Sanmati Library
Praman Nay Tatwalok
Front matter
प्रकाशक:
मन्त्री, आत्म-जागृति कार्यालय,
जैन-गुरुकुल, ब्यावर
प्रथमावृत्ति, प्रतियाँ १०००
मूल्य दस आना]
१६४२ [वि० सं० १९६८
मुहक:-
रामस्वरूप मिश्र, मैनेजर
मनोहर प्रिण्टिङ्ग वर्क्स व्यावः
प्रस्तावना भारतीय दर्शन मात्रा में जैन दर्शन का स्थान अति महत्व रा है और उसका प्रधान कारण उनको मौलिकता, व्यापकता और देशाता है। जगन के ममम्न झगडी और झझटों का निपटाग ग्ने के लिये जैन-दर्शन ने जो अपूर्व चीज जगन् की सेवा में मग्नि की है वह न्यावाद है और यह जैनदर्शन की मौलिक्ता है। न्यावाद ही जैन नीति का मूलमन्त्र है और उसका निर्माण ग्माण और नय, इन दो तच्चों की भित्ति पर ही हुआ है क्योंकि जन दर्शन के ये ही प्राणभूनतत्व है। : ग्रन्य का महत्व न्याय-गान के विशाल मन्दिर में प्रवेश करने के लिये प्रम्बर नार्किक श्री देवमूरिन श्री माणिवयनन्दि के 'परीक्षा मुख' ग्रंथ की जली पर प्रस्तुत पुग्नक की ग्चना परके प्रथम मोपान बना देने का काम किया है। 'प्रमाणनयंगविगम.' यह बात अनुभवगम्य होने पर भी प्रमाण और नय क्या है ? उसके स्वरूप-मण्या-विषय फल आदि क्या हैं? उनका विशेष परिचय प्राम करना अनिवार्य है। इसलिये प्रस्तुत पुन्तक में प्रमाण और नय इन दो नत्त्वों पर ही सुन्दर ढंग से काफी प्रकाश डाला गया है। यही कारण है कि प्रस्तुत पुस्तक मतिप्त होने पर भी सुन्दर और मारगर्भित है। न्याय-शास्त्र के सागर को प्रस्तुत पुस्तक रूपी गागर में भर देने का जो कौशल सूरिजी ने बताया है वह वास्तव में प्रशंसनीय है। जैन न्याय को अच्छी तरह समझने के लिये हम कुञ्जी कहा जा सकता है।
[ख] ग्रन्थकार का परिचय श्री देवसूरि गुर्जरदेश के 'मदाहत' नामक नगर में उत्पन्न थे। पोरवाल नामक वैश्य जाति के भूपण थे। उनके पिता 'वीरन, और माता 'जिनदेवो' थी। श्री देवमूरि का पूर्व नामा पूर्णचन्द्र थ वि० सं० ११४३ में इनका जन्म हुआ था। वि० म० ११५२ उन्होने बृहत्तपगच्छीय यशोभद्र नेमिचन्द्र सूरि के पट्टालक्कार मुनिचन्द्र सूरिजी के पास दीक्षा अङ्गीकार की थी। पूर्णचन्द्र ने 2 ही समय में अनेक शास्त्रो का अध्ययन कर लिया। गुरुजी ने इन वादशक्ति से संतुष्ट होकर वि० स० ११७४ में 'देवमूरि' मा न संस्करण करके आचार्य पद प्रदान किया। वि० सं० ११७८ काति कृष्णा में गुरुजी का स्वर्गवाम हो जाने के बाद श्री देवसरि गुजरात, मारवाड, मेवाड आदि देशों में विचरण करके धर्म-प्रचा, किया और नागौर के राजा आह्लादन, पाटन के प्रतापी राज सिद्धराज जयसिंह तथा गुर्जरेश्वर कुमारपाल आदि को धर्मानुगर्ग बनाया था। श्री देवसूरिजी की वादशक्ति बहुत ही विलक्षण थी। बहुत मे विवादो मे उन्होने विजयलक्ष्मी प्राप्त की थी। कहा जाना पाटन में मिद्धराज जयसिंह नामक गजा की अध्यक्षता में एक दिगम्बराचार्य श्री कुमुदचन्द्र के साथ 'स्त्री मुक्ति, केवलिभुक्ति और सवनमुक्ति' के विषय मे सोलह दिन तक वादविवाद हुआ था और उसमें भी विजय प्राप्त करके वादिदेवसूरिजी ने अपनी प्रखर तार्किक द्धि का परिचय दिया था। श्री वादिदेवसूरि जैसे तार्किक थे वैसे ही प्रौढ लेखक भी । उन्होने प्रस्तुत ग्रन्थ को विशद करने के लिये 'स्याद्वादरत्नाकर' नामक बृहत् स्वोपज्ञ भाष्य लिख कर अपनी तार्किकता का सुन्दर परिचय [ग] दिया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने और भी अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। इस प्रकार श्री देवसूरि धर्मोपदेश, ग्रन्थ-रचना, वाद-विवाद आदि प्रवृत्तियों द्वारा जिनशासन समुज्ज्वल करते हुये वि० सं० १२२६ में भद्रेश्वर सूरि को गच्छभार सौप कर श्रावण कृष्णा सप्तमी के दिन ऐहिक जीवनलीला समाप्त कर स्वर्गधाम को प्राप्त हुये। इस ग्रन्थ की टीकाएँ और अनुवाद इम ग्रंथ की उपयोगिता और उपादेयता इसी से मिद्ध हो जाती है कि खुद ग्रंथकार ने ही इस ग्रन्थ के अर्थगाभीर्य को परिस्फुट करने के लिये ८४ हजार श्लोक-परिमाण मे 'न्याद्वादरत्नाकर' नामक बृहद् अथ रन की रचना की है और उन्हीं के शिष्य रन श्री रत्नसिंहजी ने 'रत्नाकरावतारिका' नामक सुन्दर सुललित न्याय-प्रथ की रचना की है। यह ग्रथ वर्तमान में 'न्यायतीर्थ' की परीक्षा में नियत किया गया है। स्याद्वादग्नाकर तो अनि विस्तृत होने के कारण उसका अनुवाद होना कठिनमा है लेकिन रत्नाकगवतारिका का नो पण्डितजी जैसे नैयायिक द्वाग सग्ल सुबोध राष्ट्रीय भाषा में विवेचन और प्रामाणिक अनुवादन करा कर प्रमिद्वि मे लाना नितान्त आवश्यक है। ऐसे प्रेरणाप्रद प्रकाशन के द्वारा ही ग्रन्थ-गोरख बढ सकता है, न्याय-अन्य पढ़ने की अभिरुचि बढ़ सकती है और जन-समूह जैन- दर्शन की समृद्धि से परिचित हो सकता है। ग्रन्थ की उपयोगिता और प्रस्तुत संस्करण प्रस्तुत ग्रंथ की उपयोगिता को लक्ष्य मे लेकर कलकत्ता- संस्कृन-एसोसियेशन ने जैन-न्याय की प्रथमा परीक्षा मे इसे स्थान दिया है । प्रतिवर्ष अनेक छात्र जैन न्याय की परीक्षा देते हैं और इस [घ] दृष्टि से प्रस्तुत ग्रन्थ का पठन-पाठन जैन-समाज में काफी होता है किन्तु ऐमी उपयोगी पुस्तक का जन-साधारण भी लाभ उठा मो और विपय जटिलता के कारण छात्र जो परेशानी अनुभव कर रहे थे वह दूर की जा सके, इस ओर अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया था। इस अभाव की पूर्ति श्राज की जा रही है और वह भी ऐसे प्रौढ़ पण्डितजी के द्वारा जिन्होंने मैकडो की तादाद में छात्रों को न्याय-शास्त्र पढाया है और न्यायतीर्थ' भी बना दिया है। इस सरल सुबोध विवेचन और अनुवाद द्वाग छात्रों की बहुतसी परेशानी कम हो जायगी और जो न्याय-शास्त्र को जटिल, समझ कर न्याय शास्त्र से दूर भागते है उन्हे यह अनुवाद प्रशस्त पथ-प्रदर्शन करेगा। इसके अतिरिक्त जो संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ हैं वे भी प्रस्तुत पुस्तक के आधार पर न्यायशास्त्र मे प्रवेश कर मकेंगे। ग्रन्थ का सम्पादन, विवेचन और अनुवादन कितनी साव- धानी पूर्वक हुआ है तो पुस्तक पठन-पाठन से ज्ञात जायगा । जैन न्याय के पारिभापिक शब्दो की विशद व्याख्या इस पुस्तक मे की गई है तथा छात्रो की शंकाओं का सप्रमाण समाधान करने का प्रयास किया गया है-यह इसकी विशेषता है जो छात्रों में लिये विशेप उपयोगी सिद्ध होगी। यह के हो ही प्रस्तुन न्याय-ग्रंथ का ऐसा सुन्दर छात्रोपयोगी संस्करण निकालने के लिये अनुवादक और प्रकाशक दोनों धन्यवादाई हैं। ग्रंथ की उपादेयता पाठ्यक्रम में अपना स्थान अवश्य प्राप्त कर लेगी ऐसी शुभाशा है । सुज्ञेपु किं बहुना । ता० १-१-४२ ई० व्यावर -शान्तिलाल वनमाली शेठ प्रासंगिक - , प्रमाण-नय-तत्त्वालोक, न्यायशास्त्र का प्रवेश-ग्रन्थ है। इसे विधिवत् अध्ययन करने के पश्चात् ही न्यायशास्त्र मे आगे कदम बढाया जा सकता है। यही कारण है कि प्रायः सभी श्वेताम्बरीय 'परीक्षालयो के पाठ्यक्रमों में यह नियुक्त किया गया इस प्रकार पर्याप्त पठन-पाठन होने पर भी अव तक हिन्दी भाषा में इसका अनुवाद नहीं हुआ था। इससे छात्रों को तथा अन्य न्यायशास्त्र के जिज्ञासुओ को बडी अडचन पडती थी। यही अड़चन दूर करने के लिए यह प्रयास किया गया है। अनुवाद में सरलता और संक्षेप का ध्यान रक्खा गया है। इसके अतिरिक्त इस ग्रन्थ को पढ़ने वाले विद्यार्थियो के मामने रखकर उनसे 'पास' करा लिया सया है। न्यायशास्त्र के प्रारम्भिक अभ्यासियो को इससे बहुत कुछ सहायता मिलेगी, ऐसी आशा है। विद्वान् अध्यापको से यह अनुरोध है कि वे इसकी त्रुटियाँ दिखलाने की कृपा करें, ताकि आगामी मस्करण अधिक उपयोगी और विशुद्ध हो सके। '" -शोभाचन्द्र भारिन
प्रमाणह-नय तत्कालोक
के
2072-विषयानुक्रम-cecec
१-प्रथम परिच्छेद-प्रमाण का स्वरूप
१ ॥
२-द्वितीय परिच्छेद-प्रत्यक्ष प्रमाण के भेद .
पृ० १४
३-तृतीय परिच्छेद-परोक्ष-प्रमाण का निरूपण
पृ० २६॥
0
४-चतुर्थ परिच्छेद-आगम प्रमाण का स्वरूप
पृ० ७४
५-पञ्चम परिच्छेद-प्रमाण का विषय
६-षष्ठ परिच्छेद-प्रमाण का फल
पृ० ६६
-सप्तम परिच्छेद-नय का स्वरूप
पृ० १३४
-अष्टम परिच्छेद-वाद का स्वरूप
पृ० १५६ 0
geseesecacSERCCe
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक
प्रथम परिच्छेद
मंगलाचरण
रागद्वेपविजेतारं, ज्ञातारं विश्ववस्तुनः ।
शक्रपूज्यं गिरामीशं, तीर्थेशं स्मृतिमानये ।।
अर्थ-राग और द्वेप को जीतने वाले-वीतराग, समस्त
वस्तुओं को जानने वाले-मर्वज्ञ, इन्द्रो द्वारा पूजनीय तथा वाणी के
स्वामी तीर्थकर भगवान को मैं स्मरण करता हूँ।
विवेचन-प्रथ-रचना में आने वाले विघ्नो का निवारण करने
के लिए यास्तिक ग्रंथकार अपने प्रथ की आदि में मंगलाचरण करते
हैं। मंगलाचरण करने मे विन-निवारण के अतिरिक्त शिष्टाचार का
पालन भी होता है और कृतज्ञता का प्रकाशन भी।
प्रस्तुत मंगलाचरण में 'तीर्थेश' का म्मरण किया गया है।
साधु, माध्वी, श्रावक, श्राविका, यह चतुर्विध संघ तीर्थ कहलाता है
तीर्थ के स्वामी को तीर्थेश कहते हैं।
तीर्थेश के यहां चार विशेपण हैं। यह विशेषण क्रमशः
उनके चार मूल अतिशयो अर्थात विशिष्टताओं के सूचक हैं । चार
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (२) अतिशय यह हैं :- (१) अपायापगम-अतिशय (२) ज्ञान-अतिशय (३) पूजातिशय (४) वचनातिशय । ग्रंथ का प्रयोजन प्रमाणनयतत्त्वव्यवस्थापनार्थमिदमुपक्रम्यते ॥१॥ अर्थ-प्रमाण और नय के स्वरूप का निश्चय करने के लिए यह ग्रंथ प्रारम्भ किया जाता है। प्रमाण का स्वरूप स्वपरव्यवसायि ज्ञानं प्रमाणम् ॥२॥ अर्थ-स्व और पर को निश्चित रूप से जानने वाला ज्ञान प्रमाण कहलाता है। विवेचन-प्रत्येक पदार्थ के निर्णय की कसौटी प्रमाण ही है। अतएव सर्वप्रथम प्रमाण का लक्षण बताया गया है। यहा 'स्व' का अर्थ ज्ञान है और 'पर' का अर्थ है ज्ञान से भिन्न पदार्थ । तात्पर्य यह है कि वही ज्ञान प्रमाण माना जाता है जो अपने-आपको भी जाने और दूसरे पदार्थों को भी जाने, और वह भी यथार्थ तथा निश्चित रूप से। ज्ञान ही प्रमागा है अभिमतानभिमतवस्तुस्वीकारतिरस्कारक्षम हि प्रमाणं, अतो ज्ञानमेवेदम् ॥३॥ अर्थ-ग्रहण करने योग्य और त्याग करने योग्य वस्तु को स्वीकार करने तथा त्याग करने में प्रमाण समर्थ होता है, अतः ज्ञान ही प्रमाण है।
[ प्रथम परिच्छेद विवेचन--उपादेय क्या है और हेय क्या है, इसे बतला देना ही प्रमाण की उपयोगिता है। प्रमाण की यह उपयोगिता तभी सिद्ध हो सकती है जब प्रमाण को ज्ञान रूप माना जाय । यदि प्रमाण ज्ञान रूप न होगा-अज्ञान रूप होगा, तो वह हेय-उपादेय का विवेक नही करा सकंगा । जब प्रमाण मे हेय-उपादेय का विवेक होता ही है तो उस बान रूप ही मानना चाहिए । अज्ञान प्रमाण नहीं है न वै सनिकांदरज्ञानस्य प्रामाण्यमुपपन्न, तस्यार्था- न्तरस्येव स्वार्थव्यवसितौ साधकतमन्वानुपपत्तेः ॥४॥ अर्थ-मन्निकर्प आदि अज्ञानों को प्रमाणता मानना उचित नहीं है क्योंकि वे दूसरं पदार्थों (घट श्रादि ) की तरह स्त्र और पर का निश्चय करने में माधकतम नहीं हैं। विवेचन-इन्द्रिय और पदार्थ के सम्बन्ध को सन्निकर्प कहते हैं। वैशेषिक दर्शन मे मन्निकर्ष प्रमाण माना गया है। उसी सन्निकर्प की प्रमाणना का यहां निषेध किया गया है। पहले यह पतला दिया गया था कि ज्ञान ही प्रमाण हो सकता है, पर सन्निकर्प ज्ञान रूप नहीं है अतण्व वह प्रमाण भी नही हो सकता। सूत्र का भाव यह है-अज्ञान रूप मन्निकर्प प्रमाण नहीं है, क्योकि वह स्त्र और पर के निश्चय में माधकतम ( करण) नहीं है। जो-जो ग्व-पर के निश्चय में करण नहीं होता वह प्रमाण भी नहीं होता, - - श्रादि शन्द मे यहा कारक-साकल्य धादि की माणता का निपेध किया गया है, पर उसका विवेचन कुछ गहन होने से यहां छोड़ दिया गया है प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (४) जैसे घट । सन्निकर्ष स्व-पर के निश्चय में करण नही है इस कारण प्रमाण नहीं है। सनिक स्व-पर-व्यवसायी नहीं है न खल्वस्य स्वनिर्णीतौ करणत्वम् , स्तम्भादेरिवा- चेतनत्वात् ; नाप्यर्थनिश्चितौ स्वनिश्चितावकरणस्य कुम्भा- देरिव तत्राप्यकरणत्वात् ॥शा अर्थ-सन्निकर्ष आदि स्व-निर्णय मे करण नहीं हैं, क्योंकि वे अचेतन हैं, जैसे खम्भा वगैरह । सन्निकर्प आदि अर्थ (पदार्थ) के निर्णय में भी करण नहीं हैं, क्योकि जो म्व-निर्णय मे करण नहीं होता वह अर्थ के निर्णय मे भी करण नहीं होता, जैसे घट आदि । विवेचन-सन्निकपे की प्रमाणता का निषेध करने के लिए 'वह स्व-पर के निश्चय मे करण नहीं है। यह हेतु दिया गया था। किन्तु यह हेतु प्रतिवादी-वैशेपिक को सिद्ध नहीं है और न्याय-शास्त्र अनुसार हेतु प्रतिवादी को भी सिद्ध होना चाहिए। जिस हेतु को प्रतिवादी स्वीकार नहीं करता वह असिद्ध हेत्वाभास हो जाता इस प्रकार जब हेतु असिद्ध हो जाता है तब उस हेतु को साध्य बना कर उसे सिद्ध करने के लिए दूसरे हेतु का प्रयोग करना पडता है। यहां यही पद्धति उपयोग में ली गई है। पूर्वोक्त हेतु के दो खण्ड करके दोनों को सिद्ध करने के लिए यहा दो हेतु दिये गये हैं। भाव यह है-सन्निकर्ष स्व के निश्चय में करण नहीं है, क्योंकि वह अचेतन है; जो-जो अचेतन होता है वह-वह स्व-निश्चय में करण नहीं होता, जैसे स्तम्भ । तथा- है [प्रथम परिच्छेद . ----- सन्निकर्प पर-पदार्थ का निश्चय नहीं कर सकता, क्योंकि वह अपना ( स्व का) निश्चय नहीं कर सकता, जो अपना निश्चय नही कर सकता वह पर-पदार्थ का निश्चय नहीं कर सकता, जैसे घट । प्रमाण निश्चयात्मक है है। तद् व्यवसायस्वभावं समारोपपरिपन्थित्वात् प्रमाण- त्वाद् वा ॥६॥ अर्थ-प्रमाण व्यवमाय रूप है, क्योंकि वह समारोप का विरोधी है अथवा प्रमाण व्यवसाय रूप है, क्योंकि वह प्रमाण विवेचन-प्रमाण का लनण बताते ममय उसे निश्चयात्मक कहा था; पर बौद्ध दर्शन में निर्विकल्प नान भी प्रमाण माना जाता है। जनदर्शन में जिम दर्शनोपयोग कहते हैं और जिममे सिर्फ सामान्य का बोध होता है वहीं बौद्धो का निर्विकल्प ज्ञान है। निर्विकल्प ज्ञान की प्रमाणता का निषेध करके यहां यह बताया गया है कि प्रमाण निश्चयात्मक है । निर्विल्य ज्ञान में 'यह घट है, यह पट है', इत्यादि विशपों का नान नहीं होता, इसी कारण यह ज्ञान प्रमाण नहीं है। यहाँ प्रमाण को व्यवमाय-वभाव कहा है, इसमे यह भी फलित होता है कि सशय-ज्ञान, विपरीत-ज्ञान और अनध्यवमाय-ज्ञान भी प्रमाण नहीं हैं। सूत्र का भाव यह है-प्रमाण व्यवसायात्मक (निश्चयात्मक) है, क्योंकि वह ममागेप-संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय-का विरोधी है, जो व्यवसायात्मक नही होता वह समारोप का विरोधी नहीं होता, जैसे घट । तथा- - प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (६) प्रमाण व्यवसायात्मक है, क्योंकि वह प्रमाण है, जो व्यवसायात्मक नहीं होता वह प्रमाण भी नहीं होता, जैसे घट । समारोप अतस्मिस्तध्यवसायः समारोपः ॥७॥ स विपर्ययसंशयानध्यवसायभेदात् त्रेधा ||८|| अर्थ-अतद्-रूप वस्तु का तद्रूप ज्ञान हो जाना अर्थात् जो वस्तु जैसी नही है वैसी मालूम हो जाना, समारोप कहलाता है। समारोप तीन प्रकार का है-(१) विपर्यय () मशय (३) अनध्यवमाय । विपर्यय-समारोप विपरीतककोटिनिष्टङ्कनं विपर्ययः ॥६॥ यथा-शुक्तिकायामिदं रजतमिति ॥१०॥ अर्थ-एक विपरीत धर्म का निश्चय होना विपर्यय-ज्ञान (समारोप ) कहलाता है। जैसे-सीप मे 'यह चांदी है। ऐसा ज्ञान होना । विवेचन--सीप को चांदी समझ लेना, रस्सी को सांप समझ लेना, सांप को रस्सी समझ लेना, आदि-आदि इस प्रकार के मिथ्या ज्ञान को विपरीत या विपर्यय समारोप कहते हैं। इस ज्ञान मे वस्तु का एक ही धर्म जान पड़ता है और वह उल्टा जान पडता है। अतएव यह मिथ्या-ज्ञान है-प्रमाण नहीं है।
(७)
[ प्रथम परिच्छेद
--
गया
ܕܽ
।
संशय-समारोप
साधकबाधकप्रमाणाभावादनवस्थितानेककोटिसंस्पर्शि
ब्रान संशयः ॥११॥
यथा-अयं स्थाणुर्वा पुरुपो वा ॥१२॥
श्रर्य -माधक प्रमाण और बाधक प्रमाण का अभाव होने
मे, अनिश्चित अनेक अंशो को छूने वाला ज्ञान मंशय कहलाता है।
मे-यह लूंठ है या पुरुप है ?
विवेचन-यहाँ मशय-नान का स्वरूप और कारण बतलाया
। माथ ही उदाहरण का भी उल्लेख कर दिया गया है।
एक ही वस्तु मे अनेक अंशों को स्पर्श करने वाला ज्ञान
मंशय है, जैम ठूठपन और पुरुपान दो अंश हैं । इम ज्ञान के समय
न लूंछ को मिट्ट करने वाला कोई प्रमाण होता है, न पुरुप का निषेध
करने वाला ही प्रमाण होता है । ठ और पुरुष दोनों में समान रूप
में रहने वाली उचाई मात्र मालम होती है। एक को दूसरे से भिन्न
करने वाला कोई विशेष धर्म मालूम नहीं होता।
विपर्यय और संशय का भेद-विपर्यय ज्ञान में एक अंश
का नान होता है, मंशय में अनेक अशी का । विपर्यय में एक अंश
निश्चित होता है, मंशय में दोनों अश अनिश्रित होते हैं।
अनध्यवमाय-समारोप
किमित्यालोचनमात्रमनध्यवसायः ॥१३॥
यथा-गच्छत्तॄणस्पर्शज्ञानम् ॥१४॥
प्रमाण-नय तत्त्वालोक] (८) अर्थ-'अरे क्या है ?' इस प्रकार का अत्यन्त सामान्य ज्ञान होना अनध्यवसाय है। जैसे-जाते समय तिनके के स्पर्श का ज्ञान । विवेचन-रास्ते मे जाते समय, चित्त दूसरी तरफ लगा रहने से तिनके का पैर से स्पर्श होने पर, 'यह क्या है' इस प्रकार का विचार आता है। इसी को अनध्यवसाय कहते हैं। इस ज्ञान में अतद्रूप वस्तु तद्रूप मालूम नहीं होती, इस कारण समारोप का लक्षण पूर्ण रूप से अनभ्यवसाय में नहीं घटता, किन्तु अनध्यवसाय के द्वारा यथार्थ वस्तु का ज्ञान न होने के कारण इसे उपचार से - समारोप माना गया है। संशय और अनध्यवसाय मे भेद-सशय ज्ञान में भी यद्यपि विशेष वस्तु का निश्चय नहीं होता फिर भी विशेष का स्पर्श होता है. परन्तु अनध्यवसाय संशय से भी उतरती श्रेणी का ज्ञान है। इसमें विशेष का स्पर्श भी नही है और इसी कारण इसमे अनेक अंश भी प्रतीत नही होते। 'पर' का अर्थ ज्ञानादन्योऽर्थः परः॥१॥ अर्थ-ज्ञान से भिन्न पदार्थ 'पर' कहलाता है। विवेचन-प्रमाण का लक्षण बताते समय कहा गया था कि जो ज्ञान अपना और पर का निश्चय करता है वह प्रमाण है। सो यहाँ 'पर' शब्द का अर्थ स्पष्ट किया गया है।
(1) [प्रथम परिच्छेद . पर शब्द का अर्थ समझाने के लिए अलग सूत्र रचने का विशेष प्रयोजन है। घट, पट श्रादि पदार्थों के सम्बन्ध में अनेक मत है। चौहों में एक माध्यमिक सम्प्रदाय है। वह घट आदि बाह्य पदार्थों को और ज्ञान आदि आन्तरिक पदार्थों को मिया मानता है। वह शून्यवाही है । उसके मन के अनुमार जगत् का यह समस्त प्रपंच मिथ्या है, वास्तव में कोई भी पदार्थ सत नहीं है। अनादि कालीन मिथ्या संस्कार के कारण हमे यह पदार्थ मालूम होते हैं। माध्यमिक के अतिरिक्त वेदान्ती लोग भी वाह्य पदार्थों को मिथ्या ममझने है। इनके मत से एकमात्र ज्ञान-स्वरूप ब्रह्म ही सत् है, ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य ममम्न प्रतीत होने वाले पदार्थ असत् हैं। बोडो में भी एक सम्प्रदाय मिर्फ ज्ञान को वास्तविक मानता है और अन्य पदार्थों को भ्रम मात्र कहता है । इन सब मतो के विरुद्ध, जैन- दर्शन ज्ञान को वास्तविक मानता है और ज्ञान द्वारा प्रतीत होने वाले घट, पट श्रादि अन्य पदार्थों को भी वास्तविक स्वीकार करता है। हम प्रकार बौद्ध दर्शन और वेदान्त दर्शन का विरोध करने के लिए श्राचार्य ने इम मूत्र का निर्माण किया है। स्वव्यवसाय का समर्थन स्वस्य व्यवसायः स्वाभिमुख्येन प्रकाशनम्, बाह्यस्येव तढाभिमुख्येन; करिकलभकमहमात्मना जानामि ॥१६॥ शब्दार्थ बाह्य पदार्थ की ओर उन्मुख होने पर जो ज्ञान होता है वह बाह्य पदार्थ का व्यवसाय कहलाता है, इसी प्रकार ज्ञान अपनी ओर उन्मुख होकर जो जानता है वह स्त्र का व्यवसाय कहलाता है। जैसे-मैं, अपने ज्ञान द्वारा, हाथी के बच्चे को, जानता हूँ।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] विवेचन-प्रकाशवान पदार्थों मे दो श्रेणियां देखी जाती हैं- (१) प्रथम श्रेणी में वे हैं जो अपने-आपको प्रकाशित नहीं करते, सिर्फ दूसरे पदार्थों को प्रकाशित करते हैं, जैसे नेत्र । (२) दूसरी श्रेणी उनकी है जो अपने-आपको भी प्रकाशित करते हैं और दूसरो को भी प्रका- शित करते हैं, जैसे सूर्य । ज्ञान भी प्रकाशवान पदार्थ है अन. यह प्रश्न उपस्थित होता है कि ज्ञान प्रथम श्रेणी मे है या दूसरी श्रेणी में ? इस सूत्र मे इसी प्रश्न का समाधान किया गया है मीमांसक और नैयायिक मत के अनुसार ज्ञान प्रथम श्रेणी में है-वह घट आदि दूसरे पदार्थों को जानता है पर अपने-आपको नहीं जानता । जैन दर्शन के अनुसार ज्ञान अपने-आपको भी जानता है और दूसरे पदार्थों को भी जानता है। जब हम हाथी के बच्चे को जानते हैं, तब केवल हाधी के वच्चे का ही ज्ञान नहीं होता, वरन् 'मैं' इस कर्ता का भी नान होता है, 'जानता हूँ' इस क्रिया का भी ज्ञान होता है और 'अपने जान से इस करण रूप ज्ञान का भी ज्ञान होता है। स्व-व्यवसाय का दृष्टान्त कः खलु ज्ञानस्यालम्बनं वाह्य प्रतिभातमभिमन्यमा- नस्तदपि तत्प्रकारं नाभिमन्येत ? मिहिरालोकवत् ॥१७॥ अर्थ-कौन ऐसा पुरुप है जो ज्ञान के विषयभूत वाह्य पदार्थ को जाना हुआ माने किन्तु ज्ञान को जाना हुआ न माने ? सूर्य के आलोक की तरह।
(११) [प्रथम परिच्छेद विवेचन यहाँ भी म्व-व्यवसाय का दृष्टान्त माथ समर्थन किया गया है । जो ज्ञान बाह्य पदाथ-घट आदि को जानता है वही अपने-श्रापको भी जान लेता है। हम वाघ पदार्थ का ज्ञान हो जाय किन्तु यह जान न हो कि 'हमे बाह्य पदार्थ का ज्ञान हुआ है। ऐसा कभी सम्भव नहीं है। बाह्य पदार्थ के जान लेने को जब तक हम न जान लेग तब तक वास्तव में पारा पदार्थ का जानना समय नहीं है। जैसे सूर्य के प्रकाश द्वाग घट श्रादि पदार्थों को जब हम देख लेते हैं तब सूर्य के प्रकाश को भी अवश्य देखते हैं, उसी प्रकार जब ज्ञान द्वारा किमी पदार्य को जानते हैं तब नान को भी अवश्य जानते हैं। जैसे सूर्य के प्रकाश को देखने क लिए दृमरे प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती उसी प्रकार नान को जानने के लिए दमा वान की याव- श्यकता नहीं होती। जैसे सूर्य अनदेखा नहीं रहता उनी प्रकार नान भी अनजाना नहीं रहता। प्रमाणता का स्वरूप मानस्य प्रमेयाव्यभिचारित्वं प्रामाण्यम् ॥ तदितरच- प्रामाण्यम् ॥१८॥ अर्थ-प्रमय में अव्यभिचारी होना-अर्थात प्रमेय पदार्थ जमा है उसे वैमा ही जानना, यही ज्ञान की प्रमाणता है । हमम विन्द्व अप्रमागता है अर्थात प्रमय पदार्थ को यथार्थ रूप में न जानना-जमा नहीं है वैमा जानना-अप्रमाणता विवेचन-जो वस्तु जैसी है उसे उसी रूप में जानना ज्ञान की प्रमाणता है और अन्य रूप में जानना अप्रमाणता है। प्रमाणता और अप्रमाणता का यह भेद बाह्य पदार्थों की अपेक्षा समझना है प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१२) चाहिए । प्रत्येक ज्ञान अपने स्वरूप को वास्तविक ही जानता है अत स्वरूप की अपेक्षा सभी ज्ञान प्रमाण होते हैं, वाह्य पदार्थों की अपेक्षा कोई ज्ञान प्रमाण होता है, कोई अप्रमाण होता है। प्रमाण की उत्पत्ति और ज्ञप्ति तदुभयमुत्पत्तौ परत एव, ज्ञप्तौ तु स्वतः परतश्च ॥१६॥ अर्थ-प्रमाणता और अप्रमाणता की उत्पत्ति परत. ही होती है तथा प्रमाणता और अप्रमाणता की बप्ति अभ्यास दशा मे म्वत. होती है और अनभ्यास दशा में परतः होती है। विवेचन-जिन कारणों से ज्ञान की उत्पत्ति होती है उन कारणो के अतिरिक्त दूसरे कारणो से प्रमाणता का उत्पन्न होना परतः उत्पत्ति कहलाती है। जिन कारणो से ज्ञान का निश्चय होता है उन्ही कारणो से प्रमाणता का निश्चय होना स्वत. ज्ञप्ति कहलाती है और दूसरे कारणो से निश्चय होना परत. ज्ञप्ति कहलाती है। उत्पत्ति की अपेक्षा ज्ञान की प्रमाणता और अप्रमाणता- दोनो ही पर निमित्त से उत्पन्न होती हैं। जब किसी वस्तु के को न जानने वाले पुरुप को कोई विद्वान उसका स्वरूप समझाता है तो वह उस वस्तु के स्वरूप को समझने लगता है। यहाँ समझाने वाले का ज्ञान यदि निर्दोष है तो उस समझने वाले पुरुष के ज्ञान में भी प्रमाणता आ जाती है और यदि समझाने वाले का ज्ञान सदोष है तो उसके ज्ञान मे भी अप्रमाणता आ जाती है। इस प्रकार उस नवीन पुरुष के ज्ञान में प्रमाणता और अप्रमाणता-दोनों ही की उत्पत्ति पर निमित्त से होती है। स्वरूप (१३) [ प्रथम परिच्छेद जब कोई वस्तु बार बार के परिचय से अभ्यात हो जाती है तो उस वस्तु का ज्ञान होते ही उम ज्ञान की प्रमाणता (मचाई) का भी निश्चय हो जाता है । जैसे-गुरु अपने शिष्य को प्रतिदिन देखता है। इस अभ्यास-दशा मे शिष्य का प्रत्यक्ष होते ही गुरु को अपने शिष्य विषयक ज्ञान की प्रमाणता का भी निश्चय हो जाता है। शिष्य को देख कर गुरु यह नहीं सोचता कि मुझे अपने शिष्य का ज्ञान हो रहा है सो यह जान प्रमाण है या नहीं ? इसी को अभ्यास दशा में म्वत ज्ञप्ति हो जाना कहते है। जब कोई वस्तु अपरिचित होती है तब उसका ज्ञान हो जाने पर भी उम ज्ञान की प्रमाणता (सचाई) का निश्चय तत्काल नहीं हो जाता । वह सोचने लगता है-मुझे अमुक वस्तु का जान हुआ है पर न जाने यह ज्ञान सच्चा है या मिथ्या ? इसके बाद उम जान को पुष्ट करने वाला कारण अगर मिल जाता है तो उसे अपने ज्ञान की प्रमाणता का निश्चय हो जाता है, इसी को अनभ्यास दशा में परत नमि (निश्चय ) कहत हैं। इसके विपरीत यदि ज्ञान को मिथ्या सिद्ध करने वाला कोई कारण मिल जाता है तो वह पुरुप अपने ज्ञान की अप्रमाणता का निश्चय कर लेता है। यहाँ सामान्य ज्ञान हो जाने पर भी उस ज्ञान की प्रमाणता और अप्रमाणता का निश्चय दूसरे कारण से होता है। अतएव अनभ्यास दशा में प्रमाणता ओर अप्रमाणता का निश्चय परत' बतलाया गया है। मीमांमक लोग प्रामाण्य की उत्पत्ति और नप्ति स्वत ही मानते है और अप्रामाण्य की उत्पत्ति तथा ज्ञप्ति परत' ही मानते हैं। प्रकृत सूत्र में उनके मत का निरसन किया गया है।
द्वितीय परिच्छेद प्रत्यक्ष प्रमाण का विवेचन प्रमाण के भेद तद् द्विभेदं प्रत्यक्षं च परोक्षं च ॥ १ ॥ अर्थ-प्रमाण दो प्रकार का है-(१) प्रत्यक्ष और (२) परोक्ष विवेचन-प्रमाण के भेडो के सम्बन्ध में अनेक मत है। अलग-अलग दर्शनकार प्रमाणो की संख्या अलग-अलग मानते हैं। जैसे- चार्वाक-(१) प्रत्यक्ष बौद्ध-(१) प्रत्यक्ष (२) अनुमान वैशेपिक -(१) प्रत्यक्ष (२) अनुमान (३) आगम नैयायिक-(१)प्रत्यक्ष (२) अनुमान (३) आगम (४) उपमान प्रभाकर-(१) प्रत्यक्ष (क) अनुमान (३) आगम (४) उपमान (५) अर्थापत्ति भाट्ट-(१) प्रत्यक्ष (२) अनुमान (३) आगम (४) उपमान (५) अर्थापत्ति (६) अभाव चार्वाक प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मान कर प्रत्यक्ष की प्रमाणता और अनुमान की अप्रमाणता सिद्ध नही कर सकता। इसके अतिरिक्त वह परलोक आदि का निपेध भी नहीं कर सकता है। अतएव अनुमान प्रमाण को स्वीकार करना आवश्यक है। शेष समस्त वादियो के माने हुये प्रमाण जैनदर्शन सम्मत दो भेदों में ही अन्तर्गत हो. जाते (१५) [ प्रथम परिच्छेद हैं। आगे तीसरे अध्याय में परोक्ष के पांच भेद बतलाये जायेगे। उनमें अनुमान और श्रागम भी हैं। उपमान प्रमाण सादृश्यप्रत्यभिज्ञान नामक परोक्षभेद मे अन्तर्गत है और अर्थापत्ति अनुमान से भिन्न नहीं है। अभाव प्रमाण यथायोग्य प्रत्यक्ष आदि मे ममाविष्ट है । अतएव प्रत्यक्ष और परोक्ष-यह दो भेद ही मानना उचित है। प्रत्यक्ष का लक्षण स्पष्टं प्रत्यक्षम् ॥ २ ॥ अनुमानाद्याधिक्येन विशेषप्रकाशनं स्पष्ट त्वम् ॥ ३ ॥ अर्थ स्पष्ट (निर्मल) ज्ञान को प्रत्यक्ष कहते हैं। अनुमान आदि परोक्ष प्रमाणों की अपेक्षा पदार्थ का वर्ण, आकार आदि विशेष मालूम होना स्पष्टत्व कहलाता है। विवेचन-प्रत्यक्ष ज्ञान स्पष्ट होता है और परोक्ष अस्पष्ट होता है। यही दोनो प्रमाणो मे मुख्य भेद है। प्रत्यक्ष प्रमाण में रहने वाली स्पष्टता क्या है, यह उदाहरण से समझना चाहिए। मान लीजिये- एक बालक को उसके पिता ने अग्नि का ज्ञान शब्द द्वारा करा दिया । वालक ने शन्न (आगम) से अग्नि जान ली। इसके पश्चात् फिर धूम दिखा कर अग्नि का ज्ञान करा दिया। बालक ने अनुमान से अग्नि जान ली । तदनन्तर बालक का पिता जलता हुआ अँगार उठा लाया और वालक के सामने रख कर कहा-देखो, यह अग्नि है। यह प्रत्यक्ष से अग्नि का जानना कहलाया। यहाँ पहले दो ज्ञानो की अपेक्षा, अन्तिम ज्ञान अर्थात् प्रत्यक्ष द्वारा अग्नि का विशेष वर्ण, स्पर्श आदि का जो साफ-सुथरा ज्ञान प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१६) होता है, बस वही ज्ञान की स्पष्टता है। ऐसी स्पष्टता जिस ज्ञान में पाई जाती है वह ज्ञान प्रत्यक्ष कहलाता है। प्रत्यक्ष के भेद तद् द्विप्रकारं, सांव्यवहारिकं पारमार्थिकं च ॥ ४ ॥ अर्थ-प्रत्यक्ष प्रमाण दो प्रकार का है- (१) सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष और (२) पारमार्थिक प्रत्यक्ष । विवेचन-इन्द्रिय और मन की सहायता से होने वाला, एक देश निर्मल ज्ञान साव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहलाता है और विना इद्रियों एव मन की सहायता के, आत्म-स्वरूप से उत्पन्न होने वाला स्पष्ट ज्ञान पारमार्थिक प्रत्यक्ष कहलाता है। सांन्यवहारिक प्रत्यक्ष के भेद तत्रायं द्विविधमिन्द्रियनिवन्धनमनिन्द्रियनिवन्धनं च || अर्थ-सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष दो प्रकार का है- (१) इन्द्रिय- निबन्धन और (२) अनिन्द्रियनिबन्धन । विवेचन-स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण-इन पांच इन्द्रियों की सहायता से उत्पन्न होने वाला ज्ञान इन्द्रियनिवन्धन कहलाता है और मन की सहायता से उत्पन्न होने वाला ज्ञान अनिन्द्रियनिबन्धन कहलाता है। इन्द्रिय जन्य ज्ञान में भी मन की सहायता की अपेक्षा रहती (१७) [प्रथम परिच्छेद है, पर इन्द्रियाँ वहां असाधारण कारण हैं, अतएव उसे इन्द्रिय- निबंधन नाम दिया गया है। इन्द्रियनिवन्धन-अनिन्द्रियनिवन्धन के भेद एतद् द्वितयमवग्रहहावायधारणाभेदादेकशश्चतुर्चि- कल्पकम् ॥ ६ ॥ अर्थ-अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा के भेद से यह दोनों प्रकार का सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष चार-चार प्रकार का है। अर्थात् इन्द्रियनिवन्धन के भी चार भेट हैं और अनिन्द्रियनिवन्धन के भी चार भेद हैं। अवग्रह का स्वरूप विपयविपयिसन्निपातानन्तरसमुद्भूतसत्तामात्रगोचर- दर्शनाजातं, श्राद्यं, अवान्तरसामान्याकारविशिष्टवस्तुग्रहण- मवग्रहः॥ ७ ॥ अर्थ-विषय (पदार्थ) और विपयी (चक्षु आदि) का यथो- चित देश में मम्बन्ध होने पर सत्तामात्र को जानने वाला दर्शन उत्पन्न होना है। इसके अनन्तर सब से पहले, मनुष्यत्व आदि अवान्तर सामान्य मे युक्त वस्तु को जानने वाला जान अवग्रह कहलाता विवचन-जैन शास्त्रों में दो उपयोग प्रसिद्ध हैं-दर्शनोपयोग और ज्ञानोपयोग । पहल दर्शनोपयोग होता है फिर ज्ञानोपयोग होता है। यहां जानोपयोग का वर्णन करने के लिये उससे पूर्वभावी दर्शनो- पयोग का भी कथन किया गया है । है । - प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१८) विषय अर्थात् घट आदि पदार्थ और विपयी अर्थात् नेत्र आदि जब योग्य देश में मिलते हैं तब सर्वप्रथम दर्शनोपयोग उत्पन्न होता है। दर्शन महासामान्य अथवा सत्ता को ही जानता है। इसके पश्चात् उपयोग कुछ आगे की ओर बढता है और वह मनुष्यत्व श्रादि अवान्तरसामान्य युक्त वस्तु को जान लेता है । यह अवान्तर सामान्य युक्त वस्तु अर्थात् मनुष्यत्व आदि का ज्ञान ही अवग्रह कहलाता है। ज्ञान की यह धारा उत्तरोत्तर विशेष की ओर झुक्रती जाती है, जैमा कि अगले सूत्रों से ज्ञात होगा। + ईहा का स्वरूप अवगृहीतार्थविशेषाकांक्षणमीहा ॥ ८ ॥ अर्थ-अवग्रह से जाने हुये पदार्थ में विशेष जानने की इच्छा ईहा है। विवेचन-'यह मनुष्य है' ऐसा अवग्रह ज्ञान से जान पाया था । इससे भी अधिक 'यह दक्षिणी है या पूर्वी' इस प्रकार विशेष को जानने की इच्छा होना ईहा ज्ञान कहलाता है। ईहा ज्ञान 'यह दक्षिणी होना चाहिये यहाँ तक पहुँच पाता है। अवाय का स्वरूप ईहितविशेषनिर्णयोऽवायः॥ ६ ॥ अर्थ-ईहा द्वारा जाने हुये पदार्थ में विशेष का निर्णय हो जाना अवाय है। विवेचन-'यह मनुष्य दक्षिणी होना चाहिये' इतना ज्ञान ईहा (१६) [ प्रथम परिच्छेद द्वारा हो चुका था, उसमे विशेष का निश्चय हो जाना अवाय है। जैसे-'यह मनुष्य दक्षिणी ही है।' धारणा का स्वरूप स एव दृढ़तमावस्थापनो धारणा ॥ १० ॥ अर्थ-वाय ज्ञान जब अत्यन्त दृढ हो जाता है तब वही अवाय, धारणा कहलाता है। विवेचन-धारणा का अर्थ संस्कार है। हृदय-पटल पर यह ज्ञान इस प्रकार अंकित हो जाता है कि कालान्तर में भी वह जागृत हो सकता है। इसी ज्ञान से स्मरण होता है। ईसा और संशय का अन्तर संशयपूर्वकत्वादीहायाः संशयाद् भेदः ॥ ११ ॥ अर्थ-ईहा ज्ञान संशयपूर्वक होता है अतः वह संशय से भिन्न है। विवेचन-ईहा ज्ञान में विशेप का निश्चय नहीं होता और संशय भी अनिश्चयात्मक है, ऐसी अवस्था में दोनों मे क्या भेद है ? इम प्रश्न का समाधान यहाँ यह किया गया है कि संशय पहले होता है और ईहा बाद में उत्पन्न होती है अतएव दोनों भिन्न २ हैं। इसके अतिरिक्त- मंशय मे दोनो पलडे बराबर होते है-दक्षिणी और पश्चिमी की दोनो कोटियाँ तुल्य बल वाली होती हैं; ईहा में एक पलड़ा भारी
