Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Matwala Ki Holi
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मूतवाली
की होली
सम्पादक
কাঠডিজিাহিদ
प्रकाशक : परिमल प्रकाशन
17, एम० आई० जी०, बाघम्बरी आवास योजना
अल्लापुर, इलाहाबाद-211 006
मुद्रक : भार्गव मुद्रण केन्द्र
4/3, बाई का बाग, इलाहाबाद-211 003
आवरण . इम्पैक्ट क्रियेटिव सविसेज
सिविल लाइन्स, इलाहाबाद-211 001
सर्वाधिकार : लेखक
संस्करण : प्रथम, 1990 ईसवी
मूल्य : पचास रुपये
URN
प्रमान
परिमल प्रकाशन
१७, एम० आई० जी०, बाघम्बरी आवास योजना
गत्लापुर, इलाहाबाद-२११००६
फोन : ५२७७१
बाबा नागार्जुन के पांवों पर
गुलाल सहित
सादर
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प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हवा में नहीं हो
सकता, न यों किसी देश में उसका निर्माण हुआ है । हममें
प्रगतिशील साहित्य रचने की कितनी चाह है, इसकी एक
बहुत बड़ी कसौटी यह भी है कि अपने पिछले साहित्य की
जनवादी परम्परा को हमने किस हद तक परखा और
अपनाया है और उसे आगे बढ़ाया है।
-~डॉ० रामविलास शर्मा
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रचना-विवरणी दो शब्द १ अग्रलेख [1-5] 13-23 फोटो लेकर चाटो 13 पिचकारी मत पकड़ी 15 होली कब खेलोगे? 17 चन्द्र खिलौना 19 होली होगी 21 मतवाले की बहक 24 चलती चक्की 28 रंगस्टों की फौज 29 चंडूखाने की गप्प 31 हमारी तो बस 'हो-ली' ! 33 144 !!! 35 जोगीड़ा 37-48 हिन्दी-संसार की होली 37 होली की झोली 40 गुलाल की मूंठ 42 होली की फूलझडी 44 लोडरी की होली 46 व्यंग्य रंग से रंगी हुई कबीर को ललकार 48 होरी है 49 माधुरी-मतवाला की तान 50 'मतवाला' बनाम 'माधुरी' 51 उदार मतवाले 52 माधुरी द्विरागमन 53 मतवाला-माधुरी जन्मपत्रिका 55 ग्यंग्य-चित्र 56-59 श्रीलण्डन-स्तोत्रम् 60 साहित्य-शब्दा-गहही नवाविष्कृत गणित-सिदात 75 63 परिशिष्ट 77-100 पैसा 79 गरीब बीवी का गहर 79 होली 80 एक बैठे-ठाले की प्रार्थना 80 चौपट का नगाडा 81 वर्षा-वर्णन 82 सुशामदी टटू 84 आश्चर्य 85 खाएंगे 85 लीडरावतार 86 कच्चा चिट्ठा 90 लीहरी 91 लीडर 92 लो सुन लो 92 मनोरमा की सौगात 93 सौगात पर अभिमत 94 कम्युनिस्ट 95 फरियादे "बिसमिल' 96 जजबाते 'केस'-1 96 शाही कमीशन 97 जज़बाते 'क्रस'-2 97 तीन आँखों मे साम्यवाद 98 जजबाते कैस'-3 99 जज़बाते 'कस'-4 100 दो शब्द भारत के निकटतम अतीत में नवजागरण का सांस्कृतिक आंदोलन संभवतः सर्वाधिक महत्वपूर्ण और गंभीर घटना रही । यह केवल मिटिश सत्ता के विरुद्ध भारतीय जनता के संघर्ष का ही नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक अस्मिता की अभिव्यक्ति और उसकी गरिमा के स्थापन यत्ल का भी आंदोलन था। रचनात्मक और संभावनाशील परंपरा की सुरक्षा के साथ अपेक्षित आधुनिकता के घरण की बहुविध कोशिश ही नवजागरण का मूल स्वर था- जिसके लिए अपनाये गये तरीके हमें आज भी रोमाचित और चकित करते हैं। 'मतवाला' हिन्दी नवजागरण का एक अनोखा पन था । हिन्दी की व्यंग्य- पत्रकारिता में इसका प्रकाशन एक ऐतिहासिक घटना सिद्ध हुई । इसका पहला अंक 26 अगस्त, 1923 ई० में प्रकाशित हुआ और लगभग छः वर्षों तक नियमित निकलता रहा। अंतिम दिनों में यह कलकत्ता से उठकर मिर्जापुर माया और कुछ ही दिनों बाद बंद हो गया। बाद में मिर्जापुर से उग्रजी और जयपुर से इन्दु वाचस्पति ने भी कुछ अंक प्रकाशित किये लेकिन वह बात वापस न हुई । 'मतवाला' की सबसे बड़ी भेंट-सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला' थे । इस कविद्रप्टा को जब कोई पहचानने वाला न था और न ही उनके नाज सहलाने की समझ थी-तव 'मतवाला' ने इस ऐतिहासिक गौरव का वरण किया । महादेवप्रसाद सेठ, मुंशी नवजादिकलाल श्रीवास्तव और शिवपूजन सहाय ने उनकी प्रतिमा की न सिर्फ पहचान की बल्कि अपने ललाट का तिलक बनाया। उम्र में सभी से छोटे होने के बावजूद सभी ने सरस्वती- पुत्र को ऊंचा सम्मान और निर्दोष नेह दिया । 'मतवाला' और निराला लग. भग पर्याय रहे। 'मतवाला' की महत्वपूर्ण सामग्री-चयन का कार्य मैंने किया--जिसकी एक कडी 'मतवाला की होली' आपके हाथो में है। इसमें 'मतवाला' के होली विशेषाको तथा इसी की तर्कसंगति में कुछ अन्य चयनित सामग्री संकलित है। अपने मन-मिजाज में 'मतवाला' का जैसा तेवर था- उसमें होली- विशेषाको का निःसंदेह अतिरिक्त महत्व है । अपने विचारो को कारगर तरीके से जनता के बीच ले जाने के लिए इसके लेखक इस आत्मीय पर्व का अपूर्व कौशल से इस्तेमाल कर रहे थे--जो निश्चय ही सच्चे जनवादी लेखन के सर्वोत्तम नमूने हैं । जनता से उसकी मास्कृतिक भाषा में ही सकर्मक संवाद संभव है। पराधीन देश की जनता के लिए उल्लास और उमंग से भरे इस पर्व की अभिव्यक्ति एक कठिन त्रासदी ही रही होगी। उल्लास और पीडा की अभि- व्यक्ति के इस दोहरे दायित्व को 'मतवाला' ने किस कौशल से व्यक्त किया- इसका अनुभव इन रचनाओ के स्पर्श से सहज सभव है । यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि होली के ऐसे इस्तेमाल की परंपरा का सूत्रपात 'मतवाला' ने नही बल्कि भारतेन्दु और उनके युग के उपेक्षित लेकिन अत्यन्त महत्वपूर्ण लेखकों पं० बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र और राधाचरण गोस्वामी ने किया था । इस कडी में बालमुकुंद गुप्त का नाम भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है-जिनके जोगीड़े और चिट्ठे में इस तरीके का आदर्श रूप मूर्त हुआ है। यह अकारण नहीं कि डॉ० रामविलास शर्मा ने 'मतवाला' को द्विवेदी युग से न जोडकर, भारतेन्दु युग की अगली कड़ी के रूप मे रेखाकित किया है । तथ्य और तरीके दोनो दृष्टियों से उनकी स्थापना इन रचनाओं से पुष्ट और प्रमाणित होती है । 'मतवाला' सनसनीखेज पन तो नही था, लेकिन अपने विशिष्ट तेवर के कारण उसका प्रभाव लगभग ऐसा ही पड़ा । पहले अंक के साथ ही 'धूम मच गई।' इसका मन-मिजाज इतना विलक्षण था कि पूरा हिन्दी संसार चकित रह गया । तमाम प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, संपादकों, लेखकों और पाठकों ने इसे हाथों-हाथ लिया। इसकी अनेक बानगी, छपी प्रतिक्रियाओं मे देखी जा सकती है । स्वाधीनता-संग्राम के उस तप्त दौर मे हिन्दी ही नही, तमाम देशी पत्रकारिता अपने शिखर पर थी। उस समय बंगाल की राजधानी कलकत्ता मे तमाम दिग्गज रचनाकार थे~वहाँ बिना सुविधा और अनुभव के ऐसे शानदार पत्र को निकाल लेना और धाक जमा लेना-ठट्ठा नही था । लेकिन -10- जीवन भरे ताकतवर हिन्दी लेखकों ने अपनी सारी ताकत झोंककर स्वाधीनता के स्वर को ऊंचा किया। । 'मतवाला' अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद तब के समाज में सार्थक हस्तक्षेप था, क्योंकि उसने राजनीति, साहित्य, धर्म, समाज, संस्कृति-हर पक्ष को समेटा । उनको गहरी पड़ताल की। इसके बावजूद 'मतवाला' के अपने अंतविरोध रहे । कही-कहीं वैचारिक पिछडापन भी दिखाई पड़ा तो हल्कापन भी । हिन्दुत्व के प्रति झुकाव भी रहा मगर उसकी नीयत असदिग्ध थी। निराला और शिवपूजन सहाय के अलग होने पर उसका संतुलन और बिगडा और उन के वर्चस्व के साथ वह पूरी तरह बदल गया। उसमे उन तमाम तत्कालीन शक्तियों की गहरी छाप थी, जो स्वाधीनता आंदोलन के साथ इस देश में चल रही थी। अनेक संप्रदायो के संगठन और विचारधाराओं के दल पूरे उफान में थे और अधिकांश देशभक्त ताकतें इनके बीच सार्थक सक्रियता प्रमाणित कर रही थी। उनके नकार या स्वीकार के अनुपात की समझ या परख का 'मतवाला' में अभाव भी था, लेकिन इसे हम भी, आज देख रहे हैं जो शायद तब संभव न था । अंतिम दौर में साप्रदा- यिकता के आरोप में सेठ महादेवप्रसाद जेल भी थे और अश्लीलता तथा हल्केपन के आरोप भी दूर तक वाजिब थे । इससे इंकार नहीं । फिर भी, 'मतवाला' की मार नि:संदेह बड़ी गहरी थी। उसके व्यंग्य में जातीयता का गाढ़ा लेप था। उसकी धार विलक्षण थी। अपने अनोखेपन से उसने व्यंग्य की ऊँची मिसाल कायम की । व्यंग्य के पीछे की दृष्टि में राष्ट्र, समाज और नैतिक मूल्यों के प्रति गहरी आस्था थी। उसने तमाम पक्षो पर चतुर्दिक चोट की । उसकी निर्भीकता ने एकवारगी सभी को आकृष्ट किया । उसकी नजर अंतर्राष्ट्रीय से स्थानीय घटनाओं तक में झांकती और सही जगह पर माकूल प्रहार करती । घटनाओं के चयन और उसे भेदने की जैसी अचूक कला दिखाई पड़ती है-उसमें कुछ भी छूटने या बख्शने की गुंजाइश न थी । चोट और चुहल की घटा बेमिसाल थी। 'मतवाला' में देशभक्ति की अभिव्यक्ति दलगत नहीं थी। मोटे तौर पर उसके विचार मून तिलक के विचारों से जुड़े थे। इसके क्रातिकारी विचारों मे काफी उभार मिलता है । साम्यवादियों के प्रबल पक्षधर और देशभक्त क्रांतिकारियों के मुखर समर्थक के रूप में 'मतवाला' का यश स्थायी है। गरमपंथी राजनेताओं के अतिरिक्त जिस व्यक्ति को आलोचना 'मतवाला' में नहीं है-वे हैं-महात्मा गांधी । पंडित नेहरू तक पर विरोध के छोटे हैं- . - मगर गांधी पर एकदम नहीं। क्रांतिकारियों के प्रति 'मतवाला' का मुखर मुकाव था। अन्य नेतागण, जो कांग्रेस और स्वराज्य दल के जगमगाते नक्षत्र रहे 'मतवाला' की मार से नहीं बच पाये । 'मतवाला' की सूझ मे कट्टर देशभक्ति की केन्द्रीयता थी तो बनारसी मन का हुलास भी था। कुछ सीमित अपवादों को छोड़ दिया जाय तो उसकी तमाम शरारतो मे एक सास्कृतिक संस्कार था। उसका बनारसी ठस्सा ऐसा था- मानो कलकत्ते में काशी वस गई हो। वह समय, हिन्दी की धरोहर उप- लब्धियो में शुमार रहा । इसकी आत्मीय छवि इस संकलन में दिखाई पड़े- तो मेरा श्रम सार्थक हो। इस प्रकाशन के लिए मैं आदरणीय शिवकुमार सहाय और भाई अशोक त्रिपाठी के प्रति विनीत कृतज्ञता प्रकट करता हूँ।- -कर्मेन्दु शिशिर - -12- अग्रलेख-1 फोटो लेकर चाटो! होली खेली थी क्रोधान्ध भीम ने मुक्तकुन्तला द्रौपदी के साथ--कुरुक्षेत्र में -दुःशासन के रक्त से ! होली खेली थी आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र ने युधिष्ठिर की यज्ञशाला में-जहाँ छिन्नमस्तक शिशुपाल की धमनियो पिचकारियां वनी थी उष्ण रक्त की ! होली खेली थी रणधीर वीर राम ने लंका में राक्षसराज रावण के साथ-जहाँ रक्ताक्त राम का श्याम शरीर यों शोभता था मानों नील कमल पर वीरवधूटियां बैठी हों-रणोन्मत्त रावण 'रण-रंग' में इतना सराबोर था कि 'कज्जल-गिरि से गेरु के पनारे' बहते थे-उस होली के हुल्लड़शाह भी आपादमस्तक रक्ताभिषिक्त होकर 'कुसुमित किंशुक तरु' की तरह शोभा पाते थे। हो, जी भर कर होली खेली थी तेजस्वी मनस्वी तपोधन परशुधर राम ने !-मेदिनी रक्तरंजित हो उठी थी !-दिशाएं लाल हो गई थी !-नक्षत्र- मण्डल भी लोहित हो उठा पा ! किंतु, होली का सबसे सुन्दर स्वांग रचा था भगवान् नरसिंह देव ने !-जिनका विलक्षण विकराल रूप अहंकारी हिरण्य- कशिपु के हृदय-रक्त से सिक्त था!-जिसके गले में उस मदान्ध अन्यायी को अंतड़ियों की माला थी !---जिनके तीक्ष्णतर नखों की अग्निज्वाला अत्याचारी के वक्षस्थल के रक्तकुण्ड में शान्त हुई थी ! फिर होली हुई थी- दनादन पिचकारियां चली थी-'राजस्थान' का एक-एक पवित्र रज-कण रक्त-सिक्त हो गया था ! उस होली में एक ओर थी स्वतंत्रता की लालसा और दूसरी ओर था अधिकार का अहंकार ! खूब होली मची थी ! लालसा-ललना के दिव्य वस्त्र रक्त-रंग से सरावोर हो गये थे ! वैसी रंग-भरी होली क्या गुलामों की आंखें कभी देख सकती हैं ? हरगिज रंगीली होली की बातें जाने दो। होलिकादहन भी तुमने कहाँ देखा?-- सत्याग्रही प्रह्लाद ने हँसते-हँसते देखा था~भयंकर अग्नि को लाल लपटें भी चंदन की चैलियां बन गई थी !-अत्याचार की प्रलयाग्नि भी मन्दाकिनी की धारा बन गई थी ! फिर होली जलाई थी हनुमान ने लंका गढ़ में वाहि- वाहि की पुकार से आकाश कांप उठा था! हाँ ! उस साल, समस्त भारत में होली जलाई थी महात्मा गांधी ने विदेशी वस्त्रों की-लंकाशायर में हाहाकार 14/मतवाला की होसी 1 चमक - मप गया पा!--मचेस्टर के पेट में भाग लग गई थी ! याद है ? नहीं ? तो फिर तुम्हे असली होली काही मिलेगी ? पों ही टापते रहो । दूर मयों जाते हो? तुम्हारे देश में समाज में साहित्य में--सर्वत्र होली जल रही है । जरा आयें गड़ाकर गौर से देखो । देश में भारतीयों का स्वत्व प्रह्लाद बना है, नौकरशाही 'होलिका' बनी है। समाज में बाल-विधवाएं अपनी लालसाओं की होली जला रही है। साहित्य में सुविचारो की होली जलाई जा रही है ! क्या साहित्य में अब ऐसी होली देखने को नहीं मिलेगी? --पया हम 'भिखारियों' और 'दासो' को करियर 'भिखारीदास' का यह होली-वर्णन सुहावना लग सकता है ?- 'कढ़ि के निसंक पंठि जात रुण्ड मुण्डन में लोगन को देखि 'दास' आनंद पगति है। दौरि दौरि जेहि तेहि साल करि हारति है अंक लागि कण्ठ लगिये यो उमगति है। दमकवारी ठमक जमकवारी रमक तमकवारी जाहि रे जगति है। राम ! असि रायरो को रन में नरन में निलज्ज वनिता सी होरी खेलनि लगति है ।।' ऐसी रंगदार होली का जमाना जाता रहा ! 'बीती ताही विसारि के, आगे की सुधि लेहु !' अब प्रेम की पिचकारियों से काम लो, मुख पर गौरव का गुलाल मलो, सामाजिक कुप्रथाओं की होली जलाओ, खादी की सादी पोशाक पर अमल अनुराग का अबीर छिड़को, आपस की फूट की धूल उड़ाओ, काय. रता पर कीच उछालो, ऊँच-नीच का भेद मिटाओ, राष्ट्रीयता का राग अलापो, मादक वस्तुओ का मुंह काला करो, विदेशी वस्तुओं को जूतियों के हार पहनाओ और गुलामी को गधे चढाओ। बस ! वही होली का समयानुकूल स्वांग होगा, वही होली वास्तविक आनन्द की अठखेलियो से भरी होगी, वही होली भारत के समस्त रोगो की दवा होगी, उसी होली के दिन इन दरिद्र भारत के घर-घर में चकाचक पूए की कड़ाहियां गरगरायगी, उसी होली के दिन भारत की शुष्कप्राय जातीयता की जड़ मे संजीवन-सलिल की धारा पहुँचेगो, उसी होली के दिन शान्ति और स्वराज में परस्पर रंग-फाग मचेगा । यदि उस होली के दर्शनार्थ तुम्हारी आंखें उत्सुक नहीं है--हृदय उद्विग्न नही है-मस्तिष्क अशान्त नहीं है-- प्राण व्याकुल नहीं है, तो वही अपने वावा के गीत गा-गा कर उसी पुरानी होली का फोटो लेकर चाटते रहो ! [ वर्ष 1, संख्या 30-15 मार्च, 1924] अग्रलेख--2 पिचकारी मत पकड़ो चलने दो दनादन ! धार मोटी है तो क्या; धार पर डटे रहो, पीछे पैर न दो; छाती खोलकर सामने अड़ जाओ। यही तुम्हारी अग्नि-परीक्षा का समय है । याद करो; यह होली उस अग्नि-परीक्षा का स्मारक दिन है, जो एक दृढ़ सत्याग्रही का अस्तित्व मिटाने के लिये हुई थी। एक ओर था भीषण अत्याचार, दूसरी ओर या सत्य संकल्प ! एक ओर चमचमाती हुई तलवार, दूसरी ओर या सत्य पर बलि होने की धधकती हुई आकांक्षा ! एक ओर भयंकर ज्वालाएं, दूसरी ओर भक्ति गद्गद अश्रु धाराएं ! एक ओर प्रलयंकारी निष्ठुरता; दूसरी ओर अटल व्रत-निष्ठा। एक ओर प्रचण्ड क्रोध का ज्वाला- मुखी, दूसरी ओर एकान्त ईश्वर-विश्वास की मन्दाकिनी । बड़ी विकट अग्नि- परीक्षा थी। उसी अग्नि-परीक्षा में सफल होने वाले दृढ़वती की याद दिलाने के लिये, आज होली आई है । याद करो उस दृढ़ता को, उस निर्भीकता को, उस सच्ची लगन को और उस आस्या को, जिसके सहारे वह सत्याग्रही विजयी हुआ था। विजय के उन्ही साधनों के साथ तुम्हें आज आगे बढ़ना चाहिये । उसी सत्याग्रही का आदर्श, तुम्हें दनादन चलनेवाली पिचकारी की चोटीली धार के सामने हिमालय की तरह अचल बने रहने की शक्ति प्रदान करेगा। [हतोत्साह होने का कोई कारण नहीं । हिचकने का कोई हीला नहीं। काले और गोरे के भेद से सकुचाने की जरूरत नहीं । ब्रजमण्डल में तो एक ओर 'काला' अकेला ही था, दूसरी ओर गोरियों का गुट चारों तरफ से उस पर पिचकारियां चलाता था। वह 'हंसते ही हमते पिचकारियो की धारो को चीरता हुआ गोरियो के गुट में घुस पडता था। फिर तो भगदड मच जाती थी। सारी पिचकारियो का मुंह वह एक ही 'पम्प-हजारा' बन्द कर देता था।] तुम उसी काले के उपासक हो। उसी की तरह पिचकारी की धार पर डटना सीखो। आज देश में गोरी सरकार दमन की पिचकारी दनादन चला रही है। होली की धमार की तरह चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है ।
161 मतयाला को होनी उड़ते हुए अवीर-गुसान के पादम की सरह विपत्तियों के पास सिर पर मैहला रहे हैं । यही अवगर है तुम्हारी पुरा परीक्षा का। यह कसोटी है तुम्हारे पुगपत्य कंगन का। अतएय, उस्लाम मे गाय गान गाय से हमने. हमते, मसगजेन्द्र गति रो, मागे पड़ो; मैदान तुम्हारे हाय है. पिनपत्री तुम्हारे साप है। किन्तु आगे बढ़ते हुए यह याद रसयो, पिचकारी की धार पाहे तुम्हें 2. पनाह फर दें, पाहे साहि-त्राहि पुकारने को याध्य कर , पाहे एंडी से भुटिया तक सराबोर कर दें, तित भर न हिंगो। आधिर पिचकारी घलाने याले की शक्ति की भी कोई हर है । दुःशासन के मुदण्ड घोर का छोर पाने से पहले ही शिपिस हो गये थे । मह दमन की पिपकारी भी उगी दगा को प्राप्त होगी। विश्वास रखयो द्रौपदी दुकूल यदंफ पर । गलने दो घुमाघार ! पिचकारी मत पफड़ो। [वर्ष 2, अंक 29-7, मार्च 1925) नग्रलेख-3 होली कब खेलोगे? श्वेत साडी पहने कब से खडी हूँ, तुम्हारा पता ही नहीं है । आओ प्यारे, इस श्वेत साड़ी को पिचकारियो की मार से~ अबीरी रंग की बौछार से-- सराबोर कर दो-लाल कर दो, जब तक नहीं आओगे-~आकर धुंआधार होली नही खेलोगे-तब तक यह श्वेत साड़ी मेरे शरीर से कोरे कफ़न की तरह लिपटी रहेगी। इधर देखो, अवीरी रंग के मटके भरे रक्खें है, पिच- कारियां तुम्हारी बाट जोह रही है--दूर ही से तुम्हे देखकर रंग की धार छोड़ेंगी। जरा आओ तो, तुम हाथ औड़ते ही रहोगे, मैं दनादन पिचकारी की धार से तुम्हें बेकरार कर दूंगी। भला कहो तो, कितने दिन हो गये, अब आते हो, तव आते हो, राह देखते-देखते आँखें पथरा गई~-उधर पिचकारी के अन्दर रंग खोल रहा है, इधर कलेजे के अन्दर हौसला तड़प रहा है। इस बार तुम मिलो तो, श्यामवर्ण शरीर को रक्तवर्ण न कर डालें तो फिर नाम क्या? सच कहती हूँ, तुम्हारी तरह होली खेलने वाला कही देखने में नहीं आता। न जाने तुम होली के कितने स्वांग धारण करना जानते हो। तुम्हारे होली खेलते समय के कितने ही स्वांग आज भी मेरी आँखों के सामने नाच रहे हैं । दया कर इस समय उनमें से कोई एक स्वांग भी तो दिखाओ। वह स्वांग मुझे आज तक याद है तुम्हारे हाथ न पिचकारी, न कुमकुमा; ग्वाल- बाल की टोली लिये टूट पड़ते थे-बाज की तरह-गोरियों पर । अब आज जरा इस गोरी पर तो टूटो-बड़ी देर से पिचकारी भर कर ललकार रही है। क्या कुंज की ओर से छापा मारना भूल गये ? कम से कम इस श्वेत साड़ी पर अपने रतनारे लोचनों का रंग तो छिड़को, इस श्वेत साड़ी का हौसला तो पूरा करो। तुम्हारे लिये यह कुछ कठिन तो नहीं है । तुम तो अकेले ही गोरियों के झुण्ड में बैठकर होली खेलनेवाले हो । निकट आओ मैदान में, कहीं यहीं पर छिपे तो जरूर होगे, अवसर की ताक में कब तक तरसाओगे? तुम्हारा वह स्वांग तो भुलाये नहीं भूलता-तुम चुपचाप बागडोर यामे हुए थे, चारो से लोग तुम पर बौछारें कर रहे थे-पीताम्बर से रंग टपक रहा था~मोतीमाला लाल हो गई थी-श्याम कान्ति पर लोहित वर्ण की आभा !
