Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Nana Guru Ki Kahani

Muni Dharmesh · 2011/01

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आचार्यश्रीनानालालजीम.सा काजीवन परिचय निवासी पिता का नाम माता का नाम गौत्र जन्म तिथि विवाहित/अविवाहित दीक्षा तिथि दीक्षा स्थल :दाता श्री मोडीलालजी .श्रीमती सिणगार वाई पोखरना .ज्येष्ठ सुदी 2 संवत् 1977 : अविवाहित, वाल ब्रह्मचारी :पौष शुक्ला 8 सवत् 1996 :कपासन युवाचार्य श्री गणेशीलालजी म सा :19 वर्ष 7 मास 6 दिन आसोज सुदी 8 सवत् 2019 उदयपुर : 22 वर्ष 8 मास 24 दिन :42 वर्ष 4 दिन : 3 माह 15 दिन . दीक्षा गुरु :1 दीक्षा के समय उम्र युवाचार्य पद तिथि युवाचार्य पद प्रदान स्थल युवाचार्य पद के समय दीक्षा पर्याय युवाचार्य पद के समय उम्र युवाचार्य काल युवाचार्य काल में दीक्षा (संतो की) आचार्य पद तिथि आचार्य पद स्थल आचार्य पद के समय उम्र आचार्य पद के समय दीक्षा पर्याय आचार्य शासनकाल कुल आयु स्वर्गवास तिथि स्वर्गवास स्थल . :माघ वदी 2 संवत् 2019 उदयपुर 42 वर्ष 7 मास 15 दिन • 23 वर्ष 9 दिन : 36 वर्ष 9 मास 29 दिन :79 वर्ण 5 मास 14 दिन कार्तिक वदी 3 सवत् 2055 : उदयपुर MammaNamani Haraminatruentrep4. ht.hu

नाना गुरु की कहानी
श्री धर्मेशमुनिजी म. सा.
प्रकाशक
श्री अस्विल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ
समता भवन, बीकानेर (राज.)

܀
नाना गुरु की कहानी
* श्री धर्मेशमुनिजी म.सा.
प्रथम संस्करण : नवम्बर, 2006, 3100 प्रतियाँ
* मूल्य : 6/-
* अर्थ-सहयोगी:
पीतलिया परिवार, सिरयारी (राजस्थान)
भारत विल्डिंग, काच्छीगुडा, हैदरावाद (आ प्र)
प्रकाशक:
श्री अ भा साधुमार्गी जैन संघ
समता भवन, रामपुरिया मार्ग, बीकानेर
दूरभाष 0151-2544867,3292177,2203150 (Fax)
आवरण सज्जा व मुद्रक :
तिलोक प्रिटिग प्रेस, बीकानेर
दूरभाष 9314952475

। प्रकाशकीय शासन प्रभावक, तपस्वी आदर्श त्यागी, विद्वान श्री धर्मेशमुनिजी म सा द्वारा लिखित "नाना गुरु की कहानी" समता विभुति आचार्यश्री नानेश के सम्पूर्ण जीवन का मुह वोलता ऐसा दस्तावेज है जो समाज के वाल-युवा वृद्ध मे अत्यन्त लोकप्रिय होगी एव रुचिकर भी। प्रश्नोत्तर के रूप मे मुनि पुगव ने जिस शैली मे इसकी रचना की है, वह न केवल हृदय को स्पर्श करती हे अपितु और अधिक जिज्ञासा भी उत्पन्न करती है और यही एक रचनाकार की महती सफलता है। मेवाड की कपासन तहसील के दाता ग्राम मे ज्येष्ठ शुक्ला द्वितीया को जन्मा यह बालक शुक्लपक्ष की तरह सतत प्रवर्द्धमान रहकर विश्व वध बन गया और लाखो लोगो का आराध्य वना, यह कथा छोटे-छोटे शीर्षको मे विभाजित अत्यन्त सरल शब्दो मे कहानीकार की श्रद्धा अभिव्यक्त करती है। गोवर्द्धन से नाना और नाना के त्याग, वैराग्य तथा साधु बनने की सघर्षशील कहानी बडे सरल शब्दो मे कहकर मुनि प्रवर ने ऐसी रोचकता उत्पन्न की है जो पुस्तक को अद्योपात पढने के लिए बाध्य कर देती है। माता-पिता और गुरु के प्रति भक्ति तथा सेवा भावना इस कहानी के आधार स्तम्भ है। पूर्वाचार्यो के परिचय के साथ-साथ नानेशाचार्य द्वारा दीक्षित साधु -सतो एव महासतियाजी का वर्णन इस कहानी को सागोपाग रूप प्रदान करता श्रद्धेय धर्मेशमुनिजी ने समता दर्शन प्रणेता, धर्मपाल प्रतिवोधक, विशुद्ध साध्वाचार के प्रतिपालक नानेशाचार्य की सघर्ष गाथा को सरल शब्दो मे सजोकर समाज के वाल-युवा-वृद्ध का अत्यन्त उपकार किया है। नाना गुरु के जन्म से महाप्रयाण पर आधारित यह कहानी समाज के सामने रखते हुए हमे वडी प्रसन्नता है। इसके प्रकाशन मे समाज के धर्मनिष्ठ, उदार एव समाजसेवी परिवार पीतलिया परिवार, सिरयारी (राजस्थान), भारत बिल्डिग, काच्छीगुडा, हैदराबाद (आ प्र) ने जो सहयोग प्रदान किया है, तदर्थ हम उनके अत्यन्त आभारी है एव विश्वास है कि सत्साहित्य के प्रकाशन मे आपका निरन्तर सहयोग मिलता रहेगा। है । निवेदक शांतिलाल साड़ सयोजक साहित्य प्रकाशन समिति श्री अ भा सा जैन सघ, समता भवन, बीकानेर अनुक्रमणिका 1 नाना नाम की यथार्थता 5 2 नाना किस लोक मे कहाँ जन्मे 5 3. नाना की जन्मभूमि 6 4 नाना के परिजन 7 5. माता सिणगार को स्वप्न दर्शन 8 6. नाना का नाम गोवर्धन 8 7 गोवर्धन नाना रूप मे 9 8 नाना नन्हे मुन्नो का नेता 9 9 नाना की व्यावहारिक शिक्षा 10 10 नाना नन्हे मुन्नो का शिक्षक 11 11 नाना को पितृ वियोग का वज्रपात 11 12 नाना का रेल के ड्राईवर के समान बनने का चितन 12 13 परोपकारी नाना 13 14 मातृ भक्त नाना 14 15 नाना व्यापारी 15 16 बहिन मोती के तपस्या का निमित्त 16 17 नाना के जीवन का मोड 17 18 मेवाडी मुनि चौथ का उपदेश 18 19 नाना धर्म के मार्ग पर 19 20 नाना गुरु की खोज मे 20 21 नाना स्थविर सतो की सेवा मे 21 22 नाना गुरु गणेश की शरण मे 23 23 नाना वैराग्य की कसौटी पर 24 24 नाना की दीक्षा की अनुमति 25 25 दीक्षा भूमि कपासन 27 26 नाना मुनि नाना के रूप मे 28 27 विनय की साकार मूर्ति · मुनि नाना 30 28. मुनि नाना की आराधना 30 29 मुनि नाना की दर्शनाराधना 30 मुनि नाना की चारित्राराधना 32 31 मुनि नाना की तपोसाधना 33 32 मुनि नाना का वचन माधुर्य 34 33. मुनि नाना आचार्यश्री गणेश के उत्तराधिकारी 35 30 मुनि नाना से युवाचार्य नाना 6 5 साधुमार्ग सघ के आचार्य नाना 37 ॐ आचार्यश्री गणेश का सथारा व महाप्रयाण 37 आचार्य नानेश के पूर्वाचार्य ॐ 38 आचार्य नानेश को प्राप्त सघ निधि 40 39 आचार्यश्री नानेश का शिष्य शिष्या परिवार 42 40 आचार्य नानेश के चातुर्मास स्थल 41 आचार्य नानेश के शासन मे सत सती वर्ग का महाप्रयाण 53 42 आचार्य श्री नानेश द्वारा स्वछदवृत्ति वाले साधको को आज्ञा बाहर 54 43 आचार्यश्री नानेश का समता दर्शन 5 44 आचार्यश्री नानेश का समीक्षण ध्यान 6 45 आचार्यश्री नानेश धर्मपाल प्रतिबोधक 46 राष्ट्रीय नेता एव मूर्धन्य विद्वानो की दृष्टि मे आचार्य नानेश 57 47 आचार्य नानेश आचरण मे कठोर और वैचारिक उदारता 58 48 आचार्यश्री नानेश और विचरण क्षेत्र 49 आग मे बाग लगाने वाले आचार्य नानेश 60 50 समता विभूति आचार्य नानेश 61 51 आचार्य नानेश की साहित्य जगत को देन 52 आचार्य नानेश द्वारा उत्तराधिकारी का चयन 64 52 आचार्य नानेश के उत्तराधिकारी का परिचय 6 54 आचार्य नानेश सैद्धातिक दृढता का 6 प्रभाव ऊ आचार्य नानेश के शासन की ऐतिहासिक उपलब्धि 67 56 आचार्य नानेश के वचनातिशय का 68 चमत्कार 57 हुशिउचौश्री जगनाना लाल चमकसी भानु 69 समाना एक रहस्यमय पहेली 58. आचार्यश्री नानेश को किन-किन क्षेत्रो से 70 कितने शिष्य शिष्याएं प्राप्त हुए 59 आचार्यश्री नानेश के पौत्र शिष्य 71 शिष्याएँ 72 60 आचार्यश्री नानेश का महाप्रयाण 31 38 नाना गुरु की कहानी 65 52. आचार्य नानेश के उत्तराधिकारी का परिचय प्यारे बच्चो! आपके मन मे सहज जिज्ञासा जागृत हो रही होगी कि आचार्यश्री नानेश के उत्तराधिकारी श्री रामलाल जी मसा का क्या परिचय है ? सुनो ! युवाचार्य श्री रामलाल जी म का जन्म राजस्थान प्रात के बीकानेर जिलाअन्तर्गत प्रसिद्ध करणी माता का धाम देशनोक मे सवत् 2009 की चैत्र शुक्ला 14 को हुआ। आपके पिता का नाम नेमचद जी भूरा ओर माता गवराबाई जिनका पीहर देशनोक के ही आचलिया परिवार मे था। मागीलाल जी भूरा बडे भ्राता तथा 5 बहने है। बाल्यकाल मे हाथ, पैर मे खुजली अधिक हो गई थी, कई उपचार किये गये, व्याधि शात नही हुई। एक दिन आप ज्योतिर्धर जवाहर की अनाथ सनाथ निर्णय नामक जवाहर किरणावली का अध्ययन कर रहे थे, जिससे आपके मन मे भी सकल्प पैदा हआ कि अनाथी मुनि की तरह यदि मेरी भी यह बीमारी मिट जाय तो मै भी दीक्षा ग्रहण कर लूंगा। बस, मानो एक चमत्कार ही हुआ कि इस दृढ सकल्प मात्र से वह व्याधि शात हो गई। अपने सकल्पानुसार गुरु चरणो मे जयपुर पहुंच गये और ज्ञानार्जन मे लग गये। करीब तीन साल बाद पारिवारिकजनो की आज्ञा मिलने पर वि स 2031 माध सुदी 12 दिनाक 23-2-75 को देशनोक मे ही अन्य पाँच भव्यात्माओ के साथ करणी स्कूल के प्रांगण मे दीक्षा सपन्न हुई। दीक्षोपरान्त अहर्निश गुरु सन्निधि मे रहकर दीर्घ अनुभवपूर्ण ज्ञान का निधान करते हुए गुरुदेव के इगिताकार के अनुसार प्रत्येक कार्य (अतरग व वाह्य कार्यों) मे सहयोगी बने रहे। गुरु नाना ने भी गहन परीक्षण करने मे कसर नही रखी। आप भी गुरुदेव की कसौटी पर पूर्ण खरे उतरे, जिससे गुरुदेव को अन्तर्विश्वास हो गया कि वास्तव मे (मुनिप्रवर श्री राम) इस पद के योग्य है। इससे पूर्वजो की आन, बान, शान के साथ जिनशासन की सुरक्षा व अभिवृद्धि होगी। यह सोचकर सघ के आग्रह एव अपनी वृद्धावस्था को देखते हुए परीक्षण के तौर पर चित्तौड मे कुछ कार्य भार को सोपकर को 'मुनिप्रवर' के सबोधन से सबोधित कर अधिकार प्रदान किये। तत्पश्चात् बीकानेर सेठिया धार्मिक भवन मे वि 2048 फाल्गुन वदी 12 सं को विधिवत् युवाचार्य की घोषणा करके वि स 2048 फाल्गुन सदी 3 को बीकानेर के ही जूनागढ के राजप्रागण मे चादर प्रदान नहोत्सव मनाया गया। तब से 66 नाना गुरु की कहानी : गुरु प्रदत्त पद की गरिमा को अक्षुण्ण रखते हुए पूर्ण सजगता से शासन व्यवस्था संभालते हुए गुरु सेवा मे पूर्ण तन्मय रहे। अचानक वि स 2056 कार्तिक बदी 3 को गुरुदेव के स्वास्थ्य की स्थिति को देखते हुए संलेखना संथारा कराकर समाधि मरण का पाथेय प्रदान किया व 4 बजकर 41 मिनट पर चौविहार संथारा करा दिया जो रात्रि को 1041 पर सीझा और हमारे नाना गुरु ने इस नश्वर देह का परित्याग कर स्वर्ग की ओर महाप्रयाण कर गये। ठीक उसके बाद चतुर्विध सघ ने आपको आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया, जो आज भगवान महावीर के 82वे एवं आचार्यश्री हुक्मेश के नवमे पट्ट पर विराजित है। हमारी यही शुभकामना है कि हमारे नवम् पट्टधर आचार्यश्री राम अपने गुरु प्रदत्त उत्तरदायित्व व उनके आदर्शो को अक्षुण्ण रखते हुए उत्तरोत्तर शासन अभिवृद्धि करे। 54. आचार्य नानेश : सैद्धांतिक दृढ़ता का प्रभाव प्यारे बच्चो ! हमारे आचार्य नानेश के जिस क्षेत्र मे चरण न्यास हुए और जिन्होने उनके सचोट, सैद्धातिक उपदेश सुने, उन क्षेत्रो मे, सघो मे, व्यक्तियो ने चाहे वह किसी जाति, संप्रदाय, सघ व समाज का हो-प्रभावित हुए बिना नहीं रहा और सत्य को समझकर उसको कार्यान्वित करने मे भी पीछे नही रहे। उदाहरणार्थ-मुबई घाटकोपर चातुर्मास का प्रसग था। गुरुदेव को मालूम पडा कि यहाँ के लोग सावत्सरिक प्रतिक्रमण भी ध्वनिवर्धक यत्र के माध्यम से करते है, प्रसगोपात आचार्य देव ने इसका स्पष्टीकरण करते हुए फरमाया-बंधुओ ! प्रतिक्रमण का मूल नाम षडावश्यक है। जिसमे पहला आवश्यक सामायिक है। सामायिक मे दो करण तीन योग से सावध प्रवृत्ति का त्याग रहता है। ऐसी स्थिति मे सावद्य प्रवृत्ति से संचरित ध्वनिवर्धक का प्रयोग करना कहाँ तक उचित है। आप सुज्ञ है, चितन करे। आचार्य देव के वक्तव्य को श्रवण करके जन-मन मे ऊहापोह मच गया। बात तो बिल्कुल सत्य, पर समस्या बहुत बड़ी रहती है। करीब दस हजार व्यक्ति प्रतिक्रमण मे उस दिन रहते है, उनको कैसे सुनाया जा सके। चर्चा के समय संघ प्रमुखो ने आचार्यश्री के चरणो मे समस्या प्रस्तुत की। तब आचार्य देव ने फरमाया-आप की बात यथार्थ है पर हर समस्या का समाधान निकल जाता है। यदि प्रतिक्रमण जानने वाले 10-15 भाई एव नाना गुरु की कहानी 67 10-15 बहने तैयार हो तो एक-एक भाई अथवा बहन के साथ यदि हजार-हजार भाई बहनो का ग्रुप बना दिया जाय तो आराम से प्रतिक्रमण श्रवण की समस्या हल हो जाय और सावध प्रवृत्ति से बचते हुए प्रतिज्ञानुसार षडावश्यक की आराधना भी शुद्धता से हो सके। इस विचार से सब सहमत हुए और आचार्य देव के निर्देशानुसार व्यवस्था करके प्रतिक्रमण किया। जिससे सब आनदित होकर बोल उठे- आज जैसा शाति और आनन्द से प्रतिक्रमण हुआ वैसा तो हमारी जिदगी मे नही हुआ। बस, फिर क्या था, सारे सघ ने निर्णय ले लिया कि आगे से प्रतिक्रमण मे टेप अथवा ध्वनिवर्धक यंत्र का प्रयोग नहीं किया जायेगा। जिसका अनुकरण मुबई के अनेक सघो ने किया। साथ ही जहॉ-जहाँ पर से समाचार पहुँचे, सबने इसकी भूरि-भूरि प्रशसा की एव अनुकरण का भाव अभिव्यक्त किया। आचार्यश्री नानेश को आचार्यश्री हस्तीमल जी म सा व शासन प्रभावक श्री सुदर्शनलाल जी म सा आदि के धन्यवाद युक्त पत्र भी आये। 55. आचार्य नानेश के शासन की ऐतिहासिक उपलब्धि प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु की साधना का इतना जबर्दस्त प्रभाव था कि उनके शासनकाल मे जो भी कार्य हुए वे पाँच सौ वर्षों के इतिहास मे अद्वितीय रहे थे। जो उन दृश्यो को देखता वह यह कहे बिना नही रहता। उदाहरणार्थ-धर्मपाल प्रवृत्ति का इतिहास तो आज साक्षी है। एक लाख के आस-पास नूतन जैन अपने जीवन काल मे किसी आचार्य ने नहीं बनाये। रतलाम मे एक साथ 25 दीक्षाओ का भव्य प्रसग। 3 लाख के आस-पास जनसमुदाय-आगतुको की आवास, निवास, भोजन आदि की सुव्यवस्था मे रतलाम का हर नागरिक का जुटना, चाहे वह हिन्दू था या मुसलमान, सिक्ख था अथवा इसाई-सबने उसको अपना महोत्सव माना। कोई यह भी नही कह सका कि इस व्यवस्था मे यह कमी थी, यह सब आचार्य देव की महान् पुण्यवानी पूर्ण अतिशय का ही प्रभाव था। जैसे ही 21 दीक्षा के प्रसग पर बीकानेर मे, 15 दीक्षाओं के प्रसग पर ल्यादर तथा अहमदाबाद मे अथवा अन्यत्र जहाँ पर भी सामूहिक दीक्षा का प्रमाण वहो वैसे ही आदर्श प्रस्तुत हुए।

68 ar नाना गुरु की कहानी आचार्य देव के जहॉ पर चरण न्यास हुए चाहे राजस्थान, गुजरात, सौराष्ट्र, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उडीसा वहाँ पर भी आश्चर्यकारी अभिनव इतिहास ही निर्मित हुआ, जो आज तक दोहराया जाता है और आगे भी दोहराया जाता रहेगा। लेकिन इतना सब कुछ होने पर भी हमारे आचार्य देव बिल्कुल निर्लेप रहते थे। उनके मन मे कभी बाह्य उपाधि अथवा विशेषणो की लालसा नही जगी। कोई लगा भी देता तो आप यही फरमाते कि मै तो नाना हूँ और मुझे नाना ही रहने दो। प्यारे विद्यार्थियो ! हमारे नाना गुरु सच्चे रूप से युगप्रधान थे, इसका यथार्थ मूल्याकन तो आने वाला इतिहास करेगा। 56. आचार्य नानेश के वचनातिशय का चमत्कार प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु के हर वचन जन-जन के लिए हितकारी पावन व मगलकारी होते थे। वे जब भी बोलते, बडे नपे तुले और अल्प शब्दो का प्रयोग करते थे। साथ ही बडे आदेयकारी, रे-तू आदि तुच्छता रहित होते थे। चाहे सामने वाला व्यक्ति कितना ही छोटा हो। वे अपने शिष्यो को भी कभी रे, तू संबोधित करने मे सकोच करते थे। व्याख्यान मे भी सचोट शिक्षा को अथवा वीभत्स प्रसग को भी इतना सजाकर बोलते कि सुनने वाला श्रोता बाग-बाग हो जाता था। नाना गुरु के वचन श्रोताओ के लिए रामबाण दवा का काम करते थे। आपका हर वचन आदेय था। बड़े से बड़ा व्यक्ति भी एक बार तो आपकी बात से सहमत हो ही जाता था। आपके मुख से निसृत मगलपाठ तो यथार्थ रूप से मागलिक ही था। सच्ची श्रद्धा से श्रवण करने वाले का तो सब मनोरथ सहज सफल हो जाता था। वे किसी को कभी छोटी मागलिक, बडी मागलिक का भेद नही रखते, जैसा कि आज जन-सामान्य मे परिलक्षित होता है। उनके मुंह से निकला मागलिक सच्ची श्रद्धा से श्रवण करने वाले के लिए वरदान रूप सिद्ध हो जाता था। ऐसे अनेको उदाहरण हैं। उनमे से एक उदाहरण नोखामडी (राजस्थान) के लुणावत परिवार का है, जो जवाहर भवन (लायब्रेरी) से एक मकान छोडकर ही रहता था। पन्नीवाई लुणावत नामक वृद्धा जिसको तेरह वर्ष से लगभग दिखना वद था। डॉक्टरो ने भी ऑपरेशन करने का निषेध कर दिया । अकस्मात् संवत्सरी के बाद आचार्य देव किसी के घर दर्शन हेतु पधार रहे थे। उनके पोते ने दादी को ।

नाना गुरु की कहानी 9 लगे। साथ ही बडे प्रेम से सब पालने मे झुला-झुलाकर नामकरण के उद्देश्य से चिंतन करने लगे। तब सबने गोवर्धन ही नाम उच्चारित कर दिया। वह बालक गोवर्धन नाम से अभिवर्धित होने लगा। 7. गोवर्धन नाना रूप में प्यारे बच्चो ! आपके मन मे सहज एक कौतुहल उभर रहा होगा कि यह क्या बात है ? नामकरण तो गोवर्धन के नाम से किया गया था और आज वह नाम तो सुनने मे भी नहीं आता। जहाँ देखो हर व्यक्ति के मुंह से 'जय गुरु नाना' का ही नाम श्रवण करने को मिलता है। तो गोवर्धन नाम गौण और नाना नाम प्रसिद्धि मे कैसे आ गया ? क्या यह बात सत्य है ? बच्चे ! हॉ, हॉ आप सच कहते हैं। हमारे मन मे वास्तव मे यह प्रश्न उठ ही रहा है, जो आप बता रहे है। अब आप ही इस कौतुहल को समाप्त कीजिये। प्यारे नन्हे मुन्हे बच्चो ! सुनो- बड़े मजे की बात है। वास्तव मे नाम तो गोवर्धन ही रखा गया था। पर, मेवाड की भाषा मे छोटे बच्चे के लिये नाना शब्द ही ज्यादा उच्चारित होता है। सब बहन, भाईयो से छोटा होने के कारण सब परिवार के सदस्य ही नही, गाँव का कोई भी व्यक्ति गोवर्धन की सहज सौम्य मुद्रा से प्रभावित होता। गोदी मे उठाकर लाड प्यार करता और नाना शब्द से उच्चारण करने लग गया जिससे हुआ यह कि गोवर्धन नाम तो बिल्कुल ही लुप्त हो गया और नाना नाम ही पहचान बन गया और सारे सगे सवधी भी इसी नाम से जानने पहचानने लग गये और यही नाना नाम आज भक्तो के लिए सिद्ध मत्र हो गया है, समझे। 8. नाना नन्हें मुन्नों का नेता प्यारे बच्चो ! वही बालक नाना माता-पिता व परिवार के स्नेहिल वातावरण मे अभिवर्धित होता हुआ अब चलने, फिरने, बोलने लगा और घर की देहरी से बाहर अपने हमजोली साथियो के साथ बालक्रीडा करने जाने लगा। अडौसी-पडौसी बच्चे सहज बालक नाना के मधुर व्यवहार व मुस्कान भरे चेहरे से सहज प्रभावित होने लगे। बोली मे भी दडा मिठास, की किनी को गाली गलोज या गन्दे शब्द का प्रयोग नहीं करता। अपने से बहे बच्चो 10 नाना गुरु की कहानी को दादा और छोटे को भैया शब्द से बोलता। कोई बच्चा यदि गाली या तुच्छ शब्द का प्रयोग कर देता तो बडे प्रेम से उनको समझाता कि हम किसी को तुच्छ शब्द से बोलेगे तो अपने को भी वही तुच्छ शब्द सुनने को मिलेगा। इसलिये अच्छे शब्दो से ही बोलना चाहिये। आदर देने से ही आदर मिलता है। साथ ही कोई बुड्डे या अधे व्यक्ति को निकलते देखकर बच्चे उसकी मजाक उडाते, चिढाते तो उनको भी रोकते हुए बालक नाना उनका हाथ पकडकर उनको यथास्थान पहुंचा देता। जिससे वे उसको अपना अन्तर आशीर्वाद देते हुए कहते- अरे नाना तेरा भला हो और सबको कहते कि बच्चा हो तो नाना जैसा हो। बालक नाना के ऐसे व्यवहार से बच्चे भी बड़े प्रसन्न रहते। जो खेल खेलना होता तो बस सब नाना से ही सलाह लेते और उन्ही के निर्देशानुसार कार्य करते। धीरे-धीरे सब लोग भी यह कहने लग गये कि यह नाना तो सब बच्चों का नेता है। 9. नाना की व्यावहारिक शिक्षा प्यारे बच्चो ! उस समय आज की तरह माता-पिता बच्चो को दो साल का भी हुआ नही कि अध्यापको के हवाले करके अपने कर्तव्य की इतिश्री नही समझते थे। उनका अनुभव था कि बच्चो का मन मस्तिष्क बडा कोमल होता है। केवल अक्षरीय (किताबी) ज्ञान ही व्यक्ति को महान् नही बनाता है। बच्चे के भविष्य को शारीरिक, मानसिक दृष्टि से सुसस्कारित करने के लिए मुक्त व अच्छे वातावरण की आवश्यकता है। न आज की तरह बच्चो को चुस्त व भडकीले कपडे ही पहनाते, न चॉकलेट, बिस्कुट व डिब्बे का दूध ही पिलाते। न डराते, धमकाते और न उन पर किताबो का भार ही लादा जाता था। दो-तीन साल तक के बच्चे तो माता का दूध पीकर गोद मे खेलते और बहुत अल्प वस्त्र पहनाते जिससे उनके प्रत्येक अग पुष्ट बनते और सर्दी-गर्मी, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति मे सहनशील बनते थे। माता-पिता अपने आचरण व बोली-चाली के मधुर व्यवहार से ही उसको अच्छा सस्कारित करते थे। बालक नाना भी इन्ही संस्कारो से सस्कारित होते हुए पांच साल का हो गया तब माता-पिता उनको अक्षरीय ज्ञान दिलाने हेतु चिंतन करने लगे। लेकिन उस समय वहाँ कोई स्कूल आदि की आज की तरह व्यवस्था थी न साधन ।

