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Shree Mayoj Tarang Paheli

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48
श्रीः।
मौज
तरङ्ग-पहिली।
अर्थात
उर्दू फासी के प्रसिद्ध कवियोंके मनोहर शेरोंका
नागरी दोहा सोरठोंमें अनुवाद.
पं० बद्रीनाथचतुर्वेदी एम. ए.
असिस्टंट सेक्रेटरी
ज्युडीशियल बेंच हुज़रदरबार
गवालियर
१७
खेमराज श्रीकृष्णदासके
मुम्बई
"श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखानामें
मुद्रितकगकर प्रकट किया।
कृत.
संवत् १९५५, शके १८२०.
All rights reserved.

, प्रस्तावना. कई वर्ष हुवे तव भाषा सीखनेकी अभिलाषासे Prof. Blackie के उपदेशानुकूल इस प्रकारके अनुवाद प्रारंभ किये गयेथे होते , हरिकृ- पासे इनकी संख्या बढ़ गई और कई इष्टमित्रोंने भी इनको मुद्रित करनेके विषयमें आग्रह किया इसलिये पूर्व विचारके विरुद्ध इस प्रथम तरङ्गको छपवानेका साहस किया जाता है. इस छुद्र पुस्तकमें कोई ऐसा विशेष गुण दृष्टिगोचर नहीं होता जि- सके अवलोकनार्थ विद्रजनोंकी सेवामें प्रार्थना की जाय,परंतु एक बात अवश्य सूचनीय है कि आजकल बहुधा एतद्देशीय उर्दू फारसी के ज्ञाता भाषाको ग्रामीन बोली मानकर उसके अलौकिक लालित्य और अनूठे रस माधुर्य अपरचित रह जातेहैं. इसी भाँति नागरीके अनेक रसिकजन अन्य भाषाओंकी कविताको नीरस और असंसकृत समझके आस्वादन किये बिनाही उसका तिरस्कार करने लगते हैं: आशाहै कि, ऐसे. महाशयोंको उत्त चित होके इस तरङ्ग की सैर करना लाभदायक होगा, क्योंकि गृवं सूचित महाशयोंका एक पृष्ट दोषाच्छादन यह है कि मनुष्यकी इतनी आयुष्य कहां है जो संपूर्ण भाषाओंका यथोचित सीख सके और एक भाषाकी कविताक सूक्ष्मभाव और वाक लालित्य दूसरी भाषामें यथावस्थ कब प्रदर्शित हो सकते हैं ? परंतु हिंदी और उर्दूमें वस्तुतः अन्तर इतनाही है कि लिपि पृथक् पृथक् है तथा एकमें संसकृत दूसरीमें अरबी फारसी शब्दोंका बाहुल्यहै. कुछकालसं एक हमारही आलस्य और दुर्लक्षसे स्थाईभावका सुख भोग रही है, और दूसरी गह्वरमंटकी कृपादृष्टिके कारण प्रतिदिन वृद्धिंगतिको प्राप्त होती जाती है. इसके अतिरिक्त व्यवहार प्रचारादिकमें कोई भेद नहीं है. और उर्दूका अधिकार हो जानेसे फारसी ऐसी सरल हो जाती है जैसी हिंदी जाननेवालेको संसकृत तो फिर ऐसी अवस्थामै अल्पायुका बहाना कैसे चल सकता है. इसीप्रकार दूसरा तर्क भी विचार करनेसे यथार्थ पाया नहीं जाता; क्योंकि वर्तमानकालमेंही हमारी आँखोंके सामने अंग्रेजी भाषाका नमूना उपस्थित है, जिसके अन्यशास्त्रोंको छोडकर केवल साहि. त्यकीही विस्मयकारक उन्नतिका कारण उसके असंख्यात अनुवाद प्रस्तावना। * १ ग्रंथांको कहना अन्यथा न होगा, इस कथनकी सत्यता सहा ही विदित हा सस्ता है. काई उत्तमभाव चाहे जैसी भाषामें भूषित हो रन्तु सच्चे कविके चित्तरूपी रसायनयन्त्रमें पड़नेसे, जहां प्रायः हाल इल विषसे भी अमृत बनताहै, कौनसा अलौकिक पदार्थ प्राप्त होगा यह बतानेकी किसको सामर्थ्य है. महाकवि 'शेक्सपियर : Shakesree के अनेक प्रशंसनीय नाटक इस विषयके जगद्भिख्यात उदाहरण हैं, और आगे एक 'सोरठे' में कहा भी है,- सो०-जाकारजपै कोय, साहस करि बाँधे मर ॥ चाहे शूलहि होय, छोरहि फूल बना कि । यह बात सर्वदा स्मर्ण योग्य है कि सकल उन्नतियांका मूल हेतु भाषा- नति होती है और कोई कुछ कहै परन्तु 'हिंदुस्थान' की तृ भाषा 'हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी' ही हो सक्ती है 'न्य भाषा वा लिपि कदापि नहीं होसक्ती. बडे हर्ष का अवसर है कि बा ई प्रान्तम सबसे पहिले इस विषयका स्पष्टरूपसे बीड़ा उठाया गयाहै ( खो श्रीवे- ङ्कटेशसमाचार, तारीख ५, १२ और १९ नवंबर१८९७ई० का ! प्त स्तंभ ) और हमारे समाचारपत्रोंके ग्राहक अमेरिका, इंग्लंड, जर्मन , इत्यादि द्वीपद्धीपान्तरों में होनेसे उनका परिश्रमभी सफलीभूत हं रहा है. ऐसे२ कई एक शुभ शकुन दीख पडनेसे निश्चय होता है किह री मातृ- भाषाके जीर्णोद्धारका वह सौभाग्यदिवस अब समीपही प्रा । होगया है जिसके चिन्तवन मात्रसे प्रत्येक देशहितैषी पुरुषका व मलहृदय आनंदानिलके क्रीडा स्पर्शसे प्रफुल्लित हो जाता है. इसी शैलीके बहुत एक आग्रहोंके अनुकूल 'नागरीसाहित्र के 'सर- स्वतीभंडार' में यह पुस्तक अर्पण की जाती है. व्यवस्था यादिकमें जो दोष इसमें रहगये हैं उनको पाठकगण क्षमा करैं; यदि ईत्र रानुग्रहले इसकी द्वितीय आवृत्ति तथा इसकी सहचारी 'तरङ्गी' के प्राश कर- नेका अवसर आया तो इन त्रुटियोंके सुधारनेका उद्योग किया जायगा. अन्तमं उन मित्रवर्गीको जिनके उद्देश तथा सहायताले इस पुस्तकके मुद्रित होने की बारी आई है कोटिशः धन्यवाद प्रदानके । हित यह लेख संपूर्ण किया जाता है, लश्करग्वालियर. भाद्र शु० १० भृगुवार सं० १९५५. } अनुवाद कर्ता.

श्रीः।
समर्पण.
दोहा।
श्री अरु जय तित रहत नित, जित यदुनन्दप्रभाव ।
याते सूचित होउ प्रतु, माधी माधोराव ॥
श्रीमहाराजाधिराज !
यह तुच्छ पुस्तक किसी प्रकारकी ऐसी
योग्यता नहीं रखती है जो श्रीमानके चरणोंमें
भेंट की जावे तथापि “पत्रं पुष्पं फलं तोयं"
के न्यायानुसार इसको सत्य भक्ति पूर्वक अर्पित
मानकर यदि श्रीमान् स्वीकार करें तो इस
रीतिसे निज जनके परिश्रमको सफलीभूत
करना प्रभुकी जगद्विख्यात दयालुता और
देशाभिमानके समीप दुस्तर नहीं है.
आपका दासानुदास,
बद्रीनाथ चतुर्वेदी.

श्रीः।
श्रीहुजूर नृपतेंद्र श्रीमन्महाराजाधिराज
श्रीमाधवराव शिंदे आलीजाह बहादुर जी.
सी. एस. आई. ने निज भक्त प्रार्थनाको
९-३-९९ को स्वहस्ताक्षरसे स्वीकृत कर
अनुवादक को कृतकृत्य किया.

S मूचीपत्र। नंबर पृष्ठ. स. विषय. नंबर पृष्ठ..सं. विषय. १ मंगल, हरिस्तुति १२/घ उदारता, कृपणता १६०४० २ विनय १३. ४ च वैराग्य १८२४४ ३ उपासना, धर्म २२ ६ छ जीवन, मरणादि १९४४८ अ पश्चात्ताप, कलुष- ६ आदरसत्कार २२४५४ गर्वता ३३१० अ अभिमान, दैन्य २३१५६ ५०२४/७ सांसारिक गति २४४६० ५ परमार्थ ७३.१८ अ सुख दुःख २५९६२ अमनशुद्धि ८६२२० क अपचय उपचय २७८६८ क सन्तोष,धै र्य १०२२६ ख दया, निष्ठुरता २८५७० ख तृष्णा लोभ,अधी- ग नरपरिक्षा २९५७२ रता १३०३२ घ शत्रु मित्र ३०६७४ ग सम्पन्नता, दारिद्य १४१३४८ टिप्पनी ४ ज्ञान ITAprotoxi

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श्रीवैकुण्ठपतये नमः।
Mutaniwoman

(२)
श्रीगणेशायनमः ।
१ मंगलाचरण।
मान
हरिस्तुति।
दो०-ज्यों को त्यों तुहि लखिसकै, एती काकी सूझ ।
१-जेती जाकी सूझ है, तेती ताकी बूझ ॥
दो-तोहि बिलोकि सुकछुलख्यो,इन अँखियनलौलीन !
२-पलक रसन पलछिन रटन, हमकत नयन विहीन ॥
सोग तिल यह विस्तार, वाही कारीगर दियो।
३-जल थल विम्ब अपार, सहजहि जाय समाय जिहि
दो०-सुमन सुमनबन श्रवन बनि, पियत सुधारस बैन ।
४-मन २ रसना बनि भजत, पात तोहि दिन रैन ॥
दो-तेरीही धुनि मगन द्विज, करत शंख घनघोर ।
५-तेरे सुमिरन महजतन, मचत अजाँ को सोर ॥
दो० मूरत से इनसान की, दरसत तेरी सान ।
६-होत लिखे अखरान ते, अर्थ रूप परमान ॥
दो-जित देखो तित कहत सब, तोहि अनादि अनन्त ।
७-दिशिरतुव महिमा उदधि, उमझो अमित लसन्त ।

(3)
بم
ایمان الی۔
ناسخ
۳
امی
ترا چنانکه وی به نظر کا بیند
بقدر پیش خودم کے گنداواک
میری نمونے تھے کہ کے وہ پھر کیا
کی زریابی شہ پر شکوہ ہے بیتال کا
وہی صانع ہے جس نے انکمہ کے تلین پیر وسعت دی
سما جاتا ہے بہین عکس صدیاکوس میدان کا
گلستان میں کلون کے کان میں آواز پرتیری
برانکر نفی کرتا ہے ہریت تربان ہو کر
تیری ہی دین می ناتومی برمن کمتال سے
تیری ہی یاد میں ہے بدن میں لاقانونه
کے بیان حلوہ ترا انسان کی تصویر سے
صورت معنی ہو اس لفظ کیتے
جان و کیوان اقرا رب ہے تیری تعالی کا
ہراک سو موج زن ہے برتری کی ایک
الینا
ووق

(१)
मौज-तरंग पहिली।
"
दो०-धनी ऋणी इक सारिके, याडयोड़ीके दास ।
८-सो जाधे कंगाल हैं, जाये जिन के पास ॥
सो०-दान उदयिते नाथ, कौन सनाथ भयो नहीं।
९-मुहर मीन अँग साथ, सीप हाथ मोती भरे ।
सो०-छबि सरिता भइ गंग, तेरी किञ्चित झलक सो।
१०-जो कोउ लखत तरंग, समझत ज्वाला तूरकी ॥
दो०-दरदर भटकत नहिं फिस, मैं ही खोजत तोय ।
११-चन्द्र भानु निशदिन भगत, मानहु फनि मनि संय
२१-जरठ पुनको गमन लसि, अयोचित परकास।
१२-करत निवलको सबल है, तेरी नित्त तलास ॥
२ बिनय।
१३ सो०- नाथ! दानदे भोहि, पुरुषारथ उत्साह अस्व ।
१-राजी रायूँ तोहि, रहूँ मगन इहि मौजमें ॥
१४ सो०-घट २ तेरो बास, जो तू होय प्रसन्न कहुँ ।
२-जगार कृपा प्रकास, अनायास मो पै करहि ।
१५ दो-कौन लगाव मोहि मुँह, तू जुन पूँछ बात ।
३-परछौंई लौं मोरि मुख, मुकर मुकरमें जात ॥

(4)
मौज-तरंग पहिली।
۸
Gio
سپروسنے کیا انگ کو دریا نور کا
درویش وغین بنده این خاک و رائد
آنا نگر غنی تراندخت چتر اند
کس زیف برودت درمان مردم نیست
پشت ما بی پدرم شت صدف پرگولات
جسے دیکھا کہ کو کیا دشت لالو کا
آوارہ اک ہمین نه فقط در برپے
کیاگیاتری توست میشمس و قریے
یہ گرین فلک پیسے ہوانات
قومی تعین کرتی ہے جستجو تیری
پاسخ
}}
آتش
مرايات
تمامی
عنایت کیسی ہے وہ قومیں اور غرم مردانه
رسیون تیری رہنما جو ان کی عمر میں دل سے دیور
سب کے دل میں ہے جگہ تھی جو توراضی ہوا
جیپ گویا اس زمانان ہوجاے گا
من کا رس کو نکال کر پیچھے نو بجے
عکس جی ویتامین بے آئین میں روٹھے
قالب
سور
مع المسلحة المنتج

(६)
मौज-तरंग पहिली।
१६ दो०-पाचन तो रूसे नहीं, मो सों हे भगवान!।
४-रूसे चाहे और जो, होत न मेरी हानि ॥
१७ दो-छमा दाम ही देत कह, औरहु कछु दै जाउ ।
५-जबहिं आप गाहक भये, बढ्यो पापको भाउ ॥
१८ दो-जो पूँजी मो पै रही, दई सौपि सो तोहि ।
६-अबतू आप सँभारिले, घटी बढ़ी जो होहि ॥
१९ दो०-पंथ बताउ, बटाउ दुख, सकल कलेश नसाउ ।
७-उचित होय सो करि सबै, मोसों जिन कहिवाउ ।
२० सो०-दुरी न तोसों नाथ, जो बदरी मन कामना।
८-यह बदरी को माथ, और पौरि तेरी यहै ॥
२१ दो-हों अति चाउ प्रणामसे, भयो फरश इहि द्वार ।
९-परछाईं सम सीस सों पगलों वन्यो लिलार ॥
३ उपासना, धर्म।
२२ सो०-वासों मिलन न होय, जोहू निज करतूत बल ।
1- तोहू चहिये तोय, बस भरि करिबोजतन मन ! ।।
२३ दो-हरि सेवा चितलाइये, नव तरुणाई पाय ।
२-सूखिजाय जबलाकरी, किहु विधि नाहिं नवाय