18/ मतवाला की होली -ओह ! विचित्र ही छटा थी। तुम्हारे इशारे पर लाखों होली-खेलवया नाचते थे । क्या उन सिद्धहस्त खेलाडियों का जमघट फिर न जुटामओगे? अरे तुम्हारा वह स्वांग भी क्या कम पा-आप लाल थी-दांत लाल ये-नख लाल थे ! दोनों जघों पर 'रंग का मटका' लिये बैठे थे, और मस्ती मे इतने बूर थे कि भर-भर अंजलि रंग अपने आप ही उड़ेल रहे थे । वह मस्ती क्या हो गई ? एक बार तो उसकी झलक दिखाओ । जी करता है, तुम किसी तरफ से भरी पिचकारी लिये आते हुए देख पड़ते, और मैं तुम्हारी पिचकारी की धार से अपनी पिचकारी की धार लड़ाने के लिये ललक कर आगे बढ़ती, तुम मेरी श्वेत साड़ी सराबोर कर देते, मैं कृतार्थ हो जाती। आश्चर्य है कि तुम एक पिचकारी देखकर भी ललकार पर नहीं डटते । वह उमंग आखिर क्या हुई, जिसके बल तुम दस-दस पिचकारियों का जवाब अकेले देते थे-धीस-बीस भुजाएँ भी पिचकारी चलाकर तुम्हारे दम को तोड़ नहीं सकती थी, बताओ तो, फिर वैसी होली कब येलोगे ? । [वर्ष 3, संख्या 27--20 फरवरी, 1926] OD अग्रलेख-4 चन्द्र खिलौना ठहरो, ठहरो, व्ययं वहको मत ! जरा होश संभालो ! इस प्रकार सुध- बुध खोकर उन्मत होने से काम नहीं चलेगा। क्या कहते है ? होली आ गई । क्या सचमुच होली आ गई ? तो फिर वह है कहाँ ? हम तो आँखें फाड़- फाड कर देख रहे हैं और वह कहीं दिखाई नहीं पड़ती। स्वयं उसका दिखाई पड़ना तो दूर, हमें तो उसके आगमन की सूचना देने वाले चिह्न भी दिखाई नहीं पड़ते । यह जो पांच पंचों की दान दी हुई लकड़ियों को जला कर होली मनाते हो और प्राचीन अभ्यासवश कल की पुतली को भौति-देश और जाति के बदरंग रहते हुए भी-विलायती बुकनी घोलकर रंग खेल लेते हो- असली होली नहीं है ? यदि वास्तव में तुम इतने ही को होली समझते हो तो, बलि- हारी है तुम्हारी सहृदयता को। होली ऋतुराज वसंत की अग्रदूती है । इसी के द्वारा ऋतुराज के उन्माद- कारी आगमन का सन्देश पाकर तो प्रकृति महारानी बाग-बाग हो जाती है ? और इसी आगमन-संदेश को पाकर तो वसुन्धरा का अंचल विविध भांति के शस्त्रो से परिपूर्ण होकर अपूर्व शोभा धारण करता है ! तो फिर कहां है प्रकृति को वह रोग-शोक सन्तापहारी श्री समृद्धि और वह मुक्तहस्त उदारता जो छोटे-बड़े शूद्र-द्विज और दरिद्र-धनवान-सबको बिना किसी प्रकार के भेद- भाव के, सब प्रकार की सुख-शान्ति प्रदान करती थी? कहाँ है वसन्त महा- राज के आगमन का वह प्राणोन्मादकारी प्रभाव जिसमें विभोर होकर हम चाण्डाल को भी अपना भाई समझते और उसे सप्रेम गले लगाकर होलिकोत्सव मनाते थे? जरा आंखें खोलो और देखो। आज न तो इस अभागे देश में शस्य की ही इतनी प्रचुरता है कि बेचारा कृषक तुम्हारे इस होली के स्वांग मे दिल खोलकर योग दे सके, और न, हममें इस समय इतनी उदारता ही है कि हम ऊंच-नीच का.भेदभाव भूलकर हिन्दू मान को प्रेम-गदगद होकर आलिंगन कर सकें । इस समय तो महाकवि बिहारी के शब्दों में- भी यह ऐसोई समै जहाँ सुखद दुख देत, चैत चांद की चांदनी, डारति किए अचेत । ।
20/ मतवाला की होली का ही दृश्य नजर मा रहा है। ऐसी स्थिति में हमें न तो होलिकोत्सव मनाना ही समीचीन प्रतीत होता है और न ऋतुराज का स्वागत करना ही। इसमें कोई सन्देह नहीं कि तुम कई अपने को भूलकर इस दुदिन में भी होली मना ही लोगे और इतने ही के लिए गर्व से 'बचे सो खेले फाग' कहते हुए अपने को धन्य समझोगे, क्योकि 'लंगोटी में फाग' खेलने का असाध्य रोग तुम्हारी पैतृक सम्पत्ति हो गई है। परन्तु संसार तुम्हारी इस हृदयहीन बेहयाई को देख कर तुम्हे उस अज्ञान बालक के समान ही समझेगा जो चन्द्रमा की मनो-मुग्धकारी छटा को देखकर 'चन्द्र खिलौना लेइहौं' कहता हुआ रोता है और जल भरे थाल में चन्द्र-प्रतिबिम्ब को देखकर समझता है कि उसने चन्द्रमा पा लिया और चुप हो जाता है । अतएव, यदि तुम्हे अपनी प्राचीन परिपाटी के अनुसार होलिकोत्सव मनाने की अभिलाषा हो इस साम्य- तत्त्व के प्रचारक जातीय त्योहार के अवसर पर अछूत कहलाने वाले भाइयो के प्रति अपने मनोभाव को सबसे पहले बदल दो। और अवनति काल मे उत्पन्न हुए विषमता और घृणा के भाव की होली जलाकर, परस्पर प्रेम और सहानुभूति का गुलाल मलकर अपनी जाति को अपने शत्रुओं की दृष्टि में बचाओ। {वर्ष 4, संख्या 40---12 मार्च, 1927] अग्रलेख-5 होली होगी खूब होगी ! अच्छी तरह होगी ! देख तेना ! कहे देता हूँ। गांठ दे रक्खो। बड़ी जबरदस्त और घमासान होली मचेगी। सारे संसार के इतिहासकार एक स्वर से कह उठेगे-उफ ! ऐसी होली तो 'न भूतो न भविष्यति ।' शायद तुम्हें तो वही होली याद होगी, जिसकी धूम कालिन्दी-कूल के कदम्ब-कुंजों में मची थी-जबकि ब्रजमण्डल का चन्द्रिका-चचित आकाश- मण्डल देव दर्शकों के विमान बेड़ों से भरा रहता था~-छ:-छ: महीने तक राका रजनी ठगी रह जाती थी-अनवरत पुष्पवृष्टि से ब्रज वसुन्धरा सुशोभित हो उठती थी-क्षोझ, मृदंग की मधुरध्वनि से वायुमण्डल परिपूर्ण हो जाता था--श्याम सलिल-वाहिनी यमुना भी रक्तवर्ण होकर अपने सौभाग्य पर इठलाती हुई वहा करती थी- शीतल मन्द सुगन्ध समोर भी अभ्रक-अबीर- कुमकुमे के रंगीन पराग से रंजित होकर कुंज-कुटीरों के तीर-तीर डोलती फिरती थी। किन्तु, शंकर की समाधि भग्न करने वाली वह होली-ब्रह्मा की तपस्या भुला देने वाली वह होली-इन्द्रासन के जमे हुए जल्से को उखाड़नेवाली वह होली-मालूम है, कब हुई थी ? वह उस समय हुई थी, जब भारत में घी, दूध की नदियाँ बहती थी- जब भारतीय वीरों का प्रबल आतंक सारे भूमण्डल पर स्थापित था- भारत की विजय-वैजयन्ती नभोमण्डल में सगर्व उड्डीयमान होकर भगवान् सहस्रांशु के रथ की गति को भी रोके रहती थी। किन्तु आज? क्या दशा है ? करोड़ों भारतवासी मुश्किल से एक जून सत्तू घोलकर गुजर करते है--- भारत मां के करोड़ो मासूम बच्चों को दाने- दाने के लाले पड़ रहे हैं-दुर्भिक्षों और महामारियों की भरमार मे भारतीय प्रजा त्रस्त हो उठी है-रोगाक्रांत, क्षुधा-पीड़ित एवं दारिद्र्य-दलित प्राण- शेष नर कंकालों से भारत-भूमि के प्रत्येक खण्ड का इंच इंच छा गया है । कहो, ऐसी दशा में होली होगी? बोलो-होगी, ऐसी दशा में हो सकती है ऐसी भीषण परिस्थिति में ?
22/ मतवाला की होली - - . 1 आह ! भले ही न हो सके आज, किन्तु होगी अवश्य, अनति दूर भविष्य में ही होगी, और बड़े मजे की होगी- सचमुच कहता हूँ- सच्ची होली होगी-ऐसी-वैसी नहीं । वह सर्वया अद्वितीय होगी। संसार का इतिहास पलट जायेगा । पृथ्वी असंख्य वार प्रकम्पित होकर तो कही स्थिर हो पायेगी। अनन्तसागर महीनो क्षुब्ध हिलोलो से मथित होकर अशान्त हो उठेगा । सूर्य और चन्द्रमा आंखें फाड-फाड़ कर विस्मय के माथ देखते रह जायेंगे । भयंकर उल्का-पात की अविधान्त धारा से समस्त जगत् कम्पायमान हो जायेगा। हवा परथराती फिरेगी, पेड-पत्ते स्तब्ध हो रहेंगे, पक्षी अपने बसेरे छोड भागेंगे, भैरवी के प्रलय-हंकार से दमो दिशाएं कॉप जायेंगी और भीमाकृति रणचण्डी के अट्टहास से आकाश विदीर्ण हो जायेगा। हा : हा . हा : हा · हा.!!! कैसी अच्छी होली होगी वह ? कल्पना तो करो ? नाच उठोगे मतवाला-पाठको ! सम्हलकर सोची-कितनी विचित्र होली होगी वह । हा हा हा . हा : हा: !! ! उस दिन भारतवासियों के शरीर की नाडियां अदभ्य पिचकारियां बनेंगी लाल रंग की ! उन देव-विमानों की जगह आकाश में गीध मंडरायेंगे । उस दिन भारतीय नर-नारियो की चिताभस्म राशि पर धुलहंडी मचेगी । उस दिन अभ्रक-विन्दु के वदले देश- भक्ति की मस्ती में झूमने वाले अकलात नवयुवक वीरी के तेजस्वी नेत्रो से राष्ट्रप्रेम की चिनगारियां वायुमण्डल मे उडती फिरेंगी । उस दिन कुमकुमे के बदले भारत के अनमोल लालों की 'बोटियां उडाई जायेगी । उस दिन साम्राज्यवाद के पलीते से उकसाई हुई तोपें ही भारत की जनमण्डली में प्रचण्ड मृदंग ध्वनि की तरह घहरायेंगी । उस दिन भारतीयो के हाथ-पैर की येडियो की झनकार ही झांझ का मजा देगी । उस दिन करताल की जगह करवाल ले लेगी और गुलाल की जगह गोलियां । आह ! कैसा अद्भुत दृश्य होगा भगवन् ! निहत्थे भारतीयों की लोथों से पटी हुई पृथ्वी पर साम्राज्यवाद की अधिष्ठात्री शक्तिचण्डी का वह उल्लास. पूर्ण अन्तिम ताण्डव नृत्य कैसा सुन्दर होगा प्रभो ! मेरे प्यारे इष्टदेव-बोलते क्यो नहीं ? मेरे आराध्यदेव संहार-मूर्ति शकर ! कहो, उस दिन तो तुम्हारे तीसरे नेत्र के खुले बिना ही तुम्हारा मनोरथ सिद्ध हो जावेगा । तुम तो सहज ही अखण्ड ताण्डव-नृत्य मे निमग्न हो जाओगे-तुम्हारे सहेला-सहेली भारतीयों की मुण्डमालाएँ पहनकर--खप्परों मे भर-भर उनके तप्त रक्त को पी-पीकर, युगो के वाद, तृप्ति लाभ करेंगे। बताओ तो, उस दिन के बाद ! हो, वास्तव में उमी दिन के बाद-ठीक उसी दिन के बाद भारत-यही भारत-यही पद दलित भारत, अपने श्मशान से, उस प्रह्लाद की फूफी उस
होली होगी। 23
सत्याग्रही की निठुर-निगोड़ी बुआ-की चिताभस्म, अपने ललाट में लगाकर
अभूतपूर्व आनन्द की मस्ती में झूम-झूम कर गावेगा-
अव होगी-
अब होगी हमारी होली!
सच्ची होली, प्यारी होली !
गाओ, बजाओ घूम मचाओ!
यारो ! होली होगी ! होली होगी !!
[वर्ष 5, संख्या 29-3 मार्च, 1928]
वर्ष
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मतवाले की बहक इन्तहाये नशा में आता है होश । होशियारी इन्तहाये नशा है ।। 1. 'मतवाला' की संगदिल माशूका 'माधुर'ने ऐन होली के अवसर पर दगा दिया ! क्या पूछते हो यार, जमाना पलट गया ! सारा नशा किरकिरा हो गया !! हौसिला पस्त हो गया और सारी उमंग खाक में मिल गई !!! अब होली क्या तुम्हारे सर से खेलें या अपने ?. उफ कम्बख्त ने बड़ा धोखा दिया ! लिखा था यों कि 'फमलेगुल में छूटे आशियां अपना !' 2. अबकी होली की धूम कौंसिलों में खूब है ! मालवीयजी रंग छोड़ने के लिये जब पिचकारी उठाते हैं तब सर मलकम हेली उनकी पिचकारी ही पकड़ लेते हैं ! 3. यार, ये मजूरदल वाले भी बड़े चकमेवाज निकले, 'स्वराज्य पार्टी' की धुड़कियो मे जरा भी नही डरे ! अब 'पार्टी' को किसी नये नखरे का अभ्यास करना चाहिये । नहीं तो यदि प्रियतम यो ही रूठ गये तो होली का मजा ही बिगड़ जायेगा। 4. नौकरशाही ने न्याय की गर्दन तो पहले ही मरोड डाली थी, अब लज्जा की भी तितांजलि देने वाली है ! एसेम्बती ने उसका बजट बिगाड डाला ! इसलिये या तो वह स्वराज दल के आगे सीधी सो जायेगी या नंगी नाचेगी। 5. सुनते हैं महात्माजी का स्वास्थ्य बहुत कुछ सुधर गया है, इसलिये उनके दर्शन के लिये भक्तो को टूट पड़ना चाहिये। नहीं तो, पूर्ण स्वास्थ्य लाभ कर लेने पर वे बड़ी आफत मचायेंगे । सत्याग्रह कर लेंगे, विलायती 'पटो' की होली जलायेंगे, चरखा चलवायेंगे, मलमल का मुंह मलकर खद्दर को इलचल मचायेंगे । गर्जे कि भारत में 'वही रफ्तार वेडंगी जो पहले थी उसे फिर जारी करायेंगे । इसलिये उनको कुछ दिन और रीमार रखने की कोशिश करना, जरूरी ही नहीं, अजहद जरूरी है ! 6. अब तुर्की में खुदा की खुदाई न रहेगी क्योकि उनके प्रतिनिधि को मतवाले की बहक /25 अंगोरा एसेम्बली ने स्विटजरलैण्ड भेज दिया। अब अल्लाह मियां वहां से अपना उपनिवेश उठा लें। 7. मि० दास, श्रीयुत लालाजी और हकीम साहब ने तर्क का तूफ़ान बरपा कर दिया, युक्तियों का जाल बुन डाला और दलीलों का दरिया बहा दिया । परन्तु महात्मा के असहयोग सिद्धात का एक केश भी न हिला ! 'न टर पग मेरुहुँ ते गरु भो, सु मनो महि संग बिरंची रचा !" 8. अरे ओ, मुहर्रमी सूरतवाले खब्बीसो, दकियानूसो और आबनूसो ! जरा इस होली के मौके पर तो हंसो ! यों न हंसी आती हो तो 'स्वराज पार्टी' की अक्ल पर हेसो, नौकरशाही की अदूरदर्शिता पर हंसो, 'मतवाला' के नवकालो पर हँसो, और परिहास के बदले ग़लीज़ यमन करने वाले सम्पादकों और लेखकों की दशा पर हँसो ! तुम्हे तुम्हारे बाप की कसम, एक दफे जरूर हँस पड़ो! [ वर्ष 1, संख्या 30-15 मार्च, 1924 ] 9. लोग कहते हैं- होली आई ! हम कहते हैं-होली गई ! पूछिये, कहाँ ? क्यों नहीं, कोई बुलाने वाला भी तो हो ! उड़ा ले जाने वाला जितना चालाक था, बुलाने वाला अगर उसका भी चचा हो, तो आना क्या मुश्किल है ? सुबह-शाम मे आ सकती है । मगर वही मेकराजी चाल ! क्या वह चाल महात्मा गांधी नहीं चल सकते? लोग तो उन्हें लक्ष्य कर कहा करते हैं कि 'भतीजों' को 'नचा' अच्छे मिले हैं ! वेशक 'चना' तो ऐसे अच्छे मिले हैं कि "भतीजे' अपने बाप का जमाना भी भूल गए 10. सरकारी नौकरियां सूखी हड्डियां हैं । हिन्दू और मुसलमान 'निटिव डॉग' हैं । चबा रहे हैं चाव से और चख रहे हैं अपने ही मुंह के रक्त का स्वाद ! फिर भी तारीफ में कहते जा रहे हैं कि 'ऊख में पियूय में मयूष में न पाई जात, जैसी मधुराई सूखे हाड़ के चवाने में!' . [वर्ष 2, संख्या 29--7 मार्च, 1925] 11. थोड़ा-सा गुलाल, भूत-भावन भगवान शंकर के प्रलयंकर चरणो पर, जिनमें चंचलता आते ही अनन्त ब्रह्माण्ड आपस में एक दूसरे से धक्के लेने लगते हैं, ज्वालामुपियों का ममूह अपनी छाती के अग्नि-स्फुलिंगो से आकाग को आग-आग करने लगता है, समुद्र सूप जाते हैं, पृथ्वी पर हाहाकार उप. स्थित हो जाता है।
26 / मतवाला की होली 12. थोड़ा-मा गुलाल, जगज्जननी, मंगलमयो, मुण्ड-मालिनी, महाशक्ति, माता महिप-मदिनी के चरणों पर, जिनके नीचे लोट कर भाव-मुग्ध भूतेश्वर भी अपने भाग्यो को सराहते हैं ! 13. लगवा लो, लेखनी के लाडलो ! थोडा-सा गुलाल तुम भी अपने गोरे, काले, मटमैले, चितकबरे चेहरों पर मस्त होकर मलवा लो ! साथ ही, लगवाते वक्त, एक बार अपने आपको भूलकर मुग्ध होकर हंस भी लो! आज 'फागुन मस्त महीने की होरी' है ! 14. निर्मला, भक्ति-शिरोमणा, भठिहारिणी 'भोरप्रिये' 'मनोरमा ! देखो, चोंचले न बधारो, दूर ही से नजारे न मारो, जरा पास आ रहो और मुझे जी खोलकर लगा लेने दो थोड़ा-मा गुलाल अपने 'फुटबाल' की तरह फूले गालों पर ! सुकुमारी हो तो क्या, कुमारी हो तो क्या, निर्भतारी हो क्या, आज 'ऐसा करा लेने से' कोई कुछ न कहेगा। यह तो रस्मे दुनिया भी है, मौका भी है, दस्तूर भी है। 15. थोडा-सा गुलाल महाकवि 'शंकर' जी के भाल पर, थोड़ा-मा गुलाल कवि सम्राट पण्डित अयोध्यासिंह उपाध्यायजी की दीर्घ-दाढ़ी पर, थोडा-सा गुलाल प्रेमचन्दजी को प्रतिमा पर, थोड़ा-मा गुलाल कविवर मैथिलीशरण की सुन्दर कविता पर और थोडा-सा गुलाल 'नारी-रूप-धारी-नर' ठाकुर गोपाल शरण सिंहजी की घनाक्षरी पर भी छिड़के देते हैं। इन्ही महानुभावों को, वक्ते-जरूरत उदारता से देने की आदत से ही, हम पियक्कड़ों के प्यालों की लाली है ! 16. थोडा-सा गुलाल 'मतवाला'-मण्डल के सहृदय सखा पण्डित चन्द्र- शेखर पाठक को लम्बी-लम्बी तावदार मूछों पर, जिनकी कृपा से हमारा 'अफजल-वध' सचिन्न हो गया है । [वर्ष 4, संख्या 40-12 मार्च, 1927] साथ, 17. आज भारतीय प्रजा के प्रतिनिधियो की नस-नस में फगुनहट ने मस्ती भर दी है । वे बड़ी उमंग से, साइमन सतभैयों के स्पोच-पिचकारियों तान-शान कर होली खेल रहे है । हाय ! मैं मर्दुआ किसके साथ होली खेलूं ? 'मदर इंडिया' प्रसव करने वाली 'मिस मेयो' वीवी तो लौट गई अमेरिका ! हाय रे ! हाय रे ! उनके रहते एक भी होली नही कटी। कही आज वह होती ! आह ! कैसा रंग गैठता ! या अल्ला !!
मतवाले की बहक / 27 18. 'निराला' महाराज ने पिचकारी तानी 'पंत' महारानी पर, तो वह बसंती चुनरी समेटकर अंदर ही अंदर ऐंठती हुई फूल सेज की पाटी पकड़कर चुप बैठ गई। यह निष्क्रिय-प्रतिरोध' (Passive Resistance) तो बड़े मजे का रहा ! लाख छेड़ो-बोलूंगी नहीं। अगर बूंघट टारोगे तो सिर्फ मुस्कुरा- ऊँगी । अरे वाह री तेरी अदा ! तभी तो फिदा है सारा जमाना ! [वर्ष 5, संख्या 29-~-3 मार्च, 1928]
चलती चक्की
[पम्पदार हजारा पिककारा]
कह रहा है आसमां यह सब समां कुछ भी नहीं ।
पीस दूंगा एक गदिश में जहां कुछ भी नहीं ॥
1. गत सप्ताह से श्रद्धेय गणेशशंकरजी 'प्रताप' - सम्पादक की कुर्सी पर
बैठ गये । मालूम होता है, 'विद्यार्थीजी' फागुन की हवा लगते ही फिर ससुराल
जाने की तैयारी करने लगे।
[वर्ष 1, संख्या 30-~-15 मार्च, 1924]
2. गत 26 फरवरी को कलकत्ता कार्पोरेशन ने स्थानीय शिव लेन के
एक मन्दिर से एक माथ ही तीन शिवलिंग उखड़वा लिया और मंदिर भी
तुड़वा डाला । मुसलमान भाई तो हिन्दू बालकों की ही सुन्नत किया करते थे,
कार्पोरेशन ने तो हिन्दू देवताओ की भी सुन्नत आरंभ कर दी।
3. हिन्दी-संसार मे पत्रो की बाढ़ देखकर 'माधुरी' बीवी बहुत घबरा
उठी हैं । जानेमन ! सुथना सँभाले रहो । पत्रो की बाढ़
गोमती की बाढ़ थोडे
है ? पत्रों की स्वयंवर-सभा मे तुम्हे भटकने न दूंगा ! बन्दाराम तो तुम्हारे
'पेटेण्ट' पति मौजूद ही हैं । घबराती क्यो हो ?
