Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
The Mahabharat Karanparva
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कर्षषष Karan Pary [6209 ततः प्रपात पर तुमुलं लोमहर्षणम् । पुषण पाडवानाञ्च परस्परजयषियाम ॥ १४ ॥ ततोर्विदिए सं युद्धं कुरुपाण्डवसनयोः कणे सेनापती राजन षभूवातीप दाय णाम् ॥१५॥ ततः शत्रुक्षयं करवा मुमहान्तं रणे वृषः पश्यता घाराष्ट्राणां फाल्गुनेन निपातितः ॥ १६॥ ततस्तु सञ्जयः सर्व गरवा नागपुर प्रति भाषष्ट धृतराष्ट्राम पातं समाजले १७॥ जनमेजय उवाच ! भापगेयं हतं श्रुत्वा दोगशाप महार थम । जगाम परमामात्ति सो राजाम्बिकासुतः ॥ १८ ॥ स श्रुत्वा निहतं कर्ण दुर्यो धरतषिणमा कथे निजयर प्राणानधारयत दुखितः। १९॥ यस्मिन् जयाशा पुत्रा बांसममम्पत पार्थिवः । तस्मिन् इते स कौरव्यः कथं माणानधारयत् ॥ २० ॥ धुर्मर तमन्येऽई न कडूपि यताम। .पत्र फर्ण हतं भुत्या नात्यजस्जीवितं नृपः संथा शाम्तन सूर्य ब्रह्मन् पाहलीकमेव च द्रोणञ्च सोमद तर भूरिथय समेव च ॥ २२ ॥ तथैव धान्यान सुरः पुत्राम् पात्रies परस्पर में विजयाभिलापी कौरव और पाण्डवोंका महा रोमहर्पण युद्ध भारम्भ हुआ.। १४ । हे राजा कर्ण के सेनापतिहोने से उस कौरवी और और पापडवी सेनाओंका देखने के योग्य दो दिनतक अपूर्व युद्ध हुआ । १६ ।इसकेपछि हजारों शत्रुओंको मारकर कर्ण धृतराष्ट्र के पुत्रोंके देखतेही देखते अर्जुन के हाथसे मारागया । १६ । फिर शीघ्रही हस्तिनापुर जाकर यह सवतान्त लोगोंने धृत राष्ट्र से कहा वह वृत्तान्त कुरु जांगल देशों में प्रसिद्ध हुभा । १७ । जन्मेजय वोसे कि भीम और महारथी द्रोणाचार्यजी कोमी पृतकहुमा मुनकर अंविकाके पुत्र हद्ध राजाधृतराष्ट्रने बड़ा खेदकिया। १८। हे ब्राह्मण फिर उस दुःखी धृतराष्ट्र ने दुर्योधन के हितकारी कर्ण कोभी मराहुमा सुनकर कैसे अपने प्राणों को धारण किया। १९ । जिसने कि अपने पुत्रों के विजयकी इसी कर्ण में भाशा निश्चय करके कररखी थी ऐसे कंर्ग के मरने पर इस कौरव ने अपने कैसे जीवन को रखा । २० । ऐसे स्थानमें कर्णको मृतक मुनकर नो राजाने अपने प्राणोंका त्याग नहीं किया इससे मैं निश्चय जानताहूं कि दुःखमें वर्तमान मनुष्य वही कठिनतासे माताई । २१ । हे राजा इसी प्रकार वृद्ध माम वाइलीक द्रोणाचार्य सोमदस मोर भूरिथया को । २२ । और अन्य मित्रों समेत गिरा Kauravas fought a wonderful fight with the Panduvas for 'wo days. 15. Then having stain thosnnds of toes, Karan Wis shin by Arjun in the presença of the sons of Dóritrashtra. Then the people went to Hasthinupar and tho news spread througbout the country" Junmejaya said, "Bosring of the death of Bhishm and Drona, Dhritrashtra was much dejected; how could be sustain his life on hearing of iho death of Karan the darling of Duryodhant Row could be manage to live on hearing of the death of Karan on whom depended his hope of victory to his sons! I believe that man is capable of saTering great lardships, 21. Snilarly, old Bbislynu, VaWik, 87m2 ५ [ 62081 Mahabharat [ ६२०८] पता सूतपुत्रो राजा व मुयोधनः । दुःशासनश्च शकुनिः सौबलममहाबलः । ५ उपितास्त निशाता तु दुर्योधनानवशने चिन्तयन्तः परिक्लेशान पाण्यानां महात्म नाम् ॥६॥ यसे धूतपरिक्लिप्याः कृष्णांचानायिता सभाम् । तत् स्मरतोनु शोचतो मशमुनिग्नचेतसः ॥ ७॥ तथा सेषां चिन्तयतां तान् क्लेशान पूतकारितान् । दुःखेन क्षणदा राजन् जगामारदशतोपमा ५८ ॥ ततः प्रभातसमये स्थिता विष्टस्य शासगे। राघश्यक सबै विधिहटेन कर्मणा ॥ ९ ॥ ते कृपा परयंकायाणि समाजाप | भारत । योगमावापयामासर्युदाय च विनियंयु ॥ १०॥ कर्ण सेनापति कस्या कृतको तुकमङ्गला. धावयित्या द्विजश्नेष्ठान दधिपात्रताक्षः ॥ १९ ॥ निगोमिहिरण्यश्च पासोमिश्च महावमेः धन्दमाना जपाशीभिः सूतमागधन्दिभिः ॥ १२ ॥ तय पाण्डमा राजन् कृतपून्हिककिया। शिविरोम्नियय राजन् युवाय तनिश्चयाः ॥१३. | महावली शनि ने महाखेद किया। ५ । इन सब राजालोगों ने महात्मा पांडवों के कष्टोंकी चिन्ता करतेहुये रात्रिको दुर्योधन केही देरेमें निवास : किया। ६ । जो द्रौपदी को छूतमें कष्ट दिया गया और सभामभी लाई गई उसको स्मरणकरते और, शोचतेहुये अत्पन्त व्याकुल चित्तहुये । ७। है राजा इस प्रकार चूत में 'प्रत्यक्षहोनेवाले उन ७ खोको चिन्ता करनेवलि उनलोगों की रात्रि सेकड़ों वर्षके समान यतीतहुई उसकेपछि निर्मसमभातके होतेही वेदोक्तरीति के अनुसार मावश्यक नित्यकर्मोको करके देवकी आमा नियत हुये।९। अर्थात् — आवश्यक कर्मों से निचहोकर बड़ी सावधानी से सेनाको हेपारहोजानेकी आमादी और पुदकरने के निमित्त बाहर निकले । १० । मंगल कौतक करनेवाले कणको अपना सेना पतिकरके दधिपात्र घृतमादि पदायोंसे ११॥और गुवर्णपाता युक्त उत्तम वनादिकों से उत्तम ब्राह्मणों को पूजनकरते हुये मत. मागध बन्दीजा दिसभी स्टून नहुये । १२ । और हे राजा इसी प्रकार से माताकालके कर्मकरनेवाले युद्ध में निश्चय करनेगले पायडलोगभी शीघ्र अपने हेरोसे तैयारहोकर बाहर निकले ।१३।इसकेपाये Accopnt. Thus thinking of the wrongs done to the Pandavas in the gambling match, they wero much dejueled and their night appeared tu thom like a century of years in the nursing they were ready to go by their fate. Haring poriormed iheit usual rites, they ordered their armies to be ready and cams out to fight. 10. Haring made Karad their commander, with auspicious ritas, curds of milk and ghee, and having gratified the, Brahmans with gold garlands and good clothes, they were ndored by harda, The Panda.: vas too, liaving performed their morning riter came out of their i tunts. Then desirous of gaining victory over ons another, the Pands. yag and the Kaurarat fought a hard fight. Lad hy Karan, the 4 ॥" कर्मपर्ष Karan Pare [6209 ततः प्रवाते युर तुमुलं लोमहर्षणम् । कुमणां पाण्डवानाच परस्परजयषिणाम ॥ १४ ॥ ततोबिंदिसं युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः। कर्णे सेनापती राजन षभूवाताप दार णाम् ॥१५॥ ततः शत्रुक्षयं कृत्वा मुमहान्तं रणे वृषः पश्यतो धाराष्ट्राणां फाल्गुनेन निपातितः ॥१६॥ ततस्तु सञ्जयः सर्व गत्वा मागपुरं प्रति ! माघट धृतराष्ट्राप पातं कुरुप्राङ्गले ७॥ जनमेजय उवाच ! आपये इतं श्रुत्वा द्रोणचाप महार धम । जगाम परमामात्ति वृद्धो राजाम्बिफासुतः ॥ १८ ॥ स भूत्वा निहतं कर्णे दुरयाँ धमरितैषिणम कथै विजयर प्राणानधारयत दुखितः ॥ १९॥ यस्मिन् जयाशा पुत्रा मांसममम्पत पार्षिधः । तस्मिन् हते स कौरव्यः कथं प्राणानधारयत् ॥ २० ॥ दुर्भ तमन्येऽहं ना कमपि यतताम। पत्र कर्ण हत भुरवा नात्यजजीवितं नृपा " तथा शाम्तन यं ब्रह्मन पाहलीफमेष च द्रोणच सोमद म भूस्थिय समेश च ॥ २२ ॥ तथैव चान्यान् सहदः पुत्रान् पात्रांच परस्पर में विजयाभिलापी कौरव और पापडवोंका महा रोमहर्पण युद्ध प्रारम्भ 'हुआ। १४.। हे राजा कर्ण के सेनापतिहोने से उस कौरवी और और पापडवी सेनाओं को देखने के योग्य दो दिनतक अपूर्व युद्धहुआ । १५ । इसकेपछि । हजारों शत्रुओंको मारकर कर्ण धृतराष्ट्र के पुत्रोंके देखतेही देखते अजुन के डायसे मारागया । १६ । फिर शीघ्र ही इस्तिनापुर जाकर यह सवतान्त लोगोंने धृत राष्ट्र से कहा यह वृत्तान्त कुरु जांगल देशों में मसिद्ध हुआ । १.७'! जन्मेजय बोले कि भीष्म और महारथी द्रोणाचार्यजी कोभी मृतकडमा मुनकर अविकाके पुत्र शुद्ध राजाधृतराष्ट्रने वड़ा.खेदाकिया। १८ । हे ब्राह्मण फिर उस दुःखी धृतराष्ट्र ने दुर्योधन के हितकारी कर्ण कोभी मराहुमा सुनकर कैसे अपने प्राणों को पारण किया। १९ । जिसने कि अपने पुत्रों के विजयकी इसी कर्ण में भाशा निश्चय करके करररसी थी ऐसे कर्ण के मरने पर इस कौरव ने अपने कैसे जीवन को रखा । २० । ऐसे स्थानमें कर्णको पृतक सुनकर जो राजाने अपने माणका त्याग नहीं किया इससे मैं निश्चय जानता हूं कि दुःखमें वर्तमान मनुष्य बड़ी कठिनतासे मरताहै। २१ । हे राजा इसी प्रकार वृद्धभीष्म वाइलीक द्रोणाचार्य सोमदत्त मौर भूरिश्रवा को । २२ और भन्य मित्रों समेत गिरा Kauravas fought a wonderful fight with the Pandavas for two days. 15. Then having slain thosands of 1088, Karan Was bluin by Arjun in the presence of the sons of Dhritrashtia. Then, the people went to-Hasthinapur and the news spread throughout the country Jaimejays said, "Hearing of the death of Bhishrm and Drona, Dhritrashtra was much dejected; how could be sustain his life on hearing of the death of Karan the darling of Daryodhan? How could he manage to live on hearing of the death of Karan on whom depended his hope of victory to his sons? I believe that man is capable of Bullering great liardship. 21, 8 nilarly, olå Blislım, Vallik, sim. U 162101 Mababbarat (६२१० पातितान् । श्रुत्वा यमाजहात् प्राणास्त मन्ये दुष्पर द्विज ॥ २३॥ एतानि सपाग्याचस्व वितरण महामुने । न हि तृप्यामि पूर्वपा शुण्यानश्वरित महत् । २४ ॥ इति कर्णपर्वणि जनमेजयवाक्ये प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ 71- - -- -- । वैशम्पायन उवाच । हते कणे महाराज निशि गादलगणिस्तदा दिनो या नाग 'पुरमश्वर्यातसमेउव॥1॥ स हास्तिनपुर प्राप्तो भृशमुद्विग्नमानस । जगाम धृत रापस्य क्षय प्रक्ष यान्वयम् । २ । समुद्रीक्ष्य स राजानं कश्मलाभिहतोजसम। पए प्राञ्जलि भू वा गूद्धर्ना पादी नृपस्य ह । ३ ॥ सम्पूय च यथा याय धृतरष्टि महीपतिम् । छाप मिति चौक्या स तता वचनमादद ४ ॥ सञ्जयाह शितिपत हुय पुत्र और पौत्रों को भी मुनकर जो प्राणोंका त्याग नहीं किया इसी से है गाह्मण मै उस्को महा कठिन मानताह । २३ । ह महामाने इससव वृत्तान्त को आप मूल समेत वर्णन कीजिये मैं अपने प्राचीन वृद्ध लागों के चरित्रों के सनने से तृप्त नहीं होताहू २४ ॥ अध्याय २॥ वैशम्पायन वोले है महाराज कर्ण के मृतक होनेसे महाद.खी सजय सोय वाले समय वायुके समान शाम्रगामी घोडोंकी सवारीसे हस्तिनापुरको गया। और वही व्याकुलता से हस्तिनापुरमें पहुचकर उस धृतराष्ट्रके स्थानको गया जी वा५वों का नाशकारी था। । वहा मूर्छा से शाभाहीन राजाको देखकर बटी नम्रतापूर्वक हायजोड मस्तक से चरणों में दण्डवत् करके । ३ । न्यायके अनुसार, राजा धृतराष्ट्रको पूजके हाय बहाखदहै ऐसा वचन कहकर वार्तालाप करना प्रारम्भ किया । ४ । और कहनेलगा कि हे राजा मैं सजयह क्या आप प्रसन्नतासे और आपत्तिपाकर अपने अपराधों स आप विस्मरण तो नहीं होतेहो। ४।" do Drona, B ur shrava and his sons and grarusons weré slain, yet Di ritrashtra did not de Ths was very hard Pray give me on ount of all that happened, o Brahu an, for I am not yet twed of about my ancestors 24 CHAPTER II Va sbampayan said, 'Exceedingly grieved at the death of Karan, Sanjiya went to Hastinapur in the even af, on horses stilt like! the wind Having reached there in great confus on, he went to king Dhritraahtra the cause of tle destruct on of friends king splendourless and conlus d he bored down at his feet with bering Seing the 1(१२१२.7. कर्णपर्व Karan Parv [GI कश्चिदास्ते सुखभवान । स्पोरापदप्राप्य कच्चिनाधविमुखास ॥ ५॥ हितान्यु कीन विदुरंद्रोणगांगेय शिवीन गृहीतान्यनुस्मृत्य कश्चिन्ल कुरुषे व्यायाम ॥६॥ रामनारयण्वाहितमुक्तं समातले। 'नं गृहीयमनुस्मृत्य' कचिम्न कुरुषे व्यधाम: महदस्पर्धिते युक्ताम् भीष्मद्रोणमुखान् परैःनिहतान् युधि संस्मृत्य कञ्चित 'कुरुषे व्ययाम । तमेव धादिन राजा सूतपुत्रं कृताशलिम् । सुदीर्घमुष्ण निश्चय दुःखात इदमब्रवीत् ॥९॥ धृतराष्ट्र उवाच । आपगेय ते शरे दिव्यास्त्र पति सञ्जय। द्रोणे व परमेश्वासे भृशं में व्यथितं मनः ॥ १० ॥ यो रयानां सहमणि दशिताना दशैव है। अन्यहनि तेजस्वी निजज्ने वसुसम्भवः । ११. ॥ संहतो यासेनस्थ पुढे मह शिखण्डिना । पाण्डवेयाभिगुप्तेन भृशं मे, व्यथितं मनः ॥ १२॥ भार्गवः प्रपदो विदुर द्रोणाचार्य भीष्मपितामह और केशवजी . के .महाउपकारी का हितकारी बचनों को जो तुमने अंगीकार नहीं किया उनको स्मरण करके तो आप पीड़ित नहीं होतेहो । सभाके मध्य में परभुराम नारंद और करवादिक मुनियों के हितकारी वचनों को भी स्वीकार नहीं किया उसको' स्मरणकरके तो तुम दुःखी नहींहोतहो । ७'आपके हितकरने में मवृत्त भीष्म द्रोणाचार्य' आदि मित्रों को सुद्धमें शत्रुओं के हाथसे परेहुये स्मरण करके तो खेद नहीं करते हो। ८। तवतो दुखि से महापाडत गजातंगष्ट बहुत लम्बी स्वात लेलेकर इसप्रकारसे कहने वाले मसंजयस वोळे । ९ कि संजय दिव्यअस्त्रों के ज्ञाता भीष्म पितामह और बड़े महारी द्रोणाचार्य के गरनेपर मेराचित्त अत्यंत पीड़ित है ।१०। मौरबमुद वताओं के अंशस उत्पन्न होनेवाले महातेजस्वी पितामहने प्रति दिन बजार शिखधारी रथियों को मारा १११ पाहब अर्जुनसे रक्षित द्रुपद के पुत्र शिखण्डी के सर्थ से मोहुये उस भाप्पपितामहको सुनकर मेरा चित्त पीड़ामानहुमा १२ जिसके joined hands and begun, his conversation with a cry of alas! Saying. "I ata' Sanjaya: Are you happy? Having fallen into difficulty, do you forget your own faults? Do you not feel remorse at your disregard. Ling tha.advice of Vidur,.Dronay Bhishm and Keshav? 5.Are you unhappy,; because-.you paid, no heed to the advice of Parasknram, Narad, Kanwa and other muris? Are you grieved at the loss of your well-wishers, Bhisho, Drona and others, at the hands of enemies." Dhritrashtra, much grieved, heaved deep sighs of grief, and thus thade reply to the questions of Sunjaya;=""I am much grioved, O Sanjaye, at the loss of Bhishm the grandfather and Drona the great arches. Bhisho, who was born of the portion of the Vasus, slew ten thousand Warriors each day. 11. Protected by Arjoo, Shikhandi the son of Drupad slew Bhishm, and my mind is much grieved to licar this. I am wory unhappy at the death of Drona who had .. [6112] Malinbharat परम परमात्रं महामने । सामादामेण यो बाल्ये धनुरे उपाः १३ बर प्रसादाद कोम्तेया राममा मारया महारपावं समानास्त पायेगा पाधिपाः ॥१५॥ संद्राण निहतं भाषा पृष्टघुम्नेन सयुगे । सरपसाधं महेश्वासं मुर्श में पापितं मनः ॥ १९॥ पपोलोके पुमानसेष समोस्ति चतुर्विधे . तो द्रोणमीमी भावाती म्पपित मनः ॥ १६॥ त्रैलोक्ये पस्य पानेषु न पुमान पियते समः। द्रोग निहत भुस्या किमकुर्षत मामका...१७॥ संशप्तकानांव घसं पान महामना पत्रम विक्रम्य गमितं यमसादनम् ॥ १८ माराणाले पहले द्रोणपत्रस्य धीमतः। विप्रा सेयनीफे किमकुर्वत मामाः॥ १९ ॥ विप्रप्तान मन्ये निमग्नान गोसागर। लिये भार्गव परशुरामभी ने महायुद्ध में परम भदिपा भी पाल्यावस्थामें उनी साताद परशुरामनी ने अपने शिष्य करने कीलपे अंगीकार किया । भौरीभसकी कृपासे महारथी राजपुत्र पांडवों ने भौर अन्य रानामों ने महा. रथीपन को पाया ।।४। उस सत्यसंकल्प पहाधनुर्माणधारी द्रोणाचार्यको धष्टपुम्न के हापसे मराहुमा मुनकर मेराषित मत्यत पीड़ित होरहाद । १५ । इम लोक में चारों प्रकारकी विद्या भोर मस्रविधा मीम और द्रोणाचार्य के सिवाय और | किसी नहींहै उन दोनों महात्मामोंके मरने से मैं महा सदिवई ।१५तीनोलोजी में अतीया का मातां मिमके समान कोई नापसे महारमा द्रोणाचार्यको मृतक मुनकर मेरे पुत्रों ने क्या किया । १७ । माात्मा अर्जुनने पराममकरके संसाकों की सेनाको पार पमलोक में पहुंचाया 1१० बुद्धिमान भत्यामा नारायणास के निष्फोने भौरसनाफे मागनपर मेरे पुोंने क्या कामक्रिया । १९ । में द्रोणाचार्य के मरने पर सयको भागा हुमा पा शोकसमुद्र में स्वाभा जीवन की आगामे ऐमा चेष्टा करनेवाला देसलाई नसकि समुद्र में नौकाको reciered capons and education in arms from Paraburam himsolf; who bad taught are cry to the Pandavas and other priscer; who ob werred trao rons and was the greatest of archers. 15. Theroino. #liolar of the four scienas and wospons better than Bhishm and Drona I am sory unhapps at tho desth of those two grant me the WYlins did my sos do on haring of the death of Drops the best of #arriors! Valiant Arjac, by his prowcy, alex tho Sanasplaks and rent them to the region of yam, What did my sons do when the Yarayan Heapon was made fatile and tha womes fled! I believe that at the death of Droga all tho marriors fied away and lost all hope of ble like one who is riding a brukon bont la the milit of the (६२१३) कर्णप Drona Parv [6213] घवमानान् तं द्रोणे मिनीकानिवाणघे ॥ २० ॥ दुश्बोधनस्य कर्णस्थ भोजस्य कृत पर्मणः । महराजस्य शल्यस्य व कृपस्य च ।। २१ ॥ मत्पुनस्प शेषस्य तथान्ये पाप सम्जप । विप्रतम्बनाकपु मुखवाभवत् कथम् ॥ २२ ।। एतत् सर्वं यथा धृवं वथा गाधरगणे मम् । भाषश्च पाण्डयानां मामकानाच विक्रमम् ॥ २३ । सञ्जय साथ । तमापराधाकृत कौरथेयेषु मारिष । राच्छृत्वा मा पयाकार्षादिन, व्यपते पुषः ॥ २५॥ तस्मादभाषी भाषी घा भवेदों नर प्रति । अप्राप्ता तस्य वा प्राप्ती न पुष.करते पयाम् ॥ २५ ॥ धृतराष्ट्र उवाच । न ब्यथाभ्यधिका काधिीयते मम सम्पादिष्टमेतत्परं मन्ये कथयस्य यन्फम् ॥ १६ ॥ - इति श्री मण-पर्वणि सञ्जय धृतराष्ट्रांसंवादे द्वितीयोऽध्याय ॥२॥ टूटजाने पर उसपर चढ़ेड्ये मनुष्यों की चेष्टाहोती है । २० । हे संजय सेना के मागजोनपर दुर्योधन कर्ण भोजवंशी कृतवर्मा मद्रदेश का राजा शल्य अश्वत्थामा हपाप और मेरे शेष बचेहुपे. पुनादि और समेत अन्यलोगों के मुखका वर्ण कैसा होगया । २२ । हे संजय इस वृत्तान्तको और पाण्डव वा मेरे पुत्रोंक पराक्रमको यथार्थ जैसाहुमा वैसा मुझसे वर्णन करो । २३ । संजय बोले हे अष्ट कौरप लोगोंमें पाप के अपराधसे जोदेखने में आया उसको सुनकर तुम खेद माकरो क्योंकि बुद्धिमान मनुष्य होनहार विषय में दुखी नहीं होते हैं। २४ । जैसा कि मनुष्य में सुखदुख संबंधी प्रपोजन होताहै उसकी प्राप्ति वा ममाप्ति में कोई बुद्धिमान दुखी नहीं होताहै । २५.। धृतराष्ट्र ने कहा कि हे संजय इससे अधिक मुझको कोइ पीड़ा नहीं है मैं उसको माचीनहोनहार मानताहूं इस से तुम अपनी इच्छाके अनुसार वर्णन करो । १६ । ocean, 20. What was the colour of the faces of Duryodhan, Karan, Kritvarma, Shalya and Ashwathama when the narriore thad fied. 22 Pray let me know in detail the warlıke deeds of the Pandavas and my sons." Sanjays raid, "Best of Kartavas, do not be grieved at the calamity which is the result of your own misdeeds, for the wise are not grieved at the decrets of fate A wise man iç not grieved at the woe and weal whicb befall him" Dhritrashtra said, "Regarding all this to be the result of destiny, I shall be grieved no longer. You may proceed with your parrative at your pleasure." 26.
110214] Jialinularat (२१४) माजप उपाहते द्रोणे मासे तर पुत्र महारा मरमस्वमुन विषणा गरचेतसः ॥ मोमुखाः शम्ममता संप एस पिशाम्पते प्रेक्षमाणाः 'तकात मापमापर परस्परम ॥ १ ॥ तान् रक्षा म्पथिताकारा सम्मानित मारत । अमेव मिक्षिात दुपत्रनाम्यारा: मनायेनु राजेन्द्र गोणि तात्तापनेकशः सरपात करानीपोत्या द्रोगंरत युधितानि पसाब रिष्टॉनि लम्पमानानि भारत । माश्यम्त महाराज नक्षत्राणि पथा दिवि ॥५.तपात निमितरमा गतसरयमवरिपतमाप तप महाराज राजा दुरपोधनाप्रवीत् ॥३॥ मत मानिसमाधिाय मपाधि पायेयासमाहूता पुरतिर n७॥ तरिदं निहते द्रोणे विराम लापते । युवमानास समरे पोषा पापम्ति अध्याय ३॥ संभप पो कि बड़े वागमहारी मानेजस्वी दोणाचार्य के मरनेपर मापके मारवी पुषों के मुख शोमामे रहित हुये भार चिनमें पाकुल होकर पर सर अपेतभी होगये । ११ राना उस सपप सर नीचामुख करनेराले शोषग्रस्त माहित उन शखमारियों ने परस्पर में पानीमाप मी नहीं की। २ अनेक मकारसे दु:समे पारित आपकी मेनाओं को और, उनलोगों को ज्यादुत चित देखकर सबने स्वर्ग नानेकाही विचार किया। रामेंद्र फिर घर में होगा. पार्य को मराहमा देखकर इन सबलोगों के पिर से मोहपे शमयों में गिरपो। ४१ उम समप वा पे लटके और गिरोपे शन से देखने में भारी नसकि आकाश में नक्षत्र दिखाई देता । ५। इसके सभापको मेनाको स्यामा पराकमीन देखकर रामा दुर्योधन वोमा । ६. मन आप मांगों पराकममें रविर होकर पाएरो,से पुदकरना प्रारम्भ किया जबर द्रोणाचार्य CITA PER NIE Sanjara said, "At the fall of Drops the great archer, the SATA your sodo became destituto oluplendour ood they lost their scaden with grief. With downcast heads on amount of tifand distro-e ther kapt titent. Being then bract with girl and distrees, the warriors detired death. Sering Drotincharya raia in lattle, all the Warrion dropped their blondd-stained weapons from tbeir hande. Then the weapons, timil Langing or fallen, booltd liko star in the sky. 5. &wing your artus routel and diutura al, Prior Bargallab said, "Pulpiaz uma your peores, I love to the rat with the Pandurnes Pathakat the army haslon: heet at the full al Drera and they . कर्णपर्व Karnnary [62151 सर्वशःn६जणे वापि वधो पापि युध्वमानस्य संयुगे। भवेत किमत्र चित्र बुध्या सर्वतोमवाः ॥ ९ ॥ पश्यावञ्च महात्मानं कणकर्तनं युधि । प्रचरगत मरेवासं दिव्यरमहाबलम् ॥ १०॥ यस्य युधि सम्प्रासात् कुन्तीपुत्रो धनजयः। नियन्ते सदा मन्द सिंहात क्षुद्रमृगो यथा ॥ ११ ॥ येन नागायुतप्राणो मोमसेनो महाबलः । मानुषेणेव युद्धेन ताम्यस्यां प्रवेशितः ॥ १२ ॥ येन दिग्यालयित शरी मापावी स घटोत्कचः । ममाघया रणे शक्रया निहतो भैरवं नवन् ॥ १३ ॥सस्य दुपारवीर्यस्य सत्यसन्धस्य धीगतः । पाहोविणमक्षय्यमय श्यय संयुगे ॥ १४॥ द्रोणपुत्रस्य विक्रान्तं राधेयस्पैच चोभयोः । पश्यन्तु पांडावात विष्ण चासश्योरिष ॥ १५ ॥ सर्व एव मन्तश्च शता. प्रत्येक शोपि वा । पाण्डात्रान् रणे हन्तुं ससैन्यान किमुबहता ! वीर्यवन्तः कृतालाश्च द्रक्ष्यथाच परस्परम् ।। १६ । सञ्जय उवाच । के मरने से वई सब सेना व्याकुल ईसी दिखाई देती है और युद्ध में युद्धका लोग सबमकार से मरते हैं । ८ । युद्धमें युद्ध' करनेवाले की विजय और पराजय दोनों होती है इसमें क्या पाश्रर्य है मापलाग सब ओरको मुखकरके युदकरो ९॥ पाणावेद्या प्रद्वितीय दिव्य भत्रों को ज्ञाता महावली मूर्य के पुत्र महात्माकर्ण को देखो। १० । कि युद्धमें जिसके पराक्रम को दखकर कुन्ताका पुत्र भल्पबुद्धी अर्जुन ऐमे भाग जाताहै जैसे कि सिंह को देख छोटा मग । ११ । जिसने दशहजारहाथी के समान वली भीमसेन को मानुषी युद्ध कर के परास्त किया ।। १२ । और उसी कर्णने दिव्य अत्रों के जाननेवाले शूर मागावी भयानक गर्नना करनेवाले घटोत्कचको अपनी शमोघ शक्तीसे युद्धमें मारा । १३ । भर युदमें उस दुर्जय पराक्रमी सत्यसंकल्पी महाबुद्धिमान के नामों के बलको देखोगे । १४. विष्णु के वा इन्द्रके समान अश्वत्थामा और कणं इन दोनों के 'पराक्रमको पाण्डवलोग देखेंगे ।१५। तुम सबलोग युद्धमें सब सेना समेत पांडवों के | मारने को समर्थ हो फिर सबके साथ मिलकर कैसे समर्थ नहोगे, भव पराक्रमी lies dead everywhere in the battle field. Warriors either win or lose in a batile and this war is no exception. You must fight in all direct. ions. Look at Karan the matchless warrior who uses luis celestial weapons, and before, whom Arjun the son of Kunti vanishes like a deer before a lion. He vanquished Bhim who possesses the strength of ten, thousand elepiants and, with his iufallible spor, he slew Ghatotkach the possessor ot celestial .weapons and illusion, ,roaring dreadfully. 13. You will now see in battle the prowess of that invincible man great wisdom and true rowz. The Pandavas will see the prowo39 of Ashwathama and Karan like that of Vishnu and Indra. 15. You power to slay the Pandavas and their armies in battle; wly can you not do it when you are united together! Full of proof havo the 162:0] Mahabharat । ३२१६]. परमाया मतः कणे यके सेनापति तदा । तब पुत्रो महायीयों भ्रातृभिः सहितानघ ॥ १७॥ तस्यायस्यायाप्याथ फ! राशन महारथः। सिंहनाद विनधारः प्रायुपत रणोरकटः ॥१८॥ स जपानां सपा पानालानाध मारिष । केकयानां विदेह नामक रात् करणे महत् ॥ १२ ॥ तस्येषुधाराः शतशः प्रादुरामन् शरासनात् । अप्रे पुंसंषु संसका यथा भ्रमरपंक्तयः ॥ ३० ॥ स पासयिया पाञ्चालान पापडयांवरस्विनः। इत्या सहमशो पोधानमुनेन निपातितः ॥ २१ ।। इतिश्री कर्णपरीण समयवाक्ये तृतीयोऽध्यायः ।। . =. पैशम्पाया उपाय । पात् अत्या महाराज धृतराष्ट्रग्यिकामा शोफस्पान्तम पश्यन् ये हत मेगे सुयोधनम् ॥ १ ॥ विहयाः पनितो भूमी, नष्टता इस विपः । भोर भस्रज्ञ तुमलोग परस्पर में देखोगे । १७ । संजय बोले :कि निष्पाप आपके | महारती पुकने . अपने भाइयोंको 'इमग्रकारस“समझाकर कर्णकी सेनापति बनाया । १७ हे गमो युदर्दुनद महावली करणने सनापीत होकर ' बहे, शान्द से सिंहनादों को कर करके युद्ध करना प्रारंभ किया । ८ । और सष संजय पाञ्चाल विदेह मोर केकय लोगोंको विश्वंस करके युद्ध में अपने पापप्त भागेकी पंक्तियों के समान पाणों की वर्षा करी कि सबको व्याकुल करदिया ।' फिर गयान पाण्डव और पांचाल लोगों को पीड़ित करता 'युद्ध में अर्जुन केराथ से मारांगया । २१ । अध्याय ४।। वैशम्पायन बोले हे महाराज अधिकाका पुत्र धृतराष्ट्र पर धनकर 'दुय्यों धनको मृतककेही समान मानताहुआ। । । महा न्याकुलता से अयेत होकर हाया West and knowing the use of weapons, you will look at one another to day." Sanjaya said, "Having thus exhorted his brotherx, O win. less one, your son mado Karan the combinander of luis armics. Boing installed as Commander of tho arnics, invincible Karan, with leonine roars, bacan, fighting and having destroyed, tho Brinjags., Pan. chals, Videhas and (aikuyas, be upeet all the army with tlia flights of his arrows like the swarms of bees. Having aflicted the great Farriors of the Pandavas and Panchal, lie was at last elniu by Arjun." 21. CHAPTER TV Vaishampayan said, "flaving brood thie, Dluitraslıtra the son of Amvies, thinking Drydhan as already dead, le came rery un. 1 (६२१७) कर्णपर्ष Karan Pare [6317 सम्मिनिपतिते भूमौ विलयले राजसत्तमे ॥ २॥ गानादो मानासीत् स्त्रीणां भरत सत्ता । स शम्दः पृदिली करस्ना प्ररयामास सर्पशः ॥३॥ शोकार्णवे महाघोरे निमग्ना मरतात्रयः । करशसन्तप्ता सतायोगिनमानसाः ४ ॥ गजानञ्च समासाथ गाधारी भरतर्षभ । निसंज्ञा पतिता भूमी सधण्यन्त पुराणि च॥ ५॥ ततस्ता: सायो राजन् समाइलासयदातुंराः । मुह्यमाना: मुबहुगो मुज्वापोयारिनेत्रजम् ॥ ६॥ समाश्यता स्त्रियातास्तु घेपमाना मुहुर्मुहुः । कदल्य इव पातन धूयमानाः समन्ततः ॥७॥राजानं विदुरश्चापि प्रमायचक्षुषमीश्वरम् । याश्यासयामाम तदा सिग्चस्तो येन कोरथम ॥ 41 स लम्घा शनफैः सनां ताश्च इष्टा खियो नृपः । उमस इव राजा तु स्थितस्तूण पिशामाते ॥ ९॥ सतो 'याया'चिन कालं निश्यस्य च पुसः पुनः । स्थान पुत्रान् गहपामास घहुमेने च पाण्डयाम् ॥ १०॥ गईयंधात्मनो बुद्धि के ममान पृथ्वीपर गिरपड़ा उस राजाको अचेत होकर पृथ्वीपर गिरने से । २। एन.समें से स्त्रियोंका वड़ा शोककारी शब्दहुमा उसशब्दस सम्पूर्ण पृथ्वी व्याप्त मोगई । ३ । दुःख शोक से पीड़ित अत्यन्त ब्याकुलचित्त भरतशियों की त्रिपा, महायोर शोकसागर में ड्वकर रुदन करने लगी । हे भरतर्षभ गांधारी और दूसरी स्त्रिये रागाके पास आकर मूर्छित हो भूमिपर गिरगई । ५ । इसके पीछे संजय ने उन शोको मूर्छित ,नेत्रों से अश्रुपात डालनेवाली स्त्रियोंको विश्वास देकर समझाया । ६ । जैसे कि केलेके वृक्ष चारोंओरकी रायुसे कंपायमान होते हैं इसी प्रकार वारंवार कंपतीहुई वह सब स्त्रियां विश्वास युक्त हुई। ७ । तब जलसे कौरव के भी सींचनेवाले विदुरजीने उस घुद्धिरूपी नेत्र रखनेवाले रानाधृतराष्ट्र को विश्वास कराया 11 हे राजेंद्र उनके वचनों से बह राजाधृतराष्ट्र बड़ेधीरे पनेसे सचेत होकर उनत्रिपों को देखके उन्म के समान फिर मानहोगया । ९॥ | फिर वारंवार श्यासलेतेहुये धृतराष्ट्र ने बहुतसमपतक ध्यानकरके अपने पुत्रोंकी निन्दा करी और पाण्डवोंकी प्रशंसा करी । १० । फिरा अपने और सोथैल के easy and full down insensible like an elephant. The women of the palace rnised a tiemondous wailing at his fall. Distressed with grief and sorrow and immersed in the deep ocean of woe, the women of the descendents of Bharat wept loudly. Then Gandhari, with other, women of the household, came to tlie king and fell down in earth 5. Sanjaya consoled those weeping women Trembling lika plantains by the wind, all the women were comforted.. Then sprinkling water over the Kaurav, Vidur cuiſoited the king who hud wisdum for his eyes. . Thus comforted, the king slowly regained coneciourners and, liko on insane nuant, again bien alue xent at this sight of those we mcd. Ilien beaving night, fio Dedilated for a long time, ble ning his box Ed jira sidg tl. Penasar. Iluu binnings in & swoon.
[6118] Mahabharat (६२१॥ शकुने सौयलस्य च । ध्यारया व शुचिरं काल वेपमानो मुहुहुः ॥ ११ ॥ संस्तस्य । मनोमयो रामा घेर्यसमन्वितः । पुनगांपल्याणि स्तं पर पृच्छत मजयम् ॥ १२ ॥ रंवया यत् कथित पाय ध्रु सजयं तन्मया। कविर्योधनः स्तन गो पे थम क्षयम् ॥ १३ ॥ जये निराशः पुत्रो मे सततं जयकामुकः । भूहि सजा तत्वेन पुनक 'कांकयामिमाम् ॥ १४॥ एषमुको वीत् सतो राजानं जनमेजय । तो कर्तनो राजन् सह पुत्रैर्महारयः । भ्रातृमिश्च महेवासः मूतपुत्रस्त नुत्यजः ॥ १५॥ दु:शासनश्य, निहतः पारवेन यशस्विना । पीतन रुधिरं कोपात भीमसेनेन संयुगे॥ १६॥ इते भी.कर्णपण धृतराष्ट्रशोके चतुर्थोऽध्यायः .. vopornar - - | पुत्र शकुनी की युद्धिका निंदा करताहुमा वास्वार कांपकर ध्यानको करके ॥११॥ मनको थामकर धैर्यतास धृतराष्ट्रने संजपसे पूछा कि । १२ । हे संजय तुमने जो वचन कहा वह तो मैंने मुना परन्तु यह तो बताभो कि दुर्योधन तो यमपुर नहीं गया । १३ । सदैव विजयाभिळापी मेरापुन विजयसे निराश होगया है हे संजय इस कहाईई कथाको फिर भी मुरुपता से वर्णनकरो। १४ । हे जन्मेजय धृतराष्ट्र के इस वचनको मुनकर संनय कोते हे राजा मूर्य का पुत्र महारयी कर्ण वड़े वाणा हारी शरीरके त्यागनेवाले पुत्रों और भाइयोंसमेत मारागया पार यशस्वी पापहवके हायसे आपकापुत्र दुश्शासन भी मारागया और उसी युद्ध में भीमसेन ने उस के रूधिर को भी पान किया । १६ । 6bakuni and himself, he was plunged in meditation and shook again and ngairi, and controlling his miod with fortitude he thus tioued Sanjaya:-"[ hare heard all that you said, Sanjaya. |.tell rue if Duryodhan bo dead. Always desirous of victory, he hasy now lost all hope of it Tell me again your story, Sanjaya." Having heard the words of Dhritrashtra, O Janmajaya, Sanjaya said, "Karan the mighty warrior has been slain Blues with his brothers and relia ant song. Your son Dushasın too, was slain by Bhim wbo also drank his blood in the field of, battlo." ques. Now 16.
(६२११] कर्णपर्व Karan Pary [ 62191 वैशम्पायन उवाच । एतत् अत्वा महाराज धृतराष्ट्रॉम्घिकासुतः, अधात सम्जयं मूतं शोक संविग्नमानसः ॥ १॥ दुष्प्रणीतन मे तात पुत्रस्यांदर्घिदर्शिनः । हत करीन श्रावा तन्मे मर्माणि कृन्तति ॥ २ ॥॥ तस्य में संशयं छिन्धि दुरखपार तितीर्षतः । कुरूणां पाण्डयानाप के नु जीवन्ति के मृताः ॥३॥ सञ्जय उवाच । इतः शान्तवा राजन् दुराधर्षः प्रतापवान् । हत्वा पाण्डवयोधानामर्पदं दशभिदिनैः ॥ ४॥ तथा द्रोणो महेष्वासः पाशालानारयनजान् । निहत्य युधि दुर्द्धर्षः पश्चागुक्मरपो हतः ॥ ५॥ हतशेषस्य भीमेन द्रोणेन च महात्मना । म निहत्य सन्यस्य कों पसनो हतः ॥ ६ ॥ विर्षिशतिमहाराज राजपुत्रो महाबलः। मानतयोधान शतशो निहत्य अध्याय ५॥ वैशम्पायन वोले कि हे जन्मेजय शोकसे महाव्याकुल अम्विका का पुत्र प्रतराष्ट्र इस वातको सुनकर संजय से बोला ! १ । हे तात थोड़ी पुद्धि वाले मेरे | पुत्रकी दुर्बुद्धी से कर्ण के मरणको सुनार मेरा प्रवलं शाक मेरे मङ्गोको काटे डोलता है सो हे मूत मुझ दु.लसे पारहोनेके इच्छावान् के सन्देहोंको नियतकरो 1२ । अव कौरव और सृजियों में कौन २, जीवते वाकी हैं और कौन । मरगये । ३ । संजय वोले हे राजा महामतापी अजय भीमनी दश दिनम पांडवों है एक भरव शूरवीरों को मारकर मारेगये । ४ । इसीमकार बड़े धनुर्धारी दुराधर्ष - सुवर्ण के रथपर चढ़नेवाले द्रोणाचार्य युद्ध में पांचालों के असंख्य रथ समूहोंको मारकर प्रापभी मारगये । ५। महात्मा भीष्म और द्रोणाचार्य के मरने से शेष अचीहुई सेना के अर्धभागको मारकर मूर्पकापुत्र कर्णभी मारागया । ६ । और CHAPTER V' Vaichampayan said to Janmejayı, "Beset with grief, Dhritrashtra the son of Amrica, said to Sanjaya, "The news of Karan's death on. account of the evil policy of my unwise son, is cutting my limbs with sorrow.. Remove my doubts as I am desirous of crossing the ocean of grief. Who among the Kauravas and Srinjayas are alive and who are dead?'' Bsjaya said, "Invincible Bhishm of great pro: wess died after slaying a thousand millions of the Pandav Warriors in his ten days of fighting. Liko wiseDrona the mighty archer, who rode his golden car and slew numerous carwarriors of the Panchals, is alain. Baran too, killed half of what remained after the death of Bhishm and Dropa and then he was himself slain. The mighty prince, Vivinshati too, was slaio after extirpating hundreds of A part (६२२०) Karan Pary (6220) निहतो युधि ॥ ७ ॥ अप पुत्रो षिकर्णस्ते क्षत्रधर्ममनुस्मरन् क्षीणवाहायुषः शूरः स्थितो यनिमुखः . परान् ॥ ८ ॥ घोरकरा : परिषले शाम् तुम्यो धिनतान् परन् । प्रतिक्षा ता य मिसनन पातितः ॥ ९ ॥ विन्दानु विदाषापत्या राजपुत्रौ महायला कृत्वा त्यसुकर कर्म गता वैषस्थतक्षयम् ॥१०॥ सिन्धुराष्ट्रमुस्तानाह दशराष्ट्राणि यानिह । घशे तिष्ठन्ति पीरस्य यस्थितस्तष शासन ॥ ११ ॥ अक्षौहिणाईश काउच निजित्य निशितै शरैः । अर्जुनेन हतोराजन महावीयों जयद्रयः ।। १२ । तथा दुय्योधनमुतस्तरम्ची युस दुर्मदः । वर्तमानः पितुः शामे सौभद्रेण निपातितः ॥ १६ ।। तथा दाःशासनि शो पाहुशाली रणोत्कटः । द्रोपदेश विक्रन्य गमितो यमसादनम् ॥ १४॥ किरातानामधिपतिः सागरानूपपासिनाम् । मदायली राजपुत्र विविंशति भी भानदेशी सैकड़ों शूरवीराको मारकर युद्ध में मारागया । ७। इसीप्रकार आपकापुत्र ‘महावती' पिकर्णभी घोड़े और शास्त्रों के नाश होजाने से क्षत्रीवर्ण को स्मरणकरता शत्रुओं के सन्मुख नियत हुथा। ८ दुर्योधन के किये हुपे घोररूप अनेक ल्फेशों को और अपनी प्रतिज्ञाके स्मरण करनेवाले ‘उसी भीमसेनके हायसे युद्धमें मारागया । ९ । और अंवन्ति देशके राजा राजकुमार विन्द 'अनुपिन्द' वड़ें । कठिन कम्मोको करके यमलोक को गये । १० सिन्धके देशों में बढ़े उत्तम जो दशदेश धीरजयद्रथके स्वाधीन है और वह जयद्रय आपके श्राधीनहोकर भापका भाशावर्तीया । ११ । उस महापराक्रमी अपद्रय को ताक्षणवीणों से ग्यारह अक्षौहिणी सेना बिनय करके आर्जुनने विषय किया और इसीप्रकार दुर्योधनका पुत्र महावेगवान युद में धीरोंका मर्दन करनेवाला और शास्त्रका ज्ञाता कभिमन्युके हायसे मारागया ।१३। इसीमकार दुश्शासनका पुत्र वाशाली रणमें उत्कट द्रौपदी के पुत्र के साथ लड़कर मृत्यु के पशहुआ .१४ । सागर और अनुपदेशवासी किरातोंका राजाधर्मात्मादेवराज इन्द्रका प्यारा और अंगीकार warriors. 7. Similarly your son Vikarn deprived of horses and ives. pons, but remembering his duty as a warrior, stood in the field of battle and was slain by Bhim who romembered the wrongs done to him by Duryodhan, Vind and Anuvind, the princes of Avanti, per formed great deeds of prowess and were slain. Bravo Jayadrath, the lord of the ten kingdoms of Sindhu, was laid by Arjon who vanquished the cloven akshauhinis of your army with his slarp Arros. Duryodhan'a mighty son, the destroyer of fous and skilfal in the knowledge of weapons, was slain by Abhimanyu, Dushasan's brave son tras slain in battle by tho mighty son of Draupadi. The virtuous king of the kirnts of 8 gar of Anup dear friend Indro, over lorer of warliko dando Bhagdatta was sent to the region of Yem by कर्णपर्ष Karan Parv [6221 राजरप धारमा लियो बहुमतः सखा ॥ १५ ॥ भगदत्तो गीपालः सत्रधर्मरतः सवा । धनजन विक्रम्य गमितो यमतारनम् ॥ १६ ॥ तथा कारपदापादः सौमदति महायशाः । हतो भूरिभषा राजन् शरः सात्यकिना युधि ॥ १७ ॥ भुतायुरपि नाम्बष्ठ क्षत्रियाणां धुरम्परः । घरग्नमीतयत् संख्ये निहतः सम्यसाचिना ॥ १८ ॥ तव पुत्रः सदाम ताखो युद्धदुर्मदः । दुःशासनो महाराज भीमसेनेन पातितः ॥ १९॥ यस्य राजन् गजानीकं पहुसाहममद्भुतम् । सुदक्षिणः स संग्रामे निहतः सम्यसाचिना॥२०॥ कोशलानामधिपतिहरया पहुशतान् परान् । सोमणेह विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ २१ ॥ पशो योधयित्वा च मीगसेन महारथम । चित्रसेनस्लप मुतो भीमसेनेम पातितः ॥ २२ ॥ मद्रराजानुजः शरः परेषां भयपनः। मसिधर्मधरः श्रीमान् सौम देण निपातितः ॥ २३ ॥ समः कर्णस्य समरे पः स कर्णस्य पश्यतः। अपसेनो महा तेजाशीघ्रासो दविक्रमः ॥ २४ ॥ ममिमायोषधं स्मृत्वा प्रतिहामपि पारमनः । किया हुभा मित्र । १५ । सदैव क्षत्री धर्म में प्रीति रखनेवाला राजा भगदत्त भर्जुनके पराक्रमसे यमलोकमें पहुँचायागया । १६ । हे राजा इसीप्रकार कौरव वंशी वड़ायशी शूर मार भूरिश्रवा युद्ध में सात्यकी के हाथ से मारागया । १७ ॥ और क्षत्रियों के भारके धारण करनेवाले श्रुताय और मम्बष्ट भी युद्ध में निर्भयता से घूमतेहुये अर्जुन के हाथ से मारेगये । १८ । हे महाराज सदैव क्रोधरूप अनाज पदमें दुर्मद भापका पुत्र दुश्शासन भीमसेनके हायसे मारागया । १९ । और जिसकी हाथियों की सेना भपूर्ण भार असंख्यया यह सुदक्षिण खड्गके पुरमें भर्जुनके हायसे मारागया । २० । कोशल देशियों का राजा घड़े २ शत्रुओं को मारकर अभिमन्यु से महापराक्रम करने के द्वारा यमलोकवासी हुआ। २१। मोर आपका पुत्र चित्रसेन महारथी भीमसेन से अच्छी सतिसे युद्धको करके उसी के हायसे मारागया २॥ शत्रुओं के भयको पढ़ानेवाला महा शूर जयद्रय का पुत्र पृथ्वी पर दाल तरवारका रखनेपाला श्रीमान भर्जुन के हाथ से मारा गया । २१ । पुद में कर्णकी समान पड़े तेजस्वी अस्रोंको पीता से चलानेवाले घद पराक्रमी पसेन को । २४ । वापराक्रम करके अर्जुनने अभिमन्यु Arjun. 16. Similarly, brave Bhuriehrara of the Kaurar family ras Blain by Butyaki. Shrutaya and Amrasht, firm in the duties otkshatr.. yas, were slain by Arjan who roamod fearlessly in battle. Your son Dushasan the invincible warrior, skilful in the use of arpis, was slain by Bhim, udakshin the possessor of an inbomorable army of ele. phants, was slain by Arjun's sword. 20. The warrior king of Ko sal vas slain by Abhimanya. Your son Chitrasen fought very hard and was slain by Bhim. The brave son of Jayadrath, terror of foes with his sword and shield, was slain by mighty Arjun. Vrishssen of great promesa like that of Keran, dexterous in the use of arms, was [62221 Mababharat (१२२२ धनजयेन विक्रम्य गमितो पमसादनम् ॥ २५ ॥ नित्यं प्रसक्तबरो या पारः पृथिषी. पतिः। विधाग्य बैरं पायन श्रुतायुः सनिपातितः ॥ २६ ॥ शल्यप्रस्तु षिकान्तः सा देषेन मारिष । हतो रुक्मरयो राजन् भ्राता मातुलजो युधि ॥ २७ ॥ राजा भगीरयो पुरो वृहरक्षश्च फेफयः । पराममन्तौ विक्रान्ती निहतो धीर्यवत्तरी १८ मगर समतो राजन् छतमहो महाबलः । श्येनपच्चरता संख्ये नकुलेन निपातितः ॥ २९ ॥ पितानरस्त तथा पाइलीका सह पाहिलकः । निहतो भीमसेनेन महापलपराक्रमः ॥३०॥ जयत्सेनस्तथा राजन जायसन्धिमहापलः । मागधो निहतः संक्पे सोमण महात्मना ॥ ३ ॥ पुत्रस्ते दुर्मुखो, राजन दुःसहथ महारथः । गदया भीमसेमेन, मिहती शरमानिनी ॥ ३२ ॥ दुर्मर्पणो दुर्विपहो दुर्जयश्च महारथः । कृत्या नमुकरं कर्म, 'गता घेवस्थतक्षयम ॥ ३३ ॥ उभी कलिङ्गवृषभा मातये युद्धदुर्मदो । या मासकर के वधको मुनकर अपनी प्रतिज्ञाको स्मरण करके मारा जो राजा सदैवं पांडवों से शत्रुता करताथा वह श्रुतायु. शत्रुताको सुनाकर अर्जुन के हापसे मारागयो । २६ । हे श्रेष्ठ राजाधृतराष्ट्र सहदेव ने अपने मामा शल्यके पुत्र पराक्रमी भाई रुक्मरथ नामको युद्ध में मारा २७ वृद्ध राजा भगीरथ और बाच्छा केकया यह. दोनों बड़े वली महामतापी भी मारेगयो२८ाहेराजा वड़ा पराक्रमी बुद्धिमान भगदत्त का पुत्र युद्धो बानकी समान घूमनेवाले नकुलके हायसे मारागया २९।इसीप्रकार महा चली शस्त्रधारी आपके पितामह वाह्लीक अपने बालीक लोगों समेत भीमसेन के हाथ से मृत्यु वश कियेगये। ३०। और जरासन्धका पुत्र महावली जेपरसेन मगध का राजा युद्ध में महात्मा अभिमन्यु के हाथसे मारागया ।।१।हे। राजा आपके पुत्र महारथी दुर्मुख और दुस्सह शरों में प्रशनीय भीमसेनकी गदा से मारेगये ॥३२॥ और महारथी दुर्मर्पण दुर्विप और महारथी दुर्जय यह तीनों कठिनकर्मों को करके यम के स्थानको गये ।।१३। और युद्ध में दुर्मद कलिंग और पक दोनोंभाई slain by Aajun who, at the death of Abhimanyu, had made a Gow to slay him, Saritayu, who always bore an enmity towards the Pandavas, was slain hy Arjus. 26. Sıhader slew Rukmarath, tho sonof luis maternal uncle Shalya, The old kingsBhagirath and Vribachatra of Kaikaya, pasyerful princes of great prowess, 'were also slain. Bhag datta's sòn, svise' and full of prome, vas slain by Nakal who was roming fearlessly in the field of battle Similarly, your grandfather Vablik of great prowess and skill in arms, with his people bearing his own name, vas slain by Bhim, 30, Bravo Jayaten o son of Jarasandb, king of Magadh, was slain by Abhimanyu. Your brave sons, Durmukh and Dussah, worthy of praise among the warriors, were stain bs'the race of Bhim. Blighty, Durmarshan, Durvish and Dur- Jaya went to tlie region of Yam after performing prodigies of valour.
' [ 6223 कर्णपर्व Karan Pary कर्म गती वैषस्वक्षिपम् ॥३४॥ सचिो पयर्मा ते शूर परमवीर्यवान् । मीमसेनेन विक्रम्य गमिता पमसादनम् ॥ ३५ ॥ तथैव पौरवो राजा नांगांत्युतपलो महान् । समरे पाण्डपुत्रेण निहतः सव्यसाचिना ॥ ३६॥ घशातयो महाराज द्विसाहली प्रहारिण! गरसेनाच विक्रान्ता सधै युधि निपातिता ॥ ३७ ॥ अभीषाहाः कचितः प्रहरन्तो रणोत्कटा: । शिषपथ रथोदाराः कलिंगसहिता हताः ॥ ३८ ॥ गोकुले नित्यसंवृक्षा युरे परमकोपनाः। तपाईकवीराश्च निहताः सव्यसाचिना ॥ ३९ ॥ श्रेणयो घसा माः शनकंगणाच ये । ते सयें पार्थमासाघ गता घेवस्वतक्षयम् ॥ ४० ॥ श्यालोत महाराज राजानौ षकाचलौ । त्वमतिविक्रान्ती निहती सव्यसाचिना ॥४१॥ उन कर्मा महेवासी नामतः कर्मतस्तथा । शाल्वराजो महावाहु मसेनेन पातितः॥ ४२ ॥ मोधवांश महाराज पृहन्तः सहितौ रणे। पराक्रमन्ती मित्रार्थ गती घेघस्वतक्षयम् काठन कर्मी होकर यमलोकको सिधारे । ३४ । आपका शूरवीर पराक्रमी मन्त्री सपा भीमसेन के हाथसे कालके वशीभूत हुआ । ३५। इसीमकार दशहजार हायीके समानपराक्रमी महाराजपौरव युद्धमें बड़ेपराक्रमी अर्जुनके हाथ से मारागया .१६और महार करनेवाले दो हजार वशातय और पराक्रमी शूरसेन यहसव युद्ध में मारेगये । ३. । पचधारी महारकरनेवाले युद्धमें उत्कट महारथी: अभासा शिमय यह दोनों कलिंग देशियों समेत पारंगये । ३८ । जोकि गोकुलमें सदैव घड़ेहुये युद्ध में महाद्धरूप युद्धसे मुख न मोड़नेपाल वारथे वहभी अर्जुन के हाथ से मारेगये । १९ । हजारों संसप्तकों समेत घूमनेवाले जो श्रेणिये पह-सव भी अर्जुन के हायसे यमलोकको गये। ४० । हे महाराज मापके निमित्त पड़ा पराक्रम करनेवाले मापके साले कृपक और अचल भी भर्जुन के हायसे मारेगये । ४१ इसीसतिसे नाम और कर्मसे उग्रकर्मी बड़ा धनुर्धारी महापाहु राजा: शाल्वं भीम सेन के हायसे मारामया । ४२ । हे राजा मित्रके निमित्त युद्ध में पराक्रम करने पाले भोघवान और बृहन्त दोनों एकसाथही यमलोकको गये । ४३ । इसीरीतिसे The great warrior brothers, invinciblo Kaling, and Vrishak died fighting bravely. Your valiant counsellor, Vrishavartaa tyas elain by Bhim. Similarly, Prince Påurva, who posse bied the protsess of ten thousands of elepbants, was slain by valiant Arjun. 36. Two thousands of valiant Vashatayas and brave Saursenas were all slain in battle. Brave Avishahas and shivayas, great warriors, were slain in battle along with the warriors of Kaling, clád in mail. The wrath. iful warriors of Gokul, invincible in battle, were also slain by Arjun. Thousands of Sbrenis and Sansaptaks, coming in contact with At. jun, wore slain in battle. 40. Your brothers in-law, Vrishak and Achai, who performed great deeds of valour fur ýsur 'sake, were slain in battle by Arjan, King Shalwa the great archer of renoton was slain by Bbim. Both Oghway and Vrahant, doing deeds of valour [6224 ] Dlababharat [ १२२४ ] ॥ ४२ ॥ तथैष रथिनां श्रेष्ठः क्षेमतिविशाम्पते. 1 निहतो गदया राज भीमसेनेन संयुगे ॥ ४४ ॥ संया जन्मापासो जलसन्यो महाबलः । सुमहरकदनं करवा इतः सारपकिना रणे ॥४५॥ मलम्वुपो राक्षसेन्द्रः सरयन्धुरयानवान् । घटोत्कचेन विक्रम्य गमितो पमसादनम् ॥ ४६॥ राधेय मतपुत्राय मातरम महारथाः । कैफेयाः सर्व सन्चापि निहताः सम्पसाचिना || मालवा मन्द्रकाधेष, द्रपितामोनविक्रमाः: पौधेयाश्च ललित्याच क्षुद्रकामाप्युशीनराः ॥४८ ॥ माषेलंफास्तुगिरफेराः सावित्री पुत्रकाच ये । मायादीच्या प्रतीच्या दाक्षिणात्याच मारिष ४९ पत्तीनां निता संषा इयानां प्रयुतानि चरपराध निहता इताच घरवारणाः॥ ५० ॥ सध्वजाः सायुधाः शूराः सवमाम्बरभूषणाः। कालेन महता यताः कुलशीमषिध दिसाः॥ ५१ ।। ते तासमरे स पापनाफ्लिप्टफर्मणा। मन्येतया मितषसाः महाधनुर्धर रथियों में श्रेष्ठ तेमधूर्तिभी युद्ध में भीमसनके हाथकी गदासे मारेगये । ४४ । ऐसेही वड़ा धनुषधारी महापली जलसन्ध पुद्धमें कठिन काँको करके बड़े शब्दों को करताहुआ मात्यकीके हायसे मारागया । ४५ । गोंका रथ रखने वाला राक्षसोंका, रानाभलघुप पराक्रमकरके घटोत्कचके रायसे यमलोकको पहुँचा १४६ । फर्णके पुत्र और भाई महारथी और सब केकय लोगभी अर्जुन के साथसे मारेगये । ४७ । वड़े कठिन की मालव मद्रक और द्रविड़ यौषेप ललित्य कुंद्रक, उशीनर । ४८ । मावेल्लक दंडकेर सावित्री के पुत्र और पश्चिमोचरीय वा पूर्वीय दक्षिणीय रामालांग । ४९ । पतियों के और घोड़ों के लाखों समूह रथ हाथियों के झंडों समेत मारालेगये ॥५०॥धना शस्त्र क्वच और वस्त्रों से अलंकृत भूरवीर। मो बहुतकालते बुद्धिमान लोगों द्वारा सवातों में कुशल और पोषण कियगप 1५१ वह सुगमकर्मी युद्धमें भर्जुन के हायसे मारेगये इसीप्रकार अन्य सेनांके for the sake of friendship. were slain at the same time. Similarly the great archer, best of warriors, Krhemdharti was slain by Bhim's muce Bruye Jalsandh, 4 great archer, doing great deods of valour with load roars, was slain by Satyaki. Alamyush the prince of Takshaser, whose car was drawn by donkeys, tyas slain in battle by Ghatotkach. 46. Karan's Buns and órotiers of great prowess were slain dy Arjun, along with the Kaikaya warriors. The valient Malaras, Madraka and' Dravidhan warriors, with Lalithas, Kshudraks, Ushinars, Mavellaks Tundikers, the sons of Savitri, the kings of the North, West, East and south, with a murous armies consisting of footsoldiers, borsemen car warriors and elephants, were slain in battle. 50. The warriors equippsd with binnere, weapons, armour and clothes, rho had got good training in arms from skilful masters, fell an easy prey to Ar - ६१२५] कर्णपर्ष Karan Pary [6225 परतावषिणः ॥५१॥ एते चाग्य पधहयो राजानः सगणा रणे हताः सहमसे रात्र परमारवं परिपृच्छसि ॥ ५३ ॥ पयमेष भयो वृत्तः काग्जनसमागमे । महें देष चाहती पथा रामेण राषणः ॥ ५४ ॥ या कर्णन भरको सरम निस्तो रणे कारबीच रामेण मागंण पलीयामा ५५५. सहाति धाग्या शरः समरे पुस उगहः ।रणे करपा महएवं घोरं प्रैलोक्य मोहनं ॥ ५ ॥ यथा स्कने मरिपो यथा कई बाधकः । तगार्जुनेन निहलो हरये युराधर्मदः ॥ ५५ ॥ सामारपणाधनो राम कर्णः प्रहरसाम्बा जयाशा धाराष्ट्रागां परस्प बमुखं पतः ॥ ५८ ॥ोणे तत् पारयर पर पुरा नावबुध्यसे । उच्यमानो महाराज याधुमितिवादिभिः । लोग जो परस्पर मारनेकी इच्छा रखतथे मारेगये । ५२ । है राजा इनके विशेष बहुतसे मन्पाजारों रागालोग अपनी सेनामों समेत युद्धमें मारेगपे । ५३ । इस रीतसे कर्ण और अर्जुनकी सम्मुखतामें ऐसा यहघोर नाशहुआ जैसे कि इन्द्रकेसाय पृत्ताधर औरभीरामचन्द्रजी के हायसे रापण मारागपा ।१५। और से भी करुणना के हायसे नरक और मुरनाम दैत्य युद्धमें मारेगये और जैसे भी भार्गर परशुरामनी के हायस राजा कार्तिवीर्य पर्याद सहसाबाहु मारागया । ५५ । इसी प्रकार का बदमें दुमदं शूरवीर कर्ण अपनी जाति और पांघोंसमेत युद्धमें तीनों सोकों के मोहन करनेवाले महाघोर संग्राम को करके मारागपा । ५५ । मसे स्वातिकार्तिकजी ने महिपको रुद्रनी ने भन्धरूको माराया उसीप्रकार पद में दुर्मद प्रहार करनेवालों में श्रेष्ठ देरपकर्ण अर्जुनके साथ युद्ध करके मन्त्री पार बांधवों समेत मारागया जिससे धृतराष्ट्र के पुत्रोंकी विजयकी आशा पार माबुताका मुख उत्पत्र हुमा या । ५८ । हे राजा पाण्डव लोग उस कर्म से निरन्तहुये जो पूर्ण समय में भलाई चाइनेपाले बांधवों के समझाने से तुमनहीं jun ilke orbet warriors who were eaz for fighting. Besides the thousands of other king, possessing largo aripier, were slain in battle. Thu fighting betwocn Karan and Arjan was dreadful like that of Indra and Vritasur, Ram and Rawad, Shri Krisho and Narak or fur, or Parashuram and Kartrirya or Sabesravahu. 35. Invin. cible Karan, with his kinsmen and allies, atupefied the three worlds with his dreadful fighting and was at last slain in battle. Mighty Karao, the best of warriors with his counsellors and friends, was slain in battle by arjun, As Bahish was slain by Kartik, or Andhak, by Rudra. In him lay the hope of victory to the song of Dhritra. where and ho was the root of all enmity. The Pandavas have performed a deed which you did no: think them capable of doing, although you were admedalied by your friends and woll-wishers. i:
1 62201 dlahabharat तदिर समनुप्राप्त व्यसन मुमहारययम् ॥ ५९ । पुत्राणा राज्यकामाना (धया रोशन् हितविणा। सरितान्येव चीणान तथा तरफलमागतम् ॥ ६॥ इति श्रीकण पाणि समजपवारये पञ्च याय ॥५॥ तराष्ट्र उवाच । आख्याता मामकास्ताती हता यधि'पाण्डये निहतान् पाण्ड पयाना माम सजय । १॥ सजय उवाच । कुन्तया युधि यिकान्ता महासत्व महापला । सानवधा सहामात्या माग्मण युधि पातिता ॥२ ॥ नारापणा बलपास रामाध शतशोरण । अनुरसाथ धीरेण भीमेण यधि पातिता ॥३॥ सम किरीटीन । समझे । ५९ । इसीकारण राज्य के चाहनेवाले पुत्रों की वृदिके चाहनेवाले तुमने वग नाशकारी यह महाघोर दुखपाया और जा दुष्कर्म किये उनका पह याग्य फल पाया ६०॥ ( भध्याय ६॥ A धृतराष्ट्र वोले हे तात संजय युद्ध में पाण्डवों के हायसे मारे हुये मेरे शूर वार लोग वर्णन किये भव हमारे शूर वारों के हायसे मरेहुय पाण्डवों के शूरवारों का वर्णनकरो। सजय बोले युद्ध में वडे पराक्रमी चलवान कुतदेशी मत्री और वाधवों समेत श्री गागेय भीष्मनी के हाथसेमारेगये । २ । और नारायण वा भालभद्रनाम अन्य शूरवीरलोग जो बडे भक्त थे युद्धमें वह सबभी वीर भीम के हायसे मारेगय । ३ । और वह सत्यजित जोकि बडावली युद्धमें सत्य सकल्प Des rous of secur ng Lingdom for your coretous sons you have brought about all tins rain and m sery and have got a proper re ward of your wicked deeds 60 oparoom CHAPTFR VI Dhritrashtra sad, You have given, O Banjaya, an account of our warriors sia n by the Pandavas now tell me the names of thx Pandav warr ors slain by ours Sanjaya sa d "The brave Farriors of Kunti, with their ady sers and kidsmen, were sain by Bhism Varayans and Balthadras great warriors devoted to the Pandavash 227 - (६२२७) कर्णपर्व Drona Pary समय बीर्येण व बलेन च । सत्यजित् सत्यसन्धन द्रोणेन निहतो युधि४ -पाशा लाना महेसासः यविशारदाः द्रोणेन सह साम्ये गता यस्यमक्षयम् ॥५॥ तथा घिरादुपदी मो सास्तौ नृप। पराक्रमन्ती मित्राय द्रोणेन निहतो रणे । ६॥ पागल पप समर समितः सव्यसाचिना । कशयेन च दुर्धयों पलवेना या विमो ॥७॥ परेपो कदनं काया महद्रविशारदा परिवार्य महामात्रैः पड़ामा परमकै रथैः ॥ ॥ मशफ्नुपद्भिर्षीभत्समभिमन्युनिपातितः । तं कृतं पिर धार क्षत्रधर्मे पध स्थितम् ॥ ९॥ दोःशासनिमहाराज सामद्रं हतंबामणे । सपत्नानां निहन्ता च महत्या सेनया कृतः ॥ १० ॥ अम्बष्ठस्यमतः श्रीमान् मिहतोः 'पराक्रमन् । आसाप लक्षणं धीरं दुर्योधनात रणे ॥ ११ ॥ ममहंत कदनं कृत्वा गती पैस्तक्षपम् । दम्तस्तु महेवासा पतास्त्रो युद्धदुर्मदः ॥ १२ ॥ दुशासनेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् । अर्जुन के समान था लड़ाई में द्रोणाचार्य के हायसे मारागया । ४ । और युद्धमें कुशल बड़े धनुपधारी सब पांचाल देशीलोग युद्धमें सम्मुख होकर द्रोणाचार्य | के हायसे यमलोककोगये । ५। इसीपकार मित्र के लिये पराक्रम करनेवाले राजा विराट और द्रुपद दोनों वृद्धभी युद्धमें द्रोणाचार्यके हाथ से मारेगये । ६.।'हे | समर्थ धृतराष्ट्र जो अर्जुन केशवंजी और यलदेवजी कीसमान अजेय महाराधियों में श्रेष्ठ मन्दमुसकान करनेवाला वालक अभिमन्यु शत्रुओं के बड़ेभारी नाशको करके मुख्य उत्तमरथी जो भर्जुनके पराजय' करने में असमर्थ थे :उन छ: महारोपयों ने घेरकर मारंडाला हे महाराज क्षत्रीधर्म में वर्तमान रथ से हीन शंध्रुहन्ता वीर भभिमन्यु को युद्धमें दुशासन के पुत्रनेमारा शत्रु हननेवाली सेना संयुक्त राजा अम्मा का पुत्र श्रीमान मित्रके निमित्त पराक्रम करता हुआ “युद्धमें :दुर्योधन के पुत्र वार लक्ष्मणको पाकर । ११ और बड़े भारी 'नाशको करके यमलोक को मया वडाधनुपधारी भखज युद्धमें दुर्मद सैदन्त दुश्शासन के साथ पराक्रम करके | यमलोक को सिधारा और युद्ध में दुर्मदा राजा मणिमान भोर दण्डधार । १२ । wers slain by Bhishm. Satyajit of great prosess and true vows like Arjun, was elain by.Drona. The Panchals, great archors and skilful warriors, were slain by Drona Doing deeds of.,valour for the saka of their friends, the old kings Virat and Drupad too, were slain by Drone Abhimanyu,.who was invincible like Arjun, Vasader and Baldev, laying destroyed a large number of our warriors, yag at laat slajn by.six of our warriors who found it impossible to slay Arjun, Doing the duty of a warrior, carolos: Abhimanyu the destroyer of froes was elkin by Dushasau's son. Accompanied by a trarlike army the son of king Amrasht, doing deeds of valoar for bis friends man slain bg Lakshman the son of Duryodhan. 11. The great, archer ånd skilful warrior y'rihant was slain by. Dushasan. Brave kings 6228). Karan Pary (३२२८ मणिमान दण्डपारश्च गजानो युगदुर्मदा ॥ १३ ॥ पराक्रमन्तौ मिशा दोन मिनिषा सिती मंशुमान भोजराजभ सहसैन्यो महारथः । १४ ॥ भारद्वाजेन विक्रम्य गोमतो पमसादनम् । सामुद्रचित्रसेनक्ष सह पुत्रेण भारत । १५॥ समुदसेनेन बलात् गर्मिती पमसादनम् । मनपपासी नीलम व्याघ्रदत्तय पार्यवान् ॥ १६॥ अश्यायाम्ना विकणेन गमितोषमसादनम् । चित्रायुधमित्रयोधी कत्या तो कदनं महत् ।। १०५चित्रमागेम विक्रम्य विकर्णेन हतो मृधे वृकोदरसमो युझे पता कैकेययोधिभिः ॥ १८॥ कैफयेन सपिम्प माता माता निपातितः । जनमेजयो गायोधी पार्वतीयः प्रतापवान् ॥१९॥ दुखत महाराज तव पुत्रेण पातितः। रोचमानो नरश्रेष्ठौ रोचमानौ महाविव २०॥ द्रोणेन युगपद्राजन दिय समापिती शरैः । नपाधा प्रतियुध्यन्तः पराक्राता विशाम्पते - यह दोनों मित्रके निमिच पराक्रम लरनेवाले युद्ध में द्रोणाचार्य के यस मारेगये और महारथी भशुमान और भोजराज सेना समेत । १४ । पराक्रम करके दोगा. चार्य के हायसे कालवशहुये और पुत्रसमेत । १५ । सामुद्र चित्रसेन के पराक्रम से लमलोक को पहुंचाया गया अनूपवासी राजा नील और पराक्रमी पाघ्रदच । १६ । यह दोनों अश्वत्थामा और विकर्ण ले हायसे यमपुरको गये चित्रायुध चि. अयोधी यह दोनों भी बड़े नाशको करके । १७ । और चित्रमार्ग से पराक्रम करते हुये युद्ध में विकर्ण के हायसे मारेगये युदमें भामसेन के समाम केकयदेशी शूरवीरों से संयुक्त । १८ । महापराक्रम करके अपने भाई कैकेय के हायसे मारागया रे महाराज गदासे युद्ध करनेवाला पर्वत निवासी महामतापवान तेजस्वी जनमेजय । १९ । मापके पुत्र दुर्मुख के हायसे मारागया ग्रहों के समान प्रकाशित नरोचम नाम दोनों भाई । २० । एकतार में द्रोणाचार्य के वाणों से स्वर्ग को पठायेगये हे राना सम्भव युद्ध करनाले पराक्रमी राजालोग । २१ । कठिन कर्मको करके animan and Dandadhar, exorting for the sake of their friends were slain by Droos. Mighty Anshuman and Bhojraj fought with Drona add ware slain by bim. Citrasan the king of the Boa noast WAN slain in battle by Samudrase. Kiog Nil of Anup and valiant Vyaghradatta were slain by Ashwathama end Viksrn. Chitragadh sad Chitrayodhi slew many warriors in a wonderful manner and more blain by Vikarn. Full of process like Bhim and accompaniedby Kakaya warrions the Kaikya prince was slaid by his opa brother Glorious Janmejago, the king of the hilly conatry, who fought with mace, was slain by your 60. Darmukh. The two Rachman brotbers, glorious like stars were slain by Dronacharya, 20. The king 16229 - Fürth Karan l'art २१॥ कृषा नमुकरं कर्म गा पैवस्वतक्षयम् । पुरुजित् कुन्तिभोजन मातुली, सस्यसचिनः ॥ २२॥ सप्रामे जितांछ कान् गमितो द्रोणसायकैः । अभिभः काशि राम बहुभिः काशिभिः ॥ २३ ॥ पमहानत्य पुत्रग म्पासितो हमाहये । ममि सोजा युधामन्युरुत्तमौजाश धीर्यवान् ॥ २७ ॥ नित्य शतशः शूगनादीनिपा निता स्त्रिया वयात्य क्षत्रधा च भारत ॥ २५ ॥ द्रोणेन परमेयासी गमिती पमसादनम् । शिखण्डितनयो बारः क्षत्रदेयो युधाम्पतिः ॥ २६ । लक्ष्मणेन हतो राज न पत्रेण मारिष । मुचित्रचित्रवर्मा पितापुत्री महावली २७। प्रवरतो रण धारी द्रोणन विनिपातिती । धाक्षभिर्महाराज समुद्रः इष पर्वणि ॥ २८ ॥ मायुधक्षयमा. साय प्रशान्ति पामांगतः । सेनायिठ शात्रगान प्रदइन्युधि॥२९॥ वाहिलोन यमके लोकको सिधारे हे राजा सम्मुख पद करने वाले सव्यसाची प्रार्जुन के मामा पुरजित भौर कुन्तभोज युद्ध में पराजय होकर द्रोणाचार्य के बाणों से यमके लोकों को प्राप्त हुये । २२ । भभिभूनाम काशीका राना काशी के अनेक शूर. वारों समेत युद्ध में बमुदान के पुत्र के हाथते मारागया और बड़ा तेजस्वी युधामन्यु मोर महापराक्रमी उनमोना । २५ युदमें सैकड़ों शूरवारों को मारकर हमारे वीरों के हाथो मारेग और पांच ल देशी मित्रवर्मा और क्षत्रवर्मा यह दोनों महाधनुष धारी द्रोणाचार्य के ह यते यमलांकको भेजेगये । २६ । शूरवीरों में प्रधान सिखंटी का पुत्र क्षत्रदेव भापक पत्र लक्ष्मण के हाथ से मारागया चित्रवर्मा और मुनित्र मास्थी महावली दोनों पिता पुत्र युद्ध में धूरतेहुये महावीर द्रोणाचार्य के हायसे मारेगये । २७ । है महाराज. जैसे कि पर्व में समुद्र होताहै उसीपकार | वार्धक्षमी ने शत्रों के नाश होनेपर परमशांनी को पाया। २८ । हे राजा शस्त्र धारी युदमें भेष्ठ सेनाविका पुत्र कौरवेन्द्र बादी कके हाथ से मारागया और encountering in battle did great deeds of valour and went to the | •rrgion of Yumm. To materral uncles of Arjun, Purujit and Kuntbhoj were defeateil in baitle and sent to tlie region of Yam by Droua's A vibnu tle prines of Kashi, with miny warrio s of Kashi was slain in barcle by Vasuda.i's son. Glorious Yudhamanyu and valiant Uttamarija, having pain hundreds of warriors in battle were at last sluit by your own warriors. Mitruvarmu and Kshatraparma of Panchal Ware sent to the region of Yamu by Donncijarya the greatest of archers. 26. Shikhandi's son Kshatradev; the prince of wrr jors, wou slain by your grandson Laksliman. Chitiavarma and 8selitr, the two great warriois, tather and sun, Tere Alain by Druna. At the destruction of all his wrspune - Vardliakslemi, like the Ocean at. full tide, beatno trangril. Sanurindu's sons grent trarrior, yag slain by Vahlik the prince of - Kaumvas, Dlirisli. takotu the best of Panchal warriois, liaviog döne derds of valuar, srrows.
[6281] बन Karan Part घामाणे विक्रम्य परमास परिपृष्स ।। ३९ ॥ इति श्री कर्णपाणि समयवाक्ये षटोऽध्यायः ॥६॥ धृतराष्ट्र उवाच। मामफस्या सैन्यस्य होरसकस्य मजप मशीन पायामि कुदे भूदित सान मां हि वीरा मंगसी मदर्थे कुरुसत्तमा । भीम द्रोणीहती भत्ताको नार्थो जोणिते सति ॥ २ ॥म शोचामि राय हमारत शामिनम | बाल तुल्यं कुरणां शतं शतम ॥३॥तप्रवीरसम्यमे पथा शंससि सजय महामपि मे शंस फेत्र जीयन्ति फेवन ! पनि भूमध्यप यसपा परिमार्तिताः ।यरि जीयन्ति त स मृगारति मतिमम् ॥ ५॥ सम्जय करके पांडवों के अनेक महारथीमारे ३९ ॥ +ope अध्याय ७॥ धृतगष्ट वेसे हे संमय प्रधान पुरुषों का नाश होगानमै उस मरने से शेष वचीई अपनी सेनाको नहीं देखताह ।। मेरे प्रयोजन से मरनेवाले उन दोनों महापनुपधारी अतुल राक्रमी कौरवों में श्रेष्ठ भीष्म और द्रोणाचार्य को सुनकर भीवनको में नहीं चाहता हूँ । २ । मैं युद्धको शोभित करनेवाले मरेहुये कर्णकोना सरसत्ताई जिसकी भुनाभोंका पराक्रम दशहजार हाधीका या । ३.हे संजप इस हेतुमे जसे कि मेरी सेना मेरेहभोंका तुमने वर्णन किया वैसेही ' यहमी कहो कि मरी सेनामें कौन २ जीवनाई । ४. भर मापके वर्णन कियधुरी इन पड़े शूरवीरों में मरजाने से शेप बचेगे भी मरोंके सदृश मुझको मानपड़ते हैं। ५ / संजय Drone.*. CHAPTER VII Dhritrashtra sail," At the destruction of the principal warriors, I tuink tle 10st cannot bu safel Hearing of the death of the two 6 of Kaurav warrioia, Bhislım and Dronacharya ylio died fur mig muke. I lave no dosire to live any lwiger. I cannot brook the death of Karad, tlo ornament of battlo, wluso proste, was liko that of ten thousands of elephants. You laro givon, 8anjaya, an account of our warrions slain, now isb ras know who are alirg. Ithink that the warriors remaining now are like dead men:"5. Smjaya raid, -- . [6232], Maliablisrat (१९३२) उवाच । यस्मिन्महालागि सार्षिाने चित्राणि गुन्नाणि चतुर्विशानि । दिव्यानि गज निनानि द्रोणेन धीः द्विसत्तमेन ॥६॥ महास्यः कृतिमान सिपरनो हदायुधी स्टमुटिपुः । स पीरपंधान द्रोणपुत्रानरस्त्री गस्पिनो यं कामावर ॥७॥ भानगसी हदिकात्मजासी महारयः सारवतानां परिष्ठः । स्वयं भोजः कृतवर्ग कृतास्रो व्यरियनो यो शामस्त्वदर्थे ॥ ८ मात्तायनिः समरे दुष्प्रकम्प सेना प्रणी: प्रथमस्तायफानाम् । पायमूीयान् पारधेयान पिज्य सत्य का तो धिको पुंस्तरस्थी॥९॥ तेजोवघं मूतपुत्रस्य संपये प्रतिमायाजातशत्रोः पुरस्तात् । दुराधर्ष शकममानधीयं शल्प स्थितो योधुकामरवदयें ॥ १० ॥ माजानेयः सैन्धव पार्ष तीनदोजकाम्योजानायुमा गान्धारराजः मुपलेन युक्त। प्यवस्थितो पो काम स्वयं ॥ ९१ . शारद्वमा गतिमान राजन्महायलो बहुचित्राप्रपोधी । धनुमित्र समहद्भारमा व्यवस्थितो याधामः प्रगृय ॥१२॥ महाधनः कपराजपत्रः सदी वोले हे राना ब्राह्मणों में श्रेष्ठ द्राणाचार्य ने जितको अपने उत्तम दिव्य मख समग करदिय ६ . वह हारथी कत्ता हस्त लापर करनेप'ला द. पनुप: चाणों से युक्त पराक्रमी वेगवान मेरे निमित पद्धाभिलापी अश्वत्थामा भरल होकर विद्यमान है । ७ । यह मान देश बासी इदिक का पुत्र यादों में श्रेष्ठ महारथी भोनवंशी कृतवर्मा आपकेही निमित्त युद्धकी इच्छा करनेवाला अभी विद्यमान है । ८। युद्धा दुराधर्ष भापके पुत्रोंका सेना पति शल्य जो अपना वमन सत्य करने को अपने भानन पागडों को त्यागकर । ९ । जिमने पधिष्ठिर के अगे पुदमें कर्ण के पराक्रम के नाश करन की प्रतिज्ञा को पूर्ण किया वी भनेय इन्द्र के समान पराक्रमी आपके निमित्त मड़न की परछा करनव ला लिया ।१०। और माने कुल समेत रामा गान्धार, आन नेग, सिन्धदेशी, पर्वती कामोन देशी सिंघी बनाननदीम इत्यादि । १।। भनेकप्रकार के पाड़ों समे तेरे लिये युदाहांती वर्तमान है। १२ । है कौरवेन्द्र राना कय का पुत्र महा. Ho whom Dona bqinchoal liis fenpains, the droul'ul min olgnar. pruwasahrring hard brand arrowed xtrrons Ashwathama,drsirou. of irntine for you, in still in the fi-ld of bottle Valiant Kritvorms the son of Hidik, brat of th- Yuivas, of the fam ly of Binj, a tative of Anart, is praly to fight for your sake. "Ila grent worrin-, annmander of the armi:s of your song, w171 ft his s'ater's sons, the l'Auduvas, to hop lie wortl, who fulfilled liie vow of deatmnging Kuras for the sako vf Yoth aduir, that iirincilio varrin nf Indra like putns sanus de sirvils of bittle for sose na'r. 10. Tio king i Sandhar, to other with hit kinudin al horns of Ajraign, & niin Kiyan,'Cen wij, Binayajauloke treali, tals in ths fiotity ight *gar ynku. "The valinnt #77 of the king of Kiikayı. wit's_gon . akarma मा - (.६९१३) कर्णपर्व Karan Pary 16283] युका पनाकिनारयाघमारुह्य नरपर्ध रोगपस्थितो यो कामरयदर्थे ॥ १३ ॥ तय. सुनने ज्वलनाकंतुल्यंत सस्थाय कुरुप्रधीरः। प्यस्थित: पुरुमित्रो नम्म्द्र में सी.म्राजमानो यथा ॥ १४ " दुराधनो नागकुलाय माय व्ययस्थितः सिंहासषमासे । रधेन जाम्यूनदभूपणे। मस्थित समरे योगमान.॥ १५ ॥स गामा पुरुषप्रवीरो रराम जाममभिधाय । प्रमप्रभो पहिरिवाल्लमा मेघांनी मरये पाश । १६ ॥ तथा मुशेणोप्यासचर्मपाणिनधागजः सायना धीर ज्यवस्थिको चित्रसेनेन सा हटास्मानी समरे योद्धकामा १७॥ हनिषेषो मार तराजपुत्रउपायुधः क्षणभीजी सदः। जारासन्धि: प्रयावाद मित्रायुधः श्रुत |पमा जाय ॥१८ : शलन सम्यवादु शलो प व्यवस्थितः समरे यांधकाम: तिम्या रथी उत्तम घड़ों ममत पताका युक्त ग्थपर चढ़कर भापके निमित्त युद्धका भमिनापी भभी वर्तमान है। इसी प्रकार कौरवों में बढ़ावीर पर पत्रनाम माप का पुत्र भग्नि और सूर्य के पूर्ण रयपर सवार होकर ऐमा पत्तेमान है जैसे कि व दलों से रहित स्वच्छ भाकाश में मूर्य प्रकाशमान हेता है । ११ । भाइयों में नियत दुर्योधन सिकेसम न स्वभाववाला युद्धाभिलापी मुवर्ण जटित ग्यको सवारी में नियत है । १५ । यह पुरुषों में पड़ावीर मुवर्ण जटित कवचधारीकमल के समान प्रकाशित निर्धम अग्नि के सम न तुल्य राजाओं में ऐगा शोभायमान हुआ।१६ जने कि बादलों में मूर्यका मकाश होताहै इमीप्रकार प्रमन्न चिन युद्धामिलापी दाल तलवार धारण किये माप पुत्र मुपेण चित्रसेन और सत्य जिन पर तीनों नियत है। १७ हे मातम शामवान् उप्रशनपारा भोजी राजकुमार नरासन्धका प्रथमपुत्र अढ़ चित्रयुध श्रृतवर्मा जय शल्य सत्याच | दुःशाल यह सब नरोत्तम सेनासमंत नियत हैं। १८ । और प्रत्येक युद्धमें शत्रुओं horses, is ready to fight in your cause. 13. Likewise, Purumilia, your son the b-st of the Kaurav warriors, stinds in his car 'brilliant like the Sin.-8.anding am .ng his brothers, of lion like proye-a, ho stands in this gold b.decked car 15. That brave warrior with gold armwar, brilliant like smokeless fire, is gloricus Arpong kings like the Sun in the mill-t of clouds. Smilarly your sons Shurren, Chitra. non and 8 tyajit of clourlul mad, armed with sword and shielil, are ready to fight for your sake. Of good manners, possessed of poker: weapons, the oldest son of Jarasandh, Adrirls with Chitrayudh, Shrutvarma, Jaya, Ghalya Satyavrat and. Dushal, all these warriors are read' to fight. The revered king of Kaitavar, diatrogér ör foes, with princos, car.ivarriors, elepliant mon aad foot-soldiers; desirous of fighting, and brave Shrutayx, Dhrstagulh, and Chitravarms too, are ful . 16234] Malabliaiat (३२) नामपिरासी र घान् शहाराजपत्रः । पती हया नागरायो पास्पिनो य चुकामस्वयें । १९ ॥ वीरः अनायुध तायुधम विश्वासमा सयंत्र। पस्यो योधकाना नरामराः प्रहरिको मानिनः सत्यसम्चा । २०.कणारा सरसम्बो महमा स्थितः समरे ये धु: अथा कर्णस्तो बानी ग्यास्थिती लयहनौनरेन्द्र । पलं महमिदमापी समभिती वा स्यमानीया ॥ २२ ॥ पय मुयारसरच राजन् पाधवीरमितप्रभाषः यस्थितो भागकुलस्य मध्ये यया महेन्द्र कुरुपको जयाय ॥ २३ ॥ धृतराष्ट्र उवाच । 'माण्याता जी मामा पायोरि पातमम् । गामि व्यतीभिपचित २४ शम्पायन उपाव । ए राना तद धारणामकाजुतः। हतप्रधारभूत्येष्ठ किञ्चिारमल कम | २९ । रस तु मोहनगाडोका ! मुसानोमबार मुहई काना शूरों में प्रतीष्ठातियोंका गजा राजकुमार रथ घुड़चढ़े हायी पार पत्तियों समेत चढ़ाई करनेगाले । ११ । और भाप निमित्त युद्धाभिलाषी | श्रायु ताप चित्रांगा मौर वित्रामा भी प्रमी युद्धानिपत हैं यहसव पदाभि लाप्रारकर्ता निशान मत्यतिन नरोचम नियत हैं और कर्णकापुत्र सत्प पनि युद्ध करने का उत्तु कभी भनी निपौ। २१ । मोर कोनर दो पुत्र डाशी हा लघशी महाबली हैं यह आपके निमित्त युद्धाभिलारी वारोंक में हुये व्यूहमें वर्तमान है वह भी साधारण अल्प पराक्रमियों से कठिनता पूर्वक विजय होनेवाले हैं । २२ । राजा इन अनेक असंख्य प्रभावयाले मुख्य बोरों में संयुक्त कौरवों का राजा दुर्योधन हाथियों के समूहों के बीच महेंद्रक समान विजय करने के निमित्त उपस्थित है । ३ । धृतराष्ट्र बोले कि हमारे और परियों ने प्रो शूरवीर दोष बचेहये जायने हैं उनका तुमने वर्णन किया इसको मुनकर मुम को बड़ा शौक होताहे परन्तु जो होनहारह यह मिट नहींमती । २४ बैशम्पायन वोन कि सरीने में पचनों को कहता हुमा अम्बिका का पुत्र धृतराष्ट्र अपनी असेना को जिस के बड़े वार पारेगपे पार नाशको माताये उत में से कुछ ready to fight. All there warriors, desirous of fighting, respectful, of trne roti, best of.men are ready for battle. 20. Karun's son of trus suwr, desirous ol fighting. is ready to fight. Tero otliør sons o Koran, great warior, skilſui aail powerfil, *taad in battle array for yirir mike. They are invinc bla by ordinary men Theo chia warns, with numorpus othere, scompany Duryodban, who apr rounded by,8 largo army of el plants standa sends to win like Indrz," Dhritrashtra raid, "I liare beard, O Sanjry*, , the arbre of the warriors xbo pro xlisa. jom much grieved to hear all jhix but Fnto must have her.nay" l'aishamapayan said, "Thus hearing of the destruction of fria great warriors of whom onlgs.for work कर्णपर्व Karan Tare 162351 सिष्ठ सम्जय ॥२२॥ प्याकुल मे मनतात भ्रथा समदपिगमा मनो गुगो चानि नव नामि रितुम २७यमुस्वा वचनं परमिकामु मावित पासोप पात जगतीपतिः॥२८॥ पति श्री गण पर्वणि सनयवाय सप्तमोऽध्याय ॥ ७ ॥ जागा कम हो या पुराना नरेन्ट कम दायस्तो विजष्ट किमप्रवीत् । १ ॥ तवान परमं स्त्र पसन महत् । तस्मिन् पदुक्तवान् काले तम्ममाचक्ष्य पृच् ॥ २ ॥शम्पायन उपाय • श्रावा कर्णस्य निधनगमिषाद्भुतम् । भूसम्मान भीम मेरोः प्रपतनं था ।३॥ चित्र शेष बने ये उनका । .. दुखो व्यान होकर महामो के वशी भूत हा मोरमोहित होकर बोला कि हे संजय एक मुक्त ठहरो। २६ तात इन बड़ी अमेय वार्त.के सुनकर मेरा चित्त न्याल है और मैं अंगों से भी शिथिल गया है। २७ । वा अम्बिका सुत धृाराष्ट्र ऐसे वचन को काकर भ्रान्ति से पुक होगया । १८॥ याय. जनमेजया कहा संग्राम में में श्रेष्ठ वेशम्पायननी पदमें कर्णको मृतक और पुत्रों को नियामननान मुनकर उसमहान्याकुल राना धाराष्ट्रने क्या कहा पुरकी भापत्तियों ने उसन्न होनेवाले महाकष्ट को मामहोकर जा वर्णनांकया उसको मनसे व्यापार कहिये। वैशम्पायन कले हे महाराज कणके मरनेको सुनकर जोकि प्रदा के प्रोग्य और जीपों के भी मोहका करनेवाला महाभयानक था जितमकार कि महाका चलायमान होना । । और जैसी भार्ग परशुरामजी का अनुचित If , Dhtitha-htharho ron of Amrica wis much ngitatrnt and with . conlund mud arhed -anjaya to Buy a while, tay , thing lip Wax not thru in a fit stuto of mad tu h * TUOTU au filt tirul. Having said thir, Duitralit, a tlı 80 of Awvica lost luis vetisce," CHAPTER VIII Janmejaya said to Vaishanpaya", "Best of Brahinens ! what did Dariirashtra rayon liraring of the death of Karan and the readinexx of liis sona for fighting. Tell no splint he said wlien he was grieved at the calamities of is sun. Pray tell me all in detail" Vaham- Pugan -aid, "Hering ol Karru's dontla which mos legond belirl, streadful and stupefying, liho the mo‘ion of mount M-ru, or the undus uacunsciou-Bless of Parasliuram, or the de'tat ot Indra the terior "28.
कर्णपर्ष Karan Pary 1 6237 ] विद्विषां जयकांक्षया । दुर्योधनो करोद्वैरं पाण्डपुत्रैमहारथैः ॥ १३ ॥ स कथं रथिनां थेष्ठः कर्णः पाचन संयुगे । निहतः पुरुषव्याघ्रः प्रसह्यासह्यविक्रमः ॥ १४॥ यो नामन्यत थै नित्यमच्युतञ्च धनजयम् । न वृष्णीन्नाहितानन्यान् स्ववाहुषलमाश्रितः॥ १५॥ शागाण्डीपधन्वानी सहितायपराजिती। अहं दिव्याद्रयादेकः पातयिष्यामि संयुगे ॥ १६ ॥ इति यः सततं मन्दमवोचल्लोभमोहितम् । दुर्योधनमवाचीनं राज्यकामुक मातुरम् ॥ १७ ॥ योजयत्सर्व काम्बोजा नावंत्यान् केकयसह । गान्धारान्मद्रकान् मत्स्यास्निगस्तिगणान् खशान् ॥ १८ ॥ पाञ्चालांश्च घिदेहाश्च कुलिन्दान् काशिको शानासुझानगाश्चगाश्च निपादानपुण्डूकोचकान्॥१९ यत्सान् कलिंगास्तरलानश्मका नृपिकानपि । यो जित्वा समरे धीराश्चके वलिभृतः पुरा ॥ २० ॥ शरप्रातः सुनिशितैः सुतीक्ष्णैः फङ्कगत्रिभिः । दुर्योधनस्य वृद्धयर्थ राधेयो रथिनाम्बरः ॥ २१ ॥ सेनागोपश्च विजय की इच्छासे जिस महावाहुकी शरण लेकर पागवों से शत्रुताकरी ।१३। वह मसह्य पराक्रमी रथियोंमें अप्ठ पुरुषोत्तमकर्णयुद्ध में अर्जुनके हायसे कैसे मरागया । १४ । जिसअंहकारीने अपनेही भुजवल से श्रीकण अर्जुन और अन्य किसी क्षत्री को ध्यान नहींकिया अर्थात् किसी को कुछमाल नहींजाना । १५ । अर्थात् यही कहताथा कि मैं अकेलाही युद्ध में उन अजेय शार्ङ्गधन्या और गांडीव धनुषधारीको एक साथही उनको दिव्य रयतेगिराऊंगा यह अपनी प्रतिज्ञा उस लोभ से विस्मणीचन्तासेअधोमुख राज्य के लोभी रोगग्रस्त दुर्योधनसे बारम्बार | वर्णनकरी १७१और उस कर्णने पूर्व समय में काम्पोज देशी अवन्तदेशी कैकयदेशी गान्धार मद्रक मत्स्य त्रिगत तगण खश ।२८१ पाञ्चाल विदेह काशी कोशल सुम्हल अंग वंग निपाद पुण्डू कीचक । १९ । वत्स, कलिंग, तरल,अश्मक और ऋषिक देशियों को भी युद्ध में जोतकरवालभृत् . अर्थात् कर देनेवाला करदिया।२०। वह राथियों में श्रेष्ठ दिव्य अत्रोंकाशाता महातेजस्त्री धर्मरूप परम अस्त्रज्ञ अत्यन्त तीक्ष्णधार कंकपक्षसे युक्तसै पड़ों वाणोंकी वर्षासे दुर्योधनकी वृद्धिकेलिये सेनाका रक्षक सूर्यका the Pandavas; how was that best of warriors of matchless prowess slain by Arjun? 14. The proud man, who, by his own prowess, looked dowu upon Krishu, Arjun and other kshatryag and who said that be would bring down the wielders of Sharang and Gandiy bors from their car, bad often repeated his vaunts before Duryodhan, covetous of kingdom, who casts down his head with sorrow like a Karan bad already rauquished and made tributary the kingdoms of Camboj, Avanti, Kaikaya, Gandhar, Madrak, Matsya, Tagsrt, Tagan, Khush, Panchal, Videy, Kashi, Kosal, Samhal, Ang, Bang, Nishad, Puadra, Kichak, Vats, Kalug, Taral, Ashmak and Rishik. 20.. That best of warriors, skilful in the use of celestial weapons, glorious and virtuous, protected Duryodhan's army with sickman.
[ 6238], Mahabharat (६२३८ स कथं रानुभिः परमास्त्रवित् । घातितः पाण्डवः शरैः समरे, घलशालिमिः ॥ २२ ॥ वृषो महेन्द्रो देवेषु कृषः कर्णो नरेयपि। तृतीमन्य लोकस्मिन् वृष नैवानराचम् । २३॥ 'उच्चैःध्या बरोयानां राज्ञां पचवणो परः । परो महन्द्रो देवानां कर्णः प्रहरताम्बरः ॥ २४ ॥ योजितः पापियः शरैः साधार्यशालिभिः । दुर्योधनस्य धृद्धपर्यं कृतस्ना मुमधाजयत् ॥ २५ ॥ यं लब्ध्या मागधोराजा सान्त्यमानोर्थ सहिदः । अरौत्सीद पापिय क्षममृते फौरवयादयाषान् ॥ २६ ॥ तं धुत्या निहत :कर्ण रथे संप्यसाधिना । शोकाणं निमग्नोहं समुद्र मिन्ननोरिध ॥२७॥ नृर्ष निहतं श्रुत्वा द्वैर थिनां वरम् । शोकार्णवे निमग्नोहमालयः सागरे यथा ॥२८॥ ईशैर्यहं दु.वैन विनस्यामि साथ । पनाहढतरं मन्ये हृदयं मम दुर्मिहम् ॥ २९ ॥ ज्ञातिसम्बन्धिमित्राणामिमं त्या रा पुत्र कर्ण कसे २ युद्धों को करके . पादव अर्जुन के हाथसे मरागया । २२ । और जैसे कि देवतामों में इन्द्र वर्षा करनेवाला है उसीप्रकार कर्ण भी धनकी वृष्टि से मनुष्यों पर वर्षा करनेवालाहै इनदोनों के सिवागलोकमें किसी तीसरे वर्षा करकेवाळको नहीं मुनतेहैं जैसे घोड़ोंमें उश्चैश्रवा . राजाओंकुबेर । २४॥ देवताओं में महाइन्द्र उत्तम है इसीप्रकार शस्त्र प्रहार करने में पृथ्वीपर कर्ण सब से उत्तम है ऐसे समय पराक्रमसे शमित शूरवीर राजाओं से अजयकर्ण ने दुर्योधनकी वृद्धिकेलिये संपूर्णमयीको विजय किया।२६। और जिसको प्राप्तहोकर मगधके राजा जरासन्धने यादव और कौरवों के सिवाय अन्य सब राजाओं कोधिानकरीलया उसकर्णको द्वैस्य युद्धमें अर्जुनके हाथसेमराहुआ सुनकर | मैं शोकसमुद्रमें ऐसे डूबरहाई जैसे कि समुद्र में टूटी नौका डूबती है । २७ ! उस वृष्टि करनेवाले भोर राययोमें श्रेष्ठ कर्णको द्वैस्य युदमें मराहुआ सुनकर मैं शोकप्तमुद्रमें ऐसेहूबनेको होरहांह जैसे कि समुद्रमें विना नौकाके मनुष्य होता है।२८॥ इसंजय जो मैं ऐसे २ दुःखोंसेभी नहींमरूंगा तोनिश्चय करके मेराहृदय यजसे भी कवोर शोकचिन्तासे फटजाने के योग्यहै । २९ । और हे सूत संजय ज्ञातवाले hundreds of arrows fitted with Kank teatbers; how was Karan the SOD of Sarya slain in battle by Arjud! He showered wealth on mon us Indra pours forth rain. Except Karan and Indra, we hear of no third party's shower. Karan is the best of warriors, as Uchajshraya is the best of horses, Kurer, the best of king, and Indra, the best of godz. Karan the best of warriors, invincible by Marrior princes, conquered the whole land for the sak» of Duryodhan. 25. With his help Jarasandh the king of Magadh conquered all the kirge, with the exception of the Kauravas and the Yadavas, Hearing that Karao was slain by Arjun, I siak in the ocean of grief like a broken boat. Hearing the death nf generous Karan ip a duel, I am plunged in sorrort like a pan without a boat in the midst of the sea. 'My heart (६२३९) कर्णपर्व Karan Parv 16239] भवम् । को मदन्यः पुमान् लोके न जथात् माजीषितम् ॥ ३० ॥ विमग्नि प्रपात था। पर्वताप्रादहं धणे । न हि शक्यामि दु.सानि सार्नु कपानि सजय ॥३१॥ इति श्री कर्णपर्वणि सम्मयवाश्ये भटमोऽध्यायः ॥ ४ ॥ सजय उवाच ।थिया कुलेन पसा तपमा च भूतेनच त्यामध सन्ती मन्यन्ते रामानिमिय नाहपम् ॥१॥ध्रुने महार्य प्रतिमः शतमात्योसि पाधि । पर्यवस्थापयारमाम मा विपादं मनः कृथाः ॥ २॥ धृतराष्ट्र उवाच । देयमेघ परं मन्ये पौरुपन्तु निरर्थकमा, मोर मित्रों को इस पराजयको सुनकर मेरेसिवाय कौनसा पुरुषहै जो प्राणों को नहीं त्यागको३०मैं विपखाना अग्निमें मवेशहोना वा पब्बतके ऊपरसे गिरना | चाहताहूं परन्तु मैं इन कविन दुःखों के सहनेकोसमर्थ नहीं होसका। ११ । अध्याय ९॥ सनप बोले कि अब सन्तलोग तुमको लक्ष्मीसे कलसे यशस तपसे और शास्त्रज्ञता से नहुपकेपुत्र ययातिके समान मानते हैं ।।। हे राजा शास्त्रमें तुम महर्षि के समान मृतकृत्यहो आप अपनेको सावधान करो और व्याकुलताको त्यागो । २ । धृतराष्ट्र योले मैं दैवको श्रेष्ठ मानतई निरर्थक उपायकरने को धिकारहै जहां कि शालवृक्षक is surely harder than vajra as it does not btrak under such grief. Hearing the defeat of friends and kinsmen, O Sanjaya, who except me will remain alive! I wish to commit suicide by taking poison, entering fire, or falling down from a mountain cliff, for I cannot bear this sorrow." 31. Bondinksror- CHAPTER IX Bunjaya said, "Saints compare you with Yayati the son of Na., bush in wealth, family, fame, asceticism and learning. You are blessed with religous learning like a great rishi: Control yoursolf, and set aside your grief." Dhritrashtra said, "I hiild destitty to be above all and exertion as useless, as valiant Karad, 'huge as a sal troe has been slain in battle. Having slain the armies of the Panda. vas and Panchals, he illed all. the directions with his arrows. Hol 16240] Mahabharat ६२४०) यत्र शालप्रतीकाराः कर्णेयध्यत खयुगे ॥ ३॥ हत्या युधिष्ठिरानीकं पाञ्चालानां स्थान जान् । प्रताप शरवर्षेण दिशासर्वा महारथः ॥ मोहयित्वा रणे पार्था बज्रास्त इवासरान् । कथं स निहतःशेतेपातरुग्न इव द्रुमः ॥ ५॥ शोकस्यान्तं न पश्यामि समु द्रस्येव विप्लतः । चिन्ता मे पर्वते तीच मुमूर्षा चापि ज्ञायते ॥ ६ ॥ कर्णरूप निधनं श्रुत्वा विजयं फाल्गुनस्य च ।अश्रद्धेयमहं मन्ये षधं कर्णस्य सम्जय ॥ ७ ॥धनसा रमयं नूनं हृदयं मुहर्ट मम । यत् श्रुत्वा निहतं कर्ण न दीयंति सहमधा ॥ ८॥ भायु नन मुदीर्घ मे विहितं देवतः पुरा । यत्र कर्ण हतं श्रुत्या जीवाम्यच सुदुःखितः ॥ ९ ॥ घिग्जीवितमिदम्चैध सहसीनस्थ सञ्जय । अप चाहं दशामेतां गतः सञ्जय गार्ह ताम ॥ १० ॥ कृपणं पत्तीयष्यामि शोच्यः सर्वस्य मन्दधीः। महमेष पुरा भूषा सर्व लोकस्य सत्कृतः ॥११॥ परिभूतः कथं सूत परैः शक्ष्यामि जीयितुम् । दुःखात् मुदुस समान उन्नत महावली कर्ण युद्ध में मारागया । वह महारथी युधिष्ठिर की सेना और पाञ्चालोंके रथसम्हों को मारकर और वाणों कीवी से सव दिशामों को सन्तप्त करताहुआ । जैसे कि बजधारी इन्द्र असुरों को मोहित करता है उसी प्रकार युद्ध में पाण्डवों को मोहित कर के इस प्रकार से मृतक होकर सोता है जैसे कि वायु से टूटा हुआ वृक्ष पृथ्वीपर पड़ा होता है । ५ । मैं शोक समुद्र के अन्त को नहीं देखता हूं मेरी चिन्ता की वृद्धि और मरने की इच्छाभी उत्पन्न होतीहै ।। हे संजय मैं कर्ण के मरने को और अर्जुनकी विजयको सुनकर कर्ण के मारेजाने को श्रद्धा विश्वास अयोग्य जानताई 11 निश्चयकरके मेराहृदय बजके समान दुःखसे फटनेवाला है जो पुरुपोत्तम कर्ण को मृतक मुनकर भी नहीं फटता है । ८। पूर्वसमय में देवताओं ने मेरी भायु बहुतबड़ी विचारकरीहै इससेतुसे कि कर्णको भी मृतक मुनकर भभी पृथ्वीपर महादुःखी जीवताहुप्रा वर्तमानहूं। ९. हे संजय मुझ मुहृदजनों से रहित के इस जीवनको धिक्काहै जिससकि मैंने इस दुर्दशाको पाया।१०1 में निर्बुद्धी सयके शोचकयोग्य होकर दुःखी रहूंगा और पूर्वकाल में सवलोक में माम्य होकर १२॥ शत्रुओं से तुच्छ कियाहुआ मैंकेसे जीवनको समयदुर्गा हे मूत्र संजय मैंने भीष्म stupefied the Paudavas in battle as Indra the wielder of vajra does the asurs: yet he lies dead on the ground like a tree struck down by the wind. b. I see no bound to the ocean of my grief, the oxese of sorrow prompts me to die. I do not believe in the death of Karan ond the conquest of Arion, Sarely my heart is hard like vajra as it does not break in hearing the news of Karan's death Fie on my living without friends as I have fallen down very! 10. A fool and distressed, I am worthy of pity by all men. Bai respected by all the world, how shall I be able to live any longer a lifo of contempt Already suffering Sortor at the death of Blist - (६४१) कर्णपर्व Karan Parv [6241 ] ग्यसन प्राप्तवानस्मि सम्प । १२ ।। भीष्मद्रोणवधेनैव कर्णस्य च महात्मनः । नात्र शेष प्रपश्यामि सूतपुते युधि ।।१३ . स हि पारं महानासीत् पुत्राणां मम सञ्जय । युद्ध विनिहतः गरी विसजन सायकान् बहून् को हि मे जीविते नाथस्तमृते | पुरुषर्षभम् ॥१४॥ रथादाधिराथन न्यपतत्कायकातिापर्षतत्येशिखरं घजाताद्वि दारितम् ॥१५॥ स शेत पृथिवीं नूनं शोभयधिरोक्षितः । मातङ्ग इव मतेन द्विपेन्द्रेण निपातितः॥ १६ ॥ यदल धाराष्ट्राणां पाण्डवानां यतो मपम् । सोर्जुनन हतः कर्णः प्रतिमान धनुष्मताम ॥ १७ ॥ स हि धोरी महेष्वासो मित्राणां मे भयङ्करः । शेते विनि तो धीरो देवेन्द्रेण याचलः ॥ १८॥ पंगारिवाध्वगमनं दरिद्रस्येव काभितम् । दुर्यो धनस्य चाकूतं तृषितस्येध विनुवः ॥ १९ ॥ अन्यथा चिन्तित कार्यमन्यथा तर द्रोणाचार्य के मरण से उत्पन्न होनेवाले शोक से महा दुःखदायी मापत्तिको पायाहै । १२ । युद्ध में कर्ण के मानेपर भीष्म द्रोणाचार्य और महात्मा कर्ण के मरने से मैं शेष बचीहुई सेनाको नहीं देखताहूं । १३ । क्योंकि वह शूरवीर कर्ण मेरे पुत्रोंको युद्धरूपी नदी मैं नौकारूप होकर वारोंकी लड़ाई में अनेक शायकों को वरसाताहुआ मारागया ।१४। उस पुरुषोत्तमके विना मेरा जीवन स्था है निश्चय करके शायकों से पीटित होकर अतिरथी कर्ण रथसे ऐसे गिर पड़ा जैसे कि वज्रके पातले पर्वतका टूटाहुआ शिखर पृथ्वीपर गिरता है । १५ । निश्चय करके यह रुधिर में भरा हुआ पृथ्वीको शोभित करके ऐसा सोता है जैसे कि मतवाले हाथी से गिराहुआ हाथी होता है यही धृतराष्ट्र के पुत्रका बलया जिस से कि पांडवों को बड़ा भयथा वह धनुपधारियों का ध्वजारूप कर्ण अर्जुन के हाथ से मारागया । १७ । हाय वह धनुपधारी मित्रों का निर्भय करनेवाला वीर कर्ण मराहुमा ऐसा सोताहै जैसे कि देवताओं के इन्द्रका पात किया हुआ पर्बत होता है । १८ । जैसे कि पंगु मनुष्यका मार्ग चलना और कंगाल निर्द्धनकी धनकी इच्छा करना थाहै इसीप्रकार दुर्योधन के मनकी इच्छा कठिनतासे माप्तहोने के योग्यहै । १९ । सोचा कुछ जाता है होता कुछ है देव और काल उल्लंघनके and Drona, I am fallen into fresh trouble. I believe that the rest of the warriors cannot live when Bhishm, Drona and Karan are slain. Brave Karan was like a boat to carry my sons through the ocean of war; but sending forth a shower of urrows, he has been slain. My lile is useless without him. Pierced by arrows he lies down dead like acliff struck down by lightning. 15. Surely, with his blood stained body, he looks glorious in his sleep like an elephant struck down by another. He was the strength of the sons of Dhritrashtra and the terror of the Pandavas, That prince of Warriors has been slain in battle by Arjun. Alasl that great archer, Karan who freed his friends from fear, lies dead on the ground like a cliffstrack down by vajra.
(६२४५) कर्णपर्व Karan Pary 1.6245] मत् कार्मुकं शितः॥४४॥ पथ नागायुतंप्राग परहसमच्युतम । विरयं सहसा कृत्या भीमसनमथाहसत् ॥ ४५ ॥ सहवेच निजित्य शरैः सम्नतपीमः । कृपया विरथे कृत्वा नाहमधर्मचिन्तया ॥४६॥ पथ मायासहमाणि विकुर्वाण जयैषिणम् । घटोत् कवं राक्षसेन्द्र शकशक्त्या निजनियान् ॥ ४७ ॥ एतांध दिवसान यस्य युद्धे भीतो धनजयः । नागमद्वैरथं घी: स कथं निहतो रणे ॥४८॥ रयमद्गो न चेतस्प धनुर्वा मध्यशीर्दीत। न चे दस्राणि निणेशुः स कथं निहतः परैः ॥ ४९ ॥ फो हि शको रणे कर्ण विधुन्यानं महानुः । विमुञ्चन्तं शरान् घोरान् दिव्यान्यस्त्राणि चाहये। जतुं पुर पशाईल शार्दूलमिय गिन।।५०॥ तस्य धनुश्छिन्न रथो वापि महीं गतः । अस्त्राणि पा प्रनष्टानि यथाशंसांस मे हतम् । न हन्यदपि पश्यामि कारणं तस्य नाशने ॥ ५९॥ किपा और श्रीपरशुरामजी से महाघोर ब्रह्मास्त्रको सीखा और जिस महावाहु ने द्रोणाचार्य आदेको मुख मुद्दाहुआ वाणों से पीड़ित देखकर भाभमन्यु के धनुपको अपने तीक्ष्णवाणासे काटा ।४। और जिसमकार दशहजार हाथी के समानवली धनके समान वेगवान् दुराधर्ष भीमसेनको अकस्मात रथसे विस्थकरके १४५। हँसताहुमा गुप्तपन्धीवाले वाणों से सहदेव को विजयकर धर्म मौर कपालुताके ध्यान. से पिरथकरके नहीं मारा । ४६ । जिसने विजपाभिलापी महा मायावी राक्षसोंके राना घटोत्कचको इन्द्रकी शक्ती से मरा॥ ४७ । इतने दिनतक उसने यमपीत अर्जुनने युद्ध में जिसके द्वैस्य संग्रामको प्राप्त नहीं किया वह वीरपुरुष केसे युद्ध मारांगपा ४८ जिनका न रथटूटान धनुपट्टा मोर भत्रोंकामी नाश न हुआ वह कर्ण शत्रुमों के हाथ से कैस मारागया। ४९ । उप्त यड़े धनुपके |चढ़ानेराने घोरवाण और दिव्य अवको युद्धमें छोड़नेवाले सिंहके समान वेग वान पुरुषोत्तम कण के विनय करनेका कौन समर्थ है । ५० । उसका धनुप माश्य हटाया पृथीपर गिरा अथवा शस्त्रों का नाश होगयाथा जिससे कि उसको मराहुभा मुझसे वर्णन करता है उसके नाश होने से मैं अन्य सबको भी नाम पन देखता हूं । ५१ । उसका प्रणथा कि जबतक अर्जुनको नहीं मारलंगा battle, cut down the bow of Abhiinanyu with his arrows, who des. troyed the car of Bhim the possuasor of the strength of ten thousand elephants, who living conquered and made Sahaday deprived of his car, did not slay liim out of mercy, who slew Ghatotkach the poss-1990 of a thousand tricks with the spear of Indra and whom Arjun durst not meet in duel-how was it that he was slain in battle ? 48. How tyas Karan slaia in battle when his car was not broken and his weapons not exhausted? Who could conquer Karan the possessor of huge bow, dreadful.arrows and divine weapons, and full of projřess liks a. lion ?50. Surely his bow broke, or the car was upset or his weapons were exhausted, since you say that he is slain. Others are not safe, Mahabharat [6246:) नाम फाल्गुनं यावत् तावत् पादौ न घाधये । इति यस्य महद्घोरं प्रतमासम्म हात्मनः ॥५२॥ यस्य भीतो यने गिद्रा धर्मराजो युधिष्ठिरा । त्रयोदशसमा निस्पं माल भत् पुरुषर्षभः ॥ ५३॥ यस्य धीर्य्यघतो धीर्य समाश्रित्य महात्मनः । मम पुत्र. समां भार्यो पापडूमा नातवान् पलात् ॥ ५५ ॥ तत्रापि च समामध्ये पाण्डवानाय परपता दासमाति पाञ्चालीममधीत् कुरुसनिधी ॥ ५५ ॥ न सन्ति पतयः कृष्णे सर्षे पार 'तिः समाः । उपतिष्ठस्थ मत्तीरमनपं पा घरधर्णिनी ॥ ५६ ॥ इत्येवं य पुमान पायो रुक्षाः सथायवा समायां सूतजः कृष्णां स कयं निहतः परः॥ ५७ । यध गांडप मुकानां स्पर्शमुग्रमस्तियन् । अपतिसि कृष्णेति शुधन पार्यानवेक्षतं ॥ ५८ ॥ यस्य नासीद्भय पाथैः सपत्रः सजनाईनैः । तस्य गाहं बचं मन्ये देवेरपिसवासरः ॥ ५९ । प्रतीपमभिधादिः किं पनस्तात् पाण्डवैः ॥ ६० ॥ म हि ज्यां संस्पृशानस्य तलने तबतक नतो अपने चरणों को धाऊंगा न युद्धमें पैदलहोकर चलूंगा जिसमहात्मा का यह महाघोर प्रणया । ५२ । कि जिसके भयसे भयभीत धर्मराज पुरुषोत्तम युधिष्ठिर ने यनमें तेरहवर्षतक निद्रा नहीं आई। ५३ । जित पराक्रमी महात्माके पराक्रम में मेरेपुत्रने भायलेकर पटियों की स्त्री द्रौपदी को बड़े घससे सभाम युलाया। ५४ । वहाभा'सभाके मध्य में पांडवोंके देखते हुये कौरवों के सम्मुख द्रौपदी से बोला हे दासकी भार्या कृष्ण तेरे पति नहीं हैं किन्तु सबके सब पंड | तिल अर्थात् थोथे तिलके समान हैं है: सुन्दरी नू दूसरेपति के पास वर्तमानहो । ५६ । जिस कर्णने सभाके मध्य में ऐसे असम्प, और कख दुर्वचन द्रौपदी से | कहे वह शत्रुओंके हायसे कसे मारागपा ५ जिसनें गांडीव धनुपसे छूटेहुये वाणों के उदगस्पेशकी चिन्तारहित द्रौपदी से यहकहतहुये कि हेकृष्णा तू विनापतिकी है जित कर्ण ने पांडवों को देखा और अपने भुजाका आथयलेकर जिसको श्रीकृष्णा समेत सश्त्र पांडवों से जराभी भयनहींहुआ हे संजय उसका मारना देवताओं समेत इन्द्रसेमी कठिनथा। ५९ । हे तात उसको सम्मुख दौड़नेवाले पाण्डव लोग कैस मारसक्ते हैं । ६० । धनुपज्याके स्पर्श करनेवाले अथवा हस्तत्राणाकेद्वारा पकड़नेवाले when he is dead. He had made a dreadful vos that he would not wash his feet without sluying Arjun. Yudhisthic the just could not sleep soundly for thirteen years, Relying on his strength, say son had dragged Draupadia the wife to the Pandavas, in the court, and in the prosence of the Pandaves, he bad said, "Krishna, thou art the wife of slaves.. Thy husbando sre no more. They are like husks of seeda. Thou must select another husband. How was Karan, who said such harsh and impolite words, blain by the enemies? Karan who was not in the least afraid of the arrows shot tromtbe Gandiv bor, who told Krishna that her husbands were no more, Trbo lvolied trapletaly upon Shri Krishn and the Pauda vas and their sons, Tas dificnis the slain egen by gods; how could the Pandavas slay him!. 60.
- कवर्ष Karan Pary [0247] चापि गृहनतः । पुमानाधरयः स्थातुं कश्चित् प्रमुखताहति ॥ ६१॥ भाग स्थान्मेदिनी हामा सोमसूर्यमांशुभिः । न धधः पुरुषेन्द्रस्य संयुगेवपलायिनः ॥ १२ ॥ येन मन्दः सायन मात्रा दुःशासनेन च । वासुदेषस्य दुद्धिः प्रत्याख्यानमरोचन ॥ १३ ॥स भूगपभम्कन्धकर्ण रष्ट्या निपातितम् । दुशासन निहतं मापे शोधति पुभका ॥६४॥ हतं फर्सन रष्ट्या रथे मय्यसाचिना । अयः पाण्यांधापि स्पिदुर्यो धनोषीत् ॥ १५॥ दुर्ग इतरष्ट्या वृषसेमा संयुगे। प्रमगमश्च पल रष्ट्या बापमानं महाधिः ॥ ६६ परीमुखांश यस्तु पलायनपरोपणानं । पितान रथिनो एटुवा मध्ये शोधति पुत्रकः ॥ ६ ॥ भनेपाभिमानी घ दुयुधिरजिष्ट्रयः । हतोत्साई पलं स्ट्या किंस्थिदुर्योधनोप्रधीत् ॥ ६८ ॥ स्पं घेरं महत् इत्या पायं माण: माणैः । मघने हतसायियः किस्थिर्योधनोग्रवीत् ॥ ६९ ॥ भ्रातरं निहत कोइ धनुषधारी मनुष्य कर्ण के सम्मुख होनेको समर्थ नहीं हैं।६ १॥ पृथ्वी चन्द्र और मूर्य चाडो भपनी किरणों से रहितहोजाय परन्तु युद्ध में पुख न मोड़ने बॉस पुरुषोत्तमका मरण नही है । ६२ । जिसके कारण मारन्धहीन दुर्बुद्धी दुर्योधनने सदैव भाई दुशासन समेत यासुदेवजी के उत्तरहीको अंगीकार नहीं किया ६३। मैं यह जानताएं कि पह मेरा पुत्र दुर्योधन बड़े दोषयुक्त कर्णको पराजप और दुशासनको मराहुआ देखकर सोचको करताहै । ६४ । हे संजय रथ युद्ध में अर्जुन के हायसे कर्णको मराहुभा मुनकर और विजय करनेवाले पाएटवों को देखकर दुर्योधन ने क्या कहा ६५। वा दुर्मर्पण और पसेनको युद्धमें मृतकदेखकर और अपनी सेनाको महारथियोंसे घायल होकर भागतीहुई देखकर और भागनेकी इच्छावान मुखमोईनवाले राजाओं और रथियों को घायल देखकर शोचकरता है। ६० । अथवा दुर्योधन ने उस शासना के अयोग्यपालायमान इन्द्रियों वर्शभूत | सेना को उत्साह से रहित देखकर क्या कहा ६८और मिनकवंत मनुष्य मारेगये उन राजाभों से घिरेहुये भाप शत्रुता करनेवाले दुर्योधनने क्याकहा । ६९ । और युद्ध में रुधिर पानेवाले भीमसेनकेहाथेस मोहुये भाईदश्शासन को देखकर क्याका archer could opposa Karan, so long as he liad grasp of the boretriage and bad band-guards on his hands. The earthis the moon and the Bun might lose their splendour, bat none could slay upflnching Karan ia battie. Unlucky and unwise Duryodhnn with his brother Dusha. hany, rolying upon the prowess of Karaa, paid no hoal to the adrios of Krislin, 83eing Karan's fall and Dushavan's death, og son, fool. ish Duryodlian is no doubt plunged in grief. What did. Duryodhan kay at the full of Korea and the victory of all the Paodevar! 65, la be sorry for the death of Darmarshan and Vrishdsen, his Farriors of the army wounded and fying, the princely warriga tnrning back and wounded! What did Naryodban say when he sag bis armies rout [24] Mahabharat नसम्म फाल्गुनं याषत् तावत् पादौ न घावये । इति यस्य महघोरं व्रतमासम्म हात्मनः ॥ ५२५ यस्य मीतो पने निद्रा धर्मराजो युधिष्ठिरः । प्रयोदशसमा नित्यं माल मत पुरुषर्षभः ॥ ५३ ६ यस्य धीर्य्यवतो वीर्य समाश्रित्य महात्मनः । मम पुत्र. समा भाग्यी पाण्डमां नीतवान् घलांत् ॥ ५४ ॥ तत्रापि च सभामध्ये पाण्डपानार पश्यता दासमायेति पाञ्चालीमन्नधीत् कुरुसन्निधौ ॥ ५५ ॥ न सन्ति पतयः कृष्णे सर्वे पर तिलैः समाः । उपतिष्ठस्य भतारमन्यं पा घरधर्णिनी ॥ ५६ ॥ इत्येव य पुमान पायो रक्षाः संधाया। समायां मराजः कृष्णां स कथं निहतः प॥५७ ॥ य गांड मुकाना स्पर्शमुग्रमर्षितपन् । अपतिसि कृष्णेति शुधन पार्थानवैक्षतं ॥ ५८ ॥ यस्य मासीद्भय पाधः सपुत्रैः समनाईनैः । तस्य गाहं बधं प्रन्ये देवैरपि सवासयैः ॥ ५९॥ प्रतीपमभिधाद्भिः किं पनस्तात् पाण्डवैः । ६. ॥ म हि ज्यां संस्पृशानस्य तलने तबतक नतो अपने चरणों को धाऊंगा न युद्धमें पैदलहोकर चलूंगा. जिसमहात्मा का यह महाघोर प्रणया । ५२ । कि जिसके भयसे भयभीत धर्मराज पुरुषोत्तम | यधिष्ठिर ने यनमें तेरहवर्पतक निद्रा नहीं आई। ५ । जिस पराक्रमी महात्माके पराक्रम में मेरे पुनने भाश्रयलेकर पांडवों की स्त्री द्रौपदी को बड़े पलसे समामें युलाया । ५४ । वहाभा'सभाके मध्य में पांडवोंके देखते हुये कौरवों के सम्मुख द्रौपदी से यौला हे दासकी भार्या कृष्ण तेरे पति नहीं है किन्तु सबके सब पंड तिल अर्थात् थोथै तिलके समान हैं है: मुन्दरी तू दूसरेपति के पास वर्तमानहो । ५६ । जिस कर्णने सभाके मध्य में ऐसे असम्प, और रूखे दुर्वचन द्रौपदी से कहे वह शत्रुओंके हायप्ते कैसे मारागया ५ शजिसने गांडीव धनुपसे छूटेहुये वाहों के उदगस्पेशकी चिन्तारहित द्रौपदी से यहकहतहुये कि हेकृष्णा तू विनापतिकी है जित कर्ण ने पांडवों को देखा और अपने मुजाका आधयलेकर जिसको श्रीकृष्णा | समंत सश्त्र पांडवों से जराभी भयनहींहुआ हे संजय उसका मारना देवताओं समेत इन्द्रसेभी कठिनथा । ५९ । हे तात उसको सम्मुख दौड़नेवाले पाण्डव लोग कैस |मारंसक्ते हैं । ६० । धनुषज्पाके स्पर्श करनेवाले अथवा हस्तवाणकद्वारा पकड़नेवाले when he is dead. He had made a dreadfnl vosy that.be would not wash bis feat without slaying Arjun Yudhisthir the just could not sleep Boundly for thirteen years, Relying on his strength, my son had! dragged Draupadi, the wife to the Paada yas, in the court, and in the presence of the Pandavas, he had said, "Krishna, thou art the wife of slaves.. Thy husbands are no more. They we like husks of seeds. Thou must select another husband. How was Karan, who said such harsh arid impolite words, slain by the enemies? Karan who was not in the least afraid of the arrows shot trom the Gandiv, bor, who told Krishna that her husbands were no more, who luokód .narlegely upon Shri Krishn and the Paudavas and their sous, Tas difficult to ha lain even by gode; how muld the Pandavat slay him!.60. No - । ६२५७। **178 Kuran Pary [6247] चापि गृहनतः । पुमानाघरथः स्थातुं कश्चित् प्रमुखताहीत ॥ ११॥ आप स्थान्मेदिनी हामा सोममयमांशुभिः । न वधः पुरुषेन्द्रस्य संयुगेवपलायिनः ।। ६२ ।। येन मन्द समान मात्रा दुःशासनेन च । वासुदेषस्य दुशिः प्रायास्पानमरोचन ॥ १३ ॥ ननं मा कर्णधा निपातितम् । दुःशाप्तमच निहतं मम्ये शोचति पुभकः ॥६५॥ हतं धेफर्सन रष्ट्या द्वैरपे मम्यसाचिता । अयतः पाण्डपश्चिापि किषि दुर्यो धनोप्रवीत् ॥ ६५॥ दुर्गपणे त हष्ट्या वृषसेमा संयुगे। प्रमग्मच यर्स दवा बापमान महारथैः ॥ ६६ ॥ परीमुखांध राक्षस्तु पलायनपरायणान् । विद्युतान् रथिनो एट्वा मम्ये शोधति पत्रकः ॥ ६५ ॥ अनेयामिमानी युधिराजितष्ट्रियः । हतोत्साई पलं स्ट्या किरिषदुर्योधनावधीत् ॥ १८ ॥ स्पषं बैरं महत या पायं माण: मणः। प्रथने हतमाथिष्टः किस्वियोधनोग्रवीत् ॥ ६९ ॥ भ्रातर निहत कोड धनुषधारी मनुष्य कर्ण के सम्मुख होनेको समर्थ नहीं हैं।६१॥ पृथ्वी चन्द्र भौर भूर्य चाही अपनी किरणों से रहितहोजाय परन्तु युद्धमें मुख न मोड़ने बॉस पुरुषोत्तमका मरण नहीं है । ६२ । जिप्तके कारण भारब्धहीन दुईदी दुर्योधनने सदैव भाई दुश्शासन समेत यासुदेवजी के उत्तरहीको अंगीकार नहीं किया ६३॥ मैं यह जानता कि यह मेरा पुत्र दुर्योधन बड़े दोपयुक्त कर्णको पराजय और 'दुश्शासनको मराहुभा देखकर सोचको करसाहै । ६४ । हे संजय रथ युद्ध में अर्जुन के हाथसे कर्णको मराहुआ मुनकर और विजय. करनेवाले पाएटयों को देखकर दुर्योधनने क्या कहा ६५० वा दुर्मर्पण भौर पसेनको युद्धमें मृतकदेखकर और अपनी सेनाको महारथियोंसे घायल होकर भागतीहुई देखकर और भागनेकी इच्छावान मुखमोईनवाले राजाओं और रथियों को घायल देखकर शोधकरता है। 5. । प्रथा दुर्योधन ने उस शासना के अयोग्यपालायमान इन्द्रियों वशीभूत सेना को उत्साह से रहित देखकर क्या कहां ६८और मिनकैवंहुत मनुष्य मारेगये उन रागानों से घिरेहुये भाप शत्रुता करनेवाले दुर्योधनने क्याकहा । ६९ । और पुद्ध में रुधिर पानेवाले भीमसेनकेहाथेस मोहुपे भाईदरशासन को देखकर क्याकहा archer could opposo Karan, 80 long as he liad grasp of the borstring Bod bed band.guards on bis hands. The earth, the moon and the Sun might losa thoir splendour, but aone could slay upfinching Karan in battlo. Unlucky and unwise Duryodhan with his brother Dusla- Ban, relying on the provess of Karad, paid no hoxl to tho adrice of Krislin. Being Karan's fall and Dushasaa's death, my son, fool. ish Daiyodlian is no doubt plunged in grief. What did: Duryodhan Ray at the fall of Karan and the victory of all the Pandavas! 65.18 he sorry for the death of Darmarshan and Vrishasen, his marriors of the army wounded and dying, the princely rartions torning back and wounded! What did Duryodhan say when he saw his armies rout- 1 16248 ] Mahabharat (६२५८) दृष्ट्यामीमसेनेन संयुगारुधिरे.पीयमानेच फिस्विधनोनीत्॥७.सहगान्धार राजेन समायो पदभाषत । कर्णार्जुनं रणे हन्ता हते तस्मिन् किमब्रवीत्। एतं कृत्या पुरा हरो पञ्चपित्याथ पाण्डम् । शकुनिः सौबलतात होकण फिमवयीत् ॥ ७२५ कृतवर्मा महंग्यासः सात्वतानां महारथः। हतं कर्सन हटना हार्दिषयः किमभापत ॥७३५ प्राणाः क्षत्रिया घेन्या यस्य शिक्षामुपासते । धनुदै चिफर्पिन्तो द्रोणपुत्रस्य धीमतः ॥ ७॥ युवा रूपेण सम्पन्नो दर्शनीयो महायशाः। अश्वत्थामा हते कणे किम भापत सञ्जय ।। ७५६ आचार्यों को धनुर्द गौतमोरयसत्तमः । कृषः शारद्वतस्तान इते फर्णे किमनधीत् ॥७६॥ मद्रराजो गहेप्यासः शल्यः समितिशोमनः । हष्ट्वा श्रिीन इतं फर्ण सारथ्ये रथिनांवरः ॥ ७७ ॥ फिमभापत साचीरो मद्राणामधिपो पली! ट्या विनिहतं सर्वे योधा पा रणदुर्जयाः ॥ ७८ ॥ ये व केचन राजानः पृधिव्यो। ७० । और सभा में जो रामागाधारके सम्मुख कहाया कि कर्ण युद्ध में अर्जुन को अवश्य मारेगा उस कणके मरनेपर क्या कहा । ७१ ! पूर्वसमयमें सौवनके | पुत्र शकुनीने धूतरचकर पाण्डवोंको ठगकर कर्णके मरनेपरक्या कहा ७२॥ पादवों में महारथी हार्दिक्यकेपुत्र बड़े धनुषधारी कृतवर्माने कर्णको मृतक देखकर क्या कहा।७३। क्षत्रिय वैश्य धनुर्वेद के जानने के आकांक्षी जिस युदिमान अपत्यामा की शिक्षाको प्राप्त करते हैं उस बड़े प्रापी यशस्वी तरुण वपाले धनुर्धारी अश्य स्थामा ने कर्ण के मरनेपर क्या का । ७५ । जो गौतमकेयुत्र महाधनुरी धनु बिंद के प्राचार्य कृपाचार्य हैं हे तात उन्होंने कर्ण के मरनेपर क्या कहा । ७६ । मार राधियों में श्रेष्ठभद्र देशाधिपति पराक्रमी युदणे शोभायमान राजा शल्यने भरने सारथापने में कर्णको मृतक देखकर श्यामा । ७७ । इनके सिवाय और सब दुराधप धनुपधारी राजाओं ने युद्ध में कर्णको मरा देखकर क्या कहा७४' ed and losing lieart? What did Duryodhan Buy, when he was aur. rounded by kinge without their armio! What did he Bay, Bhin slew Doshast and sipped his bool! 70. What did he say at the fall of Karan who boastel in tho court that, ho ae suro to elny Arjun? What did Shakuni who chonted the Pandavas of their wealth, any nt tho fall of Karan? What did Kritvarma, the prest Yrday warrior, nay at the fall of Karant What did glorious, faraona and youthful Archer Ashwathatni prho teaches archery to firalımadh Kshatryas and Vaishya, kay at tho lall of Karan! 75. What did Krípacharya, tho teacher of archery, kay at the denth of Karan! What did Shalya the king of Jindra, the best of warriors, hay st be death of Kuran? What did the other great warriors, beside theme and the princes who liavo como lo Gult, say at the fall of Karan, Sanjaya! Who became the leaders of the army after tho fall of K . when । कर्णपर्ष Karan Parv (6:493 याधुमागताः कितनं हत इदमा फापमापन्त मजय ॥ ७९ ॥ द्रोणे तु निहते धोरे रयानं नरमे । क पा मुखानीकानामामन् सम्जय मागशः ॥८॥ मगम: कर्य शल्पो नियुक्तो रथिनाम्परः । बैंकसंगत्य साध्य तम्ममाचक्ष संजय ॥ ८१ ॥ करक्षन दक्षिण च मतपत्रस्य युध्यतः : घाम प ररक्ष के घा वारस्य पृष्ठरः ॥८२ ॥ फे पण न जरा फेक्षाः प्रादयंततः। कय यः समेताना ताबा मारयः ।। ८३॥ पाण्याच स्वयं शूराः प्रत्युवायुमहारथाः । एजन्तः शरयर्याणि पारिधारा पायुदाः ॥ १४ ॥ स च सर्पमुयो दिव्यो महेपुप्रयास्तदा। व्यर्थः फर्य समभषत्तन्ममाचक्ष्य सम्जय।। ८५ ॥ मामफस्यास्य सन्यस्प हतोत्सोधस्य सजप । अधशेष न पश्यामि फपुदे भृदिते सति ॥ ८६ ॥ तोहि धोरी महेवासी मद पचाजीपिती। भीमद्रोणोडती शुरल फोन्पा जोषितेन मे .८७ ॥ पुनः पुनर्न मृापामि हा फर्णञ्च पाण्डवैः। यस्य पाहोल तुभ्यं फुजराणां और जो २ सपूवक गमा पहां युद्धकरने को आये उन सीन कर्णको | मराहुआ देखकर कोनरसे अपना संजय ।८९। उस रथियों में श्रेष्ठ नरोत्तमवार कके मरनेपर कौन । सनाके सेनाध्यक्षहुये १८० आर रधियोंमें भेष्ठ मद्रदेश का राम शल्प कर्णके सारथ्य कर्ममें से नियत कियागया यह सप वृत्तान्त मुझसे ब्यारे ममेत वर्णनकरो १८१॥ युद्धकरनेपाले कर्णके दाहिनेरय के चाकी किसने रक्षाकरी और पायें चक्रकी और पृष्ठभागकी किस ने रक्षाकरी। ८२ । किसने कर्ण का संग न छोड़ा और कौनसे नीच भागग और तुम्हारे माग जाने से महारथी कर्ण कैसे मरागया ८॥ और जिसमकार यादसों से मल की धारा गिरती है उसीप्रकार पाणोंकी करते हुये महारथी शूरवीर पापहव | कैसे सन्मुखहुये १८४१ संजय उपयुद्ध में वाणों में श्रेष्ठ कर्णका वहदिव्य याण कैसे | निष्फ हुआ उसको मुझसे कही । ८५ । मधान पुरुपके न होनेसे मैं अपनी शेप पचीहुई सेनाको नहीं देखताएं 1८६ । उन धीर धनुर्धारी मेरेलिये जीवनके त्यागने पाले भीम और द्रोणाचार्यको मृतक देखकर भव मेरा जीवना निरर्यकई १८७ । 80. . Ilow was Shalya the king of Madra appointed to be tho driver of Karant Prey tell me all this in detail. Who protected Karan's car on the right and wlio protected it on the rear? Who stood with and who wore the men that fled away from and thus helped in the deathof Karan.33. How did the Pandavas encounter Karan who sent forth his arrois like a shower of rain. How was the divine artOIY of Karan made futile! Psay tell me all. 85. I think the rest of the army connot bo mfo when tho leader is slaid. Seeing Bhishu and Drona shin for my nahe, I have no durire to live any longer. Re. membring again and again the death of Karaa, I find no peace of mind. He had the strength of ten thousands of elephants. Tell me 162301 Valıblarat (६२५३ शतं शतः ॥४८॥ द्रोण हते घ पकृत काराणां परेः सह ! संप्रामे नराराणा तम्ममा Fष सजय ॥ १९ ॥ यया कर्णध कौन्तेयैः सह युद्धगयोजयन् । यथा पनिषता हन्ता रण शातिदुष्यतामा ९ ॥ गत श्री कर्णपवीण धृतराष्ट्रानुतापे नयमोध्यापा॥ साय उपाय इद्रोण महेपासे तस्मिनहनि भारत । ते र मोपस द्रोणपुरे महारथै घमाणे महाराज कोरपागा बलाणपे गिद्ध पार्यः व सम्यमति दातृभिः सा २॥ समयस्थितमामाय ते भरतपमा वितं स्वरले रएमा कपणम्पपारयम् ॥ ३ ॥ स्वमनीकमस्थार पाहुषार्थमुपाभितः युवा में पारडवों के हापसे परे पे कर्णको पारम्बार स्मरण करके शान्तीको नहींपाताई मिसकी कि भुमाकोंका यस दशहनार हायपों के ममान था 1८८1 मंजप | द्रोणाचार्य के परनपर युद्ध में शत्रुओं के हायसे नरोत्तम कौरवोंका भोगतात हुआ या मुझसकहो ।८९। भौर नसे कर्ण न्तीके पुत्रोंसे युद्ध करने को प्रपत उमा और युदमें नसे मारागया उसको भी ठीक रकहाँ । १० । अध्याय १०॥ मजय बोले रे भरतवंशी महाराज उग पड़े दिन धनुरि छोणाचार्य मरने मार मारथी अनशस्यामा के निष्फल संकल्प करने और कौरवासी समती सेनाके भागनेपर अर्जुन अपनी सेनाको पहितकरके भाइयोसमेत युद्धमै नियतमा २I उस समय मापके पुत्र ने उस सम्मत निपत होनेवाले भर्नुनको मानकर अपनी भागीदुई सेनाको मागसेरोका और अपने O Sanjaya, what was the state of the Kauravas aflet tlic death of Dronn and how Karan was randy to fight against tho sons of Kunt! rad met die death. Prago tell no a}} this csactly as it happenal," 90. CILAPTERX Sanjaya .5:1), "At the death of Drona that day, tho ſatility of Arhnatharna's reapon and herous of the owran like army Mtha Kaurtrar, Arjun formathu nrrian inst array and storetrith hir brothers in the field Then your risting Arjun ready nicht, rhackel hin Atay from rtionis ***, tad lighting Land fight with forgå Karan l'arv ६.6251] मुचिरं कालं पाण्डवैः सह भारत ॥ ५ ॥ लब्धलक्ष्यः परेष्टव्यांपच्छद्भिधिरं तदा। समयाका समासाद्य प्रत्याहारमकारयत् ॥ ५॥ फरयापहार सैन्यानां प्रविश्य शिविर स्थकम् । कुरवः स्वहित मन्त्रं मम्प्रयापकिरे मियः ॥ ६॥ पर्यन्मु परामप स्पर तरणवरमध। परासनेषपविष्टाः मुखशय्यास्थिधामराः ॥ ७॥ ततो दोधनो राजा साम्ना परमबल्गुना । तानामाण्य महेवासान् प्राप्तकालमभाषत ८॥श्योधन उवाच । मतं मतिमा श्रेष्ठाः सधै प्रवन माचिरम् । एष गते तु किं कार्य किशकार्यतरं नुपा ॥ ९ ॥ सञ्जय उपाच । एयमुक्त नरोद्रेण नरसिंहायुयुएसयः । चत्रुनानाविधा घेष्टाः सिंहासनगतास्तदा ॥ ॥ तेषां निशम्ये शितानि युदे प्राणान् जषताम् । समुद्रीप मुख रामो यामार्फसमयसम् ॥ ११ ॥ भाचार्य भुजबल से सनाको राककर पाडवों के साथ विलम्वतक युद्ध कर के । ४ संध्यासमय जानकर विजयी और बिलम्बात विचारनेवाले शत्रुभासमेत अपनी सेनाको विश्राम कराया ।५। सनाके विश्रापको कर अपने देरे में पहुँच कर कौरवों ने परस्परकी निर्विघ्नता का विचार किया ।६। यहुमूल्य आस्तर्ण वा शय्या भौर आसनों पर पेठेहुये उन लोगों ने ऐसे सलाहकरी जैसे कि देवता | लोग सुखशय्यामों पर बैठे हुये सलाहों को करतेहैं । इसके पीछे राजादुर्योधन प्यार और मृदुभापणसे उन धनुषधारियों के सुम्सखहोकरसमयके अनुसार इन बचनों को बोला । ८. कि हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ म सब अपनी राय शीघ्रता | से कहौ विलम्ब मतकरो हे राजालागों ऐसी दशा में क्या करना उचित है और कौनसी बात अवश्यकरने के योग्यहै ।९। संजयनेकहा कि इसप्रकार महा राज दुर्योधन के कहने पर सिंहासनों पर बर्तमान युद्धाभिलाषी नरोत्तमों ने भनेक प्रकारकी चेष्टानों को किया ।१० युद्ध में प्राणों के होमकरने के अभि सापी उन लोगोंकी चेष्टाभोंकों देखकर और बालमूर्य के समान तेजस्वी राजा के स्वरूपको देखकर शास्त्रों के ज्ञाता वाद्ध के स्वामी बा लापके जानने वाले अस्वत्थामाजी ने कहनामारंभकिया स्वामीकी भक्ति भौर दंशकालका पहिचानना और पल था नीति से प्रयोजन की सिद्ध करने वाले उपाय the Pandavas, for a long time, the ordered aia army to take rest to. wards the evening and went to his camp to consult with the Kauravas. 9. Saated on valuable seats, they consulted together like gode. Prince Duryodhan kindly and affectionately addressed the Brchers, saying, "Give your opinions, princes, without delay. What is to be done under the circumstances !" Sunjaya continued that being thus addressed by Prince Duryodhan, the warriors, desirous of fighting, made movements of various sorts, 10. Seeiug the attitudes of those warriors, who were ready to lay down their lives, and seeing the king glorious like the morning sud, Asliwathana the wise speaker HAAR (6252] Alahabharat ६२५९) पुत्री मेधारी पाक्यको पाफ्यमादर्द । रागो योगतथा दा नपत्यवसा घफा' । उपायाः पण्डितः प्रोक्तास्ते तु देवमुपाश्रिताः ।। १२ । लोकप्रयारा येस्माकं देवकल्पा महारथाः । नतिमन्तस्तथा युक्ता दक्षा. रक्ताय ते, हताः ॥ १३ ॥ न षेध कार्य नैराश्मस्माभिविजयं प्रति ।मुनीतैरिह सर्वाधिदेवमप्यनुलोम्यते ॥ १४॥ ते पयं प्रधर नणां सगुणयुतम् । कर्णमेघाभिषेक्ष्यामः सैन्यापायेन भारत ॥ १५ ।। कर्ण सना पति कृत्वा प्रमधिष्यामहं रिपन : एपो हातिदलः शरः कृतास्रो युद्धदुर्मदः । षस्थत इघासः सक्तो जंतु रणे रिपून् ॥ १६ । एतदाचार्य्यतनयात् शत्या गजलधारमा । आशाच महत्तीचके कर्ण प्रघि सधै तदा ॥ १७॥इते भीष्मेव द्रोणे च कर्णापति पाण्यान् । तामाशा हृदये कृत्वा समाश्वास्य च भारत ॥ १८॥ ततो दुर्योधनः प्रीत प्रियं श्रुत्वास्य तद्वचः । प्रतिसत्कारसंयुक्तं तध्यमात्महितं शुभम् ॥ १९ ॥ व मनः पण्डितों ने कहे है वह उपाय दैवके माधीन है । १२ । हमारे जो महारथी बार देवताओं के समान नीतिमान भक्तिमान और सावधनता में योग्यथे वा तो मारेगये ।१३। परन्तु हमलोगोंको विजय से निराश होना भी न चाहिये इस लोक में अच्छ। रीति से कियेहुये नीत प्रादि सब अत्यों से देव भी अनकुल किया जाता है ।१४ हेराजा यह लोग हम सबों में अत्यन्त श्रेष्ठ गुणों से भरेहुये कर्णकोही सेनापति के अधिकार पर अभिषेक करावेंगे ।१५। भारै कर्ण को सेनापतिकरके पत्रुभों को मारेंगे निश्चय करके यह बड़ा पराक्रमी शूरवीर भखम युद्ध में दुर्मद यमराज के समान असह्य लड़ाई में शत्रुओं के विजय करनेको इन्द्रकेही समान है ।१६। हे राजा अश्वत्थामाकं इस वचनको सुनकर आपके पुत्रने कर्णमें यह घड़ा भरोसा किया ॥१७॥ कि भीम औरद्रोणाचार्य के मरनेपर यही पाडवोंकी पागा इसमाशा को हृदय में धारण करके बड़ा विधासयुक्त होकर । १८ । प्रसन्नचित्त दुर्योधन उस प्रीति सरकारसे युक्त मियतम अपनी एद्धि करनेवाले वचनको मुनकर ।१९। अपने मनको अच्छी तिसे हड़करके said, "Wise men havo pointed out the ways of faithfulness towards rnnáters, knowing of time of place and sucess in enterpriscs by strength and policy; but these all depend upon Destiny. Our great warriors who were faithful, careful and masters of policy like gods, are all slain, but wo should not despair of victory. Even Destiny can, bo propitated by acts done in a proper manuer. Thoso warriors were full of good qualities. Let us instal Karan on the past of the commander of armics. With Karan. *"' our leader, wo shall slay our enemics. Surely this great warrior, 'n docontrollable like Yam, and liko lodra in conquering foes"Havide head Ashwatbama's words, your son looked up to Karn to be able to slay the Pasdarag nſter the Bhishim and Drona. With this lhopa fim in his mindi, Duryodhan, pleased, N [६२५३ कर्णपर्य Karan Pary [6253] समवस्थाप्प पाहुवीयमुपाश्रितः। दुय्योधनो महाराज राधेयमिदमब्रवीत् ॥ २० ॥ कर्ण जानामि मे वीर्य साहदंच परं मयि । तथापि त्यो माषाहो प्रवक्ष्यादित पः ॥ २१ ॥ भीष्म द्रोणापतिरया हतौ सेनापतीमम । सेनापतिर्भधामस्तु तयां प्रषिणषचरः ॥२२॥'ची हि ती महंग्यासौ सोपेक्षौ च धनम्नये । मनितो व मया पीरी राधेय पचनात्तष ॥ २३॥ पितामदुखं संप्रेक्ष्य पाण्डुपुत्रा महारणे । रक्षितास्तात भीमेण दिवसानि दशेष ॥ २४ ॥ न्यस्तशले च भवति तो भीम प्रतापवान् । शिखण्डिनं पुरस्कृत्य फाल्गुनन महारये ॥२५॥ हते तस्मिन् महेपासे शरतल्पगते तदा रपया पुरुषव्याघ्र द्रोणो शासीत् पुरःसरा ॥२६॥ तेनापि रक्षिताः पार्थो: शिष्यवा दिति मे मति । सवापि विहतो पयोधृष्टद्युम्नेन सत्परम् ॥ २७ ॥ निहताश्यां मधा अपनी भुनामों के बल में रक्षितहोकर कर्ण से यह वचन वोला । २०1कि हे कर्ण मैं तेरे पराक्रम को और अपने ऊपर जो तेरी मीत है उसको अच्छी रीति से मानता हूं हे महाबाहो मैंभा तुमसे सुन्दर फलयुक्त वचनकहूंगा। २१ । मेरेसेनापति | भतिरपी भीम और द्रोणाचार्य मारेगये उनसभी अधिक भाप पराक्रमी होकर | सेनापति हनिये । २२ । वह दोनों वृद्ध महा धनुपधारी भर्जुन से मेलरखते ये हे कर्ण मैंने तेरेकहने से दोनों की बड़ीमतिछा करीथी । २५ । हेतात भीमजी ने अपनेको वावा समझकर बड़ेगद्ध में दशों दिनतक पांडवोंकी रसाकरीः । २४ । आपके शस्त्ररहित होने पर शिखण्डी को आगेकरके अर्जुन के हाथ से भीष्म- पितामह मारेगये २५ पुरुपोचम उस पुरुष सिंह के मरने और शरसय्यापर वि. राजमान होनेपर तेरेकहने से द्रोणाचार्य संग्राम में सन्मुख हुपे २६ उन्होंने भी अपना शिप्प जानकर पांडवों की रक्षाकरी वह वृद्धभी शीघ्रताही धुम्न के हायसे मारेगये । २७ । इन दोनों प्रधान पुरुषोंके मरनेसे चिन्ता युक्त होकर to hear the predictions of his success, made a firma resolve and Prelying on the strength of his arus, thus addressed :Karan, (20) "I know well your pruwöss in battle as well as the love you bear towards me, O Karan. I give you my blessings, brave man. You will do greater deeds of prowess than those of valiant Bhishma and Drona, who have been alain. Tho two old warriors were friendly towards Arjun, although, by your advice, I treated them with grent respect. Being the grandfather of the Pandavas, Bhishman protected them during the ten days of bis tenure, and because you desisted from fighting. Arjun Ied by Shikhandi, succeeded in alaying him, 25. At the fall of that lion on the bed of arrows, I appointed Drena in his place by your advice. Hè spared the Pandaras, because they were his pupils and was soon killed by Mahalharrt . [6254 ] नाश्यां ताभ्याममितविक्रमम् । त्यसमं समरे दोघ नान्यं पश्यामि चिन्तयन् ॥ २८ ॥ भवानेवाध नः शक्तो विजयाय न संशयः । पूर्व मध्ये च पश्चाच्च नथैव विहित दितम् । २९ ॥ स भवान् धुर्यवत् संख्ये धरमुद्रोहमहतिः । अभिषेचय सेनान्ये स्वंय मात्मानमात्मना ॥ ३०॥ देवतानां यथा स्कन्दः सेनानीः प्रभरत्ययः । तथा भवानिर्मा सेनां धातराम विभन्दै ॥ ३१ ॥ जहि शनुगणान्सर्वान् महन्द्रा दानवानि ॥ ३२ ॥ अवस्थितं रणे या पाण्डवास्त्वां महारथाः । दविष्यन्ति च चाला विष्णु दृष्ट्येघ दानयाः ॥ ३४ ॥ तस्मात्य पुरुपव्याव: प्रकर्पता महाचमूम् ॥ ३५ " भयत्य यस्थिते यत्ते पाण्डवा मन्दचंतसः द्रधिप्पन्ति सहामात्या पाञ्चाखाः सजयाश्च । ॥ ३६॥ यथा म्युदिता मूर्यः प्रतपर स्पेन तेजसा । व्यपोहति तमस्तो तथा शत्रून् प्रतापय२७॥ सज्जय उवाच । भाशा पलयती राजन् पुत्रस्प तथा याभ मैं तुझबड़े पराममी के समान किसी शूरवीरको नहीं देखताई । २८ । हमलोगों के वीचमें आपही श्रादि मध्य और अन्त में विजय करनेको समर्थहो और जिसरीति आपने सदैव मेरा हित किया है । २९ । उसीमकार भाप वैलके समान धुरके उठाने के योग्यही मैं आपको सेनापति के अधिकारपर अभिषेक करूंगा। ३० । जैसेकि देिवताओं के सेनापति प्रभु अविनाशी स्वामिकार्तिक जी हैं उसीप्रकार प्राप मेरी | सेनाकी रक्षाकरो । ३१ । जैसे कि महाइन्द्र युद्धमें दानवों को मारता है । ३२ । उसीमकार आपभी हमारे शत्रुओंको मारिये तुमको सम्मुख देखकर महारथी पांडव और पांचाललोग ऐसे युद्ध में से भागेंगे जैसे कि विप्नी को देखकर दानव भागते हैं इसहेतुसे हे पुरुषोत्तम तुम इस बड़ी सेनाको अपनी रक्षा में करो । १५ । आपको युद्धमें उपाय करताहुभा देखकर मंत्रियों समेत पांडव मुंजय औरपांचाल देशी यह सब भागेंगे । ३६ । जैसे उदयहुआ मूर्य अपने तेजसे तपातामा महाघोर अन्धकारको विध्वंश करता है उसीमकार तुमभी शत्रुओंको तपाओ ।३७ । । Darishtadyuwn, Sorrowing for the death of those two grand meo, 'I see no warrior to be your equa), Whether in the beginning or middle or end, you alove are capable of conquering the enemy. You have always been my well wisher and are capable of bearing the burden like an ox; I shall appoint you as the commander of ing armies. 30. Like immortal lord Kartik the leader of gods, you will protect my Army. You will slay my enemies as Indra does the danayas, The Panchals and the Pandavas shall run away from your presence as the Danayas do from Vishnu. Take the hugo army in your protection. 35. The Pandavas with the Srinjayas and Panchals will scawper away from your presence, You will scorch and rout the ene mies as the Sun dispels darkness by his light.n' Sanjaya continued, .
कर्णपक्ष Karan Parat [6255] पत् । हो भीष्मे द्रोपच की अप्यति पाण्डवान्॥३८तामाशा हरये करया फर्णमय तदानयात् । सतपनन ते पार्थः स्थिावान संपुयुत्सति ॥ ३१ ॥ कर्ण उवाच । उक्त भेतन्मया पूर्व गान्धारे तय सन्निधा। जेष्यामि पाण्डपावसान सपत्रान् सजनाईनान् सनापतिर्मविष्यामि तपाई नाशसंशप: स्थितो भच महाराज नितान् चिनिच पाण्डवान् ॥ ११ ॥ सम्जय उवाच । परमुक्त्यो महाराज तो दुर्योधनो नृपः। उत्तस्थी राजमिः साई देवैरिव शतक्रतुः । सेनापत्थेन सत्फ पप स्पादिमिधामराः ॥४२॥ ततोभिपिपिनु. फर्ण विधिरेन कर्मणा । दुर्योधनमुसा राजन् गजानो पिज येषिणः ॥ ४३ ॥ शातकुम्भमयः कुम्भमन्नश्चवानुमन्त्रितः। सोयपूगर्विषाणेश्च द्विप खड्गमहर्षमः ॥ ४४ ॥ मणिमुक्तायुरीयान्यः पुण्यगन्धस्तथोपधैः । श्रीदुम्घरे सुखासी | संजयबोले हे राजा भापके पुनकी यही आशा पालदुई कि भीम मार द्रोणके मरनेपर यह कर्ण पाण्डवोंको अवश्य मारेगा । २८ । इस आशाको हृदय में धरकर इसप्रकार कर्ण से वोला हे कर्ण वह अर्जुन तेरे सम्मुख युद्ध करने की इच्छा नहीं करता है । ३९ । कर्ण बोला हे गांधारी के पुत्र मैंने प्रथमही यह तुझसे कहा है कि में पुत्र पौत्र और श्रीकृष्णजीसमेत सवपांडबॉको विजयकरूंगा । ४० । मैं निस्संदेह तेरा सेनापति बनूंगा हे महाराज भाप तय्यार हूजिये और पाण्डवोंको विनय कियाजानो । ४१ । संजय घोले हे महाराज इसपातके मुत ही राजादुर्यो- धन अपने राजामासमेत ऐप्ता उठा जिसमकार देवताओं समेतइन्द्र उठताहै । ४॥ अर्थात् सेनापति बनाने के लिये कर्ण के सत्कार करनेको ऐसा उठा जैसे कि स्वामिकार्तिक के अभिप्तेक कराने को देवताओं समेत इन्द्र उठाथा इसके पीछे विजयाभिलापी उन सब राजाओं ने जिनका अग्रगामी दुर्योधनथा मुवर्णके कलश और भाभिमंत्रित मृण्मयपात्र हाथी के दांतके पान गड़के सींगके पात्र वा अन्य यशपशुओं के दांतों के पात्र माण मोतियों से आच्छादित या बहुतसी सुगन्धित द्रव्यों से युक्त जलपरित पान और गंधाक्षत आदि अभिषेक को यस्तुगों सेवेदोक्त "Your son, Oking, hnd strong hope, alter the death of Bhishm and Drona, that Karan would destroy tho Pandavas. With that hopo strong in his mind, he sail to Karan, "Irjun has no desiru to come on to oppose you." Karan srid, "I have already told you that I whall conquer the Pandavas together wi h thir 107s. granticot nnd Shri Krishn. 40. 1 sim willing to leul Princo, and regard tlio Pandavas as vanquished." Sunjaya said, "On hearing theso words Daryodhan rose up like ;Indra accompanied by gods. He stood up to innoint him as Indra had done when he annointed Kartik as commander of the army of gods. Then all the princos, desirous of victory, led by Duryodhun, sprinkled over Karan . youn armies Be ready, - [62561 Mahabharat नमासने क्षौमसंवृते । शास्त्रदृष्टेन विधिना सम्मारैश्च सुसंमृतः ॥ ४५ ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिपा धेश्यास्तथा सदाश्च सम्मताः । तुष्टुपुस्तं महात्मानमभिषिकं बरासमे ॥ ४६॥ तोमिषिक्त राजेन्द्र निष्फेगॉमिधनेन च । पाचयामास विप्राणान् राधेयः परधी रहा ॥ ४॥जय पार्थान् सगोषिन्दान सानुगांस्तान्महाहवे । इति ते बन्दिनः प्राहुर्भि जाश्च पुरुषर्षभम् ॥ १८ ॥ जहि पार्यान् सपाञ्चालान राधेय विजपायनः | उन्निय सा मानुस्तमास्युप्रैगमस्तिभिः ॥ ४९ ॥ न ह्यलं त्वद्विसप्टानां शराणां पै सकेशधाः। उलूकाः सूर्यरएमीनां उपलतामिव दर्शने ॥ ५० ॥ व पार्थाः सपाञ्चालाः स्यातुं शकास्तधानतः। माचशस्त्रस्य समरे महेन्द्रस्येव दानवाः ॥ ५१ ॥ अभिषिक्तस्तु मन्त्रों के द्वारा कर्णका अभिषेक कराया । ४५ । ब्राह्मण क्षत्री वैश्य और अंगीकार कियेहुये शूदोंने भी उस महात्मा कर्णको प्रसभ किया जो स्नान किये | हुये उत्तम आसनपर विराजमानया । ४६ । हे राजेंद्र फिर अमिपेक होजानेपर शत्रुहन्ता कर्ण ने निष्क और गोधन देकर ब्राह्मणों से स्वस्ति वाचन कराया।४७) उस समय वन्दीजन भौर ब्रामणों ने उस पुरुषोत्तमसे यह कहाकि तुम गोविन्दनी मादि भव साथियोंसमेत पाण्डवोंको विजयकरो । ४८ । इकर्ण तुमहमारी विजयके निमित्त . पांचालॉसमेत सब पांडवोंको ऐसमारो जैसे कि सदैव होनेवाला मूर्य बड़े अन्धकार को दूर करता है । ४ । भाप के वाणोंको केशवनी समेत पाण्डवलोग देखने को भी ऐसे समर्थ न होंगे जैसे कि मूर्य की प्रकाशित किरणों के देखने को उलूक पक्षी नहीं समर्थ होसक्ता है ।५० । युद्धमें राम शस्त्रधारी के सम्मुख पाडरव नियत होनेको ऐसेसमर्थ नहीं है जैसे कि महारन के सम्मुख दैत्य दानव नियत नहीं होसक्ते । ५१ । अभिषेक किया हुआ वह कर्ण बड़े Faths from the vessels of gold, earth, inory, horn of rhinoceros and the tooks of other sacrificial animals, decked with pearls and jewels and mixed with odorous things and rice, with incantations of Vedic hymns, 45. Brahmans, kshatryas Vaishyas and Sbudras praised Karan wholsprinkled over with boly water sat on a precious seat. After the ceremony of Abhishek, Karan the destroyer of foos gave gold coins and come to Brahmans and recierad benedictions in return. The bards and Brahmans said' "You will conquer the Pandavas and their allies together with Govind. Destroy the Pare days and Panchals as the sun does the darkness. Koshar and the Pandavas will be unable to look at your arrows as owls are to look at the Sun. 50. The Pandaras will not be able to withstand you in fight as tho Daityas and Dingyas are to withstand Indra. Sprinkled over with holy water, Karan looked glorious like a second Son.
(६२५७) कर्णपर्व Karan Paray [ 6257) राधेयः प्रमया सोमितप्रभः। अपरिच्यत रूपेण दिवाकर रावापरः।। ५२॥ सन्यापस्ये तु राधेयामार्पच्य सुतस्तध । अमन्यत तदात्मानं कृतार्थ कालघोदितः।।५३ ।। कोषि राजन् संप्राप्प सनापत्यमान्दिमः। योगमाशापयामास मूर्यस्योदयनं प्रति ॥ ५४॥ सप पुत्रेतः कर्णः शुशुभे तत्र भारत । देवैरिष यथा स्कन्दः संप्रामे तारकामये ॥५५॥ इति श्री कर्णपर्वाण कर्णाभिषेके दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ धृतराष्ट्र उवाच । चनापत्यन्तु संप्राप्य कणों धैकत्र्तनस्तदा । तथोसा स्वयं राहा स्निग्ध मातृसमं वक्षः॥ पांगमानाप्य खेनानामामादित्येभ्युदिते तदा । अफ रोत् किं महाप्रावस्तम्ममाचक्ष सञ्जय ॥ २ ॥ सजप उयाच । कर्णस्य मतमाशाप वेनसे दूसर मूर्य के समान प्रकाशमान हुमा । ५२ । तप काल से मेरित आपके सूत्र ने कर्ण को सेनापति के अधिकार पर अभिषेक करा के अपने को सिद्ध मनोरय समझा । ५३ । हे राजा विजयी कर्णने भी सेनापति होकर सूर्योदय के समय सेना के तय्यार होनेकी भाशादी । ६४ । फिर यहां भापके पुत्रों समेत वह कर्ण ऐसा शोभित हुआ जैसे कि तारकापुर के पुद्धमें देवताओं.समेत स्वामि कार्तिक जी शोभित हुये थे । ५५ । अध्याय ॥११॥ धृतराष्ट्रवोले कि नव पुर्य के पुत्र कर्ण ने सेनापति पदवीको पाकर राजा दुर्योधन से भाई के समान मृदुभाषणको उनके ।। मूर्योदय सपप असंख्य सेनाकी तैयारीकेलिपे आजादेकर क्या काम किया हे संजय उसको मुझे समझाके कहो ।। संजयवोले हे भरतर्षभ आपके पुत्रोंने कर्णके अभिमायको जानकर Then your son, moved by Destiny, having installed Karan as commnn. der of his armios, thought that had got the desire of his heart. Karan the conquerer tvo, ordered the armies to be ready at day break, Surrounded by your eons, Karan lcobed gloricus like L'artik in the tvar of Talebasur," 55. CHAPTER XI Dhri trashtra said, "Being installed as commander of the armies and hearing svest, brotherly words of prince Duryodhan, what was 6258) B[xlinbharat । ६२५८ ] पुत्राने भरतर्षभ । योगमाशापयामासुनीग्दतूर्यपुर सरम् ॥ ३॥ महत्वपररा च तब सन्यस्य पार्थिय । यागो योगेति सहसा प्रादुगसीन्महास्यनः ॥ ४ ॥ कल्पता मागमुख्यानां रथानाच बयनाम् । सन्नधता पतातीनां वाजिनाच विशाम्पते ॥५॥ मोशनाचापि पोधानां परितानां परस्परम् । भूध तुमलः शब्दो दियस्पृक समां स्तनः ॥ ६ ॥ ततः श्वेतपताकेन घलाकाणेाजिता । हेमपृऐन धनुषा नागकक्षेण फतुना ॥ 7 ॥ तूणीरशतपूर्गेन समदन परथिना! शतघ्नी किङ्किणी शक्तिशलतोमर धारिणा 11 ८11 कामुरूपन्न :विमलादित्ययच्चसा। रथेनातिपताकेन सूतपुत्रोग्य श्यत ॥ ९॥ मापयन् पारिजं राजन् हेमजालविभूषितम् । विधन्यानो महच्चा | फार्तस्वरविभूषितम् ॥ १० ॥ पृष्ट्या फर्ण महेप्यास रया गायनाम्परम् भानुमन्त मिवोयन्त तमोपन्न दुरासदम् ॥११॥न भीमव्यसनं फेधिनापि द्रोणस्प मारिप । सेनाकी तैयारी के लिये आग करी जिसमें आनन्दमंगल सुचक पाने भागे चल ।। और पिछीरात्रि में अकस्मात् आपकी सेनागे तैयारी करनेका शब्द आधिपत्तामे हुआ।४। इसकेपीछे प्रसंत उत्तम हाथी रथ मनुप्य पदाती घोडे ॥५॥ | भोर शीघ्रता करनेवाले और परस्परमें बालनेवाले शूरवीरों के महाकाठिन शब्द भाकाशतक व्याप्त थे ।०। इसके पीछ तपताका और हमके घण घोड़े सुवर्ण पृष्टी धनुप नागकुसीध्वजा 191 सैकड़ों तूगीरों से युक्त वाजूवन्द और कवचों को धारण करनेवाले शतम्नी किोकणी शक्ति शुल भोर तोमरोंमे भरेहुये धनुपासे युक्त निर्मल मूर्य के समान प्रकाशमान वायु के विपरीत होनेो सम्मुख पताकापाले स्थ को सवारियों से । ९ । और स्वर्णमयी जालों से अलंकृत शंखको बनाता स्वर्णमयी धनुपको हिलाताहुआ कर्ण चला हे श्रेध नरात्तम वहां कोरवों ने उन बड़े धनुष- धारी रथारूढ मूर्य के समान प्रकाशित असहा तमसे अन्धकार को दूरकरते हुये कर्णको देसार. किमीने भी भोप्न द्रोणाचार्य और अन्य चारोंके दुःखों tho nost deed of karan, when he had ordered the arries to be rendy at the brenk of day; tell mo all this, Sanjaya," Sınjagu said, Knowing tho desire of Kinran, your smas ordered tho armies to be propared, with the cheerful musical instruments. Totards the end of tho niglit thoro was a great noise of properations in your array. Then gool olephants, cars, foot, and horse, well-decked, made together a tromendnuz nasz reishin to tho sky. 6. With white the banner, swan.coloured horsos, gold-1-okol box and standard with dorico of the rope of an elephant, followed by the warriors laying hundreds of qrivers, arm.guirds, armoure, Shatagonie, kinkinis. spears, arts, tomart and 1093, glorions like the sun, with banners fluttering in the air, blowing cunelis cosenu with gold neta, Karan went on moving his bour. The Kaanyag secing Karan the great ( - कर्णपर्व Karan Party (6259) नान्यां पुस्कयान मेनिरे तत्र कौरथा ॥ १२ ॥ ततस्तु. परयन योधान् शंसशब्देन मारिष । कर्णो निष्कर्षयामास कौरवाणां गहवलम् ॥ १३ ॥ व्यूह व्यूा महेप्यापणे मकरं शतापन, । प्रत्युद्यया तदा कर्णः पाण्डवान् विजिगीषया ।। १४ । मकरस्य तु तुपडे घे को रामन् व्यवस्थितः । नेत्राभ्यां शानिः शूर उलूकच महारथः ॥१५॥ द्रोणपुत्रस्तु शिगस प्रोवायां सर्वसोदराः। मध्ये दुर्योधनो रामा वलेन महताहतः ॥ १६ ॥ यामे पादे तु राजेन्द्र कृतवर्मा व्यवस्थितः । नारायणवलयुक्तो गोपाल युद्ध दुर्मदैः ॥ १७ ॥ पादे तु दक्षिणे राजन गौतमः सत्यधिक्रमः:त्रिगत्तम मद्देन्यासी क्षिणात्यश्च संवृतः ॥ १८ ॥ अनुपादेतु यो घामस्तत्र शल्या व्यवस्थितः। महत्या सेनया सार्थ मद्रदेशसमुत्थया ॥ १९ ॥ दक्षिणे तु महाराज मर्पणः सत्यसङ्गरः । वृतो रथ सहस्रेण दन्तिनाञ्च निभिः शतैः ॥ २० ॥पुच्छेप्यारला महापायर्या भ्रातरौ पार्थियों को नहीं माना । १२ । इसके पछि शंखध्वान के द्वारा शूरवीरों को चैतन्य फरते हुपे कर्ण ने कौरवों की बड़ीसेना को निकाला । १३ । इसरीति से महाधनुपधारी शत्रुसतापी कर्ण मकरब्यूह को रचकर पाण्डवों के विजय की इच्छासे सम्मुखचला । १४ । हे राजा उस मकरव्यूह के मुखपर तो कर्ण नियत हुआ नेत्रों के समीप महारथी शकुनी और शूरवीर उलूक नियतहुये । १५ । शिरपर, अश्वत्थामा और जीवापर सब सगेभाई और मध्य में बड़ी सेना समेत आप राजा दुर्योधन नियत | हुआ । १६ । और वामपादपर नारायण और गोपाल नाम सेनासे युक्त दुर्मद कृतवर्मा नियत हुआ और बड़े धनुपधारी त्रिगर्नदेशी सत्य पराक्रमी कृपाचार्य जी दक्षिण चरणके समीप नियत हुये। १८ । और मद्रदेशी बड़ी सेना समेत राजा शल्य वां चरण के पाछे और हजाररथ और तीनसौ हाथियों समेत सत्यसंकल्प सुपेण दक्षिण चरणके पीछे हुमा । २० । बड़ी सेना समेत बड़े पराक्रमी archer mounted on a car bright like the sun, dispelling darkness, none felt sorrow for tlie death oi Bkislım and Dioda. Then urging the warriors with the sounds of his conch, Karan the destroyer of foes arranged the array into the crocodile army and went on to conquer the Pandavas. Karan stood at the mouth of thio array, Shakuni and Ulak at the eyes, Ashwathama at the head, Duryodhan's own brothers at the neck and Duryodhan himself, with a largo army, stood in the middle. 16. Brave Kritvarma, with tho Narayans and Gopals, stood at the left foot, and the great archers of Trigart, led by Kripacharya, stood at the right foot. King Shalya of Madra, with a large army, stood behind the left foot, and Sushen of true prowess, with a thousand elephants and three bundreds of cars, was bobind the right foot. 20. The two brother princes, Chitra and - (6260) Jahabharat सदाचित्रच चित्रसेन मास्या सेनया दृती ॥ २१॥ तथा प्रयाते राजेन्द्र कर्णे भर परोसमे। धनजयममिग्रंप धर्मराजो प्रषीदिदम् ॥ २२॥ पश्य पार्थ यथा सेना धाराष्ट्रीह संयुगे। फर्णन घिहिता वारः गुप्ता परिर्महारयः।। २३ ॥ हतधीरतमा बंषा धाराष्ट्र महाचमः । फल्गषेषा महाबाहो तृणस्तुल्या मता मम ॥१४ ॥एको छात्र महेयासः मतपुत्रो विराजते। संदेषासुरगणः स किन्नरमहोरगैः॥ २५ ॥ घराधसिभिलोपोजल्यो रथिमाम्परः। हत्याध महाबाहो विजयत फाल्गुनः ॥ २६ ॥ उद्धतव मछल्यो मम भावराषार्षिकः । एवं जास्या महाबाहो म्यूई म्यूह पेच्छसि ॥२०॥ मातुरेतद्धः भुत्या प्राण्ड श्वेतवाहनः। भर्सचन्द्रेण म्यूहने प्रत्य म्यूात तापमम् ॥ २८ ॥ वामपातु तस्याय भीमसेतो व्यवस्थितः दिक्षिण- दोनों भाई राजा चित्र और चित्रसेन पुच्छपर निपत हुये । २१ । हे राजेन्द्र इसति से नरोत्तम कर्ण के चलने पर धर्मराज युधिष्ठिर अर्जुनकी ओर देखकर पहलोले । २२ । कि हे वीर अर्जुन देखो जस जस इस युद्ध में शूरवार महारथियों से रक्षित दुर्योधनकी सेना कणेने अलंकृवकरी । २५ । वह दुर्योधनकी बड़ी | सेना वही है जिसके बड़े दार मारेगये हे महाबाहो यहशेप पचीहुई है आशय यही कि यह सेना मेरी बुदिसे तृणोंकी समान है । २४ । इस सेना भर में अकेला धनुपपारी कर्णही प्रकाशित है यह रथियों में श्रेष्ठ कर्ण देवता भार किन्नर गंधर्व | नाग और । २५ । तीनों लोकोंके स्थावर जंगमों से महादुर्नय हे हे महावा मर्जुन आ इसकेही मारनेपर मेरी पूर्ण विजयो । २६ । इसके मरनेपर वारहवर्षका | मेरा कंटक उखड़नायगा हे महावाहु ऐसा जान और समझकर म्याको असा चाहो वैसा तैयार करो । २७ । पाण्डव अर्जुनने भाई के उस पचनको मनकर | अपनी सेनाको अर्दचन्द्र व्यूइसे अतंकतकिया। २८ । उसके बाममागपरभीमसेन Chitrasen, with a large army, stood at the tail. When Karan bad thus arrayod his army ia the abovo-mentioned way, Yudhishthir looked at Arjan and raid, "Look at the army of Daryodban seo how it is arrayed by Keran. It is the army of which tbe great Warriors are slain. I think the rest of tho army is liko & surus Karao'a ja the only promineat figure in the whole army. Karan ibo beat of Warriors is hard to bo vanqaished by gods, aturs, kinnars, gandharvas and the morcable and immorcablu things in tho sbreo world. You will gain a complete victory alter slaying him. 26. dly grief of twelve years slanding will be effaced by his death. Recombering all this, you may arrange the army as you liko. Hearing his brother's words Arjan the Pandara formod his army into a crostat-abaped array. Bhimsen was on the lelt wirg usd (६२६१) कर्णपर्व Karan Paray [6261) महेम्घासो धृष्टद्युम्नो व्यवस्थितः ॥२९॥ मध्ये व्यूहस्य राजातु पाण्यश्च धनञ्जयः । नकुलः सहदेघश्च धर्मराजस्य पृष्ठतः ।। ३० ।। चरमोतु पाञ्चाल्पो युधामन्यूत्तमो जसो । नार्जुनं जाहतुयुद्धे पाल्यमानी फिरीटिना ॥ ३१ ॥ शेषा नृपतयो धाराः स्थिता न्यूहस्य देशिताः। यथाभागं यथोत्साई यथायनञ्च भारत ।। ३२॥ एवमेतन्महा म्यहं व्यूह्य भारत पाण्डया । तावकाश्च महेष्यासा युद्धायय मनो दधुः ॥ ३३॥ दृष्ट्या व्यूढां तब जमं सूतपुत्रेण संयुगे। निहतान् पाण्डवान मैने धार्तराष्ट्रः सवान्धवः॥३४॥ तष पाण्डवों सेनां व्यूढां दृष्ट्वा युधिष्ठिरः । धाराष्ट्रान् हतान् मेने सकीन् घे जनाधिपः ॥ ३५ ॥ ततः संखाच भेर्यश्च पणया नकदुन्दुभिः। डिण्डिमाश्चात्यहन्यन्त सराश्च समन्ततः ॥ ३६ ॥ सेनयो भयो राजन् प्रायाद्यन्त महास्वनाः सिंहनादध और दाहिने भागपर वड़ा धनुषधारी धृष्टद्युम्न वर्तमान हुआ । २९ । और व्यूह के मध्य में राजा युधिष्ठिर और अर्जुन नियत हुये और धर्मराज के पाछे नकुल सहदेव हुपे । ३० 1 और पांचाल देशी उत्तमौजा और युधामन्य रयके पहियों के रसकहुये अर्जुनसे रक्षित उन दोनोंनेभी युद्धमें अर्जुन को नहीं त्यागा। ३१ । हे राजा शेपशूरवीर राजा लोग शस्त्रादि से अलंकृत अपनी २ युक्तिके अनुसार व्यूहमें नियतहुये ।' ३२ । पांडव और अन्य शूरवीरों ने इसरीति से अपनेब्यूहको रचकर तैयार किया हे राजा इसरीति से पांडव और आपके पुत्रोंने अपने व्यूहों को रचकर युद्ध करनेको उत्साहकिया । ३३ । दुर्योधन ने कर्णकी रचितकी हुई अपनी सेनाको युद्धमें देखकर भाई वन्धुमों समेत पांडवोंको मृतक रूप जाना । १४ । उसी प्रकार राजा युधिष्ठिर ने भी अपनी पांडवी सेनाको अलंकृत देखकर कर्ण समेत धृतराष्ट्र के पुत्रोंको मृतक रूपमाना । ३५ । इसके पीछे शंखभेरी दोल दुन्दुभी डिमडिम भादि पाजेभी चारोंओर से पजे ।१६। हे राजा उस समय दोनों सेनाओं में बड़े शब्दायमान वाजे बजे और युद्धाभिलापी शत्रुहन्ता शूर वीरों के भी the great archer Dhrishtadyunin on the right. In the middle of the array stood Prince Yudhishthir and Arjun and behind Yudhishthir were Nakal and Sahadev.30. Uttamauja and Yudhamanyu of Panchal protected the right and left wheels of Arjun and were always with him. The rest of the princes, armed with arms and armour, stood in ranks. The.Pandavas and Kauravas, having thus arranged their armies, stood ready to fight. Sving his army arrayed by Karan, Duryodhan took the Panday brothers for dead. Yudhishthir too, seeing the Pandav army well, arranged, thought that Karan and tho suns of Dhritrashtra would die. 35. Conchs, trumpets, tomtoms and other musical instruments sounded. was a great noise of musical iastraments in both the armies and Thero 6261) Mahabharat । ६२६५ मेश्यो यथा क्षोण पुण्य स्वर्गसदस्तदा ५ ७ गदाभिरल्ये गुमिः परिमुफ्लैरपि।। पाधिताः शतशः पेतुर्षीरा पारतर रारथा रथैमिथिता मला मत्तपिः हिना सादिनः सादिभिश्चय तस्मिन् परमसंकुले ॥ ९ ॥ रथरा रथा नागरचारोहामा पत्तिभिः ।अध्यारोहः पदाताच गिहता युधि शेरते ॥ २० ॥ रथाश्यपत्तयो नागे रथाश्वेमाध पत्तिीभः । रयपत्तिद्विपाथाश्वरथचापि नरद्विपाः ॥ ११ ॥ रथाश्मन राणान्तु नराश्वेभरथैः कृतम् । पाणिपादेव शस्नेश त्या फदनमहल ॥ १२ ॥ तथा तस्मिन् चले गयध्यमाने हतेपि च । अस्मानन्याययुः पार्धा पृफोदरपुरोगमाः ॥ १३ ॥ धृष्टाम्नः शिखण्डी च द्रौपदेयाः प्रमद्रकाः । सात्यकिश्चेफितानश्च दायिडैः सनिकैः; सह ॥ १४ ॥ धृता व्यूहेन महता पाण्याथोलाः सफेरलाः । व्यूढोरस्का वाघभुजा. मांशषः पृथुलोचनाः ॥ १५ ॥ पापीडिनो रक्तदन्ता मत्तमातङ्गविक्रमाः। नानापिरागप पुण्य होनेसे स्वर्गवासी जीव अपने अपने विमानों से गिरते हैं। ७ । युद्धमें बहे । वारों की भारी गदा परिष और मूसलों से भी मारहुये अन्य हमारों धार वृनी पर गिरे । ८ । रथी रथियों से मतवाले हाधी मतवाले साथियों से अवाद अक्षा रूढ़ोंसे उम कठिन युद्धमें महित कियेगये । ९ । रथोंसे मनुष्य और हाथियों से रथ वा पतियों से रथी और हायियोंसे रथपति घोड़े और सवार और हाथी दोनों रयों से मयेगये । ११ । मनुष्य घोड़े हाथी और राधियों ने हाथ पांव शस्त्र रयों से रप घोड़े हाथी और पर्नुप्यों का बड़ा विनाशकिया ।१०। इसरीति से शूरवीरों के हायसे सेनाके घायल और मारे जाने से यह पाएडय जिनमें अग्रगामी भीमसेन था हमारे सम्मुख पाये । १३ । धृष्टयम्न शिखंडी द्रौपदी के पुत्र प्रभद्रक नामक्षत्री सात्पकि चाकेतान द्रविड़ देशी सेना समेत । १४१ घड़े व्यूहसे युक्त मौर बड़े वक्षस्थल लम्बी भुमा दीर्घनेत्री वेगवान भाभूषणों से अलकन । १५॥ phants and carry, like the daniz 99 0; heaven falling down at th. exhaustion of their merits. The heary muces, clubs and musals, dircharged in battle, killed many warriors. The clephants were al by rad elephants, car rarriors by car, warriors and horsemon horsemea. Ben were crushed by cars, cars by clophants, car war riors by footsoldiers, and horses and e'oplants by car sarriors an clephants. 11. Jfen, horses, claplaats and car warriors, with their hends, fect, reapons and eari, destroyed core, horsan, elephanas, andty men in large numbers. Thus wounded and slain hy warrion, we yere opposal b5 that part of the arms which is led by Bhi Dirishıtadyuain, Slithaadi, the Prablariraks, Clçkitan, tho Drar dians, with a large arnig of warriors having broad clicstx, long largo eyes and great prores and dicked with ortancalı, 15. full 3 [6265 [६२६५ कर्णपर्य faran Parv सना गन्धचूर्णावर्णिताः ॥ १६ ॥ पद्धासयः पाशहस्ता घारणप्रतिधारणाः । समान मृत्यको राजन् नात्यजन्त परस्परम् ॥१७॥ कलापिनश्चापहस्ता दीर्घकशाः प्रियम्बदाः । पत्तयः सादिनभ्यान्ये घोररूपपराक्रमाः॥१८॥ अथापरे पुनः भूराश्चीवशालकैकया। कारूपा कोशलाः काम्च्या मागधाश्चापिदुद्रुवुः ॥ १९ ॥ तेषां रयाश्धनागाश्च प्रवरो योगपत्तय । नानावाघधरेप्टा नृत्यन्ति च हसन्ति च ॥ २० ॥ तस्य सैन्यस्प महतो महामात्रयरर्पतः । मध्ये वृकोदरोग्यायात्यदीयानागधर्गतः ॥२१॥ स नागप्रयरोत्युग्रो विधिवत्कलिफ्तो घमी । उदयाग्राद्रिभवनं यथा युदितभास्करम् ॥ २२ ॥ तस्यायसं रक्तदंत मताले हाथी के समान पराक्रमी नाना प्रकार के रंगोंकी पोशाकों से | भूपित चन्दनादि से चर्चित देहवाल खड्ग भिदिपालों को हाथमें लिये हाथियों के | हटानेवाले एकसी मृत्युवाले पांड्य चौल और केरल लोगोंने परस्परमें त्याग नहीं किया । १७ । तूणीर धनुप भिदि हाय में लिये लम्चे केश रखने वाले मियभापी घोर पराक्रमवाले अन्य पति और अचारुदानेभी परस्परमें त्याग नहीं किया इसके पीछे दूसर शूर चन्देर पांचाल केकय कारूप कौशल कांच्य और मगधशूरवीर | सम्मुखदौड़े । १९ । उनके रथघोड़ हाथी और अत्यन्त भयानक पतिलोग नाना- प्रकार के बाजे बजाने वालों के साथ में बड़े प्रसन्न चित्त इसते नाचते और गातेथे १२०१ अत्यन्त उत्तमम्यासे युक्तहाधोके कन्धोंपरसवार भामतेन बड़ी सेनाकमध्यभापके | शूरवीरोंके सम्मुखगये। १। अत्यन्त उत्तम महाभयानक बुद्धि के अनुसार अलंकृतकिया हुमी बदहाथी ऐमाशोयमानहुआ जैसेकि मूर्योदयवाला उदयाचलका भवन शोभा | यमान होताहै । २२ । उसका लोहमयी रत्नोसेनीटत कियाहुभाकवच इसप्रकारका प्रकाशमान था जैसे कि नक्षत्रों समेत शरद ऋतुका आकाश शोभित होता है prowess like mad elephants, clad in various sorts of clothes with their bodies decked with sandal paste, armed with swords and bbindipals that could withstand elephants, dying in the same causa, the war. riors of Pandya, Chola and Keral stood firmly by one another. Armed with quivers, bows and bhindipals, wearing long hair, speak. ing in a mild tone, of dreadful prowess, the other foot soldiers and, horsemen did not desert one another. The other warriors of Chanderi, Panchal, Kaikaya, Karush, Kosal, Kanchi and lagadh pushed on. Their cars, horses, elephants and dreadful foot soldiers, with musical instumenta, laughed, danced and sang cheerfully. 20. Followed by oxcellent cars, mounted on the back of an elephant, Bbimsen, with a large army, opposed your warriors. Decked with great. precision, the dreadful elephant looked glorious like the tnoun. tain from behind which the sun risex His iron panoply, inlaid with (6266) Mababharat (६२६६) धर्मधर पररत्नविभापतम् । ताराव्याप्तस्य नमसः शारदस्य समत्विाम् ॥ २३ ॥ स तोमरय्यप्रकाश्चारुमोलिः स्थलंकृतः । शरमायन्दिना भनेजसाध्यवहाद्रपूर ॥ २४ ॥ तं दृष्ट्या द्विरदं रात क्षेमधूतिद्वपस्थितः। आगयन्नभिशप प्रमनाः प्रमन स्तरम् ॥ २५ ॥ तयोः समभवं द्विपयोतमरूपयोः । यथा एम पतामहापर्वतयोरिव ॥ २६ ॥ संसकनागौ तौ पोरी तोमरेरितरेतरम् । पलपत् मय्य रइम्यामित्यान्योन्यं धिमेदतुः ॥ २७ ॥ अपहस्य तु नागाश्यां मण्डलानि विश्वरतु । प्रगृह्य बोभी धनुषी जान परस्परम् ॥ २८ ॥ स्वेषितास्फोटितराणशग्दैन सर्वतः । तो जनं हर्षयन्तोष सिंहनादं प्रधऋतु ॥२९॥ समुपतकराया तो दिपाया 'कृतिनायुमा । पाताधूतपताकाभ्यां युयुधाते महापली ॥ ३० ॥ तावग्योम्यस्य मनुषी तोमर संयुक्त चपलभुज और सुन्दर मुकुटधारण कियेहये महा अलंकृत सूर्य के समान प्रकाशमान वहभीमसेन अपने तेजसे शत्रुओंको भस्मारताहुआ युद्ध में नियतहमा । २४ । वहां हाथीपर घड़ाहुमा क्षेमधूर्ती दूसरे उसहाथीपर सवार बड़े साहसी भीमसेनको देखकर पुकारता भौर बुलाताहुआ सम्मुखगया । ५५ । प्रथम तो इनदोनोंके हाथियोंमिही परस्पर ऐसायुद्धहुमा जैसे कि दैवइच्छास वृक्षों समेत दो पर्वतोंका पदहोताह । २० । उनहाथियों के बड़े युद्ध होनेकेपछि बहदोनों वारमूर्य किरणरूप सोपरों से परस्पर एकएकको घायल करतेहुये बड़े वेगसे गर्ने । २७ । फिर वहदोनों हाथियों के द्वारा हटकरके मण्डलों में घूमे और धनुषोंको पकड़कर परस्परमें एकने दुसरे को घायल किया । २८ । फिर उनदोनों ने भुभा और पाणोंके शब्दोंसे मनुष्योको मसनकरके बड़े सिंहनादोंको किया । २१ । और फिर वादोनों महावली ऊंनी मूंडवाले हाथियों और पायुसे उड़तीहुई पताकामों समेत युद्ध करनेलगे । २० । उनदोनोने परस्परमें एकने दूसरेके धनुष को काटकर शक्ति मौर तोमरों की वर्षासे परस्पर में ऐसे पापलीकया जैसे कि वर्षाऋतु में gold, looked like the winter sky studded with stara. Armud with tomat, dextorous, wearing an excellent diadem, Bhim stood in the field of battle scorching the enemiou, Kohemdburti, riding on elephant, seeing Bhimsen from a distance, came od challenging and daunting him. 25. The two elephants opposed each other liko mountains overgrown with trees. Then both the parriors wounded each other with tomars bright like the rays of the sun and roared loadly. They morou in circles with their clephants and wounded each other with Arrows from their bow. They pleased the warriors with the sounde of their arms and arrows and moral leonine roats. Then their elephants with upraised trunks and banners flattering with air, cama in contiot 30. They cut each other's bow and rounded with epsara ६२६७) कर्णपर्व Karan Paray (6267) छिरदाम्पोम्यं विमदतुः। शक तोमरवण प्रामघाविधामधुमिः ३१ " क्षेमधू तिस्तदा भीमं सोमरेण सनान्तरे । निर्षिभदातिवेगेन पद्मश्चाप्यपर नंदन ॥ ३२ ॥ स ममिसेनः शुशुभे तमिररङ्गमाधिः । शोधतधः सासतिरि पांशुमान् ॥ ३३ ॥ ततो भास्करपर्णाममजोगतिमयस्मयम् । ससम तोमरं भीमः प्रत्यमित्राप यत्नधान् ॥ ३४॥ ततः फुलताधिपतिचापमानम्य सायकैः । दशशिस्तोमर छिया पाट्या विध्याध पाण्डपम् ॥ ३५ ॥ अथ कार्मुफमादाय भीमी जलदनिस्वनम रिपोपईयागमुमदन पाण्डधः शरैः।। ३६ ॥ स शरौघाईतो नागो भीमसनेन संयुगे। गृहमाणोपि. नातिधातोर्पत इधायुदः ॥ ३७॥ तमस्यधापयद्विरदं भीमा मीपस्थ मागराद । महराघातेरितं मे धातोद्धृत वाम्बुदः ॥३८॥ संनियायान्मनोनाग समाति:प्रतापवान् । विम्याधाभिद्रुतं धागभीमसेनस्य कुज्जरम ॥ ३९ ॥ ततः साधु वादल जलोंसे व्यथित करतेहैं । ११ । उससमय महागर्जना करते हुये समधूती ने अत्यन्त वेगवान दूसरे छः तोमरों से भीमसेन को छातीपर पापल किया । ३२ ॥ क्रोध से भराहुभा भीममेन शरीर में लगेहुये तोमरों से ऐसा शोभायमानहुआ जैसे कि वादलोंसे सूर्य शोभितहोता है । ३३ । इसके अनन्तर उपाय करनेवाले भीमसेनने मूर्य के समान प्रकाशित सीधा चलनेवाला लोहेका तोमर उसशत्रु के ऊपर फेंका । ३४ । फिर राजा कुलूतने धनुपको नवाकर दशवाणोंसे तोमरको काटकर भामसनको घायलकिया। ३५ । इसके अन्तर गर्जना करते भीमसेन ने पादलके समान शन्दायमान धनुषको लेकर वाणोंसे शत्रुके साथीको घायल और वाहित किया । १६ । युद्धमें भामसनके वाणोंसे वह हाथी पाहितहोकर यभामा भी ऐसे नहीं ठहरसका जैसे कि वायुसे उड़ाहुआ बादल नहीं ठहरसक्ताहै। १७॥ और भामसनका गजराज उसहाथीपर ऐसा दौड़ा जैसे कि वायु से उड़ा हुआ वादल बड़ीषायुसे उडेहुये बादलके पीछे दौड़ताहै । ३८ । फिर प्रतापा क्षेमधून अपने हाथीको अच्छी रीतिसे रोककर शीघही अपने बाणोंसे भामसेन के हाथी and tomars liko showers of rain. Then Kshemdhurti, with loud roars, wounded Bhimsen with sir sharp tomars on the breast. Bbim's body pierced through with the tomars looked glorious like the Sun overcast : with clouds. Then Bhimsen hurled na iron tomar, bright liko the sun, at his advorsary. The king of Kulut, cut down the tomar with ten arrows and wounded Bhim, 35. Then Bhim, with a loud moar, took up his box and wounded his adversary's elephant with Brows. The elephant wounded by the arrows could not be controlled and fled like a cloud blown up by the wind. Bhim's elephant chased the other like one cloud chasing another. Valiant Kshemdburti then checked his elephant and with his arrows rounded the elephant of Bhim, and having cut dowo his bax with sharp [6268] Nabalharrt (६२६८) विसष्टेन क्षरेणानतपणा छित्या शरासन शान गमामिश्माईयत् । ४० : ततः क्रुशोरणे भीम क्षेमत्तिः पराभिनत् । जघान चास्य द्विरदं नाराचैः बर्षमर्ममु ॥४१॥ स पपात महानागो भीमसेनस्य भारत । पुरा नागस्य पतनादरप्लाय स्थितो महीम ।। ४२ ॥ तस्य मीमोपिद्विरदं गदया समपाययत् तस्मात् प्रमपितानागात् क्षेमधुत्तिमयप्लुतम् । उद्यतायुधमायान्तं गदयाहन घृफोदरः ।। ४३॥ स पपात हत सासिय मुस्तमभितो द्विपम् । वज्रमम ममचलं सिंदो पनाहतो यथा ॥ ४४ ॥ ते नृपति दृष्ट्या कुलूतानां यशस्करम् । प्रायद्वयथिता सेना त्वदीया भरतर्षभ ॥४५॥ इति श्री कर्णपर्वणि क्षेमधूर्तीवधे द्वादशोऽध्यायः १२॥ को घायल किया इसके पीछे अच्छे प्रकार से छोड़ेहुये टेपक्षवाले तुरप्रसे शत्रुके धनुषको काटकर प्रतिपक्षवाले शत्रुको पीडामान किया । ४० । इसके अनन्तर शोधयुक्त मधुतीने भीमसेनको घायल करके उसके हाथीको सब मर्मों में अपने नाराघोंसे यायलकिया। ४१। हे भरतवंशी उसघायल करनेसेवह भीमसेनकाहायी पृथ्वीपर गिरपड़ा और भीमसेन हाथीके गिरनेसे पूर्वही हाथी से कूदकर पृथ्वी पर नियतहुआ । ४२ । फिर भीमसेनने भी उसकेहाथीको को गदाप्त मारातब उस गदा से महुये हाथीसे उतरेहुरे और शस्त्र उठाकर भानेवाले क्षेमधूती को भामसेननेगदासे मारा । ४३ । भौर गदालगतेही पृतकहोकर खड्गसमेत पृथ्वीपर ऐसे गिरपड़ा जैसे कि वजसे टूटाहुभा पर्वत वा पजसे मराहुभा सिंह पृथ्वी पर गिरता है । ४४ । हे भरतर्षभ उसकुलूतों के यशस्वी राजाको मृतकामा देखकर आपको सेना भतभीत और पीडितहोकर भागी । ४५ । pointed arrows; wounded him severely.40. Then Kshemdhurti, in a rago, wounded Bhimaad his elephant in the vital pares. The clephant foll down on enrth with the wounds, but Bhim jumped down from it before itfall and stood on the ground. Then Bhim slew his adversary's cleplant with his mace and with tho samo ho'sles Kabenduarti too, who had come dosyn from his cleplant and was coming on to vards him with his scapon uprised. Kshomdhurti, with his sword, full down by tbo blow like a mountain or a lion struck down by lighting. Sæing the fall of tho king of Kuluts, your army fled away terrified and distressed."45.
