Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Rajasthani Padh Sangrah

Kothari Komal · 2011/03

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STUCOATETIKATI PRILETRAS
राजस्थानी पद्य संग्रह
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान री राजस्थानी साहित्य री माध्यमिक
कक्षा वां री पद्य री पाठ्यपुस्तक]
सम्पादक :
कोमल कोठारी
निदेशक
रूपायन संस्थान बोलंदा, जोधपुर
शार्दूलसिह कविया
प्रधानाचार्य
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, जैसलमेर
POMDW
[माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान के अधिकार द्वारा प्रकाशित
स्टूडैन्ट ब्रादर्स एण्ड कम्पनी
भरतपर

प्रकाशक :
स्टूडैण्ट ब्रादर्स एण्ड कम्पनी,
भरतपुर
फोन नं. : २०३६ दुकान
:
२३२६ निवास
यह पुस्तक राज्य स्तरीय कागज आवंटन समिति के मार्फत भारत सरकार
द्वारा प्रदत्त सस्ते मूल्य के कागज पर छापी गई है।
मूल्य :
1
मुद्रक :
मित्र मण्डल प्रेस,
भरतपुर-३२१००१

सम्पादकीय राजस्थान काव्य री परम्परा वारह सौ बरसाँ सू अखूट चालै । उण माँस एक संकळन जोगो कवितावाँ छाँटणी सरळ कांम नी हो। किण कवियाँ ने टाला अर टाल्योड़ा कवियाँ रो किसी कवितावां छोड़ाँ अर किसी छाँटा । इण खातर सरू पोत आ बात मान लेणी चाहीज के ओ संकलन राजस्थानी काव्य परम्परा री एक वानगी मात्र है, जण सू राजस्थानी काव्य रो विड़द आसांनी सूकू तीज सके। राजस्थानी काव्य ने आपरी इतिहासू माठ में ओळखण री जुगत करा तो आ चौर्ड दीस के विभिन्न धारामिक राजनैतिक अर सामाजिक परि- स्थितियाँ उणरो रूप-सरूप आप रे हाथां ठायो। दूजै सवदां में आ वात यू कथीज सके के काव्य आप र वगत रो उणियारो है। सरू में राजस्थान रो राजनैतिक जीवण अथिर हो। विभिन्न सूरदीर परिवार आप आपरा राज थापण सारू जूझता अर होळे २ राजस्थान री आरवी साँस्कृतिक इकाई न्यारा रजवाड़ा रे निरमॉण री दसाँ मे वधण लागी तो इण रो सीधो प्रभाव राज- स्थानी कविता में लाथै । ज्याँ रण रसिया जुझारां री सूरवीरता साहस अर धीरज ने राजस्थान रे इतिहास री कीरत माँ नै उण रे लार ई राजस्थानी रा कवियाँ री अमर वाणी गूजै। वीर रस रे काव्यां री बणगट में जिण भाँत रोस-जोस हूंस, उमग अर उछाह दीसै वो उण जुग रा समाज अर सत्ता रो सही प्रतिविम्ब है। सूरापण, साहस अर मरण न्यू हार पण लाँव काळ ताई कविता रो खास जड़ाव रहयो । उण जुग रा कवि कोरा कलम रा धणी ही नी हा पण तरवार रा धणी भी हा । वीरा-रस रो झकोळ में जो कवियाँ रा बोल नीरसथा उण रे पाछे नवा इतियास रा निरमाण हुयगा। वीर भावना अर उण खातर त्यागमरजाद री मरोड़ आप रे काळ पर वाँण ई कू तीज। इसी साँगो पाँम दीठ सूकदीनी कवितावाँ री परख हो वणी चाहिजे । नै ६ धारो बदलियो, रूप वदलियो मरम बदलियो। अवार तॉई जकी कविता उद्- वोधन, रोस-जोस ललकार-फटकर री हुंकार रा डाका धुरावतो बा अब समाज अर मिनखरे अंतसरी भावनावाँ मे ऊडी अर अथाग उतरण लागी। सत्य- प्रकाश जोशो री 'हर' नाँव री कविता वम्बई जैड़ी महानगरी विचाल मुरघर रा 'मनख री वीसरी सुध-बुध ने विरखा रा छोटा रे साग सोधण लागी। बम्बई नगर री कीड़ो नगरा ज्यू कल बलती भीड़ में कवि एकलो अनहाय सूनो भो दोस । कवि रे मन में गाँव री निरमळ निस्छल प्रकृति रा चित्राम एक एक कर आवै अर कवि रा भावाँ ने विलमाव इण रे साग काव्य री तरगा मत ही उमगण लागे । गजानन वरमा री कवितावां मे कुटुम-कवीला री मोह ममता रा दरसण हुवे । लोकगीतां री मिठास भरी लांक मे वारी कवितावा नवी दिसा हे रै। कल्याणसिंह राजावत री नवी उक्तियाँ हिया में आणंद उम- गावै ।। कन्हैयालाल सेठिया रो रस भरी कविता मे राजस्थानी रे नवे जाग- रण री सहनाई रा सुर सुणीजै । चिड़ो कमेड़ी री कविता में दार्श नक भावां रा भला दरसण हुवै । ‘पीजरो' इणी भाँत री कविता एक वानगी जी मे कवि चिड़कल्यॉ ने संबोधन कर अचरज भरया पीजरा री अनन्तता री व्याख्या इण सबदा में करे-पारवाँ मरसी लाज, भुवाली खा खा फिरती आस्यो चिड़- कल्याँ कठ ' क उड़ जास्यो ? चन्द्रसिंह 'लू' अर 'बादली' रे मिस मरुधर रा लुभावणां चित्र कोरिया । राजस्थानी कविता में इण स्पैली प्रकृति-चित्रण रा जो वरणन 'मलै उण सू न्यारी भाँत री अन्तस री वातॉ 'वादली' मे मिलै । मुरघर री सूखी धरा आख्याँ भर भर बादळी रा वारणा लेव- ऊगियो, सोने सूरज दीठी वालि याँह । मुरधर लेवे वारणा, भर-भर आँख ड़ि याह ।

[ १ ] । । नारायण सिंह भाटी री 'साँझ' प्रकृति री छिच अर कवि री झोणी कल्पना रा पाँख पसार राजस्थानी काव्य ने नई दिशा दिखाई। मिनखरे अंतस रा हरख-विसाद सुख-दुःव, राग-विराग रा झीणा भावाँ ने दरसावण ने साँझ में एक नवो आसरो मिल्यो । हिन्दी रे छायावादी कवियां री सैली रो प्रभाव इण में सहज ही निजर आवै । सांझ रो मानवीयकरण घणो लुभावणो लागे । 'सांझ' कवि रा अंतस से रळ मिल एक मेक व्हेगी। साँझ रो ओ चित्राम जोवो लुकाती टिवलो अंबर ओट, निरखवा आई ओ संसार धड़कती छोती धीमी चाल, मुळकता नैणा सुरमो मार इणरे आगै आज रो नवीं कविता रो युग आरंभ हुवै आज जिसमे रा कवि आखर, मात्रा अर गणां ने गिण गिण परम्परा रे पंडे पड़ी क ड़या ने क वता नी मान । आ री मान्यता है के कविता रो नीझर अंतम सू आपे ई डाकै । मन रे सरळ संवेगां रो प्रवाह सारा वंधण तोड़ आपरा बेग सू मते ई खळ कोज । वा ही कविता हुदै । राजस्थानी मे नवे काव्य रो ओ आन्दोलन छंद री मरजाद ने तोड़ कविता री मरोड़ ई बदल दी। क' वता रो ओ नवो सरूप अर उणियारो नवाँ जुगरी मांग है । इण स्वच्छन्द उडाण मे उत्पन्न मनोभाव अर संवेगा री प्रक्रिया ने नवी कल्पना अर नवे विव मे ढालणो ई कविता रो सहज सरूप वणतो जावे । राजस्थानी मे मणि मधुकर, गोरधन सिह शेखावत अर तेजसिह जोधा नवी कविता रा आगीवॉण वण ने साम्हाँ आया । मधुकर री कविता "काळो घोड़ो" वरतमॉन जीवण री उण विसंग त अर विडम्बना काँनी आँगली उठावै जको भारी चहल पहल रे बीच निरासा अर रीस रा वीज वाव । कीड़ी नगरा रे उनमान कळवळता समाज री हाय तोबा रे माय मिनख मिनख रो ओ आपसी निरमोही नातो घणो विडरूप लागै । गोरधन सिंह शेखावत री कविता "मुरझायोड़ो पळ" वरतमान जीवण रा थोथा तुतड़ा उछाले । आळस अर उदासी रो एक विचित्र चित्रण प्रस्तुत माण [८] करै । तेजसिंह जोधा री कविता "वटपी गो है" कभी ना अर तूटती गाँव री जूनी परम्परा अर मान्यत.यां गे कानर है। बुद्धि प्रकाश पारीक राजस्थानी रा हान्य रग राया में अग्रणी है आपरी हास्य व्यंग री सरम रचनावा राजस्थानी रो गौरब बनाये। 'मैजू बजार की लालटण' इणी भांत री एक व्यग भरी रचना है। कागजसिंह हाडा जन कविर्या री गणना में आवै । आपरा पांच घणमोला बाजणां धूधरा' छाँटर लीना । आ न्यारा न्यारा 'घूघरारी घमरोळ घणी मीठी लागे । इण संकलन में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, गजस्थान के निर्धारित पाठ्य. क्रम ने ध्यान में राख कवितावाँ चुणी । पाठ रे आरंभ मे रचनाकार से पर- चय अर कविता रो मूळभाव अर पाठ रे अंत मे अभ्यास । सवाल दीना है। पाठवार कठिन सवदाँ रा अरथ , टिप्पणी अर छंद-अलकार पोथी रे आखिर मे लिख दीना है। म्हे वां कवियाँ रा घणेमान आभारी हाँ जिण री रचनावां इण संकलन में लोनी। -कोमल कोठारी -शार्दूल सिंह कविया प्रगुणा श्री. कविता-क्रम कविता कवि पाना मीरॉवाई १ ६ १. मीरां रा पद २. रांणा प्रताप ३. ढोला मारू रा दूहा ४. डिगळ गीत दुरसा आढाँ लोक-काव्य ओपा आढ़ा ५. गीत बाँकीदास आसिया १० १४ १६ : २३ २७ सूरजमल मीसण ६. वीर सतसई रा दूहा ७. लोक गीत ८. राजस्थानी रा दूहा ६. छपना रा छंद १० गाँधी ११- जुगवाणी हेतचाईजै संकलित संकलित ऊमरदान लाळस नाथूसिंह महिया रया गणेशीलाल व्यास उस्ताद' ३७ ४२ ४७ १२. वापू कन्हैयालाल सेठिया ५१ मेघराज मुकुल ५६ ६१ रेवतदान चारण 'कल्पित' ६ पीजरो १३. सूरज रे माथै सिंदूर १४. चेत मानखा इ कलाव री ऑधी १५. वादळो १६. साँझ १७. सोवनथाल चन्द्रसिह नारायणसिंह भाटी गजानन वरमा ६६ ७१ ७६

[ १० ]
कविता
कदि
पाना
१
१४
१८ इण धरतो कद मानी हार रामनाथ व्यास परिकार'
१६. अरज
सत्य प्रकाश जोगी
२०. -वजार की लालटण
बुद्धि प्रकाश पारीक
२१. गाड्यां निकळी चीला रेग्या कल्याण सिंह राजावत
२२. घूघरा
रघुराजसिंह हाडा
२३. कालो घोड़ो
२४. मुरझायोड़ो पल
गोरधनसिंह शेखावत
२५ काठ ई की व्हेगो है
तेजसिंह जोधा
परिशिष्ट
१. कठन सबदा रा अरथ अर टिप्पणी
२. छंद अर अलफार
मणि मधुकर
१०२
१०६
१११
११८
१३०

१. मीराबाई मीरांवाई रो जनम मेड़ता परगना रै गांव कुडकी में संवत् १५५५ रे लगभग हुयो । मीरांवाई मेड़ता रै राव दूदाजी री पोती ही अर मेवाड़ रै महाराणा सागा रे पाटवी राजकंवर भोजराज ने परणायी ही। वाळापण सू ई मीराबाई किसन भगवान री भगती करता। मीरांवाई री आव भगती रा घणा सोवणा भजन बणाया। मीरांबाई री भगती रो महातम घणो पवित्र अर ऊंचो हो । लोक- लाज अर कुळ री मरजादा ने छिटकाय आराध्य देव गिरधर नागर रे आगे' नाचता गाता अर भगती भाव दिखाता । मीराबाई रो काव्य विरह-विजोग अर प्रेम भाव रो काव्य है । वे किसन भगवान ने सूता जागता पल पल उडीकै बाट जोवै, हिड़दा में ध्यावै। मीरांवाई काव्य रो ओ मोटो गुण है के वी में गहरी अनुभूति अर अन्तस री पीड़ा चौर्ड दीसै । मीरांवाई रा भजन जिसा सरळ अर सुभट है उसाई झीणा अर मार- मिक है। इणी कारण मीरांवाई रा भजन जणो जणो गावै । अठै मीरांबाई रा पाच सरल भावपूर्ण भजन छाँट, र लीना है । . १. मोरां रा पद ( १ ) करम की गति न्यारी सतो ! करम की गति न्यारी । बडे बडे नैण दिये निरखण को, बन वन फिरत उघारी रे । उज्जवल वरन दीनो वगलन को, कोयल कर दीनी कारी रे। ओर नदियन जल निरमल कोनो, समुदर कर दीनो खारी रे । मूरख को उत्तम राज दियत हो पडित फिरत भिखारी रे । मीरा के प्रभु गिरधर नागर, राणोजी तो कोन विचारी रे ।।

[ २ ]
(२)
कोई कहियो रे प्रभु आवन की, आवन की मन भावन की।
आप न आवे लिख नहिं भेजे, वाण पड़ी ललचावन नी ।
ए दोई नेण वह्यो नहि मान, नदियां बहे जैसे मावन की।
कहा करू कछु नहिं बस मेरो, पांस नहि उड़ जावन की।
मीरां कहे प्रभु कब रे मिलोगे, चेरी भई हू तेरे दावन की।
( ३ )
गास्यां।
राणोजी रूसेला तो गांव राखेला हरि स्ट्या कुमलास्या।
राम नाम की जहाज बणास्या, भवसागर तिर जास्यां ।
चरणाम्रत को नेम हमारो, नित उठि दरसण पास्यां ।
विस रा प्याला राणोजी भेज्या, इमरत करि गटकास्यां ।
यो संसार विनास जानिके, ताको संग छिटकास्यां ।
लोक लाज कुळ का णिहु तजिके, निरम निसाण घुरास्यां ।
मीरा के प्रभु हरि अविनासी, चरण कमल वलि जास्यां ।
गोबिन्द का गुण
(४)
जो तुम तोड़ो पिया मैं नहिं तोड़ ।
तेरी प्रीति तोड़ि प्रभु कौन संग जोड़
तुम भये तरवर मैं भई पंखिया ।
तुम भये सरवर मैं तेरी मछिया ।
तुम भये गिरवर मैं भई मोरा ।
तुम भये चंदा में भई चकोरा ।।
तुम भये मोती मै भई घागा।
तुम भये सोना भई मै सुहागा ॥
वाई मीरां के प्रभु ब्रज के बासी ।
तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी ॥

[ ३ ।
( ५ )
राणाजी करमा रो संगाती कुळ मे कोत नहीं ।
एक तो माता रे दोय दोय डीकरा ज्यांनी न्यारी न्यारी भात ।
वाकी न्यारी न्यारी करमां रेल ।
एक तो राजाजी री गादी वैठिया दुजो हळ, र बैलं भरसी पेट ।
एक तो माता रे दोय दोय डीकरी ज्यावी न्यारी न्यारी भांत,
ज्यांकी न्यारी न्यारी करमाँ रेख ।
एक तो मोतियन माग भरावती दूजी घर घर की पणिहार ।
एक तो गऊ रे दो दो वाछड़ा ज्यांकी न्यारी न्यारी भात,
वानी न्यारी न्यारी करमाँ रेख ।
एक तो महादेवजी रे मंदिर नाँदियो दुजो वणजारा रे हाथ
एक तो कुम्हार रे दोय दोय मटकियां ज्याकी न्यारी न्यारी भात,
ज्यांकी न्यारी न्यारी करमां रेख ।
एक महादेव रे नंदिर जळ चढ़े, दूजी मसाणां रे माय ।
राणाजी करमाँ रो संगाती जग में कोई नहीं ।
-मीरांवाई
अश्यास रा हवाल
१. बडे बडे नैण दिये निरखण को
वन वन फिरत उधारी रे।
इण पंक्ति मे किण रा भाग री बात कही ?
(क) मीरविाई रे भाग री।
(ख) भीलणी रे भाग री ।
(ग) हिरणी रे भाग री ।
(घ) सीताजी रे भाग री ।
(च) पतिव्रता रे भाग री ।
--

[ ४ ] ( ) २ वाई मीरां के प्रभु ब्रज के वामी तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी। मीरा बाई ब्रजराज री दासी वणणो चादै । कारण: (क) मीरावाई व्रजराज ने आपरो मरवस्व माने । (ख) मीरांवाई नै राणाजी घणा सतावै । (ग) मीराबाई नै जमनाजी री याद आवै । (घ) मीरांवाई नै व्रजभोम चोखी लागे। (च) मीराबाई रो मेवाड़ में मन नी लागे । ३. विसरा प्याला राणोजी भेज्या इमरत करि गटकास्यां । इण कथन मे मीराबाई रे किण मनोभाव री ठा पड़े। (क) नारी हट (ख) अटल विस्वास (ग) भक्तिभाव (घ) वावळी रीस (च) अपघात ४. वांण पडी ललचावन की 1 इण ओळी मे बांण सवद रो अरथ है । (क) तीर (ख) चीला (ग) जेवड़ी (घ) बासण (च) आदत ५. एक तो मोतियन मांग भरावती, दूजी घर-घर की पणिहार । घर-घर पणिहार रो भावार्थ है : (क) पराये घरां पाणी भरै। (ख) पाणी मेल नै परोपकार करै । ( )

[ ५ ]
(ग) पणिहारी रे साग पाणी भरै ।
(घ) मजूरी कर नै पेट पाळ ।
(च) घर-घर मे पणिहार लगादे ।
६. नीचे लिखी ओळियां में रेखांकित रो आसय स्पस्ट करो
(क) लोक लाज कुळ काणिहु तजिके,
निरभे निसांण घरास्यां ।
(ख) एक तो महादेवजी रे मंदिर नांदियो
इजो वाणजारा रे हाथ ।
तुम भये चंदा भई मै चकोरा ।
चांद अर चकोर रो कोइ सम्वन्ध है ? ३० सवदां में उत्तर दो।
८. मीरांवाई आपरा नैणां नै सावण री नदियां री उपमा किण कारण
सूदी?
६. उज्जवल वरन दीनो बगलन को,
कोयल कर दीनी कारी रे ।
इण कथन सू कांई भाव प्रगट व्है ? .
१०. मोरांवाई करमां की गति ने न्यारी क्यू बताई ?
११. 'बांकी न्यारी न्यारी करमां रेख'
इण पद में मीरांवाई न्यारी न्यारी करमा रेख रा कोई कांई उदाहरण
दिया ? इण मे कोई सा दो उदाहरण मांडो ।
१२. मीरवाई संसार रो संग क्यू छिटकाणो चावै ?
१३. मीराबाई रे काव्य रो मुख्य भाव कांई है ?
.
.

२. दुरसा पाढ़ा
दुरसा आढा रो जनम संवत १५६२ में जोधपुर जिलं रे बूंदळे गांव
में हुयो । दुरसाजी री काव्य प्रतिभा दिल्ली रो पातसा अकबर भली भत
पिछोणतो । अकवर पातसा दुरमा जी रो खासो आदर करतो । बाँन आपरे
हाथों पसाव-पुरस्कार दिया । उदयपुर, जोधपुर बीकानेर अर मिरोही रे
रजवाड़ा मे दुरसाजी रो घणो कुरव-कायदो हो ।
दुरसाजी अपण समै रा मानेता कवि हा । काव्य रचना री आपरी
छह न्यारी-न्यारी पोथियाँ मिळं । जी में विड़द-छिहत्तरी घणी नामी । विड़द-
छिहत्तरी मे महाराणा प्रताप री धीरता अर वीरता रो मोरठा छंद में
वरणन है।
प्रस्तुत संकलन विड़द-छिहत्तरी री वानगी है।
इण रचना में राणा-
प्रताप रा स्वाभिमान रो साचो चित्राम है । विड़द-छिहत्तरी रो एक-एक मोरठो
राजस्थानी साहित्य री मोटी धरोहर है । दुरसाजी री एक-एक उक्ति वाँचण
वाळा रा हिया मे वीस रस री बोछाड़ कर ।
२. राणा प्रताप
अलख पुरुस आदेस, देस वचाय दयानिधे ।
वरणन करूं विसेस, सुहृद नरेस प्रतापसी ।।
अकबर काता याद, हिन्दू नृप हाजर हुवा ।
मेद पाट मरजाद, पग लागो न प्रतापसी ।२।
चितवं चित चीतोड़, चिता जळाई सो चतुर ।
मेवाड़ो जग मोड़, पावन पुरुस प्रतापसी ।।
कदे न नाम कंध, अकवर ढिग आवै न ओ।
सूरज वंस संवन्ध, पाळ राणा प्रताप सी।४।
अकबर पथर अनेक, के भूपत भेळा किया।
हाथ न लागो हेक, पारस राण प्रतापसी ॥५॥

[ ७ ] सुख हित स्याळ समाज, हिन्दू अकवर बस हुवा । रोसीलो नगराज, पजै न राण प्रतापसी।६। अकवर समंद अथाह, सिंह डूबा हिन्दू तुरक । मेवाड़ो तिण मॉह, पोयण फूल प्रतापसी ।७। अकवरिये इकवार, दागळ की सारी दुनी। अणदागल असवार, रहियो राण प्रतापसी ।। अकबर कनै अनेक, नम-नम नीसरिया नुपति । अनमी रहियो एक, पुहुमी राण प्रतापसी है। थिर नप हिंदूथान, लातरगा मग लोभ लग । माता भूमी मान पूजै राण प्रतापसी ॥१०॥ चीत मरणो चाय, अकवर आधीनो बिना । पराधं न दुख पाय, पुनि जीवै न प्रतापसो १११ वधियो अकवर बैर, रसत गैर रोकी रिपू । कदमूळ फळ करै, पावै राण प्रतापसी ।१२। जिणरो जस जग माँहि, जिण रो जग धिन जोवणो। लेणो अपजस नाहि, पणधर धिनो प्रतापसी ।१३। कवि प्रारथना क न, पंडित हूं न प्रवीण पद । दुरसो आढो द न, प्रभु तुव सरण प्रतापसी ॥१३॥ . दरसा आदा अभ्यास रा सवाल १. च ते मरणो चाय, अकबर आधं नो विना । राणा प्रताप अकबर री आधीनी स्व कार करियाँ पहली मरण री अभिलाखा राखे । कारण : (क) चेतक रे दाग लाग जादै । (ख) राँणाजो री पाग झुक जावै ।