[वर्ष 2, संख्या 29-7 मार्च, 1925]
रंगरूटों की फौज 1. काशी के पंडित रामप्रसाद पाण्डेय 'विशालरद' होली के दिन 'मतवाला' की टक्कर का 'माण्ड' नामक एक पत्र निकालेंगे। अब वे अपने नाम के अन्त में 'पाण्डेय' के बदले 'भाण्डेय' लिखेंगे, क्योकि 'भाण्डस्यायं सम्पादकः इति भाण्डेयः !' ठीक है-'तस्य तदेव हि मधुरं पयस्य मनो पत्र संलग्नम्' ! 2. जबलपुर की 'श्रीशारदा' का मासिक बिगड़ गया! एक साल में अनेक-पतिगामिनी होने का फल इसके सिवा और हो ही क्या सकता है ? 3. सुनते हैं कविता-कामिनी-कान्त पं० नाथूराम शंकर शर्मा को मतवाला- माधुरी की जोड़ी बहुत पसन्द है । कही इस पसन्द की निगाह में कोई दूसरी चाह न भरी हो ! फागुन में बूढ़े भी उत्पाती हो जाते हैं। 4. काशी के ज्ञानमण्डल ने अपनी 'मर्यादा' खो दी, क्योंकि जब 'स्वार्थ' सिद्ध नहीं होता तब 'मोदा' का ध्यान नहीं रहता ! 5. सुनते हैं, दरभंगा-नरेश अपने गढ़ की रक्षा के लिये एक नये फैशन के हथियार की खोज में हैं । यह भी सुनने में आया है कि होली के दिन उनके गढ़ में हथियारो की प्रदर्शनी होने वाली है [ वर्ष 1, संख्या 30--15 मार्च, 1924 ] 6. इधर असहयोग की लहर से उन बेचारे टकहा सनातन धर्मोपदेशकों का रोजगार एकदम पट पड़ गया था, जो भोली-भाली धार्मिक जनता को उलटी-सीधी बताकर मजा मारने वाले और एकमात्न स्वार्थान्ध अर्थ-दास थे। इन दिनों हिन्दू सभा के कारण इन्हें नोच-खसोट करने का अच्छा मौका मिला है। एक गुरुजी ने तो गुरुणा गुरु काशी के पण्डों पर ही जाल फेंका था। परन्तु देवयोग से गुरुजी को पटरी चौचक बैठ न सको। इधर ठठेरे-ठठेरे बदलोअल का तार देखकर गुरुजी ने ग्रहण के मौके पर मोहान्ध महन्तो की उमड़ी हुई तोंद सुहलाना शुरू किया है। देखें, मुट्ठी भरती है या कोरा 'रामलड्डू' ही मिलता है। [ वर्ष 2, संख्या 29--7 मार्च, 1925 30/ मतवाला की होली 7. भारत-धर्म महामण्डल की ओर से एक सर्वधर्म-सदन बनने वाला है। उसमे सब धर्मों और संप्रदायों के उपासना गृह बनेंगे-मसजिद, गिरजा, मन्दिर आदि । हमारी राय है कि पालटपन्थी-संप्रदाय का भी एक उपासना- मन्दिर अवश्य रहना चाहिये । आइन्दे 'विद्याव्यासंगी' महाराज की मर्जी ! [ वर्ष 3, मंख्या 27--20 फरवरी, 1926 ] 8. मतवाला-मंडल के प्रसिद्ध पियङ्कड़ मुन्शी नवजादिकलाल श्रीवास्तव की लगातार तीन शादियाँ एक ही घर मे हो चुकी-बड़े भाग्य से उनको एक 'त्रिफला साला' मिल गया है--तीन फल दे चुका, चौथे फल को 'पाल' डाल रक्खा है । अगर वह भी मुन्शीजी के बांटे पड़ा तो कहना न होगा कि उनकी 'सारी खुदाई' चारो पदार्थ देनेवाली कामधेनु है । 9. काशी के जिन पण्डितो ने गजाकार लम्बायमान घोषणापत्न निकाल । कर भारतधर्म-महामण्डल और महाराज दरभंगा का बहिष्कार किया था, वे ही सारे-के-सारे पण्डित उनकी मभाओं में मक्खन ले-लेकर बडे हौसले से पहुंचे थे। इन्हे तो टका थमा दो, 'चचा' कहवा लो। 10 कौसिलों के मेम्बर बहुत दिनो से अपना-अपना 'विल' पेश करते आ रहे हैं, मगर आज तक कुछ फल नहीं निकला । अब उन्हे यह देखना चाहिये कि उनके "विलो' मे कौन-सा ऐसा दोप अटका हुआ है, जिससे इतनी मशक्कत करने पर भी कुछ पैदावार नहीं होती। [ वर्ष 4, संख्या 40-12 मार्च, 1927 ] DO चंडूखाने की गप्प [ फक्कड़ बादशाह ] सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम 1. जबसे इस देश में अछूतोद्धार का आन्दोलन उठा है, तबसे देवलोक मे बड़ी सनसनी फैली है। बेचारे देवता घबरा उठे है। सुनते हैं, वहाँ की "नेशनलिस्ट पार्टी' इस प्रश्न पर विचार कर रही है। यदि आवश्यक हुआ तो वहाँ भी यह आन्दोलन जारी किया जायेगा। पार्टी की इस दुरभि-सन्धि की खबर पाकर विधाता की सरकार ने देवलोक के तमाम मन्दिरो और कुओ पर 'प्युनिटिव पुलिस' तायनात की है और इस आन्दोलन का विरोध करने के लिये काशी से कई अच्छे-अच्छे पण्डित वहां बुलाये गये हैं । 2. गण्डक-तट-वासी ऋपिकल्प ज्योतिपियों ने बताया है कि नवदम्पती 'मतवाला' और 'माधुरी' के संयोग से कलकत्ता में शीघ्र ही एक 'मोजी' बच्चा पैदा होगा! यह महातेजस्वी बालक कातिकेय की तरह महासुन्दर और मदन की तरह अनंग होगा। इसका प्रभाव मनुष्य-शरीर के स्थान-विशेष पर पड़ेगा। 'महादेव' ने चाहा तो यह ‘मकार-परिवार' शीघ्र बहुवंश हो जायेगा। [वर्ष 1, संख्या 30-15 मार्च, 1924] 3. हिन्दू-तीर्थो के पण्डों ने तीर्थराज प्रयाग एक सभा करके इस शर्त पर दक्षिणा लेने की प्रथा उठा देने का संकल्प किया है यजमानों या यात्रियो की युवती स्त्रियां स्वच्छन्दता पूर्वक मन्दिरो मे दर्शनार्थ आया करें। [वर्ष 2, संख्या 29-7 मार्च, 1925] 4. कविवर पण्डित सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला' जी ने बालक, युवा, वृद्ध, नर, नारी, हिन्दू के छोटे बड़े सभी "ध्वजधारी' अधिकारी सज्जनों और सजनियों को, आमतौर पर तथा अमीनावाद के कोठेवाली श्रीमती प्रोपित. पतिका रामदुलारी और श्रीमती रूपकिशोरी गणिका को, ताल ठोंककर खुला चैलेंज दिया है कि होली के दिन अपने बन्धु, बान्धवों और बन्धुनियों को साथ लेकर आवें और भरपेट भिण्ड भिडावें । [वर्ष 3, संख्या 27-20 फरवरी, 1926] 32/ मनवाला की होली 5. भरतपुर के हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति धुने गये हैं अलवर. नरेश । उन्होने अपने भाषण में एक जगह दीर्घ-शंका उपस्थित की है कि मुसलमान-माई अगर हिन्दी की होड़ में अपनी उर्दू को भिड़ावेंगे तो हिन्दू क्या कर सकेंगे। 6. पंडित मूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' आजकल संस्कृत के प्राचीन कवियो के सम्बन्ध में शोधन-कार्य कर रहे हैं। करीब-करीब सबका शोधन हो चुका, केवल 'विकट नितम्बा' का शोधन करना शेष है। 7. बहुत दिनों के बाद यह भेद खुला है कि पं० सुमित्रानन्दन पन्त जुल्फें बढ़ाकर, लचक-मटक सीखकर, नाना भांति के प्रयत्नों से स्त्रीत्व प्राप्त करने की चेष्टा कर रहे है, यहाँ तक कि पुलिंग शब्दों में भी धीरे-धीरे स्त्रीलिंग का आरोपण कर रहे हैं। उन्होंने प्रोफेसर पं० वदरीनाथ भट्ट बी० ए० को लिखा था कि हमारा स्त्रीत्व सार्थक कीजिये । इस पर भट्टजी ने भी उत्तर दे दिया है कि हम तो आप ही के लिए आज तक कौमार्य व्रत धारण कर लखनऊ की आबहवा का सेवन कर रहे हैं। (वर्ष 4, संख्या 40-12 मार्च, 1927) हमारी तो बस 'हो-ली' ! - [रामनाथ लाल 'सुमन'] हाय ! वे भी एक दिन थे, जब इस शस्यश्यामला भूमि पर दूध की धारायें बहा करती थी, जब कालिन्दी के कलित कलेवर में सुन्दर सरोजों की बाढ़ थी, जब सुरसरि का तट आनन्दोन्मत्त मोरों और कोकिलो के कल-कूजन से गूंज उठता था। उसके बाद वे भी एक दिन थे, जब मेखलाधारी ऋपियों की 'तत्त्वमसि' ध्वनि से वायुमण्डल में प्रकम्पन होता था, यज्ञकुण्ड की लपटें संसार में दिव्य ज्ञान की ज्योति फैलाती थी । और-वे भी एक दिन थे, जब योद्धाओं के भयंकर हुँकार से मेदिनी कांप उठती थी, ऊपर-नीचे होने लगती थी। और सुनोगे ? वे हमारे ही दिन तो थे, जब एक साधारण योद्धा ने स्वयं भगवान् को ही ललकार कर कहा था-'सूच्यग्रं न दास्यामि विना युद्धेन केशव !' और सुनना चाहते हो ? नहीं, जाने दो, गुलामी की चक्की के गेहुँओ ! अपनी कायरता की कहानी सुनकर क्या करोगे? उधर से आँखें ही फेर लेना अच्छा है, जिनकी आंखों के सामने से, अभागे अशान्त विश्व का वाता, महात्मा ईसा की पवित्र वाणी से संसार को कंपा देनेवाला, शान्ति का उपासक, तपस्वी --अशान्ति फैलाने के अपराध में-देखते-देखते छीनकर जेल की कोठरी में ढकेल दिया गया हो; किन्तु ईश्वरैच्छा कहकर पिण्ड छुड़ाने में जिन्हें जरा भी लाज न आई हो, उन्हें उनकी मर्यादा सुनाना क्या और न सुनाना क्या ? जीवन में ही मरे हुए हम अभागे गुलामों की सन्तान हमारे नाम अपने मुंह पर किस हौसले से लावेगी? . . . . हो, तो उस समय भी हम होली खेला करते थे और आज भी खेलते हैं- पर उस समय अपने हृदय के आनन्दोल्लास में डूबकर, प्रेमरंग से सराबोर होकर खेलते थे और आज रोकर, अपना कलेजा मसोसकर सेलते हैं । उन दिनों भी हम होली मनाते थे, जब हमारे बनाये हुए दिव्य मलमल से यूरोप की नवोढ़ा युवतियों का शृंगार होता था और आज भी होली खेलते हैं, जबकि हमारी बहुएँ वस्त्राभाव मे गोली धोती पहने हुए उसके छोर सुखाकर दिन 341 मतवाला की होली बिताती है। तब भी हम होली खेलते थे जब रुपये के मनों अन्न मिलते थे और आज भी मनाते है जबकि वमन किये हुए अन्न को धो-धोकर खाने वालो की कमी नहीं है !!! हमारी वेशर्मी पर, हमारीमवेगैरती पर, भले ही लोग थूका करे, हंसी उडाये, आवाजें कसें, किन्तु हम अभागे जीव सुनते कब है ? आज नारद की वीणा ध्वंस हो चुकी है। हमारा संगीत भंग की धारा में वह गया है । हमारी लाज कुलवधुओं की ओर झांकते-झांकते दूर हो गई है । होली का संजीवनोत्पादक पवित्र प्रेम वेश्याओ के मुखडे तक ही खतम हो रहा है। हमारी पविन्न जिह्वा दूसरे को गन्दी गालियां सुनाकर तृप्ति:लाभ करती है। विदेशी गुलाल और चकचकाती हुई अद्धी के कुर्ते, शतशत विधवाओं की भाहो को कुचलकर, पहने जाते है। हमारी ऐंठ, अपने सेवको तक ही समाप्त हो जाती है । हम अपने नाच-रंग, खुशी-मुजरे और भंगभवानी की उपासना मे यह सोचकर कभी खलल नही डालना चाहते कि हमारे ही घर के दस करोड भाइयो के पेट मे मुश्किल से एक समय चारा पड़ता है । आज यही हमारी होली है ! हम अभागो को कौन वतावेगा कि ये आँसू हो- तिरेक मे उमड़े हुए हृदय के मोती है वा कलेजे को चीरकर दो टूक कर देने वाली निगूढ क्रन्दन-ध्वनि के अशक्त और मौन दूत? [वर्ष 1, संख्या 30-15 मार्च, 1924] 144!!! [ कविरत्न 'विनोदानंद'] अरे क्या पूछते हो? मेरा नाम 144 है। मैंने बड़ों-बड़ों का मान-मर्दन कर दिया । पुण्य-शय्या पर शयन करने वालो को कारागार की ककरीली धरती पर सुला दिया । सिंह की तरह गरजनेवाले वक्ताओं के मुंह पर ऐसा मुछीका चढ़ाया कि उनकी बोलती बन्द कर दी । जो काम बड़ी-बड़ी शक्तियों से महीनों में नहीं हुआ था उसे मैंने मिनटों में कर दिखाया !!! जिस सभा में पहुंच गई उसमें बस मैं ही मैं मटकने लगी। बड़े-बड़े वीर मुझसे मगज मारकर मर गये, पर किसी से मेरा बाल बांका भी न हुआ। मैं मोम की तरह इतनी मुलायम हूँ कि मजिस्ट्रेट-मदारी चाहे जिस ओर मुझे धुमा सकता है । साथ ही, मैं बच्न की तरह ऐसी कठोर हूँ कि जहाँ पंजे अड़ा देती हूँ फिर संपटपाट किये बिना नहीं टलती। कहो, सवर है असहयोग आन्दोलन की, पता है नान-कौपरेशन मूवमेट का? कैसे करिश्मे दिखाये, क्या गुल खिलाये, कितना कौतुक किया? रोज यही सुन पडती थी कि आज फलाने लाल लद गये, कल अमुक दास गये, परसों इनके देव वेड़ियां खटका रहे हैं और अतरसों ढिमके दत हथकड़ी पहने जा रहे हैं। भाई, सच समझना, मेरी बदौलत लोगों मैं हिम्मत आ गई। जो लोग कैद के नाम से कानों पर हाथ रखते थे, वे भी मेरी ललकार पर 'जेल की चिड़िया' बनने को तैयार हो गये । और तो और, अबला कहानेवाली स्त्रियां भी 'सबला' बन बैठी ! ह ह ह ह ह ! इन बातों से मैं खूब मशहूर हो गई हूँ। मेरा नाम शैतान की तरह शोहर-ए-आझाक हो गया है । मेरी सर्वतोमुखी गति है। मैं पहले ही मोम की तरह 'मुलायम' और बज की तरह 'कठोर' बन चुकी हूँ। राजनैतिक दंगल से जी ऊब गया, तो अब मेरे मदारी ने मुझे धार्मिक और सामाजिक क्षेत्रों की पैमापश करने भेजा है । पटना, बहराइच, लखनऊ, कानपुर में मैं तमाशा दिया चुकी हूँ। अहा ! मेरे नाम में बड़ी विचित्रता है। मैं तीन अंकों से बनी हूँ, जिनका योग 9 होता है। संसार का गणितशास्त्र इन अंकों में ही समाप्त हो जाता है । अर्थात् मैं 'इल्म हिन्दसा' की दादी हूँ, या यों कहिए कि जनता से पूजा पाने के लिए नवग्रह-स्वरूप हूँ। मैं एक हूँ और चार-चार भी । अर्थात् संसार 36/ मतवाला की होली को उपदेश देती हूँ कि एक परमात्मा पर विश्वास रखते हुए काम, क्रोध, भद, लोभ से बचो; धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति में प्रयत्नवान होओ। पोलीटिकल पार्टी व्यर्थ ही मुझसे भयभीत होती है। मेरा ।' उन्हें एकता का बोध कराता है, '4' साम, दाम, दण्ड, भेद सिखाता है और दूसरा '4' चरखा, करघा, खद्दर एवं अछूतोद्धार की ओर जाता है। समझे ? मैं इतनी विशाल और ऐसी व्यापक हूँ। मैं लोगों से मैत्री करने आती हूँ। लोग मुझे देखकर बिदकते हैं, कोसते हैं, भागते हैं। इसमें मेरा क्या दोप ? मैं क्या जाने ? मेरा मदारी जाने, जो मेरी डोरी इधर से उधर और उधर से इधर करता रहता है- वा की माया मोहि नचावे-- मैं कठपुतली वह डोरी है दई मारे, भारत होरी है [वर्ष 3, संख्या 27-20 फरवरी, 1926] जोगीड़ा हिन्दी-संसार की होली [ मिस्टर परगेटिव ] अरररररर भैया ! सुन लो मोर कवीर ! कोई नचावे रंडी-मुंडी, भाड़-भगतिये कोई। आप नचाओ लेखकगण को, देश देश यश होई। भला यह ढंग निराला आला है ॥1॥ छोड़ा बूढ़े 'महावीर' को कर बख्शी से प्रीति । कलियुग की "विद्यादेवी' की सरी अनोखी रीति ।। भला यह 'पदुमलाल' मनभाया है ।।2।। 'माखनलाल' 'प्रताप' बने थे लेकर कर करवाल । 'बालकृष्ण' की 'प्रभा' निराली, मूरति मंजु रसाल । कृपा 'शिवनारायण' 'गणेश' की है ।।3।। "राधामोहन' ने 'गोकुल' तज 'नागनगर' में आई। 'प्रणवीरो' में नाम लियाया, शासक रहे लजाई । बड़ा संग्राम-वीर यह यूढ़ा है ॥4॥ ध्याह 'माधुरी' के संग होता, 'मतवाले' का आज । देख लार टपकी यारों की,-गिरी गगन से गाज ।। मरे उल्लू चुल्लू भर पानी में ॥5॥ 'साल-दुलारे' नये पुरोहित 'नारायण' के 'रूप'। मंगल ब्याह रचायें इनका, जोडी अजब अनूप ॥ भला अब मंगल गीत सभी गाओ।।611 'महादेव' मतवाले नाचें 'शिवपूजन' के संग । 'मुन्शी नौजादिकलालाजी' देवें ताल मृदंग ।। मजीरा 'सूर्यकान्तजी' खनकाते 170 -
36/ मतवाला की होली
को उपदेश देती हूँ कि एक परमात्मा पर विश्वास रखते हुए काम, क्रोध,
मद, लोभ से बचो; धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति मे प्रयत्नवान होओ।
पोलीटिकल पार्टी व्यर्थ ही मुझसे भयभीत होती है। मेरा ।' उन्हे एकता
का बोध कराता है, '4' साम, दाम, दण्ड, भेद सिखाता है और दूसरा
14'
चरखा, करघा, खद्दर एवं अछूतोद्धार की ओर जाता है। समझे ? मैं इतनी
विशाल और ऐसी व्यापक हूँ। मैं लोगों से मैत्री करने आती हूँ। लोग मुझे
देखकर बिदकते हैं, कोसते हैं, भागते है। इसमें मेरा क्या दोष ? मैं क्या
जानूं ? मेरा मदारी जाने, जो मेरी डोरी इधर उधर और उधर से इधर
करता रहता है--
वा की माया मोहि नचावे-
मैं कठपुतली वह
डोरी है
दई मारे, भारत होरी है !