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक]
(२०)
हो
जाता है-'यह दक्षिणी होना चाहिये' इस प्रकार ज्ञान एक ओर
को झुका रहता है । अतएव संशय और ईहा दोनों एक नहीं हैं।
अवग्रहादि का भेदाभेद
कथञ्चिदभेदेऽपि परिणामविशेषादेपांव्यपदेशभेदः ॥१२॥
अर्थ-दर्शन, अवग्रह आदि मे कथचित् अभेद होने पर भी
परिणाम के भेद से इनके भिन्न २ नाम दिए गए हैं।
विवेचन-जीव का लक्षण उपयोग है। उसी उपयोग की
भिन्न २ अवस्थाएँ होती हैं और वही अवस्थाएँ यहाँ दर्शन, अवग्रह
ईहा आदि भिन्न २ नामो से बताई गई हैं। इन अवस्थाओं से उपयोग
की उत्पत्ति और उत्तरोत्तर विकास का क्रम जाना जाता है। जैसे
प्रत्येक मनुष्य शिशु, बालक, कुमार, युवक, प्रौढ आदि अवस्थाओं
को क्रम-पूर्वक ही प्राप्त करता है उसी प्रकार उपयोग भी दर्शन, अव-
ग्रह आदि अवस्थाओ को क्रम से पार करता हुआ ही धारणा की
अवस्था प्राप्त करता है । शिशु आदि अवस्थाओं मे मनुष्य एक ही है
फिर भी परिणमन के भेद से अवस्थाएँ भिन्न २ कहलाती हैं उसी
प्रकार उपयोग एक होने पर भी परिणमन (विकास) की दृष्टि से
अवग्रह आदि भिन्न २ कहलाते हैं। जैन परिभाषा में इसी को द्रव्या-
र्थिक नय की अपेक्षा अभेद और पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा भेद
कहते हैं।
अवग्रह आदि की भिन्नता
असामस्त्येनाप्युत्पद्यमानत्वेनाऽसंकीर्णस्वभावतयाऽनु-
भूयमानत्वात्, अपूर्वापूर्ववस्तुपर्यायप्रकाशकत्वात्, क्रमभावि-
त्वाचैते व्यतिरिच्यन्ते ॥१३॥
(२१) [प्रथम परिच्छेद अर्थ-असमस्त रूप से भी उत्पन्न होने के कारण भिन्न २ म्वभाव वाले मालूम होते हैं, वस्तु की नवीन २ पर्याय को प्रकाशित करते हैं और क्रम से उत्पन्न होते हैं, अत' अवग्रह श्रादि भिन्न २ है। विवेचन-अवग्रह आदि का भेट सिद्ध करने के लिये यहाँ तीन हेतु वताये गये हैं:- (१) पहला हेतु-कभी सिर्फ दर्शन ही होता है, कभी दर्शन और अवग्रह-दो ही उत्पन्न होते है, इसी प्रकार कभी तीन, कभी चार ज्ञान भी उत्पन्न होते हैं। इसमें प्रतीत होता है कि दर्शन, अवग्रह आदि भिन्न-भिन्न हैं। यदि यह अभिन्न होते तो एक साथ पाँचों ज्ञान उत्पन्न होत अथवा एक भी न होता। (२) दूमग हेतु-पदार्थ की नई-नई पर्याय को प्रकाशित करने के कारण भी दर्शन आदि भिन्न भिन्न सिद्ध होते हैं। तात्पर्य यह है कि सर्वप्रथम दर्शन पदार्थ में रहने वाले महा सामान्य को जानता फिर अवग्रह अवान्तर सामान्य को जानता है, ईहा विशेप की ओर झुकता है, अवाय विशेप का निश्चय कर देता है और धारणा में वह निश्चय अत्यन्त दृढ़ बन जाता । इस प्रकार प्रत्येक ज्ञान नवीन- नवीन धर्म को जानता है और हम उनमे भेद सिद्ध होता है। (३) तीसग हेतु-पहले दर्शन, फिर अवग्रह आदि इस प्रकार क्रम में ही यह ज्ञान उत्पन्न होते हैं, अतः भिन्न-भिन्न हैं। दर्शन-श्रवग्रह श्रादि का क्रम क्रमोऽप्यमीपामयमेव तथैव संवेदनात एवंक्रमावि- भूतनिजकर्मक्षयोपशमजन्यत्वाच ॥१४॥ है प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (२२) अन्यथा प्रमेयानवगतिप्रसङ्गः ॥१५॥ न खलु अदृष्टमवगृह्यते, न चाऽनवगृहीतं संदिह्यते, नचासंदिग्धमीह्यते, नचानीहितमवेयते,नाप्यनवेतं धार्यते॥१६॥ अर्थ-अवग्रह आदि का क्रम भी यही (पूर्वोक्त) है, क्योकि इसी क्रम से ज्ञान होता है। यदि यही क्रम न माना जाय तो प्रमेय का ज्ञान नहीं हो सकता। जिसका दर्शन नही होता उसका अवग्रह नहीं होता, विना अवग्रह के ईहा द्वारा पदार्थ नहीं जाना जाता, विना ईहा हुये अवाय नहीं होता, बिना अवाय के धारणा की उत्पत्ति नहीं होती। विवेचन-पहले दर्शन, फिर अवग्रह, फिर संदेह, फिर ईहा, फिर अवाय और तदनन्तर धारण ज्ञान उत्पन्न होता है। यही अनु- भव का क्रम है। यदि इस क्रम को स्वीकार न किया जाय तो किसी भी पदार्थ का ज्ञान होना असंभव है, क्योंकि जब तक दर्शन के द्वारा पदार्थ की सत्ता का आभास नहीं होता तब तक मनुष्यत्व आदि अवान्तर सामान्य ज्ञात नही होगे, अवान्तर सामान्य के ज्ञान विना 'यह दक्षिणी है या पश्चिमी' इस प्रकार का संदेह नहीं उत्पन्न होग सदेह के विना 'यह दक्षिणी होना चाहिये' इस प्रकार का ईहा ज्ञान न होगा, इसी प्रकार अगले ज्ञानो का भी अभाव हो जायगां। अतः दर्शन, अंवग्रह आदि का उक्त क्रम ही मानना युक्ति और अनुभव से सगत है। क्वचित् क्रमस्यानुपलक्षणमेषामाशूत्पादात्, उत्पलपत्र- शतव्यतिभेदक्रमवत् ॥१७॥ ।
(२३) [ प्रथम परिच्छेद अर्थ-कही क्रम मालूम नहीं पड़ता क्योकि यह सब ज्ञान शीघ्र ही उत्पन्न हो जाते हैं, कमल के सौ पत्तों को छेदने की तरह । विवेचन-जो वस्तु अत्यन्त परिचित होती है उसमें पहले दर्शन हुआ, फिर अवग्रह हुआ, इत्यादि क्रम का अनुभव नहीं होता। इसका कारण यह नही है कि वहाँ दर्शन आदि के बिना ही सीधा अवाय या धारणा ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। वहाँ पर भी पूर्वोक्त क्रम से ही ज्ञानों की उत्पत्ति होती है किन्तु प्रगाढ़ परिचय के कारण वह सब बहुत शीघ्र उत्पन्न हो जाते हैं । इसी कारण क्रम का अनुभव नहीं होता। एक दूसरे के ऊपर कमल के सौ पत्ते रखकर उनमे नुकीला भाला घुसेड़ा जाय तो वे सब पत्ते क्रम से ही छिदेगे पर यह मालूम नही पड़ पाता कि भाला कब पहले पत्ते मे घुसा, कब उससे वाहर निकला, कब दूसरे पत्ते में घुसा आदि । इसका कारण शीघ्रता है। जब भाले का वेग इतना तीव्र हो सकता है तो ज्ञान जैसे सूक्ष्मतर पदार्थ का वेग उससे भी अधिक तीव्र क्यों न होगा? पारमार्थिक प्रत्यक्ष पारमार्थिकं पुनरुत्पत्तावात्ममात्रापेक्षम् ॥१८॥ अर्थ-जो ज्ञान आत्मा से ही उत्पन्न होता है उसे पारमार्थिक प्रत्यक्ष कहते हैं। विवेचन-पारमार्थिक प्रत्यक्ष अर्थात् वास्तविक प्रत्यक्ष । यह प्रत्यक्ष सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष की भॉति इन्द्रियों और मन से उत्पन्न नहीं होता किन्तु आत्म-स्वरूप से उत्पन्न होता है। इसी कारण इसे मुख्य प्रत्यक्ष भी कहते हैं। सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष इन्द्रियजन्य और मनोजन्य होने के कारण वस्तुत. परोक्ष है किन्तु लोक में वह प्रत्यक्ष प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (२४) माना जाता है अत. लोक-व्यवहार के अनुरोध से उसे भी प्रत्यक्ष कहा है। पारमार्थिक प्रत्यक्ष के भेट तद् विकलं सकलं च ॥१३॥ अर्थ-पारमार्थिक प्रत्यक्ष दो प्रकार का है- (१) विकल पारमार्थिक प्रत्यक्ष और (२) सकल पारमार्थिक प्रत्यक्ष । विवेचन-जो वस्तुतः प्रत्यक्ष हो किन्तु विकल अर्थात् अधूरा या असम्पूर्ण हो उसे विकल पारमार्थिक प्रत्यक्ष कहते हैं और जो संपूर्ण है कोई भी पदार्थ जिस प्रत्यक्ष से बाहर नहीं है, उसे सकल पार- मार्थिक प्रत्यक्ष कहते हैं। विकलपारमार्थिक प्रत्यक्ष के भेद तत्र विकलमवधिमनःपर्यायज्ञानरूपतया द्वधा ॥२०॥ अर्थ-विकल पारमार्थिक प्रत्यक्ष दो प्रकार का है- (१) अवधिज्ञान और (२) मनःपर्याय ज्ञान । अवधिज्ञान का स्वरूप अवधिज्ञानावरणविलयविशेषसमुद्भवं भवगुणप्रत्ययं रूपिद्रव्यगोचरमवधिज्ञानम् ॥२१॥ अर्थ-अवधिज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न होने वाला, भवप्रत्यय तथा गुणप्रत्यय, रूपी द्रव्यो को जानने वाला ज्ञान अधिज्ञान कहलाता है।
(२५) [प्रथम परिच्छेद विवेचन यहाँ अवधिज्ञान का स्वरूप बताते हुए उसके उत्पादक कारण और उसके विपय-का उल्लेख किया गया है। अवधिज्ञान के उत्पादक दो कारण हैं-अन्तरंग कारण और बहिरंग कारण । अवधिज्ञानावरण कर्म का क्षयोपशम अन्तरंग कारण है और देवभव और नरकभव या तपश्चरण आदि गुण बहि- रंग कारण हैं । देवभव या नरकभव से जो अवधिज्ञान होता है उसे भवप्रत्यय अवधिज्ञान कहते हैं और तपश्चर्या आदि से होने वाला अवधिज्ञान गुणप्रत्यय कहलाता है। दोनों प्रकार के इन ज्ञानों मे अन्तरंग कारण ममान रूप से होता है। देवो और नारकी जीवों को भवप्रत्यय अवधिज्ञान होता है और मनुष्यों तथा निर्यञ्चो को गुण- प्रत्यय अवधिज्ञान होता है। मगर सब देवो और नारकों के समान सब मनुष्यो और तिर्यञ्चो को यह ज्ञान नही होता। अवधिज्ञान मिर्फ रूपी पदार्थों को जानना है । रूप, रस, गन्य और स वाले पदार्थ को रूपी कहते हैं । केवल पुद्गल द्रव्य ही रूपी है। मन पर्याय ज्ञान का स्वरूप संयमविशुद्धिनिवन्धनाद्, विशिष्टावरणविच्छेदाजातं, मनोद्रव्यपर्यायालम्बनं मनःपर्यायज्ञानम् ॥२२॥ अर्थ-जो ज्ञान संयम की विशिष्ट शुद्धि से उत्पन्न होता है, तथा मनःपर्याय ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न होता है और मन सम्बन्धी वात को जान लेता है उसे मनःपर्याय ज्ञान कहते है। विवेचन-संयम की विशुद्धता मनःपर्यायज्ञान का बहिरंग प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (२६) कारण है और मनःपर्यायज्ञानावरण का क्षयोपशम अन्तरंग कारण है। इन दोनों कारणों के मिलने पर उत्पन्न होने वाला तथा सज्ञी जीवो के मन की बात जानने वाला ज्ञान मनःपर्याय कहलाता है। सकल प्रत्यक्ष का स्वरूप सकलं तु सामग्रीविशेषतः समुद्भूतं समस्तावरणक्षया- पेक्षं, निखिलद्रव्यपर्यायसाक्षात्कारिस्वरूपं केवलज्ञानम् ।।२३।। अर्थ-सम्यग्दर्शन आदि अन्तरंग सामग्री और तपश्चर्या आदि बाह्य सामग्री से समस्त घाति कर्मों का क्षय होने पर उत्पन्न होने वाला तथा समस्त द्रव्यों और समस्त पर्यायों को प्रत्यक्ष करने वाला केवलज्ञान सकल पारमार्थिक प्रत्यक्ष कहलाता है। विवेचन-यहाँ भी सकल पारमार्थिक प्रत्यक्ष के उत्पादक कारण और उसके विषय का उल्लेख करके उसका स्वरूप समझाया गया है। जब केवलज्ञान की बाह्य और अन्तरंग सामग्री प्रस्तुत होती है और चारों धातिया कर्मों का क्षय-पूर्ण रूपेण विनाश हो जाता है तब यह ज्ञान उत्पन्न होता है। यह ज्ञान सब द्रव्यों को और उनकी त्रैकालिक सब पर्यायों को युगपत् जानता है । यह ज्ञान प्राप्त करने वाला महापुरुष केवली या सर्वज्ञ कहलाता है । यह ज्ञान सायिक है, शेष सब क्षायोपशमिक । मीमांसक मत वाले सर्वज्ञ नहीं मानते । इस सूत्र में उनके मत का विरोध किया गया है।
(२७) [ प्रथम परिच्छेद अर्हन्त ही सर्वज्ञ है तद्वानहनिर्दोषत्वात् ॥२४॥ निर्दोषोऽसौ प्रमाणाविरोधिवाक्त्वात् ॥२॥ तदिष्टस्य प्रमाणेनावाध्यमानत्वात् , तद्वाचस्तेना- विरोधसिद्धिः ॥२६॥ अर्थ-अर्हन्त भगवान ही केवलज्ञानी (सर्वज्ञ ) हैं क्योकि वे निर्दोष हैं। अर्हन्त भगवान निर्दोष हैं, क्योकि उनके वचन प्रमाण से विरुद्ध नही हैं। अर्हन्त भगवान के वचन प्रमाण से विरुद्ध नहीं हैं, क्योकि उनका (स्याद्वाट) मत प्रमाण से खण्डित नहीं होता। विवेचन-ऊपर के सूत्र में केवलज्ञान का विधान करकं यहाँ अर्हन्त भगवान् को ही केवलज्ञानी सिद्ध किया गया है । अर्हन्त भगवान् को केवली सिद्ध करने के लिए निर्दोपत्व हेतु दिया है । निर्दोपत्व हेतु को सिद्ध करने के लिए प्रमाणाविरोधि वचन' हेतु दिया है और हम हेतु को सिद्ध करने के लिए 'अर्हन्त भगवान् के मत की अवाधितता' हेतु दिया गया है। अनुमान का प्रयोग इस प्रकार करना चाहिये:-- (१) अर्हन्त ही सर्वज्ञ हैं, क्योकि वे निर्दोप है, जो सर्वज्ञ नही होता वह निर्दोप नही होता, जैमे हम सब लोग । (व्यतिरेकी हेतु) प्रमाण-नय-तत्वालोक] (२८) (२) अर्हन्त निर्दोष हैं, क्योंकि उनके वचन प्रमाण से अविरुद्ध हैं। जो निर्दोप नही होते उनके वचन प्रमाण से अविरुद्ध नही होते, जैसे हम सब लोग । (व्यति० हेतु) (३) अईन्त के वचन प्रमाण से अविरुद्ध हैं, क्योंकि उनका मत प्रमाण से खण्डित नहीं होता। जिसका मत प्रमाण खण्डित नहीं होता वह प्रमाण से अविरुद्ध वचन वाला होता है। जैसे रोग के विषय में कुशल वैद्य । उपर्युक्त हेतुओं से यह सिद्ध हुआ कि अर्हन्त भगवान् ही सर्वज्ञ हैं, अन्य कपिल, सुगत आदि नहीं । साथ ही जो लोग जगत्कर्ता ईश्वर को ही मर्वज्ञ मानते हैं उनका भी खण्डन होगया। कवलाहार और केवलज्ञान न च कवलाहारवत्त्वेन तस्यासर्वज्ञत्वं, कवलाहार- सर्वज्ञत्वयोरविरोधात् ॥२७॥ अर्थ-अर्हन्त भगवान् कवलाहारी होने से अमर्वज्ञ नहीं हैं, क्योंकि कवलाहार और सर्वज्ञता में विरोध नहीं है। विवेचन-दिगम्बर जैन सम्प्रदाय की यह मान्यता है कि कवलाहार करने वाला सर्वज्ञ नहीं हो सकता । इस मान्यता का विरोध करते हुए यहाँ दोनों का विरोध बताया गया है। दोनो मे विरोध न होने से कवलाहार करने पर भी अर्हन्त सर्वज्ञ हो सकते हैं ।
तृतीय परिच्छेद
परोक्ष प्रमाण का निरूपण
परोक्ष प्रमाण का लक्षण
अस्पष्टं परोक्षम् ॥१॥
अर्थ-अस्पष्ट जान को परोक्ष प्रमाण कहते हैं।
विवेचन-प्रमाण विशेष के स्वरूप में प्रमाण सामान्य के स्व-
रूप का अध्याहार है, अत. परोक्ष प्रमाण का स्वरूप इस प्रकार होगा:-
जो ज्ञान स्व-पर का निश्चायक होते हुए अस्पष्ट होता है उमे परोक्ष
प्रमाण कहते हैं। स्पष्टता का विवेचन द्वितीय परिच्छेद में किया गया
है, उसका न होना अस्पष्टता है।
परोक्ष प्रमाण के भेद
स्मरणप्रत्यभिज्ञानतर्कानुमानागमभेदतस्तत् पश्च
प्रकारम् ॥२॥
अर्ष-परोक्ष प्रमाण पांच प्रकार का है:- (१) स्मरण
प्रत्यभिज्ञान (३) तर्क (४) अनुमान (५) आगम
स्मरण का लक्षण
तत्र संस्कारप्रयोधसम्भूतं, अनुभूतार्थविषयं, तदित्या-
कारं वेदनं स्मरणम् ॥३॥
(३०)
[ प्रथम परिच्छेद
तत्तीर्थकरविम्बमिति यथा ॥४॥
अर्थ-संस्कार (धारणा ) के जागृन होने से उत्पन्न होने
वाला, पहले जाने हुए पदार्थ को जानने वाला, 'वह' इस आकार
वाला, ज्ञान स्मरण है। जैसे वह तीर्थक्कर का बिम्ब ।
विवेचन-यहाँ और आगे ज्ञान का कारण,
विपय तथा
आकार इन तीन बातों का उल्लेख करके उसका स्वरूप बताया
गया है।
स्मरण, धारणा रूप संस्कार के जागृत होने पर उत्पन्न होता
प्रत्यक्ष अनुमान, पागम आदि किसी भी प्रमाण से पहले जाने
हुए पदार्थ को ही जानता है और 'वह' (तत्) शब्द से उसका उल्लेख
किया जा सकता है । जैसे-'वह ( पहले देखी हुई) तीर्थकर की
प्रतिमा
कुछ
को प्रमाण नही मानते, यह ठीक नहीं है।
स्मरण को प्रमाण माने बिना अनुमान प्रमाण नहीं बनेगा, क्योकि
वह व्याप्ति के स्मरण से उत्पन्न होता है। लेन देन आदि लौकिक
व्यवहार भी स्मरण की प्रमाणता के विना बिगड जाएँगे।
है
,
लोग स्मरण
प्रत्यभिज्ञान का लक्षण
अनुभवस्मृतिहेतुकं, तिर्यगूर्ध्वतासामान्यादिगोचरं,
संकलनात्मकं ज्ञानं प्रत्यभिज्ञानम् ॥५॥
यथा-तजातीय एवायं गोपिण्डः, गोसदृशो गवयः,
स एवायं जिनदत्त इत्यादि ॥६॥
(३१) [ प्रथम परिच्छेद अर्थ-प्रत्यक्ष और म्मरण से उत्पन्न होने वाला, तिर्यक् सामान्य अथवा ऊर्ध्वता सामान्य को जानने वाला, जोड़ रूप ज्ञान प्रत्यभिज्ञान कहलाता है। जैसे -यह गाय उस गाय के ममान है, गवय (रोझ) गाय के समान होता है, यह वही जिनदत्त है, श्रादि ।। विवेचन-किमी के मुंह से हमने सुना था कि गवय, गाय के समान होता है। कुछ दिन बाद हमें गवय दिखाई दिया । उसे देखते ही हमें 'गवथ गाय के मदृश होता है, इस वाक्य का स्मरण हुआ। इम अवस्था में गवय का प्रत्यक्ष होरहा है और पहले सुने हुए वाक्य का स्मरण होरहा है । इन दोनो ज्ञानो के मेल मे जो ज्ञान होता है वही प्रत्यभिज्ञान है। कल जिनदत्त को देखा था, आज वह फिर मामने 'प्राया। तब हम समय उसका प्रत्यक्ष होना है और कल देखने का स्मरण होता है । बम, इन प्रत्यक्ष और म्मरण के मिलने से 'यह वही जिन- दत्त है। ऐमा प्रत्यभिज्ञान होना है। इन दो उदाहरणों को ध्यान से देखो तो ज्ञात होगा कि एक में महशता प्रतीत होती है और दूसरे में एकता। सहशता को जानने वाला मादृश्यप्रत्यभिज्ञान कहलाता है, एकता को जानने वाला एकत्व- प्रत्यभिज्ञान कहलाता है। इसी प्रकार यह उसमे विलक्षण है', 'यह उममे बडा या छोटा है' इत्यादि अनेक प्रकार के प्रत्यभिज्ञान होते हैं। नैयायिक लोग मादृश्य को जानने वाला उपमान नामक प्रमाण अलग मानते हैं, यह ठीक नहीं है । ऐमा मानने पर तो एकता, विलक्षणता, श्रादि को जानने वाले प्रमाण भी अलग-अलग मानने प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (३२) पड़ेंगे। कई लोग प्रत्यभिज्ञान को स्वतन्त्र प्रमाण नहीं मानते, पर एकत्ता और सदृशता दूसरे किसी भी प्रमाण से नहीं जानी जाती, अतएव उसे पृथक प्रमाण मानना चाहिए । तर्क का लक्षण उपलम्भानुपलम्भसम्भवं, त्रिकालीकलितसाध्यसाधन- सम्बन्धाद्यालम्बनं, 'इदमस्मिन् सत्येव भवति' इत्याद्याकारं संवेदनमूहापरनामा तर्कः ॥७॥ यथा यावान् कश्चिद् धूमः स सर्वो वह्नौ सत्येव भत्र- तीतिः तस्मिन्नसत्यसौ न भवत्येवेति ॥८॥ अर्थ-उपलम्भ और अनुपलम्भ से होने वाला, तीन काल सम्बन्धी व्याप्ति को जानने वाला, 'यह इसके होने पर ही होता है। इत्यादि आकारवाला ज्ञान तर्क है । ऊहा उमका दूसरा नाम है ।। जैसे-जितना भी धूम होता है वह सब अग्नि के होने पर ही होता है, अग्नि के अभाव में धूम नहीं होता ।। विवेचन--जहाँ २ धूम होता है वहाँ २ अग्नि होती है। इस प्रकार के अविनाभाव सम्बन्ध को व्याप्ति कहते हैं। ग्रह अविनाभाव सम्बन्ध तीनो कालो के लिये होता है । जिस ज्ञान से इस सम्बन्ध का निर्णय होता है उसे तर्क कहते हैं । तर्क ज्ञान उपलम्भ और अनु- पलम्भ से उत्पन्न होता है। धूम और अग्नि को एक साथ देखना उपलम्भ है और अग्नि के अभाव मे धूम का अभाव जानना अनुप- लम्भ है। बार-बार उपलम्भ और बार-बार अनुपलम्भ होने से व्याप्ति का ज्ञान (तर्क) उत्पन्न हो जाता है ।
(३३) [प्रथम परिच्छेद और अग्नि का तर्क जान को अगर प्रमाण न माना जाय तो अनुमान प्रमाण की उत्पत्ति नही हो सकती। तर्क से धूम अविनाभाव सम्बन्ध निश्चित हो जाने पर ही धूम से अग्नि का अनु- मान किया जा सकता है। अतएव अनुमान को प्रमाण मानने वालो को तर्क भी प्रमाण मानना चाहिए । श्रनुमान अनुमानं द्विप्रकारं-स्वार्थ परार्थश्च ॥६॥ अर्थ-अनुमान दो प्रकार का है- (१) स्वार्थानुमान और (२) परार्थानुमान स्वार्थानुमान का स्वरूप तत्र हेतुग्रहणसम्बन्धस्मरणकारणकं साध्यविज्ञानं स्वार्थम् ॥१०॥ अर्थ-हेतु का प्रत्यक्ष होने पर तथा अविनाभाव सम्बन्ध का स्मरण होने पर साध्य का जो ज्ञान होता है वह स्वार्थानुमान कहलाता है। विवेचन-जब हेतु (धूम) प्रत्यक्ष से दिखाई देता है और अविनाभाव सम्बन्ध का (जहाँ धूम होता है वहाँ अग्नि होती है- इस प्रकार की व्याप्ति का ) म्मरण होता है तब साध्य (अमि) का जान हो जाता है। इसी ज्ञान को अनुमान कहते हैं। यह अनुमान दूसरे के उपदेश के विना-अपने आप ही होता है इस लिए इसे स्वार्थानुमान भी कहते हैं।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (३४) हेतु का स्वरूप निश्चितान्यथानुपपत्येकलक्षणो हेतुः ॥११॥ अर्थ-साध्य के विना निश्चित रूप से न होना, यह एक लक्षण जिसमें पाया जाय वह हेतु है। विवेचन-साध्य के साथ जिसका अविनाभाव निश्चित हो, अर्थात जो साध्य के विना कदापि सम्भव न हो वह हेतु कहलाता है। जैसे--अग्नि (साध्य) के बिना धूम कदापि संभव नहीं है अतएव धूम हेतु है। मतान्तरका खण्डन न तु त्रिलक्षणकादिः ॥१२॥ तस्य हेत्वाभासस्यापि सम्भवात् ।।१३।। अर्थ-तीन लक्षण या पाँच लक्षण वाला हेतु नही है। क्योंकि वह हेत्वाभास भी हो सकता है। विवेचन-बौद्ध लोग पक्षधर्मत्व, सपक्षसत्व और विपक्षासत्व यह तीन लक्षण जिसमें पाये जाएँ उसे हेतु मानते हैं। नैयायिक लोग इन तीन में असत्प्रतिपक्षता और अवाधितविषयता को सम्मिलित करके पाँच लक्षण वाला हेतु मानते हैं। इनका अर्थ इस प्रकार है.- १) पक्षधर्मत्व-हेतु पक्ष मे रहे (२) सपक्षसत्व-हेतु सपक्ष (अन्वय दृष्टान्त ) मे रहे (३) विपक्षासत्व- हेतु विपक्ष में न रहे (३५) [ प्रथम परिच्छेद (४) असत्प्रतिपक्षता-हेतु का विरोधी समान बल वाला दूसरा हेतु न हो। (५) अबाधितविषयता हेतु का साध्य प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो से बाधित न हो। वास्तव मे बौद्धो और नैयायिको का हेतु का यह लक्षण ठीक नहीं है । इसके दो कारण हैं-प्रथम, यह कि इन सब के मौजूद रहने पर भी कोई-कोई हेतु सही नहीं होता, दूसरे, कभी-कभी इनके न होने पर भी हेतु सही होता है। इस प्रकार हेतु के इन दोनो लक्षणों मे अव्याप्ति और अतिव्याप्ति दोनों दोप विद्यमान हैं। साध्य का स्वरूप अप्रतीतमनिराकृतमभीप्सितं साध्यम् ॥१४॥ शंकितविपरीतानध्यवसितवस्तूनां साध्यताप्रतिपत्त्यर्थमप्रतीत- वचनम् ॥१५॥ प्रत्यक्षादिविरुद्धस्य साध्यत्वं मा प्रसज्यतामित्यनिराकृत- ग्रहणम् ॥१६॥ अनभिमतस्यासाध्यत्वप्रतिपत्तयेऽभीप्सितपदोपादानम् ॥१७॥ अर्थ-जो प्रतिवादी को स्वीकृत न हो, जो प्रत्यक्ष आदि किमी प्रमाण से बाधित न हो और जो वादी को मान्य हो, वह मान्य होता है। जिसमे शंका हो, जिसे उलटा मान लिया हो अथवा जिसमे
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक]
(३६)
अनध्यवसाय हो वही साध्य हो सकता है, यह बताने के लिए माध्य
को 'अप्रतीत' कहा है।
जो प्रत्यक्ष आदि किसी प्रमाण से बाधित हो, वह साध्य न
हो जाय, यह सूचित करने के लिए साध्य को 'अनिराकृत' कहा है।
जो वादी को सिद्ध नही है वह साध्य नहीं हो सकता, यह
बताने के लिए साध्य को 'अभीप्सित' कहा है।
विवेचन-जिसे सिद्ध करना हो वह साध्य कहलाता है।
निर्दोष साध्य मे तीन बातें होनी आवश्यक हैं-(१) प्रथम यह कि
प्रतिवादी को वह पहले से ही सिद्ध न हो, क्योंकि सिद्ध वात को
सिद्ध करना वृथा है । (२) दूसरी यह कि साध्य में किमी प्रमाण से
बाधा न हो, 'अग्नि ठण्डी है। यहाँ अग्नि का ठण्डापन प्रत्यक्ष से बाधित
है अत. यह साध्य नहीं हो सकता । (३) तीसरी यह कि जिम बात
को वादी सिद्ध करना चाहे वह उसे स्वयं मान्य हो; 'आत्मा नहीं है।
यहाँ आत्मा का अभाव जिसे मान्य नही है वह आत्मा का अभाव
सिद्ध करेगा तो साध्य दूपित कहलायेगा।
साध्य सम्बन्धी नियम
व्याप्तिग्रहणसमयापेक्षया साध्यं धर्म एव, अन्यथा तदनु-
पपत्तेः॥१८॥
न हि यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र चित्रभानोरिव धरित्रीधरस्याप्य-
नुवृत्तिरस्ति ॥१॥
आनुमानिकप्रतिपत्त्यवसरापेक्षया तु पक्षापरपर्यायस्तद्विशिष्टः
प्रसिद्धो धर्मी ॥२०॥
(३७) [प्रथम परिच्छेद अर्थ-व्याप्ति ग्रहण करते समय धर्म ही साध्य होता है- धर्मी नही, धर्मी को साध्य बनाया जाय तो व्याप्ति नहीं बन सकती। जहाँ जहाँ धूम होता है वहाँ वहाँ अग्नि की भांति पर्वत (धर्मी) की व्याप्ति नहीं है। अनुमान प्रयोग करते समय धर्म (अग्नि) से युक्त धर्मी (पर्वत) साव्य होता है। धर्मी का दूसरा नाम पक्ष है और वह प्रसिद्व होता है। विवेचन यहाँ कब क्या माध्य होना चाहिए, यह बताया गया है। जब व्याप्ति का प्रयोग करना हो तो 'जहा जहां धूम होता है वहा-वहा अग्नि होती है। इस प्रकार अग्नि धर्म को ही साध्य बनाना चाहिए। यदि धर्म को ही माध्य न बनाकर धर्मी को साध्य बनाया जाय तो व्यानि यो बनेगी-जहां-जहां धूम है वहा-वहा पर्वत मे अग्नि है।' पर ऐमी व्याप्ति ठीक नहीं है। अतएव व्याप्ति के समय धर्मी (पक्ष ) को छोड कर धर्म को ही साध्य बनाना चाहिए। इसमे विपरीत, अनुमान का प्रयोग करते समय अग्नि धर्म म युक्त धर्मी (पर्वत) को ही साध्य बनाना चाहिए। उस समय 'अग्नि है, क्योकि धूम है' इतना कहना पर्याप्त नहीं है। क्योकि अग्नि का अस्तित्व मिट्ट करना इस अनुमान का प्रयोजन नहीं है किन्तु पर्वत में अग्नि सिद्ध करना इष्ट है । अतएव अनुमान-प्रयोग के समय धर्म मे युक्त पक्ष साध्य बन जाता है । तात्पर्य यह है कि पर्वत प्रसिद्ध है, अग्नि भी सिद्ध है, किन्तु अग्निमान पर्वत सिद्ध नहीं है, अत वही माध्य होना चाहिए। -
प्रमाण नय-तत्त्वालोक]
(३८)
धर्मी की सिदि
धर्मिणः प्रसिद्धिः क्वचिद्विकल्पतः, कुत्रचित्प्रमाणतः
क्वापि विकल्पप्रमाणाभ्याम् ॥२१॥
यथा समस्ति समस्तवस्तुवेदी, क्षितिधरकन्धरेयं धूमध्व-
जवती, ध्वनिः परिणतिमान् ॥२२॥
अर्थ-धर्मी की प्रसिद्धि कहीं विकल्प में होती है, कहीं
प्रमाण से होती है और कही विकल्प तथा प्रमाण दोनो से होती है।
जैसे-सर्वज्ञ है, पर्वत की यह गुफा अग्निवाली है, शब्द
अनित्य है।
विवेचन-प्रमाण से जिसे पन का न अस्तित्व सिद्ध हो और
न नास्तित्व सिद्ध हो-किन्तु अस्तित्व या नास्तित्व सिद्ध करने के
लिए जो शान्तिक रूप में मान लिया गया हो वह विकल्पसिद्ध धर्मी
कहलाता है । जैसे-सर्वज्ञ । मर्वज का अब तक न अस्तित्व सिद्ध
है और न नास्तित्व ही । अत वह विकल्पसिद्ध धर्मी है। प्रत्यक्ष या
अन्य किसी प्रमाण से जिमका अस्तित्व निश्चित हो वह प्रमाणसिद्ध
धर्मी कहलाता है। जैसे पर्वत की गुफा। पर्वत की गुफा प्रत्यन
प्रमाण से सिद्ध है । 'शब्द अनित्य है' यहाँ'शब्द' पन उभयसिद्ध है
-वर्तमानकालीन शब्द प्रत्यन से और भूत-भविष्यत् कालीन विकल्प
से सिद्ध है।
परार्थानुमान का स्वरूप
पक्षहेतुवचनात्मकं परार्थमनुमानमुपचारात् ॥२३॥
(३६) [ प्रथम परिच्छेद अर्थ-पक्ष और हेतु का वचन परार्थानुमान है। उसे उपचार से अनुमान कहते हैं। विवेचन--स्वार्थानुमान को शब्दों द्वारा कहना परार्थानुमान है। मान लीजिये देवदत्त को धूम देखने में अग्नि का अनुमान हुआ । वह अपने माथी जिनदत्त मे कहता है-'देखो, पर्वत में अग्नि है, क्योंकि धूम है। तो देवदत्त का यह शब्द प्रयोग परार्थानुमान है, क्योंकि वह पगर्थ है अर्थात् दूमरे को जान कराने के लिए बोला गया है। प्रत्येक प्रमाण जान-स्वरूप होता है पर परार्थानुमान शब्द- स्वरूप है। शन्न जड हैं अत परार्थानुमान भी जडरूप होने से प्रमाण नहीं हो सकता। किन्तु इन शब्दो को सुनकर जिनदत्त को म्वार्थानुमान उत्पन्न होता है । अतएव पगनुमान स्वार्थानुमान का कारण है। कारण को उपचार से कार्य मान कर परार्थानुमान को भी अनुमान मान लिया है। पक्ष-प्रयोग की अावश्यकता साध्यस्य प्रतिनियतधर्मिसम्बन्धिताप्रसिद्धये हेतोरुप- संहारवचनवत् पक्षप्रयोगोऽप्यवश्यमाश्रयितव्यः ॥२४॥ त्रिविधं साधनमभिधायैव तत्समर्थनं विदधानः कः खलु न पक्षप्रयोगमङ्गीकुरुते ? ॥२॥ अर्थ-साध्य का नियत पक्ष के साथ सम्बन्ध मिद करने के लिए, उपनय की भॉति पक्ष का प्रयोग भी अवश्य करना चाहिए ।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक]
(४०)
तीन प्रकार के हेतु का प्रयोग करके ही उनका समर्थन करने
वाला, ऐसा कौन होगा जो पक्ष का प्रयोग करना स्वीकार न करे ?