[ ८ (ग) सूरजत्रप रो अपमान हुय जावै । (घ) पराधीनता में घणा दु ख दीसै । (च) राणाजी बदी बण जावै । ( ) २. मेवाडो तिण महि, पोयण फूल प्रतापसी। पोयण फूल रो अरथ है : (क) गुलाब रो फूल ख) गेदा रो फूल (ग) चपा रो फूल (घ) रोहीड़ा रो फूल (च) कमल रो फूल ( ) ३. सुव हित स्याळ समाज, हिन्दू अकवर बस हुआ । रोसीळो म्रगराज, पजैन राण प्रतापसी। उक्त सोरठा मे राणा प्रताप रा चरित्र री काई विसेसता प्रगट व्है ? (क) उदारता । (ख) सूरवीरता। (ग) सहनसीलता। (घ) दान वीरता। (च) धीरता। ४. कवि रे कथनानुसार इण जगत मे धन्य जीवन-किण रो है ? (क) जो संसार नै असार मान । ख) जो ससार मे हिळमिळ, र चाले । (ग) जिणरो जगत मे जस है । (घ) जो जगत रो भलो चावै । (च) जो दुना रे आडो आवै । ५ नी लिखी ओळिया मे रेखाक्ति रो आसय स्पस्ट करो । ( ) (क) हाथ न लागो हेक, पारस राण प्रतापसी। (ब) अकवरिये इकबार, दागळ की सोरी दुनी।

[६
Land
६. थिर नप हिदथान, लातरगा मग लोभ लग ।
इण चरण में लातरगा सवद रो काई अरथ है ? लातरगा सवद
अपणे वाक्य मे प्रयोग करो।
नै
७. 'अकवर पथर अनेक'
इस पंक्ति में कवि पथर किण नै बताया
अणदागल असवार, र यो राण प्रतापसी।
राणा प्रताप नै अणदागल असवार क्यू वताओ?
९. नीचे दिया सवदा रा दो दो पर्यायवाची सवद लिखो।
समंद, पुहुमी, सूरज, म्रगराज, नरेस ।
१०. इण पाठ मे वैण सगाई अलवार रा दो सोरठा छांटो।
११. कवि राणा प्रताप ने अनेक उपमावां दी। इण मे दो उपमा लिखो।
१२. विड़द छिहतरी री रचना रे आधार पर राणाप्रताप रा स्वाभिमान रा
दो उदाहरण दो।
१३. विड़द छिहत्तरी' कविता रो मूल भाव काई है ?
।
६

३. ढोला-मारू रा दूहा ढोला-मारू राजस्थानी रो प्रसिद्ध लोक-काव्य है । माहित्य रा इति- हास रा लिखारा इण काव्य रो रचना काळ सोळवी सदी मे मान । ढोला- मारू रो कवि अज्ञात है। ढोला मारू री वात रो सार इण भांत है-ढोलो नळवर रो राज- कुवर जी रो सगपण पूगळ री राजकंवरी मारवणी रे साग हुवो। दोनां री उमर साव छोटी ही। ढोलो इण बात ने बिसरगो। बड़ो हुयो तो उण गे व्याव माळवे री राजकंवरी माळवण रे साग कर दियो। मारवणी मोटयार व्ही अर उण ने अपणे सनमन रो पतो पड्यो तो वा ढोला ने संदेसो भेज्यो । मारवणी रा समचार मिळताई ढोलो करहा पर कूची कस उण मूमिळण री उमायो मारवणी रे देस पूगो । मारवणी ने साग लेर ढोलो आपरे घर आयो। संकलित अंस मे मारवणी रा रूप वरणन अर विरह वरणन रा दहा है। प्रथम अस में दूत ढोला रे आग मारवणी रो रूप बखाणे । दुजा अम मे मारवणी ढोला री याद में विरह रो ताव होलै । चौमासा रो रुत में मारवणी ने ढोला री याद सतावै । ३. ढोला-मारू रा दूहा मारवण रो रूप वरणन - गति गंगा मति सरसती, सीता सीळ सुभाइ । महिलां सरहर-मारवि, अवर न दूजी काइ । नमणी, खमणी, बहुगुणी, सुकोमळी जु सुकच्छ । गोरी गगा-नीर ज्यू, मन गरवी, तन अच्छ ।। रूप अनूपम मारुवी, सुगुणी नमण सुचंग । सा धण इण परि राखिजे जिम सिव मसतकं गंग।। मारू घूघट दिट्ठ मई, एता सहित फुणिदं । कीर भमर को कल कमळ, च मयँद गयँद ।। --

११ ]
दत जसा दाड़म-कुळ', संस फूल सिंणगार ।
काने कु डळ भळ हलड, कठ टकावळ हार ।।
मारवणी रो विरह बरणन
ऊन मयाँ उत्तर दिसा, गाज्यो गुहिर गभीर ।
मारवणी प्रिय सँमरय, नयणे वूठो नीर ।
ऊन मि आई वादळी, ढोलो आयो चित्त ।
यो वरसै रितु आपण', नयण हमारे नित्त ।
ऊनमयो उत्तर दिसा, मेणी ऊपर मेह ।
ते विरहण किम जीवसे, ज्यॉरा देर सनेह ।
ऊन मियो उत्तर दिसा, काळी कॅठळि मेह
हूं भी जू घर आँगण, पिउ भाजइ परदेह ।।
रा त जु सारस कुर'ळया, गुजि रहे सव ताल ।
'जणकी जोड़े वीछड़ी तिणका कवण हवाल ॥
वावहिया ने विरहण', दुहुवाँ एक सहाव ।
जव हो बरस घन घणो तब हो कहे प्रियाव ।।
बावहिया निल-पॅ खयाँ, वाढ़त दई दई लूण ।
प्रिउ मेरा म्है प्रोऊ को, तू पिऊ कहेस कूण ।।
वावहिया तू चोर, थारी चाँच कटाविसू।
रा तज दोन्ही लोर, म्है जाण्यो प्रो आवियो ।
सारमड़ी मोती चुण, चुण तो कुरल काँइ ।
सगुण पियारा जो मिळं , मिळे तो बिछुड़े काँई।।
अकथ कहाँणी प्रेम की, किण सू कही न जाइ ।
गूगा का सपना भया, सुमर सुमर पिछताइ ।
आडा (गर वन घणा. आडा घणा पळास ।
सो साजण किम वीस रे. वहू गुणतणा निवास ।।
हू वळिहारा सज्जणां. सज्जण मो बळिहार ।
हूं सज्ज ण पग पानहो. सज्जण मो गलहार ।।
.
-

४ अोपा आढ़ा ओपाजी आढ़ा रो जनम सिरोही जिले रे पेगुवा गाव मे दुयो । आप जोधपुर रे महाराजा विर्जसिह रा राज कवि हा। राज दरबार में आपरी घणो सनमान हो । आपरो रचना काळ सम्बत् १८४० १८७५ ताई मानी- जै । आपरै जनम मरण री तिथियाँ रो पूरी पतो नी लागो । ओपाजी भगती काव्य रा सिरै कवि हा । टिंगळ गीतो मे आपग काव्य री छटा अनूठी मिल । डिंगल गीत छर्दा री एक टनी भान है जकी दूजी किणी भासा री काव्य-पंरपरा में नी मिळे । आ राजस्थानी गे आप खास विसेसता है। प्रस्तुत सकलन में ओपा जी रा दो लोक प्रिय सरल गीत लीना । पहला गीत मे गणगौर रा दिना मे 'घुड़ल्या' सू उक्ति आरभ हुवै अर मिनया तन पर जार ढूकै । दूजा गीत में भारतीय तत्व मीमांसा रा आधार माथे मन ने आछी सीख मिले। ओप जो रे ताँ री कड़ी कड़ी मे धारमिक मन रो सरल सात्विक भाव पळक । ४: डिगळ गीत । ॥ [ १ ] माटी रो ठॉम जोत तण माहे, घण त्रिय फेरे घणों घरे घुडत्यो के तक वार घूमसी, फोडण वाळा लार फर गौरी मिळं ग त सह गावं, जतन रखावै जुवा जुवा । फरूं हमै किता घर फिरसा, हेरू लोचपळोच अत जतना माथे ऊपाई दोली ) हुवा ॥ शकी १५ ] - न गावै अतुर अ.वै 14 आस किसी राखीजे अरी, वैरी छोरा लार बहे ॥ ओ घट घुड़ल्यो जाण 'ओपला, गोविन्द काय खळ जम कयां उघार्ड खांड़, कीधां मोटा पसण डाग ले मोटी, काळ घड़ा नर फूट । कामो भ मिनखची काया, फिरतां गिरतां फूटै ॥ ( २ ) मन जाणे चढू हा थयाँ माथे, खुर रगड़ता जनम खुबै । नर री चीती बात हुवै नह, हर री चीती वात हुवै ।। मन जॉणे पदमण माणू, गोबँद बाँधै पयर गळे मॉडण हारै लेख मॉडिया, मेटण वाळो कोण मिळे ।। मन जॉण पहरू महमूदी, फाटा धावळ लियॉ फिरै । कासू हुवै मिनख रो कीघो, करै जको करतार करै ।। मन जॉणे पोऊँ पय मिसरी, छाछ सोवनी मिळे न छॉट ।। वाळया सो पाछा कुण वाळ, उण घर री लेखण रा आँट ॥ दिल में जॉणे पाँव दबाऊँ, ।

[ १६ । पग दावे आप । औरा रा कळप कमू कमू मन कपि, प्रांणी लेख तणी परताप चित में जाण हुकम चलाऊं. हुकम तण बस नार न होय । साचा लेख लिख्या उण सांई, काचा करण न दीम कोय ।। इम जांण पकवान अरोगू, धाप, र मिळे न लूखौ पान । आदम की विध करे ‘ओपला', भोला जे रचिया भगवान ।। धारे मन बैठू तापै सैना मोटा आखर कवण मेटवे, कुटी लिखी सो महल कठे ।। घोळे-हर, ढूढ तठ ओपाजो आढ़ा अभ्यास रा सवाल १. आस किसी राखी जै अरी, पैरो छोरा लार वहै । धड़ल्या रे लारे लारे छोरा चालै। कारण : (क) अडल्या री संभाळ रासै। (ख) उडल्या रा मीठा गीत सुणै। (ग) घुडल्या नै फोडगो चावै। (घ) धुड़ल्या रो अजब अजब तमासो देखो। (च) घुडल्या रो दिवलो निरखौ। मन जाणे पदमण हू मॉणू गोवद बाँधौ पथर गळे । गदड़ मे पथर गै नात्पर्य है : [] १ :

[ . १७. ] ( ) (क) कुमाणसनार ख) कपूत बेटो (ग) मोटी सिला (घ) कुलखणोभाई (च) कळहगारी पाडीसण ३. मोटा पिसण डांग ले मोटी इण पंक्ति में मोटा पिसण रो अभिप्राय है। (क) वैरो (ख) छोरा (ग) खांडो (घ) काळ (च) गवाल्यो १. "वारै मन वैठू धोळहर" । मिनख री किण मनोवृति रो परिचायक है ? - ) (क) सुख ( ) ५. (ख) संतोष (ग) धीरज (घ) स्वारथ (च) लालच फेरू हमैं किता घर फिरसो, हेरू लोचपलोच हुवा। अठ लोचपलोच रो अरथ है । (क) सामा आवै। (ख) पाछा बावर्ड। (ग) धूमर घाल। (घ) घेरो देव। (च) चरणों में लोट। ( )

६. नीचे लिखी झडाँ मे रेखाँक्ति रो आशय स्पष्ट करो।
(क) काचो कूभ मिनख ची काया फिरता गिरतां पूट।
(ख) मोटा आखर कवण मेटदै
कुटी लिखी सो महल कठे।
७. नीचे दिया सबदां रा हिन्दी पर्याय लिखो।
जतन, डाग, मिनख, आखर, हेरू।
८. नीचे दिया सबदा रा विलोम सबद लिखो।
साचा, काचा, घणा, फाटा, लूखो।
६. इण गीता में वैण सगाई अलंकार रो दो आलियां छांटर लिखो।
१०. कवि काया नै काचा कुभ री उपमा काई सोचर दी?
५० सबदां में उत्तर दो।
११. ओपाजी मिनखातन सूघुड़ल्ये री तुलना किण रूप में कीधी ?
१२. घुड़ल्या री कथा माथ संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
१३. डिगळ गीत अर. लोकगीतां मे कांई अन्तर है?

५. बांकीदास प्रासिया
बांकीदास आसिया रो जनम पंचमदरा परगना में भांडियावास गांव में
हुवो । सरूपोत री भणाई जोधपुर में हुई । वांकीदास री गणना राजस्थानी
रा प्रसिद्ध कवियां में की जावै । आप जोधपुर नरेस मानसिंह रा राज कवि हा
दरवार में आपरी घणी धाक ही । जोधपुर नरेस आप लाख पसाव दियो अर
'कविराजा' री उपाधि सूविभूषित किया ।
बांकीदास आसिया री लिखी छोटी सोटी इगताळीस पोथियां मिले।
'वांकीदास ग्रन्थावली' रा नाम सू आपकी रचनावां प्रकाशित हुई । वीर रस,
श्रृगार' रम अर नीति सम्बन्धी दूहा आपरा सिरै काव्य है । गिल गीत आपरा
वेजोड़ है।
प्रस्तुत संकलन में बांकीदास रो एक प्रसिद्ध गीत लीनो जिण में कवि
विदेसी शासन रे विरुद्ध राजावां ने चेताया अर हिन्दू-मुसळमान री मेळप पर
वळ दियो। उण समै रजवाड़ा में अंगरेजां रे हाथा राज सूपण री होड
माचगी ही। राजावां री आ करतूत बांकीदास रे हिये अणूती साल्ही । इण
डिंगल गीत में वाही कसक मिले ।
५. गीत
आयो इगरेज मुलक रे ऊपर, आंहंस लीधा खैचि उरा।
बाणियां मरे न दीवी धरती, धणियां ऊभा गई धरा ।
फौजां देख न कीधी फौजाँ, दोयण किया न खळाडळां ।
खवां खाँच चूड़े खाँवदरै, उणहिज चूड़े गई यळा ।
छत्र पतिया लागी नह छाणत, गढ़पतियां घर परी गुमी ।
वळ नह कियो बापड़ा बोतां, जोताँ जोताँ गई जमी ।
दुव चत्रमास वादियो दिखणी, भोम गई सो लिखत भवेस ।
पुगो नहीं चाकरी पकड़ी, दीधो नहीं मई ठो देस ।

[ २० ]
वजियो भलो भरतपुरवाळो, गाजै गजरं धज र नम गोम ।
पहलां सिर साहवरो पड़ियो, भड़ ऊमै नह दोधो भोम ।
महिजाता चीचातां महिळा, अदुय मरण तणां अवसांण ।
राखो रे किहिक रजपूतो, मरद हिंदू को मुस्सळमाण ।
पुर जोधॉण, उदेपुर जैपुर, पहु थारा खुटा परियॉण ।
आँकै गई आवसी आकै, वॉक आसल किया बखाण ।
-बॉकीदास आसिपा
अभ्यास रा प्रश्न
१. "धणियाँ ऊभाँ गई धरा" मे कवि नै राजावाँ मे कांई कुलसण द सै ?
(क) लालंच
(ख) कायरता.
(ग) स्वारथ
(घ) आळस
(च) द्रोह
. ( . )
२. राखोरे किहिक रजपूती, मरद हिन्दू को मुस्सलमाण ।
इण झड़ मे रजपूतो सूतात्पर्य है।
(क) वीरता
(ख) - चातुरी
(ग) देसभक्ति
(घ) स्वामीत्व
(च) सहणशीलता
()
३. पहिला सिर साहब रो पड़ियो,
- झड़ ऊभै नह दोधी भौम ।
इण झड़ में भड़ रा चरित्र री काँई विशेषता प्रगट हुव
(क) त्याग

* [. २१. ]
(ख) स्वाभिमान
(ग) दाता।
(घ) सहण लता
(च) धोरज
४. बल नह क्यिो वापड़ा बोता
जोता जोतां गई जमी।
इण कथन रे लारे - वि रो मनोभाव है।
(क) विनोद
(ख) सन्तोपं
(ग) खीज
(घ) अचरज
(च) व्यग
५. गढ पतियां घर परी गमी में
घर परी गमी रो काई तात्पर्य है ?
३. बाकीदास जी गढ़ पतियां नै चापड़ा बोता क्यूबताया
५० सबदां में उत्तर दो।
७. वै दो औसर किसा है जद मरद नै मरमिटणो चाहिजै ?
इण रो आशय स्पष्ट करो।
(क) धनियां मरे न दोघी धरती ।
(ख) 'पहिलो सिर साहब रो पड़ियो ।
६. नीचे लिखी गीत री झड़ा रो भावार्थ लिखो।
(क) खवां खांच चूड़ खांवदरे,
उणहिज कूड़े गई यळां ।
(ख) वळ नह कियो वापड़ा बोता,
जोतां जोतां गई जमी।
?
.
--
--

[ २२ ] १०. इण गीत में बैण सगाई अलंकार रा चार उदाहरण छांटो । ११. इण गीत में कवि राजावां री किण दुरदशा रो वरणन करें ? १२. 'वजियो भलो भरतपुर वाळो ।" भरतपुर रा घेरा री बात बताओ। १३. बांकीदास जी रो ओ गीत लिम्वण रो काई अभिप्राय है ? ६- सूरजमल मीसण सूरजमल मीसण रो जनम संवत १८७२ में बूंदी मे हुयो । वांरा पिता चन्डीदानजी पिगळ अर डिगळ का आछा कवि हा । सूरजमल आपरा पिता कने काव्य कला रातारा लच्छण सीख्या । सूरजमल मीसण संस्कृत प्राक्रत अर डिंगळ रा प्रकांड विद्वान हा । राजस्थानी रा सर्व श्रेप्ट कवियां में सूरजमल मीसण री गणना हुवै। वंश-भास्कर अर वीर सतसई आपरा दो प्रसिद्ध ग्रन्थ है। वंश-भास्कर इतिहास ग्रन्थ है । वीर सतसई एक लोक प्रिय वीर काव्य है। वीर सतसई मुक्तक काव्य री परम्परा मे एक श्रेप्ट रचना है । प्रस्तुत संकलन वीर सतसई रा दूहा मां सूलियो गयो है । सन् १८५७ मे अँगरेजा रे विरुद्ध जको राष्ट्रीय विद्रोह हुयो सूरजमल मीलण उणा विद्रोह रा सिरै कवि हा । वै आपरी ओज भरी वाणी सूवीरां ने चेताया। वीर-सत- सई मे वै ही उद्गार है । इण मे दहा जिला छोटा छन्द मे वीर-भाव हिलोळा मार है। वीर सतसइ उगणीसवी सदी से शा .

[ २३ ] ६. वीर सतसई रा दूहा सतसई दोहामयी, मीसण सूरजमाळ । जंये भड़खाजी जठे, सुणे कायरां साल ॥१॥ इकडंकी गिण एक री, भूले कुळ सांभाव । सूराँ आळस ऐस मे, अकज गुमाई आव ।।२।। आज घरे सामू कहे, हरक अचाणक काय । बहू बळेबा हूलस, पूत मरेवा जाय ।।३। मूझ अचंभो हे सखी, कंत बखाणू कीस । विण माथै दळ वाढ़ियो, आँख हिये के सीस ॥४॥ नायण आज न माँड पग, काल सुणीजे जंग । धारा लागीजे धणी, तो दीजे घण रंग ॥५॥ कंत भला घर आविया, पहिरीजे मो बेस । अब वण लाजी चूड़ियाँ, भव दूजे भेटेस ॥६॥ दरजण लवी अंगियाँ, आँणीजे अब भूक्ष । तव टोटे मोनू दया, दण सिंवाई तूझ ॥७॥ मणिहारी जा री सखी, अव न हवेली आव । पीव मुवा घर आविया, विधवाँ किसा वणाव ।। घोड़ा चढ़णो सीखिया, भाभी किसई काम । वंव सुणीजे मार को, लोजे हाथ लगाम ॥६॥ पूत महादुख पाळियो, वय खोवण धण पाय । एम न जाण्यो आवसी जामण दूध लजाय ॥१०॥ भोळा की डर भागि यो, मत न पहुंड एण। बीजी दीठा कुळ वहू, नीचा करसी नैण ॥११॥ - . [ ,२४ । फल नूर । ऊपर घाम जिम जिम कायर थरहरे, तिम तिम फैल जिम जिम बगतर ऊबड़े, तिम तिम फूलं मूर ॥१२॥ टोटे सरकां भीतड़ा, घाते वारीजे भड़ झूपड़ा, अधपतियां आवाम ॥१३॥ नह पडोस कायर नरां, हेली बास मुहाय । बलिहारी जिण देसडे, माथा मोल विकाय॥१४॥ पोता रे बेटा थिया, घर में वधियो ज ल । अब तो छोड़ो भागणों; कंत लुभायो काळ ॥१५॥ इळा न देणी आपणी, हालरियां ‘हुलराय । पूत सिखावै पोलणे, भरणः वड़ाई . माय ॥१६॥ -- - सूरजमल मीमण . अभ्यास रा प्रश्न ६ . १. धारां लागं जे. धणी, तो दीजे.घण रंग। उक्त चरण मे धारा, नागीगे रो अरथ है (क) जळ धारा में बहणो । ख) लहरां मे रमणो (ग) धार रे आरपार उतरणो । ....... (घ) धारां मे वसणो; (च) रण रण में काम आणो। २. कंत भला घर आविया, पहरीज मो. वेस । इण उक्ति मे वीर नारी रे मन रो भाव प्रगट । क) रोसं (ख) त्यांग ICT ( ) .