।। ६२६९) कर्णपर्व Karan Pary [6269] सञ्जय उवाच । ततः कर्णो महेष्वासः. पाण्मवानामनीकिनीम् । अधान समरे शः सन्नतपर्वभिः ॥ १॥ तथैष पाण्डवा राजं स्तव पुत्रस्य बाहिनाम् । कर्णस्य प्रमुख द्धा निजानुस्ते महारथाः॥ २ ॥ कपि राजन् समरे व्यहनत पाण्डी धम्म । नाराचैरकरणम्यामः कर्मारपरिमान्जितैः ॥ ३ ॥ तत्र भारत कर्णेन माराचस्ता रियो गजाः । नेदुः सेदुभ मप्लुश्च पम्रमुख दिशो दश ॥४॥षध्यमाने यले तस्मिन मतपुत्रेणमीरप । नकुलोऽयद्यपूर्ण सूतपुत्रं महारपम् ॥ ५॥ भीमसेनस्तथा द्राणि कुणं कर्म दुष्करम् । विन्दाधिन्दी कैकयो सात्यकिः समधारयत् ॥ ६॥ भुतकर्मा णमायान्तं चित्रसेनो महीपतिः । प्रतिविन्धयस्तथा चित्रं चित्रकेतमकार्मुफम् ॥ ७॥ दुर्योधनस्तु राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । संशप्तकगणान् अदान ज्यघापद्धनञ्जयः ॥ ८ ॥ष्टद्युम्नः कृपेणाप तस्मिन् धीरयरक्षये । शिस्त्रण्डी कृतवर्माण समादयदव्युतः अध्याय ।। १३॥ सजय बोले कि इसके पीछे बड़ेधनुषधारी शूरवीर कर्णने टेदेपावाले भाणों से युद्ध में पांडवों की सेनाको मारा । १ । हे राजा उसीप्रकार फ्रोधयुक्त उनपांडवों के महारथियों ने कर्णके देखते हुये आपके पुत्रकी सेना को मारा । २ । हे राजा फिर कर्ण नेभी सूर्यको किरण के समान मकाशित चतुर कारीगरोंके साफ किये हुये नाराचों से उस युद्ध में पांडवी सेनाको मारा । । । तबतो कर्ण के नाराचों से घायल हुये हाथी चिन्या मारनेलगे और महापीड़ित होकर दशादिशाओं में घूमने लगे। ।। हे येष्ठ कर्ण के हाथसे उस सेनाके घायल होनेपर शीघ्रही नकुल उस युद्धमें कर्ण के सम्मुखगया। ५ । उसीप्रकार भमिसेन ने कठिन कर्म करनेवाले, अश्वत्थामा को और सात्यकीने विन्द अनुविन्दनाम केकयों को रोका । ६ । और राजा चित्रसेन ने भातहुये श्रुतकर्माको और प्रतिविन्ध्यने अपूर्वध्वजाधारी राजा चित्रको रोका फिर राजा दुर्योधन ने धर्मपुत्र युधिष्टिरको रोका और क्रोधयुक्त अर्जुन में संशप्तक गणों को रोका । ८। उस उत्तम वीरों के नाश में धृष्टद्युम्न CHAPTER XIII Sanjaya said, "Then great archer, Karan slew the Panday army with his sharp arrrows. The Pandavas too, in their rage, slet the army of your sons in the presence of Karan Karan too, slew the Pandav army with his well polished arrows bright as the tays of the Sun. The elephants wounded by Karan's arrows, shrieked loudly and fled away in all directions with pain. When Karan was thus destroying the armies, Nakul opposed him.5. Bhimsen checked . valiant Ashwathama and Satyaki oppoxed Vind and Anuvind the Kaikaya princes. Prince Chitrasen checked advancing Shrut. karma, hile Prativandhya opposed Chitra"the Possessor of a Mahabharat । - (6270) (२०) ner कोरिया शक्ष्य मादीपुत्र मतपशास महायज सादेपः प्रता- पंचान् ॥ कंपोसारपाक यु शरम भास्थमा सारयतिः कपो चाप भादयामास मारत १९ तायनमात धोरे जानतईदये भृशम् । विषाणायो यथा नाना मायने ।१२ ॥ सरसमित मर्माणो तावुभौ मातरी रणे । साया सरपकर्माण राजन विध्यधेतुः शरैः।१३ तो सात्यकिदास महसन सो दिशः छापयन मारवा पायामास भारत ॥ १४ ॥ पाप्यमानी ततार्शनियशरए विप रयं तुर्ग सादयामासः बारेः ॥ १५ ॥ तयोस्तु पी पिशिता गौरिमहाशमय सी सायकलीवारयामास मधुणे ॥१६॥ गया ये पापी बिहे प्रयच महारान् । सात्यक्षि यादयतो तो परतुल मुष्टु च । १७ ॥rit पाचार्य से लड़नलगा और शिखण्डी के सम्मस अजेप कृतवर्मा नियत हुमा ।। हे महाराज इसीमकार श्रुतकीर्ति ने शल्पको और माद्रीके पुत्र सहदेवने आपके पुत्र दिशासनको रोका २०५ दोनों कैकेयोंने युदमें प्रकाशित पाणों की वर्षासे सात्यकी आधेरा सात्यकी ने वाणों से केकयों को ढक दिया।११भरतवंशी उन दोनों बार भाइयों ने उसको हृदय पर ऐसा कटिन पायल किया जसे कि बन में सम्मुप आनेवाले दो हाथी अकेलं हांधीको अपने दांतों से घायल करते हैं । १२॥ | हे रामा पाणों से देहपे कवचवाले सात्यकी को दोनों भाइयों ने या पाया किया। फिर सात्यकी ने हँसनेहुये पाणों की वर्षा करके रन दोनोंको सब . ओरसे रोका । १४। इसके पीछे सात्यकी के वाणों से रुके हुये उनदोनों में शीघ्र। माणों से मारपाकके रपको ढक दिया । फिर इमपड़े यशस्वी मूपी मात्यांक ने उन दोनों के एत्र और धनुषों को काटकर उन दोनों को अपने सीएम शायकों से रोकी । १६ । तवतो उनदोनों ने दूसरे धनुषों को लेकर को दादिया और बहुत बीघडी शोमायुक्त होकर फिरनेलगे। १७ । और केक wonderful standard. Prino Duryodhan cacountered Yudhishthir tio jurt and Arjin fell upon tho Sansaplaks. During the destructira battle Dhrishtadyuinn fought witi Kripracharya and Shikhandi will in vinciblo þrisvarmi. Similarly, şbrutkirti opposed sbolya, and Sahnder the son of Midrioppred your son Dashain. 13. The two Kaikaya princes 'shoxeral bright arrows orer Satsaki. The two bravc irartions roanded him hard on the breast Anten furious clapknala .mind a single rleplinot in a furrcxt sith tbeir tushs. The armour of Batyki i pierred by their mTOTA Thea Satyaki, Hamile, checked tie two lorothers with his attoki, 'Checker by Estyahia'urtow they are norozent his car with their darta, 15. Theo glorious Satyali af Sar famils, cut down their ombrellas and err xnnels than with his thsparrow. They took apnibees 6271 - TA - ६२७१। Titu Karan Pary मुंका मामा कडू-शहिणवाससः। घोतयन्तो विशः सपोः सपतः, स्यणभूषणाः ॥१८॥ पाणावकारमभवत यो राजेन्महामृधे | अन्याम्पस्य धनुष विच्छतुम्न महारथाः ॥ १९ ॥ तत यो महाया सात्यतो गुरादुर्मदः । धनुल्य समापाथ सप कृत्वा च संयुगे खुरप्रेण मुतीस्गेन अनुपिगेशिरोहरत ॥ २०॥ मापासच्चिो रामकुण्डलोपचितमहत्२१॥शन्वरस्यशिरोधन्मिातस्थमदारण शिौचयम् केकयानं सान जगमा पसन्धतम् ।। २२५ मा निहत र अाता सरप महार... सम्पमापन करवा शेने पर्यधारयन् ॥ २३॥ सपट्यो सात्या पिया स्वर्ण सः शिलाशितः । ननाद पपन्नाई निष्ठ लिनि बाधीत ॥ १४ ॥ सात्यकिन ततस्तुंग केकयानां महारथः । शरैलेकसाहायोगरसिं पार्पयतं २५ ॥ स शरे क्षतसर्या सायाः सत्पविक्रमः । रराज समरे राजद संपुष्प से किंशुकः | और परिपक्षों से शोभित दोनों के छोडेहुये प्रकाशित बाण सष औरको गिर । १८ । हे राजा उस महाभारों युद्धमेंउनदानों के वाणों से अन्धकार सा छापा उस समयं उन महारांर्थयों ने परस्परं में एकंने दूसरे के धनुषको काटा १९। इसके पछि कोपभरे युद्ध में दुर्मदंसात्यकि ने दूसरे धनुषको लकर और तयारी काके पुद्धर्मे यहें तहिणतुरमं से अनुयिन्द के शिरची काटा।२०। हे राजा वह कुंडलों से भलं कृतं महाभारी शिर । २१. बड़े पुदमें मरे ये सम्परं के शिरके समान संघ केकेय लोगों को शोचता भी पृथ्वीपर गिरा ।२२। उस शूरवीर को मृतक देखकर उसके भाई महारयो ने दूसरे धनुप को पार करके सांस्पकी को रोका । ३३ । वह मुनहरी पुंख और तीरणधारवाले साठवाणी से सात्यकी को घायल करके सिंह | तिष्ठं यरन के साथ बड़े बैंगसे गर्जा । २४। इसके पाछ कैकेयों के पहारथी ने । हजारों वाणों से बहुत शीघ्रता पूर्वकं भुनी और छातीपर घायल किया । ३५ । के राजा वाणों से विदीर्ण सर्वाग सात्यको युद्धमें ऐसा शाभित हुभा जैसे कि फूलो | हुआ किशुकका सृत होता है । २६ । युद्धमें महात्मा कैकेय के हास घायल और and covered Satyaki with their prroxa Ayd walk od hitlor and thither gloriously. Decked with vulturb aud peacock feathers, itoir arrows | fell on all sid:9 and spread darkness in all direction. Then they out down each other's bows. Then valiant satyaki, much onragod, lav. ing prepared another buw, out of the head of Aduvind with a sharp arrow. 20. The huge head, decked witli tinge, fell down liko Samver's head to the grief of all. Seeing that warrior. dead, hia brother prepared another boy and checked Satyaki. Having wouidod.sat. yaki with sixty arrows of golden ftatbers and sharp edges; he said to him, "Stay, stay," and roared loudly. Then the Raihaya iwarrior, wounded him with many arrows on the arms and bresst. 25. With his body, pierced through by arrows, Salyaki looled glorjoys (6270) Mahabharat (६२001 १९ मतकोचिलाया. शल्य माद्रीपुर: मते सपा शासन महाराजसदेयः प्रता. या केकयो सारयाक युद्धे शरम भास्यना। सायकि सपो चापि पादयामास मारत ॥१९॥ तानमारा धारी जानतईदये भृशम विषाणापायां मागमायने ।१२॥ सरसभित्र मर्माण तायुमा सातरी रणे। सारयार सापफ राशन विध्यधतुः शरैः॥१३ ।तो सात्यकिदा महसन सो दिशः डादयन् शरवर्षण पारयामास भारत ॥ १४ ॥ पायगाणी तसलोनशेनियशप सिमशनरस्पर नुर्ण छायामासाः ॥ १५ ॥ तस्तु धनुपिडिया गौरिहायशाम ती सायकलीररियामास सपुगे ११६ ॥ प्रधान्ये पापी बिजे प्रगृख प महारान् । सात्यकि छादयतो तो चतुलंयु'मुष्टुप ॥ १७ ॥ त कृपाचार्य से लड़नलगा और शिखण्डी के सम्मए अजेय फुतरर्मा नियत हुमा ९ ६ महाराज इसीमकार श्रुतकीर्ति ने शल्यको और मादीके पुत्र सहदेवने आपके पुत्र दशासनको रोका १०i दोनों कैकेयोंने युदमें प्रकाशित वाणों की वर्षासे सात्यकी को आपेग सात्यकी ने वाणों से केकयों को दकं दिया । ११ । हे भरतवंशी उन दोनों बार भाइयों ने उसको हदप पर ऐसा कठिन यायल किया जैसे कि मन में। सम्म आनेशले दो हाथी अकेलं हाधीको अपने दांतों से घायल करते हैं । १२ । हे रांगा माणों से टेहुये करचयाले सात्यको को दोनों भाइयों ने यहा घायल किया। फिर सापकी ने सिनेहुपे घाणों की वर्षा करके उन दोनोंको सर जारस रोका। १४॥ इमके पाछे सात्यकी के वाणों से रुके हुये उनदोनों में शीघही वाणोंसे सारपाकै रथको टक दिया फिर इमपड़े यशस्वी मूवी सात्यकि ने उन दोनों के पत्र और पनुषों को काटकर उन दोनों को अपने सात्या थापकों से रोकी१६ । ततो सनदोनों ने दूसरे धनुषों को लेकर सात्याक को टकदिया और बहुत शाही शोभायुक्त होकर फिरनेसगे। १७ । और कर wonderful standard. Prioro Duryoihan cncountered Yudhishtuir elio just anu Arjun fell upon the SenrsplakDaring tho destructiro baltic Dbrishtadyumon foxigbt with Krimcbsrpa and Shikhandi with invinciblo Fritvarme. Similarly, brutkirti opposed sbalya, mad Babida, the son of Madri opposed your son Duslinaan, 13. The txo baihay# princa showerrd bright arrotx orer Satyaki. The two bravc vartiory rounded him hud on this brist an sin fornur cirplants round a single vilepistot in a format sith tleir taske. Ti. armor or Satguli vas piered by their attor. Then Saiyaki, Kamile, checked this two brother arith his arrota. Chockal bg But sahig'arrows, they wina corried his car sith their darts, 15, Then glorioak Satgali af Sat {scrils, rut dorn their gautrellas anil ky** and woundej them with his sharp arrów. They ime up nate: furt - (६१७१। कंग Karan Pary 62711 मुंका ममावाणाः कहिणवाससः । धोतयन्तो दिशः सपाः सपतः, स्वर्णभूषणाः १८ यायकारमभवन नयो राजेन्महामंधे । बन्योम्पस्य अनुभव निच्छिदुग्ने महारथाः ॥ १९ ॥ तत झुद्धो महाराज सात्यतो सुखदुर्मदः । धनुल्य समादाय साप कृत्या व संयुगे । क्षरप्रेण सुतीरंगेने अनुधिशिरोहरत् ॥ २०॥ असलिंग रामनकुण्डलोपचिसंमहत्.२१॥शन्वरस्पशिरोयन्मिहतस्थामदारण शोचयाकया समान जगामा घमुन्धराम् ।। २२ मा निर्स द्वार माता तस्प महारथः। सम्पमापन हत्वा शेने पर्यघारमन् ॥ २३॥ स यदया सात्यकि मिया स्वर्ण 'मः शिलाशितः । ननाद पहनाई विध मिनि बाधीत् ॥ १४ ॥ सास्पकिन ततस्तूर्ण केकयानां महारथः । शरेग्नेकसाहाहयोहरसिं पार्पयतं ॥ २५॥ स शो क्षतसर्यागः सात्याकेसत्यधिक्रमः । राज समरे रोष सपुष्प र किंशुकः और मोरपक्षों से शोभिंत दोनों के छोडेहुये प्रकाशित बाण सष औरको गिरे । १८ । हे राजा उस महाभारो युद्धमें उनंदानों के वाणों से अन्धकार सो गया उस समय उन महारांर्थयों ने परस्पर में एक दूसरे के धनुषको काटा ।१९। इसके पीछे क्रोधभरे युद्ध में दुपदंसात्यकि न देसरे धनुषा लेकर और तय्यारी करके युद्धर्मे पर्ने तहिंगतुरम से अनुयिन्द के शिरवा काटा।२०। हे रांजा वह कुंडलों | से अलंकृत महाभारी शिर । ११ वहे युदमें भरे पे सम्परं के शिरके समान संब केकेप लोगों को शोचतामा पृथ्वीपर गिरा २२२ उस शूरवीर को मृतक देखकर उसके भाई महारयो ने दूसरे धनुप को तैयार करके सांस्यका को रोका । ३३ वह सुनहरी पुंख और तीक्ष्णधारवाले साठवाणी से सात्यकी को घायल करके विध विष्ठ परंन के साथ बड़े बैंगसे गर्जा । २४। इसके पछि फैकेयों के पहारथी में हजारों याणों से पंहुत शीघता पूर्वकं भुना भौर छातीपर घायल किया । २५ । रे राजा वाणों से चिंदीणं सर्वाग सात्यको युद्धमें ऐसा शोभेत हुमा जैसे कि फूलो | हुआ किंशुकका वृक्ष होता है । २६ । युद्धमें महात्मा कैकेय के हास घायल और and covered Satyaki with their arroia and walkou hitler and thither Gloriously. Decked with valturd and peacock feathers; their arrows fell on all sides and spread darknoss in all directions. Then they out down each other's bow's. Then valiant Satyaki, much ohragod, lav. ing propared apothec buw, cut off tas bead of a purind prith a sbarp arrow. 20. The huge head, decked with ringe, foll down like Samvar's head to the grief of all; Sving tbst warrior dead, his brother prepared another box and checked Satyaki. Hiving rounded ŝat. yakl with sixty srrows of golden feathers and sharp edges; be esid - to him, "Stay, stay." and roared loudls. . Then the Kaikaya irarrior, rounded him with many arrows on the arms and bresst. 25. With bis body,jierted through by 21T0FS, Salyabi_looled glorious 1 [6272]. Baliablıarat (६२७२) ॥२६॥ सात्याकिः समरे पिद्धः कैकेयेन महात्मना । कैफेय पञ्चविंशत्या विम्याध प्रहसन्निध ॥ २० ॥ तावग्योन्यस्य समरे समिछ। धनुपी शुभे । हत्वा च सारथि तूर्ण हयाच रथिनांवरी। विरथावसियुद्धाय समाजग्मतुराहषे ॥ २८ ॥ शतचन्द्रपित गृह चर्मणी मुमुजी तथा ॥ २९ ॥ व्यरोपेतां ममारने निशियरधारिणी । यथा देवासरे युद्ध अम्मशको महाबली ॥ ३० ॥ मण्डलानि तताना तुपियरन्ती महारणे । अन्पोम्पममितस्तंग समाजग्मतुराइये। मन्योन्याय पधे वैय चतुर्यरनमुत्तमम्॥३१॥ कैकेयस्य निषाचर्म ततश्चिच्छेनु सापतः । सात्यफेस्तु तथैवासी धर्म चिच्छेद पार्थिवः॥ ३२ ॥ धर्म छित्या तु कैकेयस्तारागणशततम विचार मण्डलान्येघ गत प्रत्यागताम्पपि ॥ ३॥ पतंमधारने मिविशषरधारणम् । मपहस्तेन विष्ठेद नियन्त्यराषितः ॥ ३४॥ सवर्मा कैकयो राजन द्विधा लिनो महारणे । निपपात हसते हुपे'सात्यकी ने कैकपको पचीस' बाणों से घायल किया । २७ । वह राययों में श्रेष्ठ युद्धमें एक दूसरे के शुभ पनुपको काटकर बड़ी शघ्रितासे घोड़े और सारथियों को मारकर रथसे उतरकर युद्धमें खड्गों से प्रहार करने के लिये सम्मुख | हुऐ। २८ । वह सुन्दर सुना और उत्तम खड्ग धारण करनेवाले दोनों शूरवीर चन्द्रसूर्य के चित्रवाला ढालोंको लेकर उस महायुद में ऐसे शोभायमान हूये जैसे कि देवासुर युदमें महावली इंद्र और जमशोभित हुयेथे । ३० । इसके पीछे युद्धमें मंडलों को पूमते शीघही परस्पर में सम्मुख हुये । ३१ । और एक २ ने दूसरे के मारने में परे २ उपायकिये इसके पीछे सात्यकि ने कैकेयकी दालके दो खंडाकिये ।। १२ । इसी प्रकार वह राजाभी सात्यकि की सैकड़ों नक्षत्रों से चिह्नित दालको काटकर दाहिने और पायें मंडलों से घूमा । ३३ । फिर सात्यांक ने उस बड़ेयुद्धमें' शीघ्रता से घूमने वाले कैकेयको शिरछेहाय से मारदाला ।।४। राजा वह कैकेय उस घोरयुद्ध में कवच समेत दो खंड होकर ऐसे पृथ्वी में गिरपड़ा, जैसे कि यजसे like & lingkuk tree in bloom. Younded by the Kaikaya warrior, Satyaki, with a smile, sounded his adversury with twenty five. arrowr. They cut and killed each other's bows, horses and drivers, and then coming down froin their cars they stood ready to fight ' with sword:. Possessing goodly arms and swords, they took up, shields lasing the figaro of suns and mouta on them and looked glorious like Indra and Jambh in the yar between the gods and asure. 30. Then moving in circles, they oppozed each othor, each trying to slay the other. Satyaki broke the Kaikaya's shield into two parts Similarly.thab king. toe, having cut down Sityaki's shield, with moons aod stars on it, moved in right and left circles Then Satynki slew that priace with a slanting sword thrust. His nieiled body was ।
[६७३) कर्णप-Karan Parv 162731 महेन्यासो पनाहर घायलः ॥ ३५ ॥ ते निहत्य रणे शरः शैनेयो स्थानमः । युधा मन्युरपं तूर्णमारोह परन्तपः ।। ३६ ॥ ततोन्य रयमास्याय विधियत् पल्पितं पुनः । क्यानां महत् सैन्य व्यधमत् सात्याफिः शरैः । ३७ ॥ सा पश्यमाना समरे के यानां महाचमः । तमुत्लान्य रणे श प्रदुद्राव दिशो दश ॥ ३८॥ इति श्री कर्णपर्वणि विन्दानुविन्दवधे त्रयोदशोऽध्या १५ ॥ । सम्जय उवाच । थुतफार्मा ततो गलचित्रसेनं महीपतिम् । आजग्ने समरे शंख पम्साशादिःशिलीमुखेः॥१॥ मभिखारस्तु ते राजनयमिन्नतभिः । समागण मादत्य मत पिय्याध पम्चीमः॥२॥ श्रुतफमा ततः कुद्धचित्रसेन धम्मुख नारा घायल पर्जत गिरताहै। ३५। इसरीति से पियों मेंष्ठ शूरवीर सात्यकिने उस युद्ध में उसको मारा फिर यह शशुइन्ता शीघही युधामन्यु के रथपर सवार हुमा ।। और थोड़े समय पार्छ सात्पकि ने बुद्धिके अनुसार अलंकत दूसरे रथपर सवार होकर वाणों से कैकेयों की बड़ी सेनाको मारा । ३. युद्ध में वह कैकेयों की बड़ी | सेना मदाघायल होकर उस सात्यकि को छोड़कर दशोदिशाभों को भागी । ३८ -~- अध्याय ॥१४॥ सन्जय बोले कि देराजा इसके पीछे युद्धमें शोधभरे श्रुतकर्मा ने राजाचित्र | सेन को पचास पाणों से पायल किया । १ । फिर चित्रसेन ने टेपुंखाले नौ |बाणों से श्रुतमी को घायल करके पांच पाणों से उसके सारथी को घायल किपा । २ । इसके अनन्तर सेनामुखपर क्रोधयुक्त श्रुतकर्मा ने चित्रसेनको प्रत्यन्त out into two and he fell down like a bill struck down by lightning. Thus Satyaki the best of Warriors, having plain his adversary, mounted the car of Yudhamanyu. Mounted on another car, Ire'slew other Kaikaya warriors. The great army of krikayas left Satyaki "and fled away in all directions. 38. । CHAPTER XIV Sanjaya said, "Then Shrutlarma, tuuch erreged, Fonndal Princa Clutia with fifty arrows. Chitrasen wounded him with pine arrows and his adversary with five. Then Shrutkarma, nuch en. raged, wounded Chitrasen...with mans arrows in the vital parts.
Fibar । - Jahabharat (६२७१) चेन मती ममीश समापयत् ...३॥ सोतिषितो महाराज नाराबेन महामन। मिमियो धोए फरमलम विदेश ६॥४॥ एतस्मिन्नन्तरे धनं श्रुतिकोतिर्मही यशाःनवाया जपापालं छादयामास पत्रिीमः॥ ५ ॥ प्रतिलभ्य सतः सहा चित्र 'सेनो महारयः। धनश्चिच्छेद भल्लेन तज्ञ विव्याध सप्तभिः॥६॥ सोयह कामुक मादाय पेगन रुकर्मभूषणम् । विप्ररूपधरं धके चित्रसेन शरोमभिः ॥ ७ ॥ शर धिधितो रासा विश्रमाला घरो युषा । युषेय समरे शोमोष्ठीमध्ये स्वतः ॥८॥ श्रुतकमाणवेध घे नाराधेन स्तनान्तरे विमेद सरसा राजस्तिष्ठ तिष्ठति चानधीत् ॥१॥ तकमापि/समरे नांगचन समर्पितः। सश्राय रुधिरं तर गेरियाई इमाचलः ॥ १०॥ ततस कांधतांगो रुधिरेण कृतदपिः । राज समरधारः सपुष्प व कि ॥११॥ भुतकर्मा तदा राजन शत्रणा समभिसः। शवसवारण खो विधा. विच्छ तीक्ष्ण वाणों से मस्थिल में घायल किया ।।। हे मंहाराम उस महालोके नारांच से भस्यना घायल होकर वह बार मूळ युक्त होकर निश्चेष्ट होगया। इसी अन्तरमें बड़े यशस्ती श्रुतकीर्ति ने नवे वाणों से इस राजाको भी ढकंदियां ।। इसके पीछे महारथी चित्रसेनने सावधान होकर भल्ससे उसके धंनुपकों काटकर मातागों से उसको घायल किया । ६ । फिर उसने येग नाशकरने वाले तर्ण से भूषित सोम धनुषको लेकर बाणों की तरंगों से चित्रसेनको विचित्ररूप भारी किया। वह युवावस्थावाग सुन्दरमाला युक्त वाणों से वेधित होकर ऐसा शोभायमान हुमा जैसीक सभामें अच्छा अलंकृत मनुष्य होता है । फिर उस शूरनेवेगमे श्रृंतकर्याको नाराचसे छातीपर विदीर्णकर तिष्ठतिष्ठ शम्द तना रणाकया । ९ । वहां नाराचसे घायल होकर शुतकर्मा ने भी युद्ध में रुधिरको ऐसे गिराया जैसे कि पर्वतीय धातुओं से संयुक्त पर्वत रक्तवर्ण के जलकोसलता है। इसकेपो वह रुधिरसे रक्तशरीरसे युद्धरें ऐसे शोभायमानहुमा नसे कि फलाहुमा किंभुकका सलहोता है । ११ । इसके पोछ शत्रुसे भपात पानेवाले कोष. Wounded by those arrows, the prince fell into a swoou oud became motiolilend. In the mesatime Shrutkirti covered bim with ninety arrowt. 5. Chitra regaining consciousness, cut down his box snd Founded him with seven arrow. He took another rondorful bom and mide the body of Chitrasei 4 study, with the flight of his atrowo. That yoath, decked with garland, looked glurious like a great maa aurrounded by n inaltitude. 'llen he wounded Shrutkarma with an arrow on the breast and said "Stay, stay." Wounded with that Shrutharms dropped blood 29 8 mountain of red stone for rod mental from its sides. 10, With his body red on account of the cozing of blood, he looked gloriou« like'a kidebuk tree in Bloon. Wounded by the enemy, shrutkarma cit into tro tic bow of the Arrow, 162741 Jalabharat (६२७४) धेन तीण ममीश समापयत् ॥ ३ ॥ सोतिषिसो महाराज नापन महान मग मभियो पार करमलम्ब विरेश ६॥ ४ ॥ एतस्मिन्नन्तरे धनं श्रुतकीर्तिमहा यशाः नवराजप.पालं छादयामास पत्रिीमः ॥ ५ ॥ प्रतिलभ्य ततः संज्ञा चिन सेनो महारपः धचिल्छर भल्लेन तश्च विव्याध सप्तभिः॥६॥ सोन्यत् कामुक मादाय पेगन रुक्मभूषणम् । चित्ररूपधरं पके चित्रसेन शरोमभिः ॥ ७ संशर शिषितो रासा चित्रमाला घरी युधा । शुषेष समरे शोमोष्ठीमा स्वलंत ॥८ भुतकमाणक्य धे नाराक्षेन स्तनान्तरे । विमेव सरसा राजाला तिष्ठति चामधीत ॥१॥ भूतकमापि समरे नागवन समर्पितः। सथाय सपिर तमेरिका हमाचलः ॥ १० ॥ ततः स राधितांगो साधेिरेण कृतन्डषिः । रराज समरे पारः सपुष व शिक: ॥ १ ॥ भतकमा तदा राजन शत्रणा सममिसः। शसेवारण कुमो तिघा मि तोरण बाणों से मस्थिल में घायल किया ।। हे महाराज उस महाली नारांच से अस्यना घायल होकर वह बार मूछायुक्त होकर निश्चेष्ट होगया। इसी अन्तरमें बड़े यशस्वी श्रुतकीर्ति ने नये वाणों से इस राजाको भी दकंदियां ।। इसके पीछे महारथी चित्रसेनने सावधान होकर भल्लस उसके धनुपकों काटकर मातयागी से उत्तको पापल किया । ६ । फिर उसने वेग नाशकरने वाले तर्ण से भूषित सौम. धनुपको लेकर बाणों की तरंगों से चित्रसेनको विचित्ररूप भारी किया। वह युवावस्थावाला गुन्दरमाला युक्त वाणों से वेधित होकर ऐसा शोभायमान हुमा जैसीक सभा अच्छा अलंकृत मनुष्य होता है । ८ । फिर उस शूरनेवेगसे भूतकर्माको नाराचसे छातीपर विदीर्णकर तिष्ठतिष्ठ शब्द उच्चा रणारया । ९ । वहाँ नारायसे घायल होकर श्रुतकर्मा ने भी युद्ध में रुधिरगे ऐसे निरापा जैसे कि पर्वतीय धातुओं से संयुक्त पर्वत रक्तवर्ण के जलकोदालता है।१६। इसकेपछि वह रुधिरसे रक्तशरीरसे युद्ध ऐसे शोभापमानही मसे कि लाहुपा किंशुकका होता है । ११। इसके पोस शानुसे मयात पानेवाले काय. Wounded by those arrow, the prince toll iato swood Aud bocane motiolless, tri the meantime Shrutkirti covered bin with ninety arrowl. 5. Chitra regaining consciousness, cut down his box. snd poupled him with seven arrows. He took another wonderful box Balcano iné body if Crikimai 203, with a light Vi VISATTUN. That youth, decked with garland, loolsed glurious like a great mai surrounded by H.multitude. Thea he wounded Shrutkarma with an arrow on the breast and said "Stay, stay." Wounded with that Arrow, Shrutlarma dropped blood : a mountain of red stone flowe rod sintets from its sides, " 10. With his body red on account of the oozing of blood, he looked glorious like a kidsbuk trco in bloom. Wounded by the enemy, Shrutkaraaa cut into two tho bow of this (६२७१) कर्णपर्व Karan Pare [ G279] मोणपुत्रमयमाप सिंहनाद ममुश्चत ॥ ४॥ शरांतता द्रोणिः संवाय्यं युधि पाण्डयम सलारभ्यहनाजन् नारान स्मपग्निय॥५॥ ललाटस्य ततो याणं घार पागास पाण्यः । पपायने इस बड़ा पारयते नुए६ ॥ ततो छोणि रणे मोमो पतमा पराकी भिधिम्याप नागपललाट विस्मयालय ॥७॥ ललाटस्थ नतोपाजेप्रांप्रणोतो म्यशामता प्रायपोष यया मिलिजः पवतोनमः ॥ ८ ॥ मत शामगिरदयामास पाVARIनन करायामास माहरिषेष पर्वतमा९॥ तपेय पासपो युवं द्रौनिं शरतशितः 1 माकम्पपत सरी थाप्योंपर पर्वतम * १० ॥ तायग्योम्यं शरपरिवार पानी महारयो। पपयाती पीरो राशमाते पकोड करो ॥ ११ ॥ मादिरयायिष संदीगे लोकक्षाकरापुमो । घरश्मिमिरिकाम्योपंताप पम्सो उपक्षमः ॥ १२ ॥ ततः प्रतिकृते पतं कुर्वाणो तो महारणे । तमविरुवे यसो 1४। इसके.अनन्तर मंदमुमकान करतहुपे अश्वत्पामा ने याणों को रोककर माम. सनको नाराचों से ललाटपर घायसाकया। ५। तप भीमसेनने ललाटपर वर्षमान पाणों को पैसे पारणकिया जैसे कि गेंडा सींग को पार करता है। फिर मन्दमुसकान करते पराक्रमी भीमसेनने पदमें उपाय करने वाले प्रत्पत्यामाको तीन नाराघों से ललाटपर येपा । ७। तब वह प्रामण ललाट पर नियतहुये वाणों से ऐसा शोभायमान हुमा जैसे कि जससे साँचा हुमा तान शिखर रखनेराला उसम वर्मत होता है । इसके पछि अनस्यामा ने कहा पाणों से भीमसेन को पारित किया परन्तु उसको ऐसे कम्पायमान न करसका जैसे कि यायु पर्वतको नहीं कंपासको । ९ । फिर अत्यन्त प्रसन्न पादुनन्दन भीमसेन ने भी इसको ऐसे पापमान नहीं किया जैसे कि जलका समूह पर्चत को कंपापमान नहीं करसका 1१1 परस्पर पोर याणों से दकवेहुये उत्तम रघॉपर सपार पराकम से मववाले वर दोनों महारंपी शूरवीर महा शोमापमान हुये । १फर वह दोनों मूर्य के समान प्रकाशिव लोकके नाशक अपने तेजों समेत उसम २ बाणों से परस्पर smiling slowly, cbocked Bhim's arrots and sounded him on the fore. head. The arrow stuck to the forehead of Bhim liko tho bora of rhinocerox 6, Then he wounded: durathama with thres arrows va thio forchend. Tho Brahman, with the arrows stuck to his forobaud, loobodliko a threw poiked mountain with its valorfalls. Then Ashra. tha'os wounded Bhim with hundrods of artown, but could not sbako bim At thu mind cannot shaka a mountain. Birailarly, Bhimsea of cheerful mind quid not shake him as a strain of water is unablo to 'abato a mountain. 10. Hiding aach other with drandful arrori wananland on occolleat curs, proud of their prosedun to'two braro war. riore, Fero very glorious to behold. Bright like the San tbo two 1-6278.] Mababharat •(६२७८ माने समन्ततः । द्रौणिरेकोऽययातर्ण भीमसेन महाबलम् ॥ ३८॥ ततः समागम घोरो पम्प सहसा तयोः । या देवासुरे युद्धे युभपासपोरिभूत् ॥ ३९ ॥ इति श्री कर्णपण चित्रवधे चतुरदशोऽध्यायः १५॥. सजय उपार । भीमसने रातो द्रौणी राजन् विम्याप परिणा। परया वरया' गुको शेयबलापम् ॥ १५ तध पुनराजाने नवत्या निशितैः शरैः । समीण संप्रेक्ष्य मम्मठो लघहस्तपत् ॥ २ ॥ भीमसनः समाझीणों द्राणिना निशितैः शी। যে মই মিমানিত মাস্কঃ ॥ 3 বৰঃ নাহুমুল যুক্টর বাম से घायल होकर भागनाने पर अकेले अश्वत्थामा शीघ्रही महावली भीमसेन के सम्मुख गये। ३८। इसके पीछ अकस्मात् उन दोनोंका परस्पर में भिड़ना ऐसा 'महा भयकारी हुआ जैसा कि देवासरों के युद्ध वृत्रामुर और इन्द्रका हुमाया।।९। अध्याय ॥ १५ ॥ संजय बोले हे रामा इसके पीछे बड़ी शीघतायुक्त भलाकी सामता दिखाते हुये अश्वत्थामा में वाणसे भीमसेन को पायल किया। १।फिर मर्मत इस्तमाययी अश्वत्थामा ने सबमों को जानकर तीक्ष्ण धारयाले नव्धे पाणों से भीमसेन को पायल किया। २ । हे राजा अश्वत्यामा के वीक्ष्णधार वाले वाणांसे छदामा भीमसन युद्धमें सूर्यके समान शोभायमान हुआ।३। इसके पीछे भीमसेनने अच्छी रीति से फेंके हुये हजारवाणों से अश्वत्थामा को ढककर वहामारी सिंहनाद किया the wind. At the dispersion of thaí army Ashwathama," alone oncountered Bhim and their fighting was dreadful; like that of Vrita sur and Ipura."39, CHAPTER XVI Sanjaya continued, "Thon Ashwathama, showing his: wounded Bhim with bis artOw6. Dezteroua Ashwathama, wbo the vital parts well, wounded Bhimson with ninety arrows. p' hy Ashwathara's sharp arrows, Bhimsen looked glorious like Sun.' Then Baim covared Asbwathama with a thousand dircharged arrows and scored a loud solr. Thea कर्णपर्ष Karan Pare [62701 प्रोणपुत्रमयजय सिंहनाद ममुऽसत ॥ ४ ॥ शरः शरांतता द्रोणिः संपाय्यं युधि पाण्डयम ललाटेश्यहाजन नाराधेन स्मयाग्नष ॥ ५॥ ललाटस्ये सतोषाणं धार पागस पाणः। यया नयने रसायगा पारयत नुप ६. सतो द्रौणि रणे भीमो यसमा पराक्रमी निमिपिण्याप नागर्ललाटे विस्मयांनष ॥ ७॥ ललाटस्य नतो पाणेमांप्रमोसो व्यशामत । प्राथपोष यया मिश्रितः पपंतोत्तमः ॥ ८ ॥ नतः शागिरदयामास पाOTARIA न कमायामास मातरमधेष पर्वतमा९॥ तपय पासपो युरेब्रोनि शरशतः शितः । माकम्पपत सर. याप्योंपरष पतम ॥ १०॥ तापग्योम्य शरपरिरछापानी महारपो। स्पषयगती वापराशमाते पळोद करो ॥ ११ ॥ मादिरयाविध संदीको लोकसरफरामो । परहिममिरिणयोग्य ताप पम्तो रामः ॥ १२ ततः प्रतिकृते परनं कुर्वाणी तो महारणे । कृतमविरुवे पो 1४। इसके.अनन्तर मंदमुमकान करतहुपे अश्वत्थामा ने यागों कोरोकर भीम. सनको नाराचों से ललाटपर पायसकिया। ५। तप भीमसेनने ललाटपर वर्तमान वाणों को ऐसे पारणकिपा जैसे कि मेंहा सांग को धारणकरता है। । । फिर मन्दमुसकान करते पराममा भीमसेनने पदमें उपाय करने वाले प्रसत्यामाको तीन नारापों से ललाटपर येधा । ७। तब वह बामण ललाट पर नियतहुये वाणों से ऐसा शोभायमान हुभा जैसे कि जलसे साँचा हुमा तीन शिखर रखनेवाला उत्तम यमेव शेता है । इसके पीछे अश्वत्पामा ने सैकड़ों याणों से भीमसेन को साहित किया परन्तु उसको ऐसेः कम्पायमान न करसका जैसे कि यायु पर्वतको नहीं कंपासको ।९ फिर अत्यन्त प्रसन्न पाडुनन्दन भीमसेन ने भी इसको ऐसे कंपापमान नहीं किया जैसे कि जलका समूह पन्नत को कंपायमान नहीं करंसका । १० । परस्पर पोर याणों से टकते हुये उत्तम रथोपर सवार पराकम से मववाले वा दोनों महारयी शू'पीर महा शोभायमान हुपे । ११ । फिर यह दोनों मूर्य के समान प्रकाशित लोकके नोशक अपने तेजों समेत उत्तम २ बाणों से परस्पर | amiling alonly. chocked Bhim's arrors and rounded him on the fore: head. Tho arrow stuck to the forehosd of Bhim like the born of . rhinoceron.G. Then he wounded:Ashwathama with three arrors on the corcliend, Tho Brahman, with the arrows stuck to bis forobend, loolot like a thne poaked mountain with its valorfalls, Then Ashwa. thapa wounded Bhim with hundreds of arrows, but could not sbako him as the wind cannot shake a mountain. Similarly, Bhimson of cheerful mind could not shska him as a stronie of water is unable to abits s mountain. 10. Hiling each other with dreadful arrowst mountal on excellent curs, proud of their proton, the two bravo war riors feru very glorious to bebold, Bright like the Ban to two 62801 Vahabharat शरसंधैरमीतयत् ।। १३ ॥ ज्याम्राधि च संग्राम घरतुतो नरोत्तमो। शरदंष्ट्रो कुरा घर्षों चापपपत्री मयसरी ॥ १४ ॥ ममता वारश्यौ च शाजाला समन्ततः । मेष मारियच्छन्नी गगन चन्द्रमास्करो ॥ १५॥ धकाते मुन तवस्तारयरियो । विमुक्कापनजान अङ्गारकवुधाधिय ।। १६॥ अथ तव समामे वरमाने सुदारुणे । अपसव्य ततय द्रोणिस्ता फोदरम॥१७किररशतेदोगभिीर पतन तुमुन्ममृपे भीमः शोधिजयलक्षणम् ॥ १८ ॥ पविध सवो राजर पावरकोप सभ्यतः । मण्डलानो मिमा गतप्रापागपु च ॥ ३९ ॥ बम्ब तुमुळे युद्धको पुरुषसिंहयोःचरित्या विविधान् मार्गान् मपहलस्थानमेव ॥ २० ॥ परे पाय वोत्वरेन्योन्यमभिजामतुः । अन्योन्यस्य पधे पैर धतुपानमुखमम् ॥ २१॥ ईशक्ष संतप्त करनेवाले हुये । १२ । इसके पीछे वह दोनों युद्ध में निरके समान बदलाने में उपाय करनेवाले हुये । १३ । वह दोनों नरोत्तम पद भ्यानों के समान भ्रमण करनेवाल हुये पाणरूप जिनकी हा और भयानक पनुपही जिन का मुखधा । १४ । वह दोनों वाणों के जालसे सुन भोर से ऐसे गुप्तहोगये से कि बादल के जालोसे ढकेहुये भाकाश में चन्द्रमा और सूर्य होते हैं । १५ । इसके पीछे पड़ शत्रुता दोनों एकमुह मेंही ऐसे मकाशमानहुये, जैसे कि पादलों के जाल से निकले हुये मंगल और बुध होते है। इसके पीछे अत्यंत भपकारी पद जारी होने पर वहाँ अवस्थामा ने भीमसेन को सैकड़ों उग्रवाणों से ऐम दकदिया । १७ । जैसे किधारामों से बादल पर्वतको दकदेता है फिर भीमसेनने मी शके उस दिनप के कतण को नहीं सहा । १८ । इसके पीछे पाण्डयने भी दारिन भीर बायें पदनों के भागों में जाना आनाकया । २९। और दोनों पुरुष सिंहों में पड़ातुमुल युद्धामा और विविध मार्गों से पंढल किये । २० । फिर हरएक ने कानतक संचहुये बाणों से परमार में एकने दूसरे को घायल किया और एकने दूसरे के मारने में बड़े २ उत्तम उपाय किये । २१ । युद्धमें एक दूसरेका विरथ destroyers of the world, scorched each other with their good arrows. Fearlessly fighting, each desired to be revenged on the other. Thor roamed choro like tigers, having arrow for their fangs add drondful bora for mouths. Midden with arrows they looked like the Sun and the womhidden by clouds. 15. Shretly after they shown brightly Jike Mangal and Budh coming out from clouda Then the battle was drexdful and Ashtalkama hil Ahim by numerous arrowe, like bo zain pouring over a mountain. Dhimen could not bear that demogurat ion of his foe's victory and mored in right and left circla. The Luttle #ns sory severe beitern thua tro lions amnog mm who mated in various foris of circular 1av vements, *0. Then they wounded ach other by arrows'urawn to the ins voi tuo to kill । {६२८ माय Katauary 16261) वियप कमन्यान्यमाघरे । ततो होणिहामाणि मायके महारथः ॥ २२ ॥ तात्यप सारे प्रतिजय पाण्यः ततो घोरं महाराज मनयुद्धगयत ॥ २३ ॥ प्रत्युवं यथा मोर पसाहरणे बभूत् । ते यानाः सगसरसन्त मुक्तास्ता यान्तु मारत ॥२४॥ चातयन्ती दिसा: सस्तष भेग समन्ततः । याणसंधैर्यत पोरमाकाश सम TI ॥ २५ ॥ उमापातायत युरं प्रशानां संख्ये नृप । पाणाभिघातात साडेतत्र भारत आयफ ॥ २६ ॥ मपिछलिलो दीप्तास्चियाय हमाहिमादयमा प्रसिया महाराज संमत तोमपन् पचः ॥२७॥ युमागामति सय युद्धमेतदिति प्रमो। सर्प पुदामि तस्य कलां गादन्ति पोडशीम् ॥ २८: । नेश पुगयुंद गविण्यात कया पना महो नि सपन्नायुमो प्रानपक्षत्रियौ ॥ २९ ॥ अहो शायण संयुकापुमी धोन परापा। मदो भीमपली भीत पतस्य च एताना ॥ ३० ॥ पदो दीप्यस्य सारण करना चाहा इमरे पाडे महारगी मसत्याना ने युद्ध में महामनों को प्रकट किया १२२ । पारडसने उन अखों को अपने प्रशो नही किया इसके पीछे असाका ऐसा पोरयुद्ध नारीमा जप्ते कि जीवोंको मन में ग्रहोंका घोर युद्ध हुमाया॥२३॥ भरतवंशी उनोनों छोड़ेगे यह वाण चारों ओरसे सबदिशा और आपकीसेनाको मन्त्रकार प्रकाशित करनेगे और याण मोंसे पास माका महाभयानक रूप हा। राजा को जाना मलप में उस्कापातों में संयुक्त युदया था कोही वहां सयों के प्राचानने पेगी अग्नि उत्सन्न जिस कि सिंगरखने वाली महाशमान अग्निको ज्याला हानी है। २६ 'किर अग्नि ने दोनों सेनाओं को भस्म किया तर यह सिदलोग पाकर करने लगे। २७। कि सरयुटों में यहभी युवा | है भोर मयुद्ध इस युद के पोदशांश कलाके भी समान नहीं है । १८ । ऐसा युद किरकमी न होगा बड़ा आश्मायहे कियह बामण भार क्षधी दोनों शानस पूर्णी १२९पर दोनों पराक्रमा भनी २ उप्रगुरता भास संयुक्त और भीमसेन भयानक पराममोहे और इसकी अराधनाभी पूर्ण है ।10। इन दोनोंको मतिप्पा और बड़े । each other. Thoy tried to destroy each other's car. Then ashwathana mudo uso of his celestial weapons; but the Panday destroyed them with his own. The tro heres fought like thoplanets in pralaya. The anos discharged by thom illuinined tào dirations,' and tho oky, orereast with thosluminoas arrows, looked ominous. 25. The AITOWS full down liko mutors and shod lustro like the flames of 612, bnrning loth armics, Ttca tio sidhas said, "This battlo surpasses al), others are not equal to the sixteenth part of it. Ibao is no likelihood of such a balllo securricy agaita Tha Dol mio aod the kabatrya no both matters of the ait: byth Te brave and Dhich in drewdlul in motor sd a fiolectinifilo could go of visporu.Jo.
1 [62821 Mababharat (६२८२] महासष्ठयमेतयोः । स्थितावेतौ हि समरे कालान्तकपमोरमौ ॥ ३१ ॥ रुदौ द्वाविव सम्तो यावाविव भास्कर । यमो या पुरुषम्यानी धोररूपावुभौ रणा ३२ इतिवाचा स्म ध्यादे लिबानां धै मुहुर्मुहुः । सिंहनादश सम्बन्ने समेताना दिवौकसाम् ॥ ३३॥ अमृतचाप्यचित्पन्ध इष्टया कर्म सयो रणे । सिवचारमसंघानां विस्मयः समप चत ॥ ३४॥ प्रशंसन्ति तदा देवाः सिवाय परमर्पयः। साधु द्वामे महायाहो साय भीमेति चावन् ॥ ३५ ॥ तो रो समरे राजन् परस्परकतागसी। परस्परमुदीक्षता शोधाश्त्य वा ३६ ॥ कोघरके क्षणेतातु,शोधारमस्फोरताघरी । क्रोधात संघ एशनी तथैवदशन। ३७ सम्योग्यं सदयतो स्म शत्कृष्ट्या महारपो शरा सुधारी समरे शषिरप्रकाशिनी ॥ ३८ ॥ तारन्योन्यं ध्वज विध्या सारथिम्ब महा । अन्योन्पस्य हवान विद्या विमिदाते परस्परम् ॥ ३९ ॥ ततः कुखी महाराज साहस भपूर्व यहकाल और मृत्युकेसमान दोनों युद्धमें नियतहैं । ११ । यादोनों रुद्रकेसमान प्रकटहुये दोनों सूर्य के समान है अथवा दोनों पुरुषोतम घोररूप यमराज के रूप। १२ । यह सिद्धोंके वचन बारम्बार मुनेगये और भागनेवाले देवताओं के सिंहनाद मारम्भहये । ३३ । युद्धमें उन दोनोंके. अपूर्व बुद्धिसे बाहर कर्म को देखकर सिद्ध और चारण लोगोंके ममूरको यड़ा आश्चरप हुआ । १४ । सब देवता सिद्ध भौर परमपियों ने प्रशंसाकरी कि हे महावाहु अश्वत्थामा और हे महाया भीमसेन तुपदोनोंको धन्यहै । ३५ । हे राजा परस्पर अपराधकरनेवाले उन दोनों शूरोंने युद्धमें क्रोध से भाखाको फाड़कर परस्पर में देना । ३६ । वह दोनों क्रोधसे रक्त नेत्रहो कोषसेही ओठाके चावनेवाल होकर दांतों के किटकिटा ने वाते हुये । ३७ वाणुरूप जलधारा और शखरूप विजली से प्रकाश करनेवाले दोनों महाधियों ने बाणों की वर्षा से परस्पर में दकदिया। ३८ फिर उनदोनों ने परस्पर की अजा और धारयीको वेधकर प्रत्येकन दूसरे के घोड़ोंको पायल करके परस्पर में घायल किया । १९॥ हे महाराज इसके पीछे परस्पर मारने के Their courage is worthy of respect. They stand like Death in the field. They are like Radra and Siryn, or they may be compared to Yaas.". Such were the words of the Sidhas, while the goda ran away roaring. The Sishes sud charas Howdered at their windertial prowess. The gods, sidhes and rishis praised their worle and gara them cheers. They looked at each other with angry, staring eges. red in anger, thoy bit their lips and gnasked their teath. Poaring forth ekswers otazone and dashing out their weapons, both the warriors watered each other with arrova.38. They pierced soch other's standards and drivers and wouoded tbeir' horses and then- KIFE The desirous of slaging each other, both of thom discharged With eyes.
(६३८३). ugg Laran l'ary {62831 वाणी गृह्य महाहये । उभी चिीक्षातस्तूर्णमन्यान्यस्य पधैषिणों ॥ ४० ॥ तौसायको महाराज पोतमानो चम्मुखे । बाजानतुः समासाद्य वनगा दुरासदी ॥ ४५ ॥ तो परस्परपेगारच शपच्याच भूशाहती। निपेततर्महापीयर्यो ग्योपस्थेतयोस्तदा ॥४२॥ तत सारधिनारया द्रोणपत्रमचेतनम् । अपोवाह रणानाजन् ससैन्यस्थ पपतः । ४३ ॥ तथेष पावं राजन् विलं तं मधुर्मुहुः । मोवाइ स्नाजी साथिः शत्रुतापनम् ॥ ४४ इति श्री मणपाणे अश्वत्थामायुद्ध पंचदशोऽध्यायः १५ ॥ धृतराष्ट्र उवाच । यथा संशप्तकः सार्धमज्जुनस्यामपद्रणः । अस्येपर महापानां इच्छापान क्रोध भरेहुये उन दोनों ने युद्ध में वाण को लेकर शीघही एकने दूसरे के ऊपर फेंका। ४० । उनपजके समान वेगवान विजयी भौर सेनामुखपर प्रकाश मान दोनों ने सम्मुख पाकर परस्पर में शायकों से घायल किया । ४ । सय | परस्परकी तीव्रता और बाणों से घायल बड़े पराक्रमी वह दोनों रथों के बैठने के स्थानों में गिरपड़े । १२ । इसके अनन्तर सारथी अश्वत्थामा को अचेत जानकर सब सेनाके देखतेहुये युद्धस दूर लेगया । ४३ । हे राजा इसीप्रकार भामसेनका | सारथीभी उस वारम्बार शत्रुओंके तपानेवाले पाण्डव भामसेनको युद्धमें रथकेद्वारा दुरले गया ४४॥ अध्याय १६॥ धृतराष्ट्र पोळे जिसमकार अर्जुनका युद्ध संशप्तक लोगों के साथ और अन्य रामाका युद्ध पाण्डवोंके साथहुआ उसको मुझसेकहो । १ । संजय अश्वत्थामा arrows in anger, 40. Swift like vajra, the two conquering warriors stood at the entrance of the array and wounded each other, 'Wounded by sach other's arrows they tell down in a swoon on their seats in the cara. Seeing that Ashwathama had fainted, the driver took hica far away from tho sceno of action. Similarly, Bbimsen the des troyer of foes was romoved by the driver." 4.1 CHAPTFR XVI "Toil we" said Dhritrashtra, "how Arjun fought with the Sia. sáptals and how other kings fought with the Pandavas. Tell me, o [६२८५) कर्णपर्य Karan Pary [ 6285) मिषद्धमभित्यमतात्कटाः ॥ १० ॥ निम्नन्तमभिजन से शरैः श्रृंगारवर्षमाः । तस्य तेपाच ताबमभवालामहर्षणम् !प्रैलोक्यविजये यद्वंदेत्यानां सह पत्रिणा ॥ ११ ॥ अरमाणि संघार्य द्विषता. सर्वतोर्जुन.। पुभिपहुभिस्तूर्ण यिध्या प्राणान् जहार सा॥ १२ ॥ भित्रिवेणुचक्राक्षान् इतयोधावसारधीन् । विध्यस्तायुधतणीरान समुन्मथितकेतनान् ॥ १३ ॥ सांउन्नयोक्त्ररश्माकान् विधस्थान् फूिच रान् । बिमस्त वापरयुगन् विमुस्ताक्षप्रमण्डलान. ॥ १४ ॥ रथान विशकलीकुर्धन् महाभ्राणीय मारतः ॥१५॥ विस्मापपन प्रेक्षणीय द्विषतां भयवद्धन । महारथसहमस्य समं कर्मा करोज्नयः ॥ १६ ॥ सिद्ध देवपिसघाध चारणास्यापि तुष्टुयुः । देव दुन्दुभयो नंदुः पुष्पवर्षाणि बापतन् ॥ १७ ॥ केशवार्जुनयोदिन प्राहयागशरीरिणी । चन्द्राग्न्यनि निमित्त सम्मुख जाकर प्रहार करें उसी प्रकार उन क्रोध से भर बड़े शूरवीरों ने उस क्रोधयुक्त और प्रहार करनेवाले को वाणों से घायल किया उसका और सब लोगोंका यह घोरयुद्ध ऐसा रोमहर्पण करनेवाला हुआ जैसे कि तीनोंलोकों के विजयके लिये देत्योंका युद्ध इन्द्रकेसाथ हुआया । ११ । उस भर्जुन ने अपने प्रस्खों से शत्रुओं के प्रस्त्रों को रोककर बहुत शीघ्र वाणों से विदीर्ण करके प्राणों का हरण किया जिनके तूणीर चक और रथके अंग दुटगये और सारथियों, समेत घोड़े भी मारेगये और धनुप वा ध्वजाटूी और स्थकी वागडोर टूर्वी रथसे कूवर जुदेहुये और स्पन्दनोंके जुये पहिये आदि भी गिरपड़े ।१४। उन रथोंको खण्ड२ कराताहुमा ऐसे चला जैसे कि बड़े बादलों को खण्ड २ करता वायुचलनाह।१५ भाश्चर्य उत्पन्न करानेवाले अर्जुन ने शत्रुओं को भय करनेवाले दर्शनीय हजारों महारथियों के समान वल किया । १६ । सिद्ध देवर्षि और चारण लोगों ने भी इसकी प्रशंसाकरी देवताओं ने दुन्दुभी बनाकर पुप्पों की वर्षाकरी । १७ । वह पुष्प श्रीकृष्ण और भर्जुन के मस्तकपर गिरे और प्राकाशवाणी ने कहा कि श्री. arrows. Similarly, with thousands of his arrows, he cut and slas cars, clopbants, horses and their riders and sent them to tho region of Yan..They rushed npon that destroyer of foes like angry bulls, bel. lowing after a cow and wounded him. His battle with them was very so vero liko lodra, desirous of conquering the three worlds, with the Daity29. Ho cliecked tho Feapons of the enomics and wounded and alew them with his arrows. 12. He went on dispersing the car.sarriors as the wind does the clouds, breaking, cutting off the quivers, wheels and other parts of cars, lorses, drivers, bows, standards, traces, yokes and spokes of wheels. 15. Exciting wonder, Arjun tho terror of foes, worked as if he had tha strength of thousands of war. riors. 'The Sidhas, rishis and Clearans praised his work, while the gods showeral on him flowera with the heat of drums. Flowers fell down (6286) Mahabharat (६२८६१ लमीणा कान्तिदीप्तिबलद्युतीः ॥ १८ ॥ यो सदा विनताराविभी तो फेशवाजुना। ब्रह्मशानापियाजेयौ धीरायकरथे स्थिती । सर्वभूतवरी धीरो नरनारायणाविमौ ॥१९॥ इत्येतन्मादावर्य दृष्ट्या भुत्या च भारत । अश्याथामा ससंयत्तः कृष्णायभ्यद्रवदणे ॥ २०॥ अथ पाण्डवमस्यन्तममित्राकरान् शरान् । पुणा पाणिनाइय प्रहसन प्रोनि रब्रवीत् ॥ २१॥पदि मा मन्यसे वीर मातमाहमिवासिथिम् । ततः सात्मनाय स्वं युदातिथ्य प्रयच्छ मे ॥२२ ॥ एवमाचार्यपुत्रेण समारतो युयुत्सया । यामेनर्जुनारमा नामिविवाह जनार्दनम् ॥ २३ ॥ संशप्तकाश्च मे धध्या द्रौणिराहयते व माम विदा नन्तर प्राप्त शंस मेतद्धि माघव ॥ २४ ॥ भातिथ्यकर्माभ्युत्थाय दीयता यदि मन्यसे ॥ २५ ॥ एवमुक्कोपहत पार्थं कृष्णो द्रोणान्मजान्तिफे। जेषण विधिनाहूतं घायुरिन्द्र मिम्वाध्वरे ॥ २६ ॥ तमामध्ये कतनस फेशो द्रौणिममधीत् । अश्वत्यामन स्थिरी कृष्ण और अर्जुन सदैव चन्द्रमा वाप अग्नि और सूर्यकी कान्ति और तजको पुष्ट करते हैं । १८ । वह ब्रह्मा और शिवजी के समान श्रीकृष्ण भौर, अर्जुन एक स्थ पर नियत सवजीवों में श्रेष्ठ दोनों नर नारायण रूप धार हैं । १९ । हे भरतवंशी इस बड़े भाचर्यको देखकर बड़े सावधान अश्वत्थामा युद्धमें श्रीकृष्णाजी के सम्मुखगया। २० । फिर जिनकी नोकें शत्रुओं के मारने वाली थी उन पागों के चलानेवाले पांडव अर्जुन से वाण पकड़ने वाले हायके द्वारा बुलाकर यह वचन बोला । २१ । हे बार जो यहां वर्चमान सम अतिथि रूपको पूजनके योग्य मानता है तो तुम सब आत्मासे युदरूप अतिथि मुझको जानो । २२ । इसमकार युद्धाभिः लापी आचार्य के पुत्र से घुलायेहुये भर्जुन ने अपने को बहुत कुछ माना और श्रीरुप्मना से कहा । २३ । कि मैं संसप्तकों को मारसकाई भोर भवत्थामा मुझको बुलाते है इस स्थानपर जो उचित होय वह आप मुझसे कहिये । २४ । जो भाप मानते हैं तो उठकर अतिथि कर्म कीजिये । २५ । ऐसे कहेहुपे श्रीकृष्णनी न बुद्धिके अनुसार बुलायहुये अर्जुनको विजयी स्थकी सवारीद्वारा अश्वत्थामा के समीप ऐसे पहुँचाया जैसे कि वायु इन्द्रको पारमें पहुँचाता है । २६ । केशवजी on the heads of Shri Krishn and Arjun and the hearenly voico Faid, "They are the glory and power to the moon, wind, fire and Sun. Shri lírishn and Arjun, mounted on the saine car, liko Bralıma and shiv aro Nara and Narayan the best of being." Seeing this greut'wooder Aslwatbama carefully approached Shri Krishn. 20. lo beckoned Arjun tho destroyer of fors and said, Slow mo the respect duo to an untimely guest, if you think my worthy of it Thuo challenged by this son of Acharya, arjua thought highly of himself and said to Krialın, "I would destroy the Sjuspataks, but I am challenged by Ashwatbao. Pray let ito know what is proper to bo don under the circumstado. Hocour the guest if you would." Tlur sudiwatu!
(६२८७) कर्णपर्ष Karan Pare [6287 ] भूत्या प्रहराश सहस्य च ॥ २७ ॥ नियष्टुं भर्तृपिण्ड हि कालोपमुपविनाम् । मुक्ष्मी घियादो विप्राणां स्थली क्षात्री जपाजयो। २८ । पामध्यर्थयस महादिम्पा पाधिस्थ सक्रिपाम् । मामातुमिच्छन् युध्पपस्थिरी भवाय पाण्डवम ॥ २९ ॥ इत्युको घामदेवेन व्ययुक्त्या द्विशोचमः । विम्याध फेश पदयानारावैरर्जुनं प्रिभि ०३. ॥ सस्थार्जुनः मुसस्त्रिभिः शरासनम । चिच्छेद चान्यदादच द्रोणि घोरतरधनुः ॥ ३१ ॥ सज्य कृत्वा निमेषाव विम्याधाजनकेशयो । त्रिभिः शतैर्षासु देव सहमेण च पाण्डघम् ॥ ३२ ॥ ततः शरसहसूगणि प्रयुतान्यनुदानि च ।सएसे द्रौणिरायस्तः समभ्य व रणेजनम् ॥ ३३ ॥ पुधेधनुषश्चैव ज्यायायवाय मारिष। घायोः कराभ्यामुरसा बदनमागतः ॥ ३४. कश्या शिरसोने या लोमधर्मप उस एक चित्त अश्वत्थामा को सम्बोधन करके वोले कि हे अश्वत्थामा शीघ्र नियत | होकर घात करो और क्षमा करो। २७ । स्वामी के अर्थ नमकहलाली करने का | यह समय हे बामणों का सम्बाद बड़ा मूक्ष्म है और तत्री, सम्बन्धी विजय और पराजय योग्य है । २८ । तुम भमानता से अर्जुन के, जिस दिन्य और उत्तम कर्म को चाहते हो अब उसके भभिलापी होकर तुम नियत होकर पाण्डवों से युद करो १२९ । श्रीकृष्णानी के इसमकार के वचनों को सुनकर अश्वत्थामाजी ने बहुत अच्छा कहकर भाउ नाराचों से केशवजी को भौर तीन बाणों से भर्जुनको घायल किया । ३० । फिर अत्यन्त क्रोधयुक्त अर्जुन ने उसके धनुप को तीनवाणों से काटा । ११ । तर अशात्यामा ने बड़े घोर दूसरे धनुपको लिया भोर क्षणभर मेंही श्रीकृष्ण और अर्जुन को पायल किया तीनसे बाणों से वासुदेवजी को और हजार वाणों से भर्जुन को घायल किया । ३२ । इसके पीछे उपाय करनेवाले अश्वत्थामा ने युद्ध में भर्जुनको रोककर हजारों वाणोंकी वर्षाकरी । १३ । हेरेष्ठ उसब्रह्मादी Shri Krishn drove the car of invincible Arjun towards Ashwathama and brought himn Otar his adversarry as the wind brings Todra to a Sacrifica Krisha then addressed Ashwathama, intent on fighting, in the following words:-"Be pleased to begin your work at once. This is the time of showing your faithfulness towards your master. The meeting of Brobmans is very diflicult, while the kshatryas are born to conquer or be defeated. The celestial work of Arjun which you foolishly desire to witness, will come to your experience in your encoun, ter with the Pandavas," On hearing the words of Krishn, Ashrathama said, "Very well," and wounded Kesbar with eight darts and Arjun with three. 30. Then Arjun much enraged, cut down his bow with three darts. Aslwatbama took up another dreadful bow and at once vyounded Shri Krishn and Arjun. With three hundred he wounded Vasudev and Arjun with a thousand. Then Ashwatha.
- [6288 ] Malabharat १३२८८) एव च । रथवजेभ्यश्च रा निप्पेतुब्रह्मवादिनः । ३५ ॥ शरसाटन महता विषा माधधपाण्डयो। ननाद मुदितो द्रौणिमहामेघौघानधनम् ॥ ३६॥ तस्य तं निनद भुत्या | पाण्डवोच्युतमनधीत् । पश्य माधय दौरात्म्य गुरुपुत्रस्य मा प्रति ॥ ३७ ॥ वधं प्राप्ती मन्यते नौ प्रवश्य शरवेशमान । एपोस्मि हन्मि सङ्कल्प शिक्षया व वलेन च ॥ ३८ ॥ मबत्याम्नः शरानस्तांदिछत्वैफ विभित्रिभिः। व्यघमन्दरतयेष्ठी नीहारमिध भारतः ॥ ३९ ॥ ततः संशप्तकान भ्यः साश्चमतरद्विान् । ध्वजपत्तिरयानुप्रेमींच्या पाण्ड: n४०॥ ये ये शिर तत्र यद्यपास्तदा जनाः । ते ते. तत्र शौप्ति मेनिरमा नमात्मना ॥ ४९ ॥ ते गाण्डीवनमुक्तास्तु नानारूपाः पतत्रिणः । क्रोग-साने स्थिसाम् घमन्ति द्विपश्चिपुरुगानणे ॥ ४२ ॥ भल्लैश्छिमाः कः पेतुः फरिणां मषिणाम् । अश्वत्थामाके तूणीर धनुप कवच ध्वना हाथ छाती । १४ । नाक मुखने कान शिर और अंग देहकेरोम और रससे बहुतसे वाण निकले । ३५ 1 मसभाचित वार. अश्वत्थामा वाण समूहों से अर्जुन भौर श्रीकृष्णजी को घायल करके बड़े बादलों के समान शब्दों से गर्मा । ३६ । उसके शन्दको सुनकर अर्जुन श्रीकृष्ण जी से बोले कि हे माधवनी गुरुपुत्र के आन्तरीयद्वेषको मेरेऊपर देखो । १७ । यह हम दोनोंको बाण पिंजरमें प्रविष्टकरके सराहुभा जानताहै मैं इसके वाण पिंजर को अपने पराक्रमी नाश करूंगा । ३८ । फिरउस भरतर्षभने अश्वत्माया के पलाये हुये वाणोंको तीन तीन खण्डकरके इधर उधर करीदिया जैसे रायगहरको ।१९। इसकेपीछ अजुनने , उग्रवाणोंसे घोड़े सारथी रथ हायी धना और पतियों समेत संसप्तकों को घायलकिया । ४० । उसप्तमय जिस २ रूपके जोमनुष्य वहां दिखाई दिये वहां उन्होंने अपनेको वाणों से घापलमाना । ४१ । और युद्धमें गांदीवधनुप से छूटे हुये वह नानाप्रकारके वाण.एककोस से अधिक दूरपर वर्चमान हाधी और मनुष्यों को भी मारतये । ४२ । मदोन्मत्त हाधियोंकी सूड भल्लोंसे कटकर ऐसागर ma chechod Arjun and showered numberle£s arrows. Countless ar rows appeared coming out of the quiser, bow, armour,' standard, hands, breast, iose, mouth, eyes, ears, hend, limbs pores of hair and car. 55. Brare ashu athnua, with a cheerful mind, having wouod. ed Krislin and Arjun, roarod like thunder. Arjun on hearing that noise, said to Shri kirislio, "Do you 600 tho enmity which the precep tor's son baars towards ne. Haring imprisoned us in an arrowy { cage, he thinks that he lias slain us; but I shall destroy it." Then Arjun cut osundor Ashwathian's arrows and broke them in thrio : parts as the wind dispersea tho mist. Then Arjun, with his dread. ſul arrows, cut and slow the drivers, cars, elephants, slaodards and foot soldiers of tlic Sapsaptaba. 10. All tho poplo there found thetuselyes luset with Arjun's orrows. The artons discharged from । - [6289 कर्णपर्व Karan Pary यथा वने परशुभिनिरुत्ताः ममहाद्माः ॥ ४३ ॥ पश्चात्त शैलपत् पेतुस्ते गजाः सहसा दिभिः । यत्रियञप्रमथिता यथैधाद्रिचयास्तया ॥ ४ ॥ गन्धपनगराकागवांश्चापि मुकदिपतान । विनीतर्जवनेर्युक्तानास्थितान् युद्धदुर्मदः ॥ ४५ ॥ शरैर्षिशकलाकुर्यग्न मित्रानश्यावीपस् । स्वलतानश्यसादीन पत्तीधाहन धनन्जयः ॥ ४६ ॥ धनञ्जय युगान्तार्कः संशप्तकमहार्णवम् । व्यशोषयत दुःशोषं तोरणैः शरगभस्तिभिः ॥ ४७ ॥ पुनीणि पहागैल' नाराचैर्वज्रसन्निभैः। निविभेद महावेमस्वरन् बज्रीय पर्वतम ॥४८॥ तमाचार्यसुतः क्रुद्धः साश्ययन्तारमाशुगैः । युयुत्सुरागमद्योधु पार्थस्तानचिः नन्छरान् ॥ ४९ ॥ ततः पामसंक्रुद्धः पाण्डवखान्यनवासृजत् । अश्वत्थामामिरूपा गृहानतियये यथा ॥ ५० ॥ अथ संशप्तफांस्त्यक्त्वा पाण्डवो द्रौणिमभ्ययात् । अपक्ति पड़ी जैसे कि फरसोसे कटेहुये उनके बड़े वृक्षहोते हैं । । । इसकेपीछे सवारों समेत वह हाथी ऐसे गिरपड़े जसे कि इन्द्र के वजसे कटेड्डुये पर्वतोंके समूह गिरपड़ते हैं। ४४ । युद्धमें दुर्मद अर्जुन गन्धर्व नगरके समान अच्छे अलंकृत शीघ्रमामी सुशिक्षित घोड़ों से युक्त स्थपर नियतहोकर । ४५ । वाणोंकी वर्षा करताहुआ शत्रुओंके सम्मुखगया वहांजाकर अर्जुनने अश्वारूड़ोंको और पतियोंको मारा ४६। अर्जुनरूपी प्रलयकालीन सूर्यने कटिनतासे सूखनेवाले संसप्तक रूप समुद्र को अपने तीक्ष्ण बाणोंने अत्यन्त शोपण किया फिर बड़ी शीघ्रता करनेवाले ने अश्वत्थामाको बड़ेवत्रके समान वेगवान वाणोंसे घायलकिया ।४८१ क्रोधयुक्त युद्धाभिलापी प्राचा र्यकापुत्र अश्वत्थामा वाणोंके द्वारा घोड़े और सारथीसमेत अर्जुनसे लड़नकोआया | अर्जुनने उसके बाणों को काटा । ४९ । इसके पीछे बड़े क्रोधसे भरे अश्वत्यामाने अर्जुनके ऊपर अखाको ऐसे छोड़ा सैने अतिीय की शिष्टाचारी करते हैं फिर अर्जुन ससप्तकों को छोड़कर अश्वत्थामा के सम्मुख ऐसे गया जैसे दान करने वाला मनुष्य पक्तिके अयोग्य लोगोंको छोटकर पंक्ति के योग्य मनुष्यों के पास ephants and mon at the distance of a mile. The trunks of the mad elephants, cut down by those arrows, fell down on the ground like trees felled by an ase. Then the elephants with their liders fell down like mountain peaks struck by lightuing. Invinciblo Arjun, mountod on a car, like the city of gandbarvas, drawn by swift horsos, showering arrows, faced the foe and killed the horsemen and foot soldiers, 46. Like the Sun of Pralaya, Arjun soaked the ocean of the Sansaptak army by means of his arrows, and, at the same time checked Ashwathame. The enraged son of the preceptor dosirous of fighting, encuuntered Arjun with his arrows; but the lattor cut down his arrows. Then Asliwathama showered on Arjun his reapons as they shower blessings on a guest. Leaving the Sansap. taks, Arjun opposed Ashwatbama as a donor proceeds towards Gandiy killed Mahabharat [6290 ] . (६२९.) यानिध त्यक्त्वा दाता पक्केि यमपिनम् ।। ५१ ॥ इति श्री कर्णपण अश्वत्थामार्जुन संवादे पोडशोऽध्यायः १६ ॥ cine सञ्जय उवाच । ततः समभवध शुक्राङ्गिरसवर्चसोः । नक्षप्रमभितो व्योस्नि शुक्रागिरसपोरिव १॥ सन्तापयन्तावन्योन्यं दीप्तैः शरभस्तिमिः । लोकत्रांसफर पास्ता धिमार्गस्थौ प्रहाधिय ॥ २ ॥ ततोषिष्यत् सुयोर्मध्ये नाराचेनार्जनो भृशम् । स तेन विघभी द्रौणिरूद्धरश्मिर्यथा रधिः ॥ ३ ॥ अथ कृष्णा शरशतैरश्वत्थाम्नाहिती जाता है ।। ५१॥ MOHoron अध्याय १७॥ संजय बोले कि इसके पीछे शुक्र और वृहस्पतिजी के समान तेजस्वी. उन दोनोंका युद ऐसे अच्छेमकार से हुमा जैसे कि नक्षत्रमंडल के पास भाकाश में शुक्र और दृहस्पतिका युद्ध हुआथा । १ । एकने दूसरेको प्रकाशित वाणों की किरणों से अच्छोरीति से संतप्त किया और अपने मार्ग से हटकर चलनेवाले ग्रहों की समान लोकाका भयउत्पन करनेवालेहुये । २ । उसके पीछे भर्जुननेनाराच से दोनों भृकुटियों के मध्य कठिन घायल किया वह अश्वत्थामा उस घाव से ऐसा शोभायमान हुमा जैसे कि ऊपरकी भोर किरण रखनवाला मूर्य होता है । । । the line of persong worthy of his charity and turns from upfit ones." 51. CHAPTER XVII Sanjaya continued, "Then the battle between those warriore, glorious like Shukra and Vriha-pati, was like the two above named luminaries in the sky. Each scorched the other with his rays of bright arrows. They excited fear among the people, like planets deviating from their course. Then Arjun wounded his adversary bard between his eyebrows, and the latter looked glorious liko tba Bun. Shri Krishn and Arjun too, wounded with the arrows of Ashwathama, looked glorious, like the two Suns of Pialnya. Scoing Vasudev afllicted with the wounde, Arjun sbowered his arrows on all - 162924 Mahabharat (६२८२) नपरा निपेतुः ॥१०॥ पद्माणेन्दुनिमाननानि फिटमावलाभरणोचलानि मलाई 'चन्द्रालिसितानि प्रपेतुरुव्यों नशिरांस्यजसम् ॥ ११ ॥ अथ द्विपैयरिपद्विपामदेवा रिदापहमत्यदममा कलिंगवगागनिपादचीरा जिघांसपः पाण्डघम पधावत् ।। १२॥ तेषां दिशान निधकर पार्यों धणि मर्माणि करा नियन्लन् । ध्वजापताकार ततः प्रपेतर्यवाहतानीष गिरेः शिरांसि ॥ १६ ॥ तेषु पयग्नेषु गरोस्तनज पाणः किरीटी नयमपयः। प्रछायामास महाघ्रजालेयर्यायुः समुपन्तमिवांशमन्तम् ॥ १४ ॥ ततो जुनेपनिपुमिनरस्य दीणिः शरैरर्जुनचा मुद्देधी । प्रच्छापित्या विवि पन्नमयों ननाद खोम्भोद इबाउपान्ते ॥ १५ ॥ तमर्जुनालांध पुनस्पीयानस्पतिस्तैरभियाप शख याणान्धकार सहसप हत्या विवध सर्वानिपुभिः मुखेः ॥ १६॥ नायादव सदध समेत निपत और अलंकृत सैकड़ों शूरवीरों को भी अर्जुन ने सैकड़ों बाणों से से गिराया तब उनके साथ बड़े २ उत्तम मनुष्यभी गिरपड़े । १० । कमल मूर्य और पूर्णचन्द्रमा के समान विशाल मुख मुकुटमाला और भाभूपणों से प्रकाशमान । शिर और भल्ल अर्द्धचंद्र और पुरस नाम वाणों से घायल मनुष्यों के भी शिर बारम्बार पृथ्वीपर गिरे । ११ : फिर कलिंग भगवंगदेशी निपाद जाति के प्राण के गर्भ प्रभारी वारलोग जो बड़े उग्ररूप अर्जुन के मारने के अभिलापी थे उनके गन और असुरोंके समान हाथियों के कवच मूड सारथी ध्वना और पताकाओं को . काटा इसके पीछे वह ऐसे गिरपड़े जैसे कि बनके महार से पन्नतों के शिखर गिरते हैं । १३ । उनके पराजप और छिन्न भिन्न होने पर अर्जुन ने सूर्य वर्ग के चापानालोंसे गुरुके पुत्रको ऐसा दकदिया जैसेकि बादलों के नालोंसे वायु उदयहुपे सूर्य को दकता है । १४। इसके पाछे अश्वत्थामा अपने बाणों से अर्जुनके वाणों को काटकर बड़े तीक्ष्ण वाणों से अर्जुन और श्रीकृष्णजी को दककर ऐमा गर्मा जैसे कि वर्षाऋतु में चन्द्रमा और सूर्यको ढककर वादलगनना है । १५ । फिर अर्जुन ने भी अश्वत्थामा और अन्पलोगों को ढककर माखों से पायलय ने Stany a groat warrior fell with them. 10. With bautiful facun lilo the lotus, ibu Sun or the full wwoon, with heada shining with juwels, tho warriors lay down on the earth, árin by the arrosta of various linpor. 11. The worriors of Kaling, Ang, Fing nud Nishad, cryors of the prido of asurs and desirous of playing Arjus, were cul yn by the latter along with their slephants casad ja mail, drivery, standards and banocis, and they fell down like inountain prabe struck Jown lig lightning At their destruction and Jefeat, Arjun hid sacharya's Ron with his goldca arroka as tho claudy blown by the mu hide tho Sun. Ishwa Usama cut down Arjun's sirmat, rud hari covered Krisha and Arjun with his oxu WTUSH, mured kodu which thunder after hiding the sum and the urun. 13. Thari (६.९३) फर्णपर्व Karan Parv [6293] जब मुचन वाणाप्रथेहदयत सव्यसाची। रयांश्च नागास्तुरगान पदाती संस्थतहान् पशुहंतांथ ॥ १७॥ सन्धाय नाराचयरान् दशाशु द्रोणिस्वरन्नेमियोत्ससर्ज। 'तपतु पश्चार्जुनमभ्ययिभ्यम्पम्चाच्युतं निर्विभिः सुपुखाः॥ १८ ॥ राहती सर्व मनष्यमुख्यायस्क सूयन्ती धनदेन्द्रकल्पी। समाप्नविद्येन तथाभिमती इतौ रणे साबित मेनिरम्य । १९ ॥ अथार्जन प्राह दशाईनाथः प्रमाद्यसे कि जहि.योधमेतम् । कुरादि दो समुपेक्षितोयं कप्टो भवेत्याधिरिवाझियावान् ॥ २०॥ तथेति चोक्या च्युतमप्रमाही द्रोणि प्रयत्नादिपुभिस्ततक्ष। भुजौ चरी चन्दतसारदिग्धौ वक्षः शिरो थाप्रतिमा तयोरू ॥ २१ । गाण्डीवमुक्तः कुपितो विद्रोणि शरैः संपीत निर्षिभद। छित्या तु रश्मीस्तुरगानविध्यत्ते तं रणाद्हुरतीय दरम् ॥ २२ ॥ स तैहतो वातजधै सपीप जाकर शीघही वाणों के अन्धकार को.दूरकर मुन्दर पुसवाले वाणों से सयको घायल किया । १६ । फिर अर्जुन रथ के ऊपर वाणों को लेता चढ़ाता और मारता हुआ भी युद्ध में दृष्ट न पड़ा फिर वाणों से छिदेहुये रथ हाथी घोड़े और पदातियों को अर्जुन से मृतक देखा । १७ । तव शीघ्रता करनेवाले अश्व- स्थामा ने शीघ्रही दश उत्तम नाराों को चढ़ाकर एकही के समान छोड़ा उनमें से पांच उत्तम वाणों ने श्रीकृष्णजी को और पांचने अर्जुनको घायल किया। १८ 1 | अन्य मनुष्यों ने ऐसे धर्नुर्वेद के ज्ञाता अश्वत्थामा से पराजित और रुधिर डालेन पाले नरोत्तम इन्द्र के समान श्रीकृष्ण और अर्जुनको युद्धमें मृतकमसझा । १९ । इसके पीछे श्रीकृष्णाजी अर्जुनेस बोले कि क्या भूलमें पड़ा है इस युद्धका को मार नहींतो यह धार अपूर्व दोपको उत्पन्न करेगा और इसका बदला न लेनेवाला। शूरवीर कठिन रोगोके समान होगा । २० । फिर सावधान अर्जुनने श्रीकृष्णजी | से बहुत अच्छा यह शब्द कहकर बड़े उपायके साथ असत्थामा को घायल किया चंदन से शोभायमान दोनों भुजाओं भुजा छाती शिर और जंघावोंको । २१ । too, cuvered Ashwathama and others, and approaching liim, though wounded, cleared the darkness produced by Ashwathama and wounded him with arrows having golden feathers, Arjun's work of taking and discharging of arrows was not seen by the warriors; they could only see the cars, elephants, horses and foot, cut and killed by luis arrows, Dexterous Ashwathama took up ten darts and shot them all at once. Five of them wounded Krisha and the other five wounded Arjun, The poople who saw them wounded took them for lead. Then Shri Krisha said to Arjun, "Wbat a mistake are yon " "ng ? Slay this matchless warrior, or he will throw you into 'ifficulty. You will be like a sick man, if you donot give him unishment. 20. "Very well," said Arjun to Krishn and wounded athama with great care on his beautiful arms, breast and नाना - कर्णपर्व Karan Pare [6295] सम्जय उवाच । अथोत्तरण पाण्डूनां सेनायां ध्वनिरूस्थितः। रथनागावपसीनां दण्डधारण वयताम् ॥ १॥ निययिस्या तु रय केशवोर्जुनमनधीत् । चाहयन्नेव सुर गान गण्डागिलरहसः ॥ २ ॥ मागघोप्रतिविक्रान्तो द्विरदेन .प्रमाधिना । मगदत्तादन वर शिक्षया चपलेन च ॥३॥ एतं हत्वा निहन्तासि पुनः संशप्तकानिति यापपान्ते प्रापयत् पार्थ दण्रधारान्तिकं प्रति ॥ ४ ॥ स मामघानां प्रवरोकुशग्रंथ प्रहप्रसहो विकलो यथा ग्रहः सपत्नसेना प्रममाथ दारूमा मही समना पिकचो यथा ॥ ५ ॥ मुझोलतं दानवनागसनिम महाम्रनिदिममिप्रमहनम् । रथाघमातङ्गगणान सहयः समास्थितो हन्ति शरैरानापे ६ ॥ रयागधिष्ठाय सबा अध्याय ॥ १८॥ संजय बोले इसके पछि पाण्डवोंकी सेनामें उत्तर दिशाकी और दण्डधार के हायसे घायल रथी हाधी घोड़े और पतियों के शब्द उठे। १ । तब गरुड़ और वायुके समान शीघ्रगामी घोड़ोंको चलाते केशवजी स्थको लौटाकर भर्जुनसे बोले । २ । कि यल और शिक्षामें भगदत्त के समान मगध देशी दण्डधार मा नाश करनेवाले हाथी समेत काठन युद्ध करनेवालाहै । ३ । इसको मारकर तू फिर संसप्तकों को मारेगा श्रीमपणनीने.यह कहकर अर्जुनको दण्डधारके समीपपहुंचाया । ४ । वह मगधदेशियों के मध्य भकुश धारण हाथियोंके युद्धमें ऐसा अत्यन्त उत्तम और भत्तह्यथा जैसे कि ग्रहोंकेमध्यमें धूम्रकेतु ग्रहहोताहै उस भयानकरूपने (शत्रकी सेनाको एसा मनकिया जैसे कि धूम्रकेतु उपग्रह सम्पूर्ण पृथ्वीको मर्दन | करताहै । ५ फिर बहराजा अच्छेप्रकार से अलंकृत गजामुरके समान पड़े वादल की समान शब्द करनेवाले शत्रुहन्ता हाथीपर सवार वाणोंसे हजारों हाथी घोड़े | और रयों के समूहों को मारताहै । ६ । वह श्रेष्ठ हाथी घोड़े सारथी मनुष्य और CHAPTER XVIII Bunjaya continued, *In the nurthein side of the Panday army, there was a great noise made by car warriors, horso and foot wounded by Dandadhar. Turning round the fieot hursas, Keshuy said to Arjup, "Daudadbar of Magadla, libo Bhagdatta in training and ipower, is fighting, accompained by an army or elephants. You must slay him beforu extipating the Sansaptaks." Having said this, Shri Krishn took Arjun near Dandadhar. Surrounded by the war. Fiors of Dingadh, mounted on elepants, ſhe was an excellent and unbearable tighter like a comet among lumanarius, and like that planet he overran the hostile ai mies. Mounted on a large, well. decked elephant, louring like thundor, be was slaying with his arrows thousands of elephants, horses and car warriors, 6. Trampling down the drivere, men and cars and slaying with his trunk, the luge ele- [6296] Mahabharat जिसारयीवरच पाविरदो व्यपोगपत। द्विपांश पद्पो मझे करेंज हिपोक्सो हिन्ति च कालचक्रपद ॥५॥ नरोश कायसयमभूषणान निशय साधानपि पचिीमः सह । म्यपोयमन्तिपरंण मिणा सरादयत् स्यूलनलं यथा तथा: भधार्जुनो ज्यातलनेमिनिस्वने मूवमेरी पहुयनादित । रया यमातंगसरसंकुले स्योत्तमे नाभ्यपतद्विपातमम् ॥९॥ ततार्जुन द्वादशीमा रारोत्तमझनाइनपानामिः समार्पयतास दण्डधारस्तुरगांनिभित्रिभिस्तता ननाद प्रजहास चासमन्ततोस्य पार्थः सगुणेपुकामुक चर्स भल्ल जमप्यरातम् । पुनर्नियन्लन सदपागोप्नलतः स पक्रोध गिरिजेपर: ॥ ११ ॥ ततो न मिग्नकटन यन्तिना धनायनागिलनन्य पर्चसाः। रतीव चुक्षोभायपुर नाईन घनन्त्रपमित्रघान तोमरः ॥ १२ ॥ भागस्य रयोंको दवाकर चरणों से हाथियों को मलता मुदसे मारताहुमा चक्रके समान ब्रमण करनेलगा। ७। फिर उसने महावली पराक्रमी उत्तम हाथ के द्वारा लोके यचोंसे मलकृत मनुष्यों को और पतियों ममेत घोड़ोंकोभी गर्नना पूर्वक ऐसे सन्दापमान स्पूल नसलके समान गिराकर मारा । ८ । इसकपोउ अर्जुन पक्षपकी प्रत्यवाफे शब्द मृदंग भेरी और बहुत से खोंसे शन्दापमान हनारों घोड़े स्य और हायियों से संकुलित युद्ध भूमि में उत्तम स्यकी सबारी से उपम हाना के सम्मुख गया ।। ९. वहां उस दरडधारने अर्जुनको बारह उत्तरमाणों से और भीमपानीको सोला वाणोंसे व्यधित करके तीन २ यापों से घोड़ोंको पायल किया इनको घायल करके बड़े शब्दको करके पारंवार ईसा भोर गर्माइसके पछि अन ने भल्लों से मत्यंचा समेत उसके धनुपको काटकर उसकी अंमत भुनाकोभी फाटा फिर रक्षकों समेत सारधियों को मारा इस कारण यह महा कोधित हुआ ।११। इसके भननर उस मतवाले घातक वायु के समान तेजस्वी हाथी के द्वारा अत्यन्त व्याकुल करने के अविनाश उस राजाने तोपरों से अनुन भीर श्रीकृष्णनी को पापनाकया। १२ । इसके पीछे इसकी हाधीकी yr के समान phant turned like a wheel. By mans of that clephant, ho kleir mun cased in armour, horze and foot, and fr.mapled them down liko grass. Then Arjun, uccompained by the roino ot trange, drome, trumpets and cauchs and followed by <lephants, druro his car to lucu that elephant. Deindahar, having wounded Arjun with #olsa AITONS, Shri Krishn with sixteen and the horses with three WIONY eath, rughal and reard again and again. 10. Then cuttinglis sow. bowstring and well dated aru with the arror, Arjun view the Bunds and driver. The Prince" tras much enraged at this, and urg ing on this dreadful clepl.ant the wounded arjunal Pailer wth tantart. Arjun cutar lisarius resembling to trunk ofall die.
कायव Antant are 16297 घाह द्विपहलसन्निभी शिरच पूर्णन्दु निभाननं धिमिः ।शुरः प्रचिच्छेद हवपाण्य स्ततो द्विपं पाणशत समार्पयत् ॥ १३ ॥ स पार्थवाणैस्तपनीय भूषणैः समाचितः काशनवर्मभूतिपतिया धकाश निशि पर्वता पथा दावाग्निना प्रज्वलितीपणिद्रुमः ॥ १४॥ स देघनाम्बुदनिस्वनो नदंबरन भ्रमन् प्रासलितान्तरोद्रघन । पात सनः सनिपतृकानदा यथा गिरिविदारितस्यां ॥ ११ ॥ हिमाघदातेन सुषमालिना हिमाद्रिक्टमतिमन दन्तिमा: हते रणे भ्रातरि दण्ड माग्रजज्जिधासुरिन्द्रावर धनअपम् ॥ १॥ स तोरेरकंकरप्रमसिर्जनाईन पञ्चभिरर्जुन शितैः । समयित्वा विननाद नईयत्ततास्य पाहूनचकत्त पाण्डवः ॥ १७॥ क्षुरप्रकृत्ती मुभृश सतोमरी शुभांगदो पन्दननरुक्तिी भजी गजातपतन्ती युगपहिरेजतुयंधाद्रि,गादृचिरी महो भुजाभों को और पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखको दानतरमसे एकबार में छेदा और सैकड़ों वाणोंसे हाधीको घायल किया । १३ । स्वर्णमयी अर्जुन के वाणोंसे संयुक्त वह स्वर्णमयी कवचधारी हाथी सायंकाल के समय ऐसा प्रकाशमान हुआ जैसे कि दावानल अग्नि से ज्वलित भोपधियों समेत शौचाला पर्वत प्रकाशित होता है । १४ । वह बादलके समान गर्नता चलता धूपता दुःखसे पीड़ित चलते २ सवार समेत ऐसे गिरपड़ा जैसे कि यजसे टूटाहमा पर्वत गिरपड़ता है । १५ । उसके मरने के पीछे उसका दूसरा भाई द्वन्द युद्धमें भाई के मरने पर श्रीकृष्ण अर्जुन के मारने का आभेलाप स्वर्णमया मालाधारी हिमाचल के शिखर के समान हाथी की मवारी से मम्मुख भाया। १६ । वह मूर्यकी किरण के समान मकाशित तीक्ष्ण तीन तोमरों से श्रीकृष्णभी को और पांचसे अर्जुनको घायल करता हुआ गर्जा इस के अनन्तर अर्जुन ने उसकी भुजाओं को कार । १७ । सुन्दर तोमर और वाजू- (चंद रखनेवाले चन्दन से चर्चित भार तुरमवाण से कटीहुई दोनों भुना हाथीपर से गिरतीहुई पेशी शोभायमान हुई जो कि अत्यन्त सुन्दर दो बड़े सर्प पर्चत से plant and his head having fach like tho full moon, with three sharp darts, and wounded the elephant with hundreds of arrows. Pierced by the golden shafts of Arjun, the elephant cased in golden mail, shone bright in the evening like a hill with a burning forest, Thunder ing liko clouds, the wounded elephant, with his rider, fell down like a mountain peak struck by lightning, 15. At his death bis brother desirous of slaying Shri Krishn and Arjun, mounted on a huge ele. phant decked gith gold garlands, encountered Arjun. Wounding Shri Krishn with three tomais, bright as the Suo, and Arjun with five, ho roared loudly. Then Arjun cut down his arms, which deck ed with ornaments and sandal paste, foll down on the ground like two sorpents falling dowa from a mountain. Similarly, Danda's head, (6298) Mahabharat (६६९८॥ सो १८ ॥ तणनन्द्रेण इतं किपटिना पात दण्डस्य शिर मिति द्विपात स्वशोणितादानितद्विरेने दिधानाविध पश्चिममा दिशम॥ १९ ॥ मप विपं शेतघरानसनि दियाफराशप्रतिमः सरोत्तमः। विभेद पार्थः स पपात नादयन् हिमाद्रिकट कुलिशाहत पधा. ततोपरे ताप्रतिमा गीतमा जिगीपति सम्यसाचिना । तथाकृताने व यधेय ती द्विषो ततः प्राग्न मुमहदिपायलम् ॥ २१. गारधाषा: पुरुणध संघशः परस्परम्नाः परिपतुराधे । परस स्पलिताः समाहिता मनिपतुबहुभाषिणो हताः ॥ १२॥ भधान स्पे परिवार सीमा: पुरन्दर देवगणा वामपन् । अमेण परमारादिय पार दिएका निहत स्वपारिए: ॥ १३ ॥ धेदरक्षिप्य इमान् जनान् भपाद्विषदिर पलिभिः नीति तान् । तधामविविधता प्रमादा यया इतेश्यीय नोमिदम् ॥ २४ ॥ इहीप गिरतहों । १८ । इसीपकार अर्जुनके अर्द्धचन्द्र पाणसे काहमा दंडका शिर हाय। के ऊपरसे पृथीपर गिरते समप ऐसे शोभायमान हुभा जैसे कि मूर्य असानस से पश्चिम दिशामें गिरताहै । १९ । इसके पछि मर्जुनने मूकी किरणरूप उधम बाणों से उसके शत हार्थीको भी उदा वासी शब्द करताहुआ ऐसे गिरा जैसे वजसे टूटा हिमाचलका शिखर गिरता है ।२०। उसके सिवाय उसी के समान भन्य उत्तम हा विनपाभिलाषा हुये और यह भी उसीप्रकार से अर्जुन के हायो परे त कि वह दोनों हाधी मारेगये थे इसके पीछे धुओंकी यडीमारी सना छिन्नभिन्न होगई । २१ । युद्धमें परस्पर मारने वाले हाथी घोड़े और मनुष्यों के समूह नारों ओरसे परस्पर में अत्यन्त चापलहोकर गिरपड़े भोर बहुतसे अत्पन्न पकनेवाले मनुष्यमी मारगये । २० । इसके पछि पायरी सेनाके मनुष्य अनुनका घेरकर ऐसे बोले जैसे कि देवताओं के समूह इन्द्रको परकर वोलपे कि हे चार अजुन हमलोग जिस से कि मृत्यु के समान मपात थे वा शत्रु मारम्प से हमारे हायसे मारागपा । २३ | जो इसपकार पराक्रमी शत्रुभों से पारामानन मनुष्यों को नुम रसान करते तो रामों की वैसीही मान्नताहोती जती कि हम लोगों cut down by arjun's cruskunt slagord ortuis, lowed glurions in its full liko the Sun when he scts in the vesh. Then with arrows bright Jikw the rays of ibu San. Arjun picres his elephant which foll down with a crash likon prak of thu flívaalayas alruck by lightning: 90. Orber elephaula liko those alrerly la:6, cats on conquer Arjun, but were plain by him in a similar way. Thea the great army of tho on asics was dispersent. Llopante, hurrent and len fighting to yetber, fell dowa wounded in larga tuuless, ár:d many wasters were Rain. 7.Cu tło warriora of te dradar nimy (n.v soud Arjun lido gede skuld Luis, onsite. Esmudsjuu, joularo slain the con who tenisa us liko L'albs Cut Timis meeld le lopty like us 20 [६२९९ कर्णपर्व Kuvan Pary 1 6299) भूयश्च महद्भिरोडिता निशम्प याचः सुमनास्त तोनिः । यथानुरूपं प्रतिपूज्य तंजन जगाम संशप्तकसपहा पुनः ॥ २५॥ इस श्री कर्णपीण दण्डधारवधे अष्टादशोऽध्यायः १८ ॥ सञ्जय उवाच । प्रत्यागत्ये पुनजिजध्ने संशप्तकान बहून् । यातिवक्रग मनादारक इय प्रहः॥१॥पार्थधाणहता गजन्नराश्यरथकुराः। विचेलुर्वधमुर्नेशु: पेतर्मम्लुग्ध भारत ॥ २ । धुर्पान् धुय्यंगतान् मतान् ध्यजांश्वापानि सायफान् । पाणीन पाणिगत शस्त्रं वाहूनपि शिरानि च ॥ ३ ॥ भल्लैः क्षुरैरद्धचन्द्रघरसदन्तध को हुई है। २४ । इसके अनन्तर चिन्तकों के इन यचनों को सुनकर वह मसम्म विध संसप्तकों का मारनेवाला अर्जुन प्रत्येक को उनकी योग्यता के अनुसार | प्रसन्न करके चलदिया । २५ । havgadwarroram भध्याय॥ १९॥ संजय बोले कि इसके पीछे अर्जुन ने वहां से लौटकर मंगल ग्रह के समान वक्र भी अतिवक गतियों से.हजारों संसप्तकों को मारा।। हे भरतवंशी अर्जुन के बाणों से घायल मनुष्य घोड़े रथ हाथी सब के सब इधरको तितिर वितर होकर घूमने लगे और:धूमकर गिर और मृतक होकर नष्ट होगये । २ । युद्ध में | सम्मुख लड़नवाले वीरों के उत्तम घोड़े रथ हाथी रथी ध्वना धनुप शायक हाय वा हाथ में लिये शस्त्र भुजा और शिरों को अर्जुन ने अपने भल्ल तुरम अर्द्धचन्द्र if you had not protected us." Well pleased to hear the words of luis woll-wishers, Arjun the slayer of Sansaptake, pleased them as they deserved and moved onward." 25. CHAPTER XIX Sanjaya continued, " Turning round fronu that place, Arjun, moring zigzag like the planet Mangal, slew the Sansaptaks, Wound. ed by Arjun's arrows, med, horses, cars and elephants dispersed in all directions or fell down and died. The horses, cars, drivers, banners, bows arrowe, hands, arms holding weapons in hands, and heads of the fighting warriors were cut down by Arjun's arrows of various shapes, 163001 Mahalliarat पाण्डपः । चिच्छेदामिप्रधाराणां समरे पतियुभ्यताम् ॥ ४ ॥ यालितायें युयुत्सन्तो वृषभा वृषभ यया । निपतन्त्यजनं शसः शतशोय सरमशः ॥ ५ ॥ तेषां तस्य च तबदममघल्लोमहर्षणम् ।लोक्यविजये यादग्दत्यानां सह पनिणा ॥६॥ तमविध्यत त्रिभिणाईन्दा करियादिभिः। उपायुधसुतस्तस्य शिर कापादपाहारत् तेर्जुन सर्वत: अशा नानाशले रचीवृपन । मद्भिः प्रेषिता मेघा हिमपन्तमिघोषणगे ॥ ८॥ मीरखागि सयाय द्विषता सतानः । सम्यगस्तैः शरैः सर्यामहितानहान् ॥ ९ ॥ छिनधियणुसंघातान हताश्यान पारिणसारथीन् । विमुक्तहस्ततूणीरान पिचक्र रतनान् ॥ १०॥ संछिन्नरश्मियोक्त्राक्षान् व्यनफपयुगाप्रथान् । विश्वस्तसर्वसना हान् पाणचकर्जुनस्तदा ॥ ११ ॥ ते रथास्तत्र विश्वस्ताः परावर्या मायनेकाः । और वत्सदन्तनाम पाणों से काटा । ४। जैसे कि गोंके निमित्त युद्धाभिलाषी अनेक वैल दूसरे वैलके सम्मुख जाते हैं उसी प्रकार हजारों शूरवीर अर्जुन के ऊपर गिरते थे।५। उन सब वारों के साथ भर्जुनका युद्ध ऐसा बड़ा भयकारी रोम. हर्पण करनेवाला हुआ जैसे कि तीनोलोकों की विजय के वास्ते दैत्योंका युद्ध इन्दके साथ में हुआ था। ६ । उग्रायुधके पुत्रने सो के समान तीन घाणों से उस | अर्जुन को धायल किया और अर्जुन ने उसके शिरको धड़से जुदा किया 1 ७॥ फिर क्रोधित होकर उन लोगों ने सब ओर से अर्जुन के ऊपर नानामकार के शस्त्रों की ऐसी वर्षाकी जैसे कि वर्षा ऋतु में मात् देवता के प्रेरित किये हुपे वादल हिमालयपर जलकी वृष्टिको करते हैं। ८ । अर्जुनने शत्रुओं के अलोको सब ओरसे अपने भत्रोंसे रोककर अच्छोरीतिसे चलायेहुये पाणों से अनेक शत्रुओं को मारा ! ९ । और उनके रथोंको भी चाणों से रथियों समेत ऐसी दशाका करदिया कि जिनके घोड़े और सारथि मरजाने से हाथों से तरकस और ध्वजा पवाका गिरपड़ी बागडोर हायसे छुटगई पहिये टटे दातुये और जुये और शरीर के कवच भी टूटे । ११ । वहां दृटेड्डुये बहुमूल्य रथ ऐसे शोभायमान हुये जैसे कि Like the bulls fighting for a cow, thousands of warriors fell upon Arjun, s. Their fighting with Arjun was like that of the Daityas desirous of getting the mastery of the three worlds, with Indra, Ugrazuole sana wandad Arjun with three ship wror lla serpents, but he was beheaded by the latter. Then those warriors sbowered their arrois over Arjun as clouds pour forth rain over a mountain. Checking their tverpons with his own, Arjun slew the enemies with his well discharged arrows. He destroyed the cars and riders together with the horses and driveis. Their gaivors and standards fell down; the traces went away from their grasp and the Wheels and other parts of their cars were broken dowe, 11. The .
कर्णपर्व liaran Parv [0301] धनिनामिव दमानि हतान्यम्पनिलाम्बुभिः ॥ १२ ॥ द्विपाः सम्मिन्नवमर्माणो षवा शनिसमैः शरःपतुर्गिय प्रवेशमानि घनपाताग्निभिर्यथा ॥ १३ ॥ सारोहास्तुरगाः पेतुर्वहधोर्जुनताविता: निर्दिजान्त्राः क्षितो क्षीणाः रुधिराः मुरंशः ॥ १४॥ मपश्यनागा नाराचः संस्यूताः सन्यसाधिना । पनमश्चस्थलुः पेतुर्नेदर्मम्लुम मारिष ॥ १५॥ अनेकैध शिलापतिर्वज्ञाशनिषिपोपमैः । शरैर्निजप्निवान पार्यो मोन्द्रय पानवानं ॥ १६ ॥ महाईधर्माभरणा माना घगयुधाः। सरयाः सम्बजा धारा बताः पार्थेन शेरते ॥ १७ ॥ विमिता. पुण्यफर्माणो विशियाभिजनश्रुताः । गताः शरीरैर्वसुधामूगितः कर्मभिोदयम् ॥ १८॥ मया ने रपवरं त्वदीयाः सममिवान् अग्नि वायु और जलते टूटेहुये धनीलोगों के घर होते हैं । १२ । फिर वज और बिजली के समान वाणों से टूटेहुये हाधियों के कवच ऐसे टूटपड़े जिसमकार बनपात और अमिसे पर्वतों के शिखर गिरपड़ते हैं । १३ । फिर अर्जुन के हायसे घायल होकर बहुत से घोड़े सवारों समेत गिरपड़े उन घोड़ों की जीव और नेत्र निकल पड़े थे इसहेतु से बह पृथ्वी पर पड़ेहुये घिर से लिप्स देखनेके अयोग्य मालूम होते थे । १४ । हे श्रेष्ठ धृतराष्ट्र अर्जुन के नाराचों से छिदै हुये मनुप्प घोड़े और हार्थी गर्न २ कर घूमते और मलिन मन होकर पृथ्वीपर गिरपड़े ॥१५॥ अर्जुन ने बड़े सच्छ विगली और विपके समान बहुतमे वाणों से उनको ऐसेमारा जसे कि महाइन्द्र दानों को मारताहै । १६ । अर्जुनके हायसे मरेहुये जो वीर रथ और ध्वनाओं समेत पृथ्वी पर शयन करनेवाले हुये वह वीर बड़े मूल्य के कवच भूपण और नाना प्रकारकी पोशाकों समेत शखोंके धारण करनेवाले थे। १७ । यह पवित्रकर्गी या उत्तम कुलीन शास्त्रज्ञ युद्धकत्ता अर्जुनके वाणों से पराजयहोकर पृथ्वी पर गिरपड़े और अपने उत्तम कर्मके द्वारा स्वर्ग को गये। १८ । इसकेपीछे precious cary, brokoa down, looked liku tho houses of wealthy men, sbattered by fire, water and wind. Tha armours of the clopbants, broken by arrows liko vajra and lightning, looked like the peaks of mountains brokon down by lighting and fire. Wounded dy Arjon, pady horses fell down with their ridors; their tongues and eyes camo out, and with blood-stainod bodies they were hideous to behold. Pierod by Arjun's arrons, zien, horses and elephants shrieked hither and thithor and fell down on earth with diseased minds, 15. With many poisonous arrowe, bright like lightning, Arjun slew them As Indta does the Danayas, The Warriors slaio by him, lay on tho earth, along with their cars and standard decked with precious armours, ornaments clothos and treapons. The virtuous Farriors of noble families, Icarned in books and warfare, fallen dosyn by Arjun's arrows, lay on earth and went to heaven as a result of 6302] Mahabharat (६३०२) नानाजनपदाध्यक्षा सगणा जातमन्यवः ॥ १९ ॥ उहमाना रथाश्वः पसयचजिया सवः । समाभ्यधायानस्यन्तो विविध क्षिप्रमायुधम् ॥ २० ॥ तदायुधमहायर्ष मुक्त योधमहाम्वुदः । न्यधमन्निशितैः क्षिप्रमर्जुनमारुतः ॥ २१ ॥ साश्वपतिविपरये महाशत्रौषमम् । सहसा सन्तितीर्पन्तं महाशस्त्रास्त्र सेतुना ॥ २२ ॥ अथासपीहा। सुदेवः पार्थ कि कीडसेनघ । संशप्तका प्रमध्येतान् ततः कर्णवघे त्या ॥ २३ ॥ तथे त्युक्वार्जुनः कृष्ण शिष्टान संशप्तकांस्तदा। भाक्षिप्य शस्त्रेण बलात त्यानिन्द्रावा वधीत् ॥२४॥ आवदत् सन्दधन्नपून इष्टः कश्चिदणेग्नः । षिमुन् पा. शरान शीन रश्यतेपहितैरपि ॥ २५ ॥ आश्वयमिति गोविन्द्रः सममन्यत भारत । हंसांशगोरास्ते भिन्न देशोंके स्वामी क्रोधयुक्त शूरवीर भापके युद्धका अपने समूहों समेत रथियों में श्रेष्ठ अर्जुनके सम्मुख गये। १९ । रथ घोड़े भौर हाधियों पर सवार मारने के अमिलापी वह पतिलोगभी नाना मकारके शवों को चलातेहुये शीघ्र सम्मुख दौडेर । २०. निनको अर्जुनरूपी वायुने शीघ्रता पूर्वक छोड़ेहुये वायोंसे उस शम्ररूपी भड़ी वर्षाको जोकि युद्धकोरूपी बड़े वादलोंसे छोड़ी हुईधा पृयक २ करीदयाया । २१ । वहघोड़े हाथी और पतियों से युक्त बड़े २ शत्रों से पूर्ण अर्जुन ने शस्त्र और अन्न रूपी पुलसे पारकी। २२ । इसके अनन्तर वासुदेवजी ने कहा कि रे निष्पाप अर्जुन क्पा खेळ करताहै इन संसप्तकों को मारकर फिर कर्ण के मारनका उपाय शीघ्रता से कर । २३ । तब अर्जुनने श्रीकृष्णजी से बहुत अच्छा यह कहकर श्रेष्ठ संसप्तकोंको सुच्छ करके शत्रों के वलसे ऐसामारा जैसे कि दैत्योंको इन्द्रमारताहै । २४ अर्जुन वाणों को लेता चढ़ाता और मारतामा किसी को दिखाई नहीं दिया और सावधान वारों ने उसको शीघ्रतासे बाणों को छोड़तामा भी देखा.। २५ । हे भरतवंशी उन श्रीकृष्णजीन बड़ा आश्चर्य किया कि इंसों के their good deeds. Then the kinga of various countries, cnraged warm riors, fighting for you, went on to faco Arjun. Mounted on curs, horses and elepbants as well as those on foot, desirous of slaying, they went forward discharging weapons of ynrious sorts.20. The wind of Arjun's arrots dispersed the clouds of their weapons Tho army conaiving of harse, foot and olophant riders was crossed aver by A. jun by means of the bridge of his weapons In the meantimo Va. sudev said, "Why are you playing, sinless Arjuny Slay the san. suplaks without delay; for you have Karan to cope with." Saying Very well," In reply, Arjun slew the Sansaptaks as Indra does the Danavas. None could mark the limo spent by Arjun in tho tako, ing up, putting to the bow and discharging of arrows, though the warriors looked at him with tho closust attention. 25. Shri Krishn २ , - [ ६३०३) फर्णपर्व Karan Pary 16303) सेना हंसाः सर याविशन् ॥ २६ ॥ ततः संग्रामभूमिश्च पचमाने जनभये । अयक्ष माणो गोविन्दः सव्यसाचिनमब्रवीत् ॥ २७ ॥ एप पाच महारोदो पत्तत भरतक्षयः । पृथिव्यां पार्थिवानां धै दुर्योधनकृते महान् ॥ २८ ॥ पक्ष्य भारत चापानि रुपमपृष्ठानि धन्विनाम । महताश्चापविद्धानि कलापानिपुधींस्तथा ॥ २९ ॥ जातरूपमयैः पुरः शरा थानतपर्वणः । तेलधौतांश्च नाराचान् निम्मुंकानिय पनगान् ॥ ३० ॥ आफीस्तोम संचापि विविधान हेमभूषितान् । वर्मणि चापषिद्धानि रुक्मपृष्ठानि भारत ॥ ३१ ॥ मुपर्णयिकृतान प्रासान् शक्की फनफभूपिताः । जाम्वुनमयैः पट्टे साध विपुला गदा ॥ ३२ ॥ जातरूपमपीश्चष्टीः पटिशान हैमपितान् । दण्डैः कनकचिय, विप्रपिवान परमधाम् ॥ ३३ ॥ परिधान मिनिपालांश्च भुषण्डाः कुणयानपि। अयः कुन्ताव पाते सान् मुषलानि गुरूणि च ॥ ३४ ॥ नानाविधानि शस्त्राणि प्रगृह्य जयगृशिनः । जीवन्त समान उज्ज्वल वह वाण सेनामें एसे पहुँचे जैसे कि सरोवर हंसपक्षी पहुँचते २६। इसके अनन्तर मनुष्यों की मलय वर्तमान होनेपर युद्धभूमिको. देखकर श्रीकृष्णजी मजुनसे बोले । २७ । हे अर्जुन दुर्योधन के कारणसे यह भरतवंशी और अन्य | राजाओं की प्रलय पृथ्वीपर वर्तमानहै । २८ । हे भरतवंशी घड़े धनुपधारियों के पुवर्णपृष्ठवाले धनुपधारियों को वा आभूषणों समेत तूणीरोंको टूटाहुमा देखो २९ भौर टेदेपन और सुनहरी पुंखवाले तेलसे सन्निकण कांचलीसे छूटे सोंके समान नाराचनाम पाणोंकोदेखो । ३० । हे भरतवंशी सुवर्ण से अलंकत चित्र विचित्र | तोमरोंको भी देखा और धनुपसे दृटेहुये मुवर्ण पुखवाले वाणोंको देखा। ३. ! सुवर्ण से अलंकृत वाण वा कंचनसे शोभित शक्तियों को वा मुनहरी वस्त्रोंसे मढ़ी हुई गदाओंको देखो । ३२ । सुनहरी दुधारे खड्ग पटिश और डंडोंसमेत कटेहुये फरसों को देखो । १३ । भार बहुमूल्यके पड़ेहुये परिघ भिन्दिपाल भुसुडी कुणप और अपःकुन्तोंको देखो। १४ । विजयाभिलापी वेगवान शूरवीर नानामहार के gondered at the swan like flight of arrows which fell down in thu army as swans do in a lake. Then at the great destruction of , men, Shri Krishn looking at the field of battle said to Arjun, "Tbeo war. riors of the oarth are being destroyed for the fault of Duryodnap. Looked at thio gold-backed bows, ornaments and quivers of the warriors, fallen down on earth. Look also at the oiled and polished ajrows like serpents fieed from thoir skins, 30. Look at the gold. bodocked tornare nud the broken shafts with gold feathers. Look at the golden urrows, golden spears and the maces covered with gold | cloth. Look at tho double-edged swords, pattishes and battlefires with broken staffs. Look at the precious clubs, bhindipala, bhushun. dis, kunaps and ayahkunts. The warroirs desirous of fighting, lying [6304] Mahabharat (६३०४) इव इश्यन्ते गतसत्वास्तरस्थितः ॥ ३५ ॥ गदाभिनायितगात्रै पलैभिन्नमलफार । गज घाजिरथैः क्षुणान् पश्य यांधान सहसः ॥ ३६ ॥ मनुष्यगमवाजीनां शराफ्नृष्ठितो मर। निशिः पटिशः प्रासैनखरैलंगुरपि ० ३७ ॥ हुघाच्छिन्नैः शोणितीय परिप्लुतैः । गतासुभिरमित्रन सवृता रणभूमयः ॥ ३८ ॥ पाहुभिश्चन्दनादिग्पः साइदैः शुभलक्षणः । सतलतः सफेयरेाति भारत मेदिनी ॥ ३९ ॥.सांगुलित्रैर्भुजायश्च घिम विरलकतः । इस्तिहस्तापमोरछन्नहरूभिश्च तरस्विनाम् ॥ ४० ॥ परचूडामणिधरः शिगेभिश्च कुण्डलैः । रथांध पहुधा भग्नान हेमकिङ्किणिनः शुभान् ॥४१॥ मश्यांश्च पहुधा पश्य गणितेन परिप्लुतान् । अनुकर्षानुपासनान पताका विविधान् ध्यजान ॥ ४२ ॥ योधानाञ्च महाशंखानु पाण्डुरांच प्रकीर्णकान् ।निरस्तजियान्मातद्भान् शयानान् पर्वतोपमान ॥ ४३ ।। जयन्तीविचित्रोधः हतांध गजयोधिनः। घारणानां शस्त्रोंको लेकर निर्जीवहोकर जीवतेसे दिखाई देतेहैं । ३५ । गदाओं से मथित अंग, वाले हाथी घोड़े और रथों. समेत मूचलोसे कूटेहुये मस्तकवाले हजारों युद्धकर्ताओं को देखो । १६ । हे शत्रुहन्ता वाण शक्ति दुधारे खड्ग तोमर पटिश पास नखर लगुडमादि अनेक शस्त्रोंसे अत्यन्त घायल मनुष्य हाथी घोड़ोंके समूह रुधिरमें भरे हुये निर्जीव देहों से पड़े युद्धभूमि में वर्तमान है । १८ । और बाजूवंद आदि शुभ भूपण हस्तवाण और केयूरको धारण करनेवाली चन्दनसेलिप्त भुजामोसे पृथ्वी शोभायमानहै ।।९। और वेगवान् शूरवीरोंकी एंटीहुईउत्तम भुजाओं वा हाथीको सूड़के समान टूटीहुई जंघाओं में भार उत्तम चूड़ा बांधनेवाले कुंडलधारी शिरों से युद्धभूमि अत्यन्त शोभादेरही है सुनहरी घंटे रखनेवाले उत्तम रथों को भी अनेक प्रकारसे टूटाहुआ देखो । । और रुधिर में भरहुये बहुत से घोड़ोंको देखो वा अनुकर्प उपासंग पताका और नानाप्रकारकी ध्वजाओं को देखो। ४२। युद्धकामों के फैलहुये श्वेतरंग के महाशंखों को और जिवा निकले पर्वत के समान पड़े सोतेहुये हार्थियों को देखो । ४३ । वैजयन्तीनाम विचित्र मालाभों से with various sorts of weapong, look like living ones. 35 phants, horses and cars, shattered by maces and clubs are lying along with thousauds of warriors with broker beads, Wounded by spears, swords, tomara, pattishes, prases, xakhars, stares etc. the men, elephants and horses aro lying dead on earth with blood stained bodies The beautiful ornaments, hand guards and the arms decked with sandal pizate beautify the land. With the arms of the warriors or with their thighs like the trunks of elephants and with the headjewels, the field of battle looks beautiful, Look at the broken cars having beautiful, golden balls. 41. Look at the numerous horses, with gold trappinga, banners and standards. Look at the white conchs of the warriors and the elephants, huge like hille, The ele: .
कंप, Karan Pary [6305] परिस्तोमान् मयुक्तानेककम्वलाम् ।। ४४ । घिहिता पिचिपाच पाचवाः कुता नया मिन्ना बहुधा घण्ठाः पतनिर्णिता गजेः ॥ ४५ ॥ धैर्यमणिदाब पति ताथांकुशान्भुपि । प्रधानाच युगापडान रत्नचित्रानुरश्या ॥ ४६॥ पक्षा: सावि प्रजापु सविता कुयाः । विचित्रान गाणापांच आतरूपपरिष्कृतान् ॥ ४॥ भश्वात्तरपरिस्तोमान गन्धान पातनाभुपिडामगीर नरेद्राणां विचित्राः काय नसूजा ४८ ॥ छमाणि पापविशनि वामस्यजनानि ।। चन्दनक्षधमाश पदनै भारुकुण्डलः ॥ ४२ ॥ क्सहमभिरकोणी पूर्णचन्द्रनिर्भमहीम् ॥ ५० ॥ कुमुदोत्पल पमानां पण्डः फुल्ल यथा सा तथा मी Fat पर कुमुदोत्पलसन्निभः ॥ ५॥ तारागाधिचिस्प निर्मलातत्विषः । पश्येमा नभसातुल्यां शरनक्षत्रमालि नीम् । पतचा कमार्जन मदाहये ।। ५२ ॥ विपि पा देषराजस्य स्थया यत् और मरेहुये हार्थियों के सवार और अनेक कालकमलों से युक्त परिस्तामों से 1 १४ । अच्छी कृष्ण और विचित्र अद्भुतप कुधानों से और हाधियों से टूटकर गिरेहुये घंटामों के चूणोंको देखो। ४५॥ वैदूर्य पाणके दगडेवाले पृथ्वीपर पड़े हुपे अंशों को और घोडों के जुये पाठ और रत्नजटित छिनों को देखो । ४६ । सवारों की ध्वजामों की नाकापर होहुये सवर्ण से चित्रित पदामों को और विचित्र पनियों से जटित सुवर्ण अलंकृत । ४७ । पृथ्वीपर पड़ेहुये मृगचर्म से बने हुपे घोड़ों के जीनपोशों को और रानामों की चूड़ामणि और मनहरी विचित्र मालाओं को देखा । ४८ । धनुपते छिदेहुये उन चामर और वैजयन्तियों को देखो चन्द्रमा और नक्षत्रों के समान प्रकाशित मुन्दर कुंडलधारी । १९ । भलंकार युक्त दादी मूछों से संयुक्त पूर्ण चन्द्रमा के समान मुखों से विजयी को देखो ५० इसी प्रकार कुमुद उत्पल नाम कमलों के समान रूपी राजाओं के मुखों से इस पृथ्वी को नक्षत्र समूहों समेत निर्मल चन्द्रमा से शोभित आकाश के समान सदेव पाणरूप नक्षत्रों की मालाओं के रसनेवाली को देखो हे अर्जुन इस महायुद्ध यह कर्म तेरेही योग्य है । ५२ । वादेवराज इन्द्र के योग्य है इस रीतिसे वह अदscatterod hera and thoro, with their tongues lolling out. Wonderful garlands, the riders of the elephants slain, blankets of black and variegated colours and the bells of elephants, sro lying broken and scattered. Look at the goads with handles studded with lapis lazuli, yokes of borees and the studdod armours, Look at the beils separat. ed from the banners and beautiful, jewelled and golden trappings of horsef, made of deer sking. Lnok tbo bend jewels and garlands of kinge Look at the ground covered with broken umbrellas, chamara and vaijayantis, and the fuces bright like the moon and stars, docked with earrings beards and moustaches, beautiful like the fall moon,50, With the lotus like faces of the kings, the ground looks like the sky में ( 6307) - Mababliaiat (६३.६) कृतमध. धै। एवं तां दर्शयन्कगो युद्धभूमि किरीटिने ॥ ५३ ॥ गच्छन्नेवाणोत् शम्दं दुर्योधनपले महत् । शंखदुन्दुभिनि? मेरीपटहनिःस्वनम् ॥ ५४॥ रथाश्वग जनादांश्च शस्त्रशदांश्च दारुणान् । प्रविष्य तदलं कृष्णस्तुरंग तिगितैः । पाये नादित सैन्यं त्वदीयं वीक्ष्य विस्मितः ॥ ५५ ॥ सहि मानाविधषणिरियासररो युधि । त्यहनद्विषतां पूगान् गतामनन्तको यथा ॥ ५६ गजयाजिमनुष्याणां शरीराणि शितः शरैः। मिस्या प्रहरतांश्रेष्ठो विदेहासनपातयत् ॥ ५५ ॥ शत्रुप्रवीरैरस्तानि नाना शस्त्राणि सापकै छित्वा मानवधीत् श्वन पाण्यः शक्र इयासुरान् ॥ ५८ ॥ इति श्री कुणपर्वाण संकुलयुद्धे एकोनविंशोऽध्यायः १९ ।। भूमि अर्जुनको दिखाते । ५३ । और चळते. हुये श्रीकृष्णजी ने दुर्योधन की सेना में शंख दुन्दुभी भेरी और पणों के बड़े शब्दों को सुना । ५४ । और रथ घोड़े हाथी भोर शखों के भयानक शन्दों को भी मुना फिर श्रीकृष्णजी ने वायु के समान घोड़ों के द्वारा उस सेना में प्रवेशकरके राजा पाण्ड्य के हाथसे आपकी सेनाको पीड़ित देखकर बड़ा आश्चर्य किया । ५५ । वाण और अनावधा में अत्यन्त श्रेष्ठ उस पांड्यने युद्ध में अनेक प्रकारके वाणों से शत्रुओं के समूहों को ऐसे मारा जैसे कि मृत्यु, निर्जीर मनुष्यों को मारती है । ५६ । घात करने वालों में श्रेष्ठ पांच्यने साक्ष्ण वाणों के द्वारा हाधी घोड़े और मनुष्यों के शरीरों के छैदकर उन निर्जीवों को गिराया ।५७। फिर पाण्डयने शत्रुओंके चलाये अस्त्र और नानाप्रकार के शस्त्रों को शायकों से काटकर उन शत्रुओं को ऐसे मारा जैसे कि इन्द्र ममुरों को मारता है । ५८ । studded with the moon and stars and the arrows shine like stars. The work dona by you in this battle was worthy of you or of Indra the chiet of gode in heaven." Thus showing the field of battle to Arjun on his way back, Krishu beard a great noiss of drums and trumpets in the army of Duryodhan.. The sjunds of cars, horses, elephants and weapons were also heard there. Then untering the army by means of the horses swift like the wind, Shri Krishn was amazed to see your army grinded by Pandya. Skilful in the use of arrows and other weapons, Pandya slew the enemies with his arrows sis Yami slays those whuse periods of life code to an end. Pandya the best of warriors, pierced the bodies of men, elephants and horses with bis arrows and slew them. Then baving cut down the arrows 3nd other weapons of the enemies, Pandya slew them as Indra does the asurs."58. -- (६३०७) । कर्णपर्व Karan Pary [ 6307 ] धृतराष्ट्र उवाच । प्रोकस्त्वया पूर्वमेव प्रधारो लोकविश्रतः । नवस्य फर्म संग्राम स्षया सञ्जय कीर्तितम ॥ १ ॥ तस्य विस्तरशो हि प्रवोरस्याय विक्रमम् । शिक्षा प्रभापं धीर्यच प्रमाण दर्पमेघ च ॥ २॥ सरय ज्वाच । भीमद्रोणकृपद्रोणिकर्णार्जु नजनार्दनान् । समासथिद्या धनुपि श्रेष्ठान यान्मन्यसे रथाम् ॥ ३ ॥ सोह्याक्षिपति घीयेश सोनेतान्महारथान । न भेने चात्मना तुक्य कडियदे जनेश्वरम ॥ ॥ तुल्पता कर्णभीमायामा मनो या न मृष्यते । घामदेघार्जुनाश्याच 1 न्यूनेता मैल दात्मनि ॥५॥ स पायो नृपतिश्रेष्ठः सशसमृनाम्बरः । कर्णस्थानीफमहत परा भूत इषान्तकः । तदुर्णिरथाश्य पचिप्रवरसंकुलम्। कुलाल चक्रषत् भ्रान्त भध्याय २०॥ धृतराष्ट्र बोले हे संजय तुमने प्रथमही लोक में विख्यात पारव्य बड़ा वीर | वर्णन किया परन्तु तुमने युद्ध में इसके कर्म को वर्णन नहीं किया । १। अब उस पड़े वीर के पराक्रम और शिक्षा के प्रभाव वल वहप्पन और अहंकारको न्योरेवार कहो । २ । समय बोले कि तुम भीष्म द्रोणाचार्य कृपाचार्य अश्वत्थामा कर्ण अर्जुन और श्रीकृष्ण आदि जिन रथियों को सर्च विद्या सम्पन और धनुष विद्या | में सबसे अह मानते हो और जो इन सब महारथियों को भी अपने पराक्रम से तुच्छ समझता है जिसने अन्य किसी रामाको अपने समान नहीं माना । ४.। और जो भीष्म द्रोणाचार्य के साथ में अपनी समानताको भी नहीं सहता है और जिस ने भपनको बासुदेवनी और अर्जुन से कम नहीं जाना। ५ । उस राजाओं में और सशस्त्रधारियों में श्रेष्ठ राजापाज्य ने अत्यन्त क्रोधयुक्त होकर यमराजके समान कर्णकी बड़ी सेनाको मारा। ६ । बड़े स्थ घोड़ों समेत अत्यन्त उत्तम पतियों से न्याप्त और पांडयके पराक्रमसे घायल होकर वह सेना कुम्हार के चक्रके समान CHAPTER XX prowess of Dhritrashtra said, “You spoke of the famous warrior Pandya, but you did not mention his deods in battle. Now tell me in detail, of his prowoss, training, strength, greatness and pride." Sanjaya rep. lied, "King Pandaya, who looked down upon the your great warriors, Bhishw, Drona, Krip, Ashwathama, Karan, Arjun, Krislin and other princes, who did not think Bhislın and Drona to be bis cquals, and who did not think himself less than Vasudev and Arjun, that best of warriors, enraged like Yamraj, destroyed the.] great army of Karan. 6. Full• of large numbers of cars, horse and 'foot, the great army wounded by the prowess of Pandaya, turned round like a potter's wheel and was dispersed in all directions. Bal.
6308 ] (६३०८) Valiabiriat पारव्येनाशाह बलात्॥ ७ ॥ पश्चतापरया विविमायुधविषान् । सम्प गत पाया पायुमेंघानिवाक्षिपत् " हिरवा निस्वारोहाम् विपताकायुधाण जान् । तपादरक्षानहनत कोणानिधादिशा ॥ १ ॥ स शकिमासतूणीरानस्यारो हाम इपानाप। गुलिन्दशवा कानिगान्धातगणान् ॥ १० ॥ दाक्षिणात्यश्चि भोलिसनामशानदशनकावाबारा वाकवामन! तु रगरलं मानानन्त पाण्डपमाहवेच्याद्रीणि संम्रान्तगरसम्भ्रान्तस्तास्यात् ।।१२।। नाम न मधुरमीत तमोतयत । प्राह प्रारतभिः स्मितपूर्व समाझ्ययन ॥१३॥ राजन कमलपत्राक्ष विशियाभिजगभुतः । मसंहनमप्रस्य प्रख्यातवळपाषष ॥ १४॥ मुष्टिीलपायनल्यञ्च व्यायता दघवनः दोभ्यो विस्फारवन भासि मार घूमनी धर उधर फिरनलगी । ७ । पाइयने घोड़े ध्वजा भार सारथियोंसे रहित रयोंको और कटिन युद्धसे मारेहुये हाथियों को अच्छीरीति से चलाये गणों से ऐसे इटादिया मैसे कि गयु शदलोंको हटाताहै। ८ । पताका घना और शखों | से रहित हाथियों को हाथियों के सवारों समेत पांछ के रक्षकों को ऐसे माराजैसे किशनुहना इन्द्र अपने वजूसे पर्वतको विदीर्ण करता है । ९ । उसने शकिमास और तूणीरों समेत अश्वारूढ़ और घोड़ों कोभी मारकर पुलिंद खश, वाइलीक, निषाद अंधक तंगण । १० । दाक्षिणात्य और भोगोंको और युद्धमें निई यो शूरों को बाणोंक द्वारा शत्र भौर कवसि रहित करके निर्जीव किया ।११।युद्धर्मेवाणों मारनेवाले रुधिर से उत्पन्न होनेवाली ब्याकुलता से पृथक् पाख्य को देखकर अश्वत्थामाजी भय से उत्पन्न होनेवाली न्याकुलता से रहित चतुरंगिणी सेना समेत उस के सम्मुख गपे !! वहां महारकर्तामों में श्रेष्ठ अश्वत्थामा ने निर्भय के समान इसको मीठे वचनों से समझाकर कहा । १३ । कि हे कमलदल लोचन उत्तम कुलीन शाखा वर्ण के समान दृढ़ शरीर और बल में ing the cars destitute of horses, standards and drivers, and slaying clephants, Pandayo, with the lights of Lis well-discharged arrows, routed the army as the wind disperses the clouds. Hy cut and killed the standards, banners, weapong, elephanls, their riders and rear guards, as Indra the destroyer of foes does the mountains Having cut down the horseinen and borses, along with their spears, prases and quivere, with his arrows, he slew and deprived of arms and ar 'mour the warriors of Pulind, Khash, Vahlik, Nishad, Andhak, Tan. gaa, Southern country, Bhoj and other hard bearted warriors 11. Scoing Pandya fearlessly shed blood with his arrows, Ashwathama free from fear, and accompanied by an army. of four denominations, opposed bim. Ashwathama the best of warriors fearlessly addressed him in sweat words, saying, Lotus oyed one, of the noblest family, of (६३०१) कर्णएवं Karan Pary [6309] जालदयभृशम् ॥ १५ ॥ शायर्महावेगरभित्रानभिवर्पतः । मदन्यं नानुपश्यामि प्रति वीर तबाहय ॥१६॥ रद्विरदत्तघश्यानिकः प्रमथसे पहून । मृगसंघानिचारण्ये विभी. भीमपलो हरिः ।।१७।। महता रथघोषेण दिध भूमिश्च नादपन् । वर्षान्ते शस्यहा मेघों भासि हादीय पार्थिव ॥ ८ ॥ संस्पृशानः शस्तीक्ष्णास्तूणादाशीवियोपमान । मयेधेकेन 'युध्यस्व इयम्बकेनान्धको यथा ॥ १८ ॥ एवमुक्तस्तयेत्युक्त्वा प्रहरेति च। ताडितः । कणिना द्रोणतनयं विव्याध मलयध्वजः ॥ २० ॥ मर्मभेदिभिरत्युगिरग्नि। शिखोपमः। स्मयनश्यहनद्रौणिः पाण्ड्यमाचार्यसत्तमः ॥ २१ ॥ ततोपरान सुरक्षणा. विख्यात राजापाण्ड्य । १४ । आपके धनुप की प्रत्यञ्चा पृष्ठस्थान में चिपटी हुई दिखाईदेती है और बड़े भुजदगडों से बहुत बड़े धनुपको बड़े वादल के समान कठिन टंकारते हुये दृष्टि पड़तेहो । १५ । बड़े वेगवान वाणों की वर्षा से शत्रुओं के सम्मुख मुझ वाणवर्षा करनेवाले के सिवाय आपके सम्मुख होनेवाला शूरवीर युद्धमें नहीं देखताहूं । १६ । तुम अकेलेही बहुतसे हाथी घोड़े रय और पतिलोगों को ऐसे मयतेहा जैसे कि निर्भय और भयानकरूप पराक्रमी सिंह वन में मृगों के समूहों को मथन करताहै। १५! हे राजा रथके बड़े शब्दसे पृथ्वी और आकाश को शब्दायमान करतेहुये ऐसे दिखाई देतेदो जैसे कि वर्षाके अन्त में खेतीका हानि, करनेवाला गर्जताहुआ वादल होताहै । १८ । विपैले सपकी समान तीक्ष्ण वारणोंको तूणीरसे निकाल कर मुझ अकेले से ऐसे युद्धकरो जैसे कि अन्धकन शिवजी के साथ युद्धकियाथा । १९ । प्रहार करो ऐमे कहने से घायल हुये बस मलयध्वजपाइयने बहुत अच्छाऐसा शब्द कहकरकरणानाम वाणसे अश्वत्थामा को-पायल किया । २० । आचार्यों में श्रेष्ठ मन्द मुसकानकरते अश्वत्थामा मर्मभेदी अत्यन्त उग्र अग्निशिखा के समान वाणों से पाइयको घायल किया इसके body hard as vajra, tamous in strength and prowess, Prince Pandya, pour bow hanging by your side; with your nighty aims you are seen twanging your large bow like thunder. 15. None of the enemies, except inyself, can cope with the shower of your atrowe. "Alone you over power 'many elephants, horse and foot, as a powerful lion in a forest terrifie's a herd of deor. Filling the leaven and earth 'with the 'rumbling of your car, you look like a thundering cloud which comes to destroy cultivation at the end of the raing season." Take out poisonous arrows from pour quiver and fight with me alone, as'Andbak bad fought with Shiv." Eoraged at the chaltengé, 'King Pandya said "Very well," and wounded Ashwatháma with his arrows.' 20. With a slow smile, Ashwathama, the best of acharyas, iwounded Pandya with his dreadful, fiery arrows, and thei you have - - forQ] Mahabharat (६३९०) प्रान नाराचारमर्मभेदिनः । गत्या दशम्या संयुक्तानश्यामाप्यवासृजत् ।। २२।। ताग शराणच्छिनत् पाण्ऽयो नभिर्निशितैः शरैः। चतुर्भिरईयच्चाश्वानाशु ते व्यसषोभ चन ॥२३॥ अथ प्रोगमतस्येपूस्ताश्छित्वा निशितैः शरैः । धनुज्या पिततां पास्यधि छेदादित्यतेजप्सः ॥ २४ ॥ विज्यं धनुराधिज्य कत्या द्रौणिरमित्रहा । प्रेक्ष्य गशु र युक्तान नरैरत्वान् हयोत्तमान् ॥ २५ ॥ ततः शरसहमानि पयामास वै विजः। सर्षाधमाकाशमफरोद्दिश च ॥ २६ ॥ तंतस्तानस्यतः सर्वान् द्रोणेर्वाणाग्म हात्मनः । जामानोप्य क्षयान पाण्ड्योशातयत् पुरुषर्षभ।। २० ॥ प्रयुक्तांस्तान प्रयत्नेन छित्वा द्रोणेरिपूनरिटायरक्षी रणे तस्य प्राणुनिशितैः शरैः ॥ २८ ॥ मयारेलोष एष्ट्रपा मण्डलीकृतका कः । प्रास्यद्रोणसुतो धाणान् वृष्टिं पूषानुजो यथा ॥ १९ ॥ पछि अश्वत्थामा ने अत्यन्त तीक्ष्ण मर्मभेदी अन्य नाराचों कोभी फेंका । २२ । पांड्यने उन बाणोंको अपने तीक्ष्ण धारवाल नौवाणों से काटा और चार वाणों से घोड़ों को घायलकिया भोरं घायल होतेही वह शघि मरगये । २३ । इसके पीछे मूर्यके समान तेजस्वी पाड्यने तीक्ष्ण धारवा वाणोंसे अश्वत्थामाके उन वाणोंको काटकर धुनुपकी बड़ी प्रत्यंचाको काटा । २४ । इसके पीछे शत्रुहन्ता अश्वत्थामा ने दिव्य धनुपको तैयार करके और शीघही रथ में जुटेहुये दूसरे उत्तम घोडों को देखकर ! २५ । उसमें बैठे हज़ारों पाणों को चलाया पाकाश और दिशाकों को वाणों से व्यास करदिया । २५ । इसके पीछे याण फेंकनेत्राले अश्वत्थामा के उन सत्र वाणों को अविनाशी जानकर उस पुरुषोत्तम पाड्यने उनको काटकर गिराया 1२५ । फिर पांड्य ने अश्वत्थामा के उन बाणों को काटकर युद्धमें अपने तीक्ष्ण धार बाणों से उनके दोनों चक्र रक्षकों को मारा । २८ । इसके पीछे शत्रुकी हस्तलापवताको देखकर धनुषको मण्डलरूप करनेवाले अश्वत्थामा ने ऐसे वायों को.छोड़ा जैसे कि पूषाका छोटाभाई पर्जन्य नाम जलकी वर्षाको छोड़ता है।९। हे श्रेष्ठ जिन शस्त्रों को भाउ २ वैलवाले आठ छकड़े से चलते हैं उनकोअश्वत्थामा P shot other sharn arrows, Younding the vital parts.. With nine Bharp | arrays, Pandya cyt them. down and sley his adversary's four horses with four arrove, Then prince Pandya, glorious like the Sun, har. ing cyt Ashwathama's arrows yith his own, cut asunder his bow. string, Ashwathama the destroyer of foes then took up a celestial bow and fapn getting another set of horses yoked to his car, filled the directions with thousands of his arrows Seeing the indestructible arrows of Asbyatlarda, Pandya cut them all down and with his own arrows sley his adversary's guards. Sesing his dexterity, Athwa. thama he moved hiş bowy, in a circle en l discharged arrows like rain. Ashwathama discharged in half an hour as many arrows as could be:
. कर्णपर्ष Kuran Parv 1631) अष्टावष्टगगन्यूदुःशकानि यदायुधम अगलदष्टभागेन द्रोणिधिप मारिष॥३॥ तदन्त कमिष अशमन्तकस्यान्तकोपमम् । ये ये दरशिरे तन विसंज्ञाः प्रायशभियन् । ॥ ३१ ॥ पर्जन्य इय धर्मान्ते वृष्ट्या साद्रिद्युमा महीम् । आचार्यपत्रता सेना वाण वृष्याम्यवीवृषत् ॥३२॥ श्रोणिपर्जन्यमुक्तां तो पाणदृष्टि मुदुःसहाम् वायव्यारेण सीक्षप्य मुश पाण्ड्यानिशीमदत् ॥ ३३ ॥ तस्य नानदतः केतुं धन्वनागररूपितम। मलयप्रतिम दौणिश्छित्याश्यांशतुरोहनत् ॥ ३४ ॥ मूतमेकेपुणा हत्या महागलदनिस्व नम् । अनुदिछत्वार्द्धचन्द्रगतिलो व्यधमद्रयाम॥३५॥ मस्ररखाणे संघाछियासी युधानि च । प्राधमप्यहित द्रौर्णिन अधान रणेप्सया ॥ ३६ । एतस्मिन्नन्तरे को गानीकमुपादयत् । दापयामास सतदा पाण्डवानां महळम॥३७॥विरथानपिनचके गजाननाय भारत । योधान् बहुभिरानठेत् शरः सनतपर्वभिः ॥ ३८ ॥ अथं प्राणे ने भाषीपड़ी में चलाया। ३० । उस यमराज के समान क्रोधरूप भार मृत्यु के सहश को जिन्दों ने वहां देखाथा वे अचेत होगये । ३१ । जैसे कि वोतु में बादलों के समूह पर्वत क्ष रखनेवाली पृथीपर वीकरते उसी प्रकार आचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने उस सम्पूर्ण सेनापर वाणी की वर्षा करी । १२ । पायरूपी वायुने उस अश्वत्थामा रूप वादलसे छोड़ेहुर्य बड़ें दुःखसे सईनेके योग्य उस वाणरूपी र्ण को बड़ी प्रसन्नता अपने वायु प्रस्त्रसे हटाकर नाश करीदया । ३३ । अश्वत्थामा ने उस गजनेवाले पाण्ड्य की ध्वजा को जो कि. चन्दन भगुरसे चर्चित मलयाचळके स्वरूपधी काटकर चारों घोड़ोंको मारा ।३।। फिर एक वाणसे सारथा को मारकर और अर्धचन्द्रमे बड़े वादलकी समान शब्दा- यमान धनुषको काटकर रथको टुकड़े २ ॥३५ । अश्वत्थामा ने अंखों से रोककर और सर्व शवों को काट कर आधान होनेवाले शत्रुको युद्धाभिलापी होकर पुर्दमें | नहीं मारा ।।६। इसीमन्तरमें कर्ण हाथियों की सेनामें गया और वहां उसने जाकर पाण्डवोंकी यही सेनाके भगाया । हेभरतवंशी उसने टेप वाले बहुतसे वाणों से रथियों को विस्थ करके हाथी और घोड़ों को अचेत करदिया। ३८ । इसके carried on eight carty, each drawn by eight oxen.30: Miny of those who saw him angry, like Yaburaj ot Death; lainted with lear: Ashwatlanna tha sou of the achärya slowered his arru've like rain: Pandaya; with a cheerful wind, checked the dreadiul shower of ar. rows with his own weapon: Thor Asliwathania cut down the fragtant standard and slow all the four Lorses of rousing Pundays. The kill. ing the driver with one arrow and cuttinų asundor lle thundering bor ivith another, lio broks the car into pieces. 35. Cheching the Feapobs with weapons and cutting thein, Asbiatbama; jûtending to fight again, fpared the life of his woshened foe: In the meantime Rajan entered the army of elephants and put the Paldhy Wari's Mahabharat (63120 १६३१२३ महेष्वासः पाण्ड्यं राधुनिवणम् । विरध रथिनां श्रेष्ठं नाहनादकांक्षया ॥ ३९ ॥ हतेवरो दन्तिवरांसकल्पितस्त्वराभिसृष्टः प्रति शन्दगी चली ।तमाद्यद्रोणिशराह तस्त्वान् जवेन कृत्वा प्रतिहस्तिगजिनम् ॥ ४२ ॥ तं वारणं चारणयुद्धकोविदो द्विषो तम पर्वतसानुसत्रिभम् । तमध्यतिष्ठन्मलयध्वजस्त्वरन् यधाद्रिद्वंग हरिरुन्नदस्तया ॥४१॥ स तोमर भास्कररम्मिपच से बलात्रसौतमयलमन्युभिः। संसर्ग शीघ्र पीपाडयन गजं गुरोः मतायादिपतीदवरी नदन " ४२ ॥ मणिप्रकोत्तमयजेहाट रकत चांशुकमाल्यमौक्तिके: हनो हतोसोत्यसकन्मुदा, नदन् पराभिनद्रोणिवरान भूपणम् ॥ ४३॥ तदर्कचन्द्रग्रहणपस्विष भशामिपातात पतित विर्णितम् । महेन्द्र वाभिहत महास्वनं यथाद्रिश्चंग ' धरणीतले तथा ॥ ४ ॥ ततः प्रजपाल परेण पार्छ बड़े धनुपधारी अश्वत्थामाने शत्रुहन्ता रवियोंमें श्रेष्ठ रथसे रहित . पहियको युदकी इच्छाकरके नहीं मारा ३९ । अच्छा अलंकृत शीघ्रगामी शब्द पर चलने वाला. अश्वत्थामाके वाणोंसे घायल पराक्रमी हाथी जिसका कि स्वामी मारागयाथा वेगसे हाथियोंको मलता हुआ शीघ्र उप्स पाइसकी भोर गंपा। ४० । हाथियों के कुशल मलपध्वज पांड्य बड़ी शीघ्रताको करता हुआ उस पर्वतके शिखरकी समान अप्ठ हायापर ऐसे सवारहुआ जैसे कि गर्नतामा सिंह पर्वतके शिखापर चढ़ता है ४ाउस मलयाचलके स्वामी गर्नते और भकुशसे हाधीको क्रोधयुक्त करवानेवाले पांड्यने पराक्रम और अनचलाने के उपाय जानने के अभिमान से शीघ्रही सूर्गकी, किरण के समान तोमरको गुरूंके पुत्रपर छोड़कर । ४२। मारा है मारा है। ऐसे मानंदपूर्वक शब्दों को करताहुप्रा बड़ेवेगसे गी और अश्वत्थामा के उस मुकुटको तोमर से तोड़ा जोकि माणियों से जटित उत्तम हीरों से और सुवर्ण से शोभित वमूल्य के वन और मालाओं से अलंकृत था । ४३ । सूर्य चन्द्रमा ग्रह और अग्निके समान मकाशित वह मुकुट कठिन भाघात से ऐसे चूर्णहोकर गिर- पड़ा जैसे कि इन्द्र के वसे घात कियाहुआ बड़े शब्द युक्तहोकर पर्वतका शिखर पृथ्वी पर गिरे । ४४। उसके पीछे अश्वत्थामा ने यमराजदण्ड के समान शत्रुभों के to flight Depriving the warriols of cars, with his arrows, ho inade the elephants and horses insensible, Then the great arcbor Ashya. Lhana spared the life of Pandya who was deprised of his car, Founded by Ashwathama's arross, a well-docked elephant iphoso i rider was dend, came quickly along towards Pandya. 40, skilkul in elephant fighting, Pandya lastenci to mount that liuge elephant as' Jia lion ascends a mountain. The Prince of talnychal, making the elephant enraged with goods, hurled a tomar, bright like tho says: of the sun, at the son of the acbarya and roared chverfully crying out , I have slain hin; I have slain bim." Tho tomar destroyed Ashwa. thama's diadeni deckel with jewc's and gold. The dialein struck, -- (६३१३ । 7 Kiiran l'ary [6313 मन्युना पदाहतो नागातिर्थया नया। समाददे बान्तकदण्डसनिमानिनाभिप्राकिरी भतुर्दशा द्विपस्य पादाकरान् स परभिन पस्य याहू च शिरोधव विभः ।जधान षडाभिः पान्तस्विरः स पायर जानुचरान्महारथान् । ४६ ॥ मुदीर्घवृत्ती परसाद नोक्षिता सुवर्णमुकामणिभूषणी । भजी धरायां पतिती नृपस्य तो विष्टस्तार्थ इतषिपोरगी ॥४॥शिरध तत् पूर्णशशिप्रभाननं सरोषताम्रायतनेत्रमुगसम् । क्षिता धपि भ्रामति तत् सकुण्डक विशाखयोर्मध्यगतः शशी यथा ॥ ४६॥ स तु द्विपः पञ्चभिस्तपुभिः कृतः पशश्चतुरो नृपस्त्रिभिः । कनो शांशः कुशलेन युध्यता या हपिस्तदशदेवतं तथा ॥ ४९ ॥ स पादशा राक्षसभोजनान् परन् प्रशार पाण्डपो, पाड़ा करनेवाले पौदह बाणों को हाथ में लिया। ४५ । तब उस उत्तम. तेजस्वीन हाधीक चार पैर और मुंह पांच बाणों से राजाको दोनो भुना और शिरको तीन धाणोंसे भोर राजा पांड्यके पीछे चलनेवाले छ.महारथियों को छ वाणोंसे मारहाला १४६ राजाकी दोनों भुजा जो बहुत लम्बी चन्दन से चर्चित सवर्ण मुक्ता होरे भोर अन्य अन्य मणियों से अलंकृत पृथ्वीपर गिरपणी भोर गरुड़ से व्याकल सपो की समान फड़फड़ाने लगा यह पूर्णचन्द्रमा समान प्रकाशमान और क्रोधसे घड़ी २ लाल मांख रखनेवाला कुण्डलधारी शिरभी पृथ्वं पर गिराहुआ ऐसा शोभायमान हुमा जैसे कि दोनों विशाखों के मध्य में चन्द्रमा वर्तमान होता है 1४८ । फिर वह हाथी पांच उत्तम वाणों से छभाग कियागया और राजामी. तानमाणों से चार खंडकियागया उस सावधान युद्धकर्ता ने इसप्रकार से दशमाग किय जैसे कि दश देवनाओं से संबंध रखनेवाला हव्यहोता है । ४९ । वह पांइय घोड़े हाथी और मनुष्योंको जोकि राक्षसों के भाजन ये दुकड़े २ कराके अश्वत्थामा के पास ऐसे शातहगिया जैसे कि पितरों की प्रिय अग्नि मृतक देहरूप दस्यको by the droulul lumur, Wils biukea tuto pieces with a crusl like that of a peak of a moutain struck by ligbtring. Then Ashwathaina took; up fourteen foo-destroying arrots 45. Then the glorious one cut the four feet and trunk of the elephant with five arrows, the king's two arins and head with thres and the sic rear guards with six ap' rows. Both the arms of the king, long, sandal-pasted and decked with gold, pearl and diamond ornaments, feel down on earth, trombi. ing liko sepents attacked by a garur. The head, with a face like the, full moon and large oyes red in anger, falling down on earth, looked! glorious like the moon between two bishakl stars. Then tho clephant Fas split into sis parts by six arross and the king's body was divided into four parts by three. Thus tho careful warrior divided the two into ten parts like the sacrificial portions of ten gols. Har. 'ing caused the horses, clephants and men to be the food of rakshaser, 1163101 Mahatmaat लान्महाकुन प्रगृह्य क्षमारतुः परस्थराजधासपा । २२. घाणज्यातलशम्देन व दिश. प्रवियो पियत् । पृधिरी नेमिघोष नादयन्तो ययुः परान् ॥ १३ ॥ वेन रान माता हाच राहवम् ।' पोर घोरमहाधार कलहान तितीर्षक: ॥ १४ ॥ ज्यातलायनः सन्द कुजराणाञ्च वृहनाम् । पादानानाम्य पतता नृष्णा नादो महानभूत् ॥ १५ ॥ वाणशन्नाश्च विधि धान् शराणानांञ्चाभिग साम् । श्रत्वा तत्र भश प्रसः पैतुम सोनकाः ॥ १६ ॥ नेपां निनंदताव राख पंच मुश्ताम् । वाहून धेिरथिर्धारः प्रमोथेपभिः पगन् ॥१७॥ पम्ध सञ्चालवीराणां रथान् दश च च च । सासमतवमान कर्णः शरैनिन्य यमक्षयम् ॥ १८ ॥ योध मुपा महावीय्यां पाण्डनां कर्णमाहये । शीघ्राला स्तूर्णमादृत्य परिचयुः समन्ततः ॥ १॥ ततः को विरसेना शरवरिलोडयन् । विजगाहाण्डजाकीपों पमिनीमिय यूथपः ॥ २० । विषाध्यमवस्मन्य राधेयो धनुचमम। पिंधन्यानः शितणः तीक्ष्ण कुन्त भिन्दिपाल और, वड़े बड़े अंकुओं को हाथ में लेकर परस्पर मारने की इच्छासे चढ़ाई करनेवाले हुये । १२ । वाण और धनुपों की प्रत्ययाके शनों से दिशा विदिशाओं समेत पृथ्वी और आकाश को शन्दापमान करतेहुये शत्रुओं के सम्मुख गये। १३ । बडे शब्दों से अत्यन्त प्रसन्न युद्ध से पारहान के अभि- लापी वीरोंन शत्रुओं के वीरों के साथ महाघोर युदकिया। १४ । तर धनुप की मत्यञ्चा के शब्द और पिघाइते हाथी भार गिरतेहुये मनुष्यों का महाघोर शम्द हमा । १५ । फिर वहां पर सेना के मनुष्य सम्मुख गनते हुये शूरवीरों के नानाप्रकारों के शन्दों को सुनकर अत्यन्त भयभीत और अचत होकर गिरपो 1१६ । उनके गर्जते और वाणों की वर्षा करतहुये वार कर्ण ने पापालदेशी धारों के वीसरधियों को घोड़े सारथी और ध्वजाभों समेत अपनेयाणों से स्वर्गको पठाया । १८ । युद्ध में पाण्डवों के बड़े पराक्रमी उत्तम युद्धकर्ताओं ने शीघ्रता पूर्वक अखों के चलाने से आकाशको न्याप्तकरके कर्णको रारोंभोर से घेलिया ।१९। इसके पीछे कर्णने वाणों की वीस शत्रुनों की सेनाको छिन्न भिन्न करके ऐसा व्यधित किया जैसे कि पक्षियों से व्या'त कमलों के वनोंको गजराज मथन करता है । २० । कर्णने शत्रुओं में पिरकर उत्तम धनुपकोले तीक्ष्णवाणों से discharged. Filling the dinxtions, with thu souuds of bowstring, the two arso:os opposed. The great warriors, desirous of conquest, fougbt Fery bravely. 'Then the 'sounds ot thowstrings, the shricks ot cle phants and tho falls of inen wera tremendous to litar.15.Tbo mep or the army, raired at one another and tho timid becamo insensible on hosting them. While they were thus rusring, bravo Kaian sent tacnts Panchal warrior to the region of Yawe ' Filling the air with hiš ar. rove the warriors attached Karan of all sides. Tben Karin' dis. persed the simy of the eneniġ as an elephant 'disperace tho Linda .
[6317 hard, without caring for their lires, and wounded one another party ed witb armours and ornaments, this warriors with mages and liter like the staff of Yam, roaring and calling ono another (६३१७) कर्णपर्व Kuan Pary शिस्युन्मथ्यपातयन् ॥ २१ ॥ धर्मवर्माणि संछित्रान्यपतन भुषि देहिनाम् । विहु नस्य संस्पर्श द्वितीयस्य पतीसणः॥ २२ ॥ मर्मदेवामुमथनचनुपः प्रच्युतैः शर. मौर्या तलभ्यहनत कशा पाजिनो यथा ॥ २६ ॥ पाण्डुसजयपाञ्चालान शर गोवरमागतान् । ममई तरसा कर्णः सिंहो मृगगणानिव ॥ २४ ॥ ततः पाञ्चालराजश्व द्रौपदेयाश्च मारिष । यमौच युयुधानध सहिताः कर्णमभ्ययुः ॥ २५ ॥ तेषु व्यायच्छ मानेषु कुरुपाशलपाण्डुप । प्रियानसून रणे त्यक्त्या योधा जनुः परस्परम् ॥ २६ ॥ मुसनमा चिनः प्रशिरमाणभूपणाः। गदाभिमपलेश्चान्ये परिपेश महायलाः ॥ २७ ॥ समभ्यधावन्तभृशं कालदण्डैरिवोद्यते। नईन्तश्चाइयन्तश्च प्रवल्गन्तक्ष मारिष ॥ २८ ॥ ततो निजघ्नुरन्योन्य पेतश्चान्यान्यताडिता: 1 वमन्तो पिरं गार्षि मस्तिष्कमणा युधाः ॥ २९ ॥ दन्तः सचिवक्त्रंदाडिमसाः। जीवन्त ष उन,शत्रुओंके (शरों को काटकर दूरगिराया । २१ । तव मृतक वीरोंकी टूटीहुईटाले और कवच पृथ्वीपर गिरपई। । २२ । धनुपसे छोड़ेहुये मर्म देह और प्राणों के घातक वागोंसे धनपोंकी प्रत्यंचा और तूगीरों को ऐसा घायल किया जैसे कि चाबुकसे घोड़ों को घायल करते हैं । २३ । कर्णने पायके लक्षमें वर्तमान पाड्य मुंजय और पांचालों को बड़े बेगसे ऐसे महनकिया जैसे मृगोंके समूहों को सिंह मर्थन करता है । २४ । हे श्रेष्ठ इसके पीछे पांचाल और द्रौपदी के पुत्र नकुल और संहदेव सात्यकि समेत एक साथही कर्ण के सम्मुखगये । २५ | उन कौरव पांचाल और पांडवोंके उपाय करनेपर युद्धमें बड़े २ युद्ध करनेवालों ने अपने मियमाणों को त्याग करके परस्पर घायलकिया। २६॥ अच्छे अलंकृत कवचधारी आभूपणों से युक्त महावली कालदण्डक समान गदा मूशल और परियों को उठाये हुये गर्जते और एकएकको पुकारते शीघ्र सम्मुखगये । २८ । इसके पछि एकने एकको घायल किया और शयलहो होकर गिरपड़े और कोई शूरवीर प्रों से रुपिर गेरते मस्तक नेत्र और शखोंसे होनहोकर ।२९। शवोंसे युक्त भौर दांतो से when he enters a lake tull of lotuses. 20. Surrounded by easmies, Karan, by his sharp arrows, beheaded the warriors. Then the broken shields and armours of the warriors fell down on earth. Discharging piercing arrows from his bor, he cut the bowstringe and quivers as a horse is done by whips, Karan younded ths Pandyar, tho Brinjagas and the Panchals who came within reach of his arrowe, as a lion does a herd of deer. Then the Panchals, the sons of Draupadi Nakul, Sabadey and Satyaki united together, opposed Karan. 25. The Kauravas, the l'anchals and the Pandav varriors' fought rəisod up Very hai .
(63181 Mahabharat (६दा 'चाप्येके तस्थुः शस्रोपहिताः ॥ ३, परश्वधाप्यपरे पहिशरसिीमस्तथा । शकि: मिमन्दिपालेच नत्ररप्रांततोमरैः ॥ ३१ ॥ ततथिच्छिदुश्चान्ये विभिनुशिक्षिपुस्तथा संचनच जन कुवा रणमहार्णवे ।। ३२ ॥ पेतुरन्योन्यनिहता व्यसयो रुधिरो क्षिताः। क्षरन्तः सरस रक्त प्रकृसाधन्दना इव ।। ३३ ॥ रथे स्था घिनिहता इस्तिमि धार्पिहस्तिनः । मरेनरा हताः पेतुरश्याचाश्वः सहमशः ॥ ३५ ॥ वा शिसि छत्राणि विपरस्ता नृणां भुजाः ।क्षरैर्भल्लादचन्द्रश्य छिमाः पेतुमहीतले ॥ ३५ ॥ नसंच नोगान् सायान् हयान ममृदुराहवे। मध्यारोहेहताः शराश्छिन्नहताब दन्तिनः ॥ ३६॥ सपताका घाः पेतुषिशीर्णा इस पर्वताः। पधिभिश्च समाप्लुत्य विरदाः स्पन्दनासधा ॥ ३५ ॥ हताश्च हन्पमानाश्च पतिताचैव सर्वशः। अपधारोगा समासाथ त्वरिताः पत्तिभिहताः ॥ ३८ ॥ सादिभिः पतिसाच निहता युधि शेरते पूर्ण कपिर में भरेहुये अनारके वृक्षकी समान मुखोंसे जीवते हुये से नियतहुये १० इसीप्रकार दूमरोंने फरसा पटिश खड्ग शक्ति.भिदिपाल मास और तोमरोसे ॥११॥ कादा छेदा मौर घायळकरके फेंका गिराया मारा और क्रोधयुक्त वारोंने युद्धरूपी महासमुद्रमें घायलकिया। ११ । परस्पर में मारेहये निर्जीव रुधिरसे भगेहुये अन्दर रथवाले रुधिरको गिरातेहुये ऐसे गिरपड़े जैसे कि चन्दन के कटेहये वृक्ष गिरा | जाते हैं । ३१ । घोंसे रथीमारेगये हाथियोंसे हाथों, मारेगये मनुष्योंसे मनुष्य और घोरों से मारेहुये इनारों पोड़े। ३४ । चरम भल्ल और भर्द्धचन्द्रों से कटे हुये भुज शिर छ और हाथियों को मूडोसमेत मनुष्योंकी भुजा पृथ्वीपर गिरपड़ी । ३५ ॥ हायियों ने रथासमेत घोरे मार.मनुष्योंको मईनकिया अश्वारूड़ोंके हायसे शूर वार मारेगये । १६ । और पताका धनाओं समेत कटीहुई मंडों समेत हाथी ऐसे गिरे जैसे टूटे हुये पर्वत गिरते हैं वह हाथी रय पतियों के सम्मुख जाकर मरे और मरकर गिरपड़े । १७ । और शीघ्रता करनेवाले अश्वसवार सम्मुख होकर | पतियों के हायसे मारेगये । ३८ । भौर युदमें अश्वसवारोंके हाथसे मारेहुये पतियों opposed one another. They wounded one another and fell down bleeding from their beads and eyes and deprivod vf weapons. With weapons and teoth reeking blood, they werg. seen standing like pormer granato trees. 3.0. Others out and killed with #xes, palishęs, a words, spears, bhintipals and other weapons and ran a sca of blood. Saia and bleeding, tho. good car-warriors fell down like Sandal creen. Car-warriors slew car warriors; clephant riders slew elephant riders and men slew men and horses, Cut down by arrowe, the arros, licades, umbrellas, truuks of elephants and arms of men icll down on cartb. 35. Uorses and men were taaropled down by elephants and horse. mon, slow warriors. Tad banners, standards and the trunks of olt=" phanges were cut and fall dove like the broken pieces of wountains, 6798 Kuran Pary [35 मृदितानीघ पदानि भम्लाना व व सूजः ॥ ३९ ॥ इतानां पदनान्यासन गात्राणि च मदाहये । रूपाण्यत्यर्थकारतानि हिरदाश्वनानपं समुन्नानीच बत्राणि ययुदंई शता पराम ॥ ४॥ इवि श्री. कर्णपर्वणि संकुलयुड़ एकत्रिंशोऽध्यायः २ Arkes सञ्ज उवाच ! हस्तिभिस्तु महामानव पुत्रेण चेदिता ! धृष्टद्युम्न जिया सम्तः क्रुधाः पार्पतमध्ययुः ॥ १ ॥ प्राच्याच दाक्षिणात्याच प्रवर्ग गजयोधिनः । पाच पुण्डाय मागधास्लामलिप्तकाः ॥२॥ मेकला कोशला मद! देशाणी निषधा के समूह ऐसेनष्ट होगये जैसे कि मईन कियाहुमा कमल और मुरझाई हुई माला होयें । ११ । इसी प्रकार उस बड़े युद्धमें मृतकोंके मुख भंगहोगये और मनुष्यों अत्यन्त प्रकाशमान रूप और हाथियोंन ऐसे कुरुपताको पाया जैसे कि म्लान- वस्त्रं होते हैं.॥ ४० ॥ innamonsai 1-... अध्याय ।। ३२.॥ संजप वाले कि आपके पुत्र के कहने से हाथियों के सवार अपने हाथियों के द्वारा मारनेक इच्छावान पर्पत के पोते क्रोधयुक्त धृष्टयुम्न के सम्मुखगये । १। हे भरतवंशी अत्यन्त उत्तम हाथियों क सवार शूरवार पूर्व दक्षिणकेवासी अंग रंग पुंच मागथताम्र लिक ! २१ कल कोशल मद्र दशाण निषध कलिंगों समेन गन Elephants, car-trarriors and foot soldiers tell duwo and Video men fell dowd struck by the foot soldiers and the latter were des. troyed like lotu'ros and garlanda trampled under tont: The head of the dead warriors were crushed down and the bright faces crushed by elephan'ts becanie' disfigured like dirty clothes." 40. TV horse- CHAPTER XX1 Sinjaya said, "Many elephant riders, urged by your son, Josirous of slaying, proceeded against enraged Dhrish tadyumn' tlie grandson of Parshat. Mounted on excellent elepharits, the warriors of the East and the South, of Ang, Bang, Pundra;. Alagadb, Taaralipták, - । 116320] Alababharat (६३९०) स्तथा । गजयुद्धेपु कुशलाः कलिने सह भारत ॥ ३ ॥ शरतोमरनाराष्टिमन्त इवाम्बुदाः । सिषिचस्ते ततः अर्धे पाञ्चालवनमा तान्सीममईपिपूम् नागान् पापर्यंगुष्ठाकुरीभरामा चोदितान् पार्वतो वाणनाराचरम्यधीवपत् ॥ एकेक: दशभिः षभिरभिरपि भारत ।.द्विरदानमिषिव्याध शितमिरिनिमार शरैः ॥ ६ प्रज्छापमान द्विरदरिष दिवाकरम् । प्रययुः पाण्डुपाशाला नदन्तो निशिता युधाः ॥ ७॥ तान्नागानमिवन्तो ज्यातन्त्रोतलनादिः । बीरनृत्य मनुत्यन्तः शरताल प्रचोदितः ॥ ८ ॥ नकुलः सहदेवश्च द्रौपदेयाः प्रमद्रकाः। सात्यकि शिखण्डीप वेकितानश्च वीर्यवान् । समन्तात् सिपिचरा मेधास्तीरिवाचलान् ॥ १ ॥ युद्धमें कुशल । ३ । वाणं तोपर और नाराचों से बादलको समान वाण वृष्टि करने वाले उन सबने पांचालदेशी सेनाको अपने वाणरूप धृष्टी से साँचा ।४। पंडी 'भगष्ठ और अंकुशों से अत्यन्त तेग किये हुपे उन हाथियों को मन करने का अभिलाषा धृष्टद्युम्न वाण और नाराचों से वर्षा करनेवाला हुआ।५।हे भरतपंथी उन पर्वताकार हरएक हाथीको फेंके हुये दश छ भौर आठ पाणांसे पायलकिया जैसे कि बादलों से मूर्य ढक जाता है उस रीति से धृष्टद्युम्नको हाथियों से घिरा हुभा देखकर तीक्ष्ग शस्त्रधारी परिव और पांचाल सोग गर्जते हुयं गये ।। प्रत्यञ्चा के शब्दों से शब्दायमान वाणोंसे हाधिपोंके सम्मुख वाम शष्टि करनेवाले नकुल और सहदेव और द्रौपदी के पुत्र वा प्रभद्रक 16। सात्यकी शिखंडी चेकितान नाम पराक्रमी वीरों ने चारोंओर से ऐसे सींचा जैसे कि मलकी धाराओं सेवादल पर्वतोंको सींचता है ।९। घरों से भिदेहुये उन अत्यन्त क्रोधयुक्त हाथियों ने मनुष्य घोड़े और रयोंको भी मूडी से पढ़ २ पटक पटक कर परों से Mokal, Kosal, Indra, Dashara, Nishadh and Kaliag, skiltul in elsphant fighting, showerod arrows and tomars like rain over the Pan. chals. — Dhrishtadyunn, desirous of slaying those elephants urged by foot and gosd, showered arrows oper them. He wounded cach of those huge elephants with six or even with eight Arrows. Seeing Dhrish tadyuma surrounded by those elephants, liko the Sun with clouds, the Pandayas ap} Panchals, possessors of sharp weapons, rtished against them with loud roarr, With loud twangs of the box. strings and hissing arrows, Nakul, Sthader, the sons of Draupadi, the Prabhadraks, with Satyaki, Shikhandi, Chekitas and other warriors poured a shower of arrows like rain. Piercod by spears, the enrnged elephants dashed down men borses and cars by their trunks and trampled them under their feet. Thoy pierced soma ly pointa of: their turks and hurled tl.em far sway. 11. Sityati pierced tho cle. phant of the king of Ang with a sbarp arrow and sier it Thien Sat कर्णपषHaran Pary [621 म्लेक्छः प्रेपिता नागा नरानयानयानपि । हस्तगक्षिप्य ममूवुः पद्भिश्वाप्यतिमन्यवः ॥ २२ ॥ विभिदुश्च निपाणाः समातिय व चिक्षिपः । विषाणलग्नाधान्ये परोित विभीषणः ॥ ११ ॥ प्रमुख यत्मानन्त विपमङ्गस्य सात्यकिः । नाराचेनोप्रवेगेन भिरक्षा मर्माप्यपातयत् ॥ १२॥ तस्यावतितकायस्य द्विरदादुत्पतिष्यतः । नागनाह भवक्षः सात्यकि सोपतन्द्रधि ॥ १३ ॥ पुण्डस्यापततो जागं वलन्तमिव पर्वतम । सा देवः प्रयत्नात चाहनामिः ॥ १५ पिता वियन्तारं विधर्मषजजीवितम्। त करवा द्विरदं भूयः सहदेवोगमभ्ययात् १५ ॥ सहदेवन्तु नकुलो पारिवाजमा इयत् । नारायमदण्डामिलिमिनांग गतेनत ॥ १६ ॥ दिवाकरकरमण्यांनचिक्षेप तोमरान् । नकुलायं शतानाटोत्रिधफेकन्तु सोन्छिनत् ॥ १७ ॥ तथा चन्द्रेण शिर 'स्तस्य,चिच्छेद पाण्डयः । स पात तो म्लग्यतेनैव सदन्तिना ॥ १८॥ मयागपुरे मनिकिया और किती २ को दांतोंकी नोकों से घायलकर कर के घुमाकर दूर फेंकदिया भीर दातों में चिपटे हुये अन्य भयानकरूप जीवभी गिरपड़े। ११ । सापति ने सम्मल वर्तमान रामा आके हाथी को उघोगी. नाराच से मर्मस्थलों में छेदकर दिया । १२ । फिर सात्याके ने उन महारों से बचाये शरीवाले हाथी से उछलने के मामलापो राजा की छातीको नाराव से घायल किया तर वह पृथ्वी पर गिरपदः । ११ । सहदव ने पुगडू के राजा के हाथ को चलापमान पर्वत के समान भातेहुये को पडे उपाय से चलाये हुये तान नाराचों से घायल किया । १४ । सहदेव उस हाथाको पताका हाथापान कंपच और धजा समेत मार कर राजा अगो सम्मुख गया । १५ । फिर नकुल ने सहदेवको रोककर यमराज के दण्डके समान तीन नाराचों से हाथी को और सौसे उस राजा को पायल करके पपित किया । १६ । फिरराना अंगने सूर्य की किरणों के समान प्रकाशित आठसौ तोमरों को नकुल के ऊपर फेंका तब नकुल ने प्रत्येक तोमरके तीन २ खडकरदिये। १७ । और अर्दचन्द्रसे उमके शिरको काटा तब बह मृतक होकर अपने हाथी समेत गिरपड़ा। १८ । फिर हाथीकी शिक्षामें कुशल इस आदेशी yaki pierced through the breast of the king desirous of escaping, from the ialling elophant and be lay dead on the ground. Sabadev woundod tho hugo olephant of the king of Pundra with three arrows. Ho slew the elephant and cut down the standard, driver, armour and banner. Then Sahader was kept back by Nakul, who wounded the king of Ang with three arrows like the rod of Yam and tho 'olephuat with a hundred. 16. The king hurled ut Nakul eight hundred tnwars bright as the san, but they were all cut into three by the lattor.. Nakul then cut of his head with a crescent shaped arrow and he fell down dead along with his elephant. At the death of tbo Prince of Ang, skilluk in training elephants, the warriors of Ang oppoa.
