहागौ ।।
इसके बाद कृष्ण बडे होकर सहेलियों क साथ खेलते हैं, उनके
मासन चुराने के प्रसग भी बडे मधुर हैं । गोपियाँ बाहर से
यशोदा के पास उलाहने लाती हैं। गोपियों और कृष्ण में
शुद्ध स्नेह है। आगे चल कर कृष्ण सारे ब्रजवासियो के हृदय
में धर कर लेते हैं । गौओं को चराने का प्रसग अधिक सुन्दर
है। मुरली की तान इतनी मधुर है कि सन गाये उसक वश में हैं।
इन सब बातो का चित्रण सूरदास ने मधुर प्रजभाषा मे किया है।
इसकी महिमा अपार है। जब प्रजवासियों का कृष्ण के साथ
अगाध स्नेह हो जाता है । तब वह मथुरा चले जाते हैं। नगर के
वासी कृष्ण के वियोग से विकल हो जाते हैं। कृष्ण नहीं आते हैं।
इस विरह का वर्णन कवि ने बडी करुण भाषा में किया है।
सूरदास कृष्ण के सहृदय भक्त थे। आपको भगवान की
करुणा पर अपार विश्वास था। आप लिखते हैं कि जिस पर
भगवान की कृपा हो जाती है, वह मोक्ष पाजाता है-
चरन-कमल बदौ हरि राई
जाकी कृपा पगु गिरि लधै । अधे को सब कछु दरसाई ।।

वैष्णाषवाद
बहिरौ सुने, मूक पुनि बोले । रक चले सिर छन्त्र धराई ।
सूरदास स्वामी करुनामय । वारपार वदो तेहि पाई।
एक और पद मे श्राप कहते हैं कि भगवान की भक्ति के विना
जीवन अकारथ है । जिस तरह मृग का राग के साथ स्नेह है,
चकोर का चन्द्रमा के साथ, कमल का सूर्य के साथ, इसी तरह
जीव का भगवान के साथ। जब यह स्नेह चला जाता है तब शरीर
से प्राण भी चले जाते हैं-
तुम्हारी भक्ति हमारे प्रान ।
छूटि गये कैसे जन जीवें, ज्यौ प्रानी विनु प्रान ।।
जैसे नाद-मगन वन सारँग बधै बधिक तनु वान ।
ज्यो चितवै ससि-ओर चकोरी, देसत ही सुख मान ।।
जैसे कमल होत परिफुल्लित देखत प्रियतम भान ।
सूरदास, प्रभु हरिगुन त्यो ही सुनियतु नित-प्रति कान ।।
इस पद में भगवान को जीवन का सार बतला कर भक्त को
उनमें लीन हो जाने क लिये अनुरोध किया है । मृग, चकोर और
कमल की उपमा अति सुन्दर और स्वाभाविक बन पड़ी है।
एक और पद में भगवान क प्रति अनन्य भक्ति का वर्णन
करते कवि कहते हैं कि मेरा मन किसी और स्थान पर सुस
नहीं पा सकता। प्रभु को छोड कर जो इधर-उधर सुख खोजता
फिरता है, वह मूर्स है । कामधेनु को छोड कर बकरी को कौन
दुहेगा ? जिस तरह जहाज से पछी उडकर फिर जहाज पर लौट
आता है, उसी तरह भक्त का मनभगवान मे ही लगा रहता है । प्यासा

. हिन्दी काव्य विवेचना परम गगा के अमृत को छोड कर क्यो कुऑ सोदे ? जिस भौरे ने कमल का रस पिया है, वह भला किस तरह कडवे करील के फल को चस सकता है । यह भक्त की अभिलापा है कि वह भगवान मे लीन हो जाय । इस तरह कहाकवि सूरदास बार-बार भक्ति के भावो को प्रकट करता है। अपने आपको दीन और पापी बतला कर भगवान को कृपालु और क्षमाशील बतलाता हैं । यही उसके जीवन का सहारा है कि वह अपने आपको भगवान की भक्ति मे भूल जाय । इस प्रकार की कविता अन्य देशों में कम मिलती है । वैष्णव कवियो ने वात्सल्य रस से भरे भावो की कविता लिख कर भारतीय साहित्य को विशेप दान दिया है। वैष्णव धारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के प्रमुख कवियो में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाम माननीय है। आप प्राय इस परपरा के अन्तिम कवि माने जाते हैं । इन्होने लगभग डेढ हजार पद लिखे हैं, जिनमे अधिकतर कृष्ण लीला के हैं। इनमे तीन प्रकार के पद हैं-विनय, बाल- ल-लीला और गोपियो के खेल सम्बन्धी। इन पदों में किसी प्रकार की अश्लीलता को प्रकट नहीं किया। कृष्ण की लीला का वर्णन करते हुए अथवा अपने विनय-भावो को प्रकट करते हुए भारतेन्दु ने अपनी पदावली को सुकमार और सरस मनाया है। इनके सात काव्य संग्रह शुद्ध प्रेम रस से भरे हुए हैं जिनके नाम- (१) प्रेमफुलवारी (२) प्रेम-प्रलाप (३) प्रेमा वर्णन (४) प्रेम पद वा । वैष्णयवाद माधुरी (१) प्रेम मालिका (६) प्रेम रग (७) प्रेम सरोवर हैं। प्रेम-फुलवारी में "जगत पावन करण" प्रेम का वर्णन है। इस पुस्तक को कवि ने चार भागों में बाँटा है। इसके सभी पद सुन्दर हैं। भक्त के हृदय में जो भाव पैदा होत है, उनका इसमे विशद वर्णन है । भगवान की श्यामल छवि का वर्णन करते हुए कवि उनके मुफट का वर्णन करते हैं, उनक कफण की शोभा बतलाते हैं और उनकी मधुर वाँसुरी की तान का प्रभाव वर्णन करते हैं । "प्रेम-प्रलाप" में भक्तों का प्रलाप है । उनकी विफलता और उनक अगाध स्नेह का सुन्दर वर्णन है । प्रेमाश्र वर्णन में सभी की क्रीडा के हैं। वर्षा हो रही है, लोग हिंडोलों पर झूल रहे हैं, कुजों में छिपने का प्रयास कर रहे हैं। वर्षा फे याद भ्रमण करते हुए उनमें वार्तालाप हो रहा है, कृष्ण की लीला के वे गीत गाते हैं। इस प्रन्थ में इन सब बातों का वर्णन है। 'प्रेम-माधुरी' भारतेन्दु की अपनी रचनाओं में उन्हें सब से अधिक प्रिय ग्रन्थ था। इसकी भाषा बहुत मॅजी हुई है। विषय कृष्ण की भक्ति ही है । एक स्थान पर कवि लिखते हैं- कान्ह भये प्रानमय प्रानभये कान्हमय हिय में न जानी परै फान्ह है कि प्रान है। विषय पुराना होने के कारण भारतेन्दु की वैष्णव-कविता में नीरसता सी श्रागई है । 'प्रेम माधुरी' आदि सभी मन्थों में लगभग वही भाव और वहीं भाषा है। ऐसा जान पडता है कि सूरदास ने पहले से इस विषय का सारा रस निचोड कर सूरसागर में भर दिया .

