Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Varahi Sanhita
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वाराहामहिता। अकोनविंशोऽध्यायः। अहवर्षफल. सर्वत्र रिटसस्ययुता बनानि देवादिनायिपुष्ट्रिसमावृतानि । स्पन्दनि नैव च पयः प्रचुर सवन्त्यो रुग्मेपनानि न तयातिबलान्वितानि ॥ १॥ वन्य तपत्यदितिजः शिशिरेऽपि काले नात्यम्बुदा जलमुचोऽचलमनिकाराः । नटर- भगिणशीतकरं नाश्च सीदन्ति तारसकुलानि सगोकुलानि ॥ २॥ हस्त्यवः निमदसह्यालरुपेता वाणासनासिमुशलातिशयाश्चरन्ति । मन्तो नृा युधि नृपानुचरैश्च देशान् संवत्सरे दिनकरस्य दिनेऽथ मासे ॥ ३ ॥ प्यान नत्रः प्रचलिताचलसनिकाशालाअनालिगवलच्छविभिः पयोदः । गां पूरयनि- खिलाममलानिरनिरुत्कण्ठकेन गुरुणा ध्वनितेन चाशाः ॥ ४ ॥ तोयानि पर कुमुदोत्सलवन्त्यतीव फुलट्ठमाण्युपवनान्यलिनादितानि । गावः प्रतापको • नयनाभिरामा रामा रतैरविरत रमयंति रामान ॥५॥ गोधूमशालियबधान्य- यदि सूर्य वर्षका स्वामी, मासका स्वामी, दिनका स्वामी हो तौ तवजगह पृथ्वीर धान्य थोडा हो, वनमें जगह २ वृक्षों में कीडे लग जॉय, नदियों में बहुतसागर न रहे, मारे पीडाके औपधियोंमें अत्यन्त वल न रहे, शीतकालमेंभी सूर्य ती धूप करे, पर्वतके समान मेघगण अधिक जल नहीं वर्षा, आकाशमें चंद्रमा और तारोंकी दीप्ति जाति रहे, गाय और तपस्वी कुलको शोक हो, हाथी, घोडे, पदार तिकरूप सहनीय बलयुक्त राजा लोग बहुतसे वाण, धनु, असि और मुसल लेकर अपने अनुचरोंको साथ ले युद्ध करके समस्त देशोंको ध्वंस करते हुए घूमें ॥१॥ .. ॥ २ ॥ ३ ॥ जो चंद्रमा वर्षका मालिक हो तो चलायमान पर्वतको समान काले सर्प अञ्जन, भ्रमर और महिपीकी नाई काली तिवाले मेघवृन्द आकाशको व्यात करते हैं. उत्कण्ठासूचक मारी शब्द करके समस्त दिशाओंको पूर्ण करते हुए अमल जलसे पृथ्वीको पूर्ण करते हैं; सरोवरोंमें, कमल बबूले और उत्पल कु, जाते हैं, उपवन (वाग) प्रफुल वृक्षयुक्त और भ्रमरोंके शब्दसे शन्दायमान होते हैं, गाय दूध बहुतसा देती है, नेत्रोंको आनंद देनेवाली स्त्रियां आसक्तिसे अविरत पुरुषोंको रमण कराती है, ईख, शट्टी, जौ, धान्य श्रेष्ठ और युक्त समूह समृद्धि युक्त चैत्य अर्थात् छोटे २ देवमंदिरोंसे अंकित और यज्ञ व होमके पवित्र शब्दसे -- मापाटोकामादिता अ० १९ । परेवाटा : पाल्पते नृपतिभिर्नगराकराच्या चित्पङ्किता कतुवरेटिविषुष्ट- नादा संवत्सरे शिशिरगोरभिसम्प्रवृत्ते ॥ ६ ॥ पातोडतश्चरति पहिरविप्रचण्डो मामान वनानि नगराणि च सदिधाम हाहेति दस्युगणपातहता रटन्ति निःस्वी- हता विपशवो भुवि मर्पसङ्काः ॥ ७ ॥ आयुन्नता विपति संहतमूर्तयोऽपि मुञ्चन्ति न कचिदपः प्रचुरं पयोदाः । सीन्नि प्रजा तमपि शोपमुपैति सस्पं निप्पनमप्पविनपादपरे हरन्ति ॥ ८ ॥ भूषा न सम्पगनिपालनसक्तचित्ताः पित्तोत्यरक्रचुरता भुजगाकोपः । एवंविरुषहता भवति मजेयं संवत्सरेऽवनि- सुतस्य विपन्नसत्या ॥ ९ ॥ मापेन्द्रनाटकुहकाकरनागराणां गान्धर्वलेख्यग- , णितायापिदों च वृद्धिः। पिमीपया नृपतयोऽद्भुतदर्शनानि दित्सन्ति तुष्टिजननानि परस्सरेश्यः ॥ १०॥ वार्ता जगत्पवितथाविकला प्रयी च सम्यक् चरत्यपि मनोरिय दण्डनीतिः । अध्यक्षरं स्वामिनिविष्टाधियोऽत्र केचिदान्वीक्षिकीपु च परं पदमीहमानाः॥११॥ हास्यज्ञदूतकविधालनपुंसकानां युनिज्ञसेतु. ' शन्दापमान होकर पृथ्वी राजाओंसे पाली जाती है ॥ ४ ॥५॥ ६॥ मंगल वर्षका स्वामी हो तो वायुसे उठी हुई अतिप्रचंड अमि प्राम, वन और नगरोंको ' जलानेकी इच्छा करती है, पृथ्वीके मनुष्य चोरोंसे मार डाले जाकर सहायहीन ' और पनि होकर हाहाकार करते हुए विचरण करते, मेधकुल शून्यमें कम : ऊंचा और संहत पूर्ति होकरभी कहीं बहुतसा जल नहीं वर्षाते; पका हुआ धान्य लगमग सूरवही जाता है और किसी प्रकारसे निवटकरमी आविनयके इंतुसे दूसरे आदमी उसको हरण कर लेते हैं. मंगलके संवत्सरमें राजालोग मलोमांतिसे ' प्रजाको नहीं पालने, पित्तसे उत्पन्न हुए रोगोंकी अधिकता होती है. सोका कोप होना है. इस प्रकार प्रजाके लोग विना नाजके दीन हान और मृतपात हो जाते हैं॥७॥८॥९॥ बुध वर्षका स्वामी हो नो माया, इन्द्रजाल और मानमती : करनेवाले मनुष्य और गंधर्व, लेख्य, गणित व अस जाननेवालोंकी पाद होती है, • राजालोग मोनिकी कामनासे अद्भुतदर्शन और ताटेकर द्रव्य, परस्पर एक दूसरेको । दान करनेकी इच्छा करते हैं, जगदमें वाती और प्रयी शाख अविकल और सत्य रहता है, मनुकी समान दंडनीति भली भांतिसे विराजमान रहती है। कोई शास- ज्ञानमें अपनी बुद्धिको लगाता है, कोई २ माचीक्षिी शायसे परम पदके पानेकी चैप्टा फरता है। उधप्रद अपने वर्षम अथवा मासमें इस प्रकारसे पृयितीको हास्पा, . .
दूत, कवि, पालक, नपुंसक, युक्तिके जाननेवाले, सेतु, जल और पर्वतवामियों गामी वेदव्यान, यज्ञयंस करनेवालोंके मनको विदीर्ण कर श्रेष्ठ बामणाके में पनांश मागियोंके हृदयको आनंद कराकर भ्रमण करती है; उत्तम सस्पाती - अनेक हस्ती, घोडे, चतुरंगसेना, महाधन, गोकुल और धनयुक्त पृथ्वी राजा पाली जारर और वर्धित होकर मानो स्वर्गवासियोंकी समान स्पर्दा करनेवाल माय रािजमान होती है। आगमानी पानीसे तृप्तिकारक विविध रंगके बा- पीस टक लेने है. इन देवनानायके गुरु वृहस्पतिजीके गुमवपमें इस मार गृप्ती यन में धान्याली और ऋदियुक्त होती है ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥ म पदा करती है; घुमाको क्षप करनेवाले और पोषण करते हुए जयम मग करके नगर पानि माहित ऋदिगाली पृथ्वीशा पालन करते हैं, म मनुष्यगग कामिनियाके माप वारंवार मथुपान करके वेणुवीणा (९४) वाराहीसंहिता। जलपर्वतवासिनां च । हादि करोति मृगलाञ्छनजः स्वकेऽब्दे मासेऽय वा शत्रु- रतां तुवि चौषधीनाम् ॥ १२॥ ध्वनिरुच्चरितोऽध्वरे युगामी विपुलो यजमुरा मनांसि जिन्दन् । विचरत्यनिशं द्विजोचमानां हृदयानन्दकरोऽध्वरांशवाजाम ॥ १३॥ शितिरुत्तमसस्यवत्यनेकदिपपत्त्यश्वधनोरुगोकुलाट्या । शितिरैरजिा- लनप्रवृद्धा द्युचरस्पर्दिजना तदा विभाति ॥ १४ ॥ विविधैवियदुन्नतः पोस्ट तमुर्वी पयसाभितर्पयदिः। सुरराजगुरोः शुक्षेत्र वर्षे बहुसस्या क्षितिरूवार दियुक्ता ॥ १५ ॥ शालीचमत्यपि धरा धरणीधराभधाराधरोज्झितायःगर- पूर्णवमा । श्रीमत्सरोरुहतताम्बुतडागकीर्णा योपेव भात्यक्षिनवाभरणोज्न- लाङ्गो ॥ १६ ॥ क्षत्रं शितो क्षषितजरिबलारिपक्षमुद्दष्टनैकजयशब्दविरातिः- शम् । संहृष्टशिष्ट जनदुष्टविनष्टवा गां पालयन्त्यवनिपा नगराकराव्याम् ॥१४- पेपीयते मधु मघौ सह कामिनीनिर्जगीयते श्रवणहारि सवेणुवोणम् । बोभुन्न राप्ति करता है और पृथ्वीपर औषधियां बहुतायतसे होती हैं ॥ १० ॥ ११ ॥ १२ ॥ वृहस्पति वर्षका स्वामी हो तो यज्ञमें उच्चारण की हुई विपुल आग मुन्दर यमलोंगे जिनका जल टका हुआ है ऐसे तडागास आकीर्ण होकर नये गहोंने गजी हुई चल अंगपाली नारीको समान शोभा पाती है, और गा. दिशामो गन्दापमान करने हुए गनायोग शिष्ट जनाको संतोप और हर बरसमाप कर गान किया फाने । और भनियि माद व माई बन्धु मापाटीकासहिता अ० १९ । तेऽतिथिसुहत्स्वननैः सहान्नमदे सितस्य मदनस्य जपावघोपः ॥ १८ ॥ उदृत्तदस्युगगनरिरणाकुलानि राष्ट्राण्यनेकाशुविनविनारुतानि । रोख्यमाणह- तबन्धुजनैनेश्च रोगोत्तमाकुरकुलानि बुतुक्षया च ॥ १९॥ पातोद्धताम्बुधर- वर्जितमन्तरिक्षमारुग्णनैकविटयं च धरातलं दीः । नटार्कचन्द्रकिरणाति- रजोऽवनद्धा तोपारायाच विनलाः सरितोऽपि तन्व्यः॥ २०॥ जातानि कुत्र- चिदतोयतया विनाशमृच्छन्ति पुष्टिमपराणि जलोशितानि । सम्पानि मन्दमभिवपति वृत्ररात्री वर्ष दिवाकरसुतस्य सदा प्रवृत्ते ॥ २१॥ अणुरसद = मयूखो नीचगोऽन्यजितो वा न सकलफलदाता पुष्टिदोनोऽन्यथा यः। यदशु- E अमशुओऽब्दे मासनं तस्य वृद्धिःशुभफलमपि चैवं याप्यमन्योऽन्यतायाम्।।२२॥ इति श्रीवराहमिहिररुती बृहत्संहितायां पहवर्षफलमेकोनपिंशोऽप्पापः ॥१९॥ साथ अनमोजन किया करते हैं, शुक्रके वर्षमें इस प्रकाररो फामदेवकी जय मा करती है ॥ १६ ॥ १७ ॥ १८ ॥ जय शनि वर्पका स्वामी होना मय बोटे मतवाले चोर और बहुतसे संग्रामोंके होने से समस्त गग्य आकुल होते हैं, परनोवा पशु धन जाता रहता है; बन्धुओंका वियोग होनेसे मनुष्यगण पानी मेने सुधाके मारे और रोगोंके मारे पहुतही व्याकुल होते हैं, आकाश असेही पाइल आते र बसेही पवन उनको उडा देना है, पृथ्वीपर एफ. पत्ताभी सो मारोग्य नहीं रहता, आकाशमें सूर्य चन्द्रमाची किरणें पूरीसे बन्ध जाती है; जलाशय अलरोन और नदियां कृशांग हो जाती है। वहीं पर नाज जलके अमारसे गए हो जाता है। चही जल भरी हुइ भूमि पल जाता है। कार जिस वर्षम ने स्वामी होता हे तप इन्द्र मन्द मन्द धान्यका देनेवाला जल बता en० ॥२१॥ जो ग्रह क्षुद्र, अपरिरण, नीवगामी या रिसीमे विजित हो जाता है, या समस्त (पालका दाता और पुष्टिकारी नहीं हो सकता । जो अशुभ मा र सामी या मामा मामी होता है तो उसके भारसे उत्पन र फल माने होती है अन्यथा हो तो शुभ फलमी प्राप्त हो जाता है ॥२२ ।। इति श्रीरामिदिरावाविरोधतायां मात्संहितायां ... सा.... . पि.in... 4- -- -- गि हिमाम सागप्रद गोमें प्रवेश करते हुए देखे जाते हैं, उसी दिशा जिम नसत्रम ग्रह याया कहते , उनायो वनीभूत मना रानमा कायान मा गरम हमण ? जाने।" वाराहीसहिता। अथ विशोऽध्यायः। ग्रहशृङ्गाटक. यस्यां दिशि दृश्यन्ते विशन्ति तारापहा रवि सर्वे । भवति अयं दिशि नसा- मायुधकोपक्षुधातः ॥ १ ॥ चक्रधनु:शृङ्गाटकदण्डपुरमासवनसंख्याताः) शुदवृष्टिकरा लोके समराय च मानवेन्दाणाम् ॥ २ ॥ यस्मिन् सारी एक ग्रहमाला दिनकरे दिनान्तगते। तवान्यो भपति नृपः परचक्रोपद्रवध महान ॥ ३ ॥ यस्मिन्नृक्षे कुर्युः समाग तजनान् महा इन्युः । अविभेदनाः परा- ममतमयसा शिवास्तेपाम् ॥ ४ ॥ महसंवर्तसमागमसम्मोहसमाजमान तास्याः । कोराभेत्येपामभिधास्ये लक्षणं सफलम् ॥ ५॥ एका चला मह परियायिनोऽथवा पञ्च । संवा नाम भवेच्छिसिराहुयुतः स सम्मोहः ।। पौरः पीरममेतो पायी सह यायिना समानाख्यः । यमजीवसनन्मेऽन्यो यथा रोना कोगः ॥ ७ ॥ उदितः पभादेकः प्राक् चान्यो यदि स सनिपातास्य rry मगर, रा और मानकरी मय होता है ॥ १॥ ग्रहगंम्यान या पा, पनु, गणक ( गनुपय), दापुर, माग या पी रामान विराई देगा य, मटि और गनाया गमरमा करता है ॥ २ ॥ सूर्यभार दो दिनों पलने चले जाने पर लिग देश गाया अंशमें प्रमाला सिंग, सदर गगनाका अधिकार होता है और परचाका महान THA Arrविदित और निर्मल होनेपर यह मनु inus ! ग्रहोस मान, ममागम, गम्मोह, रामान, गमिm माय ना पाप गायि प्रहार मिलनेगे माल दासता TMEM गाता KE द मांगने गमात यो पनि पाने पर भी कई मापाटोकासहिता २० २१ । (९७) भविस्ततनवः स्निग्धा विपुलाच समागमे धन्याः ॥ ८ ॥ समोतु संवर्तसमा- गमास्यो सम्मोहकोशी भयदी प्रजानाम् । समानसंतः सुसमः प्रदिष्टो घरमकोरः सल सन्निपाते ॥९॥ इति श्रीवराहमिहिरकती बृहत्संहितापां ग्रहराङ्गाटकं नाम विशतितमोऽध्यायः॥२०॥ अथैकविंशोऽध्यायः। गर्भलक्षण. भन्नं जगतः प्राणाः प्रावृट्कालस्य चान्नमायत्तम् । यस्मादनः परीभ्यः भादृट्कालः प्रयत्लेन ॥ १॥ तदक्षणानि मुनिभिर्यानि निपद्धानि तानि रट्टेदम् । क्रियते गर्गपराशरकाश्यपपात्स्यादिरचितानि ॥ २ ॥ देवविदयाहितारिनो युनिशं यो गलक्षणे अपति । तस्य मुनेरिव पाणी न भवनि मिष्यामि- देशे ॥ ३ ॥ किं पातः परमन्यच्छाग्नं ज्यायोऽस्ति यविदित्येव । प्रत्यंमिन्यात समिपात पाहते हैं, समागममें अर्थात् चंद्रमा मिलनमें प्रांगण रिवात, सिग्ध, पिपुल और धन्य होते हैं ॥८॥ संवत और समागमफा फल गमला र गम्मोह और फोशमें मजाओंको भय होता है; ममाम संज्ञामें उत्तम गमता और सनिपातमें बैर और कोप होता है ॥९॥ शते श्रीरादमिदिराचार्यविरपितायां पृहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयगुगदापारा- स्तव्य-पंक्तियलदेवममादमिश्रविरचितायां भापाटीयां विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ अनदी जगत्या प्राण : मौर भन्नही वर्षापारके वशमें है इस कारण इस पर यरन सहित कालवी परीक्षा परनी पाईये ॥१॥मने गर्ग, गार, धाश्यप भीर बात्स्यादि मुनियोंके द्वारा रपे ए और पांधे हुए थे. समस्त हसण देखकर यह गर्मलक्षण पनाया ॥२॥ जो देखा जाननेहतरपन दिन गर्भलक्षणमें मन लगाय सावधान विसे रहते हैं, उनके सर पर समान देगाणिनमें नमी मिथ्या नहीं होते ॥३॥ ससे कौनसा . शिविस श्रेष्ट मारो मानकर रिमंसी करिमाल में भी होग TT पर चंद्रमा इन चि नसायम किसी पर नशमें रहता तप सपा (१००) वाराहीसंहिता। . स्निग्धाः। परिवेषाश्वासकलाः कपिलस्ताम्रो रविश्व शुभः ॥ २३ ॥ पनवन टियुक्ताश्चैत्रे गर्नाः शुभाः सपरिवेपाः । धनपवनसलिलविद्युत्स्तनितेश्च हिता वैशाखे ॥ २२ ॥ मुक्तारजतनिकाशास्तमालनीलोत्सलाजनामासः। जलचर त्त्वाकारा गईषु धनाः प्रभूतनलाः ॥ २३ ॥ तीवदिवाकरकिरणाशिनारिक मन्दमारुता जलदाः । रुपिता इव धाराभिर्विसृजन्त्यम्मः प्रसवकाले ॥ २१ गर्मोपधातलिङ्गान्युल्काशनिपाशुपातदिग्दाहाः। शितिकम्पस्वपुरकीटककेतुन हयुद्धनिर्घाताः ॥ २५॥ रुधिरादिवृष्टिवैकतपरिघेन्दधपि दर्शनं राहोः । सातैरोभित्रिविधश्चान्यहतो गर्मः॥ २६ ॥ स्वर्तुस्वभावजनितैः सामान्य लक्षणेदिः । गर्माणां विपरीतस्तैरेव विपर्ययो भवति ॥ २७ ॥ भावपदाइन विश्वाम्बुदैवपैतामहेष्वर्वेषु । सर्वेष्वृतुषु विवृद्धोग बहुतोयदो भवति ॥२० शतभिपगाछेपार्दास्वातिमघासंयुतः शुभो गर्भः । पुष्णाति बहुन्दिवसान हर सातेर्हतविविधैः ॥ २९ ॥ मृगमासादिष्वष्टी पट् पोडश विंशतिपतुर्युन्ना साम्ररर्ण हो तो शुभ होता है ॥ २१ ॥ यदि चैत्रमें सघ गर्भ पवन, मेघ, वृष्टि पौर परिवेषयुक्त हो तो शुभ है । जो वैशाखमें मेघ, वायु, जल और शन्दायमा मिजलीगे युक्त हो तो गर्मसे हितसाधन होता है ॥२२॥ मोती या चांदीकी समा वा तमाल, नील उत्पल और अंजनको हातके समान या जलपर माणे समान आसपाले मेघ यदुना जल पावे और सूर्यको किरणसे गर्म तपे और परनवे चाटनेगे वादल प्रसवकालमें मानो शपत होकर जलधारा वर्षावे ॥ २३ ॥३४, उल्का, वन, धारका गिरना, दिग्दाह, मांचाल, गन्धर्वनगर, कीलक, पेट, प्रम- निर्यान, नागिदिक वनेम विकारपन, परिघ, इन्द्रधनुप, राहुदर्शन इन सबका नाव और तीन उत्पादोंगे गर्मका नाश हो जाता है ॥ २५ ॥ २६ ॥ ममारमे साधारण नागदाग जो गर्म पत्ते है उनके विपरीत लागारो उन सदर हो जाता है।॥ २७ ॥ राव ऋतु मेंही पूर्वाभाद्रपदा, उत्तगमाद्रपदा । पास, उपाहा और गहिणीनसमें यदे हुए गर्म यहुनगा जल देते हैं ॥१८॥ मिता, पा, पार्टी, म्याति और मघागंयुक्त गर्भ शुभदापी और का हिनता पांग दान , नीन उलातोंमें हने हुए हों तो हनन करते हैं। राय: माममें अमानुगार ८१९२२० और तीन दिन मापाटीकासाहता अ० २१ ॥ विशतिरथ दिवसत्रयमेकतमःण पञ्चायः ॥ ३० ॥ कृरग्रहसंयुक्ते करकारा- निमत्स्पवर्षदा गर्भाः। शशिनि रयी वा शुलसंयुतक्षिते आरिवृष्टिकराः ॥ ३१ ॥ गर्नसमयेऽतिवृष्टिग नावाप निर्मिमिनरुता । द्रोणाटांशेऽश्याधिके वृष्टे गर्मः खुतो भवति ।। ३२ ॥ गाः पुष्टः प्रसवे ग्रहोपघातादिमियंदिन वृष्टः । आत्मी- यगर्भसमये करकामिभं ददात्यामः ॥ ३३॥ काठिन्यं याति यथा चिरकाल. धृतं पयः पयस्विन्याः । कालातीतं तद्वत्सलिलं काठिन्यमुपयाति ॥ ३४ ॥ पञ्चनिमिनः शतयोजनं तदधिमेकहान्यातः। वर्पति पच समन्नानपणेव यो गर्भः ॥ ३५ ॥ द्रोणः पञ्चनिमित्ने गई त्रीण्यादकानि पबनेन । पड़ विधता नवाः स्तनितेन द्वादश प्रसवे ॥ ३६ ॥ पवनसलिलविद्युद्गनितामान्चितो यः स भवति बहुतोपः पद्यलायुपेतः । विसृजति यदि नोर्य गर्नकालेऽतितरि असबसमयमित्या शीकरामः करोति ॥ ३७ ॥ इति श्रीवराहमिहिरकती वृहत्संहितापां गर्भलक्षणमेकविंशोऽध्यायः ॥२१॥ पर वर्षा हुआ करती है ॥ ३० ॥ दूरग्रहसंयुक्त होनेपर समस्त गर्भ भोले, महानि और मछली वर्षाया करते हैं और चंद्रमा या सर्व गुमनायुक्त पा सुमप्रहगे देने जानेपर पाहुनही वर्षा करते हैं ॥ ३१ ॥ यदि गर्भसमयमें भकारणही पानी दी हो तो गर्मका अमार होता है, द्रोणके अष्टांशपेमी अधिक वर्पण करनेपर गर्भ नष्ट हो जाता है ।। ३२ ॥ जो पुटगर्म प्रदोषपातादिसे न य सो समालमें आत्मीय गर्मके समय ओलेका मिला हुमा जल पाते हैं। ३३ ॥ जिम मगार बायोका पाहुन पालतक. घरा हुआ दूध कडेपनको प्राप्त हो जाता है, रोही गर्म अनेक दिन पीतनेएर पठिनताको प्राप्त हो जाता है ॥ ३४॥ जो गर्भ पांच प्रा. रके निभितसे पुष्ट होता है यह गर्म शतपोजनतक परकर वर्षा करता है, उने एक. २ निमिष अभावमें शत योजनके भादवी हानि होत होती है ॥ ३५॥ अर्थात् पतनिमिक्षा गर्म ५० पोजन (२०० योग), शिमिनिचर २५ योजन (१०० पोश), दिनिमित्तक १२॥ योजन (५. शोन) और एक ममियम ५ योजन (२० मोश) मर जर ता. पांचनिमिया रक द्रोगमल वर्माता है, पानानिमितका तीन (३) भाटक. और विनिता - बाइक जल सपना है ॥ ३६॥ जो गर्म पान, जल, विजली...- चन्द्रमा सूर्यके मण्डल सिग्ध है और अत्यन्त दापित नहीं हो तो तिस पाटी कहे है यथा ॥ ३ ॥ दामिनी, जलकण और धूरि मिला हुआ पवन चले, चन्द्रमा वा सूर्यका मेवासे ढके रहना इस प्रकारका जो गर्भ धारण है सो श्रेष्ठ है ॥४॥ जिस समय श्रेष्ठ बिजली गुम दिशाओम दमके तव बुद्धिमान् पुरुषको जानना चाहिये कि धान्यको वृद्धि होगी ॥५॥ जो बालक खेलते २ जल या धरिको वर्ग या पक्षियोंका मधुर २ शब्द हो;पक्षी जलादिमें किलोलें करें तो शुभ होता है। (१०२) वाराहीसंहिता। अथ द्वाविंशोऽध्यायः। गर्भधारण. ज्येष्ठसितेऽप्रम्याद्याश्चत्वारो वायुधारणादिवसाः । मृदुशुमपवनाः शस्तान स्निग्धघनस्थगितगगनाश्च ॥ १॥ तत्रैव स्वात्याद्ये वृष्टे चतुष्टये क्रमान्मामाः। आवणपूर्वा ज्ञेयाः परिश्रुता धारणास्ताः स्युः ॥२॥ यदि ताः स्युरेकरूपाः शुभास्ततः सान्तरास्तु न शिवाय । तस्करमयदाः प्रोक्ताः श्लोकाश्चाप्यत्र वासिष्ठाः ॥ ३ ॥ सविद्युतः सपृपतः सपांशूत्करमारुताः । सार्कचन्दपरिच्छन्ना धारणाः शुभधारणाः ॥ ४॥ यदा तु विद्युतः. श्रेष्ठाः शुभाशाप्रत्युपस्थिताः । तदापि सर्वसस्यानां वृद्धिं ब्रूयाविचक्षणः ॥ ५ ॥ सपांशुवर्षाः सापम शुजा बालक्रिया अपि । पक्षिणां सुस्वरा वाचः क्रीडा पांशुजलादिषु ॥ ६ ॥ रवि- चन्दपरिवेपाः स्निग्धा नात्यन्तदूपिताः । दृष्टिस्तदापि विज्ञेया सर्वसस्यादि रूप पंचानमित्तयुक्त है सो वहुतसा जल देता है। यदि गर्मकालमें बहुतसा अल व तौ प्रसवकालको लांघकर जलकण वर्षा करते हैं ॥ ३७ ॥ इति श्रीवराहमिहिराचार्यविरचित्तायां बृहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादावादवा स्तव्य-पंडितवलदेवप्रसादमिश्रविरचितायां भापाटीकायामेकविंशोऽध्यायः॥ २१॥ ज्येष्ठमासके शुक्लपक्षकी अष्टमी आदेको चार दिनतक वायुसे गर्मधारणज्ञात होनेके दिन हैं । सो मृदु शुभ वायुयुक्त होनेपर या चिकने मेघसे ढके हुए चार लके होनेपर श्रेष्ठ है ॥ १॥ तिसमें स्वाति आदि चार नक्षत्रों के वर्षा हो तो क्रमने श्रावणादि महीनेमें गर्मधारण परिसुत जानना अर्थात् वर्षा न होगी ॥ २ ॥ याद यह चारों दिन एकसे हों तो शुभ होता है, जो इससे विपरीत हो तौ मंगलदायी नहीं होते; वरन तस्करोंका भय होता है । वसिष्ठजीके को हुए श्लोक इस विषय .
मापाटोकासरिता १० २३ ॥ ये ॥ ७ ॥ मेघा स्निग्धाः संहनाद पदक्षिणतिक्रियाः । तदा स्पान्महती दृष्टिः सर्वसस्पार्थसाधिका ॥८॥ इति भीवराहमिहिररुती बृहत्संहितायां मेघगर्भधारण नाम द्वाविंशोऽध्यायः॥२२॥ अथ त्रयोविंशोऽध्यायः। प्रार्पण. ज्येष्ठचा समतीतायां पूर्वापादादिसम्प्रवृष्टेन । शुजमशुभ या वाच्यं परिमाणं चाम्भसस्तन्हः॥ १॥ हस्तविशाल कु.ष्टकमधिकृत्या युप्रमाणनिर्देशः । शा- रात्पलमाढकमनेन मिनुयाजलं पतितम् ॥ २॥ येन धरित्री मुद्रा जनिता वा बिन्दवस्तृणामेषु । वृष्टेन तेन वाच्यं परिमाणं वारिणः प्रथमम् ॥ ३ ॥ केचि- दायाभिवृष्टं दरायोजनमण्डलं वदन्त्यन्ये । गर्गवसिष्ठपराशरमवमेतद्वादशान्न वाही सव धान्योंको पदानेवाली है ॥ ४. ॥ मेघ चिकने, गाटे और मदक्षिण गानेसे परिक्रमा करते हुए चलते हो तो सर्व धान्य और अर्यकी साधन कर नेवाली पड़ी भारी वर्षा होती है॥८॥ इति श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां पृहत्संहितायां पश्चिमोचरदेशीयमुरादाबाद- वास्तव्य-पंडितबलदेवमादमिश्रविरचितायां मापाटीकायां दाविंशोऽध्यायः ॥२२॥ ज्येष्टके पूर्णिमाक भलीभांति वर्ष जानेपर यदि पूर्वापादादि नक्षममें वषा हो तो जलका परिमाण और शुभाशुम शुदिमानोंको कहना उचित हैः॥ १॥ एक हाथ सम्मे और एक हाय चौडे कुण्डको धारण करके जलका प्रमाण कहना चाहिये, यह पानीसे मर जाय तो उस वर्षे हुए जटको तोलकर वर्षाका परिमाण रहे। उक्त पाशा परिमाण पचास पल है। यह जलसे मर जाय तो वर्षे हुए जलका परिमाण एक मादक होता है॥२॥ जिसके गिरनेसे पृथ्वीपर चिद पड जाय या तणोंकी नोकोंपर पानीकी वर्दै टहर जाय, उस वर्षासेही जलका प्रथम परिमाण कहना चाहिये ॥ ३॥ कोई २ करते हैं कि जहांतक देखा जाय वहांहीतक वर्षा होती है। कोई २ उपर कहे हुए लक्षणसे दश योजन मण्डलमें दोका होना कहते हैं, परन्तु गर्ग, वासेष्ट और पराशरक मवसे पारह योजन अर्थात् ४८ कोशके आगे
वर्षा नहीं होती ॥ ४ ॥ जिन नक्षत्रों में वर्षा होती है;बहुधा प्रसबकाल के समय उदी
सब नक्षत्रोंमें वी हुआ करती है, परन्तु यदि पूर्वापादासे लेकर मूलनातक किसी
पूर्वापाढा, मृगशिर, चित्रा, खेती और धनिष्ठामें हो तो सोलह द्रोण, शतभिषा, पेशा
और स्वाती ४ द्रोण, कृत्तिकाम १० दश, श्रवण, मघा, यतुराधा, मरणी और
मूलमें चतुर्दश, फाल्गुनीमें पचीस, पुनर्वसु २० वीस, विशाखा और उत्तर
नक्षत्रमें वीस, आक्षेपा नक्षत्रमें तेरह, उत्तराभाद्रपदा, उचराफाल्गुनी और रोटे.
णीमें पचीस,पूर्वाभाद्रपदा, पुष्य और अश्विनी नक्षत्रमें वारह और आम अगा
पोढत हों और मंगल करके त्रिविध अद्भुतदारा आहत हों तौ वर्षा नहीं हो
इति श्रीराहमिहिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादा-
(१०४)
वाराहीसंहिता।
परम् ॥ ४ ॥ येषु च भेष्वभिवृष्टं झूयस्तेष्वेव वर्षति प्रायः । यदि नाप्यादित
वृष्टं सर्वेषु तदा त्वनावृष्टिः ॥ ५॥ हस्ताप्यसोम्यचित्रापोष्णधनिष्ठासु पोडश
द्रोणाः। शतभिपगेन्द्रस्वातिपु चत्वारः कत्तिकासु दश ॥ ६ ॥ श्रवणे मवान-
राधासरणीमुलेषु दश चतुर्युक्ताः। फल्गुन्यां पञ्चतिः पुनर्वसी विंशनि गान
॥७॥ ऐन्द्रामाख्ये वैश्वे विंशतिः साप च दश व्यधिकाः । आर्बुिध्न्यायन्य-
प्राजापत्येषु पञ्चकतिः ॥ ८॥ पञ्चदशाजे पुष्ये कीर्तिता च बानिजे दश हौ
च। रौद्रेऽष्टादश कथिता दोणा निरुपद्रवेष्वेषु ॥ ९ ॥ रविरविसुतकेतुपीडिने हे
शितितनयत्रिविधा[ताहते च । भवति हिन शिवं न चापि वृष्टिः शुससहि
निरुपद्रवे शिवं च ॥ १० ॥
इति श्रीवराहमिहिरकतौ बृहत्संहितायां प्रवर्पणं नाम त्रयोविंशोऽव्यापः॥२३॥
नक्षत्रम वर्षा न हो तौ सयनक्षत्रोंमें अनावृष्टि होती है ॥५॥ जो उपद्रवहीन चंद्रमा इस
द्रोण जल वर्षाता है ॥ ६ ॥७॥ ८॥९॥ यदि सब नक्षत्र सूर्य, शनि या कैसे
परन्तु मुसके साथ निरुपद्रव होनेपर शुम होता है ॥ १० ॥
वादास्तव्य-पंडितपलदेवमहादमिश्रविचितायां मापाटीका
प्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
मापायकासहिता १०२४ । अथ चतुर्विशोऽध्यायः। रोहिणीयोग. करकशिलाचपविवरजतरुकुपुमासङ्गिमधुकरानुरुते । बहुविहगकलहसुर- युवतिगीतमन्त्रस्पनोपयने ॥ १॥ सुरनिलपशिखरिशिखरे बृहसतिरदाय पानाह । गर्गपराशरकारपसमयाध याम्पिसापः ॥२॥ तानवलोक्य यथा- पद प्राजापत्येन्दुसम्मयोगार्थान् । स्वलयन्येनाहं तानेवायुयतोवतुम् ॥३॥ पाजेशमापाढतामिसपने क्षाकरेगोपगतं समीक्ष्य । वक्तव्यमिष्टं जगतोऽशुभं वा शास्त्रोपदेशावचिन्नकेन ॥ ४॥ योगो ययानागत एव वाच्यः स धिण्य- योगः करणे मपोकः । चन्दप्रमाणशतिवर्णमार्गस्तातपतिय फलं निगा- यम् ॥ ५ ॥ पुरादुदम्पत्पुरतोऽपि वा स्थलं यहोपितस्तत्र हुताशतत्परः । महान् सनक्षगणान् समालिखेद सधूपपुप्पैलिधि पूजपेत् ॥ ६ ॥ सरनतोपीपधिनिभर्दिश तरुणयालानिहित सुपूजितः। अकालमूलः कलशै- मुमेरुपरंतके शिखरपर लगे हुए वृक्षोंके लोपर आसक्त हुए भ्रमरोंके गुंजा. रसे, अनेक प्रकार के पक्षियोंकी चहकारसे और देवाङ्गनाओंके मृदु गंमीर गीताके स्वरसे परिपूर्ण, पर्वतकी चोटीपर स्थित रमणीक उपवनों में वृहस्पतिजीने नारद- जोसे जो रोहिणीयोग कहा था और गर्ग, पराशर, काश्यप ऋपियोंने और मयअ. मरने अपने शिष्योंसे जो कहा था, तिसको देखकर इस छोटेसे ग्रंथों उसही रोहिणी और चंद्रमाके योगका अर्थ यथार्थ र वर्णन करनेको इम उत्साही हुए हैं ॥१॥२॥ ॥ ३ ॥ पाट मासके कृष्णपक्ष रोहिणीका चंद्रमाके साथ मेल देखकर जगतका इष्ट या अनिष्ट शास्त्रक उपदेशानुसार दैवज्ञ कह सकता है ॥४॥ मेल होनेसे पहलेही उनका योग जिस प्रकारसे होना चाहिये, करण (पंचसिदान्तिका) में वह धि- पोण हमारे द्वारा कहा जा चुका है, चंद्रमाका प्रमाण, युति, वर्ण, मार्ग और उत्पातके द्वाराही फल कहना चाहिये ॥ ५॥ अहसंस्थानके जाननेराले नगरकी पूर्व उचरदिशामें नक्षत्रसहित ग्रहोंको लिखकर धूप, कल और पलिसे पूजा करे ॥६॥ चारों ओरमें वृक्ष और कापलसे टका हुआ रखसहिन जल और औषधियुक्त, तिसकी तलीकामी न हो ऐसे पूजनीय कलशके द्वारा कुश पिछे हुए यशस्थानमें । पलवान होता है ॥ १०॥ इस योगके चले जानेपर घडेमें धरे हुए वीजाममे भूमिका श्रेष्ट मिद्धि होती है । इसके उपरान्त मेघ मारुनके फल क्रमानुसार भने । ॥ १२ ॥ यावशमें कहीं काला, कहीं श्वेत, कहीं कृष्ण वर्ग, रदिन, जटर, पृट मान हरप अपांद कुण्डली मारकर सर्पके मारनेसे जैसे जिला (१०६) वाराहीसंहिता। रलंकतं कुशास्तृतं स्थण्डिलमावसेविनः॥ ७ ॥ आलाय मन्त्रण महावरे बीजानि सर्वाणि निधाय कुम्भे । पाव्यानि चामीकरदर्जतोयोमो मरुदाम सौम्यमन्त्रैः॥ ८ ॥ शुक्ष्णां पताकामसितां विदध्याद्दण्डप्रमाणां त्रिगुणोन्धिः च । भादौ कृते दिग्ग्रहणे नमस्वान ग्राह्यस्तया योगमते शशाङ्के ॥ ९ तवा धमासाः प्रहरैर्विकल्प्या वर्षानिमित्तं दिवसास्तदंशः । सव्येन गच्छच्छुचः सदैव यस्मिन्प्रतिष्ठा बलवान् स वायुः॥ १० ॥ वृत्ते तु योगेंऽकुरितानि या सन्तीह बीजानि धृतानि कुम्भे । येषां तु योऽशोऽकुरितस्तदेशस्तेषां पित्र समुपैति नान्यः ॥ ११ ॥ शान्तपक्षिमृगराविता दिशो निर्मलं बियतिदिन ऽनिलः । शस्यते शशिनि रोहिणीयुते मेघमारुतफलानि बच्म्यतः ॥ ३२ क्वचिदसितसितैः सितैः क्वचिच कचिदसितैर्भुजगैरिवाम्बुवाहैः। वलिवजार ब्राह्मणको बैठना चाहिये ॥ ७ ॥ महावत नामके मंत्रोंसे अभिमंत्रित कर प्रकारके वीज घडेमें डालकर सुवर्ण और दमयुक्त जलसे उसको धावित करे मारुत, वरुण और सौम्य मंत्रसे होम करे ॥ ८ ॥ चन्द्रमाका योग होनेपर दंड समान बारह हाथ ऊंचे वांसपर ४ हाथ लम्बी असित पताका धारण करे । पर दिन निर्णय करके उस पताकासे कितने क्षणक कौन दिशामें हवा चलती है। जानें ॥ ९ ॥ एक प्रहरतक एक दिशामें हवा चले तो १५ दिनतक वर्षा होगी। इस प्रकार वायु वहनके कालसे दिवसके अंशको निर्णय करे (श्रावणसे कार्तिक इन चार मासके आठ पक्षका एक र पक्ष एक २ अंशसे निर्देश करना चार वायी दिशामें वायु गमन करे तो शीग्रही शुभदायी होती है और जो एक नि लक्ष्यमें अर्थात् एक दिशामेंही गमन करे तो वह वायु प्रतिष्ठावान् जो यंहारत हों, उनका वही २ अंशही वृद्धिको प्राप्त होगा; और अंश नहीं। रोहिणीके माय चन्द्रमाका मेल होनेपर याद सब दिशायें शान्त हो जाय, परिण, या मृगगण उनमें मनोहर शब्द करे, आकाश निर्मल और वायु आनांदेत हो ।
२०॥ मापारीकासहिता अ० २४ ॥ (१०७) प्रमात्रदृश्यः स्फुरिततडिदूसनेवृत विशालैः ॥ १३ ॥ विकसितकमलोदरावदात- ररुणकरद्युतिरजितोपकण्ठः। छुरितामिप वियदनविचित्रमधुकरकुंकुमकिशु-- कावदतिः ॥ १४ ॥ असितघननिरुद्धमेव वा चलिततडित्सुरचापचित्रितम् । द्विपमहिपकुलाकुलीरुतं वनमिव दावपरीतमम्वरम् ॥ १५॥ अथवाअनशेल- शिलानिचयप्रतिरपघरेः स्थागितं गगनम् । हिमानिकशंसशशाङ्कवारधुनिहा- रिभिरम्बुधरैरथवा ॥ १६ ॥ तर्डिमिकक्षबलाकायदन्तैः सवदारिदानिश्चलत्या. न्तहस्तैः विचिकेन्दचापध्वजोच्छ्रायशोजस्तमालालिनीलेवृतं चान्दनागः ॥१७॥ सन्ध्यानुरक्ते नासि स्थितानामिन्दीवरश्यामरुचां घनानाम् । वृन्दानि पीताम्बरवे- टितस्प कान्तिं हरेभोरयतां यदा या ॥ १८॥ सशिसिचातकदर्दुरनिस्वन- पदि विमिश्रितमन्द्रपदुस्वनाः । समवतत्य दिगन्तविलम्पिनः सटिलाः सलि- लौचमुचः क्षिती ॥ १९॥ निगदितरुपेजलधरजालेख्यमवरुद्धं द्वयहमथवाहः । पदि वियदेवं भवति सुभिक्षं मुदितजना प प्रचुरजला ः ॥ पीठ और पेट दीख पडती हो, चमकती हुई विजलीकी समान जीमाले और शब्दयुक्त विशाल भुजंगाकार मेघोंके द्वारा जो आकाश घिर नाय, विटे कमलफी समान निर्मल व अरुण है समीपभाग जिनका, मधुकर, उम, रेस. फूलको समान निर्मल विचित्र मेघोंसे रंगनेको समान जो आकाश शोभायमान हो, काले मेघोंसे रंगनेकी समान जो आकाश शोभायमान हो, काले मेघोंमे पाएमा हो या चमकती हुई बिजली और इन्द्रधनुपके द्वारा चित्रित आकाश मानो हामी और भैंसोंके द्वारा आफुल किया तुमा दावानलयुक्त वनको समान दिररलाई दे या अझन पहाडके काले पत्थरों समान मेघोरो 'आकाश छा जाय, अपराहिम, मुत्ता, शंख धौर चन्द्रकिरणोंकी ज्योति हरण करनेशले पादलोंसे जो आगाम- पटल दफ नाप या पिजलारूप दमकक्षासम्पम वायुका रूप अपदन्नरूप जलरूप मद घुमाता मान्तरूप कर चलानेवाला, विचित्र इन्द्रका रूप ऊंची पजामे शोमा- यमान और नमाल या भ्रमरफी गमान नीलवर्ण हापोरूप पादलगे सप भारा छा जाप, जो सांके रागसे रंगे हुए भावाशमें स्थित नाले पर समान मेगा पीतोपर पहरे हुए हरिकी कान्तिको एरण परे और मोर चालक व मेंदों के शब्दो साप पदि मेघश्य गंभोर शन्द मिल जाय तो दिशामा फै ए मायामासी पादल पृथ्वीपर पहना जल सपने ॥१॥१४॥१॥१॥१७॥१८॥१९॥ इस उक्त प्रकारको बादलोंसे भारला दो या तीन दिन किसी भी हो, वाराहीसंहिता। गच्छेत् कदाचिदपिर्मनसापि पारम् ॥ ४ ॥ होराशास्त्रेऽपि राशिहोरादेका- णनवांशकद्वादशभागत्रिंशदागबलावलपरिग्रहो ग्रहाणां . दिवस्थानकालचेटा- भिरनेकमकारवलनिर्धारणं प्रकृतिधातुव्यजातिचेयादिपरिग्रहो निपेकजन्मका- लविस्मापनप्रत्ययादेशसद्योमरणायुयदशान्तर्दशाष्टकवर्गराजयोगचन्द्रयोगद्वि- ग्रहादियोगानां नानसादीनाञ्च योगानां फलान्याश्रयत्नावावलोकननिर्याणगत्यनू- कानि तात्कालिकप्रश्नशुभाशुभनिमित्तानि विवाहादीनाञ्च कर्मणां करणम् । यात्रायाञ्च तिथिदिवसकरणनक्षत्रमुहूर्तविलमयोगदेहस्पन्दनस्वमविजयस्नान- ग्रहयज्ञगणयागामिलिङ्गहस्त्यश्वेगिन्तसेनापवादचेष्टादिग्रहपाइण्योपायमंगला- मङ्गलशकुनसैन्यनिवेशभूममयोऽनिवर्णा मन्त्रिचरदूताटविकानां यथाकालं प्रयो- गाः परदुर्गलम्भोपायोश्वत्युक्तं चाचार्यः। जगति प्रसारितमिवालिखितमिव मता तन्त्रको जानता हो, छाया, जल, यन्त्र आदि द्वारा लमको जान सकता हो और होराशासमें निपुण हो ऐसे पुरुपकी वाणी कदाचित् मी मिथ्या नहीं हो सकती । आर्य विष्णुगुप्तने कहाभी है-कि कदाचित् कोई पुरुप समुद्रको तैरकर पार होना चाहे तो वायुके वेगसे तैरकर पार हो सकता है परन्तु यह कालपुरुषका रूप जो ज्योतिप शास्त्र समुद्र है उसको ऋषिभिन्न मनुष्य मनसेभी पार नहीं हो सकता है। होरा शाखमेभी राशि, होरा, द्रेकाण, नवांश, द्वादशांश, त्रिंशांश और बलाबल, परिग्रह, स्थान, काल और चेष्टा आदि अनेक प्रकारसे ग्रहवलका निवारण है; प्रकृति, धातु, द्रव्य, जाति और चेष्टा आदिका परिग्रह, निपेक, जन्मकाल, विस्मापन, . प्रत्यय ( विश्वास ), आदेश, शीघ्रमरण, आयुाय, दशा, अन्तर्दशा, अष्टवर्ग, राजयोग, चन्द्रयोग, द्विग्रहादियोग और नामसादि सव योगोंका फल; आश्रय, भाव, दृष्टि, निर्याण, गति और अनूकादि व तिस कालके सब प्रश्नोंका शुभाशुभ कारण, सवही विवाहादि कर्म समूहोंका हेतु, यात्राका वर्णन; तिथि, दिवस, करण, नक्षत्र मुहर्त, लग्न, योग, शरीरके अंगोंका फडकना, स्वाम, विजय, सान, ग्रहयज्ञ, गणयात्रा, अग्निलिंग, हाथी घोडेके संकेत, सेनापवादकी चेष्टा इत्यादि, पाइगुण्य- उपाय, मंगल अमंगलके शकुन, सेनाके वास करनेकी भूमिये, अग्नियोंका वर्ण, भंत्री, चर, दृत और वनचारियोंका कालानुमार प्रयोग, परदुर्गोपालम्भका उपाय, गय यात्रामामा देतु स्वरूप; यह सब बात होराशाखमें कही है। आचार्योंने कहा है, जगन्में प्रचार हुएको समान, बुदिमें लिसे हुएकी समान, हृदयमें ढाले इएवी समान माणसहित शास अर्थात् इस ज्योतिषशास्त्रको जो भलोमांतिसे - मापाटीकासाहिता अ०२॥ (७) निषितामिव हृदये । शायं यस्य समगणं नादेशा निष्फलास्तस्य ॥५॥ संहिता पारगञ्च देवचिन्तको भवति । यत्रते संहितापदार्थाः। दिनकरादीनां ग्रहाणां चारा स्तेषु च पां प्ररूतिविरुतिप्रमाणवर्णकिरणद्युतिसंस्थानास्तमनोदयमार्गमार्गान्त रखकानुवर्भग्रहसमागमचारादिभिः फलानि नक्षत्रकूर्मविभागेन देशेवगस्तिचार सप्तर्पिचारो ग्रहाक्यो नक्षत्रव्यूहग्रहशृङ्गाटकमहयुद्धग्रहममागममहवपफलम लक्षणरोहिणीस्यात्यापादीयोगाः सद्योवर्पकुसुमलतापरिधिपरिवेपपरिषपवनो ल्कादिग्दाहक्षितिचलनसन्ध्यारागगन्धर्वनगररजोनिर्यातार्यकाण्डसस्पनन्मेन्द्र- ध्वजेन्दचापवास्तुविद्या विद्यावायसविद्यान्तरचक्रमृगचक्राश्वचक्रवातरफमा सादलक्षणपतिमालक्षणप्रतिष्ठापनवृक्षायुर्वेदोदगार्गलनीराजनखअनोत्साशानि मयूरचित्रकघृतकम्बलखड्गपट्टरुकवाकु कूर्मगोऽजाश्वेशपुरपग्रीलक्षणान्यतापुर रचिन्तास्टिकलक्षणोपानच्छेदेवखच्छेदचामरदण्डशम्यासनलक्षणरवपरीक्षा दीर जानता है, उसका आदेश फी निष्फल नहीं होता है ॥ ५ ॥ ज्योनिषदाग:- संहिताओंमें चतुर पुरुपही दैवज्ञ हो सकते हैं । पयोंकि संहितामोंमें इन म बातोंका निरूपण होता है। यथा,-सूर्यादिप्रदकी चाल, तिनमें सपदि गए प्रयोग समाव, विकार, प्रमाण, वर्ण, किरण, ज्योति, संस्थान, उदय, अरन, मार्ग, पर मार्ग, वक्र, अनुवक और नक्षत्र, प्रह, व समागमादिसे कालका निरूपण पाना. नसमावेमाग और पूर्मविभागले सय देशोंमें उसका फल, अगस्त्य पार, राम. पियोंकी चाल, ग्रहमात, नक्षत्रव्यूह, प्रहरंगाटक, प्रायुद, प्रहसमागम, मान, वर्षाका फल, गर्भलक्षण, गोदणीयोग, स्वातीयोग, आपातीरोग, जोमस होना, पुगम, सता, परिधि (घेरा), परिवेश, परिघ, वायु, उला, दिमा भौचाल, संध्या! पूलना, गन्धर्वनगर, धारे, निर्घात, रस्तुभाग मांगा रोजाना नाजका उत्पम होना, इन्द्रध्वन, इन्द्रधनुष, वास्तुविधा (राजगीरी पई माद) अंगविधा, पायविधा, अन्तरना, मृगरक, अपचर, हातचम, प्रमादरमग प्रतिमालक्षण, प्रतिमाप्रतिष्ठा, सायुर्वेद, वृक्षदोद, उदगार्गर, नालंदन (नि- जन), संगन, उत्पानशान्ति, मयविधर, धृतरक्षण, पराग, मदरसा पार पाण, कृपयाः (पुपट) सक्षण, पूर्माण, गोलक्षण, मगरकर (II) समग, मसलाण, ताण, पुरपरक्षण, लक्षण, पला. चिन्ता, पिटमः (तादिनामा पिराग) रक्षग, मोती. पण, कद- सक्षण, पामरतनान, दाग, पाराग, कायनात, लाश, पर- वाराहीसंहिता। गच्छेत् कदाचिदनृषिर्मनसापि पारम् ॥ ४॥ होराशानेऽपि राशिहोरादेक्का- णनवांशकद्वादशभागत्रिंशदागबलावलपरिग्रहो ग्रहाणां दिक्स्थानकालचेष्टा- गिरनेकमकारपलनिर्धारणं प्रतिधातव्यजातिचेशादिपरिग्रहो निषेकजन्मका- लविस्मापनप्रत्ययादेशसद्योमरणायुयदशान्तर्दशाष्टकवर्गराजयोगचन्द्रयोगद्वि- ग्रहादियोगानां नाभसादीनाञ्च योगानां फलान्याश्रयभावावलोकननिर्माणगत्यनू- कानि तात्कालिकमनशुभाशुनानिमित्तानि विवाहादीनाञ्च कर्मणां करणम् । यात्रायाश्च तिथिदिवसकरणनक्षत्रमुहूर्तविलमयोगदेहस्पन्दनस्वमविजयस्नान- ग्रहयज्ञगणयागामिलिङ्गहस्त्यश्वेगिन्तसेनाप्रपादचेष्टादिग्रहपाइगुण्योपायमंगला- मङ्गलशकुनसैन्यनिवेशर्ममयोऽनिवर्णा मन्त्रिचरदूताटविकानां यथाकालं प्रयो- गाः परदुर्गलम्भोपायोश्चत्युक्तं चाचार्यः । जगति प्रसारितमिवालिखितमिव मती तन्त्रको जानता हो, छाया, जल, यन्त्र आदि द्वारा लग्नको जान सकता हो और होराशास्त्रमें निपुण हो ऐसे पुरुपकी वाणी कदाचित् भी मिथ्या नहीं हो सकती । आर्य विष्णुगुप्तने कहामी है-कि कदाचित् कोई पुरुष समुद्रको तैरकर पार होना चाहे तो वायुके वेगसे तैरकर पार हो सकता है परन्तु यह कालपुरुपका रूप जो ज्योतिष शास्त्र समुद्र है उसको ऋषिभिन्न मनुष्य मनसेभी पार नहीं हो सकता है। होरा शास्त्रमभी शाशे, होरा, नेकाण, नवांश, द्वादशांश, त्रिंशांश और वलावल, परिग्रह, स्थान, काल और चेष्टा आदि अनेक प्रकारसे ग्रहवलका निधारण है; प्रकृति, धातु, द्रव्य, जाति और चेष्टा आदिका परिग्रह, निषेक, जन्मकाल, विस्मापन,. प्रत्यय (विश्वास), आदेश, शीघ्रमरण, आयुह्येय, दशा, अन्तर्दशा, अष्टवर्ग, राजयोग, चन्द्रयोग, द्विग्रहादियोग और नामसादि सब योगोंका फलआश्रय, भाष, दृाष्टे, निर्याण, गति और अनुकादि व तिस कालके सव प्रश्नोंका शुभाशुभ कारण, सवही विवाहादि कर्म समूहोंका हेतु, यात्राका वर्णन; तिथि, दिवस, करण, नक्षत्र मुहर्त, लग्न, योग, शरीरके अंगोंका फडकना, स्वम, विजय, मान, ग्रहयज्ञ, गणयात्रा, अग्निलिंग, हाथी घोडेके संकेत, सेनापबादकी चेष्टा इत्यादि, पाइगुण्य- उपाय, मंगल अमंगलके शकुन, सेनाके वास करनेकी भूमिये, अमियाँका वर्ण, और वनचारियोंका कालानुमार प्रयोग, परदुर्गोपालम्मका उपाय, राव यात्राओंका देह सरूप; यह सब वाने होराशासमें कही हैं। आचार्योने कहा है, जगत्में प्रचार हुएकी समान, बुद्धिमें लिखे हुएको समान, हृदयमें दाले दुपको समान मगणसहिन दास अर्थात् इस ज्योतिषशास्त्रको जो भलीमातिसे , मंत्री, चर, दृत भाषाटीकासहिवा अ०२॥ निपित्तमिव हृदये । शास्त्रं यस्य सनगणं नादेशा निष्फलास्तस्य ॥५॥ संहिता- पारगच देवचिन्तको भवति । यत्रते संहितापदार्याः। दिनकरादीनां ग्रहाणां चारा- स्तेषु च तेषां प्रतिषिकतिप्रमाणवर्णकिरणद्युतिसंस्थानास्तमनोदयमार्गमार्गान्त- रखकानुक्कसंग्रहसमागमचारादिभिः फलानि नक्षत्रकूर्मविजागेन देशेवगालिचारः समर्पिधारो महाक्तयो नक्षत्रव्यूहग्रहशृङ्गाटकग्रहयुद्धग्रहसमागममहवर्षफलग- लक्षणरोहिणीस्वात्यापाढीयोगाः सद्योवपकुसुमलतापरिधिपरिवेपपरिपपवनो- ल्कादिग्दाहक्षितिचलनसन्ध्यारागगन्धर्यनगररजोनिर्याताकाण्डसस्पजन्मेन्द्र- ध्वजेन्द्रचापवास्तुविद्या विद्यावापस विद्यान्तरचकमृगचक्रावचक्रवातचम्मा- सादलक्षणपतिमालक्षणप्रतिष्ठापनवृक्षायुर्वेदोदगार्गलनीराजनसअनोतातशान्ति- मयूरचित्रकनकम्बलखड्गपट्टरुकवाकु कूर्मगोऽजाभपुरुपग्रीलक्षणान्यन्तःपु. रचिन्तापिटकटक्षणोपानच्छदेवसच्छेदचामरदण्डशप्यासनलक्षणरनपरीक्षा दीर- जानता है, उसका आदेश कमी निष्फल नहीं दोता है ॥५॥ ज्योतिषशायी संहिताओंमें चतुर पुरुषही दैवज्ञ हो सकते हैं । क्योंकि संहिता ओमें इन गय वातीका निरूपण होता है। यथा-सर्यादिप्रहकी चाल, तिनमें स्यादि गय प्रा स्वमान, विकार, प्रमाण, वर्ण, किरण, ज्योति, संस्थान, उदय, अरन, मार्ग, था. मार्ग, वक, अनुक्क और नक्षय, ग्रह, व समागमादसे कालमा निरूपण करना, नाविभाग और धर्मविभागमे सप देशों में उसया पल, भगत्यकी पार, राम- पियोंको पाल, ग्रहमाति, नक्षत्रव्यूह, प्रदरंगाटय, प्रत्युद, प्रहगमागम, प्राण, पका फल, गर्मलक्षण, गोहिणीयोग, स्वातीयोग, आपाटीयोग, भीम पर होना, कुमम, लता, परिधि (घेरा), परिवेश, परिघ, वायु, उखा, दिग्दार, भीवाल, संध्याका पूलना, गन्धर्वनगर, धारे, निर्यात, वस्तुओर माँगा ते जाना, नाजका उत्पन होना, इन्द्रध्वन, इन्द्रधनुष, बास्तुविधा (राजगीरी पाई मादि), अंगविधा, वायविधा, अन्तरना, मृगवन, अपचन, वातवर, प्रमादलक्षण भीतमालक्षण, प्रतिमानिष्टा, क्षमायु, पक्षदोद, उदगार्गल, नागंजन (गि- नन), पंजन, उत्पातमान्ति, मयूनिय, पृनलक्षण, एमाण, पाता, पहरामा, परराफ (फुट) लक्षण, पूर्मरक्षण, गोराग, अगलान, पु.। (३) सण, सरलक्षण, सण, पुरपला, मतम, मन्दा. चिन्ता, विष (नादि यना नापिराग) साग, मोगोरे, परद साण, पामरमण, दण्डसाग, स्पारण, कामना, ला, गट- २८) वाराहीसंहिता। दक्षणं दन्तकाठायाश्रितानि शुभाशुभानि निमिचानि सामान्यानि च जगतः तिपुरुषं पार्थिवे च प्रतिक्षणमनन्यकर्माभियुक्तेन देवज्ञेन चिन्तयितव्यानि । न काकिना शक्यन्तेऽहर्निशमवधारयितुं निमित्तानि । तस्मात् मुसृतेनैव देव- बनान्ये तद्विदश्चत्यारो भर्तव्याः । तत्रनेन्द्रीचाग्रेयी च दिगवलोकयि- वन्या। याम्या नेत्ती चान्येनैवं वारुणी वायव्या चोत्तरी पेशानी चेति । यस्मादुल्कापातादीनि निमित्तानि शीघमुपगच्छन्तीति । तेपां चाकारवर्णलेह- रमाणादिग्रहाभिवातादिभिः फलानि भवन्ति ॥६॥ उक्तश्च गर्गण महर्पिणा । कल्लागोपाझकुशलं होरागणितनैष्टिकम् । यो न पूजयते राजा स नाशमुप- गच्छति ॥ ७ ॥ वनं समाश्रिता येऽपि निर्ममा निप्परिग्रहाः । अपि ते परि- पृच्छन्ति ज्योतिषां गतिकोविदम् ॥ ८॥ अप्रदीपा यथा राविरनादित्यं यथा नमः । तथाऽसांवत्सरो राना धमत्यन्ध इवाध्वनि ॥ ९॥ मुहूतं तिथिनक्षत्रमू- तवथायने नया । सर्वाण्येवाकुलानि स्युन स्यात् सांवत्सरो यदि ॥ १० ॥ क्षण और दन्तका प्यादि आश्रित समस्त शुभाशुमनिमित्त इस संहितासे प्रगट हो जाने हैं । देशलोगोंको उचित है कि दूसरे कार्यों में मन न लगाकर संसारके और प्रत्येक पुरुष के लिये समस्त पार्थिव वातोंमें साधारण, असाधारण, रामस्त शुभा- शुभमो सर्वदा विचार । परन्तु दिनरात इन बातोंका शुभाशुभ निर्णय करना अकेले यादमीरा काम नहीं है; अन एव गुभृत देवर के साथ इस प्रकारके शास जानने- नाले औरभी चार आदमियों को राजा नियत करे । तिनमेंसे एक आदमी को पूर्व और आणिोणारी याने देनी चाहिये । दूसरेको दक्षिण और नडायी, नीसरेको पथिम और वायुमणकी, चौवे उत्तर और ईशान कोणकी बातें देखनी चाहिये कि जिसने उल्कापानादि निमित शीघ्र मालूम हो जाय । क्योंकि इन उल्कापा- नादिय पर मार, वर्ण, रममाणादि और पद नक्षत्र व अभिवातादि यहि- नही होता है। गावापने कदा है-गागोपांग कुशल, होग और गणितपिपयमें परदेशाको गोगना नदी पृतना है, यह गीनदी नाशको मात हो जानाद ६॥ ७ ॥ बामनी, ममतादीन और कुछ न ग्रहण करनेवाले पुरुपमी, ग्रहन- यादा जाननेसरे पंडितोंमे गब बातें घूम करते हैं ॥८॥ दीपदीन गाय और गर्गदर्शन माकागती गुमान देवनदीन राजाभी गोमागमान नहीं होता, दान वा मधेवी ममान पुरयमें घूमा करता है ॥९॥ गिना देवाके मुहूर्त, निषि, ।
मापारीकासारता घ०२॥ तस्मादशज्ञाभिगन्तव्यो विद्वान् सांवत्सरोऽग्रणीः। जयं यशः प्रियं भोगान श्रेषभ समाप्मता ॥३॥ नासांवत्सरिके देशे पस्तव्यं अतिमिच्छता । पशुस्नो हि पत्रप पापं तत्र न विद्यते ॥ १२॥ न सांवत्सरपाठी च नरकेपूप- पयने । बालोकप्रतिष्ठाच लभते देवचिन्तकः ॥ १३ ॥ पन्थतभार्थतश्चैतव सललं जानाति यो दिनः । अयभुक् स भवेच्छ्रादे पूजितः पक्तिपावनः ॥१४॥ म्लेच्छा हि ययनास्तेषु सम्यक् शास्त्रमिदं स्थितम् । अपियनेऽपि पूज्यन्ते कि पुनदेवषिद्विजः ॥ १५ ॥ कुहकावेशपिहितः कर्णापश्रुतिहेतुभिः । स्तादेशो न सन प्रष्टव्यो न स देववित् ॥ १६ ॥ अविदित्वैव यः शाएं देवनत्वं प्रपयते । स पंक्तिपकः पापो ज्ञेयो नक्षत्रसूचकः ॥ १७ ॥ नक्षत्रसूचकोदिष्टमुपवासं करोति यः । स बजत्यन्धतामिसं सार्धमृक्षविड- पिना ॥ १८ ॥ नगरदारलोटस्य पदव स्यादुपयाचितम् । आदेशस्तद्वदज्ञानां नक्षत्र, ऋतु और अयनादि सब उलट पलट हो जाय ॥ १० ॥ इस कारण जय, यश, श्री, भोग और मंगलार्थी राजाका विद्वान् और अग्रणी देवज्ञके निकट जाना अर्थात् गव पुर जान लेना उचित है ।॥ ११ ॥ जिस देशमें दैवज्ञ न रहता दोय, उस देशमें चास करना उचित नहीं है, क्योंकि सब बातोंका नेवरुप देवन जदा याम करना है वहांपर कोई भी पाप नहीं रहता है ॥ १२ ॥ देवाके पास पंढनेसे या देवतो पटानेगे नरकमें नहीं जाना पड़ता, वरन देवचिन्तक -दोनेसे मसलोज़ग पतिष्ठा मिलती है ॥ १३ ॥ जो मानण इस विषयको ग्रंथके अनुगार पा पर्यो अनुसार या मटीमांति जान लेते हैं, यह श्रादमें मथम भोजन करनेवाले भीर पंक्तिपावन दोकर सब जगद पूजे जाते हैं ।। १४ ।। मोष्ट या यगो पागमी जो यह शास्त्र हो तो पिलोगोंकी समा उनकी मी पूजा करनी चाहिये; फिर देरचिन्तक मामणके लिये इससे अधिक विशेष क्या फाय ॥ १५ ॥ फिगी प्रफारसे युद्दक (माया, घोसा, माइसानी ) गशे टमा मा अधा कानोंसे श्रवण करनेके हेतु विशिष्ट अर्थात् निन्दामानन दोनेपर दाम कोई बात न पूछे और देखभी न पाहे ॥ १६ ॥ जो पुरप पिना शायर देश हो जाय, उस पंतिदूपर पापारमावो “नक्षन- मूना (पटिया) जानें ॥ १७ ॥ नक्षत्रसूचकके उपदेश दिये हुए परसा- दिको जो पुरुप करना है, यह आदमी उस नक्षत्रसूचक साथ अंधतामिया नामक सरकमें पड़ता है ॥ १८॥ नगरद्वारलोष्टकी मायनाके (पटीशालप्रामादि वाराहीसंहिता। न्यः सत्यः स विभाव्यते ॥ १९ ॥ सम्पत्त्या योजितादेशस्तद्विच्छिन्न- कथाप्रियः । मत्तः शास्सैकदेशेन त्याज्यस्तादृङ् महीक्षिता ॥ २० ॥ यस्तु सम्पग्विजानाति होरागणितसंहिताः । आयर्व्यः स नरेन्द्रेण स्वीकर्तव्यो जयपिणा ॥ २१॥ न तत्सहस्रं करिणां वाजिनां वा चतुर्गु- णम् । करोति देशकालज्ञो यदेको दैवचिन्तकः ॥ २२ ॥ दुःस्वमदुर्विचिन्तित- दुःप्रक्षितदुष्कृतानि कर्माणि । क्षिप्रं प्रयान्ति नाशं शशिनः श्रुत्वा असंवादम् ॥ ॥ २३ ॥ न तथेच्छति भूपतेः पिता जननी वा स्वजनोऽथवा सुहृत् । स्वय- शोऽभिविवृद्धये यथा हितमानः सबलस्य दैवविद ॥ २४ ॥ इति श्रीवराहमिहिरकतौ बृहत्संहितायां सांवत्सरसूत्रं द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ तृतीयोऽध्यायः। आटेपा(दक्षिणमुत्तरमयनं धनिष्ठायम् । नूनं कदाचिदासीन येनोक्तं पूर्वशास्त्रेषु ॥ १ ॥ साम्प्रतमयनं सपितुः कर्कटकाद्यं मृगादितश्चान्यत् ।उक्ता- अमिलापको) समान, अज्ञानी पुरुपका आदेश कमी सत्यमी हो जाता है ॥१९॥ सम्पत्तियुक्त अर्थात् अनेक प्रकारके अर्थको बतानेवाले, अथवा सम्पत्तिहीन बातें जिगको अत्यन्त प्यारी हो, और थोडेसेही ज्ञानसे मतवाले होनेवाले दैवज्ञको राजा त्याग देवे ॥ २०॥ होरा, गणित और संहितामें उत्तम ज्ञान रखनेवाले देव- जो, जीतकी इच्छा करनेवाले राजा लोग पूजें और उसको अंगीकार करें ॥२१॥ एक देशकालका जाननेवाला देवचिंतक जो काम करनेकी सामर्थ्य रखता है उस वार्यको हजार हाथी या चार हजार घोडे नहीं कर सक्ते ॥ २२ ॥ देवज्ञके मुखसे चन्द्रका नक्षत्रमंवाद श्रवण करनेसे बुरे म्बम, बुरे देखे हुए और बुरे कर्म इनका माघही नाग हो जाता है ॥ २३ ॥ देवज्ञलोग अपना यश बहानेके अर्थ बलवाले गुजारा इस प्रकार दिन करने हैं कि जिस प्रकार उस राजाके पिता, माता, वजन और माई कामी नहीं कर सक्तं ॥ २४ ॥ इति श्रीमहमिहिंगचाय्यंविगचनायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुगदायादवाम्तव्य- पग्दिनबलदोमगादमिश्रपिचिनायां मापारीमायां द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ निभादी मिमी गमयों मापा नायके अदमागरी दक्षिणायन और धनि- के प्रयाने भाषण प्रचादिन पा, नहीं नौ पहिले मानों में इसका वर्णन क्यों 4 .
मापायीकासहिता अ०३३ भावो विरुतिः प्रत्यक्षपरीक्षणेठक्तिः॥२॥ दूरस्थचिदपादुदयेऽस्तमयेऽपि या सहस्रांशोः । छापाप्रवेशनिर्गमविद्वैर्श मण्डले महति ॥ ३॥ अमाप्य मक- रमा विनिवृत्तो हन्ति सारा याम्याम् । कर्कटकमसम्मानो विनिवृतयोत्तरां सन्द्रीम ॥ ४॥ उनरमयनमतीत्य व्यावृनःक्षेमसस्यवृद्धिकरः । प्रतिस्यथा- प्ये विरुतगतिमयरुदुष्णांशुः ॥ ५ ॥ सनमरकं पर्व विना त्वष्टा नामार्क- मण्डलं कुरुते । स निहन्ति रान भूपार जनांव शग्रामिक्षिः ॥ ६ ॥ ताम- सकीलकसंज्ञा राहुसुताः केतवनयरिंशत् । वर्णस्थानाकरिस्तान इशाक फट यात् ॥ ७॥ ते चार्कमण्डलगताः पापफलाचन्द्रमण्डले सोम्याः । वाम कवन्धमहरणरूपाः पापाः शशाङ्केऽपि ॥ ८ ॥ नेपामुदये रुपाण्यम्मः करपं रजोवृतं व्योम । नगतरुशिखरविमी सशर्करो भारतमण्डः ॥९॥ तयि- परतास्तरयो दीमा मृगपक्षिणो दिशा दाहः । नितिमहीकम्पादयो भवन्त्यत्र होता ? परन्तु सूर्यका जो अयन इस समयमें प्रचलिन देवद शटयो पादि और मकरके प्रथमसेही भारम्म होता है इस विषयो अभावकोदी विकृति पाते है। प्रत्यार परीक्षा करनेसे जो टीक होगा उसकोही मयाशित किया जायगा ॥६॥२॥ सर्यकं उदय वा अस्तकालमें महामंडलको दुरीके चित्रों के वेधमे अपरा महाम- लमें छायाके प्रवेश और छायांक निकलनेके चिहोरो अयनकी परीक्षा सती है ॥३॥ सर्य विना मकररागिमें गये यदि लौट आती दक्षिण-पश्चिम दिशामा नाग करते हैं, और जो बिना फर्फराशितक गये लौट आरे ती पूर्व दिशा नए करते हैं, यदि उत्तरायणको लांघरलौर मारें तो मंगल दातार, धान्य पृद्धि होती है, इसको ही भातस्य सूर्य करने है सर्पकी गति विकृत भए दोना॥४॥५॥ रिना पर्वकालय सूर्य अपने मंदलको गायन से नम मान राजाओंकी मृत्यु होगी, और नस अनि या दुर्भिक्ष मास मनुष्योः भास होयगा ॥ ६ ॥ तरसम और पासवादे नामराले गरे पुत्र पेतु संग भरपरके है, वर्ण, स्थान और आकारादिसे सूर्यमंडलमें उनको दायरा पनि करना चाहिये ॥७॥ पद गदि सबटलमें जारी गरी र चन्द्रमंडलमें जापती रामरालो देन हैं, जो यह पसंमें भार, जन्म भगवे रूपरे प्रमागिन होमी मंगलदापर. १॥ ८॥ इन भोग उदा शेने मरहीमें उपल को मीन हो जाता पूरी जाती है, पति भीर परिरको मन परनेल मा रन पर १२) वाराहीसंहिता। लाताः ॥१०॥ न पृथक् फलानि तेपां शिसिकीलकराहुदर्शनानि यदि । दयकारणमेपां केत्वादीनां फलं अयात् ॥ ११ ॥ यस्मिन् यस्मिन् देशे नमायान्ति सूर्यविम्यस्याः । तस्मिंस्तस्मिन् व्यसनं महीपतीनां परिक्षयम् १२ ॥ क्षुत्मग्लानशरीरा मुनयोऽप्युत्सृष्टधर्मसच्चरिताः । निमांसवालहताः छेणायान्ति परदेशान् ॥ १३ ॥ तस्करविलमवित्ताः प्रदीर्घनिःश्वासमुकु- नाशिपुटाः। सन्तः सन्नशरीराः शोकोद्भवबाप्परुद्धदृशः॥ १४ ॥ क्षामा गुप्समानाः स्वनृपतिपरचक्रपीडिता मनुजाः। स्वनृपतिचरितं कर्म च परारुतं चन्त्यन्ये ॥ १५ ॥ गर्नेप्वरि निष्पन्ना वारिमुचौ न प्रतवारिमुचः। सरितो न्ति तनुस् चित् कचिजायते सत्यम् ॥१६॥ दण्डे नरेन्द्रमृत्युयाधिनय आत कबन्धसंस्थाने । माझे च तस्करतयं दुर्भिक्षं कीलकेकस्थे ॥ ३॥ जोपहरणरुपैश्छत्रध्वजचामरादिभिर्विद्धः । राजान्यत्वलदर्कः स्फुलिङ्गधू- ती है, वृक्ष ऋतुमे विपरीत हो जाते हैं मृग और पक्षी इत्यादि प्रदीम दिशा- की ओर दौडते या शब्द करते हैं, दिग्दाह, निर्यात और भौंचाल आदि बडे २ पात होते हैं ॥९॥ १० ॥ इन राहुके पुत्रोंमें यदि वाण या माम्भादि रूप- हे राहुका दर्शन होय तौ पहिलेको समान फल कहना चाहिये इस मकाग्से उनके स्यका कारण और केतु आदिका फलाफल निर्णय करे ॥ ११ ॥ सूर्यविम्बवाले जिन जिन देशों में दिखाई दें,उन्दी २ देशोंके राजाका अमंगल होयगा ॥१२॥ के उदय होने से मुनिलोगभी भूपसे थकित देहवाले और स्वधर्म व श्रेष्ठ चरित्रसे न होकर मांगहीन पालको हाथमें लेकर अतिकष्टसे दूसरे देशोंमें जायँगे॥१३॥ धुओंको विचको तस्कर चुरा लेंगे, इस कारण वह लम्बे लम्बे मांस छोडने हुए नामे ओर बहाने व्याकुल देवसे दोको मारे गद्द पंत होकर रहेंगे ॥ १४ ॥ उपमें मनुप्प माने राजा या दूमरे गजवको अत्यन्त दुबले होकर निन्दा- न हो जातो. कोई सदेशीय गजाके चरित्र या पगत कर्ममी निन्दा करेंगे १५ जनमुन दोरहो म्हंगे, बहुनता जल नहीं देंगे, नदिये कम जलपाली जामो, न कहीं कही उत्पन्न दोगा ॥ १६ ॥ मूर्यमण्डलमें दण्याफार दिखाई देनेने रामारा मरण होता है, करन्ध दिखाई देनेसे व्याधिका दादे, मांसा दिलाई देनेगे गोरभय और स्तम्मका पर दीदने भार होता है ॥ १७ ॥ राजाक उपकरणस्प छत्र, पदमा इन्दादिदिशाभों का वर्णन झरनाभ्यायम गरेंगे।
भाषाटीकासहिता अ०३३
मादिमिर्जनहा ॥ १८ ॥ एको दुर्भिक्षकरो यायाः स्युनरपतर्विनाशाय ।
सितरक्तपीतकणस्तर्विदोऽर्कोऽनुपर्णतः ॥ १९ ॥ दृश्यन्ते च यतस्ते रविनि-
पस्योत्यता महोत्तानाः आपछति लोकातां तेनैव मयं प्रदेशेन ॥ २० ॥
ऊर्यकरो दिवसकरस्तानः सेनापति विनाशयति । पीतो नरेन्द्रपुत्र श्वेतस्तु
पुरोहितं हन्ति ॥ २३ ॥ चित्रोऽयवापि धूम्रो रविरश्मिाकुलां करोति
महीम् । तस्करशमनिपातयदि सलिलं नाशु पातयति ।। २२ ॥ ताम्रः कपिलो
चार्कः शिशिरे हरिकुंकुमच्छविभ मधी । आपाण्डुकनकवों ग्रीष्मे वर्षास
शुरुध ॥ २३ ॥ शरदि कमलोदरामो हेमन्ते रुधिरसन्निभः शस्तः । प्रादृट्-
काले स्निग्धः सर्वर्तुनिनोऽपि शुनदायी ॥ २४ ॥ रूः वेतो विमान रकानः
क्षत्रियान्विनाशयति । पीतो वैश्यान रुष्णस्ततोपरान शुभकरः स्निग्धः ॥२५॥
घन, पामरादे चिद यदि सूर्यमण्डलम विधे हुए हों तो राज्यकी बदली होती है
और चिनगारी या मादिरो ढक जानेपर सब मनुष्योंको मृत्यु होती है ॥ १८ ॥
पूर्वोकोक्त छत्राद एक चिगसे सूर्य विद होये तो दुर्भिक्ष होता है, दो आदिसे
विद होने नो राजाका नाश होता है; सपेद, लाल, पीला और काला इन वर्णवाले
पूर्वोक्त चिदसे विद होनेपर क्रमसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रका नाम होता
है ॥ १९ ॥ उत्पन्न हुए यह महाउत्पात रविपिम्पमें जहां कहीं दिखाई देंगे, उस
देहाके रहनेवाले सर लोगोंको मय होगा ।। २० ॥ सूर्यके पर भागकी किरण जो
ताम्ररंगको होय नौ मेनापनिका नाम होता है, पीत्तरंगको होय नौ राजपुधका और
श्वेतवर्णको होय तो गनपुरोहितका नाश होता है ॥२१॥ मर्यका किरणमण्डल यदि
अनेक रंगोंसे रंगा हुआ होय अथवा धूम्रवर्ण होय, यदि गोन वर्षा न हो तो
चौरासे या शमानपानादिगं समस्त पृथिवी व्याकुल होगी ॥ २२॥ सूर्यमण्डल
शिशिरकालमें नामवर्ण या कपिलवर्ण, वसन्तकालमें हरिन कुमकुमकी समान,
प्रीष्यकालमें कुछएक पाण्डुवर्ण (श्वेन और पीत मिला हुआ) और स्वर्णकी
समान, वर्षाकालमें शश्वर्ण, शरदकालमें कमलके गर्भकी उवि समान और हेम-
नाकालमें रतवर्ण होनेपर शुभकारक है, परन्तु वर्षाकालमें हिन्ध होनेपर अशुम
होता है ।। २३ ॥ २४ ॥ Fखा या श्वेतवर्ण होनेसे मामणोंश नाश होता है,
रतकी आमायुक्त होनेपर क्षत्रीका नारा, पीतवर्णसे वेश्यका और बाला वर्ण होनेसे
शूद्रका नाश होता है, सूर्यके इन सब रंगामें चमक हो तो शुम होना है ॥२५॥
वाराहीसंहिता। ग्रीष्मे रक्तो भयरुदस्विसितः करोत्यनावृष्टिम् । हेमन्ते पीतोऽर्कः करोत्याविरेण रोगायम् ॥ २६ ॥ सुरचापपाटिततनुगतिविरोधप्रदः सहस्रांशुः । प्रादृट्- काले सद्यः करोति विमलद्युतिवृष्टिम् ॥ २७ ॥ वर्षाकाले वृष्टिं करोति सद्यः शिरोपपुष्पाक्षः । शिखिपत्रनिमः सलिलं न करोति द्वादशान्दानि ॥२८॥ श्यामेऽके कीटायं भस्मनिजे भयमुशन्ति परचक्रात् । यस्या सच्छिदस्तस्य बिनासः क्षितीशस्य ॥ २९ ॥ शशरुधिरनिो भानी नभस्तलस्थे भवन्ति संग्रामाः। शशिसदृशे नृपतिवधः क्षिसं चान्यो नमो भवति ॥ ३॥ शुन्मार- टनिभः खण्डो नृपहा विदीधितिर्भयदः । तोरणरूपः पुरहा छचनिनो देश- नाशाय ॥३१॥ चापनि युद्धानि भास्करे वेपने च रूक्षे च । कृष्णा रेखा सवितरि यदि हन्ति नृपं ततः सचिवः ॥ ३२ ॥ दिवसकरमुदयसंस्थित- ग्रीष्मकालमें सूर्यका मण्डल लाल होवे तो प्राणियोंको भय होता है, वर्षाकालमें कृष्णार्ण हो तो अनावृष्टि होती है और हेमन्तकालमें पीतवर्ण होय तो शीघ्रही रोगमय होता है ॥ २६ ॥ जो सूर्यमण्डल वर्षाके समय इन्द्रका चाप सन्मुख आ पढनेसे खण्डित देहवाला दिखाई दे तो राजाओंमें विरोध होता है, यदि निर्मल किरणवाला दीखे तो शीघ्रही वृष्टि होती है ॥ २७ ॥ यदि वर्षाकालमें सूर्यबिम्ब निगपके फूलको समान आभावाला ज्ञात हो तो शीघ्र वर्षा होयगी, परन्तु मोरकी पूंछके समान आमादार दिखाई दे तो बारह वर्पतक अनावृष्टि होयगी ॥२८॥ सूर्यका विम्ब हामार्णाला हो तो (देशमें ) कीटभय, राखकी समान वर्णवाला दो तो पागष्टम भय होता है और जिस राजाके जन्मनक्षत्रमें विराजमान सूर्य छिद्र दिगा दे तो उस राजाका नाश हो जाता है ॥ २९ ॥ जो गर्यारंग सागकी ममान शोणित हो तो युद्ध होता है और चन्द्रमा- पी गमान गोपाई दे तो शोधही उस देशके राजाका नाश होकर दूसरा राजा हो जाता ॥ ३ ॥ जो सूर्यमण्डल घडेके आकारसा दिखाई दे तो (प्राणि- गा) सुध' प्राण छोटें, खण्टायर होनेपर राजाका नाश होता है; निटीर दोना है, तोरण (फाटक) रूप होनेपर नगरका नाश देशापनाश होता है ॥ ३१ ॥ जो सूर्यका पिम्प कम्पो- पमा माया थापा या धनार ममान हो तो मंग्राम होता है. यदि सूर्यम- पाटीमा दिवाई दे नौ मंत्रीमे राजारा नारा होता है ॥ ३२॥ उल्का), पप या पिनली जो उदयकालमें गर्यो घर दे वो वर्तमान राजाय नाश होकर मापाटीक्रसहिता अ०३॥ मुल्काशनिविद्युतो या हन्युः । नसनिमरण विद्यात् तान्यराजमनिष्ठ च॥ ३३ ॥ प्रतिदिवसमहिमकिरणः परिवेषी सन्म्पयोईयोरथवा । रनोऽस्त- मेति रनोतिष तां करोत्पन्यम् ॥ ३४ ॥ प्रहरणमरीजलदः स्थगितः सन्ध्य दयेऽपि रणकारी। मृगमहिप विहगसरकरारामशरुभि जपायी ॥३॥ दिनकरकरागितामाक्षमयामोति सुमहनी पीडाम् । भवति च पभादं कनकमि हुनाशारितापात् ॥ ३६॥ दिवसरुतः प्रतिस्प्यों जलसदुदग्दक्षिणे स्थितोऽनिलमत् । उपस्थः सलिलापं नामारि निहन्त्यधो जनहा ॥ ३७॥ रुपिनिमो विपत्पनिमान्तकरो न चिरात् । परपरजोडणीस्नानुदि वा दिनरुत् ॥ ३८ ॥ असिनविचिमनीलपरुपो जनयातकरः । संगमृग- भैरवखररुनश्च निशाधमुखे ॥ ३९ ॥ अमलवपुरषकमण्डलः स्फुटविपुलामट- दूसरे राजाको प्रतिष्ठा दोनी है ॥ ३३ ॥ निम देश मयंदेव मनिदिन मातालमें और गन्ध्याकालमें परिधिवाले (पापयुक्ता) होते हैं अथा लाल रंगर धारण करणे, उदय होते और छिपते हैं उग देशमें निश्चयही दुमरा गना होता ॥ ३४ ॥ यदि मातःकाल और सनगाकालमें सूर्यबिम्प शसकी गमान आकारा पादलोंगे घिर गाय नो युद्ध होगा और मृग, मदिष, पक्षी, गधे और दापोरी ममान मागे दक जाय तो अत्यन्त भय होगा ॥ ३५ ॥ जैसे अमिरे साएगे गुणं अपना पीडाको माप्त होकर पीछेरो शुद हो जाना है, सेही गमरत नसार सधी किरणों. गन्तापगे कष्ट पारर फिर शुद होते हैं ॥३६॥ ययंदेवकरी उत्तर दिशा परि मनिमय दिखाई दे तो पुष्टि होगी दक्षिगदिशामें दिखाई देनेने माधी शान होगा; पूर्वी दोनों भोर दिखाई देनेगे जलमय, नीचं दागे होना भर उपर दीरने से राजाका नाश होता है ॥ ३७॥ यदि भाग पर भागों सूर्य लाउरंगा दिखाई दे, या भयेर पूर्णसरी गशिरे साल पर दिया तो समदी रामारी मृत्यु होती है ॥ ३८ ॥ जो सूपि , ३. গা সখা না র মন আমং থাকা বা এ গ গবান प और मोशन्द गो. शम्मी मम.र भार हो तो हम पिनासनान३९ ॥ जो गनिनेर देवास, गरमाया, मार पाप निर्मल फिरणगला हो और उगा दे कि रोग- ११.पार में ही रक्तान ही प्रतिसूर्य पोहैं।
। (२०) वाराहीसंहिता। मगधान्मथुरांच पीडयेद् वेणायाच वटं शशाङ्कजः। अपरत्र कृतं युगं वदे यदि जित्वा शशिनं विनिर्गतः ॥ २६ ॥ क्षेमारोग्यसमिक्षाविनाशी शीतांशुः शिसिना यदि भिन्नः। कुादायुधजीविविनाशं चौराणामधिकेन च पीडाम् ॥ २७ ॥ उल्कया यदा शशी ग्रस्त एव हन्यते हन्यते तदा नृपो यस्य जन्मनि स्थितः ॥२८॥ भस्मनिनः परुषोऽरुणमूर्तिः शीतकरः किरणैः परिहीणः । श्यावतनुः स्फुटितः स्फुरणो वा क्षुत्समरामयचौरभयाय ॥२९॥ पालेयकुन्दकुमुदस्फटि- कायदातो यनादिवादिसुतया परिमृज्य चन्द्रः । उच्चैः सतो निशि भविष्यति मे शिवाय यो दृश्यते स भविता जगतः शिवाय ॥३०॥ यदि कुमुदमृणालहारगौर- स्तिथिनियमाव क्षयमेति वर्द्धते वा। अविरुतगतिमण्डलांशुयोगी भवति नृणां विजयाय शीतरश्मिः ॥ ३३ ॥ शुक्ले पक्षे सम्प्रवृद्धे प्रवृद्धि ब्रह्मक्षत्रं याति वृद्धि मजाच । हीने हानिस्तुल्यता तुल्यतायां कृष्णे सर्व तत्फलं व्यत्ययेन ॥३२॥ इति श्रीवराहमिहिरकती बृहत्संहितायां चन्द्रचारश्चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ करके नाश कर देता है ॥ २५ ॥ जो बुध ग्रह चन्द्रमाको भेदकरके निकलता हो तो मगध, मथुरा और वेणा नदीके किनारे बसे हुए देशोंको पीडित करता है और पश्चिम देशमें सतयुगको उत्पत्ति होती है ॥ २६ ॥ जो केतुसे चन्द्रमा पीडित होता हो तो अमंगल, व्याधि, दुर्भिक्ष व शस्त्रसे जीविका करनेवालोंका नाश होता है और नस्कर लोगोंको अत्यन्त पीडा होती है ॥ २७ ॥ राहु या केतुसे प्रस्त चन्द्रमाके ऊपर जो उल्का गिरे तो जिस रान.के जन्मनक्षत्रपर चन्द्रमा हो, उस रानाकी मृत्यु होती है ॥ २८ ॥ जो चन्द्रमाका देह मस्मतुल्य रूखा, अरुणवर्ण, किरणदान, श्यामवर्ण, फूटा हुआ अथवा कम्पमान दिखाई दे तो क्षुधा, संग्राम, रोग अथवा चोरोंका भय होता है ॥ २९ ।। मानो कि राधिकालमें हमारे लिये यह थत्पन्न मुसदायक होगा इस पिचारसे हिमाचलसुता पार्वतीजीके द्वारा यलसहित मानित होकर वढनेसे जो चन्द्रमा हिमकण, कुन्दपुष्प, कुमुदकुसम अथरा सारीक (विद्धौर ) को समान शुभ्रपर्णपाटा होता है, वह चन्द्रमाही जगतको अमदाई है ॥ ३० ॥ जो शीतरश्मि चन्द्रमा कुमुद, मृणाल या हारकी समान सुवर्णवाला होकर तिथिके नियमानुगार घटता यहता है, जिसके मण्डलमें विकार नहीं माना, जो गाते और फिरणों से युक्त होता है, विरासे सव मनुष्योंकी विजय होती है ॥ ३१॥ गुहास फिमी तिथिके पट जानेरो पक्ष पट जाय और चंद्रमा.