८॥ तमा 6324 ] Maliabliaiat रांशभुर्यासस्यादुधुयुश्च ॥ २॥ ततो भाराद्वेग तप पत्रेग घन्विना । पाण्डपुत्र श्रिीभधार्णवक्षस्थभिहतो गली ॥ ३ । सहदेषस्ततो राजन् नारावेन तपारमअम् । वित्रा विव्याध सप्तत्या,सारधिश्च त्रिीमः शरैः॥ ४ । दुःशासनस्ततचापं छिपा राजन् महादधे । सहदेवं त्रिसप्तया पावोरुति चापयत् । ५॥ सहदेवस्तु संजयः खड्गं गृह्य महाहवे । ओघि प्रारजनो नय पत्ररथ प्रति ॥ ६॥ समार्गणगुणं चाप छिन्वा तस्य मानसिः । निगपात तनो भूमी व्युनः सर्प याम्बरात् ।। धान्य अनुरादाय सहयः प्रतापवान् । दुःशासनाप चिक्षेप वाणमन्तफरं ततः।। पतन्तं विशिव यमदण्डोपमधिषम् । घगन शितधारेण विधा चिच्छेद कारयः । ५।। ततस्तनिशित खड्गमाविध्य युधि सत्यरः । धनुचायत समादाय शरं अप्राह वीर्यवान् ॥ १०॥ तमापतन्तं सहसा निखिशं निशितैः शरैः। पातयामास समरे आपके पुत्र के नीन बाणों से महावली सहदेव छात,पर घायल हुमा । । । राजा तबतो क्रोधकर के सहदेव ने नारायसे आपके पुत्रको छेदकर सत्तरवाणों से पड़िामान किया। और तीन वाणोंसे सारथी का.हे राजा इसके पछि दुश्शासन ने उस बड़े युद्धमें धनुपको काटकर सहदेवकी दोनों भुजामों को तिहत्तर बायों से छाती समंत घायल किया । ५ । फिर अत्यंत क्रोधयुक्त सहदेव ने उस महापद में खड्ग को लेकर प्रत्यंत शीघ्रता से घुमाकर आपके पुत्रके ऊपर छोड़ा। ६ । वह बड़ा खड्ग उसके प्रत्यंचा समेत धनुपको काटकर पृथ्वीपर ऐसे गिरपड़ा जैसे कि भाकाशसे सर्प गिरता है । . उसके पछि प्रतापवान् सहदेवने दूसरे धनुषको लेकर फिर नाश करने वाले वाणको दुशासन के ऊपर फेंका । ८। तब उस कौरब दुश्शासन ने यमदंड के समान प्रकाशमान आतेहुये बाणको अपने तीक्ष्ण पारवाले खद्ग से दो टुकड़े करदिया इसके पीछे शीघ्रता करने वाले महापराक्रमी खुशासन ने उस तीक्ष्णधार खड्ग को घुमाकर और दूसरे धनुषको लेकर बाणको हाथमें लिया । १० । फिर युदमे हँसतेहुपे सहदेवने उस अकस्मात् आतेहुये खड्ग waa wounded on the breast by three arrows of your son. At this eprag. ed Sahader wounded your son by seventy aftows and the driver with three. Then Dushasan cut down his huge bow and wounded his arms and breast by seveaty three arrost. Then Sabadov, much enraged, took up his sword and harled it at him with great force. The buge sword cut down his boy and bowstring and fell down on earth like, a serpent from the sky. Then glorious.Sahadev took up, another boy and shot a fatal arrow at him. Dushasaa the Xauray cut down his AFTOW, coming like the staff of Yam, with bis sword. Then Dusha. ran quickly hurled his sharp sword at him and took up anotber box and set of arrows. 10. With a smile, Sahsder made she srord fall कर्णपर्व Karan Parv [ 6325 सहदेवो इसन्निध ॥ ११ ॥ ततो वाणांश्चतुः पष्टि तप पुषो महारणे । सहदेषरये पूर्ण प्रेषयामास भारत ॥ १२ ॥ तान् शरान समरे राजन् वेगेनापततो बहून् । एक पञ्च भिणः सादेयो न्यन्तत ॥ १३ ॥ स निघायं सहावाणांस्तव पुत्रेण प्रपितान् । भधास्म मुबान पाणान् प्रेषयामास संयुगे ॥ १४ ॥ तान् घाणांस्तथ पुरोपि छित्वैकैफ त्रिभिः शरमाननाद मुमहानाद नादयानो घसुन्धराम् ॥१५॥ ततो दुशासनो राजन विध्या पाण्डसत रणे । सारथि नवभिणमाद्रेयस्थ समार्पयत् ॥ १६ ॥ ततः क्रुद्धो महाराज सहदेवः प्रतायान् । समाधत्त शरं घोरं मृत्युकालान्तकोपमम् ॥ १७॥धिकृप्य लंघचापं तप पुत्राय सोसृजत् । स तं निर्भिध घेगेन भित्वा च कवचं महत् ॥१८॥ प्राविबरणी राशन घल्मीफमिप पनगाः ततः स मुमुहे राजंस्तव पुत्रो महारथः * १८॥ मदम्चन समालोक्य सारथिस्त्वरितो रथम । अपोयाह भृशं प्रस्तो बन्यमानः को तीक्ष्ण वाणों से गिराया । ११ । हे भरतवंशी इसके पीछे उस महायुद्ध में मापके पुत्रने शीघही चौंसठ वाणों को सहदेव के स्थपर चलाया।१२। उन वेगसे आतेहुये धागों को देखकर सहदेव ने पांच वाणों से काटा । १३ । फिर उसने आपके पुत्रके चलायेहुये वेगवान वाणों को इटाकर युद्धमें उसके ऊपर बहुत से वाणों की चपीकरी । १४ । आपका पुत्रभी उन प्रत्येक वाणको तीन बाणों से काटकर पृथ्वी को फाड़ता हुआ बड़े शब्दों से गर्जा । १५ । है राजा इसके पछि दरशासन ने युद्ध में सहदेव को घायलकर के उसके सारथी को नौ वाणों से घायल किया। १६ । हे महाराज इसके पाछे क्रोधयुक्त प्रतापी सहदेव ने मृत्युकाल और कालदंड के समान घोर वाणको हाथ में लिया.। १७ । और अपने पराक्रम से अनुपको बँचकर आपके पुत्रपर फेंका वर वाण उसको छेद के कवचको काटकर पृथ्वी में ऐसे समागया। १८ । जैसे कि वामी में सर्प समाजाता है हे महाराज इसके पीछे भापका महारथी पुत्र अचेत होगया । १९ । अत्यंत भयानक तीक्ष्ण बाण से घायल रथको चलाता हुआ सारथी उसको अचेत जानकर शीघ्रही दूर on the ground with his slarp arrows. Then your son shot at the car of Sahadev.sixtyfour arrowa in quick succession. Seeing those arrows coming with great force towards him, Sahadev.out' themi down with five arrows. Having cut down your son's arrowe, he showered many over him. Your son 'too, cut every arrow shot by bin with three and roared loudly, rending the earth. 15. Then Dushasan, having wounded Sabadey, wounded bis driver with his arrows. Then glorious Sabadov, mucha enraged, took up a fatal arrow in hand, and drawing the bow with great force, hurled it at your son. That arrow, having piorced through his armour and your son became very insens ble, Wounded by the dreadful atrovs - १३२७) कर्णपर्ष Karan Parv 163273 रस्य बलास्य च ॥३॥ त्यहोपात् कुरवः क्षीणा समासा परस्परम् । वाम समरे हवा कृतफरयोस्मि विज्वरः ॥ ४ ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच नकुलं सतनन्दनः । साशं राजपुत्रस्पम्धिनश्च विशेषतः ॥५॥ प्रहरस्व च मे धीर पश्चास्तव पौरुषम् । करवा रखे र ततः कथितुमईसि ॥ ६ ॥ अनुस्या समरे तात रा युभ्यन्ति शक्तिः । स युपस्थ मया शक्त्या इनिये दर्पमेष ते ॥ ७॥ इत्युक्त्या प्राहरपूर्ण पायुपुत्राय मुजाधिव्याध धन समरे त्रिशताया शिलीमुखः ॥ ८॥ नकुलस्तु ततो विदा सूतपुत्रंण भारत । मीरयाशीविषप्रयैः सूतपुत्रमविध्यत ॥ ॥ तस्य की परित्या स्वर्णपुरः शिलाशितः। विंशता परमेयासः शरैः पाण्डघमाईयात् ॥ १०॥ सेवस कप भित्या पपुः शोणितमाहधे । माशीविषा यथा नागा भिषा गो सलिलं पपुः ॥१९॥ अथान्यनुयाय हेमपृष्ठं दुरासवम् । कर्ण विष्पाप सप्तत्या सारपित भूतहा ३ । तेरेही अपराध से कौरव परस्सर सम्मुख होकर नाशवान होगये अय. में युदमें तुझको मारकर कृत्यकृत्यहोकर तपसे निराहूं । ४ । इस प्रकार के वचनोको धनकर कर्णमे नकुलको उत्तर दिया कि प्राधिकतर धनुपधारी राजकुमार के योग्यहै । ५ हे वीर तू मुझपर महार कर मैं तेरी बीरताको देखूगा हे शूर प्रथम युद्धमें अपने शूरतारूपी कर्म को करके फिर अपनी प्रशंसा करने को योग्य है। हे तात शूरवीर युद्ध में कुछ न कहकर सामर्थ्य से लड़ते हैं तु अपनी सामर्थ से मेरे सग पद्धकर में तेरे अभिमान को दूरकरूंगा । . । कर्णने यह कहकर शीघही नकुल पर प्रहार किया युद्ध में इसको तिहत्तरवाणों से घायल किया 16 हे भरतवंशी इसके पाछे कर्ण के हाथ से घायल नकुलने सर्प के समान अस्सी पापों से सूर्य के पुत्रको छेदा । ९ । कर्ण ने सुनहरी पुंख और तीक्ष्णधार पाले वाणों से उसके धनुप को काटकर तीस पाणों से नकुलको पाड़ित किया । १० । उन वाणों ने उसके कवच को काटकर रुधिर को ऐसे पान किया जैसेकि विषधर सर्प पृथ्वी को छेदकर जलको पाताहै । ११ । इसके पीछे नकुल ने सुवर्ण Kaura vas are fighting together and dying out, I shall now be happy after slagiog tbeo and my fever shall abate." Karaa ot bearingt this replied, “ It is well for thee to speak like this. Discharge your Weapons at mo so that I way sea your bravery, Brave med give them. Pulves praises after doivg deeds. They fight sileutig. Fight with. all your might and I shall crush your pride." Having Faid this, be attacked Nakul and wounded him with seventy three arrows. Wound. 'ed by Karan, Nakul wounded thia with eighty arrows like serpente. With sharp, gold-feathered arrows, Karan cut down his bow and wounded him with thirty arrows, 10. The arrows pierced' through bis armour and drank his blood as a serpent enters the ground to driok svater. Thea Nakul taking up another unbearable bow, Wouod.
• [6328] Mahabharat (६३२८ प्रिभिः शरः॥ १२ ॥ ततः कुमो महागज नकुलः परवीरहा । श्रप्रेण सुतीक्ष्णेन कर्णस्य धनुराधिनत् । १३ ॥ अयन छिनधन्वाने सायकानां शतनिभिः माजप्ने महसन धीर सर्वलोकमहारयम् ॥ १४ ॥ फर्णमभ्याईतं दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रेण मारिष । विषमयं परमं जग रथिनः सह देवतः ॥ १५॥ अथान्यदनुरादाय की धेफर्तनस्तदा। नकुलं पञ्चभिर्वाण देशे समार्पयत् ॥ १६ ॥ तपस्थरथ पाणैस्तैमाद्रीपुत्रो व्य मत । स्वरस्मिभिरिवादित्यो भुषने घिसृजन प्रभाम् ॥१७॥ नकुलस्तु ततः कर्ण विश्वा सप्तभिराशुगः । अथास्य धनुपः कोर्टि पुनधिछेद मारिष ॥ १८ ॥ सोन्यत् कामुक मादाय समरे वेगवचरम । नकुलस्य ततो वाणः समन्ताच्छादयदिशः ॥१९॥ संछाय मानः सहसा फर्ण चापच्युतैः शरैः । चिच्छेद स शरांस्तूर्ण शरैरेव महारथः ॥ २० ॥ ततो घाणमय जालं वितत न्योम्नि दृश्यते । खद्योतानाभिव प्रातः संपतद्भिर्यथा नमः पृष्ठाले असा दूसरे 'धनुप को लेकर कर्ण · को सत्तर वाण से और सारथी को तनिवाण से घायल किया । १५ । फिर क्रोधयुक्त शत्रु के वीरों के मारनेवाले नकुलने व तीक्ष्ण सुरप्रसे कर्णके धनुपको काटा । १३ । फिर हँसतेहुये वीरन कुल ने इस टूटे धनुपवाले सब लोकके महारथी कर्ण को तीन सौ शायकों से घायल किया। १४ । हे श्रेष्ठ तब तो नकुल के हाथसे पीड़ामान कर्णको देखकर रथियों ने देवताओं समेत बड़ा भारी भश्चर्य किया। १५ । तब सूर्य के पुत्र कर्णनेदूसरे धनुपको लेकर नकुलको पांचवाणों से जत्रुस्थानपर घायल किया। वहां जत्रुस्थान में नियत होनेवाले वाणोंसे नकुल एमा शोभायमान हुआ जैत कि संसार में प्रकाश करताहुआ सूर्य अपनी किरणों से शोभायमान होताहै । १७ १,हे श्रेष्ठ इसके पीछे नकुलने शीघ्रगामी सातवाणों से कर्णको छेदकर फिर उसके धनुपकी | कोटिकोकाटा । १८ । इसके पीछे उसने बड़े वेगवान दूसरे धनुषको लेकर युद्ध में वाणों करके नकुलकी दिशाओं को ढकदिया । १९ । अकस्मात् कर्ण के बाणोंसे चिरहुये उस महारथीने अपने बाणोंसे ही कर्णके बाणों को काटा । २०। इसके पीछे प्राकाश में वाणोंका जाल फैल हुआ ऐसा दिखाई दिया जिसप्रकार पटवीजनोंके ed haran with seveuty arous and the driver with three. Then Nakul tlie enraged warrrior, destioyer of fues, cut Karan's bow. 'While the bow of mighty Karan was cut down, Nakul wounded him with thiee bundred arrows. Seeing Karan wounded by Nahul, tho warriors and gods were much amazed. Then taking up another bow, Karun wounded Nakul with five arrows. Pieiced through by those arrons, Karan looked glorious like the Sun with his rays, Nakul pierced Kaian with seven arows and again cut his bowstring. Then he took up another strong bow and covered Nakul with anows from all sides, Thus surrounded by arrows, Nakul cut his adversary's arrows with his own, 20. The metwork of arrows in the air look- ॥
- (६३२९) una Karan Part [ 6329 ॥ ११॥ विमुक्तः शरशतरादित गगनं तदा । शलभाना पथाप्रतिस्तद्वदासीद्विशा पते ।। २२ ।। ते शरा हेमविकताः सम्पतन्तो मुर्मुहुः । श्रेणीकृता पकाशन्त कौञ्चा: भणी कृताध ॥ २३ ॥ पालावृचे व्याम्नि छादिते च दिघाकरे । न स्म सम्पतते भूम्यां विञ्चिदप्यन्तरीक्षगम् ॥ ४॥ निरय तत्र मार्गे च शरसंधैः समन्ततः । व्यगे चता महात्मानी कालमर्याधियोदिती॥२५॥ कर्णचापच्युतैघाणध्यमानास्तु सोमका: भषालीयन्त राजेन्द्र वेदनाा भूशार्दिताः ॥ ९॥ नकुलस्प तथा घाणेहंन्यमाना बम् स्तष ! म्पशीयंत दिशो राजन् वातनुता घाबुदाः । २७ ॥ ते सने हत्यमाने तु तापा विम्यमहागरः। शरपातमपाक्रम्य तस्थतः प्रेक्षिके तदा ॥२८ ॥ प्रोत्सारिते जने तस्मिन् पापडपी शरे । अविध्येतां महात्मानायन्योन्य शरवृष्टिभिः ॥ २९ घिद समूहोंसे व्यास आकाश होताह । २१ । हे राना उन छोड़े हुये सैकड़ों वाणोसनकुल ऐसा ढकगया जैसे कि शलभामों के समूहोंसे कोई ढक जाताहै । २२ । वह सवर्ण से चित्रित बारम्बार गिरतेहुये पंक्तिरूप पाणऐसे शोभायमानहुये जैसे कि पंक्तिरूप क्रौंचनाम पनीहोते हैं । २३ । चाणजालसे आकाश को ज्याप्त होनाने और मूर्य के ढकमानेसे कोई अन्तरिक्षगामी जीव पृथ्वीपर नहींगिरा । २४ । बाणों के समूहों से चारोंओर के मार्गोके रुकनानपर दोनों महात्मा उदयमान काल मूर्यके समान शोभायमान हुये । २५ । हे राजेन्द्र कणके धनुपसे गिरेहुये घाणों के समूहों से घायल दुःखसे दुखित और अत्यन्त पीडामान सब सोमक पृथक् २ होगये । २६। | इसीमकार नकुलके वाणोंसे घायल आपकी सेनाभी दिशामों में ऐसे छिन्न भिन्न होगई जैसे वायुके वेगसे बादलों के समूह तिरीवर होजाते हैं । २७ । तब उन दोनों के दिध्य और बड़े वाणोंसे घायल वहदोनों सेना वाणोंकी आधिारता को विचारकर चित्रलिखीसी खड़ी रहगई । २८ । कर्ण और नकुलके वाणों से उन मनुष्यों के समूहों के हटजानेपर उनदोनों महात्माओंने याणों की वर्षा से परस्पर में घायल किया । १९ । परस्पर मारने के अभिलापी वह दोनों कसस्मात् सेनाके d like a swarın of glow-worms. The arrows covering Nakul looked like a flight of locusts. The golden arrows, falling down again and again, looked glorious like a flight of Kiounch birds. The arrows spreading throughout the sky and hiding .the rays of the Sun, left no room for any birds to come down on earth. The arrows naking a barrier, the two great warriors looked like the rising sun in glory. Wounded by Karan'a arrows, the Sumaks scattered away in great distress. 26. Similarly, wounded by Nakul's arrows, your warisors were scattered in all directious. Wounded by their bright arrowe, the two armięa looked like pictures. At the dispersion of the armies by the arrows of Naku and Karan, they wounded each other with their arrowe. Each desirous of slaying the other, they discharged 6330 ] Malabhajat (६३३०) शंयन्तो विन्यानि शस्त्राणि रणम्यनि । छादयन्ती च सहसा परस्परपधेषिणी ॥३॥ तकलेम शरा मुकाः कपर्दिणषाससः । सूनपुत्रमवच्छाध व्यतिष्ठन्त इवाम्बरे ॥३१॥ नयेव मसपुत्रेण प्रेषिताः परमाहये । पाण्डुपत्रमयच्याप व्यतिष्ठन्ताम्बरे शयः ॥३२॥ शरवंश्मप्रविष्टौ तो दख्शाते म कैचम मर्याचन्द्रमसी राजश्छापमानौ परिष ॥ ३३॥ ततः धोरणे कर्णः कृत्वा घोरतां घप: । पाण्डवं छादयामास समन्तार वृष्टिभिः ॥ ३४ ।' सोतिच्छनो महाराज.सूतपुत्रेण पाण्डवः । न चकार व्ययी राजन भास्करो जलदैयया ॥ ३५ ॥ ततः प्रहरपाधिरायः शरजालाने मारिए प्रेषयामास समरे शतशोथ सहमशः॥ ३ ॥ पकडायमस्त सर्व तस्य पाणेमहात्मनः । मनका पेष सज सम्पतद्भिः शरांसमः ॥ ३७॥ ततः कर्णो महाराज धनुश्वित्वा महात्मनः। सारथिं पातयामास रथनीदारसनिष ॥ ३८ ॥ ततोवाचतुरचास्य धतुभिनिशित: मस्तकपर दिव्य शस्त्रोंके दिखानेवाले और सेनाओं के दकनेवाले हुये । १० । नकुलके छोड़े कंपनसे जटितवाण कर्णको ढककर आकाश में नियताये । इसीप्रकार कर्णके चलाये हुये बाण नकुलको ढककर भाकाश में नियताये । ३२ । हे राजा वादलों से ढकेहुये सूर्य और चन्द्रमा के समान वाणापिंजर में प्रविष्ट 'होकर वहदोनों किसीको दिखाई नहींदिये ।।३। इसके पीछे युद्ध में क्रोधयुक्त कर्ण ने शरीरको वडापोर करके वाणों की वर्षा से नकुलको चारों ओरसे ढकदिया।३४॥ हे महारान कर्णके वाणोंसे ढकेहुये उस नकुलने ऐसे पीडाको नहीं माना जैसे कि बादलों से ढकाहुमा मूर्य पीडाको नहीं मानता है । ३५ . हे श्रेष्ठ धृतराष्ट्र इसके पीछे कर्ण' ने इसकर युद्ध में हजारों वाणनालों को उत्पन्न किया । १५ । उस महात्मा के वाणों से सब संसार छायामान हुमा और गिरतेहुपे उत्तम वाणोंसे अन के समान छापा उत्पन्न होगई। ३७। हे महारान इसके पीछे हँसते हुये कर्ण ने महात्मा नकुलक धनुष को काटकर सारयीको रथको नडिसें गिरादिया। ३८।। their divine weapons and hid the warriors. 30. Naku'ls arrows, fit. ted with kank featbers, cavered Karan and were spread in the air. Similarly, the arrows shot by Karan, covered the air over Nakul. Like the Sun and the moon hid by clouds, covered by the cages of arrows, they became invisible to all. Then Karan ausuating a dread. ful forna in the battle feld, covered Nakul with big arrows from all directions. Hid by Karan's arrows, Nakul was not aflicted like the San hiddon under cloud&. 35. Then Karan, with a smile, produced a network of thousands of arrows, covering the wholo firmament with them like clouds. Then Karan, with a smile, cut down the bow of Nakul and made the driver fall down from his seat on the car. Then he seat his four horses to the region of Yam. Then he cud down into small procea the car, standard, wheel guards, macs and word, with ४४ ॥ [६३३१ कर्णए Kuran Pary 16331 शरैः। यमस्य अपने तूर्णं प्रेषयामास भारत ॥. ३९ ॥ अथान्य तं रथं दिन्यं तिलशो प्यमाछा पताको चक्ररक्षाच गदा खड्गश्च मारप॥४०॥ शतपदा तरच सोंपकरणानि यातायो विरयश्चय पियर्मा व विशाम्पते। अयतीर्य रथापूर्ण परिषं गृह्य धिष्ठितः ।। ४१ ॥ तमुचतं महाघोरं परिघं. तस्य मुजः । प्यहनत सायफे राजन सुतीक्ष्णे रसाधनेः ॥ ४५ ॥ व्यायुधश्चयमालस्य शरैः सनतपर्वभिः । भाप यहीमः कर्णो न चैन समपीडयत् ॥ ४३ ॥ सहन्यमानः समरे कृताण बलीयसा.। प्रादयत् सहसा राजन गकुलो व्याकुलेन्द्रिय ॥ नुत्य' राधेय. प्रहसन् घे पुनः पुनः । सज्यमस्य धनुः कण्ठे ग्यपा सुजत मारत ॥ ४५ ॥ ततः स शुशुभे राजन् कण्ठासक्तमहद्धनुः ॥ ४६ ॥ परिवेशानु प्रासे यथा स्यानोस्नि चन्द्रमाः । यथैव चासितो मेघः शचान शोभित भरतवंशी इसके अनन्तर तीक्ष्णधार चार वाणों सेउसके चारों घोड़ों को शीघ्र है। मारकर यमपुर को भेजा । १९ । इसके पीछे फिर तीक्ष्ण वाणों से इसके उस दिग्यरथ पताका और चक्रके रक्षकों समेत गदा और खड्गको भी तिलक समान खंड ३ करदिया । ४० । और मूर्य चन्द्रमा के चित्रपाली दाल और अन्य सव मकार के मन्त्र शस्त्रोंको भी काटडाला हे राजा वह स्थ और कवचसे विहीन शीघही रथसे उतरकर परिघको लेकर नियत हुा । । । तब कर्ण ने उसके उठाये हुये उस महाघोर परिघ को अत्यन्त तीक्ष्ण भारवाहक वाणों से तोड़ सला । ४२ । तवतो कर्णने उसको शस्त्रहीन देखकर टेढ़े पर्ववाले अनेक वाणों | उमको घायल किया परन्तु इसको भधिक पीडामान नहीं किया। ४१ । युद्धमें उस असा पराक्रमी कर्णसे घायल होकर महान्याकुल नकुल अकस्मादभागा। ४४। तवतो वारम्बार हंसते हुये कर्णने उसके पासजाकर अपनी प्रत्यंचा समेत धनुपको उसके कंठमें दालदिया। ४५। इस के पीछे वह नकुल कण्ठ में लगहुपे उस धनुष से | ऐसाशोभायमान हुआ जैसे कि भाकाशमें चन्द्रमा भपने मण्डलसे युक्त होता हे और जैसे कि श्याममेय इन्द्रधनुप से शोभित होता है । ४७ । इसकेपीछे कर्ण 40. He cut also the shield, decked with Suns and moous, as well as other weapons. Deprived of the car and armour, he at once jumped down from the car with a club. Then Karan broko bis dreadful club, raised high, with his arrows. Seeing him destitute of drms, Karan wounded him with many arrows, without giving him much pain. Wounded by Karan, Nakul ran away all of a sudden; but Karan chased bim and threw the bowstring round his neck. 45. With the bow and bowstring round his neck, Nakul looked glorious like the moon with bar halo or a cloud with the rainbow. This Karan said, "You told.a lie; now toll it agsin while you are so wound ed. Douot light against the Kaurarar glorious Pandav. Fight ' JI his arrowa (6334) Mahabharat १६६७ निहतान पायमानाय वेपमानांश्च भारत । नानागावयहनाता तथैव भारत ॥ ६७ ॥ रथान हेमपरिष्कारान् संयुक्तान जवतैईयैः।। भ्राम्यमाणानपश्याम वेष रधिषु द्रुतम् ॥ ६८॥ भग्नाक्षयरान कश्चित् भग्नचकांश्च भारत । विपताari श्वान्याश्छिन्नेपादग्डपन्धुरान् ॥ ६९ ॥ विहीनाअधिनस्तत्र धापमानां ततस्ततः। सूत पुश्शरस्तीगहन्यमानाविशाम्पते ॥ ७० ॥ विशनांश्च तथैयायान् सशसाध बतान बदन् । तारकाजालसंउग्नान घरघण्टाविशोभितान् ।। ७१ ॥ नानावधिचिमाभिः पताकाभिरळंकृता । वारणाननुपश्याम धापमानान् समन्ततः ॥ ७२ ॥ शिसि पाहू नांश्च बिन्ननन्यांस्तथैव च । कर्णचापच्युतगिरपश्याम समन्ततः ।। ५३ म महान् व्यतिकरो रोद्रो योधानामन्धपद्यत । सायफनुन्नानां युध्यताच शितैः शरैः ७४ ॥ तेवायमानाः समरे सूतपुत्रेण सृजपाः ।, तमेवाभिमुखं पान्ति पनगाव पावकम् ॥ ५५ ॥ तपाईवमनीकानि तत्र व महारयम् । क्षत्रिया वर्जयामामुयुगान्ताग्निमिः नानामकार के अंगों से रहित युद्ध करनेवालोंकोभी जहां तहां देखा। ६५ । हमने रथियों के परनेपर सवर्णसे जटित शीघ्रगामी घोड़ों से युक्त शीघ्रधूमतेहुये रखों को देखा । ६८ । हे भरतवंशी हमने अक्ष कूवर और पताका धजा से रहित कितने हो. धन्य, रयों को देखा । ६९ । वहाँ कर्णके तीक्ष्ण बाणों से घायल मृतक रूप जहां तहां दौड़नेवाले रथियोंको देखा १७० । इसीप्रकार शस्त्रों से खाली वाणरखनेवाले बहुत से मृतकोंको देखा और तारके जालों से ढकेहुये उत्तम करवोंसे शोभायमान । .१ । नानासकार की विचित्र पताकाओं से अलंकृत वारों भोरसे दौड़नेवाले हाथियों को देखा । ७२ । इसीप्रकार चारों ओरको कर्णके धनुष से निकलेहुये वाणोंमे टूटेडुये शिर भुजा और जंघाओंको देखा । ७३ । कर्ण के वाणों से घायल और तेजवाणों से लड़नेवाले युद्धकनीओं का बड़ा भयानक दुःख वर्तमान हुआ । ७४ । युद्धमें कर्ण के हाथसे घायल वह मुंजय उसके सम्मुख ऐसे जातेथे जैसे कि अग्निके सम्मुख पतंग जाते हैं । ७५, । प्रलयकालकी अग्निक समान जहां तहां सेनाओं के भस्मकरनेवाले उस महारथी कर्ण We saw the swift horses carry away riderless cars. Other cats that we saw, were deprived of standards, bannere, yokes and other parts. Wounded by the sharp arrows of Karan, we saw the dead warriors being drawn hither and thither. 79. Similarly, we saw many dead warriora destitute of weapons, Decked with starred nets, garlands and banners the elephants were seen running away in all directions. We saw beads, arms and thighs cut away by, Karar's arrows. The battle was very dreadful between Karap and other warriors using sharp arrows. Wounded by Karan in the field of battle, the Srinjagas fell upon him like insects falling upon fire. 75. Scorching here and there like the कर्णपर्व Karan Pary 16335] पोषणम् ॥ ७६ ॥ हतशेषास्तु वीराः पाञ्चालानां महारथाः1, तान् प्रमग्नानं दुतान् वीर पृष्ठतो विकिरन्छः॥ ७७ ॥ अभ्यधावत तेजस्वी विशीर्णकवचवज्ञान् । तापयामास तान्याणः सूतपुत्रो महावलः । मध्यदिनमनुप्राप्तोभूतानांव तमोनुदः॥७॥ इति श्री कर्णपर्वणि कर्णपराक्रमे-चतुर्व-शोऽध्यायः,२४.।। सञ्जय उवाच । युयुत्वं तव पुत्रस्य दावयन्तं घले, महत् । उलूकोभ्यतर्ण तिष्ठ तिथेति पानवीत् ॥ १॥ युयुत्सुश्च ततो राजन् शितधारेण पत्रिणा। उलूके ताड़ यामास बनेणेष महाचलम् ॥ २॥ उलूकस्तु ततः युद्धस्तव पुत्रस्य संयुगे । क्षुरप्रेण क्षत्रियों ने त्यागकिया। ७६ । जो पांचालोंके महारथी वीरलोग मरनेसे बाकी रहेथे अन शीघ्रगामी पृथक् २ होनेवाले महारधियों के पीछे वाणी को छोड़ता हुमा कर्ण सम्मुख दौड़ा । ७७ । उसमहावली सूतपुत्रने उन टुटेकवच ध्वजावाले दुःखो वीरों को वाणों से ऐसे संतप्तकिया जैसे कि मध्याह्न के समय सूर्य जीव धारियों को तपाता है ७८॥ M अध्याय २५ ॥ संजय बोले कि आपका पुत्र युयुत्सुकी सेनाका भगानेवाला उलूक उसके सम्मुखगया और तिष्ठतिष्ठ इस पचनको कहा । १ । हे राजा उसके पीछे युयुत्स ने बजकी समान तीक्ष्ण धारवाले बाणों से महावली उलूकको घायलकिया।२। fre of pralaya, brave Karan was the terror of great warriors. Karda chased with his arrows the rest of the Panchal warriors and attack. ed them with great force. Brave Karan, with his arrows, scorched the warriors destitute of arms and armour, as the mid day Sun does all creatures." 78, CPAPTER XXY Sanjaya said, “Putting to flight your son's army, luyutsu, was encountered by Uluk. Yuyutsu wounded him with his atrows sharp Vajra. In his rage, Uluk cut down the bow of your son and a8 [ [6336] Mahabharat धनुश्किस्वा ताडयामास कर्णिना ॥ ३॥ तदपास्य धनुश्छिन्नं युयु मुबंगपत्तरम । अन्य दादत्त सुमहच्चा सरकलोचनः ॥ ४॥ शाकुनिन्नु ततः षष्ट्या विन्याध भातर्षभ । सारथि विभिनन्छ त भूयोन्ययिष्यत ॥ ५५ उलूकतन्तु विंशत्या विश्वा स्वर्ण विभूषितः । अयास्प समरे कुछो जंविच्छेर काम्चनम् ॥ ६ ॥ स छिन्नयष्टि मुम हान शीर्यमाणो महायजः पात प्रमुख राजन युयुत्तोः काञ्चनमः ॥ sam मुन्मथित रवा युपुत्सुः क्रोधोंछतः । उलूकं पञ्चामणराजधान सनान्तरे ॥८॥ उलूकस्तस्य समरे ते उधौतेन मारिष । शिरविच्छेद भल्लेन यन्तुर्भरतसत्तम ॥ ९ ॥ तच्छिन्नमस्तमौ युयुत्सोः सारयेस्तदा । तारारूपं ययाचित्रं निपपातमहीतले । १० ॥ जधान धतुरोवांध तम्च विव्याध पञ्चभिः । सोतिविको घलवता प्रत्यपापाद्रयान्त रम ॥ ११॥ तं निहित्य रणे राजन्नल का त्वरितो पयो । पाञ्चालान सुजयांव किर क्रोप्रयुक्त उलूकने युद्ध में भापके पत्रके धनुषको चरमसे काटकर करणानाम वाणले उसको घायलोकपा । ३ । फिर लालनेत्र करनेवाले युयुत्सने उस टुढे धनुष को डालकर दूसरे बड़े वेगवान् उत्तम धनुपको हाथमें लिया । ४ । उसके पीछे शकुनि के पुत्रको सात वाणोंसे और तीनवाणों से सारथीको घायल करके वारंवार | छदा । ५ । फिर उलूकने उसको सुवर्ण से चित्रित वीसवाणों से घायलकरके महा क्रोधमें भरकर उसकी मुनहरी ध्वज कोकाटा । ६ । हे राजा वह टूटी हुई वडीभारी सुवर्ण की ध्वना युयुत्सके सम्मुख-गिरपड़ीफिर जोधसे मूच्छित युयुत्सु ने ध्वजाको दूटीहुई देखकर पांच बाणों से उलूक को छाती पर घायल किया श्रेष्ठ राजा फिर उलूकने युद्धमें तेल से स्वच्छ कियेहुये भल्लों से उसके सारथी के शिरको काटा । ९ । व युयुत्सुके सारथी का वह कटाआशिर पृश्वीपर ऐसा गिरा जैसे अपूर्व तारा भाकाशसे पृथ्वीपर गिरता है । १० । चारों घोड़ोंको मारा और उसको पांचवाणों से भेदा फिर इस पराक्रमी के हाथ से घायल वह युयुत्सु दूसरे स्थपर चलागया । ११ । हे राजा युद्धमें उलूक उसको विजय करके शीघ्रता से ताणवाणों को फेंकता पांचालों और मंजियों को मारताहुआ मृनियों rounded him. Then with eyes red, Yuyutsu put down his bow. He another bow and younded Sbakuni's son with Bppen anops and the driver with three, 5, Then Uluk wounded him with twep. ty gold-decked arrows and cut down his standard in a rage. The buge golden standara fell down before Yuyutsu. Then lsing his wits in anger at the fall of his standard, Yuyutsu wounded Vlak with five arrows on the breast, Uluk cut down the head of his car-driver With well cleaned and oiled arrows. The head.of. the driver fell down 99 eryth like a heavenly star, 10. Then he slew his four horses and wounded him. Wounded by that brave warrior, Yuyutsu' mountad {" mother car. Having conquered him, Uluk went . on discharging took up - ६३३७ कर्णपर्ष Karan Pary [6337] विनिम्नम्नशितैः शरैः॥ १२ ॥ शवानी महाराज श्रकर्म सुतस्तव । व्यश्वस्तरथ धर्क निमेशदिसम्भ्रमः ॥ १३॥ हताश्वे तु रथे तिष्ठन् शतानीको महारथः । गदा चिक्षेप संकुलस्तव पुत्रस्य मारिष ॥ १४ ॥ सा या स्यादनं भस्म हांश्चैध ससार थीन् । पात परणीत दारवन्तीय भारत ॥ १५ ॥ नाषुमी विरथी बारी कुरूणा फीलियीनो ध्याफ्रोता मातु प्रेक्षमाणो परस्परम् ॥ १६ ॥ त्रस्तु तब सम्बान्तो विधिशो रपमाविशत् शतानीकोपि त्वरितः प्रतिषियर, गतः ॥ १७ ॥ सुतसो मन्तु शकनिदिवा सुनिशि शरैः । नाफम्पयत संकुयो पार्योध इव पर्षतम् ॥ १८॥ सुतसोमस्तु । एट्रघा मितुरत्यन्तयेरिणम । शरैरनेकसाहीछादयामास भारत ॥ १९ । तान शरान शकुनिस्तूर्ग चिच्छेदान्यैः पतत्रिभिः । लघनधित्रयोधीप जितकाशीच संयुगे ॥ २०॥ निवार्य समरे वापि शरास्ताविशतः शरैः। भाजधान के सम्मुखगया । १२ । हेमहाराज भयसे उत्पन्न होनेवाली ब्याकुलता से रहित. आपके पुत्र श्रुतकर्माने अनिमेष मारने में ही शतानीकको घोड़े रथ आरै सारथी से रहित करदिया । १३ । फिर मृतक घोडेबाले स्थपर नियत अत्यन्त कोष युक्त शतानीकने भापके पुत्रके ऊपर गदाको फेंका । १४ । वह गदा रथ घोड़े सारथी समेत स्थको भस्मकर कवचको फाइतीहई शीघ्र पृथ्वीपर गिरपड़ी। १५ । स्थस विहीन परस्पर में देखनेवाले कौरवों की फीति के घढ़ानेवाले दोनों बार युद्ध में । इटगये । १६ । फिर भयसे उत्पन होनेवाली व्याकुलता से रहित भापका पुत्र रथ पर सवार हुआ और शीघता करनेवाला शतानीक भी प्रतिविन्ध्य के रथपर गया । १७ । फिर अत्यन्त क्रोधयुक्त शकुनी ने तीक्ष्ण धारपाले वाणों से पुतसोम को ऐसे कम्पायमान नहीं किया जैसे कि जलका समूह पर्वतको कंपित नहीं | करसक्ता । १८ । हे भरतवंशी सुतसोमने पिताकं बड़े शत्रु शकुनाको देखकर बहुत । इनारों पा!से दकादया। १९ । तेज अख और मित्रके अर्थ छड़नेवाले विजय शोभायमान शकुनीने शीघही दूसरे बाणोंसे उनवाणोंको काटा । २० । और क्रोध sharp arrows at the Panchals and Srinjayas and faced the latter. Free from anxiety your son Shutkarma deprived Shatanik of his horses, car and driver in an instant, Standing on his car of which the horses were dead, enraged Shatanik hurled his maco at your bon, The mace smasbed his car, horses and driver and fell down on earth rending his armour. 15. Dastitute of care, the two famous Kauray warriore, turnod their backa on each other. Free from auxiety, your son mounted another car and Bhatanik too, mounted the car. of Pra. tivindbyar Then Shakuni, much enraged, ahot shurp arrows at Sutsuen but could not shake him liko & curreat of water washing the sido of a mountain. Seeing the great enemy of his father before him, Bustom hid him with thousands of arrows. Fighting for his friend, - 6338 ] Mahabharat (६३३८) सप्तकुद्धः समसोमं त्रिभिः शरैः॥ २ ॥ तस्याश्वान् कतनं मतं तिलशो वधमछरे श्यालस्तव महाराज तत उच्चुऋशुर्जना । २२. ॥ हताश्यो विरष छिन्न केतुम भारिप । धंधी धनुर्द्धरं गृह्य स्थामावतिष्ठत ॥ २३ ॥ व्यस्जद. सायकांधेय स्वर्ण 'पंखान् शिलाशितान् । छादयामास समरे तवं श्यालस्य तं रथम् ॥ २४ ॥ शंल माना "मिष प्रातान् शरग्रान्महारथः। रोपगान् समीक्ष्य विम्यघे नेष सीबलः । २५ ।। 'प्रेममाथ शरांस्तांस्तु शरमातैर्महायशाः। तत्रातुभ्यन्त योधाश्च सिद्धाश्चापि दिविस्थिता ॥ २६ ॥ मुतसोमस्य तत् कर्म दृष्ट्वा यमनतम् । रथस्य शकुनि यस्तु पदाति समयोधयत् ॥ २७ ॥ तस्य तीक्ष्णैर्महागैर्भग्लैः सन्नतपर्वभिः। यान कार्मुक 'रास्तूणीरश्चैिव सर्घशः ॥ २८ ॥ स छिन्नधन्वा विरथः खड्गमुद्यम्य चानदत् । वैद् युक्तहोकर युद्ध में उन वाणोंकोमा तीक्ष्ण पारवाले वाणोंसे रोककर तीन वाणों से मुतसोमको घायलोकया । २१ । हे महाराज आपके सालेने वाणों से उसके घोड़े ध्वजा और सारथीको तिलके समान खण्ड खण्ड किया इस हेतुसे सब मनुष्य घड़े शब्दसे पुकार । २२ । हे श्रेष्ठ धृतगष्ट्र बह मृतक घोड़े और दूदी ध्वजावाला रथसेरहिव होकर उत्तमरथको छोड़कर स्थसे पृथ्वीपर खड़ाहुआ ।२३। सुनहरी मुख वाले तीक्ष्ण धारवाले चाणको छोड़ताहुआ युद्ध में आपके सालेके उसरथको दक- दिया । २४ । यह महारथी शकुनी शलभनाम पक्षी के समूहोंकी समान रथके समीप वर्चमान वाणोंके समूह को देखकर पीडामान नहीं हुआ। २५, । और बड़े | यशस्वी ने अपने वाणों के समूहों से उसके वालों को मथडाला उस स्थानपरं पद्ध करनेवाले आकाशवासी. सिद्ध भी प्रसन्न हुये । २६, सुतसोम के उस अजुत | और अदाक भयोग्य, कर्मको, देखकर प्रसन्न हुये भौर बहुत से पदाती और स्थ सवार शकुना के साथ युद्ध करनेवाले हुये ।,२७ । हे राजा तीक्ष्ण वा बड़े वेगवान् टेदेपर्ववालेभल्लों से उसके धनुप, और सव.तूणीरोंको तोड़ा । २८ । फ़िर यह टूटे tvith sharp arrowe, S..akuni cut, those arrows with his own. 20. Checking other arrows with his sharp-edged ones, he wounded Sat-1) som with three. Your brother-in-law, o king, cut into pieces his horses, banner and driver and the lookers on cried out in terror. Deprived of horses, standard and oar, he left his good chariot and. stood on earth; hiding your son-in-law's car with sharp arrows decked with gold. 25. Seeing the arrows near his car, like a flight of locasts, 8hakuni was not frightened., Tho great warrior cut them down with his own arrows to the great joy of the heavenly Sidhas. Seeing the wonderful and extraodinary dead of Sustom, the cheerful loot soldiers and car-warriors attacked Shakuni and eut down his bow, ard qui. Vers with their sharp arrows. Destitute of bow and car, he took up .
१.६३३९) कर्णपर्व Karan Pary [6339 प्योत्पयषणाम हस्तिदम्तमयसरुम ॥ २९ ॥ माम्यमाणं ततस्तन्तु बिमलाम्बरमञ्च सम । कालवण्डापमं मेने सुतसोमस्य धीमतः । ३० ॥ सोचरत सहसा सगी मण्ड लानि समन्ततः । चतुईश महाराज शिक्षावलसमन्वितः ।। ३१ ॥मान्तमुद्भान्तमाप्लुतं प्लुठनिःमतम् । सम्पातं समुदीर्णच दर्शयामास संयुगे ॥३१सीपलस्त ततस्तस्य शनिक्षेप वीर्यवान् । तानापतत एवारा चिच्छेद परमसिना । ३३. ॥ ततः हुदो महाराज सौधनः परवीरहा । प्राद्रिणोत् . सतप्तोमाय शरानाशीधिषोपमान ।। १६ ॥ चिच्छेद तांस्तु खड़गेन शिक्षया च.बलेन च। दर्शयला युसे सातत्यपराकमा ॥३५॥ सस्त चरतो राजन मण्डलावर्तने तदा। क्षुर सुतीक्ष्णेन खड्ग चिच्छेद सुप्रभम् ॥ ३६ ॥ स छिन्नः सहसा भूमौ निपपात महामास । भवमस्य स्थित · हस्ते सुत्सर्गस्तस्य भारत ॥ ३७ । छिनमानाय निस्त्रिंश धनुष रथ स विहीन बैडर्थ और नाल कमलके वर्ण हाथीदांत के मूठ रखनेवाल खड्गको उठाकर बड़ी ध्वनि से गर्ना । २९ । उसके पीछे बुद्धिमान सुतसोमके घुपायेहुये निर्मल आकाशके समान उत खड्गको कालदण्डके समान समझा १० । हे महारान वह शितायुक्त पराक्रमी खड्गधारी एकाएकी हजारों प्रकारसे चौदह मंडलोंको घूपा । ३१ । उनके नाम भ्रांत, उदातमापिद्ध भाप्लु विप्लुत मृतसंपात समुहीण इन मंडलोंको युद्ध में दिखाया ' यह सातमंडल लाम विलोमके विभागले द्विगुणितहोकर चौदह होजाते हैं । ३२ । फिर उसके पीछे' पराक्रमी शकुनी ने अपने ऊपरभातेहुये वाणों को उत्तम खडगले काटा ३३ हेमहाराज इसके अनन्तर शोधयुक्त शकुनी ने फिरभी सर्पके विपके समान वाणों को मुतसामके ऊपर फेंका। ३४ । युद्ध में गाड़ के समान पराक्रमी मुतसोम ने अपनी इस्तलापाता को दिखातेहुगे खड्गकी शिक्षा के पराक्रमसे उन बाणों को काटा । ३५ ॥ है। राजा तब दायेंवायें मण्डलों के घूमनेवाले उस सुतसोमके प्रकाशमान 'खड्गको घई साक्ष्ण भुरपसे काटा और रुकाहुआ खड्ग एकसारही पृथ्वीपर पड़ा और उस श्रेष्ठ खगका आधाभाग उसके हाथमें नियतरहा । ३७ । महारथी मुतसोमने his sword with ivory handlo, blue like lotus or lapis lazuli, and roared loudly. Thea wise Sustom saw the sword hurled liko Yom's rod. 30. The brave Warrior, skilful in sword fighting, showed varioua moreinonta, known as bhrant, udbhrant eto. Thon valiant Shakuni cut down with the sword the arrois coming upon him, Thea enraged Shakuni shot arrows, liko renomous serpents, at Sutom. Full of prowess like Garur, Satsom skilfully cut down those arrows with his Sword. 35. Then Shakuni cut with bis arrow the stord of Sitsom, One part of the stvord fell down on the ground and the other remained in the hand of Sutson. Seeing his sword thus broken dows, Sutsom moved sis paces and hurled tho remaining half of the sword at the - , 16340] Mahabharat. (६३४०) मधप्लुत्य पदानि षट् । प्रायिभ्यत् ततः शेप मुतसोमो महारयः ॥ ३८ ॥ स छिया सगुणञ्चापं रणे तस्य महात्मनः । पात घरणी तूर्ग स्वर्णवनविभाषितम्॥३॥ मुतसोमस्ततोगच्छत् श्रतकीमहारथम्। सौवलोपि धनु घोरम यत् सर्जयम् 1४०॥ मभ्ययात् पाण्डवानीक निघ्नन् शत्रगणान् बहून् । तत्र नादो महानासीत पारवानां विशाम्पते । सौवल समरे हप्ट्या विचरन्तमभीतयत् ॥ ४१ ॥ तान्यनी कानि हप्तानि शस्त्रवन्ति मन्ति च । दाम्यमाणान्यदृश्यन्त सौबलेन गारमना ॥ ४२ ॥ यथा दैत्यचम राजन् देवराजो ममई ह । तपैप पाण्डर्षी सेना सौबलेयो व्यनाशयत् । ४३ ॥ इति श्री कर्णपर्वणि मूतसोमतौवल दे पञ्चविंशोऽध्यायः २५ ।। । . खड्ग को दूदा जानकर और छ। चरण हटकर फिर उस आधे खड्ग को महार किया। वह मुंवर्ण और हारों से अलंकृत खड्ग उस महात्माके डोरी समेत धनुपको काटकर शीघही. पृथ्वीपरगिरपड़ा । ३९ । फिर मुतसोम श्रुतिकार्तिके बड़े स्थपर चलागया और शकुनिर्भा बड़े कष्ट से विजय होनेवाले दूसरे घोर.धनुष को लेकर .. ४० । शत्रुमों के बहुत से. समूहों को मारताहुआ पाण्डवी सेनाके सम्मुख गया हे राजा युद्ध में निर्भय के समान घूमनेवाले शकुनाको देखकर पाण्डवोंके बड़े शब्द हुये महात्मा शकुनीके हाथ से वह अहंकारी शस्त्रों की धारण करनेवाली सेना भागतीहुई. दृष्ट पड़ी जैसे कि देवराज इन्द्रने दैत्योंकी सेनाको मर्दन किया इसीप्रकार शकुनी ने भी पांडवों की सेना का नाशकिया ॥ ४ ॥ foe. .The sword, decked with diamonds and gold, cut the bow and bowstring and fell down on the ground. Then Sutsom mounted the huge car of Shrutkirti. Shakuni took up another dreadful and invinc ible bow and faced the Panday army, alaying many warriors Seo ing Shakuni move without fear, the Pandavas cied out loudly and thu army was dispersed by him. Shakuni destroyed the Pandav army. as Indra hud dons the army of Daityas" 43.
६३४१) कर्णपर्व Karan Pary 16341 सजय उवाच । धृष्टद्युम्नं कृपो राजन् धारयामास संयुगे । यथा दृत बने सिंह शारभो वारयेयुधि ॥ १॥ निरुद्धः पार्वतस्तेन गौतमेन क्लीयता । पदात् पद विचलितुं नाशकत्तत्र भारत ॥ २॥ गौतमस्य रथ इष्ट्या धृष्टद्युम्नरथं प्रति । चित्रेसुः सर्वभू तानि क्षयं प्राप्तञ्च मेनिरे ॥ ३॥ तत्राघोचन विमनसो रधिनः सादिनस्तथा। द्रोणस्य निधनान्ग संकुद्धो द्विपदां वरः ॥ ४ ॥ शारदतो महातेजा दिन्यास्त्रविदुदारधीः । अपि स्वस्ति भवेदय धृष्टद्युम्नस्य गौतमात् ॥ ५ ॥ अपीय वाहिनी कृत्स्ना मुच्येत महतो भयात् । अप्य ब्राह्मणः सर्वान्न तो हन्यात समागतान् ॥ ६ ॥ यादशं दृश्यते रूपमन्तकप्रतिम भशम् : गमिष्य त्या पदवी भारद्वाजस्य गौतमः ॥ ७ ॥ आचार्य क्षिपहस्तश्च विजयी च सदा युधि । मस्रवान् योपसम्पन्नः कोधेन च समन्वितः ॥ ८॥ पार्षतश्च महायुद्धे घिमुखोद्याभिलक्ष्यते । इस्पे विविधा वाचस्तावकानां परः अध्याय २६ ॥ संजयवोले हे राजा कपाचार्य ने युद्धमें धृष्टद्युम्नको ऐसे रोका जैसे कि वन में हाथीको सिंह राफताहै । १ । हे भरतवंशी वहां उसपराक्रमी गौतम कृपाचार्यजी से रुकाहुआ धृष्टद्युम्न एकचरण चलनेकोमा समर्थ नहींहुआ । २ । कृपाचार्य के रथको धृष्टद्युम्न के रथके समीप देखकर सबजीवमात्र भयभीत होकर नाशकोमानने लगे।।।वहाँपर चित्तसे उदासहोकर रथी और अश्वारूढ कहनेलगे कि निश्चय करके द्रोणाचार्य के मरने से द्विपादों में श्रेष्ठ । ४ । बड़े तेजस्वी दिव्यास्त्रों के जाननेवाले बड़े बुद्धिमान शार्दूलरूप कृपाचार्य अत्यन्त क्रोधयुक्त हैं भय कृपाचार्य के हायसे धृष्टद्युम्नकी कुशल । ५ । और इस सब सेनाकानी भयसेनिटत्त होना और हम सब भागने गोंकाभी इस ब्राह्मणसे वचना कठिन विदित होताहै । । । क्योंकि इस आचार्यका रूप कालके समान दृष्ट पड़ता? कृपाचार्य अब द्रोणाचार्य के मार्गपर चलेंगे । ७ । यह कृपाचार्य सदैव हस्तलाघर युद्ध में विजयका पाने वाला अनश पराक्रमी होकर क्रोधयुक्त । ८ । अव धृष्टद्युम्न युद्ध में मुखको CHAPTER XXVI Sanjaya said, "Krípacharya chected Dhrishtadyumn in battle as a lion in a forest checks an elepbant. Checked by valiant Kripacharya, Dbrishtadyumn could not move a step. Seeing the car of Krip near that of kius, all the people believed that lie would die. With a dis. tressed mind, the car warriors and horsemen romarked that glorious Kripacharya, enraged at the death of Drona, would not spare the lives of Dorishtadyumn and all the army. 6. For the acharya looked like Death and would follow the footsteps of Drona. The great acharya, skilful in the use of weapons was alwngs victorious in battle and full of prowess and rage, and Durishtadyumn wis likely 116342] Mahabharat (६३४२ सह । व्यश्यन्त महाराज तयास्तत्र समागमे । विनिश्वस्य तत' फ्रोधात कप शारडतो नृप ॥१॥पापंचाईयामास निश्चष्टं सर्पनर्मम् । स हन्यमानः समर गौतन महात्मना ॥ १२ ॥ फर्त्तव्यं न स्म जानाति मोहेन महता वृतः। तमनवीततो यन्ता कञ्चित् सेमं तु पार्षत ॥ १२ ॥ ईशं व्यसनं युद्धे न ते दृष्टं मया चित् । देवयोगातु ते पाणा नापतन्मर्मभेदिनः "१३ ॥ प्रेपिता विजमुख्यन माण्युद्दिश्य सर्वतः। व्यावर्चये एय तूर्ण नदीगमिवार्णयात् ॥ १४॥ अवध्य ब्राह्मणं मन्ये येन ते विक्रमो हतः । धृष्टघुम्न सतो राजन् शनरमवीद्वचः ॥ १५ ॥ मुह्यते मे मनस्तात गात्र स्वेदश्च जायते । घेप शुध शरीरे में लोमहर्षश्च जायते ॥ १६ ॥ वर्जयन ब्राह्मणं युद्ध शनैर्याहि यतार्जुनः। अर्जुन भीमसेन वा समरे प्राप्य सारथ क्षेममद्य भवेदेयमेषा मे नैष्ठिको मतिः ॥१७॥ | फेरनेवाला दिखाई देताहै हे महाराज वहां उनदोनोंके सम्मुख होने में आपके पुत्रों के नानामकारके शब्द दूसरों के साथ कहे हुये मुनेगये । ९ । इसके पीछे शार्दूल कृपाचार्य ने क्रोधसे बड़ी २ वासें लेकर । १० । सदैव चेष्टाकरनेवाले धृष्टद्युम्नको सयअंगों पर पीडामान किया फिर महात्मा कृपाचार्यसे घायल होकर बड़े मोह में व्याकुल होके उसने युद्ध में करने के योग्य कर्म को नहीं जाना ॥११॥ इस के पीछे सारथी ने कहा हे धृष्टद्युम्न कुशल है । १२ । मैंनेकहीं तेरे ऐसे समय को नहीं देखाया दैवयोग से सब ओर में तेरे मर्मस्थलों को लन करके इसउत्तम ब्राह्मणके फेंकडुये वाण तेरे मम्मों के छेदने वाले मर्मों पर पड़े हैं जो तुमकहो तो स्थको शीघही ऐसे लौटाऊं जैसे कि समुद्र से नहीके वेग को हटाते हैं। १४ । मैं प्राणको अअध्य मानताहूं इसीसे तेरा पराक्रम नष्टहोगया है हे राजा यह सारथी के वचन को सुनकर धृष्टद्युम्न बड़े धोरेपनेते यहवचन बोला। १५ । हे तात मेरा चिच अचेत होताहै और अंगोंपर पसीना उत्पन्न होता है और शरीरमें कंप और | रोमांच खड़े हैं । १६) युद्धमें ब्राह्मणको त्यागकरके उधरको बड़े धोरे ३ चल जहाँ कि अर्जुन है से सारथी अवयुद्धमें अर्जुनको या भीमसेनको पाकर कुशलहोगी । यही मेरादृढ़ विश्वासहै । १७॥ हे महाराज इसकेपीछे वह सारथी घोड़ोंको मारता to turn bis face from fighting. These and other remarks like these were to be heard on all sides. Then brave Kripacharya, sighing again and again in anger, wounded Dhrishtadyumn in all the parts of his body. Wounded by Kripacharya, he did not know what to do. Then the driver said, Aro you safe Dhrishtadyumn! I never saw you. in this plight before. The brahman's sharp arrows bave pierced your vital parts. At a word from you I shall turn the car back as the sea turos back the water of a river. I think the Brahmap is immortal and so your prowess is of no avail." On hearing the words of the driver, Dbrishtadyumn slowly said, "I am losing consciousness; ny limbs sweat; my body is iternbling and the bair stand on end. Leave (६३४३) कर्णपर्थ Karan Pary [ 5343] ततः प्रायान्महाराज सारधिस्त्वरयन् हयान् । यतो भीमो महेप्यासो युयुधतष सैनिक ॥ १८ प्राता रयं दृष्ट्या धृष्टद्युम्नस्य मारिप । किररशताम्येव गौतमोनुपयो तदा ॥ १९ ॥ शखच पूरयामास मुहर्मुहुरारिन्दम । पापंत दापयामास महेन्द्रो नमुनि यथा ॥ २०॥ शिस्त्रण्डिनन्तु समरे भीष्ममृत्यु दुरासदम् । हार्दिक्यो धारयामास स्मथ शिव मुमुहुः ॥ २१ ॥ शिखण्टी तु समासाप हुविकानो महारयम् । पंचमिनिय मल्लज्जधुदेशे समानच ॥ २३ ॥ कृतवर्मा तु सलो मित्या पाट्यां पतत्रिीमः । धनुरेकेन विच्छेद हसमाजन्महारथः ॥ २३॥ अथान्यनुरादाय पदस्थात्मजो चली। तिष्ठ तिष्ठति सकुशो हार्दिक्यं प्रत्यभाषत । २४ ॥ तखोस्य नयति पाणानुपमपुंखान सुतेजनान । प्रेपयामास राजेन्द्र तेस्थानश्यन्त धर्मणः ॥ २५॥ पितास्तान समासस्य पतितांच महीतले । क्षुरमेण मुतीक्ष्णेन कार्मुकं चिच्छिदे भृशम् ॥ २६ ॥ अयन विभ हुआ बड़ी शीघ्रता से वहांगया जहां वड़ा धनुर्द्धर भामसेन भापकी सेनाके मनुष्यों से युद्ध कररहाया ॥१८॥ हेबेष्ठ तब गौतम कृपाचार्य धृष्टद्युम्न के रथको भागारमा देखकर सैकड़ों वाणों को छोड़ते हुये उसके पीछे गये । १९ । भोर शत्रुके विजय करनेवाले ने वारम्बार शंखको बनाया भारष्टद्युम्न को ऐसे भयभीत किया जैसे कि इन्द्रने नमुचिको भयभीत कियाया। २० । फिर भामजी के मृत्युरूप विजयी शिखण्डीको पारम्पार मंद समकान करतेहुये कृतवर्मा ने रोका । २१ तबसो (शिखण्डी ने भी हार्दिक्यों के महारथी को पाकर तीक्ष्ण धारवालें पवित्राणों से | अस्थानपर घायलकिया । २२ । फिर हंसते हुये महारथी कृतवर्माने साठवाणों से शिपएडीको घायल करके एकमाणसे उसकैयनुपको काटा । २३ । फिर पराक्रमी दुपदके पुपने दूसरे धनुपको लेकर अत्यन्त कोपयुक्त होकरं कृतवर्मासे तिष्ठ | ऐसावचनका । २४ । हेराना इसके भनन्तर मुनहरी पुंखवाले नन्मेवाणोंको उसके ऊपर चलाया यहवाण उसके कवचपर लगकरंगरपड़े । २५ । उन निष्फल पृथ्वी पर गिरेहुपे घाणोंको देखकर अत्यन्त तीक्ष्ण तुरम धनुपको कारो। २२ । the Brahmar and more on towards Arjun. My safety lick Dear At jun or Bhim." At this the driver whipped the horses and drove tho car to tho place where Bhim was fighting with your oray. Seoing Dhrislatadyumn run away in his car, Kripcharya chased him, discharging hundreds of arrows and sending forth victorious peals from hir cooch. Ho terrifiod Dhrishtadyumn as India had done Varnuchi With a smile, Kritvarm checked Shikbändi the destroyer of Namuchi. Shikhandi rounded him with arrows.22. Kritvarma, with a smile, wounded him with sixty arrows and cat down his low with ono more. The valiant son of Drupad took up saother bow and said "Stay, stay;" in anger. Then ho shot ai him fire arrows having gold feathers. The artows did not penetrata his ॥ [0344] Wahabharat (६३४४ ) धन्यानं भग्नश्रृङ्गमियमम् । अशोत्या मागणैः क्रुद्धो बाटोयरसि चार्पयत् ॥ २७ ॥ कृत धर्मा तु संसद्धी मागणः क्षतविक्षतः । वयाम रुधिलं गाः कुम्भवनादिघोदकम् ॥२८॥ रुधिरण परिफ्लिनः शतधी व्यराजत । चर्वण क्लीदतो राजन् यथा गैरिकपर्वतः ॥ २६॥ अथान्यद्धनुरादाय समागणगुण प्रभुः1 शिपण्डिनं पाणधरः स्कन्धदेशे व्यता दयत् ॥ ३० ॥ स्कन्धदेशस्थितषणिः शिखण्डी नु व्यराजत ! शायामशास्त्रापिप्ल. सुमहान् पादपो यथा ॥३॥ तायन्योन्यं भृशं विध्य सघिरेण समुक्षिती । योन्य धृङ्गाभहती रेजतुर्वृषभाविध ३२ ॥ अन्योन्यस्य पधे पत्नं कुर्याणी ती महारथौ । रथापावरयस्तष मण्डलानि सहमशः ॥ ३३ ॥ कृतपर्मा महागज पाप्तं निशितः शरैः। रणे घिच्याध सप्ताया स्वर्णपुरः शिलाशितः ॥ ३४ ॥ ततोस्य समरे घाणं भोजः प्रहरतां वरः । जीवितान्तकरं घोरं व्यसत्वरयाम्पितः॥ ३५ ॥स फिर टूटे धनुपवाले कनवर्मा को शिखण्डी ने कोषयुक्त होकरभास वाणोंसे छाती और भुनापर घायल किया।रातव अत्यन्त क्रोधयुक्त फ्तथर्माने अंगोंसे ऐसे रुधिर को डाला जैसे कि मटके से जल डालाजाताहै । २८ । फिर रुधिरस भराहुआ कृतवर्मा ऐसा शोभायमान हुआ जैसे कि वर्षा से धातु रखनेवाला पर्वतहोताहै ॥२९॥ इसकेपीछे प्रभुकृतवर्मा ने वाणसमेत धनुपको लेकर वाणों के समूहों से शिखण्डी को कंघस्थान में घायल किया। 1। फिर शिखण्डी स्कंधपर लगेहुपे पाणों से ऐसा शोभायमान हुमा जैसे कि छोटी बड़ीशासाओं में पड़ारत शोभित होता है । ३१ । वह दानों परस्परमें अत्यन्त घायल और रुधिर में भरेहुये ऐसे शोभित हुये जैसे कि परस्पर सींगों से घायल दो बैल होते हैं । १२ । परस्पर में मारनेकी इच्छा करनेवाल यहदोनों महारधी वहां हजारों मंडलोंको गुमे।३।हेमहाराज कृतमा ने शिखण्डी को ताक्षणधार मुनहरी पुरा वाले सचर वाणों से घायल किया ॥३४॥ इसके पीछे शीघ्रता युक्त युद्धकताओं में श्रेष्ठ भोजवंशी कृतवर्या ने पुदमें मृत्यु कारी घोरवाणको उसके पर छोड़ा। ३५ । हे रामा वह शिखण्डी उत वाणसे armour. Suring his arrows tall iueffectually on earth, ho cut down this adversary's bow with a sharp dari Ilaving.cut down the low, Shikhandi waundwl bim with cighty arrows on the breast and array, Kritvarmi, much entayed, dropped down blood liko water from a pitcher. With lia bluding baly, kritvarnı looked glorious liha a hill. Then taking up his bow nod arrow, hu wounded Shikhandi on the shouldar. 30. With arrows stuck to the shoulder, Shiklandi louho liku a thu mith broclics. The two wounded warriors looked lido tiro bulls wounding cacin other with lorne, Desirous of slaying hich other, both the Warriors moved in circles Kritvarus wouodel Shikhaadi with breaty arouk, Then Kritsarua thelut of war. riury shot a fatal arrow at bin. Wounded with it Shilligadi Lennie (६३४५) फनपर्य Haran may F6315] तेनानियती राजन् कामामु समायिशवध्यायष्टिय सहसा शिथिय फरमलाः पृतः॥३६॥मांयाहरणाम सारधी रथिनां परम् । हादिपयशरसतत नियसतं पुनः पुनः॥ ३७॥ पराजिते ततः रे पदस्पारम प्रभा। व्ययत् पाण्डवी सना पध्यमानासमन्तत: ॥ ३८॥ इति भी कर्णपर्वणि शिसगड्यपयानेपइदिशोऽध्यायः २६॥ सम्जय उवाच । श्वेताश्यापि महागज धमत्तायफ यलम् । यथा पायुः समा साप तूलशि समन्ततः ॥ १॥ प्रत्युच्युनिगा शिययः कारयः सह शाल्या: सससकाधेय नारायण यलम्च यत् ॥ २ ॥ सत्यसनचन्द्रवंया मित्रदेघा मतजयः । घायल होकर शीघ म युक्त होगया और मूछासे अचत होकर अकस्मात धना की यष्टीका भापनियां । 10 और सारथी इस महारथी को शीघ्रही युदसे दूर लेगया इस शूरवीर शिरसाटीके परास्तहोनेपर कृतवर्मा याणसे दुःसी वारंवार शासलेनेवाली चारों भोरसे पायल वह पाडवी सेना भागी ॥१८॥ भध्याय २७॥ मनप योले ई महारान इनके पीछ अर्जुन ने आपकी सेना को पाकर चारों ओरसे छिन भिन्न पसा करदिया नेमे कि वायु रुईको तिर बिर कर देता है । १ । तप विगर्ग, शिवी, शाल, संसप्तक और कौरवों को नारायणी सेना उसके सम्मुख गई है भरतवंशी सत्यसेन, चन्द्रदेव, मिवदेर शत्रुनय, साश्रुति, चित्रसेन, unconscious and took his rest on the banner statt. The driver soon tuok him far away from the field of battle At the defeat of Shikhan. di, the Paddas nrmy, wounded by Kritsorma's arrows, scattend in all directions." 35. CHAPTER .SXVII Sanjaya said, "Then, o kingrArjun haring entered your army, di-xal it as this wiod do cotton. Then the armiey of Tri. gart, Shiv, Shalwa, Sansaptals and tha Narini army of tho kale ravas fuard him. Satyasen, Chandersen, Mitradev, Shatrunjaya, Mahal harat 163401 सोश्रुतिचित्रसेगच मित्रवर्मा च भारत ॥ ३ ॥ विगतराजः समरे भ्रातृभिः परिमा रितः । पुचव महेष्वासनांनाशनविशारदः ॥ ४ ॥ यस्जन्त शामातान् किन्तो ममाहवे। अध्यवर्तन्त सहसा याय्योंघा इव सागरम् ॥५॥ ते त्यर्जुन समासाद्य योधा शतसहस्रशः । अगच्छन् विलय सचे तास्य रमेघ पन्नगाः ॥६॥ते यध्यमानाः समरे नाजाः पाण्डय रणे । दह्यमाना महाराज शलमा इव पायकम् ॥ ७॥ सत्यसनाखाम धाधायाध युधि पाण्डवम् । मिनदेखिषष्ट्या तु चन्द्रदेवस्तु समभिः ॥ ८॥मि धर्मा त्रिसप्तस्या सौश्रुतिश्चापि सप्तभिः । शत्रुजयस्तु पिंशत्या सशर्मा नामः शरैः ॥९॥ स वियो बहुभिः सरूप प्रतिविम्याध तान् नृपान् । सौति सप्तमिर्षिया सत्य सेन त्रिभिः शरैः॥ १०॥ जघुअयश पिशरया चन्द्रदेय तथाप्टभिः। मित्रदेषं शते नेप तसेन त्रिभिः शरैः ॥११॥ नवनिर्मिप्रवर्माण सशर्माग तथापभिः शत्रुञ्जपच मित्रयम्मी और बड़े धनुर्दारी अपने पुत्र भाइयों समेत राजा त्रिगर्तने । ४ वाणों के समूहों को छोड़ा और युद्धमें अर्जुन पर एकाएकी वाणों की वर्षा करते इय सम्मुख वर्तमान होकर ऐसे बिलायमान होगपे जैसे कि गाड़ को देखकर सर्प बिलायमान होते हैं। ६ । हे महाराज युद्ध में घायल उन युद्धकर्ताओं ने पांडवोंको ऐसे त्याग नहीं किया जैसे कि घायल हुये शलभ अग्निको नहीं त्याग करते हैं ।७. सत्यसन ने तीन वाणसे मित्रदेवने तिरेसठ वाणों से चन्द्रसेन ने सात वाणोंसे युद्ध में पांडव को घायल किया । ८ । मित्रवर्मा ने तिहत्तर वाणों से सौश्रुतिने सात घाणों से शत्रुनयने वीम वाणों से मुशर्माने नौवाणों से घायलकिया । ९ । बहुतोंके हाथप्से घायल उस अर्जुनने इसक्रमसे युद्धमें उन राजाओंको घायल किया कि सौश्रुतिको सात वाणों से मुतसनको तीन बाणों से शत्रुजयको वीसवाणों से चन्द्र- सेनको आठवाण से मित्रदेवको सौवाणसे श्रुतसेनको तीन वाणसे । ११ । मित्रवर्मा को नौवाणों से सुशर्मा को आठवाण से घायलकिया और राना शधुंजय को Soushruti, Chitrasen, Mitravarına and the king of Trigart, together with his song and brothers; great archers, discharged their arrows) like rain, but had to slink away like snakes at the sight of garur. Wounded in battle, the warriors did not desert 'the Pandavas as in. sects, though scorched, donot leavo fire, Satyasen, Vitrador and Chitrasen wounded Arjun with throe,sixtythree and saveri arrows respectively. Mitravarma wounded him with soventythree arrows, Saushruti with soven, Shatrunjays with treaty and Yusharma with nine. Wounded by them, Arjun wounded them in return as follows:- Saushruti with seven, Sutsen with three, Shatrunjaya with trrenty, Chaudersen with eight, Jitrader with a liundred, Shratsen spith threa, litravarma sith nine and Busharma with eight. Having "" । ६३४७) कर्णपर्व Karan Purv [1347 राजानं हत्वा तत्र शिलाशितः।१२सौश्रुतेः सशिरस्त्राणं शिरः कायादपाहगत् । वरित चन्द्रदेवच शनिन्ये यमक्षयम ॥ १३ ॥ तथेतरामहाराज यतमानामहारथान् । पञ्चभिः पञ्चभिर्याणरकका प्रत्यचारयत् ।। १४ ।। सत्यसेनस्तु सस्तोमरं व्यस् जन्महत् । समुद्दिश्य रणे कृष्ण सिंहनाद ननादच ॥ १५ ॥ स निर्भिद्य भुजं सन्य माधवस्य महात्मनः । अयस्मयो हेपदण्डो अगाम धरणी तदा ॥ १६ । माधयाय तु विसस्य तोमरेण महारणे । प्रतोदः पापतद्धरताश्मयश्च विशाम्पते ॥ १७ ॥ पासदेवं विभिनाझं रक्षा पार्थो धनञ्जयः । क्रोधमाहारयत्तीयं कृष्णञ्चेदमुवाच ॥ १८ ॥ मापयावा-महाहो सत्यसनं प्रतिप्रभो। यावदनं शरैस्तीक्ष्णेनयामि यमसादनम् ॥ १९॥ प्रतोद प्रगृह्यसोन्यतुरश्मीनपि यथा पुरा । चाहयामास तानम्मान सत्यसेनरय प्रति ॥ २०॥ विश्वक्सेनन्तु निर्मिन्नं हप्टया पायऱ्या धनम्मयः। सत्यसेन शरैस्तीक्ष्णवार यित्वा महारपः ॥ २१ ॥ ततः मुनिशितैर्भग्लै राइस्तस्य महच्छिरः । कुण्डलोपचित | वाणों से मारकर । १२ । सौश्रुतिके शिरको धड़समेत शरीरसे जुदाकरदिया और शीघही चन्द्रदेवको वाणोंकेद्वारा यमलोकमें पहुंचाया । १३ । हे महाराज इसीप्रकार | उपाय करनेवाळे अन्य महाधियों कोभा पांच २ वाणों से रोका । १४ । फिर अत्यन्त क्रोधयुक्त श्रीसन युद्धमें श्रीकृष्णजीको लक्ष्यकर उनके ऊपर बड़े तामर को फेंक सिंहनाद से गी वह मुवर्ण दंडवाला लोहेका तोमर महात्मा माधवजीकी वाम भुजाको छेखदर पृथ्वीपर गिरपड़ा। १६ । उससमय उस वडेयुद्ध में घायल | माधवजीके हाधसे चाबुक और घोड़ों की रस्सियां छूटगई । १७ । हे राजा तवकुंती | के पुत्र अर्जुनने वासुदेवजी को अंगसे घायल देखकर बड़ा क्रोधकिया और श्री- कृष्णजी से कहनेलगा । १८ । हे महावाही प्रभु घोड़ोंको सत्यसन के पास पहुं चाओ में उसको अपने तीक्ष्ण वाणोंसे यमलोकमें पहूंपाऊंगा । १९ । फिर श्रीकृ. | प्णजीने पूर्वक समान दूलरे चावुक भौर घोड़ोंकी डोरीको पकड़कर उनघोड़ोंको सत्यसेन के रथपरचलाया । २० । कुन्तीपुत्र महारथी अर्जुनने श्रीकृष्ण को slain Shatrunjaya with his arrows, he sovered the head of Soushruti from the trunk and sent Chandrason to the region of Yam. 13. Ho checkot the otder partiors with five arrows exca, Then Sorutsua, much enraged, hit Shri Krishn with a tomar and roared a lion's roar. The tomar, with a gold handle, pierced Madhava's left arm and fell down on the ground. Then much wounded in the great battle, the whip and traces went out of Madhava'a hand. Then the son of Kuati, 500- ing Vasudev wounded, was much enraged and eaid, "Take the car near that of Satyasen, mighty lord; I shall send him to the region of Yam with sharp arrows, Shri Krishn took up another set of whip and thisces and drove the car towards Satyasen. 20. Seeing Shri Krishn (6348) Blahablaat (६३४८) कायानक पृतनांतरे ।। २२ ॥ तमित्य शितणश्चियर्माणमाक्षिपत् । यत्सद तेन तीन सारथिम्चास्य मारिए । २३ । ततः शरशाभूपः संशप्तकगणान् बली पातयामास समुद्धः शतशोय सहमशः ॥ २४ ॥ ततो राजतपुंखन राजन् शीर्ष महात्मनः । मित्रसेनस्य चिच्छेद क्षरप्रेण महारथः। सुशर्माण सुसंकुलो अनुदेश समादनत् ॥ ५॥ ततः सराप्तफा: स परियाय धनत्रयम् । शस्त्रोधसमृदुः क्रुद्धा नादयन्तो दिशो दश । २६ । अस्यादितस्तु तर्जिणः शक्रतल्यपराक्रमः 1 पन्द्रमस्त्रम मेयामा प्रादुश्चक्र महारयः ॥ २७ ॥ ततः शरसहमाणि प्रादुरासन् विशाम्पते । ॥२८॥ धानां छिद्यमानानां कार्मुकाणाञ्च मारिष । रथानां सप्ताकानां नूणीराणां युगः सहः ॥ २१ ॥ अक्षाणामथ चकाणां योक्त्राणां रश्मिभिः सह । कूधराणों पर पानां पृरकानाञ्च संयुगे ।। ३. ॥ अश्वानां पतताञ्चापि प्रासानामृष्टिभिः सहा घायल देखकर तीक्ष्णवाणों मे सत्यसन को रोककर । २१ । सेनाकमध्यमें अत्यन्त ताणधारवाले भल्लों से उसराजाके कुंडलों समेत बड़ेशिरको दहसे काटा । २२ । । उसको मारकर तीक्ष्ण वाणों से मित्रवर्माको और वत्सदन्तनाम तीक्ष्ण वाणों से उसके सारथीको मारा । २३ । हे श्रेष्ठ इसके पीछे अत्पन्त कोषयुक्त पराक्रमी अर्जुनने सैकड़ों बाणों में संसप्तकों के हजारों समूहोंको गिराया ।२४। हेरामाउसके पाछे उस महारथी ने सुवर्ण पुंखवाले तुरमसे महात्मा मित्रसेनके शिरको काटा और अत्यन्त क्रोधले मुशर्माको जघुस्थानपर घायलकिया । २५ । इसकेपीछे क्रोधर्म, भरे दशों दिशाओं को शब्दायमान करनेवाले सब संतप्तकों ने अर्जुन को घेरकर शस्त्रोंके समूहोंसे घायलकिया । २६ । इन्द्रकी समान पराक्रमी बड़े साहसी संसप्त: कोसे पीडामान महारथी अर्जुन ने ऐन्द्रअस्त्रको प्रकट किया । २७ । हे राजा उस ऐन्द्राखसे हजारों वाण प्रकटहुये हे श्रेष्ठ रानाधृतराष्ट्र जहांतहां टूटीहुई ध्वजा धनुप और पताकासमेत रथ वाजुओं के समेत तूणीरोंके बड़े शब्दसुनेगये । २९ । युद्ध में गिरनेवाले अक्ष चक्र वागडोर पोक्तर वख्य और पार्षदोंके शब्द मुनेगये।३०। wounded, Arjuu.checked Batyasen and cut oft his head decked with earrings. Having slain him, he slew alįtravarma with sharp arrows and his driver with arrows known as calf-tooth. Then valiant Arjun much enreged, slew thousands of Sansaptaks with his arrows. Then the great warrior beheaded Mitrasen with arroits having gold fea thers and wounded Susharma in the shoulder joints. 25. Theo the Sansaptaks much enraged surrounded Arjun and wounded him with sharp arrows. Full of prowess like Indra, wounded by Sansaptaks, Prave Arjun produced Aindra weapon. Thousands of arrows came out of the weapon, and broken banners, bows, standards, cars, arma and quivers fell down with a great crash. The falling yoker, wheels, tracos and guards made a tremendous noise, 30. The falling horsee, .
(१३४९) कर्णपर्व Karan Parv [6349 ] गदाना परिघाणांच शक्तितोमरपशिः ॥३१॥ शतप्नीनां सचकाणां भुजानांचोरुभिः सह । कण्ठसूचाङ्गदानांच केयूराणांच मारिप । ३२ ॥ हाराणामय निष्काणां तनुत्रा णांचं भारत । छमाणां व्यजनानांच शिरसा मुकुटैः सह ॥ ३३ ॥ अभ्यत महाशब्द स्तत्र तत्र विशाम्पते। सकुण्डलानि स्वक्षाणि पूर्णचन्द्रनिभानि च।३४ ॥ शिरांस्युया महश्यन्त ताराजालमिवाम्बरे । मुस्यग्वाणि सुघासांसि चन्दननोसितानि च ।। ३५ ॥ शरीराणि व्यदृश्यन्त निहतानां महीतले। गन्धर्वनगराकारं घोरमायोधनं तदा ॥३६॥ निहतराजपुत्रैश्च क्षप्रियश्च महायलैः। इस्तिभिः पतितश्चय तुरगश्चाभवन्मही ॥ ३७॥ अगम्यरूपा समरे विशीर्णरिय पर्वतैः । नासीच्चक्रपथस्तत्र पाण्डवस्य महात्मनः ॥ ३८॥ निघ्नतः शावधान् भले हस्त्यश्यञ्चास्यतो महत् । आतङ्कगदिव सीदन्ति रथ वक्रांणि मारिए।॥ ३९ ॥ चरतस्तस्य संग्रामे तस्मिल्लोहितकमे। सांदमानानि गिरतेहुये घोड़े पास दुधारा खड्ग गदा परिघ शक्तितोमर और पटिशोंके भी बड़े२ शब्दसुनेगये । १ ।, चक्र शतधनी और जंघामों समेत भुजा कंठसूत्र बाजूवन्द समेत केयूरों के शब्द मनेगय । ३२ । हे भरतवंशी हार निष्क कवच छत्र ब्यजन और शिरोंका मुकुटोसमेत जहांतहां वहाभारी शब्द मनागया सन्दरं कुण्डल नेत्र वाले पूर्णचन्द्रमाके समान मुखोसेयुक्त शिरोंके समूह पृथ्वी में गिरेहुये ऐसे शोभायः मानधे जैसे कि आकाशमण्डल में तारागण चमकते हैं मुन्दर माला घसालंकार आदि चन्दनोंसे लिप्त । ३५ । मृतकोंके शरीर पृथ्वीपर गिरेहुये दृष्टपड़े तव युद्ध भूमि गंधर्व नगरके समान घोररूपहोगई । ३६ । वह सवपृथ्वी राजकुमार और | महावली क्षत्री और पड़े हुये हाथी घोड़ोंसे । ३० । युद्धमें ऐसीदुर्गम होगई जैसे कि पर्वताके गिरनेसे होतीहै, वहां महात्मा पाण्डव अर्जुनके रथका मार्गनहींरहा ।३८ इससे हे राजा भोंसे शत्रुओंको और घोड़े हाथियोंको मारतहुये रथों के पहिये बड़े पादित होतेथे । ३९ । उन रुधिररूप कीच रखनेवाले युद्ध में उस घूमनेवाले अर्जुन prases, swords, maces clubs, spears, tomars and pattishes made a great noise. The wheels, shataghnis, thighs, arms, necklaces, arm. lets and diadema fell down with a crasli. Garlands nishhas, armourg, umbrellas fans and head gears were very noisy in their fall. With beautiful earrings, eyes, moonlike faces and heads fallen down, the ground looked glorious like tar spangled leavens. The bodies of the warriors slain, decked with beautiful garlands, fine dresses and sandal paste were to be seen fallen on eath, and looked like the city of gandharvas. 36. The ground covered with the bodies of princes, powerful kshatryas, elephants and horsos, became impregn. able as if covered with hills, so that Arjun could find no way for lis. car. Killing the enemies, borses and elephants with his arrows, the 63501 Mahabharat चक्राणि समूहुन्तुरा भृशम् ॥ ४०॥ श्रमेण महता युका मनोमारुतरहसः'पषमा नन्तु तत् सत्यं पाण्डपुत्रेण धन्विना ॥१प्रापंगो विमुखं सर्व नावतिष्ठति भारत । तान् जित्वा समरे जिष्णुः संयतकगणान् बहन् । विरराज तदा पाय विधमोनिक रिपोरखलन ॥ १२॥ इति श्री कर्णपर्वणि भर्जुनविनये सप्तविंशोऽध्यायः २० ॥ -- . साजय उवाच । युधिष्ठिर महाराज विसृजज्लं शरान् बहम् । स्वयं प्यारो राजा प्रत्यगृहणायभीतषत् ॥१॥ तमापतन्तं सदसा तथ पुत्रं महारथम । धर्मराजी दुतं विना तिष्ठ तिष्ठति चाब्रवीत् ॥ २॥ सत से प्रतिविष्याध ममिर्दिशितः शरैः। के पीडामान पड़ियोंको पोड़ोंने अच्छेमकारसे चयाया।४ । मन और वायुकेसमान सदैव शीघ्रगामा बहोड़े बहुत धकग फिर धनुपधारी अर्जुनके हाथसे पायल कर सबसेना । ४. बहुधा मुखफेरकर सम्मुख नियत नहीं हुई तब यह कुन्तीनन्दन मर्जुन युद्ध में संसप्तकों के बहुत समूहों को विजय करके नि म अग्निके समान, प्रकाशमान होकर शोभायमान हुभा । १२ । अध्याय २८॥ भाद संजय बोले हे महाराज निर्भय होनेवाले के समान आप, राना दुय्योधनने बहुत वाणोंके छोड़नेवाले पधिष्ठिर को रोका । १ . धर्मराजले उस हुये भापके पुत्र महारथीको शीघ्र घायलकरके तिष्ठ तिष्ठ इसवचनको कहा।२। wheels of Arjun's car moved, with difficulty. 40. The horses, swift like the mind or wind, were very mush tired. Wounded by Arjun'siar. rows the great army could no longer face him. Having conquered the Sansaptak hosts, Arjun luoked glorious like' smokeless, fire.". "42. CHAPTER XXVIIL Sanjaya said, 'Fearlessly your son Daryodhan checked Yudhish; thir who was discharging many artowa Dharmraj wounded the coming: Warrior and aaid, "Stay stay:" Then he wounded him. with --- . - कर्णपर्व Karan Pray [6351 सारशिप भलेन भृशं कुचो यताइयत् ॥ ३॥ तनो युधिधिरो गजा स्वर्णखान शिलीमुखान् । दुग्योधनाय विक्षेप त्रयोदश शिलाशितान् ॥ ४॥ चतुर्थामतुरो घा लक्ष्य रखा महारथः । पञ्चमेन शिर कायात् सारस्तु समाक्षिपत् ॥ ५ ॥ षष्ठेन तु पक्ष सप्तमेने तु कामुकम् । भएमेन तथा बड्गं पातयामास भूतले, ४.६ ॥ पश्च निपतित्रापि धर्मराजोपशम्। हताशातुं रथाचस्मादवप्लुस्य सुतस्तव रिचम यसने मांगो समावेधावतिष्ठत ॥ ७ ॥ तन्तु कुछगतं रष्ट्या कर्णद्रोणिकपादयः । मञ्षति संहसा परीसन्तो नराधिपम् ॥८॥ अथ पाण्डमता सर्वे परिवार्य युधि हिरम । मेन्ययुः समरे राजस्लतो युद्धमवर्चत ॥९॥ ततस्र्यसहस्राणि प्राधान्त महामषे । ततः किलकिलाशादाः प्रादुरासम्महीपते ॥ १० ॥ पत्राभ्यगच्छन् समरे फिर उसने तीक्ष्णधारवाले नौवाणों से उसको घायल किया और अत्यन्त क्रोध युक्त होकर उसने भल्लसे उसके सारथी को घायल किया । ३ । इसकेपीछे युधि हर मुनारी प्रखवाले तेरह बागों को दुर्योधन केऊपर फेंका। ५ । फिर महा रवीने चारपाणों उसके चारों घोड़ो का मारकर पाच पाणमें उसके सारथी को शिर शरीरसे जुदाकरदिया । ५ फिर छठे माण से राजांकी ध्वजाको सातये ते धनुषको मार आठवेस खड्गको पृथ्वीपर गिराया । । फिरधमराजने पाँचाणों से राजा को अत्यन्त पाहित किया तब वह उस मरेसारथा और घोडेवाले थर्स कूदकर बड़ी आपत्तियों में फंसाआ आपकापुत्र पृथ्वापरही नियंत आं। फिर की अशियामा और सुपाचार्य भादि उस आपत्ति में फंसहुये राजा को देख कर।८। उसको चाहतेहुये अकस्मार्ट सम्मुखं आकर क्त्तमान हुये फिर सर्व सोगाने युधिारको चोरोंआरसे घेरकर युद्धमें पीछा किया हैराजा इसके पछि युद्ध जारीईभी और उस महापद्ध में हजारों वाले घने और कलकली शन्द प्रकटहुआ | १० | जिसस्थानपर पांचाल कौरवोंसे युद्ध कररहे थे वहमिनुष्य nins arrows and with another arrow, much erraged, wounded thedriv. et. Thón Yudhishthir slot thirteen gold backed árros* nl Duryo. dlat. With arrows he slow the four borsts and savered the head of the driver with the fifth. With the sixth, he cut down the prince's standard, the bow with a seventh and the sword with an eighth: 6. Witb dve arrows Dharmraj wounded Duryodhan, wybo, destitute of horse and driver, jumped down from the car and stood on the ground, Busing the king in distress, Karan, Ashwathama; Krip and others at once faced Yudhishthir and surrounded lius ifrou all sides. The battle was sorve. Thousands of musical instrubients wery sounded and the noisa was groxt. In the battle of the Panchals oud Kaurá. was men fought with men, cer-warriors with car waitions and horsb. buen with borkomen. Two duels were worth seeing, incerdible with ।" 16352] Jahabharat पाञ्चालाः कौरवैः सह । नरा नरैः समाजन्मुरिणा घरयारणैः ॥ १६॥रयाध गर्याम साई हयाच हयसादिभिः । द्वद्वान्यासनमहाराज प्रेक्षणीयानि संयुगे । विविधान्यस्य चिस्यानि शसवन्त्युत्तमानि च ॥ १२ ॥ ते दाराः समरे सर्वे चित्रं लघु च मुष्टुन । अयुध्यन्त महावेगाः परस्परपधैषिणः ॥ १३॥ अन्योन्यं समरे अनुर्योधप्रतमनुष्ठिताः । न हि ते समरञ्चः पृष्ठतो धैकयञ्चन ॥ १४॥ मुहर्चमेष तयुद्धमासीन्मधुरदर्शनम् । तत उन्मत्तवद्राजनिर्मादमयत ॥ १५५ रधीनागं समासाद्य वारयनिशितैः शर प्रेषयामास फालाय शरः सनतपर्वभिः ॥ १६ ॥ नागा स्यान् समासाद्य विक्षिपन्तो बहधणे । दारयामासुरल्युप्र तत्र तत्र तदा उदा॥१७॥हपायहाथ घहयः पीचार्य को समान । तलशब्दधगचः सम्पतन्तस्ततस्ततः॥ १८ ॥ धावमानांस्ततस्तास्तु द्रषमा णान् महागजान । पाश्र्वतः पृष्ठतश्चैव निजध्नुईयसादिनः ॥ १९ ॥ विद्राव्य च पर | मनुष्यसे हार्य हाथीले रथी रधियों से घोड़े घोड़ेसे अवसवार अध्वसवारसे । ११ । हे महाराज उसयुद्ध में देखनेके योग्य बुद्धिसे थाहर शस्त्रों से संयुक्त नानाप्रकार से उत्तम द्वन्द्वयुद्ध हुये । १२ । युद्धमें बड़े वेगवान परस्पर मारने के इछावान उन सब सवारोंने अपूर्व तीव्रता पूर्वक चिचरोचक युद्धकिया । १३ । और युदकर्ताओं की वृत्ति नियत होकर उन लोगोंने युद्धमें परस्पर शस्त्रों के महाराकेय और किसी दशा भी मुखको न मोड़ा । १४ हे राना यह युद्ध एकमुहर्त पर्यन्त देखने में वड़ा प्यारा हुआ इसके अनन्तर उन्मत्तों के समान वेमर्याद युद्ध वर्तमान हुआ १६. । तीक्ष्ण धारवाले वाणों से चीरते हुये रथी ने हाथी को पाकर टेदेपर्व । वाले बाणों से मारकर यमपुरको भेजा ! १६ । युद्धमें बहुत से युद्धकर्तामों को फेंकते हुपे हाथियों ने जहां तहां घोड़ों को सम्मुख पाकर अत्यन्त भयकारक दशा से. चीरदाला। १. । बहुतसे घोड़े रखनेवाले अवसवारों ने, उत्तम घोड़ों को परकर इधर उधर दौड़कर, तल के शब्द किये । १८ । इसकेपीछे अवसवारों ने उस दौड़ने और भागतेहुये हाधियोंको वगल और पीठकी भोरसे घायलोकया । १९ । हे राजा मनवाले हाथी बहुतसे घोड़ोको भगाकर किसीने दांतों से किमी ने पर। the oxcess of seapone. The swift hoisemen, deuirous of slaying one another, fought a very interesting battle. The warriors discharged weapons and did not turn face. The battle was very interesting for Bop10 tins, and then they fought without rule liko mad men. Pierciog with sharp edged arrows, the car warriors, with sharp ar rows, sont elephants to the region of Yam Throwing up uany warn riors, the elephants destroyed the bords that came against them. Jany borsemeo, surrounded other bordes, and running hither and thither, tiado a noiso with their palids. Then tho lorowea wound. o the ruinio, clephants from the sides and tache, Vaddenedele phants put the horses t, flight und wounded them with tusks or 15.
कर्णपर्ष Kuran Pary 16353] नयाभागा राजन्मदोत्कटाः। विषाश्विापर अनुममृदुश्च परे भृशम् ॥ २० ॥ साक्षा रोहांश्च तुरगान् विषाणविन्यधरूपा। अपर चिक्षिपुगात प्रगृखातियलालदा ॥ २१ ॥ पादारामता नागा विवरण समन्ततः । धारास्वरं घोरं दुश्वुश्च दिशो दश ॥ २२.५ पदासीनान्तु सहसा प्रतानां महाहीं । उत्सृज्याभरण पूर्णमवप्लुत्य रणजिने ॥ २३ ॥ निमिचं मन्यमानास्तु परिणाम्य महागजा. । जगृप्तर्षिभिदुश्य चित्राण्याभरणानि च ॥ २४ ॥ तांस्तु तत्र पसकान परिवार्य पदातयः । हत्यारोहाविजघ्नुस्ते , महाषेगा पलोस्कराः ॥ २५ ॥ अपरे हस्तिभिस्तैः खे विक्षिप्ता महाहवे। निपतन्ती विषाणा {श विश्वाः सशिक्षितः ॥२६॥ अपरे सासा गृह्य विषारयसूदितां । सनान्तरसमा साय फेचि तत्र महागजः। क्षुणगाव महाराज विक्षिप्य घ पुनः पुनः ॥२७॥ अपरे से मलकर मारा । २० । और क्रोधयुक्त होकर सवारों समेत घोड़ोंको दांतों से घायल किया फिर दूसरे पराक्रमियों ने अत्यन्त वेगसे एकने एकको पकड़कर फेंक दिया । २१ । पदातियों के हायसे इन्द्रियोंपर घायल हाथियों ने चारों भोरसे पीड़ा के घोर शन्द किय और दशों दिशाओंको भागे । २२ । फिर उस महायुद्ध एकाएकी छोड़कर भागनेवाले पदातियों के माभूपणों को झुककर उस युद्धाम में से उठालिया । २३ । विजय के चिन्ह पानेवाले बड़े बड़े हाथियों के सवारोंने हाथीको झुकाकर भर्व भूपणोंको ललिया और उनको छेदा । २४.। वहां उन बड़े वेगवान पराक्रमसे मदोन्मत्त पदातियों ने उन युद्ध करनेवाले हाथियों के सवारों को घेरकर मारा । २५ । बड़े युद्धमें अच्छे शितित हाथियों की सूंडों से आकाश को फेकेहुये अन्य युद्धकता पृथ्वीपर गिरतेहुये दांतोंकी 'नोकों से प्रत्यन्त पापलहये । २६ । कितनेही अकस्मात् पकड़कर दांतोंसे मारेगये और कितनही पदाती सेनाकं मध्यको पाकर बड़े. हाधियों से वारम्बार उछालहुये होकर घायल हुये । २७ । और कितनेही युद्ध में पंखकेसमान, घुमा कर मारेगये हे राजा कोईर | मनुष्य जोहाथियों के सम्मुखथे उनके शरीर उस युद्धभूमि में जहां तहां भत्यन्त | crushed thenn under foot. 20. Much euraged, they wounded the horses and riders with thoir tusks; other warriors threw one another. Wounded on the limbs by foot soldiers, the elephants shrieked with pain and fied in all directions. The foot soldiers running away in battle, stooped down to pick up ornaments. Great .clephant riders, with ensigns of victory, wade the elephants pick up curious orna. monts, piercing them with gouds. The foot soldiers, proud of their | strength, sley elephant ridord. -25. Hurled :up by ths trunks of elephants, other warriors were pierced by the tusks of the ele. phants.. , Others wers olain by tusks. , The foot soldiers, entering in the midst of the arms, were hurled up by elephants and woundod. Some were tossed like fans and blain. Some who came face to face ( 163541 Mahabharat एजनानीय षिभ्राम्य निहता मृध । पुरः संरास नागानामपरेपी विशाम्पते । शरी सण्यतिविद्धानि तत्र तत्रं रणाजिरे ॥ २८ ॥ प्रतिमानेषु कुम्भेषु दन्तयेदेषु वापर निशाता मशं नागाः प्रासतोमरतातीमः ॥ २९ ॥ निगृय च गजा कोचत नाधिश्ये अण्वाणः । रथावसाििमतत्र सीमा न्यपतन्भुवि ॥ ३० ॥ संहसा सादिमाता तोमरणमहामृधाभूमापनन वेगेन समर्माण पदातिनम॥३१॥ता साधणानका संत्रतत्र विशाम्पते। रयानागा समासाद्य परिगृह्य मारिष । व्याक्षिपद सहसा तत्र घोररूपे भयानके ।। ३२ ४ नाराचैनिहतश्चापि निपपात महागजः। पर्वतस्यैः शिसरं बजमग्न महीतलः ॥ ३३॥ योधा योघान् समासाप मुष्टिभिव्यहनन युधिशिष्य म्योम्बमाक्षिप्य चिक्षिपूर्षिभिदुख है ॥ ३४॥ उपम्य व भुजोनम्ये निक्षिप्य मही तले पया.चोर समाक्रम्य स्फुरतोपाहरछिरः ॥ ३५ ॥ जोक्तश्च तयेषाम्या रात्रकाये पायलहुये । २८ । आर किततेह। हाथी पास तोमर और शक्तियों से दोनों दांतोंके मध्यमें कुंभ भार, दन्तवेटों पर कदिन घायल । २९ । वर्ग में नियत बड़े भधानकरूप युद्धकामों के हाथ पायलहोकर कितनेही हाथी.रथ और रथके सबार वहां शरीर से घायलं होकर गिरपड़े, । ३० । उस महायुद्धमें घोड़ोसमेत सवारोंने ढाल बांधनेवाले पदातियों को बड़ी शीघतासे अपने तोमरोंसे मर्डन किया 1१। हे श्रेय्ठ राजाराष्ट्र जहां तहां हाथियों ने आभूषणों से अलंकृत कितनेही रथियों को पाकर और पकड़कर । १२ । अकस्माद उस योररूप युद्ध में फेंकदिया और नाराघों से घायल होकर बड़े पराक्रमी हाथी भी जहां तहां गिरपड़े। ३३ । युद्धय गूरोंने शूरोंको पाकर मुष्टिकामोसे व्यथितकिया और परस्पर शिरके बालोंको पकड़कर एकने दूसरे को गिरादिया । ३४ । और घायलकिया और किसीने धमानोंको उठाके पृथ्वीपर गिराकर चरणसे छातीको दबाकर फड़कतेहुये शिगेको | कादा । ३५ । इसीमकार दूसरोंनेभी शस्त्रको जावते शरीरमें प्रवेश करदिया witki slophantē, werd mucli wounded. Some dlephants were wounded by pružes, tamars, and spears in the middle of their tusks and front, globes. Wounded by the warriors, standing in their sidos. many plephanta and ear-warriors were wounded and fay dead. 30. The horses and horsemen in that battle; wounded the shielded footmen with tomars. Flephants held car-warriors decked vith orpaments and hurled them down all of s guddon. Founded with arrows the bravo elapbants toll duwir liere and thero. Bravo warriors, finding their ad. persaries in battle wounded then with fists and threw then by the hair of their lieads. They wounded them or threw down tbuie stań. dards on the ground. Some put their feet on the breasts of their alversaries and cut down their heads: Others pierced their weapons in the bodies of the living warriors. The battle there was well fought, कर्णप Karan Pary [6353] न्यमाजयत् । मष्टिगुवं महच्यासोद्योधातां तत्र भारत ।। ३६, ७ तथा फेशग्रहश्योर पाहुयुसच भरयम ! समासकस्य नान्यन मषिशानालयापा: ॥ ३७ । महार समरे प्राणान् नानाशर नेकपा । ससकेषु च पधेिषु वर्तमान च संकुल ।। ३८ ॥ कयन्धा न्युरियतानि स्युः शतशोय बहसः शोणितः सिध्यमानाने शस्त्रानि कपचानि च ॥३९॥ महारागानुरकानि पखाणीप चफाशिरे ॥ ४० ॥ एवमेतन्महायुद्धवादणं राससंकुलम् । उन्मत्तगा प्रतिम शदनापूरपज्जगत् ।। ४१ । नव स्वे न परे राजन विहायम्से शरातगः। योसमिति पुध्यन्तं राजांनी जयदिन.।।,४२॥ स्वान् स्वे अनुमदागम पराश्रय समागतान् । उभयोः सेनयो परिठाकुलं सम्पयत । ४३ ॥ पैमानमहाराज धारणश्च निपातितः हमेश्च पतितस्तत्र नाश्च पिनिपातितः ॥ ४ ॥ भगम्परूपा गृथिषी क्षणेनसमपत। क्षणेनामारमहोपाल क्षतजोधप्रतिनी ॥ ४५ ॥ हे भरतवंशी वहां युदकर्ताओं का मुष्टियुद्ध अच्छ प्रकार से हुआ ! ३६ । इसी मकार शिरके बालों का पकड़ना उग्रहुआ और भुजाओं का महायुद्ध बहा भय: कारीमा इसीरीति से एक दूसरे से भिडेहुये युद्धमें नानाप्रकार के शस्त्रों से बहुत प्रकार से एकने एकके भागोंको हरणकिया युद्धकतामों के पिड़ने और संकल युद्ध होनेपर । १८ । हजारों कर्वध अर्थात धड उठखड़े हुये और रुधिर से भरेहुये शस्त्र कवच । १९ । ऐसे शोभायमानहु जात कि बड़े रंगोंसे रंगीनवख इन भयानक शस्त्रोस व्याकुल पड़े युद्ध में उन्मत्त गंगाके समान शन्दों से जगद को पूर्ण किया। ४१ । गणोंसे पाहामान अपने और दूसरों के कुछनहीं जानेगये विजपके कोभी राजालोग युद्ध करना चाहिये ऐसा सपझकर युद्ध करतेहैं । ४२ । हे महाराज भाइयों ने भाइयोंको भार भिड़ेहुये शत्रुओं को भी दोनों सेना बीरों से ज्याकुल युद्धमें वर्तमान हुई । ४३ । हे राजा टूटेरय और गिरायेहुपे हाथियों से और यहॉपर पड़ेहुये घोड़ों से वा गिरायेहुये मनुष्यों से । ४४ । वह पृथ्वी सग भरही में दुर्गम होगई हे राजा एकक्षणही रुधिररूप जलकी बद्दनेवाली. नदी हो 36. Some held otheis by huir and fouglit with aims. kigbining with various weapons with one another, they slew one another. When the battle bad become general, thousands of beadless bodies stood up and the blood-stained armoure looked glorious like colourod clothes, In this great battle of weapons, an uproar like that of the waters of the Ganges filled the firmanent. 41. Wounded by arrows the warriors of one side were not diştinguishable from those of the other. The princes desirous of victory did their duty. Brothers slew bro. thers like enemies in that great battler. The tyo.armies fall of brave warriors met in combat. With broken cars and falen elephants, as well as with the bodies of horses and men, the ground became pręgnable and a rifer of blood diwed, Karan aley the Panchals 1 im. 1.7 (६३५७) कर्णपर्व Karan Paray [ 6357 ] कथञ्च तस्यधा नृपतिः कथम्।अपराहणे कथ युद्धमवमवल्लोमहर्षणम् तन्ममा चस्यतस्पेन फुशलोयसिसञ्जयथायउयाची संप्स पचासन्यपुयुध्यमानेपभागशः रघमन्यसमारपाय पुत्रस्तयविशाम्पते। क्रोधेन महतायुक.सविपो भुजगोयथा दुरया धनस्तु दृष्ट्वा धर्मराज युधिष्ठिरमा प्रोवाच स्तं परितो याहि याहीति भारत । तत्रमा प्रापय सिनं बारये यत्र पाण्डवः । नियमाणातपत्रण राजा राजति ६शितः ॥ ७॥ स सूतथोदितो राधा रानः स्पन्दनमुत्तमम् । युधिष्ठिरस्पाभिमुख प्रेष यामास संयुगे ॥ ८ ॥ ततो युधिष्ठिरः खः प्रभिन्न इय कुजरः । सारथिचोदयामास याहि यत्र सुयोधनः ॥ ९॥ तो समाजग्मुतुरी भ्रातरौ रथसत्तमी । समेत्य व महा पोरी सरलंधी युद्धदुर्मवर । पर्यतुमहेवासी शरैरन्योन्यमाहये ।। ११ ॥ ततो दुर्यो धनो राजा धर्मशीलस्य मारिष । शिलाशितेन भल्लेन धनुचिच्छेद संयुगे ॥ १२ ॥ तन्नामृपत संकुद्धो ह्ययमान युधिष्ठिरः॥१३॥ अपविध्य घनुदिछन्नं कायसंरकतो ने किसरीतित उससे युद्धकिया । । । उसके पीछे फिर तीसरी बार रोमहर्पण करनेवाला युद्ध कैसा हे संजय उसको मूलसमेत मुझसे वर्णनकर । ४ । संजय वांला हे गजा सेना भिड़ने वा विभागियों के घायल होनेपर विपैलेसर्प के समान | क्रोपयुक्त आरकेपुत्र दुर्योधनने दूसरेरथ पर सवारहोकर धर्मराजयुधिष्ठिरको देखकर सारधीसे कहा कि शीघ्रतापूर्वक मुझको वहीं पहुंचा जहांपर पांडवलोग हैं वहराना युधिष्ठिर कवच और छत्र धारणकियेहुये शोभायमानहै । ७ । राजाकी आज्ञापातेही सारथीने जाके उत्तम रथको युद्ध में युधिष्ठिर के सम्मुख पहुँचाया। ८ । उसके पोछ मतवाले हाथीकी समान पुधिष्ठिरने सारथीको भाषाकी कि जहां दुर्योधन है वहीं चल १९ वह रथियोंमें श्रेष्ठ शूरवीर दोनों भाई परस्परमें सम्मुखहुये उन क्रोध युक्त युद्ध दुर्मद महाधनुपधारी दोनों वारोंने युद्ध परस्पर वाणों की वर्षाकरी ११॥ तदनन्तर राजा दुर्योधन ने युद्ध में तीक्ष्णधारखाले भल्लसे उस धर्माभ्यासी युधिष्ठिर के धनुर को काटा फिर भत्यन्त कोषयुक्त युधिष्ठिरने उस अपने अपमानको नहीं सहा इसहेतु से क्रोधयुक्त लालनेत्र होकर दूसरे धर्नुपको लेकर सेना मुखपर Battee was doprivod of car. Hos was the dreadful battle fought for a tuird time.Tell me all this in detail." Sanjaya said, "At the meet ing of the armies, when both sides pero sounded, your son Duryodhad mounted another car, looking at Yudhishthir, he said to tho driver, "Take mo at once to the Pandavas, whero Prince Yudhishthir stands docked with umbrella and arbour." At the word of tho king, the driver took him beforo Yudhishthir, Then liko a nad elephant, Yudhishthir ordered his driver t) face. Duryodban. The two bravo cousins freed each other and sent forth a shower of arrows.ll. Then Durgolian cut down tho bax of Yudhishthir the just with an arrow- The latter could not bear that insult and taking anotiser bow, with - [.६३५९ कर्णपर्य Agran Parv [6359 शाः । प्रिमिश्चिमद सहसा तच विव्याध पञ्चभिः ॥ २३ ॥ निषपात ततः साथ स्वर्णदण्डा महास्ना । निगन्ती महोलोध व्यराजत शिखिसनिमा ॥ २४ ॥ शाक्त चिनिहतां दृष्ट्या पुस्तक पिशाम्पते । नवभिनिशितेस्तोरणनिजधान युधिष्ठिरम॥२५॥. साप्तिपिझो पलयता राणा शत्रुतापनः । दुय्योधन ,समुद्दिश्य पाणं जमाह सत्वरः ॥ २६ ॥ समाधत्त घ तं पाणं धनुर्मध्ये महापल: चिक्षेप च महाराज ततः कुखः पराक्रमी ।। ३७ ॥ स तु पाणः समासाद्य तव पुत्रं महारयम् व्यामोहयत राजानं धरणीञ्च जगाम ॥ २८॥ ततो दुर्योधनः कुद्धा गदामुद्यम्यं पेगिताः । विघिरमुः फलहस्यान्तं धर्मराजमुपाद्यत् ॥ २९ ॥ तमुद्यतगंदं दृष्ट्यां दण्डहस्तमिवान्तकम् । धर्मराजो महाशक्ति प्राक्षिणोत्सव सनवे । दीप्यमानां महावेगा महोक्का ज्वलितामिव ॥ ३० ॥ रथस्थः स तया विदो मर्मभिाषा स्तनान्तरे । अशं संविग्गहृदयः पपात च मुमोद च ॥ ३१ ॥ भीमरतमाह च ततः प्रविज्ञापनूचिन्तयन् । नाय वध्यस्तंच नृप स्मात् प्रातीहुई शक्ति को देखकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने तीन तीक्ष्ण वाणों से काटा सौर उसको भी पांचवाणों से घायल किया । २३ । इसके पीछे सुनहरी दण्ड वाली मंडाशद करनेवाली वहशक्ति गिरपड़ी और भाग्निरूप बड़ी उल्का के समान गिरकर शोभायमान हुई । २४ । हे राजा फिर आपके पुत्रने शक्तिको टूटा | हुआ देखकर तीण धारवाले नौ वाणोंसे युधिष्ठिरको घायलकिया। २५ । परा कमी शत्रुके हाथसे अत्यन्त घायल शत्रुहुन्ता युधिष्ठिरने दुर्योधनको विचार करकेशीघ्रही वाणकोलिया । २६ । हे राजा उस क्रोधयुक्त महाबली युधिष्ठिर ने उसवाणको धनुपर्ने चढ़ाकर छोड़ा । २७ । फिर उसवाणने आपके महारथी राजा को पाकर अचेतकिया और पृथ्वी को फाड़ा । २८ । इस के पीछ युद्धका अन्त करने का अभिलापी कोधयुक दुर्योधन शीघ्रतासे गदाको उठाकर धर्मराज के सम्मुख गया । २१ । धर्मराजने यमराजके समान गदाउठानेवाले दुर्योधन को | देखकर आपके पुअपर उस शक्तिको चलाया जो कि घड़ी वेगवान अग्निके समान देदीप्यमान उल्काके समानथी । . उसादासे वायच कटकर हृदयपर घायल स्थपर सवार अत्यन्त अचेतहोकर गिरपड़ा और अचेतहोगया । ३१ । उसके पीछे him, Yudhishthir cut down the spearwith three arrows and wounded his adversary with five. The spear then feil down with a crash, illumining, like a meteor. Seeing his spear cut down, your sou wounded;Yudhishthir with nida sharp arrows 25. Exceedingly wounded by the valiant foc, Yudbinhthir took up an arrow and aimed it at Duryodhan. He put it to his bow and discharged it. The arrow made the Prince unconcious and then entered the ground. Theo Duryodhan, desiring to make an end of the battle took up his mace and faced Yudhishthir. Seeing Duryodhan, with his mace upraised, Yudhish. thir burled at him a spear bright like fire. - 30. - Wounded by the -- ६३६१३ फर्णपर्व karan Parav 6361 द्विरदरयपदातिसादिसघाः परिकुपिताभिमुखाः मजजिरे ते ॥ २॥ शिनपरस्पधलासि पष्टिगरिपुभिरनेकविधैश्च मूदिताः। द्विरद्रयहया महाहवे वरपुरुप पुरुषाश्च पाहने ॥ ३॥ कमलदिनकोन्दुसग्निभै सितदशनैः समुसाक्षिनासिकः । रुचिरमकुरकुण्डले मही पुरुषशिरोभिरास्तृता वा ॥ ४ ॥ परिघमुपलशक्तितोमरेनखरभुपुण्डिगदारात हताः। विरदनरहयाः सहशो रुधिरनदीप्रयाहस्तदाभवन् ।५॥ प्रहतरयनराश्व कुक्षरे प्रतिमयदर्शनमुल्यणनगम् । तदहितहतमाषमा यले पितृपतिराष्ट्रमिव प्रजाक्षये ॥६॥ भय वष नरदेव सैनिकास्तव च सताः सरमनुसन्निभाः । अमितवलपुरः सरा रणे कुरुकृषभाः शिनिपुत्रमभ्ययुः ॥ ७ ॥ तदतिरुधिरभीममावभौ पुरुषवरावरदिपाक रय हाथी घोड़े और शंखोंके शब्दोंसे प्रसन्न नानासकार के शस्त्रों की आधिक्यता से कोपयुक्तहो उन हाथी रधी और सवारों के समूहों ने सम्मुख होकर प्रहार किये । २ । उत्तम पुरुषों के खेत फरसे खड्ग पोटश और नानाप्रकार के भल्लों से हाथी रथ घोड़े उस महायुद्ध में मारेगये और भनेक प्रकारकी समारियों से मनुष्य चूर्णहोगये । । । कमल सूर्य भौर चन्द्रमा के समान श्वेत दांत मुन्दर भाख नाकसमेतं मुख और अद्भुतकुण्डळ मुकुटबाल मनुष्योंके कटेहुये शिरोंसे आच्छादित वह युद्धभूमि बड़ीही शोभायमान हुई। ४ । तब सैकड़ों परिघ मूशल शक्ति तोमर नखर भुडी और गदाओं से घायल हजारों हाथी घोड़े मनुष्य सधिरकी नदीके जारी करनेवाले हुये । ५ । मृतक घायल भयानक और अत्यन्त घायल रथ मनुष्य घोड़े हाथीवाली शत्रुओं से घायल वह सेना ऐसी शोभायमानहुई जैसे कि संसारके नाश करनेमें यमराजकादेश होताहै । ६ । हे राजा इसके पीछे आपकी सेनाके मनुष्य और देवकुमारों के समान भापक पुत्रोसमेत उत्तम कौरबलोग जिनके भागे चलनेवाली असंख्य सेनाथी सब मिलकर सात्या के सम्मुगये । ७ । रुधिर से voar and the warriors, mounted on elephants and cars, discharg. od various weapons. The white axes of the warriors, swords, patti. shes and darts slew elephants, cars and horses and the cars were amashed. With beautiful white teeth, bright faces like lotus, the Sun or the moon, beautiful eyes and noses, wonderful car-rings and diadops, the heads of the Warriors beautified the land. Then hund. reds of clubs, vusals, spears, tomars, nakbars, bhushundis aud maces wounded thousands of elephants, borses and men and made a river of blood to flow. 5. Dead and dreadfully wounded, the army consisting of cars, elephants, borses and med, looked like the city of Yam. Then the men of your army, pith your god liko sons, the best of the Kauravas, accompanied by innumerable armie, faced Satyaki. Making dreadful bloodshed, the army consisting of men, horses, cars and elephants, roaring like a stormy ses, looked glorious like an army 1 . [6362] Mabalharrt लम् । लणजलसमुद्धतस्वन क्लममुरामरसन्यसानिमम् ॥८॥ सुरपतिसमविक्रमस्त तखिदशपरावरजोरम युधि । दिनफरफिरणप्रभः पृरक रविर्तनयोभ्यहनीच्छनिधी रम् ॥ ९ ॥ तमपि सरपवाजिसारधि शिनिपगो चिचिधैः शरैस्वरन् । भुजगविषस मप्रभ रणे पुरुषघरं समधास्तृगोचदा ॥ १० ॥ शिनिवृषभशरनिडित तक मुष्टदो वसुषमयुः । त्वरितमतिरथा रथर्षभं द्विरदराश्वपदातिभिः सह ॥११॥ तदुदाई निभमाद्रबलं त्वरिततरैः समभिहत परैः । पदसतमुखैस्तदामवत्पुरुषरयाश्वान যামানাই২য় বসবী জুবালি মানিবুয যথাবিঘি মনুয়া কামিল कृतनिश्चयो हतं तब बलमर्जुनकेशयौ सती ॥ १३॥ जलदनिनदनि स्वन रथं पवनविधूत पंताफकतनम् । सितहयमुपयातमन्तिकं कृतमनसो ददृशुस्तदारयः ॥ १४ ॥ अथ अत्यन्त भय उत्पन्न करनेवाले उत्तम पुरुष घोड़े रथ और हाथियों से व्याप्त मौर उठेहुये समुद्र की समान शब्दायमान यहसेना देवता और असुरोंकी सेनाके समान प्रकाशित होकर शोभायमान हुई । ८ । इसके पाछे इन्द्रक समान पराक्रमी युद्ध में विष्णु के समान मूर्य के पुत्र कर्ण ने सूर्य की किरणों के समान प्रकाशित भपक नाम बाणों से शरों में बड़ेवार सात्यकि को घायलं किया । ९ । तब शीघ्रता करने वाले, सात्यांक ने विपैले सर्पकी समान नानाप्रकार के बाणों से पुरुषोत्तम कर्णको रथ घोड़े और सारथी समेत ढकादया । १९ । मापके शुभचिन्तक अतिरथी हाथी रंथ घोड़े और पदातियों समेत शीघ्रही उस रथियों में श्रेष्ठ सात्यकि के बाणों से पीडामान सुपेणके पास गये। १ । घड़े शोघ्रगामी शत्रुओं से दवाई दुई समुद्र के रूप बह सेना भागी तब धृष्टद्युम्न आदिके हायसे मनुप्प घोहेरय और हाथियों का बड़ा विनाश हुआ ।, १२ । इसके पीछे नित्यकर्म से निवृत्त होकर बुद्धि के अनुसार प्रभु शिवजी के पूजनेवाले और शत्रुओं के. मारने में निश्चय करनेवाले पुरुषोत्तम अर्जुन और केशवनी शीघही आपकी सेनाके ऊपर चले । १३ । तब टूटेहुये चित्तवाले शत्रुओं ने बादल के समान शब्दायमान वायुसे कीपत पताका of gods: Brave and full of prowess like Indra or Visbau, Karan, with arrowa bright as the rays of the sun, wounded Satyaki tho best of warriors. Satyaki the best of warriors, hid Karan and his car, horsea and drives, with arrows like venomons serpents. 10. Your welt-wish. ere, with elephants, cars, horse and foot, wounded by the arrows of Satyaki, faced Susben. Wounded by the great enemies, the ocean liko army was destroyed 'y Dhrishtauyuinn and others. Haviog per. formed their daily prayers and worshipped Shiv, Arjun and Resbav; desirous of sløying the enemies, attacked your army. The broken: hearted enemies saw the car with the banner fluttering by the air and making a noise like that of thundor. Yith a twang of the gan..
(६३६३) कप Kamn Parny (6363) विस्फाय्यंगाध र नामनिपाईनः। शरयायम्फगे पंदिता प्रदिस्तया ॥ १५ रपान घिमान प्रतिमान् सम्पयन सायुज्यमान् | ससारपोसादा पाणरमा नीवामिलायधीत् ॥ १६ ॥ गमान गयन्तध पंजपमपायसम्मभान् । सादिनाश्यांश परिनिये पमालम् ॥१५ मन्तफामिय अनिवार्य महारगम् । यो धनोपारेको निम्ना गारविमः । १८ 1 तस्यामाधन Pawar मार सायक। हरया सरिकन चिद पप्रिणायमंच मापाप व्यय जत् प्राणघातिनम । हुम्योधनापेपर तंद्रोनिः सतामित् ॥ २० 1 तमो नारी अनावस्या हल्या चापरा छपस्यापि तरपन धनुमिद नारदः ॥२१॥ हारिक्यस्य धनुरिया म्याश्यातायधीत । वासपेपमा लिया गंधर धनापाले शेत घोड़ों से युक्त सम्मुख आनेवाले रथका देता इसके पीछे रसपर नाचतये अर्जुनने गांव धनुप को देकारकर भाकारा और दिशा चिदिशामों को वागों से आपछादित किया .१५ । और विमानरूप पोंको रामधना और सारार्थियों समेत पायों से ऐसा मारा जैसे कि ताय वादों को नाड़ित करता है । १६ । फिर उसने हामी हाधीवान और वैजयन्ती शख धना मवान्द मार पत्तियोंको वाणों से यमलोक में पहुँचाया। १ । सीपे कानों से मारता हुमा असा दुपौधन उस यमराज के समान कोषयुक्त मुख न मोहनेशले मारधा अर्जुन के सम्मुस गया। । अर्जुनने सातबाणों से उसके पनुप और चनाको काटकर सारथी घोड़ों को मारकर एकमाणसे उसके छपको काटा। १९ । और माणों के नाशकरनेवाले उत्तम नवें वाणको धनुपपर चढ़ाकर दुर्योपन के ऊपर हा उस पागके प्रभत्यामा ने सात टुकड़े करहाले । २० । इसके पीछे भनुनने राणों से भवत्यामा के धनुपको काट रथ घोड़ोंको मारकर पाचार्य के उम उप्रधनुपको भी काटा । २१ । तर वर्मा के धनुष और ध्वनाको काटकर घोडौंको मारा और दुशासनके धनुपको काटकर कर्ण के सम्पुरा गया । २२ ॥ dir bow, Arjun tillout at the directions with his arrowi. 15. Ho Hestrosol dio great anir, along with the weapons, banners and dri. cts, as the wind das ibo cloud:, llo sent olepliants and drivers, dackol with garlands, weapons and banners, horsemen and foot sol. diers to the region of Yaw, with his arrowr. Killing with bis straight going arrows, Duryodhaa alono faad Arjua. Ifith corco arrow Arjun cur down his bow, standard, driver and horses and with ona moru bo cut his umbrollan Thva putting the ninth wrows to the box ho discbergulit at Duryodhan, but it was cut into &res parts by Aabrathana 20. Then Arjun cut the bow of Ashwathuma, so laving slain bis hones, cut down the box of Kripacharya. Thou cutting down the bow and branes of Kritvama, be slew his hors:s. a laxing cut down thu ww of Dushanin, ho faced haran. Then - - {6364 Slallabharat (६३६५ मभ्ययात् ।। २२ ॥ अथ सात्यकिमुत्सृज्य स्वरन् कर्णोजुनं शिमिः ।.विध्या विम्याध विशम्या कृष्ण पाणे पुनः पुनः॥२३॥ न ग्लामिगसीत् कणस्य क्षिपतः सायकान बहूब रणे विनिघ्नतः शचून कुद्धस्येष शतक्रताः ॥ २४ ।। अथ सात्यकिरागत्य कर्णविध्या शितः शरैः । अयत्या नवभिश्योपः शतेन पुनरार्पयत् ॥ २५ ॥ ततः प्रधीराः पार्थानां सधै फर्णमपीडयन । युधामन्युः शिखण्डी च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः॥ २६॥ उत्तमौजा युयथ यमौ पात एव च। चेदिफारूपमास्यानां कैकेयानाञ्च यदलम् ॥ २७ ॥ चीकताना बलपान धर्मराजश्व सुवृत्तः । एते रथाश्वद्विरदैः पविभिश्वोपविक्रमः ॥२८॥ रिवार्यकर्ण नानाधाफिरन् । भापतो वाग्भिग्राभिः सर्व कर्ण बंध धृताः ॥ २९॥ तां शस्त्रष्टिं पहुधा कर्णपिछया शितः शरः । अपोवाहानवीयण दुर्म भक्त्येव मारुतः ॥ ३० ॥ रथिनः समहामात्रान् गजानश्वान् ससादिनः। पचित्रा इसके पीछे शीघ्रता करनेवाले कर्णने सात्यति को छोड़कर तीन वाणसे अर्जुन को और वासवायासे श्रीकृष्णको घायल करके फिर अर्जुन को वारम्वार घायल किया । २१ ! युद्धमें बहुत शायकों को छोड़ते शत्रुओं को मारते हुये कर्णकी ऐसी ग्लानि नी हुई जसे कि क्रोधयुक्त इन्द्रकी । २४ । इसके पीछे सात्यकि ने पाकर तीक्ष्ण चाणों से कर्णको घायल करके एक सौनिन्नानवे उग्रवाणों से घायल किया ॥२५॥ इसके पीछे पांडवों के इन सवारों ने करीको पीडामान किया जिनकेनाम युधा मन्यु शिखण्डी द्रोपदीके पुत्र प्रभद्रक । २६ । उत्तमौजा युयुत्सु नकुल सहदेव धृष्टद्युम्न चंदेर कारुप मत्स्य भौर कैकय देशियों की सेना । २७ । पराक्रमी चकि ताम.इन्दर व्रतवाल धर्मराज युधिष्ठिर इनसोंने जय पराक्रमी कर्ण को रथयोदे हाथी और पत्तियों समेत घेरकर । २८ । युद्धमें नानामकार के अत्रोंसे टकदिया और उग्रवचनों से वार्चालाप करतेहुये सब कर्ण के मारनेमें मवृत्तचित्त हुये । २९ । कर्ण ने जप्तअोंकी वर्षाको अपने तीक्ष्ण चाणों से अनेकरीतिश काटकर अस्त्रों के वलसे ऐसे हटादिया जैसे किवायुक्षको काटकटकर ताहै। ३० । Kalan left Satyali and having wounded Arjun with three arrows and Krisbn with twenty, he wounded Arjun again and again. Die charging mary arrows and killing the enemies, Kalan, like Indra, was not tired. Toon Satyaki wounded Karan with soarp arrows. 25. The Pandav warriors, Yudhamanyu, Shikhandi the son of Daupadi, Uttananja, Yuyutsi, Nakyl, Sahadev, the warriors of Chedi, Karush, Matsaya and Kaikaya, valiant Chekitan and Yu. dhishthir of good vowe, surrounded Karan with the army of horses, elephants and foot and bid lin with weapons of various sorts and denuting him with bard words, they were all enraged in slaying Ka. ran. Karan checked their weapons with his owu and put thepi back is the wind fells down trees. 30 Afighty Karan, much euraged, [6365 कर्णपर्व Maran Hary तांश्च संकुलो निघ्नन् को व्यहश्यत ॥ ३१ ॥ तद्वध्यमानं पाण्ड्नां बलं कणानते जसा विशस्त्रततदेहास्तु प्राय आसीत् परामुखम् ॥ ३२ ॥ अथ कर्णालमत्रेण प्रति हत्वार्जुनः मयन् । दिशः खग्ध भूमिञ्च प्रावृणोत् शरवृष्टिभिः ।। ३३ ।। मुषलानीव सम्पतुः परिघा व पवः । शतघ्न्य इव चाप्यन्ये बज्राण्यप्राणि चापरे ३४ ॥ तैर्वध्यमानं तत्सैन्यं सपत्तयश्वररथद्विपम् । निमीलिताक्षमत्यर्थं वभ्राम बननाद च ॥ ३५ ॥ निष्कैवल्पं तदा युवं प्रापुरश्वनरद्विपाः' । हन्यमानाः शरैरास्तिदा भीताः प्रदुद्रुवुः ॥ ३६ ॥ त्वदीयानां तदा युद्धे ससक्तान जयैषिणाम् । गिरिमस्तं समासाद्य प्रत्यपद्यत भानुमान् ॥ ३७ ॥ तमसा च महाराज रजसा च विशेषतः । न किश्चित् प्रत्यपश्याम शुभं पा यदि वाशुभम् ॥ ३८॥ ते पस्यन्तो महेप्यासा रात्रियुद्धस्प भारत । अपयानं ततश्चक: सहिताः सर्व अत्यन्त कोधयुक्त कर्णरयीऔर सवारों समेत हाथी घोड़ेऔर अश्वसवारों समेत सहायकों के समूहोंको मारताहुआ दिखाईदिया। ३१ । कर्णके अखोंसे, घायल उस पाण्डवीसेना केवहुतलोग शस्त्राण शरीर और माणों से रहितहोकर मुखोंको मोड़गये । ३२ इसके पीछमन्द मुसकान करतेहुये अर्जुनने कर्णके अस्त्रको अपने अस्त्र से दूरकरके दिशाविदिशामासमेत पृथ्वी और आकाशको वाणोंकी वर्षासे ढकादया।३शवह वाण फिर मुशल और पग्घिोंके समानगिरे कितनेही शतानियों के समान और कोई उग्रवजोंके समान आकाशसे पृथ्वीपर गिरे पति घोड़े रथ और हाथियोंसे संयुक्त वह सेना उन वार्णोसेघायल आँखोंको वंदकरनेवाली होकर बहुनघूमी । ३५ । तब घोड़ेहाथी और मनुष्योंने उसयुद्धको पाया जिसमें मरना निश्चय होगयाथा नव वाणों घायल पीडामान और भयभीत होकर भागे । ३६ । युद्ध में प्रवृत्त विजयाभिलाषा आपके युद्धकताओंके वाणोंसे ऐसी दशाहुई और | मूर्य अस्ताचलको प्राप्तहुआ। ३७ । हे महाराज फिर हमने अधिक अंधकार और धूलीके गुब्बारोंसे अँधेरेमें कुछ अच्छा बुरा नहीं देखा । ३८ । हे भरतवंशी रात्रिक was seen killing elephants, horses, horsemen and their helpers. Wounid. ed by Karan, many warriors of the Pandav army were deprived of their weapons, arrows, limbs and life and the army turned back. Then Arjun, with a smile, checking his werpons with his own, spread arrows through all the directions. The arrows fell down like clubs, shataghnis orivajras.. Wounded by arrows, the army consisting of borres, cars and elepliants, shut their eyes and roamed hither and thither 235. Then the horses, elephants and men, in that destruc tive battle ran out of fear. The tighting men, desirous of conquest, were reduced to such a condition, and the Sun went down. We could see nothing there on account of darkness and dust. Afraid of the night battle, the great archers ran out of the tield of battle. At 6366) Mahabharat घोधिभिः॥ ३९ ॥ कौरवेषपयावेषु तदा राजन् दिनक्षपे । अयं सुमनसः प्राप्प पार्थाः स्पशिविरं ययुः॥ ४० ॥ घोदित्रशदर्षिविधः सिंहनादः सजितैः । परानुहहसन्तम स्तुवन्तव्युतार्जुनौ ॥ ४१ ॥ कृतेऽवहारे वैरिः सैनिका सर्व एव ते । आशीर्वाचः हाण्डवेषु प्रायुज्यन्त नरेश्वरः॥ ४२ ॥ ततः कृतेधहारे व प्रत्यास्तत्र पाण्यात निशायां शिविरं गत्वा न्यबसन्त नरेश्वराः ॥ ५३ ॥ ततोरक्षः पिशाचाच परंपरा अध संघशः । जग्मुरायोधनं घोरं रुद्रस्याकोडसनिमम ।। ४४॥ इति श्री कर्णपर्वणि प्रथमदिवसयुद्धे त्रिंशोऽध्यायः ३०॥ युद्धसे भयभीत बड़े धनुषधारी वर्चमानलोग सब शूरवारों समेत युद्ध भूमिसे अळग हुये । ३९ । हे राजा दिनके समाप्त होनेपर सायंकाल के समय कौरवों के हद जानेपर प्रसन्न चित्त पाण्डव विजयको पाकर अपने देशकोगये । ४० । और नाता मकारके बाजे और सिंहनादों समेम गर्न कर शत्रुओंका हास्पकरते अर्जुन और श्रीकृष्णजीकी प्रशंसा करते चलेगये । ४१ । उनकारों के विश्राम करनेपर उन सब सेनाके लोगोंने और राजाओं ने पाण्डवोंको अशीर्वाद दिया । उसके पाछे वहां विश्राम करनेपर अंत्यन्त प्रसन्नपुक्त होकर पाण्डव और अन्य राजा लोग रात्रिमें अपने डेरों में जाकर विश्राम युक्तहुयें । ४३ । इसके पीछे राक्षस पिशाच और भेड़िये आदि मांसाहारी पशुओं के समूह उस युद्धमा में गये जोकि रुद्रनी की क्रीडाके स्थानरूप थी ४४॥ the close of the day and the defeat of the Kauravas, the Pandayas returned victorious to their camp.40. With musical instruments and - leonino rcars, laughing at the foo and praising Krishn and Arjun. When the warriors had taken rest, the warriors of the army and the pria ces blessed the Papdavas. The Panday warriors rested for the night in their tents, the Pandar warriors passed the night in their tents. Then crowds of rakshases, pishaches, wolves and other carnivo rous animals entered the field of battle which was like the pleasure ground of Rudra." 44. १५ Fotqg Karan Paray [6367) धृतराष्ट्र उवाच । स्वेन छन्देन घः सर्वानवधीयतमर्जुनः । न घस्य समरे मुझे पन्तकोप्याततायिनः ॥ १ ॥ पाश्चकोहरद्भद्रामेकश्चाग्निमतर्पयत् । पफश्चम मही जित्या थके पलिभृतो नृपान् ॥ २॥एको निघातकचानहनहिन्यकामुकः एकः किरातरूपेण स्थित शर्वमयोधयत् ॥३॥एको घरक्षगरतानेको मवमतोषयता तेनै कंगजिता सधैं महीपा धप्रतेजसा ॥४॥न ते निन्द्याः प्रशस्यास्ते यत्ते चवीहि तत् । ततो दुर्योधनः सूत पश्चात् किमफरोतदा ॥५॥ सज्जय उवाच । हतप्रहताविश्वस्त विवर्मा युधपाइनाः । दानस्वरा यमाना मानिनः शचुनिजिताः ॥ ६ ॥ शिविरस्थाः पुनर्मम् मन्प्रयन्तिस्म कौरवाः । मग्नदष्ट्रा इतविषाः पादाक्रान्ता इधोरगाः ॥७॥ सामप्रवीत् सतः कर्णः क्रुद्धः स इष श्वसन् । 'फर फरेण निष्पीड्य प्रेक्षमाणस्तधारम अध्याय ३१॥ धृतराष्ट्र बोले कि यह प्रत्यक्ष है कि अर्जुनने अपनी इच्छासे हम सबका मारा इसशस्त्रधारीके युद्ध में मृत्युभी मरनेसे न छूटे । २ । अकेले अर्जुन सुभद्रा को हरण किया अकॅलेनेही अग्निको तृप्तक्रिया और अब इसी अकेले ने इसभारी पृथ्वी को विजयकरके करदेनेवाली किया । । दिव्य धनुपधारी अकले ने किरात रूप पारी शिवजीसे युद्धकिया और निवात कवर्षोंको मारा।। । अकेले ने ही भरतवंशियों की रक्षाकरी अकेले नही शिवजीको प्रसन्न किया उस उग्रतेजवाले ने सव राजालोगोंको विजयोकया। ४ । और हमारे शूरवीरभी निन्दाके होग्य नहीं | हैं किंतु मशंसाके योग्य हैं जो उन्होंने किया उसको भी कहो हे सूत इसके पीछे दुर्योधनने क्याकिया। ५ । संजय घोले उन घायल और टूटेभंग सवारियोंसे गिरे हुये कवच शस्त्र और सवारियों से रहित दुखित शब्दकरते शत्रुओं से कंपायमान पराजित अहंकारी उन कौरवोंने ।६ । जोकि टूटी डाढ़ विप से रहित पैरसे दवाये हुये सपों की सतान थे डेरोंमें सलाह की। ७ । उसके पीछे सर्प की समान श्वास २ CHAPTER XXXI १ Dhritrashtia said," It is plain that Arjun intends to destroy us. Even Death can not scape destructon from bis arrows, Alone he absconded with Subhadra; alone he greatified Agni; and alone he .conquered all the lana and made it pay tribute. That possessor of divine bow was alone when he fought with Shiv disguised as a hunter and slew Nibat - Kabaches. Alone he protected the descendants of Bharat and gratified Shiv, That glorious one conquered all the kings. Our warriors too, are not worthy of blame. They are praiseworthy. Tell me of their deeds, Sanjaya. What did Daryodhan do?” 5. Sanj. aya said." With wounded bodies, broken lamours and weapons, [63681 Mahal barrt (६३६८). जम् ॥ ८॥ यतो ददश्च दक्षश्च धृतिमार्जुनस्तदा । संबोधयति चाप्येन यथाकालमधो क्षजः ॥ ९॥ सहसाखविसर्गेण वयं तेनाद्य पषिताः। यस्त्वहं तस्य सङ्कल्पं सर्व हन्ता महीपते ॥ १० ॥ एवमुफस्तयेत्युक्त्या सोनुज नृपोचमान् । तेनशाता नृपाः 'सर्वे स्वानि वेश्मानि भेजिरे ॥ ११ ॥ सखोपितास्तां रजनों दृष्टा युद्धाय नियंयः ।।१२॥ तेपश्यन् विहित व्यहं धर्मराजेन दुर्जयम्। प्रयत्नात् कुरुमुख्येन बृहस्पत्युशनोमतम् ॥ १३॥ अथ प्रतीपक र प्रचार परधीरहा । सस्मार वृषभस्कन्धे कर्ण दुर्योधनस्तदा ॥ १४॥ पुरन्दरसम युद्धे मरुद्गणसभं घले। कार्यवीर्यसमं पीये कण राहोगमन्ना '१५ सपाञ्चैव सैन्यानां कर्णमेवागमन्मनः मतपत्रं महावासं पन्धुमात्यीय के लेता हुआ आपके पुत्र को देखता क्रोधयुक्त कर्ण हाथ से हाथों को मलकर उनसे बोला कि अर्जुन सदैव सावधान हद पराक्रमी और धैर्यमानहै और श्रीकृष्णजी भी समयके अनुसार उसको समझादेते हैं। ५ । अब हम उसके अस्खोंके छोड़ने से अकस्मात् ठगेगये हे राजा अब कलके दिन में उसके संकल्पों नाश करूंगा । १० । यह कर्णके वचन सुनकर दुर्योधन ने बहुत अच्छा कहकर उत्तम राजामों को आझादी तब उसकी माझा पाकर सव राजालोग अपने डेरों को गये | ।। ११ । उस रात्रिमें मुखपूर्वक निवास करके प्रान काल बड़ी मतमतासे युद्ध करने के लिये निकले ।१२। उन्होंने कोरवों में श्रेष्ठ दसति और शुक्रजीके मतमें नियत धर्मराजके वड़े उपायसे रचेहुये कठिनतासे विजयहोनेवाले न्यूहकोदेखा ।१३। इसके, पीछं शत्रुहन्ता दुर्योधनने उस शत्रुनों के मारनेवाले बड़े वीर पराक्रमी और उन्नत स्कन्धवाले कर्णको स्मरणकिया । १४ । जोकर्णयुद्ध में इन्द्रके समान पराक्रम में | मरुद्गणों के सदृश वल में सहस्राबाहु के समानथा उसकण में राजाका चित्तगया । १५ । सब सेनाओंका चित्तभी उसबड़े धनुपधारीकर्णमें ऐसागया जैसेकि प्राणों के destitute of convoyances , crying with pain and trembling with fear, the proud Kauravas, like serprnis witlr broken fangsu deprived of venom and trodden under foot, held a consultation in their tents. Then sigbing the a stupent and looking at your son, emaged Karan, rubbing his hands, spoke out, " Arjun is always careful, full of pron. ess and patient and Shri Krishu too, gives hia good adris iations. We have been deceived by his weapons, but I sball prevent his advance tomor row." 10. Suryodhan approved of Karan's proposal and ordered the assembly of princes to take rest for the night. Having slept well during that night, they came out cheerfully to figlit at day break and saw the impregoable array of Yudhishthie's ur my, well arranged after the fashiou of Vrihaspati and Saukra. Then Duryodhan the desuroger of fous wished to see mighty Karan of huge shoul. ders, like Iudra in battle, like Jlaruttas in prow033 and like Sihasra- । - - (६३६९) og Karan Parav 16369) विध । धृतराष्ट्र उवाच । ततो दुर्योधनः मूत पाकिमकरोत्तदा । योगमन्मनो मन्दा फर्ण फिर्तन प्रति । जयपश्यत राधेय शीतार्च इव भास्करम् ॥ १७ ॥ कृतंष हारे सन्यानां प्रवृत्ते' रणे पुनः । कथ धेफर्तनः कर्णस्तायुध्यत सब्जय ॥ १८॥ कायमच पाण्डवाः सर्वे ययुधुस्त सूतजम् । कणों होको महावाहिन्यात भार्थान् । सहजयान् ॥ १९ ॥ कर्णस्य भुजयोधीय॑ शमविष्णुसमं युधि । तस्य शस्त्राणि घोराणि विक्रमच महात्मनः । कर्णमाश्रित्य संग्रामे मतो दुर्योधनो नृपा॥ २०॥ दुग्योधनं ततो ष्ट्या पाण्डयेन भृशाईितम् । पराकान्तान् पाण्डुमतान् दृष्ट्याचापि महारथः ॥ २१ ॥ फर्णमाश्रित्य संग्रामे मन्दो दुर्योधनः पुनः तुमासहते पार्थान सपुत्रान सहकेशवान् ॥ २२ ॥ महोषत महन्तुःख यत्र पाण्डुमुतामणे । नारदमसः संकट में मन वन्दहोकर एक ओरको जाताहै । १६ । धृतराष्ट्र वोले हे सूत इसके पीछे दुर्योधन ने क्या किया हे हीन मारब्धी लोगो जो तुम्हारा मन सूर्य के पुत्र कर्ण में गया तो सेनाओं के विश्रामकरने के पीछे फिर युद्ध के नारी होने पर कर्णको ऐसे देखा जैसे कि शीतसे पीड़ित मनुष्य सूर्यको देखता है । १० । वहां मूर्य का पुत्र कर्ण इस रीति से युद्ध में प्रवृत्तहुमा हे संजय फिर वहाँ सब पांडवों ने कर्ण से कैसे युद्ध किया ११८ । अकेलाही महावाहु कर्ण भूजियों समेत मच पांडवों का मारसक्ता ।। १९ । क्योंकि युद्ध में कर्ण की नामों का पराक्रम इन्द्र और विष्णु के समान है उस महारथी के पराक्रम संयुक्त कल बड़े घोर हैं युद्ध में कर्णका आधप लेकर राजा दुर्योधन मदोन्मत्त है । २०। इसके पीछे पाण्डव के हायसे अत्यन्त पीडामान दुर्योधनको देखकर और पण्डियों कोभी पराक्रम करनेवाला देखकर महारथी कर्ण ने क्या किया । २१। फिर अभागा वुर्योधन युद्ध कर्णकर आश्रय लेकर पाण्डवों को श्रीकृष्ण और उनके पुत्रों समेत विजय करने का अभिलापा करता है ।२२। यह महाशोककारी दुःसई जिस vahu in strength.15. All the warriors looked towards the great archer Karan as the mind is concentrated in a matter of Isle and death. Dhritrashtra said, " What did Duryodhan do, O Sut ? Unlucky fullow who'st the commencement of the battle after the night's resto looked at Karun as people distressed with cold look at the Sun. How did the Pandavas fight with Karan ? Brave Karan con alone 'destroy the Pandavas and the Srinjayas for the prowess of this arms is like that of indra and Vishnu; lais weapons are dreadful; and Duryodhan is pulled up with yride as he telits on Karan,20. What did Karando ou'reeing Duryodlian wounded and defeated by the Panduvasi Again uolucky Duryodhav, relying on Karan, aspires to conquer 'Sbri Krishn and the Pandavas and their sons. It is a pity that mighty. Karun could not conquer the Pandavas; surply Destiny is suprenie.
{63701 - २९ - . Mahabh#rats कों वैध नन परायणम् ॥ २३ ॥ अहा तस्य निष्प धारा सम्मान पत्त । अहो सीवाणि दुःखानि दुर्योधनाताम्यहम् । सोढा घोराणि घहुशः शल्यभूतानि सजप ॥ २४ ॥ सायलच तदा तात नीतिमानिति मन्यते। कर्णश्च रमसा नित्यं राजाने चाप्यनुनतः ॥ १५॥ यदे यमानेष महायुद्धेप सम्जय । अश्राप निहतान पुत्रान् नित्यमेव च निजितान् ॥ २६. न पाण्डयानां समरे कश्चिदस्ति निधारकः । स्त्रीमान मिष गाहन्ते देवन्तु पलवसरम् ॥ २७ ॥ सजय उवाच । राजन पूर्वनिमियानि धर्मि ष्टानि चिविनय २८ * अतिक्रान्तं हि यत् काय पधाञ्चिन्तयतेनरः । चास्य न भयंत कार्य चिन्तया च विनश्यति ॥ ॥ तदिद तप काम्यंन्तु दूरमा विजानता । न कृतं पश्यया पूर्व प्राप्ताप्रासं विचारणम् ॥ ३० ॥ उक्तौसि यहुधा राजन मा युध्यस्वति पाण्डवः । गृहणीपे न च तम्मोहाइच नाच विशाम्पते ॥ ३ ॥षया पापानि घोराणि समाधीर्णानि पाण्हुषु । स्वछते स्थानपर कि वगवान् कण ने युद्ध में पाण्डवों को नहीं विजय किया इस से निश्चयकरके दैव वड़ाहै । २३ । यह चूतकी निष्ठा वर्तमान है और शोकका स्थान है मैं दुर्योधनके उत्पन्न कियेहुये भालेके समान घोर कठिन - दुःखों को सहरहाई हे तात संजयं वह दुर्योधन शकुनी को नीतिज्ञ मानता है और सदैव राजा के प्रासावर्ती वेगवान कर्णको भी नीतिमान मानता है। २५ । हे संजय महा भारी युद्धों के वर्धमान होने के कारण मैंने सदैव अपने पुत्रोंको घायल और मृतकमना १.२६ । और युद्ध में पाण्डवोंका कोई रोकनेवाला नहीं है जैसे कि स्त्रियोंमें फिरते हैं, उसीमकार सेनाकोभी मझाते हैं इससे दैव अधिक बलवान है । २७ । संजय बोले कि हे राजा पूर्व समयके धर्मसंवन्धी वार्तामोंको विचारो । २८ । जोमनुष्य असंभव कार्यको पीछेसे शोषता है उसका वह कार्य नहीं होता है किन्तु शोचसे नाशको पाता है । २९ । हे राजा मुझ बुद्धिमान के पूर्वयोग्य विचार को जो तुमने नहीं किया इसीसे वह कार्य तुम्हारे हायसे जीतारहो । १० । राजा सदैव मैंनेसमझापाया कि पाण्डवों से युद्ध मतकरो तुमने अपनीभज्ञानतात उसपचनको नहीं माना।३१॥तुमनेपाण्डवकिसायपरस्सरमिलकरवड़ेघोरपापकियेऔरआपहीकारणसे All this is the outcome of gainbling. lam_suffering the pangs ot sorrow on account of Duryodhan. Duryodhan thinks Shakuni and his faithful friend Karan to be great politicians. 25. I bave everg heard of my sons as wounded and slain in battle The Pandavas roam among them unchecked as sf it were anong so many wogiet. I hold therefore that Fate is powerful." Sanjaya said, "Think of the good, advico given you in former days. He who tries to do an impossible deed fails in his enterprise and dies of grief. You baye failed in actieving, your object because you did not act upon my wiss counsel. 30. I told you again and again not to iglit with the Pandavas, , but you were (६३७१) कर्णपर्ष Karau Purav [ 5371 वर्तते घोरः पार्थिधानां जमक्षयः ॥ ३२ ॥ तरिषदानीमतिकान्त मा शुचो भरतपम । शृणु सधै यथा वृत्तं घोरं पेशसमच्युत ॥ ३३ ॥ प्रभातायां रजम्यान्तु कणों राजान मध्ययात् । समेत्य ष महाबाहुर्योधनमथानधीत् ॥ ३४ ॥ कर्ण उवाच । अद्य गजन् समेष्यामि पाण्डधेन यशस्विना । निहनिष्यामि से वोरं स वा मनिहनिष्यति ॥ ३५॥ बहुस्वाम्म कार्याणां तथा पार्थम्य भारत । नाभूत समागमो राजन् ममर्थ पार्जुनस्य च ३६॥इदम्तु मे यथाप्रनं शृण धास्थं विशाम्पते । अनिहाय र पार्थ नाह मेष्यामि भारत ॥ ३७ ॥ हतप्रधीरे सैन्यस्मिन् मयि चापरिधते युधि । अभियारयति मां पार्थः शशफ्त्या विनाकृतम् ॥ ३८ ॥ ततः श्रेयस्कर पच्च तनिधोध जनेश्वर । मायुधानाम्च मे धी> दिल्यामर्जुनस्य च ॥ ३९ ॥ कार्यस्थ महतो भेदे लाघषे पूरपा अच्छे रहजारों राजाओंका नाश वर्तमान हुआ।१२। हेभरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अब समय भागया शोचमतकरो हे अजेय जैसे कि यह घोर नाशहुआ उस सबको मुझ से मुनो। ३१ । प्रातःकाल के समय कर्ण राजा दुर्योधनके पासगया और मिलकर दुर्योधन से कहनेलगा। ३४ । कि हे राजा अब मैं यशस्वी पांडयों से युद्धकरूंगा यातो मैं उस वीर अर्जुन को मारूंगा या वही मुझको मारेगा । ३५ । हे भरत वंशी राजा दुर्योधन मेरे और अर्जुनके कार्यों की प्राधिक्यता से मरी और अर्जुन की सम्मुखता पहीं हुई । ३६ । हे दुर्योधन मेरे इस वपन को तुम बुद्धि के अनुसार मुनो कि मैं युद्ध में अर्जुन को मारकर न आऊंगा । जिसके बड़े वार मेरे वर्तमान होनेपर युद्धमें मारेगये वह अर्जुन मेरे सम्मुख आवेगा जो किमैं इन्द्रकी शक्तिसे पृथक्ह । ३८ । हे राजा जोअपनी रक्षा करनेवाली वात है उसको तुम समझो कि मेरे और भर्जुन के अखों का पराक्रम और प्रताप समान है शत्रुके बड़े कार्यका नाश हस्तलाघवता वाणों का दूरफेंकना और अख foolish enough to disregard my advice. You committed heinigus sids against the Pandavas and have caused the destruction of thouşanda of good princes. The time bas not come. Hear from me of the great destruction as it happened and be not grieved:-After day break Karan, went to Duryodhan and said, “ I shall fight with the Pandavas and shall either slay Arjun or be slain by him. I could not encounter him before, for I had many things to do. Hear me attentively, Duryo. dhana, I shall not be able to slay Arjun in battle, for Arjun, who lias slain our great warriors in my presence, will encouyter me while I am deprived of the spear given me by Indra. Hear from me, O, king, ia what lies our welfare. Aijun and I are both equal in the usa of weapons, Ho is not my equal in destroying enemies, dexterity of hand, sending off arrows to a great distance and carefulness in using -- (6372) JE<lab'iarat' [६३५२) तन । सौष्ठय चास्नपाते च सव्यसाची ममें समः ॥ ४० ॥ प्राणे शौर्य च मानेच विक्रमे चापि भारत । निमित्तानयांगे च सव्यसाची न मसमः ॥ ४१ ॥ सर्वायुध महामात्र विजय नाम तदनुः । इन्द्रार्थ प्रियकामेन निर्मित विश्वकर्मणा ॥ ४२ ॥ येन दैत्यगणनाज जितवान् वैशतक्रतुः । यस्य घायण दैत्यानां व्यामुघल दिशोदश:४३६ सद्भागवाय मायच्छच्छकः परमसम्मप्तम । ताहव्यं भार्गवो मददखनुरुत्तमम् ॥ ४४॥ तेन योत्स्ये महापाहर्मग जयताम्बरम् । यथेन्द्रः समरे सर्वान् देतेयान् ये समाग तान् ॥ ४५ ॥ धनोर रामदत्तं गाण्डावात्तद्विशिध्यते । त्रिसप्तकत्वः पृथिवी धनुषा येन निजिता ॥ ४६॥ धनषो यस्य कर्मणि दिव्यानि प्राह भार्गधः । तद्रामा पद दन्मा येन योत्स्यामि पाण्डवम ॥ ७॥ अघ युग्योधनाहं त्वां नीयम्ये खवाधषम् । निहत्य समरे पीरमर्जनं जयता घरम् ॥ ४८ ॥ सपर्वतनवद्वीपा हतर्धारा ससागरा। गिरानेकी सावधानी अर्जुन मेरे समान नहीं है । ४० । हे भरतपशी देहकावल वा मनकावल वा अलोंकी शिक्षा वा पराक्रममें लक्षभेदन करने में भी अर्जुन मेरे समान नहीं हैं । ४१ । सब शस्त्रों में श्रेष्ठ विजयनाम धनुष इन्द्र के प्रिय होनेकी इच्छा से विश्वकर्माजी ने उत्पनीकया। ४२ । हे राजा निश्चयकरके इंद्रने उसी घनुपकेद्वारा दैत्योंके समूहों को विनकिया और जिसके शब्द से दैत्यों की दशोदिशा मोहित हुई। ४३ । वह बड़ा उत्तम धनुप इन्द्रने भार्गवीको दिया और भार्गवजी ने वह दिव्य धनुप प्रसन्न होकर मुझकोदिया। ४४ । हे महाविजयी उसी धनुप के द्वारा मैं महाबाहु अर्जुनसे लडूंगा जोकि भागय दैत्योंसे इन्द्र लड़ाया ।४५ : परशुरामजी का दियाहुमा घोर धनुप गाण्डीव धनुपसे अधिक है जिसके द्वारा यह पृथ्वी इक्कीस चार विजपकागई । ४६ । इस धनुपके पोरकर्मको भार्गव परशुरामनीने मुझसे कहां | हैं उनके उस दियेहुये धनुप के द्वारा मैं पाण्डवों से लडूंगा । ४७ । हे दुय्योधन अब मैं बड़े विजयी विख्यात अर्जुनको युद्धमें मारकर तुझको बांधवों समेत प्रसन्न weapons. In the Bulength of body and inind, in the training of arms, prowess and hitting the mark be cannot cope with me. The bov, known as Vijaya, which Vishwakarma bad made for the sako of lodra and which Ivdia used in destroying and stupefying tho Danavas, was given by Indra to Bhargava - no was pleased to give me that divine bow," I shall fight with Arjun with the help of that boxy, as Indra, had fought with the Daityas and put them to flight. 45. The dread. ful bow given me by Parushuram is superior to Gandiv and has .conquered the earth twenty one tines. Parushuram told me the history of this wonderful bow with which I am going to fight the Pandavas. I sball please you all by slaying the conquering and famous. Arjun. The Earth, with hor hills, forests, islands and sas, will be thine. The geat warriors hare slready been slain and they sons and grandsons 10 (६३७३) कर्णपर्ष Karan Pary [ 6373 पुत्रपौत्रप्रतिष्ठाते भविष्यत्यय पार्थिवा४९॥नाशक्य विद्यते मेद्य त्यत्तियार्य विशेषतः। सम्यग्धर्मानुरक्तस्य सिद्धिरामवतो यथा ॥ ५० ॥ नहि मां समरे सोदु संशकोग्नि तय॑या । अवश्यन्तु मया वाच्यं पेन होनेस्मि फाल्गुनात् ॥ ५१ ॥ ज्या तस्य धनुपो दियर तथाक्षय्यौ मधेपुधी। सारथित्तस्य गोविन्दो मम तान विद्यते ॥५२ ॥ तस्य दिव्यं धनुः श्रेष्ठ गाण्डीवमजितं युधि । विजयञ्च महदिव्य ममापि धनुरुत्तमम् ॥५३॥ प्राइमधिकः पार्शत धनुश तेन पार्थिव येन चाप्यधिको धारः पाण्डवस्तनियोध में ॥५४॥ रुमिग्राश्च दाशाई सर्पलोफनमस्कृतः । अग्निदत्त ये दिव्यो रथ काञ्चन भूषणः ॥ ५५ ॥ अच्छेधः सर्वतो वीर घाजिनश्च मनोजवाः । ध्वजश्च दिव्यो टुतिमान पानरो विस्मयः ॥५६॥ कृष्णश्च स्रष्टा जगतो रथं तमभिरक्षति । एतैर्दिव्यैरह होनो करूंगा ! १८ ! हे राजा अब पर्वत वन द्वीप और समुद्रों समेत यहसब पृथ्वी वेरी होगी जिसके कि वार मारेगये और तेरे पुत्र पौत्रों की प्रतिष्ठा करेंगे।४९। अवतेरे अभीष्ठ के निमित्त मेरी कोई अच्छे प्रकार की विशेषता ऐसी नहीं है जैसेकि अच्छे धर्मपर मीति करनेवाले मनुष्य की सोतमेंहोती है ।५० । वह अर्जुन युद्ध में मेरे सहने को ऐसे समर्थ नहीं होसक्ता जैसे कि वृक्ष अग्निको नहीं सइसक्का.मैं जिस हेतुसे कि अर्जुन से कमहूं उसको भवमुझे कहना अवश्य है । ५१ ! एक तो उसके धनुष की मत्यंचा दिव्यहै और इसीप्रकार उसके दो तूगोर अक्षय हैं और उसके सारथी श्रीकृष्णजी हैं मेरा पैसा सारथी नहीं है । ५२ । उसकागाण्डीव धनुप दिब्य उत्तम होकर युद्ध में सबसे अजेयहै और गेरा विजपनाम धनुपभी दिव्य और उत्तमहै।१३। हे | रामा वहां मैं उस धनुपके कारणसे अर्जुन से अधिकहूं और जिनकारणों से कि वारपांडव अर्जुन मुझसे अधिक है उसकोभी मुझसमुना-५४प्रथमता सबके पूज्य रूप श्रीकृष्णजी सारथी हैं और अग्नि देवताका दियाहा सुवर्ण जटित रथ भी दिव्यहै । ५५ ।। रेवार यह सवप्रकारसे अजेय है उसके घोड़ेभी चित्तके अनुमार शीघ्रगामी हैं और ध्वजाभी दिव्य प्रकाशमान है और उस ध्वजामें हनुमान जी बड़े आश्चर्यकारी हैं। 1५६ । और संसारके स्वामी श्रीकृष्णमहाराज उसके रथ की रक्षा करते हैं will reigo all over. I an intent on doing you good as a virtuous 'nan on attaining salvation. 50. Arjun cannot withstand me in battlo as a tree cannot withstand filc, Now hear in what points I am inferior to Arjuz: he possesses a divino bowstring and two inexhaustibla quivers. Ho bas Shri Krishn to drive his car, while I have no such driver. His gandiy boy is the best and invincible though my bou too, called Vijaya, is equally good and divine. I au superior to Arjun in the point of bow, Hear also in what points he excels me. Firstly, he has Shri Krishn, worshipped by all, to drive his car and the gold decked car, given him by Agni, is divine. 55: He is invincible in all ways His borscs are swifthko tho mind and his banner is divino and glorious [0374] Alahal harrt ६३७४ योइधुमिच्छामि पाण्डवमा ५७ ॥ अयन्तु सदृशः गैरेः सल्यः समितिशोमनः । सारय पदि में कुर्यात् प्रषस्ते विजयो भवेत् ॥ ५८ ॥ तस्य मे सारथिः शल्यो भयमुकर परेः । नागचान गाईप्रोच राकानि पहन्तु मे ॥५८ र मुल्या राजेन्द्र युका पाजिभिरत्तमः ॥ मायान्तु पश्चात् सततं माप भरतर्षभ । ६९ ॥ पुष मश्वधिका पार्धात भविष्यामि गुणैरहम् । शल्पोप्यस्यधिक कृष्णादर्शनादपि बांध हम ॥६॥ यथाश्यहदयं घेद दागाईः परवीरहाः। तथा शल्यो विजानीते यशान महारयः। ६२ ॥ पाहुवीर समोनास्ति मद्रराजस्य कश्चन । ययालैर्मतसमो नास्ति कश्चिदेव धनुः ॥ १३॥ तथा शल्यसमोनास्ति हयद्राने हि. कपन ॥ ६४. सोय मभ्यधिक पार्यानबिष्यति रथो मम 1 समुद्यातुं न शश्यन्ति देवा भपि सपासका इन वस्तुओं से रहितहोकर में अर्जुन से लड़ना चाहताहूं । ५७ । युद्धको शोभा देनेवाला यह राजाशस्य श्रीकृष्णाजीके रामानई जोराजाशल्य मेरा सारथी बनजाय तो प्रकप तेरी विजय होय ।।५८ । शत्रुभों के साथ कठिन कर्म करनेवासा शल्प मेरा सारथी होय और कंकपतवाले मेरे अनेक बाणों के बहुतसे छकड़े साथ में ले चलें । ५९ । हे भरतर्षभ राजेन्द्र उत्तम घोडोंके रसमें बैठकर तुमभी मेरे सायही साय मुसोः । ६० । मैं अपने गुणों से भर्जुन से अधिक होजाऊंगा शल्य भी श्री- कृष्णजी से अधिक है और मैंभी भर्जुनसे अधिकहूं । ६१.। जिस प्रकार शत्रुहन्ता श्रीकृष्णजी अश्वहदय नाम विद्या के जाननेवाले हैं इसी प्रकार महारथी शल्यभी अविधा का ज्ञाताई ६२ | और भुनावलमें रामा शल्य के समान कोई नहीं इसीप्रकार प्रनवेत्ता मेरेसमान कोई नहीं है।३३।जोकि अश्वविद्या में शल्यके समान कोई नहीं है इसीसे यह मेरास्य मर्जुनसे भी अधिक होगा हेकौरों में श्रेष्ठ- ऐसा करनेसे मैं रथकी सवारी में अधिक होजाऊंगा इन्द्र समेत देवता भी तेरे सम्मुखहोनेको समर्थ नहीं होंगे। ६५ । हे शत्रुान्ता महाराज दयोधन यह काम मैं तुमसे करवाया माहwith the wondertul ape seated in it. Sari Krishn the lord of the world protects this car, Destituts of these things, I am going to fight with him, Prince Shalya, the pride of the field of battle is like Shri Krishn, and I can get victory it bo become the driver of my car. Let Shalya tho destroyer of. foes drive my car, and let cart loads of arrows go with me, You too, will go with me.60. My merits will make me superior to Arjun. Shalya is superior to Krisbn and I am superior to Arjun. Like Shri Krishn, Shalya knows about horses. Bo is unequalled in strongth, while I am unequalled in archery. Ify car will be superior to that of Arjan a Shalya is unequalled in the knowledge of horses, and I shali bs invincible by gods led by lodra. 65. I wish you to do this for me, Prince, Duryndban. Let not this opportunity slip from your hand, and we sball gain opr object by so doing. Then, you i P (६३७५) कर्णपर्व Karan Paray 13675) ॥५॥ तत् कृतं महाराज स्वपेच्छामि परत.६६ ॥ पितामेष कामो मेमा : काझोरपगादयम् । एवं ककत सघं सकामेभविष्यति ॥ ६७ ॥ ततो. श्यसि समामे यत् करिष्यामि भारत ॥ ६८ ॥ सर्वथा पाण्डवान सिंफ्ये विजय समागंतानं न हि मे. समरे सचा समुंगातुं मंरामराः । किम पाण्डमुवा रांजन ने मानुश्योरयः ॥ १९ ॥ सत्रय उपाय। एवमुकम मुतः कर्मनाद सोमिना । सम्पर संहारमा तो पपेपमनपान ॥ ७० ॥ उम्पों धन उवास। यमेतत् करिष्यामि यंधा व क मन्यसे । लोपासन स्पार सामान अनुयारपन्ति संयुगेनारामान गाईप कटानि बास्तु ते । मनुयापाम कर्ष यो पप स ध पार्थिवाः ॥ ७२ सय बाय। एवमुस्वा साप पुत्रः प्रतापवान। ममिगम्याषौद्राजा मराजमिदं वचः।७३॥ शते भी कराया 'कर्णदुर्योधन संबादे सविसोऽध्यायः ॥ ३ ॥ . ताई। ६६ । पह मेरा मनोरथ पूर्ण करो इससयम को किसी प्रकार से उल्लंघन न करना चाहिये ऐसा करनेस सर अभीए सिद्धहोंगे ।६७हेमरतवंश इसके पीछे अंसा में युद करूंगा उसकोभी तुम देखोगे मैं सम्मुख भानेवाले पाएंटयों को सम प्रकार से विजय करूंगा । ६८ । मुर और • अगर भी युद्धमें मेरे सम्मुख आनेको समय ' नहीं हैं हेराना फिर मनुष्य योनि पाण्डंबलोग मेरी सम्मुखतां क्या करेंगे। १९ । संजय रोले कि कर्णसे इन सब बचनों को मुनकर आपका पुत्र दुर्योधन अत्यन्त प्रसन्न होकर कर्णसे मशन्सा पूर्वक यह वचन बोला.१७०। कि कर्ण जसा तुम कहत हो मैं इन सब बातों को वैसाही करूंगा नूगारों से भी ये रथ तुम्हारे पाछं चलेंगे। कंकपक्ष से जटित तेरे पाणों के बहुत से एकड़े कंचांगा और मुम समेत सब राजारोग तेरे पीछे चलेंगे। ७२ । संजय बोले में मामहारान आपका मतापी पुत्र दुपोपने इस प्रकारके पचन कहकर मद्रदेश के राजा शल्प के पास जाकर उससे यह रचन बोला ७३ ।। will noo my prowesa in fighting. I shall conquer all the Pandaras wio come before nie. Gods and asurs will not be able to .omosomes how can tho Pandavas, who are but nico, withstand me." Sanjays said, di Ilearing tuoss Worces of your son, Duryodhan; much pleased, prajad Karan and said," I abalt do, Karad, as you bare directed ma Udo. Cars full of quivora aball lollow you. I shall take with ma many carta full of haok - leathérel srors for your usa :; with other princes, will bring up your mari" Sanjaya said; , "Then you're glorious soa Duryodba, baring and this, came to Shalya tho Liväg of sfadra and upoke to hirm as followr."73. .
(6376) Mahabharat [६३५६) सञ्जय उवाच । पुषस्तव महाराज मदराज महारथम् । विनयेनोपसङ्गम्य प्रणया द्वाक्यमप्रवीत् ॥ १॥ सत्यनत महामाग द्विषतां तापपईन । मद्रेश्वर रणे शर पर सैन्यमभङ्कर ॥ २॥ भुतामसि कर्णस्य वृवतो वदताम्बर। यथा नृपतिसिंहाना मध्ये स्वां घरयत्ययम्॥३॥स त्वामप्रतिषाऱ्याध शत्रुपक्षक्षयाय च। मद्रेश्वरप्रयाचे शिरसा विनयेन च ॥४॥ तस्मात पार्थविनाशाय हितार्थ मा वैध हि। सारथ्यं पिना श्रेष्ठ प्रणयात् कर्तुमईसि ॥५॥ त्वयि यन्तरि राधेयो विद्विषो में बिजेप्यते ।.६॥ ममी पूणां हि फर्णस्य प्रहीतान्यो न विद्यते । ऋते हि त्वां महाभाग वासुदेवासम. युधि सपाहि सर्वथा फर्ण यथा ब्रह्मा महेश्वरम् ॥ ७॥ यया च संघयापरसु धार्ष्णेय.पाति पाण्डघम । तथा मद्रेश्वराय त्वं राधेप प्रतिपालय ॥ ८ ॥ भीमो 'द्रोणा कृपाक अध्याय ३२॥ संजय बोले कि हे महाराज आपका पुत्र बड़ी नम्रता समेत समीप जाकर महारथी शल्यसे यह वचन बोला। १ । हे सत्यवती महावाहु शत्रु शोककारी मद्र देशके स्वामी, युद्ध में शूर और शत्रुकी सेना को भय उतसन्न करनेवाले । ३ । श्रेष्ठ वक्ता मापने वर्णका वचन मुनाहै मैं सब श्रेष्ठ राजाओं में आपको उचम जानताएँ १, ३ । हे अनुपम पराक्रमी शत्रुपक्ष के नाशकारी राजा मद्र मैं नम्रता पूर्वक आपको शिरसे दण्डवत् करताई । ४.। हे रथियों में श्रेष्ठ आप अर्जुन के नाश और मेरी. वृद्धिके अर्थ न्याय से, सारथ्य कर्म करने को योग्यहो । ५ । भापके | सारथी होनेसे कर्ण मेरे शत्रुओं को बिजयकरेगा कर्णकी बागडोरों का पकड़ने वाला दूसरा कोई पुरुष नहीं है । ६ । हे महावाहु युद्धमें वासुदेवजी के समान तेरे सिवाय दूसरा, मनुष्य नहीं है । "। आप.सव पकारसे , कर्ण की ऐसी रसाकरिये जैसे कि ब्रह्माजी ने महेश्वरजी की भौर श्रीकृष्ण ने सब आपतियों में पाण्डवों की करी है और करते हैं। ८ । भीष्म द्रोणाचार्य; कृपाचार्य कर्ण और परा- CHAPTER XXXII Sanjaya said, "Your son humbly went to Shalya and said, -" Truthful, bravo man, destroyer of fues, king of Madra, terror of fpes, you have heard the words of Karan, I think you to be the best of kings. Prince of Aladića, of matchless prowess and destoyer of .foes, I humbly.salute you. Best of car warriors, you may be pleased to drive Karan's car for Arjun's destruction and my advancertent. 5. Karan will conquer my foes, if you will drive, his car; for I co none, worthier than you forcoing this work. You aro like Vasudov ia prowess and no wrrrior, can equal you. You will protect Karan from harm as Brahma protocial Maheshwar or as Krisho protects the Pandavas, Bhishu, Drona, Krip. Karan, valiant Kritvarma, Shakini . (६३७७) कर्णपर्ष Kuan Paray [5377] भवान् मोजश्च वीर्यवान् । शकुनिः सौवलो द्रौणिरहमेव च नो बलम् ॥ १ ॥ एष मेष कृतो भागो नवधा पृथिवीपते । न च भागोत्र भीष्मस्पद्रोणस्यच महात्मनः॥१०॥ सापामतीत्य ती मागी निहता मम शत्रयः॥ ११ ॥ पृदा दिती नरव्याधी छलेन निहतोच तो। कृत्यानमुकरकर्मगती स्वर्गमितोनय। तथान्ये पुरुषव्याघ्रापचिनिहना युधि ॥ १२ ॥ अस्मदीयाश्च घनः स्वर्गाय महितो रणे (त्यक्त्वा प्राणान् यथाशार्क बेष्टां कृत्वा च पुष्कलाम ॥ १३॥ तदिदं क्षतभगि; वलं मम नराधिप । पूर्वमप्यल्पः पाहत किमुत साम्पतम् ॥ १५ ॥ पलवन्तो महात्मान. कौन्वेषाः सस्यविकमा । बल शेषन इत्युमै यथा तत् कुरु पार्थिव ।। १५ । हतबीरमिदं सैन्य पाण्डवैः समरे विभो ॥ १६ ॥ फर्णो ोको महापाहुरस्मप्रियहिते रतः । भवांश्च पुरुषव्याघ्र सर्पलोक महारथः ।। १७ ॥ गल्य कर्णोर्जुननाय योद्धमिच्छति संयुगे। तस्मिन् जयाशा कमी कृतवर्मा सौवलका पुत्र शकुनी अश्वत्थामा मैं और हमारी सब सेना । ९॥ हे राजा इस रीतिसे. यह नौ भागकियेईपरन्तु इन भागोंमें महात्मा भीष्म और दोगा. चार्यका भाग नहीं है, । १० । इन्होंने उन दोनोंभागों को जलंयन करके मेरे, शधुओंको मारा वह दोनों वृद्ध बड़े धनुपधारी युद्धमें छलसे मारे गये । १२ । निष्पाप वह दोनों कठिन कसैकोकरके यहांसे स्वर्गकोगये और इसीमकार भन्पर भी बहुतसे पुरुषोत्तम युद्धमें शवुओं के हायसे मारेगमे । १२ । हमारे अनेक शूरवीर युद्धमें बड़े २.पराक्रमों को करके माणों को त्याग कर स्वर्ग को गये ।१३॥ हे राजा यह मेरी बहुतसी सेना मारीगई पूर्वमें भी इन अत्यन्त थोड़े पाण्डवोंसे मेरे बहुत से मनुष्य मारेगये अब कौनसी बात करनी उचित है । १५ । कुन्ती के पुत्र | महावली सत्य पराक्रमी हैं सो हे राजा जिस राति से वह पाण्डवलोग मेरी शेप वची हुई सेनाको न मारसकें वही उपाय भापको करना, योग्य है । १५ । हे समर्थ यह | सेना युद्ध में पाण्डवों के हाथमे मृतक हुये शूरवीर वाली है. भव हमारी वृद्धि चाहनेवाला एक महावाहु पराक्रमी कर्ण और सब लोगोंके महारथी चम आप हो हे पाल्य अब कर्ण युद्ध में अर्जुन के साथ लड़ना चाहता हैं । १७ । हे Ashwathama, I and all our army, were divided into nine parts. Bhishin and Drona arc DO# Do more. 10. They did more than their part in slaying the foes and were slain by deceít. They died after doing great deeds like many other princes. Many of our warriors have gone to beaven after doing great deeds of prowess. The greater part of my past army has been destroyed by a handful of the Panda. What is to be done non? The sons of Kanti are excoedingly powerful and of true prowess Save the rest of my army from the Pandajag, 15. Jany warriors of my army have been blain by the Panda yas. You and valiant Karan are our only well wishere. Nov Karan is going to fight against Arjun. Jy hopes of victory lie in - vas.
. (3680), Mabablarat समरहवा गमिष्यानि ययागनम् ॥ ३४ ॥ अथ पाप्येक एवाह योपामि कुरुममा पश्ष वीप्य ममाय स्वं संग्रामे दहतो रिपन ॥ ३५ ॥ न चाभिमान कौरज्ये निघायः हृदये पुमान् । अस्मविधः प्रवत्त । म मां विमभिशहिन्याः || ३६ ॥ युधि पाप्येष -मानो मेन कर्तव्य कयॉन पश्य पोनी मम भजी धजतहननोपमो ॥ ३७॥ पश्य च मे वित्र शरांवांशीविशेषमान् । रथ पश्य व मे • कप्त सवैतिवेगिवः ॥ ३८॥ गदाव पश्य गान्धारे हेमपहारभूषिताम् । दारयेय मही कुरो विफिरेषा पर्वतार ॥ ३९ ॥ शापर्यय समुद्रांश्च तेजसा स्थेन पार्थिव ! तं मामेघविध राजन सम धपरिनिग्रो ॥ ४० ॥ कस्माधुनक्षि सारथ्ये न्यूनस्याधिरथें रणे । न मामधुरि राजेन्द्र नियोक्त स्वमिहार्हसि ॥ ४१॥ न हि पापयिसः धेयान भूत्वा प्रेग्यत्वमुत्सहे या भ्यु पगतं प्रोत्या गरोयास वो स्थितम् ॥ ४२ " वशे पापीयसो धचे तत्पापम मे आपाहूं वहांको चलनाऊं । १४. हे कौरवनन्दन चाहेमेंदी अकेला युद्ध करूंगा मातम युद्ध में मुझ शत्रुहन्ता के पराक्रम को देखो । ३५ । जैसे कि मुझसा 'पुरुष उस अपमानको हृदयमें धारण करके फिर त्याग करने को कर्मका. सोजाय | सहा तुमभी मुझमें सन्देह न करो । १६ । अथवाः युद्धमें भी मेरा अपमान किसीमकारसे न करना चाहिये मेरी वज्ररूपी मोटी र भुजाओं को देखो। १७ । और मेरे चित्र धनुरा समेत विषाले सर्पकेतमान वाणोंको देखा और वायुसमान वेगवान उत्तम घाड़ों से अलंकृत' मेरे श्रेष्ठ रथको देखो । १८ । हे गान्धारी के पुत्र सुवर्ण मूत्रोंसे वेष्ठित मेरी गदाका देखो मैं : संपूर्ण पृथ्वीको फाड़कर पर्वतों को भी तोड़सक्ताहूं । १९ । और हे राजा अपनेते नसे समुद्रको शोपण करसक्ताई ब.शामों के विजय करने में समर्थ ऐसे सामर्थवान को । ४० । युद्धमें तू नाव पिरथी के सारथीपने में वों संयुक्तं करताहै: हे राजा तुम मुझको नाचकर्म में इक्त करने को योग्य नहींहो । ११ : मैं उत्तम होकर नाचजातिके सेवन करनेको नहीं चाहताई जो कि मातिस समीप भाया और स्वाधीनता में नियतहुआ। ४२॥ Fatter achieving it. Let me fight, along aid iyon will be see my prowess. 85. A person like me is apt to leave work by insult' Have Ho doubt about me. You must never 'insalt, mo so in battlo:" Look at my thick set" arms like vajia as well as the 'vönderful bow add: Marrows like venomous serpents. Look at my good car drawg by horses ayrift like the wind.' Look at my macs, having golden strings, with which I can break through mountains' and earth. I can'soak the ocean dry withi my glory; why dost thou appoint me to drive the car. of a despicable half-warrior. You must not set me such vile work to det! Being of a noble family, I donot like to serve a man of low digin. You would maku my love and independance -sarvile.' 'It is a -in to confuse superiors and inferiors. Brahma created Brahmans from ". M [6381 ४८ .६३८१ कर्णपर्व Karan Parav रोत्तरम् । ब्रह्मासजन्मुख विमान क्षत्रियानाप बाहुतः ॥ ४३ अरुभ्यामसूजनश्यान जियो, सदानिति स्थितिः । ते यो वर्णविशेषाय प्रतिलोमानुलोमनाः ॥ ४४ अथा प्योम्यस्य सयोगात् चाषायस्य भारत । गातार संग्रहीतारो दातारः क्षत्रियाः मनाः ॥४५॥ याजनाध्यापनधिमा विशुद्धश्च प्रतिप्रहः । लोकस्यानुनहाय स्थापिता हामणा भुवि ॥ ४६॥ कृषिश्च पाशुपाल्पद विशां दानम्व धर्मतः । ब्रह्मक्षविशा द्रा विहिताः परिचारकाः । ४७ ॥ तथा वै क्षत्रियाणां च सूना वै परि चारकः । न क्षया सतानां शृण पाश्यं ममानध ॥ ॥ सोह पूर्वाभिषिक्तश्च गजाफुलसम्मेषः। महारथः समाण्यातः सेव्यः स्तव्यश्च वन्दि माम ॥ ४९ ॥ सोहमेवारशो भूत्वा नेशाविलसदन । सापुत्रस्य संग्रामे सारथ्य का मुसो.५२ . अवमानमहं पाप्य न योत्स्ामि कथन । आपृच्छ स्वाधः गान्धारे जसको तू नाच नातिकी आधीनता में करता है देखो छोटे बड़ाका विपर्यय करना: 'पापापहै प्रमाजी ने मुखसे ब्राह्मण उत्पप्रकिये और भुनासे क्षत्रियों को उत्पन्न किया । ४१ वैश्योंको जंघा से शूद्रोंको चरणों से उत्पन्न किया यह बेद का वचन है इन चारोंघीस आलोम प्रतिलोम लोगहुये हैं हे भरतवंनी चारों बाकी मिलावटसे उत्पन्न होनेवालों के क्षत्रीलोग रक्षक दराडं देनेवाल और दान करनेवाले कहे हैं । ४५ । और ब्राह्मणोंको ब्रह्माजीने यज्ञकरनेकराने दान दनैलेने भार वेद पढ़ने और शुद्ध दानोंकद्वारा लोक के अनुग्रह के निमित्त इस पूवीपर नियत कियाहै । ४६ । वैश्यों का कर्म धर्म में खेतीकरना पशुपालन और विरान करनाहै और शूदलोग ब्राह्मण क्षत्री और वैश्यों के सेवा करनेवाले वर्णन किये । ४७ और सूकलोग तो अवश्यही तत्री और ब्राह्मणों के सेवा करने वाले हैं सभी किसी दशाम भी मूनोंका आज्ञावर्ती नहीं होसक्ता । ४८ । हे राजा में राजर्षियो के कुल में उत्पन्न मूर्दाभिक नाम से प्रसिद्ध इसरीति से बन्दीजनों का पूज्य और स्तूयमान हूं। ४९ । हे शत्रुसेनापहारी सो में ऐसा होकर मूत के सारथोपने को इच्छानहीं करन हूं। ५० । मैं अमान युक्तहोकर फिर किसीमकार his mouth, keliat yas troin his arms, Vaibuyas trou his thighs and Shudras from his feet. The Vedas say so. Then there are people of 'mixed castes. Kshatryas protect all classes and give them punishmenti and oharity.45, Brahma has created the Brahmans to prrintu racrifices, to give and receive charity, to teach and read the Veilaq pod to do good to the world by holy, donations. It is the •luty of Vaishyrs to cultivate land, to domesticate bearts and to give away in charity. subay are said ta bo created for the weevice of the the: upper clasmi The Sutas .are surely among the last cluss; a kehataya can reyara command the services of a kshatrya. I am born of royal sages, 2 crowned prince and praised by baids. Being suclı,I am vot desirous of nerving Su1,50. Thus degradt!, I shall never fight again :baliny . A..