हिन्दी काव्य विवेचना है। फिर भी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहीं-कहीं मौलिकता दिसाई है। 'प्रेम मालिका' में तीन प्रकार के पद हैं, एक तो लीला सम्बन्धी हैं, दूसरे भक्त की दीनता को प्रकट करते हैं और तीसरे पवित्र प्रेम के अनुभव को वर्णन करते हैं। प्रेम तरग के प्राय सभी पदसाधारण सासारिक प्रेम के हैं। कुछ लीला सम्बन्धी भी हैं। प्रेम सरोवर एक अनूठा प्रत्य है । इसमें भगवान के प्रेम को पाने के लिये कष्टों का वर्णन है। साथ ही पवित्र प्रेम की महानता को भी बतलाया है। इस तरह इन सब प्रथों में कृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेम और अनन्य भक्ति है। इससे पहले रीति काल में कृष्ण सम्बन्धी कविता में एक प्रकार की अश्लीलता आ रही थी। कवियो ने पवित्र कृष्ण प्रेम की ओट में अपने वासना-भावों को प्रकट किया । कविता अपने आदर्श से गिर गई थी। उस समय के कविराजाओं के आश्रित थे।राजा लोग केवल उन कवियो को पुरस्कार देते थे, जो कलुषित प्रेम का वर्णन करते हों । जब भारतेन्दु ने कविता लिखना प्रारम्भ किया, वैष्णव कविता की दशा गिरावट की चरम सीमा तक पहुंच चुकी थी। हरिश्चन्द्र ने फिर से इस कविता में जान डाल दी और उसको अपने पुराने गौरव तक पहुँचाने का यत्न किया । उसमें पवित्रता फे भाव भर कर कृष्णा-भक्ति को जनता के लिये आदर्श बना दिया। जिस समय यह कविता लिखी गई, देशवासी उसी धर्म-सकट मे थे, जिसमे सूरदास के समय की जनता थी। जिस तरह सूरदास ने भक्तो को उत्साह दिया । उसी तरह भारतेन्दु ने जनता को शान्ति दी । रीति-काल की टूटी-फूटी शृगारिक वीणा के स्थान वैष्णवबाट ६१ पर एक गम्भीर झकार बनने लगी । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने रीति कविता को अश्लील गलियों से निकाल कर शुद्ध वायु में सास लेने का अवसर दिया । इस लिये आप आधुनिक कविता के जन्मदाता माने जाते हैं और गीति काव्य की परम्परा के प्राय अन्तिम कवि समझते जाते हैं। अयोध्यासिंह उपाध्याय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के बाद केवल एक दो कवियों ने ही वैष्णव कविता की है। इनमे अयोध्यासिंह उपाध्याय का नाम प्रमुख है। आपने "प्रिय प्रवास" ( काव्य ) लिख कर वैष्णव कविता क गौरव को बढाया है । यह काव्य आपने खड़ी बोली में लिखा है । इससे पहले वह प्राय ब्रजभाषा मे कविता करते थे। आप इस महाकाव्य की भूमिका में लिखते हैं-"यह काव्य खडी बोली में लिखा गया है। सडी बोली में छोटे-छोटे कई काव्य-प्रथ अब तक लिपिवद्ध हुए हैं, परन्तु उनमें से अधिकाश सौ-दो सौ पद्यों में ही समाप्त हैं । जो कुछ बडे हैं, वे अनुवादित हैं, मौलिक नहीं। इसके अतिरिक्त मुझको एक ऐसे प्रथ की आवश्यकता देस पडी, जो महाकाव्य हो और ऐसी कविता में लिखा गया हो, जिस भिन्न तुकान्त कहते हैं।" आपका भिन्न तुकान्त से अभिप्राय यह है कि छन्द के अन्त में तुक न हो और उसमें गति हो। पहले इस प्रथ का नाम आपने 'प्रजागना विलाप रखा था। क्योंकि प्रज की रहने वाली स्त्रियों को कृष्णा के मथुरा चले जाने पर दुख हुआ । इन्होंने करुणा से भरे हुए भावों में विलाप किया। परन्तु यह विषय नहीं है, इसका । । , ६२ हिन्दी काव्य विवेचना विषय कृष्ण की मथुरा-यात्रा है। इसलिये इसका नाम बदलना पडा और 'प्रिय प्रवाम' रखा गया । मथुरा-यात्रा के सिवाय कृष्ण की प्रज लीलाओं का भी इसमें वर्णन है। इस विषय कासूरदासादि कवियों ने अपनी कविता में अधिक सुन्दर रूप में वर्णन किया है। इस महा- काव्य में माता के वियोग का वर्णन बडा करुण है। कृष्ण को इस काव्य में एक महापुरुष की भॉति अकित किया है । अवतार के रूप मे नहीं । यह आधुनिक युग का प्रभाव है कि जनता अवतारो की उन लीलाओं पर अधिक विश्वास नहीं रसती, जो स्वाभाविक नहीं हैं। आपने गोवर्धन पर्वत को उठाने आदि की घटनाओं का वर्णन लौकिक दृष्टि से किया है । "प्रिय प्रवास" में इस घटना को आपने मुहावरे की खूबी से सम्भव और स्वाभाविक बना दिया है । श्राप अज के वासियों को जल से बचाते हुए कृष्ण के कौशल का इस तरह वर्णन करते हैं। लस अपार प्रसार गिरीन्द्र में, ब्रज-धराधिप के प्रिय पुत्रको। सकल लोग लगे कहने उसे, रख लिया उङ्गली पर श्यामने ।। लोग कहते आये हैं कि कृष्ण ने पर्वत को अपनी अँगुली पर उठा लिया था । कवि यहा पर और ही बात कहता है-कृष्ण ने लोगों की रक्षा करते हुए ऐसा कौशल दिखलाया कि मानो उसने 'पर्वत को अँगुली पर ही उठा लिया हो। कवि के कहने में यहाँ "कितनी चतुरता है । एक असम्भव घटना को सम्भव बना दिया है । जान पड़ता है कि अयोध्यासिंह उपाध्याय पुराने युग की कथा को आधुनिक युग के प्रकाश में नई दृष्टि से देखते - वैष्णाववाद हैं। जो घटना अलौकिक जान पड़ती है, उसको या तो बदल देते हैं या निकाल देते हैं। इस बात में आप पर बगाली के महाकाव्य "मेघनाद वध" का गहरा प्रभाव पड़ा है। इस काव्य में भी नये विचारों की धारा बह रही है। रावण को राक्षस के रूप में नहीं दिखाया गया, परन्तु वह भी साधारण पुरुष की तरह हृदय रखता है, अपने पुत्र मेघनाद के वध पर दुख अनुभव करता है । इस तरह रावण का चरित्र बिल्कुल काले रंग में अकित नहीं किया गया। राम का चरित्र भी दोषों से खाली नहीं है। कवि राम को भगवान के रूप में नहीं दिखाता, परन्तु उनको एक महापुरुप की पदवी देता है । रामायण की कथा को लेकर कविने महाकाव्य का नाम 'रामचरित मानस' नहीं रसा, परन्तु "मेघनाद वध” रखा है। इसी तरह मैथिलीशरण गुप्त ने अपने महाकाव्य का नाम 'साक्त' रखा है। क्योंकि वह इसमें राम की अपेक्षा लक्ष्मण क चरित्र को अधिक स्थान देना चाहते थे । यह आधुनिक युग का प्रभाव है, जिसके कारण कवियो ने पुराने कहाकाव्यों को नये प्रकाश मे देसने का यत्न किया है। आधुनिक युग विज्ञान का युग है। विज्ञान में सदा नवीनता की खोज रहती है, पुरानी परिपाटी को बदलने का विचार रहता है। इन विज्ञान के विचारों में बहकर अयोध्यासिंह उपाध्याय ने कृष्ण के चरित्र में परिवर्तन किया है। उनको देवताओं के स्वर्ग से नीचे लाफर भूमि पर महापुरुष की पदवी दी है। . - हिन्दी काव्य विवेचना 'प्रियप्रवास' की वर्णन-शैली में मर्म अधिक है। कवि भूमिका में लिखते हैं-"कोई सक्षेप वर्णन को प्यार करता है, कोई विस्तृत वर्णन को। मैंने अपने प्रथ में वर्णन के विषय में बीच के पथ को ग्रहण किया है।" कृष्ण के चले जाने पर प्रज की दशा शोक के भावों से भरी हुई है । कवि ने एक स्थल पर प्रभात का वर्णन करने में अपनी प्रतिभा दिखाने का यत्न किया है। यद्यपि भाषा क्लिष्ट है, परन्तु भावों का अभाव नहीं है। एक के बाद दूसरी वस्तु का वर्णन करके आपने सन्ध्या के समय का पूरा चिन्न खींचा है। तारे डूब गये हैं, आकाश में लाली फैल गई है, दिनफर धीरे-धीरे निकल आये हैं, सुकुमार बेलें घायु में धीरे-धीरे डोल रही हैं । प्रकाश वनों में और कुओं में फैल गया है, परन्तु यह सब बातें प्रजवासियों को मीठी नहीं लगती, क्योंकि कृष्ण मथुरा चले गये हैं। कवि लिखते हैं- "प्रात शोभा ब्रज अवनि में आज प्यारी नहीं थी। मीठा-मीठा विहग-रव भी कान को था न भाता। फूले-फूले कमल दल थे लोचनों में लगाते । लाली सारे गगन-तल की काल ब्याली समा थी ।। एक और पद में आप सन्ध्या के समय का वर्णन करते हैं। जिसमें प्रकृति का निरीक्षण है और इस समय का सुन्दर वर्णन है । कवि धीरे-धीरेचित्र अकित करनेकीशैलीका अनुकरण करता हुआ लिखता है कि, "दिवसावसान समीप था । आकाश लाल हो चला था। शिसाओं पर डूबते हुए सूरज की किरणें शोभा दे रही थीं।