विवेचन-बौद्ध पक्ष का प्रयोग करना आवश्यक नहीं
मानते । उनके मत का विरोध करने के लिए यहाँ यह कहा गया
है कि अगर पक्ष का प्रयोग न किया जायगा तो मान्य कहाँ मिद्ध
किया जा रहा है, यह मालूम नहीं पडेगा । साध्य का नियत पन के
साथ सम्बन्ध बताने के लिए पक्ष अवश्य बोलना चाहिए।
'पर्वत में अग्नि है, क्योंकि धूम है, जहाँ धूम होता है वहाँ
अग्नि होती है, जैसे पाकशाला, इम पर्वत में भी धूम है।' इम
अनुमान में इस पर्वत मे भी धूम है' यह उपनय है। यहाँ हेतु को
दोहराया गया है। हेतु को दोहराने का प्रयोजन यह है कि साधन का
नियत पक्ष के साथ सम्बन्ध बताया जाय। इसी प्रकार साध्य का
नियत पक्ष के साथ सम्बन्ध बताने के लिए पक्ष भी बोलना चाहिए ।
जैसे हेतु का कथन करने के बाद ही उमका समर्थन किया
जा सकता है-हेतु का प्रयोग किये विना समर्थन नहीं हो सकता,
उसी प्रकार पक्ष का प्रयोग किये विना साध्य के आधार का निश्चित
ज्ञान नहीं हो सकता । (वौद्धो ने स्वभाव, कार्य और अनुपलब्धि,
यह तीन प्रकार के हेतु माने हैं)
परार्थ प्रत्यक्ष
प्रत्यक्षपरिच्छिन्नार्थाभिधायि वचनं परार्थ प्रत्यक्षं,
परप्रत्यक्षहेतुत्वात् ॥२६॥
यथा-पश्य पुरः स्फुरत्किरणमणिखण्डमण्डिताभरण-
भारिणीं जिनपतिप्रतिमामिति ॥२७॥
(४१) [ प्रथम परिच्छेद . अर्थ-प्रत्यक्ष द्वारा जाने हुए पदार्थ का उल्लेख करने वाले वचन परार्थ प्रत्यक्ष हैं, क्योंकि उन वचनों मे दूसरे को प्रत्यक्ष होता है। जैसे-देखो, सामने, चमकती हुई किरणो वाली मणियो के टुकड़ों मे जड़े हुए आभूपणो को धारण करने वाली जिन भगवान की प्रतिमा है। विवेचन-जैसे अनुमान द्वारा जानी हुई वात शब्दों द्वारा कहना परार्थानुमान है उसी प्रकार प्रत्यक्ष द्वारा जानी हुई बात को शब्दो मे कहना परार्थ प्रत्यक्ष है । परार्थानुमान जैसे अनुमान का कारण है उसी प्रकारपरार्थ प्रत्यक्ष, प्रत्यक्ष का कारण है। यह परार्थ प्रत्यक्ष भी शब्दात्मक होने के कारण उपचार से प्रमाण है। अनुमान के अवयव पक्षहेतुवचनमवयवद्वयमेव परप्रतिपत्तेरंग, न दृष्टा- न्तादिवचनम् ॥२८॥ अर्थ-पक्ष का प्रयोग और हेतु का प्रयोग, यह दो अवयव ही दूसरों को समझाने के कारण हैं, दृष्टान्त आदि का प्रयोग नहीं। विवेचन-परार्थानुमान के अवयवो के सम्बन्ध मे अनेक मत हैं। साख्य लोग पक्ष, हेतु और दृष्टान्त यह तीन अवयव मानते हैं, मीमांमक उपनय के साथ चार अवयव मानते हैं, और यौग लोग निगमन को इनमें सम्मिलित करके पॉच अवयव मानते हैं। इन सब मतो का निरसन करते हुए पक्ष और हेतु इन दो ही अवयवो का समर्थन किया गया है, क्योंकि दूसरे को समझाने के (४२) [ प्रथम परिच्छेद लिए यही पर्याप्त हैं। इस सम्बन्ध का विशेष विचार आगे किया जायगा। हेतु प्रयोग के भेद हेतुप्रयोगस्तथोपपत्ति-अन्यथानुपपत्तिभ्यां द्विप्रकारः ॥२६॥ सत्येव साध्ये हेतोरुपपचिस्तथोपपत्तिः, असति साध्ये हेतोर- नुपपत्तिरेवान्यथानुपपत्तिः ॥३०॥ यथा-कृशानुमानयं पाकप्रदेशः, सत्येव कृशानुमत्त्वे धूमवत्त्वस्योपपत्तेः, असत्यनुपपत्तेर्वा ॥३॥ अनयोरन्यतरप्रयोगेणैव साध्यप्रतिपत्तौ द्वितीयप्रयोग- स्यैकत्रानुपयोगः ॥३२॥ अर्थ तथोपपत्ति और अन्य न्यथानुपपत्ति के भेद से हेतु दो प्रकार से बोला जाता है। साध्य के होने पर ही हेतु का होना (वताना) तथोपपत्ति है और साध्य के अभाव में हेतु का अभाव होना ( बताना) अन्यथा. नुपपत्ति है। जैसे-यह पाकशाला अग्निवाली है, क्योकि अग्नि के होने पर ही धूम हो सकता है, या क्योंकि अग्नि के बिना धूम नहीं हो सकता। तथोपपत्ति और अन्यथानुपपत्ति में से किसी एक का प्रयोग करने से ही माध्य का ज्ञान होजाता है अतः एक ही जगह दोनों का प्रयोग करना व्यर्थ है।
(४३) [ प्रथम परिच्छेद विवेचन-यहाँ हेतु के प्रयोग की विविधता बताई गई है। नधोपपत्ति और अन्यथानुपपत्ति रूप हेतुओं में अर्थका भेद नहीं है, केवल एक में विधि रूप में प्रयोग है और दूमरे मे निषेध रूप से । दोनो का प्राशय एक है 'प्रतएव किसी भी एक का प्रयोग करना पर्याप्त है, दोनो को एक माथ बोलना अनुपयोगी है। दृष्टान्त अनुमान का अवयव नहीं है न दृष्टान्तवचनं परप्रतिपत्तये प्रभवति, तस्यां पक्षहेतु- वचनयोरेव व्यापारोपलब्धेः ॥ ३३ न चहेतोरन्यथानुपपत्तिनिणौतये, यथोक्ततर्कप्रमाणा- देव तदुपपत्तेः ॥ ३४ ॥ नियतकविशेपस्वभावे च दृष्टान्ते साकल्येन व्या- प्तेरयोगतो विप्रतिपत्तौ तदन्तरापेक्षायामनवस्थितेदुर्निवारः समवतारः ॥ ३५ ॥ नाप्यविनाभावस्मृतये, प्रतिपन्न प्रतिवन्धस्य व्युत्पन्नमतेः पक्षहेतुप्रदर्शनेनैव तत्प्रमिद्धेः ॥ ३६ ॥ अर्थ-दृष्टान्त दमरे को समझाने के लिएनहीं है, क्योकि दूसरे को समझाने मे पन और हेतु के प्रयोग का ही व्यापार देग्वा जाता है ।। दृष्टान्न, हेतु के अविनाभाव का निर्णय करने के लिये भी नहीं, क्योंकि पूर्वोक्त तर्क प्रमाण में अविनाभाव का निर्णय होता है।। दृष्टान्त, निश्चित एक विशेप स्वभाव वाला होता है प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (४४) (एक महानम तक ही सीमित रहता है) उसमें व्याप्ति पूर्ण रूप से नहीं घट मकती अतएव दृष्टान्त में व्याप्ति सम्बन्धी विवाद उपस्थित होने पर दूसरा दृष्टान्त ढूंढना पडेगा, इस प्रकार अनवस्था दोष अनिवार्य होगा। दृष्टान्त, अविनाभाव के स्मरण के लिए भी नहीं हो मकना, क्योकि जिसने अविनाभाव सम्बन्ध जान लिया है और जो बुद्धिमान है, उसके आगे पक्ष और हेतु का प्रयोग करने से ही उमे अविनाभाव का स्मरण हो जाता है।। विवेचन-दृष्टान्त को अनुमान का अवयव मानने के तीन प्रयोजन हो सकते हैं । (१) दुसरे को साध्य का ज्ञान कराना । (२) अविनाभाव का निर्णय कराना और (३) अविनाभाव का स्मरण कराना। किन्तु इनमें से किसी भी प्रयोजन के लिए दृष्टान्त की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि पक्ष और हेतु का कथन करने से साध्य का ज्ञान हो जाता है, तर्क प्रमाण से अविनाभाव का निर्णय होजाता है और पक्ष-हेतु के कथन से ही अविनाभाव का स्मरण होजाता है इसके अतिरिक्त जो दृष्टान्त से अविनाभाव का निर्णय होना मानते हैं, उन्हें अनवस्था दोष का मामना करना पड़ेगा । पक्ष में अविनाभाव का निर्णय करने के लिए दृष्टान्त चाहिए तो दृष्टान्त मे अविनाभाव का निर्णय करने के लिए एक नया दृष्टान्त चाहिए, उसमें भी अविनाभाव का निर्णय किसी नये दृष्टान्त से होगा, इस प्रकार अनवस्था दोष पायगा। क्योंकि दृष्टान्त एक विशेष स्वभाव वाला होता है अर्थात् वह एक ही स्थान तक सीमित होता है जब कि व्याप्ति सामान्य रूप है अर्थात् त्रिकाल और त्रिलोक सम्बन्धी होती है । ऐमे दृष्टान्त में पूर्ण रूपेण व्याप्ति नहीं घट सकती।
(४५) [ प्रथम परिच्छेद प्रकारान्तर से समर्थन अन्तर्व्याप्त्या हेतोः साध्यप्रत्यायने शक्तावशक्तौ च वहिाप्तेरुद्भावनं व्यर्थम् ।। ३७ ।। अर्य-अन्ताप्ति द्वारा हेतु मे माध्य का ज्ञान हो जाने पर भी या न होने पर भी बहिाप्ति का कथन करना व्यर्थ है। विवेचन-अन्ताप्ति का और बहिाप्ति का स्वरूप आगे बताया जायगा। हम सूत्र का आशय यह है कि अन्तर्व्याप्ति के द्वारा हेतु यदि माध्य का ज्ञान करा देता है तब बहिर्याप्ति का कथन व्यर्थ । और अन्नाप्ति के द्वारा हेतु यदि माध्य का ज्ञान नहीं कराता तो भी वहिाप्ति का कथन व्यर्थ है। तात्पर्य यह है कि बहियाप्ति प्रत्येक दशा में व्यर्थ है। अन्तयाति और बहियाप्ति का स्वरूप पक्षीकृत एव विषये साधनस्य साध्येन व्याप्तिरन्तयाप्तिः अन्यत्र तु वहिाप्तिः॥ ३८ ॥ यथाऽनेकान्तात्मकं वस्तु सत्त्वस्य तथैवोपपत्तेरिति; अग्निमानयं देशो धूमवत्त्वात् , य एवं स एवं, यथा पाकस्थान- मिति च ॥ ३६॥ अर्थ-पक्ष में ही साधन की साध्य के साथ व्याप्ति होना अन्तर्व्याप्ति है और पक्ष के बाहर व्याप्ति होना बहियाप्ति ॥ जैसे-वस्तु अनेकान्न रूप है, क्योंकि वह सत है, और, यह
प्रमाण-नय तत्त्वालोक]
(४६)
स्थल अग्नि वाला है, क्योंकि धूमवान् है, जो धूमवान् होता है वह
अग्निवाला होता है, जैसे पाकशाला।
विवेचन-वस्तु अनेकान्तरूप है, क्योकि वह सत् है, यहाँ
सत्त्व हेतु की 'अनेकान्त रूप' इस साध्य के माथ व्याप्ति अन्तयाप्ति
है, क्योकि यह पक्ष मे ही हो मकती है बाहर नहीं । 'वस्तु' यहाँ
पक्ष है, उसमे ससार की सभी वस्तुएँ अन्तर्गत हैं, पक्ष के अतिरिक्त
कुछ भी नही बचता जिसे सपक्ष बनाकर वहाँ व्याप्ति बनाई जाय।
दूसरे उदाहरण मे 'यह स्थान पक्ष है और धूम तथा अग्नि
की व्याप्ति उस स्थान से बाहर सपक्ष (पाकशाला ) मे बताई गई है,
अतएव यह बहियाप्ति है।
उपनय निगमन भी अनुमान के अग नहीं
नोपनयनिगमनयोरपि परप्रतिपत्तौ ‘सामर्थ्य , पक्षहेतु-
प्रयोगादेव तस्याः सद्भावात् ।। ४० ॥
अर्थ-उपनय और निगमन भी परप्रतिपत्ति मे कारण नहीं है,
क्योंकि पक्ष और हेतु के प्रयोग से ही पर को प्रतिपत्ति (ज्ञान)
होजाती है।
विवेचन-योगमत का निरास करते हुए यहाँ उपनय और
निगमन, अनुमान के अङ्ग नहीं है,यह बतलायागया है। पक्ष और हेतु
को बोलने मात्र से ही जब दूसरे को साध्य का ज्ञान हो जाता है तब
उपनय और निगमन की क्या आवश्यकता है?
-
(४७) [प्रथम परिच्छेद -- हेतु का समर्थन ममर्थनमेव परं परप्रतिपत्त्यगमास्तां, तदन्तरेण दृष्टान्तादिप्रयोगेऽपि तदसम्भवात् ॥ ४१ ॥ अय-ममर्थन को ही परप्रनिपत्ति का अद्ग मानना चाहिए, कांकि ममर्थन किए बिनाः प्रान्त आदि का प्रयोग करने पर भी माध्य का ज्ञान नहीं हो मकना। विवेचन-नोतु के टोपों का प्रभाव दिखाकर उमे निर्दोप सिद्ध करना ममर्थन है । ममर्थन करने में ही हेतु ममीचीन मिद्व होता है। मगर्थन को चाहे अनुमान का अलग अग माना जाय चाहे हेतु में ही उम अन्तर्गन किया जाय, पर है व आवश्यक । समर्थन के बिना इप्टान्न का प्रयोग करना निरर्थक है। गियानुरोध मे अनुमानके अवयव मन्दमतींम्तु व्युत्पादयितु दृष्टान्तोपनयनिगमनान्यपि प्रयोज्यानि ॥ ४२ ॥ अर्थ-गन्दबुद्धि वाले शिष्यों को समझाने के लिए दृष्टान्त, उपनय और निगमन का भी प्रयोग करना चाहिए । विवेचन-पगर्थानुमान दूसरे को माध्य का ज्ञान कराने के लिए बोला जाता है । अनव जिनना बोलने मे दृमरा समझ जाय, उनना बोलना ही उचिन है; उममें किमी अनिवार्य बन्धन की श्राव- श्यकना नहीं है। हाँ, वाद-विवाद के ममय वादी और प्रतिवादी दोनों विद्वान होते है अतः उन्हें पक्ष और हेतु यह दो ही अवयव पर्याप्त हैं।
(४८) [प्रथम परिच्छेद दृष्टान्त का निरूपण प्रतिबन्धप्रतिपत्तेरास्पदं दृष्टान्तः ॥ ४३ ॥ स द्वधा साधर्म्यतो वैधयंतश्च ॥४४॥ यत्र साधनधर्मसत्तायाम् साध्यधर्मसत्ता प्रकाश्यते स साधर्म्यदृष्टान्तः ॥४॥ यथा-यत्र यत्रधूमस्तत्र तत्र वह्निर्यथा महानसः॥४६॥ यत्र तु साध्याभावे साधनस्यावश्यमभावः प्रदर्श्यते स वैधर्म्यदृष्टान्तः ॥४७॥ यथा-अग्न्यभावेन भवत्येव धूमोयथाजलाशये ॥४८॥ अर्थ अविनाभाव बताने के स्थान को दृष्टान्त कहते हैं। दृष्टान्त दो प्रकार का है-(१) माधर्म्य दृष्टान्त और (२) वैधर्म्य दृष्टान्त ॥ जहां साधन के होने पर साध्य का होना बताया जाय वह साधर्म्य दृष्टान्त कहलाता है। जैसे-जहाँ-जहाँ धूम होता है वहाँ-वहाँ अग्नि होती है, जैसे रसोई घर। जहाँ साध्य के अभाव मे साधन का अवश्य प्रभाव दिखाया जाता है वह वैधर्म्य दृष्टान्त है।
(४६) [ प्रथम परिच्छेद जैमे-जहाँ अग्नि का अभाव होता है वहाँ धूम का अभाव होता है। जैसे तालाय । विवेचन च्यामि को जिम स्थान पर दिखाया जाय वह स्थान प्रान्त है। प्रन्वयव्यामि को विम्यान का स्थल साधर्म्य दृष्टान्त या अन्वय स्ष्टान्न कर लाना है. जैम ऊपर के उदाहरण में 'रमोईघर'। ग्नोईघर में माधन (धूम) के होने पर मान्य (अग्नि) मा सद्भाव दिग्माया गया है। व्यनिक व्यामि से बनाने का स्थान वैधर्म्य या व्यतिरेक दृष्टान्त कहलाता है. जैम ऊपर के उदाहरण में 'तालाब' । तालाब में माध्य के प्रभाव में माधन का प्रभाव दिखाया गया है। किनके मदभाव में किसका मद्भाव होता है और किसके अभाव में क्रिमका प्रभाव होता है, यह ध्यान में रखना चाहिये। उपनय म-उस जगह who हेतोः साध्यधर्मिण्युपसंहरणमुपनयः ॥४६॥ यथा-धमश्चात्र प्रदेशे ॥५०॥ अयं-पन में हेतु का उपमहार करना (दोहगना) उपनय है। भी धूम विवंचन-पहले हेतु का प्रयोग करके पक्ष में हेतु का सद्भाव दिम्या दिया जाता है, फिर व्याप्ति और उदाहरण बोलने के पश्चात् दूसरी बार कहा जाता है-'हम जगह भी धूम है।' यही पन में हेतु का दोहराना है और यही उपनय निगमन साध्यधर्मस्य पुनर्निंगमनम् ॥५१॥ है प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (५०) यथा-तस्मादग्निरत्र ॥५२॥ अर्थ साध्य का पक्ष में दोहराना निगमन कहलाता है जैसे-'इसलिए यहाँ अग्नि है।' विवेचन--पक्ष मे साध्य का होना सर्वप्रथम बताया गया था, फिर व्यानि आदि बोलने के बाद अन्त में दूसरी बार कहा जाता है- 'इसलिये यहाँ अग्नि है' साध्य का यह दोहगना निगमन है। पाँच अवयव वाला अनुमान इस प्रकार का है- (१) पर्वत में अग्नि है (पक्ष) (२) क्योंकि पर्वत में धूम है (हेतु) (३) जहाँ धूम होता है वहाँ अग्नि होती है (व्याप्ति) जैसे- पाकशाला (दृष्टान्त) (४) इस पर्वत में भी धूम है (उपनय) (५) इसलिए पर्वत मे अग्नि है (निगमन) . अवयव संज्ञा एते पक्षप्रयोगादयः पञ्चाप्यवयवसंज्ञयाकीय॑न्ते ॥५३॥ अर्थ-पक्ष, हेतु आदि पाँची अनुमान के अंग 'अवयव कहलाते हैं। हेतु के भेद उक्त लक्षणो हेतुर्द्विप्रकारः, उपलब्धि-अनुपलब्धिभ्यां भिद्यमानत्वात् ॥५४॥ उपलब्धिर्विधिनिषेधयोः सिद्धिनिबन्धनमनुपलब्धिश्च ॥५॥ + (५१) [प्रथम परिच्छेद - अर्थ-अन्यथानुपपत्तिरूप, पूर्वोक्त हेतु दो प्रकार का है- (१) उपलब्धिरूप और (२) अनुपलब्धिरूप । उपलब्धिरूप हेतु से विधि और निषेध दोनों सिद्ध होते है और अनुपलब्धिरूप हेतु में भी दोनो सिद्ध होते हैं । विवेचन-विधि-सद्भावरूप हेतु को उपलब्धि हेतु कहत हैं और निषेध अर्थात् असद्भावरूप हेतु अनुपलब्धि कहलाता है। कुछ लोगो की यह मान्यता है कि उपलब्धि हेतु विधिसाधक और अनुपलब्धिहेत निषेधसायक ही होता है। इस मान्यता का विरोध करते हुए यहाँ दोनो प्रकार के हेतुओ को दोनो का साधक बताया गया है। प्रत्येक हेतु जैसे अपने सम्बन्धी का सद्भाव सिद्ध करता है उसी प्रकार अपने विरोधी का अभाव भी सिद्ध कर सकता है। विधि-निषेध की व्याख्या विधिः सदंशः॥५६॥ प्रतिषेधोऽसदंश ॥२७॥ अर्थ-सत् अंश को विधि कहते हैं। असत् अंश को प्रतिषेध कहते हैं। विवेचन–प्रत्येक वस्तु मे सत्त्व और असत्त्व दोनो धर्म पाये जाते हैं । अतएव सत्त्व वस्तु का एक अंश (धर्म) है और असत्त्व भी एक अश है । सत्त्व और असत्त्व सर्वथा पृथक् पदार्थ नहीं हैं। इसीलिए सूत्रो में 'अंश' शब्द का प्रयोग किया गया है। वैशेषिक लोग सत्त्व (सामान्य) और प्रभाव को अलग पदार्थ मानते हैं, यहाँ उनकी इस मान्यता का परोक्षरूप में विरोध किया गया है।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक]
(५२)
प्रतिषेध के भेट
स चतुर्था-प्रागभावः, प्रध्वंसाभावः, इतरेतराभावो-
त्यन्ताभावश्च ॥५८||
अर्थ-प्रतिषेध ( अभाव ) चार प्रकार का है-प्रागभाव,
प्रध्वंसाभाव, इतरेतराभाव और अत्यन्ताभाव ।
प्रागभाव का स्वरूप
पदार्थ उस
यन्निवृत्तावेव कार्यस्य समुत्पत्तिः सोऽस्य प्रागभावः।।५।।
यथा मृत्पिण्डनिवृत्तावेव समुत्पद्यमानस्य घटस्य मृत्पिण्डः॥६०॥
अर्थ-जिस पदार्थ के नाश होने पर ही कार्य की उत्पत्ति हो
वह
कार्य का प्रागभाव है।
जैसे मिट्टी के पिण्ड का नाश होने पर ही उत्पन्न होने वाले
घट का प्रागभाव मिट्टी का पिण्ड है।
विवेचन-किसी भी कार्य की उत्पत्ति होने से पहले उसका
जो अभाव होता है वह प्रागभाव कहलाता है। यहाँ सद्रूप मिट्टी के
पिण्ड को घट का प्रागभाव बतलाया है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है
कि, अभाव एकान्त असत्तारूप (नुच्छाभावरूप) नहीं है, किन्तु
पदार्थान्तर रूप है। आगे भी इसी प्रकार समझना चाहिए ।
प्रध्वसाभाव का स्वरूप
यदुत्पत्तौ कार्यस्यावश्यं विपत्तिः सोऽस्य प्रध्वंसाभावः ॥६॥
यथा कपालकदम्बकोत्पत्ती नियमतो विपद्यमानस्य
कलशस्य कपालकदम्बकम् ॥ ६२ ॥
(५३) [प्रथम परिच्छेद अर्थ-जिम पदार्थ के उत्पन्न होने पर कार्य का अवश्य विनाश हो जाता है वह पदार्थ उम कार्य का प्रध्वंमाभाव है। जैसे-टुकडों का समूह उत्पन्न होने पर निश्चित रूप से नष्ट हो जाने वाले घट का प्रध्वंमाभाव टुकड़ा का ममूह है। इतरेतराभाव का स्वरूप स्वरूपान्तात् स्वरूपव्यात्तिरितरेतराभावः॥ ६३ ॥ तथा स्तम्भस्वभावात् कुम्भस्वभावव्यावृत्तिः॥ ६४ ॥ प्रयं-एक पर्याय का दृमरी पर्याय में न पाया जाना इतरे- नगभाव है। मे-तम्भ का कुम्भ मे न पाया जाना। विवेचन-नम्भ और कुम्भ-दोना पदार्थ एक माथ मद्भाव रूप है. किन्तु म्नम्भ कुम्भ नहीं है और कुम्भ स्तम्भ ही है। इस प्रकार दोनों में परम्पर का अभाव है। यही अभाव इतरेतराभाव, अन्योन्याभाव या परम्पराभाव कहलाता है। अत्यन्ताभाव का स्वरूप कालत्रयाऽपेक्षिणी तादात्म्यपरिणामनिवृत्तिरत्यन्ता- भावः ॥६५॥ यथा चेतनाचेतनयोः ॥ ६६ ॥ अर्थ-त्रिकाल सम्बन्धी तादात्म्य के अभाव को अत्यन्ता. भाव कहते हैं।
प्रमाण-नय-तत्वालोक]
(५४)
.
विवेचन-एक द्रव्य त्रिकाल मे भी दूमग द्रव्य नही बन मकता
जैमे चेतन कभी अचेतन न हुआ, न है और न होगा। इस प्रकार
प्रत्येक द्रव्य मे, दूसरे द्रव्य का त्रैकालिक अभाव पाया जाता है:
वही अत्यन्ताभाव है। एक ही द्रव्य की अनेक पर्यायों का पारम्परिक
अभाव इतरेतराभाव कहलाता है और अनेक द्रव्यो का पारस्परिक
अभाव अत्यन्ताभाव कहलाना है । प्रागभाव अनादि मान्त है,
प्रध्वंसाभाव सादि अनन्न है, इनरेतराभाव सादि सान्त है और
अत्यन्ताभाव अनादि अनन्त
उपलब्धि हेतु के भेद
उपलब्धेरपि द्वैविध्यमविरुद्धोपलब्धिविरुद्धोपलब्धिश्च ॥६७
अर्थ-उपलब्धि हेतु के भी दो भेद हैं-(१) अविरुद्धो-
पलब्धि और (२) विरुद्धोपलब्धि ।
विवेचन-साध्य मे अविरुद्ध हेतु की उपलब्धि अविरु द्रोप-
लब्धि और साध्य से विरुद्ध हेतु की उपलब्धि विरुद्धोपलब्धि है।
विधिसाधक अविरुद्धोपलब्धि के भेद
तत्राविरुद्धोपलब्धिर्विधिसिद्धौ पोढा ॥६॥
अर्थ-विधि रूप साध्य को सिद्ध करने वाली अविरुद्वो.
लब्धि छह प्रकार की है।
भेदों का निर्देश
साध्येनाविरुद्धानां व्याप्यकार्यकारणपूर्वचरोत्तरचरसह-
चराणामुपलब्धिः ॥६६॥
(५५) [प्रथम परिच्छेद अर्थ-(१) माध्याविरुद्व व्याप्योपलब्धि, (२) माध्याविरुद्ध कार्योपलब्धि, (३) माध्याविरुद्ध कारणोपलब्धि (४) साध्याविरुद्ध पूर्व चगेपलब्धि (५)माध्याविरुद्ध उत्तरचरोपलब्धि (६)माध्याविरुद्ध सहचगेपलब्धि. विधिसाधक साध्याविरुद्ध-उपलब्धि के यह छह भेट हैं। कारण हेतु का समर्थन तमस्विन्यामास्वाद्यमानादानादिफलरसादेकसामग्र्य- नुमित्या रूपाद्यनुमितिमभिमन्यमानरभिमतमेव किमपि कारणं हेतुतया; यत्र शक्तेरप्रतिस्खलनमपरकारणसाकल्यञ्च ॥७०॥ अर्थ-गत्रि में चूमे जाने वाले आम आदि फल के रस से, उमकी उत्पादक मामग्रो का अनुमान करके, फिर उससे रूप आदि का अनुमान मानने वालो ने(बौद्रो ने ) कोई कारण हेतु रूप मे स्वीकार किया ही है, जहा हेतु की शक्ति का प्रतिघात न होगया हो और दुमरे सहकारी कारणों की पूर्णना हो। विवेचन-बौद्ध, उपलब्धि के स्वभाव और कार्य-यह दो ही भेट मानते हैं, कारण आदि को उन्होंने हेतु नहीं माना । वे कहते माय अविनाभाव है, कारण का कार्य के माय नहीं, क्योंकि काय बिना कारण के नहीं हो सकता, पर कारण तो कार्य के चिना भी होता है। अतएव कारण को हेतु नही मानना चाहिए।' बौद्धों के मत का यहाँ वएडन करने के लिए दो बातें कही गई हैं:- १) प्रत्येक कारण हेतु नहीं होता किन्तु जिम कारण का कार्योत्पादक सामर्थ्य मणि-मन्त्र आदि प्रतिबन्धको द्वारा रुका हुआ कार्य का कारण क - (५६) [ प्रथम परिच्छेद न हो और जिसके सहकारी अन्यान्य सब कारण विद्यमान हों, ऐसे विशिष्ट कारण को ही हेतु माना गया है, क्योंकि एम कारण के होने पर कार्य की उत्पत्ति अवश्य होती है। (२) बौद्ध स्वय भी कारण को हेतु मानते है । अधेरी रात्रि में (जब रूप दिखाई न पडता हो ) कोई आम का रस चूमता है। उस रम से वह रम को उत्पन्न करने वाली मामग्री ( पूर्व क्षण- वर्ती रम और रूप आदि ) का अनुमान करता है । यहाँ चूमा जाने वाला रस कार्य है और पूर्वक्षणवर्ती रस रूप आदि कारण हैं। यह कार्य से कारण का अनुमान हुआ। इसके पश्चात् श्राम चूमने वाला उस कारणभूत रूप से वर्तमान कालीन रूप का अनुमान करता है। यह कारण से कार्य का अनुमान कहलाया। इस प्रकार बौद्ध कारण से कार्य का अनुमान स्वयं करते हैं, फिर कारण को हेतु क्यो न माने? शंका-वर्तमान रम से पूर्व क्षणवर्ती रस का ही अनुमान होगा, रस के साथ रूप आदि का क्यों आप कहते हैं। समाधान-बौद्धो की मान्यता के अनुसार पूर्वकालीन रस और रूप आदि मिलकर ही उत्तरकालीन रस उत्पन्न करते हैं। अत- एव वर्तमानकालीन रस से पूर्वकालान रम के साथ रूप आदि का भी अनुमान होता है । अलवत्ता पूर्वकालीन रस उत्तरकालीन रस में उपादान कारण होता है और रूप सहकारी कारण होता है। यही नियम स्पर्श आदि के लिए समझना चाहिए। प्रत्येक कारण सजातीय के प्रति उपादान कारण और विजातीय के प्रति सहकारी कारण होता है। शंका-अच्छा, वर्तमान कालीन रूप तो प्रत्यक्ष देखा जा [तृतीय परिच्छेद - सकता है। पूर्व रूप से उसका अनुमान करने की आवश्यकता क्यो बताई? समाधान-मूत्र में 'नमम्विन्याम' पद है। उसका अर्थ है अधेरी रान । अन्धेरी गन कहने का प्रयोजन यह है कि रस का तो जिला-इन्द्रिय से प्रत्यन हो रहा हो पर रूप का प्रत्यक्ष न होना हो- नन रूप अनुमान से भी जाना जा मकेगा। पूर्वचर-उत्तरचर का समर्थन पूर्वचरोत्तरचरयोर्न स्वभावकार्यकारणभावी, तयोः कालव्यवहितावनुपलम्भात् ॥ ७१ ॥ विवेचन-पूर्वचर पार उत्तग्चर हेतुओ का स्वभाव और कार्य हेतु में ममावेश नहीं हो सकता, क्योंकि स्वभाव और कार्य हेतु काल का व्यवधान होने पर नहीं होते। विवेचन-जहाँ नाहात्म्य सम्बन्ध हो वहाँ स्वभाव हेतु होता है और जहाँ नदुतात्ति सम्बन्ध हो वहाँ काय हेतु होता है । तागम्य सम्बन्ध ममकालीन वस्तुओं में होना है और कार्य-कारण सम्बन्ध अव्यवहिन पूर्वोत्तर क्षणवर्नी धूम अग्नि आदि में होता है। इस प्रकार ममय का व्यवधान दोनों में नहीं पाया जाता। किन्तु पूर्वचर और उत्तरचर में ममय का व्यवधान होता है अतः इन दोनो का स्वभाव अथवा कार्य हेतु मे ममावेश नहीं हो सकता। व्यवधान में कार्यकारणभाव का अभाव न चातिक्रान्तानागतयोर्जाग्रद्दशासंवेदनमरणयोः प्रयो- धोत्यातीप्रति कारणत्वं, व्यवहितत्वेन निर्व्यापारत्वादिति ॥७२।।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (५८) . स्वव्यापारापेक्षिणी हि कार्य प्रति पदार्थस्य कारण- त्वव्यवस्था, कुलालस्येव कलशं प्रति ॥ ७३ ॥ न च व्यवहितयोस्तयोापारपरिकल्पनं न्याय्यमति- प्रसक्तेरिति ॥ ७४ ॥ परम्पराव्यवहितानां परेषामपि तत्कल्पनस्य निवार- यितुमशक्यत्वात् ।। ७५ ।। कहलाता है, जैसे कुम्भार घट अर्थ-अतीत जाग्रत-अवस्था का ज्ञान, प्रनोध (सोकर जागन के पश्चात् होने वाले ज्ञान ) का कारण नहीं है और भावी मरण अरिष्ट (अरुन्धो ताग न दीखना आदि ) का कारण नहीं है, क्योंकि वे समय से व्यवहिन हैं इसलिए प्रबोध और अरिष्ट उत्पन्न करने में व्यापार नहीं करते। जो कार्य की उत्पत्ति मे स्वय व्यापार करता है वही कारण कारण है। समय का व्यवधान होने पर भी अतीत जाग्रन अवस्था का ज्ञान और मरण, प्रबोध और अरिष्ट की उत्पत्तिमे व्यापार करते हैं, ऐसी कल्पना न्यायसगत नहीं है, अन्यथा सब घोटाला हो जायगा। (फिर तो) परम्परा से व्यवहित अन्यान्य पदार्थों के व्या- पार की कल्पना करना भी अनिवार्य हो जायगा ।। विवेचन-पहले बताया जा चुका है कि जहाँ समय का व्यवधान होता है, वहाँ कार्य-कारण का भाव नहीं होता । इसी मिद्धान्त का यहाँ समर्थन किया गया है।
(५६) [ तृतीय परिच्छेद . शका-जागते समय हमें देवदत्त का ज्ञान हुआ। रात में हम मो गये। दूसरे दिन हमे देवदत्त का ज्ञान रहता है । ऐमी अव- स्था में सोने से पहले का ज्ञान मोने के बाद के ज्ञान का कारण है। हमके अतिरिक्त छह महीने पश्चात होने वाला मरण अरुन्धती का न दोग्बना आदि अरिटो का कारण होता है। यहाँ दोनो जगह समय का व्यवधान होने पर भी कार्य कारण भाव है। समाधान-कारण वही कहलाता है जो कार्य की उत्पत्ति में व्यापार करता है। जैम कुम्भार घट की उत्पत्ति में व्यापार करना है इमीलिए उसे घट का कारण माना जाना है। भूतकालीन जाग्रत अवस्था का ज्ञान और भविष्यकालीन मरण, प्रबोध और अग्टि की उत्पत्ति में व्यापार नहीं करते, अत. उन्हे कारण नहीं माना जा सकता। शंका-भूनकालीन जाग्रत-अवग्था के ज्ञान का और भविष्य- कालीन मरगा का प्रयोग और अरिष्ट की उत्पत्ति में व्यापार होता है, यह मान लेने में क्या हानि है ? समाधान व्यागर वही कग्गा जो विद्यमान होगा। जो नष्ट चुका है अथवा जो अभी उत्पन्न ही नहीं हुआ वह अविद्यमान या अमन है ! अमत् किमी कार्य की उत्पत्ति में व्यापार नहीं कर सकवा । और व्यापार किए बिना ही कारण मान लेने पर चाहे जिसे कारग मान लेना पड़ेगा। सहचर हेतु का समर्थन सहचारिणोः परस्परस्वरूपपरित्यागेन तादात्म्यानुपपत्तेः सहोत्पादेन तदुत्पत्तिविपचेश्च सहचरहेतोरपि प्रोक्तेषु नानु- प्रवेशः ॥ ७६ ॥ .