मापाटीपासहिता २०५१ पञ्चमोऽध्यायः। अमृतास्वादविशेपाच्छिन्नमपि शिरः किलानुरस्येदम् । पाणरपरित्यक्त पहतां पातं वदन्त्येके ॥ १ ॥ इन्दकमण्डलारुतिरसितत्वात किल न दृश्पते गगते । अन्यत्र पर्वकाला वरपदानाद कमलयोनेः ॥ २ ॥ मुखपुच्छवित्र- काई भुजङ्गमाकारमुपदिशन्त्यन्ये । कथयन्त्यमूर्तमपरे तमानये सहिकेया रूपम् ॥ ३॥ यदि मर्ता भविचारी शिरोऽथवा मरति मण्डली राहुः । भगणा- नान्तरितो गृहाति कथं नियतचारः॥ ४ ॥ अनियतचारः खलु चेदुपलब्धिः सञ्जयपा कयं तस्य । पुनधाननाभिधानोऽन्तरेण कस्मान गृह्णाति ॥ ५ ॥ अथ तु भुजगेन्द्ररूपः पुच्छेन मुखेन वा स गृह्णाति । मुसपुच्छान्तरसंस्थं अनिदाय वृद्धिको प्राप्त होते तो प्राह्मण, क्षत्री और मजागण अत्यन्त बढते हैं, जो ऐसेही चन्द्रमा होन हो तो सबकी हानि होती है, सम हो तो सबको समता माप्त होती है. परन्तु कृष्णपक्ष हो तो इसका फल विपरीत होता है ॥ ३२ ॥ इति श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयपुरा- दाबादवास्तव्य-पापडनवलदेवप्रनादमिश्रविरचितायां भापारीकायां चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ कोई २ पण्डित करने हैं कि राहुनामक अमुरका यह मस्तक पट जाने परमी अमृत पीनेके विशेष हेतुकरके माणहीन न होकर (राहुरूप) ग्रहपनको मात हुआ है, परन्तु सूर्यमण्डल और चन्द्रमण्डलकी समान आकृतिवाला गह कृष्णवर्ण होनेसे अक्षानोके वरदान हेलुकरके ग्रहण समयके अतिरिक्त और किसी समय माकाशमें दिखाई नहीं देता ॥ १॥२॥ कोई २ पंडित कहते हैं कि यह राहु मुह और पूंछदाला सर्पाकारसा है और पंडित कहते हैं कि इस राहुका कोईमी थाकार नहीं है, वरन यह अंधकारमय है ॥ ३॥ यह आकाशमें घूमनेवाला राहु শী থাঘাে বা শবোৰাং অষষ্য যতম হানা না যা লিখব মানবাক্য যা मगणार्ध अर्थात् छ: राशिके अंतरपर होकरमी किम प्रकारमे ग्रहण करना है ॥४॥ यदि राहुकी गतिमें किसी प्रकारको स्थिरता न होती तो गणितके दारा विस प्रकारसे उसका ज्ञान हो सकता और पदि पा सुखपूंछवाले आश्यरका होता तो अमावस्या या पूर्णिमाके सिवाय और समय ग्रहण स्पों नहीं होता ॥ ५॥ जो . इसका पाकर सर्पकी समान होता वो कमी मुससे और बमो उसेमी अरब (२२) वाराहीसंहिता। स्थगयति कस्मान भगणार्धम् ॥ ६ ॥ राहुद्वयं यदि स्याद् यस्तेऽस्तमितेऽयवो दिते चन्दे । तत्समगतिनान्येन ग्रस्तः सूर्योऽपि दृश्येत ॥ ७ ॥ अच्छायां स्वय हणे भास्करमर्करहे प्रविशतीन्दुः । प्रग्रहणमतः पश्चान्नेन्दो नोश्च पूर्वा ॥८॥ वृक्षस्य स्वच्छाया यथैकपार्श्वन भवति दीर्या च । निशि निशि तब झूमेरावरणवशादिनेशस्य ॥ ९ ॥ सूर्यात् सप्तमराशी यदि चोदग्दक्षिणेन नाति गतः। चन्दः पूर्वाभिमुखश्छायामीवी तदाविशति ॥ १० ॥ चन्द्रोऽधास्था स्थगयति रविमम्बुदवत्समागतः पश्चात् । प्रतिदेशमतश्चित्रं दृटियशादास्करण हणम् ॥ ११॥ आवरणं महदिन्दोः कुण्ठविपाणस्ततोऽर्थसञ्छन्नः । स्वल रवेयतोऽजस्तीक्ष्णविषाणो रविभवति ॥ १२ ॥ एवमुपरागकारणमुक्तमि दिव्यदृग्निराचार्यः । राहुः कारणमस्मिन्नित्युक्तः शास्त्रसद्भावः ॥ १३ ! योऽसावसुरो राहुस्तस्य यरो ब्रह्मणायमाज्ञप्तः । आप्यायनमुपरागे दत्तहुतां हो जाया करता और कभी मध्यस्थलद्वारामी ग्रहणको सम्भावना हुआ करती ॥६॥ याद कोई कहे कि दो राह हैं, तो एक राहुसे चन्द्रमा ग्रस्त होता, उदय होत अथवा छिप जाता, तब यह दिखाई देता कि उसकी समान चलनेवाले दूसरे राहु सूर्यमी ग्रसित हो गया है ॥ ७ ॥ जो कुछभी हो, चंद्रग्रहणके समय चंद्रम पृथ्वीकी छायामें प्रवेश करता है और सूर्यग्रहणके समय सूर्यमंडलमें प्रवेश करत है, यही कारण है कि पश्चिम दिशासे चंद्रग्रहण और पूर्व दिशासे सूर्यग्रहणक आरम्भ नहीं होता ॥ ८॥ जिस प्रकार किमी एक वृक्षकी छाया सूर्यका आवर करके एक औरहीको फैलती है, वैसेही सूर्यके आवरण होनेके कारण पृथ्वीक छायामी प्रतिदिन दीर्घ होती है ॥९॥ जिस समय चंद्रमा सूर्यकी सातवीं राशि- रहकर उचर दक्षिणको अधिक दूर नहीं गमन करता, तब चंद्रमा पूर्वमुखमें आगम कके पृथ्वीको छायाम प्रवेश करता है ॥ १०॥ (सूर्यग्रहणके समय ) सूर्य नीच स्थित हुआ चन्द्रमा, पश्चिम दिशासे आकर मेवकी समान सूर्यबिम्बको ढ देता है, यही कारण है कि सूर्यका ग्रहण दृष्टिके वश होकर मतिदेशमें अनेक प्रकार होता है ।। ११ । इस प्रकार चन्द्रमाका आवरण अधिक होनेसेही अर्द्ध- अन्न चन्द्रमाका शृग अनिमय कुण्ठित होता है और सूर्यका आवरण बहुता कम होता है, इसी कारण सूर्यका शुद्ध अत्यन्त तीक्ष्ण होता है ॥ १२ ॥ दिर इटियाले आचार्य लोगों ने इस प्रकारसे ग्रहणका कारण बताया है, परन्तु ग्रहण होने शिपमें गाको कारण कहना शामरा सदाय मात्र है. ॥ १३ ॥ राहुनामक भE मापाटीकासरिता ०५॥ शेन ते भविता ॥ १४ ॥ तस्मिन् काले सानिध्यमस्य तेनोपचपते राहुः । याम्योनरा शशिगतिगणितेऽप्युपचयंते तेन ॥ १५ ॥ न कश्चिदपि निमितहणं विनायते निमिचानि । अन्यस्मिन्नपि काले भवन्त्ययो सातरूपाणि ॥ १६ ॥ पञ्चमहसंयोगान किल ग्रहणस्प सम्मको भवति । तेलच जलेटम्यां न विचिन्त्यमिदं विपधिनिः ॥ १७ ॥ अपन- त्पार्के पासो दिए ज्ञेया बलनयावनत्या च । तिय्यबसानावेला करणे कथि- तानि तानि मया ॥ १८ ॥ पण्माछोरवृदया पशाः सम देवता क्रमशः । ब्रह्मराशीन्द्रकुवेरा वरुणानियमाच विज्ञेयाः ॥ १९॥ माले विनाशुदि- क्षेमारोग्याणि सस्यसम्पच । तद्वत्सौम्ये तस्मिन् पीटा विदुपामवृष्टिभ ॥२०॥ पेन्द्र शुपविरोधः शारदसस्पक्षयो न च क्षेमम् । कीवरेऽर्थपतीनामर्थविनाशः रको महाजीने ऐसा पर दिया था कि लोग प्राणके समय जोम फरेंगे उसीके अंशरो तुम हम होगे" ॥ १४ ॥ इसी कारणरो प्राण समय राहुका सानिध्य होना है और इसी गणितमें पन्द्रमाकी गनिमी उत्तरदक्षिणमें होती है भा और किसी समयमें प्राण नहीं हो सकता। यदि और किसी समय ग्रहणका लक्षण निरूपित किया जाय तो या उत्सातका रूप गिना जाता है ॥ १५॥ १६॥ पांच प्रहार काहे मेलगे भी प्राण नहीं हो सकता और अध्मीके दिन जलमें तेल डालनो जो शायमें लिलाम लिलेशामी पटिन लोगोंको विश्वास न करना चाहिये ।। १७ ॥ मरनतिमाग सूर्यका मास और बलन व अपननिके द्वारा दिया और तिथि, मरसानागार रामपका जिस प्रकार निरूपण करना चाहिये सोम अपने बनाये परण अन्य कर आये २॥ १८ ॥ प्रमा, पन्द्र, न्द, कुपेर, वरण, अभि भौर पम ये गाव देवता पण्मासोत्तर दिके अनुसार माणके मालिक है ॥ १९॥ जिरा पाणमें अक्षा मालिक है उस समयमें दिन और पशुओबी वृद्धि होती है, मंगल भारोग्य और धान्यसम्पत्ति होती है। चन्द्रमाके समयमेंमी ऐसा होता है और रिता पोदार अनावृष्टि होती है ॥२०॥ मा इन्द्र के मालिक होने के समर रामामों विरोध होता. आरके धान्यका नाश होता है, बमंगल दा.सा. शासारसाहकि. मटमी के दिन पानी लारने से पहले जिस दिन के पसी दिशाभ प्रहमी प्रति होगी, सिसी fotaफिसर गर्ग:-सपाटम्यानले पा स्थान विनिदिशादि।
वाराबासाहता। सुनितं च ॥ २१ ॥ वारुणमवनीशाशुभमन्येषां क्षेमसत्यवृद्धिकरम् । आधे मित्राध्यं सत्यारोग्यालयाम्बुकरम् ॥ २२॥ याम्यं करोत्यवृष्टिं दुझिं संज्ञ च सत्पानाम् । यदतः परं तदशु शुन्मारावृष्टिदं पर्व ॥ २३ ॥ वेलाहीले पर्वणि गर्भविपत्तिय शवकोपमा भतिवेले कुसुमफलक्षयो जपं सस्पता शव ॥ २४॥ हीनातिरिक्तकाले फलमुक्त पूर्वशाबदृष्टवाद । स्कुटमणिन- विदः कालः कयश्चिदपि नान्यथा भवति ॥ २५ ॥ ययेकस्मिन् मासे पहन रविसोमयोस्तदा शितिताः । स्वपलक्षोः संक्षयमायान्त्यतिशबरी १॥ २६ ॥ यस्ताबुदितास्तमिती शारदधान्यावनीश्वरक्षपदी। सर्वप्रस्तो दुतिमादी पासवी ॥ २७ ॥ अर्कोदितोरोक्तो नैतिकान हन्ति मरनाथ । अग्न्युरनीत्रिगुणाधिकविप्रामामिणोऽयुगायुदितः ॥ २८ ॥ समय पनियों के पना नाश होता और समिक्ष होता है ॥ २१॥ श्रुणके सम- में गा मम होता है, लोगोंका मंगल होता है, धान्यकी वृद्धि होती है. मित्र करते हैं. इसके समयमें धान्य, आरोग्य, अभए और ॥२२॥ निरा समयमें प्राणका मालिक यम होता है, उस कोरेगे मारि, दुर्मिर और धान्यकी हानि होती है. इसके माते- minानेगे शुभा, महामारी और अनावृष्टि होती है ॥ २३ ॥ र दो बनाये र कालो पहले ग्रहण होनेरो गर्नाको भय Firin कतार मार मानौला अपात् गणित के नियत किये फार VERTrin नाश, मर भौर धान्यसा नाश होता है ॥२४॥ Prar पर प्रणा पल पहने शाखाको देगार इस माय intere न त जाननाडा जो गमय यतारेगा का माता ॥ २५ ॥ यदि एक महीने में मूपं पन्द्रम POnlग मानी गनाली मय जानेमेही माया rati र पलहीता॥५६॥ जो सूर्ण पदम थे हा प्रत्र प्रारपाने उदय से पा * महानता और मंही 7 प्रह रन दरमा और मन ॥२३॥ * हर गली माग दो भागमोनी K) मन या काला? मी मान हो जी- माताटोकासहिता २०५। ककरापाण्डवणिक्क्षत्रिपपलनायकान द्वितीयेऽशे। कारकशुदम्लेच्छान सव- तीपांशे समन्त्रिजनान् ॥ २९ ॥ मम्पाझे नरपतिमध्यदेशहाशोभनव धान्यापः। तृणभुगमात्यान्तःपुरवैश्यन्नः पञ्चमे सांशे ॥ ३० ॥ त्रीशूद्वान् पडशे दस्पु- पत्यन्तहास्तमयकाले । यस्मिन् सारो मोक्षस्वलोक्तानां शियं भवति ॥ ३१ ॥ द्विजातीनुगपने विद्रान दक्षिणायने हन्ति । राहुरुदगादिष्टः प्रदक्षिणं हन्ति विप्रादीन् ॥ ३२ ॥ म्लेच्छान् विदिकस्थितो पापिनच इन्पा ताथ- सक्तांश्च । सटिलवरदन्तिवातो याम्येनोदग्गवामशुमः ॥ ३३ ॥ पूर्वण सलिल- पूणां करोति वसुधां समागनो दैत्यः । पचात्कर्षकसेवकवीजविनाशाय नि- याद अयुग्म १३५७ आकाशांदामें ग्रहणका आरम्म हो जाय तो अमिसे जीविश्य करनेवाले सुनार मुरजी आदि, गुणाधिक मामण और आश्रममें रहनेवा- लोका नाश करता है ।। २८ ॥ जो आकाशके दूसरे अंशमें ग्रहणका आरम्म हो जाय तो किसान, पाखण्डी, वणिक, क्षत्री और मेनांके स्वामीका नाश हो जाता है, जो आश्वशके तीसरे अंशमें प्रासका आरम्भ होवे तो कारक (शिल्पसे जोधिका करनेवाले ), शूद्र, म्लेच्छ और मंत्रियोंका नादा हो जाता है ॥ २९ ॥ जो आकाशके बीच मागमें अर्थात् मध्याद कालमें ग्रहण आरम्भ हो तो रामाका मध्यदेश नष्ट होता है, धान्यका मूल्य महाताहुआ होता है। आकाशके पंचम माग- में ग्रहणका आरम्म होनेसे तृणमोजन करनेवाले, मंत्री, बन्तःपुर और वैश्योंकर नाश होता है ॥ ३० ॥ आकाशके छठे मागमें ग्रहण होनेसे खो, शूद्र और सतम माग अर्थात् यस्तकालमें ग्रहणका आरम होनेसे चोर और गहर आदि म्लेच्छ- देशवासियों का नाश होता है परन्तु आपके जिस अंशमें मोक्ष अर्याद ग्रहणका शेष होता है, तिस २ मागके कहे हुए देशीका और वहांके प्राणियोंका शुभ होता है॥ ३१ ॥ उत्तरायणमें ग्रहण होनेसे ब्राह्मण और क्षत्रियों की हानि होती है, दक्षिणायनमें होनेसे वैश्य और शूद्रोंकी हानि होती है और उत्पा, . दक्षिण और पाश्म इन चारों दिशाओमसे जो किसी दिशा में राष्ट्र दिखाई दे तो दक्षिण पर्यायकमसे मामण, क्षत्री, वैश्य और शूद्रजातिको हाने है ॥ ३२ ॥ ईशानको गमें दिखाई दे तो म्लेच्छनाते, अग्निकोणमें दिखाई दे तो पपिर, दक्षिगमें जल- चर और इस्ती और उत्तरमें गायदोगेका अशुभ होता है ॥ ३३ ॥ रा दिल १ ग्रहण होनेके दिनके राशिमान या दिनमानके सात भाग परनेसे जो हो रही रात्र वा दिनका सातला भाग और अपाशका सातको माग है।
(२६) वाराहीसंहिता। दिष्टः ॥३४॥ पाबालकलिङ्गशूरसेनाः काम्बोजोद्रकिरातशत्रवार्ताः । जीवन्ति च ये हुताशवृत्त्या ते पीडामुपयान्ति मेपसंस्थे ॥३५॥ गोपाः पशवोऽथ गोमिनो मनुजा ये च महत्त्वमागताः। पीडामुपयान्ति भास्करे यस्ते शीतकरेऽथवा वृपे ॥ ३६ ॥ मिथुने प्रवराङ्गना नृपा नृपमात्रा बलिनः कलाविदः । यमुना- तटनाः सवाहिका मत्स्याः सुझजनैः समन्विताः॥ ३७ ॥ आशीराञ्छवरान् सपइवान् महान् मत्स्यकुरुञ्छकानति । पाञ्चालान्विकलांश्च पीडयत्यन्नं चापि निहन्ति कर्कटे ॥ ३८ ॥ सिंहे पुलिन्दगणमेकलसत्त्वयुक्तान राजोपमा नरपतीन् यनगोचरांश्च । पठे तु सस्यकविलेखकगेयसतान हन्त्यश्भकत्रिपुर- शालियुतांश्च देशान् ॥३९॥ तुलाधरेऽवन्त्यपरान्त्यसाधून वणिग्दशान भरु- कच्छरांश्च । अलिन्यथोदुम्बरमद्रचोलान् द्रुमान् सयौधेयविपायुधीयान् ॥४०॥ शासे आवे तो पृथ्वी जलसे पूर्ण हो जाय, पश्चिम दिशासे आवे तो किसान, सेवक और वीनोंका नाश होता है ॥ ३४ ॥ यदि मेपराशिमें राहुका दर्शन हो तो पंजाब, कलिंग, शूरसेन, काम्बोज, ओड़, किरात और शस्त्रवारी ( शस्त्रधारी) आदि समस्त देश और जो अग्निसे आजीविका करनेवाले हैं, वे सवही अत्यन्त पीडित होते हैं ॥ ३५ ॥ सूर्य या चंद्रमा जो वृपाशिमें राहुसे असे जायें तो गोप, पशु, अधिक करके गायढोर पालनेवाले लोक और अत्यन्त गुणी लोग अत्यन्तही पोटित हो ॥ ३६ ॥ मिथुनराशिमें ग्रहण हो जाय तो श्रेष्ठ रमणी (स्त्री), राजा, माधारण राना (जमीदार), बलवान् आदमी, नाचने गाने और वजाने- वाले, यमुनाके किनारेपर रहनेवाले और वाहीकदेश, मत्स्यदेश और शुम देशवासी मनुयायो पीडा होती है ॥ ३७ ॥ जो कर्कटराशिमें चंद्रमा या सूर्यका ग्रहण हो नो आभीर, दापर जाति के पुरुष और पहव, मल्ल, मत्स्य, कुरु, शक, पाश्चाल और विकलदेश पीदिन हो, अन्नोंका नाश होये ॥ ३८ ॥ सिंहराशिमें ग्रहण रोनेमे पुलिन्दगग, मेक्ल, वलिष्ट गना, ' राजाकी समान पुरुष और वन पारियोंश नाश होता है. कन्यारागि प्रहण होवे तो कवि, लेखक, गीत गार मानषिका करनेवालोंका नाश होता है, धान्य नष्ट होते हैं और अश्मक, त्रिपुर व माल इन प्रधान देशोंका ध्वंम होता है ॥ ३९ ॥ जो तुसाराभिमें सूर्य पा चन्द्रमामा प्रहण होवे दो माली देश, पथिम गमुद्रके निकटका देश, दशार्ण- दंग, माधु पुरुप, वणिक और मच्छाच्छदेश के रागा ना होवे, वृधिकाशिमें आज मेरे दो उदुम्बा, मट और चोलदेगके आदमी, वृस, श्रेष्ठ योधा और विध - .
मापाटीकासहिता अ०५॥ (२७) धन्विन्यमात्यवरवानिविदेहमष्टान् पाचालवेयवणिजो विषमायुधज्ञान् ॥ हन्यान्मृगे तु अपमन्त्रिकुलानि नीचान मन्त्रीषधीषु कुशलाइ स्थविरायुधीपाद ॥४१॥ कुम्भेऽन्तगिरिजान सश्चिमजनान् भारोहहांस्तस्करान आमीरान्दर- दापसिंहपुरकान हन्यातया पर्वरान् । मीने सागरकूलमागरजलव्याणि मान्यान जनान माज्ञान्यायुपजीविनय फलं कूर्मोपदेशावदेत् ॥ ४२ ॥ सच्यापसव्यले- यसननिरोधात्रमर्दनारोहाः। आघातं मध्यतमस्तमोऽन्त्य इति ते दश ग्रासाः ॥४३॥ सन्यगते तमसि जगजलप्तं भवति मुदितमनयञ्च । अपसव्ये नर• पतितस्करावमः प्रजानाशः ॥ १४॥ जिज्ञेय लडि परितस्तिमिरनुदो मण्डलं यदि स लेहः । प्रमुदितसमस्ततता प्रततोया च तत्र मही॥ ४५ ॥ प्रसनमिति यदा व्यंशः पादो वा गृह्यतेऽथवाप्यम् । स्फीतनृपवितहानिः पीडा च स्फीत- देनेवाले आदमियोंका नाश हो जाता है ॥४०॥ धनराशिम ग्रहण हो तो मंत्री, श्रेष्ठ अश्व, विदेह, मर और पांचाल देश, वैद्य, वणिक और विपम अखोंके जान- नेवाले पुरुपोंका नाश हो जाता है। मक्रराशिमें सूर्य ग्रहण होनेसे मत्स्य, मंत्रि- कुल, नीच, सलाद व योपधि जानने या बनाने में निपुण और वृद्ध अवधारी पुरुपोका नाश होता है ॥ ४१॥ कुम्भराशिमें ग्रहण होवे तो पहादी आदमी, पाश्चात्य, बोहा टोनेवाले, तस्कर, अहीर और दरद, आर्य और सिंहनगा तथा पर देश के लोगोंका नाश हो जाता है। मीनराशिमें ग्रहण होनेसे समुद्रतीरके और समुद्रगलसे उत्पन्न हुए द्रव्य, मान्यपुरुप, पंडित और जलसे आजीविका करनेवाले मच्छीमार, महादादेकोंका नाश हो जाता है। इस प्रकार धर्मोपदेशके वश अर्थात धर्मसंस्थानले अनुमाग्से ग्रहणका फल कहा जाता है ॥ ४२ ॥ चन्द्रसूर्यके ग्रह- णमें दश मकारके ग्राम हैं यथा-१ सव्य, २ अपसव्य, लह, ४ असन, ५ निरोध, ६ आमई,७ आगेह, ८ आमात,९ मध्यम और १० तमोन्त्य हैं ॥४३॥ जो राहु सव्यमें गमन करे अर्थात् सव्य नामक ग्रहण हो तो संसार जलसे पूर्ण हो जाय, हर्षित होकर भयहीन होवे. अपसव्यमासमें राजा या चोरोंके पीडा देनेसे मनाका नाश हो ॥ ४४ ॥ यदि राहु जीमको समान चन्द्रमण्डलको चाटे तो उस ग्रहणको लेद कहते हैं. इस ग्रहणक होनेसे पृथ्वी प्राणिगण हर्पित होते हैं और पृथ्वीपर पदुतसा जल वर्षता है ॥४५॥ जय ग्रहमण्डलका एकपाद, पर्दभाग वा त्रिपाद प्रस्त हो जाता है तब उसको अमन कहते हैं, इससे गर्विन रानाके (२८) वाराहीसंहिता। देशानाम् ॥ ४६ ।। पर्यन्तेषु गृहीत्वा मध्ये पिण्डीलतं तमारतठेत् । स निरोचो पिज्ञेयः प्रमोदरुव सर्वभूतानाम् ॥ ४७ ॥ अवमर्दनमिति निशेपमेव मञ्चाय यदि चिरं तिष्ठेत् । हन्याद प्रधानदेशान् प्रधानापांश्च तिमिरमयः॥४८॥ वृत्ते ग्रहे यदि तमस्तत्क्षणमावृत्य दृश्यते अयः। आरोहणमित्यन्योऽन्यमर्दनन- यकरं राज्ञाम् ॥ १९ ॥ दर्पण इवैकदेशे सबाप्पनिःश्वासमारुतोपहतः। दृश्पे- ताघातं तत् सुवृष्टिवृद्धयावहं जगतः ॥५०॥ मध्ये तमः प्रविष्टं वितमस्कं मण्डलं च यदि परितः । तन्मध्यदेशनाशं करोति कुक्ष्यामयजयं च ॥ ५१ ॥ पर्यन्तेष्वतिबहुलं स्वल्प मध्ये तमस्तमोऽन्त्यारस्ये । सन्यानामीतिभयं भयम- मिस्तस्कराणां च ॥५२॥ श्वेते क्षेमसुभिक्षं ब्राह्मणपीडां च निर्दिशनाही। अमिभयमनलवर्णे पीडा च हुताशवृत्तीनाम् ॥ ५३॥ हरित रोगोल्वणता धनका नाश होता है और गर्वित देशोंको पीडा होती है ॥ ४६ ॥ सूर्य वा चन्द्र- मण्डलतक देश अर्थात् पिछली सीमातक ग्रस करके जो राहु मध्यस्थानमें पिण्डा कारकी समान विराजमान होवे तो उसको निरोध कहते हैं इससे समस्तही प्राणि- योंको हर्ष होता है ॥ ४७ ।। जो राहुविम्ब मण्डलको भलीभांति पूर्णतासे ढककर अधिक कालतक विराजमान रहे, तो उसको अवमईन कहते हैं, इससे प्रधान देश और प्रधान व प्रधानराजाका नाश होता है और अंधकारका मय होता है ॥ ४८ ॥ जो गोलाकार ग्रहमण्डलको राहु ढककर अर्थात् ग्रहण होकर जो राष्टु फिर तत्काल दिखाई दे तो उसको आरोहण कहते हैं, इससे गजाओंको परस्पर युद्धका अत्यन्त भय होता है ॥ ४९ ॥ वाफयुक्त सांसकी पवनसे जिस प्रकार दर्पण मलीन हो जाता है वैसेही यदि राहुसे चन्द्र या सूर्यका मंडल एक ओरको मलीन दीख पडे तो उस पासको आघात कहते हैं; इससे जगत्में सुदृष्टि होती है और सब जगत्को पाद होती है ।। ५० ॥ यदि चन्द्रमाके विचले भागमें राहु प्रवेश कर आवे और चन्द्रमंडलके चारों ओर यादे निर्मल रहे तो इस प्रासको मध्यतम कहते हैं, यह मध्यदेश नाशक और कोखके रोगोंको करनेवाला है ॥ ११॥ जो चन्द्र- मण्डलको पिछली सीमामें राहु अत्यन्त यहुतायतसे और बीचके मागमें योडासा भात हो तो इसको तमोन्त्यनामक ग्रास कहते हैं। इससे धान्योंको ईति करनेवाला मय होता है और चोरोंका मय होता है॥ ५२ ॥ राहु श्वेतवर्ण होवे तो मंगल समिक्ष और प्रात्मणोंको पीडा होती है, अमिवर्ण होनेसे अग्निभय और अमिसे नीतिश करनेवाले लहारादिको पीडा होती है ।। ५३ ॥ हरे रंगका राहु हो तो मापाटीशमाहिता २०५। सापानामतिथि विध्वंमः । कपिले शीघगममत्तम्लेच्छन्नंसोऽथ दुनितम् १५४ ॥ अरुणकिरणानुरुसे दुर्भिक्षावृष्टयो विहगीडा । आपने क्षेपमुनि- समादिशेन्मन्दवृष्टिं च ॥ ५५ ॥ कापोतारुणकपिटश्यावा अभयं विनिर्दे- श्यम् । कापोतः शुशाणां व्याधिकरः रुष्णवर्णम ॥ ५६ ॥ विमलकमणि- पीतामो येश्यध्वंसो भवेद सुभिक्षाप । साप्मित्पमिभयं गरिकरुपे तु यु- चानि ॥५७॥ दुर्वाकाण्डश्यामे हारिद्रे वापि निर्दिशेन्मरकम । अभियसाप- पापी पाटलिकुमुमोपमो राहुः ॥ ५८ ॥ पाशविलोहितः क्षत्रध्वंसार गशी दृष्टेभ । पालरविकमलमुरचापरुपन्टसकोपाप ॥ ५९॥ पश्यन मन मोम्यो पृतमधुर्तलक्षयाय राज्ञां च । भीमः ममरविम शिखिकोप तस्वयं ॥६॥ शुकः सस्पमिदं नानानेगांभ जनपनि धरिभ्याम् । रविजः करोन्यवृष्टिं दुनि तस्कर भयं च ।। ६१ ॥ यदशुभमवलोकनाभिरुनं पद्दनितं पणे प्रमोक्षगे रोगको अधिकाई और नागका ईतिगे नाश होता है। कपिलपर्णका गरेको शीघ्र घलनेवाले प्राणी, म्टेघोंका नाश और दुर्भिक्षा होगा ॥ ५४॥ गार्ण मरण दिखाई देती हर्मिर, अनावृष्टि और पक्षियोंको पीरा होती है। पर. केसा वर्ण दो मी मंगल, मुभिर और दृष्टि मन्दी दोनी ॥५५॥ होत, परण, यपिल पा कपिन वर्णका राह दिखाई देय ती धापा भय होता? और पतार वर्णा या पाले रंगका दावे तो शद्रोंगो पीडा डांसी ॥५६॥ो निर्म माणको समान पीत वर्ण होय मी वैश्योंका नाम भीर मुभिक्ष होता. शिखाके समान दो नी अग्निमय भीर गेल्को समान दिखाई देती पुरी ॥ ५७॥ दिलको रामान श्यामवर्ण या हलदीप रामान राशि • मरी परती है। पारलरकी रामान गवा रंग होरे सीबम गिरने १॥५८॥ परिशी समान या लाल वर्णश सिाई हो और सायोका नाश होता है । प्रमाणात सुर्यवी ममान, कमर पापा समान राहता वर्णय ती शसोप होता ॥५९॥ अवतर:- मरवाहसमें पुपरी रहिये मो घी, माद, तेल वेग हो कर Aar गोवा है। मंगरकी राष्ट हो तो युद्ध में मान, मिरे और गेम ॥६॥ी होती पनी धान्योंवर नारा रोग, मे... दर होते हैं। शनि हो तो दुर्भिस, माना और अपणो भारम्मसमपमें पामोलसमपमें दोनारिको मापन (३०) वाराहीसंहिता। चा। मुरसतिगुरुणावलोकिते तच्छममुपयाति जलरिवामिरिद्धः ॥ ६२ ॥ अस्ते क्रमानिमित्तैः पुनठहो मासपट्कपरिवृद्धया। पवनोल्कापातरजाक्षितिक- म्पतमोऽशनितिपातः॥ ६३ । आवन्तिका जनादाः कावेरीनर्मदातटाभाषिणः। 'दृताच मनुजातयः पीड्यन्ते क्षितिसुते यस्ते ॥ ६४ ॥ अन्तर्वदी सरयूं नालं पूर्वसागरं शोणम् । सीनृपयोधकुमारान् सह विद्वन्दि धो हन्ति ।। ६५ ॥ ग्रह- णोरगते जीये विद्वन्नृपमन्त्रिगजयध्वंसः। सिन्धुतटवामिनामप्युदाग्दिशं संकि तानां च ।। ६६ ॥ शृगुतनये राहुगते दसेरकाः कैकयाः सयौधेयाः । आर्या- वाः शिवयः सीसचिदगणाश्च पीडयन्ते ॥ ६७ ॥ सौरे मरुभवपुष पुष्करसोराष्ट्रा धावतोऽर्बुदान्त्यजनाः । गोमन्तारियात्राश्रिताश्च नाशं ब्रजन्त्याशु ॥ ६८ ॥ कार्तिश्यामनलोपजीविमगधान प्राच्याधिपान कोशलान कल्मापानय शूरसेन- सहितान् काशीच सन्तापयेत् । हन्याचाशु कलिङ्गदेशनृपति सामात्यात्य तमो दृष्टं क्षत्रियतापदं जनयति क्षेमं सुभिक्षान्वितम् ॥ ६९ ॥ काश्मीरकार वे समस्त वृहस्पतिकी दृष्टि से इस तरह शान्त हो जाते हैं जैसे जलराशिसे बढ़ी हुई आग ।। ६२ ॥ वायु, उल्कापात, धरि वर्पना, मोचाल, अंधकार और वज्रपात- रूप निमित्चद्वारा वहुधा छः मासके पीछे ग्रहण होता है ॥ ६३ ॥ मंगलका ग्रहण होवे तो अवन्तीदेश, कावेरी और नर्मदाके निकटके देश और सब गर्वित राजा- ओंका नाश होता है ॥ ६४ ॥ जो बुधग्रहसे राहुका ग्रहण होवे तो अन्तर्वेदी, सरयू, नेपाल, पूर्वसागर और शोणादिदेशोंकी खिये, राजा, योद्धा, पंडित और बाल- कोंका नाश होता है ॥ ६५ ।। बृहस्पतिका ग्रहण होवे तो विद्वान, राजमंत्री, हाथी और घोडोंका नाश होता है । सिन्धुनदीके निकट रहनेवाले या उत्तरदिशाके रहनेवाले पुरुषाका नाश होता है ॥६६ ।। शुकका ग्रहण होवे तो दासेरक, काश्मीर, यौधेय, आर्यावर्त, शिवि आदि देशको व स्त्रियों और मंत्रियोंको पीडा होती है ।। ६७ ॥ जो शनिग्रह राहु से ग्रस्त होवे तो मरुभव, पुष्कर, सौराष्ट्र आदि देशके लोग, पैदल, अर्बुदादि अन्त्यजाति, गोमन्त और पारियान पहाडके रहनेवाले शीग्रही नादाको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ६८ ॥ जो राहु कार्तिक महीने में दिखाई दे तो अनिसे आनीषिका करनेवाले पुरुप अर्थात् सुनार, लहार और मगध, कोशल, कल्माप, शुरमेन व काशीआदि देशोंके रहनेवाले प्राणी पीडित होते हैं और इस प्रकार क्षत्रि- योको ताप देनेवाले राहुके दिखाई देनेपर मंत्री और नौकर चाकरोंके साथ कलिंग देश के गनारा नाश हो जाता है और मंगल र ममिक्ष होता है ॥ ६९ ॥ अग्रहा- मापारीकासाहिता २०५। कौशलकान सपुण्ड्रान मृगांध इन्यादपरान्तकांच। ये सोमपास्तांभ निहन्ति सौम्ये सुवृष्टिरूद क्षेमसुशिक्षस्य ॥ ७० ॥ पापे दिनक्षत्रननोररोधः ससन्ध- वाल्याः कुकुरा विदेहाः । ध्वंसं वजन्त्यत्र च मन्ददृष्टिं भयं च विवादमुनिक्ष- युक्तम् ॥ ७१ ॥ मारे तु मावृतिपकवतिगांवान् स्वाध्यायधर्मनिरतान कारणस्तुरङ्गान् । बङ्गानकाशिमनु नाच दुनोति राष्टिं च कर्परुजनानुमतां करोति ।। ७२ ॥ पीडाकरं फाल्गुनमासि पर्व बगाश्मक पन्नामेकलानाम । नृनजसस्थावरागानानां धनुरक्षास्सिनां च ।। ७३ ॥ चत्र तु चित्रकर- लेखकगेयसकान् कषोरजीविनिगमनहिरण्यपण्पान् । पीण्डाडाकपजतातय चाश्मकांथ वारः स्पृशत्पमरपोत्र विचित्रवी ॥ ७ ॥ साग्यमानि पहले पिनारामायान्ति का सतिला समुद्राः । इक्ष्वाकुर्याधेयकाः कलिनः मोर- वाः किन्तु सुभिक्षमस्मिन् ॥ ७५ ॥ ज्येठे नरेन्ददिनरानान्यः सस्यानि यणमहीने में ग्रहण हो तो काश्मीर, योदाल, पुष्ट्र आदि देश, पश्चिम और दक्षि- पदेशो मृग और समस्त सोम पीनेवालोंय नाम ही जाना दे मोर मी , मंगल और समिक्षमी होना है ॥ ७० ॥ पोर मागमें रण होय मो माग और क्षत्रियोंमें उपद्रय हो, सन्धर, कुकुर और शिवशके रहने वाला है और भाल पडता है॥७१ ॥ माघमासमें प्राण दोडे तो शनिवगोपने म हुप मातापिताकी मक्ति पानेराले लोग, साध्याय भोर अपने धर्म प. नेगले सोग, बहुतही ऊंचे हाथी और बंगाल, अंग और साशी आदि में उत्पन हुए मनुष्योंको दुःख होता है, परन्तु पी किसानों की मनमानी ७ फाल्गुनमासमें प्रण रेसी यंगार, मामा, माली और मेरा गोरे लोगों को पीरा दोनो है, नापनेपाली, उत्तम धान्य तथा उतम मी. पापारी सधी और तपसियोंको पीस होती ॥७३॥ रमास में प्रोनोवि- कार (मुसोरि),सेसक गाने मास, रोपनौरी विदामाद) पर निगम (शास)को जाननेाले पुरुर, गुरगाह पारारो दर और फैन र सरमा पानीसदि देश भादमी अपन्त लेगा २॥७॥ जोरशासमासमें प्राण सोसार, तिर सा, पौधेष, शक और कालोमा होता ॥ ७५ मेहमारा प्रायोरानी, 12 (३२) बाराहसिंहिता। दृष्टिन महागणाय । प्रमंसमायान्ति नराश्च सौम्याः साल्वः समेताच निार- मंगः ७६ ॥ पाठपर्वण्युदपानवमनदीप्रवाहान् फलमूलवा न् । गान्धार- कारसीरपुलिन्दचीनान हतान् वदेन्मण्डलवर्पमस्मिन् ॥ ७७ ॥ काश्मीरान निन्दतियवनान हन्याव कुरक्षेत्रकान गान्धारानपि मध्यदेशसहितान रसो प्रहः भरणे । काम्योजक शांथ शारदमपि त्यस्ता यथोक्तानिमार अन्यत्र मराष्टिमननर्धात्री करोत्याताम् ॥ ७८ ॥ कलिङ्गायदान मसन सुरानान म्लेच्छान सुवीरान दरदाञ्चकांथ। श्रीणां च गनिमुरो शिनि मरिमरवानदेयुपेतः॥ ७९ ॥ काम्बोजचीनयवनान् सह शल्प मंडीरनिवासिननाभ हत्या । भानपीडभिजन तथा किरा- नगेभाने परिसमिक्षाच ॥ ८॥ हनुकुक्षिपायुभेदशानिधिः परंप नर । भ्यानयोग विदरणमिति दश शशिसूर्ययोमोशाः 10 मामासागमन रक्षिणहनुभेदसतितं शशिनः । सस्पपिमर्यो मुरा- HTT, गालदेशा रहनेगाले मनुष्य और निषाद लोगों i-14 मा मागमें प्राण हो तो ना, पापी, नदीमा * : या पुरुष भयांत् माली, यागान और गान्धार, ईलाकात हो जाना और देवराज इन्द्र मण्डल tram | य मागमें प्ररण हो नी काश्मीर, पुलिन्द, चीन पाता? मीर काम्पोन, एम.शक, शारद कलांग यान अन्नको गायन 712 RATE माग में प्राण होनी वारद, गार in.. मोरा नाममा, मिया माल ** .... | मन माम में प्राण १२, १rgaai.at TREATMENT ११.६८मदा में में - Swar ३ 1111८)(.) MAY मातामसाहिता ब०५१ स्म् मृति स्यात् सुदृष्टिध ॥ ८२ ॥ पूर्वोचरेण पामो हलोशे नाक भयदायी। मुखरांगं शस्ना तस्मिन् विद्यार सुभिक्षं च ॥ ८३॥ दक्षि शिविदो दक्षिणायन यदि भवेन्मोक्षः । पीडा नृपपुभाणामभिय दक्षिणासिकः ॥८॥ वामस्तु कुक्षिीदो यधुनरमागसस्थितो राहुः । गाविपतिः सत्यानि च वय मध्यानि ॥ ८५ ॥ ननवापव्यस्थी दक्षिण तु पायोदी दी । रासहगल्ला वृष्टिपोस्तु राशीक्षपो पाने ॥ ८६ ॥ प्रमहणं सत्ता भागेर चासत । सनमिति तद क्षेमतस्पहामिदं - ।। ८७॥ पात्रमहणं यस्मिन् पवादपसरणं तु तज्जरणम् । क्षुच्छर विमास शुरणहरयान्ति र जनाः ८८ ॥ मध्ये यदि मकान तन्मध्यविदरणं नाम । अन्तःकोकर स्पाद सुभिक्षदं नातिवृष्टिकरम् ॥८ पर्यन्तेषु विमटता बहुलं मध्ये तमोऽन्तदरणारये । मध्यात्पदेशनासः ॥ उसको दक्षिणानुमेद नामक मोक्ष कहते हैं। इससे धान्पनाश, मुखरोग, राज मौर अरछी वर्षा होती है ।। ८२ ॥ पूर्वोचरकोणसे मोक्ष होनेपर वाम हनुभेद होता है। इससे राजा और राजमारोंको मय, मुखरोग, शसमय और सुमित है ।। ८३ । दक्षिण ओरसे मोक्ष होनेपर दक्षिणक्षिभेद नामक मोक्ष हो जिससे राजकुमारोशे पीडा और दक्षिणके शत्रुओंमें अगडा होता है ।। ८४ | राहु उधरपक्षमें स्थापित होवे तो वामकुक्षिभेद मोक्ष होता है, इससे स्त्रियोंके । विपति और धान्य मध्यम होता है ।। ८५ ॥ प्रत्य कोणसे मोह दो सौ दक्षिणवायुभेद कहते हैं, यह दोनों मकारको मो साधारण गुह्मपीडा और! करती है और यामवायुभेदसे रानीकी क्षय होती है ॥८६॥ राहु पदि प्रान म पूर्वमागसे प्राप्त करना भारम्भ करके पूर्व दिशाकोही चला आरे तो उसको सं नामक मोक्ष पहने हैं। इससे संसारका मगले और धान्यमुख होता है। जिसमें पूर्वदिशास अहणका प्रारंभ होकर पश्चिम देशोंमें मोक्ष होवे उसको: नामक मोक्ष कहते हैं; जरण नामक मोह होनेसे मनुष्य क्षुधा और शखा घपटायकर न जाने कहां जाकर शरण मात होवे।।८८॥ मध्यस्थल मही माशित होने पर उसको मध्यविदारण नामक मोक्ष कहते हैं। यह माणि मानसिक पोप करानेवाली और मुभिक्षदायक होनेपरमी श्रेष्ठ वर्मा इसमें नहीं गग्यमें सलपाट मचता है ॥ ९ ॥ यदि चन्द्रग्रहणमें पियके चारों निरामय mmmmmmmManamaAमोस बाराहीसंहिता । सत्यक्षयवास्मिन् ॥ ९॥ एते सर्वे मोक्षा वक्तव्या भास्करेऽपि किन्वत्र । पूर्वादिक् शशिनि यथा तथा खी पश्चिमा कल्प्या ॥ ९१ ॥ मुक्त समाहान्नः पांशुनिपातोऽनसङ्ख्यं कुरुते। नीहारो रोगमयाभूकम्पः प्रवरनृपमृत्युम् १९२॥ उल्का मन्त्रिविनाशं नानावाँ घनाथ भयमतुलम् । स्तनितं गर्मविनाशं विद्यु- न्नृपदंष्ट्रिपरिपीडाम् ॥९३ ॥ परिवेपो रुपीडां दिग्दाहो नृपायं च सामिन- यम् । रुक्षो वायुः प्रबलचौरसमुत्थं भयं धत्ते ॥१४॥ निर्धातः मुरचापं दण्डभ शुभयं सपरचक्रम् । ग्रहयुद्धं नृपयुदं केतुश्च तदेव संदृष्टः ॥९५॥ अविरुत- सलिलनिपाते समाहान्तः सुभिक्षमादेश्यम् । यञ्चाशुभ ग्रहणजे तत् सं नाशमुपयाति ॥ ९६ ॥ सोमनहे निवृत्ते पक्षान्ते यदि भवेद ग्रहोऽकस्य । तत्रानयः प्रजानां दम्पत्योवेरमन्योन्यम् ॥ ९७ ॥ अग्रहात्तु शशिनो ग्रहणं यदि दृश्यते ततो विप्राः। नैकातुफलमानो भवन्ति मुदिताः प्रजाश्चैव ॥९८॥ इति भीवराहमिहिरकतौ बृहत्संहितायां राहुचारः पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५॥ है; इससे मध्यदेश और शरदऋतुकी खेतीका नाश होता है ॥ ९० ॥ यह सम्पूर्ण चन्द्रमाणको मोक्ष कही है, इन सबके विषयको सूर्यग्रहण मी कल्पना करना उचित है परन्तु जिस प्रकार चन्द्रग्रहणमें जहां पूर्वार्दशा कही, उस जगदपर सूर्य- अहणमें पश्चिमदिशाका लगाना ठीक है ॥११॥ मोक्ष होनेके उपरान्त यदि सात दिनके मौतर धरि वर्षे तो मनका नाश हो, कुहर हो जाय तो रोगका मय होवे, मूकंप दोनेसे श्रेष्ठ राजाकी मृत्यु होती है, उल्कापात मंत्रीका नाश करता है और वर्णवर्णके मेघ संध्याकालके विना दिखाई दे तो महामय होता है, मेघगर्जन गर्म- नादाका कारण होता है, विद्युत्पात राजा, डाढवाले सर्प शूकर आदि लोगोंको पीडादायक होता है, परिवेश होनेसे रोगकी पीडा होती है, दिग्दाह होनेसे राजमय और यनिमय होता है, अतिप्रचण्ड तथा समापन चलनेसे चोरमय होता है। निर्धात शन्द होने और इन्द्रधनुपके दिखाई देने तथा पवनका संघात होनेसे दुर्भिस और दूसरे रानाको सेनासे मय होता है, ग्रहयुद होनेसे राजाओंका परस्पर युद्ध होता है. केतुके दर्शनसेमी युद्ध होता है, ग्रहणमोस होने के पश्चात् सात दिनके भीतर यदि विना विकारके मामांति वर्षा हो जाय तो सुमिस होता है और ग्रहण का मन्पूर्ण अनुमासमी नाशको प्राप्त हो जाता है ॥ ९२ ।। ९३ ॥ ९४ ॥१५॥ ॥९॥ चन्द्रमाणके पीछे याद बहुत दिनके भीतर सूर्यग्रहण हो जाय तो मजा इनप रोता और पीपरपा परस्पर पैरमार होता है। और यदि सूर्य- मापाटीयसहिता २०६१ अथ षष्ठोऽध्यायः। सोमचार. पादपक्षीदकं करोति नवमाटसप्तमर्शषु । तइकमुष्णमुदये पीडाकरम- मेवानीनाम् ॥ १॥ द्वादशदशमेकादशनक्षत्रादकिने कुगेऽश्रुमुखम् । दूपपति सानुदये करोति रोगानवृष्टिश्च ॥ २ ॥ व्यालं प्रयोदशाचतुर्दशादा विषय- तेऽस्तमये । दैष्ट्रिन्यालमृत्यः करोति पीडा सुशिक्षं च ॥ ३॥ रुधिरानन- मिति वकं पञ्चदशाव पोडशाच विनिवृत्ने । तत्कालं मुसरोगं सायं च मुनि- समावहति ॥ ४॥ असिमुशलं सनदशादटादशतोऽपि वा तदनुस्के । दस्युग- गेयः पीडां करोत्यवृष्टिं सशसभयाम् ॥ ५ ॥ भाग्यायमोदितो पदि नियनने पदणसे एक पक्ष परे चंद्ररहण होप नौ माह्मणगण अनेक वायर फल पारें और है यहुन यताको करते हैं, मजा हर्पित होनी है । ९८ ॥ इति श्रीवराहमिदिराचार्यविरचितायां यत्महितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादाबादा- स्तव्य-पण्डितपलदेवप्रसादमित्रविचितायां भापाटीकायां पंचमोऽध्यायः॥५॥ जिरा नक्षत्र में मंगलग्रहका उदय होता है, उस उदय नक्षत्रके साम, अष्टम रा नवम नक्षत्रमें मंगलप्रद यदि यकी दो नो उस वकको 'उष्ण' कहते हैं, इस रण एकके उदयकालमें अमिसे आजीविका करनेवाले लोगोंको पीसदोषी ॥१॥ उदयनक्षत्रके दशम, एकादश अपया नक्षत्रसे मंगल यदि पकी रे सो उस को अचमुख 'बक शहने हैं। इसके उदय होने के समयमें समान र पिड हो जाते हैं और रोग र अनावृष्टि होती है।॥ २॥ ऐसेदो मिस नक्षत्र में मंगल मस्त हो जाय, उस अस्त होते हुए नक्षपणे तेरहरें या चौदा नसमें पदि मंगलका विपास अर्थात् बस हो तो इस चक्रका नाम 'पाल "इसमें एंट्री, प्पाल और मृगसे पीडा होती मोर मुभिक्ष होता है॥३॥ मस्तमन नारे पंपदा या पोरानमा मंगलकाबाहो मो रधिरानन' नाममा वर होता उस समयमें रोगोंको मुग्ररोग और भय होता है और भाभा करता है। मस्त होते हुए नसके सत्रहवें या मारह नसणे गर भनुम हो को भासमशल' नाम रस होता है इसमे चोरमय, समय और माहिती ॥५॥ यदि मंगलमद कागुनी या उसकालगुनी ना रदिन रोम .
(३८) पाराहीसंहिता। भपप्रदायी चरन् जगतः ॥ ७ ॥ प्रास्तविमित्रसंक्षिततीक्ष्णयोगान्तयोर पास्याः । सप्त पराशरतन्त्रे नक्षत्रः कीर्तिता गतयः॥ ८॥ प्रारूतसंज्ञा वार व्ययाम्यपैतामहानि बहुलाच । मिश्रा गतिः प्रतिष्टा शशिशिवपितृभुजयर वानि ॥ ९॥ संक्षिप्तायां पुप्यः पुनर्वसुः फल्गुनीद्वयं चेति । तीम्णायां भर दाद्वयं सशाकाश्वयुक् पोष्णम् ॥ १०॥ योगान्तिकेति मूलं वे चापाढे गति सुतस्येन्दोः। घोरा श्रवणस्त्वाष्ट्र वसुदेवं वारुणं चैव ।। ११ ॥ पापा सावित्रं मैत्रं शक्रानिदैवतं चेति । उदयप्रवासदिवसः स एव गतिलक्षणं पाह ॥१२॥ चत्वारिंशत्रिंशद् द्विसमेता विंशतिदिनवकं च । नव माताई र चैकसंयुताः प्रारुताद्यानाम् ॥ १३ ॥ प्रारुतगत्यामारोग्यवृष्टिसस्यप्रवृदय क्षेमम् । संक्षिप्तमिश्रयोर्मिश्रमेतदन्यासु विपरीतम् ॥ १४॥ ऋज्व्पतिव . इन तीन नक्षत्रों से किसी नक्षत्रको भेद कर जो बुधग्रह विचरण करे तो संताप सुधा, शस्त्र, तस्कर, रोग और भय होता है॥७॥ पराशर मुनिके रचे ज्योति पीय तंत्रशास्त्रमें नक्षत्रके द्वारा बुधकी सात प्रकारकी गति कही है, यया-१ मार २ विमिश्र, ३ संक्षिप्त, ४ तीक्ष्ण, ५ योगान्त, ६ घोर, ७ पाप ॥ ८॥ स्वात भरणी, रोहिणी और कृत्तिका नक्षत्रमें बुध होय तो इस गतिको माकृत करते मृगशिग, आर्द्रा, मघा और आश्लेषा नक्षत्रीय बुधको गतिको मित्रा कहते हैं । पुष्य, पुनर्वसु, पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनीमें संक्षिप्ता और पूर्वाभाद्रा उत्तरामाद्रपदा, ज्येष्टा, अश्विनी और खेतीमें पकी गतिको तीक्ष्णा कहते ॥ १० ॥ मूल, पूर्वापाढा व उत्तराषाढा नक्षत्रमें जो युधकी गति होती है, उस- पोगान्तिका कहते हैं, और श्रवण, चित्रा, धनिष्टा और शतभिषामें जो गति होती उसको घोरा कहते हैं ॥ ११ ॥ जव बुध इस्त, अनुराधा या ज्येष्ठा नक्ष रहता है, तब उसकी गतिका नाम पापा है, इस प्रकार पराशरमुनिने उदय अस्तदिवसके दाग बुधको गति व लक्षणोंका निरूपण किया है ॥ १२ ॥ प्रा नगाते ४० दिन, मिश्रा ३० दिन, संक्षिप्ता २२ दिन, तीक्ष्णा १८ दिन, दिन, घोरा १५ दिन और पापा गति ११ दिनतक रहती है ॥ १३ ॥ दुध, माइत गनिमें आरोग्य, दृष्टि, धान्यकी वृद्रि और मंगल होता है, संक्षिप्ता मिया गनिम मिश्रफल अर्थात् न वात यच्छा न यहुत बुरा फल होता है में दृमाग गनियोंमें विपरीत फल होता है ॥ १४ ॥ देवलके मतसे युधकी गति प योगान
माशयकासहिता २०७॥
बका विकता ए मतेन देवलस्पताः । पश्चचतुकाहा ज्यादीनां पड-
पता: ॥ १५ ॥ मम्मी हिता प्रमानामतिरका गतिविनाशयति । शमा-
पदाच थमा पिकला परोगसअननी ॥ १६॥ पापापादभावणवेशाखेदि-
दुनः समापेषु । दृष्टो अपाय जगतः शुभफलरुत् प्रोपितस्तेषु ॥३७॥ कार्ति-
केऽवयुजि वा यदि मासे दृश्पते तनुभवः शिशिरांशोः शस्त्रचौरहुनभुग्गद-
तोपक्षमपानि च तदा विदधानि ॥ १८॥ रुद्धानि साम्येऽस्तमिते पुराणि
यान्युनते तान्युपपांति मोक्षम् । अन्ये तु पवादुदिते वदन्ति लाम: पुराणां
भक्तीति तज्ज्ञाः ॥ १९॥ हेमकान्तिरथवा शुरुवर्णः सस्पकेन मणिना सदृशो
था। स्निग्धमूर्तिरलघुभ हिताय व्यत्यये न शुभकच्छशिपुत्रः ॥२०॥
शत भीवराहमिहिरकतो बृहत्संहितायां बुधचारः सनमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
प्रकारको है; पया ऋषी, अतिक्का, वका और विकला; इन सब गातयांका यथा.
कामसे विधमान पाल ३० दिन, २४ दिन, १२ दिन और केवल ६ दिनतक है
॥ १५ ॥ अनौगात मनाओंको हितकारी है; अतिक्का गति धनका नाश करने.
वाली है, कागतिमें ससमय और शिकलामें मप व रोग होता है।॥ १६॥ पोष,
मापार, श्रावण, वैशारद वा माघमासमें जो बुध मह दिखाई दे तो संसारको भय
हो, पदि इस समयमें अस्त होवे तो तुम होता है॥ १७ ॥ जो चंद्रमाका पुत्र
युध कार्तिक या अश्विन माममें दिखाई दे नौ शस, चोर, अभि, रोग, जल और
सुधाका भय होता है ॥ १८॥ बुधके चारमें मतीमांति सर कुछ जाने हुए
पंडित लोग कहते हैं कि, बुधके अस्तकालमें जो नगर रुक जाते हैं। फिर बुधके
उदय होने के समय में वह सब नगर टूट जाते हैं. कोई कोई कहते हैं कि, पश्चिम
दिशामें हुध उदय होय तो उस ओरके सब पुर लामाले होते हैं ॥ १९ ॥
जब कि चन्द्रमाके पुन सुधका रंग मुदणको समान या तोतेपसीको समान
अथवा सस्यकमाणको समान होय और जब बुध निर्मल मूर्ति और पडाय
तप सयकारी मंगल होता है। ऐसा न होनेपर अशुमही होता है।॥ २० ॥
इते श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायो पात्संहितायां पविमोचरदेशीयमुरादाबादशास्त-
व्य-परितपलदेवपसादामविरचितायां मापाटीकापां मतमोऽध्यायः॥ ७॥
(२)मर नामरवांग तो अनावृष्टि होनी और मृग, चूहे, सलम' वाराहीसंहिता। अथाष्टमोऽध्यायः। वृहस्पतिचार. नसग सहोदयपुगच्छति येन देवपतिपन्त्री तत्संज्ञ वक्तव्यं वर्ष मात्र- कमेगा॥ १ ॥ वणि कार्निकादीन्यानेयादशानुयोगीनि । क्रमशनि तु पवनमुन्त्यिमन्त्वं च पदपम् ॥२॥ शकटानलोजीवकगोपांडा व्याशि- खोरमा वृद्धिन्तु रकगीताकुसुनानां कार्तिके व ॥ ३ ॥ सौम्येऽदेता टिमुंगाघुसलमाण्ड नैव सत्यवधः । व्याविनय मित्रैरपि अपानां जायते और ॥४॥ शुनजगतः पीपो निवृत्तवैराः परतरं शितिपाः। द्वित्रिगुणो धान्यान पोटिककमननिदिम ॥ ५॥ पितृपूनापरिवृद्धिांधे हार्दिश्च सर्वभूतानाम् आरोग्यवृष्टिवान्याममदो मिनरामय ॥६॥ फाल्गुनवर्षे विद्याद काद दो मंत्री अर्यत् पस्पतिजी जिस मासके जिस नसमें उदय होते, नरारे अनुवादी महीने के नामकी नाई यह वर्ष कहलाता है। सा मार से उग प्रसार कुल यादव होंगे, तिनमें वृत्तिका नक्षपसे अ पके दो दो नापी कार्तिकादि वर्ष होगा परन्तु इन वाह वर्षोंके मध्यमें , पदा मोर दादा वर्ष तीन तीन नसोका होगा, जैसे कृत्तिा पा रो ना पतिय उदय होनेपर कार्तिक नामक वर्ष होगा ॥२॥ (१)का गाव सोनो दाग आनीधिका करनेवाले पनजारे इत्यादि, या कारेगाले सोगोंको और गायोगेको पीडा होती है, लोगों को होता है, लाल और पीले ग पूल पढ़ते हैं । रपा बाद मंदन जन्तु योग नानी दानती है, मनुष्योको प्या र मित्र के मंगमो गना मोंगी शत्रुता दी जानी है ॥ ४ ॥ (३ गालोग आपसका बरमा छोर। भना मार दिएमा वा निता हो जाना और पौष्टिक कार्यको पदि 14 (1) मा नाम लोगों की पूजा पानी है, सो पारि रा, यि, मारी, पागा मोल नाग, श्रेष्ठ सम्पत्ति और मि Frt () नाराले व ती स्थानके पीपल मगमोती वटा और गलामीमें भाषाटीमादिचा म०८॥ कंचित क्षेमवृद्धिसत्यानि । दौमाग्य प्रमदानां प्रपलाधारा शायोग्राः ॥ ७॥ मन्दा वृष्टिः नियमनं क्षेपमवाना मृदयः । वृद्धिस्तु कोशधान्यस्य पति हा च रूपवताम् ॥ ८ ॥ वैशाले धर्मपरा विगतनपाः मुदिता मनाः नृगः । यतक्रियाप्रनिनितिः सर्वसत्यानाम् ॥ ९ ॥ ज्येष्ठे जातिकूलप- अंगीठा न सधर्मज्ञाः । पीडयन्ते पान्पानि पहिला का शमीना- म् ॥ १०॥ आपाहे जारन्ने सस्यानि कचिवृष्टिरन्यत्र । योगक्षेमं मध्यं पमाय भरन्ति मालाः ॥ ११ ॥ श्रावणवर्षे क्षेमं सम्यक सस्पानि पाकसु. पानिया ये पापाः पीडयने ये च तद्रकाः ॥ १२॥ भादसो वहीजे पनि याति पूर्वसस्यं च । न भवत्यारं सस्पं क्वचिद मुझ कचिय यम् ॥ १३॥ भावनेनर्स पतति जलं प्रमुदिताः भनाः क्षेनम् । चिपः माणता सर्वेपामन्नाहुल्यम् ॥ १४॥ उदगारोग्यसुनिशनको तिमान् भानाम् । याये क्षिरीतो मध्येन तु मध्यफलदायी ॥ १५ ॥ ती है ॥ ७॥ (६) नामक व साधारण वृद्धि होती है, मिप यत्रका म होना है, राजामोंमें मोटापन, सोष और धान्यकी प्रदिप रूपवाद आदामे- को पीडा होता है।८॥ (७) पेशाप नामक वर्षमें रामा प्रजा दोनोंही मिमें तत्पर रहते हैं, मपशून्य और दर्पित रहते हैं, यज्ञ करते हैं और समस्त न्य मली माहित होते है ॥९॥(८) ज्येष्ठ नामफ वर्षमें राजालोग धर्मा इसके साथ जाति, कुल, धन और श्रेणी में श्रेष्ठ मानकर गिने जाते हैं. और गनी पा समाजातिके सिवाय राम धान्य पीडित होते हैं ॥ १०॥ (९) आर शामक व समस्त धान्य उपजते हैं. परन्तु किसी स्थानमें मना होती है, रोग शेम (मजा वस्तुस लाभ और सत्यकी सा) मध्यम और राजालोग अत्यन्त पर होते है॥ ११॥(10) श्रावण नामक व धान्य भानन्दसे कि जाते हैं, परन्तु साधारण पाखण्डी आदमी और उनके मक्क मनु अत्यन्त सोदित होने हैं ॥ १२॥ (११) भाद्रपद नामक वर्षमें सवानातीय समस्त पूर्व धान्य भलीभांति एक जाते हैं. योर धान्य नहीं होते, और कहीं सुभिन्न होता है मौर कहीं भर होता है (१९) आयुज अर्याद धिन नामक वर्षमें अत्यन्त जर गिरता है, मना हरित होती है, मागियो प्राण मुखमें (हते हैं और सबके पास बनसा अन तारे ॥४॥ जय सत्पते सय नक्षत्रों के उत्तरमें घूमता है तब सबके लिपे यारोप, पुष्टि और (४२) बाराहीसंदिता। विचरन् मयमिष्टस्तत्साध वत्सरेण मध्यफलः । सस्यानां विध्वंसी विचरे- धिक यदि कदाचित् ॥ १६ ॥ अनलभयमनलवर्ण व्याधिः पीते रणागमः श्यामे। हरिते च तस्करोत्यः पीडा रक्ते तु शखभयम् ॥ १७॥ धूमामेना- प्टिविदशगरी नृपवधो दिवा दृष्टे । विपुलेऽमले सुतारे रात्री दृष्टे प्रजाः स्वस्थाः ॥ १८॥ रोहिण्योऽनलमं च यत्सरतनुन मिस्त्वपाढायं साप हतितृदेवन च कुसुमं शुद्धैः शुभं तैः फलम् । देहे कूरनिपीडितेऽन्यनिलजं नाच्यो भयं क्षुत्रुतं पुप्ये मूलफलक्षयोऽथ हृदये सस्यस्य नाशो ध्रुवम् ॥ १९ ॥ गताति वणि शकेन्द्रकालाचतानि रुदैर्गुणयेचतुर्भिः । नवाष्टपञ्चाटयुतानि सत्ता विज्ञानयेच्छून्यशरागरामैः ॥ २० ॥ फलेन युक्तं शकभूपकालं संशोध्य पट्या विपक्षिज्य। युगानि नारायणपूर्वकाणि लब्धानि शेपाः क्रमशः समाः मंगल होता है, दक्षिण दिशामें बृहस्पति होय तो कहे हुए फलसे विपरीत फल होता है, मध्यमागमें विवरण करता होय ती मध्यम फल हुआ कर है ॥ १५ ॥ यादे गृहस्पति एक वर्ष दो नक्षत्रों के मध्य विचरण करे ने रामसारक है। दाई नक्षप्रमें विचरण करे तो मध्यम फल होता है और या संवत्मामें तिगसे अधिक नसमें कभी विचरण करे तो धान्यका नाश होता। ॥ १६ ॥ जो यारसतिका रंग अमिकी समान होय तो अग्निका भय होता है, पीत. पर्ग होप तो व्याधि, श्यामवर्ण होय तो युद्ध होयगा, हरा होनेसे चोरोंके द्वारा पोरा होपी, लाल होनेसे शखमप और धमका रंग होनेसे अनावृष्टि होती है। दिन यासात दिसाई देय तो मनुष्योंका नाश होता है, जो सुन्दर तारेकी समान बरा और निम्मल गधिकालमें दिखाई देय तौ प्रजाको मुस होता है ॥ १७ ॥ १८ ॥ कृतिका और रोहिणी नक्षत्र वर्षकी देह है, पूर्वापाढा और उस- गपाटा और नक्षत्र वर्षको नामि है, आश्लेषा हृदय और मघा नक्षत्र वर्षका कुम्भ है पापुर मो शुभ फल होता है. (गृहस्पतिके अस्थाकालमें ) वत्मरका देना पदे पारमग पारित हो तो अग्नि और पानसे मय होता है, नाभि- नाव पडित होप नौ क्षुधाका मप होता है, पुष्पनक्षत्र मूल अर्थात् मूली आदि और पासप होता है, जो हृदयना पापग्रहगे पीडित होय तो निया कला नाश होता है ॥ १९ ॥ शादित्य (गालियान ) राजाके समपणे सं या उनको दो स्थानों पर एक म्यान अंगी ११ सल्याने रो, तदोपाल हम गुमार र पार मंगपास गुणा करे, किर -
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वाराहीसंहिता। चतुर्विसुदेयताद्यान्युडूनि शेपाराकपूर्वमन्दम् ॥ २२ ॥ विष्णुः सुरेन्यो बट- सिद्धताशस्त्वष्टोचरप्रोपवाधिषध । क्रमायुगेशाः पितृविश्वसेमाः शुक्रातला- स्याविनगाः प्रदिष्टाः ॥ २३ ॥ संवत्सरोऽग्निः परिवत्सरोक इदादिकः शीन- मयूखमाली । प्रजातिचाप्यनुवत्सरः स्याविद्वत्सरः शैलसुतापतिथ ॥ २४ ॥ वृष्टिः समाये प्रमुख क्षिीय प्रततोया कयिता तृतीये। पवाजलं मुञ्चति मानता जानो, परन्तु गणनाके समय २४ - नक्षत्रसे गणना करे * अर्थात् १ सय होनेसे समझना पडेगा कि २५ वा नक्षत्र यर्यात पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्र है, २ होवे तौ २६ वां उत्तरामाद्रपदा इत्यादि ॥ २२ ॥ प्रमशादि पष्टि संवत्सरमें सव समेत १२ युग होते हैं, वस पांच २ वर्षका एक एक युग होता है । इस द्वादश युगों के यथाक्रमते अधिपति,-१ विष्णु, २ सुरेज्य, ३ बलभित्, ४ अग्नि, ५ वटा, ६ उच्च रपोटपद, ७ पितृगग, ८ विश्व, ९ सोम, १० मकानल, ११ अश्वि और १२ मग । इन युगाधिरतियोंके नामानुसारही इन युगोंका नाम होता है; यथा-नारायग, बृहस्पति, इन्द्र, अग्नि इत्यादि ॥ २३ ॥ यह युग सयके अन्तर्वी पांच २ वर्ष फिर पांच संज्ञान्तयुक्त पांच वर्ष हैं + ( यह साठ संवत्सरके अन्तर्गत नहीं है) उनके नामान्तर और उनके अधिपतियोंके नाम यथा-१ संवत्सर, २ परिवत्सर, ३ इदावत्सर, ४ अनुवत्सर, ५ इवत्सर । आधिपति १ अान; २ सूर्य, ३ चन्द्र, ४ प्रजापति, ५ महादेव ॥ २४ ॥ यह जो संवत्सराद पांच वर्षका वर्णन किया •पष्टयब्द x ९ x (पश्यन्द + १२) गृहस्पतिका भोग्यमान नक्षत्र । क्रिया यया-३६ । ६ ॥ २२ ॥ २९ ॥ २५ ॥ ३३ ॥ बाहर्क्सत्य पष्टयन्दादि । ३३४९+ (३६१२) -३६४९-३२४५३३-१२-३१३२४३३३२७१३२७:४८८१६ २७ नक्षत्र में मथक होनेसे २७ : ८१ मतशिष्ट ३ हैं यस जाना गया कि इस समय वृहस्पति २४ ३ नक्षत्रमें वर्तमान हैं और लन्ध दर होकर ३ प में इस कारण २५ वनक्षत्रके तीसरे पादमें उत्तीर्ण होकर चौथे चरणमें वर्तमान हैं. यह स्थल है। कभीर इसमें साधारण मन्तर लक्षित होगा. उसकी सूक्ष्मता पञ्चसिद्धान्तका देखनी चाहिये. -विस्तारमयसे यहां नहीं लिखा ॥ पराहमिहिरके मतस युगारम्भसेही यह वत्सरारम्म होता है. प्रसिद्ध स्मात रघुनन्द नमहापायके मतसे वैशास्तमासके प्रारम्भसेही यह वर्ष भारम्म होता है. उनके मतसे इन काम निरादिका दान करना चाहिये. " संवरसरे तथा दानं तिलस्य तु महाफलम् । समादे मलमासतत दालनप्रीत दानसागर प्रन्यकाभी यही मत है । ४ A माताकासदिता १०८॥ यचतुर्थ स्वल्पोदकं पञ्चममन्दमुक्तम् ॥ २५॥ चत्वारे मुख्यानि युगान्य- थैपां विष्पिदन्द्रजीयानलदेवतानि । पवार मध्यानि च मध्पमानि चत्वारि चान्पान्यधमानि विद्याद ॥२६॥ आद्यं धनिष्ठांशमभिप्रपन्नो माघे यदा यात्यु- दयं सुरेज्यः । पश्यन्दपूर्यः प्रभवः स नाना प्रवर्तते भूतहितस्तदादः ॥ २७ ॥ कचित्त्ववृधिः पवनामिकोपः सन्तीतयः ऐपताच रोगाः । संवत्सरेऽस्मिन् मा प्रवृत्ते न दुःखमामोति जनस्तथापि ॥ २८ ॥ तस्माहितीयो विभवः भदिष्टः शुक्लस्तृतीयः परतः प्रमोदः। मजापतिथेति यथोतराणि शस्तानि वणि फलानि चेपाम् ॥ २९॥ निष्पन्नशालीशुपवादिसस्पो अपर्विमुनामुपशान्त- राम् । सहटलोकां कलिदोपमुक्त क्षत्रं तदा शास्ति च भूतधानीम् ॥ ३०॥ आयोऽदिन्यः श्रीमुरसभावसाही युवाय धानति युगे द्वितीये । पाणि पचव यथाक्रमेण धीम्पत्र शस्तानि समे परे हे ॥ ३१ ॥ विष्वद्भिादेव निकामी गया इसके प्रथम वर्ष में वृष्टि होती है, दूसरे वर्षके आरम्ममें सृष्टि होती है, तीसरे वर्षमें अतिवृष्टि होती है, चतुर्पके शेपमें सृष्टि होती है, पयम वर्षमें साधारण वृष्टि होती है ।॥ २५ ॥ पहिले जो पारह युगका वर्णन कर आये हैं, इसके मध्यमें जो मपम चार युग हैं जिनके पति विष्णु, इन्द्र, वृहस्पति और अदि हैं, यह चार युग सबसे अच्छे हैं। तिसके पीछेके अर्थात् वीचके चार युग मध्यम हैं और अन्तके चार युगस्य मध्यम फर जानना ॥ २६ ॥ जिस समय वृहस्पति धनिष्टा नाम मयमांशमें प्राप्त होकर माघमासमें उदित होंगे विरा कालही पष्टि संवरारको प्रथम प्रम नामक वर्षका आरम्म होपगा। यह वर्ष प्राणियोंका हितकारक है ॥ २७ ॥ मभवनामक वर्षके वर्तमान होनेपर या किसी स्थानमें अनावृष्टि होती है किसी र स्थानमें वायु वा अनिका कोप होता है, किसी स्थानमें ईतिमय और किसी स्थानमें लेष्माकी पीड़ा होती है, तयाप इस वर्ष में प्राणियोको विशेष दुरा नहीं होता ॥ २८॥ दूसरे वर्षका नाम दिमय है, वोसरा शुरु, चौथा प्रमोद और पक्ष्य वत्सरका नाम प्रजापति है । यह समस्त वर्ष उत्तरोत्तर तुमफलके देनेवाले हैं। इन वर्षों में रागालोग इस प्रकारसे पृथ्वीस पाटन करते हैं कि, उनके शासन के गुणसे पृथ्वी धान्य, इस और यादि नाजको फलनेवाली और मयान्य, शत्रुदा- हीन मोर हर्षित मनुष्योंसे युक्त हो कलियुग दोपोंसे स्ट जाती है ॥२९॥३०॥ दुसरे युगमें (पासति युग ) जो पांच वत्सर हैं उनके नाम, पगिरा, 1 वाराहीसंहिता। देवो निरातङ्कजयाच लोकाः। अन्वयेऽन्त्येऽपि समा सुवृष्टिः किन्वत्र रोगा: समरागमश्च ॥ ३२॥ शाके युगे पूर्वमथेश्वराख्यं वर्ष द्वितीयं बहुधान्यमाहुः। प्रमायिनं विकममप्यतोऽन्यद्वपं च विद्याहरुचारयोगाव ॥ ३३ ॥ पाद्यं द्वितीय च शुभे तु वर्षे कतानुकारं कुरुतः प्रजानाम् । पापः प्रमाथी पविक्रमी तु समिक्षदी रोगायप्रदौ च ॥ ३४ ॥ श्रेष्ठं चतुर्थस्य युगस्य पूर्व यचित्रमा कथयन्ति वर्षम् । मध्यं द्वितीयं तु सुनानुसंज्ञ रोगपदं मृत्युकरं न तच ॥३५॥ तारण तदनु भरिवारिदं सस्यवृद्धिमुदितं च पार्थिवम् । पञ्चमं व्ययमुशन्ति शोजनं मन्मथायलमुत्सवाकुलम् ॥ ३६ ॥ त्वाष्ट्रे युगे सर्वजिदाय उक्तः संत. सरोन्यः खल सर्वधारी । तस्माद्विरोधी विकतः खरच शस्तो द्वितीयोऽ भयाव शेपाः॥ ३७ ॥ नन्दनोऽथ विजयो जयस्तथा मन्मयोऽत्य परतम दुर्मुसः । कान्तमा युग आदितनयं मन्मथः समफलोऽधमोऽपरः ॥ ३८ ॥ श्रोग्य, मार, युवा और धाता। तिनमें प्रथमके तीन वर्ष कुछ एक अच्छे हैं और दो गमभावाले हैं ॥ ३१ ॥ गिरा यादि तीन वर्षोंमें देवतालोग मली मांति दर पाते हैं और आदमी निरातंक व निर्मय होते हैं, पिछले दो वर्ष में यद्यपि कृषि मममार होती है परन्तु रोग और समर होता है ॥ ३२ ॥ वृहस्पतिके विचरणसे पेन्द्रनार जो नीमरा युग होता है उसके प्रथम वर्पका नाम ईश्वर, २ बहुधान, समापी, किम और पांचवेंका नाम वृप है ॥ ३३ ॥ इसमें पहला और दूसरा संप्रदायी है, परन मनाके लोगोंको तो मानो, सतयुगही हो जाता है। प्रमापी संसपल पापदायक है। किम और वृष नामक दो वर्ष मुभिभदायक हो। पन्ट गंग और भयो. कग्नेगले हैं॥ ३४ ॥ चतुर्थ (हुताश नामक) युगए नसं हिमका नाम चित्रमानु है; अत्युत्तम फलको देनेवाला है। दूसरा वर्ष मनु माया भयात् गेगदायी है। परन्तु मृत्युदायक नहीं है। तीसरे वर्षका मी फिमक मतगे दाणम अन्यन्त राष्ट होती है । चौपे संशा गम , इसमें धान्य बटन पं होता है। पांच वर्षका नाम प्यप न मनको काम रहीम होता है, यह उत्सम्युक्त होकर शोभायमान ३५ ॥ ३६॥ त्याष्ट्र नामक यम युगके प्रथम वर्षका नाम गाजित, २ मी थी, विकत, ५ सर इन पांच वर्षोंमें दूसरा वर्ष मंगलका कान ॥ ३० ॥ मोटाद नामक छरे युगों प्रथम वर्ग ग्दा है, शिव, नर, समय और पांच वर्मा है। इन पांच - - - ।
मापाटीकासाहिता २०८॥ हेमलम्ब इति सममे युगे स्पाद्विलम्बि परतो विकारि च । शर्वरीति तदनु पुनः स्मृतो वत्सरो गुरुवशेन पयः ॥ ३९ ॥ इतिप्रायः प्रचुरपदना वृष्टिरब्दे तु पूर्व मन्दं सस्पं न बहुसलिलं वत्सरेऽतो द्वितीये । अत्युद्वेगः प्रचुरसलिलः स्पात्तृतीयश्चतुर्थो दुर्भिक्षाप पुष इति ततः शोजनो शरितोयः ॥ ४० ॥ वैश्शे युगे शोमरुदित्यचायः संवत्सरोऽनः शुभरुद्वितीयः । क्रोधी तृतीयः परतः क्रमेण विश्वावसुधेति पराभवश्व ॥ ४५ ॥ पूर्वानरी प्रीतिकरी प्रजानामेपा तृतीपो बहुदोपदोऽब्दः । अन्त्यो समौ किन्तु पराभवेऽमिः शवामयाचिदिन- गोमपञ्च ॥ ४२ ॥ आयः पुरनो नवमे युगेऽन्दः स्पाकीलकोऽन्यः परतभ सौम्यः । साधारणो रोधकदित्यवादः शुभप्रदी कीलकसाम्पसंजी॥४३॥ कद पुषगने पहुशः प्रजानां साधारणेऽल्पं जलमीनयम । यः पञ्चमो रोधर- दिस्यादभित्रं जले तत्र च सस्पसम्पद ४४ ॥ इन्द्रामिदेवं दशमं युगं यद तत्रायमन्दं परिधाविसंज्ञम् । प्रमाययानन्दमतः परं यद स्यादाक्षसं चान- वोंमें प्रथमसे लेकर तीन मनोहर ; मन्मय वत्सर समफली और पञ्चम वत्सर अत्यन्त अपम है ॥ ३८॥ धृहस्पतिकी गतिके वासे सतम' (पिट) युगका मथम वर्ष हेमलम्य, २ विलम्पो, ३ विकारी, ४ शर्वरी, ५ धुर है । इसके प्रथम वर्ममें ईनिमय और संझावायुका मय होता है, साथमें संशारायुके पानीमी वर्षता है तदोपरान्त दुसरे वर्षमें धान्य और घृष्टिको मापता होती है। तीसरे वर्ष में अत्यन्त । 'घपटाहट और अत्यन्त वर्षा होती है. चौथे वर्ष में इंभिक्षका मप और पुब वर्षमें अत्पन्न सुहाष्टे व शुभ होता है।॥ ३९ ॥ ४० ॥ वैश्य युगमें प्रथम वर्षका नाम सोमव, २ शुभकृत, ३ क्रोधी, ४ विश्वावसु, ५ पराभा. इसका प्रथम और दूसरा पर्व मनाओंको प्रसन्न करनेवाला है. तीसरा वर्ष पहुत दोपोंका देनेराला है और शप दो संवत्सर समपली परन्तु पराभव वर्षमें आम, रास, रोग, पीडा और गोमानणाको पीडा दोती ॥१॥ ४२ ॥ नवम (सौम्य) युगमें प्रथम वर्षका नाम वंग, २ शोलक, ३ सौम्य, ४ माधारण, पञ्चम रोधकृत है. जिसमें कोलक और सौम्य वत्सर अत्यन्त शुमदा ॥४३॥ पूर्वग वर्षमै प्रनाओंको अत्यन्त कष्ट होता है. साधारण बत्सरमें साधारण घाट और तिमप रोता है और पञ्चम वर्ष जिसका नाम रोधात है, इससे सुन्दर दृष्टि और धान्यको सम्पत्ति होती है ॥ ४४ ॥ समेत जो दक्षम युग है, जिसके भएम का नाम परि- (४८) बारादीसंदिया। लसज्ञितं च ॥ ४५ ॥ परियाविनि मध्यदेशनायो नृपहानिर्जटमलमा अलसस्तु जनः प्रमादिसंज्ञे डमरं रक्तकपुष्पवीजनाराः ॥ ४६ ॥ तत्तर- लोकनन्दनो राक्षमः शवकरोडलस्तया। ग्रीष्मधान्यजननोऽत्र राक्षो पनरकप्रदोऽनलः ॥ १७ ॥ एकादरो पिङ्गलकालयुक्तसिद्धार्थरीदाः । तिश्च ॥ आये तु वृष्टिमहती सचौरा श्वासो हनूकम्पयुतश्च कासः । यत्कालयुक्तं तदनेकदोपं सिद्धार्यसंज्ञे बहवो रणाय । रोऽतिरोद्रः ६ दिष्टो यो दुर्मतिमध्यमवृष्टिकत्सः ॥ १९ ॥ भाग्ये युगे दुन्दुभि सस्यस्य वृद्धिं महतीं करोति । उद्गारिसंज्ञं तदनु क्षयाय नरेश्वराणां । वृष्टिः॥ ५० ॥ रतासमन्दं कथितं तृतीयं यस्मिन् भयं दंटिकतं कोषं पहुकोधकर चतुर्थ राष्ट्राणि शून्यीकुरुते विरोधः ॥५१॥ युगस्यान्त्यस्यान्त्यं बहुक्षयकारकं जनयति भयं वाद्विप्राणां रुपविलय उपचयकर विट्छुद्राणां परस्पहृतां तया कथितमखिलं पश्यदे यत्तद धावी, दूसरा प्रमादी, ३ आनन्द, ४ राक्षस, ५ अनल है. तिसमें परिधान वत्सरमें मध्यदेशका नाश, राजाको हानि, साधारण वृष्टि और अग्निका में है, प्रमादी वपमें लोग अत्यन्त आलसी होते हैं. उलट पुलट होता है. 2 फूलोंके वीजका नाश हो जाता है. आनन्दवर्ष आनन्दका देनेवाला और अनल वत्सरमें तय होती है. परन्तु विशेषता यह है कि राक्षस वर्षमें प्री- धान्य उत्पन्न होते हैं, और यनलवर्ष अमिकोपका दाता और नरकदाई है ॥ ४६ ॥ ४७ ।। एकादश ( अधि) युगमें १ पिंगल, २ कालयुक्त, ३ ४ रौद्र,५ दुमति ये पांच वर्ष होते हैं. इनमेंसे पहिले वर्षमें अत्यन्त वर्षा, पास और टोटीको कम्पायमान करनेवाली खांसी होती है। कालयुक्त वर्ष दोपकारी है। सिदार्थमें अनेक गुण होते हैं। रौद्रवर्ष अत्यन्त रौद्र और है और दुर्मतिवर्ष मध्यम दृष्टिका करनेवाला है॥५८ ॥ ४९ ॥ मग वारहवें युगके प्रथम वर्षका नाम द्वंद्वमि है, यह धान्यका अत्यन्त पदाने बदोपरान्त दूसरा उदारी नामक वर्ष (दूसरे मनसे रुधिरोगारी ) राजा पौर यसमान पृष्टि होती है। तीसरे वर्षका नाम रता है। इस वर्ष में इस यौर रोग होता है। चौपे सन्दका नाम सोप है। यह मोधकारी है , बार जनपदोंको शून्य पर देता है। इस मारहमें युगो पिछले वर्षका मापाटोकासाहता अ०९। सतः ॥५२॥ अकल्पांशुटिलः पृथुमतिः कुमुदकुन्दकुसुमस्फटिकामः । ग्रहहतो न यदि सत्पथपनी हतकिरोऽमरगुरुमनुजानाम् ।। ५३ ॥ इति श्रीवराहमिहिरकती वृहत्संहितायां बृहस्पतिचारोऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ अथ नवमोऽध्यायः। शुकचाराध्याय. नागपजेरावतवृपगोजरदपमृगाजदहनास्याः। अश्चिन्यायाः कैश्चित विभाः कमादीथयः कथिताः ॥ १॥ नागा तु पयनयाम्यानलानि पैतामहाविमास्तिसः। गोपीच्यामश्विन्यः पोष्णं वे चापि अदपदे ॥ २॥ जारव्यां श्रवणाव विमं च है, यह सयकारक है, माझणोंको भयदायी, खेतीके वलको बढानेवाले, पराये धनके हरनेवाले, वैश्य और शूद्रोंकी वृद्धि करता है. इस प्रकार संक्षेपसे साठ संवत्सरका समस्त फल कहा गया ॥ ५० ॥५१॥ ५२ ॥ देवताओंके गुरु वृह- सतिजी जो निर्मल फिरणवाले हों, स्थूलमूर्ति, कुमुद, कुन्दपुष्प वा बिल्लारे पत्थरकी समान कान्तिवाले हों किसी ग्रहसे भेदित न होकर श्रेष्ठ मार्गमें चलते हों तो मनु- प्योको हितकारी होते हैं ॥ ५३॥ इति श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां बृहत्संहितायां पश्चिमोचरदेदीयमुरादाबाद- वास्तव्यपंडितबलदेवप्रसादमिथविरचितायां मापाटीकायामष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥ कोई कोई पण्डित कहते हैं कि-अश्विनी आदि तीन तीन नक्षयोंमें एक एक वी होती है. यह वीथिये नी मागोंमें बांटी गई हैं। यथा,-१ नाग, २ गन, ३ ऐरावत, ४ पभ, ५ गो, ६जरगव, ७ मृग, ८ यज और९ दहन है।।१॥ किसीके मतसे स्वाती, भरणी और कृत्तिका नक्षत्रमें नागवीयि होती है. गज, ऐरावत और पम नामक जो तीन वीथि है, यह रोहिणीसे उत्तराफाल्गुनी तक तीन सीन नक्षत्रमें हुआ करती हैं. और अश्विनी, रेवती, पूर्वामाद्रपदा और उत्तरा- भाद्रपदा नक्षत्र में गोवापि हुथा करती है ॥२॥ श्रवण, धनिष्टा और शतमिषा नसभमें जारद्वी पाये होती है; अनुराधा, उपेष्टा और मूल नक्षत्र मृगतोपि होती है: इस्त, विशाखा और चित्रा नक्षत्रमें अनापोथि और पूपिाटा व रतगपादा १गतिके भनुसार पन्यविशेषका नाम दीपि है।
(५०) वाराहीसंहिता। मैत्रायम् । हस्तविशाखात्वाष्ट्राण्पजेत्यपाढायं दहना ॥ ३॥ तिन सस्तासां कमादुदङध्ययाम्यमार्गस्थाः । तासामप्युत्तरमध्यदक्षिणावति कैका ॥ ४॥ पीथीमार्गानपरे कथयन्ति यया स्थिता मार्गस्य । नमः- तारा याम्योचरमध्यमास्तद्वत् ॥५॥ उत्तरमार्गो याम्यादि निगदितो मध्यम भाग्यायः । दक्षिणमार्गोऽपादादि कैश्चिदेवं कता मार्गाः ॥ ६ ॥ ज्योतिपमा शास्त्रं विप्रतिपची न योग्यमस्माकम् । स्वयमेव विकल्पयितुं किन्तु , मतं वक्ष्ये ॥ ७ ॥ उत्तरवीयिपुः शुक्र सुमिमाशिवरुद्तोऽस्तमुदयं मध्यासु मध्यफलदः कष्टफलो दक्षिणस्थासु ॥ ८ ॥ अत्युत्तमोचमोन स- ध्यन्यूनमधमकष्टफलम् । कटतमं सौम्याद्यासु वीथिषु यथाक्रमं याद ॥ भरणीपूर्व मण्डलमृक्षचतुष्कं सुभिक्षकरमाद्यम् । बङ्गाङ्गमाहपबाहिककति नक्षत्रमें दहना वीथि हुआ करती है ॥ ३ ॥ इस प्रकार सवाईस नक्षत्रमें नौ = होनेपर मत्येक वीथिही तीन वार होती है, इस कारण इन सव वीथियों में तीन वीथि सूर्यमार्गके उत्तर, मध्य और दक्षिणमार्गमें विराजमान हैं, फिर = एक एक ययाक्रमसे उत्तर, मध्य और दक्षिणपथमें विराजमान हैं. जैसे तान - वीथि हैं; तिनमें प्रथम उत्तरमार्गस्था, दूसरी मध्यस्था और तीसरी दक्षिणमा स्थित है ॥ ४ ॥ कोई कोई महात्मा कहते हैं कि सब नक्षत्रोंके नक्षत्र मार्ग योग तारागणे उत्तर, मध्य और दक्षिणभागमें जैसे विराजमान हैं, समस्त वी- मार्गभी वैसेही विराजमान हैं ॥५॥ किसी किसी पंडितके मतसे भरणीसे उ- मार्ग, पूर्वाफाल्गुनीसे मध्यममार्ग और पूर्वापादास दाक्षणमार्गका आरम्म होत ॥ ६ ॥ ज्योतिष आगमशास्त्र अर्याव सन्देहपूर्वक किसी वातकी मीमांसा क मेरी ( मुक्त सरीखे आदमीको ) सामर्थ्यसे बाहर है, इस कारण (ऋपिलोग किसीके मतको दोप देकर या किसीके मतको पोषकता न करके ) वहुताके मत मट करुंगा ॥ ७ ॥ जिस समय शुक्राचार्य उत्तरखीयमें विराजमान होकर उ या अस्त होगे तपही मुभिक्ष या मंगल होगा. मध्यवीथिमें होनेसे मध्यम और दक्षिणवीषिमें होनेसे कष्टकारी फल होता है ॥ ८॥ आर्द्रा नक्षत्रसे आर- करके मृगशिरावक जो नौ वीथिये हैं जिनमें शुक्रका उदय या अस्त होनेसे या असे अत्युत्तम, उत्तम, उन, सम, मध्य, न्यून, अधम, कष्ट और कष्टतम उत्पन्न होता है ॥ ९ ॥ भरणीमे लेकर चार नक्षय जो मण्डल अर्थात् वीयि फिम नक्षत्रमें कितने योगतारे हे सो नक्षत्रगुणाध्याय कहेंगे।
मापाटीक्यसाहिता १०९। देशेषु भयजननम् ॥ १. ॥ अनोदितमारोहेग्रहोऽपरो यदि सितं ततो हन्यात् । दानशूरसेनकयौधेयककोटिवर्पपान् ॥ ११ ॥ चतुष्टयमाथि द्वितीयममिताम्पुसस्पसम्पत्त्ये। विमाणामशुभकरं विशेषतः कूरचेष्टानाम् ॥१२॥ अन्येनावामान्ने स्टेच्छाटषिकाधजीविगोमन्तान् । गोनर्दनीचशदान् वैदेहा- भानयः स्पृशति ॥ १३ ॥ विचरन् मयादिपञ्चकमुदितः सस्यमणाशरुच्छुकः। शुनस्करजयनननो नीचोन्नतिसङ्करकरच ॥ १४ ॥ पित्र्यायेखष्टन्धो हन्त्यन्ये नाविकाञ्चपरशूदान् । पुण्डापरान्त्यतिकवनवासिद्रविडसामुद्रान् ॥ १५॥ स्वात्यायं भरितयं मण्डलमेतचतुर्थमनयकरम् । ब्रह्मक्षासुभिक्षाभिवृद्धये मित्रदाय ॥ १६॥ अवामान्ले मृत्युः किरातभर्तुः पिनटि चेक्ष्याकून् । उसकी प्रथम वीथिमें शुक्रका उदय या अस्त होनेसे मुभिक्ष होता है; परन्तु अंग, बंग, महिप, याहिक और फलिंग देशमें भप होता है ॥ १० ॥ इस प्रथम मण्ड- लमें उदित शुक्राचार्यको ऊपर जो कोई मद होय ती मद्राध, शूरसेनक, यौधेयक यौर कोटिवर्प देशके राजाका नाश होता है ॥ ११ ॥ आसे लेकर जो चार नक्षत्र हैं उनको दुसरा मंडल कहते हैं. (इनमें शुक्रका उदय या अस्त होनेसे ) इससे यहतसा जल पर्पता है और यह धान्य सम्पत्तिका निमित्त है. परन्तु प्राह्मणोंको अशुभ होता है, विशेष करके जो लोग यूर चेष्टावाले हैं उनकी विशेष हानि है ॥ १२ ॥ दूसरे मंडलवाले शुक्रको यदि कोई आक्रमण करे तो म्लेच्छ, आटविका, यधजीवी अर्थात् बनजारे इत्यादि, गोमन्त (कुचोंसे आजीविका रखनेवाले), बहुतसी गाये रखनेवाले, नीच, शूद्र और विदेहदेशक रहनेवालोंको अनीति स्पर्श करती है॥१३॥ मघासे लेकर विप्रातक पांच नक्षत्रमें घूमते २ यदि शुक्राचार्य उदय हो तो नमस्त धान्यका नाश होता है. क्षुधामय और चोरमय होता है. नीचोंको उन्नति और वर्णसंकरजातिको उत्पति होती है ॥ १४ ॥ इन मधादि तीसरे मंडलके दैत्यगुरु यदि और किसी ग्रहसे रुक जाय तो पेड़ों के समूह, शबर, शूद्र, पुण्ड, पश्चिमको सीमाका अन्न, शूलिक, वनवासी, द्रविड, सामुद्रके पुरुषोंका नाश हो जाता है ॥ १५ ॥ स्वाती, विशाखा और अनुराधा नक्षत्रमें चौथा मण्डल होता है. इसमें शुक्राचार्य के मयाण करनेसे अभय होता है, ब्राह्मण और क्षत्रीजातिके लिये समिक्ष होता है, परन्तु मित्रोंमें परस्पर भेद हो जाता है ॥ १६ ॥ यह चौथा मंडल आक्रान्त हो जाय तो किरातराजाकी मृत्यु होती है. और इशाकुवंशवाले और प्रत्यन्त का अन्तिदेशके रहनेवाले, पुलिन्द, तंगण और शूरसेनवासी लोग
मुसी होते है, परन्तु कोई स्थान समय होता है. इसमें शुक्रका आरोहण होनेपर
शूलिका, गान्धार और अवन्तीके रहनेवाले लोग पीडित होते हैं; विदेह नरपतिश
नाश और प्रत्यन्तदेशके यवन, गक और दासलोगोंकी वृद्धि होती है ॥२०॥२१॥
त्रादि जो दो मण्डल होते हैं, यह दोना मण्डल पश्चिम दिशा में होनेसे शुभकारको
। २२ ।। सूर्य अस्त होनेके पहिले
गुटके हाटे आनसे मय होता है, सारे दिन दिखाई देनेसे क्षुधा और रोग होता है,
- याये दिन दिखाई देनेरो वा चन्द्रमाके साथ दिखाई देनेसे राजालोगोंका, मेनारा
और नमावा भेद होना ॥ २३ ॥ कृत्तिानक्षत्र भेदकरके शुक्राचार्य गमन को
(५२)
वाराहीमंहिता।
प्रत्यन्तावन्तिपुलिन्दतङ्गग्णाञ्छूरसेनांश्च ॥ १७ ॥ ज्येष्ठाय पञ्चकै शुनकर-
गदं प्रवाधयते । काश्मीराश्मकमत्स्यान सचारदेवीनवन्तींश्च ॥ १८ ॥ आगे-
हेवामीरान् द्रविडाम्बष्ठत्रिगर्तसौराष्ट्रान् । नाशयति सिन्धुसीवीरकांश्च काशीध-
रस्य वधः ॥ १९ ॥ षष्ठे पण्नक्षत्र शुभमेतन्मण्डलं धनिष्ठायम् । भूरियनगो-
' कुलाकुलमनल्नधान्यं क्वचिद सभयम् ॥ २० ॥ अत्रारोहे लिकगान्धारा
न्तयः प्रपीड्यन्ते । वैदेहबधः प्रत्यन्तयवनशकदासपरिवृद्धिः ॥२१॥ अपरयां
स्वात्यय ज्येष्ठाद्यं चापि मण्डलं शुलदम् । पित्र्याचं पूर्वस्यां शेपाणि थयोद
फलदानि ॥२२॥ दृष्टोऽनस्तगतेऽर्के भयलत क्षुद्ररोगलत समस्तमहः । अर्धदिक
च सेन्दुनृपवलपुरभेदकृच्छुक्रः॥ २३ ॥ भिन्दन् गतोऽनलक्ष कूटातिका
न्तवारिवाहाभिः । अव्यक्ततुङ्गानना समा सरिनिर्भवति धात्री ॥२४॥
पोपित होते हैं ॥ १७ ॥ ज्येष्ठासे लेकर श्रवणतक जो पांच नक्षत्र है तिन
पांचवा मण्डल है, इसमें क्षुधा, चोर और रोगको बाधा होती है. जो भृगुके पु
इसमें आरोहण करें तो काश्मीर, अज्मक, मत्स्य, चारुदेवी और अवन्तीदेश
रहनेवाले मनुष्य, आभीरजाति, द्रविड, अम्बष्ट, विगत, सौराष्ट्र, सिन्धु और सौ
रदेशके पुरुष और कामोरके राजाका विनाश होता है ॥ १८ ॥ १९ ॥ धनिष्ठा
लेकर अश्विनीतक जो छ. नक्षत्र है तिनको छठा मंडल कहते हैं, यह शुभकार
है. इसमें समस्त लोग बहुतसे धन धान्य और गायढोरोंसे युक्त होकर अत्यं
जिन छः मण्डलोंका वर्णन किया गया तिनमें साती नक्षत्रादि और ज्येष्ठान,
और मपानावादे जो एक मण्डल है, वह पूर्वदिशा में होनेपर अत्यन्त शुभदायी
₹षमण्डल ययोक्त फलके देनेवाले है
.