। निराशावाद ६५ वन में पक्षियो का झुण्ड कोलाहल मचा रहा था। इस तरह एक बात को बतना कर दूसरी वस्तु का वर्णन करते हैं और उस समय का विविध रंगों में पूरा चित्र खींच देते हैं। यही इनकी अपनी शैली है। महाकाव्य में इसी तरह की शैली उचित होती हैं। क्योंकि कथा का विकास धीरे-धीरे होता है। "प्रिय प्रवास" वैष्णव धारा की कविता का आधुनिक यत्न है, परन्तु अब कृष्ण- कविता लिखने की रीति धीरे-धीरे कम हो रही है। निराशावाद सामाजिक परिस्थिति निराशावाद हिन्दी कविता की चौथी धारा है । इससे पहले कविता का स्वरूप या तो वीर रहा है या धार्मिक ! वैष्णव और रहस्यवाद की कविता में धार्मिक भावों की पुट है । एक वैष्णव के लिए जीवन का दुख माया है। एक रहस्यवादी के लिये जीवन के कष्टों की कोई वास्तविकता नहीं है। यह दुख और फट पानी के चुलबुलों की तरह पैदा होकर फट जाते हैं। इस प्रकार के लोगो के लिए दुस और सुख स्थिर नहीं हैं। ये लोग या तो धर्म के भावों में शान्ति पा लेते हैं या इनको कर्म की गति मानकर टाल दते हैं । (१) आधुनिक युग में जनताको धर्म पर इतना विश्वास नहीं रहा, जितना पहले था। लोग फवल कर्म को भी दुख का कारण नहीं समझते । धीरे-धीरे ये विचार फैल रहे हैं कि जीवन के दुख के लिये सामाजिक विधान भी एक प्रधान कारण " . ६६ हिन्दी काव्य विवेचना है। इस लिए वह समाज को दोप देकर अपने दुख को फर्म की गति न मानकर भूल नहीं सकते। आधुनिक कवि इन विचारों को अपनी कविता में प्रकट करता है। ये विचार निराशा के मार्यों को पैदा करते हैं। इस लिये यह नवीन धारा आधुनिक कविता में बह रही है। इससे पहले कवियों ने जीवन की असा. रता को प्रकट किया है, पर जीवन के अन्त को दुस नहीं समझा। इस लिए पुराने नाटककारों ने भी दुखान्त नाटक नहीं लिखे। आजकल के उपन्यास, नाटक, चित्रपट, गाने निराशा के भावों को प्रकट करते हैं। (२) पश्चिम के विचारो के प्रचलित हो जाने से जनता के दिलों में स्वतन्त्रता के भाव पैदा हो गये हैं। परन्तु सामाजिक विधान वही पुराना है। इससे उनके मन का विकास नहीं हो सका। बन्धन अनेकों हैं-कहीं जात-पात का बधन है, कहीं साने-पीने का । इस प्रकार के बन्धनों में जनता का हृदय फल फूल नहीं सकता। यह भी एक निराशा से भरी हुई कविता लिखे जाने का कारण है । (३) इसके सिवाय आधुनिक युग में स्त्रियों को शिक्षा मिलने लगी है। इस शिक्षा के कारण वे अपने आपको पुरुषों के बराबर समझती हैं, परतु समाज में उनकी पदवी पुरुषों से नीचे है। इस लिये उनको अपनी दशा पर दुस होता है और वे निराशावाद की कविता लिखती हैं । हिन्दी में कवियित्रियों ने इस प्रकार की कविता अधिक लिसी है । (४) श्राज- कल बेकारी के कारण समाज की दशा अधिक शोचनीय हो गई है। सामाजिक बन्धनों के अतिरिक्त जनता को आर्थिक कष्टों का