प्रमाण-नय तत्त्वालोक] (६०) अर्थ-सहचर रूप-रम आदि का स्वरूप भिन्न-भिन्न होता है अत. उनमें तादात्म्य सम्बन्ध नहीं हो सकना; इस कारण सहचर हेतु का पूर्वोक्त हेतुओ में समावेश होना सम्भव नहीं है। विवेचन--रूप और रम महचर हैं और दोनो का स्वरूप भिन्न-भिन्न है । रूप चतु-ग्राह्य होता है, रम जिह्वा-ग्राह्य है । जहाँ स्वरूप भेद होता है वहाँ तादात्म्य सम्बन्ध नहीं हो मकता और तादात्म्य सम्बन्ध के विना स्वभाव हेतु मे ममावेश नही हो सकता। इसके अतिरिक्त रूप रस आदि महचर साथ-साथ उत्पन्न होते हैं और साथ-साथ उत्पन्न होने वालों में कार्य कारणभाव सम्बन्ध नहीं होता। इस कारण महचर हेतु किसी भी अन्य हेतु में अन्तर्गत नहीं किया जा सकता। उसे अलग हेनु स्वीकार करना चाहिए। हेतुओं के उदाहरण ध्वनिः परिणतिमान् , प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्, यः प्रयत्नानन्तरीयकः स परिणतिमान् यथा स्तम्भः । यो वा न परिणतिमान् स न प्रयत्नानन्तरीयको यथा चान्ध्येयः । प्रयत्नानन्तरीयकश्च ध्वनिस्तस्मात् परिणतिमानिति व्याप्यस्य साध्येनाविरुद्धस्योपलब्धिः साधर्मेण वैधर्येण च ॥ ७७ ।। अर्थ-शब्द अनित्य है, क्योंकि वह प्रयत्न से उत्पन्न होता है, जो प्रयत्ल से उत्पन्न होता है वह अनित्य होता है, जैसे स्तम्भ । अथवा जो अनित्य नहीं होता वह प्रयत्न से उत्पन्न नही होता है, जैसे वन्ध्यापुत्र । शब्द प्रयत्न से उत्पन्न होता है. अतः वह अनित्य. है । यह (विधिसाधक) साध्य से अविरुद्ध व्याप्य की उपलब्धि अन्वय- व्यतिरेक द्वारा बताई गई है।
(६१) [ तृतीय परिच्छेद विवेचन-यहाँ अनुमान के पाँच अवयव बताये गये हैं- 'परिणतिमान' साध्य है, 'प्रयत्नानन्तरीयकत्व' हेतु है, स्तम्भ' माधर्म्य दृष्टान्त और 'वान्ध्येय वैवर्म्य दृष्टान्त है, 'शब्द प्रयत्नानन्तरीयक होता है। उपनय है, 'अत. वह परिणतिमान है' निगमन है। जो अल्प देश में रहे वह व्याप्य कहलाता है और जो अधिक देश में रहे वह व्यापक कहलाता है । जैसे परिणतिमत्त्र मेघ, इन्द्र- धनुष और घट-पट आदि में रहता है पर 'प्रयत्नानन्तरीयकत्व' मिर्फ घट-पट आदि में रहता है मेघ आदि प्राकृतिक पदार्थों में नहीं रहता। इस कारण प्रयत्नानन्तरीयकत्व और परिणतिमत्व व्यापक है। यहाँ परिणतिमत्व साध्य से अविरुद्ध प्रयत्नानन्तरीयकत्व रूप व्याप्य हेतु की उपलब्धि है। अविरुद्ध कार्योपलब्धि अस्त्यत्र गिरिनिकुञ्ज धनञ्जयो, धूमसमुपलम्भाव, इति कार्यस्य ॥ ७८ ॥ अर्थ-इम गिरिनिकुञ्ज में अग्नि है, क्योकि धूम है यह अविरुद्ध कार्योपलब्धि का उदाहरण । विवेचन–यहाँ अंग्नि साध्य से अविरुद्ध धूम-कार्य-की उप- लन्धि है। अविरुद्ध कारणोपलब्धि भविष्यति वर्ष, तथाविधवारिवाहविलोकनात्, इति कारणस्य ।। ७६ ॥ है ह
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक]
(६२)
अर्थ-वर्षा होगी, क्योकि विशिष्ट (वर्षा के अनुकूल ) मेघ
दिखाई देते हैं, यह अविरोध कारणोपलब्धि का उदाहरण । (यहाँ
वर्षा साध्य से अविरुद्ध कारण विशिष्ट मेघ की उपलब्धि है।)
अविरुद्ध पूर्वचरोपलब्धि
उदेष्यति मुहूर्तान्ते तिष्यतारकाः पुनर्वसूदयात्, इति
पूर्वचरस्य ॥ ८० ॥
अर्थ-एक मुहूर्त के पश्चात् पुष्य नक्षत्र का उदय होगा,
क्योंकि इस समय पुनर्वसु नक्षत्र का उदय है, यह अविरुद्ध पूर्वचरो-
पलब्धि है। (यहाँ पुष्य नक्षत्र से अविरुद्ध पूर्वचर पुनर्वसु की उप-
लब्धि है)
अविरुद्ध उत्तरचरोपलब्धि
उदगुर्मुहात्पूर्व पूर्वफल्गुन्यः, उत्तरफल्गुनीनामुद्गमो-
पलब्धेः, इति उत्तरचरस्य ।। ८१ ।।
अर्थ-एक मुहूर्त पहले पूर्वफल्गुनी का उदय हो चुका है.
क्योकि अब उत्तरफल्गुनी का उदय है, यह अविरुद्ध उत्तरचरोपलन्धि
है। (यहाँ पूर्वफल्गुनी से अविरुद्व उत्तरचर उत्तर फल्गुनी की उप-
लब्धि है)
अविरुद्ध सहचरोपलब्धि
अस्तीह सहकारफले रूपविशेषः, समास्वाद्यमानरस-
विशेषात्, इति सहचरस्य ॥ ८२ ॥
(६३)
[प्रथम परिच्छेद
अर्थ-इस आम में रूप विशेष है, क्योकि श्रास्वाद्यमान रम
विशेष है, यह अविरुद्ध सहचरोपलब्धि का उदाहरण है । ( यहाँ
माध्य-रूप-से अविरुद्ध सहचर-ग्स की उपलब्धि है)
विल्दोपलब्धि के भेद
विरुद्धोपलब्धिस्तु प्रतिपेधप्रतिपत्तौ सप्तधा ॥ ८ ॥
-
अर्थ:-निपेय मिद्ध करनेवाली विरुद्धोपलब्धि सात प्रकार
की है।
स्वभाव विरुद्धोपलब्धि
तत्राद्या स्वभावविरुद्धोपलब्धिः॥ ८४ ॥
यथा नास्त्येव सर्वथैकान्तोऽनेकान्तस्योपलम्भात् ॥५॥
अर्थ-विरुद्वोपन्धि का पहला भेट स्वभावविरुद्वोपन्धि है ।।
जैसे-सर्वथा एकान्त नही है, क्योंकि अनेकान्त की उप.
लब्धि होती है।
विवेचन-यहाँ प्रतिपेव्य है-सर्वथा एकान्त | उससे विरुद्ध
अनेकान्तरूप स्वभाव की उपलब्धि है। अतएव, यह निषेधसाधक
साध्यविरुद्ध स्वभावोपलब्धि हेतु है।
विरुद्धोपलब्धि के भेद
प्रतिषेध्यविरुद्धव्याप्तादीनामुपलब्धयः षट् ॥ ८६ ॥
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक (६४) अर्थ-प्रतिषेध्य पदार्थ से विरुद्ध व्याप्त आदि की उपलब्धि छह प्रकार की है। विवेचन-विरुद्धोपलब्धि के सात भेद बताये थे। उनमे मे पहले भेद का स्वभावविरुद्धोपलब्धि का, उदाहरण बताया जा चुका है। शेष छह भेद यह हैं-(१) विरुद्धच्यानोपलब्धि (०) विरुद्ध- कार्योपलब्धि (३) विरुद्ध कारणोपलब्धि (४) विरुद् पूर्ववगेपलब्धि (५) विरुद्धउत्तरचरोपलब्धि और (६) विरुद्ध सहचरोपलब्धि । विरुद्ध व्याप्तोपलब्धि विरुद्धव्याप्तोपलब्धिर्यथा-नास्त्यस्य पुसस्तत्त्वेषु निश्चयस्तत्र सन्देहात् ॥ ८७ ॥ अर्थ-इस पुरुष को तत्त्वो में निश्चय नहीं है, क्योकि उसे तत्त्वों में सन्देह है। यह विरुद्ध व्याप्तोपलब्धि का उदाहरण है। विवेचन यहाँ नत्त्वो का निश्चय प्रतिषेध्य है, उससे विरुद्ध अनिश्चय है और उससे व्याप्त सन्देह की उपलब्धि है। विरुद्धकार्योपलब्धि विरुद्ध कार्योपलब्धिर्यथा न विद्यतेऽस्यक्रोधाद्युपशांति- वंदनविकारादः ॥ ८८ ॥ अर्थ-इस पुरुष के क्रोध आदि शान्त नहीं हैं, क्योकि चेहरे पर विकार आदि पाये जाते हैं। विवेचन-यहाँ प्रनिषेध्य क्रोधादिक की शान्ति है, उससे (६५) [तृतीय परिच्छेद विरुद्ध क्रोध आदि का अनुपगम है और अनुपशम का कार्य वदन- विकार आदि पाया जाता है, अत. यह विरुद्वकार्योपलब्धि का उदा- हरण हुआ। विरुद्ध कारणोपलब्धि विरुद्ध कारणोलपब्धिर्यथा नास्य महर्पोरसत्यं समस्ति, रागद्वेपकालुष्याऽकलङ्कितज्ञानसम्पन्नत्वात् ॥ ८६ ॥ भर्य-इम महपि मे अमत्य नहीं है, क्योंकि वह राग-द्वेष रूपी कलंक से रहित जान वाले हैं। विवेचन यहाँ प्रतिपेध्य असत्य है, उसमे विरुद्ध मत्य है और सत्य के कारण राग-द्वेष रहिन ज्ञान की उपलब्धि है, अतः यह विरुद्ध कारणोपलब्धि का उदाहरण है। विरुद्ध पूर्वचरोपलब्धि विरुद्धपूर्वचगेपलब्धिर्यथा नोद्गमिप्यति मुहूर्तान्ते पुष्यतारा, रोहिण्युद्गमात् ॥ १० ॥ अर्य-एक मुहूर्त पश्चात पुष्य नक्षत्र का उदय नहीं होगा, क्योंकि रोहिणी ननत्र का उदय है। विवेचन-यहाँ पुष्यतारा का उदय प्रतिषेध्य है, उससे विरुद्ध मृगशीर्ष ननत्र का उदय है और उसके पूर्वचर रोहिणी नक्षत्र के उदय की उपलब्धि है । अत यह विरुद्ध पूर्वचरोलब्धि का उदाहरण है।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (६६) विरुद्ध उत्तरचरोपलब्धि विरुद्धोत्तरचरोपलब्धिर्यथा नोद्गान्मुहूर्तात्पूर्व मृगशिरः, पूर्वफल्गुन्युदयात् ।। ६१ ॥ अर्थ-एक मुहूर्त पहले मृगशिर नक्षत्र का उदय नहीं हुआ, क्योंकि अभी पूर्वफल्गुनी का उन्य है। विवेचन–यहाँ प्रतिपेध्य मृगशिर का उदय है, उनसे विरुद्ध मघा नक्षत्र का उदय है और मघा के उत्तरचर पूर्वफल्गुनी के उदय की उपलब्धि है। अत यह विरुद्व उत्तरचरोपलब्धि का उदाहरण हुआ। विरुदध सहचरोपलब्धि विरुद्धसहचरोपलब्धिर्यथा--नास्त्यस्य मिथ्याज्ञानं सम्यग्दर्शनात् ॥ १२ ॥ अर्थ-इस पुरुप का ज्ञान मिथ्या नहीं है, क्योंकि सम्य- ग्दर्शन है। विवेचन यहाँ प्रतिषेध्य मिथ्याज्ञान है, उससे विरुद्ध सम्यग्ज्ञान हे और सम्यग्ज्ञान सहचर सम्यग्दर्शन की उपलब्धि है। अतः यह विरुद्धसहचरोपलब्धि का उदाहरण है। विरुद्धोपलब्धि के इन सब उदाहरणों में हेतु से पहले 'निपेघ- साधक' इतना पद और जोड देना चाहिए । जैसे-निषेधसायक विरुद्धस्वभावोपलब्धि, निषेधसाधक विरुद्ध कार्योपलब्धि, आदि । के (६७) [तृतीय परिच्छेद अनुपलब्धि के भेद अनुपलब्धेरपि द्वैलप्यं-अविरुद्धानुपलब्धिः विरुद्धा- नुपलब्धिश्च ।। ६३ ॥ अर्थ-उपलब्धि की तरह अनुपलब्धि भी दो प्रकार की है- (१) अविरुद्धानुपलब्धि और (२) विरुद्धानुपलब्धि । निषेधसाधक अविरुद्धानुपलब्धि तत्राविरुद्धानुपलब्धिःप्रतिषेधावबोधे सप्तप्रकारा ।।६४॥ प्रतिपेध्येनाविरुद्धानां स्वभाव -व्यापक-कार्य-कारण- पूर्वचरोत्तरचरसहचराणामनुपलब्धिः ॥६५॥ अर्थ-निपेच मिद्ध करने वाली अविरुद्वानुपलब्धि सात प्रकार की है। प्रनिपेभ्य मे (१) अविरुद्रुम्वभावानुपलब्धि (२) अविरुद्ध व्यापकानुपलब्धि (३) अविरुद्ध कार्यानुपलब्धि (४) अविरुद्ध कारणा- नुपलब्धि (५) अविरुद्ध पूर्वचरानुपलब्धि (७) अविरुद्ध उत्तरचरानुप- लब्धि ७) अविरुद्र महचगनुपलब्धि ।। अविध स्वभावानुपलब्धि स्वभावानुपलब्धिर्यथा-नास्त्यत्र भूतले कुम्भः, उप- लब्धिलक्षणप्राप्तस्य तत्स्वभावस्यानुपलम्भात् ॥ ६६ ॥ अर्थ-हम भूनल पर कुम्भ नहीं है, क्योकि वह उपलब्ध होने योग्य होने पर भी उपलब्ध नहीं हो रहा है।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (६८) विवेचन यहाँ प्रतिषेध्य कुम्भ है. उससे अविरुद्ध स्वभाव है। उपलब्ध होने की योग्यता और उस स्वभाव की अनुपलब्धि है। अत यह अविरुद्ध स्वभावानुपलब्धि का उदाहरण है। अविरुद्ध व्यापकानुपलन्धि विरुद्धव्यापकानुपलब्धिर्यथा-नास्त्यत्र प्रदेशे पनसः पादपानुपलब्धेः ॥ १७ ॥ अर्थ-इस जगह पनम नहीं है, क्योंकि वृक्ष नहीं है। विवेचन यहाँ प्रतिषेध्य पनस से अविरुद्ध व्यापक पादप की अनुपलब्धि होने से यह अविरुद्ध व्यापकानुपलब्धि है। अविरुद्ध कार्यानुपलन्धि कार्यानुपलब्धिर्यथा-नास्त्यत्राप्रतिहतशक्तिकं बीज- मंकुरानवलोकनात् ।। ६८॥ अर्थ-अप्रतिहत शक्तिवाला बीन नहीं है, क्योंकि अंकुर नहीं दिखाई देता। विवेचन-जिसकी शक्ति मंत्र आदि से रोक न दी गई हो या पुराना होने से स्वभावतः नष्ट न हो गई हो वह अप्रतिहत शक्ति वाला कहलाता है । यहाँ प्रतिषेध्य अप्रनिहत शक्ति वाला बीज है, उससे । अविरुद्ध कार्य अंकुर की अनुपलब्धि होने से यह अविरुद्ध कार्यानुप- लब्धि है।
(६६) [ तृतीय परिच्छेद -- , अपिदध कारणानुपलब्धि कारणानुपलब्धिर्यथा न सन्त्यस्य प्रशमप्रभृतयो भावास्तत्वार्थश्रद्धानाभावात् ॥ १६ ॥ अर्थ-इम पुरुप में प्रशम, संवेग, निर्वेद, अनुकम्पा और अस्तिस्य म्प भाव नहीं हैं, क्योंकि नत्वार्यश्रद्वान का अभाव है विवेचन यहाँ प्रनिपेध्य प्रशम श्रादि भाव हैं, उनमें अवि- रुद्ध कारण मम्यग्दर्शन की अनुपलब्धि है, अतः यह अविरुद्ध कारणानुपलब्धि है। अविरुद्ध पूर्वचरानुपलब्धि पूर्वगनुपलब्धिर्यथा-नोद्गमिष्यति मुहूर्तान्ते स्वाति- नक्षत्रं, चित्रोदयादर्शनात् ।। १०० ।। अर्थ-एक मुहूर्त के पश्चात् म्बानि नक्षत्र का उदय नहीं होगा, क्योंकि अभी चित्रा नक्षत्र का उदय नहीं है। विवेचन-हम्त ननत्र के बाद चित्रा और चित्रा के बाद म्वाति का उदय होता है । यहाँ स्वाति का उढय प्रतिपेध्य है, उमसे अविरुद्ध पूर्वचर चित्रा के उदय की अनुपलब्धि होने से यह अविरुद्ध पूर्वचगनुपलब्धि है। अविरुद्ध उत्तरचरानुपनब्धि उत्तराचरानुपलब्धिर्यथा नोद्गमत् पूर्वभद्रपदा मुहूर्ता- त्पूर्व, उत्तरभद्रपदोद्गमानवलोकनात् ।। १०१ ॥
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक (७०) अर्थ-क मुहूर्त पहले पूर्वभद्रपदा का उदय नहीं हुआ, क्यों- कि अभी उत्तरभद्रपना का उदय नहीं है। विवेचन–यहाँ प्रतिषेध्य पूर्वभद्रपदा का उदय है, उमसे अविरुद्ध उत्तरचर उत्तरभद्रपदा के उदय की अनुपलब्धि होने से यह अविरुद्ध उत्तरचगनुपलब्धि है। अविरुद्ध सहचरानुपलब्धि सहचरानुपलब्धिर्यथा, नास्त्यस्य सम्यग्ज्ञानं, सम्य- ग्दर्शनानुपलब्धेः ॥ १०२॥ अर्थ-इम पुरुष में सम्यग्ज्ञान नहीं है, क्योकि सम्यग्दर्शन की अनुपलब्धि है। विवेचन-यहाँ प्रतिषेध्य सम्यग्ज्ञान है, उससे अविरुन सह- चर सम्यग्दर्शन की अनुपलब्धि होने से यह अविरुद्ध सहचरानुपलब्धि का उदाहरण है। विधिसाधक विरुद्धानुपलब्धि विरुद्धानुपलब्धिस्तु विधिप्रत-तौ पञ्चधा ॥ १०३ ॥ विरुद्ध कार्यकारणस्वभाव-व्यापकसहचगनुपलम्भमे- दात् ॥ १०४ ॥ अर्थ-विधि को सिद्ध करने वाली विरुद्धानुपलब्धि के पांच भेद हैं। (१) विरुद्ध कार्यानुपलब्धि (२) विरुद्ध कारणानुपलब्धि (७१) [तृतीय परिच्छेद (३) विरुद्धम्वभावानुपलब्धि (४) विरुद्व व्यापकानुपलब्धि (५) विरुद्ध महचरानुपलब्धि ।। विरुद्ध कार्यानुपलब्धि विरुद्ध कार्यानुपलब्धिर्यथा-अत्र प्राणिनि रोगातिशयः समस्ति, नीरोगव्यापारानुपलब्धेः ॥ १०५ ॥ अर्थ- -इस प्राणी मे रोग का अतिशय है, क्योकि नीरोग चेष्टा नहीं देखी जानी। विवेचन-यहाँ रोग का अतिशय माध्य है, उसमे विरुद्ध नीगेगना है और नारोगता के कार्य को-चेष्टा की-यहाँ अनुपलब्धि है । अन यह विरुद्र कार्यानुपलब्धि है। विरुदध कारणानुपलब्धि विरुद्ध कारणानुपलन्धिर्यथा, विद्यतेऽत्र प्राणिनि कष्ट- मिष्टसंयोगाभावात् ।। १०६ ।। अर्थ-हम प्राणी को कष्ट है, क्योकि इष्ट-संयोग का । प्रभाव who विवेचन यहाँ साध्य कष्ट है । इमसे विरुद्व सुख है। उसका कारगण हटमित्रों का संयोग है और उसका अभाव है । अतः यह विरुद्ध कारणोपलब्धि है। विरुद्ध स्वभावानुपलब्धि विरुद्ध स्वभावानुपलब्धिर्यथा वस्तुजातमनेकान्तात्मक, एकान्तस्वभावानुपलम्भात् ।। १०७ ॥
प्रमाण-नय तत्त्वालोक] (७२) अर्थ-वस्तु-समूह अनेकान्तरूप है क्योकि एकान्त स्वभाव की अनुपलब्धि है। विवेचन--यहाँ अनेकान्तरूपता साध्य से विरुद्ध एकान्त स्व- भाव की अनुपलब्धि है । अन यह विरुद्धस्वभावानुपलब्धि है। विरुद्ध न्यापकानुपलब्धि विरुद्ध व्यापकानुपलब्धिर्यथा अस्त्यत्र छायां, औष- एयानुपलब्धेः ॥ १०८ ॥ अर्म-यहाँ छाया है, क्योंकि उष्णता की अनुपलब्धि है। विवेचन यहाँ छाया-साम्य से विरुद्ध व्यापक उष्णता की अनुपलब्धि होने से यह विरुद्ध व्यापकानुपलब्धि है। विरुद्ध सहचरानुपलब्धि विरुद्ध सहचरानुपलब्धियथा-अस्त्यस्य मिथ्याज्ञानं सम्यग्दर्शनानुपलब्धेः ॥ १०६ ॥ अर्थ-इम पुरुष में मिथ्याजन है, क्योकि सम्यग्दर्शन की अनुपलब्धि है। विवेचन--यहाँ मिथ्य ज्ञान-सध्यसे विरुद्व महचर सम्यग्ज्ञान की अनुपलब्धि होने में यह विरुद्ध सहचरोपलब्धि है। ऊपर बताये हुए तथा इसी प्रकार के अन्य हेतुओं को पह- चानने का एक सुगम उपाय यह है- -
(७३)
[तृतीय परिच्छेद
(१) मबसे पहले माध्य को देखो। माध्य यदि सद्भाव रूप
हो तो हेतु को विधिसाधक और अभावरूप हो तो निषेधसाधक
समझ लो।
(२) इमी प्रकार हेतु यदि मद्भाव रूप है तो उसे उपलब्धि
ममझो और निपेवरूप हो तो अनुपलब्धि ममझो।
(३) माध्य और हेतु-दोनों यदि सद्भावरूप हो या दोनों
अभावरूप हों तो हेतु को 'अविरुद्ध समझना चाहिए। दोनों में
मे कोई एक मद्भावरूप हो और एक प्रभाव रूप हो तो 'विरुद्ध'
मममना चाहिए।
(४) अन्न में माध्य और हेतु का परस्पर कैसा सम्बन्ध है,
इमका विचार कगे। हेतु यदिसाध्य से उत्पन्न होना है तो कार्य होगा,
माध्य को उत्पन्न करता है तो कारण होगा, पूर्वभाषी है तो पूर्वचर
होगा, बाद में होता है तो उत्तरचर होगा। अगर दोनों में तादात्म्य
सम्बन्ध है तो व्याप्य या व्यापक होगा। दोनों साथ-साथ रहते हों
तो महचर होगा।
चतुर्थ परिच्छेद श्रागम प्रमाण का विवेचन श्रागम का स्वरूप आप्तवचनादाविर्भतमर्थसंवेदनमागमः ॥ १ ॥ उपचारादाप्तवचनं च ।। २।। अर्थ-आप्त के वचन में होने वाले पदार्थ के नान को आगम कहते हैं। उपचार से प्राप्त का वचन भी आगम कहलाता है ।। विवेचन-श्राप्त का स्वरूप अगले सूत्र में बनाया जायगा। प्रामाणिक पुरुष को प्राप्त कहते हैं । प्राप्त के शब्दों को सुनकर श्रोता को पदार्थ का ज्ञान होता है। उसी ज्ञान को आगम कहते हैं। श्रागम के इस लक्षण से ज्ञात होता है कि आगम-ज्ञान में प्राप्त कारण होते हैं। अत. शब्द कारण हैं और ज्ञान कार्य है। कारण में कार्य का उपचार करने से प्राप्त के वचन भी आगम कहलाते हैं। प्रागम का उदाहरण समस्त्यत्र प्रदेशे रत्ननिधानं, सन्ति रत्नसानुप्रभृतयः ॥३॥ अर्ष-इस जगह रत्नों का खजाना है, मेरु पर्वत आदि हैं।
(७५) [चतुर्थ परिच्छेद विवेचन-पागम के यहाँ दो उदाहरण हैं। इन वाक्यों को मुनने में होने वाला मान आगम कहलाता है, और ये दोनो वाक्य उपचार में पागम हैं। प्रागे प्राप्त के दो भेद हैं। प्रागे प्राप्त के दो भेद बतायेगे, उन्ही को अपना यहाँ दो उदाहरण बताये हैं ! भाप्त का स्वरूप अभिधेयं वस्तु यथावस्थितं यो जानीते, यथाज्ञानं चाभिधत्ते स प्राप्तः ॥ ४ ॥ तस्य हि वचनमविसंवादि भवति ॥ ५ ॥ भयं-कही जाने वाली वस्तु को जो ठीक-ठीक जानता हो और जैमी जानना हो वैमी ही कहता हो, वह प्राप्त है । उम यथार्थज्ञाना और यथार्थ वक्ता का कथन ही विसंवाद गहित होता है। विवेचन-मिल्या भाषणा के दो कारण होते हैं--(१) अज्ञान और (२) कपाय । मनुष्य किमी वस्तु का स्वरूप ठीक-ठीक नहीं जानता हो फिर भी उस वस्तु का कथन करे नो उसका कथन मिथ्या होगा । अथवा वस्तु का म्वरूप ठीक-ठीक जानकर भी कोई कपाय के कारण अन्यथा भापण करता है । उसका भी कथन मिथ्या होता है। जिम पुरुष में यह दोनों कारण न हो अर्थात् जिसे वस्तु का मम्यग्ज्ञान हो और अपने ज्ञान के अनुसार ही भाषण करता हो, उसका कथन मिथ्या नहीं हो मकता । ऐसे ही पुरुप को आप्त कहते है।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक]
(७६)
प्राप्त के भेद
स च द्वेधा-लौकिको लोकोत्तरश्च ॥ ६ ॥
लौकिको जनकादिः, लोकोत्तरस्तु तीर्थकरादिः॥ ७ ॥
अर्थ-श्राप्त दो प्रकार के होते हैं-(१) लौकिक प्राप्त और
(२) लोकोत्तर आप्त ।
पिता आदि लौकिक प्राप्त है और तीर्थंकर आदि, लोकोत्तर
प्राप्त हैं।
के
विवेचन-लोकव्यवहार में पिता माता आदि प्रामाणिक
होते हैं अत. वे लौकिक प्राप्त हैं और मोक्षमार्ग के उपदेश में तीर्थंकर,
गणधर आदि प्रामाणिक होते हैं इमलिए वे लोकोत्तर प्राप्त हैं।
मीमामक लोग सर्वज्ञ नही मानते है। उनके मत
अनुमार
कोई भी पुरुष, कभी भी सर्वज्ञ नही हो सकता । उनसे कोई कहे कि जव
सर्वज्ञ नहीं हो सकता तो आपके आगम भी सर्वजोक्त नहीं हैं। फिर
उन्हे प्रमाण कैसे माना जाय ? तब वे कहते हैं-"वेद हमाग मूल
आगम है और वह न सर्वजोक्त है न असर्वज्ञोक्त है। वह किमी का
उपदेश नहीं है, किसी ने उम बनाया नहीं है। वह अनादिकाल से यों
ही चला आ रहा है। इसी कारण वह प्रमाण है।" मीसासको के
इस मत का विरोध करते हुए यहाँ यह प्रतिपादन किया गया है कि
आप्तोक्त होने से ही कोई वचन प्रमाण हो सकता है, अन्यथा नहीं।
वचन का लक्षण
वर्णपदवाक्यात्मकं वचनम् ॥ ८॥
(७७)
[चतुथे परिच्छेद
है
अकारादिः पौद्गलिको वर्णः ॥६॥
वर्णानामन्योन्यापेक्षाणां निरपेक्षा संहतिः पदम् ,
पदानां तु वाक्यम् ॥ १० ॥
अपं-वर्ण, पद और वाक्य रूप वचन कहलाता है।
भाषावर्गणा से बने हुए अ आदि वर्ण कहलाते हैं ।
परम्पर मापेन वर्गों के निरपेन समूह को पट कहते हैं और
परम्पर मापेन पटो के निरपेन ममूह को वाक्य कहते हैं ।
विवेचन-वर्ण, पद और वाका ये मिलकर वचन कहलाते
| अ. श्रा, श्रादि म्वगे ओ तथा क, ख . आदि व्यजनों को वर्ण
कहते हैं। यह वर्ण भापावर्गणा नामक पुद्गल द्रव्य में वनते है ।
इन चरणों में पारम्परिक मेल में पट बनता है और पदों के मेल से
वाक्य बनना है।
यर्गा का मेल जब ऐमा होता है कि उसमें किमी और वर्ण
को गिलाने की आवश्यकता न रहे और मिले हुए वही वर्ण किसी
अर्थ का बोध कग तभी उन्हें पद कह सकते हैं, निरर्थक वर्ण-समूह
को पद नहीं कह मकन । जैसे 'महावीर' यह वर्ण समूह पन है,क्योकि
इममें वर्षमान भगवान के अर्थ या बोध होता है और इम अर्थबोध
के लिये और किसी भी वर्ग की आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार
पढों का वही समूह वाक्य कहलाता है, जो याग्य अर्थ का बोध कराता
हो और श्रर्य के बांध के लिए अन्य किमी पद की अपेक्षा न
रखता हो।
शब्द अर्थवोचक कैसे है?