नाना गुरु की कहानी 11 सिर्फ एक पडित पडौस के गाँव से आता जो बच्चो को क का, बारहखडी, पहाडे, जोड वाकी गुणा भाग व उसके बाद कुछ व्यापारिक गुर सिखाता था और वेतन के रूप मे एक टक्का ताबे का लेता था। बालक नाना को भी शुभ मुहूर्त मे वहाँ पर भेजा गया। वहाँ विद्यार्थी के रूप मे नाना विद्यार्जन करने लगा। 10. नाना नन्हें मुन्नों का शिक्षक प्यारे बच्चो ! विद्यार्थी नाना जो पूर्व पुण्योदय के सहज सस्कार से सस्कारित तो था ही। अति अल्प समय मे उसने अपनी प्रतिभा का ऐसा चमत्कार दिखाया कि अध्यापक व बच्चे सब आश्चर्य करने लगे। स्वय ने तो उस पडित से सारी विद्या ग्रहण कर ही ली थी साथ ही शाला मे जो कमजोर विद्यार्थी थे उनको खूब मेहनत करके सिखाते और उनका उत्साह बढाते। जिससे सारे विद्यार्थी उनका अहसान मानकर पूर्ण आदर सत्कार के साथ उनकी हर बात को बड़े ध्यान से सुनते व उनके निर्देश का पूरा पालन करते। कभी अध्यापक देरी से पहुंचते तो विद्यार्थी नाना सव बच्चो को बिठाकर उनका पाठ सुनता और सबको याद कराता, जिससे अध्यापक के हृदय मे भी विद्यार्थी नाना के प्रति विश्वास जमता गया। अब तो उन्होने सब बच्चो को कह दिया कि नानालाल तुम्हारी स्कूल का मॉनीटर है। मेरे नहीं पहुंचने तक सारी व्यवस्था यही सभालेगा। यदि नाना ने किसी की शिकायत की तो मै उसकी खबर ले लूंगा, सब पूरा ध्यान रखे। साथ ही प्रतिदिन का टवका लेने व उसका हिसाब का भार भी नाना पर डाल दिया। जिसको बालक नाना ने बड़ी प्रामाणिकता व बखूबी से वहन किया। अध्यापक जी स्वय गाँव के लोगो के सामने भी नाना की तारीफ करते रहते कि यह बालक आगे जाकर बहुत होनहार निकलेगा। इसका भविष्य महान् उज्ज्वल है। 11. नाना को पितृ वियोग का वज्रपात प्यारे बच्चो ! यह जीवन चलचित्र के समान दडा चित्र विचित्र रूप से प्रस्तुत होता है। सब दिन एक समान नहीं रहते। जीवन दाई 12 नाना गुरु की कहानी संघर्षमय मोडो से गुजरना पड़ता है। ऐसे विकट मोडो से जो निरन्तर सावधान रहता हुआ आगे बढ़ता है, वही महान् बनता है। बालक नाना जो अभी युवावस्था मे भी प्रवेश नही कर पाये थे कि अकस्मात् पिताश्री मोडीलाल जी बीमार पड गये। सबके मन में गहरी चिता व्याप्त थी। आपके बड़े भाई जडावचंद जी बडे विह्वल होकर बोले- अब मेरा क्या होगा, मुझे कौन सभालेगा। मोडीलाल जी धैर्य बंधाते हुए कहने लगे- दादा ! यह नाना तुम्हारा ही है। नाना आपकी सेवा करेगा। इससे जडावचंद जी तो आवश्वस्त हुए पर मोडीलाल जी की बीमारी बढती गई। बालक नाना अपने पिताश्री की अग्लान भाव से अहर्निश सेवा मे जुटा रहता। मोडीलाल जी भी नाना पर अत्यधिक स्नेह भाव रखते थे। अपनी बीमारी को देखकर वे हमेशा इसी बात की चिंता करते रहते कि मेरे कुछ हो गया तो बच्ची सोहन व नाना ये दोनों छोटे हैं, इनका क्या होगा? चिता से शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ने लगा। तब बालक नाना पिताश्री को पूर्ण धैर्यता प्रदान करते हुए यही कहते- आप क्यो चिता करते है। हमारा सब कुछ अच्छा ही होगा। आप अपनी तबीयत का ध्यान रखिये। इस प्रकार बालक नाना के धैर्य युक्त मधुर शब्द सुनकर पिताश्री के चेहरे पर मधुर उभर आती। वे अपने लाडले को सीने से चिपका कर अन्तर्मन से ढेरो आशीर्वाद प्रदान करते। पर कहावत है- 'टूटी को बूटी नहीं है। इसी के अनुसार हजार प्रयत्न करने पर भी कुछ उपचार नहीं चला और पिताश्री परलोकवासी हो गये। सारे परिवार मे हाहाकार मच गया, सब जोर-जोर से रोने चिल्लाने लगे। मॉ और बहनो का तो कहना ही क्या । भाई भाभी सब का हाल बेहाल हो रहा था लेकिन बालक नाना उम्र में छोटे होते हुए भी न मालुम इतना धैर्य कहाँ से प्राप्त किया कि सब लोग आश्चर्यपूर्वक कहते कि नाना की छाती तो वज की बनी हुई है। इस प्रकार सबको धैर्य बंधाते हुए पिताश्री की अतिम क्रिया से निवृत्त हुए। 12. नाना का रेल के ड्राईवर के समान बनने का चिंतन प्यारे बच्चो ! क्या तुमने कभी रेल देखी है। बच्चे बोले- आप कैसी बाते करते हैं। रेल देखी क्या, हम तो कई बार उसमें बैठकर यात्रा भी कर चुके हैं।

नाना गुरु की कहानी 13 बच्चो ! बहुत अच्छी बात है पर मेरा पूछने का तात्पर्य कुछ और है। किसी चीज को देखना व उसका उपयोग करना अलग बात है ओर उससे जीवन निर्माण की प्रेरणा लेना अलग बात है। हमारे नाना गुरु की आपको जो जीवन घटनाएँ मैं बता रहा हूँ वो सभी प्रेरणास्पद है। नाना बचपन से ही बडे खोजी स्वभाव के थे। जब कोई नई चीज देखते तो वे उसकी गहराई मे उतर जाते और उसमे से कुछ-न-कुछ जीवन विकास की प्रेरणा लेते थे। एक बार जब उन्होने कपासन जाते समय अपने साथियो के साथ सबसे पहले रेल देखी। उसमे बालक नाना भी थे। सब तो देख-देख कर चले गये, बात आई गई हो गई। लेकिन बालक नाना उसको गौर से देखते हुए विचार करने लगे कि इतनी बड़ी रेल और उसमे बैठे हुए यात्रियो को एक इजन खीच रहा है, जिसका एक ड्राईवर सचालन कर रहा है। यह देखकर मन मे विचार आया कि मनुष्य मे कितनी कला छिपी हुई है कि इतने व्यक्तियो को अपने लक्ष्य तक पहुंचाने मे सहयोगी बन सकता है। बस, मन मे भाव जगा कि काश ! मुझ मे भी यह कला आए और मै भी ड्राईवर बनकर इस प्रकार लोगो को यथास्थान पहुंचाने का कार्य करू । प्यारे बच्चो यह बालक नाना का ट्रेन के ड्राईवर बनने का मनोरथ तो सफल नही हुआ लेकिन आगे जाकर वही नाना धर्मसघ रूपी ट्रेन जो चतुर्विध सघ को स्वर्ग की यात्रा कराती है उसके ड्राईवर बनकर अपने मनोरथ को-संकल्प को सार्थक किया। हम सब धन्य हुए उस नाना ड्राईवर की धर्म रूपी सघ ट्रेन मे बैठकर। 13. परोपकारी नाना प्यारे नौनिहालो! यह जीवन बडा कीमती है। इसको सार्थक तो वही व्यक्ति बना सकता है जो इस जीवन से परोपकार करता हो। अपने व अपने परिवार के लिये तो कुत्ते, बिल्ली आदि प्राणी भी सब जीते है, दौड धूप करते है। लेकिन जो दूसरो के लिए जीता है. दूसरो के दुखो को देखकर दयाई होते है उनके दुख को दूर करने हेतु तत्पर होता हे वही महान् बनता है। मेरे प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु जो इतने महान् कहलाये, इसका मूल कारण है उनकी यह परोपकारी वृत्ति जो उनको जन्म जात सत्कार 14 नाना गुरु की कहानी मे प्राप्त हुई। जिसके कारण सारे गॉव मे किसी जाति, समाज मे यदि कोई बीमार पड जाता तो मालूम पडते ही बालक नाना उनके वहाँ पहुँच जाते। उनके दुख सुख की बाते सुनते, उनको धैर्य बधाते । बीमार होता तो उसको दवा के साथ पथ्य परहेज की चीज लाकर देते। कोई बुड्डा व्यक्ति यदि घास व लकडी का गट्ठर लेकर निकलता तो झट उनके पास पहुंचकर उनको सहयोग देते। कोई ॲधा, लूला व्यक्ति देखते तो झट उनको सहारा देकर अपने स्थान पहुंचाते। एक बुद्धी तेलन के परिवार मे उसका कोई संरक्षक नही था। इसलिये स्वय कुएँ से पानी भरकर लाती थी जिसको देखकर बालक नाना दयार्द्र हो उठते और जल्दी से उसका घडा अपने कधे पर उठाकर उसके घर पहुंचा देते। जिससे खुश होकर वह बुढिया बालक नाना को छाती से चिपका लेती और अपने अन्तर्मन से ढेरो आशीर्वाद देती हुई उसके गुणों का वर्णन करते नही अघाती। ग्रामीण बालक, वृद्ध, अडौसी-पडौसी सब बालक नाना के परोपकार वृत्ति की सराहना करते नहीं थकते। 14. मातृ भक्त नाना प्यारे बच्चो क्या आप जानते हो हमारे इस जीवन पर माता का कितना बड़ा उपकार है। जब बालक गर्भ में आता है तब से ही माता उसके सरक्षण हेतु कितने कष्ट उठाती है। गर्भवती माता को उठने बैठने मे भी कितनी तकलीफ होती है। कभी-कभी तो माता का जीवन भी खतरे मे पड जाता है और जन्म के बाद तो बालक को सर्दी गर्मी आदि से बचाती हुई अपने लाडले के पोषण हेतु स्वय भूखी रहकर भी मेहनत मजदूरी करने हेतु भी तत्पर होती है। लेकिन वही बालक बडा होने पर उन सब को भूलकर बात-बात मे माता की उपेक्षा करने लग जाता है। लेकिन बालक नाना अन्तर्मन मे मातृ भक्ति इतनी कूट-कूट कर भरी थी कि हर समय छाया की तरह माता के साथ ही रहता। जब से समझ पकडी तब से तो माता जो भी कार्य करती उसमें वह पूर्ण सहयोगी बनता। फिर चाहे वह काम झाडू लगाना, पशुओ का गोबर उठाना, कुएँ से पानी लाने का ही क्यों न हो। इतना ही नही खाना खाना तो भी माता के हाथ से और वह भी साथ बैठकर खाना। इसके लिये तो कभी-कभी इतनी जिद्द कर बैठते कि माता सामायिक व उपवास मे भी अडचन आ जाती।

नाना गुरु की कहानी 15 एक बार खाना खाने घर पर आया और कहने लगा-मॉ जल्दी से खाना परोस, भूख जोरदार लग रही है। लेकिन मॉ सामायिक मे बैठी थी। हाथ से इशारा कर दिया कि हाथ से ले के खाले या भाभी से कह दे। ऐसा प्रसग जब दो तीन बार आ गया तब तो बालक नाना का मन इतना खीझ उठा कि मॉ के सामायिक के उपकरण व पास मे जो रेत की घडी पड़ी थी उसको ही उठाकर फैकने लग गया, बड़ी मुश्किल से उनकी रक्षा की। ऐसे ही पर्व तिथि पर जब माँ उपवास करती तो बालक नाना का मन खित हो जाता, यह सोचकर कि पिताजी का वियोग व हमारी आर्थिक कमजोरी अथवा भाभी से कुछ बोलचाल हो जाने के कारण मॉ भूखी रहती है। इसलिये येन-केन-प्रकारेण हठाग्रह से उपवास तोडने को विवश कर बैठता और साथ मे भोजन कराके ही शाति का अनुभव करता। उनके थोडे से बीमार हो जाने पर रात-दिन उनके पास ही बैठा रहता। दु 15. नाना व्यापारी मेरे प्यारे नयनसितारो! आप जानते हैं कि जिस परिवार मे हम रहते है उस परिवार के कुछ उत्तरदायित्व भी एक वय बाद हमारे साथ मे जुड जाते है जिसका निर्वाह करना हर पारिवारिक सदस्य का आवश्यक कर्तव्य हो जाता है जिसका पालन नहीं करने पर वह परिवार का प्रिय नहीं बन सकता। उल्टा अनेक तानो व उपेक्षाओ का शिकार बनना पड़ जाता है जिससे परिवार मे कलह अशाति की आग लग जाती है। बालक नाना अब किशोरावस्था मे प्रवेश करने लगे साथ ही अपने कर्तव्य का बोध भी होने लगा। पिताजी की मृत्यु के बाद जो दुख उनके मन मस्तिष्क को अशात बना रहा था, कुछ समय बाद वह कुछ ठडा पडा। अपने बड़े भैय्या (मिट्ठालाल जी) के साथ खेती बाडी मे सहयोग देने लगे। साथ ही एक छोटी दुकान भी लगा ली जिसमे ग्रामवासियों की आवश्यक सामग्री गुड, तेल, तबाकू, बीडी, हल्दी, धनिया, मिर्च-मसाला, कण्डा आदि सामान बेचने लगे। युवक नाना के स्नेहिल व्यवहार व प्रामाणिक जीवन से सब ग्रामवासी प्रभावित थे ही इसलिये व्यापार भी चलने लगा और अनुभव भी बढ़ने लगा। जिसके फलस्वरूप अपने चचेरे भाई कन्हैयालाल जी पोजना के 16 नाना गुरु की कहानी साथ साझे मे व्यापार की योजना इस शर्त पर बनाने लगे कि यदि मुझे गुस्सा आ जाय उस समय तुम चुप रहना और तुमको गुस्सा आ जाय उस समय मै चुप रहूँगा। बाद मे परस्पर बैठकर निपटेगे। लेकिन कुछ निमित्त ऐसा बना कि नाना का मन धन से उदासीन होकर धर्म के व्यापार मे लग गया, जिसका जिक्र आगे करेगे। 16. बहिन मोती के तपस्या का निमित्त प्यारे बच्चो ! यह जीवन एक बहते पानी का रेला है। जो किस समय किधर मोड खा जावे, किस समय कौन से निमित्त से व्यक्ति कौन सी राह पकड ले। कुछ कहा नहीं जा सकता। नाना के जीवन में भी ऐसा ही एक निमित्त आया कि धनोपार्जन की योजना ने धर्मोपार्जन की दिशा मे मोड ले लिया, भोग से योग की ओर चरण बढ गये। राग से वैराग के रंग में रंग गये, ममत्व से समत्व की ओर बढ गये। वह निमित्त यों बना किशोर नाना अपनी दुकान पर बैठे थे। अचानक माता सिणगार घर से बाहर आई और बोली- अरे नाना ! मिट्ठालाल कहाँ गया। नाना बोला- भैया बाहर गये हुए हैं। बोलो, क्या काम है ? तब माता सिणगार कुछ हिचकिचाती हुई चुप हो गई क्योकि वह जानती थी जिस कार्य को मै बताना चाहती हूँ उस धर्म कार्य मे तो नाना की बिल्कुल ही रुचि नही है। यह तो धर्म के नाम से ही चिढता है। इसलिये इसे कहना भी उचित नही। यह सोचकर अफसोस करती हुई उदास होने लगी। पहले ही बताया जा चुका है कि किशोर नाना सब कुछ सहन कर सकता है पर माँ को उदासीन नही देख सकता। यही कारण था कि माँ को उदासीन देख कर नाना का मन मचल उठा। बोला-मॉ! क्या बात है? आज तू उदास क्यो लग रही है ? जो कुछ बात है मुझे बता। भैया नही है तो क्या हुआ ? मै बैठा हूँ जो बात हो वह वता। नाना के इन वचनों से माता कुछ विश्वस्त हुई। बोली-बेटा ! वात ऐसी है कि अभी भादसोडा से समाचार आये हैं कि वाई मोत्या के पंचोले की तपस्या है। इसलिये ऐसे मौके पर अपने यहाँ से चूदडी ओढाने जाना आवश्यक है। नही जाने पर सगे संबंधियो में अपने परिवार की हल्की लगेगी। भैया यहाँ नहीं है, किसको भेजूं ? बस, इसी चिंता से मन उदासीन हो गया।

नाना गुरु की कहानी 17 माता की इस बात को सुनते ही नाना बोला-इतनी छोटी बात के लिये उदास होने की क्या आवश्यकता है ? जो ले जाना है वह दे, मै अभी जाकर आता हूँ, जल्दी कर) माता सिणगार हर्षित होकर घर मे जाती है और चूदड लहरिया, कपडे व नगद रुपये लाकर नाना को देते हुए सारी बात समझाकर भादसोडा के लिए रवाना करती है। 17. नाना के जीवन का मोड़ प्यारे बच्चो ! आपने कभी घोडी देखी ? बच्चे ठहाका मारते हुए बोले- हॉ बाबा, हमने कई बार शादी विवाह मे वर राजा को घोडी पर सवार होकर जाते हुए देखा है। हमारे भैया की शादी मे भी घोडी आई थी। उस पर मैं भी बैठकर घूमा था । बडा मजा आया था, अब भी मन बारवार घोडी पर बैठने के लिये ललचाता है। पर घोडी बहुत कम ही नजर आती है। प्रिय बच्चो ! आपकी बात बिल्कुल सही है। आजकल घोडा, घोडी, ऊँट की सवारी बहुत कम हो गई है। अब तो साईकिल, स्कुटर, कार आदि यातायात के प्रमुख साधन हो गये है लेकिन हमारे नाना गुरु जब घर मे थे उनके यहाँ हमेशा घोडी रहती थी, कही एक गाँव से दूसरे गाँव जाना होता तो उसी पर बैठकर जाते थे। भादसोडा जाने के लिए भी उन्होने घोडी तैयार की और उस पर बैठकर तेज गति से दौड़ाते हुए वहाँ से 12 कि मी दुर भादसोडा पहुँच गये। नाना के भादसोडा पहुँचते ही सबको भारी खुशी हुई। आप जल्दी से घोडी से उतरे और मॉ द्वारा भेजा हुआ सारा सामान बहन के सासुजी के हाथ मे पकडा कर अपनी बहन को नमस्कार करके रवाना होने लगे। यह देखकर सगे सबधी सब आश्चर्य करते हुए कहने लगे-अरे नानालाल जी ! इतने बड़े हो गये हो कुछ तो रीति रिवाज समझो। यह सामग्री जो आप लाये है वह यहाँ ऐसे नही दी जाती। उसको तो जब अपन सनी यहाँ से आपकी बहन को गीत गाते हुए महाराज साहब के यहाँ व्याख्यान में ले जायेगे और जब म सा तपस्या के प्रत्याख्यान करायेगे तब आप अपने हाथो से अपनी बहन को ओढाना और अन्य सद चीज भेट करना। यह सुनकर किशोर नाना मन मे तो झुसला गये। पर विवशतादश रुकना पड़ा। समय पर सब लोगो के साथ व्याख्यान स्थल पर मन-मसोसकर बैठ गये और वहाँ विराजित मेवाडी मुनि चौथमल जी मसा का उपदेश श्रवण करने लगे।

18 नाना गुरु की कहानी 18. मेवाड़ी मुनि चौथ का उपदेश प्यारे बच्चो ! आपने कभी म. सा. का उपदेश सुना, दर्शन किये। बच्चे-हॉ बाबा, हम तो कई बार म सा. के पास जाते रहते हैं और उनका उपदेश भी सुनते रहते है। बच्चो ! आप तब तो बहुत भाग्यशाली हो। परन्तु खास बात यह है कि उपदेश सुनना अलग है और आचरण मे लाना अलग है। इसलिये हमारे जैन शास्त्रो मे उपदेश श्रवण करने वाले श्रोताओ को तीन भागो मे विभाजित करते हुए बताया कि कुछ श्रोता जो उपदेश सुनते तो जरूर हैं पर इस कान से सुनकर उस कान से निकाल देते है। ऐसे श्रोताओ को खाकीणे श्रोताओ की गिनती मे लिया गया है। लेकिन कुछ श्रोता ऐसे होते है जो सुनने के बाद याद रख के दूसरो को सुनाते है पर जीवन मे नही उतारते। उन श्रोताओ को लाखीणे श्रोताओ की गिनती मे लिया है। लेकिन वे श्रोता जो उपदेश सुनकर उसके अनुसार आचरण बनाने का प्रयत्न करते है उनको अनमोल श्रोताओ की गिनती मे लिया गया है। ऐसे अनमोल श्रोता बनकर बैठे थे युवक नाना जो हालाकि पहली ही उपदेश सुनने बैठे थे। मेवाडी मुनि चौथमल जी म सा उपदेश सुना रहे थे। उस दिन संवत्सरी महापर्व था। उसकी महत्वता बताते हुए फरमा रहे थे कि जो इस मनुष्य भव को पाकर उपवास, व्रत, पौषध, सामायिक, प्रतिक्रमण आदि धर्म क्रिया नहीं करते है और आज के दिन भी अपने वैर विरोध का शमन करके क्षमायाचना नहीं करता है वह जैनत्व से गिर जाता है। अभी पचम आरा चल रहा है इसमे तो फिर भी हम धर्माराधन करके मोक्ष के नजदीक तो जा सकते है। परन्तु यदि यह मौका चूक गये और कही छठे आरे मे हमारा जन्म इसी भरत क्षेत्र मे हो गया और मनुष्य भी बन गये तो भी हमारी कैसी भयंकर दशा हो जायेगी। वहाँ धर्म भावना तो दूर, मनुष्यता भी कितनी विकृत हो जाएगी। मुंड हाथ प्रमाण देहमान, कच्छ-मच्छ का आहार ही जीवनाधार बन जायेगा। भयकर सर्दी गर्मी का प्रभाव, वैताढ्य गिरि की गुफा मे निवास होगा। यही दशा इस क्षेत्र में 42 हजार वर्ष तक रहेगी। इसलिये जागृत होईये, धर्माराधन करके मनुष्य जीवन सार्थक कीजिये। यदि धर्माराधन नहीं किया तो हमारे और पशु में क्या फर्क है।