,
निराशावाद
६०
भी सामना करना पड़ता है। ये कष्ट मनुष्य के जीवन को पीस
देते है। (५) किसानों की गरीयी, शिक्षित लोगों की बेकारी,
समाज के वधन, त्रियों की दीनता, धर्म और कर्म में अविश्वास
इन सब के कारण परिस्थिति करणामय हो गई है। इस दशा में
स्वाभाविक है कि कवि निराशा के भावों को प्रक्ट करे । इसी भाव
को एक वगाली कवि ने 'जीवन की कथा को मन की व्यथा ।"
कह कर प्रकट किया है।
तारा पाण्डे
-
निराशावाद की कविता लिखने वालों में तारा पाण्डे का स्थान
प्रमुख है। श्राप की कविताओं के तीन साह छप चुके हैं । प्राय
सभी कविताओं पर निराशावाद की छाप लगी हुई है। अपनी
जीवन गाथा को तारा "सीकर" में इस प्रकार वर्णन करती हैं-
"किससे कहूँ ? कौन सुन लेगा, इस जीवन की करुण कथा ?
बार-बार मचली पड़ती है भोली भाली मौन व्यथा ।
करूँ कहाँ तक याद अरे बीती बातों को मैं अपनी ?
गिनते ही गिनते
बीतेंगी, पता नहीं कितनी रजनी ।।
तारे ही हैं केवल सुख-दुस को सुनने के अभ्यासी।
जिन्हें देखती हैं रजनी में मेरी ये आँखें प्यासी ।
उस झिलमिल से अजब जगत में उलझी पडती है पीडा।
खेल-खेल कर तारों से ही, आँसू करते हैं क्रीडा।"
इन शब्दों में जीवन की गहरी पीडा है और करुण वेदना है।
तारा पाण्डे को अपने जीवन में घोर कष्टों को सहना पड़ा है।
,