( و )
मौज-तरंग पहिली।
تناسخ
یی
ور
حی
می زمن معده من نرنید
برخور سرکہ بد برنجد
نقد رزین فقہ کیا تو مجھے کچھ اور بھی
تم ہوئے ہوشتری یان زنیان بیا
پردم تو این خویش را
تو این حساب کم و بیش را
میرابادی میرا موش ہو پر غور بات ہو
جو ہو نا چاہئے وہ ہوتا ہوا مجھے کیا تو پو
مخی زمین سے تجھے تنائے احمدی
یہ تیرا آستان۔ تھے یا احمدی
اس در پشوق سجدہ سے فرش زمین ہون من
انسانی سر سے قدم تک حبین ہون مین
و عبادت وعدل
گرد وصالش به یکیش بود
نقد رایدل کر وان کوش
مینو باریجوانا طاعت کن
کپور خشک پوردبین میرود
}
ووق
داراشکوه
}
سرم
صائب

(८)
मौज-तरंग पहिली।
२४ दो-विहसत बदन दलायको, बदरी ले सिर भार ।
२-जो सांचो करतारको, है तू ताबेदार ॥
२५ सो-भौं सकोरि मत मीत, पहुंचे आय बलाय जो ।
४-मली न मूंदन रीत, दर अतीत दैवी विमुख ।
२६ दो०-आयसु ते तू ईस की, बदरी नारि न फेर ।
५-जो फिर फेरें नारि नाहि, कोऊ तेरी बेर ॥
२७ सो०-सुर समाजके काज, जेते नर सब करि सकत
६-करि न सकहिं सुरराज, पै नरके करतव्य जे ॥
२८ सो सुरसद सकिये पाय, पै निज पौरुषते नहीं।
-याको अवस उपाय, हरिजन को सतसंग है।
२९ दोलोजन जीवन हेत अरु, भजन करनको साज
८-पै तेरे मन तो ठनी, जीवन भोजन काण।
३० सो-कार अपनो करतव्य,अरुबिशेष जिन चाहि क ।
९--तिसना थोरी साय, नीकी सेवा अधिकतें ।
३१ दो-इलि कोपको राखिमत, किरपाहोप गँवार ।
१०--दामन भरी पयोधके, लखि दामिनि चिनगा
३२ सो०-धरम न्याव करि मीत,तो परीकविच फलमि ।
११-जो उपासना रीत, दै न सकहि सौचरस में। .
-

(3) -ir rf 1 ۲۳ فیضی صائب ۲۹ زوق ۴۸ با بروسے کشادہ بلا را پذیرا شو معبد و اگر بودیت اندرکی چون بایسے میشورنازل خزانین بین در بردسے اغيب بتن خوینیت تر کردن انوار اور پیچ کردن نوری در توییچ جو رشتے کے بین کر سکتا ہے انسان بھی پر فرشتوں سے نو جوا ہے انسان کا تو خود فرشتشو از خویش توان شد بر تک محبت خاصان کردگار بود خوردن میراسے لیت و در کرمان است تو تنقید کیت ترک خوردن است فرض یا ار و پیش از انگلہ مصر کے طاعت بسیار به اور فقیہ سے ہو سکے اور مرید کر تعلم ہے شرار برت سے دامن سحاب کا عدالت کی که در دل ان کیساعت بدست آید مینیت در هفتاد سال اہل عبا دست را نیرو وم سی افیسرو اسم سور الم صائب

(१०)
मौज-तरंग पहिली।
३ (अ) पश्चात्ताप, कलुषगर्वता
३३ सो०-बदरी सकू न आंख, न्याव हाटके भावक ।
१-पाप पोट मो कांख, छमा दाम कर रामके ॥
३४ दो०-लेत दयानिधि की दया, रोये धोये पाप ।
२-सौदा घटिको लाभ से, बिकत सींच हग प
३५ दो-असित मेघ सित जातक्षै, बितरनके गुनतात् ।
३-त्योंही निर्मल होत मन, अरध निशा असुप ।
३६ दो-है काबेकी आबरू, जो जमजमको सोत ।
४-तो मनमन्दिर स्वच्छता, नम अँखियन सोई त
०-बालक रोवत जात, खोय बाट निज सदनव !
५-मैं रोऊँ किन तात, खोय दियो सदनैसही ॥
३८ दो०-बिन औसर वरषा भये, होतन खेती हेत ।
६-बूढ़े पनमें लाजमय, अँसुवाका फलदेत ॥
३९ सो-खाली सीस दवात, यदपि सियाही सो भई ।
७-लिखत अजहुँ पैजात, सिसुलों पाटी पापकी ॥
४० सो-जरा झराये दाँत, हरि सुमिरन मनना दियो
टखेलि बालकनि भांत, सुमिरन दियो हिरायसो
३७ सो

-in qfe 1 (۹۹) ووق ۳۴ صائب الضا انفعال نادری قدسی نان چون شو وسواسے بازایا اونقاهرش بکن منیر عصیان ونیل خریدار اس کی درست و عصیان کی ہے رو سے پڑ کر پیتا ہون تنفع سے سوراخسارے کا ریش سفید میکندای سیاه را به ۳۵ روشن شودول از شب گریستن آبروے کعب را همیشه زمزم بود کعبہ دل را صفا ازرویه ی خم بود چون نریمان کی صاحب غازیگم کردم باران بےخل تعد مرتفع شت را پر در وقت پیری اش ندانست چه میکند سری رشتی سیاسی دواتر مشق که منو چواطفالن میلیم زپری نیت دندان تداوم آن با ورق بازی آخر این بی چون اطفال کم کردم اسم طفل منگریو همراه خانه راگر مین مسم وع غنی الفا .م

(१२)
मौज-तरंग पहिली।
४३ सो०-परै चूक बनि जोय, भाजि लाजकी सरनग ।
९-चूकत विथा न होय, दूतर यह अपराध ह ॥
४२ दो०-अम्बर तर अम्बर नहीं, भलोदिगम्बर छोर ।
१०-कारन या पोसाकमें उलट सुलट दुख थोर ॥
४३ दो०-सूखो ज्ञानी मूरसहि, पंथ बुझावन जोग ।
११-बाट टटोवत लकुटिल, निपट आँधरे लोग ।
१४ दो-ब्रह्मवेचा बावरे, स्वर्ग हमारे भाग ।
१२-पापिन के ही सीसपै, लसत छमाकी पाग ।
४५ सो०-दृग मरोरि जिन जोय, कर्म हमारे कर्मठी।
१३-बरषत करुना तोय, इन कारे बदरानते ॥
४६ दो०-मेरे पापी होन को, प्रभु दयालुता हेत ।
१४-मेघ मोहिं मद पानको, करत रहत संकेत
४७ दो. नरक अनलते कबडरहिं करहिं जुनितमदपान
१५-पावक ख पंछीनको, ज्वाला सुमन समान ॥
४८ सो०-मोर प्रफुल्लित चित्त, तपन नरक सकुचाउँन
१६-गुलअनार रँग नित्त, रहूँ आँचमें लोह निति ॥
४९ दोकाने पहुँचे सेखजी, पाहन चूमन सौक ॥
१७-सब बुत चुम्बन जोगहे, जग मन्दिर में जौव ॥

(93)
मौज-तरंग पहिली।
ہم
سلام کا بینا عصارا راسے تولیشی سازد
چون خطاسے از تو مزدور پیشانی گرنی
اخطانادم نگردیدن خطاے دگراست
کے بیان سے بہتر کوئی دنیا میں لباس
یہ وہ جام ہے کر جانشینید با
من از این شکایت رہیے تنیان را
صائب
بهم
تی
مان
کمی
نصیب ماست شت او خداشناش برو
کمسی را متناسا ر آئندہ
بچشم کم ہین در نامه اعمال ما نامور
هم کمی با موازین و بری باران حجمها
رحمت حق سے میری گنگار
ابر کر اسے اشارد سینے میخواری کا
بادہ نوشان راغنیا اتش د وریخچه پاک
34 شعلشان گل بود مرغان آتش خوار را
ہوں وہ شافت وایند و در زمین تنگ ہون
ان کی طرح آگ مین بھی لال رنگ ہون
وم
ماست
Grie
۲۷۸
وق
زوق پورت تمایل بوسہ اس قانین

(१४)
मौज-तरंग पहिली।
४ज्ञान।
५० सो०-हरे द्रुमन के पात, ज्ञानवानकी दृष्टि में ।
१-पात २ दरसात, ब्रह्म ज्ञान की संहिता ॥
५१ सोबदरी जो खुलजाय, मत अभेदको भेदतुहि।
२-अजब रूप दरसाय, फूल मूल फिर लखैतो॥
५२ सो०-कनिकाहै खरियान, बूंद विपुल सागर हमें।
३-सूझत अखिल महान, चमतकार, लघु अंसमें।
५३ सो०-बुलबुल देखन आउ, गुल धंघट पट भानु मुखि
४-बौरे क्यों चित चाउ, भयो तोहि पटसों निपट
५४ सो०-अचरजकाजु पुनीत, दुयो रहे मुख मीतको
५-बीच उठाई भीत, मेरी माटी मूठि भर ॥
५५ सो देखहितो चलि देख, बदरी वह पीतम अलख ।
६-दीख परत सत पेख, चित्त झरोखा झिरीते ॥
५६ दो०-सब कछु वासों लखत वह, लख न परतज्योंदीठ
७-नयनन ही में रहत पै, नयनन रहत अदीठ ॥
५७ सो०-देखहु बदरी नाथ, देत बड़ाई लघुन को।
८- गतिल कियोसनाथ, ना अपार जिहिमेंदिसत

(۹۶)
मौज-तरंग पहिली।
بابیل بندرپردگی آفتابی را
م موفت
برگ درخسانہ نور نظر ہوشیار
پوست و تربیت معرفت کروا
کل تامین کے معنی توحید ارتش
پھر دیکھے تو دکھ میں گل و نایب روی
دانه نورمن ہے ہی قطرہ ہے دریا کو
وق
آنے سے ہی نظر کا تماشا کو
سی
ترش
معنی
وق
چرا از سادگی حبوب خود کر دی نقاسی را
کیا عجب پنهان و روسے شاہ مقصود ہے
و من دیوانی میریشت ناک نے
ریکہ اور کیا دوں کہ وہ پروفشین
ویدیو روزن سے ہے دکھائی دیتا
سب کو کیا اس سے اور اسکو نہ کیا ہون نگاه
ود را آنگون مین اور تکمون رومانی ر ا
کہ چھوٹون کوسے الت برای دستیا
انسان آنکه کتل میناہور ہائی یا
هه

(१६)
मौज-तरंग पहिली।
५८ सो-आपकरत प्रतिरोध, तू अपनो जग मुकरमें।
९-कौन हतो जुबिरोध, तो सन धरतो नाहितो ॥
५९ दो-ध्यान धरत जब मीतदो, आपुन परत दिखाय
१०-नयनन सनमुख होतही, मनदरपन बनजाय ।
६० सो-तोसों बाहिर नाहि. जो कछु या संसारमें।
११-आप आपुतो चाहि, जो चाहे ह्या है तुही ।
६१ सो०-हीं ऐसो दारेगाव, प्रति बुद २ महलोक जहँ ।
१२-डुलत तरंग सुनाव,तुरत नयो सिरजत जगत।
६२ सो०-परछाई लों धाय, फिरूँ संग श्री अंगके।
१३--जानें ना लपिटाय, रहूँ बिलग याते सदा॥
६३ सो०-सुमन सुगंध सुरंग, वासों मम संबंध तस ।
१४-रहत परस्पर संग, उड़त फिरत पै एकनित ॥
६४ सो०-मोहन करत निवास, मोहूतों मेरे निकट ।
१५-यह अचरज दुख रास,दूर रहति मैं कूर नित॥
६५ सो-कासों कहूँ सुनाय, कहा करूंरी पीउ तो।
१६-मेरे अंक सुहाय,पै मैं विरह विथा सहूं ॥
६६ सो०-पलछिन आठहु याम, रहत हमारे निकटजो।
१७-सो पूरन सुख धाम, सदा इन्द्रिशनको अगम।।
marwammam

( و ) sat ft روق ناسخ ۶, ناسخ آپ آئینیستی میں ہے تواپان ورنیان کون تھاجویامقابلوا جب تصورارکاباند اتو ہم اسے نظر سامنے آنکھون کے آئینی اولوا بیرون تو نیست اینچ در عالم ست از خود بیلاب برای خواہی نہ ہوئی ہوں وہ دریا جسمیں سے ایک وشاغل یاب گئی ایک بم کجانی مانته ان کے منہ ای کی مانند وین سچی کہ ان کی ہی نہیں آتا جب میں اس میں باہر و با رنگ بزرگی وہ را آغوش بین نگین گریزران ہی را پارنزو تراز من این است دینی ترکی نازوووورم من با توان گفت که او در کتازین و منسجم بوجود سے ان جونزدیک ہارے وہ دوگانوی حقیقت این پرور زوق ۶۲ مر الفا مه سعدی ايضا زینت

(१८)
मौज-तरंग पहिली।
६७ दो०-नाथ अचंचो कौनयह, सूझ बूझ एहिठाय।
१८-दौरी लाख सकी नहीं, आपुहि आप लॅपाय ॥
६८ सो०-अली बुद्धि सँग जाय, एकगली लयग्रामकी।
१९-तरकसूर अरुझाय, तार २ अँचरा भयो।
६९ सो०-रहे मनोरथ दूर, फँस्यो जायमन तरकवन ।
२०-मानिन सेनी कूर, ऊँची नीची भूमिको ॥
सो०-के हो परम सुजान, कै रहु निपट अजान तू ।
२१-जाइँ प्यासते पान, मृम तृष्णा बीचकी ॥
७१ सो०-भाषत विष विचार, सेख विशेष भनतवहे ।
२२-दोउन एकही सार, बोलीको कछु भेदहै ॥
७२ दो-चन्द्र भानु अलिरैन दिन, पल छिन चैन न लेत।
२३-यह फिराकमें कोलके, फिर २ फेरीदेत ॥
५योगपरमार्थ।
७३ दो०-जग उपकार निवार अरु, नहिं परमारथ बाट ।
१-माला आसन गूदरी, वृथा बनावत ठाट ॥
७४ सो०-देखहु अचरजनैन, बसीटेरीकहत सदा ।
२-बोलतलकरीबैन, सुर साधक की फूंकते ॥