.
२५ ]
( )
(ग) पछतावो
(घ) डर
(च) संतोप
३. नहं पड़ोस कायर नराँ. हेलो वास सुहाय ।
इण चरण में हेली रो अरथ है।

२८ ] ऊपर घाम जिम जिम कायर थरहरे, तिम तिम फैल नूर । जिम जिम वगतर ऊबर्ड, तिम तिम फूल मूर ॥१२॥ टोटे सरकां भीतडा, घाते वारीजे भड़ झूपडा, अधपतियां आवाग ॥१३॥ नह पड़ोस कायर नरा, हेली वाम मुहाय । बलिहारी जिण देसड़े, माथा मोल विनाय॥१४॥ पोतां रे बेटा थियां, घर मे बधियो जछ । अंब तो छोड़ो भागणों; कंत लुभायो काळ ||१५|| न देणी आपणी, हालरियां हुलराय' । पूत सिखावै पालण, भरण : वड़ाई . माय ॥१६॥ - हळा सूरजमल मोमण 4 अभ्यास रा प्रश्न 1 f. १. धारा लाग जे.धणी तो दीजे.पण रंग। उक्त चरण मे, धारा, लागीगे रो अरथ है (क) जळ,धारा में बहणो. : (ख) लहरा मे रमणो 1 : (ग) धार रे आरपार उतरणो। ... (घ) धारा में धसणो । (च) रण में काम आणो। २. कंत भला घर आविया पहरीज: मो वेस । - इण उक्ति मे वीर नारी रे मन रो भाव प्रगटै । (क) रीस S (ख) त्यांग ( ) . 4 . . C 12 ७. लोक गीत राजस्थान में लोक गीतां रो घणो प्रचार । देसरी लोक संस्कृति री पावन धारा लोक गीतां मे देखण ने मिलै । लोक गीत किणी एक कब री रचना नही । औ तो जन वाणी रो एक मुखरित रूप है। पारिवारिक अर सामाजिक जीवन मे लोक गीता रो घणो महत्व । आणे टाणे अर परव उछब रा न्यारा २ गीत गई जै। राजस्थान में चौमासा रा गीत, तीजां रा गीत, होली गणगोर रा गीत गांव गाँव मे गाया जावै । पार- वारिक जीवन मे जापा, जड़ ला, सगाई ब्याव र मायरा रा भात-भांत रा गीत गई जै । जिण मे कई गीत तो इसा आखियात हुवा वै सारा राजस्थान में गाया जावं हालरियो, पीपळी, पीळो, घूधरी, ओल्यू, बधावो अर बीरो इण गीता री पांत मे अग्रणी। प्रस्तुत संकलन मे तं न घणां प्रचलित गीत छाँटर लिया। 'रेणादे एक रूड़ी काव्यात्मक कल्पना है। 'सपनो' वधावा रा गीतां री गणना मे आवै । 'बीरो मायरा री अजळी परम्परा रो प्रतीक है। । लोकगीत ( १ ) रेणादे घोळा धोळा काँई करो अ, घोळा वन में कपास घोळो सूरज जी रो घोडलो अ, धोळा बहू रेणादे रा दाँत उगतो उजास वरणो, आथमतो सिदूर वरणो गऊ ए चरण चाली, पंछीड़ा मारग चाल्या चेम-धरम सब साथ ।

[ २८ ] सहेत्यां, बावल घर बाज्वा बोल महेल्यां, मुमरंजी घर आणंद-उछाव । रातो रातो काई करो अ. राती युद्धले री मजीठ रातो मुरजजो रो घोडलो अ, गता रेणादे रा नंग उगतो उजाम वरणो, आथमतो सिर वरणो गऊ ए चरण चाली, पंछीडा मारग चाल्या नेम-धरम सब साथ । सहेल्या, बावल घर बाज्या ढोल सहेल्या, सुसरैजी घर आणंद-उछाव । काळो काळो काई करो ओ, काळा वन रा काग काळो सूरज जी रो घोडली मे, काळा वह रेणादे रा केस उगतो उजास वरणो, आथमतो सिंदूर वरणो गऊ ए चरण चाली, पंछीरा मारग चाल्या नेम-धरम सब साथ । सहेल्या, बावल घर वाज्या ढोल सहेल्या, सुसरैजी घर आणद-उछाव । पीळो पीळो काई करो मे, पीळी चणा केरी ढाळ पीळो सूरजजी रो घोडलो अ, पीळो बहु रेणादे रो चीर उगतो उजास वरणो. आथमतो सिंदूर बरणो गऊ ए चरण चाली. पंछीरा मारग चाल्या नेम-धरम सव साथ । सहेल्याँ. बावल वाज्या. ढोल सहेल्या. सुसरैजी घर आणद-उछावै । ह रयो हरियो काँई करो से हरी से बन, मे तो दूब हरियो सूरजजी रो घोडलो ओ हरी बहु रेणादे री कूख उगतो उजास वरणो. आथमतो सिंदूर बरणो गऊ ए चरण चाली. पंछीड़ा मारग चाल्या - घर २६ ] नेम-धरम सव साथ । सहेल्या. वावल घर वाज्या ढोल सहेल्यां. सुसरैजो घर आणंद-उछाल । सपनो फुलड़ा वीण सुणो. ओ भंवर म्हॉने सपनो सो आयो जो राज. सपनै रो अरथ वतावो जी रान। कहो. अ गोरी थाने किण विध आयो जी राज. सपनै रो अरथ बतावॉ जी राज । हंस-सरोवर ढोला गाजत देख्यो जो राज. मान-सरोवर जळ भर्यो राज बाँमाँ माँयला चंपला म्हे फलत देख्या जी राज. वीण दोय' कामणी राज । पोळा माँयला हसता म्हे घूमत देख्या जी रान. हरी हरी दूब घोड़ा चरै राज । आँगणियाँ रो चोक म्हे पूरत देख्यो जी राज . ऊपर कूभ कळस भर्यो राज महला मॉयलो म्हे जग तो देख्यो जी राज. दिवला री जोत सुहायो राज गोरी पोर थॉरो जी रान. मान-सरोवर थारो सासरो राज बाँगा माँयला चंपला वै वीर थारा सी राज, फुलड़ा वीण थॉरी भावजाँ राज पोलाँ माँयला हसतो वै जेठ थारा जो राज. हरी-हरो दूव सुवास णो राज . हस-स रोवर - -

[ ३० ]
आँगणियाँ रो चोक वो कंवर थांरो जी राज,
कुंभ-कळम थारी कुळबहू राज ।
महला माँयलो दिवलो वो कत पारो जी राज,
दिवला री जोत सायवणी राज ।
धन-धन, जी वसेदेव जी रा छावा जी राज,
सपना रो अरथ भलो दियी राज ।
धन-धन, ओ साज नियाँ री जायी जी राज
सपना रो अरथ भलो लियो राज ।
बीरो
पान
वीरा अक बड़लो द्वजो पीपलो
ज्यारा
सवाया होय,
माँ री जाई सू क्याँको रूसणो।
वीरा अक कूवो दूजी वावड़ी
ज्यारा नीर सवाया होय
जाँमण जाई सूक्याँको रूसणो ।
वीरा अंक पीळो दूजी चूदड़ी
ज्यारा
रग सवाया होय,
जाँमण जाई सूक्यॉको रूसणो।
बीरा एक गऊ दूजो बाछड़ो
ज्याँरा दूध सवाया होय,
माँ री जाई सू क्याँको रूसणो ।
अॅक
बीरो दूजी वैन है
ज्याँका
हेत सवाया होय
मॉ री जाई सू क्याँको रूसणा।

[ ३१ ]
वीरा पाँच भायां री आ वैन छै
वा पगाँ ऊवाणी जाय
जामंण जाई सू क्याँको रूसणौ ।
वीरा अक वीरा री वैन छै
रथड़ा में बैठी वैठी जाय
जामंण जाई सू क्याँको रूसणो।
-सकलित
अभ्यास रा प्रश्न
१. हरियो सूरज जी रो घोडलो ,
हरी बहू रेणादे रो कूख ।
हरी बहु रेणादे री कूख रो आशय है :
(क) रैणादे हरी भरी लागै ।
(ख) रैणादे सपूती नार है ।
(ग) रैणादे हरी आँगी धारण करै ।
(घ) रैणादे हरा पल्ला रो चूदड़ी ओढ ।
(च) रैणादे री कूख में हरो दुपट्टो सोवै ।
()
२ सपने रो अरथ बतावो जी राज ।
इण कथन में राज सबद किण रे वास्तै प्रयुक्त हुवो?
(क) पति
(ख) देवर
(ग) जंवाई
(घ) राजा
(च) कारीगर
( )

[ ३२
३. हरी-हरी दूब सुवासणी राज ।
सुवासणी किण रे वास्तं प्रयुक्त हुयो ?
(क) सखी सहेली
(ख) कुळ बहू
(ग) वहन वेटी
(घ) दिवराणी 'जठाणी
(च) आडोसण पाडौसण
( )
४. 'जामण जाई सू क्या को रूसणो ।'
लोकगीत मे आ वात कुण कही?
(क) मा
(ख) बाप
(ग) भाई
(घ) व'हण
(च) सहेली
( )
५. नोचे लिखी ओलियां रो आशय स्पष्ट करो :
(क) सहेल्यां वाबल घर वाज्या ढोल ।
(ख) दिवला री जोत सायवेणी राज ।
(ग) जामण जाई सूक्या को रूमणों।
६. नीचे दिया सवदा रा हिन्दी रुप लिखो :
वावल, धोळा, राता, बाछड़ा, दिवलो।
७. लोकगीत में रैणादे रा दांत, नैण, अर चीर रो रंग किसोक बतायो ?
८. गौरी नै सपनां मे सरोवर अर वागां मे काई निजारो निज र आयो ?
६. भाई वहण नै चूंदडी किण ओसर पर औढावै ?
१०. राजस्थान मे 'वीरो' गीत किण ओसर पर गायो जावै ?
११. लोक जीवण मे लोक गीता रो वाई महत्व है ?

८. रोजम्थानी रा दूहा for ह राजस्थानी मे सवसो घणो साहित्य दूहा-सोरठा में मिलै । राजस्थान रा ठेठ गाँवा में मिनखाँरी जवान पर राजस्थानी रा जूनां दूहा-सोरठा सुणन ने मिल । किणी दूहा-सोरठा रे लारे कवि रो छाप है तो घण करा दूहा रा लखारो रो अतो पतोई कोनीं। पण औ दुहा समाज रा हिया रा हार है । कई कवि आपरे सेवक री सेवा चाकरी पर रीझ बानै दूहा रै मिस जग जाहर कर दिया। राजिया रा दूहा इणी परम्परा मे आवै । राजस्थानी री बातों में दूहा सोरठा रो समावेश मिले। इसो दूहा घणां च वा हुआ। घणकरा दूहा में नीति, उपदेश, वीररस शृंगार, प्रेम, विरह-विजोग, भूडा भला री पिघाण री झीणी वातां मिले। प्रस्तुत संकलन में इसाही सरल दूहा रो संग्रह है जो बालोपयोगी साहित्य री कोट मे आवै । ८. राजस्थानी रा दूही बड़ा बडाई ना कर बडा न बोल बोल । होरा मुख सूना कहे,. लाख हमारा मोल ॥१॥ तरवर सरवर संतजन, चोथो बरसण मेह । परमारथ रे कारण, च्यारां धारी देह ॥२॥ हंसा, सरवर ना तजो, जे जळ खारो होय । डावर-डावर डोलतां, भला न कहसी कोय ।।३।। हूगर उळतो लाय, जो सारो ही जगत । प्रापळती 'नज प.य, रतो न सूझै राजिया ॥४॥ मुख ऊपर मीठास, घट माँही खोटा घड़े । इस डा सूइखळास, राखी जे नह राजियां ॥५।।

[ ३ ] - A खाल . साँपड़ झैराँव सेढा रे सारू वेरे , बेढाकर हेरे हथहारू भैस्याँ रिड़क रिड़ गाया रँभावै । प्राणी तिरपातुर पाणी कुण पावै ॥३॥ खेळो में बाजै खणणाटा। भाज धाफड़ले कोटा भणणाटा वार वेरा रे धन दे बणणाटा। गाँजर खाँचैदे पॉचर गणणाटा ॥४॥ न चा नैणा सू धोवाँ जळ धाव ऊचो ईखण रो अभलेखो आवै। गाढी गयणांगण · रज ले गरणाँटा । सावण' सूकोगो देतो सरणाता ॥५॥ फुरियो भादरवो घुरियो नह फीको । नं रद रज आग आल ति सया संगारा भूपर नर तिरसै बिसिया अगारां ऊपर सू वरसै ॥६॥ बाळक वरळावै आखाँ अभिलाखे । भूभू बूबू विन भाखा नहि भाखै । सूपै सीरावण व्याळ ले बाँस । वेळा व्याळ री सीरावण साँस ॥७॥ ढाँढा , ताँभाड केरडिया · ढीक । रोटी पॉणी नै टीगरिया रीकै। महळा मुरधर री तरस अन तॉई । तीजै पोरॉ तक बीजै दिन ताई ॥८॥ सरधा बॉकी सू. झाँकी सुखसेरी 1. ढूंढ़ी- ढाहड़ इाडोती हेरी नह नीको । - - [ ३६ ] ३ जाँणी जीवण नै जिण तिण मिस जुळिया । पाणी पीवण नै पूरव दस पुळिया ||६|| जाडा धन वाला सिधू तट जुड़या । गाडा तन पाळा गुज्जरधर गुड़िया । घर घर छपने में घर घर री घाली । मोऊ मुरधर री सन मुख सुख माल्ही ॥१०॥ वलदां गांडासल पाडाँ पर बोरा । छोटा डोरान्तर रोराँकुर छोरा । करणॉ दरसावै केटा बरकड़ियाँ । जूती फाटोड़ी वाँधी जेबड़ियाँ ॥११॥ धावळिया घाघरिया फाटा । फरक चोटलियाँ देती फरराटा तागत तूटोड़ी तूटोड़ा खाता पीता सू पेलाँ खूटोड़ा ॥१२॥ सासा नोली में अटकाया साँसे वाळक झोली मे लटकायाँ वॉसे माथै ओड़ी धर सारवीणाँ माडे छपन लाखीणाँ घर अपणाँ छाडै ॥१३॥ फाटा तापड । - -अमरदान लाळस अभ्यास रा सवाल १. महळा मुरघर री तरस अन ताँई । तीज पोराँ तक बाजै दिन ताई। कविरा उक्त कथन भाव मन में काई भान जाम ? (क) सतोप (ख) क्रोध

३६ ]
५. रेखाकित रो आशय स्पस्ट करो।
(क) मुख ऊपर मीठास घट माही वोटा घड़े।
(ग्व) धारा में धसतांह आँसू आवै ईलिया ।
६. नीचे 'लखी ओ लयाँ रो अरथ बताओ।
(क) सीख सरीरां ऊपजे दिवी न आवे सीख ।
(ख) टोलो सू टळताह हिरण मन माठा हुई ।
७. नीचे दिया सवदाँ रा विलोम रूप लियो ।
करडावण, उतावळा, माठा, ओछो
८. पंडित ओर मसालची दोऊं उलटी रीत ।
कवि पंडत अर मसालची री उलटी रीत पाई बताई ?
६. परमारथ रे कारणे च्यारा धारी देह ।
औ चार कुण कुण है ? आरा नाँव बताओ।
१०. कवि अगन अर पळ नै जवर विरोधी क्यू बताया ?
११. उण दोय चीजाँ नै गिणवो ज्यो फाटयाँ पाछे नही ‘मले ।

-- ९. ऊमरदोन लालस . ऊमरदान लाळस रो जनम फलोदी तहसील रे ढाढरवाल गाँव में सर्वत् १६०८ में हुयो । बाळपण में शिक्षा वॉरे पिता रे हाथों हुई पछै जोधपुर रा एक राम दुवारा में आसण का जमायो । उणो विचाळे वॉने रिसी दयानंद फटकार लाग।। वै पक्का आर्यसमाजी वणग्या । ऊमरदान लाळस री गणना जन कवियों में की जाणी चाहिजे । कवि सानंतो परम्परा ने छोड़र सामान्य जनता पर कविता 'लखी। लाळस एक सुधारवादो कवि हा । धरम रे नाँव पर प्रचलित झूठ पाखंड, अन्ध विश्वास पर कवि आकरा प्रहार किया। समाज सुधार रो संख नाद सुण.यो । प्रस्तुत संकलन छपना रा छंद रो चुणो हुयो अंश है । छपनो देस' माथै एक भूडो काळ पड्या । मरुधरा हाल उठी । क व इण काळ रो बड़ो सशक्त चरणन करै । इणी रो एक करुण चित्राम इण पाठ में लयो है। । -- -- ६. छपना रा छंद काळी पोळी सह सींळी ककुभाळो । काँठळ कावळती वावळ बळ बाळ । अचल उलटाती कुलटाकृति आवै । खै खै करतोड़ी मरतोड़ा खीवै ॥१॥ वायू आयू हर विवरण वहावै । थरथर थरकत थिर थिर चर थहरावै । खेहाडंवर अवर अरड़ावै । धरणी तल धणे गरदन गरडावै ॥२॥ खर

[ ४० .]
( )
(ग) घ्रणां
(घ) करुणां
(च) उदासी
२. गाजर खाचे ले पॉचर गणणाटा ।
वेरा माँ मूपाचर गणणाटा देती आवै । कारण -
(क) वेरा में पाणी निठगो।
(ख) वेरो ऊडो वंठगो।
(ग) पाणी का बोझ सूचड़स फाटगी।
(घ) लाव री लड़ तूटगी।
(च) की लयो ऊंतावलो वैवे।
३. बार वेरा रै धन दे वणणाटा ।
उक्त चरण मे धन सबद रो अरथ है।
(क) माया
(ख) सांसर
(ग) पत्नी
(घ) सखी सहेली
(च) पणिहारी
४. भूभू वूवू विन भाखा नहिं भाख ।
नान्हा टावर भूभू बूबू किण चीज नै पुकारै ।
(क) माखण
( )
.(. )
(ख) दूध
(ग) छाछ
(घ) रोटी
(च) पाणी
५. नीचे लिखी ओलियां में रेखांक्ति रो आसय स्पस्ट करो।
(को अंचल उलटाती कुलटा कति आव।

४१ ]
(ख) खेहा डंवर खर अंवर अरडावै ।
(ग) प्राणी तिरखातुर पाँणी कुण पावै ।
६. नं.चे 'दया पदां रो अरथ लिखो।
(क) नीचा नैणा सूधोवा जळ धावै ।
ऊंचो ईखण रो अभलेखो आवै ।
(ख) माथै ओडी धर साखीणां माडे ।
छपने लाजीणो अपणां घर छाडे ।
७. नीचे दिया पशुआ रे नांव आगे उपयुक्त सबद सोध र मांडो ।
(रिड़के, गरड़ावै, अरड़ावै, रभावै)
गाया
भैस्यां
गरधव
८. छपना रा छंदा में वैग मगाई रा दो उदाहरण छांटो ।
६. नीचे दिया सवदा रा हिन्दी रूप लिखो।
गयग, जाडा, मोऊ, ढाँढा, केरडिया टीगरिया ।
२०. इण सवदां रा विलोम रूप लिखो।
फीको, सूको, पाळा, वाँको ।
११. “वारे वेरारे धन दे बणण टा।" बेरा रेवारे सांसर वणणाटा देना क्यू
डोल।
१२. छपने रे काळ री आंधी रो कवि किण रूप मे वरणन करै ?
१३. छपनै रे काळ में मुरधर रे मिनखां री काई दशा हुयगी । १०० सवदा
मे उत्तर दो।

१०. नाथूसिंह महियारिया
नाथूसिंह महियारिया उदयपुर रा वासी हा । वं आधुनिक काल में
राजस्थानी री जूनी परम्परा नै कायम रावी । आपरी 'वीर मतसई वार सा-
त्मक दूहा री एक आधुनिक रचना है जकी जूना राजस्थान रा वीर भाव
री याद दिरावै।
प्रस्तुत संकलन कवि रो नवी रचना 'बापू' सूं लीनो है। नाथूमि
महियारिया महातमा गाँधी सूप्रभावित व्है उण पर काव्य रचना करी । इण
दूहा में गाँधी जी री महानता अर वाकी देस भक्ति पर कवि री अनूठी
उक्तियां मिलै । दूहा जिसा छोटा छद मे कवि आछा चित्राम कोरया है । इण
मे कई दुहा तो घणा प्रसिद्ध हुयगा है। बापू नी तो कदेई हाथ मे तरवार
झाली नी रीठ बजायो न रगत बहायो तो ई वो नवै जमाना रो सवमूलूठो
सूरमो हो। इण दूहा मे कवि नवै सूरमै री नवी वीरता रो विड़द
वखांणियो।
१०. गाँधी
-
नैणां निरभागी हुवा, दरसण विण तरसंत ।
मम रसणा वड़भागणी, गाँधी-सतक रचंत ॥१॥
फौजां रोकी फिरंगरी, तोकी नह तरवार ।
गॉधी ते लीधो गजव, भारत रो भुजभार ॥२॥
आतम बळ सो वळ नही. आतम वळ अदभूत ।
जै जरमन सू जीतिया, हारया गाँधी हूत ॥३॥
लाखॉ घण लोहां हुवा, जिण हथणापुर काज ।
गांधी लोह न भीटियो, लियो दली सूराज ॥४॥

[ ४३ ] . - है + । , खग नह लेतो हाथ में, सेल न लेतो पास । गाँधी अनसन लेवतो, तो फिरंग निवास ॥५॥ गोरा हंदी गौरियां, कहे म्हारो वड भाग । पिव जीवत घर आवियाँ, गाँधी दियो सुहाग ॥६॥ इण दहु कुळ रो हित कियो किया सुतंतर सत्य । मंदिर और मजीत रो, इक गाँधी मूरत ॥७॥ अंगरेजॉ रा राज मे, अस्त न हो तो भाण । अस्त किया जानै अठै गाँधी करूं बखाण ॥८॥ महल गढॉ जकड़ी रखी, जुगाँ जुगाँ रे वाट । गाँधी ते कधी गजव. आजादी आजाद ॥६॥ केवाँ धन प्रिय धाम प्रिय धर प्रिय कितां विसेस । पण गांधी प्रिय देल रो, गाँधी ने प्रिय देस ॥१०॥ सरब मनां स्वारभ बसै. मानव जात सुभाव । परमारथ वसतो मनां. रे गाँधो फिर आव ॥११॥ देवां समंदर म त्थयों. थाक गया मथ मत्थ । भारत ने विण सम मिल्यो. तू गाधी अमरत्थं ॥१२॥ जे रावण होतो नही. नह हो तो फिरंगॉण । राम-कथा गाँधी-कथा. कुण सुणता दुनियाँण ॥१३॥ -नाथूसिंह म हयारिया --- - --- । -- - + - - . 1 1 म ~- अभ्यास रा सघाल 1 -- इण दहुं कुळ रो हित कियो. किया सुततर सत्थ । इण पंक्ति मे दहुं कुळ सूतात्पर्य है। (क) हिन्दू अर मुसलमान । (ख) हिन्दुस्तानी अर अंगरेज । r [ ४४ ] (ग) गाँधी और फिरंगी। (घ) जरमन अर अंगरेज । (च) देवता अर मिनख । [ ] २. गॉधी अनसन लेवतो लेतो फिरंग निसास निसासा लेण रो अरथ है। (क) लाम्बी सॉस लेणो। (ख) ढब ढब र सांस लेणो। (ग) सासा रोक लेपो । (घ) दुःख री सास लेणो। 'च) निरासा मे जीवणो। [ ] [ ] ३. गोरा हदी गोरियॉ कहै म्हारो बड भाग । गोरां री गोरियाँ आपरो बडो भाग मान । कारण- (क) गोरा घणो वीरता दिखाई। (ख) गोरा रा राज मे सूरज नी आँथे । (ग) गोरा जरमन नै हराय दियो । (ध) पति जीवता घरे आयगा । (च) गाँधी गोरा रो तरवार सू सामनो नी कियो । ४. 'गाँधी लोह न भीटयो ।' इण चरण मे लोह भीटणे रो तात्पर्य है। (क) लोहा रै हाथ लगायो। (ख) लोह नै हाथ में लेणो। (ग) लोह रो कवच धारण करणो । (घ) लोह रो टोप ओढ़णो। (च) ससतर धारण करणो । . [ ]

( ४५ )
५ इण कविता में प्रयुक्त छंद रो नाम है।
-
(क) दूहा
(ख) सोरठा
।
(ग) छप्पय
(घ) गीत
[ ]
(च] कुड लया
६. रेखांकित रो आसय स्पस्ट करो।
क गाँधी ते कीधी जिव आजादी आजाद ।
।
(ख) देवाँ समंदर मन्थियो थाक गया मथ हत्थ ।
७. नैणाँ निरभा-
हुआ दरसण विण तरसंत ।
कवि नैणाँ नै निरभामी क्यू वताया ?
८. नीचे दिया सवाँ रा हन्दी पर्याय लिखो-
आतम, हथणापुर, सुहाग मूरत, माण ।
र
६. कवि आतम वळ नै अदभुत क्यू मान ?
१०. कवि गाँधी नै पाछो क्यू वुलाणो चात्रै ?
११ गाँधी कथा री तुलना राम-कथा सूकिण कारण सू कर ?
१२. गाँधी भारस रो भार बण भांत उठायो ?
१३. गाँधी सतक रा दूहाँ रो मुख्य भाव कॉई हैं ?