६८
हिन्दी काव्य विवेचना
बचपन में ही आप को माता के स्नेह से वचित होना पड़ा।
आपका विवाह १४ वर्ष की आयु में हो गया। इसके बाद दो वर्ष
तक रोगी रहीं। आप की बहुत-सी कवितायें बीमारी की दशा में
लिखी गई। इसलिये कविता में जो वेदना और निराशा के
भाव मिलते हैं, वे कोरे काल्पनिक नहीं, परन्तु तारा के सच्चे
अनुभव है। एक स्थल पर आप लिखती हैं-
कितनी मनोव्यथा थी उसमें,
हृदय विकल हो आया था।
सध्या में अपने जीवन की
सध्या को लस पाया था।
इस पद में वह जीवन के अन्त को सध्या के रूप से पाती हैं,
जो अन्धकारमय है । अपनी व्यथा को पार-बार सुनाने का यत्न
फरती हैं और कहती है-
वियोगी हो, या वैरागी-
कथा कुछ अपनी कहदो आप।
और बदले में हे सुकमार।
व्यथा सुनलो मेरी चुपचाप ।
और आँसुओं को अपने जीवन का सगी और साथी
समझती हैं। ये उमड-उमड कर हृदय में आते हैं। मन का सारा
मैल बहा कर ले जाते हैं। दुख में भी आते हैं, सुख में भी आते
हैं। आप औरों के दुख-सुख के साथी बन जाते हैं। तारा निराशा
के भावों से पराजित होकर कहती है-
.
-

निराशावाद
६६
खिलने से पहले ही मेरी,
मृदुल पखडी सूस चली।
परिमल और पराग हीन मैं,
मुरझाई हु एक फनी।
"परिचय" में इन भावों को और भी अधिक कसकती हुई
भाषा में वर्णन करती हैं।
जीवन फी कुछ चाह नहीं,
अभिलापाओं का क्षार हुआ।
झूठे जग को निरस-निरख कर,
पागल-सा यह प्यार हुआ ।
आगे अपना परिचय देती हुई कहती हैं-
परिचय मेरा सुनो यही,
मैं स्वप्न जगत की हू रानी।
सम्बी, निराशा के सँग में-
फिरती रहती हू दीवानी ।।
ये भाव तारा पाण्डे के नहीं, परन्तु सारे स्त्री समाज के हैं,
जिन्हें श्रादिकाल से घोर कष्ट झेलने पडे हैं । “सीकर" में तारा
ने।इन कष्टों की ओर सकेत किया है। यद्यपि भापा और शैली
इतनी पकी हुई नहीं है, परन्तु भावों में सरलता, वेदना और
जीवन की पीडा है। वारा पाण्डे की कविताओ का दूसरा सग्रह
"शुफ पिक" है। इस में भाषा अधिक मँजी हुई है । भाव भी पफे
हुए हैं। पदों में संगीत और लय है । वेदना में मधुरता है। अपने

मैं
हिन्दी काव्य विवेचना
जीवन के दुस को अपना कर कहती हैं-
दुस से शृगार करूँगी
जीवन में जो थोडा सुख है,
मृग-जल है, उसमें भी दुस है,
छली गई बहु वार जगत में
फिर क्यों अपनी हार करूंगी?
मैं दुख से शृगार करूँगी।
तारा पाण्डे दुस से घबराती नहीं । इसको वे अपने जीवन
का साथी समझती हैं। सुख और दुख जीवन में क्रम से
आते रहते हैं। मनुष्य सुख को अपनाता है और दुख से दूर
भागता है। परन्तु तारा पाण्डे ने जीवन के सार को इस तरह
अनुभव किया है कि सुख-दुस बराबर हैं-
सुस दुख दोनों ही पावेंगे,
क्रम क्रम से छवि दिसलावेंगे।
इस भिक्षुक जग को सुख देकर,
दुस के सुख को प्यार करूँगी।
मैं
से शृगार करूँगी।
आपने जीवन में इतनी पीडा अनुभव की है कि
आपके लिये हँसना कठिन हो गया
| जीवन-दीपक के बुमा
जाने से उत्साह नहीं रहा, चाह नहीं रही, आशा भी नहीं रही।
खा-पीकर सो जाते हैं। प्रात उठकर थोड़ा सा काम भी
कर लेते हैं और फिर वही क्रम | वारा की दृष्टि में जीवन का
.
,