(98)
मौज-तरंग पहिली।
۶
ورو
۶۸
۶۹
Go
باربی کی فلم ہے ادراک و تمرین
روپے مزار پر باہر جاکے
اعقل شهنی کوچر از بیخودی
شد ریشترینها لم تخار نستدلال
ولی باستدلال بتواند از مقصودور
شریان کردم تصور راو نا ہموار را
قدم برون منازل افلاطون شو
که در میان گزینی سرا و آنالیت
چوہے کام شیخ وہی قول بهمن
مطلب وا کی فقفقا وافاتها
نوشیرواہ میں پھرتے ہی کتا بون
، یکی بتجومین اواره بین
وفي
ناسخ
سمیعی
طرقت بزن دست نت نیت
تبيع وتباده ولی نمیت
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ني

(२०)
मौज-तरंग पहिली।
७५ दो०-साँसा आवा गमनको, जो तू करै बिचार ।
३-श्वास २ पैकरि सके, स्थिति प्रलय बिहार ॥
७६ दो०-अजब असत्ताको डगर, जो यह पंथ चलाय ।
४-पूरब गामिन सों मिलै, एकहि डगमें जाय ॥
७७ सो०-है यह मारग सोय, जिहि पहुँचै हरि लोकनर
५-द्वार हियेमें जोय, याजगारी सिखिरको ॥
७८ दो-हियकपाट खोलन चहत, खट खटाउ अधिरात
६-यातहोत सबदर खुलत, पैयहदर मुँदिजात ॥
७९ दो०-विषय बासना पुष्ट अति, होत बुढ़ापे वीर।
७-या नागिन बट पारिको, केस धौरई छीर ॥
८० दो-काम कोप मोहादिके, दिन २ क्यों वशहोत ।
८-देउ घटाय अहारकिन, बल पकरै जियजोत ॥
८१ सोतन मन कियोन धूर, है जातोअक सीरजो।
९-रसायनीकूर, पारो मारो तो कहा ॥
८२ दो-फुक्यो चपल कंचन असल, ताँबेको करिलेय ।
•-जोचंचल चितफुक सकै, जानैका गुनदेय ॥
८३ सो०-गये चित्त मुरझाय, ऋद्धिसिद्धि केहि अर्थकी ।
११-मुरदा जल उतराय, पैको मानै सिद्धतिहि ।

(8) st wfet | زوق ، ان قدم مین پی قدموں کی برابرہوگیا پاسخ ایضا 4 وائی فاك ۷۸ غافل بودم کی آمدوشدسے ہو وہ تو مردم سے قبل وجود و عدم نیب سبب راه عدمی جو اس راوین ہے یہ راہ کرتا عرش پونیاش ولین دروازہ ہے اس گازگاری کا در دل نیشان کوب چون روز شود هورا کشایند و در دل بندند زیادہ ہوتا ہے پری مین فرض اماره بالوں کی سفیدی ہے اس کارنین کو نفس امارہ سے کیون زیواچاہتاہے زورکر روح میں نقلیں قداس پیا دارا کو توخاک ہواک پنهانا ۸۱ گرایوے اکسی گرما اتومایکل سیماب خاک ہوس کو عطا کرے اورول ہوتا ہو تو کیا جائے یاکے خرق عادت کے بار آید دل افسردہ را ۸۳ گروو باب نتوان معتقدشوا زوق و، صبا زوق ایضا Gid

(२२)
मौज-तरंग पहिली।
८४ सो०-तरबरलचिलचि जाय, दव्यो भार उपकार फल
१२-फलसों हाथ उठाय, याउपवन में सरोवनि ॥
८५ दो-नहीं कामना बन बिषै, बाघ बीगभयदाय ।
१३-तो ही सो ह्याँ उठि लगै, तेरे संग बलाय ॥
५ (अ) मनशुद्धि।
८६ दो०-पूँजी चित्त प्रकाश की, निबल मिताई होय ।
१-मधुज मेल गुन सूत पद, सभा दिया की लोय ॥
८५ दो०-जतन यहै मन सुच करन, उठे न अनरसभाय
२-इहि दरपन नत कीठ द्वै, बैंठि अवस यह जाय ॥
८८ दो०-जाको मन होवे अमल, बढ़त घटन ते सोय
३-देखौ मोती जात बन, सूखि २ कन तोय ॥
८९ सो०-कनकनमें दरशाय, भास भास करको प्रकट ।
४-जो मन मल मिटि जाय, माटीमें दरपन मिलै ॥
९० सो०-निरमल मन तिहि जान, दरपन सम जोलेय करि ।
५-अपने विषे समान, हित अनहित सब भाँतिके ॥
९१ सो०-बिमल भक्त जन टेक, दरपन लौं भन धरै नहि।
६-नीक अनीक बिबेक, तासु करहिं जिहि पाहुनो।
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( 33 ) r- net | صائب ۸۴ فنی ۸۵ صائب دنبال خم از بارنت شماست ۸۴ قبول کرد و این استان باش درشت آرزو نبود بی ام و دو رابیت اینکہ ہم تو برائے تو ۵ دالف) صفا و روش قلب دوستی با ناتوانان ایر وشدلی ست سومین بارش ساز شعف میشود کر دی جائے گی یاضرورت اس آیین بیان کر زوق شفاودگی بھی ہے عورت کو والدین نے نوکورت تنزل میں ترقیات کے واسطے صفا کھلونا ہے موت تک قطره آب کا میتوان دبیزیم در نوع خورشید ۸۹ و گمان شوروے مینائیت روشن کر کسی است که خوب و زشت را شتن چائینہ ہوا کرده است صائب تر ہی نونی و شتی سے غرض آنی وار گمی جهان جے ای مفاسنے رکها مم Gic . و ,و ووق معلم

(२४)
मौज-तरंग पहिली।
९२ दो०-लोक चक्षु लो एक चख, देखत सबको मीत ।
७-भले बुरे दोउ न मिलत, बिमल हृदय जनरीत ।
९३ सो०-बुरो जुदृष्टि समाय, तेरी तौतूहै बुरो।
८-नीको तोहि दिखाय, है आछो तोहू तुही ॥
९४ सो०-जिन चित स्वयं प्रकास, दुरिन सकहि जग भेषमें
९-दीप सिखा सुचिरास, दिपति चीर फानूस मधि ॥
९५ सो०-मन उजास कब होय, बसे देह तम गेहके।
१०-बाती लेय न लोय, जौलों साचे में रहै ॥
९६ दो०-निरमल मन तिहि जानिये, तत्व बेचा जोय ।
११-बिमल मुकुरकौ को कहे, रूप दिमानो होय ॥
९७ सो०-निरमलता जब होय, आकुलता चहिये अबस।
१२-निरमल दरपन जोय,चपल लगत उपयोगतिहि ॥
९८ दो०-मल बिन निरमलता सुछवि,फल नहिं देय कदापि
१३-मधु समीरदरपन लगत, उपवनकलई थापि ॥
९९ दो-बिमल मन जनन मिलनगुन,मलिन असितहियहोय
१४-लगत मोरचा लोह तन, परसत निरमल तोय ॥
१०० दो०-देखु सरोवर मुकरमें, नजर न भीजत पायें ॥
१५-जिन्ह पवित्र मनवसनते,मल जल मधि असजाय

(3) मौज-तरंग पहिली। زوق ۹۶ الضا ۹۳ عی شیشی ایک تحریک کے روشنفتے کی نیک و بدسين ہے وہی نظر یا اگر بکوبرا تو اپاہوریتی علوم کا پانی کب بام دنیوی میں پینے میں روشن ضمیر جام فانوس بین بیشعلیمیان ہی را دل نور کے شو دولت آباد بن ۵ و شمع را روشن نیسان تارقالب است دل صاف ہو توها بی معنی پستو آینا صان صورت پرت ہے ہے صفای اصل توتا بھی ہے ابدال ضرور صاف ہوگی محتاج ہے یاب لطافت بے کثافت جلوہ پیار نہیں سکتی ۹۸ چہرہ نگار ہے آئینہ بار باری کا صحبت صافی دن سے ہون کہ رتیوول ۹۹ بیگ سے آلودہ ہوجاتا ہے ان کی مین چنائینین كنب تروا پائے گاه اسطرح جانتے ہیں کہ ایک اس کین وو روتی ناسخ الب زوق ايضا

(२६)
मौज-तरंग पहिली।
१
१०१ दो०-यह बिलास जल बुन्दको,जाय तोय निधि खोय
१६-दरद बढे मर्यादते, आपुहिओषद होय ॥
५ (क)संतोष, धैर्य।
१०२ सो०-बीर धीर सन्तोष, मन दरपन रोसन करें।
१-हरै हीय तमदोष, जौकी रोटी चंद्रसो ॥
१०३ सो०-घेझर नीकी तोहि, भरे पेट गुन लगै नहिं ।
२-मेरो प्रीतम होहि, तेरे जान कुरूप जो ॥
१०४ दो०-रहे अघाने जनम भरि, लै सन्तोष सवाद ।
३-सदा बरत दीनों सदा, हरि इच्छा परसाद ॥
१०५ सो०-सुख दुख हैं सब ठौर, जो कुछहै सबहै भलो।
४-वाहीको सुख और, है वाहीको दुःखहू ॥
१०६ दो०-जग बगियामें सुमन की, तृप्ति ईर्षा जोग ।
५-एक बसन दिन बैक को, जीवन डारो भोग ॥
१०७ सो०-हरि इच्छाके बाग, कदम सरों समगाढि दृढ़।
६-हेर फेर दे त्याग, मौसम शिशिर बसन्तकी ॥
१०८ सो०-ौसकोरि मतयार, आपति बात प्रचंडसे ।
७-सागर क्षोस अपार, मोतिन पानी थिर रहत ॥

(یہ )
ms-a wfet |
عشرت طوہے درامین قنا ہوجانا
در واحد سے گذرتا ہے دوا سوجاتا
الب
قناعت و صبر
۰۲
Gic
سعی
هر )
روشن قناعت شود این باطن
بار ہے کہ دل افروز یونان جاینت
اسے اسیرانان ونوش زنان
۱۰۳ شوقین استان اردکان شتت
قناعت کے طے نیتا کہ کو
بانوان توکل پرطرفتیبانی کا
ہو جاخوش و ناخوش است نیکوست
با شادی اودست ياعم اوستہ
بار جان مینگل کی سماعت ہے جائے ٹیک ستش
و روزهای تب مین تم کی
چون سرو در مقام رضاپایدار باش
برادو را نقداب خزان ویار باش
زندادارن پی ببن زن
در جواب گرد قرار باش
ملیریا یا
و ۰
صائب
ايضا

मौज-तरंग पहिली।
१०९ दो०-समुहे विपति प्रवाहके, मुख नहिं मोरत बीर
८-सूधो पैरत सिंहहै, धारा नीर गंभीर ॥
११. दो०-अनावृष्टिके कालमें, मोती जल न सुखाहि ।
९-निस्प्रेहीको सूमता, ननकी सालत नाहिं ॥
१११ सो०-बांधी निज करबीर, मेंहदी अस सन्तोषकी।
१०-बसि समुद्र जस धीर, मूंगा मोती छुवे नहिं ॥
११२ सो०-संतोषी मन नाहि, चिन्ता औ सन्ताप मग ।
११-तृप्ति जगतके माहिं, कौन भिखारी होवहै ? ॥
११३ सो-वींची निज २ ओर, जो २ जा मन कामना
१२-दोऊ हाथ सकार, मैं दै राखे काँखमें ॥
११४ दो०-आज्ञापालक दास चित, नहिं जग अनहित दाग।
१३-अगिन भई नमरूदकी, इबराहीमहि बाग ॥
११५ सो०-चित्त तृषा सों जोड़, गगन कटोरामें सलिल ।
१४-गरे करे जन छोड़, और नजर काको परो॥
११६ सो०-जाके मन सन्तोष, ताहि असन निज करन नित।
१५-रहन अँगूठा चोष, बालक पय पाये बिना ॥
११७ सो०-माखी सहजहि जात, फँसि मकरीके जालमें।
१६-त्यागीके कर तात, असन बसन लगि कल्पतरु॥
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(32) मौज-तरंग पहिली। ind ۱۰۹ پتلی حوادث سے مین دوغان وق فیدراتی ایسے وقت رفتن آبين شمالی گمرکی نمی شود صائب ۱۱۰ مجال فلک ابر قناعت کچھی کنند دست نوچان بنائے بے نیازی را که چون چیدمان را درمان می گیرد در دل بے آرزو را هم تشویشن میت صائب در جهان بے نیازی کیں درویش نیت کشیده آرزوۓ خویش در کنار است خویش در خود کشیده ایم نیست درگیری رونیانداتها باشنگی باز کردرسانچر ایضا غیراز دل گداختہ آنے دیکس توکل میشه را روزی بہت خوش میباشد ۱۱۹ انگشت خودکودک چوزنوشتارا گسرا ہے تردعنکبوت آروبام خود صادی بطولات وتوھیل روزی گونگیان را Grid صائب ۱۱۴ تن پروزار است برایم هو معنی 144

मौज-तरंग पहिली।
११८ दो-बसें कुंज सन्तोषमें, धन्य अदृष्टहि मान ।
१७-न्यून अधिक बदरी तिनहि, दोनों होत समान।
११९ सो०-सदा बरतहू और को, दीजै बदरी त्याग ।
१८-परचो भानुउपकारको, दधि सुत छाती दाग ।
१२. दो०-सीप भाँति मोतीनको, तोहि बनायें धाम ।
१९-जो बदरीदिविलोकसे, याँचै असन मुदाम ॥
१२१ सो०-विधन परै जब काज,खुलत जीविका द्वार तब।
२०-आवत यह आवाज, चाकीते मम कानमें ॥
१२२ सो०-उदय होत जब मीत,तब बूढो ना कहत हँसि।
२१-विधिकी गति बिपरीत, रोटी देतहि लेतरद ॥
१२३ दो०-बैठि दिननके फेरते, बदरी मत मन मार ।
२२-धीरज करुबो देत पै, फल मीठे रुचिसार ॥
१२४ सो०-समय पाय प्रतिकूल, बिगरे कारज धीर धरि ।
२३-दरजी कतरे तूल, बहुर सिबनके कारने ॥
१२५ सो०-बन्द एक दर होय, दश द्वारे खुल जातहै ।
२४-गूंगी बानी गोय, टीका दस २ आँगुरीं ॥
१२६ दो०-हरै दुःख जो औरके, हारें निज दुखपाय
२५-ौंके ज्यों निज घायपै, सकैन सूज लगाय ॥

( 3 ) मौज-तरंग पहिली। (۸ وق وا) مو کن قناعت مین بین تقدیر شاکر سے خون باہر تین کم اور بارہ کار خود پرکن نمازخوان سے راع از احسان خوشی است برول او را م چون مصرف کنین اور صائب نده زری خود در روز در عالم بالا کن نتجون خہ درکار تو شاید در روزی تعني صائب عني ۱۲۱ ی اسارگر تم ان آواز می آید ایها و روم مج غنی پر فلک می گوید رضانان دیران خود که دمای نشین تزری توازگردش ایام که بر sai ۱۲۳ پخت ولیکن پیشین دارو رنک کارتر بوم من از امیرو ۱۴۴ غمی جامی راخار ساز قطع برونستن وہ دورشو کشادہ پوشدین کی دورے Gid ۱۲۵ گشت تان زانست دل را د چارو ساتان ہے غنی از دور خود رواند کے قوانین رو سورن بو فروشتن فی ||