दो पुष्टातिवाल जराशिमादिनी नदियों के द्वारा पृथ्वी ऊँच नीचे स्थान
कातिर ममान हो जाते हैं अर्थात् पदी मारी याद आती है ॥ २४ ॥
मापाटीकासहिना अ०९। 'मानापत्ये शकटे सिने सत्देव पातकं वसुधा केशास्टिास्टपता कासालमित्र वतं धने ॥२५॥ सोम्योरगतो रससस्पसङ्ख्यायोखना नमुद्दिष्टः आगतातु कोशलकलिङ्गाहा सलिलनिकरकरः ॥ २६ ॥ अश्मयाणां पुनर्वसुस्ये मिते महाननयः। पुष्ये पुष्टा दृष्टिविद्याधरगणविमर्दश्च ॥२७॥ आक्षेपासु भुजङ्गमदा- रुणपीडाबहमारकः । जिन्दन मयां महामात्रापरिदृष्टिकरः ॥२८॥ भाग्ये शयरपुलिन्दमध्वंसकरोडम्युनिवहमोक्षाय । आर्यम्णे कुरजाइटावा- लमः सलिलदायी ॥ २९ ॥ करियचित्रकराणा हात पीटानलम्य च निरोधः । कूपरुदण्डनपीडा चित्रास्ये शोजना वृष्टिः ॥३०॥ मानी जातवृष्तियनिमा- विकान स्पृशत्पनयः । ऐन्दानेऽपि नुवृष्टिगिजांच अयं विजानीरात ॥ ३३ ॥ शुक्रमे रोहिणीनक्षत्र का शरटे भिन्न होय (पापी लोग जिस प्रकार पाएका माय- वित करने के लिये कापालिक मन धारण करने गेही) नीची और आस्थयोंके टुफलामे अनेक रंगोको धारण फरफ मानी पाप करें। उपरान्त फपाल मत धाण परलो अर्थात अत्यन्त मरी ना॥ २५ ॥ उशना मृगशिरा नक्षत्र में आने नौ जल और धान्यका नाश होय । मानसमें गमन करे नी कोमल और पलिंग देशका नाश होता है। पान पटि पलानी ॥२६॥ पुनम नामें शुक्राचार्य के गमन करनेपर भामर, भीर टिकाये. रहनेवाले मनुष्योंमें अत्यन्त अनाति आती है। पुष्प न गमन पारनेर भनेक वृष्टि होती है। परन्तु विशामें विमई मा सरकार ॥२७॥ माया नसमें सूर्यो गमन यरनेसे सपंभर और अत्यन्त पीरा होता है । सपथ भेद कानेपर हस्लिपक लोगोंधो दुष्ट परना है और अत्पल वृष्टि होता है.th वाफाल्गुनी नक्षत्र शुकरे भिन्न होय तो अपर पुलिन्दगग नागो भार है। गृष्टि पहन होती । उसराफाल्गुनी भिन्न होय तो ती भोर माग र पांचाल देशका नाश हो जाता ॥२९॥ पदिस्त नार गुरमे भिर में भौरव और चित्रहरीको पौराहोती है, जलन वर्षता । विधानसर रमे भिर दोप मी परक और मानोंको पीरा होती शोमतीनों है ॥ ३० ॥ सानी नाम म. आर मा दा हो और हम, हनियर "पू समद भागेदय माया योनिमः PRIMARE परे।
(५४) वाराहीसंहिता। मैत्रे क्षत्रविरोधो ज्येष्ठायां क्षत्रमुख्यसन्तापः। मौलिकभिपजां मले विष्वपि चते- प्वनावृष्टिः॥ ३२ ॥ आप्य सलिलजपीडा विश्वेशे व्याधयः प्रकुप्यन्ति । श्रव- णे श्रवणव्याधिः पापण्डिायं धनिष्ठासु ॥ ३३ ॥ शतभिपजि शोण्डिकानामनै- कपे द्यूतजीविनां पीडा । कुरुपाञ्चालानामपि करोति चास्मिन् सितः सति- लम् ॥ ३४ ॥ अहिर्बुध्न्ये फलमूलतापक्रयायिनां च खत्याम् । अभिन्या हयपानां याम्ये तु किरातयवनानाम् ॥ ३५ ॥ चतुर्दशे पञ्चदशे तथाटने तमिस्रपक्षस्य तिथी मोः सुतः । यदा बजेद्दर्शनमस्तमेति चा तदा महीवारि- मर्याव लक्ष्यते ॥ ३६ ॥ गुरुगुश्चापरपूर्वकाष्ठयोः परस्परं सप्तमराशि गौ यदा। तदा मजा रुग्मयशोकपीडिता न वारि पश्यन्ति पुरन्दरोज्झितम् ॥ ३७॥ यदास्थिता जीवबुधारसूर्यजाः सितस्य सर्वप्रपथानुवर्तिनः । नृगनाम- विद्याधरसङ्गरास्तदा भवन्ति वाताश्च , समुच्छ्रितान्तकाः ॥ ३८ ॥ न मित्रनावे सुहृदो व्यवस्थिताः क्रियासु सम्यङ् रता द्विजातयः । न चान्यमप्यम्बु ददाति वासयो भिनत्ति पजेण शिरांसि भूभृताम् ॥ ३९॥ नारिक लोगोंको अत्यन्त अनीति स्पर्श करे । विशाखामें शुक्र होय तो सुदृष्टि और मनियोंको मय होता है ॥ ३१ ॥ अनुराधामें क्षत्रीवध, ज्येष्ठामें प्रधान क्षत्रियों मुन्नार, मूलमें प्रधान वैद्योंको पीडा होती है, और जितने दिनतक इन वीन न त्रोंमें गुरु रहना है तपतक अनावृष्टि होती है ॥ ३२ ॥ जो पूर्वापाढा नक्षत्र गु गमन करे नौ जलगे उत्पन्न हुए जीवोंको पीडा होती है, उत्तरापाटामें व्या भागने कीहा और धनिष्टा पाखण्डियोंको भय होता है ॥ ३३ ॥ शतभिः नक्षत्र में गुगका गमन होय ती कटवारलोगोंको पीडा होती है, पूर्वाभाद्रपद भारियोंकी, कुपांचालीको पीडा और दृष्टि होती है ॥ ३४ ॥ उत्तरामाद्रपद पन और महामनी में पदानिक, अभिनीमें अधपालक और मरणीमें किरान पान रोगको नाप होता है ॥ ३५ ॥ कृष्णपक्षको चतुर्दशी पञ्चदशी या अर्थ तिदिन होता रदप या अम्न होय तो पृथ्वापर यदुतही जल वर्षता है ॥ ३५॥ यदे एक और गुरु पृथिममें परस्पर सानवी शॉप तो गेग और मापने प्रशासन अन्यन्न पीडित रोते हैं, गृष्टि नहीं होती है ॥ ३७॥ यह हर, मंगल और नान यह मम ग्रह यदि शुरके यागेके मार्ग पर म्दुर, म यो विषय में गुट होता है, और यायुमै नाश होता है, ब मापाटीकासाहिता म०९। निथरे म्लेच्छपिडालकुमराःसरा महिन्योऽसिनधान्पशुकराः। पुलिन्दशुदाम सदक्षिणापथाः क्षयं वजन्त्यक्षिमरुद्गदोदवः॥४०॥ निहन्ति शुकः क्षितिजेड- अतः मना हुताशशचक्षुदवृष्टिनस्करः। चराचरं व्यकमयोत्तरापथ दिशोऽनिवि- धुदजसा च पीडयेव ॥ ४५ ॥ बृहसती हन्ति पुर स्थिते सितः सित समस्तं द्विजगोसुरालयान् । दिशं च पूर्ण करकाजोऽम्युदा गले गदा भूरि भवेच शारदम् ॥ ४२ ॥ सौम्पोऽस्तोदययोः पुरो रसुतस्यावस्थितस्तोपरुद् रोगान पिचजकामलां च कुरने पुष्णाति च प्रेमिकम् । हन्यात मनजितामि- होषिकभिपमझोपजीपान हयान् वैश्यान गाः सह वाहनेनरपतीन् पीतानि पधादिशम् ॥ १३ ॥ शिसिनयमनलाई शत्रकोपच रके कनकनिकपगौरे व्यापयो देत्यपूज्ये। हरितकापिलरूपे सासकासप्रकोपः पतति न सलिलं खाद- लोग परस्पर मिप्रमाव नहीं रखते, दिनाति लोग अपनी क्रियाको छोड़ देते हैं, इन्द्र साधारण जलभी नहीं पता वरन व गिराकर पर्वतोंके मस्तक फोड देता है ॥ ३८॥ ३९ ॥ जय शनैश्वर शुक्रके आगे चले तो म्लेच्छजाति, मिलावजाति, हाथी, गधा, भैस, काले धान, शूकर, पुलिन्द जाति, शूद्रगण और दक्षिणदेश, नेत्र और वायुसे उत्पन्न हुए रोगोंसे नाशको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ४०॥ याद शुकके आगे मंगल गमन करता होय तो अग्नि, शख, क्षुधा, अष्टि और तस्करोंसे समस्त प्रजाको पीडा होती है, उत्तर दिशा नाशको माप्त हो जाती है, और अमि, बिजली और रिसे सब दिशा पीडित होती हैं ॥४१॥ शुक्रके भागेको मार्गमें जो वृहस्पतिका गमन होय ती समस्त मधुर पदार्थ, मामण, दोर, देवताओंके स्थान और पूर्वदिशा नाशको माप्त हो जाती है, मेघ ओले परसाते हैं, सब लोगोंके गलेमें पीडा होती है और शारदीय समस्त धान्य उत्पन्न होते हैं॥४२॥ शुभके उदय या अस्तकालमें शुक्रके भागेके मार्गमें जब बुध रहता है तय वर्षा और रोग होते हैं, परन्तु निसमें पिससे उत्पन्न हुए रोग तथा कामला रोग अधिक होता है, ग्राम में उत्पन्न होनेवाले सब द्रव्य अधिकाईसे उत्पन्न होते हैं, संन्यासी, अमिहोत्री, वैध, नृत्य आजीविका करनेवाले, अश्व, वैश्य, गौ, वाह- नोके साथ राजा, पीले वर्णके पदायोंका और पश्चिम दिशाका नाश हो जाता है ॥ ४३ ॥ जिस समय अमिको समान शुरुका वर्ण होय तर अमिमप, रक्तवर्ण होप नौ शसकोप और कसोटोपर घिसे हुए सुवर्णको रेखाकी नाई गौरवणं होय तो च्याधि होती है, यदि शुक्र हरित और कपिलवर्ण होप नौ दमा और सांसोका को मयंका पुत्र शनि श्राण, स्वाती, हस्त, आ, भरणी और पूर्वाफाल्गुनी वाराहीसंहिता। स्मरुशासितामे ॥ ४४ ॥ दधिकुमुदशशाङ्ककान्तिमृद स्फुटविकसत्किरणो बृहत्तनुः । सुगतिरविकृतो जयान्वितः कृतयुगरूरपकरः सिताद्वयः ॥ ४५ ॥ इति श्रीवराहमिहिरकतो वृहत्संहितायां शुक्रचारो नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ अथ दशमोऽध्यायः। शनैश्चरचार. श्रवणानिलहस्ताा भरणीभाग्योपगः सुतोऽकस्याप्रचुरसलिलोपगूढां करोति धात्री यदि स्निग्धः॥१॥अहिवरुणपुरन्दरदैवतेषु सुक्षेमकन्न चाति जलम् । सादृष्टिकरो मूले प्रत्येकमपि वक्ष्ये ॥२॥ तुरगतुरगोपचारककविवैद्यामात्यहाई- जोऽश्विगतः । याम्पे नर्तकवादकगेयज्ञक्षुम्नौरुतिकान् ॥३॥ बहुलास्थे पीड्यने सौरेऽम्युपनीविनश्रमूपाश्च। रोहिण्यां कोशलमद्रकाशिपाञ्चालशाकटिकाः॥४॥ रोग होता है, और भस्मकी समान रूखा या काला रंग होय तो आकाशसे वा नहीं होती ।। ४४ ॥ दैत्योंके गुरु शुक्राचार्य जव दही, कुमुद या चन्द्रमा समान शान्तिवाले हों, कांति स्वच्छरूपसे झलकती होय, किरणें फैली हुई हो। उघस गानेगटा, विकाररहित और जययुक्त होय तो सय प्राणियोंके लिये माने गतयुगदी आ जाता है ॥ ४५ ॥ इति श्रीरयदमिदिराचार्यविरचितायां पढ़त्महितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादाबाद- नन्य-पडितपठोपमादामेश्रविरचितायां भाषाटीकायां नवमोऽध्यायः ॥५॥ वना और नमा गितमान होकर मनोहर वर्णवाला होय नौ पृथ्वीपर पहुनही जल ॥ १ ॥ भोपा, गमिपा वा ज्येष्टा नसमें शनि विचरण को तो मुमंगर होता है, मन्दल वा नहीं होती। मूल नसमें विचरण करे तो शुधा, मममय या होती है। यह नो माधारण फल कहा गया अब प्रत्येक नक्षत्रमें दानि चान बग्ने जो फल होता है वह कहा जाता है ॥२॥ शान अभिनी नापने अदा को नो यक्ष, यभमादी, कार, वैद्य और मणियोंकी हानि होती है। ने चिन को नो नापना, बनानाले गानेशले और छोटी नारी काल पण हान होता है॥३॥ पनिका नामें धी र मार बागानों और गालोगोशे पीती है।
-- मापारीकासहिता अ० १०॥ मृगशिरासे पत्सयागयजमानार्यजनमध्यदेशाध । रोबस्थे पारतरामउनेलिकर जरुचीराश्च ।। ५॥ आदित्ये पञ्चनदमत्यन्तसुराष्ट्रसिन्धुसौवीराः । पुष्ये घाण्टि- रकोपिकपवनयणिक्तिरकुसुमानि ॥ ६॥ सा जलरुहसाः पित्र्ये पादी- कचीनगान्धाराः । शूलिकपारतवैश्याः कोठागाराणि वणिजश्च ॥ ७ ॥ भाग्ये रसपिकषिणः पण्यास्त्री कन्यका महाराष्ट्राः। आर्यम्णे नृपगुडलवणनि- अका धूनि तक्षशिला ॥ ८॥ हस्ते नापितचाकिकचौरभिपसूचिकविषयाहाः। बन्धक्या कौशलका मालाकाराध पीच्यन्ते ॥ ९ ॥ चित्रास्थे प्रमहाजनले. सकचित्रज्ञाचित्रवाण्डानि । स्वाती मागधवरदूतसूतोतप्नुवनटाद्याः १० ॥ ऐशमाएये प्रेगर्तचीतकोलूतकुङ्कुम लामा । सस्यान्यथ माअिष्ठं की च रोहिणी नक्षत्रमें शाने विराजमान होय तो कोशल, मद्र, काशी, पांचालदेश और उकडासे जीविकाका निर्वाह करनेवाले पुरुपोंको पीडा होती है ॥ ४॥ मृगशिरा नक्षत्रमें शाने होय तो वत्सदेश, याजक, यजमान आर्यपुरुष और मध्य देशके -लोगोंको पीडा होती है। आदी नक्षत्रमें शनि होय तो गमठदेश, नेली, धोबी, रंगरेज और घोर अत्यन्त पीदिन होते हैं ॥ ५॥ पुनर्वसु नक्षत्रमें हानि होय तो पंजाब, मत्यन्त, मुराष्ट्र, सिन्ध और सौवीर देशको अत्यन्त पीडा होती है। पुष्य नक्षत्रम शनिका सहवास होप तो घंटा बजानेवाले, घोपिक (दंढोरा फेरने वाले ), यवन, वणिक, खल और सब पुष्पोंको पीडा होती है॥६॥ आश्लेषा नराधम मानि होय तो पद और सपाको मघा नक्षत्र में होय तो पाहीक, चीन, गान्धार, शूलिक, पारत, वैश्य, धनागार और पनियों के लिये वित होता है ॥७॥ पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र मानि रहता होय तो रस बेचनेवाले लोग, वेश्या, कन्या और महाराष्ट्रदेशको विघ्न होता है। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में शनि होय तो राजा, गुड, लवण, भिक्षु, जल और तक्षशिला नगरीको विग्न होता है ॥ ८॥ हस्त नक्षत्रमें शाने होय तो नाई, चाक्रिक (चक्रशिल्पी), चोर, वैद्य, दर्जी, दिपनाह ( हाथी पकडनेवाले ), बन्धकी, कौशली और माला बनानेवालोंको पीडा होती है ॥ ९ ॥ याद शनि चित्रा नक्षत्र में होय तो सी, लेखक, चित्रविधाको जाननगालों ( मुसो- विर) को और अनेक प्रकारके द्रव्य पीडाको माप्त होते हैं। यदि स्वानी नक्षत्र शनि होय तो मागध, दूत, चर, साराष; नावपर चलनेवाले और नटादिकोको पौडा होती है ॥२०॥ जो विशाखा नक्षत्रमें शनि विचरण करता हो तो त्रिगर्त, चीन और पुलूत देश, कुमकुम, लाख, धान्य, मजीठ और कुमुम्भ सयको - इम्यूनतम वग ग्ल, पण थोर फलोगे मुनि आगम्यती की अदाग नातामा जल, मेगारिवानि मगा। rani.oानी पापमयादशमान,उता. (७०) वाराहीसंहिता। श्रूयताम् ।। ७ ।। उदये च मुनेरगस्त्यनानः कुसमायोगमलप्रदूषितानि । हर- यानि सतामिव स्वभावात् पुनरम्बुनि भवन्ति निर्मलानि ॥ ८॥ पार्भवाधिष्टि- तचक्रवाकामापुष्णती सस्वनहंसपंक्तिम् । ताम्बूलरतोत्कपितापदन्ती विजाति योपेव सरित्सहासा ।। ९ ।। इन्दीवरासन्नसितोपलान्विता सरिद्धमत्सट्पदीकि- पिता । नभुलताक्षेपकटाक्षवाक्षणा विदग्धयोपेव विभाति सस्मरा ॥ इन्दोः पयोदविगमोपहितां विद्युतिम् । द्रष्टुं तरङ्गन्दलया कुमुदं निशासु । उन्न तयत्यलिनिलीनदलं सुपक्ष्म वापीविलोचनमिवासिततारकान्तम् ॥ १॥ नानाविचित्राम्बुजहंसकोककारण्डवापूर्णतडागहस्ता । रवैः प्रभृतः कुसुम- फटभ जपच्छनीवार्यमगस्त्यनाने ॥ १२॥ सलिलममरपातयोज्यिातं यदर- परिवेष्टितमूतिभिर्भुजङ्गः । फणिजनितविपामिसम्प्रदुष्ट अति शिवं तदगस्त्य- दर्शनेन ॥ १३ ॥ स्मरणादपि पापमपाकुरुते किमुत स्तुतिभिर्यरुणाङ्गमः। पगे॥७॥ जिस प्रकार पुरे लोगों के समागमरूप मलसे दूपित हृदयवाला साधु दान करनेही स्वमावरोही निर्मल हो जाता है वैसेही वर्षाकालीन मट्टीके योगासन पगार मितामा जल अगस्त्यमुनिका उदय होतेही स्वभावसेही निर्मल हो जाना ॥ ८॥ दिग प्रकार मुन्दरी लीक हँसने के समय ताम्बूलरागरंजित अतएव र मोटापरके मागमागमें भेनदन्तपांति पिराजमान होती है, तैरोही अगरय और हम दोनों पाभने यधिमित दो लालवर्ण चक्रयाकोंके वीचमें विसनमान, FEAT गायोग नदियां शोभायमान होती ॥९॥ अगस्त्य मुना उपरवी नदियां नीलामक निकटस्थित शेतपद्मयुक्त और तिसके ऊपर मामा पानी नामित होना मानो मा साथ कटाक्षो चलाने पत्री र मदिरापाशी गमान गोमायमान होती है ॥ १०॥ नरक कार नाग कानवाली, दीपिका कामिनी रात्रिकालमें मेर परेको वर पटमारी विभूतिको दर्शन करने के लिये मानो अन्न व अगदन अनुदान पानांपाद श्रेष्ट पलादार नेत्रोंको सोलनी !!" अंग का नंदा पर, इंग, पाक और कारण्यादिदाग पगिता, मापाटीकासहिना अ० १२ । (७१) मुनिभिः कथितोऽस्य स्थाविधिः कथयामि तथैव नरेन्द्रहितम् ॥१४॥ संस्-याविधानाच प्रतिदेशमस्य विज्ञाय सन्दर्शनमादिशेजाः। तचोजयन्यामग- तस्य कन्या भागः स्वरास्य फुटभास्करस्य ॥ १५॥ ईपरभिन्नेऽस्परमि- नालंशेऽन्धकारे दिशि दक्षिणस्याम् । सांवत्सरावेदितदिविभागे भूपोऽधमन्या प्रयतः प्रयच्छेव ॥ १६॥ कालोवः मुरभिभिः कुसुमैः फटश रबंध सागर- भः कनकाम्बरेच । धेन्वा वृषेण परमानयुतश्च भयदध्यक्षतः मुभिभूप. पिलेपनच ॥ १७ ॥ नरपतिरिममय प्रधानो दधानः प्रविगतमददोषी मिनि- नारातिपक्षः। भवति यदि च दवाव सम पाणि सम्यग् जलनिधिमनायाः णकुमार अगरस्यजीको स्वान करनेका फल हम कहांतक. बरे, मुनिलोगों ने उन अगस्त्यजीके अर्थको विधि जिस प्रकार यही?, गगामी दिनार व्यवस्था अप कही जाती है ॥ १४ ॥ पण्डितलोग गणितक नियमानुसार अगरय. जाँका उदय गिनयर सब देशोंमें आदेश करेंगे। जप सर्पका स्पष्ट पार सान मंस यम अर्थात् ४.२३ चार राशि २३ अंग दोगा । (या प्रायः मामा- राके २२-२३-२४ दिनतक होता है) तम जयिनीनगरी अगायमुनिया पक्ष्य होगा॥ १५ ॥ सूर्यनारायणकी किरणोंसे जय रात्रिका यार एस पर नागरी प्राप्त हो जाता है (मोरको पेला) तम देवास मशिन दिशामा दिमाग (" यह दक्षिण दिशा दे, इस दिशा में भगवान अगररयगोरो मर्मदा इस प्रकार देवली आज्ञा पाय ) रानाको उचित है कि दक्षिणदिवा पर समए अर्थात् शरत्कालके पुण, पाल, समुद्रकं निकले हुए गन, पुरणं, म, धेनु, धूपम, परमामयुक्त मध्य, दरी, अक्षत, मुगन्धि, धूप और पन्दताया गिर्यत मार्य पृथ्वी ऊपर देय ॥ १६॥ १७ ॥ यदि राजा प्रदान कर प्रकार भाप धारण करे तो निरोग र समरत आधु मोरी और । भीर इसी प्रकारले सात सपनेश मार्य देवा रहे तो समदरगना मार स्वामी बार ३" अशीतिमांगयांग्यायामगायो मिानान्तर मना भादमिपम दिल देना हो गया. परिवाया नए । समिति SEE अपोदार"ri, TIPS भूगामापावित्रहा इन भनी र महासमा म . शप या है 1 मिन्त। .
चक्रवर्ती हो जाय ॥१८॥ जोब्राह्मणलोग जितनी वस्तु मिले उससेही अगस्त्पनी ययं दे तो चारों वेदोंके अधिकारी हों और सुन्दरी स्त्री व पुत्रलाम करे। वानों भी यदि ययालन्ध वस्तु ( अर्थात् जितनी वस्तु मिले ) उससे अगस्त्यको आर्य है नो गाय टोर और अधिक धनको प्राप्त करते है ॥ १९ ॥ अगस्त्य नक्षत्र पर परुप अर्यान् कसा दिखाई दे तो रोग होता है, कपिल वर्ण होनेसे अनावृष्टि, धूम वर्ण होनेसे गायटोरोंगा अशुभ, स्फुरण अर्थात् कम्पनशाली होनेसे मय, मनीट समान रंग होनमे सुधा और युद्ध और सुक्ष्म होनेसे नगरका रोध (रुकना) बनाली होकर मय थोर रोगरहित जनांसे परिपूर्ण हो जाती है ॥ २१॥ प. बाम्पनी उल्का या केतुमे आदत होय तो सुधामय और मरी पहनी है, जर (७२) वाराहसिंहिता स्वामितां याति तमः ॥ १८॥ द्विजो यथालानमुपाहताः प्रानोति वेदशन प्रमदाश्च पुत्रान् । वेश्यश्च गां आरिधनं च शूद्रो रोगक्षयं धर्मफलं च सर्वे ॥१९॥ रोगान् करोति परुषः कपिलस्त्ववृष्टिं धम्रो गवामशुभकत स्फुरणो जयाप । माजिठरागसदृशः क्षुधमाहवांश्च कुर्यादणुश्च पुररोधमगस्त्यनामा ॥ २० । शातकुम्नसदृशः स्फटिकाजस्तर्पयन्निव महीं किरणोधेः । दृश्यते यदि ततःपड राना पुर्नवत्यत्नयरोगजनान्या ॥ २१ ॥ उल्कया विनिहतः शितिनाव शुदयं मरकमेव च धत्ते । दृश्यते स किल हस्तगतेऽर्क रोहिणीमुनगये स्तमुपैति ।। २२॥ इति श्रीवराहमिहिरकती बृहत्संहितायमगस्त्यचारो द्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥ (मिटौर) को गमान गुभ्रवर्ण होकर किरणोंमे पृथ्वीको तृप्त करे तो पृथ्वी पहा गेहीमें मयं गमन को नो मय देगोंमें अम्न हो जाते हैं ।। २२ ।। इति श्रीररामिविगचायरिचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादापारा ग्दव्य-संहितालदेोपमादमिश्ररिनिनाया मापाटो द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥ मागण्ययोदयोरपि मम मातु कायगापरः ।" महत्परः।
- मापाटीकासहिना अ० १३ । अथ त्रयोदशोऽध्यायः। सप्तपिचार. सकावलीन राजती ससितोत्सलमालिनी महामेव । नायवतीय च दिग्पः कोररी माभिमुनिभिः ॥ १॥ भुवनायकोरदेशान्नारिनतावोत्तरा दिया। यभारमहं नेपां कपिप्ये वृद्धगर्गमतात् ॥ २ ॥ आमन्मरासु मुनयः शामति पुथ्वी युधिष्ठिरे नृपती । पद्विकपञ्चविद्युतः शककालम्लन्य राजय ॥ ३ ॥ एककस्मिन्नक्षे शतं शतं ते चरन्ति वणिाम । मागुत्तरतीने मदोदपन्ने ससाध्वीकाः ॥ ४॥ पूर्व भागे भगवान मरीचिरपरे स्थितो मिठोऽम्माव । -तस्याङ्गिरास्ततोऽनिस्तस्यासनः पुलस्त्यच ।। ५॥ पुलहः करिति भगवाना- जानुक्रमेण पूर्वाधाः । तत्र वसिष्टं मुनियरमुपामितारन्धती साध्वी ॥ ६ ॥ उत्काशनिधूमाहता विवर्णा विरश्मयो हस्याः । हन्युः व स्वं यग विपुला स्निग्धान तहृदये ॥ ७ ॥ गन्धर्वदेवदानवमन्त्रीपपिमित्यक्षनागानाम । शेतकमलको माला पहिरं कामिनीको ममान उत्तर दिया, जो समर्पिमण्डलगे, एक लडीकी माला पहिरनेसे शोभायमान, मन्द मुश्यनयुन भी मनायामी गान पड़ती है और एक नक्षत्ररूप नायकके उपदेशो धर उधर भ्रमण करनेगरे मार- पियोंके साथ उसर दिशा मानो पारम्बार नाचती है, पृट गर्गनोरे. मतानुसार उनकी गतिका विषय कदा भायगा ॥१॥२॥ जय राना युधिष्टिर पृथ्वीर राज्य फरसे थे, तय मानक्षनमें गर्षि थे, कान्द अंरके साथ २२२६ मिटानेगे युधिष्ठिरका समय जानना ॥ ३॥ वह एक नक्षत्र मत र शरिराण करते हैं। यह उत्तर-पूर्वदिशामें सदा साध्वी भरुन्धतीफे साप उदय होते हैं ॥४॥ पूर्वमागमें भगवान् मरीचि, मरीचिको पश्चिम दिशामें वनि, निन. पोडे मंगन, तदनन्तर अधि, तिनके निकट पुलस्त्य, पुला और भगरान् अनु अमातुमा पूर বিম বিষমান, নিম ধানী সানী, স্বাৰম্ব বা মাথমি हुए है ॥५॥६॥ उल्का, बन सपूमादिसे ल, शिवम, सोनिदान और हस होनेपर या अपने २ वर्गका नाश करने और विपुल भनेर अपने अपने वर्ग भने ॥७॥ मगच मी मा दोहन होप दो सीमामा के स्पस समानापार वाराहांनाहता। हिरो मरीचियो विद्याधराणां च ॥८॥ शक्यवनदरसारकापत्र सारसार बनातान । हन्ति बसिष्टोऽभिहतो विश्वदियो रश्मिसन्मनः॥१॥ अहिलसो जातयुता धीमन्तो ब्राह्मणाम निर्देियाः । अत्रेः कान्तारमा इटा न्यानोतितिः नतिः ॥ १० ॥ रक्षः शिाचदानवदैत्यभुजका सा- पुरवस्य । पुतहस्य तु मूलफलंकवोस्तु यज्ञाः सपज्ञतः॥१३॥ इति श्रीराहमिहिररुती बृहत्संहितायां समर्पिचारत्रयोदशोऽध्यायः २१३६ अथ चतुर्दशोऽध्यायः। कूर्मविभाग. मसारंगपान्यायितनाया। भारतवर्षे मध्याद पागारिविज्ञानि मामालनीमोजिहानसाल्याताः। महासयोग- नामिकाः ॥ ॥ माधुरकोोग्योतिपधारण्यानि शूरमेनाम A. गिद, गश, माग और गिधी पक्ष 1 नाही तासा, गान, दान, पान, Pr... पाणिमुक्त होकर वृद्धि करने ५ ...... समान पर और पाहाणीया नाम PHTTET नाना नान जलनात, जननिधि और ई । ' ... ft गाग, पिगाग, दाना, ए, "मा. श्री ऋतुमानमा EिR या ... माया मीनागा पाश्मिानानागपुगता *. fiलामmami OF THE *7:24TAER: * ॥ 7. मद्र 2. , , , Pi, MA: * . . . .in मेन म ... 18 मासाटीकासहिता अ० १४ ॥ गौरपावाहिकपाण्डुराडापत्यपाथालाः ॥ ३॥ साकेतकङ्ककुरुकालकोटि- कुकुराध पारियानगः । औदुम्बरकापिठलगनाद्वयाभेति मध्यमिदम् ॥ ४ ॥ अथ पूर्वस्यामअनवृषभध्वजप ममाल्यवहिरयानव्यायमुससूक्ष्मकर्वटचान्दपुरान शूर्पकर्णाश्च ॥ ५ ॥ ससमगधशिविरगिरिमिथिलसमतटोड्राश्चवदनदन्तुरकाः। प्राग्ज्योतिपलगाहित्यक्षीरोदसमुद्रपुरुपादाः ॥ ६ ॥ उदयगिरिजदगौडकाण्ड्रो- कलकाशिकलाम्बाः । एकपदताम्रलिनिककोशलका वईमानम ॥ ७ ॥ आग्यां दिशि कोशलकलिनन्वनेपवनजठरागाः। शीलिकविदर्भवत्सान्ध- वेदिकायोधकण्ठाय ॥ ८ ॥ वृपनालिकरचमीपा विल्यान्तवासिनस्त्रि- पुरी | श्मश्रुधरहेमकूट्यच्यासपीका महागीयाः ॥ ९ ॥ किष्किन्धकण्टकस्थल- निषादराष्ट्राणि परिकदाशार्णाः । सह नमपर्णशपरराष्ट्रपाये त्रिक देशाः ॥१०॥ अथ दक्षिणेन लङ्का कालानिनसारिकीर्णनाटिकटाः । गिरिनगरमलयद१रमहे- न्द्रमालिन्यारुकच्याः ॥ ११॥ कङ्कटटङ्कणवनवासिशिषिकफाणकारकोङ्क- गाभाराः। भाकरचेणायन्तकदशपुरगोनर्दकरलकाः ॥ १२ ॥ कर्णाटपहाट- पाण्डुगुड, यवस्थ, पांचाल, साकेत, केक, पुरु, कालकोटि, कुकुर, पारियात्र, नग, औदुम्बर, कपिटल और हस्तिनादेश (३)(४)(५) नक्षत्रमें विराजमान हैं॥२॥३॥ ॥ अनन्तर पहिले अंजन, वृपभध्वज, पद्म, माल्यवद्विारे, ज्यान मुष, सूक्ष्म, कर्वद, चान्द्रपुर, शूर्पकर्ण, खस, मगध, शिविरगिरि, मिथिल, समतद, योड़, अश्ववदन, दन्तुरक, प्राग्ज्योतिष, लोहित्य, सीरोद-समुद्र, पुरुपाद, उदय- गिरि, मद्रगोडक, पाण्ड, रत्वल, काशी, मेकल, अम्बष्ठ, एकपद, ताम्रलिप्सिक, कोमलक और वर्धमान ये सब देश (६)(७)(८) नक्षत्र में विराजमान है ॥५॥६॥७॥ अग्निकोणमें कोशल, कलिग, बंग, उपवंग, जठर, अंग, शौलिक, विदर्भ, वत्स, अन्ध, चोदिक, ऊर्यकण्ट, वृष, नालिकेर, चर्मदीप विन्ध्याचलके. निकट, निधी, मनुधर, हेमकट, व्यालीव, महाग्रीव, किष्किन्धा, काटकस्थल, निषादराष्ट्र, परिक, दशार्ण, नम्रपर्ण और शपर ये सब देश आलेपादि तीन नक्षत्रोंमें (९)(१०)(११) विराजमान हैं ॥८॥९॥१०॥ तदनन्तर दक्षिणमें लंका, कालाजिन, सौरिकीणं, तालिकट, गिरिनगर, मलय, द१र, महेन्द्र, मरुकठ, कंकट, टंकण, वनवासी, शिविक, फणिकार, कोरण, आमीर, आकार, बेण, आपन्तक, दापुर, गोनर्द, केरल, कर्णाट, महाटवी, चित्रकूट, नासिक्ग
रमननाथ (१))(१)
भावापनुगानालहलमाः। अश्मककुटनलहडीराज्यनिहार
मा. मगमद्र, नागाश्रम, पिस, याधी, मगर
rit.inगम, यरहा. पनन, दण्डकारन, निमिाईनागन, मा
रामानी मादि देश (१२) (१३) (१४) मा
Triti, सामग, भार, अम्या, पित, नारा
Friar,ग. पागगर, , पी गि
मिसालकता, गुगम गाहा
पाराहीसंहिता।
विचित्रकूटनानियकोहगिरिचोलाः । कौंचद्दीनगरकायों पर
॥ १३ ॥ वैडूरंशंखमुक्ता त्रिवारिचरधर्मपट्टनद्वीपाः । गणराज्यरुष्णोन्या-
शिक्षादिकुसुमनगाः॥ १४ ॥ तुम्धवनकामणेयकयाम्योगधिनासाथमा
कोकाः । काञ्ची मरुचीपट्टनचेार्यकसिंहला पनाः ॥ १५॥ बटोवा
दन्डकारनानिमिडिलाराना माः । कच्छोऽय कुअरदरी सतानपणीति विजेर
॥ १६ ॥ नेत्यां दिशि देशाः पहवकाम्बोजासिन्धुसीवीराः। बडबामगार
मकालनारीमुसानाः॥ ३७ ॥ फेणगिरियवनमारकर्णमायारण
गाः । वकिरातखाइक्रया यासारचञ्चकाः ॥ १८ ॥ हेमगिरिमिन्सुर
टकरीतासुगवादग्दविडाः ।म्बात्याये भत्रितये शेयच महार्णवोऽवषय३५.
आरम्पा मगिमान मेवान वारःशुरार्पणोऽस्तगिरिः । अपरानाशानि
मनाविहागाः ॥ २० ॥ पञ्चनदरमठपारततारशितिनामा
मिया म्लेच्छा ये पश्चिमदिरिस्थताने च ॥ २१ ॥ दिगि पनि
गर जीप, नटापा, कारेग, ऋष्यमूक, वर्ग-शंगमुताप दे.
FFIEमा, धर्मवीर, गणगाय, कृष्णरेन्दर, पिशित, शांति, एक
44
मागमान, भयान, पर्वत,
*
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मापारीकासाहिता १० १४ ॥ (७७) नसस्थाः ॥ २२ ॥ वेणुमती फल्गुलका गुरुहा मरुकुचचर्मरगख्याः । एक- बिटोचनलिकाग्रीवास्यकेशाध ॥ २३ ॥ उत्तरतः कैलासो हिमयान्वसु- मान् गिरिधनुष्मांध । कांधो मेरुः कुरवस्तधोतराः क्षुद्रीनाश्च ॥२४॥ कैक- ययसानियामुनशीगमस्थार्जुनायनापीधाः । आदर्शान्तदीपित्रिगर्चतुरमाननाच- मुसाः ॥ २५ ॥ केशधरविपिदनासिकदासेरकवाटपानशरधानाः। तक्षशिला- पुष्कटापतकलायतकण्ठधानाय ।। २६ ।। अम्बरमद्रकमालवपौरवकच्छारद- ण्डपिङ्गन्तकाः । मागहलहूणकोहलशीतकमाण्डव्यभृतपुराः ॥ २७ ॥ गान्धा- रयशोमतिहमतालराजन्यखचरगब्याध । यौधेयदासमेयाः श्यामाकाः क्षेमधू. नांश्च ॥ २८ ॥ ऐशान्यां मेरुकनष्टराज्यपशुपालकीरकाश्मीराः । अभिसार- दरदतङ्गणकलनसरिन्धयन राष्ट्राः ॥ २९ ॥ ब्रह्मपुरदाडामरवनराज्यकिरात- चीनकाणिन्दाः । मल्लापलोटनगरकुनठखपरोपकचिकाख्याः ॥ ३० ॥ एक- चरणानुविधाः सुवर्णपुर्वसुवनं दिविष्ठाम । पौरवचीरनिवसनविनेत्रमुादिग- न्धर्वाः ॥ ३१ ॥ वगैरानेयायः करग्रहपीडितः कमेण नृपाः । पाञ्चालो माग- लद्दड, खीराज्य, नृसिंहवन, खम्त, वेणुमती, फल्गुटका, गुरुहा, मरुकुत्स, चमरंग, एकविलोचन, शूलिक, दीर्घोष और अस्यकेदा ये सब देश (२१) (२२) (२३) नक्षत्र में विद्यमान हैं उत्चदिशाम कैलास, हिमवान, वमुमान्, धनुष्मान, क्रौंच, मेरुगिरि र चरपुर, क्षुद्रीन, कैकय, वसाति, यामुन, भोगमस्थ, अर्जु- नापन, अग्नीध्र, आदर्भ, आन्तद्वीपी, घिगर्न, तुरगानन, अश्वमुख, केदाधर, चिपिटनासिक, दासेक, बाटधाल, सरधान, तक्षशिल, पुष्कलावत, कैलायत, कण्ठ- धान, अम्बर, मद्रक, मालप, पौरख, कच्छार, दन्तपिंगलक, मान, हल, हण, कोहल, शीतल, माण्डव्य, भृतपुर, गान्धार, यशोवात, हेमताल, राजन्य, सचर, गव्य, यौधेय, दासमय, पामक और सेमधूतादि देश (२४) (२५) (२६) नक्ष- में विराजमान है ॥ २२ ॥ २३ ॥ २४ ॥ २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥ २८ ॥ ईशान- कोणमें मेरक, नटराज्य, पशुपाल, कीर, काश्मीर, अभिसार, दरद, नंगण, उहत, सरिन्ध, वनराष्ट्र, महापुर, दाडामर, वनराम्य, किरात, चीन, कौणिन्द, भटप, लालनट, पुरसुनट, सस, घोप, कुचिका, एकचरण, अनुविध, सुवर्णभ, यमुवन, दिविष्ठ, पौरख, चागर्नयरान, त्रिनेत्र, मुजाद्रि और गन्धादि समस्त देना (२७)(१)(२) नक्षत्रमें रहते है ॥२९ ॥ ३० ॥ ३१ ॥ आमेगादि 1 बैल, जलचर, किमान, पर्वत और मम्पत्तिमान् पुरुष रोहिणीके अधिकार ॥२॥ मुगमिवन, पम, कुमुम, फल, रत्न, वनचर, विहंग, मृग, यज्ञमें सोमरत पानी नभयके वाम, वध, बन्ध, मिध्या, परदारहरण, शाठय और मेद वगरे. पारे पुरुष, ममीधान्यमे तीक्ष्ण मंप्रकरके टयाटन मरणादि अभिचार और रे दाम माननेराले वनमान १॥४॥ पुनव मुम उत्तम धान्य, सत्य, उदार, पौष, कुटान, बुद्धि, या, अर्ययुक्तः, मेवानियुक्त शिल्पजनममन्तित बलेरे (७८) वाराहीसंहिता। "धिकः कालिंगश्च क्षयं यान्ति ॥ ३२॥ आवन्तोऽथानः मृत्यु चायानि निन्धु- सौवीरः। राजा च हारहीरो भदेशोऽन्यश्च कोणिन्दः ॥ ३३ ॥ इति श्रीवराहमिहिररुती वृहत्संहितायां कूर्मविनागो नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥३१॥ अथ पंचदशोऽध्यायः। नक्षत्रव्यूह. आनेये सितकुसुमाहितानिमन्त्रज्ञसूत्रनाप्यज्ञाः। आकरिकनापितादेव- न्टकारपुरोहिताब्दज्ञाः ॥१॥ रोहिण्यां मुव्रतपण्यपधानयागयुक्तशाकोटकाः । गोवृपजलचरकर्षकशिलोचयेश्वर्यसम्पन्नाः ॥ २ ॥ मृगशिरसि मुरनिवखान- कुसुमफलरनयनचरविहंगाः । मृगसोमपीथिगान्धर्वकामुका लेखहाराच ॥३॥ रौदे वधवन्धानृतपरदारस्तेयशाम्योदरताः। तुपान्यतीक्ष्णमन्त्राभिचारसेन लकर्मनाः ॥ ४ ॥ आदित्ये सत्यौदार्यशौचकुलरूपधीयशोऽर्थयुताः । उत्तर समस्त वर्ग पापग्रहादिसे पीडिन होनेपर ययाक्रमसे पांचाल, मागधिक, क्यालेन यावन्त्य, आनत, सिन्धुसौवीर, हारहौर, भद्र और कौणिन्द देशके राजाओंक नाश होता है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ इति श्रीवराहमिदिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोचरदेशीयमुरादाबादसा- स्तव्य-पंडितवलदेवप्रसादमियविरचितायां मापाटीकायां चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥ मफेद फूल, अग्निहोत्री, मंत्र जाननेवाले, सूत्रको भाषा जाननेवाले, आरि, नाई, दिन, कुमार, पुरोहित यौर अन्दज्ञ (वर्षके फलका जाननेवाला) कृषि जसके आधीन हैं ॥ १ ॥ मुवत, पण्य, राजा, धनी, योगी, शाकाटक, गा; पीनेवाले, गन्धर्व, कामी और पप्रवाहकगण (डॉकिये मृगशिराके वश हैं ॥३॥ -- -- मापाटीकासहिता अ० १५ ॥ (७९) चान्यं वणिजः सेवानिरताः सशिलिजनाः ॥५॥ पुष्ये यवगोधमाः शाली- बनानि मन्त्रिणो नराः सलिलोपजीविनः साधवश्च यजेटिसक्ताच ॥ ६ अहिदेचे सत्रिमकन्दमूलफलकोटपनगविषाणि । परधनहरणाभिरतास्तुपधान्यं सर्वनिपजन भ७ ॥ पिये धनधान्यान्याः कोष्ठागाराणि पर्वताभयिणः । पिवजनवाणक्शूराः कन्यादाः खोधिपो मनुनाः ॥८॥प्राफाल्गुनीषु नट- 'युपतिसुभगगान्धर्वविल्पिपण्यानि । कसिलवणमाक्षिकतैलानि कुमारकाचापि ॥९॥ आर्यणे मार्दवशीचविनयपापण्डिदानशासरताः शोजनधान्यमहाधनधर्मा- 'नुरताः समनुभन्दाः ॥१०॥ हस्ते तस्करकुअररायेकमहामाप्रशिल्पिपण्यानि । 'तुपधान्यं श्रुत्युका वणिजस्लेजोयुतामात्र ॥३३॥ त्याने आपणमणिरागलेल्य- गान्धर्वगन्धयुक्तिज्ञाः । गणितादुतन्तुपायाः शालाश्या राजधान्यानि ॥१२॥ स्वाती खगमृगतुरगा वणिजो धान्यानि वानबहुलानि । अस्थिरसीदलघु- - सत्त्वतापसाः पप्पकुपलाच ॥ १३ ॥ इन्द्रामिदेवते रक्तपुष्पफलशाखिनः विराजमान है॥ ५ ॥ जौ, गेहं, सब प्रकारको शाली, गन्ने, मंत्र जाननेवाले, सब 'राजा, जलसे आजीविका करनेवाले और यज्ञको क्रिया आसक्त हुए साधुलोग -पुष्पनक्षत्रमें हैं ॥ ६॥ आपके अधिकारमें पनाये हुए कन्द, मूल, फल, कीडे, पन्नग (सर्प), विप, तुपधान्य, पराये धनको हरण करनेवाले पुरुष और समस्त वैच॥७॥ मघानक्षत्रके अधिकारमें धान्यागार और समस्त प्रह, धन 'धान्ययुनः पर्वतके रहनेवाले पिहमत पनिये, शूर, कन्याद और स्त्रियोंसे द्वेष कर- नेशले मनुष्यगण हैं ॥ ८॥ नट, युरनो, मुमगगायक, शिल्पी ( कारीगर ), कपास, नान, मधु, तेल और कुमारकगण पूर्वाफाल्गुनीके वश हैं॥९॥ उचग- 'फाल्गुनी नक्षत्रक अधिकारमें महता, पवित्रता, विनय, नास्तिकपन, दान, और शाखरन पुरुष, रामा, सुन्दर धान्य और स्वधर्मानुरागी महाजन लोग विरामा FAN ॥ सरकर, 'कुंगर, रथी, मंत्री, मिल्यो, पण्य, तपधान्य, वेदन कर ज्योतिष जाननेशले, वणिक हस्तनसके पश हैं ॥११॥ चियाके राम राम मणि, अंगराग, लेख्य, गंधर्वव्याहार, गन्धयुक्त जाननेवाले विज्ञानी, निपुण लोग और जुलाहे वर्तमान है॥ १२ ॥ स्वातीमें खग, मृग, बहुतसी वाले स्थान, कुशल पनिये और जिनकी मित्र RT से लघुस्खमावाले तपसी लोग वास करते ॥ १३ ॥ - २ नेवाले साधुलोग वर्तमान है और शरद ऋतुके उत्पन्न हुए समस्त द्रव्य है ११५६ जीविका करनेवाले और अतिधनवान् पुरुप विद्यमान हैं।॥ १७ ॥ पूर्वापान (८०) वाराहांसंहिता। सतिलमुद्दाः। कसिमापचणकाः पुरन्दरहुताशनाथ ॥ १४ ॥ मंत्र शाय- समेता गणनायकसाधुगोटियानरताः। ये साधवच लोके सर्व च शरत्सनुल- नम् ॥ १५॥ परिन्दरेऽतिशूराः कुलविनयशोऽन्विताः परस्यहतः। विजि- गीपयो नरेन्द्राः सेनानां चापि नेतारः॥ १६ ॥ मले नेपजभिपनो गणमुख्या कुसुममूलफलवा ः। बीजान्यतिधनयुक्ताः फलमूर्ये च बर्चन्ते ॥ १७ ॥ आप्ये मृदयो जलमार्गगामिनः सत्यशीचधनयुक्ताः। सेतुकरवारिजीवकान कुसुमान्यम्बुजातानि ॥ १८॥ विश्वेश्वरे महामात्रमहकारतुरगदेवतानाः । स्थावरयोधा भोगान्विताच ये चौजसा युक्ताः ॥१९॥ श्रवणे मायारटयो नित्य धुक्ताश्च कर्मसु समर्थाः। उत्साहिनःसधर्मा भागवताः सत्यवचनाश्च ॥ २०॥ वसुभे मानोन्मुक्ताः क्लीवाश्चलसौहृदाः स्त्रियां देयाः । दानाभिरता बहुविचन युताः शमपराश्च नराः ॥ २१ ॥ वरुणेशे पाशिकमत्स्यबन्धजलजानि जलवा जीवाः। सौकरिकरजकशौण्डिकथाकुनिकाचापि वर्गेऽस्मिन् ॥ २२ ॥ आने फूल फलवाली शाखायें, तिल, मूंग, कपास, उर्द, चने, इन्द्र और अग्नि म (पारसी ) हैं ॥ १४ ॥ अनुराधाम शूरतासम्पन्न, गणनायक, साधु समूहमें बैं- ज्येष्टानक्षत्रके अधिकारमें कुल वित्त यशवाले, पगया धन हरण करनेवाले, आर. शूरगण, विजयको इच्छा करनेवाले गजा और समस्त सेनापति लोग हैं ॥ १६ ॥ मूलमें औषध, वैद्य, गणमुख्य लोग, फूल, फल, मूल, पत्ते, बीज और फल भूट मृष्टु, जलपयगामा और सत्यशौचधनयुक्त मनुष्य, पुल बनानेवाले, नहर काटने वाल, मेवक फल समस्त कुसुम और समस्त पम है१८॥ मंत्री, मलयोग, हाथी, घोडे, तुंग और देवताके मक्त, मोगवान्, तेनयुक्त, स्थावर, वीर लोग दर गपाटामें है ॥ १९ ॥ श्राणके यशमें माया जानने में चतुर, नित्य उद्योग बग्ने- वाला, वर्ग, मामर्थ्य रखनेवाला, उत्साहयुक्त, धर्मपगयण, मगरद्त और सत्य वाटी दोग हैं ॥ ३० ॥ धनिष्ठा मान छोडे हुए होजटे, चंचल मुहदताग, मोटेपी, दानात. यहुनमे धनाल और शान्तिपरायण राजालोग वनमान ? ॥ २३॥ गमिपा व्याधे मत्पन्ध, जलन जलचरोंसे आजीविका काना, भूपानंदाल, धोवी, कथ्यार और मानिसमग ॥ २२ ॥ प्रमहराले मापाटीकासहिता म० १५ ॥ तस्करपशुपालहिंसकीनाशनीचशठचेष्टाः । धर्मवतेविरहिता नियुदकुशलाभ मनुजाः ॥ २३ ॥ आहिर्बुध्न्ये विप्राः ऋतुदानतपोयुता महाविभवाः । आष. मिणः पापण्डा नरेश्वराः सारधान्यं च ॥ २४ ॥ पाणे सलिलमफलकुसुम- लवणमणिशंखमीक्तिकान्जानि । सुरभिकुसुमानि गन्धा वणिजो नौकर्णधा- राध ॥ २५ ॥ भविन्यामधहराः सेनापतिवैवासेवकास्तुरगाः । तुरगारोहान्य पणियूपोरेतास्तुरगरक्षाः ॥ २६ ॥ याम्पेऽमृपिशितभुजः करा ववन्धताड- नासक्ताः । तुपधान्यं नीचकुलोदवा विहीनाश्च सत्त्वेन ॥ २७ ॥ पूर्वात्रयं सानलममजानां राज्ञां तु पुष्येण सहोत्तराणि । सपोष्णमे रितुदैवतं च मना- पते च रुपीपलानाम् ॥ २८ ॥ आदित्यहत्ताभिनिदाश्चिनानि वणिम्जनानां प्रवदन्ति भानि । मलत्रिनेत्रानिलवारुणानि भान्युमनातेः मनविष्णुतायाम् ॥२५॥ सौम्पेन्दचित्रावसुदेवतानि सेवाजनस्वाम्यमुपागतानि । सा पिशाखा अवणो भरण्पश्चण्डालजातरिति निर्दिशन्ति ॥ ३० ॥ रविरविमुतभोगमागतं क्षितिसुत- भेदनवक्रपितम् । ग्रहणगतमथोल्कया हतं नियतमुपाकरपीडितं च यव ॥३१॥ तस्कर, पशुपालक,हिंसा करनेवाले, कीनाश, नीच और शठ चेष्टावाले, धर्मवतहीन, मल्लयुद्ध करनेमें चतुरटोग वास करते हैं ॥ २३ ॥ उत्तराभाद्रपदानक्षत्रमें यन दान और तपवान महाविमावाले, आश्रमी राजा लोग, ब्राह्मण, पाखण्डी और श्रेष्ठ धान्य विराजमान हैं ॥ २४ ॥ खेतीके अधिकारमें जलसे उत्पन्न हुए फल, फूल, लवण, मणि, दशर, मुक्ता, पन, सर्व प्रकारके मुगान्धत फूल, गन्ध, द्रव्य, पनिये और नावके खेवट लोग हैं ॥ २५॥ अश्विनीमें अवहर लोग, सेनापति, वैद्य, सेवक, घोडे, घुडसवार, रहीस, पनिये और रूपवान पुरुप हैं ॥२६॥ भरणीके वसमें तुपधान्य रक्त मांस खानेवाले, दूर, वध, बन्ध ताडना करने में थामक्त और सहणहीन लोग रहते हैं ।। २७ । पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वापाडा, पूर्वामाद्र- पदा और कृत्तिकानक्षम प्रामणका अधिकारी है, उचराफाल्गुनी, उचरापाढा, उत्तरामादपदा और पुण्यनक्षत्र शश्यिोंका है, रेवती, अनुराधा, मया और अश्विनी- नक्षत्र पनियोंका अधिकारी कहा जाता है; मल, आः, स्वाती और शतमिपा उमभातिके मम है ॥ २८ ॥ २९ ॥ मृगशिरा, ज्येष्टा, चित्रा और धनिष्ठा नक्षत्र सेवकोंके स्वामी है। आरोपा, विशाखा, श्रवण और मरणी चाण्डाल जातिके सामी हैं ॥ ३० ॥जो नक्षत्र राव और शनिसे मुक्त है, मंगलके भेदन या कसे ६ ..
मा. नत्र, काम्बीन, मेरट, फिरान, टिक, परंता गि inाग, म.ड, पंग, गुल्म, याहिय, शक, पान, मगध, , मी गट, गर्थ, यमुनामा दाहिना रिनाग, घमा, it पाटी, मटिंग, पुण्ड, गोलांगुण्ड, श्रीज, वमान (८२) पाराहीसंहिता। तदुरहतमिति प्रचक्षते प्रतिविपर्यययातमेव वा निगदितपरिवर्गदूषण की- जविसर्पयगं समृद्धये ॥ ३२॥ इति श्रीवराहमिहिररुतो वृहत्संहितायांनक्षत्रव्यूहः पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥ अथ पोडशोऽध्यायः। पाइर्मदाशोणोद्रवद्न्सुलाः कलिङ्गबाहीकाः । शकयवनममधाबर ग्ज्योतिपचीनकाम्योजाः॥१॥ मेकलकिरातविटका बहिरन्न शैलजाः पुरि न्दाभ । अविडानां पागदं दक्षिणकूलं च यमुनायाः॥ २॥ चम्पोदुम्परा विचेदिविन्ध्यायीकलिङ्गाभा । पुण्ड्रा गोलांगूलीपर्वतवर्द्धमानाभ ॥ ३ ॥ अतीयथ तस्करसारतकान्तारगोरवीनानाम् । तुपधान्यकटुकतरुकनाशा नपिनमरशूराणाम् ॥ ४ ॥ ओपनभिषश्चतुष्पदरुषिकरनृपहिंस्रयापिचार पान । पालारण्ययशोयुततीक्ष्णानां भास्करः स्वामी ॥५॥ गिरिसलिलार कोगटाटसमुदरोमातुपाराः । यनयासितगणहलग्नीराज्यमहापा * प्रणगत या उल्लासे हत है, अथा सूर्यकिग्णसे सदा पीडित होते , या भया प्रतिषिपर्यापगत या वारियर्गदूपण अथा विपयांपगा। rt मागीनिलायां पृहलगंहितायां पशिमोत्तरदेशीगमुगदापार मादागादमिश्रागीतायां मापाटीया पंगदशोपापः॥१॥ मनदार, पाग्न, मानार, गोपीन, वाधान्य, 1. पण, अ, ममामा, भी, या पद, मान, प, मि १ मा, भरदान भो माग योगसामी मो? P4, 33, वर्ग, मगर, गमर, ना. रगतलमान, मगुराम,गुन, पर, भड, हाग मापाटावसाहता दोषाः ॥ ६ ॥ मधुररसकुसुमफलसलिललवणमाणिशंखमौक्तिकाभानाम् । शालिपवीषधिगोधूमसोमपाकन्दविमाणाम् ॥ ७॥ सितसुभगतुरंगरतिकरयुव- विचमनायाोज्यवसाणाम् । शृङ्गिनिशाचरकर्षयज्ञविदां चाविपचन्द्रः॥ ८॥ शोणस्प नर्मदाया भीमरथापाथ पश्चिमाईस्याः। निर्विन्ध्या वेत्रवती शिमा गोदावरी येणा॥९॥ मन्दाकिनी पयोष्णी महानदी सिन्धुमालतीपाराः। उत्तरमाण्ड्यमहेन्दादिविन्धमलपोषणाबोलाः ॥ १०॥ द्रविइविदेहान्धाश्मक- जासापुरकोडणा समन्विपिका । कुन्तलकेरलदण्डककान्तिपुरम्लेच्छसङ्करजाः ६१ १६ नासिपमोगरदनविरादविन्ध्यादिपार्श्वगा देशाः। ये च पिबन्ति सुतोयां तापी ये चापि गोमतीससिलम् ॥ १२॥ नागरपिकरपारतहुताशनाजीवि- शनवाचानाम् । आटविकदुर्गकटवधकनृशंसावलिमानाम् ॥ १३ ॥ नरपति कुमारकुअरदाभिकडिम्भानियातपशुपानाम् । रक्तफटकुसुमविद्रुमच- भूरगडमातीक्ष्णानाम् ॥ १४ ॥ कोरामवनामिहोत्रिकपात्वाकरशाम्यभिक्षु- चौराणाम् । शउदीवरषदाशिनां च वसुधामुतोऽधिपतिः ॥ १५॥ लीहित्य: सिन्धुनः सरयूगारिका स्थादा च । गङ्गाकोशिश्यायाः सरितो वैदेहका- मंस, मुक्ता, पर, शालि, यव (जौ), दवा, गेहूं, यज्ञमें सोमपान करनेवाले, राजाके वमा हुए ग्रामणगण, सितसुमग तुरंग, रतकरी युक्ती, सेनापति,मोग्य, स, शृंगी, पशु, निशाचर, किसान और यज्ञ जाननेवालों का स्वामी चन्द्रमा है ॥ ६॥ ७ ॥ ॥८॥ शोण, नर्मदा और मीमरथाके आधी पश्चिम दिशाके सब राना, निर्विघ्या, वेत्रवती, गोदावरी, शिमा, रेणा, मन्दाकिनी, पयोष्णी, महानदी, सिन्धु, मालनी, पारादिनदी, उसर भारण्य, महेन्द्रादि, विन्ध्य, मलयका निकटवर्ती भाग, चोल, द्रविड, विदेह, अन्न, यमक, मासापुर, कोकण, समन्ििपक, गुंतल, केरल, दण्डक, कान्तिपुर, म्लेच्छ, संकरज, नासिक्य, भोगवर्दन, तराद, विन्ध्याचलके निकटके देश लोग तापती और गोमती नदीका मधुर जल पीने , नगरवासी, किसान, पारत आपसे आजीविका कानेवाले, दासस आजीविका करनेवाले, बनचारी, दुर्ग, छद्रनगर, घातक, गर्वित, नरपति, कुमार, हस्ती, दांभिक, चालक, अभियान, -पशुपालक, रवपाल और फूल, मूंगा, सेनापति, गुण, मद, नोक्षणकोश, मपन, अग्निहोत्री लोग, धातु ओंकी मार, जन, भिक्षु, चार, शट, दोपहर और भोजन बहतसा करनेवालोंका खामी मंगल है ॥९॥१०॥ ११॥ १२ ॥ १३ ॥१४॥ ॥ १५ ॥ लोहित्य और सिन्धुनद, साप, गम्मारिका, स्थान, गंगा और काशिकी इन बाचन मा मामी ना?" . तनिषद भोर माणतका जाननेवाला, चरपुरुप, मुहकजीस, बार ०१८॥...॥२०॥ गिन्युनतका माग, मयुग निमामा रमदमत्री उमा दिमा, विपाना और मतदुनही, गमर, ग्रान. रामपान, बादधात, यौधेय, गायन, आनुनायत भी मार दे मामा मामय गरा, दार्थी, घोरा, पुरोहित, गना, मंत्री, मग में बगन, जन भरदाधन, सम्दार माना, (८४) वाराहीसहिता। बोजाः॥ १६॥ मयुरायाः पूर्वाद्धं हिमवगोमन्तचित्रकूटस्या 1 सौगोड- जलमार्गपण्यविलपर्वताश्रयिणः ॥ १७ ॥ उदपानयन्त्रगान्धर्वलेल्यमानित गन्धयुक्तिविदः । आलेख्यशब्दगणितमसायकायुप्यशिल्पज्ञाः ॥ १८॥ पुरुषकुहकजीवकाशशुकविशठसूचकाभिचाररताः । दूतनपुंसकहास्यज्ञान वेन्द्रजालनाः ॥ ३९ ॥ आरक्षकनटनर्तकघृततेलस्नेहबीनातितानि । बार रिरसायनकुशलवेसराश्चन्द्रपुत्रस्य ॥ २० ॥ सिन्धुनदपूर्वजागो मथुरारभार रतसीवीराः। युग्मोर्टाच्यविपाशासरिच्छतदरमठसाल्याः ॥ २१ ॥ प्रगती दाम्पसारता पाटयानयाँधेयाः । सारस्वतार्जुनायनमत्स्यायामराष्ट्रागि ॥२२॥ हस्त्यधपुरोहितापमन्त्रिमाङ्गल्यपौष्टिकासक्ताः। कारुण्यसत्यशीचवनविभाग नरमंयुताः ॥ २३ ॥ पौरमहाधनशब्दार्थवेदविदुषोऽभिचारनीतिज्ञाः । मनुषे भगेतकरणं वचननामरायं च ॥ २४॥ शैलेयकमांसीनगरकुटरसमन वाति पटीनम । मधुररसमच्छिटानि चोरकथेति जीवस्य ॥ २५ ॥ गिलमार्तिकानपगिरिगान्धारपुष्कलायतकाः। प्रस्थलमालयकैकपदागाना मर गय नदिये, याम्योग, वैदेह, मयुराका पूर्णर्द, हिमालय, गोमन्त में जारी गर गग, गेव, जलमार्ग, पाय, बिल और पहाडी जीगण, फुध, सीर, गुगर (योनी), अभिवारन, दृत, हीजडा, मगर, दाया जाताटा, सा, नट नाचनेगला, घी, तेल, रोह, पोज, तिन. न म पन, पाप और गिटन का स्वामी युध ॥ १५॥ मात्र, पा, गमगाद ग गन्मानद्रव्य, जा सनी (सर), नगार, पाग, मंभा, लागे IITE REE, मा. मगर गया, . मापारीकासादिना अ० १६ । मशीनराः शिवयः ॥ २६ ॥ ये च विन्ति निस्तामिरापती चन्द्रमाणसरितं च । रथरनताकरकुमरतरगनहामात्रधनयुताः ॥ २७॥ सुरभिकुसुमानुलेप- नमणिश्यविपणाम्बुरुहशम्याः । परतरुणयुपतिशमोरकरणमृष्टानमधुर- -भुगः ॥ २८ ॥ उद्यानलिलकामुकपशमुसीदायरसम्पन्नाः। रिदमात्य- वणिजनपटकाचित्राण्ड नासिफ़ल्लाः ॥२९॥ कीशेयपट्टकम्पलपत्राणिकरो- धपत्रचोपानि । जातीफलागुरुवचापिप्पल्यचन्दनं च गोः ॥ ३० ॥ भानतायुंदपुपरसीराष्ट्राचीरशुद्धयतकाः । नष्टा यस्मिन्देशे सरस्पनी परिमो देशः ॥ ३१ ॥ कुरुमिनाः प्रभासं विदिशा दस्मृती महीतटनाः । सलम- लिननीयतैलिकविहीनसोपहतपुंस्त्याः ॥ ३२ ॥ पन्धनशाकृनिकाशकिर तविरुपवृद्धसीकारकाः । गणपूज्यस्सलितबतरापरपुलिन्दारिहानाः ॥३३॥ कटुलिनरसायनविषयगोपतो भुजगतस्करमहिन्यः । सरकरारणकपाट निपावाभावपुत्रस्प ॥ ३४ ॥ गिरिशिखरकन्दरदरी विनिषिटा लेउजातयः भूमाः । गोमायुक्षशलिमपोधाणाश्चमुसपिकलागः ॥ ३५ ॥ पृटपांगह- खारत मस्थल, माला, कार, दाशार्ण, उमाना और शिपिविदेश जो लोग हिलता, इरानी और पन्द्रपागा नया जल पीते हैं, रप, पादी, सानि, गर, पोरा, महावन, धनयुक्त मुगंधिया फूल, स्वदन, माणवज्ञादि विभूषण, पोज, उसस नवीन पुस्ती, पामो सामान, गोधित मन, मधुर व्यसनेवाले पुरुष, पगार, अस्ट, यामी लीग, यश गुख उदारता और रूपवान विद्वान, मंत्री, पनियो, धुंभार, दिशा रज. शिला (र, पहे, मामला), शामीन कपडे, पम्पल, पण, पर, उन, लोध पचे, पोर, जापरल, भगर, वय और चन्दन पामय को आधीन , १२६११ २७ ॥ २८ ॥ २९ ॥ ३० ॥ पार, मद, पुका, गौराष्ट्र, भाभार "पतर, मिस देशमें सरसती नदी दिखाई नहीं देती, पश्मिदेश, पुरक्षेत्र, माम, विदिशा, वेदरमती, महाके किनारेवाले, सब गन्य, दुध, मटीन, नीच, मी, सन्द- इनि, निसा पुरपपन नष्ट हो गया है, पन्धक, म्याध, भाषिक, . हला पदा प्रमरपाल, गणपुग्य, जिनका मन एट गया है, गर, पुहिन्द, सिर, तिक्त, रसापन, विधासी, गर्प, हरकर, भग, गया, परम, घना, मर और रंगर ( भुस्सी) ये गप बस्नु शानिय साधीन ॥ ३१॥३४१ पर्वत शिखर, कन्दर, दारको रानगली म्हेमामा, राय, भूली, दोसण, मधमुर, सिरहांग, पगार, Ir, R, कोर, सर, ॥ ३६॥ ३७ ॥ पहाडी किला, श्वेत, हूण, चाल, अवगान, मरु, चीन, मत्पन्न देश, धनी, महेच्छका व्यापार करनेवाले, पराक्रमयुक्त, पराई स्त्रीम रत, झगडा केतुकी आधीन है ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ जो ग्रह स्वाभाविक महान्, सिग्धांशु और इसे देख जाकर उदय होते है, वह जिनके स्वामी कहलाते हैं उनका मंगल करते। ॥ ४०॥ उक्त विपरीत लक्षणा करके ग्रहोंके अधिकार किये सब द्रव्य क्षम मंग्रीका किया हुआ अमय न हो; अथवा पृथ्वीम अनावृष्टि न हो तो निपरे (८६) वाराहीसंहिता। सकतनचीरनिःसत्यशोचदानाश्च । सरचरनियुद्धविचीवरोपग गया नीचा- ॥ ३६॥ उपहतदाम्भिकराक्षसनिद्राबहुलाश्च जन्तवः सर्वे । धर्मेण च सन्त्यका मापतिलाधार्कशशिशत्रोः ॥ ३७ ॥ गिरिदुर्गपहवश्वेतहूणचोलावगणार चीनाः। प्रत्यन्तधनिमहेच्छव्यवसायपराक्रमोपेताः ॥ ३८ ॥ परदारविवादनः पररण्ड्रकुनहला मदोत्सिताः। मूर्खा धार्मिकावजिगीपवश्च केतोः समास्या ॥ ३९ ॥ उदयसमये यः स्निग्धांशुमहान प्रतिस्थितो यदि च न हतो मित्र तोल्कारजोगहमर्दनः । स्वभवनगतः स्वोचमानः शुभग्रहवीक्षितः सजा शिवस्तेषां येषां प्रभुः परिकीर्तितः॥ ४० ॥ अनिहितविपरीतलक्षणैः क्षपन पगच्छति तत्परिग्रहः। डमरसयगदातुरा जना नरपतयश्च भवन्ति दुःखित ॥ ४१ ॥ यदि न रिपुकृतं भयं नृपाणां स्वसुतक नियमादमात्यजं वा । जर्जा जनपदस्य चाप्यवृष्ट्या गमनमपूर्वपुराद्रिनिम्नगासु ॥ ४२ ॥ इति श्रीवराहमिहिरकतौ वृहत्संहितायां ग्रहमतयो नाम पोडशोऽध्यायः॥१३ और दानरहित, खच्चर, मल्लयुद्ध जाननेवाले, तीवदोप युक्त, नीच, उपहत, दे राक्षस, बहुत सोनेवाले और धर्महीन जन्तु, उर्द और तिल राहुके वश हैं ॥ ३५॥ पराण्डक, कुतूहली, मदगर्वित, मूर्ख और धार्मिक, विजयकी इच्छा निर्यान, उल्का, धारे या ग्रहमदनसे हत नहीं है, स्वभवनगत, स्वोचमाप्त और शुभा प्राप्त होते हैं, और तिस कालमें आक्रमण करनेमें डरपोक गदातुर जन और राम अत्यन्त दुःखित होते हैं ॥ ४१॥ यदि राजाओंका शत्रुका अपने पुत्रकार बससे अपूर्व पुर पर्वत और नदियोंमें गमन करना उचित है ॥ ४२ ॥ शनि श्रीवगदमिहेिगचार्यविरचितायां पहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादाबाद स्तन्य-गडिनयलदेवपमादमिश्रविरचितायां मापाटीकायां पोडशोऽध्यायः ॥१६॥ करनेवाले + न एयपोगो समागन भार मसाप योग होनको मातमन रहा। गृहसतिनी मंगटको जीत लें तो बाहीक, यापी और अग्निसे आजीरिय करने बाले पीडाको पाते हैं । दुध मंगलको जीते तो शूरसेन, कलिंग और शालदेश पीडा होनी है।॥ १३ ॥ शनिके द्वारा मंगल जीता जाय तो पुरवासियोरीका उत्तरने हो या दमिट्टी, बहुधा पुदम जपी होगा " उदास्थो दक्षिणास्योगमा करनी॥ २प्रहार परस्पर मिटनमा युद्ध समागम भार अनामत से = .मरनपुत्पधिर मंगलादप प्रकसाथ भंगटारे पर मोमिनो (८८) वाराहीसंहिता। याम्याक्रन्दी नागरयायिग्रहाचैव ॥ ८ ॥ दक्षिणदिवस्यः पुरुषो वेपथुरा- सनिवृतोऽणुः । अधिगूढो विकतो निष्पनो विवर्णव यः स जितः ॥ ९ उक्तविपरीतलक्षणसम्पन्नो जयगतो विनिर्दिष्टः । विपुलः स्निग्धो युतिक दक्षिणदिक्स्थोऽपि जययुक्तः॥ १०॥दावति मयूखपृक्तौ विपुटी कि: समागमे जवतः । तत्रान्योऽन्यपीतिर्विरीतावात्मपक्षनौ ॥ ११॥ युद्धं उन गमो वा यद्यव्यक्तौ तु लक्षणैर्भवतः। भुवि जुन्नतामपि तथा फलनव्यवं वित श्यम् ॥ १२ ॥ गुरुणा जितेऽवनिमुते याहीका यायिनोऽनिवाचीच शशिजेन शूरसेनाः कलिङ्गसाल्वाश्च पीड्यन्ते ॥ १३ ॥ सौरेणारे विधि जयन्ति पौराः प्रजाच सीदन्ति । कोठागारम्लेच्छात्रियतापाच शुभ जिते ॥ १४ ॥ भौमेन हते शशिने वृक्षसरितापसाश्मकनरेन्दा अपने २ अधिकारियोंको नष्ट करते हैं ॥ ८॥ जो ग्रह दक्षिणदिशाम रूस कम्पायमान, अप्राप्त होकर भलीमांतिसे निवृत्त अर्थात् टेढा, क्षुद्र और किसी ने टका हुआ, विकराल, प्रमाहीन और विवर्ण जान पडे वह ग्रह पराजित होगा को इसके विपरीत लक्षणवाला ग्रह जयो कहता है, परन्तु बडे मंडलबाला चिकना और गतिमान होकर दक्षिणदिशामें भी हो तो उसको जययुक्त कहां जाता है ॥९॥१॥ प्रहयुदकालमें यदि दोगी, इसके विपरीन होनेसे आत्मपक्षका नाश होगा ॥११॥ जो युद्धं या सना लागने जाना जाय तो पृथ्वीमें राजालोगों का फलभी माही जाना जायगा ॥११॥ होती है। प्रजा व्याकुल होकर नष्ट हो जाती है। शुक्र मंगलको जीत ले तो को र म्लेच्छ और क्षत्रियोंको ताप होता मंगलके द्वारा बुध हन । १ यह रक्षा केवल के लिये है क्योंकि मुद्दप्रकरणमें लिसा है कि शो Hd मोहना होकर दक्षिण दिशाम नहीं जाता और इसका जानना उचित है कि . जन्योन्य प्रीति कदा टायगासगापु14. ' जिते । पाहत होती है ॥ २३ ॥ मानिके द्वारा मंगल जीता जाय ती पुरवाशिया हकमें दो दरमहीमा युद्ध में जगी होगा " सदास्यो दक्षिणारयो काम (८८) वाराहीसंहिता। याम्पाकन्दी नागरयायिग्रहाश्चैव ॥ ८ ॥ दक्षिणदिक्स्थः परुषो वेश्युरसा- सनिवृत्तोऽणुः । अधिगूढो विकतो निष्पमो विवर्णव यः स जितः ॥ १ उक्तविपरीतलक्षणसम्पन्नो जयगतो विनिर्दिष्टः । विपुलः स्निग्धो युतिम्भ दक्षिणदिरस्थोऽपि जपयुक्तः॥ १० ॥ द्वावपि मयूखपृक्तौ विपुली बिग समागमे भवतः । तान्योऽन्यभीतिविपरीतारात्मपक्षना ॥ ११॥ युद्ध सम्म गमो वा यद्यव्यक्ती तु लक्षणेर्भवतः। भुवि तामपि तथा फलमव्ययं गिन देश्यम् ॥ १२ ॥ गुरुणा जितेऽयनिसते पाहीका यापिनोऽनिवार्ताभ शशिजेन शूरसेनाः कलिङ्गसाल्वाश्व पीयन्ते ॥ १३ ॥ सौरेणारे विनि जयन्ति पौराः प्रजाब्ध सीदन्ति । कोठागारम्लेच्छात्रियतापाथ शु १४ ॥ भौमेन हते शशिजे वृक्षसरितापसाश्मकनरेन्द्राः अपने २ अधिकारियोंको नष्ट करते हैं ॥ ८॥जो ग्रह दक्षिणदिशाम का कम्पायमान, अप्राप्त होकर मलोमांतिसे निवृत्त अर्थात् टेढा, क्षुद्र और किसी दरा दुमा, विकराल, प्रमाहीन और विवर्ण जान पडे वह ग्रह पराजित होगा, इसके विपरीत लक्षणवाला ग्रह जयो कहाता है; परन्तु बडे मंडलबाला विकता गुतिमान होकर दक्षिणदिशामें मी हो नो उसको जययुक्त कहा जाता है ॥१॥ प्रयुटयालम यदि दो रद्द किरणयुक्त बडे मंडलवाले और चिकने हों तो इस अन्योन्य प्रानि कदा जायगा. ऐसा हो तो पृथ्वीमें गजालोगोंकीभी युद्धकालमें यगर रोगी, इसके पिरीत होनेसे आत्मपक्षका नाश होगा ॥११॥ जो युद्ध लागो जाना नाय तो पृथ्वी रागालोगों का फलमी वैसाही जाना जायगा । पासनिती मंगलको जीत लें तो बाहीक, यापी और अमिसे आजीनिा के वाले पोदारो पाते हैं । वुप मंगलको जीते तो शूरसेन, कालिंग और मास्वदेश होती है, मजा व्याकुल होकर नष्ट हो जाती है। शुक्र मंगली जात ले तो को मार और शनियों ताप होता मंगलके दाग पुध त । यह रक्षा के लिये है क्योंकि गुदप्रकरणमें लिया है कि शाह कोई मान होगा त दिशाम नहीं जाता और इसका जानना मित्र है प्रका" मोर परम्पर मिटने को युद्ध समागम भार मानमत । लादपार मंगाई पर माया के साथ मनादि पर मह मिस दरम्य गो ममगम और मया सापयोग होने को आगमन की Haमागरनाल दागया और Ratin५॥ बुधमाके शनि पराजित हो तो भंगदेश, + :.: पग-नागिन ॥ २६ ॥ मंगल, गुप, (९०) वाराहीसहिता। रविजेन सिते विजिते गणमुख्याः शखजीविनः क्षत्रम् । जलनाभ तिमि सामान्य भक्तिफलमन्यत् ॥२४॥ असिते सितेन निहतेऽर्घवृद्धिरहिविहान पीडा । क्षितिजेन टङ्कणान्धोडकाशिबाहीकदेशानाम् ॥ २५ ॥ सौम्येन । अने सन्देऽङ्गवणिग्विहनपशुनागाः । सन्ताप्यन्ते गुरुणा वीबहुला मनमा शकाच ॥ २६ ॥ अयं विशेषोऽभिहितो हतानां कुनज्ञवागीशसितासिनालन। फलं तु बाच्चं ग्रहलन्तिोऽन्यद् यथा तथा नन्ति हताः स्वभक्तीः ॥२॥ इति श्रीवराहमिहिरकती वृहत्संहितायां ग्रहयुद्ध सप्तदशोऽध्यायः ॥१०॥ अथाष्टादशोऽध्यायः। चन्द्रग्रहसमागम. भाता पपानमामनरेण यातो यहाणां पदिया शशायः। प्राक्षिणं का Hi पापेन यातो न शिवः शशाः ॥ १॥ चत्रमा परि कुवर ॥ २३ ॥ गान गुरुमित दो नाग तो गणश्रेष्ठ शमगीरी, मान ARTHEIRHAहोता है, यह अहमता का १५ital मा निहत हो तो महंगी, गर्ग, पशी और मानियों में पोर inान निदानी देरण, अन्न, मोड, कादशी और गापित होना इत होनेपर । • . नि भनगार करना चाहिये ता. •i नात पायो नाग का ॥१॥ iiiनगालामा विमानसागमा ५८-नामापाया। * ३ मानानां गमन 14 • ६ ५.१ TEE TAL पाया तुम्हारा महापी नहीं ॥ १ ॥ जो पन्द्रमा मण्डल प्रा. हा वाराहांसहिता। रविजेन सिते विजिते गणमुख्याः शबजीविनः क्षत्रम् । जलनाम निरोड्यने सामान्य भक्तिफलमन्यत् ॥२४॥ असिते सितेन निहतेऽपवृद्धिरहिविहगनामि पीडा । क्षितिजेन टङ्कणान्प्रोडकाशिबाहीकदेशानाम् ॥ २५ ॥ साम्येन पर- भूते मन्देऽशवणिग्विहङ्गपशुनागाः । सन्ताप्यन्ते गुरुणा स्त्रीबहुला महिषक- शकाच ॥ २६ ॥ अयं विशेपोऽनिहितो हतानां कुजज्ञवागीशसितासितानाम् । फलं तु वाच्यं ग्रहक्तितोऽन्यद् यथा तथा प्रन्ति हताः स्वभक्तीः ॥ २७॥ इति श्रीवराहमिहिरकतो वृहत्संहितायां ग्रहयुद्धं सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ अथाष्टादशोऽध्यायः। चन्द्रग्रहसमागम. जानां यथासम्भवमुत्तरेण यातो ग्रहाणां यदि वा शशाङ्कः । प्रदक्षिणं तय भरुन्नराणां याम्येन यातो न शिवः शशाङ्कः ॥ १ ॥ चन्द्रमा यदि कुमा होनी है ॥ २३ ॥ शनिसे शुक्र विजित हो जाय तो गणश्रेष्ठ शसजीवी, क्षत्रिलोक और जलज पीडित होते हैं और अन्न साधारण होता है, यह ग्रहमक्ता फर! ॥ २४ ॥ शुक्रमे शनि ग्रह निहत हो तौ महंगी, सर्प, पक्षी और म होती है। मंगलसे शनि निहत होवे तो टंकण, अन्ध, ओइ, काश देगारो पीडा होती है ॥२५॥ बुध कर विहंग, पशु और सर्पगण मंतापित होते हैं मारिप और कजातिके पुरुष सन्तापित गुर और शाने इन ग्रहों के परस्पर हननका अपन साधारण नक्षधादिक साय जो ग्रह अध्यापमें रम जो पाल कदा दैनिसके स्थानों में हन होरर माने २ निपन पदायाँका नाश करते है ॥२ इति थंजगहमिहिगचाप्पविगविनायां यहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीय नव्य-पोटेनदलदेवमादमिश्रगिविनायामापाटीकायां सदशोऽध्यायः ॥ १० यादे चन्द्रमा नायक या ग्रहावे. याममा तामें गमन करे तो उस पर सलिल' करने पर मनुप्पोका मगरी है, परन्तु उसया दक्षिण र . .
(१०६) वाराहीसंहिता। छतं कुशास्तृतं स्थण्डिलमावसेद्विजः॥ ७ ॥ आलस्य मन्त्रेण महाव्रतेन जानि सर्वाणि निधाय कुम्मे । पाल्पानि चामीकरदर्भतोयोमो मरुदारुण म्यमन्त्रैः॥ ८ ॥ शुक्ष्णां पताकामसितां विदध्यादण्डप्रमाणां त्रगुणोचिट्रवां ।। आदी लते दिग्ग्रहणे ननस्वान् ग्राह्यस्तया योगमते शशाङ्के ॥ ९॥ तत्रा- मासाः प्रहरैविकल्प्या वर्षानिमित्तं दिवसास्तदंशैः । सव्येन गच्छञ्छुत्तरः दैव पस्मिन्प्रतिष्ठा बलवान् स वायुः॥ १० ॥ वृत्ते तु योगेंऽकुरितानि याति न्ताह बीजानि धृतानि कुम्ने। येषां तु योऽशोऽकुरितस्तदंशस्तेषां विवाद मुपैति नान्यः॥ ११ ॥ शान्तपक्षिमृगराविता दियो निर्मलं वियदनिन्दितो- निलः । शस्यते शशिनि रोहिणीयुते मेघमारुतफलानि बच्म्यतः ॥ १२ ॥ चिदसितसितः सितैः कचिच कचिदसिते नगैरिवाम्बुवाहैः। वलितजारपु- माग पटना चाहिये ॥ ७॥ महावत नामके मंत्रोंसे अभिमंत्रित कर सर गरंक पीन पढेमें डालकर मुरर्ण और दभयुक्त जलसे उसको शापित करे और रन, कग और सौम्य मंत्र होम करे ॥ ८ ॥ चन्द्रमामा योग होनेपर दंडी न्सन पारदराय ऊंचे यांसपर हार लम्बी अमित पताका धारण करे। पाई मतिमंग करके उस पतासमे कितने क्षणतक कौन दिशामें हवा चलती है सो बारें ॥९॥ पर प्रदरता एक दिशामें हवा चले तो १५ दिनतकवा होगी हिर मकर वायु वान के पालम दिवस अंशको निर्णय करे (श्रावणमे कार्तिकता नकार माग भाट पसा पर २ पक्ष एक २ अंशसे निर्देश करना चाहिये। दीपिकाने सायु गमन को नो शीवही गुमदायी होती है और जो एक निया इसमें संप दिशामेही गमन करे तो यह वायु प्रतिष्ठान और जानता। इन गोगा पठं जानेपर घमें धरै हुए योगामेमे में न , ना हो रही दिको भान होगा; और भंसनी॥११॥ नाव नन्दवाराल होनेपर यदि मय दिशायें शानदो नांग, पशिगण खम में मगहर मन्द को माना निर्मल और पाय आनदित होना ला है। इन उपान्न मेघ मारतो व प्रमानुसार । माने मी हामी मंत, कही या य, समरी माय मानोinik मापाटीकासहिता अ०२४ ॥ अमावश्यः स्फुरिताडिदसनेवृत विशालः ॥ १३ ॥ विकसितकमलोदरावदाते- ररुणकरद्युतिरञ्जितोपकण्ठः । छुरितामिव विपदनविचित्रैमधुकरकुंकुमकिशु- कावदातः ॥ १४ ॥ असितघननिरुद्धमेव वा चलिततडित्सुरचापचित्रितम् । द्विपमहिपकुलाकुलीरवं बनमिव दावपरीतमम्बरम् ॥ १५॥ अथवाअनशैल- शिलानिचयप्रतिरूपधरः स्थगित गगनम् । हिममाक्तिकसंखशशाङ्गवारद्युतिहा- रिचिरम्बुधरैरथवा ॥ १६ ॥ तडिदमकक्षलाकायदन्तः सक्दारिदानश्चलत्मा- तहस्तैः विचित्रेन्दचापध्वजोच्यायशोलेस्तमालालिनीलेवृतं चाब्दनागः ॥१७॥ सन्ध्यानुरक्ते नभात स्थितानामिन्दीवरश्यामरुचां धनानाम् । वृन्दानि पीताम्बरखे. टितस्प कान्ति हरेधोरयतां या वा ॥ १८॥ सशिखिचातकदर्दुरनिस्वने- यदि विमिश्रितमन्दमदुस्वनाः । समवतत्य दिगन्तविलम्बिनः सलिलदाः सलि- लोपमुचः क्षितौ ॥ १९॥ निगदितरूपेजलपरजालख्यमवरुद्धं व्यहमयवाहः । पदि विपदे भवति सुनिशं मुदितजना च प्रचुरजला ॥ २० ॥ पीट और पेट दीख पडती हो, चमकती हुई बिजलीकी समान जीभवाले और शब्दयुक्त विशाल भुजंगाकार मेघोंके द्वारा जो आकाश घिर जाय, खिले हुए कमलको समान निर्मल व अरुण हे समीपभाग जिनका, मधुकर, कुंकुम, टेसके कूलकी समान निर्मल विचित्र मेवोंसे रंगनेकी रामान जो आकाश शोभायमान हो, काले मेघोंसे रंगनेकी समान जो आशश शोभायमान हो, काले मेघोंसे ढका हुया हो या चमकनी हुई बिजली और इन्द्रधनुपके द्वारा चित्रित आकाश मानो हाथी और भैंसोंके द्वारा आकुल किया हुआ दावानलयुक्त बनको समान दिखलाई दे या असन पहाडके काले पत्थरको समान मेघोंसे आकाश छा जाय, अथवा हिम, मुक्ता, शंख और चन्द्रकिरणोंकी ज्योति हरण करनेवाले बादलोंसे जो आकाशम- पहल दक जाय या विजलारूप हैमकक्षासम्पन्न वायुका रूप अग्रदन्तरूप जलरूप मद बुधाता मान्तरूप कर चलानेवाला, विचित्र इन्द्रका रूप उंची ध्वजासे शोभा- यमान और चमाल वा भ्रमरकी समान नीलवर्ण हाथीरूप वादलसे सब आकाश छा जाप, जो सांसके रागसे रंगे हुए बाकाशमें स्थित नीले पद्मकी समान मेघद पीतांवर पहरे हुए हरिकी शान्तिको हरण को और मोर चातक व मेंढकाके शन्दके साथ यदि मेघा गंभीर शन्द मिल जाय तो दिशाओंमें फैले हुए आकाशव्यापी बादल पृथ्वीपर पहुनसा जल वर्षाने हैं ॥१३॥१४॥१५॥१६॥१७॥१८॥१९॥ इस उक्त प्रकारके बादलोंसे आकार दो या तीन दिन घिरे रहे तो मुभिक्ष होते.
(१०८) वाराहीसंहिता। रूक्षेरल्पैर्मारुताशितदेहैरुष्ट्रबासषेतशाखामृगाजैः। अन्येषां वा निन्दितानां सही- - कैश्चाब्द! शिव नापि वृष्टिः॥२१॥ विगतघने वा वियति विवस्वानमृदुमयस- सलिललदेवम् । सर इव फुछ निशि कुमुदाढ्यं समुडुविशुद्धं यदि च सुदृष्टी ॥ २२ ॥ पूर्वादतः सस्पनिणतिरब्दैरामेयाशासम्भवैरमिकोपः। याम्ये सत्वं शीपते नैऋतेऽयं पचानानेः शोजना वृष्टिरब्दैः ॥ २३ ॥ वायव्योत्यैतिवृष्टिः कचिच पुष्टा वृष्टिः सौम्यकाठासमुत्यैः । श्रेष्ठं सत्यं स्थाणुदिक्सम्प्रवृर्वाियु दिक्षु धत्ते फलानि ॥ २४ ॥ उल्कानिपातास्तडितोडशनिश्च दिग्दाहनितिमही- प्रकमाः। नादा मृगाणां सपतत्रिणां च माह्या यथैवाम्बुधरास्तथैव ॥ २५ । नामाङ्किनेस्तरुदगादिकुम्नः प्रदक्षिणं श्रावणमासपूर्वः। पूर्णः स मासः सटिटस दाताबुतैरवृष्टिः परिकल्प्यमूनः ॥ २६ ॥ अन्यैश्च कुम्मैपनामचिर्दशादि. मनुष्य प्रसन्न हो और पृथ्वीपर बहुतसा जल वर्षे ॥ २० ॥ रूखे और अल्प पर नसे निनाय देह फैल गया है, उंट, काग, प्रेत किंवा वानरोंकी समान या अन्न निन्दिन आग्रवाले शन्दरहित मेघ जो उदय हो तो शुभ नहीं होता, न मा नोजलगा और मालमें आकाश निर्मल नक्षत्रों के साथ कुमुद सरोवर होती है ॥ २१ ॥ अथ आकाश मेघशुन्य हो, यदि सूर्यको किरणें तीक्ष्ण हो समान मत हो तो गृष्टि अच्छी होती है ॥ २२ ॥ पूर्वदिशाके उत्पन्न हुए मेघोंने पन्य मडी मानि पक जाती है, आग्नेयकोणके उठे हुए मेघोंसे अभियो रोता है। दक्षिगादेगा के उत्पन्न मेयोंसे धान्यका क्षय होता है। नैतसे उठे बादलों मांगी होती है और पधिमके उठे हा मेघोंने मुन्दा वा होती है ॥ २१॥ गयुग के उटे हुए मनोगे वायु और कदीमी वर्षा होती है, उत्तर दिशा के उतार इरोने 'पुट वा होती है और इशानकोण के उठे हुए मांगे श्रेय मान्य हो। मागे भाग्यो सयुभी ऐमाही फल होता है ॥२४॥जो गहिणीयोगले दिन , दिली, बत्रात, दिदाइ, निघांत, पृथ्वी पापमान होना म परिनाम टाइट ग्रन्दनी बादल लाणकी गमान फल प्राण किया है। २५ गरीयोग दिन गृष्टि गिग्न ममय उदगादिया दिशा में आग, मादी, मर, कार्तिक इन नाग नागि सन्नातही दो पहा जलने पूर्ण होगा पदारणादि माग मार दानामा बिन बन जर टाक जाप नो माथि रोगी, परका Aध । २६॥ मी मातिम और नाम at मापाटीकासाहता ० २४॥ तैमाप्पपरस्तथैव । अप्रैः युतन्यूनजलैः सुपूर्णग्यिानि बाच्यानि यथानुरू- पम् ॥ २७ ॥ दूरगो निकटगोऽथवा शशी दक्षिणे पथि यथातथा स्थितः। रोहिणी यदि युनक्ति सर्वथा कष्टमेव जगतो विनिर्दिशेद ॥ २८ ॥ स्पृशनुद- ग्पाति यदा शशास्तदा सुवृष्टिर्यहुलोपसर्गाः । असंस्पृशन्योगमुदक्समेतः करोति वृष्टिं विपुलां शिवं च ॥ २९ ॥ रोहिणीशकटमध्यसंस्थिते चन्द्रमस्य शरीरुता जनाः । कापि यान्ति शिशुयाचिताशनाः सूर्यततपिठराम्बुपा- चिनः ॥ ३० ॥ उतिं यदि शीतदीधितिं प्रथमं पृष्ठत एति रोहिणी। शुभमेव तदा स्मरातुराः प्रमदाः कामिवशे च संस्थिताः ॥ ३१ ॥ अनुगच्छति पृष्ठतः शशी कामी बनितामिव प्रियाम् । मकरध्वजवाणखेदिताः प्रमदानां वशगास्तदा नराः ॥ ३२॥ आरोग्यां दिशि चन्द्रमा यदि भवेत्तत्रो- पसर्गो महान् नर्कत्यां समुपदुतानि निधनं सस्पानि यान्तीतिभिः। प्राजेशानि- देशोंके नामके प्रदक्षिणाके मावसे स्थापन करे, फिर दूसरे दिन उनको देखे. जो ट जाय, टपक जाय, जिसका जल कम हो जाय या जो पूर्ण रहे, उसका तैसाही माग्य निर्णय करना चाहिये ।। २७ ।। चन्द्रमा दूर स्थित होकर रहे या निकट स्थित रहे, पर दक्षिणमार्गमें यदि रोहिणीयुक्त होवे तो सर्व प्रकारसे संसारको कष्टदायी होता है ।॥ २८ ॥ जव चन्द्रमा रोहिणीके उत्तरदिशावाले नक्षत्रको स्पर्श. करता हुआ हो तो वहुनसे उपद्रवोंके साथ अच्छी वर्षा होती है और विना योग- स्पर्श किये उत्तरदिशाके नक्षत्र में जाय तौभी बहुतसी वर्षा होती है और मंगल होता है ॥ २९ ॥ जो चन्द्रमा रोहिणीके शफटमें (आकाशमें शकटके आकारके पांच तारे हैं) विराजमान हो तो आदमी शरणरहित, क्षुधातुर, वालकयुक्त और सूर्य करके तपाई हुई हांडीके जलको पीते हुए समय बिताते हैं ॥ ३० ॥ पहले चंद्रमा उदय हो और तिसके पीछेही रोहिणी उदय हो नौ कामदेवसे। व्याकुल हुई खियां कामी पुरुपके वश हो जाती हैं ॥ ३१ ॥ प्यारी मार्याके पीछे कामी जनकी समान यदि चन्द्रमा रोहिणीके पीछे चले वो मनु- प्यगण पञ्चपाणके पाणोंसे पीरित होकर औरतोंके वशमें हो जाते हैं ॥ ३२ ॥ जो अग्रिकोणमें चन्द्रमा विराजमान हो तो पडे २ उपद्रव होते हैं; नैऋतकोणमें हो तो समस्त धान्य इविसे ग्रसित होकर नष्ट हो जाते हैं, पश्चिम और वायुकोणमें चन्द्रमा हो तो खेतीका मध्यम संग्रह होता है। ईशानकोणमें हो ती अनेक गुण होते (११०) वाराहीसंहिता। लदिश्श्यिते हिमकरे सस्पस्य मध्यश्चयो याते स्यागुदिरा गुणाः मुबहाः सस्पार्घवृदयादयः ॥ ३३ ॥ ताडयेद्यदि च योगतारकामावृणोति वपुश यदापिवा । ताडने जयमुरान्ति दारुणं छादने नृपवघोऽङ्गनाकतः ॥ ३४ ॥ गोत्र- वेशसमयेऽग्रतो वृपो याति छष्णपशुरेख वा पुरः । नारि वारि शवले तु मध्य नो सितेऽम्बु परिकल्पनातरः ॥ ३५॥ दृश्यते न यदि रोहिणीयुतश्चन्द्रमा नभसि नोयदावृते । रुग्मयं महदुपस्थितं तदा सब जरिजलसत्यसंयुता ॥३६॥ इति श्रीवराहमिहिरकती वृहत्सं० रोहिणीयोगो नाम चतुर्विशोऽध्यायः॥२१॥ अथ पंचविंशोऽध्यायः। स्वातियोग। यद्रोहिणीयोगफलं तदेव स्वातावपादासहित च चन्दे । आपाइशुक्लै निखिलं विचिन्त्यं योऽस्मिन् विशेपस्तमहं प्रवक्ष्ये ॥ १॥ स्वाती निशांशे प्रथमेऽधि- वृष्टे सस्पानि सर्वाण्युप्रयान्ति वृद्धिम् । भागे द्वितीये तिलमुद्द्रमापा श्रेष्मं तृती हैं और'धान्यका मूल्यमी वढ जाता है इत्यादि ॥ ३३ ॥ जो चन्द्रमा योगतारेको ताढना करे या शरीरसे ढकले ती क्रमानुसार दारुण भय और स्त्रीके द्वारा राजा बध होता है ॥ ३४ ॥ संध्या के समय जय गायें वनसे चरकर आवे ( और उन समय चन्द्रमाके प्रवेशका समय हो) और तिस समय उनके आगे बैल या काला पशु आवे तो बहुतसी वर्षा होती है। शुक्ल पशुके आगे आनेसे मध्यम वर्षा होती है। जो अनेक रंगशाला पशु आगे हो तो वर्षा वादलमी मेघ नहीं वर्षात ॥३५॥ याद मेघसे ढके हुए याकाशमें चन्द्रमा रोहिणीसे युक्त न दिखलाई पड़े तो रोगरा वडा भारी भय आता है और पृथ्वीपर बहुतसा जल और धान्य होते हैं ॥ ३॥ इति श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादाबाद वास्तव्य-पांदतपलदेवप्रसादमिश्रविरचितायां मापाटीकायां चतुर्विशोऽध्यायः॥२४॥ जैसे चन्द्रमाके साथ रोहिणीयोगरा फल है साती और थापाट नक्षत्रके मार चन्द्रमाके योग फलमो वैवाही है । आपाहमासके सपसमें इसका मीमां शिवार को इसमें जो विशेषता र यो की जाती साति नक्षत्रराधिक पाले में पो हो ती सर्व प्रकारके धान्य बहते, इमरे मागमें विल मूंग और - मापाटोकासहिता अ० २५ । (१११) येऽस्ति न शारदानि ॥ २॥ वृष्टेऽह्नि भागे प्रथमे सुदृष्टिस्तद्वितीये तु सकीट- सपा । दृष्टिस्तु मध्यापरभागवृष्टे निन्छिवृष्टिधुनिशं प्रवृष्टे ॥ ३ ॥ सममुत्रेण तारा चित्रायाः कीर्त्यते सांवत्सः । तस्यासन्ने चन्द्रे स्वातेर्योगः शिवो भवति ॥ ४ ॥ सप्तम्यां स्वातियोगे यदि पतति हिमं माघमासान्धकारे वायुर्वा चण्ड- वेगः सजलजलधरो वापि गर्नत्यजस्रम् । विद्युन्मालाकुलं वा यदि जवति नभो नष्टचन्दातारं पिलेया पाडेपा मुदितजनपदा सर्वसस्यैरुता ॥५॥ तयैव फाल्गुने चैत्रे वैशाखस्पासितेऽपि वा। स्वातियोग विजानीयादापादे च विशेषतः॥६॥ इति श्रीवराहमिहिरकती बृहत्सं. स्वातियोगो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥२५॥ उद और तीसरे भागमें ग्रीष्मकालका धान्य होता है। परन्तु शरदऋतुकी खेती नहीं होती ॥ २ ॥ दिनके पहले भागमें दृष्टि होनेसे मुष्टि होती है; दूसरे भागमें होनेसे सर्प और कीडे होते हैं; मध्य और अपरमागमें वृष्टि हो वो मुवृष्टि और रातादेन पर्पनेसे उस वर्पमें बहुतसी वृष्टि होती है ॥ ३ ॥ चित्राके उत्तर ओरका तारा अपवित्स कहा जाता है, उसके निकट हुए चन्द्रमाके साथ खातीका योग होनेपर मंगल होता है ॥ ४ ॥ यदि माघ मास कृष्णपक्षीय सप्तमी तिथिमें स्वातियोगसे हिम गिरे या प्रचंड वेगसे पवन चले, जलयुक्त वादल गर्नता रहे और आकाश यदि विज- लोकी रेखाओंसे युक्त हो, चन्द्रमा सूर्य और ताराओंकी ज्योति जाती रहे तो वर्षा- कालमें जनपद आनंदित और सव धान्योंसे युक्त होते हैं ।। ५ ॥ फाल्गुन, चैत्र या पैशाखको कृष्णपक्षमभी ऐसाही सातीका योग होता है परन्तु आपाढमासमें स्वातियोगको विशेषरूपसे जानना ॥ ६ ॥ इति श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां पृहत्संहितायां पश्चिमोचरदेशीयमुरादावाददा- स्तव्य-पंडितपलदेवप्रसादमिश्रविरचितायां मापाटीकायां पंचविंशोऽध्यायः॥२५॥ १"अपवित्सस्तु चित्रायामुत्तरऽशेस्तु पञ्चभिः " चित्रानक्षत्रके पाच अंश उत्तरवले. पर्ने अर्थाव तीन अंश स्कुट होने के बाद विक्षेप नो एक वटा तारा दिखाई देता है सोई " भावत्स है। सूपसिद्धांत नक्षत्रमहस्युयाधिकार । .