स्वाभाविकसामर्थ्यसमयाभ्यामर्थवोधनिवन्धनंशब्दः॥११॥
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] -(७८) अर्य-स्वाभाविक शक्ति और संकेत के द्वारा शब्द, पदार्थ का वोधक होता है। विवेचन-शब्द को सुनकर उममे पदार्थ का वोध क्या होता है ? इम प्रश्न का यहाँ समाधान किया गया है। शब्द के पदार्थ का ज्ञान होने के दो कारण हैं-(१) शन की स्वाभाविक शक्ति और (२) संकेत । (१) स्वाभाविक शक्ति जैमे ज्ञान मे ज्ञेग पदार्थ का बोध कगने की स्वाभाविक शक्ति है, अथवा सूर्य में पदार्थों को प्रकाशित कर देने की स्वाभाविक शक्ति है, उसी प्रकार शक में अभिधेय पदार्थ का बोध करा देने की शक्ति है ! इस शक्ति को योग्यता अथवा वाच्य वाचक शक्ति भी कहते हैं। सकंत-प्रत्येक शब्द में, प्रत्येक पदार्थ का बोध कराने की शक्ति विद्यमान है। किन्तु एक ही शब्द यदि संसार में समस्त पदार्थों का वाचक बन जायगा तो लोक-व्यवहार नहीं चलेगा। लोक-व्य- वहार के लिए यह आवश्यक है कि अमुक शब्द अमुक अर्थ का ही वाचक हो। ऐसी नियतता लाने के लिये संकेत की आवश्यकता है। इस प्रकार ग्वाभाविक मामर्थ्य और संकेत के द्वारा शब्द मे पदार्थ का ज्ञान होता है। अर्थप्रकाशकत्वमस्य स्वाभाविक प्रदीपवत्, यथार्था- यथार्थत्वे पुनः पुरुषगुणदोषावनुसरतः ॥ १२ ॥ मर्ग-जैसे दीपक स्वभाव से पदार्थ को प्रकाशित करता है उसी प्रकार शब्द स्वभाव से पदार्थ को प्रकाशित करता है, किन्तु सत्यता और असत्यता पुरुष गुण-दोष पर निर्भर है। के (७६) [चतुर्थ परिच्छेद विवेचन-दीपक के समीप अच्छा या बुग जो भी पदार्थ होगा उसी को दीपक प्रकाशित करेगा उमी प्रकार शब्द वक्ता द्वारा प्रयोग किये जाने पर पदार्थ का बोध करा देगा, चाहे वह पदार्थ वा- स्तविक हो या अवास्तविक हो, काल्पनिक हो या मत्य हो। तात्पर्य यह है कि शब्द का कार्य पदार्थ का बोध कराना है, उसमें मचाई और झुठाई के वक्ता गुणों और दोपों पर निर्भर है। वक्ता यदि गुणवान् होगा तो शालिक मान सत्य होगा, वक्ता यदि दोपी होगा तो शाब्दिक ज्ञान मिथ्या होगा। शम्द की प्रवृत्ति मवत्रायं चनिर्विधिप्रतिरोधाभ्यां स्वार्थमभिदधानः सप्त- भंगीमनुगच्छति ॥ १३ ॥ भर्ग-शत, मर्वत्र विधि और निषेध के द्वारा अपने वाच्य- अर्थ का प्रतिपादन करता हुआ सप्तभगी के रूप में प्रवृत्त होता है। ससभगी का स्वरूप एकत्र वस्तुन्येककधर्मपर्यनुयोगवशादविरोधेन व्यस्तयोः समस्तयोश्च विधिनिषेधयोः कल्पनया स्यात्काराङ्कितः सप्तधा- वाक्प्रयोगः सप्तभङ्गी ॥ १४ ॥ वर्ष -क ही वस्तु में, किसी एक धर्म (गुण) सम्बन्धी प्रश्न के अनुरोध से सात प्रकार के वचन-प्रयोग को सप्तभंगी कहते हैं। वह वचन 'म्यात्' पद से युक्त होता है और उसमें कहीं विधि की विवक्षा होती है, कहीं निषेध की विवक्षा होता है और कही दोनों की विवत्ता होती है।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक]
(८०)
१
१
विवेचन-प्रत्येक पदार्थ में अनन्त धर्म पाये जाते हैं, अथवा
यो कहें कि अनन्न धर्मों का पिड ही पदार्थ कहलाता है। इन अनन्न
धर्मों में से किसी एक धर्म को लेकर कोई पूछे कि, अमुक धर्म मत्
है ? या अमत् है ? या सत् और अमत उभय रूप है ? इत्यादि । तो
इन प्रश्नो के अनुसार उस एक धर्म के विषय में सात प्रकार के उत्तर
देने पडेंगे । प्रत्येक उत्तर के साथ 'स्यात्' (कथंचित् ) शब्द जुडा
होगा। कोई उत्तर विधि रूप होगा-अर्थात कोई उत्तर हाँ मे होगा
को नहीं मे होगा। किन्तु विधि और निपेध मे विरोध नहीं होना
चाहिये । इस प्रकार सात प्रकार के उत्तर को-अर्थात् वचन-प्रयोगको
सप्तभंगी कहते हैं।
सप्तभंगी से हमें यह ज्ञान होजाना है कि पदार्थ में धर्म किस
प्रकार से रहते हैं।
सात भंग
तद्यथा-स्यादस्त्येव सर्वमिति विधिकल्पनया प्रथमो
भङ्गः॥ १५ ॥
स्यानास्त्येव सर्वमिति निषेधकल्पनया द्वितीयो भङ्गः॥१६॥
स्यादस्त्येव स्यानास्त्येव क्रमतो विधिनिषेधकल्पनया
तृतीयः ॥ १७ ॥
स्यादवक्तव्यमेवेतियुगपद्विधिनिषेधकल्पनया चतुर्थः (१८
स्थादस्त्येव स्यादवक्त मेवेति विधि कल्पनया युगपद्
विधिनिषेधकल्पनया च पञ्चमः ॥ १६ ॥
स्यानास्त्येव स्यादवक्तमेवेति निषेधकल्पनया युगपद्
विधिनिषेधकल्पनया च षष्ठः ॥ २० ॥
(८१) [चतुर्थ परिच्छेद से स्यादस्त्येव स्यानास्त्येव स्यादवक्तव्यमेवेति क्रमतो विधिनिषेधकल्पनया युगपद् विधिनिषेधकल्पनया च सप्तम इति ॥ २१ ॥ १ अर्थ-स्यात् ( कथञ्चित्) सव पदार्थ हैं, इस प्रकार विधि की कल्पना से पहला भङ्ग होता है। २ कथचित् मब पदार्थ नहीं हैं, इस प्रकार निषेध की कल्पना दूमरा भग होना है। ३ कथंचित् सत्र पदार्थ हैं, कथंचित नहीं हैं, इस प्रकार क्रम से विधि और निषेध की कल्पना से तीसरा भग होता है ।। ४ कथंचित् मब पदार्थ अवक्तव्य हैं, इस प्रकार एक साथ विधि- निषेध की कल्पना से चौथा भङ्ग होता हे ॥ ५ कथंचित् सब पदार्थ हैं और कथचित् अवक्तव्य हैं, इस प्रकार विधि की कल्पना से और एक साथ विवि-निषेध की कल्पनासे पाँचवॉ भङ्ग होता है ।। ६ कथंचित् सब पदार्थ नहीं है और कथंचित् अवक्तव्य हैं, इस प्रकार निपेध की कल्पना से और एक साथ विधि-निषेध की कल्पना से छट्ठा भङ्ग होता है। ७ कथंचित् सब पदार्थ हैं, कथंचित् नहीं हैं, कथंचित् अवक्तव्य हैं, इस प्रकार क्रम से विधि-निषेध की कल्पना से और युगपद् विधि- निपेध की कल्पना से सातवाँ भङ्ग होता है। विवेचन-सप्तभंगी के स्वरूप में बताया गया है कि एक ही प्रमाण-नय तत्त्वालोक] (८२) धर्म के विषय में मात प्रकार के वचन-प्रयोग को सप्तभंगी कहते हैं। यहाँ सात प्रकार का वचन-प्रयोग करके सप्तभंग को ही स्पष्ट किया गया है। घट पदार्थ के एक अस्तित्व धर्म को लेकर सप्तभंगी इस प्रकार बनती है- - (१) स्यात् अस्ति घटः -(२) स्यात् नास्ति घटः (३) ग्यात् अस्ति नास्ति घट (४) स्यात् अवक्तव्यो घटः (५) स्यात् अस्ति अव- तव्यो घटः (६) स्यात् नास्ति-अवक्तव्यो घटः (७) स्यात् अस्ति-नास्ति अवक्तव्यो घट । यहाँ अस्तित्व धर्म को लेकर कही विधि, कही निषेध और कहीं विधि-निषेध दोनो क्रम से और कही दोनों एक साथ, घट में बताये गये हैं । यहाँ यह प्रश्न होता है कि घट यदि है तो नही कैसे है ? घट नहीं है तो है कैसे ? इम विरोध को दूर करने के लिये ही 'स्यात्' (कथचिन ) शब्द सबके माय जोडा गया है । 'स्यात्' का अर्थ है. किसी अपेक्षा से । जैसे- (१) स्यात् अस्ति घट:-घट कथंचित् है-अर्थात् स्वद्रव्य, म्वतंत्र, स्वकाल और स्व-भाव की अपेक्षा से घट है। (२) स्यात्'नास्ति घट-घट कथंचित् नहीं है-अर्थात् पर- द्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परभाव से घट नहीं है। (३) स्यादस्ति नास्ति घटः-घट कथचित् है, कथंचित नहीं है-अर्थात् घट में स्व द्रव्यादि से अस्तित्व और पर द्रव्यादि से नास्तित्व है। यहाँ क्रम से विधि और निषेध की विवक्षा की गई है। (४) स्यात् अवक्तव्यो घटः-घट कथंचित् अवक्तव्य है जब विधि और निषेध दोनों की एक साथ विवक्षा होती है तब दोनों को (८३) [चतुर्थ परिच्छेद एक माय बनाने वाला कोई शब्द न होने से घट को प्रवक्तव्य कहना पडा है। है (७) केवल विधि और एक माथ विधि-निषेध की विवक्षा करने से 'घट हैं और प्रवक्तव्य है। यह पाँचवाँ भंग बनता (8) केवल निषेध और एक माथ विधि-निषेध-दोनों की विवक्षा में 'घट नहीं है और अवक्तव्य है। यह छठा भग बनता है। (७) क्रम में विधि-निषेध-दोनो की और एक मात्र विधि- निषेध-दोनों की विवना में घट है, नहीं है, और अवक्तव्य है। यह मातवा भंग बनता है। प्रथम भंग के एकान्त का निराकरण विधिप्रधान एव ध्वनिरिति न साधु ॥ २२ ॥ निपेधस्य तस्मादप्रतिपत्तिप्रसक्तः ॥ २३ ॥ अप्राधान्ये व ध्वनिस्तमभिधत्ते इत्यप्यसारं ॥ २४ ॥ क्वचित् कदाचित् कथञ्चित्प्राधान्येनाप्रतिपन्नस्य तस्या- प्राधान्यानुपपत्तेः ॥ २५ ॥ अर्ग -शन्न प्रधानरूप से विधि को ही प्रतिपादन करता है यह कथन ठीक नहीं। क्योंकि शद से निषेध का ज्ञान नहीं हो सकेगा। शळ निषेय को अप्रधान रूप से ही प्रतिपादन करता है, यह कथन भी निस्सार है। .
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक
(४)
---
क्योकि जो वस्तु कही, कभी, किमी प्रकार प्रधान रूप में
नहीं जानी गई है वह अप्रधान रूप से नहीं जानी जा सकती ।।
विवेचन-सप्तभंगी का स्वरूप बतातं हार शब्द को विधि-
निषेध आदि का वाचक कहा गया है। यहाँ 'शद विधि काहीवाचक
है' इस एकान्त का खण्डन किया गया हैं।' इम खण्डन का प्रश्नोत्तर
रूप में ममझना सुगम होगा.-
एकान्तवादी-शब्द विधि का ही वाचक है, निषेध का
वाचक नहीं है।
-
अनेकान्तवानी-आपका कथन ठीक नहीं है। ऐसा मानन
मे तो निषेध का ज्ञान शब्द में होगा ही नहीं।
एकान्तनादी-शब्द से निपेध का ज्ञान प्रधान रूप में होता
है, प्रधान रूप में नहीं।
अनेकान्तवादी-जिस वस्तु को कभी कही प्रधानरूप में-
असली तौर पर नहीं जाना उसे अप्रधान रूप में जाना नहीं जा
सकता । अत निषेध यदि कभी कही प्रधान रूप से नहीं जाना गया
तोप्रधान रूप से भी वह नही जाना जा सकता। जोअमली केसरी
को नहीं जानता वह पंचाव कसरी को कैसे जानेगा? अतएव शब्द
को विधि का ही वाचक नही मानना चाहिए।
द्वितीय भंग के एकान्त का निराकरण
निषेधप्रधान एव शब्द इत्यपि प्रागुक्तन्यायादपा-
स्तम् ॥ २६ ॥
(५)
[ चतुर्थ परिच्छेद
भर्प-शन प्रधान का से निपेश का ही वाचक है, यह
एकान्त कयन भी पूक्ति न्याय में न्यएिटत हो गया।
चियेपन- गदि प्रधान रूप में निषेध काहीवाचकमाना
आय नो उममे विधि का ज्ञान कभी नहीं होगा। विधि अप्रधान रूप
में होगट ने मालूम होती है, यह फयन भी मिथ्या है, क्योंकि जिसे
प्रधान रूप में कभी कही नहींजाना उमे मे गौण रूप में भी नहीं जा
जान माने।
नृतीय भंग के एकांत का निराकरण
क्रमादुभयप्रधान एवायमित्यपि न साधीयः ।। २७॥
अम्य विधिनिषेधान्यतरप्रधानत्वानुभवस्याऽप्ययाध्य-
मानत्वात् ।। २८॥
घर दमाम में विधि-निषेध का (तीसरे भंग का) हो
प्रधान रूप ने बाचक है, "मा कहना भी ममीचीन नहीं है।
कोकिन अऊन विधि का ओर अमले निपेध का प्रधान
मप में वाचक है, इस प्रकार होने वाला अनुभव मिथ्या नहीं है।
विवेचन-शद मिर्फ नीमरे भग का वाचक है. इम एकान्त
का यहाँ ग्यएटन किया गया है, क्योंकि शन्द तीसरे भंग की तरह
प्रथम और द्वितीय का भी वाचक है, सा अनुभव होता है।
चतुर्थ भंग के एकान्त का निराकरण
युगपद्विध्यात्मनोऽर्थस्याऽवाचक एवासाविति च न
चतुरस्रम् ॥ २६ ॥
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (८६) तस्यावक्तव्यशब्देनाप्यवाच्यत्वप्रसङ्गात् ॥ ३० ॥ अर्थ -शब्द एक साथ विधि-निषेध रूप पदार्थ का अवाचक ही है, ऐसा कहना उचित नहीं है । क्योंकि ऐसा गनने से पदार्थ अवक्तव्य शब्द से भी वक्तव्य नहीं होगा। विवेचन-शब्द चतुर्थ अंग अर्थात् प्रवक्तता को ही प्रनि. पादन करता है, ऐसा मान लेने पर पदार्थ मर्वथा प्रवक्तव्य हो जायगा, फिर वह अवक्तव्य शब्द से भी नहीं कहा जा सकेगा। अत' केवल चतुर्थ भंग का वाचक शब्द नहीं माना जा सकता। पंचम भङ्ग के एकांत का निराकरण - विध्यात्मनोऽर्थस्य वाचकः सन्नुभयात्मनो युगपदवाचक एव स इत्येकान्तोपि न कान्तः ॥ ३१ ॥ निषेधात्मनः सह द्वयात्मनश्वार्थस्य वाचकत्वावाचका- भ्यामपि शब्दस्य प्रतीयमानत्वात् ॥ ३२ ॥ अस्य-शब्द विधि रूप पदार्थ का वाचक होता हुआ उभयात्मक-विधि निषेध रूप पदार्थ का युगपत् अवाचक ही है, अर्थात् पंचम भंग का ही वाचक है; ऐसा एकान्त मानना ठीक नहीं है । क्योंकि शब्द निषेध रूप पदार्थ का वाचक और युगपत् द्वयात्मक (विधि-निषेध रूप) पदार्थ का अवाचक है,ऐसी भी प्रतीति होती है।
(७) [चतुर्थ परिच्छेद विवेचन-शन केवल पचम भंग का ही वाचक है, ऐसा माना मिथ्या है क्या के वा न्यात नाम्ति श्रवक्तव्य रूप छठे भन कावाजर प्रतीत होता है। पाए भन के एकांत का निराकरण निषेधात्मनोऽर्थस्यैव वाचकः सन्नुभयात्मनो युगपद- वाचक एवायमित्यवधारणं न रमणीयम् ॥ ३३ ॥ इतरथाऽपि संवेदनात् ॥ ३४॥ गर्थ- पिय रूप पदार्थ का वाचक होता हुआ विधि- निषेध रूप पदार्थ का युगपत् अवाचक ही है, ऐसा एकान्त निश्चय करना ठीक नहीं है। स्थाकि अन्य प्रकार में भी शब्द पदार्थ का वाचक मालूम नाना है। विचन- मिर्फ नास्ति वक्तव्यता रूप छठे भग का ही वाचा है ऐमा फान्न भी भिण्या है क्योकि शब्द प्रथम, द्वितीय प्रादि भद्गों का भी वाचक प्रतीत होता है। सातवें मन के एकांत का निराकरण क्रमाक्रमाम्यामुभयस्वभावस्य भावस्य वाचकश्वावा- चकच ध्वनिर्नान्यथेत्यपि मिथ्या ॥ ३५ ॥ विधिमात्रादिप्रधानतयाऽपि तस्य प्रसिद्धःप्रतीतिः॥३६॥ अर्प-शन्द क्रम मे उभयरूप और युगपत् उभयरूप पदार्थ प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (स) का वाचक और अवाचक है अर्थात् मातवे ही भग का वाचक है, यह एकान्त भी मिथ्या है। क्योंकि शब्द कंवल विधि आदि का भी वाचक है । विवेचन-शब्द क्रम से विधि निषेध रूप पदार्थ का वाचक और युगपत् विधि-निषेध रूप पदार्थ का अवाचक है, अर्थात् केवल सप्तम भङ्ग का ही वाचक है. यह एकान्त मान्यता भी मिण्या है,क्योंकि शब्द प्रथम, द्वितीय, तृतीय श्रादि भंगों का भी वाचक है। भग-संख्या पर शंका और समाधान एकत्र वस्तुनि विधीयमाननिपिध्यमानानन्तधर्माभ्युप- गमेनानन्तभंगीप्रसंगादसंगतैव सप्तभंगीति न चेतसि निधे- थम् ॥ ३७॥ विधिनिषेधप्रकारापेक्षया प्रतिपर्यायं वस्तुन्यनन्तानामपि सप्तभंगीनामेत्र सम्भवात् ।। ३८ ॥ अर्थ-जीव आदि प्रत्येक वस्तु में विधि रूप और निपेवरूप अनन्तधर्म स्वीकार किये हैं अनः अनन्नभंगी मानना चाहिए; सप्तभंगी मानना असगत है। ऐसा मन में नहीं सोचना चाहिये ।। क्योंकि विधि-निषेध के भेद से, एक धर्म को लेकर एक वस्तु में अनन्त सप्तभंगियाँ ही हो सकती हैं-अनन्तभंगी नही होसकती॥ विवेचन-शंकाकार का कथन यह है कि जैनो ने एक वस्तु मे अनन्त धर्म माने हैं अतः उन्हें सप्तभंगी के बदले अनन्तभंगी माननी चाहिए । इसका उत्तर यह दिया गया है कि एक वस्तु में अनन्त धर्म (८) [चतुर्थ परिच्छेद हैं और एक-एक धर्म को लेकर एक-एक सप्तभंगी ही बनती है इसलिए अनन्त धमों की अनन्त सप्तभंगियाँ होगी। और अनन्त मप्तभंगियाँ जैनों ने स्वीकार की हैं। भग सम्बन्धी अन्यान्य शका-समाधान प्रतिपर्यायं प्रतिपाद्यपर्यनुयोगानां सप्तानामेव संभवात् ॥३६॥ तेषामपि सप्तत्वं सप्तविधतजिज्ञासानियमात् ॥४०॥ तस्या अपि सप्तविधत्वं सप्तधैव तत्सन्देहसमुत्पादात् ॥४१॥ तस्यापि सप्तप्रकारत्वनियमः स्वगोचरवस्तुधर्माणां सप्त- विधत्वस्यैवोपपत्तेः ॥ ४२ ॥ अर्थ-भंग सान इस कारण होते हैं कि शिष्य के प्रश्न सात ही हो सकते हैं। सात प्रकार की जिज्ञासा (जानने की इच्छा) होती है अत. प्रश्न सान ही होते हैं। सात ही सन्देह होते हैं इसलिए जिज्ञासाएँ मान होती हैं ।। सन्देह के विषयभून अस्तित्व आदि वस्तु के धर्म सात प्रकार के होते हैं अतएव सन्देह भी मात ही होते हैं। विवेचन-वस्तु के एक धर्म की अपेक्षा सात ही भंग क्यो होते हैं ? न्यून या अधिक को नहीं होते ? इस शंका का समाधान करने के लिए यहाँ कारण-परम्परा बनाई है। सात भंग इसलिए होते हैं कि एक धर्म के विषय में शिष्य के प्रश्न सान ही हो सकते हैं। सात ?
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (६०) ही प्रश्न इसलिए हो सकते हैं कि उमे जिज्ञासाएँ सात ही हो सकती | जिज्ञासाएँ सात इमलिए होती हैं कि उसे सन्देह मात ही होते हैं। सन्देह सात इसलिए होते हैं कि सन्देह के विपयभूत अस्तित्व आदि प्रत्येक धर्म सात प्रकार के ही हो सकते हैं। सप्तभनी के दो भेद इयं सप्तभंगी प्रतिभंगं सकलादेशस्वभावा विकलादेश- स्वभावा च ॥४३॥ अर्थ-ग्रह सप्तभंगी प्रत्येक भंग में दो प्रकार की है-सकला- देश स्वभाव वाली और विकलादेश स्वभाव वाली। विवेचन--जो सप्तमगी प्रमाण के अधीन होती है वह सकला- देश स्वभाव वाली कहलाती है और जो नय के अधीन होनी है वह विकलादेश स्वभाव वाली होती है। सकलादेश का स्वरूप प्रमाणप्रतिपन्नानन्तधर्मात्मकवस्तुनः कालादिभिरभेद- वृत्तिप्राधान्यात् अभेदोपचारात् वा यौगपद्येन प्रतिपादकं वचः सकलादेशः। अर्थ-प्रमाण से जानी हुई अनन्त धर्मों वाली वस्तु को, काल आदि के द्वारा, अभेद की प्रधानता से अथवा अभेद का उपचार करके, एक साथ प्रतिपादन करने वाला वचन सकलादेश कहलाता है।
(६१) [ चतुथे परिच्छेद -- विवेचन-वन्तु में अनन्त धर्म हैं, यह बात प्रमाण से सिद्व है। अतएव किमी भी एक वस्तु का पूर्ण रूप से प्रतिपादन करने के लिए अनन्त शब्दों का प्रयोग करना चाहिए, क्योकि एक शब्द एक ही धर्म का प्रतिपादन कर सकता है। मगर ऐसा करने मे लोक-व्य- वहार नहीं चल मकना । अनाव हम एक शब्द का प्रयोग करने हैं। वह एक शब्द मुख्य रूप से एक धर्म का प्रतिपादन करता है, "और शेप बचे हा धों को उम एक धर्म मे अभिन्न मान लेते हैं । इम प्रकार एक शब्द से एक धर्म का प्रतिपादन हया और उमसे अभिन्न होने के कारगा शेप वर्मा का भी प्रतिपादन होगया। इस उपाय "क हो गन्द एक माथ अनन्न धर्मों का अर्थात सम्पूर्ण वस्तुका प्रति- पादक हो जाता है। इसी को मकलादेश कहते हैं। शन द्वारा मानान् रूप से प्रतिपानिधर्म से, शेप धर्मों का अभेद न श्रादि द्वारा होता है। काल ग्रादि पाठ हैं-(१) काल (२) श्रात्मरूप (३) अर्थ (2) सम्बन्ध (५) उपकार (8) गुणी-देश (७) ममर्ग () शट। मान लीजिये, हमे अस्तित्व धर्म में अन्य धर्मों का अभेट करना है तो वह हम प्रकार होगा-जीव में जिम काल में अस्तित्व है उमी काल में अन्य धर्म है अत. काल की अपेक्षा अस्तित्व धर्म में अन्य धमों का अमंद है। इमी प्रकार शेप मान की अपेक्षा भी अभेद ममझना चाहिये । इसीको अभेट की प्रधानता कहते है । द्रव्यार्थिक नय को मुख्य और पर्यायार्थिक नय को गोण करने से अभेद की प्रधानता होनी है । जब पर्यायार्थिक नय मुख्य और द्रव्यार्थिक नय गौण होता है तब अनन्त गुण वास्तव में अभिन्न नहीं हो सकते । श्रतण्व उन गुणों में अभेट का उपचार करना पडता है। इस प्रकार अभेद की प्रधानता और अभेद के उपचार से एक साथ अनन्त धर्मा- ।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (२) त्मक वस्तु का प्रतिपादन करने वाला वाक्य मकलादेश कहलाता the विकलादेश का स्वरूप तद्विपरीतस्तु विकलादेशः ॥ ४५ ॥ अर्थ-मकलादेश से विपरीत वाक्य विकलादेश कह- लाता है। विवेचन-नय के विषयभूत वस्तु-धर्म का काल आदि द्वाग भेद की प्रधानता अथवा भेद के उपचार से, क्रम से प्रतिपादन करने वाला वाक्य विकलादेश कहलाता है। मकलादेश में द्रव्यार्थिक नय की प्रधानता के कारण वस्तु के अनन्त धर्मों का अभेट किया जाना है, विकलादेश में पर्यायार्थिक नय को प्रधानता के कारण उन धर्मों का भेट किया जाता है। यहाँ भी कालादि पाठ के आधार पर ही भेद किया जाता है। पर्यायार्थिक नय कहता है-एक ही काल में, एक ही वस्तु में, नाना धर्मों की सत्ता स्वीकार की जायगी तो वस्तु भी नाना रूप ही होगी-एक ही नहीं । इसी प्रकार नाना गुणों सम्बन्धी आत्मरूप भिन्न-भिन्न ही हो सकता है-एक नहीं। इत्यादि । प्रमाण का प्रतिनियत विषय तद् द्विभेदमपि प्रमाणमात्मीयप्रतिबन्धकापगमविशेष- स्वरूपसामर्थ्यतः प्रतिनियतमर्थमवद्योतयति ॥ ४६॥ अर्थ-वह प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों प्रकार का प्रमाण, अपना अपना आवरण करने वाले कर्मों के क्षमोपशम रूप शक्ति मे नियत- नियत पदार्थ को प्रकाशित करना है।
[चतुर्थ परिच्छेद विवेचन-परोन ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से परोक्ष प्रमाण उत्पन्न होता है और प्रत्यक्ष ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से प्रत्यक्ष प्रमाण उत्पन्न होता है। हमीप्रकार घट-ज्ञानावरण कर्म का नयोपशम होने पर घट का ज्ञान होता है और पट-ज्ञानावरण कर्म का क्षयो- पशम होने पर पट का ज्ञान होता है। यही कारण है कि किमी ज्ञान में कंवल घट ही प्रतीत होता है और किमी में सिर्फ पट ही प्रतीत होता है। मारांश यह है कि जिम पदार्थ को जानने वाले ज्ञान के आवरण का नयोपशम होगा वही पदार्थ उम ज्ञान में प्रकाशित होगा । हम प्रकार क्षयोपशम रूप शक्ति ही नियत-नियत पदार्थों को प्रकाशित करने में कारण है। मतान्तर कापण्डन न तदुत्पत्तितदाकारताभ्यां तयोः पार्थक्येन सामस्त्येन च व्यभिचारोपलम्भात् ॥ ४७ ।। अर्थ-तदुत्पत्ति और तदाकारना से प्रतिनियत पदार्थ को जानने की व्यवस्था नही होमकती, क्योकि अकेली तदुत्पत्ति मे, अकेली तदाकारना में और तदुत्पत्ति-तनाकारता दोनो में व्यभिचार पाया जाता है। विवेचन-ज्ञान का पदार्थ से उत्पन्न होना तदुत्पत्ति है और मान का पदार्थ के आकार का होना तदाकारना है। बौद्ध इन दोनो से प्रतिनियन पदार्थ का ज्ञान होना मानते हैं। उनका कथन है कि जो ज्ञान जिन पदार्थ से उत्पन्न होना है और जिस पदार्थ के आकार का होना है, वह ज्ञान उमी पदार्थ गे जानता है। इस प्रकार नदुत्पत्ति और तदाकारता से ही ज्ञान नियन पट आदि को जानता है, क्षयोप- प्रमाण-नय-तत्त्वालोक शम रूप शक्ति से नहीं । बौद्धो के इस मत का यहाँ खण्डन किया गया है। चौद्धो की मान्यता के अनुमार पूर्व क्षण, उत्तर क्षण को उत्पन्न करता है और उत्तर क्षण, पूर्व क्षण के आकार का ही होता है। इस मान्यता के अनुमार घट के प्रथम नए मे अन्तिम क्षण उत्पन्न होता है अतएव वहाँ नदुत्पत्ति होने पर भी अन्तिम क्षण,प्रथम क्षण को नही जानना यह तदुत्पत्ति मे व्यभिचार है। इसी प्रकार एक स्तम्भ समान आकार वाले दूसरे स्तम्भ को नहीं जानता यह नढाकारता मे व्यभिचार है। जल में प्रतिविम्बिन होने वाला चन्द्रमा, पाक म के चन्द्रमा में उत्पन्न हुआ और उमी आकार का भी है, अत वहाँ नदु- त्पत्ति और तदाकारता दोनो हैं फिर भी जल-चन्द्र, आकाश-चन्द्र को नहीं जानता । यह तदुत्पत्ति और तदाकारता दोनों में व्यभिचार है। यदि यह कहो कि यह सब जड़ पदार्थ हैं, इसलिए नही जानते तो पूर्वकालीन घट-जान से उत्तरकालीन घट-ज्ञान उत्पन्न होता है और वह तदाकार भी है और ज्ञान-रूप भी है, फिर भी वह उत्तर- कालीन घट ज्ञान पूर्वकालीन घट जान को नहीं जानता (घट को ही जानता है ), अतएव ज्ञानरूपता होने पर भी तदुत्पत्ति और तदा- कारता में व्यभिचार आता ow इससे यह सिद्ध हुआ कि तदुत्पत्ति और तदाकारता अलग- अलग या मिलकर भी प्रतिनियत पदार्थ के ज्ञान मे कारण नहीं है, कितु ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से ही यह व्यवस्था होती है।
पंचम परिच्छेद प्रमाण के विषय का निरूपण प्रमाण का विषय तस्य विपयः सामान्यविशेपाद्यनेकान्तात्मकंवस्तु॥१॥ अर्य-मामान्य, विशेष श्रादि अनेक धर्मों वाली वस्तु प्रमाण का विषय है। विरेचन-मामान्य, विशेप आदि अनेक धर्मों का समूह ही वन्तु है। अनेक पदार्थों में एकमो प्रतीति उत्पन्न करने वाला और उन्हें एक ही शब्द का वाच्य बनाने वाला धर्म सामान्य कहलाता है। जैन अनेक गायों में यह भी गौ है, यह भी गौ है', इस प्रकार का ज्ञान और न प्रयोग कराने वाला 'गोत्व धर्म सामान्य है। इससे विप- गेत एक पदार्थ में दूसरे पदार्थ मे भेद कराने वाला धर्म विशेप कह- लाता है. जैसे उन्हीं अनेक गायों में नीलापन, ललाई, सफेदी आदि। मामान्य और विशेष जैसे वस्तु के स्वभाव हैं उसी प्रकार और भी अनेक धर्म उमके स्वभाव हैं। ऐसी अनेक स्वभाव वाली वस्तु ही प्रमाण का विषय है। सामान्य-विशेपरूपता का समर्थन अनुगतविशिष्टाकारप्रतीतिविपयत्वाद, प्राचीनोत्तरा-
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक]
कारपरित्यागोपादानावस्थानस्वरूपपरिणत्यार्थक्रियासामर्थ्य-
घटनाच ॥२॥
अर्थ-सामान्य विशेष रूप पदार्थ प्रमाण का विषय है, क्यों-
कि वह अनुगत प्रनीति (सहश ज्ञान ) और विशिष्टाकार प्रतीति
( भेद-ज्ञान ) का विषय होता है । दूसरा हेतु-क्योकि पूर्व पर्याय के
विनाश रूप, उत्तर पर्याय के उत्पाद रूप और दोनों पर्यायो मे अव-
स्थिति रूप परिणति से अर्थक्रिया की शक्ति देखी जाती है।
विवेचन-जिन पदार्थों में एक दृष्टि से हमें सहशता-ममा-
नता की प्रतीति होती है उन्ही पदार्थों में दुमरी दृष्टि से विमहशत
विशेष की प्रनीति भी होने लगती है। दृष्टि में भेद होने पर भी जब
तक पदार्थ में सहशता और विसदृशता न हो तब तक उनकी प्रतीति
नही हो सकती । इममे यह सिद्ध है कि पदार्थ में सहशता की प्रतीति
उत्पन्न करने वाला सामान्य है और विसदृशता की प्रतीति उत्पन्न
करने वाला विशेष धर्म भी है।
इसके अतिरिक्त पदार्थ पर्याय रूप से उत्पन्न होता है, नष्ट
होता है, फिर भी द्रव्य रूप में अपनी स्थिति कायम रखता है। इस प्रकार
उत्पाद व्यय और ध्रौव्य मय होकर ही वह अपनी क्रिया करता है।
यहाँ उत्पाद-व्यय पदार्थ की विशेषरूपता सद्ध करते हैं और धौव्य
सामान्य रूपता सिद्ध करता है।
इन दोनों हेतुओं मे यह स्पष्ट होजाता है कि मामान्य और
विशेष दोनो ही वस्तु के धर्म हैं।
सामान्य का निरूपण
सामान्यं द्विप्रकार-तिर्यक्सामान्यमूर्खतासामान्यश्च ॥३॥
-
(६७)
[पंचम परिच्छेद
प्रतिव्यक्ति तुल्या परिणतिस्तिर्यक्सामान्यं, शवल-
शावलेयादिपिण्डेषु गोत्वं यथा ॥४॥
पूर्वापरपरिणामसाधारणं द्रव्यमूलवासामान्यं, कटक-
कंकणाद्यनुगामिकाञ्चनवत् ।। ५ ॥
अर्थ-सामान्य दो प्रकार का है-तिर्यक् सामान्य और
ऊर्ध्वता सामान्य ॥
प्रत्येक व्यक्ति में समान परिणाम को तिर्यक् सामान्य कहते हैं,
जैसे-चितकबरी, श्याम, लाल आदि गायों मे 'गोत्व' तिर्यक्
मामान्य है।
पूर्व पर्याय और उत्तर पर्याय में ममान रूप से रहने वाला
दव्य ऊर्ध्वतासामान्य कहलाता है, जैसे-कडे, कंकण आदि पर्यायो
में समान रहने वाला सुवर्ण द्रव्य ऊर्ध्वता सामान्य है ।।
विवेचन-तिर्यक् सामान्य और ऊर्ध्वता सामान्य के उदाहरणों
को देखने से विदित होगा कि ध्यान-पूर्वक एक काल मे अनेक व्य-
क्तियो में पाई जाने वाली ममानता तिर्यक सामान्य है और अनेक
काला में एक ही व्यक्ति में पाई जाने वाली समानता ऊर्ध्वतासामान्य
है। दोनों सामान्यों के स्वरूप मे यही भेद है।
-
--
विशेष का निरूपण
विशेषोऽपि द्विरूपो-गुणः पर्यायश्च ॥ ६ ॥
गुणः सहभावी धर्मो, यथा-आत्मनि विज्ञानव्यक्ति-
शक्त्यादयः ॥ ७॥
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक (६८) पर्यायस्तु क्रमभावी, यथा-तत्रैव सुखदुःखादि ॥ ८ ॥ अर्थ-विशेष भी दो प्रकार का है-गुण और पर्याय || महभावी अर्थात् मदा साथ रहने वाले धर्म को गुण कहते हैं। जैसे-वर्तमान में विद्यमान कोई ज्ञान और भावी ज्ञान रूप परिणाम को योग्यता। एक द्रव्य में क्रम से होने वाले परिणाम को पर्याय कहते हैं, जैसे आत्मा में सुख-दुख आदि ।। विवेचन-सदैव द्रव्य के माथ रहने वाले धर्मों को गुण कहते है। जैसे आत्मा मे ज्ञान और दर्शन सदा रहते हैं, इनका कभी विनाश नहीं होता । अतएव यह आत्मा के गुण हैं। रूप, रस, गंध स्पर्श मदेव पुद्गल के साथ रहते हैं-पुद्गल से एक क्षण भर के लिए भी कभी न्यारे नहीं होते, अत रूप आदि पुद्गगल गुण दव्य की भाँति अनादि अनन्त होते हैं। पर्याय इससे विपरीत है । वह उत्पन्न होती रहती है और नष्ट भी होती रहती है। प्रात्मा जव मनुष्य-भव का त्याग कर देव-भव मे जाती है तब मनुष्य पर्याय का विनाश होजाता है और देव पर्याय की उत्पत्ति हो जाती है । एक वस्तु की एक पर्याय का नाश होने पर उमके स्थान पर दूसरी पर्याय उत्पन्न होती है अतएव पर्याय को क्रम- भाषी कहा है। के हैं । गुण m षष्ठ परिच्छेद प्रमाण के फल का निरूपण प्रमाण के फल की व्याख्या यत्प्रमाणेन प्रसाध्यते तदस्य फलम् ॥ १॥ -प्रमाण के द्वारा जो साधा जाय-निष्पन्न किया जाय, वह प्रमाण का फल है। फल के भेद तद् द्विविधम्-आनन्तर्येण पारम्पर्येण च ।। २ ॥ अर्थ-फल दो प्रकार का है-अनन्तर (माक्षात् ) फल, और परम्पग फल (परोक्ष फल) फल-निर्णय तत्रानन्तर्येण सर्वप्रमाणानामज्ञाननिवृत्तिः फलम् ॥३॥ पारम्पर्येण केवलज्ञानस्य तावत्फलमौदासीन्यम् ॥४॥ शेषप्रमाणानां पुनरुपादानहानोपेक्षाबुद्धयः ॥५॥ अर्थ-अज्ञान की निवृत्ति होना सब प्रमाणो का साक्षात् फल है।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१००) केवलज्ञान का परम्परा फल उदासीनता है।। शेप प्रमाणो का परम्पराफल ग्रहण करने की बुद्धि, त्याग- बुद्धि और उपेक्षा-बुद्धि होना है ।। विवेचन-प्रमाण के द्वारा किसी पदार्थ को जानने के बाद ही अज्ञान की निवृत्ति हो जाती है वह अनन्तर फल या साक्षात् फल है। मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, प्रत्यक्ष, परोक्ष आदि सभी जानो का साक्षात फल अज्ञान का हट जाना ही है। अज्ञान-निवृत्ति रूप साक्षान् फल के फल को परम्परा फल कहते हैं क्योंकि यह अज्ञाननिवृत्ति से उत्पन्न होता है । परम्पग फल सब ज्ञानो का समान नहीं है। केवली भगवान केवल ज्ञान से सब पदाथों को जानते हैं, पर न तो उन्हें क्रिमी पदार्थ को ग्रहण करने की बुद्धि होती है, न किमी पदार्थ को त्यागने की ही। वीनराग होने के कारण मभी पदार्थों पर उनका उदासीनता का भाव रहता है । अतएच केवलज्ञान का परम्परा फल उदासीनता ही है। केवलज्ञान के अतिरिक्त शेप सांगवहारिक प्रत्यक्ष, विकल- पारमार्थिक प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रमाणो का परम्परा फल समान है। ग्रहण करने का भाव, त्याज्य पदार्थों को त्यागने का भाव और उपेक्षणीय पदार्थों पर उपेक्षा करने का भाव, होना इन प्रमाणो का परम्परा फल है। ग्राह्य पदार्थों को प्रमाण और फल का भेदाभेद . तत्प्रमाणतः स्याद्भिन्नमभिन्न च, प्रमाणफलत्वान्यथा- नुपपचेः॥६॥ Hom- (१.१) [ पष्ठ परिच्छेद --- - मर्थ-प्रमाण का फल प्रमाण मे कथंचित भिन्न है, कथंचित अभिन्न है, अन्यथा प्रमाण-फलपन नहीं बन सकता। विवेचन-प्रमाण से प्रमाण का फल मर्वथा भिन्न माना जाय नो दोप पाता है और सर्वथा अभिन्न माना नाय तब भी दोप आता है. इसलिए कथंचित् भिन्न-भिन्न मानना ही उचित है। फल. प्रमाण से मर्वथा भिन्न माना जाय तो दोनों में कुछ भी सम्बन्ध न होगा, फिर 'हम प्रमाण का यह पल है ऐसीव्यवस्था नहीं होगी और मर्वथा अभिन्न माना जाय तो दोनो एक ही वस्तु हो जाग-प्रमाण और फल अलग-अलग दो वस्तुएँ सिद्ध न हो सकेंगी। दोप परिहार उपाठानबुद्धयादिना प्रमाणाद् भिन्नेन व्यवहितफलेन हतोयभिचार इति न विभावनीयम् ॥ ७ ॥ तस्यैकग्रमातृतादात्म्येन प्रमाणादभेदव्यवस्थितः॥८॥ प्रमाणतया परिणतस्यवात्मनः फलतया परिणति- प्रतीतः ॥ ६ ॥ यः प्रमिमीते स एवोपादत्ते परित्यजत्युपेक्षते चेति सर्वसंव्यवहारिभिरस्खलितमनुभवात् ॥ १० ॥ इतरथा स्वपरयोः प्रमाणफलव्यवस्थाविप्लवः प्रस- ज्येत ॥११॥ अर्ष-उपादान बुद्धि आदि प्रमाण से सर्वथा भिन्न परम्परा
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक]
(१०२)
फल से 'प्रमाणफलत्वान्यथानुपपत्ति' रूप हेतु में व्यभिचार आता है,
ऐसा नहीं सोचना चाहिए ।
क्योंकि परम्परा फल भी प्रमाता के साथ तादात्म्य सम्बन्ध
होने के कारण प्रमाण से अभिन्न है ।।
क्योंकि प्रमाण रूप से परिणत आत्मा का ही फल रूप से
परिणमन होना, अनुभव सिद्ध है ।
जो जानता है वही वस्तु को ग्रहण करता है, वही त्यागता
है, वही उपेक्षा करता है, ऐसा मभी व्यवहार-कुशल लोगो को अनु-
भव होता है।
यदि ऐमा न माना जाय तो स्व और पर के प्रमाण के फल
की व्यवस्था नष्ट हो जायगी।
विवेचन-प्रमाण का फल, प्रमाण से कथंचित् भिन्न-भिन्न
है, क्योकि वह प्रमाण का फल है। जो प्रमाण से भिन्न-भिन्न नहीं
होता वह प्रमाण का फल नहीं होता, जैसे घट आदि । इस प्रकार के
अनुमान-प्रयोग मे दूमरों ने प्रमाण के परम्परा-फल से व्यभिचार
दिया। उन्होने कहा-'परम्परा फन भिन्न-भिन्न नहीं है फिर भी
वह प्रमाण का फल है, अतः आपका हेतु सदोष है।' इमका उत्तर यहाँ
यह दिया गया है कि परम्परा फल भी सर्वथा भिन्न नहीं है किन्तु कथं-
चित् भिन्न-अभिन्न है । अतएव हमारा हेतु सदोष नहीं है।
शका-उपादान-बुद्धि आदि परम्परा फल अभिन्न कैसे है ?