नाना गुरु की कहानी 19 इस प्रकार व्याख्यान समाप्त होते ही प्रत्याख्यान के समय बहन को चूदडी ओढाकर स्थानक से बाहर निकले और जाने की तैयारी करने लगे। देखने वाले देखते रह गये, ताने मारने वालो ने भी कसर नहीं रखी। ये देखो जैन कुल मे जन्म लिया है। सवत्सरी पर्वाराधन का भी भान नहीं। लेकिन उनको क्या मालूम कि इस एक प्रवचन को भी इन्होने अनमोल श्रोता के रूप मे श्रवण किया जो इनके जीवन की दिशा और दशा को ही बदल देगा । आज जिनको हम ताना मार रहे हैं वे ही एक दिन महापुरुष के रूप मे प्रख्यात होकर जैनत्व का विश्व मे पाठ पढायेगे और हम हजारो उपदेश श्रवण करके भी यथास्थान ही रह जायेगे। 19. नाना धर्म के मार्ग पर प्रिय बच्चो ! आप जानते हो, हमारे जीवन की हर क्रिया का फल हमारी भावना पर आधारित है। भाव रहित क्रियाएँ केवल क्रियाएँ रह जाती हैं फिर चाहे वह जप-तप, दान-शील, उपदेश श्रवण, गुरु-दर्शन आदि कुछ भी हो। इसलिये हर क्रिया शुद्ध भाव से करनी चाहिये। भावो मे जितनी सहजता, सरलता, शुद्धता रहती है उतनी ही उस क्रिया की महत्वता बढ जाती है। फिर वह क्रिया दिखने मे साधारण व छोटी ही क्यो न हो, महान् फलदायक बन सकती है। देखिये, हमारे नाना प्रवचन सुन कर चल पडे भादसोडा से भदेसर । जाते हुए जगल मे पहुंचे। वहाँ वे वारबार विचार करने लगे कि हा हा ! मनुष्य जीवन मे धर्म का कितना महत्व है, धर्म रहित मनुष्य तो पशु से भी हीन है। आज मुझे समझ मे आया। जैनधर्म का प्रत्येक तत्त्व कितना सत्य व महान् है। मैने अज्ञानतापूर्वक उपवास, व्रत-नियम, सामायिक का कितना महत्व है नही समझकर माँ का कितना दिल दुखाया है। मैं इस पाप से कैसे छूटूगा। ऐसा चितन करते हुए मन मे इतना पश्चाताप हुआ कि वह ऑखो के द्वारा ऑसूओ के माध्यम से गहर बहने लग गया। कुछ समय बाद थोडा मन हल्का हुआ तो अन्तर्चेतना जागृत हो उठी। उसी समय मन मे निश्चय किया कि अब मुझे तो इस पवित्र पावन मनुष्य जीवन को संसार के विषयभोगो मे समाप्त नहीं करके योग गर्ग में लगाना है और सद्गुरु की शरण में जाकर धर्माराधन करना है। इन्नी दृढ निश्चय के साथ आगे बढ़ते गये। मालूम ही नहीं पड़ा कि कद रास्ता पर 20 नाना गुरु की कहानी हुआ और घर के द्वार पर आकर घोडी रुक गई। युवक नाना घोडी से उतरकर घर मे आये। घोड़ी व समान को यथास्थान रखा और माँ के चरणो मे नमन करते हुए फूट-फूट कर रोने लगे और कहने लगे-मॉ! मुझे माफ कर दे । मैने अज्ञानतावश तुम्हारी धर्मकरणी मे बाधा पैदा की। अब मैने धर्म के मर्म को समझा है और निश्चय किया है कि अब इस जीवन को धर्म मार्ग पर ही लगाना है। यह कहकर ससार के हर कार्य से उदासीन बनकर अगले मार्ग को प्रशस्त बनाने हेतु चितन करने लगे। 20. नाना गुरु की खोज में प्यारे बच्चो ! आप जानते ही हो कि जहाँ चाह होती है वहाँ राह अपने-आप बन जाती है। होनी चाहिये सच्ची चाह । हुआ यही, युवक नाना अन्तर चाह के अनुरूप ही घर बैठे ही ऐसा संयोग जुड़ गया कि पूज्यश्री मोतीलाल जी म. सा को जब किसी ने बताया कि दाता वाले नानालाल पोखरना के मन मे संसार से उदासीनता छा गई है और धर्म के अभिमुख होना चाहते है। यह सुनते ही गुड पे मक्खी, फूल पे भ्रमर अपने-आप पहुँच है वैसे ही या तो खूब विनंती करने पर भी नही पधारते लेकिन यह बात सुनते ही अचानक विहार करके दांता पधारे। जैसे भूखे को भोजन, प्यासे को पानी, अधे को ऑख, पक्षी को पॉख मिलने पर जैसा आनद आता है वैसा ही पूज्यश्री के शुभागमन से युवक नाना को तो परमान्द हुआ और जुट गये आपकी चरण उपासना में। पूज्यश्री मोतीलाल जी म. सा ने आपकी धर्म भावना को सवर्धित करने मे कसर नही रखी। उनके स्नेह से युवक नाना इतने प्रभावित हो गये कि जब आपने दांता से विहार किया तो नाना भी परिवार वालो को समझाकर साथ हो गया। विहार करते हुए पूज्य मोतीलाल जी म सा चातुर्मासार्थ बदनोर पधार गये। विरक्तमना नाना ने मार्ग मे पूर्ण विनय भाव से सामायिक, प्रतिक्रमण, सूत्र, पच्चीस बोल, पॉच समिति तीन गुप्ति, साधु प्रतिक्रमण, दशवैकालिक आदि कंठाग्र करके उसके अर्थ पर गहराई से चिंतन मनन करने लगा। चितन की चाँदनी मे यह बात स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई कि इन मुनियो की कथनी करणी में रात-दिन का अंतर है। हालाकि मेरे प्रति इनके दिल मे स्नेह की कोई कमी नही है, मेरी हर बात का ध्यान रखते है। इस सम्प्रदाय के श्रावक कहते है कि तुम दीक्षा लेते हो तो पूज्य पदवी का पट्टा अभी लिखकर दे देते हैं। लेकिन इतने मात्र से ही तो लक्ष्य की सिद्धि सभव नहीं है। बस, मुझे लक्ष्य की सिद्धि हेतु सुयोग्य गुरु की शरण मे जाना चाहिये, जिनकी कथनी करणी मे एकरूपता हो और शुद्ध संयम मर्यादा के पालक हो। बस, अब युवक नाना इसी मौके की इतजार करने मे लग गये। सयोगत स्थानक मे अहर्निश धर्माराधन करने वाले सुश्रावक श्री मोतीलाल जी वाफना को अपने कपडे समेटकर कहीं जाने की तैयारी करते देखकर सहज पूछ बैठे-क्या बात है, कहाँ जाने की तैयारी हो रही है ? श्रावक जी बोले-मै ब्यावर पूज्य श्री जवाहरलाल जी म सा के सतो की सेवा मे जा रहा हूँ। यहाँ सिर्फ गाँव के नाते श्रद्धा नही होते हुए हमारे घर के भोजन की बारी निपटने के कारण रहना पड़ गया है। लेकिन इन सतो की कथनी करणी का अतर देखकर मन नहीं मानता। आप तो रात दिन पास रहकर अनुभव कर ही रहे होगे। सुनते ही मुमुक्षु नाना बोल पडे- बाफना जी! आपने तो मेरे मन की बात कह दी। वास्तव मे आपका कथन यथार्थ है। नया था तब कुछ समझता नही था, अब ज्ञानार्जन के बाद मुझे भी अनुभव हो रहा है। मै भी चाहता हूँ कि किसी सच्चे महापुरुष की शरण मे जाऊ। मैने भी पूज्य जवाहरलाल जी म सा की महिमा तो बहुत सुनी पर दर्शन सेवा का सौभाग्य प्राप्त नही हुआ। क्या आप मुझे साथ ले चलेगे। श्री बाफना जी बोले- भैय्या ले जाने मे मुझे कोई एतराज नही है पर ये लोग ऊहापोह मचा देगे। इसलिये मेरे यहॉ से जाने के बाद जब भी इच्छा हो बस मे बैठकर ब्यावर सतीदान जी की हवेली पहुंच जाना, वहॉ में आपको मिल जाऊगा। ऐसा कहकर किराये के रुपये देकर बाफना जी चले गये। 21. नाना स्थविर संतों की सेवा में मेरे प्यारे भावी समाज के कर्णधारो ! यह बात आपने सुनी ही होगी कि फूटी नौका कभी व्यक्ति को पार नही लगा सकती। यही सोचकर हमारे नाना गुरु जब वैराग्यावस्था मे थे तब सच्चे गुरु की खोज मे बदनोर से निकलकर ब्यावर पहुंचे और वहाँ से पूछताछ करके सतीदान जी की हवेली जहाँ पर महास्थविर बोथमल जी म सा आदि वृद्ध संत विराजमान थे. उन्ही की सेवा मे पडितश्री जवरीमल जी म सा (बालेसर वाले) भी विराजमान थे. वहां पहुंचे।

22 नाना गुरु की कहानी विरक्तमना युवक नाना ने भक्ति भाव से वदन किया और बिना किसी परिचय के देखने लगा उनकी सारी दिनचर्या को तोलने लगा अपने सीखे हुए ज्ञान के तराजू से। सहज उनको इस निश्चय पर पहुंचने मे देरी नही लगी कि जो मैंने श्रमणचर्या का पाठ पढ़ा है आगम धरातल से उसका विधिवत् पालन वृद्ध, रोगग्रस्त साधक से लगाकर सेवारत सभी संत यथार्थ रूप से कर रहे हैं। इतने मे मोतीलाल जी बाफना भी आ गये, जो कही बाहर गये हुए थे। उन्होने ही परिचय कराया। तब बोथमल जी म सा. जो मेवाड मे बहुत समय तक विचरण कर चुके थे उनके सारे परिवार का परिचय बताया तो सहज इतने प्रभावित हुए और कहने लगे- बाफना जी ! आपका उपकार मैं कभी नही भुलूगा। आप मुझे सच्चे गुरु की शरण दिखाने मे सहायक बने हैं। मै अब यह दृढ प्रतिज्ञा करता हूँ कि मै शिष्य बनूगा तो पं जवरीमल जी म सा का और सकेत करते हुए बोला-इन्ही का बनूगा-यह मेरा दृढ निश्चय है। इस प्रकार विरक्तमना नानालाल जी की बात को सुनकर प जवरीमल जी म सा. बोले-भैया! आप तो मेरे शिष्य बनने का सकल्प कर चुके हो पर मै आपको अपना शिष्य नही बना सकता क्योकि हमारे संघ मे आचार्यश्री जवाहर के सामने सब संतो ने मय हस्ताक्षर प्रतिज्ञा की है कि कोई भी संत अपनी नेश्राय मे शिष्य नही बनायेगे। सारे शिष्य आचार्यश्री की नेश्राय मे ही होगे। आपने भी उनका नाम तो सुना ही होगा। आचार्यश्री जवाहर अभी गुजरात में विराजमान है। साथ ही अपनी वृद्धावस्था को देखते हुए अपने उत्तराधिकारी के रूप मे युवाचार्यश्री गणेशीलाल जी म सा की नियुक्ति की है। युवाचार्यश्री गणेश बडे सौम्य प्रकृति के धनी, विद्वत्-शिरोमणी, चुस्त-संयमी है जो अभी कोटा में विराजमान है। आप यहाँ कुछ समय तक ज्ञानार्जन करते हुए फिर उन महापुरुषों की सेवा का लाभ ले सकते है। यह सुनकर तो विरक्तमना नाना को और आश्चर्य हुआ कि कहाँ वहॉ तो हर छोटा सत अपना शिष्य बनाने की पाटी पढ़ा रहा था और कहाँ इस सघ के निर्लेप साधक । वास्तव मे यही उद्धार संभावित है। ऐसा सोच कुछ समय तक ब्यावर में ही ज्ञानार्जन करके एक बार घर पहुंचे और अनेक संतो का संपर्क साधते हुए भी अपने मन में निश्चय को अटल रखते हुए नाना गुरु की कहानी 23 कपासन के चडालिया जी आदि से विचार विमर्श कर युवाचार्यश्री गणेश के दर्शनार्थ कोटा रवाना हुए। 22. नाना गुरु गणेश की शरण में प्रिय बच्चो ! विरक्तमना नाना ने जब ज्योतिर्धर जवाहर व युवाचार्य गणेश की गुण गरिमा मुनिश्री से एवं जन समुदाय से सुनी तभी से उनके अतरमन मे उनसे साक्षात्कार की तीव्र तमन्ना जागृत हो रही थी। सारे रास्ते भर उनकी महिमा, गुण-गरिमा का चितन करते रहे कि इतनी लबी यात्रा कब समाप्त हुई, कुछ पता ही नहीं चला और कोटा स्टेशन आ गया। ट्रेन से उतरकर बडी उत्सुकता के साथ पूछताछ करते हुए स्थानक मे पहुंचे और ज्योही युवाचार्यश्री गणेश के दर्शन किये, प्रथम दर्शन मे ही इतने भाव विभोर हो गये मानो रक को रत्नो का निधान मिल गया हो, उनकी सौम्य मुद्रा, चेहरे का तेज, मन्द मुस्कान ने तो इतना प्रभावित कर दिया कि वदन करते हुए पूर्ण रूप से उनके चरणो मे अपने-आप को समर्पित कर कहने लगे- प्रभो ! यह दास नानालाल पोखरना, दातावाला आपकी शरण मे आया है। अब यथाशीघ्र चरण-शरण प्रदानकर, दीक्षा देकर मेरे जीवन का उद्धार कीजिये। अब आप ही शरणभूत हैं। मुमुक्षु नाना की इस अभिव्यक्ति को श्रवण करके कोटावासी तो हर्ष विभोर हो गये कि चलो घर बैठे ही हमको दीक्षा महोत्सव का लाभ मिलने वाला है। वैरागी भी तैयार है। बस, देर है तो सिर्फ युवाचार्यश्री की स्वीकृति की। बस, सब युवाचार्यश्री की ओर टकटकी लगाकर निहारने लग गये। पर युवाचार्यश्री ने जब विरक्तमना नाना की बात और लोगो के मन की उत्सुकता सम्मुख रखते हुए गहन गभीर मुद्रा मे फरमाया- भैया ! आपकी भावना श्रेष्ठ है। मगर अभी तो आप आये हैं। न आप से मेरा परिचय है न मेरे से आपका । दीक्षा कोई मधुर मिष्ठान्न नही है जो मैं आपको बॉट दू और आप उसको खाकर मजा चख ले। यह तो तलवार की धार है, जीवन भर की बात है इसलिये भावुक न बनते हुए दीक्षा की शिक्षा लो। परस्पर एक-दूसरे को परखो और अपने मन मे तोलो। जब इन सब बातो मे आपका और हमारा मन विश्वस्त बन जाये फिर आगे कदम दाना। यह बात सुनते ही सब अवाक रह गये. चिंतन करने लगे। कहाँ तरफ तो एक-एक शिष्य के लिए कितनी हेराफेरी, ऐस गेरा नत्यू गेन 24 नाना गुरु की कहानी भी मिले खरीदकर छल कपट से मूडने की तैयारी मे रहते है और कहा ये महापुरुष जो ऐसे परिपक्व, खानदानी सहज प्राप्त शिष्य के लिए भी इस प्रकार के निर्लेप स्पष्ट भाव । विरक्तमना नाना के तो आश्चर्य का कोई पार ही नही रहा, पूर्व सारी स्थिति का चितन करते हुए एक ही निश्चय पर पहुंचे कि अब इनके चरणो मे दीक्षा की शिक्षा लेकर इनकी हर परीक्षा में उत्तीर्ण होना है। इसी मे मेरा उद्धार है, कल्याण है। इसी निश्चय के साथ लगा दिया अपने जीवन को श्रीचरणो की उपासना मे। 23. नाना वैराग्य की कसौटी पर प्यारे नौनिहाल बच्चो ! आपने कभी सोना देखा है। सोने का रग कैसा होता है ? तपाक से बच्चे बोले- बाबाजी ! सोना चमकदार व पीला होता है। जब मम्मी सोने के जेवर पहनती है तो वह भी चमकने लग जाती है। मुझे भी सोने की अंगूठी, चैन पहनने का बडा शौक है। अच्छा बच्चो ! यह तो जानते हो कि सोना पीला व चमकदार होता है पर जिस समय वह खादान से निकलता है, उस समय तो वह इन पडे पत्थरो के टुकडो जैसा ही होता है। लेकिन जब उसको तपाकर अलग करके घिस घिसाकर तैयार किया जाता है तब वही साधारण दिखने वाला पत्थर चमकदार कीमती सोने का रूप बन जाता है। इसी प्रकार हमारे नाना गुरु जिनके बारे मे बताया गया है कि कैसे छोटे से ग्राम मे एक साधारण परिवार मे जन्म लेकर सत्संग से जीवन को आगे बढ़ाते हुए गुरु गणेश के चरणो मे पहुंचे तब गुरु गणेश ने इनको खूब तपाया और इनकी खूब परीक्षाएँ हुई। कोटा से विहार हुआ, कई जगह भोजन हेतु कहने वाले भी नही मिले तो भी समभाव से भूखे रहकर भी ज्ञानार्जन करते रहे, न किसी की शिकायत, न किसी को कोई उलाहना। थोडे बहुत चने, मुरमुरे चुपचाप बाजार से ले आते और भूख अति असह्य होने पर खा लेते। दो जोडी कपडे और एक बोरी का टाट जिस पर सो जाते एवं अधिकतर ध्यान मौन मे रहकर सर्दी गर्मी आदि परिषह सहन करते रहते। इसी क्रम मे युवाचार्य गणेश के साथ उदयपुर पधारे। वहाँ भी किसी ने भोजन हेतु नही कहा तो चुपचाप ज्ञानार्जन करते रहे। आखिर चार बजे गुरुदेव के पास आकर उपवास पच्चक्खाने का आग्रह करने लगे। तब वहाँ नाना गुरु की कहानी 25 वैठे गहरीलाल जी खमेसरा आदि का ध्यान गया। परिचय पाकर बहुत पश्चाताप करने लगे। प्रात पारणे हेतु आग्रहपूर्वक अपने घर ले गये, रास्ते मे भी उनकी बोली-चाली विवेक की परीक्षा लेने लगे। घर पहुंचे। हाथ-मुँह धोने हेतु पानी दिया गया, तब आपने प्रासुक धोवन की पूरी जानकारी करने के बाद ही हाथ लगाया। नीचे जाने लगे तो खींवेसरा जी ने नाली मे हाथ धोने का सकेत किया पर समुर्छिम जीवो की हिसा की वात बताकर नीचे गये और खुली जगह पर अत्यल्प धोवन मे कार्य निवृत्त कर वापस ऊपर आ गये, पारणा किया और रवाना होने लगे। उसी समय आपका हाथ पकडकर खमेसरा जी अपने कमरे मे ले गये। रुपये और नये वस्त्र लेने का आग्रह करने लगे। आपने आवश्यकता नही समझकर निषेध करते हुए स्थान पर आ गये और लग गये ज्ञानार्जन मे। बाद मे अपने कार्य से निवृत्त होकर खमेसरा जी आदि गुरुचरणो मे आये। सारी बात बताते हुए अर्ज करने लगे-अन्नदाता ! वैरागी तो बहुत परिपक्व और आत्मार्थी है। लगता है आगे जाकर एक महापुरुष के रूप मे चमकेगा। हमारी इच्छा है कि इनकी दीक्षा उदयपुर मे ही निवृत्त हो जाय । बस, आपके हुक्म की देरी है। उन सघ निष्ठ श्रावको की बात सुनकर युवाचार्यश्री गणेश ने फरमाया- श्रावक जी! आप शासन निष्ठ व अनुभवी है। यदि परिवार वालो की अनुमति मिल जाय तो मेरी तरफ से कोई मनाही नही है। बस, यह बात सुनते ही सब हर्ष विभोर हो उठे और जुट गये परिवार वालो से अनुमति प्राप्त करने मे। 24. नाना की दीक्षा की अनुमति प्यारे बच्चो आपको यह बात सुनकर आश्चर्य होता होगा व्यक्ति आत्मकल्याण करने मे तो स्वतत्र है फिर उसमे परिवार की अनुमति की क्या आवश्यकता है। लेकिन इसमे सोचने की बात तो यह है कि आत्म साधना मे व्यक्ति तो पूर्ण स्वतत्र है लेकिन जिन महापुरुषो की चरण शरण मे साधना करना चाहता है वे महाव्रत धारी है। विना परिजनो की ईजाजत से किसी को दीक्षा देकर अपना शिष्य बना लेना चोरी के अन्तर्गत आ जाता है इसलिये अनुमति प्राप्त करना आवश्यक हो जाता है। इसी उद्देश्य से विरक्तमना युदक नाना उदयपुर से कुछ विशिष्ट 26 नाना गुरु की कहानी व्यक्तियो के साथ दाता पहुंचे। नाना सीधा जाकर माताजी के पॉव पड़ा और बडी विनम्रता से अर्ज करने लगा- मातेश्वरी ! आप जानते ही है कि मेरा मन ससार से उदासीन हो गया है और मैने दो साल (वर्ष) मे साधु जीवन की सारी ट्रेनिंग भी प्राप्त करली है और गुरुदेव की हर परीक्षा मे उत्तीर्ण हो गया हूँ। अब मेरा मन संयम के लिये अति छटपटा रहा है इसलिये अब आपसे दीक्षा लेने की अनुमति चाहता हूँ। आप मुझे इसके लिए शीघ्र अनुमति प्रदान कर दें ताकि मै सयम ग्रहण करके अपनी आत्मा का कल्याण करता हुआ आप के नाम को भी उज्ज्वल करूगा। विरक्तमना नाना की यह बात सुनते ही मोहावेश मे माता सिणगार व परिवार के सब सदस्य फूट-फूटकर रोने लगे। माता सिणगार कहने लगी- बेटा तू यह क्या बात कर रहा है, तू मेरा छोटा बेटा है। तेरी आशा मे ही तो दुःख के दिन निकाल रही हूँ। तू ही तो मेरा जीवनाधार है। तेरे बिना मेरी कौन सार सभाल करेगा। ये तेरी बहनें कितना दुख पायेगी, जरा विचार कर। तेरे को यह क्या रग लग गया, एक समय तो तू धर्म के नाम से ही चिढता था। अब तेरे को यह रंग कैसे लग गया, कुछ समझ मे नही आता। विरक्तमना नाना कहने लगा- मातेश्वरी ! आप का कथन सत्य है। अज्ञानतावश मैने धर्म के महत्व को नही समझने के कारण आपके दिल को खूब दुखाया, आपकी धर्म करणी में अन्तराय दी। अब यह अज्ञानता का पर्दा हटा तो धर्म का मर्म भी समझ पाया और सच्चे गुरु की खोज कर पाया। आप थोडा अपने मोह को दूर कर सोचिये- मै कितने अच्छे मार्ग पर जा रहा हूँ, उससे अपने कुल का गौरव ही बढेगा। रही तेरी सार सभाल तो धर्म के प्रताप से कोई कमी नही रहेगी। बस, तू मुझे अनुमति दे दे। जब तक आज्ञा नही देगी, तब तक मै अन्न जल भी ग्रहण नही करूगा। इतना कहते ही तो माता का हृदय भर आया और मन की ममता को मारती हुई बोली- बेटा ! जब तूने इतना दृढ निश्चय कर ही लिया है तो ले मै तुझे सहर्ष आज्ञा देती हूँ कि तू संयम ग्रहण करके अपने पिता जी का नाम उज्ज्वल करना, मेरे दूध को लजाना मत और धर्म तथा गुरु का खूब गौरव बढाना, यही मेरा अन्तर आशीर्वाद है। माता सिणगार द्वारा ज्योही यह अभिव्यक्ति हुई कि चारो तरफ भगवान महावीर स्वामी की जय, जैन धर्म की जय, आचार्यश्री जवाहर की जय, युवाचार्यश्री गणेश की जय, वैरागी नानालाल की जय आदि के नारो नाना गुरु की कहानी 27 से सारा गाँव गूंज उठा। सब लोग वहाँ पर एकत्रित हो गये। उदयपुरवासी भी आ गये और सारे परिवार को धन्यवाद देते हुए अर्ज करने लगे-अब हमारी अर्ज भी स्वीकार करे और इस दीक्षा का लाभ उदयपुर श्रीसघ को प्रदान करे, हम आपके यहाँ बड़ी आशा लेकर आये हैं। लेकिन इस बात को सुनकर तो सारे दाता वासी जैन जैनेतर सब एकमत होकर कहने लगे कि दीक्षा तो किसी भी हालत मे दाता ही होगी। आप जब भी अच्छा मुहूर्त हो निकलवा दीजिये। हम सहर्ष दीक्षा देने हेतु तैयार हैं। आखिर राजपडित भी तो साथ ही था। तत्काल मुहूर्त निकाला गया तो सबसे श्रेष्ठ मुहूर्त पौष शुक्ला अष्टमी, 1996 का निश्चित हुआ। उदयपुर वासी दीक्षा की अनुमति की सफलता से ही सतुष्ट होकर उदयपुर की ओर प्रस्थान कर गये और यह शुभ सदेश चारों तरफ प्रसारित हो गया। 25. दीक्षा भूमि कपासन प्यारे बच्चो ! आप सब जानते ही है कि हर व्यक्ति व क्षेत्र अच्छे कार्य करना चाहता है लेकिन चाह चाह रह जाती है, कर वही व्यक्ति व क्षेत्र सकता है जिसका पुण्य प्रबल है। बिना पुण्य प्रबल के दीक्षा जेसे पावन प्रसग तो बहुत बड़ी बात है, साधारण से साधारण प्रसग भी प्राप्त होना दुर्लभ हो जाता है। उदयपुरवासी बहुत चाह रहे थे कि यह दीक्षा का लाभ हम ले, तो दाता वासी चाह रहे थे कि हम ले पर लाभ किसी अन्य क्षेत्र के योग मे ही लिखा हुआ था। हुआ वही, ज्योही यह शुभ संदेश कपासन वासियो को प्राप्त हुआ। कपासन के गुरु भक्त हर्ष विभोर होते हुए दाता पहुँच गये। वधाई देते हुए धन्यवाद देने लगे। दाता वासी कहने लगे- हम तो सब आपके ही भरोसे । हमारा हर कार्य आपके सहयोग से निवृत्त होता है। अब आप ही बताईये इस कार्य को अच्छा से अच्छा कैसे निवृत्त किया जाय। हम तो इस मामले मे पूरे अनभिज्ञ है। तव कपासन वासी बोले- आपका कहना यथार्थ है लेकिन अन्य ससार के कार्य अलग हैं और यह दीक्षा का कार्य जगदह भी आचार्यश्री जवाहरलाल जी म सा के उत्तराधिकारी युवाचार्य गणेशीलाल जी म सा के नेत्राय में हो रहा है। आपने देखा ही जिन के चातुर्मास मे भी कितनी दूर-दूर से बडे-बडे राजा रईस लोग से 28 नाना गुरु की कहानी यह तो दीक्षा का पावन प्रसंग है। कम से कम सात-आठ हजार आदमी तो समझ ही लें। साथ ही युवाचार्यश्री जी पधारेगे तो 30-40 साधु-साध्वी के पधारने की पूरी संभावना है। अब आप ही सोच ले कि इतनी सारी व्यवस्था बैठाना क्या यहाँ सभव है। सब सुनकर चुप हो गये। फिर बोले-अब आप ही बताईये, यह कार्य अच्छा से अच्छा कैसे निवृत्त हो सके। तब उपयुक्त अवसर देखकर कपासन के एक सज्जन ने कहा- यदि आप इस कार्य को यशस्वी बनाना चाहते है तो मेरी समझ मे तो यही उचित लगता है कि दाता और कपासन कोई अलग नही है। आप वहाँ निवास करले ताकि सारा कार्य हम संभाल लेगे, वहॉ रेल्वे स्टेशन भी है। आने जाने वालों को भी कोई तकलीफ नहीं होगी। साधु-साध्वियो के भी आहार पानी मे कोई बाधा नही आएगी। सारा कार्य सहज सुन्दर निपट जायेगा। यह बात सुनते ही सब के चेहरे पर मुस्कान आ गई और आखिर कपासन में ही दीक्षा दिलाना निश्चित हो गया। भगवान् महावीर की जय ध्वनि गुंजाते हुए कपासनवासी हर्ष विभोर होते हुए भोजन आदि से निवृत्त हुए और कपासन पहुँचकर यह शुभ सदेश सारे शहर मे पहुँचाया। सारा शहर खुशी से झूठ उठा, लग गया इस महोत्सव को श्रेष्ठतम बनाने मे। 26. नाना मुनि नाना के रूप में प्यारे बच्चो! क्या आपने अपने जीवन मे किसी की दीक्षा देखी। बच्चे कहने लगे-नही बाबा, हमने अपने जीवन में कभी दीक्षा नहीं देखी। अच्छा तो हम बताते है आपको दीक्षा का अर्थ होता है-सन्यास लेना, घर-परिवार, धन-वैभव सबसे नाता तोडकर साधु बनना। वैसे ऐसी दीक्षा तो हर धर्म संप्रदाय मे होती है पर जैनधर्म की दीक्षा का अपने-आप मे बहुत महत्व है। जो भी दीक्षार्थी होता है सबसे पहले उसको परिवार की आज्ञा प्राप्त करके गुरु चरणो मे रहकर नंगे पैर पैदल चलकर अल्प वस्त्रो में सर्दी गर्मी सहन करना, रात्रि भोजन का त्याग रखना, सत्य बोलना, अनुशासन मे रहना, ब्रह्मचर्य की साधना करना आदि के साथ जैन तत्त्व का ज्ञानार्जन करना आदि पूरी ट्रेनिग लेनी पड़ती है। जब उसमे परिपक्वता आ जाती है तब भी परिवार के सदस्य पूर्ण सहमति पूर्वक लिखित रूप से आज्ञा पत्र भेट करे नाना गुरु की कहानी 29 व दीक्षार्थी खुद अपनी दृढता सूचक प्रतिज्ञापत्र भेट कर देने के पश्चात् बडी धूमधाम के साथ पारिवारिक सदस्य अर्ज करते हैं कि हमारी आज्ञा है, अब आप इनको दीक्षा दे सकते हैं, तब ही दीक्षा दी जाती है। विरक्तमना नानालाल जी को भी आज्ञा मिल गई एव कपासन मे दीक्षा दीलाने का निश्चय हो गया तो परिवार व सघ के सदस्यो ने युवाचार्य श्री गणेशीलाल जी म सा से दीक्षा देने हेतु कपासन पधारने की विनती की। तब सघ को स्वीकृति प्रदान कर कपासन की दिशा मे विहार किया। दीक्षा के कुछ दिन पूर्व ही लगभग 40 साधु-साध्वी कपासन पहुँच गये थे। सारा कपासन धर्ममय बन गया। हर गली और घर मे दीक्षा के मंगल गीतो की गूज हो रही थी। कही वैरागी को भोजन कराया जा रहा था। कहीं बदोली निकाली जा रही थी। आखिर वह दिन पौष शुक्ला अष्टमी का भी उदित हो गया। सब तालाब के पास आम्र उपवन मे एकत्रित होने लगे, लगभग आठ हजार की जनता एकत्रित हो गई थी इधर विरक्तमना नानालाल जी अपने स्थान से अभिनिष्क्रमण करके परिजनो के साथ आम्र उपवन मे पहुंच रहे थे। रास्ते भर मे कोई मुँह ऐठा रहा था तो कोई नगद रुपये भेट चढा रहा था। आप सब का अभिवादन स्वीकार करते हुए आगे बढ़ते-बढते आम्र उपवन मे जय-जयकार के साथ पहुंच गये एव वहाँ विराजित युवाचार्यश्री एव सत सतीवृंद को वदन करके मगल पाठ श्रवणकर पास की स्कूल मे चले गये। वही पर सिर का मुडन करवाकर श्रमणवेश रूप मे चादर चोलपटा, मुँहपत्ति, रजोहरण, पूजनी के साथ लकड़ी के चार पात्र व मर्यादित वस्त्र ग्रहण करके गजगति से पुन आम्र उपवन मे पहुंचे, जय-जयकार से आम्र उपवन गूज उठा। मगलाचरण के साथ ही युवाचार्यश्री गणेश ने परिवार व उपस्थित जन समुदाय की विधिवत् अनुमति प्राप्त कर सविधि सर्व सावद्य प्रवृत्ति का तीन करण तीन योग से प्रत्याख्यान कराकर सामायिक चारित्र रूप दीक्षा प्रदान करके ठीक आठवे दिन छेदोपस्थापनीय चारित्र रूप मे महाव्रतारोपण करके मुनिमडल मे सम्मिलित कर दिया। सब मुनिश्री नानालाल जी म सा की जय-जयकार करते हुए भोजनादि से निवृत्त होकर मगल पाठ श्रवण करके अपने-अपने स्थान की ओर प्रस्थान कर गये।