[वर्ष 3, संख्या 27-20 फरवरी, 1926]
जोगीड़ा हिन्दी-संसार की होली [ मिस्टर परगेटिव ] अरररररर भैया ! सुन लो मोर कवीर ! कोई नचाये रंडी-मुंडी, भाड़-भगतिये कोई । आप नचाओ लेषकगण को, देश देश यश होई। भला यह ढंग निराला आला है ॥1॥ छोड़ा बूढ़े 'महावीर' को कर यरुशी से प्रीति । कलियुग की 'विद्यादेवी' की खरी अनोखी रीति ॥ भला यह 'पदुमलाल' मनभाया है ॥2॥ 'माखनलाल' 'प्रताप' बने थे लेकर कर करवाल । 'बालकृष्ण' की 'प्रभा' निराली, मूरति मंजु रसाल । कृपा "शिवनारायण' 'गणेश' की है ॥3॥ 'राधामोहन' ने 'गोकुल' तज 'नागनगर' मे आई। 'प्रणवीरो' में नाम लिखाया, शासक रहे लजाई । बड़ा संग्राम-वीर यह बूढ़ा है ।।4।। ब्याह 'माधुरी' के संग होता, 'मतवाले' का आज । देख लार टपकी यारो की, -गिरी गगन से गाज ।। मरे उल्लू चुल्लू भर पानी में ॥5॥ 'लाल-दुलारे' नये पुरोहित 'नारायण' के 'रूप' । मंगल ब्याह रचायें इनका, जोड़ी अजब अनूप ॥ भला अब मंगल गीत सभी गाओ॥6॥ 'महादेव' मतवाले नाचें 'शिवपूजन' के संग । 'मुन्शी नौजादिकलालाजी' देवें ताल मृदंग ॥ मजीरा 'सूर्यकान्तजी' खनकाते 1711 38 / मतवाला की होली ? कल का पैदा चला ब्याहने 'सरस्वती' को आज । माता से परिहास ! छोकरे ? तुझे न आई लाज ? भला कैसा खाया 'रसगुल्ला' है ॥8 'कर्मवीर' के 'ठाकुर छेदीलाल' रहे प्रण ठान । कौसिल के द्वारा काटेंगे नौकरशाही-कान ॥ भला वे भी तो रहे बरिस्टर हैं 119॥ 'गहमर' के 'गोपालरामजी' हिन्दी के जासूस । करे विलास 'विलास भवन' मे छोडा छप्पर फूस ॥ अहा ! क्या उलटी बानप्रस्पी है ।1101 आज बनाओ 'श्यामसुंदर' को 'सभा' बीच अलबेली। अॅगिया चोली भी पहनाओ, होवे रेलापेली ॥ भला यह होली बरसाने की है ॥11॥ 'लाला' ने 'भगवा ना दीना' 'दीन' बने दिन रात । 'उग्र' भाव धारण कर अब तो, खड़े चलावें लात । भला यह वीरांबडा किष्किन्धा का 1121 'नाथूराम' सदा 'शंकर' का 'जगन्नाथ' से जोड़। बदाबदी साहित्य क्षेत्र में, करें परस्पर होड़ ॥ भला यह ताण्डव नृत्य अनोखा है ॥13॥ है 'समस्त नारायण जी' 'शिक्षा' अगम अपार । मिले आय "विधुशेखरजी' से जहें विलसे तलवार ।। भला 'असिधारा-प्रत' कब तक होगा 1140 'भारतमिन' हुआ 'शंदा' है चोरो पर ही आज । दिल से, जो से, हुआ फिदा है, 'विश्वम्भर' के राज ।। भला 'गजी' ने गहरी छानी 115॥ है 'स्वतंत्र' और 'विश्वमिन्न' का यह सिद्धान्त अपेल । छुआछूत का भूत भगे हो ग्राह्मण-भंगी-मेल ।। भला जग 'मूल' 'अम्बिकाजी ही हैं ।।16। 'साबरमलजी' ने झांसी दे, दिया 'उमा' को ठेल। चले छोड़ कलकत्ते को वह, यह 'नेकी' का १५. यह 'वगवासी' को फांसी . छोड़ा 'रामदत्त' 'जौहर नया प मला हिन्दी-संसार की होली / 39 कालिदास और शेक्सपियर के नाम करें बदनाम । महामुछ्न्दर बडे लफन्दर खावें माल हराम ॥ भला सव माल मसाला चोरी का 1191 'जयशंकर' के नाटक पढ लो खुल जायेगी आंख । 'भारतेन्दु' के रहते होगा कभी अंधेरा पाख ? भला दुस्साहस की भी तो हद है ।।20।। 'दपतर' देख 'दरोगाजी' का 'कातिकजी' का मोर। 'व्यास नरोत्तमजी' का देखो दाढी-दंगल शोर ॥ भला यह सब 'प्रसाद ईश्वर' का है 121।। 'नागराजजी' नागफांस में फंसे बडे बेतौर । मिटी तरुणता की चचलता बदल गया सब तोर । भला यह, करनी की भरनी देखो ॥22॥ है न नाम को 'पाठकजी' के मन में तनिक 'प्रमोद'। 'बन्धु-बिहार' बन्द होने से लहते नहीं विनोद ।। भला अब धीरज कैसे होवेगा? ॥2311 'लक्ष्मी बाबू' ने 'लक्ष्मी' से कीरति लही अमन्द । कौंसिल के झकाझूमर मे हुई पत्रिका बन्द ।। भला 'लाला' की यह लुटिया डूबी ॥2411 'लाला रामसहायलाल' की 'श्रीविद्या' घर-फोड़। 'विधु' से नौसिखुए को छोड़ा 'दीन' से नाता जोड़। भला यह 'गया' से जाती काशी है ॥25॥ नाम 'केसरी' 'सूंड गजो' सी है बकरे सी पूंछ । डूंछ मनोरथ रहे तुम्हारे ज्यो बिल्ली की मूंछ । तुच्छ यह 'नौरंग' तेरा रंग सारा ॥26॥ काककण्ठ ने चोच निकाली काव्यकण्ठ कर बन्द । पिता-पुत्र-संग्राम मचा है लडने दो स्वच्छन्द ।। भला इस बीच तीसरे क्यों बनते ? 12711 [वर्ष 1, मंख्या 30-15 मार्च, 1924 ] होली की झोली [पं० गौरीशंकर शर्मा अररररर सुन लो यारो मोर कबीर ! लम्बा टीका हाथ सुमिरनी गेरुआ कफनी धार । पर नारी पर डीठ लगावें फैलावें व्यभिचार। भले जी वगुला-भगत वने फिरते ॥1॥ नित्य 'अहिंसा परमो धर्मः' करते रहे प्रचार । दीन दुखी पर छुरी चलावें, निकले रंगे सियार । भला खद्दरपोशों से पिण्ड छुटा ।। 2 ।। कोट बूट पतलून डाटकर सिर पर रखते हैट । समझे हमी मनुष्य जगत मे, वाकी सब हैं 'रेट' । भले तुम फैट वने हो ऐ मामू ॥ 3 ॥ पर्दा-'सिस्टम' बहुत बुरा है, इसको करके दूर । संग लिये ! लेडी को घूमे नकली बने हुजूर । भले दिन रात फिरें चपलूमी में ।। 4 ।। हिन्दी 'लैंगवेज' को मुर्दा कह वोलें गिटपिट बैन । समझें उसी गुणी को धन दे बाकी फूलिशमैन । बने इंगलिशमैनो के शहजादे || 5॥ नमा ब्याह बूढो का भषा कही अगर रुक जाय । सच मानो तो युवक पड़ोसी बिना मौत मर जाय । हाय बाबा का ध्याह करा दो राम ॥ 61. कलकत्ते के धरमतला मे अधरामृत की रखकर धरमघका खाते है कितने लक्ष्मीदास । नई बीवी घर में 'ग्वाला-संग है ॥7॥ दुराचार दुरि जाय देश से, चाहें नेता लोग । तो बस एक एक वेश्या से, कर लें शीघ्र नियोग । वांस जब रहे न वंशी कहाँ बजे? ॥ 8 ॥ आस- होली की झोली-41- वन्धु अधून विधर्मी होकर यदि अफ़सर हो जाय।' भाग सराहें तो फिर उससे सादर हाथ मिलाय । यही तो धर्म-सनातन-लीला है ॥9॥ घेतगंज काशी में देखो 'मण्डल' एक महान । भांति-भांति के 'भूपण' विकते, जहाँ पुले मैदान । टका दे इच्छा पूरी कर लीज 111011 ज्ञानी घ्यानी दास पहनते हैं तन पर कोपीन । पड़े घाट पर नजर लड़ाते उनके सुत शौकीन । अजब है भोला बाबा की काशी ॥11॥ धंधा कोई मिले न तो फिर संपादक बन जाव । कही का ईट कही का रोड़ा कर दो लेख चुनाव । कला को धता बता दो अब भाई॥1211 काव्य-कनक की कड़ी कसौटी 'खन्नाजी' का द्वार । रगड़ रहे हैं पकड-पकड़ कर कवियों के हथियार । बहा अफमोस धातु खोटा निकला ||1311 छल-छबीली अति गरबीली 'रूप' 'माधुरी' ओर । ताक रहा छैला 'मतवाला' उड़ा न ले चितचोर । 'लालजी' संभल जाइये होली है ॥14॥ दिखलाई देता 'भविष्य' है 'वर्तमान' अरु 'आज' । पर न 'भूत' के दर्शन होते, विगड़ रहा सब साज । भला भेजो दाता कोई घर-बैठे ॥15॥ है 'गणेश' विध्नों को हरता, देता खरी सलाह । कितने अन्यायी कठपुतलो को सिखलाता राह । धन्य है उस 'प्रताप' कनपुरिया को ।।16। इक 'वकील साहब' की 'लक्ष्मी' जाती देश विदेश । दो रुपये लेकर सालाना, हरती विरह कलेश । धन्य इन उपकारी भगवतियो को 111711 एक 'प्रयागी पण्डितजी' की 'गृहलक्ष्मी' चितचोर । 'शिशु' समेत प्रतिमास पधारे पहन घाघरा घोर । भेंट में सिर्फ चार रुपये लेती ॥18॥ [वर्ष 1, संख्या 30-~-15 मार्च, 1924] गुलाल की मूठ [श्री बैताल] छ र र र र र र कबीर ! लेकर कामन बिल का खसड़ा गई 'वसन्ती' पार । सनहक लेकर वांग लगाया पड़ी किन्तु फटकार ॥ कौन है पुसा हाल तुम्हारा ।। 1 ।। पार्लामेण्ट-मेम्बरों ने भी कही यही ध्रुव बात । चल शतरंजी चाल अनोखी किया सभी को मात ।। टैक्स की बन्दी कर दो॥2॥ 'होमरूल' का पचडा छेड़ा रचकर अजब प्रपंच । धूमधाम कर आयी बूढा खाकर टी और लंच ! मंच पर धर ललकार।। 31 द्वापर युग मे रही पूतना धरती रूप अनेक । कलियुग की भी देखो लीला यारो खाकर 'केक' । 'लैक' यह राजनीति की ॥ 4 ।। सपरू के संग लाला जी भी बने कौसिल-भक्त । लेकर चरखा गांधी बाबा बैठे बने विरक्त । वीर 'सन्यस्त' हुये है ।। 5 ॥ केल्कर, किलक किलक कर गावें प्रति सहयोगी गीत । जोर शोर से रोर मचाकर लेंगे भारत जीत । मंत्री-पद के ये भूखे है ।। 6 ।। मिस्टर ताम्बे भी पीछे से छोड़ स्वराजी मंत्र । लगे घुमाने बड़े लाट का घर के शासन-यंत्र ।। पेट अब खूब भरेगा ॥7 ।। लिवरल दल की बात निराली 'मद-रत' हैं सब लोग। पूंछ हिलाकर खीस निपोरें लगा स्वार्थ का रोग ।। यही 'हे है' दल है ।। 8॥
गुलाल की मूंठ/43 कष्ट उठाना देशभक्ति हित है यह बुरा विचार । लेक्चर झाड़ो मौज उड़ावो केवल करो प्रचार । बनो उपदेशक बाबा ॥१॥ 'अलीबन्धु' अल्लाह मनाते सर रहीम के हेत । 'गढ़' में आज 'अली' चिल्लाते खाते हिन्दू-खेत । लखो उजड़ी जाती खेती ॥1011 'श्रद्धानंद' ने धूम मचाई शुद्धि किया भरपूर । कहाँ निजामी के भड़वे हैं, कहाँ सरंगी-शूर ।। तबल-तबलीगी ठनकावें ॥11॥ 'दीनदयालु' मीन बिन पानी मलें हाथ पछताय । टका पंथ तो बन्द हो गया बैठ सुंौरा खाय । बुढ़ौती में कोंपर चाटै ।।12। [वर्ष 3, संख्या 27--20 फरवरी, 1926] होली की फूलझड़ी [ श्री सिड़ी] हिन्दू महासभा ने यारो, नष्ट किया सब येल । मरे पुराने पोगापंथी, लगी कलेजे सेल॥ मिले गुलछरें सारे मिट्टी में ॥ 1 ॥ दहल उठी है तोद महन्ती, खुल गई सारी पोल । हा ! हराम का हलुआ पूरी, होगा मोती-मोल ।। जमाना बदल रहा है ।। 2 ।। माथे खोर लगाकर, बनना पण्डित परम प्रवीन । धर्म-कर्म का ठीका लेकर, बैठ बजाना बीन ।। न बन आवेगा बाबाजी ।। 3 ।। जिनके धन से तोंद फुलाया; बैठे करते चैन । हाय ! उन्हीं की कन्याओं से, लगे लड़ाने नैन । हद्द हो गई हरामीपन की भी ।। 4 ।। बाल पके हैं कमर झुकी है, भुरकुस हो गयै दांत । धनुही से अकडे फिरते हैं, धरे हाथ से अति ।। किन्तु है हविस ब्याह की बनी हुई ।। 5 ।। बोतल छाके रांड मचावे, हरें पराया माल । वही अभागे धर्म ध्वजा घर, बैठ वजावें गाल । हाल है यही सनातन हिन्दू की ॥ 6 ॥ घर में विधवा पोती वैठी, बावा करते व्याह । ऐसे उल्लू के पट्टे का, कर दो चेहरा स्याह ।। जला दो जीते-जी होली ।। 7 ॥ जिनके बल से बड़े विधर्मी, करते अत्याचार । उन्ही अछूतों को अपनाते क्यो फटती है यार ।।. उन्हें क्या नहीं बनाया ईश्वर ने ॥ 8 ॥ 1 होली की फूलझड़ी/45 विधवाओं को ब्रह्मचर्य का देते हो उपदेश। किन्तु स्वयं हो काम-कोच में रहते सने हमेश ।। साज की चाट गये हड्डी ॥9॥ टेढ़ी टोपी चख में चश्मा, छिकुनी पकडे हाय । गिटपिट करते टहल रहे हैं, घरे फ्रेंड का हाथ ॥ यही नवयुवक देश की आशा है ॥10॥ धर्म कर्म का ममं न जानें, पहें पिता को 'फूल' । सारा बाना घरे जनाना, यकते ऊलजलूल ।। फूल ये बैठेंगे अब कोठे पर ॥11॥ होली है, भई होली है ! [वर्ष 3, संख्या 27-20 फरवरी, 1926] , लीडरों की होली [ऐण्टी लीडर लीडर सारे हुए इकट्ठ, खेल रहे हैं फाग ! करो एकता, करो एकता, रोज अला राग । पोल, पर खुल ही जाती है ॥1॥ सत्य, अहिंसा, खद्दर, चर्खा, छिन्न-भिन्न है आज । फिर भी यारो टपक पड़ेगा, एकाएक स्वराज ।। 'लंगोटी बाबा' की जय हो ॥2॥ 'कौंसिल रेकिंग' का चमका दे, विछा वकीली जाल । बमभोला को झांस लिया है, किया देश बेहाल । कौसिलें टूट गई यारों 130 हम तो हैं 'बापू के सैनिक, गाँधी है सरदार | हिन्दू-मुसलिम-इत्तहाद पर, सब कुछ दारमदार ॥ ढोल दिन-रात पीटते हैं ।140 कभी गगन तो कभी धरातल तक की दौड़ लगाय । भोली जनता श्रद्धा-पथ में सौ-सौ चक्कर खाय ।। गर्जना करे शेर-पंजाब ।।5।। सदा संभल कर रहते बाबा, बिगड न जावे जात । खूब जमाई अहा ! बेचारे समधी के सिर लात ।। तरीका यही संगठन का ॥6॥ बुलबुल चहक रही है भैया, सुनो आज चहकार । मतलब क्या उसूल से हमको, असहकार सहकार ॥ रिझाना ही है अपना काम 170 कांग्रेस वालों को होली चंदा लाओ नियम करेंगे जल्दी सविनय भंग । गोरी 'गवरमिट' भागेगी, दुनिया होगी दंग ॥ देश की काया पलटेगी 1811 लीडरों की होली/47 देश-प्रेम है कैसी चिड़िया, राजनीति-मैदान । नही मिलावे हाँ-में-हाँ जो, वही उमेठो कान ।। यही गांधी-युग का है धर्म ॥9॥ 'सेठी' कौन 'मुहानी' कैसा कम्यूनिस्ट ये यार । डण्डे से कामिल-आजादी का दे दो उपहार ।। लाठियां कब आवेंगी काम? 1100 सत्य, अहिंसा, प्रेम आदि का खूब दिखाया नाच । वह 'हथियार बन्द' वागी-दल कुचल दिया शाबास ॥ सबक डायर से सीखा था ||1|| नौकरशाही की होली न्याय करूंगा, न्याय करूंगा, पूव मचाया शोर । अहा न्याय की हनी दुलत्ती, लौट गया इन्दौर ।। अनूठा न्याय लादकर लाया था ॥1511 'बूढ़े वुल' के सिर में देख, घुसा बावला-भूत । यही सबब है फागुन में ही चलवाया है जूत ॥ नफा नीली आँखो का है |13|| [वर्ष 3, संख्या 27 -~20 फरवरी, 1926] 30 व्यंग्य रंग से रंगी हुई कबीर की ललकार {कमला] अरररररर..."कबीर ! मला जी भला- होरी की मैं करूं ठठोली, पुरा न मान कोय । जो कवीर को दोप लगावे, उल्टा दोषी होय ।। भला यह यरस दिनों को होली है ॥ जात पात का ख्याल न रखना, आया फागुन मास । साठ बरस के बूढ़े बाबा, रखे नवोढ़ा पास । भला यह गस्त महीना फागुन का 11211 कोल्हिन रक्वे, भूमिन रक्खे, रखनी रखे चमैन । बूढे रंडुए युवक हो गये, युवकन को कत्र चैन । भला बोतल ने रंग जमाया 11311 कोटि-कोटि जीवों की हत्या, करें लहेड़ी आप । भक्त कहावें निर्दय होकर, करें कभी नहिं पाप । भला धर्मादा खाता खोल दिया |141 तीन दिनो में गाल मारकर हुए दरिद्री सेठ । लम्बी चौड़ी हीग हाँकते, दुष्टों के ये मेठ । भला यह नया नशा है दौलत का 1511 कभी भलाई करो न भाई, छिपकर रखना द्वेष । मिले बहाई कर कुटिलाई, रक्खो सज्जन भेष । भला इज्जत तो मिलती इसमें है ॥6॥ कंठी बांधो तिलक लगाओ, लेव द्वारका छाप । धोखा देना कभी न छोड़ो, बगुला भगत के बाप । भला टट्टी की ओट शिकार करो 171 बेटी बेची, वेटा वेवो, बेचो दासी दास । बेच चुके अब हल्दी धनियां, कपड़ा और कपास । भला इसमें क्या दोलत होती है 181 {वर्ष 5, संख्या 29-~3 मार्च, 1928]
होरी है
[लाला भगवानदीन]
एक ओर मोहन से मोहन सखान संग,
दूजी और शाहशाही कीरति किशोरी है।
परी झकझोर घोर फटी है सुधार चोली,
दीन्हीं लुढ़काय हेली पटुता कमोरी है।
चीर फार डारे सर्व कुटिल कानून चीर,
वाक्य पिचकारी मारि कीन्ही बुद्धि भोरी है।
'दीन' कवि देखो आज देशभक्त खेलि रहे,
कौंसिल के आंगन में नोखी नई होरी है।
[वर्ष 1, संख्या 30-15 मार्च, 1924]
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माधुरी-मतवाला की तान
कर
.
[कविता-कामिनी-कान्त पं० नाथूराम शंकर शर्मा ]
ले प्यारी माधुरी,
पातिव्रत-रस-पान ।
देख सुनाता है तुझे, मतवाला वर तान॥
छवि निरख माधुरी बाला।
मटकता मोद-मढ़ा मतवाला ॥
नाच दिखाता, गाल बजाता, उगले राग निराता ।
हा ! पर तू न दाद देती है, अटका कोप कसाला ।।
मौज उडाती है बिन ब्याही, कर मुकवाला चाला।
तुझ-सी-रंग-दंग-ढक्को के, संग पड गया पाला ।।
रामदुलारी रूप किशोरी वरज रही मा खाला।
तो भी तजती नहीं कुलट्टी, पकड़ा छोट छिनाला ॥
गोपीनाथ 'कृष्ण' कपटी का, ओढ़न कम्बल काला।
आ शंकर से धेरे घर का, धार धरैल दुशाला।
[वर्ष 2, अंक 29-~-7 मार्च, 1925)
'मतवाला' बनाम 'माधुरी' !
[होली का पत्र-ध्यवहार
(1)
1. माइ डालिग!
हुए नमूदे जवानी उभारके काबिल,
दिन आ गये हैं मुहब्बते प्यार के काबिल ।
खुदा के वास्ते छोड़ो स्याल सादःपन,
तुम्हारा हुस्न है सोलह सिंगार के. काबिल ।
चुकाना दिल का सौदा है तो नाद बोसे दो,
यह जिन्स तो नही हरगिज उधार के काबिल ।
कलकत्ता 7-2-26
-अधरामृताकाक्षी
मतवाला
( 2 )
[ कोरा जबाव !]
मेरे खूसट"
न कर तू बोसये रुखसार की हविस खूसट
यह गुल नहीं रूखे खारदार के काबिल !
लखनऊ
-माधुरी
15-2-26
20-2-26
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उदार मतवाले
[पं० लोचनप्रसाद पाण्डेय]
पाते हैं प्रमोद माते रहते विनोद ही में
मिन-मण्डली के नीके प्रेम प्रतिपाले हैं।
महादेव 'शंकर' महेश 'शिवपूजन' के
नव-नव जाति कमनीय पुष्प थाले है ।
लेख-कविताओ के लिए न कभी तंग करें
वणिक-प्रसंग से हैं दूर, शीलवाले हैं ।
हिन्दी मे निराले रंग-ढंग के दिखानेवाले
आले गुणवाले ये उदार मतवाले हैं।
[ वर्ष 3, संख्या 27--20 फरवरी, 1926 ]
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माधुरी द्विरागमन
(प्रद्युम्न कृष्ण फौल)
आई गवनवा की सारी उमरि अवहीं मोरी बारी ।
साज समान पिया ले आये कलकतिया संग चारी।
"नवजादिक', 'महादेव', 'निराला', 'उग्गर' निपट अनारी।
बने सब खद्दर धारी॥
चौक पुराय पूजि गौरी को लम्बोदर भुज चारी।
अचरा पकरि के 'निरलवा' बेदर्दी जोरत गठिया हमारी ।
सखी सव गावत गारी।।
विधना गति 'सरसुती', 'मनोरमा' बरी भई महतारी।
'रूप' 'दुलारी' सँग सहेली घरवा से देत :निकारी।
भई सबको हम भारी॥
गवन कराय चले कलकतवा इत-उत घाट निहारी।
छुटत नवाबी. नगर-लखनऊ छुटत गोमती प्यारी ।
करम गति टरत न टारी॥
शंकर घोष लेन में राख्यो दीन्ह पूंघट पट टारी ।
बोतलवारो बलम मोरा बोरा भरिक पियलवा मारी।
न लेऊ देत है गारी ।।
कोरो घट रंग से भर राख्यो भख्यो कुमकमा थारी।
भरी पिचकारी बेदर्दी ने मारी तंग भई चोलिया हमारी।
अनोखी निपट गंवारी ।।
'मतवारों' गलबहियां देके सुन्दर पलंग बैठारी।
मलत गुलाल गुलगुले गालन ऐसो दुर्गति कारी।
बड़ी यह आफत मारी॥
541 मतवाला की होली
बूढ़े बड़े सामने मांगत जोबन दान भनारी ।
झूम-झूम पीवत अधरामृत 'सगरी सुध-बुध हारी।
जुलुम कर डारी भारी॥
कहत जान माधुरी 'दुलारी हम पति हैं तुम नारी।
रूठ न जाहु रंग-रस लूटो कर ले भेटे अकवारी।
गोद में बैठहु प्यारी ।।
[वर्ष 4, संख्या 40-12 मार्च, 1927]
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मतवाला-माधुरी जन्मपत्रिका ! - (•गणनाकार श्रीमान् ज्योतिषाचार्य पण्डित यमुनाप्रमाद शुक्ल शास्त्री विद्यामार्तण्ड, शिवकुमार-भवन, कलकत्ता) आदित्यादि ग्रहाः सर्वे नक्षत्राणि च राशयः । आयु कुर्वन्तु ते : नित्यं यस्यैषा जन्मपत्रिका ॥ आयुष्मान 'मतवाला' का जन्मलग्न । आयुप्मती 'माधुरी' का जन्मलग्न जन्मकाल-श्रावण शुक्ला पूर्णिमा जन्मकाल-श्रावणशुक्ला रविवार प्रात.काल धनिष्ठा नक्षत्र शनिवार प्रातःकाल 'स्वाती नक्षत्र दण्ड 2 पल 25 दण्ड2 पल 5 सप्तमी शा०६ दी ४ ०श. ५ ५ सू.म.रा.शा ३ चं. म.वृ.राह 3 . २ ८ 2 ६ ११ के.. है केतु १० १० १२ फल-"दोनों जन्मपत्रिकाओ में 'ग्रहमेलापक' तथा 'गणना' बहुत ही उत्तम हैं । सन्तान, आयु, धन और सौभाग्य के योग भी अत्युत्तम पड़े हैं । परन्तु कन्या मे 'पुंश्चली' और वर में 'लम्पट' के योग आ पड़े हैं ! कन्या का गण 'देवता' और वर का गण 'राक्षस' है ! अतएव निरंतर वर-भाव को सम्भावना है । इतिशुभम्।"
56/ मतवाला की होली
जेहि विधि तुम्हहि रूप अस दोन्हा ।
तेहि जड़ बर वाउर फस कोन्हा ?
रूपकिशोरी कस कीन्ह बर बौराह विधि जेहि तुम्हहिं मुन्दरता दई !
रामदुलारी-तुम्ह सहित गिरिते गिरउँ पावक जरउँ जलनिधि मह परउँ !
घर जाउ अपजस होउ जग जीवत 'विदा नहि' ही करउँ ।
माधुरी--जिनि लेहु मातु कलंक करना परिहरहु अवसर नहीं ।
दुख सुख जो लिखा लिलार हमरे जाय जहँ पाउब तही।
मतवाला~-चलो जल्दी करो, नहीं तो गाड़ी छूट जामगी।
व्यंग्य चिन्न /57
केहि हेतु रानि रिसानि ?
मतवाला-कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर।
जानति मोर सुभाउ, बरोरू !
मन तव आनन चन्द चकोरू ॥
माधुरी-चलो हटो, बातें न बनाओ, जले पर नोन न लगाओ,
तुम बड़े नटखट हो, प्रेम दिखाते हो, मुंह भी चिढ़ाते हो,
। और मेरी बोली में भूल भी दिखाते हो । अब मैं तुमसे न बोलूंगी।
58/ मतवाला की होली
मानिनी-मान-मोचन !
रामदुलारी
मतवाला-तुम लाख अनीति करो पै करो हमैं नेह को नातो निवाहनो
माधुरी 1-ओ अम्मीजान ! ओ खाला ! देखो, यह दाढीजार फिर मुझे
तंग करने आया है !