समाधान-एक प्रमाता में प्रमाण और परम्परा फल का
तादात्म्य होने से।
(१०३) [ पष्ठ परिच्छेद गंका-एक प्रमाता में दोनों का तादात्म्य कैसे है? समाधान-जिम श्रात्मा में प्रमाण होता है उमी में उसका फल होता है अर्थात जो आत्मा वस्तु को जानता है उमी श्रात्मा मे प्रहरण प्रादि करने की बुद्धि उत्पन्न होती है । एक के जानने मे दूमरे ग्रहण या त्याग करने की भावना उत्पन्न नहीं होती, इससे प्रमाण और फल का एक ही प्रमाना में तादात्म्य सिद्ध होता है। शंका-सा न माने तो हानि क्या है? समाधान--प्रथम तो यह कि सभी लोगो का ऐमाही अनुभव होता है, अन एमा न मानने में अनुभव विरोध होगा। इसके अति- रिक्त मा न मानन में प्रमाण-फल की व्यवस्था ही नष्ट हो जायगी। देवदत्त के जानने मे जिनदत्त उस वस्तु का ग्रहण कर लेगा और जिनदत्त द्वारा जानने में देवदत्त उमका त्याग कर देगा। अर्थात् एक को प्रमाण होगा और दूसरे को हमका फल मिल जायगा। हम अव्यवस्था से बचने के लिए प्रमाण के परम्परा फल को भी प्रमाण से कथंचित् अभिन्न ही मानना चाहिए और ऐमा मान लेने से हेतु में व्यभिचार भी नहीं आता। पुन. दोप-परिहार अज्ञाननिवृत्तिरूपेण प्रमाणादभिन्नेन साक्षात्फलेन साधनस्यानेकान्त इति नाशकनीयम् ॥ कथञ्चित्तस्यापि प्रमाणाद् भेदेन व्यवस्थानात् ॥१३॥ साध्यसाधनभावेन प्रमाणफलयोःप्रतीयमानत्वात् ।१४॥
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१०४) प्रमाणं हि करणाख्यं साधनं, स्वपरव्यवसिती साधक- तमत्वात् ॥१५॥ स्वपरव्यवसितिक्रियारूपाज्ञाननिवृत्त्याख्यं फलं तु साध्यम्, प्रमाणनिष्पाद्यत्वात् ॥ १६ ॥ अर्थ-प्रमाण से सर्वथा अभिन्न अज्ञाननिवृत्ति रूप माक्षात फल से हेतु मे व्यभिचार आता है, ऐमी शका नहीं करनी चाहिए । क्योकि वह-माक्षात् फल भी प्रमाण से कथंचित भिन्न है- सर्वथा अभिन्न नहीं है। कथंचित् भेद इमलिए है कि प्रमाण और फल साध्य और और साधन रूप से प्रतीत होते हैं। प्रमाण करण रूप साधन है, क्योकि वह स्व-पर के निश्चय में साधकतम है। स्व-पर का निश्चय होना रूप अज्ञाननिवृत्ति फल माध्य है, क्योंकि वह प्रमाण से उत्पन्न होता है ।। विवेचन--पहले परम्परा फल को प्रमाण से सर्वथा भिन्न मान कर हेतु में दोष दिया गया था, यहाँ साक्षात् फल को मर्वथा अभिन्न मानकर हेतु में व्यभिचार दोष दिया गया है। तात्पर्य यह है कि साक्षात् फल, प्रमाण का फल है पर प्रमाण से कथचित भिन्न- अमिन्न नहीं है। इस प्रकार साध्य के अभाव में हेतु रहने से व्यभि- चार दोष है। किन्तु हेतु में साक्षात् फल से व्यभिचार दोष नहीं है, क्योकि (१०५) [ षष्ठ परिच्छेद परम्पग फल की भाँति मातात फल भी प्रमाण मंकथंचित भिन्न और कथंचित अभिन्न है। शंका-आपने ज्ञान को प्रमाण माना है, अज्ञान निवृत्ति को मानात् फल माना है और इन दोनों में कचित् भेट भी कहते हैं। पर ज्ञान में और अज्ञाननिवृत्ति में कमा भेट है ? यह दोनों एक ही मालूम होते हैं? समाधान-शान ही अजान-निवृत्ति नहीं है परन्तु ज्ञान से अज्ञान-निवृत्ति होती है। अनः ज्ञान-रूप प्रमाण साधन है और प्रज्ञान निवृत्ति रूप फल माध्य है। प्रमाता और प्रमिति का भेदाभेद प्रमातुरपिस्वपरव्यवसितिक्रियायाः कथञ्चिद् भेदः।१७ क क्रिययोः साध्यसाधकभावेनोपलम्भात् ॥ १८ ॥ कर्ता हि साधकः स्वतन्त्रत्वात् , क्रिया तु साध्या कर्तृनिवर्त्यत्वात् ॥ १६ ॥ अर्य-प्रमाता (नाता) से भी स्व-पर का निश्चय होना रूप क्रिया का कथंचित भेद है। क्योंकि कर्ता और क्रिया में माध्य-साधकमाव पाया जाता है। स्वतन्त्र होने के कारण कर्त्ता साधक है और कर्ता द्वारा उत्पन्न होने के कारण क्रिया साध्य है ।। विवेचन- यहाँ कर्ता (प्रमाता) और क्रिया (प्रमिति) का प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१०६) कथंचित भेद बताया गया है। अनुमान का प्रयोग इस प्रकार होगा- क्रिया से कर्ता कथंचित् भिन्न है, क्योंकि दोनों में साध्य-माधक संबंध है। जहाँ साध्य-माधक सम्बन्ध होता है वहाँ कथंचित् भेर होता है, जैसे देवदत्त मे और जाने में। कर्ता माधक है और क्रिया साध्य है। - एकान्त का खण्डन न च क्रिया क्रियावतः सकाशादभिन्नैव भिन्नैव वा, प्रतिनियतक्रियाक्रियावद्भावभङ्गप्रसङ्गात् ॥ २० ॥ अर्थ-क्रिया, क्रियावान् (क्र्ता) से न एकान्त भिन्न है और न एकान्त अभिन्न है। एकान्त भिन्न या अभिन्न मानने से नियत 'क्रिया-क्रियावत्व' का अभाव हो जायगा। विवेचन-योग लोग क्रिया और क्रियावान् मे एकान्त भेद मानते हैं और बौद्ध दोनो में एकान्त अभेद मानते हैं। यह दोनो एकान्त मिथ्या हैं। यदि क्रिया और क्रियावान मे एकान्त भेट माना जाय तो यह 'क्रिया इस क्रियावान् की है। ऐसा नियत सम्बन्ध नहीं सिद्ध होगा । मान लीजिये. देवदत्त क्रियावान , गमन क्रिया कर रहा है, मगर वह क्रिया देवदत्त से इतनी भिन्न है जितनी जिनदत्त से भिन्न है। तब वह क्रिया जिनदत्त की न होकर देवदत्त की ही क्यो कह- लायगी ? किन्तु वह क्रिया देवदत्त की ही कहलाती है इमसे यह सिद्ध होता है कि क्रिया देवदत्त (क्रियावान् ) से कथचित् अभिन्न है। इससे विपरीत, बौद्धों के कथनानुसार अगर क्रिया और क्रियावान् मे एकान्त अभेद मान लिया जाय तो भी 'यह क्रिया इस (१७) [ पाठ परिच्छेद क्रियावान की है मा सम्बन्ध सिद्ध नहीं हो सकता । एकान्त अभेद मानने पर या तो क्रिया की ही प्रतीति होगी या कर्ता की ही प्रतीति होगी-दोनों अलग-अलग प्रतीत नहीं होगे । एक ही पदार्थ किया और करी दोनों नहीं हो सकता अतण्व क्रिया और क्रियावान में कथचित् भेद भी मानना चाहिए । शून्यवादी का खण्टन संवृत्या प्रमाणफलव्यवहार इत्यप्रामाणिकप्रलापः, परमा- र्थतः स्वाभिमतसिद्धिविरोधात् ।। २१ ।। अर्य-प्रमाण और फल का व्यवहार काल्पनिक है, ऐसा कहना अप्रामाणिक लोगो का प्रलाप है, क्योंकि एमा मानने से उसका मन वाम्नविक मिद्व नहीं हो सकता ॥ विवेचन-प्रमाण मिथ्या-काल्पनिक है,और प्रमाण का फल भी मिथ्या है, ऐसा शून्यवादी माध्यमिक का मत है। इस प्रकार प्रमाण को मिथ्या मानने वाला शुन्यबादी अपना मत प्रमाण से सिद्ध करेगा या विना प्रमाण के ही? अगर प्रमाण मे मिद्ध करना चाहेनो मिथ्या प्रमाण में वास्तविक मत कम मिद्ध होगा? अगर विना प्रमाण केही सिद्ध करना चाहे तो अप्रामाणिक वान कौन स्वीकार करेगा? इम प्रकार शुन्यवादी अपने मत को वास्तविक रूप ते सिद्ध नहीं कर मस्ता। निष्कर्ष ततः पारमार्थिक एव प्रमाणफलव्यवहारः सकलपुरु- पार्थसिद्धिहेतुः स्त्रीकर्त्तव्यः ।। २२ ॥
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१०८) अर्थ-अतएव धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष रूप पुरुषार्थों की सिद्धि करने वाला प्रमाण और प्रमाण-फल का व्यवहार वास्तविक ही स्वीकार करना चाहिये। अाभासों का निरूपण प्रमाणस्य स्वरूपादिचतुष्टयाद्विपरीतं तदाभासम् ॥२३॥ अर्थ-प्रमाण के स्वरूप, संख्या, विपय और फल से निप- रीत स्वरूप आदि स्वरूपाभास, संख्याभास, विषयाभास और फलाभास कहलाते हैं। विवेचन-प्रमाण का जो स्वरूप पहल बतलाया है उससे मिन्न स्वरूप, स्वरूपाभास है। प्रमाण के भेदो से भिन्न प्रकार के भेद मानना सख्याभास है । प्रमाण के पूर्वोक्त विषय से भिन्न विपय मानना विषयाभास है और पूर्वोक्त फल से भिन्न फल मानना फलाभास है। स्वरूपाभास का कथन अज्ञानात्मकानात्मप्रकाशकस्वमात्रावभासकनिर्विकल्प- कसमारोपाः प्रमाणस्य स्वरूपाभासाः॥ २४ ॥ यथा सनिकर्षाद्यस्वसंविदितपरानवभासकज्ञान-दर्शन- विपर्यय-संशयानध्यवसायाः॥ २५ ॥ अर्थ-अज्ञान-अनात्मप्रकाशक-स्वमात्रप्रकाशक-निर्विकल्पक जान, और समारोप प्रमाण के स्वरूपाभास हैं ।।
(१०६) [ षष्ठ परिच्छेद जैसे सन्निकर्ष, स्व को न जानने वाला ज्ञान, पर को न जानने वाला ज्ञान, दर्शन, विपर्यय, संशय और अनध्यवसाय ।। विवेचन-प्रमाण के स्वरूप से स्वरूपाभास की तुलना करने से विदित होगा कि स्वरूपाभान, स्वरूप से सर्वथा विपरीत है। अज्ञान रूप सन्निकर्ष को प्रमाण का स्वरूप कहना, स्व को अथवा पर को न जानने वाले ज्ञान को प्रमाण कहना, अनिश्चयात्मक ज्ञान अथवा दर्शन को प्रमाण कहना या समारोप को प्रमाण कहना, प्रमाण का म्वरूपाभास है। स्वरूपाभास होने का कारण तेभ्यः स्व-परव्यवसायस्यानुपपत्तेः ॥ २६ ॥ अर्थ-पूर्वोक्त ज्ञान आदि से स्व-पर का व्यवसाय नही हो सकता ( इसलिये वे स्वरूपाभास हैं)। विवेचन-प्रमाण का स्वरूप बताते समय कहा गया था कि जो ज्ञान स्व और पर का यथार्थ निश्चय करने वाला हो वही प्रमाण हो सकता है, पर स्वरूपाभासों की गणना करते समय जो ज्ञान बताये हैं उनसे म्व-पर का यथार्थ निश्चय नहीं होता, अतएव वे स्वरूपाभास । इन ज्ञानो मे कोई 'स्व' का निश्चायक नहीं, कोई पर का निश्चायक नहीं, कोई स्व-पर दोनो का निश्चायक नहीं है और निर्विकल्पक, दर्शन तथा समारोप यथार्थ निश्चायक नहीं हैं। सन्निकर्ष ज्ञान रूप नहीं है। अत. इनमें प्रमाण का स्वरूप घटित नही होता । सांव्यवहारिक प्रत्याभास सांव्यवहारिकप्रत्यक्षमिव यदाभासते तत्तदाभासम्॥२७ प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (११०) यथा-अम्बुधरेषु गन्धर्वनगरज्ञानं, दुःखे सुखज्ञानञ्च॥२८ अर्थ-जो ज्ञान वास्तव में सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष न हो किन्तु मांव्यवहारिक प्रत्यक्ष सरीखा जान पडता हो वह सांव्यवहारिक प्रत्य- ताभास है। जैसे--मेघों में गन्धर्व-नगर का ज्ञान होना और दुख में सुख का ज्ञान होना ।। विवेचन-सांव्यवहारिक प्रत्यक्षाभास का लक्षण स्पष्ट है । यहाँ 'मेघो में गन्धर्व-नगर का ज्ञान', यह उदाहरण इन्द्रिय निबंधन माव्यवहारिक प्रत्यक्षाभास का उदाहरण है, क्योंकि यह इन्द्रियो से होता है और दुख मे सुग्व का ज्ञान' यह उदाहरण अनिन्द्रियनिबंधन- सांव्यवहारिक प्रत्यक्षाभाम का उदाहरण है क्योकि यह ज्ञान मन से उत्पन्न होता है। पारमार्थिक प्रत्यक्षाभास पारमार्थिकप्रत्यक्षमिव यदाभासते तत्तदाभासम् ||२६|| यथा-शिवाख्यस्य राजर्षेरसंख्यातद्वीपसमुद्रे सप्तद्वीप- समुद्रज्ञानम् ॥ ३० ॥ अर्थ-जो ज्ञान पारमार्थिक प्रत्यक्ष न हो किन्तु पारमार्थिक प्रत्यन सरीखा मलके उसे पारमार्थिक प्रत्यक्षाभास कहते है। जैसे--शिव नामक राजर्षि का असंख्यात द्वीप-ममुद्रों मे से सिर्फ मात द्वीप समुद्रो का ज्ञान ॥ विवेचन-शिव राजर्षि को विभंगावधि ज्ञान उत्पन्न हुआ (१११) [ पष्ठ परिच्छेद था। उम ज्ञान मे पि को सान द्वीप-समद्रों का ज्ञान हुश्रा-धागे के द्वीप-समुद्र उन्हें मालूम नहीं हुए । नब उन्होंने यह प्रसिद्ध किया कि मध्यलोक में सिर्फ मान द्वीप और मात समुद्र हैं, अधिक नहीं। पि फेम विभग ज्ञान का कारण मिथ्यात्व था। अतएव यह उदा. हरण अवधिनानाभास का है । मन पर्याय ज्ञान और कंवलज्ञान के प्रामाम कभी नही होतं, क्योंकि यह दोनो ज्ञान मिध्यादष्टि को नही हाने । स्मरगाभास १॥ अननुभूते वस्तुनि तदिति ज्ञानं स्मरणाभासम् ॥३१॥ भननुभृत मुनिमण्डले तन्मुनिमण्डलमिति यथा ॥३२॥ अर्ध-पहले जिममा अनुभव न हुआ हो उस वस्तु में 'वह' मा-मानहाना मारणामाम जमे-जिम मुनि-मण्डल का पाले अनुभव नहुप्राहो उसमें 'व, मुनिमण्डल'मा शान होना । विवेचन-जिम मुनिमहल को पहले कभी नहीं जाना-देवा, उसका 'वह मुनि-मंडल' हम प्रकार म्मरण करना स्मरणामाम है। गोकिम्मरणमान अनुभुन पदार्थ में ही होता है। प्रत्यभिज्ञानाभाम तुल्ये पदार्थ स एवायमिति, एकस्मिश्च तेन तुल्य इत्यादि जानं प्रत्यभिज्ञानाभासम् ॥ ३३ ॥ यमलकजातवत् ।। ३४ ॥
प्रमाण-नय-तत्वालोक (११२) अर्थ-समान पदार्थ मे 'यह वही है। ऐसा ज्ञान होना और उसी पदार्थ मे 'यह उसके समान है' इत्यादि ज्ञानो को प्रत्यभिज्ञाना. भास कहते हैं। जैसे-एक साथ उत्पन्न होने वाले बालको में विपरीत ज्ञान हो जाना। विवेचन-देवदत्त के समान दूसरे व्यक्ति को देखकर यह वही देवदत्त है' ऐमा ज्ञान होना प्रत्यभिज्ञानाभाम है। तात्पर्य यह है कि सहशता में एकता की प्रतीनि होना एकत्वप्रत्यभिज्ञानाभाम और एकता मे सहशता प्रतीत होना सादृश्यप्रत्यभिज्ञानामाम है। तांभास असत्यामपि व्याप्तौ तदवभासस्तर्काभासः ।। ३५ ॥ स श्यामो मैत्रतनयत्वादित्पत्र यावान्मैत्रतनयः स श्याम इति ॥ ३६॥ अर्थ-व्याप्ति न होने पर भी व्याप्ति का आभास होना तर्काभास है। जैसे-वह व्यक्ति काला है, क्योंकि मैत्र का पुत्र है। यहाँ पर 'जोजो मैत्र का पुत्र होता है वह काला होता है ऐसी व्याप्ति मालूम होना।। विवेचन-व्याप्ति के ज्ञान को तर्क कहते है, पर जहाँ वास्तव में व्याप्ति न हो वहाँ व्याप्ति की प्रतीति होना तर्काभास है। जैसे- (११३) [ पष्ठ परिच्छेद - 'मैत्र के पुत्र हेतु के माथ कालेपन की व्यानि नहीं है फिर भी व्याप्ति प्रनीति हुई अन. यह मिया व्याप्ति-ज्ञान तर्कामाम है। मनुमानाभास पत्ताभासादिसमुत्यं ज्ञानमनुमानाभासम् ॥ ३७॥ अर्थ-पत्तामाम आदि में उत्पन्न होने वाला ज्ञान अनुमाना- भास है॥ शिवचन-पत्न. तु दृष्टान्त, उपनय और निगमन, अनुमान के अवयव हैं। इन पांचों अवयवों में में किसी एक के मिथ्या होने पर अनुमानाभास हो जाता है। श्रतण्व यहाँ पाँचों अवयवी के प्रामाम आगे बताये जायेंगे। इन सर श्रामासी को ही अनुमाना- माम मममना चाहिये। पशाभाम तत्र प्रतीतनिराकृतानभीप्सितसाध्यधर्मविशेपणास्त्रयः पनाभासाः ॥ ३८॥ अर्थ-पनाभास तीन प्रकार का है। (१) प्रतीतसाध्यधर्म- विशेषण (0) निगकृत सागधर्मविशेषण (३) अनभीमित माध्यधर्मविशेषण-पत्ताभास । प्ररिसर अनाधित विवेचन-मान्य को अप्रतीत, अनिराकृत और अभीमित बताया है, उसमें विरुद्ध माध्य जिम पन में बताया जाय वह पक्षा- भास है। उर
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक
(११४)
.
प्रतीतसाध्यधर्म विशेपण पक्षाभास
प्रतीतसाध्यधर्मविशेपणो यथा-आर्हतान्प्रति अवधारण-
वयं परेण प्रयुज्यमानः समस्ति जीव इत्यादिः ॥ ३९ ॥
अर्थ-जैनो के प्रति अवधारण (ण्व-ही ) के बिना जीव है।
इस प्रकार कहना प्रतीतमाध्यधर्भविशेपण पक्षाभाम है।
विवेचन-'जीव है। यहाँ जीव पक्ष है और 'है' साध्य है ।
यह साध्य जैनो को प्रतीत मिद्ध है । अतः इस पक्ष का माध्य-धर्म रूप
विशेषणपक्षाभास होगया । यदि इस पक्ष में 'एव-ही' का प्रयोग किया
गया होता तो यह साध्य अप्रतीत होता क्योकि जैन जीव में एकान्त
अस्तित्व स्वीकार नहीं करते, किन्तु पर-रूप से नास्तित्व भी
मानते हैं।
निराकृत साध्यधर्मविशेषण पक्षाभास के भेद
निराकृतसाध्यधर्मविशेषणः प्रत्यक्षानुमानागमलोकस्व-
वचनादिभिः साध्यधर्मस्य निराकरणादनेकप्रकारः ॥४०॥
अर्थ-निराकृत साध्यधर्मविशेषण पक्षाभास, प्रत्यक्ष निरा-
कृत, अनुमाननिगकृत, आगमनिराकृत, लोकनिराकृत और स्ववचन-
निराकृत आदि के भेद से अनक प्रकार का है।
प्रत्यक्षनिराकृत
प्रत्यक्षनिराकृतसाध्यधर्मविशेषणो यथा-नास्ति भूत-
विलक्षण प्रात्मा ॥४१॥
(११५) [ षष्ठ परिच्छेद s अर्थ-'पाँच भूतो से भिन्न आत्मा नहीं है। यह प्रत्यक्षनिरा- कृतसाध्यधर्मविशेषण पक्षाभास विवेचन-पृथ्वी, आप, तेज, वायु और आकाश-इन पाँच भूनो से भिन्न आरमा का म्वसंवेदन प्रत्यक्ष से अनुभव होता है, अत. 'भूतो से भिन्न श्रारमा नहीं है। यह पक्ष प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित है। अनुमाननिराकृत अनुमाननिराकृतसाध्यधर्मविशेषणो यथा-नास्ति सर्वज्ञो वीतरागो वा ।। ४२ ॥ अर्थ-'मर्वज्ञ अथवा वीतगग नहीं है यह अनुमाननिगकृत- माध्यधर्मविशपणपत्नाभास है। विवेचन-अनुमान प्रमाण में मर्वज्ञ और वीतगग की सत्ता मिद्ध है, अन 'मन या वीतराग नहीं है। यह प्रतिज्ञा अनुमान में बाधित है। प्रागमनिराकृत आगमनिराकृतसाध्यधर्मविशेपणो यथा-जैनः रजनि- भोजनं भजनीयम् ॥ ४३ ॥ अर्थ-जनी को रात्रिभोजन करना चाहिये यह आगम निगकृत-माध्यधमविशेपण पक्षाभाम है। विवेचन-जैन आगमो में गत्रिभोजन का निषेध किया गया | कहा है।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] अत्थंगयम्मि आइच्चे पुरत्था य अणुग्गए । आहारमाइयं सव्वं मणसा वि ण पत्थए ॥ अर्थात् सूर्य अस्त होजाने पर और पूर्व दिशा मे उदित होने से पहले सब प्रकार के आहार आदि की मन में इच्छा भी न करे। रात्रि-भोजन का निषेध करने वाले इस आगम से 'जैनो को रात्रि में भोजन करना चाहिए' यह प्रतिज्ञा बाधित होजाती है। लोकनिराकृत लोकनिराकृतसाध्यधर्मविशेषणो यथा-न पारमार्थिकः प्रमाणप्रमेयव्यवहारः॥४४ ॥ अर्थ..'प्रमाण और प्रमाण मे प्रतीत होने वाले घट-पट आदि पदार्थ काल्पनिक हैं। यह लोकनिराकृतसाध्यधर्मविशेपण पक्षा- भास है। विवेचन-लोक में प्रमाण द्वाग प्रतीत होने वाले सब पदार्थ मच्चे माने जाते हैं और ज्ञान भी वास्तविक माना जाता है, अतएव उनकी काल्पनिकता लोक-प्रतीति से बावित होने के कारण यह प्रतिज्ञा लोकबाधित है। स्ववचनबाधित स्ववचननिराकृतसाध्यधर्मविशेषणो यथा-नास्ति प्रमेय- परिच्छेदकं प्रमाणम् ॥ ४५ ॥ अर्थ-'प्रमाण, प्रमेय को नहीं जानता' यह स्ववचन निरा- कृत साध्यधर्मविशेषण पक्षाभास है।
(११७)
[ षष्ठ परिच्छेद
विवेचन-प्रमाण. प्रमेय (घट आदि ) को नहीं जानता,
ऐसा कहने वाले से पूछना चाहिए-तुम प्रमाण को जानते या नहीं ?
गदि नहीं जानते तो कैसे कहते हो कि प्रमाण,प्रमेय को नहीं जानता ?
अगर जानते हा नो तुम्हाग जान प्रमाण है या नहीं? नहीं है तो
तुम्हाग कथन कोई स्वीकार नहीं कर सकता। यदि तुम्हाग ज्ञान
प्रमाण है तो उसने प्रमाण मामान्य रूप प्रमेय को जाना है, यह बात
तुम्हारे ही कथन में मिद्व हो जाती है । अतण्व 'प्रमाण, प्रमय को
नहीं जानता' यह प्रतिज्ञा स्ववचन बाधित है।
'मेरी माता वन्ध्या है', 'मैं श्राजीवन मौनी हूँ,' इत्यादि अनेक
स्ववचन बाधित कं उदाहरण समझ लेना चाहिए ।
श्रमभीप्सितसाध्यधर्मविशेपण पक्षाभास
अनभीप्सितसाध्यधर्मविशेपणो यथा-स्यावादिनः शा-
श्वतिक एव कलशादिरशाश्वतिक एव वेति वदतः ॥ ४६॥
श्रर्य-घट एकान्त नित्य है अथवा एकान्न अनित्य है, ऐमा
बोलने वाले जैन का पक्ष अनभीग्मित साध्य-धम-विशेपण पक्षाभास
होगा।
विवेचन-जिस पक्ष का माध्य वादी को स्वयं इष्ट न हो. वह
अनभीमित माध० वि० पक्षाभाम कहलाता है । जैन अनेकान्त-
वादी हैं। वे घट को एकान्त नित्य या एन्न अनित्य नहीं मानते ।
फिर भी अगर कोई जैन ऐमा पक्ष बोले तो वह अनभीप्सित सा० ध०
वि० पक्षाभाम होगा।
हेवाभास के भेद
असिद्धविरुद्धानकान्तिकास्त्रयो हेत्वाभासाः ॥४७॥
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (११८) अर्थ-हेत्वाभास तीन हैं-(१)असिद्ध हेत्वाभाम (२)विरुद्ध- हेत्वाभास (३) अनैकान्तिक हेत्वाभास । विवेचन--जिसमे हेतु का लक्षण न हो फिर भी जो हेतु सरीखा प्रतीत होता हो वह हेत्वाभाम है । उसके उपर्युक्त तीन भेद हैं। प्रसिद्ध हेत्वाभास यस्यान्यथानुपपत्ति प्रमाणेननप्रतीयते सोऽसिद्धः॥४८ स द्विविध उभयासिद्धोऽन्यतरासिद्धश्च ॥ ४६॥ उभयासिद्धो यथा-परिणामी शब्दः चाक्षुषत्वात् ॥५०॥ अन्यतरासिद्धो यथा-अचेतनास्तरवा, विज्ञानेन्द्रिया- युनिरोधलक्षणमरणरहितत्वात् ॥ ५१ ॥ अर्थ-जिसकी व्याप्ति प्रमाण मे निश्चित न हो उसे प्रसिद्ध हेत्वाभाम कहते हैं। वह दो प्रकार का है-उभयामिद्ध और अन्यतरासिद्ध । 'शब्द परिणामी है, क्योकि चातुप है, यहाँ चाक्षुषत्व हेतु उभयासिद्ध है। 'वृन अचेतन हैं, क्योकि वे ज्ञान, इन्द्रिय और आयु की समाप्ति रूप मृत्यु से रहित हैं। यहाँ अन्यनगसिद्ध हेतु है ।। - विवेचन-जो हेतु वादी को प्रतिवादी को अथवा दोनो को सिद्ध नही होता वह प्रसिद्ध हेत्वाभास कहलाता है। जो दोनों को सिद्ध न हो वह उभयासिद्ध होता है। जैसे यहाँ शब्द का चाक्षुषत्व (११६) [ पष्ठ परिच्छेद दोनो को मिद्ध नहीं है, क्योंकि शब्द आँम्ब से नहीं दीखता बल्कि कान में सुनाई देता है। यून प्रचेतन हैं, क्योंकि वे ज्ञान, इन्द्रिय और मरण से रहित है. यहाँ मान इन्द्रिय प्रौर मरण से रहिन हैं, यह हेतु वाटी बौद्ध को मिद है शिन्तु प्रतिवाटी जैन को मिद्ध नहीं है। क्योकि जैन लोग वृनों में जान, इन्द्रिय और मरण का होना स्वीकार करते हैं। अनः कवन प्रतिव दी को अमिद्ध होने के कारण यह हेतु अन्य- तगनिद्ध है। विन्द हेत्वाभास साध्यविपर्ययणव यस्यान्यथानुपपत्तिरध्यवसीयते स विरुद्धः ॥ ५२ ।। यथा नित्य एव पुरुषोऽनित्य एव वा, प्रत्यभिज्ञानादि- मचात् ।। ५३॥ अर्थ-मान्य से विपरीत के पदार्थ माथ जिसकी व्याप्ति निधित हो वह विमद हवामाम कहलाता है । जैसे-पुरुप सर्वथा नित्य या सर्वथा अनित्य ही है, क्योंकि वह प्रत्यभिज्ञान आदि वाला विवेचन-यहाँ मर्वथा नित्यता अथवा सर्वथा अनित्यता माध्य है हम माध्य में विपरीन कथंचिन अनित्यता है। और कथं- चिन निस्यना अथवा कथंचित् अनिष्यता के साथ ही 'प्रत्यभिज्ञान श्रादि वालं' हेतु की व्याप्ति निश्चित है । अर्थात् जो सर्वथा प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१२०) नित्यता और सर्वथा अनित्यता से विरुद्ध कथंचित नित्य होना है वही प्रत्यभिज्ञानवान् होता है। अतः यह विरुद्ध हत्वाभास है । अनेकान्तिक हेत्वाभास यस्यान्यथानुपपत्तिः सन्दिह्यते सोऽनैकान्तिकः ॥५४॥ सद्वधा निर्णीतविपक्षवृत्तिका सन्दिग्धविपक्षवृत्तिकश्च ५५ निर्णीतविपक्षवृत्तिको यथा-नित्यः शब्दःप्रमेयत्वात् ।५६। संदिग्धविपक्षवृत्तिको यथा-विवादापन्नः पुरुषः सर्वज्ञो न भवति वक्तृत्वात् ॥२७॥ अर्थ-जिम हेतु की अन्यथानुपपत्ति (व्याप्ति) मे सन्देह हो वह अनैकान्तिक हेत्वाभाम कहलाता है । अनेकान्निक हेत्वाभाम दो प्रकार का है—निर्णीतविपक्ष- वृत्तिक और संदिग्ध विपक्षवृत्तिक। शब्द नित्य है क्योंकि वह प्रमेय है, यहाँ प्रमेयस्त्र हेतु निर्णीतविपक्षवृत्तिक है। विवादग्रस्त पुरुष सर्वज्ञ नहीं है, क्योंकि वक्ता है, यहाँ वक्त- त्व हेतु सदिग्ध विपक्ष वृत्तिक है। विवेचन-जहाँ साध्य का अभाव हो वह विपक्ष कहलाता है। और विपक्ष में जो हेतु रहता हो वह अनैकान्तिक हेत्वाभाम है । जिस हेतु का विपक्ष मे रहना निश्चित हो वह निर्णीनविपक्षवृत्तिक है और जिस हेतु का विपक्ष में रहना सदिग्ध हो वह मंदिग्धविपक्ष- वृत्तिक अनैकान्तिक हेवाभास कहलाना है।
(१२१) [ पष्ठ परिच्छेद मन्द नित्य है, गोंकि प्रमय है: यहाँ नित्यता माध्य है। इस माध्य का प्रभाव घट आदि अनित्य पदार्थों में पाया जाता है अतः घट प्रादि विपन हा और उनमें प्रमेयस्व ( हेतु) निश्चिन रूप से रहना है (कोकि घट आदि भी प्रमेय-प्रमाण के विषय-हैं) इसलिए प्रमंगव हेतु निर्णीनविपक्षवृत्तिक अनैकान्तिक हेत्वाभाम हुआ । विवादग्रस्त पुरुप नर्वन नहीं है, क्योकि वक्ता है. यहाँ मर्ष- सना का प्रभाव माध्य है। हम मान्य का अभाव मर्वज में पाया जाता है अनः मर्वत विपन हया । उम विपक्ष सर्वज्ञ में वक्तृत्व रह मकना है, अत. यह हेतु मंदिग्धविपनवृत्ति अनेकान्तिक हेत्वाभाम है। विरुद्ध हवामाम विपन में ही रहता है और अनैकान्तिक याभाम पन्न,मपत्न, और विपन नीनों में रहता है। अनेकान्तिक को व्यभिचारी हेतु भी कहते हैं। दृष्टान्ताभास " साधर्म्यण दृष्टान्ताभासो नवप्रकारः ॥ ५० ॥ माध्यधर्मविकलः, साधनधर्मत्रिकलः, उभयधर्मविकलः, संदिग्धमाध्यधर्मा, मंदिग्धसाधनधर्मा, संदिग्धोभयधर्मा, अन- न्वयो, प्रदर्शितान्वयो, विपरीतान्वयश्चेति ॥ ५६ ॥ अर्थ-माधर्म्य प्रान्ताभाम के नौ भेट हैं। (१) माध्यधर्म विकल (२) माधनधर्मविकल (३) उभयधर्म- विफल (8) निम्नमाध्यधर्म (५) मंदिग्बमाचनधर्म (६) संदिग्धउभय- धर्म (७) अनन्वय (6) अप्रदर्शितान्वय और (E) विपरीतान्वय ।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक]
(१२२)
विवेचन-माधर्म्य दृष्टान्त मे साध्य और माधन का निश्चित
रूप से अस्तित्व होना चाहिए। जिस दृष्टान्त में साध्य का, साधन का,
या दोनों का अस्तित्व न हो, या अस्तित्व अनिश्चिन हो अथवा
साधर्म्य दृष्टान्त का ठीक तरह प्रयोग न किया गया हो वह साधर्म्य
दृष्टान्ताभास कहलाता है।
(१) साध्य-विकलदृष्टान्ताभास
तत्रापौरुषेयः शब्दोऽमूर्त्तत्वात् , दुःखवदिति साध्यधर्म-
विकलः ॥ ६०॥
अर्थ-शब्द अपौरुपेय है, क्योकि अमूर्त है, जैसे दु.स्व ।
यहाँ दुःख उदाहरण साध्यविकल है क्योकि उसमे अपौरुपेयत्व माध्य
नही रहता ॥
(२) साधनधर्मविकल दृष्टान्ताभास
तस्यामेव प्रतिज्ञायां तस्मिन्नेव हेतौ परमाणुवदिति
साधनधर्मविकलः॥६॥
अर्थ-इसी प्रतिज्ञा में और इसी हेतु में 'परमाणु' का उदा-
हरण साधनविकल है।
विवेचन-शब्द अपौरुषेय है क्योंकि अमूर्त है, जैसे परमाणु,
यहाँ परमाणु मे अमूर्तता हेतु नही पाया जाना, क्योकि परमाणु मूर्त
है। अत. यह साधनविकल दृष्टान्ताभाम हुआ।
(३) उभयधर्मविकल दृष्टान्ताभास
कलशवदित्युभयधर्मविकलः ॥ ६२ ॥
(१२३) [षष्ठ परिच्छेद भर्म-पूर्वोक्त अनुमान में कलश का उदाहरण देना उभय- विकल है। विवेचन-कलश पुरुपकृत और मूर्त है अतः उसमें अपौ- रुपेयत्व साध्य और अमूर्त्तत्व हेतु दोनो नहीं हैं। (७) सदिग्धसाम्यधर्म रटान्ताभास रागादिमानयं वक्तृत्वात् , देवदत्तवदिति संदिग्ध- साध्यधर्मा ॥ ६३ ॥ अर्थ-यह पुरुप गग आदि वाला है, क्योकि वक्ता है, जैसे देवदत्त । यहाँ देवदत्त दृष्टान्त सदिग्धसाध्यधर्म है। विवेचन-जिम दृष्टान्न म माध्य का गहना संदिग्ध हो वह हटान्त मांढग्धमाध्ययम कहलाता है। देवदत्त में गग आदिक साध्य के रहने मे मदेह है अतः देवदत्त दृष्टान्त सदिग्धसाध्यधर्म है। (२) सदिग्धसाधनधर्म रटान्ताभास मरणधर्माऽयं रागादिमत्वान्मत्रवदिति संदिग्धसाधन- धर्मा ।। ६४ ॥ अर्थ-'यह पुरुप मरणशील है क्योकि रागादिवाला है, जैसे मैत्र । यहाँ मंत्र दृष्टान्त संदिग्धमाधनधर्म है। विवेचन-मैत्र नामक पुरुप मे रागादित्व हेतु के रहने में मन्देह है, अनः मैत्र उदाहरण संदिग्धसाधनधर्मदृष्टान्ताभास है। - प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१२४) - (६) संदिग्धउभयधर्मदृष्टान्ताभास नायं सर्वदर्शी रागादिमत्त्वान्मुनिविशेषवदित्युभयधर्मा।६५ अर्थ-यह पुरुप सर्वज्ञ नही है, क्योकि रागादि वाला है, जैसे अमुक मुनि । यह सदिग्ध-उभय दृष्टान्ताभास है । क्योंकि अमुक मुनि मे सर्वज्ञता का अभाव और रागादिमत्व दोनों का ही संदेह है। (७) अजन्वय दृष्टान्ताभास रागादिमान विवक्षितः पुरुषो वक्तृत्वादिष्टपुरुपवदि- त्यनन्वयः ॥ ६६ ।। अर्थ-विवक्षिन पुरुष रागादि वाला है, क्योंकि वक्ता है, जैस कोई इष्ट पुरुष। विवेचन-जिस दृष्टान्त में अन्वय व्याप्ति न बन सके उसे अनन्वय दृष्टान्ताभास कहते हैं । यहाँ इाट पुरुपमे रागादिमत्व और वक्तृत्व-दोनों मौजूद रहने पर भी जो जो 'वक्ता होता है वह वह गगादि वाला होता है ऐसी अन्वय व्याप्ति नहीं बनती । क्योकि अई- न्त भगवान वक्ता हैं पर रागादि वाले नहीं है। अन 'इष्ट पुरुष' यह दृष्टान्त अनन्वय दृष्टान्ताभास है। (5) अप्रदर्शितान्वय दृष्टान्ताभास अनित्यः शब्दः कृतकत्वात् , घटवदित्यप्रदर्शितान्वयः।६७। अर्थ-शब्द अनित्य है, क्योंकि कृतक है, जैसे घट । यहाँ घट दृष्टान्त अप्रदर्शितान्वय दृष्टान्ताभास है। h -- (१२५) [ पष्ठ परिच्छेद विवेचन-जिम दृष्टान्त में अन्वयव्याप्ति नो हो किन्तु वादी ने वचन द्वारा उसका कथन न किया हो, उसे अप्रदर्शितान्वय दृष्टा- तामाम कहते हैं। यहाँ घट में अनित्यता और कनकता भी है, मगर अन्वय प्रदर्शित न करने के कारण ही यह दोप है। (6) विपरीतान्वय दृष्टोन्ताभास अनित्यः शब्दः कृतकत्वात्, यदनित्यं तत्कृतकं, घटवदितिविपरीतान्वयः ॥ ६८ ॥ अर्थ---शब्द अनित्य है, क्योंकि कृनक है; जो अनित्य होना है, वह कनक होता है। जैसे घट । यह विपरीतान्त्रय दृष्टान्ताभास है। विवेचन- अन्वय व्यानि में साधन होने पर साध्य का होना बनाया जाता है, पर यहाँ साध्य के होने पर साधन का होना बताया गया है, इसलिए यह विपरीन अन्वय हुआ। यह विपरीत अन्वय घट इप्टान्त में बनाया गया है अतः घट दृष्टान्त विपरीतान्वय दृष्टान्ताभास है। वैधम्यं दृष्टान्ताभास वैधयेणापि दृष्टान्ताभासो नवधा ॥ ६६ ॥ असिद्धसाध्यव्यतिरेको, ऽसिद्धसाधनव्यतिरेको ऽसिद्धो- भयव्यतिरेकः, संदिग्धसाध्यव्यतिरेकः संदिग्ध साधनव्यतिरेकः, संदिग्धोभयव्यतिरेको,ऽव्यतिरेको, प्रदर्शितव्यतिरेको, विपरीत- व्यतिरेकच ॥ ७० ॥ अर्थ-वैधर्म्य दृष्टान्ताभास नौ प्रकार का है।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१२६) (१) असिद्धमाध्यव्यतिरेक (२) असिद्धमाधनव्यनिरेक (३) प्रसिद्ध उभयव्यतिरेक (४) संदिग्धसाध्यव्यतिरेक (५) संदिग्ध माधन- व्यतिरेक (६) सदिग्धोभयव्यतिरेक (७) अव्यतिरेक (6) अप्रदर्शिन- व्यतिरेक () विपरीनव्यतिरेक । विवेचन-वैधर्म्य दृष्टान्त में निश्चित रूप से साध्य और साधन का अभाव दिखाना पडता है । जिस दृष्टान्त मे साध्य का, साधन का या दोनों का प्रभाव न हो या अभाव संदिग्ध हो अथवा अभाव ठीक नरह बनाया न गया हो वह वैधयं दृष्टान्ताभास कह- लाता है। उसके भी नो भेद हैं। (१) असिद्धसाध्यव्यतिरेक दृष्टान्ताभास तेषु भ्रान्तमनुमानं प्रमाणत्वात् , यत्पुनन्तिं न भवति न तत् प्रमाणं यथा स्वप्नज्ञानमिति-असिद्धसाध्यव्य- तिरेकः, स्वप्नज्ञानाद् भ्रान्तत्वस्यानिवृत्तिः ॥ ७१ ॥ अर्थ-अनुमान भ्रान्त है क्योंकि वह प्रमाण है, जो भ्रान्न नहीं होता वह प्रमाण भी नहीं होता, जैसे स्वप्नज्ञान। यहाँ स्वप्नज्ञान' यह उदाहरण अमिदू-माध्य व्यतिरेक दृष्टान्ताभास है, क्योंकि स्वप्नज्ञान में भ्रान्तता (माध्य) का अभाव नहीं है। (२) प्रसिद्धसाधनव्यतिरेक दृष्टान्ताभास निर्विकल्पकं प्रत्यक्षं प्रमाणत्वात् , यत्तु सविकल्पकं न तत्प्रमाणं यथा लैङ्गिकमित्यसिद्धसाधनव्यतिरेको, लैङ्गिकात् प्रमाणत्वस्यानिवृत्तेः ।। ७२ ।।