30 नाना गुरु की कहानी 27. विनय की साकार मूर्ति : मुनि नाना प्यारे बच्चो ! आप मे से कौन ऐसा है जो अपने जीवन का विकास नहीं चाहता। मेरे ख्याल से प्रत्येक बच्चा यही चाहता है कि हम अपने जीवन के हर क्षेत्र मे उन्नति करे। लेकिन प्यारे बच्चो ! केवल चाहने मात्र से ही तो उन्नति नही हो सकती। उन्नति मे सबसे पहला सहायक आधार है-विनय । भगवान महावीर ने साधको को अपनी अतिम शिक्षा मे सर्वप्रथम स्थान दिया है-विनय को और विनयवान वही हो सकता है जो अपने गुरु तथा बडो के इगतिकार को समझकर अथवा आज्ञा लेकर ही प्रवृत्ति करे। चाहे वह अपनी इच्छा के विरुद्ध ही क्यो न हो। हमारे नाना गुरु ने मुनि धर्म मे प्रवेश पाते ही इस विनय मूल धर्म को जीवन का आधार बनाकर साधना प्रारम्भ की। हर कार्य मे गुरु गणेश की आज्ञा ग्रहण करके ही कार्य करते, यदि कोई संत किसी कार्य के लिए कह भी देते तो बडे मधुर शब्दो मे अर्ज करते कि आपकी आज्ञा शिरोधार्य है मै अभी गुरुदेव से आज्ञा लेकर आता हूँ। आपकी इस सहजवृत्ति से गुरुदेव तो प्रसन्न रहते ही, साथ ही छोटे बड़े सभी सत सहज प्रभावित होते और उसके फलस्वरूप उनके हर कार्य मे सहयोगी बनते। साथ ही इस विनयवृत्ति से आपकी बुद्धि का तीव्र रूप से क्षयोपशम होने लगा, जिससे आप मे ज्ञान कठस्थ करने की अपूर्व क्षमता उत्तरोत्तर बढती ही गई। बडे से बडे थोकडे व शास्त्रो के कठिन से कठिन स्थल, व्याकरण न्याय जैसे ग्रन्थो को सहज मुखाग्र करके उसके तलस्पर्शी अध्ययन मे सफल हुए। इसलिये प्यारे बच्चो ! यदि अपने को भी विकास करना है तो इस विनय के सूत्र को साधने मे सजग बनकर माता-पिता, गुरुजन, बडे-बुजुर्ग सभी का आदर सत्कार करते हुए उन्हे पूर्ण संतुष्ट रखना चाहिये ताकि उनका अतआशीर्वाद हमारे जीवन विकास मे वरदान रूप से सिद्ध बन सके। 28. मुनि नाना की आराधना प्यारे बच्चो ! क्या आप जानते हो जैनत्व साधना का मूलाधार क्या है ? देखो मैं आपको बताता हूँ। जैनत्व की साधना का मूलाधार ज्ञानाराधना, दर्शनाराधना, चारित्राराधना, तपाराधना है। इसी को आधारभूत बनाकर हमारे नाना गुरु ने मुनि धर्म मे प्रवेश करके पूर्ण विनय भाव से साधना पर अग्रसर होते हुए सबसे पहले ज्ञानाराधना मे सजग बने। क्योकि भगवान नाना गुरु की कहानी 31 महावीर ने ‘पढम नाण तओ दया का उद्घोष करते हुए फरमाया कि साधक ! तुझे जीवन मे जो कुछ करना है, साधना है उसका पहले ज्ञान कर। प्रभु के इसी फरमान को शिरोधार्य करके आचार्य गणेश की सन्निधि मे सम्पूर्ण जैनवाड्मय अर्थात् 11 अंग, 12 उपाग, 4 मूल, 4 छेद एव आवश्यक सूत्र के साथ उस की टीका, टब्बा, चूर्णी के साथ प्रकीर्णक, कर्मग्रन्थ, कम्मपयडी, तत्त्वार्थ सूत्र, विशेषावश्यक भाष्य एव अनेक थोकडो के साथ हिन्दी, प्राकृत, शौरसेनी, अपभ्रश, पाली, सस्कृत आदि की व्याकरण लघु सिद्धात कौमुदी गुजराती आदि भाषाओ का ज्ञान प्राप्त कर स्वमत परमत के आधारभूत स्याद्वाद मजरी, प्रमाण, मीमासा, कर्म काड, रत्नाकरावतारिका, साख्यकारिका, षट्दर्शन समुच्चय, प्रमाण, नय, तत्त्वलोक आदि अनेक न्याय शास्त्रो के साथ बाईबल, कुरान, गीता, महाभारत, रामायण, पुराण, मनुस्मृति वेद, वेदाग का भी गहन अध्ययन ही नहीं, अध्यापन मे भी कुशलता प्राप्त की। जिनकी विद्वता पर बडे-बडे विद्वान एव वैज्ञानिक प्रोफेसर भी आश्चर्य करते थे। साथ ही उनके चितन मनन पर विपुल साहित्य उनकी विद्वता का साक्षी है जो आने वाली पीढियो के लिए प्रेरणादायी बनेगा। 29. मुनि नाना की दर्शनाराधना प्यारे बच्चो ! जैसा कि पूर्व मे आपको बताया गया कि साधना के विकास मे ज्ञान की परम आवश्यकता है इसके बिना सारी क्रियाएँ निरर्थक बन जाती है। इसी प्रकार अध्यात्म विकास में दर्शन की अर्थात् सम्यक श्रद्धा का भी बड़ा महत्व है। जैसे नीव के विना महल का अस्तित्व खतरे मे पड जाता है, वैसे ही धर्म रूपी महल की दशा बन जाती है। अपने आराध्य देव गुरु धर्म के प्रति यदि श्रद्धा नहीं है तो जीवन का विकास ही अवरुद्ध हो जाता है। मुक्तिमार्ग का तो दर्शन यह प्रथम सोपान है, आधार है। हमारे नाना गुरु अपने इष्ट देव गुरु व धर्म के प्रति इतने दृढ आस्थावान थे कि कई बार ऐसे-ऐसे विचलित करने के प्रसग सामने आये कि साधारण व्यक्ति होता तो कभी किनारा कर लेता। आप नये-नये थे, चापलूस सत पहले तो इनकी खूब तारीफ करके अच्छी दस्तुएं खाने को देकर अपना स्नेह बतलाते हुए कहते-देखो ना युवाचार्यश्री जी आपका ध्यान ही नहीं रखते है, आप इतने बीमार रहते है फिर भी आपको साथ ले जाने की जगह इन वृद्ध संतो के पास छोड़कर चले गये। ऐसा करना 32 नाना गुरु की कहानी अच्छा थोडा ही है। ये तो आप हैं इसलिए चुपचाप है। ऐसे कई अनुकूल प्रतिकूल वचनो के प्रयोग करते। मुनि नाना छोटे भले ही थे लेकिन अपनी विलक्षण प्रतिभा से उनके भावों को समझकर सहज फरमाते-आप ऐसी क्या बात करते हैं मेरी तबीयत ठीक नही होने के कारण ही तो मुझे साथ विहार मे लेकर नही गये, क्योंकि वहाँ लंबे विहार मे कई कठिनाईयां आ सकती हैं। इसीलिये तो आप महापुरुषो के भरोसे छोडकर गये है ताकि इलाज भी हो जाये, पढाई मे भी बाधा पैदा न हो। साथ ही बडे गुरुदेव भी तो पास ही विराज रहे हैं। कहिये मेरे कारण आपको कोई तकलीफ तो नही है। यह बात सुनते ही वे ऐसे समझ गये कि वापस कभी किसी प्रकार की कोई ऊँची-नीची बात ही नहीं की। ऐसी थी हमारे नाना गुरु की आराध्यों के प्रति दृढ आस्था । 30. मुनि नाना की चारित्राराधना प्यारे बच्चो ! जैसा कि आपको बताया गया कि ज्ञानाराधना, दर्शनाराधना मे नाना गुरु जितने सजग थे, उतने ही चारित्राराधना मे पूर्ण सजग थे। वे जानते थे कि जीवन मे चारित्र धन ही सबसे बड़ा धन है। इसके खो जाने से सब कुछ खो जाता है। इसलिये अपने लिये हुए महाव्रतो का आराधन करने मे वे “भारडपक्खीव्व चरे पमत्ते" इस प्रभु के संदेश को प्रतिपल सम्मुख रखकर के सावधानी से हर क्रिया पूर्ण विवेक से करते थे। जो भी साधक की आवश्यक चर्या है उसको गुरुदेव के निर्देशानुसार यथाविधि करने में तत्पर रहते। आपने सारी दैनिकचर्या को काल विभाजन करके ऐसी व्यवस्थित कर रखी थी कि उसका किसी भी हालत मे चाहे अनुकूल परिस्थिति हो या प्रतिकूल-कभी व्यवधान पैदा नही होने देते। कभी कारणवशात् व्यवधान आ भी जाता तो उसका गुरु चरणो मे प्रायश्चित लेकर आगे उसकी पूर्ति अवश्य करते। चाहे वे आवश्यक क्रियाएँ प्रतिक्रमण, प्रतिलेखन, पूंजन, मौन, ज्ञानार्जन, पुनरावर्तन, सेवा, स्वाध्याय, तपोनुष्ठान आदि कुछ भी हो। नाना गुरु ने यह नही देखा कि अन्य संत महात्मा कर रहे हैं या नही कर रहे है। उनका एक ही लक्ष्य था-मुझे कुछ करना है, अपने लिये करना है। प्रामाणिकता से करना है। आत्म-परमात्म साक्षी से करना है। हॉ, इतना अवश्य ध्यान रखते कि यदि कोई रुग्णतावश अपना कार्य नहीं कर नाना गुरु की कहानी 33 पा रहा है तो जल्दी से उन के कार्य मे सहयोग करने हेतु तत्पर रहते। यदि कोई व्रत नियम आराधन मे स्खलना हो जाती तो बडे सहज भाव से उसकी आलोचना करके शुद्ध बनने हेतु तत्पर रहते। कभी किसी की थोडी भी आशातना हो जाती तो पश्चाताप के साथ जल्दी से जल्दी क्षमायाचना कर लेते। इससे बडे छोटे सत व गुरुदेव के हृदय मे इतना गहरा स्थान जम गया कि कोई भी आपके बारे मे कितनी ही चिकनी चुपडी बात बनाकर कुछ भी कह देते तो भी उस पर विश्वास नही होता था। 31. मुनि नाना की तपोसाधना प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु जैसे ज्ञान-दर्शन-चारित्राधन को आत्म-विकास मे पूर्ण सहायक मानकर उसके प्रति पूर्ण सजग रहते उसी प्रकार आत्म-शुद्धि मे तप का बहुत बड़ा महत्व समझते हुए समय-समय पर अनशन तप की स्थिति से उपवास बेला, तेला, पचोला, अठाई आदि तप भी करते रहते थे। लेकिन उससे अधिक आपका विश्वास ऊणोदरी तप पर ज्यादा था। उसमे विशेष रूप से आवश्यकता से कम खाना ही नही, वस्त्र भी इतने कम रखते कि केवल आवश्यकता की पूर्ति हो जाये। उसमे भी विशेष बोरी का टाट ज्यादा प्रयोग मे लेते। उसी पर सोना और सर्दी मे ओढ लेना, कभी चोलपटा आदि धोने का काम पडता तो उसी को पहन लेते। साथ ही रस परित्याग के प्रति आपका विशेष लगाव था। आठ-आठ महीने तक बिना आहार पानी के केवल छाछ पर कई बार रह जाते । केवल एक-एक रोटी पर दिवस बीताते। अधिकाधिक स्वाध्याय करना व घटो ध्यान मे एकाग्र रहना यह आपकी दिनचर्या बन गई थी। रसनेन्द्रिय पर तो इतनी विजय प्राप्त करली कि कोई संत कहता कि दूध तो बिल्कुल फीका है तभी आपका ध्यान जाता। छोटे बड़े सभी सतो की वैयावच्च भी सदा अग्लान भाव से करने मे तत्पर रहते। गुरुदेव की सेवा आपने जिस अग्लान भाव से की वह तो क्या डॉक्टर, क्या सत एवं श्रावक सब अवाक् थे। पर अपने छोटे-छोटे शिष्यो की भी आपने हर छोटी से छोटी सेवा करने में कसर नही रखी। यदि कोई संत बीमार पड़ जाता तो अपनी ऐसी भयकर बीमारी मे भी तीसरी मजिल से नीचे पधार कर उसकी सेवा करना, आपद देना, यहाँ तक की लघुनीत आदि परठने का काम भी खुद करके उसको पूर्ण सांत्वना देते। ऐसी आपकी उत्कृष्ट सेवाभावना ही हर शिष्य के अतर्मन । vian 34 नाना गुरु की कहानी मे अपनत्व का गहरा स्नेह सम्बन्ध जोडने मे कामयाब हुई। हर शिष्य यही सोचता कि गुरुदेव की मेरे ऊपर महान् कृपा, प्रेम व वात्सल्य है। इसी प्रकार साध्वी समूह के लिए भी थोडी सी शारीरिक ऊँची-नीची बात सुनते ही तो भरी दोपहरी मे उनको सभालने के लिये पहुँच जाते। इसी प्रकार ध्यान एव व्युत्सर्ग की तरफ भी आपकी विशेष रुचि थी। ध्यान के क्षेत्र मे तो आपने अपनी अनुभूति की नई विधा से समीक्षण ध्यान योगी के रूप मे प्रसिद्धि पाई थी। लगे दोषो के प्रायश्चित करने मे आपने कभी सकोच नही किया। कभी भी शारीरिक स्थिति से सदोषता उत्पन्न होने पर बडे आचार्यों के समक्ष भी अपनी आलोचना भेजकर उनके सुझाव व अपनी अनुभूति से भरी सभा मे प्रायश्चित लिया। विनय के गुणो से तो आपने अपने से बडो की कृपा पाई थी, साथ ही प्रतिसंलीनता व कायाक्लेश तप के रूप मे आप घंटों एक आसन से बैठना व उग्र विहार मे सलग्न रहे। सुदूर प्रांतो मे विचरण करके जिन शासन का ध्वज फहराया। 32. मुनि नाना का वचन माधुर्य प्यारे बच्चों ! यह तो आप जानते ही है कि शांति और अशांति का मूल कारण यह जबान है। यह खा करके भी बिगाडती है और बोलकर के भी बिगाड करती है। जीवन में सच्चा सुख, सच्चा आनंद वही व्यक्ति प्राप्त कर सकता है जो जबान को नियंत्रित रखता हो। जबान मे विष भी भरा है और अमृत भी। इससे व्यक्ति सबको अपना मित्र भी बना सकता है और शत्रु भी। हमारे नाना गुरु ने जो लोकप्रियता अर्जित की उसका मूल कारण उनकी वचन माधुर्यता, वचन व्यवहार की विवेकता एव नियत्रण ही था। आपश्री बहुत कम बोलते, जब भी बोलते तो बहुत नपे तुले शब्द बोलते। बडे संतो के मुख से सुना कि हम तो फूटी झालर की तरह है। इसलिये हमारी बात पर कोई विचार नही करता लेकिन मुनि नानालाल जी घडी की टनकार है जो समय पर भी इतने कम बोलते है कि सब इनके एक-एक वचन को बड़े ध्यान से सुनते एवं रहस्यमय समझते हैं। उसका ही प्रभाव था कि आपके प्रवचन इतने प्रभावी व ठोस तो होते ही साथ ही आवाज मे भी इतनी ओजस्वीता थी कि हजारो की परिषद् मे भी इतनी तेज रहती कि ध्वनिवर्धक यत्र का भी कोई महत्व नहीं रहता।

नाना गुरु की कहानी 35 छोटा से छोटा साधु, साध्वी हो या श्रावक श्राविका हो, सबको आप वडे ऊँचे एवं मधुर शब्दो से संबोधित करते जिससे वह सदा-सदा के लिए आपका बन जाता। आपके चेहरे पर सदा समतामय आभामडल ऐसा दैदीप्यमान रहता कि कितना ही उत्तेजित व्यक्ति क्यो न हो वह अपने आप शात हो जाता था। मुनि श्रीचद जी महाराज तो आपको चद्रकान्तमणि की उपमा से उपमित करते हुए बताते रहते थे कि मै सव पर अपना गुस्सा निकाल सकता हूँ पर मुनि नानालाल जी को देखते ही जैसे प्रदीप्त अग्नि चन्द्रकांतमणि के सामने अपने-आप शांत हो जाती है वैसे ही मेरी क्रोधाग्नि भी। 33. मुनि नाना आचार्यश्री गणेश के उत्तराधिकारी प्यारे बच्चों ! देखिये, आपके सामने दो फूलदान पडे है। एक मे प्लास्टिक के रग-बिरंगे फूल हैं और दूसरे मे असली फूल । क्या आप जानते हैं कि भ्रमर किस पर मडरायेगा, बैठेगा। असली पर या नकली पर। सभी बच्चे बोले-असली पर मडरायेगा, नकली पर नहीं। प्यारे बच्चो ! ठीक इसी प्रकार हमारे नाना गुरु जिन्होने आध्यात्म- साधना करके अपने जीवन को इतना सुरभित बना दिया था कि सारे सघ की दृष्टि मुनि नाना पर टिकने लग गई। गुरु गणेश ने भी आपको अनेक तरह से परखने में कोई कसर नही रखी। आप भी अपने गुरु की हर कसौटी पर खरे उतरते गये और अपने सारे अन्तरंग व्यवस्था मे आपको सहयोगी बनाते रहे। उदयपुर प्रवास के समय आचार्य गणेश का स्वास्थ्य निरतर गिरावट पर बढता जा रहा था फिर भी आपने हर तरह से एक अनुभवी डॉक्टर की तरह सभालने में कोई कसर नही रखी। इजेक्शन से लगाकर हर कार्य आप कुशलता से निवृत्त कर लेते। समय-समय पर श्रमण संघ के विवाद की स्थिति पर भी आगंतुको को पूर्ण समाधान देकर सतुष्ट करते। बहुश्रुतश्री समर्थमल जी महाराज सनवाड चातुर्मास परिसंपन्न कर पूज्य गणेश की सेवा मे उदयपुर पधारे। आचार्यश्री गणेश ने श्रमण सस्कृति की पवित्रता कैसे सुरक्षित रह सके, साथ ही पूर्वजो से चली आ रही हमारी प्रीती भी अधिकाधिक बढती रहे। एक श्रद्धा, प्ररुपणा स्पर्शन की भूमिका कैसे निर्धारित हो और मेरी शारीरिक स्थिति को देखते हुए आगे की सुव्यवस्था के बारे में चिंतन करना अपेक्षित है इसलिये आपके आगमन से 36 नाना गुरु की कहानी मै प्रसन्नता व निश्चितता का अनुभव करता हूँ। आप और मुनि नानालाल जी बैठकर इसके बारे मे चितन मनन करे एवं जहा मेरी आवश्यकता हो, वहाँ मैं भी हूँ। आचार्य गणेश के आदेश को शिरोधार्य करके दोनो महापुरुषो ने उनके सामने ही बैठकर सारी समाचारी का मिलान करके एकरूपता का, निर्धारण किया। उसके पश्चात् बहुश्रुतजी म सा ने आचार्य गणेश का विधिवत लिखित नेतृत्व स्वीकार किया। एकान्त मे जब आचार्यश्री गणेशीलाल' जी म सा. ने बहुश्रुतजी महाराज सा. से उत्तरदायित्व संबधी जिज्ञासा व्यक्त की तब बहुश्रुतश्री समर्थमल जी महाराज ने फरमाया कि मै तो इन बातो से अपने-आप को दूर ही रखना चाहता हूँ। पडित मुनिश्री नानालाल जी महाराज इस आचार्य पद के लिए सर्वथा योग्य है। इसमे हमारा पूर्ण सहयोग है और रहेगा। बहुश्रुतजी ने आचार्यश्री गणेश के निर्देशानुसार बालेसर चातुर्मासार्थ विहार कर दिया। उसी चातुर्मास के दरम्यान जब आचार्य गणेश की शारीरिक स्थिति अधिक बिगडने लगी तब चतुर्विध सघ के लिखित व मौखिक निवेदन पर आचार्य गणेश ने अपने उत्तराधिकारी के रूप मे मुनि नानालाल जी म सा का नाम घोषित कर दिया। 34. मुनि नाना से युवाचार्य नाना प्यारे नन्हे मुन्हे नौनिहालो! जब आचार्य गणेश ने अपने उत्तराधिकारी के रूप मे आपका (पडित रत्न मुनिश्री नानालाल जी म सा का) नाम घोषित कर दिया। तब चतुर्विध संघ का पुन यह आग्रह हुआ कि जब नाम घोषित कर दिया तो आपकी शारीरिक स्थिति को देखते हुए श्रेष्ठ यही है कि आपके कर कमलो द्वारा विधिवत् चद्दर प्रदान की रस्म भी अदा कर दी - जाय। तब सघ के आग्रह को सम्मुख रखते हुए आचार्य देव ने भी स्वीकृति प्रदान कर दी। साथ ही उसके लिए शुभ मुहूर्त रूप मे आसोज सुदी 2, वि स 2019 को निश्चित कर दी गई, साथ ही भारत के कोने-कोने मे भी यह शुभ सूचना प्रदान कर दी गई। सूचना मिलते ही तो सुदूर प्रान्तो से श्रद्धालु भक्तों का समूह उमड पडा। उदयपुर (राज) के राजप्रांगण मे सूर्य झरोखे के सामने विशाल पंडाल लगभग तीस हजार की जनमेदनी से भर गया।