3382] Mahalsharrb (.६३८२) गमिष्यामि गृहाय' । ५१ ॥ सजय उवाचं एषमुक्या नरव्याघ्रः शल्पः समिति शोमनः । उत्थाय प्रययो पूर्ण राजमध्यादर्षितः ।। ५२ ॥ प्रणयावहुमानाच्च निगृह्मा व मुतस्तष । अनवीरधुरं वाक्यं साम्ना सर्विसाधकम् ॥५३॥यथा शम्य स्वमात्येश्य मेवमेदसंशयम् । अभिप्रायस्तु मे कश्चित्तनिवोध जनेश्वर ॥ ५४॥ न कोप्यधिकरण त्तोन शर्छ त्वाञ्च पार्थिव । नहि मद्रेश्वरो राजा कुश्यांचदन्त भवेत् । ५५ ॥ ऋत मेव हि पूर्वास्त वदन्ति १रुषोसमाः। तस्मादायिनिः प्रोको भवानिति मतिम ॥.५६, शल्पभूतश्च शत्रूणां यस्मात्वं भुवि मानद । तस्मान्छल्येति ते नाम कथ्यते पृथिवीतले ॥ ५७ ॥ यदेष व्याहत पूर्व भहता भूरिदक्षिण । तदेव कुरुधर्मश मदर्थ मघदुच्यते ॥ ५८ ॥ न च त्वचा हि राधेयो न बाहमपि वीर्यघान् । पूर्णीमस्व हया से भी युदनहीं करूंगा हे गान्धारी के पुत्र मैं तुमसे पछकर अब अपने घरको जाऊंगा। ५१ । संजय बोले हे महाराज युद्ध में शोभा पानवाला क्रोधयुक्त शल्य इसप्रकारसे कहकर राजाओं के मध्य में से शीघ्रही उठकर चलदिया। ५२ । माप का पुत्र बड़ी मतिष्ठा पूर्वक उसको पकड़कर सब प्रयोजनों के सिद्ध करनेवाले माठे २ वचनों से बड़ी नम्रतापूर्वक वोला । ५३. । हे शल्य जैसा आप जानतेहो और कहतेहोसो यथार्थहीहै इसमें किसीमकारका सन्देह नहींहे इसमें मेरा प्रयोजन है | उसको भाप कृपाकरके मुनिये । ५४ । हे राजा कर्ण मापसे अधिक नहीं है और न मैं आपपर सन्देहकरता हूँ आपमद्देशके राजाहैं जो मिथ्या समझे तो उस कामको न करियगा । ६५ । हे पुरुषोत्तम तुम्हारे वृद्ध लोगों को रत अर्थात् सत्यतायुक्त वोलते हैं उनकी सन्तानहोनेस भाप : आर्तायन कहेजाते हैं यह मेरा मत है । ५६ । हे मतिष्ठा देनेवाले इस कारण से आप युद्धमें शत्रुओंके शल्प रूप अर्थात् भल्लरूपहो इसीहेतुसे पृथ्वीपर आपका नाम शल्य विख्यातहै ॥५०॥ हे बड़े दक्षिणा देनेवाले आपने.जो प्रथम कहाहै उसको करो हे धर्मज्ञ 'मेरे निमित्त जो २ कहा है । ५८ । कर्णसमेत मैं भी आपसे अधिक पराक्रमी नहींहूँ परन्तु your permaission, go horne, son of Gandhari.” Sanjaya continued,” Having said this, valiant Shalya, much enraged, went away from among the princes But your son held him and spoke sweet rod humble words to gain his purpose, saying," It is no doubt true what you say and know, Shalya. Play bear me with patience. Neither Karan is suporior to you nor 1 doubt you, king of Bladra You may not dowhat is false. You are called Artayan, because your predecessors are koown as ratas or 'truthful. You are a shalya or dart to the enemies in battle and hence your name is Shalya Do As you have, said, generous man for my sake. Neither Karan por I am superior to your, yet I request you to be a driver to these excellent horret! ( beliava that Kar.at is superior to Asjua in good qualities, and all ।
- (६३८३) कर्णपर्ष Karan l'ary [63331 प्रयाणां यन्तारामेति संयुगे । ५९ ॥ यथा हयधिक कणों गुणस्तात घतजयात् । वामदेवादपि त्यञ्च लोकोपमिति मन्यते ॥ ६ ॥ कणों द्यभ्यधिकः पार्थादारेप नरर्षम् । भवानप्यधिकः कृष्णादवाने तथा बले ६१ ॥ यथाश्वहृदयं वेद वासु वेधो महामनाः । विगुणं त्वं तथा चेरिस महाराज न संशयः॥ ६२ ) शल्प उवाच । यम पीषि गान्धारे माये सैन्यस्प कौरवी.विशिएं देवकीपुत्रात प्रतिमानसम्पई स्वयि ।। ६३ ॥ एप सारथ्यमातिष्ठे राधेयस्य यशस्विनः । युवतः पाण्डवाप्रपेण यथा त्वं पीर मन्यसे । ६४ ॥ समयेच हि मे बार कपिफर्चनं प्रति । उत्यजेयं यथाश्रय महषाधीस्य सनिधी ।। ६५ ॥ सञ्जय उवाच । उपेति राजन् पुत्रस्त सहकर्णेन भारत । मप्रवीन्मद्रराजस्य सुतं मरतसचम ॥ ६६ ।। इति भी कर्णपर्वणि शस्यस्प कर्ण सारथ्यस्त्रकिारे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥३२॥ . युदमें भाप को उत्तर घोड़ोंका सारथी चाहताहूँ । ५९ । हे शल्य मैं कणकोभी उत्तम गुणों के द्वारा अर्जुन से अधिक मानता हूँ और भापको वासुदेवजी से भी अधिक मुझ समेत सवलोकमानते हैं। ६० । हे नरोत्तम कर्ण अत्रों में भी अर्जुन से अधिक है इसीप्रकार प्रापभी अश्वविद्या के जानने में और पराक्रम में श्रीकृष्ण से अधिकहो । ६१ । जैसे कि बड़ेसाहसी वासुदेवजी प्रश्न हृदय को जानते हैं उसी प्रकार उनसेभी दिणित माप जानतहो ।६२ । शल्य बोला है. गांधारी के पुत्र कौरव जो तुम सेनाके मध्य में मुझको श्रीकृष्णनों से अधिकमानते और कहते हो इसी से मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। ६३ । अब मैं अर्जुन के साथ युद्ध करने पाळे यशस्वी कर्ण के साथ सारथीपने में निपत होता हूँ हे वीर जैसेकि तुम मानकर चाहते हो । ६४ हे वीर कर्ण के विषय तें.मेरा यह संकल्पहै अर्थात भतिज्ञा है कि इसके सम्मुख श्रद्धा के समान कहुँगा । ६५.। संजय बोले हे भरत वंशी गना धृतराष्ट्र आपका पुत्र कर्ण समेत वोला कि जैसी राजा मद्रकी इच्छा है वैसाही हो ।। ६६ । the people, including mysell, say.that you are superior to Krishp. 6g. Karan is superior to Arjun in the knowledge of weapons and.you are superior to Vasuder in the knowledge of horses as well as in prore.s. You know twice as much about horses as Vasudev does.", Shalya: said, “I am pleased with you, is son of Gundhari,, because you hold me superior to Krisho in the presence of all the warriols. I shall now drive Karra's car in his encounter with Arjun as you wish. I have resolved, O brass warrior, that I sḥall say in his presence wpat, pleases him." Banjaya said, • Then. o king Dhritrahtra, your,son and Karap said..."Let the king of Aladra do as bo raya." 60,-- # - (-6384), Mahabharat [३८५) दुर्योधन उनाच । मूब एवं तु मद्रंश यायां धागामे ताण । यथा तराकृतागर्द युरे देवासरे प्रभो ५.१ ॥ यदुकवान पितुझं 'मार्कण्डयो महानृषि । तदेशेषेण मरतो मम राजपिसत्तम ॥२॥ हनिसोध न चास्यत्र कच्यात घिधारणा | देवानामसरा पाच परस्परजौरिमाम् ॥३॥ बध परमो गजन् खग्रामस्तारकामपः मिजिता सदा दैत्या देवतरिति न श्रुतम् ॥ ४ ॥ निजितेषु च देत्येपु तारकस्य, मतास्रायः । ताराचः फमलावध विद्युन्मालीच पार्थिष ॥५॥ तप उग्रं समास्थाय परमे ग्यिमे स्थिताः । तसा कमासुदेहांने शत्रुतापन । ६ • दमेन तपसा वेष नियमेन समा धिना । तेषां पितामहः प्रीतो. परदा प्रददौ घरान् ॥ ७॥ मघाययश्च ते गजम् सर्व भूनेषु सर्वदा । सहिता यस्यामसुः सर्वलोकपितामहम् ॥ ८॥ तानप्रदा देवो लोकानां प्रभुरविरः । नास्ति सामरत्वं वै नियमितोमुगः ॥९॥ मन्य वरं अध्याय ३४॥ दुर्योधन यांले हे राजा मद्र आपसे जो मैं कहताहूँ उसको फिर भी तुम सुनो हे समर्थ जैसे कि पूर्व देवासुरों के संग्राम में जो वृत्तान्तद्दुमा । १ । उतीको महर्षी मार्कण्डेयजीने जिसरीति से मेरे पितासे कहाः हे राजपभ भाप उमका मुझसे मुनिये और चित्त में समाये । २ । तुमको इममें विचार न करनाचाहिये हे राजा परस्पर में विजयकी इच्छासे देवता और असुरोंका प्रथमयुद्ध । ३। तारक संबंधीहुआ तब दैत्य देवताओंसे हारगये यह हमने सुना । ४ । राजा दैत्यों के हारने पर तारकके तीन पुत्र तारात कमलाक्ष विद्युन्माली। ५। उग्रतपी हॉकर रहे भारी नियम में नियतहये हे शत्रुसंतापी उन तीनों ने अपस्पामोंसे अपने शरीरों को दुल करदिया उनकी शान्त चित्ता तप नियम और · समाधी से प्रसन्न होकर घरदाता ब्रह्माजी ने उनको वरदान दिये । हे राजा उन सब मिले हुओं ने सब जीवमात्रके हाथ से मृत्युका न होना लोकके पितामह ब्रह्माजी से परमांगा। ८ । तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा कि सबकी अविनाशिता नहीं है हेममुर CHAPTER XXXII Duryodhan said," Hear what I say, king of Madra, what happened in the war of gods and asus, Hear it as was told by Mnrkandeya to my father. You should bave no hesitation in doing sybat I ray: Desirous, of couquering one another the gods and asurs, fought for Tarak, We hear that the gods were vanquished in that first rare, At the defent of the gods, the theo song of Tarak, kaown as Taraksb, Kamalaksh and Viłyunnsli, performoi a szvere ascsticism. Thoy mide their bodies lasa Boing p!0:29 xd with their ascaticism, Brahms cho giver of bonas, gays, then boous 7. They asked of thia grandfather that thoy should not mit death at the hands of any living being.. । .
कर्णपः Kamn Parer (638 पूण यार सप्ररोगते। ततस्तेः सदिता गइन् संमघाय्यांसाहुः ॥१. सर्व लोकेश्वर वाक्यं प्रणम्येदमावयन् । अस्माकं स्वं घरं देव प्रयच्छेम पिनामा ॥ १५॥ वयं पुगयि श्रीग्येव समास्याय महीभिमाम् । यिधिारण्याम लोकस्मिसमप्रसादपु रस्ता ततोवर्षसहनेतु समेष्यामः परस्परमाएकीभाचं गमिष्यन्ति पराण्येतानि बामए । १३. समागतानि चकत्यं यो हम्याग सदा । पपुणा देववरः सनो मृग्युभविष्यति ॥ १५ ॥ पघमस्विति तान्देषः आयुकाया प्रापियम । ते तु साक्ष वपाप्रीताः संप्रधार्थ परशरम् ॥ १५ ॥ पुरवसत्यर्थ मपं पमहापुरम विश्वकर्माममजा देस्यदानवपूजितम् ॥१६। तसो मपः स्वतपसा धके धीमाम् पुराणि चाण काचनभे] रोप्य कायसं तथा ॥ १७॥ काञ्चनं दियि सत्रासीदन्त लोगो इसविचारसे लीयो । ९ । और इसके सिवाय जो दूसग वर चाहते हो उसको मांगो हे राजा इसके पीछे वह सर मिलेहपे प्रभुका वारम्बार ध्यान करके । १।। और सर्वेशर को नमस्कार मंक या वचन बोले हे देवता पितामह हमको या | परदानदो । ११ । कि हम तीन घरों में नियतहोकर आपकी झपास इसलोकमें इस वृथ्वीपर घूमें। १२ । इसकेपीछे हजारवप के अनंतर परस्परमें मिलेंगे हे निष्पाप यह तीनोंपुर एकहीरूप होजाय । १३ । हे भगवान् उससमय जो देवता हमारे इस मिलेहुये पुरको एकहीवाणसे दानेवालाहोगा उसीहमारी मृत्युहो । १४ । यमाजी तथास्तु कहकर स्वर्ग में चहुपे फिर वह तीनों यरमदानको पाकर अत्यन्त प्रसभा हुये। १५ । और तीनपुर.पनानेके सिपे असुरों के विश्वकर्मा अजर अमर और दैत्यों से पूजित जो मयनाम देस्यहै उससे बोले । १६ । उसके पाछे उस बुद्धिमान मयदैत्य ने अपने तपसे तीन पुरों को उत्पन्न किया उनमें एक सुवर्णका दूसरा चादीका तीसरा लोकाया । १७ । वह सुवर्णका पुरतो सर्ग नियत हुमा चदि। का अंतरिक्ष और लोहेकापुर इच्छा के अनुसार पृथ्वीपर चलनेवालाहुआ। But branma told them that he would not grant them imaortality and that they wore at liberty to ask & mething else instead. Then they ,bowed down to the lord of ibe world and said, father, that we 'may rosido in three cities and roam throughout the world12. Then let theu by united togethor in one mass, when they weet after a thousand years, and let us die by the hand of that god who demolishes the combined cities rith one arrow," Brahms granted their request and went to heaven. They were much plessed at receiving the Boop. 16. They asked Maga the immortal meso of asura to build the three cibice. Wise Masa built the three cities, with great application. One of them was of gold, the other of silver and the third of ison. The gulden city, was in paradise, the silver ono in * Grant us, grand.
(६३८७) कर्णगर्ष Kau PITAT [5387 ॥ २७ ॥ सम्मएमवृणोदेव पापी मयत नः परे। शधिनिहता यत्र क्षिताः स्युक्लप रा॥ २८॥ सतु लास पी पीरलारक्षम हसिप तत्र वापी त मृतस जीधनी प्रभो ॥ २९ ॥ येन रूपेण देण्यास्त येन योन हामृतस्या परिसिमाना प्रोनेर अहिरे ॥ ३०॥ तां प्राप्प से पुरतरत न होकान माघिरे । महता रुपमा सिमा मुरानो भव संगान पाममद्राजन् यो युदं कथा ॥३२॥ ने लोममोहम्प मभिमना विचेतसःमिकाः सस्थिता स स्थपिताः समल मुपन॥३३॥धिदाम्प सगणार वास्तत्रत तदा तदा। विहीन कामेन र दानेन पिताः ॥ ३४॥ देवारण्यानि पनि विपाणि च विशोकसRI गणामा | मान पुष्पान रम्पान् जनपदस्था | पनाशयत मांदा वानमा दुएषारिणः ॥३५॥ पायमानेप लोके ततः को :: पुराग्यापोधपाच पनपाता समन्ततः के पुत्र बार पराक्रमी हरिनाम ने बड़ी पोर तपस्या करी उस तपो नमानी प्रसन्न रुपे । २७. तब ब्रह्मानी को प्रसन्न जानकर उसने यहबर मांगा कि हमारेपुर में एक ऐसी वापी अधीन यापही सनदो नसमें शन्नों से मृतकलोग उसमें आपने से सनी होकर बलवान होनाय । २८ । हे रामा उत वारकास के पुत्र हरि ने इस वरको पाकर वहां मृतक संजीविनी पायही को तैयार किया । २९ । फिरमरे हरे देत्य निम रूप और पोशाक 3A में लेगा या उसी रूपको धारण किय पोशाक समेत उत्सान हुपे ।३० उन्होंने उस बावड़ी को पाकर फिर उनसर सोकों को पीड़ित, किया यह सरदत्य बड़े बड़े तपस्त्री और सिदलोगों के भी भपके बढ़ानेवाले हुये । ३१ । हे राजा कभी उनकी युद्ध में परानप नहीं हुई.।२। उसके पछि लोभ मोहसे व्यात निदो निनहोकर वह सवलोभ में फंसे हुये निया हु । ३३ । वरदान से भकारी होकर वह सब जहां तहां देवताओं के समूहों को भगाकर अपनी इन्छाके भनुमार घूमने लगे।४। देवताओं के पिय. कारी सत्र क्रीडा स्थानों को वा शापयों के पत्र अ.नों को भोर अनेक मुन्दर मुन्दर देशोंको नाश करके उन दुटकी देशों ने मर्यादा में को भी विगाहा । १५ । इस के पीछे सबके पीड़ित हानेर मरुद्गणों समेत इन्द्र ने चारों और performod a suvuru asculici.ru and gratitel Brahima He asked ol Brakna tho boon of a well that could rorire tlsose, who were killed by. wcapons, and giro thern strongth. Su thu Duvivio; vell was usado there. The slain Daityas thrown into the well, came out a bolo of body and dress like before. 30. They tortuned the people the word after getting tho wall and increud wie larof tho asceties nod sidlar, Thox wurs frum that Limau jarinciblu iq buttia Dovoid of shiamo and fall of avarics, thoy breams rery. greely. Proud of the boons, they put to dizht ebu armios of lani raamsl unrestrainal. They destroyal the pleasur. house of g de and the loly hermitages of the -- . - (-3300] Blahal barrt व्यम्बकेणाभ्यनुज्ञाता स्ततस्ते स्वस्थचेतसः । नमो नमो नमस्तेस्तु प्रभो इत्यनुयन पर ॥५४॥ नमो, देवाधिदेयाय धन्विनेधातिमन्यये । प्रजापतिमखाय प्रजापतिमिरीज्यते ॥ ५५ ॥ नमोस्तुताय स्तुत्याय ल्लूयमानाय शंभवे । घिलोहिताय रुद्राय नीलग्रीवाय शलिन ॥ ५६ ॥ अमोघाय मृगाक्षाय प्रवरायुधयोधिने माय चैप नुमाप क्षयाय क्रय नायव॥५॥ दुर्धारणांय शुक्राय ब्रह्मणेब्रह्मचारिणे। ईशानायाप्रमेयाय निबन्ने चीरता ससे ॥ ५८ ॥ तपोरत्ताय पिङ्गाय प्रतिने कृतिवाससे । कुमारपित्र पक्षाय प्रवरायुध योधिने । ५९ ॥ प्रपत्रातिविनाशाय ब्रह्मविट्संघघातिने,। वनस्पतीनां पतये नराणां पतये नमः ॥६॥ गयाञ्च पतये नित्यं यज्ञाना पतये नमः ॥६१ ॥ नमोस्तु ते ससैन्याय ध्यम्पकायामितौजसः । मनोवाफ्काभेदेष त्यां प्रपन्नान मजस्थनः ॥ १२ ॥ ततः प्रसन्नो भगवान् स्थागतेनामिनन्यतान् । प्रोवाच व्येतु घनासो त किं किस निमित्त आयहो तय तो शिवजीकी आशापाकर वहसब देवता नियत 'चिचता से तप नियमों में नियत होकर सनातन वेदको पढ़तेहुये शिवजी की स्तुति करनेलगे,॥ ५४॥ नमोदेवाविवायधन्विने यातिमन्यये । प्रजापतिमखम्नायप्रजापतिभिरीयते ॥५६॥ नमोस्तुतायस्तुत्यायस्तूयमानायशम्भवे । पिलोहितायन्द्रायनीलग्रीवायशूलिने । ५६ । अमोघायमृगाक्षायप्रवरायुधयोधिने । अर्हायचैवशुद्धायक्षयायकायनायच ॥ ५७ ॥ दुर्वारणायशुक्रायब्रह्मणेप्रमचारिणे । ईशानायाप्रमेयायनियन्त्रचीरवासस ।५८ ॥ तपारचायपिंगायत्तिनेकृतिवाससे ! कुमारांचयक्षायभवरायुधयोधिने । ५९ ॥ प्रपन्नात्तिविनाशायबसावट्मंघयातिने । वनस्पतानांपतयेनराणांपतयनमः ॥ ६ ॥ गर्वाचपतनित्यंयज्ञानांपतयेनमः । नमोस्तुतेससैन्याययवकायामितौजसे । ६१ ॥ नमोवाकभिवतांप्रपन्नान्मजस्वनः ।। ६२ ।। तव प्रसन्न होकर शिवजीने. उनका स्वागत किया और कहा कि पतलाओ Shiv. Then smiling slowly, Shiv asked the purpose of their mission And they began to adore him as follows:--" We adore you, lord of gods, bowyer, wrathful, destroyer of Daksb's sacrifice, adored by tho lords of the world. Salutations to theo that art always praised, worthy of praise, Shambhu, red-coloured, Rudra, blue-throat, Shuli, Amogh, deer-eyed, warrior god, invincible, boly, destroyer, Durvaran, Shukra, Brahman, Brahmcharin. Ishan, immeasurable, controller, robed in tatters, engaged in penances, taway, observant of vows, father of Kumur, three-cyed, great warrior, refuge of the distressed, destroyer of the foes of Brahmans, lord of trees, men,. COVs and sacrifices, Salutations to thee leader of troops, threeroyed, of immense energy. We salute thee in thought, word and deed, be kind to ua" Pleased with these adorations, Shiv welcomed them, saying, "Say, what ra कर्णपये haran lary [6391] (६३९१) फरहाणि बः ॥३३॥ इति श्री कर्णपर्वाणे त्रिपुराख्याने वयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ दुर्योधन उवाच पितृदेवर्षिसंवेभ्योभये दत्ते महात्मना । सत्कृत्य शङ्करं प्राह लोकहितं यचः ॥१॥ तपातिप्सर्गात सर्वेश प्राजापत्यमिदं पदम । मयाधितियता दसा दानवयो महान् चरः ॥ २ ॥ तानतिकावार्यावान्नान्यः संहर्तमेहति । त्यामृत भून भव्येश स्वं शेषां प्रत्यरिर्वधे ॥ ३ ॥ स स्यं देव प्रपन्नानां पाचताञ्च दिवौकसाम । ग्मुर प्रसादं देवेश दानवान जाहि मूलधृक् ॥ ४ ॥ त्वरप्रसादाजगत् सर्व सुखमेधतुः तुम्हारे लिये क्याफरें ६३ ॥ - अध्याय ।। ३४॥ दुर्योधन बोले कि पितृदेवता और ऋषियों के समूहोंको शिवनीने भिर्भयता दी उस निर्भयताक देनैपर प्रमाजी शिवजीकी प्रशंसाकरके यहलोकोंका हितकारी वचन वोले । १ । हे.देवताओं केईश्वर आपकेदियेहुये प्रजापति के पदपर वत्त- मानहोकर मैंने दैत्योंको बड़ामारी घरदानदियाथा । २ । उनमर्यादा उल्लंघन करने वाले अनुरोंके मारनेको प्रापके सिवाय किसीको सामर्थ्य नहीं है हे भूत भविष्य के स्वामी आपही उनके मारनेको विरोधी शत्रुहो । ३ । हे देवेश्वर शंकर देवता तुम शरणागत आनेवाले और मार्थना करनेवाले देवताओं के ऊपर कृपाकरो और दानव लोगोंकोमारो । । । हे वड़ाईदनेवाले प्रापकी कृपासही सवसंसार बुद्धि we are to do for you." 63. 1 CHAPTER XXXIV Duryodhan said, " The pitris, gods and jishis nero freed from fear by Shiv. At this Brahma praised him and said these words for the benefit of tho world;" Being installed by you on the post of a protector of the world, I gave the Daityas a powerful bccn. None canept you can now destroy those breakors of rules. You only can be their tornil. ablo loe, lord of the Past, Present and Future. Be kind to the gods who come to seek refuge of thee, lord of gods; Shankar, and stay the Danavas. The world grome by your garo aud you are the refuge of} कर्णष Karan Patar (8303) बारामदेव इति स्यातस्ततः प्रयि शङ्करः ॥ १३ ॥ ततोप्रधाग्मदेवो धनु याणपरमवहम । हनिष्यामि रपेनानी तान् पिन यो दिवोकसः ॥ १४ ॥ ते पूयं मे रक्षावेष धनुषा तथप च । पश्यम्य यात्रचतान पातयामि महति ॥ १५ ॥ | देवा अनुः । मसिषा समाधाय त्रैलोकस्य ततस्ततः। रयं ने कायिष्यामो देवेभर महोजसम् ॥ १६ ॥ तव बुद्धपा विहितं विश्वकर्माकून मात । तता विधुधशाईलात रय समकलायन् ॥ १७॥ विष्ण सोम ताराच तोपु समकल्प । भूप्रमन्निई भूषास्म मल्लः सोमो विशाम्पते. ॥ १८ ॥ कुनलस्वाभवद्विष्णुस्तस्मिनिषुवो तदा । बाधिवी देवी विशालपुरमालिनीम् ॥ १९ ॥ सपर्वतश्नही पतधरां तदा मन्दरा पर्वतवासं जंघा तस्य महानदी ॥ २० ॥ दिशश्च प्रदिशश्व परिपारो रथम होगये ॥१२. अयोद शिवनी उनके आधेरलसे सबसे अधिक बलवान होगये तभीसे शिरजीकर महादेवनाम प्रसिद्धरमा ।।३ । इसके पाले महादेवजी बोले कि ? | देवताभो में धनुषवाण पारीहूं और पद भूमिमें स्थकी सबालके द्वारा तुम्हारे | उनमासुमोको मारूंगा । १४ । इसहेतुसे तुममेरे स्थ पौर धनुष बाणको विचारकरके तबतक खोजो जबतक कि उनशत्रुओं को पृथीपर न गिराऊ । १५ । देवता बोले कि हे देवेश्वर हम जहां तहांसे तीनोलोकोंका सवतेज सट्ठा करके उससे आपके प्रकाशमान रथको तैयार करेंगे । १६ । फिरजैसा कि बुद्धिके अनुसार बतायागया बिसादी विशकर्मानीने शुभ और उत्तम स्थको तैयारकिया तदनन्तर उन उत्तम देवताभ ने उस घनेय दिव्य रथको अच्छेमकार से अलंकृत किया । १७. विष्णु जी चन्द्रमा पीर भाग्नि देवता यहीनों तो शिवजी के वाणमें कपितये अग्नि श्रृंगहुआ और चन्द्रमा भल्लहुआ । १८ । और विष्णुजी उस 'उत्तम वागामें कुंतत हुये और बड़े पुरोंकी धारण करनेवाली पृथ्वीदेवी शिवजी का रथ वनी बह पृथ्वी पर्वत वादपों से युक्त होकर अखिलजी की धारण करनेवाली थी उस समय मन्दराचल पर्वत अतभा और उसकी जघा महानदी गंगा हुई ।२० । तव दिशा their strength, so that he became the most powerful and from that time be is known as Maheshwar. Then Shiv said to the gods." I shall alay your enemies with bow and arrow from a car. You just search me out a car with a bow and arrow so that I may bring down your enemies." 15. The gods promised to prepare for him a car from all the glorious things of the world. Vial pakarma made him a car worthy of the occuion. The gada decked the divine car. Vishou, Chandia and Agui entered the arrow of shit, Angni formod the staff; Chandra formed the dort and Vishdu the point of that arrow. The Eartb, with bor cities, became Shiva's car. The Earth with her mountuing, lands and jangmerable creatures, formed the car, Mandar hill was made its Axle and the great river Ganga pas made its jangka, 20. The -- (6396) Hababharat पनि विषत करवा स्थापयामास गोषम् ॥३७॥ प्रादण्डः कालदण्डो रुद्रदायों मा परिकादा रथस्यासन सर्वतोदिशमुग्रताः।। ३८ ॥ भवाङ्गिरसादास्तां बक रक्षी महारमनः । ऋग्वेदः सामवेदश्च पुगणश्च पुरस सुराः। ४९ ॥ इतिहासय जुनी पृष्ठरसी सम्बतुः । दिव्या बारच दिन्याच परिपाइयचराः स्थिता ४० ॥ स्तोत्राद पा राजेन्द्र वषटकारस्तरीय च । आगराध मुखे राजप्रतिशोभाकरोभवत् ॥५१॥ विचित्रमृन्युभिः पभिः कृत्या तयत् सरं धनुः। छायामेबारमनचके धनुंज्यामक्ष रणे । ४२ ॥ कालो हि भगवावद्रस्तम्प संवत्सरो धनुः । तस्माद्रोदी कालरात्रिर्या कृता घनपोजरा॥४३॥ पुश्चास्याभयविष्णुज्जलनः सोम एव च । अग्नीषा जगत कृत्स्नं वेगंवञ्चोच्यते जगत् ॥ ४३ ॥ विष्णुश्चामा भगवतो भवस्यामिततेजसः। सम्मानुर्पा संस्पर्श न विदुहरस्य ते ॥ ४५ ॥ तस्मिन शरे तिग्मन्युर्मुमो शारजी ने अपने भत्रंशत्रोंको उस स्थपर' रखा और आकाशको धजांकी स्टीवनाक नन्दीगण को उसपर नियत किया। ३७ . ब्रह्मदण्ड कालदण्ड कद्रदण्ड बोर तप यह चारों सर्व दिशाभों से युक्त रथके भोर पांसके रक्षकहुये ।।४। अथर्वा और अङ्गिरस उत्तमहात्माके स्थचक्रोंके रक्षकप ऋग्वेद सामवेद मौर पुराण यह सब भागे चलनेवाले हुये ।।५ । इतिहास और यजुर्वेद पीछे के रक्षक हुये और दिव्यवाणी और विधा यह रथके चारों ओर नियत हुये । ४० । हे राजेन्द्र | स्त्रोत्रादिक वपना कार और प्रणा यह मुख में शोभा करनेवाले हुये । । । और छमों तुओं समत वर्ष के अन्तको विचित्र धनुप करके अपने सम्मुख, अविनाशी छायारूप सावित्र को युद्ध धनुपकी प्रत्यंचा बनाई । ४२ । वेगवान बद्रजी कालरूपहुये और उनका धनुप संवत्लर हुआ इस पेतुसे रौद्री कालरात्रीको धनुषकी | प्रत्यंचा बनाया । ४३ । विष्णु भग्नि और चन्द्रमाभी वाणरूपहुये यह सब नगद अम्मिषोम नाम दो रूपवाला वैष्णव.कहा जाताहै ।. ४४ । भोर विष्णुनी उस भगवान महातेजस्वी शिवजो की आत्मा हैं इस कारण से दानवोंने शिवजीके धनुप The roda of Brabin, Kal, Rudra and Fever protected the wheels on all sides Athnrya and Angiras protected the wheels and Rigved and Naivel, with the Puranas,, led the way. . Itihas and Yajurved protected from behind, and celestial language and knowledge sur. rounded the car. 40. Stotras and Vashathar. with Pranav stood in the van. Making a bow of the year and six seasons, he made immortal Savitri its buwstring. Rudra assumed the form of Death, his bow consisted of the year, and the night of Death was made into the bowstring. Vishnu, Agni and Chandra tecame the arrow and herefore the world of Vislinu, is said to consist of Agni and Som Vishnu is the soul of Rudra and therefore the Dinavas could not bear the 4 . है .
--- (६३९७) कर्णपर्व Karaa Parv [ 6337] चाविषहं प्रभुः । भृग्यनिरोमन्युभयं क्रोधाग्निमतिदुःसाम, || ४६ ॥ सनील खोहितो धूम्रः कृत्तिासा भयङ्करः । श्रादित्यायुतसंघाशस्तजाचालायतोवलत ॥४७॥ तुरध्यापश्च्यायनो जता हन्ता प्रझविषां हरा नित्यं पाता घ इन्साय धर्मा बर्माभिताभरान् ॥ ४८ ॥ प्रमाधिमिर्मीमयले भीमरूपमनोजपैः धिमाति भगवान स्थाणुरेवानगुणहतः ॥ ४२ ॥ तस्याङ्गानि समाश्रित्य स्थितं विश्वमिदं जगत् । माजम गमन् । गुराभेनुरादर्शनम् ॥ ५० ॥ एष्ट्या तरतु र युकं फयची में पराशनी घाणमादाय तं दिव्यं सोनविष्ण्यग्निपामयम् ॥ ५१ ५ तस्स राजस्तदा देवाः कल्पयाफिरे प्रभोः। पुग्यगन्धवहं रागन् श्वसने देवमत्तमम् ॥ ५२ ॥ तमा स्थाय महादेवनासयन् देयतानपि । आरोहतदायकम्पयन्मिय, मेदिनीम्॥५३॥मा की प्रत्यंचाके स्पर्शको न सहा । ५५ । इंवरने भृगु वा अंगिरा ऋषि के क्रोध से उत्पन्न बड़ी कठिनतासे सहनेके योग्य जसंकल्पवाले भसम क्रोधाग्नि को उसबाण में लगाया ।४६. भौर नीललोहित धूम्रवर्ण दिगम्बर भयकारी दमाहजार मूर्य के समान प्रकांशों से संयुक्त ज्वलिरा तेजको । ४७ । कठिनतासे गिरने के योग्य राक्षसों का संहार करनेवाला और बामणों के मारनेवाले शत्रुओं का, ना. करनेवाला सदैव धर्म में नियत मनुष्यों की रक्षा करनेवाला और अर्षी ले.गो. का संहार कीया । ४८ । शत्रुओं के मथन करनेवाले भयानक पल भर म चित्र के समान शीघ्रगामी इन अपने गुणों से युक्त भगवान शिवजी. प्रकाश मान ये । ४९ । यह जड़ चैतन्य रूप विश उन शिवजी के अंगों में शरण सप होकर अपूर्व दर्शनवाला शोभायमान हुमा । ५० । यद धनुपधारी शिवनी | उस तैयार हुये रथको देखकर और चन्द्रमा विष्णु और अग्नि से उत्पन्न होने वाले.पसवाणको लेकर नियत हुये । ५१ । हे प्रभु राजा शल्प तय देवताभों ने सके पीछे चलनेवाले देवताओं में श्रेष्ठ वायुको पवित्र गान्धयों का पहुंचानेवाला. विचार किया । ५२ । तत्र सावधाज शिवनी देवताओंको भी भयभीत करते ये पृथ्वी को कंपायमान करके उस रयपर सवार हुपे । २३ । उस रथपर.सपार nouch of Shiva's bowstring. 45. Ishvar (Shiv ) put the unbearable Gre of Angica's wrath into that arrow. Tho blue-red, smoke-coloured, dreadful Digambar, brilliant like a myriad suns, dustroyer of intia. aible rakshasza and enemies of Brahmans, protector of virtuous med and destroyer of signers, swifo liko the mind, Shiv slono glorisaaly with his qualities. Under the protection of Shiv, tlo world, connisting Irofmovabios and immorables, looked wonderfully glorious. 50. Sir Pthe wielder of bow, finding the car readymounted it, with the aree cortposed of Som, Vishau and Agri. Then the gods asłał Poza the best of gods to blow a fragrant breeze. Wise Shir then monoted the cour terrifying oven the gods and shaking the Earth. The cordo of gada, [3393] Nabal barrt रंगी देयेणे तुष्टुषुः परमर्षयः । गन्धर्वा देवसंघाश्च तथैयाप्सरसांगणाः ॥५४॥ aff भिस्त्यमानो पन्धमानन्ध पन्दिभिः । तथैवाप्सरसांवृन्दैर्नृत्यदित्यकोषिदः ॥५५॥ शेममानो परदः सगी वाणी धरासनी । हसन्निपात्रयीदेवान सागधः को मात यति ।। ५६ ॥ तमनुप देयामाय भवान सीनयोक्ष्यते । स भविष्यति देवेस सार विस्त न संशयः ॥ ५७ वानप्रवाद पुनर्देवो मत्तः श्रेष्ठतरोहित सारथि कुरा मे स्वयं सम्चिन्य मा चिरम् ॥ ५८ ॥ एतरया ततो देवा वाक्यमुकं महामना ! गरम पितामहं देवाः प्रसाधई वचोबुवन् ॥ ५९॥ यया स्वरकयितं देव मिशारित निप्रोतया च कृतमस्माभिः प्रसन्नो नो वृषध्वजः । १. रप विहितमाम पिचित्रायुधसंवृतः। सारधि जानीमः का स्तरिमनपोतमे ॥ ६१ स्मर धापा कश्चित् सारादेवसत्तमः । सफलो तो गिरं देव करमहसि मो विभो । १९७. होनेके अभिलापी देवताओं के ईश्वर शिवमी को परमपि गन्धर्व देवगण और मप्सरामा के गणों ने स्तुतिमान किया । ५४ । ब्रह्मऋषियों से स्तुतिमान और बन्दी जनों से प्रतिष्ठित पार नृत्य विधामें कुशल नाचनेवाली अप्सराओं से बोभापमान । ५५ । सद्ग बाण और पनुपधारी वरदाता शिवजी देवताओं से बोले कि हमारा सारथी कौनहोगा । ५६ । तब देवगणों ने कहा कि हे देवेश पाप निसको मासा देगे वही निस्सन्देह भापका सारथीहोगा । ५७ । फिर शिवनीने का कि जो मुझसे भेष्ठतम होय उसको. तुम भच्छीरीति से विचारकर शीघही मेरा, सारथी बनानों विलम्ब न करो । ५८ । इसके पीछे शिवजी के इस बचनं को सुनकर देवतालोग ब्रह्माजी के समीप पहुँच बहुत प्रसन्न करके यह पचन यो । ५९ । कि हे देवता असुरों के मारने में जो २आपने कहा बहसब हमनेकिया 'और शिवजी हमपर प्रसन्न हैं। ६० । हमने विचित्र शनों से युक्त रथ को तैयार किया है हम नहीं जानते हैं कि उस उत्सम रयमें सारथी कौन होगा ।१।। देवोत्तर इसहेतु से आपही किसी सारथी को विचार कीजिये है समर्थ देवता हमारे इस पचन सफल करने को आपही समर्थ हैं। ६२ । हे भगवन् तुमनेपूर्व rishis, gandharvas and apsaras adorad Shiv the lord of gods at the time of riding the car, Adored by divino sages and eulogised by bards, with well-trained Apsaras dancing round, Shiv the bood-giver, armed with aword, arrow and bow, said to the gods," Who will drive the car.!"56 The gods repliod, "Lord of gods, it.rests with your pleasure to appoint a driver to your car." Then Shiv directed thera to select without delay a driver that should be superior to him, At this the gods want to Brahma and said, " Vo have acted upon your directions to socura the destruction of the asurs, and Shiv is kind to us, 60. Vo haro gab ready a car turnishad with ourious weapons, but we donot know vbo will drive it. Choose a driver to it, beat of gods, You alone ara (6399) (६१९९) कणपव Karan Paray एपमहमाम् हि पुरा भगवन्नुलवानसि । हितं कास्मि भयतामिति तत् कत्तमसि स देषयुक्तो रषसत्तमो नो पुराषपे प्रावणः शात्रवाणाम् ॥ ६ ॥ पिमाफ पाणिनिहितीर योद्धा विभीषन दानशानुद्यतोसी ॥ ६५॥ तथैव घेदावतुरो हषाप्रपा परा संशेलारवा महात्मनः ॥ ६६ ॥ नक्षप्रशानुगतो मरूथी इरो योदा साराये मामिलाः ॥१७॥ तत्र सारपिरेम रतविशेषान् । तत्प्रतिष्ठो रणो देव हरो बोरा तर ६८ ॥ कपानि सशमाणि कामुक पितामह । स्यामो सारथि तमाम् पश्यामहे अयम् ॥ ६९ ॥ त्वं हि सगुणयुको देवते पोधिकः प्रभो । सरये तूर्णमाका संयच्छ परमान हयान् ॥ ७० ॥ अयाय विशेशानां पधाप विवशताम ॥ ७॥ इति ते शिरसा नवा प्रिछाकेश पितामहम् । देघाः प्रसादयामामः सारया. समय में लोगों से ऐसा कहा कि मैं तुमलोगों का हित करूंगा उसको आप करने के योग्य । ६३ । हे देव तर वह राययों में श्रेष्ठ कठिनता से सहने के याम्प शलोगों का भंगानेवाला पिनाक धनुपधारी हमारे अनुक्ल युद्ध करनेवाला विचार कियागया वह दानवों को भयभीत करता हुआ वर्तमान है। ६५ । उसी प्रकार चारों वेद यही चारों उसम घोड़ेहुये और पर्वतों समेत पृथ्वी रथहुई नक्षत्र उसके गोमादेनेवाले और शिवनी युद्धका बने हैं परन्तु सारथी जानन के योग्य 1.६७ । इन सबसे अधिक तेन वळवाला सारथी चाहिये हे देव रय पोड़े समेत लड़नेवाला देवता नियत है।६८। और हे पितामही कवच धनुष और शखमी तयार है परन्तु उनका सारथी आपकेसिषाय दूसरा हम नहीं देखते हैं । ३९ हे. प्रभु भापही सब गोंसे सम्पन्न देवतासे प्राधिकहो सोतुम शीघही पतम परपर समारकर घोड़ोंकी नाग पकड़ो आपको देवताओं के विजय और प्रमरों के लिपे ऐसा करना उचित है 1७॥ यह कहकर उन देनतामोंने तीनोंलोकों के ईश्वर capable of granting this request of ours. You have already promised to do us good. Bo pleased now to grant our request. That best, of Warriors, unbearablo destroyer of foes, wielder of Pinak ond terror of the Danavas, is ready to fight for us. The four Vedas are the good steeds; the Earth, with her mountains, is the car; the stars adorn it, and Shiv is the warrior; but we donot know the driver. He sbonla poesess greater energy and strength than all of them. The warrior god, with the car and borses, is ready. The armour, bow and other weapons are ready, but wa wo see no driver botter than you. You fare ondued with all the good qualities. You may be pleased to mount 'the car at once to hold the reigns of the houses, 70. You most du this to conquer and destroy the asurs," Having said this, they lowed down to Brabma and requested him to becomo a driter to the - (6400) Jahabharat बेतिर भूतम् । ७३ ॥ पितामह उधार । नात्र फिीमयमा पाक्यं पदुकंपरिक कसः। संयच्छामि हयानेषु युध्यतो ये कपाईनः ॥ ७ ॥ ततः स भगवान्देवो लोग सहा पितामहः सारस्पे फलियती व्यरोशानस्य महारमनः ७५ तस्मिनाtale सिम स्यन्दने लोकप्रिते। शिरोमिरगमन भूमि ते या पावसः ॥ ७६ माया भगवान्देवो दीप्यमानः स्वतेजसा । अभीन दिप्रारभ्य सम्ममा पिताम... तब उरथाप्य भगवान तान हयानगिलोरमान् । पमाणे व तदा स्थाणमारोहीत मगे सम्म ५७८ ॥ ततस्समिपुमादाय विसोनाग्निप्तगया ! मारपेहतमा स्थान भुपा फम्पयन परान ॥ ७९ ॥ तमास्तु देखें। नुपुयुः परमपंपा। गायक पाच तपासतसा गणाः ॥ ८ ॥ स शांगमानो परयः सहमी पाणी राम।। प्रदीपपन्नधे तस्या बॉलोवान स्पेन तेजसा ७१ ॥ ततो भूपोजवादकोषमाप्रपो बलानी को शिरसे दण्डवतकरी और उनको सारथाके बनने निमित्त समकिपा १७३मानी योले हे देवताओं तुमसे जो कदाद उसमें भी मिथ्या नहीं अपने युद्धका शिगनी के घोड़ा थांमनाई । ५४ । सरकारकर यह संसारके समी ग्रमानी देवनाओं की प्रार्थना से सारया निपत हुये । ७५ । एन लोकश नमानी के रयपर सरार होनेपर उनके समान शीघ्रगामी पाडाने शिरों पधाको मात्र किया ! १६ । आने तेजसेही प्रकाशमान भगवान मामाभीने पार पहार बाग. होरों समेत चालकको हायमें लिया ! ७७ । उगके पीछे देवतामा श्रेष्ठ मान समानी न पाउके रामान, घाटोंको इटाकर शिवजी से बोले कि रयपर सार हणिये । ७८ । सो अननर शिवजी विष्णु भन्नि भौर चन्द्रमा से उत्सा होनेवाले.उसयाणको लेकर धपप्ले शत्रुओं को कंपाते सपाहुये । ५९ । परम मूपिगन्ध देवगण पार अप्सरानों के गर्योन स रथारूद देवकी स्नातकरी 100 यह योभापमान राग धनुपपाप पारी पादाता अपने मतानोटोको को अत्यन्त प्रकार करते हुपे स्थपर सपारदुये। ८१ । भार इन्द्रादिक देवाभास Brahma said, " There is no suutruth in what you way I ahell hold tio rims of Shiva's l.oncl" Having bitbit Brabus thu loni v thu orid wus appointed the driver of the car, at tl.o request of tho gxlx,75. At hin mounting the car, the hurt Wwwel down lucir hraids to the ground. Shining in lingbry, Bia, kaa Brálna mnuunted the car and lield trio rigne and whir. Tara Ileahwa raimed who lords and as a liv i want the car. Thin Sliv, wlin; the arrow compwd of Vishaw, . gni srod Sm, ani waling the cocnice wishishor, mounted the cer. Tha ghab riabi, Gardharyn and Apaspas milorad Sbiy si ho mountat ibu car. 30. With his boautilui aword. illuminingtho three worlds with his glory, ho mountal the Tleo Sbir said to Indra anut other gals, llaro so daabe in CAT.
६४०५) कर्णपर्ष Karan Paray (6101 गमान । म हत्यादिति फग्यो न शोको : फयरन । ८२ ॥ इतानीत्येव जानीत बाणेमानेन चामराम् । ते देयाः सत्पमित्यानिहता इनि चाप्रवन् ॥ ८३ ॥ न च तर चन मिथ्या पक्षाद भगवान् प्रभुः ॥ ८४ ॥ इति सञ्चिन्त्य फैं देवाः पगं 'दुरिमवाप्न पर । ततः प्रयातो रेवेश संवदेवगतः ।। ८५६ रथेन महता राजन्नपमा पस्प नास्ति ८६॥ स्वश्च पारिषदेदेव पूजमानो महायता- 1 वृत्यद्भिरपरैध मांसभक्ष्य रासदे। धायमानः समन्ताव तजमानः परस्परम् ॥ ८७ ॥ रुपयश्च महामागा सपोयुक्ता महागुणा । बारानुर्विजय देया महादेवस सर्वशः ॥ ८८ ॥ प्रयाते घरदे लोकानामभयंडारे तुष्टमासीजनगत् सबै देवताश्च नरोसम ॥ ८९ ॥ ऋयस्त प्रवेश स्तुवन्तो वदुभिः सः । तेजधान पश्यन्ती राजन्नासन पुनः पुनः ॥ १० ॥ गन्धर्वाणां सहस्त्राणि प्रयुतान्यवंदानि च । बादयन्ति प्रयाण्येस्य पाचानि विविधानि घ.॥ ९१ ॥ ततोधिरूटे परदे श्यात चामुराम प्रति । साधुसाध्धिति विश्वेशः स्मय फिर कनेरमे कि यह तुमसन्देह न करना कि शत्रु नहींमारे जायेंगे । ८२ । इसवाणसे तुम अनुरोंको मराहुआही जानना उन देवताओंने कहा कि सत्यहै अपुर मारेगये । ७३.। यह वचन जो आपके मुख से निकलाहै वह मिथ्या नहीं । ४। देवतालोग ऐसा विचारफर बड़े प्रसन्नहुये उसके पाछे सब देवगणों समेत देवेश शिवजी १८५। उसबढेरथमें बैठेहुयेचले जिसके समान कोईनहीं द६१ वहवड़ायशस्वी देवता मांसभक्षी भजेय दौड़ते नाचते और चारोंओर से धमकाते हुये अपने पार्षदोंसे शोभित था । ८७ । महावाहु तपोमार्च बड़े गुणवान् सब पि और देवगणोंने महादेवजी की विजयकी भाशाकरी । .८८ । हे नरोत्तम इसरीति से लोकों को निभय करनेवाले लोकेशके चलनेपर सब संसारी जीवों समेत देवतालोग प्रपत्र हुये। ८९ । वहां ऋपिलोग बहुतसे स्तोत्रोंसे शिवजीकी स्तुति को करतेहुये बारम्बार इनके तेजकी शादिकरनेवाले हुपे । ९० । उनके यात्राकरनेपर प्रयतों अर्थदोंगंधयोंने नानामकारके यानोंको यमाया । ११ । इसकेपछि वरदाता नमानी our being able to slay the toes, With this arrow the onemies cannot scape death." The gods said, " It is. true." and belioved tho foos to be already slain. Having thought so, the gods were much pleased. : Then Shiv the lord of gods, went on in the matchleas car. 86.** The glorious god was followed by carnivorous, invincible warriors, wllo wont on dancing, 'friaſing kud terrifying. The great anscotic rishis and gods were hopeful of Shiva's victory. Ifhen tho ford of tho world was thus going on, the creatures of the world and gode wore much pleased. The rislis adored him with hymns and augmented his glory. 90. Sfillions of gandbartai sounded musical instruments at his departure. When Brahwa the boongiver had mounted the car and was going towards tho Danavas, Shiv (640) Mahal harat (१.२) मानयभापत ॥ ९. " याहे देवरतो देत्याधादगावामसन्दितः। पाय पाहोने भेष निम्नतः शापवाण ॥ ९३ । ततोश्वांधोदयामा मनोमारतरहला । येन तमि पु राजन इत्यदानवं गक्षतम् ॥ पियनिधि चाकाश तेहथेलोंकपूजितः । जगाम भगवान् क्षिप्र जयाय त्रिदिवौकसाम् ॥१५॥ प्रयाते रयमारवाय त्रिपुराभिमुके भषे। नगद सुमहानादकृषभः पूरयन टिशः । ९६ ॥ ऋषभस्याप निनदं परमा भएक' महत् । विनाश नगमस्तप तारकाः मुरशत्रयः ।। ९७ ॥ अपरेषारपसार युडायाभिमुबाला । तत स्थाणहाराजगूलक क्रोधमाजतः । ॥ वास्तानि सर्वभूमारि भूः प्रकरते । निमित्ताने च घोराणि तत्रास दतः शरम ॥ ९९ ॥ तस्मिन् सामाग्निविष्णूनो क्षोमेण ग्रह्मद्रपोः । सरपोधनुषः सोमारतीय के रथपर सवारहोने पार असुरोंकीमोरको यलनेपर मन्दमुसकान करतेहुये शिवजी वाले कि-धन्य धन्य है । ९२ । हे देवता उधरको चलो जिधर दैत्यलोग मौर सावधानहोकर तम घोड़ोंको तेजकरो अब तुम मुझ शत्रुहन्तके युद्ध में मुनालको देखो। १३ । हे राजा इसके पीछे मन और घायु के समान. शीघ्रगामी पोको, साक्षण किया और निप्स भोर को दैत्य दानवोंसे संयुक्त वह त्रिरपुरया उपरकोटी स्का, मुखकिया । ९४ । भगवान शिवजी देवताभोंकी विजय के निमिच लोक पूजित-इन भाकाशके पान करनेवाले घोडके द्वारा बड़ी शीघ्रता से चले ।.९५ । जिवनीको स्थपर सवार होकर त्रिपुरक सम्मुख चलने के समय नन्दीगण दिशामों को शम्दायमान.करताहुमा बढेवेगसे गर्जा । ९३: । वहाँ देवताओंके अनुहारक | दैत्य इन नन्दीगणके .महामयकारी शन्दको मुनकर नाशको प्राप्तहुये । ९७ सब दूसरे.प्रसुरलोग वहाँ. युद्धके निमित्त सम्मुलगये. हे महारान इसके पी गित भारी शिवजी क्रोध में ज्वालतहुये, । ९८ । तव सव जीवधारी और तीनों सोक भयभीतहुये और पृथ्वी कम्पायमान , हुई और धनुपके चढ़ातेही बड़े शकुन से 1. ९१ .। उस समय चन्द्रमा अग्नि विष्णु समेत जो धनुपया उसके वेगस और welcomed him with a smile, saying, Proceed towards the Danavas% make your horses ran fast and see the prolgess of my arms ia destroying the 1009. Then the horses, swift like the mind or vind, were made to run fast in the direction of the three cities of the Danayas. For the victory of the gods, Shiv worthy of respect by all the world, W84 carried by borses which on account of their swiftness, soomed to touch the sky. 95. At the time of Shiva's departure to conquer tho three cities of gods. Nandi bellowed with a terrible noiso. The Turak Daityas died on hearing the dreadful ballowing of Nandi. Tbon other Daitges faced Shiv in batue, and the rage of Shiv tha wielder of trident was kindled. All the creatures were terrified; the Earth 'shook and great omens occurred when Shir drew bis bow. From कर्णप, karan Paras [6403] असीति ।। 100 ॥ ततो नारायणस्तरमाच्छरमागाद्विनिहाप समास्याय उनहार महारपम् ॥ १० ॥ सीदमाने रथे चेष नमानेषु शबपु । ससम्रमान भगवान नाई के महावलः ॥ १०२ वृषभस्यास्थितो मूद्धिन श्यपृष्टे व मानद । तपास भगवान् रुद्रो निरक्षदान पुरम ।। १०३ ॥ धृषभस्यास्थितो रुद्रो हयस्य च भरोचमा स्तमांस्तदाशातयत गुरांधव विधाकरोत् ॥ १०४ ॥ ततःप्रभृति मदते मारपीकताः पुराः। यानाभ स्तनाराजस्तदाप्रभूति नामषन् ॥ १.५ ॥ पार्डि शाम बलबता रुद्रेणारकर्मणा। तथाधिभ्य धनुः कृत्य सर्वः सम्धाय ते 'शरम् १०६ ।। युक्रवा पाशुपतासंग त्रिपुर समचिन्तयत् । तस्मिन् स्थिते महाराज करे विश्वकामुंके । १०७॥ पुराणि तेन कालेन जग्मुरकता तदा । एकीमा गते पत्रिपरस्वमपागते। यस्व तुमुलो हों येषताना महात्मनाम् । १०८ ॥ ततो देव नमानी मौररुद्र के कोयते इसके पीछे वहस्थ अत्यन्त पीड़ाको पाताया।१००नारायण मी सबाणके भागनेसे वार निकले और उपभरूप मेकर उसबड़े रथको उठग हिपा१०१। रथ के पीड़ित होने और शत्रु भों के गर्भने पर उन महाबली शिर जीने प्रांती से शब्द दिपा । १०२ । इसके पालक मस्तक और घोड़ों के पोछे नियत होनेवाले रथ पर बैठकर उन शिवजी ने दानों के पुर को देखा । १०३। हे नरोत्तम नव वेल और घोड़ों पर नियत रुजी ने उनके स्तनों का नाशकरके खुरों के दाटुकड़े कर दिये । १०४ । हे राजन शरप आपका भलाहों सभी से गौ और और बैलों के पैर याचमें सेफटे और उसी समय से घोड़ों के सन नहीं हुये। १०५ । अद्भुतकर्मी महावली रुद्रनी ने उनको पीड़िकरत | अपने अनुप को संधान बाणको चढ़ाके पाशुपत अखसे संयुक्त करके त्रिपुरको अल्छेप्रकारसे चिन्तनकिया हेमहाराज उसधनुषधारी शिवजीके नियतहोने ११०७१ पर देवकी प्रेरणा से समय के आनेपर वह तीनों पुर एकत्वभाव को प्राप्त फिर उन त्रिपुर नामकी एकदशा होनेपर देवताओं को बड़ी प्रसन्नताहुई । १०८i the velocity of th- dow, made up of Som, Agni, andi Vishnu and the rage of Brahma and kiudra, the car was much shaken. 100. Then Narayan came out of the arrow and lifted up the car in the shape of At the shaking of the car and the roaring of the onomies, Valiant Shiv roared loud and looked at the cities of the Danavas from. his car driven by the ox and the horses. Ho then cut off the teets of the horass and split thohoofs of the oxen. May you bo blessed Shalyat from that time cows and ozen hape clofen hoofs and horses have no teats.105. Vighty Rudra then put the arrowto his bow, and haring unit. ed with it the Pashupat weapon, ko aimed well at the three cities. In the meantime the three cities came together to the great joy of the gods. Then adoring Shiv, the gods, Síabarshis and Sidbas cried out," Victory" . AR OL, - (6406) Muhabbarat [ १४०६) शल्य विनिधित्य मा भूदत्र विचारणा ॥ १२६ ॥ भागवाणां कुले जातो अमदग्नि. महातपाः। तस्य रामेतिविख्यातः पुषस्तेजोगुणाधितः ॥ १७ ॥ स ती तप भास्थाथ प्रसादयितधान् भवम् । अनहेतोः प्रसन्नात्मा मियत: संयतेन्द्रियः॥१८॥ तस्य तुष्टो महादेवो भक्त याच प्रेशमेन च हुद्गतञ्चास्य विज्ञाय दर्शयामास शङ्करः ॥ १२९ ॥ महादेव उवाच । राम तुष्टोऽस्मि भद्रन्ते विदितं में तबप्सितम् । कुरुम्व पूतमात्मानं समेतदवापस्पसि ॥ १३ ॥ दास्यामि ते तदनाणि यद पूतो भविष्यसि । अपात्रमसमर्थञ्च दहन्त्यस्त्राणि भार्गव ॥ १३१ ॥ इत्युक्ती जामदग्नयन्तु देवदेवेन शलिना । प्रत्युवाच महात्मानं शिरसाव नतः प्रभुम ॥१३२५ यदा जानाति देवेशः पात्र मामनधारणे । तदा शुथ्यवेऽस्राणि भघान्मे दातुमर्हति ॥ १३३ । दुर्योधन उवाच । ततः स तपसा चैव दमेन नियमेन । पूजोपहारवालभिहोममन्यपुरस्कृतैः ॥ १३४ आराधयितवान् सर्व मुहन् प विचार मतकरो । १२६ । भार्गववंश में बड़े यशस्वी जमदग्नि जी उत्पन्नहुपे उनके पुत्र तेजगुण में पूर्ण परशुरामजी मासिद्धहुये । १७ । उस प्रसन्नचित्त सावधान जितेन्द्री ने अस्त्रों के निमित्त उत्तम व्रतोंको धारण करके शिवजीको प्रसन्न किया । १२८ । उसकी भक्ति और शान्त चित्तता मे प्रसन्न होकर शिवजी ने उनको | दर्शन दिया । १२९ । और परशुराम से कहा हे परशुरा मजी तुम्हाराकल्याणहो मैं प्रसन्न हं और तुम्हारे चिचको इच्छाभी मुझको विदित हुई तुम अपनी आत्मा को पवित्रकरो सब अभीष्टों को पावोगे । १३० । और जब तुम पवित्र होगे तभी तुमको प्रस्त्र दूंगा क्योंकि यह प्रस्त्र अपात्र और असमर्थ को भस्म करते हैं । १३१ । शिवजी के इस वचनको मुनकर परशु-म जी ने देव देव को प्रणाम करके उत्तर दिया । १३२ । हे देवेश जब भाप मुझको पवित्र और पात्र जाने तभी भस्न दानियेगा । १३३ । दय्योधन ने कहा कि. हे शल्य इसके पीछे तप शांति और नियम पूर्वक पूजा भेंट और वालेमदान होम और मुख्य मन्त्रों के द्वारा । १३४ । बहुत वर्षातक शिवजी को प्राराधना करी तक उन महादेवजी ने महात्मा of Bhrigus, and Parashuram of great glory and virtues was bis son. The latter, with a control of mind observed good vows and gratified Shiv. Being pleased with his devotion and patience, Shiv appeared to him and said," May you be blessed, Parashuram, I am pleased with you and know the desire of your heart. Purify yourself and you will gain the object of your desire.130. I shall give you weapons when you are purfied, for those weapons burn the unworthy and incapable." Having heard the words of Shiv, Parushuram replied with respect," You may be pleased to give me the weapons whea you find me purified and worthy." Then with asceticism, uboryancos, litations, sacrifices ana hymns, he adored Shiv for many years. Shiv । (६४०७) कर्णपर्ष Karan Tarv [64071 गांतदा प्रसन महादेवो मार्गयस्य महात्मनः ॥ १३५ ॥ अनधीत्तस्य पशो गुणान् देव्याः समीपतः । मक्तिमानेष सतते मयि रामोहनतः ॥ १३६, ॥ एवं तरूप गुणान् प्रोतो बदुशोऽक्थयत् प्रभुः । देवतानां पितृणाच समक्षमरिसूदन ॥ १३७ ॥ एतस्मिभेष कालेतु दैत्या शासन महायलाः तस्तदा मोहाग्र पश्यन्त दिवाकसः ॥ ९३८ ॥ ततः सम्भूय विवुधास्तान इन्तु कुतनिक्षयाः । चकः शवधे यो न शेकुजेतुमेव तान् ॥ १३९ । अभिगम्य ततो देवा महेश्वरमुमाप- तिम् । प्रासादयन्त ते भक्त्या जहि शत्रुगणानिति ॥ ४० ॥ प्रतिनाय ततो दषो देवताना रिलुक्षयम् । रामं भार्गवमाहृय सोऽभ्यभाषत शङ्करः ॥ १.१रुद उवास। रिपून मार्गव दधाना नहि सर्वान समागताम् । लोकानां हितकामा मन प्रारपर्थ तथैव च । एवमुक्तः प्रत्युवाच पम्वकं वरदं प्रभुम् ॥ १४२॥ रामउवाच भार्गवजी की। १३५ । प्रशंसा देवी पार्वतीजी के सम्मुख वर्णन की कि यह दृढ व्रत रखने वाले परशुराम सदैव मुझम भक्ति रखने वाले हैं। १२६ । हे शत्रुहन्ता इस प्रकार से प्रसन्न होकर शिवजी ने देवता और पितरों के सम्मुख उन परशु- | रामजी के बहुत से गुणों का वर्णन किया । १३ । इसके पीछे उसासमय में दैत्यलोग बड़े पराक्रमी हुये और प्रवल और अहंकारी राक्षसों से देवतालोग परामित होकर घायल हुये । १३८ । तब उनके मारने में निश्चय करने वाले देवताओं ने इकट्ठे होकर उन शत्रुओं के मारने का उपाप किया परन्तु उनके मारने को समर्थ नहीं हुये । १३९ । इसके पीछे देवताओं ने उमापति महेश्वरजी को भक्ति से प्रसन्न किया और प्रार्थनाकरी कि शओं के समूहों को मारे १४० इसके अनन्तर वह देवेश शिवजी देवसंतापी दैत्यों के नाश करनेका मसकर के भार्गव परशुरामजी को बुलाकर यह वचन बोले । १४११ कि हे भार्गव देवता के सब आयेहये शत्रुओं को हमारी माति और लोकों के हितके भर्थ तुममारो । १४२ । यह वचन सुनकर परशुरामजी ने शिवजी से प्रार्थनाकरी कि हे देवेश युद्ध में दुर्मद असंवत्ता दानवों के मारने को भत्रों से अभिज्ञ कैसे मारनेको समर्थ praised the Bhargav in the presence of Uma, saying, " Patashuraw, is observing hard vors and is truly devoted to me. of gods and pitars, Shiv spoke thighly of Parashuram's virtues. In the meantimno tho Daityas became powerful and the gous wero vanquish od by powerful and proud saksliares. Then tbe gods assembled lo slay the Daityas, Lut were unable to do so. The gods then pleased Shiv with their devotion and requesled bim to slay the foes. Shiv promised to sing the enemics of gods and calling Parushurain in bis prerence, said, " For my love and the good of the world, slay.tha enemies of gods, O Bhargar." 142. On Hearing this, Parashuram, srid to Shiv, "Being unacquainted with the use of weapons, how "In the presence - [6408] Mahabharat (६४०८1 का शक्तिर्मम देवेश मरुतात्रस्य संयुगानिहन्त दानवानसन्तास्त्रान् युद्धदुर्मदान ॥ १५३॥महेश्वर उवाच । गच्छ त्वं मदनबातो निहनिष्यानि शापान । विनित्य- रिपून सर्वान् गुणान् प्राप्स्यसि पुष्कलान् ।। १४४ ॥ एतफ्छ्रया व पचय प्रति गृ च सर्वशः । रामः कृतस्वस्त्ययनः प्रययौ दानवान प्रति ॥ १४५ || मनवीरे पशाईस्तान मदायलान्यता । मत युद्ध प्रयच्छध्वं दैत्या युद्धमदोत्कटाः ॥१४६॥ प्रेपितो देवदेवेन वो विजेतु महासुरान् ॥ १४७ ॥ इत्युक्त्या मार्गणाथ दैत्या योद.प्रचक्रमः । स तानिहत्य समरे दैत्यान भार्गवनन्दनः । यत्राशनिसमस्पर्श प्रहरिरेय भार्गवः ॥ १४८ ॥ स दानवैः क्षततनुर्जामदग्नयो द्विजोत्तमः। संस्पृष्टः स्थाणुना सो निर्वणः समजायत ॥ १४९ प्रीतश्व भगवान्देवः कर्मणा तेन तस्प पै। घरान् प्रासावविधान् भार्गपाय महात्मने ।। १५० ॥ उक्तश्च देवदेवेन प्रीतियुकेन शलिना ॥ ५१ ॥ निपाताचव शस्त्राणां शरीरे पाभवजा । तया ते मानुपं कमें होसता है । १४३ । महेश्वरजी ने कहा कि मेरी आज्ञासे तुम वहाँ जावो शत्रुओं को. मारोगे और शत्रुओं के समूहों को विजय करके बड़े गुणों को प्राप्त होगे ।१४४ इस वचनको सुनकर परशुरामजी सब बातोंको अंगीकार करके स्वस्तिवाचन पूर्वक 'दानयों की ओर चले। १४५ । वहां जाकर बड़े अहंकारी और वली उन दानवोंसे वोले कि हे युद्धदुर्मद दैत्यलोगो मुझसे युद्ध करो (१४६॥ हे महाअसुरलागो मुझंको महादेवजी ने तुम्हारे विजय करनेको भेजाहै । १४७ । फिर भार्गवजी के इस बचन को सुनकर दैत्यों ने युद्ध किया उससमय भार्गवनन्दन ने वज्र और बिजली के समान स्पर्शवाळे प्रहारों से युद्ध में उन दैत्योंको मारकर शिवजीका दर्शन किया फिर जमदग्निजी के पुत्र ब्राह्मणों में श्रेष्ठ परशुरामजी दानवों के हाथ से घायल शरीर शिवजी के हाथके स्पर्श घातजन्य पीडासे रहितहुये और शिवजी महाराज ने इनके उस. कर्ममे अत्यन्त प्रसन्न । १५० । होकर इन महात्माभार्गवनीको वहुतसे वरदान दिये और उन प्रप्सनमा शिवजी ने परशुरामजी से कहा shall I be able to slay the Dapasas who are so skilful in lighting, "Go there by my order," said Shiv "and you will slay them. .You will guin great fame by conquering the foes." Parashuram censented to the proposal of Sbiv and went towards the Danavas with benediotions. 145. Oa reaching there, he said to the Danavas, "Proud Daityas ! fight with me. I am sent by Sbiy to conquer you." hearing the words of the Bhargav, the Daityas attacked him. He slew abe Daityas with his powerful 'weapons and Baby Shis. Jamed. 'Agni's son, the best of Brahmans, with his boly wounded by the weapons of the Danavas, became sound again at a tonch of Shiva's hand. Much' pleased with his deeds of prowess, Shiv gave him many boona antjoyfully said to him, " Tha wounds in your boly, mada " • On (६४०९) कर्णपर्व Karan Paray [6409] न्यपोई भगुनन्दना दाणास्त्राणि दिव्यानि मतसफाशात् यथेप्सितमा१५२॥दुर्योधन उवाच । ततोऽस्त्राणि समस्तानि घरांच मनसेप्सितान् । लध्वा बहुवित्राम:प्रणम्य शिरसा शिषम् ॥ १५३ । रानुज्ञां प्राप्य देवेशाज्जगाम स महातपाः । एवमेतत पुरावृत्तं तदा कथितवानृषिः ॥ १५४ ॥ भागयोऽप्यददत् सधैं धनुर्वेदं महात्मने । फर्णाय पुरुषव्याघ्र प्रीतेनान्तरात्मना । सृजिन हि भवेत् किञ्चिद्यदि कर्णस्य पार्थिव ।। १५५ ॥ नास्सै हस्त्राणि दिव्यानि प्रादास्यन्गुनन्दनः । नापि मृतकुले जात कर्ण मन्ये कथन ॥ १५६ । देवपुत्रमई मन्ये क्षत्रियाणां कुलोद्भयम् । घिसष्टमय- बोधार्थ कुलस्येति मतिर्मम ॥ १५७ ॥ सर्पया न हा शल्य कर्णः मतकुलोद्भवः। सकुण्डल सकवचं दीर्घघाहुंमहारथम । कथमादित्यसाशं मृगी च्यानं ननिष्यति। १५८ ॥ यथा घस्व भजी पीना नागराजकरो गमो। पक्षः पश्य । १५१ । कि शखों के भाघातसे यह तेरे शरीर में पीड़ा हुई उस पीड़ा से हे भृगुनन्दन तेरामानुपीकर्म नष्ट होकर दिव्यकर्म प्राप्तहुआ अब तुम अपनी इच्छा नुसार मुझसे दिव्य भत्रोंको लो । १५२ । दुर्योधनने कहाकि इसकेपीछे पर- शुरातजी सब भत्रों को और अनेक अभीष्ट वरोंको पाकर शिरसे दण्डवत् कर शिवजी की आज्ञा लेकर वहांसे चलेगये । १५३ । तव ऋपिने इसरीति से प्राचीन वृत्तान्त को वर्णन किया भार्गवत्री ने भी भत्यन्य प्रसन्न अन्तःकरण के साथ | दिव्य धनुर्वेद महात्मा कर्णको दिया हे पुरुपोचम राजा शल्य जो कर्णमें कुछ पापहोता तो भृगुनन्दनजी काहे को दिव्यअस्त्र उसको देते और भी उसको मूतके वंशमें उत्तम नहीं समझताहूँ । १५६ । मैं इसके। क्षत्रियोंके वंशमें उत्पन्न देवकुमार जानताहूँ औरि यह कुलके गुप्तकरनेको भाज्ञा दिया गया यहमेरामत है । १५७ । हे शल्ययह कर्ण सब प्रकार स क्षत्री है और मूत के वंशमें नहीं उत्पन्न हुआहै कुएटल और कवचधारी महावाहु महारथी । १५८ । सूर्यके समान तेजस्वी सिंहको मृगी कैस उत्पन्न करसती है। । १५८ । और जैस कि इसके You will by weapons, bave raised you from humanity to godhood, now receive from me the celestial weapons." 152. Duryodhan continued, “Having got the weapons and books, Parashuram bowed down to Shiv and returned by his permission, The rishi told us this ancient bistory. Parashuram was kind to Karan and gave his celestial weapons Karan could not get those celestial weapous from him, if he were not worthy of them, I donot think him to be born of a Sut. I believe that boiis descended from some god in a kshatrya family and forbidden to disclose his parentage. He is a kshatrya from top to toe. He can not be a Sat. How can a marrior, with Armour and ear-rings, glorious like the Sun, a lion, be brought forth by.
(6410) JIzbahbarat विशालय सर्वशत्र निवणम् ॥ १५९ न त्येप प्राकृतः कधित कर्णो कमी नृप । महात्मा गा राजेन्द्र रामशिष्यः प्रतापयान् । १६०॥ इति श्री कर्णपर्यागी त्रिपुरवधोपख्याने चस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥ दुर्योधन उवाच । एवं स भगवान देयः सर्यलोकपितामहः । सारध्यमकरोचत्र ब्रह्मा द्राश्वथा ॥ १ ॥ रथिनोऽभ्यधिकारीरः कत्तव्यो रथसायिः । तस्मात् पुरुषव्याघ्र नियच्छ तुरगान युधि ॥ २॥ यथा देवगणस्तत्र वृतो पत्लात् पितामहः। तथास्माभिभवान् यत्नात् कर्णाश्यधिको धृतः ॥ ३ । यथा देमंदाराज ईश्वराद दोनों सजा गजरानकी मूडके समान मोटी हैं उसीमकार हे शत्रुहन्ता इसकी बड़ी छाती काभी देखो। १५९ । यह सूर्य का पुत्र धर्मात्मा कर्ण कोई प्रतिपुरुष नहीं है हे राजेन्द्र यह कर्गा महात्मा परशुरामजी का प्रतापवान् और महा पराक्रमी शिष्य है ॥६०॥ F 14 C . अध्याय 1॥ ३५॥ दुर्योधनबोले कि इसरीतिसे वहां सब लोकोंके पितामह भगवान रामाजी ने सारथ्य कर्मकिया और श्रीस्दनी रीहुये । १ ! हे वीर ग्थी से अधिक रथ का सारथी करता योग्य है हे पुरुषोत्तम इसहेतुमे तुम युद्धमें घोड़ोंको थांभो जो कि शिजी के निमित देवगणोंने भगवान ब्रह्माजी को सारथ्य कर्मकेलिये प्रार्थनाकरी उनीपार हम लोगोंकी औरने कणसेभी अधिक आप मार्थनाकिये गयेही । ३. । hind! !low thin the trunk of an elephant are his two arms ? Look. st his firmal cult st! KITAL, the son of Surya, cannot be a rulgsr He w the glorious disciple of Parushurama." 160. nian. । CHAPTER XXXV .' Duryodhan said, " Brabona acted as a driver to Rudra's car. A driver can be superior to a warrior. You may drive. Karan's car.. We request you to dire Karan's car as the gods had requested Brahma to drive that of Rudra, thinking you to be better than Karan, Being superior to Karan 56 ask you to drive the car, as Brahma, who is superior to Rudra, TEs asked to do the work. 'Hold the - T (६४११) कणपर्व Karan Parny (6411) धिको पृतः । तथा भयानपि क्षिप्रं रुद्रस्येच पितामहः । नियच्छ तुरगान युद्ध राधे पस्य महागुते ॥ ४॥ शल्य उचाच महाप्यतनरश्रेष्ठ बहुशोऽमरसिंहयो । कथ्यमानं भुतं दिग्यमाण्यानमामिमानुपम ॥५॥ यथा च पके सारथ्य भयस्य प्रपितामहः । यथा मुराध निहता पुणेकेन भारत 1 कृष्णस्य चापि विदित संयंमेलन पुरा प्रभूत ॥७॥ यथा पितामहो जज्ञे भगवान सारपिस्तदा । यनागतमतिक न्तं वेद कृष्णमपि सस्यतः ॥ ८॥ एतदर्थं विदित्वा तु सारणमुपजग्मियान् । स्वायम्भुरिय सदस्य कृष्णः पार्थस्य भारत ॥ ८॥यदि हन्याच्च कौन्ठेयं मृतपुत्र कय गन विनिहतं पार्थ स्वयं योत्स्यति फेशयः ॥१॥ शङ्खचक्रगदापश्यते पाहिनीम् । न चापि तस्य कुद्धस्य वा यस्य महात्मनः । स्थास्यते पूर ..पु काय दत्र नपस्तव । २१ ॥ सम्जग उवाच ।तंतथा भाषमाणन्तु मद्रराज गिदमः । प्रत्यु पाच महापाहरदीनात्मा सुतस्तव ॥ १९ ॥ मायंस्था महावाहो पण फत्तने जैसे कि देवताओंकी ओरसे शिवजी स बहेभी ब्रह्माजी प्रार्थना कियेगये ठेमहाराज उसी प्रकार आपभी कर्णसे अधिक होनेके कारण प्रार्थनाकिय गये लेकि ब्रह्माजीने रुदनी के घोड़ोंको घामा उसीप्रकार प्रापभी बड़े तेजस्वी कर्ण के घोड़ों को यांभों । ४ । शल्य वाले कि हे नगेत्तम मैंने भी इन नरोत्तम श्रीकृष्ण और अर्जुनके मुखसे कहीहुई इस उत्तम अद्भुत कथाको वधा सुनाई । ५ । जैसे कि ब्रह्माजीने शिवनांके सारथ्य कर्मको किया है और जैसे कि शिवजीने एकही वाण से सब अमुराको मारा । ६ । हे भातवंशी यह भूतकाल का वृत्तान्त श्रीकृष्ण नो का भी नाना हुआई जैसे कि भगवान ब्रह्माजी सारधा हुये उसी प्रकार श्रीकृष्ण जी भी भूतभविष्य के वृत्तान्तों को जानते हैं । ८ । इसी हेतुसे जैसे कि जान बूझकर भगवान् ब्रह्माजीने शिवजी के सारथ्यकर्मको किया हे भरतवंशी उसी प्रकार श्रीकृष्णजीने अर्जुनकी स्थवानी अङ्गीकारकरी । ९ । जोकर्ण किसी दशा | में भी अर्जुनको मारदाळेगा तो अर्जुनके मरनेकेपीछे आप श्रीकृष्णजी युद्ध करेंगे। १० । शङ्ख चक्र गदाके हायमें धारण करनेवाले श्रीकृष्णजी तरी सेनाको भस्मकरेंगे उससमय उन क्रोधयुक्त श्रीकृष्णनी के सम्मुख तेरी सेनामें से कोई भी युद्ध करनेको समर्थ न होगा । ११ । संजय बोले कि शत्रुओं का विनय करने icins of Karan's borses as Brahma niele L1 084 of Rudra" Shalya replied, “ I too have heard this wonderful account from Vasudev. 5. Shree Krishn knows the old history of how Brahma drove Rudra's car and also how Rudra destroyed the Asurs with one arrow. Shri Krishn too, deiros Arjun's car as Brahms drove that of Rudra,' If Karan kill Arjun, Shri Krisha himself will fight 10. Armed with conch, discus and pace, he will destroy your army and then none will be able to withstand him," ' Sanjay said, "Having heard this from Shalya, your valiant son Duryodhan said, "You should not think Maballiarrt [12] (६५१२) रणे । सशस्त्रभृतां श्रेष्ठं सर्वशनार्थपारगम् ॥ १२ ॥ यस्य ज्यातलनिधो भुत्ता भयकरें महत् । पाण्डवेधानि सैन्यानि विद्रयन्ति दिशो दश ॥ १३ ॥ प्रत्यक्षं ते महा. पासो यथा रात्री घटोत्कचः । मायाशतचिकुर्घाणो तो मायापुरस्कृतः ॥१४॥ चातिष्ठत धीमत्मः पूत्पनीके कथयन । एतांश्च दिवसान भयन महता वृतः ॥ १५॥ भीमसेनश्च यलवान् धनुष्कोट्याभिचोदितः। उक्तश्रासंज्ञया राजन मुड़ औदरिति च॥ १६ ॥ माद्रीपुत्रो तथा पूरी येन जित्वा महारणे । कमर्थं पुरस्कृत्य न हती युधि मारिष ॥ १७ ॥ येन वृष्णिप्र धीररत सात्यकिः सात्वतां वरः। निजाय समरे थोरो बिरयश्च तथा कृतः ॥ १८ ॥ सुजयश्चितरे स पृष्टवानपुरोगमाः। वाला महासाहसी भापका पुत्र दुर्योधन ऐसे वचन कहनेवाले बाल्य से बोला है महावाहु तुम सूर्यके पुत्र महा पराक्रमा. कर्णका अपमान मतकरो जो कर्ण कि सव अवधारियों में श्रेष्ठ होकर सर्व शाखाका पारगामी है । १२ । जिस के धनुषकी भयानक प्रत्यञ्चाके शब्दको सुनकर पांडवी सेना दशदिशाओं को भागती है । १३ । हे महावाहु आपके नेत्रों केही सम्मुख हुआथा जैसेकिवह मायावी सैकड़ों मायाओंका प्रकट करनेवाला घटोत्कच रातमें मारागया । १४ । और अर्जुन किसी प्रकारसे भी सेनाके सम्मुख नहीं हुआ बड़ा भयभीत अर्जुन इस सबदिनों में कभी सम्मुख नहींहुभा । १५ । और पराक्रमी भीमसेन धनुपकी कोटि से प्रेरित किया गया हेराजा बहुतसे लोगोंके सामने कर्णन कहाया कि तू पेटपासन करने वालोंके समान अज्ञान है । १६ । इसी प्रकार बड़े युद्ध में माद्रीके पुत्र शूरवीर नकुल और सहदेवको विजय करके किसी प्रयोजनसे युद्ध में नहीं मारा । १७॥ श्रेष्ठ जिस कर्णने वाष्णयों में वड़ावार और यादोंमें श्रेष्ठ महा पराक्रमी सात्यांक को युद्ध में विनयकरके रथसे विहीन करदिया । १८ । और उसी मन्दंपुसकीन वालेने मुंजियों को भादिलेकर अन्य सब योदामोंको जिनमें मुख्य धृष्टद्युम्न था उनको बारम्बार युद्धमें विजय किया उस महारथी पराक्रमी कर्णको पाण्डव लोग 7 so meanly of Karon, the best of warriors, so clever in the wc of weapons and terror of the Pandav armies. You yourself have seen how be slew Ghatatkach in the night battie. Arjun has always been hiding himself from his encounter, Valiant Bhim was struck with the bow and, in the presence of many warriors, be called Bhin a fool and gluttop. 16. Nakul and Sabador too, wero defeated by Karad, bot somehow their lives sero spared. He conquered Satyaki and deprived him of the use of car and often defeated the Panchals led' by Dhrisb. tadyumn How can the Pandavas defeat him? He can slay Indra the wielder of vajra in battle and you are the best of warriors. There ir 20, warrior to match you You are a dart to slay foes. . You are a (6113) + कर्णपर्व Karan Paray मलकानजिता संख्ये स्मयमानेन संयुगे । १९ ॥ कयं पाण्डषा युद्धे विजय. ति महारथम ॥ २० पोहन्यात समरे कुरो पनाहस्ते पुरन्दरम् ॥ सानाविधीर सर्वविद्यासु पारगः ॥ २१ ॥धानुयायेणते तुल्यः कृषिम्यो मास्ति कचन । स्वं शल्यभूतः शत्रूणामयिषणः पराकमे ॥ २३ ॥ मतसमुध्यसे राजन शल्य इत्यारिसूदन । तप बाइपलं प्रात्य न शेकुः सर्वसावताः ॥ २४ ॥ तर पाहुबलादाजन् किन्नु कृष्णो षलाधिफः । यथा हि कृष्णेन पलं पापं ये फाल्गुन ते। तथा कास्ययीभावे त्वया धार्य महदलम् । २५ । किमर्थ समरे सैन्य भानुदेवो न्यधारयत् । किमर्थच मवान् सैन्यं न इनिस्पति मारिष' २६ ॥ स्वत् कृते पर्षी गन्तु:माछय युधि मारिप । सोदराणा पीराणां सपा महीक्षितात ॥ २७ गल्य उवाच । यन्मां बीपि गान्धार अंग्रे सैन्यस्य मानद पिशि देवकी पंगत भीतिमानसम्मई त्यपि ॥ २८ ५. एप सारथ्यमातिष्ठे" राधियस्य युद्धमें कैसे विजय करसक्ते हैं ! २० । जोकोपयुक्त होकर युद्ध में वजधारी । इन्द्रको भी मारसकाई और भापर्वविधा सम्पन्न महा अखंश और पीडतहो ।२२॥ और पृथ्वीपर आपके भुजवलके समान भी कोई नहीं है तुम शत्रुनों के भल्लरूप कर पराक्रममें भी भक्षयही । २ । हे शत्रुहन्ता राजा शल्प इसीहेतु से आपको नाम विख्यात है भापके भुजबलको पाकर सब यादव लोग समर्थ नहीं हुये । २४ हे राजा श्रीकृष्णजी मापके भुजवल से अधिक हैं जैसे कि अर्जुन के मरनेपर श्रीकृष्गनी से सेना रताके योग्य है उसीमकार कर्णके नाश होमानेपर सेना के लोग मापसे रक्षाके योग्य हैं । २५ । जैसे कि वासुदेवजी युद्धमें सेनाको रोकेंगे उसीमकार आपभी सेनाको अवश्यमारोगे । २६ । अापके कारणस युद्धमें अऋणता मासकरना चाहताहूं और सब सगे भाई इष्ट मित्र और अन्य सघ रानाभी की अश्णता चाहताई । २७ । शल्यवोला हे मशंसा करनेवाले दुर्योधन तुम सर्व सेना के समक्ष मो कृष्णजी सेभी अधिक मुझको कहते हो इस हेतुमे मैं तुझार मसमहूं अब मैं प्रसन्नतासे अजनमे लड़नेवाले यशस्वी कर्णके साथ उसके रयपर इसमोतमासे सारथी बननाई कि मैं जिससमय जी चाहूंगा वहकर्णके विषयों को famous warrior and all the Yada pas cannot withstand you except 86 Krishn, You will protect the Kauravas when Karan is no more as Krishn will do in case Arjun is slain.25. Like Shri Krislin you will be able to slay the foes. I wish to win victory by your help. The safety of my brothers and allies depends on you.27. Sbalya said, "I am pleased because you say that I am superior to Kriebn. I mbull, witti pleasure, drive Karan's car on condition that I shall say to Karan whatever I like, without having any' regard for him." 30. Sanjaya Mahabharat- F64141 यशस्विनः । युभ्यतः पाण्डवामयण यथा र पीर मन्यसे ॥ २९ ॥ समयाने बीर कविकतने प्रति । उतमय यथाश्रमई पाचोऽस्य सविधी ॥३ संजय उवाच । वषेति राजन् पुषस्ते सह कर्णेन मारिष । मधीमंदाजाने को कमरय सभिषो । ३१ ॥ सारथ्यस्याम्म पगमात् शल्येनाशासितसार हुन्य मतदाः कर्ण समविषयों । ३२॥ मावास्न पुनः कर्ण स्तूयमानः मतमा नहि पर्धितो सार महेन्द्रो दानवनिषस शल्येनाध्यपगते बाद सनिपाउने । कणों रमना स्पो. दुर्योधनमभाषद ३४ नातिहरममा मद्रराजोमिमारने I :राजमएम बाधा पुनरेव प्रवाहि ॥ ३५ ॥ ततो रामा REATकालो लीवनोपीय महरा महीपतिम पूजित मोरेण मेगामापा गिप। मोईनाथ योगप्पमिति' arat Byबर पुरुषम्माम निम तुरगान युधि कणों या सी कारणे डूंगा उसका किसीमकारका माननी करंगा । ३. संभयकोले हे भेष्ट रामा धृतराष्ट्र तक भापकापुत्र कर्णसमेत पर बोसाकि ऐसाठी दोष याकहकर सा दीयोंकसमक्षमें । शल्पके सारथी होनेसे विषासयुक्तहोकर पुपोषनं गो प्रसन्नतास कसे प्रातिपूर्जक मिसा । १२ । और की मसंसाकरके कहनेमा कि पदमें तुम सम पायडवाको ऐते मारो जैसे कि महाइन्द सर दानवोंको मारता है, 10 इसके अनन्तर घोड़ोंके किनेको शरपके पारहोनेपर प्रसन्नचित्त होकर कर्ण ने दुयोपन में कहा । १४ । यह मरदेशका राजा भरपन्त प्रसन्नचित होकर बात नहीं करता है हे रीना माप मीठे वचनों से फिर इसप्रकार से को।१५। तर महामानी सर्वधात और अखों का येचा पराक्रमी रागा दुर्योधन म दशियों के महाराम से पोला । २५ हे शल्य अब कर्ण बादल के समान घिसुपे शब्दयुक्त बाणों से युद्धभूमिको पूर्ण करना मानता है कि भर्जुन के साथ युद्ध करना चाहिये 1101 पुरुषांचम. आप युद्ध में उसके घोड़ों को याभों कर्ण सम योदामों मकर अर्जुनको मारना चाहता है। ईराना, में वारंवार आपको कग के सारथी बनने के निति अपनी इंग्णा से प्रार्थना करता न कि सारथियों में rayituat prince Duryodhan and Karan agreed to Shalya's propoial. Baing avotjoyed by securing Skalya's morrices as a driver, Duryodhas probraced Karan with great Affection and said, " Slay the Pandavau ai Indra does the Dadaya, il Seeing Shalsa ready to drive the horsen, Karan raid to:Daryodhan that the prince of ladra 'did not appear pleaned and that he should bo mado a littlo mora cheerful by sweet, Hords.35."ivisn and learned - Duryodhan then said tatha king oil Vlad:x;". Karan will fill the field of buttle with his arrows liko cloudal pwd 87. Il fight with Arjun Hold the reins of his hones us ho desire plný Arjun and other great warriors. I am again and again orquest 019# harau l'ary पामिच्छति ॥ ३८ ॥ अस्याभोषुनदे राजद प्रसाद खां पुनः पुनः १९.. पास्य सचिषः कृष्णो यथाभीषुप्रो घर । तथा पमपि राधेयं संतः परिपालय ॥... संम्जय उपाय । ततः शल्पः परिषस्य सुते ते वाक्यमम्रसोत्रयों नमामिप्र प्रीतो मनाधिपतदा ॥ ११॥ एषम्म्मन्यसे रान गारपाई मिपार्शन । तस्माते यत् प्रिय किश्चिदं तत् सर्वे करवायहम् ॥ ५॥ यत्राभिमस्त योग्यः कर्मणि कहिंचित । तर सोममो युको पश्येकार्पधरं तप ॥ १.पा कर्ण मायां हितकामः प्रिपापिये। मप सत् क्षमता सर्वे भवान् कर्णम सर्वशः ॥ ४४ ॥ की बांध । ईशानस्पं पया प्रक्षा यथा पाचस्प केशवः । तपा निरर्ष हित युको मराज भयाप नः ॥ ४५ ॥ शल्प उपाय । आत्ममिन्दारमा परनिराशा परस्तषः । मनाचरितमार्याणां वृत्तमेतञ्चतुर्विधम् ॥४६॥ पर विदन प्रपश्यामि प्रत्ययार्धमा सघ । भारमनः स्तवसयुक्त सनिषोध पंथा तथम् ॥ ४७ ।' मई भेत श्रीकृष्णमी भर्जुन के मन्त्री हैं उसी प्रकार भाप भी कणकी सम और से रखाकरो : ४०. संजय बोले इसकेपछि प्रसन्नचिसहो राजाशल्यं आपके पुत्र दुर्योधन से बड़े स्नेह से मिलाप करके यह.. पचन बोला । ४१ । गांधारी के पुत्र अपदर्शन राजा दुर्योधन जो तुम मुझको ऐसा मानतेही इसहेतु से विरामो अभीष्ट है उस सबको में करूंगा। ४२ । हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ शत्रु, संतापी में जिस जिस फर्म के योग्य और जहां जहां जैसा मैं करसता हूं वहा बपने मन से सर्वात्मा से तेरेकर्म को करूंगा । ४३ । मैं इंदिका चाहने पाला होकर कर्णसे जोकुछ मिया अमिय याताकहूं उस पचनको माप और कर्णदोनों समकारसे सहनके योग्य । ४५ । फर्गवीला हे रामामद्र जिसमकारसे, बालाजी शिवजीके और भीछणनी मर्जीन के सारधीहुये. उसी मकार तुमभी हमारी दिमें मश्वानिये । ४५ । शल्यने कहा कि अपनी नन्दा और स्वाति और दूसरे की निन्दा मार स्तुति पा चारसकारके कर्म अच्छलोग नहीं करते हैं । ४६ ।। दिमान फिरभी तेरे निप होने के लिये अपनी मशंसा से मरेहुये इचनको करताई उसको रुप पथोपही समझो..प्र में मालिक समान सार, सना र प्रवकी रथयानी अथवा आगे होनेवालेदोरके मानने पार उसके गाने 'ing you to drive Karan's car. You will protect, Suran, in all waya 28 Shri Krishn dous Arjun,"40. Sanjaya couciņilod," Then Shalya affectionately embraced, your son, şaying, " Son of Clandoari, Duryo dian, I shall satisfy your desire. Best of Abarats i destroyer of fops! I phall do, that lies in tag power, with all my luca. t. But, you 49d. Karan miget ,beas patiently at bay. to baras, lor, four good Karai asid," You will drive my car m Bral ma drpra that of Sbin ** Kripko drivea lbst of Arjup," Suplja said, '" Vittuous med Logol praise or blame themselves and othere, but to sure you I speak 15416] Mahalbharrbe शत्यस्प-सारस्थे योग्यो मागलियत प्रभो । अप्रमादप्रयोगारध जानषिधाविधि सितः । ४८. ॥ ततः पार्थेन संग्रामे युध्वनागस्य वेऽनघ । बावियामि राम विज्वरो भरमज ॥.५९ ॥ इवि कमणि दायस्प कर्णसारथ्यस्वीकार पञ्चत्रिशोऽध्यायः १५ ॥ दुयोधन उवाच । मयं वे कर्ण सारथ्ये मद्रराज करिष्यति । कपादन पन्ता देधेशस्येव मातलिः ॥ ॥ यथा हरिहयैर्युकं संगठि स मामि: शल्पस्तथा तपाचार्य संयन्ता रपवाजिनाम् ॥ २॥ पोघे त्वयि रणाये मरार सारथी। स्यभेठो ध्रुवं संरणे. पानिमिममिप्यति ॥ ३ ॥ सम्जय उपाय का उपायके जानने से मार दोपाके दूर करने की सामर्थ्य रखने से इन्द्रकेसारथी होने के योग्य । ४८ हे निष्पाप कर्ण इस हेइसे युद्धमें अर्जुन से युद्धकरने के तुझ रथीके साथसारथी होकर तपते पृथक् घोड़ोंको चलाऊंगा ४९ ॥ अध्याय ३६॥ दुर्योधन घोला हे कर्ण यह राजा मह तेरा सारथी बनेगा यह तमारा सारथी: श्रीकृष्णजी से भी ऐसा अधिक है जिसमकार इन्द्रका सारथी मातलि ।।। जैस कि मातलि हरित घोड़ों के स्थको चलाता है उसी प्रकार यह शल्य भी.रेरक, बोणों को चलावेगा । २ । तुझ पदक के रथी होने और राना मद्रके सारधी होने पर तुम्हाराही उत्तम रथ निधय करके पाण्डवों को विजय करेगा। । ।संजयगोल in self praiet! I am cuver like Alatali is the knowledge of horses and know how to remove tbeis defects, Lam able to do tbo work of Matali Being your driver, I sball manage your borses without tiring them; put 9.. : CHAPTER XXIVI Dirsodhad'maid to Karan, "The king of Madri chrinemperior b'even Krisha, will drića poar car. He is as dorer as otali, then iteris Indri's car. He will drive your l:orses like Mutali. You cor will conquer the Peodaros, 'when you are the warrior and sbalz' ६५१५) कर्णपर्व Karan Parav [5417] उसो दुग्योधनो भूयो गहरानंतरस्किममाउवाच राजन संग्रामेपिनेपर्युपरिधना फर्णस्य पच्छ संग्रामे मद्रराज होलान् । त्यपाभिगुप्तो गधयो विजष्पत्ति, धन अपम ..." इत्युको स्थमास्थाय तथेति शह भारत। ५ । शल्येऽभ्यु पाते कर्णः सारथि समनावधीत । पमत स्यादने कल्पयायवर रन ॥ ६ ॥ तयो जै रथपरं गन्धपनगरोपमम् । विधिवत् कल्पित भद्रं जयत्युक्त्या पदयात् ॥ ७॥ त रयं रपिना श्रेष्ठः कर्णोऽभ्यर्थ्य यथाविधि । सम्पादितं प्रशविदा पूर्वमेष पुरोधसा ॥ ८ : कत्यामदाक्षिण: यत्नादुपस्थाय च भास्करम् । समीपस्थ मदराजमारोह त्वमानवीत ॥ ततः कर्णस्य दुर्यप स्यन्दनप्रया महत। आरोह महातेजाः माल्यः सह इबावलम् . १० ॥ ततः शस्थास्थित एया कर्णः स्वायमुचमम् । सम्पतिमद्यधाम्भोदं वित्यन्नं दिवाकरः ॥ ११ तावेकरथ, हे राजा इसके अनन्तर माताकोळ होजाने पर राजा दुर्योधन ने उस वेगात राजा मदन फिर, कहां। ५ । कि हे राजा मद्रभापं अब युद्धमें कर्ण के उत्तम घोड़ों को थामों तुम से रतित होकर कर्ण अर्जुन को अवश्य विजय करेगा । ५। हे भरतपंशी पड़े वचन सुनकर शक्य ने स्थपर निपत होकर कहा कि ऐमाही होगा तब प्रसन्नचित्त कर्ण अपने सारथी शल्य के पास आकर यह वचन बोला कि भूत आप मेरे रथको शीघ्र तैयार करो"।६। उसके पीछे सारथी शल्यने कहा विजयकरो यह शब्द कहकर स्याम श्रेष्ठ गंधर्व नगरके समान पुद्धि के अनुसार अलंकृत कल्याणरूप और विजयी रयको वड़ी.शीघ्रतासे तैयार करके वर्तमानकिया 1.। उस उत्तम स्थको प्रथम तो महारथी कर्ण ने ब्रह्मज्ञानी अपने पुरोहित के झारा, बुद्धि के अनुसार पूजके परिक्रमाकर विचारपूर्वक मूर्य का उपस्थान करके सम्मुख वर्तमान हुये शल्पसे कहा कि आप सवार इजिये ,९ । इसके पीछे बड़ा तेजस्वी शल्य कर्णक उस अत्यन्त उत्तम पढ़े अजय रथपर ऐसे चदा जैके कि पर्वत पर सिंह चढ़ता है ।१०॥ तदनन्तर कर्ण अपने उत्तम रथको शल्य के स्वाधीन देखकर ऐसे सवार इआ जैसे बिजली से भरे हुये बादलपर मूर्य सवार होता है । ११॥ 'the driver of your car." Sanjaya said, :: Thes, in the. morning, 'Duryodhan again eaid to inlya, "Hold the reins of Karati's car. king .of. Madras Protected by you, Karan is sure to conquer Arjun." At this shalya mounted the car of Karan, saying, " " Lot it be so" Then KArang much pleased, came to Bhalya and said, B00n." Shalya said in reply, " Gain victory." Having said this, Shalya brought thu woll-decked car to Karao, who having properly worshipped the car, prayed with his face towards the 8an. said to Shalya, " Take your seat on the car." Then glorious Sbaly took his szat on the groat invincible car as a lion'over a bill. 10, See ing his car guided by Shalya, Karan mounted it as the S10.does a " Prepare my tar Then he उपरे ।। १३ (6418) Mahatharts माहापादित्याग्निसमरिक्षयो । यमाता पया मेष माग्मा सहित विपि ॥११॥ स्त्यमानी तो पारी दानापुतिमतभी। अधिकाशिग्मी यमानiver ॥ स शल्यसंगृहीताधे रपे कर्ण स्थिताsभवत् । परिकारपर पारंपरिबेशीर भास्कर । १४॥ भास्थितः स रथभे कर्णः शरंगमंलिमान मी पुरुषाराम्रो मादरम्य इवांशमा । १५ ॥ तरपस्थ महावाई पाषा. मिततासम् । दुराचनमा गरेपमिदं वचनमब्रवीत् ॥१६॥ मरुतं द्रोणीमा दुष्करं कर्म यो कुरुवाधिरणे व पिता विनाम ॥१७) मनोगत भम वासोत् भीष्मंदाणी ' महारयो । भजन भीमसमाज निहताविति भय ॥ १८ ॥ ताभ्यां यद् धीर धारकर्भ महामधे । तत्कर्म कुरु गर्वच पक्रपाणि रिवापर:॥ १९ । गृहाण धर्मराज था अलवा पानयम । भीमसमा फिर वह सूर्य और अग्निक समान प्रकाशमान दोनों एक रसपर सवार होकर ऐसे शोभायमान हु जैसे कि सर्ग के सूर्यर्थ भार चन्द्रमा दोनो बादलों में शोभित होने है।१२। उस समय वह महात्मा पड़े तेजावी ऐसे दिखाई दिप जो कि पामें ऋतिक और सदस्यों से स्तुतिमान इन्द्र और अग्नि होते हैं । १३ । फिर बाकर्ण रपार नियत होगया जिसके घोड़ों को शपने पाडावखापा वापस किरणोंका रखन घाला कर्णधार धनुपको टंकारता हुआ अपने उत्तम स्थपर ऐम निपत हुभा जिस प्रकार मरहलयुक्त मूर्य नियन होता है वह पुरुषोत्तम ऐसा शोभायमान हुआ और कि मन्दराचल पर्वतपर सूर्य नियत ताई । १५ । फिर शल्य उस महापा स्थपर चहुये तंजस्ती कर्णसे यहवचन बोला कि हे धार कर्ण युदमें द्रोणाचार्य और भ.प्मनी से जो कठिन कर्म नहीं कियागया तुम सब धनुषधारियों के समक्ष में उसको करो। १. मेरे विचमें यह पूर्ण विश्वास था कि महारथी भोप्य और द्रोणाचार्य अप अर्जुन और भीमसेनको मारने । १८ धार ससमहायुद्ध में जो वीरताका कर्म जैन दानों से नहींहुभा हे कण तुमदितीय इन्द्र के समान होकर सकर्मको करो ।। तुम धर्मराजको भाषा अथवा अर्जुनको मारो हैक cloud charged with lightning. Both riding tho sumo car like the sun and fire, looked glorious like ths San and mosi of hearsa Peepirig througli cloude. The 't Hu glorious warrior looked like ladra in the midst of the priests at a sacrifice. Tlou Karan toonted tho ar tha reins of whule borses were held by Shalya Having arrows for rage, twanging the bowstring, haran looked like the sun on poudt Mad. dar. 15. Then Shalysthurmprke to Kahani Brave karan, fou will do deedx each as Whistu Hau Drous could oot do 1 bolioved that they would alay Bhim and Arjua Like a becond Idrs you will do deoda which they could not do. You may captirato Dharma: w or olay Arjun, You way slay Bhim agd the two was of Madrid, कण Karan Parar (64191 राधेय माद्रीपत्री यमावपि ॥ २०॥ बया सेऽस्तु मई से प्रयाहि पाभ । पाण्डपुत्राप सेम्यानि कुर माणि भस्मसात् ॥ २१ ॥ तासमानि मरीणा मयुतानि । वाघRIRIपरोषन्त मेषशया या विधि ॥ २२ ॥ प्रतिगृह्यतु हायो रपसIRIश्यमापन राधेय शल्य पुरविवादमोदयावा. (PRATो पाराम धनन्जयम् । मामलेग पमोचाभी राजानप युधिष्ठिरमा भप पश्यतु मे शल्य पाहपीय धनजपः । अस्थत कराएत्राणां सहस्राणि शतरीन ॥ २५ ॥ मय क्षेस्माम्बई शल्य शगन परमतेशलान् । पालामा विनासाय पुष्पा धनमाय ध ॥ २६ ॥ शस्य जयाच मतपुर र नुवं पापानमन्यसे । सोमवान्महग्यासान् सर्वानेव महाबलान् ॥ २७ ॥ मनिपतिनो महामागार पजाप्यार सस्पविक्रमान । भपि सम्जन भूयं साक्षात् शतकतो. ॥३८॥ यहा तुम बामसेनसमेत मादीके पुत्र नकम और सहदेवको भी मारो।२ पुरुषोत्तम तुम यात्राको मारा करपाय है और विजय होगी वहां जाकर पाएडयों की सब सेनाको भस्मकरो। २। इसके पीछे तरी नामादि नारों वाले और भेश वनाई उनका शरद पेसामुन्दर विदितहमा अतीक स्वर्गमें बादलों के पान्द होते. १९२ फिर बई महारथी रयमे वेठा हुआ कर्ण उसके वचनको अंगीकार करके उस युद्ध में सत्पन्त सावधान शल्प से बोला । २३ । हे महापा घोड़ों को ताणकरी में अर्जुनको मागा और भीमसेन समंत दोनों नकुल सहदेव और राजा युधिष्ठिर को मारूंगा । १४ । ईशल्प भर तुम अर्जुनको और मुम हमारों पाया फेंकने पास के भुनालको देखो। २५) अब मैं बई प्रकाशित बाणों को पांडवों के नाश और दुर्योधन की विनय के लिये फेंकता हूं शल्प घोला हे मूतके पुत्र तुम इस रीतिसे पादयों का प्रपमान करने को बह पांडव सब भबशनों के माता बड़े अनुपभारी भतिवळी कभी मुख न मोड़नेवाले महाभाग प्रजेय और सत्यपराक्रमी मो साक्षाद इन्द्रको भी भय के उत्पन्न करने वाले हैं। २८१ हे कण जर बके 30. Procood Karon, and you will win. Destroy R)] the army of 2h0 Pandayag." Then thousands of musical instruments wero rounded and their noisa res like that of thundar. Karan beliored in Sanlya's ivords and said to Shalya wi-a in war, “D.ivo the horses fast; I sball olay Arjun, Blim, Nakal s.Iday and Yudhislithir. You will not see the strongth of my arms in shooting thousands of arrows at Arjun, 25. liam about to shoot my bright arrons to slay tbe Pandavas and to secure victory to Duryodhan," Bhalya taid, 'Why do you thpa insult the Pandayıs, 800. of Sat1 The Pandavas sro ekital ia the use of all weapons, great Archera, yndisching in battle, ibrincible and of true prowess, They car terrify Indra himselt. You will not say ko, Karat, when you will hour the sound of the Gandir!
(6420) Bahubbarat [६४२." श्रीप्यास निर्घोष चिस्फुजितमिवासनः । गधेय गाण्डीवस्याजी तदानेषं वदिष्यसि ॥ २९ ॥ यदा त्यास संप्रामे धर्मपुत्रं यमौ तथा । शितैः पूषत कैः कुर्षाणाम प्रच्छायामिधाम्बरे ॥ ३१ ॥ अस्पतःक्षिपधतश्चालिघुइस्तान दुरासदान् । पार्थि पानपि चान्यस्य तदा नै दिष्यति ॥ ३२ ॥ सञ्जय उवाच । अनारपतु तवाक्य, मंद्रपजेन मातिन याहीत्येपानीत कमी मद्रराज तरस्निम् ।.३३ ॥ 'इति वाकणपर्वणि त्रिपुरवधोपख्याने चत्रिशोऽध्यायः ॥ ३४ . सजय उवाच । दृष्ट्या फर्ण महेप्यास त्यास सपस्थितम् । चुकशुः कुरवः -सर्व दृष्टरूपात समत्ततः ॥ १,". ततो दुन्दुभिनिघोपमैरीधा निनदेन च । धाण शम्वैध विधिणेजितश्च तस्विनाम । निर्षयुस्ताधका युद्ध मृत्यु करवा निसनम समानं गाडीव.धनुष के शब्दको मुनोगे तब ऐसा नहीं कहोगे । २९ । जव युद्ध धर्मपुत्र युधिष्ठिर वा नकुल सहदेव को देखोगे और जब तीक्ष्णवाणों से माकाशको पाच्छादित कानेवाले. बाणोंके चलाने वाले हस्तलाघव करने वाले अजय शत्रुओं को अथवा अन्य २ बड़े २ मतापी राजाओं को देखोगे तब तुम ऐसे वचन नहीं कहोगे। ३२ । संजय बोले कि इसके पीछे कुर्ण राजा माके कहेयं वचनों को निन्दित करके उस वेगवान राना मद से कहने लगा कि अव चलो।३। . .. - यध्याय ३७॥ सञ्जप बोले कि प्रसन्नमति सष कौरव उस बड़े. धनुषधारी युद्धाभिलाषी कर्ण को देखकर चारों रिसे पुकारे । १ । इसके पाछे दुन्दभी और नानामकार के बाणोंके घोड़ोंकी गर्जना समेत शब्दोंको करते आपके युद्ध करनेवाले युद्ध में You will not say. so when you will see Yudhishthir, Nikul, Bahadev, and other in viocible , parriors, shooting their arrows like cloud.."; Sanjaya said, " Then Karan disregarding Sḥalýa's words said, "Now drive the car faster." 33. CHAPTER XXXV11 Sanjaya said, Then the Kauravas cried with chver at the sight of Falan. Then raising a troinondous aniss" irith the'r musical instrumouls and the neighing of borses, your warriors came oal to Latulons if against । - - . N - - (6424) Mahabharat (१७२४) द्रोणपया यमाय ॥ २३ ॥ न रपे घाई न गमिष्यामिमध्यं तेषां शरणामिति शल्य विधि : मित्रद्रोहो मर्पणीयो न मेऽयं स्यफ्रण प्राणाननुयास्यामि द्रोणार २॥ प्रांनस्य मुदस्य च जीवितान्त नास्ति प्रमीक्षोऽन्तफसत्कृतस्य । अतो. विश भिपास्या पार्शन दिष्टं न शक्य व्यतिपातुं 4 ॥ २५ ॥ कल्याणवृत्ति: सतले हि राजन वैचित्रवीर्यस्य कुतो. ममासीत् । तस्यार्थ सिध्धर्यमहं त्यजामि मिशन प्राणान तुस्त्या जीवितञ्च ॥ २६ ॥ पैयाघ्रचर्माणमफूजनाक्ष हेमत्रिकोष रजत त्रिवणम् धिप्रधई तुरगमधईयुक्तं प्रादान्मायमिमें हि रामः ॥ २७ ॥ धषिधित्रा- घि निरीक्ष्य शल्य बजान गदा सायकांचोग्ररूपान। असिम्य दतिं परमायुधंध शखश्च शुभ्र स्वनवन्त मुंग्रम् ॥ २८ ॥ पताफिन बनिपातनिस्वनं सिताश्वयुकं मंजियों समेत पाण्डवों को मारूंगा वा उनके हाथ से यरकंर द्रोणाचार्य के समान ! यमराज के समाप जाऊँगा । २३ । हे शल्य यह बात नहीं है कि मैं भीमादि शूरों के समान न माँगा किंतु मरना अवश्यहै परन्तु मुझसे मियके दो करनेवाले नहीं सहेजाते इसहेतुसे उनमें परापपूर्वक लड़कर प्राणोंको त्यागकरके द्रोणाचार्य के पाछे जागा ।२४। जीवन के अन्तहोनेपरमृत्युक चाहेहुये बुद्धिमान और अबुद्धिमान दोनों बच नहीं सक्ते हे बुद्धिमान इसहेतुमेमैं पाण्डवों के सम्मुख जाऊंगा निश्चय करके देवके उल्लंघन करनेको कोई समर्थ नहीं है । २५ । राजा धृतराष्ट्र का पुत्र सदैव से, मेरा शुभचिन्तक और मित्ररथा है इस निमित्त मैं उसके भभीए सिद्धोने के लिये. मियभाग भौर कीड़ननासे त्यागने के योग्य अपने प्राणोंको भी त्यागकरूंगा ।२६। वह, व्याघ्रचर्य से मदाहुअर रथ मुझको परशुरामजी ने दिया है जो शब्दरादेव चन.मुवर्णमय त्रिकोश और रगतमय त्रिवेणु और अत्यन्त उत्तमं घोंडासे संयुक्ता २।।हे. शल्य चित्र विचित्र धनुप ध्वना गदा पा उग्ररूप शायक प्रकाशित स्वग और उत्तम.आयुधों समेत शब्दायमान उग्र उज्ज्वल बासकोदेखो ३८) मइस ||Pince Yudhishthir of true rows; Bhim, Arjun, Vasudev, Satyakin, Briöjayas, - Nakul and Shadev! Hasten therefore king ct Madra, Ao that I may slay the Srinjayas, Panchals and Pandavas or bo släin by them like Drona, It is true, O Shalys, that I shall die like Bhish and Dioda, yet I cannot bear to see the enemiea ofony friends. Having fought with them, I shall go the way that Drona has gone. Both fool and wise die at last. I shall therefore encounter the Paridavas. Surely none can overstep Fati 1 25. • Duryodhan has ever been my friend; I am therefore ready to set aside all toy conforts and to lay down my sery lifa for his sake. Muis'car, lided by tiger's hide has becs given me by Parashuram. It makes no ratdling noise, is décked with golden Trikosh and Silver Trivenu and is Parawn by good steeds. Look at my wonderful boy, standard, whce, म .. . - (६४२५) कर्णपर्व Haran lary [64251 शुम शोभिनम् । इस समास्थाय रथं रथभं रणे इनिप्याम्यहमर्जुन पलात् ॥२९॥ चन्द्रायुः सबहरोऽभिरक्षेत सदाप्रमत्तः समरे पाण्डपुत्रम् । तं या हनिष्यामि समेस्य युद्ध यासामि धा भीममुखो यमाय ॥ ३० ॥ यमपरणधरधासमा यदि युगपत सगणा पहाइवे । जगपिपप इत्य पाण्डवं किमु बहुना सह नज्जयामि तन ॥३१॥ सम्जय उवाच । इति रणरमसस्थ यात्थतस्तदुगनशम्म वास मद्रराट् । अपहसदयमयेधार्थधान प्रितिपिपिधे च जगाद धोत्तरम ।। ३२ ।। शल्य उचाच विरम विरम कर्ण कत्थनादयिरमतोऽतिघाप्ययुक्तयाफ कच हिनापरो धनश्याक्य पुनरहो पुरुष धमो भवाम् ॥ ३३ ॥ यदुसदनमुन्द्रमालित विविधमिधामरराज रक्षितम् । प्रसभमभिषिलोडय को हरेत् पुरुण्यरावरजामुने जुनात् ॥३४ - ॥ त्रिभु पताकाधारी वजके समान बढ़ शब्दायमान श्वत घाड़े और तणीरों से दोभायमार रथोंमें श्रेष्ठ इस रथपर भाट्टहोकर युद्ध में अपने पराक्रमसे अज्जनको मलिंगा '! '२९ । जोयुद्धभूमि में सदैव सावधान सबका नाशिकरनेवाला कालमा अर्जुनकी रक्षाकरे तो भी युद्ध में सम्मुखहोकर उसको अवश्य मारूगां अथवा भाप के समक्ष. यमरान के पास जाऊंगा। ३० । भो युद्धमें थपराज वरुण कुबेर इन्द्र अपन सब समूहों समेत इकट्ठे होकरभी भर्जुनको रक्षाकरें तभी मैं उनसय सतेत अर्जुनको विजप करूंगा बहुत वात के दहन से क्या प्रयोजनहै । ३१ । संजय पोलेक कर्ण के वचनों को सुनकर पराक्रमी राजाशल्प उसका अपमान करके हँसा और निषेध करके उत्तर दिया । ३२ । शल्यनेकदा हे कर्ण अपनी प्रशंसा मतकरी हे वड़े प्रहकारी तुमबहा बोल बोलतेहो बड़े आश्चर्यपकी वातहै कि कहां तो नरोत्तमभर्जुन और कहां नराधम तुम । ३३ । अर्जुन के सिवाय कौनपुरुष विष्णुजी और इन्द्रस रक्षितदेवस्वरूप यदुभवनको विलोहनकरकेश्रीकृष्णकी छोटीवहिन सुभद्राकोहरणकर सक्ताथा । १४ । भौर मृगवध कलह में अधीन शूकर के शिकार करने में इन्द्रके darts bright sword and loud-sounding white concb. From this cat, docked with banner, strong like vajra, and equipped with quivers, I shall slay Arjun. I shall slay erer-vigilant Arjun, though Deuth himself may protect hiw, or, lile Bhishm, I shall go to the legion of Y.in. 30. I shall conquer hiai, though he be protected by Yararaja Vårúñ, 'Kúver, 'Indra and their armis. But what is the use of talking mucb?" Sanjaya said, On hearing the words of 'Karan, valiant Shalya laughed at him in scorn and said, • Dotiot praise róurselt Karan. I fronder why you boast so much. There is no comparison between Arjun' the best of men and you the frorst of 'tmens What miani except Arjun, could seize the younger sister of * Kesbar from the home of -Yadus protected by vetrius's of “Vitinu and Indra 'like prowess ? Who except Arjun of Indu like pawrts, [6428 Mahabharat पाण्डवं पर्यपृच्छत ॥ १ ॥ यो ममाघ महात्मानं दर्शयेत श्वेतवाहनम् । तस्मै वद्यामभिप्रेतं धनं यन्मनसच्छति ॥ २॥ स च सदभिमन्येन तस्मै दयाई पुनः । गकर रत्नपूर्णश्च यो मे प्रयावनञ्जयम । ३ ।स. चेत्तदभिमन्येत परपोजन वर्शिवानु । शश दद्यां गया तस्मै नेत्यर्फ कास्पदोहनम् ॥ ४॥ शतं प्रामधराव दग्राम नाशिने । तथा तस्मै पुनद्यां श्वेतमश्वरीरयम् ।, पुक्कम जमफेशी भियों मे बयानअयम् ॥ ५ स चेत्तभिमन्येत पुरुषोऽर्जुगदर्शियान) अभ्यं तस्मै घरं दधां सौवर्ण हस्तिषट् गवम् ॥ ६ ॥ तथात्यम्मै पुनरंधां खोणां शम्मल कृतम् । श्यामानां निष्ककण्ठीनां गतिघ्रायविपश्चितार ॥ ७॥ स तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिधार । तस्मै दद्यां शत नागान् शवे प्रामान शतं रथान् ॥८॥ सुपर्ण. स्य च मुख्यस्म हयाप्रयाणां श शतान् । प्राध्या गुणैः मुवान्तांध धुर्म्यधारान युद्ध में प्रत्येक को देखकर पाण्डवों से कहा। १ । कि इस समय जो पुरुष महात्मा अर्जुन को मुझ दिखावे मुंह मांगा धनदूं । २ । और जो वह पुरुष उसको भी थोड़ा जाने उसको मैं रत्नों का भराहुआ एक शकट दूं । । और जो अर्जुन का बतलाने वाला पुरुप उसको भी थोड़ा माने तो मैं उस को भोजन और कांस्य दोहिनियों समेतसौ गौवदूर्जुनके दिखलाने परसौ उत्तम गांबदूं और खस्यों समेतरधीदं अथवाइन सबकोभी थोड़ाजानेतोमैं उसकोकृष्णकेशोंसेशोभित खियों को दूगा ।५ । जो अर्जुन का दिखलानेवाला इसको था साधारण जाने तो उसको सुनहरी हाथी के समान छ: बैलों से युक्त स्थएं । ६ । और इसीप्रकार उसे ऐसी वखालंकारयुक्त त्रियों का एक सैकड़ादंगा जोकि निष्ककी माला धारण किसे गतिवाद्य में कुशल श्यामांगी हो ।७। अथवा जो अर्जुन का दिखलानेवाला उसको भी कममाने उसको सौ हाथी सौगांव सौ रथ । ८ । और दशहजार सुरक्ष से युक्त सुशिक्षित हृष्ट पुष्ट रथके लेचलने में समर्थहीय ऐसे घोड़े दंगा । ९ । पौर सुवर्ण अंगों से युक्त संवत्सा चारसौ गौवेंदूंगा जो अर्जुन का दिखलाने वाला Pandav warrior, saying, " I shall give to tha man who may show great. Arjua to me, as much wealth as he wants. And if that bo ineuficient, shall give him a cart load of jewels. If this too, boinsur. ficient, 1shall add a hundred comes with brazon wilk pots. To one, wvido showa Arjúo to me, I shall give a bundrod good villages and cats drawa by mules, If this Lo insufficient, I shall add to it women with • hair.5. If the above be insufficient, I shall give the man, who Arjun to mo, six ore2, like slephants, decked with gold. Isball so give him a hundred yomen decked with fine clothes and orda ments, garlanded and skilfulin singing and talking. If this bo too small, I shall gire him a hundred glephanted as many villages and cars. I shall udd to it ten thousands of horses, well thained, healthysfit to . 3 ..(६४२९) कर्णपर्व Karan Paray [5429) सुशिक्षितान् ॥ ९ ॥ तथा सुपर्णशृङ्गीणां गोधेन्ना चतुःशवम । दो तस्मै सप सानो यो में भूपादनञ्जयम ॥ १० ॥ स घेत्तदभिमन्यत पुरुषोऽर्जुनदर्शिघान् । भन्य तस्मै परं दद्या श्वेतान् पशतान् हयान्' ॥ ११ ॥ हेममाण्डापरिक समृष्टमणिभूषणान् ॥ १३ ॥ सदान्तानपि वैवाई दयामप्टादशापरान् । रया शुभ्र सौवर्ण दो तस्मै स्वलंकृतम् । युक्तं परमकाम्बोजयों में व्याधनजयम् ॥१३॥ 'स सदाभमभ्येत पुरुयोग्जुनदर्शिवान् । भन्य तस्मै घर दया कुजराणां शतानि , पद १४ ॥ काञ्चनर्षिविधर्भाण्डे संछन्नान हेममालिनः' । उत्पन्नानपान्तेषु, विनीतान' हस्तिशिक्षकः ॥ १५ ॥ स घेत्तदभिमन्यत पुरुषोजनदर्शिवान् । मन्य तस्मै वरं दद्यां घेश्यग्राम्यश्चतुर्दश ॥ १६॥ सुस्फीतान धनसंयुक्कान् 'प्रत्यास. भवनोदकान् । अकुतोमयान् सुसम्पनान् राजभोज्यांश्चतुर्दश ॥ १७ ॥ दासीनां निलकण्ठीना मागधीनां शतं तथा । प्रत्यग्रवयसा दयां यो मे व्यादनञ्जयम् ॥१८॥ सभिमन्येत पुरुषोजनदर्शिवान् । अन्य तस्मै घर दद्यां यमसौ कामयेत् हो ।१०। जोवह पुरुष इसकोभी थोड़ामाने उसकेलिये दूसरावरदेकर पांचसो पोडे जोकि श्वेतवर्ण और सुवर्णसे मांडेत स्वच्छ मणियों के भूपणों से अलंकृतहों ॥१२॥ इसके विशेष मैं अठारह अच्छे शिक्षित अन्य घोड़ोंकोभी दूंगा. और भति. उज्वल मुरण से अलंकृत कांबोजी भी घोड़ों से युक्तरथ दूं. ११ । जो, अर्जुन का दिख- लानेवाला पुरुष उसको भी न्यूनसमझे तो दूसरा दानद. अर्थात् नानामकार के स्तर्ण भूषणों से और मालाओं से. अलंकृत पश्चिमीय, कच्छ देशों में, उत्पन्न और माल्यवान् हाथीवानों से शिक्षित छ। सौ हाथी दं और जो इसको भी योड़ा माने । १६ । उसको बहुत वृद्धि युक्त धनसे पूर्ण वन जंगलबाले ऐसे चौदह गांवदं जो निर्भय और अच्छे राजाओं के भोगने के योग्य होय । १७ । इसीप्रकार निष्ककी मालाधारण करने वाली मगधदेशी दासियों का एक सैकड़ा अर्जुनके बतलाने वाले कोदूं ।१८। और जो भर्जुनका दिखलानेवाला पुरुष इसकोभी थोड़ामाने तो जोवर मांगे वह दं, इसके विशेष जो जो मेरा धन है और वह चाहता है वह सब उसको draw cars and decked with gold ornaments. I shall also give him four bundred cows with golden horps and calves. But it be thinks this insufficient, I shall give him mon. I shall give him five hundred white horses decked with golden ornaments and jewels. Besides this I shall also give himn eighteen Camboj horses. of white colour, decked witlu'gold ornaments. If he think this too, insufficient, I shall give him more: I shall, give him six buadred well-trained elephants of Western couatry, decked with garlands. It this too, bar insufficient, I shall add toit fourteen prosperous villages, full of forests and grazing. grounds, worthy of kings and fres from danger.ir. I shall give the man, who shovs Arjun to me, a bundred slave girls. If this be । {64283 Mahabbarst (६४२८ पाण्डवं पश्यपृच्छत ॥ १ ॥ यो ममाघ महामानं दर्शयेत श्वेतवाहनम् । तस्मै दद्यामभिप्रेतं धनं यन्मनसेच्छति ॥ २॥ स चेत्तदभिमन्येन तस्मै दद्याई पुनः । राकट रस्तपूर्णच यो मे यादनञ्जयम् ।..३, । सवेराइभिमन्येत परपोऽर्जन दसियाम् । शश दयां गया तरी नेत्यकं कांस्यदोहनम् ॥ १॥ शत प्रायवरायत दाम नदाशने . तथा तस्मै नईयां इवेतमश्वरीरयम् ।, पुकमजमकेशी भिषों मे व्याधनअयम् ॥ ५ स चे सदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् । अन्य तर घरं दद्यां सौवर्ण हस्तिषट् गवम् ॥ ६ ॥ तथात्यम्मै पुनई खोणां शतमल कृतम् । श्यामानां निष्ककण्ठीना गीतवाद्यविपश्चितान ॥ ७॥ स.पत्तदमिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवार । तस्मै दद्यां शत नागान् शतं ग्रामान शतं रयान् ॥ ८ सुवर्ण. स्य च मुख्यस्म इयाप्रयाणां रात शतान् । ऋध्या गुणैः सदान्ताच धुर्म्यवाहान | युद्धमें प्रत्येक को देखकर पाण्डवों से कहा । १ । कि इस समय जो पुरुष महात्मा अर्जुन को मुझे देखावे उसको मुंह-मांगा धनदूं । २। और जो वह पुरुष उसको भी थोड़ा जाने उसको मैं रत्नों का भराहुआ एक शकट दूं। ३। और जो अर्जुन का पतलाने वाला पुरुप उसको भी थोड़ा माने तो मैं उस को भोजन और कांस्य दोहिनियों समेतसौ गौ।४।अर्जुनके दिखलाने परसौ उत्तम गांवदूं और खच्यों समेतस्थभी, अथवाइन संवकोभी थोडाजानेतोमैं उसकोकृष्णकेशोंसेशोभित खियोंको (दूगा'। ५। जो अर्जुन का दिखलानेवाला इसको भी साधारण जाने तो उसको | सुनहरी हाथी के समान छः चैलों से युक्त स्थ५। ६ । और इसीमकार उसे ऐसी वस्त्रालंकारयुक्त स्त्रियों का एक सैकड़ादंगा जोकि निष्ककी माला धारण किये गतिवाद्य में कुशल श्यामांगी हों ।। अथवा जो अर्जुन का दिखलानेवाला उसको भी कमजाने उसको सौ हाथी सौगांव सौ रथ । ८ । और दशहजार सुवा से युक्त सुशिक्षित हृष्ट पुष्ट स्थके ले चलने में समर्थहोंय ऐसे घोड़ें दंगा । ९ । और सुवर्ण अंगों से युक्त संवत्सा चारसी गौवेंदूंगा जो अर्जुन का दिखलाने वाला Pandav warrior, saying, "I shall give to tho man who may show great, Arjun to me, as much ealth as he wants. And if that bo insuficient, shall give bim & cart load of jewels. If this too, bo insuf. ficient, I shall add a hundred coys with brazen milk pots. To one, who shows Arjún to me, I shall give a bundred good 'villages and cars drawn by mules. If thig be insufficient, I shall add to it women with black hair.5. If the above be insufficient, I shall give the man, who shows Arjun to me, six oxen, like slephants, decked with gold. Izba)] also give him a bundred yomen decked with fine clothes and orna ments, garlanded and skilfulin singing and talking. If this bo too small, I shall give him a bundred elephants and as many villages and care. I sball add to it.ten thousands of bofecs, well trained, healthy. Sit to ।
(३४२९) कर्णपर्व Karan Paray [5429] सुशिक्षितान् ॥ ९ ॥ तथा मुघर्णशङ्गीणां गोधेन्नी चतुःशतम् । दो तस्मै सष रसांना यो मे धूपाखनब्जयम ॥ १० ॥ स चेत्तदभिमन्यत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् । मन्य तस्मै घरं दी श्वेतान् पशतान् हयान् ।। ११ । हेममाण्डापरिजनन् समष्टमणिभूषणान् ॥ १९६३ - सदान्तानपि वाहं दद्यांमष्टादशोपरान् । रयश गुनं सौवर्ण दर्या तस्मै स्वलंकृतम् । युक्तं.परमकाम्बोजयों में व्यानञ्जयम् ॥१३॥ 'सत्तदाममभ्येत पुरंशेज्जुनदर्शिधान् । मन्ये तस्मै घरं दद्या कुजराणां शतानि पट १॥• काश्चनर्षिविधर्भाण्डः संछन्नान् ममालिनः' । उत्पानपरान्तेषु, विर्मातान् हस्तिशिक्षक ॥ १५ ॥ स घेत्तदभिमन्येत पुरुषोजनदर्शिवान् । मन्य तस्मै घरं दधां पश्यनाम्यश्चतुर्दश ॥ १६ ॥ सुस्फीतान धनसंयुक्तान् प्रत्यास. भवनोदकान् । अकुतोमयान् सुसम्पन्नान् राजभोज्यांश्चतुर्दश ॥ १७ ॥ दासीनां निककण्ठीना मागधीनां शतं तथा । प्रत्यप्रवयसा या यो, मे ब्यारनञ्जयम् ॥१८॥ सत्ताममन्येत पुरुषोजनदर्शिवान् । अन्य तस्मै थरं दद्यां यमसी कामयेत् हो ।१०। जोवह पुरुष इसकोभी थोड़ामाने उसकेलिये दूसरावरदेकर पांचसी घोड़ेद जोकि श्वेतवर्ण और सुवर्णसे माडेत स्वच्छ मणियों के भूषणों से अलंकृतहों, 1१२॥ इसके विशेष मैं अठारह अच्छे शिक्षित अन्य घोड़ोंकोभी- दंगा. और: अति. उज्वल मुरण से अलंकृत कांबोजी भी घोड़ों से युक्तरथ दूं ! १३ । जो, अर्जुन का दिख- लानेवाला पुरुप.उसको भी न्यूनसमझे तो दूसरा दानंद. अर्थात नानामकार के सणं भूषणों से और मालाओं से.अलंकृत पश्चिमीय कच्छ देशों में, उत्पन्न और मारयवान् हाथीवानों से शिक्षित छ: सौ हाथी दं और जो इसको भी थोड़ा माने 1.१६ । उसको बहुत वृद्धि युक्त धनसे पूर्ण वन जंगलवाले ऐसे चौदह गांव, जो निर्भप और अच्छे राजाओं के भोगने के योग्य हॉप । १७ । इसीप्रकार निष्ककी मालाधारण करने वाली मगधदेशी दासियों का एक सैकड़ा अर्जुनके बतलाने वाले को, ।१८। और जो भर्जुनका दिखलानेवाला पुरुष इसकोभी थोड़ामाने तो जोवह | मांगे वह दं. इसके विशेष जो जो मेरा धन है और वह चाहता है वह सब उसको dray cars and decked with gold ornaments. I sball also give him four bundred cows with golden horns and calves. But if he thinks this insufficiunt, I shall give him moie. I shall give him five hundred white horses decked with golden ornaments and jewels. Besides this I shall also give hito eighteen Camboj hoises, of white colour, decked with gold ornamente If he think this too, insufficient, 1 sball give him more. I shall give him six hundred well- trained telephants of Western country. decked with garlands. If this too, be insufficient,. Ishull add toit fourtean prosperous villages, full of forests and grazing grounds, worthy of kings and free from danger. 17, I shall give tho man, who shows Arjun to me, a hundred slave girls. If this be [ 6428} Mahabbarat पाण्डवं पय्यपृच्छत ॥ १ ॥ यो ममान महारमामं दर्शयेत श्वेतवाहनम् । तस्मै वामभिप्रेतं धनं यन्मनसेच्छति ॥ २॥ स चेसदभिमन्येन तस्मै दयाहं पुन: । बाकट रत्नपूर्णश्च यो मे व्यावनञ्जयम् .., ३. स चे सदभिमन्येन परपोजन दुर्तिवान् । शश दद्यां गया तो नेत्यक कांस्पदोहनम् ।। ४ । शतं प्रामघरात दयामर्जुनदर्शिने । तथा तस्मै नद्यां वेतमश्वरीयम् । पुकमजनकेशी भिर्यो मे स्याङ्कन अयम् ॥ ५ स चेसभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् । अन्य तरस घरं दद्या सौवर्ण हस्तिषट् गवम् ॥ ६ ॥ तचात्यम्मै पुनदो खीणां शतमल कृतम् । श्यामानां विष्फकण्ठीनां गीतवाद्यविपश्चिताम् ॥ ७॥ स . चत्तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शियाम् । तस्मै दद्या शत नागान् शतं ग्रामान शतं रथान् | c सुवर्ण. स्य च मुख्यस्म हयाप्रयाणां शवं शतान् । ऋभ्या गुणैः मदान्तांध धुर्यशाहान युद्ध में प्रत्येक को देखकर पाण्डवों से कहा। । ।कि इस समय जो पुरुप महात्मा अर्जुन को मुझं देिखावे उसको मुंह मांगा धनदू । २ । और जो वह पुरुष उसको भी थोड़ा जाने उसको मैं रत्नों का भराहुआ एक शकट दूं। 1 और जो अर्जुन का बतलाने वाला पुरुष उसको भी थोड़ा पाने तो मैं उस को भोजन और कांस्य दोहिनियों समेतसौ गोदू४िामर्जुनके दिखलाने परसौ उत्तम गांवदूं और खच्चरों समेतरथभीदूं अथवाइन संवकोभी थोडाजानेतोमैं उसकोकृष्णकेशोंसेशोभित स्त्रियोंको 1५। जो अर्जुन का दिखलानेवाला इसको भी साधारण जाने तो उसको सुनहरी हाधी के समान छ: बैलों से युक्त स्थदं. ६ । और इसीप्रकार ,उसे ऐसी | वस्त्रालंकारयुक्त स्त्रियों का एक सैकड़ादंगा जोकि निष्ककी माला. धारण किये गतिवाद्य में कुशल श्यामांगी हो ।। अथवा जो अर्जुन का दिखलानेवाला उसको भी कमजान उसको सौ हाथी सौगांव सौ रथ । ८ । और दशाहजार मुवी से युक्त सुशिक्षित हृष्ट पुष्ट रथके ले चलन में समर्थहोंय ऐसे घोड़े दंगा । ९ । और सुवण श्रृंगों से युक्त सवत्सा चारसी गौवेंदूंगा जो अर्जुन का 'दिखलाने वाला Panday warrior, saying, "I shall give to tha man who may show great, Arjun to me, as much stealth as he wants. And if that be insufiçient, I shall give him a çart load of jewels. If this too, bo insuf. ficient, I shall add a hundred ,cows with brazen milk pots. To one who shows Arjúp to me, 'I şhall, gire a bundred good 'villages and cars drawn by mules, If this be insufficient, I shall add to it women with black hair.5. If the above be insufficient, I shall give the man, who shows Arjun to me, six oxen, like slephants, decked with gold. Ishall also give him a hundred women, decked with fine clothes and orne ments, garlanded and skilfulin singing and talking. If this be too small, I shall give him & hupdred elephants and p3 many villages and care. I shall add to itten thousands of houses, well,tipined, healthyfitto (१४२९) कर्णपर्व Karan Paray [5429] सुशिक्षितान् ॥ ९ ॥ तथा मुघर्णशङ्गीणां गोघेन्ना चतुःरातम् । दो तस्मै सष साना यो मे ध्याउनम्ञयम् ॥ १० ॥ स घेतदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिधान् । मन्य तस्मै घरं दधा श्वेतान् पशवान हयान् ॥ ११ ॥ हेममाण्डापरिजनन् समृष्टमणिभूषणान् ॥ १३॥ सदान्तानपि वाहं दद्यामप्टादशापयन् । रयश शुभ्र सौवर्ण दया तस्मै स्वलंकृतम् । युक्तं परमकाम्बोजयों मे व्यास नजयम् ॥१३॥ मतदाममम्पेत पुरुषोल्जुनदर्शिवान् । भन्य तस्मै घर दया कुजराणां शतानि। घट १४ ॥ काऽधनर्षिविधर्माण्ड संछन्नान् हेममालिनः । उत्पन्नानपरान्तेषु, निर्मातान हस्तिशिक्षकः ॥ १५ ॥ सवेत्तदभिमन्येत पुरुषोजनंदर्शिघान् । मन्य तस्मै परं दद्यां घेश्वग्राम्यश्चतुर्दश ॥ १६ ॥ सुस्फीतान धनसंयुक्तान् प्रत्यास., भवनोदकान् । अकुतोमयान् सुसम्पनान् राजभोज्यांश्चतुर्दश ॥ १७ ॥ दासीनां निफकण्ठीना मागधीनां शत तथा । प्रत्यप्रययसा दयां यो.मे व्यायनञ्जयम् ॥१८॥ सचदभिमन्येत पुरुषार्जुनदर्शिवान् । अन्य तस्मै घरं दद्यां यमसौ कामयेत् हो ।१०। जोवह पुरुष इसकोभी थोड़ामाने उसकेलिये दूसरावरदेकर पांचसो घोड़े जोकि श्वेतवर्ण भोर सुवर्णसे मांडत स्वच्छ मणियों के भूपणों से अलंकृतहों ॥१२॥ इसके विशेष मैं अठारह अच्छे शिक्षित अन्य घोड़ोंकोभी दूंगा. और, अति..उज्वल मुरण से अलंकृत कांबोजी भी घोड़ों से युक्तरथ दूं। ११ । जो अर्जुन का, दिख- लानेवाला पुरुष उसको भी न्यूनसमझे तो दूसरा दानंद, अर्थात नानाप्रकार के सणं, भूपयों से और मालाओं से, अलंकृत पश्चिमीय. कच्छ देशों में, उत्पन्न और माल्यवान् हाथीवानों से शिक्षित छ। सौ हाथी दं और जो इसको भी थोड़ा माने 1.१६ । उसको बहुत वृद्धि युक्त धनसे पूर्ण वन जंगलवाले ऐसे चौदह गांव, जो निर्भय और अच्छे राजाओं के मोगने के योग्य होय । १७ । इसीप्रकार निष्ककी मालाधारण करने वाली मगधदेशी दासियों का एक सैकड़ा, अर्जुनके बतलाने वाले को, ।१८। और जो अर्जुनका दिखलानेवाला पुरुष इसकोभी थोड़ामाने तो जोवर मांगे वह दं, इसके विशेष जो जो मेरा धन है और वह चाहता है वह सब उसको draw cars and decked with gold ornaments. I shall also give him four bundred cows with golden horns and calves. But if he thinks this insufficiunt, I shall give him moe. I shall give him five hundred white horses decked with golden ornaments and jewels. Besides this I shall also give him eighteen Camboj horses, of white colour, decked with gold ornaments If he think this too, insufficient, I sball give him more: I shall. give him sir hundred well- trained telephants of Western country, decked with garlands. It this too, be insufficientia I shall add to it fourteen prosperous villages, full of forests and grazing, grounds, worthy of kings and free from danger. 17, I shall give the man, who shows Arjun to me. a hundred slave girls. If this ba (6430) Mababbarat स्वयम् ॥ १९॥ पुत्रदागन विहारांश्च यवन्यडिसमस्त मे । तच्च तस्मैवरचा पंचच्च मनसष्ठति ॥ २०... हत्या च सहिता कृष्णी तपोर्षितानि सर्वशः । तस्मै दयामहं यो मे प्रन्यात केशवाजुंनो, ॥ २१ ॥ पता पाचः सणुशः। उपचारपन् युधि । दमी सागरसम्म मुस्वरं शंखमुत्तमम ॥, २२ ॥ वाचार: 'सूतपुत्रस्य ययायुक्का निशम्य ह । दुर्योधनो महाराज संहष्टः सानुगोऽनपद ॥ २३ ॥ ततो दुन्दुभिनिर्घोषी माना सर्वशः। सिंहनादः सादिनः कुम्जरा, णाच निधना ॥ २४ ॥ 'प्रादुरासीत्तदा राजन् सैन्येषु पुरुषर्षम । सोपान सत्र धष्टानां तथा समभवत् स्वनः ॥ २५ ॥ तथा प्रहप्ठेसैन्ये तु लवमान महारपर। षिकरथमानच तदा राधेयमरिकर्षणमः । मद्रराजः प्रहस्य वचनं प्रत्यक्षाता॥ इति श्री कणपर्याण. त्रिपुरवधोपख्याने यस्त्रिंशाऽध्यापेः ॥ ३४ देसक्ताहूं जो अर्जुन को मुझे बतावे व दिखाये । २० । श्रीकृष्ण और अर्जुनको एक समय में ही मारकर उनका संबधन उसको दूं जो अर्जुन और श्रीकृष्वानी को मुग्ने दिखायें । २१ । युद्ध में ऐने बचों को कहतेहुये कर्ण ने समुद्र से उत्पन हुये अपने शङ्कको बमाया । २२ । हे महाराज कर्ण के इन वचनों को पुनकर दुर्योधन अपने साथियों समेत अत्यन्त प्रसन्नहुमा । २३ । इसकपीछे हे. पुरुषोत्तम | दुन्दुभी भादि मृदंगों के सब प्रकारके शब्द वा बाजोंसमेत सिंहनाद और हाथियों के शब्द । २४ । सेनाओं के मध्यमें प्रकटहुये इसी प्रकार अत्यन्त प्रसन्न चित्त शुर- वारों के अनेक शब्दहुये। २५ ।' तव तो सेनाके प्रसन्न होनेपर राजामद सिकर | उस शत्रुओं के विजय करनेवाले और अपनी प्रशंसा करतेहुये जानेवाले महारथी कणसे यहवचन वोला २६ ॥3 insufficient, I shall give him more. I can give him whatever he asks out of my cherished wealtb, I shall slay Arjun and Krishn at the same time and shall give their wealth to him who points them, out to me." Having said this, Karag bless his sea born conch, Duryodben and his brothers were much pleased to hear Karan's words. Then the musical instruments were sounded and the warriors roared leonine roars with glee. At these signs of pleasure, the king of Madra laughed and said to Karan who was thus p aising himself. "26. ...
(१४३१) 619 liaran l'arv [6031] शल्य उवाच ।मा मतपत्र दानेन सौवर्ण हस्तिण्ड गवम् । प्रयच्छ पुरुषायाध इस्वसिधधनंजयम् वाल्पादिहत्यत्यजसिधमुक्षेप्ररणोपया भयानेनैवधियभ्रष्टास्य यमगंजयम्॥२॥पराजसियवित्तंकिंचित्यवहुमूढयत् अपात्रदानेये द्रापालान्मोहान्नाव हुण्यस H३ यरवं प्रेरयस येसं पातेन खलु स्वशाशक्य बहुविधेपोयटन पास्त्र ते ४ यश प्रायसे हन्तुं कुणी मोहात पृथैव तत् । नहि शुभुम समरें कोटा सिंहो निपातितो ॥ ५ ॥ भप्रार्थत प्रार्थयसे सहदो न हि सन्ति । ये रस निधारयस्पाग प्रपतन्तं इताशने ॥ ६॥ कार्याफार्य न जानीये कालपक्षो ऽस्यसंशपम यहवयममार्गीय को हिध्याबिजीविपुः ॥ ७॥ समुद्रताणं हो. भ्यांकण्ठे यया यथा शिलामगिर्यप्राशा निपतनं तारक तष विकीर्षितम् ॥ ८ ॥ अध्याय ३१॥ शल्पबोले हे भूतपुत्र दान करनेसे बन्दहो तू मुवर्णमय हाथी के ममान छ। बलों से संयुक्त रथको मतदे तुम अर्जुनको देखोगे । १ । हे राधाके बेटे तुम यहां बालबुदिसे अज्ञानों के समान धनको देतेहो भब तुम बिना उपायकेही भर्जुनको देखोगे ।। तुम प्रज्ञानियों के समान जो निरर्थकपनकांदतेहो भपावके दानदेनमें जो दोष उनकोभी अपने मोहसे नहीं जानते हो । । ।जो तुम बहुतसे धनको देतेहो उसपनफेदाग तुमको उचित है कि यज्ञोंको करो ! ।। जोतुम अपनी प्रज्ञानसासे श्रीकृष्ण भार अजुनको मारना चाहतेहो वह निरर्थको श्रृगालोंसे सिंहोंका मारना हमने नहीं मुनाह । ५ । तू अमार्थितको चाहताई वरे शुभचिंतक मित्रनहीं है जोकि तुझको अग्निमें गिरतेहये नहीं रोकतेहै । ६ । तू शुभाशुभकमीभी नहीं जानता है और मिसान्देर तू कालके गालमें फंसताई जीवनका चाहनेवाला कौन पुरुष सर्वधा निष्प्रयोजन भार सुनने के अयोग्य वार्तामोंको करे । ७ । जैस कि.गले में पत्थरकी शिलाको बांधकर समूद्रमें पैरना चाहै अथवा पर्वत के शिखरते गिरनाहाय वैसेही मकारका तेरा इप्सितकर्मई । ८ । जो अपना कल्याण चाहतहो CHAPTER XXXIX Shalya said, "Stop giving donations, ton of Sut for you will tea Arjun today, without your giving a car drawo, by six elephant-liko You are foolislily offering wenſth like children, though you will soa bim without exertion on your part. Like Tools you ure needlessly offering woulth and dunot, on account of your stupidits, kuor the harms artending the gift of wealth to the undeserving. You can perform inany sacrifices with the wealth you tlnus offer, Your fulisla desire to blay Krishu and Anjun is vain; cay a jackal alay a lion ! 5. You wisla to obtain things which are impossible lave you no friends who could keep you back from fallug into firu? You donot Luow whe. thor a thing is proper to do or not and would fall in the jaws of death; Oxen, 6432.) Mahabharat [१४३१) सहितः बर्ययोपस्यं न्यूदानीकैः सुरक्षितः । धनम्जयन युध्यस्थ भैयक्षेत् प्राण मिच्छसि ॥१॥ हितार्य धाराष्ट्रस्प ग्रामि त्वां न हिंसपा । श्रयत्वैवं मया प्रोकं यदि तेऽति जिजीविषा ॥१०॥ कर्ण उवाच । स्वधाहुवीर्यमाश्रित्य मार्य पाम्यर्जुनं रणे । वन्नु मित्रमुखः शमीमापयितुमिच्छति, ॥ ११ ॥ न मामा दभिमायात् कश्चिदद्य निवर्तयेत् अपीन्दो पत्रमुधम्य. किमुमर्त्यः कथञ्चन ॥ ११ ॥ सम्ज उवाच । इवि:कर्णस्य वाक्यान्ते शल्यः प्राहोचरं बचः। चुकोपपिपुरत्यय कणे मद्रेश्वरः पनः ॥ १३ ॥ यदा घे फाल्गुनवेगमुक्ता ज्याचोदिता, स्तरता विसष्टाः । अन्धेतारः कङ्गापत्राः शिताप्रास्तदा नुप्स्यस्पर्जुनस्यानुयोगात् ॥ १४ ॥ पदा दिज्य धनुरादग्य पार्यः प्रतापपान पृतनां सपसाची । त्वामहयिष्यनिशितैः तो तुम सब योद्धाओं से युक्त सनीहुई अपनी सेना समेत भर्जुनसे युदकरो । ५ । मैं दुर्योधनकी दृद्धिकेलिपे तुझसे कहताहूं जोतू जीवनकी इच्छा रखता है तो मेरे वचनोंको शत्रुता और ईपीसंयुक्त ना जान । १० । कर्ण वोला मैं अपनेही भुजबल के आश्रित होकर युद्ध में अर्जुनको चाहवाहूं, हे उत्तम मित्र तुम शत्रुरूप होकर, मुझको भयभीत करातेहो।। ११ । अब मुझको मेरे इस विचारसे कोई भी नहीं हटा सक्तानो इन्द्रभी वज दिखाकर मुझको युद्धसे निटत्त कियाचाहै तो नहीं.निवृष होसता । १२ । संजय बोले कि फिर कर्ण को क्रोधयुक्त करनेकी इच्छस मद्रदेश के सामी शल्पने कर्णके बोलनेके पीछे इस- उत्तररूप वचनको कहा ।।१३ । कि जभर्जुन के वेगसे युक्त प्रत्यंचासे प्रेरित तीन हार्थोसे छोड़ेहुये कंकपक्षसे जटित तीक्ष्ण नोकवाले वाण तेरे सम्मुख आयेंगे तब तू अर्जुनके विषयमे ऐसे पचन कहने । को दुखी होगा। १४ । जवसेनाको संतप्त करताहुधा तुझको तीक्ष्णनोकवाले बाणो से मर्दन करना चाहनेवाला अर्जुन अपने दिन्या घनुपको लेकर तेरे सम्मुख भावेगा That, persoas. wishing long life, will indulge in taiking nonsense ? Your alteinpt is like that of him who, with a stone rtund his neck, wishes to strim accross the ocean, or of one who could jump down from a muntain. Fight with Arjun with the help of all your army; it Wishi to seek your own welfare. I say this to you for the gond of Düri godhár; you must not think that I do so for malice,"10. Karan: *** It is with the strength of my own arins that I wish to fight with Arjun; being a friend, you terrify mo like an enemy, Esen Indra caunot turn me back from my purpose." Sanjaya said, “ Wishing to enrage Karan the more, Shalsa continued by way of roply, ". You will regret Faying so with regard to Arjum, when you wiln' meativith his stiarp pointed arrow, fitted, sith Kank feathers, and discharged 'with's fore You will be sorry, when Arjun comes on with his célestial boss, you (६४३३) कणपर्व Karan Paray (6433) पृपतया पश्चातप्स्यसे मतपत्र १५ । बालचन्द्र मातुरङ्ग शबानो यथा कथित शार्थयतेऽपाम् । तन्मोडात घोतमान रथस्थत्य प्रापस्पर्जुन जतु प्रिवालमाधिस्य सूतीक्ष्ण धार सर्वाणि मात्र णि निधर्षसि त्वम् । मतदणधागपमकर्मणा व युयुत्ससे योऽर्जुनैनाच कर्ण ॥ १७ ॥ द सिंह केश, रिक्ष यात याला मूढ क्षुद्रमृगोऽनरस्यो ! समाहवयेवदतत्तवाध समापन सूतपुत्रार्जुनस्प मा मतपुत्रापि राजपुत्र महावीर कशमि पवैष । बने धृगाळ पिशितस्य तृप्ता मा पार्थमासाय पिनयास त्यम् ॥ ९॥ शादम महलाय प्रभित्रकरटामुखम् । सरकारक्यसे युरे कर्ण पार्थ धनन्जयम् ॥ २० ॥ पिलस्य कृष्णासपंव वाल्यात काठन विध्यास । महाविष पूर्णकोप पत् पार्थ यांच मिच्छसि ॥ २१ ॥ सिंह केशारण कुसमतिफम्याभिनईसे । भृगाल इस सदस्य तब हे मूतपुत्र तू महादुखी होगी ! १५ । जैसे कि माताकी गोदीमें कोई सोताहुआ बालक चन्द्रमाके पकड़ने की इच्छा करता है उसी प्रकार भववम इस स्थकर सवार होकर प्रकाशमान अर्जुनको अपने मोहसे बिजप किया चाहत।१६। हेकर्ण भव तुम अत्यन्त तीक्ष्णधार वाले त्रिशूल से चिपटकर अपन भगोंको घसीटतेहो जो कि अत्यन्त ताण धारवाले त्रिशून कर्मी अर्जुन के साथमें लड़ना चाहतेहो । १७ । जो कि प्रज्ञान बालक वा वेगवान नाचम्ग क्रोधयुक्त बडे केसरी सिंहको युद्ध के निमित्ति बुलावे हे मूतपुत्र इसीप्रकार सेतूभी भर्जुनको बुलाता है। १८ । हेमनके पुष तू राजकुमार को मतबुलावे जैसे कि मान्स नृप्तहुआ श्रृंगाल बनमें केसरी सिंहको नहीं बुनासक्ता उसी प्रकार तुम अर्जुन को प्राप्त होकर अपना नाशकरना पहितहो सो मतकरो । १९ । जैसे कि श्रृगाल ईशाके समान दांत रखनेवाले मुख और गंडस्थळ से मद माइनेवाले बड़े हाथों को युद्ध में बुलारे हे कर्ण उसी प्रकार तुम पाण्डर मार्जुनका बुलातहो । २० । तुम अपनी अज्ञानता और रल बुद्धिसे विलमें चैटेहुये क्रोधयुक्त महा विषधर कालसर्पको लकडी से मारतहो जो मनस युद्ध करना चाहनेहो । २१ । हे कर्ण अब श्रृगाल रूप अज्ञानहोकर तुम destroying the armies and shooting his sharp arrows at you. 15. Like a child who, being in the areas of its mother, wiebes to catch the Pegowa yuw masik,ts couquor glomous arjea fim the ear Chagring to a sharp edged dirt, you lub your body agasrst at 19 as much as you yould meet in battle with Arjuu who worhs lhe a trident Your challenge of Arjun to fight is like that of a weak deer against a lion. Dorot challango him, son of Sut, for you will love your life Jackal satisfied with meat, does on challenging a lion You challenge Arjun to light, lila a' jacbal,'challenging & mad elephant of large Your wish to 'bght with 'Arjun valiio beating out a vopomous blarla serpent with a stick, Like a foolish jackal you bark ANB lusks.20 {643 Jala blistat नृसिह कर्ण पाण्डपम् ॥ २२ ॥ सुपर्ण पतगभ्रेष्ठं वैनतेयं तरस्थिनम् । भागो वाहनसे पाते कार्ण पाय धनअपम २३ ॥ साम्भा निधि भीमभूमिमग्न प्राधिनमा चन्द्रोदय विषदन्तमश: मन्तितीति : २४॥ ऋषभं दुन्दुभिप्राय नणि पहारिणम् । घन्म भागयत युर फर्ण पाय धनञ्जयम् ॥ २५ मा मेध महाघोर दरः मतिनसि कामनायाद लोक नरपर्जन्यमर्जुनम् ॥ २६ ॥ यथा व सगृहस्थः इशा गानं बनगतं भवेत् । तथा स्वं भरसे कर्ण नरव्याघमजयम् गालाऽपि बने कर्ण शशः परिवृतो पसन् ।, मन्यत मिहमात्मानं यावत् सिंहं न पश्यति ॥ २८ ॥ तथा त्वमपि राधेय सिंहमारमानमिसि अपयर शा दमन नरम्यान धन अयम् ,२९ ॥ मनं स्वं मम्सस्मानं यावत् कणीन कसरी सिंहरूप क्रांधयुक्त नरोत्तम पांडव अजुनको उल्लंघन करके गर्नते हो । २२॥ और सर्प के समान तुम अपनी मृत्यु के लिये मुन्दर पक्षवाके अनुत पराक्रमी गरुड़ के समान वगगन महाबली पाण्डन अर्जुन को बुलातेहो । । । सप जलों के स्वामी भयानक मत्स्पादिक जीवों से ब्याप्त चन्द्रोदय में मसम रूप हारे पानेवाले मूर्तिमान समुद्रको भुजाओं से तरनाचाहतेंहो । २४ ।' हे कर्ण बछड़े के समान तुम दुन्दुभीरूप क्षुद्रघंटिकाओं के शन्द रखनवाले होकर तीक्ष्ण शृगसे घात करनेवाल बड़े पैसके समान पांडवअर्जुन को युद्धमें बुलातहो । २५ । सुमं महक के समान होकर लोकमें घोर जल परसानेवाले, नररूप वादल के समान अजुन के सम्मुख पेस गर्जते हो। २५ । जैसे कि, अपने घरमें नियंत कुचा वन में वर्तमान व्याघका अपने स्थान से.. भोंकता है, उसीकार तुमभी कुत के, समान नररूपव्याघ्र अर्जुनकी भेर का भोंकेतहो । २७। ई कर्ण खरगोशों से युक्त शृगास भी.वनमें निवास करता हुआ अपेनको उस समयतक सिंहरूप मानताई जबतक कि सिरको नहीं देखता है । २८ । हे. राधाके पुत्र इसीप्रकार शत्रुओं के यिनय करने गले अर्जुनको न देखके तुमभी अपने को सिंहरूप मानर हो ।२९ । जबतक एक रथपर सूर्य और चंद्रमाके समान नियत श्रीकृष्ण और अर्जुन को नहीं देखतही at lwn like Arjun, You challenge Arjan to fight as wake does a garut ul matchless prowess. You wish to cross with yourarins the ootan, wherein dreadfut acquatic uniwala live, wben it is uwollen at ithe full moon. like a calf decked with small tinkling bells you wish to encounter Arjun who is like a bulliesdy'to attack with butas. '25. Like a frug you cr uk at the cloud.like form of Arjun. Like. a dog whicl, bang at lionu, bai ke at # lion, you bärk át'Arjun. "A Irjaskal living in the midst of thenti, tirints himself to be a fion as long as hu las not been a liun. You think yourself's tiger s louig as you Jihare not seen Kiisha and Arjun Sented on the same car file ths - (६४३५) कणपष Haran Paray (64351 पश्यसि । समास्पितावकरथे सूर्याचन्द्रमप्लाविध ॥ ३० ॥ पाषष्टापहीनिधीष' राणोषि महाये तावदेव रेवया कर्ण शक्य वक्तुं यच्छसि ।। ३१ ॥ रघशम्म घनःशब्देनादयन्तं दिशो दश । मन्तमिष शार्दूल रएषा काप्टा भविष्यास ॥ ३२ ॥ नित्यमेष श्रृंगार निस्पं सिंह धनजयः । वरिपरिणाग्मद तस्मात क्रोष्टेष लम्प से ॥ ३३॥ यथायः गाविडाल श्षा म्याघ्रश्च यमायले । पथा नागाल: सिंहस पथा च शशकुञ्जरी॥१४। थानृतश सत्यं यथा चापि विषामृते । तथा बमपि पार्थध प्रण्यातावात्मकर्मभिः ॥ १५ ॥ इति कर्णवाण पाल्पस्य कर्णसारथ्यस्वीकार पञ्चत्रिशाऽध्यायः १५ ॥ . तबतक सुम अपनी आत्माको न्याम मानतेो। ३० । हे कर्ण जबतक कि तुम युद्ध में गांडीव धनुपके शन्दको नहीं सुनते होतभातक तुमजो चाहो मुखसं वालम्हेहो।३।। रथ और धनुषों से दशादिशामों को शब्दायमान करनेवाले और शार्दूल के समान गर्मने वाले अर्जुनको देखकर तू गृगालरूपहो होजायगा ।।२। तुम सदैव शगालरूप हो और अर्जुन सदैव सिंहरूप है हे अनाने इस कारण वरिलोगों से शत्रुता करने में त सुगाल के समान दिखाई देताहै ।। जैसे कि चूहाविलार और महावन में कुत्ता और व्याघ्रशेय और जैसे शृगाल और सिंह हॉप और जिसमकार गोश और हाथी हॉय। ३४ । मया मिथ्या और सत्य वा विप और अमृतहोय उसीमकार तुम भोर भर्जुनभी अपने २ कर्म से विख्यातहो । ३५ । Sua and moon. 30 You are talking nonsense, O Karao, so long as you have not heard the twang of the Gandis bow. You will be turned into a jackal at the sight of Arjun who fills the directions with tbe sound his of bory and laopine rodrs. You are like a ja, kele, while Arjun jg like a lion; for you slink away like a, jackal in the presence of warriors. You and Arjun are famous lor your deeds like a rat und acat, ajackal and a lion, a hare and an elephant, falsehood and truth, or poison and antedote." 35. 1 (5436] Mahal,hartb समय उवाच । अधिक्षिप्तस्त राभेयः शल्येनामिततेजसा । शल्यमार मुसंधु सो वाफशल्पमधारयन् ॥१॥ कर्ण.उवायः। गुणान गुणवतां शल्प, गुणवान वेति नागणः स्यन्त सर्वेगुगैहीनः किं वास्वागणागुणम: ॥ २. ॥ अर्जुनस्य महामाणि को धीय धनुः शरान् । महशल्य विजानामि विक्रमंच महामनः ॥३.तर कृष्णस्य माहात्म्यमृषभस्य महीक्षिताम । यथाई शल्य जानामि नरवं जानासि तवा .!!, ४ ।। एवमेषात्मनो धार्यमहं वीर्यच पाण्डवे । जानन्नेवाइयये युर शल्प नाग्नि पतझवतं ॥ ५॥ अस्ति चायमिषुः शन्य मुमुखो रकमोजना एकतणीशया पत्री सुपौत: समलंकृतः ॥ ६॥ शेते चन्दनचर्णन पूजितो यहुलाः समाः । माहेयो विषधानमो नराश्वविसंघहा ... .. घार महारदस्त नुप्रास्थिविदारणः । निर्भिया येन रुष्टोऽमहपि मेरु महागिरिम ॥ ८ ॥ तमई जातु नास्येपमन्यस्मिन् अध्याय ४० संजय बोले कि तेजस्वी शल्य से निन्दा कियाहुमा कर्ण अत्यन्त क्रोधयुक्त होकर बचन लामालों को धारण करताहुआ.वोला.। १।.कि हे. शल्य, गुणवानों के गुणों को गुणवानही जानताहै गुणहीन मनुप्प नहीं जानता है, तुम गुणों से रहितहो. इसीसे गुण और अवगुणों को क्या जानसक्तहो । २ । हे शल्य में महात्मा अर्जुन के बड़े अखों को वा क्रोध. वल पराक्रम धनुष और वाणों को अच्छे प्रकार से जानता हूं। और रानाओं में वा यादवों में श्रेष्ठ श्रीकृष्णजीको भी महानता को.जैसा कि मैं जानताई वैसा तुम नहीं जानतही ४ मैं अपने और पाण्डवों के.पराक्रमको अच्छेप्रकार से जानता हुआ युद्धमें उसगांडीव धनुपधारीकोबुलाताई नकि भग्नि और पतंगकीनाई। ५ ।हे. शल्प, यहसुन्दर पुंखवाला रुधिर पानवाला तरकस में अकेला.ही रहनेवाला स्वच्छ , अलंकृत । ६.चन्दन से लिय बहुत वर्षों से.पूजित सर्पकर विषधर उग्रमनुष्य. घोड़े और हाथियों के समूहोका.मारनेवाला । घोररुद्ररूप कवच समेत अस्थियों का चूर्णकत्ती जिसके द्वारा मैं क्रोधयुक्त होकर मेरुपर्चत सरीके पड़े पर्वतों को भी चीर हालवाह... मैं अर्जुन भोर CHAPTER XL Sanjaya said, Insulted by shalys, Karan was much enraged and thvia spoks to him. Worthy misn koon the worth of the worthy me. Biog yourself uoworthy, you can not knoir about merits and deworits: 1 know sell the morite and strength as well as the baw andånd atrows of Arjun, I know also the worth of Shri Krishn tho bost of Yadavas and kinge'as you do not knowing well the strength of the Pandavas and my self, I challenge the wielder of Gandiv to hght. Vy case is not that of inseeta and fire.5. This deat, OSealya,itted with beautiful feathers, blood drinking, kept singlo in a quiver, clean, sandal-pustod, For. shipped for long years, lika 2.rebomaos soako capible cf slaginy wed, ।
- कर्णपत्र Karan Party [6437 } फागताते ! कृपयाहा देवकोपुनाव सत्यश्चात्र शुध्ध मे ॥ १॥ तेनामिषुणा शल्य धारदेवधाज्ञो । पोररूपे परमसंभ बस्तत कम समय मम ॥ सर्वेषां वृष्णि धाराणां कृप्पो लक्ष्मी प्रतिष्ठिता । सर्वेषां पाण्डपुत्राणां जयः पार्थे प्रतिष्ठितः ॥ १९ ॥ अभयं तत् समासाद्य कोऽतिपहिंतुमईति तावुभौ पुरुषन्यानो समेतो स्पन्दने स्थिती ॥ २२ ॥ मामेकमभिसंघाती मुजातं पश्य शल्प मे । पितृप्यसामातुलजी भ्रातरावपुरा शियो मपी सूत्र इव प्रीतो द्रष्टासि निहती मया ॥ १३ ॥ अर्जुने गाडय फष्णे चमं साक्ष्यकपीध्वजो। भारणा त्रासजननं शल्य हर्थकर मम ॥ १४॥ खन्तु दुध कृतिमंदो महायुद्धेवकोविदः । भयावदीर्णः सत्रासादवई यह मापसे ॥१५॥ तो इत्या समरे हन्ता त्यामय सुक्ष्वान्यषम । मुहत्या रिपुः कि मां कृष्णाभ्यां भीषयस्थ देवको नन्दन श्रीकृष्ण के सिवाय उस बाणको कभी दूसरे पर नहीं चलाऊंगा इसहेतु से मैं सत्य वचन कहताहूं ! १ । में अत्यन्त क्रोधयुक्त होकर उस वापसे भर्नुन और वासुदेवजी से लहूंगा यह कार्य मेरेही योग्य है । १० । सब बाणा वंशी वारोंकी लक्ष्मी श्रीकृष्ण जी नियत है और सब पाएडवों की विजय अर्जुन में लियत है । ११ । इससे अब दोनों को एक स्थपर पाकर कौन लौटसक्ता है । १२ । मुझ अकेले के सम्मुखहोनेपर हे शल्य मेरे युद्धकी शोभा को देखना बुभा और मामा के बेटेअजेय दोनों भाइयों को सूतमें पोहीहुई दोमणियों के सहा मेरे हाथमे मृतकही देखोग । १३ । अर्जुन के पास गांडीव धनुप है श्री कृष्णके पास सुदर्शनचत है और गरुड या हनूमानजी के रूप रखनेवाली दोनों ध्वजा हैं हे शल्य भयभीतों को भपके उत्पन्न करनेवाले और मेरी मसमताके बढानेवाले बह.दोनों हैं । १४ : दुष्टमकति अज्ञानी .महायुद्ध में अनभिज्ञ भय से विदीर्ण चित्त.तुम भयभीतहोकर बहुत से भपकारी वचनोंको कहतेहो । १५ । अब युद्ध में इनदोनों को मारकर तुझको भी बांधयों समेत महागा तू मित्रहोकर शव horses and elephants, of dreadful form, breaker of bungs and armours, with which I can.break through,mountains, has been reserved by me for Arjun and Vasudey and for no pther. I shall fight with Arjun and Vasudey by means of that arrow, This work is worthy of me. 10. The prosperity of the Vrishvis depands upon Krishn and the conquest of the Pandavas depends upon Arjun, Finding..both of them together, on the sauja car, who can return from fishing, You will see, Shalya, the beauty of my fighting, at the time of encounter. You will see the tạo cousins (Krishy and:Arjun ), like two beade strung in the same thread, pierced ad slain. Arjus possesses the gandiy bow, and Shri Krishn wieds, the discus, knows/ es Sudarshan, and they have thoịr „standards of çarese, and monkey Both give joy to ms and are the causes ofesr to the timid."Word alगाथा '(6438) Mababbarat (६४३०) लम् ॥ १७॥ तो वा ममाद्य हन्तारौ हनिप्ये वापि तापहम् । नाई विभमि कृष्णा भ्यां विज्ञाननात्मनो बलम् ॥ १८ ॥ पामुदेवसहसं वा फाल्गुनानां शतानि या। अहमेफो हनिष्यामि जोपमास्स कुदेशज । १९ ॥ खियो पालन्ध वृयाश्च प्रायः फ्रीड़ागता जनाः । यागाथाः संप्रगायन्ति कुर्यन्तोऽध्ययनं यथा ॥ २० ॥ शुण मे शक्य मद्रकेषु दुरात्मम ॥ २१ ॥ ब्राह्मणैः फथिताः पूर्व यथावराजसधि- धौ । श्रुत्वा चम्ममा मूढ़ क्षमा बर्हि घोचरम् ॥ २२ ॥ मित्र मद्रको नित्यं यो नो द्वेष्टि स मद्रकः । मद्रफे सङ्गतं नास्ति क्षुद्रयाक्ये नराधमे ॥ २३ ॥ दुरात्मा मद्रको नित्यं नित्यमानृतिकोऽनुजः । यावदन्तं हि दौराल्पं मद्रकेप्यिति नः श्रुतम् ॥ २४ ॥ पिता पुनश्श माता च यथुझ्यशुरमातुलाः जामातादुहिता भ्राता नप्ता तेते बान्धवाः ॥ २५ । पयस्याभ्यागताश्चान्ये दासीदासाच सङ्गतम । भिििममा के समान मुझको श्रीकृष्ण और भजन से क्या डराता है । १७ । यातो वह दोनों | मुझकोही मारेंगे वा मही उन दोनों को मारूंगा मैं अपने पराक्रमको जानता हुआ श्रीकृष्ण और अर्जुनसे नहीं डरताहूं।१८। मैंअकेलाहीहजारो वासदेवों और कड़ी अर्जुनों को मारसक्ताहूं हे दुईशमें उत्पन्न होनेवाले मौनहो । १९ । दुष्ट अन्तप्करण वाले मद देशियों के विषयमें क्रीड़ाके निमित्त इकट्ठे होनेवाले स्त्री बालक वृद्ध मनुष्यबहुधाजिनकथाओंको गानकरकेपढ़ाकरते देशल्यउन गाथाभोंकोमुझसमुनो २१ औरपूर्वसमयमें इन्हीं कथाओंको राजामों के समक्षमें ब्राह्मणोंनेभी जिस प्रकारसेवर्णन करीहै हे अज्ञानी तुम उनको एकाग्रचित्त से सुनकर क्षमाकरमा वा चारदेना२२ । मद्रदेशी सदैव मित्रसे शत्रुता करनेवाले हैं जो हमसे शत्रुताकरता है हग उसको मद्रदेशा ही जानते हैं मद्रदेशी में मेल मिलाप नहीं होता है औरआपस में तुद्रश्चन वोला करतेहैं । । हमने सुना है कि मदेशीयलोग सदैव दुष्टात्मा मिथ्यावादी और कुटिलहोते हैं । २४ । पिता, माता, पत्र, सास, सहर, मामा गामात्र, लड़की | भाई, पोते, वांधव और समान अवस्थावाले, अभ्यागत, और अन्यदासी दासमादि talking nonsense on account of fear, wicked, foolish, unacquainted with warfare and timid as you are .55. Having slain both of them, I shail play you together with your kiosmen. Being a friend why do ter you rify me like an enemy. Either they will slay me or I shall slay them. Knowing my own prowess, I am not afraid of Arjun and Krisba Alone I can say thousands of. Vasudevas and hundreds of Arjuna Be silent you who are born in a wicked country. Hear about the songs which the ill-natured women, children and old mon of Usdra siug to please themselves. Brahmans told this in tha presence of kings. Hiar them quietly and then you may either forgivo or rosent. 22. The people of Dadra are always deceivers of friends: we call our enemies Dladrabs. They are not friendly and their talks with one - ६४३९) कर्णपर्य Karan Parv [6439] नायब माताज्ञानाः स्वच्छयां ॥ २६ ॥ येणं गृशशिष्टानां सक्तमत्स्याशिना तथा परियासीधु सगोमांस फन्दन्ति च हसातचा२७गोपन्तिचाप्यवद्धापत्तन्ते चकामतः 1 कामप्रलापिनोऽन्योऽन्यं तेषु धर्मः फथ मवेत् ॥ २८ ॥ मद्रकेश्व घलिप्पु प्रख्याताशुभकर्मसु । नापि धैरंन साहा मद्रोण समाचरेत् ॥ २९ ॥ मदके सङ्गत नास्ति मद्रको हि सदामलः । मद्रकेप च संसृष्टं शौच गान्धारकेप ॥ ३० ॥ राजयाअफयाज्ये घ नष्टं दरा हविभवेत् । शुद्रसंस्कारको विप्रो यथा याति पराभयम ॥ ३१ ॥ यथा ब्रह्मविष्णनिय गच्छन्तीह पराभवम् ! तयेय सङ्गत कृत्या मरः पतति मद्रफैः ॥ ३२ ॥ मद्रफे सतं नाति इन वृश्यिक ते विषम् । आयपणेन मन्मेण यथा शान्तिः कृता मया ॥ ३३ ॥ इति वृश्चिकदष्टस्य धिपंवेगहतस्पं सय मिल हुये हैं और उनकी स्त्रिये जाने और जनाने पुरुषों के साथअपनी इच्छांसे विषय भोगकरने वाली हैं । २६ । इसीप्रकार जिन नाच अचतता में युक्तं मत्स्य- खादकों के घरमें गौके मांससमेत मद्यको पाकर पुकारते शर हसते हैं । २७ । और अयोग्य मीलों को भी गानहुये इच्छानुसार कर्मों को करते हैं और परस्पर में यी इच्छानुसार वार्तालाप करते हैं उनमें धर्म कैस होसक्ता है । २८ । जो कि मद्रदेशी अहंकारी होकर दुष्टकी विख्यात हैं इसहेतुसे मद्रदेशियो मित्रता और शत्रुता दोनों न करे। २९ । मद्रदेशियों में स्नेह और माति नहीं होती और वह सदैव अपवित्र मद्रदेशी और गान्धार देशियोंमें पवित्रता नप्दहोगई है । ३० । रागा जिस में पाजकहै उस यज्ञमें जो हवि दियाजाता है वह सब जैसे नहताको पाता है और जिसमकार शूद्रोंका संस्कार करनेवाला प्राह्मण तिरस्कारको पाताहै और जैसे इसलोकमें ब्राह्मणों के शत्रु सदैव नाशहोते हैं उसीमकार मद्रदेशियों से मोतिकरके मनुष्य नहताको पाताहै । ३२ । गद्रदेशी में मेलमिलाप नहीं है है विषले विच्छू मतेरे विषको अथर्वणवेदके मन्त्रोंसे शांतकियाहै । ३३ । इसीप्रकार another is immoral, Wo hear that your countrymen ære ill-natured, untruthful and.wicked. Fathers,tiothers, sony, mothers-in-law, fathers -ig lav uncles, sons-in-law, daughters, broclters, grandeltildren, kinsipen, people of the sando ago, guests and others mix with s'aves, and their women associate with friends and strangers 26. The wicked people of your country ent fish and beef and rerel after drinking wine. They sing imnioral songs and are licencious. They talk as they please. low can they bo vil tuous ? They are notorious for their wickedness and pride and therefore friendship and enmity is forbidden with them. The peoplo oJadra are not friendly. They as well 33 the Gaudhars Are unclean.30. Tlo libations poured by a king in the sacrificial fire are lost. The Bralinian who presides at the ceremonies of Shudras, is degraded, likewise, he who forms friendsbip with the people of ६ । (6410] Mahabharrt कुन्ति बजे प्रायः सत्यं तच्चापि श्यते ॥ ३५ ॥ एवं विद्वन् जोषमाम्य शृणु चत्रिोचर यचः। पासोरंयुत्तर नृत्यन्ति लियो या मधमोदिताः॥३५॥ मैथुनै ऽसयता चापि यथाकामघराश्चतातासां पुत्रः कथं धर्म मद्रकोयतुमहतियातिष्ठन्त्याप्रमेहन्ति क्योष्ट्र देशेरकोः ॥ ३६ तासां विभ्रधानां निलेजान ततस्ततः पुस्तादेशानां हि धर्म पतामहच्छसि ॥ ३७॥ सुधारकं पाध्यमाना मद्रिका कति रिफची । अदातुफामा यचामिद पदति दारुणम् ॥ ३८ ॥ मी सुधीरक कधित योचता दायते ममापुत्र दयापति दद्यानतुदद्यांमुवारकम्॥३९॥ गोर्योऽइत्यो निहींकाः मंद्रिका कम्बलावृताः। घरमरा नहशीचाश्च प्राय इत्युनशुधुम ॥ ४० ॥ पर्वमादि मयाने शक्य वक्त भवेदई । भोकशाप्रानखानाधं यकन्या कुकर्मसु ॥४॥ ज्ञानी लोग विच्छू कोटेदुय विपके बैंगसे घायलं मनुष्यकी औपधीकरते हैं वहभा सत्य २ देखने में भाते हैं। १४ । हे बुद्धिमान यातो मान होजाओ नहीं तो ऐसे अपनों को सुनोगे जिस वचनों को मद्यसे मदोन्मन स्त्रियां गाकर नाचती ।। उन स्वेच्छाचारी पतिवचक भोगों में अनियम खियोंका पुत्र मददेशी किसरीति से धर्म कहनेको योग्य होसक्ताहै । ३६ जो खिशांकि ऊंट और गधोंके समान रखडी खड़ी पेशावकियां करती हैं उन वेधर्म और निलज्ज स्त्रियोंका पुत्रहोंकर तू धर्म कहना चाहताहै । ३७ । जो स्त्रियां कांनी मांगनेपर कीचों को खींचतीहै और न देनेकी इच्छासे इन भयकारी असह्य वचनोंको कहती हैं। ३८ । कि कोई हमसे कोजी मतमांगो वह हमारी बड़ी मियहै बेटेको दें पतिको दें परन्तु कोजी को न देंगे। ३६' । कन्या और पद श्री निलज्ज और कम्बलोंकी धारण करनेवाली होकर बहुधा दुराचारिणी और भ्रष्टहैं। ४० । इसरीति से अन्यलोगभी शिरकी चोटीसे परके नखोतक अयोग्य और अनुचित वात मंद्रदेशियोंके विषयों कहोकरते है।४१ । और पापिष्ट देशमें उत्पन्न होनेशले मलच्छ रूप धर्मों से रहित भद्र Madra, is lost. The people of Madia ary not social, i hava allayed thy poison; 0 scorpion, with the hymns of the Atharv Ved. Wisa men thug cure those who are stung by scorpioas. Be quiet, wisa man or you will hear from nie the song sung by the drunken women of Four cantıy.30. How can one born of such lewd woman talk of dharma Being the son of shameless women who make water standing like amely and asses, how can you talk of dharm? When some one asks for! a little vinegar of a Midrak woman, she scratches her hipy, and not: wisłying to give it, so attors such unbearable and dreadful words, saying, “Let no one ask us to give vinegar which is very dear to uariye would rather give up a son or a husband than vinegar," Both | young and old women aro'shanieless. They wear blankets and are often land and uncleas, People say that the Andraks are noclean from top -- 1 (६५४१) कर्णपर्व Karan Paray (6441) मद्रकाः सिन्धुसौवीरा ध विधुः मथान्वित । पापदेशोङ्गया म्लेच्छा धर्माणामविच क्षणा ॥ ४२ ॥ एप मुख्यतमा धर्मः क्षाययस्यति म भुगम् । यदानी निहतः शेत सद्भिः समभिपूजितः ॥ ४३ ॥ आयुधानां साम्पराये मन्युच्येयमई ततः । ममेष प्रथमः कल्पो निधने स्वर्गनिच्छत: ॥४४॥ सोऽह नियः मसा चास्मि धार्तरायस्थ धीमतः । तदर्थे हि ममा यच में विद्यते यस ॥ ४५ ॥ व्यतं यमप्युपदितः पाण्डः पागदेशज : ययावामित्रपतु स त्वममाम प्रसे ॥ ४६ । काम न खलु शफ्योऽहं सहिधानां शतरपि । संग्रामाविमुखः कषु धर्मश इच नाम्निकैः ॥४७॥ सारङ्ग इच घर्तिः काम बिलप शुष्य घनिधि भीपयितुं शक्य क्षमसे व्यवस्थितः ॥ ४८ ॥ तनुत्यां नृसिंहानामाहवेचनिपतिताम् । पागतिगुरुणा प्रोक्ता पुरा रामेण तां स्मरे ॥ १९ ॥ तेषां प्राणार्थमुटुक्त वधार्थ विषतामपि । विद्धि मामास्थितं वृत्त तिन्य और सौवीर देशीलोग कैसे धमों को जानेगे । ४२ । यहभी इसनेमना है कि क्षत्रियोंका यह सेप्ठयम है कि युदभूमि में मृतकहोकर अथवा सत्पुरुषों से स्तूरमानहोकर' । ४३ । पृथ्वीपर शयनकरें इसहेतुसे जो मैं युद्धभूमिमें जीवनको त्यागकरूं तो मुझ स्वाभिलापो का यह प्रथमकल्प है। ४४ । ऐसा मैं बुद्धिमान दुर्योधनका पारामित्रहूं उसके लियेही मेरेमाण और धन हे पापी देशमें पैदा होनेवाले विदित होता है कि तूगी पांडवों से मिला हुआ है तुम शत्रु के समन जैस कर्म हमारे साथ करतेहो । ४६ 1 यह निश्चय गमझो कि मैं तुझ सरीके सैकड़ों मनुष्योत मा युद्धमें नहीं फिरूंगा जैसेकि धर्मज्ञ मनुष्य नास्तिक के वचनोंसे ॥४७॥ धूपकमारे सारंग पक्षीके समान विलापकर पा सूख पीके व्यवहारमें 'नियतहोकर मैं डराने के योग्य नहींई । ४८ । पर्चप्तमयमें मेरेगुरू श्रीपरशुरामजीने युद्ध में मुख न मोड़नेवाले और शरीर त्यागनेवाले नरोत्तमलोगोंकी जो गात कही है उसको में स्मरण करताई । ५१ । मोर धृतराष्ट्र के पुत्रों की रक्षा और शत्रुओं के नाश to toe. People born in tiiat wicked country behave like mlechex. How can those born in Madra, Sindh and Shuvir know of Dharm? 42, We hear that the best duty of a kshatrya is ta lie on earth slain in battle or praised by the virtuous It would be a happy moment for me, if ( lie dead on the ground. Duryodhan is very dear to me and I can lay down my life and wealth for his sake. You, who are born in a wicked country, seem to be in collusion with the Paudawas, You behave with me like an enemy.46. Remember well that I can not 'turn back from battle at the instigation of hundrods of men like you, as a virtuous ment can not be misled by an athiest You may scream like a sarang bird afflicted by the heat of the Sun, but I am not to be terrified by you. I remember the lot of those best of men who die in a field of battle without tuining back, a9 was told me by my (6142) Jiilabharat (६४४२) पोकरलसमुस्तरम ॥ ५० ॥ न त पश्यामित्रिपुलोफेषु मनायो मामस्मा दभिप्राया द्वारयेदिनि मे मति ॥५१॥ एवं विद्वान् जोपमास्व प्रासात् किं भाषम । म त्या प्रदास्यामि मशद्धयो मद्रकाधम ॥ ५२ ।। मित्रप्रतीक्षया शल्य धार्तराष्ट्रस्य धोभयो । अपवाद तितिक्षाभिनिमितहि जोपास ॥ ५३॥ पुनभेदी शं पाक्यं मद्गज पदिसि । शिरस्ते पातयिष्यामि गदया पत्रकल्प या। ५२ ॥ धोनारस्त्विदमा द्रष्टागवा कुदेश । कर्ण या जमतुः कृष्णौ कों पा निजधान तो । ५५॥ एवमुक्त्वा तु गधेयः पुनरेव विशाम्पते । अनवोन्मदराजा ने नाहि याही-यसमम ॥ ५६ ।। झाते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवाद चत्तारियोऽध्यायः । ४ ॥ करने में प्रवृत्त है मुझको उत्तम ब्यवहारमें नियत पुरवावंशा नानो । ५० । हे राजायद मैं तानोंलोकों में ऐसा कि जीवधारीको नहीं देखताहूं जो मुझको इस विचारते हटावे यह मेरा सिद्धान्त है । ५. । हे बुद्धिमान ऐसा जानकर मौनहीं भयभीत होकर क्यों वहन वकता है हे मद्देशियों में नाच मैं तुझको मारकर कच्चे मान्स भक्षियों को नहीं दूंगा ॥५२॥ हे शल्य तुम मित्र दुर्योधन इन दोनों और अपवादकेभय से भातक जीवते बचेहो । ५३ । हे गजा मद्र जो तू फिर ऐसे वचनों को कहेगा तो तेरे शिरको अपनी बचकी समान गदासे काटकर पृथ्वीपर गिराऊंगा । ५४ । हे दुष्टदश में उत्पन्न होनेवाले अव यहां इम यातकोदेख और मुन कि श्रीकृष्ण और अर्जुन कर्णको मारें अथवा कण उन दोनों को मारे १५॥ राजा इसप्रकार कहकरफिरकण राजामद्रस वोला कि निभय होकर तुमबदी ५६॥ preceptor Parashuram. I am ready to protect the song of Dhritrashtra and to slay their foes I shall imitate the noble character of Pururava.50. I donot see a creature in the three worlds that can turn me from my purpose. Knowing this you must keep silent. Why do you talk like timid men ? I shall not slay you to give you to fiesh-cating birds, because you are a friend of Daryobhan, and because they will blame me. I shall break your head with my vajra like mace, if you will again ay such words to me. Noi lools and her attentively: either Karan will slag Krishn and Arjun or they will kill him." Having said this, Karan asked the king of Mudha to proceed fearlessly."36 .