(१२७) [ पष्ठ परिच्छेद अर्थ-प्रत्यक्ष निर्विकल्पक (अनिश्चयात्मक) है, क्योंकि वह प्रमाण है। जो निर्विकल्पक नहीं होता वह प्रमाण नहीं होता जैसे अनुमान । यहाँ 'श्रनुमान' दृष्टान्त अमिद्धसाधनव्यतिरेक दृष्टान्ना- भास है क्योंकि उसमें 'प्रमाणत्व' (हेतु) का अभाव नहीं है अर्थात् अनुमान प्रमाण है। (३) असिद्ध-उभयन्यतिरेक दृष्टान्ताभास नित्यानित्यः शब्दः सत्चात् , यस्तु न नित्यानित्यः स न संस्तद्यथास्तम्मः इत्यसिद्धोभयव्यतिरेकः स्तम्भान्नित्यानित्य- त्वस्य सत्त्वस्य चान्यावृत्तेः ॥ ७३ ॥ अर्थ-शब्द नित्य-अनित्य रूप है क्योंकि सत् है, जो नित्य- अनित्य नहीं होता वह मत् नहीं होना जैसे स्तम्भ । यहाँ स्तम्भ दृष्टा- न्त अमिद्ध-उभयत्यतिरेक दृष्टान्ताभास है, कोंकि स्तम्भ में नित्या- निन्यना ( माध्य) और सत्त्व ( माधन ) दोनों का प्रभाव नहीं है अर्थात् स्तम्भ निन्यानित्य भी है और सत् भी है। (४) संदिग्ध साध्यन्यतिरेक दृष्टान्ताभास असर्वज्ञोऽनाप्तो वा कपिलोऽक्षणिकैकान्तवादित्वात् ; यः सर्वज्ञ प्राप्तो वास क्षणिककान्तवादी यथा सुगतः, इति संदिग्धसाध्यव्यतिरेकः सुगते ।। ७४ ॥ अर्थ-कपिल मर्वज्ञ अथवा प्राप्त नहीं हैं क्योंकि वह एकान्त- नित्यवादी हैं जो सर्वज्ञ अथवा प्राप्त होता है वह एकान्त क्षणिकवादी होता है, जैसे सुगत (बुद्ध) । यहाँ 'सुगत' दृष्टान्न संदिग्धसाध्य- व्यतिरेक दृष्टान्ताभाम है, क्योंकि सुगत में असर्वज्ञता अथवा अना- प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१२८) तना ( माध्य ) के अभाव में सन्देह है अर्थात् सुगत मे न श्रमर्वज्ञता का प्रभाव निश्चित है और न अनाप्तता का अभाव निश्चित है। (श असिद्धसाधनव्यतिरेक दृष्टान्ताभास अनादेयवचनः कश्चिद्विवक्षितः पुरुपो गगादिमत्त्वात् यः पुनरादेयवचनः स वीतरागस्तद्यथा शुद्धोदनिरिति संदि- ग्धसाधनव्यतिरेकः, शौद्धोदनौ रागादिमत्त्वस्य निवृत्तेः संशयात् ।। ७५ ॥ अर्थ-कोई विवक्षित पुरुप अग्राह्य वचन वाला है, क्योकि वह रागानि वाला है, जो ग्राह्य वचन वाला होता है वह वीतराग होना है, जैम बुद्ध । यहाँ 'बुद्ध' दृष्टान्त संदिग्धसाधनव्यतिरेक है है क्योकि बुद्ध मे रागादिमत्व (साधन ) के अभाव में संदेह । ) संदिग्ध-उभयव्यतिरेक दृष्टान्ताभास न वीतरागः कपिलः करुणास्पदेष्वपि परमकृपयाऽन- पितनिजपिशितशकलत्वात् , यस्तु वीतरागः स करुणास्पदेषु परमकृपया समर्पितनिजपिशितशकलस्तद्यथा तपनवन्धुरिति संदिग्धोभयव्यतिरेकः; तपनबन्धौ वीतरागत्वाभावस्य करुणा- स्पदेष्वपि पग्मकृपया समर्पितनिजपिशितशकलत्वस्य च व्या- वृत्तेः संशयात् ।। ७६ ॥ अर्थ-कपिल वीतराग नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने दया-पात्र व्यक्तियो को भी परम कृपा से प्रेरित होकर अपने शरीर के मांस (१२६) [ पष्ठ परिच्छेद के टुकडे नहीं दिये है; जो वीतराग होता है वह दयापात्र व्यक्तियों को परम कृण से प्रेरित होकर अपने शरीर के मांस के टुकड़े दे देता है, जैसे बुद्ध । यहाँ बुद्ध दृष्टान्त संदिग्ध-उभय व्यतिरेक दृष्टान्ताभाम है क्योंकि बुद्ध में नो वीनगगना के अभाव की (माध्य की) व्यावृत्ति है और न दयापात्र व्यक्तियों को माम के टुकड़े न देने रूप माधन की ही व्यावृत्ति है। अर्थात् यहाँ दृष्टान्न म माध्य और माधन की ही व्यावृत्ति है। अर्थात् यहाँ इप्टान्त में माध्य और साधन दोनो के अभाव का निश्चय नही है। (७) अन्यतिरेक दृष्टान्ताभास न वीतगगः कश्चित् विवक्षितः पुरुषो वक्तृत्वात् यः पुनर्वीतरागो न स वक्ता यथोपलखण्ड इत्यव्यतिरेकः ॥७७॥ पर्य-गोड विवक्षित पुरुप वीनराग नहीं है क्योकि वह वक्ता है, जो वीतराग होता है वह वक्ता नहीं हाना, जैसे 'पत्थर का टुकडा' इप्टान्त अव्यानरंक इप्टान्नामाम है, क्योंकि यहाँ जो व्यतिरक व्याप्ति बताई गई है, वह ठीक नहीं है। (5) अप्रदर्शित व्यतिरेक दृष्टान्ताभास अनित्यः शब्दः कृतकत्वादाकाशवदित्यप्रदर्शितव्यति- रेकः ॥ ७८ ॥ अर्थ-शब्द अनित्य है क्योकि कृतक है, जैसे आकाश । यहाँ आकाश दृष्टान्न अप्रदर्शिनव्यतिरेक दृष्टान्ताभास है, क्योकि इस दृष्टान्न म व्यतिरेक व्याप्ति नहीं बताई गई है।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक (१३०) (6) विपरीतन्यतिरेक दृष्टान्ताभास अनित्यः शब्दः कृतकत्वात् , यत्कृतकं तन्नित्यं यथा- ऽऽकाशम् , इति विपरीतव्यतिरेकः ॥ ७९ ॥ अर्थ-शब्द अनित्य है क्योंकि है। जो कनक होता है वह नित्य होता है, जैसे आकाश । यहाँ आकाश दृष्टान्त विपरीन- व्यतिरेक दृष्टान्ताभाम है क्योकि यहाँ व्यतिरेक व्याप्ति विपरीत बताई गई है। अर्थात् साध्य के अभाव मे साधन का अभाव बताना चाहिए सो साधन के अभाव में साध्य का प्रभाव बता दिया है। उपनयाभास और निगमनाभास कृतक उक्तलक्षणोल्लानेनोपनयनिगमनयोर्वचने तदाभासौ।८० यथा परिणामी शब्दः कृतकत्वात् , यः कृतकः स परिणामी यथा कुम्भः, इत्यत्र परिणामी च शब्दः कृतकश्च कुम्भ इति च ॥८१॥ तस्मिन्नेव प्रयोगे तस्मात् कृतकः शब्द इति, तस्मात् परिणामी कुम्भ इति ।। ८२॥ अर्थ-उपनय और निगमन का पहले जो लक्षण कहा गया है उसका उल्लंघन करके उपनय और निगमन बोलने मे उपनयाभास और निगमनाभास हो जाते हैं। उपनयाभास का उदाहरण-शब्द परिणामी है, क्योंकि (१३१) [ पर परिच्छेद कृनक है. जो कृषक होता है वह परिणामी होता है जैसे कुम्भ; यहाँ 'शब्द परिणामी है' या 'कुम्भ कृतक है। इस प्रकार कहना ।। और इमी अनुमान में 'इमलिए शब्द कृतक है अथवा 'इमलिए घट परिणामी है ऐमा कहना निगमनाभास है। विवेचन-पन में हेतु का दोहगना उपनय कहल ता है । हेतु को न दोहग कर किसी और को दोहगना उपनयाभास है। जैसे उक्त उदाहरण 'शब्द परिणामी है' यहाँ पन मे साध्य को दोहराया गया है और 'कुम्भ कृतक है' यहाँ पर सपक्ष (दृष्टान्त ) मे हेतु दोहराया गया है, अतः यह दोनो उपनयाभाम है। पक्ष में माध्य का दोहगना निगमन है। और को न दोहरा कर, फिमी को किपी में दोहरा देना निगमनाभाम है । जैसे यहाँ पन (शब्द) में एक जगह कुनकत्व हेतु को दोहरा दिया है और दूमग जगह मपक्ष (कुम्भ ) में माध्य को दोहराया है। इस लए शब्द परिणामी है' ऐमा कहना निगमन होता किन्तु 'उमलिए शब्द कृनक है। 'इमलिए कुम्भ परिणाम है' ऐमा कहना निगमनाभास है। पक्ष में माध्य भागमाभास वचन से अनाप्तवचनप्रभवं ज्ञानमागमाभासम् ॥ ८३ ॥ अर्थ-अनाप्त पुरुप उत्पन्न होने वाला ज्ञान आगमाभास है। विवेचन--आगम और प्राप्त का स्वरूप पहले कहा जा चुका है। यथाथ ज्ञाता और यथार्थवक्ता पुरुप को कहते हैं । जो श्राप्त न हा वह अनाप्त है। अनाप्त के वचन से होने वाला ज्ञान भागमा- भास है।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक
(१३२)
प्रागमाभास का उदाहरण
यथामेकलकन्यकायाः कूले, तालहितालयोर्मूले सुलभाः
पिण्डखजूराः सन्ति, त्वरितं गच्छत गच्छत बालकाः ॥८॥
अर्थ जैसे रेवा नदी के किनारे, ताल और हिंताल वृक्षों के
नीचे पिंड खजूर पड़े हैं-लड़को | जाओ, जल्दी जाओ ।।
विवेचन-वास्तव मे रेवा नदी के किनारे पिंडखजूर नहीं हैं,
फिर भी कोई व्यक्ति बच्चों को बहकाने के लिए झूठमूठ ऐसा कहता
है । इस कथन को सुनकर बच्चों को पिडखजूर का ज्ञान होना
आगमाभाम है।
प्रमाण सख्याभास
प्रत्यक्षमेवैकं प्रमाणमित्यादि संख्यानं तस्य संख्या
ऽऽभासम् ॥ ८५ ॥
--एक मात्र प्रत्यक्ष ही प्रमाण है, इत्यादि प्रमाण की
मिथ्या संख्या करना संख्यामाम है।
अर्थ-
विवेचन-वास्तव मे प्रमाण के
प्रत्यक्ष
और परोक्ष दो भेद
हैं, यह पहल स्पष्ट किया जा चुका है। इन भेदों से विपरीत एक, दो,
तीन, चार आदि भेद मानना सख्याभाम या भेदाभास है । कौन
कितने प्रमाण मानते है यह भी पहले ही बताया जा चुका है।
विपयाभास
सामान्यमेव, विशेष एव, तद् द्वयंवा स्वतन्त्रमित्यादि-
स्तस्य विषयाभासः ॥८६॥
(१३३) [ पष्ठ परिच्छेद 4- के पर्य-मामान्य हो प्रमाग का विषय है विशेष ही प्रमाण का विषय है. प्रशवा परम्पर मर्वथा भिन्न मामान्य-विशेप प्रमाण विषय है. अन्यादि मानना प्रमागा का विषयामाम है। विचन-मामान्य श्री विशेष अलग पदार्थ नहीं हैं। यह दोनो पार्थ के धर्म और पदार्थ से कयचित् अभिन्न हैं। पारस में भी दोनों कांचन प्रभिन्न हैं। श्रन' सामान्य-विशेष रूप वस्तु को ही प्रमाग विषय कहा गया है। उसमें विपरीन वेदान्नियों का माना श्रा क्वल मामान्य, बानो माना हश्रा केवल विशेप और योगी के गाने हा मर्वथा भिन्न सामान्य-विशेष, यह मत्र विषयाभाम हैं। फन्नाभाम अभिन्नमेव मित्रमेव या प्रमाणात् फलं तस्य तदा- मासम् ॥ ७॥ पर्य-प्रमाण में मर्वया प्रभिन या मर्वथा भिन्न प्रमाण का फल फलाभाम है। विचन-यात प्रमाण का फल प्रमाण में मर्वथा अभिन्न मानत पीर नयायिक सर्वथा भिन्न मानते हैं । वस्तुन' यह सब फलाभाम है; कोकि फल नो प्रमाण मे कथचित भिन्न और कथचित अभिन्न होना है। Mod सातवाँ परिच्छेद नयों का विवेचन - नय का स्वरूप नीयते येन श्रुताख्यप्रमाणविषयीकृतस्यार्थस्यांशस्तदि- तरांशौदासीन्यतः स प्रतिपत्तुरभिप्रायविशेषो नयः॥१॥ अर्थ --श्रुनज्ञान द्वाग जाने हुए पदार्थ का एक धर्म, अन्य धर्मों को गौण करके, जिस अभिप्राय से जाना जाता है, वक्ता का यह अभिप्राय नय कहलाता है। विवेचन-श्रुनज्ञान रूप प्रमाण अनन्त धर्म वाली वस्तु को ग्रहण करता है। उन अनन्त धर्मों में से किसी एक धर्म को जानने वाला ज्ञान नय कहलाता है । नय जब वस्तु के एक धर्म को जानता है नब शेष रहे हुए धर्म भी वस्तु में विद्यमान तो रहते ही हैं किन्तु उन्हे गौण कर दिया जाता है। इस प्रकार सिर्फ एक धर्म को मुख्य करक उसे जानने वाला ज्ञान नय है। नयाभास का स्वरूप स्वाभिप्रेतादशादितरांशापलापी पुनर्नयाभासः॥२॥ अर्थ-अपने अभीष्ट अंश के अतिरिक्त अन्य अंशो का अपलाप करने वाला नयाभाम है।
(१३५) [ मानवाँ परिच्छेद विवेचन-वस्तु के अनन्त अंशो (धर्मों) में से एक अंश को ग्रहण करकं शेप ममत्त अंशो का प्रभाव मानने वाला नय ही नया- भाम है । तात्पर्य यह है कि नय एक अश को ग्रहण करना है पर अन्य अंशा पर उपेक्षा भाव रखता है और नयाभास उन अशो का निषेध करता है । यही नय और नयाभास में अन्तर है। नय के भेद स व्याससमासाम्यां द्विप्रकारः॥३॥ व्यासतोऽनकविकल्पः॥४॥ समासतस्तु द्विभेदो द्रव्यार्थिकः पर्यायार्थिकश्च ॥ ५॥ अर्थ -नय दो प्रकार का है-व्यामनय और समासनय ॥ व्यासनय अनक प्रकार का है ।। समाननय दो प्रकार का है-द्रव्यार्थिक नय और पर्यायार्थिक नय ॥ विवेचन-विस्तार रूप नय व्यामनय कहलाता है और सक्षेप रूप नय स्माम नय कहलाता है । नय के यदि विस्तार मे भेद .किए जाएँ तो वह अनन्न होंगे, क्योकि 'वस्तु मे' अनन्त धर्म हैं और एक- एक धर्म को जानने वाला एक-एक नय होता है । अतएव व्यास-नय के भेदों की सख्या निर्धारित नही की जा सकती। समामनय द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक के भेद से दो प्रकार का है । द्रव्य को मुख्य रूप से विषय करने वाला द्रव्यार्थिक और पर्याय को मुख्यरूप से विषय करने वाला पर्यायार्थिक नय है।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१३६) दन्यार्थिक नय के भेद आयो नैगमसंग्रहव्यवहारभेदात् त्रेधा ॥६॥ अर्थ-द्रव्यार्थिक नय नीन प्रकार का है-(१) नैगम नय (२) संग्रह नय और (३) व्यवहार नय । नैगमनय धर्मयोधर्मिणोधर्मधर्मिणोश्च प्रधानोपसर्जनभावन यद्वि- वक्षणं स नैकगमो नैगमः ॥ ७ ॥ सच्चैतन्यमात्मनीति धर्मयोः॥ ८ ॥ वस्तु पर्यायवद्राव्यमिति धर्मिणोः ॥ ६॥ क्षणमेकं सुखी विषयासक्तजीव इति धर्मधर्मिणो॥१०॥ अर्थ-दो धर्मों की, दो धमियो की और धर्म-धर्मी की प्रधान और गौण रूप से विवक्षा करना, इस प्रकार अनेक मार्गों से वस्तु का बोध कराने वाला नय नैगमनय कहलाता है। दो धर्मों का प्रधान-गौण भाव-जैसे आत्मा में सत्त्व से युक्त चैतन्य है॥ दो धर्मियो का प्रधान-गौणभाव-जैसे पर्याय वाला द्रव्य वस्तु कहलाता है। धर्म-धर्मी का प्रधान-गौणभाव-जैसे विषयासक्त जीव क्षण भर सुखी होता है | विवेचन-दो धर्मों में से एक धर्म की मुख्य रूप से विवक्षा (१३७) [सातवाँ परिच्छेद करना और दूसरे धर्म की गौण रूप से विवक्षा करना, इमी प्रकार दो द्रव्यों में से एक की मुख्य और दूसरे की गौण रूप से विवक्षा करना नथा धर्म धर्मी में से किमी को मुख्य और किमी को गौण ममझना, नैगमनय है । नैगमनय अनेक प्रकार से वस्तु का बोध कराता ܕܽ मत्व और चैतन्य आत्मा के दो धर्म हैं. किन्तु 'श्रात्मा में मत्व युक्त चैतन्य है' इस प्रकार कह कर चैतन्य धर्म का मुख्य बनाया गया है और मत्व को चैतन्य का विशेषण बनाकर गौण कर दिया है। इमी प्रकार हव्य और वस्तु दो धर्मी हैं, किन्तु 'पर्याय वाला दव्य वस्तु है' एमा कह कर द्रव्य को गौण और वस्तु को मुख्य रूप से विवक्षित किया गया है। इसी प्रकार 'विषयासक्त जीव क्षण भर सुम्बी है' यहाँ जीव विशेष्य होने के कारण मुख्य है और मुखी विशेपण होने के कारण गौण है। नेगमाभास का स्वरूप धर्मयादीनामैकान्तिकपार्थक्याभिसन्धिनेगमाभासः॥११॥ अर्थ-दो धर्मों का, दो धर्मियो का और धर्म तथा धर्मी का एकान्त भेद मानना नैगमनयामाम कहलाता है। विवेचन वास्तव मे धर्म और धर्मी मे कथंचित् भेद है, दो धों में तथा दो धर्मियों में भी आपस मे कथंचित् भेद है, इसके बदले उनमें सर्वथा भेद की कल्पना करना नैगमनयाभास है।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक
(१३८)
नेगमाभास का उदाहरण
यथाऽऽत्मनि सत्वचैतन्ये परस्परमत्यन्तं पृथग्भूते
इत्यादिः ॥ १२॥
अर्थ-जैसे आत्मा में सत्त्व और चैतन्य धर्म परस्पर में
सर्वथा भिन्न हैं, इत्यादि मानना ।
सग्रहनय का स्वरूप
सामान्यमात्रग्राही परामर्शः संग्रहः ॥ १३ ॥
अयमुभयविकल्प:-परोऽपरश्च ॥ १४ ॥
अर्थ-सिर्फ सामान्य को ग्रहण करने वाला अभिप्राय संग्रह
नय है।
संग्रहनय के दो भेद हैं-(१) परसंग्रह (२) अपरसंग्रह ।।
विवेचन-विशेष की ओर उदासीनता रख कर सत्तारूप पर
सामान्य को और द्रव्यत्व, जीवत्व आदि अपर सामान्य को ही ग्रहण
करने वाला नय संग्रहनय कहलाता है। सग्रहनय का विषय सामान्य
है और सामान्य पर-अपर के भेद से दो प्रकार का है अतएव सग्रह-
नय के भी दो भेद होगये हैं-परसग्रह और अपरसंग्रह ।
.
परसंग्रहनय
अशेषविशेष्वौदासीन्यं भजमानः शुद्धद्रव्यं सन्मात्रमभि-
मन्यमानः परसंग्रहः ॥ १५ ॥
(१३६) [ मानवाँ परिच्छेद विश्वमेकं सदविशेषादिति यथा ॥ १६॥ अर्थ-समस्त विशेषों में उदासीनता रखने वाला और शुद्ध सत्ता मात्र द्रव्य को विषय करने वाला नय पर संग्रहनय कहलाता है। जैसे-सत्ता सब में पाई जाती है अतः विश्व एक रूप है। विवेचन–पर मामान्य को सत्ता या महासत्ता कहते हैं। उसी को पर संग्रहनय विषय करता है । सत्ता सामान्य की अपेक्षा विश्व एक रूप है, क्योकि विश्व का कोई भी पदार्थ सत्ता से भिन्न नहीं है। परसग्रहाभास सत्ताद्वैतं स्वीकुर्वाणः सकलविशेषानिराचताणस्तदा- भासः ॥ १७ ॥ सत्चैव तत्वं, ततः पृथग्भूतानां विशेषाणामदर्शनात् ॥१८ अर्थ-एकान्न मत्ता मात्र को स्वीकार करने वाला और घट आदि सब विशेषों का निषेध करने वाला अभिप्राय परसंग्रह नया- भास है। जैसे-सत्ता ही वास्तविक वस्तु है, क्योकि उमसे भिन्न घट आदि विशेप दृष्टिगोचर नहीं होते। विवेचन-पर संग्रह नय भी सत्ता मात्र को ही विषय करता है और परमंग्रह नयाभास भी सत्तामात्र को ही विपय करता है किन्तु दोनो मे भेद यह है कि परसग्रह विशेषो का निषेध नहीं करता-उनमें उपेक्षा वतलाता है और परसंग्रहाभास उनका निषेध करता है। इस
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक]
प्रकार दूसरे अंश का अपलाप करने से यह नयाभास हो गया है।
वेदान्त दर्शन परमंग्रहाभाम है क्योकि वह एकान्त रूप से सत्ता को
ही तत्त्व मानता और विशेपो को मिथ्या वतलाता है।
अपर सग्रहनय
।
द्रव्यत्वादीनि अवान्तरसामान्यानि मन्वानस्तद्भेदेपु-
गजनिमीलिकामवलम्बमानः पुनरपरसंग्रहः ॥ १६ ॥
धर्माधर्माकाशकालपुद्गलजीवद्रव्याणामैक्यं द्रव्यत्वा-
भेदादित्यादिर्यथा ॥ २० ॥
अर्थ-द्रव्यत्व पर्यायत्व आदि अपर सामान्यो को स्वीकार
करने वाला और उन अपर सामान्यों के भेदों में उदासीनता रखने
वाला नय अपर संग्रहनय कहलाता है।
जैसे--धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पुद्गल और जीव द्रव्य
सब एक हैं क्योकि सब में एक द्रव्यत्व विद्यमान है।
विवेचन-छहों द्रव्यो में समान रूप से रहने वाला द्रव्यत्व
अपर सामान्य है । अपर सग्रह नय, अपर सामान्य को विपय करता
है। अत. इसकी दृष्टि में द्रव्यत्व एक होने से सभी द्रव्य एक हैं।
अपरसग्रहाभास
द्रव्यत्वादिकं प्रतिजानानस्तद्विशेषान्निनुवानस्तदाभासः॥
यथा द्रव्यत्वमेव तत्त्वं, ततोऽर्थान्तरभूतानां द्रव्याणामनुप-
लब्धेः॥ २२॥
(१४१) [ सातवाँ परिच्छेद अर्य-व्यत्व आदि अपरमामान्यों को स्वीकार करने वाला और उनके भेदी का निषेध करने वाला अभिप्राय अपरमग्रह- नयाभान है। जैमे--दव्यत्व ही वास्तविक है, उसमे भिन्न धर्म आदि द्रव्य उपलब्ध नहीं होतं ॥ विवेचन-दव्यत्व आदि मामान्यो को अपर संग्रहनय म्बी- कार करता है पर वह उनके भेटो का-धर्म आदि द्रव्यो का-निषेध नहीं करना: यह अपग्मंग्रह नयाभास अपर मामान्य के भेटो का निषेध करना है, इसलिए नयाभाम है व्यवहारनय संग्रहेण गोचरीकृतानामर्थानां विधिपूर्वकमवहरणं येना- भिसन्धिना क्रियते स व्यवहार ॥ २३ ॥ यथा यत् सत् तद् द्रव्यं पर्यायो वा ॥ २४ ॥ अर्थ-संग्रह नय के द्वाग जाने हुए मामान्य रूप पदार्थों में विधिपूर्वक भेट करने वाला नय व्यवहार नय कहलाना है। जैसे-जो सन होता है वह या तो दर होता है या पर्याय ।। विवेचन-मंग्रहनय द्वारा विपय किये हुए मामान्य मे व्यव- हार नय भंट करता है। मामान्य से लोक-व्यवहार नही होता। लोक- व्यवहार के लिये विशेपो की अावश्यकता होती है। 'गोत्व' सामान्य दुहा नहीं जा मकना और न 'अश्वत्व' मामान्य पर सवारी की जा मकती है । दुहने के लिये गाय-विशेप की आवश्यकता है और मवारी के लिए अश्व-विशेप की अपेक्षा होती है। अतः लोक-व्यवहार के अनु-
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक]
(१४२)
है
कूल, सामान्य मे भेद करना व्यवहार नय का कार्य है। उदाहरणार्थ-
संग्रहनय ने सत्ता रूप अभेद माना, व्यवहार उसके दो भेद करता
है-द्रव्य और पर्याय
व्यवहारनयाभास
यः पुनरपारमार्थिकद्रव्यपर्यायविभागमभिप्रेति स व्यव-
हाराभासः ॥ २५ ॥
यथा-चार्वाकदर्शनम् ॥ २६ ॥
अर्थ-जो नय द्रव्य और पर्याय का अवास्तविक भेद स्वी-
कार करता है वह व्यवहारनयाभाम है ।।
जैसे-चार्वाक दर्शन ॥
विवेचन-द्रव्य और पर्याय का वास्तविक भेद मानना व्यवहार नय
है और मिथ्या भेद मानना व्यवहाग्नयाभास है । चार्वाक दर्शन
वास्तविक द्रव्य और पर्याय के भेद को स्वीकार नहीं करता किन्तु
अवास्तविक भूत-चतुष्टय को स्वीकार करता है। अतः चार्वाक दर्शन
(नास्तिक मत) व्यवहार नयाभाम है।
पर्यायार्थिकनय के भेद
पर्यायार्थिकश्चतुर्द्धा-ऋजुसूत्रः शब्दः समभिरूढ एवं-
भूतश्च ॥२७॥
अर्थ-पर्यायार्थिकनय चार प्रकार का है-(१) ऋजुसूत्र
(२) शब्द (३) समभिरूढ और (४) एवभून ।
ऋजुसूत्रनय
ऋजु-वर्तमानक्षणस्थायि पर्यायमात्र प्राधान्यतः सूत्र-
यन्नभिप्रायः ऋजुसत्रः ॥ २८ ॥
(१४३) [सातवाँ परिच्छेद यथा-सुखविवर्त्तः सम्प्रत्यस्तीत्यादि ॥ २६ ॥ अर्य-पदार्थ की वर्तमान क्षण में रहने वाली पर्याय को ही प्रधान रूप में विषय करने वाला अभिप्राय ऋजुसूत्र नय कहलाता है। -इम समय सुग्ब रूप पर्याय है, इत्यादि । विवेचन-द्रव्य को गौण करके मुख्य रूप से पर्याय को निय करने वाला नय पर्यायार्थिक नय कहलाता है। ऋजुसूत्र नय भी पर्यायार्थिक नय है अतएव यह पर्याय को ही मुख्य करता है। 'इस समय सुख पर्याय है इन वाक्य से सुग्व पर्याय की प्रधानता घोनित की गई है, सुख पर्याय के आधार भूत द्रव्य-जीव को गौण कर दिया गया है। ऋजुसूत्रनयाभास सर्वथा द्रव्यापलापी तदाभासः ॥ ३० ॥ यथा-तथागतमतम् ॥ ३१ ।। अर्थ-द्रव्य का एकान्त निपेव करने वाला अभिप्राय ऋजुसूत्र- नयाभास कहलाता है। जैसे-बौद्धमत। विवेचन-ऋजुसूत्रनय द्रव्य को गौण करके पर्याय को मुग्व्य करता है, किन्तु ऋजुसूत्राभाम द्रव्य का मर्वथा अपलाप कर देना है। वह पर्यायों को ही वास्तविक मानता है और पर्यायों मे अनु- गत रूप से रहने वाले द्रव्य का निषेध करता है । बौद्धो का मत- क्षणिकवाद या पर्यायवाद-ऋजुसूत्रनयाभास है।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१४) शन्टनय who कालादिभेदेन ध्वनरर्थभेदं प्रतिपद्यमानः शब्दः ॥३२॥ यथा बभूव भवति भविष्यति सुमेरुरित्यादिः ॥३३॥ अर्ध-काल आदि के भेद से शब्द के वाच्य अर्थ में भेद मानने वाला नय शव्दनय कहलाता ॥ जैसे-सुमेरु था, सुमेरु है. और सुमेन होगा । विवेचन-शब्दनय और आगे के ममभिरूढ नथा एवंभून नय शब्द को प्रधान मानकर उसके वाच्य अर्थ का निरूपण करते हैं इसलिए इन तीनो को शव्दनय कहते हैं। काल, काग्क, लिग और वचन के भेद से पदार्थ में भेद मानने वाला नय शदनय कहलाना है । उदाहरणार्थ-मुमेक था, सुमेरु है और सुमेरु होगा, इन तीन वाक्यो मे एक सुमेरु का त्रिकाल सम्बन्धी अस्तित्व बनाया गया है, पर यहाँ काल का भेद है, अतः शब्द नय सुमेर को तीन रूर म्वीकार करता है। शव्दनयाभास तभेदेन तस्य तमेव समर्थयमानस्तदाभासः ॥ ३४ ॥ यथा बभूव भवति भविष्यति सुमेरुरित्यादयो भिन्न- कालाः शब्दा भिन्नमेवार्थमभिदधति, भिन्नकालशब्दत्वात्, तादृसिद्धान्यशब्दवदित्यादि ॥ ३५ ॥ अर्थ-काल अादि के भेद से श के वाच्य पदार्थ में एकात भेद मानने वाला अभिप्राय शब्दनयाभाम है।
(१४५) [ सातवाँ परिच्छेद जैसे सुमेरु था, सुमेरु है और सुमेरु होगा, इत्यादि भिन्न कालवाचक शब्द सर्वथा भिन्न पदार्थों का कथन करते हैं, क्योकि वे भिन्न कालवाचक शब्द हैं, जैसे भिन्न पदार्थों का कथन करने वाले दूसरे भिन्नकालीन शब्द अर्थात् अगच्छत, भविष्यति और पठति आदि ॥ विवेचन-काल का भेद होने से पर्याय का भेद होता है फिर भी द्रव्य एक वस्तु बना रहता है। शब्द नय पर्याय-दृष्टि वाला अतः वह भिन्न-भिन्न पर्यायो को ही स्वीकार करता है, द्रव्य को गौण करके उसकी उपेक्षा करता है। परन्तु शब्नयामास विभिन्न कालों अनुगत रहने वाले द्रव्य का सर्वथा निषेध करता है। इसीलिए यह नयाभास है। में समभिरूड नय पर्यायशब्देषु निरुक्तिभेदेन भिन्नमर्थं समभिरोहन समभिरूढः ॥ ३६॥ इन्दनादिन्द्रः, शकनाच्छकः, पूर्दारणाद् पुरन्दर इत्या- दिपु यथा ।। ३७ ॥ श्रर्थ- पर्यायवाचक शब्दों में निरुक्ति के भेद से अर्थ का भेद मानने वाला समभिरूढ नय कहलाता है। जैसे-ऐश्वर्य भोगने वाला इन्द्र है, सामर्थ्य वाला शक्र है और शत्रु-नगर का विनाश करने वाला पुरन्दर, कहलाता है। विवेचन-शब्दनय काल आदि के भेद से पदार्थ में भेद मानता है पर समभिरूढ़ उससे एक कदम आगे बढकर काल आदि प्रमाण-नय-तत्त्वालोका (१४६) का भेद न होने पर भी क्वल पर्यायवाची शब्दों के भेद ने ही पदार्थ में भेद मान लेता है। इन्द्र, शक्र और पुरन्दर शब्द-तीनी एक इन्द्र के वाचक है विन्तु नमभिरूद्ध नय इन शब्दों की व्युत्पत्ति के भेट पर रष्टि दौड़ाना है और कहता है कि जब नीनों शब्दो की व्युत्पत्ति पृथक्-पृथक् है तब तीनों शब्दों का वाच्य पदार्थ एक कैमे हो नक्ता है ? अत. प्याय- वाची शन्न के भेद ने अर्थ से भेद मानना चाहिये। इम प्रकार समभिरु नय अर्थ सम्बन्धी अभेद को गौरा करके पर्याय-भद से अर्थ मे भेद स्वीकार करना है। समभिक नयामास पर्यायध्वनीनामभिधेयनानात्वमेव कक्षीकुर्वाणस्तदा- भासः॥ ३८॥ यथा इन्द्रः शक्रः पुरन्दर इत्यादयः शब्दा भिन्नाभि- घेया एव, भिन्नशब्दत्वात् , करिकुरगतुरङ्गवदित्यादिः ॥३६॥ अर्थ-एकान्त रूप से पर्याय-वाचक शब्दों के वाच्य अर्थ में भेद मानने वाला अभिप्राय समभिरुड़ नयाभास है।। जैमे-इन्द्र, शक, पुरन्दर आदि शन्न भिन्न-भिन्न पदार्थ के वाचक हैं। क्योंकि वे भिन्न-भिन्न शब्द हैं, जैसे करी (हाथी) कुरंग (हिरन ) और तुरंग (घोड़ा) शब्द ।। विवेचन-समभिरूदनय पर्याय-भेद से अर्थ में भेद स्वीकार करता है पर अभेद का निषेध नहीं करता, उसे केवल गौण कर देता (१४७) [सातवाँ परिच्छेद है ममभिरूढ नयाभाम पर्यायवाचक शब्दों के अर्थ में रहने वाले श्रभेद का निषेध करके एकान्त भेद का ही समर्थन करता है। इस. लिय यह नयामाम है। एवंभूत नय शब्दानां स्वप्रवृत्तिनिमित्तभूतक्रियाऽऽविष्टमर्थ वाच्य- लेनाभ्युपगच्छन्नेवंभूतः ॥ ४० ॥ यथा-इन्दनमनुभवन्निन्द्रः शकनक्रियापरिणतः शक्रः, पूरणप्रवृत्तः पुरन्दर इत्युच्यते ॥ ४१ ॥ अयंगाट की प्रवृत्ति की निमित्त रूप क्रिया से युक्त पदार्थ को उम नट का वाच्य मानने वाला नय एवंभूत नय है ।। जमे-इन्दन (श्वर्य भोग ) रूप क्रिया के होने पर ही इन्द्र कहा जा सकता है, शान ( मामर्थ्य )म्प क्रिया के होने पर ही शक कहा जा सकता है और पूरण (गत्रु नगर का नाश) कप क्रिया के होने पर ही पुग्न्टर कहा जा मकता है। विवचन-एवंभूत नय वह दृष्टिकोण है जिमके अनुमार प्रग्या गळ क्रियाशठ ही है। प्रत्येक शब्द से किसी न किसी क्रिया का अर्थ प्रकट होता है। एमी अवस्था में जिम शब्द से जिस क्रिया का भाव प्रकट होता हो, उम क्रिया में युक्त पदार्थ को उसी समय उस शट में कहा जा सकता है। जिस ममय में वह क्रिया विद्यमान न हो उम ममय उस क्रिया का सूचक शन्द प्रयुक्त नहीं किया जा मकना । जैसे पाचक शन मे पकाने की क्रिया का चोध होता है, अतण्व जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु को पका रहा हो तभी उसे प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१४८) पाचक कहा जा सकता है, अन्य समय मे नही । यही भाव इन्द्र,शक और पुरन्दर शब्दों के उदाहरण से समझाया गया है। इस दृष्टि- कोण को एवंभूत नय कहते हैं। एवम्भूत नयाभास क्रियानाविष्टं वस्तु शब्दवाच्यतया प्रतिक्षिपंस्तु तदा- भासः ॥४२॥ यथा-विशिष्टचेष्टाशून्यं घटाख्यं वस्तु न घटशब्द- वाच्यं, घटशब्दप्रवृत्तिनिमित्तभूतक्रियाशून्यत्वात्, पटवदि- त्यादिः ।। ४३ ॥ अर्थ-क्रिया से रहित वस्तु को उस शब्द का वाच्य मानने का निषेध करने वाला अभिप्राय एवभूत नयाभास है। जैसे-विशेष प्रकार की चेष्टा से रहित घट नामक वस्तु, घट शब्द का वाच्य नहीं है क्योकि वह घट शब्द को प्रवृत्ति का कारण रूप क्रिया से रहित है, जैसे पट-आदि । विवेचन-एवभून नय अमुक क्रिया से युक्त पदार्थ को ही उस क्रिया-वाचक शब्द से अभिहित करता है, किन्तु अपने से भिन्न दृष्टिकोण का निषेध नहीं करता। जो दृष्टिकोण एकान्त रूप से क्रिया-युक्त पदार्थ को ही शब्द का वाच्य मानने के माथ, उस क्रिया से रहित वस्तु को उस शब्द के वाच्य होने का निषेध करता है वह एवभूत नयाभास है । एवंभूत नयाभास का दृष्टिकोण यह है कि अगर घटन क्रिया न होने पर भी घट को घट कहा जाय तो पट या अन्य पदार्थों को भी घट कह देना अनुचित न होगा। फिर तो कोई !