-
7
(३२)
मौज-तरंग पहिली।
१२७ दो०-आगे काहू धनीके, हाथ सीसपै जाय ।
२६-या ते तो वा हाथपै, चूना लेय बुझाय ॥
१२८ सो-खानन चाहे मार, जो संसारी नरनकी।
२७-घर घर मतझक मार, मुहरालों सतरंजके ।
१२९ दो०-दीरघ साधन सो मिलै, सो अमोल फल जानि
२८-हरि याचत रीते फिरें, कर तोडर मंतः मानि ॥
५(ख) तृष्णा, लोभ, अधैर्य ।
१३० दो-सबके केस पारके, औधिधरे करतार ।
१-ताहूपै नर नरनते, मांगत हाथ पसार ।
१३१दो०-उदर काज उद्योग नर, कार अपमान कमाय।
२-चाकी मुखदै आँगुरी, पीसिलाजसों जाय ॥
१३२ दो-तिसना दुनिया दारकी, दुनिया पायन जाय ।
३ मुख भरि आवै नीरतिहि, तिसना बुझत अधाय
१३३दो - सोने रूपेके निकर, तृष्णा तुष्टन होय ।
४-उस्स प्रकृति सों क्रूरगति,सम्पति सकहिन खोय
१३४ सौर-तिसनाभये प्रधान,मुनि पुनि कुटी न टिकसक
५-जैसे तिस अकुलान, जीहनिकसि मुखसों परत

(33)
मौज-तरंग पहिली।
اما
نعمتی
مائے
پستانک تشترودر خمیر
است برسید پیش امیر
میل نوری نازک اہل زبان
۱۲۸ چون محوری ترین دونان جان
از گران قدرت طلب کر
در اندیدست
۱۲۹ رتی کشتن دسترعانگین مباش
هرج) حرص وطلع وے مبی
کے نالت نے بنائے مانی در واژگون
آدمی اس پر بھی این آردی مائل ہوا
جستجواز پیروزی با عر شرمندگی ست
زمین خیالت های انگشت دارد درون
کے توانند زوناش وشادابیر
تشنگی ریلی نگر اگزوزب دہن
حصرا جمع زردی از دخنه
اندرون شہر کی ری اطینت مار
و چون غالب شولوت نشینی شکلات
مي)
این
تمام و
صائر
غنی
۱۳۴ تفن چون گرودوزیان از کار می آید برون

(३५)
मौज-तरंग पहिली।
१३५ दो०-भाजि छुटै धोके घड़ि, बँधुवा कैद फिरंग।
६-आस छूटिवेकी नहीं, प्रस्यो लोभजिहि तंग ॥
१३६ सो०-'बस' कहिते न अघाय, यह जन पूरे रामके।
७-देते राम सिहाय, सब प्रभुता लोभीन जो ॥
१३७ दो-लोन पोखरा कोपियो, एक बूंद भरतोय ।
८-सोहू अन्त निकरि गयो, लाज पसीना होय ॥
१३८ सो०-मत मन आनि अजान, लालच तिसना वासना।
९-आसय नसत निदान, पोथीमें कीरा लगे ।
१३९ दो०-चित्र उदर चिन्ता फँस्यो, खोय हरष सामान।
१०-ऊजर बाग अभागजुत, खेती करत किसान ।
१४० दो-सोनो रूपो देखिके, क्यों न मुदित नर होय।
११-होत धुवाँ टक सारको, नीको अंजन लोय ॥
५(ग)प्रसन्नता, दारिद्य।
१४१ सो है रहिबो आसान, सावधान मद पान करि।
१-मरद ताहि पै जान, धनहि पाय इतराय नहि ॥
१४२ दो०-वसी करन उच्चाटके, पूँछत काहे तंत्र ।
२-जान रुपैयानकसको, सिद्ध जाग तो जंत्र ॥

(3)
ta
sfr-تی
وما
غنی
میتوان بستن به گرو حیله قیفنگ
صامی
نیست امید رائی باگرفت طمع
سے اب کہتے ہ میگزین کے بندے
ووق
گیر اعوان کونداسارینای دنیا
ازجوئے دم می خورم نقطه
آن نیز عاقبتعرق انفعال شد
حرص و ہوا وسینیین غافل ہیکہ
نے
متن
۱۳۸ مطالب کو فوت کرتا ہے کی کتاب کا
والی اسباب طبیگم کو درید میباشد
زراعت کاه دهقان می شود چون باغ ویران شد
سیریز کے لیئے نوش کیا انسان بودن است
طوطیا ہوتاہے روان
به دو ، تونگری واخلاس
اره نوشیدن داشتن هل ست
۱۴ اگر دولت برسی مست گردی مردی
کیا پوچھنا ہے تول فیض وجبت
زوة
چلتا ہوا تونیسم نقش درم کو
غالب
.

३६)
मौज-तरंग पहिली।
१४३ दो०-एक दियासे चासिबो, कयुक सहजही बात।
३-सम्पति पायन भूलिये, सुजन सनेहिन तात ॥
१४४ सो०-सहज तुष्टिको जान, तात रसायन आतमिक
४-यदपि नाहिं धनवान, मनही मन भरपूर रहु ।
१४५ सो०-जगके धनिक अजान, काजाने या कोसको।
५-औरहि सम्पति जान, मनोकामना त्याग सुख ।
१४६ सो-बढे अभाव अपार, तुरत धरत धृति आयकर।
६-देह वर्तुलाकार, चाहन राखहि लकुटकी ॥
१४७ दो०-बुद बुदलों निज सदन सो, मदन पदारथकादि।
७-जो तेरे घरना धसे, फिर बलाय जल बाढ़ि ॥
१४८ सो०-खाली हाथनतात, अलीसामरथ हस्तगत ।
८-चाकी बैठी खात, आय जिमावत पाहुने ॥
१४९ दो०-मन मौजिनके हाथमें, मालकहाँ ठहराय ।
९-प्रेमी मन धीरज नहीं, जलचलनी नटिकाय ।
३५० सो०-साँपहि मिलत अहार, देखो और न धरित ।
१०-खाक सीस पैढारि, ऐसी दौलत मिलनके ।
१५१ सो०-खीसा रहत हमार, बुद बुद समरी तो सदा ।
११-मुहरै तनपै भार, होय न मीन कमीन लों॥

(قا3 ) मौज-सरंग पहिली। مم صائم ازواغیتوان افروخت چندین شمع را دولت چون رووبراز دوستان غافل شو غناولی بہو کیسائے روحانی ۱۴۳ چیت مال میربل تونگرباش نان پین کو باخبریں گنے کی دوات آسایش ترک تناور حاجت از چورودت دراستنا تعلق جو دکاندارد با خانه خالی کرین اسباب تعلق چون حباب ۱۳۵ تانیا به راه در کاشانات میں ملا داچون آسیاخوش دستگاہی دیتی دستی ست کمزوری اور ووضامن امان از خود قارورکن آزادگان کی وال ۱۴۹ صبورول عاشق ناب وغفرال روری انیت غیرازناک اینها عالی غنی ۱۴۶ اله اله سعة ) . ۱۵۰ خاک برفرق الداربيا بانکی ایران جای خالی ست ارور ہونا ہی جزوبدن گره

मौज-तरंग पहिली।
१५२ दो०-भुंजी मछरिया कहतहै, देखकरमलिखधार ।
१२-दाग देतहैं उनहि जिन्हि, मुहरे देत अपार ॥
१५३ दो०-जानो अधिक फकीरपै, अमीर सों भौधार।
१३-इक कामरिके बोझौ, चढत बुसाला चार ॥
१५४ सो०-तो को करत अमीर, जो कोऊ नहि बावरे।
१४-वाको तेरी पीर, है तोसों निश्चय अधिक ॥
१५५ सो०-नरके दोस न जात, बदरी भवनिधि पाय निधि।
१५-कंचन नाहि सकात, मेटि कसोटी कालिमा ॥
१५६ दो-चले जात गुल कहत तब, सुमनलता के पात।
१६-तिन छोरे जरदार किन, जिनके खाली हात ॥
१७-
१५७ दो०-निरधन बसे धनीन सँग, लहत सोच संकोच ।
-डोरामुक्ता हलनि मधि, होत दूबरो पोच ॥
१५८ सो०-सफल एक नहिं होय, करै लाख उद्योग जो।
१८-बिन जरको नर जोय,सोबिन परके सर सरिस।
१५९ दो-मिलत चुगा बहिरारसे, परे पीजरा कीर ।
१९-अम्बर तरआधीन द्विज,क्यों नाहक दिलगीर॥

(39)
मौज-तरंग पहिली।
زوز
نام
مه
سعة )
کہتی ہے یہ بیان کہ ایران تنها
داغ و یقین اس کو وہ بیوی
بارودنیاہے امیون سے فون پر زیاد
بوجھ کم ہو اسے کیل سے نہایت شالها
کس کرتوتگارت بنی گرداند
وعملت توا توجروا نه
نیاز دولت ونائٹر جیکس زایل
که نتوانداز رو ک بون یاہ
گلی چلاتین نوکت ہی بریتین
ہم دوستوں سے ہو تا تو را میا
نیستنلس از قرب اغنیاز پیچ و تاب
رشتہ اور ماردیبره جرا نشدن
سعی مفلس کے لئے میرید
۱۵۰ آوری سے ہی تیر پرت
نفسی روزی زبرو مخورور غف
۱۵۹ غم ہے بگ باد زرگون خوری
في
تاسو
و ۵
۵ ،
صائی
8.

४०)
मौज-तरंग पहिली।
--
५(घ) उदारता, कृपणता।
१६. दो०-यज्ञ तत्वके भेदको, जानो चाहे जोय।
१- बनै हलाहल आपको, और हि सक्कर होय ।।
१६१ दो-लेत डारि फल दारको, फलके हेतु लचाय ।
२- दान देत में अधिकतर, दानी झुकि २ जाय ॥
१६२ दो०-दूरस्थनि हित मुधि करन, साँचो साहस दान
३-यों वो डारे द्रुम सबै, फल दल निज पगथान ॥
१६३ सो०-मेवा मीठी लाय, जोजगहित नहि करि सकहि
४-सेवाछाप विछाप, सरों बेतलों अवसकरि ॥
१६४ दो०-छोरि २ भाजत बसन, हम सूचीकी चाल ।
५-जग लागे बागे सिये, आपु उधारे हाल ॥
१६५ दो०-परदा ढांकन जगतसे, नीको कौन निचोल।
६-औरन औगुन ढाँकि ग, आपुउधारोडोल ॥
३६६ सो०-जिनके मन दरयावरावरक तिन हगन सम ।
७-ऊंचनीच थलभाव, दुरोरहत जलके तरे ॥
१६७ दो०-सूर बीर मुइदीन जन, शरनलहैं जिहि पाहि ।
८-काम चामको खरगते, अधिक वीरतामाहिं ॥

(89) rati sfer | ۶۰ فضی ووق ۱۹۱ کے بانی وقت کم و زیاده ۱۶۲ وند متھلے پائے خونری ۱ ۶۲ صائب د ۰۱ سخاوت ونبل خواہی یعنی انشا دربی باخود لالٹی کن و باغینشگری پیتے ہیں نشان ترورو کا کر دوریستانا احسان پا کردن تات بیوہ کام بیان کرنمیکنیشین چورووسیبرال اینتر با من و سوزن را که از متن کریر نیم کا ۱۹۴ امیر خلق می دوزر کوبانی ۱۶۵ پر انتخائی سخت میان این شاد و نا پدیده دریادلان کیت ۱۶۶ پوشیده است ولی زمین در آب جونت و یا زیرستان وہ ہاررہے جوانی مین افزودن تین سے کاریا الها فی که او با مرمی ازپردہ پوشی خلق صائب ایضا ۶۶ فرح او |

(४२)
मौज-तरंग पहिली।
१६८ दो०-कहा भयो जो जगतकी, सम्पति घरी समेट
९-उठत नफातासों नहीं, बिनादान करनेट ।
१६९ दो०-लोगनके तू हगन सों, अपनी देन दुराउ ।
१०-हात भसम निजदानके, किस्सा मत कहि बाउ॥
१७० सो०-जिनहिं विधाता बाम, दाता तिनहिं नदेहिं कछु।
११-देख अवरको जाम, भरी नदी नहिं भरिसकहिं॥
१७१ दो०-दाता तुल्य उदार नहि, लखदर याउ गंभीर ।
१२-इनकब दियोहुबाबको, तनक जामारनीर ॥
१७२ सो-कहावैरियादाय, दानिनसों ना कहतहै।
१३-हाँलों देउँ झुकाय, तोडूं डारिजु देय फल ॥
१७३ दो०-ऐसो बैरी होत जग, वीर पुरुषको बीर ।
१४-मारे हूपै बाघको, मुँहपुरसत बेपीर ॥
१७४ दो०-ओछे लोगनको कहा, फल उदारता देय ।
१५ोह प्रकासत दीप निज, मुँहकारो करिलेय ।
१७५ दो०-मनमौनी हू जातढे, हित उपकारी दास ।
१६-कत गुलाम किरपन बनत,कनक रजत जगआस।
१७६ दो०-पाथरसे नहिं बाँटके, झुक्पो चहे तू जोय ।
१७-न्यून अधिकके फेरमें, मतन तराजू होय ॥

( 83 ) मौज-तरंग पहिली। دو من حب ۱۰ فی وق دنیا کا زوال کی جمع تورکیا زوق ۱۶۸ کچھ فائدہ ہے درست کر انہیں ستا ریزش خود از میدان پرشید داره ۶۹ تفاوت خونین انسانی چون حاکن نمیفیت اہل کاری بیشترینتان را کی زمینان کا سرداب رادرا کے عمل درکیب این تا ا۱۰ نین بیاتاکہ جب اسباب تورے کیا ژمنیو ال کرم ہے کے ہین انت حبائن شاخ غرور کوتوڑدون بانک دوران سے دلیکا در این بنکاکے کی شیک ضعفیاضی سے نظفون کونیاش چاغ ۱۰۴ گے تو روشن کردیا تو یہ رو ہوگیا چون احسان حیوان آزادگا ناجده کرد بلی بندیوزرونیانو بیگ تختخوابی و خوشنوی ۱۵۶ مغوبمان ترازو و در پی نیت ) 47 با ده ر4{ ناخ و اب . وظ ويعمل بقاع العام