नाना गुरु की कहानी 37 ठीक सूर्य झरोखे के नीचे उच्च पाट पर आचार्य गणेश व आस-पास मे साधु-साध्वी जी विराज गये। नंदी सूत्र का स्वाध्याय पूर्ण हुआ, आचार्य गणेश ने मगल उद्बोधन प्रदान करते हुए सघ को निर्देश दिया कि आज में अपने उत्तराधिकारी के रूप मे पडित रत्न मुनिश्री नानालाल जी की नियुक्ति के प्रतीक चादर चतुर्विध सघ की स्वीकृति के साथ ओढाता हूँ। यो कहकर आचार्य गणेश ने अपने तन से वह चादर उतारकर आपको ओढा दी। उसी समय सारे चतुर्विध सघ ने युवाचार्यश्री नानालाल जी म सा की जय के साथ आकाश को गूंजा दिया। उसी समय बादलो को चीरता हुआ सूर्य भी बाहर निकलकर युवाचार्यश्री पर अपनी किरणो को प्रसरित करने लगा। जिसको देखकर थली के शेर मोतीलाल जी वरडिया की ललकार गूज उठी-हु शि उ चौ श्री जग नाना लाल चमकसी भानू समाना। आचार्य गणेश ने फरमाया जिस प्रकार चतुर्विध सघ ने मेरी हर आज्ञा को शिरोधार्य कर संघ सचालन मे सहयोग दिया वैसा ही सहयोग युवाचार्यश्री को देकर संघ का विकास करे। यही मेरी आज्ञा व हार्दिक शुभकामना है। सारे चतुर्विध सघ ने आचार्य गणेश की आज्ञा को शिरोधार्य करके पूर्ण श्रद्धा अभिव्यक्त की। 35. साधुमार्ग संघ के आचार्य नाना प्यारे बच्चो ! क्या आपको मालूम है-युवाचार्य नानेश जिस सघ के अनुशास्ता बने, उस सघ का नाम साधुमार्गी जैन सघ है। साधुमार्ग वैसे तो अनादिकाल से चला आ रहा है जिसकी सिद्धि महामंत्र नवकार से स्पष्ट सिद्ध है। क्योकि महामत्र नवकार मे पॉच पद है। उसमे से एक नमो सिद्धाण पद साधना की सिद्धि का पद है और चार पद साधुओ के हैं। उनमे से णमो अरिहताण पद सर्वोच्च है जिसके द्वारा ही यह साधुमार्ग प्रतिपादित हुआ। इसीलिये कहा गया है-साधो आगत मार्ग स साधुमार्ग काल के प्रभाव से भरत क्षेत्र मे साधुमार्ग की आदि ऋषभदेव से हुई जिसका मध्यवर्ती 22 तीर्थकरो व प्रभु महावीर ने गहरा पोषण दिया और उनके निर्वाण के बाद यह साधुमार्ग विक्रम संवत् 609 मे दिगम्बर श्वेताम्बर के रूप मे और 670 मे मूर्तिपूजक अमूर्तिपूजक के रूप ने विभाजित हो गया। उसी अमूर्तिपूजक साधुमार्ग के भी तेरह पन्थ, स्थानकनसी, बाईस टोला. ढूंढिया आदि कई नाम प्रचलित हो गये। फिर वि स 2009 में एक 38 नाना गुरु की कहानी विशाल 1111 साधु-साध्वियो ने मिल कर सगठित रूप धारण करके एक संघ निर्मित किया जिसका श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रमण संघ नामकरण करके सम्मान की दृष्टि से आचार्यश्री आत्माराम जी म. सा. को आचार्य पद पर एवं सर्व सत्ताधिकारी के रूप मे आचार्यश्री गणेशीलाल जी म. सा. को उपाचार्य पद पर नियुक्त किया गया। लेकिन जिस उद्देश्य से उसका निर्माण किया गया उसके नियम व उद्देश्य के विपरीत बढती स्वछदवृत्ति एव शिथिलाचार को देखते हुए आचार्यश्री गणेश ने अपने उपाचार्य पद का भी त्याग कर दिया। उसके बाद पुनः जब युवाचार्यश्री नानालाल जी म. सा की नियुक्ति के साथ ही पुन. उसी श्रीसाधुमार्गी जैन संघ की विधिवत् स्थापना की गई। वही साधुमार्गी जैन संघ आज चल रहा है। उसी के आचार्य हमारे नाना गुरु थे। 36. आचार्यश्री गणेश का संथारा व महाप्रयाण प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु जब युवाचार्य पद पर नियुक्त हो गये उसके बाद संघ की सारी व्यवस्थाओ की जबावदारी आप पर आ गई थीं। साथ ही आचार्य गणेश की शारीरिक स्थिति भी उत्तरोत्तर बिगडती जा रही थी। इसलिए अहर्निश उनकी सेवा का भी विशेष ध्यान रखना पड़ता था। फिर भी आप पूर्ण धैर्यता से सारी व्यवस्था सभालते हुए अग्लान भाव से उनकी सेवा में तत्पर बने रहे एवं थोडी गुरुदेव की एक आवाज आते ही तो हाथ का ग्रास छोडकर सेवा मे जुट जाते, निद्रा भी अत्यल्प ही ले पाते। केसर जैसी भयंकर बीमारी जो सैकेण्ड्री फॉम तक पहुँचकर भी आपके (आ श्री गणेश के) चेहरे की सौम्यता-प्रसन्नता को देखकर डॉक्टरी थ्योरी भी फैल हो चुकी थी। बडे-बडे डॉक्टर भी आश्चर्यान्वित थे कि किस शक्ति के बल से इतनी शान्ति से जी रहे है। यह सब आपकी विलक्षण सेवा का ही प्रभाव था। सारे संघ को विशेष रूप से एक ही चिता थी कि कहीं गुरुदेव खाली हाथ न चले जायें। इसीलिये थोडा उतार चढाव देखते ही सथारा पच्चक्खाने का आग्रह करते रहते और जब नही पच्चक्खाते तो कई तरह की बातें बनाने मे भी कसर नही रखते। लेकिन आप उन बातों पर ज्यादा ध्यान नही देते हुए अपने कर्तव्य का सजगता से पालन करते हुए यही कहते-समय पर सब श्रेष्ठ होगा, किसी को कोई चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योकि उनके लिए यह नाना गुरु की कहानी 39 वात नई नहीं थी। पहले भी जमनापार टीटरीमडी मे अचानक मूर्छित हो जाने पर ऐसा ही दबाव डाला गया लेकिन आपने अपने अनुभव से सथारा नहीं पच्चखाया, उसके बाद 13 वर्ष और विराजे। लेकिन वि स 2019 की माघ वदी 2 को गुरुदेव की स्वास्थ्य की स्थिति को देखकर आपने पूर्ण होश हवाश मे विधिपूर्वक सथारा पच्चक्खा कर सघ को सूचना दी तो सबके आश्चर्य का पार नहीं रहा। गुरुदेव की सोम्यमुद्रा को देखकर ऊहापोह करने लगे की ऐसी सजग अवस्था और यह संथारा कैसे पच्चक्खा दिया। लेकिन दूसरे दिन 4 बजे चौविहार सथारे के साथ ही पूर्ण सजगता मे आचार्य गणेश की आत्मा ने ऑखो से इस नश्वर देह का त्याग कर महाप्रयाण कर दिया। सुनकर सारे सघ मे हाहाकार मच गया। पूरे भारत मे रेडियो, तार द्वारा ज्योही यह समाचार पहुँचा, बहुत लोग तो सथारे के समाचार मिलते ही पहुँच गये, वाकी महाप्रयाण के समाचार श्रवण करके उदयपुर पहुंच गये। चतुर्विध सघ ने उसी प्रकार अपने कर्तव्य का पालन करते हुए आपको आचार्य पद पर प्रतिष्ठित करके आचार्यश्री नानालाल जी म सा की जय वोलाई और गुरु गणेश के शव को वोसिरा दिया जिसका अतिम सस्कार रजत व स्वर्णमय भव्य विमान मे बिठाकर मेवाड के राजा महाराजाओ के अंत्येष्टि स्थल के सन्निकट आयड मे चदन की चिता मे अतिम सस्कार कर दिया और पुन स्थान पर आकर विशाल शोकसभा मे श्रद्धाजलि अर्पित करके विसर्जित हुए। 37. आचार्य नानेश के पूर्वाचार्य प्यारे नन्हे मुन्नो ! हमारे नाना गुरु आचार्य गणेश के स्वर्गवास होने के बाद भगवान महावीर के इक्यासीवे पाट पर विराजे | उन महापुरुषो के नाम इस प्रकार है- 1 सुधर्मास्वामी जी, 2. जम्बू स्वामी जी, 3 प्रभवस्वामी जी. 4 शय्यभव स्वामी जी, 5 यशोभद्र स्वामी जी, 6 संभूतिविजय जी, 7 श्री भद्रबाहु स्वामी जी, 8 श्री स्थूलिभद्र जी, 9 श्री महागिरी जी. 10 श्री बलिस्सह जी, 11 श्री सोहन स्वामी जी, 12 श्री वीरस्वामी जी, 13 श्री स्थडिलाचार्य जी, 14 श्री जीवधर स्वामी जी, 15 श्री आर्य समद जी, 16 श्री नदिल स्वामी जी, 17. श्री नागहस्ती जी, 18 श्री रेवतगणी जी, 19 श्री सिहगणी जी, 20 श्री शाडिलाचार्य जी, 21. श्री हेमवत स्वामी जी. 22 श्री 40 नाना गुरु की कहानी नागजीत स्वामी जी, 23 श्री गोविद स्वामी जी, 24 श्री भूतदीन स्वामी जी, 25 श्री छोगगणी जी, 26. श्री दुसह गणी जी, 27 श्री देवर्धिगणी क्षमा श्रवण जी, 28 श्री वीरभद्र स्वामी जी, 29 श्री शकरभद्र जी, 30 श्री यशोभद्र जी, 31 श्री वीरसेन स्वामी जी, 32 श्री वीरसंग्राम जी, 33 श्री जिनसेन स्वामी जी, 34 श्री हरिसेन जी स्वामी, 35 श्री जयसेन जी, 36. श्री जगमाल जी, 37. श्री देवऋषिजी, 38. श्री भीमऋषिजी, 39. श्री कर्मऋषि जी, 40 श्री गजसेन जी, 41. श्री देवसेन जी, 42 श्री शंकरसेन जी, 43 श्री लक्ष्मीलाभ जी, 44 श्री रामऋषि जी, 45. श्री पद्मसूरी जी, 46. श्री हरिसेन जी, 47. श्री कुशलदत्त जी, 48 श्री उपनीऋषि जी, 49 श्री जयेसन जी, 50 श्री विजयसेन जी, 51. श्री देवसेन जी, 52 श्री सूरसेन जी, 53 श्री महासूरसेन जी, 54. श्री महासेन जी, 55 श्री गजसेन जी, 56. श्री जयराज जी, 57 श्री मिश्रसेन जी, 58 श्री विजयसेन जी, 59. श्री शिवराज जी, 60 श्री लालऋषि जी, 61 श्री ज्ञानऋषि जी, 62 श्री भाणोजी, 63 श्री रूपजी, 64 श्री जीवाजी महाराज, 65 श्री तेजराज जी, 66 श्री कुंवर जी, 67. श्री हरजी म, 68 श्री गोदाजी म, 69 श्री फरसराम जी म, 70. श्री लोकपाल जी म, 71 श्री जी म, 72 श्री दौलतराम जी म, 73 श्री लालचद जी म, 74 श्री हुक्मीचद जी म, 75, श्री शिवलाल जी म, 76 श्री उदयसागर जी म, 77, श्री चौथमल जी म, 78 श्री श्रीलाल जी म., 79 श्री जवाहरलाल जी म, 80 श्री गणेशीलाल जी म, 81 श्री नानालाल जी म । . 38. आचार्य नानेश को प्राप्त संघ निधि प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु अब एक साधक से साधक ‘णमो आयरियाण' पद पर प्रतिष्ठित हो गये थे। उस समय संघ में कुल 15 संत व 73 सतियाँ जी साधना रत थे। सत- 1. बहुश्रुत श्री पन्नालाल जी म, 2 श्री आचार्य जवाहर की धायमाता बाबोजी श्री बगतावरमल जी म, 3 आदर्श त्यागी श्री सूरजमल जी म, 4 घोर तपस्वी श्री धनराज जी म, 5 श्री सागरमल जी म, 6 तपस्वी श्री केशुलाल जी म, 7. आचार्य श्री गणेशीलाल जी म की धायमाता श्री करणीदान जी म, 8 श्री सुदरलाल जी म, 9. तपस्वी श्री ईश्वरचद जी म, 10 आदर्श त्यागी श्री गोपीलाल जी म, 11 धायमाता श्री इन्द्रचद जी म, 12 श्री रामेश्वर जी म, 13 तपस्वी श्री कंवरलाल जी म., 14, महात्मा श्री 41 नाना गुरु की कहानी घेवरचंद जी म. (खींचन), 15 श्री बाबूलाल जी म । सतीवृंद महासती खेता जी के संघाडे में- 1 चम्पाजी महाराज, 2 श्री सूरजकवर जी म, 3 श्री मानकंवर जी म, 4 श्री मोहनकंवर जी म, 5 श्री प्यारकंवर जी म, 6 श्री पार्वता जी म, 7 श्री केशरकवर जी म, 8 श्री पानकंवर जी म, 9 श्री कंचनकंवर जी म, 10 श्री आनद कवर जी म, 11. श्री चांदकवर जी म, 12 श्री बदामकवर जी म, 13 श्री सुमतिकवर जी म, 14 श्री वल्लभकंवर जी म, 15 श्री नदकंवर जी म, 16 श्री झमकूकवर जी म महासती श्री रंगूजी म के संघाडे मे- 17. श्री भूरा जी म, 18 श्री चम्पाकंवर जी म, 19. श्री पानकंवर जी म, 20 श्री मनोहरकंवर जी म, 21. श्री शायरकवर जी म, 22. श्री चद्रकंवर जी म, 23 श्री धीरजकवर जी म, 24 श्री सुगनकवर जी म, 25 श्री बदामकवर जी म, 26 श्री छगनकवर जी म, 27 श्री भंवरकंवर जी म, 28 श्री इचरजकवर जी म, 29. श्री पेपकंवर जी म, 30 श्री नानूकवर जी म, 31 श्री फूलकवर जी म, 32 श्री इंद्रकंवर जी म, 33 श्री रोशनकवर जी म, 34 श्री अनोखाकंवर जी म, 35 श्री सूर्यकान्ता जी म, 36 श्री सुगनकवर जी म, 37. श्री धापूकवर जी म, 38 श्री गुलाबकवर जी म, 39 श्री शाताकवर जी म, 40. श्री छोटाकंवर जी म, 41. श्री रसालकवर जी म, 42. श्री लाडकंवर जी म, 43 श्री सरदारकंवर जी म, 44 श्री सौभागकवर जी म, 45 श्री जीवनाकंवर जी म, 46 श्री टीपूकंवर जी म, 47. श्री नगीनाकवर जी म, 48 श्री गटूकंवर जी म., 49 श्री धापूकंवर जी म , 50 श्री चतरकवर जी म, 51 श्री वरजूकंवर जी म, 52 श्री धापूकंवर जी म. 53 श्री हगामकवर जी म, 54 श्री राजकंवर जी म, 55 श्री सिरेकवर जी म, 56 श्री नगीनाकंवर जी म, 57 श्री सूरजकंवर जी म. 58 श्री सपतकवर जी म, 59. श्री शायरकंवर जी म, 60 श्री रोशनकंवर जी म, 61 श्री कमलाकवर जी म, 62 श्री सुगनकवर जी म, 63 श्री गुलाबकवर जी म, 64 श्री सूरजकवर जी म, 65. श्री उगमकंवर जी म, 66 श्री सपतकंवर जी म, 67. श्री कंकुकंवर जी म, 68 श्री गुलाबकंवर जी म महासती श्री मोती जी महाराज के संघाडे मे- 69 श्री तेजकंवर जी म, 70. श्री वल्लभकंवर जी म, 71. श्री गुलादकंवर जी म, 72 श्री पानकवर जी म., 73. श्री कस्तूरकंवर जी म, 42 नाना गुरु की कहानी 39. आचार्यश्री नानेश का शिष्य शिष्या परिवार प्यारे नन्हे मुन्हे बच्चो ! जिस समय हमारे नाना गुरु आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए उस समय कुल 15 सत व 73 सतियाँ जी शासन मे साधना रत थे। उसमे भी वृद्धो की सख्या अधिक थी। सबके मन में एक ही शका थी कि सघ की उन्नति कैसे होगी ? लेकिन इस महापुरुष की पुण्यवानी आचार्यश्री श्रीलाल जी म. सा की भविष्यवाणी, गुरु गणेश का दिव्य आशीर्वाद का सुफल समझे कि आचार्य पद पर प्रतिष्ठित होकर दूसरे दिन जब विहार का चिंतन करते हुए उदयपुर संघ के अध्यक्ष श्रीमान कुदनसिह जी साहब खमेसरा के बगले पर पहले विहार की घोषणा हुई तो सब मे भारी ऊहापोह मच गया। सबका यही कहना था कि इस दिशा मे दिशाशूल सामने पडता है और आचार्य पद का पहला विहार। लेकिन नवोदित आचार्यश्री नानेश ने सबको सांत्वना देते हुए साधु भाषा की महत्वता को सम्मुख रखते हुए उसी दिशा मे विहार कर दिया। विशाल जनमेदिनी के साथ खमेसरा जी के बगले पधारे और जुलूस धर्मसभा मे परिणत हो गया। आचार्य देव ने सिद्ध स्तुति के साथ सामायिक उद्बोधन देकर क्षमायाचना प्रस्तुत की। इतने मे मोतीसिह जी कोठारी ने आग्रहपूर्वक विनती प्रस्तुत की और अपनी सुपुत्री वैराग्यवती श्री सुशीला का आज्ञा पत्र पेश करते हुए मिति 2019 माघ बदी 12 को दीक्षा देने की घोषणा कर दी। इधर सेठ वृद्धिचद जी पामेचा ने स्वयं वेश पहन कर दीक्षा ग्रहण कर ली। बस उसी के साथ दीक्षा का शुभ क्रम प्रारभ हुआ जिसकी सख्या 289 तक पहुंचाई। उनकी शुभ नामावली इस प्रकार है- क्रम दीक्षा नाम गॉव दीक्षा तिथि दीक्षा स्थल 2 1. 2. w 4 श्री सेवतमुनि जी कन्नोज 2019 का सु 3 उदयपुर महा. सुशीलाकवर जी उदयपुर 2019 मा व 12 उदयपुर मुनि श्री वृद्धिचद जी पीपल्यामडी 2019 मा. सु 2 डबोक श्री शाति मुनि जी भदेसर 2019 का सु 1 भदेसर श्री कंवर मुनि जी निकुभ 2019 फा सु 5 बडीसादडी श्री हरक मुनि जी लसडावन 2019 श्री शांताकंवर जी गगाशहर 2020 फा ब 12 गगाशहर 5 6. 7.