११.
गणेसीलोल व्यास
व्यास 'उस्ताद
गणेसोलाल व्यास 'उस्ताद' रो जनम स्थान जोधपुर हो : आप आरंभ
मे ही जन जागरण रे वास्ते कलम उठायी । गणेस लाल 'उस्ताद' रो ओ अटळ
विस्वास हो के कविता जन चेतना अर जन-जागरण सारू एक अचूक हथि-
यार है । आरवी अमर इणी दीठ सू वै कविता लिखी ।
गणेसी लाल एक सुधारवादी अर क्राँ त दर्शी क व हा । वै अन्याय अर
शोपण रे विरुद्ध जिया जत जनता मे प्राण फूपता 'रहया ।
इण संकलन मे वाँरी दो रचनावाँ ‘जुगवाणी आर हेत चाहिजै लीनी
है । 'जुगवाणी मे कवि जनता री वाणी रो प्रतीक वणगो है। जुगवाणी जन
जीवन में आपरो कोई प्रभाव राखै कवि इण रो चोखो चित्राम माँडयो है।
देस मे फैली फूट अर विषमता रे माथै कवि हेत चाईजै में करारो प्रहार करै ।
देस रा करण धारा नै सोव सूधो मारग बतावै।
११. जुगवाणी
आ जन कवि री जुगवाणी. आ कदेन चुप रह जाणी.
कोई लाख जतन कर हारे. आ समझे साँच सुणाणी।
कोई मार कूट धमकाई. धन-कुरव-धाम ललचाई.
से जुग रा जुल्मी खपग्या. इण करी नही सुणवाई. ;
आखड़िया सो आंथडिया इण माथै धूस जमाणी ।
जन जन रे पग वेड़ी ही. जनता गाडर जैड़ी ही.
राजा रो जोर जमावण' अँगरेज फौज नेड़ी ही.
जद व छै दवी जरवॉसू. अव किणरे हाथ दबाणी।
जाद गोरी हुकुमत अड़तो. सड़कों पर गोल्यॉ झड़ती.
जेलॉ मे चौखट चढ़िया. मौरॉ री खाल उघड़ती.

है ( ४७ ) 1 । - - 1 पण जै स्वराज घुर्राता, नरसिंघ जुत्योड़ा धाँणी । आ चोट लग्यां चमकै है, निरणां पेटा निरणां पेटा दमक है, फाटा जामाँ में रण रा, झंडा रिणती धमकै है, इण रा धण - टावर जाणे, वपदा माथै मुसकाणा । आ भूला समझा लेला, ऊजड़ खड़ता पालैला, पूर्वी इग घड़ी अगाड़ो, हाली हालै, हालैला, जुग-जुग इण री भावी है, सिल गॉणी फेर वणाणी । गायक इक दिन 'मट जास , पण औडा गीत वणामी, जन-जन रे केठा रमसो, पीढ़ी दर पीढी जासी, आ काया तो कवि री है, पण जनता री जुगवाणी । । । । مساحه -- -- धरम-ढंग रा खुल्या हेतु चाईज जन-जन रे मन हेत चाईजै जुग साथे संकट री वेळा, सगला सुभट सचेत चाईजै, जिण जनता में फूट-फजीता, खुली किवाड्या, लोग नचीता, तक मिलता उण घर में वड़सी लू क, सियाल्या, गडक चीता, जन-वळ मे ळय बज र कट, पर तन बळ तेज सचेत चाहिजे । खलीता, जात पात राजग्या पलीता, जुग जवण गे लाय लगाता, पनप रया जन लोही पीता, फूट समदरी भंवरा तरवा, जन-मन मेळप सेत चाहिजे । लिख्या लेख सू लोक मुगत है, पण जीवन जंजाल जुगत है, नवा राव ने नवा रावळा, कुण जाणै जन री हुकमत है काम करे वारी रखना मे. करी बात रो बेत चाहजै । ऐक चरे चौरासी पसे, उण घर समता किण विध दीसै. जन रा पीड़क को बखारा. जन रा भीडू मुड़दा धावियाँ रे धून साजनै. न्हाँखण मूठी रेत चाईजै । मुड़दा घीसै.

४८ ]
नेता, हाकम, ने इधकारी, हळवर कळघर जनता सारी,
एक मना पुरसारथ कर ने, मुलक करे केसर री न्यारो,
भुज मैगत रा सीरी उपजै, बरो कमायो खेत चाईज ।
धर खैच न दुसमण सीवाड़े, दो चीता दोनू दिस व्हाई.
एक मनो जाग्यां जन जीवण, एक भिड़ इक्कीस पछार्ड,
बजरवळी भारत रे रथ रा, सुगळा तुरंग कुमेत चाहिजे ।
रजथॉनी. कस्मीर. वगाली, पंजाबो उ ड्या मलियाली,
करण,टकं गुजरात मराठा, केरर उत्तरा बंड रा हाली,
वां में मुज मैणत मेळा री, नव जीवण री नेत चाईज ।
- गणेगीलाल व्यास 'उस्ताद
अभ्यास रा प्रश्न
१
.
जुग जुग इगरी भावी है, सिलगाँणी फेर वणाणी।
इण ओली मे जुगवाणो रो काम दरसायो है ।
(क) साव साची वात कहणो ।
(ख . मेटणो अर मांडणो।
(ग) जुल्मा रो धको सहणो ।
(घ) विपदा रे माथै मुसकाणो ।
(च) लाय लगार तमासो देखणो।
पण 'जै स्वाराज' पुर्राता नरसिघ जुत्थोड़ा घाणी।
अठ नरसिघ रो तात्पर्य है।
(क) वीर सिवा जो
ख) राणाप्रताप
(ग) गुरु तेगबहादुर
( )
२

नीचे दिया सबदां रा हिन्दी पर्याय लिखो।
[ ४६ . ]
(घ) वीर देश भक्त
(च) जन साधारण
३. 'खरो कमायो खेत चाहिजै' कमायोड़ा खेत रो अरथ है ।
(क) बा जोतर सुधारयोड़ो खेत ।
(ख) सूड़ करयोडो खेत ।
(ग) हळ चलायोडो खेत ।
(घ) निनाण काटयोड़ो खेत ।
(च) इंचणी करयोड़ो खेत ।
४. "अंक चर चोरासी पीसै" समाज री किण समस्या रो प्रतीक है ?
(क) नेता अर जनता
(ख)
पूंजीपति अर मजदूर
ग) जमीदार अर करसो
घ) हळधर अर कळघर
(च) राजा अर प्रजा
( )
५.
घर खैचण दुसमण सी वार्ड,
दो चीता दोनू दिस दहाड़।
कवि दो चीता कुण ने बताया है ?
६. इणरा विलोम सबद लिखो।
नेड़ो, उधेड़णो, अगाड़ी, सिलगाणी, हेत , खरो।
गाडर; जरवा, गाभा, नेड़ी, धाड़वी, भीड़, सीरी।
७.

[ ५० ]
८. नीच लिखिया मुहावरां रो अरथ बताओ।
खाल उधेड़णो, लोही पीणो, खंखरा करणा,
मुडदा.
घोसणां, मांजना में घूळ नाखणो।
देस ने केसर री क्यारी बणाणो ।
९. नीचे लिखी ओलियां रो अरथ बताओ।
(क) जद जन रे पग वेडी ही
जनता गाडर जड़ी ही।
ख) बजरवळी भारत रे रथ रा सगळा तुरंग कुमेत चाईज ।
१०. कवि 'जुगवाणी' नै अडर अर अजय किण भांत बताई ?
११. नवा राव ने नवा रावळा सू आप कांई समझो ?
१२. 'हेत चाहिजे' कविता सू आपने कांई प्रेरणा मिल ?
१३. 'हेत चाहिजे कविता रो अंतस रो भाव कांई है ?
५० सबदा मे लिखो।

१२. कन्हैयालाल सोठिया
कन्हैयालाल सेठिया रो जनम सुजाणगढ़ जिला चुरू में हुयो । आप दस
वरस री छोटी ऊमर में ही कविता लिखण लागगा। आपरी हिन्दी कविता
वांरी अनेक पोथियां छपी। राजस्थानी में मीझर नांव रो कविता संग्रह पर
'गलगचिया' नांव रा गद्य-गीत घणां लोक प्रिय हुवा । 'पातळ अर पीथल'
आपरी प्रथम लोक प्रिय रचना है, जिकी घणी मुखरित हुई।
कन्हैयालाल सेठिया रो प्रकृति-चित्रण अर मरुधर रा ग्रामीण जीवण
रो चित्रण आपरी न्यारी ही छटा छिटकावै । सूवटो, अड़वो अर कालबेलियो
आदि कवितावां में इण धरा रा रंग पळकै ।
इण संकलन मे आपरी दो रचना 'बापू' अर पीजरो लीनी है । 'बापू'
रा निधन पर लिखी आ रचना एक लोक-प्रिय मरसियो वणगो । इण रचना
मे मदरी मंदरी वेदना झळकै । पीजरो चीड़ी कमेड़ी री कविता नी है आ तो
एक दार्शनिक भाव सू परिपूर्ण ऊंचा स्तर री पदिता है । इण रचना में
भावनांवा री ऊंची उडाण है।
१२. बापू
वै
आभे में उड़ता खग थमग्या
गे ले में बता पग थमग्या
हाको सो फूटयो धरती पर,
कुण गमग्या, वै कुण गमग्या ?
ओ मिनख मर्यो के मप्यो पांखी
सै साथे नाड़ कियां नांखी?
वा सिर कूटे है हिंदुवाणी
वा झुर झुर रोवे तर कांणी,

[ ५२ ] - वरस इसड़ो कुण सजन सनेही हो सगळा रा हिवड़ा उगमगग्या । वै कुण गमग्या, वे कुण गमग्या ? मिनवां रो रुळग्यो मिनख पणो देवा री मिटगी सकळाई वापूजी मुरग सिधार गया, होणी रे आडी के आई ? जीवूला सी'र पचीस विसवान दिरा'र किया छळगया ? गिगनार पड़े लो अव सतवादी वचना सू डिगग्या । कुण गमग्या, वै कुण गमग्या ? बापू सा मिनखा देही मे धरती पर मिनख नहीं आया, आगै री पीढ़या पूछली- के इस्या नखतरी जग जाया? ई एक जोत रे पलकै तूं इतियास सदा ने जगमनग्या, ई एक मौत रे मौके पर सगलां रा आंसू रळ मिळग्या । वै कुण गमग्या, कुण गमन्या? पोजरो १ वै --- चिड़कल्यां कठे'क उड़ उड़ जास्यो ? धरती ऊपर गगण भन्योडो बंद, पीजरो ढव रो, बिना बारणे थां ने वाड़ी [ ५३ ] . । + - - बो कारीगर जबरो, पांखां मरसी लाज, मुंवाली- खा सा फिरती आस्यो। चिड़बल्यां बढ़'क उड़ उड जास्यो ? ई इचरज सू भये पीजरे- मांय पीजरा कैई- थां रे जी रो वणी पीजरो- थां रे निज री देही, ओ तो गोरखधंधो ई सू पार मुसकल्यां पास्यो, चिड़कल्यां कठ'क उड़ उड़ जास्यो ? इस्ये पीजरे से कारीगर दया धरम सै छोड्या, जीव पखेरू मौत मिनकड़ी दोन्यू साग 'भख भक्षक ने कऱ्या एकठा- पांड्यो अजव तमासो। चिड़कल्यां वाठक उड़ उड़ जास्यो ? कन्हैयालाल सेठिया अभ्यासरा सवाल १- कवि रे कथनानुसार सतवादी वचनां सूडिग जादै तो कांई हुवै ? को फूट जावै। (ख) आकास नीचे आ पड़े । (ग) मिनख रो मिनख पणों रुक जावै (घ) देवा री सकळाई मिट जावै । (च) सूरज आं थूणो उग आवै । * रोड्या, - - -- -~- -- (क) देस में हा -- - । - - - 4 - ( +

[ ५४ ]
२. “इतिहास सदा नै जगमगगा"।
अठ इतिहास जगमगगा रो तात्परय है।
(क) नवा इतिहास लिखी जगा।
(ख) इतिहास अमर हुयगा।
(ग) इतिहास पर नवो प्रकास पड़गो।
(घ) पुराणा इतिहास फीका पड़गा।
(च) इतिहास मे नवो जागरण आयगो।
( )
३. “सै साथै नाड़ किया नाखी।"
नाड़ नाखण रो आसय है।
(क) घांटी नीची करणो।
(ख) नाड़ गोडा मे देणो ।
(ग) घणो दुःख हुवणो।
(घ) लचखाणो पडगो।
(च) मूडो नी दिखाणो ।
४. ई अचरज स्यू भये पीजरे मांय पीजरा कई ।
इण कथन में कवि मांय पीजरा कैई किण नै गिणाया?
(क) मिनखा तन नै।
(ख) पंछीरा पीजरा नै ।
(ग) संसार रा गोरखधंधा नै ।
(घ आकाश अर धरती ने।
(च) जगत रा माया जाळ नै ।
५. नीचे लिखी ओळिया रो भावारथ बताओ।
(क) सगळा रा हिवड़ा डगमगगा।
(ख) सतवादी वचना सूडिगग्या।
( )
ad

[ ५५ ]
कवि महातमा गांधी नै नखतरी मिनख बताया।
नखतरी मिनख रो कांई अरथ है
७.
महातमा गांधी नै हिन्दु वाणी अर तुर कांणी दो न्यू क्यू झूरै ।
पोंजरो कविता में कवि चिड़कल्यां न कोई वात पूछ ?
६. ई संसार नै कवि अजव तमासो क्यू बताओ?
१०. जीव पंखेरू मोत मिन कड़ी दो न्यू सागै रोज्या ।
इण पद में प्रयुक्त अलंकार बताओ।
(उपमा, मयक, रूपक, अन्योक्ति)
११.
--
नीचे दिया सवदां रा हिन्दी पर्याय लिखो।
गिगनार, सगळा, एकठा, पळको, मिनकी, नाड़।
.
१२.
नीचे लिखी ओलियां रो अरथ समझांवो:
(क) पांखां मरसी लाज भुवाली खा खा फिरती आस्यो।
(ख) जीव पंखेरू मौत मिन कड़ी दो न्यू साग रोड्या ।
गंधी री मौत रे दिन देसरी कांई दसा हुई ।
१०० सयदां में लिखो।

१३. मेघराज
मुकुल
मेघराज मुकुल रो जनम सन् १९२३ में राजगढ़ चुम् में हुयो । आप
एम० ए० ताई शिक्षा पायी। मेघराज मुकुल आधुनिक गम्यानी रा पैला
कवि है जका आपरे सुरीले कंठ सू मायड भासा रो मिलरी.सू मीठो स्वाद जण
जण नै चखायो । कावि-सम्मेलना रे मंच मू आपरे सुरीला गळा न इनो रंग
जमाता क श्रोता झूमता झूमता मस्त हुइ जाता । आपरी पाणी' नारी
राजस्थानी कविता देस रा कूणां कूणां में आपरो प्रभाव जमायो । राजन्यानी
भासा रो इसो देस व्यापी प्रचार दूजो कोई कवि नी कार पायो । मुकुल जी इण
जोत रा एवळा जगमगाता रतन नीसर्या ।
'सैनाणी' अर 'करत्या' आंपरी राजस्थानी रचनावाँ रा मंग्रह प्रका-
सित हुवा । इण संकलन में आपरी कविता 'सूरज रे माथै सिन्दूर' किरत्यां में
सू ली गई है । इण कविता में नवां युग री नवी मानता री जोत जगमगावै ।
कवि री बाणी करसां र का मेतरॉ ने चितावै।
१३. सूरज रे माथै सिन्दूर
बरसै चारू कूट चानणो,
अ'धकार ने आवै लाज ।
जिको बूकियां पांण कमावै,
वो धरती पर करसी राज ।
धरा धरम ने छोड़े कोनी,
शोसण पर तो पड़सी गाज ।
जिको वहासी खून पसीनो,
वो ही अब तो करसी राज।
आग उकाळ सीळो पाणी,
भक भक करती निकळ भाप,
.

ܝܚ ५७ ] विजळी 'फाट मेघ माळिये 'उमस्यां धरती बढ़सी ताप । लियां मूगळी फूक न चूल्हो, 'आँधी आप जगावं आग इसी घड़ी में दम दम करती, लपट सजावै जुग रो भाग । हळ रै सागै आस ऊभरे निकमो छोल छाती आप । अम मद पीठ थपथपावं तो, ढील मुंह पर पड़ज्या थाप बात बात में बात' नीसरी, वणगी लंबी-चौड़ी । बात वात ..वणायाँ सरसी कोनी, अजे मोकळी ऊंघे रात जिक हाथ में हंसियो-कसियो, वो हो हो हाथ वाण्यो मजबूत । जिकै हाथ में जेळी खुरपी, वो जी वैलो सावळ सूत । जिक पगां में रुळी गरबी, वै पग हुया पांगला आज । झिक पगां सू माटी लिपटी, वण्या गरीब-निवाज वीज उघाड़ कूपन न्हावे मिरमिर मेह । नाज नी पजे खेतड़ला में, दम-दम दमकै उजळी देह । ५. वै पग मूदी पलका;

। ५८ ]
हिळ मल बाव, हिळ मल का,
हिलिमल
वे करसो आज ।
जगमग खेती, झिळमिळ खेती,
खिळण मिळण री उमर दराज,
जुग हुंकार शंख
शंख वजावे,
झालर सी झणक अणकार ।
जण-जण के हिवड़े बसग्यो,
मिनख पणे में भोज्यो प्यार ।
ले पसवाड़ो अब मत सो रे,
• जाग जाग किरसाण मजूर ।
सूरज रे
इण वेळा में
रात बीतगी अरे देख अष,
मार्थ सिंदूर ।
ले अंगड़ाई,
जमती जोत' धरा पर देख ।
घणो देखली;
एगा बली ने 'झुक झुक देख
.
डूगर बळतो
F
.
चूको मत किरसाण मजूरी.
मुलक पसीनो मांगे आज !
धरा-धरम ने जिको राखसी,
अब तो वो ही करसी राज ।
-मेघराज मुकुल

१ ५६
अभ्यास रा सवाल
कवि र कथानानुसार अव धरती पर राज करसी ।
(क) नेता
(ख) श्रमजीवी
नै
(ग) देस भक्त
(घ) देस रा जवान
(च) देस रो किसान
()
२. कवि 'सूरज रे माथे सिंदूर' कविता में किण ने जगाया है ?
(क) राजा महाराणा नै ।
(ख) नेता भर हाकिम नै ।
(ग) किसाण अर मंजूर नै ।
(घ) किसाण अर जवान
(च) गरीब अर अमीर नै ।
३. वरर्य चालं कूट चानणो, अंधकार न आवै लाज । इण पंक्ति में चानणे
रो आसय है
(२) चांद रो चानणो।
(२) सूरज रो प्रकारा।
(३) दिवले री जोत ।
(४) आग रो लपटां।
(५) नव जागरण री चेतना।
४. किसाणां अर मजूरा कनाँ आज देस काई मांगें ?
(क) मिनखा चार
(ख) अन्न जळ
(ग) वलिदान
(घ) लोहो
(च) पसीनो

६. .]
५. इण ओलियां रो आशंय स्पष्ट करो।
(क) जिकै पर्चा में रुळी गरीबी
वं पग हुआ पांगळा माज।
(ख) जण जण के हिवई वसग्यो
मिनख पण में भीज्यो प्यार ।
६. नीचे दिया मुहावरां रो अरथ लिखो।
पीठ थपथमाणो, छाती छोलणो, अंगड़ाई लेणो, जोत जगाणी, गाज
गिरणी थाप मारणी ।
७. नीचे दिया सवदां रा हिन्दी पर्याय लिखो।
चांनणो, करसो, डूंगर, मोकळी, निकमो मिनख पणो।
८. हंसिये कसिये रा हाथां नै कवि मजबूत न्यू बताया ?
६. कवि धरती पर जगतो जोत किण ने बताई ?
१०. रात बीतगी अरे देख अव
सूरज रे माथै सिन्दूर।
इण चरण में 'रात वीतगी' रो काँई तात्पर्य है ?
११- करसण में सहयोग रो महत्व किण ओलियां में दरसायो गयो ?
१२. कवि किसाण-मजूर नै किण भाँत जगाणो चावै ?
१३. समाज रै नव सृजन री वात कवि किण रूप मे बखाणी ।

१४. रेवतदान चारण 'कल्पित' रेवतदान चारण कल्पत रो जनम गाँव मणिया जोधपुर में संवत् १९८१ में हुयो। रेवतदान चारण री मणना उण क वयाँ में करी जावै है जिणरी वाँणी मे भावाभिव्यक्ति री भागीरथी हिलोरा मारै। कवि रो एक एक आखर युगान्तर री जगमपाती चिणगारी रो काम करै। - आपरी भासा सरल अर शब्द-चयन अनूठी है । आप गाँवां में घूम-घूम ने आपरी जोसीली कविता सू करसा ने चेताया। चेत 'मानखा' मे आपरी बड़ी ई जोसीली कवितावाँ रो सग्रह है। इण संकलन में आपरी दो कविता लीनी है-चेत मानखा अर इंक- लाब री आँधी । पहली कविता में कवि माँटी रे मिस करसाँ में चेतना जगावै । दूची कविता साच्या ही इकलाव री आँधी है जकी घुवाँधार धंव धंव करती आती दीखै । इण अनूठी आँधी रा अजब प्राभव रा चित्राम कवि री कलम सूब प्रगट किया। १४. चेतमानखा खेत खड़ण ने हळ ले हाली. जद करसाँ री टोळी; कितरा दिन तक सवर करेला; माटी हंसने बोली; रे बंदा चेत मानखां चेत, जमानो चेतण रो आयो। इण मांटी में सौ-सी पीढ़ी. मरगी भूखी प्यासीं; भाग भरोस रह्यो बावळा. प्रीत करी आकासीं; कदे तो पड़ग्यो काळ आभागो. गिण गिण काट्यो दोरो;