४४)
मौज-तरंग पहिली।
१७७ दो०-जोरि २ संचय कियो, दियो न बिलसो आप।
१८-ज्ञानवानकी जानमें, यह कुकर्म औ पाए ।
१७८ दो०- गगनकपनतापै कमर, ऐसी कसी बनाय।
१९- ओस बिहीन मसौस कर, निरझर तपनित पाय।
१७९ दो०-किरपन धन बसनीकसत,ज्यों द्विज अंडअछेद।
२०-लगत पंख व्ययचाउ धन, जानत ना यहभेद ॥
१८. दो०-धन समेटि सूमहि मिलत, केवल चिन्त अहार।
२१- एक डंक तजि रहत कह, मधुमासी सँगयार ॥
१८१ सो०-लीने मेरे प्राण, सूमनकी गुन कूतने ।
२२-उनके द्रव्य समान, अनरस माटीमें गड़यो॥.
५(च)वैराग्य।
१८२ दो०-बनै अजानो जगतसों, अच्युतपरचित सोय
१-या सागरते कढ़तही, नर मुक्ताहल होय ॥
१८३ सो०-आनखसिख सोपूत, जिन घोये कर जगतसों
२- उनहि मिटावनछूत, मल २न्हान जरूर नहिं ॥
१८४ सो०-मन बिरवापे वन्द, मतकरि विटप जहानसों
३-पौद लगाई मन्द, यह औरहि थल कारने ॥

(۶۹) मौज-तरंग पहिली। سر کی 148 غنی ۱۸۰ ما امیدی نواد وخورد ،،۱ خردمنداند ناخوب کرد آسمان نے مل پاسدرج باندہی سے کر ، پر زور دیتی تھی شبنم موگیا اف نارومیک از مان چو مرغ منه در بیرون ۱۵۹ زرین تافل کارورز شوق خ پیرون روزی مسکن جمع ال تشویق است ولی ۱۸۰ انچ میاندن نورانی نیست اور سکون کی قدردانی نے مجھے ۱۸۱ ش ز خاک کدورت مین من فنون با ۵ دو، ترک دنیا ان سے شاکس کا بیان پایان شد ماه ۱۸ برزین دریا برآمد گوہر کی وا نشہ سامیاں ہیں دہوے جنورین نے ہاتھ دنیاسے نین حاجت کو پانی ٹوٹین سے اونتیک نور اول در این بنده این ونالا صائر از هر سرزمین کسب کرده اند اسی شده بیمه ۱۸۳ ۱۸۴

(४६)
मौज-तरंग पहिली।
१८५ सो०-दिव्यलोक थल देख, या बिरवा फल दारको।
४-मतकरि पुष्ट विशेष, नातो मांगी भूमि सों।
१८६ सो०-महि पर डारि बहार, आगेही पत झारसों।
५-छोडत अपनोकार, मरद दूसरे नहीं ।
१८७ सो-जग अनुराग निवार, मैयाको निज दूध जो।
६-तेरो दिव्य अहार, सोहू धौरे रँग रुधिर ॥
१८८ सो०-विषय वारितजि हंस, जो सूखै दुख मूलही ।
७-पावत फिर मधु अंस, पहिले देशमहूक सहि ॥
१८९ दो-त्याग बिसन अहिफेनको, भलो घटाउ इलाज।
८-क्रम २ करिके मोचिये, जग सम्बन्ध समाज ॥
१९. सो०-अपने सदन मझार, होत भिखारिहु भूपहै।
९-पग निज सीमापार,धरि जिन रहु अवनीसबनि।
१९१ दो०-असकत वा सन्तोष बस, तज्यो नाहिं उद्योग ।
१०-पुरुषारथ आरत अयो, साहस लाग्यो रोग ॥
१९२ दो-रनमें जो तनमें लगें, धलेसुधाव अनेक ।
११-नीको लमैन खालपै, दाग ढालको एक ॥
१९३ दो०-रहे वसन सब शवनके, कांटनमें अरुझाय।
१२-बन अभावते हौं न गिन, आगे पहुँचो जाय ।

( 99) मौज-तरंग पहिली। (۸۵ وب ( ۸۶ وا ۸۷ در خون است دریاس ارشیات ۱۸۸ نان عالم الاستجاے این نابارور ۸۵) شنود در زمین تاریست فک کن بنا نزران بشار نشانه با این مروان به دیگران نگذارند کا نیٹ هانیبان بر خداسے لطیف و ترک لندت کرد بونے نہ انجکوزند نون تپیچھے ہے چانیش زنبورکا تک افیون اعلیے بہتر تقلیل نیست ۱۸۹ ان کا بیان سخنان جهان بیگانه ستور درون خانه خود گدا شنہشاہت قدم برون من از خویش وسلطان باش ضعف سے ہے نے قانتو ترک تھے نور محمد شمس گریبان ما اور مردون ک کون کانون میں اکٹھے ہوئے ان کا اور ان پر بدن ماکر عاب الفي | ۱۹۱ من ومال کیا ہمت مردانه ال به عني ۱۹۳ کے حوالے قوم کے ہی یہ بیان دیگری تار

(४८)
मौज-तरंग पहिली।
५(छ)जावन, मरण, यशरचना।
१९४ दो०-खोय खोज निज मरनते, प्रथम अमर होतात।
१-राखे किनके खोजनत, मौत जगतविख्यात ॥
१९५ सो०-प्रिय जीवन संसार, कुढि २ गारन जोग नहि
२-मत जराउ यहतार, एतोदीरघहै कहाँ ? ॥
१९६ सो०-उमर घटावत तात, अमर होनकी घातमें।
३-वे मूरख प्रख्यात, चोरत काल जु आपनो ।
१९७ सो०-रे दीपक नादान, परम बैस तुव एक निस ।
४-रोय २ दे पान, चाहे हँसि २ काटिले ॥
१९८ दो०-चलति आयुको दियो तुहि,या लगि चपलतुरंग।
५-धेग एड करि पारहो, जवनद लहर उतंग ॥
१९९ सो-असमन उठत तरंग, लखि २ सरित प्रवाहको।
६-बही जात पहिरंग, मम बयतरनी अहर निस ।।
२०० दो-जीतवको परमानका, भवसागरमें भीव ।
७-जल प्रवाहमें कोकरे, बुद बुदकी परतीत ॥
२०१ सो०-अहो भाउ परमाउ, बैर कहाँलों बैंधि गयो।
८-एकहि जल दरयाउ, बुदबुद और तरंगलों ॥

tar-ain wfet 1
زون
صاب
الع
به دنیا زندگی دو ناموری تومیر
ہے نشان پلانا سے ہوجو موج کوتها
۱۹۳ ورنہ ہے انغان زون بنائے رکھا
عزیز قابل سوز و گداز نیست
۱۹۵ این رشته اموریت این دانیت
خود یک یا بیرونی میکنند
۱۹۶ ساده لوحانے کی انڈین
تیری علی ہے ایک رات
۱۹۰ واگذار اسے نگلنار ہے
مروان او پاک اس لیے
۱۹۸ تجودا کر عید کے بیان سے ایرتو
دکور و کریستین بیل سے ہے
بامدیریت مالی اعتبار سے
آب روان پرکیا ہے اور جواب کا
ہوئی ہے کیا تین سے منی ام
نہیں اگر چناب اور موج آبجدة
زو
و ۱۹
الم
میریا یونہین ہی جائے ہے
آپ
,
"

(५०)
मौज-तरंग पहिली।
२०२ सो०-छि करेजेतासु, करुवाई जग जियनकी।
९-फरतबुराई जासु, एकोएक विनोद नित ।
२०३ दो-जग करबो पयपानसे, लै पयदान वलक ।
१.-जनमघुटीमें घोट दुख, नरको देत फलक ।
२०४ सो-जीवनराखत स्वार, लोकगनमें पुरुषको।
११-टूटतस्वाँसा तार, लोग उठावत कंधौ ॥
२०५ दो-देहीके जग गेहमें, गहै देहयों पाय ।
१२-ज्यों माटीके मेलते, सलिल रेलथम जाय ॥
२०६ सो-जौलों तनमें साँस, जीव जाय सुरलोक नहिं ।
१३-पाउँ दामकी फाँस, सो पक्षी क्यों उडिसकै
२०७ दो-तन मन्दिररचि समय धन, वृथा गमावत लोग।
१४-यह बन्दीगृह छुटनको, करत नाहिं उद्योग ।
२०८ सो-बदरी मत बिसराउ, निजकारजपरि नामतू ।
१५-मौत नींद चितलाउ, जगत कहानी कानदै ॥
२०९ दो०-अपने सचा भवनको, आँगन बिकट अभाव ।
१६-करलीजै व्यायाम नित, पैन होय छिटकाई ॥
२१० दो-आये लाये करमके, बँधे धरमके जात ।
१७-अपने मन आये नहीं, चलेन आप बसात ॥

(4)
- wfet |
ماس
الف
نے بیان میں خوار ہوتی ہے ولا
توریت کے لیے سے پونچھے
۲۰۲ یکی رانی کا نتیجہ لال ہے
ایسا شرتیں ایک ہی معنی ہین
۳۰۳ غمگنا کھانے ویانان جهانی اول
۲۰۳ ورش پانے یاجب اوی مو
نساخته اند درین محل جان لے
۲۰۵ ساکن کن افرین خان آب روان را
نداردوره گبوون روحنا بانفس دن
۲۰۶ سائینیت در پرواز مرغ شتر را
منشوراو ناتموم صرف درهمین
، ۲۰ تفکر راوی این زندان نداریہ
غافل شوزعانت کارخودغنی
دل نخوابدیل کردن انسان است
خان ہستی کا اپنے عین ہے نت عدم
زوز
روز کریں چہل قدی مگر خونین
سی بات آئی قضایچلی چلے۔
اپنی روٹین کے ناپنی خالی
تعني
الف
صاب
عني
النا

(५२)
मौज-तरंग पहिली।
२११ दो०-बदरी जब आये यहाँ, लाये कहधों संग ।
१८-होते तो लै जाउगे, जिय भरि लाख उमंग ॥
२१२ दो-लाखन भूपतिकै मिटे, आली आली जाह ।
१९-निस सराय जग सोयके, गही भोर उठिराह ।
२१३ दो०-आये चढ़े समीरपै, जैसे सुमनसुबास ।
२०-माटीमें यों मिलिगये, ज्यों जल पावसमान ॥
२१४ दो०-गये बैक दिन फूलतो, जोबन सुखद दिखाय।
२१-कलक होतउनकलिनको, हैंनिपटकुम्हिलाय॥
२१५दो०-जम अनित्यधों नित्य है, मैं क्यों करूँ निदान
२२-मोबलायसे होय कछु, जम ले जैहै पान ॥
२१६ सो-कियो मौतलाचार, नातर यह नरवर अटल।
२३-अहंकार चितधार, गिनतो नहिं नारायनहु ॥
२१७ सो०-मैयाके उर होय, सम आदर सब सुतनको।
२४-भूमि अंकमें सोय, राउ रंक कर एकपद ॥
२१८ दो-को आयो संसारमें, रह्यो सदा जो होय ।
२५-पैवाको जानो रहत, सुयस कमायो जोय ॥
२१९ दो०-मरोताहिनहिं जानिये, जाने दिये रचाय ।
२६-पुल भन्दिरवाफी कुवाँ, बागतड़ाग सराय ॥

(3) so-air ster 1 روا وان سے ان آئے تو اسے زوق کیا تیر ۲۰۱ ان سے تو جائیں گے ہم لاکتالیکہ نئے کون شفنا إن عالیجاہ ہو کر سے دو این شبای دوسوگر چون بوئے گل آمدند بربادسوار ۲۱۳ برخاکی چوتطوراے این قند پھول تو دو دن بہار انفرادکھلا گئے ۲۱۴ تا خون پیری و مالی اس میں ہم رات زبان کوحادث ہے بائی موت نے کر دیاناداروگرہ انسان بیرونی میں نماز کا بھی قائل ہونا بابا دل مادرین و زندگی بنزینان کا بادشاہ کا نار کے دربان کو باند غوا کہ اندپس ازوے کالے بل دعدواه والے ۲۱۵ زروق ۲۱۵ کشور سے اپنی بر قانون میم ۴۶ ایضا ناسخ | { MIA ۲۱۸ عمران کی نام نیکو باند سعدی ۲۱۹ ایفا

(५४)
मौज-तरंग पहिली।
२२० दो०-जस चाहत तो अवसही, सकल लोकहितलाग।
२७-पुल बनाउ मन्दिर विपुल, वापी बाग तड़ाग ॥
२२१ दो-मन्दिर रचिवोछोरिकै, मन बनाउरे कूर ।
२८-अनरस रजतजि कहा फल, खेलत धूसरधूर ॥
२२२ सो०-मनमन्दिर रचि साज, जो उठाय सँग जायलै ।
२९-यों विनाशके काज, दरउठाउकै भीत चुनि ॥
२२३ सो-रचिपचि साजो धाम, अवनीपै तो कहाफल ।
२४-होते पूरन काम, काहू चित हित घर बसे ॥
६ आदरसत्कार।
२२४ दो०-शुश्रूषा संसारकी, निश्चय बाधक जान ।
१-नबत जाहि देखो यहां, पायो तेग समान ॥
२२५ सो०-मानन लेहु बचाय, कोमल वनिके निठुरते ।
२-भयविधिवेको नाय, मोती लों जल बुन्दको ॥
२२६ सो०-ज्यों बुदबल की गोट, घर अपनो खाली करें।
३-जा बैरी सों चोट, होय तहाँ सो पाहुनो ॥
२२७ सो०-झुकि २ सीसा लेत, हँसि २ चसकलगायगर ।
४-यह मद पान निकेत, है नाहीं थल ठसकको ।

(49)
मौज-तरंग पहिली।
جا ما
ووق
صائب
ناسخ
نامنظور ہے تیض کے اسباب با
۲۴۰ بانی ناجا با دو تالاب با
نوساز سے ہی لیکن اسی ولی خانسازی
/۲۲ گرد کدورت بیت حاصل خاکبازی را
پاستمبول ہجومات اٹھالیا کا
یونی خرابی کے لئے دلی اٹھایا گیا
بمان مکان بنایاتوکیا کیا ہے
۲۲۳ ناتھاجب کیا لینا ناگوا
و رالفه تواضع۔
تواضعا دنیای شینی قاتل جان۔
۲۲۴ شال نے دیکھا ہے اسکو کونم با با
ای نری بانزیستانت گیران می برم
بیفتن نیست چون قطرائے آب را
جائے خود جون پور شریف خالی میکنیم
۲۲۶ مین ا مینوددرخانه مهمان
رشتے ملتے ہی نہیں ان کے عام
میکده مقام مینہ نور کا
قبول
۴۴۵
فنی
الضا
۲۲
تاست