(६४५३) कर्णपर्व Karan Paray (6443) सन्जय उवाच । पारिपाधिग्धेः श्रत्या वाचो युदाभिनन्दिनः । शल्योऽनधीत पुनः कर्ण निदर्शनमुदाहरन् ॥ १ ॥ जातोऽह यज्वनां वंशे संग्रामेष्यनिघर्तिनाम । गन्ना मूर्दाभिषिक्तानां स्वयं धर्मपरायणः ॥ २ ॥ यथैव मत्तो मद्यने त्वं तथा लक्ष्य से वृष । यथापि त्वां प्रायन्तं चिकित्सेय सुहत्तया ॥ ३ ॥ इमां काफीपा कर्ण मोचमाना निधोध मे । श्रुत्वा यथेष्ट कुर्यास्त्वं निहीनकुलपासन ॥ ४ ॥ नाह मात्मनि किञ्चिदै किल्विषं फर्ण सम्मरे । येन मां त्वं महामाहा हन्तुमिच्छस्थना गसम॥५॥अवश्यन्तु मया पाच्यं बुध्यता त्वद्धिताहितम् विशेषतोरथस्थेन राशय तिषिणा ।।६। समय विषमचैध रथिनश्च यलावलम् । श्रमः खेदश्च सततं हयाना रथिना सह ॥ ७ ॥ आयुधस्य परिझानं रुतश्च मृगपक्षिणाम् । भारश्चान्य अध्याय ४१ संजय बोले कि हे श्रेष्ठ फिर शल्य युद्धके अभिलापी अधिरथी कर्ण के पचनों को सुनकर उससे यह उदाहरणदेकरयह वचन वोला कि मैं अपने धर्म में नियत यज्ञकर्ता युद्ध में मुख न मोड़ने पाले मूर्दाभिषेक राजाओं के वंशमें उत्पन्न | हुआ हूं। २ । हे कर्ण जैसे मादरा से उन्मत्त मनुष्य होता है वैसाही तू मुझको दिखाई देता है इससे अब मैं उसीप्रकारसे शुभचिंतकतासे तुझमतवाले की चिकित्सा करताहूं । ३ । हे नीष कुलकलेकी कर्ण इस मेरी कहीहुई काकोपमा को समझो उसको सुनकर अपनी इच्छाके अनुसार कर्म करना । ४ । हे कर्ण मैं अपने विषय | में उस दोपको स्मरण नहीं करताहूं जिसके हेतुसे हे महावाहु तुम मुझ निरपराधी को मारना चाहतेहो । ५ । मुरुपकर राजा का अभ्युदय चाहनेवाले रधपर सवार | होकर में तेरे हानिलाभ के कहने के योग्यहूं मेरे इन वचनों को समझो । ६ । कि टेढ़ा सीधा मार्ग स्थके सवारों की वल निर्वलता रथकी सवारी में घोड़ोंका क्लश और थकावट । ७ । शस्त्रोंकाज्ञान पशु पक्षियों के शब्द भारकी न्यूनाधिकता CHAPTER XLI Sanjaya said, " Hearing tne words of Karan who was so eager for fighting, Sbalya cited the following example, saying, "I am descended from crowned monarchs who were firm on their duty, performed sacrifices and were unfliuching in war. You look like a drinkard and I shall have to cure you of your folly. Hear the example of a crow and then yon may act as you like. I remember no fault of mine sbich can justify you in slaying ne Being specially a well-wisher of Duryodhan and in the capacity of the driver of your car, I must shor you the pros and cons, strength and weakuess, state of horses, knowledge of weapons, omeas taken from the sounds of birds and beasts, quantity of weight, curs of wounds, putting together of Aposs - and other (६४४५) कर्णपर्व Karan Paray [54:5] तः सर्वैग्लपबुद्धिभिरण्डजः । तद्वचः सत्यमित्येष माख्याहच्च मन्यते ॥ १७ ॥ तेषां पं प्रवरं मेने हंसानां पातिनाम् । तमापत दुर्बुद्धिः पताब इति पक्षिणम् ॥ १९ ॥ तच्छुत्वा माहसन् ईसा ये तासन् समागता ! भाषतो वहु काकस्य पलिनः पततां घराः ॥ २० ॥ इदमूचुः स्म चक्राना पचः कार्फ विहङ्गमाः ॥ २१५ इसा ऊचुः वयं सायरामेमा पृथिवी मानसौकसः। पक्षिणाञ्च घनत्य दूरपरतेन पूजिताः ॥२२५ कथं नु, इंसं यलिन चक्राङ्गदरपातनम् । फाफो भूत्वा निपतन सना प्रयसि दुर्मते ॥ २३ । कथं त्वं पतिता काक सस्माभिम्रवाहि तत ॥ २३ ॥ अथ इंसवचो मदः कुरसयित्वा पुनःपुनः प्रजगादोत्तर काफः फायनो जातिलाघात ॥ २४ ॥ काक उवाच । शतमेकञ्च पातानां पतितास्मि न संशयः । शतयोजन मेकैक विचित्र विविधं तथा ॥ २५ ॥ कास्मि मिषतां योऽध ततो द्रक्ष्यय में बलम । तेपामायतमेनाहं पतिष्यामि विहायसम । प्रदिशप्पं यथान्यायं केन हंसा: पताम्य अहङ्कार और अज्ञानता से उस वचनको सत्यही जाना । १७ । और उन दूरगाने वाले बहुत ईसकि पास जाकर उस दुद्धीने कहा कि तुमलोगों में से जो श्रेष्ठहोय वह मेरे साथ उड़े (१८॥ यह सुनकर वह सब आयेहुपे हंस इसे और उन आकाश चारी मनगामी और पक्षियों में श्रेष्ठ इंतों में से चक्रांग नाम इसने उस अहंकारी काकसे कहा । २१ । कि हम इंसोंकी गति मनके ममान है और दूर जाने के कारण से हम सब पक्षियों में शिरोमणि गिनेजाते हैं हे निर्बुद्धी तू काक होकर अपने साथ हमको उड़ने के लिये कैसे बुलाता है । २३ । भला कहतो सही कि तू हमारे साथ किस प्रकारसे उड़ेगा यह मुनकर उस निशा जाति भौर अपनी प्रशंप्ता आप करनेवाले काकने हंसों के कहेहुये वाक्यों को पारंवार निंदा करके उत्तर दिया। २४ । कि मैं निस्सन्देह एक सौ एक प्रकारकी गति से उड़ सत्ताहू और मत्येकगति शतपोजन लम्बी चित्र विचित्र मकारकी है। २५ । उन गतियों को मैं तुम्हारे सम्मुख करताहूं इसी मेरे पराक्रमको देखोगे मैं उन गतियों में से एक of birds that fly in air." On hearing lus praise, the foolish cow was putfed up with pride and believed in wbat. they had said. Then guing to the far-flying swaps the fool said, you fly with me, The swans laughed at his words and their leader, known as Chakrang, said to hini, "Wo fly swilt like the mind and We ale considered best among birds on account of our long fight. How can yon challenge us to fly with you, foolish croir? How can you keep pace with us ?" The vain crow laughed with scorn at the reply of the swan and said, "I can fly a hundred and one sorts of iraye, every sort clearing a hundred yojans in a wonderful manter. 25. sball show you those Higlets and from them you will see my Drowess. I shall Ay in one of thoso ways, whichever you may like " " Let the best among [6446] Mahabbarat (10) हम ॥. २६ ॥ एवमुक्के तु काकेन प्रास्यैको विहङ्गमः उवाष का रायप तन्निवोप मे ॥ २७ ॥ स उपाच शतमेफच पाताना त्वं काक पविता भुषम् । एकमेव तु यं पातं विदुः सर्वे विहंगमाः ॥ २८ ॥ तमहं पतिता काक नान्य जानामि कचन । पत धमपि एकाक्ष येन पातेन मन्यसे ॥ २९ ॥ मयकाकाः प्रजह तत्रासन् समागताः कथमेकेन पातेन इंसः पातशतं नयेत् ॥ ३० ॥ प्रपेततः स्पईया च ततस्तो संघायसी । एकपाती च धागः काकः पातम !, च॥ ३१ ॥ अथ काकस्य चित्राणि पतितानि मुहुर्मुहुः हट्वा प्रमुदिताः काका धिनतुरधिः स्वरैः ॥ ३२ ॥ अथ हंसः स ततश्रुत्या प्रापतत् पश्चिमा विशम्। उपर्युपरि वेगेन सागरं मकरालयम् ॥ ३३ ॥ ततो भीः प्राषिशत् काकं तदा तत्र विचंतसम् । बापमानपश्यन्तं निपातार्थे श्रमान्वितम् ॥ ३४ ॥ निपतेयंक्य तु भान्त गतिके द्वारा प्राकाशमें उड़ताहूं हे हंसलोगो पाप जिस गतिस कहो उसींगातसे उसूं । २६ । काकके इसवचनको सुनकर एक हंस ने इसकर काकको उत्तर दिया। कर्ण उस बचनको मुझ से समझो । २७ । इंसने कहा हे काक तुम निश्चयकरप्सी मकारकी गतिको गड़ोगे और मैं उसी उतिसे उडूंगा जिस गतिसे सवपक्षी उड़ते हैं । २८ । क्योंकि मैं इस एकगतिके सिवाय दूसरीगतिको नहीं जानताएं हे ताम्राद अवतुमभी चाइजिप्त गाविसे उड़ो । २९ । इसके पीछे जो वहाँ और काक इकठे होगयथे वह सब हँसे और कहनेलगे कि हंस एकही गतिवालाहोकर सो गाते जानने वाले को कैसे परास्त करसक्ता है । ३० । इसके अनन्तरहंस और काक पीकरके उड़े अर्याद एक गाते उद्दनेवाला हंस सौ गतिवाले काक के साथ उदा । ३१ । उसकी विचित्रं गति को देखकर सब काक प्रसन्न हुये और उच्चस्वरसे चिलाये । २२। इंसउसके वचनको मुन वहुतसा हँसकर पधिम समुदकी औरको चाप और उसके संगकाकभी अपनेपरों को चपल करताहुमा चला समुद्र के ऊपर चलते २ कुछंदरपर काक थकित गया और कोई वृक्ष टाप में देखक धैर्यतासे रहित होकर उड़नेलगा। 1४1 जब उसके सवपक्ष शिथिलहोगये तब समुद्र में गिर On hearing the crow's words one of the swans replied. His answer is .worth hearing. He said, "You may By in a hundred way, 0 crowy; but I sball Ay in the way that all birds do, for I know no other ways. Yo may fly in whatever way you like, red-eyed one." The ernw laughed at this ond said, "How can a bwan knowing ouly ope way of Aiglır, defcat a crow who knoty a bundred ways.,' 30. Then the crow and tbe swan flew together. The swan who could by a single flight, flow with the crosy sho knew a hundred ways. The CFOws ascembled there were pleased at the wonderful fight of the crow and cawed loudly. The swan laughed at him and flew over the restern sea. The cror too, flew fast with him afer the Ocean, but (६४४७) कर्णपर्ष Karan Paray (6447) इति तस्मिन् जलार्णधे ॥ ३५ ॥ अविषयः समुद्री हि बहुसरवगणालय: । महा भूतशतोनासी नमसोऽपि शिष्यते ॥ ४६ ॥ हंस उवाच घिमि पतितामियमा घक्षाणो मुहुमुहुः । पातस्थ व्यारंवेदं न नो गुह्यं प्रभाष से ॥ ३६ ॥ विनाम पतित काक यरवं पतास साम्प्रतम । जलं स्पृशासि पक्षाभ्यां तुण्डेन च पुन:पुनः॥३७॥ प्राजहंस प्रपचे त्यो बीयन्तं प्रापयस्व माम् ॥ ३८ • यपहं स्वस्तिमान ईस स्वदेश प्राप्तयां विभो।न कभिदधमन्येयमापदो मां समदर ॥ ३९ ॥ अनुक्या वायसं हंसो.जलक्लिःशुंदुईशम् । पनामुक्षिप्य घेपन्त पृष्टमारोपयच्छनः ॥ ४० ॥ उछिटभोजनः काको पथा घेश्यकुले तु सः । एवं त्यमुनिष्टभृतो धाराष्ट्र संशयः॥४१॥ द्रोण द्रौणि कृपाप्तो भीष्मेणाम्यैश्च कौरयः। घिगटनगरे पार्यमेकं कि भावधीस्तदा ॥ ४२ ॥ यत्र यस्ताः समस्ताश्च: मिर्जिताः स्थकिरीटिना गाला इध सिंहन क्य ते धीर्यमभूचदा ॥ ४३ ॥ भ्रातरच इतं दृष्ट्या समरे सध्यसाधिना पड़ा। ३५ । हंसके कहा कहो सौ गतियों से यह कौनकी भापकी गतिहै कि जलमें मौनहोकरअपनेपन और चोंचको डुवाते और निकालतहो ।३०। यह वचन | सुनकरबह नीच वायसआरत वचनोंसे घोला हेहंस अप आप अपनी भोरकोदेखकर मेरे उपर क्षमाकरो और जलसे निकालकर मुझको कहीं पहुंचादो।३८ायदिमें अपने देशमें पहुंचजाऊं तोफिर कभी किसीका अपमान न करूंगा । ३९ । हे कर्ण,यह काकके वचन मुनकर इसने अपने पंजेसे उसको पकड़कर स्थलमें लाकर दालीदया । ४० । सो जसोकैवैश्यकेघरमें उच्छिष्ट खाखाकर काकपुष्टहुमाउसीमकार तुमभी धृतराष्ट्रके घरमेंखाके मोटेहोकरबहो । ४१ । विराटनगर में द्रोणाचार्य कृपाचार्य और भाप्मादिक सरीके शुरवीरोंको पार्थने विजयाकया तव तुमने अकेले अर्जुनको क्योंनहीं मारा । ४२ । उसस्थानपर प्रथक और संयुक्ततुमसब लोगोंकोअर्जुननेऐसे विनपकिया जैसेकि श्रृगालोंको सिंहविजयकरताहै तवतेरा पराक्रमकहांया ॥४॥ युद्ध में अर्जुन के हायसे मारेहुये भाईको देखकर सब कारवी वारों के देखते हुये . प्रथमतो was tired after some time. Seeing no tree or island in the way, be flew on with a very distressed mind. His wings became stick and ho foll down into thesea. Then the swan said, "Which of bundred fights'is this fligit that you silently sink and raiss your beak and sings:'' At this the mean crow much humiliated, said, "Excuse me and:take me uut from water. If through your kindness I reach some land, I shal) never look down upon any one." At this the swap took up the crow with bis claws and left it on land. 40. You have become fat on the food of the sons of Dbritrashtra as the crowy ,was ou that of the Vaishiyag. Arjun defeated Drona, Krip, Bhishm and other warriors at Virat. Why did you not slay him when ho was glone? There he con. quered you all, singly and separately, as a lion does jackale; where was your -- ४४ " - (16448) lalabaarat {६५४०) 1पश्यतां कुरुवीराणां प्रधर्म धं पलायितः ॥ ॥ तथा दैतपने. कर्ण गन्धः समभिटुनः । कुरून समग्रान्सृज्य प्रथम धं पलायितः ४५ ॥ हत्या जित्वा च गन्धर्वाचित्रसेनमुखाणे । कर्ण दुर्योधनं पार्थः समाय्यै सममोक्षपत ४६ ॥ पुनःप्रभावः पार्थस्य पांगण: केशवस्य च । फषिता,कर्ण रामण सभायां राजसं सदि ॥ ४७ ॥ सततच त्यमश्रीर्वधनं द्रोणभीष्मयोः । अघध्या पदतो: कृष्णा सनिधी च महीक्षिताम् ॥ ४८॥ फिरत तत् प्रवक्ष्यामि येन येन धनञ्जयः । स्वतोऽतिरिक्तः संश्यो भूतेश्यो ब्राह्मणो यथा ॥ ४९ ॥ इदानीमेघ द्रष्टासि प्रधागे स्यन्दने स्थितीपुत्रश्च यसुदेषस्य कुन्तीपुत्रञ्च पाण्डवम् ॥ ५॥ यथाश्रयत चमार घायसो बुद्धिमाधित तथाश्रयस्व काणे पाण्डव घनम्जयम् ॥ ५॥ यहा य युधि विक्रान्ती पासुदेवधनन्जयो । द्रष्टास्यकरथे कर्ण तदा नै परिप्यास तुम्हींमागे हैं।४४॥ दार्ण इसीमकार द्वैतवन में गन्धर्वोसे सम्मुखता होने में प्रथम तुमक्ष सब कारयों को छोड़कर भागथे । ४५ । वहां भी हे व.र्ण अर्जुन ने ही युद्ध में गन्धर्वो को मारकर और चित्रसेनादिकों की विजय करके स्त्री समेत दुर्योधन को छुटाया था। १६ । हे कर्ण फिर परशुरामजी ने राजाओं के मध्य सभा के वाच अर्जुन और केशवजी का प्राचीन प्रभाव. वर्णन किया था । ४७ । तुमने 'राजालोगों के समान में श्रीप्ण और अर्जुनको अवध्य वर्णन करने, वाले भीम और द्रोणाचार्य के वारंवार कहे हुये वचनों को सुना । ४८ । मैं उसको कहांतक तुझसे कहूँ अर्जुन अनेक प्रकार से तृझ से ऐसा अधिक है जैसे कि सब जीवों से ब्राह्मण अधिक होताहै४९ तू अभी रथपर चढ़ेहुये वसुदेव नन्दन और कुन्ती नन्दन श्रीकृष्ण और अर्जुन को देखगा । ५० । जैसे कि वुद्धि में नियत होकर काक' हंसके पास शरणागत हुआ उसी प्रकार तू भी वासुदेवजी और अर्जुनके पास जाकर शरणागतहो । ५१ । हे कर्ण जब तुम · युद्धमें पराक्रमी your prowess then ! Seeing your brother slain by Arjun, you were the first to run away in the presence of all the Kaurav warriors. In the same manner you fled from the Dwait forest, from the Gandharvas. 45, Arjun conquered Chitrasen and other . Gan. dharvas there and rescued Duryodhan and his wife from their captivity. Parashuram mentioned the gretness of Arjun and Keshav in the assembly of kings and you have often heard from Drona and Bhishm the indestructibility of those two great ben. How long should I tell you thie! Arjun is as superior to you as a Brahman is to other beings. You will see presently the sons of Vasudev and Kunti. As the crow, on receiving a lesson, took refuge with the swan so you go to Arjun and take refuge. You will now see Arjuo and - should कर्णपर्व Karan Parav 16449) ॥ ५५ ॥ यदा शरशतः पार्यो दाते पारयिष्यति । तदा त्वमगरद्रष्टा भारम नयासुनस्य च ॥ ५३ । यामुरमनुष्येषु प्रपातो यो नरोत्तमा । तो मावस्था भीगार सात प रोचनी ।। ५४ ॥ मर्याचगसो यत्त जनायो। प्राकादयनानिविषयाती पन्तु बचतयन् ॥ ५५ ॥ एवं विधामायमस्वमूतपुत्रा. स्युनार्जुनी । नासदी ती मदारमानी जपमा पिकस्यने ।। ५६ ॥ इनि कर्णणि इंसफापावाप रूपात एकचत्वारिशोऽध्यायः ।। ४२ ॥ .. अर्जनमोर पामुदेवजीको एक स्थपर देखोगे तब ऐसी बातेनकहोगे राना अर्जुन सकहो पागोसे तेरे प्रकारका नाश करेगा तभी नुप अपने और भर्जुनके बलाबल कप अन्तरको देखोगे । ५३ । अरे जो नरोत्तम देव अमुर और मनुष्यों मसिद्ध उनका अपमान तुम ऐसे मतकरो जसे कि पटवीजना मूर्यका अपमान नहीं कर सक्ता । ५४। भैसे कि मूर्य और चन्द्रमा हैं उसी प्रकार मर्जुन और धीहष्णजी अपने तेजसे विरूपातहै तुम तनुप्पोम पदवीजन के समानहो। ५५ । युदिमानमतके. पुत्र कर्ण तू अर्जुन और केशवजीका अपमान मतकर यह दोनों नरोत्तम महात्मा | मौनहोना अपनी मसा मतकर ५६ ॥ Vasador soated on the sum , car and then yon till forget saying such things. You will mark the differenco between your strength and that of Arjun, whon the latter crushes your prido with .huudreds of his arrows Donut insult the best of gods, asurs and men, for a glow -worm cannot surpass the Sun Siires Krislia and Arjun are famous for their glyry like the sun and the inoon, while you are like a glow -Won among men. Donot insult Shro Krisba and Arjun son of Sut, They are the best of inen. Ba silent and Cae giving yourself praisc."36.
[30] Jalal.bairt सञ्जय उवाच । मद्राधिपस्याधिरधिमहामायचो निशम्या प्रियमप्रतीतः । उपाय शल्यादित ममैतत् यथाविधावर्जुनधासुदेवा। १ ॥ शौरे रथं पाहतोऽमस्य पलं महाखाणि च पाण्डवस्य । माहं विजानामिः यथायदध परोक्षमतं तपत राम ॥ तो चाप्य शलभतां पण्ठिी व्यपेतमार्योधयिष्यामि रुष्णो सन्ताप यत्य पधिफन्तु रामाच्या मां प्रधणसतमाञ्च ॥ ३ ॥ मया, च्छनाना राम पुरा दिव्यमानं चिकी। तत्रापि मे देवराजेन विनो हितापिता फाल्गुनस्य शल्प ॥ ४ ॥ तो पिमेदन ममेस्मेत्य प्रारश्य कीटस्य तनु विरूपाम गमासमन्य प्रविद कोटः म गुरीत शिरा निधाय ॥ ५॥ ऊकम्मेदार महान् पभय वरती मे घनशणितीयः । गुम्याध्यापिन बीलामहं सवार अध्याय ४२॥ संजय बोले कि महात्मा कर्ण शल्य के अमिय वचनों को सुनकर शल्य से बोला कि मैं ठीक जानता हूं जो कि भर्जुन और श्रीकृष्णजी हैं । १। में अर्जुन स्थक हकिनवाले केशरजी और अर्जुन के पराक्रम समेत बड़े अखों को भी अच्छी रीति से मानताएं हे शत्रुरूप शल्प उसको तू नहीं जानता है। मैं उन शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ और निर्भयरूप श्रीकृष्ण और अर्जुन से युद्ध करंगा पति बामणों में श्रेष्ठ परशुरामजी का दिया हुभा शाप अत्र मुसको अधिकतरदुःखदे रहा है । ३ । शल्प शापका कारण यह था कि मैं पूर्न समय में दिव्य अखाका अभिलाषी मेकर बामणका रूप बनाकर कपट से परशुरामनी के पास गरने को गयाया वहांभा अर्जुनकी उन्नति चाहने वाले देवराज इन्दने । ४ । भयानकरूप कीटके शरीर में प्रवेश करके मेरी जंघा चिपटकर काटने से विघ्नकरादेया अर्याद मेरी जंघापर शिर रखकर गुरू पाशुरामजी के सोनेपर उस कीटने मरी जंघा को काया५ । भौर बड़े पाप होने के कारण मेरी जंया में से बहुतसा और प्रकट दुभा परन्तु मैने गुरुजी के भप से शरीरको नराभी न कंपाया इसके पाजे जब CHAPTER XLII Sanjaya said, “Hearing the unwelcome words of Shalya, Karan said, " I know the reality of lirishn and Arjun. I know well tbo prosess of Arjun and Kristin and thu power of their arms more than you do. I shall bght syith thoso intropid and bust of warriors, but tbo curso of Parashuraw aflicts me much. The cause of the curso WA that desirous of obtaining divino weapons, I went to Parabura in the disguiso of a Brabayan. Thero to), lodra the well-wisher of Arjua gadid.me, for ia tho thapo a diordfal reptile, be clung to my lbigb, whilo Parukuram was religiog bis hemel on it Tbo reptua bit by thigh and a great quantity of loud sorod down from the wound But I did not spore my bely for fear of disturbing the precuptor. Os (६४५१) कर्णपर्व liaran larv FG451 दुबो दहशेऽथ विप्रः ॥ ६॥ स धैर्ययुक्तं प्रसमीक्ष्य मां घे न त्वं विप्रः कोऽसि सत्यं वदेति । तस्मै तदात्मानमहं यथावदाख्यातवान सूतयदेश्य शल्य ॥ ७ ॥ स मां निशम्पाथ मदातपस्वी संशप्तवान् रोषपरीत चेताः । मूतोपधायासामिद तवासं न कर्मकाले प्रतिभास्यति त्वाम् ॥ ८ ॥ अन्यत्रतस्मात्तथ मृत्युकालाद प्रामणब्रह्म नहि भुवं स्यात् । तदध पर्याप्तमतीय चाखमास्मिन् संग्रामे तुमुले तोष भीमे ॥ ९ ॥योऽध शल्प भरतेपूमपन्नः प्रकर्षणः सर्षहणेऽतिभीमः । सो ऽभिमन्ये क्षत्रियाणां प्रवीगन् प्रतापिता बलवान् बै बिमः ॥ १० ॥ शल्पोमध म्यानमई परिछ तरस्थिन भीममसायीर्यम् । सत्यप्रतिशं युधि पाण्डयेय धनजयं मृत्युमुख नयिष्ये ॥ ११ ॥ असं हि मे तत् प्रतिपत्रमद्य येन क्षप्स्य समरे शत्रु पूगान् । प्रतापिनं पलपन्तं कवार तमुप्रधन्वानममितीजसञ्च । शूरं रोममित्र गुरुजी जागे और उस मेरी जंघा के रुधिरको देखा। ६ । उन्होंने उस घाव से भी मुझको धैर्यता में नियतदेखा तव या बचन कहा कि निश्चपकरके तू ब्राह्मण नहीं हैकौन यह सत्य कहो ह शल्य तवतो मैंने सूतके समान समीप जाकर अपना । यथार्थ वृतान्त कहा 1 9 1 उस समय क्रोधयुक्त होकर महातपस्वी गुरुजीने मुझको देखकर शापादया कि हे सूत तूने अपनी ज्ञातिको गुप्तकरके जो इस भत्रको माप्त किया है वह युद्धकर्म के समय पर तुझको स्मरण न रहेगा । ८। इससे सिवाय मृत्यु कालमेंयहब्रह्मभन स्थिरनहींहोगा अवइस भयकारी कठिनयुद्धमैउसबड़े अस्त्रका प्रयोग संहार स्मरण नहीं भाताहै । ९ । हे शल्य जो यह सबका मारनेवाला महा- घोर भयानकरूप प्रवलयुद्ध भरतवंशियों में उत्पन्न हुआहै यह कालरूप युद्ध बहुतसे बड़े पत्री शूरवीरों को निश्चय करके संतप्त करेगा। १० । परन्तु मैं उसउग्र धनुष धारी महावेगवान भपानक कठिनता स सहन के योग्य सत्य पराक्रम और मतिज्ञा बाले पाण्डव अर्जुन को युद्धमें मृत्युके मुखेमें, पहुँचाऊंगा। ११ । वह मेरा अस्त्र Awakening ho saw the blood on my thigh and said, "Surely you are nob a Brahman. Who are you? Speak the trutb." Then I had to disclose my secret. He was very angry and cursed me, saying, "You will not remember at your need the knowledge of arms which you acquired by keeping your birth a secret,8. This weapon will not stay with you at the time of your death." During this dreadful battle, I donot remember how to discharge that weapon. This dreadlul battle among the descendants of Bharat, will bring about the ruin of many warriors.10. Finding that great archer, unbearable and of great velocity in fighting, of true prowess and pows, I shall throw him into the jaws of death. With my weapons I sball destroy great (6452) Jabalbajat (६४५२) साई धनम्ञयं संयुगेऽहं हनिष्ये ॥ १२'अपामतिवेगवानप्रमेयो निमवषिष्यन् यहुला मजाथ ॥ १३ ॥ महाग संकुरुते समुद्री. पेला बन धारपत्यमभयम् ॥ १५ ॥ प्रमुश्चन्तं पाणसंघानमोघान मर्मच्छिा धीरान मुपत्रान् । कुस्तापु प्रतियोस्यामि युद्ध ज्याः कर्वतामुत्तममय लोके ॥ १५ ॥ एष यलेनातियलं महास समुद्रकल्पं सुदुरापमुप्रम् । शरीघिणं पार्थिवान्मजयन्तं पलेय पार्यमिपुभि सस लिये ॥ १६ अशय यस्य न तुल्यमयं मन्ये मनुष्यं धनुराहदानमाराम रान् यो युधि घे जपत तनाथ मे पश्य युदं मधोरम् ॥ १७ ॥ भीष मानी पाण्डवो युद्ध कामो जमानरम्यतिमे महामस्थाखमलः प्रतिहत्य सरयेयानमःपातयिष्यामि पार्थम् ॥ ८ ॥ दिपाकरेणाभिसम तपन्तं समाप्रमिं यशसा घम्सम समो | वर्तमानहै उसी के द्वारा युद्ध में शत्रुओं के समुहों को और मतापी बलवान असम और महाउग्र धनुषधारी तेजस्वी निया शूर रुद्र शत्रुभों के नाशकरनेवाले मर्जुन को युद्धमें ऐसे मारूंगा जैसे कि महायेगवान् अप्रमय जलोंका स्वामी समुद्र अनेक जीवोंको अपने में मग्न करलता है । १३ । जैसे समुद् बड़ा वेगवान बुदिसे परे मर्यादा और, किनारों को धारणकरताहै । १४ । इसी प्रकार अब मैं भी: इस लोकके युद्ध में मौके भेदी वारों के मारनेवाले ताण समूहों के छेड़नेवाले प्रत्यञ्चा बचनेवालों में श्रेष्ठ अर्जुनके साय पद्धकरुंगा ।१५। इस रीतिसे वाणोंके वलके ममापसे उसबड़े पराक्रमी असा समुद्रकी समान महादुर्जय बड़े शुरवीर राजाभों के नाशकरनेवाले अर्जुन को ऐसे सहूंगा जैसे कि समुद्र को मर्यादा सहलती है । १६ । भव युद्ध में जिसके समान दूसरे घनुप धारीको नहीं समझता और मानताई वह देवता और असुरोंको भी पद्ध, विजय करसक्ताहै उसके साथ अव मेरे महापौर युद्धको देखो युदाभिलापी महामहद्वारी भर्जुन दिन्प महाअस्त्रों के द्वारा मेरे सम्मुस भायेगा । १७ । तब मैं युद्ध में उसके मस्त्रों को अपने अस्त्रोंसे हटाकर उत्तम वाणों में उस मूर्यकेसमान उग्रदिशाओंके तपानेवाले अर्जुन को गिराऊंगा।१८। जैसे कि बड़ागदल मूर्य को दकदंताई warriors 44 well as the great archer Arjun as the Ocean does those who fail into it Like the Ocean rising in anger in of apito ita sboro, I tball, with my fco destroying arrows, encounter tho great archor Arjun. 15. With ths strength of my arrows.I shall withstand invincible Arjun the destroyer of brave warriors, as the coast dors thu I believo that arjun is the greatest archier, capablo of conquering the grals iad asura You will see my dreadful battle with him. Proud Arjun, desirons of Eghting, will face wo with his powerful *capons but having checked his weapons with wing own. I shall kill him who sporches all warriora lihat the Sirn Isball, with my arrota, bide glorious Arjun the scorcher of the world, as the condi ocean.
--- waga Karan Pary [6153] मेपरपानिमा घमाजयादपियामि याः । ११. बेधानमशिर्व बसन्न तस्विन लोकाममं मम। मंधी यथा घरपानधाई। कुन्तीपुत्र राम यियानि । २० • युर सरिये दिमपानिपाचले पनम्जय इसममप्यमाणम विशारद रथमागेपुश धुप्य निायं समरपु प्रपरम ॥ २१ ॥ परस धनुरंगमा पनज संयुगे ससहिप्प । सामिमा यः पुधियी मितिमय वपा पिवान् पमामाऽस्मि तन ॥ २२ ॥ यः सयंभूतानि मधमानि प्रस्प जय थापा सायमापी ) २३ । कोजापित रसमायोटिन युयुत्सरे मामृत मानुपोऽम्य: मादाय स्वहस्सयांगो दिमायेत येतायः ममापी ॥ २५॥ स्याई मपाविरपस्य कापात शिरोपामि सितः पृषाक: । योत्स्पाम्पहं धनब पेग मुग पुरस्परपरमे अयं पा ॥२५. मम्पोरि मास्फरपेन मती युध्येत यः उसीमकार आग्निरूप क्रोध रखनेवाले महातेजसी इसलोक के भस्म करनेवाले अर्जुन को भपने पाणों से माच्छादित कादंगा। १९ । मैं पाइलरूप भपन वी कप पाणोंसे गुदमें उस भोग्नात वळ पराक्रम रखने वाले महारकी वायुरूप उग्र पार्जुनको शान्तकरूंगा । २० । हिमालय पति के समान युद्ध में भाग्निके समान कोपरूप परिस्त सत्यरक्ता रथ मागों में समर्थ महाबली भजन को देंगंगा १२१॥ लोक अद्वितीय धनुर्धर जिसके समान दूसरा नहीं देसता और निमने सर भी को नियाकिया में युद्ध में सम्मुखहोकर उस अग्गुन से लहूंगा ।। २१ । निम मातुनने इन्द्रमस्य के समीप सायनान में देववाणी समेत सपनीयों को विजय किया । २७ । उम पारके सम्मुरउमेरे सिराय इच्यापूर्वक कौन युद्ध करसक्ताद वह मा आंकारी भम्रा इस्तत्तापाका करनेवालादिव्य भयोकेमयोग संहारोमा ज्ञाता प्रसपका मचानालाई । २४:भा में नाग पाणों से उन तिरपीके शिको दोसे जुदामरूंगाईप में पदमें घिनपको और मृत्युको भागे कर इस भर्नुन से लगा । २५॥ ऐसा मेरे सिपाप दूसरा कोई मनुष्प नहीं है जोकि उन इन्टके समान पराकमा के साथ एकरपसे पुदकर पदमें अमन पिच होकर क्षत्रियों के hido Ine Sun. Tetall ontwguish tho filo ut Arjan's Www X 2013 with thu raia of my atruns 20. Ishall scu Arjun, who is tirın lihon mora tain, cnraged like fire, learned, truthful, clerer in tighting and injl of powest 1 buricio that there is no other warrior in the world anal w Arjun cho conqueror of all the world, but I sball fight with him. Ilo conquend the gods and other creaturs at thio Khamday forrit Yu warrior, orrpt myself, can cope with proud Irjua who is the clever in fizistio ad in the uso of celestial seapon, I shall now beser kis licaud Anna bis iwly sad aball @ght with him for death ur cumquest 25. Sono exept mycit can fight with that warrice of ladra liko process fas culosisar the bravery of Sujan in the proxncs of all . 116454 } Malabharat पाण्ड मृत्युफलाम् । तस्याहये पार पाण्डस्यव्यां हटः समिती क्षत्रियाणाम॥२६ कि स्वं मूर्खः प्रसभं मदचेताः समायोचः पादयं फाल्गुनस्य । अप्रिया निरोहि क्षुद्रः क्षेप्ता क्षभिणधाक्षमावान् ॥ २७ ॥ हन्यामहं ताशानां शनि क्षमाम्यहं क्षमया कालयोगात् । बतोवरचं पाण्डवार्थेऽप्रियाणि प्रधषयमा पापकर्मा ॥ २८ ॥ मयाजधे जिह्ममतिइतस्त्वं मित्रद्रोही साप्तपदं हि मैत्रम् । कालस्वयं प्रायुपपाति दारुणो दुर्योधनो युद्धमुपागमट्यत् ॥ २९॥ सिपि स्वभिकांक्षमाणतन्मत्यसे यत्र नैकान्त्यमस्ति । मित्रं मिदेर्नन्दवः प्रीयते 'चा संत्रायतेनुतदिता ॥३०॥ प्रवीमि ते सर्वमिदं ममाति तचापि सर्वसम पति राम॥३१॥शत्रुः शवः शासतेीश्यतागणोतेर्षा घसतः सीदते । उपसर्गाव हुधामदतेश्च प्रायेण सर्वं त्वयि तञ्च मबम ॥ ३२ ॥ दुर्योधनाय व प्रिया देखतेहुये उस पांडव अर्जुनकी वीरता वर्णन करताई । २६ । तुम महामूर्ख और अमानचित्त शंकर हठसे उस अर्जुनकी वारताको क्या कहतेही जो पुरुष अमिय कंठगेर चित्त नीच और प्रशान्तचित्त होताहै वह शान्त चित्तवालोंकी ...। करता है। २७ । मैं इस प्रकारके सैकड़ों पुरुषों को मार सक्ताई परन्तु मैं क्षमा करनेके समय आनेपर क्षमाकर देताहूं हेपापात्मा शल्य तू मझानीके समान डराकर अर्जुनके लिये प्रियवचनोंको कहताहै । २८ । हे सत्यताके समय मित्रसे शत्रुता करनेवाले कुटिल बुद्धि निश्चय करके मित्रता सात पदोंसे संबंध .. है वह भयकारी समय सम्मुख आता है जिससे कि दुर्योधनने युद्धकोमाप्त किया । २९ । और मैं भी उसीके अभीष्ट सिद्धीका चाहनेवालाहूं परन्तु तुम उसी. | मानतेहो जिन में कि प्राति नहीं है अर्थात हमारा पतवाला होकर भी साथ माति करता है मित्रवहहै जो प्रसन्न कर अथवा रक्षाकरे और मुखदे । ३०. | मैं तुमसे सत्य कहताहूं कि यह सब गुणमुझमें प्राप्त राजा दुर्योधन मेरे गुणोंको जानताहै और मारनाशासनकरना स्वाधीन करना दंडदेनालम्वेवासलेने प्रवृत्त करना और पाड़ित करना इनगुणों के होनेसे शत्रुकहानाता है। २२ । यह the wrirriors. Being ignorant and unacquainted with Arjun, your talking foulishly of his bravery. A bad natured, hard hearted man, I ot'unpeaceful mind, speaks ill of those who are of contented minds. I can sloy bundreds of people like you, but being of a forgiving nature, I forgive you. Being a sinful man, you terrify me by praising Arjun. You show enmity towards friends. 'Surely, 'O fool, friendship is of seven degrees. Duryodban has brought about these terrible times. I uni bis well-wisher, but you seem to lack in friendship as you show gour love towarde another. 30. I tell you truly that I possess all the good pualities required of friendship, such as pleasing, protecting and giving happiness, and Duryodhan knows it. An enemy, on the कर्णपर्व Karan Parv 164551 पशोऽधपारमायमपीदवसम् । तस्मादई पाषामदेवी योत्स्ये पक्षात्कार तर लक्ष्य मेऽप । भरप्राणि पश्याच ममोत्तमानि प्राइभ्याणि दिग्यान्वय मानुपाणि ॥ ३३ ॥ माप्तादायिष्याम्यहमप्रवीयं द्विपो द्विपं मतसिपातिगत्तः । मयं प्राहम्य ममसा तस्यजस्य क्षेप पार्यायाप्रमेयं जपाय ॥ ३४ । सेनापि मे नंष मुच्येत पुरम के पतेविषमे मेऽ घक्रम ॥ ३५ ॥ चैवस्वताहण्हतावरणातापि पाशिनः । मगमा धनपतः सबजावापि यासयात् ॥ २६ ॥ अन्यस्मादपि स्मास्चिमितादाततापिनः । इति शल्य विजानीहि यथा नाई विमेम्पतः मस्मान मेपापांग्रामि चिय मनाईनात् । ३७ ॥ सह युवंलि मे ताप साम्पराये प्रविष्यति. कदाचिदिजयस्याहमहतोरटन्नप ॥ ३८ ॥ अनानादिलिपन पाणान घोररूपान् भपानकान् ॥ ३९ ॥ होमधेन्या पास्पमस्प प्रमच पणाहना सम गुण बहुपा तुझमें नियतहैं इसनिमित्त भयमैं दुर्योधनकी वा तेरीइच्छा अथवा अपनी शुभकानि और ईश्वरकी प्रसन्नता के लिये अर्जुन और वासुदेवजीसे लडूंगा भव उस कर्मको वा ब्रह्मास्त्र भादि महा उत्तम भौर दिव्य प्रसों को और मानुपा शत्रों को देखो । । मैं उस उग्र पराक्रमी को ऐसे प्राप्तकरंगा जैसे कि घड़ा मतवाला हाथी दूसरे मतवाले हाधीको और विनयके हेतु उस अनेप धासको मनसे भार्जुनके ऊपर चलाऊंगा।।४। उस मेरे भनस भी युदमें कोई शत्रु नी यपसक्ता है जो;.कदाचित यह रथकाचक किसीगमें नहीं गिरे । १५ । तो हे शल्प मैं दगडधारी यमराज पामभृत् वरुण गदाधारी कुबेर वन धाइिन्द्र पौर पदामिलापी शास्त्रोंसे मारनेपाले किसीमकारकेभी सवसे नहीं डरताहूं इसीहतुसे मुझको भर्जुन और श्रीकृष्ण नी मे जराभी भयनही । भेरायुद्ध उन दोनोंके साथ परलोक के निमिसहोगा हे गना इसका हेतु यहहै कि एकसमप शत्रोंके सीखनमें मैंनेघोररून असोंको फेंकने में । १८ । वहां जानतासे एक बामणकी होम साधन करनेवाली गौका पछड़ा जो निमन hand, dostroys, injurry caurs us to hcaro long sighs and makes us cheerless. All these signs are found in you. To pleass Duryodhan, as Tell as you and aigrell, and for the sake of faoi, and to pleasu Gou, ? shall fight with Arjun and Vasudev. Now you will witnous iny decds, and celestial and human weapons. I shall mect that brava man as one mad elephant incets with another, and shall discharge the Brahroasta in wind alone, to gain victory orer Arjun Nono can rape my weapon if ay ulecl dosahut s'ık is the greune's Tom rol atraid of Yaoi, Varun Kun, Ihinner any other for. Itm inlio ray nirail of Siri xulnardariun. fy thout silly them roil istortioralcuttha rects 11s mattising arthery l kuting, torry estandoned piltl. l'rbranoly 1 hit the cult of a Bml.dat'. cow - .x:mird 3458] Jahathirurt बांमाश कथश्वन । अन्य जानीहि यः परस्या माधयितुं रणे ४ नाचरण चलमतापत् पारध्यं यत् स्वमात्य माम् । मशक्का महगुणान् वकुं लगसे बात ॥ ५ ॥ न हि फर्गः समुहतो भपायमिह मादक । विमान जातो यो ऽयंजन तयारमनः ॥ ६ ॥ सासमापन सौदामिप्रभावन घहित कारणेखि मितिस्प शलए जीयसि साम्प्रतम् ॥ ७ ॥ रामा तराष्ट्रस्य काव्य मुमहदूप तम् । मपि तवाहिन शल्य-तेम जीपति मे भणतय समयः पूर्व सम्म्म विधियं पसः ॥ ९॥ ने शल्पसहस्रण विजय परानमामिदाह पापी यामिति जीयसि साम्यतम् ॥ १०॥ इति कण पणिशल्य संवादे पिरिशोध्यायः ।। केवल वातातीस किसी दशा भी भयभीत होनेको योग्य नहीं हे शल्प वह कोई दूसरेही मनुष्यहोंगे जा पदमबर्जुनसे में।४ माच मनुष्य की इतनी से सामर्थ्य है जो.मन मुझको कोर वचन कहो दुदी मेरी प्रशंसा करने को असमर्थ होकर तुम बहुतसो बातें करत हो । ५। हे मदेशी इसलोक में कर्ण भपके लिये नहीं उत्पन्नहुमा है किन्तु यशकार्ति और पराक्रम के हेतु मैंने जन्मालपा है।। हे राजाशल्य तुम इनतीन कारणों से जीवो चहो एकतो सारथ्यकर्म करने से उत्पन्न हुई मित्रता रे मेरी समायुक्त प्रकृति तासरे अपने परममित्र दर्योधन के कार्य सिद्धके लिये।७। हे शल्प राना दुर्योधनका बड़ा भारी कार्य वर्तमान होकर मुझमें नियत है इसहेतुसे महाकाल तक मेरे हायसे जीवते से क्योंकि मथम में निपम करचुकाई कि तेरे पिय वचनों को सहूंगा । ९ । मैं शल्प के विनामी | शत्रुओं को विनपकरसता हूँ और मित्रसे शनुता करना पापकर्म का है मी कारण से तुम जीवत हो । १० । may be torrficl of Arjun A wicked man like you cas ba terrified by words You cannot speak of my merita and aro talking nonsense. 5. Karan is not created in this world t) bs terrifiod, bu is born for fans and prowess. You ore life to tires thing, Sbalyst friend. ship arising out of your work as a driver.my forgiving nature: nad tho thought of accomplishing the work of my dear friend Duryodhaa. A grout weight of Duryolhan's work lics on me and therefore I spare you for a short time; I havo promiral to hear your hanh words for sowo time. I can conquer my foo: sithout Shalya. It is a sin to sako ennits with a friend and therefore you aro alive."10.
Tv कणपर्व Karnm Parmy (6159) शल्प उपाच । नन प्रलापाः फर्णत पान प्रयोगि परान प्रति । ते कर्ण सहसंण शक्यं तु र युधि । ॥ सजय उयास । तथा पन्त १० कों धियं सदा । पर मिगुण भूयः यावापिपदर्शनः ॥ २॥ कण उवाच । रवन्तु में षमेकामा गृप मजनाधिप । सम्मिो धृतराप्रस्य पोध्यामानं मया भुतम् ॥३॥देशभिविपिधाधित्रान् पूर्ववृत्ताच पार्थिवान् । ब्राह्मणाः पात: स्म धृतराष्ट्र मुपास॥४॥ तत्र पृषः परावृधाः कथाः कश्रिमिजीसमः । बादलोकद शाम मदाम कुस्सपर वाफ्यमयात् ।। ५ ॥ पहिष्का हिमपना गया पहिताः । सरस्वत्या यमुनया कुरुक्षत्रण चापि ये ॥ ६ ॥ qurat सिन्धान मदीमा पेऽन्तभिताः । तान् धर्मधाधानाचीन पातीकनपरिषजयेत् ॥ ७ ॥ गोपनो नाट वरः सुमाण्डं नाम वापरम् । एतद्राजकुलबारमाकुमारावस्मरा. अध्याय ४४ ॥ शल्पमोला हे कर्ण निषप करके ये सब निष्फल बातें हैं जिनको तुम शाओं के विषय में कात हो- युद्धमें हनार कग के बिनाभी मेरे , हायसे वायुविनय होनके योग्य है । । संजप पोले कि इस पछि कर्णने । इसमकार के कंगेर पचन कनेशले शल्प से फिर प्रथमसेभी द्विगणित ऐसे कठोर पचन कहे जो देखने और सुनने के अपोग्पये । २। कर्णवोला हे राजा म तुम चितकोस्थिर करके उन बपनों को सुनो जो दुर्योधन के समक्ष में। ३ मामलों न भूताष्ट्रकी सभा मध्य नानाभकार के अदभुत देशों के भूत तृवान्तों को राजाओं से वर्णन कियाघा वहां एक वृद्धब्राह्मणोधम भूतकातीन वृतान्त विषयक कयाओं को कहता.वाहीक और पददशोंकी निन्दा करता हुआ यह वचनबोला, ५॥ कि जो लोग हिमाचल पर्वत श्रीगंगानी सरस्वती यमुना और कुरुक्षेत्रमे भरून कियेगये हैं और जो लोग पंजाब और सिन्ध के मध्य में निवास करनेवाले हैं उन धर्महीन अपवित्र शरीक नामबालों को त्यागकरें।७। वापर गोवर्धन पाए CHAPTER XLIV Shalya said, "surly, O Karan, your words are to no purposform couquer the foo without the help of a thousand Karans Sanjaya said. Ulcariug the harsh words of Shalya, Karan spoke to bio ia doubly barsh words unfit for the ear. Kasan said, " Hear me attentivoly., O'Shalya, the words which a Brahmaa said io the court of Dbritrashtra, wbile giving an account of varices cocotries. An old Brahman, speaking about the countrix of l'abus and ladra said, " Those who live, beyond the Hirways, the Ganges, tho Saraswati, the Yamuna and Karaiseta- 6506 who live bote won the Punjab and Sindh- the Vabilu te tbe lowest class of me Thuru is a slaughter house lot kiss wide tall-for-tolling in * .
- (64631 Mahabbarat (६४६२) कथं सञ्जय राधेयः प्रत्यज्यूहत पाण्डवान् । धृष्टद्यम्नमुखान् सर्वान् भीमसना भिरक्षितान् । सर्वानव महेवामानजस्यानमारपि ॥ ५ ॥ क च पंक्षी प्रपक्षीया मम सैन्यस्य सजय । प्रधिभनय यथान्यायं कथं पा समवस्थिताः ॥ ६॥ कथ पाण्डुसुताश्चापि प्रत्यम्यहम्त मामकान् । कथश्व महाद्धं 'पावर्तत मुदारुणम् ॥ ७ ॥ क च वीभत्रमुग्मयत् यत् कोऽयाद युधिष्ठिरम । को हर्जुनस्य सान ध्ये शकायतुं युधिष्ठिरम ॥ ८ ॥ सर्पभूतानि यो झेका खाण्डवे जितवान् परा कस्तमन्यस्तु राधेषात् प्रतियुध्यजिजाषिपुः ।। ९॥ सञ्जय उवाच । शृणु म्यास्प रचनामर्जुनश्च यथागतः । परिवार्य नृपं स्वं स्वं संग्रामश्चाभयद्यथा ॥१०॥ कृपः शारद्वतो राजामागंधाध तस्विनः । सात्वतः कृतवर्मा घ दक्षिण पक्षमाथिताः ॥ ११ ॥ तेषां नपक्षी शकुनिरुलूकच महारथः । सादिभिर्विमलनासस्तयानी कमरक्षनाम ॥ १२ ॥ गान्धारिभिरसंभ्रान्तेः पार्वतीयैश्च दुर्जयः । शलमानामिषप्रातः सब पाएउवों के सम्मुख जिन में अग्रगामी धृष्टद्युम्न था कैस न्यूहको अलंकृत जिया । ५ । और देवतामों से भी अजेय बड़े धनुषधारी सव युद्धकाओं को किस किस रीति से रोका और हे संजय मेरी सेनासे पक्ष और प्रपक्ष कौन हुये ।। और न्याय के अनुसार सेना का विभागकरके किस गति से नियत हुये और पाण्डवों ने भी मेरे पुत्रों के सम्मुख कैसे यूव्हको रचा । ७। और वह महाभ भयानक युद्ध कैसे जारी हुआ और उस समय अर्जुन कहांथा जबकि कर्ण युधिष्टिर के सम्मुख गयाथा । ८ । क्योंकि अर्जुन के समक्ष युधिष्ठिरके मम्मुख जाने को कौन समर्थ होसक्ताई कि जिसने पूर्वकालमें खाण्डव वनके मवगीत मात्रों को विजय किया उसके सम्मुख कर्ण के सिवाय कौनमापुरुष जीवनी मागाकर युद्धको करे । ९ । संजयवोले कि ब्यूहकी रचनाको सनिये और मेसे पाणुन वहां से गया और जिसरीतिसे अपने गजाको पहुये युद्ध जारीहुआ। १० । राजा शारद्वत कृपाचार्य वेगवान् मगध देशीय यादव कृतवर्मा यह तो दाहिने पक्षपर | नियत हुये । ११ । और उनके मपक्षपरमहारथी शकुनि और महारधी उलूक ने स्वच्छमास रखनेवाले सवारों समेत भापकी सेनाको रक्षित किया। १२ । भयो dyumn 35, How did he check all those warriors who were invinciblo oven by gods ? Who wero for and against my rido ? How did tho Pandavas arrango the arniy divided and posted ! their army? How was the lattle fought? Where was Arjun when Karan oppasci Yudhishthir! For, who could oppose Yudhishthir in the presenco af Arjun, who alone conquered all at tho , Khanday ferest?, Who, desirous of lite, except Karno, could withstand Arjun !" Sanjaya said, "Hear how the army was arranged; how Arinn went thero and how the battle wins fought Kripacharya and Kritrarma stond op the right, and Sbakuni and Uluk, with the horse How Tas । फर्णएवं Karan Paray (6463) पिशाचैरिव दुरंशः ॥ १३ ॥ चतुर्विशतसहस्राणि रयानामनियर्तिनाम । संशप्त का युद्धशाजा धामं पारंमपालन१५ । सान्चिताप्तध मुतैः कृष्णार्जुन जिघासवः । तेषां प्ररक्षा: काम्बोजा.शफाय ययनः सह ॥ ३५ " निदेशात मतपुषस्य सरथाः शाश्वपतयः । माहयन्तोऽर्जुन तस्थुः कंशवण्च मावलम ॥ १६ ॥ मध्य सनामुने फर्ण पवातिष्ठत दंशित: चित्रवर्माङ्गदः संधी पाल यन् पाहिनीमुखम् ॥ ७ ॥ रक्ष्यमाणः मुसंरब्धः पुनः शास्त्रभृतो घर । यादि नीप्रमुखे धीरः संप्रकर्षनशास्त्त । १८ ॥ अभ्यवर्तमहावाहुश्चन्द्र वैश्यामरप्रभः । महाद्विपस्काधगतः पिङ्गाक्षः प्रियदर्शनः ॥ १९ ॥ दुःशासनो घृतासन्यैः स्थिती न्यूसस्य पृष्टतः । तमन्वयान्महाराज स्वयं दुय्याधनो नृपः । २० ॥ चित्रार्थ उत्पम होनेवाली व्याकुलता स रहित गान्धारदेशी लोग और कठिनतासे विजय होनवाले उन पहाड़ियों ततेत जोकि टीड़ीदल के समान पिशाचोंके तुल्प कठिनता से देखने योग्यथे । १३ । मुख न मोड़नेवाले चौबीस हमाररथी पद्धमें कुशल | संसप्तकोन वायें पक्षको रक्षितकिया । १५ । यह सब आपके पुत्रोंसे युक्त श्रीकृष्ण भज्जुनको मारनेके अभिलापी थे और पाण्डवों के पक्ष में यवनों समेत कांवोन देशीय शलजातिके लागहुये । १५ । और कर्णकी ओझासें रथ घोड़े और पतियों | समेत सबलोग श्रीकृष्णजी और अर्जुनको पुकारतेहुये। १६.। यह अपूर्व कवय वाजूवन्द और मालाधारण करनेवाला कर्णमी सेनामुखको राक्षितकरताहुआ सेनाके (मुखकर नियतहुआ। १७ । वह अत्यन्त क्रोधित आपके पुत्रोंस व्याप्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ शूरवीर कर्ण सेनाका संहार कर्चा मध्य सेना मुखपर शोभायमान । १८ । और सूर्य और अग्निके समान भकाशित अपूर्व दर्शन पिंगलवरण नेत्रवाले बड़े हाथीपर सवार सेना समेत व्यूहके पृष्ठभागकर दुश्शासन नियतहुआ हंराजा उसके men armed with prases, guarded the other wing. 12. Free from uneasinoes of frar, tho invinciblo warriors of Gandhar, and the hill warriois, numberloss like a flight of locusts, terrible to look at like pistaches, with twenty four thousand invincible car-warriors of the Sansaptaks clever in lighting, guarded the lett wing. All these, with your sops, were desirous of sayidy Arjun und Sbii Krishn On the side of tho Pandavus, were thu Yuvans, Cambojes and Shakas. All the warnions, whether on ears or on horse back or on toot, led. by Karan, challenged Krislin and Arjun to fight, 16. Karan adorned with arttour, garland and arnulet, protected the entrance of the array. Valiant karun, the best of wairiure, looked glurious at the bead bf the almy. Mounted in a yellow elephunt ut wonderful fow, glorious Inke the snu or fire, Dushstan stocd protecting the real, Ariued with Forderlul vontursand #UOUI, cowpapięu by bis brothers 2* »p]} and- - । (6464) Bfahabbarat घिसमाहः सोदरपरभिरक्षितः रक्ष्यमाणो महाशयः सहितमंद्र केकयेः ॥२१॥ मशोभत महाराज दरिव शतक्रतुः । प्रवधामा कुमणाच ये प्रयास महारथाः २२ ॥ नित्यमचा माननः शरैम्लाः समन्विताः । मन्वयुलामी सात घ वोयदाः ॥ २३ ॥ ते ध्वजवंजयन्तीभज्लानः परमायुधैः । सविभि मास्थिता रेजुईमपात वाचलाः ॥ २४ ॥ तेषां पदातिमागानां पादरक्षाः सहसा पहिशासिधराशरा वभूपुरनिवर्तिनः ॥ ५ ॥ सादिभिस्यन्दन गैरधिकं सम मस न्यूहरामोलिवमी देशामुरबम्पनः ॥ २६ । वास्यः मविहिता नापन विपश्चितः । नृश्यतीव महाम्यहा पोषां भयमादधत् ॥ २७ ॥ तस्य पक्षपभ्यो निपाति पुयुषवः । पस्यश्वरयमानाः प्रावृषणेव यलाइका: ! २८ ॥ ततः सेनानखे का इष्टा गजा युधिष्ठिर । धनजयममित्रनमेक पीछे अशुत अस और कावधारी निज भाइयों से और एकत्रहुपे बड़े शुरवीर मद् भार कैकेय देशियों से चारों ओरसे रक्षित प्राप राजा दुयोधन ऐमा शोभा- यमान हुमा जैसे कि देवताओंके मध्यमें रक्षा कियाहुआ इन्द्र शोभित होता भार भलत्यामा वा कौरवोंके बड़े २ महारथी शूर म्लेच्छोंमे पक्त सदैव मताले बादलों के समान मदरूप नलके डालनेवाले हाथी उस स्योंकी सेनाके पाछे २ चले ॥२॥ वंद बना पताका वा प्रकाशित उत्तर शस्त्र और सबारों समेत नियत कर देते शोभायमानहगे जैसे कि वृक्षधारी पर्वत होतेहैं । २४ । उन पदाती और हाथियोंक पाद रसकभी पाहिश और खड्गके पारण करनेवाले मुख न मोनाले हजारों भरधार वर्षमान्थे । २५ । वह देवासरों की सेनाकं समान व्यहराज सगर स्य और हाथियों समेत भलंकृत महा शोभायमान हुआ। २६ । उस बुद्धिमान सेनापति ने इतने वाहस्पत्य व्यूहकोरचा उस नाचतहुये महा व्यूहको भय उत्पन्नहुमा २७ उसके पक्ष मार प्रपक्षों से पनी घोड़े रथ और हाथी सबकसप युद्धाभिलापी होकर एस निकलतेथे जो कि वर्षा प्रानु में बादल निकलते हैं । २८ । इसके पीछे राजा He tho warriors of Afadia and Kaihaya, Princo Duryodhtau looked liko Iudra surrounded by gous. Aslıwathams and other brave frarriors of the Kauravas, accuni panied by Mlecbas like clouds or elephants, followed the army. 23. With bsnners, standards, glorious weapons und horsemen, they looked glorious like bills with trres, Thu frot soldiers and guards of the elephants, armed with pattishes sad swords, invincible in battle, were thousanda in, number. 25, Liko tho arıny of lodra, the warriors mounted on cars and elephanst, looked very glorious. The vias leader of the armies, arranged the forces after the fashion of Vriliaspi and caused courternation among the foc., Tho fout, borse and elephants at the wings of his Army dtainous of fighting, looked like clouds of ruior. Prince l'udhishthir, scuing कर्णपर्व Karan Parar (6485) वीरमुबाघ । २॥ पश्यानमहाव्यूई कर्णेन विहितं रणे । युक्त पक्ष मंग अपनी प्रकाशते । ३० । नरक समालोक्य प्रायमित्र महाबलम् । यथा नाभिभवत्यस्माता नीतिविधीयताम् ॥ पयमुकोऽज्जनो रास प्रारज लिनपमापीत् । यथा मवाना तथा तत् संवैन सदम्यया ॥ ३२ ॥ यस्यस्य पिता मातस्वं परिष्यामि भारत । प्रधानषध हास्य चिनागस्तं करोम्यहम ॥ ॥ युधिष्ठिर उपाय । तस्मात्योष गधा भीमसनः सयोधनम सेन व नकुलः सादेकोऽपि सापलम् ।। ३४ ॥ दुःशामनं शतानीको हार्दिक निशि पुरुषः । पाण्यो द्रोण मुतं पातु स्यय योत्स्यायह काम ॥ ३५ । द्रौपदेया मागष्ट्रान शिष्टान् मह शिखण्डिना । ते तेच तांस्तान सहितानस्माकं मतु मामकाः || ३६ ॥ सञ्जय उवाच । इत्युको धर्मराजेन तथेत्युपाया धनन्जयः। पुधिष्ठिर कर्ण को सेना मुखकर देखकर शत्रुओं के मारनेवाले अकेले अर्जुन से बोले । २९ । ई भर्जुन युद्धमें कर्णके रचहुये उसमा व्यूहको देखो जो पक्ष और अपक्षों से संयुक्त शनुकी सेनाको मकाशित करताहै । ३० । सो तुम इसशत्रुकी सहसेनाको मच्छे प्रकारसे देखकर ऐसी नीने विचारों जिससे कि यह हमके। भयभीत न करे।३१। राना के इसरीति के वचनको धनकर अर्जुन हाथ जोड़कर रामा से कहनेलगा कि जैसा भाप कहते हैं वैसाही है मिथ्या नहीं है । ३२ भरतर्षभ जिस रीतिसे इसका मारना विचार कियाहै उसको मैं करूंगा इसकामारना बहुत श्रेष्ठ है इससे मैं इसका नाशकरता हूं । ३३ । युधिष्ठिर बोले कि हम तो ..पण से लड़ो भीमसेन सुपोधन से नकुल वृषप्तनसे सहदेव सविक से । ३४ । शतानीक दुशासन से सात्यिकी कृतवर्मा से पाण्डय ममामा से सम्मुख होकर लड़ो और मैं आप कृपाचार्य से युद्ध करूंगा । ३५ । और शिखप्पी समेत द्रौपदी के सब पुत्र उन शेवरच हे ये धृतराष्ट्र के पुत्रोंसे सम्मुख होकर लड़ेनको जाओ और सर हमारे शूरवीर उनके शूरवीरोंको मारो ! १६ । संजय बोले कि इसरीति से धर्मराज Ku140 at the entrance of the army, said to Arjun the destioyer of " Look at the array finned by Karan, which gloriies the enemy's fines 30. Look at the vast army of the enemy and arrangn vur army in a manner thut o may not be terrified by them.' Heur. ing these words of the kiog, Arjun with clasprod lanılı, raid. " will be as you have said. I shall bring alout their tuin and shall begin directly." Yudtishtlir said, “'You should engave:in fight. ing with Karan; Bhimson will meet with Suyodhan, Nakul withi Vrishasen, Sahader with Saahuni, Shatanik with Dushasan, Satyaki, 1. with Kritvarus, Pandya with Asliwathamu and I with Kripacharyn 35. Shikhandi and the potis of Draupadi will engage with the remaining 80 18 of Dhrit uolatra and thus our warriors will slay thiazo fles [64661 Malhubhurat व्यादिदेश स्वसैन्यानि स्वयञ्च माच्चममुखम् ॥ ३७ ॥ ब्रोशानेन्द्रघरुणान् कम शो योऽवहन पुरा। तमाद्यं रथमास्थय प्रयाती केशवार्जुनी ॥३९॥ अथ त रथमा यान्तं स्ट्या चातदर्शनम् । उवाचाधिरथि शल्पः पुनस्सं युद्धदुर्मदम् ॥ ४० ॥ अयं स रथ यायाति देवताश्वः कृष्णसारथिः । दुरः सर्वसम्यानां विषाकः कर पाधि ॥ ४ " निनन्नमित्रान् फोन्सया यं कर्ण परिपृच्छसि ।। ४१ । श्यते तुमुल शब्दो यथा मेधस्वनो महान् ॥ ४२ ॥ ध्रुवर्मती महात्मानौ घामुदेवधनाज यो । एप रेणु समुद्भनी दिधमावृत्य तिष्ठति ।। चकनेमिमणव कम्पने कर्ण मेदिनी पूयात्येप मायायुरभितस्तत्र चाहिनीम् ॥ ५४ ॥ कब्यादा न्याहरन्त्येते मृगाः ऋन्दन्ति भैरवम् । पश्य कर्ण महाघोरं भयई लोमहर्षणम् ॥ ४५ ॥ कम, मेघ के वचनोंको सुनकर अर्जुनने कहा कि ऐसाही होगा यह कहकर अपनी सेनाओं को आजादी और आप सेनामुख परगया । ३७ । जिसने पूर्वतमय में ब्रमा रुद्र इन्द्र और वरुणको क्रमपूर्वक सवारकिया उस रथपर सवारहोकर केशवनी और अर्जुनचले । १९ । तदनन्तर शल्य उस अपूर्व दर्शनीय आतेहुये स्थको देखकर उस युद्धदुर्मुद अधिरथी कर्णस वोला । ४० । यह श्वेत घोड़ोंस युक्त सारथी श्री कृष्णजी. ममेत सव सेनाओं से भी कठिनता से रोकनेक योग्य अर्जुनका ग्थ आया यह रथ ऐसे कठिनता से रोकने के योग्य है जैसे कि कोका फल रोकने के योग्य नहीं होता है । ४१ । हे कर्ण जितको तुम पूछत थे वह शत्रुओं को मारता हुआ अर्जुन चला आता है उयका ऐसा कठोर शब्द सुनाई देता है जैसा कि शादलका घोर शब्द होता है । ४२ । निचय करके यह दोनों. महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं देखो यह उठीईई धूलि आकाशको व्या करके नियत है । ४३ । हे कर्ण रथके पहिये के नासे चलापान पृथ्वी कंपायमान है और महावेगवान वायु प्रापको सनाके सम्मुख चलरही है। ४४ । यह को मांसखाने वाले राक्षस आदि of the enemy."36. Sanjaya said, " On hearing the words of Dharuraj,Arjun said," Let it be so. " He ordered his army and weat at the licad of the farces. The car which had carried Bralimna, liudra, Indra and Varun in turn, now carried Arjun and Vasudev. T'hen Sbalya, seeing the car come toward hini, said. tor Karan, " Here comua ajua's invinciba car with the white horses driven by Krishit. It conatibo turned back like tha punishdiont of sin. Bere comes Arjun about whom you were asking. The poiss of his car is like that of thunder. Surely Krishu and Arjua are there.. Look at the dust rising to the sky. The Earth trembles under the wheels and a dreadful wisd is blow.
(६४६७) - कर्णपर्य karith larv F6467 संघाशं भानुमात्य संस्थितम् । पश्य यूथैर्यहुविधगाणां सर्वतो दिशम ॥ ४६ ॥ बलिभिः कण शालैगदित्याऽभिनिपक्ष्यते ।पश्यकङ्काथगृध्रांश्च समतान् सहस्रशः ॥४७॥ स्थितानभिमुखान् घोरानन्योऽयमभिभापनः । रन्जिताश्चामरा युक्तस्तष कर्ण महारथे ॥ ५८ ॥ पूराः पूचलन्यते ध्वजश्व पूकम्पते । सर्वपशून हयान् पश्य महाकायान्महाजषान् ॥ ४९ । लघमानान् दर्शन पानाफाशं गड़ानिय ध्रुधमेषु निमित्तेषु भूमिमाश्रित्य पार्शिवाः ॥ ५० ॥ स्वप्सन्ति निहताः कर्ण शतशो थ सहस्रशः । संखानां तुमुलः शब्दः श्रूयते लोमहर्पणः । ५१ ॥ आनकानाच राधेय मृदङ्गानाच सर्वशः । पाणशम्दान् परिधान मराश्वरथनिस्वमान । ५२, । ज्यातलंपु शम्दांथ गृणु फर्ण महात्मनाम् । हेमरुप्यपसष्टानां पासस! शिलानिर्मिताः ॥ ५३॥ नानावी रथं मान्ति श्यसनेन प्रकम्पिताः। सहेमचन्द्रनाराकोः पताका भी वोलरहे हैं यह मृग भयानक शब्दों को करते हैं हे कर्ण इस घोर भयदायक रोमहर्पण करनेवाले सूर्यको आच्छादित फियहुये वादल की मत केतु नक्षत्रको देखो और सब दिशामों में नानाप्रकार के पशुओं के झंड और पराक्रमी शाल मूर्यको देखते हैं हजारों भागनेवाले और सम्मुख नियत होनेवाले परस्पामें धारे । शब्द करनेवाले कंक और युद्धों को देखो और हे कर्ण तेरे स्थपरलगे हुये प्रति उत्तम चामरभी अग्निके समान होगये है । ४८ । बजाकांपती है बड़े वेगवान उन्नत बलिष्ट शरीरवाले घोड़ों के कैपको देखो । ४९ | जैसे दर्शन करने के योग्य आकाश में उड़नेवाले गरुड़ोंको देखते हैं उसीप्रकार निश्चय करके युद्धों में हजारों मरेहुये रागालोग पृथ्वीपर आश्रपलेकर । ५० । शयनकरेंग और शंखों के कठोर शब्द रोमांच खड़े करनेवाले सुनाई देते हैं । ५१ ॥' हे कर्य दोल और मृदंगोंके शब्दों को सुनो हे राधाके पुत्र वाणोंके मनुष्योंके और घोड़े हाथियों के शब्द ५२। महात्मा के मत्यंचाके तलवोंके शब्दोंको और कारीगरोंके हायसे सुवर्ण और चांदीसे निर्मित वस्त्रों के बनायेहुये । ५३ । नानामकारकी वर्णवाली ध्वजाओं से कंपायमान पृथ्वी चन्द्रमा मूर्य और नक्षत्र रखनेवाली क्षुद्रघंटिकायुक्त पताका ing against your army, The rakshases, who eat raw flceh, are howling. The deer are crying dreadfully. Look at Ketu which excites fear by hida ing: the Sun, The herds of beasts and the tiger are looking at the Sun. Kanks and Vultures fly at one another with a noise. The chamars on your car are shining brightly like fire. Your banner trembles and the strong horses of our car are shaking. Thousands of kings Jie dead on the ground and look like garurs in the sky.50. The sounds of the conchs make the hair of tbe body stand on end. Hear the sounds of drums, arrows, men, horses, elephants, bowstrings and palms of hands. Banners made of the cloths of gold and silver, small bells, bright like (3468] ballalharra किंकिणोयुताः .. ५.. ॥ पश कांजुनस्यता सौदामिबि वारे । पजाकण कणापत मातेनाभिमहिलाः ।। ५५ । विनाजन्ति रणं कर्ण विमाने देवता पथा। सपनाका रथाचते पाम्बालानां महामनाम ॥ ५६ ॥ पश्य कुन्तीमुतं बार बाम सुमाराजितम् । पूर्वयितुमाया कपिपूर्वकेतनम् ॥ ५५ ॥ एष बजामे पार्पस्य प्रेक्षणीयः समन्ततः । रयते धानरो मोमो द्विषतां मम्युषर्वन ॥ ५८ ॥ पताच गदा गाशवं कृष्णस्य धीमतः। मस्यय माजते हम्ण कौस्तुभानु मान ततः ॥ ५९॥ पा शागदापाणिमिदयोऽतिवार्यवान् । पाहयोति तुष्णा पायरान वातरंहसः। ६॥ एतत् जति गाण्डोषं विकृष्टं सम्यसामिना ! ते. इतषता मुक्का नम्त्यमिवान् शिताः ॥ ६॥ विशालापतताम्राः पूर्णचन्द्र रयपर महा शोभायमान फर्रारही हैं। ५५ । हे कर्ण देखो कि अर्जुन की चना वायुसे चलायमान ऐसी कणकणारही हैं जैसे कि आकाशमें रिमिलिया कण. कणापा करती हैं। ५५ । और महात्मा पांचालोंके यह पताकाधारी रय विमानों से सदृश कैसे शोभायमान हैं। ५६ । वानराधीशको धारण करनेवाली अतिरथम विमपकारिणी ध्यजा संयुक्त मानेवाले अजेय कुन्तीनन्दन को देखो.। ५.। यह चारोंमार से देखने के योग्य पराभयानक शत्रुओका भयकारी बानर अर्जुन की मजाकी नोकपर दिखाई देरशाहै । ५८। और बुद्धिमान श्रीकृष्णजीका यह शंख चक्र गदा और शाङ्ग धनुपहै जिसमें श्रीकृष्णनी का कौस्तुभमणि न्यारीही शोभा दरहाहै । ५९ । यह शाई धनुप और गदा हाथमें रखनेवाले पराक्रमी रामदेवजी बायके समान शीघ्रगामी अंतघोड़ोंको चलातेहुये चलेभाते हैं। ६० । अर्जुन से संचाइमा यह गांडीव धनुष कैने शन्दोंको करता है उस इस्तलाशी के छोडेर पहते.क्षणवाण शधुओंको मारहे हैं। ६१ । और मुख न मोड़नेवाले पहेलचे रक्त the Sun and moon'and stars are tinkling on the batners, 54, Arjun's banner, Buttered by the wind, flashes lika lightning. The bannered cals of the Panchals look glorious ilko celestiul cars, Look, theru comea invincible Arjun, with his victorious banger having the device of the king of monkeys. The dreadful monkey, exciting foar among this foes all sound, is shiniag from the buoner. There you see the conch, discus, maco and Sjarany bois of wisa Shri Krishn, on whose persoa the Kaustubh Jewel shines with great rudianco. Vasudev, the wielder of glarang bow and mace, is coming on driving the whito hories Aeet as the wind.60. The Gundir bow. drawn by Arjun, makes a tremendous noise and his sliarp ariows are slaying the foes. The grwood is being covered with the body of tall, unflinching warriors, with faces like the full moon. The club like arms of the warriors, - (९) वर्णपर्व Karan Pare [6469]] निभाननः । एषा भूः कीर्यते गा शिरोभिरपलापिनाम ॥ ६२ ॥ पते परिध सकाश ण्यगम्बानुलेपनाः उद्यायुधशाण्डानां पात्यन्ते सायुधा भुजाः ॥ ६३ ॥ निरस्तनेजितना वाजिनः सह मादिभिः। पतिताः पात्यमानाच क्षिती क्षीणाश्च शरसे ॥ ६४ एरोपर्वताणां तुल्यरूप हना द्विपाः । संछिन्नभिन्नाः पार्थेन प्रपतयंद्रयो था । ६५ । गगराकारा रथा हतनरेश्वराः । विमानावीय पुष गन्ते स्वर्गिनिम्त्यमी ॥ ६६ ॥ ब्याकुलीकृतमस्यर्थ पश्य सैन्य किरी टिना। नानामृगसामाजदूध केरारिणा वया ॥ ६७ ॥ नन्त्येत पार्थिवान् पीपः गण्या समभिना । नागाश्वरथहयोधास्तावकम् समभिन्नतः ॥ ६८ ॥ मर्य इवाम्भोदेउम्नः पार्थो म दृश्यते । बजा हाते स्वस्य ज्याशब्दश्चा पिथ्यते ॥ ६९ ॥ अध द्रष्टासि तं धीर श्वेताश्व कृष्णसारधिम् । निधनात मी पूर्णचन्द्रमा के समान मुखडाले शूरवीरों के शिरोसे यह पृथ्वी आच्छादित होता चली जाता है। ६२ । उठाये हुये शात्रों में कुशल युद्धकर्ताओं के परिघकी समान पवित्र चन्दनादि चर्षित भुजदंड शस्त्रोंके द्वारा गिरायेजाते हैं । ६३ । जिनके नेत्र और निन्दा निकल पड़ी यह सवारोंसमेत घोड़े पृथ्वीपर मर कर गिरे.. हुये सोरहे हैं। १४ । पर्वतके शिखरकी समान रूपवाले यह हाथी मांरंगये और मर्जुन के हायसे घायल वा चूर्णीभूत अंगवाले हाथी पर्वतों के समान घूमते हैं ६५ । वह गंधर्वनगरके समान रूपवाले स्थ जिनके कि राजा मरगये वह स्वर्ग: वासियों के पवित्र विमानों के समान पृथ्वीपर गिरते हैं । ६६ । अर्जुनके हाथ से अत्यन्त न्याकुलसेना ऐसी दिखाई देती है जैसे कि नानाप्रकारके हजारों पशु. के समूह केशरी सिंहसे व्याकुल होते हैं । ६७ । आपके हाथी घोड़े रय और पतियोंसे समूहों को मारनेपाले सम्मुख दौड़नेकाले यह वीर पाण्डवलोग राजामों को मारते हैं । ६८ । जैसे कि बादलोस सूर्य दकजाता है उसीप्रकार यह अर्जुन दकाहुआ दिखाई नहीं देता है उसकी ध्वजाकी नोकही दिखाई देतीहै और प्रत्यंचा का शब्दभी समाजाता है । ५९ । अब उस श्वेत घोड़ेवाले श्रीकृष्णजी को सारथी b autified with sandal paste, are being cut down by weapons. The horses, with eyes and tongues out, are lying dead on earth along with their riders The elephants, huge as hills, are slain by Arjun, while the wounded ones are moving like hills.65. The cars, like the city of Gandharvas, whose riders are dead, are lying on the ground like celes. tial care. Tho.army, wounded and fleeing from Arjun's arrows, looks like a herd of deer chased by a lion. The elephants, horser, cars and foot of your army are being destroyed by the Pandavas. Arjun is astered us it were with clouds; his banner only is visible and the twang of his bow is audible. With bis white horses driven by Shri Krishn 10 (6470) Mahabharat शानधान संख्येय कर्ण परिपृच्छसि । ७. ॥ अप.तो पुरुप यामी लोहिताको परन्तपौ । यासजुनौ कर्ण द्रष्टास्करथे स्थिती ॥,७१ ॥ साथियस्य पायेगो गाण्डीवं यस्य कार्यकम् । तद्धन्तासिराय पन्नो राजा भविष्यसि ५ ७२ ॥ एए संशप्तकातस्तानेवाभिमुखो गतः। करोति कदनंच संग्रामे विपता पही ॥ ७३. ॥ इति वाण मद्रेशं फर्ण: माहातिमन्युषान् । पश्य संशप्तकः क्रुद्ध सर्वठः समभितः ॥ ७॥ एष सय्यं स्याम्भोदेश्छन्न पार्थो न पश्यते । पतवन्तोर्जुनः राप निमग्नो योधसागरे । ७५ ॥ शल्य उवाच । यरुण कोऽम्भसा इत्यादि धनेन च पायकम् । कोऽलिनं या निगृहणीयात् पिवेता को महार्णधम.. ॥ ७६ डिप्रपमह मन्ये पार्थस्य युधि निप्रहम् । न हि शक्योऽर्जुनोनेंतु युधि सेन्द्रः । सुरे ॥ ७७ ॥ अथपा परितोषहते पाचोपरया मुममा भव । न स सक्यो थुधा रखनेवाले युद्धर्मे शंभोंके मारनेवाले वीर अर्जुन को देखोगे। .. जिसको कि तुम पूछतेथे हे कर्ण भव तुम इन पुरुषोत्तम लालनेत्र शत्रुओं के संवतकरनेवाले एक रथ पर नियत अज्जुन और वासुदेवजी को देखोगे । ७१ । जिसके सारमा श्रीकृष्णजी है और धनुष जिसका गांडीच है हे कर्ण उसको जो तुम मारोगे तो. हमारे राजाहोगे । ७२ । संसप्तकों का बुलाया हुमा यह अर्जुन उनके समीप सम्मुख होकर उन महापराक्रमियोंका युदमें नाशकररहीहै, ७३ऐसे शत्यके वचनों को मुनकर कर्ण महाक्रोध युक्त होकर बड़ेः अहंकारसे, बोला कि शल्य तुम महाकोष युक्त संसप्तकोसेसवोरसाँघरेहुये अर्जुनको देखो।७४।जैसेकिसूर्य बादलोसढकजाय उसीमकार ढकाहुआ यह अर्जुन दिखाई नहीं पड़ता है हे शल्य अर्जुन ऐसेही। अत्वका करनेवाला है, जो कि युद्धकचीमोंके समुद्र सुवरहा है । ७५ । शल्पयोग कि कौन पुरुप वरुणको जलसेमारे और कौन मनुष्य इंधनसे अग्निको बुझाये और कौन इवाको पकड़े अथवा कौन पुरुष, महासमुद्रको पानकरे । ७३ । मैं युद्ध में अर्जुनका मरना असंभव मानताहूं इन्द्रसमेत देवतालोगभी युद्ध भत्रोंसे अजुनको. विजय नहीं करसक्ते । ७७ 1 अब तेरी प्रसन्नताहे तो अपने वचनको कहकर चि, Arjun the destroyer of foes will be visible to you by and by .70, Your will now see, O Karan, the two red-eyed warriors, Krishn and Arjun,' ahäät whom you were asking. You will ba our king, if you can slay Arjun the possessor of the Gaudiv bow, Those car is drivea by Krielır. Challenged by the San-aptaks, Arjun attacks and destroys' those Warriors " Having heard Shalya's words, Karan said with pride and auger, " Look at Arjun surrounded by the Boraged Sarrsaptits. Ho is invisible like the sun luidden by cloud, That'destroyer of fors is non ainking in tho Ocean of our warriors." 75. Shalya said, "Vlto car., oxtinguish fire with fuel; who can hold the wind or diink to recan? I think that the slaying of Arjun is im pnssible; “ven Indra Wilft gode - (६४७१) पाणपर्व Karan Paray 15471) अनुमन्य कुरा मरियम ॥ ७८ " पाश्यामुसरेमि दहेस पुसमाप्रमा तोचिदिवाईवान योन समरे जयेत् ॥ ७९ ॥ पश्य कुन्तीसुत धीर भीम' 'माफ्लिप्टफारिणम् । प्रभास महावाहुँ स्थित भेरुभिवापरम ॥ || शमी निस्पसरवियरमनुस्मरन् । एर भीमो जयोतुयुधि तिष्ठति घीर्यघान् ॥८१॥ एष धर्मभृतां धेठो धर्मरानो युधिष्टिरः । तिष्ठत्यमुकरा संख्ये गरेः परपुररुजयः ॥ ८२ ॥ एती ध पुरुषव्याघ्रायश्विनाविध सोधी । नकुलः सहदेवध तिष्ठतो युधि दुर्जयो । ८३ || श्यन्त पते धागैया पक्ष्य पाचला इव । व्यवस्थिता योचुभामा सऽनिसमा युधि ॥ २४ ॥ एते दुपदपुत्राय धृष्यम्नपुरोगमाः । फीता: सापजतो धारास्तिन्ति मरमौजसः ॥८५ ॥ असाविन्द्र यासः को मसभकर वह तो युद्धमें किसीसे विजयकरनेके योग्यनहीं है अब तू दूसरे मनोरथ को कर् । ७८ । जो भृजामोसे पृथ्वीको उठा सके और क्रोधयुक्त होकर इनसप जई चयों का नाशको स्वर्गसे देवताओं को गिरासकै उस भर्नुनको युद्धमें कौन "विनय फरसका है । ७९ । साधारण कमी महाप्रकाशमान द्वितीय मेरुपर्वत के समान निपत महावाहु कुन्तीफे पुत्र शूग्वीर भीमसेनको देखो।८० सदैव कोपयुक्त माहिष्णु विजयाभिलाषी यह पराक्रमी भीमसेन चिरकालकी शत्रुता को स्मरण करता युद्धमें नियतहै । ८१ । यह धर्मधारियों में श्रेष्ठयुद्धमें शत्रुओंके साथ कठिन "कर्मकरेनवाला शत्रुओं के पुरोका विजय करनेवाला धर्मराज युधिष्ठिर नियत है । ८२ । यह कठिनता से विजय होनेवाले दोनों पुरुषोत्तम भश्विनीकुमारों के समान निम सहोदर नकुल सहदेव दोनों भाई युद्धमें नियतहैं । ८३ । यह पांच पर्वतोंके समान पांचो द्रोपदीके पुत्र नियतहैं यह सब अर्जुनकै सनान युद्धाश्लिापी युद्ध में वर्तमानहैं । ८४ । बाकी दिवाले बड़ेतेजस्वी सत्परता मुपदके शूरवीर पुजिनमें मुख्य धृष्टद्युम्न है । ८५ । इन्द्र के समान असा पूर्व समयमें क्रोधयुक्त मृत्यु के समान •counut cunquer hin. You may plearo your self with words, for yon cannot sluy jun, and must get your miad on any other thing. Who cau conquer Arjun who is capablo of lifting up the earth, of Jestroyaing the norables nud immovables and of making tho 'gods fall duwn from learen when he is angry. Look at Taliant Bhim standing in glory like a second Meru.30. Naturally wrathful, dosirous of pictory, vulinat Bhim, remembering the old standing eamity, stands in the field of battle. Yudhishthir the just, of great profess. destroy: er of fues, stands ready to fight. The two invincible warrior, Notul and Silinde yetend these like Asl winib umars. The fire sona of Draupadi, Loge 13. bills, ajo full of prowers like Arjug. Thore jeload the raliont zocs of Divpad, led by Dhrishtadsoon. Here epous, Satynki, liko Destlabimuself the best of the Yadaras, desirous of • [0472] Mahabharat सात्यकिः सात्वतां धरः । युयुत्सुरुपपात्यस्मान कुवातकसमा पुरः ॥५.. संघदतोरेष तयोः पुरुषसिंहयाः। ते सेने समसज्जेता गडायमुनाएभराम । इविधी कर्णपर्वणि कणेशस्यसंवादे पटचता रिंशोऽध्यायः ।।। Lewan धृतराष्ट्र उवाच । तथा म्यूढ़ेघनीकेषु संसक्तेषु च सम्भय । पार्थो गतः कर्णश्च पाण्डवान् ॥ १ ॥ एतद्विस्ताशो युवं प्र हैकुशलो असि न हि तृप्यामि धीराणां शृण्वानो विक्रमानणे ॥ २ ॥ सञ्जय उवाच । मवताय प्रत्यमित्रपलं महत । अयूहतार्जुनो न्यूर पुत्रस्य तव दुर्नये ॥ ३ . यादवोंमें श्रेष्ठ युद्धामिलापी यह सात्यकि हमारे सम्मुख माताहै । ८६ । उन पुरुषोत्तमों के इसरीविसे वाचीलाप करते करते वह दोनों सेना श्रीगंगा के समान बड़े वेगसे भिड़गई। ८७ । . a .. अध्याय ५६॥ धृतराष्ट्र बोले कि इसरीति से सेना के तैयारहोने पर और अच्छी रीति से भिजानपर अर्जुन किसरीतिसे संसप्तकोंके सम्मुखगया और कर्ण कैसे पांडवों | सम्मुखगया । १ । इस युद्धको व्यारे समेत कहो क्योंकि तुम बड़े नढरहो मैं में शत्रुओं के पराक्रमोंके सुनने से तृप्तनहीं होताई। ।। संजयकोले कि आपके पुर, हेतु अन्याय होने पर अर्जुन ने शत्रुओं की बड़ी सेनाको नियत जानकर यह को fighting." then the two great warriors were thus talking together the vartiora met with agreat force like the Ganges and the Yamuna." 87.1 CHAPFER XLVI Dhritrashtra said. " When the armies had thus met together, how did Arjun face the Sansaptaka and how did Karao face tho Pandayas ! Please let me kdoy all this in detail, for you are Tery derer and I am not satisfied with hearing of the prowess of the foes." Sanjaya said, "On account of the injustice of your son, Arjun formed an array of his army consisting of horse, foot, elephants and cars nod led by Darishtadyuma, Glorious like the sun and the moon, the - (६४०) कर्मपर्व Karan Pare 164781 सादिनागकलिलं पड़ातिपयर्सकुलम् । धृपयुम्नमुखं पदमशोमत महद्वतम् ॥ ४॥ पारावतसपर्णाश्वयादिस्यसमातिः। पार्षता प्रवी धन्धी कालो विप्राधानिक ॥ ५ ॥ पातम्स्थमितस्तस्य प्रीपदेया युयुत्सवः। विम्यधर्मायुधधराः शाईलसम विक्रम सानुगा वीप्तवपुभ तारामा ५ ॥ ६ ॥ भय न्यूदेपनीकेषु प्रय संशाप्रये । कुशोजनोऽनिहाय व्याशिपन गाग्टिई धमः ॥ ७॥ भय संशतकाः पार्यमन्यवावर बषिणः । विजये. धृतसरया मृत्यु परषा निधनम् ॥ ८ ॥ तभराषौघवाल मचनागरयाकुलम् । पचिमन्ठावारी टुतपर्जुनमाईयत् ॥९॥ संमहारस्वमुलस्तेषामामान बिरीदिना : तस्य नः श्रुतो पानिपातकपः मह ॥ १. रयानरबार बसानागार पचीम्रणगतानपि । इपून धनर्षि अगांच सामाणि पायथान् ॥ १॥ सायुभानुषतान पान शिषिधान्यापुधानि च । रचा र भश्व सवार हाथियों समेत स्थ भौर पदातियों से 'पात बड़ी सेना पाला.म्यूइ जिसमें मुख्यपृष्टयुम्नया शोभायमाना। ४ । चन्द्रमा भौर मूयं के समान भेजस्वी धनुषधारी मूर्तिमान काल के समान धृष्टद्युम्म कपातवर्ग घोड़ीमत शोभित हुआ । ५ । दिम्प करच और भनुप रखनेवाले शाईलके समान पराक्रमी शरीरसे प्रकाशमान युद्धाभिनापी दौपदी के पुत्रोंन अपने साथियों समेत धृष्टद्युम्न को ऐसा रक्षित किया जैसाकि वारागरा चन्नमाको रक्षित करतहैं । ६ । तदनन्तर सेनामों के सम्रद्ध होनेपरयुद्धमें संसप्तकों को देखकर गोषयुक्त अर्जुन गपने गांडीव धनुष को टंकारता हुमा सम्मुखगया । ७ । इसके पीछे मारनेके अभिलापी संसप्तक लोग अर्जुनके सम्मुख दौड़े वह विजय में संकल्प करनेवाले मृत्यको तिरस्कार करके सम्मुख गये । । । मनुष्य हाथी घोड़ों के समूहों से युक्त मतकाले ह थी और रथोंस माप्त पत्तियों से युक्त शूरवीरों के उस समूहको अर्जुन ने बड़ी शोभता से पादित किया । ९ । अर्जुन के साथ उनलोगों का ऐसा कठिन बुद्ध, हुमा जैसाकि उसका युद्ध निवात कवधियों के साथ हमने सुनाया । १० । स्थघोड़े ध्वना हाथी इस युद्धमें वर्तमानों कोभी वाण धनुष खड्गचक्र फरसे । ११ । भा.दे नानाप्रकार glorious archer, like Death himself, Darish tadyumn rode his borses of the colour of pigeons. 5. Armed with armours and bow, of the prowess of tigers, the song of Draupadi, desirous of fighting, protected Dhrishtadyumn as the star surround the moon. Seeing the S11189plake ready to fight, edraged Arjun, tvanging the Gandiv bow, fuced them. The Santaptakr, desirous of ighting and teauless of life, attacked Arjun. Composed of men. elephante, houses, mad elephanti, ears and foot, the army rusbed against Arjud. Their battle with A rjun was like that betwen Arjun and Nibat Labaches. Arjun cut dowe the heads of warriors ard destroyed the cars, borger, standards, elephante bows, arrows, awords discuser. xes and the arms holding • E472] Mahal barat सात्यक्षिः सात्वतां धरः । युयुत्सरुपयारयस्मान कुवातकसम: पुर।४। संपतोरेष तयोः पुरुषसिंहयाः। ते सेने समसम्ता गायमुनाभयम ।। इविभी कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे पठचत्ता रिशोऽध्यायः || धृतराष्ट्र उयाच । तथा व्यूढेष्वनीफेषु संसक' र सम्जय । पार्थो मतः कर्णश्च पाण्डवान ॥ १ ॥ एतद्विताशो युवं प्र हैकुशलो नहि तृप्यामि वीराणां शृण्वानो विक्रमानणे ॥ २ ॥ सञ्जय उवाच । मवन्नाय प्रत्यमित्रवलं महत । अयूहतार्जुनो न्यू पुत्रस्य तव दुर्नये ॥ ३ ॥ यादवोंमें अप्ठे युद्धाभिलापी यह सात्यकि हमारे सम्मुख माताह । ८६ । उन पुरुषोत्तमों के इसरीविसे वाचीलाप करते करते वह दोनों सेना श्रीगंगा के समान बड़े वेगते भिड़गई । ८७ ।। ५. अध्याय ५६ ॥ धृतराष्ट्र बोले कि इसरीति से सेनाभोंके तैयारहोने पर और अच्छी रीति भिड़जानपर अर्जुन किसरीतिसे संसप्तकोंके सम्मुखमया भौर कर्ण कसे पांडवों | सम्मुखगया.। १ । इस पद्धको व्यारे समेत कहो क्योंकि तुम वह ननरहो मैं मुद्ध शत्रुओं के पराक्रमोंके सुनने से तृप्तनहीं होताई । । । संजयवोले कि आपके हेतु अन्याय होने पर अर्जुन ने शत्रुओं की बड़ी सेनाको नियत जानकर न्यूह के fighting." When the two great warriors were thus talking together the warriors met with a great force like the Ganges and the Yamuna." 87. - CHAPFER YLYI Dhritrashtra waid. " When the armies had thus met together, how did Arjun face the Sansaptaks and how did Karan face the Pandavas : Please let me know all this in detail, for you are very clever and I am not satisfied with hearing of the prowess of the foos," Sanjaya said, "On account of the injustice of your son, Arjun formed an array of his army consisting of borse, foot, elephants and cars and led by Dhrishtadyumn, Glorious like the sun and the moon, tha । (६४०१) कर्मपर्व Raran Pare 161781 साविनागकलिलं पातिपयर्सकलम् । धृष्टद्युम्नमुखं पदमशोमत महवलम् ॥ ४॥ गारासानन्दादित्यसमातिः पार्वतः प्रबभी घन्धी कालो विप्राथानिय ॥ ५ ॥.पार्षतम्यमितस्तस्य दीपदेया युयुत्सवः विश्यधर्मायुधधराः शालसम विक्रमाः सानुगा दीसवभन्दै तारागा व ॥ ६ ॥ अथ म्यूदेवनाकेष प्रय संशतकाप्रवे । कुखोजनोऽनिधाय व्याक्षिपन गाग्दि धमः ॥ ७॥ मय संशतकाः पार्थमन्यवापर मषिणः । विजये. धृतसजुन्या मृत्यु हत्या निधनम् ॥ ८ ॥ तभराषौषवलं मचनागरथानम् । पत्तिमलावीरा तपाजुनमाईयत् ॥ ९ ॥ समबारस्तुमुलस्तेवामासीर विरोटिना : तस्वनः श्रुतो यानिवातकरः सह ॥ १.५ रपानावार अनानागार पत्तीग्रणगतानपि । इपून धर्षि यहगांश्च पाणि परश्यवान् ॥ ११ ॥ सायुधानुद्यतान पान विषिधान्यायुधानि च । स्वा ना मन सार हाथियों समेत स्थ और पदातियों से भारत बड़ी सेना पाला.म्पूर जिसमें मुख्यधृष्टयुम्नया शोभायमाना। ४ । चन्द्रमा भार मूयं के समान ओजस्वी धनुषधारी मूर्णिमान काल के समान धृष्टद्युम्म कपोतपर्श घोड़ोंमत घोभिव हुआ। ५ दिन्य करच और भनुप रखनेवाले साईलके समान पराक्रमी शरीरसे प्रकाशमान युद्धाभिगपी दौपदी के पुत्रोंन अपने साथियों समेत घुम्न को ऐसा राक्षव किया जसकि वारागर चन्द्रमाको रक्षित करतेहैं । ३ । तदनन्तर सेनामों के समद होनेपरयुद्धय संसप्तकों को देखकर सोधपुक्त अर्जुन अपने मांडीव धनुष को टंकारता हुमा सम्मुखगया । ७ । इसके पीछे मारनेके अभिलापी संसप्तक लोग अर्जुनके सम्मुख दोहे वह विनय में संकल्प करनेशले मृत्यको तिरस्कार करके सम्मुख गये। 6 । मनुष्य हाथी घोड़ों के समूहों से पुस मसाले हथी और रघोस समाप्त पचियों से युक्त शूवीरों के इस समूहको अर्जुन ने बड़ी शामता से पाड़ित किया । ९ । अर्जुन के साथ उनलोगों का ऐसा कठिन बुद्ध हुमा जैसाकि बमका युद्ध निवात कचियों के साथ हमने सुनाया । १० । स्थघोड़े ध्वना हाथी हा पुदमें वर्तमानों कोभी वाण धनुष खड्गचक्र फरस । ११ । प्रा.दे नानाप्रकार glorious archer, like Death himself, Darish tadyumn rode his horses of the colour of pigeone, 5, Armed with armours and bow, of the prowess of tigers, the cops of Draupadi, desirous of fighting, protected Dhrishtadyumn as the star surround the moon. Seeing the stisaptake ready to fight, enraged Arjun, twanging the Gandi bow, fuced them. Tho Sapsaptabe, desirous of fighting and fenilers of life, attacked Arjud. Composed of men, cleplants, lioisee, mad elephants, ·an and foot, the army rushed against Arjun. Their battle with A rjon was like that belwen Arjun and Nibat babaches. Arjun cut dowa tbe besds of warriors ard destroyed the carf, borger, standards, elephants bows, arrows, swords diecuses, axes and tbe aims holding , •f6172] Mahal barat सात्यकिः सात्वतां पर । युयुत्सुकृपयारयस्मान् मुखान्तकसमः पुर। . संपदतोरेष तयोः पुरुषसिंहयाः। ते सेने समसज्जेता गायमुनयम।। " इविधी कर्णपर्वणि कणेशस्यसंवादे पटवता रिंशोऽध्यायः ।। धृतपष्ट्र उवाच । तथा म्यदेण्यनीकेषु संसक्तेषु च सम्बय। पार्थो गतः कर्णश्च पाण्डवान् ॥ १ ॥ एतद्विस्तरशो युद्ध प्रव हकुशलो प्राप्ति न हि तृप्यामि वीराणांगण्यानो विक्रमाणे ॥ २ ॥ सञ्जय उवाच । मवसाय प्रत्यमित्रवलं महत् । महतार्जुनो ब्यूरं पुषस्य तव दुर्नये ॥३।। पादवोंमें श्रेष्ठ युद्धामिलापी यह सात्यकि हमारे सम्मुख भाताह । ८६ । उन | पुरुषोत्तमों के इसरीविसे वाचीलाप करते करते वह दोनों सेना श्रीगंगा के समान वड़ वेगसे भिड़गई। ८७. ५० - ३ अध्याय ४६॥ धृतराष्ट्र बोले कि इसरीति से सेनाभोंके तैयारहोने पर और अच्छी रीति से मिजोनपर अर्जुन किमरीतिसे संसप्तकोंके सम्मुखगया और कर्ण कैसे पांडवों के सम्मुखगया । १ । इस युद्धको व्यौरे समेत कहो क्योंकि तुम बड़े चनृरहो मैं रद्ध में शत्रुओं के पराक्रमाके सनने से तृप्तनहीं होताई । ३ । संजयवोले कि आपके पुक हेतु अन्याय होने पर अर्जुन ने शत्रुओं की बड़ी सेनाको नियत जानकर न्यूह को fighting.' Then the two great warriors trera thus talking together the warriora met with agreat force like the Ganges and the Yamuna." 87. " CHAPTER XIII Dhritrashtra said. * When the armies bad thug met together, how did Arjun face the Sansaptaks and how did Karan face the Pandamas 1 Please let me know all this in detail, for you are Terg clever and I am not satisfied with hearing of the prowess of the foos." Sanjaya said, "On account of the injustice of your son, Arjan formed an array of his army consisting of horse, foot, elepbants and cars and led by Dhrishtadyuma, Glorious like the sun and the moon, tha (६४७१) कर्णपर्व Raran Pare [64731 साजिनागमसिल पदातिपत्रसंकुलम् । धृष्टद्युम्नमुखं पदमशोमत महतलम् ॥ ४॥ पारापासवांववादावित्यसमातिः। पार्वतः प्रषभी घन्धी कालो विषानिय ॥ ५ ॥ पाहताश्वामितस्तस्य प्रौपदेया युयुत्सवः। दिव्यधर्मायुधधराः शालसम विक्रम सानुगा दीप्तवपुश्च नारागया इव ॥ ६ ॥ अय न्यदेवनाकेषु श्य संशप्तकाप्रमे। कुलोचनोऽभिप्राय पाशिफ्न गाडिष धमः ॥ ७॥ भय संशतकाः पार्थमध्यवावर बपिणः । विजये. धृतसादुलपा सत्यं करवा निधनम् ॥ ८ ॥ पराषोधबाहुलं मसनागरथाकुलम् । पत्तिमन्दावारी दुतपर्जुनमाईयत् ॥९॥ संभहारस्तुमुलस्तेषामामीन गिरीटिना : तस्यैव नः श्रुतो पाइनिधात कवयः मह ॥ १. रथानवार सानागार पत्चीत्रणगतानपि । इपून् घनर्षि महमांश्च समामि परश्यमान् ॥ ११ ॥ सायुधानुयनान पान विषिघान्यायुधानि च । | रचा रह अल सबार हाथियों समेत स्थ और पदात्रियों से भारत बड़ी सेना साला.न्यूह जिसमें मुख्पष्टयुम्नथा शोभायमानहुआ। ४ । चन्द्रमा और सूर्य के सपान भेजस्वी धनुषधारी मूर्तिमान काल के समान धृष्टद्युम्म कपोतव घोड़ों मेत शोभिव हुआ। ५ । दिन्य काच और भनुप रखनेवाले शाईलके समान पराक्रमी पारीरसे प्रकाशमान युदाभिगपी दौपदी के पुत्रोंन अपने साथियों समेत धृष्टद्युम्न को ऐसा क्षित किया जैसाकि वारागर चन्द्रमाको राक्षित करतहैं । ६ । तदनन्तर | सेनामों के सम्रद होनेपरयुद्धमें संसप्तकोंको देखकर सोधयुक्त अर्जुन आपने गांडीव धनुष को टंकारता हुभा सम्मुखगया। । इसके पीछे मारनेके अधिलापी संसप्तक लोग अर्जुनके सम्मुख दौड़े वह विजय में संकल्प करनेवाले मृत्यको तिरस्कार | करके सम्मुख गये। । मनुष्य हाथी घोड़ों के समूहों से मुक्तक मतवाले ह थी और (रघोंसे म्माप्त पचिपों से मुक्त शूरवीरों के इस समूहको अर्जुन ने बड़ी शमिता से पाड़ित किया। ९ । अर्जुन के साथ उनलोगों का ऐसा कठिन बुद्ध हुभा जैसाकि उसका युद्ध निवात कचचियों के साथ हमने सुनाया । १० । स्थघोड़े ध्वना हाथी इस युद्ध में वर्चमानों कोभी वाण धनुष खड्गचक्र फरसे । ११ । प्रा.दै नानाभकार glorious archor, like Death himself, Darish tadyumn rode his borses of the colour of pigeons. 5. Armed with arnours and bow, of the prowess of tigers, the sons of Draupadi, desirous of fighting, protected Dhrishtadyuun as the star surround the moon. Seeing the Suti88ptake ready to light, enraged Arjun, tranging the Gandiv bow, faced thew. The Sansaptukr, desirous of fighting and ferilers of life, attackedJArjun. Composed of men, elephants, horsee, mad elephants, Gara and foot, the army rushed against Arjun. Their battle with Arjun #88 like that bettern Arjan and Nibat labscbes. Arjun cut doma' tbe beads of Fairion ard destroyed the cars, borger, standards, elephanta bow, AIIOws, swords discurer, axes and the arms holding ॥ [64741 Jlahabharat .. विच्छेद दिपता पार्ग: शिरभि सहनशः ॥ १२ ॥ तस्मिन् सम्यमदार पानालसलसानों । निमग्न त रथं गरमा मेटः संशतकातदा ॥ १३॥ स पुरता दरीन इत्या पुरावलोऽचवात । दक्षिणेन च पचारादो का पानिय , ४ । अव चालोसीनो मंजवानांच मा.रेषत्वदीयः सा संग्राम आसीद परमदावणः ॥ १९रुपंछ हावा च शकुनियापि सौरलः हट सेनाः मुसरवा रथानीक प्रहा. रिपः १६ । फशियः काशिमी कायौः कयैरपि । शरसनेः शरत युंगुधमुरमुर्मदाः ॥ १७ ॥ तेषामन्तकर पुई देहपाप्माननाशनम् । क्षेत्राष्टि अश्योराजा पपई यशस्करम ॥ १८० तुयोधनीय सहिनो नाभिभात। गुप्त कुराध महापाक्ष महारथैः ॥ १९ ॥ पाण्डवैः सह पांचालदिभिः सायन च । समान रणे कण फुधारोऽवपालयत् ॥ २० ॥ फोऽपि निश्तेि | के शवोंको उठाये हुये भुजाओं या नानामकारके शवों को और शत्रुओं के इंमारों शिरोंको भजनने काटा । १२ । तर पाताल तलके समान उस सेनारूपी सागर में इसमकार मनो उत्तरय को देखकर संतप्तालोग-गरने । १३ । तदनन्तर उसने उन शत्रों को मारकर फिरभी उत्तरकी भोरसे मारा दक्षिण और परिपम और मेभी एसा मारा जो कि कोधयुक्त रुद्र पशुओं को मारते हैं। १४ । उसके पीछे ३ श्रेष्ठ पांचाल चरी मौर जयदासयों के युद्ध भारके युद्धकामोंसे घड़भारी कठिन हुये । १५ ।. युद्ध, दुर्मद भत्य-त क्रोश्यक स्थसमेत सेनाको मारनेपाल प्रसन्न वित्त कृपाचार्य कृतवर्मा और सौनसके पुत्र शकुनी ने कोशल काशी मत्स्य कारूपकैकप और शूरनेनदेशी उत्तरशूरों सपेत युद्धकिया ।10। यह तीनों उनके युद्धका अन्व करनेवाने शरीर पाप और प्राणों के नाशकरनेवाले भविश्य और शूद्रभीरों के धर्म सर्ग और यशके उत्पन्न करनेवाले ये । १८ । भरतपम इसके पछे बड़े वार, कौरव भार महारथी मददशियों से रक्षित बार दुर्योधन ने-माइयों समेत युदने आकर पांडवाल और चंदेरी देशियों समेत सात्सिकीके साथ युद्ध करनेवाले कर्णको चरों भोरसे रक्षित किया । २. .. फिर कराने मी तीनपार wvca pons 12. The & innop'aks roared on seeiak thie, car of, Arjan drowood in the ocean of tho army. Thon Arjun alew tho maonice right and lolt, before and behind as Rudra slays .animalh, Theartha Warriors of l'anchal, Clanderi, Srinjaya and others fought brately.15. Valiant Kripacharya, Kritrarms and Shakuni fought with tho wvriors of Koshal, Kashi, Harya, karus', and Shuran, Destroy. ing bulis, sins and life, ta kshatry, Vaisvas aud S'adra warrior obtained Dharm, famo and learen, Protested by the warriorsiol Madra and the Kauravas Daryalhan kod his brothers, protected Kman who was unhting wilksha Paschale.mod. Paoday as led by Satyakigo. Karan eli the bost of Farrior, aad, woandou-Yudhiab.
॥ [६७५) कर्णपर्व kuran Paree (647) वाणिमिहत्य महासम्मः । प्रमुफ प रयमष्ठान् युष्ठिरमपाइयत् ॥ २१ विध युधदेहासन त्याशिधून सहस्रशः युकास्वर्गपशोभ्यांच शेम्यो मुत्रमुदायत ॥ २२ ॥ एवं भारिप संप्रामी नरवाजिरपक्षयः । फुरूणां सञ्जय नाच देवासुर समाजमवत् ॥ २३॥ " इतिथी कर्णगि संकुलयुद्धे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४७॥ प्रताप पाष । यत्तत् प्रविश्य पार्थानां सैन्यं कुर्वत जनक्षपम् । कों पजाममभ्यर्छसम्ममाचस्व संजय । १ ॥ के च भघीग: पानि गधि कर्णमवार पनीका प्रमभ्याधिरधियुधिष्ठिरमपीवपत् ॥ २॥ संजय उवाच। धृष्टद्युम्नमुखा घाले बाणों से वहीभारी सेनाको मारकर अक्षम उत्तम राधियोंको मर्दनकरके युधि- विरको पारामानकिया । २१ । हजारों शमुओंको अनशन शरीर और माणसे प्रथक्कर स्वर्ग और यशको स्पर्श करके अपने शूग्वीरों को प्रसन्नकि । २२ । हे थेप्ट इसति से मनुष्य हाथी और घोड़ों का नाशकरनेवाला युद्ध कौरव और सानियों में देवासरोंके युद्ध के समानाभा २३ ॥ अयोध्य ४७ ॥ धृतराष्ट्र पोले हे संजय मनुष्यों का नाश करनेवाले कर्णने पांडवों की उस सिनामें जाकर राजा युधिधिरको जैसे अचेत किया वहसव मुमने वर्णनकरो।। युद्धमें पाएडवों के कौन से बड़े पारोंने कर्णको रोका भार अधिरथा कंगने कौन thir. Depriving thousands of focs of their weapons and lite, 'Karan pleased his companions in arms, Thus the battle, destructivo of elephants, horses and men, fought belween the Kaurupas and Pandavas, kas apvere like tliat between the guds' und usurs," 23. ३ CHAPTER XLVIII - Dhritrashtra said; " Tell me, Sunjaya bow Karan the destroyer of loss entered the Panrlav army and mide Yudhishthir insensible. What great warriors of the Pandavas checked karao? What warriors vers destroyed by Karan, before he wounded Yodlishthir?Scujuya (6176) Vababharat খাবার বা বাবা। বাবাকে বলা যায় ॥ ३ तूमभिशात पाम्बाला जितकाशिमा प्रत्युपपुमहारमा सार महार्णयम् ॥ ४ ॥ ततः शवसाम्राणो निस्समो हवामः । प्रादुरासाभपतो भेशिया दारुणः ४५ ॥ नानागादिवमावरच बिहाइपरयनिस्वमासिंहनादर पोगणाममदारुणतरा ६ ॥ सानिमार्णका भूमिः समावाम्बुषमम्याम मान्दु प्रहनक्षत्राधि व्यकं विभूषिता । इति भूवानितं राम मेमिलते विषय: । पानि घान्यवासायामिप्रायस्लानि मुनानि वाजप काम राशन मनसदीरवन । अचान पायवी सेनामामुरी मधयानिश ॥ ॥ स पासपल कर्णः प्रविश्य विस्जद प्राकामांप्रवपनहनत सप्तसप्ततिम्॥१०॥तत: सेवारों को मथकर प्रधिष्ठिरको पहितकिया । २ । संमयोस कि मौका विनय करनेवाला कर्ण सम्मुग्व वर्तमान पाण्डवों को मिनमें मुख्य पृष्टयुम्नया देखार शीघही पांचालके सम्मुख दौड़ा । । । विजयसे शोभायमान पांचाल शोध हा उससम्मुबदाइनेवाले महात्मा के सम्मुख ऐसेगमे जैसीक इंससमुद्रके सम्मुख जान । ४ । इसके पीछे दोनों मोसे हजारों शंखों के वित्तरोवक शम्द प्रकट हो और भारयों के भयानक शब्द होनेलगे । ५। तब नानामकार के वाणोंका गिरना भीर । इधी पाहे वा रधों के शब्द और भयकारी वीरोंके सिंहनाद उत्पन्न हुये।।। पति स भोर समुद्रसमा पृशी गाय और बादलों समेत आकाश अथवा मूर्य चन्द्रमा प्रबनमा समेत सर्ग या मा मस्या में घूमने संग। सब जीवमात्र उत्त शब्दको इसमकार का मानकर पातारनेसे वादहुये और छोटे जीवतो भयभीत होकर-मरगये । ८ । इसके पीछे अगत क्रोपयुत कर्ण ने शीघही अखका माटकर के पारडी मेनाको पोदारा जिसमकार भारी सेनाको इन्द्रमारता? 1 ९ माणों को जड़नेहुदै उत ने पारवी - सेना में घुसकर ममदकों के पड़े taid, - Karan the destroyer of fors, sceing tbo Pardar army #d by Dhrishtudyumn, ruaisi on against him. Tho raliant Prirhala rusbed at Karad a3 swans do towards the sea. The sonnds of conchs on both sidu wito heartstirring and tho noise of tbv druuis was dreadful. Arrowa fell down and the noise arising out of bornet, elephants and cars, nus mingled with tho rians of the warriors Tho carth with hor bills, tras and Acal as well as the sky with cloude, the Sun, the moon and stars sxmad turning round. All the creatores were disturbed with ulat noise, whilo to smaller one full duwn deal. Ihro Karn, mach oninged, discharged bie teapons and slow we Pander woy us ladra dous cho arms of usort, Sbooting live Astuw Karan entered tbo Pandur way and a * screatyretca Prabludiak (6477) 11 (६५७७) कर्णपर्व Karan Paray निशितै रयश्रेष्ठो रथेषुभिः । अवधीत् पञ्चविंशत्या पांचालान पञ्चविंशतिम ॥११॥ सुपर्णपुरैनाराचैः परफायविदारणः । चेदिकानवधीतीरः शतशोऽथ सहस्रशः ।। १२ । तं तथा समरे कर्म कुर्वाणमतिमानुपम् । परिघवमहाराज पाञ्चालानां स्यनजाः ॥ १३ ॥ ततः सन्धाय विशिखान पञ्च भारत दुःसहान् । पाञ्चालान षधीयत् पञ्च कणों चैकतनो वृपः ॥ १४ ॥ भानुदेवं चित्रसेन सेनाविन्दुञ्च भारत । तानं शूरसेनस्य गाम्चालानहनद्रणे ॥ १५ ॥ पाशालेषु च शरेषु घश्यमा नेषु सायकः । हाहाकारो महानासीत् पाञ्चालानां महाहवे ॥ १६ ॥ परियमहा राज पाञ्चालानां रथा दश। पुनरेव व तान् फर्ण जघानाशु पत विभिः ॥ घरदी तुकर्णस्य पुत्री मारिष दुर्जयो । स्पेण सत्यसेनश्च त्यक्त्वा प्राणानयुध्यताम ॥८॥, पृष्ठगोप्तातु कर्णस्य ज्येष्ठः पुत्रो महारथः । वृषसेनःस्वयंफर्ण पृष्ठतः पर्य्यपालयत् ॥ १९ ॥ धृष्टद्युम्न सात्यकिश्चद्रौपदेया वृकोदराः । जनभेजयः सतहत्तर वीरों को मारा । १० । इसकेपछि उस महारथी कर्ण ने सुनहरी पुंखवाले तीक्षणधार पच्चीस उत्तम वाणों से पच्चीसही पांचालों को मारा । २१। फिर उस वारने मुनरी पुंखवाले शत्रुओं के चीरनेवाले नाराों से हजारों चंदेरी देशियों को भी मारा । १२ । हे महाराज इसके पीछे पांचालों के स्थसमूहों ने इसरीति के बुद्धि से बाहर कर्म करनेवाले कर्णको चारों ओर से घेरलिया । १।। फिर तो सूर्य के पुत्र महात्मा कर्णने दुस्सह पाचविशिखोंको धनुपपर चढ़ाकरपांचपांचालोको मारा । १४ । अर्थात हे भरतर्षभयुद्धमें भानुदेव,चित्रसेन सेनाविन्दु तपना मूरसेन इन पांचालों को मारा । १५ । उस युद्ध में शूरपार पांचालोंके मरनेपर पांचालों में बड़ा हाहाकार हुआ। १६ । हे महाराज तबतो पांचालों के दश महारथियों ने कर्णको चारोंओर से घेर लिया उससमयभी कर्णने शीघ्रही वाणों से उनको माग ।१७। इसके पीछ चक्र के रक्षक दुर्जय कर्णके पुत्र सुपेण और सत्यसेन ने कर्णको त्याग कर युद्ध किया । १८ । फिर कणके पुत्र पृष्ठरक्षक वृषसेन ने कर्णको पछिकी ओरसे रक्षित किया ।१९। कवच और शस्त्रोंके धारण करनेवाले धृष्टद्युम्न, सात्याक warriors. 10. Then with twenty five arrows he slew as many Panchals. He slew thousands of Chanderi warriors with his foodestroying Warriors. Then Panchal warriors surrounded Karan who was doing extraordinary deeds of prowess Karan the son of Suryaput five arrows to his bow and slew five Panchals; namely, Bhanuduv, Chitrasen, Sepavindu, Tapan and Shursen.15. At the death of those Warriors the Panchals cried out ir dismay. Then ten warriors of the Panchals surrounded Karan but the latter blev them all. The Valiant sons of Karan, who guarded the wheels.of his car, fought away from his car. Karan's son, Vrisbasen guarded his car from .
॥ (-6478) ITuhabjarat [१५७८) शिखण्डी च प्रवीपथ प्रभदकाः ॥ २० ॥ वैदिकैफयपाञ्चाला यमी मस्याश्च देशि ता समभ्यघावप्राय जिघांसन्तः प्रहारिणम ॥ २१ ॥ तपनं विविधः शरः शरधाराभिरेव च । श्रभ्यवन विमदन्तं प्रावृषीवाम्बुदा गिरिम ॥ २२ ॥ पिवरस्तु परीप्सन्तः कर्णपुत्राः प्रहारिणः । पदीयाचापरे राजन् बीरा चोरानवारयन् ॥२३॥ सुपेको भीमसेतस्य छित्वा मल्लने कामफम् । नाराचैः सप्तमिर्विया दृदि भीमं | ननाद ह ॥ २५ ॥ अथान्यदनुगदाय मुहृद भीमविक्रमः । सज्यं वृकोदर करा मुपेणस्यान्छिनधनुः ॥ २५ विव्याध चनं दशभिः कुलो नृत्यनियेमिः। कर्णश्च तर्ण विव्याध सप्तत्या निशितैः शरै । २६ ॥ भानुसेनच दशभिः साव मतायुपध्यजम् । पश्यतां सहृदां मध्ये कर्णपत्रमपातयत् ॥ २७ ॥ क्षुरप्रणतरस्य द्रौपदी के पुत्र, भीमसेन, जन्मेभय, शिखण्डो और बढ़े वीर प्रभद्रक ।२०। चन्देरी केकया पांचालदंशो, नकुल सहदेव और. मत्स्यदेशी शूरवीर यह सब पारने को इच्छावान उस प्रहार करने वाले कर्ण के मम्मुख । २१ । और नानाप्रकारकी वाण वर्षासे इस कर्णको ऐमा महत किया जैसे कि वर्षाऋतु में बादल पर्वतको मईनकरते हैं । २२ । इसके पीछे पिता के चाहनेवाले प्रहारकर्ता कर्ण के पुत्रोंने और भापके अन्य वीरों ने उन सब पीरोंको रोका । २३ । सुपेण भल्लसे भीमसेन | के धनुषको काटकर और सात नाराचों से भीपोन को छातीपर पायल करके गर्जा । २४ । इसके पीछे भयानक पराक्रमी भीमसेन ने बड़े रद दूसरे धनुषको लेकर अपने बाणसे सुपेण के धनुप को काट । २५ । क्रोपत युक्त नाचत हुये भीयसेन ने दश वाणों से उसको घायल किया और बड़ी शीघ्रता से कर्णको भी सत्तर वाणोंसे उसको घायल किया । १६ । और देखनेवाले मित्रों के मध्यमें कर्ण के पुत्र. भानुसेनको घोड़े सारथी रथ शस्त्र और ध्वजासमेत दशवाणों से गिगोदया । २७ । फिर तुरमसे कटाहुआ.उसका वह प्रकाशमान शिर ऐसा शोभित हुआ behind. Armed with weapons and armour, Dhrishtadyutnu, Satyaki, the sons of Draupadi, Bhitosan, Janmejaya, Shikhandi, the warriors of Prabhadrak, Chanderi, Kaikaya and Panchal, Nakul, Sahader and Matsya warriors, desirous of slaying, attacked Karun. Thuy showered their arrows over him liko rain Thea tho sons of Karan, desirous of the safety of their father, checked those warriors srith the help of other warriors. Susben cut the bow of Bhim and wounded him on the breast, with a roar. Bhim of dreadful prowess then took op Another hard bow and cut Sushen's bow. Dancing in Bhim wounded bim with ten errows and Karan with sereoty sefen. In the presence of all his friends, lie deprived Karan'a son Вbanusya of driver, car, weapons and standard Severed by a suary xrow, his head looked glorious like a lotus flower severed from its stalk. Having . anger, - १६४७९) फर्णपर्व Haran Paray (6479) शिरमन्द्रनिभाननम् । शुभशनमेघासीन्नालमष्टमिधाम्बुजम् ॥ २८ ॥ इत्या कर्णमुलं भीमस्तापकान् पुनराई यत् । पहाईक्ययोश्छिा धापी तापप्यशाईयत् ॥ २९ ॥ दुःशासनं पिभिर्विध्या शकुनि डभिरायसः । उलूकम्प पताधिश्व चकार घिरघाबुभो । ३० ॥ हा सुपेण इतोऽसीति ध्रुवन्नादत्त शायकम । पमस्य कर्णः भिन्छे विभिश्चनमताडयत ॥ ३१ ॥ अथास्यं परिजमा मुपर्धाणं सुतेजनम मणापासजीमस्तमप्यस्याच्छिनवृषः ॥ ३२ ॥ पुनः कर्णखिसप्तत्या भीमसेन मधेपनिः । पुत्रं परीप्सन् विम्याध र रोहिंघांप्सया ॥ ३३॥ मपेणस्तु धनह्य भारसाधनमुत्तमम् । नकुलं पञ्चभिर्यानडाकरसि वापत् ॥ ३४ ॥ नकुलस्त विशत्या विध्या भारसइईदैः । ननाद बलवन्नादं कर्णस्य भयमादधत् ॥ ३५ ॥ तंसपेको महाराज विभ्या दशभिराशुगः । चिच्छेद ब धनुः शीघ्र भरप्रेण महारय जैसे कि नालसे जुदाहुआ कमल होता है ।२८। भीमसेन ने कर्ण के पुत्रको मारकर मापकं शूरवीरों को फिर पीडामान करके कृपाचार्य भौर कृतरमा के धनुपों को काटकर उनकोभी व्याकुल किया । २१। फिर दश्शासनको तानवाणसे और शकुनीको छ। लाहे के बाणों से घायल करके उलूक और पत्री इनदोनों को विरकिया । ३० । हा सुपेण को मारा है ऐसा कहत हुये ने भीमसेन ने शायक को | लिया तवाण ने उसके उसवाण को काटकर तीन बाणों से उसको भी घायल किया । ११ । इसके पीछे भीमसेनने सुन्दर पर्बवाले वाणको लेकर मुपेणके ऊपर छोडा फिर कर्णने उसवाण कोमो काटा । ३२ । इसके पीछे पुत्रको बाहत निय कर्ण ने मारने की इच्छासे तिहत्तर वाणों से भीमान को फिर घायल किया ३३i फिर सुपेणने बड़े भारवाहक उत्तमधनुपको लेकर पांचवाणासे नकुलको दोनों भुना और छातीपर घायलोकया । ३४ । तब नकुलभी भारसहने वाले वासवाणों से | उसको घायल करके बड़े शब्दसे गर्जा और कर्ण के भयको उत्पा किया ।३५ । फिर महारथी सुपेण ने शीघ्रगामी तीक्ष्ण दशवाणोंसे उसको घायल कर के शीघ्रही sluin Karau's son, Bhim wounded your warriors und cut the bowe of Eripacharya and Kritvarma. Then he wounded Dusbasan with three arrows and Shaluni with six, and deprived Uluk and Patri of their car, He took up an arrow crying out, " I have s]njn Sushen." Bot Karan cut down his arrow and wounded him with three arrowe. Then Bhim tauk upa pointed arrow and discharged it at Sushea; but Karan cut that arrow to.), Then cruel Karan, desirous of the safety of his own son, wounded Blin with seventy three ariows. Susben then took up another hard bow and with five arrows wounded Nakul on both his arms and breast, Nakul wounded him with twenty arrows and roared loudly, causing fear to Karan 35. Then bravo Sushen, with ten swift arrows, wounded him and,cut his bow with another. Then Nakul, " (6478) Mahabharat शिखण्डी च प्रवीराध प्रभदकाः ॥ २० ॥ चदिकैकपपाञ्चाला यमी मास्याच दथि ताः समभ्यधावनाघेय जिघांसन्तः प्रहारिणम् ॥ २१ ॥ त पने विविधैः शनैः शरधाराभिरेव च । वयवर्षन घिमईन्त प्रावृषीवाम्बुदा गिरिम ॥ २२ ॥ पितरन्तु परीप्सन्तः कर्णशःप्रहारिणः । त्वदीयाचाररे राजन् वीरा बोरानधारयन् ॥ २३॥ सुपेणो भीमसेतस्य छित्वा भने कार्मकम् । नाराचैः सप्तमिद्धिा ददि भी ननाद ह ॥ २५ ॥ अथान्यद्धनुगदाय सुहृद भीमविक्रमः । सज्यं वृकोदर त्या सुषेणस्याच्छिनधनुः ॥ २५ विव्याध चनं दशभिः कुबो नृत्यनियुमिः । फर्णश्च तर्ण विव्याध सप्तत्या निशितैः शरै । २६ ॥ भानुसेनस्व दशभिः साख मतायुधध्वजम् । पश्यतां सहृदां मध्ये कर्णपत्रमपातयत् ॥ २७ ॥ क्षुरप्रण तसस्य द्रौपदी के पुत्र, भीमसेन, जन्मभय, शिखण्डो और बड़े वीर प्रभद्रक ।२०। चन्देरी केकय, पांचालदंशी, नकुल सहदेव और. मत्स्यदेशी शूरवीर यह सब मारने को (इच्छावान उस महार करने वाले कर्ण के सम्मुख दौड़े । २१ । और नानाप्रकारको वाण वर्षासे इस कर्णको ऐमा मदन किया जैसे कि वर्षाऋतु में बादल पर्वतको मानकरते हैं । २२ । इसके पीछे पिता के चाहनेवाले महारकर्ता कर्ण के पुत्रोंने और आपके अन्य वीरों ने उन सब वीरोंको रोका १.२३ । मर्पण भल्लमे भीमसेन के धनुपको काटकर और सात नाराचों से भीमसेन दो छातीपर घायल करके गर्जा । २४ । इसके पीछे भयानक पराक्रमी भीमसेन ने बड़े ह दूसरे धनुपको | लेकर अपने वाणसे. सुपेणं के धनुप को काट । २५ । क्रोधसे युक्त नाचत हुये भीमसेन ने दश वाणोंसे उसको घायल किया और बड़ी शीघ्रता से कर्णको भी सत्तर वाणोंसे उसको घायल किया । १६ । और देखनेवाले मित्रों के मध्यमें कर के पुत्र, भानुसेनको घोड़े सारथी स्थ शख और ध्वजासमेत दशकाणों से गिदिया । २७ । फिर तुरमसे कटाहुआ.उसका वह प्रकाशमान शिर ऐसा शोभित हुआ behind. Armad with weapons and armour, Dhrislıtadyutan, Satyaki, the sons of Draupadi, Bhitosan, Janmejaya, Shikhandi, the warriors of Prabhadrak, Chanderi, Kaikaya and Panchal, Nakul, Suhader and Mataya warriors, desirous of slaying, attacked Karan. Thuy shawered their arrojs over him like rain Then the sons of Karan, desirous of the safety of their father, checked those warriors with the belp of other warriors, Sushen cut the bow of Bhim and wounded him on the breast, with a roar. Bhim of dreadful prowess then .took ap another hard bow and cut Susben's bosv. Dancing in anger, Bin wounded him with ten errows and Karan with seronty seven. lo the presence of all his friends, he deprivod Karan's son Bhanusea of driver, car, weapolis and standard. Serered by a sharp arrow, his bcad looked glorious like a lotus flower severed from its stalk. Having +4 1६४७९) कर्णपर्व Karan Paray (.6479) शिरचन्द्रनिभाननमः । शुभशनमेधासीन्नालम्रएमिधाम्युजम् ॥ २८ ॥ हत्या कमुत भीमस्तावकान् पुनराईयत् । कृपहाईक्ययोपिछत्वा चापी ताघप्यथाईयत् ।' २९ ॥ दुःशासनं विभिर्विध्या शकुनि षडाभरापसैः । उलूकञ्च पताच धकार विस्थाबुमो ॥ ३० ॥ हा सुषेण हतोऽसीति वनादत्त शायकम ! यमस्य कर्ण विच्छेद त्रिभिश्चनमताइयत ॥ ३१ ॥ अयात्य परिसमा.मुपर्धाणं सुतेजनम मुषणायास्जद्भीमस्तमप्यस्थाच्छिनवृषः ॥ ३१ ॥ पुनः कर्णत्रिसप्तस्था भीमसेन मधेपुनिः । पुत्रं परीप्सन् विम्याप फर क्रूरेजिंघांसया ॥ ३३॥ सुषेणस्तु धनध भारसाधनमुत्तमम् । नकुलं पञ्चमिग दोहरसि चार्पयत् ॥ ३४ ॥ नकुलस्त व शिया विध्वा भारसहैईः । ननाद बलवनादं कर्णस्य भयमावधत् ॥ ३५ ॥ ते परेको महाराज विधा दशभिराशुगैः । चिच्छेद च धनुः शीघ्रं क्षरप्रेण महारय से कि नालसे जुदाहुआ कमल होता है ।२८ भीमसेन ने कर्ण के पुत्रको मारकर मापकं शूरवीरों को फिर पीडामान करके कृपाचार्य भौर कृतवर्मा के धनुषों को काटकर उनकोभी व्याकुल किया । २९। फिर दशासनको तानवाणते और शकुनीको छ। लाहे के वाणों से घायल करके उलूक और पत्री इनदोनों को विस्थाकिया । ३० । हा सण को मारा है ऐसा कहत हुये ने भीमसेन ने शायक को लिया तवकर्ण ने उसके उसवाण को काटकर तीन पागों से उसको भी घायल किया ।२१। इसके पीछे भीमसेनने मुन्दर पर्षवाले वाणको लेकर सपेणके ऊपर छोडा फिर कर्णने उसकाण कोभी काटा । ३२ । इसके पीछे पुत्रको चाहते निय कर्ण ने मारने की इच्छासे तिहत्तर बाणों से भीममन को फिर घायल किया।३।। फिर सुपेणने बड़े भारवाहक उत्तमधनुपको लेकर पांचवाणोंसे नकुलको दोनों भुजा और छातीपर घायलोकया । ३४ । तब नकुलभी भारसहते वाले सिवाणों से उसको घायल करके बड़े शब्दसे गर्जा और कर्ण के भयको उत्पन किया ।३५। फिर महारथी सुषेण ने शीघ्रगामी तीक्ष्ण दशवाणोंसे उसको घायल कर के शीघ्रही slain Karan's son, Bhm wounded your warriurs and cut the bows of Kripacharya and Krityarma. Then lie wounded Dusbasan with three arrows and Shakuni with six, and deprived Uluk and Patri of He took up an arrow crying out, "J have sain Sushen." Bat Karan cut down his arrow and wounded line with three arrows. Then 'Bhim took upa pointed arrox and discharged it at Sushen; but Karan cut that arrow too. Tlzcu cruel Karan, desirous of the safety of his own son, wounded Bhim with seventy three ariows. Sushen then took up another hard bow and with five arrows wounded Nakulon both his arms and breast. Nakul wounded bim with twenty arrows and roared loudly, causing fear to Karan 35. Then brave Sushen, with ton swift arrows, wounded him and cut his bow with another. Then Nakul, their car, शायक माने 116480] Mahabharat (६५८.. ॥३६॥ अथान्यदनुरादाय नकुलः क्रोधमञ्ठितः। षणं नाभवाणर्धारयामाससयुग । ॥३७॥स तु पाणर्दिशो राजन्नाच्छाच परवीरहा। निभिःचिच्छदचास्यमुदृढ़ धन लाख भित्रिधा॥३८॥अथान्यरनुरादायमुषेणाको हितामविध्यन्नकुलं पष्टया सहदेवञ्चसप्तमः ॥३९॥ तद्युखं सुमहाघोरमासीदेवा सुरोपमम् । निघ्नता सायकैस्तूर्णमन्योऽन्यस्य षधं प्रति ॥४॥ सात्याकषमा मूतं हत्वा निमः शरैः । धनश्चिच्छेद भल्न जघानाधि सप्तमिः ॥ १ ॥ . भेकेषुणोन्मभ्य प्रिभिस्त हुघताड़पत् । अयावसनः स रये मुहात पुनरुस्थितः ॥४२० स रणे युयुधानेन विस्ताश्वरथध्यजः । कृतो जिघांसुः शनेय खडगवर्मधुगध्ययात् ॥४३॥ तस्य चालवतः शनि वृषसे नस्य सात्याक: । बगहरदशीभवियर तुरमसे उस के धनुषको काटा । १६ । इसके पछि क्रोधसे भरेहुये नकुलने दूसरे. धनुषको लेकर युद्धमें नौवाणों सुपेणको रोका । ३७ । उस शत्रुहन्ता ने बाणों से दिशाओं को ढककर इसके सारथीको घायल किया फिर अपेणको तीनवाणसे छदा और तीन भल्लों से उसके बड़े दृढ़ धनुपके तीनखण्ड करादिये । १८ । इसके पीछे क्रोपयुक्त सुपेण दूसरे धनुपको लेकर साठवाणों से नकुलको घायल कर के सातवाणोंसे सहदेव को छेदा १३९ । परस्परके युद्ध में शीघ्रतापूर्वक वाले वारोंका युद्ध देवासुरों के युद्ध के समानहुआ । ४०। फिर सात्यकि तीन याणों से वृपसेन के सारथीको मारकर भल्लसे उसके धनुपको काट घोड़ों को भी सातवाणों से मारा ! ४१ । एकवाण से ध्वनाको काटकर तीनवाणों से उसको भी हृदयपर घायलकिया इसके पीछे एकमुहूर्त अपने रथपर अचेतहोकर फिर उठखड़ा हुआ । ४२ । युद्धमें सात्यकि के हाथ से सारथी घोड़े रथ और ध्वतासे राहत किया हुआ यह पसेन उस के मारनेकी इच्छासे दाल तलवार यांधकर सम्मुख गया 1३ 1 उस शीघ्रतास पानेवाले वृपतेनकी दालतलवार को सात्यांकने वाराहकर्ण inuch enraged, took up another buw and checked Syghen with nine Arrows. That destroyer of foes, having spread his arrows in all diroctione, Wounded his adversary's driver. Then he wounded Soshen with three arrons and with thres moto cut his bow at three places. Then enraged Sushon took up another bosy and having wounded Nakal with sisty arruns, wounded Sahadev too, with sever. The battle betwecn those warriors, desirous of slaying one another, was like that between gols and agurs. 10. Then Satyaki slew the driver of Vrie shasco with three unows and having cut down his bow, blew the horscs with seven more, He cut his standard with ove "arrow and wounded him on the breast with three. Vrishasan fainted in the car for some time, Deprived of driver, car, horses and standard by Satynki, Vrishwen opposed him with shield nad sword But Satyaki cut into pieces his shield and sword with ten arrowe. Sxing ! * 15481 द्रौप ॥ (६४८१) कर्णपर्व Karan 1Parv सिनर्मणो ॥ ४४ ॥ दुःशासनस्तु ने रष्ट्या विरथ व्यायुध कनम् । नाप्यसुरथ दूर्गामपोषाह रथान्नरम ॥ ४५ ।। अधान्य रथमास्थाय वृषसेनो महारथः । देयांत्रिसप्तत्या युयुधानश्च पञ्चाम: ॥ ४६ ॥ भीमसेन चतुःषष्ट्या सहदंषण पञ्चभिः । नकुल शिता वाणः शतानीकच सप्तभिः ॥ ४७ ॥ शिखण्डिनष दशभि धर्मराज शतेन च। पताश्चान्यांश्च राजेद्र प्रवीरान जयगृद्धिनः ॥ ४८ ॥ अभ्याई । यम्महेवासः, कर्णपुत्री विशामते । कर्णस्य युधि दुर्दस्ततः पृष्ठमपालयत् ॥ ४९ ।। दुःशासनश्च शैनेयो नवैनपभिरायसः । विमताश्यायं कृत्वा ललाट निभिरार्पयत स त्वन्यं ग्यमास्थाय विधिवत् कल्पितं मः। युयुधे पाण्डवैः साई कर्णस्थाप्याययन यलम् ॥ ५१ ॥ धृष्टद्युम्नस्ततः कर्णमविध्यदशभिः शरैः । द्रोप देगानिसप्तत्या युयुधानस्नु सप्तभिः ।। ५२ ।। भीमसेनश्चतुःषष्ट्या सहदेववश्व नाम दशवाणों से काटा॥४४॥ मोर दुश्शासन ने उस रथ और शास्त्रहीनपसेनको देखकर अपने स्थपर सवारकरके शीघरी दूसरे रथपा सबारफिया । ४५। इसके पीछे महारथी कृपसेन ने दूसरे रथपर सवार होकर तिहत्तरवाणोंसे द्रुपदके पुत्रोंको और पांचवाणों से सात्या को ४६। चौंसठ वाणों से भीमसेनको पांचसे सईदव को तीनसा बाणोंसे नकुलको सातवाणोंसे शतानीक को ४७ दशवाणसे शिखण्डी को और सी बाणोंसे धर्मराजको घायलकिया हे राजा उस धनुपधारी कर्ण के पुनने इन और अन्य शूरवीरों को पीडामानकिया इसके पीछे उस भजपने युद्धमें कर्णके पृष्ठभागको रक्षितकिया। ४९ । फिर सात्यकि ने नवीन लोहे के नौ वाणों से दुशासनको सारथी घोड़े और रथसे विहीनकरके तीनवाण मे उसके ललाटको घायल किया।५।फिर वह दुश्शाशन बुदिके अनुसार अलंकृत दूसरे रयपर सवार होकर कर के वलको बढ़ाताहुभा पाण्डवों के साथ युद्ध करनेलगा । ५। इसी प्रकार धृष्टद्युम्न ने दश बाणों से कर्णको घायल किया द्रौपदीके पुत्रोंने तिहचर वाणोंसे सात्यकि ने सात वाणोंसे भीमसेनने चौंसठ बाणोंसे नकुलने तीनसौ वाण Vrislusen deprived of arms and car, Dushasan took him up on his own car. 45. Mounted on another car, Vrisliasen wounded the Soda of Drupad with seventy three arrows, Satyaki with five, Bhim with sixty four, Sahader with five, Naku! with three hundred, Sbatanik with soyon, Sbikhandi with ton and Yudbishthir with a hundrede Karan's son wounded these and othec Warriors and then went on to protect Karan's rear. With nine new arrows made of iron, Satyaki deprived Dushasan of driver, horses and car and with three more wounded him on the head.50. Dushasan mounted another car and holped Karan in fighting with the Pandavas, Dhrishtadyume woun dou Karau with five SITOWE; the Sons of Draupadi wounded bim with seventy thice; Satyaki wounded Lím with seven; Bhim with sizly - --- (6452) Mahabharat (६५८२ सप्तमिः । नकुलविंशता चाणः शानीच समभिः ॥५३ ॥ शियडी दशभिधाग धरंगजः शतेन च ॥ ५५ ॥.एते चारे व राजेन्द्र प्रचीरा जयगृमिनः । अध्यम् यमप्यास मनपुर महामृ॥ १५॥तान् मतपुत्रो पिशिदेशभिः ईशानः । रथेनान चरन धारः प्रत्यविध्यदरिन्दमः ॥ ५६ । तपासणीय कर्णस्य लाघार महात्मनः । अपश्याम महाराज तदननामिवाभवत् ।। ५७ । न याददानं दहशुः सन्दधानाच सायकान् । विमुचन्तच संरम्भाइरशुस्तं हतानरीन् ॥ ५८ ॥ पोर्वि यदिशश्चय अपूर्णा निशितैः शरैः। अरुणानावृताकार तास्मन्देशे पभो पियत्॥५१॥ नृत्यनियहि गधेयश्चापहस्तः प्रतापवान् । पैर्विद्धः प्रत्यद्धिसानी त्रिगणैः शरैः । ६०॥ इमियाम धनान् पुर्णाननाद च । साशसमस्या सतत पियर ददुः ॥ ६१ ॥ ताम् प्रमृय महेष्वासानाधेयः शरवृष्टिमिः । राजानीकमपा से शतानीकन सातगण.से शिखण्डीने दशवाणों से और धीर धर्मराज ने सो वा!से घायल किया। ५४ । हे राजेन्द्र विजयामिलापी इन वीरों और अन्यवारों ने उस महायुद्ध में बड़े भारी धनुपधारीको पीड़ा मानकिया।५५फिररथ मे घुमकर उस शत्रुविनयी वीर कर्णन विशिवनाम दश दशवाणासे प्रत्येकको घायलकिया । ५६ हे महावाहो हमने महात्मा कर्ण के अस्त्रवल और हस्तलायत्रता को देखकर वहा माश्चय किया। ५७ । क्रोध वाणों को लेने चढ़ाते और मारतेहुये कर्णको नहीं देखा परन्तु शत्रुओं को मृतकामा देखा । ५८। उसप्तमप ताक्षणधारवाले बाणोंसे पृथ्वी स्वर्ग दिशा और भाकाश भर व्याप्त होगया उस स्थानपर भाकाश लालबादलों से व्याप्त होने के समान परिपूर्ण होगया । ५९ । उससमय धनुप हाधर्मे, लिय नाचता हुआ मतापवान् कर्ण मिन के हाथ से घायल हुभाया उन उन को एकएक करक तिगुने बाणों से घायल किया । ६० । फिर हज़ारवाणों से उनको, घायल करके बड़े वेगमे गर्ना इसके पीछे घोड़े रय सारी समेत वह सबलोग घायल हो होकर हटगये । ६१ । शत्रुओं का घायल करनेवाला कर्ण वाणोंकी four; Sahadev with seren: Nakul irith three hundred, Satanik with suven; Shikhandi with ten and Yudhishthir wounded him with a hundnd. Thess and othe-warriors woundol Karan. Ruran wound. ed each of them with tựn arrows,56. Wo wonderod at tho dexterity and prowess uf Karun.: We could not mark luis taking up and putting ou nud discharging of arr»we; ve only saw the ugensies slain. All tbu directions were filled with luis arrows. He wounded his ad rörsariwa: with thricu the number of struts which they lind und in wounding bim.GO. Having wounded them with thousands of arroxa, bo roared a mighty ruur. All the warriors, thus wounded, rcmured themselos 'irom his presence. Haran tho destroyer of focs, sharing routed them.
(६५८३) पर्व Kuan Parv 16483) प्राषिशब्छत्रुकर्षणः ।। ६२ ॥ स रात्रिंशत हवा दीनामनियत्तिनाम् ।गयो निशितैर्षाणनतोऽश्यच्छधुधिष्टिरम् ॥ ६३ ॥ ततस्ते पाण्डया राजन् शिखण्डी पससात्यकिः । गधेगात् परिरक्षन्तो राजानं पर्यधारयन् ॥ ६४॥ तथैव ताव काः संघ फर्ण दुर्वाण रणे । यत्ताशरा महेष्वासाः पय्यरक्षन्त संवंशः ॥ ६५ ।। नानाधादित्रघोपाच प्रादुरासन् विशाम्पते । सिंहनादश्च सबसे शाणामभिगजंताम् ॥६६॥ ततः पुनः' समाजग्मुरभीताः कुरुपाण्डवाः । युधिष्ठिरमुखाः पायोः सतपुत्र मुखा घपम् ॥ ६७॥ इतिथी कर्णपर्वणि संकलयुद्धे अप्टचत्वारिंशोऽध्यायः । ४४ । वर्षा से उनाड़े धनुपधारियों को मथकर परस्पर मनरूप पीड़ासे रहित होकर हाथियोंकी सेनामों में आया । ६२ । वहां उस कर्णनेमुख न मोडनेवाले चन्देरी देशियो के तीनसौ रथों का मारकर तीक्ष्ण धारेवाले वाणोंसे युधिष्ठिरको पायल किया । ६३ । इसकेपीछे हे राजा सव पाण्डव सात्यकि और शिखगड़ी जोकि राजाको कर्ण से रक्षा कररहेथे उन सक्ने प्राकर युधिष्ठिरको चारोंभोरसे रक्षित किया । उसीप्रकार सावधान शुरवीर महाधनुपधारी आपके सब यूद्धकर्ताओं ने युद्धमें दुर्जय कर्णको चारों भोरसे रक्षितं किया । ६५ । हे राजा फिर नानाप्रकार के बाजों के शब्द मकटहये और सम्मुख गर्जनेवाले वीरों के सिंहनाद उत्पन्न हुये। । १६ । इसके पीछे निर्भय पाण्डव और कौरव फिर सम्मुख हुये पाण्डवों का | मुख्य युधिष्ठिर था और हमारा मुख्य अग्रगामी कर्ण था । ६७ ॥ . enterod the array of elephants. There he şlery three hundred of the Chanderi warriors and wounded Yudhishthir. Then all the Pandavas, vitla Satyaki and Shikbandi. protected Yudhishthir og all "sides. In the same manner, your warriors protected Karan. Then musical jastrar cats trens souaded. The fearless Pardavas aud' Kauravas lod by Yudhishthir and Karan respectively, met in battle. "87.
। . . [6484] Dlanzlibarat सअय उवाच । विदार्य कर्णता सेनां धर्मराजमुपाद्रवत् । रथहस्यमयपत्तीना सहस्रः परिपारितः ॥ १ ॥ नानायुधासदलागि प्रपितान्यरिभिषः । डिरषा वाण शतप्रस्तान विध्यसनमात् ॥२॥ निषक शिरास्तेषां याहूश्च साजः । ते हता पमुधां पेतुर्भग्नाश्चान्ये विद्युः ॥ ३॥ दूषिडान्धानपदाच पमः सारव किवोदिताः । अश्वद्धन जिघांसन्तः पत्तयः कर्णाहये । ॥ ते विधाहुशिाना णाः प्रहताः कर्णसापकः। पेतुः पृथिव्यां युगपच्छित्र शालपनं यथा ॥ ५॥ एवं यांधशतायाजी सहस्त्राप्ययुतानि च । हतानोयमही देहर्यशसापूर्य रोदसी ॥ ६ ॥ मय धैकतनं कर्ण रणे अमिधान्तकम् । रुरुधुः पाण्डपाञ्चाला व्याधि मन्त्रीपरिष १७ तान् प्रमृधाग्यपतत् पुनव युधिष्ठिरम् । मन्त्रौषधिक्रियातीता व्यापित्यु ल्पणो यथा ॥ ८॥ सराभरिभी रद्धः पाण्डुपाञ्चालकेकयैः । नाशकसानसिकन्तुं अध्याय ४८ संजय बोले कि इसके पीछ हजारों रथ घोड़े हाथी और पचियों समेत कर्ण उस सेनाको चीरकर युधिष्ठिरके सम्मुखगया। १। वहां कर्णन निर्भयता पूर्वक शत्रुओं से संतप्त होकर नानामकारके हजारों शस्त्रों को काटकर सैकड़ों महाउग्र बाणों से शत्रुओंको घायल किया। २ । कर्णने उनके शिरजंघा और भुजाओंको काटा तब वह घायल और मृतक होकर पृथ्वीपर गिरपड़े और बहुतसे भागगया। फिर सात्यकि के कहनेपर द्राविड निपाद और शूरवीर पत्ती लोग युद्धमें मारने की इच्छासे कर्णके सम्मुखगये । ४। वह लोगभी कर्ण के हायसे शिरत्राण और भुजाओं से रहित होकर मारेगये और एकसाथही पृथ्वीपर ऐसे गिरपड़े जैसे कि टूटाहुआ तालका वन गिर पड़ताहै ।इसरीतसे युद्धभूमिमें दिशाओं को व्याप्तकरते (सैकड़ों भौर हजारों शूरवीर मृतकहोकर पृथ्वोपर वर्तमान हुये इसकेपी पांडव और पांचालाने मृत्युके समान मूर्यके पुत्र कर्णको ऐसेरोका जैसे कि मन्त्र और भोपाधियों के द्वारा रोगको रोकते हैं । ७। वह कर्ण उनकोभी मर्दनकर के फिर अधिष्ठिर कपास ऐसे. पहुँचा जैसे कि मंत्र वा औषधियोंके कर्मको उल्लंघन करनेवाला महा कठिन रोगहोता है । ८ । राज्य के अभिलापी पाण्डब पांचाल और केकयलोगों से रोकाहुआ वह कर्ण उल्लंघन करनेको ऐसे समर्थ नहींहुआ जैसे कि काल ब्रह्म CHAPTER XLIX Sanjaya said, " Then having crossed thousands of elephants, borse, cars and foot, Karan came face to face with Yudhishthir. Having fearlessly chastised the foe and cut down thousands of treapons, he wound ed the foes with his dreadful weaponz Koran cut down their heads, thighs and arms and they fell dowa dead on the ground or flod from At the instig stinn of Satyaki, the Dravida, Nishads and brave foot-soldiers, opposed Karan. But they were all slaia by him and fell down on the ground like troes struck down by the wind. Filling the him' .
(१४८५) कर्णपर्व Karan Paray 16485) मायुपषिको यथावतो युधिष्ठिरः कर्णमारय निधारितम् । मावीत परवीरज कोवसरकलोषनः १०॥ कर्ण कर्ण वृधारटे सतपुत्र वचः गणं । सदा स्पयसि संमा फाल्गुनेन तास्थिना ॥ ११ ॥ वयास्मान पारसे निराधा रामते स्पितः। पाल पास है बाय प्रदेश या पाण्डुप ॥ १२॥ व सर्व धावप पोर महवास्थितः। युरभयाञ्च तेऽचाई पिनेष्यामि महाहवे ।। १३. एषमुक्या महाराज कर्ण पासवस्तदा । सुवर्णपुरेशभिषियाघापस्मयैः शरैः • १५ ॥ तम पुगवणमिः स्यविध्यदरिन्दमः। यत्सदन्तमंहवासा प्रहसनिष भारत ॥ १५ ॥ सोऽवतापातु नियः भवपुत्रेण मारिए । प्रजज्याल महापा रविषय हुताशनः ॥ १६ ॥ ततो विस्कार्य ममहचाप देमपरितम्। समापन पानीको नही उस्लंघन करसका है । ९ । इसके पीछे समीप वर्तमान शत्रुविनपी राकेहुपे कर्ण से वह फ्रोधसे रक्तनेत्र युधिष्ठिरवोले । १० । वृथा दीखनेवाले मूत पुत्र कर्ण मेरे पचनको मुन नू सदैव युद्ध में महावेगवान अर्जुन से ईप करताहे ११ । और दुर्योधन के मतमें होकर सदैव हमलोगों को पड़िादेता है तेरा तेम एल पराक्रम और पायदवोंके सायमें जो शत्रुताहै । ११ । उस सवको तू पड़ी परिता में निपत होकर दिखला प्रब में पड़े युद्धमें वो पदकी.बदाका नाशकरूंगा । १५ ।महाराज पाण्डव पिठिरने कर्णसे ऐसे वचन कहके मुनहरी पुंखवाल वषाणों से उसको पापळीकपा। १४ । भरतवंशी शत्रुओंके विगयी कर्ण ने सकर वत्सदन्तनाम दशवाणों से उसको पायलकिया। १५ । हे भेट कर्ण के आपसे पापल वह युधिष्टिर उसको तुपए करके ऐसा नोपयुक्त हुमा जैसे कि व्यके कारणसे अग्नि मम्मलित होतीहै । १६ । उसकेपीछे मुवर्णसे जटित बहुत योपनुप को टंकार कर पर्वतोंक भी विदीर्ण करनेवाले बहुत तीक्ष्णवाणों को पढ़ापा । १७॥ diroctions with bis arrows, ho killed thousands of warriors Then tho Pandavas and Panchala checked Karan as a wodicino daug sickness Having routod thou, ho approachod Yudhishthir as sickness proraila oror modicina Chocked by the Pandavas, Panchals and Kaikayao, baror for kingdon, Kuad could not operatop them as Death cannot arortuko one who knows Brahm. Thea kving Karau the cooquor *r. of focs near him, Yudhish thir, with rol oyca in apger, said, "Hear ino rain son of Sut: you have always lorno curity with Arjan and hare alwaga giren us troublo for the sako of Duryodban. Now shop us your great strength, chmityfand prowess, and I sball.zatisfy your desite for fighting." Haria, said this to Karan, l'udbúhthir wound. od him with tea artowa haring goldeo ſcatbert Thea Kirka wodaded him with Arrows known u Vatulant.15. Din garding the founde [6486] Mahabharat (१५ शितं पाणं गिरीणामपि दारणम ॥ १७ ॥ ततः पूर्णायतोत्कर्ष यमदण्डनिम शरम् । मुमोच त्वरितो राजा सतपुत्रजिघांसया ॥ १८ ॥ स तु वेगवता मुको पाणो, गनिस्वन । विभेद सहसा फर्ण सम्पपाश्र्थे महारथम ॥ १९ ॥ स तु वेन पीडितः प्रमुमोह वै । सस्तगात्रो महाबाहुर्घनुरुत्सृज्य स्यन्दने ॥ ७ ॥ होबारुतं सर्वे धार्तराष्ट्रवलं महत् । विवर्णमुखमूयिष्ठं राष्ट्रवा कर्णे तथागवम लिइनास सजश्वका किलकिलास्ता ! शदशन महाराज सदा रामः क्रमम् ॥ २२ ॥ प्रतिलभ्य तु राधेयः सं नातिचरादिव । वधे राजन् : सनः परराक्रमः ॥ २३ ॥ स हेमाविक्रवं पाप घिस्फार्य विजयं महत् । परमधारमा पाण्डवं निशितैः शरैः ॥ २४ ॥ ततःभुराभ्यां पाञ्चाल्यो इसकेपीछे राजाने कर्णके मारने की इच्छासे शीघ्र कर्णतक खीचहुये यमराज दयरकी समान वागको छोड़ा। १८ । फिर वह उस वेगवान के हाथसे टाइम विजली के समान शब्दापमान वाण अकस्माद उस महारथी कर्णक वाईकोस नियत इमा। १९ । तब वह महावाहु उसवाण से पीडितहोकर रथपर छोड़कर अचेत होगया । २० । इसके पीछे दुर्योधनकी बड़ीसेनाने कर्णको उसका में विपरीत चेष्टायुक्त देखकर बड़ा हाहाकार किया । २१ । हे राजा . पराकमको देखकर पाण्डवोंकासिंहनाद और क्रीडापूर्वक किलकिलाशब्द । २५ ! फिर बड़े पराक्रमी कर्णने थोडेही काल में सचेतहोकर राजा के मारने कम मनोरकिया । २३ । और उस साहसी ने सुवर्णजटित विजयनाम धनुपको फर तक्षिण धारवाले वाणों से पाण्डवों को घायल किया २४ इसके पीछे युद्ध महात्मा रानाके चकरसक पांचालदेशी चंद्रदेव और दण्डधार को दो तुरमों : पाप किया २५ धर्माजके वह दोनों बडेबीर दोनों पहियोंकी ओर स्थक riven by Karan, Yudhishthir was enraged like fire with lib;' He then, twanged his bow and put to it many arrows which pierce through wousteios. Then tho king desirous of slaying Karan, drawing his bow to the ear, discharged an arrow liko the staff, Yam. Shot by him, the srrow, with the speed of lightning. pierced through the let: rib of Karan, That brave warrior swoonod with wound and let go the bow and airoir from bis grasp. 20. Karın in that state, a great cry was raised from the army of " Kauravas. The Pandav svartiors roared in gleo at the eight o Yudhishthir's prowess, ' Karan reyained consciousness aftera time, and desirous of slaying tho king, Le twanged his bow and wound ed him. He also founded Chandrader and Dandadhar tho i Panchal wheol-guards, 25. The two bravo warriors N - .
णणपर्व Karan Pary (6487) महात्मनः जवान चन्द्रदेवम्ब दधारच संयुगे ॥ २५ ॥ साधुमो धर्मराजस्य प्रवीरो परिपार्वतः । रथाभ्यासे चफाशेते चन्द्रसेवं पुनर्वसू ॥ २६ ॥ युधिष्ठिरः पुनः कर्णमविध्यस्त्रिं गता शरैः। सुषेण सत्यसेन त्रिीमसिमिरताड़पत् ॥ ७॥ शल्य नपत्या विव्याध त्रिसप्तत्याथ मतजम् । तचास्य गोप्तर विव्याध निमि सिभिजिह्मगैः ॥ २८ ॥ ततः प्रहस्याधिपध्रिन्यान, स्वकामुकम । विस्था भल्लेन राजागं षिक्षा षष्टयानदत्तदा ॥ २९ ॥ ततः प्रधीराः पाण्डनाम यथाव. समर्षिताः । युधिष्ठिरं परीप्सम्तः कर्णमध्यईयञ्छरैः ॥ ३० ॥ सात्यकिवेकितानुम्ब बुयुत्सुः पाण्डय एव च ।धृष्टद्युम्नः शिखण्डी व द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः ॥ ११ ॥ बमोच भीमसेनश्च शिशुपालस्य चात्मजः ! काम्पा मत्सराच फेयाः काशि कोशलाः ॥ ३२॥ एते व त्वरिता वीरा धमुसेनमताड़पन् । जनमेजयध पाउचाल्यः पणे विध्याध सायकैः ॥ ३३ ॥ चराहकाराचैर्नाली निशितैः शरैः । पार्स (देसे शोभायमान हुये जैसे कि चन्द्रमाकेपास पुनर्वसु नक्षत्र शोभायमान होते हैं १६ अधिष्ठिरने तीक्ष्ण धारवाले वाणों से कर्णको फिरछेदा और सुपेण व सत्यसेन को सानवाणों से घायल किया २७ शल्यको नवाणो से और कर्ण को तिहार बाणों से पीडामान किया और उनके रक्षकों को सीधे चलनेवाले तीनतीन वाणों से घायल किया २८ इसकपीछे धनुपको चलायदान करताना यह कर्ण तडतहँसा भौर भल्लसे राजाको व्यथितकर साठवाणों से घायल करके गर्ना २९ इसके पीछे अधिष्ठिर पाण्डबके बडे वार क्रोधयुक्त होकर युधिष्ठिर की रक्षाकरने को कर्ण के सम्मुख दो और वाणों से उसको पाढामान किया ३० सात्यकि, चकितान, युत्स, पारड्य, धृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पुत्र, मभद्रक १ नकुल, सहदेव, भीमसेन, शिशुपालकेपुत्र, फारुष्य, मत्स्य, कैकय, काशी, कोशल इनदेशों के शेषशूरवीरों, ने ११ सुसेनको घायलकिया और पांचालदेशी जनमेजयने शायकों से कर्ण को पीडित किया वाराई कर्ण, नाराच, नालीक, वत्सदंत, विपाट, तुरस चुटका- by the wheels of the king, looked glorious like Pudarfasus close by the moon. Yudhishthir again pierced Karan with his arrows and with hree Arrows each, wounded Sushen and Satyasen. He also wounded their wheol guards with three arrows each, Karan laughed loudly and having wounded the king with sixty arrows, roared a mighty foar. Then the brave warriors of the Pandavas rusbed against Karan to proteot Yudhishthir and wounded ſhim with their arrows 30. Postyasi, Chekitan. Yuyurse, Pandya, Dhrishtadyumr, Draupadi's sons, Prabhadraka, Nakul, Suhadev, Bhimsen, Shishupat's son, Karu, Jabyas, Matsyar Kaikayas, Kashis, and Rosal •warriors surrounded Vasusen. Janamojaya of Panchal wounded Karan with arrowr.,With तं यथा . J ', (6488) Mahabharat [१४८८ वन्दर्षिपाठ शुरौटफामुझे ॥ ३४ ॥ नानामहरणधीन रथहस्पदवसानिमिः सर्वतोऽभ्यश्चन् कर्ण परिवायं जिघांसया ॥ ३५ ॥ स पाण्डवानां प्रबरःसर्वतः समभिद्रुतः । उदीरयन् ग्राममलं शरेगपूरनहिशः ॥ १६ ॥ ततः शरमहाज्यालो वीर्यामा कर्णपावकः । निर्दशन पाण्डवन वीर पर्यचरद्रणे ॥ ३७॥ ससन्धाप महास्त्राणि महेन्यासो महामनाः । प्रहस्य पुरुषेन्द्रस्य शोधिछेद फार्मुकम् ॥ ३८ ॥ ततः साधाय नक्षति निर्मपानतपर्वणः । विभेद कवचं राहो रणे कर्णः शिते शरैः ॥ ३९ ॥ तदर्म हेमाविकृतं रत्नचित्रं यमी पतत् । सविपद सवितुः श्लिप बात तदङ्गात् पुरुपेन्द्रस्य भ्रष्ट धर्म म्यरोषत। रत्नरल कवं मुख्य मुख १४ भौर नाना प्रकारके उग्रशस्त्रों से और रय हाथी घोड़े और अश्व समारा: से कर्णको घेरकर मारने की इच्छासे सम्मुखदौडे ३५ सवपकार करके पायरवों के उत्सम शुरवीरों से घिराहुआ होकर ब्रह्मास्त्रको प्रगट करते हुये उस कर्णने से दिशामों को व्याप्त कराव्या ३६ इसकेपीछे वाणरूप वही भग्नि और पराक्रम- रूप वढी उप्याता रखनेवाला अग्निरूप कर्ण पाण्डवरूपी वनको भस्मकरता हुआ इधर उधर भ्रमणकरने लगा ३७ फिर बडे धनुषधारी वीरकर्णनईसकर महामनको चढाकर वाणों से महाराजा युधिष्ठिर के धनुषको काटा १८ इसके पीछे कर्ण ने। एक पलभरमही नवे वाणों को चढाकर युद्ध में राजा के कवच को छेदा ॥ उससमय वह रत्नजटित मुवर्णसे खचित कवच पृथ्वीपर गिरता हुआ ऐसा शोभायः । मान हुआ जैसा कि बिजलीका रखनेवाला पादल बायुसे ताडित होकर मूर्य से चिपटाहुमा होता. हे ४० उस महाराज के शरीर से गिराहुभा रत्नों से अलंकृत वह कवच ऐसा अत्यन्त शोभायमान हुमा जैसे कि रात्रिके 'वादलों से रहित भाकाश होता है । ४१ । इसके पीछे वाणों से टूटे कवच arrows of different sorts and other weapons, with horses, elephants and horremen, they attacked Karan from all sides. 35. 'Suirounded by the Panday warriors, Kaian filled all the directions with arrows from the Brahmastra With the fire of his arrows, he burnt down the forest of the Pandav army and soamed throughout the field of battla Theo, with a zipile, Feliant Karen cut down the bow of Yudhishtbir and pierced his armoar with ninety Arrowe. by arrows, fell down from Yudbislsthir's body like a cloud with lightning. The armmour falling down from the body of the kipp, looked like the starlit sky of a clear night. Then the king, desti tute of armour, with bleeding body, hurled an iron spear at Karan; hut the latter cut it down in the air with sovea arrows and made it fall down on the ground. Then Yudhishthir the Panday wounded . .. The armourl.
- ४८ ६४८९) कर्णप/ Karan Paray (6489) व्यन्त्र निशिपयाम्वरम् ॥ ११ ॥ छिन्नमा शरैः पार्टी रुधिरेण समुक्षितः । कुमः सवसी शक्ति चिक्षपाधिरधि प्रति ॥ ४२ ॥ ज्वलन्तीमिपाकाशेरे विच्छेद सप्तभिः । सा छिन्ना भूमिमगमन्मधासस्प सायकः ॥ ४॥ ॥ मतो बागोलादेव र हरि व युधिष्ठिरः । चतुर्मिस्तोमरः कर्ण तायित्वानदन्मुड्छु । रणिधिरः कर्णः कुरः सर्प य श्यसन् । घज विद भल्लेन त्रिनिर्विव्याप पाण्यषम् ॥५४॥ षुधा चास्य विच्छर स्थन दिलशोऽस्मिनत् ॥ ४६ ॥ कालयाकारतु मे पाय दस्तयाबहन् स्याः । संयुक्त रयमास्थाय प्रायानाजा पराए ॥ एवं पाथों पायात् स निहतः पाणिसारथिः । अशफ्नयन प्रमुखतः स्थातुं कर्णस्य दुर्मनाः ॥ ॥ अमित्य तु राधेयः स्कन्ये सस्परप पाणिना । अग्रवीत् प्रासम्राजन् कुरमयीणघ पाण्डघम् ॥ ४९ ॥ क माग कुले बातः क्षत्रधर्म ग्यपस्थितः । प्रजात समरंभात प्राणानूक्षन्महादये पपिरसेभरोहुये उसराजाने केवल लोहेकी वनीहुई शक्तिको कर्णके ऊपरफेंका ॥४२॥ कने उस माग्नरूपी शक्तिको आकाशही सात वाणों से काटा और वह पाक्ति पृथ्वीपर गिरपडी । ४३ । इसके पीछे पीछे पाण्डव युधिष्ठिर चार तोमरों से कर्णको दोनोंभुजा छळाट और दृदयपर घायलकरके बड़ी प्रसन्नवासे गर्मा । ४४॥ फिर रुधिरभरे क्रोधयुक्त सर्प के समान श्वास लेनेवाले कर्णने भल्लसे धजाको काटकर तीन वाणों से पाण्डव युधिष्टिरको पायलकिया । ४५ । और उसकेदानों तूणीरोंको काटकर रथको तिल के समान चूर्ण करडाला । १६ । जिन कृष्ण वर्ण पालरसने वाले दतवर्ण घोड़ों ने युधिष्ठिर को सवार किया राजा उनघोड़ों के रथपर पढ़कर मुखमोड़कर घरको चलदिया। ४७ । इसरोतिसे वह अधिष्टिर | जिसका सारथी और पीछे रहनेवाला परगयाधावा इटगया फिर वहमहाखेदित चित्तहोकर कर्णके सम्मुख होनेको समर्थ नदाटुआ|४८।फिरकर्ण हाथ से कंधेकोकर सताहमा और पाण्डवों की निन्दाकरता हुआ वोला ४९ यडे कुलमें उत्पन्न क्षत्री- धर्ममें नियत होकर इसवटे युद्ध भयभीतवा से प्राणों की रक्षाकरते युद्धको त्याग कर कैसे जातो ५० इससे मेरे मतसे आपक्षीधर्म में कुशल नहीं होआप प्रमाणों Karan with four tomars on the two arms, forehead and breast, and roared with joy. Karan, bleeding profusely and sighing like a serpent, cut down Yudhishthirs banner and wounded him with three darts. 45. Then bo cut down his quiyers and car into small pieces. Then Yudhishthir turned back the white horses with black hair; for without driver and guarda bo could no longer oppose him, Karan tben touched Yudhishthit's shoulder ard with a smile, insulted the Pandar, saying, Born in a poble family of kebatryas, how it is that you dy away from the field of battle. 50. I think you are nob firm on your duty.
. (6490) Jiahabharat * ५० ॥म भवान क्षत्रधर्मेषु कुशल होते मे मतिः । बाबले भधान युकास्थामा पाकमणिम् ॥५१॥ मास्म युध्यस्व काम्तेय मामधाररान समासदमा धनानप्रिरि मा वै प्रजमहारणम् ।। ५१ ।। एवमुफ्त्वा ततः पार्थ विराजय व महाबलः । पम्हनत गाण्डवी सेना वजाहत हवामुगम ।। ५२ ॥ ततोऽपायावतं गमन प्रोमानव जनेबार ॥ ५३॥ अथापयानं राजान मत्वान्वीयुस्तमच्युतम् । धेदि पाण्यपावाला सारपीकर महारया द्रौपदेयास्तया शूरा मादीपुत्रा च पाया ॥ ५५ ॥ ततो यधिष्टिरानकि हटा कर्ण: पराकमुखम् । कुरुमिः सहितो धारः मटा महतोऽन्यगात् ॥ ५६ ॥ भेरीशंखमृगानां कार्मुकाणाच निस्वनः । पभूध ,धाराष्ट्राणां सिनावरणस्नया ॥ ५७ ॥ युधिष्ठिरस्तु कौरम्य रयमाव सत्यभूतकामदास स्वान कर्म विक्रमम् ॥ ५८ ॥ काल्यमानं बहा धर्मराज युधिष्ठिरसास्वानयोधानप्रीत के सम्हों में वेदपाठ और यह करने में योग्यहाँ ५१ हे कुन्ती के पुत्र युद्ध मतकरो और शेरों के सम्मुख पतहो इनको प्रेय मतकही बडे युद्ध में मत जाओ ५२ उस यो वरने इसरीति से कहकर पाण्डवको छोड पाण्डवी सेना को ऐसमारा जैसे वर्ज पा, इन्द्र आमुरी सेनाको मारताहै ५३ हे राजा इसके पीछ लज्मा युक्त राजा युधि प्ठिर शीघ्रही हटगपा तदनन्तरजसअप राजा को हटाहुआ मानकर भागे लिए हुये वार इसक पाछ चळे चंदेरी देशवाले पांडव पांचाल महारयो सारपाक दूर द्रौपदी के पुत्र नकुल सहदेव इत्पादिा५५तदनन्तर युधिष्ठिरकी सेनाको फिराहुआ देख कर अत्यन्त प्रसन्न चित्त की कौरवों समेत पछिकी भोरसेचला.५६ पौर भूतराष्ट्रके पुत्रों के भेरीशंख मृदंग धनुष और सिंहनादों के शब्दहुये। ५७। हे कौरज्य महाराज फिरयुधिष्ठिरने शीघ्रही श्रुतकीर्चिके स्थपर पढकर कणके पराक्रमको देखा। ५ ।फिर धर्मराज अपनी सेना को छिन्न भिन देखकर यहाकोधितहो अपनेशूरवीरोंसे बोला कि तुम कैसे खरेहो इनको क्यानहींमारते । ५९ । तर राजाकी माझाशकर पांडवों के सर महारथी जिनमें भप्रगामी भीमसेनया आपके You are fit only to perform sacrifiocs among Brahinang. You should fight no longer, with warriors, son of Kuati, nor should you insalt thérn with your challenge," Having said this, Karao lot him go and then.degan slauglicering tus Paadav armag es ladra does the army of Asurs. Tbon Yudbishthir slunk away with abame. Then aceing the king give way, the warriors of Chanderi and Pancha!, ihe. Pandarasi Satyaki, the song of Draupadi, Nakui and Sabader followed him. Thea sceing the army of Yudbishthir turo buck, Kárea with a cleorful mind tarned back with tbe Kagrar army, 56. Ansical instrument werd touoded in tho army of the sons of Dhritrashtra and the Warriors roared uke lion Then Yudhishthir mounted the car of Shruthird, and seeing Karan's propress in disparaing his arms, ho said " .(६४९१) कर्णपर्व Karan Parv (3191) कुको निहतमान किमासत ॥ ५९ ॥ ततो रानाभ्यनुलाताः पाण्डवानां महारथाः। भीमसनमुखाः सर्व पुस्ते प्रत्युपाषन ॥ ३० ॥ अमघमुसलः शम्दो योधामा तभ भारत रियास्वापरतोनी शस्त्रानाश ततस्ततः॥ ६१ ॥ गंतष्ठत प्रहरत.प्रताति पततति । इति वाणा अन्योन्यं जन्नुर्योधा महारणे ॥ १२ ॥ अच्छायेव वासीफरपुष्टिभिरम्परे । समावृतनरवनिम्नद्भिरितरतरम ॥ १३ ॥ विपता कावमशाग्यश्वस्तायुषा रणे । म्यागययवा: पेतुः क्षिती क्षीणाः क्षितीघरा: ६. ' प्रवणादिव चैलाना शिवाराणि द्विपोतमाः । सारोहा निहताः पेतुर्वज भिन्न इवानवः । ६५ । मिमिविपर्यस्तैर्मालङ्कारभूषणैः । सारोहास्तुरगाः पेतुईतवीराः सहस्रशः ॥ ६६ ॥ विविधायुधागा द्विरदाश्वरथेहताः । प्रति पुत्रों के सम्मुख दौडे। ६१ । तब वा सूरवीरोंके व कठोर शब्द हुये रथ हाथी घोडे और पत्तियों के बही वहां शन्द होनेलगे।६१। फिर उठो घायलकरो सम्मुख होनाभो दौडो इसप्रकारकी परस्पर में वार्चा करते हुये शूरवीरोंने उस पडे युद्ध में एकने एकको मारा राऔर भाकाशमें बाणोकेकारण घटासी छाई परस्परमें मार नेवाले लौट हुये उत्तम पुरुषों के हायसे युद्धमें ध्वजापताकाभोंसे खादत घोडे सारथी और शखों से रहित शरीर के अंगोंसे चूर्णित राजालोग मृतकहोकर पृथ्वीपर ऐसे शिरपडे जैसे कि टूट कर पहाड़ों के शिखर गिरपडते हैं इसी प्रकार सवारों समेत एसम हाथी मृतक होकर पृथ्वीपर ऐसे गिरपडे जैसे कि ब्रज से टूटेहुये भूषण और कवचों से संयुक्त पर्वत गिरतेहैं । ६६ । हजारों सवारों समेत घोड़े जिनके बहुत से यूरवीर मारेगये वर्षभी पृथ्वीपर गिरपहे और युद्धमें सम्मुख युद्धकरने वाले वारोंसे पत्तियों जितकं हजारों समूह मारे गये । ६७ । बडी लपी | लाल आँख और चन्द्रमा कमलके समान मुख रखनेवाले युद्ध कुशल पुरुषों के उत्तम to his warriors in a rage, Why are you standing idle! Why do you pot attack ?" At tho king's command, the Panday warriors led by Bhimsen rushed against your son's army,60. Then there were heard harsh words of the warriors, mingled with the noise from cars, ge. phants and horses. "Rise; attack; run," were the words uttered by the warriors who slew one another. There was a cloud of arrows in the air, The fighting warriors, with broker banners, destitute of horses, drivers and weapons, wounded and dead, luy on earth lika broken pieces of mountains. The elephants with their riders lay dead on varth liko bills struck down by lightning. The riderless horses were lying down on earth by thousands. Thousads of foot soldiers lay dead. The earth was covered with heads boring red eyes and boautiful faces. The noise of tho warriors reached the sky. The parties of apsaras carried thousands of warriors in celestial cars. : Seeing this great ।
(6494) Mahabharat, (६५९४) मुंकम् ॥ ८४ ॥ व्यवधायकं सैन्यं लोडपमान समन्ततः । सिंहापितमिश रम्ये पथा गजकुलं तथा ॥ ५ ॥ इतिश्री कर्णपर्वणि संकुलयुद्ध एकोनपंचाशोऽध्यायः । ४४। सम्जय उवाच 1. सामभिद्रवतो रष्ट्या पाण्डवास्नाषक बलम् । दुर्योधन महाराम वारयामास सर्पशः ॥ १ ॥ घोषांश्च स्वपलम्वैष समन्तात कोशतस्तव पुत्रस्य न स राजनथवा ॥ २ ॥ ततः परं प्रपक्षश्च सनिवार मौरलः । तदा सराखाः कुरषो भीममभ्यद्रवव्रणे ॥ ३ कोऽपि रदयात धाराष्ट्रान सगजकान् । मद्रराजमुवावेदं पाहि भीमर प्रति ॥ ४ ॥ एक धनुपाली चारों ओरसे ऐसे तिर बिर होकरमागी से कि वनमें सिंहसे पारित हाथियों के समूह व्याकुल होकर भागते हैं । ८५ ।। - अध्याय ॥५०॥ संजपचोले कि हेमहाराज आपकी सेना के सम्मुख दौड़नेवाले पांडवों को देखकर | दुर्योधनने सेनाको सब प्रकारसे रोका १ हे भरतर्षभ उस दुर्योधनने वढे शूरवीरों को और सेना को अनेक प्रकारसे रोकापरन्तु आपके पुत्रकेभी पुकारनेसे वइलांग नहीं लौटे २ तब उसके पीछे पक्ष मपक्ष समेत सौरलका पुत्रशकुनी और शखधानी कारण सदमें भीममेन सम्मुख गये ३ कर्णभी राजाओं समेत धृतराष्ट्र के पुत्रोंको देखकर मद राजासे यहखोला कितुम भीमसेनके रयके समीप चला ४ कर्णक इस बचनको सुनकर राना मगने ईसवर्ण के उत्तम घोड़ों को वहां पहुंचाया जहांकि भीमसेनया ५ bruken shield3, Weapons and armours, they flod asay in all directions as a herd of elephants runs away from bufora a 1:001, "05. CHAPTER L Sanaya said, "Sning the Pardavas attack tho Kaurar army, Duryodhad trieu his best, lo rally his forces, but they would not bear him. Then Shakuni the son or Bural, tog-ther with his army, faced Bhim. Sring the Kaurav warriors them, Karan too, said to the king of fadra," Let us go towards Bhim." Madra Jaughed at this - FOTO Kar Paray (6495) शुकणेन शो मद्राधिपस्तदा । हमवान हयाप्रथन् प्रधान कोदरः ॥ ५॥ ते येषिता महाराज शल्येनावशोभिना । भीमसेनरथं प्राप्य समसजन्त वाजिनः ॥६॥ एटमा कर्ण समाय न्तं भीमः क्रोधसमन्वितः । मति चक्र विनाशाय कर्णस्य भरत पंम ॥ ७ ॥ मोऽप्रीत सात्या पार पृष्टद्युम्नश्च पार्षतम् । यूपं रक्षत गमा पारमानं युधिष्ठिरम् ॥ ८ ॥ संशयास्महतो मुकं कथित प्रेक्षतो मम ॥ ९ ॥ हन्तास्मयप रणे फर्ण सा मां निहनिष्यति । संप्रामेण मुघोरेण सत्यम प्रीति ते १० ॥ रामानमा भवतां न्यासमूतं ददामि । ता संरक्षगे से यह विगतज्यपः ॥ ११ ॥ पत्रमुरा महावाप्रयादधेिराध प्रति। सिंहनादेन महता सा: समायधिशः ॥ १२॥ वा स्वस्तिमायान्तं भीम युद्धानिन्दिनम् । सूतपुत्र, मघोषाव मद्राणामीश्वरी विभुः ॥ १३ ॥ शल्य उवाच । पश्य कर्ण महायाएं सकुर राण्डुनन्दनम् । दीर्घकालाजित क्रोध मोकुकाम स्वयि ध्रुवम् ॥ १४ ॥ हे महाराज युद्धको शोभा देनेवाले कर्णक मेरित घोड़े भीमसेनके रपको पाकर | अच्छे मकारसेभिड़े ६ हे भरतर्षभ क्रोधयुक्त भीमसेनने कर्णको भाताहमा देखकर | उसके मारनेका उपाय विनारा • और वारसात्यांक औरघृष्टद्युम्नसे बोला कि धूम धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरकी रक्षाकरी ८ क्योंकि वह मुझको देखकर बड़े सन्देहको न करे ९ मैं तुमसे सस्यसत्य कहताहूं कि घोर युद्ध के द्वारा किती मेही कर्ण को पारंगा अथवा कर्ण मुझको मारेगा १० अमैं रामाको आपलोगों के सुपुर्द करता तुम सबलोग अनेक प्रकारमे उसकी रक्षाके उपाय को करो। ११ वह महावाहु | मिसेन इसप्रकार धृष्टद्युम्न से कहकर वह शब्द से सिंहनाद को करके दिशाओं को शन्दायमान करताहुभा कर्ण के रथकी और गया । १२ । इसके पीछे मद्दे. शियों का स्वामी समर्थ शल्य पृद्ध के चाहनेवाल शघ्रतापूर्वक मानेपाले भीमसेन को देखकर कर्ण से बोला । १३ । हे कर्ण इस अत्यन्त क्रोधयुक्त बहुतकाल से दवे हये क्रोधको तेरेऊपर निकालने की इच्छा वाले पांडुनन्दन भीमसेन को देखो।१४॥ हे कर्ण पन में मैंने अभिमन्यु और घटोत्कच के मरनेपर भी इसका इसप्रकार का aud drove the car tuwarda Barw. 5. The hot bed of halan took tho car straight towards that of Buitm. Bhim, enraged tos.s Karan's adyance towards him, thought of slaying him. Then he add183 sed braye Satyaki and Dhrish tadyumn, saying, "Protect kiug Yudhisb. thiſ well, so that he may not wory himself for my baka. Jahall fight bard with Karan and shall either slay bim or be slsia by him. 10, I coumit the king to your care and keeping." Having said this to Dhrisutadyumn, Bhim advanced towards laran, filling the directions with his cars. Then the lord of Madra, seeing Bbim advance, said to harap, Look at Bhim who is coming towards you, to discharge on you his long pent up fury, 1 DeFer elw Bhim so (6496) Iuhabbarat 1 ६४९६] . ईदृशं नास्य रूपं मे दृष्टपूर्व कदाचन । अभिमन्यौ हते कर्ण राक्षसे व घटोत्कचे ॥१५॥ त्रैलोक्यस्य समस्तस्यशदोनियारणाविमा यादर्श रूपंयुगाताग्निसमप्रभम् ! ॥१॥षमय उधाचाइति पति राधेयं मद्राणामीश्चरे नृप.अभ्यवर्चतधै फर्ण क्रोध दीप्तो वृकोदरः ॥ १७ ॥ तथागतन्तु समेक्ष्य भीम युखाभिनन्दिनम् । अमवाद्धचनं शल्य राधेयः प्रहसचिव ॥ १८ ॥ यदुक्त घननं मेऽद्य त्वया मदजनेचा । भीमसेन प्रति विमो तत् सत्य नात्र संशयः ॥ १९ ॥ एष शूरव धीरथ कोधनश्श पृकोदर निरपेक्षः शरीरे व प्राणतश्च चलाधिकः ॥ २० ॥ अज्ञातवास बसता विराटनगरे तदा । द्रोपद्याः प्रियकामेण केवलं पाहुसंश्रयात् ।। २१ ॥ गढसावं समाधित्य कीचकः सगणोदता ॥ २२ ॥ सोऽद्य संग्रामशिरास सनद्धः कोष रूप नहीं देखाथा जैसा कि अब देखने में आता है । १५ । यह क्रोधयुक्त तीनों लोकों के भी हटाने में समर्थ है इससमय इसने प्रलयकालकी अग्नि के समानदेदी- प्यमान अपने रूप को धारण किया है। १६१ संजय बोले हे राजा शल्यके इस प्रकारके कहतेही कहते में महाविकरालरूप भीमसेन कर्ण के सम्मुख वर्तमानमा । १७ । इससे पीछे हँसताहुआ कर्ण उस सम्मुख मायेहुपे भीपसने को देखकर शल्य से यह पचन वोला । १८ । हे मद्रदेश के स्वामी अब तुमने भीमसेनके विषय मे,जो वचन मुझसे कहा वह सत्य है इसमें सन्देह नहींह । १९ । यह भमिसेन बड़ा शूरवीर क्रोध में भरा शरीर से असादृश्य पराकामियों में भी अधिक परक्रमा॥२०॥ विराट नगर में गुप्त रहने वाली दौपदी के अभीप्ट चाहनेवाले ने केवल भुनवळकेही द्वारा । २१ । गुप्त उपाय त आधित और प्रवृत्त होकर कीचक को उसके सर समूहों समेत मारा, । २१ । अव कवचधारी क्रोध से व्याकुल यह भीमसेन दण्ड wrathful before, arcu at the time of the death of Abhimanyu aod Ghatothacl. 15. He is capable of upsetting the the worlds in his wrath. He is now burning in rage like the fire of pralaya." Sanjaya said, " While tho kiog of Mladia nas thus saying, Bhini approacbed Karan, Karın smiled at the sight of Bhim and said to tho king of Afadra, " Your opinion about Bhim was quito right. Surely, Bhim, the bravest of the brave, is full of wrath. For the sake of Draupadi, during his socret residenco at Viratnagar, he dostroyed Kichak and his party with the strength of his baro arnis alone. Protected by armour, syratlful Bhir is capable of encountering Death. It Las baca buy long cherished dosite that either 1.phould slay Arjun or ho should slay me. There is now orery probability of my desire being satished in tho unsuing fight with Bhi; for arjun is sure to come against we, it I ain citier slay Bhim or deprise him of the car. In either case rinil be n gnizer. You pusi do nor what is needfat." Onhunting है (६४९७) कर्णपर्व Karan Jaray (6197) मूञ्छितः । किं करोधतदण्डन् मृत्युनापि ब्रजेद्रणं ॥ २३ ॥ चिरकालामिलापतो ममायन्तु मनोरयः । अर्जुनं समरे हन्यां मांधा हनाधनञ्जयः स मे कदाचिदद्यैव भवेन्द्रीमसमागमात् ॥ २४ । निहते भीमसेने तु यदि वा विरथीकृते । अभियारयो मां पार्थस्तन्मसाधु भविष्यति । अव धनान्यसे प्रासं तच्छी संप्रधारय ॥ २५ ॥ पतच्छुत्या तु पचन गधेयस्यामितौजसः । उवाच यचनं शल्यः सतपत्र तथागता ॥ २६ ॥ अभियाहि महायादो भीमसेनं महाबलम् । निरस्य भीमसेनन्तु रात .सि फाल्गुनम् ॥ २७ ॥ यस्ते कामोऽभिलषिताश्चरात्पूभृति हृन्दतः । सर्वस पत्स्यते कर्ण सत्यमेतदवीमि ते ॥ २८ ॥ पमुकं ततः कर्ण शल्प पुनरभाषत ॥२९॥ हन्तार्जुनमहंतख्य मां वा हन्याद्धनन्जयः युद्ध मनः समाधाय याहि यत्र वृकोदरः ॥ ३० । सञ्जय उवाच । ततः प्रायाद्रथेनाशु शल्यस्तन विशाम्पते । यत्र भीमो महेष्वासो व्यद्रावयत वाहिनीम ॥ ३९ ॥ ततस्तूर्य निनादश्च धारी मृत्यु के संगभी युद्धकरने को समर्थ है ।२३ । फिर यह मेरे मनका अभिलाप बहुत कालस होरहा कि मैं युद्ध में अर्जुन को मारूं अथवा अर्जुन मुझेमारे । २४॥ वह मेरा प्रयोजन भीमसेनके लड़ने से कदाचित् अभी होजाय क्योंकि भीमसेनके मरनेपर अथवा विस्थ करनपर अर्जुन मेरे सम्मुख आवेगा यही मुझको झूठ लाभ दोगा, अब यहां जो उचित समझतेहो उसको शीघ्रत.से करो। २५ । बड़े तेजस्वी कर्ण के इस वचनको सुनकर शल्य कर्ण से वोला । २६ । कि हे महाबाहो तुत वढे पराक्रमी भीमसेनके सम्मुखचलोतुम भीमभेनको विजयकरके अर्जुनका पायोग।२७। जा तेरे चित्तका अभीष्ट बहुत कालसे हृदयमें वर्तमान है हे कर्ण वह अभीष्ट तेरा तुझको प्राप्तांगा इसमें मिथ्या न होगा । २८ ऐसा कहने पर फिर कर्ण शल्यसे घोला ।२९। कि मैं युद्ध में अर्जुन को मारूंगा वा वहमुझको मारेगातुम युद्ध में मन लगाकर वहांचलो जहां भीमसेनहैं । ३० । तव संजयनेकहा हे राजा फिर शल्य रथ के द्वारा वहां गया जहां बड़े धनुधारी भीमसेन ने भापकी सेना को भगायाथा 1.३१। हे राजेन्द्र इसके पीछे कर्ण और भीमसेन की सम्मुखता में तूरीऔर मेरा those words of glorious Karap, Shalya said, You may advance against Bhim, for atter conquering him you will see Arjan. You will be able to satisfy your long cherished desire." On hearing thir, Karan spoke again to Shalya, saying, * I shall either slay Arjun or ho will slay me. You must take me to the place where Bhim is." At this Shalya drove the car to the place s here Bhim had routed the Kauriy army. Drums and trumpets sounded at the time of Bhim's encounter with Karan: Then wrathful Bhim of great prowess routed the Kaurav arthy with his clean and sharp arrors. The encounter of Gäräd with'' Bbibf 'vasztery revere! . The Bhim rushed against [619313 Mahablarat ८ भेगणाप महारानः । उदातश्च राजेन्द्र कर्णभीम समागमे ॥ ३२ ॥ भीममेनोग्य सकुदस्सव सैन्यं दुमदम् । नाराविमलस्तीरोहिंशः प्रादायली ।। ३३ । स सत्रिपातस्तुनुलो घोररूपो घिरा माते ! आसोद्रोही महाराज कर्ण पाण्डयामधे । ३४ ॥ ततो महादजेन्द्र परिहा कर्णमावत तमापतम्त समयकों वैकर्सनो सृषः । भाजधान मुसकुरो नाराथन सनातरे।। ३५॥ पुननिममेयरमा र धारित । स षिदः सूतपुर्षण छादयामास पत्रिमिः विव्याध निशितैः कर्ण नयामतपमिः । ३६ ॥ तस्य कर्णो धनुमध्ये विधा बिच्छेद पात्रमिः अयन डिजधावाने प्रत्ययिष्यत् समान्तरे । नारावेन सतीक्ष्णेन सर्यावरणभदिना ॥३॥ सोऽन्यत् कामुकमादाय सूतपुत्रं वृकोदरः । राजन्म महो षिव्याध निशितः शेरेः ॥ १८ ॥ ननाद बसपाद कम्पयनिय मेदिनीम ॥ ३१ ॥ तं कर्णः पन्च आदि बानों के शब्द होनेलगे. ३९॥ तदनन्तर अत्यन्त क्रोधयुक्त पराक्रमी भीम- सन ने उसकी महागुर्जप सेनाको साफ और तीक्ष्ण नाराचों से दिशामों में भगादिया ! २३ । हे महाराज धृतराष्ट्र इसके पीछे भीरसेन और कर्ण का महा भकारी कठिन रोमहर्षण युद्ध हुमा ।।४। इसके पीछे एक क्षणमात्र में ही भीमसेन कर्ण की भोर दौड़ा फिर मूर्य के पुत्र धर्मात्मा कर्ण ने उस भातेहुये भीमोनको देखकर न्यन्त कोधित होकर छातीपर घायल किया । ३५ । और बाणों की वर्षा से दकदिया कर्ण के ह.यो भीमसेन ने भी कर्णको बाणों से ढककर टेटे पवाल नी वाणों से देह में घायल किया। १६ । फिर कर्णनेवाणों में उसके धनुपको दो स्थानों से काटकर अत्यन्त तीक्ष्ण सब प्रकार के कवनों के काटने वाले नाराच से उसकी छाती का घायल किया। फिर माँ के जानने वाले उम भोमरेन ने दूसरे यारो लेकर क्ष्य वाणों से कर्णको मर्म स्थलों में घायल किया । ३८ र पृषी वा आकाश को कंपायमान करताहुमा महा घोर शब्दको गर्म । ११ फिर गैने उसको पच्चीस नाराचोसे ऐसे घायल किया जैसे कि वनमें मचाले दाधीको उरकाओं से घायल करते हैं। ४० । इसके Karao, Soeing Bliima advance towards uin, Kaian the son of Surys, much Onraged, wounded him on the broast, covering him with his atrowe, Wounded by Karao's arrows, Bum cufetud him with the Aight of his ariuws and woundai him with aina arrowe, Thou Karan cut down his box ut two places and piercing his armour with hard | urrows, wounded him wpain on the broast. Bhim took up smother bow and suundu bru ia tho rial parts, Tbeo with his oar be sbook the earth. Then Kaian wounded bin with twenty fivo arrows as they wound ab ek puant with sparks of fire. Wounded with arrows, with eyes red in arger, Bhim wisbinsy to destroy bio, jut ad astui to bio low .