पांज (पोरन ) परापर तौलकर रसदे और दूसरे दिन जिस धान्पायर अत्याबिरादेशी मरसतीकी इस मंत्र इस प्रकार स्तुति करनी चाहिये, मासान ! थार गत्यसम्मन्धमे सत्यवनपाली ६, इसलिये जो सत्य निमो प्रहरी पुषी मादित्या नाम पिम्यान, याप गोत्रमें काश्यपी और दलाता टचरितारी दातीर, उमकीचाग गोरियाका प्रमाणात र.नमसरदाना पहा बनम : चंगुट परिमाणी इननम्मना जातीय, परक परम प ट्रम्य और Asia (११२) बाराहीसंहिता। अथ षड्रिंशोऽध्यायः। आपाढीयोग. आपायां समतुलिताधिवासितानामन्येार्यदधिकतामुपैति बीजम् । दिवति न जायते यदून मन्त्रोऽस्मिन् भवति तुलानिमन्त्रणाय ।।। स्तोतव्या मन्त्रयोगेन सत्या देवी सरस्वती । दर्शयिष्यसि यत्सत्यं सत्ये तर बता ह्यसि ॥ २॥ येन सत्येन चन्दाळ यहा ज्योतिर्गणास्तथा । उनिधन्टर पूर्वेण पवादस्तं वजन्ति च ॥३॥ यत्सत्यं सर्ववेदेषु यत् सत्यं ब्रह्मचापित। यद सत्यं विषु लोकेषु तव सत्यमिह दृश्यताम् ॥ ४ ॥ ब्रमको दुहितासि त्वमादित्येति प्रकीर्तिता । काश्यपी गोत्रतश्चैव नामतो पित तुला ॥ ५॥ क्षीमं चतुःसूत्रकसनियद्धं पडङ्गुलं शिश्यकवचमत्या सूत्रमाणं च दांगुलानि पडेव कक्षोभयशिस्यमध्ये ॥ ६ ॥ पार शिक्ये काचनं सनिवेश्य शेपद्रव्याण्युत्तरेऽम्यान चैवम् । तीये के मापारी पूनमके दिन जप उत्तरापाटामें चन्द्रमा चलाजाय तर सभी पलायतको प्राप्त हो अर्थात् यह जाप उसको वृद्धि होती है, जो धान्य को समभाति नहीं होता। इसमें तुला अमिमंत्रका मंत्र पढना चाहिये ॥१॥ दिममा त्यो पलसे चन्द्रमा, सूर्य, प्रार मोतिर्गम पनि उदित होने और पधिममें मस्त हो जाते हैं, मां वेदमें जो १और वियर जो गत्य है वह मत्य यहांपर आप दिरा दें। स्मात ॥ ३ ॥ ४ ॥ गनको बनी इंचार डोरियोंमें धीमा (दिन मथा पारसने उगे कक्षा पा) ||" मापार्यकासहिता अ० २६ । स्थन्निाः सारसेभ दृष्टिहीना मध्यमा चोत्तमा च ॥ ७॥ दन्तै गा गोहया- पाम लोना ना भूपाः सिस्थकेन द्विजायाः । तदद्देशा वर्षमासा दिशभ शेपदव्याण्यात्मरूपस्थितानि ॥ ८ ॥ हैमी प्रधाना रजतेन मध्या तयोरलाने सदिरेण कार्या । विदः पुमाम्पेन शरेण सा वा तुला प्रमाणेन भवेदि- तस्तिः॥९॥ हीनस्प नाशोऽयधिकस्य वृविस्तुल्येन तुल्यं तुलितं तुला- याम् । एतनुलाकोशरहस्यमुकं प्राजेशयोगेऽपि नरो विदध्याद ॥ १०॥ स्वातावपादास्तथ रोहिणीषु पापमहा योगमता न शस्ताः । याहां तु योगदयम- प्युपोप्य पदाधिमासो द्विगुणीकरोति ॥ ११॥ त्रयोऽपि योगा सहशाः फलेन पदा तदा वाच्यमसंशयेन । विपर्यये यत्तिह रोहिणीनं फलं तदेवात्यधिक चाहिये. १, सरोवर या नदीके जलसे यह कार्य करनेसे क्रमानुसार हीन, मध्यम और उत्तम वर्षा होती है, अर्थात् कुएका जल यदि पहले दिनकी अपेक्षा दूसरे दिन कुछ अधिक भारी हो जाय तो वर्षा न होगी. यदि वृष्टिका जल अधिक भारी दो जाय ती मध्यम वपी होगी और नदी या कुण्डका जल अधिक भारी हो जाय तो उचित जल पता है सब जल वटै नो अतिवृष्टि और सब जल घटै तो मना- वृष्टि होता है।॥७॥ दन्तसे नागगण, लोमसे अश्वादि पशुगण, स्वर्णसे राजा- लोग. सिक्थ अर्थात् एक ग्राम प्रमाण मोमसे द्विजातिलोगोंकी वृदिहानि जानी जाती है, तथा मध्यदेश, वर्ष, मास और दिग्मंडल तथा शेप द्रव्य (धान्पादि) यात्मरूपसे यर्थात् जिस वस्तुको हानि वृद्धि जाननी हो उसीको मापकर फल कहना. सुवर्णका बना हुआ तुलादण्डही अच्छा है, चांदीका मध्यम है, यह न हो चौ खेरकी लककी दण्डी बनानी चाहिये किंवा जिस शरसे पुरुप विद हो जाते हैं वैसेही आकारको और वितस्तिके प्रमाणको दण्डी बनानी चाहिये ॥८॥९॥ तराजूके साथ तोल करने में हीनको उच्चता और अधिकको वृदि (नीचता) होती है यह दलाकोशरहस्य कहा गया । मनुष्य रोहिणीयोगभी इसको धारण करते ॥ १० ॥ स्वाति, रोहिणी और आपाटनक्षत्रमें पापग्रहयोग अच्छा नहीं है, एन्ड मिस वर्ष अघिमात हो यदि आपादमास मलमास हो, उस वर्षमें पहले कहे हुए दोनों योग ग्रहण किये जायंगे ॥ ११॥ यदि तीनों (रोहिणी, स्वाती और अपाडी) योगोंका फल समान हो तो निसन्देह होकर शुभ या अशुभ फल निस चन्द्रमासमें रविसंक्रमण नहीं होता तिसको मधिमास या मलमास कहते हैं "भसंक्रातिमातोऽधिमासः स्फुटं स्यात् ।" (सिद्धान्तशिरोमणि)॥
यमिघावसे पन्ध जाता है तब समस्त पृथ्वी एकान्तमें स्थित नीले पादा १जन केषितातपर्क (अध्याय) पठन्ति तहराहमिहिरकृतं न भवति । (११४) वाराहीसंहिता। निगद्यम् ॥ १२ ॥ निष्पचिरनिकोपो वृष्टिर्मन्दाथ मध्यमा श्रेठा । बहुनडा वना पुष्टा शुभा च पूर्वादिभिः पवनः ॥ १३॥ वृत्तापामापाढयां कृष्णन- मिजैकपादर्छ । यदि वर्षति पर्जन्यः प्रावृट् शस्ता न चेन्न ततः ॥१४॥ आपाट्यां पौर्णमास्यां तु यीशानोऽनिलो भवेत् । अस्तं गच्छति तीदार सत्यसम्पत्तिरुत्तमा ॥ १५ इति श्रीवराहमिहि० बृहत्संहितायामापाढीयोगो नाम पड्विंशोऽध्यायः॥२६॥ अथ सप्तविंशोऽध्यायः। वातचना पूर्वः पूर्वसमुद्रवीचिशिखरमस्फालनापूर्णितचन्द्राकांशुसटामिवातकालिदो बायु- यंदाकाशनः । नैकान्तस्थितनीलमेघपटलां शारयसंवर्धितां वासन्तोत्कटनस्पन जैसा हो सो कहना और अदलबदल होनेपर रोहिणीसे उत्पन्न हुआ जो फळ, वही अधिक कहा जाता है ॥ १२ ॥ यदि पूर्वाई हवा चले तो धान्य मलीमा निवट जाता है, अग्निकोणकी हवा चलनेपर अनिका कोप होता है, ऐसेही याद दक्षिणादिकी प्रदक्षिणानुसार मन्दवृष्टि, मध्यवृष्टि, उत्तमवृष्टि, झंशावृष्टि, पुष्चको और शुभवृष्टि होती है ॥ १३ ॥ आपाढी पूर्णिमाके पीछे कृष्णचतुर्थी में और पुर्वापादानक्षत्रमें जो वादल वर्षा करे तौ वर्षा अच्छी है, नहीं तो नहीं ॥ १४ ॥ आपाटी पौर्णमासीको सूर्य अस्त होनेके समय यदि ईशानकोणकी पवन चले । पृथ्वीपर धान्य उत्तम होता है ॥ १५ ॥ इति श्रीवराहमिाहेराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादावादशस्त- व्य-पंडितपलदेवप्रसादमिश्रविरचितायां मापाटीकायां पडिंशोऽध्यायः ॥२६॥ आपाटीयोगके दिन जब सूर्य अस्त होवे तव आकाशसे पूर्वाई पवन पूर्व के तरंग शिखरको स्पर्श करता हुआ घूमता और चन्द्रमा सूर्यके किरणरूप जया । 'निए " पति पाहता भोपटनोक्तम् ।
मापाटाकासहिता अ० २७ । (११५) ण्डितकलां विद्याचदा मेदिनीम् ॥ १ ॥ पदागेयो वायुमलयशिखरास्फालन- पदुःपूवत्यस्मिन् योगे भगवति पतङ्गे प्रवसति । तदा नित्योद्दीता ज्वलनशि- खरालिङ्गिततला स्वगात्रोमोच्छासर्वमति वसुधा भस्मनिकरम् ॥ २॥ ताली- पत्रलतावितानतरुनिः शाखामृगानर्तयन् योगेऽस्मिन् पूवति ध्वनन् सुपरुषो वायुर्यदा दक्षिणः। सोद्योगसमुन्नताच गजवचालाकुरीघट्टिताः कीनाशा इव मन्दवारिकणिकान्मुञ्चन्ति मेघास्तदा ॥ ३ ॥ सूक्ष्मैलालवलीलबङ्गानिच- यान् व्याघूर्णयन् सागरे भानोरस्तमये पुवत्यविरतो वायुपदा नकतः। चन- प्णामृतमानुपास्थिशकलमस्तारभारच्छदा मत्ना प्रेतवरिवोपचपला मिस्तदा लक्ष्यते ॥ ४ ॥ यदा रेणूलतिः प्रविकटसटाटोपचालः प्रवातः पश्चार्य दिनक- रकरापातसमये । तदा सस्योपेता प्रवरनृपराषदसमरा धरा स्थाने स्थाभेप्ववि. रतवसामांसरुधिरा ॥ ५॥ आपादीपर्वकाले यदि किरणपतेरस्तकालोपपत्ती समूहोंसे और वृदिको प्राप्त हुए शरतुके फल धान्यसे युक्त होकर ममस्त वसन्ती धान्यसे शोभायमान हो जाती है ॥ १॥ भगवान सूर्यके अस्ताचलपर गमन करनेपर जव मलयपर्वतके शिखरपर अखंडित आग्नेय वायु वान करे तो पृथ्वी नित्य उद्दीप्त होती है, और प्रकाशको शिखासे वलमें आलिंगन पानेपर अपने गाप्रके वापसे उत्पन्न हुए श्वासोंसे मानो भस्मको वमन करती है ॥२॥ जय इस योग निठुर दक्षिणी पवन शन्द करते २ तालवृक्ष लताओंके समान- हित वानरोंको नचाता रहता है, तब सर्व प्रकार के उद्योग करके अंचे गजवी नमान ताल व अंकुशसे ताडित हाथीकी समान मेघ कृपण मनुष्यको समान थोसी व करते हैं ॥ ३ ॥ सूर्यके अस्तगमनकालमें जब नर्मवापु छोटी इलायची और समान उग्र व चपल दिखाया करता है॥४॥ संध्याके समय जब कि धारे ने करके फेदारफे आक्षेपदारा पचल और गईके हेतुसे चचल हो पश्चिममें रहता है, विप पृथ्वी धान्ययुक्त और प्रधान राजाभाको समरभूमि होकर स्थान २ में परी मांस व रुधिरसे परापर की राती॥५॥ मापारी पूर्णिमारे जप के अस्त होनेय समय आरे, उस समय यदि मेपर शत्रु परीर परन परमी चालर घलनेवाला होकर गमन करता है तय पृथ्वी जल धारासे प्रमुख, र- --
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मापाटीकासहिता अ० २८॥ न चिराचन्द्रवमार्गवोऽपि ॥ १ ॥ आई द्रव्यं स्पृशति यदि वा वारि नर्स वा तोपासन्नो भवति यदि या तोयकार्यान्मुखो वा । प्रष्टा वाच्यः सलिलमा रादम्नि निःसंशयेन पृच्छाकाले सलिलमिति वा श्रूयते यत्र शब्दः ॥२ उदयशिखरिसंस्थो दुर्निरीक्ष्योऽतिदीत्या द्रुतकनकनिकाश स्निग्धवैडूर्यकान्तिः तदहनि कुरुतेऽजस्तोयकाल विवस्वान् प्रतपति यदि वोचः ख गतोऽजीवी क्ष्णम् ॥ ३ विरसमुदकं गोनेत्रानं विपदिमला दिशो लवणविरुतिः काकाण्डा यदा च भवेन्नाः। पवनविगमः पोलूयन्ते झपाः स्थलगामिनो रसनमसरुन्मण्डूकानां जगगमहेतवः ॥ ४ ॥ मानारा रामवनि नखैर्लिसन्तो गोहानां मलनिचयः सविखगन्धः । रथ्यायां शिशुनिचिताश्च सेतुबन्धाः मान जलमचिरानिवेदयन्ति ॥५॥ गिरयोऽअनपुअसन्निमा यदि वा वापनि- ९दकन्दराः। रुकवाकुरिलोचनोपमाः परिवेपा शशिनच वृष्टिदाः ॥ ६॥ हो और शुभ ग्रहसे देखा जाय तो बहुतता जल वर्पता है, पापग्रहसे देखा जाय ती थोडा जल वर्पता है और यात कालतक वर्षा नहीं होती। शुक्रभी चन्द्रमाको समान फलदाता है।।१॥जोप्रश्न करने के समय प्रश्नका करनेवाला गीला द्रव्य वा जल अथवा जलपर जिसका नाम हो ऐसे किसी द्रव्यको छुए अथवा जलके निकटवाले या जल- सम्बन्धी किसी कार्यमें रत हो या प्रश्न करनेके कालमें जल या जलवाचक शब्द हो तो प्रश्नकांसे निःसन्देह कहा जा सकता है कि बहुत शीघ्र वर्षा होगी ॥२॥ कालमें निस दिन उदयपर्वतपर स्थापित सूर्य भगवान् अपनी कांतिसे दृष्टिको ताप पहुँचानेवाले हो; पिघले हुए सुवर्णकी समान या चैडूर्यमणिको समान किनी कांतिपाले हो उस दिन जल वर्षेगा और यदि आकाशके ऊंचे स्थानमें कर तीक्ष्ण किरणांसे तपे तो तिस समय जल वगा ॥ ३ ॥ जलका स्वाद ।ड जाना गायकी आंखके समान आकाशका रंग हो जाना, दिशाओंका विमल , सांभरका पसीज नाना, कागके अंडोंके रंगको समान रंगपाले मेघोंका उदय , पवनके बहनेसे थम जाना, मछलियोंका जलमेंसे वारंवार उछलना और मेंड- का वारंवार शन्द करना, जलकी आईका चित है ॥ ४॥ विलियोंका अपने नोंसे पृथ्वीको कुरेदना, लोहेपर मैल जम जानेसे उसमें को मांसको समान गंध ना, वालकोका मार्गमें रेते आदिका पुल यांधना शीघ्रही जल वर्पनेके लक्षणको श करता है ॥ ५ ॥ समस्त पर्वत अंजनराशिको समान रंगपाले हो जाय, ये कंदराओमें बाफ भर जाय और चन्द्रमाका परिवेष कुकुरके नेप्रकी समान परम्पराममान नन्द्रमा का लाल रंगदो या तीन सनी मनाला माग14. मालीपन पृथी पसगा दोगगी ॥१०॥famil (११८) वाराहीसंहिता। विनोपघातेन पिपीलिकानामण्डोपसंक्रान्तिरहिव्यवायः। दुमाधिरोहर भुका- मानां वृष्टेनिमित्नानि गवां प्लुतं च ॥ ७ ॥ तरुशिखरोपगताः सकलासा माता- टस्थितदृष्टिनिपाताः। यदि च गवां रविवीक्षणमूह निपतति वारि नाम चिरेण ॥ ८॥ नेच्छन्ति विनिर्गम गृहादुन्वति श्रवणान खुरानात | SAF पशुवच कुझुरा यद्यम्नः पततीति निर्दिशत् ॥ ९॥ यदा स्थिता महाक कुरा भवन्ति वा यदि विततं दिवोन्मुसाः। दिवा तडिद्यदि च पिनाकिर गनवा तदा क्षमा भवति समातिवारिणा ॥ १० ॥ शुककपोतविलोचनसभिः मधुनिभम यदा हिमाधितिः। प्रतिशशी च यदा दिवि राजते पति को ना न चिरादिनः ॥ ११ ॥ स्तनितं निशि विद्युतो दिवा रुधिरनिभा कर इन्दवत् स्थिताः। पवनःपुरतच शीतलो यदि सलिलस्य तदागमो भवेत् ॥ १२॥ तां गगनतोन्मुसाः प्रपालाः स्नायन्ते यदि जलपांशुभिहिलाःभात गादि न नरीमास्तृणापाण्यासनो भवति तदा जलस्य पातः ॥ १३॥ रनो पा रोगो ॥ ६॥ गिना किसी उपद्राके चीटियोंगा भाने प्रणा गरे स्थानपर ले जाना, पोका मैथुन करना, सोमा STा मोर गायों का उछलना दना वर्गाका लानेवाला है ॥ ७ ॥ जो THE ARE READ A और देरी, गागंभी अपरको दृष्टि उटाहा, गुन को गिगा | जो गृहने बाहर जाने की इजान से सपनाको सामान कान भी नमी इन पशुओ ना। दोसना नाशिकलगारको कर इस परवा देगे और जयदिन समय गानकोणमें ias नपान मा नन्दमा दिला ना आnt Rani Aama - म.
माषाटोकासहिता अ० २८ । मयूरशुकचापचातकसमानवर्णा यदा जपाकुसुमपङ्कजातिमुपच सन्ध्याघनाः । जलोमिनगनककच्छपवराहमीनोपमाः प्रभूतपुरसशया न तु चिरेण यच्छ- , न्त्यपः॥ १४ ॥ पर्यन्तेषु सुधाशशाङ्कपवला मध्येऽअनालित्विपः स्निग्धा नेकपुटा क्षरजलकणाः सोपानविच्छेदिनः। माहेन्द्रीप्रमवाः प्रयान्त्यपरतः प्रा- क्वाम्बुपाशोदवा ये ते वारिमुचस्त्यजन्ति न चिरादाः प्रभूतं भुवि ॥ १५ ॥ शकचापपरिघमतिसूर्या रोहितोऽथ तडितः परिवेपाः । उद्रमास्तसमये यदि भानोरादिशेत प्रचुरमम्बु तदाशु ॥ १६॥ यदि तित्तिरसपनि गगनं मुदिताः प्रवदन्ति च पक्षिगणाः। उदयास्तसमये सवितुर्युनिशं विसृजन्ति घना न चिरेण जलम् ॥ १७ ॥ यद्यमोपकिरणाः सहसगोरस्तभूधरकरा इवोच्छ्रिताः । भूसमं च रसते यदाम्वुदस्तन्महद्भवति वृष्टिलक्षणम् ॥ १८ ॥ प्रापि शीतकरो भृगुपुत्राव सप्तमराशिगतः शुभदृष्टः । सूर्यसुतानवपञ्चमगो वा सनमगध जलागमनाय ॥ १९ ॥ प्रायो ग्रहाणामुदयास्तकाले समागमे मण्डलसंकमे च। जप संध्याकालके आकाशमें मेघगण मोर, शुक, नीलकण्ठ या गातकपक्षको समान रंगवाले या जपाकुसुम वा कमलकी कांतिको हरण करें और जलपी वरंग, पर्वत, नाका, कछुआ, शूकर या मछलीको समान आकारवाले हों तो शीय जल वगा ॥ १४॥ चारों किनारोंपर सीधा और चन्द्रमाकी समान श्वेतवणं दो, मध्यम अंजन और भ्रमरकी समान दीप्तिवाला हो, चिकने जलपी दें टपाता दो, पारे- योंकी समान एकके ऊपर एक चढे रहें, पूर्व दिशा से आकर पश्चिम दिशाको जाम वे यादल शीमही पृथ्वीमें बहुनसा जल पाते हैं ॥ १५ ॥ वर्गके उदर या अस्तके समप जो इन्द्रधनुप, परिघ, दूसरा सूर्य, दण्डाकार इन्द्रधनुष गा बिजलीयो समान परिवेप प्रकाशित होय तो शीघ्रही यहुतसा जल वर्पता है ॥ १६ ॥ सूर्यके. उदर मस्तके समय यदि आकाशका रंग तीतरके पंखोंकी समान हो जाय और पनिगग आनन्दित होवर कलरव करते हैं तो मेप शीग्रही दिनरात जल ते ॥१७॥ पदिजार किरणवाले सूर्यके अस्तकालमें अस्ताचलकी हिरणोंके समान उंची और अमोघ किरणें विराजमान हैं और यदि मेघगण पृथ्पोके निकट शन्द करें तो इन पातोंरो पा होनेका वडा भारी लक्षण कहा जा सकता है॥ १८॥ जो मां- काठमें पन्द्रमा शुभ प्रो करके देखा माय नो शुबसे समन राशि या सात नवम, पचन वा सनम गशिमें हो तो यह जहागमस्य वरण है ५ प्रहों के उदयास्तरालमें मण्डल मंक्रमण और समागम होनेपर और पसारमें, मनरे. .
मना मिस मग होता ॥ २१ ॥र गूग। मामा HITE या पधिमगरनी पृधागे मम्मो समान। kriti माया नया मुलाला मार रोमाइल भोर कमit २.दामाजधानीnil ENG दिनमा0k नो, (१२०) वाराहीसंहिता। पक्षक्षये तीक्ष्णकरायनान्ते वृष्टिगतेऽक नियमेन चाम् ॥ २० ॥ सन्तले पतति जलं ज्ञशुक्रयोजनोपयोमुरुसितयोध सङ्गमे । यमारयोः पनताहर भयं न दृष्टपोरसहितयोभ सग्रहः ॥ २१ ॥ अग्रतः पृष्ठतो वाति या सूर्यावलम्बिनः । यदा तदा प्रकुर्वन्ति महीमेकार्णवामिव ॥ २२ ॥ इति श्रीवराहमिहिरकती वृहत्सहितायां सद्योवृष्टिलक्षणं नामाटाविंशोऽध्याप२८ अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः। कुसुमलता. फलसुमनप्रवृदि वनस्पतीनां विलोक्य विज्ञेयम् । सुलमत्तं पन्ना विपनिभा सस्यानाम् ॥ १॥ शालेन कलमशाली रकाशोकेन रत निभा TT सीरिकया नीलायोकेन सूकरकः॥ २ ॥ न्यग्रोधेन तु ममन्दगरपाच पटिको भवति। अश्वत्येन ज्ञेया निष्पतिः सांसद पान । ३ ननिस्तिलमाषाः शिरीपवृक्पा च कंगनिणानः । गोपूक 47 भोर पंहे मादी में जानेपर या नियमानुसार पपी होती है ॥.. गुमनामना, युप नापति गमागमसे, बालबारपान और गुरम भग्रह कर या न मिलार शनि : गवतायां महिनामा पश्रिमानदेसीगगदा Hinानामबागवताला नापाटागामधावियोगायः ॥ १४ भापाटीकासहिता अ०२९ । (१२१) मधुकैर्यवादिः सप्तपर्णेन ॥ ४ ॥ अतिमुक्तककुन्दायां कसं सर्पपान्वदेद- शनैः । बदरीनिष कुलत्यांचिरविल्वेनादिशेन्मुद्दान् ॥ ५ ॥ अतसी वेतसपुप्पः पलाशकुसुमैन कोद्रवा ज्ञेयाः । तिलकेन शङ्समौक्तिकरजतान्यथ गुदेन शुणः ॥ ६ ॥ करिणय हस्तिकर्णरादेश्या वाजिनोऽवकर्णन । गावभ पाट- लाभिः कदलीमिरजाविक भवति ॥ ७ ॥ चम्पककुसुमैः कनकं विद्रुमसम्पर वन्धुनीवेन । कुरुषकवृद्धया वजं वैदूर्य नन्दिकावर्तः ॥ ८॥ विद्याच सिन्दु- वारेण मक्तिकं कुंकुमं कुसुम्भेन । रत्तोललेन राजा मन्त्री नीलोत्सलेनोन: ॥ ९ ॥ श्रेष्ठी सुवर्णपुष्पैः पविप्राः पुरोहिताः कुमुदः । सौगन्धिकेन बलपति- रण हिरण्यपरिवृद्धिः ॥ १० ॥ आप्रैः क्षेमं भहातयं पीलभिस्तथारो- म्पम् । सदिरशमीच्या दुर्भिक्षम नः शोजना वृष्टिः ॥ ११ ॥ पिचुमन्दनागकु- सुमैः सुभिक्षमथ मारुतः कपित्थेन । निचुलेनावृष्टिभयं व्याधिभयं भवति कुटजेन ॥ १२॥ दूी कुशकुसुमायामिक्षुर्वद्विव कोविदारेण । श्यामालताभिवृदया बन्धक्यो वृद्धिमायान्ति ॥ १३ ॥ यस्मिन्देशे स्निग्धनिश्उिपनाः संहत्पन्ने महुएसे गेहूं और समपर्णसे जौकी वृद्धि जानना चाहिये ॥४॥ अतिमुक्तक और कुन्द इन दोनों पुष्पवृक्षको वृदिरो कपास, असनासे सरसों, वरसे चुन्नथी और सदावेलसे भूगको जानना चाहिये ॥५॥ वेतससे अलसी, पलाशग कोदोकी वृदि, तिलको शंख, मोती और चांदीकी वृद्धि और गुदीको दिन गनी उत्पत्ति होती है ॥ ६॥ इस्तिकर्णसे हाथियोंकी, अश्वकर्णसे पोडको, पारलाकी वृदिगे गायोंकी और कदलीसे वकरी व भेडोंकी पृद्धि होती है ॥ ७॥ चम्पावे. फूलसे मुवर्ण, दुपहरियाके फूलसे मूगा, कुरषको वृद्धिसे वज, नन्दियरतने वैदूर्य, सिन्धुवारको वृद्धिसे रत्नोंकी वृदि, कुमुम्भसे केशर, लालकमलसे गजा और नील कमलसे मंत्री कहा जाता है ॥ ८॥९॥ मुवर्णपुष्पसे वणिक, परमं रिस, कुमुदसे पुरोहित, सुगन्धद्रव्यसे सेनापति, आरके वृक्षसे मुवर्ण, आमने कल्याण, मिटावेसे भय, पीटसे आरोग्य, खैर और शमीसे दुर्भिक्ष, अर्जुन शुभमनी बाई नीम और नागमुमसे मुभिक्ष, काथसे परन, निबुलमे किस भय और उटजसे व्याधिभयकर मान रोता है॥१०॥ ११ ॥१२॥ दूर और उसके बानते इख, फरनारसे भाग और सामालताको वृद्धिसे न्यभिचारिणी तिचे बरदार ॥ १३ ॥ जिस देशमें वृक्ष और गुल्म और लतामोंक पर चिक्ते और दवे - हिमवानरपानी रन-लाय॥ ॥ मृग, हुन, पान, परिण मांगी नयनानिमियामीमनगmilnail (१२२) वाराहीसंहिता। वृक्षगुल्मा टताभ । तस्मिन् वृष्टिः शोजना सम्प्रविष्टा सौरियरत प्रदिष्टम् ॥ १४॥ इति श्रीवराहमिहिररुती बृहत्संहितायांकुसुमलताध्याय एकोनविंशोऽध्याय २१ अथ त्रिंशोऽध्यायः। संध्यारक्षण. आदस्तिमितानुदितात् सूर्यादस्पष्ट नमो यावद । तावद सन्ध्या मिरतः फट चास्मिन् ॥ १ ॥ चारः । मन्ननगररकिरदण्डरजः ॥ ९ : मछल्पामातमाटे । रविदीनो दक्षिणतो महास्वनः सैन्ययातरः ॥३॥ भान संपामः मन्ये सेनासमागमः शान्ते । मगचके पपने वा मन्यात विभने पतिः ॥ ४ ॥ दीनमुगाण्ड नपिरुता माक् सन्ध्या देशनाशमास्पात। मीसियासता ग्रहणाय पुरस्प दीमास्यैः॥ ५ ॥ में शुभम दोगी और जिस देश के पसे रूप में main गोडा २ जलता है॥ १४ ॥ गगनामागचनायो वृहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुग- महाम-सिपलदायमादमिश्रतिचिनायो भाषाटीकामा मनायशोगायः ॥२९॥ दिन जान गमगा जस्ता प्रामाश नम नामंगागल महनार गाही भदौदित गरी मा दुर, भीनमा, मगरण, दाह, रे, और वर्ग (i): नानागामा दोनता साना दाणभाग मनात नानाला बागम मापाटीकासाहिता य०३०॥ गृहतस्तोरणमथने सपांशुलोप्टोत्करेऽनिले प्रवले । भैरवरावे रुक्षे सगपातिनि चागुना सन्ध्या ॥ ६ ॥ मन्दपवनावपट्टितचलित पलाशद्रुमा विपवना वा। मधुरस्वरशान्तविहङ्गमगता. पूजिता सन्ध्या ॥ ७ ॥ सन्ध्याकाले स्निग्धा दण्डनडिन्मत्स्यपरिधिपरिवेपाः । मुरसतिचापरावतरविकिरणाचाशु वृष्टिकराः ॥ ८॥ विच्छिन्नविपमविध्वस्तविस्त कुटिलापसव्यपारवृत्ताः । तनुहस्वविकल- कलपाभ विग्रहावृष्टिदाः किरणाः ॥ ९ ॥ उद्दोतिनः प्रसन्ना ऋजवो दोः प्रदक्षिणावर्ताः । फिरणाः शिवाय जगतो वितमस्के नमारी भानुमतः ॥ १० ॥ शुक्लाः करा दिनकतो दिवादिमध्यान्तगामिनः स्निग्धाः । अन्युच्छिन्ना ऋजवो दृष्टिकरास्ते समोधास्याः ॥ ११॥ कल्मा- पवरूपिला विचित्रमाजिष्टहारतशरलानाः । त्रिदिवानुवन्धिनो दृष्ट्येऽल्प- भयदास्तु समाहात् ॥ १२ ॥ ताम्रा पलपतिमृत्यु पीतारुणसनिनाथ कर लिया जाता है॥५॥ गृह, वृक्ष, तोरणमथन और धरिके साथ मट्टीके देलोंको उडानेवाला पवन, मयल वेग और भयर रूखे शन्दसे पक्षियोंको गिरावें तो अशुभकारी सन्ध्या होती है ॥ ६॥ सन्ध्याकालमें मन्द परनके प्रवाहसे हिलते हुए पलाश अथवा वायुराहत हो और मधुर स्वरसे शान्त दिशामें विहङ्ग और मृगोंके नाद करनेसे सन्ध्या पृजित होती है ॥ ७॥ संध्याकालमें दण्ड, वडित, मत्स्प, मंडल, परिवेप, इन्द्रधनु, ऐरावत और सूर्यको किरण इन सबका सिग्ध होना शीघ्र वर्षाको लाता है ॥ ८॥ टूटी फूटी, टेढी वेदी, विश्वस्त, विकराल, कुटिल, कई ओरको झुकी हुई, छोटी २ विकल और मलीन सूर्यको किरणे संध्या- कालमें हों तो युद होवे वर्षा नहीं हो ॥ ९॥ अन्धकारहीन आकाशमें सूर्यको किरणोका निर्मल, प्रसन्न, सीधा, दीर्पताका प्राप्त होना और प्रदक्षिणाके आकारमें घूमना संसारके मंगलका कारण होता है ॥ १० ॥ सूर्यके किरण दिनके आदि मध्य और अन्तगामी होकर, विक्ने अवंडित, सीधे और श्वेत हों तौ वर्षा होती है और इनका नाम अमोघ है ॥ ११॥ वही काले, पीले, कपिल, लाल, हरे अनेक प्रकारके होकर आकाशमें फैल जाय तो वर्षाके परन्तु एक सप्ताहनक कुछ एक भयदायी है ॥ १२ ॥ इनके ताम्ररंग होने में सेनापतिको मृत्यु होती है, पोले और लालरंगकी समान में तो सेनापतिको दुःख होता है, हरे रंग के होनेमे पशु और धान्यका नाश होता है, धूम्रवर्णसे गोनाश, मजीठकी आमाके समान रंगदार होनेसे शख व अमिका भय. कारणरूप है,.
सवि संध्याकालकी धरि दुपहरियाके फूल और अंजनचूर्णके समान काली होस इसका घेत होना मनुष्योंकी गृद्धि और शान्तिका कारण होता है ॥ १५ मूर्यको किरण जल और पवनसे मिलकर दंडकी समान हो जाय तो या संता है,वह विदिक्में स्थित हो तो राजाओंको और दिकमें स्थिर होकर दिनानियों दिपाई दे ना राम्रमय और रोगमयका करनेवाला होता है, शुलादि वर्णन जानगोंगे और जिनक सन्मुस स्थित होवे उन दिशाओंको हनन करता है। भासन मूर्यके हरनंराले दहीको समान किनारेदार नीले मेघको अभ्रता । पानना जल वरना ॥१८॥ अननस शत्रुके ऊपर यह मानेराले गहामी रडार भरस्मान् शान्त हो जाय तो युपरान और मंत्री नाम हो जाए। र नरधिगम प्रशामिन ह नौ या पाती ॥ २० ॥ भगुमार, (१२४) वाराहीसंहिता । नव्यसनम् ॥ हरिताः पशुसत्यवधं धूमसवर्णा गवां नाशम् ॥ १३॥ माजिष्ठानाः शनामिसम्भ्रमं बनवः पवनवृष्टिम् । जस्मसदृशास्त्ववृष्टिं ननुत शवलकल्मापाः ॥ १४ ॥ बन्धूकपुष्पाजनचूर्णसन्निा सान्ध्यं रजोशी यदा दिवाकरम् । लोकस्तदा रोगशतैर्निपीब्यते शुक्लं रजो लोकविवृदिशा ये ॥ १५॥ रविकिरणजलदमरुतां सङ्घातो दण्डवत् स्थितो दण्डः । स. स्थितो नृपाणामशुभो दिक्षु द्विजातीनाम् ॥ १६ ॥ शनायातकरो प्राङ्मध्यसन्धिषु दिनस्य । शुक्लायो विमादीन् यदभिमुखस्तां निहन्ति दि ॥ १७ ॥ दधिसदृशायो नीलो भानुच्छादी खमध्यगोऽनतरुः । पीतच्छुरित बना घनमूला भूरिदृष्टिकराः ॥ १८॥ अनुलोमगेऽभवृक्षे समुद्रते यानि नृपस्य वधः । पालतरुपतिरूपिणि युवराजामात्ययोर्मृत्युः ॥ १९॥ कुाट वैर्याम्वुजकिअल्कामा प्राअनोन्मुक्ता । सन्ध्या करोति वृष्टिं रविकिरण सिता सद्यः॥ २० ॥ अशुनारुतिघनगन्धर्वनगरनीहारपांशुधमयुता। पा होता है, पीले हा तो पवनके साथ वर्षा होती है, भस्म समान होनेसे अना सवल और कल्माप रंग के होने से वृष्टिका शीणभाव हो जाता है ॥ १३ ॥१॥ सपके सामनेको जाती है तब मनुष्य सैकडो प्रकारके रोगोंसे पीडित होते अशुभयरी होता है ॥ १६ ॥ दिन निकलने से पहले और मध्य सन्धि जो १. यह और पीले रंगका मेघ जो घनमूल अर्थात् उसके नीचे मुरा युक ५९ ॥ नीलकमल, वैदूपं और पोशा समान कालियुक्त, पनीत मार मापारीकासदिता म०३० । (१२५) करोत्यवाहमयतों शवकोपकरी ॥ २१॥ शिशिरादिषु वर्णाः शोगपतिसित- चिराममधिनिभाः। प्रतिभवाः सन्ध्यायां स्वर्ती शस्ता विकतिरन्या ॥२२॥ मायुधानरत छिनार परधयाय रविगामि । सितसपुरेऽकाकान्ते पुरलामो भेदने नाशः ॥ २३ ॥ तितनितान्तपनावरणं रचरति वृष्टिकरं यदि सव्यतः । यदि च वीरणगुल्मनिपनावसभरदीपरिशुद्धवः ॥ २४ ॥ नृपविपत्तिकरः परिषः सितः क्षतजनुल्यवपुलकोपरुव । कनकरूपधरो बलवृदिदः सवितुरु- दमकालसमुत्थितः॥२५॥ उजयपाधंगती परिधी खेः प्रचुरतोयकती वपुषा- विती । अथ समस्तककुपरिवारिणः परिषयोऽस्ति कणोऽपि न वारिणः॥२६॥ ध्वजातपत्रपक्षिावरूपधारिणः । जयाप सन्ध्ययोपना रणाय रक्तसनिमा ॥२७ ।। पलालधूमसञ्चयस्थितोपमा बलाहकाः। बलान्यरुक्षमूर्तयो विवर्च- गंधर्वनगरी, हिम, धार और धून (कुहर) युक्त संध्या वर्षाकालमें वर्षाकी कमी करती है व और अनुमें हो तो शसका कोप करनेवाली होती है ॥ २१॥ शिशि- रादिक संध्याका स्वभावसे उत्पन्न हुमा रंग जो लाल, पीला, श्वेत, चित्रविचित्र पर और रुधिरको समान होता है जैसो मातु हो वैसाही वर्ण हो तो कल्याणदायी है, दूसरा रंग हो तो विकार होता है ॥ २२ ॥ शख धारण किये नररूपधारी सूर्य के सन्मुसके मेघ जो छिन्नमिन्न हो नौ सानुभव होता है, श्वेत आकाशमें गंध- वनगर जो सूर्यको ढक लेवे तो आक्रमणकारी राजाको घेरा हुआ नगर माप्त हो जाता है, सूर्यनगर गंधर्वनगरका भेदन करे तो नगरका शयुसे नाश हो जाता है ।। २३ । शुस्वर्ण और शुक्ल किनारेवाले मेघ जो बाई ओरसे सूर्यको ढके अथवा उशोर ( खस) गुल्मको समान अदीस दिशा उत्पन्न हुए बादलसे जो सूर्य दक जाय तो वर्षा करनेवाला होगा ॥ २४ ॥ सूर्यके उदयकालमें जो शुरुवर्णका परिय दिखाई दे तो राजाको विपद होती है, रतवर्णसे सेनाका कोप होता है और कनकरूपधारीसे वलकी वृद्धि होती है ॥ २५ ॥ सूर्यके दोनों ओरको परिधि जो शारीखाली हो जाय नौ बहुनसा जल वर्पता है, सब परिध दिशामाको घेर लें तो जसका एक कणमी नहीं गिरता ॥ २६ ॥ सन्ध्याकालके मेध यज, छत्र. पर्वत, इस्ती और घोडेका रूप धारण करे तो जयका कारण है और रक्तको समान लाल होवें तो रणके कारण होते हैं ।। २७ ।। पलालके धुएकी समान सिग्ध'
(१२६)
वाराहीसंहिता।
चन्ति मृताम् ॥ २८ ॥ विलम्बिनो द्रुमोपमाः खरारुणप्रकाशिनः। घना
शिवाय सन्ध्ययोः पुरोपमाः शुभावहाः ॥ २९ ॥ दीप्तविहङ्गशिवामृगचुना
दण्डरजःपरिघादियुता च । प्रत्यहमर्कविकारयुता वा देशनरेशसुनिक्षत्रवार
॥ ३० ॥ प्राची तत्क्षणमेव नतमपरा सन्ध्या व्यहादा फलं सताहालारितो-
रेणुपारधाः कुर्वन्ति सद्यो न चेत् । तद्वत्सूर्यकरेन्द्र कार्मुकताडितत्सत्यमेश-
निलास्तस्मिन्नेव दिनेऽष्टमेऽथ विहगाः सप्ताहाका मृगाः ॥ ३१ ॥ एक दल्लिा
योजनं भाति सन्ध्या विद्युद्धासा पट् प्रकाशीकरोति । पञ्चाब्दानां गर्जितं पारि
शब्दो नास्तीपत्ता काचिदुल्कानिपाते ॥ ३२॥ प्रत्यर्कसंज्ञः परिधिस्तु तस्स
वियोजना ना परिघस्य पञ्च । पट् पञ्च दृश्यं परिवेपचकं दशामरेशस्य
धनुर्विजाति ॥ ३३॥
इति श्रीवराहमिहिररुतो वृहत्संहितायां सन्ध्यालक्षणं नाम त्रिंशोऽध्यायः॥३॥
गर्नधारी मेघ रानालोगोंके वलको बढाते हैं ॥ २८ ॥ मेघ संध्याकालमें तीन
नप के मायमरु वृक्षाकार हो या झुक जाय तो मंगल होता है, इसी समयने नमः
सो समान मे हो तो शुभ होता है॥२९॥सक सन्मुख होकर पसी, गदिड और
गृग करके गुन्दापमान और दंड, धरि और परिपयुक्त वा प्रतिदिन सूर्यको शिकार
पाटी गंगा देश, गना और मुभिश नाशका कारण है ॥ ३० ॥ पूरसंध्या
नासउ फल देती है, राबिया सापसन्ध्या तीन दिनमें और पचिप, रज
परिर उसी दिनमें फल न दे तो एक सप्ताहमें फल देते हैं, ऐसेही सूया राग,
द्रा, मिनी, अनिम्य, मेघ और वायु आठ दिनमै और पक्षी व मृग मा
में रउये परत है. मन्या अपनी दी एक योजन और बिजली भान
वन योजनता प्रक्रिया करती है मेघ गर्जना पांच योजनता मा
र उसने गिरने के योजना छ परिमाण नहीं ॥ ३१ ॥ ३९॥
त्या नाटी पागवकी दोन तीन गाजन, परिपको दात पांच पोजन, .
रचम देव पाव या गोननता देसी जाती है और इंद्रधनुष दश पोड
टरमा मता॥३३॥
यसमिरगयाम्योगपतायां हितायां पविमोनादेशीयमुगामा
सानिनवनायो माया विमोपायः ॥१०॥
मापाटीपासाहिता १०३१॥
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अथेकत्रिंशोऽध्यायः।
दिग्दाहलक्षण.
बाहो दिशां रामायाप पीतो देशस्य नाशाप हुताशवर्णः। यथारुणः
पादपसव्यवायुः सस्पस्प नाथं स करोति यः ॥ १ ॥ योजीवदीया कुरुते
का छापामा व्यापतेऽकंवयः । रातो महदेदयते भयं स शवमको
मजानुरूपः ॥ २॥ पारक्षत्रियाणां सनरेश्वराणां पारदक्षिणे शिल्पि-
मारपीडा । याम्ये सहोयः पुरुषस्तु वैश्या दूताः पुनर्गप्रमदाय कोणे ॥ ३ ॥
भानु शूद्राः सापनीविनय चौरास्तुर : सह वायुदिक्स्थे । पीडां बजन्त्यु-
रतब विमाः पापण्डिनो वाणिजकाच शायाम् ॥ ४ ॥ नः प्रसन्नं विम-
आनि मानि प्रदक्षिणं वाति सागतिभा दिशां च दाहः कनकावदातो हिताय
टोकस्य सपार्थिवस्प ॥५॥
ति श्रीवराहमिहिरनी वृहत्संहितायां दिग्दाहलक्षणं नामकत्रिंशोऽध्यायः ३१
पीले वर्णका दिग्दाह गजमयका कारण, हुतादानके वर्णका दिग्दाह देश नाराका
गरण होता है और लालरंगा हुमा दक्षिणी पवन धान्यको नष्ट करता है।॥ १॥
जस दिग्दाइमें अत्यन्त दीति हो, और सूर्यको समान छायाको (अंतर्गतज्यो-
को) प्रकाशित करता है वह रुधिरकी समान दाह राजाको महाभप देता है
नौर शसका कोप प्रकाशित करता है।॥ २॥ पूर्व दिशा में दिग्दाइ हो तो राजा
मार क्षपियोंको पीडा होती है, अग्निकोणमें कुमारगण और शिल्पयोगी पीडा
हवा है, दक्षिणमें उमपुरुप, वैश्य, नगण और दूसरी बार व्याही हुई खियोंको
सदायक होता है ॥ ३ ॥ पश्चिमदिशामें शूद्र और किमान, वायुकोणमें तुरंग-
पहन चोर लोग और उत्तर दिशामें प्रामण टोग और ईशान कोणमें पापण्डी
और पनियोंको पीटा होती है।।४॥ जो आकाश मसन्न हो, नक्ष निर्मल हो,
वन धूमता हुया चले.तो सुवर्णके रंगकर दिग्दाह लोगोंके और राजाके हितका
नमित्त होता है ॥५॥
वि श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादाबादवास्त-
य-पंडितबलदेवप्रसादमिश्रविरचितायां मापाटीकाया मेकाशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
ELECTURनाने मोरनी मायमान ही दाताभार
पानी मानी गिरन हुए और पृषीप RArk
gaनगी योनगान मान मरा" मरठा" ना.
intHER समान पानामगरलापु
2113 पालामुम मानस
॥३॥ भगवन्नाम ममेतत्त्वया रुतं यश्चलेति तन्न तथा। किपतेजना
(१२८)
वाराहोताहेता।
अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः।
भूमि कांपने के लक्षण.
शितिकम्पमाहुरेके बृहदन्तलनिवासिसत्त्वकतम् । भारसिकांना
विश्रामसमुद्रसं चान्ये ॥ १ ॥ अनिलोऽनिलेन निहतः क्षिती पतन मन
करोत्येके । केचित्त्वदृष्टकारितमिदमन्ये पाहराचार्याः॥२॥ मिरिन ।
मासुधा प्रपतनिरुत्पतन्धि । आकम्पिता पितामहमाहामरसानिधार
गुनाहं नास्य सदस्य ॥ ४॥ तस्याः समदगिरं किविकुरिना
तनाव । माऽविलोचनमाननमवलोक्य पितामहः पाह ॥ ५ ॥ मन
पाचाः सिा कुलिशं शैलपक्षनङ्गाय । शकः कतमित्युक्त्वा मा औरंगी
कालाइ ॥ ६ ॥ छिन्त्यनिलपहनसुरपतिवरुणाः सदसत्फला रोशन
समिरिन भागेर नितिशोः कमयिष्यन्ति ॥ ७॥ चत्वापार्यपाल
नाम भूमि पर जलमें रहनेवाले पडे प्राणिपोका कित
HTTी है भारको धारण करनेसे पके हुए दि.प.
इसका कारण है ॥ १ ॥ मार कोई २ करते
नामावमिको करना
" मनु का कहने की मी प्राचार्य र
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नालापानीको
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भालव देशमें पीडा होती है और अभिलाषाके अनुसार वर्षा होती है ।॥ १९ ॥ खेती, पूर्वापाढा, आर्द्र, आश्लेषा, मूल, उत्तराभाद्रपदा, शतभिपा ये सात नक्षत्र समान मतिफलित गुतिमान, विजलीकरके उद्भासित देह बहुतसे वादल मधुर शब्द करते २ जलधारारूप अंकुरासे वर्षते ॥ २० ॥ २१॥ इस वारुणमंड वृष्टिकारक, देपहीन और गोनर्द, चेदी, कुकुर, किरात और विदेहवासियों नास उल्का, गंधर्वपुर, धरि, उपद्रव, मूकंप, दिग्दाह, प्रचंडपवन और सूर्य चंद्रमाम आण, नक्षत्र और तारों के विकारके लिये कहा गया ॥२४॥ विना वादलके वान (१३०) वाराहीसंहिता। चलिताचलवाणो गम्भीरविराविणस्तडित्वन्तः । गवललालिकुलाहिनिशा विसृजन्ति पयः पयोवाहाः ॥ १७ ॥ ऐन्नं श्रुतिकुलजाविख्यातावनिपालगणा- विध्वंसि । अतिसारगलग्रहबदनरोगलच्छर्दिकोपाय ॥ १८॥ काशियुगन्धर पौरखकिरातकीराभिसारहलमद्राः । अर्बुदसुवास्तुमालवपीडाकरमिष्टवृष्टिकर ॥ १९॥ पोष्णाप्या पामूलाहिर्बुध्न्यवरुणदेवानि। मण्डलमेतद्वारुणमत्या भवन्ति रूपाणि ॥२०॥ नीलोखलालिभिन्नाअनविपो मधुरराविणो बहुटा: तडिदुनासितदेहा धारांकुशवपिणो जलदाः ॥ २१ ॥ वारुणमर्णवसरिदाभिर भ्रमतिवृष्टिदं विगतवरम् । गोनर्दचेदिकुकुरान किरातवैदेहकान हन्ति ॥ २२॥ पड्भिर्मासैः कम्पो द्वाश्यां पाकं च याति निर्यातः । अन्यानप्युलातान म रन्ये मण्डलैरेतैः ॥ २३ ॥ उल्का हरिश्चन्द्रपुरं रजश्व निर्वाताकमककुम दाहाः। वातोऽतिचण्डो ग्रहणं रवीन्दोर्नक्षत्रतारागणवैकतानि ॥ २४ ॥ध्यक्ष वृष्टिकतं वातवृष्टिधूमोऽनमेविस्फुलिङ्गार्चिपोवा। वन्यं सत्त्वं ग्राममध्ये विशेषज्ञ ऐसा है, चलते हुए पर्वतकी समान रूपधारी, गंभीर शब्दकारी, तडिद्युक्त, वन, भैंस, भ्रमर और सांपकी समान काले मेघ जलको वर्षाते हैं. इन्द्रवर्गमें भूमिका होनेसे समुद्र और नदियोंमें रहनेवाले राजा और गणपतियोंका विवंस होता है और अतिसार, गलग्रह, वदनरोग और वमनकोप होता है ॥ १६ ॥ १७ ॥१८॥ काशी, युगंधर, पौरख, किरात, कीर, अभिसार, हल, मद्र, अर्बुद, सुवास्तु और भूमिकम्प हो तो समुद्र और नदियोंके आश्रयमें रहनेवालोंका नाश होता है, या होता है। इन मंडलोंमें और उत्पात हों वेमी इन दो महीनों ही फल देंगे ॥ २१॥ " मापाटीकासहिता २०३२। रात्रावन्दं कार्मुकं दृश्यते वा ॥ २५॥ सन्ध्यापिकाराः परिवेपसण्डा नया प्रतीपा दिवि तूर्यनादाः । अन्यञ्च यत्स्यात् परतः प्रतीपं तन्मण्डलैरेव फलं निगाद्यम् ॥ २६ ॥ हन्त्यैन्दो वायव्यं वायुश्चाप्पैन्द्रमेवमन्योऽन्यम् । वारुण- होतभुजावपि वेलानक्षत्रजाः कम्पाः ॥ २७ ॥ प्रथितनरेश्वरमरणव्यसनान्या- प्रेयवायुमण्डलयोः । शुदयमरकावृष्टिनिरुपताप्यन्ते जनाश्चापि ॥ २८ ॥ वारुणपोरन्दरयोः मुभिक्षशिववृष्टिहाईयो लोके । गावोऽतिपुरिमयसो निवृत्तवे- राश्च भूपालाः ॥ २९ ॥ पक्षश्चतुर्मिरनिलविधिरागिर्दवराट् च सताहाद । सद्यः फलति च वरुणो येषु न कालोद्भुतेषतः ॥ ३० ॥ चलयति पवनः शतद्वयं -शतमनलो दशयोजनान्वितम् । सलिलपतिरशीतिसंयुतं कुलिशधरोऽत्यधिक च पष्टिकम् ॥ ३१॥ त्रिचतुर्थसप्तमदिने मासे पक्षे तथा विपक्षे च । यदि भवति भूमिकम्पः प्रधाननृपनाशनो भवति ॥ ३२ ॥ इति श्रीवराहमिहिरस्ती वृहत्सं शूमिकम्पलक्षणं नाम द्वारिंशोऽध्यायः ॥३२॥ होना, विकार, अनिकी चिनगारीदार लपट, पवनके साथ वर्षाका होना, भूम, पने प्राणियोंका ग्राममें आना, रात्रि इन्द्रधनुषका दिखाई देना, संध्या विसार, परि- वैपखंड, नदियोंकी गतिका विपरीत होना, आकाशमें तुरंदीकर बजना. औरभी को कुछ संसारमें विपरीतता हो इस वर्गसेही उसका फल यहा जाता है ॥२५॥ २६ ॥ जो इन्द्रमंडल वायव्यमंडलको निहत को या वायन्यमंडल इन्द्राकर नाश को, जो ऐसेही वारुण और आनेयमंडल परस्पर एक दूसरेको हनन करे वो उसको बेलानसप्रजात कम्प कहते हैं ॥ २७ ॥ आग्रेय और वायल्पमंडलके परस्सर एक- रानेसे विख्यात राजाको मृत्यु होती है या वह विपचिने पड़ता है. और मनुष्य सुपामय, मरी और वाके न होनेसे सन्तापित होवेवरुण और पौरन्दर :- लके अभिपावसे मुभिक्ष, कल्याणी वो और भीति होती है, गारें बालवा दूध देने लगती है, राजा लोग आपसका वैर छोड़ देते हैं ॥२८॥२९॥ अंग परस्त्य आदि जिन उपद्रों के फलका समय नहीं कहा उनके वारपटलमें होनेवे दो मायके मध्यमें पल दोवा, आमिर्ग चीन पस, इन्दा साइके पोरे और करुणार्ग शीम फलान् रोताहै ॥३०॥ र्ग दो शव पोजन, सनम एक शव दस योजन, वरुणार्ग एक वयस्वी योजन और हवायं सार पो नसे कुछ प्रषिक भनियो रापमान कराय११॥ भूकरके दाद टीवरे, इसका परिमाण दो हाथका ॥६॥ तारा तापा, कमल, ताररूप वा शुछ होती, नक माणियोंको त्रास उपजाती हुई कुदिल और विशाल होकर जलती, हुई जोराडे उपर गौर ईधनके टेरपर गिरती है॥५॥ पतली, छोटी, पूंछवाली धिप्पया जटते हुए अंगारेकी समान दश धनुषसे कुछ अधिक स्थानतक दिखाई देवी। (१३२) वाराहीसंहिता। अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः। उल्कालक्षण. दिवि भुक्तशुभफलानां पततां रूपाणि यानि तान्युल्काः। धिष्ण्योल्का- निविद्युत्तारा इति पञ्चधा जिन्नाः॥ १ ॥ उल्का पक्षेण फलं तद्वद्धिष्ण्याशनि- विनिः पक्षः। विद्युदहोभिः पशिस्तद्वत्तारा विपाचयति ॥ २॥ तारा फलपा दकरी फलार्धदात्री प्रकीर्तिता धिष्ण्या । तिस्रः सम्पूर्णफला विद्युदथोल्काश- निश्चेति ॥ ३॥ अशनिः स्वनेन महता नृगजाश्चमृगाश्मवेश्मतरुपशुषु । निपनाति विदारयन्ती धरातलं चक्रसंस्थाना ॥ ४ ॥ विद्युत्सत्त्ववासं जनयन्ती तटतटस्चना सहसा । कुटिलविशाला निपतति जीवेन्धनराशिपु ज्वलिता॥4॥ धिष्ण्या कशा- ल्पपुच्छा धपि दश दृश्यतेऽन्तरात्यधिकम् । ज्वलिताङ्गारनिकाशा दी हस्ती साप्रमाणेन ॥६॥ तारा हस्तं दीर्घा शुक्ला ताम्राजतन्तुरूपा वा। चौथे और सातवें दिनमें या महीनेमें वा पक्षमें अथवा तीन पक्षमें जो फिर भूमिका हो तो मुख्यराजाका नाश होता है ॥ ३२ ॥ स्वर्गमें फल भोगे हुए पुरुषोंका गिरनेके समय जो रूप होता वही उल्का है. धिष्ण्या, उल्का, अशाने, विजली और तारा यह पांच भाग उल्काके हैं ॥ १ ॥ उल्का १५ दिनमें वैसेही धिष्ण्या और शान तीन पक्षमें अर्थात् ४५ दिन और तारा वा विजलीका फल दिनमें होता है ॥ २ ॥ तारा एक चौथाई फटका करनेवाली है, धिण्या आधे फलको देनेवाली और विजली, उल्का, . इन तीनोंका सम्पूर्ण फल होता है ।। ३ ॥ अशानका आकार चक्रकी समान है। यह बडे शब्दके साथ पृथ्वीको फाडती हुई मनुष्य, गज, अश्व, मृग, पत्थर, ग. वृक्ष और पशुओंके ऊपर गिरती है ॥ ४ ॥ तड २ शब्द करती हुई विद्युत् अचा, तिर्यगधश्वो .
भापाटीकासाहेता अ० ३३ । वा याति वियत्युह्यमानेव ॥७॥ उल्का शिरसि विशाला निपत पतनुपुच्छा। दीर्घा भवति च पुरुष भेदा बहवो भवन्त्यस्याः॥८॥ खरकरजनन कपिदष्ट्रिलाइन्टमृगानाः । गोपाहिधूमरूपाः पापा या के रस्का ।।९॥ धनझपकरिगरिकमलेन्दुतुरगसन्तमरजतईसानाः । श्रीवन शवस्वास्तिकरूला शिवसुनिताः ॥१०॥ अम्बरमध्याइयो निप राजराष्ट्रनाशाय । वनमती गगनोपरि विचममाख्याति लोकस्य । संस्पृशतो चन्द्रार्को तदिसता वा तपकम्पा च । परचक्रागमनृपवधा बृटिनयजननी ॥ १२॥ पारेतरनमुल्कापसव्यकरणं दिवाकरहिमांश्यो उल्का शुनदा पुरतो दिवाकरनिःसृता यातुः ॥ १३॥ शुक्ला रक्ता पीता कप चोल्का विनादिवर्णनी । क्रमशचतान् हन्युमरि पापुच्छस्थाः ॥१४ त्तिरदिगादिपतिता विषादीनामनिष्टदा रूक्षा । ऋग्वी स्निग्धाखण्डा नीचोपगत का विस्तार एक हाय है, खींचते हुएको समान आकाशमें तिरछी या आधी । दुई गमन करती है ॥७॥ प्रतनुपुच्छा विशाला उल्का गिरते २ वढती है; परन्तु की पूंछ छोटी होती जाती है. इसकी दीर्घता पुरुपकी समान होती है, इसके अनेक भेद हैं ॥ ८॥ कभी यह प्रेत, शख, खर, करभ, नाका, बन्दर, डादवाले जीव और मृगकी समान आकारवाली हो जाती है. कभी गौह सांप और धूमरूप हो जाती है और कभी दो शिरके रूपवाली होती है. यह पापमयी है ।।९।। कमो धन, मत्स्य, हायी, पर्वत, कमल, चन्द्रमा, अश्व, तपी हुई धूल और इसकी समान, कभी श्रीवत्स, वन, शंख और स्वस्तिक रूपसे मकाशित होती है परन्तु यह सब कल्याण और मुभिक्षकारी है ॥ १० ॥ परन्तु अनेक प्रकारको रूपवाली ल्कायें निरन्तर आकाशमें घूमते २ आक्रामसे गिरती हैं ॥ ११ ॥ चंद्र और र्यको स्पर्श करके उनमेंसे गिरे अथवा भामे कम्पयुक्त हो तो नगरपर पराये नाका अधिकार होगा, नृपवध, दुर्भिक्ष, अवृष्टि और भयकारी होती है ॥ १२॥ चिंद्रमाके दाई ओर उल्का गिरे तो वनवासियोंका नाश करता है. दिवाकरसे नकली हुई उल्का सन्मुख आवे वो गमनकारीको शुभ है ।। १३ ।। शुक्छ, रक्त, पीत और काले रंगकी उल्का क्रमानुसार विनाविवोका नाश करनेवाली है और उसका मस्तक, छाती, वगल और पूंछमें यह सब वर्ण स्थापित हों तौभी यह क्रमानुसार बामणादि चार वर्णोकी नाश करनेवाली है ॥ १४॥ प्रदक्षिणाके कमसे उत्तर आदि दिशाओमें उल्का रूखे मावसे गिरे तो क्रमानुसार प्रादण साघुयोको पीडा होती है ॥ २१ ॥ पुरदारपर उल्का गिरे ती पुरकर सपाद- पुनर्वस, धनिष्ठा और मूल नक्षत्रके योगतारेको उल्का हनन करे वो युवतिया उल्कासे मेद हो तो गीत नृत्य आदि कला जाननेवालोंको पीडा होती है ॥१९॥ देवताकी मूर्तिपर उल्का गिरे तो राजा और राज्यको भयदायक है. इन्द्रमवार गिरे तो राजाबोंको और घरमें गिरे तौगृहस्वामियोंको पीडा उत्पन्न करती है ।।२।। दिशाके स्वामी गृहके ऊपर उल्का गिरे ती तिस दिशाके रहवासियोंका, सरियानमें गिरनेसे किसानोंको, छोटे मंदिरके निकट वृक्ष लगा हो उसपर उल्ला गिरे (१३४) वाराहीसंहिता। च तदृद्धये ॥ १५ ॥ श्यामा वारुणनीलामृग्दहनासितजस्मनिमा रहा। सन्ध्यादिनजा वका दलिता च परागमभयाय ॥ १६॥ नक्षत्रग्रहवाते तदनीय क्षयाय निर्दिष्टा । उदये नती रवीन्दू पौरेतरमृत्यवेऽस्ते वा ॥ १७ ॥ भाग्या- दित्यधनिष्ठामूलेपूल्काहतेषु युवतीनाम् । विपक्षत्रियपीडा पुप्यानिलविष्णु- देवेषु ॥ १८॥ ध्रुवसीम्येपु नृपाणामुग्रेषु सदारुणेषु चौराणाम् । क्षिपेड कलाविदुषां पीडा साधारणे च हते ॥ १९ ॥ कुर्वन्त्येताः पतिता देवनातिनानु राजराष्ट्रभयम् । शकोपरि नृपतीनां गृहेषु तत्स्वामिनां पीडाम् ॥ २० आशाग्रहोपघाते तद्देश्यानां खले कपिरतानाम् । चैत्यतरी सम्पतिता सत्कवी करोत्युल्का ॥ २१ ॥ द्वार पुरस्य पुरक्षयमथेन्द्रकीले जनक्षयोऽनिहितः क्षत्री, वैश्य और शूद्रोंका नाश करती है. सीधी, चिकनी, अखंड और आक्यश नीचे भागमें जानेवाली हो तो उपरोक्त वर्णोकी वृद्धि करती है ॥ १५ ॥ मा अरुण, नील, रक्त, दहन, असित और भस्मकी समान रूखी संध्यासे उत्पन्न हु दिनसे उत्पन्न हुई, टेढी और दालेत हुई उल्काका गिरना शत्रुके मयका कार है ॥ १६ ॥ उल्कासे नक्षत्रघात या ग्रहयात हो तो पीछे कही हुई मक्तिका ना होता है और तिस २ वस्तुका क्षय होता है, उदय या अस्तकालमें उल्का । या चंद्रमाको हनन करे तो वनवासियोंका वध होता है ॥ १७ ॥ पूर्वाफाल्गुन पीडा होती है, और पुष्य, स्वाति व श्रवणको उल्का हत करे तो ब्राह्मण सात्रियोंको पीडा होती है ॥ १८॥ रोहिणी, तीनों उत्तरा, मृगशिरा, चित्रा, मल राधा और खेतीको उल्का पीडित करे तो राजाको पीडा होती है, तीनों पूर्वा मरणी, मघा, आर्द्रा,:आश्लेषा, ज्येष्ठा और मुलनक्षत्रको उल्का ताडन करे दो चोरोंको पीडा होती है, अश्विनी, पुष्प, अभाजित, कृतिका और विशाल * मापाटीकासाहता म० ३३॥ मलापतने विमान विनिहन्याहोमिनो गोठे ॥ २२ ॥ वास्फोटितवादितर्ग तुस्त्वना भवन्ति यदा। उल्कानिपातसमपे भयाय राष्ट्रस्य सनृपस्य ॥ २ यस्पाभिरं तिष्ठति खेऽनुपङ्गो दण्डारुतिः सा नृपतेर्भयाय । या चो तन्तुधृतेव खस्था या चा महेन्द्रध्वजतुल्यरूपा ॥ २४ ॥ श्रेष्ठिनः प्रतीप तिर्यगा नृपागनाः । हन्त्यपोमुखी नृपान् ब्राह्मणानथोर्ध्वगा ॥ २५ पहिपुच्छरूपिणी लोकसंक्षयावहा। सर्पपद प्रसर्पिणी योपितामनिष्टदा ॥ २६ हन्ति मण्डला पुरं उत्रवद पुरोहितम् । वंशगुल्मपद स्थिता राष्ट्रदोपका रिणी ॥ २७ ॥ व्यालसूकरोपमा विस्फुलिङ्गमालिनी । खण्डशोऽथवा गत सस्वना च पापदा ॥ २८॥ सुरपतिचापमतिमा राज्यं नमासि विलीना जलदान हन्ति । पवनविलोमा कुटिलं याता न भवति शस्ता चिनिवृचा वा ॥ २९ ॥ उके ऊपर गिरे तो मनुष्यों का क्षय कहा है, अक्षाके मंदिरपर गिरे तो ब्राह्मणोंको और गोटमें गिरे तो बहुत से गोसम्पन्न मनुष्योंको हनन करती है ॥ २२ ॥ जो ल्लिा गिरनेके समय क्षेड (समरके समय वीरका सिंहनाद करना), आस्फोटित, पादित गीत और रोनेका ऊंचा शन्द हो तो नृत्ययुक्त राज्यको भप होता है २३ ॥ जिसका आकार दंडके आकारको समान होकर आफ्यशमें बहुत रतक रहे वह उल्का राजाओंके भयका कारण होती है और जो आकाशमें ठहर- र डोरोसे बंधी हुईको समान माहित या इन्द्रकी ध्वजाके समान हो तो जाको भयदायी है ॥ २४ ॥ जो उला विपरीत चले अर्थात् जहां निकली हो '. वहींको फिर लौट चले तो शेठलोगोंको मय करती है, टेदी पलनेपाली उल्का रानि- योंका, नीचेको मुखवाली उल्का राजाओंका और ऊपरको चलनेवाली उल्का बार- णोंका नाश करती है ॥ २५॥ मोरपूछके समान आकारखाली उल्का लोकक्षय- कारी और सर्पको समान चलनेवाली उल्का सियोंका अनमल करती है ।। २६ ॥ मैडलरूपवाली उल्का नगरको, उग्ररूप उस्का पुरोहितको नाश करती है और यांसको बीटके समान उल्का देशमें दोष उत्पन्न करती है ॥ २७ ॥ व्याल (काले सांप ) और सकरकी समान आकारयुक्त वा चिनगारीदार अथपा पिण्डाकार या शब्दसहित उल्ला चले तो पापदायिनी है ॥ २८ ॥ इन्द्रधनुषकी समान हो तो राज्यका नाश करे, आकाशमें लीन हो जाय तो यादलोंका नाश करे और पवनको प्रतिकूल दिशामें कुटिलमावसे गमन करे और फिर लौट आवे तो शुमदापी नहीं
पुनर्वस, धनिष्ठा और मूल नक्षत्रके योगतारेको उल्का हनन करे वो युवतियाये
चोरोंको पीडा होती है, अश्विनी, पुष्य, अभिजित्, कृत्तिका और विशाराम
देवताको मूर्तिपर उल्का गिरे ती राजा और राज्यको मयदायक है. इन्द्रमवार
दिशाके स्वामी गृहके ऊपर उल्का गिरे ती तिस दिशाके रहवासियोंका, खरिदार
गिरे ती राजायोको और घरमें गिरे तौगृहस्वामियोंको पीडा उत्पन्न करती है ॥२०॥
मापुमाको पीडा होती है ।। २१॥ पुरद्वारपर उल्का गिरे तो पुरक्य सय, इन्दा
(१३४)
वाराहीसंहिता।
च नदृष्ये ॥ १५ ॥ श्यामा वारुणनीलामग्दहनासितजस्मनिज्ञा झा
सन्ध्यादिनजा वका दलिता च परागमभयाय ॥ १६॥ नक्षत्रग्रहयाते तदन्छीनां
क्षयाय निर्दिष्टा । उदये प्रती सीन्दू पौरतरमृत्यवेऽस्ते वा ॥ १७ ॥ जान्या-
दित्यधनिष्ठामूलेपूल्काहतेषु युवतीनाम् । विपक्षत्रियपीडा पुप्यानिलविष्णु-
देवेषु ॥ १८ ॥ध्रुवसीम्येषु नृपाणामुग्रेषु सदारुणेषु चौराणाम् । क्षिरे
कलांविदुषां पीडा साधारणे च हते ॥ १९॥ कुर्वन्त्येताः पतिता देवमतिमातु
राजराष्ट्रायम् । शकोपरि नृपतीनां गृहेषु तत्स्वामिनां पीडाम् ॥ २० ॥
आशायहोपघाते तद्देश्यानां खले कपिरतानाम् । चैत्यतरी सम्पतिता सलतीही
करोत्युल्का ॥ २३ ॥ द्वार पुरस्य पुरक्षयमन्दकीले जनक्षयोऽनिहितः
क्षत्री, वैश्य और शूद्रोंका नाश करती है. सीधी, चिकनी, अखंड और आक्रयशने
नीचे भागमें जानेवाली हो तो उपरोक्त वणोंकी वृद्धि करती है ॥ १५ ॥ श्यान
अरुण, नील, रक्त, दहन, असित और भस्मकी समान रूखी संध्याते उत्पन्न हुई,
दिनसे उत्पन्न हुई, टेढी और दलित हुई उल्काका गिरना शत्रुके भयका कारन
है ॥ १६ ॥ उल्कासे नक्षत्रघात या ग्रघात हो तो पीछे कही हुई मतिय नास
होता है और तिस र वस्तुका क्षय होता है, उदय या अस्तकालमें उल्का वर्ष
या चंद्रमाको हनन करे तो वनवासियोंका वध होता है ।। १७ ॥ पूर्वाफाल्गुनी,
क्षत्रियोंको पीडा होती है ॥ १८ ॥ रोहिणी, तीनों उत्तरा, मृगशिरा, चित्रा, अमर
राधा और खेतीको उल्का पीडित करे तो राजाओंको पीडा होती है, तीनों पूरा
मरणी, मघा, आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा और मुलनको उल्का ताडन को ठी
उल्कासे मेद हो तो गीत नृत्य आदि कला जाननेवालोंको पीडा होती है ॥१९॥
मापाटीयसाहिवा म०३३॥ चलायतने विशन् विनिहन्यानोमिनो गोडे ॥ २२॥ क्षेठास्फोटितवादितगीतो- कुस्त्वना भवन्ति यदा । उल्कानिपातसमये भयाय राष्ट्रस्य सनृपस्य ॥ २३ ॥ सस्पाविरं तिष्ठति खेऽनुपरे दण्डासतिः सा नृपतेयाय } या चोहाते तन्तुधृतेव सस्था या वा महेन्दभागवल्परूपा ॥ २४ ॥ श्रेष्ठिनः मतीपगा निगा नृपादनाः । हन्त्यधोमुखी नृपान् बामणानयोर्ध्वगा ॥ २५ ॥ बर्हिपुच्छरूपिणी लोकसंक्षपातहासविद प्रसर्पिणी योपिनामनिष्टा ॥ २६ ॥ हन्ति मण्डला पुरं उत्रपद पुरोहितम् । वंशगुल्मपद स्थिता राष्ट्रदोपका- रिणी ॥ २७ ॥ पालसूकरोपमा विस्फुलिङ्गमालिनी । खण्डशोऽधवा पता सस्वना च पारदरा ॥ २८ ॥ सुरपतिचापमतिमा राज्यं नभसि विलीना जलदान हन्ति । पपनाविलोमा कुटिलं याता न भवति शस्ता चिनिवृत्ता वा ॥ २९ ॥ सके अपर गिरे तो मनुष्यो क्षय कहा है, मक्षाके मंदिरपर गिरे तो बामणोंको और गोठमें गिरे तो बहुत से गोषम्पन्न मनुष्योंको हनन करती है ।॥ २२ ॥ जो उल्का गिरनेके समय वेड (समरके समय वीरका सिंहनाद करना), आस्फोटित, वादित गीत और रोनेका ऊंश शब्द हो तौ नृत्ययुक्त राज्यको भय होता है ॥ २३ ॥ जिसका आकार दंडके आसारकी समान होकर आकाशमें बहुत देरतक रहे वह उल्का राजाओंके भयका कारण होती है और जो आकाशमें ठहर- कर डोरीसे बंधी दुईको समान भवादित या इन्द्रकी मजाके समान हो वो राजाको भयदायी है ॥ २४ ॥ जो उल्का विपरीत चले अर्थात् जहां निकली हो हॉो फिर लौट चले तो शेठलोगोंको मय करती है,टेदी चलनेवाली उल्का रानि- पोका, नीचेको मुखवाली उल्का राजाओंका और अपरको चलनेवाली उल्का माह गोंका नाश करती है ॥ २५ ॥ मोरपूंछके समान आकाराली उल्का लोकक्षय- कारी और सपकी समान चलनेवाली उल्का खियाँका अनमल करती है।॥२६॥ मैडलरूपाली उल्का नगरको, छत्ररूप उल्का पुरोहितको नाश करता है और... बांसको बोटके समान उका देशमें दोष उत्पन्न करती है ॥ २७ ॥ व्याल सांप ) और सूकरको समान आकारयुक्त का चिनगारीदार अपा। शन्दसहित उल्का चले तो पापदायिनी है ॥ २८ ॥ इन्द्रधनुषको राज्यका नाश करे, आकाश, हो जाय तो बादलोंका नाश प्रतिकूल दिशामें कु रे और फिर लौट मंडलाकार होकर थोडेसे मेघवाले आकाशमें अनेक रंग और आयरके दिखलाई देते हैं उनको परिवेप कहते हैं ॥ १ ॥ रक्त, नील, थोडासा श्वेत, कबूतरके रंगका, मेघके रंगका, शबल ( अनेक प्रकारके रंगोंसे युक्त) परिवेप करते हैं और परस्पर गुण आश्रयके हेतु जो वारंवार लीन होता है वा तेल, दूध और जलकी समान यामावाला हो, स्वकालसम्भूत हो जिसका वन खंडित न हो, जो खिग्ध हो वह मुमिक्ष और मंगलका करनेवाला है ॥ ४ ॥ परिवेप सारे भाकाशमें गमन करे; अनेक आमादार हो, रुधिरकी समान हो, रूस वाराहीसंहिता। अभिनवति यतः पुरं वलं वा भवति भयं तत एवं पार्थिवस्य । निपततिर यथा दिशा प्रदीप्ता जयति रिपूनचिरात्तया प्रयातः॥ ३० ॥ इति श्रीवराहमिहिररुती बृहत्संहितायामुल्कालक्षणं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः३६ अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः। परिवेपलक्षण. सम्मूर्छिता रवीन्दोः किरणाः पवनेन मण्डलीजताः। नानावर्णानयत्व न्यचे व्योनि परिवेपाः॥ ॥ ते रक्तनीलपाण्डुरकापोतानाजशबलहरिशङ्काः। इन्द्रयमवरुणनितिश्वसनेशपितामहानिकताः ॥ २॥ धनदः करोति मेचक मन्योऽन्यगुणाश्रयेण चाप्यन्ये । प्रविलीयते मुहुर्मुहुरल्पफलः सोऽपि वायुः कृतः॥ ३॥ चापशिखिरजततलक्षीरजलामः स्वकालसम्भूतः । अविकलवृतः स्निग्धः परिवेपः शिवसुभिक्षकरः॥ ४ ॥ सकलगगनानुचारी नैकामः क्षनजा- है ॥ २९ ॥ जिस ओरसे उल्का आकर पुर या सेनाके ऊपर गिरे उस दिशात राजाको भय होता है और जिस दिशामें प्रकाश करके. गिरे राजा उस दिशाने जाय तो शीघ्र शत्रुओंको जीतनेके लिये समर्थ होता है ॥ ३० ॥ इति श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोचरदेशीयमुरादाबादवा स्तव्य-पंडितवलदेवप्रसादमिश्रविरचितायां मापाटीकायां त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥३३॥ चंद्रमाके किरण पर्वतके ऊपर प्रतिविम्बित और पवनके द्वारा हरिद्वर्ण और शुक्लबर्णके परिखेप क्रमानुसार इन्द्र, यम, वरुण, निति, वायु, महादेव, ब्रह्मा और अग्निसे उत्पन्न हुए ॥२॥ धनदाता कुवेरजी काले रंगका अल्प फल देनेवाला परिवेप वायुका है ॥ ३ ॥ जो परिवेष नीलकंठ, मोर चांदी, सूर्य या.
मापाटीकासहिता म०३४॥ (१३७) निगो रूक्षः । असकलशकटशरासनाटकवर स्थितः पापः ॥५॥ शिखि- गलसमेऽतिषपं बहुवर्णे नृपवधो भयं धने। हरिचापनिने युधान्पशोककुमुम- भने चाति ॥ ६ ॥ वर्णेनकेन यदा बहुलः स्निग्धः क्षुरामकाकीर्णः। स्वर्ती सद्यो वपं करोति पीतव दीप्ताः ॥ ७॥ दोलविहङ्गमगातः कलपः सन्ध्या- अयोत्थितोऽतिमहान् । भपरुत्तडिदुल्काहतो नृपं हन्ति शस्रेण ॥८॥ प्रतिदिनमहिमांन्धोरहनिरा रक्योरेन्दवः । परिविष्टयोरभीक्ष्ण लमास्तनपान स्थयोत्तद्वव ॥ ९ ॥ सेनापतेर्भयकरो दिमण्डलो नातिशतकोपकरः । विप्रकृति शस्त्रको युवराजमपं नगररोधम् ॥ १० ॥ वृष्टिरूपहेण मासेन विग्रहो वा यहेन्दुभनिरोधे । होराजन्माधिरयोर्जन्मः वाशुभो राज्ञः ॥ ११॥ परिषेपम- ण्डलगनो राक्तिनयः क्षुधान्पनाशकरः । जनयति च वातवृष्टिं स्थावरलपिक खंडित छकडेको समान, धनुष और शृङ्गाटकी समान हो सो पापकारी है ॥५॥ मोरकी गर्दनको समान परिप हो वो अतिपर्ण होती है, पहुवसे रंगासे युक्त दो चौ राजाका वध होता है, धूमपर्ण होनेसे भव होता है, इन्द्रधनुपके समान या अशोकके फूलको समान कान्तिमान होनेसे युद्ध होता है ॥ ६ ॥ जिस ऋतुमें परिखेप एक वर्णके मेलसे बहुत चिकना, उस्तरेकी समान छोटे २ मेघोंसे व्याप्त हो वा सूर्यको किरणें पीले वर्णकी हो उस समय शीघ्र दृष्टि होती है।॥ ७॥ सूर्यको भोरको मुख करके पक्षी और मृगोंके शन्दसहित त्रिकालके शन्दसाइत त्रिकालको सन्ध्यामें उत्पन्न हुआ, आतेमहान् परिवेष भयंकर होता है, परन्तु जो यह उल्लय या विजली करके भेदित हो तो शससे राजाको मृत्यु होती ॥ ८॥ प्रति दिन राव सूर्य चन्द्रमाका परिवेष रक्तवर्ण हो तो राजाका क्य होता है और उदयाल, अस्तकाल, दिनरातके मध्यकालमें सूर्य चन्द्रमारने एक दिनमें यादे अधिक परिखेप हो तोभी वही फल अर्थात् रामाका वध होता है ॥९॥ दो मंडलाला परिवेष सेनापतिको भयकारी है, परन्तु अत्यन्त शसस्कारी नहीं है, तीन मंडलबाला या अधिक मंडलवाला परिवेष शखकोप, युवराजमय और नगररोधका कारण होता है ॥ १०॥ भौमादि कोई प्रह, चन्द्रमा, नक्षर यदि एक परिवषमें हों तो तीन दिनमें वर्षा या एक मासमें युद्ध होता है. होरा और समाधिपति का जन्मनक्षत्रार परिवेष हो तौर नाका अशुभ होता है ॥ ११॥ जो शनि परिवेपमंडलमें हो तो छोटे धाम्पको नए करता है और स्थावर वा किसानोंय हननकारी होकर पवनयुक पब और तिमके पीउ नीन विपिन परिसेप होनेरो राजाम दोnt सेनाको व्याकुलता होय और अग्नेि व शत्रका भय हो व बृहस्पति परिपको सधी, वैश्य और गुहार ना हो जाता है. पंचमीसे लेकर सात ये, पुर और प्रेषय अगुमायरी होता है॥ १९ ॥ अष्टमीमें पास (१३८) वाराहीसंहिता । निहन्ता च ॥ १२ ॥ भौमे कुमारवलपतिसैन्यानां विवोऽपिशवजयम् । जीवे परिवेपगते पुरोहितामात्यनृपपीडा ॥ १३॥ मन्विस्थावरलेखकारित दिश्चन्द्र सुदृष्टिय । शुक्रे यायिक्षत्रियराज्ञां पीडाप्रियं चानम् ॥ १४ ॥ क्षुदनलमृत्युनराधिपशखयो जायते भयं केतौ । परिविटे गजयं राही व्याधि- नृपतयं च ॥ १५॥ युद्धानि विजानीयाव परिवेपात्यन्तरे दयोर्यहयोः । शि- सझतः शशिनो वा क्षुदवृष्टिभयं त्रिषु प्रोक्तम् ॥ १६ ॥ याति चतुर्षु नरेन्द्र सामात्यपुरोहितो वशं मृत्योः। प्रलयामिव विद्धि जगतः पञ्चादिपु मण्डल स्थेषु ॥ १७ ॥ तारामहस्य कुर्याद पृथगेव समुत्थितो नरेन्द्रवधम् । नार- णामथवा यदि केतो!दयो भवति ॥ १८॥ विपक्षत्रियविदछुवहा भवेद परि- पशादिषु क्रमशः। श्रेणीपुरकोशानां पञ्चम्यादिष्वशुनकारी ॥ १९॥ युवराज स्पाटम्यां परतत्रिषु पार्थिवस्य दोपकरः । पुररोधो द्वादश्यां सैन्यक्षोजनयो- वृष्टिको उत्पन्न करता है ॥ १२ ॥ मङ्गल परिखेपमें हो तो कुमार, सेनापति और तौ पुरोहित, मंत्री आर राजाओंको पीडा होती है ॥ १३ ॥ बुध परिखेपमें हो तो मंत्री, स्थावर और लेखकलोगोंकी वृद्धि और अच्छा वर्षा होती है. परिवेपमें शुको ती चहकर जानेवाले राजा, क्षत्री राजाको पीडा और दुर्भिक्ष होता है ॥ १४॥ पेतु परिषेपमें हो तो क्षुधा, अनल, मृत्यु, राजा और शस्त्रसे मय उत्पन्न होता है, रह परिखपमें हो तो गर्ममय, व्याधि और राजमय होता है ॥ १६॥ रि, चन्द्र परिपके भीतर दो ग्रहोंके होनेसे युद्ध होता है. तीन ग्रह जो परियेपमें हो तो दुर्मिस और पां न होनेका मय होता है ॥ १६ ॥ परिवेषमें चार प्रह मंत्री और पुरोहित के साथ राजाको मृत्यु हो जाय, पंचादि ग्रह मंडल में हो तो जगन्ने मानो प्रश्य हो जाय ॥ १७ ॥ ताराग्रह अर्थात् मालादि पंचप्रा मारा गण पाद अलग २ परिषेपमें हो तो राजाका र हुआ करता है या मा उदयन रोकेदय होनेसे उसका फल होता है ताराहादिफल नी हे है॥१८॥ प्रशिदासे टेकर चौयना तिथि पविष हो तो क्रमानुसार बम मापाटीकासाहिता २०३५॥ दश्याम् ॥ २०॥ नरपतिपलीपीडां परिवेपोऽन्युत्थितचतुर्दश्याम् । कुर्याद 'तु पञ्चदश्यां पीडां मनुजाधिपस्पैच ॥ २१॥ नागरकाणामाभ्यन्तरास्थिता यायिनां च बाह्यस्था। परिवेपमध्यरेखा विज्ञेयाकन्दसाराणाम् ॥ २२ ॥ रक्तः श्यामो रुक्ष भवति पेयां पराजयस्तेपाम् । स्निग्धः श्वेतो द्युतिमान येषां भागो जयस्तेपाम् ॥ २३ ॥ इति श्रीवराहमिहिरकती वृहत्सं० परिखेपलक्षणं नाम चविंशोऽध्यायः॥३४॥ . अथ पंचत्रिंशोऽध्यायः। इन्द्रायुधलक्षण. सूर्यस्य विविधवाः पवनेन विवाहिताः कराः साले। वियति धनुसंस्थाना ये दृश्यन्ते तदिन्द्रधनुः ॥ १॥ कचिदनन्तकुलोरगनिःश्वासोतमाहुराचार्याः। तयायिनां नृपाणामभिमुसमजपावंह भवति ॥ २॥ अच्छिन्नमवनिगाद युति- बादशीमें परिवप होनेसे पुरका रोध हो जाता है और प्रयोदशीमें होनेसे शसका सोम होता है ॥ २०॥ चतुर्दशीमें परिवेप होने से रानीको पीडा होती है. पंचद-. शीमें राजाको पीडा होती है ॥ २१॥ जो परिपके भीतर रेखा दिखाई दे की नग- खासियोंको पीडा होती है। परिपके बाहर रेखा हो तो चढ जानेवाले राजाओंको पीडा होती है। परिपके वीवमें हो तो आनन्दसारका शुभाशुभ विचारे ॥ २२ ॥ बहभक्ति या धर्मविभागके अनुसार देशका विभाग करलेसे जिस देशके मागमें परिपका रंग लाल श्याम या रूखा हो उस देशकी पराजय होगी. सिन्ध, श्वेत- वर्ण या दीप्तिशाली परिवेष जिनके भागमें गिरे उनकी जय होगी ॥ २३ ॥ .. .- चतुर्विंशोपायः॥ ३४॥ अलेक रंगाले दर्यके किरण परनसे रोके जाकर मेषयुक्त आकाशमें जो धनु- एका आकार दिखाई देता है वही इन्द्रधनुष है ॥ १॥ कोई १ आचार्य कावे है कि, अनन्तनामक कुलनागके पाससे या उत्पन्न होता है जो राजा इन्द्रधनुषको सन्मुख रखकर जांप ठी युद्धमें उनकी पराजय होती है ॥ २ ॥ मपंडित भामेमें लगा हुभा, मकामादार, विकता, निविड, अनेक रंगोरे युक्त भौर स्तव्य-पंडिनवरदेशप्रसादमिश्रविरचितायां भाषाटीचयां पंचत्रिंशोभपाय: UNE ॥ दक्षिण, पश्चिम और उत्तरदिशासे उत्पन्न हुआ इन्द्रधनुष सेनापति, नापक मंत्रीका नाश करता है।॥७॥ रात्रिके समय इन्द्रधनुष श्वेत वर्णादि अर्थात में- रक्त, पोत और कृष्ण वर्ण हो तो क्रमानुसार ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य को शूद्राय नारा करता है; परन्तु जिस दिशामें होय उसी दिशाभोंके राजाम शल श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादागारा- (१४०) वाराहीसंहिता। मस्निग्धं धनं विविधवर्णम् । द्विरुदितमनुलोमं च प्रशस्तमम्जः प्रयच्छ ॥ ३॥ विदिशुद्धतं दिक्स्वामिनाशनं व्यत्रनं मरककारि। पाटलगीत शखामिक्षुत्कता दोपाः ॥ ४॥ जलमध्येऽनावृष्टिभुवि सत्यवधस्तरी व्याधिः। वल्मीके शवजयं निशि सचिववधाय धनुरैन्दम् ॥ ५ ॥ करोत्यवृष्टयां वृष्टिं वृष्टयां निवारयत्यन्याम् । पश्चात्सदैव वृष्टिं कुलिश- पमाचष्टे ॥ ६॥ चापं मघोनः कुरुते निशायामाखण्डलायां दिशि सूरी याम्यापरोदक्मा निहन्यात्सेनापति नायकमन्त्रिणी च ॥ ७ ॥ सुरचापं सितवर्णायं जनयति पीडां विजपूर्वाणाम् । जवति च यस्यां तद्देश्य नरपतिमुख्यं न चिराद्धन्यात् ॥ ८॥ -इतिश्रीवराहमिहिरकती बृहत्सं०मिन्दायुधलक्षणं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥१ दोनों वार उदित व अनुलोम होनेपर श्रेष्ठ है और वहुतसा जल वर्षाता है । ईशान, अग्नि, नैर्ऋत और वायु इन चारों कोनोंमें जो इन्द्रधनुष उदय हो संस्थानके राजाका नाश होता है. विना मेधक आकाशमें इन्द्रधनुप हो तो पडती है । पाटलके फूल, पीले और नीले रंगका हो तो शख, आग्ने और इन क्षादि दोष उत्पन्न होते हैं ॥ ४ ॥ जलमें इन्द्रधनुप हो तो अनावृष्टि, ए. होनेसे धान्यको हानि, वृक्षपर होनेसे व्याधेि और वल्मीक (वमई ) पर हो शस्त्रमय और रात्रिमें होनेसे मंत्रीके वधका कारण होता है ॥५॥ जो मन टिके समय इन्द्रधनुप पूर्वदिशामें हो तो जल वर्षता है; वर्षनेके समय पूर्वाद हो तौ दृष्टिको रोकता है। पश्चिममें इन्द्रधनुप हो तो सदाही वर्षा होती है । पूर्वदिशामें राधिकालके समय इन्द्रधनुष हो तो राजाओंको पीडित करना सीन नाश होगा ॥८॥. . ।
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देखा जाय वी पहिली वोई हुई खेतीका नाश करता है परन्तु पोछे की वोई सेती भली भांतिसे उपजती है ॥९॥ वृश्चिक राशिमें स्थित सूर्यकी सातवीं कर मेंके या केन्द्रस्थित और कर ग्रह खेतीका नाश करते है, परन्तु उनको गुना नासा या मंगका कारणभी होता है ऐसा पंडितोंको कहना चाहिये। मेपादि तीन राशियोंमें रियत मूर्य शुभ ग्रह करके युक्त हो या गुममा मन मोर कुंभराशिमें स्थित सर्व शरत्काठमें उत्पन्न रोतीसमोरी परटोहदोनो बना ले (परलोक बनाने के लिये अन्नदान करें)॥१ जाय दो प्रीमी पेनी समय हो और इतना सस्ता अन्न रहे कि मादली हो (१४६) वाराहीसंहिता। निष्पत्तिरस्ति महती पश्चात् परचक्र रोमजयम् ।। ७ ॥ मध्ये पापग्रहयोः सूर्यः सत्यं विनाशयत्यलिगः। पापः सप्तमराशी जातं जातं विनाशयति ॥४॥ अर्थस्थाने क्रूरः सौम्यरनिरीक्षितः प्रथमजातम् । सस्पं निहन्ति पश्चान निषादयेव्यक्तम् ॥ ९ ॥ जामित्रकेन्द्रसंस्थौ कूरी सूर्यस्य वृधिकस्यस्य । सस्पविपत्तिं कुरुतः सौम्यदृष्टी न सर्वत्र ॥ १०॥ वृश्चिकसंस्थादकवि मन- पठोपगौ यदा करी । भवति तदा निष्पत्तिः सस्यानामर्वपरिहानिः॥१॥ विधिनानेनैव रविवृषप्रवेशे शरत्समुत्यानाम् । विज्ञेयः सस्यानां नाशाप विचार वा तज्ज्ञैः॥ १२॥ त्रिपु मेपादिषु सूर्यः सौम्पयुतो वीक्षितोऽपि वा विचरन् । प्रैष्मिकधान्यं कुरुते समर्थमुभयोयोग्यं च ॥ १३ ॥ कार्मुकमृगपटसंरयः शारदस्य तद्वदेव रविः । सङ्ग्रहकाले ज्ञेयो विपर्ययः कुरदृग्योगाव ॥ १४ ॥ इति श्रीवराहमिहिरकती बृहत्सं सस्यजातकं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४॥ राशिमें गमन करे उस समय जो कुंभमें वृहस्पति, वृपमें चन्द्रमा और मंगल व रात यदि मकरराशिमें हों तो अन्न भली भांतिसे होता है. परन्तु पीछेसे परवन रोगका मय हुआ करता है जो सूर्य वृश्चिकराशिमें दो पापग्रहोंके बीउने हो तो धान्यका नाश करता है. इस समय वृपशाशमें स्थित हो तो पैदा होने अन्ना नाश कर देता है ॥ ८॥ उसके अर्थस्थान में स्थित कर ग्रह शुम इसे देखता हो तो सब जगह धान्यका नाश नहीं कर सकते ॥ १० ॥ जब दो । अह विशिमें स्थित सूर्यसे सातवें और छठे हों तो खेती होती है, परन्तु इस महंगा रहता है ॥ ११ ॥ वृषराशिमें सूर्यके प्रवेश करने से उत्पन्न हर पालो मापाटीकासहिता अ० ४१ । थिकचत्वारिंशोऽध्यायः। Foltimbai द्रव्यनिश्चय. शिरतमो राशयः समुदिष्टाः । मुनितिः शुनागुताप 11 ॥ चयाविककुनुपानां ममुरगोधरालस्यवा- नां कवकल्प च कीर्तितो मेपः॥ २॥ गरि पचकुसु- सुरभितनयाः स्युः । मिथुनेऽपि धान्यशारदवटीगारम- किणि कोवादलीफिट कन्दरपचोचानि । सिंह नां त्वचः सगुडाः ॥ ४ ॥ पठेउसीकलापा फुटत्यो- मराशी मापा गोधूमाः सपंता सरयाः ॥ ५ ॥ अटम- हान्यनारिक चारि । नरमे तु तुरगलपणापरापतिस- और मना पत्रहकालमें जर महकी राशि और योगसे इसपर उलटा पान होता है यही जानना चाहिये ॥ १४ ॥ इति श्रीराइभिदिराचा चितामा पहरसंदिता पशिनोपरदेसीगा. प्प-टितपउदेशमतादमिवपिरपितायां भापाटोयो पत्रकार ... निन २ राशिको निम पोंग्य सामी मुनिलोग:ने कहा है, आम और याम जानने के लिये भागनने उनस्ववियर पहा जावा है॥१॥ मेपनि दम, मेरो रोमो को कम्मल, पर जाने घने कम्प, मसर, गे, राज ( गो), नी, स्यउसे राई भोगवि और गरगर सारिनी की जाती है। स, उस, गे, माउिपाय, जौ, मोहप और गाय नही मिनी et पान्य वारसा उसनमुपपदार्थ, ला, कमल कुममादिश्य जा पद मियीन है। करीने कोदों, येडा, ब, फर, और 3 Rो के वियरने, भुस्ती, धान्य, सोर दादिक पद॥ कलाशिम बरसो, मर, २ मेग निशा (मटर) १. तुला राशि जई, गे: सरतो र पान ॥ ५ ॥ स स स (समें पानी से देख होता है, . पाये सन .. . ...