(५६)
मौज-तरंग पहिली।
२२८ दो---जरन नवाबत जगतमें, गुन कुलीनतासील।
५-कसत वहे. तरवार है, जाको पिंड असील ॥
२२९ दो०-आदरशील महोत नर, जिहि उपकार उदार
६-लसत डारि फलदारमें, फलसों फूल अपार ॥
२३० दो०-दीननसों नविकै मिलत, जिनको विभवउदार
७-देखौ भूमि पनामको, झुकिरह्यो गगन अपार ॥
६(अ) अभिमान, दैन्य।
२३१ सो-जगविलासके धाम, लसै प्रकाश सुहावनो।
१-जब कंदील ललाम, लटकै गर्वी सीसकी ॥
२३२ सो०-कहत सुराही बैन, निहुरि कानमें जायके।
२-लचत नारि तिन ऐन, सीस उठावत जो यहाँ।
२३३ सो -तितर बितर भयो फूल, हाँसीके फल बागमें
३-अरीकली जिन भूल, ह्याँ उपहास भलो नहीं ॥
२३४ सो०-अन्त जाय हलकाय, ज्ञानवानकी दृष्टि में।
४-पानीपै उतराय, जो बुदबुद की भाँति नित ॥
२३५ दो-अधिमानी पाइनपरे, है जिन बैठि निचीत ।
५-भगिन परै चाहे जहाँ, निज गुण तजै नमीत।

sr-aim afret |
ووق
۲۲۹ خان نامی پہلے تم
تناسخ
خمیدواری سے انسان کو جو شرافت کا
۲۲۸ اصالت میں ہوتی ہے وہ گالستیا
ويطلق سے پیش آتے ہیں جنیفان این
خاکساروں سے کرتے ہی عبید رسید
۲۳۰ آسمان پیش زمین و تواضع ہوا
(۶) الف دینی و فروتنی
جان ہے غای عشرت ہی ہوا کا فروغ
(۲۳ کل کے امین پور کی نیل
۲۳۲ پرس سرش جهان نگون شود
ای پیان ہوانی کرکے پن میں آخر
دکھانے فن بیان خنده ی خونین
یہ ہنین آخریب دریائی
۲۳۴ عنوان حساب نوابی روانین
چوک پرس افقانی پیشوائین
۲۳۵ م کا خون خوا کراتش می افتد
وق
مي
۲۳۳
دوق
فنی
۲۳۵
الها

(५८)
मौज-तरंग पहिली।
२३६ दो०-कोमलता अरु नेहते, अभिमानी वश होय
६-तेल तूलके मेल फॅसि, बँधति दिया की लोय ॥
२३७ सो०-जबर न लहै करार, जेर रहै धीरज धरे।
७-याके साखीदार, चाकीके दोउ पाट हैं ।
२३८ दो०-बदरी कुत्सित दृष्टिसे, यहाँ देखिये काहि ।
८-सवही हमसों अधिक हैं, थोरो कौन दिखाहि ॥
२३९ सो०-चढत हमारो रंगु, आखिरखिलि जग अखिल
९-परे पुहुमिपै पंगु, जोहू मेंहदीपात सम ॥
२४० सो०-लेहु पतन बत धारि, अधम धूर ग्रह छोर यह।
१०-इनहीं परन पसारि, ओस जात उडि सूरपै ॥
२४१ सो०-पहुँच तरनिलों जाय, ओस शिरसरनिकारने।
११-देखो तो चितलाय, कहँ सों कहलो गम्यहै ।।
२४२ दो०-नाउँ होय ऊँचो बहुत, आपुन नीचे होत ।
१२-तारा सब कोऊ कहत, जलपतालके सोत ॥
२४३ दो०-पाटीसो जो बनिरहे, ऊँचे पद जाय ।
१३-नदी नीर मीची सदा, ऊँचो तीर दिखाय ॥

(8)
as-min wei
غنی
۲۳۶ کتا شمع این تعد
الضا
وق
۲۳۸
تواناب و زی کردا سیخویش ریش را
اور زنی یا است
زبردست اضعطا سے زبردست آسودگی دارد
۲۳۰ دو شاہور کالام من دوسنگ اسی باشد
سے ژوق کو حقارت سے کیسے
سے ہی زیادہ کی کم سے کمین
آب ورنگ بابا عاقبت این لیند
زمین ہی چین بر خافتاده ایم
کوئی گزین که این خاندان بہت
شبنم کتاب رازقادگی
نام میں تین بار ادا کیا
کھاتوخاکسار کارت ملین ہے
و ۲۲
فی
۲۴۰
صائب
ايضا
۲۳۰ شب آفتاب با سن بال وپیہ
۲۳۱ بار بھی کیا میتوان شدن
۲۴۶ با لین دین کی کیا کیا
۲۲۳ وراہے پستال بیان ہے
وق

६०)
मौज-तरंग पहिली।
७ सांसारिकगति।
२४४ सो०-जैसी होय चितौन, अचरज तस संसारमें।
१-अधिक दिखै या जौन,चकित चित्तताको अधिका
२४५ दो०-कहुँ कलिका कहुँ सुमनहैं,कहुँ कुम्हिलाये फूल।
२-हमहिं कुतूहल नितनयो, जग फुलवारि अमूल ।
२४६ दो०-उपवन लसत सुहावने, रंग बिरंगे फूल ।
३-लौट फेर है जगत में, बदरी शोभा मूल ॥
२४७ दो०-साँझ सकारे नितनई, जगमें स्थिति होय ।
४-निस भर बसति सराय जो, बासर ऊजर सोय ॥
२४८ दो०-मतवारो इक एक नर, सुराविस्मरन फूल ।
५-यह मीनाई गगनप्रति, ग्रह कलाल निर्मूल ॥
२४९ सो०-जे तेहैं उनमाद, मदिरापान समान सब ।
६-होय जात दुस्स्वाद, बढ़त अपरमित वितन जब॥
२५०दो०-नरचित लाग्यो रहत है, नित चिन्ता दरवार ।
७-मेरे लेखेहै सभा, सूने भौन मँझार ॥
२५१ सो०-तन मन छायो पाप, नहिं अधीन सो दैवके ।
८-करन लोक सन्ताप, है कोटी अधिकारकी ॥

ہو جانتے بوٹھ جانے لرن ( 49 ) मौज-तरंग पहिली। میت کسی دراین عام صائب ناسخ زوق در کیفیتونیا قبر پنین است ۲۴۴ سرینات درین به نام ایران بیشتر کوئی خفیہ سے کوئی ہے کوئی پردہ ہے ۲۳۵ کیتے پیو تاشکیشن ایبد کا مہاسے تنگ کیا ہے رونن من که به ۲۳۶ سے زوقیاس با کون ہے زیب اخترفی قامت احوال دنیا ہے نام ۲۳۴ شب کی آبادی مسلمین کو پرانر با باروی فت سے ہو نہ پیناہے چرخ میان بینی با بخار سے جتنے من بان نے روش ثشاب ہے آرمی سے خوراکی محنخی البنت من خلوت ہو کیون بنو مجبوریت نگردد آلوده میامی ۲۵۱ میکرون برای بیان اعتیات بل مم عالی و ۲۴ وق ۴۵۰ الب صائب

(६२)
मौज-तरंग पहिली।
२५२ दो-नरपे हाथ पसार मत, हरिको द्वार बिसार।
९-प्रीतमको गिल्लाकर, गैरन जाय गवार ।
२५३ दो०-सहि २ हिमहित कालगति, रहिनकरेजे आहि।
१०-जो द्रुमदह्यो तुसारलगि, धुवाँन निकसति ताहि॥
२५४ सो०-चौथे पनमें आय, नरकी मति कटि जात है।
११-दांतन बिन मुखपाय, मैं आपै बालक गिनें ॥
२५५ दो०-बुरे परोसीसे सदा, सबकाहू दुख होय ।
१२-अधर डसै जो दशनतो, कौन अचंभो तोय ॥
२५६ दो-होय परोसीको जुहित, नीको सो उद्योग ।
१३-हगन नींदकारन करन, करत कथा उपभोग ॥
२५७ दो०-फरत मनोरथ तिनहिके,करत रहत कछु जोय।
१४-राखे हैं कर तारने, करम करम गुन पोय ॥
२५८ सो०-जा कारजपै कोय, साहस सों बांधे कमर ।
१५-चाहै सूलहि होय, छोरै फूल बनायकै ।
७(अ)सुखदुःख।
२५९ दो०-भलो दुःख सो जानिये, पाछे करै हुलास ।
१-वा सुखसों जोअन्तमें, देय निरन्तर पास ।

( 3 )
-rn wfet |
صائب
الضا
۲۵۴
ايضا
زورق به در خلق مبھاجت خود
۲۵۰ شکوه ازایرانیانی باید کرد
اندازه دنیا سے دوران در گراہم
۲۵۳ ختی راکی است دوش بینی آید
وی در عهد پیری بے خوگر وغی
شارق خوداریت تادتان مرا
بازاراز مسایہ گیس کی بندہ کو
۲۵۵ ی استادگی درب از بین نیت دماتا
سعی بر احتمالیگان کردن نوشت
۲۵۶ بن نون انبارے خواب نمافسانا
کچھ کرنے والے ہوتے ہی مقصدین جو در
۲۵۰ رکھا ہے کارساز نے فلمین اثر
به کارے کو تبیگردد
۲۵۰ مارے بوتگرد
، رالف، رنج واحت
۲۵۶
میدی
نے پیش شادمانی بری
۲۵۹ بازنشانی از پیش نمی
سعی

६४)
मौज-तरंग पहिली।
२६० दो०-कहा जगत आराममें, होत न सुमन विलास ।
२-है विहारके जोगपै, नहिं बिहार अवकास ॥
२६१ सो०-देखहु बदरी सोच, कष्ट मूल संकोचहै।
३-जिन नितज्यो संकोच, तिन पायो आराम फल
२६२ दो०- बदरी भव सुख दुःखको, हरष सोच मतमान
४-कबहूँ वह कबहूँ यहो, रीत यहाँकी जान।
२६३ सो०-दुखअरुसुखके काल इहि जग होत समान ननि
५-निसभर रोवै लाल, दिया हँसे ऊषा छिनक ।
२६४ सो०-सुख सोवन कहें लोग, जानोसीस विकारसो
६-जाहि लगे यह रोग, सो सेवै बिस्तर सदा ॥
२६५ सो-जो सुख नहिं ठहराय, सो पूँजी पछतावकी।
७-मेंहदी सुरंग बँधाय, आखिरकर मींडन परै ।।
२६६ सो०-दुख न विसर जन होय,मनको मुखके हँसनसों।
८-बिहँसत बदन न तोय, मीठो होय गुलाबको ।
२६७ दो०-कहूँ रंग आरामको, नहिं जगके आराम ।
९-माली सालै सुमन उर, वधिक कीरको बाम ॥
२६८ सो०-मोद सुरा नहि लेस, या माटीके माठ घर ।
१०-यह धुनि उठति विसेस,रीते नरगिस जाममों ॥

(44 sa-ata ste 1 ذوق ۴۶۶ آرام سے ہے وہ جوتان بین کرا الفا غنی استان جائیں کیا لعنت نہین ۲۶۰ سی کے قائل ہے یہ میری خونین زروق تلفن سینمای ترین و راحت کیتی میان دلشونورم ۲۶۲ کاتین جہان کا ہے ان کا ہے چنان باشند مسرت شادی و غمنیت برایبان ۲۶۳ کشییع ش خنده میحات رے خواب راحت دیت مایه دروس است ۲۶۴ که دارای تصاحب بیت عیشے کمی ماند سرایہ افسوس است این دست ناب بتبرهم زدن دار دو نمی توان مدل از خنده بیرون برد ۲۶۶ زنده رود میاب نرفت گوشت باغ عالمین را تامین ۲۶۵ گل ایران میں تین بار کا تلے پسته شیان نا لازمی نت با ما این استان ایوان میں آیا کر الها ۲۶۵ صائب ناسخ نی

(६६)
मौज-तरंग पहिली।
२६९ दो-सुख मदिरा तबते भई, करुई बिसवावीस ।
११-गरल पियनको गगनको, कियो कटोराईस ॥
२७० दो०-वा घरमें आनन्दको, रहै सदादर बन्द ।
१२-जा घर उठति तियानकी, नित उठि सदा बिलंद।
२७१ सो०-जग माटी ग्रह चित्त, खेम आस मत राखतू ।
१३-जान गराउ निमित्त, घरि यारची बिरंच यह ॥
२७२ दो-चाहे फिरत खगोलहै, औ चाहे भूगोल।
१४-पैनहिं ह्यां बिसरामथल,हमहि मिलनको डौल॥
२७३ सो०-जनम्यो जब दुखपाय, मैया हीकी कूखने ।
१५-क्यों नाहक भटकाय, सुखकारन हाँ सुख कहाँ।
२७४ दो०-विधना उनके सीसपै, डारन लाय पहार ।
१६-पाहनसम जिनको दुसह, पुहुप पखुरिया भार॥
२७५ दो०-काल अधिक दुख दरदकी, संभावना जुहोय ।
७-आजहि तिहिको खेइबो, कौन बतायो तोय ॥
२७६ सो०-होते नाइहि धाम, सोग पीरके रंग जो।
३८- गगन न हो तो श्याम, औ पिरथी पीरी नहीं ॥
२७७ दो०-विषय विषे मनकी लगन, सकल सोगकी माता
१९-हम सनहित सम्बन्धकरि,जनति विपतिकुलतात

(49) मौज-तरंग पहिली। زوق صائب جام ووق پی جیسے مجھے منے مین ہو کر تلخ ۲۶۹ موی بدن سے ملک کاشی زریاب بنا درخوری براے بہنہ ۲۵۰ کانگ زن ازوسے برآیلند از شاگردان و سلامت طمع دار ۲۰۱ این بود را برائے گراف میداند خواہ کرتا ہے فلک اور واہ چھ رہی ہے زمین پر وارے واسطے ان منزل راحت نمین بطن بادینی پاسواليف سے ۲۰۳ یان مهمان راحت کر نواز سے بات کی طلب سری یا ان کے نہ اسے آسمان را ۲۰۳ جون کو جھیں رینگی گران گرا فواچ غم زیاده زا مروزیه امروز خوردن غم را مهاجت است سوزناک ترین ها را بیان نمود ہوتا تو زمینه زرد ہوتی به فلک کہودہوتا همیشگی است در یکے است مزایا تعلیع املت الها ناسخ ۴۷۵ صائب ۴۵۶ ژو ۲۷۷ صائب

(६८)
मौज-तरंग पहिली।
७ (क) अपचय, उपचय।
२७८ दो०-चूर २ आपहि करहि, सोही पूरो होय ।
१-दरश करावन बालशशि, कर उठाय सब कोय॥
२७९ दो०-नहीं दीनता प्रकटते, बढ़ि अधूरकी पूर।
२-अन पैराको कर गहत, कर उठाइ बोकूर ।।
२८० दो०-बदरी अवनति डारिसे, बीनो उन्नति फूल ।
३-साँस अधोगति बाँसते, कढ़त उच्च रस मूल ॥
२८१ दो०-पूनोंसे बढ़ दूजके, चाउ चन्द्रको होय ।
४-गाहक नहिं संसारमें, पूरन गुनको कोय ॥
२८२ सो०-मुख कलंक नहिं जाय, सोरह कला मयंककर।
५-कलाकुशलता पाय, सरयो न एको काज मम ॥
२८३ सो-अपचय उपचय साथ, रहत गगन मंडल तरे।
६-सकल कला कर नाथ, कुढ़ि २ होत अदर्श सो॥
२८४ दो०-हमें अपूरन होनको, मा कारन अभिमान ।
७-जगमें प्रथम बढ़ाउ निहि, ताहि घटाउ निदान ।