नाना गुरु की कहानी 43 8 9 श्री लीलावती जी निकुंभ 2020 फा सु 2 निकुभ श्री अमर मुनि जी पीपल्यामडी 2020 बै सु 3 पीपल्यामडी 10 महा कस्तूरा जी पीपल्यामडी 2020 सु 3 पीपल्यामडी 11 महा. हुलासकंवर जी कपासन 2020 वै सु 10 चिकारडा 12 श्री ज्ञानकवर जी मालदावाडी 2021 अ सु 9 पीपल्याकला 13 श्री माणक मुनि जी 14 महा श्री सोहनकवरजी इदौर इंदौर 15 श्री रतन मुनि जी अमलनेर 2014 भा सु 13 लोणार 16 श्री फूलमुनि जी बूड 17 महा. वृद्धिकवर जी बीकानेर 2023 बै सु 8 बीकानेर 18 श्री सपत मुनि जी रायपुर 2023 आ सु 4 राजनादगाव 19 श्री प्रेम मुनि जी भोपाल 2023 आ सु 4 राजनादगाव 20 श्री पारस मुनि जी दलौदा 2023 आ सु 4 राजनादगाव 21 महा ज्ञानकवर जी राणावास 2023 आ सु 4 राजनादगाव 22 महा प्रेमलता जी राजनांदगाव 2023 आ सु 4 राजनादगाव 23 महा इन्दुबाला जी राजनादगाव 2023 आ सु 4 राजनादगाव 24 महा गगावती जी आसरा 2023 मि सु 3 डोगरगाव 25 महा पारसकवर जी कलगपुर 2023 मि सु 3 डोगरगाव 26 महा चन्दनबाला जी पीपल्यामडी 2023 मा सु 10 पीपल्यामडी 27 श्री धर्मेशमुनि जी मद्रास 2023 फा व 9 रायपुर 28 महा जयश्री जी मद्रास 2023 फा ब 9 रायपुर 29 महा सुशीलाकवर जी मालदावाडी 2024 अ सु 2 जावरा 30 महा मगलाकवर जी बडावदा 2024 आ सु 1 दुर्ग 31 महा शकुन्तलाश्रीजी बीजा 2024 मि व 6 दुर्ग 32 श्री संतोषमुनि जी केसिगा 2025 मि सु 15 यवतमाल 33 महा जतनकंवर जी हिगणघाट 2025 मि सु 15 यदतनाल 34 महा चमेलीश्री जी बीकानेर 2025 फा सु 5 बीकानेर 35 महा सुशीलाकंवर जी बीकानेर 2025 फा सु 5 बीकानेर 36 महा छगनकंवर जी रुण्डेडा 2026 + सु । कानोड 37 महा चन्दकान्ता जी रतलाम 2026 दै सु7 ॐ महा कुसुमलता जी मदसौर 2026 आसु 44 नाना गुरु की कहानी 39. महा. प्रेमलता जी मदसौर 2026 आ सु 4 मंदसौर 40 श्री संतोष मुनि जी अमलनेर 2027 का ब 8 बड़ी सादडी 41. श्री रणजीत मुनि जी कजार्डा 2027 का. ब 8 बड़ी सादडी 42 श्री महेन्द्र मुनि जी गोगुदा 2027 का. ब. 8 बडी सादडी 43 महा विमलाकंवर जी कजार्डा 2027 का ब 8 बडी सादडी 44. महा. कमलप्रभा जी विजयनगर 2027 का. ब 8 बडी सादडी 45 महा पुष्पलता जी बड़ी सादडी 2027 का ब 8 बड़ी सादडी 46 महा सुमतिश्री जी बडी सादडी 2027 का. ब. 8 बड़ी सादडी 47. महा. विमलाकंवर जी मोडी 2027 फा. सु 12 जावद 48 मुनि श्री गजानंद जी देवगढ 2028 भा सु. 14 ब्यावर 49. श्री सौभाग मुनि जी बडावदा 2028 भा सु 14 ब्यावर 50 श्री रमेश मुनि जी उदयपुर 2028 भा सु 14 ब्यावर 51 श्री सुरेद्रमुनि जी बडावदा 2028 भा सु 14 ब्यावर 52 महा. सूरजकंवर जी बडावदा 2028 भा सु 14 ब्यावर 53 महा. ताराकवर जी रतलाम 2028 भा सु 14 ब्यावर 54. महा कल्याणकवरजी बीकानेर 2028 भा सु 14 ब्यावर 55. महा श्रीकाता जी बडावदा 2028 भा सु 14 ब्यावर 56 महा. कुसुमलता जी रावटी 2028 भा. सु 14 ब्यावर 57 महा. चंदनबाला जी बडावदा 2028 भा सु. 14 ब्यावर 58 महा ताराकवर जी रतलाम 2028 चै ब 2 जयपुर 59 महा. चेतनश्री जी कानोड 2029 चै सु 13 टोक 60. श्री रविन्द्र मुनि जी कानवन 2029 भा ब 12 जयपुर 61. श्री भूपेन्द्र मुनि जी निकुभ 2029 आ. सु 3 जयपुर 62 श्री वीरेन्द्र मुनि जी आष्टा 2029 मा सु. 2 देशनोक 63 श्री हुलास मुनि जी गंगाशहर 2029 मा सु 12 भीनासर 64 श्री जिनेन्द्र मुनि जी बीकानेर 2029 मा. सु 12 भीनासर 65 श्री राजेन्द्र मुनि जी गगाशहर 2029 मा. सु 12 भीनासर 66 श्री विजय मुनि जी बीकानेर 2029 मा. सु 12 भीनासर 67 महा भवरकंवर जी बीकानेर 2029 मा. सु 12 भीनासर 68 महा तेजप्रभा जी नागेलाव 2029 मा. सु. 12 भीनासर 69 महा कुसुमकांता जी जावरा 2029 मा. सु 12 भीनासर 70 महा वसुमती जी बीकानेर 2029 मा सु 12 भीनासर नाना गुरु की कहानी 45 बै 71 महा राजमती जी दलौदा 2029 मा सु 12 भीनासर 72 महा पुष्पावती जी देशनोक 2029 मा. सु 12 भीनासर 73 महा मंजुबाला जी बीकानेर 2029 मा सु 12 भीनासर 74 महा प्रभावती जी बीकानेर 2029 मा. सु. 12 भीनासर 75 महा ललितप्रभा जी गंगाशहर 2029 फा सु. 11 बीकानेर 76 महा सुशीलाकवरजी मोडी 2030 बै सु 9 नोखा मडी 77 महा. समताकवर जी अजमेर 2030 सु 9 नोखा मडी 78 महा निरजनाश्री जी बडीसादडी 2030 आ. सु. 13 बीकानेर 79 महा सुधाश्री जी ब्यावर 2030 आ सु 13 बीकानेर 80. महा. पारसकंवर जी बांगेडा 2030 मि. सु. 9 भीनासर 81. महा सुमनलता जी बागेडा 2030 मि सु 9 भीनासर 82. श्री नरेन्द्र मुनि जी बंबोरा 2030 मा सु 5 सरदारशहर 83 महा स्नेहलता जी सरदारशहर 2030 मा सु 5 सरदारशहर 84 महा विजयलक्ष्मी जी उदयपुर 2030 मा. सु 5 सरदारशहर 85. श्री ज्ञान मुनि जी ब्यावर 2031 जे सु 5 गोगेलाव 86 महा. रजनाश्री जी मंगलवाड 2031 जे सु 5 गोगेलाव 87 महा अजनाश्री जी मंगलवाड 2031 जे सु 5 गोगेलाव 88 महा ललिताश्री जी ब्यावर 2031 जे. सु 5 गोगेलाव 89 श्री पुष्प मुनि जी डब्बावालीमडी 2031 आ सु 2 सरदाशहर 90 श्री बलभद्र मुनि जी पीपल्यामडी 2031 आ सु 2 सरदाशहर 91. महा विचक्षणाश्री जी पीपल्यामडी 2031 आ सु 2 सरदाशहर 92 महा सुलक्षणाश्री जी पीपल्यामडी 2031 आ सु 2 सरदाशहर 93 महा प्रियलक्षणाश्री जी पीपल्यामंडी 2031 आ सु 2 सरदाशहर 94 श्री मोतीलाल जी गंगाशहर 2031 मा सु 12 देशनोक 95 श्री राम मुनि जी देशनोक 2031 मा. सु 12 देशनोक 96 महा. प्रीतिसुधा जी निकुभ 2031 मा सु 12 देशनोक 97 महा किरणप्रभा जी बीकानेर 2031 मा. सु. 12 देशनोक 99 महा. सुमनप्रभा जी देवगढ 2031 मा सु 12 देशनोक 99 महा सोमलता जी रावटी 2031 मा सु 12 देशनोक 100 श्री किस्तूरचद जी गंगाशहर 2032 बैं ब. 13 भीनासर 101. महा मजुलाश्री जी देशनोक 2032 . ब. 13 भीनासर 46 नाना गुरु की कहानी 102 महा सुलोचनाश्री जी कानोड 2032 बैं. ब 13 भीनासर 103 महा प्रतिभाश्री जी बीकानेर 2032 बै ब 13 भीनासर 104. महा. वनिताश्री जी बीकानेर 2032 बैं ब 13 भीनासर 105 महा. सुप्रभाश्री जी गोगेलाव 2032 बै ब 13 भीनासर 106 श्री प्रकाश मुनि जी देशनोक 2032 आ. सु 5 देशनोक 107 श्री जयवंत मुनि जी देशनोक 2032 आ. सु 5 देशनोक 108 महा. जयतश्री जी बीकानेर 2032 आ. सु 5 देशनोक 109 श्री गौतम मुनि जी बीकानेर 2032 मि. सु 3 भीनासर 110 महा हंसकवर जी अमरावती 2029 का सु 5 जावरा 111. महा. सुदर्शनाश्री जी नोखामंडी 2033 आ सु 5 नोखामडी 112. महा. निरूपमाश्री जी रायपुर 2033 आ. सु. 15 नोखामडी 113 महा. चन्द्रप्रभा जी मेडता 2033 मि सु 13 नोखामडी 114. श्री प्रमोद मुनि जी हासी 2033 मा ब 1 भीनासर 115. श्री प्रशम मुनि जी गगाशहर 2034 वै ब 7 भीनासर 116 महा. आदर्शप्रभा जी ऊदासर 2034 वै ब 7 भीनासर 117. महा. कीर्तिश्री जी भीनासर 2034 वै. ब 7 भीनासर 118. महा हर्षिलाश्री जी गगाशहर 2034 वै. ब 7 भीनासर 119 महा साधनाश्री जी गगाशहर 2034 वै ब 7 भीनासर 120 महा. अर्चनाश्री जी गगाशहर 2034 वै सु 15 भीनासर 121. महा सरोजबाला जी धमतरी 2034 भा ब 11 दुर्ग 122. महा मनोरमाश्री जी रतलाम 2034 भा ब 11 दुर्ग 123 महा चंचलकंवर जी काकेर 2034 भा. ब 11 दुर्ग 124 महा कुसुमकाता जी नेवारी कलां 2034 भा ब 11 दुर्ग 125 श्री अशोक मुनि जी जावरा 2034 आ सु 2 भीनासर 126 महा सुप्रतिभाश्री जी उदयपुर 2034 आ सु 2 भीनासर 127. महा शातप्रभा जी बीकानेर 2034 आ सु 2 भीनासर 128 महा मुक्तिप्रभा जी मोडी 2034 मि ब 5 बीकानेर 129. महा. गुणसुदरी जी ऊदासर 2034 मि ब 5 बीकानेर 130 महा मधुबाला जी छोटीसादडी 2034 मि ब 5 बीकानेर 131. श्री मूल मुनि जी नोखामंडी 2034 मि सु 5 नोखामडी 132. श्री ऋषभ मुनि जी बबोरा 2034 मा सु 10 जोधपुर 133 महा राजश्री जी उदयपुर 2034 मा सु 10 जोधपुर नाना गुरु की कहानी 47 134 महा कनकश्री जी रतलाम 2034 मा सु 10 जोधपुर 135 महा शशिकांता जी उदयपुर 2034 मा. सु 10 जोधपुर 136 महा सुलभाश्री जी देशनोक 2034 मा. सु. 10 जोधपुर 137 श्री अजित मुनि जी रतलाम 2035 आ. सु 2 जोधपुर 138 महा निर्मलाश्री जी गंगाशहर 2035 आ सु 2 जोधपुर 139 महा चेलणाश्री जी कानोड 2035 आ सु 2 जोधपुर 140 महा. कुदुमश्री जी गगाशहर 2035 आ. सु 2 जोधपुर 141. श्री जितेश मुनि जी पूना 2036 चै सु 15 ब्यावर 142 श्री पद्म मुनि जी नीमगावखेडी 2036 चै सु 15 ब्यावर 143 श्री विनय मुनि जी ब्यावर 2036 चै सु 15 ब्यावर 144 महा पद्म श्री जी महिदपुर 2036 चै सु 15 ब्यावर 145 महा मधुश्री जी इन्दौर 2036 चै सु 15 व्यावर 146 महा कमलश्री जी उदयपुर 2036 चै सु 15 ब्यावर 147 महा अरुणाश्री जी पीपल्यामडी 2036 चै सु 15 ब्यावर 148 महा कल्पनाश्री जी देशनोक 2036 चै सु. 15 व्यावर 149 महा दर्शनाश्री जी देशनोक 2036 चै सु 15 ब्यावर 150 महा ज्योत्स्नाश्री जी गगाशहर 2036 चै सु 15 ब्यावर 151 महा पकजश्री जी बीकानेर 2036 चै सु 15 ब्यावर 152 महा प्रवीणाश्री जी मदसौर 2036 चै सु 15 ब्यावर 153 महा पूर्णिमाश्री जी बड़ीसादडी 2036 चै सु 15 ब्यावर 154 महा वदनाश्री जी गंगाशहर 2036 चै सु 15 ब्यावर 155 महा प्रमोदश्री जी ब्यावर 2036 चै सु 15 व्यावर 156 महा उर्मिलाश्री जी फलोदी चै सु 15 ब्यावर 157 श्री गोविद मुनि जी ब्यावर 2036 जे सु 13 जगदलपुर 158 महा सुभद्राश्री जी बीकानेर 2036 सा. सु 11 राणावास 159 महा हेमप्रभा जी केसिंगा 2036 आ सु 3 राणावास 160 श्री सुमति मुनि जी नोखामंडी 2036 पो सु 3 भीम 161 श्री चदेश मुनि जी फलोदी 2038 वै. सु 3 गगापुर 162 महा ललितप्रभा जी विनोता 2038 वै सु 3 सु 3 गंगापुर 163 महा वसुमती जी अलाय 2038 अ सु 8 अलाय 164 महा इन्द्रप्रभा जी बीकानेर 2038 का सु 12 उदयपुर 165 महा ज्योतिप्रभा जी गंगाशहर 2038 का सु 12 उदयपुर 2036 48 नाना गुरु की कहानी 166. महा. रचनाश्री जी उदयपुर 2038 का सु 12 उदयपुर 167. महा सुरेखाश्री जी जोधपुर 2038 का. सु 12 उदयपुर 168. महा चित्राश्री जी लोहावट 2038 का. सु 12 उदयपुर 169 महा. लब्धिश्री जी गंगाशहर 2038 का. सु 12 उदयपुर 170 महा. विद्यावती जी आदर्शनगर 2038 मि सु. 10 उदयपुर 171. महा. विरक्ताश्री जी विनोता 2038 मा ब.7 बबोरा 172 श्री पंकज मुनि जी राजनांदगांव 2038 चै. ब 3 अहमदाबाद 173. श्री धर्मेन्द्र मुनि जी रायपुर 2038 चै. ब 3 अहमदाबाद 174. महा. जिनप्रभा जी राजनादगांव 2038 चै ब 3 अहमदाबाद 175. महा. अमिताश्री जी रतलाम 2038 चै. ब. 3 अहमदाबाद 176. महा. शुचिताश्री जी रतलाम 2038 चै ब. 3 अहमदाबाद 177. महा विनयश्री जी छुईखदान 2038 चै ब 3 अहमदाबाद 178 महा. श्वेताश्री जी केशकाल 2038 चै. ब.3 अहमदाबाद 179. महा मणिप्रभा जी गंगाशहर 2038 चै ब.3 अहमदाबाद 180. महा. सिद्धप्रभा जी नागौर 2038 चै ब अहमदाबाद 181. महा. विशालप्रभा जी गंगाशहर 2038 चै. ब 3 अहमदाबाद 182. महा. नम्रताश्री जी जगदलपुर 2038 चै ब.3 अहमदाबाद 183. महा. सुप्रतिभाश्री जी सडकचिरचारी 2038 चै ब 3 अहमदाबाद 184 महा मुक्ताश्री जी कपासन 2038 चै. ब. 3 अहमदाबाद 185 महा. कनकप्रभा जी बीकानेर 2038 चै ब 3 अहमदाबाद 186 महा. सत्यप्रभा जी बीकानेर 2038 चै. ब 3 अहमदाबाद 187. महा रक्षिताश्री जी पाली 2040 आ सु 2 भावनगर 188 महा. महिमाश्री जी अहमदाबाद 2040 आ. सु 2 भावनगर 189 महा मृदुलाश्री जी भिलाई 2040 आ सु 2 भावनगर 190 महा वीणाश्री जी भिलाई 2040 आ सु 2 भावनगर 191. महा लक्षप्रभा जी अलाय 2040 पो. ब 10 बीकानेर 192. श्री धीरज मुनि जावद 2041 फा. सु 2 रतलाम 193 श्री कांति मुनि नीमगांवखेडी 2041 फा सु 2 रतलाम 194. महा प्रेरणाश्री जी बीकानेर 2041 फा सु 2 रतलाम 195 महा गुणरजना श्री उदयपुर 2041 फा सु. 2 रतलाम 196 महा. सूर्यमणि जी मदसौर 2041 फा सु. 2 रतलाम 197 महा. सरिता श्री जी बीकानेर 2041 फा सु. 2 रतलाम नाना गुरु की कहानी 49 198 महा सुवर्णाश्री जी रतलाम 2041 फा सु 2 रतलाम 199 महा निरूपणाश्री जी उदयपुर 2041 फा सु 2 रतलाम 200 महा शारदाश्री जी डोडीलोहारा 2041 फा सु 2 रतलाम 201 महा विकासश्री जी बीकानेर 2041 फा सु 2 रतलाम 202 महा तरुलता जी चित्तौडगढ 2041 फा सु 2 रतलाम 203. महा करुणाश्री जी मोडी 2041 फा सु 2 रतलाम 204 महा प्रभावनाश्री जी बडाखेडा 2041 फा सु 2 रतलाम 205 महा सुयशमणि जी भीनासर 2041 फा. सु 2 रतलाम 206 महा चितरजनाश्रीजी रतलाम 2041 फा. सु 2 रतलाम 207. महा मुक्ताश्री जी बीकानेर 2041 फा सु 2 रतलाम 208 महा सिद्धमणि जी बेगू 2041 फा सु 2 रतलाम 209. महा रजतमणि जी बगुमडा 2041 फा सु 2 रतलाम 210 महा अप्रणाश्री जी कानोड 2041 फा सु 2 रतलाम 211 महा मजुलाश्री जी भीनासर 2041 फा सु 2 रतलाम 212 महा गरिमाश्री जी चौथकाबरवाडा 2041 फा सु 2 रतलाम 213 महा हेमश्री जी नोखामडी 2041 फा सु 2 रतलाम 214 महा कल्पमणि जी पीपल्यामडी 2041 फा सु 2 रतलाम 215 महा. रविप्रभा जी जावरा 2041 फा सु 2 रतलाम 216 महा मयकमणि जी पीपल्यामडी 2041 फा सु 2 रतलाम 217 महा चंदनबाला जी बड़ीसादडी 2041 फा सु 2 वडीसादडी 218 महा मीताश्री जी गगाशहर 2041 मा सु 10 भीनासर 219 पीयूषप्रभा जी बीकानेर 2042 घाटकोपरददई 220 संयमप्रभा जी शाहदा 2042 घाटकोपरचई 221 रिद्धिप्रभा जी शाहदा 2042 घाटकोपरबदई 222. वैभवप्रभा जी अकलकुआ 2042 घाटकोपरदबई 223 पुण्यप्रभा जी अकलकुआं 2042 घाटकोपरददई 224 सुबोधप्रभा जी जांगलू 2042 घाटकोपरब्बई 225 परागश्री जी कपासन 2044 चै सु 13 इदौर 226 भावनाश्री जी भीम 2044 चै सु 13 इदौर 227 दिव्यप्रभा जी डोडीलोहारा 2044 इदौर 228 उज्ज्वलप्रभा जी राजनादगांव 2044 सु 2 इदौर र नर उस सु2 50 नाना गुरु की कहानी वै 229. कल्पलता जी रायपुर 2044 बै. सु 2 इदौर 230. सुमित्राश्री जी बाडमेर 2044 बै. सु 7 बाडमेर 231. इगिताश्री जी बाडमेर 2044 बै सु 7 बाडमेर 232 लक्षिताश्री जी बाडमेर 2044 बै सु 7 बाडमेर 233 विकासश्री जी फलौदी 2045 चै सु. 10 फलौदी 234. अक्षयप्रभा जी बडीसादडी 2045 जे सु 5 जावरा 235 सरोजश्री जी उदयपुर 2045 जे. सु 5 जावरा 236 श्रद्धाश्री जी उदयपुर 2045 जे. सु 5 जावरा 237. समर्पिता जी खण्डेला 2045 जे सु. 5 जावरा 238 अर्पिताश्री जी बंबोरा 2045 जे सु 5 जावरा 239 श्री विवेक मुनि जी उदयपुर 2045 मा सु 10 मदसौर 240. महा. किरणप्रभा जी नीमच 2045 मा सु 10 मदसौर 241. महा. गरिमाश्री जी राजनादगांव 2046 वै सु 7 निम्बाहेडा 242 महा. चारित्रप्रभा जी विल्लिपुरम् 2046 सु 7 विल्लिपुरम् 243. महा. रेखाश्री जी नांदगांव 2046 वै सु 7 निम्बाहेडा 244 महा. कल्पनाश्री जी नांदगाव 2046 वै सु 7 निम्बाहेडा 245 महा. शोभाश्री जी बोल्ठाणा 2046 वै. सु 7 निम्बाहेडा 246 महा. विवेकश्री जी पाटोदी 2046 बोलोतरा 247. महा. पुण्यप्रभा जी विल्लिपुरम् 2046 वै सु 7 विल्लिपुरम् 248. महा. पुनीताश्री जी बाडमेर 2046 वै. सु. 7 बालोतरा 249. महा. पूजिताश्री जी वायतु 2046 वै सु 7 बालोतरा 250 महा स्वर्णप्रभा जी उदयपुर 2046 पो सु 8 उदयपुर 251. महा. स्वर्णरेखा जी ब्यावर 2046 पो सु 8 उदयपुर 252. महा स्वर्णज्योति जी कोटा 2046 पो सु 8 उदयपुर "3. महा. स्वर्णलता जी गगाशहर 2046 पो सु. 8 उदयपुर 254. महा साधनाश्री जी बीकानेर 2046 पो सु 8 उदयपुर 255. महा नदिताश्री जी येवला 2046 फा सु 2 मद्रास 256. श्री रत्नेश मुनि जी कानोड 2047 वै. सु. कानोड 257. महा. प्रमिलाश्री जी बीकानेर 2047 वै सु कानोड 258 महा. सुमंगलाश्री जी चपलाना 2047 वै सु कानोड 259 महा. शर्मिलाश्री जी बीकानेर 2047 वै सु कानोड वै सु 7 -rrror नाना गुरु की कहानी 51 260 महा पावनश्री जी चिकारडा 2047 वै. सु चिकारडा 261. महा. प्रज्ञाश्री जी चिकारडा 2047 वै सु चिकारडा 262. महा मृगावती जी भूमिया 2047 पो सु 3 रायपुर 263 महा. श्रुतशीला जी धमतरी 2047 पो सु 3 रायपुर 264 महा सौम्यशीला जी मोझर 2047 पो सु 3 रायपुर 265 महा सम्मतिशीला जी श्रीरामपुर 2047 पो सु 3 रायपुर 266 महा विवेकशीला जी दलीराजहरा 2047 पो सु 3 रायपुर 267 श्री सभवमुनि जी बीकानेर 2047 मा. ब 2 चित्तौडगढ 268 महा इच्छिताश्री जी रायपुर 2048 चै सु 10 बैंगलोर 269 श्री इन्द्रेश मुनि जी चिकारडा 2048 मा. सु 13 बीकानेर 270. श्री राजेशमुनि जी कलकत्ता 2048 मा सु 13 बीकानेर 271. महा सबोधिश्री जी जम्मू 2048 मा सु 13 बीकानेर 272 महा विपुलाश्री जी बीकानेर 2048 मा सु 13 बीकानेर 273 महा विजेताश्री जी बीकानेर 2048 मा सु 13 बीकानेर 274 महा. स्थितप्रज्ञा जी बीकानेर 2048 मा सु 13 बीकानेर 275 महा मनीषाश्री जी भदेसर 2048 मा सु 13 बीकानेर 276 महा धैर्यप्रज्ञा जी वीसणिया 2048 मा सु 13 बीकानेर 277 महा मणिश्री जी बीकानेर 2048 मा सु 13 बीकानेर 278 महा वैभवश्री जी कलकत्ता 2048 मा सु 13 बीकानेर 279 महा शीलप्रभा जी जगपुरा 2048 मा सु 13 बीकानेर 280 महा अभिलाषाश्री जी देशनोक 2048 मा सु 13 बीकानेर 281 नेहाश्री जी खंडेला 2048 मा सु 13 बीकानेर 282 कविताश्री जी श्यामपुरा 2048 मा सु 13 बीकानेर 283 अनुपमाश्री जी देशनोक 2048 मा सु 13 बीकानेर 284 नूतनश्री जी देशनोक 2048 मा सु 13 बीकानेर 285 अंकिताश्री जी गंगाशहर 2048 मा. सु 13 बीकानेर 286 समर्पिताश्री जी बालेसर 2048 मा सु 13 बीकानेर 287 जागृतिश्री जी देशनोक 2048 मा. सु 13 बीकानेर 288 विभाश्री जी श्यामपुरा 2048 मा सु 13 बीकानेर 289 मननप्रज्ञा जी भीनासर 2048 मा. सु 13 बीकानेर 52 3 नाना गुरु की कहानी 40 आचार्य नानेश के चातुर्मास स्थल प्यारे बच्चो! हमारे नाना गुरु ने सयमग्रहण करने के बाद कुल साठ चातुर्मास किये जिसमे विक्रम संवत् अनुसार- 1 1997-फलौदी 2 1998-ब्यावर 1999-ब्यावर 4 2000-बीकानेर 5 2001-सरदारशहर 6 2002-ब्यावर 7 2003-बगडी 8 2004-बड़ीसादडी 9 2005-रतलाम 10 2006-जयपुर 11 2007-दिल्ली 12 2008-दिल्ली 13 2009-उदयपुर 14 2010-जोधपुर 15 2011-कुचेरा 16 2012-बीकानेर 17. 20013-गोगेलाव 18 2014-कानोड 19 2015-जावरा 20. 2016-उदयपुर 21 2017-उदयपुर 22 2018-उदयपुर 23 2019-उदयपुर 24.2020-रतलाम 25 2021-इंदौर 26 222-रायपुर 27-2023-राजनादगाव 28 2024-दुर्ग 29. 2025-अमरावती 30. 2026-मन्दसौर 31. 2027-बडीसादडी 32 2028-ब्यावर 33 2029-जयपुर 34. 2030-बीकानेर 35. 2031-सरदारशहर 36 2032-देशनोक 37. 2033-नोखामडी 38 2034-गगा-भीनासर 39 2035-जोधपुर 40. 2036-अजमेर 41.2037-राणावास 42 2038-उदयपुर 43 2039-अहमदाबाद 44 2040-भावनगर 45 2041-बोरीवली 46 2042-घाटकोपर 47. 2043-जलगांव 48 2044-इन्दौर 49 2045-रतलाम 50. 2046-कानोड 51 2047-चित्तौडगढ 52 2048-पीपल्याकला 53 2049-उदयरामसर 54 2050-देशनोक 55 2051-नोखामडी 56 2052-गगा-भीनासर 57 2053-बीकानेर 58 2054-ब्यावर 59 2055-उदयपुर 60 2056-उदयपुर इन 60 चातुर्मासो मे साधक अवस्था मे दो बीकानेर, एक ब्यावर और एक दिल्ली-वृद्ध सतो की सेवा व निजी शारीरिक परिस्थितियो के कारण अपने गुरु देव से अलग तथा 19 चातुर्मास उनकी सेवा मे व्यतीत किये एव आचार्य पद पर प्रतिष्ठित होने के बाद कुल 37 चातुर्मास पूर्ण किये। साठ चातुर्मासो मे से 42 चातुर्मास राजस्थान मे, 10 चातुर्मास मध्यप्रदेश मे, 4 चातुर्मास महाराष्ट्र मे 2 चातुर्मास दिल्ली मे तथा 2 चातुर्मास गुजरात सपन्न किये। मे नाना गुरु की कहानी 53 41. आचार्य नानेश के शासन में संत सती वर्ग का महाप्रयाण प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु ने आचार्य पद पर प्रतिष्ठित होते ही सबसे पहले उन्होने अपने दादा गुरु आचार्यश्री जवाहर व गुरुदेव आचार्यश्री गणेश की कल्पना के आधार पर जो एक आचार्य के नेतृत्व मे शिक्षा-दीक्षा-विहार-प्रायचित्त आदि की भूमिका सघ मे निर्धारित हुई थी, जो सत-सतीवर्ग उस सिद्धात पर प्रतिज्ञाबद्ध होकर पूर्ण समर्पण भाव से अनुशासनबद्ध सेवा मे जुटे रहे, उनकी आत्मा मे अतिम समय तक समाधी बने रहे और पडित मरण पूर्वक अपने लक्ष्य की ओर आगे बढते रहे। इस दृष्टिकोण से उन वृद्ध साधु-साध्वियो की सेवा हेतु सव अग्रगणीय साधु- साध्वियो की एक-एक साल की बारी बांध दी गई जिससे उनकी सेवा मे किसी प्रकार की कमी नहीं रहे और किसी एक पर सेवा का भार भी नहीं पडे। बड़े गौरव की बात रही कि सघस्थ विनीत साधु-साध्वियो ने आचार्यश्री के आदेश को स्वीकार करके सेवा केन्द्र पर पहुँच कर सेवा का लाभ लेकर आत्मशुद्धि के साथ सघ को भी गौरवान्वित किया व अनेक साधु-साध्वियो के समाधिमरण मे सहायक बने। जो-जो साधु-साध्वी सघ-सघपति पर पूर्ण समर्पित होकर आचार्य देव के शासनकाल मे समाधिमरण को प्राप्त हुए। जिनकी क्षति सघ के लिए एक रिक्तता अथवा खामी का कारण बनी। उन महान् आत्माओ की नामावली निम्नप्रकार है- संत- 1 बहुश्रुत श्री पन्नालाल जी म, 2 श्री बगतावरमल जी म, 3 श्री सूरजमल जी म. म, 4 घोर तपस्वी श्री धनराज जी म.5 तपस्वी सागरमल जी म, 6 धायमाता श्री करणीदान जी म, 7 तपस्वीराज श्री ईश्वरचद जी म, 8 आदर्श त्यागी श्री गोपीलाल जी म, 9 धायमातृ पदालकृत श्री इन्द्रचद जी म. 10 महात्मा श्री घेवरचद जी म, 11. तपस्वी श्री वृद्धिचद जी म, 12 घोर तपस्वी श्री अमरमुनि जी म, 13 श्री संतोष मुनि जी म, 14 आदर्श त्यागी श्री सौभाग मुनि जी म, 15 तपस्वी श्री रवीन्द्र मुनि जी म. 16. सेवाभावी श्री भूपेन्द्र मुनि जी म. 17 आत्मार्थी श्री हुलास मुनि जी म. 18 आदर्श त्यागी श्री जितेन्द्र मुनि जी म, 19 विद्वान् श्री राजेन्द्र मुनि जी न. 20 घोर तपस्वी श्री पुष्प मुनि जी म, 21 तास्वी रत्न श्री मोतीलाल जी म. 22 घोर तपस्वी श्री कस्तूर चद जी म, 23 सेवाभावी श्री जयवंत मुनि जी म.. 24 विद्वान् श्री प्रमोद मुनि जी न, 25 घोर तपस्वी श्री मूल मुनि .

54 नाना गुरु की कहानी जी म, 26 पंडित तपस्वी श्री ऋषभ मुनि जी म. 27 तपस्वी श्री धीरज मुनि जी म., 28 सरलमना श्री सभव मुनि जी म सा । महासती- 1 श्री वरजू जी म, 2 श्री धापूकंवर जी म., 3 श्री हगामकंवर जी म, 4. श्री चत्तरकंवर जी म, 5 श्री नगीनाकवर जी म, 6 श्री सौभागकवर जी म, 7. श्री चंपाकवर जी म., 8 श्री बदामकवर जी म,9 श्री पार्वता जी म., 10. श्री सुगनकंवर जी म, 11 श्री भूराकंवर जी म, 12. श्री तेजकवर जी म., 13. श्री सुगनकंवर जी म, 14. श्री जीवणा जी म., 15. श्री गटूकंवर जी म., 16 श्री सूरजकवर जी म., 17. श्री मोहनकंवर जी म, 18 श्री छोटाकंवर जी म., 19. श्री सुगनकवर जी म, 20 श्री सिरेकवर जी म, 21 श्री मानकंवर जी म, 22 श्री छगनकवर जी म., 23 श्री टीपूकंवर जी म., 24. श्री वल्लभकवर जी म., 25. श्री रसालकंवर जी म, 26 श्री मनोहरकवर जी म, 27. श्री संपतकवर जी म, 28 श्री गुलाबकवर जी म, 29. श्री प्यारकवर जी म, 30. श्री राजकवर जी म. 31. श्री गुलाबकंवर जी म, 32 श्री कुंकुकवर जी म, 33. श्री धापूकंवर जी म, 34. श्री पानकंवर जी म, 35 श्री लाडकंवर जी म, 36 श्री धापूकंवर जी म, 37. श्री कचनकवर जी म, 38 श्री सूरजकवर जी म., 39 श्री नगीनाकवर जी म.. 40 श्री आनदकवर जी म., 41. श्री गुलाबकवर जी म, 42 श्री कस्तूरकवर जी म, 43 श्री शायरकंवर जी म., 44 श्री उगमकवर जी म, 45 श्री चादकवर जी म. 46. श्री पानकवर जी म, 47 श्री सूरजकवर जी म., 48. श्री बदामकवर जी म 49 श्री सुमतिकंवर जी म, 50 श्री वल्लभकवर जी म, 51 श्री धीरजकवर जी म, 52 श्री रोशनकंवर जी म., 53. श्री फूलकवर जी म, 54 श्री कस्तूरकंवर जी म, 55 श्री हुलासकवर जी म, 56 श्री सोहनकवर जी म, 57 श्री वृद्धिकंवर जी म, 58 श्री ज्ञानकवर जी म, 59 श्री जतनकंवर जी म, 60. श्री छगनकंवर जी म, 61 श्री सूरतकंवर जी म, 62 श्री भवरकवर जी म, 63. श्री हसकवर जी म, 64 श्री अकिताश्री जी म। 42. आचार्य श्री नानेश द्वारा स्वछंदवृत्ति वाले साधकों को आज्ञा बाहर - । प्यारे बच्चो हमारे नाना गुरु जिस परम्परा के आचार्य थे, उस परपरा का सदा से अनुशासनबद्ध मर्यादा के पालन का गौरवशाली इतिहास रहा 55 नाना गुरु की कहानी है। पूज्य हुक्मेश से लगाकर आचार्य नानेश तक सभी महापुरुषो ने जो साधक अनुशासनबद्ध मर्यादा मे पूर्ण समर्पण भाव से चला उनके लिए शासन मे किसी प्रकार की कमी नही रही। चाहे वह साधारण से साधारण ज्ञानी भी क्यो न हो। लेकिन जिन्होने इन दो बातो से विपरीत प्रवृत्ति अपनाई, समझाने पर भी नही समझे उनको आगम निर्देशानुसार सघ से आज्ञा वाहर करने मे भी कभी हिचकिचाहट नही की, चाहे वह विश्रुत विद्वान लेखक, व्याख्याता, लोकप्रिय भी क्यो न हो। यह केवल कहा नही समय आने पर करके भी दिखाया, और कईयो ने स्वयं की स्थिति को समझकर ही सघ से भी बहिर्गमन कर दिया, जिनकी सख्या आपके शासन काल मे 84 तक पहुंच गई। 43. आचार्यश्री नानेश का समता दर्शन प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु जब आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए तो कुछ प्रबुद्ध व्यक्तियो ने अपने भाव अभिव्यक्त किये कि आचार्य प्रवर आज अपेक्षा है ऐसे धर्म के धरातल की जिस पर समग्र मानव समुदाय जाति, पथ, सप्रदाय के भेदो से ऊपर उठकर आत्मानन्द की अनुभूति करता हुआ परमात्म स्वरूप का दर्शन कर सके। उन प्रबुद्ध जनो की अन्तर भावनाओ को समझकर गहन चितन पूर्वक समता-दर्शन के रूप मे चार सोपान-1 समता सिद्धात दर्शन, 2 समता जीवन दर्शन, 3 समता आत्मदर्शन और 4. परमात्म दर्शन व उसके उद्देश्य के साथ ही व्यवहार की पद्धति का निर्देश देते हुए, उसकी समतादर्शी, समताधारी, समतावादी-ये तीन श्रेणिये बनाकर 21 सूत्र निर्दिष्ट किये, जो एक दिव्य भव्य समता-समाज के निर्माण की भूमिका मे सहायक हो सके। जब-जब ये विचार वार्तालाप व प्रवचनो के माध्यम से जनता के सामने आये तो सब आश्चर्य के साथ बोलने लगे कि यह समता दर्शन तो विश्व शाति का अमोघ उपाय सिद्ध हो सकता है। इसलिये इसका अधिक से अधिक प्रचार करने के उद्देश्य से 'समता दर्शन व व्यवहार के नाम से उसको संकलन करके पुस्तक रूप मे प्रस्तुत किया। जिसका हिन्दी, अग्रेजी, मराठी, गुजराती मे भी अनुवाद हो चुका है व समता समाज रचना का रूप भी उभर कर आया है जिसमे हजारो व्यक्ति जुड़े हैं। तब से आचार्यश्री नानेश को समता दर्शन प्रणेता के रूप मे सबोधित करने लगे और बाद मे तो वह आचार्यश्री नानेश का पर्यायवाची ही बन गया। साथ ।