६२ ]
-
कदे तो ठाकर लाटो लाग्यो, कदे लाटग्यो वीरो;
कदे तो बरी दाबो पड़ग्यो, पादे आयगी, रोली;
कितरा दिन तक सबर करेला, मांटी हंसने दोलो;
रे बंदा त मानवा चेत.
जमानो चेतण रो आयो।
मांग्यां खेत मिळ नी करसा, मोल चुकाणो पड़नी;
मोत्यां मूगी इस धरती रो, कोल निमाणो पढ़सी;
सांमी छाती जे कोई नायो, जोर जताणो पटसी;
खेत खड़ता हळ जे रोक्यो, हाथ कटाणा पड़स';
लोई बिना रंग नी आवै, धरती पड़गी धोळी;
कितरा दिन तक सवर करेला, माटी हँसने बोली
रेबंदा चेत मानखा चेत.
जमानो चेतण रो आयी ।
इकबाबरी भांधी
अंधार घोर आंधी प्रचंड
आ धुवाधोर धंव-धंव करती
आवं है उर मे आग लियाँ, गढ़ कोटां वंगला ने ढहती।
वेताल बतूळो नाच है, जिण रे आगे संदेस लियाँ
राती ने काळो पीळी आ, कुण जाणे कितरा भेख कियाँ
वै संख बजे सरणाटा रा, कोई गीत मरण रागा वै है
उकै री चोट करै भीतां, वारियो ढोल वजाव है
विकराळ भवानी रमै झूम, धरती सूअंबर तक चढ़ती
अंधार घोर आंधी प्रचंड; आ धुवाँधोर धंव-धंव करती
आवै है उर मे आग लियाँ
गढ़ कोटाँ बंगला ने ढहती।

[ ६३ ] ma- . .. नोवां रे नीचे दबियोड़ी, जुग जुग री माटी दे झपटो ले उड़ी किलाँ ने जड़ा मूळ, पसवाड़ो फेर कियो पलटो तिणके ज्यूं उड़गी तरवारा, घोचे रो रूप कियो भालाँ रूखाँ रे पतां ज्यू उड़गा, वे लाज बचावण री ढालां बापड़ी उखरड़ी में बोतल, मद मीसण रा प्याला उड़ग्या मैफिल रा उड़ग्या ठाट-बाद, महला रा रख वाळा उड़ग्या वै देख जुगाँ रा सिंघासण, रड़ बड़ता पड़िया ठोकर में वै देख हजारां मुकट आज, उड़तौड़ा दीस अम्बर में वै ऊँधा लटकै अधर वम्ब, नहिं झेल अम्बर ने धरती अंधार घोर आँधी प्रचंड, आ धुवाघोर घंव-धंव करती आव है उर में आग लियाँ गढ़ कोटां वंगला ने ढहतो । आंधी आ अजव अनूठी है. डूगर उडाया सिल उडी नहीं सिमरथ वे उड़ग्या रंग-महल, हळ की झूपड़िया उड़ी नहीं उड़ गयो नवलखो हार देख. मिणियां री माळा पड़ी अठ उड़ गई चूड़ियां सोने री, लाखां रो चुड़लो उड़ कठ उड़ गया रे समी गदरा वे, राली रे रंज नहीं लागी ला फिर कामतण लड़ाभूम, लखपतणी मरणी लड़खड़ाती आवै है उर में आग लियां मढ़ कोटा बंगलां ने ढहती। अंधकार मत जांण बावळा, इंकलाव री छाया है इण भाग वदलिया लाखों रा, कई राजा रंक बणाया है रे आ वा काळी रात जकी, पूनम रो चांद हसावं है रे आ वा वाळी मौत जकी, मुगती रो पथ बताव है रे आ वा भोळी हंसी जी, के मरती वेळा आव है

[ ६४ ]
इण धुवाधार रे आँचळ में, इक जोत जग है जगमगती
अधार धोर आँधी प्रचड, आ धुवाधार धव धव करती
आवै है उर में आग लियाँ
गढ़ कोटा बंगला ने ढहती ।
- रेवतदान चारण 'कल्पित
अभ्यास रा सवाल
१. भाग भरोसे रहयो बावळा
प्रीत करी आकासी।
अठ प्रीत करी आकासी रो तात्पर्य है।
(क) भगवान रे भरोसे रहणो।
(ख) मोटा मिनखाँ सू हेत राखणो ।
ग, नेता री बात नै सान्ती मानणी।
(ध) झूठो हेत जमाणो ।
(च) बिरखा रे भरोसै खेतो करणो।
२. 'सांमी छाती ज्ये' कोई आयो जोर जताणी पड़सी।
सामी छाती आण रो सही अरश है।
(क) सामनो करणो ।
(ख) छाती पर मूंग दळणा !
(ग) छाती छोलणी।
(घ) बााँ बायाँ मिलणौ ।
(च) सामो चालर आणो।
३. डूंगर उड़ाया सिल उड़ी नहीं
इण पंक्ति मे डूंगर अर सिल प्रतीक है।
(क) भाखर अर भाटारा।
(

[ ६५ ]
--
(ख) राजा अर रंक रा।
(१) नेता अर जनता रा।
(घ) तरवार अर तिणक रा।
(च) झूठ अर सांच रा।
४. 'इंकलाब री आंधी' कविता में कवि रो मूल उद्देश्य है।
(क) ऊँच नीच रो भेद बताणो।
(ख) धनपतियां री बुराई करणो।
(ब) राजावां नै राख में मिलाणो ।
(ध) मदरा मतवाळा ने खरी खोटी सुणाणो।
(च) बनतन्त्र रो नवल संदेश सुणाणो ।
५. इणरा विलोम सबद लिखो।
रंक, दोरो, मूगी, भोळी जोत ।
६. नीचे दिया सवदाँ रा हिन्दी पर्याय लिखो।
घोचो, आंचळ, उखरड़ी, कामेतण रमै ।
७. नीचे दिया मुहावरां रो अरथ वताओ।
पसवाडो फेरणो, रंग जमाणो, भाग बदलणो, ढोळ वजाणो सामी छाती
चढ़णो।
८. 'चेत मानखा कविता मे खेतरी माटी व रसा नै काँई सीख देव ।
६. करसां री सौ सी पीढ़ी भूखी प्यासी क्यूमरगी ?
५० सवदा में उत्तर दो।
2. धरती नै मोत्याँ मूगी न्यू मान ?
:. इंकलाब री आंधी में रखवाड़ा री काई दशा हुई ?
३. 'लखपतणी मरगो लड़खड़ती इण उक्ति रो भावार्थ स्पष्ट करो।
राली रे रंज नहीं लापी
इण पंक्ति में इकलाव री आंधी रो वाई प्रभाव प्रगट हुवै ?
इंकलाब री आंधी अर साधारण आँधी में कवि काई अन्तर बतायो

१५. चन्द्रसिंह । र चन्द्रसिंह रो जनम बीकानेर जिले में गाँव चिरकाळी में संवत् १९६६ में हुयो । मरुधर रो प्रकृ'त चित्रण आप रो मुख्य विपय रहह्यो । राजस्थानी भासा रे लोकप्रिय छंद दहा में 'लू: अर वादळं ने सांतरी सणगारी । 'लू बाँच्या इसो लखावै जाँण दूहे दुहे वळती लूवाँ रा खैखाड़ वाज वण मन झुलस कोनी । वादळी वांच्या सावण भाददारी उल्हारा आवै । इण दूहा में मन रम हुलसै अर मगन हुवै । प्रस्तुत संकलन मे बादळो रा २१ दूह चुणर लीना है। मुरधर रा मिनख वादली ने माथै हाथ दिया ऊभा ऊर्ड के । वादली रा घणां कोड करें वादळी दीख्याँ घणा उमावै भर नैण भर-भर ने वारणा लेवे । 'वादळी' एक आछी लोकप्रिय रचना है जिणरा अनेक संस्करण छपी- जगा । 'वादळं ' पर कवि ने नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी सूरत्नाकर पुरस्कार' मिल्यो। 3, १५. बाळो . आस लगायाँ सुरधरा, देख रही दिन रात । भागी आ तू बादळी, आयो रुत बरसात ॥१॥ कोरॉ-कोरॉ धोरियाँ. डूंगा-डूंगा · डेर । रमां से बादळी; ले ले मुरधर ल्हेर ॥२॥ ग्रीखम-रुत दाझी धरा, , कळप रही दिन-रात । मेह मिलावण बादळी, वरस बरस बरसात ॥३॥ -- आव [ ६७ ] सोने सूरज गियो, मुरघर लेवै विनर मौनी संग दोठी वादळियाँ । वारणा भर-भर आंख'ड़यां ॥४॥ सूरज किरण ऊतावळी, मिलळ धरा सू आज । वादळयां रोवयां खड़ी, कुण जाण किण काज ॥५॥ सूरज ढकयो बादल्यां पडिया पड़द अनेक तडप किरणां वापड़ी, छिके न पड़दो एक ॥६॥ ऊंडी 'अवर में उठी गहडंवर घहराय वरस सुहाणी वण घटा, सारी धर सरसाय ॥७॥ घटाटोप आभो धिर्यो, रहयो खूब घरराय । आखी जीवा-जूण रो, हियो हिलोळा खाय ॥८॥ काळी-काळी कांठळी, उजळी कोरण जोय । उत्तर दिम में उठ्यो, वॉण हिवाळो होय || अम्बर मे उमडी घटा, आभै अटकी आँख । चढ़-चढ़ छाताँ छोळ में, मोर संवारै पाँख ॥१०॥ पळ-पळ में पळका करै आभै भरयो उजास । जाण प्रीतम-खोज में, छाणे वीज अकास ॥११॥ भूरो काळो वादळी, वीजळ रेख खिचाय । जाण कमोटी ऊपरां, सुवरण-रेख सुहाय ॥१२॥ सोरभ आवै सोगुणी, मिळियो । घर सू मेह । हूंगे सांसां जग पिये, हिवड़ भीतर नेह ।।१३।। किरसाणां हळ साँमिया, 'चित से आयो चेत हरव भरया से पूपिया, अपर्ण-अपणे खेत ॥१४॥ वीजाँ अंकुर फूटिया, अळसाया “सरसाय हरिया-भरिया फूलड़ा, फूल्या-फळिया जाय ॥१५|| लो मी त मान हा राम!

[ ६८ ] अंबर झूले बादळी; पण झूले झुल्लाह । वेलां विरछा-डाळियां, हिवड़ो हिवड़ माह ॥१६॥ चांद विलू वी वादयां, कर-कर मन में चाव । मुळकै मिल-मिल मोद में, पळ पळ नवलो भाव ।।१७।। बांदळियां आभो घिर्यो, बिच-विच चांद सुहाय । लुक-मचणी लाग्यो रमण. मुळक-मुळक मन माय ॥१८॥ कठक वंजड़ बरसगी, कठक माघ खेत । तरसा मत इण रीत सू, वदळी वरस सचेत ॥१६॥ हरिया हरिया बड़ा, मामी मध वेव । हलको झोलो पवन रो. आय विगार्ड खेल ॥२०॥ आज सिधावो तो सिधो, दीज्यो मती 'बसार । तिसवारी जद अवासी, सुध लीज्यो उण वार ॥२१॥ -चन्द्रसिंह अभ्यास रा प्रश्न १. मुरघर लेवे वारणा, भर भर आँखड़यां । भर भर आँखड़ियाँ रो कारण है। (क) काली काँठळ घणी सोवणी लागी। (ख) वादळी घाँ दिनों पाछै दीसी। (ग) मुरधर नै बादली री ओल्यू आवै । (ध) वादळी आभै ऊभी मुरघर (ब) बादळी मुरधर री आस नी पूरी। ने तरसावै। ( )

[ ६६ ]
२. आखी जीवाजूणरो हियो हिलोळा खाय ।
हियो हिलोळा खाय रो अरथ है।
(क) हियो ही जरै।
(ख। हियो हाथां वायां नी रैवे
(ग) हिया में आणूतो कोड आवै ।
(घ) हियो डगमगावै ।
(च) हियो भलभेड़ा सावै ।
३. तरसा मत इण रीत सू बदळी वरस सचेत । किसाण आ बात क्यू कहो?
(क) वादळी ओळा बरसागी।
(ख) वादळी आई बाँ पगाँ ही चलीगी।
(ग) बादळी बायरा में उडगी।
(घ) बादळी आधो खेत सूखो छोड़गी।
(च) वादळी वरस्यां विना चलीगी।
()
४. आज सिधावो तो सिधो दीज्यो मती बिसार ।
आ बात किण न कहीं?
(क) पति ने ।
(ख) बादळ नै ।
(ग) चाँद नै ।
(ध पंछी नै।
(च) मोरा नै
.
५. नीचे लिखी ओळियाँ रो आशय स्पष्ट करो।
(क सोरभ आवै सौगुणी मिळियो धर सू मेह ।
(ख) वेला बिरधा डालियाँ हिवडो हिवड़ा माँय ।

७२ ] । . रात री अ नंनकड़ी बैन उड़े है कूकू थाळ संभाळ ||१|| चिलकै सोने रा चीलरिया, बंधगो बा रूपाळी पाळ कूपलो किण रो दुळियो आज गुदळतो घण असमानी ढाळ ||३|| चिड़कलियां री चाट, रूख री डाळा रो संसार । कर खुल मन री वातां दोय, मनीजै सुख-दुख री मनवार ॥४॥ मिळ माळां में चांचां खोल, पंखेरू विचिया इदक मोद । मिळण रो कितरो मोटो चाव. हजाराँ हिवड़ा रो परमोद ॥५॥ झंवरा झुटपुटिये री वेल, खुलै वा अन्धार रो आंस। वेल लख लचकांणो पड़ जाय लजाळू सिरके पल्लो नांख ॥६॥ वेल रे खोळ में में घर सीस, कंवळा फूल रहया - ऊँगीज । पान री लीली सेजां हीड, बिलमता रहग्या यू विलमीज ॥७॥ रोवता टावरियों ने छोड़, आई दूवण ने घर नार। -- [ ७३ ] जिण घर घणेरी व्हेगी गोयर भीड़ सुणीजै मीठी दूधां धार ॥ ८ ॥ धवळ धार री कार, करू मिनखां रो कितरो मोल । अजांणी सरग-पुरी रो सार, राखलू कुणसी लाला तोल ॥ ६ ॥ सांझ रो क्यू पाछो परभात, करै कुण टावरियां रो खेल । जगत है वण-मिटवा रो नाम, अंधारै उजाळे रो मेळ ॥ १० ॥ लोभ रे रे कूडाळे में आज, उड़ाई आभै तांई खंख । जगत री जग में ही रह जाय, वणावै नर सोने री लंक ॥ ११ ॥ विहाण पोयण पंथ पवाण, उगूणी ऊषा धरती आय कसूवल आंख्यां में आंख्यां में भर राग, धड़कता हिवड़ा से हरखाय ॥ १२ ॥ नारायणसिंह भाटी अभ्यास रा प्रश्न ." १. सांझरो क्यू पाछो परभात करै कुण टावरियां रो खेल । इण पद में टावरियां रा खेल री विशेषता है।

[ ७४ ]
(क) मेटे अर माडे ।
(ख) नवी रामत रमै ।
(ग खेलै अर भाजै।
(घ) रमै अर रोवै।
(च) हंसै अर कूदै ।
।
( ).
२. "वणावै नर सोने री लक ।"
सोने री लंक वणावण रो अरथ है ।
(क) लालच रे गैलै लागणो।
(ख) घणो धन जोड़णो।
(ग) माया रे लारै लागणो।
(घ) घर नै सोना सू मंढणो ।
(च) अणहोणी बात सोचणी।
३. रात री औ नैनकड़ी वैन
उड़ है कूकू थाळ संभाल ।
अठै कू कू सू अभिप्राय है ।
(क) सांझ री लालिमा ।
(ख) कूकूरा मांडणा।
(ग) आरती रो थाळ ।
(घ) कूकूरा पगल्या ।
(च) कूकूरो टीको।
( )
४. "जिण घर घर धवळ धार री कार।"
धवळ धार रो अरथ है।
(क) तलवार
(ख) गंगाजळ
..

[ ७५ ]
(ग) छाछ
(घ) दूध
च) घोळा केस
( )
५. नीचे लिखी ओलियां रो भावार्थ लिखो।
(क) कूपलो किण रो दुलियो आज ।
(ख) कसूमल आख्यां में भर राग
(ग लजाळू सिरके पल्लो नांख ।
६. नीचे दिया सबदां रा हिन्दी पर्याय लिखो ।
पोयण, कंवळा, रूपाळी, कोड, अचपळी, उगूणी, आथूणी।
७. कवि रात री नान्ही वैन कुण नै बताई ?
८. कवि दिन नै अचपळो किण कारण सूबतायो ?
९. सांझ धरती पर किण भांत उतरै ?
१०. सूर्यास्त रे पछ कवि आथूणी रा आंबर रो वरणन किण सवदा
में करें?
११. सांझ वेळा धरती पर आंणद छा जावै ।
सांझ कविता रे आधार पर इण रा दोय उदाहरण दो ।
१२. सांझ रा प्रकृति-चित्रण रा दोय चित्राम अपणां सबदा में व्यक्त करो।
१३. आप रा गांव री सांझ रो वरणन करो।
सवद सीमा १०० सबद ।

१७. गजानन वरमा
गजानन वरमा राजस्थानी कविता ने लोकगीतां री सौरभ, स्वाद अंर
सुर दीनो। आपरी कविता मे पिरवार, समाज अर गावां रा जीवण रो
सजीव चित्रांय निगे आवै। राजस्थान रा लोकगीतां री आतमा ने झकझोर,
गीतां री गंभीर भावना ने परख नवै गीतां री नवी बानगी राजस्थान ने दी।
गेयता आपरी कविता रो मोटो गुण है ! कविता री भासा बोल चाल री
भासा सूमिलै ।
गजानन वरमा रतनगढ़ रा वासी है। इण संकलन में आपरी एक
लोक-प्रिय रचना चुणर लीनी है । सोवन थाल एक गांव रा सुखी पारिवारिक
जीवण रो सफल सजीव चित्रण है।
१७. सोवन थाळ
पौ फाटी जद बोलण लाग्या
पांख-पंखेरू पीपळ-डाळ ।
छोटी दयोरांणी पीसण वैठी
वाजर-मोट चिणां री दाळ ।
वडी जिठांणी जायो गीगलो
वाजण लाग्यो सोवन थाळ ।
नणद सुरंगी सात्या देवै
घर घर बांध वांतरवाळ ।
पौ फाटी जद वोलण लाग्या
पांख-पखेरू
पीपल-डाल ।
-

[ ७७ ] दिन चड़ आयो गोवै ऊभ्यो गाया रो म्हारो कान्ह-गुवाळ । आंटो-टूटो हाथ गेडियो सिर पर वांध्यां लाल रुमाल । कांध लटक लाल. लोटड़ी संकड़ी है माटी री नाळ । घर की धिराणी गाय उछेरे मधरी मधरी चाल चाल । पौ फाटी जद बोलण लाग्या पांख-पखेरू पीपळ-डाळ । धीकी देय' र हांकण लाग्यो गायां ने गुवाळियो रे लाल । फळसै वा' रे टाबर खेल खेत बणावै बांध धाळ गोबर चुगै सहेल्यां मिल थाप थेपड़ी करै कमाल मरद लुगाई यू बतळावै आयौ समौ भाजग्यो काळ । पौ फाटी जद बोलण लाग्या । पाख-पखेरू पीपल-डाळ । आंगण मे दो चुनै चिडल्यां विख रेडी चाकी री दाळ । छोटी नणद काई लुळ लुळ साफ करे है ठाण दादी ताई चरखो कात बैठी है जै पीढ़ो ढाळ - भूवारी है

[.. ७८ ]
राख रावड़ी घोळ संवार
चतर चरखलै री वै माळ ।
पौ फाटी जद, बोलण लाग्या
पाख-पखेरू
पीपळ-डाळ
हाळी हळ रा ठाट संवार
गावे है तेजे री ढाळ ।
मिनल मजूरी करण लागग्या
लेकर कसिया और कुदाळ ।
हूचे वैठ्या भोळा भाई
करै खेतरी नित रखवाल ।
मणत रा त्यूहार मनावै
नाच गावै दे दें ताळ ।
पौ फाटी जद वोलण लाग्या
पांख-पखेरू पीपळ-डाळ ।
छोटी द्योरांणी पीसण बैठी
वाजर-मोठ चिणां री दाळ ।
बड़ी जिठाणी जायो गीगलो
वाजण लाग्यो सोवन थाळ ।
नणद सुरंगी सात्या देव
घर-घर वांदै वानरवाळ ।
पौ फाटी जद बोलण लाग्यां
पॉस्ख-पखेरू पीपळ-डाळ ।
-गजात वरमा

f७९
अश्याल रा सवाल
( )
१. घर में गीगलो जनमै जद कांई बाजै ?
(क) ढोल
(ख) नगारा
(ग) सहनाई
(व) थाळ
(च) अलगोजा
२. आयो समो भाजगो काळ रो अरथ है।
(क) आज काल करता ऊमर बीतगी।
(ख) चोखो जमानो हुयगो।
(ग) मौत रो डर मिटगो।
(घ) सामनो करतां ही भाजड़ पड़गी।
(च) सहज ही सांप मरगो ।
३. दादी ताई चरंखा री माळ किण चीज सूसंवारै ?
(क) राख रावड़ी सू।
(ख) तरता पाणी सू।
(ग) दूध री थर सू।
(घ) मीठा तेल सू।
(च गाय र गोवर सू।
४. कान्ह-गुवाल कवि रा सवदां में पायां उधेरी ।
क) पौ फाटता ही।
(ख) दिन उग्यां पहळी।
(ग) दिन उगता ही।
(घ) चढ़त दिन ।
(च) दिन मथारै आयो जरं ।

८०
ہا
५. नीचे दिया सवदां रा हिन्दी रूप लिखो:
सुरंगी, वानरवाळ, गेडियो, लुगाई, मंदरी, गोवो।
६. नीचे दिया मुहावरां रो अरथ बताओ।
छीकी देणो, थाळ बजाणो ।
७. गीगलो जनमता ही घर मे काँई उछाव करें।
८. कवि नणद नै सुरंगी क्यू वताई ?
६. राजस्थान में सात्या देणरी काँई प्रथा है ?
१०. घरां में वानरवाळ किण मौके वांधी जावे?