उपचय स्थान यर्थात् तीसरे, छठे, दशम या एकादश स्थानमें हो तो शुभदापो बलवान् फर ग्रह जिस राशिके पीडास्थानमें अर्थात् उपचय स्थानफे विसर होरर दुर्लभ हो जाते हैं ।। १२॥ बलवान् शुभ ग्रह जिन राशियोंके इस्थानमें अलग स्थानमें स्थित हो, उस राशिके अधिकारमें जितने द्रव्य हा वह सब मंचे होनी है, मामय और मुलमता होती है ॥ १२ ॥ गोचर पीडामभी सब यहि अर्थात् उपचयस्थानमें हों, उन गशियोंके अधीनमें जो जो द्रव्य है उनकी वृदि (१४८) • वाराहीसंहिता। धान्यमूलानि ॥ ६ ॥ मकरे तरुगुल्माद सेक्येशुसुवर्णकृष्णलोहानि । कुन्ते सलिलजफलकुसुमरनचित्राणि रूपाणि ॥ ७॥ मीने कपालसम्भवरलान्य- म्बूद्भवानि बज्राणि । स्नेहाब नैकरूपा व्याख्याता मत्स्यजातं च ॥ ८॥ राणे- चतुर्दशायसप्तनवपञ्चमस्थितो जीवः । ब्येकादशदशपञ्चाष्टमेषु शशिनम वृद्धिकरः॥ ९ ॥ पट्सप्तमगो हानि वृद्धिं शुक्रः करोति शेपेषु । उपचय- संस्थाः क्रूराः शुभदाः शेपेषु हानिकराः॥ १० ॥राशेर्यस्य कुराः पीडास्थानेषु संस्थिता बलिनः। तत्मोक्तद्रव्याणां महार्यता दुर्लभत्वं च ॥ ११ ॥ इटल्याने सौम्या बलिनो येषां भवन्ति राशीनाम् । तद्रव्याणां वृद्धिः सामर्थ्यमदुलावं च ॥ १२ ॥ गोचरपीटायामपि राशिलिभिः शुभग्रहदृष्टः । पीडां न करोति तथा कूरैरेवं विपर्यासः ॥ १३॥ इति वराहमिहिरकतौ बृहत्संहितायांव्यनिश्चयो नामकचत्वारिंशोऽध्यायः ४१ अम्बर, अस, तिल, धान्य और मूल धनराशिमं विराजमान है ॥ ६ ॥ मकरन वृक्ष गुल्मादि और सींचनेसे जो वस्तु उत्पन्न होती है, ईख, मुवर्ण और काना लोहा है. कुंभमें जलसे उत्पन्न हुए फल, फूल, रत्न और चित्रविचित्र रूप वाले वर्तमान हैं ॥ ७ ॥ कपालसम्भव रत्न ( हाथीके शिरसे निकली मणि या नागके शिरसे निकली मणि ), जलसे उत्पन्न होनेवाले पदार्थ, अनेक रूपवाले, स्नेह द्रव्य और मछलियां मीनराशिके अधीन हैं। जिस राशिके दूसरे चौथे, पांच, सातवें, नववें, दश या ग्यारहवें स्थानमें वृहस्पति हो अथवा दूत, पांचवें, आठवें, दश वा एकादश स्थानमें बुध हो उस राशिमें जो द्रव्य करे । उनकी वृद्धि होगी ऐसेही शुक्र तिस शिक या सातवें स्थानमें हो; तिन राशिके द्रव्योंकी हानि और अभिन्न राशियोंमें हो तो वृद्धि करते हैं; और वरमा हैं और तिसके सिवाय और राशिम स्थित हो तो हानिकारी हैं ॥ ९॥ १० ॥ A मापाटीकासहिता अ० ४२ । (१४९) अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः। अर्घकाण्ड. अतिवृष्टयुल्कादण्डान परिवेपमहणपरिधिपूर्वाश्च । दृष्ट्वामावास्यायामुला- न पोर्णमास्यां च ॥ 1 ॥ यादवविशेपान प्रतिमासं राशिपु कमाव सूर्य । मन्यतियाबुताना ये ते डमरातये राज्ञाम् ॥ २ ॥ मेपोरगते सूर्य ग्रीमन- न्यस्य संग्रहं कुर्यात् । वनमूलफलस्य वृपे चतुर्थमाते तयालांभः ॥ ३ ॥ मेथुनत्ये सर्वरसान् धान्यानि च संग्रह समुपनीय । पठे मासे विपुलं विकीणन् मग याहासम् ॥ ४॥ कर्किण्यकें मधुगन्धलघृतफाणितानि पिविधाय । देगुणा द्वितीयमासे लम्बिहीनापिके छेदः ॥ ५ ॥ सिंह सुवर्णमणिधर्मरावागि मान्तिक रजतम् । पञ्च मासे लब्धिर्षिकेतुरतोऽन्यथा उदः ॥ ६॥ कन्यागर बलवान और शुभ ग्रहों करके देखी जाय तो पीदा नहीं; भोर कर प्रा देखने हों तो इससे विपरीत फल होता है ॥ १३ ॥ इति श्रीवराहमिदिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पधिमोचरदेशीयमुगदापार स्तव्य-पंडितवलदेवप्रसादमिश्रविरचितायांभापारीकापामेकचत्वारिंशोऽध्याय:५१ प्रतिमासमें सर राशि जव सूर्य, गमन को; अमावस्या का निमामें रिखेप, ग्रहण, परिधि, अतिवृष्टि, उल्का व दंडरूप उत्साताको दर मामा- नुसार मय पियोंको ना चाहिये और तिथियोंमें जो उत्पात होते गय उत्पात राजाओं के लिये गडपडीस भय प्रगट करते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ सभेपराशिमें जाय तो ग्रीष्मजात धान्य संग्रह करना उचित है. यूप निले फल और मूल या संग्रह परना कम्य है. पौषे मासमें उस समता ३॥ ३ ॥ सूर्य मिथुन राशिमें प्राप्त हो वो सब प्रसारके रख और सब प्रकार के. धान्यों का अंग्रह करके छठे मासमें विक्रय करे तो या नसा लाभ होता है ॥४॥ सर्प कर्क राशिमें स्थित हो तो मधु, गन्ध, नेल, घी और सारी र फलेने अपार इनके भर सेनेसे दूसरे मासमें दना लाभ होता है, परन्तु बारिक कर होनेपर पन लाभ और नाश होई ॥५॥ निशि दो दो मुवर्ण, भाग, चर्म, पर्म, राम, मोती और. पारी संग्रह र यो मानमें से दो वने काले ये लाभ होता है, इसके विरुद्ध होनेसे पाने होती है ॥ ६ ॥ तुकार-
पासोदिता।
तानाः सहरः च्यानः सहतीपी शामन्युरीयः॥ ५in
कलाम इन्दसतारं सुरेशम् । द्वयामि शकं पहन
रा उनरे जान्नु । १५॥ पारणे चोपने प्रोगे लाने का काली
दिनी । डेस्निानाति सोसानो मन्त्राञ्जुनान पुलाव
मनमानाचार्गोत्रनालाारीचरः। सम्मान
को जिन लोकपालेः॥५॥ अनिरन्न ।
शायनासोरगन् । उत्थायेउन सहसपा सारामपुर,
मान। ५८ ॥ अमिरातरा मालागीपणात
गीतानो पाउमिन पिर
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मापाटीकासाहता अ०४३। वित्तूपणं च । उत्यानमिटमने यस्तोऽन्यथा स्याद तान्तिभिर्नरपतेः मयेत्पुरोधाः ॥ ६१ ॥ कन्यादकौशिक रूपोतककाकककैः केतुस्थितेमहदु- न्ति भयं नृपस्य । चापेण चापि युवराजायं वदन्ति श्येनो विलोचनभयं पतन् करोति ॥ ६२ ॥ छत्राङ्गातने नृामृत्युस्तस्करान्मधु करोति निली- म् । हन्ति चाप्यय पुरोहिनमुल्का पार्थिवस्य महिपीमशनिश्च ॥ ६३ ॥ जीविनाशं पतिता पताका करोत्यवृष्टिं पिटकस्य पातः। मध्यापमूलेषु च केतुङ्गो निहन्ति मन्विक्षितिगालपारान् ॥ ६४ ॥ धूमावृते लिखिमपं मिसा च मोहो व्याटेश्य जमातितर्न भवन्त्यमात्याः । ग्लायन्सुदप्रति च कमशो विनाद्या भङ्गे च वन्धकियधः कथितः कुमाः ॥६५॥ रज्जूसगरे ने पालीडा राज्ञो मातुः पीडनं मातृकापाः। यद्यकुर्युर्यालकाधारणा या चिनाहग्नापि पा शुनं वा ॥ ६६ ॥ दिनचतुष्टयमुत्थितमर्पितं समाणिज्य र गिरें तो उसका उटाना हितकारी होता है. इसके सिवाय और भांतिका उटाना पशुम है. रामाके पुरोहितको चाहिये कि शान्ति करके सर विनोको दूर करे । ६१ ॥ मांसको खानेवाले पक्षी, उखु, कबूतर, काग, गिद् जो इन्द्रधनपर पे ती रानाको अत्यन्त अशान्ति होती है. इन्द्रध्वजपर नीलकण्ठ बैठे तो पुरानो पय कहा जाता है। याजपक्षीका इन्द्रध्वजपर गिरना नेपभयको उत्पन्न परवा है ॥ ६२ ॥ छम भंग होकर धानका गिरना राजाओंको मृत्युको प्रकट करता है। जो २२ इन्द्रधनपर शहदी मुहाल लगा दें तो तस्करों की मृत्यु होती है। मनपर उसा गिरे तो पुरोहित की और यज्ञ गिरे तो राजा रानीको मृत्यु सेती ॥३॥ पताका गिरनेसे रानीका नाता और पिटकके गिरनेसे सूखा पड़ता हैरिवला, अपरका और जडमा भाग इन्द्रधना टूट जाप दो कमसे मंत्री, राजा और पुर- गासियों का नाश करता है ॥३४॥ इसपर ना जाय तो मोह होता है, बीचम। टूटकर गिर जाय तो मंत्रियों का नमार हुमा करता है। उत्तरादि चार दिशाभाने टूटकर गिर वो कमसे मामग, सविर, वैश्य और शूदरो ग्लानि उत्पन्न करता है। उमारियां फट फट जाय तो यभिचारिणी सियों मरती ॥ १९ ॥म- धन उटाने के समय उसके सस्ते कहीं पाक जाप दो साल पीडा दोहै। तोरणरी यगठमें ससे इए काठके टूट जाने से राजमाताको पीस रोती है, पालक या दूत इन्द्रपान के समापन पेय को जी (माम कारं होनेर) सापकर या(शुभकार्य ) रूप होता है ॥६॥ उठे हुए भी पूषित भारी पए मत्स्य, ध्वज और चक लगाये जाय ॥४॥ शान्तिग्रह और सपये व्य-पंडितबलदेवप्रसादमिश्रविरचितायां मापाटीकायां त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४॥ वान् कमलनाम जय नेत्र खोलते हैं अर्थात जागते है तव घोडे, हाथी और मत प्योंको नीराजन करना चाहिये ॥ १॥ कार्तिक शुक्लपक्षकी पूर्णिमा, दादशीको यष्टमीम या आश्विनमासमें नीराजन संज्ञाको शान्ति करे ॥२॥ नगरी बस चौडा एक वोरण बनाये ॥३॥ विजयसारका वृक्ष, गूलर और अर्जुन पादा शांतिग्रह बनावे तिसमें बहुतसे कुशमी रक्खे हों । इसके बारमें बांस के से (१६०) पारादिसंहिता। नृपोऽहनि पञ्चमे। प्रतिभिः सह लक्ष्म विसजयेदलगीदः स्ववलागितिर ॥६७॥ उपरिचरखसुप्रवर्तितं नृपतिभिरप्यनु सन्ततं रुतम् । विधिमिममनुमन पार्थिवो न रिपुतं भयमा यादिति ॥ ६८॥ इति श्रीवराहमिहिरकतो वृहत्सं मिन्द्रध्वजसम्पन्नाम निचत्वारिंशोऽध्यायः॥ अथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः। नीराजन. भगवति जलधरपक्षमक्षपाकरा:क्षणे कमलनाने । उन्मीलयति तुरङ्गा रिनरनीराजनं कुर्याद ॥ १॥ द्वादश्यामष्टम्यां कार्तिक शुक्लस्य पञ्चदश्यां वा आश्वयुजे वा कुर्यानीराजनसंज्ञितां शान्तिम् ॥२॥ नगरोत्तरपूर्वदिशि प्राप्त भुमो प्रशस्तदारुमयम् । पोडशहस्तोच्छायं दशविपुलं तोरणं कार्यम् ॥३॥ सर्थोदुम्बरशाखाककुभमयं शान्तिसम्म कुशबहुलम् । वंशविनिर्मितमत्स्यमा चक्रालंकृतद्वारम् ॥ ४ ॥ प्रतिसरया तुरगाणां भल्लातकशालिकुठसिद्धायांच भली भांतिसे चार दिन पूजा कर पांचवें दिन मजाको साथ ले राजा उस इन्द्रधवक विसर्जन करे तो राजाकी सेनाका वल वदता है ॥६७ ॥ उपरिवरचमुराधा चलाई हुई, फिर राजाओंके द्वारा सदा की हुई इस विधिसे जो राजा इस इन्द्रध्वजकी पूजा करेंगे, वे शत्रु लोगोंसे भयको प्राप्त नहीं होंगे ॥ ६८ ॥ इति श्रीवराहमिहिराचार्याविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादाबादसार, वादल जिसकी आंखोंके पलक हैं, चंद्रमा सूर्य जिसके दोनों नेत्र हैं यह
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कह उनको समझाते वुझाते धीरे २ अनेक प्रकारके बाजे, शंख, पुण्ययुक्त सन्द जिसकी ध्वनि दिशामें भर गई है ऐसे आश्रमतोरणमूलके समीप उधार र ॥ १६ ॥ जो लाया हुआ घोडा पहले दांया चरण उठाकर खडा रहेको राजाको भय होता है. हाथी, घोडॉकी वाकी चेधाका फल जो यात्राध्यापक कर ले वो जयदायी होता है. इससे विपरीतका होना अशुभ कहा है ॥ पोडोंकी शान्तिके लिये पौष्टिकमंत्रसे पुरोहित या ब्राह्मण स्पर्श करे और राम गूलरकी शाखा कलशके जलसे भिगोकर राजा और हाशियोंसे युक्त सेना और वृदिके लिये यभिचारके मंत्र पट वारंवार शान्ति करे. पुरोहित को उचित हित मंध पदफर टगामको घोडेके मुखमें दे, फिर राजा उस अषपर मार मृचिस्यको शत्रुमूर्चि वनाय शूलसे उसकी छातीको फाडे ॥ २० ॥ २१॥ नीराजिव होकर सेनाके साथ उचर दिशाम जाय ॥ २२ ॥ वह मृदंग, सदा (१६२) वाराहीसंहिता। चेदीपुरोहितानललक्षणमस्मिस्तदवधार्यम् ॥ १४ ॥ लक्षणयुक्तं तुरगं दिएका चैव दीक्षितं स्नातम् । अहतसिताम्बरगन्धसम्धुपातिं कृत्वा ॥ १५ ॥ आश्रमतोरणमूलं समुपनयेत्सान्त्वयञ्छनेर्वाचा । वादिनशंखपुण्याइनिश्ता पूरितदिगन्तम् ॥ १६ ॥ यद्यानीतस्तिष्ठेद्दक्षिणचरणं हयः समुत्सिप्प ! । जयति तदा नरेन्द्रः शत्रूनचिराविना यत्लाद ॥ १७ ॥ त्रस्पन्नेटो राज्ञः परिश . चष्टितं द्विपहयानाम् । यात्रायां व्याख्यातं तदिह विचिन्त्यं यथायुक्ति ॥ १८॥ पिण्डमनिमन्त्र्य दद्यात् पुरोहितो वाजिने स यदि जियेत् । अन्नीरावा जयकविपरीतोऽतोऽन्यथाभिहितः॥ १९ ॥ कलशोदकेषु शाखामाप्तायौदुग्य स्पृशेत्तुरगान् । शान्तिकपौष्टिकमन्त्रैरेवं सेनां सनृपनामाम् ॥ २० ॥ शानि राष्ट्रविवृद्ध कृत्वा भूयोऽभिचारकर्मन्त्रैः। मृण्मयमरि विभिन्याच्छूलेनोरमकडे विप्रः॥ २१ ॥ खलिन हयाय द्यादभिमन्य पुरोहितस्ततो राजा । आस्से दक्पूर्वा यापानीराजितः सबलः ॥ २२ ॥ मृदङ्गशंखध्वनिहष्टकुअरसान्या चाहिये ॥ १४ ॥ उत्तम लक्षणवाले हाथी, घोडेको दीक्षा देकर न्हवाय, नकेत वस्त्र पहिराय फूलोंके हार और गंध पादिसे पूजन कर ॥ १५ ॥ मीठे है सो यहांपर यथायुक्तिसे विचारना चाहिये ॥ १७ ॥ १८ ॥ पुरोहित मंत्र कर अश्वको भोजन करने के लिये पिण्ड दे और घोडा उसको संघ ले या मा मापाटोकासाहिता म०४४ ॥ होदसुगन्धिमारुतः। शिरोमणिबातचलमनाचवेर्जलन्विवस्थानिय तोयदात्यये १२३५ हंसपंक्तिनिरितस्ततोऽविराट् सम्मतभिरिव शुक्लचामरेः। मृष्टगन्धपव- अनुवाहिनियमानरुचिरस्रगम्परः॥२४॥ नैकवर्णमणिवजापित पितो मुकुट- कुण्डलाइन्दैः । भरिरनकिरणानुरअितः शककार्मुकरचं समुहहन् ॥ २५ ॥ त्पतनिरिव खं तुरन्मदरियाभिरिख दन्तिभिर्धराम् । निजितारिभिरिवामरेनरैः क्रवतरितो बन्नृतः॥ २६ ॥ सवनमुक्ताफलतपणोऽथवा सितमगुष्णी- विलेपनाम्बरः। धृताताको गनपृष्ठमाभितो धनोपरीवेन्दुतले भृगोः सुतः 1 २७॥ सम्भहष्टनरवानिकुअरं निर्मलपहरणांशुनासुरम् । निर्विकारमरिपक्षणी- गणं यस्य सैन्यमचिरात्स गां जयेत् ॥ २८ ॥ इति श्रीवराहमिहिरकतौ बृहत्संहितायां नीराजनपिधिर्नाम चतुरचत्वारिंशोऽध्यायः॥४४॥ पार मद भरते हुए हर्षित हाथीकी मदगन्धसे सुगन्धित हुई, पवनके सेवनसे इर्पित । मुकुटमें जडी हुई मणियोंकी चञ्चल कान्तिसे वादल फट जानेपर सूर्यको समान काशमान मूर्ति धारण करके शुद गन्धयुक्त पवनके पीछे बहते हुए गिरनेवाले वेत चामरसे इंसावलीसे शोभायमान पर्वतराजकी समान कम्पायमान, सुन्दरमाला मोर मुन्दर वस पहरकर शोभित हो ॥ २३ ॥ २४ ॥ अनेक रंगके मणि और परोसे भूपित, मुकुट, कुण्डल और पाजू धारण करे हुए राजा तिस कालमें अनेक बोकी किरणोंसे रंगे हुए इन्द्रधनुपको समान सुन्दर रूप धारण करके आकाशमें नो उडते हुए घोडे, धरनीके विदारण करनेवाले हाथी और शत्रुको विजय कर- वाले मनुष्यों के साथ, देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रको समान गमन करे ॥२५॥२६॥ या हीरा, मोती, जडी क्षेतमाला, पगडी, उपटना या चंदनादि लगाय, वय हर, छत्र धारण कर हाथीपर सवार हो, मेघके ऊपर चन्द्रमाके नीचे विराजमान ककी समान गमन करे ॥ २७ ॥ विस कालमें जिसकी सेना इर्पित है और व हाथी, घोडे और मनुष्योंसे युक्त है, निर्मल अन्न शोंकी कान्तिसे प्रका- मान है, विकाररहित और शत्रुपक्षको मय उपजागली होती है, वह राजा ब्रही पृथ्वीको जीत लेने में समर्थ होता है ॥ २८॥ वे श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पक्षिमोचरदेशीयमुरादाबाददास्त- -पंडितपलदेवमसादमिश्रापिपिवायां मापाटीकायां चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ .
पण्मासात्सूतिफलं शान्ती श्लोकी च गर्गोक्तौ ॥ ५३॥ नार्यः परस्य नि गुधिसिरके कालमें सूर्य चन्द्रमा और पवनका यज्ञ करे तिस काल धान्य दो नदियां नगरके नीचे बहती हो और वह नगरोंको छोडकर मरक जारी नगरके न मुसनेराले स्थान कुंड इत्यादि सूस जांय तो शीघ्रही नगर मग हो जाय, उटी बहने लगे तो छ: मासके वीचमें भी सेना नगरसर anet मन वस्ताद मुनाइयारे तो इन बातोंका होना मरीका कारण ॥1 बदरजा निसलना, जलकी गन्ध और रममा भइल रहल। उडारण सिरसा प्राप्त हो जाना बडे भारी भपका कारण विमt? मंने आसन करना चाहिये, इस प्रकार इस पापी शानियोant इस पसरलेलानी चाहिये, जलपिकारमें वारुणमंत्रो रणनीरी पूना ॥ इति लोहन । जो नियां प्रगशिकार हो या TALK नवा नार पदा, सारसमपके पीछे पाप मा रामोनत्रिम अगदाना॥५२॥ घारी, उंटनी, कमायो यदा हाना इनकीही मृत्यु सी. (१७२) वाराहीसंहिता। सूर्येन्दुपर्जन्यसमीरणानां योगः स्मृतो वृष्टिविकारकाले । धान्यानमोगरा क्षिणाय देयास्ततः शान्तिमुपैति पापम् ॥ ४६॥ इति वृष्टिबैठतम् । गाः पणं नदीनां नगरादचिरेण शून्यतां कुरुते। शोपञ्चाशोष्याणामन्येषां वाह- दीनाम् ॥ ४७ ॥ स्नेहासृडांसवहाः संकुलकलुपाः 'प्रतीपगाबापि । परम स्यागमनं नद्यः कथयन्ति पण्मासाद ॥ ४८ ॥ ज्वालाधूमकाया राशि धानि चैव कूतानाम् । गीतमजल्पितानि च जनमरकाय प्रविष्टानि ॥ ११॥ तोयोततिरखाते गन्धरसविपर्यये च तोयानाम् । सलिलारायविकनी बस अपं तत्र शान्तिरियम् ॥ ५० ॥ सलिलविकारे कुर्याद पूजा वरुणस्य पम मन्त्रैः। तैरेव च जाहोमं शममेवं पापमुपयाति ॥ ११ ॥ इति जटौहान प्रसवविकारे वीणां दिविचतुःप्रकृतिसम्प्रसूतौ वा । हीनातिरिक्तकाले च कुलसंक्षपो भवति ॥५२॥ वडवोट्रमहिपगोहस्तिनीषु यमलोमचे मरम्भमेन गौ और मुणकी दक्षिणा देनसे पापको शान्ति होगी ॥ ४६ ॥ इति । जाता है ॥ ७ ॥ जो तेल, मधिर या मांस नादियोंमें वहता हो, मलीन ८ ॥ उपमें गाला या म दिपाई दे, जल सीलने लगे, रोने . 1 मापाटीकासहिता अ०४६ । पक्तव्यास्ता हितार्थिना । तर्पयेच विजान कामः शांतिं चैवात्र कारयेत् ॥५४॥ अतुप्पदाः स्वयूथे यस्त्यक्तव्याः परमिए । नगरं स्वामिनं यूथमन्यथा हि पेनाशयेत् ॥ ५५ ॥ इति प्रसववैरुतम् । परयोनावभिगमनं भवति तिरश्वाम- जाधु धेनूनाम् । उक्षाणो वान्योऽन्यं पिबति सा वा सुरभिपुत्रम् ॥ ५६ ॥ जासत्रयेण विद्यात् तस्मिानिःसंशयं परागमनम् । तत्पतिघातायती शोको गर्गेण निर्दिष्टी ॥ ५७॥ त्यागो विवासनं दानं तत्तस्याशु शुभं भवेत् । तर्पयेद्राह्मणां- भाव जाहोमांच कारयेत् ॥ ५८॥ स्थालीपाकेन धातारं पशुना च पुरोहितः। माजापत्येन मन्त्रेण यजेदवनदक्षिणाम् ॥ ५९॥ इति चतुष्पदवकृतम् । यानं वाहवियुक्तं यदि गच्छेन बजेच वाहयुतम् । राष्ट्रभयं भवति तदा चक्राणां साद- भचंच ॥६०॥ अननिहततूर्यनादः शब्दो वा ताडितेपु यदि न स्यात् । व्युसत्ती वा तेषां परागमो नृपतिमरणं वा ॥ ६१ ॥ गीतरवतूर्यनादा नभसि यदा वा फल छः मासके पीछे होता है. इसको शान्तिके लिये गर्गजीने दो श्लोक कहे है; जिनके मसवमें विकार हुआ हो हितार्थो पुरुषको चाहिये कि इन स्त्रियोंको दूर देशमें छोड आवे. ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार तृप्त करे और इसमें इस प्रकारसे शान्ति कराये. चौपायोंको अपने थलसे अलग करके दूसरेफी भूमिमें छोड आवे, नहीं तो नगरसामी और अपने झुंडका नाश हो जाता है ॥५३॥५४॥॥१५॥ इति प्रसववैकृत । एक जातिका पशु दूसरी जातिके पशुसे मैथुन करे तो अमंगल होता है या दो बैल जो परस्पर थन पियें अथवा कुचा गायके बछडेका थन पिये तो अमंगल होता है ॥५६॥ ऐसा होतोतान मासमें निःसन्देह शत्रुकी सेना आती है. इसकी रोककेलिये गर्गजीने यह दो शान्तिकारी श्येक कहे हैं-"उनके छोड देने,निकाल देने या दान कर देनेसे शीघ्र शुभ होता है. इस कारण ब्राह्मणोंको हप्त करे और जप होम करावे। पुरोहितको उचित है कि माजापत्यमंत्रसे स्थालीपाक और पशुओंसे धाताका यजन करे और बहुतसे अन्नकी दक्षिणा दे" ॥५७ ॥५८॥५९॥ इति चतुप्पा. दीकृत । रथ, पहली यादि सवारी जो विनाही घोडे पैलादिके जुते हुए चलने लगे या वैलादिसे जुती हुई सवारी गमन न करे और पहिया पृथ्वीमें गड जाप तो राज्यको भय होता है॥६० ॥ विना बनायेही वर्षदीय सन्द हो या पना- येने तरीही पजे नहीं या तिसमें व्युत्पत्ति अर्थात् अनेक मारके शन्द हों वो ..शत्रुको सेनाका आगमन या राजाका मरण होता है।। ६१॥ जप मागसमें इबरी शान्ति का होना मुनिजीने इस प्रकार कहा है-"इरा पायव्यरिकारमें राज्य सेदो सरदानी ॥३८॥५॥ परमें, सत्यमें, तोरग मोरा मिरे मार मापना, बनावमय पर पानी (१७४) वाराहीसंहिता । चरस्थिरान्यत्वम् । मृत्युस्तदा गदा वा विस्वरतूर्ये पराजितवः ॥ ६२४ गो- गूलयोः सङ्गे दींशूर्पाद्युपस्करविकारे । क्रोटुकनादे च तथा शवजयं मुतिसर- वेदम् ॥ ६३ ॥ वायव्ययेष्वेषु नृपतिर्वायु सक्नुभिरर्चयेत् । आ वारिसे पञ्च! जाप्याच प्रयतैर्दिनैः॥६४॥ ब्राह्मणान् परमान्नेन दक्षिणानिमतदि। वन्नदक्षिणा होमाः कर्तव्याच प्रयवतः ॥६५॥ इति वायव्यवैकृतम् । पुरु पक्षिणो वनचरा वन्या वा निर्नया विशन्ति पुरम् । नक्तं वा दिवसचरा का चरा वा चरन्त्यहनि ॥ ६६ ॥ सन्ध्यादयेऽपि मण्डलमावभन्नो मृमा हिका वा । दीमायां दिश्यथवा कोशन्तः संहता भयदा ॥ ६७ ॥ शानः प्रदन दारे वाचन्ति जम्बुका दीप्ताः । प्रविशेनरेन्द्रावने कपोतकः कौशिको यदि वा ॥ ६८ ॥ कुमुदरुतं प्रदोपे हेमन्तादौ च कोकिलालापाः। प्रतिलोमान लचराः श्येनाद्याधाम्बरे भयदाः ॥ ६९ ॥ गृहचैत्यतोरणेषु दारेषु च पनि प्रतिघाने हो, तुरंदी वजे या कर्कादि राशिका विपरीत घटन हो तो रोग या का होती है। तुरंहीका सन्द सरहीन हो तो शत्रुको पराजय होती है ॥ ३२॥ और इलमा अचानक जुड़ जाना, दा (चमचा) आदि परकी सामग्रीमें रिली सबरियर मा जाना और शूगोलके शब्दका होना शस्त्रमयका कारण है। रानुगे परनकी पूना करे और ब्राह्मणों के दारा आरायो जा कगो; परमान और दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंको संतुष्ट करे, यमके सहित । उना मन दलिगामें दे और होम करा" ॥३॥६॥६५॥ इति वायनी पर पाडे र पतिगण यनचारी हो गाय या वनले पो निमय होकर पुत्र मोश मनोदिन के चराले रात्रि गया राम चरनेराले दिनमें लिए में दोनों व्यायाम मा और पसी मंडल वापर करा ! मुसका पिडतो मग होता ॥६६॥ ६ ॥ सो २ दासर 2 में, की भोरको मुसा करके गीदद से, जो कर रामें माया गर्ने मुरंगा राम मन शुर शेवउ बोडे, यासाने वान आदि पतियों का प्रतियोम मणि " इस सरपंच भाषाटीकरसहिता १०४६ । इसम्माताः। मधुवल्मीकाम्भोरुहसमुन्नाबापि नाशाय ॥ ७० ॥ समिर- यशवावयवमवेशनं मन्दिरेषु मरकाय। पशुरामव्याहारे नृपमृत्युमुनिवभेदम् ७१ ॥ मृगपक्षिविकारेषु कुर्पाचोमान् सदाक्षिणान् । देवाः कपोत इति च सव्याः पञ्चभिः ॥ ७२॥ सुदेवा इति चेकेन देया गावच दक्षिणा । जो -छाकुनसूक्तं पा मनोवेदशिरांति च ॥७३॥ इति मृगपक्ष्यादिवैठतम् । शकम्व- न्द्रकीलस्तम्भहारमपातमझेपु । तत्कपाटतोरणकेतूनां नरसतेमरणम् ॥७४॥ न्ध्पादयस्प दीतिधूमोलतिच काननेऽनमी । जिवाभाचे भूमेदेरण कम्पन यकारी ॥ ७५॥ पापण्यानां नास्तिकानां च भक्तः साध्यापारमोन्तिः पशीलः । ईप्युः कूरो विग्रहासकचेता यस्मिन् राजा तस्य देशस्प नायः ७६ ॥ प्रहर हर छिन्दि पिन्दीत्यायुधकाठारमपाणयो बालाः । निगदन्तः इरन्ते तत्रापि भयं भवत्याशु ॥ ७७ ॥ अङ्गारगरिकार्यपिरततागिलेसनं स्मिन् । नायकचित्रितमथवा क्षपे क्षयं याति न चिरेण ॥ ७८ । पर को हुए स्थानोस नाश होता है ।। ७०॥ जो नदीको कुचे पग्में मारेगा -तफ अंगका पोई माग ले आरे तो मरी कारण है. पशु और पास मनुप्पी वि बोलें तो राजाको मृत्यु होती है. इन पातोंकी शान्ति के लिये मुनि जीने का वन कहा -"मृगपतियोंके विकारमें दक्षिणाके साथ होम परे, पांच मालगोंडे देवाः कपोत " इस मंत्रका जप कराना चाहिये, और "गुदेशः" श्वे दक्षिणा कर शाकुनरकरण जप करना उचित है अथरा मनोदमिरज E मंत्र जपे ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ इति मृगपासिरिसर । दघन, इन्दकील, यम, दार, कपाट, तोरण, फेल टूट जाय या गर बार डी नारस मरण होता है॥७४ ॥ दोनों सन्ध्याके समय तेज दीना, अमितीत में शुमका उत्पाप होना, पिना के पृथ्वीर पर जाना और ना भरती बाहे॥७५ ॥ जिस देशका राना पारी और नास्तिर मऊ होती. शुभांकसे आचरण नहीं करता, युद्धसभार, ही करनेराला, दर, दिने चर गानेगला रोता है, उस देशर नारा जाता है । ७६ जा सख उपरपर बायो र पालकमग “ मारो, जेन लो, न्यो, दोर राझे ऐसा ते २ एक दूसरेखो मारवे १. व शामरी मर रोगा? ॥७॥ मेरस से जिस पर भीवोंपर मृतक के पित्र मनाये जार अपरा तास चार ।
को उतका लंबा नहीं होना ।। ९० ॥ सत्यसरूप, अगरत, वापूपिणी या
सवोतो पहले सब देवता मां विवाण करतो थी फिर मनुष्यों को प्राप्त हुई।
जो देशन गगिाके ज्ञान को नहीं जानता, वहभो जो उत्पातका ज्ञान मजीमा
को वो वहमी शिरूपात होकर रानाका प्यारा होता है. यह वही मुनिश्वनय राम
इदि श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पविमोचरदेशीयनुयदायरा
स्वम्प-परिववउदेशप्रसादमियपिर० मापाटीकायां पट्चलारिंशोऽध्यायः ॥1
याश्रपी, समस्त रामाशुभ फल हमने निरूपण किपे॥१॥बरामिदिरा
मावार, समागम, युद और वीयि मादिमें वसुधा दिग्प और मजा
सातो वातार काला टोकना है कि उन दोष यहीiated
पाया पडदायी मयूराधिक नामक प्रामा.नाने से मना
(१७८)
वाराहीसंहिता।
पदाः । मनोरन्यत्र चेताता दृटास्ते वृधदारणाः ॥ १६ ॥ उन्मजाता
गाया सियां भाषितं च यद । त्रियो यच प्रमापन्ते तस्य नास्ति न्य
कमः ॥ ९७॥ पूर्व ची वे पश्चाबच्छति मानुपान् । नाचोदिवा वा
दति सया बेगा सालो ॥ ९८ ॥ उलातान् गणितविवनिनोधी यु-
विख्यातो भगत नरेन्याठाया एततन्मुनिवचनं रहत्यमुक्त यज्ञातामा
नरनिकालदर्शी ॥ ९९ ॥
इति श्रीवराहमिहिरकती बृहत्संहितायामुसातलक्षणं नाम
पट्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४६॥
अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः।
मयूरचित्रक.
रियानारशापमुक्तपारी मया फलं शस्तमयोजनं च । पायेग गरे।
समाने युदे मागछि तिरेग ॥ १ ॥ पो वराहमिहिरका
युको क समारसमिति तस्य दोपः । तन्जे वायनिता
होते हैं ॥९६ ॥ पागों का गाय और गाया, बालकों के वचन और जिसने ।
कहा गया है कि नित को जानकर मनुष्य विकालदशों हो सकता है ॥ ९॥
मापाटीकासाहिता ब०४७। 'फलानुगीति यदहिचित्रकामति प्रयित वराङ्गम् ॥ २ ॥ स्वरुपमेव तस्य तत् प्रकीर्तितानुकीर्तनम् । बीम्यहं न चेदिदं तयापि मेऽय वाचता ॥ ३ ॥ उतरतीविता द्युतिमतः क्षेनमुनिमशिवाय समस्ताः। दक्षिगनार्गगता द्युतिहीनाः क्षुपताकरमृत्युकरास्ते ॥ ४ ॥ कोठागारगते आयुधे पुष्पस्थे च गिरो प्रभुविष्णी। निराः क्षितिः सुखभानः संहृष्टाम जना गरोगाः॥५॥ठयन्ति यदि कनिकां मयां रोहिणी श्रवणमेन्द्रमेव चा। मोश सपनारे ग्रास्ता पनिमा दिगनयेन पोख्यो ।। ६ ।। पान्यां नादवस्थिता दिलान्ने पाच्यानां भवति हि वियहो नृपाणाम् । मध्ये नाति हि मध्यदेखीडा क्षेतैर्न तु रुचिरैर्मयूखवनिः ॥ ७ ॥ दक्षिणा ककुमाभिस्तु सिगास्थापोमुचा क्षयः । होनरुक्षाननिय विमहः स्थलदेहकिरणान्वितः शुभम् ॥ ८॥ उचरमा सष्टमयूखाः शालिकरास्ते नातीनाम् । हसथरीरा भस्मतवा दोपकराः स्युर्देशन पाणाम् ॥ ९ ॥ बाजे पंडित लोग उनको कुछमी निन्दा न करेंगे ॥२॥ (पाले मेयर रिपपमें) ही मयाचित्रकार स्वरूप है इस कारण फिर उनका वर्णन नही करना चाहिये सहवर्गन न करनेपरमी निन्दा न टूटेगो ॥ ३ ॥ जो उचर मार्गमें मा गगन रे और पाशमान हों तो कुशल, मुभिक्ष और मंगल रोता ,दक्षिणमा भार चार प्रकाशहीन हों तो अकाल, तस्करमय और मृत्युपारफ होने हैं ॥४॥ ग्रह फोटागारम भर मपानक्षपर होय और नास्पति पुप्पनसय गिम- न हों तो राजा लोग समुदित होते. ममा मुखी, हर्षित और रोगहीन रहती ॥५॥ परिसके भतिरिक्त प्रागण विका, मघा, रोहिणी, प्राण पोर शिश नसतारे पीडित करें तो अनविसे पश्चिम दिशारे पीटती है ॥ ६॥ से सपाकाल के समय दिशामें मजा नाई प्रागण विराजमान होने दी दिशाके रानेगळे रामामा युरोवार. सरि थाराशके मध्यमाग पेक्षा मोवी मध्यदेश पारित होता है. परन मासे, मनोहर अपरा किरणदार हो की मम्मदेसोपोग नहीं होती ॥७॥ जो दक्षिणदिशा प्रददौ दक्षिणाय मौर मेपोंस सप होता है जो इस समय प्रा रोशरीर और रूरलो दराडेरो रिप्रद सेवा, परन्त परी देसाई और किरणक्षार दोशनवारे ८५ । उखरमार्गमें सहस्रिोंसेवी सतरावाने शान्त पलेले बोटे शरीराले और मस्सगे समान पाजे दी देश र रामे बरसकी मुनानगराती सधा और मTIME नरवानगोहा अत्यन्त गुम होता है, दो सूर्यके दिखाई देनेसे सविसर भटनभा सदा करे तो यादलाका नाश, कुशल कर्ममें हानि और मेरा जनपदम उपद्रा होकर यह शीघ्र नाशको प्राप्त हो जाता ? प्रति द्वार प्रयान् मृत्तिकादि रात नक्षत्रमें विचार को दुर्मि, उग्र भव, मित्रोंका विरोध करता है और वपासो नहीं पाता 7411 भने,नंगल या केतु रोहिणीशरटको मेद करे तो समस्त जग बननदनाछि कमाना जाता ॥ १४॥ भरमा हैमा सुदने नाके चाचरण करता? तो बासना Air मनात मुरडाका दनुमा करना॥ १५॥ धनु ममा मा (१८०) वाराहीसहिता। नक्षत्राणां तारकाः सग्रहाणां धूमज्वालाविस्फुलिङ्गान्वितायेत् । आगे निनिमित्तं न यान्ति याति ध्वंसं सर्वलोकः सभूपः ॥ १० ॥ दिवि जाति तुहिनांशुयुगं द्विजवृद्धिरतीव तदाशु शुभा । तदनन्तरवर्णरणोऽयुने । प्रलयनिचतुम्नति ॥ १३ ॥ मुनीनभिजितं ध्रुवं मववतन जंतर शिखी घनविनाशकत् कुशलकर्महा शेकदः । भुजङ्गलमय स्पृशेक्षति नाशो ध्रुवं क्षयं ब्रजति विद्रुतो जनपदश्च बालाकुलः ॥ ३२ ॥ पाद चरन् रविपुत्रो नक्षत्रेषु करोति च वक्रम् । दुर्भिक्षं कुरुते जयमुबं कि च विरोधमवृष्टिम् ॥ १३ ॥ रोहिणीशकटमकनन्दनो यदि भिननि कति थवा शिसी। किं वदामि यदनिष्टसागरे जगदशेपमुपयाति संक्षयम् ।। उदयति सततं यदा शिखी चरति अचक्रमशेपमेव वा । अनुभवति पुर तदा फलमशुझ सचराचरं जगत् ॥ १५॥ धनुःस्थायी सक्षो रुपिया शुभयकरो बलोयोगं चेन्दुः कथयति जयं ज्यास्य च यतः। अगर दोपकारी होते हैं ॥ ९॥ जो ग्रह और नक्षत्रों के तारे धुएकी लपट और विक रियोंसे युक्त हों या विनाही कारणके उनमें प्रकाश न हो तो राजाके सा टोमा धन होता है ॥ १० ॥ जब आकाशमें दो चन्द्रमा दीप्तिमान । युद्ध होता है और नीन चार इत्यादि अनेक चन्द्रसूर्यके निकलनेसे नगदमें में सेतो है ॥ ११ ॥ शिरसी अर्थात् केतु गदि सप्तर्षिमण्डल, अभिनित था होता है. गो आधषानसत्रको स्पर्श करे तो निश्चयही वृष्मिा नारा मापारीकासहिता १०४७ । (१८१) गोमो निश्नमपि सस्पस्प कुरुते ज्वलन्धमायन् वा नृपतिमरणायैव भवति ॥ १३ ॥ स्निग्धः स्थूलः समशृङ्गने विशालस्तुबन्धोदग्विचरनागवीच्याम् । दृष्टः सौम्परशुभियुक्तो लोकानन्दं कुरुतेऽजीव चन्द्रः॥ १७ ॥ पित्र्यमैत्रपु- रुहूतपिशासात्वाष्ट्रमेत्य च युननि शशाङ्क । दक्षिणेन न शुभो हितरुत्स्यादा- पुदक् चरति मध्यगतो वा ॥ १८॥ परिघ इति मेघरेखा या तिर्यग्नास्करो- दयेऽस्ले वा । परिधिस्तु प्रतिसूर्यो दण्डस्त्वृजुरिन्द्रचापनिमः ॥ १९ ॥ उदयेऽ- स्ते वा भानोपै दीर्घा रश्मयस्त्वमोपास्ले । सुरचापखण्डमृजु पद्रोहितमेरावतं दपिम् ॥ २० ॥ अर्धास्तमपासन्ध्या व्यक्तीतता न तारका यावत् । जमरिहानिमुखाद् भानोरदियं पावत् ॥ २१ ॥ तस्मिन् सन्ध्याकाले चिरेतः शुमा वाच्यम् । संघरने लिग्धः सदोवर्ष अयं सोः ॥ २२ ॥ अच्छिनः परियो वियर पिनले मामा मयूखा रखेः लिग्धा दीधितयः सितं है और इस चन्द्रमा मजिस ओरको होती है वहांपर सेनाका उद्योग और जयकी सूचना होती है. चन्द्रमाका शृंग नीचे हो तो धान्य और गायोंका नाश : होता है और लपट व पुरा विस्तार करे तो राजाओंके मरणका कारण होता है ॥ १६ ॥ चिकना, स्थूल, वरावर शृंगवाला, विशाल और ऊंचा चन्द्रमा उत्तर- दिशाने नागवीथिमें विचरण करे, अशुभ ग्रहसे अलग और शुभ ग्रहसे देखा जाय तो मनुष्पोंको अत्यन्त आनन्द देता है ॥ १७ ॥ जो चन्द्रमा मघा, अनुराधा, । ज्येष्टा, विशाखा मौर विमानक्षत्रको प्राप्त होकर दक्षिणमें जाय तो शुभ फल नहीं होता; पदि उत्तरदिशामें वा मध्यमें हो वो हितकारी होता है ॥ १८ ॥ सूर्यके । उदय या अस्तकालमें जो मेघी रेसा हो, उसकाही “ परिष नाम है यह : तिरछी हो तो " परिधि " सूर्यको समान वस्तु हो तो " प्रतिसूर्य" और इन्द्रके । धनुपको समान सरल मेघा "दंड" कहते हैं. सूर्यकी लंबी किरणको "अमोघ" । कहते हैं और लम्बे व सीधे इन्द्रधनुषको " ऐरावत " कहते हैं ॥ १९ ॥२०॥ जप सूर्य आधा छिप गया हो, तारे प्रकाशित न हुए हों और तेजहानिके आर- -म्मसे जबतक सूर्यका आधा उदय हो तबतक संध्या कहाती है ॥ २१ ॥ उस सन्ध्याकाल में इन चिटोंको देखकर शुभ अशुभ फल कहना चाहिये; यह समस्त चिकने हों तो शीम वर्षा और रूखे हों तो भय होता है ॥ २२ ॥ सावत परिष, विमल थापादा, सूर्यको श्याम किरणें, निग्ध दीधिति, वेतवर्णका देवताओंका . - -- है॥२४॥जिन युद्ध करने की इच्छा किये राजाओंके पीछेसे मांना परन्तु हिंगगग भाग २ चलें तो विजय होती है।॥ २५ ॥ सबके सर यतममयमं धनारे युक्त गन्धापुरकी प्रतिमा जो सूर्यको रोक ले तो या पानाडा गया, पूरदिगामें पसी मौर मृगगणोंका शन्द होना मगर हो । २०॥ मनिलोगाने निराको विस्तारमे कहा, मैंने उसस नरनियाको छोटकर इस मागम कहा है. कोपली कुरु गनर गाय चना गरामनी वास्तान कागस्य सन्द करना पड़ता हले अंगिकार गरतावा यात्मदितार्या पधिमावरदेशीपमा -दिवरदेवमादाम पिर मापासापांगरवारेमा (१८२) वाराहीसंहिता। सुरधनुर्विद्युच्च पूर्वोचरा। स्निग्धो मेषतरुर्दिवाकरकरैरालिभितो वाया। स्याद्यदि वार्कमस्तसमये मेघो महाश्छादयेत् ॥ २३ ॥ खण्डो पका हस्वः काका; चिरैर्विदः । यस्मिन्देशे रुमवास्तवाभावः पायो । ॥ २४ ॥ वाहिनीं समुपयाति पृष्ठतो मांसभुक्खगगणो युयुत्सतः । यत् का पलविवो महान् अग्रगैस्तु विजयो विहङ्गमैः ॥ २५ ॥ भानोहरले यो वास्तमये गन्धर्वपुरपतिमा ध्वनिनी। बिम्बं निरुणद्धि तदा नृपतेः पार्न मन सभयं प्रवदेव ॥ २६ ॥ शस्ता शान्तद्विजमृगघुष्टा सन्ध्या निग्या मात्र च । पाशुध्वस्ता जनपदनाशं धत्ते रूक्षा रुधिरनिशा वा ॥ २७ ॥ परिवार कथितं मुनिनिस्तदस्मिन् सर्व मया निगदितं पुनरुक्तवर्जम् । अता कोकिलरुतं बलिभुग्विरीति यत्नत्वज्ञावकतमस्य पिकं न जेतुम् ॥ २८ ॥ इति श्रीवराहमिहिररुतौ वृहत्संहितायां मयूरचित्रकं नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः॥४७॥ भनुप, पूर्णत्तर दिशा में बिजली विराजमान हो अथा जब पादरता मर्यो के गोके पडनेसे चिकना हो जाता है या सूर्यको छिपने के समय महामेघ इको है नौ मां होती है ॥ २३ ॥ जिस देशमें सूर्य टुकडेदार, टेडा, काग, कायाद दिने विधा हुआ और रूखादी वहाँपर अमर राजाला मकान है। कादों है कि गनायो मययुक्त समरको प्राप्ति होगी ॥ २६॥ चिन्ने मेरो मन्दा भूगगे बाको प्राप्त राई या मधिरकी समान ही हो तो हिनीदे।॥ २८॥ जनपदम मापाटीकासहिता २०४८ अथाटचत्वारिंशोऽध्यायः। पुप्यतान। मूलं मनुनाधिपतिः प्रजातरोस्तदुपघातसंस्कागत् । अशुग शुभं च लोके भवति यतोऽतो नृपतिचिन्ता ॥ १ ॥ या व्याख्याता शान्तिः स्वयम्भुवा सुर- गुरोमहेन्दार्थे । तां प्राप्य वृद्धगर्गः प्राह यथा नः शृणुत ॥ २॥ पुप्प- झानं नृपतेः कर्तव्यं देववित्पुरोधान्याम् । नातः परं पवित्रं सर्वोत्पातान्तकर- मस्ति ॥ ३॥ ऐप्मातकाक्षकण्टफिक दुवित्त विगन्धिपादपदिहीने। कौशिक- गृध्रप्रभृतिभिरनिष्टविहगः परित्यते ॥ ४ ॥ तरणतर एल्मरहीरतापतानावृते यनोद्देश । निरुपहतपनपाठवमनोज्ञमधुरद्रुमपाये ॥ ५॥ रुकवाकुनीवजीवक- शुकशितिशतपत्रचापहारतः । ककरचको करिअलाउजुलपारावतीक ॥६॥ कुसुमरसपानमचदिरफपुस्कोकिलादिभिश्चान्यः। विरुते वनोपकप्ठे क्षेत्रागारे शुचावथवा ॥ ७ ॥ हदिनीविलानिनीनां जलवगनमविक्षनेपु रम्येषु । राजाही मनारूपी वृक्षके लिये जरूप, तिसलिये प्रजाके ऊपर उपपाव संस्कार के लिये अशुम और शुभ फल होता है, इसलिये राजाके मालविषयमें सदा चिन्ता करनी चाहिये ॥ १॥ समानाने मोन्टके लिये पृरपतिमीले जो शान्ति यही थी, पर गर्गजीने तिसपो प्राप्त रे भारिसे जो वहा तिसपो श्रवण करो ॥ २ ॥ ज्योतिषी और रोहितगणों द्वारा गजायो पुष्पमान करना गर्चित है. इसके अतिरिक्त पवित्र भी सर्व प्रकारफे उत्पावाका नाश करनेवाला दूसरा कोई नहीं है।॥३॥ मातक (सोडा), मा (यदेडा), कंटकी (खैर), परपरे, प व गन्ध न पृक्ष और उप व शहाने आदि अधिकारी सयों करके छोडे ए. तरुण पृक्ष, लना, गुल्म, पल्ली और बेलसे शाददार पि. ए सायत परे और पोपलोंसे मनोहर और मधुर पहुनसे सगले इनमें पुष्यमान करना उचित है. जिस स्थानमें वृषवाकु (गिरगिट), जीवनीरक (पपोर ), नोता, मोर, शतपत्र (सुरपई) चाप (नील), सरीत (परेरा), कार (का), पपिझल (चाक), बंल (पशिविशेष) और ययूतर और फूलोंका मापान परने में मतवाले भ्रमरगण भोर कोपलादि पक्षियोग्य मनोरचन्द होता है, उनके समर्माप ऐसे परिवागारमें इस शान्तिको करना चाहिये ॥४॥ ॥५॥६॥७॥ अपना नरन मन प्रसन्न करनेगले बटवारी पहिले नखविक्षत नदीरूप कामिनीकी पुलिनरूप मनोहर जांघोंपर यह शान्ति करनी चारे ॥ ८॥ या खिले हुए कमलरूप वदनवाली, कलहंसकी कलनादरूप वारसा और पद्मके मुकुल (कली ) रूप ऊंचे स्तनवाली नलिनीरूप विलासिनिये जहां वर्तमान है, उडते हुए इंसही जिसका छत्र है, कारण्डव, कुरर और सारस पक्षिक घनिसे जो गानेके युक्त है, प्रफुल्ल इन्दीवर रूपवाले, अतएवं सहस्राक्ष इन्द्र समान रूपधारी पवित्र सरोवरके तीरपर शान्ति करनी चाहिये ॥ ९ ॥१॥ अथवा गायोंके जुगारनेसे फेन गिरा है, खुरोंसे ताडित होकर जहर नेमें उत्सव हो गया है, ऐस गोगोठम पुष्यस्नान करना चाहिये ॥ ११ ॥ जहांपर कुशटसे आये हुए जहाज और रत्नोंके देर और घने निचुल (जर) वृक्ष और जलचर, श्वेत पक्षियोंके लीन होनेसे जहांका किनारा अनेक रंग गया है, उस समुद्रके तीरपर पुष्यमान करना चाहिये ॥ १२ ॥ 'निस समासे क्रोध जीत लिया जाता है, वैसेही जिस स्थानमें मृगीगण करके सिंह मिया है, जहांपर पक्षी और मृगोंके यो निडर होकर घूमते हैं तैसे आश्रम, अ कांचीफलाप, नपुर, बडे २ नितम्बों करके जिनके पांव फिसल रहे। अपान मन्द गतिशालिनी और कोपलके फूकनेकी समान मधुरभाषण करनेवाली ममता परिष देवमन्दिरम, तीय या उद्यानके रमणीक स्थानमें पा पारेरमाटी स्टनायोंसे श्रीमान् गृहम यह शान्ति करनी चाहिये ॥ १३ ॥ १४ ॥ He (१८४) वाराहीसंहिता। पुलिनजघनेषु कुर्यादृशनसोः प्रीतिजननेषु ॥ ८॥ ॥ प्रोत्प्लुतहंसच्छचे काम वकुररसारसोद्रीते । फुल्छेन्दीवरनयने सरसि सहन्नाशकान्तिधरे ॥ ९ ॥ पोर कमलवदनाः । कलहंसकलस्वनप्रभापिण्यः। प्रोत्तुङ्गकुडलकुचा यस्मिन्नति विलासिन्यः॥ १० ॥ कुर्याद्रोरोमन्थनफेनलवशळखुरक्षतोपाविते । आप प्रसूतहुंरुतवल्गितवत्सोत्सवे गोष्ठे ॥ ११॥ अथवा समुद्रतीरे कुशलापको रवसम्बाधे । घननिचुललीनजलचरसितखगशबलीकतोपान्ते ॥ १२ ॥ क्रोध इव जितः सिंहो मृग्याभिभूयते यत्र । दत्तानयखगमृगशावकेषु तेपाते पथवा ॥ १३ ॥ काञ्चीकलापनपुरगुरुजघनोदहनविनितपदाभिः । श्रीको मृगेक्षणाभिर्गृहेऽन्यकृतवल्गुवचनानिः ॥ १४ ॥ पुण्येष्वायतनेऽ । तीर्थपूद्यानरम्पदेशेषु । पूर्वोदक्प्लवजूमौ प्रदक्षिणाम्भोवहायां च ॥ १५ ॥ चारों ओर गोवर पडा है, जहांपर नये पैदा हुए बछडोंके हुंकार और कूदने का मापाटीकासाहवा म०४८ । राजारास्थ्यूपरतुपकेशवभकर्कटावासैः । श्वाविन्मूपकविवरैर्वल्मीकैर्या च नका ॥ १६ ॥ धात्री घना सुगन्धा खिग्धा मधुरा समा च विजयाय । चासेऽप्य योजयितच्या यथायोगम् ॥ १७ ॥ निष्कम्य पुरानक्तं बामात्ययानकाः प्राच्याम् । कोपेयां वा रुत्वा पलिं दिशीशाधिपायो वा ८॥ लानाक्षतदपिकुसुमैः प्रयतः प्रणतः पुरोहितः कुर्याद । आवाहनमथ बस्तस्मिन्मुनिभिः समुद्दिष्टः ॥ १९॥ आगच्छन्तु सुराः सर्वे येऽत्र पूजाभि- पणः । दिशो नागा विनाश्चैव ये चान्येऽप्यंशनागिनः ॥ २० ॥ आवाहोवं = सर्वानेवं पाद पुरोहितः । श्वः पूजां प्राप्य यास्यन्ति दत्त्वा शांति मही- ॥ २१ ॥ आवाहितेषु रुत्वा पूजां तां शर्वरी वसेयुस्ते । सदसत्स्वमनि- नं यात्रापां स्वमविधिरुतः ॥ २२॥ आरेऽहनि प्रभाते सम्भारानुपहरेद्यथो- गुणान् । गत्वावनिप्रदेशे शोकाचाप्यत्र मुनिगीताः ॥ २३ ॥ तस्मिन् मण्ड- सका जल वहता दो, पूर्व व उत्तरकी ओरको बहती हुई, क्रमसे नोचेकी भूमिमें न्यमान करना चाहिये ॥ १५ ॥ राख, कोयला, हड्डी, ऊपर, तुप, केश, गदा, कांकडा रहता हो, इत्यारे जंतु और नुहोंके मदक जहां नहीं हों, जहांपर वई हो, जिस स्थानको भूमि घनी, मुगन्धित, चिकनी, मधुर और बरावर हो वही हम विजयको कारण है; छावनी भी १६ ॥ १७ ॥ देवत, मंत्री और य त्तर दिशा में या ईशानकोणमें जांय, सत, दही और फूलों से बलिदान करे. इसका आवाहन मंत्र मुनियोंने इस प्रका- ने कहा है,-"जो देवता लोग इसमें पूजा,चाहते हैं, जो दिशा नाग, ब्राह्मण व नौर जो कोई अंशके भागी हों, वह सबही आगमन करें" ॥ १८ ॥ १९ ॥२०॥ जसके उपरान्त पुरोहित इस प्रकार सयको पुलाय ऐसा कहे,-"आप लोग आने- ले फलको शुभ पूजा प्राप्त कर राजाको शान्ति दे चले जाय"॥२१॥युलाये हुए बतायऑकी पूजा करके सबको वह रात्रि वहींपर विवानी चाहिये. रानिमजोसमदिखाई २. उसका शुभाशुभ फल निरूपण करना चाहिये. यह विषय यापाध्यायमें कहा है॥२२॥ दूसरे दिन प्रभातको कहे हुए द्रव्य लाय, उस पृथ्वीमें जाय जो जो करना चाहिये तेस विषयमें मुनिके गाये ये श्लोक हैं-"विदान पुरोहित वहांपर मंडल संचकर तिसमें अनेक रस्त्रोंकी खानिवाली पृथ्वीको संच और विविध स्थानोंकी कल्पना करे और यथास्थानमें नाग, यक्ष, पित, गन्धर्व, अप्सरा, माने और सिदाको धरे. 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गन्धद्रव्य और मालासे गन्धर्व और अप्सराओंकी पूजा करे ॥ ३२ ॥ रंगोंसे रंगकर, सुगन्धित और डोरखाली मनोहर माला, चन्दनादि पन्न जलके पदार्थोसे रीतिपूर्वक पूजा करे ॥ २३ ॥२४॥२५॥ २६ ॥ २७ ॥२८॥ इसमें अमिलपित देवनाओंकी जैसे पूजा करनी चाहिये, सो में कहता हूं. ग्रहया ग्रहोंकी पूजामें जो विधि कही है, यहांपर वही कर्तव्य है ॥ २९ ॥ तिसमें मांडे, पका हुआ अन्न और मत्स्यादिसे पिशाच, दैत्य और दानवाकी पूजा करनी चार चाहिये ॥ ३० ॥ साम, यजु और ऋमन्त्रसे गन्धयुक्त धूप और मालासे मुनियन आहुति, माला, रन, स्तुति व प्रणाम करके देवताओंको व अत्युचम गन्धान और अनेक वर्ण व त्रिमधुसे नागकी पूजा करनी चाहिये ॥ ३१ ॥ धूप, पंजे सपकी सार्ववर्णिक बलिसे पूजा करे. प्रतिसर (हारकी लकडी), रस, पर (१८६) बाराहीसंहिता। लमालिख्य कलपेचन मेदिनीम् । नानारवासारवती स्यानानि विविचार च ॥ २४ ॥ पुरोहितो पयास्यानं नामान्यज्ञान सुरान् पितृन् । गम्दाना सधव मुनीन् सिद्धांभ विन्यसेद ॥ २५ ॥ ग्रहांश सह नक्षत्र रुद्रांच कर मातृणिः। स्कन्दं विष्णुं विशासं च लोकपालान सुरमियः ॥ २६ ॥ ई- विविधेः रुला हृद्यर्गन्धगुणान्वितैः । यया पूनविद्वान् गन्धमाल्यामुळे ॥२७॥ पक्ष्यैरन्यश्च विविधः फलमूलामिपेस्तथा । पानकविविधर्होः सुग रासवादिभिः ॥ २८॥ कथयाम्यतः परमहं पूजामस्मिन् ययामिलिसिनाकम् । ग्रहयज्ञे यः प्रोक्तो विधिर्महाणां स कर्तव्यः॥२९॥ मांमौदनमद्यायः रियाव- दितितनयदानवाः पूज्याः । अश्यअनाजनतिलः पितरो मांसौदनैश्चापि ॥३॥ सामय जुनियस्त्वृग्भिर्गन्धैश्च धूपमाल्ययुतः । अश्वपकवर्णे नमधुरेण चा चयेन्नागान् ॥ ३१ ॥ धूपाज्याहुतिमाल्पविबुधान रवैः स्तुतिषणाम गन्धर्वानप्सरसो गन्धैर्माल्यैश्च सुसुगन्धः ॥ ३२ ॥ शेपास्तु सार्ववणिकवाटी पूनां न्यसेच सर्वेपाम् । प्रतिसरवनपताकाभूपणयज्ञोपवीतानि ॥ ३३ नक्षत्रोंके साथ ग्रह, मातृकाओंके साथ रुद्र, स्कन्द, विष्णु, विशाख और लोका लोंको व देवताओंकी स्त्रियोंको उचित स्थानमें बनाये फिर तिनको अनेक प्रकार अभ्यञ्जन, अञ्जन, तिल, मांस और रंधे हुए अन्नसे पितरोंकी पूजा मापाटीकासहिता अ०४८। मण्डलपभिमभामे ठत्वानि दक्षिणेऽथवा वेद्याम् । भादद्यात्सम्भारान् दर्नान्दीर्घा- नगमांच ॥ ३४ ॥ लाजाज्याक्षतदधिमधुसिदार्यकगन्धसुमनसो धूनाम् । गोरोचनामनतिलगन स्वतुजमधुराणि च फलानि ॥ ३५॥ सघृतस्प पारसस पता शरावाणि तेथ सम्भारः। पश्चिमवेयां पूजां कुर्याद सातस्प सा वेदी ॥ ३६ ॥ सस्याः कोणेषु दृद्वान् कलशान सितसूपवेटिनयावान् । सक्षी- वृक्षाछत्रफलापिधानान् व्यवस्थाप्य ॥ ३७॥ पुप्पस्तानविमिभेणापूपान- नसा सरपंच । पुष्पलानदव्याणादयावर्गगीतानि ॥ ३८ ॥ ज्योतिष्मती बापमाणामनपामाराजिताम् । जीवां विश्वेश्वरी पाठां समझ विनयां तथा ॥ ३९ ॥ सहां च महदेवा च पूर्णकोशी शतावरीम् । अगिटिकां शियां भवा तेषु कुम्नेषु रिन्यसेत् ॥ ४० ॥ माली क्षेमामा र सर्पपीनानि काधनम् । पदल्यानि पयाला सर्वोपध्यो रसांस्तथा ॥४१॥रवानि सरंगांभावित च सपिकतम् । प्रशस्तनापभोपध्यो हिरण्यं मलालानि च ॥ ४२ ॥ भूषण और यज्ञोपवीत सपकोही अर्पण करे ॥ २५ ॥ मण्डलके पधिमभागने अपना दक्षिणदिशामें वेदीके ऊपर अमि स्थापन करके पुरा और सर सामiva दान करे. खोलें, पी, चावल, दही, मधु, सिदार्थक, फूलमाला, भूप, गारेशन, मान, तिल, मातु के उत्पन्न हुए मधुर फल और घी व सौरसे भी सपा इस समस्त सामग्रीके साथ अर्पण करे, प्रधानवेदोके पधिममें मोदी in पूजा करनी चाहिये. वही वेदी सानदी है॥३४ ॥ ३५ ॥ ३॥ राम मजबूत बलशोंके गलेमें सत मांध, दुधारे वृक्षके पत्ते और फलरो सन 27 वेदके पारों कोनोंमें म्पररथासे पसे. सर परशोको पुष्पमानके पानी में हुए पदापोसे मिले जलसे मरकर तिसमें सघ रत्न गरे, महानने पुष्पमानकी सामग्री कही है वह पर है-“कंगनी, प्रापमाण, ममा(R), पर- गजिना (कोपल), जीरा (ब), विपरी (साँउ), पाय (E), बस (पसरन), मंग, राहा(को) सरदेस (साई), पूर्णमा ( नागरमोगा- गरी, माहिर (ब), शिरा, भदा (मोपा), मजा (औपनि)ोन्न (पोरनामफ गन्धदम्प), माली (रिमी), सोश, मुर्ग, मंगर के दर, सर मकर भोपपि, रस, रख, पर मारके गन्यम, क. (), प्रशस्त नामक सोपाप, गुण भौर मखमय को दम परेशर
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भाषाटोकासाहता अ०४८॥ बोचरमयं च मन्त्रोऽत्र मुनिगीतः ॥५१॥ आज्यं तेजः समुद्दिष्टमाज्यं. सारं परम् । आज्यं मुराणामाहार आज्ये लोकाः प्रतिष्ठिताः॥५२॥ मान्तरिक्षं दिव्यं च यत्ने किल्विपमागतम् । सर्व तदाज्यसंस्पर्शात्मणाशमुप- छतु ।। ५३ ॥ कम्बलमानीय ततः पुण्यस्नानाम्बुभिः सफलपुष्पैः। अभि- शेन्मनुजेवं पुरोहितोऽनेन मन्येण ॥ ५४ ॥ सुरास्त्वामभिपिश्चन्तु ये च दाः पुरतनाः । ब्रह्मा विष्णुभ शम्भुध साध्याम समरुद्गणाः ॥५५॥ आदित्या पसवो या अधिनौ च निपावरी । अदितिर्देवमाता च स्वाहा दिः सरस्वती ॥५६ ॥ कीर्तिलक्ष्मीधृतिः श्रीच सिनीवाली कुहूस्तथा। बुध मुरसा चैव विनता कद्रुरेव च ॥५७॥ देवपत्न्यच या नोक्ता देवमातर च। सर्वास्त्वामभिषिचन्तु दिव्याभाप्सरसां गणाः ॥५८ ॥ नक्षत्राणि हूर्ताच पक्षाहोरात्रसन्धयः । संवत्सरा दिनेशाध कला काठाः क्षणा लवाः ५९ ॥ सर्वे त्वामभिषिञ्चन्तु कालस्यावयवाः शुभाः। वैमानिकाः सुर- गा मनवः सागरैः सह ॥ ६० ॥ सप्तर्पयः सदाराच ध्रुवस्थानानि यानि च । दिने अधिक होंगे उतनाही गुण अधिक पढेगा. इस विषयमें मुनिका कहा हुआ । मन्त्र है-"माग्य (घी) ही परम तेज है, आज्यही श्रेष्ठ और पापका नाश लेशला है, आग्यही देवताओंका आहार और समस्त लोक आज्यमेंही प्रतिष्ठित रहे हैं. हे राजन् ! भौम, आन्तरिक्ष और दिव्य जो समस्त पाप आपको पस्थित हुए हैं, वह समस्त माज्यको छूकर नाशको प्राप्त होते हैं " ॥५१॥५२॥५३॥ र पुरोहित राजाके शरीरसे कम्बलको उतारकर फल और पुष्पयुक्त पुष्यमानके टमें राजाका अभिषेक करे. तिस विषयका मंत्र यह है-“मझा, विष्णु, शम्भु, रगण, साध्य और जो देवता सिद व पुरातन हैं वह तुम्हारा अभिषेक करें. मादित्य, स, रुद्र, वैद्योंमें श्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमार, देवताओंकी माता अदिति, साहा, सिदि, सरस्वती, कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, श्री, सिनीवाटी, कुह, दन, सुरक्षा,. बिनता, , देवताओंकी माताएं और दिव्य अप्सराएं यह सब तुम्हारा अभिषेक करें. नक्षत्र, मुहूर्त, पक्ष, दिवा, रात्रि, सन्ध्या, संवत्सर, श्रेष्ठ दिन, कला, काटा,. सण और लव आदि काल के शुम अंग तुम्हारा अभिषेक करें. विमानमें बैठनेवाले देवतागण, सागर, मनु, स्त्रियोंके साथ सातों ऋष, समस्त ध्रुवस्थान, मरीचि, मनि, पुलह, पुलस्त्य,कत, अंगिरा, भृगु, सनत्कुमार, रानक, सनन्दन, सनातन,.
यच्या लगनेवाला और शन्दरहित सङ्ग अनिष्टकारी है. इससे विपरीत हो नौ मन हो तो विजय होती है ॥ ५॥ राजाको चाहिये कि वृंथा सोनम्मान अधम है. अंगुलिके परिमाणसे इसमें व्रणको जानना चाहिये, यदि विपम अंकुते परिमाणमें अर्थात् ३।५।७।९ यादिमें व्रण हो तो अशुम है ।। श्रीवृक्ष, वर्द्धमान, आतपत्र, शिवलिङ्ग, कुंडल, कमल, ध्वज, आयुध और सार ककी समान दाग शुमदायी है ॥ २॥ गिरागट, काक, गिद, कन्याद, व नहीं होता ॥ ३ ॥ फूटा हुआ, छोटा, खुटला, वंशछिन्न, दृष्टि और मनो। ( १९४) वाराहीसंहिता । शास्त्रज्ञः शान्तिमादिशेशज्ञः । शस्तनिमित्तः पट्टो नृपराष्ट्रविवृदये गवति ॥८॥ इति श्रीवराहमिहिरकती वृहत्सं पट्टलक्षणं नामकोनपञ्चाशनमोऽध्यायः॥१९॥ अथ पंचाशत्तमोऽध्यायः। खड्गलक्षण। अंगुलशतार्धमुत्तम ऊनः स्यात्सञ्चविंशतिं खलः अंगुलमानाज्ञयो बगो ऽशुजो विषमपर्वस्थः॥ १॥ श्रीवृक्षवर्धमानातपत्रशिवलिङ्गकुण्डलाम्जानाम् । सहशा व्रणा प्रशस्ता ध्वजायुधस्वस्तिकानां च ॥ २॥ लकलासका । व्यादकवन्धवृश्चिकारुतयः । खड्ने व्रणा न शुभदा वंशानुगाः प्रभूताच ॥ ३॥ स्फुटितो ह्रस्वः कुण्ठो वंशच्छिन्नो न दृङ्मनोऽनुगतः । अस्वन इति चाटि प्रोतविपर्यस्त इष्टफलः ॥ ४ ॥ क्वणितं मरणायोकं पराजयाय कोशाव । स्वयमुद्रीणे युद्ध ज्वलिते विजयो भवति खड्ने ॥ ५॥ नाकार जाननेवाले शान्तिको आज्ञा दें, जिस मुकुटमें किसी प्रकारके अशुभ चिव नर्स होते, तिसके धारण करनेसे राजाका राज्य वढता है ॥ ८ ॥ इति श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुराद- बादवास्तव्य-पंडितबलदेवप्रसादमिश्रविरचितायां मापाटीकाया- मेकोनपंचाशचमोऽध्यायः॥ ४९ ॥ पचास अंगुलके प्रमाणका खड्ग उत्तम है, पच्चीस अंगुलके परिमाण है। . और स्पानसे सटखटानेपर पराजय, स्वयं म्यानसे निकल पड़े तो युद्ध मापाटीकासाहिता भ०५०। विवृणुयान विवट्टयेच पश्येन तत्र वदनं न वदेव मूल्यम् । देशं न चास्य कथये प्रतिमानपेच नेव स्पृशेनृपतिरसयतोऽसियष्टिम् ॥ ६ ॥ गोजितासंस्थानो नीलोललवंशपत्रसभ । करवीरपत्रशूलायमण्डलायाः प्रश- स्ताः स्युः ॥ ७ ॥ निन्नो नच्छेयो निकः कार्यः प्रमाणयुक्तासः । मुले नियते स्वामी जननी तस्यापताश्छन्ने ॥ ८ ॥ यस्मिन् सरुपदेशे व्रणो भवेत- ददेव सदस्य । वनितानामिव तिलको गुह्ये वाच्यो मुसे दृष्ट्वा ॥ ९॥ अथवा स्पृशति यदङ्ग प्रष्टा निविंशवृत्तवार्य । कोशस्थस्यादेश्यो वणोऽस्ति शास्त्रं विस्तेिदम् ॥ १०॥ शिरसि स्पृष्टे प्रथमेंऽगुले द्वितीये ललाटसंस” । भूमध्ये च तृतीये ने सृष्टे चतुर्थ च ॥११॥ नासोठकपोलहनुश्रवणयीवांसकेषु पञ्चायाः । उरसि दाशसंस्थत्रयोदशे कक्षयोर्जयः ॥१२॥ स्तनहृदयोदरकुक्षी. निकाले या न हिलावे डुलावे, तिसमें मुख न देखे, तिसका मूल्य न करें, इसकी उत्पचिस देश न यतावे और अपवित्र होकर उसको नहीं सुप ॥ ६॥ गापको जीभके समान आकारवाला, नोटे कमल और वंशके पत्रकी समान, कोरके पचेकी समान, शूलाग्र और मंडलाप यही सब खड्ग अच्छे हैं ॥ ७ ॥ ऊपर को हुए प्रमाणवाले सदाका कसोटीसे परीक्षा करना या काटना उचित नहीं है. खनको नोक टूट जाय वो खड्के स्वामीकी और मूठ टूट जाय तो खड्के मालिककी माता मेरे ॥ ८॥ जिस प्रकार खियोंके मुखपर तिल देखकर उनके गुप्तस्यानमेंमी तिल कहे जा सकते हैं, वैसेही खगकी मूठमें हुए दार्गोको देखकर, खड्में व्रण कहे जा सकते हैं ॥ ९॥ सङ्गधारी पूछनेवाला (इस खगके किस स्थानमें प्रग है बवाभो ऐसा पूछकर) जिस अंगको हुए दैवज्ञ विसका निश्चय करके इस शखज्ञानके शायके अनुसार म्यानमें पड़े हुए खगमें कहां र व्रण हैं सो बता सकेगा ॥ १० ॥ जो पूछनेके समय प्रश्नका करनेगला मस्तकको हुए तो कहना चाहिये कि खनके प्रथम अंगुलमें व्रण है, ललाट छुए तो दूसरे बंगुलमें, भौरोंके बीच हुए तो तीसरे अंगुलमें, नेत्रोंको हुए तो चौथे अंगुलमें दणका होना कहना चाहिये ॥ ११ ॥ जो प्रश्न करनेवाला नासिका, ओठ, गाल, गेडी, कान, गरदन या संसकन्ध स्थानोंको छुए वो क्रमसे पांचवें, छठे, सातवें, आटवे, नववें, ददारे और ग्यारहवें अंगुलमें बणका होना बताना चाहिये. उरके हुनेसे वारह अंगुलमें और दोनों कोखोके हुनेसे तेरह अंगुलके स्थानमें व्रणका होना बवावे ॥ १२ ॥ स्तन, हृदय, उदर, कोख या नामीका पर्श करनेसे क्रमानुसार सममें होनेसे शुम फल देता है और कोई करते है कि तीस अंगुल का २४ और जंघाके स्पर्शसे २५ अंगुलम व्रण होता है ॥ १४ ॥ वित मानं ॥ १५ ॥ जो खगका व्रण एक अंगुलसे लेकर पांच अंगुलवक हो तो मार अंगुलतकके स्थानमें व्रणका होना निरूपण करे यह गर्गाचार्यका मन कहा व यह फल होता है,-पुत्रमरण, धनलाभ, धनहानि, सम्पत्ति और बन्धन ॥१५ पुघलाभ, क्लेश, हस्तिलाभ, पुत्रमरण, धनलाभ, विनाश, स्त्रीमाप्ति और विस दु:ख यह क्रमानुसार पडादि अंगुलके व्रणका फल है ॥ १७॥ लामा स्त्रीलाम, वध, वृद्धि, मरण और संतोष यह फल क्रमानुसार चौदहसे आदि इंच २० मंगुलमें व्रण हो तो उसके फल जानने चाहिये. २१ अंगुलमें बम होने धनकी हानि होती है ॥ १८ ॥ धनकी प्राप्ति, निर्माण, धनागम, लेकर तीस अंगुलितकनी अंगुलवाले व्रणका फल है ॥ १९ ॥ इसके पो कोई फल नहीं कहा है वोमी विपम अंगुलमें व्रणका होना अशुन एक वाराहीसंहिता। नाभीपु चतुर्दशादयो ज्ञेयाः । नाभीमूले कट्यां गुह्ये चकोनविंशतितः ॥ १३॥ ऊर्वापिंशे स्यादूर्वामध्ये वणम्नयोविंशे। जानुनि च चतुर्विशे जवायांपञ्चाक च ॥१४॥ जङ्घामध्ये गुल्फे पाण्या पादे तदंगुलीप्वपि च । पविशतिका पत्रिंशदिति मतेन गर्गस्य ॥१५॥ पुत्रमरणं धनातिर्धनहानिः सम्पदश्व बन्नका एकाद्यगुलसंस्थैर्वणः फलं निर्दिशेत् क्रमशः॥ १६॥ सुतलानः कटहो हर लब्धयः पुत्रमरणधनलाभौ। क्रमशो विनाशयनितामिचित्तदुःखानि पालन ॥ १७ ॥ लब्धिनिम्त्रीलब्धयो वधो वृद्धिमरणपरितोपाः। ज्ञेयाश्चतुर्दशा धनहानिश्चैकविंशे स्यात् ॥ १८॥ वित्तातिरनिर्वाणं धनागमो मृत्युन ऽस्वत्वम् । ऐश्वर्यमृत्युराज्यानि च क्रमाशिदिति यावत् ॥ १९ ॥ परतो न विशेषफलं विषमसमस्यास्तु पापशुभफलदाः । कैश्चिदफलाः पग्नि चौदहसे लेकर अठारह अंगुलतकके स्थानमें व्रण वतावे. नाभिकी जडमें, कर गुह्मस्थानके स्पर्श करनेसे क्रमानुसार उन्नीस वीस और इफीस अंगुलमें व्रण है। है ॥ १३ ॥ दोनों अरुके स्पर्श करनेसे २२ व अंगुलमें और दोनों अरु मध्य स्थान स्पर्श करनेसे २३ वें अंगुलम व्रण होता है, जानुके साथ इनसे किसी अंगको स्पर्श करे तो क्रमानुसार छब्बीस अंगुलसे लेकर को . है मापाटीकासाहिता २०५० (१९७) विशतरतोऽयमिति यावत् । २० ॥ करवीरोत्सलगजमदघृतकुंकुमकुन्दचम्प- कसगन्धः। शुनदोऽनिष्टो गोमूत्रपङ्कमेदः सदृशगन्धः ॥२१॥ कूर्मवसासक्क्षारो- पमध जयदुःखदो भवति गन्धः । वैदूर्यकनकविद्युलनो जयारोग्यवृद्धिकरः ॥ २२ ॥ इदमीशनसं च शखरानं रुधिरेण नियमिच्छतः प्रदीताम् । हविषा गुणवत्सुनानिलिप्सोः सलिलेनाक्षयमिच्छतय वित्तम् ॥ २३॥ षडयोष्ट्रकरे- शुदुग्धपानं यदि पापेन समीहतेऽर्थसिधिम् । झपपित्तमृगाश्ववस्तदुग्धेः करि- इस्वच्छिदये सतालगः ॥२४ ॥ आकंपयो हुइविपाणमपीसमेतं पारावता- खुशरुता च युतं प्रलेपः । शवस्य तेलमाथितस्य ततोऽस्य पानं पश्चाच्छितस्य न शिलासु भवेविघातः ॥ २५ ॥ क्षारे कदल्या मथितेन युक्ते दिनोपिते पायितमायसं यत् । सम्यक् रितं चाश्मनि नैति भङ्गं न चान्यलोहेष्वपि तस्य कोण्यम् ॥ २६ ॥ इति श्रीवराहमिहिररुनो वृहत्सं० सङ्गलक्षणं नाम पञ्चाशनमोऽध्यायः ॥५०॥ शेपवक किसी स्थानमें श्रण हो तो किसी प्रकारका विशेष फल नहीं होता ॥२०॥ कनेर, उत्पल, इ.थीका मद, घी, कुंकुम, कुन्द या चम्पाकी समान गन्धवाला खड्म हो तो शुभ फलदायी होता है, परन्तु गोमत्र, पंक या मेदकी समान गन्ध आती हो तो अनिष्टकारी होता है ॥ २१ ॥ कर्म, वसा, रक्त या भारकी समान गन्ध आनेसे भय और दुःखका देनेवाला होता है, जो खड्गमें वैदूर्य, मुवर्ण और विजलीकी समान चमक हो तो जय और आरोग्यका बढानेवाला होता है॥ २२ ॥ जिनको लक्ष्मीके प्राप्त करनेकी इच्छा है, उनको अपने शोपर रुधेि- रसे पान देना चाहिये, गुणवान पुत्रके माप्त करनेकी इच्छा करनेवालेके रूपर धृतसे पान देवे और अक्षय विचको चाइनेवालेके. खड्गपर जलकी पान होनी चाहिये ऐसा शुक्राचार्यके वनाये शासका मत है ॥ २३ ॥ जो घोडी, ऊंटनी और पथनीके दूधसे पान दी जाय तो पापकार्यसे भलीमांति अर्थकी सिद्धि होती है. मत्स्यापिच, मृग, मश और छाग दुग्धके साथ तालमेथोके रसमें पान देनेसे हाथीकी शंभी काट डाली जा सकती है ॥२४॥ पहिले शसपर तेल मले फिर माग वृक्षका गोंद, मेपके सींगको मस्म और कबूतर व चूहेको वोट मिलापकर शसके उपर लेप करे फिर तिसको तेज करके पत्थरकेभी उपर मारे तोमी उसकी धार नहीं टूटती है ॥ २५ ॥ कदली वृक्षका (मूलका) क्षार और मध मिलापफर एक दिन इन्दर नर्शन तिनकाके लगे रहनेरो हरे वर्णगला स्थानही प्रश्न को प्याव्याच्यापति कााता महोस्पटेनोतम तनाध्यापEATINR. - इति श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोचरदेशांना शास्त्रामें कहा हुआ दिशाओंका ज्ञान लाये हुए पदार्थोके पर छोग प्रश्न करनेवालेका अंग, अपना अंग और दूसरेके अंगोंको घना दिसे शुभ व अशुभ फलको कह सकते हैं. स्थावर जङ्गमादि पदायोग। करनेसे अर्थ चाहनेवाले पुरुपोंके शुभाशुभ फल दिसते ।। लो स्थान कूलरूपी मुन्दर मुसकानसे युक्त है, यहुतसे फलोंसे भरा एमा, डाटयाले, बुरे पक्षियोंसे शून्य, श्रेष्ठ नामको प्राप्त हुए वृक्षोंसे युक्त, मो देवता, ऋषि, दिन और सिद्धोंके रहनेको वासभामजी मत कपिदविधा पठन्ति । आचार्यज प्रागेाक्त' पास्तुनिया हरित मान, पिटकरमप्रारम्ने पमितः परमपि काnिtali (१९८) वाराहीसंहिता। अथैकपंचाशत्तमोऽध्यायः। अंगविद्या. दैवज्ञेन शुभाशुभ दिरादितस्थानाहृतानीक्षता वाच्यं । चालोक्य कालं धिया। सर्वज्ञो हि चराचरात्मकतयासौ सर्वदर्श ध्याह्वातामः शुभाशुभफलं सन्दर्शयत्यर्थिनाम् ॥ १॥ स्थान ! रिफलमृत्सस्निग्धकत्तिच्छदासत्पक्षिच्युतशस्तसंज्ञिततरुच्छायो वर्पिद्विजसाधुसिद्धनिलयं सत्पुष्पसस्योक्षितं रख छोडे फिर लोहेका बना हुआ खड्न उसको पिये फिर उस सङ्को । पत्थरपरमी मारे तो वह नहीं टूटेगा और लोहेपरभी मारनेसे वह राई नहीं होगा ॥ २६ ॥ दावादवास्तव्य-पण्डितबलदेवप्रसादमिश्रविरचितायां भाषाटीकर पंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥ भसीमांतिसे ज्ञान है, इससे दैवज्ञ सर्वज्ञानी, मात् नारायणजीको समान है. क्योंकि इसी चेष्टा और सब कुछ देखनेराज, । अविद्यापिटरक्षण नात दाध्यायो न सापादिसम्मती । Lificrom मापाटीकासहिता अ०५१। टाइटम् ॥ २॥ छिन्नभिन्नकमिखातकप्टकिप्लष्टरूक्षकुटिलेन सद - कुरसतियुतनिन्यनामभिः शुष्कशीर्णबहुपर्णमर्मनिः॥ ३ ॥ श्मशा- यितनं चतुप्पथं तथामनाझं विपर्म सदोपरम् वस्करागारकपा- निश्चित तुपैः शुष्कतून शोजनम् ॥ ४॥ पवजितनमनापितरि- 'नमानेकैस्तथा सपचेः । फितवयतिपीड़ितयुतमायुधमाध्वीकविक्रयैर्न ॥५॥ पायचरेशाभ दिशः प्रशस्ताः मधुन वाप्वम्वुयमामिरक्षः । • कालेऽस्ति शुभ न रात्री सन्ध्यादये प्रभसतोऽपराहे ॥ ६॥ यात्रा- ने हि शुभाशुभं यद भो निमित्तं तदिहापि वाच्यम् । दृष्ट्वा पुरो जनताहतं वा पनुः स्थितं पाणितलेऽथ वस्खे ॥ ७॥ अथाङ्गान्यूर्योधस्तनवृ. दं च दशना भुजौ हस्तौ गण्डो कचगलनसांगुष्ठमपि यत् । सशंसं सश्रवणदसन्धीति पुरुपे नियां भूनासास्फिम्बलिकटिमुलेखांगलिचयम् ॥ जिला ग्रीवा पिण्डिके पाणियुग्मं जंघे नाभि कर्णपाली रुकाटी। है॥२॥ जिस स्थानमें छिन्नभिन्न कोडोंके खाये, कांटेदार, जले हुए । और कुटिल वृक्ष लगे हों, जो स्थान र पक्षियोंसे घिरा हुआ हो, पुरे नाम 3, दुपले, बहुत सारे पवेही है मानो जिनका मर्म ऐसे पृस लगे हों, वह स्थान शुभ है ।। ३ ॥ जो स्थान चौराहा मसानकी समान स्ने गृहसे युक्त, मनको न नेवाला, टेढा, सदा ऊपर रहनेवाला, जहाँ किसीका वास न हो, कोयला आद- की खोपड़ी और सूखे तिनकोंसे व्याप्त है सो शुभदायी नहीं होता है ॥४॥ साई, नागा, नाई, शत्रु, बन्धन, कसाई, चाण्डाल, शठ, यति और पीडित गोसे जो स्थान युक्त है और आयुध और मदकी बिक्रीका जो स्थान है सो नकारी नहीं है ॥५॥ पूर्व, उत्तर, ईशानकोण, प्रश्न करनेवालेके लिये श्रेष्ठ है, न्तु वायु, पश्चिम, दक्षिण और नर्वत दिशा अच्छी नहीं है. राधिकाल, दोनों ध्या और अपरानमें प्रश्न करना शुभ नहीं होता ॥ ६॥ यात्राकी विधिमें जो माशुम निमित्त कहे गये हैं, पूछनेवालेके सामने लाये हुए या उनके हाथ वस्त्रके दि देखकर उनका शुभाशुभ कहना चाहिये ।। ७ ।। ऊरू, होंठ, स्तन, अंडकोश, व, दांत, मुना, हाथ, कपोल, केश, गला, नख, अंगूठा, शंख, कन्धा, स्थान, दा जोरके स्थान यह पुरुषसंशावाची शब्द है. भी, नासिका, सिक (कमरका स पिंड), कमर और मुन्दर रेखावाली अंगुलिये सीनामवाची हैं और जीभ,
५ मतदाता परंतु यदि उR 14
टाप नो प्रियवियोग होना है, जाने
iii (f.)नागोया की माने
मिला होगा ॥१॥11 पा 43
(२००)
वाराहीसंहिता।
यॐ पृष्ठं जत्रुजान्वत्यिपावं हवाल्वक्षी मेहनोरविकं च ॥ ९ ॥ जय
च शिरो ललाटमात्यायतंरपरैचिरेण । सिद्विवेजातु नपुंसकों को
मकरीध पूर्वैः ॥ १०॥ सप्टे वा चालिते वापि पाशंगुठेशीको
अंगुल्यां दुहितुः शोकं शिरोधाते नृपामयम् ॥१३॥ विप्रयोगमुरजिसर
काटाइतिरलथवा भवेत् । स्यात्मियातिरमिगृह्य कर्पटं पृच्छतभरणासाय
॥ १२॥ पादांगुठेन विलिलेनूमि क्षेत्रोत्यचिन्तया । हस्तेन पादी कर
रानीनपा च सा ॥ १३ ॥ तालभूनपटदर्शनेंऽशुकं चिन्तयेत्कवचार
लगम् । व्यापिराभवति रज्जुजालकं वल्कलं च समवेक्ष्य बन्धनम् ।।
शिजलीनरिचशुण्ठिवारिदै रोधकुछवसनाम्बुजीरकैः । गन्धमातिय
वदेव पूच्चनस्तारकेण चिन्तनम् ॥ १५॥ श्रीपुरुषदोपपीडितसर्गभनुजा
गर्दन, सिडक (डिजिग), पडिये, जांघ, नाभि, कर्णपाली, साटो (
पोरे, गन, पोट, सली, गानु, अस्थिपा, हृदय, ताल, नेत, किंग,
हि (र) के नीचे की तीन हांडगा, मस्तक और ललाट पर
नमो , मास्यादि (मुरादिछप गाय तो रिलम्पसे गिद
मंगलरो, शत, टूटे हुए गा दुपले हो तो इन क प :
मंगाए जानेगे कदापि सिदि नहीं होती ॥ ८॥९॥ १० ॥1
नया दिगाना नोनाको मेयरोग हो।
4. नाशिर
माता
na ના ના કાકા એ છે કે
Airi
मापाटीयसाहिता म०५१। (२०१) न्यतनयानाम् । द्विचतुष्पदक्षितीनां विनाशतः कीर्तितेष्टः ॥१६॥ न्यग्रोधमधु- कनिन्दु जम्बनाप्रपद रिजातिफलैः। धनकनकपुरुषलोहांशकरूप्योदुम्बरा- नेपि करनेः ॥ १७॥ धान्यपरिपूर्णता कुम्भः पूर्णः कुटुम्बवृद्धिकरी। गजगोशुनां पुरीपं धनयुवतितृहविनाशकरम् ॥ १८॥ पशुहत्तिमहिपाज- रजतम्यापलत सन्दऐ। भविधननिवसनमलपनकाशेयावरणसंपातम् ॥१९॥ पृच्छा वृद्भावकसरिवादीने नृभिर्विहिता। मित्रातार्यभवा गणिकानृप- सतिकार्यरता ॥ २० ॥ शापोषाध्यापाहतनिर्यन्यनिमिचनिगमकैवर्तः। चार- चमूपतिवाणिनां दासीयोबापणस्थवभ्यानाम् ॥२३॥ वापसे शौण्डिके दृष्टे पोषितः पशुपालनम् । हगतं पृच्छकस्य स्यादुच्छवृत्तौ विपन्नता ॥ २२ ॥ इच्छामि प्रष्टुं जग पश्पत्ताः समादिशेयुक्त। संयोगकुटुम्बोत्या लानेश्वोदता दुपायाका नाश, चौपायोक्य नादा और पृथ्वीके नाराको चिन्ता कहनी चाहिये ॥ १५ ॥ १६ ॥ जो प्रश्न करने के समय प्रश्नक के हाथमें बड, महुआ, तेन्द, जामन, पिलखन, आम, वेर और जायफल हो तो क्रमानुसार धन, सुवर्ण, पुरुष, लोह, वस्त्र, चांदी और तांवकी प्राप्ति होती है ॥ १७ ॥ धान्यपरिपूर्ण पात्र और मरे हुए घडेके देखनसे कुटुम्ब बहता है. हाथीको लीद, गापका गोबर और कुत्तोको विध देखने से धन, युवति और महदोंका विनाशकारी मान जानना चाहिये ॥ १८ ॥ विस कालमें पशु, हाथी, महिप, पंकन, चांदी और व्यायके दिखाइ इनसे ऋमानुसार मेप, धन, मेडके उनका बना हुआ कंबल, चन्दन, रेश- मीन बस और गहनोंके लाभ चिन्ता होती है ॥ १९ ॥ वृद्धश्रारक (जैनसं- न्यासी) का दर्शन होनेसे मनुष्यों को मित्र, द्यूत और धनको चिन्ता, संन्यासीकर दर्शन पानेते वेश्या, राजा, वया और धनशे चिन्ता कहनी चाहिये ॥ २० ॥ साक्य, उपाध्याय, अहत, निम्रन्थ , निमित, निगम और धीररके दिखाई देने झमानुसार चोर, सेनापति, वणिक, दासो, योदा, दुरनदारीके द्रव्य और वध- सम्बन्धी चिन्ता जाननी चाहिये ।। २१ ॥ तापस या कलालके दिखाई देनेसे मनकारीको परदेशमें गये हुए पुरुषकी और पशुपालनको चिन्ता होती है और उंछ (भूमिपर गिरे हुए एक २ दानेके इको करने नाम उंछ है) वृदिले जीवन धारण करनेवाले मुनि आदि दिखाई दे वो विपार पडने चिन्ता होती है॥२२॥ "मैं पूछनेको इच्छा करता हूँ काहये 'दर्शनः कीजिये मली मांतिसे आज्ञा दीजिये" यह वाक्य कहे जानेपर संयोग, कुटुम्बचे उत्पन "" " "4 SHAYAT .... यनिष्ठरवतो लभते न हृतम् ॥ २८॥ निगदितमिदं यत्तत्व र कः सह मृतिकरं पीडार्तानां समं रुदितश्रुतेः। अवयत्रमरि समान उमा लाम और धनकी चिन्ता होती है ॥ २३ ॥ "मलीभांनिसे मनोरय पहिये" और " बताइये " यह कहे जानेसे जप और मा। दुर ज्योतिषीमे कही जाय तो पन्धु और चोरको चिन्ता होतो मोनमा भंगारा किया जाय तो सजनकी चिन्ता कही जाती सोनो बादरे मनुष्यको चिन्ता होती है. पांगमा अंग्रडा पार ठिन बार तो दागदागीननकी चिन्ता होती है, जंगासन पुरा, नामिणगे यहन, हदगंक सरो भाया, हारो अंगुडे पा समन पत्याको चिन्ता होतीप्रश्नाला पेट धुरनामा, 441 नामदार या पापाय दुए ना धाता और निगरी भाषा गाने. २२ ॥ २१॥ नो पूछनेगला भीतर मंग rut या बगान, मथ मोरया गागार rhसमनदा मान्न मगरinak गहोगामुमा मा मादायमें मानो,if AT मदनगम: Tinfositil नामा, नबार गापा 11 ग माप शीग्रही देखिगे" यह यात सर भागमे । (२०२) वाराहीसंहिता। चिन्ता ॥ २३ ॥ निर्दिशेति गदिते जयाध्वगा भाशु सर्वजनमध्यगं त्वया दृश्यतामिति बन्धुचौरजा ॥ २४ ॥ स्वजन उदितो बाह्मजे बाह्य एवं पादांगुष्ठांगलिकतलया :- स्यात् । जंचे प्रेष्यो भवति भगिनी नामितो हवनायो :- यकतस्पर्शने पुत्रकन्ये ॥ २५॥ मातरं जठरे मूनि गुहं मा बाहू भाताथ तत्सली स्पृष्ट्वं चौरमादिशेद ॥२६॥ ... बाह्यगस्पर्शनं यदि करोति पृच्छकः। श्रेष्ममूत्रशकृतस्त्यनमा । लस्थवस्तु चेत् ॥ २७ ॥ भृशमवनामिताङ्गपारमोटनतोऽप्यथा र कमाण्डमवलोक्य च चौरजनम् । मृ.. होती है. और “ प ।
टीकासहिता २०५१ (२०३ -- इरेदतिबहु तदा भुक्त्वान्नं संस्थितः सुहितो वदेव ॥ २९ ॥ लला च्छूकदर्शनाच्छालिजीदनम् । उरःस्पर्शाद पष्टिकानं श्रीवास” म् ॥ ३० ॥ कुतिकुचजठरजानुस्पर्श मापाः पयस्तिलपवादः नादयतधीष्ठी लिहतो मधुरं रसं ज्ञेयम् ॥ ३१ ॥ विस्पृक्के कोटयेजिता- वर्क विकूणयेव । कटुतिककपायोष्णहिकेद श्रीवेच सैन्धवे ॥ ३२ ॥ त्यागे शुष्कवितं तदल्यं श्रुत्वा कव्यादं प्रेक्ष्य वा मांसमिश्रम् । भूगण्डो- ने शाकुलं तद् भुक्तं तेनेत्युक्तमेतन्निमित्तम् ॥ ३३ ॥ मूर्द्धगलकेशहनुशं. जई पस्ति च स्पृष्ट्वा । गजमहिपमेपशूकरगोशशमृगमांसयुग्भुक्तम् ४ ॥ दृष्टे श्रुतेऽप्यशकुने गोधामत्स्यामिपं वदेद्भुक्तम् । गर्जिण्या गर्भस्य च नमे प्रकल्पयेत्यभे ॥ ३५॥ पुंग्रीनपुंसकास्ये दृष्टेऽनुमिते पुरःस्थिते छौंकका शन्द हो वो रोगियोंका मरण होता है. जो पूछनेवाला भीतरके गको छूकर पास टेवे तव मोजन पहुत करनेसे प्रश्न करनेवाला तृप्त हो रहा यातको दैवज्ञ प्रकाश करे ॥ २९ ॥ पूछनेवाला माथेको स्पर्श करे और स्यका दर्शन करे तो शॉठोका चावल इसने खाया है ऐसा कहे, छाती स्पर्श नेसे शॉठी और गर्दन पर्श करनेसे जौका अन्न खाया है ॥ ३०॥ कोख, स्तन.. दर और जानुको प्रश्न करनेवाला छुए तो क्रमानुसार उरद, दूध, तिल व दालका सोनन करना वतावे. दोनों ओगेके चाटनेसे मधुर रसको जाने ॥ ३१ ॥ जो छनेवाला विष्टम्भी हो या जीभसे ओठोंके स्थानको चाटे अथवा बदनको सकोरे तो उसने खट्टा खाया है और कटु, तिक्त, कपाय व गरम द्रव्य सानेसे हिचकी उत्पन्न होती है, सेंधा नोन खानेसे थूकता है ॥ ३२ ॥ जो प्रश्न करनेके समय कफको त्याग करे, थोडा, सूखा, तीखा पदार्थ और मांस खानेवाले पक्षीको देखे । उसका नाम मुने तो उसने मांसका मिला हुआ अन्न भक्षण किया इ. भा पल और ओठके स्पर्श करनेसे तिस करके (नीचे लिखे अनुसार) शाकुन सीका मांस खाया गया है यह कहे ॥ ३३ ॥ मस्तक, गला, केश, मेटी, कनपटी, प और वस्तिके पर्श करनेसे क्रमानुसार गज, महिप, मेप, शूकर, गाय खरगोश, 1. इनका मांस प्रश्नकर्षाने भक्षण किया है ॥ ३४॥ दृष्टयान दर्शन र श्रवण करनेसे गोद और मछलीके मांसका खाना कहा जायगा. न करनेपर गर्मिणीका गर्भनिपातमी इससे प्रगट हो जाता है॥ ३५ प्रश्नसे पुरुष, खी या नपुंसक अंग या कुछ दीसे अनुमानसे ज्ञात * मदनसमाजमनी ॥४१॥ माया, उठाद, नी, नान, मा, मुराण, रत्न, मूंगा अथरा माता, धाई और पुत्र यह आगे खडे हुए दिखाई दे को कारे दाहिने दारको सश करे तो एक मासके पीछे गर्म धारण होगा. बाम नामे और बारे कानोसा करे तो चार मासके पीछे गर्भ धारण होगा ॥ पोटाचारका सा करनेसे तीन पुत्र और दो कन्पा उत्पन्न होगी. कानेने पांच पुध भार हायसन करनेमे तीन पुष जन्म लेंगे. मोना रस्त करने के नमर पांच यंगूठा अथरा दोनों पड़ी शर्म करे तो पर इमन्न होती है. एमेही जकी उंगलीके सशंगे पांच कत्या, अनामियम चार, सपना सामने नीन और वनांके सनमे दो सत्या होंगी।। दनी रुस छनोदी कन्या और वांया उस सर्व कानेगे । मा.ना मध्यभाग सा कान चार भोर मारीत (२०४) वाराहीसंहिता। स्पृष्टे । तजन्म जवति पानानपुष्पफलदर्शने शुभम् ॥ ३६ ॥ अंगुठेन भूता बांगुलिं वा स्पृष्ट्वा पृच्छेद्र चिन्ता तदा स्यात् । मनाया?नरजनन लैरमस्थैर्वा मातृधाग्यात्मजैव ॥ ३७॥ गर्नयुता जठरे करगे स्याद् दुः निमित्तवशात्तदुदासः । कति तजठरं यदि पीठोत्तीडनतः करणे च करे ऽपि ॥ ३८ ॥ घाणाया दक्षिणे दारे स्पृष्टे मासोत्तरं वदेत् । वामे दो कर्म से वा द्विचतुर्थः श्रुतिस्तने ॥ ३९ ॥ वेणीमूले त्रीच मुतान् कन्यो वे कसे पुत्रान् पञ्च हस्ते त्रयं च । अंगुष्ठान्ते पञ्चकं चानुपूर्वी पादांगुठे पानिने ऽपि कन्याम् ॥ ४० ॥ सव्यासव्योरुसंस्पर्श सूते कन्ये सुतद्वयम् । सो ललाटमध्यान्ते चतुनितनया भवेत् ॥ ११ ॥ शिरोललाटनूकर्णगण्डहनुमा गलम् । सन्यापसव्यस्कन्धब्ध हस्ती चिबुकनालकम् ॥ ४२ ॥ उरः कुनै पुरस्थित जो स्पर्शित होवे उस गर्भसे उसका जन्म होता है. परन्तु पान, म पुष्प और फलका दर्शन करना शुभ है ॥३६॥ अंगूठेसे मी उदर या इंपन्न सर्श करके पूछे तो पूछनेवालेको गर्भको चिन्ता होती है. शहद, घी आहे, से नो गार्भगी गर्नयुक्त होती है परन्तु दुष्ट निमित्त दिखाई देने से गर्भका नाम जाता है, जो पूछनेवाला दबाकर पेटको सच या हायसे हाय मलकर प्रश्न कर देने गर्म ना हो जाता है ३८ ॥ गर्भग्रहण प्रश्नमें प्रश्न करनेगला जो ना - (२०६८ भाषाटीकासहिता अ०५२। दक्षिणमप्यसव्यं हतार्श्वमेवं जठरं काटिभ । स्फिक्सायुसन्ध्यरुयुगं च न अंधेऽथ पादाविति कचिकादी॥ ४३ ॥ इति निगदितमेतदात्रसंस्पर्शल प्रकटमभिमताप्य वीक्ष्य शास्त्राणि सम्यक् । विपुलमविरुवारो पति यः सबै मेतन्नरपतिजनतानिः पूज्यतेऽसौ सदैव ॥ ४४ ॥ इति श्रीवराहमिहिरकतो वृहत्संहितायामङ्गविद्या नाम- कपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५१॥ अथ द्विपंचाशत्तमोऽध्यायः। Et पिटकलक्षण. सितरक्तपीवरुष्णा विमादीनां कमेण पिटका ये। ते क्रमशः प्रोक्तफला वर्णानामयजादीनाम् ॥ १ ॥ नुस्निग्धव्यक्तशोभाः शिरसि धनचर्य मार्फ सोना- दांत, गला, दाहिना फन्धा, बांया कन्धा, दोनों हाथ, ठोडी, नाल, उदर, कुच, हृदयके वीचमें और दोनों पार्थ, जठर, कमर, स्फिक (कमरका मांसपिण्ड), गुदा, सन्धि, अरुयुगल, दो जानु दोनों छावा और पांव दोनोंमें क्रमानुसार कृति- कासे लेकर सय नक्षत्र विराजमान रहते हैं ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ सब शास्त्रोंको भली- ति विचार कर पंडितोंकी संदरताके लिये यह गावस्पर्शलक्षण भलीभांतिसे कहा या, जो अत्यन्त पुद्धिमान और उदार समाववाला दैवत उसको मलीमॉतिसे न लेगा तो वह, राजा और प्रजासे सदा पूजित होगा ॥४४॥ श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोचरदेशीयमुरादावादास्त- पंडितपलदेवप्रसादमिश्रविरचितायां मापाटीकायामेकपंचाशचमोऽध्यायः॥५१॥ क्षण, क्षत्री, वैश्य और शूद्रोंके क्रमानुसार सफेद, लाल, पीली और रंगकी (कुनसी) चिकनी और रमणीय हों तो वह क्रमानुसार द्विजादि वणोंके धमें फल प्रकाशित करती है, अन्यथा निष्फल हैं. अर्थात् सफेद रंगकी प्रामणोंको फलदायी है, क्षत्रियोंके लिये लालरंगकी सुनसो फटदायी ॥शिरमें उनसी हो वो धन पास आता है. मस्तकपर होनेसे सौभाग्यको तिमात्र माझगादि यहाँपर दिनातिपदके पाय नहीं है. जन्मराशिके अनुसार गादि धार वर्ण निथप हुए हैं, उनकोही समझना चाहिये।
गता अयोधातं घातं सुततनयलानं शुचमाप । नियों
शत्रुनिचयस्य विधातं पृष्ठवाहुयुगजा रचयन्ति ।
भूपणामुपवाहुयुगोत्याः ॥ ५॥ धनानि सौनापं शुका
मुपानानं नामी तदध इह चौरेर्धनहतिम् । धनं धान्न मन
मोहों के बीच में हो या नेत्रपुट में हो तो शोक होता है, दोनों
कनपटीमें हो तो संन्यासी करता है, ओस गिरने के सानो
दोती॥२॥ नासिका और गालमें हो तो वसन और मामले
मघरमें हो तो अन्न लाम होता है. टोडीके तलेहो तो
कपारमें हो तो बहुत धनमा लाभ होता है, दोनों टो:
डान होता,गटेमें हो तो भूषण, अन्न और पान।। Ri!