56 नाना गुरु की कहानी ही इसी समता के नाम से धर्मस्थान एव अनेक सामाजिक प्रतिष्ठान भी प्रतिष्ठित हुए। जो समता भवन, समता प्रचार सघ, समता आगम शोध संस्थान, समता युवा सघ के रूप मे सारे भारत मे प्रसिद्ध है। 44. आचार्यश्री नानेश का समीक्षण ध्यान प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु के सामने जब यह प्रश्न उभरकर आया कि आज हर व्यक्ति इतना तनाव (टेन्शन) से व्यथित है कि उसके पास प्रचुर सत्ता संपति सुख के साधन मौजुद होते हुए भी सुख की नींद नही ले पा रहा है। हालाकि उससे निवृत्त होने के लिए, अनेक तरह के प्रयोग योगासन, प्राणायाम, ध्यान के रूप मे अनेक महर्षियो-विद्वानो के विचार अनेक पुस्तको, लेखो व शिविरो के माध्यम से सामने आ रहे है लेकिन उसमे से कई दुसाध्य एव हठयोग से जुड़े हुए है तो कई शारीरिक व्यायाम तक सीमित व सहायक है। इसलिए इसके लिए ऐसा कोई सहज व सरल उपाय हो जो व्यक्ति के सीधे मन मस्तिष्क पर प्रभावी होकर तनाव से मुक्ति दिलाता हुआ प्रकृति व प्रवृत्ति को मोडने मे भी सहायक हो सके। इस प्रश्न के समाधान के रूप मे आचार्यश्री नानेश ने अपनी सतत् साधना की अनुभूतिपरक जो प्रयोग प्रतिपादित किये वे समीक्षण ध्यान विधि विधान के रूप मे आत्म समीक्षण, क्रोध समीक्षण, मान समीक्षण, माया समीक्षण, लोभ समीक्षण, समीक्षण ध्यान एक मनोविज्ञान आदि पुस्तको के रूप में संकलित होकर प्रस्तुत हुए है। समय-समय पर शिविरो के माध्यम से प्रयोगात्मक रूप से भी सिखाये जाते है। जिससे प्रबुद्ध वर्ग सहज लाभान्वित होता हुआ इस अभिनव शैली को पाकर तनाव मुक्ति का अनुभव करता हुआ लाभान्वित हो रहा है। यह आचार्य देव की विशिष्ट देन जन साधारण के बहुत उपयोगी सिद्ध हुई है और होती रहेगी। इसीलिये हमारे आचार्य नानेश 'समीक्षण-ध्यान योगी के विशेषण से भी विभूषित है। 45. आचार्यश्री नानेश : धर्मपाल प्रतिबोधक प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु ने समता दर्शन का केवल प्रतिपादन ही नही किया, उन्होने उसके प्रयोगात्मक रूप से जो देश, राष्ट्र, समाज, धर्म के धरातल पर समता की आदर्श मिशाल प्रस्तुत की है वह है धर्मपाल समाज | जो पूर्व मे मानव जाति मे कलक स्वरूप अछूत गिनी जाती थी। जिसके हाथ खून से सने रहते थे, जिनके मुंह पर दारू (शराब) की बोतल :

57 नाना गुरु की कहानी चढी रहती थी। जो रात-दिन लूट खसोट मे लगे रहते थे। जो हिन्दु होकर हिन्दु सस्कृति से कटते हुए गौरक्षक से गौभक्षक बनते जा रहे थे, उन लोगो के बीच जाकर उनको प्रभु महावीर का दिव्य संदेश दिया और धर्मपाल सवोधन देकर मानवता की राह बताई। वे ही आज भगवान महावीर के सच्चे अनुयायी के रूप मे उनके बताये अहिसा सयम तप रूप धर्म के पुजारी बनकर सात्विक व प्रामाणिक जीवन-व्यसन मुक्त जीवन जी रहे हैं। जिसकी शुरूआत नागदा जक्शन से लगभग 8 किलोमीटर दूर गुराडिया गॉव से हुई, जो मन्दसौर, जावरा, रतलाम, उज्जैन, इन्दौर भोपाल आदि जिलो के अनेक गॉवो, नगरो मे फैली हुई है। जिनकी संख्या एक लाख के आस-पास है। जिसको सन् 1979 के प्रवास मे श्री धर्मेश मुनि जी म सा ने धर्मपाल समाज का रूप देकर ठोसता प्रदान की है। जिसके फलस्वरूप आज अनेक गॉवो मे समता भवनो के रूप मे आराधना स्थल बने हुए हैं। जहाँ वे लोग सामायिक, प्रार्थना, प्रवचन व अपने आराध्य देव प्रभु महावीर को देव, अपने गुरु रूप आचार्य नानेश एवं पच महाव्रतधारी जैन मुनियो को तथा धर्म के रूप मे जैन धर्म को वदन नमस्कार करते है। धर्म पाल स्थापना दिवस चैत्र सुदी 7 को अगता पालते है। प्रतिवर्ष आसोज महीने मे अखिल भारतीय साधुमार्गी जैन सघ के अधिवेशन के समय धर्मपाल समाज का भी अधिवेशन करके सारी व्यवस्थाओ को व्यवस्थित रूप देते हुए अपना प्रचार-प्रसार का लेखा-जोखा करते हैं। श्री साधुमार्गी जैन संघ की तरफ से इस समाज के विकास हेतु एक विशाल धर्मपाल छात्रावास रतलाम मे चला रखा है। साथ ही समय-समय पर पदयात्राएँ भी करते है एव समता भवन, साधर्मी सहयोग आदि योजनाएँ भी निर्धारित है। 46. राष्ट्रीय नेता एवं मूर्धन्य विद्वानों की दृष्टि में आचार्य नानेश प्यारे बच्चो! यहे तो आपने पहले ही जान लिया कि हमारे नाना गुरु ने तत्कालीन अध्ययन व्यवस्थानुसार मात्र प्रथम कक्षा की ही पढाई की थी लेकिन दीक्षा ग्रहण करने के बाद गुरु चरणो मे अध्ययनरत होकर जैन दर्शन के साथ ही वैदिक, बौद्ध, नैयादिक, वैशेषिक, साख्य, चार्वाक, जैमिनी आदि दर्शनो के साथ ही कुरान, बाईबिल के अलावा विज्ञान, मनोविज्ञान 58 नाना गुरु की कहानी साहित्य का भी गहन अध्ययन किया और भाषा विज्ञान की दृष्टि से हिन्दी, सस्कृत, प्राकृत, अंग्रेजी, गुजराती, शौरसेनी, अपभ्रंश, पाली, पैशाची आदि का भी अध्ययन करके उसमे गहरे पैठने के लिए सदा प्रयत्नशील रहे। इसी के फलस्वरूप आपके प्रवचन इतने गहन एव सचोट होते थे कि हर मतानुयायी उसको श्रवणकर आश्चर्यानुभूति व्यक्त करता। आपकी शंका समाधान की शैली तो इतनी सचोट एव सहज थी कि बडे-बडे विद्वान् व वैज्ञानिक भी आपसे समाधान पाकर बडे सतुष्ट व प्रभावित होते थे। उदाहरण के तौर पर थादले के बालेश्वरदयाल जी जिन्होने शका रखी-मॉस के त्याग से अन्न की समस्या बढ जायेगी। धारा नगरी के सिद्धनाथ जी उपाध्याय ने जैन दर्शन को नास्तिक दर्शन के रूप मे निर्धारित किया, धारा नगरी के गजानन्द शास्त्री ने जैनधर्म के स्याद्वाद सिद्धांत को संशयवाद के रूप मे निरुपित किया था। लेकिन जब वे आपके पास मे आये और आपसे सचोट समाधान पाया, समाधान मिलते ही इतने संतुष्ट हुए कि बडे पश्चाताप के साथ कहने लगे कि हमने ऊपरी अध्ययन से ही यह निर्णय ले लिया, लेकिन अब इसका सही स्वरूप समझ मे आया है। इसी प्रकार इन्दौर मे गगवाल जी, गौतम जी शर्मा, प्रकाशचद जी सेठी आदि जो मध्यप्रदेश के तीनो मत्री थे-साथ ही पाटस्कर साहब, बडनगर के विष्णुकुमार जी, बृजवल्लभ जी जो प्रकांड दिगबर विद्वान् थे, साथ-साथ अमेरिका मे कार्यरत वैज्ञानिक डा सघवी, विश्रुत विद्वान् डा डी एस कोठारी आचार्य नानेश का सान्निध्य पाकर बडे प्रभावित व प्रशसक रहे हैं। राजनैतिक क्षेत्र मे भी बडे-बडे राष्ट्र नेताओ मे राष्ट्रपति वी वी गिरी के सुपुत्र श्री शकरगिरी जी, मोहनलाल जी सुखाडिया, श्री भैरोसिह शेखावत, भूतपूर्व प्रधानमत्री देवगौडा, शातिलाल चपलोत, गुलाबचद कटारिया, गिरिजा व्यास, डा. करणीसिंह जी आदि जो भी सपर्क मे आये, वे आपके शुद्ध श्रमणाचार से पूर्ण प्रभावित थे। समय-समय पर कहते थे कि सच्चे साधुत्व के दर्शन आप मे सहज प्राप्त होते है। नही तो आज योगी भोगी के रूप मे साधु स्वादु के रूप में परिवर्तित होते जा रहे है। 47. आचार्य नानेश : आचरण में कठोर और वैचारिक उदारता प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु मर्यादा व अनुशासन मे कठोर होते हुए भी सैद्धातिक एकता के पूर्ण पक्षधर रहे है। वे कभी भी केवल वाहवाही :

59 नाना गुरु की कहानी लूटने के लिए लोकदिखावु सतरे की तरह एकता को पसद नही करते थे। साथ ही सिद्धात बेचकर समझौता करने के लिए भी कभी तत्पर नही रहते थे। लेकिन मौलिक सिद्धात व ग्रहित प्रतिज्ञा की रक्षा करते हुए भावात्मक एकता का जब भी प्रसग आया, पूज्य गुरुदेव कभी पीछे नहीं रहे। उदाहरणार्थ सरदारशहर मे 2500 वीर निर्वाण शताब्दी के प्रसंग पर आपने श्रावको को फरमाया कि आप एक दिन यहॉ प्रवचन का लाभ ले ले और दूसरे दिन वहाँ (अन्यत्र साधु विराजमान) लाभ ले लेवे। बाकी सारे कार्यक्रमो मे मिल-जुलकर भाग ले। इसी प्रकार सवत्सरी एकता के बारे मे आपने अपने विचार स्पष्ट रखे कि यदि सारा समाज एक निर्णय पर आ जाता हो तो मै कभी पीछे नहीं रहूँगा, चाहे श्रावण भादवा की जगह अन्य मास का भी हो। केवल कहा ही नही, समय पर करके दिखाया। चित्तौड चातुर्मास (सन् 1990) के प्रसग पर आपने अपने संघ मे चौथ की सवत्सरी निर्धारित कर दी थी, फिर जब भारत जैन महामडल द्वारा प्रस्ताव आया कि बहुमत पंचमी के पक्ष मे बन रहा है तो आपने सारे सघ में पांचम का निर्देश फरमा दिया, जिसको सुनकर सब आश्चर्य मे पड गये। तेरापथ धर्म सघ के अनुशास्ता आचार्यश्री तुलसी जिनसे इस सप्रदाय से सैद्धांतिक मतभेद पूर्वजो से चला आ रहा है, उन्होने जब देवगढ नगर प्रवेश के समय आचार्यद्वय (आचार्यश्री नानेश व आचार्यश्री तुलसी) का सहज मिलन हो गया तो सबसे पहले धन्यवाद देते हुए आपकी एकता के विचारो की खूब प्रशसा की। तब आचार्यश्री ने फरमाया कि मैने तो कर दिखाया, अब आप भी जब भी मौका आये ऐसी उदारता दिखावे। भोपालगढ मे रत्न वशीय आचार्यश्री हस्तीमल जी म. सा भावनगर आचार्यश्री चंपकमुनि जी म सा आदि के साथ सावंत्सरिक एकता के आधार के साथ सयम की व्यावहारिक शुद्धता को प्रमुखता देते हुए ही परस्पर वदन व्यवहार आदि प्रारभ किया गया था। साथ ही जो भी संत महापुरुष विद्युत् सचालित साधनो का उपयोग न करता हो, आरंभ परिग्रह के कार्यों मे भाग न लेते हो, मूल महाव्रतो मे किसी प्रकार की गडबडी न हो उनके साथ प्रवचन आदि एक साथ देने के लिये भी सदा तत्पर रहते थे। 48. आचार्यश्री नानेश और विचरण क्षेत्र प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु पूर्ण अहिसा के पूजारी थे। उसी अहिसा की आराधना हेतु कभी हरी वनस्पति, उगने वाला अनाज आदि को 60 नाना गुरु की कहानी काटना, पकाना तो दूर छूने मे भी हिसा समझते थे। अग्नि में भी जीव होते है उनकी हिसा से बचने के लिए अग्नि जलाना, दीपक, बिजली के द्वारा चलित साधन भी प्रयोग नही करते थे। हवा मे भी सूक्ष्म जीव होते हैं, उनकी रक्षा के लिए वे कभी वस्त्र, कागज, पंखे आदि से हवा नही खाते थे, यहाँ तक कि बोलते समय मुँह की गर्म हवा से वायुकाय के जीव नही मर जाय इसके लिए अपने मुँह पर हमेशा मुँहपत्ति बाध कर रखते थे। कच्चे पानी मे भी जीव होते है इसलिए पानी के जीवो की हिसा से बचने के लिए चाहे प्यास से प्राण चले जाय पर वे उस कच्चे पानी को पीना तो दूर, छूने मे भी पाप समझते थे। अपने लिए कोई भोजन बनाकर या सामने लाकर देते तो भी नही लेते थे। साथ ही शुद्ध शाकाहारी परिवार मे जो अपने लिए भोजन बनाते है उसमे से भी देते लेते कोई जीव की हिसा न हो इसलिये 42 दोष टालकर ही अनेक घरो से थोडा-थोडा भोजन लेते थे, जिसको गोचरी कहते हैं। छोटे-से-छोटे चलते-फिरते कीडे-मकोडे न मर जाय इसलिये सूर्योदय बाद नगे पाव पैदल ही चलते थे एवं सूर्यास्त के पहले ही किसी स्थान पर ठहर जाते थे। रात्रि को कोई शारीरिक बाधा की निवृत्ति हेतु चलना ही पडे तो रजोहरण से पूजकर चलते थे। इस प्रकार साधु बनने के बाद आपने लगभग 50 हजार किलोमीटर की पदयात्रा की जिसमे राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उडीसा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पजाब, हरियाणा, गुजरात, सौराष्ट्र आदि क्षेत्रो को पावन किया। विहार मार्ग में अनेक बार भूख प्यास के कष्ट सहने पडे। कई बार वृक्ष तले रात बितानी पड़ी तो कई बार पशुओ के बाधने के झोपडो मे भी रहना पड गया। एक तरफ सत्कार सम्मान देने वालो की कमी नही रही तो दूसरी तरफ विरोधी लोगों ने विरोध खडा करने मे भी कसर नही रखी। फिर भी आपने सत्कार और तिरस्कार सबको समभाव से सहन करते हुए मानव मात्र के अभ्युदय मे अपने जीवन को समर्पित कर दिया था। 49. आग में बाग लगाने वाले आचार्य नानेश प्यारे बच्चो ! इस संसार मे कई व्यक्ति ऐसी प्रवृत्ति वाले होते है जो सुदर सुवासित बाग मे भी आग लगाकर उसे वीरान बना देते है लेकिन -y नाना गुरु की कहानी 61 कोई विरले ही व्यक्ति होते हैं जो अपने मृदुल व्यवहार से आग मे भी बाग लगा कर शाति व आनन्द के वातावरण का निर्माण कर देते हैं। हमारे नाना गुरु भी आग मे बाग लगाने वाले दिव्य पुरुषो मे एक थे, जिन्होने अपने साधना काल मे अनेक जगह जहाँ सघ, समाज, परिवार मे ईर्ष्या, द्वेष, वैमनस्य, कलह की आग जल रही थी जो जन-जीवन को व्यथित कर रही थी, भाई-भाई का शत्रु बन रहा था, धर्म व समाज मे भी गहरी दरारे पडती जा रही थी, कोर्ट केस मे लाखो रुपये खर्च करके भी कोई नतीजा नहीं निकाल पा रहे थे ऐसे क्षेत्रो मे नाना गुरु ने अपने प्रवचनो के माध्यम से ऐसी समता की सरिता प्रवाहित की कि वे परस्पर क्षमायाचना करके गले मिल गये एव एक साथ बैठकर भोजन करने लग गये। जिसमें जयपुर के जौहारियो का अमर रिलीफ सोसायटी का विवाद, लीडी गाव मे तीस साल से तनाव जिसमे बहु-बेटियो का पीहर सासरे जाना वद था। टाटगढ का लोडी न्यात, बडी न्यात का विवाद जिसको निपटाने मे बडे-बडे आचार्यो की, साधु-सतो की शक्ति लगी पर नहीं मिट पाया वह आपके एक प्रवचन मे समाप्त हो गया। सरदारशहर के मोतीलाल जी वरडिया व भवरलाल जी बरडिया का जगह को लेकर वर्षों से विवाद था जो आपके सकेत मात्र से समाप्त हो गया और दोनो ने परस्पर क्षमायाचना करके एक थाली मे भोजन खाया। सोजत सिटी के लालचंद जी मेहता एव चुन्नीलाल जी मेहता का वर्षों का विवाद विहार मे रास्ते चलते-चलते समाधान पाकर वे फूट-फूटकर रो पडे और एक दूसरे के गले मिल गये। उस समय तो भरत राम के मिलाप का दृश्य प्रस्तुत हो गया। ऐसे अनेक गॉवो नगरो के प्रसग जिसका लम्बा-चौडा इतिहास है ये तो कुछ नमूने के रूप मे प्रस्तुत किये गये है। 50. समता विभूति आचार्य नानेश प्यारे बच्चो ! आपने पहले पढ ही लिया है कि हमारे नाना गुरु को लोग 'समता विभूति' के रूप मे सबोधित करते थे। यह विशेषण केवल औपचारिक ही नहीं वास्तव मे हमारे नाना गुरु मे समता का यह गुण उनकी प्रत्येक व्यवहार मे झलकता था। उनके समक्ष राजा महाराजा राष्ट्र दं सर्वोच्च नेता एव अरबपति खरबपति श्रेष्ठिदर्य से ल॥ साधारण व्यक्ति भी उनके चरणो की धूल (चरण-रज) दे 62 नाना गुरु की कहानी भक्तमंडल जय गुरु नाना की गूज से आकाश को गूजायमान कर देता था, जिसको सुनकर लोग यह कहते भी नही चुकते कि ये अंधभक्त तो भगवान महावीर को भी भूल गये। इधर दूसरी तरफ ऐसे व्यक्तियो की भी कमी नही रही जिन्होने आपके सामने तिरस्कार जन्य विरोधी वातावरण निर्मित करने मे, लोगो को बर्गलाकर मकान, आहार, उपदेश मे अडचने पैदा करने मे कसर नहीं रखी। उदाहरणार्थ-आचार्य पद पर प्रतिष्ठित होने के बाद रतलाम चातुर्मास के विहार क्षेत्र मे आगे जाकर विपक्षी लोगो ने भैरुगढ, बमनिया, खाचरौद आदि क्षेत्रों में उतरने हेतु स्थान व आहार आदि का निषेध करना। सैकडो व्यक्तियो का दल उज्जैन पहुंचकर अत्याग्रहपूर्वक इदौर चातुर्मास की स्वीकृति लेकर के बाद मे स्थान के लिए मना कर दिया। तब गुरु भक्तो के द्वारा खालसा स्कूल मे चातुर्मास सम्पन्न कराया गया। बैतूल में जवाहरलाल जी मुणोत (जैन कान्फ्रेन्स के उपाध्यक्ष) ने आकर इतना रोषभरा वातावरण पैदा कर दिया स्थानीय लोगो ने धक्का देकर वहाँ से रवाना करने लगे पर आचार्य देव ने उनको एकदम रोककर बड़ी शाति से उनकी हर बात का समाधान करते रहे। जिसका उन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वे दृढ श्रद्धावान बन गये और अमरावती मे बड़ी सादडी सघ का खुला हुआ चातुर्मास उनसे झोली फैलाकर मांगा और अपने यहाँ सम्पन्न कराया। महावीर जयंति के प्रसंग पर आचार्यश्री नानेश रायपुर मे विराजमान थे। सदर बाजार मे भगवान महावीर की जय का बेनर लगा हुआ था। उन्ही दिनों में मुसलमानो के ताजिये निकल रहे थे। उसमे से एक बडा ताजिया बेनर मे अटक जाने से कुछ मुस्लिम युवको ने चाकू से काट दिया जिसको भीकमचद जी बैद ने देख लिया और आकर बीच में खडे हो गये। उनकी आवाज से जैन समाज के अनेक लोग इकट्ठे हो गये और हगामा मच गया। पर कुछ लोगो की सलाह से मौलवी लोग एक नया बेनर बनाकर आपके चरणों में आकर भेंट करते हुए क्षमा मांगने लगे। तब आचार्य देव ने कहा- भाई साहब ! मै यहाँ तोडने नही जोडने आया हूँ। हर धर्म की हर व्यक्ति ईज्जत करे और ऐसी गुस्ताखी से बचे, यही सच्चे धर्म का सार है। आचार्य देव की समता का एवं मधुर वचनो का ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होने रायपुर के पूरे चातुर्मास मे प्रवचन लाभ ही नहीं लिया, व्यवस्था मेभी पूरा सहयोग दिया। - नाना गुरु की कहानी 63 इसी प्रकार अनेक क्षेत्रो मे ऐसे प्रसग अनेक बार प्रस्तुत होते रहे जो आज भी लोग बडी श्रद्धा से याद करते हैं। इतना ही नहीं अपने स्वय के शिष्य-शिष्या जिनको योग्य बनाने में कितना परिश्रम किया, उन्होने ही उनको अक्षम वताकर बहिष्कार पत्र देकर कई पदलोलुपी आत्माओ को बहकाकर अपने साथ ले गये लेकिन ऐसी विपरीत स्थिति मे भी उनके प्रति वही समता भाव रखते हुए फरमाते-वे भी मेरे अग ही हैं। यहाँ तक की एक साधु को थोडा-सा टोकने पर आग-बबूला हो कर पुलिसथाने मे रिपोर्ट लिखाने भी चला गया और पुन आकर अदर से कमरा बद कर के सो गया। उस समय भी उनको वही प्रेम देते हुए उसकी सार सभाल करने पहुँच गये। ऐसे एक नही, अनेक उदाहरण समताविभूति परिचायक हैं। 51. आचार्य नानेश की साहित्य जगत को देन प्यारे बच्चो ! हमारे आचार्य नानेश ने आध्यात्म जगत को अपने जीवन काल मे अनेक ऐसी उपलब्धिये प्रदान की हैं जो आने वाली पीढियो के लिए बहुत बडा पाथेय प्रदान करने वाली है। जिसमे सबसे श्रेष्ठतम उपलब्धि साहित्य की देन है। जो विद्वान् जगत को चमत्कृत करने वाली एव सैद्धातिक धारणा प्ररूपणा को पुष्ट करने वाली तथा सघ की अमूल्य निधि है। क्योकि साहित्य ही समाज, सघ, व्यक्ति का दर्पण है। हमारे नाना गुरु का प्रकाशित साहित्य निम्न रूप से उपलब्ध है- पावस प्रवचन, आध्यात्म आलोक, आध्यात्म वैभव, नवनिधान, शाति के सोपान, ताप और तप, प्रेरणा की दिव्य रेखाए, प्रवचन पीयूष, मगल वाणी, जीवन और धर्म, अमृत सरोवर, समीक्षण धारा, कुकुम के पगलिये, कर्म प्रकृति, क्रोध समीक्षण, मान समीक्षण, माया समीक्षण, लोभ समीक्षण, आगन साहित्य मे भगवती सूत्र प्रथम भाग, अतकृतदशाग सूत्र, कर्म प्रकृति द्वितीय खड, जिणधम्मो, गहरी पर्त के हस्ताक्षर, समता दर्शन और व्यवहार, समीक्षण ध्यान प्रयोग विधि, समता क्राति का आहान, सस्कार क्रांति, निन्। परपरा मे चैतन्य उपासना, गुणस्थान स्वरूप और विश्लेषण । काव्य साहित्य मे- आदर्श माता, पाडव चरित्र नल दमयन्ती, हरिशचन्द तारा. मजुला चरित्र, चदकाता चरित्र सुशीला विद्यापती चरित्र, आनदसेन चद्रसेन चरित्र, रुदनणी ... अग्रेजी मे- समता दर्शन और व्यवहार! और भी कई साहित्य उपलब्ध है।