- कर्णपर्ष Karati larv 8499 विस्या नागचानां समापयत् । मदकट बने समलकाभिरिष कुम्जाम् ॥ १० ॥ मतः सायकभिभाः पाण्यः क्रोधमाहितः । सरमा माताम्राक्ष मतपत्रवधप्स या ४१ स कार्मुके महायगं मारसाधनमुत्तमम निर्णणामरि भतार सापक समयोजयत् ॥ ४२ ॥ विलय बलपचाप माकर्णादति मारनिः तं मुणेष महास: रणजियांसया ॥४३॥ स विषपोषलरता बाणो बजाशनिस्वनः । मदारपद्रण क बनगो यापलम् ॥ ४५ ॥ समीमसनामिहतः मनपुत्रः कुरुवह । निषाद रयोग विसंशः पृतनापतिः ॥ ५॥ ततो महाधिपो र विसंबं मूतनचनम अगा पाररयेनाजी कर्णमाइशोभनम् ॥ ४६॥ ततः पराजि कणे धारा महाचमूम भ्यासपीमसेनो पेन्द्रोशानधान् पुरा ॥ ५७ इति कर्ण पर्वणि कर्प-पयान पनाशोध्यायः ॥ ५० ॥ पीछे गायकों से पायल शीर कोषो माकुल कोध और ईपी से लाल नेत्र करके उसके मारनेकी इछासे भीमसेन ने । ४१ । बडे मारवाही पर्वतों के भोछेदेनेवाने | उग्रवाणको धनुपर्ने चटापा । ४२ घर बड़े धनुपधारी वेगान वायुपुत्र भीपमनने कर्णके मारने की मसिनापा से कर्ण पर्यन्त धनुषको बैंचकर वह वाण चलाया 1.४३ । पराक्रमी भीमसेन के पथसे छूटे हुए वन और विनती के सपान शब्दाय मान उस प्रवल वाणसे युद्ध में कर्ण को घायल किया जो कि बकाया पर्वतको व्याकुल करके घायल करता है । ४४ । हे कौरव्य. वह सेनापति कर्ण भीमसनेक हाथ पापल पार भरत होकर रसके बैठनकेस्थ न पर गिरपड़ा । ४५ । तरतो राजा पद्रकर्ण को अचेत दखकर युद्ध में शोभादेनेवाले कर्ण को पद्धभूम मे दूरलंग- या । ४६ । इसके पीछे कर्ण के विजय हनेपर भीमसेन ने दुर्योधनकी बदी सेना को ऐसा भगाया जैसे कि पूर्वकाल में इन्द्र ने दानों को भगाया था । ४७ । that could pierce even mountain, and d...wing his bww wibe ear, in order to slay Karan, he shot that arrow at him lightning, the arrow discharged from the mighty buw, wounded liim as lightning pierces through a mountain. Wounded by Bhim, Karan the commander of armies swooned and fell down on his seat in the car. Seeing Karan senselex, the king of Hadra took him far away frou the field of dattle. Thes at the defeat of Karan, Blim routed the Panday army as India bad done the Danayak 47, 8 not like vajra or 1.6500] Diahaldharat । . धृतराष्ट्र उवाच । सुदुप्यामिद कम हंत भोमेन सजय । येन कणे महापाहरणे पस्थ निपातितः ॥ ॥ कधकोरणे दन्ता पांडधान सृञ्जयः सह । इति दुर्योधनः सूतप्रामवान्मा मुहमहुः ॥२॥ पराजितन्तु राधेयं एष्ट्वा भीमेन संयुगे । ततः परं किम कारात पुत्रा दुयोधना मम ॥ ३॥ सञ्जय उवाय विमुख प्रेक्ष्य राधेय सूतपुत्र महाहवे पुत्रस्तष महाराज सोउन् समभापत ५|| शोध गच्छत मधो राधेयं परिरक्षत । भीमसेनमयागाधे मजन्त व्यसनाव ॥ ५॥ तेतुराजा समादिया भीमसेन जियांस प: । अभयवर्तन्त सद्धाः पतङ्गाः पावकं यथा ॥ ६ ॥ श्रुतवान्दुर्द्धर; फ्रायो चियिाम र्षिकठः समः । निषङ्गी फवची पाशी तथा नन्दोपनन्दको ॥ ७॥ दुष्प्रधर्षःसुधाश्च. घातपंगसुवर्णसी। धनुाहो दुर्मदश्च जलसन्धः शलः सहः ॥ ८॥ एतरयः परिश्ता धीर्यवन्ती महायला । भीमसेनं समासाद्य समन्तात् पर्यवारयन् ॥९॥ तव्यमुम्चन् अध्याल । ५१। धृतराध बोले हे संजय भीमसेन ने यह अत्यन्त कठिन कर्मकिया जिसने अपने हाथसे कर्णको रथके स्थान में अचेत करके गिराया । १ अकेला कर्णयुद्धीमान यो सतेत सब पाण्डवों को मारेगा हे संजय यहवात वराम्बार मुझसे दुरपोधन ने कही है । २ । युद्धमें भीमसेन के हायसे विजय कियेहुये कर्णको देखकर मेरे पुत्र दुर्योधन ने क्या किया। ३ । संजयनेकहा हे महाराज युद्धमें भापकापुत्र कर्णको मुखमाउनेवाला देखकर अपने भाइयों से बोला कि। ४ । तुम्हारा भलाहो तुम शीघजाकर भीमसेन के महाकप्टरूपी अथाह समुद्रमें डूबेहुयेकर्ण की सवओर से रक्षाकरो। ५ । राजाकी आज्ञापातेही वह सबलोग महाकोधायुक्त होकर, भीमसेन के.सम्मुख ऐसे हुये जैसे कि अग्नि के सम्मुख पृतन होते हैं। ६ । श्रृंतवान, दुर्दर, काय, विवित्स, विकट, सम, नियंगी, कवची, पाशी, नन्दा अपनन्द ।। दुष्पधर्प सुबाहु, वाणेवग, सुवर्चसा धनुग्रीह, दुर्मद जलसंध, शल, CHAPTER LI Dhritrasbtra said," Bbim did a brave deed in as much as he made Karan senseless, , 1 bave often been told by Duryodhan that Karou will slay the Pandavas and Srinjayas. What did Duryodban do when Karan was made insensible by Bhim ? " Sanjaya said, " Seeing Karan tura back,, Duryodban said to his brotbers, " Protect Karan from Bhim, may you be blessed !". By the order of the king, they faced Bhim in great anger as insects fall in five. Shratvan, Dundhar, Krath, Vivitsu, Vikat, Sam, Nishangi, Kabachi, Pashi, Nand, Upnand, Dushpradharsh, Surahu, Vatveg Suvarches, Dhanurgrah, Durmad, Jalsandb, Shal and Sah, the sons of Dhritrashtra surrounded Bhim on all sides and attacked bin with Mighty Bhim, wounded by their arrows, slew five hundred of their रा arrors.
- गणपE Karan Pare (63011 माता नानालिङ्गान् समन्ततः ॥ १० ॥ स तैरन्यईपमानस्तु मीमसनो महासः | तेषामाaat क्षिप्रं पुत्राणी ठे जनाधिप । रयः पञ्चशतः सार्स- पञ्चाशदहनयान ॥ ११॥ विवित्सोस्तु बतायो मनापहरीच्छरः। भीमसनो महाराज पपात वतोमुवि ॥ १२॥ स कुण्डलशिरस्त्राणं पूर्णचन्द्रोपमं तदा । तं दृष्ट्वा निहतं भूर मातर : ममो ॥१३॥ मययन्त समरे भीमं भीमपराक्रममdasural भवाम्यो पत्रयोले महाहवे। जहार समरे प्राणार भीमो भीमपराक्रमः ॥१५॥ अपमम्तो पातकनधिय प्रमो । विकटश्च सहयोमी देवपुत्रोपमो नृप ॥ १५ ॥ तवस्तु त्वरितोभीमः प्राधानन्ये पमक्षयम् । नाराचेन सुतीक्ष्णेनसातोभ्यरतभूपि१५॥ हाहाकारनंतस्तीमः सम्बभूय जनश्पर । यध्यमानेपु पारेषु तपपुत्रेषु घन्धिपु ॥१७॥ सह, इनमहापराक्रमी रयोंसे रक्षित धृतराष्ट्रके पुत्रों ने भीमसेन को पाकर चारों ओर से घेरालिया । ९ । और नानाप्रकार के रूपराले वाण समुहों को चारोंऔर से फेंका । १०। फिर महाबली भीमसेन ने उनके हाथसे पीडामान होकर उन आते हुये आपके पुत्रों के पांचसो रयों समेत पचास रथियों को मारा ।११। इसके पाछे फिर क्रोधयुक्त भीमसेन ने मल्लसे विवित्स के शिरको देहसे जुदाकिया और वह मरकर पृथ्वीपर गिरपड़ी । १२ । पूर्णचन्द्रमा के समान कुण्डलभी उसके शिर के साथही गिरा हे राजा तवतो उसके सबभाई उस शूरवीर अपने भाईको मरा हुआ देखकर । १३ । युद्धमें भयानक पराक्रमी भीमसेन के सम्मुख गये इसके भनन्तर उस भयानक भीमसेन ने उस महायुद्ध में दूसरे दो भल्लों से आपके दोपुत्रों के माणोंका.हरणकिया । १४ । हे राजा हवासे टूटेहुये वृक्षों के समान देवकुमारों के समान वह विकट और सहनाम दोनों भाई भी मरकर पृथ्वीपर गिरपड़े । १५ । इसके पछि शीघ्रता करनेवाले भीमसेन ने कायकोभी यमलोक में पहुँचाया भत्पन्त तीक्ष्ण नारावफा माराहुआ वह काय पृथ्वीपर गिरपड़ा। १६ । तर तो महाकठिन हाहाकार उत्पन्न हुआ आपके धनुषधारी बार बेटोंके मरने और उनकी सेना के चलायमान होनेपर फिर महाबली भीमसेन ने युद्ध में नन्द उपनन्द को यमलोक में warriors and destroyed filty cars. Enraged. Bbim cut off tho, head of Vivitsu and made him fall down dead on the ground. His earrings, like the full moon, fell down with his head. His brothers, seeing him dand, faced Bhimsen. The latter then cut down the heads of your two sons, Vikat and Sah who fell dowa like crees struck by the wind 15. Ho then sent Grath too, to the region of Yam, Then there was a great alarm, raised at the death of your 8002 Again he Bleur Nand and Uppand. Then your sons fled at the sight of the dreadful form of Bhia. Karan was much griored at the death of your song and drovo his swan like borses towards his car. The forses (6502) Mahabharat तेषां सळुलिते सन्ये पुनर्भीमो महाबलः । नन्दोपनन्दी समरे प्रेषयामसाइनम् ॥१६ ततस्ते प्राद्धन् भोताः पुत्रास्ते विद्वलोकृताः। भीमसेन रणे हष्ट्वा कालान्तरमो पमम् ॥ १९ ॥ पुत्रांस्ते निहतान् एष्ट्या मतपुत्रः सुदुमनाः । इसवर्णान स्यानु ममः प्रारिणो धर पाण्डवः ॥ २०॥ ते प्रेषिता महाराज नद्रराजेन पाजिनः । भीमसेमरण माप्य समसजन्त गिताः ॥ २१ ५स सन्निपातस्तुमुलो घोररूपो विशाम्पते। मासी द्रौद्रो महाराज कर्णपाण्डवयोमुचे॥ २२ ॥ दृष्ट्वा मम महाराज तो समेवो महारको मासीवुवः कथं युरमेतदद्य भविष्यति ॥ २३॥ ततो भीमो रसलाधी अध्यामास | पत्रिभिः। कर्णरणे महायज पुत्राणां तव पश्यताम् ॥ २५ १ ततः कर्णो भंग कुयो भीम मीमरायसः। विम्याघ परमारतो भलैः सनतपर्वभिः ॥ २५ भाइत: स महावादीमो भीमपराकमः । माकपूर्णविशिः कर्ण विव्याध सप्तभिः ॥ २६ ॥ तो महाराज माशीविष व श्वसन् । शरवण महता अदयामास पाहम ॥ २७॥ भीमोऽपित धरणावादयित्वा महारथम् । पश्यता कारयाण घिममार पहुंचाया । १८ । उसके पीछे वह आपके पुत्र भयभीत और व्याकुल युद्धमें काल रूप मीमसेन को देखकर भागे । १९ । फिर बड़े दुःखी कर्ण ने आपके पुत्रों को मराहुमा देखकर फिर हंसवर्ण घोड़ोंको वहाही चलाया जहां पांडव भीमसेन था । २० । हे महाराज राजामदके चलाये हुये.पंह वेगवान घोड़े भीमसेन के रसको पाकर अच्छीरीति से.भिड़े । २१ । हे राजा धृतराष्ट्र युद्धमें कर्ण और पांच भीमसनका वह युद्धमहाकठिन घोररूप रुधिरका उत्पन्न करनेवाला हुमा । २२ ॥ फिर उन भिड़े हुये महारधियों को देखकर मैंने विचार किया कि यह युद्ध कस होगा । २३ । इसके पीछे युद्धमें प्रशंसनीय भीमसेन ने वाणों से कर्णको भाप: पुत्रों के देखते हुये ढकदिया । २४ । फिर अत्यन्त झोपयुक्त असों के माननवाल कर्ण ने भी भीमसेनको टेटे पर्ववाले नौ भल्लों से पीडामान किया । २५ । क्व | उस घायळ मावाहु भयानक पराक्रमी भीमसेनने कानतक बँचे ये सात विशिखों से कर्णको पालामान किया । २६॥ हे महाराज इसके पाछे विपले सर्पकी। समान श्वास लेनेवाले कर्ण ने वाणोंकी बड़ी,वर्षा से भमिसनको दकदिया। १२७ 2 driven by the king of Badia, took him well up to the car of Phim. Then the hostle betrex tbass two varias ver extrowy srandal. Seeing their fight I wondered what the result would be. Bhim lid Karan with his arrows in the presence of your song Karan too, wound. od Bhin with his arrows.25. Bhim, much wounded, drew hia bow Lotho ear, and wounded Karan with saren darts. Sighing likoa serpont, Karan hid Bhim with tho flights of bis arrowa Bhim too, hid him with his arrows and moarod in the presence of tho Kaurave, - (६५०३) कर्णपर्व Karun Paray (6503) महायला ॥ २८ ॥ ततः फर्णो मृशं नो हदमादाय कामुकम् । भीमं विम्माष शनिः कडूपरेः शिलाशितः ।। २९ । फार्मुफम्चास्य विरुद भबन निशिवेन ॥ ३० ॥ ततो भीमो महायामपट्टपरिष्कृतम् । परिधं घोरमादाय मत्यु दण्टीमवापरम । कस्य निधनाकाक्षी चिक्षेपातियलोनयन् ॥ ३१ ॥ ठमापात परिषं पनाशनिसमस्यनम् चिद पहुचा कर्णः शरराशीपिपोपमः ॥ ३२॥ म: फाफमादाय भीमो बदतरं तदा। दयामास घिशिख:कण परपलाईनः ॥ ३३ ॥ वतो युबमममियोर फर्णपापवयोगधे । हरीन्द्रपोरिप गुहुः परस्परयषिणी: ॥ ३४॥ ततः कणों महाराज भीमसन त्रिभिः शरैः। माकणमूलं पिम्पाघ दमायम्ब कामुकम्॥ ३४ ॥ सोऽतिषियो मरेप्यासः फर्णन पलिनाम्यरः। घोरमावत विशिष फायविदारणम् ॥ १६ ॥ तस्य सिया तनुत्राणं भित्या कायश्च सायकः । फिर महावली भागसेन ने भी अपने वाणोंकी दृष्टि से उस कर्णको टकादिया और कौरवों के देखतहुधे गर्छ । २८ । इसके पीछे अत्यन्त क्रोधयुक्त कर्णने रदयनुपको लेकर तीक्ष्णधारवाळे दशवाणों से भीमसेन को पीडामान करके तीक्ष्णधारवाने भल्लसे उसके धनुपको काटा । १० । इसके पीछे पड़े पराक्रमी पहावाहु कर्ण के मारने की इच्छा गर्जना करतेहुये भीमसेन ने सुवर्ण वनों से अलंकृत कालदया के समान घोर परिघ को लेकर फेंका कर्णने उस बन भीर पिजली के समान आते हुये परिधको विपैले सों की समान पाणों से टुकड़े करदिया । ३२ । तरतो शत्रुसंतापी भीमसेन ने बहुत बड़े दृढ़ धनुप को लेकर कर्ण को मारे वाणोंकामाछा दित करदिया । ३३ । उसके पाछे कर्ण और भीमसेन का ऐसा घोरपद हुआ जैसे कि परसार मारनेकी इच्छाकरने वाले महावली सिंहोंके रानाभों का युद्ध वारंपार होता है ।१॥ हे महाराज इसके पीछे कर्ण ने हद धनुपको चढ़ाकर सान माणसे भीमसनका कर्ण मूळपर घायल किया ॥३५॥ कणके हायसे अस्पात घायल महावली भीमसेन ने कर्णके शरीरको छदनेवाले घोर विशिखको हायमें लेकर फेंका यह वाण | उस कर्णक करच में घुस शरीरको छेदकर पृथीम ऐसा समागया जैसे कि सर्पयामी Ther karun, wuch enraged, wounded him with ten darts and cut his how.30. Then desiring to alay mighty Karan, Bhim with a roar, burled at him a dreadful club, dakol with tho cloth of gold, like tho staff of Yam; but Karan cut it dowo into pieces with his serpent liko arrows, Bhim tho destroyer of focs then look up a hard box and asured Karan willi arrowr. Then Karan and Blim fought drcad. fully like two kings of lions Karan wounded his adressary with three hard arrows 31. Wounded ly Koran, nighty Bhimsen tok up a dart and buried it at bim. It piciord karan's body and catered tha grund as a urant enteas an ant-hill. Pierred by that dart, ३ (6504] Mabal barab (६५०४ प्राधियरणीयजन् पल्मीकमि पन्नगः ॥ ३७ ॥ सतेनातिप्रहारेण व्ययिता विलनिषा साचपाल रथे कर्णः क्षितिकम्मे पयाचलः ॥ ३८ ॥ ततः कर्णो महा राम रोषामर्षसमन्वितः। मीम तं पञ्चविंशत्या नायचाना समापयत् ॥ ३१॥ भाषने बहुभिषाणेच अमेफेषुणा इनत् । सारथिशास्य भछन प्रेशयामास मृत्यो ॥ ४० ॥ जिया च कार्मुक तूण पाण्डवस्याशु पत्रिणा | घिरप भीम कमाण भीम कर्णश्वकारद કર विरयो भरतश्रेष्ठ प्रहसमा निलोपमः गर्दा गृध महाषाहरपतत् स्पन्दमोचमात् ॥ अवप्लुस्प तु' बेगेन तव सैन्य विशम्पत । व्ययमद्दया भामः शरमेघानिया निलः ॥४४॥ नागान् सप्तराताप्राजश्रीपादन्तान प्रहारिण । म्यधमत् सासा भीमः करम्पः परन्तपः ॥ ४५ ॥ दन्तषेष्टपु नेत्रेषु कुम्भपु व कटेपुष मर्मस्थापित में समांजाता है । १७ । उत्त कटिनय तसे महापीडित ब्याकुल और अंचतके समान वह कर्ण रथपर ऐसा कंपित हुआ जैसे कि पृथ्वी के भूकम्प में पर्चत हिलता है 1 ३८॥ हे महाराज इसके पीछे क्रोध और व्याकुलता से रहित कर्णने भीतसेनको पच्चीस नाराचों से घायल किया।१९। और भनेक वाणोंस देहको घायलकरके एक | वाणसे घनाको काटाभोर भल्लसे उसके सारथीको कालके क्शाकया।४। और शीघही वाणवाणोंसे उसके धनुपको काटकर इसतेहुये कर्णने एकमुहूर्तमें सावधानी से भपकारी कर्म करनेवाले भीमसेनको रथसे विस्य करीदया । ४२॥ हे भातर्षभ वह वायुके समान रथसे विहीन हँसताहुआ महावाहु · भीमसेन गदाकोलेकर उस उचम रथजूदा । ४३ । और बड़े घेगले दौड़कर भीमसेन ने आपकी सेडाको उस गंदासे ऐसा तिरीपर करदिया जैसे कि बादलों को बाय छिन्नभिन्न करदेताहै ४४ फिर उस भयानकरूप शत्रुसंतापी मापसेन ने ईपाके समान दातरखने वाले यात सातसौ हाथियों को भी छिन्नभिन्न करके। ४५ । बडे पराक्रम से उन हाथियों के जावड़े आंख मस्तक कमर और मर्मस्थलों को घायलीकया । ४६ । इसके पीछे सब हायी भयभीत होकर भागे और फिर शत्रुओंकी मोर से भेजय अन्य सवारों Karan shook like & mountain during an earthquake. Sluch çnroged and without confusion, he wounded Bhim with twenty fiva arrows and cut the banner and slevy the driver with one atroy each.10. Then having cat bis bow with a sharp arrow, with a smile, he took to deprive him of bis car. Destitute of the car, Bbim frea tiku thu vind, jumped dowa taca in hand and with it began routing your army as the wind disnerus the clouds Dreadful Bhinaku tha destroyer of foos dispersed soven kundred eleplaatsvspd Founded theio on the jaws, eyes, head, back and vital parts.45. Then care (६५०५) 098 Karon l'ary 13505) ममबस्तानागानहनद्वली ॥ ४६ ॥ ततस्ते प्राद्धन् भीताः प्रतीपं प्रहिताः पुनः महामात्रै स्तमापधुर्मेधा प दिधाकरम् । ४७ ॥ तान् स सप्तशतान् गगान साराहायुघंकतनान् भूमिहो गयाने घणेन्द्र पचालान ॥ ४८ ॥ ततः सुघलपुत्राय नागानतिषलान पुमः पोथयामास कौन्तेपो द्वापश्चाशदरिदमः ॥ ५९ ॥ तथा ग्धशत सानं पींधशतसोऽपरान् । न्यानत् पाण्डयो युये तापयंम्तष घाहिनीम ॥ ५० ॥ प्रताप्यमान सूर्येण भीमेन च महात्मना । तय से सचुकांच धानाधरित या ॥ ५१ ५ ते भीमभयसम्प्रस्तास्तयका भरमा विष्ठाय समरे म दुयु दिणे दश ॥ ५२ ॥ रथाः पञ्चशताधाम्पे झानिमश्च मधर्मिणः । भीममध्यद्रघन नम्तः शरपूगः समन्ततः. ॥ ५३ ॥ तान समतरथान धीरान सपताकाध्यायुधान् । पोषपामास गदया मीमो विष्णुरिघामुरान् ॥ ५४॥ ततः शकुनिनिर्दिष्ट: सादिनाः समेत हाथियों ने उसको ऐसा घेरलिया जैसे कि मूर्यको वादल घालता है ।४७॥ फिर उस पृथ्वीपर नियतने उन सातसा हापियोंको भी सवारशस्त्र और ध्वनामों समेत ऐसा मारा जैसे कि इन्द्र वजूस पाड़ोंको मारताहै ॥ ४८ । इसकेपीछे शत्रुओंके विजयी भीमसेन ने शकुनी के बड़े पराक्रमी वावन हाथियों को फिर पारा । ४९ । इसीप्रकार मापकी सेनाको कंपयामान करतहुये पापहव भीमसेन ने एकसौसे अधिक स्थ भार हजारों पतियोंको मारा ॥ ५० ॥ तब भापकी सेना महात्मा भीमसेनकपी मूर्यसे संतप्तहोकर ऐरुमखगई जैसे आगसेचमड़ा ॥५१॥ हे भरतर्षभ भीमसेन के भयसे भापके शूरवीर भयभीत होकर युद्ध में भीमसेनको छोड़कर दशदिशाओं को भागे ॥ ५२ ।। तव शन्द करनेवाले चर्म के कवचधारी अन्य पांचसो स्य रघियासमेत भीमसेनपर चारों भोरसे पाणोंकी वर्षाकरताये सम्मुख भापे । ५।। भीमसेनने उन पांचसौ रथसमेत वारों को भी ध्वना पताकाओं समेत अपनी गदासे ऐसा मारा जैस कि अमुरोंको विष्णु भगवान मारते हैं। ६ Thus shaking they fled in terror. Other elephante, sent by the enemy, surrounded Bhim as the clouds hido the Suo, but he soon put them to death as Indra breaks through mountains with vajra. Then Bhim the dostroger of foes destroyed 6fty two elephants of the enemy. your army, Bbim the Panday destroyed more than a bandred car warriors and thousaade of foot. Your army was scorched by the Sun of Bhim as leather by fire. Torrified by Bbim, your warriors van in all directions. 52. Then came to him fire hundred warrior protected by leathero armour, and shooting arrons at Bhim; but they too, well destroyed by Bbim's maco As Asun are destroyed by Visbou. Then the followers of Shsluni, arried wild darts and Stardi threw thousand in aumler, faad Bhim and were destroyed bs bom 1 6506 ] Mintablerat - बारसम्मताः । त्रिसहसास्पयुभी शफ्त्यष्टिगपाणयः ॥ ५५ ॥ प्रत्युदभ्य जरे नाशुसाश्वारोहांस्नदारिता वियि चान विचरमाग गया समपाययत् ।। ५६ . पामासीन्महाशब्दाताडितानाच सर्वशः। अश्मभिध्यमानानां नागानामिव भारत ॥ ५७.॥ एवं पलपत्रपत्रिसाहन्नान योत्तमान् । हत्वान्य रथमास्थाय को राधेयमाश्यात् ॥ ५८ ॥ कर्णोऽपि समरे राजन् धर्मपुत्र मरिदमम् । स शापवाद यामास सारथिम्चाप्यपातयत् ॥ ५९ ॥ ततः स प्रती सोपे रथ इप्पा मारण मन्यधावत् फिरत्यापैः फटूपत्रैरजिमगः ॥ ६० ॥ राजानमाभिधायन्ते पर वृत्परोदसी । द्रः प्राच्छादयामास शरजालेन मारुमिः ॥ ६१ ॥ संनियूचात्तात यता राधेयः शत्रुकर्षणः । भीम प्रच्छादयामास समन्तानिशितैः शरैः ॥ ६२ भीमसेनग्थम्ब कण भारत सात्यकिः । अस्पईयदपात्मा पार्णि प्राणकारणात इसके पीछे शकुनाक भाज्ञावर्ती शुरोंके अंगीकृत शक्ति दुधारे खड्ग और मासोंके हायमें रखनेवाले तीनहजार भश्वसवार भीमसेनके सम्मुखगये । ५५ ॥ तव शत्रुहन्दा भीमसेनने नानाकार के मागों, घुमघूमकर शीघही सम्मुख जाकर बड़े वेग पूर्वक गदासे मन मश्वसवारोंको भी मारा । ५६ । हे भरतवंशी तब तो उन सब घायलोंके ऐसे शब्द मकटहुये जैसे कि पत्थरों से घायलहुये साथियों के शब्द होने । ५७ । इसरीति से शकुनीके तीनोहजार भन्नारूढीको मारकर दूसरेरयमें सवार हो क्रोधयुक्त भीमन कर्ण के सम्मुखगया। ५८, । वहाँ उस कर्णनेभी शत्रुविजयी धर्मपुत्र युधिष्टिर को वाणों से ढककर सारथी को स्पसे गिराया। ५५ । इसके पीछे वह महारथी युद्धम सारथीसे रहित स्थको देखकर भागा और कर्म कंत्रपक्षों से जटिव सीचे वाणोंको मारताहुआ उसके पीछेचला । ६० । वायुके पुत्र भोमसेन ने राजाकी भोर मानेवाले कर्ण को देखकर अपने नाणमालों से ढकीदमा दिया फिर वाणों से पृथी आकाश को ढककर.शत्रुओं का विजय करनेवाला कर्ण बहुत शीघ्रलोटा और तोष्णवाणों से भीमसेनको सब ओरसे ढकादया ।१२। इस के पीछे के राजा वह धनुपधारी सात्यकि ने पीछे होने के कारण भीमसनके स्य से व्याकुल कर्णको पीडामान किया । ६३ । कार्णोसे अत्यन्त पाडेत कर्णभी उस के सम्मुख वर्तमानहुआ फिर सब धनुपधारियों में श्रेष्ठ वह दोनों वीर सम्मुखड़ो They cried like elephants bit with stones. Having slain the horsomen of Slakuni, Bhiin mounted another car and faced Karan. Karaa hid him with arraws and slew tbe driver of bis car, Withouts driver, Bhim ran away in his ar nod wus chased by Karap' arrasts. GO. Seeing Karan advance towards the king. Bbim covered bim with bis arrows. Kuran tiro, spread bis arros, in all diroctions and bid Bhim. Then Satyaki, seeing Bhia touch arlicted, woundod Karan with his arrows. Though wuch nounded Karan faced him. Then [६५०७) कर्णपर्व Kar Paray (6507) ॥ ॥ मध्यवर्सत फर्गस्तमाईतोऽपि शशम् ॥ ६४ ॥ तावन्योऽन्य समासाच वृषभो सर्वधग्विनाम् ॥ ६५ ॥ विसृजन्ती शसंविधान विभ्राजेता मनस्विनी ताभ्यां पियति राजेन्द्र विततं भीमदर्शनम काञ्चपृष्टारुणं रोद्र धाण बाल म्याश्यतं ॥ ६५ ॥ नेघ मयंप्रभा राजन् म दिशः प्रदिशस्तथा । प्राशा सिम्म पये ते पाशामुक्तः साशः ॥ ६६ ॥ मध्यान्हे तपतो राजन् भास्क रस्य महाप्रमाः ।। ६७ ॥ हा सर्वाः शरीयस्तैः कर्णपाण्ययोनदा । सीपल कृतवाण द्रणिमाधिरयि छपम् ॥ ६८ ससकार पाण्डरष्ट्वा निवृत्ता कुरषः पुनः । तेषामापतता शब्दस्तीत पासीविशाम्पते ॥ ६९ ॥ उम्दृशाना पथा घृष्ट्या सागराणां भयापहः । ते संम भृशसंसक दृष्ट्यान्योऽन्यं ममाह। कर युद्ध करनेलगे और हरएकने परस्पर में चौसठ २ घाण छोडे उन वाणों के छोरते में वह दोनों वीर अत्यन्त शोभित हुये हे राजा उन दोनों का फैलाया हुभा भयकारी मदनकरनेवाला रुद्र वाण जाल क्रौंचकी पुच्छके समान रक्त वर्ण दिखाई | दिषा । ६५ । फिर छोड़े हुये हजारों वाणों के कारणसे हमने और उन सब लोगों |ने सूर्यकोनहीं देखा और दिशाओं को ऐसे नहीं पाईचाना जैसे कि मध्याहून के समय तेजस्वी मूर्य के कारण दिशाओंका ज्ञान नर्स होता है । ६७ । उस समय कण और भीमसेन के वाण समूहों से हटापेहुपे शकुनी अश्वात्मा कृतवर्मा और भपिरथी पाचार्य । ६८ । यह सब कर्णको पाण्डवों से भिड़ाहुआ देखकर फिर लौटे हे राजा उन भानेवाले वारों के ऐसे बड़े कठोर शब्दहुये । ६९ । जैसे कि चन्द्र के उदय से उठेहुये महासमुद्रों के शब्द होते हैं वह दोनों सेना उस महा पद में परस्पर अच्छप्रकारसे देखकर खूबलड़ी और परस्परमें एक एकको घेरकर बड़ी मसभहुई ! ७० । इसके पीछे मध्याह्न के समय मूर्य के वर्तमान होनेपर। पुद नारीहुआ ऐसा युद्ध पूर्व में कभी देखाथा न सुना था। ७१ । फिर सेनाक समूह दूसरीसेना के समूहोंको पाकरतीबतासे ऐसे सम्मुख गये जैसे कि जोकसमूह the two bost of archers fought hard and each wounded the other with sixty four arrows. They looked very glorious in fighting and the flights of their artoks Jooked like those of Krounch birds with red tails 65. The Sun and the directions Foro kid with their arrows: we could not know tbo points of the compass as at mid-day. Then Shakuni, Ashwatbama, Krit varma and Kripacharya seeing, Karan fight with the Pandavus camo back and faced Bhim with flights of arrots. Then there was a uoise like that of the Ocean at the full moon. The two sides fought woll and wore much pleased at the prospect of Victory.70. The battle began at noon and was so serere as we bad (6508) Mahabharat हक महता युक्त परिगृह्य परस्परम ॥ ततःप्रवृते युरमा प्रासे दिखाकरे ।। पाहन कदाचिधि टपूर्व न च भ्रतम् ॥ ७॥ बलीयस्तु समा साए पलोध सहला रणे। उपासर्पत बेगेन वायाध इव सागरम ।। ७२ ॥ मासी निनादः सुमहान पलोधानां परस्परम् । गर्जता सागरीधान पथा स्थाविस्वनी महात् ॥ १॥ सेतु सैने समासाद्य धेगवत्यो परारम | एकीभाषमनुप्रा नद्यापित समागते ॥ ७४ ॥ ततः प्रवते युद्ध घोर भयानकमा कुरणां पाण्डवाना लिप्सता सुमा ७५ ॥ शूराणा गत पिछदवा गिराध्यन्ते विविधाराज म्नामान्युरिट्य भारत १७ ॥ यस्य यहि रणे व्यङ्गं पितृतो मातृतोऽपिवाकर्मता शीतोवापि सतत भाषपठे युधि ॥ ७७॥ तान् रष्ट्रया समरे शस्तनमानान परस्परम । अभवन्मे मती राजन्नपामतीति जीवितम् ॥ ७८ ॥ तेषां रष्ट्या तुरा मो वयमिततेजसाम । अभवन्मे भयं तीघ्रं फयमेतद्भविष्यति १७९ ॥ ततस्ते पारा पज कौरवाच महारथाः | Tतक्षासायस्वीक्षण वि दि परस्परम् ॥ ८॥ इतिकर्ण पर्वणि संकुलदेएक पंसाशोध्यायः ॥ ५१ ॥ समुद्रके सम्मुख होतेहैं । ७२ 1 उससमय परस्पर वाणोणी वी के ऐसे वो शब्द हुये जैसे कि गर्जनेवाले ममुद्रों के अलके वेगकी बड़ी वान होती है। फिर उन दोनों वेगवान सेनामों ने परस्परमें एक एकको पाकर एकताको सेपाया जैसे कि दो नदियां परस्पर मिलकर एक होजाती हैं । ७४ । हे राजा इसके पार पशके चाहने वाले कौरव और पांडवोंका घोररूप युद्ध जारी हुआ । ७५ । उस समय रहा गर्भनेवाले शूरवीरोंकी बार्शलाप जोकि निरंतर नानामकार कीधी और नामाको लेलेकर होरहीया सुनाई। ७६ | जिस के पिता माताके अवगुण स्वाभा- विक दोपये वह युद्धमें परस्पर एकएकको सुनातेथे । ७७ । हे रामा युद्धमें परस्पर पुड़कने राले उन शूरों को देखकर मैंने समझा कि भव इनका जीवन नहीं है ।७।। और उन क्रोधयुक्त बड़ेतेनास्वियों के शरीरों को देखकर मुफको मत्यन्त भयहुमा: यह कैसे होगा। ७९ । इसके पीछे उनमहारधी पांडव और कौरवों ने परस्पर मारकर प्रत्येकको अपने ताणशायकोंसे पापलाकया 1 ८० ॥ assr sisa bsfire. The semies amet with grast forms like two masure of wator. The sounds of arrows on both sides wero like the roar of The two armics were theo united like two stream, The Kauravas and the Pandavas vied for victory. The Toars of the warriors, who called others by date, were of rarioux surts, They brought to light the sins of one another's parents. Seeing tbem engaged in fighting, I thought that the period of their lifo had come to an 1.As much terrified at the sight of their dreadful visages and wonder. od what the and would be. Thus the laurar and Panday warrior wounda ono another in battic" 80, the ocean भशदारुण elepbant, and the latter did tho same to borses, Swift elephants oother and cried, and the battlo field looked dreadfallite a slaughter (६५०९) कर्णपर्व Karan Paray (6109) समय उपाच । क्षत्रियास्ते महाराज परस्परयषिणः । अन्योऽन्यं समरे जनुः कृतघराः परस्परम् ॥ १ । रथोपाय हयौपाच नरोधाय समन्ततः । गीघाट महाराज सशकाध परस्परम ॥ २॥ गदानां परिधानाच पुणपानाच मिप्यताम प्रसानां भिन्दिपालानां भुषुण्डानाच सर्वशः । सम्पात घानुपश्यामः संग्राम ॥ ३॥ शलमा इव सम्पेतुःशवृष्ट्या मुदारुगा। नागा नागान् समा साप ध्यधमन्त परस्परम । हया इयांश्च समरे रचिनो रधिनस्तथा ॥ ५ ॥पतयः पत्तिसंघांध इयसंघांधपतयः । परयो ग्यमातगान रया हस्पषमेषघ । नागाश्च समरेनयममृदुःशीघ्रगा नृपावभ्यता प्रशाणां मोशताब परस्परम घोरगायोपन जले पशूनां घेरास यथा । ७ गधरेण समास्तीणी भाति भारत मेदिनी । शमगोपगणाफीणी मापीय यथा घरा ॥ ८ ॥ यथा पा पाससी एफ्ले अध्याय ५ ।। संजप पोले हे महाराज परस्पर में मारने के भभिलापी और शत्रुता करने वाले उन क्षत्रियों ने परस्पर में घायलकिया। मौर रथ घोड़े और मनुष्यों समेत राजाओं के समूह चारोंओरसे आपस में खूब जुटे। २ । फेंकेहुये परिघ, गदा, कुणप, मास, भिन्दिपाल भौर भुशुडियों के सयमकार के प्रहारों को युद्ध में महाभयकारी देखा । ३ । और वाणों की वर्षा टीड़ी के समान हजारों मकारसे होने लगाहाथियोंने हाथियों को परस्परमें पाकर छिन्नभिन्न किया तप घोड़ों ने घाड़ोंको रधियों ने रथियोंको। ५ । पचियों के समूरों को वा घोड़ों के यूधोंको अथवा रथ और हाथियों ने घोड़ोंको । ६ । और शीघ्रगामी हाथियों ने सेनाको अंगो से विहीन करके छिन्नभिन्न करदिया । ७ । वहाँ शूरवीरों के समूह परस्परमें धाप होते और पुकारतये इसहेतुसे युद्धभूमि ऐसी अत्यन्त भयानकहोगई जैसी कि पशुओं की संहारस्थानकी भूमी होती है। ८ । हे भरतवंशी उससमय पिर से भरीहुई पृथ्वी ऐसी दिखाई देतीथी जैसे कि वर्षाऋतुमें परिवरियों के समूहों से पृथ्वी रक्त दिखाई देती है अथवा जैसे कुसुम के रंगेहुये श्वेत वस्त्रोंको CHAPTER LI Sanjaya suid, " Thoso warriors, desirous of slaying one another througla eninity wounded one anotlor. Partics of cars, burses and men met in tho fiold of battle. The clubs, maces and other weapons dischargod wore dreadful to behold. The shower of arrofa looked Jika tho Night of locusts. Elephants, horses and car-warriors destroyed their own kind. Foot soldiers destroyed foot soldiers, líorsemen, cars and bestropad and dispersal the warrios, The brare men hy one buse. The ground covered with blood looked as if srin with red!
[१६५११) कर्णपर्व Kar Parav (6511) नगनिमोपमाः । पिनेशुः समरे तस्मिन् पक्षवन्त इषाद्रयः ॥ १७ ॥ अपरे माहवागाः शल्याती प्रणतापिता । प्रतिमानश्च कुम्भश्च पेतुरुपयों महाहधे ॥ १८ ॥ बिनेदु सिंहपच्चान्ये नदन्तो भैरवाग्रधान । घनमुबहधो राजश्चुकशु वापरे गजा: ॥ १९ ॥ हयाच निहता पाणः स्वर्णभाण्डपरिच्छदाः - निषेदुश्चैव मम्लुध पनमुश्च दिशो दश ॥ २० ॥ अपरे कृष्यमाणाध विचेन्तो महीतले । भाषान् बहाधधांश्वस्ताडिताः शरतोमरैः ॥ २१ ॥ नरास्तु निहता भूमो कूजन्त स्तन मारिप । रष्ट्या व धान्धवानन्ये पितृमन्ये पितामहान् ॥ २२ ॥ घावमानान् पराधान्यान राष्ट्रवान्ये तत्र भारत । रुपातानि गोत्रनामानि राशमुरितरेतरम् ॥ २३ ॥ वेष छिना महाराज भुजाः कनकभूषणा|उद्वेष्टन्तेषिचन्ते पतन्ति चोत्पतन्ति १२४ निपतन्ति तथैवाम्पे स्फुरन्ति च सहस्रशःधेगांश्चान्ये रणे चकुपन्चास्यां इव पन्नगाः ॥ १५ ॥ ते भुजा मोगिभोगाभाधन्दनाक्ता विशाम्पते । लोहितार्दा सुशं रेजुस्तपनी । १८ । और बहुतेरे सिंहों के समान शब्दोंको गर्ने बहुतसे घूमने लगे। १९ । और बहुतसे हाथी पुकारे और सुनहरी सामानों से अलंकृत घोड़े वाणों से मारेयं बैठगये और मृतक माय होकर दोदिशाओं में घूमनेलगे ।२०१ वाण वा तोमरों से 'घायल चेष्टाओको करतेहुये बहुतसे हाथी घूमने लगे और भनक हाथियों ने नाना प्रकार की चेष्टाओं को किया | २१ । हे श्रेष्ट भरतवंशी यहां मनुष्य घायल होकर पृथ्वीपर शब्द करनेलगे और वहुतसे लोग भाई वन्धु पिता और पितामहादिकों को देखकर । २२ । किसी ने दौड़तेहुये शत्रुओंको देखकर गोत्रनामोसमेत अपनीजातों को वर्णन किया । २३ । हे महाराज उनलोगोंके स्वर्णमयी भूषणोंसे अलंकृत भुनदण्ड टूटे हुये हाथ पैरोंमें चेष्टा करकर लिपटते थे और उछलतेथे ॥२४॥ इसीमकार बहुतसी भुजा उछलकर अनेक चेष्टा करतीर्थी और हजारों ऊपर नीचे होकर अपल चेष्टा करती थीं और किसी भुजाओं में पांचमुख रखनेवाले सर्पकी समान में बहुतसा वेगकिया । । हे राजा सो के फणों के looked like mountains on fire. Others, huge like hills, wounded by tusks, looked like winged mountains and wero destroyed. Others vounded by darts, fled from the field of battle and fell outside. Others roared like lions or roamned here and there. Many elephants shrieked, and horses with gold trappings were struck dead by arrows or flod in all directions. Wounded by arrows and tomars, many elephants moved in different directions. Men wounded there cried and called their kinemen, fatbers and grandfatheis to belp. Some seeing the enemy give way, announced their wames and pedigloo. Decked with ornaments, their severed arms and 1€et lay tiemlling on the Aground and jumped there like five-beaded snakes, 25. The blooding armas, sandal-pasted, looked like the heads of serpents or lile golden - ल 6512) tahabharat यध्वजा इंघ ।। २५ । वर्तमाने तथा घोरे संकुले सर्वतो दिशम् । अविज्ञाता: स्म युध्यन्ते यिनिम्नन्तः परस्परम् ॥ २७ ॥ भौमेन रजसाफीर्णे शनसम्पतिसंकुले । नध स्वेन परे राजन् व्यनापन्न तमोवृताः ॥ २८ ॥ तथा तदभवावं घोररूपं भयानकम ! शोणितोदा महानद्यः प्रसस्तन चासत् ॥ २२ ॥ शीर्षपापाणसं उधाः फेशशैवलशाला अस्थिमीनसमाकीणां धपु शरगदोडुपाः ॥ ३० ॥ मांसशो मितपकिन्यो धाररूपाः सुदारुणाः । नदीः प्रायःयांमासः शोणितीयप्रवर्तिनीः ॥ ३९॥ मोरुचित्रासकारिग्यः शूराणां हर्षवर्द्धनाः । ता नधो धोरस पास्तु नयन्त्यो यम सादनम् । अवगाढ़ान्मजयन्तः तत्रस्याजनयन भयम् ॥ ३२ ॥ कम्य। दानों मरस्यान नईतां तत्र तत्र ह । घोरमापोधनं अन्ने प्रेतराजपुरो समान चन्दनप्ले लिप्त रुधिर से भरीहुई वह सबभुजा स्वर्णमयी बजाके समान पहुत शोभायमान हुई । २७ । इप्सरी से दशादिशाओं में घोपसंकुलनाम धोरयुद्ध होनेपर अज्ञातरूप परस्पर में युद्ध करनेवाले हुये । २८ । और धूलसे संयुक्त शखों के प्राघातों से व्याकुल युद्धमें अंधेरे होने के कारण अपने और पराये नहीं मानेगये इसरीतिसे वह युद्ध महाघोर रूप और भयानक हुमा वहां अधिररूप जल रखने वाली बड़ी नदियां वहानकी । २९ । वह नदियां शिररूप पत्थरों से युक्त केशरूप शैवल और शादलरखने वाली अस्थिरूप मछलियों से पूर्ण धनुपवाण, और गदापी नौका रखने वाली 11०। मांस रुधिररुपी कांच से भरी हुई घोररूप बड़ी भयानक कपिररूप जल के वेगकी बढ़ाने वाली. होकर बहने लगा . । ३२ । भयभीतों के भयकी बढ़ाने वाली शूरवारों की प्रसन्नता बढ़ाने वाली घोररूप वह नदियां यमलोक को पहुँचाने वाली होगई हे नरोत्तम यह नदिया भीतर जाने वालों को डुवाने वाली क्षत्रियों का भय बढ़ाने वाली हुई वहां मांस भक्षी जीवोंको गर्जना करने से यह युद्ध भामे घोररूप रामपुरी के समान होगई । ३३ । और चारोंमोर से असंख्यों रुण्ड उठ ... standards. Thus the battle became gedtial, Ibere vere darkmess dust and confusion, and friends and fues were not distinguishable, The battle was dreadful and rivers of blood flowed, with beads for stoner, hair tor weods, bonos for fizh and bons, arrows and macos fur bouts 30. Havia tlesh and blood for mirc, tho rivors of blood wers draad ful to behold, causin, fear to the tim:d and joy to tho brave, leading tu the region of Ya: - They sunk those who entered them and fear to the warriors. With the hiduous cries of the birds of prof the battle fioll brame dreadful to behold like the region of the floaillesa bo lies rus) on all sides and beasts of prey, satisfied with fies' aud bloni. dulnced liere and there. Lious, crows, vultures and here .
army shook like a broken boat in the midst of a TSSIL $699 laran l'ary (3513 31 पमम् ॥ ३३ ॥ उत्थितान्यगणेयानि कवधानि सन्तितः ॥ ३४॥ नृत्यान्त भूतगणाः मतृप्ता मातनोरिणतः। पीत्वा च शोणितं तत्र पसा पात्वा च भारत ॥ ३५॥ मेदो मज्जायसामसा स्तृप्ता मांसस्य धीद । धायमानाः स्म दृश्यन्ते काकगृदयकास्तथा ॥ ३६॥ शरास्तु समरे राजन् भयं त्यक्त्वा सुदुस्थाम । योधतं समासाद्य च कायमीतवत् ॥ ३७॥ शशफिसमाकीणे फव्यादगणसकुले । दयचरन्त रणे शूगः ख्यापयन्तः स्वपौरुपम् ॥ ३८ ॥ अन्योऽन्य भावन्तिम नामगोयाणि भारत । गत नामानि च रणे गोत्रनामानि याविभा ॥ ३९ ॥ श्राययाणाभ घायस्तत्र योधा विशा म्पते । भन्योऽन्यमवमगन्तः शक्तितोमरपाशः ॥ ४० ॥ धमान तथा युद्ध धाररूपे सदारणे । व्यदित कौरथी सेनाभिन्ना नरिव सागरे ॥४१॥ इतिश्री कर्णपर्वाण संकुलयुद्ध वि पंचाशोऽध्यायः । ४४ । । १४ । मांस और रुधिर से तृप्त होकर जीवोंके समूह नाचते थे हे भरतवंशी वहां सीधर और मज्जाका भोजन करके । ३५ । मांस मज्जा भौर भेजों के खानसे मत | वाले सिंह काक गृध्र आर वगलेभी दौडतहुये दिखाई दिये। ३६ । शूरवीरों ने त्यागने भयोग्य भयकोभी.त्यागकरके पदामिलापी होकर निर्भयलोगोंके समान पद्धमें कोंको किंगा । १७ । उस युद्ध में वह शुरलोग अपनी वीरता को प्रसिद्ध करते हुये भ्रमण करने लगे जो कि वाण और शक्तियोंसे पुक्तहाँका मांस भक्षियों से ब्याकुलथे । ३८ ॥ हे समर्थ भरतवंशी उनलोगोने परस्परमें गोधनामों समेत अपने पिताओंका भीनाम लिया ! ३९ , हजारों ने तो अपने गोत्रादि और नामा को बहुत से युद्धका । ४० । इधर उधर से तोमर शक्ति और पट्टि शों के द्वारा परस्पर मे मर्दन करनेलगे इसरीति से घोररूप महाभयानक युद्धनारी होनेपर कौरवीसेना ऐसी पीडित हुई जैसे कि समुद्रमें टूटीई नाका डामाडोल होकर पीडित होती है । ४१ । एनाया और ran at the heaps of flesh,36. Setting aside a! fear, La varriors fought very bravely. They rcawed in the field of battle sed showed their prowers in the midst of arrotys, darts and fil.sh mez animals They announced their nanies and pedigree, whila cca Escharged their weapons. When the battle was thus ragicg Erssig, ta fagras .
65141 Mahabharat सम्जय उवाच । वर्तमाने तथा गुदे क्षत्रियाणां निमज्जने गाण्डीवस्य महाघोषः भूयते युधि मारिष ॥ १ ॥ संसप्तकानां कदनमकरोघा पाण्डः कोशलामा तथा गजभारायण पलस्यत्र ॥ १ ॥ संशप्तकास्तु समरे शरवृतः समन्ततः ।भपातय पार्थ मदनि अयगृद्धाः मम्पयः ॥ ३ ॥ता वृष्टीः सहसा तरसा धारयन् प्रभु। भगाहत रणे पार्थो विनिम्नप्रथिनां धरान् ॥ ४॥ विगाह्य तु स्थानीकं कडूपः शि लाशितः आससाद ततः पार्थः सुशाण महारथम ॥५॥ स तस्य शरवर्षाणि पक्षप' रथिनां धरः । पथा संशप्तकाध पार्थ घाणः समापयन् ॥६॥ मुशर्मा तु ततः पार्थे गया दशभिराशुगः । जनाईनं त्रिभिर्वाण रहनइक्षिण मुंजे । ततोऽपरेण भल्लेन कत विघ्याध मारिष ॥ ७ ॥ स धानरपरों राजन विश्वमकृतो महान् । मनाम महानाएं भाषाणो जगजंच 1८॥ फपस्तु निनंदत्वा सन्त्रस्ता तप पारिनी। मय विपुलमाधाय निवेश समपद्यत ॥९॥ ततः सा शुशुभे सेना निधेटा परिषता अध्याय ।। ५३ ॥ संजय बोले कि हे श्रेष्ठ इसरीति से क्षत्रियों के नाशकारी युद्ध के जारी होने पर युद्ध में गाण्डीव धनुपके बड़े शब्दमुनाई दिये हे राजा जहाँपर कि पांडव अर्जुन ने संसप्तकों का वा कोशिल देशियों का भार नारायण नाम सेनाका नाश किया १.२ । वहां क्रोधयुक्त संसप्तकों ने युद्धमें चारोंओर से अर्जुन के शिरपर वाणोंकी वर्षा करी।।। हे राजा रथियों में श्रेष्ठ वेगसे अकस्माद उन वाणवर्षा को सहते और मारते हुये प्रभु अर्जुनने सेनाको बिलोडन किया । ४। और अपने तीक्ष्ण धारवाले बाणों के द्वारा उस स्थवाली सेनाके पारहोकर उत्तम शखधारी सुशर्माको सम्मुख पाया ।५। तब उस श्रेष्ठरथी ने बाणोंकी वर्षा से उसको आच्छादित किया जैसे संसप्तकों ने वाणों की वर्षा से प्रार्जुनको टकाया ।६) इसके पीछे मुशर्मा ने शीघ्रगामी दशवाणों से अर्जुन को ओर तान उत्तम वाणों से श्रीकृष्ण चन्द्रनी को दाहिनी भुजापर छंदकर दूसरे भल्लसे ध्वजाकोभी विदीर्ण किया । हे राजा विश्वकमीजी का उत्पभ किया हुआ वानरोंमें श्रेष्ठ वह बड़ा वानर सबको भयभीव करके बड़े शन्दसे गर्जा । ८ । इस हनुमानजीके शब्दसे सुनकर आपकी CHAPTER LUT Sanjaya said, " When the battle, destructive to kahatryas, was thus raging on, fearful sounds of Gendir bopp were heard at the place whore Arjun was destroying the Sansaptaks, Kosals and Narayans. The Sansaptaks discharged arrows at the head of Arjyn, Bearing their bits and slaying, Arjun agitated the army and having crossed tha cars by means of bis sharp arrowe, bo ſuund Susbarma opposing him.3. Ha bid him with bis ariowe, while the Sansaptaks covered hins with the shower of their arrows. Then Sashara wounded Arjun with ten arrows and Krishn with three and with another dart hit the of iná Kuran Pary (6515) नृप । नानापुप्पसमाकीण यथा चैत्ररथ वनम् ॥ १०॥ प्रातलभ्य ततः सहा बोगस्ते कुरुसत्तम । अर्जुन सिपिधुर्वाणः पर्वतं जलदा इथ । १९ ॥ परिचय स्तता सबै पांड स्य महरथम निगृह्य तं प्रधषध्यमानः शितः शरः॥१२॥ ते इयानथचक्र बरषाचापि मारिष । निगृह्य बलवत् संघ मिहनावमयोऽनन् ॥ १३ ॥ अपरे जगृहुधेष केशवस्व महामुजो। पार्थमन्य महाराज रथस्थं जगृहुदा केशधातु ततो पाहु विधुन्वन् रणमून । पातयामास तान सर्पान दुष्टहस्तीय इस्तिपान ।। १५ ततः कुखोरणे पार्थः संवृतस्तैमहारथैः । निगृहीत रथ रष्ट्या केशवञ्चाप्यभितम् । रयानाथ मबहून पहातचाप्यपातयत् । १७ ॥ मासनांध तथा योधान शररीसन्न सेना महाभयभीत हुई और अत्यन्त भयभीत होकर चेष्टारहित होगई। ९ । इसके पीछे है राजा वह सेना निश्चष्ट होकर ऐसी शोभायमान. हुई जैसे कि नानाप्रकार के फूलों से युक्त चैत्ररथ बनहोता है ।१०। हे कौरव्य इसके पीछे उन युद्धकर्ताओं ने सावधान होकर भर्जुनको बाणों से ऐसा माच्छादित करदिया जैसे कि पर्वत को यादल आच्छादित करदेते हैं । ११ । इसके पीछे सबने अर्जुन के बड़े रमको पेरलिया उसको घेरके तक्ष्णि वाणोंसे घायल करके पुकारनेलगे। १२ । हे श्रेष्ट इसके पीछे वह सब क्रोधयुक्त रथकेचारोंमार होकररथचक्र और ईशाके भापकंडेन को पासगये वह हजारों शूरवीर उसकेउसरथकोमोरसव साथियोंकोपकड़करसिंहनाद करनेलगे।१३और कितनोंदीने केशबजीभिभुजाको पकडीलयाऔर पकड़ने बहुतोंने रथमें सवार अर्जुनको पकडीलया। १४ । इसकेपीछे दोनों भुजाओंकों कंपायमान करतेहुये केशवजीने उन सब को ऐसे गिरादिया जैसे कि मतवाला हाथी हाथी के सवारों को गिरादेता है । १५ । इसके पीछे उन महारथियों से घिरे हुये क्रोपयुक्त भर्जुन ने युद्ध में उस पकड़े हुये स्थको देख और भीकृष्णजी को भी पकड़ी हुमा जानकर बहुतसे रथ सवारों समेत पदातियों को गिराया १६ उसीमकार समीप वर्तमान शुरवीरोंको समीपहीसे मारे बाणों के दकदिया और केशवजी से कहने लगा । १७ । हे महाराज श्रीकृष्णाजी भयकारी कर्म करने standard. Made by Vishwakarma, the best of monkeys on the standard, cried with a tremendous roar, Your army was much terrified at the sound and lost senses, looking like the forest of Chitrarath, overgrown with various flowers. 10. Then coming to consciousness, they covered Arjun with arrows and surrounded his car like clouds round a bill. They cried all round his car. They held the car by its various parts and roared like lions. Some held Keshav by the arm and others took bold of Arjun. Thou Keshav shaking both his arms, set himself free, making them fall down as ons mad elephant throws another down, 15. Surrounded by those warriors, enraged (6616] Jabal barat . योधिभिः। खादयमास समरे केशमशेदमप्रवीत् ॥१७॥ पश्य काण महाबाहो संघ सफगणान् यहून् । फुधाणान दारुणं फर्म वपमानान सहमशः ॥१८॥ रथवघमिर्म घोरं पृथिव्यांनास्ति फशन । यः संहत एमाल्लोके मदम्यो यदुपुङ्गव ॥ १९ ॥ इत्येवमु तवा मिस देवदतमधाधमत । पाञ्चजन्यऽघ कृष्णोपि प्रायनिष रोदसी ॥ २० ॥ तन्तु शङ्कास्वनं श्रुत्या संशकपरूधिनी । सञ्चाल महराज धिप्रस्ता बामपदृशम ॥ २१॥ पादचन्ध ततश्चक पाण्डः परवीरहा नागभलं महाराज संप्रदीर्य मुहुः १२२।। ते घद्धाः पादधन्धेन पाण्डधेन महात्मना । निवेशश्चामषानाजन अश्मसार मया इव ॥ २३ ॥ निश्वष्टांस्तु ततो पोधानयधोद पांडु नन्दनः । यधेन्द्र समरे देत्यां स्तारकस्प बधे पुरा ॥ २४ ॥ ते वध्यमानाः समरे मुमुचुस्तं रथोत्तमम् । अयु पानि च सर्वाणि विनोदुमुपयक्रमुः ॥ २५ ॥ ते घवः पादयन्धेन सेकुश्चेष्टितु वाले शरीरसे घायल हजारों संसप्तकों को देखो। १८॥ यह रथोंकी बधावट महा घोर है और पृथ्वीपर मेरे सिवाय ऐसा कोई नहीं है जो नरलोक में इसबंधनको सहै । १९ । अर्जुन ने ऐसा कहकर अपने देवदत्त शङ्खको वजाया और पृथ्वी भाकाशादिको व्याप्तकरके श्रीकृष्णजी ने भी पांचजन्य शङ्कको वजाया । २० महाराज उस शङ्खके शब्दको सुनकर संसप्तकों की सेना महाकपितईई और भयभीत होकर भागी । २१ । इसके पीछे शत्रुविजयी अर्जुनने वारम्वार नागास्त्र को प्रकट करके उनके चरणों को बांदिया । ३२ । हे राजा महात्मा अर्जुनके बंधनसे चरणों में बघेहुये वह लोग लोहेकी मूर्चिके समान निश्चेष्ट सहेरहगये । २३ । इसके पीछे उन निश्चष्ट मनुष्योंको पाण्डुनन्दनने ऐसे मारा जैसे कि पूर्वसमय में तारक अमर के मारनेवाले युद्ध में इन्द्रने दैत्योंको माराया ।२४। युद्धमें घायल होकर उनलोगों ने भर्जुनके उचम स्थको छोड़दिया और शत्रोंका मारना प्रारंभ किया । २५॥ हे Arjun seeing himself and Krishn cought hold of covered the enemies standing by with his arrows and said to Krisha, "Look at the Sansaptak warriors of whom thousands are woundod. Tho jointa of our car are unusually strong. None oncept mo can hold it." Having said this, Arjun blew lis coach named Devdatla. Shree Krishn blew Panchjanya. Tho armics of Sansaptaks shook at the sound and fled in terror. Then Arjuu tho conquerer of loca discbarged bagastra which beld them by their fcct They stood like iron statues and Arjun slow them as Indra had done the Daityas in tho war of Tarak. Wounded in battle, they left Arjun's car and began burling their weapons at him. Being held by their legs, thoy could no longer more, and Arjuo began alaying them with their ATTONE. Being held fast by serpents, thay:
(६५१७" कर्णपर्ष Karap Pary (3517 नृप । ततस्तानवधीत पार्यः शरैः शतपर्वमिः ॥ २६ सपोधा हि समरे भुजगे बेष्टिताभवन् । यानुदिश्य रणे पायः पादयन्धं सकारह ॥ २७ ततः सुसमा राजेन्द्र गृहीता बोश्य पाहिमाम् । सापर्णम चरितः प्रादुध महारथाः ॥ २८ ॥ तत: सपः संपर्नुभक्षयन्तो मुसलमान । ते वै विदुवुनांगा रष्ट्वा तान् सचरानृप ॥ २९ ॥ घभी वर्क विमुकं पादधन्धा विशाम्पते । मेघवृन्दापया मुको मास्करस्ता स्तापयन् प्रजाः ॥ ३० ॥ विममुकास्तु ते योधाः फाल्गुनस्य रयं प्रति । ससृज़र्याण सधाख खसघाच मारिष पियिधानि च शस्त्राणि मत्पीय पन्त सयंशः ३१ at महारसमधी वृष्टिं सछिध शरवृधिभिः । न्यवधीच्च ततो योधान यासपिः परवी रहा ॥ ३२ ॥ मुशमांतु तमो राजन् वाणेनानतपणा । मर्जुन हद पिया पिया धान्येत्रिभिः शरैः ॥ ३३ ॥ स गादपियो व्यथितो रथोपस्थ उपाधिशत् । तत उच्चुनः सं हसः पार्थ इति स्म ह ॥ ३४ ॥ ततः शहनिमादा भेराशब्दान्ध पुष्फ राजा धरण बंधनके कारण से वह लोग हिलचलभी न सके इसके पीछे मर्जुनने | टेदेपर्ववाले वाणोंसे उनको मारा । २६ । युद्ध में वहसव शूरवीर लोग सपोंसे हुये खडेरहगये जिनको कि भर्जुनने लक्षकरके चरणाका चयन किया 1२७ ॥ हेरामा इसके पीछे महारथी मुशर्मानवधा हुई सेनाको देखकर शीग्रही गरुडानको मकट किया। २८ । तब तोबहुत से गरुड़ सोको भक्षण करने को दौरे और वह सर्पउन गल्डोंको देखकरभागे । २९ । फिर चरण वंधनोंसे छूटीई वह सेना ऐसी शोभायमानहुई जैसे कि सब मृष्टि के संतप्तकरने वाले मुर्य वादलोंसे राहत होकर शोभित होते हैं। ३० । इसके पीछे उनबंधनोंसे छूटेहुये शूरवीरीने अर्जुनके रयपर वाण भोर शत्रोंके समूहों को छोड़ा और सबने नानाप्रकार के भत्रोंको घळाया। ११ । सय तो इन्द्रपुत्र महावीर भर्जुनने उनलोगोंको वाणोंकी वर्षासे दककर पुदकर्ताओं को मारा । १२ । इसके पीछे मुशर्माने टेढ़े पर्ववाले वायोंसे अर्जुनको हृदयमें घायलकरके दूसरे तीन वाणोंसे पीडित किया। ३१ । सप का अत्यन्त घायल और पीडामान होकर स्थके बैठनेके स्थानपर बैठगया इस के पीछे सबोंने पुकारकरी कि अर्जुन मारागया | १४ । इसके पीछे शङ्ख भेरी stood in the field of battle. Then brave Susharma, seeing the army so captivatol, discharged Garurastra. Then many garurs rushad on to seize tho serpents. The snakos slunks away at the sight of tho:0 garurFreed from captivity, thoy looked glorious like the Sun freed from clouds.30. Then they discharged arrows and other weapons over Arjun. Arjun covered them with the shower of his arrows and slew them, Sosbarma wounded Arjun in the breast with three arrows and he sat down with pain on bis scat in the car, the varriors Forying out," Arjun is slain." Thca tbe musical instruments were sounded and the warriors roare.l.35. Then Arjun the possessor of 65181 Mahabharat (१५) काः नानावादिन निनादाः सिंहनादाच नशिरे ॥ ३५ ॥ प्रतिलभ्य सका घेताश्वः कृष्णसारथिः । चन्द्रमस्त्रेममेयामा प्रादुश्चम त्वसन्वितः ॥ ३६॥ ततो वाणसइमाम समुत्पत्रानि मारिप । सदिक्षु व्यदृश्यन्त मृदयन्ति नृपद्धिपान् ॥ ३७ ॥ हानथोर संभरेशर्सः शयः ॥२८॥ संशप्तकगणानाञ्च गोपालानाच भारत की व पुमान करियोजनं प्रत्ययुध्यत ॥ ३९ ॥ पश्यनां तत्र पाराणामपित पळतष। इन्यमनिमपश्य निकाः स्म पराक्रमे ४० ॥ मयुतं तत्र योधानां हरषा पाण्डुसुतो रणे । पनाजत महायज विध्मोऽग्निरिय चलन ॥ ४१. परंथ सामाणि यानि इटानि भारत । रयानामयुतम्य निसाहसाथ यन्तिनः तंतः संशप्तका भयः परिवर्धनन्जयम मितव्यमिति निमित्य जयं पापि निधत्तमम ॥४३तत्र युं महासचिवफानो पिशाम्पते । शरेण धलिना सा पार घे किरीटिना ॥४॥ इतिथी कर्णपर्वाण संकुलयुद्ध दि पंचाशोऽध्यायः । ४४। मादि वाजोंके बाद और सिंहनाद उत्पन्न हुये । १५ । फिर वेतघोड़ों ।। युक्त श्रीकृष्णजी को सारथी रखनेवाले पदे साहसी सीबतासे युक्त मर्जुन ने होकर पेन्द्रास्त्रको प्रकटकिया । १३ । हे भेष्ठ उस ऐन्द्रास से हमारी भाषा उत्पन्न हुये और सब दिशामों में दिखाई दिये । १७ । और युद्ध में आपके हमारी स्थ घोड़े और हाथियों को शवों से मारा 1 २८ । संसप्तक और गोपालों के संपूो। को बड़ा भय उत्पन्न हुमा ऐसा कोई मनुप्पनया और न रसागोभ नकोमास:३९ सर्व वारों के देखतेडुये भापकी सेना मारागई वहाँ पारडष अर्जुन सेनाको पाप और पराक्रम से यथित देखता हुआ युद्धमें दशहमार शूरवीरों को मारकर नि अग्नि के समान प्रकाशि होकर दोभायमान हुआ। ४१ भरतवंशी महारानी [ परीक्षा करी दुई चौदह सहस्र सेना और तीन हजार हाथियों समेत दश हमार रयों से संमतकों ने फिर अर्जुन को आ घेरा और यह विचार गलिया। चाई विजयहोय वा पराजहोय युद्धमें लड़कर मरना योग्यहै । ४३ | ऐसा". आपके शूरवीरों का और अर्जुनका महापौर युदहुआ। ४४ । bvbite borser, ivhich were driven by Suri. Krishn, regaiting conscigar ness, discharged Aindrastra from which appeared thousands of arrows in all directions and slow thousands of car. Warriors, horseman and elephant riders, The Sansaptaks and Gopals were terrified and there Was none who could withstand Arjun,' Your army was slain in ti presence of all the warriors. Sceing the army slain and tired, and having slais ten thousands of warriors, Arjan luoked glorious like smokeless Gre.41. Then fourteen thousands of experienced warriors, irith thro thousaada of elephants and ten thousands of tar-warriors of the Bansaptaks again surrounded Arjun and were resolved to die fighting for victory or defeat Then the battle between Warriors and Arjun tras very severe, 14, कर्णपर्व Karan Paray (6510) सम्जप उबाघ । कृतघर्मा छपो द्रोणिः सूतपुषश्च नारिप । उनकः सौपाव राजा च सा सारैः ॥ १॥ सीदमानां घसंहष्ट्या पाण्डुपुत्रभाषाईतम । समुन्न हारगन मिना गवमिवाणये ॥ २ ॥ ततो युवमतीयासीनमुहमिय भारत । भी प्रासअननं शाणा प्रदर्शनम् !! ३ । कृपेण शरवर्षाणि प्रपिमुकानि संयुगे। बञ्जयांवादयामासुः शलमानां व्रजा इथ ॥ ४॥ शिप्रण्डीच ततः यो गाव परितो.यया । षवर्ष शरवाणि समन्ताद्विजपुङ्गवम् ॥ ५॥ छपरा बर्षन्तहिनिहत्य महास्वपित् । शिखण्डित रण वो विव्याध दशभिः शरैः ॥६॥ ततः शिखण्डी कुपितः शरैः सप्तभिराहये । कृप विन्याध मुभृत कलपत्रैरजिया ॥ ७ ॥ ततः कृपः शरैस्तीवणः सोऽतिषियो महारथः । व्यवस्वरयं च शिख अध्याय ५४॥ संजयगोले इश्रेष्ठ धतराष्ट्र कृतवर्मा · पाचार्य अश्वथामा , कर्ण , उलूक शकुनि , और अपने निजभाइयों समेत राजा दुर्योधनने ! ११ अर्जुन के भयसे पी हामान सेनाको देखकर बड़ेचेग से उनको ऐसे छुटाया जैसे समुद्रमें से टूटीहुई नौका को शिफालतहैं । २ । हे भरतवंशी इसके अनन्तर एक मुहूर्ण तक का कठिन युद्ध रहा जो भयभीतोंको भग्न और शुरवीरों की प्रसन्नता कापढ़ाने वाला था । युद्धमें पार्य के छोड़े हुपे टाड़ियों के समूहों के समान वाणों ने सृजियों को ददिया । ४ । इसके पीछ वहुत शीघ्रतासे शिखंडी कृपाचार्यके सम्मुखगया पार चारोंभोर से उन श्रेष्ठ ब्राह्मण कृपाचार्यके ऊपरवाणों को बरसाया। ५। फिर महाअत्रों के ज्ञाता कृपाचार्य ने क्रोधयुक्त होकर उन वाणोंके सम्हों को हटाकर युद्ध में शिखंडी को दशवाणों से पादितकिया।६ । फिर शिखंडी ने भी कोध युक्त होकर कंकपक्षसे जटित शीघ्रगामी सातवाणों से उन क्रोधरूप कपा- मार्य को पीडामान किया । ७। उसके पीछे उनमहारथी कृपाचार्यनी ने तीक्ष्ण बाणों से शिखंडीको रथ और सारथीसे राहत करदिया 1८ इसकेपीछे मसारथी शिवडी मृतक घोड़ों के रयो कूदकर अच्छे प्रकार से दाळ तलवारको लेकर शीघ्र CHAPTER LIV Sanjaya said, " Kritvarma, Kripacharya, Ashwathama, Karan, Tlak, Sbakum and Duryodban with bis brothers, beeing their army Alicted by Arjun rescued them like a broken bɔat. Then the battle (yaa sovere, terrifying to the timid and plossing to the brave. The Errows disobarged by Kripacharya, like tho-lights of locusts, hid.the: rinjayas 'Ihen Shilbandi.faced Krip and showered his arrows over: Fim.kripncharya, mueli rnraged, chechtd his shower of arrows and ! Founded lim with tеp arrows. Sbihbandi tco, wounded him with, Miun arrows With his sharp arora he distroyed Shik bani's horse and driver. Shikhandi jumped down from the car and faced the 2 ८ (6520] Jabal barad ( १५२०) विडनमयो द्विजः॥ ॥ एतायातु ततो यानादपप्लाय महारयः । माघi तथा गृह्यसत्वर माधणं ययौ ॥ १.१ तमारतन्तं सहसा गरेः समतपमिः शिवा मास समरे तदद्भुतमिषामवत् ॥ १०॥ तत्राद्वतमपश्यामशिलानः वने यथा । निये प्टोपद्रणे राजन शिखण्डी सतिष्ठत ॥१॥ कृपेण छादित रष्ट्या नृपोतम शिमणि नम् । प्रत्युधया रूपं तूर्ण धृष्टद्युम्नो महारथः ॥ १२॥ पृष्टद्युम्नं ततोपान्तं शारत रयंप्रति । प्रतिजग्राह धेगेन कृतवर्मा महारथः ॥ १३ ॥ युधिष्ठिरमाया शार इतर प्रति । सपुत्रं सहसैन्धश्च द्रोणपुत्रो पधारयत ॥ १४ । नकुलं सारे वञ्च वरमाणो महारयो । प्रतिजग्राह ते पुषः शायण धारयन् ॥ १५ ॥ भीम सनं करूपांश कियान साहण्जयैः । कर्णो धैकसको युरे धारयामास भारत। ॥ १६ * शिखण्डिनस्ततो वाणान् कृपः शारहतो युषि । प्राहिणोत्वरया युको विधारित मारिप १९७ातानशरान्प्रे प्रेषितांस्तेन समन्तात् स्वर्णभूषितान विर आचार्यजी के सम्मुलगया । ९ । चर प्राचार्यमी ने उस आतेहु को टेप-- वाले बाणों से ढकंदिया यह देखकर सबको आश्चर्यमा हुमा । । वामपने घस्रों के अपूर्व आपातोंको ऐसा देखा जैसेकि शिलाओंका उबलना होताहै भर हे.राना शिखंडी निश्चेष्ट होकर युद्धमें नियत हुमा । ११ । तव श्रेष्ठ मारती धृष्टएम्न उस कृपाचार्यके वालों से ढकेहुये शिखंडीको देखकर शीघ्रही कृपाचार्य, के सम्मुख गया । १२ । इसके पीछे महारथी कृतवर्माने कृपाचार्य के रथकी ओर जानेवाले धृष्टद्युम्न को बड़े वेगसे रोका। १३ । पीछे से कृपाचार्य के रथको भोर पुत्र और सेना समेत भानेवाले युधिष्ठिरको अश्वत्थामा ने रोका १४ । की वर्षा करनेवाले भापके पुत्रों ने शीघ्रता करनेवाले महारथी नकुल और . को रोका । १५ । हे भरतवंशी मूर्य के पुत्र कर्ण ने युद्ध में भीमसेन को कैकप और मुंजपदेशियों को रांका । १६ । इसके पीछे शीघ्रता से इक्त भस्म , ने के प्रभिलापी शारद्रत कृपाचापने पदमें शिखंडी के ऊपरवाणों कोचलाया । फिर वारंवार खसको फिराते हुये शिखंडी ने उन उपाचार्य के स्वर्णमया ओरसे फेंके हुये वालों को काटा । १८। हे भरतवंशीफिर गौतम उसकी सौ चन्द्रमा रखनेवाली दामको वही शीघता पूर्वक शायकों से वोडा arrarya wira ziart and shield. The laver vared wine with sincere to the amazyment of all. 10. There we aaw.the weapons hurled thers Rike stonts Seeiay Suikkandi hard pressed by Kripacharys, Dbrie tadyumna adranced to rescua hia, but spis, checked by Kritrary Aslawathama chased Yudhishthir and your brave sons chocked Nak and Sahalar.15. Karan checked Bhimser and the warriors Karushyn, kaikaya and şcinjaya. Kripacharya, wishing to destroy Skrandi, aynt forth his srrors Against hita; bat Shikbaodic them all down with the movoident of his sword. Then Krip २० 11 गणपर्ष Karan Pary (6521) मगमाविष्य मामयं पुनः पुनः ॥ १८॥ राधम्नं ततम्रर्म गौतमः पार्वतस्य हायधमत सायकैस्तूर्ण तत उम्सुक शर्मनाः । १९ ॥ स विद्या महाराज खड़ गपाणिरूपाद्रवत् । कृपस्य घशमापनोमृत्योराश्य मिधातुरः ॥ शारवत शरस्त पिलक्ष्यमानं महाबलम् । चित्रकेतुमतो राजन सुकंतुस्थरतो र २१॥ विकिरन श्राह्मण युवे बहुर्मिशितः शरैः । मायापतदमपात्मा गौतमस्प रथं प्रति ॥ २२ ॥ इप्ट्या विषक्तं तपो ब्राह्मणं चरितम्रतम् । अपया तस्ततस्तर्ण शिखण्डी राजसतम ॥ २३ ॥ सुकेतुस्तु ततो राजन् गौतम नमः शरैः। पिया पिण्याय सप्तरपा पुनधन त्रिभिः शरैः॥ २५ ॥ अथास्य सशरऽचा पुनश्चिछेद मारिष सारपिञ्च गरेपास्य म मर्मस्वताइयत् ॥ २५ । गौतमस्तु ततः कुमो धनुष नषं दम । मुकेतुं विंशता पाणैः संघमर्मस्वनाबपत् ॥ २६॥ स यिष्यालितसर्थान इसोतु से सब मनुप्प पुकारे । १९ फिर यह टालते रहित हायमें खड्गलिये जैसे कि मृत्यु के मुखपर रोगी वर्तमान होता है वैसेही पाचार्य की वाधीनता में वर्त मान शिखएदी उनके पासगया हे राजा चित्रकेतुका पुत्र वडापराक्रमी एकेतु कृपा चार्य के वाणों से दकहये महादुखी शिखंडी को देखकर शीघ्र ही सम्मुख गया 1 २१ । युदमें वो तक्षिण वाणों से डकताहमा महासाइसी. केतु कृपाचाय्ये के रपके समीपपहुँचा । २२ । हे राजाओ श्रेष्ठ इसके पीउ शिखंरी युद्ध में मवृत्त उस तकरनेवाले वामण को देखकर शीघ्रही हटगया । २३ । तदनन्तर मुकेतुने रुपाचार्यको नौ बाणों से व्यथित कर सत्तरवाणों से पाहामानाकया फिर दूसरी वारभी तीनवाणों में घायल किया । २४ । भौर उनके धनुपको वाणसमेत काटकर एक वापसे उनके सारपा कोभी मर्मस्थल में कठिन घायल किया । २५ । इसके पाछे क्रोधयुक्त कृपाचार्य ने ४ नवीन धनुप लेकर तसिवाणों से मुकेतु के सब मर्मस्थलों को पायल किया । २६ । तब वह अत्यन्त कम्पायमान और व्याकुल सुकेतु अपने उत्तम रथपर ऐसे चेष्टा करने वालाहुभा जैसे कि भूकम्प होनेमेटक्ष कापताई । २७ । तब उस कम्पायान के शरीरसे प्रकाशित कुंडलों समेत शिरको into pieces his shield bearing a hundred micons and the people cried out in dismay, Tben Shikbandi stood with his sword like a sick man in the jaws of death, Suketu the son of Chitraketu, seeing Sbikhandi covered with the aridits of Kripacharya, faced the latter, covering him with his sharp arrowr, 22. Seeing the acharya engaged in fight. ing with another, Shiklendi removed himself from his presenca. Suketu wounded Krip with seventy nino arrows and again with three, and having cut his bow and arrow, he wounded the driver too. in the vital parts, 25. , Kripacharya took up another very hard bow and wounded Suketu with thirty arrows in the vital parts. Suketu F (6524) Blahabharat [६५२४ सम्जय उवाच । द्रौणिधुधिष्ठिर रष्ट्या नयनाभिरक्षितम होईपर्यतया रस्यवर्तत हएबत् ॥ १ ॥ किरग्निपुगणान् घारान् स्वर्णपुंसाउिलाशिवान् । दर्शपन विविधान् मार्गान शिक्षा लघुहस्तयत् ॥ २ ॥ ततः स पूरयामास गरे हिंग्यानमन्त्यित: । युधिष्ठिरतु समरे पर्यवारयपावित ॥३॥ द्रोणापनि शरच्छनाक्षायत किञ्चन । पाणभूतमभूतत् सर्षमायोधमशिरो महत् ॥ ४ ॥ वापजाल विविच्छनं स्वर्णजालविभूषितम् । दाशुभे भरतश्रेष्ठ विताननिव विटितम ॥ ५ ॥ तेन छन् नमो राजन पाणजालेन भास्वता । अभ्रष्छायेव सजने पाण रुप नभस्तले ॥ ६ ॥ तत्राश्चय्यमपश्याम पाणमते तथापिधे न स्म सम्पत भूतं किषिदेषान्तरीक्षगम ॥ ७ ॥ सात्यकियंतमानस्तु धर्मराज पाण्डवः तपेवराण सैन्यानि न म धक्रुः पराक्रमम.॥ ८ ॥ लाघध द्रोत्रपुत्रस्य धा तत्र अध्याय ५५॥ संजयवोले कि सात्यकि और शूरवीर द्रोपदीके पुत्रोंसे रक्षित युधिष्ठिरको देखलर अश्वत्थामा जी मसन्न विचके समान सम्मुख वर्तमान हुये । १ । हस्तायता के समान सुनहरी पुंखवाले तक्षिण घोर वाणों को फेंकते और नाना प्रकार मार्गो समेत अपने अभ्यासों को दिखलातेहुपे सम्मुख आये । २ । उसके पीछे बड़े असा असत्यामा ने युद्ध में युधिष्ठिर को घेरकर दिव्य भोंसे मभिमंत्रित वाणों की वर्षा | के द्वारा भाकाश को व्याप्तकिया ।।। अश्वत्थामा के बाणोंसे आच्छादित आकाश में कुछनहीं जानागया और बड़ी युद्धभूमिका शिर वाणरूप होगया। ४। है भरतर्षभ आकाशमें मुवर्णजालों से अलंकृत और ढकाहुआ बागाजात पेसा शोभायमान हुआ जैसे कि नियत हुआ यज्ञ शोभित होताहै । ५ । उन प्रकाशित वाणजालों से जब प्राकाश दकगया और वाणों के युद्धमें भाकाश मंडल में बादलों की छाया होगई। ६ । ऐसे वाणरूप जालों के होनेपर हमने एक आश्चर्य को देखा कि अन्तरिक्ष का उड़नेवाला कोई जीव नहींउटा । ७। उपाय करनेवाले सात्यकि और पाण्डव धर्मरान समेत अन्य सेनाके शूरवीर लोग पराक्रम नहीं CHAPTER LV Sanjaya said, " Seeing Yudhishthir protected by Satyaki and the brava sons of Draupadi, Ashwathama cheerfully faced him, charging gold-feathered arrows and moving in different directions, ho opposed Yudhisthir. Ashwathamı surrounded Yudhishthir with Nothing except arrows was seen in the sky and oper the field. The sky, full of gold-feathered arrows looked glorious like s Well-arranged sacrifice.5. The arrows were spread ttrough the sky like clouds, andino birds could be seen flying through the air. In spite of their exertions, Satyaki and Yudhishthir were powerless before bin.. arrows - (६५२५) कर्णपर्व Karan Pary 16525) महरयाव्यस्मयन्त महाराज न चनं प्रत्युदीक्षितम् । शेकुस्तेसर्पराजान स्तपन्तमिव भास्करम् ॥ ९ ॥ घंध्यमाने ततः सैन्ये द्रौपदेया महारथाः । सात्यकिर्मराजश्व पावालाचापि सङ्गतला त्याचा मृत्युभयं घोर दाणायनि मुपद्रवम् ॥ १० ॥ सात्याकः सप्तविंशत्या ट्रोणि पिया,शिलीमुखेः पुनर्षियाय नारायः सप्तमिः स्वर्ण भूषितः ॥ ११ ॥ युधिधिरस्त्रिसप्तत्या प्रातिविन्ध्यश्च सप्तभिः । श्रुतकर्मा त्रिीमणिः धुतकीतिध पसमिः ॥ १२॥ मुतसोमस्तु नवभिः शतानीकश्च सप्तभिः । अन्ये व पाषः शराविधिधुस्तं समाप्ततः ॥ १३ ॥ स तु अधस्ततो राजन्नाशीविष इसा स्वसन् । सायकिं पञ्चविंशत्या प्राविध्यत शिलाशितैः ॥ १५ ॥ श्रुतकीर्तिच ममिः सतमोमय पंखामः । महाभिः सुतफर्माणं प्रतिविध्यं विभिःशरैः ॥ १५ ॥ शतानीकंच नवनिर्धर्मपुत्रंथ पंचभिः। अधेतस्तित्तः शानद्वाभ्यांमाश्यामताड़यत् । श्रुतकीसित्तय करसके । ८। हे महाराज वहां महारथी अश्वत्यामाको हस्तलायरता को देखकर आश्चर्य युक्त होकर वह सव राजालोग उसके सम्मुख देखनेको भी ऐसे समर्थ नहुये जैसे कि संवत करनेवाले सूर्यको कोई नहीं देखसका है इसके पीछे सेनाके घायल होनेपर महारथी द्रौपदी के पुत्र सात्याके धर्मराज और सब पांचाल देशी इछेहुये और घोर मृत्युके मयको त्यागकर अश्वत्थामा के सम्मुखगये । १० । सारपाक ने शिलीमुखनाम सत्ताईस वाणोंसे अश्वत्थामा को छेदकम् सुवर्ण से मंळकृत सातनाराचोंसे पाडामान किया । ११ । युधिष्ठिर ने तिहत्तर पाणों से प्रतिविन्ध्य ने सातबाणों से श्रुतकर्या ने तीनवाणों से श्रुतकीर्ति ने सातवाणों से 1 १२ । सुतसोमने नौ वाणों से शतानीकने सात पाणों से और अन्य शूरॉनभी चारों ओरसे घायलकिया १५ । हे राजा इसके पीछे उस क्रोधयुक्त विपैले सपके समान श्वासलेने वाले अश्वत्थामा ने शिलीमुखनाम पच्चीस वाणों से सात्याकको धापकिया । १४ । श्रुतकीर्ति को नौ वाणों से मुतसोमको पांचवाणों से श्रुत- कर्मा को आट्याणों से प्रतिविन्ध्यको तीनवाणों से । १५ । शतानीकके नौयाणास पधिष्ठिर को पांचवाणसे और इसीमकार अन्य शूका दो दो वाणोंसे घायलकिपा The warriors wondered at the dxeterity of Ashwathama and none could look at him as at the burning Sun. When the army was thus wounded, the song of Draupadi, with Batynki, Yudbishthis and the Panchale, fearless of death, opposed Asbwatbama, Havingipierced him with twenty seven arrows, Satygki wounded him with seven mors decked with gold. Yudhisthir, Prativindhya, Shrutkarma, Sutsom and Sharajpk wounded Ashwathama with seventy three, seven, nivo and reven arrows respectivety, and other Warriors wounded hin from all aides. Then Ashwathama, hissing like an enraged venomous serpent wounded Satyaki, Shrutkirti, Sutsom, Shratkarma, Prati. frndhya, Shatanik and Yudhishthir with twenty ==ve, nine, five, eight, mainamurar (.6326] Stahal harab (६५२६) भार्प विच्छेद निशितै शरः ॥ १६ ॥ मथान्यद्धनरादाय भूतफोत्तिमहारथः द्राणायानि विभिदा पिच्या धान्य. शितः ॥ १७ ॥ ततो द्रौणिमदाराज शरघन मारिष यादयामासतत सैम्पं समन्तागरतम ॥१८॥ तंतःपुनरमेयात्मा धर्मराजस्यकामुकम् । दौणिधिग्छेद मिहसन विम्याध व श्वरस्तिभिः ततो धर्ममुतो राजन प्रधान्याल इरनुः । दौर्षि विम्याध सप्तस्या पाइयोरसि चैष । ॥ २० ॥ सात्यस्ति तक: कुलो द्रोणेः प्रहरतो रणे । भचन्द्रेण तीक्ष्णेन धनुश्छित्यानदशम् ॥ २१ ॥ छिन | धम्मा ततो द्रोणिः शक्पा शक्तिमतां घरः । सारथिं पातयामास शैनेयस्य स्थान इसम् ॥ २२ ॥ अथान्यसनुरादाय द्रोणपुत्रः प्रतापवान् । शैनेयं शरवर्षेण छाया माख मारत. २३ ॥ तस्याश्वाः प्रदुता संख्ये पातिते रथसारथी । उतष धान्त: माश्यन्त भारत ॥ २४ ॥ युधिष्ठिरएरोगास्तु द्राणि शनमृतां वरम और तीक्ष्णधारवाले शाणसे श्रुतकीर्ति के घनुपको काटा। १६ । इसके पीछे महारथी श्रुतकीर्ति ने दूसरे धनुषको लेकर अश्वत्थामा को तीन बाणोंसे छेदकर दूसरे तीक्ष्ण वाणोंसे पाढ़ामान किया ॥१७॥ हे भरतर्षभ महाराज धृतराष्ट्र इसके पीछे अश्वत्थामा ने वाणों की वर्षा से उस सेनाको चारोंओर से दकदिया। १८ । तबतो महासाहसी सतहुये भवत्यामाने धर्मराजके धनुषको फिर काटा और तीनवाणोंसे पीडामान किंपा।१९। हे गजा उसके पछि धर्मपुत्रने दूसरे बड़े धनुपको लेकर अश्वात्यामाको सत्तरवाणसि पादित किया और छाती समेत भुजाओंको घायलकिया । २० । तव सात्याक युदमें महार करने वाले अश्वत्यामाके धनुपको अपने तीक्ष्ण प्रचन्द्र वाण से काटकर महाध्यान गर्जा । २१ । इसके पीछे उस टूटे धनुपधारी शक्ति रखने | पाले अश्वत्थामा नै शक्तिप्ते सात्याके के रथसे बड़ी शीघ्रतापूर्वक सारथीको गिराया । २२ ॥ तदन्तर प्रतापवान् अश्वत्थामा ने दूसरे धनुपका लेकर सात्यकि को वाणों की वर्षा से दकदिपा । २३ । रयसे सारथी के गिरनेपर युद्धमें उसके घोड़े भागने लगे और जहां तहां भागतेहुये दिखाईदिये । २४ । फिर युधिष्ठिर के साथी नूरthreo, nine and five arrows respectively and other warriors with two arrows each. With a sharp arrow, he cub Shrut kirti's bow.16. Tha latter pierced Ashwathamawith three arrows from another bor and then bøgan discharging other arrows, Ashwathama hid the Warriors with his sharp arrows, and with a smile cut Yudhishthir's bow again and wounded him with 'three. Arrow& Yudhishthir took up another low and wounded Ashwathama with seventy arrows on the arms and breast.20, Satyaki cut Ashwathama's bow with a sharp arrow and roared a mighty roar. With a spear, the latter illed the driver of Satyaki, and tóking up another bow, bid bim with arrows. His borses became anruly at the death of the drrri. -- [65301 Mahabharat (६५३९) पनि परमिशः ॥१०॥ ततोऽपरा महापाघनपो समन्तत । यमयोः सरसा बम् बिम्बाध व निमतभिः ॥ ११॥ सावरे बमोभे शऋचापनि शुमे । प्राय अतः शरा देवपापमोरधि ॥ १२ ॥ ततस्तो रमसो युरे मातरी मातरं नूप। सरपतुपौरमहामेघो यथावलम् ॥१३॥ ततः कुसो महाराज तष पुत्रो महारथः। पादपत्रा महेषाप्सी घारयामास पविधिः। १४ ॥ धन मंगलवास्प रयते युधि भारत गयका दृश्यन्तेनिभासमन्ततः १५॥ तस्य सायकसयकाशाते म पाण्डी मेघनौ यथा व्याम्नि वायाँ हतप्रमा॥ १६ ॥ तुषाणा महाराज हेमाला शिलाशिताः । माच्छादयन दिशः सर्गः सूर्यस्पेवांशपस्तदा १७ पाणभूते ततस्तमिन संउने प नमस्तले । पमयोदशे रूपं कालान्तकयमापेमम् ॥ १८॥ पराक्रमस्तु ते रमना तब मनोर्मशारथाः । मुत्योहपातिक प्राप्ती मानीपुरी सस मेनिरे ॥१९॥ तत. सेनापती राजन पाण्डवस्य सहारयः । पार्वतः प्रययो तर भरतवंशियों में और सब धनुपधारियों में श्रेष्ठ नकुल सहदेवको घायल करके दूसरे दोभल्लोंसे उन दोनोंके धनुषोंको भी अकस्मात् काटडाखा और कीस वालोंसे घायलकिया ।११। युबमें देवझुमारों के समान वह शूरवीर दूसरे इन्द्रधनुपके समान शुभधनुपोंको लेकर शोभायमानहुपे । १२ । इसके पीछे युद्धमें वेगवान वह दोनों भाई युद्धमें घोरवा!की वर्षाभाई के ऊपर ऐसे करनेलगे जैसे कि दो बादल पर्पलर पीकरते हैं। १३ । हे महाराज तर,वो आपके क्रोधयुक्त पुत्रने बड़े धनुषधारी | दोनों पाण्डवों को अपने वाणोंसे रोका । १४ । उप्ससमय दुर्योधन का वनुष युद्ध में मण्डलाकार दिखाई देताया और पाराओरसे दारतहुवे हक दृष्टपडते थे। १५ सय दिशाओंको ऐसे दकीदया जैसे कि मूर्यकी किरले संसार को व्यापकर देता हैं इसके अनन्तर भाकाशमयडळ को वाणरूपी जालों' सेहत जानेपर। ०। नकुल और सहदेव के निमिच उसकारुपकाल और मृत्युदर ५५ राज के समान दिखाईपहा । १८ 1 महारथियों ने भापके पुत्रके उस पराक्रमको देख कर नकुल और सहदेव को मृत्युके गालमें फँसाहुमा माना । १९ । इसके पीछे much oaraged, wounded your son with twenty one and five arrows respectively. Duryodhan wounded them with live arrows each, cut their bows with two more and hid.them again with twonty one Like the sons of gods in battle, they took up other strong buwa and losked glorious. Then tliey showend their arrows orer their copsia as two clouds shower rain ovor a mountain angrily checkod them with his ar1088. Duryodhan's bow mored in a circle and arrows sped from it all round, spreading like the rays of the San Fighting with Nakul and Babadey he looked like Death himself. 18. Those who san his profess, took Nakul and Bahndar for dead. lleo Dbrislu dz un the bravo commander of the Puodat arrow Your son है [६५३१) कोपर्व Karn Parar (6531) पण रामा प्रयोगमा २" मानी ततः पूरीपतिकम्प महास्यौ । घण्टरमस्तव सतं वारपामास सापकः॥ २१ ॥ तमविध्यदवारमा पुव पूत्रोऽयमणः । पाश्चान्य पञ्चशिया इस्ष पपर्षमः ॥ २२ ॥ ततः पनरमयात्मा तव पुत्राप्यमनः । विद्या नमार पाम्बा षष्ट्या पश्चभिवरापास्य सशरचा हस्तावापसमारिष सरप्रेण सुताणे राजा विध्छेद संपा। २४॥तपास्य धनुर्दिछन्न पासात्यः शत्रु का । मबदारच वेगर धनुमास नवम् ॥२५॥ प्रज्वलभिध घेगेन संरम्भा दुनिसणः । मशोमत महेपासी धृष्यम्नः कृतयणः । ४६ ॥ पादशनारावास सतः पम्नगानिव । जिधासुमरतभेष्ठ धृष्ट्युम्नो म्यवासुजत ॥ २७ ॥ ते धर्म मे वित जिया राकः शिलाशिताः वियितर्वमुधा वेगात् कहिणवाससः ॥ २८ ॥ सोऽतिषियो महाराजपुत्रास्तति व्यपजता वसन्तकाले मुमान सपुष्पाय किंशुक:२९ सानिमा माराचःप्रहाजिरीकृतः।धृधुम्नस्प मल्लन हुदधिद कार्मुकं ३. पारस्वोंका महारथी सेनापति धृष्टद्युम्न वहांगया जहां कि राजा दुर्योधनथा २०। पहा भाकर महारथी शूरवार नकुल और सहदेव को उल्लंघनकर धृष्टद्युम्नने आपके पुत्रको शायकों से रोका । २१ । तब मापके साहसी क्रोधयुक्त पुत्रने ाँसकर धृष्ट पुम्न को पच्चीस वाणोंसे छेदकर पैंसठवाणों से घायलकर वदे शाब्दसे गर्जनाकरी 1 २१ । और फिर उसके वाण और इस्तत्राण समेत धनुपको अपने तीक्ष्णतुरप्रसे काटडाला २४ तव शरिजयी धृष्टयुम्नने उसटूटे धनुषको दालकर बड़े वेगसे बड़े भारसाक नपीन धनुपको हाथमें लिपा । ११और वेगसे लालने क्रोधयुक्त पापल तुमा धृष्टद्युम्न महायोभायमान हुमा । २६ । फिर सपोंके समान शास सेनेवाले पन्द्रह नाराचों को मारने के इच्यावान धृष्टद्युम्नने राजादुर्योधनके ऊपर छोडे । २०। वह तीक्ष्णधार कंक और मोरपक्षीके परीसे जटितवाण राजाके स्वर्ण बपी कवचको काटकर पृथ्वी में बड़े वेगते समागपे । २८ । फिर वह आपका पुत्र अत्यन्त घायलहोकर ऐसा शोभायमानहुआ जैसे कि वसन्तऋतुमें अच्छ। प्रफुल्लित किशुका होता है । २९ । नाराचोंसे टूटाकवच और महारोंसे घायल शरीर २८ कोपयुक्त दोधनन मल्लसे पृष्टद्युम्नके धनुपको काटा। और वही शीघ्रता- -- armies approached Duryodhan and checked him with his arrang 21. Your courageous son, with a smile, hit bis adversary with tweuty five and sixty firo arrows and roared loudly. Then he cut bis buvo and band-guard. Dhrishtadyamn the destroyer of fogs laid aside the broken bow and took up a now one. With eyes red in anger, wounded Dhrishtadyumn looked very glorious and discharged fifteen sharp ANTOWs at Duryodhan. The arrots, fitted with Kaik and peacock feathers, pierced the king'a arrmour and entered tho ground, Your EUD, Founded by them, looked glorious like akinshuk tree in bloom, With broken armour and wounded - (6532) Jahabbarat (६५३२) अथैनं छिन्नधन्यानं घरमाणो महीपतिः सायफे ईशमिः रामअधोमध्ये समापपक्ष ॥ ३१ ॥ तस्यतेऽशोभयन वयं कमांरपरिमार्जिताः । प्रफुलं पळून् यद्भमरा मधु लिप्स वः ॥ १२ ॥ तदपास्य धनुश्छिन्नं धृष्टपम्नो महामनाः अन्यदादर धेगेन घनुमन पोडश॥३३॥ो मुखम्मस्पान हामा सतर पञ्चभिः धनुचिपछद मलंग जातरूपपरिकतम् ॥ ३४ १५ सरकार उन शार्क वगं गदा षणम् मलविन्द दशमिः पत्रस्य तष पार्षतः॥ ३५ ॥ तपनीयाङ्गवं चित्रं नाग मणिमय। शुभम । यज कुरुपतदिछन्नं दपशुः सर्व पार्थिवाः ॥ ३६॥ दुर्योधनस्तु घिर छिन्न सायुध रणे । भ्रातर पर्यरक्षन्तं सोदरा भरतर्षभ ।। ३७ । तमारोप्य रथे राजन् दण्डधारो नराधिपम् । अपोषाहं रणादाशु धृपयुम्नस्य पश्यतः ॥ ३८ ॥ कर्णस्तु साफि जिरवा गज्यगृद्धीमदायलः । द्रोणहन्तारमुन ससाराभिमुखो रणे ॥ ३९. से टूटे धतुपवाले धृष्टद्युम्नको दश शापकोंसे दोनों भृकुटियों में घायल किया ।३१। बड़े कारीगरके स्वच्छ कियेहुये ननवाणों ने उसके मुखको ऐसा शोभाय मान किया जैसे कि मधुकेलोभी भ्रमर अच्छे फूलहुये कमलको शोभित करते है 1 ३२ | फिर उस महासाइसी धृष्टद्युम्नने उस टूटेडुये धनुप को डाल कर यहे वेगसे | सोलह मरलों समेत दूसरे धनुपको लिपा।११। इसके पीछे पांचवाणों से दुर्यो पन के सारथीसमेत घोड़ों को मारकर एक मल्लमे सुनहरी धनुप को काटा॥१४॥ फिर धृष्टद्युम्न ने भापके पुत्र के स्य, उपस्कर, छत्र, शक्ति खड्ग, गदा और धनाको भौर दश भल्लों से काम । ३५ । सब राजाभोंने दुर्योधन की उस टूटी- हुई ध्वनाको जो कि सुवर्णके वाचन रखनेवाली अपूर्व मणियों से जटिन नाम चिह्नवाली यति शुभरूपकी यो देखा १३६ हे मरतर्षभ फिर उस रपसे विहीन टूटे करत मोर मानावासे दुर्योधनको उसके निज भाइयों ने चारों ओरसे राक्षत किया 1 ३७ । इराना मपस उत्पन्न होनेवाली व्याकुलतासे रहित राजा दण्डधारी दुय्योधन को रथार वैगकर धृष्टद्युम्नके देखते हुये दरलेगया ।३८ फिर राज्यकालोमी महाल कर्ण सात्यकि को विजयकरके युद्धमें द्रोणाचार्यके मारने वाले उग्रवाणधारी पृष्ठ- पुम्नके सम्मुखगपा । १९ । फिर पाणोंको मारताहुआ सात्याकै उसके पीछे ऐसा body, Daryodhan cut the bow of his adversary and qaickly wounded hin an the forehead with ten arrows, 31. The woll-cleaned arrowa mado his face look glorious liko a lotus flower sprinkled over with bees. Bravo Dhrishtadyumn laid asids the brokon box, and having slain his borses and driver with five arrowe, cut his bow with one more. Then with ten arrows he cut the parts of his car, umbrells, apear, sword, mace and standard. 35. The warriors present there saw the broken standard of Duryodhan harin; the figure of an elephant on. His owa brothers came to his protection. Daadadhar unconfusedly took the prince on his car and took him far atray from the sight oi [१५१३) कर्णपर्थ Karn Paray 16533) पृष्ठतोऽभ्ययापूर्ण नेपो पितुष्टः । पारणाधनोपान्ते विषाणभ्यामिनिपाः .॥४.,॥ स भारत महानासीत् योधानां सुमहात्मनाम् । फर्णपार्वतयामध्ये सोयाना महारण: ॥४१॥ न पाण्डयानां नास्माफ पोषः कधित परांमुपः स्परश्यत पत् कर्णः पाचालास्त्परितो ययों ॥ ४२ ॥ तस्मिन्क्षण नरश्रेष्ठ गजवाभिजनक्षयः। मारासीदुमयतो रामायगतेऽहनि ॥४३॥ पाम्बालास्तु महराज त्वरिता दि जिगीषा ते सध्ययन फर्ण पतत्रिण च दुमम् ॥ ४४ ॥ तास्तथाधिरायः कुनो पायानामनाविनः । स्थिचिन्वानिय पालाः समासादयग्रतः ॥ ४५ ॥ व्याघ्रकेतन समर्माणं चित्रमयोप्रायुध जयम । शुक्लश्च रोचमानञ्च सिहाय बुर्जयम् ॥ ४६॥ पारा रप पेगेन परियानरोधमम् । सुमन्त सापकान अदं फर्णमाइप. शोभिनम ॥ ४ ॥युध्यमानस्तु तान गान मनुजेन्द्र प्रतापवान् । अष्टाभिरष्टौ राधेपोवईय शीघचला जैसेकि हाधीको दाधी दातोंसे जंघासस्थानमें पीडामान करताहुआ जाताहै 1 ४० हे.भरतवंशी पड़े महात्मा भापकं शूरवीरोंका वह महाघोर युद्ध कर्ण और पृष्टयान के मध्यमें ऐसा उत्तम हुआ। ४१ ! कि जिसमें पाण्डयों के और हमारी ओरके किसी पुरुषने भी मुखको न मोड़ा इसके पीछे वही शीघ्रता से, कर्ण पांचालों से युद्ध करनेलगा । ४२ : हे नरोचम राजा धृतराष्ट्र मध्याह्न के समय घोड़े हाथी मनुष्यों का विध्वंसन दोनों ओरमें हुआ। ४५ फिर विजयाभिलापी वह सब पांचाल शीघ्रता से कर्णके सम्मुख ऐसे गये जसे कि वृतकी और पक्षी जाते हैं । ४४ ! इसरीति से कोयुक्त वाणसमूहों से रोकतेहये अधिरथी कर्ण ने उन, उपाय करनेवाले सारसी सेनापति से मिले हुये । ४५ । न्याय केतु मुशर्मा, चित्र, उग्रायुध, जय, शुक्ल,रो- चमान, सिंहसन और दुर्जयको सम्मुखपाया । ४६ । उनपीरों ने उस. नरोत्तमको रथमार्गसे घेरलिपा जोके वार्नाका छोड़नेपाला कोषयुक्त होकर युद्धमें शोभादेनेवाला | या । ४७ । उप्त मतापी कर्ण ने उन द्रसे युद्धकरनेवाले आर्गवीरोंको तीक्ष्णधारवाले Dhrish tadyumo. Karan desirous of obtaining the kingdom, having conquered Satyaki, faced: Dhrishtadyumn the slayer of.Drona and wounded him with arrows as onu elephant wounds anothor with tusks on the thighs. 40. The battle botween those two warriors wau such that none of the varriors of the two sides turned back. Then Karan began fighting with the Panchals, Horses, elephants and men were destroyed at midday. The Panchals, desirous of conquest, went cagerly towards Karan aş birds fall on tree. Checking their urrows 'valiant Karan found Vyaghraketu, Susharma,a Chitra, Ugrayudh, Jaya, Shukl, Rochman, Siphasan and Durjaya face to face with him. 'self. They surrounded the enraged warrior wha looked glorious sphila discharging his arrots at the foe. Ho wounded them with eight Anove and slew thousands of skifal warriors. Then, in anger, he [6534] Mahabharat (६५३४) विशितः शरैः॥४८॥ अथापरान महाराजमतपुत्रः प्रतापवान् । जघान बटुसाहन्धान योधान युद्धविशारदान् ॥ १९॥ जिष्णुश्च जिष्णुकर्मार्ण देवापि भद्रमेवच । दण्डन्ध राजन समरे विचित्रायुधं इरिम् ॥ ५० ॥ सिंहकेतुं रोचमागं सलमच महारयम् नियमान मुसकुशं वेदनिमच महारयान ॥ ५१ ॥ तेषामाददतःप्राणानासीदाधिरये। वः । शोणिताभ्यूक्षितालस्प सदस्येवोजितं महत् ॥५२॥ तत्र मारत फर्णेय माता स्लादिताः गौ। सर्वतोऽभ्यद्वयनमीताः कुर्वन्तो महवाफुलम् ॥ ५३॥ निपेतुरूपी मपरे कर्णसायकनाड़िताः । कुर्वन्तो विविधान्नादान् वजनुभा श्वाचळाः ॥१४॥ गज पाजिमानुश निपतद्भिः समन्ततः । रयेवाधिरयेोर्गे समास्तीत भेदिनी ॥५५॥ नेव भीमो न च द्रोणो नाप्यन्ये युधि तायकाः । चक्रु स्म सारशं फर्म याद छतं रणे ॥५६॥ सूतपुत्रेण मागेषु श्येषु च रयेपुष । नरेषु च नरव्याघ्र, छत स्म कदम महत । ५७ ॥ सुगमध्ये पया सिंहो पश्यते मिर्मयधरम । पाचालानतिया मध्ये :क 'बाठमाणों से पाड़मानकिया। ४८॥ हे महाराज उनको पाईवकरके महामवापीर्ण ने उन अन्य इनारों शूरवीरोंको मी जो कि युद्धमें बड़े कुशलथे मारा । ४९ । इस केपीछे उस अत्यन्त क्रोषयुक्त ने जिष्णु, निप्णुकर्मा, देवापी, मद्र झण्ड, चित्र, चित्रा. | युष, हरि, सिंहकेतु, रोचमान, महारपी शलभ इन चंदेरी देशों के महारापियों को | मारा । ५। उस समय उनके प्राण हरनेवाले कर्णका शरीरऐसा होगया जैसे कि रुधिर से लिम शिवजी का घड़ा शरीर होता है । ५२ । हे भरतवंशी इसके मिनाय पुद्ध में कर्ण के बाणों से अनेक हाथी भी घायलडेय बड़ी ब्यकुलता उत्पन करने | पाले मयकारी वह हाथी युद्धमें कर्णके बाणों से चारोंभोरको भाग भागकर पूची पर गिरपड़े वनसे तादित पर्वतों के सपान घोरमाव्द करसहुये गिरनेवाले हाथीयोड़े मनुष्य और रथों से कर्ण के मार्ग की पृथ्वी, आच्छादित होगई। ५५ । कुदने मीम द्रोणाचार्य और अन्य प्रापके वशिने भी ऐसाकर्म नहीं किया जैसा कि | पद्धभूमि में कई ने किया । ५६ । हे महराज हाथी घोहे रथ और मनुष्यों का कणेके हाथसे नाशहुआ १५७ । जैसे कि मुगोंके मध्य में घूमनेवाला निर्भय सिंह Blow Jishnu, Jishnukarma, Devapi, Bhadra, Dand, Chitra, Chitrayudb, Hari, Sinhaketu, Rochmar, valiant shalabh and other warriors of Chapueri. 51. While destroying those warriors, Karan's form, stained in blood..looked dreadful like that of Rudra. elephants which, maddened with the sounds ran out in all directions and fell down here and there. Making a dreadful noise like that of mountaina struck by lighting, the elephants, horses, men and cara impeded the path atharan, 53, Bhishm, Drona and other wastioso of yours did not do deeds of bravers like those of Karan. Elephants, horses and cars were destroyed by him. Karan roamed amongst the the Panchals liko a lion amongst lower animals and put them to He wounded many कर्णपर्व Karan Parv (6535 [ोऽवाभीतयत् ॥ ५८ ॥ पथामृगगणांनस्तान सिंहो ब्राघयते दिशः। मालामा रपनातान की व्यद्रावयत्तथा ॥ ५९ ॥ सिंहास्यश्च यथा प्राप्य न श्रीवन्ति मृगाः चित् । या फर्णमनुप्राप्प न जीयनित महारयाः ॥ ६ ॥ धैधात यया दीत प्राप्य पद्धम्ति घे जनाः ।काग्निना रणे तहग्धा भारत सृजयाः ॥ ६१ ॥ कर्णेन बेदिकेन.पांचालेषु च भारत । विधाम्प नाम निहता पाहवः शूरसम्मताः ।। ६२ ॥ मम चासीन्मती राजन् दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् । नेकोऽप्याधिरथजीवन पांचाल्बो मोक्षते युधि ॥ ६३ ॥ पाचालान व्यधमत् सोय सूतषः पुनः पुनः ॥ १४ ॥ पाषालाप निनन्त फर्ण राष्ट्या महारणे । अभ्यधावत सकुशी धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥६५॥ धृपयुम्नस्तु राधेय द्रोपदेयाश्च भारिप । परिषा मित्रन शसशचापरे जनाः ॥ १६ ॥ शिसण्टी सइऐवश्व नकुलो नाफुलिस्तथा । जनमेजयः शिनेमा परम प्रमकाः ॥ ६७ ॥ पतं परोगमा भूत्या धृष्टद्युम्नस्य संयुगे । फर्ण मस्यन्त पशुओंको नाशकरता है उसीमकार कर्णभी पांचालों में निर्भया पूर्वक विचारा । ५८ । जैसे कि सिंह भयभीत मृगों को दिशाओंमें भगादेता है उसीपकार कर्ण ने पांचासों के रयसमूहों को भगादिया । ५९ । जैसे कि सिंह के मुखको पाकर कोई पशु नहीं जीता है उसीमकार महारथी कपको पाकर कोई जीयता नहीं रहा ॥३०॥ निश्चय करके जिसमकार सब जीवमात्र वैश्वानर अयि को पाकर भस्महोते हैं उसी प्रकार हे भरतवंशी संजयभी कर्णरूपी भग्नि से भस्म होगये । ६१ हे वारण कर्ण ने चंदरी कैकय और पांचाल देशियों के मध्य में नामों को सुना कर वीरों के अंगीकृत अनक युद्धकर्ताओं को पारा । ६२ । कर्ण के पराक्रमको देखकर मैंने विचार किया एकभी पांचालदेशी जीवता न बचेगा ।।१। कय ने युद्ध पांचालों को पारम्बार छिन्न भिन्न करदिया। ६४। इसके पाछे अत्यन्त प्रधियुक्त धर्मरान युधिष्ठिर उस महायुद्ध में पांचालोंके माग्ने वाले कर्णको देखकर सम्मुख दौथे । १५ । पृष्टद्युम्न, द्रौपदी के पुत्र, और अन्य हजारों मनुष्यों ने शत्रुके मारने | बाले कर्णको घेरलिया। ६६ । शिखण्डी, सहदय, नकुल, नकुलका पुत्र, जनमेजय सात्या के मभद्रक । ६७ । और धृष्टद्युम्न, यह सब बड़े तेजस्वी, युद्धमें सम्मुख flight. None of the warriors oncountering bim escaped with lifo liko animals fallen in the jaws ot a lion. 60. lhe Srinjayas wore destroyed by Keran as though they had fallen in the all devouring fire. Ho slow the notewortby worrors of Chanderi, Kaikaya and Panchal. On seeing karan's prowess, I thought that none of the Panchals would remain alive. He routed them again and again. Scoing them thus destroyed by bin, Yudhislithir attacked him. Durishtudyumn, the Sons of Draupadi and thousands of other warriors surtounded Karad. 8bik bandi, Sabadev, Nakul and his son, Janmojaya, Satyaki, Prabhadraks and Dhtishtadyumn faced Kaian in battle; but alone bo (6536) Mahabharat ' [६५३६] या बिरेजुरमितौजसः ॥ ६८ ॥ सांस्तथापिराधिः सोय धेदिपांचालपाण्डवान् । पको पहनभ्यपतद्वरमान् पनगा निध ॥ १९ ॥ तैः कर्ण स्याभवएवं घोररूपं विशा म्पते । तारक या पुरावृत्तं देवानां दानवैः सह ॥७० ॥ रात्र मर्मसु भीमेन नारा ताडिता गजाः । प्रपतन्तो तारोहाः फम्पयन्तिस्म मेदिनीम् ॥७॥ धाजिनश्च इतारोः पत्तयध गराासघः । शेरते युधि निर्भिमा घमन्तो रुधिरं बहु ॥ ७२ ॥ सासम्रशा थिनः पतिता परितायुधाः। ते कृताः समपन्त भीमादीता गसासवः गधिभिः सादिमिः सतः पादासर्वानिमिर्गः । भीमसेनशरच्छिन्नेराउन्ना बसु धाभवत् ॥७३॥ तत् स्तम्भितमिवातिष्ठगीमसेनमयादितम् । तुर्योधनपलं राणम् नियत्माहं कृतप्रणम् ॥ ७९ ॥ निधेट तबलं दीन भी तस्मिन् महारणे ॥ ७५ ॥ प्रसासतिले काले यथा स्यात् सागरो नृप । सदसवलं तमे निधलं समवास्थितम ॥ ७६ ॥ मायुधीर्यवळोपेतं पात प्रत्पधरीपितम् । ममवतयं पुत्रस्य तत् सैन्य होकर घनुपधारी बाण फेंकनेवाले कर्ण के सम्मुख होकर वाण और अनों समेत शोभापमान हुये । ६८। वहां अकेला कर्ण युदमें उन चंदेरी पांचालदेशी भौर अन्य शूरवीरों समेत पारदबोंके सम्मुख ऐसे हुआ जो कि सोंके सम्मुख अकेला गरुड़ होता है ।६९। हे रामा उन सबके साय कर्ण का ऐसे घोररूप युद्धहुआ जैसे कि पूर्व समय में देवताओं का युद्ध दानवों से हुआया। ७० । और भीमसेन के नाराचों से हाथी मर्मस्थलों में घायल हुये जिनके सवार मारेगये उन गिरतेहुओं ने पृथ्वी को कम्पायान करदिया घोडोंने भिनके सवार मारेगये ये और पनियोंने भी युदमें घायल रुधिरको नमन किया। ७२ । और जिनके किशन गिरपड़े वह हजारों रथी प्रश्वमवार सारथी पदावी घोड़े यह सब हाधियों समेत घायल होकर भीमसेन. से भयभीत और मरहुये दृष्टपड़े । ७३'। दुर्योधनकी वह सय सेना भीमसेन के भयसे पीड़ित अचेष्टितों के समान नियत थी । ७४ । उत्साह से रहित घायल और अंगचेप्या दिना अत्यन्त दाखी रूप युद्ध में दिखाई पड़ी । ७५ । हे राजा जैसे कि प्रसन्न काल में स्वच्छ जलवाला समुद्र स्थिर निपत होता है उसीमकार मापकी रोना भी निश्चल होगई । ७६ । क्रोध पराक्रम faced the warriors of Chanderi, Panchal and uther allies of the Pandavas as Garur encounters serpents. He fought with them as the 'gods had once fought with asurs 70. Bhimren slew elephants with bis arrows and they fell down shaking the tarth. The riderless borsos acid foot soldiers vomitted blood and tell down along with the car. Warrios, hoises, drivers, foot soldiers hoises and elephants. The army of Daryodban terribed by Bhim, stood motionless, courageless, wounded and dejected. 75. Your army became motionless like the sea in a calm weather. The army of your enrnged son, destitute of pride and glory, stood bleeding and wounded. • Karan and Bhim, (६५३७) 098 Karau l'ary (35371 निपमं तदा ॥ ७७ ॥ तल भरतश्रेष्ठ युध्यमानं परस्परन् । रुधिरोधपरिक्लिभं रुषिगई यभूध तु ॥ ७० ॥ सूतपुची रणेमुद्धः पारउवानामनीधिनीम् । भीमसेना कुरूंश्चापि द्रावयन पहुयशोमत ॥ ॥ परमाने तथा गद्रे शंग्रामेऽयदर्शने निहाय पृतनामध्ये संशप्तकंगणानबहन् । भर्जनांजपताश्रेष्ठो बासदेवमणप्रांता८१६ प्रमग्नं पलमेतरि योत्स्थागानं सनाईन एते पशि सगणाः सशतकमहारथाः । मपात्यन्तो मवाणान सिंहशदं मृगाच॥२॥ दास्यते च महार सैन्य जयाना मदारणे ॥ ८३ ॥ हरीशक्षा असो कण हेतुः पर्णस्य धीमतः । श्यते राज । सैन्यस्य मध्ये विचरतो मुहुः ॥ ८॥ न च कारणे शका जैतुमन्ये महारथाः । जानीते हि भवान् कर्ण वीरपन्त पगमे । तन याति यतः कर्णों द्वापयत्येष नो पळम् ॥ ८५ ॥ पज्जीयत्या रगे याहि सूतपुत्र नहारयम् । एप मे रोचते कृष्ण यथा षा तप रोयते ॥ ८६ ॥ एतात्या बचतम गोविन्दः प्रहसनिय । मनपी से पुक्क आप पुषको यह सेना. अहंकार से परामित होकर शोभा से रहित होगई । ७५ । हे भरतप वह सेना. परस्पर घायल कर रुधिरों से लिप्सहागई. 1७८ । फिर युद्धमें क्रोधयुक्त पराक्रमी कर्ण पाण्डवों समेत सेनाको और भीमसेन भी कौरवों समेत कौरची सेनाको भगातेहुये शोभायमान पे । ७९। इस रीतिसे महा घोर भयंकर युद्धमारी होनेपर महाविजयी अर्जुन सेनामें संसप्तकों के बहुतसे.सनहों को मारकर फिर वामदेवनी से बोला । ८१ । कि हे जनाईनजी यह युद्धाभिलाषी सेना छिन्नभिन्न होकर पराजितहुई यह संसप्तक महारथी अपने समूहों समेत मेरे बाणों से ऐसे भागते हैं जैसे कि सिंहके शन्दको सुनकर मृग भागते हैं। ८२ । और बड़े युदमें मृज्जियोंकी बड़ीसेना पृथक् दुईजाती है । ८३ हे श्रीकृष्णची राजाओं की.सेनाके मध्यमें प्रसन्नतापूर्वक घूमनेवाले बुद्धिमान कर्णफी यह ध्वजा दिखाईदेती है जिसमें कि हाथी की कक्षाकाचिन्द है। ८४और कोई महारथी कर्णके विजप करने को समर्थ नहीं है आपभी कर्ण को वड़ा पराक्रमी जानते हैं अब आप वहां चलिये जहाँपर कि वह कर्ण हमारी सेनाको भगारहा है । ८५ माप इन सबको 'स्पांगकर युद्ध में महारथी कर्ण के सम्मुख चलिये हे श्रीकृष्णजी मुझको यह चित routing the armies of the Pandavas and the Kauravas respectively, were glorious to bebold. When the battle was thus raging, furiously, Arjun said to Vasuder, " This army has been vanquished and dispersed. They are running away from my arrows liko deer from a lion: The great army of the Srinjayas is being dispersed,83. Yonder is to be soon the standard, with the ensign of elephant's rope, belong- 'ing to Karan who is roaming cheerfully and whom none can conquer, You know, lis prowess Krishn. Let us now go to the place where Karan is putting our army to fight 83. I think it will be better that you leave sil others to faco Karan for aught you know still । - (6538) Maliabhalat परनं तूग फोरम आदि पापड ततस्तथ महासन्यं गोविश्वप्रेषिता हयाः। ईसपा प्रविमुहातः कृष्णगडयो । ८८ ॥ केशवप्रेषितेरथैः श्वेतः कारण नभूपमः । प्रशिस्ति यले पर्दिशमभिवत ॥ ८९ ॥ मेघस्तनितनिदि। स रोवार । बलस्पताकस्तां सेनां विमानं धामियाविशत् ॥ ९ ॥ तो विधार्य महासमां प्रविष्या केशवानो । कुलो संस्मरकाक्षी न्यम्राजेता महाती ॥ ९१ ॥ गुहशोबडो समाहुतावागतो तो रणाचरर । यज्यभिर्विधिनाहूतौ मले स्वाधिषादिनी । ९२ ॥ मुझो तो त मरवानो पेगपम्वा यम्यनुः । तलशब्देन तो यथा गागौ महावने ॥ १३ ॥ विगाह्य तु रयानीकमश्यसघांच.फाल्गुनः । स्वचरत् पृतनामध्ये पाशहत्त इबालकाः ॥ ९५ ॥ दरष्टा युधि विक्रान्तं | मालूम होता है अशा ती प्रापकी इच्छाहो वही करना योग्य है । ८६ । उसके इसबचनको सुनकर गोपिन्दनी हँसकर चोलेहेपाड तुम शीघ्रही कौरवों को मारो८७ इसके पाउ गोविन्दगी की आज्ञानुसार अपने सारथी रूप श्रीकृष्णजी समेत श्वेत इसपर्ण घोड़ों को सबारी से अर्जुन भापकी सेनामें भापहुँचा । ८८ । केशवजी का भाज्ञाकारी सपा के भूपणां से युक्त शेत घोडों के रथके पहुँचतही भापकी | सेना चारों दिशाओं में इटगई । ८९ । वादलके समान शन्दायमान हनुमाननी की प्रजासे संयुक्त चेष्टावान् पताकावाला वह रथ उससेनामें ऐसे पहुँचा जैसे कि स्वर्ग में विमान पहुँचता है। वह अर्जुन और कैशवजी दोनों सेनाको चीरते | हुये प्रविष्टहुये और क्रोध से भरे लालनेत्र कियेहुये बह दोनों श्रीकृष्ण अर्जुन शो. | भायमानदुये ।,९१ । युद्धमें कुशल और चुलायेहुपे वह दोनों युद्ध में ऐसे मापहुँचे जिसप्रकार विधिपूर्वक यज्ञ करनेवालों से आहान किये हुये अश्विनी कुमार होते हैं। ९२ । फिर क्रोधयुक्त वह दोनों नरोनम ऐसे युद्ध में महत हुपे जैसे कि महावन में तल शन्द से क्राधित महावली नाग होते हैं। ९३। फिर अर्जुन रयों की सेना और घोड़ों के समूहों को मझाकर पाशधारी यमराज के समान सेना में घूमने लना । ९४॥ हे भरतवंशी युद्ध में आपकी सेना के मध्यमें पराकम करनेवाले उस अर्जुन better. On hearing this, Govind said, “3take haste to destroy the Kauravas." At this, Arjun, acting upon the advice of Krisha, drove bis Shawʻliko horses into your army. Your army scattered at the sight of the white horsen decked with gold ornaments. The car, equippod with the figure of nuisy Hanuman, reachod like a celestial ar in the midst of your army. 30. Both Arjun and Keshav entered in the midst of the army with rod eyes. The two warrios, challenged to fight, entered the army libe Ashwinilumais invited to a sacrifice. Tlie two curaged wurrius vero ibtu engagidip fighting like elephants startica ly the leat of jalms in a forest, Breaking through the lines of cars and horser,Arjun reantd there lihe Ysm the bearer of - कंगपर्व Karan Paray (6539) सेमायां तप भारत । संगतकगणार मयः पुत्रम्ते .समयोदत ॥ १५ ॥ ततो वसामण विरदामा प्रिमिः शतः । चतुरंशसहन स्तनागाणां मरावे ॥ ९६ द्वाश्या शतसहसाध्या पदासानाच धग्विमाम् शिराणा लाभलमानां विदिनानां सम म्तवः . ९७१ मावतात कौतय छावणातो महारयाः । शरयमसराज ततः पाण्डमग्नमम् ॥९८ ॥ संहापमानः समरे शरैः परपलाईनः ॥ १९॥ यमौद्रमा रमान पाराहस्त इयान्तकः । निम्नन संशप्तकान पाया प्रेक्षणीपतरोऽभयत् । १०. ततो विपत्प्रभवाः कास्मिरयिभूषितः । गिरवर भिषामाश माच्छ किटिना ॥ १०१७ फिरीटि मानिमुक्तः सम्पतद्धिमहाशरः । समाच्छन्नं पभो सबै कादयेवरित प्रमो । १०२ ॥ रुपमहान् प्रसन्नामान शगन् सातपर्वणः । अथाएजदमेयात्मा दिनु सामुपाण्डकः ॥१०३ ॥ मही वियदिशः सर्या: समुद्रा गिरयोऽपि या। स्फुटन्तीति जना नः पार्यस्प तलमिरयमात् ॥ १०४ ॥ इत्यावश सहस्राणि पार्यिघाना महारथः। को देखकर आपके पुत्रने संसप्तकोंके समहांको फिर प्रेरणाकरी ।१५। तवहजार रथ वीनसौहावी पौदाहजार घोड़े और दो९६लाख धनुपपारी शुरवीर लक्षोंके बेधने वाले चारोमोरसे घिरेहुये पदातियों समेत महारथी अर्जुनको वाणोंसे माच्छादित करतेहुये सम्मुख पर्वमानहुये । ९८ । हे महाराग उन सवलांगोंने चारोंओरसे वाणोंकी याकरके अर्जुनको दकादया फिर शत्रुकी सेनाका पालामान करनेवाला युदमें वाणोंस ढकाहुआ यह अर्जुन पाशधारी यमराजके समान अपना रुद्ररूप दिखलावाहुआ और संसप्तकों को मारताहुआभपूर्व दर्शन के योग्यहुमा ।१०। इसके पीछ विजली के समान प्रकाशमान सुवर्णसे अलंकव अर्जुनके चलायेहुये वाणोंसे सर आकाशकगया । १.१ । यहाँ भर्जुनके रोडहुपे बड़े वाणों के गिरनेसे सब आकाश भाच्छादित होकर ऐसा शोभायमानहुभा जैसे कि कद्रुके वेटे सपोंसेव्याप्त होकर शोभितहोताहै । १०२ । बड़े साहसी पापहवने सुनहरी पुखयुक्त साक्ष्णनोक देदे पवाले वाणों को सब दिशाओं में छोड़ा । १०३ । मनुष्योंने अर्जुनकी | प्रत्यंचाके भन्दसे यह अनुमान किया कि पृथ्वी आकाश सब दिशा समुद्र और पर्पत टूटते हैं । १० । महारवी अर्जुन दशहनार क्षत्री महारथियों को मारकर noase. Swing Arjun fight in the midst of your army, your son again urgal tho Sinsaptaks. Then a thousand car-wariors, tbree hundred clopbants, fourteen thousand horse and tiro handred thousands of good archers on food Burtoanded Arjua, corering him with arrows. Arjan tho dostroyer of focs, bid by the arrows assumed a dreadful form like that of Yam and legan slaying the Sanrpataks 100. All the sky was covered with Arjua's arrows swift like lightning which sppaanod like offspring of Kadro. The braye Pandar shot his gloden arrows in all directions From the trangs of Arjun'a bow people Slanal,harat (6540] (६५४०) संशप्तकानां कौन्तेयः प्रपल पीरतोऽदयात् ॥ १०५. ॥ प्रपक्षश्च. समासाद्य पार्थः काम्पोजगीतम् । प्रममाय लावाणे हनिघानिय वासपः ॥ १६॥ प्रषिध्छेदाशु भल्लेन द्विषतामाततायिनाम । शत्रपाणी स्तथापाहूं स्तया बचाःशिरसि च ॥१०७ मनाजायप्रियायुधास्तेऽपतन भधि। विश्वपातमिसंभग्ना बहुशाखा इषमाः ॥ १०८ ॥ इस्त्यश्वरयपत्तीनां मातानिनन्त मजुनम् । मदक्षिणादपरजः शरदृष्टपाध्य कषत् ॥ १०९ ॥ तस्यास्पताऽर्स पादाभ्यां पाडू परिषसपिभी । पूर्णचन्द्राभयका इच क्षुरेपणास्यहरष्ठिरः । ११० ॥ स पपात ती पाहात् मुलोहितपरिषः । मनः शिलागिरेः गृहं बनणय घिदारितम् ॥ १११ ॥ सुदक्षिणां दवर काम्बोज दाई तम् । मांशु कमलपत्राधमत्यर्थ प्रियदर्शनम् ॥११२ ॥ कांचनस्तम्भसदृशं मिलं हम शीघ्रदी संसप्तकों के सम्मुख गया ।२०५१ वहां अर्जुनने काम्बोज के राजासे रक्षित सेनाको नेत्रों के सम्मुख पाकर अपने वालोंके वलसे उसको ऐसे मारा जैसे कि दानवलोगों को इन्द्र मारता है। १०६ । और बड़ी. शीघ्रता से मारनेके इच्छावान शत्रुलोगों के शस्त्र भुजा हाथ और शिरों को भी,काटा । १०४ वह शखोसेरहित टूटेअंग पृथ्वीपर ऐसे गिरपड़े जैसेकि संसारी, वायु से टूटे बहुत शाखावाले वृक्ष गिरते हैं । १०८ । हाथी घोड़े रथ य रथियों के समूहों के मारनेवाले अर्जुन ऊपर मुदक्षिणके छोटे भाईने वाणोंकी वर्षाकरी । १०९ । तव अर्जुनने उस वाणवा करनेवाले की परियके समान दोनों भुजाओंको दो. अर्द्धचन्द्रोंसे और पूर्णचन्द्रमाके समान मुखवाले शिरको तुरमसे जुदाकिया । ११० । उसके पीछे बढेरुधिरको गिरानेवाला वह राजा रथसे ऐसे गिरपड़ा जैसे कि वजसे फटाहुआ मनशिल पर्वतका शिखर गिरतीहै । १११ । मुदाक्षणके छोटेभाई. कांबोजदेशी कुमल पत्र के समान, नेवधारी उन्नत पड़े तेजस्वी अपूर्व दर्शन, को जो कांचनले स्तंभसमान टूटे हेमागरिक समान वर्तमानयामारा । २१३ । इसके अनन्तर फिर महाघोर युद्ध जारीहुमा उप्त युद्धमें लड़नेवाले शूरवीरों की नानी believed that the earth, sea and mountains: tvēre brealingHaving slain ten thousands of warriors. Atjun attacked the Sansaplake., Seeing the arıny protected by the king of Kamboj, he slew them as Indră does ths Dapajas. He cut down the weapons, arms and hands of the foes. Destitute of weapons and wounded they fell down like trees broken by the wind. Sudakshin's younger brother , showered allows ofer Arjuo, bat the latter cut both his club like arms with crescenti shaped arrows and severed also his head havịng moon like His bleeding body fell down from the car like a hill struck down by lightning. Thus vas sláin Sudarshan's brother whose face was like that of lotus patals. He fell down like a mountain of gold, 113. face.10.
og Karan Pary (651) गिरिपातमोऽमपत् पन{मं घोरमस्यधमतम । नानापायाध योजना पपुरा गुरुपताम् ॥ ११५० एमनिहतरयः सम्पयनः शकः गणिता सदा रकंसवासीविशाम्मत ॥ ११५० रपवारमय हतारोदेध पाजिभिः । हिप हतारो मामांत्र सदियः । मापोऽपिन महाराज छतो घाणे जनसपा .११६ ॥ तस्मिन् प्रपक्षे पक्ष थ निहवे सम्पसाधिना । मर्जुन जपता ई परितो बोगितयात् १७॥ रिम्पानो महच्या फार्चपराविभूषितम् । पायदानः दारा घोरान घरदमानिय मारकरा । ११८ धामपांविषयी लोमिताक्षो पोयली। मस्तकाल पधा यो मृत्युः पिण्यभृत् । १२९. ॥ ततःमाएअनुप्राणि शरपाणि सायशः पिरामियाज परपत् गादी यमः ॥ १२॥ सरप तुपासाई स्थगनस्प पिशाम । प्रायजनुप्राणि शरयपनि मारिए,१२१ ॥ पतामहाराज श्रीनिमुः समन्ततः । संदितो रपस्थी तापमो नया प्रकार की अपूर्वदशा परमान। १० । अर्थात् पाणसे मोठ्ये काम्नौन देशी यानदेशी मार शकदेशो घोड़ोंसे और कपिरसतिम तारवारों से सब रुपिर | मपी भूमि होगई ।।१५। मृतक घोड़े औरसारापालेरय वामृतक सवारों के पोरे पा मृतक हाथीवान और सवारों वाले हापियों से परस्समें मनुष्यों का पानाशा 11.१६ । प्रार्जुन के हाथ से उस पन और मात के मरनेपर पड़ी धीमतापूर्वक मवत्यामानी उस महाविनयी भनके सम्स गपे । ११७ । मुगणनटिन पड़े धनुपको कम्पापमान करता मूर्य की किरणों सनान घोरयापोंको लेना ।१३८ । कोप और अशानी से फलाहमा मुख रक्तने यह पराक्रमी ऐसा शोभायमान हुमा से कि मलपकाल में किकरनाम दगड्या कोथरूप माग्न होताई 1११४॥ इसके पीछे उग्राणों की वर्षामों को बरपाया हे महारान उनछोडे पे पाणों से पांजी सेनाको भगाया । १२० । राजा उसने रपपर सवार धाकृष्ण जीको देरातही फिर उप्रयाणों की वर्षा करी। १२१ । तर हे महारान अपत्यामाके हे पे और पारों ओर से गिरते हुये उनबाणों से यह रपार बरे हुपे दोनों Tha G;lting warnors vero ja n slmng plight. Slain by arrows, tho Cambojas, Yurans and Shaky with bleeding bodics, lay on carth. Warriora destitute of horses and disore, riderla horses and clonhanta weru slain there. At the slaughter of both tho dus by Arjun, Ashrathauntinesd him. Shaking this bar, spressling arrons like the rays of the Sun, thu enraged warries with red eyes, looked glorious like the firo ol pralaya Ilo put the Pandar Warriors to fight with thasmorer of his arrorm120. llo wint forth his arrows at Krisba. Both Krislin And Arjun rerü bil in their ar by his arrons and rroundesi The people cried in terror at the sight of those tro protectors of t5a armies kin; hii under the cload of arrows The । 16544) Malabharat [६५४४] शतशोऽथ सहमशः । पश्यतस्तस्य धीरस्य तय पुत्रस्प मारिप ॥ १५३ ॥ एषमेष क्षपो वृत्तस्तावकानां परैः सह । तरो विशसनो घोरो राजन् दुर्मन्त्रिते तय ॥१४४ ।। संशप्तकांच धीमत्सुः कुस्थापि वृकोदरः। वसुपेणश्च पाचालान क्षणेन व्यघमणे ॥ १४५ ॥ परीमाने तथा रौद्रे राजन् धीरवरक्षये। उत्थितापगणयांनि कपन्धान समन्ततः ।। १४६ ॥ युधिष्ठिरोऽपि संग्रामात् प्रहारदिवेदनः । कोशमाप्रमपक्रम्य तस्थी भरतसराम ।। १४७ ॥ इति कर्णपर्वणि संकुल युद्धे पट् पञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ अर्जुनने उस आपके वीर पुत्रके देखतहुये किया ।' १४३ । इस रीतिसे आपके कुमन्त्रों के कारण शत्रुओं के साथ आपके शूरवीरों का यह महाघोर नाश बर्त- मान हुआ । १४४ । अर्जुनने संसप्तकों को भीमसेनने कौरवोंको क सुपेणने पांचा लोको क्षणमात्रमेहा युदभूमिमें छिन्न भिन्न करदिया। १५५ । हेराजा इस रीतिसे उत्तम वीरोंके सम्मुख नाशकारी युद्ध के होनेपर चारोभोर से असंख्य रुण्ड उठ | खड़े हुये । १४६ । हे भरतर्षभ प्राघातों से कठिन पीडामान युधिष्ठिरभी युद्धमें एक कोस हटकर नियतहुआ। १४७ । 1 slew thousands of your warriors, through your evil policy. Arjun routed the Sansaptake, Bhimsen slew the Kauravas and Karan slaughterou the Panchals. Thousands of headless trunks were to be seen on tho field of battlo in a moment. Having received many wounds, Yudhishthir stood a wile from the scene of action."147 [ ६५४१) फर्णपर्ष Karn Paray (6545) सञ्जय उवाच । दुयोधनस्ततः कर्णनुपेत्य भरतषभ । अनवीन्द्रराजश्व तथै धान्यांध पार्थिवान् ॥ १ ॥ यरच्छयैतत् संप्राप्तं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः कर्ण लभन्ते युद्धमाशम् ॥ २ ॥ सदशैः क्षत्रियः शर गणां युद्धता युधि । पति राधेप तदिदै समुपस्थितम् ॥ इत्या या पाण्डधान युद्धे स्फीतामुवीमवाप्स्यथ । निहता.: परयुद्ध धौरलोकमहास्यथ ॥ ४ ॥ दुर्योधनस्य तच्छुम्या पचनं क्षत्रियमाः । दृष्टा नादानुवोशन यादिधाप घ सर्वशः ॥ ५ ॥ ततः प्रमुदिते तस्मिन् दुर्योधनयले तदा। हर्षयातायफान् योधान् द्रौणिर्वचनम प्रवीत् ।। ६ । प्रत्यक्ष सर्वसन्यानां भवताश्चापि पश्यताम् । न्यस्त शस्रो .मम पिता. धृष्टद्युम्नेन पातितः ॥ ७ ॥ स तेनाहमण मित्राधे धापि पार्थिवाः । सत्यं यः प्रतिजानामि तद्वाफ्यं मे नियोधत । ८॥ धृष्टद्यम्नमात्यादं न विमाक्ष्यामि देशनम् । अध्याय ५७॥ संजय वोले हे भरतर्षभ इसके पीछ दुर्योधनने शल्य आदि अन्य राजामों समेत कर्णसे कहा कि । १ । देवइच्छासे यह स्वर्गकाद्वार खुलाहुमा है ऐसे युद्धको स्वर्ग और मोक्षक पानेवाले क्षत्री लोगाते हैं । २ । हे व.र्ण तुझते युद्ध करने वाले शूरवीर क्षत्रियों के चित्तका जो प्यारा होता है वह दिन भाज वर्तमान है 1३ । युद्धमैं पांडवों को मारकर सद्धियुक्त पृथ्वी को पावोगे अथवा युद्ध में शत्रुमोके हाथ से मरकर वारों के लाकों को पायोगे।४ । वह सब श्रेष्ठ क्षत्री लोग दुर्योधन के इस वचनको मुनकर बडे प्रसन्न होकर अत्यन्त उच्चस्बरसेगमें और वाजोंको वजाया । ५ । इसके पीछे दुर्योधनकी उस सेनाके अति प्रसन्न होने पर अश्वत्थामाजी आपके शूरवीरोंको प्रसन्न करते हुये यहवचनवाले । ६ । किसर | सेनाके मनुष्यों के और आपके सपक्षमें शत्रोंका त्यागनेवाला मेरारिता इस पृष्ठ घुम्न के हाथते मारागया । ७। हे राजालोगो इसहेतुसे क्रोध और मित्रके लिये भी तुमसे सत्यपतिज्ञा करताहूं उसको आपसब समझो । ८ । मैं धृष्टद्युम्नको जबतक न मारलूंगा तब तक कवचको नहीं उतारूंगा जो मरी प्रतिज्ञा पूरी न होगी | तो स्वर्गको भी मैं नहीं पासत्ता । ९ । युद्धमें भीमसेन अर्जुन आदि जो कोई CHAPTER LVII Sanjayn said, " Then Duryodhan said to Karan in the presence of Shalya and other kings. " It is by good luck that the way paradise is open for kshatryns engaged in fighting. This is the time which kshatryas like you seek for. You will secure the kingdom by slaying the Pandavas, or gain the region of the brave, if you aro slain by them." The warriors roared in glee at the words of Duryodhan. Then Aslıwathama said as follows to cheer up still more tho Army of the Kauravas, "My father who had laid aside weapons was slain by Dhrishtadyumn in the presence of all the warriors. For to {6544) NIaliabharat {६५४४] शतशोऽथ सहस्रशः । पश्यतस्तस्य धीरस्य तव पुत्रस्य मारिप ॥ १५३ ॥ एवमेप क्षयो वृत्तस्तावकानां परैः सह । क्रो विशसनो घोरो गजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥१५४ ।। संशप्तफांश्च वीभत्सुः कुश्चापि वृकोदरः। वमुपेणच पाशालाम् क्षणेन व्यधमद्रणे ॥ १४५ ॥ वचमाने तथा रौदे राजन धीरवरक्षये। उत्थितापगंधांनि धन्धान समन्ततः ॥ १४६ ॥ युधिष्ठिरोऽपि संग्रामात् प्रहारगाढवेदनः । कोशमाप्रमपक्रम्प तस्थी भरतससम ॥ १४७ ।। इति कर्णपर्वणि संकुल युद्ध षट् पञ्चाशोऽध्यायः ॥५६ ॥ अर्जुनने उस आपके वीर पुत्रके देखतहुये किया । १४३ । इस रीतिसे आपके | कुमन्त्रों के कारण शत्रुओं के साथ आपके शूरवीरों का यह महाघोर नाश परी मान हुआ। १४४ । अर्जुनने संसप्तकों को भीमसेनने कौरवोंको क सुपेणने पांचा लोको क्षणमात्रही युदभूमिमें छिन्न भिन्न करदिया। १५५ । हेराजा इस रीतिसे उत्तम वीरोंके सम्मुख नाशकारी युद्ध के होनेपर चारोंभोर से असंख्य रुण्ड उठ | खड़े हुये । १४६ । हे भरतपम प्राघातों से कठिन पाढामान युधिष्ठिरभी युद्धमें एक कोस हटकर नियतहुआ । १४७ । slew thousands of your warriors, through your evil policy. Arjun routed the Sansaptaks, Bhimsen slew the Kauravas and Karan slaughtored the Panchals. Thousands of headless trunks were to be seen on the field of battlo in a moment. Having received many wounds, Yudhishtbir stood a inile from the scene of action." 147 ३ [ ६५४१) फर्णपर्ष Karn Paray (6545 सञ्जय उवाच । दुर्योधनस्ततः कर्णमुंपत्य भरतपम । अनवीन्मद्रगजश्व तथै घान्यांध पार्थिवान् ॥ १ ॥ यदृच्छयैतत् संप्रासं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः फर्ण लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ २ ॥ सदृशैः क्षत्रियैः शरै गणां युद्धता युधि । इट मपति राधेय तदिदं समुपस्थितम् ॥ ॥ इत्या चा पाण्डघान युद्धे स्फीतामुर्वीमवाप्रपथ । निहता. परंयुद्ध धारलोकमहाप्स्यथ || ४ ॥ दुर्योधनस्य | सच्या पचनं क्षत्रियपभाः । हृष्टा नादानुवफ्रोशन यावित्रा घ सर्वशः ॥ ५ ॥ वतः प्रमुदिते तस्मिन् दुर्योधनवले तदा । हर्षयम्ताधकान् योधान् द्रौणिर्वचनम प्रवीत् ॥ ६ । प्रत्यक्षं सबसन्यानां भवताश्चापि पश्यताम् । न्यस्त शस्रो मम पिता. धृष्टद्युम्नेन पातितः ॥ ७ ॥ सतनाहगमर्पण मित्राथै चापि पार्थिवाः । सत्यं यः प्रतिजानामिनाक्य मे नियोधत ॥८॥धृष्टद्यम्नमात्याई न विमायामि दंशनम् । अध्याय ५७॥ संजय बोले हे भरतर्षभ इसके पीछे दुर्योधनने शल्प आदि अन्य राजाओं समेत कर्णसे कहा कि । १ । देवइच्छासे यह स्वर्गकाद्वार खुलाहुभा है ऐसे युद्धको स्वर्ग और मोक्षक पानेवाले क्षत्री लोगपाते हैं। २ । हे कर्ण मते युद्ध करने वाले शूरवीर क्षत्रियों के चित्तका जो प्यारा होता है वह दिन भाज वर्तमान है । ३ । युद्धमैं पांडवों को मारकर श्राद्धयुक्त पृथी को पावोगे अथवा युद्ध में शत्रुनोंके हाथ मरकर वीरों के लाकों को पायोगे । ४ । वह सव श्रेष्ठ क्षत्री लोग दुर्योधन के इस वचनको सुनकर बडे प्रसन्न होकर अत्यन्त उच्चस्परसेगर्ने और वाजोंको बनाया । ५ । इसके पीछे दुर्योधनकी उम सेनाके अति प्रसन्न होने पर अश्वत्थामाजी भापके शूरवीरों को प्रसन्न करते हुये यहवचनवाले । ६ । किसब सेनाके मनुष्यों के और आपके सपक्षमें शत्रोंका त्यागनेवाला मेरारिता इस धृष्ठ एम्न के हाथते मारागया । ७ । हे राजालोगो इसहेतुसे क्रोध और मित्रके लिये भी तुमसे सत्यप्रतिज्ञा करताहूं उसको आपसव समझो । ८ । मैं धृष्टद्युम्नको जबतक न मारलंगा तब तक कवचको नहीं उतारूंगा जो मेरी प्रतिज्ञा पूरी न होगी तो स्वर्गको भी मैं नहीं पासत्ता । ९ । युद्धमें भीमसेन अर्जुन आदि जो कोई CHAPTER LVII Sanjaya said, " Then Duryodhan said to Karan in the presence of Shalya and other kingga. " It is by good luck that the way to yaradise is open for kshatryns engaged in fighting. This is the time which kshatryas like you seek for. You will secure the kingdom by slaying the Pandavas, or gain the region of the brave, if you aro slain by them." The warriors roared in glee at the words of Duryodhan. Then Aslivathama said as follows to cheer up stil more the army of the Kauravas, "My father who had laid aside weapons was slain by Dhrish tadyumn in the presence of all tho warriors. For 16546] maintent अन्वारा प्रतिज्ञायां न हि स्वर्गमाप्नुयाम् ॥९॥ मजनो भीमाश्य यश्च मां मायुदपति inान प्रमधिमिति में वायसरायः ॥ १० । एवमुचं ततः गर्गा मदिना भारती म् । सायदया कौन्तयोस्तथा ते चापि पापडचाः । ११ ॥ स सभिपातो रगय्यपानां महात्मना भारत मोहनपः । जनतो कालयुगातकल्पः प्रावचत प्र फुरस्नानाम् ॥ ११ ॥ ततः प्रचं युधि मनधारे भूतानि सणि संदेवतानि । । आमन् सभेतानि सदासोभिर्दिशमानानि नाप्रवीगार । १३ ।। विध मायाधिविधध गदि पथ रत्नाविधनरामगन् । रणे सोदतः प्रची रानवाफिरममा प्रहप्टाः । १४ ॥ समीरणांचा निषेव्यगन्धान सिषेव सर्यो नपि योधमुपयानु । नियमापास्त्वनिलन योधाः परस्परला धरणी नितः ।।१५।। सा दियपुपौधको माना सवर्णएं अध शचित्रः । नक्षसरिय विधिता शूरवीर :एम्नका रक्षकहोगा उसकोभी मैं युद्ध में थानोंसे मारूंगा। १० । इस वचन के सुनतेही भरत शियों की सजना एक साथही पांडवों के सम्मुख गई और इसीकार वह पांडवलोगभी कारों के सम्मुख दोहे । ११ । राजा वह महाराधियों का संग्राम बढ़ा भयकारी हुआ और कौरख वा मृजियों के भागे मनुष्योंका नाश कुछ कम मलपही के समान हुमा । १२ । इसके पीछे युद्धमें उन काठन प्रहारों के पमान होनेपर अप्सराओं समेत देवता भौर सवीतमात्र उन नरवीरोंके देखनेके | अभिलागी इकठे हुये । १३ । अत्यन्त गसमचित्त अप्सराओंने युदमें अपने कर्म से स्वर्ग में पहुँचने के योग्य बड़े बड़े नरोचन वीरोंको दिव्य माला वा नातामकार की गोध और रत्न जटित उत्तम अद्भुत भूपणों को यरसा कर इकदिया ! १४ । फिर वायुने उनसब गंधादिकों को लेकर उन सब श्रेष्ठ युद्ध करनेवाले शूरवीरों को सेवन किया वापसे सेवित होकर परस्पर में मारेहुये शूरवीर गिरपड़े । १५ । दिपमाण वा सुनहरी खवाले विचित्र वाणोंसे ज़्याप्त उत्तम शूरवीरों से विचित्र वह पृथ्वी ऐसेशोभायमान जाके नक्षत्र मगइल से अलंकृत आकाश होता है।१६। Elus reason and for the sake of my friend, I inako a tipe youy that I shall not put off armour without playing Dhrishtadyumn. May I not gain heaven, if I donot full! my promise, I shall play every protgctor of bius-- whether lo be Bhim or Arjun" 10. at thiş, all the Kayray army rusbod at once against the Pandavas, and the latter høstored tw meet tto former. The battle is dreadful, aud the destruction of the Kauravas and Srinjayas ras some that like that at pralaya. The apsaras, gods and others assembled to see the feats of those They covered the warriors with showerp of scoated Garlands and jewels. A fragrant breeza blew wbon thu warriors Beru falling down. 15. The ground was covered with the warriors varriors, (६५४७) gerai Karuli Patni (6571 पोः क्षिनि गोधयविधिमा १६ ततोऽन्तरीक्षादपि साधुवादादित्रायः समुदीयमाणः । जयघोशन निस्वननादमिश्रः समालः सोऽभवत् संग्रहार. ॥ १५ सोत कपालि अश्वत्थामा मतिज्ञायां स पंचाशोऽध्याय ५७ संजय उवाच । एवमेप मदानासीत साम:पृथिवी सिताम् । प्रद्धेऽर्जुने तथा कणे 'भीमसनेच पाण्डधे ।। द्रोणगाजित्य जिला चान् महारान् । भवादनी राजारवासदेवमिदं वचः ! ॥ पश्य कुष्ण महावाही द्रवाती पांडपी चम्मच पश्यमाने पालयन्तं महारथान ॥ २ जन' ५५मि दासाई धर्मराज युधिष्ठिरम् । नापि'फेतुयुधांश्रेष्टधर्मप्रस्प दृश्यते ॥ ४॥ विभागधारशि. इसकेपीछे वह युद्धभूमि भन्तरिक्षके प्रशंसायुक्तवचनवानों के शब्दोंसे शब्दायमान धनुप और स्पचकों के अपूर्व शब्दो अद्भुत रूप होकर व्याकुल होगई १० । नध्याय ५८.0 संजय बोले कि अर्जुन कर्ण और भीमसेनके शोधयुक्तं होनेपर इस रीति से रानाओं का यह अत युद्ध हुमा १ हे राजा "अर्जुन भश्वत्थामा और दूसरे महारार्थियों को विजय 'करके वासुदेवनी से यह वचन योलार हे महावाहु श्रीकृष्ण, जी भागती हुई पाण्डवी सेनाको और युद्ध में महारथियों को भगाते हुये करणको देखो। हे पोरणनी तें धर्मराज युधिष्ठिर को नहीं देखताई है बड़े शरधीर मुझ को युधिष्ठिरकी बड़ी ध्वजाभी नहीं दिखाई देता ।।४।। हे 'जनादनजी दिनका FAसरा भाग शेप है पृतराष्ट्र के पुत्रों में से युद्धमें मेरे सम्मुखकोई नहीं आता है worring ornamonts and looked like the star-spangled sky. The field was ringing with the sounds of the divine music coming from air." 17: CHAPTER LYIII 'Sanjaya said "Karan, Bhim and Arjun, enraged, made a harod among the warriors. Havjog conquered Aswathawa and others, Arjan' said to Vasuder... "Look at Kuran who is ronting the Pandby Harmy. Idonot sa Yudhishthir and his standard. .This is the third Daliablarat 16548} (६५४८) सोऽयं दिवसस्य जनाईन । म घमां धार्तराष्ट्रप कश्चिाध्यति संयुगे। तस्मात् मत प्रिय कुर्वत याहि यत्र युधिष्ठिरः । ५ ॥ दृष्ट्या कुशीलन युद्ध धर्मपुत्रं सहानुजम पुनयोद्धास्मि पाणय शभिः सह संयुगे ॥ ६ ॥ ततः प्रायादथेनाश धीमरमर्व चनादरिः ॥ ७॥ यतो युधिष्ठिरो राजा ए जयाश्च महारथाः । अयुध्यन्त महासापा मृत्यु कृत्वा निवर्सनम् ॥ ८॥ ततः संग्रामममि तो .क्तमाने जनाये । अवेक्षमीणो गोविन्दः सम्पसचिनमयीत् ॥ ९॥ पस्य पार्य महारौद्रो पर्तते । भरतक्षयः । पृथिव्यां क्षत्रियाणांचे दुर्योधनकृते महान् ॥ १० ॥ पश्य भारत चाशनि रुक्मपृष्ठामि धन्धिनाम । मृतानामपविद्धानि कलपांश्च महाधनान ॥ ११॥ जातरूपमयः पुरः शरी श्यानतपर्वणः। तैलपोतच नाराचान निर्मुक्तान पनगागिव ॥ १२॥ हस्तिदन्तत् सरून खड़गान जातरूपपरिष्कृतान् ।चर्माणि चापविद्धानि कमगर्भाणि भारत ॥ १३ ॥ मुवीय कृतान् प्रासान् शक्तीः कनकभूषणाः । जाम्बूनदमयः पद्धाश्च पिपुला गदाः ॥१४ । जातरूपमयीयः पटिशान हेमभूषितान । दण्डैः कनकचित्रेधाविन इस हेतु से आप मेरे हिनको करते हुये वहां चलो जहाँपर युधिष्ठिर है। ५ । हे मावजी में युद में अपने छोटे भाइयों समेत युधिष्ठिर को फुशल देखकर फिर पांकर शत्रुमों से लडूंगा। ६ । यह सुनकर श्रीकृष्णजी शीघ्रहो रथके द्वाराषले 1७ । जहां राजा युधिष्ठिर और महारथी मृञ्जय अपनी सेनासमेत मृत्यको हाथ में लिये परस्परमें युद्ध करतेथे । ८ । इसके पीछे मनुष्यों के नाशकाल वर्तमान होनेपर युद्धभूमिको देखतहुये गोविन्दनी अर्जुन से बोले । ९ । हे अर्जुन देखो कि दुर्योधन के कारणले पृथ्वीपर क्षत्रियोंका और भरतवंशियों का महाघोर रुद्ररूप नाश वर्तमानहै । १० । हे धनुपधारी मरेहुये धनुपधारियोंके सुवर्णपृष्ठ वाले पनुप और बहुमूल्य टूटेहुये तूणीरोंको देखो। ११ । भौर मुनहरीपुंख युक्त टेढ़े पर्वधाले पाणोंको तेलसे सफा कियेहुये कांचली से राहत साँकी समान नाराचों को देखो । १२ । हाथीदांत का बेटा रखनेवाले सुवर्ण जटित खगोंको और दृढेहुये स्वर्णमपी कवचोंको देखो । ११ । सुवर्ण जटित प्रास और सुवर्ग भूपणों से अलंकृत शक्ति अपवासपात्रोंसेखचित वड़ीगदाओंकोदेखो।१४ मुवर्णसेजटितदुधोरेखन औरफरpart of the day and none of the sons of Dhritrash tra_ara near to Let us therefore go to Yudhishthir. 5. back again after secing. Yudhishthir. 5. I shall come back again after sceing Yudhishthir and othor brother safe." At this, Shri Krislin drove the car to the place whero Yudhishthir and the Sridjayas, cardless of their lives, were fighting with the enemy. Scoing that great destruction, Govind said to Arjun: "Look at the great destruc. cion of warriors caused by Duryodhan.10. The lows of the warriors with gold backs, the precious quivers and well-cleaned arrows are seen everywhere. Tho swords decked with gold, having ivory handles, and golden armours aro mattered everywhere. Prasses, speare, macox, OPPoss me I shall cotro कर्णपर्व Karan Pary (6549) विधान परसधान्१५मयाकुन्तांश्च पतितान मुघलानि गुरुणि वाशनानी:पश्य वित्राम पिपुलान् परिपांस्तथा ॥ १६ ॥ चक्राणि पापविधानि तोमराक्ष महारणे। नानाविधानि शस्त्राणि प्रगृह्य जयरादिनः ॥ १७ जीवन्त इव श्यन्ते गतसत्या स्तरस्विनः । गदायिमथितेगांमपलभिभमस्तकान् ॥ १८ ॥ गनघाजिरयाणान् पश्पयोधान् साशः । मनुष्याहयनागानां शरशक्त्यष्टिपहिशैः । निखिंशः परिधः प्रासरय कुन्तः परषधैः । १९ ॥ शरीरपंहुभिन्छिः शोणितीघपरिप्लुतः ।गता मुभिरमित्रान संघृता रधभू मयः ॥ २० ॥ पातुभिवन्दनादिग्धः सानोमभूषितः। सतलजसकेयूरासि भारत मेदिनी ॥ २१ ॥ सांगलिग्न जाप्रेच विविधरलकते। इस्तिहस्तोपमा छनक रुभिश्च तरस्थिगाम् ॥ २१ ॥ यचडामणियः शिरोभिश्च सकुण्डले । पतितवृषभाक्षाणां विराजति धमुन्धरा । २३ ॥ कपन्धः शोणितादिग्धे सोकोदेखो।१५। गिरयेभारीमुशल चित्रितशतघ्नी औरवड़े परियोंकोदेखो। १६ । इसमहायुद्ध में टूटे चक और तोमरों को देखो विजपमिलापी वेगवानयुद्धकालोग नाना प्रकारकेशस्त्रीसमेत मरहुयेभी जीवतेहुये से सिदितहोते हैं। १८ । गदाओ से अंग भंग मुशलोंसे टूटे मस्तक हाधी घोड़े और रयों से घायल हजारों शूरवीरोंको देखो । १९ । हे शत्रुहन्ता भर्जुन मनुष्य घाड़े भौर हाधियोंके शरीर वाण, शाक्त, धारा, खड्ग, पहिश घोर रूप लोहे की परिघ भसिकान्त, फरसा इत्यादि शखों से छिन्नरूप और बहुतसे मृतकरूप शरीरोंसे । २० । पाच्छादित होकर चन्दन से लिप्त सुवर्ण के वाजुभों से भलंकत इस्तत्राण वा केयूर रखनेवाली भुजाओं से पृषी प्रकाशमान हुई । २१ । हे भरतवंशी इस्तत्राण रखने वाले अत्यन्त अलं कृत और छिदाई उत्तम सुना और हाधीकी मूंडके समान महावेगवानोंकी टूटी जंघा भार उत्तम चूडामणि समेत कुण्डलधारी उचम नेत्रबाले वीरोंसमेत पड़े हुये शिरों से पृथ्वी महा शोभापमान होगई है । २१ । हे भरतर्षभ रुधिरसे लिप्त भंग swords; pattishes and axes are lying ererywhere.15. Clubs, shatogunis,' musals, broken wheels and todars are lying on the ground along with the slain warriors who look alive oven in death. With heads broken by maces, thousands of elephants, horso: and warriors lio dead. Tho bdies of men, horses and elephants, wounded by arrowse Axes, swords, clubs and other weapons as well as the arms of the warriors,decked with sandal paste and ornaments, beautify the field.21, Tho arms, docked with hand guards pierced, the severed thighs like tho trunks of elephants, and the heads of sparriors with beautiful eyes, ear-rings and head jowels beautify the land. The bleeding bodioa, with broken necks and limbs, made the ground look liko & burnt forest. Look at tho broken cars with golden bells and the horses dead or dying with wounds 25. Look at the different parts Mababharat [65501 दिलघमात्रशिरोपरः। मर्माति भरतश्रेष्ठ शान्ताभिरिवाग्निभिः ॥ १४ ॥ रपत्र बाधा मग्नान रेमपिडिणिनः शुमान् । पाजिमम हताम् पश्य विनिकीणांना श्वान् ॥ २५ ॥ सनुरूपानुपासङ्गान पताका विविधायजाद। रथिनाच माद्वार पाण्डरोब प्रकीर्णकान् ॥ २६ ॥ निरस्तजिहान माता पालन पोषमान । क्षयन्तीचित्रामसच गजयासिनः ॥ २७ ॥ बारणानां परिस्तोमांसपेमा जिनकन्यवान् । विपादितविचित्रांच चित्ररूपाः कुयास्तथा ॥ २८ ॥ विमान परवा घन्टा महानिः पतिः। पैयद शुमान पतिता फुशान भूवि २९॥ पनाः सादिमुजाप्रषु सुवर्णषिकताः कशाः ॥ ३. ॥ विचिप्रमणिचित्रमास बरपरिष्कृताम् । मश्वास्तरपरिश्तोमान रांकयामतान मुवि॥३॥डामणीमरे द्राणां वियित्राकाम्वनम्रमः। छत्राणि चापविद्यानि चामरम्यजनानिय ३२ । समासैध पदापण्डले फलप्तश्मश्रुभिरस्य धीराणां समasnet जिनकी प्रीवा टीई इनसब नानाअंगोंसे पृथ्नी ऐसी प्रकाशित हुई जैसे कि गांव ज्योतिषाली अग्रियों से बनशोभित होता है । २४ । और मुनहरी घरटे एसनेपाले पात प्रकार से टूटेहुये शुभरपों से पाप्त बाणों से घायल मृतक या व्यावृष्ट पड़े पे मानसवाले घोड़ोंको देखो । १५ । अनुकर्ष उपासंग पताका और माना प्रकारकी धजाओंको देखो स्थी लोगोंके बड़े शंखश्वेत चामर और निनकी निगा | बाहर निकल पड़ीं उन पर्वताकार सोतेहये हाथियों को देखो वैजयन्तीमालार | रपके विचित्र मृतक घोड़े वा हाथियों के परिस्ताम मृगचर्म भोर कम्बलों को देखो विचित्र चांदी से जड़े हुये अंकुश और बड़े हाथियों समेत गिरकर टूटे घंटोंको देखो वैडूर्य मणियों से जटित मुन्दर दराड पुक्त गिरे हुपे शुभ अंकुश और सवारोंकी भुजाओं में बंधेहुये मुवर्ण जटित चाबुकों को देखो। विचित्र माणियों से जटिव सवर्ण से अलंकृत रांकवान मृगचर्म से बनहुपे पृथ्वीपर पापे पोड़ों के स्तर परिस्तामों को देखो । ११ । राजामोंकी चूड़ामणि व विपिन स्वर्णमयी माला वा टूटेहुये छत्र चामर और पजनों को देखो । ३२ । चन्द्रमा और नक्षत्रों के समान प्रकाशमान मुन्दर कुंडलधारी दाढ़ी मूणेसे मलंडत मर संयुक्त वारोंके मुखों से । १३ । दकीहुई रुधिररूप कीचवाळी पृथ्वीको देसो of cars and banntra. Look at the large conchs of the car warriors and the huge sloplaats lying with their tonguos out. Look at the garlands, the wonderful horses of the cars slain, the trappings of elephants, deor skins and blankets Look at tho wonderful silvor goads and the broken bells of the dead elephants. Look at the beautiful baodles of the goads decked with lapis lazuli and the golden whipa tied to the arms of the horsemed,30 Look at the golden trappings of horses, made of the best deer eking and furs. Look at the head jewels, golden garlands, the broken umbrellas, chamars and 6552) Blahabharat (६५५२) चौदपत् ॥ ४२ ॥ तो युद्धभूमि पार्यस्य दयित्वा च माधयः । त्वरमाणस्ततः कृष्णः पार्थमाह शनैरिदम ॥४३॥ पक्ष्य कोरपराजानमुपयातांचीयवानाकर्णपश्य महारङ्गं ज्वलन्तमिपावफम् ॥ ४॥ असाभीमो महे वासःसन्निवृतो रणं प्रति समेते चिनियन्ते घटयनपुरोगमाः। पाञ्चालसभयानाम्य पारपानांचये मुखम् ॥ ४ ॥ मितेच पुनः पार्थेभग्नं राशुवलं महत् । कौरवान् द्रवतो ह्यप कों कारयोऽर्जन | ॥ ४७ ॥ अन्तफातिमा पेगे शतुल्यपराकम: 1 असौ गच्छति फोरप्प द्राणिः शस्नमृतांधर ॥ ४८ ॥ त्यमेव प्रद्रुतं सप धृष्टयानो महारयः । अनप्रयाति संग्रामे श्तान पश्य घ सम्जपान् ॥ ४९ ॥ सर्पमा सुदुर्दों पामुदेवः पिरीटिने । ततो रातन प्रादुरासीन्महाघोरो महारणः ॥ ५० ॥ सिंघनादरयाशेष प्रादुरासन, समा गमे । उमपो सेनपो राजन मृत्यु हत्या निधनम् ॥ ५१ ॥ एषमेप क्षयो पृतः पृषि सेसा शीघ्रता फरनेपाले माघर श्रीकृष्णनी ने वह युद्धभूमि अर्जुनको दिखाकर बड़ी धैर्यता से अर्जुनसे यह वचन कहा । ४३ । कि हे अउर्जुन राजा युधिष्ठिर को और सम्मुख जानेवाले राजाओं को देखो और महायुदमें अग्नि के समान क्रोधरूप कणकोभी देखो। ४४ । यह बड़ाधनुपधारी भीमसेन युद्धमेलोटापांचाल मृन्नी और जो पाण्डयों के उत्तम गिनजाते हैं जिनका अग्रगामी तुम्न है वह सब उस भीमसेनक संगमें लौटते हैं। ४६ । और उस लौटनेवाले पांडव भीमसेन से शत्रुभोंकी वडीसेना फिर पराजय हुई हे अर्जुन यह कर्ण भागनेवाल कौरवोंको रोकताह । ४७ । हे कौरव्य वेगमें यमराज सपान और इन्द्र के सदृश पराक्रमी शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ यह अश्वत्थामाभी जाताहै । ४८ । महारथी धृष्टद्युम्नयुद्धमें उस भागनेवाले के पाछे जाताहै और युद्ध में मरेहुये मृजियोंको देखो । ४९ । महाअजेय वामदेवजीन इसरीति से इससव वृत्तान्तको अर्जुनसे कहा हे गजा इसकेपीछे महापौर युद्ध जारीहुभा । ५० । तब मृत्युको निरच करके दोनों सेनाओं के समागम होने में दोनों ओरको सिंहनादों के महान शन्द होनेलगे । ५१ । हे पृथ्वीपति राजा धृतराष्ट्र आपके दुर्मत्रों से पृथ्वीपर आपके और अन्यों के शूरवीरों का इसति ing shown the field of battle to Arjun, Shri Krishn again said, " Look at Yudhishthir and other fighting warriors, Look at Raran who is: ouraged like fire. The great archer Bhim is coming back to the field, of battle. The Panchals, the Srinjayas and the other good warriors of the Pandavas, led by Darish tadyuan, aro somiog back wita Bhim. Bhim bas again routed tho Kauravas, l'hero goed'Ashwathama liko YADiraj of Indra in prow033. Brare. Dhrishtadyumn is chasing : Look at the Srinjayas slain. " Inrincible Govind, was thus tolking to Arjan, whilo & dreadful fighting begar. The roats of the warriors of both sides wers heard during their encounter. Thus the ! floatruction of your warriors and those of the Pandavas began on 355 (६५५३) कर्णपर्व Karan lary व्यां पृथिवीपते। तायकामा परेषाञ्च राजन दुमिते तय ॥ ५ ॥ इति कर्णपर्वणि कृष्णपाक्य अप पञ्चाशोऽध्यायः । ५८ ॥ .. rvari सम्जय उवाच । ततः पुनः समाजामु रमाताः कुरुजयाः । युधिष्ठिरमुखाः पार्थाः सूतपुत्रमुत्रा धयम् ॥ १॥ तत-प्रबहतेभीमः संग्रामो लोमहर्षणः । कर्णस्य पाण्डयानाञ्च यमराष्ट्रविद्धनः ॥ २॥ तस्मिन् प्रवृत्ते रुप्रामे तुमुले गोपितोदक संशप्तके शरेषु किञ्चिच्छिष्टपु भारत ॥ ३॥ धृष्टद्युम्नो महाराज सहित सर्वराजमिः फर्णमेपाभिदुद्राय पाण्डवाश्च महारथः ॥ ४ ॥ आगछमानस्तान संख्य प्रहृष्टान् से नाश जारी हुमा ५२॥ मध्याय ॥ ५९॥ मजयबोले कि इसके पीछे निर्भय कौरव मृज्जी और युधिष्ठिरको अग्रगामी करनेवाले पाण्डव और कर्णको अग्रगामी करनेवाले हमलोग फिर भिड़गय । १ । उससमय कर्ण और पाण्डवोकाः वहयुद्ध फिरजारीहुआ जो भयकारी रोमहर्पण करनेवाला यमराज के देशकी, वृद्धि करनेवाला था । २१ हे भरतवंशी उसकठिन | रुपिररूप जल रखनेवाले युद्ध के जारीहानंपर और शूरवीर संसप्तको के कुत्राकी रहनेपर । ३ । धृष्टद्युम्न और महारथी पाण्डव सब राजाओं समेत कर्णके सम्मुख गमे तव. अकेले कर्णने युद्धमें आनेवाले प्रसन्नचित्त ,विजपाभिलापो उन बारोंको account of your hvil policy, n king. *25. CHAPTER LIX Sanjaya said, " Tho the intrepid Kauravas and Srinjayas, led by Yudhishthir, and. Our warriors led by Karan again. met ia battle. The battle was dreadful, increasing the region of Yam. When the bloody battle was being fought add only a small part of the Sansap- Itak arniy was left, Dhrishtadyumn and the Pandar warriors : faced Karán alone bore them as a mountain does & storm of rain, 16531] lanabharat विजयोरया । दधारको रणे कणों अलौघानेष पर्वतः ॥ ५॥ समासाद्य तु ते कर्ष ग्यशाग्यन्त महारथाः । यथाचल समासाथ पारायाः सर्वतोदिशम् ॥६॥ तपो रासीन्महाराज संप्रामो लामापं । धुमस्तु राधषं शाण नतपणा। ७॥ तारनामास समरे तिष्ठतिप्रति बालवीत् । विजरम्ब पनः श्रेष्ठं विधवानो महारया ॥ ८॥ पातस्य धनु ठिरवा राधाशो पिशोपमान विदयामास संकुबः पार्षत मशः॥९॥ ते धर्मरेमानितं मिस्वा तस्य महात्मनः । ग्रेणिका पराजत | शगोपा पानय ॥10॥ तदपास्य धनुरिटायगुम्नो महारपः । सम्पब कपादाय संशविपमान् । कर्ण पिण्या सप्तश्या शरः समतपभि. तपेर राजन काऽपि पार्वतं शत्रुतापनर । उ.दयामास समरे शरैराशीपिषोपमः ॥ १२॥ द्रोणनुमहासो बिन्याध निशतः शरैः॥ १३ ॥ तस्य कर्णो महाराज शर कनकभूषणम् । प्रेषयामास संकुदो, मृत्युदण्डमिवापरम ॥ १४ ॥ तमापतगत सहसा ऐसे धारणकिया जैसे कि जलके समूहों को पर्वत धारण करवाई। ५ । बहसम महारथी कर्णको पाकर ऐसे छिन्नभिन्न होगये जैसे कि जलकेसमूह पर्वतको पाकर पर उधर दिशामों को चलेजाते हैं। ६ । हे महाराज इसके पछि रोमहर्पण करने पाला युद्ध होनेलगा तब धृष्टपुम्नने कर्णको टेदेपर्ववाले वाणोंसे घायलकिया मार | तिष्ठ विष्ठ कहा विजपनाम उत्तम धनुषको और विषले सों के समान पाणाको (काटकर अत्यन्त कोधयुक्तहोकर नौवाणोंसे धृष्टपुम्नको पायक किया । रे निष्पाप वह कर्णके वाण उस महात्माके एनारी करचको छेदकर रुधिरमें भरे हुये बारबहटी के समान शोभायमान हुये । १० । महारयी धृष्टपुम्न ने उस बूढेहुये धनुषको सलकर दूसरे धनुष और रिपले सर्पकी समान वागोंको भेकर येथे पर्व गले समर गानोंसे कर्णको पारामान किया । १५ ।पौर उसी प्रकार कर्णनेभी युद्ध पाशुसंतापी पुम्नको पिसे सर्पके समान पाणोंसे टकदिवा । १२ । फिर द्रोणाचार्य के बड़े धनुरारी पृष्टपुम्नने साइन धारवाले बाणों से पालापान किया । ११ राना फिर बसन्त क्रोपयुक्त कर्यने सनारी भूषण युक्त द्वितीय पपदयटके समान पाणको उसके ऊपरफेंका। १४॥ इस्तमायाकरने पाडेसात्यात Thoy were dispersed before him like water falling over a bill 6. When tho battle was serere, Dhrishtadyumn rounded Karan Drawing up his bow, knowo as Vijaya, Karan cut bis bow and arrows and wounded him'with nino darts, which pierced bis armour and came out blood stained. 10. Dhriah tadyuma thror aside the broken bow and wounded Karan with sorentg arrowe. Karan tog, hid bim with lia. darta Agaia his adversary wounded him. Then Karan shot at him a gold.decked arrow like a serpente Satyaki cut it into seven parte, Soeing thia Karan hid Satyaki with us ances and wounded bim with *ren darts Satyaki too, sounded him with brid*8. Tbea tbo baillo कर्णपर्ष Karn Paray (6355) - .. पोररूपं विशाम्पते । विद सप्तघा राजन शेनिया सदन १५ एग.दिने तंबाणेश का विशाम्पते । सास्या रग समन्तात् पप्यधारयत् ॥ ६ ॥ विधायन समरे नाराचसा जतभिः । तमस्य विध्यछनेयः शमविभूषितः ॥ १७ ॥ ततो यु महाराज वधुनोत्रमयायहम् । भालीवीच बिच मेक्षणीय समन्ततः ॥ १८॥ स तत्र भूतामा रोमहर्षोऽयजायत । तमका समरे कम शेनेयोनप , परमतरे द्रोणिसभपात ममहाबलः । पार्षत शवमने गावापासुनाशनम् ॥ २०॥ मापमा संक्रयो द्रोणिः परपरजयः । तिष्ठ तिप्रानन मे श्रीपण विमोल्पसे ॥ २१ ॥ इयुकावा मुमशं पारं शीशनि शितः । पारतं मामास धोररूपैः मतेजः ॥२३॥ यतमान परेशापा बसमानो मारयः । पारि समरे द्रोणा तल मारिष ॥२३॥ तयागि ने रस अकस्मात् आनेसमे घोरप वाणको सात दुकड़े किया । १५ । तर कर्ण नेपालको कटाहमा देखकर मारपरिको वाणों की वर्षा करके चारों ओर से करिया । १६ । और सात नाराचों से पीड़ामानभी किया इसके पीछे सात्यकि में भी मुवर्षजटिल पाणों से उसको छेदा । १७ हे महाराज इसके पोछ घोरयुद्ध हुआ पर बुद्ध नेत्र और कणीको भयभीत करनेवाला महाप्रभुत चारोंभोरसे देख नेही योग्य था। १८हे.राजा बहा कर्ण मोर सात्यकिकै उव कर्मको देखकर सजीवोंके रोमांच सहोगये । १९ । इसी अन्तरमें अश्वत्थामाजी बड़ेपराक्रमी इस पृष्ठभुम्न के सम्मुख गये जोकि शत्रुओं का विजप करनेवाला और पराक्रम समेव माणोंका हरनेवाला था । २० । शत्रुके पुरके विजय करनेवाले और अत्यन्त भोपयुक्त अवस्थामा जी घोले कि हे ब्राह्मणके मारनेवाले ठहरोठहरो अब मुफ से बचकर भीवानहीं वचसक्ता । २१ । यह कहकर शीघ्रता करनेवाले अश्वत्थामा ने बक्षणधार घोररुप सन्दर वैतवाले पाणों से धीर धृष्टद्युम्न को अत्यन्त वेगसे उकदिया । २२ । हे श्रेष्ठ असे कि महारथी द्रोणाचार्य जी पुद में उपाय करने पाले पृष्टद्युम्न को देखकर बड़ेपरिश्रमसे उपाय करनेवाले हुये । २१ । उसीमकार was terrible to the eye and ear and wonderful to look at. The hair of the lookers-on stood on ond, In the mean time Ashwathamda faced Dhrishtadyumn the destroyer of loes. 20. Ashwathama the con- 'querer of foes said, "Stay, slayer of Brahman. You cannot scape from me." Having said this, he hid bis adversary with artows. Dhrishtadyuma was not pleased with the encounter of Ashwathama and was in the same mood of mind as Drona, when he fought with him. He thought that his end was near and fought dejectedly. But knowing bimself to be unslayable with weapons ho faced Ashwatbama liko Deah Mahabharat 6556) [६५५६] रपा पार्षतः परवीरहा । नातिदृष्टमनी भूत्वा नातवान् मृत्युमात्मनः ।। २५ ॥स या समरेऽत्मान शत्रणाघध्यमेव तु । जवेनाभ्यद्रयाणि कालः कोलमिष क्षये । २५॥ श्रोणिस्तु दृष्ट्वा राजेन्द्र प्रद्युम्नमवस्थित्तम् । क्रोधेन निश्वसन पारस पपितं समुपाद्रवत् । तावन्योऽन्यस्तु हवि संरम्भ जग्मतुः परम् ॥ २६ ॥ अथाब्रवीन्महा राज द्रोणपत्र, प्रतापपान । धृष्टद्युम्नं समीपस्थं स्वरमाणो पिशाम्पते ॥ २७ ॥ पांचा लापसर यस्यां प्रेषयिष्यामि मृत्यये ।। . २८ ॥ पापहि यत्यया कर्म घ्नता द्रोणं पुरा कृतम् । अद्य त्या तपस्यंत तरे यथा न कुशलं तथा ॥ २९ ॥ अरक्ष्यमाणः पार्थेन यदि तठति संयुगे । नापकामसि वा गद सत्यमेतदर्धामि ते ॥ ३० ॥ एवमुक्तः प्रत्युषाच घाटाम्नः प्रतापवान् । ३० ॥ प्रतिवाक्य संपवासिमामको दास्यते तय । ये नैव ते पितुई पतमानस्य संयुगे ॥ ३१॥ यदि तायन्मयाद्रोणो निहतो ब्राह्मणशु यः । स्वा शत्रुभों के वीरोके मारनेवाले धुएघुम्नने पुद्धमें अश्वत्थामाको देखकर कुछअमसन्न होकर अपनी मृत्युकोमाना । १४ । फिर वह युद्धमें अपनेको शस्त्रसे अवध्य जानकर पड़ी तीव्रतासे अश्वत्थामाके सम्मुख ऐसेगया जैसे कि प्रलयकाल में काल कालके सम्मुख जाता है । २५ । हे महाराजेन्द्र फिर वीर अश्वत्थामा अपने । सम्मुख धृष्टद्युम्नको देखकर क्रोधसे ,श्वासलताहुआ उसके सम्मुखगया और उन दोनों ने परस्पर देखकर बड़ा क्रोधकिया । २६ । हे महाराज राजा धृतराष्ट्र इसके पाछे शीघ्रता करनेवाला प्रतापवान् अश्वत्थामा सम्मुख होनेवाले धृष्टद्युम्न से वोळे । २७) हे पांचालदेशियों में नीच अब मैं तुझको मृत्युके समीप भेजूंगा । २८ । जो कि पूर्वसमय में तुमने द्रोणाचार्य को मारकर पापकर्म किया है अब वह (पापका फल तुझको ऐसा मिलेगा जिसमें तेराकल्याण न होगा । २९ । हे अज्ञान जो.तू अर्जुनसे अक्षितहोकर युद्धमें नियतहोताहै या नहीं हटताहै इसीसे सत्प २ वेरा कल्याण नहीं है यह वचन मुनकर प्रतापवान धृष्टद्युम्नने उत्तर दिया । ३० । के मेरा वहींखड्ग तेरे उचरकोदेगा जिसने कि युद्धमें उपाय करनेवाले तेरेपिताको उचर दिया था । .३१ । नाममात्र अपनेको ब्राह्मण कहनेवाले, द्रोणाचार्यनी: | मेरे हायसे मारेगये अव युद्धमें अपने पराक्रम से तुझको भी क्यों न मारूंगा encountering Death at pralaya 25. Seeing Dkrishtadyumu beſoro him, Ashwathama faced him with deep sighs, Both were enraged at the sight of each other. Then Ashwathama said to his adeversary, "Waist of Panchals, I shall send you to the region of Death, You will reap the punishment of slaying Drona, if you are not protected by Arjun or if you donot run away. To this Dhirshtadymn replied,' "[y sword, which slew thy father, willieply you. Drona, a Brahman in bane, ras slain by me and I shall not spare your life." Having said [ ६५९७) कर्णपर्व Karn Paray (6557) मिदानी फयं युद्धे न हनिष्यामि षिकमात् ॥ ३२ ॥ एवमुक्त्वा महाराज सेनापति गणः । निशितनाथ घाणेन द्रोण विम्याध पातः ॥ ३३ ॥ ततो द्रौणिः सुसं कुदः शरैः सनतपर्वामः । आच्छादयहिशो राजन् घुटानस्य संयुगे । ३४ ॥ मेवान्तरशिंग दिशो नापि योधाः समन्ततः । श्यन्त घे महाराज गरेपछवाः सह श्रयः । ३५ ॥ तथैव पार्वतो राजन् द्रौणिमाहवयोभिनय गरेः छादयामास सूतपुत्रस्प पश्यतः. ॥ ३६ । रापोऽपि महाराज पाध्चान सह पाण्डवः । द्रोप देयान युधामन्यु सात्यफिच महारधम् । एकः संपारयामास प्रेक्षणीयः समन्ततः ॥ ३७ ॥ धृपघुम्नस्तु सारे होणेपिच्छेद कामुकम् । येगवत् समरे घोर शरामा शोधिषोपमान ॥ ३८ ॥ स पार्षतस्य राजेन्द्र घः शक्ति गदा स्वबम स्या सतं रथय निमेषाद्वयधमच्छरैः ॥ ३९ ॥ स छिन्नधम्चा पिरयो हताश्यो हतसारायः खड्गमायच विपुलं शतचन्नध्य भानुमत् ॥ ४० ॥ प्रोणिस्तदपि राजेन्द्र भाई. । १२ । हे महाराज क्रोधयुक्त सेनापति धृष्टद्युम्न ने ऐसा कहकर अत्यन्त तीक्ष्ण पाग से अश्वत्थामाको घायलकिया । ३३ । फिर अत्यन्ध क्रोधयुक्त अश्वत्थामा टेदेपर्ववाले वापोंसे युद्ध में धृष्टद्युम्नकी दिशाओं को ढकदिया । १४ । उस समय चारों ओर से याणों से ढकेहये न शूरवीर दिखाई दिये न दिशा विदिशा समेत अन्तरिक्ष दिखाई दिया हेराना इसीप्रकार धुष्टद्युम्न ने भी युद्धमें शोभादेनेवाले अश्वत्थामा को कर्णके देखतेहुये वाणोंसे ढकदिया । ३६ । फिर चारों भोर से देखने के योग्य अकेले कर्णनेभी पांचाल पांडव द्रौपदी के पुत्र युधामन्यु और मा- रथीसात्यकि को रीका । फिर धृष्टद्युम्न ने युद्धमें अश्वत्थामाके धनुपको काटा तब वेगवान अश्वत्थामाने उसको डाल दूसरे धनुषको लेकर घोरजंग में विपैले सोकी सपान वाणोंको फेंका फिर उसने धृष्टद्युम्नकी गदा शक्ति धनुप ध्वमा रथ सारथी और घोड़ोंको वाणों से एक क्षणमात्र में मारा । १९ । तब उस धनुप रय गदा पाक्ति रथ धना दृटेडुये धृष्टद्युम्नन बड़े खड्ग और सौ चन्द्रमा रसने पाया ढालको लिया । ४० । हे राजेन्द्र तत्र हस्तलाघवी धार अश्वत्थामा ने शीघ्रही अपने भल्लों से रथसे न उतरने वाले धृष्टधुम्न के उसखड्ग को भी काटा यह बड़ा this, enraged Dhrishtadyumn wounded Ashwathama with sharp arrows. 33' Nothing except arrows was seen on all sidea. Dhrishta. dymn too. covered Ashwathama with arrows.36. Karan alone checked the Panchals, the sons of Draupadi, Yudhamanyu and Satyaki. Then Dlrishtadyumn cut the box of Ashwathama. The latter put it down and taking up another bove, discharged from it arrows like serpente. He then cut down the bow, spear, mace, standard, ear, driver and. horses in an instant, Dhrish tadyumn took up his sword and shield: 40. Ashwathama cut his sword also, before he could .. (6558) Mahabbarat [६५५८] शिनं महारपः। विच्छेद समरे धीरः क्षिग्रहस्तो हदायुधः। रथादनपदस्य तपत मिधामषत . ॥ ४२ ॥ धृष्टद्युम्नन्त पिरथ हताश्व लिनकार्मुकम् । शरम पाषा विमलय शफीकतम ॥ ५३॥ नाशकद्भरतश्रेष्ठ यतमानो महारथः । ४४ ॥ तस्यान्तमिपुभी राजन् यदा द्रागिन जाग्मवान् । अथ पक्वा धनुरि पपित परि तोयगाव ॥ ४५ ॥ आसीदासयतो धेगतस्य राजग्महात्मनः । गरुहस्य पत्तो शिक्षो पत्रगोत्तमम् ॥ ४६ ॥ एतस्मिन्लेव काले तु माधवोऽर्जुनमधीव Avon पश्य पाए यया द्रौणिः पातस्य रथं प्रति । पानं करोति पिपुल हम्याचमाया 1४८ . मोघय महाषाहो पार्यतं शत्रकर्षण । द्रोणेरास्थमनुप्राप्तं अस्पोराम गत पपा । ४९ एपमुफ्षा महाराज पासुदेवः प्रतापवान् । प्रेषयानुरगालन पाणिर्यवस्थितः ॥ ५० ॥ ते हयाबन्द्रसल्लाशाः कंशन प्रचोदिताः समापि पन्त इष योम जग्मद्रोणिरयं प्रति ॥ ५१ ॥ रष्ट्यायान्तौ महापीयोबुझो जन धनम्बयो । पृष्टपुम्नयधे परममकरोत् स महायलः ॥५२॥ विकृया रोष | आपसा हुआ । १२ । हे भरतर्षभ फिर उपाय करनेवाला महारथी उस रथ गदा | अक्ति खड्ग आदि से रहित वाणों से अत्यन्त घायल धृष्टद्युम्न को न मारसका हेगना जब अश्वत्थामा बाणों से उसको न मारसका तब वहवीर धनुप को स्पाग- कर धृष्टगुम्नकी ओरको चला । ४५ । और उससमय हे महाराज उस महारमा भ्रमरहित अवस्थामांका इसप्रकारका हुमा जैसेकि उत्तम सर्पके भतण करनेवाले गरुंडका वेगहोताहै ! ५६ । उप्तीसमय श्रीकृष्णजी अर्जुन से बोले । ४७ । | अर्जुन देखो कि अश्वत्थामा धृष्टद्युम्नके स्थपर बड़े उपायों को करताहे वह निस्स- |न्देह इसको मारेगा । ४८ । हे शत्रुभों के विनय करनेवाले महावाहु असे हो सझे वैसे अश्वत्थामारूप मृत्युके मुखमें फंसहुये धृष्टद्युम्नको निश्चयकरके झुटामो । १९ । हे महाराज ऐसाकहकर प्रतापवान वामदेवजीने घोड़ोंको वहां पहुंचाया | वहां कि अश्वत्थामा नियतथे । ५२ । केशवजीके हकिहुये वह चन्द्रवर्ण पौड़े आकाशगामी होकर अत्यामाके रथपरपहुँचे । ५१ । हे राना महापाक्रमी अश्वत्थामाने उन बड़े पराक्रमी श्रीकृष्ण और अर्जुनको देखकर धृष्टपुम्नके मारने में उपाय किया । ५२ । तव बड़े पराक्रमी अर्जुनने खिंचे हुये धृष्टद्युम्नको देखकर come down from the car, to the amazement of all; but in spite of dastraying all his weapros and cer, he could not slay Dhrish tadyumn. Not being able to slay Dbrishtadyumn with arrows, Aahwatbama, left bis bow and 'rushed at him as 3 garur does towarda & Berpent. Then Shri Krishn said to Arjyn, * Look at Ashwathama who is coming with great spoed ta slay Dhrishtadyumn. You must sayo the latter from the former." Having said this. Vasudey drove the car towards Ashwathama. jl. Driven by bio, thọ şilter white horses reachsıl Ashwathama's car in a moment. Szing Krislin and - (६५५९) कर्णपर्व Karan Paray '(6559) पृष्टपुम्न जनेश्वर । घरविक्षेप घे पायो द्रोणि प्रति महाबलः ॥ ५३ || ते भारा हेमगिहता गाण्डीवप्रेषिता भृशम् । द्रौणिमासाद्य विधिशुल्मीकमिव पनगाः ॥५४॥ पविस्तः शरघोद्रिोणपुत्रः प्रतापपान् । उत्सृज्य समरे गजन पाश्चास्यसमिती जसर ॥ ५५ ॥ रपमारहे पारो धनञ्जयशराहितः । प्रगृह्य च धनुः श्रेष्ठं पार्ष विम्यांध सायकः ॥ ५५ ॥ एतस्मिन्नन्तरे धीरः सहदेवो जनाधिप । पोथा रथे माजी पारतं शत्रुतापनम् ॥ ५७ ॥ मनोऽपि महाराज द्रोणं पिच्या पात्रेमिः । तमोगपुनसकुलो पाइयोहरुसि चापपतं ॥ ५८ ॥ क्रोधितस्तु रणे पाथों मारा बालसम्मितम । द्रोणपुत्राय धिक्षेप कालदण्डमिघापरम् । ब्राह्मणस्यांसदेशेस निपपात महाधुतिः ।। ५९ ॥ स वियलो महाराज शरवेगेन संयुगे । निषसाद रथोपस्पे वैक्लम्पम् परं पयौ ॥ ६० ॥ ततः कों महाराज व्याक्षिपद्विजयं धनः । मर्जुनं समरे क्रुद्धः प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः । गैरपश्चापि पार्थम काम डाणों को अश्वत्थामाके ऊपर फेंका । ५३। गांडीवधनुपसे चलायेहुये यह वर्णमयी साण अश्वत्यामाको पाकर उसके शरीर में ऐसे प्रवेशकरगये जैसे कि सर्प यामी में घुसते,। ५४ । हेराजा उनवाणों से घायल भौर पाडावान वीर भवत्थामा पुदमें पड़े वेजस्ती धपधुम्नको छोड़कर रपपर सवारहुये।५५ामौर अर्जुनके वाणोंसे पीड़ितहोकर उधमपनुपको लेकर शायकों से अर्जुनको घायल किया । ५६ । इसी अन्तर में रसादेव युद्धभूमि ते शत्रुसंतापी धृष्ठद्युम्नको रथ में बैठाकर दूर लेगयो । ५७ । हे महाराज फिरतो अर्जुनने भी अश्वत्थामा को याणोंसे पीड़ित किया फिर बड़े क्रांधयुक्त अश्वत्यामाने अर्जुनको दोनों भुजा और छातीपर पायल किया । ५८ । फिर कोषयुक्त अर्जुन ने युद्धमें कालके समान दूसरे कालदण्डके समान नाराचनाम गावंको अश्यत्यामाके ऊपरफेंका वह वहातेजस्वी याण उसयाह्मण अश्वत्थामा के कन्धेपरगिरा। ५९ । तयवाणके वेगसे व्याकुलहोफर अश्वत्थामा रथके बैठने के स्थानपर वैठगया और महान्याकुलताको पाया । ६० । हे महाराज इसकेपीछे कर्णने अपने विजयनाम धनुपको टंकारा युद्धमें क्रोधयुक्त होकर वारम्वार भर्जुनको देखनेवाले Arjun come towards him, Ashwathania tried to slay them. Arjun discharged his arrows at Ashwatbama and they entered his body like serpents in ant hills. Wounded by them, brave Ashwathama leit Dbrish tadyumn and riding on his car 'began shooting arrows at Arjun. In the mean time, brave Sabadov took Dhrichtadyumn on his car and took himn far away from the scene of action. Arjun and Ashwatbama wounded each other with arrows. Arjun sbot at his adversary an arrow like the staff of Yami. It fell datorn on his aboulder and be wccped on bis erat. €0. Ibın Karen itvanged hie brw, named Vijaya, ard resist us of fighting with Arjun, lie took (65601 Alabahbarat (६५६०] यानी महारणे ।। ६२० विवलं तन्तु धीपाथ द्रोणपुषघ सारथिः । अपोषाहरणे माजीरयरमाणो रणाजिरात् ॥ १२ ॥ मयोरमाटुं महाराज पाश्चालितफाशिभिः मोक्षितं पापंतं दृष्ट्या द्रोणपत्रञ्च पदितम् ॥ ३ ॥ पवित्राणि चविष्पानि मायन्त सहमयः सिंहनादांध पस्ते इष्ट्या सक्ष्य तवनतम् । ४ ॥ एषं स्वामयीत् पापो वामदेधं धनम्जयः । पाल संशप्तकान कृष्ण कार्यमेतात पर मम ।। ६५ ॥ ततः प्रयातो दावा: श्रुत्या पाण्उभामितम् । रथेनातिपताकेन मनोमायतरसा ॥ १६ ॥ इति कर्पणि द्रौप्यपयाने एकान परितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥ और भर्जुनसे युदमें देरध युद्ध करने के अभिलापी कर्ण ने धनुष को टंकारकर 1 ५१ । युद्धभूमि में शीघ्रता करनेवाले अश्वत्थामाको व्याकुल देखके स्थकेद्वारा युदभूमिसे दूर लेगया । ६२ । हे महाराज धृष्टद्युम्नको छुटाहुआ और अमत्यामा को अचेतता पूर्वक व्याकुल देखकर विजय से शोभायामान पांचालों ने घड़े शब्दकिये ।६३ । हजारोंदिव्य वाजाने भौर युद्धमें उसअङ्गतपनको देखकरनारवारों ने सिंहनाद किये । ६४॥ पाण्डव अर्जुन ऐसा कर्मकरके वामदेवजी से बोलाकि हे भीकृष्णनी आप संसप्तकों के सम्मुखचलो यहमेरा बड़ा कामहै । ६५ । अर्जुन के वचनको सुनकर श्रीकृष्णजी बड़ीपताकानालेमन और वायुकप्तमान शीघ्रगामीरयकी सवारीस चलदिये ६६ ॥ Ashwathama far away from the scene of action. Seeing Dhrishtadyumn roscued and Ashwathama removed, the Panchala cried out'in gled. The cries of the Warriors were mingled with the sounds of musical instruments. Having done that deed of bravery, Arjun. said to Vasuder, "Take me before the Sansaptaks. My work lies with them." At His Shri Krishn druve the horses stift like the mind or wind." 66.