(१४६) [सातवाँ परिच्छेद भी पदार्थ किसी भी मन में कहा जा सकेगा। इस अव्यवस्था का निवारण करने के लिए यही मानना उचित है कि जिम शब्द मे जिस क्रिया का भान हो उस क्रिया की विद्यमानता में ही उस शब्द का प्रयोग किया जाय । अन्य ममयों में उस शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता। अर्धनय और शन्दनय का विभाग एतेषु चत्वारः प्रथमेऽर्थनिरूपणप्रवणत्वादर्थनयाः॥४४॥ शेपास्तु त्रय शब्दवाच्यार्थगोचरतया शन्दनयाः ॥४॥ अप -इन माता नयों में पहले के चार नय पदार्थ का निरू- पण करने वाले हैं इसलिए वे अर्थनय हैं। अन्तिम नीन नय गन्द के वाच्य अर्थ को विपय करने वाले हैं हम कारण उन्हें शनय कहते हैं। विधन-नंगम, मंग्रह, व्यवहार और ऋजुमूत्र, पदार्थ का प्रम्पण गत हैं उमन्निा उन्हें अर्थनय कहा गया है और शब्द, मम- मिन्द और एवंभृत-यह तीन नय, किम शब्द का वाच्य क्या होता है-यह निरूरा करने हैं. इसलिए यह शट नय कहलाते हैं। नयों के विपय में अल्पबहुत्व पूर्वो पूर्वो नयः प्रचुरगोचरः, परः परस्तु परिमित- विपयः ॥ ४६॥ अर्ण-सात नयों में पहले-पहले के नय अधिक-अधिक विपय वाले हैं और पिछल-पिछले कम विषय वाले हैं।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१५०) विवेचन-सातो नयो के विषय कीन्यूनाधिकता यहाँ सामान्य रूप से बताई गई है। पहले वाला नय विशाल विपय वाला और पीछे का नय संकुचित विषय वाला है। तात्पर्य यह है कि नैगम नय सबसे विशाल दृष्टिकोण है । फिर उत्तरोत्तर दृष्टिकोणों मे सूक्ष्मता आती गई है। विशेष विवरण सूत्रकार ने स्वयं दिया है। अल्पबहुत्व का स्पष्टीकरण सन्मात्रगोचरात् संग्रहान्नैगमो भावाभावभूमिकत्वाद् भूमविषयः॥४७॥ सद्विशेषप्रकाशकाद्व्यवहारतः संग्रहः समस्तसत्समूहो- पदर्शकत्वात् बहुविषयः॥४८॥ वर्तमानविषयादृजुसूत्राद् व्यवहारस्त्रिकालविषयावल- म्बित्वादनल्पार्थः ॥ ४६॥ कालादिभेदेन भिन्नार्थोपदर्शिनः शन्दाद्-ऋजुसूत्रस्त- द्विपरीतवेदकत्वान्महार्थः ॥ ५० ॥ प्रतिपर्यायशब्दमर्थभेदमभीप्सतः समभिरूढाच्छब्दस्त- द्विपर्ययानुयायित्वात् प्रभूतविषयः ॥ ५१ ॥ प्रतिक्रियं विभिन्नमर्थ प्रतिजानानादेवंभूतात् समभि- रूढस्तदन्यथार्थस्थापकत्वान्महागोचरः ॥ ५२ ।। अर्थ-सिर्फ सत्ता को विषय करने वाले संग्रहनय की अपेक्षा सत्ता और असत्ता को विषय करने वाला नैगम नय अधिक विषय वाला है।
[ सातवाँ परिच्छेद थोडे से सत् पदार्थों को विषय करने वाले व्यवहार नय की अपेक्षा, समस्त सत् पदार्थों को विषय करने वाला संग्रहनय अधिक विषय वाला है। वर्तमान क्षणवर्ती पर्याय मात्र को विषय करने वाले ऋजु- सूत्रनय की अपेक्षा त्रिकालवर्ती पदार्थ को विपय करने वाला व्यव- वहारनथ अधिक विषय वाला है। काल आदि के भेद से पदार्थ में भेद बताने वाले शब्दनय की अपेक्षा, काल आदि का भेद होने पर भी अभिन्न अर्थ बताने वाला ऋजुमूत्रनय अधिक विपय वाला है। पर्यायवाची शब्द के भेद से पदार्थ में भेद मानने वाले सम- भिरूढनय की अपेक्षा, पर्यायवाची शब्द का भेद होने पर भी पदार्थ में भेद न मानने वाला शब्दनय अधिक विपय वाला है। क्रिया के भेद से अर्थ मे भेद मानने वाले एवंभूतनय की अपेक्षा, क्रिया-भेद होने पर भी अर्थ मे भेद न मानने वाला ममभि- रूढनय अविक विषय वाला है। विवेचन-सातों नयों में उत्तरोत्तर सूक्ष्मता किस प्रकार आती गई है, यह क्रम यहाँ बताया है। नैगम-नय सत्ता और असत्ता दोनों को विषय करता है, संग्रहनय केवल सत्ता को विषय करता है, व्यवहार थोड़े से मत् पदार्थों को विपय करता है, ऋजुसूत्रनय वर्त्त- मान क्षणवर्ती पर्याय को ही विषय करता है, शब्दनय काल, कारक आदि का भेद होने पर पदार्थ में भेद मानता समभिरूढ़ नय काल आदि का भेद न होने पर भी शब्द-भेद से ही पदार्थ मे भेद मानता है और एवंभूत नय क्रिया के भेद से ही प्रमाण-नय-तत्त्वालोक (१५२) पदार्थ को भिन्न मान लेता है। इस प्रकार नय क्रमशः सूक्ष्मता की ओर बढ़ते हैं और एवभूतनय सूक्ष्मता की पराकाष्ठा कर देता है। नयसप्तभंगो नयवाक्यमपि स्वविषये प्रवर्त्तमानं विधिप्रतिषेधाभ्यां- सप्तभंगीमनुव्रजति ॥ ५३॥ अर्थ-नय-वाक्य भी अपने विषय में प्रवृत्ति करता हुआ विधि और निषेध की विवक्षा से सप्तभंगी को प्राप्त होता है। विवेचन-विकलादेश, नयवाक्य कहलाता है। उमका स्त्र- रूप पहले बताया जा चुका है। जैसे विधि और निषेध की विवक्षा से प्रमाण-सप्तभगी बनती है उसी प्रकार नय की भी मप्तभंगी वनती है। नय-सप्तभंगी मे भी 'स्यात्' पढ़ और 'एव' लगाया जाता प्रमाण-मप्तमगी सम्पूर्ण वस्तु के स्वरूप को प्रकाशित करती है और नय-सप्तभङ्गी वस्तु के एक अंश को प्रकाशित करती है। यही दोनों में अन्तर है। , है नय का फल प्रमाणवदस्य फलं व्यवस्थापनीयम् ॥५४॥ अर्थ-प्रमाण के समान नय के फल की व्यवस्था करना चाहिए। विवेचन-प्रमाण का साक्षात् फल अज्ञान की निवृत्ति होना बताया गया है, वही फल नय का भी है। किन्तु प्रमाण से वस्तु सम्बन्धी अज्ञान की निवृत्ति होती है और नय से वस्तु के अंश-सम्ब- [सातवाँ परिच्छेद न्धी अज्ञान की निवृत्ति होती है। इसी प्रकार वस्तु के अंश-विषयक उपादानबुद्धि हानबुद्धि और उपेक्षाबुद्धि नय का परोक्षफल समझना चाहिए। दोनो प्रकार का फल प्रमाण से कथंचित् भिन्न कथंचित् अभिन्न है, इसी प्रकार नय का फल नय से कथंचित् भिन्न और कथं- चित् अभिन्न है। प्रमाता का स्वरूप प्रमाता प्रत्यक्षादिप्रसिद्ध आत्मा ॥ ५५ ॥ चैतन्यस्वरूपः परिणामी कर्ता साक्षाद्भोक्ता स्वदेह- परिमाणः प्रतिक्षेत्रं भिन्नः पोद्गलिकादृष्टवांश्वायम् ॥५६॥ अर्थ--प्रत्यन आदि प्रमाणो से सिद्ध आत्मा प्रमाता कहलाता है। श्रात्मा चैतन्यमय है, परिणमनशील है, कर्मों का कर्ता है, कर्मफल का सानात भोक्ता है, अपने प्राप्त शरीर के बराबर है, प्रत्येक शरीर में भिन्न है और पुद्गलरूप अदृष्ट ( कर्म ) वाला है। विवेचन-चार्वाक लोग आत्मा नही मानते । उनके मत का खण्डन करने के लिए यहाँ यह बताया गया है कि आत्मा प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम प्रमाण से सिद्ध है । 'मैं सुखी हूं, मैं दुखी हूँ' इस प्रकार स्वसंवेदन प्रत्यक्ष आत्मा का अस्तित्व सिद्ध करता है। तथा 'रूप आदि के ज्ञान का कोई कर्त्ता अवश्य है, क्योंकि वह क्रिया है, जो क्रिया होती है, उसका कोई कर्ता अवश्य होता है, जैसे काटने की क्रिया। जानने की क्रिया का जो कर्त्ता है वही आत्मा है। इस प्रकार प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१५४) अनुमान से भी आत्मा सिद्ध है । इसके अतिरिक्त 'एगे आया' इत्यादि आगमो से भी आत्मा सिद्ध है ।यह आत्मा चैतन्यमय आदि विशेषणों से विशिष्ट है। चैतन्य स्वरूप-इस विशेपण मे नैयायिक आदि का खण्डन होता है, क्योकि वे आत्मा को चैतन्य रूप नहीं मानते। परिणामी-इस विशेषण से मांख्य मत का निराकरण होता है, क्योंकि सांख्य आत्मा को कूटस्थ नित्य मानते हैं, परिणमन- शील नहीं मानते। कर्ता-यह विशेपण भी सांख्य-मत के निराकरण के लिए है। सांख्य आत्मा को अकर्ता मानते हैं और प्रकृति को कर्त्ता मानते हैं। साक्षात् भोक्ता-यह विशेषण भी साख्य-मत के खण्डन के लिए है । सांख्य आत्मा को कर्म-फल का साक्षात् भोगने वाला नहीं मानते। स्वदेह परिमाण-इस विशेपण से नैयायिक और वैशेपिक मत का खण्डन किया गया है, क्योंकि वे आत्मा को आकाश की भाँति व्यापक मानते हैं। प्रतिशरीरभिन्न-इस विशेषण से वेदान्त मत का खण्डन किया गया है, क्योंकि वेदान्त मत में एक ही आत्मा माना गया है। वे समस्त शरीरों में एक ही आत्मा मानते हैं। पौद्गलिक अदृष्टवान्-यह विशेषण नास्तिक मत का खण्डन करता है, क्योंकि नास्तिक लोग अदृष्ट नहीं मानने । तथा जो लोग अदृष्ट मानते हैं किन्तु उसे पौद्गलिक नहीं मानते उनके मत का भी इससे खण्डन होता है।
[सातवाँ परिच्छेद मुक्ति का स्वरूप तस्योपात्तपुंस्त्रीशरीरस्य सम्यग्ज्ञानक्रियाभ्यां कृत्स्न- कर्मक्षयस्वरूपा सिद्धिः॥ ५७ ॥ अर्थ-पुरुप का शरीर या स्त्री का शरीर पाने वाले आत्मा कोसम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र से, समस्त कर्म-क्षय रूप मुक्ति प्राप्त होती है। विवेचन-आत्मा पुरुप या बी का शरीर पाकर सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र के द्वारा ज्ञानावरण आदि आठो कर्मों का पूर्ण रूप में तय करता है । इमी को मुक्ति कहते हैं । यहाँ 'स्त्री का शरीर' कह कर स्त्रीमुक्ति का निषेध करने वाले दिगम्बर सम्प्रदाय का निगस किया गया है। कोई लोग अकेले ज्ञान से मुक्ति मानते हैं, कोई अकेली क्रिया से मुक्ति मानते हैं। उनका खडन करने के लिए ज्ञान और क्रिया-दोनी का ग्रहण किया है। सम्यग्दर्शन भी मोक्ष का कारण है किन्तु वह सम्यग्जान का महचर है, जहाँ मम्यग्ज्ञान होगा वहाँ सम्यग्दर्शन अवश्य होगा। इसीलिये यहाँ सम्यग्दर्शन को अलग नहीं बताया है।
अष्टम परिच्छेद वाद का निरूपण वाद का लक्षण विरुद्धयोधर्मयोरेकधर्मव्यवच्छेदेन स्वीकृततदन्यधर्म- व्यवस्थापनार्थ साधनदृपणवचनं वादः ॥१॥ अर्थ-परस्पर विरोधी दो धर्मों मे से, एक का निषेध करके अपने मान्य दूसरे धर्म की सिद्धि के लिए साधन और दूपण का प्रयोग करना वाद है। विवेचन-आत्मा की सर्वथा नित्यता और कथंचित नित्यता ये दो विरोधी धर्म हैं। इनमे से किसी भी एक धर्म को स्वीकार करके, और दूसरे धर्म का निषेध करके, वादी और प्रतिवादी अपने पक्ष को साधन के लिए और विरोधी पक्ष को दूषित करने के लिए जो वचन- प्रयोग करते हैं वह वाद कहलाता है। वादी को अपने पक्ष की सिद्धि और पर पक्ष का निराकरण-दोनों करने पड़ते हैं और इसी प्रकार प्रतिवादी को भी दोनों ही कार्य करने पड़ते हैं। वादी-प्रारम्भक के भेद प्रारम्भकश्चात्र जिगीषुः, तत्वनिर्णिनीषुश्च ।। २ ॥
(१५७) [ अष्टम परिच्छेद अर्थ-गो प्रकार के प्रारम्भक होते हैं--(१) जिगीपु-विजय की इच्छा करने वाला और (२) तत्त्वनिर्णिनीपु-तत्व के निर्णय का इच्छुक । निगीपु का स्वरूप स्वीकृतधर्मव्यवस्थापनार्थं साधनदूपणाभ्यां परं परा- जेतुमिच्छुः जिगीपुः ॥ ३॥ अर्थ-वीकार किये हुए धर्म की सिद्धि करने के लिए, स्व- पक्ष के साधन और पर-पक्ष के दूपण द्वारा प्रतिवादी को जीतने की इच्छा रखने वाला जिगीपु कहलाता है। तत्त्वनिर्णिनीपु का स्वरूप तथैव तत्त्वं प्रतितिष्ठापयिपुस्तत्त्वनिर्णिनीपुः ॥ ४॥ अर्ध-पूर्वोक्त गति से तत्त्व की स्थापना करने का इच्छुक तत्वनिर्णिनीपु कहलाता है। विवेचन-वाद प्रारम्भ करने वाला चाहे विजय का इच्छुक हो, चाहे नत्व निर्णय का इच्छुक हो, उसे अपने पक्ष को प्रामाणिक स्य से सिद्ध करना पड़ता है और पर-पक्ष को दूपित करना पड़ता है। जिगीपु और तत्त्वनिर्णिनीपु का भेद वाद के उद्देश्य पर ही अव- लम्बिन रहना है स्वपक्ष-साधन और परपक्ष-दूपण तो दोनो के लिए समान कार्य है तत्वनिर्णिनीपु के भेद अयं च द्वेधा-स्वात्मनि परत्र च ॥ ५ ॥ आद्यः शिष्यादिः॥६॥ द्वितीयो गुर्वादिः ।।७॥
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१५८) अयं द्विविधः क्षायोपशमिकज्ञानशाली केवली च ॥८॥ अर्थ-तत्त्वनिर्णिनीपु दो प्रकार के हैं-(१) स्वात्मनि तत्त्व- निर्णिनीपु और (२) परत्र तत्त्वनिर्णिनीपु ।। शिष्य आदि स्वात्मनि तत्त्वनिर्णिनीपु हैं। गुरु आदि परत्र तत्त्वनिर्णिनीपु हैं । परत्र तत्त्वनिर्णिनीपु भी दो प्रकार के होते हैं। क्षायोपशमिक- ज्ञानी और केवली ॥ विवेचन-अपने आपके लिए तत्वबोध की इच्छा रखने वाले स्वात्मनि तत्त्वनिर्णिनीपु कहलाते हैं और दूमरे को तत्त्व-वोध कराने की इच्छा रखने वाले परत्र तत्त्वनिर्णिनीपु कहलाते हैं । स्वा- त्मनि तत्त्वनिर्णिनीपु शिष्य, मित्र या और कोई सहयोगी होता है और परत्र तत्त्वनिर्णिनीपु गुरु, मित्र या अन्य सहयोगी हो सकता है। इस प्रकार वाद का प्रारम्भ करने वाले चार प्रकार के होते हैं- (१) जिगीषु (२) स्वात्मनि तत्त्वनिर्णिनीपु (३) क्षायोपशमिकज्ञानी परत्र तत्वनिर्णिनीषु और (8) केवलीपरत्रतत्त्वनिर्णिनीपु । प्रत्यारम्भक एतेन प्रत्यारम्भकोऽपि व्याख्यातः ॥ ६ ॥ अर्थ-पूर्वोक्त कथन से प्रत्यारम्भक की भी व्याख्या होगई। विवेचन-प्रारम्भक के चार भेद बताये हैं, वही चार भेद प्रत्यारम्भक के भी समझने चाहिए । इस प्रकार एक-एक प्रारम्भक के साथ चारो प्रत्यारम्भकों का विवाद हो तो वाद के सोलह भेद हो सकते हैं। किन्तु जिगीषु का स्वात्मनि तत्त्वनिर्णिनीपु के साथ, स्त्रा- मनि तत्त्वनिर्णिनीषु का जिगीपु के साथ, स्वात्मनि तत्त्वनिर्णिनीषु का स्वात्मनि तत्त्वनिर्णिनीपु के साथ और केवली का केवली के साथ वाद होना सम्भव नहीं है, इसलिए चार भेद कम होने से वाद के
प्रत्यारंभक
प्रारम्भक
जिगीपु
स्वा. त नि. प.त.नि. क्षायो
प.त वि.
केवली
सम्भव
संख्या
जिगीपु
हो सकता है
हो सकता है। हो सकता है
३
स्वा० तत्त्वनिर्णिनीपु
.
२
[ अष्टम परिच्छेद
(१५६)
बारह भेद ही होते हैं। प्रारम्भक का किस प्रत्यारम्भक के माथ वाद
होता है और किसके साथ नहीं, यह इस नक्शे से स्पष्ट ज्ञान होगा
पत. क्षायोपशमिकज्ञानी हो सकता है हो सकता है
४
प. त. केवली
سد
सम्भव संख्या
३
२
४
३
१२
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक (१६०) अंग-नियम तत्र प्रथमे प्रथमतृतीयतुरीयाणां चतुरङ्ग एव, अन्यत- मस्याप्यपाये जयपराजयव्यवस्थादिदौःस्थ्यापत्तेः ॥ १० ॥ अर्थ-पूर्वोक्त चार प्रारम्भको मे.से पहले जिगीपु के होने पर जिगीपु, परत्रतत्त्वनिर्णिनीपु क्षायोपशमिकज्ञानी और केवली प्रन्या- रम्भक का वाद चतुरग होता है । किमी भी एक अङ्ग के अभाव में जय-पराजय की ठीक व्यवस्था नही हो सकती। विवेचन-वादी, प्रतिवादी, मभ्य और सभापति, बाद के यह चार अङ्ग होते हैं । जिगीपुवादी के साथ उक्त तीन प्रतिवादियो का वाद हो तो चारो अगां को आवश्यकता है। द्वितीये तृतीयस्य कदाचिद्व्यङ्गः, कदाचिद् व्यङ्गः।११॥ अर्थ-दूसरे वादी-स्वात्मनितत्त्वनिर्णिनीपु का तीसरे प्रति- वाढी-क्षायोपशमिकज्ञानी परत्र तत्त्वनिर्णिनीपु का वाद कभी दो अग वाला और कभी तीन अङ्ग वाला होता है। विवेचन-स्वात्मनि तत्त्वनिर्णिनीपु जय-पराजय की इच्छा से वाद में प्रवृत्त नहीं होता, अत उसके साथ परत्र तत्त्वनिर्णिनीघु क्षायोपशमिकज्ञानी का वाद होने पर सभ्य और सभापति की आव. श्यकता नहीं है, क्योकि सभ्य और सभापति जय-पराजय की व्यव. स्था और कलह आदि की शान्ति करने के लिए होते हैं । अलबत्ता जब क्षायोपशमिकज्ञानी परत्र तत्त्वनिर्णिनीपु तत्व का निर्णय न कर सके तो दोनों को सभ्यों की आवश्यकता होती है। इसीलिये कभी दो अंग वाला और कभी तीन अङ्ग वाला वाद बतलाया गया है।
(१६१) [ अष्टम परिच्छेद तत्रैव दूयंगस्तुरीयस्य ॥ १२॥ अर्थ-स्वात्मनि तत्त्वनिर्णिनीपु वादी का चौथे प्रतिवादी- केवली के साथ दो अङ्ग वाला वाद होता है । विवेचन केवली भगवान् , तत्त्व-निर्णय अवश्य कर देते हैं अतएव इस वाद में सभ्यों की भी आवश्यकता नही पड़ती। तृतीये प्रथमादीनां यथायोगं पूर्ववत् ॥ १३ ॥ अर्थ-परत्र तत्त्वनिर्णिनीपु क्षायोपशमिकज्ञानी वादी हो तो, प्रथम, द्वितीय आदि प्रतिवादियों का पहले के समान यथायोग्य वाद होता है। विवेचन-यदि तीसरा वादी हो तो उसके साथ प्रथम प्रति- वाटी का चतुरंगवाद होगा, द्वितीय और तृतीय प्रतिवादी का कभी दो अङ्ग वाला, कभी तीन अङ्ग वाला वाद होगा और चतुर्थ प्रतिवादी के साथ दो अङ्ग वाला ही वाद होगा। तुरीये प्रथमादीनामेवम् ।। १४ ॥ अर्थ-परत्र तत्वनिर्णिनीषु केवली वादी हो नो प्रथम प्रति- वादी के साथ चतुरग और द्वितीय तथा तृतीय प्रतिवादी के साथ दो अङ्ग वाला वाद ही होता है। वाद के चार अंग वादिप्रतिवादिसभ्यसभापतयश्चत्वार्यङ्गानि ॥ १५ ॥ अर्थ-वाद के चार अंग होते हैं-वादी, प्रतिवादी, सभ्य और सभापति ।
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१६२) वादी प्रतिवादी का लक्षण प्रारम्भकप्रत्यारम्भकावेव मल्लप्रतिमल्लन्यायेन वादि- प्रतिवादिनौ ॥ १६ ॥ अर्थ-मल्ल ओर प्रतिगल्ल की भाँति प्रारम्भक और प्रत्या- रम्भक क्रम से वादी और प्रतिवादी कहलाते हैं। वादी-प्रतिवादी का कर्तव्य प्रमाणतः स्वपक्षस्थापनप्रतिपक्षप्रतिक्षेपावनयोः कर्म । अर्थ-प्रमाण से अपने पक्ष की स्थापना करना और विरोधी पक्ष का खण्डन काना वादी और प्रतिवादी का कर्तव्य है। विवेचन केवल अपने पक्ष की स्थापना कर देने से या केवल विरोधी पक्ष का खण्डन कर देने से तत्त्व का निर्णय नहीं होता । अतः तत्त्वनिर्णय के लिए दोनों को दोनों कार्य करना चाहिए। सम्यों का लक्षण वादिप्रतिवादिसिद्धान्ततत्त्वनदीष्णत्व-धारणा-बाहुश्रुत्य- प्रतिभा-शान्ति-माध्यस्थैरुभयाभिमताः सभ्याः ॥ १८ ॥ अर्थ-जो वादी और प्रतिवादी के सिद्धान्त-तत्त्व में कुशल हों, धारणा, बहुश्रुतता, प्रतिभा, शान्ति और मध्यस्थता से युक्त हो तथा वादी और प्रतिवादी द्वारा स्वीकार किये गये हों, ऐसे विद्वान् सभ्य होते हैं।
(१३) [ अष्टम परिच्छेद सभ्यों का कर्तव्य वादिप्रतिवादिनौ यथायोगंवादस्थानककथाविशेषांगी- कारणाऽग्रवादोत्तरवादनिर्देशः, साधकबाधकोक्तिगुणदोषाव- धारणम् , यथावसरं तत्कलप्रकाशनेन कथाविरमणम् , यथा- संभवं सभायां कथाफलकथनं चैपां कर्माणि ॥ १६ ॥ अर्थ-वादी और प्रतिवादी को वाद के म्यान का निर्णय करना, कथा-विशेप को स्वीकार कराना, पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष नियन कर देना, बोले हुए माधक और बाधक प्रमाणां के गुण दोष का निश्चय करना, अवमर ान पर (जय वादी, प्रतिवादी या दोनों श्रमली विपय को दोडकर इधर-उधर भटकने लगें तत्र) तत्त्व को प्रकट करके वार को ममाम करना, और यथायोग्य वाद के फल (जय-पराजय ) की घोषणा करना, सभ्यो का कर्तव्य है। सभापति का लपण प्रवाऽऽनश्वर्यक्षमामाध्यस्थसम्पन्नः सभापतिः ॥२०॥ अर्थ-प्रमा, श्राना, ऐश्वर्य, क्षमा और मध्यस्थता गुणों से युक्त मभापति होना है। विवेचन--जो स्वयं बुद्विशाली हो, श्राजा प्रदान कर मकता हो, प्रभावशाली हो, नगाशील हो और वाढी तथा प्रतिवादी के प्रति निष्पत्त हो वही सभापति पद के योग्य है। सभापति का कन्य वादिसम्याभिहितावधारणकलहव्यपोहादिकं चास्य - कर्म ।। २१ ॥
प्रमाण-नय-तत्त्वालोक (१६४) अर्थ-वादी, प्रतिवादी और मभ्यो के कथन का निश्चय करना, तथा कलह मिटाना आदि सभापति के कर्तव्य हैं। विवेचन-वाढी-प्रतिवादी और सम्यो के कथन का निश्चय करना तथा वादी और प्रतिवादी में अगर कोई शर्त हुई हो तो उसे पूर्ण कगना अथवा पारितोपिक वितरण करना सभापति का कर्तव्य है। वादी-प्रतिवादी के बोलने का नियम सजिगीपुकेऽस्मिन् यावत्सम्यापेक्ष स्फूतौ वक्तव्यम् ॥२२॥ अर्थ-जब जिगीपु का जिगीपु के साथ वाद हो नो हिम्मत होने पर जब तक सभ्य चाहे तब तक बोलते रहना चाहिये । विवेचन-जब तक वादी प्रतिवादी में से कोई एक स्वपक्ष- साधन और परपक्ष-दूपण करने में असमर्थ नहीं होता तब तक किसी विपय का निर्णय नहीं होना । इस अवस्था मे वादी-प्रतिवादी. को अपना अपना वक्तव्य चालू रखना चाहिये । जव सभ्य बोलने का निषेध करदें तब बंद कर देना चाहिए । यह जिगीपु-वाद के लिए है। उभयोस्तत्त्वनिर्णिनीपुत्वे यावत्तत्त्वनिर्णयं यावत्स्फूर्ति च वाच्यम् ॥ २३॥ अर्थ-दोनों-वादी प्रतिवादी यदि तत्त्वनिर्णिनीपु हो तो तत्त्व का निर्णय होने तक उन्हे बोलना चाहिए । अगर तत्त्व-निर्णय न हो पावे और वादी या प्रतिवादी को आगे बोलना न सूझ पड़े तो जक तक सूझ पड़े तब तक बोलना चाहिए । -00 बंगाल संस्कृत एसोसिएशन की प्रथमा परीक्षा के प्रश्नपत्र ? सन् १६३६ पूर्णसंख्या-१००। समय १२-४ । [मर्वे प्रश्नाः ममानमानार्हाः। पञ्च एव प्रश्ना. समाधातव्या' । १। म्वमते कानि प्रमाणानि ? को वा नय ? किञ्च तत्त्वम् पतन सर्च मूत्राण्युल्लिख्य वैशयेन लेख्यम। २। को वा अवग्रह. ? का च ईहा ? कीडशो व्यपदेशभेद ? किश्च अवधिनानम ? एतत् मर्च सन्दर्भतो विशदीकृत्य लेखनीयम् । ३ | "उपलम्भानुपलम्भसम्भव त्रिकालीकलितसाध्यसाधन- मम्बन्धाद्यालम्बनमिठमम्मिन मत्येव भवतीत्याद्याकारं संवेदनमूहापर- "न तु बिलनणकादि."; "व्याप्तिग्रहणसमयापेक्षया माध्यं धर्म ण्वान्यथा तदनुपपत्ते.”–सूत्राणामपां ससद्गतिक व्यायानं कुर्वन्तु । ४। स्वमते अभावः कतिविधः ? तेपां सार्थक्यं लक्षणानि चोल्लेख्यानि । का विरुद्धोपलब्धिः ? सा कतिविधा ? सूत्रमुल्लिख्य पष्टतया लेसनीया। " नामा तर्क ५1 ६ । किं तावद्वचनलक्षणम ? किं तस्यात्र प्रयोजनम् ? किवा शब्दलक्षणं तत्प्रामाण्यश्च ? तत् सर्च सूत्रमुल्लिख्य व्याकरणीयम् ।
-
.
[२]
७ । "इतरथापि संवेदनात्" "विधिमात्रादिप्रधानतयापि
तस्य प्रसिद्धः" , "तद्विपरीतस्तु विकलादेशः"-एपां सूत्राणां सङ्गति-
प्रदर्शनपूर्वक व्याख्यानं कुर्वन्तु श्रीमन्त ।
८। “यत् प्रमाणेन प्रसाध्यते तदस्य फलम", "प्रमातुरपि
स्वपरव्यवसितिक्रियाया कथञ्चिद्भेद"-अनयो सूत्रयोः मङ्गति
प्रदर्श्य व्याख्यानं कार्यम |
है। व्या'ते' तर्कामासस्य च लक्षणमुद्धृत्य व्याख्यायताम् ।
१० । प्रत्यभिज्ञान-स्मृत्योश्च लक्षणं प्रदर्श्य सोदाहरणं
व्याक्रियताम।
सन् १९४१
पूर्णसंख्या–१०० । समय. १२-४ ।
[सर्वे प्रश्ना' समानमानार्हाः । पञ्च एव प्रश्ना समाधातव्याः ।],
१। स्वाभिमतप्रमाणयोयो प्रत्यक्षपरोक्षयोः यया रीत्यामि
अन्येषां प्रमाणानाम् अन्तर्भावः सा रीतिः प्रदर्शनीया ।
व्यपदेश अनवगतिप्रसङ्गः, विकलम्
केवलज्ञानम् , त्रिलक्षणकादि', प्रसिद्धो धर्मी, इत्येषां पदान
लक्षणज्ञापकानि सूत्राणि समुल्लिख्य व्याख्यायन्ताम् ।
३। सादृश्य-शक्ति-स्मरण-अभावानां स्वमते कस्मिन् प्रमार
अन्तर्भावः १ तद् विशदरीत्या लेख्यम् ।
२। अवाय
.
[३] ४। साधर्म्य-वैधर्म्यदृष्टान्तानां सोदाहरणं सूत्राण्युल्लिख्य न्याख्यायन्नाम् । प्रागभाव-प्रध्वंमाभाव-व्याप्य-व्यापकजातीनां सोदाहर- रणानि सूत्राणि ममुद्धृत्य तानि व्याख्यायन्ताम् । ।। वर्णपटवाक्यात्मक वचनम् , म च द्वधा लौकिको लोकोत्तरश्च , स्यान्नाम्त्येव सर्वमिति निषेधकल्पनया द्वितीयः, इत्यनेपां मूत्राणां मोदाहरणा व्याख्या विधेया श्रीमद्भि.। ७। इतरथापि संवेदनात्, युगपद्विधिनिषेधात्मनोऽर्थस्यावाचक प्रवासौ इति वचो न चतुरस्रम् प्रतिपर्यायं प्रतिपाद्य पर्य्यनुयोगानां समानामेव सम्भवान् एतेपां मूत्राणाम् उदाहरणमुखेन व्याख्यान कुर्वन्तु श्रीमन्तः। । यत् प्रमाणन प्रमाध्यते तदस्य फलम् , प्रमातुरपि म्वपरव्यवमितिक्रियाया कथञ्चिद्भवः,मांव्यवहारिकप्रत्यक्षमिव यदा भामत तत्तदाभासम्-तेपा सूत्राणा साशय व्याख्यानं कायं श्रीमद्धि। ६। शब्दम्य नित्यत्वानित्यत्वसाधने सूत्राणि प्रदर्श्य स्वमते सिद्धान्त. प्रदर्शनीयः। १०। बमने किं निर्वाणलक्षणम् ? को वा वीतरागः, अवीनगगश्च क. इत्येतत् सर्व ग्रन्थतो वैशयेन लेखनीयम् ।