64 नाना गुरु की कहानी 52. आचार्य नानेश द्वारा उत्तराधिकारी का चयन प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु ने सयम लेकर अपने आत्मोत्कर्ष को तो साधा ही, साथ ही अपने गुरु आचार्य गणेश द्वारा प्रदत्त सघ उत्तराधिकार को भी पूर्ण सजगता के साथ सभालते हुए उसे बहुआयामी बनाकर चहुमुखी विकास करके उनकी बहुगुणी अभिवृद्धि की लेकिन अपनी वृद्धावस्था एव भयंकर रोगाक्रात स्थिति को परिलक्षित कर उस भार से मुक्त होकर अपनी अतिम साधना मे सजग बन सकू, इस उद्देश्य से योग्य उत्तराधिकारी की खोज मे अपनी दृष्टि पैनी करते हुए अपने सब शिष्यो का सब तरह से परीक्षण करते रहे। समय आया तब चतुर्विध संघ ने भी आपके स्वास्थ्य की उत्तरोत्तर कमजोर स्थिति को देखते हुए निवेदन किया। गुरुदेव ! अब आप अपने उत्तराधिकारी की घोषणा फरमा देवे ताकि सघ भी निश्चितता का अनुभव करे और आपकी सान्निधि मे उत्तराधिकारी को भी सघ सचालन की सर्वागीण अनुभूति हो सके। हमारे नाना गुरु ने भी सघ के आग्रह पर चिंतन करते हुए लगभग 12 वर्ष के गहन परीक्षण के बाद अपनी कसौटी पर जो खरा उतरा, उसको सन् 1990 मे चित्तौडगढ चातुर्मास की आसोज सुदी 2, को चातुर्मास, विहार क्षेत्र का निर्णय, पत्राचार, क्षेत्रिय विवाद का निपटारा आदि के अधिकार प्रदान करते हुए मुनि प्रवरश्री रामलाल जी महाराज के नाम की घोषणा कर दी। इस घोषणा से सारे सघ मे आश्चर्य की लहर व्याप्त हो गई। साल भर का समय बीता। चतुर्विध सघ की अंतरंग अनुकूल प्रतिक्रिया का चितन करते हुए बीकानेर सेठिया धार्मिक भवन में वि स. 2048 फाल्गुन बदी 12 को संध संरक्षक (1), स्थविर प्रमुख (5), शासन प्रभावक (3), महाश्रमणी रत्ना (5), शासन प्रभाविकाओ की नियुक्ति एव स्वीकृति के साथ चतुर्विध सघ के सामने युवाचार्य हेतु मुनिप्रवर श्री रामलाल जी म सा की घोषणा की। युवाचार्य चादर प्रदान समारोह जूनागढ (बीकानेर) के राज प्रागण मे हजारो की जनमेदिनी की उपस्थिति मे महाराजा महेद्रसिह जी की प्रमुखता मे चतुर्विध सघ की साक्षी में मनाया गया। उसके बाद आप आचार्यश्री नानेश के विधिवत् उत्तराधिकारी युवाचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए।

नाना गुरु की कहानी 5 1. नाना नाम की यथार्थता प्यारे नन्हे मुन्हे बच्चो ! क्या आपने कभी नाना का नाम सुना है, क्या आप जानते हैं, नाना किसे कहते है ? बच्चे ! हॉ, हॉ क्यो नही, नाना शब्द तो हर गाँव, हर गली, हर मोहल्ले मे सुनने को मिल जायेगा। क्यो नाना तो मम्मी के पापा होते है न जो सबको बहुत प्यारे लगते हैं। जब भी हम हमारे ननिहाल जाते वहाँ नाना का बहुत प्यार दुलार मिलता है। जिसको पाकर पुन अपने पापा के घर आने की इच्छा ही नहीं होती। क्या आप उसी नाना की बात कर रहे हैं। प्यारे बच्चो एक अपेक्षा से आपकी बात बहुत अच्छी है लेकिन में आपको उस नाना की बात बताना चाहता हूँ जो हमारे धर्म गुरु है, जिसको नाना के नाना भी नमस्कार करते थे। जिनके नाम मात्र से हमारे सब कार्य सिद्ध हो जाते है। बडे-बडे राजा महाराजा, भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमत्री, से लगाकर हर धार्मिक, सामाजिक नेता, सेठ साहूकार, बाल वृद्ध बडी श्रद्धा भक्ति से उनके चरणो मे नमन करते थे और जय गुरु नाना, जय गुरु नाना के नारो से आकाश को गूंजा देते थे। क्या तुमने कभी उनके दर्शन नहीं किये ? क्या तुमने ये नारे नहीं सुने ? बच्चे - हॉ, हॉ, अव याद आया। क्या आप उस नाना गुरु के बारे मे बात कर रहे है। वे तो बडे महापुरुष थे जो एक बार हमारे गाँव मे पधारे थे, तव हजारो लोग दूर-दूर से उनके दर्शन, प्रवचन का लाभ लेने हेतु आए थे। हॉ, हॉ, प्यारे बच्चो ! मै उन्ही नाना गुरु के बारे मे पूछ रहा हूँ। क्या आप जानते हो कि उनका जन्म कहाँ हुआ था। सुनो, मै आपको उनके जन्म से लगाकर उनके अंतिम समय तक की सारी बाते सुनाता हूँ जिसको सुनकर तुमको बडा आनन्द आयेगा। 2. नाना किस लोक में कहाँ जन्मे प्यारे बच्चो ! हमारे उस नाना गुरु का जन्म इसी दुनिया हु ! दुनिया को जैन शास्त्र मे लोक कहते है। लोक चोदह राजपमान राजू मे थोडा कम ऊर्ध्वलोक है जिसमें प्राय मानिय देव राजू प्रमाण नीचा लोक है। जिसमे प्राय नारटीजीपाने 6 नाना गुरु की कहानी जिसे ति लोक कहते है। तिर्छ लोक मे असख्यात द्वीप हैं। उनमे से जम्बूद्वीप, घातकी खण्ड और अर्ध पुष्कर द्वीप (ढाई द्वीप) ही ऐसे है, जहाँ मनुष्यो की उत्पत्ति होती है। ढाई द्वीप मे 5 भरत, 5 एरावत, 5 महाविदेह- ये पन्द्रह क्षेत्र है। इन क्षेत्रो मे जन्म लेने वाली पुण्यात्माएँ ही अनादिकालीन आबद्ध कर्म श्रृखलाओ से मुक्त बनने का पुरुषार्थ कर सकती है और सम्यकज्ञान, सम्यक्दर्शन और सम्यक् चारित्र की आराधना करती हुई सिद्ध, बुद्ध, निरजन, निराकार अवस्था को प्राप्त कर सकती है एवं जन्म जरा मरण की महाव्यथा से मुक्त बन सकती है अथवा परित्त ससारी बनकर परमेष्ठि पद पर प्रतिष्ठित होकर देव-देवेन्द्रो, नर-नरेन्द्रो की भी वदनीय-पूजनीय बन सकती है। प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु ने भी उन्ही ढाई द्वीप, पद्रह क्षेत्र मे से जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के वर्तमान प्रसिद्ध दुनिया के छ महाद्वीपो मे से एशिया महाद्वीप मे भारतवर्ष की पावन भूमि मे जन्म लिया था और हमको भी इसी पवित्र भूमि मे जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। परन्तु आपको आश्चर्य होगा कि इसी भारत भू पर जन्म लेकर उस दिव्य पुरुष ने अपने जीवन को इतना उज्ज्वल व पवित्र बनाने की शक्ति कहॉ से प्राप्त की, जो आज भी जन-जन के श्रद्धा केन्द्र बने हुए है। जिनका स्मरण करके लोग अपने आपको धन्य-धन्य मानते है। प्यारे बच्चो ! मै आपको नाना गुरु के जीवन के आदि से लेकर अत तक की वे सारी घटनाएँ बताऊगा जिसको सुनकर आपके दिल मे भी यह आस्था व विश्वास पैदा होगा कि अपने पुरुषार्थ एव दृढ सकल्प से एक साधारण व्यक्ति भी कितना असाधारण व्यक्तित्व के रूप मे उभरकर सामने आ सकता है। 3. नाना की जन्मभूमि बच्चो सुनो, इसी भारतवर्ष मे राजस्थान प्रदेशान्तर्गत मेवाडाचल है जहाँ राणाप्रताप जैसे कर्मवीर, भामाशाह जैसे दानवीर, गणेशाचार्य जैसे धर्मवीर ने जन्म लेकर मेवाड को गौरवान्वित किया है। उसी मेवाड की कपासन तहसील के अंतर्गत छोटा-सा गॉव दाता है जो अपने 'यथा नाम तथा गुण' की कहावत को चरितार्थ करने वाला है। क्योकि दाता के चारो ओर हर कदम-कदम पे श्वेत पत्थर की ऐसी पक्तिये परिलक्षित होती है नाना गुरु की कहानी 7 । मानों धरती माता अपने उज्ज्वल दातो से खिलखिला रही हो। उसी दांता मे कुल दो सौ घरो की बस्ती, जिस पर पूर्ण ग्रामीण सस्कृति का प्रभुत्व फैला हुआ था। न कोई यातायात, न शिक्षा, न स्वास्थ्य के साधन थे। दाता निवासियो का प्रमुख व्यवसाय खेती ही था। ग्राम्यवासी जनता की दिनचर्या प्राय प्रात जल्दी उठना, पशुओ की सार सभाल करना, खेती की देखभाल करना, फिर मोटा खाना, मोटा पहनना फिर थोडी देर परस्पर गपशप लगाना और फिर सो जाना और पुन उठकर उसी क्रम मे जुट जाना, उसी दाता को हमारे नाना गुरु की जन्म भूमि कहलाने का सोभाग्य प्राप्त हुआ है। वही आज नानेश नगर के रूप मे स्वास्थ्य एव विद्या का केन्द्र स्थापित हुआ है। 4. नाना के परिजन प्यारे बच्चो ! उसी दाता मे एक ओसवाल परिवार जिनके वशजो ने वि स 222 माघ शुक्ला पचमी, गुरुवार को ओसिया (मारवाड) के राजा परमार वशी सुरसेन जी के समय भट्टारक रत्न प्रभसूरि जी से प्रतिबोध पाकर अनेक परिवारो ने व्यसन मुक्त बनकर जेनत्व को धारण किया था। वे महाजन आगे चलकर ओसवाल कहलाये। उन्ही ओसवालो में राठोड राजपूत सुसाणी गोत्र वाला परिवार पोकरण जाकर बस गया था। वे पोखरणा कहलाये। उसी पोखरणा गोत्र का एक परिवार दाता करकडा मे कालातर मे आकर बसा। पोखरना परिवार में 1 जडावचन्द जी, 2 बख्तावरमल जी, 3 दोयमल जी और 4 मोडीलाल जी चार भाई थे। लघु आता मोडीलाल जी की शादी भदेसर के नाहर परिवार की सौभाग्यवती सिणगारबाई के साथ हुई थी जो सरल, उदार एव माधुर्यता के गुणो से ओत-प्रोत थी। सच्ची पतिव्रता के रूप मे कुल की आन, बान, शान से अपने बड़े पुत्र मिट्टालाल एव भूरीबाई मोतीवाई, छगनीबाई, धापूबाई इन चारो पुत्रियो के साथ परिवार के हर छोटे बडे सदस्य को आदर सम्मान देते हुए सुखद जीवनयापन कर रही थी। साथ ही सारे गौच के दुख-सुख मे व आवश्यक साधनों की प्राप्ति में मेरी एक आधारभूत परिवार था। सब सेठ बा, सेठ या कहते हुए नि पर पहुंच जाते थे।

8 नाना गुरु की कहानी 5. माता सिणगार को स्वप्न दर्शन प्यारे बच्चो ! वही शृगारबाई एक बार रात्रि मे गृहकार्य से निवृत्त होकर अपने बिस्तर पर सोयी हुई थी। अचानक पिछली रात्रि को अर्धनिद्रित अवस्था मे एक दिव्य स्वप्न दर्शन कर सिणगार मॉ का मन आनदित हो उठा। साथ ही निद्रा भी उड़ गई और निहारने लगी, टकटकी लगा कर । उसने पास सोये हुए पतिदेव को जगाया और सारी बात बताई। स्वप्न वर्णन श्रवण कर सेठ मोडीलाल जी भी हर्षित होते हुए कहने लगे- यह तो बडा शुभ स्वप्न है। लगता है निकट भविष्य मे हमारे कुल मे कोई पुण्यात्मा जन्म लेने वाली है। जिससे हमारे कुल का भाग्यादेय हो सकता है और गौरव भी बढ़ सकता है। यह सुनकर सिणगारबाई भी हर्षित हो उठी। ठीक कुछ ही दिनो बाद वह गर्भवती हुई। वास्तव मे स्वप्न की बात सार्थक होती दिखाई देने लगी। पुण्यवान आत्मा के आगमन की झलक साफ-साफ परिलक्षित होने लगी। घर मे गौधन निरंतर सवर्धन होने लगा। सिणगारबाई को उसकी सार-सभाल करने मे बडा आनन्द आने लगा। घर मे घी-दूध की नदियाँ बहने लगी। सारे गाँववासी द्वार पर मट्ठा लेने आने लगे। जिनको बड़े प्रेम से बर्तन भर-भर कर देते हुए वह आनन्द का अनुभव करने लगी। साथ ही पूर्ण सजगता से गर्भ का पालन करने लगी। 6. नाना का नाम गोवर्धन प्यारे बच्चो ! ठीक नौ महीने साढे सात दिन व्यतीत होने पर विक्रम सवत् 1977 की जेठ सुदी द्वितीया को शृगारबाई ने एक पुत्र रत्न को जन्म दिया, सारे परिवार मे खुशी की लहर व्याप्त हो गई। जिसने भी सुना वह मोडीलाल जी के द्वार पर आकर बधाई देने लगा। बहनो के तो खुशी का पार ही नही रहा। झूम-झूमकर थाली बजाने लग गई। मगल गीतो की गूंजार होने लगी। ढोल बजने लगे। शुभ मुहूर्त मे सूर्य दर्शन कराया गया । पारिवारिक व ग्रामीण सदस्य बालक के जन्म की खुशियाँ जाहिर करने लगे। निकट सबधी भी पहुंच गये और बालक की सहज सौम्य मुद्रा को देखकर आनन्द का अनुभव करने .

नाना गुरु की कहानी 69 दर्शन देने का निवेदन किया। साम्प्रदायिक उन्मेष से वे धर्मस्थान मे नहीं आते थे। ज्योही उन्होने अर्ज की, गुरुदेव चले गये और मंगलपाठ श्रवण कराने लगे। बुढिया करवट पकडे हुई थी। उठना व बैठना भी नही होता था। आचार्यश्री ने यथायोग्य पच्चक्खान करवाकर मंगल पाठ सुनाया और धर्मस्थान पधार गए। थोड़ी देर बाद ही बुढी माजी उठकर बैठ गई। इधर-उधर पड़ी वस्तुओ की ओर सकेत करने लगी। घरवालो को आश्चर्य हुआ। उन्होने डॉक्टरो को भी दिखाया। डॉक्टर भी आश्चर्य कर रहा था। 2-4 दिनो मे वह माजी धर्मस्थान मे आकर मगल पाठ सुनने लगी। फिर साम्प्रदायिक दवाव के कारण वह धर्मस्थान के बाहर खडी रहकर मागलिक सुनती। 57. हुशिउचौश्री जगनाना लाल चमकसी भानु समाना एक रहस्यमय पहेली प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु जव युवाचार्य पद पर प्रतिष्ठित किये जा रहे थे, उस समय आकाश बादलो से आच्छादित था, कुछ बुदावादी भी हुई लेकिन जिस समय आपको चादर ओढाई गई उस समय सूर्य वादलो को चीरकर बाहर प्रगटा और अपनी रश्मियो द्वारा नाना गुरु पर प्रकाश फैलाने लगा, उसी समय सरदारशहर निवासी गुरु भक्त श्री मोतीलाल जी वरडिया ने बुलन्द स्वर मे नारा लगाया- "हुशिउचौ श्री जगनाना लाल चमकसी भानु समाना।।" बच्चो! आपने भी यह नारा कभी सुना। हॉ, हमने यह नारा कई वार सुना है। बताओ-इस नारे का क्या अर्थ है ? इसका मतलब हुआ-हमारे नाना गुरु सबसे ऊँचे बनकर सूर्य के समान चमकेगे। क्यो यही तो अर्थ हुआ ना। प्यारे बच्चो ! किसी अपेक्षा से आपका कथन सत्य हो सकता ह. मगर वास्तव मे इसका अर्थ कुछ और है। वह यह है कि साधुमार्ग में जब-जब विकृतिये आने लगी तब-तब उन विकृतियो का उच्छेदन करने हेतु लोकाशाह, आचार्यश्री जीवराज जी म सा. आचार्यश्री धर्मदास जीन सा आचार्यश्री धर्मसिह जी म सा. आचार्यश्री लवजीऋषि जी म ग आचार्य हरजीऋषि जी म सा आदि ने क्रियोद्धार का तिहनाद दिया। उन्नी महापुरुषो के सत्पुरुषार्थ का ही फल है कि आज जो हम भगवान महावीर .

70 नाना गुरु की कहानी द्वारा निर्दिष्ट अहिसात्मक निर्वद्य साधना मे रत साधक वर्ग जो चैतन्य आराधना के लक्ष्य से परमात्मा की भक्ति मे जड अवलम्बन का परित्याग कर किसी भी सावध प्रवृत्ति से निवृत्त होते हुए मुँह पर मुँहपत्ति बांधकर सवर की करणी में विश्वास रखने वाले साधकवृंद के पावन दर्शन कर पा रहे हैं। उन्हीं क्रियोद्धारक हरजीऋषि जी म. का शिष्य समुदाय कोटा गच्छ के नाम से प्रख्यात हुआ। उसके बाद उनके पाट पर आचार्य गोधा जी म सा., आचार्य परसराम जी म. सा., आचार्य महाराम जी म सा, आचार्य दौलतराम जी म सा व उनके पाट पर आचार्यश्री लालचन्द जी महाराज विराजे। उनके शिष्य पूज्य हुक्मीचन्द जी म सा. ने तत्कालीन प्रस्तुत विकृति का उच्छेदन करने हेतु विक्रम संवत् 1890 मे क्रियोद्धार किया। तब से यह आचार्यश्री हुक्मीचंद जी म. सा. के नाम से हुक्मगच्छ के रूप मे प्रख्यात हुआ। उनके पाट पर आचार्यश्री शिवलाल जी म सा., आचार्यश्री उदयसागर जी म सा, आचार्यश्री चौथमल जी म सा, आचार्यश्री श्रीलाल जी म सा., आचार्यश्री जवाहरलाल जी म. सा., आचार्यश्री गणेशीलाल जी म. सा. व उनके पाट पर युवाचार्यश्री नानालाल जी म. सा को प्रतिष्ठित किया गया। इन्ही आचार्यों के नामों का पहला-पहला अक्षर का क्रमश योग जुडने से यह "हु शि उ चौ श्री ज ग नाना" के साथ ही सोने के सूर्य झरोखे के नीचे ही आप विराजित थे, तब बादलो से आच्छादित सूर्य भी बाहर निकलकर अपनी किरणों को युवाचार्यश्री पर विकीर्ण करने लगा। इस दृश्य को देखकर बोल पडे- "हु शि उ चौ श्री ज ग नाना, लाल चमकसी भानु समाना।" 58. आचार्यश्री नानेश को किन-किन क्षेत्रों से कितने शिष्य शिष्याएँ प्राप्त हुए पाव-पाव घूमने वाले समतासूर्य आचार्यश्री नानेश जिस प्रांत व क्षेत्र में पधारे वहाँ की दिव्य भव्यात्माएँ आपके सदुपदेश से प्रभावित हुई और धन वैभव कुटुम्ब-कबीला त्यागकर गृहस्थ से सन्यास की ओर अग्रसर हुई। उन चारित्रात्माओ की सूची क्षेत्रानुसार इस प्रकार है- राजस्थान प्रात-बीकानेर-33, गगाशहर-21, भीनासर-4, उदासर-2, देशनोक-12, जांगलू-1, नोखामंडी-4, अलाय-2, गोगेलाव-1, नागौर-1, मेडता-1, सरदारशहर-1, जोधपुर-1, पाली-1, फलोदी-2, पाटोदी-1, वायतु-1, बाडमेर-4, बालेसर-1, अजमेर-2, विजयनगर-1, कोटा-1, खडेला-2, व्यावर-7, नाना गुरु की कहानी 71 नीमली-1, आदर्शनगर-1, पावडेरा-1, श्यामपुरा-2, उदयपुर-14, गोदाजी का गाव-2, बली-1, देवगढ-2, कपासन-3, चिकारडा-3, निकुभ-4, बबोरा-3, गोगुदा-1, वेगू-1, बडीसादडी-6, विनोता-2, भदेसर-2, कन्नोज-1, लसडावन-1, मगलवाड-2, वांगेडा-2, रूण्डेडा-1. मोडी-4, छोटीसादडी-1, बूढ-1, जगपुरा-1, चित्तोड-1, कजा -2, कानोड-5, मध्यप्रदेश-नीमच-1, मंदसौर-4, जावरा-3, दलौदा-2, पीपल्यामडी-11, रावटी-2, चपलाना-1, रतलाम-10, इंदौर-2, भोपाल-1, बडावदा-6, कानवन-1, आष्टा-1, महिदपुर-1, वीसनिया-1, सोमनी-1, राजनादगाव-5, कलगपुर-1, डोगरगाव-1, बीजा-1, दल्लीराजहरा-1, धमतरी-2, भोमिया-1, डौंडीलोहारा-2, भिलाई-2, सडक चिरचारी-1, जगदलपुर-1, केशकाल-1, छुईखदान-1, नेवारीकला-1, काकेर-1, रायपुर-6, महाराष्ट्र-श्रीरामपुर-1, मालदाबाडी-2, हिंगणघाट-1, अमलनेर-2, मोझर-1, येवला-1, कई-1, नांदगाव-2, अक्कलकुआ-2. शाहदा-2, नीमगांवखेडी-2, पूना-1, अमरावती-1, हरियाणा-हासी-1, डबवालीमडी-1, उडीसा-बगमुंडा-1, केसिंगा-2, बंगाल-कलकत्ता-3. तमिलनाडू-विल्लिपुरम्-2, उटकमण्ड-1, गुजरात-अहमदाबार-1, जम्मू-जम्मूतवी-1, अज्ञात-1, इस प्रकार 289 चारित्रात्माओ ने गुरु चरणो मे जेन भागवती दीक्षा अगीकार की। 59. आचार्यश्री नानेश के पौत्र शिष्य शिष्याएँ प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु ने अपनी वृद्धावस्था को लखकर अपने उत्तराधिकारी के रूप मे शिष्यमंडल मे से मुनिप्रवर श्री रामलाल जी म सा को युवाचार्य पद प्रदान (फाल्गुन सुदी 3 विक्रम संवत् 2048) करने के साथ की पूर्वापेक्षा और अधिक निर्लेप भावना से अपनी अन्तर्यात्रा में कराः हुए इतने सजग बन गये कि संघीय सारी व्यवस्था के सात ही भविष्य होने वाले साधु-साध्वी की दीक्षा शिक्षा का अधिकारी पुजाचार्यश्री का प्रदान करके सघ को स्पष्ट निर्देश दे दिया कि स्वस्थ शिष्य 72 नाना गुरु की कहानी युवाचार्यश्री रामलाल जी म सा की नेश्राय मे ही होगे। इसलिये उसके बाद होने वाले दीक्षित साधु-साध्वी आचार्यश्री नानेश के पौत्र शिष्य शिष्याओं के रूप में गिने जाने लगे- 60. आचार्यश्री नानेश का महाप्रयाण प्यारे बच्चो ! हमारे नाना गुरु इतनी वेदना मे भी उसी उत्साह से उदयरामसर, देशनोक, नोखामडी, बीकानेर, गगा-भीनासर के क्रमिक चातुर्मास सम्पन्न कर ब्यावर तक पधार गये। उसके बाद भी आप सतो के सहयोग व अपने पुरुषार्थ के बल पर धीरे-धीरे अपनी जन्मभूमि को पावन करते हुए उदयपुर की उस पौषधशाला मे जहाँ आचार्यश्री गणेश का स्वर्गवास हुआ और आपने आचार्य पद पाया, वहाँ 59 वा चातुर्मास भी सम्पन्न किया। 60वें चातुर्मास मे यथाप्रसंग प्रवचन आदि फरमाते। लेकिन उनका शरीर एकदम कमजोर होता गया। अपनी शरीर की हालात को जानकर संलेखना प्रारम्भ कर दी और पूर्ण आत्म समाधि के साथ अन्तर तमन्ना थी कि मैं संथारा संलेखना सहित पडित मरण को वरण करलू। इसी भावना से प्रेरित होकर सब बाह्य उपचार से मुँह मोडते हुए अन्तर भावो मे रमण करने लगे। उत्तरोत्तर शारीरिक परिस्थिति को देखते हुए युवाचार्यश्री राम ने एव श्री ज्ञानमुनि जी ने उनकी भावनानुसार चतुर्विध सघ की साक्षी से सजग अवस्था मे दिनांक 27-11-1999 को 10 बजकर 40 मिनट पर तिविहार तथा 3 बजकर 30 मिनट पर युवाचार्यश्री ने चौविहार संथारा पच्चक्खा दिया। वि. स 2 56 कार्तिक बदी 3 बुधवार को रात्रि के 10 बजकर 40 मिनट पर इस नश्वर देह का परित्याग कर ऑखो के द्वारा शरीर से निकलकर हमारे नाना गुरु की आत्मा ने स्वर्ग की ओर प्रयाण कर किया। ज्योही ये समाचार मिले सारे सघ मे हाहाकार मच गया। हजारो व्यक्ति उदयपुर पहुंचे, जिनकी व्यवस्था सभालना राज्य के लिए भी भारी पड़ गई। युवाचार्यश्री राम आचार्यपद पर प्रतिष्ठित हुए। आखिर गुरुवार को एक बजे चॉदी के भव्य विमान मे उस पार्थिव देह हो बिठा कर विशाल जन समुदाय के साथ मुख्य मार्गों से श्री गणेश जैन छात्रावास, उदयपुर चन्दन की चिता को समर्पित कर दिया गया। मे ܀

विश्व का प्रत्येक पदार्थ एक-दूसरे से संवद्ध है।
कोई भी ऐसा नहीं है, जो एक-दूसरे से बिलकुल
निरपेक्षा हो । समाज के अन्दर ही सबकुछ है;
अर्थात् समस्त उन्नति की जननी कहो तो समाज है।
साधक को साधना के दोत्र में निरन्तर चलते रहना
चाहिये। कभी भी विराम का नहीं सोचना चाहिए।
विराम का चिन्तन साधक के गिराव (पतन) का सूचक है।
आत्मा की मौलिक अवस्था प्राप्त करने के लिए
स्वयं को ही अधिक देखना पड़ता है। वास्तविकता
बाहर से विकसित नहीं होती है, विकास का मूल
सोत अंदर से ही प्रवाहित होता है।
ईर्ष्या पतन का भयंकर रास्ता है। यह अमूल्य जीवन
का घुन है। यह जहर है जो जीवन को श्मशान तक
शीघ्र ही पहुंचा देता है। ईर्ष्या एक जीवन को नहीं.
अनेक जीवनो का नष्ट करती हैं।
आचार्यश्रीनने

Nana Guru Ki Kahani

Author
Muni Dharmesh
Title
Nana Guru Ki Kahani
File name
Nana Guru Ki Kahani
Text
OCR done
Citation
2006
Published
2011/01
Publisher
Shree Sadhumargi Jain Sang Samta Bhawan Bikaner Rajasthan
Language
Sanskrit
Pages
74
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548799
Barcode
4990010028890.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
08mtUzBLcj2
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