कर्णपर्ष haran tarv (ib61) सञ्जय उवाच । एतस्मिन्नम्तरे कृष्णः पार्थ घरममनधीत् । दर्शपन्निय कौन्तेयं धर्मराज युधिष्ठिरम् ॥ १॥ एष पाण्डपते भ्राता धासंग महावः । जिघांभिर्म हेप्यासति पार्थोमुसार्यते ॥ २ ॥ तवानुयान्ति संस्धाः पावासा युद्धदुर्मदा युधि हिर मामा पर्याप्सन्तो महायला ॥ ३ ॥ एप दुय्योधनः पार्थ स्थानांकन दंशितः । राजा सर्वस्प लोकस्य गजानमनधावति ॥ ४ ॥ जिधांमुः पुरुषच्या भ्रातृभिः सरिती बली : माशीविषसमस्पर्शः सर्षयुद्धविशारदः ५ ॥ पते जिपक्ष यान्ति विपा परयातयः। युधिष्ठिरं घाराष्ट्र रानोत्तमभिधार्थिनः ॥ ६॥ पप सावतमीमा या निरुशा विष्ठिताः पुनः । जिहीर्पयोऽमृतं दैत्याः शक्राग्निश्वामिषावयाः ॥७॥ पते बहुत्वावरिताः पुनर्गच्छन्ति पाण्मयम् । समुद्रमिय यायोधाः प्रावृट्काले अध्याय ६०॥ संजय बोले कि इसी अन्तरमें कुन्तीपुत्र धर्मराजा युधिष्टिरको दिखाते हुये श्रीकृष्णजीने अर्जुनसे यह बचन कहा हे पाण्डव बड़े पराकमी मारने के इच्छा- वान महाधनुपधारी धृतराष्ट्र के पुत्रों से यह तेराभाई राजायुधिष्ठिर बड़ी शीघ्रता से पोछाकिया जाताहै । २ । वहां महादुर्मद क्रोधयुक्त पांचाल महात्मा युधिष्टिर को चाहतेहुये पीछे चलेजाते हैं । ३ । और पृथ्वी का राना रथसमेत सेनामों से अलंकृत दुर्योधन राजायुधिष्ठिरके पीछे दौड़ताहै। ।। हे पुरुषोत्तम यह पराक्रमी विपले सकेसमान स्पर्शवाले सपयुद्धों में कुशल भाइयों समेत मारने का अभिलापी है । ६ । युधिष्ठिर के पकड़ने की इच्छा करनेवाले यह घृतराष्ट्र के पुत्र डाथी घोड़े रथ और पतियों समेत ऐसे जाते हैं कि जैसे कि इच्छावान् परुप उत्तम मनुष्यके पास जाते हैं। ६ । यादव सात्याके व मीमसेन से रोकेहुये युधिष्ठिर को पकड़ने के इच्छाचान यहलोग फिर ऐते नियत हैं जैसे कि इन्द्र और अग्नि से वारंवार रुके हुपे अमृत के चाहने वाले दैत्यहोते हैं। ७। यह शीघ्रता करनेवाले CHAPTER LX Sanjaya said, " Pointing towards Yudhishthir, Varuder said to Arjun, " Your brother Yudhishthir is being chased yonder by the sons of Dhritrashtra. The Pancha's follow Yudhishthir, and king Duryodhan is going after Yudhishthir, With his brothers, like poisonous serpents, he is desirous of slaying Yudhish thir, Desirous of capturing him, the sons of Dhritrashtra go along with elephants and hot ges as if going to meet some great man, Checked by Satyaki and Bhimsen and desirous of catching Yudhishthir, they are standing like Daityas desirous of getting nectar checked by Indra and Agni. The numerous army of Kaurayås is going towards Yudhishtbir liko rain water towards the Ocean. The brave Warriors, roaring and (6562) Mbabharat (.१५६२) महारथाः ॥ ८ ॥ नदन्तः सिंहनादाच घमन्तथापि पारिजान् । पलपमो मरे मासा विधुन्धन्तो धपि च ॥ ९ । मृत्योर्मुखगतं मन्ये कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् हतमानी च कौन्तयं दुर्योधनघशंगतम ॥ १० ॥ यथाषिधमनीकन्तु धाराष्ट्राप पाण्डव । नास्य शापि भव्येत सप्राप्तो पाणगोचरम् । ११ ।। दुय्योधनस्य वारस्य शरोधान शीघ्रमस्थतः । संस्थान्तफस्पेष को पंग संसद्रणे ॥ १९॥ दुग्योभनस्य पीरस्य द्रोणः शारतस्य च । कर्णस्य चेषुयेगो पे पर्वतानपि शातयेत् ॥ १३ ॥ कॉन प कृतो राजा विमुखः शत्रुतापनः घलदिलघुपस्ता कृतायुद्धाविशारदः ॥ १५ ॥ राधेवः पाण्डव शक्तः पादयितुं रणे । सरितो धृतराष्ट्रस्य पुत्रैः शरैर्मदापले: ०१५ ।। तस्यैमियुध्यमानस्य संग्रामे शशितारमनः। अन्यैरपि च पायस्प कृतंबर महारयः ॥ १६ ॥ उपचासको राजा भृशं भरतसत्तम । ग्रामपे पले स्थितो श्रेषण महारथी बहुत होने के कारण पाण्डव युधिष्ठिर की ओर फिर ऐसे जाते हैं जैसे कि वर्षा ऋतु में जलके पवाइ समुद्रकी ओर जाते हैं । ८ । वड़े पराक्रमी बड़े धनुषधारी सिंहनादौको करते शंखोंको वजाते और शत्रुओं को चलायमान करते हुये चले जाते हैं। ९ । मैं कन्ती के पुत्र युधिधिरको मृत्युकै मुखमें बर्चमान मान- | ताई और उस कुन्तीके पुत्रको दुर्योधनकी प्राधीनता में वर्तमानहोकर अग्नि में होमा हुभा विचार करताई 1:१० । हे अर्जुन फिर दुर्योधनकी सेना इसमकारकी है कि इसके बाण लक्षमें वर्चमान होकर इन्द्रभी नहीं वचसक्ता है ।११। युद्ध में बाणों के समूहों को शीघ्र छोड़नवाले यमराज के समान अत्यन्त क्रोधयुक्त वार | दुर्योधन के वेगको कौन सहसता है । १२ । वीर दुर्योधन अश्वत्थामा कृपाचार्य और कणके वाणोंका वैग पर्वतोंका भी तोड़नेवाला है। १३ । शत्रुओं का संतप्त करनवाला पराक्रमी इस्तलाघवी कर्मकर्ता युद्ध में कुशल राजायुधिष्ठिर कर्ण के हाथमे मुखमोड़ने वाला होचुका है और बड़े गुरबार धृतराष्ट्र के पुत्रों समेत कणे युदमें युधिष्ठिरको पीडामान करने को समर्थ है। १५ । युदमें लड़नेवाले प्रशंस- नीय बुद्धि उस युधिष्ठिर के पराजय हानेका गुमान इन और अन्य महारार्थियों को भी पास है । १६ । क्योंकि यह भरतवंशियों में श्रेष्ठ व्रत करनेवाला समर्थ रामा blowing their coachs, are going on. I fod Yudhishthir in the jawa of death. Fallen in the hands of Duryodhan, he is like a victim of sacrifice. 10. Even Indra cannot scape from the darts of Duryodhan's warriors. Who can bear the Indra like prawess of Duryodhan? Brave Duryodhan, Kripacharya and Karan can break mountains with their arrows. Yudhishthir is turning back from the encounter of Karan, who with the holp of the sons of Uhrishtrashtra is too strong for him. 15: Olher warriors too, are desirous of defeating him; for ho is better suited to do the duties of Brahmaps than those of Kshatry&s. Surely he is in a great danger from Karan. I think that Yudhish- - (१५६३) कर्णपंव Karan Parv (6563) साहिषले विभुः ॥ १७ ॥ कर्णन चामियुक्तोयं भूपतिः शत्रतापनः । संशयं समनु मातः पाण्डवो पै युधिष्ठिरः ॥ १८ ॥ न जापति महाराजो मन्ये पार्थ युधिष्ठिरः। यमिसेमः सहत सिंहनावममर्षणः ॥ १९ ॥ नईतां धार्तराष्ट्राणां पुनः पुनररिन्दमः । धमताम्य महाशखान संग्रामे जितकाशिनाम् ॥२०॥ युधिष्ठिरं पाण्डधेयं हतंति पुरु वर्षमा सम्चादयस्यसौ कणों धाराष्ट्रान महारथान् ॥ २१ ॥ स्थूणाकर्णेन्मजालेन पार्थ पाशुपतेन छ । प्रछादयन्ति राजाने शखजालमहारथाः ॥ २२ ॥ भातुरोहि तो राजा सनिषणच भारत ! ययनमन तन्ते पाचाला सह पाण्डः ॥ २३ ॥ स्परमाणस्पराकाले सर्पशास्त्रमावराः । मम्जन्तभिव पाताले घलिनोप्युज्जिहीर्षक: ॥२४॥ केतुर्दश्यते राज्ञः कर्णेन निहतः शरैः। पश्यतोर्यमयोः पाप सात्यकेश शिखण्डिनः ॥ २५॥ कृपयुम्नस्य भीमस्थ शतानीकस्य घा विभो । पाञ्चालानाञ्च मां चेदीमाञ्चव भारत ॥ २६ ॥ एषकों रणे पार्य पाण्डवानामनीकिनीम। मुधिष्ठिर ब्राह्मणों के क्षमा माद पराक्रमों में नियत है यह क्षत्री धम्मरूप पराक्रम में नियत नहीं है। १७ । निश्चय करके कर्णके साथ भिड़े हुये शत्रुहन्ता युधिष्ठर रहे संशय में प्राप्तहमा है । १८॥ हे अर्जुन जोकि असहनशील भीमसेन शत्रुओं के सिंहनादों को सहरहा है इससे मैं अनुमान करता कि महाराज युधिष्ठिर जीवते हुए नहीं है । १९ । हे भरतर्षभ युद्धमें विजयसे शोभायमान वारंवार गर्नते औरक शंखोंको बजाते हुये । २०, यह कर्ण बड़े पराक्रमी उन धृतराष्ट्रके पुत्रों को प्रेरणा करता है कि तुम पांडव युधिष्ठिरको मारो । २१ । हे मर्जुन महारथी लोग इन्द्र- जालरूप स्थूणा कर्णनाम गांधभत्र वा पाशुपतिमन और वाणोंसे राजाको ढक रहे हैं । २२ । हे भरतवंशी अर्जुन राजायुधिष्ठिर को ऐसाब्याकुल कर्गदयाहै यह पोचालेदेशी. पांडवों समेत सब शूरवीर इसके पीछे हुपे हैं इसीप्रकार तुमसे भी यह राजा रक्षाकरनेके योग्य है । २३ । सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ पराक्रमी शीघ्रता के समय भीमता करनेवाले शूरवीर उस पातालमें डूबेहुये के समान युधिष्ठिरको निकालने की इच्छा कररहे हैं । २४ । राजाकी वजनहीं दिखाई देती है हेअर्जुन वह राणा नकुल, सहदेव, सात्यकी और शिखण्डी के देखते हुये कर्णके बाणों से मारागपा । २५ । हे भरतवंशी समर्थ अर्जुन वह रानाधृष्टद्युम्न मामसेन, मावानीक this is no more, because valiant Bhim is silently hearing the roars of the hostile warriors. Roaring and .blowing their conchs, Karan ja urging the sons of Dhritrashtra to slay Yudhishtbir. 21. The network of enemy's asrows has covered the king. Yudhishthir is in great trouble and the Pancbals and Pandavas follow him. You too, must protect the king. Our warriors are trying to extricate him from •trouble. I donot see the king's banner: he is slain by Karan in the |ipresence of Nakul, Sahadev, Satyaki and Shikhandi.25. in spite of Dhrishtadyumn, Bhim, the Panchals and the Chanderis, Ho is slain Mahabharat 165621 शरर्षिय सयति धै नलिनीमिष कुञ्जरः ॥ २७ ॥ एते द्रयन्ति रथिनानदीया पाण्डुनन्दम । पश्य पश्य यथा पार्य गच्छन्तेते महारथाः ॥ ३८ ॥ एते भारत भातमाः फणेनाभिहता रणे । मार्शनादान विकुर्वाणा विद्रयन्ति दिशो दशः ॥ २९ ॥ रथाना द्रवते वृन्दमेतब्य समन्ततः । द्रव्यमाणं रणे पार्थ कनामित्रकर्षिणा ॥ ॥ हस्ति कक्षा रणे पश्य थरन्तीं तत्र तत्र हरयस्थ सूतपुत्रस्य केतुं केतुमता घर ॥ ३१ ॥ असी धावति राधयो भीमसनरथं प्रति । किरन शरशतान्य विनिम् स्तव याहिनीम्।।१२।एकच पश्यपाञ्चालान् द्राधमानान् महारथान् । शक्रेणेव यथा त्यान् हन्यमानान्महाध.३३ः एष कर्णो रणे जिस्या पाञ्चालान पाण्डसजयान्! दिश प्रेक्षते सर्यास्त्वदर्थमिति मे मतिः ॥ ३४ ॥ पश्प पार्थ धनु श्रेष्ठं विकर्ष न स धु शोभते । शयु जित्वा यथा शझो देवसंघैः समावृतः ॥ ३५ ॥ एते नईन्ति और सब पांचाल वा चंदेरीदेशियों के देखाहुये मागगया । २६ । हे भजुन यह कर्ण, वाणों से पांडवोंकी सेनाको ऐसे मारहाहै जैसे कि कमळके वनोंको हाथी मारताहे । २७ । हे पांडुनन्दन यह आपके रथी भागते हैं हे अर्जुन देखो २ यह महारथी जाते हैं । २८ । हे भरतवंशी यह हाथी कर्ण के वाणों से घायल और पादित होकर शन्दोंको करतेहुये दशों दिशाओंको भागते हैं । २९ । हे भर्जुन शत्रुओंके पराजय करनेवाले कर्ण से युद्ध: भगोयहुपे यह रथों के समूह चारों औरसे भागते चलेजाते हैं । ३० । हे ध्वजाधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन कर्णके रथ पर नियत हाथोकी कक्षाका चिन रखनेवाली और जहां तहां युद्धमें घूमने वाली धमाको देखो । ३." यह कर्ण हजारों वाणों को वरसाता तम्हारी सेना को | मारता हुआ भामसेनके रघुपर दौड़ताहै । १२ । इन भगायहुये महारथी पांचालोको ऐसा देखो से कि महापुद्र इन्द्रसे भगायहुये दैत्यहोते हैं । ३३ । यह कर्ण | युद्धमें पांचाल पांडव और मृत्रियों को विजय करके तेरेनिमित्त सय दिशाओंको देखताहै यहमेरा पकायतुमान है।५४ हे अर्जुन यंहकर्ण उत्तम धनुपको सेंचता ऐसा शोभायमानहे जैसे रि देवगणोंसे व्याप्त शत्रुओं को रिभयकरके इन्द्र शोभायमान होती ३५ यह सब कौरखें. कर्ण के परागको देखकर गर्न Karan is destroying the army of the Pandavas as an elephant dues a forest of lotus. Look at the warriors who are running away.. The elephants wonnded by Kõran's arroys are running away. in all direct, ions. Routed by: Garan, the lines of cars are being broken.30. Look at the standard of Karan baying the device of elephant's lope, movang here and there's Showering thousands of arrows over your army, Karan attacks Bhim. Look at the routed Panchals like Daityas. routed by Indra. Having conquered the Srinjayas and Panchals, Karan is looking for you in all directions. Drawing his bow, Karan looks glorious like Indra after dispersing the Dairyas, 35. All the .
. । कर्णपर्ष Karan Parvi 16565] कोरल्या हट्वा कर्णस्य विक्रमम् । त्रासयन्तो रणे पाण्डुन् संजयांश्च समन्ततः ॥ ३६॥ एष सर्वात्मना पाण्डूलासयित्वा महारणे । अभिमाषति राधेयः सर्व सैन्यानि मानद ॥ ३७॥ अभियत भद्र घों दुतं द्रवत सौरवाः । यथा ओपन्न षः कश्चिन्मुच्येत युधि पयः ॥ ३८ ॥ तथा कुरुत संपत्ता षयं यास्थाम पृछतः । एषमुक्त्वा गतीधेष पृष्ठतो पिकिरछरान् ॥ ३९ ॥ पश्य फर्म रणे पार्थ श्वेतच्छत्रपिराजितम् । उदयं पर्वत यत् शशान्नोपशोभितम् ॥ ४० ॥ पूर्णचन्द्रनिफाशेन मुर्द्धिन छत्रेण भारत । ध्रियमाणेन समरे श्रीमच्छतशलांकिना ॥ ४१.॥ एष स्वां प्रेक्षते फर्णः सफटाक्षं विशाम्पते । उत्तम अवमास्थाय ध्रुवमेष्यति संयुगे ॥ ४२ ॥ पश्य ह्येने महाबादी विम्यान महखनुः। शराचासोविषाकारान् पिएजन्त महारणे ॥ ४३ ॥ असीनिचो राधेयो दृष्ट्वा ते वानरध्वजम् । प्रार्थयन् समर पार्य स्वया सह परन्तप ।वधाय हुये शब्दोंको करते हैं और युद्धमें चारोंओर से पांडव और जियों को डराते । ३६ हे प्रशंसा देनेवाले यह कर्ण युद्धमें सव आत्मासे पांडवोंको भयभीत करके सब सेनाके मनुष्यों से वोलताहै । ३७ । हे कौरव्य तुम्हारा कल्याणशे तुम शीघ्र चलकर सम्मुखताकरो जिससे कि कोई मुंनी युद्ध में तुम्हारे हाथसे जीवता वचकर न जावे १८। तुम शस्त्रोंको धारणकिये सावधानी से युद्ध करो और हमपीछे की ओरसे चलते हैं यह कर्ण इसरीतिसे कहकर पीछे की ओरसे बाणों को मारता हुआ चलागया । ३९ । हे अर्जुन, त्यसे शोभायमान कर्णको देखो वह, ऐसा मालूम होता है जैसे कि चन्द्रमा से शोभायमान उदयाचल पर्वतहोता है, ४० हे भरतवंशी अर्जुन पूर्ण चन्द्रमा के समान शोभायमान सौ शलाका रखनेवाले मस्तकपर,पारण किये हुये छत्रसमेत । ४१ । यह कर्ण.तुमको सकटाक्ष देखता है | निश्चय करके यह वड़ो तीव्रता में नियत होकर युद्ध में पायेगा ।४२ हेमहावाहु,पड़े युद्ध में इन धनुपको चढ़ानवाले विपते. सपके समान पाणों के छोड़ने पाले इस कर्णको देखो। ४१ । हे शत्रुसंतापी भर्जुन यह कर्ण तुझ से युदःकरनेकी इच्छा; करताहुआ तेरी पानरीधजाको देखकर लौटा यो अपने मरने के लिये.ऐसें आता. Kauravas roar with joy at the sight of Karai's powess and terrify the Pandavas and Panchals. Terrifyipg all the warrioia of the Pandaras, Karan thus addressed his men,',' Fight with the Srinjayas, !! Kauravas, so that none of them can scaps you.: Frght rarafally and we shall follow you.. Having said thiş, "Karán goes on showering arrows Luok at the white uobrolla of Karan who looks like Udaya. chał with the moon over it." 40. Having, an" umbrella, Áright like the moon, orir him, he throws sitle glances at you. Sarely, he will come.upon you in great fury. Look at Karan drawing his huge bow and discharging arrows like venomous snakes. Desirous of fighting with you, be turns back at the sight of your monkey stanuurd. He .
. (6566] Ilabahbarab धामनोश्येवि दीवास्यं शलभो पथा। ४॥ कर्णमेकााकनं पृष्ट्या स्थानीफेन भारत।रिरक्षिपुः सुसंपत्तो धार्तराष्ट्रो निधीते । सयः सहभिर्युगात्मा पायता प्रयत्नतः ४६ ॥ त्वया पशञ्च राज्यञ्च मुखञ्चोचममिच्छता । मदीनयोर्षिभृत्यो पंतपयमानयोः ॥ ४७ ॥ देवासरे पार्थ मृध देघदानधयोरिघ ॥ ४८ ॥ त्याच त्या तिसंरब्धं फर्णय भरतर्षभ । असो दुर्योधनः ऋद्धो नोत्तरं प्रतिपद्यते ॥ ४ ॥ मात्मनश्च कृतामान समर्माक्ष्य भरतर्षभ । तागसम्ध राधेय धर्मात्ममि युधिीरे ॥५०॥प्रतिपद्यस्व फोन्तय प्राप्तकालमनन्तरम् । आर्यो युद्धमति कृत्या प्रत्यादि रषयूपपम् ।। ५१ ॥ पाच घेतानि मुग्याना रयानां रथसत्तम। शतान्यायान्ति समरे पतिनां सिग्मतेजसाम् ॥५२॥ पञ्च नागसहस्राणि द्विगुणा पाजिनस्तया । मभिस हत्य कौन्तेय पदातिप्रयुतानि पद ॥ ५३५ भन्योन्परक्षित पारलं स्यामभिवते। मतपुष मदेशसं दर्शयात्मानमारमना । उत्तम जपमास्थाय प्रत्येहि भरतपम ॥५४॥ है जैसे कि शलभनाम पदी प्रकाशमान अग्निके के मुखमें जाता है।४।। हे भरत. वंशी रथको सेनासमेत साकानेका अमिलापी दुर्योधन अओले कर्णको देखकर लड़ता है इन सत्र समेत इसदुष्ट मनताकरणपाले दुर्योधनको पई विचार पूर्वक उपायोंसे मारनाचाहिये । ४६ । हे उरचाभिलापीपालाको अच्छीरीति से जानने वाले पदामिलापी यश राज्य और उचमनुसको चाइनेवाले तेरे हाथो मारनेके पोग्य? । १७ । हे राजा जैसे कि देवासुरों के युद्धमें देवता और दानवोंके युद्धहोते है इसीपकार हे भरतर्षभ अत्यन्त क्रोधयुक्त तुमको और कर्णको देखकर यह कोपयुक्त दुर्योधन अपनेको बुद्धिमान विचारकर उत्तरको नहीं पाता है । ४९ ॥ हे कुंतीपुत्र तुम धर्मात्मा युधिष्ठिरकेसाथ भपराध करनेवाले आसन्नमृत्यु कर्ण के सम्मुख शीघहीनाओ भोर बुद्धिको प्रवल करके इस महारथी के सम्मुख चलो। १ । हे रधियोमें श्रेष्ठ यह पांच महापराक्रमी और तेजस्वी उचम पांच हजार दायी और दशहजार घोड़ों समेत हजारों शूरवीरोंको सापलिये मयुखों पदातियोंसे युक्त होकर आते हैं । ५।। हे वीर परस्परमें रक्षित सेना तेरे सम्मुख आता है हे भरतर्षभ नुम भाप चलकर इस बड़े धनुपधारी कर्ण को दर्शन दो और बड़ी तीवता में निपत होकर सम्मुख जाभो । ५४ । यह अत्यन्त कोष comes to scek his deatà like an insect at lira d. Swing Karan fight slono, Duryodhan, with his army, fights to protect him. You should take care todestioy the bad.natured princs and his followers. You must shay him, clover warrior. if you wish for famo, greatness, kingdom and happioess. Swing you and Karan fight liko gouls and asura, edragod Duryalbar will not be able to give you any roply. Goat ono to encounter Karan who has singou against Yudhishthir, 50. The aro warriors, with fire thousiad clephants, ten thousand borse and pumberless foot soldiers, are coming against you, You must ६५६७) फर्णपर्व Karan Parav (6567) असौ कर्णः सुसंरग्धः पाञ्चालानाभधावति । फेतुमस्य हि पश्यामि धृष्टद्युम्नरथं प्रति ॥ ५५ ॥ समुच्छेत्स्पति पाञ्चालानिति मे धीयते मतिः। आचक्षे च प्रिय पार्थ सषेदं भरतर्षभ ॥ ५६ ॥ राजा जीवति कौरव्यो धर्मराजो युधिष्ठिरा। असौ भोमो महाबाहुः सनित्तधमूमुखे। वृतः सृजपसैन्येन सात्यकेन च भारत ॥ ५७ ॥ पन्त पते समरे कौरया निशितैः शरैः ।। ५८ ॥ भीमसेनेन कौन्तेय पाबालश्च महात्मभिः । सेना हि धार्तराष्ट्रस्य विमुखा विस्रवद्रणा । विप्रधावति धेगेन भीमस्य निहता शरैः ॥ ५९ ॥ विपक्षसस्थेष मही रुधिरेण समुक्षिता । भारतभरतश्रेष्ठ सेना कृपणदर्शना ॥६० ॥ निवृत्तं पश्य कौन्तेय भीमसेनं युधाम्पतिम् । पाशीधिपमिव अवं द्रावयन्तं वरूथिनीम् ।। ६१ ॥पातरक्तासितसितास्ताराचन्द्रार्फमाण्डताः । पताका यिप्रकीर्यन्ते छाप्येतानि पार्जुन ॥ ६२ ॥ रथेयः प्रपतन्त्येते रचिनो विगतासवः । नानावणेहता पाणः पाञ्चालेरपलापिभिः ।। ६३ ॥ निर्मनुष्यान् गजानवानथांश्चैव धनसय । समा युक्त होकर कर्ण. पांचालोके सम्मुख दौड़ता है मैं इसकी ध्वजाको धृष्टद्युम्न के रथ पर देखताहूं ॥५५॥ हे शत्रुप्संतापी मैं अनुमान करताहूं कि यह पांचालाके सम्मुख जाताहै हे अर्जुन अा मैं उस तेरी अभीष्ट प्रियवार्ता को कहताहूं। ५६ । कि यह श्रीमान धर्मका पुत्र राजा युधिष्ठिर.आनन्द पूर्वक कुशल से है यह महाबाहु भीमसेन सेनाके मुखसे निवृत्तहुआ लौटाहै । ६७ । और वह भरतवंशी मृजियों की सेना सात्यकि से युक्त है । ५८ । यह कैरव युद्धमें तीक्ष्णधार वाणों से मर | रहें हैं हे अर्जुन महात्मा पांचालों से और भीमसेनः के हाथ से दुर्योधनकी सेना | युद्ध में मुखों मोडमोड़कर भीमसेनके वाणोंसे घायल होकर पड़ी शीघ्रता से भागतीहै । ५९ । और टूटे कवच रुधिरसे लिप्त शरीरवाली महादुखी भरतवंशियों की सेना दिखाईदेतीहै । ६० । हे भरतर्षभ अर्जुन इस शूरवीरों के स्वामी भीम सेनको देखो कि यह विषले सर्पकी समान क्रोधयुक्त सेनाका भगानेवाला है। हे राजन यह लाळपीले काले और श्वेत सूर्य चन्द्रमा और नक्षत्रों से शोभायमान अलंकृत पताका और छत्र गिरते हैं । ६२ । मुख न मोड़नेवाले और नाना प्रकार के वर्णवाले पांचालों के वाणों से घायल और निर्जीव होकर यह स्थी अपने २ stendily face. that great archer. Enraged Karan is rushing againat tho Panchals; his banner is seen against the car of Dbrislıtadyumn. I baliave that he will attack the Panchals. I shall now tell you a piece of good news. 56. Prince Yudhishthir jg safe and sound; for brave Bhim is standing at the batrance of the army and Satyaki is with the Srinjayus. The Kauravas are dying fast of sharp arrows. Bhimsen and the Panchals bave routed the Kaurav army. They have lost their armours and are seen with bleeding bodies, 60 Look how enraged Bhim is putting them to fight There ſall the bapters 6568) Alahabharat (६५६८) द्रयन्ति पांचाला धाराष्ट्रांस्लर स्विनः ॥ १५॥ विमृदन्ति नरम्याघ्रो भीमसेनष लाभ पात् । पलं परेषां दुदस्यक्त्या प्राणानरिन्दम ।। ६६ ॥ एते नईन्ति पांघाला म्माप यन्ति धारिजान् । अभिद्रयन्ति य रणे मृदनन्तः सायकै परान ॥ ६७,॥ पश्यस्ये पाच माहात्म्यं पांचाला हि पराक्रमात् । धार्तराष्ट्रान विनिम्नम्ति कुमार सिंसर दिशा ॥ ६८ ॥ शखमाच्छिद्य शपूणा सायुधानां निरायुधाः । सेनवतानमोपासानि जन्ति घनन्ति च ॥ १९॥ शिरांस्येतानि पात्यन्ते शत्रणां घायोपि च । रचनाग दया वारा यशस्थाः सर्व एप च ॥ ७० ॥ सर्वतयाभिपन्नपा धार्चराष्ट्रमिहाचमः । पाञ्चालमानसादेत्य हंसगनेच घेगितः ॥ ७१ ॥ सुभृशंच पराक्रान्ताः पांचालाना निधारणे। रुपफांदयो पारा अपमाणामिवर्षभाः ।। ७२ ॥ मुनिमग्नांध भीमाने धाराष्ट्रान् महारथान धृष्टद्युम्नमुखा धीरा प्रन्ति शधून सायशः ॥ ७३ ॥ पांचा रथों से गिरतहैं । ६३ । हे अजुन वेगवान पांचाल मनुष्य हाथी घोड़े और रथों से जुदे धृवराष्ट्रके पुत्रोंके सम्मुख जाते हैं और नरोत्तम भीमसेन स रक्षित होकर | वह अजय पांचाललोग अपनेरमाणोंकी प्राशा छोड़ शत्रमाको मईन करते हैं। वाहे शीवजयी यह सब पांचाल मसानहो होकर शंखोंको बजातहैं और युद्धमेवाणोंसे शत्रुओं को मर्दन करतेहुये दौडतेहैं। ६७इन अपन शूरवीरोंके साहसको देखो कि पांचालदेशी शूर अपन पराक्रमोंसे धृतराष्ट्ररकेपुत्रों को ऐसे मारतजमांक क्रोधयुक्तीसंह हाथियोंका | मारतो । ६८ शस्रों से रहित शूरवीर शस्त्रधारी शत्रुओं के शस्त्रको काटकर उसीसे | इन अमोघ शस्त्रधारियों को मारतेहुये गर्जनाओं को करते हैं । ६९ । शत्रुओं के शिर और भुजाभी गिरायी जाती हैं रथ हाथी घोड़े और युद्ध के सप वीरलोग शरताके उत्पन्न करने वाले शब्दों को कररहे हैं । ७० । और यह दुर्योधन की की बड़ी सेना सब ओर को पांचालों के सम्मुख ऐसे वर्तमान है जैसाकि वेगवान | इसों से चारोंओर को व्याप्त श्री गंगाजी होती हैं, श्रेष्ठों में भी अतिश्रेष्ठ वीर कृपाचार्य और कर्ण आदि यह सब पांचालों के रोकने में कठिन पराक्रम करने वाले हुये । ७२ । भोर भामतेन के भलों से पराजित महारथी धृतराष्ट्र के पुत्रों को देखो ! और शत्रुओं के हाथ से पांचालों के पराजय होनेपर निर्भय होकर गर्नने and umbrellay of various bright colours. Wounded by the arroys of the Panchals, the warriors are falling dead. The Panchals 'rush against the sons of Dhritrashtra who are destitute of cars and beasts, Fearless of their own lives and led by Bhimasen, they slay the foes. The Panchals blow their conchs gleefully and rush against the foes to slay them with their arrows. Look at the bravery of your own warriors, who are slaying the Kauravas as lions do elephants, Deprip. ed of weapons, they make the enemies weaponless and roar loudly. The heads and arms of the enemies are being cut, The warriors and their beasts utter sjunds indicative of bravery. The great army of Duryodheu is facing the Panchals and looks like a flight of SWANA !
(१५६८) काय Karan PAIV (6559) लेवभिभूतेषु द्विषद्भिरपभीनंदन । शत्रपक्षमयस्कन्य शराजस्थति मालीः॥ ७४ ॥ विष्णभूयिष्ठतरा घासगष्ट्री महाचमः। रथाभाः मुदिप्रस्ता भीमसेनमयादिताः ॥७५ ॥ पश्य भीमेन नाराभिनानागाः पतन्त्यमा । यजिवनहतानवि शिखगणि घराभूताम् ॥ ७६ ॥ भीमसेनस्य निर्षिद्धा पाणैः सत्रतपर्वभिः। स्थायिनीक नि मृदनम्तो द्रवन्त्येते महागजाः ॥ ७७ ॥ नाभिजानासि भीमस्य सिंहनादं मुदुःसहम् । मदतोजन संग्रामे भैरवं जितकाशिनः ॥ ७८ ॥ एपे नेपादिरस्येति द्विपमुख्येन पाण्ड | धम । जियोमुस्तोमरैः कुरो दण्डपाणिरिवान्तकः 1७९॥ सतोमरावस्य भुजोराछनौ भीमेन गर्जतः सतीगैरग्निविप्रख्यनारायदेशभिईतः ॥ ८० ॥ हत्वैनं पनरायाति नागानन्यान महारिणः ॥ ८१ ॥ पश्य नालाम्बुदानभान मितामाधिष्ठितान् । शक्ति वाले धृष्टद्युम्न मादि वारहजारों शत्रुओं को पारते हैं वायुका पुत्र भीमसेन शत्रुभो के पक्षों को मझाकर वाणों की वर्षा करता है । ७४ । और धृतराष्ट्र कीवड़ी सेना महान्याकुल है और यह रथी भी भीमसेन के भयसे अत्यन्त पीड़ामान होकार भयभीतहैं १५/देखो भभिसेनके नाराचोंसे घायल होकर यहहायी एसे गिरते हैं जैसे कि इन्द्रके बनसे टूटे हुये पर्वतों के शिखर गिरते हैं भीमसेन के गुप्तग्रन्थी बाले वाणों से घायल यह बड़े हाथी अपनी सेनाओंको कुचलते दवाते हुये इधर उधरको भामते हैं, भीमसेन का सिंहनाद व दुःखसे सहनकं योग्यभानो हे राजन दण्डधारी यमराज के समान कोधयुक्त तोमरों से भीमसेनके मारनकी इच्छासे यह निपादकापुत्र इस युद्धमें गर्जनेवाल और विजप से शोभायमान वीर भीमसन के सम्मुख जाता है 1 ७९ । इसकी दोनों भुजाभों को उस गर्जन वाले भीमसेन ने तोमर से काट गला और देदीप्य भग्नि और सूर्य के समान प्रकाशित दशाणों से माराडाला इसको मारकर भर प्रहार करने वाले दूरे हाथियों के सम्मुख भाता है । ८१ । सवारों समेत सवारियों को और नीले वादलों के समान हाथियों को शक्ति पार falling on the Gangos. Kripacharya and Karau, the best of warriors are trying their best against the Panchals. Look at the sons of Dhrit rashtra routed by tho weapons of Bhimsen. Seeing the Pancbals rouoted by the foes, Dhrishtadyumn and other warriors slay the enemies. Bhimsen is sending forth a flight of arrows over the foos and the army of Duritrashtra is hard pressed. They run away from fear of Bhim.75. Wounded by Bhin's arrows the elephants fall down like mourtains struck down by vajra and run away here and there, trampling down the warriors. The roar of Bhim is unbearable The Nisbud's son is ushing on to clay Bhim with tomars like the staff of Yam. Now Bhim cuts down both his arms and kills him with ten bright arios. Having sluin him, he advances towards the line of elephants. Look at Bhin slaying riders, beasts and elephants ॥ 165700 Mallabharat (६५७०) तोमरसंघानचिनिनन्ने वृकोदरम् ॥ ८२६ सनसप्त च नागास्तान वैजयन्तांश मामा 'निहाय निशिनश्छिन्नाः पााग्रजेन ते ॥ दशभिशामको नाराबनिहतो गजः । न चासो धाराष्ट्राणां श्रूयते निनदस्तथा । पुरन्दरसमे युगे निवृत्त भरतर्षभ ॥ ८४ ॥ अक्षौहिण्यन्तमा तिम्रो धाराष्ट्रस्य संहताः । कुद्धेन नर सिंहन भीमसेनन धारेताः । ८५ ॥ संजय उवाच । भीमसनेन तर कर्म कृतं दृष्ट्या सदुष्करम । अर्जुनो ध्यधपच्छिष्टानहिनाश्रिीरातः शरैः।। ८६ ॥ ते वध्यमानाः समरे सशप्तकगणाः प्रभो । प्रभग्नाः समरे भीना दिशो दश महाबलाः। शकस्यातिीयता गत्या पिशोका भवस्तदा ॥ ८७ ॥ पार्थश्च पुरुषव्याघ्र शरैः सनतपर्वभिः । जघान णार्तराष्ट्रस्य चतुर्विधपलाचमूम् ॥ ८८ ॥ इति श्री कर्णपर्वणि संकुलद्र पटिनमोऽध्याय ६० तोमरों से मारने वाले भीपन को देखो । ८२। हे राजन तीक्ष्णशर वाले पाणों से उन सातहाथियों की वैजयन्ती ध्वजाओंको काटकर तेरे पड़ेभाईभीमसेनने मारडाला । ८३ । दशर नाराचों से एक २ हाथी मारागया इसीसे धृतराष्ट्र के पुत्रोंके शब्द नहीं सुनेजाते हैं हे भरतर्षभ इसीप्रकार युद्धमें इन्द्रक समान भीमसेन के लोटने पर क्रोधयुक्त नरोत्तम भीमसेनके हाथसे दुर्योधनकी तीनमक्षाहिणी सेना घायल और रोकीगई संजय योले कि भीमसन के उन कठिनकर्मों को देखकर अर्जुनने शेप बचहुथे शत्रुओं को तीक्ष्णधार वाणों से छिन्न करदिया । ८६ । हे प्रभु वह संसप्तकों के समूह युद्धमें घायड और भयभीतहोकर दशों दिशामों में विभागित होकर भागे और इन्द्रक मातिथ्यको पाकर शोक से रहित हुये । ८७ ॥ पुरुषोत्तम भर्जुनने टेढ़े पर्नवाले वाणों से दुर्योधन की चतुरंगिणी सेनाकोमारा like blue clouds 82. He bas out and killed seven garlanded elaphants bearing banners He has slain each telephant wich ten arrows and the cries of the sons of Diritrashtra are 11.) longer heard, Bhim has Fouadel and destroyed three akshaulinis of the Kaurar army." Sanjaya continued, "Seeing Bhim's bravery Arjun dispersed the rest of the army with his sharp arrowa Woanded and tortified battle, the Sansaptaks ran away and were sent to the region of lodra, Arjun slew the army of the sons of Dbricraslıtra," 88.
[६१७१) कर्णपर्व Karn Paray (6571 धृतराष्ट्र उवाच । निहत्ते भीमसेने तु पाण्डये च युधिष्ठिरे। यायमाने यले चापि मामके पाण्डुराजयः ॥ १ ॥ द्रवमाने कलौधे अ निरानन्दे मुमुहुः । फिम फुर्यन्त कुरषस्तन्ममाचक्ष्य संजय ।। २ । संजय उपाच । इष्ट्या भीम महा पाहुं सूतपुत्र प्रतापवान् । क्रोधरकेक्षणो राजन् भीमसनमुपाद्रवत् ॥ ३ ॥ ताप कन्तु घट्या भीमसेनात् परांगमुखम् । यत्नेन महता राजन् पयवस्थापयदली ॥४॥ व्यवस्थाप्य महायाहस्तव पुत्रस्य धाहिनीम । प्रत्युद्ययौ तदा कर्णः पापा पुखदुमदान् ॥ ५ ॥ प्रत्युद्यस्तु राधेयं पाण्डवानां महारथाः । धन्यानाः काम काण्याजी पिक्षिपन्त सायकान् ॥ ६ ॥ भीमसेनः शिने शिवण्डी जनमेजय धृष्टद्युम्नश्श पलवान से चापि प्रमद्रकाः ॥ ७ ॥ पांचालाब मरच्याघ्राः समन्ता सप वाहिनीम् । अभ्यद्रयन्त संकुयाः समरे जितकाशिनः ॥ ८ ॥ तथैष तायफा राजन पाण्डवानामनीकिनीम् । अभ्यद्रयन्त परिता जिवासन्तो महारथाः ॥ १ ॥ अध्याय ६१॥ धृतराष्ट्र पोले कि पाएडव भीमसेन और युधिष्ठिरके लाटने और पांडव वा मंजियों कहायसे मेरी सेनाके मरने । १ । अथवा अमसन्नता पूर्वक सेनाकेसमूहों के बारम्बार भागने पर संजय मुझको समझाकर कहौ कि कारवोंने क्याफिया २ | संजय बोले कि हेरामन् क्रोधसे रक्त नेत्रवाला प्रतापवान् कर्ण महा पाहु भीमसेन को देखकर उसके सम्मुख गया । ३ । भौर उस पराक्रमी भीमसेन से 'मुख फेरी हुई आपके पुत्रकी सेनाको देखकर बड़ी युक्ति और उपायसे नियत किया । । वह महाबाहु कर्ण मापके पुत्रकी सेनाको नियत करके युद्ध मे दुर्मद पाण्डवें। | के सम्मुख गया । ५। फिर युद्धभूमि में धनुपों को चढ़ाकर गायकों को छोड़ते पाण्डवोंके महारथी लोग कर्ण के सम्मुख उये । ६ । उनके नाम यह हैं भीमसेन सात्यकि शिलण्डो जनमेजय पराक्रमी धृष्टद्युम्न और सब मभद्रक नरोत्तम पांचाल मारनेकीच्छासे अत्यन्त कोधयुक्त युद्ध के शोभादेनेवाले भापकी सेनाके सम्मुख गये। ८। राजा इसीप्रकार मारनेके इच्छावान् शीघ्रता करने वाले आपकेभी महारथी पाण्डवों की सेनाके सम्मुखगये । ९ । हे पुरुषोचम,स्य हाथी घोड़े CHAPTER LXI Dhritrashtra said, "What did tho suravas do after the coming back of Bhim and Yudhishthir and destruction of our armies!" Sanj. aya said, " \\ith eyes red ia angor, brave Karan faced Bhim and rallied tho armies routed by him. Having rallied the armies, Karan opposed the Pandayas, 5, The Pandav Warriors weat against Karan discharging their arrows. Bhim, Satyaki, Shikhandi Jana. mejaya, Dhrishtadyamn and the Prabhadraks opposed your army. Your warriors too, opporod the Paoday armies. The armies, full of | elephants, horse, foot and banners were wonderful to behold. 10.
. 16872) Blahabharat रयनागासलिलं पत्तियजसमाकुलम् । षध पुरुषव्याघ्र सैन्यमद्भुतदर्शमम ॥ १० ॥ शिखण्डी तु ययांफर्ण धृष्टयम्नः मुत तप । दुःशासन महाराज महत्या सेनपावृतः ॥ ११॥ मकुलो वृषसेनन्तु चित्रसेन युधिष्ठिरः। उल्कं समरे राजन् सहदेव समय यात् ॥ १२ ॥ साम्यफि शकुनिश्चापि द्रौपदेयाः कौरवान् । भर्जुनच रणे यतो द्रोणपुत्रो महारथः ॥ १३॥ युधामन्युं महेण्यासं गौतमोश्यपतधणे । कृतषमा च बल घानुनमाजसमागपत् ॥ १४ ॥ मोमनः कुरुन् सर्वान पुषि तप मारिष । सहानी कान्महाबाहुरेक एव न्यषारयत् ॥ १५ ॥ शिघण्टी तु ततः कर्ण विचरन्तमभीतषतां भीमहन्ता महाराज पारयामास पत्रिीमः ॥ १६॥ प्रतिस्ततः कर्णों रोषात प्रस्फु रिता | शिखण्डिनं विभिपण गेमपताइयत् ॥ १७ ॥ पारपंस्तु स तान पति और घनाभों से युक्त वह सेना भपूर्व देखने में माई । १०1हे महा राज शिखण्डी कण के सम्मुख गया धृष्टद्युम्न उस भापके पुत्र दुशासन के | सम्मुख गया जो कि बड़ी सेनाको साथलिये दुषेया । ११ । हे राजन नकुल वृषसेनके युधिष्ठिर चित्रसेनके और सहदेव उलूकके सम्मुख गया ।१२। सात्यकि शाने के द्रौपदी के पुत्र कौरवोंके और युद्धमें कुशल अश्वत्यामा अर्जुन के सम्मुख गया । १३ । कपाचार्यप युद्ध में बड़े धनुपधारी युधामन्यु के और पराक्रमी कृतवर्मा उचमाजाके सम्मुख गया । १४ । हे श्रेष्ठ फिर महावाहु अकेले भीमसेन ने सब कौरवों समेत सेनाकोसाय रखनेवास आपके पुत्रों को रोका १५ हेमहाराज | इसके भनन्तर भीमनी के मारनेवाले शिखण्डी ने उस निर्भयके समान घूमने पाने कर्णको रोका । १६ । उसके पीछे रुके हुये और क्रोधसे चलायमान ओप्ठ माळे कर्ण ने शिखण्डीको तीन वाणोंसे दोनों भकुटियों के मध्यमें घायल किया१७ यह शिखगरी उन वाणों को धारण कियेहुये ऐसे शोभायमान हुआ जसे कि तीन शिखरों से उठे हुये मुवर्ण के पर्मत होते हैं । १८ । युद्धमें कर्ण के हाथ से प्रत्पन्त घायल बड़े धनुपधारी शिरदखीने ताणधारवाले नरे वाणों से कर्ण को Slikhandi opposed Karan and Dhrishtadyumo opposed Dushası, and his army. Nakul met Vrishasco; Yudhishthir opposed Chitrasen and Uluk opposed Sahadur. Satyaki met Shakuni, the song of Draupadi opposed the Kauravas and Ashwatboma met Arjun. Kripa. charya faced Yudbamangu and Kritvarma inot Uttavanja. Bhimasen alonu opposed all your sons. 15. Snikbandi tho slayor of Bhishm oppiasel Karaa. Enraged Karan wounded Shikbandi with three arrows in tho midst of brows and the latter lookod glorious like a three piakol mountain. Wounded by Karan, Shikbandi wounded lim with - - (६५७३) कष Karan Parv • (657301 पाणान् शिस्त्रण्डी षड्यशोभत । राजतः पर्वतो यात्रिभिः श्रृंखरियोच्छ्तैिः ॥१८॥ सोतिविद्धो महेष्वासः सूतपुत्रेण संयुग। ण पिप्पाघ समरे नपत्या निशितैः शरैः ॥ १९ ॥ तस्य कर्ण हयान हत्या सारथिमच विभिः शरैः । उन्ममाथ पम्हारय क्षुरप्रेण महारथः ॥ २०॥ हताश्यात सतो यामादघालाय महारय: शक्ति निक्षेप कर्णाय संकुदः शत्रतापनः ॥ २१ । ता लिस्या समरे कर्णखिमिर्भात सायकैः । शिखण्डिनमथाविध्यन्नभिनिशितैः शरैः॥ २२ ॥ फर्णचापच्युतान् पाणान् घर्ज यस्तु नरोत्तमः । अपयातस्तसस्तूर्ण शिखण्डी मुशविक्षतः ॥ २३॥ ततः कर्णो महाराज पाण्डसन्यान्यपातत् । सूलराशि समासाद्य यथा घायुमहापलः ॥ २४ ॥ धृष्टद्युम्नो महाराज तब पुत्रंण पीडितः । दुःशासनं त्रिभिणः प्रत्यविध्यत् स्तनाग्तरे ॥ २५ ॥ तस्य दुःशासनी घाहु सव्यं विव्याध मारिप । शितेन रुपमपुंखेण भल्लेनानतपर्वमा ॥ २६॥ धृष्युम्नस्तु निषिद्धः शर घोरेभमर्पणः। दुःशासनाप संधः प्रेषयामास भारत ॥ १७ ॥ आपतन्तं महागे धृष्यम्नसमरितम् । शरश्चिच्छेद पुषस्ते रिभिरेष पीड़मानकिया ।१९। फिर महारथी कर्णने तीनवाणोंसे घोड़ों और सारथीको मारकर सुरमसे उसकी ध्वनाको काटा । २० । शत्रुओं के संतप्त करनेवाले महारथी शिखंडी ने मृतक घोड़ों के रथसे उतरकर अपनी शक्तिको कर्णके,ऊपर फेंका । २१ । है भरतवंशी फिर कर्णने तीनशायकोंसे उसशक्तिको काटकर तीक्ष्णनौ वाणों से शिखण्डीफो घायल किया । १२ । इसके पीछे अत्यन्त व्याकुळ शिखएडी कणके धनुप से निकले हुये वाणोंको रोकताहुआ शीघ्रही हटगयो । २३ । हेमहाराज इसके पछि कर्णने पाडवी सेनाको ऐसा भिन्न २ करदिया जैसे कि बदा पराक्रमी वायु रुईके ढेरोंको तिर विर करदेता है । २४ । फिर आपके पुत्रके हाथते.पीडामान | धृष्टद्युम्न ने तीनवाणों से दुश्शासनको छातीपर छेदा । २५ । फिर दुश्शासन ने | उसकी वाई, भुजा को छेदा हे भरतवंशी मनहरीख टेटेपर्ववाले भल्लसे घायल २६ क्रोधयुक्त धृष्टद्युम्न ने घोरवाणको दुइशासनके ऊपर फेंका ।२७। हे रामनू आपके पुमने धृष्टद्युम्न के चलाये हुये बड़े वेगवान् वाणको तीनवाणों से काटकर । २८ । ninety arrows. At this, Karan slew bis horses and driver and cut his standard, 20. Shikbandi the destroyer of foes came down from his car and burled his spear at Karan; but the latter cut it down and wounded the former with nine sharp arrows. 22. Having checked the arrows for some time, Shikhendi withdrew {from Karan's encounter. Then Karan routed the Panday army as the wind disperses a beap of cotton. Wounded by your son, Dhrishtadyumn wounded Dusha. san on the breast. 25. Dushasan than pierced his left arm. Wounded by that arrow enraged Dbrishtadyumn shot a dreadful arrow at Dashasan. The latter cut it down into three and wounded the former with seventeen arrows on the breast and arme brænraged Dhrishta- Mababbarat 6574) विशाम्पते ॥ २८ ॥ अयापर सप्तदशै छैः कनकमवतैः ।धृष्टपुग्न समासाप पारो हरसि चार्गपत् ॥ २९ ॥ ततः स पापंतः कुलो धनुचिच्छेद मारिष। क्षरण मुदी पोन तत उच्चु शुजनाः ॥ ३० ॥ अथान्यचनुगदाय पुप्रस्ते प्रहसन्निष । धूपएम्न शारणात समन्तात् परयवारय ॥ ३१ ॥ तव पुत्रस्य ते दृष्ट्वा विक्रम मारमनः । स्पस्मयन्त रपे वोधा: सिद्धाशाप्सरसत्तथा ॥ ३२ ॥ धृष्टद्युम्नमइपयाम घटमानं पा पलम् । दुःशासमेन संरुद्ध सिंहनेव महाद्विपम् ॥३३॥ ततः सरधनागावाः पापाला पाण्डुपूर्वज । सेनापति परी सो सरुधुस्तनयं तय ॥ ३४ ॥ ततः प्रयते युसंताप कानां परैः सह । घोरं माणभूतां काले भीमपं परन्तप ॥ ३५ ॥ नकुलं वृषसेनत मिया पञ्चभिरायसः । पितुः समीपे तिष्ठन् चे प्रिभिरम्पैविध्यत ॥ ३६॥ नमस्तु सो पसेन इसन्निव । नाराधेन सुतीक्ष्णेन विव्याध हृदये भुशम । ३७ ॥ मुनहरे अंगवाले सत्रह भल्लों से धृष्टद्युम्न को दोनों भुना और छातापर पापलं किया । २९ । इसके पीछे उस क्रोधभरे धृष्टद्युम्नने अत्यन्त तीक्ष्ण क्षुरपसे दुबशा- सन के पनुपको काटा तातो पनुष्य पुकारे ।३०। इसके पीछे हँसतेहुपे आपकं पुन दूमो धनुपको लेकर वाणों के समूहोंसे धष्टयम्नको चारों ओर से रोकार सर शूरवीर और सिद्धौंसमेत अप्सराओं के समूह आपके पुत्रके पराक्रमको देखकर पद्धर्भ माश्चर्यसा करनेलगे । २२। उपाय करनेवाले बड़े पराक्रमी दुशासन से रुकेहये धृष्टद्युम्नको ऐसे नहीं देखा जैसेकि सिंहसे रुके ये बड़े हायीको नहीं देखते श पांडके बड़े भाई इसके पीछे सेनापातके चाहने वाले पांचालों ने रब हामी भौर घोड़ोसमंत भापके पुत्रको रोका १० देशघुसन्तापी इसकेपछि आपके शरीरों का युद्ध दूसरोंके साथ होनेलगा चह युद्ध महाघोर भयानकरूप और समपपर माणों का दरनेवाला था । ३५ । पिताके सम्मुख नियत इपसेन ने पाच सारे के पाणों से मौर तीन अन्ययालों से नकुल को छेदा । ३६ । इसके पाछे हँसते ये शूरवीर नकुल ने अपन्त तीक्ष्ण नाराच से पसेनको हृदग पर कठिन पीरामान किया।३५ । पराक्रमी शत्रु के हाधसे अत्यन्त घायल उस शत्रुओं के पराजय करने पाल ने वासबाणों से शत्रुको पीडामान किया और उसने भी उत्तको पांचवाणोंसे dyumun then cut Dushasan's bow and tho people criod out in dismay 30. Your son smilingly took up another boss and checked his adver.. sary with the flights of his arrows. All the warrriors, with the sidhas kad apasras, wondered at the priveas vf your son. Hidden ander ATIONS, Dhrishtadyumn became invisible and was checked like an clephat by n líon, Then other warriors helped Dbrishtadyumn by checking Dushasan with the army of clephants and horses.' Then the battle of the two armies was dreadful. 35. In the presence of his father, Vrishažen, wounded Nakul with eight arrows. Nakul with a souls, wouila. Yríslusen with arrow, The latter again wound.
10575 कर्णपर्ध Karan l'arv सोतिषिखा पलपता शत्रुणा शत्रुमर्पणः । शत्रु घिच्याध विशत्या स च तं पञ्चभिः गरेः ॥ ३८ ॥ ततः शरसहस्सेण तावुभौ पुरुषर्षभो । आमादयेतामन्योन्यमयाभज्यत चाहिनी ॥ ३९ ॥ एष्ट्या तु प्रदतां सेनां धाराष्ट्रस्य सूतजः। निवारयामास पलाद नुसम्प विशाम्पते ॥ ४० ।। निचे तु ततः कर्ण नकुलः कोग्यान गयो। फर्णपत्रस्तु समरे हित्वा नकुलमेव तु ॥ ४॥जुगाप पर्छ त्वरिता राधेयस्यैष मारिपाउलूकस्तु रेण कुखः सहदेवेन पारितस्याश्यश्चतुरा इत्या सहदेवः प्रतापवान् । सारापिं प्रेषया मास यमस्य सदनं प्रति ॥ ४३ ॥ उलूफस्तु ततो यानादघप्लुत्य विशाम्पते । त्रिग साना पलं नूर्ण जगाम पितृनन्दनः ॥४४॥ सात्यकिः शपुन विध्यापिंशस्या निशितैः शःजारच्छद भल्लेन सोचलस्य हसन्निध ॥ ४५ ॥ सोयलस्तस्य समरे कुयो राजन प्रमापयाम् । यिदाय्यं कवचं भूयो ४ चिच्छेद काञ्चनम् ॥ ४६॥ अथैनं निशिसेवाणः सात्यक्षिा प्रत्यविध्यत । सागपञ्च महाराज त्रिभिरेष समार्पयत् । व्यथित किया। १८ । उसके पीछे उनदोनों पुरुषोत्तमों ने हजारों वाणोंसे परस्पर ढक दिया तदनन्तर सेना छिमभिन्न होगई । ३१ । हे राजन् कर्णने दुर्योधनकी माग हुई सेनाको देसकर उनको पीछे से जाकर रोका.। ४० । इसके पीछे कर्ण के लौटने पर नकुल कोरवोंकी भोरचला फिर कर्णके पुत्रने युद्ध में नकुलको छोड़ कर । ४१ । फिर शीघ्रता से कणकोही सेनाको राक्षित किया वहां क्रोधयुक्तउलूक | को युद्ध में प्रतापवान सहदेवने रोककर उसके चारों घोड़ों को मार सारथीको यम- लोक में पहुंचाया । । हे राजन् इसके पीछे पिताको प्रसन्नकरने वाला उलूक रयते उतरकर शीघही विगतदेशियों की सेनामें गया । ४४ । और सतेहुपे सात्यकिने तेज धारवाले वीसवाणों से शकुनिको छेदकर एकवाणसे उसको ध्वन को कारा । ४५ । हे राजन् फिर क्रोधयुक्त प्रतापवान शकुनी ने युद्ध में कवच को चीरकर उसकी मुनहरी ध्वजाको काटा । ४६ । इसकपीछे शीघ्रता करनेवाले | साल्पाक ने वाणोंसे उसके सारधी और घोड़ोंको यमलोकमें पहुंचाया। १७॥ है भरतपम फिर शकुनी अकस्मात् रथसे कूदकर शीघ्रठी महात्मा उलुकके रथपर od the former with tiponty arrows and was founded in return by five Then the two best of neu hid each other with thousands of arro va and the arnies were dispersod. Seing Duryodhan's army put to flight, Karan checked the flying warriors from bohjnd, 40. At the return of Karan, Nalul advanced towards the Kauravas. Karan's son loft Nakul and protected the army. Having checlod in battle, Sabadev slew lis Lurres spd driver. Uluk tanie duwu from the car and entered the army of Trigantas to flerte his father. Hay. ing pierced Sliaduni with twenty thorp arrow, Satyaki cut his stand. ard too, with u smile. Glorious Sbakuni pierced bis ac tersary's armour and cut down bis golden standard. 46. Satyali scontent arrowe.
(6576) Mahabharat [६५७६] । भथास्य वामांस्त्वरितः शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥४७॥ ततोचप्लुत्य सहसा शकुनिर्भरत पम । मारोह रपं तूर्णमल्फस्य महारयः। अपोवाहाथ शीघ्रं स शैनेयायुधशालिनः ॥४८॥ सात्यकिस्तु रणे रास्ताषकानामनीकिनीम् । अभिदुद्राय धेगेन ततोनीकम भन्यत ॥ ४९ शैनेयशरसंछन्नं तव सैन्य विशाम्पते । मेने दश दिशस्तूर्ण न्यपथ मतासुरम् ॥ ५० ॥ भीमसेन तव सुतो वारयामास संयुगे। तन्तु भीमो मुहान व्यश्व मतरवजम् ॥ ५१॥ चके लोकेश्वर तत्र तेनातुप्यन्त वै जनाः। ततोपायान्नृपस्तत्र भीमसेनस्य गोधगत् ॥ ५२ ।। कुरुसन्ध तत्तः सय भीमसेनमुगादयत् । तत्र नादो महानासोलीमसेनं जिघांप्सताम् ॥ ५५ ॥ युधामन्युः कृपं विध्या धनुरस्थाशु चिच्छेद अथान्यचनुरादाय कपः शनाचरः ॥ ५४॥ युधामन्योयज स्तं उपचापातयत क्षिती । ततोपायाद्रयनैव युधामन्युमधारयः ॥ ५५॥ उत्तमौजाश्च हार्दिक्यं भमि भीम' ('सवारमा तव युद्धको शोभा देनेवाले सात्यकिने उसको शीघ्रही हटाया। ४८ । है राजन फिर सात्यकि आपकी सेनाके सम्मुखगया और सेना भिन्नभिन्नहोंगई । ४१ । सात्याकके वाणोंसे ढकीहुई आपकी सेनाके लोग शीघ्रही दशों दिशाओं में भागकर निर्जीवों के समान गिरपड़े । ५० । फिर आपकं पुत्रने युद्ध में भीमसेन को रोका ता भानसेनने एकमुहूर्त भरमेही वहां उस पृथ्वी के राजा दुर्योधनको घोड़े रथ सारथी और वजासे रहित करदिया उस कर्मसे सब मनुष्य प्रसन्न हुये इसके पछि राजा दुर्योधन भीमसेनके आगे से हटगया ।५२। फिर सब कौरवी सेनाने भीमसेनको घेरा वहां भीमसेनके मारने के इच्छावान् शूरवरॉिके बड़े शब्दहुये ।। ५१ । युधामन्युने कृपाचार्यको छदकर शीघही उनके धनुपको काटा इसकेपछि शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ कृपाचार्यने दूसरे धनुपको लेकर । ५४ । धामन्युकी ध्वजा | सारथो और छत्रको पृथ्वापर गिराया इसकेपीछे महारथी युधामन्य स्थकी सवारी से इंटंगया । ५५ । उत्तमौजाने भयानकरूप और भयानक पराक्रमवालकृतवर्माको वाणोंसे नकस्मात ऐसा ढकदिया जैसे कि वादलपानीकी वर्षासे पर्वतकोढकदता bis horses and driver to the region of Yam. Shakuni came down from the car and mounted that of Uluk. He was put to fight by Satyaki. Thea Satyaki routed your army. Your warriors bid by Satyaki's arrons, dispersed in all directions or fell down dead. 50. Your son checked Bhim; but the latter soon deprived him of horses, car and driver, and the lookers on were pleased. Then Duryodhan removed himself from the presence of Bhim. The Kaurav warriors then surrounded Bliim with loud cries, l'udbamanyu wounded Kripacharya and cut down his bow. Kripacharya look up another bow and cut down his adversary's banner, driver, and umbrella and made him link away. Uitawaạja, all of a suddon, hid Kritvarma of dreadful process wità arrows as clouds hide a hill. I had never [६५७७) fuqi Kure Paray' (6077) पराकमम् । छादयामास सरसा वृपया मेघवाचलम् ।। ५६ ॥ तर मुमचासी घोररूप परन्तप । यारशं न मया युद्धं दृष्टपूर्व घिशाम्पते ॥ ५७ ॥ कृतवर्मा तता राजन्नुमाजसमाइये । हदि यिम्बाध सहसा स रथोपस्थ भाधिशत् ॥ ५८ ॥ सारथिस्तमपोषाह रथेन रथिनां वरम् । फुरुसैन्य ततः सर्व भीमसेनमुपादयत् ॥५॥ दुशासनः सायलय नजानीकेन पाण्डवम् । महता परियाच क्षुद्रसपतायत ॥६॥ ततो भीमः शाशतर्दुराधनममर्पणम् । विमुखीमत्य तरसा गजानीफमुपाद्र पत्॥११॥ तमापतन्तं सहसा गजानोकं वृकोदरः । इष्टनव मुभृश मुद्धो दिथ्यमन भुदरपत् । गजगजानध्याहन घणन्द्र घासुरान् ॥ ३२ ॥ ततोऽन्तरीक्षं पाणोधेः। शलभैरिय पावकम् । आदयामास समरे गानिनन् वृकोदरः॥ ३॥ ततः कुञ्जर यूपानि समेतानि सहस्रशः । यधमत्तरसा भीमा मेघसङ्घा निपानिलः ॥ १४ ॥ सवर्णजालपिहिता मणिजालैश फुजराः।रेजुरभवधिक सख्ये विद्यार पन्त इवम्युदाः है । ५६ । हे शत्रुसंतापी रामा धृतराष्ट्र वह महाघोर युद्ध ऐसा बहुत बड़ाहुमा (जैताकि मैंने पहले कभी न देखाथा । ५७ । इसकेपछि कृतवर्माने युद्ध उत्तमौजस को दृायपर पाडामान किया तब वह मकस्मात रथके अंगार बैठगया । ५८। फिर सारथी रथके द्वारा उस महारधीको दूरलेगया इसकेपीछे सन कौरवी सेना भीमसनके उपरचढ़माई । ५९ । दुश्शासन और शकुनीन हाथियों की सेना समेत भीमसेनको धेरकर चरम नाय वाणोंसे घायल किया । ६० । तयक्रोधयुक्त भीमसेन सैकड़ों वाणों से क्रोधपुत दुर्योधनको विक्षस करके वड़ो तीघ्रतासे हाथियों की सेनापर आटूटा । ६१ । यहाँ अत्यन्त क्रोधयुक्त भीमसेन ने उस अकस्मात आने वाली हाथियों सेनाको देखकर दिव्यभत्रको मकट किया हाथियों को हाथियों से ऐसमारा जैसे कि वजसे इन्द्र भामरों को मारताहै । ६२ । इसकेपाछे युद्ध में हार्थियों को मारतेहुपे भागसेनने वालों के समूहों से आकाशको ऐसा ढदिया जैसे कि टायों से वृक्ष ढकजाताहै इसकेपीछे भीमसेनने मिले हुये हाथियों के हजारोंझण्डों को बड़े वेगसे ऐसे छिपभिन्न करदिया जैसे कि बादलों के समूहों को वायु ति |विर करदेताहै । ६४ । सुवर्ण और मणियों के जालों से ढकेहुयेहाथी युद्धमें ऐसे अधिक शोभायमान हुय जैसे कि विजलो रखनेवाले बादल । ६५। हे राजन भीमseen such a dreadful battle before. Then Kritvarma wounded Uttamaujas on the breast and the latter sat doyn on his, car and was romoved by the driver far away. Then all the Kauray army attacked Bhim and wounded him with arrows. G0. With thousands of arrows, Bhim put Duryodban to fight and charged the line of elephants. Enraged Bhim, seeing the army of clepbants belore him, used a celestial weapon and slew them as Indra slays asurs with Fajra. Slay. ing the elephantx, Bhim covered the air with bis arrows like the Aights of locusts and dispersed them as the wind does the clouds. Covered by goldea arrows, the elephants looked glorious like clouds, (6580] Slababharat नृपः शरवण महता प्रत्यवारयदागतान् ॥९॥ शरीघान् विसृजन्तस्ते प्रेरयन्तम तामरान् । म शयनयन्तोऽपि राधेयं प्रतियीक्षितुम् ॥ १० ॥ तवसोमहवासाम् सर्वशखानपारगः महना शरण राधेयः प्रत्यवारयन् ।। ११ । दुर्यानन्तु विस स्या शानमनमुदीरयम् । अविध्यपूर्ण ध्येय सहदेवो महामनाः ॥ १२ ॥ स घिद्धायदेवेन रराणाचलसन्निभः । मामन इव मातको रुधिरेण परिप्लतः ॥ १५॥ दृष्ट्या तव सुतं तत्र गाढ़ायेदं सुतेजनः । अस्पधावत संकुलो राधेयो पिना बरः ॥ १४ ॥ दुर्योधने तथा दृष्ट्वा शीघ्रमनमुदीर्य सः । तेन पौधष्ठिर सघन घघात पात तथा ।। १५ ।। ततो यौधिष्टिरं सन्यं वध्यमान महात्मना । सहसा प्रायदाराजन सतयुधशादितम् ॥ १६ ॥ विविधा विशिस्त्रास्तत्र संपतन्तः परस्परम् फलैः पुंसान समाजग्मुः सूतपुत्रधनुरुच्युताः ॥ १७ ॥ अन्तरीक्ष राधाणां पत ताम्च परस्परम् । संखाध महाराज पायकः समजायत ॥ १८ ॥ ततो दश धनुषधारियों को वाणों की वर्षासे रोका और वाणोंकी वकरते वोमरो को चलाते वह उपापकरने वाले लोगभी कर्ण की भोर देखने को समर्थ नहीं हुये ।१०। फिर कर्णने उन सब शस्त्रकुशल वड़े धनुपधारियों को बड़ी बाणों की वर्षा करके रोका ।११। और शीघ्र अस्त्र के प्रकट करनेवाले प्रतापी सहदेव ने दुर्योधन के | सम्मुख होकर शीघ्रही वीसवाणों से छेदा । १२ । सहदेवके हायसे घायल पर्वतके समान राना दुर्योधन मदोन्मत्त हाथीके समान रुधिरसे लिप्तहुमा । ११। फिर | वहां वाणोंसे घायल हुये आपके पुत्रको देखकर रथियों में श्रेष्ट कर्ण क्रोधित होकर दौड़ा । १४ । तब दुर्योधनको देखकर शीघही अस्त्रको प्रकटकिया उस अखसे | युधिष्ठिरकी सेनासमेत धृष्टद्युम्नको घायल किया। १५ । इसके पछि महात्मा कर्ण के हाथसे घायल और पीड़ामान युधिष्ठिरकी सेना अकस्मात् भागी । १६ । हे राजन् वहां नाना मकारके वाण परस्पर में फेंकेगये कर्ण के धनुष से निकले हुये वाोंने भल्लोंसे पुखौंको काटा । १७ । हे गजन अन्तरिक्ष में परस्पर गिरनेवाले वाण समूहोंकी घिसावट से अग्नि उत्पन्न हुई । १८ । इसके पीछे कर्णने चलने | वाली टीड़ियों के समान शत्रुके शरीर में प्रवेश कर जानेवाले वाणोंसे बड़े वेगयुक्त thu coming warriors with arrows and tomars and gone could look bim in the face. 10. Then Karan checked all those clever warriors with the shower of arrows Sahadev pierced Duryodhan with twenty The huge body of the king bled profusely like that of an elephant. Seeing your son wounded, Krran ran on in rage to his belp. Duryodhan at once took up arms at the sight of Karan aud wounded Yudhishthir and his army. 15. The Pandav army trounded by Karan, ran away all of a sudden. Karan cut down tho arropa gbob at him and there was fire produced from the concussion of arrows in the air. Then he filled all the directions with his sharp arrows like the - arrows 16582]-..- Mahabharat प्रहसनियतं कर्णः कङ्कपः शिलाशितः । उरस्पविष्यद्राजानं प्रिमिमलेश्च परिषम् ॥२२॥ स पीड़ितो भृशं तेन धर्मराजो युधिष्टिरः । उपदिय रयोपर मत माहीत्व घोदयत् ॥ ३०॥ प्रांफ्रोगन्त ततः स धाराष्ट्राः सराजकाः । गन्हीग्घमिति गजान 'मभ्यधापन्त. सर्वशः ॥ ३९ ॥ ततः शताः शप्तदश कैकेयानो प्रहारिणाम पाशा सरिता राजन धाराष्ट्रानयारपन् ॥३२॥ ताम्म स्तु तुमुले युर परमामे,महामये दुर्योधमञ्च भीमध समेयातां महावलो ॥ ३३ ॥ इति थी कर्णपर्वणि युधिष्ठिराएयाने त्रिपष्टोऽध्यायः ६३ समय उयाच। कर्णोऽपि शरजालेन फेयानां महारथान् । म्यधमद परमेप्यास नप्रतः पथ्यपस्थितान् ॥ १॥ स तेषां यतमानानां राधयस्प निधारणे.। रपान पर युधिष्ठिरने,उसको सुनहरी पंखवाले सौ वाणों से घायल. किया फिर हंसतेहुये कई नितीक्ष्ण, ककपत से जटित तानभल्लों से. उस युधिष्ठिर को छातीपर पायल किया २९ । उससे अत्यन्त पीडामान, राजा. युधिष्ठिर रयके अंगपर पैठकरसारथी- से कहनेलंगा किं, चल, ।। तदनन्तर सव धृतराष्ट्र के पुत्र और राजा सोंग | पुकारे कि राजाको पकड़ो यहकहकर सबदौड़े।३१। उसकेपीछे प्रहार करनेवाले संक्रय देशियों के एकहनार: सातौं रथियों ने पांचालों समेत धृतराष्ट्रकपुमों को रोका । २३ । और मनुष्योंके नाशकारी उसकाटनं युद्धके जारीहोनेपर बड़ेपराक्रमी. भिमिसने और दुर्योधन परस्परमें सम्मुखहये, ३३ ॥ अध्याय.६॥ संजय बोले कि कर्णने आगे नियत होनेवाले महारथी केकपदोशयों को अपने- बाण नालों के छिन्नभिन्न करदिया रोकनेमेंही उन केकयदोशपों के पांच सौ रयों, aaked the driver to take him aray. Then the warriors and sons of Dhritrashtra cried, out, 'Seize the king.". and • chased him. såventeen hundreds of Kaikaya warriors, with the Panchals,' opposed then. Durring that battle Bhim and Duryodhan came face to face,"33: 14 --- CHAPTER.LXIII Sanjaya said, "Karan dispersed the Balkaya warriors and destroedi; five hundred cars. Unable to withstand . Karan, they went to Buym) [१५८३) कर्णपर्व Karn Paray (6583) शतान कणः प्राहिणोधमसावनम् ॥ २॥ अपिषवं ततो दृष्ट्वा गधेयं युधि पोधिनः भीमसनमुगच्छन फर्णयाण प्रपीड़िताः ॥ ३॥ रयानी विदाय्यप, शारजालेरनेकधा का एकरनेव, युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥ ४॥ सेनानिवेशमाच्छन्तं मागंणे क्षतविक्षतम पम्पोमध्यगंधार शनर्यान्त यिनेतसम.॥५॥ समासाद्य तु राजाम, दुर्योधनहिते सया । सतपुत्रनिमिस्तीपणे घिच्याध परमेषुभिः १.६.॥ तय गंजा राधेयं प्रत्य दिश्यत मनान्तरे । शरत्रिभिध यन्तार, चतुर्भिश्चतुरो हपाम् ॥ ७॥ चक्ररक्षीत पायस्थ माद्रीपुत्रो परन्तपो । तापप्यधावतां संग राजानं मा बधीविति तो पुयक शरवर्षायों राधेयम पवर्षताम् । नकुलःसहदेयश्च परम यज्ञमस्थिती ॥९॥ तर तो मत्यविष्यत् सतपुषः प्रतापपान मिलाभ्यां शितधाराभ्यो महास्मामा रिपमा ॥ १०.. दन्तवर्णास्त राधेयो निमधान मनोजधान ! युधिष्ठिरस्य संग्रामे फाल पालाई त्योत्तमान ॥ ११ ॥ ततोऽपरेण भल्लेन शिरस्त्राणमपातयत् । कायस्प मो को कर्णने यमलोककोभेजा । २ । इसकेपीछे शूरवीरळोग नियतहुये कर्णकोरोकने को असमर्थ होकर उसके वार्णोसे अत्यन्त पाहित होकर भीमसन के पासगये ।। फिर कर्ण एकही रयके द्वारा वाणोंके वलसे रथकी सेनाओं को चीरतामा युधिष्ठिरके पासगया । ४ । अपने डेरेको जानेवाले बाणोंस घापलं शरीर धार चलनेवाले अचेत हुपे नकुल और सहदेवके मध्यवर्तीवीर । ५ । राजाको दुर्योधन की प्रसनताकी इच्छाले कर्णने तीक्ष्ण धारवाले तीन उगम पाणों से पीटामान किया और इसीप्रकार युधिष्ठिरनेभी कर्णको छातीपर घायप्त करके तीन बाणोंसे सारथीको, और चारपाणों से घोड़ोंको पाड़ामानकिया । ७ । फिर शत्रुसंतापी नकुल, सहदेव जो कि अर्जुन की सेनाके रसकथे वहसब कर्णकी और इसनिर्मित दौरे कियह कहीं रोजा को न पार । ८ । उनदोनों नकुल सहदेव ने कर्णके ऊपर पाणों की पीकरी और वड़ेउपाय में प्रवृत्तये।९।इसीमकारप्रतापवान् कर्ण भी उन शत्रुओं के विजयी महात्मा दोनोंनकुलं और सहदेवको यई तीक्ष्ण भरलों से पायल किया। १० । फिर कर्णने धर्मराजको दन्तवर्ण काळेवाल और चित्त के समान शीघ्रगामी घोड़ों को भी मारा । ११ । इसके पीछे बड़ घुनुपधारी सितहुये। for refuge, Karani alone penetrated the Pandav army and approchaod Yüdhiähtbir.. Finding Yudhishthir wounded and ready to go to his camp with Nakul and Sahador, Karan wounded him with throa arrniva.in the middle of cliest, to please Duryodhan. Yudhisdi. túir two wounded Karan' the driver and the horses with three and rour, arrows respectively. . Nakul and Sulrader who guard. ed Yudhishthir rán on to rescue the king. They showered their Harrors at Karan and tried their utmost: Karan too, wounded Kahil, and Sohader with his anowr.10. Bose w the white houses.st Yi. dbiththir, laving black huir avd áwilt of face, and with epother.lay प्रस्तमाघ ६५८५) orga Karan Paray (6585) मानितो भवान् । तं पार्थ जहि राधेय किन्ने हत्या युधिष्ठिरम् ॥ २१ ॥ शंखयो मातयोः शमः ममहानेष कुणोः। यते चापधोषणेयं प्राधीधाम्वृदस्य ॥२२॥ भसी निम्नवोदारानर्जनः शावृष्टिभिः । सो प्रसति नः सेना फर्ण पश्यनमा इये ॥ २३ ॥ पृष्टरक्षी चशस्य युधामन्यूत्तमोजसो । उत्तरम्चास्य पेशाम रक्षति सात्यकिः॥२४॥ष्टद्युम्नातथा चास्प चक्रं रक्षति दक्षिणमाभीमसेनस्तु कै राका धाराष्ट्रेण युध्यते ॥२५॥ यथा न हन्याचं भीमःसपा नोग्ध पश्यताम् । तथा राधेय क्रियतां रामा मुच्येत नो पा॥२६॥पश्यने भीमसेनेम शाभिना। यदि त्यासाद्य मुच्येत विस्मयः सुमहान् भवेत् ॥ २७ ॥ परित्राोनमध्येस्य संशयं परमं गसम किन्तु मादीसुतो हावा राजानं चा युधिष्ठिरम १.२८ रति शल्यययः श्रुत्वा राधेयः पृथिवीपते । रष्ट्या दुर्योधन भीमप्रस्त महाइवे ॥२९॥ मारो युधिष्ठिरके मारनेसे तरा क्या लाभहोगा । २१ । श्रीकृष्ण और अर्जुनकेवड़े शंखों के यह वडे शन्द और धनुष का यह शब्द ऐसा सुना जाताहै जैसे कि वर्षा ऋतुमें वादलों के शब्द होते हैं । २२ । यह अर्जुन वाणों की वर्षा से महारार्थियों को मारताहुभा हमारी सब सेनाको निगले जाताहै हे कर्ण इसको तुम युद्ध में देखो । २३ । उसशूरके पृष्ठकेरक्षक युधामन्यु और उत्तमौनसहैं और इसकी उत्त- रीय सेनाका सात्याके रक्षक है । २४ । इसीप्रकार पृष्टद्युम्नउसकी दक्षिणीसेनाका रक्षकह मार भीमसेन धृतराष्ट्रके पुत्रों से युद्ध करताहै । २५ । सो अवहम सबके देखतेहये यह भीमसेन जैसे उस दुर्योधन को नहीं मारे और जिसमकार से यह छूटजाय हे फर्ण उसीमकार तुमको करना चाहिये । २६ । युद्धको शोमा देनेवाले और भीमसेन से निगलेहुये इस दुर्योधनको देखा जो कदाचित तुमको पाकर यह छूटनाय तो बड़ा आश्चर्य होय । २७ । इस बड़े संशय में पड़ेहुरो दुरपोधन को वचाभो माद्रीके पुत्र नकुल सहदेव भार राजा युधिष्ठिर के मारने से क्या लाभह । २८ । हे राजा कर्ण ने शल्य के इन वचनों को सुनकर और महायुदमें भीमसन से पराजित दुर्योधन को देखकर । २९ । राजाका अत्यन्त चाहनेवाला trying to slay Yudhishthir ? 21. The sounds of the huge conchs of Shri Krislin and Arjun as voll as that of Arjun's bow are heard like thuuder. Killing the warriors with arrows, Arjun is swallowing all our army. Look at him, Karan. Yudhamanyu and Uttawauja protect luiu on the back. Satyaki protects the left wing of his army and Dbrishtadyumn the right ono. Blimsen is fighting with the sons of Dhritrashtra. . 25. You must try, O Karan, to rescue the Prince from Blim und not to let him slay Duryodhan, Look at Duryodhan fallen in the jaws of Blim. I wonder if you can rescue him. Sare him trom danger; what is the use of your slaying Nakal, Sahadev and Yudhishthir !" Hearing these words of Shalya, Karan Malabbarat (6584) वासः प्रहसनिय सूतन : ॥ १२ ॥ तचैव नकुलस्यापि हयान हत्या प्रतापमान यां धन्य विछंद मादीपुत्रस्य धीमतः ॥ १३॥ तो हताश्वी इतरयो पाण्डवी,भश विक्षती । म्रातरावारुहतुः सहदेवरथ तदा ॥ १४ ॥ तो दृष्ट्या मातुलस्तत्र विरधी पाचोरक्षा | अभ्यभाषत राधेयं मद्रराजोऽनुकम्पया ॥ १५ ॥ योद्धव्यमय पाथन फा लगुनेन त्यया सह । किमर्थं धर्मराजेन युध्यसे भूशरोपित ॥ १६ ॥ क्षीण शस्त्रास कषधः क्षीणवाणी विवाणधिः । श्रान्त सारथि चाहश्च नुनोऽवरिभि तथा । पार्थ मासाध रोधय उपहास्यो भावयास ॥ १७ ॥ एपमुक्तोऽपि कणेतु मद्रराजेन सयुगे । तथैव कर्णः सरन्धो युधिष्ठिरमताडयत्॥१८. शरस्तावणः पगघिध्यमाद्रीपुत्री च पाण्डयो । प्रहस्य समरे कर्णश्चकार चिमुखरः॥ १९ ॥ततः शल्पःप्रास्येदं कर्ण पुनरुपाचहरथस्थमति संरब्धं युधिष्ठिरवर्धधृतम् ॥ २० ॥ पदर्थ घात राष्ट्रेणसततं कर्णने दूसरे भल्लसे युधिष्ठिर के उनको गिराया । १२ । इसीप्रकार प्रतापी बुद्धिमान कर्णने नकुलकभी घोड़ोंको मारकर उसकेरथके इशा और पनुपको काटा । १३ । तर मृतक घोड़े और टूट रधवाले अत्यन्त घायल वह दोनों भाई सहदेव के रथपर सवार हुये । १३ । वहां शत्रुओं के वागेका मारनेवालामामा शल्य उन दोनाको विस्थ देखकर करुणाकरके कर्ण से वोला । १५ । कि हे कणं तुझको पाण्डव अर्जुन से लड़ना चाहिये तू अत्यन्त क्रोपरूप होकर धर्मराजकं साथ क्यों लड़ताहै शस्त्र प्रस्त्र म्वच वाण और तूणीरसे रहित । १६) यकहुये रथके सारथी और घोड़वाला होकर तुम अर्जुनको पाकर हास्यक योग्य होगे । १७ । इसरीतिके शल्यके वचनको मुनकर क्रोधयुक्त कर्ण ने वैमी देशामें भी युधिष्ठिर को घायल किया। १८ । और पांडव नकुल और सहदेवको तीक्ष्णाणों से छेदा फिरकण, ने इसकर वाणों मे उनका मुख फेरदिया । १९ । इसकेपछि उस क्रोधयुक्त युधि- प्टिर के मारने में परत कर्ण को शल्प ने हँसकर फिर यह वचन कहा कि कर्ण मापको दुर्योधनने गित प्रयोजनकेलिये प्रतिष्ठित कियाहै । २० । उस भेजुनके cut down his umbrells. He also slew Nakul's horses and cut down his car. The two brothere, much wounded and deprived of horses, mounted Sahadevas's car. Sesing them destitute of ears, their uncle Shalya said to Karan," You have to fight with Arjun. Why do you fight withi Yudhishthir ? Having wasted your weapons and tired your drivor and horses, you will be laugheri at shan you come to fencounter witli Arjun." 17. Having heard Shalya's words, Karan .***3 much enraged and wanded Yudhishtliis again. He wounded Nakul and Sahadev tun, Lill thoy turued back. Saeiog Karan intent on luying Yudhiththir Shalya again said, “ Slay Arjun foi whose druth you are Jepata 1 hg Duryodhao. 20. What is tbs ugg of your १६५८५) प्रस्तमा६५ कर्णपर्व Karan Party (6585) मानितो भवान् । तं पार्थ अहि राधेय फिन्त हत्या युधिष्ठिरम ॥ २१ ॥ शखयो मातयोः शमः ममहानेष कुणशेः । भूपत्ते चापोषोय.प्राधीधाम्सदस्य ह ॥२२॥ भसौ निम्नत्रयोदारानर्जुनः शादृष्टिभिः । सर्वी प्रसात न: सेना फर्ण पश्यनमा हये ॥ २३ ॥ पृष्टरक्षा च शास्य युधामन्यूत्तमोजसो । उत्तरम्चास्य घे शरम रक्षति सात्यकिः॥२५॥धृष्टद्युम्नस्तथा चास्य चक्र रक्षति दक्षिणमाभीमसेनस्तुचे राहा धाराष्ट्रेण युध्यते ॥२५॥ यथा न हत्या भीमःसां नोऽध पश्यताम् । तथा राधेय क्रियतां राजा मुच्येत नो पथा॥२६॥पयन भीमसेनेम शामिना। यदि त्यासाद्य मुच्येत विस्मयः सुमहान भवेत् ॥ २७ ॥ परित्राोनमध्यस्थ संशयं परमं गतम् । किन्न मावीसुतो हावा राजानं घा युधिष्ठिरम् ॥.२८ .. इति शल्ययः श्रुत्वा राधेयः पृथिवीपते । शुष्ट्या दुर्योधनचेष भीमप्रस्त महारये ॥२९॥ | मारो पुधिष्ठिरके मारनेते तरा क्या लाभहोगा । २१ । श्रीकृष्ण और अर्जुनकेवड़े शंखों के यह बड़े शन्द और धनुष का यह शब्द ऐसा सुना जाताहै जैसे कि वर्षा ऋतुमें बादलों के शब्द होते हैं। २२ । यह अर्जुन बाणों की वर्षा से महाराधियों को मारताहुभा हमारी सब सेनाको निगले जाताहै हे कर्ण इसको तुम युद्ध में देखो। २३ । उसशूरके पृष्ठकेरक्षक युधामन्यु और उत्तमौनसहैं और इसकी उत्त- रीय सेनाका सात्याकि रक्षक है । २४ । इसीप्रकार घृष्टद्युम्नउसकी दक्षिणीसेनाका | रक्षकई और भीमसेन धृितराष्ट्र के पुत्रों से युद्ध करताहै । २५ । सो अवहम सबके देखतेहये वह भीमसेन जैसे उस दुर्योधन को नहीं मारे और जिसमकार से वह छूटजाय हे कर्ण उप्तीप्रकार तुमको करना चाहिये । २६ , युद्धको शोभा देनेवाले और भीमसन से निगलेहुये इस दुर्योधनको देखो जो कदाचित तुमको पाकर यह छूटजाय तो बड़ा आश्चर्य होय । २७ । इस वहे संशय में पढ़ेहुगे दुर्योधन को वचाभो माद्रीके पुत्र नकुल सहदेव और राजा युधिष्ठिर के मारने से क्या लाभह । २८ । हे राजा कर्ण ने शल्य के इन वचनों को सुनकर और महायुद्धमें | भीमसन से पराजित दुर्योधन को देखकर । २९ । राजाका अत्यन्त चाहनेवाला trying to slay Yudhislithir ? 21. The sounds of the huge conchs of Sbri Krislin and Arjun as well as that of Arjun's bow are heard like thunder. Killing the irarriors with arrows, Arjun is swallowing all oui army. Look at him, Karan. Yudhamanyu and Uttamauja protect him on the back. Satyaki protects the left wing of his army and Dbrishtadyumn the right ono. Blimsen is fighting with the sons of Dhritrashtra. 25. You must try, O Karan, to rescue the Prince from Bhim and not to let bim slay Duryodhan, Look at Duryodhan fallen in the jaws of Bl:im. I wonder if you can rescue him. Save him from danger; what is the use of your slaying Nakul, Sabadev and Yudhishthir ?" Hearing these words of Shalya, Karan - - (6566) Buhabuitut (६५८६) राजगृद्धी भृशम्श्व शल्पाश्यं प्रचोदितः । अजातशत्रुमुत्सुम्प माद्रीपुत्री प. पांडवी ॥ ३० ॥ तय पुत्रं परित्रातुमभ्यधावत धाय्यधान । मद्रराजमगुदित रदयराफाश गरिव ॥ ३१ ॥ गते कर्ण तु कौन्तेयः पांडुपुत्री युधिष्ठिरः । अपायजवनरस्वैः सहदेव स्यमारिप ॥ ३२ ॥ तास सहितस्तूण प्रीडापिय मरंधरः प्राप्यसनानिधेशंध मा गंगः क्षतविक्षनः ॥ ३३ ॥ जयतीनों स्यातर्ण मा पिकाच्छयनं गुमम्। अपनीतल्या मभूश हरयाभिनिपीडितः ॥ ३४ ॥ सोऽनधीतरी रामा मापुत्री महारधी गाफ भीमसेनस्प पाण्यापाशु गतम् ॥ ३५५: जीमूत इथ महस्तु युध्यते स दृकोदरः ।। ३६ ॥ ततोऽस्य रथयारण्य नकुलो रप परुथः । सादेषश्च तेजस्वी | मातरी शकषणी ॥ ३७ ॥ तुरगैरमपरं हाभियोरया मोमस्य गुप्मिणौ। अनीक साहतीत भातरोगपस्थिता ॥ ३८॥ | भौर शल्पके वचनसे चलायमान वड़ा पराक्रमी कर्ण अजातशत्रु युधिष्ठिर और पाराव नकुल सहदेव को छोड़कर । १० आपके पुत्रकी रक्षा करनेको दोहा रे श्रेष्ठ धृतराष्ट्र राजा मद्रकी प्रेरणासे और मानो भाकाशंगामी घोड़ोंके द्वारा कर्णके चलेजाने पर कुन्तीका पुत्र युधिष्ठिर और पाण्डव नकुल मादेन शीघ्र- गामी पोड़ोंके द्वारा दूर चलेगये । ३३ । यह सम्मायुक्त रामायुधिष्ठिर बाणोंसे पायल उनदोनों भाइयों समेत शीग्रही डेरेको पाकर । १३ । बहुतशीघ्र रथसेउतरा वंडो निसके भन्ल निकाले गये वह रानां युधिष्ठिर हृदयके भालोसे माउपड़िामान होकर अपने शुभ शयन पर जाकर लेटगया। ३४ । और लेटकर अपने पहारथी | दोनों भाई नकुल भौर सहदेवसे बोला हे पाण्डव तुम दोनों बहुतशी भीमसेनकी सनाभाओ। १५ । यहभीमसेन वादलकसमान गर्मताभा लढताहे इसकेनन्तर बड़ेभाईको आशापाकर शाकेपीडा देनेवाले महातेजस्वी रपियोंमें थेप्टपराक्रपी दोनो भाई नकुल भोर सहदेव दूसरे रघपर सवार होकर । ३० । उत्तम वेगासे घोड़ों के द्वारा भीमसेनकी सेनाको पाकर दोनों भाई अपनी सेनामा समेत यहाँ निपत हुये ३८॥ AG H Duryodbaprossed by Bhim Bearing a great love for tho Princs and urged by Shalya, Karan lelt' Yudhishthir, Nakul and Sabadov. 30. No macio wasio to go to the help of your win: Driven by Snalga, the lioras at onco tuok him far away and Yudhisis. thir, with Nakul and Sahader, went away in their swift car. On ruaching their camp, Yudhislitlir came down from thio car, Arrons were extracted from bis body add liv lay down on bed in great pain. Then he ashed liis brave biütliern. Nabul and Sabadev, to so at onco ialo tbe nring of Bhim who was fighting and roaring like tuun. der. By thoorder of their elder brotler, Nalul and Sahadev mount cd ubother car and with their swift Loises Econ reached the place whers Bhim was fighting. *38.
2016 Karan Parv (6567] सम्जय उवाच । प्रीण्स्तुि रथवंशेन महता परिवारितः । आपतत् सहसा राजन् : पत्र पार्थो पंस्थितः ॥ १॥ तमापतन्तं सहसा शारिसहायषान् । दद्यार सदसा.पार्थो वेलेव मकरालयम् ॥ २॥ ततः यो महाराज द्रोणपुरः प्रतापषान् । अर्जुबासदेवश्च डादयामास सायकैः ॥ ३ ॥ अयच्छन्नी ततः कृष्णा रष्ट्या तक महारया विस्मयं परमं गत्वा प्रेक्षन्त पुरयस्तथा ॥४॥ अर्जुनस्तु ततो दिव्यः मझ कइसभिष । तदलं. ब्राह्मणो युदे धारयामास भारत ॥५॥ पति, व्याक्षि पारे, पाण्डवोऽवं जिघांसया । तत्सदत्रं महेचासो द्रोणपुत्रो यशातयत् । ६ ॥ अग्युरे ततोगजन घर्तिमाने भयावहे । अपश्याम रणे द्रौणि पाचाननमिषान्तकमा ॥ ५॥ स विशः प्रदिशधेष छापिरवा जिह्मगैः । बासुदेव त्रिभिांगरषिध्य दक्षिणे मुझे ॥ ८ ॥ ततोऽर्जुनो हयान् हत्वा सर्यास्तस्य महात्मनः। वफार अध्याय. ६४.॥ संजय, घोले, हे राजा इसके. पाछे स्थकी सेनाके बड़े, समूहों. समेत अश्वत्थामा- जी. भकस्मात् वहाँ पहुँचे. महां. भर्जुन नियत, था । १ । श्रीकृष्णजी को साथ रखनेवाले. शूरवीर अर्जुन ने अकस्माद, आनेवाले, अश्वत्थामा को तत्क्षण ऐसे,रोका जैस.कि मर्यादा, समुद्रको, रोकती है।। २ । हे; महाराज़ इसके पाछे क्रोधयुक्त प्रतापवान् अश्वत्थामा ने शायकों से श्रीकृष्ग़जी समेत अर्जुन, को, दरदिया। । । इसके पीछे वहाँपर महारथी कौरवों ने, श्रीकृष्ण अर्जुन को दका हमा देखकर, घड़ा आधर्य किया । 1, इसके मनन्तर हे; भरतर्षभ सिते हुये मजुन ने दिव्य अत्रों को प्रकटकिया, तव अश्वत्थामा ने उस प्रखको रोका । । फिर अर्जुन ने मारनेकी इच्छासे जित. २. भत्रको चलाया, उस २ भत्रको, बड़े- धनुषधारी, अश्वत्थामा ने नाशकरदिया ।:६:1, इसके पीछे बड़े.भपकारी, अत्रोंकाः युद्ध पर्सपान होने पर युद्ध में, हमने, अश्वत्थामा. को मुखफ़ाड़े. हुये कालके समान- देखा। ५ । उसने,वाणों से दिशा विदिशाओं को भाच्छादित करक, तानयागों से वासुदेवजीको दाहिनी भुजापर छेदा.. ८.। इसके पाछे अर्जुन ने उस महात्मा के सब CHAPTER:LXIV. Sapjaye said, "Then Ashwathama, accompanied by a large.army.. reached, tho place whero Arjun pas. Arjun accompanied by. Vabadey, checked Ashwathama as the coast checks, the ocean. The.latter covorod Krishn and, Arjun with arrows to, the amazent: of, the, | PKauravas Arjun, with a smile, dischargod colestial weapons, but war checked by Ashwathama. 5. Whatever wespons; Arjun, jusod to slay Ashwathama wers destroyed by the Intter... During, that dreadtul battle we ssw Ashwathame like Death, with gạping mouth. Covering the directions with arrows, he wounded. Vasudev with three arrows on the right arm. Arjun sleir all his horses and :
maig Karan Pary (0589 द्रौगिरायाय पत्रिगा। वादे पृपाकन तायामाम निर्दयम् ॥ १७ ॥ सोऽतिपितो रजतेन द्रोणपुत्रंगमारत । १८ । गण्डोपाषाप्रस शरदारधीः । साध सारे लिपिच्छेदास्य च कामुंगम ॥ १९ ॥ स हिप्रधाषा परिष पनस्पक्ष युधि । भादायधिक्षेप तदाद्रोणपुत्रः किटिन ॥२०॥ तमापतन्तं परिधजाम् नदरिष्कृतम्। बिर सहसा राजन महसनिय पाण्डवः ॥ २१॥ स पपात तदा भूमीमत: पासाय विकाणः पो गजन् यथा पजेप तादितः ॥ २२ ॥ aaमो माराम प्रोगपुत्रो महारथः। ऐन्द्रेण धास्यगत धाममं समयाफिरतः ॥ २३ ॥ Ear छायत समीण पापों राजन गायियमाददाता | पन्जाल प्रत्यहनतरस्थी बन्न मानाय महेन्मएएम् ॥ २४ विधार्य तम्जालमहेन्द्रयुकं पार्थस्ततो द्रौगिर पणेन । माच्छादयामास तवायुपश्य दोणिस्तथा पाशराभिमूतः ॥ २५॥ पिगम पाप पाणधि नाम ततः प्रफाप । शतेन एप्पं सहसायविष्यधिामा शंतन शुनकाणाम् ॥ २६ ॥ ततोऽनः सायफानो शतेन गुगः म ममम निर्षिभदा भरवां हे भरतवंशी उस अश्वत्थामा के हाथले युद्ध मत्पन्त घायलं । १८॥ गांडीव धनुपधारी व बुद्धिमान अर्जुन ने पाणोंकी वपी से ममत्यामा को ढककर. उसके धनुषको काटा। १९ । तब उस टूटे धनुपवाले अश्वत्थामा ने युदमें वनक समान पर्पवाली परिषको लेकर भर्जुन के ऊपर फेंका ।२०।। रानां उस स्वर्णमयों भात हुये परिपको इसतेहुपे पाडुनन्दन अर्जुनने अकस्मात् काटकाला २५ फिर भर्जुन के शापों मे वह टूरा हुआ परिघ पृथीपर ऐसे गिरपड़ा जैसे कि | यजसे घायल टूटे हुये पहाड़ गिरते हैं । २२ । हे महारान इसके पीछ मोधयुक्त महारथी भात्यामाने इंद्रात्र के वेगसे अर्जुनको दकदिया । २३ । तर उस वेगवान् पांडव अर्जुन ने उसके फेलहुये इन्द्रजालको देखकर अपन गांडीव धनुषको लिया । २४ । भोर महाइन्द्र के उत्पन्न किये उत्तम मसको लेकर न्द्रनालको दूरकरकं मर्जुन ने मह इन्द्रको शक्ति से युक्त उस जालको फाड़कर एक सयभर मेंही अश्वत्थामा के रथको ढकदिया इसके अनन्तरं भर्जुनके वाणों से दवेहुये अश्वत्थामा ने समीप में भाकर । २५ । अर्जुनकी उस वाण दृष्टिको सहके मोर प्रपन वाणोसे शको हाटके सम्मुख करके सौचाणों से अकस्माद पीकपणजी को पायल करता हुआ तीन नद्रकनाम चाणों से अर्जुनको पायन किया । १६ । इसकेपछि अर्जुन Arjun. 20. Arjun cut the golden club cuming towards him and it full down on earth liko a lill struck down by 'njm. Then Asuratha. ma curored Arjun by lodiastra. S ting this, Arjun took up the Gundir bow and cutting a -uuder that scl work wjib bis artuss and spear, he hid Ashwathama's car. The atter approachetarjun's car and wounded Shri Krislin with a bundred arrows and Arjun wilde tbroc, Arjun pierced his adversary with a buadrul atuws and den. troyel his armour, thor and driver in the preserce or all jour war.
[6590] Mahabharat मतम्ब तथा धनुज्या मघाकिरत् पश्यतां तावकानां ॥ २७॥ स विधा मौन द्रौणि पाण्डपः परवीरहा 1 सारथिञ्चास्थ भल्लेन रथनीड़ादपातयत् ॥ २८ ॥ स सं. गृह स्वयं पाहान् कृष्णो प्राच्छादयच्छरैः । तत्राद्भुत मपश्याम द्रौणे रा{ पराक्रमम ॥ २९ ॥ प्रायच्छत्तरगान मञ्च फाल्गुनश्चाप्य पोषयत् । तदस्य समरे रामरस योधा म्यपूजयन् ॥ ३०॥ ततःप्रहस्य धीमत्सु द्रोणपुत्रस्य संयुगे । क्षिप्रं रमोनथा माना क्षरप्रविच्छिदे जयः ॥ ३१ ॥ प्राद्वस्तुरगास्ते तु शरपेग प्रपीडिताः ततोऽस् बिनदो घोरस्तध सैन्यस्य भारत ॥ ३२ ॥ पाण्डघास्तु जयं लब्धा सघ सैन्य समाचार समन्ता निशितान् वाणान विमुञ्चन्तो जयैषिणः ॥ ३१॥ पाण्डवस्तु महाराजा राष्ट्र महाधमः । पुनः पुनरयो धीररभजि जितकाशिभिः ॥ ३४॥ पश्यतां ते. महाराज पुत्राणां नित्रयोधिनाम् । शकुनः सौषलेयस्य कर्णस्य व विशाम्पते ॥ ३४ ॥ पार्यमाणा महासेना पुत्र स्तुप जनेश्वर । नावातिष्ठत संग्रामे पाडयमाना समन्ततः ने सौगायकोंसे गुरुके पुत्रको मर्मस्थलों पर छेदा और आपके शूरवीरोंके देखतेहुपे घोड़े सारथी कवच और धनुपको काटा । २७ । फिर उस शत्रुओं के मारनेपाले. अर्जुनने मर्मस्थलों में छेदकर भल्लों से उसके सारथीको रथकी नीडसे गिरादिपा २८ । फिर उसने भाप घोड़ों को भिकर वाणोंस श्रीकृष्ण और अर्जुन को दकदिया वहां हमने अश्वत्थामाके इस शीघपराक्रमको देखा । २९ । कि जिसने घोड़ीकोभी थांभा और भर्जुन से भी युकिया हे राजा युद्धमें सव शूरवीरों ने | उसके उसकर्मकी बड़ी प्रशंसाकरी । ३० । इसके पीछे अर्जुनने इसकर अपने चरमनाम वाणों से शीघही अश्वत्थामाके घोड़ोंकी वागको काटा। ३१ । फिर वाण वेगसे पीड़ामान होकर वह घोड़े भागे हे भरतवंशी इसकेपीछे भापकी सेनाका घोरयुद्धहुआ। २२ । फिर चारोंओरसे तीक्ष्ण वाणों को छोड़ते विजया मिलापी पाण्डव विजयको पाकर आपकी सेनापर दौड़े । ३३ । हे महाराज युद्ध में विजयसे शोभायमान वार पाण्डवों के हायसे दुर्योधनकी बड़ी सेना वारम्बार छिन्नभिन्न हुई । ३४ । तव अपूर्व युद्ध करनेवाले आपके पुत्र और मुबलके पुत्र शकुनी और कर्ण के देखते हुये सब भागे । ३५ । उससमय चारोंभोरसे पास riors. 27. Then Aajun made his driver tall down from the car. Ashwathama held the reins of the horses and at the same time cuvered both Arjun and Shri Krishn with arrows. There we saw the prowess of Ashwathama in doing both works and the warriors praised his work. 30. Thea Arjun cut the traces of his borses and wounded with arrows they became unruly. Then there was a great cry raised from your warriors, The Pandavas, being rictorious,' rushed upon your army and dispersed it again and again in the pre. sence of your sons, Shakuni and Karan, 35. Your -- army would not (१५९१). कर्णपर्व Karan Parv 10591 ॥ ३६॥ ततो योधर्महाराज पलायद्भिः समन्ततः अभवव्याकुलं भीतं पुत्राणां ते महलम् ॥ ३७ ॥ तिष्ठ तिष्ठतिच ततः सूतपुत्रस्य जल्पतः । नावातिष्ठतसा सेना वध्यमाना महात्मभिः॥ ३८ ॥ तथोत्कुष्ट महाराज पाण्डवैजितकाशिशिः। धार | राष्ट्रपलंशष्ट्या विद्रुतं समन्ततः ॥ ३९ ॥ ततो दुर्योधनः कण मध्यीत् प्रणयादिन पश्य फर्ण यथा सेना पाण्डवै रहिता भृशम् ॥ ४० ॥ त्यधि तिष्ठति संग्रामात् पला यमपरायणा । एतज्ज्ञात्वा महावाहो कुरु प्राप्तमरिन्दम ।। ४१ ॥ सहस्राणि च योधानां स्थामय पुरुषोत्तम । कोशन्ति समरे वीर द्राव्यमाणानि पाण्डधैः ॥ ४२ ॥ एतच्छुत्या तुरायो दुर्योधनवचो महत् । मद्रराजमिदं पाफ्यमनवीन प्रहसनिव।।४३ ॥ पश्य में भुजयो यं मखाणाञ्च जनेश्वर । अद्य हन्मि रणे सर्वान् पाञ्चालान पाण्डुभिः सह । घाइयाश्या गरब्याघ्र भद्रेणेव न संशयः ॥४४॥ एष मुकत्या महाराज मुतपुत्रः प्रतापवान् । प्रगृह्य पिजयं चोरी धनुः धेष्ठं पुरा मान मापके पुत्रोंसे रोकीईई बड़ी सेना युद्धमें नियत नहीं हुई । ३६ । हे महा राज उसके पीछे भापके पुत्रों की बड़ी सेना चारों ओरसे भागनेवाले शूरवीरों के कारण व्याकुल और भयभीत होगई। ३७ । तदनन्तर ठहरो इसप्रकार से कर्ण के कहने परभी महात्माओं के हायसे घायल हुई वह सेना नियत नहीं हुई । ३८ । हे महाराज इसके पीछे दुर्योधन की सेना को चारों ओर से भागी हुई देखकर विजय से शोभायमान पाण्डवों ने बड़े शब्द किये । ३९ । तव दुर्योधन बड़ी. नम्रना पूर्वक कर्ण से. बोला हे कण देखो पांचालों के हायसे बड़ी सेना अत्यन्त पीड़ित होगई है। ४० । तेरे नियत होनेपर भी भागी देशत्रुविजयी महाबाहो इस बात को समझकर उचितकर्म करो । ४१ । हे पुरुषोत्तम वीर पाण्डवोंके हायसे | भगाये हुये हजारों शूरवीर युद्ध में तुझी को पुकारतहैं। ४२ । दुर्योधन के इस पंड पचनको मुनकर हँसताहुआ कर्णभी मद्र देशके राजा से यह वचनवोला।। हे राजा अखों समेत मेरी दोनों भुजाओं के पराक्रमको देखो अमें युद्ध में पाण्डवों समेत सब पांचालोंको मारताहूँ हे नरोत्तम अब तुम कल्याणके निमित्त घोड़ोंको निस्स न्देहचलाओ।४४ा हे महाराज प्रतापीकर्णने इसवचनको कहकर विजयनाम उत्तम और माचीन धनुपको लेकर मत्यंचा समेत बड़ी दृढ़तासे पकड़कर सच्चेपकारसे शूरवीरों stay in spite of the exertions of your sons and rad away in terror. Karan tried to stop thum, but they would not hear him. The Pand- Avas cried out in glea at the flight of your army. Then Duryodban humbly said to Karan, " See, the Pandavas haverouted my army.40. Seeing that the arny is running in your presence, you should do what is needful. Routed by the Pandavas, the warriors call you for bulp Hearing this from Duryodban, Kaian said, You will see the prowess of my arms, king of Madra. I shall slay the Pandavas and | Panchals. Drive the horses without hesitation." Haring said this, (6592) Mahabharat सनम ॥५५॥ सज्यं त्या महाराज समृज्य व पुनः पुनः । सनिवार्य च योधान स सत्येन सपणेन च । प्रायोजयदमेयात्मा भार्गवालं महायलः ॥ ४६॥ ततो राजन सहस्राणि प्रयुतान्ययुदानि च । कोटिशश्च शरास्ताक्षणा निरगच्छमहामृधे । ४७ ॥ ज्वलितस्तैः शीघोर फडहिणवाजितः । सछन्ना पाण्डधी सेना न शनायत किंचन ॥४९॥ बादामागे महानासीन चालानां विशाम्पते । पीडिताना दलषता भार्ग पासण संयुये । ५० निपतगिजै राजनश्चिापि सहस्रशः । रपश्चापि महाराज मरापि समन्ततः ॥ ५१ . प्राकम्पत मही राजनितस्तस्ततस्ततः । ग्याकुलं सर्वम भवत् पाण्डयामा मलम् ॥ ५२ ॥ कर्णस्यको युधा श्रेष्ठा निधूम इस पावंका इन शवन नरव्याघ्रः शुशुभे स परन्तपः ॥ ५३॥ ते धध्यमानाः कर्णेन पाञ्चाला दिभिः सह । तत्र तत्र समुह्यन्त धनदा पयाद्विपाः शुश्च नरव्याघ्र पया व्याघ्रा नरोत्तमाः ॥ ५४ ॥ तेषान्तु क्रोशतामासीनीतानां रणमूनि पावताच दिशोग को रोक कर उसशूर पराक्रमी और साहसीने भागय अस्त्रको धनुपपर चढ़ाया ।४६॥ इसके पीछे उस महायुद्धमें लाखों मयुतो और अदों तीक्ष्णवाण धनुषस निकले।४ उन अग्निरूप पोरकंक और मोरके पंखो से जटित वाणों स पाण्डवी सेना पसी टकगई कि कुछ भी नहीं जानपढ़ताया । ४९ । हे रामा युद्ध में भार्गव अस्त्रसे पीडामान पराक्रमी पांचालोका' वड़ाहाहाकार हुआ । ५० । हेनरोत्तम राजा धृत राष्ट्र चागंभोरसे गिरतहुये हजारों हाधी घोड़े रथ और चागंभोरसे मृतकहुयो५॥ मनुष्योंसे पृथ्वी कम्पायमान' हुई और सब पाण्डपी सेना ब्याकुल हुई । ५२ । हेनरोत्तम शत्रुओंका तपानेवाला अकेलाकण शत्रुओंको मस्म करता हुभा निर्धूम अग्नि के समान शोभायमान हुआ। ५५ । कर्ण के हाथ से घायल वह पाञ्चाल पन्देरी दशियों समेत जहां तहां ऐसे अचेत होगये जैसे कि वन के भस्म होने में हाथी भचेत होजाते हैं हे नरोत्तम वह उत्तम पुरुष व्याघों के समान पुकारे । ५४ । इसकेपीछे युद्ध में उन' भयभीत पुकारनेवाले और रसे दौड़नेवालों से ऐस बड़े शब्द उत्पन्नहुये जैसे कि महाप्रलयमें जीवों के शब्द होते Karan took up bis bos luown as Vijaya and put the Weapon of Bhargav on the string. 46. Thousands of arrows came out from the bow and spread throughout over the Puoday army Wounded by. thoso arrows, the l'anchala cried out in dismay. 50. The earth shook with the fall of men and beasts Destroying the foes, Karan alone looked glarious tke smokeless fire. Whunded by Karan's arrows, lbe warriors of Paocbal and-Chanderi fell down senselesa bere | und there like elephants eurrounded by a bnrning forest. The warriors rearel Bus lions and the sounds of the warriors who were ri.ping away asid like those of pialay'a Birds and beasts were । १५९३) कर्णपर्ष, Karn Paray (6593) सतानाच समन्ततः । भानादो प्रहस्तित्र मतानामिय सप्लव ॥ ५५ ॥ वध्यमानांस्तु तान् सदमा सतपुषेण मारिए । विसः सर्वभूतानि तिर्यम्योनिगतान्यपि ॥५६॥ वेषध्यमानाः समरे मतपत्रण सञ्जयाः । मजनं वासुदेवश्च क्रोशान्ति स्म मुहुर्मुहुः ॥ ५७ ॥ प्रेतराजपुरे यत् प्रेतराज विचतसः । ५८ ॥ श्रुत्वा तु निनद तेषां वध्यता कणसायक: । अयानबीवासुदेवं कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ १९ ॥ मार्गधास्त्रं महाघोर हप्पा तत्र समोरितम ॥ १० ॥ पश्य कृष्ण महाबाहो भार्गधास्त्रस्य विक्रमम् । नैतदहि समरे शक्यहन्तुंकवाचन ॥ ६१ ।। मतपत्रंच सरन्धं पश्यकृष्ण महारण। मन्तकप्रतिम धाय कुर्वाणं कर्म दारुणम् ॥ ६२ ॥ भभीषण चोदयनयान प्रेक्षते मां मुहमहुः । न च शक्ष्यामि समरे कर्णस्य प्रालायितुम ॥ ॥ जीवन प्रामोति पुरुषः संख्ये जयपराजयौ । मृतस्य तु हृषीकेश घध एव कुतोऽनय।। ६५ एषमुक्कस्तु पार्थेन रूसी मतिमताधरम् । धनजयमुपाचद पातकाल. न्दिमः ।। ६५॥ कर्णेन हि है। ५५ । अप्ठ फिर कण के हायसे घायल उन जीवोंको देखकर पशु पक्षी जीभी षपभीर हामये । ५६ । युद्ध में कर्णके हायसे घायल वह एंजय अर्जुन और वामदेवजी को वाम्बार ऐसेपुकारतेथे । ५७ । जैसे कि यमपुरी में दुखिोजीव यम- राजमो पुकारतहै । ५८। कर्णके शायकोंसे घायल होनेवालोंके शब्दोंको मनकर कुन्तीकापुन अर्जुन वापर छोड़ेहुये भार्गवासको देखकर वासुदेवजीसवोला १६०॥ हिमहावाही श्रीकृष्णनी भार्गवास्त्र के पराक्रमको देखो यह भस्त्र युद्ध में किसीके नाश करनेक योग्य नहीं है । ६१ । श्रीकृष्णाजी युद्धमें भपकारी कर्म करनेवाले पराक्रम में यमराज के समान क्रोधयुक्त कर्णकोदेखो।१२।यह कर्ण, घोड़ोंको चला चलाकर मतिपद वारंवार मुझको देखता है मैं युद्धमें कर्ण से भागने वाला नहीं हूँ ।। सजीव मनुष्य युदमें विजय भौर पराजय दोनों पाता है हे शत्रुसंहारी श्रीकृष्णजी मृतक मनुष्यकी तो पराजयही होती है विजय कैसे होसक्ती है ।६।। अर्जुनके इस वचन को एनकर श्रीकृष्ण जीने बुद्धिमानों में श्रेष्ठ अर्जुन से समयके अनुसार या पचन कहा । ६५ । कि कर्ण के हाथ से राजा युधिष्ठिर अत्यन्त घायल दुमा terrifiod to see the warriors wounded by Karan, 36. l'he Srinjayas wounded in battle called Arjun and Yasudev for help life tho denizens of the region of Yam calling on Yam. On hearing the cries of the Srinjayag wounded by the Bhargay weapon, Arjua said to Vasuder, " Seo the force of the Bhargav weapon which too ar withstand. 61. Look at Knran of dreadfut prores the Yamil Israge. He looks at me again and again from his car nd I shall att atand him. Living men are subject to victory and defeat; bori khe, who is dead, gain violory ? 64. At this Shri Kran said tapps these words propor for the occasion: " Yodhiththir batin है (6596) Malabberat समयं गमितः पाण्याप्रयः न सत्येध महानुभाषः।' पातुं प्रयायाशु तमय भीम यास्याम्प शत्रु गणाविरुण्य ॥७॥ मीम उपाय त्वमेय जानीहिमान भार गमः प्रपात भरतपभस्य ।यजन यामि त्रस्यन्ति मां भीत इति प्रोग॥ ८॥ ततोऽग्रीदनी भीमसनं संशका प्रायनीकास्पता मे । एतानहत्या तु मया न शपथमितोऽपयातुं रिपुसधगोष्ठात् ॥ १ ॥.मयाप्रदिजनं भामसनः स्थधामस्थाय पुरुषार संशप्तकान प्रतियोतस्यामि संस्पेसपोनई यादि धनंजय, रथम् ॥ १०॥ संजय उवाच । तसीमसेनाय घघो निशम्य सुर्यवं भ्रातामित्रमा। नए कुरुभएपमिप्रपास्थन् पोयाचणिपूपरं तदानीम् । ११ ।। अनिउयाप । चोदया. वान् हुपाश वियायतलाणषम्। भाजातशधं राजानं द्रष्टुमिच्छामि फेरा ॥२॥ सम्बय उवाच । ततो हयान् सदाशाहमुख्यः प्रचोदयन भीममुभाष पदम् । रोककर नियतंगा । ७ । भीमसेन बोले है महानुभाव तुम ही उस भरतर्षभ युधिष्ठिर के स्वान्सको जानो मार हे अर्जुन जो मैं यहां से चलानाऊंगा तो पड़े शूरवीर शत्रुमुझको अपने से भयभीत हुमा कहेंगे । । । तब अर्जुन ने भीमसेन से कहा कि संसप्तक मेरी सेनाके सम्मुख नियत हैं अवे उनको विनामार इन शत्रु समूगों के स्थान से जाना योग्य नहीं है । ९ । हे कौरवों में पड़े वार तब भीम सेन अपने पराक्रमको पाकर अर्जुन से वोळे कि मैं संसप्तकों के सम्मुख ग करने को जाऊंगा हे अर्जुन तुम चलनाजो। १० । शत्रुओं के मध्य में भाई भीम सेन,के. कठिनतासे होने के योग्य वचन को मुनकर कौरवों में श्रेष्ठ भाई युधि प्ठिर के दसनकी इच्छासे उन दृष्णिवंशियों में अप्ठ श्रीनारायणजीसे पोला 1 ११. किडे इन्द्रियों के सामी इस समुद्ररूप सेनाको त्यागकर घोडाको पला- इये केशानी मनात शत्रु राजा युधिष्ठिरको में देखना चाहताई। १२ । संजय गोला कि तदनन्तर घोरों को पसायमान करतेहुपे संव यादवोंमें श्रेष्ठ श्रीछणनी भीमसेन से यहवात बोले कि हे भीमसेनमय या तेरा कर्म कुछ अपूर्ण नहीं है wounded by Karuu. Jou must buchen LU 5 luni, Bb.m, utiu l-ball koep tho anemy is click during your absence, " Bhim baud, to You. should gu to encei cain the diato of Yudhishthir; for if I puro from my past, the enemies will think that I am urrified. Iben Arjun said to Blim, Tlo Santaplaks die standing before any army; it is not woll for mo to go away withont slaying them." Bhim, relying on his own process, said to Arjun, " I shall beep the Salis plaka in check. You aay go away. 10. Hearing theso swords on Bhim. Arjun desirous of nocing Yadhisuthir, said to Vasuder, "Leave this ocean liks artsy sod drive tho horses. I wish to cce Yudhishthir," Ssnjaya mid, “Diiving tho hurts Sari Krisha the bot of Yadavus said to Bhim. * It is no wonder for you to do such deals. I bel.ero thati कर्णपर्व Karn Paray 16597) मेतचित कर्माध मीम यास्याम्यहं अहि- पारिसधान् ॥ ११॥ ततो पयो दृशीकेश पर राजा युधिष्ठिरः । शीघ्राच्छीघ्रतरं राजन् वाजिमिंगरुडोपमै १४॥ प्रत्यनीक व्यवस्थाप्य भीमसेन मरिन्दमम । सन्दिश्यचैनं गजेन्द्र युद्धप्रति घृकोदरम ॥१५॥ ततस्तु गरवा पुरुषप्रवीरी गजाममासाघ शयान मेकम् । रपादुमा प्रत्यय तस्मादयन्दतु ईम राजस्थ पादौ ॥१६॥ दृष्ट्या पुरुषव्याघ्र क्षमिणं पुरुषर्षभम। मुदाभ्युपगती कृष्णा पश्विनाविष पासरम् ॥ १७ ॥ तायभ्यनन्दद्राजापि विवस्वान शिवनापियां ते महासुरे जम्भे शझविष्णू यथागुरुः ॥ १८ ॥ मन्यमानो हतं कर्ण धर्मराज युधिष्ठिर। हर्षगद्गदया यांचा प्रीतः प्राह परन्तपः ॥ १९ ॥ इति श्री कणपर्वणि अर्जुनस्य युधिष्टिरसमीप गमने पंचपष्टोऽध्यायः ॥ ६६ ॥ नाताई तुम वाणों के समूहों से शत्रुओं के समूहोंको मारों । १३ । हे राजा | इसके पछि श्रीकृष्णजी गरुड़के समान शीघ्रगामी घोड़ों के द्वारा घड़ी शीघ्रता से जहाँ राजायुधिष्ठिर या वहांगये । १४ । हे राजेंद्र उस शत्रुविजयी, भीमसेनको युद्धके विषय में समझाकर सेनाके सम्मुख नियतकरके । १५। फिर पुरुषों में पड़ें वीर दोनों श्रीकृष्ण अर्जुन युधिष्ठिर के समीप गये और वहाँ अकेले ही सोतेहुये राजा को पाकर दोनों ने रथसे उतरफर धर्मराज के चरणोंको नमस्कार किया श्रीकृष्ण और अर्जुन उस पुरुषोत्तमको कुशलपूर्वक देखकर ऐसे प्रसन्न हुये जैसे कि इन्द्रको देखकर अश्विनीकुमार प्रसन्न होते हैं । १७ । फिर राजाने भी उनको ऐसा प्रसन्न किया जैसे कि इन्द्र अश्विनीकुमारों को और जैसे महाअसुर जम्भके मरने पर वृहस्पतिजी ने इन्द्र और विष्णु को कियाया । १८ । संजय बोले कि | इसके पीछे शत्रुसन्मापी राजा युधिष्ठिर कर्णको मृतक मानता हुआ बड़ी प्रसन्नता पूर्वक मन्दमुसकान श्रीकृष्ण अर्जुनको वेदीमृदुता और मिष्टवाणीसे प्रसन्न किया you will stay the enemies." Then Shri Krishn drove bis horses feat to the place whore Yudhishthir was. · Having advised Bhim the destroyer of foes what to do, both Krisbn and Arjun went.to Yudhislithir, and finding bim sleeping alone, tboy bowed down at dia feet. Both were 'pleared to find him alive as Aowinikumars aro at tha sight of lódra. Tho king congralulated them as India does tho Aswing of as Vrihaspati bad welcomed Indra and Vishnu at the death of Jármbh.' Then Yudhishthir hoping that Krishn and Arjun had slain Karan, smiled with joy and talked to them in sweet words: 19, ।
- १ . ('6600) Mahabharat (६६००। भवेत् ॥ १७ ॥ जाप्रत स्थपंच कौन्तेय कर्णमेव सदा शाम श्यामि श्रेष कर्णभूतमिदं जगत् ॥ १८ ॥ यत्र यत्र हि गध्यामि कर्णागीतो धनमाय । तत्र तत्र हिपश्यामि कर्णमेवाप्रत स्थितम् ॥ १९ ॥ सोऽहंतेनेष धीरेण समरेपपलायिना । सहपः सरयः पार्थ जित्या.जीधन विसन्जितः ॥ २९ ॥ को मु मेजोषित नापों राज्ये नाओं भवेद पुनः । ममेवं धिक्कृतस्यांध कर्णनाइयशोमिना ॥ २१ ॥ प्राप्तपूर्व पीप्मात् छपाइम्रोणारच संयुगे । तत् प्राप्तमध मे युद्ध मूतपुत्राम्मारथात् ॥ २२ ॥ सं त्वां पृच्छामि कौन्तेय यथाध कुशलन्तया । तन्ममाचक्षध कार्वन्येन ययों कों इतस्वया ॥ २३ ॥ शकतुल्यवलो युद्ध मयतुल्यः पराक्रमे । गमतुल्यतयाण स फयं ये निसदितः ॥ २४॥ महारथःसमाण्यातः सर्वयुधिशारपः धनुवराणाप्रपर सेवेषामेकपूरुषः ॥ २५ ॥ पूजितो धृतराष्ट्रेण सपुत्रेण घिशाम्पते । स्वदर्यमेप गया स कथं निहतस्त्यया ॥ २६ ॥ धाराष्ट्रो हि युद्धेषु सर्वम्वेव सदानि । तपमृत्यु रणे योग्य होय । १५ । हे मर्जुन मैं जागते सोते उठते बैठते चलते फिरते नहीं वहां हरसमय कर्णहीको देखतार्दू सब संसार मुझको कर्णारूप दीखता है। मजुम मैं कर्ण से ऐसा भयभीत होरहाई कि जहां जहां जाताहूं वहां वहां.कर्ण कोही नियत देखताई। १९ । हे. श्रीकृष्ण अर्जुन उस युद्धसे कभी न. इटनेवाले वीर कर्णने मुझको घोड़े और रथ समेत विजय करके जीवता त्यागफियाहै.।२०। अब मुझ कर्ण के हाथ से पराजय पानेवालेका इस संसारमै जीवना व्यर्थ है । २१ । पूर्वमें भीमजी द्रोणाचार्य व कृपाचार्य से भी ऐसा दुख मैंने नहीं पायाया जैसा कि भवयुद्ध में इसमहारथी कर्ण से पाया है । २२ । हे अर्जुन अवमे तुझसेयह पूछताहूं कि किसरीति से निर्विघ्नता पूर्वक तेरे हाथ से कर्ण मारागया उस सब | वृत्तान्तको यथावस्थित व्यौरे समेत मुझसे वर्णन करो । २।। पराक्रममें यमराज और पुरुषार्थ में इंद्रके .समान और अस्त्रों में परशुरामजी के समान वह कर्णः युद्धमें कैसे मारागया । २४ । महारथी और सव युद्धोंमें कुशल धनुदीरियों में अत्यन्त भेष्ठ और सब में अकेला पुरुषार्थी। २४ : वह.कर्ण तेरही निमिच पुत्रों समेत धृत- | राष्ट्रसे स्तुति कियागयाथा वह तेरे हायसे कैसे मारागया। २६ । पुरुषोत्तम that I see him in all things. 19. Having conquered mo in battle, invincible Karan has spared my life. It is not proper for me to livo any longer under such circumstances. 21. I was never in hard pressed by Bhishm, Drona and Kripasharya as by Karao, Prag let mo know how you were successful in sleying Karan. Like Yarn and Indra in prowess and bravery, like Parashuram in the use of weapons, how it was that Karan was slain by you. The skilful warrior, best of archers and unrivalled warrior Karan was praised by the 'ions of : Dhritrashtra for your iske alone; how was he slain by you ? Duryg. dhaa always boasted that Karaa would kill Arjun; how was he slain : - - १ 7 कर्णपर्व Karan tarv (3601 रणे मन्यते पुरुषपम ॥ २७ ॥ सत्वया पुरुषव्याघ्र कर्ययुये निदितः । तन्ममावषय कौन्सेय पथा को इतस्रथया ॥ २८ ॥ युध्यमानस्य च शिरः पश्यना सहदा हतन स्वमा पुरुषलशार्दूलेन यथारुरुः॥२९॥य पर्युगासाद प्रदिशा दिशश्च स्वा मूतपुत्रः समरे परीपसन् । दिनमः कर्णः समरे हस्तिषयगपं स इदानी कडूपः सुतानः । स्पारणे मितः सूतपुत्रः कच्चि छेते भूमितले दुरात्मा ॥ ३०. प्रियच म परमो धे इतोऽय थयारण सूतपुत्रं निहत्य ॥ ३१ ॥ यः सचतःपर्यपतत्व मदाधितोगर्षितः मतपुत्रः । स शरमानी.समरे समेत्य कश्चित्यया निहत: संयुगंऽसा । ३२ ॥ रोषम पर हस्तिगयावयुलं र प्रदितमः परेश्यस्तदर्थे । सदा रणे स्पर्द्धत यः स पापः कवित्वया निहतस्तात युद्धे ॥ ३३ ॥ पोऽसौ लदा रामदेन मचो विकायते संसदि कारवाणाम । नियोऽत्ययं तस्यसुयोधनस्य कञ्चित् स पापो निहतस्त्वपाच ।। ३४ ॥ भर्जुन वह दुर्योधवं सदैव सब शूरों के मध्य में कर्णहीका तरा मारनेवाला मान वाचा बह कर्ण मेरे हाथ से कैसे मारागयो । २८ । और तुमने उसके शुभचिन्तको के देखते हुये उस युद्ध करनेवास का सिर ऐसे काटडाला जैसे कि रुरु नाम मृग का शिर सिंह कारता है । २९ । छ। हाथी दान करने का इच्छावान युद्धमें 'तुभ को चाहनेवाले मिस कर्प ने दिशा और विदिशामों को सेवन किया वह दुरात्मा कर्ण क्या भव मेरे अत्यन्त तीक्ष्ण बाणों से युद्ध में मरागुआ पृथ्वी पर सोता है । । युद्ध में तैने कर्म को मारकर मेरा बड़ा भारी अभीष्ट किया । ११ बो कर्म सदैवं पूजित और अहंकारयुक्त होकर तेरोनीमच.सक्योर 'को रोड़ा वह अपने को शर माननेवाला तुझको युद्ध में पाकर मर क्या बारा गया ३२॥ हे ताट जोकि तेरे निमित्त हाथी घोड़ों समेत उत्तम मुनहरी रथों से दूसरे लोगों को देने की इच्छा कररहाया और सदैव युद्ध में पी करनेवासापा वो पापात्मा क्या युद्ध में तेरे हायसे मारागपा । १५ । जो वल पुरुषार्थ में खुद सदेव कौरवों की सभा में निरर्थक वाचालाप करवाया और उस दुर्योधन श अत्यन्त मियथा अब वह. दुष्टात्मा क्या तेरे हायसे मारागया १४ सम्मुखहोकर by you? In the presence of all his wellkwishers.you cut off his head, as a lion does that of a deer. He who promised to give six bulls like elephants to the person who should point you put to him, is ho lying qa oarth slain by your artowa 130. You have done me a great service by sięyiag hin. . Have you elain Karan, who was seeking you to .sight i Hava you slain Karan who wished to give golden caya to. the person that should discover you to him. Have slaia Karan, the dear friend of Duryodhaa, who used to boast of bis proped in the court of the Blurayas and was the dear friend's Duryodban ? Is hoa lying qa, qarth with body bleeding by, your får reaching arroya you - .. - (6600) Jahabharat (६६० भषेत् ॥ १७ ॥ नाप्रत् स्वपंच कौन्तेय कर्ममेव सदा शाम । पश्यामि तव कर्णभूतमिदं जगत् ॥ १८ ॥ पत्र यत्र हि गड्यामि कर्णाद्रीतो धनमाय । तावत्र रिपदयामि कर्णमेधानत स्थितम् ॥ १९ ।' सोऽहंतेनेष धीरेण समरम्पपलायिना। सहयः सरपः पार्य जित्या बीपन घिसालितः ॥ २० ॥ को नु मे जोषितनापों राज्ये नायो नषेद पुमः । ममेषं धिकृतस्याध कर्णनावशोभिना ॥ २१ ॥ त प्राप्तपूर्ण पनीमा छपाइद्रोणारच संयुगे।तत् प्राप्तम मे युद्ध मतपुत्रा महारयात् ॥ २२ ॥ स त्वां पृच्छामि कौन्तेय पयाध कुशलन्तथा । तन्ममाघष कारस्पन या कों इतरंथपा ॥ २३ ॥ शकतुल्यपलो युरेमपतुल्यः पराक्रमे रामतुल्यत्तयारण स रूपं ये निसदितः ॥ २४ ॥ महारयासमाण्यातः संघयुधिशारयः पराणांमधरः सर्वेषामेकपुरुषः ॥ २५ ॥ पूजितो धृतराष्ट्रेप सपुत्रेण विशाम्पते । स्वदर्थमेप गधेयः सफ निहतस्त्यया ॥ २६ ॥ धाराष्ट्रो हि युद्धेषु सम्वेव सदाईन । वामृत्यु रणे योग्य होय । १५ । हे मर्जुन मैं जागते सोते उठते बैठते चलते फिरते नहीं वहां हरसमय कर्णहीको देखताहूं सब संसार मुझको कर्णदारूप दीखता है। भाजुन मैं कर्ण से ऐसा भयभीत होरहाई कि जहाँ जहाँ जावाहूं वहां वहां.कर्ण | कोही नियत देखताहूं। १९ । हे. श्रीकृष्ण अर्जुन उस युद्धसे कभी न हटनेवाने वीर कर्णने मुझको घोड़े और रय समेत विजय करके जीवता त्यागोकपाहै ।२० । अब मुझ कर्म के हायसे पराजय पानेवालेका इस संसारमें जीवना व्यर्थ है । २१ । पूर्व में भीप्पनी द्रोणाचार्य व कृपाचार्य से भी. ऐसा दुख मैंने नहीं पायाया जैसा कि भवयुद्ध में इसमहारथी कर्ण से पाया है । २२ । हे अर्जुन अवमे तुझसेपर पूछताहूं-कि किसरीति से निर्विघ्नता पूर्वक तेरे हाथ से कर्ण मारागया - उस सब वृत्तान्तको यथास्थित पारे समेत मुझसे वर्णन करो। ३।। पराक्रममें अपराज और पुरुषार्थ में इंद्रके समान और अत्रों में परशुरामजी के समान बह कर्ण- युद्धमें कैसे मारागया । २४ : महारथी और सब युद्धोम कुशल धनुर्दारियों में अत्यन्त भिप्ठ और सब, में अकेला पुरुषार्थी । २४ । वह.कर्ण तैरही निमिच पुत्रों समेत धृत- | राष्ट्रसे स्वति किगागपाया वा ते रे हायसे कैसे मारागया । २६ पुरुषांचम that I sco kim in all things. 19. Haring conquered ms in battle, invincible Karan has spared my life. It is not proper for me to live ang lungor under sach cirrorstandes. I was never so bard pressed by Bhishm, Drona and Kripacharya as by Karan, Pray lot ne know how you wore successful in slaying Karan, Like Yam and Indra in prowess and brarery, like Parashuram in the use of weapons, how it was that Karan was slain by you. The skilful warrios, bent of archers and unrivallod yarrior Karna was praised by the sons of Dbritrasbtra for your asko alone; hor was be alaia by you? Duryo. disa always buested that Karaa would kill Arjua; how was bo slain । 3601 (६६०१) कर्णपर्व Karan l'arv कणे मन्यते पुरुषर्षम ॥ २७ ॥ सत्वया पुरुषायाम कर्ययुके निमदितः । तन्ममाध कौन्तेय पंथा को इतस्त्वया ॥ २८ ॥ युध्यमानस्य च शिरः पश्यना सहवा हतन् । स्वरा पुपाईलशालेन यथाररुः॥२९॥य पर्युगसीद प्रदिया विशव या मूतपुत्रः समरे परीपसन् । विवसुः कर्णः समरे हस्तिषगपं स इदानी कडुपौः मुताक्षमः । स्पारणे निहता मूतपुत्रः कचिच्छेते भूमितल दुरात्मा ॥ ३०॥ प्रियच म परमो वे तोऽय पयारण सूतपुत्रं निहत्य ॥ ३१ ॥ यः सर्वतःपर्यपतत्व मदाम्वितोगर्षितः सूतपुत्रः । स शरमानी समरे समेत्य कञ्चित्यया निहता संयुगडसा),३२ ॥ रोक्म पर हस्तिगयावयुकं रथं प्रदितसर्वः परेश्यत्तदर्थे । सदा रणे स्पर्द्धते यः स पापः कवियपा निहतानात युद्ध ।। ३३ ॥ पोऽसौ सदा शूरमदेन मनोविकत्यते संसदि कौरवाणाम् । मियोऽत्यर्थ तस्यसपोधनस्य कञ्चित् स पापो निहतस्त्वयाय ॥ ३४॥ | अर्जुन वहं दुर्योधवं सदैव सब शूरों के मध्य में कहीका तरा मारनेवाला मान ताया यह कर्ण लेरे हाथ से कैसे मारागया । २८ । और तुमने उसके शुभचिन्तकों के देखते हुये उस युद्ध करनेवाले का सिर ऐसे काटडाला जैसे कि रुरु नाम पृग का शिर सिंह कारता है । २९ । छ। हाथी दान करने का इच्छावान युद्धमें तुल को चाहनेवाले मिस कर्प ने दिशा और विदिशाओं को सेवन किया कर दुरात्मा कर्ण या भव मेरे अत्यन्त ताण बाणों से युद्ध में पराहुआ पृथ्वी पर सोता । ३०"। युद्ध में मैंने कर्म को मारकर मेरा बडा भारी अभीष्ट किया ।।१।बो कर्ण सदैवं पूजित और अहंकारयुक्त होकर रोनमिस.सवचार को रोड़ा वह अपने को शर माननेवाला तुझको युद्ध में पाकर भग क्या नारा गया ३२॥ हे तावं जोकि तेरे निमित्त हाथी घोड़ों समेत उत्तम मुनहरी" रथों से दूसरे लोगों को देने की इच्छा कररहाया और सदैव युद्ध में पी करनेवालाया वा. पापात्मा क्या युद्ध में तेरे हायसे मारागपा । ३५ जो वल पुरुषार्थ में उर्वद सदैव कौरवों की सभा में निरर्थकं वाचालाप करवाया और उस दुर्योधन का भत्पन्त मियथा अब वह दुष्टात्मा क्या तेरे हायसे मारागया । १४ सम्मुखहोकर by you?. In the presence of all his owellkwishers you cut off his head: as a dion does that of a deer. Ho who promised to give six bulls like elephants to the person who should point you put to him, is ho lying on earth elaip by your.arrowat30. You have done me a great sorvice by Blaying him. . Have you elain Karan, who was seeking you to -Sighi? Hava you slain Karan who wished to give golden casi to, the peraop that should discover you to him Have you slaia Karan, the dear friend of Duryodhaa, who used to boast of bis prowess in the court of the Kauravas and was the dear friend ni Duryodhan ? Is 10 lying, qa,garth willy, body, bleeding by, your far reaching arrows ? " [6602} Mahabharst. ममित गम्यनः प्रहरपूरितलोहिताडोमाशते सपापीमिक्षगा करिमो धाराप्रपा । ।५ ॥ योऽसी सदा साधने राजमाये दुष्यालय न दपंपूर्ण । महंसा फाल्गनीति मोहार कावासनातन ॥ ३६॥ नाईवोधायपिये कदाचित स्थितः पाइपलपतु प्रतपस्वत: सर्वका राक्रमनो करिनावपा निहनः सोऽय कर्ण । ३७ । योऽसौ रुपमा एवादिः कः सयां कुरुशरमाणे किं पान जहासिकणे महान पतितान रोनसायान् ॥ ३८ ॥ योऽमी कर्णः प्रायजामायदय नाहावाह सह पापंम् । शेपयाति सपरिवते शरसभित्रगाः ॥ ३८ ॥करियर संग्रामो मिरिता तपासमागमे सम्प्रयकोरयाणामा स्यामोशी पूरा कविया सोऽपता समाय ४०॥ कम्विाषया तस्स समागायमुर्विनि भला सकुशल मानदुत्तमान कायात पूछतं युधि सव्यसाचिन् ॥ ४॥ पर. तेर पलाये हुपे रक्तांग आकाशचारी. वाणों से शरीर में अत्यन्त पापड या सपापीकर क्या असता दुर्योधन की रजा दीली और निर्बल हुई॥५ जो यह कणं अपने मान से राजाओं के मध्य में दुर्योधन को प्रसन्न करता हुमा कार में भराहुभा सदैव पानी या प्रशंसा करताया कि अग्न का मारनेवालाई क्या उमका का वचन ठीक नहीं हुमा ।१६ कि मैं तबतक कमी पदाती रूप से नही दांडूंगा जातक कि मर्जुन निपत होकर वर्षमान र निदि का सदैव यही प्रतया रे इन्द्र के पुत्र अर्जुन वाकणे स्वा. बरे हापस मारागया। 11 जिस दुष्टबुद्धि कर्ण ने सभा में कारवारों के माप में द्रौपदी से या काया कि हे पणा तू इन अत्यन्त निर्वड और नाशक पुरु पार्थ रहित परियोको क्यानही त्यागकरती है और सी का ने तेरे विषय में प्रति करीथी कि में श्रीक्षण समेत अर्जुनको विना मारेहुये कहा नहीं भाऊंगा वा पापदि बरे वागोंसे पायस हुमा भब या सोरहा है। मृमियों और कौरवों के इस युद्धको क्या-तुम जानते हो जिस में कि मेरी यादमा रोगई है मय वह दुरात्मा क्पा तरे हाथमे मारागपा । १० अर्जुन तुमने पुदमें अपन गाण्डीव पनप से छोड़ेसे भाग्नएर बाणों से उस अत्यन्त निदि कर्न I. Duryodban's arm broken by bis death 1 35. Hayo Karan', bosatu of slaying you in battle proved frltel 36, Hare you slain liaran who had tored not to walk on loot without slaying you ? Does bo slerp in deall, Xaran wbo said to Draupadi in the court of the Kadra pas that she should giro ap the weak and domanly Pandırma and who said that ho would not rofara without saying Krisha sod Arjun ! Do you know of the battle betrece the Kaurasa and Srinjaya ia which' I was reduced to this condition! Here you waia the wrotch.to. Have you sovered with your bap Asrows the ben . कए Karan Parar (6603) सपा पानसमारंतन भ्यानोपसे कर्णस्य पधाय पार । वाम षया काञ्चदमोपमय पानेहत कर्णनिपातने॥२॥ पहपंपूर्णः स सयोधनोऽमानुदाशते कर्णसमायेग कायस्थमा सोध समाभयोऽस्थ भानः पराकम्प सुयोधनस्य ॥ ४३ ॥ यो मादुरा पडतलानघोचत सभामध्ये कोरषाणां समक्षम् । सातः कामदुग्य सध्ये साताभूतपुत्रोश्यमर्षी ॥ ४४॥ यःमूतपुत्रःमासन दुरारमा परावीत निzिa सोवन । स्वयं प्रसमामय पानसेनीमपीह कस्वित् सहमपराय ॥४५॥ बशमा भष्ठतम पृषिम्या पिताम शासिपवल्पचेताः । संस्थापमानो बरस कविरथया तो पाविरीधर्महात्मन् ॥ ४॥ मम नितिसमीरणारत हदि स्थित स्पळनामि सदा मम । हते मया सोऽपसमेत्य कर्ण इति शुभम् प्रशमप. का फुगलों समेत देदीप्पमान सिर क्या शरीर से काटाला है ।४१॥ हे वीर जो मुझ वालों से यायल ने तुमको कर्ण के मारनेके निमित्त ध्यान कियाई अब तुमने कर्म के मारने से क्या यह मेरा ध्यान सफल किया । ४२ । जो दुर्योधनो कर्म के मामित होकर हमका देखता है अव तुमने क्या उस दुर्योधन के रक्षक /- पराबर किया । ४ । पूर्व समय में जिसने सभा के मध्यवर्ती करकौरवों के सम्मुख हमको थोतिल और नपुंसक कहा या दुर्बुदि क्रोध से भग हुमा कर्ण सम्मुख होकर सपा युर में तेरे हाथ से मारा गया। ४४ । पूर्वकाल में मिस सिवे हुपे दुरात्मा कर्ण ने शकुनी से जीती दुई दौपदी को बड़ी उसे कहा था कि इस दीपदीको यहाँ साओ पर कसे क्या अब तेरे हाथ से मारागया । ४५ । और मिस निर्वाशी न रिख्यात शत्रधारी महात्मा पितामहकी निन्दा की मनपा अर्दयी पयां रे हायसे भव माराम । ४६ । हे अर्जुन भर तुम इसमासको कार कि यह कर्ण युद्ध में मेरे हायस मारागपाद मेरे हृदय तो अग्नि को बुझायो कि वह माग्न अमर्प जमिव वायु से प्रेरित मोदय में मदी बोकर सदैव नियत रहती है । ४७ । सोहे अर्जुन रे हायसे कसे पारागपा है उस मेरे दुष्पाप्प मनारय को न करो हे पर वार boautiful bead of Karan adoi nod with earrings. I was thinking of you as long as Kaian Wounded to have you fulalled my hope by alaying him! Hays you killed Ka'an the protector of Duryodhan who, relying on uim, loukou down upon uk Have yo u slsu Karay, who called us busks ot te-amun in die Curt of the Kauravast have you slain Karan wh» insisted ou Draupadi bing buayut into the court at the timo of Suakuni's viuming ler 145. Have yun slaiu Karan who insulted Bhishm the famous warrior Quencla tho bio of my broust by saying that you have slain Karan, The firo is buruing always. How as Karan alain by guu! Pray tell us all about it, Arjun. ma (8606) Mahabharat यायित्समम्पो वभूव समर्माहतो मविरुष्टः पृषकः ॥ १० ॥ स विक्षरावर सर्व | गात्रै रयानीकं सूतसूनोधिवेश । मयाविभूतान सैनिकानां प्रधानसी प्रपश्यधिश प्रविग्धान् ॥ ११ ॥ ततोऽभिभूतं युधि वीक्ष्य सैन्यं विप्रस्तयो द्रुतवाजिनागम् । पंचाशता रयमुपः समेत्य कर्णस्त्यरन्मामुपायात प्रमाथी । तान मुदयिस्याह म मुपास्य कर्ण द्रष्टुं भवन्त स्वरपाभिजातः ॥ १२ । सबै पाञ्चाला झुद्विजन्ते स्म भागन्धादगाव शरिणो यथैध । मृत्योगस्य व्यासमियाभ्यपधन प्रमद्रकाः कर्ण मांसाच राजन ॥ १३ ॥ रथास्तु सान सप्तशतानिमग्नां स्तदा कर्णः प्राहिणोन्मायुसन गधाप्यभूत् फलान्तमंनाः स रांजन पापन्नास्मान् दृष्टयान सूतपुत्रः ॥ १४ ॥ श्रधा तुरयां तेन समेतमश्वत्थाम्ना पूर्वतरं क्षतञ्च । मन्ये कालमपयानस्य राज पलमात्रमही वजके समान तीसवाणों से उसको पीडामान किया फिर मेरे प्रपत्क नाम वाणों से पीड़ित होकर वह अश्वत्थामा क्षणोंही श्वाक्ति के समान रूप पासा होगया । १० । सब अंगों से रुधिर को डालता हुआ वह अश्वत्थामा मुस से पराजित होकर सेनाके बड़े श्रेष्ठ मनुष्यों को अपने रुधिर भरे ये शरीर से देखता हुमा कर्ण के रथों की सेनामचलागया। ११ । उसके पीछे मारने वाला फर्ण युद्धमें सेना को भयभीत और हाथी घोड़े और रथों को भगाता हुआ देखकर पचास उत्तम रथियों को साथ में लिये हुये वड़ी शीघ्रता करता हुमा भायां मैं उनको मारकर युद्धका भार भीमसेन के सपुर्द करके और कर्ण को छोड़कर आपके देखने को बडे बेंगसे शीघ्रता करके आयाई ॥१२॥ सव पांचाल लोग कण को देखकर ऐसे भयभीत हुये जैसे कि केशरी सिंहको देखकर गौवें भयभीत होता हे राजा प्रभद्रक नाम क्षत्री मृत्यु के फैले हुये मुखकोप्राप्त करके और कर्णको पाकर युद्ध करनेवाले हुये । १३ तब कर्णनेप्रत्यु रूपी नदीमें डूबेहुये उन सातसौ रधियों को मृत्युलोक में भेजा हे राजा यह कर्ण भी तबतक चित्तसे पीडामान और क्लांत चित्तहीरहा जबतक कि उसने इपलोगों को नहींदेखा ।१४। फिर तुमको उस से भिड़ाहुआ और अश्वत्थामा से पहिले बहुत with my arrova sticking to his body. 10, Bleeding prolubely from all the parts of his body, and defeated in battle, he left me and entered Karia'a'army in the presence of all the warriors. Tben K'alaa came on towards me terrifying the warriors and routing tho lines of elephants, borses and care. He was Bccompanied by fifty warriors whum I slew, and leaving all the burden of war on Bhim, I came to "ee you in baste, 'The Panchals were terrified at tho sight of Karan Lºcows are at the sight of a lion. The Prabhadraks encountoring Karan, fell down in the jaws of death. - Karan slew Saven hundreds of boso Warriors and was very anxious in bis mind as long as he had not H-sring that you were wounded by 'ashsathana and मेरे सम्मुख •ents, [६६०७) कर्णपर्व Karn Paray (6607" रात् कणांत्तेऽहमाचन्त्यमन् ॥ १५ ॥ मया कर्णस्यास्त्रमिदं पुरस्तायुद्धे हर पांडव चित्ररूपम् ॥ १६ ॥ न हन्ययोद्धा विद्यते सूजयानां महारथं योऽध सत् कर्णम् । नयो में सात्यधिकरतो धृष्टद्युम्नश्चााप तथैव राजन ॥ १७ ॥ युधामन्युश्चोत्त | मौजाश्च गरी पृष्ठतो मां रक्षता राजपुत्रौ । स्थवीरेण महानुभाव द्विषत् सैन्ये परता दुस्तरेण ॥ १८ ॥ समेत्याहं मलपुषेण संख्ये वृषेण धजोष नरेन्द्रमुण्य । पोस्पाम्ययं भारत मतपुत्रमस्मिन् संग्रामे यदि वै दृश्यतेऽध ॥ १९ ॥ आपाह पश्या ध ययुत्समानं मां मूतपुत्र रणे जयाय । महमस्येव मुख प्रपन्नाः प्रभद्रकाः कर्ण ममिद्रवन्ति ॥ २० ॥ पट्साहना भारत राजपत्राः स्वर्गाय लोकाय रणे निमग्ना। | कर्ण न चेदद्य निहमि राजन् सपान्धवं युध्यमानं प्रसछ । प्रतिनत्या कुर्षता | गतिर्या फटां याता तामहं राजासह ॥ २१ ॥ आमन्त्रये त्यो ब्रूहि रणे जयमे पुति घायल हुआ पुनकर मैं कर्ण से हटजानेका आपका समय मानता हूं हे ध्यान से बारोंके कर्म करनेवाले राजा युधिष्ठिर मैंने कर्णका यह अपूर्वरूपवाला अत्र देखा । १६ । सृजियों में कोई ऐसा शूरवीर नहीं वर्तमान है जो उस महारथी कर्णका सामना करसके हे राजा मरी सेनाका रक्षक धृष्टद्युम्न, सात्यकिहो और युधामन्यु उसमाजस यह दोनों राजकुमार भी पीछेकी भारसे मेरी रक्षाकरें । १७ । हे महानुभाव में कठितासे पारहोने के योग्य महावीर और रक्षापूर्वक शत्रुकी सेना में वर्तमान उस मूतपुत्र कर्ण से अपने सहायकों समेत सम्मुख होकर युद्धमें ऐसे युद्ध करूँगा जैसे कि वज्रधारी अपने वनमे युद्धकरताहै हे राजामों में श्रेष्ठ भरतयंशी अब जो वह इस युद्धमें दिखाई देता है । १९ । उस मूतपुत्रका और मेरा युय जयके निमित्त माप देखोगे अभद्रक कर्ण के सम्मुख ऐसे जाते हैं जैसे काई वैलके सम्मुख जाय । २० । छ।हजार राजकुमार स्वर्गके अर्थ रण में ढूंचे इस से हे राजा अब जो मैं इठकरके बांधयों सहित उस लड़नेवाले कर्णको नहीं माऊँ तो प्रतिज्ञाके न, करनेवाले की जो घोरगतिई उसको मैं पाऊँ मैं आपसे पूंछवाहू आप पदमें मेरी विजयको कहिये और मेरे आगे भीमसेन धृतराष्ट्र के retreated from Karan's encounter, I thought that you must havo gone to take rest. I have soen the wonderful weapon of Karan and think that no Srinjaya warrior oan withstand him in battle. Let Dhrish tadyuion and Satyaki protect my army and let Yudhiamaryu and Uttamaujaa protest my rear. Then encountering Karan and his warriors, 1 shall fight with him like Indra the wielder of vajra. You will sən my battle with Xaran. The Prabhadraks are encountering. him as one encounters an angry bull. Six thousand princes are fight. ing for the sake of heaven. May I got the punishment of those who break their promiso, if I donot slay Laran to day. I ask your biegs- 10610) Mkxbarat [६६१०] 'विगोऽय मनि शूगन शापान जप्यनीति ॥ १० ॥ अयं जता खाण्डवे देवसंघान्' सवाणि भूनाम्यपि चोत्तमांजाः । अयंजतामद्र कलिङ्गकेकयानय कुरूमाजमध्ये निहन्ता ॥ ११ ॥ अस्मात् परी न भरिता धनुद्धगं नैनं मत फिञ्चन जातु जता । इच्छभय मर्वभूतानि कुर्याद्वश वशी सर्वसमाप्त विद्यः ॥१२. कानया शशाइन्स्य जयेन पायोः स्पण मराः क्षमया पृषिव्याः । पूर्यस्य भासा धनदस्य लकन्या शौर्यण शक्रस्य चलन विष्णो. १३॥ तुल्यो महात्मा तय कुन्ति पुधा जातोऽदितैर्विष्णरिवारिहना। स्वेषां जयाय द्विषतां वधाय ख्यायांऽमितीजाः कुलतन्तुकता ॥ १४॥ इत्यन्सरीक्ष शतमानि तास्सिना ण्यतां घागुषाच । एवंविधं तच्च नाभत्तथा ते देवापि नूनमन्त पदन्ति । १५ ॥ तथापरेयानृषिसत्तमानां श्रुत्या गिरः पूजयतां सदा त्यान् । नियुदि के उत्पन्न होनेके सातदिन पीछे अन्तरिक्षम यह आकाशवाणी हुईथी कि यहपुत्र इन्द्र के समान पराक्रमी उत्पन्नहुमा है यह शत्रुरूप शूरवीर मनुष्यों को | विजय करेगा। १० । और मद्र कलिंग और फेकय देशियोंका भी विजय करके राजाओं के मध्य में सबकौरवोंको मोरंगा । ११ । इससे उत्तम कोई धनुपधारीनहीं होगा कोई जीवधारी इसको कभी विनय नहीं करसकेगा यह जितेन्द्री और सब विधामों में पूर्ण होकर अपनी इच्छासे सब जीवमात्रों को अपने प्राधान,करेगा१२ के कुन्ती यह तेरापुत्र कांति और शोभामें चन्द्रमाके समान तावता और शीघ्रतामें वायुके सदृश और स्थिरतामें मेरु पर्वतके समान क्षमा करने में पृथ्वी के तुल्य तेजमें सूर्यके समान लक्ष्मी में कुवेरके शरता में इन्द्र के पराक्रममें विष्णुके समान यह महात्मा ऐमा उत्पन्न हुआ है ।।।। जैसे कि शत्रुओं क मारनेवाले दिति के पुत्र विष्णुजी अपने लोगों के विजय और शत्रुओं के मारने के निमिच सब जगत में विख्यात महातेजस्वी पनुप चलानेवाले उत्पन्न हुये हैं । १४ । शत शृंग के मस्तकपर अन्तरिक्ष में यह सब तपस्वी लोगों के मुनते हुये भाकाश पाणी ने कहा सो वह जैसा कहाथा वैसा नहीं हुमा इससे निश्चय करके देवताभी मिथ्या बोलते हैं । १५ । और इसीतकार सदैव तेरी प्रशंसा करनेवाले अन्य अन्य उत्तम bat you have buuk us all in liell. On the defenth day true your birth te heard a henreoly voico say ab sut you, " The child will be of Indra ake prowess and will destroy the bravest euemies. I0. He will conquer Madra, Kaling and Ruikaya and will destroy the Kauravau. He will be a matchloss archer jovincible by all. llaviag control over his organs and possessing all sorts of knowledge, he will conquer all. This son of Kunti will be beautiful like the moon, like the wind in agility, like llora in firmaess, like the earth in forgiveness, like the sun in glory, Like Kuberin wealth, like Indra in bravery and like Vishnu prowess. He will conquer and doutroy focs like Vishau the famous 500 of Diti." This ras heard by tho rishis all over Shatsbring; but in (६६११) कणपर्व Karan Paray (661) सतिमि मुयोधनस्प न त्या जानाम्याधिरमपानम् ॥ २६ त्यष्टा सहम जनाझं शुभं समास्थाय फपियज सम् । बग गृहाधा हेमपट्टायन धनुधर गानि तालमात्रम् । स केशवनोद्यमानः कथं व कांद्रीता ग्यापासोसि पार्थ ॥ १७ ॥ धनश्तत् केशयाप प्रदाय पन्ताभविष्यात रणे दुरात्मन् । ततोऽधनियत कशषः कर्ण मुग्रं मरुत्पतिवंत्रमिधात्यवः ॥ १८ ॥ राधेयमे यदि नाय शकचर.. सुमं प्रतिपावनाय । देशपस्मै गाडियमेतदस्य त्वत्तो योऽस्रोप्यधिको नरेन्द्रः ॥१९॥ भस्मानिय पुत्रदारबिहीनान सुखानप्टोम्राज्यनाशाच्च भयः । द्रष्टा लोका. पतितानप्यगाधं पापैर्जुष्ट नरफे पाण्येय ॥ २० ॥ मासेऽपतिभ्यः १ मे त्य मुकुन् न या गर्भेऽप्यमधिप्याथायात श्रेयो राजापत्रामाईप्या चेत्सप्रामावश्यान युगात्मन् अपियों के वचनों का सुनकर दुर्योधन के शिष्टाचार को अंगीकार नहीं करता हूँ और कर्ण के भयसे पीड़ामान तुझको नहीं जानताहूँ । १६ । हे अर्जुन त्वष्टा देवता के बनाये हुये निश्शब्द पहियेवाले हनुमानजी की घना रखने वाले उस शुभरथ पर सवार होकर और स्वर्गमयी वेष्टन से अलंकृत खड्गको और ताल वृक्षके समान इस गांडीव धनुपको लेकर केशवजी के साथ स्थपर सवार होकर हम कर्ण से भयभीत होकर कैसे हटाये । १७ । अब उस धनुपको केशव जी को दो और तुम युद्धमें केशवजी के सारथी वनो तव केशायनी उस उन कर्णको ऐसे मारेंगे जैसे कि वजधारी इन्द्र ने वृत्रासुरको मारा । १८ । जो तू मव इस घूमनेवाले उग्रकर्णके मारने में समर्थ नहीं है तो जो राजा अनविधा में तुम से अधिकहो उसको यह गाण्डीव धनुप देदो ।१९। हे पाण्डव अब यह लोकपुत्र नियोंसे रहित और राज्यके नाशकरनेके हेतुसे प्रानन्द और कुशलतासे रहित हमलोगों को उस पापियों से सेपित अगाध और धार नरक में पड़ाआ देखेगा । २० । जो तू कुन्तीकं गर्भमें न पैदाहोता वा पांच महीने गर्भपात होजाता तो तेरा कल्याण होजाता जो तू युद से हटकर न आता ।' २१ । . it appears that even gods tell lies as those words are not proved true .15. Having board the same words from rishis, I thought that Duryodhan would not gain victory. I never thought that you see afraid of Karan. Possessing Twashta's car with noiseless wheels, Hanuman's banner, golden sword, and hugo Gandi bow, and accompanied by Krisho, you should not be afraid of Karan. You should give up your Gandir bow to Krishn and change places with him. He will slay Karan as Indra slew Vritrasur. Give your Gandiy bow to some other warrior better than yourself, if you cannot slay Karan. The world will now see us destitute of sone, wires, happiness, kingdom and pesco and fallen in bottomless perdition. It would have been better it thou hadat diver been born in the rombof Runts, or bad coine out in [6612] Blahabbarat (६६१२) २१. धिक गाण्डीवं धिक घने शाहुवीयमसंख्येयान् पाणगणांश्च धिकते । धित फेर्नु फेरिणः सुतस्य कृशानरचय स्थञ्च धिक ते॥ २२ ॥ इति श्री कर्णपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये अष्टपष्टोऽध्यायः ॥ ६८ ॥ सअप उवाच । गुधिष्टिरेणवमुकः कौन्तेयः श्वेतपादनः । मसिं जग्राह संकुलो जिघांसभरतमम् ॥ १॥ तस्य फाप समुद्धीक्ष्य चिन: केशवस्तदा । उयाच कि मिदं पाथ गृहीतः बड्ग प्रत्युत ॥ २ ॥ नहि पश्यामि योदव्य रघया किभिनय। ते प्रस्ता धारााहि भीमसमेन धीमता ॥३॥ अपयातोऽसि फौम्तेय राजा द्रय गाण्डीव धनुपको और तेरे मुनालको धिक्कार है और तेरे असंख्य वाणों कोभी | धिक्कार है और हनुमान रूप धारण करनेवाली री ध्वजाको भी विकार और भग्निके दियेहुये तेरे रथ को धिक्कार है २२ ।। maavarao- अध्याय ७० ॥ सन्जय बोले कि हे भरतर्षभ युधिष्टिर के इन वाणरूप निन्दित वाक्योंको सुनकर महाको रूप होकर कुन्ती के पुत्र अर्जुनने मारनेकी इच्छा करके हाथमें खड्गको लिया। १। तय अन्तर्यामा सब के पनकी जाननेवाळे श्रीकृष्णजी ने | उसके क्रोधको देखकर कहा कि हे अर्जुन यह क्या बात है जो खड्गको हाय | में लिया हे अर्जुन तुझ के लड़ने के योग्य मैं किसी को नहीं देखताहूं बुद्धिमान भमासेन ने उन धृतराष्ट्र के पुत्रोंको घेरालियाहै । ३ । राजा को देखने के लिये स the fifth month an abortion than to have thus come back from battle. Fie on the Gandıy, fio on the strength of your arms, fiu on thy banner having the gigantic ap on it and fie on the car given by Agni."22. CHAPTER LXIX Sanjaya said, " On bearing the insulting language of Yudhishthir, arjun drew up his sword in order to slay him. Then Shri Kristo who knew what passed within the mind of all persons, sceing him enraged, thus addressed Arjuv, "Wby hare you taken up your . कर्णपर्व Karaa ary 6613 इत्याप । सगजा भवता बरः कुशली च युधिष्ठिर ॥ ४॥ स दृष्ट्वा नृपशाईलं शार्दूलसमषिकपम् । हर्षकाले च संप्राप्ते किमिद माहकारितम् ॥५॥ न पश्यामि कौन्तय पस्ते पध्यो भविष्यति । प्रहर्तुमिच्छसे कस्मात् किं पाते चित्तषिनमः ।।६। कस्माद्भवान् महाखड्ग परिगृहणाति सत्परः । ततयां पृच्छामि कौन्तेय किमिदं ते चिफीवितम् । परामृशसि यत यः पमतविक्रम ॥ ७॥ पधमतरतु कृष्णेन प्रेक्ष्य 'माण युधिष्ठिरम् । अर्जुनः प्राह गार्दिद कुवःसर्प इव श्वसन ॥ ८॥ अन्यस्मै देहि गा| ण्डाधिमिति मां पोऽभिवादेयत् । छिन्द्यामहं तस्य शिरः इत्युपांशुव्रतं मम ।। ९ ॥ तदुक्तं मम चानेन राशामितपराक्रम'। समक्षं तव गोविन्द न तत् क्षन्तुर्मिहोत्सहे, ॥१०॥ तस्मा देने वषिष्यामि राजानं धर्मभीरुकम् । प्रतिनांपालयिष्यामि त्वनेनर पद्धस हद आया? हे अर्जुन उस रानाको तुमने कुशल पूर्वक देखा । ४ । सो तुम उस राजाओं में श्रेष्ठ शार्दूलके समान 'पराक्रमी अपनेभाई राजा युधिष्टिरको देखकर और प्रसन्नताका समय वर्तमान हानेपरजो भूलसे यहकर्म होगया तो क्या हुआ। ५ । हे कुन्ती के पुत्र मैं ऐसा किसी को नहीं देखत्ताहूं जो तुझको मारने के योग्यहोय किस हेतु से तू महारकरना चाहताई तेरे चित्तकी भ्रान्ति क्याहै ।। सुम किस कारण शीघ्रतासे बड़े खड्ग को पकड़तेहो हे कुन्ती के पुत्र अब मैं तुम से पुछताहूं कि तेरी कौनसे कर्म करने की इच्छाहै गा महाक्रोधित होकर इस पड़ेभारी ग्वड्गको पकड़ताहै। 1फिर श्रीकृष्णजीके वचनों को मुनकर युधिष्ठिर को देखताहुआ सर्पके समान श्वासलेता क्रोध युक्त होकर अर्जुन श्रीगोविन्दजीसे योला। ८ । कि भाप इस गाण्डीव धनुष को किसी दूसरेको देदो जो मुझको इस शत्तिमे मेरणा करे, उसके शिरको काटूंगा । ९ । यहमेरा अपांशुव्रतहै अर्थात गुप्तवतह हेपतुलबल पराक्रमवाले गोविन्दजी जैसा कि इस राजाने आपके सम्मुखयुक से कहा उसके सहनेको मैं इस उत्साह नहीं करसक्ताई ।१०। इस हेतुसे उस धर्मसे sword, Arjun ? I see none hero to fight with you. Wise Bhimsen has assailed the song of Dhritrasbtra. You came here to see the king and you have seen him safe. You should be pleased . to seo your Valiant brother. What folly are your going to commit ?). I see aone that should be able to slay you. Whom are yon going to attack by your folly! Why havo you taken up your large sword ? What do you intend to do with this huge sword ?". Having heard the yords of Krisbn and looking towards Yudhisha thir with deep sighs Arjun said to Govind, "I shall cut off the hord of him who says that I should give up the Gandip bow to some one else, This is my secrot yow.. I can not bear the language used by the king. 10. I shall slay him to fulfil my yow and have .