(5)
मौज-तरंग पहिली।
۲۰۰ او را زین سیب انگشت ساسانیاندا
صائب
ایفا
هي
ادب کا زوال
نخودی تمام بنات است تمام
نیست ناقص کالے بتاز طما عبر
گیا نادرست بالاردن است
توان شان تنزل گلی ترقی چی
۲۸۰ فشن چونو شایندیگود
مشتاق ببن بدر سے افزون طلال کے
۲۸۱ ونیامین قدر وان نین و کمال کے
بنوریہ سیاہی زروئے اه نرفت
نادرست کیا ہے کمال خویش مرا
کالے راز والت در زیرفلک
۲۸۳ ناقص بری کر دیا بین رفت
مینی با خانی به نازان مبین اسلیے
جواب کمال نے کوروال ہے
ناسخ
۴۸۴
في
صاب
۴۸۴
عاج
معهم بها

(७०)
मौज-तरंग पहिली।
७(ख)दया, निष्ठुरता।
२८५ सो०-यहाँ बडी सौगात, कर गहिबो आधीनको।
१-लेहु असीसें तात, जब पावहु दुखियानकीं ॥
२८६ दो०-करत बीनती धनिनसों, “सेवाको तय्यार"।
२-दीनन सोंहूं पंछिये, जब तब "का दरकार"।
२८७ दो०-हरष हँसन मृदु कामना, तात तोय जो होय ।
३-पोंछत रहियो प्यार कर, अँसुवापर हग जोय ॥
२८८ दो०-कर असीसपर तापते, श्रीपासाद हदाय ।
४-पुस्ता बुढिया कूटिका, किसरा महल सहाय ॥
२८९ दो०-केवल बाहु प्रताप बल, सरै न कोई कार ।
५-राजश्रीके पदरको, कर असीस रखवार ।
२९० दो०-राजश्रीकी नींउ खुद, खोदे निठुर नरिन्द ।
६-परसेना निज प्रजाको, करै कुसासक निन्द ॥
२९१ दो-निज जनपै दुनियादया, भूलि करै नहिं तात ।
-अगिन होत्री गात कब, राखन अगिन सिरात ॥
२९१ २०-अति कठोर जी जानिये, बाहिर कोमल जोया
८-ज्यों कपासमें पासही, दुरो बिनौरो होय ॥

( 9 )
xia-ata wfet 1
۴۸۶
الضا
۴۸
۴۸۸
نوع تر و سنگیلی
کر رہی ہے ان دستگیری کانون کی
۲۸۵ خریدار کی بنی دعائین ناتوانوی
مضمون سے کتے ہو حاضر پخت نام
بیکسونا سے بھی ہیں پر جا کر کیا چاہیے
و گردن و شاخ بلب کی آرزو
۲۸۷ نئے انوییفقت ہونی چاہیے
تم دولت پایدار از دست ارباب دعاست
۲۸۸ پشتیان لانی کی کلیبرال است و بس
بورازوسے اقبال کار برنمی آید
۲۸۹ نظر دارد گریت وعادان دولت را
پرت خوندیو با دولت را
۲۹۰ نگین رایگان ساز خودرویت را
دنیا بابا اولین تر می کند
۲۹۶ تن مان نمی در آتن پست را
سنگین است که نامه ای است
۲۹۲ پنهان درون بازیگریہ دان برانکو
صائم
الضا
محله
فی

७२)
मौज-तरंग पहिली।
२९३ सो०-गोफनलों मन होय, जाको पाहन निरदई ।
९-लरै परस्पर कोय, तब सो नाचे हर्ष सों।
२९४ सो०-जो पाहन चित होय, छातीते तिहि काढ़ नित।
१०-या मारगमें तोय, गोफन राह बतायहै ॥
७(ग) मनुष्यपरीक्षा, गुणग्रहण ।
२९५ दो०-भली कही यह सोचिकै, काहू चतुर सुजान ।
१-भागवानकी आंखको, भाग रसाइन जान ।।
२९६ दो-निरखत प्रथमवनायकै, दरपन दरपन कार।
२-अपनेहू गुण दोषको, परसत गुणी विचार ।
२९७ दो०-गुणकी जाने खाग कब, जो आपहि गुण हीन।
३-गुण गाहक वे होत जो, सकल कलान प्रवीन ॥
२९८ छो०-मोती कूतै जौहरी, कंचनकसे सुनार ।
४-दुर्लभ नागर पुरुष सो, जो परखें नरनार ॥
२९९ दो०-सज्जनता गुण मिलतहै, नरहि मानसनमान ।
५-यह ओछे मन होय नहि, ओछे तन नहिं हान ॥
३०. दो०-सज्जनता कछु और है, विद्या और बात ।
६-सुवा पढ़ायेहु विविधविधि, रहत विहंगम तात ॥

( 93 )
1- wift |
۲۹۳
ماه
سرکه اندوختن دار سنگین دارو
قصد ان کے ایکس جلود
بوارسینه بیرون کردن آن را سنگین است
۲۹۳ میں وہ خودگردان دین وادی ناخن را
، و مردم شناسی و قدردانی
نیوزوند اینتل هوشمندان
الشما
ابوالفضل
۲۹۵ کانت است نمانان
ووق
۴۹ :
سورا
با کے آئینہ دیکھے سے پہلے اینکر
نور اپنے عجیب و نگوی
حسین نوے ہوم ویشتاس کب ہے
جوماحبہ ہے وہ ہی مہنر کو پیر کے
گوپروری اور رات کو پر کے
۲۹۸ ایسا کوئی دیا دو جوان کو پرکھے
آدمیت سے ہے با ر آدمی کا مرتے ہو
ستات بے نواوریپت قامت ہوتو ہو
قومیت اور شے ہے علم ہے کہ اور چیز
کتناطو کے ویرایرود حیران ہی را
ایفا
وو
ووتی
ايضا

(७४)
मौज-तरंग पहिली।
३०१दो-मलिन बहिर गति देखि मम,निन्दक चखमत तानि
७-फठ्यो पिधान करहि कहा,असि असीलकी हानि॥
३०२ सो०-साखा बिसवाबीस, रुख फेरै निजमूल तन ।
८-देखहु अपैं सीस, फल दल तरबर चरनपै ॥
३०३ दो०-औगुन औरनके गिनै, आगे तेरे लाय ।
९-औगुन तेरे सो सही, और न पैलै जाय ॥
३०४ दो०-होय नेकतू और बद, बदरी कहे जहान ।
१०-वासों भलो कि होय बद, करें नेक अनुमान ॥
३०५ दो०-सज्जन जनको आदिते, मान घटत सल बीच ।
११-सुरगुरु ते ऊंचो रहत, सदा सनीचर नीच ॥
७ (घ) शत्रु, मित्र।
३०६ दो०-निपुण सखा सम होतहै, जोड़ा कब निर्दोस ।
१-बसि गुलाब सँग आब बहु, पावै मणिते ओस ॥
३०७ मो०-भार रहित नित होय, छाँई जदपि पहारकी।
२-क्षुद मुरुनते कोय, महिमा सम्पादै नहीं।
३०८ दो-ऐसे नरते चित्तमें, अनुखन मान कोय ।
३-चितवन परखै ताहि की, सखा जाहि को होय॥

.( و ) मौज-तरंग पहिली। /۰ مع ۳۰۲ نی الها اینم بین من ظاہزیل را عیب اخلاق ان تین میل با کیا فرع است آرد رو درس خونی سے یا فساد اداری و بار ہر عیب دیگران می تواور دورود ۳۰۳ بیگمان یب تریشی درون خوابیرد نیک باشی و برت گوی خلق ۳۰۴ بکه بهداشتی نکیت بنیه ازل سے قد زیون لی ہے کستر ۳۰۵ رحل بافت بیشتری ہے ، دہ، دوست و ژمن باہمیت نایت اکسسینی باید سایگرسای کوک است می باشد ۳۰۵ کرسی می کنید از ارباب وتار شخص با ناطہ زنی کرنے کا بمانیم واکی تک کو رکھے عالی و ۳۰ قرب الانه از اقوت صائب غنی موو الم وع عدم استفاده

मौज-तरंग पहिली।
३०९ दो०-जन मन सुख संचयालो, संचयभलोन कोस।
४-निधनभलो जन होनसे, पीडित हत सन्तोस ॥
३१. सो०-देख! आस जिय माँहिं,राखिन सम्पति मीतकी।
५-सीप अधर तर नाहिं, पानी मोतीमें घनो ॥
३११ सो०-अपनेसे उपकार, जान पराये को भलो।
६-जलनिधि माँझ अगार, पियति सीप अनतपय ॥
३१२ सो०-कारज अटके तात,आस राखि जिन स्वज़नकी।
७-खोलन नखन सकात, पोरनपै गाँठे परीं ॥
३१३ दो०-यू सुफ संग सहोदरन, करी सुजग विख्यात ।
८-और कुटुम्बिन सों कहा, आसकरो पुनि तात ॥
३१४ दो०-भले बुरे में दीजिये, प्रतिरोधिनको अंग ।
९-छोर न उनहिं उतारमें, छाक्यो जिनके संग ॥
३१५ सो०-सहवासिन सँग मान, हेल मेल अतिमति करे।
१०-खटकत शूल समान,लोचनमें अटकत पलक॥
३१६ सो०-गाफिल संगति पाय, नष्ट होत कर तूत सव ।
११-सोय एक पग जाप,सकहि दूसरो फिर न चलि॥
३१७ सो०-पालो डारिन मोर, गगना हिम हित मीत सों।
१२-द्रुम तुसार ज्यों खोर,ल्यों जरि जैहों बात लगि॥
,

(فاو ) Rain qet | عي الها اول داستان حمبورگینی ۳۰۹ خواتی به مردم بر کی محبت کی دولت سے نور کی سین ۲۱۰ لندن کے انہیں جن کو مین آب فیض از کامیابی نے ای شنا چون مدرن و با بازی دیگر نخوریم انشا کا خودتان طبع از اشناکردن ۳۱۲ کان می تواند بند انگشت و گردن بدون نیاز اخوان پوشیده چې ترتع نیز بیان دیگری باید داشت ورنومش و شیرین کن نے بیان موافقت ۳۱۴ بابر کم ہی دینارا من کمر با دوستان ازناشائی اختلا افزون برمیگرده نیت اور غفلت بریندار کامیان جو اسے خفت سے دیگر واریاند بروموں سے ناک والا ہے لیکن ان ۳۱۵ نخل سرکار ایک ایسے مل جائن کا ۳۱ صائب ۳۱۴ الها ۳۵ با درون دیده شان فی ايضا زوق

(७८)
मौज-तरंग पहिली।
३१८ सो०-भये भावसों कोय, जगत ग्रंथ नहिं एक मन
१३-मनके अखरा दोय, रहत परस्पर अनमने ।।
३१९ सो०-मधुलों मधुर दिखाय, स्वारथ साधत हलाहल
१४-बैरी मृदु बतराय, बैठे जिन बेखटक है।
३२० सो०-बैरी नबैजु आय, निश्चय दुख फल लाय है।
१५-फरसा लागै पाय, फरस देय करि तरवरहि ॥
३२१ दो०-बैरी सों नय विनयकरि, बचहिन पान गँवार।
१६-लच्यो गात बुडरानको, सकहिन जम कोटार॥
३२२ सो०-बदरी सुख मत मान, बैरीके विस्मरनको ।
१७-लखि कमानकी बान, तकति निसानो पीठदै॥
३२३ सो०-अरि घर कबहुँ न जाय,जीदानी जगको जदपि।
१८-परतहि तुरत बुझाय,अनल सुधा जल विमलहू॥
३२४ दो०-दीप अनूप प्रताप अरि, कबधों सकहि बढ़ाय।
१९-मानिक अनल कदापि नहि,जलके भय सकुचाय
RRC

( جو )
मौज-तरंग पहिली।
۸ ام
صائب
۳۲۰
ارزندم شیر زمان ناعم نباش
مهدی پاکدل نو ایک سے ایک کی
ولی کے میمن کی ہدایت کی
وق
میکندوز سرطان کا خود را بین می
نبول تواضع من بزند
پا پس نے انداز پنهان را
نتوان بروز من بتواضع جائرل
قامت نهم سرطانزال ایران را
وحید نائل آنلاین مشوار قصم
۳۲۲ پیت بوریت کان بو سے نشانہ
مرور زمینی که بار نشست عالما
۳۲۳ سر میرواش ارونی بریقا اتہ
نفر پہنچا سکے کب متعاقبال کو زمین
۳۲۴ نوے انشر یاقوت کاندیش بانی کا
فنی ایفا
امر

ANVI
खेमराज श्रीकृष्णदासके
"श्रीवेंकटेश्वर छापखाने में
छपा-मुंबई.