मस्तम्माधि, गरदन, हृदय, हुन, पाने और पानी
नंतर मिताभ्रमण औरतलाश
गुना मगर, भाधान, गुनदान, दो और निराधे 16
टमारपीटा."
.नानाहानामांग-1 IN/
वाराहीसंहिवा।
(२०६)
ग्यमाराद् दौर्भाग्यं भूयुगोत्याः प्रियजनघटनामा ।
त्याच शोकं नयनपुटगता नेत्रयोरिष्टर्टि प्रव्रज्या शतः
गाश्चातिचिन्ताम् ॥ २॥ घाणागण्डे
। चिबुकतलगा भूरि वित्तं ललाटे । हन्दोरेवं गुटकाय,
तद्रूपणगणमपि ज्ञानमात्मस्वरूपम् ॥ ३ ॥ विari
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मिक्षार्थमसरुदिनाशं कक्षोत्या विदधति धनानां नानुन
प्राप्ति, दोनों भौहोंमें हो तो दुर्भगता और प्यारे मनुष्पर मन
भापाटीकासहिता ब०५२ । (२०७) सोनाग्य वा सुवृपणजाता विदधति ॥ ६ ॥ अोर्यानाङ्गाना- शत्रुजनाद क्षतिम् । शरण जत्योमुल्फेऽवबन्धक्लेशदायिनः पाणिपादजाता धननाशागपगमनमध्वानम् । बन्धनमंगुलिनि- ज्ञातिलोकतः पूजाम् ॥८॥ उत्तातगण्इपिटका दक्षिणतो ता। धन्या नवन्ति पुंसां तद्विपरीवास्तु नारीणाम् ॥ ९ ॥ विजागः पोक्त आ मूर्खतोऽयं वणतिलकविभागोऽप्येवमेव 'भवति मशकलक्ष्मावर्तजन्मापि तवनिगदितफलकार पाणिनां ति श्रीवराहमिहिरस्ती बृहत्संहितायां पिटकलक्षणं नाम विचाशचमोऽध्यायः ॥५२॥ डकोशके ऊपर हो तो धन और सौभाग्यका विधान करता है ॥६॥ हो तो सारी और सीकी प्राप्ति होती है, दोनों जानुमें हो तो शत्रु- उठाना पड़ती है। दोनों छाकामें शखका घाव और गुल्कमें हो तो मार्ग का वेश होता है ॥ ७ ॥ परन्तु स्फिक् ( कमरका मांसपिंड), एडी में हो तो धनका नाश, अयोग्य स्त्रीसे गमन और मार्गका लाम होता है. के समूहमें हो तो वन्धन और अंगूठेमें हो तो जातिवाले लोगासे पूनाकी ॥ ८॥ पुरुषके दाहिने मागमें जो पिटक होता है, तिसको कहते हैं, वामभागमें पिटकको "यमिपात पिटक कहते हैं, ऐसे क्षिण मागम पिटकाले आदमौके धान्य होता है, परन्तु पियों के उलटे नेसे फल होता है अर्थात् खियोंके दाहिने भागके पिटकको "अमिधात" के पिटकको “ उत्सातगण्ड " कहते हैं, यही वामभागले शिपोंके शुभ- , अन्यथा इनका अशुभ फल होता है ॥९॥ मस्तकसे आरंभ करके संगके पिटका विभाग अर्थात् फल यह कहा गया. व्रण या तिल (काले के तिल होता है) इन दोनोंकर फल इसी तरह जानना और मशक पा मिक जो दो प्रकारके रिन हैं, वे चिट यदि प्राणियोंकी देहमें हो तो वही राहमिहिराचार्यविरचितापां बहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादाबादवास्त तबलदेवमसादमिश्राविचितायां मापाटीयांदिपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥
उचम घर ६४ हाथ चौड़ा होता है और फिर छ: भागयुक्त विस्वारही उसने पांचवां-लम्बाइमें ९५ और चौडाईमें ७६ हाथका होता है ॥ ४ ॥ सेनापविम लम्बाई होती है. यथा-पहला-६४ हाथ चौडा और ७४ हाथ १६ मंजूर लंम्वा होता है. दूसरा, ५८ हाथ चौडा, और ६७ । १६ लम्बा होता है तीसरा-५२, हाथ चौडा और ६० हाथ १६ अंगुल लम्बा. चौथा-४६ हार। (२०८) वाराहीसंहिता। अथ त्रिपंचाशत्तमोऽध्यायः। वास्तुविद्या. वास्तुज्ञानमथातः कमलभवान्मुनिपरम्परायातम् । किपतेऽधुना मये विदग्धसांवत्सरप्रीत्यै ॥ १ ॥ किमपि किल भूतमानवद् इन्धान रोदसी शरीरण तदमरगणेन सहसा विनिगृह्याधोमुखं न्यस्तम् ॥ २॥ यत्र च येन गृहीतं विध धेनाधिष्ठितः स तत्रैव । तदमरमयं विधाता वास्तुनरं कल्पयामास ॥ ३ ॥ उच- ममष्टायाधिकं हस्तशतं नृपगृहं पृथुत्वेन । अष्ट्राटोनान्येवं पञ्च सपादानि देण्येन ॥४॥ पशिः पत्निहींना सेनापतिसद्मनां चतुःषष्टिः । पञ्चैव विस्ताराव जो ब्रह्माजीके पाससे मुनि लोगोंके पास आई है पंडित और ज्योती लोगोंकी प्रसन्नता के लिये अव वही वास्तुविद्या कही जाती है ॥ १॥ शदेले पृथ्वी और आकाशका रोकनेवाला कोई एक भूत पूर्वकालमें उत्पन्न हुआ था, वह देवतासे मारा जाकर नीचेको मुखकर पृथ्वीपर गिरा ॥ २ ॥ जिस देवताले उसके जिस स्थानका अधिकार प्राप्त किया था, वही देवता उस स्थानका स्वामी है, इसके उपरान्त ब्रह्माजीने. उस देवमय शरीर मूतको वास्तु पुरुषरूपसे कलिन किया ॥ ३ ॥ ( संसारमें समस्त मनुष्यों के वास्तुगृहके भेद पांच प्रकारके । तिनमें पहला उत्तम, पहलेकी अपेक्षा दूसरा अधम और तिससे तृतीयादि. सक्ने पहिले राजाके घरका परिमाण कहा जाता है, एक शत आठ १०८ ( चौडा और १३५ हाथ लम्ब होता है; पांच मेदवाले राजाके घरमें यही उत्तर घर है, द्वितीयादि और चार प्रकारके गृह क्रमसे लम्बाई और चौडाईमें आठ [. कम होंगे, यथा, दूसरा लम्बाईमें १२५ हाथ और चौडाईमें सौ हाय, तीसरा लम्बाईमें ११५, चौडाईमें ९२ हाथ, चौथा, लम्बाईमें १०५, चौडाईमें ८४ १२४ भंगुरका एक हाय, और ६० व्यंगुलका एक अंगुल होता है।
. मापाटीफासहिता अ०५३। (२०९ पड्लागसमनिता दैर्ध्वम्॥५॥पष्टिश्चतुर्विहीना वेश्मानि भवन्ति पञ्च सचिचर स्वाष्टांशयुता देध्यं वदर्धतो राजमहिपीणाम् ॥ ६ ॥ पतिः पशिधवं युवन जस्यारवर्निताशीतिः । व्यंशान्विता च देध्यं पच तदर्धेस्तदनुजानाम् ॥ ७ । नृपसचिवान्तरतुल्यं सामन्तमवरराजपुरुषाणाम् । नृपयुवराजविशेषः कञ्चुकि 7 और पांचवा - १६ अंगुल लम्या होता है ॥५॥ मंत्रियोंके गृह मी पांच प्रकारके होते हैं, तिनमें मुल्यगृह ६० हाथ चौडा होता है. फिर ६० से क्रमानुसार चार २ हाथ कम किये जांपगे. अर्थात् क्रमानुसार ५६ । ५२ । ४८॥ ४४ हाथ चौडा दो. चौदाईके साथ चौडाईका आठवां वंश मिलानेसे लम्बाईका परिमाण निरूपित होगा. तिसका परिमाण यया:-पहला ६७ । १२, दूसरा ६३, तीसरा ५८ ॥१२, चौथा ५४१०, पांचवां ४९ हाथ १२ अंगुल इसकी लम्बाई और चौडाईसे थाधे भागके. परिमाणका गृह रानियोंका होना चाहिये, लम्बाई यथा, पहला ३३ ॥ १८, दुराग ३१ । १२, तीसरा २९ । ६, चौथा २७ । ०, पांचवां २४ । १८ ॥ चौडाई यथा, पहला ३० । दूसरा २८। तीसरा २६ । चौथा २४ २२ हाथ होता है ॥ ६ ॥ युवराजफे गृहभी पांच प्रकारके होते हैं, निसमें उधम गृह ८० हाथका चौडा होता है, दूसरे गृहोंकी चौड़ाई ममानुसार ए. राय म होगी. चौडाईका तीसरा अंश मिलानेसे तिनको लम्वाईफा परिमाण निणीत गा. गया-पहला ८० हाथ चौडा, १०६ हाथ १६ अंगुल लम्या, दूसग ४ च चौडा, ९८ हाथ, १६ अंगुल लम्बा; तीसरा ६८ हाथ चौडा, ९० प १६ गुल लम्या, चौथा ६२ हाथ चौडा, ८२ हाथ १६ अंगुल लम्या. पांच ५१ व चौस और ७४ हाथ १६ अंगुल लम्या. इन उत्तमादि गृहोंते नाधे परिमाण- गृह युवराजके छोटे भ्राताओंके गृह दों, तिसके परिमाण चौमा । ३७ । ३४।१।२८ हाथ और लम्बाईका परिमाण था-५३ । ८, ४१ । ८, १७ । ८ हाप ॥ ७॥ राजा मंधी इन दोनोंके गृहमें जो अन्तर हो वही सामन्त और श्रेष्ठ गनारोके परिमाण है, उत्तमके प्रमसे चौड़ाई पपा-४८१४४४० ॥१॥ प. भोर उधमके कमसे लम्पाई ६७ ॥ १२, २०५६ ॥ १२, ५१। १२ गुरु है. राजा और युवगनके परमें जो मन्तर होता है, दही बन्दर वेश्या और नाच गाना जाननेगों के घरोंका परिमाण है. उसमादे कसे सम्पाई यथा-२८1८,२९१ ८, २४ । ८, २२१८, २०१८ बाल 17 और निमय बधिर निर्णय हुआ , चौडाईके भंग घरेनो70 हाय हो यहभी पांच प्रकारके है, इसही कारण दूसरे क्रमानुसार चार २ होंगे और इनकी छः पदमागयुक्त चौडाईही इनकी क्रमानुसार लम्बाई हो यो चौडाइ यथा-४० । ३६ । ३२ । २८ । २४ हाथ हो. लम्बाई यथा १६, ४२ । ०,३७ । १६, ३२ । १६, २८।० अंगुल॥१०॥ ग्राम वैश्य, शूद और चाण्डालादि हीन जातियों में किस २ को किस २ प्रसार हाय होती है. इस ३२ मंख्यासे तबतक चार घटाने हागे फिजखक न निरुदेगी । नवहीं ३२ मेसे घटानेर १६ निकलने तक पांच अंक11 यदा-२२ । २८ । २४ । २० । १६ इन पांच अंकामंही नामगजाने के नागनाति के दूदरे गृहको चौडगावी रोख्या २८ से १६ यवनेतर गृहकी चौडाका व्यार और पांच प्रामरके गृहमें इस जातिय भगिर! परेर बानि मामा परिमाग धौर यधिस्पर कहा गया. नीगरेमा चये भंने शुदय और पापोंगे यन्पन (चाण्डालादिसीन) Murna (२९०) वाराहीसंहिता। वेश्याकलाज्ञानाम् ॥ ८॥ अध्यक्षाधिकतानां सर्वपामेव कोशरविनुल्यम् । युवराजमन्त्रिविवरं कर्मान्ताध्यक्षदूतानाम् ॥ ९॥ चत्वारिंशदीना चतुः र्निस्तु पञ्च यावदिति । पड्ञागयुता देध्य दैवज्ञपुरोधसोषिजः।।। पास्तुनि यो विस्तारः स एव चोच्छायनिश्चयः शुभदः । शालकेषु गृहे विस्तराद्विराणितं दैर्घ्यम् ॥ ११॥ चातुर्वर्ण्यव्यासो द्वात्रिंशत्स्याचढने है तिसी तरह उत्तमादिकमसे चौडाई २८, २६, २४, २२, २० है । समस्त अध्यक्ष और अधिकारी पुरुषोंके गृहका परिमाण, कोशगृह और गृहका परिमाण समान है, युवराज और मंत्री के गृहमें जो अन्तर हो वही कमान और दूतोंके गृहका परिमाण है. तिसके परिमाणमें चौडाई यया,-२०१७ १६ । १४ । १२ हाथ. लम्याई यया,-३९ । ४, ३५ । १६, ३२ ।। १०. १६, २५ ॥ ४ ॥ ९ ॥ ज्योतिपी, पुरोहित और वैयोंके उत्तम घरको चौर चौडा हो उतनाही ऊंचा हो तो शुभदायी है. परन्तु जिन घरोंमें केवल एक हो उसकी उम्बाई चौडाईसे दुगुनी होनी चाहिये ॥ ११ ॥ ( प्रामग, । अधिचा है और उस वास्तुगृहका परिमाण कितना हो वही अब कहा, वामगाद चार वर्ण और होनजातिके लिये उत्तम गृहके व्यासको चोगा ।। जा . . . . . मापाटीकासहिता अ०५३। (२११) आ पोउसादिति परं न्यूनतरमतीवहीनानाम् ॥ १२ ॥ सदशांश विप्राणां क्षत्रस्याष्टांशसंयुतं देर्ध्वम् । पड्भागयुतं वेश्यस्प भवति शूद्रस्य पादयुतम् ॥ १३ ॥ नृपसेनापतिगृहयोरन्तरमानेन कोशरतिभवने । 'सेनापतिचातुर्वर्ण्य- उत्तम. मध्योचम. मध्यम. अधमा अधमाधम. ब्राह्मण २८ २० क्षत्री. २८, २. १६ वैश्य. २४ २० २० अन्त्यज. 10 इससे जाना गया कि ब्राह्मणलोग ऐसे पृथु व व्यास युक्त पांच प्रकारके गृहोंमें अधिकारी हैं, वैश्य तीन प्रकार, शूद्र दो प्रकार और अन्त्यजजातिवाले एक -प्रकार के गृहमें अधिकारी हैं ॥ १२ ॥ पहले कही हुई चौडाईके साथ क्रमानुसार अपना दशवां, आठवां, छठवां और चौथा अंश मिलानेसे ब्राह्मणादि चार वर्णो के वास्तुमानका व्यास और लंबाईका निर्णय होगा परन्तु अन्त्यजजातिके व्यासमा- नको जो चौडाई है, वही लम्बाईके नामसे नियत हुई है. लम्वाईके अंक धरे जाते हैं यथा- ॥ १३ ॥ मध्योचम. मध्यम. अधम अधमाधम. ब्राह्मण. ३५।४।४८ ३०।१९।१२ २६९।३६ २२ १७११४।२४ क्षत्री. ३१।१२ २७ .२२।१२ वैश्य. २८ २३३१६ १८१८ . . . 0 . । . अन्त्यज. १६ :प्रजा और सेनापतिके गृहमें जो अन्तर होगा, वही कोपगृह और रतिगृहका परिमाण होगा. वितके परिमाणमें चौडाई यया,-४४ । ४२ । ४० । ३८ । ३६ हाथ. लम्बाई यथा-६०1८,५७ । १६, ५४ । ८,५१८, ४८ । ८ अंगुप्त कोपटइ वा रविगृहके साथ सेनापाते और चार वर्णके वास्तुमानका अंतरमानही राजपुरूषों के वास्तहमा परिमाग दोगा अर्यात् राजपुरुप प्रामण हो तो ब्राह्मण वासु-व्यासको सेनापति-वास्तुमान-पास होन करके जो शेप रहे उस मानाइसे उसका गृह-पंचक बनावे. जो राजपुरा क्षत्री हो तो तिसके वास्तुमानको सेनापवि. वास्तुमानके दूसरे अंकले अधिकारके भनुसार वास्तुमान धपकर अधिकारानुसार Ashoz कोई गृहमी शत हायसे ऊंचा न हो. यही शासकार लोगोंका अमिरी राघर मिलाये फिर उसको दो जगह रखे एक जगह १४ चौदहवे माग र जगहफे अंकको १५ पन्द्रहसे भाग करनेपर मलिन्द अर्थात् सालाना याहरी भाग सोपानयुक्त आंगनका परिमाण होगा, यह रानाके बिना और जानिके पुरुपोंके घरके भानशाला और अलिन्दमान निना कारानुगार) सनातीय व्यासार हीन करके तिसमें (७०) मिझोर उमरोदो जगद रसकर कमसे १४ और १५ पन्द्राने माग करनेरकर ग्राला और याटिन्दर परिमाण निकल आरेगा ॥ १७ ॥ पहले चार र जो लगादि चार वर्गाका गृह व्यारा ३२ वतीय हायके सपने न अंगुट३ दाय, पन्द्रह भंगुल, दीन हाय तेरह अंगुल मोरा बार मंगुट परिमागरी माला बनाई जाय योर इन गृहम माना। दगार ननय उनी मंगल तीन हाप बाठ मंगल दोप' (२१२) वाराहीसहिता। विवरतो राजपुरुषाणाम् ॥ १४ ॥ अथ पारसवादीनां स्वमानसंयोगदल भवनम् । होनाधिकं स्वमानादशुजकरं वास्तु सर्वपाम् ॥ १५॥ पशाति- गाममितं धान्यायुधवहिरतिगृहाणां च। नेच्छन्ति शास्त्रकारा हस्तथा च्छ्रितं परतः॥ ३६॥ सेनापतिनृपतीनां सप्ततिसहिते विधाते ज्याने। शाला चतुर्दशहते पञ्चत्रिंशहतेऽलिन्दः ॥ १७ ॥ हस्तद्वात्रिंशादिषु चतुभा- वित्रिकत्रिकाः शालाः । सप्तदशत्रितयतियित्रयोदशकताटलान्याधिकाः 11८' त्रित्रिदिदिदिसमाः क्षयक्रमादंगुलानि चैतेपाम् । व्येका विंशतिरटौ विशतिरष्टा गृहादि निर्माण करे ॥१४॥ पारसब राजतिलक पाये और अम्वष्ठ आदि काटेको गृह निर्माण स्थानमें अपने २ परिमाणके योगजाई (चौडाई, लम्बाई) तुल्य होगा अर्थात् संकर जातियें जिन दो जातियोंसे उत्पन्न हुई हैं उन दो जातिक घराको चौड़ाई और लम्बाई मिलाकर तिसके आधे मानमें उनका गृह-पंचक बन्द सब जातियोंके लिये अपने २ परिमाणको अपेक्षा हीन या अधिक वास्तुका पोकान रामदाई होता है ॥ १५ ॥ पशुशाला, प्राजिकालय, धान्यागार, शस्त्रागार, को शाला और रतिगृह (वैठक) का परिमाण इच्छानुसार किया जा सकता है. परन्तु ॥ १६ ॥ सेनापतिका गृह और राजाके गृहके व्यासा परस्पर जोडकर उसने जो कुछ प्राप्त हो, वही शाला अर्थात् घरके भीतरका परिमाण है और हमें गा है, जिसमें जमानुगार । चार दाय, ममा अंगुल, भाषाटीकासहिता अ०६ दरा वितयम् ।। १९ ॥ शालाविवागतुल्या कर्तव्या वीथिका पहिर यदायतो जवति सा सोप्णीपं नाम तदास्तु ॥ २० ॥ सायाभयमिति सावष्टम् तु पार्श्वसंस्थितया । संस्थितामिति च समन्ताच्यः पूा सर्वाः ॥ २१ ॥ विस्तारपोडशांशः सचतुर्हस्तो जवेगृहोच्छ्रायः। द्वादश नोनो नमो नमो समस्तानाम् ।। २२ ॥ व्यासात् पोडशनागः सर्वपा सह भवति मितिः । पकेटकालतानां दारुलतानां तु सविकल्पः ॥ २३ एकादशभागयुतः सत्तनविपपलेशयोातः। उच्छ्रायोऽगुलतुल्यो द्वारस्या विष्कम्नः ॥ २४ ॥ विनादीनां व्यासात् पञ्चाशोऽष्टादशांगुलसमेतः । साटार -- " " दो हाथ अटारह अंगुल और दो हाथ तीन अंगुलके परिमाणका होगा॥१८॥१९॥ पहले कहे हुए शालामान के त्रिमागको स्थानभूमि, भवन के बाहर रखे, इस भूमिका नाम वीथिका है, जो यह वीथिका वास्तुभनके पूर्वभागमें दो तो उक्त वास्तुका नाम “ सोष्णी। है. पदि वास्तुके पश्चिम और वीथिका हो तो उस वास्तुको “ सायाश्रय" पारनु कहते हैं, जो उत्तर अक्षा दक्षिण दिशामें वीथिका हो तो उसको "सावष्टम्म नामक वास्तु कहते हैं और जो वास्तुभवनके चारों मोरही ऐसी वीथिका हो तो तिसको मुस्थित कहते हैं, इन समस्त वास्तुओंको शाखकार लोग पूजा किया करते हैं अर्थात् ऐसी वास्तु अत्यन्त शुभदायी है ॥ २० ॥ २१ ॥ उस गृहफा जितना विस्तार हो उगको सोलहवें शके साथ चार हाथ मिलानेरो जितने हाथ हो वही उस घरकी ऊंचाई दोगी, की चार प्रकारके घरोंकी उंचाई क्रमानुसार उसकी अपेक्षा वारह भाग के कम होगी ॥ २२ ॥ समस्त गृहोंके व्यासका मोलहवा भागही भीतका परिमाण है, यह परिमाण पकी टोंसे पने घरा है, परन्तु काटो घने घरकी भीतका परिमाण इच्छानुसार कर लेना चाहिये ॥ २३ ॥ राजा भौर सेनापति के घरका जो व्यास हो तिसके साथ मचर मिलाप ११ ग्यार- इसे भाग करनेपर जो प्राप्त हो, नितने हाथ उसके प्रधानदारय विस्तार होगा. वस्तार हस्त परिमाण जितने अंगुल हो, तितने हाथ वह ऊंचा होगा और दार- नस्तारके अर्दी झारका नाम विष्फम्भ माना है ॥ २४ ॥ प्रामणादि दूसरी तिके पुरुषोंके गृहव्यासके पचासमें नठारह अंगुल मिटानेते जो होगा, वही स घरके दारस्त परिमाण होगा. दारपारमाणका आवां भाग, दारर रिफम्म 4 PM है, अव चौसठ पदका वास्तु कहते है ॥ ५४॥ अथवा चौसठ कोटाकाही । पनावे अर्थात् नौ रेखा पूर्व पश्चिम और नौ रेखा दक्षिण उत्तरमें सैंचकर चौक में ब्रह्मा चार कोठोंका स्वामी है. ब्रह्माके कोनोंमें स्थित आठ देवता आपवत्स, तो सावित्र, इन्द्र, जयन्त, राजयक्ष्मा और रुद्र ॥ ५५ ॥ और वाहिरके कोनान ले हुए आठ देवता है अग्नि, अंतरिक्ष, वायु, मृग, पिता, पाप, यक्ष्मरोग औरत यह सव आधे आधे कोष्ठके स्वामी हैं और इनके दोनों ओर विराजमान मृश, भृगराज, दौवारिक, शोपनाग और अदिति यह डेढ डेढ पदके सात सुग्रीव, कुसुमदंत, वरुण, असुर, मुख्यभल्लाट, सोम, भुजंग, अर्यमा, मिलर मित्र, पृथ्वीधर यह सव दो दो कोष्ठके स्वामी है. यह चौसठ पदक्त वास्तु है॥५६ ॥ आगे वंशोके सम्पात जो कहेंगे वह और पदोंके समनध्य यह बातों मर्म जाने, प्राज्ञ पुरुपको उचित है कि कभी इनको पीडन न करे ॥५॥ वास्तुमें मर्म स्थान, अपवित्र, माण्ड, कील, स्तम्म इत्यादि करके और शसरे भागे कहेंगे, उनसे पीडित हो तो घरके स्वामीके उस उस अंगमें अर्थात् वारदा जो जो अंग हो, उसी अंगमें पांडा देते हैं ॥५८ ॥ होम अथवा प्रश्न सा घरका मालिक अपने जिस अंगको खुजलावे. वास्तुके उस अंगमें शल्य होगी। मौर अनि आदि जिस देवताके आहुति देनेके समय छौंक रोना आदि अन शकुन हों अथवा अग्निमें कुछ विकार उत्पन्न हो तो वह देवता वास्तुपुठपके सि मंगमें हो, उस यंगको शल्ययुक जाने ॥ ५९ ॥ काठका शल्प होनेसे धना, (२१८) वाराहीसंहिता। न्ती हृदये ब्रह्मा पितांघ्रिगतः ॥ ५४ ॥ अष्टाप्टकपदमयका ला.. गास्तिर्यक् । ब्रह्मा चतुःपदोऽस्मिन्नईपदा ब्रह्मकोणस्थाः ॥ ५५॥ - बहिष्कोणेष्वपदास्तदुभयस्थिताः सार्धा। उक्तन्यो ये शेपास्ते and स्ते च ॥ ५६ ॥ सम्पाता वंशानां मध्यानि समानि यानि च पदानाम् ।. तानि विन्द्यान परिपीडियेत् प्राज्ञः ॥ ५७॥ तान्यपिया पीडितानि शल्यैश्च । गृहनतुस्तत्तुल्ये पीडामङ्गे प्रयच्छन्ति ॥ ५८ ॥ १॥ यदज गृहपतिना यत्र वामराहुत्याम् । अशुभं भवेनिमितं विकृतित्रिक तत् ॥ ५९॥ धनहानिर्दाहमये पशुपीडारुग्मयानि चास्थिकते । लोहनचे वास्तुपुरुषके लिङ्गपर इन्द्र व जयन्त स्थित हैं, हृदयपर ब्रह्मा स्थित है कौन पर पिता है. यह नगर, ग्राम, गृह इत्यादिमें इक्यासी पदके वास्तुका विमान र वास्तुमें बनावे और चारों कोनों में कर्णके आकार दो तिरछी रेखा खेंचे. इतर मौर शेप वीस देवता जयन्त, इन्द्र, सूर्य, सत्य, वितथ, बृहत्क्षत, यम, भाषाटोकासहिता अ०५३ । (२१९) पंकपालको मृत्युः स्यात् ॥६० ॥ अङ्गारे स्वेनभयं भस्मानि च विनि- येव सदामिजयम् । शल्यं हि मर्मसंस्थं सुवर्णरजवाहतेऽत्यशुभम् ॥६१ ॥ मण्यमभंगो वा रुणदपागमं तुपसमहः । अपि नागदन्तको मर्मसंस्थितो परुदयति ॥ ६२॥ रोमाद्वायुं पितृतो हुताशनं शोपसूत्रमपि वितथा । स्थादृशं जयन्ताब गमदितेभ सुमीवम् ॥६३॥ तत्सम्पाना नव ये तान्य- माणि सम्परिटानि । यध पदस्पाष्टांशस्तलोकं मर्मपरिमाणम् ॥ ६४ ॥ हस्तसंस्थया सम्मितानि वंशोऽगुलानि विस्तीर्णः । वंशव्यासोऽध्यर्थः शिरा- पाणं विनिर्दिष्टम् ॥ ६५ ॥ तुसमिच्छन् ब्रह्माणं यवादशेट्टही गृहान्तस्थम् । च्छिटायु पचानाद् गृहपतिरुमतप्यते तस्मिन् ॥ ६६ ॥ दक्षिणभुजेन हीने स्तुनरेऽर्थक्षयोऽङ्गमादोपाः। वामेऽर्थधान्यहानिः शिरसि गुणैर्हीपते सर्वेः॥७॥ स्थियोंका शस्य होनेसे पशुपांडा और रोगमय होता है. लोहके शल्यसे मृत्यु खमय, कपाल और केशोंके शल्पसे होती है ॥ ६० ॥ कोयलोंके शल्यसे रमय, मस्मके शल्यसे सदा अनिभय होता है. सुवर्ण और चांदीके सिवाय और ई शल्प जो वास्तुपुरुपके मर्म टिका हो तो अत्यन्त अशुम होता है ।। ६१ ॥ । धान आदिके तुप वास्तुपुरुपके मर्मस्थान या और किसी स्थानमें हो तो धनके गमनको रोकते हैं. नागदंत शुम है, परन्तु मर्मस्थानमें हो तो दोपकारी होता है ६२॥ वास्तुपुरुपमें रागनामक देवतासे अनिलतक, पितासे शिखी पर्यंत, वितयसे पतक, मुखसे भृशतक, जयन्तसे मँगतक और अदिविसे सुग्रीवतक सूब डाले ६३ । इन सूत्रोंके नौ संपात वास्तुपुरुपके अतिमम फहे हैं. एक पदका एमांश मर्मका परिमाण कहा है। ६४ ॥ पहले कहे छः सूनोंका वंशमी कहते और वास्तु विमागके लिये जो पूर्वापर और दक्षिणोत्तर दश दश रेखा करो हैं नको शिरा कहते हैं. एक पादका विस्तार वास्तुमें जितने हाथ हो, उतने अंगुल. क वंशका विस्तार होता है और वंशके विस्तारसे ड्योढा शिराय विस्तार होता ॥६५ ॥ यदि पाका स्वामी मुख चाहे तो वास्तुके यीचमें स्थित हुए ब्रह्माकी बसे रक्षा करे, बलाके ऊपर उठन इत्यादि डालनेसे परके मालिकरये छेस होता ।। ६६ ॥ वास्तुपुरुषके दाहिनी भुना हीन होनेसे धनका नाश व स्रीदोष होते १. वामभुजा हीन होनेसे धन और उनकी हानि होती है. वास्तुपुरुषका शिर इनि हो तो धन आरोग्यादि समस्त गुणोंका होता है ॥६ बंधन, शत्रुाद, पुत्र और धनका लाम, सय गुणाकी सम्पत्ति, पुत्र और पता ग्राममें अथवा नगरमें ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य और शुद्ध वने, वे घर ऐसे बनाये का कि अपने घरके आंगनमें प्रवेश करनेके समय अपने निवासके घर दाहिनी आठगुणे सूचसे विभक्त किये जो अनलाादि वत्तीस द्वार है. क्रमानुसार सर फल कहते है ॥ ७१ ॥ अग्निसे लेकर अन्तरिक्षतक जो आठ देवता वास्तुपुर पूर्वभागमें है, उनपर द्वार होय तो क्रमसे अग्निमय, कन्याजन्म, बहुत राजाकी प्रसन्नता, क्रोधीपन, असत्य बोलना, चरपन और चौरपन यह मजा क्रमसे अल्पपुत्रता, दासपन, नीचपन, भोजन, पान और पुत्रोंकी वृद्धि, रोह, ता. धनहीनता, पुत्र और बलका नाश होता है ॥७३॥ पितासे लेकर पारपर्वत में मके आठ देवताापरदार रखने का फल क्रमसे पुत्रपीडा, शत्रुवृद्धि, धन और पुत्र ममाति, पुन, धन और वलकी प्राप्ति, धन संपचि,राजमय घनक्षय और रोगint पक्ष्मरोगसे लेकर दितितक उत्तरके आठ देवताओंपर दार लिखने पर (२२०) चाराहीसंहिता. वीदोपाः सुतमरणं प्रेष्यत्वं चापि करणवैकल्ये। अविकलपुरुपे यसतां मानार्थ- युतानि सौख्यानि ॥ ६८ ॥ गृहनगरमामेषु च सर्वत्र प्रतिष्टिता देवाः ।। च यथानुरूपं वर्णा विप्रादयो वास्याः ॥६९॥ वासगृहाणि च विन्द्याद् दिन दीनामुदग्दिगाद्यानि । विशतां च यथाजवनं भवन्ति तान्येव दक्षिणतः ॥३० नवगुणसूत्रविभक्तान्यष्टगुणेनाथवा चतुःपटेः। द्वाराणि यानि तेपाननलाईन फलोपनयः ॥ ७१ ॥ अनलजयं स्त्रीजन्म प्रऋतधनता नरेन्द्रवालल्यम् । को परतानृतत्यं कीयं चौयं च पूर्वेण ॥ ७२ ॥ अल्पसुतत्वं पैप्यं नीचत्वं कम पानसुतवृद्धिः। रौद्रं कृतनमधनं सुतवीर्यन्नं च याम्येन ॥ ७३ ॥ सुताई रिपुवृद्धिर्न धनसुतातिः मुतार्थवलसम्पद । धनसम्पन्नृपतिजयं धनक्षयो रो इत्यपरे ॥ ७४ ॥ वधबन्धी रिपुवृद्धिर्धनसुतलानः समस्तगुणसम्पद । पुष वास्तुपुरुप चरणरहित हो तो खीदोप, पुत्रमरण और दासपन होता है. में - वास्तुपुरुपके संपूर्ण अंग पूर्ण हो तो उस वास्तुमें रहनेवालों को मान और धन होता है ॥ ६८ ॥ गृह, नगर और ग्रामोभी ऐसेही यह वास्तुदेवता विराज ने उस नगर ग्रामादिमें ब्राह्मणाद वोको क्रमानुसार वसावे ॥ ३९ ॥ उस, ई दक्षिण और पश्चिम इन चार दिशाओंमें क्रमानुसार चतुःशाल ( चटशाउ) हैं ।। ७२ ॥ पवनसे लेकर मृगतक दक्षिण आठ देवताओंके पदमें द्वारका - भापारीकसाहिता अ०५३ । (२२१) नानियर मुनेन दोपाः प्रिया नैःस्वम् ॥ ७५ ॥ मार्गतरुकोणकूरसभाममविद्ध- मगुग द्वारम् । उच्छायाद्विगुणमितां त्यस्ता अमिन दोपाय ॥ ७६ ॥ रथ्याविद्धं दारं नाशाय कुमारदोपदं तरुणा। पद्वारे शोको व्ययोऽयुनि स्राविणि प्रोक्तः ॥ ७७ ।। कूोनारस्मारो भवति विनाशन देवताविहे । स्तन सीदोपाः कुलनाशो बह्मणोऽभिमुसे ॥ ७८॥ उन्मादः स्वयमुदाटिनेऽप पिहिते स्वयं कुलविनाशः। मानाधिके नामयं दस्युभयं यमनदं नीचम॥७९॥ द्वारं द्वारस्योपरि पचन शिवाय सङ्करं यच । आल्यानं शुभपदं कुज कुट- नाशनं परति ॥ ८०॥ पीडाकरमतिपीडितमन्तर्विनतं भवेदशापार । पार. विनते प्रयासो दिग्धान्त दस्युभिः पीडा ॥ ८१॥ मूलदारं नान्यद्वाररतिसन्द- माप्ति, पुनसे वैर खोदोष और निर्धनता ये हैं ।। ७५ ॥ मार्गमा पृक्ष, किसी दूसरे घरकी एंट, कुंआ, सम्भ, जल निकलनेकी मोरी इनसे विधा दुमा दार नाम होता है अर्थात् परके द्वारके सन्मुख इनका होना नहीं पाहिये परन्तु परके शारी जितनी ऊंचाई हो, उससे दूनी पृथ्वी छोडकर जो इनमें से किसी वेध हो तो कुछ दोष नहीं है ॥ ७६ ॥ परके दारके मार्गका रेप हो तो परचे. मारकर नाग, गृक्षका वेध होनेसे पालकोंका दोप, पंक अर्थात् पीपका वेध रोने नांव घरके सन्मुस सदा पंक पना रहे तो शोक होता है. मोरोप वेध होनेसेस वर्ष होता है ॥ ७७ || सका ये दोनेसे मृगारोग, देवताका मूर्तिर: पेप गेनों परके स्वामी नाश, स्तम्भन वेध होनेसे खिसोंके दोप और महाके गन्नुपर रोनेसे उदय नाश होता है ॥ ७८ ॥ जिस गाके दारफा वितार निा लदी खुल जाय उसमें उन्माद रोग होता है. जिसपर फिगर मापदी बन्द हार, उसमें उलनाश हो जाता है. अपने परिमाणसे दार या तो राजागा भर और छोटा हो तो चोरभय होता है और दुःख देवा है ॥ ७९ ॥ टोक दारपर दूसरे राण्या दार भाषे तो वह शुभ नहीं होता और भोला दारभी गुम नोबर पोरदार सुपारा भप परता है और कुरा दार कुबस मास करनेस दोदा ६॥८० ॥ अपरफे पाटसे पहल दया मा सार परफे सामारोपांग करता है। भारत पुसमा गृह सामीका मरण करता है. बास्को पुस म को हर- सामी विदेश में रहे भौर पिली दिशाको ओर देखता रोको कोरोले रोडा १॥ ८१ ॥ परफे मुल पारका रूप और साधारण रोके रामान नहीं करे न और शारों मुपदारसा रूप होना पाये. गुरुप सरपर फरस, पज, र ---- उपासमार होना क्या पटी यात ॥८८ ।। घरके निकट राजा धीमा सचिवालयेऽर्थनाशो धूर्तगृहे सुतवधः समीपस्थे। उद्वेगो देवकुले चतुप्यार खुदवावे ॥ ८२ ॥ घरके बाहर ईशान 'आदि चारों कोनों में क्रमानुसार कार पश्चिम, उत्तर और पूर्वमें हों तो अशुभ होते है और उचर, पूर्व, दक्षिण और पनि क्रमसे यह वृक्ष उत्पन्न हो तो शुभ है ।। ८५॥ घरके समीप सैर आदि संदर फलनेवाले वृक्ष सन्तानका क्षय करते है. इन वृक्षोंको काठमी घरमें न लगाuil वृक्ष हो तो शत्रुमय करते है. आक आदि दूधवाले वृक्षधनका नाश करते हैं. मा जो घरके समीप यह वृक्ष हों और इनको काटे नहीं तो इनके साथ और गुना है॥ ८७॥ उचम योपधिवृक्ष और लतामआसे युक्त मधुर मुगंधवाजी nि समान और छिद्रोंसे रहित ममिके मार्गमें चलनेवाले पुरुष जो श्रम दा रस सणमात्र के लिये उसमें बैठ जाय तो उनकोमी लक्ष्मी देती है. फिर मिलकर ऐसी भूमिमें बने और वह पुरुष सदा उनके नीचे वास करते, (२२२) वाराहीसंहिता। 'धीत रूपा । घटफलपत्रप्रमथादिभिश्च तन्मङ्गलैचिनुयात् ॥ ८२ । न्यादिषु कोणेषु संस्थिता वाह्यतो गृहस्यैताः । चरकी विदारिनामा५ ।। राक्षसी चेति ॥ ८३ ॥ पुरभवनग्रामाणां ये कोणास्तेषु निवसतां दोपा । चादयोऽन्त्यजात्यास्तेष्वेव विवृद्धिमायान्ति ॥ ८४ ॥ याम्यादिष्वगुजा जातास्तरवः प्रदक्षिणेनैते । उदगादिपु प्रशस्ताः पक्षवटोदुम्बरावत्याः ॥८॥ आसन्नाः कण्टकिनो रिपुजयदाः क्षीरिणोऽर्थनाशाय । फलिनः .:. : दारुण्यपि वर्जयेदेपाम् ॥ ८६ ॥ छिन्याद्यदि न तवंस्तान् तदन्तरे पूषित न्वपेदन्यान् । पुन्नागाशोकारिष्टयकुलपनसान् शमीशाली ॥ ८॥ -शस्तीपधिद्रुमलतामधुरा सुगन्धा स्निग्धा समा न सुपिरा च मही नारागार अप्यध्वनि श्रमविनोदमुपागतानां धत्ते श्रियं किमुत शाश्वतमन्दिरेषु ॥ ८८. शिवजीके गण आदि मंगलदायक शोभासे शोभित करे अर्थात् इनके चित्र म विदारी, पूतना और राक्षसी यह चार देवता टिके हैं ॥ ८३ ॥ घर ग्राम और उन कोणोंमें जो श्वपच आदि नीच जाति वसें तो उनकी वृद्धि । है॥ ४ ॥ पिलखन, वट, गूलर, पीपल यह चार वृक्ष क्रमानुसार घरके दी लगा दे. नागकेशर, अशोक, नीम, मौलसिरी, कटहर, जाट, शाउ या माषाटीकासहिता अ०५३ । (२२) चाकीर्तिः ॥ ८९ ॥ चेत्ये भयं यहळतं वल्मीकवनसंकुले विपदः । गायां तु पिपासा कूर्माकारे धनविनाशः॥१०॥ उदगादिपवामिष्टं विप्रादीनां प्रदक्षिणेनेव । विषः सर्वत्र वसेदनुवर्णमथेष्टमन्येपाम् ॥ ९१ ॥ गृहमध्ये हस्तमितं सात्वा परिपूरितं पुनः श्वधम् । ययूनमनिष्टं तत् समे समं धन्यमधिकं यत् ॥ ९२ ॥ श्वनमथवाम्बुपूर्ण पदशतामित्वागतस्य यदि नोनम् । तदन्यं यच भवेद पलान्यपामादकं चतुःषष्टिः॥ ९३ ॥ आमे वा मृत्युपत्रे वनस्थे दीपवर्ति- रस्यधिकम् । ज्वलति दिशि यस्य शस्ता सा मिस्तस्य वर्णस्य ॥ ९४ ॥ हो.तो धनका नाश होता है. दूसरोंको टगनेवालेका घर पास हो तो पुत्रमरण, देवताका मंदिर समीप हो तो वित्तको खेद रहे. चतुष्पथ (चौराहा) समीप हो वो अकीर्ति हो ॥ ८९ ॥ चैत्य अर्थात् प्रधान वृक्ष घरके समीप हो तो स्वामीको ग्रहोंका डर है. सर्पको यांवी और गोंदार भूमि घरके पास होय तो विपत्ति होते. घरके समीप गढा हो तो प्यासका रोग हो और कछुएके समान आकारको भूमि घरके समीप हो तो घरके स्वामीके धनका नाश होता है । ९० ॥ उदक्लव (जिस भूमिका झुकाव उत्तरको ओर हो) वह भूमि ब्राह्मगोंके लिये शुभ है. इसी प्रकार पूर्वष्ठव, दक्षिण पुर और पश्चिमप्लव भूमि क्रमसे क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके लिये शुभदायी होती है. बामण सब प्रकारको भूमिमें बसें, उसका चाहे जिस दिशामें न हो और वर्गकि लिये मनुवर्ण भूमि शुभ है. पूर्वप्न, दक्षिणलव और पश्चिमा क्षत्रियोंको, दक्षिणप्लव और पश्चिमा वैश्योंको और केवल पश्चिमप्लव शूद्रोंको शुभ है ।। ९१ ॥ घरमें एक हाथ चौडा एक हाथ गहरा गढा खोदे, फिर उसको उसी मट्टीसे पूर्ण करे. जो गढा भरनेमें मट्टी कम हो जाय तो वह घर अशुभ होता है. ठीक टीक गदा भर जाय तो न शुभ और न अशुभ होता है. और जो गहा भर जाय व मट्टी वच रहे तो वह गृह सब प्रकारसे शुभ होता है ॥ ९२ ।। पहली कही हुई रीविसे गढा खोदकर उसमें जल भरे. सौ पदक जाकर लौट आये, उतने समयमें यदि गढेका जल कुछभी न घटे यह भूमि शुभ होती है. और जहांको पुरेसे आदकको भरकर फिर दोले और वह धरि चौसठ पल हो तो वह भूमिभी शुभ है (अन नापनेका एक फाठा परवन जिसमें अनुमान चार सेर अन्न आता है, उससे आटक कहते हैं. चालीस मासेका एक पल होता है) ॥ ९३ ॥ महीके करे पर्चनमें चार बच्चीगलादीपक डाले. उनमें उत्तरादि वत्तियोंमें वासण इत्यादि चार वोंको कल्पना कर दीपक जलाय गमें रखे. जिस वर्णको दिशामें बची --- मरकर गो मांश समयसे सो और दूगरेको 17एमाह I ममि उस गणके लिये शुभ का • गागं वीके लिये समानुगार ।।" (२२४) वाराहीसौदेता। भानोपितं न कुसुमं यस्मिन् प्रम्लायतेऽनुवर्णसमम् । वक्त यस्य च यस्मिन्मनोरमते ॥९॥ सितारतमीतकम्नासिक गन्धव जाति यस्या घृतरुधिरानागमयसमः॥२६॥ कुशनुहार कागाना कमेण मही। अनुवर्ण वृद्धिकरी मधुररूपापालनमा छटो प्रदयौनां गोऽम्युपितां पासणैः प्रशस्तां च । गत्या की सा सांवलरोदिटे ॥ ९८ ॥ जानाकारैर्दयातनुरी मुरीमा उता स्थातीतत्यन्य विमाभ ॥ ९९ ॥ तिः स्वाधी गियो । ः पारी स्पृष्ट्वा कुरितां गृहारम्ने ॥ १० रुपान्नांगुल्याथग प्रदेशिन्या । कनकमणिरणामुकाका! गर नमान्न जाती है, वह भूमि उस वर्णको शुभाता है। मगर को रंगो समान भात राकेरर नि गुभ है, में मोर जमाने म Bika Trum, ii Iो शुभ ॥ ५॥ ... मोt R नाम हो, fri in HinES ( ३ i. 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मापाटीकासहिता २०५३। (२२५) शुभम् ।। १०१॥ शस्त्रेण शस्नमृत्युर्वन्धो लोहेन भस्मनामिभयम् । तस्कर- भयं तृणेन च काछोडिखिता च राजायम् ॥१०२।। वका पादालिसिता शन- भपकेशदा विरुपा च । चालरास्थिकता दन्तेन च कर्तुरशिवाय ॥१०॥ परमासम्पलिखिता प्रदक्षिणं सम्पदो विनिर्देश्याः। वाचः परुपा निष्ठीवितं धनं चाशुभ कथितम् ॥ १०४ ॥ अनिचितं रुतं वा प्रविशन् स्याति हे निमितानि । अवलोकपेढहपतिः क संस्थितः स्पृशति किं चाङ्गम् ॥ १०५॥ रविदीतो पदि शकुनिस्वस्मिन् काले विरोति परुपरवः। संस्पृष्टाङ्गसमानं तस्मिन्देशेऽस्थि निर्देश्यम् ॥ १०६ ॥ शकुनसमयेऽयवान्ये हत्त्यवश्वादयोऽ- मोती, दही, फल, पुष्प, असत इनमें किसीसे रेखा करे तो शुभ होता है ॥१०१॥ रखे रेखा फरे तो शखसेही गृहस्सामीको मृत्यु हो, लोहेसे करे तो बंधन, भस्मसे परे तो अनिमय, तिनकेसे करे तो चोरभय और काठसे गृहारम्भमें रेखा करे तो राज्यमय होता है ।। १०२ ॥ टेटो, पैरसे बँची हुई अथवा बुरे रूपकी रेखा हो तो शत्रुमय और छेशदायक है. चमडा, कोयला, अस्थि और दांतसे करी हुई रेखा गृहस्वामीका अगुम करती है ॥ १०३ ॥ जो रेखा दाहिनी ओरसे वाई मोरको सेंची जाय वह वैर करती है. वोई ओरसे दाहिनी ओरको जो रेखा बैंची जाय वो संपत्ति होती है. गृहारंभके समय कोई कठोर वचन कहे, थूके अथवा जीके तो अशुम कहा है ॥ १०४ ॥ अध बने व संपूर्ण पने गृहमें मवेश करता हुमा कारीगर शुभ अशुभ चिद्ध देखे, कि परका मालिक वास्तुपुरुपके किस अंग- पर टिका है और अपने किस अंगको छू रहा है ॥ १०५ ॥ उस काल सूर्यके वा जो दीस दिशा हो उसमें टिका हुआ पक्षी रूखे शब्द वोलता हो तो जिस स्थानपर गृहपति स्थित हो वहां नीचे हड्डी गयी है और इडीभी उस अंगकी है मीने उस समय छु खखा है, यह जाने.. उदय होनेके समय सूर्य पूर्वदिशामें रहता है. फिर दिन रातके आठ पहरों में क्रमानुसार एक एक प्रहर आठों दिशाओं में सूर्य गमन करता है. जिस दिशाको सूर्य छोड आया हो, वह दिशा अंगारिणी है. जिसमें स्थित हो वह दीप्ता और जिसमें + जानेवाला हो वह धुमिता दिशा कहाती है. इन वीनोंको त्याग वाकी पांच दिशा शांता होती हैं ॥ १०६ ॥ शकुन देखने के समय दीप्त दिवाकी ओर मुख करके हाथी, घोडा, कुचा इत्यादि जीव बोले तो जहां गृहस्वामी टिका है उस स्थानमें रन जोरोंके उसी मंगकी ही माने जो भंग गृहपतिरे छु जो वृक्ष कटकर उचर अथवा पूर्वदिशामें गिरे तो वह शुम होता है और दिखने न करे और वांसके नीचे शय्या बिछाकरमीन सोवे,उत्तर अथवा पश्चिमको महा करके न सोरे नग्न अर्यात् धोती खोलकर न सोरे और जलसे भीगे हुए पैरसर नसोना चाहिये ॥ १२४ ॥ बहुत पुरुपोंके समूहसे दूपित, तोरणसे दुल पूर्ण कलशोंसे शोभायमान और जिसमें धूप, गंध, वलि आदिसे देवाका पूजन हुआ हो योर ब्राह्मण जिसमें वेदधान कर रहे हों ऐसे घरमा (२२८ वाराहीसंहिता। धन्यमुदक्पापतनं न ग्राह्योऽतोऽन्यथा पतितः ॥ १२१ ॥ छेदो यासिर ततः शुभं दारु तगृहोपयिकम् । पीते तु मण्डले निर्दिशेव तरोर्मध्यगां गोचर ॥ १२२ ॥ मअिष्ठाने को नीले सर्पस्तथारुणे सरदः । मुद्रानेश्मा करिडे । मूपकोऽम्भव खड्गाचे ॥१२३॥ धान्यगोगुरुहुताशसुराणां न स्वपेदुपरि मान्य- नुवंशम् । नोत्तरापरशिरा न च नग्नो नैव चाईचरणः श्रियमिच्छन् ॥ १२ ॥ भूरिपुष्पनिकरं सतोरणं तोयपूर्णकलशोपशोभितम् । धूपगन्यबलिपूनिवार बामणध्वनियुतं विशेद्रहम् ॥ १२५॥ इति श्रीवराहमिहिरकती बृहत्संहितायां वास्तुविद्या नाम त्रिपञ्चाशचमोऽध्यायः॥ ५३॥ पूज वलि देकर दिनमें प्रदक्षिणाके क्रमसे ईशानकोणसे लेकर उस वृक्षको को गिरे तो उसको ग्रहण न करे ।। १२१ ॥ काटनेके समय वृक्षके कटनेश न विकाररहित हो तो उस वृक्षका काठ घरके लिये शुभ होता है, वृक्षके छेदमें पने रंगका मण्डल दिखाई दे तो उस वृक्षमें गोहका रहना कहना चाहिये ॥ ११२ मजीठके सदृश लाल रंगका मण्डल दिखाई दे तो मेंडक, नील रंगका महान तो सर्प, रक्त वर्णका मण्डल हो तो गिरागेट, मूंगके रंगका अर्थात् हरा मन दिखाई दे तो पत्थर, कपिल वर्णका मण्डल हो तो चुहा और वृक्षके छेदमें जा रंगका मण्डल दिखाई पडे तो वृक्षके बीच जलका होना कहना चाहिये ।। ११ लक्ष्मीको इच्छा करनेवाला पुरुष अन्न, गौ, गुरु, आग्ने और देवताके ऊपर का फरना चाहिये ।। १२५ ।। इति श्रीरराहमिहिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोघरदेशीपग दामादवास्तव्य-पण्डितपउदेवप्रसादमिश्रविण्चतायां मापाटीसपा त्रिपंचाशवमोग्यायः ॥ ५३॥ ..
मापाटीयसाहिता अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः। उदकागल. धम्य यास्यं च वदाम्पतोऽहं दकार्मलं येन जटौलन्धिः। पुंसां यथा शेरास्तथैव क्षितावपि प्रोन्नतनिम्नसंस्थाः ॥ ३ ॥ एकन वर्णन रसेन चानचुनं नमस्तो वसुधाविशेषात् । नानारसवं बहुपर्णतां च गर्ने परीक्ष्यं शितितुल्य- भेर ॥२॥ पुरुहूतानलयमनिमंतियरुणपवनेन्दुशङ्करा देवाः । विवातमा क्रमाः प्राच्याद्यानां दिशां पतयः ॥ ३॥ दिसतिसंबाब विग नवमी मप्पे महासिरानानी । एतापो.न्याः शतशो विनिम्ना नामाः प्रपिताः ॥2॥ पातालार्धशिरा शुमाबतुर्दिक्ष संस्थिता याच । कोणदिगुत्या न गुजाः शिरानिमितान्यतो वक्ष्ये ॥ ५॥ यदि नमोऽम्पुरहित देशे हसमिनिस्ततः पभाद । साथै पुरुपे तोयं वहति शिरा पश्चिमा तत्र ॥ ६ ॥रिदार पाएं- अवधर्म और यशको देनेवाला उदयाल पाहते हैं, जिगर जाननी पाने स्थित जउका ज्ञान होना है. मनुष्यों अंगमें जिस प्रकार नाही 417,सो गूमिमी कई ऊंची और कई नीची शिरा ॥१॥ भावाने या रोनेपरमर ल एकहो सास गिरता है, वह भूमेिकी विशेषतागे भनेक रंग और राया हो जाता है, उसी परीक्षा भूमिके तुल्यदी करनी चाहिये मर्यात जमा भर पैसाही जल दोगा ॥२॥ इन्द्र, भमि, यम, नित, वरुण, यापु, मोर म. ईशान यह माठ देवता प्रमानुसार पूर्वादि भाउ दिशामोंके स्वामी ॥३॥ साठ दिशामों के सामियों के नामरो माठ क्षिरा विल्याव? जैसा मी.. पाम्पा इत्यादि और पोचमें एक यही शिरा महाशिरा नाम स्तन मरिक मौरभी मेरा शिरा निरलाई वे अपने अपने नाम से विख्यात पातालमे जो शिग सीधी उपरको निपलती रह और दिमागे ५० मोंमें जो शिग होवे गुम होती. मात्रकोण भादिपार कोण को हिरा गुम नहीं होती. या शिराझान होनेके चित कावे ॥ ५॥ो जान . वेदमवय क्षरो तो उस पुसवे पशिमोहीनहायपररेर पुरुष ना ५३ २और यसपाधिमाशिय बातो. समभपनी भुमा बारसी मोर एमायो एक पुरष पार , एक सौबीत एड होती है is रोगनिसाईनाम मीना (२३०) वाराहीसंहिता। पुरुपे मंडूकः पाण्डुरोऽथ मृत्तीता। पुटभेदकश्च तस्मिन् पापाणो जवति वर- मधः ।। ७ ।। जम्म्याचोदगधस्तैनिमिः शिराधो नरद्वये पूर्वा । मृसोहमनिए पाण्डुराय पुरुपेऽत्र मण्डूकः॥ ८॥ जम्बूवृक्षस्य प्राग्वल्मीको यदि भोली- पस्थः । तस्मादक्षिणपार्थ सलिलं पुरुषद्वये स्वादु ॥ ९॥ अर्धपुरुषे च मला पारावतसन्निाथ पापाणः। मृद्गति चात्र नीला दीर्घ कालं बहु न तोज ॥ ३० ॥ पश्चादुदुम्बरस्प प्रिभिरेव करैर्नरद्वये सार्थे । पुरुषे तितोऽहिरका अनोपमोऽधः शिरा सुजला ॥ ११ ॥ उदगर्जुनस्य दृश्यो वल्मीको परिनने ऽर्जुनादस्तैः । त्रितिरम्बु जवति पुरुषविभिरर्धसमन्वितः पभाव ॥१२॥ घेता गोपानरे पुरुषे मृद्धसरा नतः लष्णा । पीता सिता ससिकता ततो पर्न निशेिदमितम् ॥ १३ ॥ वल्मीकोपचितायां निर्गुण्ड्यां दक्षिणेन कति। शेना है कि भाधा पुरुष खोदनेपर कुछ इमेत रंगका मेंडक निकलना है, रिकी गामटो निकलती है फिर परतदार पत्थर निकलता है उसके नीचे जल होता है। मिलि में जो जामुनका क्ष हो तो उससे तीन हाय उत्तरको दो पुरुष मिरा होता है यहां सोदनेसे लोहको समान गन्धवाली मही निरलती है। संगी मी निकलती है मौर एक पुरुष नीचे में निकलता ॥८ गानुन पाने दिशांने गमीपही सर्पको यांची हो तो उस गारो लोन सन दो पुरुा नीचे मधुर जल होता है॥९॥ आधा पुरुष तोदनो का निना, तर रंगका पर निकलना है, नीली मी यहा होती 23 भार अत्यन्त काला ना भावाने गया मानना हा पहला बापमाण जाननामा यहाँ प्रमाण न Tieीन सय ममना गा देश Tant दिगो सो नील हाय पशिम मापनाचे शिग हो । १.१. मनिला - mins है, गन्दा नयाmammi its मान दी १, TET लगीhififts मापाटीकासहिता अ०५४ । पुरुपये सपादे स्वादु जलं भवति चायोप्यम् ॥ १४॥ रोहितमत्योभनरे मृत्कपिला पाण्डुरा ततः परतःसिकता सशर्कराय क्रमेण परतो भवत्यम्मः ॥ १५॥ पूर्वेण यदि पदर्या वल्मीको दृश्यते जलं पथाव । पुरुषसिभिरादेश्य श्वेता गृहगोधिकानरे ।। १६॥ सपलाशा पदरी चेद् दिश्यपरस्यां नतो जलं भवति । पुत्रपत्रये सपादे पुरुपेऽत्र च दुण्डनिभिनम् ॥ १७ ॥ विल्योदुम्पर- योगे विहाय हलवयं तु याम्येन। पुरुपैविििरम् भवेत् रुष्णोऽर्धनरे च मण्डूकः ॥ १८ ॥ अर्कोदुम्परिकापां वल्मीको दृश्यते सिरा तस्मिन् । पुरुप- प्रये सपाटे पश्चिमदिवस्था यहति सा च ॥ १९ ॥ आपाण्डुपीतिका मृद्रो- रसवर्णध भवति पापाणः । पुरुपाः कुमुदनिको दृष्टिपथं मुंपको याति ॥२०॥ जलारिहीने देशे वृक्षः कम्पिको यदा दृश्यः। प्राच्यां हस्तत्रितये वहति शिरा दक्षिगा प्रथमम् ॥ २१ ॥ मृनौलोललवर्णा काता दृश्यते हाय दक्षिण सवा दो पुरुप नीचे मीठा और कभी न सूखनेवाला जल होता है ॥ १४ ॥ आधा पुरुप खोदनपर रोमछली निकलती है. फिर क्रमानुसार कपिल रंगकी मट्टी, पांदुर रंगको मट्टी और पत्थरके सक्ष्म कोसे मिला हुआ बालू रेत निकलना है, उसके नीचे जल होता है ॥ १५ ॥ वरवृक्षके पूर्व जो वल्मीक हो तो उस वृक्षसे तीन हाथ पश्चिम तीन पुरुपके नीचे जल करना चाहिये. आधा पुरुष खोदनेसे सफेद रंगकी छपकिया निकलती है ॥ १६ ॥ निर्जल देशमें दाक्षियुक्त पेरी वृक्ष हो तो उससे पश्चिमको तीन हाथपर सवा तीन पुरुप नीचे जल होता है. वहां एक पुरुप सोदनेपर एक प्रकारका -निर्विप सर्प निकलता है यही चिद है ॥ १७ ॥ बेलका पेड व गूलरका पेद यह दोनों जहां इकटे हों, उनसे दक्षिण तीन साथ छोडसर तीन पुरुप नीचे जल होता है और आधा पुरुष खोदनेसे काले रंगका मेंडक निफलना है ॥ १८ ॥ आफगूलरवृक्षके अविनिस्ट बल्मीक हो तो उस वल्मीकके नीचेही सवा तीन पुरुष खोदनेसे पश्चिमको वहनेवाली शिरा निक छती है ॥ १९ ॥ पाण्डु और पील रंगकी मही निकलती है. गोरस (गायर मध) के समान क्षेतरंगा पत्थर निकलता है और आधे पुरुप नीचे कुमुद के फूलको सहर घेत रंगका हा दिखाई देता है ॥ २० ॥ निर्जल देशमें, फपिलक्ष दिगई दे तो, उस वृक्षसे तीन हाथ पूर्वको सबा वीन पुरुपके नीचे दक्षिण शिरा बहती है ॥ २१ ॥ प्रथम नील कमलके रंगरी मही करना चाहिये ।। २९॥ यहांमी चित्र होते है कि माप पुरुष सोनार निकलती है, फिर कबूतरके रंगकी मट्टी दिखाई पड़ती है, एक हाथ नीचे मी पुरुप खोदनेपर शेत रंगा विश्वभरक (एक प्रकारका जीप) दिखाई देता. फिर केशरी रंगका पत्थर निकलता है. उसके नीचे पश्चिम दिशाको पाता। युक्त शेतरंगी मट्टीकी वमई हो तो वहां फोरिदारवृक्ष और वल्मीको मापनेवर मागी समान रंगव सर्प निकलता है, लाल वणी भूमि भाती है, फिर हो। न्दनामरु पत्थर निरुड़ता है, यह चित काहने चाहिये ॥ २८ ॥ निमंत समाने युक्त सतास हो तो उससे एकाय उत्तर पांच पुरुष नीचे (२३२) वाराहीसंदिता। तस्मिन् । हस्तेऽनगन्धिमत्स्यो भवति पयोऽयं च-सक्षारम् ॥ २२॥ शोर कतरोरसरोचरे शिरा दी करावतिकम्य । कुमुदा नाम शिरा सा पुलवा हिनी भरति ॥ २३ ॥ आसन्नो वल्मीको दक्षिणपार्षे विजीतकस्य यदि। अध्यधै तस्य शिरा पुरुषे ज्ञेया दिशि प्राच्याम् ॥ २४ ॥ तस्यवे पबिना दिशि वल्मीको यदा भवेद्धस्ते। तत्रोदग्जवति शिरा चतुभिरर्धाषिक पुहर ॥ २५ ॥ श्वेतो विश्वम्भरकः प्रथमे पुरुपे तु कुंकमाजोऽश्मा । भारत दिशि च शिरा नश्यति वर्षत्रयेऽजीते ॥ २६ ॥ सकुशाशित ऐशान्यां वल्ली को यत्र कोविदारस्य । मधे तयतिरपीञ्चमैस्तोयमझोत्यम् ॥२॥ प्रथमे पुरुपे भुजगः कमलोदरसनिनो मही रक्ता। कुरुविन्दः. - णचिह्नान्येतानि वाच्यानि ॥ २८ ॥ यदि भवति समपर्णी वल्नीका स्तदुत्तरे तोयम् । वाच्यं पुरुषः पञ्चनिरवापि जति चिह्नानि ॥ २१ ॥ पुरुषार्ध मण्डुको हरितो हरितालसन्निशा जूथ । पापाणोऽननिकाशः सौदा निकलती है. जिसमें चकोरकी समान दुर्गंध आती है, वहां थोडा और सारा १ निकलता है ॥ २२ ॥निल देशमें श्योनाकक्ष (अलू) दिखाई दे तो उन दो हाय पायव्य कोणमें जाकर खोदनेसे तीन पुरुप नीचे क्रमानुसार शिरा किन ॥ २३ ॥ बहेडा वृक्षके समीप बमई हो तो उस वृक्षसे दो हाथ पूर्व देश नीचे शिरा होती है ॥ २४ ॥ बहेडेके वृक्ष के पश्चिम दिशामें वर्मई हो तो वृक्षसे एक हाथ उत्तरको साढे चार पुरुप नीचे शिरा होती है ॥ २५ ॥ प्रयन शिरा निकलती है. परन्तु तीन वर्षकै पीछे वा शिरा नष्ट हो जाती है अर्थात् । सूस जाता है ॥ २६ ॥ कोपिदारवृक्ष (सप्तपर्ण) के ईशानकोणमें कुछ पांच पुरुप नीचे बहुत जल होता है ।। २७ ॥ पहले पुरुप कमलपुष्पके मन माषाटीकासहिता मः (२३३) पशिरा शुमाऽम्बुहा ॥ ३० ॥ सर्वेषां वृक्षाणामयःस्यितो दुर्दुरो यदा श्यः । तस्मादस्ते तोयं चताराधिकैः पुरुषैः ॥ ३१ ॥ पुरुषे तु भवति नकुलो नीला मृत्तीतिका ततः श्वेता। दुर्दुरसमानरूपः पापाणो दृश्यते चात्र ॥ ३२ ॥ ययहिनिलयो दृश्यो दक्षिणतः संस्थितः करमस्य । हस्तदये तु पाये पुरुषत्रितपेशिरा साथै ॥ ३३ ॥ कच्छाकः पुरुषधि प्रथमं चोनियते विरा पूर्वा । उदगन्या स्वादुनला हरितोऽश्माऽधस्ततस्तोयम् ॥ ३४ ॥ उत्तर- तब मधूकादहिनिलयः पश्चिमे नरोस्तोयम् । परिहत्य पञ्च हस्तान् अर्थाष्टम- पौरुले प्रयनम् ॥ ३५॥ अहिराजः पुरुषेऽस्मिन् धूम्रा धात्री कुलत्यवर्णीमा। माहेन्दी भाति गिरा वहति सफेनं सदा तोयम् ॥ ३६ ॥ वल्मीकः स्निग्धो दक्षिणेन तिलकत्व सकुशर्वश्चेत् । पुरुमैः पञ्चमिरम्मो दिशि वारुण्यां शिरा पूर्वा ॥ ३७॥ सर्मातासः पवाद् यदा कदम्बस्य दक्षिणेन जलम् । परतो मेंड निकलता है, पीछे दरितालके समान पीले रंगको भूमि निकलता है, फिर भेषके समान कृष्णण पत्या मिलता है. इन सबके नीचे मधुर जलसंयुक्त उचर- शिरा होती है ।। ३०॥ चाहे जित वृक्षके नीचे बैठा हुआ मेंडक दिखाई दे तो उस वृक्ष एक हाथ उत्तर साडे चार पुरुष नीचे जल होता है ॥ ३१ ॥ एफ .पुरुप नीचे न्योला निकलता है, फिर क्रमानुसार नीली, पीली और शेत मट्टी निकलती है, पीछे मेंडकके सहा रंगका पत्थर दिसलाई पड़ता है ॥ ३२ ॥ यदि करंजसके दक्षिगमें वल्मीक दिसलाई पडे तो उस वृक्षसे दो हाय दक्षिण साढे तीन पुरुप नीचे शिरा होती है ।। ३३ ॥ आधे पुरुष नीचे का और फिर पहले की शिराने जल निकलता है, दूसरी सादु जलसे युक्त उचर- शिरा बहती है, पहले हरे रंगका पत्थर और उसके नीचे जल होता है ॥ ३४ ॥ महुए के वृक्षसे उचर वल्मीक हो तो उस वृक्षसे पश्चिम पांच हाथ छोडकर सादे भाठ पुरुप नीचे जल होता है ॥ ३५ ॥ पहला पुरुप खोदनेसे बडा सर्प दिसाई देता है. धूम्रवर्णकी भूमि फिर कुलथोके रंगफा पत्थर निकलता है पीछे पूर्वशिरा निकलती है. जिसमें सदा झागदार जल वहता है ॥ ३६ ॥ तिलव वृक्षके दक्षिण कुशा और दूर्वा करके युक्त स्निग्ध वल्मीक हो तो उस वृक्षसे पांच हाय पश्चिम पांच पुरुप नीचे जल होता है और पूर्वशिरा बहती है ॥ ३० ॥ कदंरक्षके पश्चि- ममें वई हो तो उस पृक्षसे तीन हाथ दक्षिण पौने : पुरुष नीचे जल होता (२३४) नेसे पांच पुरुप नीचे जल मिलता है ॥४१॥ एक पुरुष नीचे चित्रपर्णका मिलती है ॥ ४२ ॥ अश्मंतकवृक्षके यांई ओर धेरफा वृक्ष हो अथरा बल्ला पक्षने तीनधाय पूरे एक तिहाई सहित पांच पुरुप नीचे जल होता? निस्टनी है. सिर पहिले पश्चिमशिरा निकलती है और दूसरी दक्षिणशि AP पती॥ ४६॥ निर्जस देश में जहां पहुत जलयाले देसाके चिट दिन वाराहीसंहिता। हस्तत्रितयाद पनिः पुरुपेस्तुरीयोनेः ॥ ३८॥ कौबेरी चात्र शिरा वहरि जलं लोहगन्धि चाक्षोयम् । कनकनिनो मण्डूको नरमाने मृत्तिका पीश ॥३९॥ वल्मीकसंवृतो यदि तालो वा भवति नालिकेरो वा । पञ्चाव पर- मिर्हस्तै रैश्चतुर्भिः शिरा याम्या ॥ ४० ॥ याम्येन कपित्थस्याऽहिसंभयथे. दुदग्जलं वाच्यम् । सप्त परित्यज्य करान् खात्या पुरुषान् जलं पञ्च ॥४॥ फर्बुरकोऽहिः पुरुषे रुष्णा मृत्पुटनिदपि च पापाणः। श्वेता मृतचिनगार शिरा ततथ्वोत्तरा भवति ॥ ४२ ॥ अश्मन्तकस्य वामे वदरो वा दृश्यतेपद- निलयो वा । पइनिरुदक् तस्य करैः सार्धे पुरुपत्रये तोयम् ॥ ४३ ॥ प्रथमे पुरुषे पापाणो धूसरः ससिकता मृत् । आदी शिरा च याम्या पूर्वोचरो द्वितीया च ॥ ४४ ॥ वामेन हरिद्रतरोल्मीकथेत्ततो जलं पूर्वे । हस्तविक पुरुषैः सव्यंशैः पञ्चभिर्भवति ॥ ४५ ॥ नीलो भुजगः पुरुषे मृतीता मरको पमधारमा । छष्णा भूः प्रथमं वारुणी शिरा दक्षिणे नान्या ॥४६॥ जलपारित है ॥ ३८ ॥ वहां उत्तशिरा निकलती है, जल वहुत होता है, परन्तु उसमें दो गन्ध आता है, एक पुरुप खोदनेसे सुवर्णके रंगका मेंडक और फिर पीली में निकलती है ॥ ३९ ॥ वमईसे घिरा हुआ ताडका पेड अथवा नारियलय । हो तो उस वृक्षसे छः हाथ पश्चिमको चार पुरुष नीचे दक्षिणशिरा होती है.. कैयके वृक्षसे दक्षिण वल्मीक हो तो उस वृक्षसे उत्तर सात हाय छोडकर दे और काली मही, परतदार पत्थर फिर श्वेत मृत्तिका निकलती है, पीछे उन्नति तो उस अनंतक छाप देतान पुरुष नीचे जल होगा! ॥ ४३ ॥ पहिला पुरुष खोदनेसे कछुआ, फिर धूसरवणका पत्थर और रेत मिल ईमट्टी फिर पहले दक्षिणशिरा निकलती है और पीछे ईशानकोणको सिंग निक याती है ॥ ४४ ॥ हन्दि ( हलदुआ) Nो पाई और वल्मीक हो तो मापाटीकासहिता २०५४ । (२३५) देशे दृश्यन्तेऽनूपजानि चिनानि । वीरणदूर्वा मृदयध यत्र तस्मिन् जलं पुरुपे ॥४७॥ भार्ड विवृता दन्ती शूकरसादी च लक्ष्मणा चैव । मवमालिका च हस्तदयेऽम्बु याम्ये त्रिभिः पुरुषैः ॥४८॥ निग्धाः प्रलम्प- शाखा वामनपिटपद्रुमाः समीपजलाः। सुपिरा जर्जरपत्रा सक्षाभ जलेन सन्त्यक्ताः ॥ ४९ ॥ तिलकाघ्रातकवरुणकभल्लातकबिल्वतिन्दुकाकोठाः। पिण्डारशिरीपांजनपरुपका पञ्जुलाऽतिबलाः॥५०॥ एते यदि मुस्निग्धा पल्मीकः परिवृतास्ततस्तोपम् । हस्तेविनिरुत्तरतधतुर्भिरर्धेन च नरस्य ॥५१॥ अतृणे सतृणा पस्मिन् सढणे तृणवनिता मही यत्र । तस्मिन् शिरा पदिष्टा पक्तव्यं वा धनं तस्मिन् ॥५२॥ कण्टश्यकण्टकानां व्यत्यासेमविनिः करेः पवाद । खात्वा पुरुपत्रितयं विभागयुक्तं धनं वा स्यात् ॥ ५३ ॥ नदति मही गम्भीर पस्मिश्चरणाहता जलं तस्मिन् । सानिनिर्मनुप्पः कौबेरी तत्र च शिरा स्यात् ॥ ५४॥ वृक्षस्यका शाखा यदि विनता भवति पाण्डुरा या वीरण (गांडर) और दुर्वा जहां अत्यन्त कोमल हों, वहां एक पुरुष नीचे जल होता है ॥ ४७ ॥ भारंगी, मिसोत, दंती ( दात्यूणी ), करपादी, लक्ष्मणा, मालती यह योपाधि जहां हो, इनसे दो हाय दक्षिणको तीन पुरुप नीचे जल होता है ।। ४८ ॥ जहां सिग्ध लंबी शासाओंसे युक्त छोटे २ और फैले हुए वृक्ष हो, वहां जल समीप होता है और छिद्रयुक्त जर्जर पचोंवाले और रूखे वृक्ष जहां हो वहां जल नहीं होता ॥ ४२ ॥ जहां तिलक, मंबाडा, वरण, मिलावा, येल, तेंदु, अंकोल, पिंडार, तिरस, अंजन, फालसा, अशोफ और अतिबला ॥५०॥ यह पेड अत्यन्त निग्ध वल्मीकोंसे घिरे हों, वहां इन वृक्षोसे तीन हाय उचर साढे चार पुरुप नीचे जल होता है ॥ २१ ॥ जिस भूमिमें यहीं तृण न हों और यीचमें एक स्थान तृणयुक्त दिखाई दे या सब भूमिमें कृण हो और एक स्थान तृणहीन हो वो उस स्थानमें साढे चार पुरुप नीचे शिरा होती है या धन गदा होता है, यह कहना चाहिये ॥ ५२ ॥ जहां कांटेवाले वृक्षों में एक वृक्ष विना कांटेवाला अया विना काटेवाले पक्षामें एक वृक्ष कांटेगला हो वो उस वृक्षसे तीन हाथ पश्चिमको एक तिहाई युक्त तीन पुरुष खोदनेसे जल अथवा धन निकलता है।५३ ।। जहां परके ताडन करनेसे भूमिमें गंभीर सन्द हो, यहां साढे तीन पुरुष नीचे जल होता है और उत्ताशिरा निकलती है ॥५४॥ वृक्षी एक शाखा भमिकी ओर झुक रही हो,या पीली पड़ गई होवो उस शारसाके नीचे मां रनों पर काम मटर, रि पपित Otle करभागामिय भूतलसंस्थाः शिरा यान्ति ॥ ६२॥ पूर्वोत्तरेण पार वल्मीको जलं भवति पश्चात् । उत्तरगमना च शिरा विज्ञेया पचनि पुगे तीन पुरुष खोदनसे जल निकलता है ।। ५५॥ जिस पेडके फल और पुरो विकार हो, उस वृक्षसे तीन हाथ पूर्व चार पुरुष नीचे शिरा होती है. नारे निठता है और भूमि पीले पीले रंगकी होती है ॥ ५६ ॥ जहां कटेगा। काटोंसे रहित और श्वेत पुष्पासे युक्त दिखा दे उसके नीचे साडे तीन पुस सोदनेसे जल निकलता है ॥ ५७॥ जित निर्मल देशमें खजूरका दो शिता हो, वहां उस राजूस दो हाथ पश्चिमको तीन पुरुप नीचे जलसाना॥ ॥ ५८ ॥ मत पुष्पमाला कर्णिकारवृक्ष अथा दाफा वृक्ष हो तो उस17 हाय दक्षिगको नीन पुरुप नीचे जल होता है॥ ५९॥ निरा भूमिमें या चूंमा निस्टता दिखाई दे तो वहां दो पुरुप नीचे यदुन जल पहनेलो गि पाहिय।। ६०॥ नितरोनम रोनी उत्पन्न होकर नाश हो जाप मा।' चिग्य खेती हो या रोती उत्पन्न होर पाली पड जाय वहां दो बानही न होना ३॥ ६१ ।। मापार देश में जिरा मांतिगि करते. उंटछपाकी भांति भूमिमं नीची उंची शिरा जानीm पीटा (नाल) शानयोग, वल्मीक हो तो उस समid पार पायमसो पांच रुप नाच उपर बहनेपाली मिरासitam वाराहीसंहिता। स्यात् । विज्ञातव्यं शाखातले जलं त्रिपुरुष खात्वा ॥ ५५॥ विकारो यस्प तस्य पूर्व शिरा त्रिनिहस्तैः । भवति पुरुषचतुर्भिः - क्षितिः पीता ॥५६॥ यदि कण्टकारिका कण्टकैपिना दृश्यते सितैः कुकुर तस्यास्तलेऽम्बु पाच्यं त्रिनिरैरर्धपुरुपे च ॥ ५७ ॥ सजूरी दिशिरमा भवेजलविवर्जिते देशे। तस्याः पश्चिमभागे निर्दश्यं त्रिपुरुषे वारि ॥ ३८ ॥ यदि भवति कर्णिकारः सितकुसुमः स्यात्पलाशवृक्षो वा । सव्येन नत्र हा येऽम्वु पुरुपत्रये भवति ॥ ५९॥ ऊष्मा यस्यां धान्यां धूमो वा नबरा नरयुग्मे । निर्दष्टव्या च शिरा महता तोयमबाहेण ॥ ६० ॥ यस्मिन् के देशे जातं सत्यं विनाशमुआयाति । स्निग्धमतिताण्डुरं वा महागिग र युगे तत्र ॥ ६ ॥ महदेशे भवति शिरा यथा तथातः परं प्रवक्ष्यानि ।। ॥ ६३ ॥ चिह्न दर्दुर आदौ मृत्कपिलातः परं भवेद्धरिता । भगति च पु ॥ ...