ध्याय 1ि59 आनन्द-नृत्य ! CR- . मतवाला-मेरी तेरी जोड़ी बनी मजेदार ! माधुरी-प्यारे सैयां 4 मैं हूँ निसार ।
भृशम् ।
श्री लण्डन-स्तोत्रम्
[गांगेय नरोत्तम शास्त्री ]
तवादी विनियोगः
ओम् अस्य श्री लण्डनस्तोत्र-महा-माला मन्त्रस्य गागेय ऋषिः अनुष्टुप्छन्दः
श्रीलण्डनो देवता, विदग्ध. साधकः, पारतंव्य-बीजं, उत्तेजना शक्तिः, साम्य-
विचार कीलकम्, कूट नीति-ज्ञानपूर्वकम् अर्थ-काम सम्पादने विनियोगः ।
ऋषिरुवाच--
उन्नताय सुरक्ताय बलिने छलिने
अवलाना खण्डनाय लण्डनाय नमो नमः ॥1॥
अनेक देश-जनता गर्व-गञ्जन • कारिणे।
धनाऽपहारिणे तुभ्य लण्डनाय नमोनमः ॥ 2 ॥
मदोन्मत महोत्थानं लोकच्छिद्रनगवेषकम् ।
उग्र रूपं महाकरं प्रचण्ड लण्डनं भजेत् ।। 3 ।।
मण्डनं भोग-लिप्सानां, सण्डनं धर्म-कर्मणाम् ।
दण्डनं श्रमिणा तज्जा-भण्डनं लण्डनं भजेत् ॥ 4 ॥
देवैन्यश्च यक्षश्च पूजितं श्रम-कूजितम् ।
अप्सरोभिश्च गन्धर्व शोभितं लण्डनं स्मरेत् ।।5।।
सुराऽऽह्नादमानतं सुरा-प्राणं सुरा-प्रियम् ।
सुरा-सेवन-संवृद्ध प्रसिद्ध लण्डनं भजे ॥6॥
अनेक योनि-संमिद्धं ततो यातं परां गतिम् ।
वेदान्ति-साधुवद्विश्वे निलंग्ज लण्डनं नमेत् ।। 7 ।।
कर्ज-व्यथने
भर्जनं भव्य-भावानां 'कर्जन' युव चेतसाम् ।
तर्जनं तपसां स्त्रीणां स्वर्जन लण्डनं नमेद ।। 8 ।।
महाप्रापवती पुष्टां प्रजां बलबलायिताम् ।
दृष्ट्वा प्रौढ़ां स्खलद्गवं लण्डनं तं स्मराम्यहम् ॥9॥
-प्रो लण्डन-स्वीतम् 16 अभावरभियोगश्च खिन्ना ये निर्धना सदा । तेषां कृषक भृत्याना खण्डनं लण्डनं भजे 110mm- शीघ्र समुन्नति कृत्वा विशालाकार-धारक । प्रचण्ड-वेग दुर्दान्त भो भो लण्डन पाहि माम् ॥11॥ युग्मम्- अग्रे बलाऽवलं वीक्ष्य नत्युग्नति-विधायक । शुक्राचार्यदुदनाक्ष कौटिल्य-पय-पारग ।।12।। कदाचिद्वधित-वन कदाप्युच्छिन्न-जंगल । ब्रह्माण्ड-गोलके पूज्य अहो लण्डन ते नमः ॥13॥ नाना-क्रीड़ा-कृतोत्यान प्रिय-नाटक दुर्दम । भद्र-भोगेश भगवन् भो भो लण्डन ते नमः ।।14।। रात्री प्रदीप्त रोचिष्मन् निद्रा-नाशिन् क्षधाऽऽनुर । क्रीडा-निशाचरी कुर्वन् कुरु लण्डन मे कृपाम् ।।1511 समस्त-लोक-सन्तापिन्-नारी-हारिन् निशाचर । अहो रावणवद्वीर्य वीर लण्डन ते नमः ॥16॥ कंसवबन्धु -विद्रोहिन ! एकान्त-व्यवसायकृत् । शिशुहत्या - भ्रूणहत्याहेतो लण्डन ते नमः ।।171 दुर्योधन-समं माने वर्द्धने केतुवन्मतम् । प्रवेशे सर्पवतूर्ण सरलं लण्डनं भजे ||181 युवती - संघ -संचारिन् युवती - भ्रश-भावुक । युवती-व्यवसाये च धूतं लण्डन ते नमः ।।1।। मुक्त्वा भुक्त्वाऽपि भुंजान भक्ष्याऽमक्ष्य सुभक्षक । पिशाचवद्भोजनेच्छो भो भो लण्डन ते नमः ॥20॥ अपूर्यमाण भोगेच्छ! भूमि प्रकामुकः । रानिन्दिवमसन्तपित् लोभिन् लण्डन ते नमः 12m अहो बलमहो वेगः अहो क्रौर्यमथोन्नतिः । तव लण्डन भूताऽद्य अदृष्टा चाऽश्रुता पुरा 1122।। अद्य ब्रह्मा च विष्णुस्त्वं शम्भुरिन्द्रः प्रजापतिः । कुबेरो वरुणो ह्यग्निः अश्विनी मरुतस्तथा ।।2311 दण्ड-दाता यमश्चासि, धर्मराट् च स्व-धर्मदः । साष्टांगप्रणति कुर्वे, तुभ्यं लण्डन दण्डवत् ।।241 - 621 मतवाला को होती जगत्पूज्य जगद्गीत. परमाऽऽनन्द मण्डन। मक्ताऽनुकम्पिन् भगवन् रक्ष मां रक्ष सण्डन ।।25।। इदं स्तोत्रं महापुण्यं दु.ख-शोक - विनाशनम् । श्री लण्डन-सुलीलाना ज्ञापकं नीति-मापकम् ।।26।। अर्थ विचारयन् सम्यग् यः पठेद्भक्तिमान्नरः । आगलाऽन्त-मोदः स्यात् तस्य प्रेयान् पदे पदे ॥2711 रातो स्वप्ने यथा शम्भुः प्रोक्तवान् प्रीति-पूर्वकम् । तथैव कृतवान् प्रात: गांगेयः स्तोत्रमुत्तमम् ॥28॥ इदं स्तोत्रं महासत्यं सत्य-लीला-समन्वितम् । प्रत्यक्ष-फलदं चैव लक्ष्मी • नीति - मति -प्रदम् ॥29॥ गंगा - तीरे मन्दिरे वा वने वा जपतां शुभम् । शान्तिः क्रूर - ग्रहस्येव लण्डनस्य महा - भोग-प्रदं भव्यं महा • शक्ति - विधायकम् । महा सृष्टिकर रम्यं महा - साहस - दायकम् ।।3111 प्रचण्ड लण्डनं चिले चिन्तयन् यः पठेदिदम् । लण्डनाऽनुग्रहात्तस्य भवेत्सर्व सुखं प्रसादनम् ।।301 . ध्रुवम् ॥32॥ [ काशीस्थ पण्डितो की सेवा में नित्य पठनार्थ ! ) [ वर्ष 3, संख्या 27--20 फरवरी, 1926 ] साहित्य-शव्दार्थ-गड़ही [ कोशकार-श्री एकलिंग ] 1. अम्बिकाप्रसाद बाजपेयी [ पहले पुलिंग अव नपुंसकलिंग ]-आप नीम गोरे हैं, नीम वयोवृद्ध हैं, नीम मोटे हैं, और नीम-प्रसन्न मुख हैं । आपने अनेक अखबारो की वैलगाड़ियां हांकी हैं और आजकल कलकत्ते के मशहूर मारवाड़ी स्वतंत्र की लण्डो, बड़े रफ्तार से हाँक रहे हैं। वैसे तो आपका जीवन सदैव पवित्र रहा मगर एक बार सन् 1921 में आप बीबी नौकरशाही पर आशिक हो गये थे । इसी से जेल काट चुके हैं। 2. अयोध्यासिंह उपाध्याय [ नपुंसकलिंग ]~यदि आप अपनी पगड़ी से लैस होकर अचानक किसी महफिल में पहुंच जावै तो-अजी वाह, वाह ! की ऐसी आवाज उठे कि आफत मच जाय । आप लाइब्रेरियन से, कानूनगो से, कवि से, लेखक से, प्रोफेसर तक हुए। प्रोफेसर भी ऐसे कि जी ही जानता होगा । आप कवि सम्राट हैं, महाकवि है, हिन्दी भाषा के आचार्य हैं, कवि. सम्मेलनों के पेटेण्ट सभापति हैं, ब्रिटिश गवर्नमेन्ट के अनन्य दास है । साठा के बाद पाठा हैं और काव्य रस, पिंगलादि को चौपायो के रूप में होकने वाले हैं । आप शापत, ताडत. परुप कहन्ता, जूआ खेलक, रण्डी कन्ता मनुष्य को भी, यदि वह ब्राह्मण हो तो, अन्य जातियो के बड़े-बड़ो से बड़ा मानते हैं । आप महा-ब्राह्मण समर्थक हैं । जवानी में एक बार बाबा ज्ञानानन्द आपके ऊपर आशिक हो गये थे। उन्ही ने आपको 'साहित्यरत्न' बना डाला है। आपके गर्भ से निकले हुए चौपाये सुन्दर होते हैं । 3. अम्बिकाप्रसाद गुप्त-[नपुंसक लिंग] आप पुराने और नये इन्दुओं के प्रकाशक और एडीटर, गल्पमाला के गड़क और पुस्तक प्रकाशन के बहाने हजारो मन कागज और सैकड़ों मन स्पाही के बर्वादक है । पौने छ: फोट ऊंचे हैं और दो फीट चौड़े । खाना एक छटाक से ज्यादा नहीं हजम कर सकते मगर, जोक्न बेगार ढोने में अद्वितीय दिलचस्पी लेते हैं, अथक परिश्रम करते हैं । कवि-सम्मेलनों में आपके पहुंचते ही कविता सुन्दरी घिधियाती हुई भाग पड़ी होती है।
64 / मतवाला की होली 4. अमृतलाल चक्रवर्ती-[पुलिंग] आप हिन्दी-साहित्य के 'बड़हर' सेवक हैं । कई पत्रो का सम्पादन कर चुके हैं तथा पचासों से अधिक होलियो में लाखो से अधिक गालियां खा चुके हैं । 'तुलसी बूढ़े बैल को कौन बांधि भुस देइ', न्यायानुसार आजकल आपको पूंछ बिलकुल छोटी हो गई है। कल के पैदा बहुत से छोकरे तो आपको जानते भी न होंगे। 5. अनूप शर्मा-[पुलिंग] आप साधारण लम्बे-दौड़े गोरे, ग्रेजुएट एण्ड एल० टी० हैं । आपने लखनौवे वाबू दुलारेलाल भार्गव के पीछे काम करने मे काफी यश प्राप्त किया है। आपको कविता में वह कमाल हासिल है कि वर्तमान हिन्दी साहित्य के सैकड़ों कवि आपके ठीक पीछे हैं । 6. अन्नपूर्णानन्द-[ पुलिंग, इधर चार-पांच महीनों से उभयलिंगी] 'सभ्य भाषा में आप कृष्ण हैं, सीधी भाषा मे काले और बदमाशी भाषा मे 'जेट ब्नंक' हैं । कहने का मतलब यह है कि आप अपनी कालि के लिये भी काफी प्रसिद्ध हैं । यू० पी० की युनिवर्सिटियों ने आपको दुमदार आदमी बनाने की भरपूर चेष्टा की थी, मगर आपने हमेशा यही कहकर उन दुमो को कालिजों की दीवारों में घिस घिस दिया, कि जब तक जी० पी० श्रीवास्तव की दुम झड़ नही जाती, तब तक मैं दुमदार बनूंगा ही नहीं । एक जंगल में दो शेर नही रह सकते । आप कुछ लोगों की दृष्टि मे निषटू है और कुछ की दृष्टि मे-'मंत्री श्री शिवप्रसाद गुप्त ।' 7. आनन्दिप्रसाद श्रीवास्तव (नपुंसकलिंग) आप अभी महज़ लोडे हैं । पहले जबलपुर को 'श्रीशारदा' में 'किरीट' नाम से कविता-सुन्दरी के कोमल- कलेवर में किरिच कोपा करते थे। अब अभ्युदयादि इलाहाबादी पत्रों की मैटर-भर्ती अपने पूरे नाम से किया करते हैं। काफ़ी कलम-घिस्सू हैं । शायद अब तक आपने सैकड़ों महाकाव्य और लाखों खण्ड-काव्य लिखकर दीमकों को समर्पण कर दिया होगा। 8. इन्द्र विद्यावाचस्पति-(पुलिंग) आप प्रोफेसर हैं-गुरुकुल के, एडीटर हैं गत 'विजय' और वर्तमान 'अर्जुन' के, 'सन' हैं स्वर्गवासी स्वामी श्रद्धानन्द के, धन हैं-~आर्य समाज के । न लम्बे हैं, न गोरे हैं, न सुन्दर हैं और न बद- शकल हैं । न जाने क्यों दड़ियल आपसे दहला करते हैं। 9. ईश्वरीप्रसाद शर्मा-(पहले उभयलिंगी अब पुलिंग) आप हिन्दी के भयानक अनुवादक, वीभत्स देतनिपोड और वीर (सम्पादकबनने के) प्रेमी हैं । किसी दूसरी भाषा की पुस्तक को 'जान' निकाल कर अपनी भाषा में डाल देना आपकी बायीं सोपड़ी का काम है । हंसी-मजाक के आप ऐसे प्रेमी हैं कि साहित्य-शब्दार्थ-गड़ही 165 उस क्षेत्र की गन्दी से गन्दी चीजें मुंह में भरे घूमा करते हैं । गद्य के अलावा आप पद्य भी लिखते हैं, जैसे- खद्दर-चद्दर वाले हैं जो देश दरिदर वाले हैं आफ़त के परकाले हैं जो देश-नाशने वाले हैं जो उनसे सदा रहो होशियार मेरे भाई ! मेरे यार !! 10. कामताप्रसाद गुरु-(पुलिंग) आप प्रसिद्ध व्याकरण व्याघ्र हैं। कोई भी नाम सुनते ही उसका लिंग ढूंढ निकालते हैं । आप ही के मत से प्रयाग के श्री सुमित्रानंदन पंतजी 'स्त्रीलिंग' हैं। 11. किशोरीलाल गोस्वामी-(पुलिंग) आप सम्राटों के मजमूआ हैं। याने उपन्यास-सम्राट, कवि-सम्राट, हास्य-सम्राट, अश्लील-सम्राट, बकबक- सम्राट, आदि, आदि। बूढ़े हो गये हैं मगर अभी तक शृगार-प्रकरण में पूरे गो-स्वामी हैं। 12. केदारनाथ सारस्वत-(पुलिंग) आप बिलकुल नवयुवती (ओ, आई वेग योर पार्डन) नवयुवक हैं, संस्कृत के अच्छे विद्वान् और सुलेखक हैं. भावुक हैं, भंगभक्षी हैं—पूरे झपसट हैं । 13. कृष्णकान्त मालवीय-(उभयलिंगी) आप हिन्दी जगत् के पड़सिद्ध एडीटर्र हैं, दुमदार भी हैं मगर दुम को पर्स में रखकर चलते हैं पीछे खोसकर नहीं । आप आज के अनेक हिन्दी-लेखकों के 'चचा' हैं और आपके भी चचा हैं पण्डित मदनमोहन मालवीयजी? पण्डित मोतीलाल नेहरू के प्रसाद से आप तीन वर्षों तक बड़ी कौंसिल की कुर्सी की छाती के भार भी रह चुके हैं। भाषा तूफानी लिखते हैं, व्याख्यान उथल-पुथलकारी देते हैं । आप इलाहाबादी 'अभ्युदय' के यशस्वी प्रवर्तक हैं और आप ही की 'मर्यादा' बाबू शिवप्रसाद के हाथों में पड़कर चौपट हुई है। आपको सदा सोहागिन बने रहने का शौक है । 'वजीर' को आप 'जान' की तरह 'लव' करते हैं। याने मिनिस्टिरी के समर्थक हैं--कोई दूसरा अर्थ न समझ ले । हाँ आपका एक विख्यात गुण यह है कि यदि आप पान की 'भीट' में छोड़ दिये जायें तो घंटे दो घंटे में खेत का खेत चर सकते हैं। 14. कृष्णदेवप्रसाद गौण-(उभयलिंगी) आप एम० ए० हैं, एल० टी० हैं, लंबे हैं, गोरे है, परम चाकलेट हैं, 'सरस' हैं, हसीस हैं, हुस्नपरस्त हैं, दिलदार हैं, एक खूबसूरत दिल्लगी हैं।
66/ मतवाला की होली 15. कृष्णबिहारी मिय-(पुलिंग) आप दुलारेलालाकाश के झाड़-तारा हैं 'साहित्य-समालोचक' के एकमान सहारा हैं, छोटे हैं, कुछ मोटे हैं, वकील हैं, शायद सज्जन भी हैं। कवि नहीं हैं, केवल काव्य मर्मत हैं। मगर अकमर कविता-बानन में बटोर-वहार करते हैं। आप 'ज्ञानमण्डल' और 'माधुरी- मण्डल' दोनों मे फेरी लगा चुके हैं। देव के भयानक समपंक हैं और उनकी इस लाइन पर डेढ-जान से फिदा हैं-'मोगहू ते कठिन संजोग पर नारी को।' वायू दुलारेलाल की अनुपस्थिति मे आपने उनको दुलारी 'माधुरी' का अभि- भावक होना सहर्ष स्वीकार किया है। 16. गणेशशंकर विद्यार्थी-(पुलिंग) आप 'प्रताप' के सर्वे-'गरवा' हैं । यू० पी० नौकरशाही के 'सगे हनवेण्ड' हैं । इस बार वोटरों की दया से एम० एल० सी० हैं । नादिरशाहों की नानी आपको देखकर मरा करती है। कहा जाता है कि आप ही का शरीर देखकर डॉक्टर एस० के० वर्मन को अपने साइनबोडों में एक अस्थिपंजरावशिष्ट पुरुष को दिखाने की बात मूझी थी। 17. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'-(उभयलिंगो) मनहूसों सा मुंह है, मगर बड़ी-बडी पटाखा-कविता-कामिनी के विख्यात जनक है। आप ही 'त्रिशूल' या 'शंकर' के हथियार है। देशी दूकानों के सभी 'बोसो' और विलायतियों के 'चाकलेट' आपको ज्यादा पसन्द हैं, ऐसा विद्यार्थी शान्तिप्रिय द्विवेदी का 'आब्जरवेशन' है । भविष्य की राम जानें, मगर आपका भूत साहित्यिक-युग 'वर्तमान' से 'बेटर' था । 18 गांगेय नरोत्तम शास्त्री-(पुलिंग) कविचक्र चूडामणि, मगर हिन्दी- कविता कामिनी-शृगार-संहारक । भारी खिस-खिस, विकट गलफरानन्द । 19. गिरिधर शर्मा 'नवरत्न'- दुबले, पतले, लंबे, भौटाकार हैं । आपकी सबसे अधिक ख्याति उमर खैय्याम और रवि ठाकुर की दुर्दशा करने के कारण हुई है । आप कविता क्या लिखते हैं साहित्य का गला घोंटते हैं । आप नवरत्न हैं-पत्थर हैं । 20. गोपालशरण सिंह - (पुलिंग) आप ताइवत् लंबे और पहाड़वत तगडे हैं । रीवा रियासत के लाखों के जागीरदार है। आपकी गठरीदार- प्रतिभा देखकर अनेक हिन्दी कविरायों के मुंह मे लारों का तूफान उठ खड़ा होता है । आप बहुत दिनो से कवि हैं और हमारा विश्वास है बहुत दिनों तक कविता की छाती पर सवार रहेगे। 21. गोपालराम गहमरो-(असार लिंग) गहमरीजी हिन्दी-संसार में जासूमी करते-करते अब बिलकुल जुल जुल जासूस बन गये हैं। किसी जमाने मे आपकी सीटी बोलती थी-अब संख बजता है।
साहित्य-शब्दार्थ गड़ही। 67 22. चतुरमेन शास्त्री-(महापुलिंग) गद्य के पमासान गढ़क, कभी-कभी पद्य-पग तोड़क तथा तुक जोड़क; 'व्यभिचार-प्रचारक' भारी ‘टाकू' आदि- आदि। 23 चन्द्रशेखर पाठक-(पुलिंग) अघेडावस्था के पार अनुवादों के अव- तार, यारांगना-रहस्य-फोड़कों के सरदार, पाठक एण्ड को० के सरकार । 24. चण्डीप्रसार हृदपेश-(पुलिंग) आप वी० ए० है, गल्प लेखक हैं और औपन्यासिक है । आपकी संस्कृत समलकृता भव्या-भाषा-भेजा-भेदिनी होती है। 25. जगन्नाथदास 'रत्नाकर'-(प्रचण्ड पुलिंग) आप सचमुच हिन्दी भाषा के दिग्गज-शरीर और खोपडी दोनों से विद्वान हैं । कुरूपनारायण की आप पर असीम कृपा है। लोगों का कहना है कि आप वीवी 'माधुरी' के नव्य बिहारी के द्विपदो' में अक्सर तेल लगाया करते हैं । आप अंग्रेजी के बी० ए. और ब्रजभापा के आचार्य हैं। 26. जगन्नायप्रसाद 'भानु'-(पुलिंग) एक शब्द में आप भारी पिंगल हैं। 27. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी-(चाकलेट लिंग) चौवेजी हिन्दी-चन्द्र के चमचमाते चकोर हैं। आपकी आंखें आठो पहर अनुप्रास के अन्वेषण में ही अटकी रहती हैं । आपने लाहौर साहित्य-सम्मेलन की गद्दी पर अपना गौरव- मय गोल गाड़ा था। जिस साहित्यिक महफिल में आप नहीं रहते वह वीरान समझी जाती है। 28. जयशंकर प्रसाद --(उभय लिंग) आप कवि, नाटककार और गल्पक तो हैं ही, खिस-खिस भी भारी हैं। 29. जी० पी० श्रीवास्तव--(उजबक-लिंग) कहा जाता है, मरने वाद झांस के मोशिये मोलियर की आत्मा बरसों चारों ओर घूम घूमकर अपने लिये एक दरवा खोज रही थी। अन्त में वह हमारे जी० पी० श्रीवास्तवजी के भीतर जा घुसी । आप वकील और विद्वान् तो हैं ही भारी ‘ह्य मर' भी हैं । दुमदार आदमी भी है, मर्दानी औरत भी हैं। अब सुनते हैं भाजकत आपकी खोपड़ी से मोलियर की आत्मा उतरी सी जा रही है। आपके पीछे हमेशा करोड़ों काम लगे रहते हैं । 30. ज्योतिप्रसाद मिश्र 'निर्मल'-(नपुंसक लिंग) यह बीवी 'मनोरमा' के हरम के वेदम के रखवाले हैं। 'मतवाला' का और इनका बड़ा मधुर नाता है । उजवकई में आप पूरे प्रयाग मे प्रख्यात हैं। कविता सुन्दरी के दो-चार सुन्दर पाद आपके माथे में हमेशा ही भरे रहते है।
68/ मतवाला की होली 31, दशरयप्रसाद द्विवेदी-(पुलिंग) आप गोरखपुरी 'स्वदेश' के जेल- जानक संपादक है । कलम पर आपका एकाधिकार है, अवस्था पतीस के पार है । आपकी अजीबोगरीब खोपड़ी में 'स्कीमों' की भरमार है । जैसी चाहिये, जो चाहिये, जब चाहिये तैयार है। आप 'स्वदेश' को जी-जान से सजाते हैं और अपनी गरीब शक्तियों को लेकर अच्छे अच्छे अमीरों को लजाते हैं। 32. दीनदयाल शर्मा-(सनातन लिंग) चतुरानन्द ने आपको रचने के पहले एक भंसा रचा था। उमी 'मेण्टलिटी' में आपका भी निर्माण होने से आप कुछ-कुछ तदाकार हो गये हैं। सड़ातन-धर्म के आप झनाझन्न ठेकेदार हैं । आदर्शों के नाम पर आप गरजते हैं विकट-बाघ की तरह, मगर जरूरत पड़ने पर बरसते हैं खाली बन्दूक की तरह । सुना है आपका मत है कि चालीस हजार की गठरी का दाता महान् पतित, नारकी और हत्यारा होने पर भी पुरुषोत्तम कहा जा सकता है। संसार-स्टेज पर आपका ड्रामा प्रायः समाप्त हो चला है-आप घोर ओल्ड हैं। 33. दुलारेलाल मार्गव-(हिजो लिंग) दुवले हैं, अध-पतले हैं, नमकीन है, हिन्दी के अभिमानी सेवक हैं, अपने को जरूरत से ज्यादा लगानेवाले हैं, 'माधुरी' के फादर है, पण्डिा अनूर शर्मा के प्यारे विरादर हैं, गंगा-पुस्तक- माला वाले हैं और हिन्दी कवियो के अब क्या कहे ? सुना है रत्नाकरजी की कृपा से आप महाकवि बिहारी के टक्कर के दोहाकार हो गये हैं। आपके दोहे के चन्द उदाहरण- मेरी भव बाधा हरों परी-माधुरी प्यारि, नीके हैं छीके हुए ऐसी ही रह नारि । सखी सिखावति मान विधि, सननि बरजति बाल, 'हिवस्पर' कर मो मने बस, सदा दुलारेदाल । जरी हरी आसा लता, 'प्रेम', 'कृष्ण' दोउ टूट हरी परी माधुरी प्रिय, करी परी रस लूट ? 34. नवजादिक लाल-(भ्रष्ट पुलिंग) आप भी 'चालीसा' का विक्टो. रिया-क्रास वाली उम्र के मैदान में पा चुके हैं । कोहियो कितावों के टायटिल पेज पर हजारों बार चिपक चुके हैं। 'मतवाला' एडीटर की हैसियत रो 'न्युटीफुली' बहक चुके हैं। मगर आपकी अधिक गुहरत का कारण आपकी बीवियाँ हैं । आप 'आल्टनेंट इयर्स' बीवी बदल लिया करते हैं । 35. नरदेव शास्त्री-(पुलिंग) दाढ़ियां आपसे दाड़ी सी रहा करती हैं - आप 'मारिया' हैं। लाल पगड़ियों की आखें आपकी ओर लाल-लाल रहा साहित्य-शब्दार्थ-गड़ही/69 करती हैं-आप बलवाई है। नामधारी नेता आपसे नकियाये रहते हैं आप एडीटर--शंकर हैं। बड़े भयानक जीव हैं। 36. पद्मसिंह शर्मा-(पुलिंग) आप हिन्दी संसार के झंझावात है। एक बार हवा होकर बहे उखाड-पछाड़ किया। हाहाकार उपस्थित किया और शान्त हो गये। 37. परिपूर्णानंद-(स्त्रीलिंग ) आप शुद्ध चाकलेट 'कलर' के है । श्री संपूर्णानंदजी के छोटे भाई हैं। प्रेम महाविद्यालय के पुजारी हैं, भारी घक-यक हैं, गल्पू हैं, उपन्यासू हैं और नाटक भी है । 38. पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र'---(उभयलिंगी) आप देश, साहित्य और स्वराज्य सबसे अधिक अपनी जुल्फो को प्यार करते हैं। सखी-भाव में रहना आपको ज्यादा पसन्द है। आप 'चाकलेट' शब्द के भारत-विख्यात निर्माता और दर्जनों चाकलेट-स्टोरियों के विधाता हैं। चाकलेट भी हैं और चाकलेटो के कमाण्डर-इन-चीफ भी। झूठी-मूठी कहानियां लिखने के लिए आप काफी बदनाम हैं। 39. प्रेमचंद-(पुलिंग) आप ही वर्तमान हिन्दी औपन्यासिकों के माथे पर के कोटेदार ताज हैं । कितनों की आंखो में खटकते है। आपके नाम का 'इनलार्ज फार्म' है-श्री धनपत राय बी० ए। आप 'माधुरी' जनक बाबू दुलारेलाल के फण्ड हैं और आप ही ने अब 'माधुरी' को अपने गाजियनशिप में लिया है । आपने नाटक के मैदान में भी दौड़ने चेष्टा की थी, मगर सुना है, चारो पाने चित्त गिर पड़े थे। कलम घिस-घिस में आपको भी कमाल हासिल है । साल में दर्जनो किताब कांख देते हैं। 40. बदरीनाय मट्ट-(उभय लिंगी) आप लखनऊ गुनिवसिटी के प्रोफेसर है-बस इतने ही से आपका शुद्ध परिचय मिल सकता है । दंतनिपोरई मे आपको खासी इज्जत मिली है । आपके शिर पर अक्सर 'कवितास' भी चढ़ती है-कभी अच्छी, कभी अनच्छी । आप नाटककार भी भारी है, मगर वैसे ही जैसे पारसी स्टेज के 'जोहरजी' । 41. बाबूराव विष्णु पराड़कर-(पुलिंग) आप बनारसी 'आज' के संपा- दक हैं, मनहूसी के लिये मशहूर हैं और साथ ही, चालीसा लग जाने पर विधवा-विवाह के मजेदार-मैदान मे छलांग मारने के लिये यशस्वी हैं । हिन्दी के, खासकर काशी के, कितने अख़बार केवल आपका नाम लेकर अपना जीवन धन्य बनाया करते हैं। 42. बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'-(उभयलिंगी) आप सुंदर हैं, सुंदर देश- सेवक हैं, सुंदर लेखक हैं और सुंदर कवि भी हैं। हुस्नपरस्ती आपकी आदत 70 मतवाला की होली है और बुतपरस्ती पेशा । चार यारों के बीच में आप बहुत अच्छे लगते 43. विश्वम्भरनाथ शर्मा 'कौशिक' (उभयलिंगी) कानपुर के साहित्यिक-भंगियो के आप प्यारे सखा हैं। 'कौशिकजी' के नाम प्रसिद्ध है जिसका संस्कृत अर्थ बडा विचित्र होता है । आप मशहूर गल्प ग 44. विश्वम्भरनाथ जिज्जा-(उद्धत लिंग) आप जो कुछ ही है । है । भारी लिक्खू, भारी गल्पू, भारी लम्बक, भारी भंगक और । गिनाएँ ? सुना है ऐसा कोई दिन नही जाता जिस दिन, किसी न किर शेविक की आत्मा आपकी खोपडी पर चढकर आपको घंटे दो घंटे न वाती' हो । 45. बिनोदशंकर व्यास-- --(उभयलिंगी) आप हिन्दी के उभडते | मुण्डे हैं । बाबू जयशंकर प्रसादजी आपको नीचे से ऊपर तक जानते है 46 महादेवप्रसाद सेठ-(पुलिंग) आप 'मत ता' के मशहूर एडीटर हैं । दाढियो के मूल मे घुन बनकर घुसने मे आपको 'जेलानन चुका है । पहुँचे हुए मंपादक हैं । निराली प्रतिभाओं के पीछे आप चा से दौडते है । इस वक्त आप बुढापा और जवानी के बीच मे खड़े होकर ठीक कर रहे है। 47. माधव शुक्ल-(पुलिंग) आप नाटक भी है, नट भी, गायन गान भी, साहित्यिक भी है, साहित्य भी, दीवाने भी है, होशियार भी 48. माखनलाल चतुर्वेदी-(स्त्रीलिंग) आप मूक पहेली से मुन अन्धकार पूर्ण संसार में भाव-जुगुनूमयी कविताएँ प्रसव किया करते है। और 'प्रभा' को भरपेट संपाद चुके है । आजकल 'कर्मवीर' में पैतरे बर है । आप, सुना है 'दिल' भी रखते हैं । 49. मिश्रबन्धु-बहु-लिंगी) आप लोगों के फुलबेंच में तीन हिन्द रथी है (i) पण्डित गणेश बिहारी मिश्र (ii) पण्डित श्यामबिहारी मिः (iii) रायबहादुर पण्डित शुकदेवविहारी मिश्र। आप लोग सैकड़ो लेखको के 'श्रद्धेय हैं। एक शब्द में आप हिन्दी साहित्य की ! रागिनी हैं। 50 मुच्छन द्विवेदो-(बटुक-लिंग) आप सनसना कर सनकते औ बमा कर बमकते हैं । आपने अपने 'मुच्छन' को, अपने 17-18 वर्षों के मे, माडे तीन बार छोला-खरादा है। अब उसका शुद्ध रूप श्री शा द्विवेदी के रूप में प्रकट हुआ है । जरा भी भाव का जुलाब मिलते ही अ प्रतिभा महीनी ना 'पोका' करती है। 51 मैथिलीशरण गुप्त--(पुलिंग) आप वर्तमान खड़ी बोली की के नखशिख हैं । मधुर भी है, कर्कश भी। कवि भी हैं, तुक्कड़ भी !