"
१८. रामनाथ व्यास परिकर
रामनाथ व्यास परिकर रो जनम सन् १९२६ में बीकानेर में हुयो।
आप विद्यार्थी जीवण में ही राजस्थानी काव्य रचना री ओर अग्रसर हुया ।
रवि ठाकुर री गीतारली रो आप राजस्थानी में अनुवाद करयो । लेनिन माथै
रचियोड़ी सी कवितावां रो आप अनुवाद करयो। इण रचना पर आपने
रूस सूपुरस्कार भी मिल्यो ।
रामनाथ व्यास री कविता में गतिसीळ जीवण रा दरसण हुवै । नवै
समाज रा नव निर्माण रा सुर मिलै । आपरी कविता मे मेहनत रो महातम
अर सोसण रो खंडन है।
इण संकलन में आपरी एक देस भगती सूपरिपूर्ण भावभरी कविता
लीनी है । कवि देस रे खा तर मर मिटवाळा झंझारा रा दरसण करावै अर
नव जागरण रा नव सदेस सुणावै ।
१८. इण धरती कद सानो हार
इण धरती कद मानी हार
निपजै साख वीरता री नित, माथाँ रो होवै बीजाण,
रगतदार सू पाणत पीवै, रण-खेतों में धुरै निसाण,
कण-ऋण जाणे इण धरती रो, भाख र हूगर है सैनाण,
आभयो थर्रावै ऊमो, पंछीड़ा
पावै
समदरियो ले उफण हवोळा, नद नाळा जायै बलिहार ।
रिच्छा कर हिमाळे जभो, हुलरावै गगा रो धार,
सागर गावै अगम सुरों में, बन वन मंदरी उड़ बयार,
गुणगान,

८२ ]
फारस,
सोनल दिन रूपाळी रातां; स्त-रुत रा साज सिणगार
फळे वेल मुसकावै फुलड़ा, अमर सहोदां जावै वार,
सरण आण पड़या उण पायो, गोदी मे मायड़ रो प्यार ।
अगन-झळों में दम दम दीप, घणी पद्मण्यां रो वो रूप,
आन मान मरजादा खातर, घाँ जणां दोन्या सिर सूप;,
काँकण-डोरा पड्या पगां में, मन में पिरतग्या रो ध्यान,
वन-बन फिरया घणा दुख झेल्या; नित राख्यो माता रो मान
मिसर, अरब, तातारी, घणां सिकंदर करी जुहार ।
लूट छावणी लाया इंगजी, राज फिरंगी ने ललकार
कटगी वेड्या खिरी हथकड़याँ, कोट लांघ चमकी तरवार,
बादुरसा, नीना साहब अर वोर तांतियाँ सा सिरदार,
स्यामसिंध, खुसियाळ कंवर सिंघ करण रतन सा झंझार,
जगी जोत आजादी रो, ले राणी लिछमी रो अवतार ।
नव देस री नुवी कल्पना, नुवो मिनख जीवण पाव,
आज खेत मे नुवो धानड़ो, मुलक-मुलक मंगळ गावै,
धुरै आज है नुवो नगारो. नुको रगत उफण्यां जावै.
नुवै राग रो नुवो गीतड़ो. नुवै सुरां निरमै गावं ।
सौ बरसाँ सू आजादी रो नुवो सई को करै जुहार ।
-रामनाथ व्यास परिकर
अभ्यास रा सवाल
१. "अगन झळाँ मे दम दम दीप।"
इण पक्ति में जगन झळा रो अरथ है।
(:) दिवले री लोय ।

१९. सत्यप्रकाश जोशी ज सत्य प्रकाश जोशी आज ल बम्बई में हिन्दी रा प्राध्यापक है अर राज- स्थानी मासिक पत्रिका 'हरावळ रे सम्पादक रो काम करै। हिन्दी क वतावां मे आछी ख्यात रे उपरान्त सत्यप्रकाश जोशी राजस्मानी मे कचतावाँ लिखणो चालू करयो । 'राधा' आपरी पैली रचना है। 'दीवा कॉपै क्यू आपरी फुट- कर कवितावॉ रो दूको संग्रह छप्यो । जिण मे माता अर सैली रा नवा नवा प्रयोग कीधा। प्रस्तुत संकलन में आपरी दो रचनावाँ लीनी । अरज अर हर । 'हर आपरी भाव पूर्ण अर सरस रचना है, जिण मे वम्बई जैड़ी महा नगरी रे विचाळ मरुधर रा एक मिनख ने जनम भौम री याद आवै। हिया रा भाव आखरों में उत्तर आवै। १६ अहम सारद माता सीस निवाऊं, ओवर दीजै, मन री बातों सैज सुणाऊँ, आवर दीजै । सबद अकथ री मून तुड़ावै, सवदां री सुतियाँ वण जावं, ग्याँन सिंवट सबदा में आवे, वाणी ! ओ किरियाबर कीजै । प्राणां सू सबदाँ ने सिरजू. सबदाँ सू जग पीड़ा परसू रूप अरूप सबद सू निरखू सबदा , माही आदर - दीज

homemad
सवदां सू भारी तुल जाऊं,
सवदा सू मूघो दिक जाऊँ,
सवदां में जीऊँ, मर जाऊँ
सबदाँ री आगोतर दी ।
सारद माता सीस निवांऊ ओ वर दीजै ।
मन री बातां सैन सुणाऊं मालर दीजै ।
हर
लगतोई गाज्यो रे सांवण ने भादर बो
अवर सू धारोळा ओ सरता आवै है,
रेळा तो उतरे म्हारी मेड़ी री लाल किंवाड़ी
वाळापण रो, गांव री घणी हर आवे है ।
रळकाती मेह थन वाँकड़िये केसा में,
पलकां रे छाजे रिमझिम छॉटां मे टोळती,
ऊँचै चढ़ डागाळिये बायाँ में भर लेती,
कंचन सी काया ने डाबर मे झिकोळती
छांटां ने रग देती टप चंवत मजीठ,
भीज्योड़ी चुनड़ी रे सह। मे लुकाती म्है,
सरवर री पाळ सात साणियाँ माथ लेय
आँवाँ री डाला थनै हीडा हीडाती म्है ।
पण थू तो धायोड़ी धरती रो पांणतियो
समदर रा जायोड़ा समदर ई बिलमावै,
तिरसी है रतन तळायाँ,
तिरसाई हंसला
देसाँ रो साँवण तो सूख ई टळ जावै ।
बरस्यांजा बरसां लग इण मोटी नगरी में
कू कू रे पगल्या, कुण बधावळा फेरां में
२५

hond २७ -- 1 - * पग पग - पळका dc - + - ५ भाग है जीवण तो आँचो ने उतावळो, मिनख अठं चकरी चढ़ घूमै है घेरा मे । इण नगर झुकी सतखंड हवे'लयाँ आभा ने धरती सू आगरे ई सरकावै ढक लेवे चन्दा ने सूरज उमड़ घुमड़ वादळया कुण जाण कद जावै । गोली ज्यू बंधियोड़ी विळी इण नगरी मे, कुण जाँण आभा में गोरी सो कुण खिवै ? लोखण कल पुरजाँ रा ऊँडा धमाकॉ बीच कुण जाँण आभा में इन्न रयो धररावै । मार्ग है मारग मे अणगिणिया. मनख रूप छॉटाँ रे पड़ता ई भाटा से विलमावै । ऊँची चढ़ रोक जे मारग विरखा दे रो, भूखी है भीता, व मिनखाँ ने गिट जावै । पग नो भोम रुकी भाटॉ सू की करवै माटी री कूख हरी हरियाळी सरसण दे । बोलनी सवावै जदे मोर मिनखाँ रे बस मे व्हे विरावानी बासण दे। टाबर नी मोद करे मेह वावा झुक रे झुक ठुलो तो मर जावै दूली पण नी । रोवै । कथ नी पधारे भीगी ले पागड़ी तन घुळियो लाल रंग लाल रंग कॉमणियाँ नी चावै कुण गाव कुण नाचे मन मे कुण मोद करैः कुण जॉणे चोक सिगरथ पाँवणी आई है । कुण पूछ बात अठ देसाँ परदेसाँ री, देवाँ रो काँई आ संदेसौ लेर आई है । - पग पपीयाँ रा, A - 3 ----

Lord
-
छोड़ ‘मनलागी इण मोटी नगरी ने;
जू नी मी गेडी रे डागळिये जावण दो।
आडा तो टेढ़ा म्हारे पड़ना बंधाय राज,
सावण भर अलबेली प्ररावा मे न्हावण दो।
।
-
सत्यप्रकाश जोगी
१. कूकू रे पगल्या कुण धावेला
कू कू रे पगत्या वयाचे रो तात्पर्य है
(क) स्वागत सत्कार करै ।
(ख) आया रो मान रान्दै ।
(ग) कू कू रा पगल्या मांडे ।
(घ) पगाँ रें
कू लगावें।
(च) कूरो थापो देव ।
()
२. तिरसी है रतन तलायाँ तिरसाई हंसला। कवि नै कठारी रतन तला-
याँरी याद आई ?
(क) माळवा री
(ख) गुजरात री
(ग) मरुधर री
(घ) मान सरोवर री
(च) सारा देश री
()
३. वरस्याँ जावरसा लग इण मांटी.नगरी में ।
अठ मोटो नगरी 'कण नै वताई ?
(क) दिल्ली
(ख) बनारस

[' ६१ ] छ, हर आबाळा का पगाँ तलै, मै पलकां फैलाती रू छू। अर जाबाळा नै दूर तलक, पोंछाबा नै जाती रू छू। हिबड़ा मैं धधक आग और आख्यां में आंसू बरसै छ, पण इतरी होतां सातर भी, होटॉ सै मुसकाती रू छू। ज्यो भी आयो बो मन चायो करगो म्हारो पर कास घेण । मै छू बजार की लालटण ।। २ ।। मैं ज्यां के तांई जुपू, मनै बै,खुदी फोड़बो चावै म्हारे माळ भाटा बगार, बै ओठा मन मैं स्यावै छै । जीतै न कुम्हार कुम्हारी नै अर कान गधी का जाई है, या एक कहावत छै जीनै नै सांची कर र दिखानै छ । मै फूटी तो-गै जुप, ऊठी म्हारी भैणां लैण की लैण । मै हूं वजार की लालटण ॥ ३ ॥ थां जस्या सुधारक किंतरा ही जनम र मरगा अर मर जासी, मैं यू ही जुपती रै स्यू, मारी हालन न सुधर पासी । मू नै मत छेड़ो जुप बायो, बस ई मै ही थांको हित छ, नातर तो वंधबा के बदल, ओठो घर बंध्यो बिखर जासी। थे टपटेळा खाता फिरस्यो होता सांतर भी खुला नैण । मै छू बजार की लालटण ॥ ५ ॥ -बुद्धि एकाश पारीक पण अभ्यास रा सवाल १. सड़का पर जनम बिताऊं । आ बात कुण कही? (क) सड़क पर सूतो भिखारी ख) चोराया रो सिपाही

-
1
२१. कल्याणसिंह राजावत
.
.
कल्याणसिंह राजावत नागोर जिले रा चितावा गांव रा वासी है।
आप अध्यापक रो काम करै । आप छोटी ऊमर में ही राजस्थानी काव्य
रचना में रुचि लेण लागा। थोड़ा दिनां मे ही आप राजस्थानी कवि सम्मेलना
रा लाडला कवि वणगा। मनांरी प्रीत अर अथिर जीवण रो छळावो आपरी
कवितावा रो खास विसय । प्रकृति री छिव रा चित्राम बणावा मे भी आप
घणाँ सिद्धहस्त ।
राँमतिया मत तोड़' नाम सू आपरी कवितावाँ रो एक सुन्दर संग्रह
छपियो । आपरी काव्य रचना मे सबद-चयन अर मौलिवता घणी मोवणी
लागै । इण संकलन मे आपरी एक रचना लीनी है जीण में मिनखातन री
अथिरता रे सागै प्रकृति री परिवर्तनसीलता रो चित्र खेच खण भंगुर जीवन
री सार्थकता निरर्थकता रो ससक्त सजीव चित्राम कर्यो है ।
२१. गाड्यां निकळो चाला रंग्या
अळग देसॉ रूंख ओझल्या; नंण पंथड़ा गीला रैग्या,
ज्मर री गाँठडल्याँ लाद्याँ, गाड्या निकली चीला रंग्या ।
फलसे फलसै बज्या नगारा, ऑगण आंगण पायल बाजी।
नणां नणाँ काजळ सार्यो, हाथ हथेळी मैंदी राची ।
कंठ कंठ में गीत सुहाया, जद बनडी चंवरी में आई।
दिवलो दिवलो जोत उजाळी साधण मुळकी प्रीत बंधाई ।
रूप मैं लरी नीव निकरमी, गोख गरकता टीला रैग्या।
ऊमर री गाँठड़ल्या याँ, गाड्या निकली चीला रैग्या ।
फूल फूल पर भवरा आवं, डाळी डाळी आवं पंछी
लैर लैर पर जोवण थिरकै, प्रीत बटाऊ क्यू कर थमसी ।
4

[ ६५ ]
गीताँ पाछै आँसू हळक सहनाई संग छिता वळ रे ।
रूप छाँवळी दरपण दरस, मुरथळ तिरसा मिरग छळ रे।
कुण सिकली गर चकर घुमावै, धार ट्रटमी खीला गया ।
धरा गूदड़ी गिगन झुपड़ी, चाँद सुरज रा दीप उजाल्या,
वायरिया री लाँवी चादर, ओढ़ पोढिया लाल दुलार।।
सपना रे मिस बाग लगाया, मुळको वळियाँ कूपळ सारी,
फूल फूलिया फलड़ा फाट्या, सौरभ दुळगी क्यारी क्यारी ।
कुण चिणगारी आग लगाई, साँसा लळगी खारा रैग्या,
ऊमर री गाँठडल्याँ लाद्याँ, गाड्यां निकळो चोला रैग्या ।
ईट ईट सू अंबर नाप्यो वायरिये खुलग्या चौबारा,
नीव अटारी न्यारा न्यारा आछो भेद को चेजारा।
तार तार सूताँणो ताँण्यो, आंतॉ चिपगो गिणती तारा,
थान वणाया डील उघाड़े, वेजाँ हो रे चेजारा ।
हाथ कमाई हाथ न आई, धाड़ो पड़ग्यो ढीला रंग्या,
ऊमर रो गाँठडल्याँ लाद्या गाड्याँ निकळी चीला रंग्या ।
कल्याणसिंह राजावत
अभ्यासरा सवाल
१. ऊमर री गाँउडल्याँ बाँयाँ गाड्या निकळो चीला रैग्या ।
कवि रा इण कथन मे जोवण रो काँई साँच चौड़े आवे ?
क) जीवण अथिर है।
(ख) जोवण वोझल है।
ग) जीवण रा अनेक गैला है।

[ ६६ ]
(घ) जीवण सार हीण है।
(च) जीवण मे उतार चढ़ाव है।
२. गीतां पाछं आंसू ढलक सहनाई संग चिता बळ रै।
इण उत्ति रो मुख्य भाव है ।
(क) सांच झूठ ।
(ख) छळ पाखण्ड
(ग) आँणद उछाव।
(घ) सुख दुःख ।
(च) शोक संताप ।
३. धरा गूदड़ी गिगन झूपड़ी इण पंक्ति मे अलंकार है ।
(क) अनुप्रास
(ख) वैण सगाई
(ग) उपमा
(घ) रूपक
(च) अन्योक्ति
( )
४. नीचे लिखी ओलियां रो आशय स्पप्ट करो।
(क) धार टूटगी खीळा रंग्या ।
(ख) गीतां पार्छ आंसू ढलकै ।
(ग) सपनां रे मिस वाग लगाया।
५. इण ओळियाँ रो भाव सौंदर्य वताओ।
(क) ऑगण आँगण पायळ बाजी।
(ख) ऑता चिपकी गिणती तारा ।
६. नीचे दिया सवदाँ रा हिन्दी पर्याय लिखो।
चीला, चंवरी, मुळकी, कू पळ निकरमी, धाड़ो, उघाड़, साथण ।

[ ९७ ।
७
नीचे दिया मुहावरां रा अरथ लिखो।
तारा गिणणा, ऑता चिपणी, नैण पीला होणा,
सपनां में बाग लगाणा, आसूढलकाना ।
८. कवि रूप में ल रो नीव नै निकरमी क्यू वताई ?
६. "कुण सिकलीगर चकर घुमावै।"
कवि सिकलीगर किण नै बतायो ?
१०. कवि जोबन री अथिरता री बात किण रूप में कही?
११. कवि चेजारा रे मिसकॉई सीख दी ?
१२. "गाडयाँ निकली चौला रैग्या"
कविता रो मुख्य भाव कॉई है ?
अग। श्री
..
द
+
४
६

-
२२. रघुराज सिंह हाडा
F
रघुराज सिंह हाडा रो जनम गांव चमलासा झालावाड़ मे सन् १९३४
में हुयो । विद्यार्थी जीवन मे हा आपरी रुचि काव्य साधना रा दिसा मे मुडी ।
समाज-शिक्षा रे साग सागै आप गावां री जनता ने रस भरया गीत सुणा भाव
विभोर करता आया। आपरी जादूभरी कवितावाँ हजारां' कंठा में गूज ।
समाज ने इण गीता सूनवी प्रेरणा मिलै । कविता अर गीतां री आपरी अनेक
पुस्तकां प्रकाशन मे आई जिण मे 'घूघरा' घणी धमरोळ मचावै । 'अणबांच्या
ऑखर' आपरे राजस्थानी गीता रो नवो संकलन नीसरयो।
T
।
प्रस्तुत संकलन में आपरी पुस्तक धूघरा सूछांट र पांच पद लीना ।
प्रत्येक चतसपदी आपरी'न्यारी न्यारी मरोड़ राक्ष, न्यारा न्यारा भाव राखे ।
पण कवि री आतमा एक एक घूघरा
मे झणकारा मार।
२२. घूधरा
(१)
ग्या छा समंदर में तो अमरत को कळस ले आता;
सारी
धरती को जहर सोरमार ले जाता,
-
चांद पै जार भी भाटा ही काई लेर आया-
मन अंधेरो छो, चांदणी
छो, चांदणी ही थोड़ी ले आतां ।

[ . -६६ :]
क
(२)
लाखतारां सूभी मानव की रात काळी छ,
फूल लाखू छ पण कंवला की बात नाळी छ,
पाणी का यूं तो समन्दर भरया छ धरती पै,
प्गार का मद बना ऊमर को कळश खाली छ।
( ३ )
सॉस का साथ विना बंसरी न गरणावै,
हेत की ताल बिना पायला न झरणावै,
कोयलां वोल भी जावै कदी महलाँ ऊपर,
दैठ ऊमरायाँ में वोले ज्यू उमंग न आवै ।।
(४)
-
होळी लेलो को भांख खूभी रंग ढोळो रे,
रंगभरया रसभरया मीट सा बोल बोलो रे
दाग झेलो रे प्रीत की गुलाल उड़ री छ,
गळं मिलो तो हिया का भी क्वाँड़ खोलो रे ।'
( ५ )
वाग मे छान सेक झूमतो फागण. उळग्यो,
चाल मतवाळी छी खसवू को कळश ही ढुलग्यो,
माचगी धूम सी कळयाँ की रग गळियां मे
सवका नैणाँ मे जाणे आज कसूम्बो ढुलग्यो।
- रघुराज सिंह हाडा

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[ १०१ ]
४. चाँद पं जार भी भाटा ही कांई लेर आय ।
कवि चांद पर सू काई मगवो चावे
(क) अमरत
(ख) चांदणी
(ग) सोनो चाँदी
(घ) रस को कलश
(च) कोई अमोलक चीज
५. नीचे दिया सवदॉ रा हिन्दी पर्याय लक्षों
समंदर, अमरत, भाटा, कंवलाँ, हिया, उलग्यो अर कसूबो ।
६ इण रो आशय स्पष्ट करो
(क) मन अंधेरो छो
(ख, आँख सू भी रंग ढोळो रे
(ग) बैठ अमरायां में बोले ।
७. निचे लिखी ओलियां रो भावार्थ बताओ
(क) गलै मिलो तो हिया का भी नवाँड खोलो रे।
(ख) सबका नैणां में जाणे आज कसूबो ढुलग्यो ।
८. कवि सारी धरती रो जहर सोरसार कठ भेजणो चावै ?
६. कोयल महलां पर बैठ र बोलै जदो ऊमरायाँ पर बोले जसी उमंग क्यू
,
.
नही आवै?
१०. लाख तारों में भी मावस की रात काली क्यू लागै ?
११. कवि होळी खेलवा को सही ढंग काई बतायो ?
५० सबदाँ में उत्तर दो।
१२. कवि चाँद पर जाबाळा ने कॉई ओलमो दीयो?
१३. फागण लागताई मिनखाँ रा नंणों में कम्बो क्यू ढुल जावे

२३. मणि मधुकर । हिन्दी नाटक, कहानी पर कविता ने लेय मणि मधुमार को देम चापी व्यांत । आँरी रचनावां देस री पत्रिका में छपती रे वै। आप राजस्थानी में भी लिखे । आज रे समाज रा पाखंड, अफंड; छल छंद, कपट र प्रमा आडम्बर आपरी कवितावा रो खास विषय । आपरी राजस्थानी कवितावा दुनिया से नवी कविता वालं । सैली भासा अर भावो रो दीठ मे आपरी रावन्याना बनाया बेजाद । आप प्राध्यापक रो काम करै । अध्ययन चितन में आपग समय गढ़पयोग करें : प्रस्तुत संकलन मे 'कालो घोड़ो' नाम री आप रो एक आधुनिक राज- स्थानी रचना लीनी है । जीवण रो कुठा वेवसी अर विसंगति रो जग कवित मे सरस चित्रण मिले। इण मच्छगळागळ रे बीच आसारो धुबळी फिरण घणी हेताळ लागे। २३. काळो घोड़ो रात धनख डोर ज्यू नरणाव रीस मे भरियोडी घोराँ घूजै मेदी वरणी रेत रूख रुवाळा विनां तड़फा तोड़, गिगन मोदगी रे दोवड़े मे लुकतो [ १०३ ] कळेस पाताळ, " रा आखर चुगतो अँडी लाम्बी निसाम छोड़, सरणाटो घणो विकराळ घणो संकाळ है । अन्तस में ऊकळे अपसूण, आँख्यां में रड़क काँकरा ने आळ-जंजाळ हाथां सू छूटती जावं लाव, गोड़ा ताई आयग्यो तिरस्यो कुण निगै राखै फूल-पानकारी समै रो डूंगर नचीतो अर निदाळू हैं । सरणाटो घणो विडरूप घणो संकाळ है । च्या कूट अछूट अन्धारो इतियास जण-जण रा मूडा ओळावतो सूत्या सवट ने मुडदां रा घर-गोखा टोवतो फिरै, इण खूण काळस उण खूणे कीच-कादो, कठे वासती - वळ वळता । -- - कठ अंगार, कठे जिनगाँनी रो च्यानणो, क? नुवै निरमाण रो गारो, देखू न पावूओ फेर ए 7 मिनखरो अळ सायो उ णयारो, पून पाणी री पलका पलका तिरै । - M

( १०४ )
जंगळ में
काळो घोड़ो कुदड़का कर,
पण आस ने उजास रो पावणो घणो हेता है।
सरणाटो घणो विडरूप धणो संकाळ
- मणि मधुकर
।
अभ्यास रा सवाल
( )
4
'काळो घोड़ो' कविता मे कवि नै रात किसीक नागै?
(क) घणो डरावणी।
(ख) अखूट अन्धारी।
(ग) रोस में भरियोड़ी।
(घ) कीच मे किलयोड़ी।
(च) अळसाई अर लडकाणी।
२. कवि रा सवदाँ में काळी रात में निसासा कुण छोड़ ?
क) गिगत
(ख) वियोगण
(ग) सतायोडो मिनख
(घ) धोरां री घरा
(च) तिरस्यो पाताळ
३. अळसाया उणियारा रो अरथ है।
(क) बिडरूप उणियारो।
(ख) काळो उणियारो।
(ग) उदास उणियारो।
(घ) सूखो उणियारो।
(च) आळसी उणियारो।
( )
.