मापाटोकासहिता अ०५४ । (२३७) पोश्मा वस्प तले वारि निर्देश्यम् ॥ ६४॥ पीलोरेव प्राच्यां वल्मीकोनोऽध- पंञ्चमैहस्तैः । दिशि याम्यायां तोयं वक्तव्यं सप्तभिः पुरुपैः॥६५॥ प्रथमे पुरुषे भुनगः सितासिनो हस्तमात्रमूर्तिश्च । दक्षिणतो वहति शिरा सक्षार भूरि पानी- यम् ॥ ६६ ॥ उत्तरतय करीराबहिनिलये दक्षिणे जलं स्वादु । दशभिः पुरुष- यं पुरुपे पीतोऽत्र मण्डूकः ॥ ६७ ॥ रोहीतकस्य पवादहिवासथेत्रिभिः करै- पाये । द्वादश पुरुषान खात्वा सक्षारा पश्चिमेन शिरा ॥ ६८ ॥ इन्द्रतरोर्व- ल्मीकः भाग्दश्यः पश्चिमे शिरा हस्ते । खाला चतुर्दश नरान् कपिला गोधा नरे प्रयमे ॥ ६९ ॥ यदि वा सुवर्णनानस्तरोवेवामतो भुजङ्गगृहम् । हस्त- ये तु पाम्ये पचदशनरावसानेऽम्बु ॥ ७० ॥ क्षारं पयोऽत्र नकुलोऽर्धमानवे ताम्रसन्निनवाश्मा। रक्ता च भवति वसुधा वहति शिरा दक्षिणा तत्र ।। ७१ ॥ पदरीरोहितवृक्षी संपृक्ती चेदिनापि वल्मीकम् । हस्तत्रयेऽम्बु पश्चात् पोउरा- निर्मानवविति ॥ ७२ ॥ सुरसं जलमादौ दक्षिणा शिरा वहति चोत्तरेणान्या। और पत्थर निकलता है इन सब सव चिह्नोंके नीचे जल होता है ॥ ६४ ॥ पोलरक्षकेही पूर्वदिशामें वल्मीक हो तोउस वृक्षसे साढे चार हाथ दक्षिणको सात पुरुप नीचे जल करना चाहिये ।। ६९॥ पहले पुरुपमें श्वेत कृष्ण रंगका एक हाथ लम्या सर्प, फिर बहुतसा खारा जल वहनेवाली दक्षिणशिरा निकलती है ॥ ६६ ॥ करीरवृक्षके उचर वल्मीक हो तो उस वृक्षके साढे चार हाथ दक्षिणको दश पुरुप नीचे मधुर जल जानना चाहिये. यहां एक पुरुष खोदनेसे पीले रंगका मेंडक निकलता है ॥ ६७ ॥ रोहीतकवृक्ष (रुहीडा) के पश्चिममें वल्मीक हो तो उस वृक्षसे तीन हाय दक्षिणको बारह पुरुष खोदनेसे खारा जल बहनेवाली, पश्चिम- शिरा निकलती है ।। ६८ ॥ अर्जुनवृक्षके पूर्व में वल्मीक दिखाई दे तो उस वृक्षसे एक हाथ पश्चिमको चौदह पुरुप खोदनेसे शिरा निकलती है. यहां पहिले पुरु- पमें कपिल रंगकी गोह दिखाई देती है ॥ ६९ ॥ जो धतूरावृक्षके पाममागमें वल्मीक हो तो उस वृक्षसे दो हाय दक्षिणको पन्द्रह पुरुष नीचे जल होता है ।। ७० ॥ वह जल खारा होता है आध पुरुष नीचे न्योला और नायेके रंगका पत्यर, लाल रंगकी भूमि मिलती है । र और रुहीडा यह दोनों वृक्ष जो वृक्षोंसे तीन हाथ पश्चिमको सोलह पुरुप नीचे जल होता है ।। ७२ ॥ यहां जल अत्यन्त मधुर होता है. पहिले दक्षिण शिरा और पीछे दूसरी उचर शिरामी नाती उन म पयाम माना जाता॥८॥ एकस्पान पाव जहां पहुना और करीरवृक्ष इफ हो अथग अर्जुन वृक्ष और amit रहे हो तो उनसे दो हाय पश्चिमको पचीस पुरुप नीचे जल होता सोदनेते मग पुरुष नीचे जल निकलता ॥७७॥ जहांगर ममि र वर लगे और वल्मीकके ऊपर दूप दिसाई दे, वहां उस कदमासने दाग पोम पुरूप नाचे ना होता?॥ ७८ ॥ तीन पत्मीर नाविनीन नामे युक्त सीटेका क्ष होतो वहां जल काना चाहिये। रमन स्थित महाके याने चार तय भोर मोठा गुड उत्तरपान पटवाश भौधरी और उनके घर परमीक दो तो शमी वृक्ष (२३८) बाराहीसंहिवा। पिष्टनिनः पापाणो मृच्छेता वृश्चिकोऽर्धनरे ॥ ७३ ॥ सकरीरा चेदरी रित करेः पश्चिमेन तत्रामः । अष्टादशनिः पुरुपरेशानी बहुजला च शिरा ॥१॥ पीलसमेता बदरी हस्तायसंमिते दिशि भाच्याम् । विंशत्या पुरुषाणामो गोऽत्र सक्षारम् ।। ७५॥ ककुनकरीरावेकर संयुती यत्र ककुजविल्ली छ। इस्तद्दपेऽम्बु पचानवेत्तञ्चविंशत्या ॥ ७६ ॥ वल्मीकमूर्धनि पदार्शन कुशाच पाण्डुराः सन्ति । कूपो मध्ये देयो जलमत्र नरकविंशत्या ॥४॥ भूमी कदम्वकयुता वल्मीके पत्र दृश्पते दूर्वा । इस्लत्रयेण यान्ये नये पञ्चविंशत्या ।। ७८ ॥ वल्मीकत्रयमध्ये रोहीतकपादपो यदा भवति । वृक्षैः सहितविमिर्जलं तत्र वक्तव्यम् ॥ ७९ ॥ हस्तचतुष्के मध्याव परे। जिवायुलैरुदग्वारि । चत्वारिंशत्पुरुपान् खात्वाश्मातः शिरा भवति ५८०! ग्रन्थिाचुरा यस्मिञ्छमी जवेदुत्तरेण वल्मीकः । पश्चातञ्चकरान्ते धन संख्यक सलिलम् ॥८१॥ एकस्याः पञ्च यदा वल्मीका मध्यमो जरेपणे है. आटेके समान श्वेत रंगका पत्थर, श्वेत मृतिका और आध पुरुष दिखाई देता है॥७३॥ जो करीरक्षके साथ येरीका हो तो उन वृक्षोंने हैं। हाय पश्चिम अठारह पुरुष खोदनसे जल निकलता है, वहां बहुत जउवाले शानशिरा होती है ॥ ४ ॥ पीलपक्षक सहित यो या हो तो उनसे इन हाय पूर्वको पोय पुरुष नीचे सारा जल होता है, जो कमी नहीं सूखता । ११, जो वल्लीको उपर दूध और श्वेत रंगो कुरा हो तो उस वल्मीर के नीचे है। रोदतेने पावर निष्ठता है. उसके नीचे गिरानी catar नीम मापाटीकासहिता म०५४ । (२३९) तस्मिन शिरा प्रविष्टा नरपष्टया पववर्जिवया ॥ ८२ ॥ सपलाशा पत्र शमी परिमभागेऽम्बु मानवैः पष्टया । अर्धनरेऽहि प्रथमं सवालका पीतमृतरतः ॥८३॥ वल्मीकेन परिवृतः श्वेतो रोहीतको भवेयस्मिन् । पूर्वेण हस्तमारे सनत्या मानवैरम्बु ।। ८४ ॥ श्रेता कण्टकबहुला यत्र शमी दक्षिणेन तर पयः। नरसञ्चकसंयुतया समत्याहिर्नराः च ॥ ८५ ॥ मरुदेशे यचिह्न न जाङ्गले नेजलं विनिर्देश्यम् । जम्बूवेतसपूर्व ये पुरुपाले मरी द्विगुणाः ॥८६॥ जम्बूविता मूवा शिशुमारी सारिसा शिक्षा श्यामा। वीरथयो वाराही ज्योति- मती च गरुडवेगा ॥ ८७॥ सूकरिकमापपर्णी व्याघपदाति यद्यहेनिलये। पल्मीकादुचरततितिः करैखिपुरुषे तोयम् ।। ८८ ॥ एतद्नूपे वाच्यं जाङ्गल- भूमी तु पञ्चभिः पुरुः। एतैरेव निमिचर्मरुदेशे सप्तभिः कथयेत् ॥ ८ ॥ उनके मध्यका वल्मीक घेत वल्मीको पचपन पुरुष खोदनेसे जलकी शिरा निक- उती है ।। ८२ ॥ जहां पलाशवृक्षयुक्त शमी वृक्ष हों, वहां उन वृक्षोंसे पांच हाय पश्रिम साठ पुरुप नीचे जल होता है. प्रथम आध पुरुप खोदनेसे सर्प और पीछे बालू मिली हुई पीली मही निकलती है ॥ ८३ ॥ जहां वल्मीकसे घिरा हुआ धेव रंगका रुहीडेका वृक्ष हो वहां उस वृक्षसे एक हाथ पूर्वको सचर पुरुप नीचे जल धोता है ॥ ४ ॥ जहां बहुत फांटोंसे युक्त श्वेत शमीवृक्ष हो, वहां उस वृक्षसे एक हाथ दक्षिणको पचहार पुरुप नीचे जल होता है और आध पुरुष खोदनेपर सर्प निकलता है ॥ ८५ ॥ मरदेशमें जलज्ञानके जो यह चित्र को इन चिटोंसे जांगलदेशमें जल नहीं कहना चाहिये अर्थात् जांगल देशमें इन विद्रोसे जलका जान नहीं होता. जामन, वेदमजनूं मादे वृक्षोंके चिटोंसे प्रथम जलज्ञान कहा, वह चिद मरदेशमें दिखाई दे तो जितने पुरुप नीचे पहले उन चिटोंसे जल कहा, ये पुरुप यहांपर ने कहने योग्य है. बहुतही जलपाले देशको अनुपक कहते हैं, जसके अभाववाला देश मरुस्थल कहाता है, इन दोनों से अलग जो देश हो अर्थात् जहां यहुद अधिक और अत्यन्त कम जलन होय, यह जांगल देश है. इस मांति तीन मकारके देश होते हैं।। ८६ ॥ जामन, नियोत, मर्या, शिशुमार, शरिवन, शिवा, श्यामा, वाराहीकंगनी, गरुडपेण ॥ ८७ ॥ सुरिका, मापन और व्याधपदा (वघनखी) यह औपधी जो वल्मीफके ऊपर हों तो उस रस्मीकसे दीन हाय उत्तरको वीन पुरुष नीचे जस होवा है ॥८८ ॥ तीन पुरुष नीचे जलकी बात मन्स देशमें पानी पाहिये. जो पा पिश जांगरदेशमें नीचे जल होता है॥९५ ।। वर, पीपल और गूलर.पहवीन पूजा वहां साढे चार पुरुप नीचे अथवा पांच पुरुप नीचे जल होता है ॥१॥ बहुतसे स्निग्ध वृक्ष हो, वहां उन वृक्षोंसे दक्षिण चार पुरुष नीचे बहुतले बम महक न हो वहांभी डेढ पुरुप नीचे जल होता है ।। ९३ ॥ जहां सब भूमिका हो और एक देवाम ठण्डी हो वहां या जहां सब भूमि शीतल हो और एक जना गरम हो वहां साढे तीन पुरुप नीचे जल रहता है, इन्द्रधनुष, मत्स्य पावला ॥ ९४ ॥ जहां जांगल या अनुप देशमें यदुतसे वल्मीकोंकी पांति हो, उसमें पल्मीक सबसे ऊंचा हो तो उस ऊंचे पल्मीकके नीचे चार हाय सोदन दिन निरहती है और जहां सती जमकर मर जाप या जमेही नहीं, वामी र (२४०) बाराहीसंहिता। एकनिमा यत्र मही तृणतरुवल्मीकगुल्मारिहीना । तस्यां यत्र विकारो का परिन्यां जलं तत्र ॥ ९० ॥ यत्र स्निग्धा निम्ना सवालुका सानुनादिती स्यात् । तत्रार्थपञ्चमैर्वारि मानवैः पञ्चभिर्यदिवा ॥ ९१॥ निग्धतरूणां का नरैश्चतुर्जिलं प्रतं च । तरुगहनेऽपि हि विकतो यत्तत्माचददेव वदेव ॥१ नमते यत्र धरित्री सार्धे पुरुबु जाङ्गलानो । कीटा वा यत्र विनालपेन का घोऽबु तत्रापि ॥ ९३॥ उष्णा शीता च मही शीतोष्णांजविभिनरैः सानि इन्द्रधनुर्मत्स्यो वा वल्मीको वा चतुर्हस्ताद ॥ ९४ ॥ वल्मीकानां पता योकोऽज्युच्छ्रिताः शिरा तदधः । शुष्यति न रोहते वा सत्यं यस्यां च वस मः ॥ ९५॥ न्ययोधपलाशोदुम्बरेः समेतैत्रिनिर्जलं तदयः। वटपिट दिखाई दे तो तीन पुरुपके स्थानमें पांच पुरुप नीचे जल कहे. इनही विक मरुस्थलमें देखनेसे सात पुरुप नीचे जल वतावे ॥ ९ ॥ एकरंगकी भूमिमें इस तृण, वृक्ष, वल्मीक और गुल्म नहीं हों, ऐसी भूमि जहां विकारयुक्त अर्यात में प्रकारको दिखाई दे, वहां पांच पुरुष नीचे जल होता है ( भूमिमें एकही गई बहुतसी शाखायुक्त समूहके उत्पन्न होनेको गुल्म कहते हैं ) ॥ ९ ॥ जहां निग्ध नीचा वालु रेतदार या जहां पैर रखनेसे शब्द हो, ऐसी भूमि हो । होना कहना चाहिये और बहुतसे वृक्षोंमें एक वृक्ष विकृत हो अर्थात् उसके पुष्प औरही प्रकारके हो तोउस वृक्षसे दक्षिणको चार पुरुष नीचे जल होता है ॥ १॥ नांचे जल होता है और जहाँ बहुतसे पांडे दिखाई दे और उनके रहनेय की मापाटीकासाहवा ०५४। बापे तदद्वाच्यं शिरा चोरक् ॥ ९६ ॥ आमेये यदि कोणे ग्रामस्य पुरस्य या भवति कूाः । नित्यं स करोति भयं दाहं च समानुपं प्रापः॥ ९७ ॥ नैर्मत- कोणे पालक्षयं वनिताभयं च वायव्ये । विश्वयमेतत्त्यक्त्वा शेपासु शुभावहा: फराः ॥ ९८ ॥ सारस्वतेन मुनिना दकार्गलं यत्सतं तदवलोक्य । आयातित रुतमेतद् वृत्तरपि मानवं वक्ष्ये ॥ ९९ ॥ सिधा यतः पादपगुल्मवल्यो निश्छि- दपत्राच ततःशिरास्ति। पोक्षरोशीरकुलाः सगुण्डाः काशाः कुशा वा नलिका -मलो वा ॥ १० ॥ सजूरजम्बर्जुनवेतसाः स्युः क्षीरान्विता वा द्रुमगुल्म. वहयः । उजतागाः शतानीपाः स्युनतमालाच ससिन्दुवाराः ॥ १०१ ॥ विभीतको वा मद्यन्तिका वा पत्राऽस्ति तस्मिन् पुरुषत्रपेऽम्भः । स्यालर्व- तस्योपरि पर्वतोऽन्यस्तत्रापि मूले पुरुपयेंः ॥ १०२॥ या मौजकैः काश- कुशेध युक्ता नीला च मृवत्र सशर्करा च । तस्यां प्रातं सुरसं च तोयं छष्णा- वहां इन वृक्षोंके नीचे तीन हाथ खोदनेसे जल निकलता है और जहां बड, पीपल दोनों इकटे हों, उनकेभी तीन हाथ नीचे खोदनेसे जल निकलता है. इन दोनों स्थानों में उत्तर शिरा होती है ।। ९६ ॥ गांव से अथवा नगरसे अग्निकोणमें कुओं हो तो नित्य भय देता है और प्रायः ग्राम और नगरमें अग्नि लगती है, जिसमें मनुष्य भी जल जाते हैं ॥ ९७ ॥ नात्यकोणमें कुऑ हो तो पालकोंका सय होता है. वायव्यकोणमें फूप हो तो खियोंको मय होता है. यह तीन दिशा छोड- कर वाकी पांच दिशाओंमें फूप शुभ होते हैं ।। ९८ ॥ सारस्तमुनिने जो उदका- गेल कहा है, वह देखकर यह उदकाल हमने आर्याछन्दके दाग कहा. अव मनुक्र पहा उदार्गलभी वृचोंमें कहते हैं ॥ ९९ ॥ वृक्ष, गृल्म और वल्ली जिस भूमिमें मिग्ध हों और छिद्रहीन पचोंसे युक्त हों, वहां तीन पुरुप नीचे शिरा होती है या स्परपा, गोखरू, खस, फुल, गंद्र (शर), काश, कुश, नलिका, नल यह हण ॥ १०० ।। और खजूर, जामन, अर्जुन, वेवस वृक्ष हों या जहां वृक्ष, गुल्म और बल्ली ऐसे हों, जिनमें दूध निक्ले अथवा उत्री, हस्तियणी, नागवे सर, कमल, कदम्ब, नक्तमाल, सिंधुवार ॥ १०१ ॥ बडे और मदयन्तिका जहां से वहाँ तीन पुरुप नीचे जल होता है और जहां एक पर्वतके उपर दूसरा पर्वत हो वहांभी उपरके पर्वतके मलमें तीन पुरुप नीचे जल होता है ॥ १०२ ॥ मुंज, काश और कुश करके जो भूमि युक्त हो; जहां पत्थरो कणिकामोदे मिली नाली मही हो वो बात और मीय जल होता है, जहां काली या लाल १. कन्दमानांनी, टिक, मोतीपुरा 11 सूर्यामिवर्णा च शिला वितोया ॥ १०९॥ चन्द्रातपस्फटिकट मट्टी हो वहांभी पहुत और मधुर जल होता है। १०३ ॥ १. पपिल रंगती भूमिमें खारा पानी होता है. पारंगी भूमि शाक, मश्वकर्ण, अर्जुन, पिल्प, सर्ज, श्रीपर्णी, अरिष्ट, और शोभा नादियाले पत्तोसे युक्त हों और जहां गृक्ष, गुल्म, वेलेभी दिया। भोर करती वहां जल बहुत दूर होता है॥ १०५॥ जो भूमिका 5.र, गदमके रंगकी हो वह भूमि जल हीन होती है और निसrathix रके नीचे जन होना है।॥ १०६ ॥ पदूर्ग माण, मुा (ग) मोरो जोगिटार्गहो पपके हुप गूलरके समान रंग हो, जोशिस समान अनिमाडे रंगकी निगा या कपिल वर्ण हो उस शिन दोना॥१०७॥गोमिला पागत (फतर), श्रा याताय पाम भानगळी सोमलसीसमान it. नमन गुन्डनो शिक्षा को पांगती हो, मंग... 31,मुर्ग या भाव मान लीजिये (२४२) वाराहीसंहिता। थवा यत्र च रक्तमृदा ॥ १०३ ॥ सशर्करा तात्रमही कपार हो कपिला करोति । आपाण्डुरायां लवणं प्रदिष्टं मिटं ...', ५.१०४॥ शाकाश्वकर्णार्जुनविल्वसर्जा श्रीपपरिक्षापरिधान पंणैर्दुमगुल्मवयो रक्षाश्च दूरेऽबु निवेदयन्ति ॥ १० ॥ रानुवर्णा या निर्जला सा वसुधा प्रदिष्टा । रक्तांकुराः 'सीरयुवाः क. घरा चेन्जलमश्मनोऽधः ॥ १०६ ॥ वैदूर्यमुद्राम्बुदमेचकाजा . प्परसन्निना वा। शृङ्गानामा कपिलायवा या या शिटा भूमि ॥ १०७ ॥ पारावतक्षौघृतोपमा वा क्षोमस्य वनस्य च द्वन सोमवल्याश्च समानरूपा साप्याशु तोयं कुरुतेऽक्षयं च ॥ समेता पृपतेविचित्रैरापाण्डुभस्मोष्ट्रारानुरूपा । झोरगांगुटिक कणोरो मिली हुई ताके रंगकी) भूमि हो तो उसमें करौले सादर स्वादका जल निकलता है और नीले रंगको भूमिमें मीठा जल होता । मी माय मज करती है ॥ १०८ ॥ त ग for माषाटीकासहिदा ०५४। पाभेदनीलमणिहिशुकामनामाः । सूर्योदयांशुहारतालनिभाय या: शोभना मुनिवचोऽत्र च वृत्तमेतत् ॥ ११०॥ एता खोयाध शिला सच यम नागम सदानिशम् । येषां च राष्ट्रेषु भवन्ति राज्ञां तेपामवृ- मजोरदाविद ॥ १११॥ यदा नैति पिला नवानी पालाशकाः "विन्दुकानाम् । पन्चालपित्वानलमप्रिवर्णा सुधाम्बुसिक्का पविदारमेति T१२॥ तोपं शृतं मोक्षकारमना पा परसमसत्ता परिपेचनं तद । कार्य सारयुतं चिलायाः प्रकोटनं वनिविदारिदायाः ॥ ११३ ॥ वाकाभिक- सकुलत्या योनितानि परराणि च तस्मिन । सप्तरातमुपितान्यभितप्तां पनि हि शिलां परिपकैः ॥ ११४ ॥ नैवं पत्र तक च नालं तिलाना सामागं विन्दुकं स्याहइची । गोमुत्रेण सावितः क्षार एषां पछत्वोऽजस्ता- को मियतेश्मा ॥ ११५॥ आकं पयो हुडुपिपाणमपीसमेतं पारावता- के समान रंगकी जो शिला हो, सिंगरफके समान बहुत लाल रंगकी या अंजनके AT बहुत काली, उदय होते हुए सूर्यके किरणों की समान पहुत लाल और कदार हो अथवा हरितालके तल्प पोरे रंगको शिला हो तो वह शुम होती है। मकरणमें आगे कहा हुआ वृच मुनिवचन है अर्थात् प्रामाणिक है ॥ ११ ॥ मुले जोशिला कही यह सब शुम है, इसलिये इन शिलाओंको तोडना योग्य स. यह शिला सदा यक्ष और नागोंसे सेवित रहती हैं, जिन राजाओंके राज्यमें सो शिला हो उनके राज्यमें कभी अष्टि नहीं होती ॥ ११९ ॥ स यादि सदनेके समय सिला निकल पावे और वह फूट न सके तो उसके ऊपर टाक र तेंदुके काठको जलापकर उस शिलाको लाल कर ले फिर उसके ऊपर चुनेकी ग्लो मिला हुआ जल छिडके तो वह शिला टूट जाती है ॥ ११२ ॥ भरुवा 'सकी मस्म मिलाय जलो ौटाने फिर उसमें शरका खार मिला पीछे अमिसे पाई हुई शिलाके ऊपर सात बार उस जलको छिडके वो शिला टूट जाती है । ११३ ॥ छाछ, कामी, मय, कुलथी और बेरके फल इन सबको एक बरतनमें व राधि रखे फिर शिलान्ये पहले काही कई रीतिसे तपाय इन वस्तुओंसे पार पर छिडके वो बह शिला टूट जाती है। ११४ ॥ नीयके पचे, नींपकी छाल, वेटोंका नाल, अपामार्ग (चिराचा), दूके फल गिलोप इनको मस्सको घरो जन ले शिर पत्थरको तपापकर सवार इसमें छिडके नौ वा पत्पर दूर जावा है ॥ ११५ ॥ इमेपके सींगको जलायकर उसको स्याही फाइबर और गरेको दे॥ १२० ॥ यंजन (मुरमा), मोथा, खस, राजकोशावकी (बडीमा किनारोंको हद काष्ठसे वांध दे या पत्थर, ईट आदिते चिनवा दे और पत। वह मिट्टी दव जाय और जलके धसे नहीं टूटे ।। ११८ ॥ अर्जुन, रड, र पिटखन, कदम्ब, निचुल, जामुन, वेतस, नीम (एक प्रकारका कदम्ब), उस ताल, अशोक, महुआ यौर मौलसिरी ये वृक्ष उस वापोके तटपर लगा ॥१॥ जल निकलने के लिये एक ओर एक मार्ग रस्खे. जिसको पत्थरों वधवार पर देखें और उस मार्गको छिद्ररहित पाठके तसतसे टफार उपरसे मिहाले । (२४४) वाराहीसंहिता। खुशरुता च युतं प्रलेपः । टङ्कस्य तैलमथितस्य ततोऽस्य पान पभावित न-शिलास भवेद्विघातः ॥ ११६ ॥ क्षारे कदल्या मथितेन युक्त रिनोति पापितमायसं यत् । सम्यक् छितं चाश्मनि नैति जङ्गं न चान्पलोहनी तस्य कौव्यम् ॥ ११७ ॥ वापी प्रागपरायताम्बु सुचिरं धने न यायोग्य फल्लोलेरपदारमेति मरुता सा प्रायशः प्रेरितः। तां चेदिच्छति सारदाहनि संपातमावारयेद पापाणादिभिरेव वा प्रतिचयं क्षुण्णं द्विपार्थादितिः ॥ १३८ ककुभवटाम्रपक्षकदम्पैः सनिचुलजम्बूवेतसनीपैः। कुरवकतालाशोकमान कुलविमिश्नावृततीराम् ॥ ११९ ॥ दारं च नैर्वाहिकमेकदेशे कार्य गिन सञ्चितवारिमार्गम् । कोशस्थितं निर्विवरं कपाट कत्ला ततः पाशुचिरापेदन ॥ १२ ॥ अअनमुस्तोशीरः मराजकोशातकामलकचूर्णः। कतकार • युक्तयोगः कूपे प्रदातव्यः ॥ १२१ ॥ कलुप कटुकं लवणं विरतं साडि वीटके साथ पीसकर मिला ले और इन सवको आकके दूधमें डालकर लेप कर शंत्रपर लगावे और फिर तेलसे मथित टंक(पापाणदारकयंत्र) पर पान देकर तो कर ले. शिलापर मारनेसेभी इस शस्त्रकी धार नहीं टूटेगी ॥११६॥ कदलीकेशन छाछ मिलाकर एक दिन रहने दे फिर जिस लोहेमें उसको मिलाकर पान दी , और वह भलीमांतिसे तेज धारखाला हो जाय तो फिर वह पत्थरपरभी करते नहीं टूटता और लोहेपर लगनेसे मी खुटला नहीं होता ॥ ११७ ॥ पूर्व मको लम्वी वापीमें जल बहुत कालतक रहता है और दक्षिण उत्तरको टी नहीं ठहरता क्योंकि पानसे उठाये हुए वडे तगासे वह टूट जाती है, जो दो उचर लंबा पुष्करणी बनाया चाहता जो चोटका वचाव करने के लिये उसे समय उसके प्रत्येक मिट्टी के आसारको घोडे हाथी आदिसे रुंदवावा जाय, fat भाषाटीकासहिता म०५५ । पदि वा शुभगन्धि भवेत् । तदनेन भवत्यमलं सुरसं सुसुगन्धिपुणेरपरैम पुतम् ॥ १२२ ॥ हस्तो मपानुराधापुप्पपनिठोत्तराणि रोहिण्यः । शतभिप- गित्यारम्ने कूराना शस्यते भगणः ॥ १२३ ॥ कला वरुणस्य वलिं घटवेत- सकीलकं शिरास्थाने । कुसुमेर्गन्धैधूः सम्पूज्य निधापयेत्लथमम् ॥ १२४ ॥ मेघोद प्रथममेव मया प्रदिष्टं ज्येष्ठामतीत्य वलदेवमतादि दृष्ट्वा । भौमं दकार्ग- लमिदं कथितं द्वितीयं सम्यग्वराहमिहिरेग मुनिप्रसादात् ॥ १२५ ॥ इति श्रीवराहमिहिररुती बृहत्सं० दकार्गलं नाम चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥५४॥ अथ पंचपंचाशत्तमोऽध्यायः। वृक्षायुर्वेद. पान्तछायाविनिर्मुक्ता न मनोज्ञा जलाशयाः । यस्मादतो जलपान्तेवा रामान पिनिवेशयेद ॥ १ ॥ मृद्दी भूः सर्ववृक्षाणांहिता तस्यां तिलान पद । गदला, रडुआ, खारा, वेस्वाद या दुर्गन्धदार हो तो वह इस चूर्णके टालनेसे निर्मल, मोठा, मुगन्ध अग्मी कई उचम गुणों करके युक्त हो जाता है ।। १२२ ॥ इस्त, मघा, अनुराधा, पुण्य, धनिष्ठा, तीनों उत्तरा, रोहिणी और शतभिषा नक्ष- प्रमें फूषका आरंम करना श्रेष्ठ है ॥ १२३ ॥ वरुणको बलि देकर गंध, पुष्प, धूप आदिसे पड या वेतर काठके कीलका पूजन करे फिर शिराके स्थानमें प्रथम उस कीलको गाड दे ॥ १२४ ॥ ज्येष्ठकी पूर्णिमा होनेसे पीछे वर्षाऋतु में जो जलका मान है वह मेधसम्बन्धी कार्गल है, वह हमने बलदेव आदि आचायोंके मतको देखकर पहलेही कह दिया, वह भूमिसम्बन्धी दूसग उदकार्गल मुनियों के प्रसादसे भलीभांति वराहमिहिरने अर्थात् हमने कहा है, उदक शन्द जलका वाचक है और मर्गल रुकावटका नाम है, जलकी रुकावट जिस शाखसे जानी जावे वह उदकार्गठ पहाता है “नार नीर भुवनमुदकं जीवनीयं दकं च राते हलायुधः ॥ १२५ ॥ इति श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादावादवास्त. म्य-पंडितबलदेवप्रसादमिविरचितायां भाषाटी चतुःपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४॥ वापी, कूप, वालाव आदि जलाशयके और पास जो छायासे हीन हो तो विचको भानंद नहीं देते, इस कारण जलाशयों के किनारोंपर माराम (बगीचे) लगावें ॥ १ ॥ कोमल भूमि सप वृक्षों के लिये अच्छी होती है, जिस भूमिमें बाग १ भन शोकोऽय प्रक्षिपष्टीकापामनुल्लेखाद । " पाले देशमें होते हैं॥११॥ एक वृक्षसे वीस हाथके भंवरपर दारा ART AN -- मूमिका प्रथम कर्म है ॥२॥ नींव, अशोक, पुन्नाग, शिरीप और मिवंगु पदमा फेला, जामुन, लिकुच (बडहर ), दाडिम, दाख, पालीवत, विजौरा और सुन दालसे काट उसके ऊपर लगाये ॥ ४॥ ५ ॥ जिनके शाखा उत्पनीर हों ऐसे वृक्षोंको एक स्थानसे उठाकर दूसरे स्थानमें अपनी दिशाके वीव मिर मातुमें लगावे. जिनके शाखा हो गई हों उनको हेमंतमें और अच्छे र ने एक स्थानसे उठाकर दूसरे स्थानमें लगावे ॥७॥ पवित्र हो, स्नान अनुलेपन घृक्षकी पूजा करे पीछे उस वृक्षको दूसरे स्थानमें लगावे तो वह वृक्ष उनी । करके युक्त लग जाता है अथात् सखता नहीं॥८॥ लगाये हुए वृक्षोंमें नीम सांह सवेरे दोनों समय सींचने चाहिये; शीतकालमें एक दिन के अंदर भौर वपरितुमें भूमि सूखनेपर सींचना चाहिये ॥९॥ जामुन, बेसरी कदम्ब, गूलर, अजुन, पिजौरा, दाख, पठहर, दाडिम ।।१०।। वंजुल, नटरा विलक, कटहर, विमिर और अंबाटा यह सोलह वृक्ष अनूपज अर्थात् गर# (२४६) वाराहीसंहिवा। पुष्मितांस्तांश्च गृहीयाद कमैतत्लथमं मुवि ॥२॥ ना. सप्रियङ्गवः । मङ्गल्याः पूर्वमारामे रोपणीया गृहेषु वा ॥ ३ ॥ पनसंगोत्र दलीजम्बूलकुचदाडिमाः । द्राक्षापालीवताव बीजपुरातिमुक्तकाः ।। एते द्रुमाः काण्डा रोप्या गोमयेन प्रलेपिताः । मुलच्छेदेऽय वा कने णीयाः प्रयवतः॥ ५॥ अजातशाखांश्चिशिरे जानखाशान हिमाउने । गमे च सुस्कन्धान्यथादिक् प्रतिरोपयेत् ॥ ६॥ गोमपैः। आमूलस्कन्धलिप्तानां सङ्कामणविरोपणम् ॥ ७॥ पूजां कत्वा स्रानानुलेपनैः। रोपयेद्रोपितश्चैव पत्रस्तैख जायते ॥ ८॥ पातश्च धर्मान्ते शीतकाले दिनान्तरे । वस च भुवः शोपे सेकन्या गरि द्रुमाः ॥ ९ ॥ जम्बूवेतसवानीरकदम्बोदुम्बरार्जुनाः । ...... Ans चाश्च सदाडिमाः ॥ १० ॥ वजुलो नतमालय तिलकः पनसरतथा। रोऽप्रातकश्चैव पोडशानूपजाः स्मृताः ॥ ११ ॥ उत्तमं विशतिर्दरता ।। लगाना हो पहिले उसमें तिल बोवे, जब वे तिल कूलें तब उनका मर्दन को है इस कारण वागमें अथवा घरमें पहिले लगाने चाहिये ॥ ३॥ कटहर, वृक्षों को वर्षास्तुमें लगावे ॥ ६ ॥ घृत, खस, तिल, शहत, वायविडंग, दून गोवर इन सबको पीसकर मूलसे लेकर डालतकोंको लेप दे पीछे, -- मापाटोकासहिता म०५५॥ (२४७) गान्तरम् । स्यानाद स्यातान्तरं काय वृक्षागा द्वादशावरम् ॥१२॥ याराजातास्तरवः संस्पृशन्तः परस्परम् । मिमूलध न फलं सम्यग्यच्छन्ति उताः ॥ १३ ॥ शीतवातात रोगो जायते पाण्डुरात्रता । अवृद्धिध लानां शाखायोपो रसतिः ॥ १४॥ चिकित्सितमथतेषां शप्रेणादी वियो- नम् । विडङ्गवृताङ्काकान सेचयेद क्षीरवारिणा ॥ १५॥ फटनाशे कुल- वैध मापैमुद्रस्तिलयकैः। शृतशीतपय सेकः फलपुष्पाभिवृद्धये ॥ १६ ॥ पिकाजशरच्चूर्णस्याटके वे तिलाटकम् । सनुपस्यो जलदोणो गोमसतु- या सह ॥ १७॥ सप्तरात्रोपितरः सेकः कार्यो वनसतेः। वहीशुल्मलतानां व फलपुषाय सर्वदा ॥ १८॥ वासराणि दश दुग्धनावितं मोजमापयुतह- लयोजितम् । गोमयेन पहुशो विरुक्षितं कौडमार्गपिशितैश्च धूपितम् ॥ १९ ॥ मत्स्यशूकरवसासमन्वितं रोपितं च परिकर्मितायनी । क्षीरसंयुतजलावसेचितं नाय तो उचम है, सोलह हाप अंतरपर मध्यम और बारह हाथके अंतरपर लगाया जाय तो अधम होता है ॥ १२ ॥ जो वृक्ष बहुत समीप उत्पन्न हो, परस्पर स्पर्श करे और जिनकी जड मिल जावें वे पीडित होते हैं और इसी कारणसे भलीमांत नहीं फलते ॥ १३ ॥ बहुत शीत पवन और धूपसे वृक्षोंगोगग हो जाता है; तय उनके पत्ते पीले हो जाते, अंकुर नहीं पडते, डाली सखती और रस टपकने लगता है॥१४॥ रोगी पृक्षकी इस मांति चिकित्सा करे कि पहले जिस अंगको सडा सखा मादि देखे उसको गलसे काट देवे फिर वायविडंग घृत और कीचको मिलाय- सर वृक्षों के लेप करे पीछे दूध मिले जलसे सीधे ॥ १५ ॥ वृसमें फल न लगे तो कुलप, उडद, मूंग, तिल और जो दूध डालकर औटाये, फिर उस धो टी - कर उस दूधसे फल और पुष्पांकी वृदिके लिये वृक्षको सींचे ॥ १६ ॥ भेड नौर परीकी मेगनका पूर्ण दो आढक, तिल एक आरक, सत्तू एक मस्य, जळ एक द्रोण और गोमांस एक तुला इन सपको एक पाप्रमें डालकर ॥ १७ ॥ बात रात्रितफ रस्ते, पीछे फल और पुष्पोंके लिये इस जलसे वृस, वेल, गुल्म भोर स्वाओंको साँचे ॥१८॥ चाहे जिस वृक्ष के पौन घृतसे चिकने आप करके चुपरे पीछे उसको दूध डाल देइमी मांति नित्य दश दिनतक चिकने हापसे चुपड दूध डालता जाय पीछे उसको गोवारी बहुत बार रूसा करे. यार मौर हरिणके मांसकी उस बीजको धूप देवे ॥ १९ ॥ फिर मत्स्प और सकरको
"
हम निनम् । पठी भरत्याशु शुभप्राला विस्माती ममामा
मन
मामा मागोमा
भी जप नि... मी iiii
(४८)
वाराहीसाहता।
जायते कुमुमयुक्तमेव तत् ॥ २०॥ तिन्तिडीत्यति टी.
विठचूर्णसतिः। पूर्तिमांस हतब सेचिता पूरिता च ।
करित्यवाहीकरणाय मूलान्यास्फीतधानाधववासिकातान् ।।
सूर्यवही सामातिमुक्तः सहिताटमुली ॥ २२ ॥ क्षीरे मते का
नागरात स्थाप्य कपित्यानम् । दिने दिने शोपिनमा
ततोऽधिप्यम् ॥२३॥ हस्तायतं ताहिगुगं गर्म र साकार
शुष्कं पर मधुसपिपानव मलेग्येनत्मसमन्वितेन । २४
जिलयीय पारयेन्मृतिमयान्तरस्यैः।मस्यापिाजःताहिका
नवं समुपगतं तद ॥२५॥ उप चवीनं चतुरंगुतारो मत्स्य
मा ( ) मा गयो पोमे गुर
16 inोग योग जो होगा :
... ॥ ३० ॥ भोजो तोरा
११. on नाव नो,
• 1. 11... Mitti it als
14
+
itiatrint
स मापाटीक्यसाहिता म०५५ । (२४९) डोछसम्भूतफलकल्केन भावितम् । एतचेलेन वा वीज टेप्मातकफलेन २७ ॥ वापित करकोन्मिभं मृदि तत्क्षणजन्मकम् । फलनारान्चिता भवतीति किमद्भुतम् ॥ २८ ॥ खेप्मातकस्य पीनानि निष्फुटीरत्य व प्रातः । अकोलविजलामिश्छायायां समस्त्येवम् ॥ २९ ॥ माहिए. वृटान्यस्य करीपे च तानि निक्षिप्य । करकानलमृदोगे न्युनान्यदा राणि ॥ ३० ॥ ध्रुवमृदुमूलविशाखा गुरु श्राणस्तथाविनीतम् । न दिव्पग्निः पादपरोपणे भानि ॥ ३१ ।। इति श्रीवराहमिहिरकती वृहत्संहितायां वृक्षादो नाम पथपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥ । सच तो शीघ्रती उत्तम पचों करसे युक्त वली से जारे भार भरपाटक जिसको देखनेसे सबको विस्मय हो ॥ २६ ॥ अंकोल पर सरक १)से, लालके नेलो अथमा लसोडेके पालो जति गरेको वा तेलसे चोद जिस पीनको सो भावना देवे भर्यात गोवारविको॥१७॥ उसे ओलोसे भीगी हुई मिट्टीमें गोरे तो उसी सण जम माता है, Tat ने ही हुई लता हो जाती है इसमें क्या बटुत है अर्थात मराठी २८ ॥ पुद्धिमान मनुष्य लसोडेके बीज लेकर उनका उिल उतारे कार लपालको बिजली अर्थात् फल के भीतरका पिलि जल उग पायाने न को सात भावना देरे भर्थात् भावना दे देवर छापामें मुरमता पारे । उन चीजोको भैसके गोयररो पिसकर भैससे सूपे गोवा के हमें सो जय भोले पडनेपर मिट्टी भीज जारे तब उसे भोलसे भागी में इन को बोरे तो एकही दिनमें यक्ष र फल लग जायेगा ॥१.it रा. गोहिणी, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, मल, रिता, पुर, बाण, Vी और दस्त यह नाम दिप भाले मुनीश्वराने वृक्ष मानदरे को२॥११॥ धीररामिदिरापारिपितापांपास. विमोतरदेशीया- स्विरबदेसादमिति माया ANTIRE U ५५ ५ कौश्वकाञ्चोकलापाच कलहंसकलस्वनाः। नयस्तोयांशुका पत्र शो युन्नतोरस्या हंसहासाख निम्नगाः ॥ ७ ॥ वनोपान्तनदीशैलनिसरी बहुत जल करके युक्त जलाशय बनाकर और उनके तटपर वाग लगाएर इष्ट कहाता है और वापी कूप तडागादि वनाना पूचे कहाता है, इथपूरी से उत्तम लोक मिलते हैं उनके पानेकी इच्छावाला पुरुप देवमंदिर वनाने दर इष्ट और पूर्व दोनाहीका फल मिलाता है ॥ २ ॥ जल और उपवनसे युक्त त • 'चाहे किसीके बनाये हुए हों, चाहे स्वाभाविक बने रहें तो उन स्थानोंमें देश कि जिनका मार्ग उसमें है. निर्मल जल जिन सरोवरोंमें मरे है ॥ ४॥ हंस की कोच और चक्रवाक जिनमें शन्द कर रहे हैं और किनारों के निनुदान छायामें जहां जलके जीव विश्राम करते है॥५॥ौंचपक्षी जिनका कांची है, कलहंसाका मधुर शब्द जिनका सन्द है, जल जिनका वस है, मच्छो हिर मेखला है, किनारापर फूले वृक्ष जिनके कर्णपूर है, जल थलका संगम जिला प्रोणिमण्डल है, पुलिन जिसके उठे स्तन और इंसही है हास्य विना उस' नीचको वहनेवाली नदियोंके समीपवर्ती स्थानोंमें देवता सोग गर ॥६॥७॥पनके निकट नदी पर्वत और झरनोंके समीपको ममि दिन (२५०) वाराहीसंहिता। अथ षट्पंचाशत्तमोऽध्यायः। प्रासादरक्षण. रुत्वा प्रभुतं सलिलमारामान्विनिवेश्य च । देवतापतन कुयशोधर्माधि: वृद्धये ॥ १ ॥ इष्टापूर्तेन लश्यन्ते ये लोकास्तान् चुनूपता । देवानामाटर फार्यों द्वयमप्यत्र दृश्यते ॥ २ ॥ सलिलोद्यानयुक्तेषु कनेष्वनकेषुः । स्थानेष्वेतेषु सानिध्यमुपगच्छन्ति देवताः ॥ ३ ॥ सरः नलिरीग- निरस्तरविरश्मिपु । हंसांसाशिकहारवीची विमलवारिषु ॥ ४ ॥ इसका ण्डवक्रौञ्चचक्रवाकविराविषु । पर्यन्तनिचुलच्छायाविश्रान्तजलचारिषु ॥ ५॥ कृतमेखलाः ॥ ६ ॥ फुल्छनीरद्रुमोत्तंसाः सङ्गमश्रोणिमण्डलाः । पुनिए- और धर्मकी वृद्धि के लिये देवताका मंदिर बनाना चाहिये ॥ १॥ यज्ञादि का कमलरूप छत्रसे सूर्य किरण दूर किये हों, हंसपक्षियोंके कंधोंसे प्रेरित घेत । - . .
मापारीकासाहिता म०५६ । (२५१). नान्तभूमिषु । सन्वे देवता नित्यं पुरेश्यानवत्सु च ॥ ८॥ मयो बाह्मणानां पाः पोका वास्तुकर्मणि । ता एव तेषां शस्यन्ते देवता. पतनेम्वति ॥ ९॥ चतुःषष्टिपदं कार्य देवतायतनं सदा । द्वारं च मध्यमं तत्र समरिक्स्य प्रशस्यते ॥१०॥ यो विस्तारो भवेद्यस्य द्विगुणा तत्समुन्नतिः। उच्छ्रायावस्तृतीयोऽरास्तेन तुल्या कटिः स्मृता ॥ ११ ॥ विस्ताराधं भवेद्रों भिचयोऽन्याः समन्ततः । गर्भान विस्तीर्ण द्वारं दिगुणमुच्छ्रितम् ॥ १२॥ उच्छ्रापालादविस्तीणां शाखा तद्वदुइम्परः । विस्तारपादप्रतिम बाहुल्यं पाखयोः स्मृतम् ॥ १३ ॥ विपञ्चसप्तनवाभिः शाखाभिस्तत्पशस्यते । अपः शाखाचतुर्भागे प्रतीहारी निवेशयेत् ॥ १४॥ शेपं मङ्गल्यविहरीः श्रीवृक्षस्व- स्तिकैपटेः। मिथुनः पत्रपर्छ भिः प्रमथैथोपशोभयेत् ॥ १५॥ दारमानाष्टमा देवता रमण करते हैं और उपवनोंसे युक्त नगरोंमेभी देवता विहार करते हैं ॥८॥ माक्षण भादि चार वर्णो को जैसी भूमि पहले गृह मनाने के लिये का माये हैं सीही भूमि उन वर्णाको देवताके मंदिर पनानेके मर्थ श्रेष्ठ है ॥९॥ देवमंदिरमें सदा पूर्णोक्त चौसठ पदका वास्तु करना चाहिये उस देवमंदिरमें मध्यम दार सम दिशामें स्थित हो तो श्रेष्ठ है ॥ १० ॥ देवमंदिरका जितना विस्तार हो उससे दूनी उसकी ऊंचाई होती है, ऊंचाईको तिहाई परावर देवमंदिरकी काटे होती है, सीटीके ऊपर जहांसे देवगृहका पारंम होता है उसको काट करते हैं ॥ ११ ॥ विस्तारसे आधा गर्भ होता है, शेप आधे विस्तारमें चारों ओरकी मीत बनती है. गर्मकी चौपाईके समान दारका विस्तार और दारके विस्तारसे दिगुण दारकी ऊंचाई होती है ॥१२॥ दारकी ऊंचाईकी चौपाई के परावर शाखा (चौखटका बाज) भार उदुम्बर (चौरसटके उपरके पाठ) की चौगई होती है, शाखाकी चौकी चौपा- के तुल्प शाखाओंकी मोटाई होती है॥१३॥ शाखाकी जितनी चोडाई कही उसके बीचमें तीन, पांच, सात अथा नौ शाखा हों वौदार श्रेष्ठ होता है। दोनों शाखाओं के नीचे के घीशमें देवताओं के दो प्रतिहारोंकी मूर्ति खोदनी चाहिये ॥१४॥ भासा- मोके शेप वीन चौथाई भंशोको सादि मंगलदायक पसी, बेल, सस्तिक, सपिपा, कलश, मिथुन (सीपुरुषश जोग), पत्र और सतागणों से शोभिव करे ॥ १५ ॥ झारखी उंचाई के प्रमाणमें उसय अमांश घटार जो बचे वा पिडिला (देवता. स्थापनकर पीठ) सहित देवप्रतिमा उंचाईका प्रमाण सेवा है. उस पीठके सहित प्रविमासी उंचाईके वीन माग करके दो मागके पार उंची प्रतिमा और एक.
मासाद होता है, तिसमें बारह भूमिका खंड होता है और अनेक मांतिके की गानों करके युक्त होता है; उसमें चार दार चारों दिशाओंमें होते हैं और पिस्तार पचीस हाय होता है, चौसठ हाय ऊंचाई होती है ॥२०॥ पद्कोण तीम हायके विस्तारवाला, दश भूमिकाओसे युक्त और शित मंदर प्रानाद होता है; कैलास प्रासादभी शिखरोंसे युक्त, मांस को नाटी झरोखांदार इमीग दाय विस्तारका और माठ भूमिका भोसे पुक्क पिमानच्छंद नामक प्रासाद होता, नंदन प्रासाद पदोण, भूमिस पदनान मामाद गोठ रोता है। दोना प्रासाद माठाव चौगो पुक्त, बीम हाय विस्तारपाला और सोलह भंडारके युक्त होना पसी भंग होता है और दोनों एक २ भूमिकासे युक्त होते?॥११.41 कानाद गहा के भारसाही होता है परन्तु उसके पस मौरी.. (२५२) वाराहीसंहिता। -गोना प्रतिमा स्यात्सपिण्डिका । दो भागो प्रतिमा तत्र तृतीयांराध रिलिजा ॥ १६ ॥ मेरुमन्दरकैलासविमानच्छन्दनन्दनाः। समुद्रपनगरुउनन्दिरक मराः ॥ १७॥ गृहराजो वृपो हंसः सर्वतोजदको घटः। सिंहो बुर कोणः पोडशाटाअयस्तथा ॥ १८॥ इत्येते विंशतिः प्रोक्ताः प्रासादा संस मया । यथोक्तानुक्रमेणेव लक्षणानि वदाम्यतः ॥ १९ ॥ तत्र पडभिनाई दशनीमो विचित्रकुहरवा दारैर्युतचतुर्भित्रिंशद्धस्तविस्तीर्णः॥ २०॥it दस्तायामो दशभौमो मन्दरः शिखरयुक्तः । कैलासोऽपि शिखखान् । विशोऽटनामश्च ॥ २१ ॥ जालगवाक्षकयुक्तो विमानसंज्ञत्रिसप्तकापाका नन्दन इति पड्नीमो द्वात्रिंशः पोडशाण्डयुतः ।। २२ ॥ वृत्तः समुहनावार पमारुतिः शयानष्टौ । शृङ्गेणेकेन भवेदेकैव च भूमिका तस्य ॥२३॥ गरुडारुतिश्च गरुडो नदीति च षट्चतुष्कविस्तीर्णः । कार्यभ सादर मागके समान ऊंची पिंडिका ( पीठ) बनाना चाहिये. यह प्रमाण सप प्राचादर लिये कहा है ।। १६॥ मेरु, मंदर, कैलास, विमानच्छंद, नंदन, समुद्र, पम, पर नंदिवर्धन, कुंजर ॥ १७ ॥ गुहरान, वृप, हंस, सर्वतोभद्र, घट, सिंह, पुन, कोण, पोडशाधि और अष्टाधि ॥ यह वो नाम हमने प्रासादों को अब नामके कमसे इनके लक्षण कहते हैं ॥ १९ ॥ छ. कोणवाला मेनन . U प्रासादो कार हुमा करते है निनो शिमर मा ।।
मापारीकासाहिता २०५६। विपितोऽथ विंशत्या ॥ २४ ॥ कुअर इति गजपृष्ठः पोडशहस्तः समन्ततो मूलाद । शहराजः पोदशकपिचन्द्रशाला भवेदलमी ॥ २५ ॥ वृप एकभू- मिशृङ्गो द्वादशहस्तः समन्ततो वृतः । सो इंसाकारो घटोऽष्टहस्तः कलशरूप: ॥ २६ ॥ द्वारयुतभनिहुशिखरो भवति सर्वतोभद्रः । बहुरुचिरचन्द्रशालः पशिः पञ्चमीमम ॥ २७ ॥ सिंहः सिंहाकान्तो द्वादशकोणेऽष्टहस्त- विस्तीर्णः । चत्वारोऽअनरुपाः पञ्चाऽण्डयुतस्तु चतुरस्रः ॥ २८ ॥ भूमि- कांडगुलंमानेन मयस्याटोऽचरं शतम् । साथ हस्तत्रयं चै कथितं विश्वक- मणा ॥ २९ ॥ पाहुः स्थपतयभात्र मतमेकं विपश्चितः । कपोतपालिसंयुक्ता दोनों मासाद चौवीस हाप विस्तारके सात भूमियोंसे युक्त चौवीस अंडोंसे भूपित करने चाहिये ॥ २४ ॥ कुंजर मासाद हाथोकी पीठके आकारका होता है और मूलसे चारों ओर सोलह हाथ विस्तारखाला होता है. गृहराज मासाद गृह (कार्ति- केप) के आकार बनता है और सोलह हाथ इसका विस्तार होता है. इन दोनों मासादोंकी वठभी तीन २ चंद्रशालाओंसे युक्त होती है ॥ २५ ॥ पृप नाम मासाद एक भूमिका और एक शृंगदार होता है. इसका विस्तार बारह हाय है और यह चारों योरसे गोल (वर्तुल) होता है. इसमासाद सपक्षीके आकारके चोंच पंख और पूंछसे युक्त होता है, यहभी बारह हाथ चौडा, एक भूमिका और एक रंगसे युक्त होता है. घटनामक मासाद फलशके आश्रका होता है और थाठ हाथ उसका विस्तार होता है. यहमी एक भूमिका और एक शृङ्गयुक्त होता है ।। २६ ॥ सर्वतोमनामक भासाद चारों दिशाओंमें चार दारोंसे युक बहुत शिखरों करके शोभित, बहुत और सुन्दर चंद्रशालाओंसे भूपित छवीस दायका विस्तारमें चरस और पांच भूमिकाओंसे युक्त होता है ॥ २७ ॥ सिंह नामक भासाद सिंहकी प्रतिमाके दारा भूपित बारह कोणोंसे युक्त और आठ हाय चौरा होता है. शेष चार प्रासाद वृक्ष, चतुष्कोण, पोदशास्त्र और अष्टान अपने नामके समान माकारवाले होते है, यह चारों अंजनरूप होते हैं अर्थात् इनके मीतर अंधकार रहता है, पाइरसे प्राश नहीं पहुँचता ॥ २८ ॥ मपके मनसे एक भूमिका ममाण एक सौ आठ अंगुल होता है और विश्वकर्माने एक २ भूमिस ममाण साढे तीन हाथ कहा है ॥ २९ ॥ विदान कारीगर मय और विश्वकर्माके मनको एकही कावे हैं उनका यह कथन है कि विश्वकर्माने साढे वीन हाप मर्याद चौरासी अंगुन भूमिका प्रमाण कहा, वह कपोकपालिकाको छोडकर कहा है जो परन्तरतालारा, उदक, गूग, परसामाझ बीजानिए कीनां धन्वनवल्को वचा चेति ॥ १ ॥ एतैः सलिलद्रोणः कापितम्योपद पाख्यः ॥ ३॥ पासादहर्म्यवलमीलिङ्गप्रतिमासु कुड्यकोषु । सन्तानो पर वर्पसहनायुतस्थायी ॥ ४ ॥ लाक्षाकुन्दुरुयुग्यलगृहधूमकरित्यरिलमारी उसमें कपोतपालिकाका प्रमाण जोड दिया जाये तो वह मयके कहे ममाणका रोजाता है।॥३०॥ यह प्रासादलक्षण हमने संक्षेपसे कहा. परन्त गर्ग सुना मासादलक्षण रचा इवह सब इसमें आ गया है और मनु, वसिष्ठ, मय, नर मादि आचार्गाने जो बडे २ भासादरक्षणपंथ रचे हैं उन स्मृति इति श्रीराहमिदिराचार्यविरचिवायां वृहत्संहि०पश्चिमोचरदेशीपमुरादागदसरा पंडितर उदेशमसादमिश्रपिर० मापाटीकायां पदपंचाशवमोऽध्यायः ॥५॥ वेंदके कधे फल, कैयके को फल, सेमलके फूल, समीक्षके पीन, बंगा साउ और बच ॥१॥इन रावर एक द्रोण जलमें काथ करे जर मामा या नामक करक॥३॥ पापको देखेपासाद, और मिटिंग, देशप्रतिमा, मिति और कोंमें गर्म करके टगा. पाni (२५४) बाराहीसहिता। न्यूना गच्छन्ति तुल्यताम् ॥ ३०॥ प्रासादलक्षणमिदं कथित यविरचितं तदिहास्ति सर्वम् । मन्वादिमिविरचितानि पृथूनि यानि त प्रति मयात्र सतोऽधिकारः॥ ३१ ॥ . इति श्रीवराहमिहिरकतो वृहत्संहितायां प्रासादलक्षणं नाम पट्पश्चाशत्तमोऽध्यायः॥५६॥ अथ सप्तपंचाशत्तमोऽध्यायः। वज्रलेपलक्षण. मामं तिन्दुकमा कपित्यकं पुनमपि व शाल्मल्याः । शेपच । भवनार्योऽस्य च कल्को द्रव्यैरेतेः समनुयोज्यः॥ २ ॥ भीतर सगुग्गुलभल्लातककुन्दुरुकसर्जरसैः । अतसीविल्वैव यतः कल्कोऽयं पर हमने यहां अधिकार किया ॥ ३१ ॥ जाप तव उवारे ॥२॥ पीछे उसमें . (देवदारु वृक्षमा निर्यास), राल, अल .
मापाटीकासाहिता म०५८॥ गवलाफलानन्दुकमदनफलमधूकमाझेदाः ॥५॥ सरसरमालकानि चेति हल्का कतो द्वितीयोऽयम् । बवाख्यः प्रयमगुणरसमपि तवं कार्येषु ॥६॥ गोमहिपानविषाणः खररोम्णा महिपचर्मगपश्च । लिम्ररित्यरसे सह पब- रो नाम करकोऽन्यः ॥ ७॥ अष्टो सासकमागा: कांसस्य द्वीतु गतिका- मागः। मपकषितो योगोऽयं विज्ञपो वजाहातः ॥ ८॥ दति भीवराहमिहिरकती वृहत्संहितायां वजलो नाम समस्याशचम यायः ॥ ५७॥ अथाटपंचाशत्तमोऽध्यायः। 4 प्रतिमारक्षण. जालान्तर धानो परतरं दर्शन रजो यातिनिश्यितरमा पपर्म नरि प्रमाणानाम् ॥ १॥ परमाणुरजो पालामलिलयूका योऽलं ति। अगु- लकी गिरी, नागपाला (गंगेरण) के फल, महुए के फल, मीठ ॥५॥ राय पोल, आपले इन सर रस्तुमों के फरकामी पाली मांति सियशेणमा जड मिलानेसे दस पाप विद होता है, इसमें भी वही गुण है जो परले स्लप को और यहमी मासाद आदिक उपमें से पहले पलेपको भाविकाम माताtu गो, भैस और पकरा इन तीनोंके सींग, गर्दभ, मास और गोइन तीनों के पन, नायके फल कपके फठ भौर नीलाल सपने पालो मोदि तीसरा करक मिर रोता है, इसका नाम रजवर है. इसमें भी पाठे को ए गुण और पर चौमें काम आता ॥७॥ माठ भाग सोसा, दो माग कांगा, एक मात्र पीतल इन अपये इसका गलावे या मयस्य का हुमा योग। और हा नाम रमपात है॥८॥ इति श्रीररामिदिरापाप्यविरचितार्या सदिवायां पपिनोसादगीपारा- .दारादास्तम्प-पण्डितपदेवरसादामेश्रारातापा मारा समपंचायतमोशापः ।। ५७ ॥ जानी बोरसे एक माने जो मापन्दसामरख देखा सरो परमाघ शने, रममाणामें पानी भाउ परम पानी राय, मुराचार भगुरुसम्बा मोर मंगुन चौमालामा (२५६). घटाकर जो वच रहे उसकी जो तिहाई हो वह पिण्डिका (मूर्तिकी पीठ) ग्राम है और पिण्डिका प्रमाणसे प्रतिमा (मूर्ति)का प्रमाण दूना होना चाहिये ।। एक सौ आठ अंगुल होती है. प्रतिमाका मुख अपने अंगुल प्रमाणरो पारामा चौडा और चौदह अंगुल लम्बा हो ऐसा नग्नजित् नाम आचार्यने पास मान द्रविडदेशका है॥४॥ प्रतिमाके नासिका, सलाद, ठोडी, गरदन और पपने अंगुल प्रमाणसे चार २ अंगुल लम्बे यनाने चाहिये. इन दो लम्बे बनावे, चिबुक्की चौडाई दो अंगुल होती है ॥ ५ ॥ आठ अंक माया होता है मायेसे दोनों मोर परे दो दो चंगुल प्रमाण (कनपरी) कनपरीकी लम्बाई चार २ अंगुल से, कणं दो दो अंगुल चौडे पनरो।। कर्णका उपान्त ययात् कांग्र नेप्रांतसे ऐफर भ्रू सम अपसे, साडेचार करना चाहिये, कानका छेद और मकुमारक अर्थात् फर्णशोतके समी समन्ता मंतर चार अंगुस करना ठीक ३. नीचेका मोड पर वाराहीसंहिता। णानि यथोचरमंगुलमेकं भवति संख्या ॥ २॥ यस्तृतीयोऽशः । तसिण्डिकाप्रमाणं प्रतिमा तद्विगुणपरिमाणात एलप्रमाणैदिश विस्तीर्णमापतं च मुखम् । नमाजता तु चतु: ५५ कथितम् ॥ ४॥ नासाललाटचिबुकग्रीवाश्चतुरंगलास्तया की । देश हनुके चिबुकं तु व्यंगुलं विस्तृतम्॥५॥ अष्टांगुलं ललाटं पित्त परे शंखौ । चतुरंगुलौ तु शंखी कर्णो तु व्यंगुलं पृथुली ॥ ६ ॥ को कार्योऽर्धपञ्चमे चूसमेन सूत्रेण । कर्णश्रोत्रः सुकुमारकं च नयनादक ॥ ७ ॥ चतुरंगुलं वसिष्ठः कथयति नेत्रान्तकर्णयोर्विवरम् । अवरोध माणस्तस्यानोचरोष्ठश्च ॥ ८ ॥ अर्धायुला तु गोच्छा वनं पage रज, आठ रजका वालाग्र, आठ वालाग्रकी लिक्षा, आठ लिक्षाकी यूका, आउ . यव और आठ यवका एक अंगुल होता है, इस प्रकार यह प्रमाण । हैं. एक अंगुल संख्या होती है ॥ २॥ देवमंदिरके द्वारकी ऊँचाईमें उसका मन जितनी ऊंचाई प्रतिमाकी आवे उसके बारह भाग कर एक २ भागके फिर माग करे. वह एक अंगुल होता है, क्योंकि सप प्रतिमा अपने २ अंगुर है भापाटीकासाहिता म०५८। (२५७) पम् । पिपुलं तु सार्धमंगुलं मध्यातव्यंगुलं व्यातम् ॥ ९ ॥ व्यंगुलतुल्पी सापुटी च नासा पुटामतो ज्ञेया । स्वाइ व्यंगुलमुच्छ्रायचतुरंगुलमन्तरं reणोः ॥ १०॥ व्यंगुलमितोऽक्षिकोशो वे ने तत्रिजागिका तारा । क् रापञ्चांशो नेत्रविकाशोंऽशुलं भवति ॥ १३ ॥ पर्यन्तापर्यन्तं दश योऽ- गुलं वोर्लेखाः। भूमध्य ब्यंगुलकं भूर्दर्पणांगुलचतुष्कम् ॥ १२॥ गर्या तु केशरेसा भूपन्धसमांरटापिस्तीर्णा । नेत्रान्ते करवीरकमुमन्यसे- गुलमतिमम् ॥ १३ ॥ वार्षिशतारणाहाचतुर्दशायामतोगुलानि शिरः । दश तु चित्रकर्मणि दृश्यन्ते विंशतिरदृश्याः ॥ १४ ॥ आत्यं सकेशनिचयं गोडश देण नमजित्योकम् । पीवा दश विस्तीर्णा परिणाहादिशतिः सैका 1 १५ ॥ कण्ठाद्वादश हृदयं हृदयानानिय तद प्रमाणेन । नाभीमध्यान्मेद्रा- तरं च ननुल्यमेवोनम् ॥ १६ ॥ करू चांगुलमानेश्चतुर्युता विंशतिस्तथा नुख मर्यात् नृसिंह भादि देवताओंका फैला हुआ मुख तीन अंगुल चौडा करे ॥९॥ आसिकाके दोनों पुट दो दो मंगुलके को और पुोंके अग्रसे नासिकामी दो अंगुल माने. नासिकाकी ऊँचाई दो अंगुल और दोनों नेत्रों के बीच चार चंगुल अन्तर रखना चाहिये ॥ १० ॥ नेत्रका कोश दो मंगुल, नेत्र दाना दो २ अंगुल, नेप्रकी तेहाईके दल्य तारा, ताराके पचमांशके तुल्य दृछ बनावे और नेत्रकी चौड़ाई रफ भंगुलकी करे ॥ ११ ॥ एक मौके मन्तसे दूसरे मौंके अन्ततक दश अंगुल रखना चाहिये; आध अंगुल भूकी चौडाई दोनों भूका मध्यभाग दो अंगुल और एक मौकी लम्बाई चार चार अंगुल करनी चाहिये ॥ १२ ॥ माथेके ऊपर केशरेखा भूवन्धके तुल्प करे और आप अंगुल चौडी. केशरेखा रक्खे, नेत्रके अंतमें एक अंगुलका करवीरक करे जिसको मूपिकामी कहते हैं ॥ १३ ॥ वचीस यंगुल सम्बा, चौदह अंगुल चौडा शिर बनाना चाहिये, जो चित्र बनाया जाय तो उसमें शिर यारह मंगुल दिखलाई पडदा है और वीस अंगुल जो पिछली ओर रहते हैं वह नहीं दीख परवे ॥ १४ ॥ नमजित्माचार्यने केशरेखासहित मुखका विस्तार सोटा मंगुल कहा है, प्रीवाका विस्तार दश अंगुल और उसकी सम्बाई इहोस अंगुल कही है।॥ १५ ॥ कंटके माधे मागसे हृदयवक बारह अंगुल अंतर रस्ते, हृदयसे नामितक और नाभिके मध्यसे लिंगके मध्यतक धारह अंगुलदी अंतर कहा है ॥ १६ ॥ अरु और जंघा चौवीस २ अंगुल लम्बे करने चाहिये, गोरोंके उपरकी पाठी चार अंगुल और पादमी पार .
( २५६). य; कान का द और मुहमारक अपात् पाणयोतके समीप Tal समान करना चाहिये॥७॥ वशिष्टमुनि पातेर र चार यंगुल करना टोक. नीचे मोर एक मंदी माय मंगुड रखना चापि ॥८॥ गोरग माघ भाउ वाराहीसंहिता। णानि यथोचरमंगुलमेकं भवति संख्या ॥ २ ॥ देवागारद्वारस्पाटांवोट यस्तृतीयोऽशः । तसिण्डिकाप्रमाणं प्रतिमा तद्विगुणपरिमाणा ॥ ३ ॥ एलप्रमाणैदिश विस्तीर्णमायतं च मुखम् । ननजिता तु चतुर्दश देपेण पानि कथितम् ॥ ४॥ नासाललाटचिवुकमीवाश्चतुरंगलास्तथा कर्णी । वे अंगुळे हनुके चिबुकं तु व्यंगुलं विस्तृतम्॥५॥ अष्टांगुलं ललाटं विस्ताराद्व्यंगुटा परे शंखौ । चतुरंगुली तु शंखो को तु व्यंगुलं पृथुलो ॥ ६ ॥ कर्णोग कार्योऽर्धपञ्चमे धूसमेन सूत्रेण । कर्णश्रोत्रः सुकुमारकं च नयनयन्यतन ॥ ७ ॥ चतुरंगलं वसिष्ठः कथयति नेत्रान्तकर्णयोर्विवरम् । अधरोंऽयुट माणस्तस्यानोत्तरोष्ठश्च ॥ ८ ॥ अधायला तु गोच्छा वक्र चतुरंगुटार रज, आठ रजका बालान, आठ घालाप्रकी लिक्षा, आठ लिक्षाकी यूका, आठ पूया पब और आठ यवका एक अंगुल होता है, इस प्रकार यह प्रमाण उचरोचर भाउन १. एक अंगुल संख्या होती है ॥ २॥ देवमंदिरके दारकी ऊँचाईमें उसका अष्टमा घटाकर जो बच रहे उसकी जो तिहाई हो वह पिण्डिका (मूर्तिकी पीठ) का प्रमाण है और पिण्टिका प्रमाणसे प्रतिमा (मतिका प्रमाण दूना होना चाहिये ॥३॥ नितनी ऊंचाई प्रतिमाकी आवे उसके बारह भाग फर एक र माग फिर नी ने माग को. यह एक अंगुल होता है, क्योंकि सप प्रतिमा अपने २ अंगुल प्रमाण एक सा माठ अंगुल होती है. प्रतिमाका मुख अपने अंगुल प्रमाणसे पार मंडर चौडा और चौदह अंगुल लम्बा हो ऐसा नग्मानित नाम आचार्यने यहा है. मान पिडदेशका है ॥ ४॥ प्रतिमा मास, लाट, ठोडी, गरदन और कर यापन अंगुल प्रमाणसे चार र अंगुल हम्मे पनाने चाहिये. नु दो २ एम्बे बना, चियुकको चौडाई दो अंगुल होता ॥ आठ अंगुर और माया रोना है, मायसे दोनों मोर पर दो दो मंगुस प्रमाण ( कनपटी ) का कनपटीरी लम्बाई चार र अंगुल करो, पण दो दो अंगुल चौडे पनारे । का उपान्त अर्थात् कणांग्र नेत्रांतसे ठेका 5 सम रायरो, साढे चार अंगुर , पुस चार भंगुलममा मोर समाचारसता at 1 ) भाषाटीकासाहिता अ०५८ । (२५७) कार्यम । विपुलं तु सार्धमंगुलं मध्यात्तव्यंगुलं व्याचम् ॥ ९॥ व्यंगुलतुल्पी नासापुटी च नासा पुटायतो क्षेया । स्याद् ब्यंगुलमुच्छ्रायभतुरंतुलमन्तरं चाक्ष्णोः॥ १० ॥ व्यंगुलमितोऽशिकोशो वे ने तत्रिभागिका तारा । हक तारापञ्चांशो नेत्रविकाशोंऽशुलं भवति ॥ ११ ॥ पर्यन्तात्पर्यन्तं दश क्षुयोऽ- धांगुलं भुवोर्लेखाः । भूमध्यं ब्यंगुलकं र्पणांगुलचतुष्कम् ॥ १२॥ कार्या तु केशरेखा भूषन्धसमांरालार्धविस्तीर्णा । नेत्रान्ते करवीरकमुपन्यसे- दंगुलपतिमम् ॥ १३ ॥ द्वात्रिंशसारिणाहाचतुर्दशापामतोऽगुलानि शिरः । बादश तु चित्रकर्मणि दृश्यन्ते विशतिरदृश्याः ॥ १४ ॥ आस्यं सकेशनिचयं पोडश देण नपजिलोक्तम् । ग्रीवा दश विस्तीर्णा परिणाहादिशतिः सैका ॥ १५॥ कण्ठाद्वादश हृदयं हृदयानानिय तत् प्रमाणेन । नाभीमध्यान्मेद्रा- न्तरं च तनुल्यमेवोक्तम् ॥ १६ ॥ ऊरू चांगुलमानेश्चतुर्युता विंशतिस्तथा मुख अर्थात् नृसिंह आदि देवताओंका फैला हुआ मुख तीन अंगुल चौडा करे ॥९॥ नासिकाके दोनों पुट दो दो अंगुलके करे और पुटोंके अग्रसे नासिकाभी दो अंगुल जाने. नासिकाकी ऊँचाई दो अंगुल और दोनों नेत्रोंके बीच चार अंगुल अन्तर रखना चाहिये ॥ १० ॥ नेत्रका कोश दो मंगुल, नेत्र दाना दो २ अंगुल, नेत्रकी तिहाई के दल्य तारा, ताराके पचमांशफे तुल्य हक् बनावे और नेत्रकी चौगई एक मंगुळकी करे ॥ ११ ॥ एक भौंके अन्तसे दूसरे मौके अन्ततक दश अंगुल रखना चाहिये, आध अंगुल भूकी चौडाई दोनों भूक्य मध्यमाग दो अंगुल और एक मौकी लम्बाई चार चार यंगुल करनी चाहिये ॥ १२ ॥ माथेके ऊपर केशरेखा भूवन्धके तुल्य करे और आध अंगुल चौडी केशरेखा रक्खे, नेत्रके अंतमें एक अंगुलफा करवीरक करे जिसको मूपिकाभी कहते हैं ॥ १३ ॥ पचीस अंगुल लम्वा, चौदह अंगुल चौडा शिर बनाना चाहिये, जो चित्र बनाया जाय तो उसमें शिर वारह अंगुल दिखलाई पडता है और वीस अंगुल जो पिछली ओर रहते हैं वह नहीं दीख पडते ॥ १४ ॥ नमजित्भाचार्यने केशरेखासहित मुखका विस्तार सोलह अंगुल कहा है, ग्रीवाका विस्तार दश अंगुल और उसकी लम्बाई इफीस अंगुल कही है।॥ १५ ॥ कंठके आधे मागसे हृदपतक बारह अंगुल अंतर पखे, हृदयसे नामितक और नाभिके मध्यसे लिंगके मध्यवक बारह अंगुलही अंतर कहा है ॥ १६ ॥ अरु और जंघा चौवीस २ अंगुल लम्बे करने चाहिये, गोरोंके उपरकी पाली चार मंगुल और पादमी चार १७ बारसमोर माध संगुडना यात्रिये ॥८॥ गोप्य भाष मंant एनो चाय, मुमर चार भगुडम्या मोर मंगुड चौरा रातारा (२५६). मदग नेवश्वन्धके समान करना चाहिये ॥७॥ वशिष्टमुनि वारिस करना चाहिये; कानका डेद और मुकुमारक याद कर्णखोतके समरिश Tal कग:न्न अंतर चार अंगुश करना यक है. नीचेरा मोत्र एक मंजुरी वाराहीसंहिता। णानि यथोत्तरमंगुलमेकं भवति संख्या ॥ २ ॥ देवागारद्वारस्याष्टांशोगस्य यस्तृतीयोऽशः । तसिण्डिकाप्रमाणं प्रतिमा तद्विगुणपरिमाणा ॥ ३३ - गुलप्रमाणैर्दादश विस्तीर्णमायतं च मुखम् । नमाजिता तु चतुर्दश दैपेण बारिश कथितम् ॥ ४॥ नासाललाटचिवुकमीवाश्चतुरंगुलास्तथा करें। वे अंगुठे च हनुके चिबुकं तु व्यंगुलं विस्तृतम्॥५॥ अष्टांगुलं ललाटं विस्ताराव्यंयुलाइ परे शंखो। चतुरंगुलौ तु शंखी कर्णोतु व्यंगुलं पृथुली ॥ ६॥ कर्णोगन्त कार्योऽर्धपञ्चमे चूसमेन सूत्रेण । कर्णश्रोत्रः सुकुमारकं च नयनयन्यात ॥ ७ ॥ चतुरंगलं वसिष्ठः कथयति नेत्रान्तकर्णयोर्विवरम् । अधरोंऽगुटा माणस्तस्यानोचरोष्ठश्च ॥ ८ ॥ अघांगुला तु गोच्छा वक्र चतुरंयुटार रज, आठ रजका वालान, आठ घालायकी लिक्षा, आठ लिक्षाकी यूका, आठ पूरा पर और आठ यवका एक अंगुल होता है, इस प्रकार यह प्रमाण उचरोचर माउस १. एक अंगुल संख्या होती है ॥२॥ देवमंदिरके द्वारकी ऊँचाईमें उस अमर पदाकर जो बच रहे उसकी जो तिहाई हो वह पिण्डिका (मूर्तिकी पीठ) का मकान है और पिण्डिका प्रमाणसे प्रतिमा (मतिका प्रमाण दूना होना चाहिये ॥३॥ जितनी ऊंचाई प्रतिमाको आये उसके बारह भागकर एक र भागके फिर नौ ने माग को. यह एक अंगुल होता है, क्योंकि सप प्रतिमा अपने २ अंगुल प्रभागने एक सौ आठ अंगुल होती है. प्रतिमाका मुख अपने अंगुल प्रमाणसे पार मंटर चौडा और चौदह अंगुल टम्या हो ऐसा नग्मानित नाम आचार्यने कहा है। मान द्रविडदेशका है ॥ ४ ॥ प्रातमाके नासिका, लाट, ठोडी, गरदन और कई यपने अंगुठ प्रमाणसे चार र अंगुल सम्पयनाने चाहिये. 'इनु दो २ . टम्बे बनारे, चियुकको चौडाई दो अंगुल होnam आठ मंगुड और माया होता है; माथसे दोनों और परे दो दो अंगुल प्रमाण ( कनपटी ) बसा, कनपरी लम्बाई चार २ अंगुल पसे, कण दो दो अंगुल चौरे यनारे । कर्णका उपान्त यांत कांय नेत्रांतसे लेकर 5 सम मासे, साडे पार भापाटीकासाहिता म०५८ । (२५७) कार्यम् । विपुलं तु सार्धमंगुलं मध्याचव्यंगुलं व्यातम् ॥ ९ ॥ व्यंगुलतुल्यो नासापुटी च नासा पुटामतो क्षेया । स्याद् ब्यंगुलमुच्छ्रायश्चतुरंगलमन्तरं चाक्ष्णोः ॥ १०॥ व्यंगुलमितोऽशिकोशो द्वे ने तविभागिका तारा । हक तारापयांशो नेत्रविकाशोऽगुलं भवति ॥ १३ ॥ पर्यन्तात्पर्यन्तं दश भुयोऽ- धांगुलं ध्रुवोर्लेखाः। भूमध्यं ब्यंगुलकं भूर्देर्पणांगुलचतुष्कम् ॥ १२॥ कार्या तु केशरेखा भूपन्धसमारलार्धविस्तीर्णा । नेत्रान्ने करवीरफमुपन्यसे- दंगुलपतिमम् ॥ १३ ॥ द्वात्रिंशत्सरिणाहाचतुर्दशापामतोऽगुलानि शिरः । बादश तु चित्रकर्मणि दृश्यन्ते विंशतिरहश्याः ॥ १४ ॥ आस्य सकेशनिचयं पोटश देण नमजित्लोक्तम् । ग्रीवा दश विस्तीर्णा परिणाहाद्विशतिः सैका ॥१५॥ कण्ठाद्वादश हृदयं हृदयानानिय तद प्रमाणेन । नामीमध्यान्मेद्रा- न्तरं च वनुल्यमेवोक्तम् ॥ १६ ॥ ऊरू चांगुलमानश्चतुर्युता विंशतिस्तथा मुख अर्थात् नृसिंह मादि देवताओंका फैला हुआ मुख तीन अंगुल चौडा करे ॥१॥ नासिकाके दोनों पुट दो दो अंगुलके करे और पुटोंके अग्रसे नासिकाभी दो अंगुल जाने. नासिकाकी ऊँचाई दो अंगुल और दोनों नेत्रोंके बीच चार पंगुल अन्तर रखना चाहिये ॥ १० ॥ नेत्रका कोश दो मंगुल, नेत्र दाना दो २ अंगुल, नेप्रकी विहाईके तल्प तारा, ताराके पचमांशके तुल्य ह बनाने और नेत्रकी चौड़ाई एक अंगुळफी को ॥ ११॥ एक भौंके अन्तसे दुसरे मौंके अन्ततक दश अंगुल रखना चाहिये; आध अंगुल भूकी चौडाई दोनों भूका मध्यमाग दो अंगुल और एक मौकी लम्बाई चार चार अंगुल करनी चाहिये ।। १२ ।। माथेके ऊपर केशरेखा भूवन्धके तुल्य करे और आध अंगुल चौडो केशरेखा रक्खे, नेत्रके अंतमें एक अंगुलफा करवीरक फरे जिसको मूपिकाभी कहते हैं ॥ १३ ॥ पचीस अंगुल लम्बा, चौदह अंगुल चौडा शिर वनाना चाहिये, जो चित्र बनाया जाय तो उसमें शिर पारह मंगुल दिखलाई पड़ता है और वीस अंगुल जो पिछली ओर रहते हैं वह नहीं दीख पडवे ॥ १४ ॥ नग्नमित्भाचार्यने केशरेपासहित मुखका विस्तार सोलह भंगुल कहा है, प्रीवाका विस्तार दश अंगुल और उसकी लम्याई इफीस अंगुछ कही है ॥ १५ ॥ कंठके आधे मागसे हृदपतक बारह अंगुल अंतर रखे, हृदयसे नामितक और नाभिके मध्यसे लिंगके मध्यवक बारह अंगुलदी अंवर कहा है ॥ १६॥ उरु और जंघा चौवीस २ अंगुल लम्बे करने चाहिये, गोगेके उपरकी पाली चार अंगुल और पादमी चार माग नेत्रप्रवन्धके समान करना चाहिये ॥७॥ वशिष्टमुनि कहते है कि नेश मौ ( २५६). जितनी ऊंचाई प्रतिमाकी आवे उसके बारह भाग कर एक २ भागके फिर नौने माग करे. वह एक अंगुल होता है, क्योंकि सब प्रतिमा अपने २ अंगुल प्रभाग माया होता है; माथेसे दोनों मोर परे दो दो अंगुल प्रमाण ( कनपटी ) नारे, फनपटीकी लम्बाई चार २ अंगुल रक्खे, कर्ण दो दो अंगुल चौडे घना ॥१॥ फर्णका उपान्त अर्थात् कर्णाग्र नेत्रांतसे लेकर भ्रू सम सघसे, साढे चार गुरुय फरना चाहिये; कानका छेद और सुकुमारफ अर्थात् कर्णस्रोतके समीपका का कर्णान्तका अंतर चार अंगुल करना ठीक है. नीचेका मोष्ठ एक अंगुरको ऊपरका ओष्ठ आध मंगुल रखना चाहिये ॥८॥ गोच्छा आध अंगुली करनी चाहिये, मुख चार मंगुल उम्वा मोर दे मंगुल चौडा रसना दौरा बाराहीसंदिता। णानि यथोचरमंगुलमेकं भवति संख्या ॥ २॥ देवागारद्वारस्पाांगोर- यस्तृतीयोऽशः । तसिण्डिकाप्रमाणं प्रतिमा तद्विगुणपरिमाणा ५ ३॥ त- एलप्रमाणेद्वादश विस्तीर्णमायतं च मुखम् । नमनिता तु चतुर्दश दैयण प्रापित कथितम् ॥ ४॥ नासाललाटचिबुकधीवाश्चतुरंयुलास्तया की । वे अंगुळे च हनुके चिबुकं तु व्यंगुलं विस्तृतम्॥५॥ अष्टांगुलं ललाटं विस्ताराव्यंयुनाव परे शंखौ । चतुरंगुली तु शंसौ करें तु व्यंगुलं पृथुलौ ॥ ६ ॥ कर्पोगान्दः कार्योऽर्धपञ्चमे भ्रूसमेन सूत्रेण । कर्णश्रोत्रः सुकुमारकं च नयनायन्यमनन ॥ ७ ॥ चतुरंगुलं वसिष्ठः कथयति नेत्रान्तकर्णयोर्विवरम् । अधरोऽयुटर माणस्तस्यार्धेनोत्तरोष्ठश्च ॥ ८ ॥ अर्धायुला तु गोच्छा वकं चतुरंयुटाप रज, आठ रजका वालाग्र, आठ वालाग्रकी लिक्षा, आठ लिक्षाकी यूका, आठ यूर यव और आठ यवका एक अंगुल होता. ३. एक अंगुल संख्या होती है ॥२॥ घटाकर जो वच रहे उसकी जो तिहाई हो वह पिण्डिका (मूर्तिकी पीठ) का प्रमान है और पिण्डिका प्रमाणसे प्रतिमा (मतिका प्रमाण दूना होना चाहिये ॥१ एक सौ आठ अंगुल होती है. प्रतिमाका मुख अपने अंगुल प्रमाणसे वारइ अंदन चौडा और चौदह अंगुल लम्बा हो ऐसा नग्मानित नाम आचार्यने कहा है. 4 मान द्रविडदेशका है। प्रातमाके नासिका, ललाट, ठोडी, गरदन और कई अपने अंगुल प्रमाणसे चार र अंगुल लम्वनाने चाहिये. हनु दो २ लम्बे बनावे, चिबुकको चौडाई दो अंगुल होता है ॥ आठ अंगुल का भापाटीक्यसाहिता २०५८। (२५० कार्यम् । विपुलं तु सार्धमंगुलं मध्यानम्पंगुलं व्याचम् ॥ ९ ॥ व्यंगुटखा नासापुटी च नासा पुटायतो मेया । स्याद् व्यंगुलमुच्छायचतुरंगुलम चाक्ष्णोः ॥ १०॥ व्यंगुलमितोऽशिकोशो द्वे ने तविजागिका नारा । तारापयांशो नेत्रविकाशोशुलं भवति ॥ १३ ॥ पर्यन्तात्तपन्नं दश वो. पांगुलं भुवोर्लेखाः । धूमप्पं ब्यंगुलकं भूय॑णांगुलचनुपम् ॥ 10 कार्या तु केशरेखा भूषन्धसमायला विस्तीर्णा । नेत्रान्ते करवीरकमुपसे- दंगुलपतिमम् ॥ १३ ॥ द्वात्रिंशतरिणादापतुर्दशारामतोंशुलाति शिरः । बादश सुचित्रकर्मणि दृश्यन्ते विशतिरहश्याः ॥ १४ ॥ आस्पं मानिन पोठा दर्पण नजित्लोकम् । पीया दश विस्तीणां परिणाहादिशतिना 1 १५॥ कण्ठादादश हृदयं हृदयानाविध तत् प्रमाणेन । नाजीमम्मामा- तरं च तनुल्पमेवोनम् ॥ १६ ॥ ऊरु चांगुलमानधना वितिस्तथा पुरा मर्यात् नृसिंह भादि देवतामोका फैला हुमा मुख तीन अंगुल पार करे । नासिकाके दोनों पुट दो दो भंगुलके बारे भौर पुटोंके अमरो नासिकामी दोन जाने. नासिकाको उचाई दो मंगुल भौर दोनों नेत्रोंके पीच पार पंगु बना रखना चाहिये ॥ १०॥ नेत्रका कोश दो मंगुळ, नेत्र दाना दो १ ब नशा तिहाईके तत्प नारा, ताराके पचमांशफे पल्प एक यनारे और भी एक भंगुलकी करे ॥ ११ ॥ एक भाके भन्तसे दूसरे मा पन्त भंगुल रखना चाहिये, माध भंगुल भूफी चौगई दोनो भूगर मायभायो और एफ भीको सम्पाई चार पार भंगुल करनी चाहिये ॥ १२॥ मासा परेखा भूपन्धके तुल्य परे भोर माघ गुल पोरी रोरा सन नसमें एक भंगुरुका करवीरक करे जिसको मूपिकाभी पाते?॥ १५ ॥ गुरु जम्मा, चौदा भंगुल पोगशिर बनाना चाहिये, गो विश बना र उसमें शिर गरम भंगुज दिखाई पाता और पौत पंज 0 रहमानोदीस परते ॥ १४ ॥ नमजिव भाचार्यने सात पर विस्तार सोहा मंगुहा, मोगरा Rस्तार दश बंड कर रखी माईरस भंगुष पोरे १५ ॥ रे मारे माग सदE TRE व मंतर परएपसे नाभितक और नामक मारले सिमनापास सी र १९॥ हर रेमंड ने पारिये, रोके अपर पाली पार भंगुश भर पानी पर सनी चीय, मुख चार भेगु३ उम्सा मोर मंगुश चौरासना ( २५६). माया होता है; मादसे दोनों मोर परे दो दो अंगुल प्रमाण (पनपटरी) स्नपरीकी रम्बाई चार २ संगुल खसे, फणं दो दो अंगुल चौडे पना11 फर्गा उपन्त याद पाणांप नेत्रविसे सेकर भ्रू सम सुरसे, साडेचार करना चाहिये; कानका छेद और मकुमारक अपांद पाणपोतर समोसा मग नेत्रबन्धके मकान करना चाहिप ॥७॥ पशिष्टमुनि पनि वाराहीसंहिवा। णानि यथोचरमंगुलमेकं भवति संख्या ॥ २ ॥ देवागारदारस्याटागोर यस्तृतीयोऽशः। तसिण्डिकाप्रमाणं प्रतिमा तद्विगुणपरिमाणा ॥ ३॥ - गुलप्रमाणैर्दादश विस्तीर्णमायतं च मुखम् । नमनिता तु चतुर्दश देन कारण कथितम् ॥ ४॥ नासाललाटचिबुकग्रीवाश्चतुरंगुलास्तया करें । वे अंगुळेच हनुके चिबुकं तु व्यंगुलं विस्तृतम्॥५॥ अष्टांगुलं ललाटं विस्ताराद्व्यंगुठान परे शंखौ। चतुरंगुलौ तु शंखौ करें तु व्यंगुलं पृथुलो ॥ ६॥ कर्णोदः कार्योऽर्धपञ्चमे चूसमेन सूत्रेण । कर्णश्रोत्रः सुकुमारकं च नयनायन्सार ॥ ७ ॥ चतुरंगुलं वसिष्ठः कथयति नेत्रान्तकर्णयोर्विवरम् । अधरोंऽयुत माणस्तस्यानोत्तरोष्ठश्च ॥ ८ ॥ अर्घायुला तु गोच्छा वक्रं चतुरंगुटा रज, आठ रजका वालाग्र, आठ वालाग्रको लिक्षा, आठ लिक्षाकी यूका, आउ पूया पर ओर आठ यवका एक अंगुल होता है, इस प्रकार यह प्रमाण उचरोत्तर पाउन ३. एक अंगुल संख्या होती है ॥२॥ देवमंदिरके दारकी ऊँचाईमें उसका मान घटाकर जो यच रहे उसकी जो तिहाई हो वह पिण्डिका (मूर्तिकी पीठ) काम है और पिण्डिका प्रमाणसे मतिमा (मर्चि)का प्रमाण दूना होना चाहिये ।। जितनी ऊंचाई प्रतिमाको मापे उसके बारह भागकर एक २ भागके किर नौ माग करे. वह एक अंगुल होता है, क्योंकि सप प्रतिमा अपने २ अंगुल प्रकार एक सौ आठ अंगुल होती है. प्रतिमामा मुख अपने अंगुल प्रमाणसे पार घौडा और चौदह अंगुल लम्या हो ऐसा नग्मानित नाम आचार्यने कहा ... मान विदेशका दे ॥ ४ ॥ प्रतिमाके नासिका, लाट, ठोडी, गरदन और यपने भंगुल प्रमाणसे चार र अंगुल सम्पयनाने चाहिये. इन दो २ . एम्बे बना, पियुया चौदाई दो अंगुल होना men आठ अंदर देर यसन्नरा अंदर चार अंगुष्ठ पाना यैक है. नोवेरा मोड पर भापाटीकासहिता अ०५८॥ (२८ कार्यम् । विपुलं तु सार्धमंगुलं मध्याचव्यंगुलं व्यातम् ॥ ९ ॥ व्यंगुल सापुटी च नासा पुटायतो ज्ञेया । स्याद् ब्यंगुलमुच्छ्रायश्चतुरंगुटम चाक्ष्णोः ॥ १०॥ ब्यंगुलमितोऽक्षिकोशो दे ने तत्रिभागिका तारा। वारापञ्चांशो नेत्रविकाशोंशुलं भवति ॥ १३ ॥ पर्यन्तासर्यन्नं दश बों धांगुलं वोर्नेसाः। भूमध्यं ब्यंगुलकं भूणांगुलचतुष्कम् ॥ १२ कार्या तु केशरेखा भूपन्धसमांरटायपिस्तीर्णा । नेप्रान्ते करवीरकमुपन्यसे- दंगुलपतिमम् ॥ १३ ॥ द्वात्रिंशसारणाहाचतुर्दशापामतोऽगुलानि शिरः । बादश तु चित्रकर्मणि दृश्यन्ते विशतिरदृश्याः ॥ १४ ॥ आस्पं सकेनिन पोउ देर्पण नमजित्लोनम् । पीवा दश विस्तीणां परिणाहादिशतिः सेका ॥१५॥ कण्ठाद्वादश हृदयं हृदयानानिय तद प्रमाणेन । नाजीमध्यान्नद्रा- न्तरं च तनुल्यमेवोकम् ॥ १६ ॥ ठरू चांगुलमानचतुर्युना शितिस्तथा -मुख अर्थात् नृसिंह मादि देवताओंका फैला हुमा मुख तीन भंगुल चौरा करे ॥९॥ नासिकाके दोनों पुट दो दो भंगुलके को भौर पुटोंके अपरो नासिकाभी दो अंगुठ जाने. नासिकाकी ऊँचाई दो मंगुल और दोनों नेत्रोंके बीच पार चंगुल मन्तर रखना चाहिये ॥ १० ॥ नेत्रका कोश दो मंगुल, नेत्र दाना दो २ भंगुल, नेत्री तिहाई के तुल्य तारा, ताराके पचमांशके तुल्य ह यनारे भौर नेसी पोलाई एक भंगुरूकी करे ॥ ११ ॥ एक भोके अन्तसे दूसरे मोके मन्तवक पस मंगुल रखना चाहिये, माध भंगुल भूफी चौराई दोनों भूयर मध्यमाग दो मंज और एक भौकी लम्पाई चार चार मंगुल करनी चाहिये ॥ १२ ॥ मायेके पर नरेखा भूवन्धके तुल्य परे भौर माघ मंगुल चोटी केशरेरा रस, ने में एक अंगुठया करवीरक परे जिसको मूपिकामी परते ॥ १ ॥ बर्गस ल सम्बा, चौदह भंगुल चौडा शिर बनाना चाहिये, जो चित्र बनाया जाप उसमें शिर बारह भंगुल दिसलाई परता है और बीस पंगुल मोटी रहते हैं वह नहीं दीख पडवे ॥ १४ ॥ ननजित्भावाने केशोरात व हरिस्तार सोए मंगुल का प्रोगका विस्तार दश मंगु और उतरी रस भंगुष्ठ कही है॥ १५ ॥ कंटके माधे मागते एम सद भंवर स्वारे, दयसे नामितक और नाभिके मापते लिंगो मायवरा अंतर का?॥१६॥ अरु और अंपा पौरोज २ मंड टन्ने जाहिये, गोरोंके उपरको पाली पार भंगुन और पादमी पार
जितनी ऊंचाई प्रतिमाकी आवे उसके बारह भाग फर एक २ मागके फिर नौ
माग करे. वह एक अंगुल होता है, क्योंकि सव प्रतिमा अपने २ अंगुल मायले
एक सौ आठ अंगुल होती है. प्रतिमाका मुख अपने अंगुल प्रमाणसे बारह मंत
चौडा और चौदह अंगुल लम्बा हो ऐसा नग्नजित् नाम आवार्यने कहा कि
मान द्रषिडदेशका है ॥ ४ ॥ प्रतिमाके नासिका, ललाट, ठगेडी, गरदन और र
अपने अंगुल प्रमाणसे चार २ अंगुल लम्बे वनाने चाहिये. हनु दो २३
लम्बे बनावे, चियुफकी चौडाई दो अंगुल होती है ॥५॥ आठ अंगुट अंग
माथा होता है; माथेसे दोनों मोर परे दो दो अंगुल प्रमाण ( कनपटी )
पनपटीकी लम्बाई चार २ अंगुल रखे, फर्ण दो दो अंगुल चौडे पनारे ॥॥
कर्णका उपान्त अर्थात् कर्णा नेत्रांतसे लेकर भ्रू सम सुत्रसे, साढे चार म
करना चाहिये, पानका छेद और सुकुमारफ अर्यात् कर्णस्रोतके समीपरा AT
माग नेत्रप्रवन्धके समान करना चाहिये ॥७॥ पशिष्टमुनि कहते किनेर
कर्णान्तका अंतर चार अंगुल करना ठीक है. नीचेका मोष्ट एक अंगुरको
उपरका योट आध मंगुल रखना चाहिये ॥८॥ गोच्छा आध अंतर
करनी चाहिये, मुख चार अंगुल लम्बा मोर दे अंगुल चौरा रसना मरका
(२५६)
वाराहीसंहिता।
णानि यथोचरमंगुलमेकं भवति संख्या ॥ २॥ देवागारद्वारस्पायोसस्य
यस्तृतीयोऽशः । तसिण्डिकाप्रमाणं प्रतिमा तद्विगुणारिमाणा ॥ ३॥ ती.