साहित्य-शब्दार्थ-गडही / 71 52 रघुपति सहाय-(अजीव लिंग) आप हजारों में एक वी० ए० हैं, खूब नवयौवन है, आंखें खुलती ही नहीं, पूरा छायावाद ! Sheयों से अधिक Heयों को 'इम्पोर्टेन्स' देने वाली उर्दू शायरी के आप मास्टर हैं ! एक शब्द में आप एक नमकीन शेर है। 53. रमाशंकर अवस्थी-(नपुंसक लिंग) आप कनपुरिया 'वर्तमान' के मूक 'भूत' और 'मतर्क' भविष्य हैं। 54. रायकृष्ण दास ---(उभयलिंगी) आप भयानक भावुक है। भाव- साहित्य-समुद्र में अक्सर डुवकियां लगाया करते है । फलतः आपके हाथों मे कभी-कभी साहित्य मुक्ता भी दिखाई पड़ते है, मगर अधिक तादाद शंखों और घोंघों की ही होती है। 55. रामनरेश त्रिपाठी (पुलिंग) आप राष्ट्रभाषा सब गुन आगरी नागरी के वणिक-पुत्र हैं । 'लण्डन टाइम्स' में एक बार पढ़ा था कि 'एलाहा. बाड का पण्डत रामनरेश त्रिपाठी चूरन का लटका आच्चा लिक लेटा हाय।' आप हिन्दी के 'खण्ड' कवि है। बड़े मीठे है । 56. रामचन्द्र शुक्ल--(मौन-लिंग) हिन्दू विश्वविद्यालय की भाषा के 'वीपिंग फिलासफर' हैं, विद्वतसमाज की भाषा मे आप 'गम्भीर' हैं, रायसाहब वायू श्यामसुन्दर दास की भाषा मे आप 'सर्वस्व' है। हमारी भाषा में आप 'धन्य' के 'फाल्स' है। 57. रामचन्द्र वर्मा-(पुलिंग) आप काशी नागरी-प्रचारिणी-सभा के लवण ही हैं। क्या नमकीन तबीयत पायी है। आप ही की कृपा मे हिन्दी- शब्द-सागर-कोप का पानी बरकरार है । 58. रामचरित उपाध्याय--(पुलिंग) आप भारी महाकवि है। आपको महा-कविता 'सरस्वती' में हर महीने मिल-मिलाया करती है । 59, राधेश्याम कथावाचक-[उभयलिंगी] आप अपने को नाटककार भी कहते हैं, कवि भी । यदि जौहर और शैदा नाटककार कहे जाये तो राधेश्यामजी उनसे पहले नाटककार हैं । कविता तो क्या आप कविता की नोट की रचा करते हैं । महाकवि शंकरजी ने 'डीग राधेश्याम से कथक्कड़ों की फीकी है' लिखकर आपको अमर कर दिया है। इसमें कोई शक नहीं कि आप नमकीन बक्कू हैं । हजारों और लाखों के नीचे वोलते ही नहीं । 60. रामवृक्ष शर्मा 'बेनीपुरी'- [अभी अवस्था नही] आप हैं तो वर्षों के मगर बनते हैं 'बालक' | 'मिठाई की तरह गद्य लिखते हैं और खिलौने' की तरह कविता । आपके 'बालक' पन पर सैकड़ों साहित्यिक फिदा हैं। 61. रामनाथलाल 'सुमन'-[नपुंमक लिंग] कहा जाता है एक बार 72/ मतवाला की होली सुमनजी को किसी आवनूस ने देख लिया । उफ !! आफत आ गई गरीब पर-वेचारा बिलकुल ब्लैक पड़ गया । आप संसार की ठेलों भापा के पण्डित हैं । 'वायरन' और 'कीट्स' से आपका पन-व्यवहार होता है । 'मिल्टन' और "शेली' ने आपको लण्डन में बुलाया है । आप लंवे बिलकुल नहीं हैं । खाली चौडे ही चौड़े हैं । आपको भी बहुतों की तरह अक्सर "प्रियतम' रोग हुआ करता है। 62. रामाज्ञा द्विवेदी-[उभय लिंग ] आप बड़े भारी 'अंग्रेजी' है, कविता उडावन कला के आप 'स्पेशलिस्ट हैं । सुना है वात रोग भी अक्सर उभडा करता है । आप जब अंग्रेजी पोशाक धारण करते हैं तब बड़ा मजा आता है ! भ्रम होने लगता है। 63 रूपनारायण पांडेय---[भ्रष्ट-लिंग] आप ही 'माधुरी' के प्रसवक नम्बर-2 । साहित्य मे आपकी ख्याति अन्धाधुन्ध अनुवादने से हुई है । कविता का कचूमर निकालने में आपको मजा आता है । आप बाबू दुलारेलाल के दाहिने । 64. लाला भगवानदीन-[ पुलिंग ] आपको 'गुरु' बनने का रोग है । काशी का सारा 'गुरुडम' आप ही के पास बिखरा पड़ा रहता है । ब्याह करने में आप मुंशी नवजादिकलालजी से फ़लागो और पराड़करजी से योजनों आगे हैं। 65. सकलनारायण शर्मा-जरठ लिंग] आप 'शिक्षा' :के सुधारक है, हिन्दी भाषा के कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान हैं, तीन गो 'तीर्थ' है, योगी है, कुण्डलिन चढा लेने वाले हैं और 'जो है सो' हैं। 66. सम्पूर्णानन्द-[पुलिंग] आप भी काले हैं, शृंगार रस की तरह । चूकनेवाले चाचा चतुरानन आपके जाति निर्माण मे ही चूक कर गये हैं । आप ऐसे चतुष्कोण ब्राह्मण को 'लाला' बना दिया है । आप बी० एस-सी० और एल० टो० हैं तथा प्रचण्ड पण्डित हैं । बीवी नौकरशाही है । आप पर हजार जान से निसार रहती है। आप एम० एल० सी० भी हैं । अभी कल आपने भी दूसरी शादी की है । आप बड़े इन्द्रिय-दमनी भी हैं । कोषकार का भ्रम है कि आप ग्रेट आदमी हैं, मगर केवल महीने में दो या तीन रोज । 67. श्यामसुन्दरदास-[नपुसक लिंग] आप हिन्दी साहित्य के 'अनुदार' इतिहास है । हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रवीण प्रोफेसर है । पण्डित रामचन्द्र शर्मा के 'आदान-प्रदान' हैं । हिन्दी सेवी होकर भी और इस सूर्यास्त काल मे टाई-शू और पेण्ट है। 68. सियारामशरण गुप्त-( उभयलिंगी) देखने मे आप बिलकुल साहित्य-शब्दार्थ-गड़ही /73 सियारामशरण नही मालूम पड़ते। अभी महज कच्ची उम्र है । मगर आप हजारों में एक तुषकड़ हैं। 69. श्रीधर पाठक -(ओल्डलिंग) हिन्दी साहित्य के पुराने मधुकर हैं। एक दिन ऐसा भी था जब चारों ओर आप ही आप नजर आते थे । अब लोगों की नजरों पर 'बदली' का परदा चढ़ गया है। आप कम नजर माते हैं। 70. श्री कृष्णदत्त पालीवाल-(शुद्ध पुलिंग) आप एम० ए० हैं, साहित्य- रत्न हैं, "प्रताप' और 'प्रभा' के भूत सम्पादक हैं, कानपुर के मशहूर 'एजी- टेटर' हैं और आजकल आगरा सुन्दर सहयोगी 'सैनिक' के तडातड एडीटर हैं । हाँ, वर्तमान चुनाव के पहले आप एम० एल० सी० भी थे मगर इस मार की चढ़ाई में फील्ड आपके हाथों से निकल गया। 'सनेहीजी' के तो आप भक्त सुने गये हैं, मालूम नही उनके 'च्वायसो' के भी भक्त है या नही। 71. सुवर्शन--(अज्ञात लिंग) अधिक नही एक शब्द मे आप मुंशी धनपत- राय की शुद्ध स्टाइल हैं। 72. सुमित्रानन्दन पंत-(स्त्रीलिंग) यद्यपि आपका रंग 'चाकलेट' नहीं है फिर भी, हजारों चाकलेट आपका मुंह ताका करें। कनक-छरी सी काया -पायी है । 'कपि' कलर के काकुल पाये हैं 'मुग्धा की सी मृदु मुस्कान' पायी है । आप अपनी अनोखी कविताओं मे लिंगों को तोड़ने-मरोड़ने के लिये मशहूर है । साहित्यिक पकी दाढ़ियां आपको 'छोकरा' समझती हैं और अपने राम 'छोकरी'। 73. सूर्यकान्त त्रिपाठी-(पुलिंग) आप ही 'निराला' हैं । अपनी अनगढ़- रागिनी से आप ही ने 'मतवाला' के प्यालों में एकबार तूफान पैदा किया था। आप देखने मे कवि से अधिक 'कोपर' मालूम पड़ते हैं । आप 'रवि बावू' और डी० एल० राय के मिक्सचर भी कहे जा सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि आप उजबकाचार्य पण्डित शान्तिप्रिय द्विवेदी (मुच्छन) के गुरु हैं । 74. शिवप्रसाद गुप्त-(वीभत्स पुलिंग) आपका शुद्ध 'डिस्क्रिप्शन' पेश करना मुश्किल जो नहीं है तो फिर आसां भी नहीं है । दूर से आप 'रुई की गांठ' की तरह दिखाई पड़ते हैं । आपकी गांठ टटोलनेवाले खाली काशी में ही नही तमाम यू० पी० में और खाली यू० पी० में ही नहीं 'होल इण्डिया' में भरे पड़े हैं। लोगों का कहना है कि आप अगड़बम्म-भोला-बाबा की तरह उदार और औढरदानी हैं। काशी की जागृति के आप जाग्रत इतिहास हैं। आप पक्के नो-चेन्जर थे, मगर गत नुनाव में 'आज' के भूत-एठोटर-दार्शनिक- 72 / मतयाला की होली सुमनजी को किसी आबनूस ने देर लिया। उफ !! आफत आ गई गरीब पर-वेचारा बिलकुल लंक पड़ गया । आप संमार की ठेलों भाषा के पण्डित है । 'यापरन' और 'कोटम' से आपका पत्र-व्यवहार होता है । 'मिल्टन' और 'शेली' ने आपको लण्डन में बुलाया है । आप नये बिलकुल नहीं हैं । पाली चौड़े ही चौड़े हैं । आपको भी बहुतों की तरह अपसर "प्रियतम' रोग हुआ करता है। 62. रामाज्ञा द्विवेदी-[उभय लिंग ] आप बडे भारी 'अंग्रेजी' है, कविता उड़ायन कला के आप 'स्पेशलिस्ट हैं । सुना है वात रोग भी अमर उभडा करता है। आप जब अंग्रेजी पोशाक धारण करते हैं तब बड़ा मजा आता है ! भ्रम होने लगता है । 63. रूपनारायण पांडेय-[भ्रष्ट-लिंग] आप ही 'माधुरी' के प्रसवक नम्बर-2 हैं । साहित्य में आपकी ख्याति अन्धाधुन्ध अनुवादने से हुई है। कविता का कचूमर निकालने में आपको मजा आता है । आप वायू दुलारेलाल के दाहिने । 64. लाला भगवानदीन-[ पुलिंग ] आपको 'गुरु' बनने का रोग है । काशी का सारा 'गुरुडम' आप ही के पास विपरा पड़ा रहता है । म्याह करने में आप मुंशी नवजादिकलालजी से फ़लागों और पराडकरजी से योजनों आगे हैं। 65. सकलनारायण शर्मा-जरठ लिंग] आप 'शिक्षा' :के सुधारक है, हिन्दी भाषा के कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान है, तीन गो 'तीर्थ' है, योगी हैं, कुण्डलिन चढ़ा लेने वाले हैं और 'जो है सो' हैं। 66 सम्पूर्णानन्द-[पुलिंग] आप भी काले हैं, शृंगार रस की तरह । चूकनेवाले चाचा चतुरानन आपके जाति निर्माण में ही चूक कर गये हैं । आप ऐसे चतुष्कोण ब्राह्मण को 'लाला' बना दिया है । आप बी० एस-सी० और एल० टी० हैं तथा प्रचण्ड पण्डित हैं । बीवी नौकरशाही है । आप पर हजार जान से निसार रहती है । आप एम० एल० सी० भी हैं । अभी कल आपने भी दूसरी शादी की है । आप बड़े इन्द्रिय-दमनी भी हैं । कोषकार का भ्रम है कि आप ग्रेट आदमी हैं, मगर केवल महीने में दो या तीन रोज । 67. श्यामसुन्दरदास-[नपुसक लिंग] आप हिन्दी साहित्य के 'अनुदार' इतिहास है । हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रवीण प्रोफेसर हैं। पण्डित रामचन्द्र शर्मा के 'आदान-प्रदान' हैं । हिन्दी सेवी होकर भी और इस मूर्यास्त काल मे टाई-शू और पेण्ट है। 68. सियारामशरण गुप्त-( उभयलिंगी) देखने में आप बिलकुल साहित्य-शब्दार्थ-गड़ही /73 सियारामशरण नहीं मालूम पड़ते। अभी महज कच्ची उम्र है । मगर आप हजारों में एक तुक्कड़ हैं। 69. श्रीधर पाठक--(ओल्डलिंग) हिन्दी साहित्य के पुराने मधुकर हैं । एक दिन ऐसा भी था जब चारों ओर आप ही आप नजर आते थे। अब लोगों की नजरों पर 'बदली' का परदा चढ़ गया है । आप कम नजर आते हैं। 70. श्री कृष्णदत्त पालीवाल--(शुद्ध पुलिंग) आप एम० ए० हैं, साहित्य- रत्न हैं, 'प्रताप' और 'प्रभा' के भूत सम्पादक हैं, कानपुर के मशहूर 'एजी. टेटर' हैं और आजकल आगरा के सुन्दर सहयोगी 'सनिक' के तडातड़ एडीटर हैं । हो, वर्तमान चुनाव के पहले आप एम० एल० सी० भी थे मगर इस बार की चढ़ाई में फोल्ड आपके हाथों से निकल गया। 'सनेहीजी' के तो आप भक्त सुने गये हैं, मालूम नहीं उनके 'च्वायसों के भी भक्त हैं या नहीं। 71. सुदर्शन--(अज्ञात लिंग) अधिक नहीं एक शब्द में आप मुंशी धनपत. राय की शुद्ध स्टाइल हैं। 72. सुमित्रानन्दन पंत--(स्त्रीलिंग) यद्यपि आपका रंग 'चाकलेट' नहीं है फिर भी, हजारों चाकलेट आपका मुंह ताका करें। कनक-छरी सी काया -पायी है । 'कपि' कलर के काकुल पाये हैं 'मुग्धा की सी मृदु मुस्कान' पायी है । आप अपनी अनोखी कविताओं मे लिंगों को तोड़ने-मरोड़ने के लिये मशहूर हैं । साहित्यिक पकी दाढ़ियां आपको 'छोकरा' समझती हैं और अपने राम 'छोकरी'। 73. सूर्यकान्त त्रिपाठी--(पुलिंग) आप ही 'निराला' है । अपनी अनगढ़- रागिनी से आप ही ने 'मतवाला' के प्यालों में एकबार तूफान पैदा किया था। आप देखने में कवि से अधिक 'कोपर' मालूम पड़ते हैं । आप 'रवि बाबू' और डी० एल० राय के मिक्सचर भी कहे जा सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि आप उजवकाचार्य पण्डित शान्तिप्रिय द्विवेदी (मुच्छन) के गुरु हैं । 74. शिवप्रसाद गुप्त-(वीभत्स पुलिंग) आपका शुद्ध 'डिस्क्रिप्शन' पेश करना मुश्किल जो नहीं है तो फिर आसां भी नहीं है । दूर से आप 'रुई की गोठ' की तरह दिखाई पड़ते हैं । आपको गांठ टटोलनेवाले खाली काशी में ही नही तमाम यू० पी० में और खाली यू० पी० में ही नहीं 'होल इण्डिया' में भरे पड़े हैं। लोगो का कहना है कि आप अगड़वम्म-भोला-बाबा की तरह उदार और ओढरदानी है। काशी की जागृति के आप जाग्रत इतिहास हैं । आप पक्के नो-चेन्जर थे, मगर गत चुनाव में 'आज' के भूत-एडोटर-दार्शनिक- 741 मतवाला की होली प्रवर श्रद्धेय बाबू भगवानदास जी के फर्स्ट पिसरे लण्डनी वैरिस्टर, भैय्या जी बावू श्री प्रकाश के लिये आप भी स्वराजियों के गोल में आकर-काफिर वन गये ! कोई करे क्या !-~'धुरो है वालेपन को नेह ।' 75 शिवपूजन सहाय--(स्त्रीलिंग) आप कुछ दिनों तक अध्यापक तथा बहुत दिनो तक आरा की एक छोटी लाइन के गार्ड रह चुके हैं, अस्तु, वटुक- विलसित है । चमेली के फूल की माला की तरह भाषा लिखते हैं। आपकी अवस्था तीस-एकतीस के ऊपर नीचे है । 76 हनुमान प्रसाद पोद्दार--(उभय लिंगी) आप कलकत्ते के भारी आदमी हैं । हाँ, हाँ ! आदमी ही से हैं ! खूब 'सासी' शकल पायी है । कलकत्ता कवि-मम्मेलन के आप ही संयोजक है । 77. हरिकृष्ण 'जौहर'-(नपुसक लिंग) आप पहले हिन्दी के सम्पादक थे, अब पारसी स्टेज के 'छीछालेदरक' हैं । हजारों नाटको को फांक गये हैं, मगर आप स्वयं जो लिखते वह शुद्ध घोघा-पंयी होता है । 78. हरिशंकर शर्मा-(पुलिंग) महाकवि शकरजी के सुपुन, आर्यमित्र के एडीटर-खूब लेखक और बहुत खूब कवि हैं। 79. हेमचन्द्र जोशो-(उभयलिंग) राय साहब, श्यामसुन्दर दास आपको लौंडा समझते हैं क्योकि आपने उनको एक बार घिसा था। प्रेमचन्दजी आपको आफत समझते हैं क्योंकि, उन पर भी आप टूट चुके हैं। स्वामी सत्यदेव परिव्राजक आपको 'लुच्चा' और 'आवारा' और 'खुफ़िया' समझते हैं क्योकि, आप स्वामी जी के ढोंग में सहायक नही होते । हम आपको हिन्दी का उज्ज्वल घोघा समझते है। 80. हेडम्ब मिश्र--(नपुंसक लिंग) आप कई पत्रों को, खासकर काशी के 'केसरी' को 'एडिट' करने के बाद अब 'सूर्य' को सम्पाद रहे हैं। बरे योग्य मित्र, भाड़ी लिक्खाड औड औधे संपादक हैं । , [वर्ष 4, संख्या 4-12 मार्च, 1927 ] 00
नवाविष्कृत गणित-सिद्धांत
[ योग-वियोग की महिमा
सम-प्रपंप
माधुरी
पावर
मारनाम
रो
- मामिलान
अवगम्दार - मलामोपना
बीना
गीराम वर्मा + शाम -fini-मः
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प्रवर श्रद्धेय बाबू भगवानदास जी के फर्स्ट पिसरे लण्डनी में
बाबू श्री प्रकाश के लिये आप भी स्वराजियों के गोल में आ
गये ! कोई करे क्या !-'बुरो है वालेपन को नेह ।'
75 शिवपूजन सहाय--(स्त्रीलिंग) आप कुछ दिनो र
बहुत दिनों तक आरा की एक छोटी लाइन के गार्ड रह चु
विलसित हैं । चमेली के फूल की माला की तरह भाषा ।
अवस्था तीस-एकतीस के ऊपर नीचे है ।
76. हनुमान प्रसाद पोद्दार--(उभय लिंगी) आप म
आदमी है । हाँ, हाँ ! आदमी ही से हैं ! खूब 'मासी' शकल
कवि-सम्मेलन के आप ही संयोजक है ।
77 हरिकृष्ण 'जौहर'--(नपुसक लिंग) आप पहले
थे, अब पारमी स्टेज के 'छीछालेदरक' है । हजारों नाट
मगर आप स्वयं जो लिखते वह शुद्ध घोषा-पंयी होता है ।
78. हरिशंकर शर्मा-(पुलिंग) महाकवि शंकरजी
के एडीटर खूब लेखक और बहुत खूब कवि हैं ।
79. हेमचन्द्र जोशी-(उभयलिंग) राय साहब, श्या
लौडा समझते हैं क्योकि आपने उनको एक बार घि
आपको आफत समझते हैं क्योकि, उन पर भी आप
सत्यदेव परिव्राजक आपको 'तुच्चा' और 'आवारा' और
क्योंकि, आप स्वामी जी के ढोग में सहायक नही होते
का उज्ज्वल घोंघा समझते हैं।
80. हेडम्ब मिथ-~(नपुंमक लिंग) आप कई पत्रों
के 'केसरी' को 'एडिट' करने के बाद अब 'सूर्य' को समृ
मित्र, भाडी लिक्वाड औड औंधे संपादक हैं ।
[ वर्ष 4, संख्या 4-5
परिशिष्ट 36/मतवाला की होली बाइनस-माया दुलारेलाल माधुरी महामंडल स्वराज पार्टी सनातन धर्म ब्रिटिश गवर्नमेण्ट बारिस्टरी इसलाम मारवाड़ी कलकत्ता लखनऊ बनारस पटना कांग्रेस महंत टीचर देशभक्त लेखक सम्पादक सुन्दरी जोरू हिन्दू-परिवार महामहोपाध्याय सुशिक्षित कॉलेज छान्न मंगरेज-जाति साहित्य-सम्मेलन- सनातनधर्म मंडल- लिहाफ होली माधुरी मतवाला =0 ज्ञानानन्द =0 नेहरूजी =0 भूणहत्या =0 हिप्लामेसी = 0 यंग लेडी - 0 छूरा विदेशी व्यापार =0 सोनागाछी =0 चाकलेट =0 दाल की मंडी =0 गंदगी वकील-दलील 10 मालपूआ = 0 बटुकोपासना =0 लेक्चर D0 चश्मा =0 ऐंठ =0 सिन्दूरबिन्दु =0 साला =0 वाल-विधवा D0 चापलूसी =0 चुलबुलाहट दरवार सिगरेट बन्दरघुड़की - 0 दलबन्दी 20 भारतमित्र बाबी साला [वर्ष 4, संख्या 40-12 मार्च, 1927] DO .