वह किस
निराशावाद
इतिहास एक पक्ति में बन्द हो सकता है । मनुष्य पैदा हुआ,
उसने दुख भोगा और वह मर गया । यदि यही जीवन का इतिहास
हृदय से हँसे ? आप कहती हैं-
कैसे हँसू, बतादो ना।
जीवन में उत्साह नहीं है,
परिचित सुस की राह नहीं है,
जी भर हँसू, चाहती जी से,
कोई युक्ति बता दो ना
आगे चल कर लिखती हैं, यदि जीवन दुसमय है तो इसको
सुखमय कैसे मानले । योगी कहते हैं कि सुख दुस दोनों
मिथ्या हैं, परन्तु तारा ने अभी तक यह सीस नहीं पाया है कि
ये दोनों मिथ्या हैं। ऐसा सीसने के लिये वह अति विकल है।
आपने बचपन रोकर खोया है, यौवन आँसुओं में
गँवाया है, सारा जीवन व्यथित हो गया है, केवल पीडा शेष रह
गई है। आप कहती हैं-
जन्म से ही मनुज को झूठे जगत का प्यार माया,
शान्ति के बदले जगत से अश्र का उपहार पाया,
क्षणिक जीवन देख फर अली । मैं बनी उन्मादिनी-सी।
इस तरह आपकी निराशा में भी कोमलता और मधुरता
है, जो हिन्दी कविता में बहुत कम पाई जाती है । तारा पाण्डे
जैसी कविता लिखने वाले अधिक नहीं, फेवल दो-चार कवि ही
होंगे। इसमें जीवन की वह सरलता है, भाषा का वह सगीत है,

।
हिन्दी काव्य विवेचना
जीवन के दुस को अपना कर कहती हैं-
मैं
से शृगार करूँगी
जीवन मे जो थोडा सुख है,
मृग-जल है, उसमें भी दुख है,
छली गई बहु बार जगत में
फिर क्यो अपनी हार करूँगी ?
मैं दुख से शृगार करूंगी।
तारा पाण्डे दुख से घबराती नहीं । इसको वे अपने जीवन
का साथी समझती हैं। सुख और दुख जीवन में क्रम से
आते रहते हैं। मनुष्य सुग्व को अपनाता है और दुख से दूर
भागता है। परन्तु तारा पाण्डे ने जीवन के सार को इस तरह
अनुभव किया है कि सुख-दुख बराबर हैं-
सुख दुख दोनों ही आवेंगे,
क्रम क्रम से छवि दिखलावेंगे।
इस भिक्षुक जग को सुख देकर,
दुस के सुख को प्यार करूँगी।
मैं
दुख
से शृगार करूँगी।
आपने जीवन में इतनी पीडा अनुभव की है कि
आपके लिये हँसना कठिन हो गया है । जीवन-दीपक के बुझ
जाने से उत्साह नहीं रहा, चाह नहीं रही, आशा भी नहीं रही।
खा-पीकर सो जाते हैं। प्रात
उठकर थोड़ा सा काम भी
कर लेते हैं और फिर वही क्रम । वारा की दृष्टि में जीवन का

कैसे हँसू,
।
गँवाया है, सारा जीवन व्यथित हो गया है, पेवल पीडा शेष रह
इस तरह आपकी निराशा में भी कोमलता और मधुरता
है, जो हिन्दी कविता में बहुत कम पाई जाती है। वारा पाण्डे
जैसी कविता लिखने वाले अधिक नहीं, पेवल दो-चार फवि ही
निराशावाद
इतिहास एक पक्ति में बन्द हो सकता है । मनुष्य पैदा हुआ,
उसने दुस भोगा और वह मर गया। यदि यही जीवन का इतिहास
है तो वह किस हदय से हसे ? आप कहती हैं-
बतादो ना
जीवन में उत्साह नहीं है,
परिचित सुख की राह नहीं है,
जी भर हँसू, चाहती जी से,
कोई युक्ति बता दो ना
आगे चल कर लिखती हैं, यदि जीवन दुसमय है तो इसको
सुखमय कैसे मानले । योगी कहते हैं कि सुख-दुख दोनों
मिथ्या हैं, परन्तु तारा ने अभी तक यह सीस नहीं पाया है कि
ये दोनों मिथ्या हैं। ऐसा सीखने के लिये वह अति विकल हैं।
रोकर खोया है, यौवन आँसुओं में
गई है। आप कहती हैं-
जन्म से ही मनुज को झूठे जगत का प्यार माया,
शान्ति के बदले जगत से अश्र का उपहार पाया,
क्षणिक जीवन देख कर अली ! मैं बनी उन्मादिनी-सी ।
आपने बचपन
लता है. भाषा का वा ....
होंगे। इसमें जीवन की

१०२
हिन्दी काव्य विवेचना
जीवन की वह वेदना है, हृदय की वह व्यथा है जो केवल या तो
बमला कविता में मिलती है या पश्चिमीय कविता में या मीरा में।
आप निराशा के अधकार में कभी-कभी आशा की किरण को भी
देख पाती हैं। परन्तु यह किरण इतनी मन्द है कि निकल कर
मिट जाती है। इसका उदाहरण नीचे दिये पदों में हैं-
मैंने सोचा था, हू जग से
शीघ्र बिदा होने वाली ।
हँसना मेरा नहीं जगत मे
मैं तो
हू
रोने वाली ।
चारों ओर घिरे थे, मेरे
अन्धकार के बादल घोर,
नहीं सूझना था तब कुछ भी
आशा अभिलापा का छोर
मैं निराशा थी इस जीवन से
सूना था मेरा ससार,
निकल रही थी भान हृदय से
अस्फुट और करुण झकार ।
हाथ जोड निज अन्तरतम से
मैंने वितनी की पहुवार
हे प्रभु ! मुझे बचाओ दुस से
अथवा करो जगत के पार