[ १०५ ]
४. कवि रे कथानुसार अन्धारा में जणं जण रा मूडा ओळखतो
कुण फिरै?
उजास ।
(क) पंछी
(ख) मिनख
(ग) कालो घोडो
(घ) इतिहास
(च) पावणो
( )
५. नीचं लिखी गोलियां रो आशय लिखो।
(क; अन्तस में ऊकळ अपसूण ।
(ख) हाथां सू छूटती जावै लाव ।
६. नीचे दिया सवदां रा हिन्दी पर्याय लिखो।
धनख, मांदगी, कळेस, आखर, काकरा, काळस,
७. इण रा विलोम सवद लिखो।
लाम्बी, कळेस, रीस, विडरूप ।
८. नीचे दिया मुहावरां रो अरथ वताओ।
हाथ सू लाव छंटणो, आंख्या में कांकरा रड़क,
निसासा छोडणो, ताफडा तोड़े।
६. नीचे दिया प्रश्ना रा उत्तर ३० सवदां में लिखो।
क) धोरा री रेत रूख रूखाळी विना किसी लगै?
(ख) निरासा री रात में कवि नै काई शास दीसै ?
१०. कवि चारू कूट अखूट अन्धारो किण कारण सूवतायो ? ५० सरदां में
उत्तर दो।
११. कवि निरासा अर पाखण्ड रो किण सवदां में वरणन करै ?
१२. आस अर उजास नै कवि हेताळ क्यू माने ?
१३. 'कालो घोड़ो' कविता रो मुख्य भाव कांई है ?

२४. गोरधन सिंह शेखावत
गोरधन सिंह शेखावत जिन्ना मीगार मणगढ फालेज में प्राध्यापक
को काम करै । हिन्दी री नवी नहानी माथै भोगिन दो काम गरिने पी.एच.डी.
री उपाधि लीनी । राजस्थानी रा उदयमान कविया मे आपगे नाम । आधुनिक
जुग री नवी कवितावा रे परवाण नई सैली।
'किरवर' गाव मूमाव छोटी कवितावां रो एक नया प्रकागित हुयो।
प्रस्तुत गवलन मे 'मुरझायोड़ो पल' नांव री आपरी एक रचना लीनी । इश
नवी कविता में जूनां दिना री गागरत
मिन हर बिण जको धर्को आवं वो
परम्परा री रुढ, जड अर निरजीव माय रे कारण मिनल रा मन मे भान
भांत री कुंठावां भरै।
-
२४. मुरझायोड़ो पल
उदास कमरां री
धूळ सू भरियोड़ी
टेविल,
मरियोड़े अतीत री
गिध सूफूल्योड़ी
दीवळ सू खायोड़ी
मोटी पोथ्यां।
भीत पर

L
१०७
मकड़ी रा जाळां सू
भरियोड़ी तसवीर रे उनमांन
धुंधळाता वरतमान री
पिछाण नीं,
खूटयां रे माथे
आपघात सारु
लटक्योड़ी डोरड़ी,
एक खुणे में
चिगदयोड़ा सोसन्या रंग रा
कागद ।
रीस अर निरासा सू
काळी करियोड़ी
फाइला रो मानसिक बोझ
कुठा सूदाझियोड़ा
दिनां री
अणचीती, वेविस्वासी,
का 'णी रा पैरादार,
थूक सू
बदरंग हुयोड़ो
निरास आंगणो,
कठ-कठ
प
-

[ १०८ ]
लीक लिकोळ्यिा अर
काटा-पाटी करियोड़ी
जवानी रा पसीना सू
भीजियोड़ी
कोजी अर चीगटी डायरी
छी ज्योड़ी ऊमर री
खरी गुवाईदार ।
मार खायोड़ा
टावर रे मूडा री
उदासी सा गिरम्यां रा दिन
विखरया पड्या,
फूटयोड़ी बोतल रा
काग सा टुकड़ा ज्यू
जूनां दिनां री:
गांगरत में सांवटयोड़ा
खुद रा ताव सू
पिघल्योड़ा
लागै कांटां सू
भरियोड़ो अकास
उग्यायो म्हारै
दरवाजा माथै ।
.
गोरधन सिंह शेखावत

[ १०६
अश्यास रा सवाल
२. छो ज्योड़ी अमर री गवाई कुण देवै
(क) बुधळी निजर।
(ख) ढीली चामड़ी।
(ग, उदास उणियारो।
(घ) निरास आंगणो।
(च) कोजी धर चीगटी डायरी ।
खूटयां रे माथै लटकती डोरड़ी कवि ने दरसावै ।
(क) चीजा मेलण सारू।
(ख) गाभा टाकण सारू ।
(ग) अपघात सारू।
(घ) छीको लटकावण सारू।
(च) गीगल्या रो पालणो वांधण सारू !
()
()
गिरम्या रा दिन नै कवि ओपमा दीनी।
(क) मार खायोड़ा टाबर रे मूडा री उदासी री।
(ख) मुरझायोड़ा फूल री।
(ग) वदरंग हुयोड़ा निरास आंगणारी।
(घ) मकड़ी स जाळा सू भरियोड़ी तसवीर री ।
(च) कोजी अर चीगटी डायरी री।
काळी करियोड़ी फाइल रो सही अरथ है !
(क) लिखा पढ़ी करियोड़ा कागजां री फाइल !
(ख) काळा रंग री फाइल ।
(

[ ११४ ]
लोगड़ा कैवे
कई गाँव मे एक जेठू विया करतो;
जि को, किणरे ई भाई
किणरे ई भतीजो
किणरे ई काको
अर किणरे ई माँमो तो किणरे ई मासो
लाग्या करतो,
पण जाण क्यू
वो जद सू करनल वियो
ओ गांव मॉय समझगो
कवो अव सम्ला रे करनल ई लामण लाग्यो है
स्यात आपरी अणमणी लुगाई रे भी।
++
+
+
कितो चोखो व्हेतो
जे कोई दुरगादास
अणचेत
सोतां
ई गाँव नै भाली री अणी सू वाटी ज्यू पोयर
दाव दय तो भोभर में,
गत तो व्हेती
आ टोटण रात
ई गांव में उतरण सू पैली
म्हारी आंख्यां मे “टोपां-टोपां
अधेरो
ईयां तो नी राळती।

[ ११५ ]
-
खैर......"खैर
म्हनै अब ई टेम घणो आगो नी जावणो चाई जै
क्यूक रूगता ऊमा कर सके
किणी भी जेज ताँई रे सोवणे मे
रे
खुद गुमण
रो
ई गाँव मे कठेई की व्हेगो है ।
-तेजसिंह जोधा
अभ्यासरा सवाल
घासीराम नीसरगो उगाई माथै स्यापो वीसरगो।
अठ घासीराम किण रो प्रतीक है ?
(क) नवाँ नेता रो।
(ख) गॉव रा छोरा छापरा री ।
(ग) गाँव रा बूढ़ा बडेराँ रो।
(घ) जन साधारण रो।
(च) ठाकराँ रा चाकर रो।
कोल्डी रे आगे घासीराम ने उगाई माथै देख ठाकर सोच करै। कारण
(क) ठाकर घणाँ दयालू है ।
(ख) ठाकर नामी परोपकारी है ।
(ग) घासीराम से गरीवी पर तरस खावै ।
"
(.

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[ ११७ ]
६. कवि गांव नै वासी उवासी री उपमा क्यू दी?
७. नीचे दिया सवदां रा हिन्दी पर्याय लिखो।
चौमासो, जेव, भोमर, टोपो, सातरो, आँतरो, घोना, घाँसी।
८. कोल्डी रे मूडागा सू घासीराम उगाई माथै निसरगो।
ईरो ठाकर सोच वयू करै ?
६. गाँव रा जेठू रे करनल वणता ही कोई आंतरो आगो ?
१०. गाँव रो सामाजिक जीवन काई पलटो खायगो ? ५० सवदा में
उत्तर दो।
११. कवि नै आज रो गाँव क्यू खावा नै आवै ?
१२. युग रो नवो वायरो लागता' ही गाँव री मरोड़ में कॉई आँतरो
आयगो

परिशिष्ट-१ বাবা বা ও gg 3 fiqul १. मोरा रा पद - निरस्वण देखण। उघारी- नागी, वमतर हीण । वरन-रंग। वाण - मभाव, आदत । दावन पल्लो। रूसला नाराजव्हैला । भवसागर- ससार सागर । विप - जहर । गटकास्या -पीजास्या । विनाम - नासवान । काणि - मरजादा। त ज के त ज के छिटका 'र, छोडकर । निसांण- नगारा । घुरस्या वजास्या । अविनासी अमर । गिरवर डूंगर । संगाती माथी, सीरी। डीकर वेटा । रेख - लीक । डीकरी बेटी । स रावती भरती। २. राणा प्रताप .- अलस सरुपु- मरमातपा । आदेस-नमसकार । दया निवे- दया री खान । सुहृद--सजन, सदपुरुप । नरेस-- राजा । नृप--राजा । मेदपाट- मेवाड । चितवै-~याद कर। जग मौड--जग रौ तुरंगो, जग मे ऊंचो। पाचन--पवित्र । नाम--झुकावं । दिग -नड़ो। भूपत--राजा । रोसीलो रोस मे भरियोडो, क्रोधित । मृगराज ---नाहर, सिंघ । पर्ज- बस मे आवै । अथाह--अथाग। पोयण--कमळ । दागळ की -छाप लगाई, दावली । अणदागळ--विना दाग लागो । असवार--सवार । नृपलि--राजा | अनमी--ऊंचे मार्थ ।

[ ११६ ] पुहुमी-धरा, पृथ्वी । लातरगा-गैलो बिसरगा, पथ भ्रष्ट हुगा । चीते-चावै । पुनि पछ, फेर । रसत- रसद । गैर-दूजो । रिपू-वैरी। पणधार-पण रो पूरो वात रो घणी। धिनो धन्न है। प्रवीण - चतर, सुजाण । ३: ढोला-मारू रा दूहा गत 2 चाल । मति - बुद्धि । सील-सीतळ । महिलां-नार,लुगाई । सरहर-सरीखी । नमणी-लजाळू , विनयसील । खमणी-क्षमाशील, सहण- सील । सुकोमळी-कंवळी । सुकच्छ-काळा भंवराळा केश। गरवी पीरी। सुचंग-रूपाळा, अणयाळा । सा-वा । धण-पत्नी, नारी। दिट्ट-दीठा दीसा । पुणिंद-सांप, सरप । कीर -सुवो । भमर-भवरो। कोकिला- कोयल । मयंद- नाहर, सिंघ । गयंद-हाथी । कुळी-गुळी, बीज । भल हळई-दिपै, चमक । टका- वळ-घणमोलो, बेस की मती। ऊनमियो-उमड़ आयो। गु'हर-गाढो । गम्भीर-गहरो। संभयो-चितारै याद करै । बूठो-बरस । मेड़ी-अटारी । सनेह -हेताळ , पति । कठालि-घटा,कांठल । परदेह परदेश । कुरळया कुरळाया वावा हया-पपैया । बाढ़त - काट, चीरै । लोर कुरळाट, लम्बी आवाज । कुरल-चीचावै । पळास राकस खोटा मिनख । पानही-जूती । गळहार - गळा रो हार । ४. डिंगल गीत ढांम-वरतण । त्रिय - नारी, लुगाई । घुड़ल्यो-घड़ा रा आकार रो छोटो पात्र जिण में जगां जगां छेद हुवै अर मांय दिवलै री जोत जागै । जुवा जुवा-न्यारा न्यारा । हेरू-खोजी । लोचपलोच-ओलू दोलू, चारू मेर । अत-घणां । ऊपाड़--राखै । रंभा--रूपाळी नार । दोळी--नेड़ी सांकड़ी। 1 [ १२० ] घट टन । खळ - वैरी, दुमः । लांडे-तरबार । आतुर -बेगो, उतावळो । पिसण - वैरी। - काळ - मोत । कूभ - घड़ो । खुर- पग । रगडता-घिसता । सुवै- गमावै, वोळावै । चीतो - सोची। पदमण रुपवती अर गुणवन्ती नार । मॉणू - परणू, साग राग्यू । पत्थर भाटो। बाँध पत्थर गळं . -गळा मे टोल बाँचे, कुलखणी नार पालै पई । महमूदी घण मोला कपणा री एक भात । धावळ - ऊनी घाघरो, ऊनी वसतर । पय लिखिया । वाळं- मेटे । आट -आँटा । कळप--1बलले । साई--स्वामी, भगवान । अरोगू- जीमू, खाऊं । धापर- पेट भर । लूखो--मूखो । आदम- आदमी । मोळा- धीमाँ, फीका । धोळे हर-महल, मालिया। ढूढ-पुराणां घर, कुटी, सूपड़ी । दूध । वळिया - धृडल्या री कथा--मारवाड़ रे को साणा गाँव री बात है सन् १४६२ री २५ फरवरी रे दिन गाँव री छोटी मोटी वायत्यों गणगोर रा गीत गाती सरवर री तीर सामी चाली । उठे मोको देख अजमेर रा मुवेदार मल्लू खां रो साथी घुडले खाँ कन्यावॉ रो अपहरण कर अजमेर सामो भाज्यो । अ माड़ा समचार सुण जोधपुर रा राव सातलजी रा सेनापति साग- देव खीची आपरी. सेना ले घुड़लेखॉ री गैल दबाई। रीस मे झळ.लोळ हुयो खीची पूगता पॉण पुड़लेखॉ रो माथो वाड लियो । घुड़ल्या रो सिर भाळा में पिरोयाँ सारी वायल्यों ने साथे लियाँ पाछा को साणे टूका । को साणा री कन्याँ घुड़ल्या रो माथो मॉग'लयो अर माथा न थाली मे घाल घर घर घुमायो। ई घटना री याद में राजस्थान रे गाँव गाँव मे गथगौर रे दिनों मे मुड़ल्या रो मेलो मंडै । गाँव रो कुम्हार छोटे घडै रे आकार रो घुड़ल्यो थाप । वी मे जगॉ जगाँ को चरा राखै । गाँव री वायल्याँ घुड़ल्या ने थाळी मे मेल माय 'दवलो जगा घुडल्या रा गीत गाती घर घर घूम । .

[ १२१ ] ५. गोत आहस-साहस, सौर्य । दोयण-डैरी । खळाडळा-तहस नहस । ग्यवां-कांधो । खवा खांच-खांचा चूड़ो जिको खवां ताई पहरै । खांवद- पति, धणी । यळा-धरा। छत्र पतियां-छत्रधारी राजा। छाणत-काळ स; वळक । वापडा-वेचारा । वोतां-कायरां । जोतां जोतां-देखतां देखतां । चत्रमास-चौमासा । वादियो-भेडियो । दिखणी-दिखणी सू अठ अभिप्राय जमवन्त राव होलकर मू है । होलकर सन् १८०४-१८०५ में अंग्रेजो रो कड़ी मुकावलो करयो। मडैठो देस-मराठा रो देस । वाजियो-भिडियो रीठ बजाई। भरत- पुर वालो-भरतपुर रा राजा रणजीतसिंह जि काजसवन्त राव होल्कर ने सरण दीनी अर सन् १८०५ री ६ जनवरी रे दिन अग्रेजां री फौज ने परास्त करी। गाजे-बाजे । गजर-नगारा । धजर-जस, कीरत । नभ-आकास । गोभ-धरती । साहव-करनल-जेटलेण्ड अग्ने नां री फौज रो सेनापति । महि-पृथ्वी । चीचाता-गरळाता, रोतां। महिळा-नारी। अवसांण- औसर, मौका । रजपूती-वीरता, सौर्य । जोधाण-जोधपुर । पहुः-राजा। खूटा-वीतगा । परियाण-जस, कीरत । आकै-भावी वस । बाकै-बांकी- दास आसिया। आसल-साचा । बखांण-वरणन । ६. वीर सप्तसई रा दूहा. मीसण--चारण जाति री एक खांप । जंपे-वाज । भड़खाणी--वीरां ने खावै। साळ-चुभै । इकडंकी-एक छत्र राज । साभाव-सुभाव । ऐस- भोग विलास । अकज-वथां, विना काम । आव-अमर । हूलसै-उमावै, खुनी मना। कंत-पति । कीर-किम भांत । विग-विना । बाढियो-काट। मांड पग-पग मांडणां, पगां रे महदी लगाणी। जंग-जुद्ध । वारा लागी जै-रण में काम भाणो, तरवार री धार सू कटणो।

[ १२२ ] मा. धणी - पति । दीजे घण रंग-खूब रंग लगाजे, घणी मंहदी मांडजे । वेस- सुरंगा कपड़ा। भव जनम । भेटेस-भेटूगी। लंबी आगिया - पूरी बावा री काचळी ( लंबी आंगिया विधवा नार धारण करै ) आणीजै - लावो । टोटे-घाटो । मुवा-मरगा । बंव-नगारो। यार को-दूजा को, वैरी रो। वय-अमर। थण-बोवा । जामण जननी । पहु. - नावडै । ऐण-घर । वीजी-दूजी। नीचा करसी नैण- सरमासी । थरहरै - पूजै । नूर-तेज । वगतर-कवच । ऊबडे - फाट। टोट- गरीवी। सरका- डोका । घात-छावै । अधपतियां- राजा । हेली- सहेली। इळा - धरा, पृथ्वी । हालरिया--पालणां रा हालरा, झूला रा गीत । हुलराय-रमावै । पालण - झूले । - ७. लोक गोत रेणाद-सूरज जी री जोड़ायत, सूर्य री पत्नी । बविल-पिता । रातो-लाल । मजीठ-लाल रंग। चीर-लूगड़ी, ओढणी । कूख - गोदी, पेट । भंवर-पति ! कामणी-रूपवती नार । पोला--दरवाजा । हसती- हाथी । कूभ- कळस, मांगळीक कळस । वीर-भाई । सुवामणी-बहन-बेटी । कंवर-बेटो । छावा-वेटा । वसदेव जी रा छावा-किसन, अठ पति ने सम्बो- धन करै । साजनियां री जायी-व्याही री वेटी, समधी री जायी, अठ पत्नी ने सम्बोधम करै । बीरा भाई । जामण जाई-माजाई वहन । ८. राजस्थानी राहा परमारथ-जाँ री भलाई। तजो-छोडो । डाबर-तळीव 1 डोलता-फिरतां । जोवै-देखे । प्राजळती-वळती। घटमांही-मन मे । खोटा घड़-धुरी सोचै । इखळास-मेळ । खेड़ा-गांव । वावड़े-पाछा आवं [ १२३ ] सुपह-राजा । पड़वै-सयनागार । पोटताह-सोतां । धारां मे धसतांह- तरवारां वीच बढ़तां । सांवळा-काळा । माठा-फीका, उदास । मन माठा हुवै-मन मे उदासी छावै । बाल्हा-प्यारा, हेताळ । बाहळा-नाळा । उतावळा-वेगा। छह-ओड़, नाको, अन्त । ६. छपना रा छंद ककुभाळी-आंधी । कांटळ-घन घटा । कावळती-आंटा खाती, रीस दिखाती । वावल-वायु, वायरो अचल-पल्लो। कुलटाकृति- कुगैलां चालती नार री भांत । थरकत-धूजै । थिर-अचर । विहार्डवर-धुळ रा वतूळ । खर-तेज । गरदब-गधा । गरड़ावै-रीकै, बोले । सायड-सांड, ऊंटणी। झेरावै-हर करै, दरद भरी बोली बोलै । सेढ़ा-दूध द्वणिया । वेरे-अरड़ावै । वेटांकर-बुरी तरह । हेरै-पतो लगावै, खोजे । हथहारू- हथारू, जो नित दूध दुवै । तिरषातुर-तिसाया मरता। खेळी-कुवाकी खेळ, बेरा री खेळ । धापड़-आडू, चाठ, ढाणो । वेरा-कुवा । धन-पसु धन । वणणाटा-चकरी खावै, भागला फिरै। गांजर-चड़स खेचणिया मिनख, कीलियो । पाचर-गुटको, चड़स री मांडल अर लाव ने जोड़ण री जगां लकड़ी री खील । धाव-वै वै । ईखण-देखण । ईखण-देखण। अभलेखो- उणारत । गाढ़ी-गहरी । गयणांगण-आकास में । रज-धूळ फुरियो-आयो। भादखो-भादवो, भादव मास । घुरियो-गाज्यो । नीरद- वादळ । तिसिया-तिसाया । सगारा-पशु । भूपर धरती पर । नर तिरस- मिनख तिसाया मरे। विसिया-विस वरसावणियां। अगारा-खीरा वरळावै-रोवै, गरळावै । आखा-दाणा, धान । अभिलाखै-चावै । भूभूबूबू- छोटा टाबर पाणी मागे पाणी रो पर्याय । भाखा-वोली। भाख-वोल । सूपै-देव । सीरावण-कलेवो । व्याळ-रात रो भोजन । वांस-कैन; नेड़ा, साग । वेलासमै । सांस-घाटो सांसा पड़ जावै । ढ़ाढ़ां-पशु धन, गायां । - - ।

[ १२४ ] ] - तांभाड-गाय री बोली। ढी-बोले। टीगरिया-छोटा टावर । रीन रोवै, री रावै । महळा-लुगाई । मुरधर-मुम्भौम, मारवाड़ । पोग-पोहरा । सरधा-हिम्मत । झांकी मुख सेरी-मुव रो पंथ है रे । सेरी–गळी । ढूढी-हेरी, खोजी । ढूढ़ाह ---जयपुर वाटी । जुळिया- हालिया । पुळिया-हालिया । जाडा-घणा । जाडा धन वाला-ज्यां रे वन 'घणा पशु हा । सिन्धू तट गुडिया-सिन्ध रो काठो जालियो, निन्ध नदी री तीर पर जा भेळा हुया । तनपाळा-वैद न । गुज्जरधर-गुजरात । छपने- सं० १९५६ रो काळ बरस । मोऊ-पिरजा । बलदा-वना । गाडामल- गाड़ी में उचाळो घाळ । पाडां- भैसा। रीराकर-रोता हुयां । डोरांतर- डोरा सूबंधिया । करणा-दया । धावलिया-ऊनी घाघरा । तापड तु टोड़ा- 'फाटा पुराणां गावा, फाटोड़ा वसतर । खाता पीता सू-धनवाना मू। पेला खूटोडा-पहली ही दूवळा । नौली-अस्थिपंजर । सासा नोळी मे-हाडहाड हुई दुबळी देही में सास अटका यां। वासे-पास मे । ओडी-छाबड़ी। साखीणा-सम्बन्धी । माडै हेरे । लाखीणा-ठावा मिनख, आछा आदमी । - me १०. गांधी ५ तरसंत ललचाय । रसणा-जीभ । फिरंग-अंगरेज । तोकी-उठाई, झाली । घण-घणा। लोहां हुवा-झाटक बाजी, जुद्ध हुवा । हथणापुर-- भारत री राजधानी। भीटियो- हाथ लगायो । लोहन भीटियो-ससतर नी झालियो। निसास-निसासा। खग-तरवार । गोरिया-नारिया। पिव-- पति । मजीत-मस्जिद । भांण-सूरज । विण--विना। अमरत्थ- अमरत्व। ११. जुगवाणी, हेत चाहिजै कुरव--मान प्रतिष्ठा । . खपग्या-नास हुगो। आखड़िया- ठोकर खाई। आथड़िया-लड़खड़ाया। घूस-हेकड़ी, जोरावरी। गाडर-लरडी, .