परिशिष्ट
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[वर्ष 1, संख्या 23-26 जनवरी, 1934) . हया पोगार. मेरी ओं' मुहम्बत मेरा डेयर है॥1॥ मेरी पदर पी पादर यूक देती है दुगालों पर 1211 परिशिष्ट इमर अंउमेत देनी रस्ता गरेनीगोरो मागति. मग नो गई हैं । यात सौर मे वरपर होगी कि सामनी गा पीर की सी-इम ना REE सामान मातिमी। पैसा पही है वह गजर जिममे पर मोर ग परते हैं । यही माचा है मि पर पौधार पर यही परमा है जिसमें भादमीया दूर जाती है। पही सोता है जिसमें नु परिया निकाले है ॥2॥ गरीबी वीवी का गरूर वफ्रायें मेरा मुश नेकी मेरा जीन-ए-जर है। गरीबी में भी हंग परती है गयो मासयालों पर।
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परिशिष्ट/81 धर्म कर्म की धूम मचाकर कलि को कर दूंचूर, पथ्वी पर ही स्वर्ग दिखा दूं, करू दिलद्दर दूर- के दाम, नाम का नाम ! इरी मुझे दिलो दो राम ॥3॥ 11 वर्ष 1, संख्या 30-15 मार्च, 1924] का नगाड़ा . चौपटानन्द शास्त्री चारों ओर मचा अन्धेर । मिले नहीं सज्जन को बेर॥1॥ सब मिल पूजें उनके पर। हो नही दिखलाती खैर ।।2।। का, पा जाते हैं लण्ठ लबार । क्यों चन्दा जावें नहीं डकार? ॥3॥ भरमाया लोगो को खूब । वि, दुनिया को लूटा है खूब ।।4।। असहयोग की थाम लगाम । " किया, हुए बस मालामाल । अब हैं पूरे बने दलाल ।।6।। उसमें पाये पांच हजार । रुपये खाये बीस हजार 11711 उनकी बदनामी का ढोल । निकालता मुंह से बोल ॥8] 80/ मतवाला की होली होली [पं० अयोध्यासिंह उपाध्याय ] खेलो रंग अबीर उड़ावो लाल गुलाल लगावो । पर अति सुरेंग लाल चादर को मत बदरंग बनाओ। न अपना रग गैवाओ॥ जनम भूमि री रज को लेकर सिर पर ललक चढ़ाओ । पर अपने ऊंचे भावों को मिट्टी में न मिलाओ। न अपनी धूल उड़ाओ॥ प्यार उमंग रंग में भीगो सुन्दर फाग मचाओ । मिलजुल जी खोलो हित की गांठ बंधाओ। प्रीति की बेलि उगाओ॥ [वर्ष 1, संख्या 30-15 मार्च, 1924] एक बैठे-ठाले की प्रार्थना [प्रोफेसर पं० बदरीनाथ भट्ट] लीडरी मुझे दिला दो राम, चले जिससे मेरा भी काम । कुछ ही दिन घलकर दलदल में फंस जाती है नाव, 5ष लगे पर दूना जोर पकड़ते मन के भाव- कि मैं भी कर डालूं कुछ काम, लीडरी मुझे दिला दो राम ॥1 हिन्दू-मुस्लिम-प्रेम-भाव का करूं गर्म बाजार, देश-भक्ति का मेरे ही मिर रख दो दारमदार- सगा दूँ सेक्चरों का साम, सोहरी मुझे दिला दो राम 120 परिशिष्ट/81 धर्म कर्म की धूम मचाकर कलि को कर दूं चूर, पृथ्वी पर ही स्वर्ग दिखा दूं, करू दिलद्दर दूर- दाम के दाम, नाम का नाम ! लोडरी मुझे दिलो दो राम 113॥ [वर्ष 1, संख्या 30-15 मार्च, 1924] an चौपट का नगाड़ा बजा [हिज होलीनेस स्वामी चौपटानन्द शास्त्री] नगाड़ा चौपट का, चारों ओर मचा अन्धेर । माल मारते हैं मूजी सब, मिले नहीं सज्जन को बेर || बदमाशों की बन आयी है, सब मिल पूजें उनके पर। सीधे-सादे बेचारों की, कहीं नहीं दिखलाती खैर ।।2।। जाति-देश के नेता-पद तक, पा जाते हैं लण्ठ लबार । क्यों न रकम वे हजम करें? क्यो चन्दा जावें नही डकार ? ॥3॥ देश-प्रेम का दम भर-भर कर, भरमाया लोगों को खूब । अपना काम .बनाया सब विधि, दुनिया को लूटा है खूब 141 ऐसे ही चौपटचन्दों ने, असहयोग की थाम लगाम । लुटिया खूब डुबायी इसकी, हुए आप पूरे बदनाम 1511 चन्दा खाया, फण्ड सफाया किया, हुए बस मालामाल । छोड़ देश-सेवा का धन्धा, अब हैं पूरे बने दलाल ।।611 कभी धर्म-सेवा का रंग या, उसमें पाये पांच हजार । कांगरेस के मन्त्री बनकर, रुपये खाये बीस हजार 70 सुली पोल, सव लगे पीटने, उनकी बदनामी का ढोल । जूते पड़े हजारो सिर पर, नही निकलता मुंह से बोल ॥8 ।
80/ मतवाला को होली होली [पं० अयोध्यासिंह उपाध्याय ] खेलो रंग अबीर उड़ावो लाल गुलाल लगावो । पर अति सुरंग लाल चादर को मत बदरंग बनाओ न अपना रग गॅवाओ जनम-भूमि की रज को लेकर सिर पर ललक चढ़ाओ। पर अपने ऊँचे भावो को मिट्टी मे न मिलाओ। न अपनी धूल उड़ाओ। प्यार उमंग रंग में भीगो सुन्दर फाग मचाओ। मिलजुल जी की गांठे खोलो हित की गांठ बंधाओ। प्रीति की वेलि उगाओ। [वर्ष 1, संख्या 30-15 मा एक बैठे-ठाले की प्रार्थना [प्रोफेसर पं० बदरीनाय भट्ट ] लोडरी मुझे दिला दो राम, चले जिससे मेरा भी काम । कुछ ही दिन चलकर दलदल मे फैम जाती है नाव, भूख लगे पर दूना जोर पकड़ते मन के भाव- कि मैं भी कर डालूं कुछ काम, लोहरी मुझे दिला दो राम ॥1॥ हिन्दू-मुस्लिम-प्रेम-भाव का करूं गर्म बाजार, देश भक्ति का मेरे ही मिर रख दो दारमदार- सगा हूँ लेक्चरों का साम, सोहरी मुझे दिला दो राम ।।2।। - परिशिष्ट 183 दोहा বীঃ नव सरिता जल जलनिधि मह जावै। जिमि पबलिक-धन नेता खावै । हरित भूति तृण-संकुलित, समुझि नहिं पन्थ । जिमि मिलाय नेता दिये, श्रुति-कुरान-गुरु-ग्रन्थ । दादुर-धुनि चहुँ ओर सुहाई । जिमि लीडर भाषन मनभाई। पल्लवमय विटप अनेका। वर्तमान-युग लीहर-भेका । अर्क जवास पात बिन भयऊ। जस स्वराज्य के उद्यम गयऊ1 खोजत कतहुँ मिली नहिं धूरी। जिमि स्वराज्य की आशा दूरी। सस-सम्पन्न सोह महि कसी। लीडर-गण की बातें निशि-तम-धन खद्योत विराजा। नकली नेतन-केर समाजा। महावृष्टि चलि फूटि कियारी । जिमि कौसिल ने बात बिगारी। कृपी निरावहिं चतुर किसाना । सत्य तर्हि जिमि सुबुध सयाना । देखिय चक्रवाक खग नाहीं। जिमि गान्धी जी कौंसिल माही । ऊसर बरसे तृण नहिं जामा । कौंसिल गरजे सरै कामा। विविध-जन्तु-संकुल महि प्राजा । भारत जिमि अंगरेजी राजा । जहें-तह पथिक रहे कि नाना । जिमि नेतागण मुंह पिपराना । सी। न 1. अर्थात् वर्तमान युग-रूपी वर्षाकाल में जैसे लीहर-रूपी भेक अर्याद मेंढक बहुत पैदा हो गये हैं, वैसे ही इस बरसात में नये-नये पल्लव और शाखाएँ वृक्षों में निकल आयी हैं । इति संजीवनी-भाप्यः ।
821 मतवाला की होली बड़े सोच पड़े, करूं क्या, कमे बच जायेगी लाज । कैसे मुंह दिखलाऊँ जग में, गिरी गगन से कसी गाज 1911 बड़े भाग्य से अवसर आया, हुआ गिरफ्तारी का जोर । वह भी पकड़े गये मचाकर, गांधीजी की जय का शोर ॥10॥ वह भी खासा मेला ही था, पूरी थी भेडिया धसान । सच्चा झूठा कौन देखता ? सत्तू मे मिल गया पिसान ॥11॥ ( अंश) [वर्ष 1, संख्या 41-7 जून, 1924] चौपाई घोरा। मोरा। वर्षा-वर्णन बीसवी सदी की रामायण के लीडर-कांड से उद्धृत [बाबा बबूलदास] घन घमण्ड नभ गरजत टका-हीन कलपत मन दामिनी दमकि रही धनमाहीं । जिमी लीडर की मति थिर नाही। वहिं जलद भूमि नियराये। लोडर जिमि चन्दा-धन पाये। बूंद-अघात सहहिं गिरि कैसे । लीडर-वचन प्रजा क्षुद्र नदो भरि चलि उतराई। जस कपटी-नेता-मति भाई। भूमि परत भा डाबर पानी। जिमि नेहि माया लपटानी। मिमिटि-सिमिटि जल भरहिं तलावा। जिमि चन्दा नेता पह आवा। सह जैसे।
परिशिष्ट 183 दोहा चौपाई सरिता जल जलनिधि मह जावै । जिमि पबलिक-धन नेता खावै । हरित भूति तृण-संकुलित, समुझि पर नहिं पन्थ । जिमि मिलाय नेता दिये, श्रुति-कुरान-गुरु-ग्रन्थ । दादुर-धुनि चहुँ ओर सुहाई। जिमि लीडर भापन मनभाई। नव पल्लवमय विटप अनेका। वर्तमान-युग लीहर-भेका। अर्क जवास पात बिन भयऊ। जस स्वराज्य के उद्यम गयक। खोजत कतहुँ मिली नहिं धूरी। जिमि स्वराज्य की आशा दूरी । सस-सम्पन्न सोह महि कैसी। लीडरनगण की बातें निशि-तम-घन खद्योत विराजा। नकली नेतन-केर समाजा। महाष्टि चलि फूटि कियारी । जिमि कौसिल ने बात बिगारी । कृषी निरावहिं चतुर किसाना । सत्य तर्हि जिमि सुबुध सयाना । देखिय चक्रवाक खग नाही। जिमि गान्धी जी कौसित माही। ऊसर बरसे तृण नहिं जामा । कौंसिल गरजे सर न कामा। विविध-जन्तु-संकुल महि भ्राजा। भारत जिमि अंगरेजी राजा। जहे-तह पथिक रहे थकि नाना । जिमि नेतागण मुंह पियराना । जैसी। 3 1. अर्थात् वर्तमान युग-रूपी वर्षाकाल में जैसे लोडर-रूपी भेक अर्थात् मेंढक बहुत पैदा हो गये हैं, वैसे ही इस बरसात में नये-नये पल्लव और शाखाएँ वृक्षो में निकल आमी हैं। इति संजीवनी-भाष्यः ।
84/ मतवाला की होली
दोहा
कबहूँ प्रबल चल मारुत, जह-तह मेघ बिलाहिं।
जिमि गांधी की फूंक ते, मिथ्या-भ्रम नसि जाहिं।।
[वर्ष 2, संख्या 3-30 अगस्त, 1924]
नोट : 'मतवाला' में शिवपूजन सहाय एक ऐसे सदस्य थे जो पं० ईश्वरी
प्रसाद शर्मा के शिष्य थे। अन्य कोई किसी के शिष्य रूप में ख्यात न
था। अनुमान किया जा सकता है इसके कवि पं० शर्मा ही होंगे । वे
ऐसी कविताएं लिखते भी थे।
खुशामदी टटू
वशिष्ठनारायण 'निर्बल')
दुम टाइटिल की लगी है बड़ी देखो पीछे;
हुँ हुँआं सबके ही हाँ में हां मिलाते हैं।
दूसरे मरें कि जियें कुछ न पड़ी है इन्हें;
अपनी भलाई में ही खुशी ये मनाते है ।
अड़ते न मौके पर धीमे से हैं भाग जाते;
हाकिम घुडकते तो पूंछ ये हिलाते हैं।
इन्हें कहें गीदड़ या हम 'हाँ हजूर' कहें।
दीखता न भेद कुछ एक सम पाते हैं ।
[ वर्ष 2, संख्या 9---18 अक्टूबर, 1924 ]
१. इस कविता में लीडर या नेता से उन स्वयं सिद्ध लीडरों और नेताओं का
ही अर्थ लेना, जो केवल पब्लिक का धन नष्ट करते है। सबको बबूल के
कांटे में एक ही तरह घसीटना बाबा बबूलदास का अभिप्राय नहीं है ।
वाबा बबूलदास का शिष्य हेंगादास
परिशिष्ट/85
आश्चर्य
[निर्मल ]
जिसने विमियों की धुरियां उड़ाई और,
जिसने कुशासन को बार बार मसका।
जिसने बहाई शान्ति क्रान्ति की लहर लोल,
'निर्मल' सचाई से नहीं जो नेक खसका।
पार महासागर के जिसका अखण्ड बल,
गोरी गरबीली के हिये में जाय कसका।
ऐसे बीर गांधी भी दरिद्र देशवासियों को,
पान न करा सके स्वराज-सुधा रस का।
[वर्ष 2, संख्या 14-22 नवम्बर, 1924]
D
खाएँगे
[ कालिकाप्रसाद 'कमल' ]
पूरे है प्रवीण स्वांग भरने में हिन्दू लोग,
सैकड़ों नुमाइशी ढकोसले बनाएंगे।
आड़ लेके धर्म की चलेंगे चाल जाल भरी,
संगठन का भी शोर जोर से मचाएंगे।
भाई भाई कहेंगे अछूतों को सभा के बीच,
गन्दगी न छूत की कलेजे से हटाएँगे।
खाएँगे स्वर्मियो के हाथ का प्रसाद नहीं,
'चांद पर जूतियां विधर्मियों की खाएँगे।
[ वर्ष 2, संख्या 15-29 नवम्बर, 1924 ]
84/ मतवाला की होली
दोहा
कबहूँ प्रबल चल मारत, जह-तह मेघ बिलाहिं ।
जिमि गांधी की फूंक ते, मिथ्या-भ्रम नसि जाहिं ।'
[वर्ष 2, संख्या 3-30 अगस्त, 1924]
नोट: 'मतवाला' में शिवपूजन सहाय एक ऐसे सदस्य थे जो पं० ईश्वरी
प्रसाद शर्मा के शिष्य थे। अन्य कोई किसी के शिष्य रूप में ख्यात न
था । अनुमान किया जा सकता है इसके कवि पं० शर्मा ही होंगे । वे
ऐसी कविताएं लिखते भी थे।
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खुशामदी टटू
[वशिष्ठनारायण 'निर्बल')
दुम टाइटिल की लगी है बड़ी देखो पीछे
हुआ हुँआं सबके ही हां में हां मिलाते हैं ।
दूसरे मरें कि जियें कुछ न पड़ी है इन्हे;
अपनी भलाई में ही खुशी ये मनाते हैं ।
अडते न मौके पर धीमे से हैं भाग जाते;
हाकिम घुड़कते तो पूंछ ये हिलाते हैं।
इन्हें कहें गीदड या हम 'हा हजूर' कहें।
दीखता न भेद कुछ एक सम पाते हैं ।
[ वर्ष 2, संख्या 9-18 अक्टूबर, 1924 ]
30
१. इस कविता मे लीडर या नेता से उन स्वयं सिद्ध लीडरों और नेताओं का
ही अर्थ लेना, जो केवल पब्लिक का धन नष्ट करते है । सबको बबूल
के
कोटे में एक ही तरह घसीटना बाबा बबूलदास का अभिप्राय नहीं है ।
वाचा बबूलदास का शिष्य हेंगादास
परिशिष्ट/85
आश्चर्य
[ निर्मल ]
जिसने विधर्मियो की धुर्रियां उड़ाई और,
जिसने कुशासन को बार बार मसका।
जिसने वहाई शान्ति क्रान्ति की लहर लोल,
'निर्मल' सचाई से नहीं जो नेक खसका।
पार महासागर के जिसका अखण्ड बल,
गोरी गरबीली के हिये में जाय कसका ।
ऐसे वीर गांधी भी दरिद्र देशवासियो को,
पान न करा सके स्वराज-सुधा रस का।
[वर्ष 2, संख्या 14-22 नवम्बर, 1924]
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खाएँगे
[कालिकाप्रसाद 'कमल' ]
पूरे हैं प्रवीण स्वांग भरने मे हिन्दू मोग,
सैकड़ों नुमाइशी ढकोसले
बनाएंगे।
आड़ लेके धर्म की चलेंगे चाल जाल भरी,
संगठन का भी शोर जोर से मचाएंगे।
भाई भाई कहेगे अछूतो को सभा के बीच,
गन्दगी न छूत की कलेजे से हटाएंगे।
धाऐंगे स्वघमियो के हाप का प्रसाद नहीं,
'चाँद पर जूतियां विमियों की पाएंगे।
[ वर्ष 2, संख्या 15-29 नवम्बर, 1924]
. लीडरावतार [ वर्तमान पुराणात्' बाबा बबूलदासेन संगृहीतः, तस्य शिष्येण हेंगादासेन प्रेषितश्च ] पार्वती उवाच कैलासशिखरे रम्ये गौरी पृच्छति शंकरम् । लीडराणांतु माहात्म्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो। भाषाटीका : रमणीय कैलास-पर्वत के शिखर पर बैठी हुई गौरी-जो है सो जाय करके, शिवजी से पूछती भई कि हे महाराज ! मै लीडरों का माहात्म्य सुनना चाहती हूँ, सो जाय करके आप मुझे सुनाइये ॥1॥ शंकरोवाच मूल: शृणु देवि प्रवक्ष्यामि लीला रम्यां सुखप्रदाम । लीडराणां महापुण्यां ज्ञान-वैराग्यदायिनीम् ॥ भाषाटीका : शिवजी कहते भये कि हे देवि जो है सो जाय करके सुनो, मैं तुम्हें बड़ी ही सुन्दर और सुख देने वाली, पुण्य से भरी हुई, ज्ञान और वैराग्य को उत्पन्न करनेवाली लीडरों की •लीला सुनाता हूँ॥2॥ कलियुगे भारतदेशे श्वेतद्वीपसमागताः । कोट-बूट-धराः लोकाः राज्यं कुर्वन्ति वै सुखम् ॥ भाषाटीका : कलियुग में भारतवर्ष में, जो है सो जाय करक, सफ़ेद टापू से आये हुए कोट-बूट धारण करनेवाले लोग, जो है सो जाय करके, बड़े सुख से राज्य करेंगे ।।3।। मूल भारतीयाः नराः सर्वे तेषां चरण-पूजकाः । चाटुकाराः भविष्यन्ति श्वेतांगभपपीडिता.॥ भापाटीका : हे देवि ! जो है सो जाय करके, भारत के सब लोग इनके पर पूजेगे और इनके खुशामदी टट्ट हो जायेंगे और सदा गोरे चमड़े के डर से डरते रहेंगे 1411 अवलोक्य दुर्दशा हपा भगवान्कमलापतिः । गांधीनाम महात्मानं प्रेपयिष्यति भूतले ।। मूल : मूल :
.. परिशिष्ट/87 भाषाटीका : इनकी ऐमी जो है सो दुर्दशा देखकर भगवान् लक्ष्मीनाथ गांधी नाम के महात्मा को पृथ्वी पर भेजेगे ॥5॥ मूल : निर्भयो सदयो गान्धी अहिंसाव्रतमुदहन । भारतोद्धारणं कर्तुं तत्परो भविता लघुः ।। भाषाटीका : वह निर्भय और सदय गांधी, जो है सो जाय करके, अहिंमा- व्रत को धारण कर भारत का उद्धार करने के लिये शीघ्र ही तत्पर हो जायेगा ॥6॥ मूल : तस्मिन् काले महादेशे भारते वायुमण्डलम् । क्षुधं मेघसमाच्छन्नं भविष्यति न मंशयः ।। भापाटीका : उस समय, जो है सो जाय करके, इस भारी भारतदेश का वायु-मण्डल क्षुब्ध हो उठेगा और बादलों से ढंक जायेगा, इसमें कोई सन्देह नही है ।।7।। मूल : शासकाः मुह्यमानास्तु यास्यन्ति निभृतालयम् । पश्यन्नेवेदृशीं देशे लोकानां शुभजागृतिम् ।। भाषाटीका : देश में लोगो की ऐसी शुभ जागृति देखकर, जो है सो जाय करके, शासक लोग मोह में पडकर मूने घरों में जा छिपेंगे ।।8।। मूल : अस्मिन् काले भविष्यन्ति गेहे गेहे चतुप्पथे । लीडराख्या: नराः सर्वे शुक्ल-खद्दर-धारिणाः ।। भाषाटीका : इसी समय जो है सो जाय करके, घर-घर और गली-गली, हर चौराहे पर सफेद खद्दर पहने हुए सब लोग, लीडर बने हुए नजर आने लगेंगे 1911 स्वार्थत्यागं महापुण्यं धारयन् व्रतमुत्तमम् । अहिंसां धारयिष्यन्ति सर्वभूतहितेरताः।। भाषाटीका : महापुण्यमय स्वार्थत्याग-रूपी उत्तमव्रत धारण करतं, जो है सो, ये सब प्राणिमान के हित में लगे हुए, अहिंसा का वा ग्रहण करेंगे 1101 पार्वती उवाच मूल : क्षिप्रं वद देवेश देशदुर्भाग्य दुःखिताः। लीडराः किं करिष्यन्ति ईदृशं व्रतमुद्हन् । भापाटीग: पार्वती ने कहा-हे देवताओं के देवता! आप जो है सो जाय फरक, शीघ्र ही मुले वतालाइये कि ये देश के दुर्भाग्य मे दुःखिन मूल : .