अधकार
निराशावाद
१०३
अपने उस अशान्त जीवन में
मुझको फिर से शान्ति मिली,
कण-कण के सूनेपन में ही
मुखरित स्वर्गिक कान्ति मिली।
बादल हदे, प्रकाश हुआ कुछ,
भी
आशा औ' अभिलाषाओं से,
सूना-उर भरपूर हुआ !
हँसना रोना
दोनों मेरे,
मैं
सुस-दुस की मतवाली,
जग मे रहकर भी हूँ जग से
बहुत
इस कविता के दो भाग हैं, पहले भाग मे अन्धकार है,
दूसरे में प्रकाश है। पहले में निराशा है और दूसरे में आशा।
परन्तु इस प्रकार की कवितायें, जिनमें आशा के भाव हों, बहुत
कम हैं। इस लिये तारा पाण्डे को निराशावाद की एक प्रमुख
कवियित्री मानना पडता है। जिनकी कविता में सागर फी
म्भीरता है, सरिता का प्रवाह है, काले बादलों का अन्धकार है।
नाप जीवन के पथ पर वेदना का भार उठाकर चलती हैं। मृत्यु के
सवाय न विश्राम है, न ठिकाना । कभी कभी जीवन के आदर्श
की झलक दीख पडती है, परन्तु वह शीघ्र मिट जाती है।
दूर रहने
वाली ।
,

२०४ हिन्दी काव्य विवेचना कविता बहुत रामेश्वरीदेवी 'चकोरी' इसी प्रकार के भावों को प्रकट करने वाली स्वर्गीया रामेश्वरी देवी 'चकोरी' भी थीं। यदि आपकी छोटी आयु में ही मृत्यु न हो जाती, तो आपकी प्रतिमा का विकास होने की इतनी आशा थी कि सम्भव है आप हिन्दी के कविता-क्षेत्र में एक विशेष स्थान पा लेती । आपके भावों में वह सरलता है, भाषा में वह लय है जो हिन्दी कविता को गौरव देती है। "किंजल्क" आपकी कविताओं का समह है । इसमें 'एक घुट', उत्कृष्ट है। इसमें भावों का इतना वेग है और भाषा का इतना प्रभाव है कि पढते-पढते पाठक इसके साथ बह जाता है । 'चकोरी' सागर के किनारे अपने आपको पाती है और वहाँ पर एक महा कलरव सुनती है। इस ससार में उसको कोई आश्रय देने वाला नहीं, वादल गरजते हैं। समुद्र की तरगें बढती हैं। बिजली आशा का चिराग लिये चमकती है और फिर वुझ जाती है। एक भीपण'अट्टहास होता है । कवियित्री सागर की तरल तरगों को पकडना चाहती है, परन्तु वह भी हाथ से निकल जाती हैं। इसके बाद सागर की लहरें शान्त होती हैं। अरुण मुसकराता है, लहरें प्रलय का गान गाती हैं। जीवन की आशा मिट जाती है और अन्त में वह जीवन से इतना निराश हो जाती है कि सारे ससार के लिये प्रलय चाहती है। इसी तरह "प्रतिरोध" में वह सुखों को एक स्वप्नों का ससार मानती है। ये स्वप्न शीघ्र मिट जाते हैं। अन्त मेवह सरिता

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१०८
.
हिन्दी काव्य विवेचना
वाद है। आधुनिक काल अन्धकारमय है, समाज की स्थिति
शोचनीय है, जिसमे जोवन का विकास कठिन-सा हो गया है।
जब चारों ओर दुख के बादल हैं तो असहाय मनुष्य इन भावो को
प्रकट करने के सिवाय और कर ही क्या सकते हैं। समाज के
विधान और नियमो को एक लेसक ने मशीन से उपमा दी है,
जिसमे अनेको मनुष्य पिस जाते हैं, परन्तु यह मशीन चलती
रहती है । आधुनिक युग भी मशीन युग है । इस लिये यह उपमा
और भी अधिक घटती है।
भगवतीचरण वर्मा
इस निराशा-युग के भगवतीचरण वर्मा प्रमुख कवि हैं।
आपकी कविता जीवन की वेदना से भरी हुई है । निराशावाद
आपकी कविता की विशेषता है। कभी-कभी कवि नास्तिक बन
जाता है और अपने जीवन की कसक-कहानी को सुनाता है।
यद्यपि आप सुस को माया समझते हैं तो भी आपका यह विचार
है कि दुस में भी कोई सार नहीं । एक स्थान पर वह लिखते हैं,
"मैं समझता हू कि जीवन एक गति है और इसलिये ससार मे
कोई चीज़ स्थायी नहीं है। हर एक भावना बनती और बिगडती
है। फिर बनना और बिगडना समार की गति है, यही उसका
नियम है । गति ही जीवन है । असफलता जीवन का प्रधान अग
है।" इस गति को नीचे दिये पद मे प्रकट करते हैं-
जीवन और मरण का अभिनय होता है प्रति काल,
और यहाँ के प्रति कण में है परिवर्तन की चाल ।
।

.
है
निराशावाद
१०६
फिर भी यही शून्य है, उसमें वह अस्तित्व विशाल,
इन्द्रजाल-सा पिछा हुआ है किस माया का जाल ।
कवि निराशा पे भावों में बिल्कुल वह नहीं जाते, किन्तु उन
पर विजय पान का यत्न करते हैं। प्रयास में कभी कभी सफल
भी हो जाते हैं। जन आशा और निराशा को, सुख और दुस को,
एक वरावर समभत तर दुस पर विजय ही पाते हैं। आप कहते
हैं कि ससार मे दोनो प्रकार क मनुष्य हैं। एक गेकर जग को
सपना बतलात हैं, परन्तु यह भी मन का छल हैं। दूसरे हँसकर
जीवन को सुसमय कहते हैं, यह भी मन की भ्रान्ति है ।
वास्तव में सपल काल का चक्र धूमता रहता है । मनुष्य का हृदय
उसफ आगे निर्मल है । ममता में पडकर कभी सुख अनुभव करता
है, कभी दुस । जब ससार को अपने हृदय के अनुकूल पाता है,
तो उसको सुसमय समझता है । जब उसको प्रतिकृन्न पाता है, तो
वही मुस दुस में बदल जाता है । कवि चार-चार योगियों की तरह
सुस दुस दोनो पर विजय पाने की चेष्टा करता है, परन्तु इस
प्रयास में जो दुस होता है,
उसको
भूल
नहीं सकता
एक-एक के बाद दूसरी, तृप्ति प्रलय पर्यन्त नहीं,
अभिलापा के इस जीवन का आदि नहीं है, अन्त नहीं।
यहाँ सफलता असफलता के बन्धन का अभिशाप नहीं,
यहाँ निराशा औ आशा का पतझड नहीं, बसत नहीं।
जो पूरी हो सके कभी भी, ऐसी मेरी चाह नहीं,
वहाँ महत्त्वाकाक्षाओं की परिधि नहीं है, थाह नहीं।
-