[ . १२५ ] -- भेड़ । जरवां-जूता । मौरी-मंगरा, पीठ । निरणा-भूखा तिसाया । गाभा- कपड़ा । ऊजड़ खड़ता-कुगैला चालता । पालैला-वरजैला। पूछ-पाछा । भावी होणहार । सुभट-वीरवर, सूरमा । फजीती-दुरगत, दुरदसा । तक-औसर, मोको । लूक-लूमड़ी। खलीत---थ ली। पलीता--आग की लपट, लुक । वेत--जुगा। पीड़क-दुःख देवा । करें खंखारा-रड़ावण दिखावे, मौजा मांण । भीडू-सीरी. सहायक । धाड़विया-लुटेरा। धूड़-धूळ, रेत । कळधर--मजूर, कारीगर । तुरंग-घोड़ा । कुमेत-राता वरण रा वेस कीमती घोड़ा । नेत-नियत । . १२. बापू, पोंजरो खग-पंछी। गिगनार-आकास । डिगग्या-फिरगा, टळगा। पळकै- चमक । भुवाली खा खा-चक्कर खा खा । गोरखधंधो-उळझाड़ रो काम मिनकड़ी--मितकी, विलाई । भख-खाण री चीज । भक्षक-खाऊ । एकठा- भेळा । १३. सूरज रे मार्थ सिंदूर बूकिया-भुजां । गाज-बीजळी । सीळो---उंडो । भूगली कणी। थाप-चाटो, थप्पड़, रैपट । अजे-हालताई । सावळ सूत-भली भांत । गरीब निवाज-गरीव रो संग यती। उमारदराज-लांबी उमर । १४. चेत मांनखां, इंकलाब री आंधी मांनखा-मिनख । खड़ण-जोतण । दोरो-कठिनाई ढूं। लाटो- खळो । दावो-सी सरदी । रोळी-गेहूं री फसल रो एक रोग | कोळ- [ १२६ ] बचन, प्रण । खडता-जोतता। इंकलाव-बदलाव, परिवर्तन । उर-हियो । वतूळो-वभूळ । घोचो-तिणवळो । उवरडी--ऊकरड़ी। मद-नमो । मद- पीवण दारू पीवण । रड़वड़ता---एक दूजा सू टकराता, ठोकरां खाता । लाखां--लाख, चूडी बणावण री लाख । राली-ओढ़ण रो गूदड़ो। रंजरेत रा कण । कामैतण-करसणी। लड़ाझूम--गणा सू लदी। रंक-साधारण मिनख । वाळी-वाल्ही, प्यारी । १५. बादली डूंगा-गहरा । रमा-खेला । ग्रीखम-गरमी । दाझी-बळगी । वारणा बलिहारी । गह डवर-घटाटोप । आखी-मारी । हिलोळा-लहराा । हियो हिलोळा साय-मन घणो हुलस । कांठली-वादळी । कोरण-काळा बादळ रे किनारे धोळा वादळ री रेख । आभै-आकास । छोळ में उछाव मे। बीज-वीजळी ! बीजळ-- वीजळी । सोरभ-सुगन्ध । सांमिया-संभालिया। बिलूबी-लिपटी, लटकी । बजड़-विना जोती धरती। सिधावो-पधारो । मिघो-जावो। तिसवारी- तिस, प्यास । १६. सांझ लुकाती-छिपाती । दिवलो-दियो । मुळवता-मदरा मदरा हंसता । आगूच आग । पळकती-चमचमाट करती । ननकड़ी-छोटकी। चीलरिया- तालरा, टुकडा । रूपाळी-चादी री, सुन्दर । गुदळतो-~-मैलो हुतो। माला- धुरसाळा ! इदक-घणो, अधिक । चाव-लालसा । परमोद-आणंद । झंवरां- पता सू लडालूम हरी डाळी । झूटपुटिये-सांझ रो अधेरो । वेळ-वेला, समै । लचकाणी-सरमाव । खोळं--गोद। अंगीज-झपकी ले । लीली-हरी । गोपर-~-गोंर । धवळ--धोळी । कूडाल----गोळो । खंख-रंज । कमूवल- लाल ।

[ १२७ १७. सौवन थाळ गीगलो-नान्हों टाबर, छोटो वेटो । सात्या--स्वस्तिक चिन्ह । सात्या- देव--सात्या माडे, र:जस्थान मे पुत्र जनम पर माडला री पूजा (सूरज नारा- यण री पूजा रे दिन) पर नणद जच्चा री साळ रे बारण सात्यो माड जिण ने मागलिक प्रथा मान । आंटो-टूटो-~वाको, बळ खायोड़ो। फळसै--बारण । समो-जमानो । संवारै--सुधारै । माळ-डोर । १८. इण धरती कद मानीहार वोजण--बीज बाबै । भाचर--डूगर । आभयो-आकास । हुलरावै- रमावै। मंदरी--धीमी। सोनल-- सोना रा। रूपाळी--चांदी री । रूपाळी- रातां-~-चांदणी रात । मायड़-मा । झलालपटा । दीपै-चमकै । सई को- सौ सालो, शताब्दी। डुगजी-राजस्थान रानामो धाई ती जिका डूगजी जवाहर जी रा नाव सूजाण्यो जावै । भोपा वांरी वीरता रा गीत गाकै । आ बात प्रसिद्ध है के डूंगजी अंग्रेजारो छावणी लूटलो । अंग्रेज डूगजी ने आगरा रा पिला में कैद- कर दोना । जवाहर जा आपरा संगो साथियां ने लेर एक दिन मोको देख हमलो कर दोनो। आगरा रो जेल तोड़ डूगज' ने छुड़ा लाया । स्यामसिह--१८५७ रो राष्ट्रीय क्रान्ति रा नामी जोधा ! खुसियाल-आहवा ठाकर खुसालसिह चांपावत जिका १८५७ र कान्ति मे अंग्रेजॉ री फोज रो डटर मुकावलो कियो । दो बार अप्रेजा री फौज रा पग पाछा दिरा दिया। अंग्रेज सेनापति कपतानं मेसन ने मार लियो अर क्रान्ति रो झंडो ऊंची उठायो। कंवर सिह-साहबाद जिले रे गाँव जगर्द सपुर रा राजा कवर सिंह जी का अस्सो बरस रे ऊमर मे १८५७ री क्रान्ति में कूद पड़या । अग्रेजा रो ग्वजानो लूट लियो। कप्तान डनवर री सेना मार भगाई। दूजा दो १२८ ] सेनापति सेना लेर चढाई वरीण ने मब ने हरा दिया। गंगा पार करेहा अते हाथ मे गोली लागी। २३ अप्रेल १८५८ रे दिन काम आया। १६. अरज; हर - आखर : अक्षर । मून-मौन । सूतियां-मूत्तियां, अमोलक वातां। किरियावर-ईसान, कृपा । सिरजू-वणाऊ । परसू-भोट । निरन्व-देव । धारोळा-वादळा । रेला-धार । हर-याद । रळकाती-टपकाती। डावर-तलाव, नाडी । आवा-आम । हीडा-सूला। धायोड़ी-तिरपत हुयोड़ी । विलमा-मुळाव, फंमावै । मोटी नगरी-अठ बम्बई मू अभिप्राय है । कू कू- केसर । बधावला- आदर सतकार कर ला। आंचो-बेगो। सतखंड-सतखणी । गोली-दासी। लिव-चमकै । इन्तरिमो-न्दर, इन्द्र। ठूलो - गुढो । ठूली- गुढी । कंथ - पति । कामणिया- मरूप लुगायां । मिग- रथ - घणो लाडलो । जूनी-पुराणी । अलबेली-नखराळी, छली। २०. बाजार को लालटण 'धणी-धोरी म लिकः । खु-बताऊं । बैण-वचन । नितकी- रोजीना । गैल-गैलै । भाती-चोखी लागती। तळ -नीच, हटै । घेण- लेणो - माळ उपर - ओठा-पाछा । स्याव - मन मे राजी हुवै । भैणा- बहिना । टपटेळा - अन्धेरा मे धक्का खाणो। २१. गाड्यां निकळो घोला रेग्या अळगै-दृरा । ओझत्या-दीखण सू रहगा। पंथड़ा-गला । चंवरी- व्याव रो मडप । गोल-गोखा। गरकता-पड़ता । बटाऊ-पंथी, गैला सरू, पावणो । मुरथल- मरुधरा । मुरथळ तिरसा-मृग तृष्णा । सौरभ--सुगंध । वेजा--अणहोणी, अनुचित । धाड़ो-लूट, डाको ।

[ १२६ ]
२२. घूघरा
सोरमार-भेळोकर । नाळी-न्यारी । अमरायां--आमां रा बाग ।
क्वांड-किवांड़ । उलग्यो-वड़गो, धंसगो । खसबू-सुगन्ध । कसूम्बो-लाल
रंग, कसूमल रंग ।
२३. काळो घोड़ो
।
धनख-धनस । धोरांटीवां । विकराळ-डरावणो । रड़क-चुभै ।
आळ जंजाळ-आळ पताळ सपनां । विडरूप-कोजो, कुरूप । ओळखतो-
पिछाण तो । टोवतो-हेर तो, पतो लगातो । काळस-कालूस ।
२४. मुरझायोड़ो पल
अतीत-वीता जुग । उनमांन-समान । धुंधलाता-फीका पड़ता
यापधत-अपघात । सोसन्या रंग-गहरो चमकीलो नीलो रंग । दाझियोड़ी-
बल्योड़ी । कोजी-कुरूप । झीज्योड़ी-वीत्योड़ी, बोळायोड़ी। गांगरत-रोगान,
वार ।
२५. कठै ई की व्हेगी है
विसरगो-भूलगो। उगसण्यां-हांडी धोवण री तिण कला री कूची ।
घोनां-वकरी । दिन गे—दिन उगे। वेरो–कुवो। कांवळा-गिरजड़ा ओट
थोड़ी-भोमर मे दवायोड़ी । अणमणी-उदास ।

[ १३२ ] . ६. ७. संगण-आदि न-- 15 ५. जगण-मध्य गुग-10 रगण-गध्य ना-: । संगण-यन्त गुम- ।। तंगण--उन्न त । छन्द रा चरण में गण गणना करना आसार को जावै । आ गणना गण वा इन्दा । गोया, माया मजा प्रयात इणी जात रा छन्द है, जि मा आर्य, में परस्पर गणां रो भेद पायो जावै । उदाहोद में दाम पर जिण में नार मगण आये। कुसमालय लेन सुवान गटां । उसकी सपतान करा सपटां । मोतीदाम में बारह वरण जिनमे चार जगता। 15 । 15 1 150 जसोमति पूत नचे फण जाण। इणी भांत मुजंग प्रयात में चार वगण भावे । धक चाढ़वो माग रो साग धाग। अथवा- - गुसाई रहै जागता राग गावै । छन्द रा भेद छन्द तीन भांत रा हुवै । (१) मात्रिक (२) वणिक

[ १३३ ]
(३) मुक्तक
मात्रिक छन्द-जिण छन्द में मात्रा री गणना रा आधार पर रचना
हुवै । इण छन्दा मे वरणा री गणना नी हुवै । दूहा, सोरटा अर छप्पय इण
जात रा छन्दा मे आवै । पण प्रत्येक री न्यारी न्यारी पिछाण है।
वाणिक छन्द-जिण छन्द मे वरणां री गिणती निश्चित हुवै अर गुरु
लघु रा क्रम निश्चित हुवै । वार्णिक छन्द मे जिण छंद रा गण निश्चित हुवै
गण वन्ध छन्द री गणना मे आवै।
मुक्तक छन्द-वं छन्द जिका मात्रा अर वरणां रा वन्धन छिटका दिया
व्है मुक्तक छन्द कहा।
१. दूहा
राजस्थानी साहित्य में दहा अर सोरठा छन्द रो घणो प्रयोग मिले ।
दूहो मात्रिक छन्द है । दूहा मे चार चरण हुवै जिण री मात्रा री गणना इण
भांत की जाय।
पहला अर तीजा चरण में प्रत्येक में १३ मात्रा।
दूजा अर चौथा चरण मे प्रत्येक में ११ मात्रा।
पहलो अर तीजो चरण विषम कहावे,
दूजो अर चौथो चरण सम कहावै ।
दूहा रा विपम चरण मे तेरह मात्रा पर सम चरण में ग्यारह मात्रा
आवै । सम चरण रा अत में लघु हुवै-
उदाहरण--
इला न देणी आपणी, हालरियां हुल राय ।
पूत सिखापै पालणे, मरण वडाई भाय ।।
-

[१३६ ] उदाहरण- 5।।।।। । ।।।।।। पट जेवर पराय, रिया मिण गाम छप्पय रा पाइला दोन णा में प्रया:- मासा मा अर प्रत्येक चरण मे १५-१६ पर यति आई उदाहरण- V ।।3 मन -- प.मरो जहान जिण . ग अंगम प्रय छन्द दी मामा गणना प्रथम नमन ना गाना चरण में-२४ माना। पांचवांइटानगर-गाना। उदाहरण-- १. दुरजोधन जाणियो, पाट हनणांपुर । अहडी लद जाणतो, जाय जन भीतर । मह करव ले माध, पियो नाम मृदा । मन री मन में रही, गुवी भीग गे गदा नू। त्रयलोक नाथ होतब तणां, अनप पाने गुण आगगं । कवि ओप अज्ञानी नर वाहे, नव्वं री तेरह पारा २. भूटण यू भाचियो, हणे गण मन हता। अरे भाण आथियो, मर गूरां किम जूता । डाढ़ाळा डार रा, ऊडर थार वळ आती। नाह जाग नाहरा, राह खोटी कर रानी। चे वडया वाड़ आई चढया, पार्ट पोड़ा फोर हैं । खागैल ऊठ पाडान्वुरा, आडा खल न ओर ९ ॥ ३. डरी काय भूडणी, घणा नाहर नन्न घाटा । सीह नाह साच र, वहै सूरो जिण वाटां । दातल द्रग देखिया, छत हासळ बळ छाडे । नह हिम्मत नाहरां, मगां सूरा पग मांड । -- [ १३७ ] थू मोच करै काळी थकी, वाळी नार वराहरी । ताहरी राह रो के तिको, नाहर जण्योन नाहरी ।। ४. कवित्त कवित्त वणिक छन्द है । निणमें वरणां री गणना हुदै । कवित्त मे चार चरण हुवै । प्रत्येक चरण मे ३१ वरण आवै । प्रत्येक चरण मे १६ वरण अर १५ वरण रे मध्य यति आवै । इण भांत रा कवित्त ने मन हरण कवित्त अर धनामरी रा नाम सू भी वतळावै । वरणा री गणना मृगपति मारे जात कवळ विडारे जात, जस हल कारे जात दस हूं दिसान में । प्रथम ओळी में वरण-१६ दूजी ओळी मे वरण-१५ इण भांत कवित्त रा एक चरण में ३१ वरण आवै । उदाहरण- १. किलो कोट ओट न भकेलो चट्यो साह ऊ पै, मढ्यो मजपूती रजपूती की मजल पै । कवि हिंगलाज रण काज बाज चेटक की राण चंपराण आन पूगो खान दल पै । ता समै कुवोल बहलोलखां उचारयो तव, मंडलाग मारयो ता कुजीव के कमल जोध जग जत्ता सोध वारू रांण पत्ता हू पै; वारू जग जत्ता खग कसा की कतल पै। दूजो उदाहरण- कौलपति जकि जात मेद नी मचकि जात, लचकि लचकि जात नतिगत मान में। सागर उमगि जात महिधर डिगि जात, जागि जात संकर समाधि डुली ध्यान में । - [ १३६ ] राम दिन दुल्लह के प्रबल पयान होत, विकलित प्रान होत अरि थान पान मे । मृगपति मारे जातं कवळ विडारे जात, जन हल कारे जात दम हूं दिमाग में । ५. मोतीदाम मोतीदाम छन्द वगण गण वन्ध छन्द है । इद में बरणा भी गिणती हुवै अरण रे मागै गणा रो निबाह हुई। मोतीदाम छन्द मे चार चरण हवे । प्रत्येक नाण में १२ बरण आवै । प्रत्येक चरण में चार जगण (151) अ. १२ वरण अर चार जगण मूगोतीदान छन् : उक। वरण अर गणारी गणना- 15 । ।5। झवाझव बीज उई खग जाट । । या। 5 ।। डकावत नाहर लेत उदाहरण- १. मिवा निवारण क्षेलत सीस । उझेलत पत्र उमा कज ईस'। परस्पर दम्पति । सम्पति पाय । हिकोहिक भेट कर हर खाय । २. उडे गति गेद नरा उतमग ! गहै झट कंज करा जटगंग । महानट हाथ हकालत मुण्ड । रोळा मझ घुम्मर घालत रुण्ड । अलंकार अलंकार काव्य रो सिणगार है । जिण प्रयोग सू कायं रो र निखरे, सोभा वढ, अलंकार री कोटि मे आवै । । .

[ १३६ काव्य मे चमत्कार त्या वाळी उक्ति अलंकार कहावै । . अलंकार रा भेद- काव्य में सबद अर अरय दो मिल । इण भांत अलकार रा दो मोटा भेद हूंवै। १. सवदालंकार २. अर्यालंकार ज सब्द रो चमत्कार दीमै सवदालंकार हुवै अर जिण उक्ति गे अर्थ में चमत्तार आवै अर्थालंकार कहाव । अलंकार री प्रहा १. वैण सगाई वैण सगाई सवदालंकार है। राजस्थानी रा जूना ठावा कवि वैण सगाई अलकार रो घणो निर्वाह कीयो । वैण मगाई वरण समानता है। छेद मे वैण सगाई रा प्रयोग सू. रस री पुस्टी हुवै । छंद रा किणी चरण रो प्रथम आखर उण चरण रे अतिम सर्वद रा पहला आखर मू मेळ खावै अथवा मध्य या अतिम आखर सू मिलै उठ वैण सगाई अलंकार कहावै । घण केंसर घालियां, होद लेवे हीलोळा। इस चरण में पहलो आखर 'छ' अर इणी चरण रा अतिम सवट घोलियां में भी पहलो आखर ध आयो । इण भन्नंत धण अर घोलियां मे अर होद अर ही लोळा में वैण सगाई आई है। माता भूमि मॉन, पूज राणं प्रताप सी। इणसोरा री झड़ा में वैग सगाई रो निर्वाह हुयो है । -- [ १४० ] उदाहरण- १. गह भरियो जगराज मद छकियो चालै मत । कूकरिया घिण काज, रोय घुस क्यूराजिया। २. अकवर पथर अनेक, के भूपत भेळा किया। हाथ न लागो हेक' पारस राण प्रतापसी। ३. माटी रो टाम जोत तिण मांहे, घण त्रिय फेरे घणा घरे । घुडल्यो केतिक वार घूमसी, फोडण वाळा लार फरे । वैण मगाई मे आदि मेळ री भांत मध्यमेळ अर अन्त मेळ रा उदा- हरण भी मिले। पण उत्तम कोटि री वैण सगाई आदि मेळ यानी जाये। मध्यमेळ- १. रोसीलो मृगराज, २. रण हाली चारणां, अन्तमेळ- १. सदा कहाऊ दास, २. रण मे दोय हजार, २. यमक यमक सबदालंकार है। जठे एक सबद री अनेक बार आवृत्ति हुवै अर प्रत्येक वार विण रा न्यारा न्यारा अरथ नीसरै यमक अलंकार वाज। उदाहरण-- दियो सवद सुणतां दुसह तन मन लागं लाय सूम दियो न करै सदन, परव दिवाळी पाय ।

[ १४१ ] . - । इण दूहा में दियो सवद दो वार आयो । पहला चरण मे इणरो अरथ है देणो अर तीजा चरण मे दियो दिवले रे अरथ मे आयो है । दूजो उदाहरण- चूडो चमवीलो, कच वीडी चमकै । दामण दमकीली, दामण सी दमकै । इण छद में दामण सबद दो वार आयो। पहला दामण रो अरथ सू न्यारो है। दानण=जोडली मूंदडी दामण-बीजली किणी छंद मे सबद या उणरा अंस री आवृत्ति सू भी यमक अलं- कार वणे पण उठे सवदांम निरथक हुवै, कोरी आवृत्ति मात्र आवै । उदाहरण- अरज एक ऊचरण, चरण छूवण हूं चाऊं। अठै ऊचरण में चरण सवदास है, जिको अगला चरण सवद रे साग यमक अलंकार वणावै । दूजा उदाहरण- १. सारंग ले सारंग चली सारंग पूगो आय । २. मायड़ खाय दिखाय थण, धण पण वळय वताय । ३. पावक माथै पाव । ४. भीड़ वाह दुवाह चर, भीड़ सनाह । ३. श्लेष इलेप सबदालंकार है। जठे सवद एक वार आवै पण प्रसंग रे सा विण रा न्यारा न्यारा अरथ नीसरे, इलेष अलंकार कहावै । उदाहरण- नदी नीर अर कपण धन, हर कोई हर लेत । बलिहारी नप कूप री, गुण विन बूंद न देत ।। इण दुहा में गुण सवद रा प्रसंग वस न्यारा न्यारा दो अरथ नीपरै । नाह -- सारी सरश-सराणा - mar [ १४४ ] . उदाहरण दरसे मुख आगळ दात दुवै । वक वादळ आगळ जाण बुदै । हाथी रा आगा आया दो दात इमा लागै जाण काळा वादळ रे आगे धोळ बगुला उड़ । अठ दाता ने बगुला मान लिया । इण भांत री प्रयोग उत्प्रेक्षा अलकार बाजै । दूजा उदाहरण १ मूरी काली बादळी, वीजळ रेख विचाय । जाण कसौटी ऊपरा, सुबरण रेख मुहाय ।। २. दीधा दिस दिस लू विया, उठ कत भजाय । कुभ करण रा झाड़िया जाण वंदर जाय ।। ३. चख चोळ मूछ भूहा चढ़ी, तामस ऊठि तमोगणी । मेहरी गाज जाणे मरद सारदळ काना मुणी ॥ ७. अन्योक्ति अन्योक्ति अर्थालंकार री गिणती मे आवै। जठे अप्रस्तुत बात बतार प्रस्तुत वात रो बोध करावं, अन्योक्ति अलार हुवै । अन्योक्ति अलकार मे कोई बात दूजा पर डाल र कही जावै । वारो एक न्यारो ही अरथ नीसरै । उदाहरण- हंसा सरवर ना तजो जे जल खारी होय । डावर डावर डोलतां भला न कहसी कोय ।। अठ हसा ने संबोधित कर वात किणी दूजा ने कही गई है । दूजा उदाहरण रण- १. माळी ग्रीखम मांग पोख घणो द्रुम पानिमो । जिणरौ जस किम जाय, अत घण बूठा हो अजा ।। २. गह भरियो गजराज,- मद छकियो चालै मत, कूब रिया विणकाज, रोय घुस क्यू राजीया ॥

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Rajasthani Padh Sangrah

Author
Kothari Komal
Title
Rajasthani Padh Sangrah
File name
Rajasthani Padh Sangrah
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Bharatpur, Student Brodhers And Company
Language
Sanskrit
Pages
132
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
550743
Barcode
4990010031553.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
0TfvBSxLrb9
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