88/ मतवाला को होली
लीडर लोग ऐसा व्रत ग्रहण कर क्या करेंगे? 111
शंकरो उवाच
मूल . शक्नोमि वक्तुं नहि लीडराणां यथायं रूपं शृणु देवि सत्यम् ।
अशेषलीलाचरितानि तेषां सहय-जिह्वो कपनेऽममर्थः ।।
भापाटीका : शिवजी ने कहा-हे देवि ! जो है सो नाय करके, इन लीडरों का
यथार्थ रूप में वर्णन नहीं कर सकता। इनकी लीलाएं और
चरित अशेष अर्थात् जो है सो अनन्त हैं। इनका वर्णन करने
मे सहस्र जिह्वाएँ रखने वाले शेष भी समर्थ नहीं हैं 11211
मूल : प्रगृह्य चन्दाधनमायकातरा: स्वदेशकल्याण निमित्तमात्रकम् ।
क्रमेण सर्व निजलालसाग्नौ दास्यन्ति होता इव लोहरास्ते ।।
भाषाटीका : चन्दे का धन अकारभाव से स्वदेश के कल्याण के ही निमित्त
ग्रहणकर, ये धीरे-धीरे, जो है सो जाय करके, सफाचट कर
जायेगे और अपनी लालसा रूपी अग्नि में होता की तरह सारा
धन डाल देंगे11411
मूल : यदाकदा जेल-समागतास्ते भूयोऽपि सर्वानपि वंचयन्ति,
स्वदेशभक्तिखलु बाह्यदर्शनं निजार्थसिद्धिस्तु यथार्थ लक्ष्यम् ।
भाषाटीका : यदि कही जेलखाने से लौट आये, तो फिर भी, जो है सो जाय
करके, लोगों को ठगेंगे । इनको स्वदेश-भक्ति ऊपर से दिखाने-
भर की और यथार्थ लक्ष्य स्वार्थ सिद्धि ही होगी ।।15।।
मूल : सहस्रशः भान्ति इमेव लीडरा:धूर्ता. नटाः नित्यविवर्तशीलाः ।
प्रवंचयन् सर्वजनान् समुत्सुकान् विहाय लज्जा जयमाप्नुवन्ति ।।
भापाटोका : इस तरह के हजारो लीडर जो हैं सो, शोभायमान होगे । ये
धूतं और नटों की भांति नित्य नये रंग बदलने वाले होंगे। ये
देश की उन्नति के लिये उत्सुक सर्वसाधारण जनता को खूब
ठगेंगे और बेह्याई का पल्ला पकड़कर जय को प्राप्त होगे अर्थात
लोगों से जय-जयकार कहलवायेंगे 116।
पार्वती उवाच
मूल : कथं इमे लोडर-नाम-धारिणः कुर्वन्ति देशस्य हितार्थसाधनम् ।
वद प्रभो श्रोतमहं समीहे विदक्तसम्भूतविचारमालाम् ।।
भाषाटीका : पार्वती ने कहा, हे प्रभो ! ये लीडर नाम रखाने वाले लोग
किस प्रकार देश का हित साधन करेंगे? मैं जी है सो,
मुंह से निकले हुए विचारो को सुनने की बड़ी इच्छा रखती
:
आपके
हूँ॥17॥
परिशिष्ट/89 शंकर उवाच मूल : पुरा शुंभनिशुंभाना सेनानी रक्तबीजक: रावणस्य सभामध्ये ये च राक्षस-पुंगवाः ॥ ते एव सद्यः सम्भूता: धूर्तलीडरसंज्ञकाः । तवंचितो महात्मा सः लुप्तशतिर्भवप्यति ॥ भाषाटीमा :प्राचीनकाल मे जो है सो शुंभ निशुंभ का सेनापति जो रक्त- बीज था अथवा रावण के दरबार में जो बड़े-बड़े राक्षस थे, वे ही आजकल धूतं लोडरों के रूप में घूम रहे हैं । इनसे ठगा जाकर वह महात्मा अपनी सारी शक्ति खो देगा ॥18-191 मूल : ये त्यागिनः सत्यसन्धाः तेऽपि यान्ति पराभवम् । नप्टे प्रभावे लोकानां शासका: उग्रमूर्तयः । पुनः पुनः प्रजापुंजं पीडयिप्यन्त्यकातराः । - लोकानां ताडनं सम्यक् प्रेक्षयिष्यन्ति लीडराः। भापाटीका : [ इन्ही धूतों के करते ] जो त्यागी और सत्यसन्ध होगे, वे भी पराभव को प्राप्त होगे और लोकसत्ता का प्रभाव नष्ट हो जाने पर शासक उग्रमूर्ति धारणकर बारम्बार प्रजापुंज को पीड़ित करेंगे तथा लीडरगण, जो हैं सो, टुकुर-टुकुर लोगों को दमन की चक्की में पिसते हुए देखा करेंगे 120-21॥ : दास्यामि हृदये स्थानं भारतोद्धारकल्पना । न तावद्देवि कल्याणि यावधूतलीडराः ।। लोकान् वंचयिष्यन्ति भाषयन् प्रियभापणम् । धारयन् शुक्लवेशंतु हृदि हालाहलं विषम् ।। भाषाटीका :हे देवि ! हे कल्याणि ! जब तक जो है सो, इस प्रकार के धूतं लीडर, लोगों को मीठी-मीठी बातें सुनाकर अर्थात् जो है सो लच्छेदार व्याख्यान दे-देकर, हृदय में हलाहल-विप रखते हुए भी, सफ़ेद पोश बनकर ठगते फिरेंगे, तब तक मैं भारत के उद्धार की कल्पना को हृदय में स्थान नहीं दूंगा। 1122-23॥ [इति श्रीवर्तमान पुराणे लीडरावतारवर्णने पार्वती-शंकर संवादो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥] [ वर्ष 2, संख्या 17-13 दिसम्बर, 1924] On (1) (2) कच्चा चिट्ठा [ लेखक-मुनीमजी ] आज तक मौज से बहार लुटि वाह-वाह, सबसे कराई पिटवाई घोर तालियाँ। झाड़-झाड़ वक्तृता सुनाई देशभक्ति-राग, गोरी सरकार को सुनाईं खूब गालियां ॥ रेख नहीं भीनी, अभी उम्र है नवीनी, तऊ लीनी सब देश से बधाई अरु डालियां । खांस-खाँस कंठ खोल आफत खिलाफत की, सवको सुनाई और चलाई चक्रवालियाँ ।। कोट डाट खद्दर को, टोप गांधी बाबा को सो, धोतिहू सु-मोटी या लँगोटी बांधि लीनी है। सूधो सो सुबैस यह देखि देम मोहि रह्यो, मीठी-मीठी बातन मे देस-भक्ति भीनी है। सांचे स्वार्थ त्यागी देस-सेवक को पूछे कौन ? लंठ और लबारन की लीला परवीनी है। याही हेत देस सब आँखि मूंदि मूदि निज, वार-वार पलियां इन्ही की भरि दीनी है। जन्म धारि हिन्दू-कुल जाइ जवनों में मिले, आफत खिलाफत की आपनी बनाई है। नाम लिखवायो जाति-पाति-तोड़को में जाइ, खाइ सब संग चुटिया भी कटवाई है। मौलवी के संग इकरंग भए पंडित जू, दग दुनिया है, धूम चारो ओर छाई है। एकता के धोखे एकाकार करि याही भांति, हिन्दू.जनता को खूब जूतियां खिलाई है। खाइ-खाई चन्दा-धन मोटे अलमस्त फिर, घूमते है लाखन में धाक-सी जमाई है। धारि के अहिंसा छिपे हिंसा को प्रचार करे, मेल को हिमायती ह्र रार मचवाई है। गुण्डे कर लूटपाट हिन्दू सब खावं लात, कहाँ है स्वराज? जान आफ्त में आई है। । (4) परिशिष्ट/91 (5) पूछे जाइ नेतन सों हिन्दू और मुसलमान, मेल की दीवार वह कौन ढह्वाई है ? कोक लेवें मोटर बनावं घर-द्वार कोऊ, खावै धन चंदा को निकाला नया धंदा है। नेक ना लजावे ओ बनावं वात भांति-भांति, ऐसो बनि जावं ज्यो खुदा का प्यारा बंदा है । राम ही बचाव ऐसे ढोंगी देसभक्तन सों, अजब अनोखा विकराल जाल-फंदा है। ऊपर सों राम राम, भीतर सों सिद्ध काम, बाहर सों साफ़-साफ, भीतर सो गंदा है। [20-12-24 ] लीडरी रंग गिरगिट-सा बदलता हूँ सभाओं में जनाब । आर्य होकर भी उड़ाता होटलों में जा कमाव ।। मूंछ टेता घूमता हूँ चाभता हूँ माल तर । मिस शरीफा हैं पिलाती नाज से मुझको शराब ।। मारकर चंदा मजे में पेलता हूँ उण्ड रोज । 'स्टुपिड पब्लिक' न मुझसे ख्वाब में लेती हिसाब ।। ''फर्स्ट' श्रेणी का मुझे है रेल में डब्बा 'रिजर्व' । आज कलकत्ता तो कल हूँ लखनऊ का मैं नवाब ।। लाद सिर से पैर तक खद्दर महा मोटा सफेद । मौज से चलता, मटकता, दाबकर इंगलिश किताब । देखकर भौहे तनी 'सर्जेण्ट' की बदूक सी। बीवियों सा डाल लेता हूँ दवक मुख पर नकाब ।। मार पालथी ध्यान बक-सा हूँ लगाता सुबह-शाम । ढोग रचकर साधुता का देखता रंगीन खवाब । लीडरी है इस सदी का सबसे आला रोजगार । इससे बेहतर हो नहीं सकता कोई कारे-सवाब ।। -तूफानप्रसाद प्रेजुएट [ 6-6-25] लाडर लिलीडर: किं न करोति पापम् । देश हितार्थय लीडर शिपाय ।। दिखाई दे रहे है मुल्क में, चारों तरफ लीडर । यहां लीडर, वहां लीडर, जहाँ देखो वही लीडर ।। किसी की है बढ़ी दाढी, किसी की मूंछ गायब है ।। घुटा करके कई सिर-मूंछ-दाढ़ी हैं बने लीडर । जमाते रोव हैं अपना, डपटकर बोलते इंगलिश । जबाने हिन्द से लेकिन, है कोसों दूर पर लीडर ॥ बदन के फेंक कर कपड़े, बगल में दाबकर झोला । खुले सिर घूमते फिरते, अनोखे रूप में लीडर ॥ कई तबलीग के हामी, कई है संगठन करता। कई तंजीम शुद्धि मे, बने फिरते बड़े लीडर ।। कही गांधी की आंधी में, जो हजरत जेल जा पहुंचे। तो घर आते ही आते छूटकर, वे बन गये लोडर ।। बधारेंगे बडी शेखी, य' जनता मे शुजाअत की। मगर मौक़ा पडे पर दुम दबाकर भागते लीडर ।। कई 'एमेलसीयो' ने, लिया है देश का ठेका । नचाते हैं इशारे पर, समूचे देश को लीडर ।। भरे हैं 'कांगरेस' में ये, न चलने दें किसी की भी। ग़रीबों की कमाई पर, उड़ाते माल हैं लीडर ॥ बहस करते रहे दिन रात, कर दें खोपड़ी खाली। न करते है, न करने दें, किसी को काम ये लीडर ॥ पडी है हिन्द की किश्ती, भंवर में डगमगाती है । किनारे पर लगे कैसे, दसाठस भर गये लीडर ।। -एण्टी लीडर (23-10-26) लो सुन लो [कवित्त-घनाक्षरो] रंडियों पं खोल के खजाने खूब खर्च करो, पंडितों को दान दे कलंक अंक लेओ ना। (1 ) परिशिष्ट/93 (2 ) आप तर माल को उड़ाओ सुख पाओ फूल, भूल के चबेना भी स्वबंधुओं को देओ ना। धारे बेटा बेटियों के व्याह मे बड़ाई हित, रकम लुटाओ पर जाति नाव घेओ ना। जाने दो रसातल को खूब सुख नीद सोओ, नाम संगठन के छदाम एक देओ ना। अधम महान् छूत पापी है अछूत बड़े, इनको समाज वीच स्वप्न में मिलाओ ना। लुटने दो लाल ललनायें सरे आम यों ही, जग को विरोध को अवाज से हिलाओ ना। मुक्ति-मार्ग से जो पथभ्रष्ट हो गये हो उन्हें, सच्ची सुधा शांति की स्वधर्म की पिलाओ ना। पिटने दो पद-पद पर परमियो से, जीवन दे किन्तु कभी जाति को जिलाओ ना । फैनी हैं कुरीतियां समाज में अनेक आज, किन्तु कभी साहस से उनको भगाओ ना। मुर्दा जो रहे हैं दिल देशवासियों के किन्तु, जीवन की ज्योति से उन्हें तुम जगाओ ना। हो के हतबुद्धि पथभ्रष्ट हो रहे हैं कुछ, जाने भी दो उनको सुकर्म में लगाओ ना। पायेंगे किये का फल आप ही विरोधी सब, भाई-भाई पर आप प्रेम में पगाओ ना। पड़े-पड़े यों ही पिटो, होकर कूर निकाम । किन्तु संगठन का कभी, भूल न लेना नाम । --कण्टक (इटावा) [7-7-26] (3) दोहा- मनोरमा की सौगात प्पारी सखी 'मनोरमा' ने अबकी होली के अवसर पर 'मतवाला' के लिये बहुत बढ़िया सौगात भेजी है । यह सुदर सौगात संग्रह करने में सखी के उत्त. मोग को जो अनिर्वचनीय कष्ट पहुँचा होगा, उसके प्रति 'मतवाला' अपनी 94 / मतवाला की होली । आंतरिक सहानुभूति प्रगट करता है और प्रेपित सौगात की दीर्घता देखकर सखी की अवस्था का अनुमान करता हुआ, उसके अभिभावकों से अनुरोध करता है, कि 'अब विलम्ब केहि काज !' कोई सुपालन प्राप्त हो तो हज़रत जहूर के ही गले मढ़कर बला टालिये। (1) सौगात का प्रतिचित्र (2) मंजूषा का अग्रभाग (3) मंजूषा का पश्चाद् भाग। 'मतवाले मेरे छीटों से 'शायद तुझे छोक आ गयी । खैर, अब दो-चार बाल सेवा में उपस्थित हैं। इन्ही को लेकर संतोष कर । तू इसी के लायक है । -'मनोरमा' From The Editor Tho Editor 'Matwala' 'Manorama' Bal Krishna Press Belvedera Press 36, Shanker Ghosh Lane Allahabad Calcutta 10 सौगात पर अभिमत [ले० कविकुल-कुमुद-कलाधर कविवर श्री घोंघाकर ] लज्जा की सुलंक तोड़ मूंड फोड़ भद्रता का, सभ्यता को हुकुम सुना दिया कडा-कड़ा। प्रेमी 'मतवाला' को पठाय चौथ 'झोआ भर', शीलता व श्लीलता को खा गई खड़ा-खड़ा । 'धो धाकर' देखि के प्रताप वी 'मनोरमा' का, भय से है कपिता पतिव्रत पड़ा-पड़ा। अभी तो है छोटी जव उमर हो जायगी तो, करेगी यह छोकरी बड़ा-बड़ा 1- [6-3-26 ] 'मनोरमा' संपादक श्री ज्योतिप्रसाद' निर्मल घोर निराला-विरोधी थे। 'मतवाला' के साथ हास-परिहास और विरोध का आदान-प्रदान लगातार रहा । इस प्रकरण में ग्राम्यता का रंग ज्यादा ही गाढ़ा है। 'मतवाला' ने अपने परिहास में कभी शील का अतिक्रमण नही किया। गजब
परिशिष्ट/95
कम्युनिस्ट
[अण्टावक्र]
जाग रे गरीव, जाग ! जाग !!
यह पूंजीपति पापी हैं
त्रिभुवन के संतापी हैं
विश्व सकल यह तेरा है
जिस पर इनका घेरा है
तू है हजार ये चार
तू सिंह और ये स्यार
पार ! इनके चंगुल से-
भाग रे गरीब; भाग ! भाग !!
तू जिस दिन करवट लेगा
इनको इक धक्का देगा
गुल ऐसा यहाँ खिलेगा
जिससे त्रिभुवन महकेगा
फिर, क्यों करता है देर
हो एक
जमाना फेर
लगा दे विषम-विश्व में
आग रे गरीब; आग ! आग !!
[ वर्ष 5, संख्या 1-13 अगस्त, 1927]
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फरियादे 'बिसमिल'
[बिसमिल ]
हमें होता है जाहिर 'पानियर' के भी खयालों से ।
वह आजिज आ गये हैं आजकल अखबार वालों से ॥
खराब दिन करे बरबाद रात कौन करे।
वह कह रहे हैं कि ऐसों से बात कौन करे ।
परीशां रातदिन तू ऐ दिले नाशाद होता है।
कोई ऐसा भी महयो नाल ओ फरियाद होता है ।
किसी को कर नही सकता कोई बरबाद आलम में ।
जिसे बरबाद तुम करते हो वह बरबाद होता है ।।
हजारों मर गये इस कोशिशे बेजा में ऐ 'बिसमिल' ।
गुलामी से कही 'हिन्दोस्तां' आजाद होता है ।
परवा जो 'डॉक्टर' को नही मेरे हाल की।
बेकार पी रहा हूँ दवा 'अस्पताल' की ॥
[ वर्ष 5, संख्या 13---12 नवम्बर, 1927 ]
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जज़बाते 'केस'-1
[शिवमूरतलाल 'कैस' बनारसी]
जेल होगा उसको या कुर्सी मिले दरवार की।
जिसकी जानिब घूम जायेगी नजर सरकार की ।।
गर कोई सच्ची खबर छापी कही सरकार की।
आ गई शामत एडीटर की भी और अखबार की।
चलते हैं जूते यहाँ भी गालियों के साथ-साथ ।
आजकल हालत न पूछो कोर्ट में कुछ 'वार' को ।।
परिशिष्ट/97
गोलियों से कम नहीं है सीडरों की बात 'झम'।
हिन्द को हाजत नही बन्दूक की तलवार की ।।
[वर्ष 5. संध्या 17-10 दिसम्बर, 1927]
शाही कमीशन
[आज़ाद]
बहार आई है पूरे पर कि आमद है कमीशन की।
सबा होशियार हो जाना तवाही है ये गुलशन की।
शफी भूले शफ़कात पर नजर पर गजनवी भूले ।
मनायें घर कह दो चुपके चुपके अपने खिरमन की।
तमन्नाओ की पिचडी 'सर' की हाँडो में पका लेवें।
जो फ्रीडम वेच कर उम्मीद करते हैं कमीशन की ।
पड़े थे रुवावे गफलत में जगाया आप जमों ने।
हमें भी पड़ गई है फिक्र अव 'आज़ाद' गुलशन की ।
अगर होगा कवी वाजू तो ले लेवेगे हक अपना ।
जरूरत अब नही भारत को है शाही कमीशन की।
[ वर्ष 5, संख्या 19-24 दिसम्बर 1927 ]
जज़बाते 'कैस-2
[शिवमूरतलाल 'फैस']
हजारों गालियां खाएँ न क्यों साहेब के दफ्तर में ।
करें क्या ए वेचारे जब गुलामी है मुकद्दर में ॥
यही कुछ वाकयाते जिन्दगी जम है रजिस्टर मे।
छुटे कालिज से तो जाकर फसे साहेब के दफ्तर में ॥
98/ मतवाला की होली फकन इतना ही तो है फर्क पबलिक और लीडर में । फंपा है एक रोटी में और यक कौंसिल के चक्कर में ॥ खुशामद एक करता है और यक हंस हंस के सुनता है । जमीनों आसमां का फर्क है आका में नौकर में ॥ खुदा भी दो नजर से देखता है अपने बन्दों को। कोई रोता है गाडी को कोई बैठा है मोटर में । कोई मजमून लिखता है कोई रुपया कमाता है । न पूछो फर्क क्या है आज कल राइटर एडीटर में ।। जनावे 'कम' फन्ने शायरी आसां नहीं यक दम । बहुत दुश्वार कहना शेर का है रंग 'अकबर' मे ।। [ वर्ष 5, संख्या 19-24 दिसम्बर, 1927 ] न प्रकट 1 तीन आंखों में साम्यवाद [ मुक्त ] मोर- मुक्त हम मम्मति करेंगे अभी गमय स्वयं ही गर पुछ कहतायगा किन्तु, देने पर भी दुहाई हिन्दू-हित की न पोट मिनी के लिए हमे मिल पायगा ।। शागि यो सहर मे भरेगा मय ही या यार यकरापगा। में रितु वह एक भी गयेगा नहीं सामाग्यपाद यहां पं पहरामगा। पति- माहारा frrenागियों में दोर पा न जाय। मुधी इंग को हमारी गुममा । दिमाग एक माट
परिशिष्ट 199
वैभव हमारा दीखता है जो अतुल 'मुक्त'
उसके बढे हुए उदर में समा न जाय।
पा न जाय शासन की बागडोर हाय ? कहीं
'बोल-शिव-जयं' का नाद भारत में आ न जाय ।।
दलित-यातना से भूख की मरे जो जा रहे हैं नित्य
उनको जिलाया, अन्न सूखा भी खिलाया करे ।
अंधे औ अपंग हों जो पीडित अनेक भांति
"मुक्त' उनकी तो दिव्य-कंचन-सी काया करे ।
अपनी बना के स्कीम नाश देश का जो करें
उन लीडरों को सीधा पथ दिखलाया करे ।
देव दलितों का दुख दूर करने के लिए
ऐसा दिन भारत में रोज-रोज आया कर।।
[ वर्ष, 5 संख्या 21-7 जनवरी, 1928 ]
जज़बाते 'कैस'-3
[ शिवमूरतलाल 'फैस' ]
वढ के हैं सरकार मे नौकर मेरे सरकार का ।
कुछ क्लक्टर से नही कम रोब थानेदार का॥
जो न हो जाए यहाँ, यह राज है सरकार का।
काम बी० ए० कर रहे हैं आजकल वेगार का ॥
हो के आजिज कर दिया दरवाजा मुखतारी का बंद ।
हथ होता क्या बतावो आखिर इस भरमार का ॥
नाम ऐ जानां समझ लोग पढ़ते हैं इमे।
आजकल तो है जमाना पानियर अपवार का ॥
माहरेट के नाम से मशहूर हैं पबलिक में वो।
चैन से रहते है जो गुन गाते हैं सरकार का ।।
100/ मतवाला की होली
दस्ते शफकत वो बढा कर फीस करते हैं तलब ।
डाक्टर साहेव से कहिये हाल जो बीमार का ।।
इन मिसों के 'कैस' जो तेगे नजर के है शिकार ।
भूल जायेंगे वो एक दिन नाम भी तलवार का ।
(वर्ष 5, संख्या 23, 21 जनवरी, 1928)
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। जजबाते 'कैस'-4
{ शिवमूरतलाल 'कैस' ]
'लब' का मामला कहां मगरिब में 'डीप' है।
बासो का
'मार्केट' तो वहाँ 'वेरी चीप' है ।
लीडरों का आजकल तैयार है कितना गला ।
तोप की आवाज मे कुछ कम नहीं इनकी सदा ।।
जो म्युनिसपिल्टी के कुछ दिन हेल्य अफसर हो गए।
घर के कोने-कोने में आबाद मच्छड हो गए,
मुफ्त का तो माल है जो चाहिये सो कीजिये ।
भेजकर 'रायरा कमीशन' को कमीशन दीजिये ।।
हिन्द वालों की कहाँ हिम्मत जो मुंह से चं करें।
आप खुद मुखतार है जो दिल में आये कीजिये।
पहनने को 'सूट' और रहने को 'होटल' चाहिये।
और 'हनटिंग के लिये चिडियों का जंगल चाहिये ।
आरजू है एक 'अप टू डेट जेंटिल मैन' की।
रोज 'डीनर' में हमें 'टिमकी' बोतल होना चाहिये ।।
क्या बताऊँ दोस्ती में साहेबों के क्या हुआ।
उनका 'डोनर' हो गया और अपना दीवाला हुआ।
पालिमी से उनके वचना 'कस' कुछ आसां नहीं।
सस्त मुशकिल से है वचता साँप का काटा हुआ ।
[ वर्ष 5, सध्या 24 -28 जनवरी, 1928 ]
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कर्मेन्दु शिशिर
जन्म : 26 अगस्त, 1953 ईसवी
चार वर्षों तक बिहार की उम्र वामपंथी राजनीति
में सक्रिय भागीदारी । एक वर्ष भोजपुर (बिहार)
के गांवों में होल टाइमर' भी रहे। मतभेदों के
बाद साहित्यिक-कर्म में संलग्न ।
कृतियाँ : उपन्यास-कोचान की धार
कहानी संकलन-कितने दिन अपने
साहित्येतिहास-मतवाला-मंडल
संपादन- भोजपुरी होरी गीत (दो भागों में)
• मतवाले की पहक
. 'साक्षात्कार के मतवाला अंक में
विशेष योगदान
• राधाचरण गोस्वामी की पुनी
रचनाएँ
• मतवाला को होली
इनके अलावा हिन्दी को सभी प्रतिष्ठित पन.
पत्रिकाओं में कहानियां, विचारोत्तेजक लेख और
समालोचनाएं लगातार प्रकाशित ।
संप्रति : हिन्दी प्राध्यापक : वी० डी० कालेज, मीठापुर, पटना
निवास । हनुमान नगर, शास्त्री नगर, पटना-800 023
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