११० हिन्दी फार पिरचना क्या भविष्य है ? नहीं जानता, गुफको नात अतीत नहीं, सुस से मुझको प्रीति नहीं है, दुस से मैं भयभीत नहीं। लडना ही रहमा हूँ प्रति पाल, पाधानो का पार नहीं, काल-चक्र फ महासमर में हार नहीं है, जीत नहीं। वर्मा जी के निराशावादी भावों का आधार ज्ञान है। आपकी कविता में विचारों की मात्रा अधिक है। आप तारा पाण्डे, चकोरी और हृदयेश की तरह बेदना को ही प्रकट नहीं करते, परन्तु वेदना के कारण को समझने की चेष्टा करते हैं। जन किसी वस्तु के कारण को पाने का यत्न किया जाय, तो उसमें ज्ञान का अश अवश्य आ जाता है । जीवन फे विपाद को प्रकट करना एक यात है, परन्तु विपाद क्यों है, इसका स्वभाव क्या है, इसको वर्णन करना भिन्न धात है । कविता लिखते समय आप के सामने जीवन के अनेक चित्र आते हैं। उन पर आप विचार करते हैं । विचार करने का परिणाम यह होता है कि वे भावों में यह नहीं जाते, परन्तु इनके ऊपर उठ जाते हैं । इस लिये श्राप कहते हैं कि इस अभिलापा के जीवन का कोई प्रादि नहीं है, कोई अन्त नहीं है। न ही निराणा को पतझड हे और न ही आशा का बसत है, न भविष्य का ज्ञान है, न अतीत की याद है, न सुख से प्रीति है, न दुख से भय है, काल-चक्र क महासमर में न हार है न जीत है । जीवन एक सग्राम है। एक गति है। यद्यपि जीवन में निराशा है, बाधा है पर उससे युद्ध करना मनुष्य का आदर्श है। यही उनकी कावता का सन्देश है । . , निराशावाद लिरिक कविता आधुनिक निराशावादी सभी कवि एक नये ढग पर कविता करते हैं। इन पर अगरेजी और बगला की कविता का काफी प्रभाव पड़ा है। इस लिये इन्होंने नई शैली को प्रचलित किया है । इस प्रकार की शैली को अगरेजी में 'लिरिक' के नाम से पुकारा जाता है। लिरिक' में तीन प्रधान बातें होती हैं। एक तो कवि अपने भावों को प्रक्ट करता है । यह 'लिरिक' का सबसे पहला अड्ग हे । दूसरे लिरिक सतिप्त होता है । इसलिए कवि अपने एक भाव को प्रकट करता है वह अधिक लम्बी कविता नहीं करता, यदि लम्बी कविता करेगातो केवल अपने एक भाव को नहीं प्रकट करेगा। बल्कि उसमें व भार भी आ जायेंगे जो उस के पहले भावों से गहरा सम्बन्ध नहीं रग्यते । एक भाव की जगह अनेक भाव हो जायेंगे, जिससे वह 'लिरिक' के आदर्श से गिर जायगी। 'लिरिक' का तीसरा अङ्ग सगीत है । यहाँ सगीत का प्रयोजन लय से है । जव 'लिरिक' कविता का आरम्भ हुआ था, तब 'लिरिक' गाये जाते थे। श्राज कल इनका गाया जाना प्रावश्यक नहीं है, परन्तु इन म लय का होना आवश्यक है । इससे सार यह है कि 'लिरिक' कविता लिखते समय कवि को प्रवाह का ध्यान रखना पडता है । ये तीनों अन आधुनिक निराशा की कविता में पाये जाते हैं। इस कविता मे कवि अपने भावों को प्रकट करते हैं । करितायें लम्बी नहीं है, सक्षिप्त हैं और इन में लय और प्रवाह है । इस प्रकार की कविता

११२
हिन्दी काव्य विवेचना
करने वाले और भी कई कवि हैं जिन में श्री वचन, श्री रामकुमार
वर्मा, श्री श्रज्ञ य, श्री हरिकृष्ण 'प्रेमी', और श्रीमती महादेवी
वर्मा, प्रमुख हैं । इस प्रकार की कविता आधुनिक युग में और
भी अधिक लिखी जायगी। अभी तक तो ससार में आशा की
रेसा नहीं दीस पड़ती।
॥वस ॥

Hindi Kavya Vivechana

Author
Dr.indra Nath Madan
Title
Hindi Kavya Vivechana
File name
Hindi Kavya Vivechana
Text
OCR done
Citation
1940
Published
2011/01
Publisher
Vishva Sahitya Granth Mala Lahore
Language
Sanskrit
Pages
109
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546488
Barcode
4990010024958.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
05DsBZGXpLo
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