टिप्पनी। मंगल, हरिस्तुति। -'जल' यह शब्द मूलसे अधिक है इस चर- णको यदि 'जल थल व्योमअपार' इति, पढा जाय तो भी उत्तम है -अजाँ( 5 )मसजिद(a) निमाज (पढनेके हेतु लोगोंके एकत्र करनेके निमित्त जो पुकार मुल्ला करता है. .-'मुहर' असरफी()मछलीके सिन्ने तदाकार होतेहैं. १ .-'छवि'-प्रकाश-भाश्छवि द्युति दीप्तयः' इत्यमरः " तूर( पहाड, विशेषतः 'शाम' देश (Asiatic Turky) का 'सेना' - (Sinai)नाम पर्वत जिसपर परमेश्वरने तहित स्वरूपमें हजरत मूसा पैगम्बर - ( Moses ) को दर्शन दियेथे, उस दुःसह

८२
टिप्पनी।
पृ०
नं०
तेजके कारण 'मूसा' अचेत होगये और
पर्वत जलकर सुरमा बन गया-यहाँ कवि
का तात्पर्य यह जान पडता है कि श्री गंगा
की तरंग छवि अवलोकन करि जीव आनंद
प्रवाहमें निमग्न हो जाता है और उस तेजसे
जलकर मनुष्यके अघ शैल तत्क्षण भस्म
हो जाते हैं.
१२-'गगन'-फारसी उर्दू कविगण 'आस्मान'
'चर्ख' 'फलक' इत्यादि गगनवाची शब्द
देव' के अर्थ में प्रयोग करते हैं. कारण यह
ज्ञात होता है कि जो भी, हजरत मुहम्मद
रसूल अल्लाह(RJrathi)ने ज्योति-
षशास्त्र मिथ्या बताया तो भी कदाचित्
किसी पूर्व विश्वासका प्रमाणदायी यह वाक्
संप्रदाय अभीतक प्रचलित है.
अबके यूरुपीय सिद्धांत तथा हमारे जूने
शास्त्रप्रमाण के विरुद्ध इन लोगोंका यह
कथन था कि गगन एक पदार्थ है जिसके
७ पुडन ( सप्त ग्रहोंके स्थानरूपी) हैं-यह
आडंवर तारागण, नक्षत्र, ग्रहादि सहित

टिप्पनी।
८३
पृ०
अचला पृथ्वीके चहुँओर निरंतर परिश्रमण
करता रहता है.
इस दोहेका भावार्थ यह है कि 'गगन'
को गमन सेही चिरकाली होनेपर भी ऐसी
परमशक्ति प्राप्त होगई है जो मनुष्यादिकके
भाग्यको बिगाड़ और बना सक्ताहै, तो
इसीके समान यदि तरुणपुरुष नित्यपरमे-
श्वरकी तलाशमें लगा रहै तो उस सर्व शक्ति
मानके प्रसाद से क्या न पात होगा.
विनय।
४ १५ -मुखमुकर- Milinks:
अर्थात् ध्यान देना, आदर करना वा प्राप्त
होना-'मुँह लगाने से मिलता हुवा यह
फारसी वाक् संप्रदाय मुँह देना' है. IN
उपासना।
३। होप-अंगरेजी शब्द है. Hope--आशा.
पश्चात्ताप।
३-आँख-आँकना, कूतकरना, अन्दाजकरना.
८

टिप्पनी।
नं०
पृ०
१०
-
१२
३६-काबा-
'भक्का' (IN)का जग
द्विख्यात मंदिर है.
जमजम( )काबे' के पास एक
खारी कुबाँ है जिसके जलको 'मुसलमान'
लोग 'गंगोदक' के समान पवित्र मानतेहैं.
खारीपानीकी आँसुवोंसे सादृश्यता स्पष्ट है.
४९-पाहन-कावे' में एक काला
पत्थर है जिसे यात्री लोग चूमते हैं-कोई
कहते हैं कि उसमें किंचित् स्वेतचिह्न भी हैं,
और संसार) ज्यों २ पाप और दुराचारकी
वृद्धि होती जाती है त्योंही त्यों वह सफेदी
लोप होती जाती है. जब बह निश्शेष
असित हो जायगा तबहीं (6) प्रलय
होगी. कदाचित् इसी को मक्केश्वर महादेव'
कहते होंगे.(
)( )-
" शेखजी-मुसलमानों की चार प्रसिई जाती
شي. خواجد پر انفاشی پان و ملیار وشیخ .
स्वामी, वृद्ध, गुरु बहुधा कवितामें 'शेख'
(5) धर्मशाख प्रतिपादक के अर्थ में

टिप्पनी। पृ० नं प्रयोग करते हैं और प्रेममार्गी कविजन विचारे शेखजीका इसीकारण यथोचित उपहास करते हैं. 'मुहम्मद साहब शेखथे, ()सिरधरा;( 2 )मुखिया; (Vir) राजमान्य; यह कौम ब्राह्मणोंके तुल्य पूज- नीय मानी जाती है. 'हज़रतअली' और उनके वंशज सैयद' कहलाते हैं और शीया (2)मुसलमानोंमें उनकी प्रतिष्ठा अधिक है. (12)मुहर्रममें(ताजिया'अली' के पुत्रपौत्रादिके स्मरणार्थ जिनको(2) यज़ीद' ने 'करबला' में वध कियाथा, बनाये जाते हैं;)मुगल यह 'तुर्की' भाषांका शब्द है; के अर्थ() विख्यात जाति(Jihin)तुर्कोंकी एक श्रेष्ठ जाति;(Unit)ोला पुरुष (5) छलिया, लिखे हैं. 'पठान' शब्द हिन्दी ज्ञात होता है क्योंकि 'अरबी' 'फारसी' वर्णमालावोंमेंटवर्ग'नहींहै. )i(غیاث اللغات)

टिप्पनी।
पृ०
नं०
१२
"
"
१६
पठानलोग क्षत्रियोंके सम तुल्य समझे जाते
हैं यह शब्द 'काबुली' भाषाका 'पै ठान'
बताते हैं अर्थात् पाउँजमानेवाला.
४९-जौक-कविका उपनाम
बुत-मूर्ति, प्रियतम, निष्ठुर,
ज्ञान।
५१-अभेद-अद्वैत.
६४-६४-५-यह दोनों 'सोरठे' परस्पर मिलेहुवे हैं
७०-परमसुजान-मूलमें (HI) फलान हो'-
( फलातूं Plato ) 'यूनान' Greece
देशका एक परम प्रसिद्ध तत्त्वज्ञ और चतुर
विद्वानथा.
७२-अलि-आली वा भमर ( चक्रितमन)
परमार्थसाधन।
७६-असत्ता-अभाव, अहंकारका नाश देखो नं०
१९३ तथा २०९
७७-जंगारी सिखर-जंगारी रंगका शिखराकार
१८
२.०
आसमान.

टिप्पनी। ८७ पृ० नं २० ८' -चपल-पारा;-'चपलोरसः सूचश्चपारदे' इत्यमरः- २२ ८' -बीग-सं० वृकका अपश-भेडिया. मनशुद्धि। ९ :-साँचा-मोमबत्ती साँचेमें ढाली जाती है. वास्तवमें मोमका नाम है; परंतु बहुधा बत्ती- के काममें मोमका उपयोग होने के कारण 'शमा' दीप को कहने लगे. संतोष। २८ ११।-मूंगा की जड़ें हाथकी अंगुलियों के सहश- होतीहैं अतएव उन्हें फारसीमें ( पंजए मिर्जा ) मुंगे का पंजा कहतेहैं. ११४-नमूद-इब्राहीम-नयूद पादशाहके राज्य में मूर्ति पूजन प्रचलितथा-इब्राहीम पैगंबरने बचपनमें एक दिन अपने पिता आजर' (8) के कारखानेकी सब मते खंडन करडाली और बापने जब कारण पूछा तो निगुण उपा- सना का उपदेश करने लगे, जब यह झगड़ा "

टिप्पनी।
पृ
.
न.
बढते २ पादशाहतक पहुँचा तो उसने
अनेकयत्न करने के उपरांत निरुपाय होके
अपने पूर्वजों के धर्म त्यागका दंड इब्राहीम
को देना निश्चय किया-और इस हेतुसे उनको
प्रज्ज्वलित अग्निमें डलवा दिया; परंतु हरि
कपासे ज्वाला शांत होकर शीतल सौगंध
पुष्पवाटिका बनिगई-अंग्रेजीमें इब्राहीम को
Abraham और नयूद को Nimrod
कहते हैं 'इंजील' 'कुरान' इत्यादिमें इनकी
कथा सविस्तार वर्णित है. प्रहाद' 'हिरण्य
कशिपु के आख्यान से यह कथा मिलती
हुई है इसलिये दोहे के उत्तरार्ध को यदि
'बाग भई प्रह्लाद को हिरनाकुशकी
आग 'पहें तोभी ठीकहै.
२८ ११७-कल्पतरु-पहिले(पाठ प्राप्तहुवाथा,इस
लिये, 'कल्पतरु' उसका तर्जुमा कियागया
क्योंकि-'तूबा' नामक एक वृक्ष 'बहिष्त'
में बताते हैं, जिसकी एक २ शाखा प्रति
मंदिर में वहां पसरी हुई है और जिसके

टिप्पनी। नं. फलोंमें यह मुणहै कि खानेवाले को यथेच्छ- स्वाद मिलताहै-परंतु()(SA)पाठपाया- गया 'यदे तूला' लम्बे हाथ, अर्थात् कला कौशल्य-अतएव उत्तराई दोहेका पाठ बद- लकर 'असन बसन हित हात, लम्बे जग त्यागीनके' अथवा 'उपजीवन हितहात, कुशल होत त्यागीनके' होसक्ताहै तृष्णा लोभ। ३४ १३१-कैदफिरंग-जब 'मुसलमानों और ईसाइयों का परस्पर धर्म सम्बन्धी संग्रामचालूथा (Wars of Crusades)तब जो 'मुस- लमान' 'फिरंगियों के हाथ पड़जातेथे उन विचारों का छुटकारा अत्यंत कठिन प्रयत्नों से होताथा-अहएवं मुसलमानों में ऐसा वाक् प्रचार प्रचलित होगया कि अति क्लिष्ट खेदको कैद फिरंग' की उपमा देने लगे. सम्पन्नता। ३६ १४-मदन पदार्थ-मदन-काम-इच्छा' इच्छा ही सम्बन्ध (5) का कारण भूतहै. .

टिपनी।
९०
पृ०
नं०
३८ १५६-ज़रदार-जर()धन, स्वर्ण, पुष्प,मकरंद
इस पदमें श्लेष स्पष्ट है.
११ १५९-द्विज-यह मूलसे अधिक है परंतु इसका
श्लेषार्थ दोहेके भावार्थ में सिपताहै
द्विज-पक्षी; ब्राह्मण.
उदारता।
४० १६०-यज्ञ-(SLEL()शब्दके अर्थ यह लिखेहें
دیدن این نعت میر بلخیر مقدم کاشت کی جانب بھارت)
--
विवेक करना अर्थात् दूसरे के लाभको
अपने अभीष्ट से बढ़कर समझना
और यह दातृत्वकी सीमाहै. ( Forbes
Dictionary ) में इस शब्द के माने-
(Offering)-'बलिप्रदान दिये हैं-यज्ञ से
यहाँ तात्पर्य दानरूपी यजन से है-पूर्वार्ध को
पदियों पढ़े तो भी उचित है-'दान तत्त्वके
मरम को, जानो चाहे जोय'--
१६२-साहसदान-( 1 )सूफी, ईश्वरमाप्त्यर्थ
जम त्यागको 'साहस' कहते हैं.
४३ १६९-हातिम-'तय(नियमें 'हातम एक अत्यंत

टिप्पनी। ९१ पृ० दानशूर पुरुष हुवाहै; इसी कारण उसे 'हातमे ताई' कहते हैं-उसने महानचमत्का- रिक दानकियेथे-किस्सए 'हातमताई' एक- विख्यात मनरंजक पुस्तक है उत्तरार्ध को यों पलट दिया जाय तोश्री अनुचित न होगा. "करन तुल्य निजदान की, चरचा जिन करिवार हैराग्य। ४४ १८१-पूत पवित्र, निर्मल. ४६ १८:-हंस-हंस शीर और दीरको पृथक् करदेता है; और परमार्थी लोग हंस भात्मा'को कहतेहैं. १९-सवन-शर मृतक अभाव-असत्ता-देखो नं० ७६ की टिप्पनी जीवन मरण। ४८ १९४-चोरतकाल-अधिक वय होके तरुणाईकी लालसा में कम उमर बताते हैं. २०४-फलक-(-)आसमान देखो नं०१२की टिप्पनी. , २०५-देहीदेहधारी, जीवात्मा. " --Laad Gam Wr टिप्पनी। पृ० नं० ५० २०९-व्यायाम-स्वास्थ्यके हेतु चलना फिरना. ५२ २११-(12) नेकहाहै, روایات کے کوئی کہ دنیا به جان اور ای میل کرائی २१९-वापी-बाउड़ी. तडाग-तालाब, सरोवर. आदर सत्कार। ५४ २२६-बुदबल-'बुद्धिबल' का 'मराठी' अपवंश मालूम होताहै शतरंज, 'चलत २ सतरंज में प्यादा होत वजीर' २२७. चसक'चषक'पानपात्र, ५६ २२८-पिंड-लोहा-'लोहोऽस्त्रीशस्त्रकंतीक्ष्णं पिंड- काला यसाऽयसी' इत्यमरः अभिमान, दैन्य। ५८ २३७-दोउपाट-मुसलमानी 'शरएशरीफ'(धर्मशास्त्र) के मतानुसार आरोपके सिद्ध करनेके लिये कमसेकम दो साक्षी चाहिये. सांसारिकगति। ६० २४५-अमूल-श्लेषार्थ-बहुमूल्य तथा निर्मूल- मूलमें ईजाद निर्माण है, उसमें भी यह श्लेष घटित हो सकता है.

टिप्पनी। पृ० नं० " सुख दुःख। ६४ २६०-आराम-बाग. २६८-माठघर-जिस ठौर मद्यसे भरे बड़े २ बरतन रखतेहैं. ६६ २६९-पीने'का करता मूलमें 'जगत् है और दोहे में व्यंगार्थ स्पष्ट है. अपचय उपचय। ६८ २७८-चूर चूर-(6) दैन्य' ननशीलता. "दया, निष्ठुरता"। ७० २८८-किसरा-'ईरान देश में एक बादशाह नौशेवा' नाम का बडा न्यायशाली हुवाहै,इसी कारण उसको(कहतेहैं. उसीकानाम 'किसरा' है एकममय उसने एक महल बन- वायाथा जिसकी दीवारकी सीधमें एक गरीब बुढिया की झोपडी आतीथी-बुढिया झोपडी छोडने पर राजी नहीं होतीथी-जब बाद- शाह को उसके हठकी सूचना हुई तो उसने अपने महल की दीवार टेढी करके बुढियाका

पृ०
घर बचादेनेका हुक्म दिया, ऐसी २ अनेक
कथाएँ प्रस्तुत हैं.
शत्रु मित्र।
७४ ३०६-जोड़ा--यह 'रसायनियों' की परिभाषाका
शब्द है अधिकांश सस्ती धातुमें थोडी
कीमती धातु मिलाके सबको बहुमूल्य बना-
लेनेको 'जोडा' बनाना कहते हैं-दूसरा अर्थ
७६ ३१३-यूसुफ़-हजत याय(पैगंबरके
पुत्र थे-सबसे कनिष्ट हज़रत यूसुफ़' पर
अत्यंत स्वरूपवान और अंशधारी होने के
कारण पिताका पूर्ण स्नेह था-ई
दाध ज्येष्ठ माता इनको एक दिन पितासे छल
करके जंगल में लेगये और वहाँ एक अंध
रूपमें ढकेल दिया और उनके बय रुधिरमें
रंग लाये-बापसे कह दिया कि यूसुफ को
मेडिया खागया-हनको एक सौदागरने मिश्र
देशमें वेचा-वहाँ वज़ीरकी खी 'जुलेखा'
उम्पर आसक होगई सो, किस्सा प्रसिद्ध है,

Shree Mayoj Tarang Paheli

Title
Shree Mayoj Tarang Paheli
File name
Shree Mayoj Tarang Paheli
Text
OCR done
Citation
1898
Publisher
Lucknow
Language
Sanskrit
Pages
101
Library
Hindi Sahataya Samalayan
Classification
Literature
DLI number
486473
Barcode
5990010113749.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
VMLT id
0HvMraCg93o
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Shree Mayoj Tarang Paheli