गुलममाणैर्दादश विस्तीर्णमायतं च मुखम् । नमाजिता तु चतुर्दश देषेण प्रति
कथितम् ॥ ४॥ नासाललाटचिवुकग्रीवाश्चतुरंगलास्तया की । वे अंगुळेच
हनुके चिबुकं तु व्यंगुलं विस्तृतम्॥५॥ अष्टांगुलं ललाटं विस्ताराद् व्यंजुटाव
परे शंखौ । चतुरंगुली तु शंसो कर्णां तु व्यंगुलं पृथुलौ ॥ ६॥ कर्णोरातः
कार्योऽर्धपञ्चमे भूसमेन सूत्रेण । कर्णश्रोत्रः सुकुमारकं च नयनपयन्यनगन
॥ ७ ॥ चतुरंगुलं वसिष्ठः कथयति नेत्रान्तकर्णयोर्विवरम् । अधरोंऽगुटर
माणस्तस्पार्धनोत्तरोष्ठश्च ॥ ८ ॥ अघायला तु गोच्छा वक्र चतुरंयुद्धाय
रज, आठ रजका वालाग्र, आठ वालायकी लिक्षा, आठ लिक्षाकी यूका, आठ पूरा
यव और आठ यवका एक यंगुल होता है, इस प्रकार यह प्रमाण उचरोचर आउन
हैं. एक अंगुल संख्या होती है ॥२॥ देवमंदिरके द्वारकी ऊंचाईमें उसका महान
घटाकर जो बच रहे उसकी जो तिहाई हो वह पिण्डिका (मूर्तिकी पीठ) का मदन
है और पिण्डिका प्रमाणसे मतिमा (मतिका प्रमाण दूना होना चाहिये ॥३॥
भापाटीकासाहिता म०५८। (२५७" कार्यम् । विपुलं तु सार्धमंगुलं मध्याच चंगुलं ब्याचम् ॥ ९ ॥ बंगुरतुल्पी नासापुटी च नासा पुटाग्रतो मेया । स्पाइ व्यंगसमुदायपरंगुटमन्वरं चाक्ष्णोः ॥ १०॥ व्यंगुलमितोऽक्षिकोथो देने तविनागिका नारा । इकू वारापश्चांशो नेत्रविकाशोंशुलं भवति ॥ १३ ॥ पर्यन्तातर्यन्तं च षोड- धांगुलं भुवोर्लेखाः । भूमध्यं ब्यंगुलकं भूदर्पणांगुलचतुफम् ॥ १२॥ कार्या तु केशरेखा भूपन्धसमांरालापिस्तीर्णा । नेपान्ने करवीरकमान्यने- दंगुलपतिमम् ॥ १३ ॥ द्वाविशत्सारणाहाचतुर्दशापामनों गुलानि शिर। बादश तु चित्रकर्मणि दृश्यन्ते विशतिरहश्याः ॥ १४ ॥ आस् सकेयनियर पोडश देपर्येण नजित्लोक्तम् । पीया दश विस्तीणां परिणाहागिदिनमा ॥ १५॥ कण्ठाद्वादश हृदयं हरपानानिय तत् प्रमाणेन । नानीमध्यान्नद्रा- तरं च तनुल्यमेवोकम् ॥ १६ ॥ उरु चांगुलमानचतुर्युता वितिसा मुस गति नृसिंह भादि देवतामोंका फैला हुमा मुख तीन भंगुल पोरायो ९ नासिकाके दोनों पुट दो दो मंगुलके को मोर पुटों के अगसे नासिकामी दोन जाने. नासिकाकी ऊँचाई दो चंगुल और दोनों नेत्रोंके बीच पार गुरु का। । रखना चाहिये ॥१०॥ नेत्रपा फोश दो भंगुळ, नेत्र दाना दो १ गुल नंगी । तिहाई के सत्य ताग, ताराके पयमांशफे दल्य र पगारे और नेशी पफ मंगुलकी करे ॥ ११॥ एक भीक मन्तसे दूसरे भोर मन्ततः । भंगुल रखना चाहिये, माध अंगुल भूषी चौगां दोनों का मापभाग दोन और एक भीको सम्माई पार चार भंगुल परनी चाहिये ॥ १२ ॥ मार फेशरला स्पन्ध दल्य परे भौर भाप मंगुल चौरी गरेरस समोर मंवमें एक अंगुष्ठर करवीरक परे जिसको पिकामी यते॥११॥ भंगुल सम्बा, चौपायुत चौगशिर बनाना चाहिये, जो विध बनारा र वो उसमें शिर पार भंगुल दिसलाई परवा और वोस मंगु seal भोर रहते बना दीख परवे ॥ १४ ॥ नमवित्भावाने बीच भुरका विस्तार सोहा मंगुठा मी विस्तार कार 30 सम्माई पोस गुल हो॥१५॥ के मारे भाग 3 भंगुर भंवर सादपसे नामिवर और नामि मार दिया । मंगु नंबर स॥ १६॥ उर और द व रे दुर र परने पर, अंगे अपर पास चार भंगुर हा पदको पर ( २५६). लम्बे बनावे, चिबुककी चौदाई दो अंगुल होती है ॥ ५ ॥ आठ अंगुर माया होता है; माथेसे दोनों ओर परे दो दो अंगुल प्रमाण (कनपटी ). स्नपरीकी लम्बाई चार २ अंगुल रक्खे, कर्ण दो दो अंगुल चौडे पना।।। फर्णका उपान्त अर्थात् यणाय नेत्रांतसे लेकर भ्रू सम पत्रसे, पाहे वारा फरना चाहिये, पानका छेद और मकुमारक अर्थात् फर्णयोतके समीसा माग नेप्रमवन्धके समान करना चाहिये ॥७॥ वशिष्ठमनि फातेमा कान्तमा यंतर चार अंगुल करना चैक है. नीचेका मोध एक अंकुर वाराहीसंहिता। णानि यथोत्रमंगुलमेकं भवति संख्या ॥ २ ॥ देवागारद्वारस्याओरत - यस्तृतीयोऽशः । तसिण्डिकाप्रमाणं प्रतिमा तद्विगुणारिमाणा ॥ ३॥ - एलपमाणैदिश विस्तीर्णमायतं च मुखम् । नमनिता तु चतुर्दश देण प्रतिसे कथितम् ॥ ४॥ नासाललाटचिवुयीवाश्चतुरंगुलालया करें। वे अंगडेच हनुके चिबुकं तु व्यंगुलं विस्तृतम्॥५॥ अष्टांगुलं ललाट विस्तारायंउटर परे शंसी । चतुरंगलो तु शंखा को तु व्यंगुलं पृथुली ॥ ६ ॥ कर्णोदः कार्योऽर्धपञ्चमे भूसमेन सूत्रेण । कर्णश्रोत्रः सुकुमारकं च नयनाथकान ॥ ७ ॥ चतुरंगुलं वसिष्ठः कथयति नेत्रान्तकर्णयोर्विवरम् । अधरोंऽgar माणस्तस्पार्थेनोत्तरोष्ठश्च ॥ ८ ॥ अधायुला तु गोच्छा वकं चढरंगुठान रज, आठ रजका वालाग्र, आठ वालाग्रको लिक्षा, आठ लिक्षाकी यूश, आउ पूरा यव और आठ यवका एक अंगुल होता':.: हैं. एक अंगुल संख्या होती है ॥२॥ घटाकर जो वच रहे उसकी जो तिहाई हो वह पिण्डिका (मूर्तिकी पीठ) कादर है और पिण्डिका प्रमाणसे प्रतिमा (मतिका प्रमाण दूना होना चाहिये ।। जितनी ऊंचाई प्रतिमाको आवे उसके वारदमाग कर एक र भागके किर में माग को. वह एक अंगुल होता है, क्योंकि सप प्रतिमा अपने र अंगुल प्रमाने एक सौ आठ अंगुल होती है. प्रतिमा मुख अपने अंगुल प्रमाण वाहन चौडा और चौदह अंगुल लम्बा हो ऐसा नालाजित नाम आचार्यने कहा है की मान विदेशका है ।। ४ प्रातमा नासिका, लाट, ठोडी, गरदन और पर थपने अंगुल प्रमाणसे चार गुम्नाने चाहिये. इन दो र करनी चाहिये, मुख चार अंगुल या मोर मंगु चौडा रसना और भापाटीकासाहिता म०५८। (२५७) कार्यम् । विपुलं तु साधर्मगुलं मध्याचम्पंगुलं म्याचम् ॥ ५॥ व्यंगुरतुल्पी नासापुटी च नासा पुटायतो झेया । स्याद् व्यंगुलमुच्छापधतुरंगुटमन्वरं चाक्ष्णोः ॥ १० ॥ बंगुलमितोऽशिकोशो वे ने ये तविजागिका ताराह वारापश्चाशो नेत्रविकाशोशुलं भवति ॥ १३ ॥ पर्यन्तात्रपतं दश वो. चांगुलं वषोर्टसाः । धूमध्य ब्यंगुटकं गांगुलचतुफम् ॥१० कार्यातु केशरेखा भूपन्धसमांसुटायपिस्तीर्णा । नेत्रान्ले करवीरकमान्यो- गुलमतिमम् ॥ १३ ॥ द्वात्रिंशसारणाहाचतुर्दशापामनोगतानि शिरः। बादश तु चित्रकर्मणि दृश्पन्ने विशतिरहश्याः ॥१४॥ आर मकेशनियर पोटश देण नमनियोक्तम् । पीया दश विस्तीर्णा परिणाहादिति का ॥ १५॥ कण्ठाद्वादश हृदयं हृदयानाविध तत् पमाणेन । नाभीमप्यान्मदा तरं च तनुल्यमेवोनम् ॥ १६ ॥ उरु चांगुलमान चतुर्यता विशसिया मुख अर्थात् नसिह मादि देवताओंका फैला हुमा मुख तीन भंगुल बोरकर ९॥ • नामिकाफे दोनों पुट दो दो मेगुलके को मार पुटों के भमरा नाशिकरोड जाने. नासिकाकी ऊँचाई दो मंगुठ और दोनों नेत्रों के बीच पार मंजस रखना पाहिये ।। १० । नेफा कोश दो मंज, नेत्र दाना दोर गुप्त, in ( तितके बल्य तारा, नाराके परमांश कल्प र पनारे और मंत्री . एक भंगुलकी करे ॥ ११॥ एक भाके भन्त से दूसरे मा. पन्तत: अंगुल रखना चाहिये, माघ गुरु भूपी चौई दोनों पर मसभागदो- और एक भीको सम्पाई चार पार भंगुल करनी चाहिये ॥ १२ ॥ मापा फेशरेला पन्ध दल्य परे भोर माघ गुल पोरी बायको भंवमें एक अंगुलका कारक परे जिसको पिकामी का अंगुष सम्बा, चौदा मंगुल पोगविर बनाना चाहिये, जो कि बनारस वो उसमें सिर पर भगुरु दिसलाई पाता है और Trahest भोर रहते १ नहीं दीख परते ॥ १४ ॥ नमितभावाने मुखपत रिस्तार सोलर मंगुल का दौरा रिस्टार दमा का कर व सम्पास गुना ५ ॥ो मारे माग सरला मंत भंवर सराव, दरसे नामिता और नानिमाले सिर मंगुती वा ॥१॥ अरु मा c स २८ करने चाहिये. मोगे उपर से पार र पारसी पर -- माग करे. वह एक अंगुल होता है, क्योंकि सब प्रतिमा अपने २ अंगुर मार्ग ( २५६). जितनी ऊंचाई मतिमाकी आवे उसके बारह भाग कर एक २ भागके सिर माथा होता है; माथेसे दोनों मोर परे दो दो अंगुल प्रमाण (क्लपये)। कनपटीको सम्बाई चार २ मंगुल स्खे, फर्ण दो दो अंगुल चौडे बना। फर्णका उपान्त अर्याद कर्णान नेत्रांतसे लेकर भ्रू सम सघसे, ग्राहे पार करना चाहिये; कानका छेद और मकुमारफ अर्थात् कर्णखोतके समीप कान्तका अंतर चार यंगुट करना बैंक है. नीचेका मोष्ट एकत्र माग नेप्रमवन्धके समान करना चाहिये।॥७॥ वशिष्टमुनि कहते परका यो याध मंगुल राना चाहिये ॥८॥गोच्या मांध र करनी चाहिये, मुरा चार अंगुक हाबा भोर टेद मंगुल चौरा रसना वाराहीसंहिता । णानि यथोत्तरमंगुलमेकं भवति संख्या ॥ २ ॥ देवागारद्वारस्पाटोगोर यस्तृतीयोऽशः । तसिण्डिकाप्रमाणं प्रतिमा तद्विगुणपरिमाणा ॥ ३॥ एलपमाङ्गदिश विस्तीर्णमायतं च मुखम् । नग्नजिता तु चतुर्दश देषेष प्रति कथितम् ॥ ४॥ नासाललाटचिबुकमीवाश्चतुरंगुलास्तया की । वे अंगुळे । हनुके चिबुकं तु व्यंगुलं विस्तृतम्॥५॥ अष्टांगुलं ललाटं विस्ताराव्या परे शंखो। चतुरंगुली तु शंखी कर्णो तु व्यंगुलं पृथुली ॥ ६ ॥ कर्णोद कार्योऽर्धपश्चमे चूसमेन सूत्रेण । कर्णश्रोत्रः सुकुमारकं च नयनपचन्दनन ॥ ७ ॥ चतुरंगलं वसिष्ठः कथयति नेत्रान्तकर्णयोर्विवरम् । अधरोऽवटा माणस्तस्यानोत्तरोष्ठश्च ॥ ८ ॥ अायला तु गोच्छा वत्रं चतुरंगुनार रज, आठ रजका वालाग्र, आठ वालाग्रको लिक्षा, आठ लिक्षाकी यूका, आउ यूट यव और आठ यवका एक अंगुल होता है, इस प्रकार यह प्रमाण उत्तरोतर मार हैं. एक अंगुल संख्या होती है ॥ २॥ देवमंदिरके हारको ऊँचाईमें उसका अमर घटाकर जो वच रहे उसकी जो तिहाई हो वह पिण्डिका (मूर्तिकी पीठ) क्यान्न है और पिण्डिका प्रमाणसे मतिमा (मर्षि काममाण दूना होना चाहिये ।। एक सौ आठ अंगुल होती है. प्रतिमाका मुख अपने अंगुल प्रमाण वार में चौड़ा और चौदह अंगुल लम्बा हो ऐसा नाति नाम आचार्यने कहा है। मान द्रविडदेशका है ।। ४ ॥ प्रतिमा नासिका, ललाट, ठोडी, गरदन और र अपने अंगुल प्रमाणसे चार अंगुल सम्पबनाने चाहिये. इन दो र उम्मे पनावे, चियुकको चौडाई दो अंगुल होnan आठ अंगुर है।
- मापाटीकासाहिता ०५८। पतियाहू लंगुलचतुष्कम् ॥ २५॥ पोडरा पाहू मूले परिणाहावा- हो च । विस्तारण करतलं पडंगुलं सन दैर्येण ॥ २६ ॥ पञ्चांगु- रामदेशिनी सम्पपदलहाना । अनया तुल्या चानामिका कनिशा तु २७ ॥ पर्वयगुडः शेषांगुलपविनिविनिः कार्याः। नखारिमाणं मा पगोत ॥ २८ ॥ देशानुरूपनपगपालारतिनिः कार्या। सगका सनिहिता वृदिदा भाति ॥ २९ ॥ दशरथतनयो रामो रोचनिः श्रुतं शिम् । द्वादशहान्या रोपा प्रवरसमन्यूनारिमाणा का भुगो भावांचतुर्भुजो विभुज एव वा विगुः। श्रीवत्सादिन. तुभमणिभूपितोरस्कः॥ ३१ ॥ अतनीकुमुनश्यामः पीताम्बरनियमनः पाहुका चार अंगुल रखना चाहिये ॥ २५ ॥ बाइके पूटमें वोटर भंगुल में अर्थात् प्रोटके समीप यारह बंगुल परिणाह रखना चाहिये और चौडाई : अंगुल और लम्बाई सात अंगुल रानी चाहिये ॥ २६ ॥ समीपी अंगुली प्रदेशिनी, उसके आगेगी मध्यमा, उससे आगे अना- और अनामिासे भागेगी अंगुली कनिया कहानी है और एक २ गुना न पोहरे होते हैं. मम्पमा परि मंगुल लम्बी परे, मायाको विषले पोर- आधा घटा दे तो मदेशिनीकी लम्बाई होती है और प्रदेशिनार गुल्मी मा दोती है, जनानापने एसपीमा घटानेरो पनिशा लम्बाई को ७॥ अंडे के दो पौरुरे और शेष चार भंगुलमों के तीन २ पाररे करने और सप गलियों के नरोकी लम्बाई अपने २ पके भयो र २८ ॥ भाने २ देशके अनुसार प्रतिमाके भूषण, वेप, असंबर (संगर) पर पना; सगक प्रतिमा देतास सानिध्य रोना है, इसका टेकी पर प्रवरसे वृद्धि परती है ॥ २९ ॥ सरयर पुत्र रदार भोर पिनके पुत्र बाकी मविका उसम्मी पनारे बातम प्रतिमा एक सौ भाउ अंगुल यो उतन, भार सम्मो मध्यम, चौरासी गुरु लम्बी मविश नि दोहै। गारी प्रविमा भन, न नपरा टिभुज बनारसमा र और वास्तममगि प्राविमा सारपसोमायसन परे ॥३०॥११॥ के पुपके समान माडमास रंग को, पीउ रख परिरे, मीत - Sad पले मोर मदिनाके दाने तीन हाय. सा. पदा.
M (अंगुष्ठके समीपवी अंगुली) तीन भंघुल लम्बी रस्से ॥ १८ ऊँचाई सा अंगुल कदो है, इसी दिसायसे और अंगुलियों 3/22 अंगुली प्रदेशिनीसे अष्टांश अष्टांश कम करके क्रमके अनुसार पारे मतिमासा रक्षण जाननेवालोंने अंगूठेके नसती लम्बाई पौन अंडी दोष भंगुलियों के नसों की लम्बाई आध २ अंगुल करे नपरा रो" न्यून बना जाय जिसमें अंगुली और नसमुन्दर दास ॥२00t मागकी विशासना चौदद अंगुल और विस्तार पांच अंगुरपा,iit मागास्तार गात अंगुल थोर मिशालता इफीर मंगुर सी नानु के नयरा विस्तार आठ अंगुल और विशालता चौरी मध्यमागमें चौदह अंगुलरिस्तीर्ण होते और मांग गुज :: १॥ २२॥ परिमारिनार मटारह भगुड़ और कारगी in तीनानिरा सिस्तार भार वेध (गहराई) एक २ मंगुर ननिको बीच टेकामध्यमाग परिणाद पपासांग भंगुर : ला दर मा अंग मोर स्तनों के प्रारkि २४॥गदम्बाई गादगेर मार (२५८) वाराहीसंहिता । जर्छ । जानुकपिच्छे चतुरंगुले च पादौ च तनुल्यौ ॥ १५ पट् पृथुनया च पादौ विकायतांगौ । पञ्चांगुलपरिमाही .. दीर्घा ॥ १८ ॥ अष्टांशाटांशोना शेपांगुलयः कमेण कर्तव्याः। गुलमुत्रोधों गुटकस्योक्तः ॥ १९॥ अंगुष्टनसः १९५० तज्ज्ञैः। शेपतखानाम गुलं क्रमाव किञ्चिदूनं वा ॥ २० ॥ हमतुर्दशोक्तस्तु विस्तरः पञ्च । मध्ये तु सप्त विपुटा परिणाह सात ॥ २३ ॥ अष्टौ तु जानुमध्ये वैपुल्यं ज्यष्टकं तु परिणाहः ।। दशोरू मध्यं द्विगुणश्च तत्वारिधिः ॥ २२ ॥ कटिरष्टाश त्रिपुरा शचतुर्युता परिधौ। अंगुलमेकं नाभिधेन तथा प्रमाणेन ५ २३।। शद् द्वियुता नानीमध्येन मध्यपरिणाहः । स्तनयोः पोडश १ . : पगुलिके ॥ २४ ॥ कार्यावष्टावंसी द्वादश बाहू तथा प्रचार कार अंगुल करे ॥ १७ ॥ बारह अंगुल लम्बे और छ: अंगुन । चाहिये, दोनों पापोंके गूढ तीन अंगुल लम्बे बनाने में M याबार भार प्रसार करने में।
माषाटीकासाहिता म०५९ । पूजां वृक्षं संस्पृश्य च ब्रूयात् ॥९॥ अचार्यममुकस्य वं देवस्य परिकलितः। ममस्ते वृक्ष पूनेयं विधिपत्संप्रगृह्यताम् ॥ १० ॥ यानीह भूतानि वन्ति नानि बलि गृहीत्वा विधियत्ययुक्तम् । अन्यत्र यासं परिकलयन्तु क्षमन्तु तान्यद्य नमोऽस्तु तेभ्यः ॥ ११ ॥ वृतं प्रभाते सटिलेन सिस्वा पूर्वानरस्यां दिगि सनिरुत्य । मध्वाग्पलिमेन कुठारकेण प्रदक्षिणं शेषमतोऽभिहन्याद ॥१२॥ पूर्वण पूर्वोत्तरतोऽथवोदक् पतेपदा वृद्धिकरस्तया स्यात् । आमेसकोगाव क्रमशोऽभिदाई वोगरोगास्तुरमक्षयम ॥ १३ ॥ यमोसमास्मिन्वन गरे मिपातविच्छेदन वृक्षगर्भाः । इन्द्रध्वजे पास्तुनि च पविष्टाः पूर्व मया नेत्र तथैव योज्याः ॥ १४ ॥ इति भीवराहमिहिरकतो पृहत्संहितायां धनसंपदेशो नाम- कोनपटितमोऽध्यायः॥ ५९॥ विनायकादिकी राधिक समय पूना करके वृक्षास करके यह मंत्र परे ॥ ९ ॥ देवम ! म अमुक देवताको पूजाफे लिये परिपत इप तुमको नमानस पूजाको विधिविधानसे ग्रहण य.रो. इस वृक्षपर जो भाणो बारा पाने , पुक्त पूजाको ग्रहण करके गौर की वास कलिलत घरे बाज बहसमा यो जिनसे नमस्कार करता है.' ममुकस्प' के स्थानमें पध्धत देशवापर नाम बम ॥१०॥ ११ ॥ प्रभातके समय वृक्षको जलसे सींच बु.टारो और सुपडे और फिर उस कुटारसे शानकोणमें पहले वृक्षको कर समय कम शेष वृक्षको काट ले ॥ १२ ॥ कटा हुमा वृक्ष शिनरोण करा उसादिशामें गिरे तो पूर्ति करनेवाला होता है। आमशेण भादि पायो गरे ती क्रमसे ममिदार, रोग भोर पोगेका नारा सा प . इस रनमशाध्यापमें जो हमने नहीं बहा अर्थात् इसके निपात, विपन, * पर्भ मादिशाम बशुभ फनी गरे, सब इन्द्रमा रास्तापिपाध्यायमें हमरमाये हैं, उसी भांति यानी उन तमाचा सारे भाव मादी एम मशुभ फल सभी भाने ॥ १४ ॥ वि श्रीरामदिरापार्यविधितायो शास. परिमोबदेशीरदादर स्टन्य- परितरतदेशमसादनिवरिचिता मारायबापानेकोनमापायः २९.
पक्षी पूजा करे ॥ ८॥ देवता, पिता, पिशाच, गरम, नाग, अमापन ॥ वेलोसे पीडित वृक्ष, विजलीके मारे वृक्ष, पवन करके तोडे हुए वृक्षपिने तोडे हुए, सखे, अनिसे जले हुए वृक्ष और मधुनिलय अर्थात् जिनमें शराब छचा लगा हो ॥ २ ॥३॥ ऐसे वृक्ष त्यागने चाहिये। इनके पाटमे मीन ११. वनम इस मांति शुभ वृक्ष देखकर उसके समीप जाय वलि और पुगोमो लिथुक और स्पन्दन यह वृक्ष पैश्योंको शुभ फल देते. तंद, नागरेसर में, भजुन भौर साल यह गुदा के लिये शुमदायक ॥६॥ लिंग अपनी वृक्षरी दिशामा अनुसार स्थापित को इसी भांति वृक्षके अपरके मागको माके पद पनाने चाहिये, इस कारण काटनेसे पाले वृक्षमें चारों दिशानी उमंमाग अथवा मधोमागके चिट कर देने उचित॥७॥सीर, उदोरिन ( एकरस भोजनपदाव)मादिमश्य, मघ, पुण, 7 'बाराहीसंहिता। मनाः। चैत्यसरित्सङ्गमसम्भवाथ घटतोयसिताश्च ॥ २ ॥ कुम्जानुसारडी- निपीडिता वजमारुतोपहताः। स्वपतितहस्तिनिपीडितशुष्कानिष्टुटमधुरिटया- ॥ ३ ॥ तरवो वनयितव्याः शुजदाः स्युः स्निग्धपत्रकुमुमफटाः। अनिल गत्या कुर्याद पूजां सबलिपुष्पाम् ॥ ४ ॥ सुरदारुचन्दनशमीमधूकतरवः शुजा द्विजातीनाम् । क्षत्रस्याऽरिष्टाश्वत्थखदिरबिल्वा विवृद्धिकराः ॥ ५ ॥ वैश्यास जीवकखदिरसिन्धुकस्पन्दनाश्च शुभफलदाः। तिन्दुककेसरसाऽर्जुनाप्रशा- लाश्च शूद्राणाम् ॥ ६ ॥ लिङ्ग वा प्रतिमा वा द्रुमवत् स्थाप्या यथादि यस्माद । तस्माचिह्नायितव्या दिशो द्रुमस्योऽयमयवाऽधः ॥ ७ ॥ परमानने दकौदनदधिपललोलोपिकाभिस्यैः। मौः कुसुमधुर्गन्धैव तरुं समापन ॥८॥ सुरपितृपिशाचराक्षसभुजगासुरगणविनायकाद्यानाम् । लत्ता याग, तपस्वियोंके आश्रम, चैत्य और नदियोंके सङ्गमस्थानों में उत्पन्न हुए १ पडोंके जलसे सिंचे हुए वृक्ष, कुपडे वृक्ष, एक वृक्षके सहारेसे उपजे हुए 15 अनानेमें अशुम होता है, जिन वृक्षोंके पचे, फल, फल स्निग्ध हो वे या शून, ग्स वृक्षको पुना करे ॥ ४॥ देवदारु, चन्दन, शमी और महुआ सा ब्राह्मणों के लिये शुभ हैं अर्थात् ब्राह्मण इन काठको देवप्रतिमा बकरे की पीपल, सैर और पेल या मात्रियों को याद करनवाल वृक्ष है ॥ ५ ॥ जोर, रापो मापारीकासादिवा ०६०। भद्रासनसतशीर्पोरधानपादो न्यसेत्यतिमाम् ॥ ७॥ पक्षाश्वत्योदुम्बरशिपिं-- पटसम्भः कपापजले। मनन्ट संहिताभिः सपिपिकि कुशाद्यामिः॥८॥ पिपलोद्भुतपर्वतवल्मीकसरित्समागमतटेषु । मसर-सु च मृभिः सपश्चग- ध्येच तीर्थजलेः ॥९॥ पूर्वतिरस्कां लातां सुवर्णरलाम्बुभिश्च ससुगन्पैः । ! नानातूरनिनादः पुण्याहर्वेदनिपः ॥१०॥ ऐन्द्रयां दिशीन्द्रलिजा मन्त्राः । माग्दाक्षिणेऽमिलिझाब । जातव्या दिनमुख्यैः पूज्यास्ते दक्षिणाभिश्च ॥ ११ ॥ यो देवः संस्थाप्पस्तन्मवैभानलं दिजो जुहुपात् । अमिनिमित्तानि मया १ पोक्तानीन्द्रध्वजोमाये ॥ १२ ॥ धूमाकुलोऽसिव्यो मुहुर्मुहुर्बिस्फुलिङ्गकन्न शुभः। होतुः स्मृतिलोसो वा प्रसपणं वाशु प्रोक्तम् ॥ १३ ॥ लातामभुक्त- पखां स्वस्तां पूजितां कुमुमगन्धः । प्रतिमा स्वास्तीर्णायां शप्यायां स्थारकः कुपांद ॥ १४ ॥ सुमां सुनृत्यगीतिजागरणैः सम्पगेवमधिवास्य । दैवज्ञसम्पदिष्टे सिंहासन) के ऊपर रखे और प्रतिमाके पां उपधान तकियाके ऊपर रक्खे ॥ ७॥ पाकर, पीपल, गूलर, सिरस और घड इन वृक्षोंके पत्तोंका कपायनल कुशाको भादि लेकर मंगल नामवाली जपा, पुनर्नया, विष्णुमाता आदि औषधि ॥ ८ ॥ छायी और कृपकी उदवाडी मृतिका, कमलयुक्त सरोधाको मृचिका, पंचगव्य सहित तीथों के जल ॥९॥ मुवर्ण और रनयुक्त जल इन सबसे प्रतिमानो सान करा, उसका गिर पूर्वकी और करके स्थापन करे. उस समय भानि २ के तुम्ही भादि बाजे बनें. पुण्याहवाचन और वेदधानि ब्रह्मण करें ॥ १० ॥ उत्तम ब्राह्मण पूर्वदिशामें इन्द्र के मंत्र और यामकोण, अनिके मंत्र ज, यजमान उन ब्राह्मणों की दक्षिणासे पूजा करे ॥ ११ ॥ जिस देवतारी प्रतिष्ठा करनी हो उमरे मंत्राये साक्षण अग्निमें हवन करे, अमिके शुभ अशुभ लक्षण हमने इन्द्रधनाध्यागमें कदै हैं ॥ १२ ॥ जो उनके समय अग्नि धूमसे आउल हो, उसकी चाला बाई और घूमती हो,कारंवार शब्द को भी उसमें शिनगारो उडें तो यह शुभ नहीं होना, दान फरनेवालेकी स्मृतिलोग हो जाय (मंत्र आदिका स्मरण न रहे ) अथवा उसस महर्पण हो अर्थात् जहां हवन करने पहले बैठा है वहां परक जाय तोमी अनुम है ।। १३ ॥ प्रतिमाको सान कपर नये वस्त्र धारण कराय, भूपण दिरो अलंकृत कर, पुष्प और गंधले उसको पूजन कर उचम भांतिसे विजेई दायाने उपर उरा प्रविमा प्रनिष्ठा कानाला पुरुष स्थापन करे ॥ १४ ॥ सोई हुई उस प्रतिमाका नृत्यगातसहित जागरणों करके इस प्रकार मलीभांति ऊपर कुदा विद्याप प्रतिमाको उसके ऊपर मुलादेप्रतिमाका शिर मद्रासन( पनोंसे ढका हो ॥ १॥ उस मंडपकी पूर्वदिशामें पुष्पमाला और पताका दिन र्णकी लगावे, अग्निकोणमें लाल रंगकी, दक्षिण और मैतकोणमें कृष्णवर्ण ॥१ पश्चिममें श्वेत, वायव्यकोणमें पांडुर, उत्तरमें चित्रवर्ण और मंडपके ईशानकर शोभाके लिये पीले रंगकी पुष्पमाला और पताका लगानी उचित है। वनाई देवप्रतिमा लोगोंका हित करती है, सुवर्णकी प्रतिमा शरीरपुष्टि देती है। काठकी और मिट्टीको देवप्रतिमा, आयुष, लक्ष्मी, वर और जय देती है. मम चांदीकी नीति करती है, तांबेकी संतानकी वृद्धि करती है. शिला अर्थ णकी बनी प्रतिमा अथवा शिवलिंग बहुत भूमिका लाम करते हैं ॥५॥ पुरुषका और वंशका नाश करती है और जिस प्रतिमामें गढा हो वह अनार रोग और अनेक प्रकारके उपद्रव करती है।॥ ६॥ अश्विासन मंडप को स्थंडिल बनाय उसको गोवर आदिसे लीपे, उसके ऊपर कल रेत और बनुरो बारादीसहिवा। अथ पष्टितमोऽध्यायः प्रतिमाप्रतिष्ठापन. दिशि सौम्यायां कुर्यादधिवासनमण्डपं बुधः प्राग्वा । तोरणचतुष्टयां शस्तद्रुमपन्छवच्छन्नम् ॥ १॥ पूर्व जागे चित्राः सनः पताकाच मण्डपस्योगा। आनेय्यां दिशि रिक्ताः कृष्णाः स्युर्याम्यनेऋतयोः ॥ २ ॥ वेता दिश्यारस्त पायव्यायां तु पाण्डुरा एव । चित्राश्चोत्तसाचे पीताः पूर्वोत्तरे कार्याः ॥३॥ आयुःश्रीवलजयदा दारुमयी मृण्मयी तथा प्रतिमा। लोकहिताय मणिपको सौवर्णी पुष्टिदा भवति ॥ ४॥ रजतमयी कीर्तिकरी प्रजाविवृद्धिं करोति तात्र मयी । भूला तु महान्तं शैली प्रतिमाऽयवा लिङ्गम् ॥ ५ ॥ शंका प्रतिमा प्रधानपुरुष कुलं च घातयति । श्रोतहता रोगान् उपद्रवांश्चाक्षयाद कुरुते ॥ ६ ॥ मण्डामध्ये स्थण्डिलमुपलिप्यास्तीय सिकतयाऽथ कुछ। प्रतिष्ठा करनेवाला विद्वान् पूर्वदिशामें अधिवासन नामक प्रतिमाका संस्कार नेको मंडप बनावे, वह चारों दिशाओंमें चार तारणांसे युक्त हो और वृक्षों के कर पह प्रतिमा जिसके फिसी अंगमें कील जैसा खडा रह जाय वह प्रतिमा मुरा मापाटीकासहिता १०६१। शस्तम् ॥ २३ ॥ सामान्यमिदं समासनो लोकानां हित मया स्तम् । अधि- पासनसंनिवेशने सावित्रे पृथगेव विस्तरात् ॥ २२ ॥ इति भीवराहमिहिरकता बृहत्सं० प्रतिष्ठापनं नाम पष्टितमोऽध्यायः॥ ६ ॥ अथैकषष्टितमोऽध्यायः। गोलक्षण. पराशरः माह बृहदथाय गोलक्षणं पत्कियते ततोऽयम् । मया समामः शुभलक्षणास्ताः सर्वास्तथाप्यागमतोऽभिधास्ये ॥ १ ॥ मासाविलसमापो पकनयनाथ न शुभदा गावः । पचलचिपिटविषाणाः करटाः सरसरशवः ॥२॥ दशसमचतुईन्स्यः प्रलम्बमुण्डानना विनतपृष्टाः । हस्वस्थूलपांवा पर- मण्या दारितखुराध ॥ ३ ॥ श्यावातिदीर्घनिता गुल्फरनितनुनिरतिबृहनिर्ग। स्वाति नक्षत्र हो, मंगलके मियाय मौर वार हो, प्रतिष्ठा करनेराग मना दिन सेतो ऐसे समपमें देवताका स्थापन प्रभो ॥ २१ ॥ सर्व देव साधारण मतिमा प्रतिष्ठाविधान लोगोंको करपाण देनेवाला जो हमने संक्षेपसे का, समतियार मधिवासन मौर प्रतिधापनविधान विस्तारपूर्वक महगी मपरा मारित्र (सौरपास) में मव देवतामोंका अधिरासन और प्रतिष्ठापन मल्य र विस्तारसे का? ॥२२॥ इति श्रीवराहमिारापार्यविरचितायां बहत्संहितायां पविमोचरदेशोपनुरा- दायादवास्तव्यन्तिपलदेवमसादमिश्रविरचितापां मापाटीया परितमोजन्यायः ॥ १०॥ पराशरमुनिने अपने शिभ्य पादपको जो गोरक्षण कसा है, उस ते टेम इम संक्षेप करते हैं. सगी गौ शुभलभग रोती? साभी शारसे उनके पर मराम लक्षण कावे॥१॥ जिन गोगोंको आसे मांनुमोसे परी, पटी हों और करतो ग गौ शुम नहीं होती, परके समान नेपाली मी एन. जिनके सींग दिलने में मार चपटे रों रहगो शुभ नी. मला पौर साठ मिटर हुमा जिनका रंग रो भौर यधेके तुल्य जिनका मरोरा मौमी इस नोटो है॥२॥जिनके मुरतमें दस, सात रा बार दांव हों, जिनस मुग लम्स और र मर्याद दिना भोगकरो, मिनकी पीठ को जिन गरदन मेरी में , नो, मृगाली, चिया, अनुगधा, प्रागस विशेष पूजन करे. इस भांति देवमतिष्ठा करनेराठा पुरुष इस लोक कल्याण मागी होता है और परलोको स्वर्गवास पाता है ॥ १८॥ विष्णुको प्रतिश भामा (प्र) करें. मूर्यकी प्रतिमा मग (शाकदीपके रहनेवाले ब्राह्मण).it प्रतिक्षा भस्म धारण करनेगले ब्राह्मण करें. ग्राझी मादि मारसमाको मतिया xग करें. महिनीयात् युदिी मतिना शांत विधाले शास्स (Ta में. जिनकी पति नन (दिगम्बरमपणक) करें. जो मनुष्य निमा उदर मक्काउन दानाको प्रतिक्षा यादि मर क्रिया सम्मोकपात ॥ १९॥ मगमग हो, गुमान हो, चन्द्रमा नास्पति के पहागने रिपोin 2 और रिवर नसांत हो, मौम्य ग्रा, पंचम, 'नाम, सम, प, मारसे परस्पना हो। २. परमादतीय, पत्र, दशम भोर पास (२६८) पाराहीसंहिता। काले संस्थापनं कुर्यात् ॥ १५॥ भायर्य कुसुमक्वानुलेपनैः शंतनू घोपैः। प्रादक्षिण्येन नयेदायतनस्य प्रयत्लेन ॥ १६॥ कृत्वा बति । सम्पूज्य बाप्मणांध सत्यांश्च । दत्त्वा हिरण्यशकलं विनिक्षिोलिन्डि वने ॥ १७॥ स्थापकदैवज्ञद्विजसत्यस्थपतीन् विशेषतोऽज्यर्च्य । कन्या जागी भवतीह परत्र च स्वर्गी ॥ १८ ॥ विष्णोर्भागवतान् मगाश्च धी शम्भोः समस्मद्विजान मातृणामपि मण्डलक्रमविदो विप्रान्निदुर्वसन शाक्यान् सर्वहितस्य शान्तमनसो नमान् जिनानां विदुर्य यं देवमुगानि स्वविधिना तेस्तस्य कार्या मिया ॥१९॥ उदगयने सितपक्षे शिशिरराज च जीववर्गस्थे। लमे स्थिरे स्थिरांशे सौम्यै(धर्मकेन्द्रगतः ॥२०॥ चयसंस्थैर्भुवमृदुइरितिष्यवायुदेवेषु । विकुने दिनेनुकूले देवानां स्या अधिवासन कर ज्योतिपीके बतलाये हुए शुभ मुहूर्त में उसका स्थापन करे ॥१२ उस मतिमाको पुष्प, वस और चन्दनादि अनुलेपनोंसे पूजित कर अधिक मंडपसे उठाप प्रासादसे प्रदक्षिण हो यानपूर्वक गर्मगृहमें ले जाये उस समय ई. तूर्य मादिवाने बनाये जा ॥ १६ ॥ वहां जाय पदुतसा वाले देकर , भार सभ्य अर्थात् उस समामें स्थित मनुष्योंका वस दक्षिणा आदिसे पूजन पिरिका(पीठ) के गमें सोनेका दुकगागल उसके ऊपर प्रतिमाको स्थापन करे। स्थापक (प्रतिष्ठा करनेवाला), ज्योतिषी, प्रामण, सभ्य ( कारीगर ) इन ॥ पारी .
मापाटीकासहिता म०६१। (७१) तनहत्वोपवणा सुकुक्षपः राजवाध ॥१०॥आताप्रसंहाखुरा व्यूढोरका वृहत्कायुक्ताः। लिपटगानुत्तमोमाणस्तानातु ॥ ११॥ तना- स्पृग्वालपयो रक्तान्तविलोचना महोच्छासाः । सिंहस्कन्ध स्तन्वल्पकवाला पूनिताः सुगताः ॥ १३ ॥'वामावर्त मे दक्षिगपाः च दक्षिणाः । शुभदा भवन्त्यनडहो जंघानिधणकानिज्ञानिः ॥ १३॥ पैदूर्यन हिकापरेक्षणाः स्थूल- भेत्राणिः । पाणिनिरस्फुटितानित यस्ताः सर्वेऽति भारपहाः ॥ १४ ॥ प्राणोद्देशे सपलिजिरिमुखः सिनथ दक्षिणतः । कमलोसललामान सुबगला- धिर्वाजिनुल्पनवः ॥ १५॥ लम्बे पगर्मपोदरम संक्षिप्तपक्षणाकोडः । ज्ञेयो भारावसहो जरेवतुल्पथ शस्तफलः ॥ १६ ॥ सितपर्णः रिङ्गाक्षस्तान ोटे पतले और ऊंचे जिनके कान हों, मुन्दर पेट हो, सीधी अंधा हो १०॥ वांवके वर्ण और मिले हुए खुर हो, छाती र हो, पड़ा ककुद ( थूही) हो, निग्ध (चिकने) कोमल और ननु (पतले) जिनके त्वचा और रोम हो. तांबेके रंगके शरीर और सांग हो ॥ १९ ॥ पतली और भूमिको स्पर्श करनेवाली जिनकी पूंछ हो, जिनके नेत्रों के अंत लाल हो, वडा वास लेनेवाले हों, सि.को जिनके कंधे हों, पतला और छोरा जिनका गलबंपल, मुन्दर जिनको नाति हो ऐसे वृक्षम अच्छे होने हैं ।।१२।। जिनके वाममागमें वांई ओर घूमे हुए आरते (मरी) और दक्षिणभाग दहिनी ओर घूमे हुए यावर्त और जिनकी जंया भेटेकी अंघा- ओंके समान हों ऐसे बैल शुम होते हैं ॥ १३ ॥ दुर्गमणिको समान जिनके नेत्र हों, निवारीपुष्पके समान जिनके नेघ हो अर्थात् नेत्रों के वाहिर चारों और शुक्छ रेखा हों, जउ बुटुंदके समान जिनके नेत्र हों, जिनके नेत्र और शरीर स्थल हों, सुरके छले भाग जिनके फूटे हुए न हो सो सब वैठ गुप होते हैं और भार उठा सकते हैं।॥ १४ ॥ जिस पल को नाम बलि पडे, विलाप के नुल्य जिसस मुख हो, दहिना भाग जिसका श्वेत हो, स्मल (नीलकमल ) या लासके समान जिसकी कांति हो, अरछी पूंछ हो, गमनमें घोडेसा वेग हो ॥ १५ ॥ लम्बे पण हो, भेटेवासा पेट हो, वंक्षण (पिछली जंपा और अपणोंका मध्यभाग) और कोड ( मगली जंघामका मायमाग) जिसको संकुचित हों ऐसा पल भार उटाने में और मार्ग चलने में समर्थ होता है, घोडेको नगवर जिसका वेग हो वह बल शुमही होता है ॥ १६ ॥ जिस.पला शेव वर्ग हो, वादक रंगके सांग मोष्ट हों, छोटी स्फिकू (कटिस्थमांसांड) हों; नांवेके रंगके वाल और जीम वहभी शुभ नहीं होता और स्थूल व वहुत लम्बे हैं अंडकोश जिसके, शिसमें करके व्याप्त है कोड जिसका, स्थूल शिराओं करके व्याप्त हैं कपोल जितके तीन स्थानोंसे जो मेहन करे अर्थात् जिसके दोनों नेत्रोंसे आंद टपके और सिने उसका त्यागही करना चाहिये, बल्कि वहभी यूथका नाश करनेवाला होता है 119 जिसके शरीरमें काले फूल पड रहे हों और बिल्लीके समान जिसके नेत्र हो ऐसा हुआ बैल ऐसे पैर उठाये जैसे कर्दममें गड़े हुए पैरोंको बड़े पत्नसे उसाडते । जिनकी ग्रीवा दुर्बल हो, नेत्र काचरे हों, पीठ छोटी या देवी हुई हो वह पे मार उठानेमें समर्थ नहीं होते हैं ॥९॥ मल.मिले हुए और तारके रंगो जिनो (२७०) बारादीतीदेवा। अतिका काहा नेटा हीताविकम्य ॥ ४॥ वृानोऽपस्यागी लम्मरगः सिरातकोडः । स्थडचिराचितगण्डनित्यानं मेहले यथ ३५ मानांराक्षः कीस करटो यान शुनो विनत्र । रुगोउनालनिकमा यूयस्य बातकरः ॥ ६ ॥ स्थलराउन्नगिङ्गः मितोदरः छष्णतास्वर्णध गृहनातोडी यायो यूथविनावाहो वृततः ॥ ७॥ श्यामपुभविता भस्माऽगनितोषिडाक्षः । विमाणानिशुभं करोति वामः परिगृहीत ॥८॥ ये चोदरनिपादान पवादिषयोजिताः काग्रीवाः। काचरलयता दीनाथ पृठतस्ते न भारसहाः ॥ ९॥ मृदसंहलतानोगतनुक्तिजस्तावनालाविज्ञान और मोटी हो, जिनका मध्यमाग जौके तुल्य हो अर्थात् बीचसे बहुत मोटा जिनके खुर बहुत फट रहे हों, जिनका नाम शारंगको और बहुत लम्बी हो- जिनके ढकने बहुत छोटे अथवा वक्त वडे हों, जिनका यूही बहुत ऊंचा है, जिनका देह सदा दुवला रहे और जिनका कोई अंगहीन अथवा अधिक हो ऐसी गौ शुभ नहीं होती है ॥ ३ ॥ ४॥ पहले कहे हुए लक्षणोंसे युक्त वृष 'मूत्र गिरे ॥ ५ ॥ विडालकेसे जिसके नेत्र हों, जिसका कपिल अया करट नी रक्त रंग हो ऐसा वृप ब्राह्मणकोभी शुभ नहीं होता कर और वर्णाको तौ वाता क्या है जिसके ओठ, ताल और जिवा काले रंग के हो और जो वृप वेतन अर्थात् डरनेवाला हो वह अपने यूथका नाश करता है ॥ ६॥ जिसका गोष मणि ( लिंगका अग्रभाग) और शृंग स्थूल हो, श्वतवर्णका पेट हो और इस का रंग कृष्ण और श्वत मिलकर हा साप घरमें उत्पन्न हुआ हो वीची वृप ग्रहण किया हुआ ब्राह्मणों कोभी शुभ नहीं होगा Me मारके नीचे जोर हो दी (२७५) मापाटीक्यसहिता २०६५। अथ पंचपष्टितमोऽध्यायः। न छागलक्षण. जागशुभाशुभलक्षणमभिधास्पे नवदशाटवन्तास्ते । धन्याः स्थाप्या वेश्मान याज्या सनदन्ता ये ॥ १ ॥ दक्षिणपार्च मण्डलमसितं शुभस्य शुभफलं "ति। ऋम्पनिमरणलोहितवर्णामां श्वेतमपि शुनदम् ॥२॥ स्तनवदवलम्बते कण्ठेऽजानां मणिः स विज्ञेयः । एकमणिः शुभफलरुदन्यतमा विधिमणयो ॥ ३ ॥ मुण्डाः सर्वे शुभदाः सर्वसिताः सर्वरुष्णदेहाच । थासिता सिता. धन्याः कपिलाधरणाच ॥ ४ ॥ विचरति यूथस्पाये प्रथमं पामोऽस- इते योऽनः । स शुनः सितमूर्धा या मूर्धनि वा रुचिमा यस्प ॥ ५॥ सप. कण्ठशिरा या तिलपिष्टनिाच ताम्रहक् शस्तः । उप्णचरणः सितो वा अव पारेका शुभ अशुभ उक्षण कहते हैं, जिनके नौ या दश या माठ दांत यह छ.ग गुम होते हैं और पामें रखने चाहिये. जिनके पाव दांव उनको न खे कारण कि वे अशुभ होते हैं ॥१॥शेत रंगके जागके दाहिने पाच काले ४ मंडल हो तो शुभ होता है. जिस छागका रंग ऋष्यमृगके तुल्य नीटा, पाहा सा लाल हो तो उसके दक्षिण पार्थ, शेतमण्डलभी शुभ दोबारे॥२॥ हे गडे में जो स्तनकी भोति लटकता है उसे मणि कावे . जिस के एक ग दो वह शुभ फल करता है और जिसके दो या तीन माणि रों या तो वहरी शुभ होते२॥३॥ विना सींगके सब जाग शुभ होते है जिनका सब हरीर से भरा सब शरीर कृष्ग हो वे छागशुभ वे है,जोग साधे का भार पेशेत रोवे गुम हो.जो जाग आधे पापड और आधे कृष्णा देसी [ होवे ॥४॥जो जग माने यके भागे यळे और सबसे पाले जसमें से शुभ सता है पानिससशिरमेन रोपवाजिवके शिस्ने कृपयनरी ते सही मर्याद एबिन्द हों वह शुभ होता है ऐसे मगर नाम उत्र ॥५॥जिसके मार सिस्में दूनो रंगके विन्दु रों, विलोके समान सईद व और पीव मिला दुभा जिसमभोर वा रंग दल जिसके घ. नेश संसार डा. ratो मार चारों पैर का ते पहा 5 जो कछु मा स्फटिक अथरा चांदकि तुल्य राल वर्ण हो और नीली रोगको चित्रित हो, कलशके समान जिसका आकार हो, सुन्दर जिसम।। (पीठको दी) हो गया लाल रंगका कछुआ हो और सरसों के लिये होपना कम राजाभाका गग्य वढाने के लिये होता है ॥२॥ वैदूर्यमणि मग जिन कनुपको काति हो, फंठ स्यूल हो, त्रिकोण आकार हो, यदि उमा हो मार पृषांत मुन्दर हो ऐसे कुर्मको मंगल लिये राना मानीarrii (२७४) वाराहीसंहिता। अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः। कूर्मलक्षण. स्फटिकरजतवर्णो मीलराजीविचित्रः कलशसदृशमूर्निचारुवंशव कूर्मः। अरुणसमवपुर्वा सर्पपाकारचित्रः सकलनृपमहत्त्वं मन्दिरस्थः करोति ।।। अअनङ्गश्यामतनुर्वा बिन्दुविचित्रोऽव्यङ्गशरीरः। सर्पशिरा वा स्यूठाने यः सोऽपि नृपाणां राष्ट्रविवृद्धये ॥ २ ॥ वैदूर्यत्विट् स्थूलकण्टत्रिशेनी गूढच्छिद्रश्वारुवंशश्च शस्तः । क्रीडावाप्यां तोयपूर्णे मणी वा कार्य में मङ्गलार्थ नरेन्द्रः ॥३॥ इति श्रीवराहमिहिरकतो वृहत्संहितायां कूर्मलक्षणं नाम चतुःषष्टितमोऽध्यायः॥ ६४ ॥ मुन्दर हों ऐसी कुशुटी राजाओंको चिरकालतक लक्ष्मी, यश, पिंजय, व में सम्पति देती है ॥ ३ ॥ इति श्रीवराहमिहिराचार्यविरचितायां वृहत्संहितायां पश्चिमोत्तरदेशीयर दायादरास्तभ्य-पंडितबलदेवप्रसादमिश्राविरचितायां मापाटीया विपष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३॥ चित्रित हो ऐसा कुर्म घामें स्थित हो तो सब राजाओंमें पढ़ाई करता मलन या भ्रमरके तुल्य जिस धर्मको याम शरीर मार निक गचित्र हो, सम्पूर्ण अंग पूर्ण हो, मप ममान शिर हो और गला पर जमे मो यो मटा में ग्वखे ॥३॥ हतियोगामागचापागचनागा वहीतायां पश्चिमोत्तादेशोपग- दापादनस्य पहिलोप्रमादाम या गवतायां मापापा चपापनमोऽध्यायः॥ १४॥ Tun भापाटीकासहिता अ०६८। (२८३) तनयो लिङ्गे शिरासन्तते स्थूलपन्थियुते सुखी मृदु करोत्यन्तं प्रमेहादिभिः ॥७॥ कोपनिगूढगा दीक्षिमेव वित्तपरिहीनाः। प्रवृत्तरोफसो लघुशिरा- लरिभान धनवन्तः ॥ ८॥ जलमृत्युरेकवृपणो विपमैः पीलंपटः समः शि- तिपः। हस्वायुधोद्धः प्रलम्बवृपणस्य शतमायुः॥ ९॥ रक्तैराव्या मणि- भिर्निद्रव्याः पाण्डुरैश्च मलिनेभ । सुखिनः सशम्दमूत्रा निःस्वा निःशब्दधाराष ॥१०॥ द्वित्रिचतुर्धाराभिः प्रदक्षिणावर्तवलितमूत्राभि । पृथ्वीपतयो क्षेपा विकीर्णमूत्राच धनहीनाः ॥३१॥ एकैव मूत्रधारा वलिता रूपप्रधानसुत- रात्री। निग्धोन्मतसममणयो धनवनितारननोक्कारः ॥ १२ ॥ मणिनिध मध्यनिनेः कन्यापितरो भवन्ति निःस्वाश्च । बहुपशुमानो मध्योनतम नात्यु- तो पुषवान होता है, जिसका लिंग नीचेको बहुत मुका हो वह दरिद्री होता है. नाडियोंसे व्याप्त लिंग हो चौ वह पुरुप अल्पपुषवाला होता है अर्थात् उसके पोडे पुत्र होते हैं. स्थूल प्रथिसे युक्त जिसका लिंग हो वह सुखी होता है, मा लिंगाला पुरुप प्रमेह आदि रोगोंसे मरता है॥७॥ कोश (चर्मको पैलोसो) में गिनका लिंग निगूट हो वे राजा होते हैं; दीर्घ और टूटे हुए लिंगराले धन- हनि होते हैं, सीधे और गोल व छोटे या नाडियोंसे व्याप्त लिंगवाले पुरुष धन- बान होते हैं ।। ८॥ एकही वृषणवाला पुरुप जलमें डूबकर मरता , विपम (ोटे पडे) पण हों तो सीरपट होता है, पण समान हों तो राजा होता है, उपरको खींचे हुए वृपणाला हो तो अल्पायुष होता है और जिस पुरुपके धूपण सम्ये हों उसका आयुप सौ वर्ष होता है ॥९॥ लिंगके मप्रमागको मणि काले हैं. लाल रंगकी मणिवाले पुरुष धनवान होते हैं श्वेत और मलिन मणि हो वो धनहीन होते हैं, मूत्र करनेके समप शन्द हों वे पुरुप सुखी होते हैं. शन्दरहित जिनकी मनधारा हो वे निर्धन होते हैं ॥ १०॥ जिनके मूषको धारा दो तीन मथवा चार रों और दक्षिणावर्त करके वे धारा मूत्रको गेरें तो वे पुरुष राजा होते हैं. मत्र करने के समय जिसका स्त्र विखरता हो वे धनहीन रोवे ॥ ११ ॥ एक धार मूत्रकी हो और वह वलित (वेटित ) हो तौ रूपवान पुत्र देती है, जिन पुरुषों के माणि मिन्ध, अंचे और समान हों वे पुरुष धन, घी और रोंको भोग फरनेवाले होते हैं।॥ १२ ॥ जिनके मणि मध्यभाग निन्न होवे पत्यामोंके पिता होते हैं अर्थात् उनके घर कन्याही जन्मवी हैं और वे पुरुष निर्धनभी रोते हैं, जिनके मणि मध्यके ऊंचे हों वे बहुत पशुओंके स्वामी सेते हैं. बहुत ut पुरा थन मोर पुरान गीत राहीनी मां 4gre समें तीन २ चार २ आदि रोम होय वे मनुष्य निर्धन मौरी बादादा होने.जिनके जानु निन (नीने) हो या पुरुष १.ममयुन जानुटो गम्प मिलता है मोर पडे भानु शित (२८२) वाराहीसंहिता। दुःखपदौ । मार्गायोत्कटको कपायसदृशौ वंशस्य विच्छित्तिदो बायो। पक्कमृद्युतितली पीतावगम्यारतौ ॥ ३ ॥ प्रविरलतनुरोमवृचजला दिएर तिमैघरोरुनिश्च । उपचितसमजानपश्च रूपा धनरहिताः समगातल्यम ॥ ४ ॥ रोमैकैकं कूपके पार्थिवानां वे ये पण्डितोत्रियाणाम् । मा निःस्वा मानवा दुःखभानः केशाधैवं निन्दिता भूनिताच ॥ ५ ॥ निमांना प्रियते प्रवासे सौभाग्यमल्यैर्विकटदरिद्राः। स्त्रीनिर्जिताचापि भवन्ति । राज्यं समांसश्च महाबिरायुः॥ ६ ॥ लिङ्गेऽल्पे धनपानपत्यरहितः स्यूळे विस धर्मढ़े वामनते सुतार्थरहितो केऽन्यथा पुत्रवान् । दारिद्रयं विनते तक आगेसे चौड़े, अंतरंगके नखोसे युक्त, टेटे, नाडियोंसे व्याप्त, उसे और मंगुलियोंवाले चरण हों तो दरिद्र और दुःख देते हैं. मध्यसे ऊंच मेंउको भार चरण हो तो सदा मार्ग में चलाते हैं. कपायरंग ( थोडेसे लाल ) के चरण वंशका विच्छेद करते अर्थात् जिस पुरुपके कंपाय रंगके चरण हो उस नहीं चलता. परिपक ( अनिमें पकी हुई) मृत्तिताके तुल्य जिसके पास पनि हो वह पुरुप ब्रह्महत्या करता है और पीले रंगके चरणाला पुरुष आ. नीमें आसक्त होता है ॥ ३ ॥ विरल और सूक्ष्म रोमोंगला, गोल हाथी समान मुन्दर उरूपाला, मांसयुक्त और समान जानुपाला यह सब सागवाना। होना है. धान भौर शगालके तुल्य जिनको जमा हो धनहीन होते हैं। जिनी धाओं के रोमणोंमें एक रोम हो वह ना होते हैं, जिन रोमहामें दादा रोग हो पहपडित मोर प्रोधिय होते जिनके एक इसमे मस्तक कासमी शुभ मम लाने मी गान न हो । पुरुष मानमें मरता , छोटे नानुमाया गौमागी शेता? fok दापुर पाते हैं धनान । पनि शेता. स्टलिंगाला धन । मापाटीकासहिता प०६८। (२८५) ठिनाः स्युनिषा विपमकुक्षाः। तोदरा दरिद्रा भवन्ति बहाशिनश्चव २० ॥ परिमण्डलोनतानिविस्तीणाभिश्च नानिमिः सुखिनः । स्वल्पा बह- पनिम्ना नाभि: क्लेशावहा भवति ॥ २१ ॥ पलिमध्यगता विषमा शूलाबाध रोति नैःस्व्यं च । शाम्यं वामावर्ता करोति मेधा प्रदक्षिणतः ॥ २२॥ चियिता चिरायुपमुपरिष्टाधरं गवान्यमधः शतपत्रकर्णिकाता नाजिर्मनु. विरं कुरुते ॥ २३ ॥ शखान्तं ग्रीभोगिनमाचाध्य बहुसुतं यथास्यम् । कद्वित्रिचतुर्विलिनिषिद्यान्नृपं त्ववलिम् ॥ २४ ॥ विपमवटयो मनुप्पा तवन्त्यगम्याभिगामिनः पापाः । फजुवलयः समानः परदाग्वैपिणश्चैव । २५ । मांसलमृदुनिः पार्षः प्रदक्षिणावर्तरोमभिपाः । विपरीतनिध्या खपरिहीनाः परप्रेन्याः ॥ २६ ॥ सुभगा भवन्त्यनुबच्चुका निर्धना विपन. हित लम्बा हो वे पुरुप दरिद्री होते हैं और बहुत भोगन परते॥२०॥ गोल, ऊंची और विस्तीर्ण नाभिवाले मुखी होते हैं, छोटी मश्य ( न देख परे) पौर अनिम्न अर्थात् गहरी न हो ऐसी नामि दुःखदायक होती है ॥ २१ ॥ जसकी नामि पेटको वलिके योच मावे और विषम ओ, वा पुरुष स्लीपर चढाया नाता है और निर्धनभी होता है, यामारत जिसकी नाभि हो वह पुरुष शठ होता है. दक्षिणावर्त नाभि हो तो उसकी उत्तम बुदि हो. दोनों भोर लम्बी नाभि युप करती है, ऊपरको नामे दीर्घ हो तो ऐश्वर्षयुक्त पुरुपको पता है सोचेको लम्बी दो नौ बहुन भोगोंसे युक्त करती है. कमलको कणिका के तुल्य नाभि हो तो पुरुषको राजा करनी है ॥ २२ ॥ २३ ॥ उदरके मध्य में जो रोगरों उनकों वाले कहते हैं. जिस पुरुषको एक बलि हो उसकी मृत्यु सस वो है. दो बलि हों तो वह पुरुष बहुत खिपोंसे मोग करनेवाला होता है. पीना हो तो थाचार्य (उपदेशका) होता है और चार बलि जिस पुरुष उदरों में उसके यात पुष होते हैं, जिसका उदर बलिरहित हो वह राजा होता है । २४ ॥ जिनके उदरमें कोई छोटी कोई परी वति होवा पुरुष भाम्पा सीमें गमन करने हैं. जिनके उदरमें सीधौ वलि होवे मुरती मौर परोसे विमुस त ॥ २५ ॥ मांसद्वारा पुष्ट कोमल और दक्षिणावर्त गेमोंसे युक्त निफै पालो पुरुष प्रमा होते हैं और मांससे न कटोर और रामा रोमोंवे पुक जिनके पार्भ नरे निर्धन मुससे होन और दूसरे पुरुषों के दास होते हैं ॥ २६॥ खनके भामागो सूचक पाहते हैं. जिनके पूपक उपरको खीचे नहीं दे पुरुष मन होते.
-हीन और सब मनुष्योंके भप्रिय होते हैं. पुष्पके समान सुगन्धित करते पान दो, मत्स्यांके समान गंध वीर्य में हो तो बहुत संतान हो, योगका रोता है और जो पुरुप महत काल पर्यंत मैथुन करे यह अल्पायुप होता? ॥१॥ मिस पुरुष के रिकर (पटिस्थ मांगपिण्ड) आति मोटे हों या निधन होना। मन्दर मावयुक सिकायाला मुखी होता है. जिस पुरुपके चोमो उसयो र मऊंचा और न नीचा) उदरसाला पदप भोगी। पेट हो नौ ये पुरुष निधन होते॥१८॥ 41, निम भार हे पाहो तो भी पुष मोगी ने निम्न कायाको म..। होने, नियम उदर गहे गर) (२८४) वाराहीसंहिता। न्वणैनिनः ॥ १३॥ परिशुष्कवस्तिशी धनरहिता दुर्भगाय विबेस कुसुमसमगंधशुका विज्ञातव्या महीपालाः ॥ १४ ॥ मधुगन्धे बहुतिमा मत सगन्धे बहून्यपत्यानि । तनुशुक्रः खीजनको मांससगन्धो महामोगी ॥ १२ मदिरागन्धे यज्वा क्षारसगन्धे च रेतसि दरिद्रः। शीघं मैथुनगामी दीर्घायुरो न्यथालायुः ॥ १६॥ निःस्वोऽतिस्थूलस्फिक् समांसलस्फिक् सुसानि भवति । व्यापान्तोऽध्यस्फिग्मण्डूकस्फियराधिपतिः ॥ १७ ॥ सिंहकारित जेन्दः कतिकरणकटिः परित्यक्तः । समजठरा जोगयुता घटपिठरनिनोपया निःस्वाः ॥ १८॥ अधिकलपार्था धनिनो निम्नैर्वकैश्च भोगसन्त्यताः। 5. फुक्ष्या भोगाव्या निम्नानि गपारिहीनाः ॥ १९ ॥ उन्नतकुक्षाः शिशिर स्थूल जिनके माणि न हों वे धनी होते हैं ॥ १३ ॥ लिंग और नाभिक मा रको वस्ति कहते हैं. जिनके वस्तिका उपरिमाग मांसरहित हो वे पुरुष राना होते हैं ॥ १४ ॥ शहतके ममान गंध. वीर्यमें हो तो बहुत ।। वौ कन्याओंका पिता हो, मांसके समान गंध वीर्यमें हो तो महामोगी हो ॥१४ मयके रामान गंध वीर्यमें आती हो तो पुरुष या करनेवाला हो, सारके तुपकर वीयभानी हो तो पुरुष दरिद्री हो. शाही जो पुरुष मथुन करे या दोन गना होता है. वानर मया उष्ट्र के समान का काते हैं, और सर मणमागो काया हगा हो तो गना हो (ens .
मापाटीकासाहिता १०३८॥ (२८७) सोपवीपवताम् ॥ ३४॥ करिकरसरशी वृत्तावाजान्ववलम्बिनी समौ पीनी । बाहू पृथिवीशानामधमानां रोनशी हस्ती ॥ ३५॥ हस्तांगुलयो दीर्घाधिरा- सुपामवलिताच सुनगानाम् । मेधाविनां च सूक्ष्माधिपिटाः परकर्मनिरतानाम् ॥ ३६॥ स्थूलानिनरहिता बहिर्नतानिय शस्त्रनिर्वाणाः। कपितहराकरा पनिनो व्याघोपमपाणपः पाताः ॥ ३७ ॥ मणिबन्धनैर्निगुम सुशिष्टसन्धि- भिग। हीनहस्तच्छेदः थ्रथैः ससन्दभ निर्दव्याः ॥ ३८ ॥ पितृविचेन विहीना जन्ति निन्नेन करतलेन नराः । संवृत्तनिम्नैपनिनः प्रोत्तानकराध दातारः ॥ ३९ ॥ विपीर्पिमा निस्वाथ करतलैरीश्वरास्तु लाक्षाः। पीतै- रगम्यवनितानिगामिनो निधना रूक्षेः॥ ४० ॥ तुपसदृशनसाः क्लीवाश्चिपिटैः स्फुटिभ विचतन्त्यकाः । कुनखविवर्णः परतर्कुकाच तात्रैध भूपतयः॥४३॥ मुखी और वली पुरुषोंके होते हैं ॥ ३४ ॥ इस्तीको शुंडके समान,वर्तल, जानुक्क लंबे, सम, मोटे ऐसे वाहु पृथ्वीपतियोंके होते हैं और निर्धनोंके रोमोंसे युक्त, इस्स होते हैं ॥ ३५ ॥ दीर्घायुवाले पुरुषोंकी अंगुली लम्बी होती है. सीधी अंगुली मुमग पुरुषों को होती है. बुद्धिमानोंकी अंगुली पतली होती हैं. परसेवा करनेवालोंकी अंगुली चपटी होती हैं ॥ ३६ ॥ मोटी अंगुली हों तो निर्धन होते हैं, जिनकी अंगुली बाहरको झुकी हो उनकी शखसे मृत्यु होती है. वंदरके तुल्य हावाले धनवान होते हैं. ज्याप्रके तुल्य हाथवाले पापी होते हैं ॥ ३७ ॥ हस्तके मुलको मणिबंध अर्थात् पहुंचा कहते हैं. जिनके मणिबंध निमूह व मुशिष्ठ संधि हों वह राजा होते हैं, छोटे माणबंध हों तो उनसे हाय काटे जाते हैं, टीले और शन्दसे युक्त जिनके मणिबंध में वह निर्धन होते हैं ॥ ३८ ॥ जिनकी हथेली निम्न (नीची) हो वह पिताके धनसे रहित होते हैं. सम, गोड और निम्न जिनकी इयेली हो वह धनवान होते हैं. जिनको ऊंची हथेली हो कर पुरुप दावा होते हैं ॥ ३९ ॥ विपम हथेली जिनकी हो वह घर और निर्णन होते हैं, लाखके समान लाल रंगी जिनकी हथेली हो वह ऐश्वर्यवान होते हैं. पीले रंगकी इथेलीवाले अगम्या सीमें गमन करते हैं, रूखी हयेलीवाले निर्धन होते हैं ॥ ४०॥ तुपोंके समान रेखाओंसे युक्त जिनके नख हो वह नपुंसक होते हैं. चपटे और 'फूटे जिनके नख हों वह निर्धनते हैं. बुरे नक्षले और हमने हीन नखाले पुरुष दूतरेकी बातमें वकं करनेसले होते हैं, बांके के समान लाल रंगके जिनके अननसतानमा stil न जानो पुरुष धनसान होता?॥३०॥ चपरी प्रोगराठा पुन मामी और नारियाने युक्त निसरी ग्रीस होवामी नित सरगमन गहन पवार वीर्य होता है, वृष रामान मिय निराशामा होता, निराधम्या दो ! साना मना (दुदीन) र रोगाने गीत पांडप मानोर गलाम युक्त पाठ निधनी होती है ज, म्युक, गम भार ऐनयुक(hu) ! बना शासिनी॥RAarti (२८) वाराहीसंहिता। दीर्वेः। पीनोपचितनिमगैः क्षिातपतयधूचुकैः सुखिनः ॥ २७ ॥ इयं समुझा पृथुन वेपनं मांसलंच नृपतीनाम् । अधमानां विपरीतं खररोमचितं शिराउ न ॥ २८ ॥ समवक्षसोऽर्थवन्तः पीनेः शूरास्वकिञ्चनास्ताभिः। विपनं वो पेषां ते निःस्वाः शवनिधनाथ ॥ २९ ॥ विपमैर्विपमो जत्रुभिरर्थविहीनोपरय सन्धिारिणः । उन्नतनत्रुर्भागी निम्ननिस्वोऽर्थवान् पीनेः ॥ ३० ॥ विधि- पीवो निःस्वः शुष्का सशिरा च यस्य वा ग्रीवा । महिपग्रीवः शूरः शान्ने वृषसमग्रीवः ॥३१॥ कम्युग्रीवो राजा प्रलम्बकण्ठः प्राणो भवति । पठन प्रमरोमशमर्थवतामशुभदमतोऽन्यत् ।। ३२ ॥ अस्वेदनपीनोन्नतसुगन्वितनरो- ममंकुलाः कक्षाः। विज्ञातव्या भनिनामतोऽन्यथाविहीनानाम् ॥ ३३॥ निमांती रोमचिती भयावली च निनस्यांसी। विपुलापव्युच्छिन्नी कृष्टिी जिनके सूचक छोटे बड़े और लम्बे हों वे निर्धन होते हैं. जिनके चूचक काम और निमम अर्थात् ऊंचे न हो वे राजा.होते है भौर मुखी रहते हैं ।॥ २७ चा, विस्तीर्ण, को हीन और मांसल हदय राजाओंका होता है और ना मुसा उमा और हरा हृदय अधम पुरुषोंका होता है. कठोर, रोमोंसे युक्त नादियों कर के व्याप्त हदयमी अधोकाही होता है ॥ २८॥ न ऊंची न के माग धनवान होते है. छोटी मातीपाले पुरुषास दोन होते हैं. पिन पडे धन होत होते हैं और शमसे उनका मृत्यु होता है ॥ २९ ॥ कधोंके और मकाने पिम जाला पुरुष र होता है, अस्थियोंगी संधि का होतो धान होता. नगला मागो, निम्नजयु हो तो तित रिकी रानो मृत्यु होती है।३१॥ सके दल तीन मनाने r ।"
मापाटीकासाहिता २०६८। (२८९) कोणाभिः । अंगुष्ठमूलरेखाः पुत्राः स्युर्दारिकाः सूक्ष्माः॥ ४९ ॥ रेखाः देशिनीगाः शतायुपां कल्पनीयमूनानिः । छिन्नाभिर्दुमपतनं बहुरेखारेखिणो स्वाः ॥ ५० ॥ अतिरुशदीपश्चिबुकनिर्देच्या मांसलैर्धनोपेताः । बिम्बो- मैरवकरधरै पास्तनुभिरस्याः॥ ५५ ॥ओठः स्फुटितविखण्डितविवर्णरुक्षेश्व नपरित्यक्ताः । स्निग्धा घनाच दशनाः सुतीक्ष्णदंष्ट्राः समाच शुभाः ॥ ५२॥ जिता रका दीर्घा शुक्ष्णा सुसमा च भोगिनां ज्ञेया । श्वेता सप्णा परुपा निई- याणां तथा ताल ॥५३॥ वक्त्रं सौम्यं संघृतममलं शृक्ष्णं समं च भूपानाम् । विपरीत क्लेशभुजां महामुख दुर्भमाणां च ॥ ५४ ॥ नीमुखमनपत्यानां वाम्यवतां मण्डलं परिज्ञेयम् । दीर्घ निर्दव्याणां भीरमुखाः पापकर्माणः ॥५५॥ - माकारको रेखा हो और त्रिकोण रेखा हो वो वे धर्म करते हैं. बंगुष्ठमूलकी रेशा संतानकी है उनमें जितनी रेखा सूक्ष्म हों उतनी कन्या होती हैं, जितनी रेखा स्थूल हो उतने पुत्र होते हैं ।। ४९ ॥ तर्जनी अंगुलीवक जिनकी रेखा पहुँचे वेसी वपका आयु पाते हैं. छोटी रेखा हो तो अनुमानसे आयु जाने, टूटी रेखा हापमें हो तो वृक्षसे गिरे, जिनके हाथमें बहुत रेखा हों अथवा रेखा न हो वे निर्धन होते हैं॥५०॥ बहुत कृश और लंबी ठोडी हो तो निर्धन होते हैं, मांससे चितुक पुष्ट हो तो धनवान हो। कम्दरीके समान रक्तवर्ण और अवक्र नीचेका मोष्ट हो तो राजा होते हैं. छोटा अधर (नीचेका ओष्ठ) हो तो निर्धन होते हैं ॥५१॥ फूटे हुए, खडित, पुरे रंगके और रूखे ओष्ठ हों तो वे पुरुष धनहीन होवे. सिग्ध, घन ( गहरे), तीखी गटोंसे युक्त और समान दांत शुभ होते हैं ॥५२ ॥ रक्तवर्ण, यी, स्टष्ण और समान जीभ हो तो भोगी होते हैं. स्वत, कृष्ण मौर रूखी जिया हो तो धनहीन होते हैं. यही लक्षण तालुफाभी जाने ॥५३॥ सौम्य, संवृत, निर्मल, लक्षण और सम वक्र (चेहरा) राजाभोंका सेवा है. इससे विरुद अर्थात् असाम्य, असंघृत, अश्लक्ष्ण और विपन बफ हँस भोगने- वाले पुरुपोका होता है, बहुत फैला हुआ मुख दुर्गम पुरुषोंका होता है ॥ ५४ ॥ खोपासा मुख जिन पुरुषोंका हो वह संतानसे हीन होते हैं, गोल मुरबाले पुरुष साठ होते हैं. लये मुखवाले धनहीन होवे है. भयभीत दाख परेव पारी रोने १ इस रेसपा जिम रपान स्नुपात करके जितने जर निया ने पनि यह पक्षसे गिरेगा। .
(२८८) बाराहीसंहिता। अंगुष्यबैराध्याः सुतवन्तोऽगुष्ठमूलगेश्च यवैः । दीपायलिया पियुपश्चैव ॥ ४२ ॥ स्निग्धा निम्ना रेखा धनिनां तव्यत्ययेन निस्थान विरलांगुलयो निम्त्या धनसञ्चयिनो घनायलयः॥ ४३ ॥ तिसो रेता नही न्धनौत्यिताः करतलोपगा नृपतेः। मीनयुगाड़ितपाणिनित्यं समायो ॥४४॥ वज्ञाकारा धनिनां विद्यामानां तु मीनपुच्छनिभाः। शंसाबले विकानगासामोपमा नृपतेः ॥४५॥ कलशमृणालपताक युगमा पन्ति निधिलाः । दामनिभाभिश्याच्याः स्वस्तिकरूपानिरसयंम् ॥ ४॥ घकातिरशतोमरशक्तिधनुःकुन्तसनिभा रेसाः। कुर्वन्ति चमूनाथ समार मुन्तलाकाराः॥४७॥ . . . . ::: निमन बैवामिहोत्रिगो ब्रम..... .... .
मापायकासहिता २०६८ सानुनादं च। दीर्घायुपां प्रमुकं विज्ञेयं सहतं चैवं ॥ ६३ ॥ नो रकान्तपिलोचनाः भियोभाजः । मधुपिनन्लैमहार्या मार्जार- ताः॥६४ ॥ हरिणाक्षा मण्डललोचनाभ जिीव लोचनेचौराः। नेवा गनसदृशदृशभभूपतयः ॥ ६५॥ ऐश्वर्य गम्भीरैनीलोत्स- " विद्वांसः । अविरुष्णतारकाणामक्ष्णामुसाटनं भवति ॥ ६६ ॥ ', "यूलहतां श्यावाक्षाणां च भवति सौभाग्यम् । दीना निःस्वानां .....: पुलार्थनोगवनाम् ॥ ६७ ॥ अथुन्नतानिरल्पायुपो विशालोनता- .: पनः । विषमभुवो दरिद्रा बालेन्दुनतभुवः सधनाः ॥ ६८ ॥ दीर्घा- - निनः सण्डाभिर्थिारहीनाः । मध्यविनतनुवो ये ते सताः नीष्व- 14 ६९ ॥ उन्नतविपुलं शंखैर्धन्या निम्नैः सुतार्थसन्त्यक्ताः। विपमल- नाना धनवन्तोऽर्धेन्दुसहरोन ॥ ७० शुक्तिविशालैराचार्यता शिरास- .-हुमा हाद अनुनाद करके युक्त प्रयुक्त (अतिदीर्घ) और संहत जो पुरुप दीर्घायु होते हैं ॥ ६३ ॥ कमलदलके तुल्य नेप्रपाले धनवान होते हैं, इयोंके अंव लाल हों वे लक्ष्मीवान होते हैं. शहतके तुल्य पिंगल रंगके धनवान होते हैं. विल्लोके तुल्य कुंजे नेत्र हों तो पापी होते हैं॥६४॥ तुल्य नेत्र हों और गोल नेत्र हो और जिम ( अचल ) नेत्र जिसके हों वे नते हैं, भैगे नेत्र हों तो दूर होते हैं. हाथोके तुल्य नेत्र हो तो सेनापति होते हैं, । गहरे नेत्र हो तो ऐश्वर्य होता है. नील कमलके समान कान्तिके नेत्र विदान के होते हैं. जिन नेत्रोका तारा आति कृष्ण हो वे नेत्र उखाडे जाते हैं ॥६६॥ संघ हो तो राजाके मंत्री होते हैं. कपिश रंगके नेत्र हो तो सौभाग्य होता है। नेत्र दीन हों वह निर्धन होते हैं, निग्ध और बडे नेत्रबाले धनवान और होते हैं ॥ ६७ ॥ मध्यसे जिनकी भू ऊंची हो वे अल्पायु होते हैं. बड़ी अंची भू हो तो अविमुखी होते हैं. छोडी बडी भू हो वो दरिद्री होते हैं. चंद्रमाकी भांति जिनकी झुकी भू हो वे धनवान होते हैं ॥ ६८ ॥ लम्बी परस्पर न मिली हुई जिनकी 5 हो वे धनवान होते है. टूटी हुई भू हो तो न होते हैं. मध्यसे जिनकी भू न हो वे पुरुष अगम्य सियोंमें आसक्त ॥६९ ॥ ऊंची और पडी कनपटी हो तो धनी होते हैं. निम्न शंख हो प्र और धनसे हीन होते हैं. जिनका ललाट टेदा हो वे निधन होते हैं. अर्ध- के तुल्य जिनका ललाट हो वे धनवान होते हैं ॥ ७० ॥ सीपके समान : बडे -- . कानबाडे तो वे पुरुष र होते है. लम्बे और मांससे पुष्ट कानगळे या १५९ पनिसके कपोल ऊंचे हो वह मोगी होता है. मांससे पुत्र निमा १॥ ३०॥ जिमचे नासिका कटीसी दिखाई दे मगम्पा ग्रीसे गन. (२९०) वाराहीसंहिता। चतुरभं धूर्तानां निम्नं वक्त्रं च तनयरहितानाम् । छपणानामनिहवं सम्पूर्ण भोगिनां कान्तम् ॥ ५६॥ अस्फुटितायं स्निग्धं श्मश्रु शुभं मृदु च रूई चैव । रक्तैः परुपैश्वीराः श्मश्रुचिरलेथ विज्ञेयाः॥ १७॥ निर्मः पारमृत्यवदैः सुबहुजोगाः । रुपणाम हवकर्णाः शंकुभवणाभनवर ॥५८ ॥ रोमशकर्णा दीर्घायुपस्तु धननागिनो विपुलकर्णाः । कूराः प्रिया प्लम्बमांसलैः सुखिनः॥५९॥ भोगी त्वनिम्नगण्डो मन्त्री सम्पूर्णनांवरून यः। सुखनाक् शुकसमनासचिरजीवी शुष्कनासथा ॥६० ॥ विनानुस यागम्यगामिनो दीर्घया तु सोनाग्यम् । आकुञ्चितया चौरः सीमृत्युः परि पिटनासः ॥ ६३ ॥ धनिनोऽप्रवकनासा दक्षिणवकाः प्रक्षणाः कूरा कर स्वलच्छिद्रा सुपुटा नासा समाग्यानाम् ॥ ६२ ॥ धनिनां श्रुतं सरु दिर १॥ ५५ ॥ भूतोका मुख चौखुंटा होता है, निम्न मुख पुत्रहीन पुरुषों है. कंजूषोंका मुख बहुत छोटा होता है, सम्पूर्ण और मनोहर जिनका सुरा हो मोगी होते हैं ॥ ५६ ॥ जिनके वाल आगेसे फटे न हों,निग्ध हों, फोमल का पांत् मली भांति नीचेको झुकी हुई दाढी हो तो शुभ है. लाल रंगकी काय कर अस दाढी जिनकी हो वे चोर होते हैं। ५७ जिनके कर्ण मांसगीत । मृत्यु पापस्ममे होती है. चपटे कानवाले वडे मोगी होते हैं, छोटे कानोरा ।। होते है. शंछके तुल्य मागेसे तारो कर्णवाले सेनापति होते हैं॥ ५८ ॥ एक कर्ग हो तो दीर्घायु पाते हैं, वडे कानाले धनवान होते हैं. नाडियो रों का राजा मयी होता है तोते के समान नियको नासिक मोगी होता इ. मूखो प्रयात निर्माण जिससे नासिक रोप यादी राने होते हैं, उम्मो नालिस दोनो सौमाग्य होता है, माईपित (. खींचो ) नामिनाला चोर होतात. पटी नालियाला सो जाता है, मागेले दो दिनकी नासियोनी रोग, दाहिनी को दिल नासिर धनी दो पानी और ही नियन और मरात. साधी छोटे से गुरू गन्दा पुरोग ma हो ? पारा 2.5 -- मापाटीकासहिता म०६८। (२९३) सल्पायु नानिधान्तरे कल्प्यम् ॥ ७८॥ परिमण्डलैगपाध्याश्याकारः शिरोजिरवनीशाः। चिस्टिः पितृमातृनाः करोटिशिरसां चिरान्मृत्युः ॥ ७९ ॥ घटमूर्धा ध्यानरुचिर्दिमस्तकः पापलद्धनेस्त्यकः । निम्नं तु शिरो महतां बहु- निम्नमनर्थदं भवति ॥ ८०॥ एफैकशवः स्निग्धः कृष्णराकुचिरमिनायः । मृदुभिर्न चातिबहुभिः केशः मुखभाग् नरेन्द्रो वा ॥ ८१ ॥ बहुमूलपिपमा- पिला स्थूलस्फुटितायपरुषहत्वाथ । अतिकुटिलाभानिधनाभ मुर्धजा विनही. नानाम् ॥ ८२ ॥ ययानं रुक्षं मांसविहीनं शिरापनदं च। तत्तदनिष्टं पोतं पिपरीतमना शुभ सर्वम् ॥ ८३॥ त्रिषु विपुलो गगारविष्वेव पनवधन. हस्वः । समसु रक्तो राजा पचतु दीपंच सूक्ष्मभ ॥ ८१ ॥ उरो टलाट वदनं च पुंसां विस्तीर्णमतधितयं प्रशस्तम् । नानिः स्वरः सत्त्वमिति वरिष्ट है. वामभागमें टेढी रेखा दो ता पास वर्षको आयु दोती है छोटी रानी स वर्परोभी कम थायु होती है,न्यून रेग अर्थात् एफ दो रंगा हो नाभी बायसं न्यूनही भायु होती है, इन रेखाओंने मध्यमें कल्पना करके आयु जान लो. जगा तीन रंग्या होनेसे सौ वर्ष और चार रेस होनेसे पिचानवें वर्षकी भायु फहना, साई नीन मेरा होने से सारे सतानवें वर्ष बायुसे कल्पना करनी चाहिये, एसही औरभी जानी ॥ ८ ॥ गोड शिर जिनपर हो वा पहुत गायोंसे युक्त होते हैं, उपवे मापार अपरमे विस्तीर्ण शिर हो नौ राजा होते हैं. पपटे शिरफे पुरुप माना पिनाया बप पाने ? फरोटिके आगर जिनका शिर दो वे याहुन दिन जीते हैं ॥ ७९ ॥ घरके. भार जिनफा शिरसे वह पापी और निर्धन होते हैं. निस शिर जिनका जनहित पुरुष होते हैं. परन्तु भतिनिग्न होतो अनर्थ करता है॥८॥ एक गेनापमें एकर | रोम उत्पन्न हों, कृष्ण, सिग्ध, भाकुंपित (पोरसे कुटिल) र मिनरे, नारे ए, फोम और बहुत पने नहीं ऐसे फेश जिन मनुष्योंके हो वह मुसी ने सपा - राजा होते हैं ॥८१॥ एक र रोमपसे पतसे उत्पन्न हुए हों, कोई मरे, कोरे, - कपिल रंग, मोटे, भागेसे फटे हुए, रू, छोटे व यात पुटिन और बहुत दन पत्र - निर्धनाके होते हैं ॥४२॥ जो जो भंगरूसा, मांससे दोन भौर नारियति मात्र हो । मंग माम दांता और जो भंग सिग्ध, पुष्ट और नारियोंसे राहत होकरपुरांदा । ५८३॥जिसके भंग विस्वान हों, तीन भंग गंभीर हो पच, पार - अंग दस (ोरे), साव गरजवण हरों, पांच गदीर्य हों और पांच य नम को राजा होता है। तो, घर और रसन या दोर बस्ति स्वस्तिककी मांति स्थित हो वे पुरुप धनाढ्य होते है ॥ ७१ ॥ जिनके इस १. रूस, दीन मोर बहुत अक्षुओं करके युक्त रोदन पुरुषोंने गुमनाई नाम इसनेके समय शरीर न कांपे तो हँसना शुम होता है, नेत्र मूंदकर इसने होते. दोपयुक्त पुरुष पारंपार हँसता है. इसनेके नंतमें घासार सना TRA शत वर्ष होता है और चार रेखा ललाटमें हो तो राजा होता और विधान नायुप होता है।। ७५ ।। टूटी हुई रेसा टलाटमें दो ना पुरुप भगन्न गमन करनेवाले होते हैं और नन्ये वर्ष उनस आयुष होगा, रेट न दो तीनी नवे वर्ष आयुष होता है, केशोसी जहां गम १॥ ७६ ।। पांच सेपाटाहो नी मचर परकी मार दीनी मा मिउगये हो नौ गाट १ भागुबानी मातो. उझानी पचान कराना होगी,ससे संग टार (२९२) वाराहीसंहिता। न्ततरधर्मरताः । उन्नतशिराभिराव्याः स्वस्तिकवत्संस्थिताभिध ॥७॥ निम्नललाटा वधवन्धनागिनः क्रूरकर्मनिरताय । आयुन्नतैश्च भूगः काणा- स्युः संवृत्तललाटाः ।। ७२ ॥ रुदितमदीनमनश्रु स्निग्धं च शुनावहं मनुष्पा- गाम् । तक्षं दीनं प्रचुराश्रु चैव न शुभप्रदं पुंसाम् ।। ७३ ॥ हसितं अदरक- कम्प सनिमीलितलोचनं च पापस्य । दुष्टस्य हसितमसरुव सोन्मादत्वाना- लान्ते ॥ ७४॥ तिस्रो रेखाः शतजीविनां ललाटायताः स्थिता यदि दाः चतसृभिरवनाशत्वं नरतिभायुः सपञ्चान्दा ॥ ५५ ॥ विच्छिन्नामिनावर मिनो नवतिरप्यरेखेण । केशान्तोपगतानी रेखाभिरशीतिवर्षायुः ॥७॥ पञ्चभिरायुः सप्ततिरेकामावस्थिताभिरपि पष्टिः । बहुरेखेण शताधं चत्ता शच वकानिः ॥ ७७ ॥ त्रिंशद्भूलनाभिविंशतिकथैव वामवानिः। शुगर विस्तीर्ण जिनके ललाट हों उनको आचार्यता होती है, नाडियोंसे व्याव जिरका ललाट हो वे अधर्म करने में तैयार रहते हैं. ललाटके वीच ऊंची नारी हो निम्न हों वे वध और वन्धनके भागी होते है और क्रूर कर्म करने में तत्पर रहते ऊंचे ललाट हों वे पुरुष राजा होते हैं. गोल ललाट होनेसे कृपण होते हैं ॥ १४ दोनतासे होन, अश्रुओंसे होन और सिग रोदन (रोना) मनुष्योंको शुभ युक्त पुरुषका लक्षण है ॥ ७४ ॥ ललाटमें लम्बी रेस तीन ती पुरुष यहांत कहते हैं. टलाटमें सातनका मा पनी हो तो सीi बनाती है ॥ ॥ भूगर एग गाय की मांग की है। त भाषायेकासाहिता ०६८। (२९५) सर्वार्थसिद्धिजननी जननीव चाप्या छाया फलं तनुभृतां शुजमादधाति ॥९॥ चण्डाधृष्या पनहेमामिवर्णा युक्ता तेजोविक्रमः सप्रतापैः आग्नेयीति पाणिनां स्याज्जयाय क्षिप्रं सिद्धि वाञ्छितार्थस्य धत्ते ॥ ९२ ॥ मलिनारुपलष्णा पाप- गन्धानिलोत्था जनयति वधयन्धव्याध्यनर्थार्थनाशान् । स्फटिकसदशरूपा भाग्ययुक्तवत्युदारा निधिरिव गगनोत्या श्रेयसां स्वच्छवर्णा ॥ ९३ ॥ छायाः कमेण कुजलाम्पनिलाम्बरोत्याः केचिदन्ति दश ताच यथानुपूर्व्या । सूर्याजनाभपुरुहूतयमोडुपानां तुल्यास्तु लक्षणफलैरिति तत्समासः ॥ ९४ ॥ इति मृजा ॥ करिवृपराधोरीमृदङ्गासिंहान्दनिस्वना भूपाः। गर्दजनररूक्ष- स्वराय धनसीख्यसन्यताः ॥९५॥ इति स्वरः ॥ सप्त भवन्ति च सारा लता, सुख और अभ्युदय करती है, सब कार्योकी सिद्धि करनेवाली होती है और मावाको मांति पुरुप आदि जीवोंको शुभ फल देती है ॥ ९१ ॥ आमिकी छाया (क्रोधशील) अधृष्या (जिसका कोई तिरस्कार न कर सके), कमल, मुवर्ण और अग्निके तुल्य वर्ण, तेज, पराक्रम और प्रतापसे युक्त होती है, ऐसी अनिकी छाया जीवोंको जय देती है, शीघही वांछित अर्थकी सिदि करती है ॥ ९२ ॥ वायुकी छाया मलीन, रूखी, काली और दुर्गन्धदार होती है, वह छाया मरण पंधन, रोग, अनथ और धनका नाश करती है. आकाशकी छाया साटकके समान अति निर्मल होती है. यह छाया भाग्ययुक्त और अति उदार होती? और कल्याणोंका मानो निधान होती है और स्वच्छ होती है ॥९३ ॥ ऋमसे भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाशको पांच छाया कहीं और गर्गादि कोई मुनि दश छाया कहते हैं. उनके मतमें पांच छाया तो भूमि आदिको और पांच छाया सर्य, विष्णु, इन्द्र, यम और चन्द्रको है, परन्तु इन अपाओंके लक्षण और फल भूमि आदिको छायाओंके घरावरही है कारण हमने दश छापा संक्षेप करके पांच छाया रखी है, यह मृना ( पंचमहाभूतमपी छाया) का लक्षण कहा है ॥ ९४ ॥ हाथी, पप, रपसम्र, मेरो, मृदंग, सिंह और मेघो तल्प जिनका शन्द हो, वे भूप होते हैं. जर्जर और रूसा जिनका सर दोरे धन और मुसरो दीन होने हैं. यह सरका लक्षण कहा ॥९५ ॥ मेद (अस्पिोंके मोवसर मेह), मजा (कपालके भीतरका मेह), त्वचा (चर्म), अस्पि, वीर्य, रुधिर मोर मांस या सात माणियाक शरीरमें सार होते है, मष संक्षेपसे इन फल