6614) Slabalharab सत्तमम् ॥ ११ ॥ एतदयं मया खडगो. गृहीतो यदुनन्दन । सोऽहं युधिष्ठिरम हत्या सायस्थानृण्यतांगतः ॥ १२॥ विशोको विज्वरश्चापि नदिध्यामि जनार्दन ।। ११ ।। संचार मम्पसे सममास्मिन् काले समास्यते । त्वमस्य जगतस्तात घस्थ संगता गतम् । ततथा प्रकरिष्यामि यथा मां पक्ष्यसे भवान् ॥ १४ ॥ सन्जय उपाय। विधिवित्येव गोविन्दः पार्थमुक्त्वाप्रपाद पुनः॥ १५ ॥ कृष्ण उवाच । इदानींपाय मानामिन बाा सेवितास्त्वया। अकाले पुरुषव्याघ्र संरम्भं यद्भगनगात् ॥ १६ ॥ नदिधर्मविभागाः कुरादेयं. धमजय । पथावं पाण्यापेह धर्मभीरपण्डित ॥१७॥भकाम्यांणां क्रियाणाश्च संपोगः करोति थे। कार्याणामक्रियाणा स पार्य पुरुषाधमः ॥ १८॥ मनुषस्य तु पे धर्म कथपेयुरुपस्थिताः। समासविस्तरधिदा म पबिपनिधयम ॥ ११ ॥ मनिधपको हिरः कायाकार्यविनिमये। मषशो मुभते पाप पण स्वं मूदएष तु ॥२०॥ न हि कामकाप्पै बास बातुं कपाचन। भयभीत राजाको मागा इस नरोत्तम को मारकर अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करंगा । ११ । यदुनन्दन ने इसी निमित्त खड्गको पकड़ाहै हे जनाईनजी सो में | धिष्ठिरको मारकर सत्यसंकल्प होकर शोक और ज्वरसे निवत्त होऊंगा । १३ । अथवा ऐसे समपके वर्तमान होनेपर आप क्या सचित आमा देते हैं जिसको में योग्य समझ कर कहे जगतपिता और सब की गति मैं आपकी नो आमा होगी उसीको करूंगा। १४ । संजय बोले कि इस घातको सुनकर गोविन्दनी ने घड़ी चिकारियां देकर भर्जुन से कहा । १५ । हे अर्जुन मैं निधय जानताई कि तुमने वृद्ध लोगों का सेवन नहीं कियाहै. पुरुषाचम जा. तुमको मोघहुआया क्रोध समपके समान नहीं है ।१६।हेअर्जुन धर्मके प्रकारों का ज्ञातापुरुप ऐसा नहीं | करसता जैसेकि भव यहाँ तुमधर्मसे भयभीतहोकर निर्बुद्धिसहोरहहो।१७॥जो मनुष्य | करने क अयोग्य कमों को भौर योग्य कर्मों को एककरताहै हे अर्जुन यह अधम परुप कहानाताई । १८ । पपिडत लोग जो धर्मपर आरूढ़ होकर विधानकरते उसको तुम नहीं मानते । १९ । अर्जुन योग्यायोग्य कमाके निपश्य में हड़ता रखनेवाला मनप्प विवशहोकर ऐसाही मनानी संभालाहै जैसे कि तुम होगयो । २० । उचित और मनुचित कर्म किसीमकारसे भी मानन्द पूर्वक मानने के Torelord sized thosrørd. Hy sagor and ros sill be satilod by laying him, labail however act upon your advioe, for you aro tbo fatbor And rolugo nf the world." Sanjaya said that Govind, on hoaring tbone rurds, repronched Arjun. 15. He said, " I know for certain that you are ruilo to your elders. Your anger is out of placa. No virtuous inan will do so, Howho mixes deeds and misdeeds i: very lon ia tho scalo ot being. You do not knoty the ways of tho virtuoue. bo wbo mires donds and misdeede, bocomes a fool like you. It is bard" to know tbo propriety and otherwise of things All the religious sorge arn Pardy (6615) भ्रतेन ज्ञायते स तच्च व नावबुध्यसे ॥ २१ ॥ अविनानाद्वान् पच्च धर्म रक्षति धर्मवित् । प्राणिनां त्वं वधं पार्थ पार्मिको नापजसे ॥२२ ।। प्राणिनामवधतात सर्वव्यायान्मतो मम । अनुता का पदेशाचं तु हिस्याव कथम्बन ॥ २३ ॥ स कथं मातरं ज्येष्ठं राजानं धर्मकोविदम । हम्बादाम रमेष्ठ माहतोन्यः पुमानिध ॥ २४ । मयुग्यमानस्य वधस्तथा पत्रोम भारत। एवं मुखस्य द्रवतः शरणचामिगतः ॥ २५ ॥ कवाजले अपनस्य प्रतिस्प हमेष बाधः पूज्यते सद्भिस्तम्ब सबै गुरी तष ॥२६ सपा बय ते पाप बामेष छत पुरा । तस्मादधर्म संयुकं मोदयात् कर्म न्यबस्यसि ॥२७॥ स गुरु पाकस्मात दन्तुकामोऽमि पाषसि । भसंप्रधार्य धर्माणां गति सूक्ष्मणां तुररथयाम् ॥ २८ ॥ धर्मरहस्पश तवं वक्ष्यामि पासष । यद्मयाज्य मीमोहि धर्मको पा युधिधिर ॥ २९॥ | अयोग्य नहीं है यह सब शास्त्र कहते हैं तुम उसका विचार नहीं करतेहो । २१ । तुम पूरे बुद्धिमान नहींहो जिस बुद्धिके द्वारा धर्मश होकर धर्मकी रक्षा करता है हे अर्जुन जो धर्मके अभ्यासी होकर भी पाप पुण्यकारी कर्म नहीं जानते हो ।२२। हे तात मावों का न मारनाही उत्तम धर्महै यह मेरा, मतई चाहै मिथ्या पचन किसी समय कहदे परन्तु हिंसा कभी न करे । २१ । सो, नरोत्तम तुम इस धर्म पंडित | होकर अपने बड़े भाई राजा युधिष्ठिर को कैसे मारने को महत्तहो जसे कि कोई साधारण मनुष्य होताहै । २४ । हे प्रशंसा देनेवाले सुन कि युद्ध न करनेवासे वा पुदसे मुखमोड़नेवाले वा भागनेवाले और घरमें भाथप सेनेवाले शभु अयषा हाय जोड़नेवाळे वा शरणागत और, मदोन्मत्तों के मारनेको उत्तमलोग नहीं प्रशंसा करते हैं वह सब गुण तेरे गुरुरूप बड़भाई युधिष्ठिर में हैं । २६ । हे अर्जुन पूर्व समय में तुमने बाल्यावस्था से ऐसा व्रत कियाथा इसीहेतुसे अपनी मानता करके अधर्म कर्म को निश्चय करत हो । २७ । हे भजुन धर्मोकी कठिनता से मिलनेवासी मूक्ष्मगति को अच्छे मकारसे धारण न करके तु किसहेनु से अपने गुरुरूप बड़े के मारनेकी छासे दौड़ता है। २८ । हे पांडव धर्मकी उस गुप्तवार्षा को तुमसे कहूंगा जिसको भाप्मजी या पांडव युधिष्ठिर । १९ । बिदुरजी और books say Bo, but you donot know this. 21. You are a fool as you know no distinction betwera right and wrong. One should trover injuro living beings, though one way təll a lie on cortait Orcasion, Why are you ready to atrike your elder brother like a vulgar fel!ax ! It is wrong to slay those who donot fight, who run away, take refuge, fupplicate and are nınd; yoor elder brother Yudhishtbit peassesses ali the good qualities. Your observed this votv in your younger days, but should not foolishly stick toit now. 27, Not knowing the subtle ways of dbarw, but are you going to attack your younger brother. I shall tell you the secret of dharm as dieclored by Bhism, (6616) Valabharat विधुरो पा तथा क्षता घुन्तीवापि यशस्विनी । ततं पक्ष्यामि तत्तन निघधि धनम्जय ॥३० सररय पचनं साप सापापित गरम । तनय मुदाय रस्प सरपम नधितम ॥ ३१ ॥ भवर सस्यमयकाय पान्यमन्तं मयेत् । यत्रानुतं भवेत् सत्य सांपञ्चापन सयेत् ॥ ३२ ॥ प्रणात्य चिया पक्तध्यमन्त मपेत् ! सर्वस्पस्पाप हारेच पसन्मनु भयर ॥ ३३ ॥ वियाहफाले रमिसंप्रयोगे प्राणायये सधनापहारे। पिनस्य चाय बनत पत गयान्ताम्पा मुरपातकानि ॥ ३४॥ तान्तं भवेत् सत्य पत्यचायनृतं भवेत् ॥ ३५ वादशं मन्यो पालो याप सत्यमनष्ठितम । सत्यानने पिनियत्य ततो गति धीवत् ॥ २६॥ किमाधय रुतः पुरषोऽपि मदायणः। ममध्न माप्नपात पुष्पं ग्लाफोग्यपधादिव ॥ ३७॥ फिमाधय्य पुनमो धर्मकामो पदामिनीकुन्तीने कराया भनुन इसको मूगसमत कहूंगा तुम मित्तमेमुनना।३०।सत्य सोखनेवाला साधुह सत्य से अच्छी कोई चीज नहीं है बड़े दाम से जाननेक योग्य भम्पास करीई सत्यताको मूलसमेत देसो॥३१॥ सत्यताकहनेक योग्यनहीं होती है परन्तु गरसत्यनामें मिथ्या पनरोताह तवह सत्यताभी मिथ्या कहने योग्य होती। विवााके समप वाविषयभोग करने के समय पाप्राणोंके नाश वासयपनके चौराहोंने मेंशारनामणके मनोरथसिद्धहोंने मिथ्या बोलना इनपांचों स्थानों मिथ्या बोलनेका कोहपापनहीं होताह सरधन के चुरापजाने मिथ्यावालना योग्यहोताहै ऐसे स्थानमें गत्यामध्यारोताई।३५। गुद्धिमान सावधानपुरुष इसरीतिसेदेखताह अभ्यासकरीही सत्यताको देखो कि सत्यता दोपलगाने के योग्य है भार अभ्यास करीहुई फहने के योग्य नहीं प्रथम सत्य और मिध्याको अच्छी रीति से जानकर निश्चय धर्म या ज्ञाताहोता है। क्या अनुत कर्म देखने में आता कि बहामानी मनुष्य भी पहन बड़े पुण्य को भपकारीकमरे ऐसे मात करता ।सेक पलार नाम पधिरुन न्याय के मारडालने से पुगपमाप्त किया Yudhishdhir, Vidur and funti, 31. Truth is the best of virtuer, though it in hard to practice. Thith miris with falschool turns intu tia latter. It is allowable to tell lic in the nuatur of marriage women. life an deitth and when all the sealth is at stalo a voll as fervite paal vf Bralıtun& It is good to tell a liu when you are ia langer or lowing all your wealth. 35. A wiss and learnal wan shriathlepak after distinguishing between truth and untruth. It Awuraler thats wixinin tang obtain grut incrit ly doing a crueldadas (ell to the lot of a hunis, saun Bilak, by saying a tiger. Tbs.. in no wor, if a luxlish Inan, Suning to practise dhiario should Cuturritting rearrin liks Kaushik living by thesitoot a tirer." A. unitel Krilbatotelthin all aheat Biak and Kaushik ail. Thers rnshunter, named Balat in thedayaal yore (66171 ग F ---- का Karan Partv पण्डितः । सुमान प्राप्नुयात् पापमापगाधिय कौशिकः ॥ ३८ ॥ अर्जुन उवाच । नाचक्ष्व भगवनेतत् यया विन्द्यावई तथा । यमाकस्यामि सम्बन्ध नदीनां कौशि सस्प ॥ ३९ ॥ धासदेव उवाच म्याधिो भयत् फाधित् पलाको नाप भारत। शाार्थ पुपदारस्प मृगान् शान्त ने कामतः ॥ ४०॥ वृशेव मातापितरी विभय गाध संधितान् । स्वधर्मागरतो निस्य मत्यवागनमयका ४१ ॥ स कदाचिन्मृगंलि माभ्यापद्यत प्रयनवार । अप: पियात दहश बाप माणघम् ॥ ४२ ॥ यह पूर्वमा तत् सत्व तेन हतं तदा । अन्धे हते तो योम्नः पुमय पपात च ॥ ४३ ।। असगेगौतानि नास्तिश्च मनापम् । विमानमागत् सत् मृगम्याध निनीयया ॥ तद्वत सपंभूताना मभावाय फिलार्जुन । तपस्तप्त्वा पर मतं कृतमाघं रपयम्भुषा ॥ ४५ ॥ तस्त्या सर्वभूताग मभाषतनिश्चम तो पलाकः स्वागाधर्मः मुटु फिर पा माश्चर्य है कि अज्ञानो भोर मूर्ख धर्मका अभिलापी पुरुप बहुत बड़े पापका प्राप्तकरे जैसे कि नदियों के सभीप कौशिकने प्राप्त किगाथा । ३८ । अर्जुन चोले हे श्रीकृष्णजी इस पलाकनदी और कौशिक संवधी कथाको ऐसे विचार से काहय जिस में मैं समझं । ३० । वासु. देवजी बोले हे भरतवंशी पूर्ण समप में पलाकनाम एक यधिक हुआ वह सदैव अपने स्त्री पुत्रादिकों के पोपणके अर्थ मृगों को माराकरताया अपनी इच्छासे नहीं | मारताया। ४० । अपने दृद्ध माता पिता और अन्य माश्रित लोगों की पालना करताथा भार अपने धर्म में मातवान होकर सत्यवत्ता और किसीके गुणमें दोप नहीं लगाताथा । ४१ । एक समय उत मृगाकांक्षीको कोई मृग नहीं मिला तब बहुत खोग करते २ एक जक पावाहुमा नाकही जिसकी नेत्र रूप था ऐसे मापद व्याघ्र को उसने देखा । ४२ । ऐसे रूपका जीव उसने पहले नहीं देखाया इसी हेतुले उसको भी अपूर्व दर्शन नानकर मारा उस भन्थे भापद के मारनेपर भाकाश से पुष्पों की वर्षा हुई। ४३ । भौर उचमगीत वाद्यासमेत असरा नाची और उस पधिक लेजानेकोलय वर्ग से विमान आया।४४ हेअर्जुन निषय करके रस वापरजीव ने सय जीवों के नाशके लिये तपस्याफरक परदानायाया इसीसे माजीने उसका अन्धाकरदिया । १५ । सवजीवों के नाशमें निश्चय करनेवाले killod deer to feed lin wito und whildroa und not for the sake of pleasuro. 40. Ho fed his agud parents and retainers and passed a life of truth and vrtua novar fading fault in the good qualition of Othere, Ono day he found no game and while lio was in search of it, he came upon a least of prey who had his nose to suyply the defect of He bad never seen such an animal before but he kleur him at once. At the death of that animal & shower of Howevs fell down from the sky; tho apsaras sang and danced and a celestial car canie down from beaven to receive the buster. The boast of prey had got isܨܐ eyes.
6622) Slabal barát संध। पश्चाच्चा मतपुषेण धीर शरैश ताड़ितोऽयुध्यमानः ॥ ७६ ॥ मतस्यतन सरोपमुको दुःखान्वितेनेदमयुक्तरूपम् । माकोपितोहष पदि स्म सस्य कर्ण निहन्या दिति जानधीत्वाम् ॥ ७७ ।। जानाति तं पाण्डय एष चापि पापं लांघ कर्णमतल मन्यः । तठस्वमुको भृशराषितेन राजा समक्षं परुषाणि पार्थ ॥ ७८ ॥ नित्यो पृक्ते सततम्चाप्रसो का त छद्य रणे नियम । तस्मिन् हते कुरषो निम्तिाः स्युरेय बुद्धिः पार्पिवे धर्मपुत्रे ॥ ७९ ॥ ततो वध नाईति धर्मपुत्रसषया प्रतिमान पाननीया । जीवनयं येन मुनो भद्धि तन्मे निवोधेद तथानुरूपम् ॥ ८॥ पदा मान लभते माननाईस्तदा सवै जीपति जीवलोके । यदायमान लभते महा तदा मीदमित इत्युपते सः । ८१ ॥ सम्मानितः पार्थियोऽयं सदेव रखया व भीमन तथा पमाभ्याम् । प्रदेश लोके पुरुपैश्च रैस्तस्यापमान कलया प्रयुष ॥ ८२ ॥ सिराना युधिष्ठिर महापायल दुःखी थकावटसे युक्त वारंवारयुद्ध करनेमें कणकेवाकोस विदीर्ण होगया है । ७६ ! इस हेनुसे इसने महादुखी होकर ऐसे अयोग्य वरन तुमसे कहे जिससे कि तुम क्रोड्ययुक्त होकर युद्धमें कर्णको मारो इसी कारण से वारस्वार तुझमें क्रोध बढ़ाने के लिये कहा कि तू युद्धमें क्रोधरूप होकर कर्णको मारे । ७५ । यह युधिष्ठिर भी इस लोक में उस पापी कर्णके समान अथवा | उसके सम्मुखता करनेवाला तेरे सिवाय किसी दूसरेको नहीं समझवारे भर्जुन | इसी हेतुसे मेरे सम्मुख अत्यन्त कोषयुक्त होकर राजानेतुमसे यहकगेर वचन कहे? । १८ । युद्धमें सदैव सनद दूसरे के सहनेको अयोग्य कर्णमही अब युद्ध रूपी पूत बांधागोह उसांके मरनेपर कोरब लोग विजयहोंगे ऐसांपाद रामा युधिष्ठिर में है । ७९ । इस कारण से धर्मपुत्र युधिष्ठिर मारने के योग्य नहीं हे मर्जुन तुझको अपने प्रणको पूरा करना योग्य है और अपनेयोग्य उस पातको त्युझसे सममें जिससे कि यह जीवता हुआ भी मृतक के समान होनाप । ८० । जब प्रतिष्ठा के योग्य मनुप्यको प्रतिष्ठा मातहोतीहै तभी वह इसनीय लोकमें जीवता | रहताहै मार गवतिष्ठितपुरुप अपमानको पाताद तवयह जीवताहुआभक्तिककेसमान यहकहाजातीहाराजायुधिधिष्ठिरसदैवरो भीमसेन नकुल सहदेव और तुझस मच्छी नसे प्रतिष्ठा कियागपाहै और लोकमें दृद वाशूरवीरलोगोंनेभी इसकीमतिष्ठाकोरे इसीमकार तुममी वातों कही द्वारा इसका अपमान करो ।।२। हेकुन्तीके बेटे उसके tbus propared you to slay Karan. Yudhishthir too, thinks that none or ropt you can cope with Karan, and therefore he used thoso barab yorda The game of battle lias Karan for its stake : Yudhishthit thicks that the Kauravas, pould losa at the death of Karan. Yudbishthir the just does not merit death. You should keep your vox. Isball direct you to say to him words that rould kill him whilo alive. 80, man is alire as long as ho is respected by the world; ho is liko ono dead as soon as bo loses respect. Yudhishthir has over beon, respected (६६२१) कणपर्व Karan Parav 16623 एवमानर कोन्तेय धर्मराज युधिष्ठिरे। अधर्मयुक्तं संयोगंकुरुप्येषं कुरुवह॥८॥अथवा गिरसी श्रेया श्रुतीनामुत्तमा श्रुतिः। अविचावकार्येषा अयस्कामैनरैः सदा ॥४॥ अवधेन पयःप्रोक्तो यद्गुरुस्त्वमिति प्रभः.तद्वद्धि त्वं यन्मयोक्तं धर्मराजस्य धर्मवित ५ ८५ ॥ यथं धयं पाण्डव धर्मराजस्त्वत्तो युक्तं घेत्स्यते चैवमेपः । ततोऽस्य पादायमियाय पश्चात् समं ब्रूयाः सान्त्वीयत्वा च पार्थम् ॥ ८७ ॥ भ्राता मास्तव कोपं न जातु कुर्याद्राजा कश्चन पाण्डवेयः । मुक्तोऽनृतात् भ्रातृवधाच्च पार्थ दृष्ट कर्ण रवं जहि मूतपमम् ॥ ८७ ॥ इति श्री कर्णपर्वणि कृष्णार्जुन संवादे एकोनसप्ततितमोध्यायः ॥६९ | साथ ऐसा कर्म करके अधर्मयुक्त कर्म को कर । ८३ । यह अथवा ङ्गिरसी नाम श्रति है कल्याणके चाहनेपाळे पुरुषों को सदैव इस श्रुतिको काममें लाना योग्य है पही विनामार हुये मारना कहा जाता है और यही समर्थ गुरुतम कहाजीता है हे | धर्मशं तुम इस मेरे कहेहुये वचनको धर्मराज से कहो । ८५ । हे पाण्डव यह धर्मराज तेरे हायसे इसरोतिपर मरनेको अयोग्यजानताहै इसके पीछे इसके चरणोंको दवा करके बड़े मीठे वचनों से इससे शुभचिन्तकता की बातें कहो । ६६ । बुद्धिमान | तेराभाई राजा युधिष्ठिरभी धर्म को विचारकर फिर कभी तुझपर क्रोध न करेगा हे अर्जुन भाई के मिथ्या मारनेसे अलग होकर तुम बड़ेहपसे युक्तहोके इसमूत के | पुत्र कर्णको मारो ८७ ।। by Bhim, Nakul, Sabader and you as well as by the great warriors of the world; but you may insult him though the thing is improper. Peoplo desirous of their welfare should keep the hymn of Athartang. iras in view. It will be a death in life to Yudhishthir, if you say to him the words as I shall instruct yoư. Having said those worda, you may conciliate him by falling at his feet and speaking to him Sweet words: Your brother too, who knows dharm; will not be you will scape from the sin of sleying him:" 87: angry with and you n (6626) Mahabharat (६६२६) ऐवं यन्मा याग्यिशिखन हसि त्यत्तः मुखत घयं विन किञ्चित् ॥१३॥ मामाघमरयो द्रौपदीतहासस्थो महारथान प्रतिष्ठन्मि स्थदथें । तेनाधिशङ्की भारत निष्दुरोऽसि रयत मुखं नाभिजामानि किचित् ॥ १४॥ प्रोक्त स्वयं सत्यसन मृत्युस्तव मियाय नरदेव युद्ध । धीरः शिखण्डी दीपदीऽसौ महामा मयाभिगुप्तन हतश्च तेन ।। १५ । न चाभिनन्दामि साधिराज्य यत त्यमक्षेश्वहिताय सचः । स्वयं कृपा पापमनाय्यंजुष्ट मस्माभिधं तत्तमिच्छस्परस्त्वम् १६ ॥ अक्षेपुदोषा पहषो विधर्माः श्रुतास्वया सहदेवोऽनयाद्यान् । तापित्य त्यतुमसाधुजष्टांम्तेन स्म स निरयं प्रपत्राः ॥ १७ ॥ सुखं वो नामिजानीम फिञ्चितस्यापितु संप्रघुचः । स्वयं मया व्यसनं पाण्डव त्वं भूयस्तीक्ष्णाः श्रावयस्यद्य पाचः॥ १८॥ शेतऽस्माभिहिता धु चित्तका प्रियकरनेको सदैव प्रयत्न रहताहूं इसपरभी जो तू मुझको वचनरूपी धाणों से भेदकर मारता है हम तुझसे उस मुखको महीं जानते । १३ । तू द्रौपदी की | शय्यापर नियत होकर मेरा अपमान मतकर मैं तेरेही निमित्त महारथियोंको भारताई हे भरतवंशी इस हेतुसे तुम शंकाकरने वाले होकर महानिप्र महतिहो मैंने तुम से कभी मुखको नहींपाया । १४ हं नरदेव युद्धमें सत्य संकल्प भीमजी ने अपनेआप (तेरेही अभीष्ट के लिये अपनी मृत्युको तुझसे कहा द्रुपदका पुत्र शिखंडीवीर महात्मा है उसीने पर आश्रय में होकर उनको मारा । १५ । जोकि तुम पाशोंकी बाजी में कार्यों के विगाने में महत्तहुये इस हेतुसे मैं तेरे राज्यकी प्रशंसा नहीं करताहूं तुम नीचों से सेवित अपने माप पापोंको करके, इमार द्वारा शत्रुओंको विजय करना चाहतेहो । १६ । नुपने पांशोंकी बाजी में धर्मके विपरीत बहुससे दोपोंको जिनको | कि सहदेवने वर्णन किया तुम नाचोंसे सेवित उन दोपों के त्याग करनेकी sur नहीं करतेहो इसी कारणसे हम सब दुःखों में पड़ेहुये हैं। १७ । किसी भकारकाभी सख तुम से हमको नहीं हुआ स्पोकि तुम पाशों के खेल में बड़े मतवालही हे पायडर तुम भाप दुःखको उत्पभ करकं अब इसको कठोर वचन मुनातहो । १८ prowess of Brahmans lies in words and that of kshatryas in aros You are strong only in words and know my prowoss In ever engaged, heart and soul, in doing you good, yet you always speak harsh words to me. You should josult mo no longer by lying on tbo bad of Draupadi. Islay warriors for your sake, but you are enreless and cruel. Trutblul Bhishm himself pointed you out the means of his death and Shiklardi el w bim with suy ausistance. Yau lust all in the genre of nice and therefore your career was not praiseworthy, You lose in gan.bling scd wish to win 8guin by our bavers, 16. Salader poioted out or any faults of dict, yet you did not abandon the wicked labit and thie w us all in difficulty. We beser received sby Lppipars from you, because you we wid alter dice, Having F ६.६६२७) कर्णपर्व Karan Pary 36271 सेना निर्मात्रमितले नदन्ती । त्वयाहि तत् फर्म कृत नृशंस यस्माहापः कीरवाणां वघचाहताउदीध्या निहताप्रतीच्या नष्पाः प्राच्या दाक्षिणात्या विशस्ताः । रुतक मांप्रतिस्पं महद्भिस्तेषां पौधेरस्मविश्वयुवं॥२०॥ यंदयितात्वत्कृत गज्यनाशस्त्वत्स म्भवं नो प्यसनं नरेन्द्र । मास्मान् वाकप्रतोदेस्तुदस्त्वं भूयो राजन् कोपयस्त्यल्प भाग्यः ॥ २१ ॥ सञ्जय उवाच । एना वाचः परुषाः सव्यसाची स्थिरमशः श्राव यियातिरक्षा । बभूवासी विमना धर्मभीरुः कृत्या माशः पातक किश्चिदयम् ॥ २२ ॥ ततोऽनुतेपे सुरराजपत्री यिनिश्वसचाप्यसिमुदवई । तमाह कृष्ण किमिद पुनर्भधान विफोपमाकाशनिभं करोत्यसिम् ॥ २३ ॥ प्रवीहि मा त्व पुनरुत्तरं धचस्तपा प्रव- क्ष्याम्महमर्थसिद्धये । इत्येवमुकः पुरुषोत्तमेन मुदुःखितः केशवमर्जुनोऽब्रवीत् ॥ २४ ॥ हमारे हायसे अंगभंगमारी हुई शत्रओंकी सेना पृथ्वीपर सोतीहुई पुकारती है तुमने ऐमा निहयकर्म किया जिसके दोपसे कोरवों का मरण उत्पन्न हुआ। १९ । उत्तर के रहनेवाल मारे पश्चिमी लोगोंका नाशकिया और पूर्वी वादांक्षणी मागय युद्धमें हमारे और उनके शूरवीरों ने यह अपूर्व और मद्भुतकर्म किया। २० । तुम चूतके खेलनेवाले हा तुम्हारेही कारण से राज्यका नाशहुमा हे नरेन्द्र हमारा दुःख तुझसे पैदा होनेवाला है हे राजा हम लोगों को वचनरूपी चायुकों से पीड़ा देनेवाले तुम दुर्भाग। फिर इमको भोधयुक्त मत करना । २१ । संजय बोले कि वह स्थिरबि धर्म से भयभीत महाज्ञानी अर्जुन इन कठोर अप्रतिष्ठित वचनों को मुनाकर कुछ पाप किया हुमा समझ कर उदास होगया यह इन्दकापुत्र पारम्बार सासलेताहमा पाछेसे माहादुसी हुआ और फिर खड्गको निकाल लिया तव श्रीकृष्णनी बोले आप इस आकाशरूप खड्सको फिरकिस निमित्त म्यानेस अलग करतेहो । २३॥ इसका हमको उत्तर दोगे तब मैं तुम्हारे कल्याण और प्रयोजन के सिद्ध होनेको | कुछ कहूंगा पुरुषोत्तमजी के इसवचनको मुनकर अर्जुन बड़ा दुखी होकर केशवनी से बोला कि जो मैंने अप्रियरूपी पापकर्म किया है इससे अपने शरीर को नाश करूंगा धर्मधारियों में श्रेष्ठ श्रीकृष्णजी अर्जुन के इस वचनको सुनकर पहरपन youself created affiicultees you speak harsh words to me the Kaurav warriors, slain by us, are lying dead on the ground, Al this destruction has been caused by your own lault, The Warriand both wonderful deeds of bravery in gene the armies of the four quarters, 20. You lost the kingdom i ke game of dico and caused us grief. You should peyor smart us by his whip of your tannts. " Sanjaya said, " Having said those irá of cruel taunts, Arjun besame silent and dejected. Sighing gu sad agaio ho became very, sorrowfal and drew out his sword sagthis, Shri Krishn asked him the reason of again taking out theksord, saying {b'at on hearing bimble would advise biter for his good dicis Arjan' said sides have done (6628) Mahabharat [६६२८) अहं दनिये सारीमेय प्रसख येनाहितमाचरं । निशाम्य तत् पायचोऽबीदिद धनजयं धर्मभृतां पारष्ठः ॥ २५ ॥ राजानमेन त्वमितीदमुफ्वा कि करमलं प्राषिशः पार्थ घोरम् । त्याञ्चामानं हन्तुमिच्छस्मारिन नेदं सद्भिः सेवितं फिरी टिन । २६ ॥ धर्मात्मानं घातयं ज्येष्ठमध खड्गेन गं यदि हन्या नृवीर धर्मा दोतस्तत् फयं नाम ते स्यात् सिम्वोतरं घाफरिप्तस्त्यमेव ॥ २७ ॥ मुभमो धर्मों दुर्विदश्चापि पार्थ विशेषतोऽशः प्रोच्यमान नियोध। हत्वात्मानमारमनत प्राप्नुयास पधावातुनरफञ्चातिधोरम् ॥ २८ । प्रधीशियाचाच गुणानिहात्मनस्तया इतात्मा भपितासि पार्थ पचास्तु रुप्पोत्यभिनन्ध ताचो धनन्जयःपार धनुर्घिनाम्य ॥ २९ ॥ युधिष्ठिर धर्मभृतां वरिष्ठं भ्रगुप्प राजनिति शासनः । न मादृशोन्पो नरदेष विद्यते धनुदंरो देवमृते पिनाकिनम ॥ ३० ॥ अहं हितनानुमतो महात्मना क्षणेन न्यो वाने कि । २५ । हे अर्जुग तुम इस रागा से ऐस. वचन कहकर घोर दुख में क्यों महत्तहुये हे शत्रुओं के मारनेवाले अर्जुन जोतुम अपघात करना चाहतहो यह कर्म सत्पुरुषों का नहीं है । २६ । हे नरवार जो तुम भव इस धर्मात्मा बड़े भाईको खड्ग से मारोगे तो तुम धर्मसे डरने वालेकी कीचि किस प्रकारकी होगी इसका तुम क्या उचर दोगे । २७ । हे अर्जुन धर्ष बड़ा सूक्ष्म होकर कठिनता से जानने के योग्यहै तुम बड़े बुद्धिमानों के कहे ये धर्मको समझा तुम आप अपना अपघात करके वा भाई के मारने से महाघोर नरक में पड़ोगे । २८ । हे अर्जुन अब तुम यहां अपने वचनस अपनेही गुणोंको वर्णन करो जिससेकि तुम हतारमा होजाओ इस वचनको इन्द्र के पुत्र अर्जुन ने पसन्द किया हं श्रीकृष्णजी ऐसाहीहो ।२९॥ फिर धनुप को चलाकर धर्मधारियों में श्रेप्ड युधिष्ठिर से बोला कि राजा सुनो कि महादेवजी के सिवाय मुझसा धनुषधारी कोई नहीं है । ३० मैं तुझ महात्मा की भाज्ञासे एक क्षणभरही सब स्थावर जंगमजीवों समेत संसारभरेको मारसक्ताई हे राजा मैंने दिपालों समेत सय दिशामों को बिनय करके तेरे माधीनकर दो ॥ ३१ । वह पूर्ण दक्षिणायुक्त राजमूपपक्ष और आपकी वह दिव्यसमा मेरेही परा- कम से हुई और मेरे हाथों में तीक्ष्णधारवाले वाण और पागोंसे युक्त प्रपंचावाला to Krisha very sorrowfully, " Baring committed this beinous sin, I wish to commit suicide." Shri Krishu said, " Why did you say such tarala words to the king. Your attempt to commit suicide is not good. If you will slay your clder brother, you will commit tin. Dharm is very subtle and hard to knos. You will fall into hell, if you your brother and commit suicide. You nust spenk out your own praiso so that you may inortiſy your own rul. "Arjun urprored this method and banding his bov, ho said to Yodhishthir, "I baro no equal among ths wariors, axceps Mahadev. 30. By your 'pæmission, I can destroy all the morables and immoroblcs of the कर्णपर्ष arn Paray (6629) सबराबरंगत मवादिराजन सदिंगीश्वरा दिशो विजिप सर्षा भषतः कृता पशे ॥ ३१ ॥ स राजसूयक्ष समाप्तदक्षिणः सभा व दिव्या .मघतो ममोजसा। पाणी पृषत्का निशिता ममेव धनुश्च सज्यं घिहित सयाणम् ॥ ३२ ॥ पादौ च मे सरथी सध्या च म मारशं युद्धगत जयन्ति । हता उदीच्या निहताः प्रतीच्या: प्राध्या मिरस्ता दाक्षिणात्या विशस्ताः ॥ ३३ ॥ संतप्तकानां किनिदेवावीशर्ष संघस्य सैन्यस्यहत मयाम् । शेतमया निहता भारतीया चमूराजन देवच प्रकाशा ॥ ये बास्त्रनास्तान हन्मि घास्त्रस्तस्माल्लोकान्नेह करोमि भस्मसात् । बिरयं भीममास्थाय कृष्ण याषः शीघ्र सूतपुत्रं निहन्तुम ॥ ३५ ॥ राजा भयावर मुनिवृतोऽयं कर्ण रणे नाशयितारिम वाण ॥ ३६ ॥ भयापुत्रा स्तमाता भवित्री कुन्ती पायो मया था तेग वापि । सत्यं पदाम्बद्यन फर्णमाजी शरबत्या कर विमोये ॥ १७ ॥ सञ्जय उयाच । इत्येषमुक्त्वा पुनरेव पार्थो युधिष्ठिरं धर्मभृतां सम्बायमान धनुषहै । ३२ । और मेरेचरण स्थ और ध्वजा समेत हैं और युद्धमें वर्षमान होकर मुझको कोई शूरवीर विजप नहीं करसक्ता है मैंने पूर्वीय पचिनीय उत्तरीय और दक्षिणीय राजा लोगों को मारा । ३३ । संसप्तकों का कुछ शेष पाकी है इसरीतिसे सब सेनाका आधाभाग मार डाला हे राजा देवसेना के समान यह भरतवंशियों की सेना मेरे हायसेही मारी हुई पृथ्वीपर सोरही है। ३४ । जो अस्तों के माननेवाले हैं उनको मैं प्रसोंही से मारता हूं इसी हेतुसे यह प्रस्त्र लोकों के भस्म करनेवाले हैं हे श्रीकृष्णजी भयके उत्पन्न करने वाले इस विजयी स्थपर सपार होकर कर्ण के मारने को चलें। ३५ । अव यह राजा पुधिष्ठिर मुखी | होजाग में युद्धमें अपने वाणों से कर्ण को मारूंगा ऐसा कहकर अर्जुन ने धर्मधा रियोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर से यह ६धन कहा । ३६ । कि अब कर्ण की माता अपने पुत्र से रहित होगी अथवा कुन्ती मझ से पृथकहोगी मैं सत्य २ कहता हूं कि भन युद्धभूमि में कर्ण को पाणों से मारे विना मैं अपने कवचको नहीं उता कंगा। १७ । संजय बोले कि मर्जुनन युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर फिरभी शतको world. I conquered all the directions and brought them under your rule. The Rajsuya sacrifices with large donations, and the divine court house of yours were the results of my prowess. possess sharp arrows and long bow, and when I am seated on my bannered car no warrior can overcome me. I slew the warriors of East, West, North and South. A small portion of the Sansaptaks remains, I have slain early balf the Kaurav army. Tho godlike army of the Kauravas, slain by me, lies on the field of battle. I slay skilful warriors with my wear pons which can destroy the world, Leb Suri Krishn ride the doarful car to slay Karan. 35, Let king Yudhishthir be cheerfu. | for, with my, arrows, I shall slay Karan." Haring said this, Arjun I ॥ (6630) Mahabharat [११० वरिष्ठम् । विमुच्य शस्त्राणिधनुर्विसृजय कोषे च खड़ा घिनिधाय पूर्णम् ॥ ३८ . सब्रीड़या नम्रशिरा किरदी युधिष्ठिरं प्राञ्जलिरभ्युवाच। प्रसाद राजन क्षमयर मयोत कालेभवान् घेतस्थति तन्नपस्ते ॥ प्रसाद्य राजानममित्रसाद स्थितोऽनपछि पुनः प्रधीरः । नेदं चिरात् क्षिप्रामिदं भघिप्यत्याधतेऽसामिषामि चनम् ॥ ५ ॥ याम्पर भीम सनरात प्रमोक्षु सर्वात्मना मतपत्रच तुम् । तर प्रिपार्थ मम जीवितंहि प्रवीमि सत्यं तदवोदि राजन् ।। ४१ ॥ इति प्रयास्यन्नुपम पादौसमुत्थितो दीक्षतेजाः किरीदी ॥२ ॥ एतच्छ्रुत्वा पण्डको धर्मराजो भ्रातुन पापं फागुनस्य । उत्याप तस्माच्छयना दुवाच पार्थ ततो दुःखपर्यतचेताः ॥ १३ ॥ कृतं मपा पार्य यथा न साधु येन प्राप्तं व्यसनं वः . सुघोरम् । तस्माछिरविधि ममेवमय कुलान्तकस्याधमपूरुपस्य ॥ ४४॥ पापस्य पापव्यसना वितस्य धिमा पतार धनुष छोड़ बड़ी शीघ्रता से खड्ग को म्यानमें रखकर । १८ । बड़ी लग्जा से नीषा, शिरकिये हाथ जोड़कर अधिष्ठिर से कहा कि हे राजा प्रसन्न हूजिये भार मेरे कहेहुये को क्षमा करिये आप समय पाकर जानेंगे भव आपको नमस्कार है। ३९ । इस रीति से अप्रसन्न राजाको प्रसमकरके फिर यह वचन बोला कि इस कार्य में विलम्ब नहोगी बड़ी शीघ्रता पूर्वक यह कार्य होगा मैं इस लोटते हुये के सम्मुख जाता हूं । ४० । अव मैं सर्वात्मभाव से भीमसेनको युद्ध से छुटाने भौर कर्णको मारनेको जाताई मेरा जीवन केवल. आपके अभीष्ट के ही निमित्त है है राजा मैं आपसे सत्य २ कहताहूं आप मुझको प्रानादीजिये । ११ । यह कहकर बड़ा तेजस्वी अर्जुन चलने के समय भाई के चरणों को पकड़कर उठग । ४२ | फिर.पांडव धर्मराज ने अपने भाई अर्जुन के इस कठोर अयन को सुनकर महादुःखी हो अपने उस शयनस्थान से उठकर भर्जुनसे कहा । ४३ । हे भर्जुन मैंने वह महादुष्ट कर्म किया जिसके कारण तुमको ऐसा महापोर दुःखमाप्त हुमा इसकारण से मुझकुल के नाशक महापापी दुःखों से युक्त अज्ञानधुद्धि मानसी भयभीत वृद्धों के अपमान करनेवाले इस नीच पुरुपके शिरको काटडालो । ४४ । addressed Yudhishthir thu just, saying. “ Either .Karan's mother of Kupti will be childless today. I say truly that without slaying Karan I shall not put off my armonr." Having said this to Yudhib. thit, Arjen bid asido bis how and arrows and putting the spond into tho acabbard, hoshamefully cast down his head, and with joined palrs, he said to Yudhishthir," Be cheorful, king, and pardon ne. You will know all in time, I salute you. Thus cheering the dejected king, he again said, ul shall work with all possible haate. I am going away to encounter Karan who is returning.40. - Ianu going with all my heart to relieve Bhim and to slay Karan: 'I tell you truly, king, that I live for your sake, Now bloss me bolore I दो कर्णपर्व Karan l'arv 166311 रलसस्य भौरोः। वृद्धाबमन्तुः परुषस्थ चैध किन्वेचिरं मे धनुस्त्य भम् ॥ ४५ ॥ गच्छाम्यहं धनमेताच पापः सुखं भवान् वतां मविहीनः । योग्यो राजा भीमसेमो महारमा ल्फीवस्य पा मम किं राजकृत्यम ॥ ४६ ॥न चारिम शक्तः परुषाणि सोk पुनस्तमानि उपाधितस्य । भीमोस्तु राजा मम जीवितेन न काय्यमद्यायमतस्थ परि ॥ ४ ॥इतेऽधमुक्या सहसोत्पपात राजा ततस्तच्छयन विहाय । इयेष निगन्तुमको घनाय तं वासुदेवः प्रणतोऽभ्युवाच ॥४८॥ राजन विदितमेत यथा गाण्डीवधन्धनः प्रतिमा सत्यसन्यस्य गाण्डीवं प्रति विश्रुता ॥ ५९॥ याच एनं गाण्डीवं देखापस्मै स्वमित्युत । अध्योऽस्यस पुमाल्लोके त्यया चोत्तोऽपरिशम् ॥ ५० ॥ ततः सत्या प्रतितां तापाचन पूतिरक्षतामच्छन्दादधमानोऽयं कृतस्तव पहीपते। गुरुणामय मानोदि धारयभिधीयते॥५१॥तस्मात्वं वैमहावाहोमम पार्थस्य चोमयोः । व्यतिक्रममिभराज तेरे रूखे पचनोंके सुननेसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है अब मैं महापापी बनकेही माने के योग्यहूं मैं अवश्य वनहीको जाऊँगा और आप मुझसे पृथक् होकर मुखसे राज्य को करो महात्मा भीमसेन राजाहोनेके योग्य है मुझ नपुंसकका राज्य में क्योकाम है। ४३ । और तुन क्रोधयुक्त के इनकठोर वचनों के सहनेकोभी में समर्थ नहीं हूं हे वार मुम अपमानवाल के जीवन के कारण से फिर भीमसेन रामाकरने के योग्य न होगा। ४३ इस रीतिक वचनोंको कहकर राजा युधिष्ठिर अपने शयन स्थान को छोड़कर उछला और वनके जाने की इच्छाकरी तब तो वासुदेवजी ने बड़े ननहोकर युधिष्ठिरसे कहा । ४८ । हे राजा यह आप समझिये कि जैस सत्यमतिज्ञ गांडीच धनुपधारी की प्रतिमा मुनी गई प्राद जो कोई कि ऐसा कहै कि गांदीव धनुप दूसरे के देने के योग्य है यह पुरुपलोक ने उसके हाथ से | मारने के योग्य है और यह तुमने उससे कहा । ५०। इस हेतु से अर्जुन ने उस अपनी सत्य प्रतिज्ञाकी रक्षाकरी है हे राजा यह तेरा अपमान मेरी इच्छा से कियागया क्योंकि गुरुओं का अपमानही मारने के समान कहाजाता है । ५१ । Away." Having said thie, glorious Arjun touched the feet of his elder brother. Hearing the barsh words of Arjun, Yudhishthir with & dojected mind rose from his seat, and said, " I have done a heinous deed and thrown you into trouble. You may cut off my head, because I am the destroyer of my family, sinful, foolish, laty, terrified and rude towards my elders. I wish no more to hear your harsh words. I must go into exile. May you reign happily when 1 am gone. Mighty Bhim ja , fit to be a king; what have I to do with a kingdom as I am & cowardly man ? 46. I am upable to bear Bhim will pot reign as long as I am alive,". Having said this, Yudbrhthir jumped up from his seat and desired 10 RO to the forest. Then Vasudev bumbly said to:Yudhishthir: ycar harsh words, (6852) Mababbarat संसंरक्षाने प्रति ॥ ५१ ॥ शरणं त्या महाराज प्रपत्री र उभावपि । सन्तुमईलि मे रामन् प्रणतस्याभियाघः ॥ ५३ ॥ राधेयस्याच पापस्य भूमिः पास्पति गोणि तर । सस्य से प्रतिजानामि हतं विनयध सूतजम : पस्च्छसि घधं तस्य गत मप्पय जीवितम् ॥ ५४ ॥ इति रुग्णवचः श्रुत्वा धर्मरानो युधिष्ठिरः। ससम्मम हवीशमुस्याप्य प्रणतं तदा ॥ ५५ ॥ कृताञ्जलिस्ततो वाक्यमुषाचामन्तरं पण। परमेष वायत्वमस्त्वषोऽतिक्रमो मम ॥ ५६ ॥ भनुनीतोऽस्मि गोविन्द सारि तभास्मि माधष । मोमिता म्यसनायोगस्यमय श्याच्युत ॥ ५७ ॥ मषन्तं मायमालापवावा व्यसनसागरात योगदद्य समुत्तीणांबुभावहानमोरिती ॥५८॥ हे महाबाहो रामा युधिष्ठिर इस हेतु से सत्यकी रक्षा के निमित्त मेरी और अर्जुन की अनम्रताको भाप क्षमा कारेये। ५३ हे महाराज सम दोनों आपकी शरण वर्तमान राजा मुझ प्रणतरूप प्रार्थना करनवालेका अपराध क्षमाकरिये ।५।। अब पदवी उस पापत्मा कणके रुधिषको पानकरेगी यह मैं तुमसे सत्यप्रतिषा करताहूं कि भय तुम कर्णको मराहुआहे. जानो जिसको नू मारनाचाहता है अब वसको अवस्था जीवन की भी समाप्त हुई। ५४ । तर श्रीकृष्णजी के वचन को पुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने भ्रान्तीसे युक्त मुकहुये श्रीकृष्णजी को उठाकर । ५५ । हायजोड़कर श्रीकृष्णनी से,यह वचनकहा कि हे भीकृष्णजी जैसा मापन कहाहै पैसाही है । ५६ । कि इसमें मरी भमर्यादा होय हेमाधव गोविन्दनी में मापके समझाने से समझगयाहू हे अविनाशी अवहम तुम्हारे कारणसे घोर दुख से छूटे'। ५. । और अपनी अज्ञानतामे अचेत हम दोनों आपरूप स्वामीकोपाकर इस पाररूप दुःख समुद्र से पारहुये । ५८। हम सब अपने पन्त्रियों समेत प्रापकी पुद्धिरूपी नौकाको पाकरदुःख और शौकरूपी नदी से पारहुये हे अविनाशी हम • You know already the vow of the bearer of the Gandir that he would slag him who says to him to give up the bow to another, and you said this de has kept his word and insulted you by my instigation; for an insult to an elder is equal to slaying him. The rudeness was to keep the yow and therefore you will pardon mo and Arjun for the insulting language 52. Both of us are ready to obay you and ask your pardon The earth will now drink the blood of tricked Karan. You may taße bin up for dead on my word. H. whom you wish to slay, has bis days pumbred." Hearing the words of Krishn, Yudhishthir raised him up from the supplicatory position and with joined palaas, said, "You are right, Krishu. I under stand the meaning of Arjun's eonducts I am not free from anxiety and both of us are made happy by you. You are a boat to us for - कणपर्व Karan Paray (6633) स्वरिषमासाप दुःखशकार्णवाद्वयम् । समुच्चीणाः सहामात्याः सनापा कम इति भी कणपनि युधिष्टिरमबोधने सप्ततितमोध्यायः ॥ ७० ॥ सम्बन उवाच इति स्म कृष्णवचनात् प्रत्युच्चार्य युधितिरम् । पम्प विमनाः पार्थः किम्वरकरवेध पातकम् ॥ १ ॥ ततोऽमधीवामदेवः प्रहसायः पाण्डयम ॥ २ ॥ नाम भवदेतपदि त्वं पार्य धर्माजम् । मसिना तीक्ष्णधारण हत्या धौ म्पपस्थिमम् ॥ ३ ॥, स्वमित्युपस्वाथ राजानमे कश्मलमाविशः । हत्या तु नपति पार्य भकरिष्यः फिमुतरम् । एवं विदुर्षिदो धमों मन्दप्रोविशेशतः ॥ ४॥ समयाभू धर्ममीयात् भूवमेध्यमहत्तमः । नरकं घोररूपञ्च भ्रातुन्य तस्य यात् ॥ ५ ॥ सवं धर्मभृतांश्रेष्ठं राजानं धर्मसहितम् । प्रसादय कुरुश्रेष्ठमेत तुमसे सनाय ५९ ॥ अध्यायः ७१॥ संजय बोले कि अर्जुन इसरीतिसे श्रीकृष्णजी के वचन से युधिष्ठिर को कठोर वचन काकर उदास हुआ जैसे कि कुछ पापको करके उदास होते हैं तब इसतेहये वासदेवजी उस पाण्डवसे वोले । २। कि हे अर्जुन यह कैसे होसक्ता है जो उसधर्मनिष्ठ धर्मपुत्रको तीक्ष्णधारवाले खड्गसे मारे तुमराजासे यह कहकर एक पापमें पड़े। ।। हे अर्जुन रानाको मारकर पीछेसे तुम क्या करते इसतिसे | भल्स वुदियों बड़ी कठिनता पूर्वक धर्मजानने के योग्य है सो आपधर्मके भयसे बड़े भाई मारने के द्वारा बहुत बड़े धोर नरकमें अवश्य पढ़े। ५ । सो तुम धर्म crossing the ocean of anxiety and we find a protector in you." 59.. Paromo- CHAPTER I.XXI having asid barsh words to ľudbishtluir by the instigation of Krishni, Arjun slood dejected like one who has comunitted a sin. Then Vasudev said to him with a smile," How could you dare say to the king that you would cut off bis head? What would be your state after slaying bim. The ways of dharm are bard to know. You have committed á beinous ein by attempting the murder of your brothers (6634) Alanalharab दव मनं मम ॥ ६ ॥ प्रसाध भक्त्या राजानं प्रीते चैप युधिष्ठिरे। प्रवावस्त्वरितो पख मतपत्ररथ प्रति ॥ ७ ॥ हत्या तु समरं कर्ण समय निशितैः शरैः।' विपुलो प्रतिमाधास्यधर्मपुत्रस्य मानद ।८पता महापाहो प्राप्तकाल मतं मम। एवंकृते रुत उचैव तप कार्य भविष्यति ॥ ९॥ ततोऽर्जुनो महाराज लज्या पे समन्धितः । धर्म रापस्य चरणी प्रपद्य शिरसा नतः ॥ १० ॥ उवाच भरतभेष्ठं प्रसीदेति पुनः पनः । क्षमस्व राजन् पत् प्रोकं धर्मकामेण भीरुणा ॥ ११ ॥ सब्जय उवाच। दृष्ट्या तु पतितं पद्यां धर्मराजो युधिष्ठिरः। धनञ्जयमामित्रनं रुदन्तं मरयतंभ ॥ १२ ॥ उत्थाप्य भ्रातरं राजा धर्मराजो धनञ्जयम् । समाश्लिष्य च सस्नेह रोद महीपतिः॥ १३ ॥ रुदित्वा सुधिरं कालं भ्रातरी मुमहाती । कृतशोषी महाराज प्रीतिमन्ती यभूवतुः ॥१४॥ तत माश्लिष्य तं प्रेम्ना मूनि वाघ्राय पाण्डवः। प्रीत्या परमया युक्तः प्रस्मयंशाप्रयोज्जयम् ॥ १५ ॥ कर्णेन में महापारी संस | धारियोंमें श्रेष्ट धर्मकेसमूह कौरवों में श्रेष्ठ राजायुधिष्ठिरको प्रसन्नकरो यहीमेरा मतहै। ६ । अपनी भक्तिसे राजाको मसन्नकरो फिर उस युधिष्ठिर के प्रसन्न | होनेपर शीघही युद्धके निमित्त कर्णके रयके समीप चलेंगे। ७ । हे बड़ाई देनेवाले अब तुम युद्ध में अपने तीक्ष्णयारवाले वाणों से कर्णको मारकर धर्मरामकी बड़ी | प्रसन्नताको प्राप्त करो । ८ । हे महाबाहो यहां यह पा समयके अनुसारहे यह | मेरामतह ऐसा करनेपर तेराकियामा कार्य सिद्धहोगा । ९ । हे महाराज इसके पाछे लग्नायुक्त अर्जुन धर्मराज के दोनों चरणोंको पकड़कर शिरसे झगया ।१०। और उस भरतपम से वारम्बार विनयकरने लगा कि हेरामा जो मुझसन कामों से दरहुये ने आपके सम्मुख असभ्य वचन कहे उनको भाप क्षमाकारये 1 ११ । हे भरतर्षभ धृतराष्ट्र तव तो धर्मराज युधिष्ठिर ने उस शत्रुसंहारी रोबेहुपे और गिरेहुये अर्जुन को देखकर । ११ । उस संसारको लक्ष्मी के विजय करने वाले भाईको उठाकर पड़ी मीति से हृदयसे लगाकर अति रोदन किया। ।। हे महाराज वह महातेजस्सी शुद्ध भताकरणवाले दोनों भाई बहुत विलंबतक रोदन करके प्रसन्नहुये । १४ । फिर पाण्डव धर्मराज बड़े मेमसे मिल कर उसके मस्तक को मूष के बड़ी प्रातियुक्त मन्दमुसकान करते हुये उस बड़े धनुषधारी से बोले You must pleasu him by your respectful conduct and let us fight after pleasing him. You will please bim mors by slaying Karan with your arrows. Yon must do this now. Your good lies in doing so." Then Arjun held the feet of Yudhishthir with both his hands and laid bis head on them. 10. He said to him again and again to jarion him for the rudo words Secing Arjun fallen at his feet and weeping. Yudhishthir liſted him up and embraced bin, Both the brothers wopt long and were happy. Yudhishthir then Joyfally smolt Arjun's forehead and said,15. "Kuan the great archer go to (६६३५) कर्णपर्व.Karan Parv (6635) स्परूप पदपतः काचच यजम्य धनुः शाक्तयाः शराः । शरः कथा महेवास यतमानस्य संयुगे ॥ १७॥ सोऽमात्वा रणे तस्य कर्म सृष्ट्या घ फाल्गुम । म्यषसी दामि खनन मे जीवितं प्रियम् ॥ १८ ॥ न दद्य हितं धार निनिभ्यसि संपुगे । माणानेष परित्यक्ष जाषितार्थी हि को मम ।। १९ ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच विजयोभरतर्षः ॥ १०॥ सत्येन ते शपे राजत् प्रसादेन तव च । भीमेन , नरश्रेष्ठ पमापांच महीपते ॥ २१॥ यथा समरे कण हनिष्यामि इतोऽपि था। मही तले पतिष्यामि सत्वेनायुषमालमे ॥ २२॥ एपमाभाग्य राजानतग्रयोन्माधयं वचः। भय कर्ण र कृष्ण प्रदषिये न संशयः । तब वुद्ध्या हि भदेते पघातस्थ दुरात्मनः ॥ ५॥ एवमुक्तोऽप्रवीतू पार्थ केशवो राजससम शक्तोऽसि रतश्रेष्ठ हन्तुं कर्ण महापलम् ॥ २४॥ एष चापि हिम कामो नित्यमेध महाग्य । कथं भवामणे । १५ । हे महावाहो बड़े धनुपधारी कर्ण ने युद्ध में सब सेना क देखेत हुये मुझ उपाय करनेवाले को कवच, ध्वजा, धनुप, शक्ति घोड़े और वाणों को अपने वाणों से काटकर परामयाकिया । १७ । हे अर्जुन सो मैं युद्ध में उसको जानके और उसके कर्मको देखकर महादुःखी होताई और जो युद्धमें उस वार शत्रुको नहीं मारेगा तो मुझको जीवन प्यारा नगा । १८ । भाव अपने माणोंको त्यागकरूंगा फिर जीने से मेरा कोई प्रयोजन नहीं है भरतर्षभ इस | प्रकार के युधिष्ठिरके वचनों को मुनकर अर्जुनने उत्तरदिया। १० । हे नरोत्तम महाराज मैं भापकी सत्यता वा प्रसन्नता वा भीमसेन नकुळ और सहदेवकी शपथ करताई । २१ । मैं जिसमकारसे भव कर्णको मारूंगा वा भाप मरकर पृथ्वीपर गिरूंगा मैं सत्यतासे उसशस्त्रको माप्त करताहूं । २२ । ऐसा राजासे कहकर फिर | माधवजीसे बोला कि हे श्रीकृष्णजी अब मैं निस्संदेह युद्ध में कर्णको मारूंगा भाएका कल्याणहोप यहसव भापही के विचारसे है उस दुरात्माका मरणहोगा । २३ । हे राजाओं में श्रेष्ठ यहवचन सुनकर केशवजी अर्जुन से वोले हे भरतर्षभ तुम बड़े पराक्रमी होकर कर्ण के मारने को समर्थ हो । १४ । हे महारथी मेरीभी cut my armour, babaer, bow, spear, horses and arrowa with his own and vanquishod me. Seeing his prowess and having an experieace of him, I an much grieve d. My life will not be sweet to me as long as you donot slay him. Isball commit suicide." Having heard the words of Yudhishthir, Arjun said, " I swear by the truth and pleasure of yourself, Bhim Nakuland Sabader that either I shall slay. Karan or be slain by him. I hold my weapon for that purpose." Laying said this to the king, he again aldrassed Krishn, saying, "I will glay Karan by your. grace, He sball die. "On bearing this Shri Krishn said to Arjun, “ You have sufficient prowess to slay Karan. I hiroallways been thinking of how you will slay him."25.
-- 16638] Mahabharat संजय उवाच । प्रसाद्य धर्मराजानं प्रहरैनान्तरात्मना । पार्थः प्रोवाच गोषि सूतपुत्रवधोद्यतः ॥ १ ॥ कल्प्यतां मेरथो भूयो युज्यवांध इयांचमा मायुधानि सर्वाणि ययाती महारथे ॥ २ ॥ उपाचा तुरगाः शिषिताबारपसा दिभिः । रथोपकरणः सज्जा उपायान्तु त्वन्धिताः । प्रवाहिशी गोविन्द मत पुजिघांसया ॥ ३ ॥ एवमुको महाराज फालानेन महात्मना । उपार पाक कृष्णः कुरु सर्व पयावधीत् । मर्जुनो भरतश्रेष्ठः श्रेष्ठः समभवाम् ॥५४ मापस स्षय कृष्णेन दारुको राजसत्तम । योजयामास स रथं वैयाघ्र शत्रुतापनम् । सन् निवेदयामास पाण्डवस्य महात्मनः ॥६॥ युक्तन्तु तं रथ सुपपा बारकेन महा रममा पृच्छप धर्मराजानं ब्राह्मणान् स्वस्तिवाव्य च । सुमङ्गलं स्सस्स्पयनमा रोहयोत्तमम् ॥ ८ ॥ तस्य राजा महाप्राजो धर्मराजो युधिष्ठिर माशिषोऽरक अध्याय ७२॥ संजय बोले कि कर्ण के मारने को उपस्थित भर्जुन अत्यन्त प्रसन पिच होकर धर्मराजको प्रसन्न करके गोविन्दनी से वोला । १ । कि मेराव फिर तैयार करिये और उत्तम घोड़ों को जोतो और उसी मेरे कल्याणरूपी रथपर सब मस शाखकोपरो । २ । अश्वसवारोंसे शिक्षित और पृथ्वी के लोटने से गत परिश्रम और रथके सब सामानों से अलंकृत शीघ्रता युक्त चंचल घोड़े बहुत शी समाख लायनाय हे गोविन्दनी कर्णके मारने की इच्छा से अब शीघचलो ।। महाराज महात्मा अर्जुन के इस बचनको सुनकर भीकृष्णनी दारुक सारथी से बोले कि वह सबकरो जिसमकार इस भरवर्षम और सब धनुषपारियों में श्रेष्ठ | अर्जुन ने कहाहै । ५। हे राजामों में श्रेष्ट इसके पीछे श्रीकृष्णनीकी आमापातेही | उस दारुकने शत्रुसंतापी व्याघ्रचर्म से मढ़ेहुये उत्तम रथको जोड़ा भार पको तैयार करके महात्मा पांडव अर्जुनके आगे निवेदन किया कि रय तेयारहै । ६ ता महात्मा दारुक के तैयार किये हुये रथको देखकर धर्मराज से भाशाले माक्षणों से स्वस्ति वाचन कराके बड़े मंगल और स्वस्त्ययन के साथ स्थपर सवार हुआ । ८। उस समय बड़ेशानी धर्मराज राजायुधिष्ठिर ने उसको भाशीर्वाद दिया इस CHAPTER LXXII Sanjayá said, “ Having pleased the king, Arjun cheerfully said to Govind, Have my car prepared, 'harness the horses and put the weapons on the car. Let my well-trained horses which have taken rest by lying down on the earth, be brought bere zon. Lot us beaten to slay laran." Having heard the words of Arjun, Shri Krishn ordered Larak the drive to do all that was directed to be done by Arjan. 5. By the order of Shri.Krishn, Daruk prepared the car lined by tiĝer's hide and informed Arjua that it was ready Seeing the car ready, Arjan, permitted by Yudhishthir and bloused - । ॥ WOTE Karan Päry (6654) सततः याद कर्णरयं पति ॥ ९ ॥ तं पूयान्तं महेष्वासं हष्ट्वा भूतानि भारत निहतं मेनिरे कर्ण पाण्टवेन महात्मना ॥ १. ।। बभर्विमनाः सर्वा दिशो राजन समानता जापाम शतपत्राश्च फ्रांञ्चाष जनेश्वर । प्रदक्षिणमकुन्त तदा वै पापहमदनम ॥ १३ ॥ बहवः पक्षिणो राजन् पुनामानः शुमा शिक्षः । परपन्तोऽवन युद्ध रूपा पदाशिव का गृधा बकाः मा पासाश्च विशाम्पते । अग्रतातस्य गच्छन्ति भक्षोतोमानका । १५ । निमिचानि च घम्यानि पाण्डवस्व शशंसिर । विनाशमरिसैन्याता कवि ॥ १५ ॥ प्रयातस्याय पायस्य महान् खेदो व्यजायत । चिन्ता समिया बड़े फयम्वेदं भविष्यति। ततो गाण्डीयधन्यानममधीमधुसूदनः । पाट्या पा तबामात पिम्सापरिगतं तदा ॥ १६ ॥ वासुदेव उवाच । गापडोषधयन् संग्रामेबसा बनुपाजिताः मतेम मानुषो भेता त्वदन्य इव वियते ॥ १५ ॥ पीपा कर्ण के रयके पछिचला । ९ । भरतवंशी सब जीवों ने उस बड़े धनुषधारी भर्जुन को आता देखकर महात्मा पांडव के हाथ से कर्णको मराहुभा माना । १० । राजा सबदिशा चारोंभोर से निर्मलहुई उस समय चापशतपत्र और कोचनाम पक्षियों ने पांदुनन्दन भर्जनको दक्षिणकिया । १३ । हे राजा मंगपा करमाणरूप और प्रसन्न रूप अर्जुन को युद्ध में प्रेरणा करते यहुत से नर पषी मी शब्द करनेलगे। १३ । और हे राजा भयानकरूप कंक गिद्ध पक वाज और काक यह सब मांसखाने के लिये उसके आगे चल । १४ । उन्होंने अर्जुन के मंगलकारी शकुनों को इमरीतिसे वर्णन किया कि शत्रुओं की सेना का और कर्णका नाश होगा । १५ । इसके पीछे यात्रा करनेवाले अर्जुन को बड़ा खेद उत्पन्न दुमा और बड़ी चिन्ता उत्पन्नदुई कि यह कैसेहोगा इसके अनन्तर पधुसुदनमी चिंकाग्रसित गांडीग धनुपधारी से बोले । १६ । हे गांडीव धनुषधारी पुदमें ओ तेरे पनुषसे विजयकियेगये उनका विजयकरनेवला दूसरामनुष्य इसपथ्यी परना है ।१७॥ इन्द्र के समान भी अनेक पराकमा देखे जन शूानेभी तुझको पाकर by Brahmans, took his seat on the car. Yudhishthir blessed hip and he went on after Karan. Those who gave him thus coming. thought that Karan was sure to be slain. 10, The directions became olear and birde of food omen flew to his right. Many male birde led him to fight. 'Dreadful birds of prey flew in his van with the prospect of Amh. They predicted destruction to the enemies, Arjua way to the field of battle wag dejected and grieved and wonderad abono vybat was going to happen, Krislıp, seeing Arjun thus dajactad, gaid, "None could conquer the warriors whom you have conquered. Warriors of Lodra like promessa were conquered by you, Dronacharya, Bhishm, Bhagdatta, Vind, Aravind, the warriors of on hie GRA CARPET41.4 EMA . (6640) Mahabharat [६६४०) दृष्ट्वा दिवहपः शराः शकतुल्यपराममाः । स्यां प्राप्य समरे शरं ये गताः परमा गतिम् ॥ १८ ॥ को हि द्रोणञ्च भीष्मञ्च भगदत्तञ्च मारिष । चिन्दानुविन्दायापन्ती' काम्योजच मुदक्षिणम् ॥ १९ ॥ धृतायुध महावीर्यमयुतायुधमेव च । प्रत्युद्गम्य भवेत क्षेमी यो न स्यात् त्यमिय प्रभो ॥ २०॥ तच घस्त्राणि दिव्यानि लायबलमंद च । असम्मोहश्च युद्धेषु विज्ञानस्य च सन्ततिः । वेधः पातश्च लक्ष्येपु योगक्षेव तपार्जुन ॥ २१ ॥ भवाम् देवान् सगम्यान निहन्यात सचपचपन् । पृथिव्यां हि रेण पार्थ न योद्धा त्यत्समः पुमान् ॥ २२ ॥ धनुग्रंदा हिये केचित क्षत्रिया युद्ध दुर्मदाः। आदेधात त्यतसम तेषां न पश्यामि शृणोमि या ।। २३ ॥ ब्रह्मणा-घ प्रजाः सृष्टा गाण्डीवम महद्धनुः । येन त्वं युध्यसे पार्थ तस्मानास्ति त्वया समः ॥ २४ ॥ अवश्यन्तु मया धाच्यं यत् पश्यं तव पाण्डव । माघमस्थां महाबाहो कर्णमाहवशो भिनम् ॥ २५ ॥ फर्णी हिवलवान दृप्तः कृतास्त्रच महारथः । कती च चित्रयोधी परमरगतिको प्राप्तकिया । १८ । इन द्रोणाचार्य भष्मि, भगदत्त, विन्द, अनुविन्दा अवन्तिदेश के रामालोग, कांवोज, मुदक्षण । १९ । बड़ेपराक्रमी श्रुतायुध. मौर भयुतायु के सम्मुख जाकर जो तेरे पास दिव्य अस वा हस्तलाधवता वा पराक्रम वा युद्धोंमें मोह न होता वा विझानरूपी नम्रता न होती तो तेरे सिवाय किस दूसरे की सामग्रंथी जो इनके आगे कुशल रहता और वेधचिन युक्तयोगभी तुझ को माम.है । २१ आप गंधर्व और संसार के जड़ चैतन्यों समेत देवताभों कोभी मारसक्तेहो हे अर्जुन इस पृथ्वी पर तेरे समान कोई शूरवीर पुरुष नहीं है। २२ । भोर जो कोई क्षत्री युद्ध में दुर्मद बड़े धनुपधारीहैं उनके | मध्यमे तेरे समान देवताओं तकमें किसी को नहीं देखताहूं न सुनताहूँ । २३. | ग्रहानाने मृप्टिकी उत्पत्ति करके गांडीव धनुपको उत्पन्न कियाई हे अर्जुन को कि तुम उस धनुष के द्वारा लड़तेही इसी कारण से तुम्हारे समान कोई नहीं है । २४ । हे पांडव मैं उस वात को अवश्य कहूंगा जिसमें तेरा कल्याण होगा। महावाही युद्ध के शोभा देनेवाले कर्ण कोनू मत अपमानकर । २५ । यह.महारयी Avanti and Cumboj. Sądakshin, Shrutayudli and Ayutayy, who 'came before you, were conqnered by you. Who except you could be safe before them. You possess matchless weapons, dexterity and | humility. 21. You can destroy the gandtarvas as well as all the inovables and immovables of the world. There is no warrior equal to you in the world. I find so archer equal to you even among the 1. gods. Brahma created the Gandir bow in the beginning of the world and there is no archer equal to you in the world, because yon possess that baw. 24. I shall tell you what is needful'; you should 'not think Kiran to be weakerthan you. He is full of prowess, proud,, clover in the use of arms, matobless warrior and working in due - ill natured Karan who bears enmity with Padams Yoa way now tty 116411 rakehases cannot panquish Karan, You will seeufal in slaying (६६४१) कर्णवर्ष Karan l'arv च देशकालस्य कोधिदः ॥ २६ ॥ बहुनाच किमुत्न संक्षपाहणुपांडव । तत्सम विशिष्ट वा मन्य कर्म महारथम । परमं यत्रमाथाय त्वया वायो महाइये । २८॥ तेजसा यन्हिसदृशो मायुवेगममोजये । अन्तकप्रतिमा कोपे विसंहत्तनो थली ॥ भठरक्षिमहत्या दोरका सदुज्ञयः । अमिमानी च शरम प्रवीरः प्रियदर्शनः ।। ३० । संबोधणयुको पित्राणाममकरः । सततं पाण्डवद्वेषी धासरापूर्तिते रता । सरपध्यागयो देवैरपि सपासवः स्यामिति मे पुगिस्तदध जपि भूतना ॥ ३२ ॥ देवापि हि संपविभ्रमिासशोणितम् । अशक्या स रथो जनु सवैरपि युयुत्मभिः ॥ ३३ ॥ दुरात्मान पामत्तं रास दुष्टप्रशं पापहवेची नित्यम् । होनस्वार्थ पाया मेविरीधे लाया कर्ण निश्चितायों भवाय ॥ ३५ ॥ तं सूतपुत्रं रचिनो परिष्ट कर्ण पराक्रमी महंकारी अनज्ञ कर्मकत्ती व अपूर्व युद्धकता होकर देशकाल का जाननेवालाहै । १६ । यार अब बहुत कहनेसे क्या लाभहे हे पाहव अब इसका संक्षेप पुनो मैं महारथी कर्णको तेरे समान वा तुक से अधिक मानताई वह तुमसे बड़े उपाय पूर्वक युद्धमेस्थिरहोकर मरनेके योग्य है ।२वा तेजमें माग्निके सदश वेगमें वायु के समान कोष में यमराज की मूरत सिंह के समान हद शरीर महा पराक्रमी ।..२९ । और शरीर की बम्बाई में आठहाय बड़ी सुजाओं से युक्त वातस्थल वाला बड़ी कठिनता से विज्ञप होने वाला महा अभिमानी शूर और बड़ा वीर अपूर्व दर्शन । १० । सव शूरवीरों के समूहों से मुक्त मित्रों को निर्णय करनेवाला सदैव पांडवों का शोधन के मनोरथ सिद्ध करनेसें तत्पर । ३१ । तरेसिवाय इन्द्र समेत सर देवताओं से भी मारने के योग्य यह मेरा मत है कि तुम उस सूतपुत्र को मारी । ३३ । सावधान कपिर मांस के धारण करनेवाले मनुष्यों सभेव युद्धाभिलावी मव देवनाओ. मेभी बह महारथी कर्ण विजप करने के योग्य नहीं है। IR दुरामा पाप अकारी निईपी सदैव पांडवों में दुबुद्धि वनवाई और पाएको हो विधिक विरोध करनेवाले कणको मारकर अब तुम अपने अमीर को सिद्धकरी | ३ | अब तुम उन राषिोमेश्रेष्ट अजय भूतपुर को कालके रहने place and tima, 26. I shall Le}] all about him'in a few words : 1 think that Barap is equal te of even greater than yod you shop! fight with him very carefully, Like Agui in slang, like Pasa ia velocity, like Yam in adger, liko 8.lion in the strength of bods, eight cubits bigh, of long arms and large breast, hard tu caguer, proad warrior, of hahdsome face, making the friends fearles, szemy of the Pandavas and friend to Duryodhan, he is incanquerable cren by gods, You alone can kill that son of But. B2,' All be gate and cannibal .(0642) Stahal,hara) (१२) निष्कालिक कालब नया। समापनानाति हि पाहुणुप्रातसादात सापुत्रो दुरामा " ३५ ॥ आल्माय मानते घोर ग पाप सुयोधनः । त्वमद्य मूलं पाहाना सहि सोति घन जप ॥ ३६॥ खड्गाजय भनुगस्य शरवः तास्पिनम् । इतं पुरुषशार्दूलं जहि फर्ण धनम्जय।। ३५४ अहस्यामनुजानामि धीरयेत व बलेन च । जहि कर्ण रण पूर मातङ्गमिष केशरी ।। ३८ ॥ यस्य घायण प्रोग्य ते धाराष्ट्रपमस्यते । प्रय पार्थ समार कर्ण धैफर्जन जति ॥ ३९ ॥ इति थी कर्णपीच्च कृष्णार्जुनसंवादे दिसमतोऽध्यायः ॥ १२ ॥ करो और नियों में श्रेष्ठ मूतपुत्रको मारकर धर्मराज में मातेकरो। १५ । भौर जिसके द्वारा पापी दुर्योधन अपने को वीर मानता है हे अर्जुन अब उस पापों के मूल रूप सूतपुत्र को मारो । १६ । के अर्जुन खड्गके सHIT जिना धनुपके समान मुख और वाणरूप दाद रखने वाले उस वेगवान् प्राङ्कारी पुरुषोत्तम कपको मारो 119। मैं तुझको आज्ञादेता हूं कि युद्धमें उस शूरवीर कर्णको ऐसे मारो निस प्रकार केसरी सिंह हाथी को मारताहै। १८ । दुर्योधन जिसके पराकम से ते पराक्रम को अपमान करता है है अर्जुन उस कवच और कुण्डल से सरित कर्णको अब गुद्धमें मारो । ३९ ! Roulay the son of Sut and thus pleasa Yudhiahthir, You willalay Karan on wþose help Duryodhap rplies and who ia tbø igot of all ovil. His mouth is like a bow; hiç teeth fiko Arrows and he is full of propess and proud. I give you permission to ulay brave Karan as a lion alayo an elephant. Blay Karan who is now destituta ol armour And ear rings and on account of physg belp Duryadhap diaregards your prowesy"३, कर्णपर्ष Karan Parav 6649 5 सम्जय उवाच। ततः पुनरमेयात्मा केशवो नमब्रवीत् । तसङ्कल्पमायान्तं धं कर्मस्य भारत ।। १. पप सप्तदशाहानि वर्तमानस्य भारत। बिनाशस्वीतियारस्य मरवारमिनाम् ॥ २॥ भूया विविपुला सेना तालकानों पर सह मन्याय समरं माप किन्चच्छेगापिशाप ॥ 1. भूत्वा हि फरकाः पार्थ प्रभूतगजया निमः ।सा पेश समासाच पिनष्टार दिने ॥ ४ ॥ एने तु पृथिवीपानी सज्ज 'या समागताः समाता दुरी पाण्याच पस्थिताः । ५ ॥ पश्चिा: पर्म कारूपैषिभिः सह । घश गौरमिन कत: शत्रुगणक्षयः ॥ ६ . कोशिशको रणे जेतुं कौरवातात सगतान् । अन्य पाण्डवान् युद्धे त्यया गुप्तान महारथान् ॥ ७॥ शसंपहिणे जेतु ससुरासुरगार्नुपान् । श्रीलोकान् सारे घुकावं किं पुनः कोर पळम् ॥ ८॥ भगदत्तच राजाम कोन्यः शास्त्वया विना अध्याय ५३ ॥ हे भरतवंशी इसके पीछे बड़े बुद्धिमान् केशवनी कर्ण के बारने में संकल्प करके यात्रा करनेवाले अर्जुन से फिर बोले।। हे भरतवंशी व मनुष्य बड़े हाथी आदिके घोर नाशके होने को संग्रह दिन भ्यतीत हुये १२ । हे राना शनुमो के समूहों से आपके शूरवारों की सेना बड़ी होकर परस्पर युद्ध करती हुई कुछ बाकी रहगई है । ३ । हे अजुन मिषय करके कौरख लोग बहुत हापी घोड़े वाले होकर तुझ शत्रको पाकर सेनाके मुखपर नाशवान होमये । ४। वह राजालोग और मुंभपरकंठे हैं और सब पांडव लोगभी तुझ अजेयको पाकर वर्तमान हैं 11 तुझ से रक्षित शत्रुओं के मारनेवाले पांचाल पांडव मत्स्य मोर कारुष्य देशियोंने चंदेरी देशियों समेत शत्रुभों के समूहों का नाशकिया । ६ । हे तात युद्ध में तुझसे तित महारथी पांडवों के सिवाय कौन मनुष्य युद्धमें कौरवोंके विजय करन को समर्थ होसक्ता है । ७ । तुम युद्धमें देवता भसुर और मनुष्यों समेत युद्ध में तत्पर होकर तीनोलोकों के विजय करने को समर्थहो फिर कौरपी सेना के विजय करने को क्यों न होमे । ८१ हे पुरुषोत्तम तेरे पिना दूसरा कौन मनुष्य इन्द्रो समान CHAPTER LXXIII Sanjaya kage that Vasadar desirour of getting {Karao Lilled, again said to Arjun, ** The destruietion of men, horaus And slephants has continued for 'seventeen days. A small portion of both armies remains, nomerous elephants and horses of the enemy have beea slain by the army led by yor, The waited Warriors of the Srinjayas and the Pandavas are ready to help you. 5, Protected by you, the Patchals, Pandavas, Matsyas, Karushas and Chanderia bavo destroyed thė édemies, Who, exsept the Pandavad protected by you, could conquer the Kauravas! You can destroy the three worlds it is not difficult for gou to conquer tho Kaurapids Who (66441 Mahablaat (६६४४१ जे पुरुपशाईल योपि स्यावासवोपम ।। ९ । तेथेमा घिपुला सेनां गुप्ता पार्थ त्वया नघन शेकुः पार्थिवाः सर्वे चमर्मिरपि वीक्षितुम् ॥१०॥ तथैव सततं पार्थ रक्षिताभ्यां त्वया रणे । धृष्टद्युम्नशिखण्डिभ्या भीमद्रोणोनिपातितौ ॥ ११ ॥को हि शक्तोरणे पार्थ मारताना महारधी । भीमद्रोणा युधा जे शक्रतुल्यपराक्रमी ।। १२ ।। को हि शान्तन भी द्रोण पैकर्सनं रुपम। द्रौणिञ्च सामदातञ्च छतधर्माण मेष व ॥ १३ ॥ सैन्य मदराजानं राजानम्च सयोधाम । पीरान कृताखान समरे सनिया नितिनः ॥ १४ ॥ अक्षौहिणीपतीनुमान् संहताम् युद्धदुर्मदान् । वामृते.. पुरुषव्याघ्र जेतु शकः पुमानिह । १५॥ श्रेण्पश्च बहुला क्षीणाः प्रदोणाश्वरथद्विपाः। नानासन पदाचोप्राः क्षत्रियाणाममर्षिणाम् ॥ १६ ॥ गावासदासमीयानो षशातीनाञ्च मारत । प्राच्याना घाटघानानां भोजानाञ्चाभिमानिनाम् ॥ १७. उदीर्णाशगजा सेना ब्रह्मक्ष बल पराक्रमी भी राजाभगदत्त के विजय करनेको समर्थ है।९। निष्पाप अर्जुन इसीप्रकार सब राजालोगभी तुझसे रक्षित इस बड़ी सेनाके देखनेको भी, समर्थ नहीं हैं । १० । अर्जुन इसीप्रकार युद्धमें तुझसे सदैव रक्षित धृष्टद्युम्न मौर शिखण्डीके हाथों से द्रोणाचार्य और भीष्म मारेगये ।११। हे भर्जुन कौन मनुष्य | युद्ध में इन्द्रके समान पराक्रमी और भरतवंशियों के महारथी भीष्म और द्रोणाचार्य को लड़ाई में विजय करने को समयै था। १२ । हे पुरुषोत्तम इसलोक में तेरे सिवाय कौन पुरुष युद्ध में सुख न मोड़नेवाले महाअवर अक्षौहिणी सेनाओं के | स्वामी प्रतिउग्र परस्पर मिलेहुये युद्ध में दुर्मद इन भीष्म 'द्रोणाचार्य कृपाचार्य | सोमदत्त अश्वत्थामा कृतवर्मा जयद्रथ शल्प और राजा दुधाधन के विजय | करने को समर्थ ।। १५ । बहुत से सेनाओं के समूह तो नाशहुये घोड़े रस वा हाथी परामित और मारेगये हे भरतवंशी क्रोधयुक्त नानादेशों के क्षत्री और गोपालदास, मीयान, वंशाती पूर्वीय राजालोग, वाटयान, अभिमानी भोजवंशी | और बानेण चीत्रयों की बड़ी सेना घोड़े हाथी और नानादेशों के वासी यह could copquer Bbagdatta vf Indra, like propese? No warrior can cope with the army. protected by you, 10. Protected by your Dhrishtadyumn and Shikbandi slew , Drona und Bhishm. Who except you, could stay Bhishm and Drona in battle f 12.' Who .except • yot turuld conquer the invincible warriora and leaders of armies like Bhishm, Drona, Kripa, Somdatta, Ashwathama. Krit. Varma, Jayadrath, Shalya and Duryodhant 15. You and Bhim have slain numerous Warriors including the Gopalty Dases, Myans, .Vsehatis, Easterrere Vatudhany, proud Bhojes, Brahmans, kshatryas, and armies of horses and elephants of different climes. The dreadful warriors of Tushars, Yavans, Khash Darv, Abbisar, Darad, powerful Motbars, Tapgads Andhraks, Palinda Kiratas Mlechas hillmen and . कर्णपर्व Karan Paray (6745.) त्रस्य भारत । स्वासमासाथ निधनं गता भीमच भारत ॥ १८ ॥ उमाश्च भीमकर्मा प्रस्तुखारा वषनाः नशा । दार्वामिसारा दरवाः शकाः , रमठतजनाः ॥ १९ ॥ अन्ध्र काच पुलिन्दाम फिराताधोगविक्रमाः । म्लेच्छाव पार्वतीयाश्च , सागरानूपयासिनः ॥ २०॥ सम्मिगो युद्धशोपडा पलिनो दण्डपाणयः । ते सुयोधनस्यार्थे सरन्याः कुरुभिः सह । न शक्या युधि निर्जतं त्वदायेन परन्तप ॥ ३१ ॥. घाराष्ट्रमुदन हि व्यद एटवा महबलम् । यदि त्वं न भवेलीता प्रतीपात् को नु मानवः ॥ २२ ॥ तत् 'सागरमियोधूतं रजसा संवृतं बलम् । विदार्थ पाण्डवैः अधस्त्वया गुप्तत बिभो ॥ २३॥ मागधानामधिपतिर्जयसेनो महाबलः। अद्य सप्तष चाहनि, हतः संख्ये 'भिमन्युना ॥ ५४॥ ततो दशसहस्राणि गजामा भीमकर्मणाम । अघान गदया भातस्य गहा: परिच्छदम् ॥ २५ ॥ तताम्येभिहता नागा रथाच शतशा पलात् ।। २६ ॥ तदेवं समरे पार्थ वर्तमामे महाभपे । भीमसेन समासाय स्वाञ्च पाण्डव कौरवाः । सयाज प्यमातङ्गा मृत्युलोकमितो गताः ॥ १७ ॥ तथा सेनामुसे तत्र.निहते पार्थ पाण्डयः। सब महा, उमरूप तुमको और भीमसेन को पाकर' नाशहोगये । १८ महाउग्न भयकारीकर्म करनेवाले तुपार, यवन, खंश, दार्वे, अभिसार, दरद पड़ेसमर्थ मोठर तंगण, आंधक, पुलिन्द और उग्र पराक्रमी किरांत म्लेच्छं, पहाड़ी, सागर और अनूप देशके रहनेवाले । २० । यह सब वेगवान युद्ध में कुशल पराक्रमी हाथ में दंबरखनेवाले कौरवों समेत दुर्योधन के साथ क्रोधयुक्त । २१ । युद्धमैतेरे सिवाय दसरे से विजप करने के योग्यनहीं हे शत्रुओं के तपानेवाले जिसके तुम रक्षक न हो वैसा कौनसा मनुष्य दुर्योधनकी उस वड़ी अलंकृत सेनाको देखकर सम्मुखहो सक्ताह हेसमर्थ यह समुद्र के समान उठीहुई धूलसेयुक्त सेना तुझसे रक्षितः कोपयुक्त पाण्डवों से चीरकर मारीगई।२अब सात दिन हुये कि मगधदेशियों का राजा बड़ा पराक्रमी जयत्सेन युद्ध में अभिमन्युके हाथ से मारागया । २४ । उसके पीछे भामसेन ने भयभीत कर्म करनेवाले दश हजार हाथियों को अपनी गदा से ही मारडाला। २५ । और जो कुछ राजाके घोड़े आदिये उनको भी मारडाला' इसके पाछे अपने पराक्रम सेही अन्य सैकड़ों हाथी और रथियों को मारा ।२॥ हेपाण्डव मर्जुन इसरीति से उस' वड़े भपकारी 'युद्धके वर्तमान होने पर' कौरव लोग the yarfjors, of Sagar and anup, armed with clubs, led by 'enraged Duryodhad, were invincible by any other warrior except, you. What | army, not protected by, you, cpuld face the large army, of Duryodhaa, rising like the ocean and enveloped in dust. 23. Seven days ago, Jayatsen, the grent king of Magadh, was slain by Abhimanyu. Bhimsep, slow ten thousand elephants with his maco.25. He slevmany horsemen, elephants and car-warriors by his prowess. During this Presarg worth Kaurav variors, with their horses, aravad elephants, were destroyed by the Pandava's Stroms His pierenog .. . । 68461 Mababbaras भागः प्रापजाणि शरजालानि मारिए । २८ । माप निधनममपर परमा प्रति चोपच्युदेवः परदेवविधारणैः। पूर्णमाकTराममय पर ज: । ३० पापसामामि एकैकना मुधिना। सं RRRIE: हत्या समेजर स महांबला ॥ ३१ ॥ गया नराम्यात गवा अनभित्रिपार दिया नयगाईप्यास वाणानारपेयजद॥ २२ ॥ दिनानि शमीन wिala arch पलम् । सन्मा: 'मता पोपस्था हताश गजयाजिनःविधाममो उपदोन्स युधिः पाण्डवानामनीकानि निगृहाती स्पशायर | ३४५ विनिमय धियोपालांदिपायलकंकपान (अहनस् पाण्दी रोनारयाइयगजसंकुलाम् ! मनम्त मलये मन्दमुनिमःमयोपनम ॥ ३५ ॥ या परन्त समरे aaमिव भास्करम। पति कोरिसाइमा प्रवरायुधपापयाानपुर सजया बर्ग तथैवाम्ये दीक्षित मासन और तुमको पाकर पाई रथ और हाथियों समय पा से मर मरकर यमपुरको गये । २९॥ हे अर्जुन इसी प्रकार यही पांडव हायसे सेना मुलक मरनेर परम अनमने बाणों से टककर सबका नाशकदिया उसके धनुषसे निकले हुष प्रमों के शरीरों के पीरनेवाले मनहरी मुखयुक्त सीपनानेवाले वाणों से भाकाश न्या गया 1101 वह भीमसेन एक २ घुसे से हजारों रवियोंको भारतापा उसने पड़े पराक्रमी इकट्ठे एकलाप पनप्प और हाथियों को मारकर दी गति से उन हाथी घोडे मोर क्यों को पाकर मारा दोपों से पूर्व नवगतियों को त्यागकर उसने युदर्भ वाणाको छोड़ा। और आपकी सेना को मारते इथे माजी ने दशदिन तक रयके पासन सांसी करके घोडे गायियों को सारा । १५ । इसने पद में रुद और पिता के समान अपने पको दिखाकर भार पारों की सेनाको भापीन करने पारा। ३४ । फिर चंदेरी पायालार कप देशीय राजाभों को पारतहुये पिना नौका के मदीय दूरनेवासे मभाग दुर्योधन के निकालने के सायान् भीम ने रथ हाथी और घोड़ों से प्यायन पापस्वी सेना को भस्मकिया । १५ । पद में उघम भन्न रसनाले बनारों कारि पदावी वा नप या अन्य रागालोग घरते हुये मूर्य के समान घूमनेगाले artows, Glled with guld fcatburs, straight going, covered the sky. Wilk siaglo blox's. Blum dosttoyed thousands of 'car.warrior Hu * hundred thodsaad warriors and clephanus aud shut 'artono iA all direction. For ten days, Bbuhm destouyed numerous warriors of Fourt U. wu drvadful lisu Rudsu or Viilupu tben to desuoyal ako Padar'ermita hillits the warrion of Cuanderi, Pancial and Vaikaga and desirous of liilias up Duryodhaa 'from the Owend of wimsy, Bhishta deirosed the elephant and agd hursas of ll. i'andare 35. Utadral of foot.moldin armul bilb good respons, 15. Sriajases find other warriors wuld not look as Bhub. who want (१७] कर्णपर्व Haran Part (6647) .३६ विघrd Tथा ता संग्रामे जितकाशिनम । सर्वोचोगेन महता पण्डवाः सम मिषन् ।.३७. ॥ स तु विद्राव्य समर पाण्डवान एञ्जयानाप । एक एक र भीम एकवीराषमागतः ॥ ३८ ॥ तं शिखण्डी समासाथ त्यया गुप्त महानतम जपान पुरुषम्या शरःसनतपर्वमिः ॥ ३९ ॥ स पर पतितः शंत शरत पितामह प्राप्य पुरुषप्याघ्र पुत्रः प्राप्पेष पासबम् ॥ ॥ द्रोण पञ्च दिनान्युप्रो विधम्प रिषु पाहिनीम । फरयाव्यूहमपञ्च पातयित्धा महारथान ॥४१॥ वपद्रप्रस्य ममरे कृत्या रक्षा महारथः । मस्तकप्रतिमधामो गांधयुवदात् प्रजादरध्या योधाच्छोंगे भारद्वाजःप्रतापपात् । पृष्टद्युम्न समासाध संगतः परमो गाहम ॥ ५३ ॥ यदि पाय भवान युर नश्वमुखानयान् । नागगर्ययत् संप्रामे न स्म दोणी म्यननक्षत भषता सुपळ मां पाराष्ट्रस्य पारितम् । ननो द्रोणो Far धुंध पातेन धनम्जय ॥१५॥क पवाग्यो रणे कुय्यास्पदस्पा क्षत्रियो युधि । यावर ते कृत पार्थ जयद्रय युद्ध में विनय से शोभायमान निम भीष्मनो के देखने को भी समय नहीं ये । ३६ । सामतापी माम भी बड़े उपाय से पांडवों क सम्मखगया यहां प्रकल भीष्मन पांडव और मांजपों को भगार सब यार में प्रतिमा को पाया । ३८ । र तुझमें रक्षित शिखएडाने उम महाव्रतनाम भाष्य को पाकर गुम ग्रन्थावाले वाखों से मारा । ३९ । षा भीष्मपितामह तुझ पुरुषोत्तम को पाकर गिराहुभाशर शाय्यापर ऐसे माह नसकि इन्द्रको पाकर वृत्रावर सांयाथा । १० । रूप भारगज द्रोणाचायन पांचादन तक शत्रुओं को सनाको छिन्न भिन्न करके अभेध म्यूहको भलंकत करके बड़े बड़े महारथियों को गिराते हुये युद्ध में जयद्रथकी रक्षा करके उस उग्ररूप में यमराज के समान रूप धारण करकं राधिक युद्ध में मनाका मार दिश। ४१ । फिर शूरबोरा को बाणास भास्कर धृष्टद्युम्न को पाकर परमगति को पाया । ४५ । भव जो तुम कर्णआदि थियों को नहटाते नो द्रोणाचाय्यं युद्धमें न मारमाते । ५१ । तुमने दुर्योधन को सह सेना रोको उस कारण द्रोणाचाप्यं युद्ध में धृष्टद्युम्न के हापस मारंगये । ४५ । । जुन तेरे glorious like the Sun. He tried his boat to slay the Landavas and Brinjayay, routed them again and again, and yar respected by the warrior. Protected by yon, Shikhandi encountered Bhisho and sley him. Slaithy you. he lieg on the bed of arrqwg like Writrą gr. slain by Indra. Haxing destroyed the foes for five days, Dropa gho arrayed the army ipta au impregpablo array, protected Jayadrath apd slew ogr Wanias liko Yam. 42 Haying plain the warriors with bia norowa, be at, Jast met Dhrişhtadyump and died. Drone i could not be slain ip Fattle if you had not checked Karşu and other warriors. . You checked all the supy of Puyodhan and therefore Drona vas slain by Dhrish tadyapp, 45 Who except you could do . .३...and--- (6648) . Mahabharat [ ६६४८) चधं प्रति ॥ ४६ ॥ निवार्य सेना महती हत्वा शरांश्च पार्थिवान् । निहतः सैन्धवो राजा त्याखवलतेजसा ॥४७॥ आश्चर्य सिन्धुपजस्य वधं जानन्ति पार्थिवाः । अनाश्चर्ये 'हि.तत्यत्तस्त्वं हि पार्थ महारथः ॥ ४८ ॥ त्वां हि प्राप्य रणे क्षत्रमेकाहादिति भारत 1 नश्यमानमहं युक्तं मन्ये यमिति मे मतिः ॥ ४ ॥ से पार्थ चोरा धारी राष्टस्य संयुगे । हतसर्प स्पषीराहि भीष्मद्रोणी यदाहती ॥ ५० ॥ शीर्णप्रवरोधाच इतपाजिरविपा हाना सूयेन्दु नक्षत्रैयरिवाभाति भारती ॥ ५९॥ विखस्तावि रणे पार्थ सेनेयं भीमविक्रम । आसुरीव पुरा सेना समस्येव पराक्रमः : ५२ ॥ तेषां इवायशिधास्तु सन्ति पञ्च महारथाःअवस्थामा कृतवर्मा को मद्राधिपःकृपः।।५३' तास्त्वमय नरव्याघ्र हत्यापश्च महारथान् । हतामित्रः प्रयच्छोपी राजे सद्वापपसनाम् सिवाय दूसरा कौन सा क्षत्री ऐसे कर्मको करसक्ता है जैसा कि तुमने जयद्रथ के मारने में कियाथा । .४६ । अर्थात् वडीभारी सेना को रोककर बड़े बड़े शूरवीरों को मारकर राजा जयद्रथ को तूने अपने तेज़ और वलस मारा । ४७ । सव गंजा | लोग जयद्रथके मारने को आश्चर्य और अद्भुत मानते, हेअर्जुन तुम महारथी हो | इससे उसका मरना आश्चर्य युक्त नहीं है । १८ । हे भरतवंशी मैं तुझको युबमें पाकर एकही दिन में क्षत्रियों के समूहों का नाशहोना मानता हूं यह मेरा पूर्ण विश्वास है । ४९ । सो हे प्रज्जुन यो दुयोधन की घोर सना युद्धमें संव शूरवीरों समेत मृतक रूप है जब कि भीम आर द्रोणाचार्य सरीखे मारेगये । ५० यह भरतवंशियोंकी सेना जिसके अत्यन्त शूरवीर मारेगये और धोड़े रथ और हांगी भी मारेगये अब ऐसी दिखाई देता है जैसे कि सूर्य चन्द्रमा और नक्षत्रों से रहित माकाश होता है । ५. । हे भयानक पराक्रमी अर्जुन या सेना युद्ध में ऐसे नष्ट | होगई जैसे कि पूर्व समयमें इन्द्रके पराक्रमसे अमरोंकी सेना नाश होगईया ५२इस सेनामें मरनेसे बाकी बचेहुये पांचमहारथी हैं अश्वत्थामा कृतवर्मा, कर्ण, शल्य, कृपाचार्य । ५५ । है नरोत्तम अब तुम इनपांचों महारार्थियों को मारकर शत्रुओं से रहित जानकर द्वीप, नगर, भाकाश तल, पाताल, पर्वत और महायनों समेत such deeds as you did in slaying Jayadrath:? Having checked the lage army and slain great warriors, you slow Jayadath. All the kings wondered at the strange death of Jayadrath. You are a great warrior and therefore nothing is strange for you to do I believe that you can'slay all the warriors in a day. I take up all the warriors for dead, when Bhishm and Drona are slain. 50. The army of the Bharats, destituto of warriors, horses, cars and elephants, looks like the 'ský without the moon and stars. The army has been destroyed like that of asurs destroyed by Indra in the days of yore. Only'fire of their great warriors, remain, namely, Ashwathamà, {Kritrarma, Karan, Shalya and Kripacharya daving slain these live; you inay .
Mlababharat 16654 पांचाला कथञ्चित्स्युः परामसाः। न हि मृत्यु महेप्यासा गगन्ति महारणे ॥९९६ पएकः पाण्डवी समांशधः समष्टयत् ।। समासाद्य :पाचाला भी नासन पराङ्मुयाः ॥ १० ॥ तथा ज्वलन्तमाग्निं गुरुं सर्वानुमताम || निदइन्तश्च । सारे दुर्द द्रोगमंजसा ॥ १०१ ॥ ते नित्यमुदिता जेतुं मृध र नरिन्दम । न जायाधिस्यभीताः पाञ्चाला स्युः पराहमु सः ॥ १.२॥ तेपानापरतां पूरः पाञ्चालानांतरस्थिनाम् । आदमन् शरिकर्ण पतङ्गनामिधानमः ॥ १०३ ॥ तांस्तस्याभिमुपाद पीराद मिप्राय पतनीधितान् । सेयी नयति राधेयः पांचालाच्यतया रणे । १०४॥ तन्नारत माइप्यासानगाधे मज्जतोहये । कर्णवे पो भूत्या पाम्घला खातुमहसि ॥ १०५॥ नहि रामान फर्णेन मार्गवारासत मात् । पदुपा महाघोर तस्य सपमुदापते ॥ १०६ ॥ तापनं सर्प सैन्यानां घोररूपं | मोहते और बड़े युद्धमें मृत्युकोभी नहीं गिनते हैं । ९९ । जिस भकेले ने वाणों के समुद्रों से पायी भेनाको ढकदिया ऐसे भीप्मनी कोभी पांकर वह पांचाल दिशी.नहीं मुड़े। १०० । हे शत्रुओं के विजय करनेवाले इसीप्रकार युद्ध में सदैर अग्निके समान प्रकाशित शत्ररूपी भाग्न रसनेवाले सब. धनुमधारियों के गुन् 'युद्ध में अपने तेजसेही भस्म करनेवाले अनेय द्रोणाचार्य को । १०१। और सब शत्रुओं के विजय करने में प्रवृत्तहुँ पांचालदेशी कभी कर्ण से भयभीत और मुख मोड़नेवाले नहीं हुये हैं। १०२ । उन शूरवीर पांचालों के प्राणों को कर्ण ने वाणों के द्वारा पेने हलिपा जैसे कि पतंगों के प्राणों को अग्नि हरलेताई युद्धमें इसरीति से सम्मुस भपने मित्रके निमिच जीवन का त्यागनेवासा कर्ण उन हजारों भारवीर पांचालों को नाश कररहाई । १०४ । सो तुम हे भरतवंशी | नाकारूप होकर उसे कर्ण रूपी नौका रहित भया समुद्र में डूबतेदुये यह पनुपधारी पांचालों की रक्षा करने के योग्यहो । १०५ । कर्ण ने नो महाघोर अन्न महात्मा- भार्गव परशुरामजी से लियाहै उसका रूप द्धियुक्तहै । १०६ । वह सबसनामों plaintino crics of thu Panchaly woundo by Karan's arrow's Tbo bravo Pancials nuiur turn back from any danger and nro not'afraid of death in any forlik. They wero not afraid of Bhishim istiu alene nreral the Pandav army with his arrowe. 100. Tho Panchals srcra norer so tuucb afraid of Droiachary. ( the procopter of all tho archers, burning nil in bis glory, and caruering the warriors ) as thoy aro of Korul Ue las destroyed thu Pruchals as fire lestroys insects, lo bas sain thousands of tho Puncuial warriors in battle. You must protect thivu liko a boat froiu drowning in a bottomless oocari. Karan Fosta strange weapoa mien bim by Paraluram, which has na ila glory over all the army, Tho arrows shot by Kara ore (६६६६ 3655 "कर्णपर्ध Karan Parv सुदारुणम् । खनापत्य महासेना ज्वलितं स्पेन तेजसा ॥१९७ ॥ एते चरन्ति संग्रामे कर्णचापच्युताः शराः । भ्रमराणमिव वातास्ता पयन्तिस्म तावकान् ।। १७८ ॥ गते द्रयन्ति पाबाला दिक्ष सर्वामु भारत । कर्णालं समरे पापा दुनिवार्य मनात्मानः ॥ १०९ ॥ एष भीमी सदझोधो वृत्तः पार्थ समन्ततः । सृजयुर्योधयन् कर्ण पीड्यते निशितैः शरैः ॥ ११ ॥ पाण्डवान् सृञ्जयांश्चैव पाञ्चालांश्चैव भारत । इम्यादुपेक्षितः कृणों मेगो देहमिवागतः ॥ ११९ ॥ नान्यं त्वत्तो हि पश्यामि योधं योधिष्ठिरे चले। यः समासाध राधेयं स्यस्तिमाना मजेदगृहं ॥ ११२ ॥ तमद्य निशितैर्वाण विनिहत्य नरर्षभ । यथाप्रतिझं पार्थ त्वं त्या फोर्तिमवाप्नुधि । ११३ ॥ व हि सक्तो रण जेतुं स कानपि कौरवान् । नान्योयुधि युधां श्रेष्ठ सत्यमेतद्मवामिते ॥ ११५ ॥ एतत् का तपानेवाला घोररूप बड़ा भयानक बड़ी सेनाको ढककर अपनें तेगसे प्रकाश मानहै । १०७ । कर्ण के धनुपसे निकलेहुये यह वाण युद्ध में घूमते हैं और भ्रमरों के समूहों के समान उन वाणों ने आपके पुत्रों को तपायो । १०८ । हे भरनवंशी यह पाञ्चाल युद्ध में अज्ञानी मनुष्यों से कष्ट से हटाने के योग्य कर्ण के शस्त्र को पाकर सब दिशाओंको भागते हैं । १०९ । हे अर्जुन कठिन क्रोध में भरा | चारों ओरको राजा और मुन्जियों से घिराहुमा यह भीमसेन फर्णसे युद्धकरताहुया घुसके तीक्ष्णधारवाले वारणों से पीडामान होता है.। ११० । ई भरतवंशी विचार न किया हुआ कर्ण पाडव मुजी गौर पाराचादों को ऐसे माररहा है जैसे कि उत्पन्नहुआ रोग शरीरको मारडालना है । १११ । मैं युधिष्टिर की सेना भर में | तेरे सिवाय किसी दूसरे शूरवीर को नहीं देखता हूं जो कर्णके सम्मुख होकर जीता हुआ अपने घरको भावे । ११२ । हे नरोत्तम अर्जुन अब तुम अपने तीक्ष्णवाणों से उसको मारकर अपनी प्रतिज्ञा के समान कर्मको फरके कीतिको पायो । ११५ । हे शूरवीरों में श्रेष्ठ तुमहीं युद्ध में कर्णसमेत कौरवोकं विजयकरनको समर्थ हो दूसराकोई नहीं है यह तुझसे मैं सत्यसत्य कहता हूं । ११४ । हे नरोत्तम अर्जुन उस बड़े कर्णको करके और उस महारथी कर्णको मारकर सफल अवयुक्त 'spregd over all the field of battle like bees and are giving troublə to' your warriors. The Panchals, unflinching warriors on other occasions, are running away from the presence of Karan, Bhimson, full of rage, surrounded by the Srinjayes and Panchals, is fighting with Karan. 110. Karan slays the Pandavas, the Srinjayag and the Panchals as a sickness destroys the body. I see none among our warriors fit to oppose. Karan, without loss to his own lite. You should now fultil your promiso by slaying Karan and alsonld guin fame. You slopa tau vanquish Karan and the Kayrayas, and this is the truth.' You must şlay Karan to obtain the fruit of your great skill in archery and to be GG58) Mahabharat (६६५८) ॥ १४ ॥ अव कुन्तीसुतो राजा हते लतसु मया । प्रष्ट मनाः मोतिश्विर सुखमयाप्स्यति ।। १५ या चादमनायं कंशबाप्तातिमं शरम । उत्सत्या | मोह या धणे जीविताभाविष्यति ॥ १६ । यस्तो प्रतं महा घधे किल दुरात्मनः । पादौ न घावये वायत् यावद्धयां न फाल्गुनम् ॥ १५ सपा कृत्या मत तस्य पापस्य मधुसूदन । पाताये ये रात का शरः सनतपर्वभिः । १८ ॥ यो सौ रण नरं नान्यं पृथिव्यामभिमन्यते । तस्याद्य सूतपुत्रर समिः पारयति शोपितम् ॥ १९ ॥ अपतियोसि कृष्णेति सता अदधीत् । धृतराष्ट्रमते फर्ण श्लाघमानःस्वाकान्गुणान॥२१॥अनंततकरिम्परित गमका निशिताया आशीप्रिपा इव वास्तस्स पास्यन्ति शोणितम्॥२१॥ मया हस्तवता मुक्ता नाराचा वैतत्विषः। गाण्डीवस्टा दास्यन्ति कर्णस्य परमां गतिम् ॥ २२॥ पद्य तपस्पति राधेयः पांचाली यसदानवांत । सभामध्ये यथारं कुरसयन् पाण्डयान प्रति ॥ २३ ॥ पे राणा युधिष्टिर के कठिन जागरण को दूरकल्गा । १४ । भव मेरे हायसे कर्णके मरने पर राजा युधिष्ठिर भूसान चित्त होकर बहुत कामंतक आनन्दों को पावेगा । १५ । हे केशवजी भव मैं ऐसे अजय और अनुपम वाणोंको छोड़ेगा जोकि कसको जीवन से नष्टकरके गिरावेंगे । १६ : निश्चय करके जिस दुरात्माका यह व्रत मेरे पाने में है कि जबतक अर्जुनको न मारलंगा तबतक अपने चरणों से न | चलूंगा । १७ । हे मधुसूदननी जस कापी के व्रतको मिथ्या करके गुप्तप्रन्यी वाले बाणों से उसको रथले गिराऊंगा । १८ । जो यह पृथ्वीपर अपने समान दूसरेको नहीं मानता है इसी से इस मूतश्न के रुधिरको पृथी मानकरेगी । १९ । है कृष्णा तू विना पतिकी है. इस मकार से अपनी प्रशंसा करते हुये कर्णने जो धृतराष्ट्रके मत | से कहा है उसको विपले सर्पकी समान तीक्ष्णधार वाले मेरे वाण मिथ्या करके उसके रुधिरको पियेंगे । २१ । मुम इत्तलाघुवी से छोड़े गागडीप धनुपसे निकल हुये विजलीके ममाम मकाशमान नाराच कर्णको परमगति देंगे । २२ । अववह कर्ण महादाखी होगा जिप्सने पांडवों के निन्दक कौरवोंको सभामें कुत्सिवचनोंको | कहाहै । २३॥ निश्चय करके जो वहां मिथ्यावादी और हास्य करनवालेथे वहसव happy for many days to come. 15. I shall discharge , matchlessly effective arrows skich will depriyo Karan of life. Surely, the ill-natur. ed one who has made a vow that he would not palk on the field of battle without killing my, shall fall by my arrows and his vow annulled. The earth will drink the blood of him who thinks there is ņo warrigt like him ai tha fice of the earth, My sharp edged arrows, like serpents, will drink the blood of him who said to Uraupadi that she was & widow, 21, My arrone, dexterously shat from Gagdov, bright lika lightning, will bring about Karan'a fall Keran who said harsh words in the court of the Kauravas, shall fall in trouble. Thosa - फपप Karan Pariy (105) वैडतिलात भभितारोऽद्य ते तिला त वैफने करें मूतपुत्रे दुरात्मHि माई यः पाण्डुपुत्रेभ्यसमिति यद्यपीव धृतरासुतान् कर्णःलांघमानोत्मनो गुंणान्। अनृतं तत् फरिष्यन्ति मामको निशिताः शराः ॥ २५ ॥ हन्ताहं पारडयान्. सर्वोन स पुयानिति योऽधीत् । तमा मर्ग हन्तास्मि मिपता संवैधन्विनाम् ॥ २६ ॥ तरय वीय्ये समावस्य धाग'ट्रो महामनाः। अंधामन्यत दुधिनियमस्मान दुरात्मघान् तमद्य कर्ण राधेयं हन्तारिम मधुसूदन ॥ २७ ॥ अद्य कर्ण देते कृष्ण धाराष्ट्रा सराजका विद्रयन्त विशी भीताः सिंहस्ता मृगा इव ॥ २८ ॥ अध उसीधनो राजा मारमानचनुशोच्यताम् । हते काणे मया संख्ये सपुत्रे समुज्जने ॥ २९ ॥ मद्य कणे हत ६ष्ट्या धार्तराष्ट्रोऽस्यमर्षणः । जानातुमारणे कृष्ण प्रधरं सम्यिनाम ॥ ३० ॥ पुत्रपौत्र सामात्य सभृत्यञ्च निराशेयम् । अद्य राज्ये करिष्यामि धृतराष्ट्र जनेश्वरम् ॥ ३१. ॥ ॥ कर्णस्य चक्रालाः कन्यादाश्च पृथग्धिताः। शरेरिछनानि गाभाजि विहरि पति केशव ॥ ३२ ॥ अद्य राधामुतस्याए संग्रामें मधुसूदन । शिर | लोगभी भवइस सूतपुत्रके मरनेपर शोके युक्त होंगे भएनी प्रशंसा करनेवाळे कर्ण ने धृतराष्ट्रके पुत्रोंसे जो यह वचन कहाहै कि मैं तुमको पाण्डवों से बचाऊंगा उसके उसवचन को भी मेरे तीक्ष्णधारवालेवाण मिथ्या करेंगे, और जिसने यहभी कहा कि मैं वेटों समेत सर्व पांडवोंको मारूंगा उस कर्णको अब मैं सब धनुप धारियोंके देखेतहुयेही मारूंगा । २६ । वड़साहसी दुरात्मा दुबी दुर्योधन ने जिप्स के पराक्रमका साश्रम लेकर सदैव हमारा अपमान किया हे श्रीकृष्णजी अ कर्ण के मरनेपर भयभीत धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं समेत दिशाओं को ऐसे भागेंगे जैसे कि सिंह से भयभीत होकर युगभागते हैं । २८ । अब युद्ध में मेरे हायस पुत्र यिंत्र भादि समेत कण के मरनेपर राजा दुर्योधन अपनेको शोच । ३९ । हे श्रीकृष्ण जी धेर अत्यन्त क्रोधयुक्त दुर्योधन कर्णको मृतक देखकर मुझको सब धनुष धारियों में श्रेष्ठ जानेगा । ३० 1 मैं राजा धृतराष्ट्र को पुत्र पौत्र मुहृदमंत्री राज्य और सेवकों से निराश । ११ । हे केशव जी अब भनेपकारके मांसभक्षी चक्रांग नामजीव मेरे वाणों से टूटेहुये कणके अंगों को भक्षण करेंगे । ३२ । हे मधुमून false men who laughed at us then, will be grieved at the death of Karan who had promised to cuve the bons of Dhritrashtra from the Pandavas. I shall prove his words false with my arrows. I shall, in the presence of all the archery slay Karan who said that he would destroy the Pandavas and their sons. Like deer terrified of a lion, the sons of Dbrishtrashtra will run away in all directions at the fall of Karan on account of whom ill-natured Duryodhan has īpšalted us. 28. Daryodhan will bo sörtwoful at the fall of Karan and hið son by my arrows and'shall believe ma to bo tho best of archers. 30• I shall make king Dhritrashtra loso all "hope of sóng, grandsons, friends, (6660) Vahabharat [६६६०) उत्स्याम कर्णस्यभिषतां सर्वधन्विनाम् ॥ ३३ .॥ अद्यतीगर्षिांठश्चपुरेश मधे सदन । रणे छेन्स्यामि गात्राणि राधेपस्प दुगरमनः । ३४ ॥ अव राजामहत् कडू सम्यक्ष्यति युधिष्ठिरः । सन्तापं मानस धारधिर समृतमात्मन ॥ ३५ ॥ मध के राष राधेयम इत्या सपान्धयम् । नन्दायच्यामि राजाने धर्मपुत्र युधिष्ठिरम् । ३६ । मया एमनुगान् कृष्ण कर्णस्य कृपणान युधि । ता ज्वलन सङ्काशैः शरैः सर्पविषोपमः ॥३७॥ धामकयगादप रजिह्मगैः । संस्तरियामि गोविन्द पसुधा यमुधा धिपः ॥ ३८ ॥ अद्याभिमन्योः गणां सर्वेषां मधुमदन । प्रमपियामि गात्राणि शिसि च शितः शरैः ॥ ३९ ॥ अद्य निर्धाराष्ट्रांच भ्राने दास्यमि मेदिनीम् । निरर्जुना या पृथिवीं कराधानुचरिष्यसि ॥ ४० ॥ मधाहमणः कृष्णा भविष्यामि धनम्रताम् । क्रोधस्य व कुरूणांच शराणां गाण्डियस्य च ॥ ४१ ॥ अथ दु:खमई मोक्ष्य प्रयोदशसमार्जितम । हत्या फर्ण रणे कृष्ण शम्बरं मघघानिय ॥ ४२ ॥ अद्य जी अवमें युद्ध में राधाके बेटे कणके शिरको सब धनुपधारियों देखतेहुयेही काढूंगा । १३ । और अप तीक्ष्ण विपाट तुरपनामवाणों से दुरात्मा राधेप के गावों को | रणमें छेदूंगा । ५४ ! तबरामा युधिष्ठिर बहुत काळसे धारणकिये हुये अपने चित्त के शोकको दूरकरेगा । ३५ । हे केशव अत्र में बांधवोसमेत राधाकेपुत्र को मारकर धर्मपत्र रामायुधिष्ठिरको अत्यन्त प्रसन्न करूंगा। १६ । और कर्ण के दुखी सय सहायकोंको अग्नि समान प्रकाशमान सर्पके समानवाणोंसे मारकर मुवर्ण जटित गृध्रपक्षयुक्त सीधेचलनेवाले वाणोंसे पृथ्वीको राजाओं समेत गरूंगा । १८॥ और भभिमन्युके सशत्रुओंके अंग और शिरोंको अपने सागवाणों से मथन करूंगा ! ३९ । और धृतराष्ट्र के पुत्रों से रहित इसपृथ्वी कोअपने बड़े भाईको दूंगा अथवा हे केशवजी भाप भर्जुनसे रहित पृथ्वीपर घमोगे । ४०। हे यदुनाथ अम धनुपधारियों का वा कोरवों के क्रोध वा गांडीव धनुपके वाणों से उ णहंगा। ४१ । भव वैरहवपके इकट्ठे कियहुगे दुःखीको त्यागा युद्ध कगाको मारकर जैसे कि इन्द्रने संबर दैत्यको माराया । उसीप्रकार हेकेशवजी अय advisera, kingdom and attendants. The birds of prey will eat the flesh of Karan. wlioso head I will cut off with my arrows in tho presence of all the warriors. With my sharp arrows, I shall cut off tho parts of his body. I shall relieve Yudhisthir of his long stand. ing grief. 35. I sbull plcaso Yudbishtbir by slaying the son of Radba and his kin. Ishall slay Karan's unhappy allies with my sharp arrosa bright liko fire and fatal liko serpente With my arrows I shall slay the enemies of Abbimanyu. Having slain tho say of Düritashtra, I shall giro tho kingdom to Yudhishthir, or, you will 1060 Arjun, O Kcsbar. With the arrows shot from Gandiv, 1 sball romove tho sage of the Kauras; Warriors. Tbo.thirteen years of कर्णपर्व Karan Pary [6661]] कणे हते युद्ध.सोमकाना महारथाः । कृतं कार्यंच मन्यन्तां मिप्रकायेप्सयो युधि ॥४३॥ न जाने च कथं प्रीतिः शैनेयस्याध माधव । भविष्यति हते कणे मथि चापि अयोधिके ॥४४॥ अहं हन्ता रणे,कर्ण पुत्रञ्चास्य महारयम । प्रीत दास्यामि भीमस्य पमयोः सात्वकस्य च ॥ ४५ ॥ धृष्टद्युम्नशिखण्डियां पांचा लानाञ्च माघष । अद्यानुण्यं गमिष्यामि हत्वा कणे महाहवे ॥ ४६॥ अद्य पश्पन्तु संग्रामे धमजयममर्षणमा युध्यन्तं कौरया संख्ये पावयन्तश्च मतजम ॥ ४७ ॥ भवत्सकाश पवे , पुनरेवायसंस्तषय ।। ४८ ॥ धनुर्धेद मत्सभो मास्ति लोके पराक्रमे वामम कोऽस्ति तुल्यः । को वायापी मत्समोऽस्ति क्षमाघांस्तथा क्रोधे सहशोन्पो न मेऽणि ॥ अहं अनुमानसुरान सुरश्च सर्वणि भूतानि च सद्गानि स्थवाहुधीवांद्गमये परान मत्पीकर्ष गिदपरं परेभ्यः ५५० ॥ शराचिपा गाण्डि नाहमेकः सर्वान कुरून पाहिलकांभाभिदत्यादिमात्यये कक्षगतो पंथाग्निस्तथा दहेयं युदय कर्ण के मरनेपर युदमें प्रभीष्ट चाहनेवाले मित्र सोमकों के महारथीकारको माप्तहुआ मानो। ४३ । हे माधबधी भव मेरी और सात्यकि की कैसी प्रीति होगी और कर्ण के मरने व मेरी विजप होनेपर कैसी प्रसनताहोगी। ४४ । मैं युद्धमें उसके महाथी पुत्रसमेत. कर्णको मारकर भीमसेन, नकुल, सहदेव और सात्यकि को प्रसन्नकरूंगा । ४६ । हे माधवजी अवमैं युद्धमें कर्ण को मारकर धृष्टद्युम्न शिखण्डी और पांचालोंकी भऋणताको पाऊंगा । ४६ । अब युद्धमें क्रोधयुक्त कारणों से बुद्धकरनेवाले चौर युद्धमें कर्ण के मारनेवाले अर्जुन को देखो। ४ । इसके पीछे में अपनी प्रशंसा मापके सम्मुख करूंगा। ४८ । इस पृथ्वपिर धनुर्वेद विधामें आममेरे समान कोई नहीं है और पराक्रम में भी मेरे समान कौन होसक्ता है न मेरे समान कोई क्षमावान है और इसीप्रकार क्रोधर्म भी मेरे समान मेंहीं हूं । ४९ । मैं धनुषधारी अपने भुजाओं के पलसे इकठेहोनेवाले देवता अमुर और मनुष्यों भादिनीवोंको पराजय करसक्ताहूं मेरे पराक्रम और पुरुषधिको भद्वितीय नानो । ५०। मैं अकेगही वाणरूप अग्नि रखनेवाले गांडीय धनुपसे सर कौरव और बाहलीकों को विजयकरके बड़े इटसे समूहोंसमेत इसरीति | misery will come to an end when I shall slay Karaa as Indra had slain Samvar. With the fail of Karan, I shall please the Somaks: How much sball I ploaso Satyaki by slaying Karan : Bhim, Nakul, Sabader and Satyaki by slayiog Karan and his brave son. 45. I shall satisfy the debt of Dhrishtadyumn, and Shikhandi of Pan bal by slaying Karan. The enraged Kauray warriors will aosy see Arjun the slayer of Karao. I shall be able to.say to you that thero is no arober equal to me on the face of the earth, that in prowess, mercy and anger I am my own equal and that I can destroy tho assembled gods, asurs and mene .50. Having conquered the Kauravas and I shall please ८ ।। कर्णस्य पुत्रन्तु . (666) Jlahabharat (६६६४) ध्रुवथया द्रोणसुतेन सायुधामन्युधिषसेनेन साम् । रपी मुषेण समाग सन्जयोत्तमोजाः । गान्धारराजं सहदयः सुधात्तोमहर्प सिंह इवाध्यधावत् ॥ ८ ॥ शतानीको नाकुलिः कर्णपुत्रं युयुधानों वृषसेन शरीधः समार्पयत् कर्णपुत्रय परः पाञ्चायं गरिने । १० । रथपर्भः कृतवमा पमाठमाद्रीपुत्रो नकुलधियोधी। पांचाहानामधिपो यासेनिः सेनापति कर्ण मात् ससैन्यम् । २१ ॥ दुःशासनो भारत भारती च संशप्तकानां पृतना समृया । भीमें रणे शखभृतां परि भीम समात्तिमसहगम् ॥१२॥ स्मज तजधान रक्तपाधिनतिमोजाः प्रम । तस्योत्तमा निपपात् ममी निनादयगां निनदेन च ॥ १३ ॥ भुषेणशी पतित दृषिम्यां पिलोषय रणों ऽध दार्चयः। कोधापयांपरपजम्प वा मुधारनिशिरधन्तत् ॥ १॥ शिवरही पद्ध में सम्मुख हुये सात्वाक दुर्योधन के सम्मुतगया श्रुत .अवा अश्वात्यामा के साथ मौर युधामन्यु चित्रसेन के साथ में युद्ध करनेलगा। फिर रवी मुंजय और उत्तमौजा कर्म के पुत्र पेण के सम्मुख हुमा और सहदेव रानागांधार के सम्मुस ऐये दौरा जैसे कि धासे पाड़ित सिंहबड़े वैलकी भोर | दोडताहै । ९ । नकुल के पुत्र शतानीकने कर्ण के पुत्रको सात्पकिने स्पसेन को वाणोंक समूहों से घायलीकया और करे गूखीर कर्ण के पुत्रने वागोंकी प्रतिवर्षा से पांचाल देशी को धापनकिया। १० । रधियों में श्रेष्ट युद्ध करनेवाले माद्री नन्दन नकुलने कृतवर्मा को मोहितकिया और पांचाल देशियों को राजा सेना पति धृष्टद्युम्नने सब सेना समेत कर्ण को घायल किया हे भरतवंशी दुशासन और भरतवंशियोंकी सेना और संसप्तकोंकी वृद्धिमान सेनान युद्ध में शास्त्रधारियों | में श्रेष्ठ असह्य वेगवाले भयकारी रूपवाले भीमसेनको मोहितकिया। १२ । वहाँ | इस मकार से पायल शूरवीर उनमौनाने बड़े इकारके कर्ण के पुत्रको मारामार उसका शिर पृथ्वी और आकाशको शन्दायपान करवा पृथ्वपिर गिरपड़ा । १३॥ संब पाहामानरूप कर्ण ने सुपेण फे शिरको पृषीपर पड़ाहुआ देखकर शोधयुक्त हो पृथ्वीपर उसके घोड़े रस और ध्वजा को अपने तीक्ष्ण धारवाले वाणोंसे काटा । १. फिर उस उचमौजाने भी अपने प्रकाशित खड्ग से कर्ण को पारामान Shrutshrama fought with Ashwathana and Yudhamanyu, with Chitroseo. Bravo Uttamauja engegod with Sushon and Shador rusbed upon Shakuni li:c a hubgry lion upon a bull, Nokul'a son, Shatanik soundel Karan': son; Satyaki wounded Vrishasen and tho bravo son of Karan covered the Pancbals with his arrows, Nakul the son of Jajri, best of warriors, onde firitrarma in cosille. Dhrishtadyumn the varrior king of Panchal and coximander of thio Pandar army wounded Krran add bis army. Dusbasun and liis brave Sansaptak sarriors mode Bhim insensibla Ottamaują, tbough wound. 10.
13663 कर्णपर्ष Karan l'ary सत्तमोजा निशितः परकीर्विव्याध पोन च भास्वरेण । पाणि हयांवर करावं हत्या शिखण्डिया स ततोऽध्यरोएत् ॥ १५ ॥ कृपन्तु सपण चिर यस्तो उच्छरस्तादयितुं शिक्षण्दी । तं द्रौणिराचार्य र रुपस्य समुज्जर पडतो पया गाम् ॥ १६ ॥ हिरण्यदमा निशितः पृषकस्तपात्मजानामनिलारमजोवा मता पयत् सेन्यमतीष भीमः फाले शुची मपगतो ययाः ॥ १७ ॥ इते फर्मपर्वणि संकुळयुद्ध पंचसमतोऽध्यायः ३५ ।। - किया सदनन्तर पहछपाचार्यके पाछे चलनेवालों और घोड़ोंको मारकर शिखण्डी के रथपर सबारहुआ। १५ । फिर रथारूढ़ शिखढी ने स्थस रहित कृपाचार्य को देखकर बाणों से घायल करना नहीं चाह। फिर अश्वत्थामाने कपाचार्य को चारों ओरसे आड़ में करके ऐसे छुटाया जैसे कि कीचमें फँसीहुई गोको निकालने हैं। १६ । वायु के पुत्र सुवर्णमयी कवचवाळे भीमसेन ने भापके पुत्रों की सबसेना को अपने तीक्ष्ण वाणों से ऐसे संतप्त किया जैसे कि उष्णमृतु में आकाशमें पत्त- मान मूर्य सबको संसात करंदताई १७ ॥ ed, slow Karan's son and his head fell down on earth with a crash. 13. Seeing Sushen's bord fallen on the ground, Karan destrogod his advorsary'a car, banner and Lorscs with his sharp arrows. Uttamauja too, wounded Karan with his sword and having slain the goards and horses of Kripacharya, he rode the car of Shikhandi. 15, · Seeing Kripacharya deprived of air, Shikhandi did not woun him, Ashwa thoma protocted Kripacharya and rescued him like a ww stuck in mud. Bhim, in his golden serrour, heatod your son's army like the summer sun. 17.
៤៨៩ } Nahabhirat - सानप उपाय 1 अय रियदानी नुमुले यिम विपतिरेको पमिः समागतः। महारणे सारधि भिायुयाच भीमध याहए घातराष्ट्रीय । १ व सारपे यादि अपन मारनाम्येतान् धाराशर यमाय । सचोदितो भीमसेनन यं स सारथिः पुश्यलं स्वीयम् । मायात्ततः सत्यरमुनवेगो पता भीमानलं हन्तुपैयद । ततोऽ गरे नागरपारपतिभिः प्रायुपपुस्तं कुरषः समन्ताद ॥२॥ भीमस्य पाहाप्रपमुदार धे पाणीजप्नुः ॥३॥16: शरानापती महामा चिच्छेद पासप नीय व नितुस्तपनीया द्विपा विधा भीमशीनिया॥ तो पज धामपाययूनो मामाहताना घराजपथ्ये । घोर निनादः प्रमया नरेन पञताना विपर्यतानाम् ॥५.ते यष्यमानाय नमण्या निभिपतो भीमशरमपेके भीम समता समोरोपन वृत्त शकुम्ता पातपक्षाः ॥६तोऽभिपाते उप खम्ये अध्याय ७६ ॥ संजपयोले कि इसके पीछे कठिन युद्धमें बहुतसे शत्रुओंसे पिराहुभा अकेला बामसन उस युद्ध में अपने सारथी से यह वचन बोला कि अब तुम दुर्योधन की सेनाचगे।।।हे सारथी तुमघोड़ोंके मारा पड़ी शीघतातचलो इन धृतराष्ट्रके | पुगेको यमपुर पहुंचाऊंगा उसकी मात्रापातही वा पहावेगवान मारपी आपके पुरकी सेना में भामसनको ले पहुँचा । २ । नियरस कि भामसनने उस सेनामेंजाना चाहा का दूसरे कौरव रय हाधी घोड़े और पतियोसमेत उसके सम्मुखगये।।। मोर पारोंभोरस भामसन के बड़े हदरपको अपने पापों के समूहों में घायलीकप। तर मामसेन ने अपने मुनहरी पुखराले वाणों से उन सबके छोड़ेहये भातेहुपे याणों को कारा भायसन के बाणों से ये वह मनहरी पुंसवाले वाण दोदो चार चार खएर होकर गिर । ४। हे राजा इसके पाछे उत्तम रानाभोंके मध्य में भामसन के रायसे मारहुये हाथी घाई रय और गूरलोगों के घोरशब्दरसे प्रकटय न कि यमसे देहुपे पतोंके सन्दहोते हैं। ५ मामसन के तमाम नातों से पापलहुये उत्तम राजाभान युदमें भागसेन के ऊपर चारोंमार से (मे पढ़ाई करी त कि फूलके निमिच पसी सरपर चढ़ाई करते हैं । ३ । CHAPTER LXXV1 Banjaya said, "Sarrounded by wray cosmics and alono, Bhim said to his driver, " Tako me into the army of Daryodban. ako lapte, for Indi destroy the song of Dhritrashtra." At bis onder the driver took him within tho army, The Keuratas opposed his entranco with to help of their cars, olephant, hors and foot. They shower their band airsorer the car of Bhind and tle latter cut thoir arrowa into t*o od throw purus,'t. Blaia by Bhim't Arrons, tho elephants borte and car warrion hsda a tremendogs poik. Voanded by his arrots, Le marriansattacked him on all sideathta Liris falling antteen Tiru कर्णपर्व Karan Paray (6667) स भीमः प्रादुश्चक्रे बेगमनन्तधेगः । यथान्तकाले क्षमपन् दिधक्षुतान्तकृत् काल इयापदण्डः ॥ ७॥ तस्याहिगस्य रणेऽतिधेगं नाशफ्नवत् पारयितुं स्वदीयाः । व्या ताननस्यापततो पथैव कालस्य काले हरतः प्रजावै ॥ ८॥ ततो पल भारत भारतानां प्रदह्यमानं समरे महात्मना । मीत दिशोऽर्पित भीमनुग्नं महानिलेनाघ्रगणो यर्थव ॥९॥ ततो धीमान सारथिमप्रवद्विली स भीमसेनः पुनरेवदृष्टः । स्तानिंजानीहि स्वकान परान् पा रथान् ध्वजा श्वापततः समेतान् ॥ १०॥ युध्यन्, ह्यहं नाभिजानामि किचिन्मा सैन्य स्वछादयिध्ये पृषकैः । अरीन् विशोकाभि निरीक्ष्य सर्वतो रयान ध्वजाप्राणिदुनोमि ये भृषम् ॥ १९ ॥ राजातुरो नागमकिरीटी पनि दुःखान्या मावोऽस्मि सूत । एताव सारथे धर्मराजो यन्मां हित्वा यातघान् शत्रुमध्ये । नैन जीप नापिजानाम्प जीव धीमत्सु षा तन्ममाघातिदुः सम् ॥ १२ ॥ सोऽहं द्विपत्री इसकेपीछे भापकी सेनाके सम्मुख जानेपर उस अत्यन्त वेगवान भीमसेनने अपने | वेगको ऐसा प्रकट किया जैसे कि प्रलयकाल में सबके मारनेका अभिलापी दंड- पारी जीवोंका ना शककाल जीवोंको मारताहै । ७ । तव भापके सब शूरवीर यद्ध में उस वेग वान के वंगके सहनेको ऐसे समर्थ नहीं हुये जैसे कि समय पर सबके भक्षण करनेवाले कालके वेगको सव सृष्टिके जीव नहीं सहसक्ते हैं । ८1 हे भरतवंशी इसके पीछे भरतवंशियों की सेना युद्ध में उस महात्मा भामसम के हाथ भस्मीभूत भयभीत और महाघायल होकर चारों दिशाओं में ऐसे विह्वल होकर भागी जैसे कि वायुसे बादलों के समूह पलायमान होत हैं । ९ । इसके पीछे पुदिमान भामसेन प्रसन्न होकर सारथी से फिर बोळे हे सारथी तुम अपने और दूसरों के शूरवीरों के भिड़े और गिरते हुये रप और ध्वजाभों को जानो । १ । युद्ध करताहुआ कुछभी नहीं जानता हूं क्योंकि मैं भ्रांतिसे कहीं अपनी सेनाको ही पृपक नाम वाणोंसे न छाद हे विशोक सब ओरसे शवों को देख कर मेरास्य ध्वजाकी नोकको अधिक कंपायमान कारताह । ११ । विदित होताहै कि राजा रोगमें ग्रसित होगयाहै जो भवतक अर्जुन नहीं मापा हे सूत मैंने बड़े: २ कठोंको पायाहै हे सारथी यहबढ़ा दुःखहै जो धर्मराज मुझको शत्रुओं के मध्यमें छोहार Bhim destroyed the opposing warriors like Yam the wielder of staff. They could not resist him like the all-destroying Death. Younded, fallen and terrified, your warriors scattered in all directions as clouds are dispersed by the wind, Wise Bhim' was pleased at this and again said to the driver, " Have an eye on the falling banners and cars, 10. I have no idea of friends and foes in the fury of the fight See that I donot shower my arrows over my owo army. The point of my banner is trembling excessiyely in the midst of enemies, I think the king is taken up with disease. Arjup has not returned and I havo suffered much sincs Yudhishthir left me in the midst of (6668) Mahabharat [६६६८) ग्यमुदप्रकल्प निनाशयिष्ये परमप्रतीतः । एवं निहत्याजिंमध्ये समेत प्राव भविष्यामि सह त्ययाच ॥ १३ ॥ सर्वास्तुणान सायकानामवेक्ष्या शिष्टं स्यात सायकानां रथेमे। का पा जातिः किं प्रमाणञ्च तनात्वा व्यक्त तन्ममाचक्ष्व सूत ॥ १५॥ विशोक उपाच । षण्मार्गणानामयुतानि धार क्षयश्च भल्लाध तथायुतायाः। नाराधाना दे सहसेच धीर श्रीप्येव च प्रदाणां स्म पार्थ ॥ १६ ॥ अस्त्यायुधं पाण्डया पशिष्ट न यद्वरेच्छकट षड्गीयन । पतद्विद्वन मुञ्च सहस्रशोऽपि गदासिपाहुद्राये पञ्च तेऽस्ति ॥ ॥ १७ ॥ प्रासाश्च सड़गाः शक्तयस्तोमराव मा भैपीस्त्वं सक्षया वायुधानाम ॥ १८ ॥ भीम उधाच । सतायेम पश्य भीमप्रमुक सछिन्दादिः पार्थि घानाशुवेगैः । छन्न पाणेराइवं घोररूपं नादित्यं मृत्युलोकेन तुल्यम ॥ १९ ॥ अद्यत विदितं पार्थिवान भविष्यति ह्याकुमार सूत । निमग्नो वा ममेरे भीमसेनो चलागया अब मैं उसको वा अर्जुनको जीवतानहीं जानताहूं मुझको यही बडाकप्टर । १२ । सो मैं प्रसमा चित्त उस वडी साहसी शत्रुओं की सेनाको नाश करूंगा इससे अब मैं युद्धभूमि में सम्मुख मानेवाली सेनाको मारकर तुझ समेत प्रसन्न होऊंगा । १४ । हे सूत रथ में शायकोंके सब तूणीरों को देखकर और यह जानकर कहो कि शायक कितन वचे हैं और जो शायक वहैं वह किसकिस प्रकार के भौर संख्या कितने हैं। १५ । विशोक बोला हे वार मार्गणनाम वाणों की संख्या तो साठ हजारहै और भुर वा भरलोकी संख्या दश हमारहै और हे वीर पांढर | नाराचोंकी सरूपा दो हजारहे और प्रवर नाम वाणों की संख्या तीन हजार है । १६॥ इतने शस्त्र वर्चमान जिनकोछ वैलों मे युक्त छकड़ाभी नेलचल हेद्धिमान शत्रों को छोड़ी और हजारों गदा खड्ग वा भुजारूपी धन भापके पास वर्तमान है। १७ । मास, मुद्गर, शक्ति और तोमर भी : हैं तुम शखोंकी न्यूनता और खर्च होने का भयमतकरो। १८। फिर भीमसेनके चलाये हुऐ राजाओं के छेदनेवाले बड़े वेगवान घाणों से गुप्त होने वाले युद्ध में घोररूर छिपोहुई मूर्यवाली संसारकी मृत्यु के समान इसयुद्धभूमि देखो । १९ । हे सूत अब राजाओं के बालकों तकको भी यह मालूम होगा कि अकेला भामसेन युद्धमें डूवगयाथाउसने कौरवोंको विजय enemies. I donot know of the life or death of botd Yudhishthir and Arjun and at therefore much grieved.11, I shall destroy the enemy's army and shall please you and myself by doing 90. Have a look at the arrows and hee how many of each sort remain." 15. Vishok replied, "The margan arrows are sixty thousands in number; there are ten thousand darts; tho naraches are two thousand the number of pravara is three thousands. There are more than enough weapons to be carried'in a car drawn by vix oxen. We have thousands of maces, swords, prases, clubs, spears and tomars Never fear that your weapons will run short." At Ithis Bhim' covered the whola field'of battle with, कर्णपर्य Karan Pary [666001 होका कुरून प समरे व्यजेषीत् ।।२०।। सर्प संख्ये कुरवो निष्पतन्तु मां पा लोका कतिपत्वाकुमारम् । स नेफस्तानदं पातयिष्ये ते या सर्वं भीमसेन तुदन्तु ॥ २१ ॥ आशास्तार कर्म चाप्युत्तम ये तन्मे देवाः फेवलं साधयन्तु । भायाविहाघार्जुनः शघाती शस्तण यन्न इयोपहूतः ॥ २२॥ ईशस्वैतर्ता भारती दीर्यमाणामेते फस्मा विद्रयन्तनरेन्द्र र व्यकं धीमान सव्यसाधी नरामयः सय घेतच्छादयत्या वापैः ॥२३॥ पश्य जांच यतो विशांक गागान् हयान् पत्तिसंघाध संख्थे । रधान विफोगान शरशकिनाडितान पश्यस्वताप्रथिव मूत २४ ॥ मापूर्यते कौरपी चाप्यमी सेना हासी सभा हन्यमाना । धनम्नयस्यानितुल्यवेगस्ता शरैः कामचर्हिवाजः ॥ २५॥ पद्रवन्ति सा रथाश्वनागाः पदातिसंघानमध्यन्तः । समुसमानाः कौरवाः सर्व एव द्रयन्ति नागाध दायभीताः ॥ २६ ॥ हाहाताप फिया । २० । अब सब कौरवलोग मेरे ऊपर चढ़ाईकरो और दृद्धोंसे वाळक पति सब लोग मेरायश बखानकरो न भकेलाही उन सबको मारूंगा अथवा वह सब मिलकर मुझ भीमसन को पाडित करो । ११ । जो देवता कि मेरे उत्तमकर्म के उपदेश करनेवाले हैं वह सब केवल मेरी इतनी साधना करें कि वह शत्रुओं का मारनेवाला अजुन मेरे ध्यानसे शीघ्र ऐसे आजाय जैसे कि यामें बुलायाहुमा इन्द्र अ.ताहै । २२ । भरतवंशियों की इस सेनाको छिन्न भिन्न देखो यह राजालोग किस हेतुसे भागते हैं धझे विदित होता है कि पद बुद्धिमान् नरोत्तम अर्जन शीघ्रता | से इस सेनाको ढकता चलााता है। १३ । हे विशोक युद्धर्गे ध्वजाभों को और | भागतहुगे हाथी घोड़े और पतियों के समुहाँको देखो हे सत वाण और शक्ती से घायल उन रथियों को भार फैले हुये रथों को देखो । २४ । यह कौरवी सेना भी महापायल और वज के समान धेगयुक्त मनहरी परवाले अर्जुन के पांणों से बराबर गुप्त । २५ । यह रथ घोड़े और हांधी पदातियों के समूहोंको मर्दन कररोहय भागते हैं और सब कौरवलोग भी महा माहितहुये ऐसे भागे जाते हैं जैसे कि यन दाहसे भयभीत होकर हाथी भागत । २६ । हे विशोक युद्ध में हाहाकार करनेवाले his pioiceing arıowe. The postouty of the warriors will know that Bhim, was left alone among the enamics and cpoquered them. 20. Let all tho Kauravas attick mo; 1 shall slay them all avd the ulu and young wall talk of my famo. I pray thu gouls, who lead no ia doing good, to grant me that Arjun the descroyer of tots may como atay nced like India invoked at a sacrifice. Look at the dispersiog arny of the Kauravas. Why ale they running away? I think wise Arjun is coming this way covering the enemy with his arrows. Look, at tho baaneis of the dispersin; slephants, horso aad loot. tha wounded cor-warriors and the dispersin's foot soldiers. The Kaurav arny, wounded by the vajra liko arrows of Arjuu, is running away Ferushing the caus, horees, elephants and foot soldiers. They lly likes lephants in a 'lurning toresta 26. The elephantarata shrieking witil Look ati (६६७१) कर्णपर्ष Karan Parav (8071 पाञ्चजन्य महोईमेतद्विजराजवर्णमाकान्तय पश्योरासिकौस्तुभधाज्यल्पमान विजया खजय ॥ ३५॥ रथामयः समुपैति पा विद्राययन सैन्यमिदं पाषामा सिताम्रवर्णसितप्रयुक्त ईयमहा रपिना बरिष्ठः ॥ ३६॥ ग्यान हयान पतिगांचा सायकैरिवारिपान पम्य पस्यमी यया। तवामुंजगामरराजसा. महापनानीष अपर्णधायुना ॥ ३७॥ चतुः शतान पश्य रथानिमान् हतान् साज़िमतार समरे किरीटिना । महभिः सशतानि दन्तिनां पदातिसादीच तानकरः ॥ ३८ ॥ मर्य समायसि तयाटिकवली निम्न कुरुथिन व महानः। समृरकामसि तात पाहिता घळ तवायुश्च विराय वताम् ॥ ३९ भीम ज्यादा ददानि मामसंध से कटीईई पृथीपर गिरती है और उस अर्जुन के हाथ वाणों से सवारों समेत हाथो ऐसे मारमय जैसे कि रनों से पर्वत चूर्ण कियेजात हैं। १४ । इसोप्रकार. श्रीकृष्णजी के बस महा उत्तम चन्द्रमा के समान वर्णवाले वड़ों के योग्य पांचजन्य सख को देखा भार हृदय में शोभायमान कौस्तुभमणि और वंजयन्तोशालाको भी दिखो। ३५ निश्चय करके रथियों में श्रेष्ठ अर्जुन शत्रुओंकी सेनाको भगाता भेत सदलों के रंग श्रीकृष्णगी से युक्त वड़ों के योग्य घोहों के द्वारा सम्मुख आताई । ३६ । देवराज के समान तेजस्वो आपके छोटे भाई के शायकों से फटेहप रथ घोड़े और पतियों के समूहों को देखा कि यह ऐसे गिररंद हैं जसे कि गरुड़की के मरोंकी वायुसे महापन गिरते हैं। १७ । युद्धमें अर्जुन के हाथ घाई और सार पिषों समेत मारेछुये इन चारसी पोंको दखा और बड़े वाणोंसे भरह इन सातसा हापो पदाती अवसबार और अनेक रथियों को देखो। १८ 1 या महा बली भर्जुन कारों को मारताहुभा तरे समक्षम एस भाता है जैसे कि बड़ा ग्रह पाता है सुर अमीरसिद हो आपके सब सत्रु मारेगये भाएका बल पराक्रम | reins of Arjun's horses. The trunks of the huge elephants, cut down by Arjun's errows, fall like trees and the elephants with their riders are crushed by his arrows like a mountain hy vajra, Look at Panch. jappa the wbito conch of Krishn and the Kaustubh jewel and Vaij. ayanti garland shining on his breast. 35. Surely Arjun the beat of warriors is coming on destroying the foes from his car drawn by white borsus, driven by Shri Krisha. Look at the cars, horses and foot destroyed by tho arrowa of your younger brother of Indra's glory. They are falling dowa lite trees broken by the wind of farur's wiogr. . Look at the four huadrod cars whose horsm and drivers are slain by Arjun. Look at the seven hondreds of large Holoplants, with numerous liorre, fuot and car warriors slain by him. Killing to Kaurave, braya Arjuu is coming towards you liku a go meteor. Your wish is accomplished; for all your enemies are .
6672) lahabharat तुई। प्रियागयाने सारथ सुप्रपन्नः । दासीसतम्यापि त्यांच विंशतिं यदने घेदयसे यिशोक इति कर्णपोण विशोकसंवादे परततोऽध्याय: ५६ ॥ सअप उपाच । धुत्या च रथनिधो सिंहनादय संयुगे । अर्जुनः प्राह गोविन्द शीघ्रं चोदय घाजिनः ॥१३ अर्जुनस्प पचः शुत्वा गोविन्दोऽर्जुनप्रवीत् । पप गच्छामि मुक्षि यधभीमो व्यवस्थितः ॥ २ ॥ तं यान्तमश्च हिमशः सुवर्षमुका मानि जालनः जम्भ जिघांसु मगृहातपनं जपाय देवेन्द्र मियोगमन्युम ॥ ३ ॥ रथावमा मोर आयुदी चिरकाल पर्यपन्त शाद को पारे । ३९ । भीमसेन बोले हे विशोक सारयी में अत्यन्त प्रसन्न होकर सुझको चौदह गांप सी दासी भोर वीसरथदेसाई जो मर्जुनके चिपकी प्रसन्नतापालो वा मुझत करताहै । ४० ॥ अध्याय ॥ ७७॥ संजय बोले कि युदने सिंहनाद और रपके शब्दको मुदकर जोसे बोला कि हे गोविन्दनी शीघ्रही भाप घोड़ोंको झांकिये । १ । गोविन्दजी से अर्जुन के वचनको सुनकर कहलगे कि अप मैं वहींपर शीघ्र पहुंचताई जहाँ भीमसेन निपत है । २ । तुपार मोर शंखके रंगवाले सुवर्ण मोती और मणि जटिन जालों से अलंकृत पोहों के द्वारा जंभ के मारने के इच्छाधान वनधारी क्रोधयुक्त इन्द्र जैसे जाताहै उसोमकार जानेवाले उस अर्जुनको, । ३ । व घोड़े slain; may your life, prowess and greatness le of long standing. Bhim said, " Isball give you fourteen villages, a bunured femalo slavea and twuoty cars, because you have given me the pleasant news o? Arjun's arrival. " 40. CHAPTER LXXVII Sunjaya eaid, “ Hearing the leonine roars and the rounds of i car-rheels, Arjunsaid to Gvind, " Drive the horses faster. " At thir, Govind 'esid, “ 1 shall soon take you to the placo where Bhim is. Bhin then saw Arjun on the car drawa by snow white hors3s, wit, gala.trippings, resaunding with the tyangy of the bow and the " {६६७३) quga ka:«n l'aniv (61079 शरयाठिसाड्या पाणखगमि खुरवनय | संवादयन्तो मधो दिशा सिंधा अयमभ्युदोयुः ॥ ४ ॥ ते पाथस्य न मारिषासो देशपापक्षयण सुयुद्धम् । प्रैलोक्य हलायसरेधासीदयस्य विष्णोर्जपतो पास्य ॥ ५॥ सराईचन्द्र निशितश्च मल्लः शिगंसि तेषां जया च वाहन ॥ ६॥ छपाणि पालम्पजनानि वेतनशनधार যধিৰ স্লিায় ৪ বনুষ যাবি থামমালার যথ মনৰ मपर्णजालाश्तता महागजाः सवेशयन्तीयजगंधकल्पिता: सवर्णपद्धरिषुभि समा বিনা মনি। যখন যা হযখাৰ এনঞ্জ: হালৈ मर्यासपपशुसानमः ।दन यपी पापाजधांसया तथा यथा मरुत्यान्द्रः पल भेदने पुग ॥ ९ ॥ स पुरुषव्याघ्रलय मेन्यमरिन्दमः । भविषेश महावाहुर्मास सागर यथा ॥ १० ॥ तं दृष्ट्वा तायका राजमयपतिसमन्विताः। गनासादिबहुलाः पाण्डक हाथी पदातियों के समूह ओर वागनेभी वा घोड़ों के शब्दोंसे पृथ्वी और दिशाओं को शब्दायमान करते हुय झांधकर रातमने सम्पुख पाया हे श्रेष्ठ उन्होंका भोर अर्जुन का युद्ध शरीर और पागों के पापोंका हरनेवाला ऐसा हुआ जो कि त्रिलोकी के निमिच महाविजयी विप्णुजी और भमुरोंका हुभाथा । ५ । अकेले अर्जुन ने उन्होंके बताये हुये सबछोटेवड़े सखोंको काटकर शुभर्दचंद्र और तीक्ष्ण भल्लासे उनक शिर भौर शुजाओंको भनेक प्रकारसे काटा। चित्र विचित्र वाले व्यजन ध्वना घोड़े रथ हाघी और पतियों समूहोंको भी काटा इसके पछि यह भनेक प्रकारके रूपांतर होकर पृथ्वपिर ऐसे गिर पड़े जैसे कि वायुके वेगस बन गिरपड़ते हैं। फिर मुनहरी जाल युक्त वैजयन्ती ध्वनामों समेत शूरवीरों से अलंकृत बड़े हाथी सुनहरी क्वाणों से विचित्र प्रकाशमान पर्वों के समान प्रकाशमान हुसे। ८ । अर्जुन इन्द्रके वजूकी समान उत्तम वाणास हाथी घोड़े और ग्थों को मारकर को के. मारने की इच्छास इसरीति से शीघ्र चला जैसे कि पूर्व समय में राजावाल के मारनको इन्द्र चलाया । ९ । हे शत्रुसंहारी उस के पीछे यह महावा पुरुषोतम प्रेस प्रापहुंचा लेसे के समुद्र में मगर पुन आता है । १० । rumbling af per whçels, Aujan destroyed the sins of body and soul and fought As Visbny bad done during his conquest of Asyra." Alone be cut, their weapons, and with his arrosa cut off their heads and arms He destruyed fane, standards and horses, cars and plephants in large numbers. They fell down ap garth like trees struck down by. lightning The liuge elophants, defled with gold pets, garlands, bappers and warrior, studded with the arrows of golden feathers, looked lika burning mountaina: Haring slain elephants, horses and cate with his pajra liko artawa, Arjuv advanced to slay Karan 83 Indra, had done to slay Bali. He then entered that Army as an alligator enters the ocean. 10. Your Brme composed of Forse, 190", clephants and 1 6676 Mahabbasit समुशाषन् । ११॥ तेगामापतहां पापंमारायः महामस्त सागरस्पेष भुरघर यथा सात सलिलस्वनः ॥ १२ ॥ सेतु ते पाया व्याघ्रा इस महारथाः द्रपन्त सप्रामे त्यक्त्वा प्राणकृत गएम् ॥ १३ ॥ तेषामाता तब शरषषाणि मुम्ब ताम् । अर्जुनी धमन सैन्यं महायाता घनानि ३ ॥ १५ ॥ तर्जुन सहिता मुस्वारए शे प्रहारिणा । अभियाय मह घासा विल्यधुनिशितः सः ॥१५॥ तानः सह साणि रपधारणाजिनाम । प्रेमामास विशिखयमस्य पद प्रति ॥ १६॥ याय मानाः समरे पाचचापच्युतैः शरैः। तत्र तत्र स्म लायन्ते अपंजात महारथाः ॥१७॥ तेशाचा शतान् वाम् यतमानान् महारथान अजुनो निराितेवांण रनयमसान ॥१८॥ ते वध्यमानाः समर नानालिशितः शरः अजुनं समभित्यज्य अध्धु विशी पश ॥ १९ ॥ शन्दा महानासीत् धता पधिनामुले। महाभ्येष जलधागरि हे रामा रथ भार पनियों से संगुक भनेक हायी घोड़े पर सवारों समेत बड़े प्रसशाचेच भापक शूरवीर इस पांडवक सम्मुख गय अर्जुन की ओर दौड़नाले उनलोगोंके ऐसे बड़े शब्दहुये जैसे कि अपनी उपचता में आनेवाल साद के शब्द होते हैं । १२ । फिर वपात्रों के समान वह सब महारयी युद्ध में अपने माणोंको आशाको त्यागकर उसपुरुषाचम के सम्मुख गये वर्ष अर्जुन ने बन बाणोंको वा करते हुपे आनेवाले शूरवीरों को सेनाको ऐसा शिम भिन्न करोदया जसे कि बड़ा पाप बादलोंको विरविर करदताहै । १४ । उनप्रहार करनेवाले बड़े धनुषधारियोंने रप समूहों समैन उसके सम्मुख जाकर सोणवाणों से अजुनको घायल किया । १५ । इसके पीछे अजुनने विशिषों से हजारों ग्य हाथी और घोड़ोंको यमलोकमें भेजा १६युदमें अर्जुनके धनुपके निकले हुये वाणोंसे घायल ह महारथी भयके उत्पन्नहानेपर जातको छिरगये । १७ । अजुनने इनकेमध्यम उपाय करनेराले चार सो बड़े महारथो शूरवारों को पाणके द्वारा यमलोकमें पहुंचाया दानानाप्रकारके रूपवाले युदणें तीक्ष्णवाणोंसे घायल होकर वह शूरवीर अर्जुनके सम्मुख जाकर दशदिशाओं को भागे । १९ । युद्धमें से भागनेवाले उनलोगों के मे महाशब्दहुये जैस कि पर्वतकोपाकर फरनेशले बड़े बदक माह के शब्डोले Car Warriors, cheerfully opposed the Pandar with a tremendous noise like that of a story $22. Discogsrding all fear for their lives, they rushou like tigara aguinst Arjua, who disparged them with liis arrows 79 the wind disperse the clouds. They wounded bins with their sharp arrows. 15. Arjun sent thousands of cars, horses and elephants, to the region of Yarn with his arrows. Terrified with Arjup's arrowe, thoy slunk away in all directions He sent four hundred of the beat Warriors to the region of you. The karrioix vounded by his arrows Sew in all directiops. Thry made a doise in their fight like a stocam -- 15673 Tierge nuru t'ary मासाथ धोध्यतः ।। 30 तन्तु सेना भू प्रस्ता दायित्वार्जुनः शरैः । मामि भुमा पाथः प्रतानीकाय मारिष ॥ २१॥ तस्य पादा मदानासीत परानभिमुखस्य थे। गरस्येव पततः परगा व रंग ॥ २२॥ तन्तु शमिश्रुरप भीमसेनो महाबलः । बभून परमप्रीत पादनलालसः ॥ २३ ॥ प्रत्येष पार्थमायान्तं भीमसेनः प्रतापभन्। स्थरता प्राणान् महाराज सेना तय मम ॥ २४ ॥ स वायुधीर्थप्रतिमो षायुधेग समो जपे। वायुषपचरद्धीमो पायुपुत्रः प्रतापवान् ॥ २५ मार्यमांना गजेन्द्र सेना तब विशाम्पते । उपभ्राम्यत महाराज भिषा नौरिय सागरे ॥ २६ तान्तु सेना तक, श्रीमी शेप पाणिलाधयम । शोरवयकतानः प्रेपयिष्यन् यमक्षयम् ॥ २७ ॥ त 'भारत सीमाप नलं .प्यतिमानुषम् । व्यस्यन्त रणे योधाः कालस्येष युगक्षये ५.२८ तार्दिती भीमपलान् भीमसेनेन भारत । दृष्ट्या दुयोधनो १.९० हे श्रेष्ठ फिर अर्जुन वाणों से उस सेनाको खूब छेदकर और भगाकर कर्ण के सम्मुखगया । २१ । वही उसंशत्रुजेता अर्जुनका ऐसा महाशन्दहुभा जैसे कि पूर्वसमय में सर्पके खानको आनेवाले गरुड़का शब्दहोताहै । २२ । अर्जुन के देखनको अभिलापी महाबली भीमसेन उस अर्जुन शन्दको मुनकर बहुत प्रसन्न हुभा । ११ । हे महाराज उस प्रतापवान भीमसेनने मातेहुये अर्जुनको मुनकर अपने भाणी की आशा छोडकर भापकी सेनाका महनकिया । २४ । पराक्रम में वायु के समान शीघ्रचलने में पापकी तीव्रतांके सदृश पायुमा पुत्र प्रतापी भीमसेन वायुके समान मूमनेलगा । २५ । हे महारान रामा राष्ट्र उससे घायल और पाहताकर भापकी मेना ऐसे गिरपड़ी जैसीक टूटीहुई नौका सागरमें गिरती हैं । २६ । फिर अपनी इस्तलाधवताको दिखाते सर्वको यमलोक में पहुंचाते हुये उसभीमसेनने पारम्बार उग्र वाणों की वर्षाकरके उस सेनाको काटा २७ । हे भरत- वंशी उसयुद्ध में महाबली भीमसेनके भटुंत माश्चर्यकारी पराकमको देखकर सब लेग ऐसे चषकर मारनेलगे जैसे कि मलयकालमें कालके पराक्रमको देखकर सब भपभोलकर फिरते हैं । २८ । हे भरतवंशी समकार भीमसेनके हाथसे पीड़ामान flowing through a mountain crovicta. 20. Having routed the larguurmy, Arjun encountered Karan. Tbo pouse at the coming of Asjun was like that of garur at his coming down to eat ter fents. Desircus of seeing Arjun, mighty Bhimsen was much pleased to hear that noise. Hear. ing the sound of Arjun's arrival, Bhimsen, without any tear for his own life, began destroying your army. Buim the son of Vayu, live the latter in prowess and velocity, began to. roam hke him.25. Wonoded, by his weapons, your warriora full down like a buat broken in the midst of water. Showing . the i dextarity of his hand, he casy and killed them with his arrows Beeing the prowess of Bhip, ling -. 1 G674 Bfahabharat (१६७४) समुष ! ११॥ मानतां पार्यपारावः सुमहानमत सागरस्येव सुर घर यथा सात सलिलम्बनः ॥ १२ ॥ से तु तं पुरुषायाधं व्याघ्रा इष महारथाः । समय द्रधन्त सप्रामे त्याचा प्राणत पर . १३ ॥ तेषामाश्ता तत्र शरपाणि ga ताम् : अर्जुना व्ययमम सैन्यं मावात यनानि 4 ॥१५॥ तेऽर्जुन साहता मुस्वारप शे मारिणः । मभिणय यह पासा विज्यानाशतः शरैः॥१५॥ नताजना सह साणि रपवारणाजिनाम । प्रेषयामास विशिखयमस्य सदले प्रति ॥ १६॥ ते वाप' मानाः समरे पार्थचापच्युतैः शरैः। तत्र तत्र स्म लीयन्ते भगवान महारथrntan तेषावान वारान् यतमानान् महारथान ।अजनो निशितवाणरतपयमसनम ॥१॥ ते वध्यमानाः समर नानालिशिक शरः मजुनं समभित्यज्य इक्षु शिशो पश १९ ॥ ते शब्दा महानासीत् यतां घधिनीमुखे। महोयम्येष जलधागरि हेरामा रथ भार पतियों से संयुक अनेक हायो घोड़े और सवारों समेत बड़े प्रभात पापके शूरवीर इस पांडवक सम्मुख गय अर्जुन की ओर दौड़नेपाले उनलोगोंके ऐसे बड़े शब्दहुये जैसे कि अपनी उत्पत्तता में आनेपाल सधद के शब्द होते हैं । १२ । फिर, क्यानों के समान वह सब महारथी युद्ध में अपने प्राणोंको आशाको त्यागकर उमपुरुषाचम के सम्मुख गये वा अर्जुन ने इन बाणोंको यपी करते हुये आनेवाले शूरवारों को सेवाको ऐसा विष भिन्न करदिया जैसे कि बड़ा पाप पादलोंको विरविर करदेताई । १४ । उनप्रहार करनेवाले बड़े धनुषधारयांने रथ समूहों समेत उसके सम्मुख जाकर वीक्ष्णयाणों से अजुनको घायल किया । १५ । इसके पछि मजुनने विशिखों से हजारों ग्थ हाथी और घोड़ोंको यसलाको भेना १९६॥युद्धमें अर्जुनके धनुपके निकलहुये वाणोंसे घायल यह महारथी भयके उसनहानेपर जहांतहां छिगये । १७ । अर्जुनने उनकेमध्यम उपाय करनाले चार सौ बड़े मारयो शूरवारों को वाणां के द्वारा यमलोकमें पांचाया थानानाप्रकारके रूपवाले युदमें वाणवाणासे घायल होकर बह शूरवोर भजुनके सम्मुख जाकर दशदिशाओं को भागे। १९ । युद्धमें से भागनेवाले 'उनलोगों के मे महाशब्दापे जैसके पतिकोपाकर फाले बड़े नदीक माह होते car warriors, cheerfully opposed tho Paaday with a tremendous noise like that of a storrmy sas Disregarding all fear for their lives, they rushed like tigars against Arjun, who disporazd them with his arrows As the wind drepurses the clouds, They wounded bit with their sharp arrowr. 15. rjua sent thousands of cars, horses and elephants, to the region of Yarn with bis arrows. Terrified with Arjup's arrowe thoy hlunk away in all directions He sant four hundred of the beac Warrior to the region of Yaw. The warriors wounded by bis arrows few in all direction. They made a poise in their tight like a strona 15675 (६६७५) कर्मपर्य Marinary मासाबाध्यतः ॥ २०॥ तान्तु सेना भृशं प्रस्ता द्रावविश्वार्जुनः शरैः । प्रायोनि मुखः पाय: सहानीकाय मारिष ॥ ३१॥ तस्य शया महामासीत् परानभिमुखस्य थे। गारस्येव पततः पनगा वर्ष पुरा ॥ २२॥ तन्तु शब्दममिथुत्य भीमसेनो महाबलः । पभूष परमप्रीत पानिलालसः ॥ २३ ॥ अवैष पार्थमायान्त भीमसेनः प्रतापशन् । स्पारमा प्राणा महाराज सनाय ममई ह॥ २४ ॥ स धायुधीर्यप्रतिमो आयुधेग समो जये । वायुषद्वपवरहीमो वायुपुत्रःप्रतापया ॥ २५ ॥ तमामाना गजेन्द्र सेना तविशाम्पते । स्याम्पत महाराज भिषा नौरिष सागरे ।॥ २६ ॥ तान्तु सेना तक, श्रीको दर्शपर्व पजिलाधवम् । शरदचकत्तप्रैिः प्रेयिष्यन् यमक्षयम् ॥ २७ ॥ त 'भारत भीमस्य नलं प्रतिमानुषम् । व्यस्यन्त रणे योधाः कोलस्पेष युगक्षये ॥ २८ ॥ तवाहितार भीमपलान् भीमसेनेन भारत । इंधा दुर्योधनो ११२० । हे श्रेष्ठ फिर अर्जुन वाणों से उस सेनाको खूब छेदकर और भगाकर धर्म के सम्मुखगया । २१ । वहां उसंशत्रुजेता अर्जुनका ऐसा महाशब्दहुधा जैसे कि पूर्वसमय में सर्पके खानेको आनेवाले गाहका शब्दहोताहै । २२ । अर्जुन के देखनेका अभिलापी महाबली भीमसेन उस अर्जुन शन्दको सुनकर बहुत पसम हुमा । २५ । हे महाराज उस मतापवान भामसनने मातेहुये अर्जुनको मुनकर । अपने प्राणों की आशा छोडकर भापकी सेनाका महनकिया । २४ । पराक्रम में वायु के समान शीघ्रचलने में बाकी तीव्रतांके सदृश वायुका पुत्र प्रतापी भीमसेन वायुके समान धूमनेलगा । २५ । हे महाराज रामा राष्ट्र उससे घायल और पीड़िताकर भापकी मेना ऐसे गिरपड़ी जैसीक दूढीहुई नौका सागरमें गिरती हैं । २६ । फिर अपनी हस्तलाधवताको दिखाते सबको यमलोक में पहुंचाते हुये | उसभीमसेनने परिवार उन बाणों की वर्षाकरके उस सेनाको काटा २७ । हे भरत. वंशी उसयुद्धमें महाबली भीमसेनके भतुत प्राश्चर्यकारी पराक्रमको देखकर सब लोग ऐसे चक्कर मारनेलगे जैसे कि प्रलयकालमें काल के पराक्रमको देखकर सब भयभीतकर फिरते हैं । २८ । हे भरतवंशी इसमकार भामतेनके हाथ से पीडामान Howing through a mountain crovice. 20. Having routed the languarmy, Arjun encountesed Karan. The noise at the coming ot As juo was like that of garur at bis coming down to eat terpents. Desis cus of seeing Arjun, mighty Bhimsen was much pleased to hear that poise. Hear. ing the sound of Arjun's arrival, Bhimsen, without any tear tor this own lite, began destroying your army. Buim the son of Vayu, live the latter in prowess and valacity, began to, roam like him. 25, 'Yonoded, by his weapons, your warriora fell down like a buat broken in the midst of. Frater. Showing the dexterity of his hand, hq.cat and killed them with his arrows, Seeing the prowoss of Bhixho 6676) Mahabharat राजा इदं वचनमवीत् ॥ ६६ ॥ सनिकांच ग्रहेण्यासान योधांध भरतर्षभ। समादगद्रणे सर्वान् हरा भोगमिति स्म ह । तस्मिन् ते ६ पम्प पाडु सन्याशेषतः ॥ ३० ॥ प्रतिगृह्य च नामाज्ञां तव पुत्रस्य पाधिपाः। भीमं प्राछादय मासुः शरवः समन्ततः ॥ ३२ ॥ जय बालाजन् पनि जयगृद्धिगः । रथा हयाच राजेन्द्र परिपत्रवृकोदरम् ॥ ३२ ॥ सतः परिवृत्त शिरो राजन् समन्ततः शुशुभे मरतबाठो नक्षत्रैरिय चन्द्रमाः ॥ ३३ परिवेशो यथा सोमः परिपूनों राज ते। ३४. स रराज तथा सजथे पनीयो नरोत्तमः निशिर्ष महराज यथा हजियार ॥ ३५ ॥ तस्या पार्थः स शर, वृष्ट समारजन् । मोधरकेक्षणाः जरा हन्तुकामा को दरम ॥ ३६ ॥ ता विधार्थ महा सेनां शरैः सनतपर्वमिः । निक्षमाम रवाहीमो मत्स्यो जालाविधान्भसि । ३७ ॥ भयानक पराक्रम वाले बड़े शरीरों को देखकर राजा हुय्योधन इंसपचनको बोला । २९ । कि हे महावली मूवीर लेगो म मामान को मारी इसी मामतेन के मरनेपर मैं सा पांडयोंकी सेनाकामी मृतरूपही मानताई । ३० । तर तो सब राजाओं ने प्रापके पेटेकी आज्ञाको अंगीकार किया और भीमसन को चारों ओर से पाणीकी से आच्छादित करदिया ।३१ । हे राजा बहुत से हाथी घोड़े और विगपभित्तापी रथारून मनुष्यों ने मामतेन को घेलिया । ३२ । तर उनसरों से चारोंओर को घिराला यह पराक्रमी भीमसेन महा शोभायमान हुमा जैसे कि नक्षत्रों में शोभायमान चन्द्रमा पूर्णमासी के दिन अपने मण्डल से युक्त होकर शोनित होताहै । ३४ । उसकार वह दर्शनीय नोचा भीमसेन भी युद्ध में शोभायमान हुमा हे महाराज जैसा अर्जुन पैदी यहभीर इसमें भेदनहीं ॥३५॥ कापसे रक्तनव भीमसेन के मारनेके उत्मक उनसव शूरवीर रागागोने वाणों की पाउस के उपरकरी । ३६ । भीमसेन टेढ़े पदाले वाणोंसे उस बड़ी सेनाको चीर कर युद्धाम से ऐसे निकलगया जोकि जलकी मछली जलके जालमें से निकल नाती हैं। १७ । हे भरतवंशी भनिन ने मुख न मोड़नेवाले दशहनार हाथी walivis sere afraid of him as it he wen Death at pralaya. Seeing |-his great warriors wounded by Bhim,.Duryodlikn said, " Brav७ warriurs, slay Bhim. . I think that you will be able to dostroy, all tho Pandave way, it you can alayım. 30. All the kinys obeyed his urders dud worco Bhius with arrows liom all sides, Surrounded by elem, usghty Buimsen looked glorious like the moon surrounded by' stars. Huts surely as brave as Aijun. 35. Vith eyea tel in anger, llis Warriors deuous of slaying Buim shovered thoir.arrows.ating but tiu biuko chioaga the.dists and cape out like a fish from the sumeshes of a neta 37. He or ten thousands ot elephants, two कर्णपर्ण Karan Parv (6677.1 हस्वादशसहस्राणि गजानामनिधर्चिवाम् । नृणां शतसहने देवेशते चैध भारत ॥ ३८॥ पञ्च चाश्वसहस्राणि रयानां शतमेव च। हत्या प्रास्यन्दयन्द्धीमो नदों शोणि तसाहिनीम् ॥ ३९ ॥ शोणितोदा रथावर्ती हस्तिग्राहसमाफुलान । नरमीनाश्वनकान्तां केशशेषलशालाम ॥ ४०॥ संविधभुजनागेन्द्रां बहुरत्नपहारिणीम । अरुमाहा मज्ज पडून शीर्षापलसमावृताम् ॥ ४१ ॥ शरचापलपां भीमां गदापरिधपन्नगाम । सछय ध्याजोपतामुणोषधर फेनिलाम् ॥ ४२ ॥ हारपनाकराञ्चैव भूमिरेशभिर्मालिनीम् । मार्यवृत्तपता संख्यं सतरा भीरुदुस्तराम ॥ ४३ ॥ योधग्राहयती सख्ये पहन्ती पितृ सादनम् । क्षणे पुरुषव्याघ्रः प्रावयत निम्नगाम.॥४५॥ यथा वैतरणीमुमो दुस्तरा मझतात्मभिः । तथा दुस्तरणी घोरा भीरूणां भयपनीम् ॥ ४५ ॥ पत्तो यतः पाण्ड दोलाखदोसी मनुष्य । १८ पांचहजार घोड़े और सौ रधियोंको मारकर रुधिर के प्रवाहवाली नदीको बारीकिया। १९ । जिसमें रुधिररूप जल स्वरूप भ्रमर चक्र हाथीरूप ग्राहों से भयानक मनुष्य रूपमछली घोड़ेप नक और बालरूप शयल और सावलथे । ४० । और बहुतरत्नों की हरनेवाली मूंढकटे हाथियों से व्यास जघारूप ग्राहों से भयानक मज्जारूपी पंक और शिररूप पत्थरों से संयुक्त थी। ४१ । धनुप, चायुक, तूणीर. गदा, परिघ, ध्वजा, छत्ररूपी इंसों से युक्त और उणीप अर्थाद पगड़ीरूप झागराली । १२ । हाररूपी कमलों के वन रखने | वाली और पृथ्वी की धूलीरूप तरंगों की रखनेवाली युद्ध में उत्तम पुरुषों के चलन रखनेराले पुरुषोंसे सुगमतासे पार होनेके योग्य भयभीतोंको दुर्गम । ४३ । शूरवीर रूप ग्राहोंसे पूर्ण युद्ध में पितृलोक की बोरको बहनेवालीपी ऐसी उग्र अजुन नदीको इसपुरुषोत्तम भामसनने एक क्षणमात्रही में जारी करदिया ! ४४। जैसे कि अशुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुषों से महादुस्तर रूप वैतरणी कहातीहै उसी- मकारइसकोभी महाघोर दुःख और भयकी करनेवाली कहा । ४५ । बहरथिोंमें श्रेष्ठ hundred thousands of men, five thousand hoiss and hundred car-warriors, and caused a river of blood to flow on the field, 'having blood for water, cars for eddics, elephants for crocodiles, men for fish, Lurses for alligators and hair for weeds. 40. It carried with it jowels, trunks of elepiacts and thigls, and had fat for mud and heads for stones. It was full of bove, whips, quivels, maces, clubs and standarda. Shados floated over it like flights of sans and head gears wero liko foam. Having garlards for the forest of lotusas, the dust, of earth for currentz easy to be crossed by the virtuous and difficult to the timid, full of warrior alligators and leading to the region of the dead, thio waderful river was created by mightý Bhim in un instant. It was difficult to ba crossed by the ill-naturol, like the famous Vaitarni. 45. That brave warrior killed thousands in what " : 11. UT - ... (6678) Mahabharat (१९७८) प्रदियो स्यामः । ततस्ततोपाठयत पोषाद : I पंच दवा एवं कर मामले मयुगाइयोधनी महायज गर्मि यमनपात ..४७ ॥ जय मातुल संप्रामे भीमसेन महायज्ञम । अस्मिन जिते हित मम्मे परिमेय महाप लम ॥४८॥ ततः प्रायोन्महाराज सोवलेयः प्रतापपान । रणाम महशको माहाभिः परिवारिता समाप.संग्रामे मीम मी पराक्रम्म् । पारयामास तरी. वेलेप मकरालयम॥ ५० ॥ मम्पद ते मीमो पाप्यमाणः शिवः गौः एकुनिलस्य | राजेन्द्र वामपा उनान्तरे पयामास नावामुक्मपुंषान् शिलाशितान् ॥ ५॥ धर्म भिरवा तु ते पोग: पाण्यस्य महामना म्यमज्जन्त महाराज कारणाससः ॥५२॥ सोतिषियोरण माना गरें रुपमषिभूषितम् । प्रेषयामास सासा सोषलं प्रति भारत ॥५॥ माया यो कुनिः शाप सिरुन सा राजन कृत। एस्तो.मापनः । ५४। तस्मिनिपतित मूमो, भीमः यो विशाम्पते । अधिक, परिवानस जिस ओरहोकर निकाला उस ओरके सासाही गरवारों को मारा ४६। महारान इसतिस बदन भीमसेनके किंपहुये कर्मको देखकर वोपन बानीसे पारन वोला । ४७ हे. मापानी इस बड़े पराक्रमी भीमसेन, को युबमें तुम विजयकरो इसके विजय होमानेपर में सब पायडवी सेनाको विजय, किया मारी | मानता.। ४८ हे महाराने इसके अनन्वर भाइयों समेत बढेमारी युद्ध करने को- उत्सुक भवापवान शंकुनी चला ।।२। उस वीरने युद्धमें भयानक पराक्रमी भीमा सेन को पाकर उस को देते रोका जैसे कि समंद्रकी मर्यादा समको रोकलेती है। 1५1 लीलयों से रोकामा भीमसेन उमकी भोर को लौटा और मानाने, हाय भोर छातीपर गुनहरी पुंखगले तीक्ष्णपार नाराचोंको चलाया । २१॥ फिर वह ककपस . से जटित घोर वाण महात्मा पंडिव भीमसेन के कवच, को। काटकर शरीर में जुनगये । ५२ । फिर युद्ध में अत्यन्त घायल उस भीमसेन ने। | शोधयुक्त होकर मुवर्ण जटित वाण को शकुनी के ऊपर चलाया। ५।। हे राजा शत्रुसंतापी इस्तसापती महावती शकुनी ने बस मातेहुपे घोर वाण की सावखपर कराया । ५४ राजा उस वाण के पृषी में गिरनेपर कोपयुक्त हसतऽये erer diruation de yoktor Szing the propose of Bhim, Duryodia. aaid to shakuri, M.Couquer mighty Bhim, uncle , I think that all:) the Pandav army will be easy of conquest phon you here couquered him, " At this, brate Skakuci, with his brothers, went on to fight. Laring fougd Bhim uf dreadful propesa, ho chocked bíta as zbo coast chocks the Oscara 50. Chocked by sharp arrows, 'Bbita Eurood Lowards him, aad Shakuai discharged his sharp arrows at his arms sad breast. Thp Crosdful arrowin, Gitted with Kook feathera pierced she xmour of Bhimand entered his body. Exceedingly rounded:: Bhim discharged a gold decked arrow at Shukudi; but the latter cut । - कर्णपद Karan Parariatr. -60679) मल्लेन सीवलस्य इसभिव।। ५५ ॥ तदपास्य धनुश्छिम्नं सौबलेयः प्रतापवान् । मन्य समाप न धनुर्भलाय पोय ॥ १६ ॥ तेस्तस्य तु महाराज मन्दः समतपभिः मान्यांसारपि द्याछत माम सप्तभिरेव च ॥"५७ जमेकेन बिच्छदै छ माया विमरते। चतुर्मिमतुरो चाहान् विम्यान मधलात्मजः ॥ ५८ ॥ ततः बुद्धी महागजे भीमसेनः प्रतापवान् शक्तिनिक्षेप समरे हमदण्डामेयरमथीम ॥ ५९॥ सा भीनमुजनिर्मका नागजिहयेव वाचलानिपपात रणे तर्ण सौधनस्य महामRE ॥६९॥ ततस्तासेप संगृह्य शक्ति कनकभूषणाम् । भीमसेनाय चिक्षप कुखरूपो शिां पते ॥ ३१ मा निर्मिग्र भुज सायं पाएरषस्य महात्मनः । निनुपात तदा भूमी अपा विनमश्स्यतो ॥६॥ मपोत्कृष्ट नहाराज धाराष्ट्रः समन्ततः। न तु तं मष भोमः सिंहनाद नरस्विनाम् ।।१६३ ॥ अन्वरगृह्य धनुः सज्यं त्वरमाणो महाबलः महर्चा दिव राजेन्द्र पादयामास सायके । सोषलस्य पलं मध्ये पावामान महाबलः भीमसेनते भल्लसे शकुनो के धनुषकोकाटा ।५५ । फिर मतापवान शकुनीने उसधनुष को डालकर प्रेगसे दूसरे धनुष और सोलह भल्लोंको लेकर उन टेदे भल्लोंमें से दो भरलों से उसके सारथी को और सात भरलों से भीमसेन को घायल किया फिर एकसे घना को भार दो अल्लों से इसको काटकर सौवलन्ने चार वालों से चारों घोड़ों को पाक किया । १८ । इसके पीछे क्रोपयुक्त मतापी भीमसनने पदमें मुनापी दगडवाली शाकि को फेंका । ५९ । भीमसेनं की भुनासे छोड़ी हुई वा सपको मिला के समान पचल शक्ति युद्धमें शीघही महात्मा शकुनाके ऊपर गिरी । ३१ ! इसके पीये कोपरुप मुनी ने उस मुरण से अंतकृत शक्ति को लेकर भीमसेन के ऊपरफेंका । ६१ | तब वह महात्मा पाण्डवको बामवना को छेदकर गली पर ऐसे गिरपड़ी जैसे कि भाकाश से गिरी हुई बिजली होता है । ६२ । इसके पीछे धृतराष्ट्र के सड़कों ने चारों ओरसे बड़ा शब्द किया फिर उन वीरों के सिंहनाद को न सहकर बड़े भारी मलकृत धनुप को लेकर अपने जीयन की भाषा को त्यागकरके पद में एक मुहूर्त मेंही शकुनी को सेना को शायकोस दक He down into seven parts. At the fall of that arrow, Bhim, smiling in rage, cyt asunder Sheknis' bor. "He dropped the broken boy and taking up ynother, with sixteen' darts, wounded the driver with two, Bhim vila seved his standará yith pas and baving cut his ymbrella pitui'two, wounded hig hoses yaith four arrow.. Ther' wighty Bhim, auch ènpeged, burled his spear with the golden fraddle: [He ahap spear, like a serpent's tougue, discharged by Bhim foll dowp 'upun Sbakuni. $p. The latter seized it ip his hand and sent it bpok towards Bhim, and piercing Bhim's arm, it fell down on'esttḥ }iks lightuing: At this, tho bors of Dpritrashtro óriod with joy. Bhim could not bear their leopine roaza sad covered' dbakuni's. army with ..............
.4t-..--- Mahabharat (66781 (१९७८) यः प्रविष्टो रयासमः। ततस्ततोपातयत बोधान तहy.lyष्ट्या इंदं कर्म भीमनेन मयुग। दुर्योधनी महाराज शकुनि पायमंधीत ४७ ॥ जय मातुल संप्रामे भीमसेन महावलम । अस्मिन् जिते जितं मन्ये पाण्डवं महाप कम् ॥ ४० ॥ ततः प्रायोन्महाराज सौषलेयः प्रतापवान् । रणाम महते, पाको माडमिः परिवारितः स समासाद्य संग्रामे श्रीमं मामुपगक्रमम् । धारयामास तंग वेलेय मकरालयम.१,५०॥ मन्यवचट्ट व मीमो वायमाणः शितः घर शकुनिलस्य राजेन्द्र धामपा वनान्तरे। प्रेषयामास नाचानुक्मपुंसान शिलाशितान ॥ ५ ॥ धर्म भित्वा तु ते पोराः पाण्डवस्य महामनः यमज्जन्त महाराजे काहणधाससः ॥५२॥ सोतिषियोरण मामः गरे रुपमविभूषितम् । प्रेषयामास सासा सोषलं प्रति भारत ॥१३॥ तमायान्त शरघोर शकुनिः मतापनः । चिच्छेद सप्तवा राजन कृता । स्तोमा ५४१ वसिमविपतिते भूमी, भीमः यो विशाम्पो । अनश्चिच्छेद परिवाजेस जिस औरहोकर निकाला उस ओरके लाखाही शूरवारों को मारा ॥४६॥ हेमहाराज इसरीतिसे उदय भीमसेनके कियेहुये कर्मको देखकर दुर्योधन सगुनीसे यह वपन वोला । ४७ कि है- मामाजी इस बड़े पराक्रमी भीमसेन, को युबमें तुम विजयको इसके विजय होनानेपर में सव पाण्डवी सेनाको विजय, कियाहुआ। मानता. ४८ । हे महाराजे इसके अनन्तर भोइयों समेत बड़ेभारी युद्ध करनेको | उत्सुक भवापवान शैकुनी चला । ४९ । उस वारने युद्धमें भयानक पराक्रमी भीमः सेन को पाकर उस को . ऐसे रोका जैसे कि समंद्रकी मर्यादा समको रोकलेती है। 1५1 जवानों से रोकाहुमा भीमसेन उसकी भोर को लौटा और पानीने, उस के हाय ओर छातीपर सुनहरी पुखगले तीक्ष्णधार नाराचोंको चलाया । ११ । फिर वह ककपत . से जटित घोर वाण महात्मा पंडिव भीमसेन के कवच को काटकर शरीर में घुसगये । ५२ । फिर युद में अत्यन्त घायल उस भीमसेन ने क्रोधयुक्त होकर सुवर्ण जटित वाण को शकुनी के ऊपर चलाया । ५।। हे राजा शत्रुसंतापा इस्तलाघवी मावती शकुनी ने उस आतेहुये घोर वाण को सातखण्ड कराया । ५४: हे राजा उस वाण के पृथ्वी में गिरनेपर क्रोषयुक्त सितदुये ever direction he webte Seeing the prowess of Bhim, Duryodban? said to Shakuri, ".Couquer mighty Bhim, uncle. I think that all tha Pandav army will be easy of couquest jpbox you have couquered; him. At this, brave Sbakuni, with his brothers, went on to fight. Having fougd Bhim of dreadful proyesò, ho checked him as the count chocks the Ocear. '50. Checked by sharp arrowe, Bbita furred towards him, and Shakuai discharged his sharp arrows at his arms and breast. Thp dreadful arrow, bitted with Kask foather's pierced the armour of Bhim and entered his body. Exceedingly :rounded:: Bhim discharged a gold-decked arrow at Shakuhi, but the latter Lut काप Karan Parava 66679) भल्लेन सीपलस्व रसनिव॥ ५५ ॥ तदपास्य धनुश्छिम्नं सोवळेयः प्रतापपान । मम्य दादाप गम् धनुर्भग्लास गोला ॥ ५६ । तेस्तरुप तु महाराज भन्दा समतभिः! माभ्यां में सारपि द्यात् मोमें सप्तभिरेव : जमेकेन विष्छद उंचं माश्या विनामते । चतुर्मिधतुरो बापान विव्याध संपलात्मजः। ५८ ॥ ततः कुयो महागजे भीमसेनः प्रतापपान् । शक्तिस्विक्षेष समरे रुक्मदण्डामेयरमपीम,५९ ।। सा भीनमुजनिर्मका नागजिहधेय पलानिपपात रणे तर्ण सौपलस्य महात्मनः ॥ ६९॥ ततस्तासेष संगृह्य शक्ति कनकभूषणाम् । भीमसेनाय चिप कुखरूपो विशां पते ॥६१ मा निर्मिद्य भुजं सऽयं पारस्य महात्मनः । निपात तदा भूमी यमा वियुमत्युगो ।६॥ मयो नहा धाराष्ट्र समन्ततः। न तु वे ममृर्ष मोमः सिंहनाद तर विनाम् ।। ६३ । अन्यागृह्य धनुः सत्यं त्वरमाणो महाबलः । मची दिव राजेन्द्र पायामास सायके । सोषलस्य पलं मम्प पत्वामान महाबलः भीमसेनने भलसे शकुनो के धनुषकोकाटा (५५ फिर मतापवान् शाकुनीने उसधनुष को डालकर प्रेगसे दूसरे धनुष और सोलह भल्लोको लेकर उन टेढ़े भल्लोमें से दो मल्लों से उसके सारथी को और सात भरलों से भीमसेन को घायल किया फिर एकसे घना को और दो अल्लों से इसको काटकर सौबूरन चार वालों से चारों घोड़ों को वापरू किया । १८ । इसके पीछे क्रोधयुक्त प्रतापी भीमसनने युद्ध में मुनाही दरख्वाली शान को फेंका । ५९ । भीमसेन की भुनासे छोड़ी हुई वा सर्पको मिला के समान पचल शक्ति युद्धमें शीघ्रही महात्मा शकुनाके ऊपर गिरी । १ ! इसके पीय क्रोधरुप सामनी ने उस मुवी से अंजकृत शक्ति को सकर भीमसेन के ऊपरफेंका । ६१ । तब वह महात्मा पाण्डवको बामधना को रदकर मी पर ऐसे गिरपड़ी जैसे कि भाकाश से गिरी हुई विमली होती है । ६२ । इसके पाछे धृतराष्ट्र के सड़कों ने चारों ओरसे बड़ा शब्द किया फिर उन वीरों सिंहनाद को न सहकर पढ़े भारी अलंकृत धनुप को लकर अपने जीवन की पाशा की त्यांगकरके पुड़ में एक मुहूर्त मेंही शकुनी को सेना का शायकोस दक it down into seven parts. Ag the fall of that arrow, 'Bhim, smiling in rage, cyt asunđer Shekpy's bon, "He dropped the broken bov and teking up #nother with sixteen darts, wounded the driver with tyro, Bhim vila seved, big standard yith pns and having cut his yombrella With'&sro, wounded hig boſses yith four armowe. Ther' wighty Bhim, auch ünpaged, burled big spear with the golden brandle: The sharp speas, like a serpent's tougue, dişcharged by Bhim, fell down opin Sbakuni. 6. The latter seized it is his band and rent it bipol lowards Bhini, and piercing Bhim's arm, it fedt.down't onearth like lightning. At this, the song of Dhritrashtra brist with joy. Bhim could not bear their leonine road and covered Shakuni's army with क - 6680) Mahabharat ॥ १५ ॥ तस्याश्यांचतुगे इत्या सूतं चैव विशाम्पते । ध्यजं विच्छेद गल्लेन घर माणः पराक्रमी ॥६६॥ हताप रयमुत्सृज्य त्यरमाणो नरोत्तमः । तस्थौ विस्फार यंचा शोधरक्तक्षणः श्वसन् ॥ ६७ ॥ शरश्च वहधा राजन् भीममाञ्छत् समन्ततः । प्रविपत्य तु घेगेन भीमसेनः प्रतापयान् । धनुधिच्छेद संकुलो विव्याध च शितैःशर ॥ ६८।। सोतिषिद्धोपलधता शनुणा शत्रुकर्षणः। निपपात तो भूमी फिञ्चितप्राणो नराधिप ॥६॥ ततस्तं विह्वल ज्ञात्वा पुत्रत्तय विशाम्पते । अपोवाह रचनाजी भीम सेनस्य पश्यतः ॥ ७० ॥ रथस्थे तु नरव्याघ्र धाराष्ट्राः पगंमुखाः। प्रदुर्दिशो भीता भीमाज्जाते महाभये ।।७१५ सौवले निजित राजन भीमसेनेन धन्विता । भयेन महताविष्टः पुत्रो दुर्योधनस्तय ।। ७२ ॥ अपायाजघनैरश्वः सापेक्षो मातुई प्रति ॥ ७३ परांमखन्न राजानं दृष्ट्या सैन्यानि भारत । विप्रजग्मुः समुत्सृज्य बैरथानि दिया । ६५ । हे राना फिर शीघ्रता करनेवाले पराक्रमी भामसेन ने उसके चारों घोड़ों समेत सारथीको मारकर भल्ल से उसकी घना को भी काटा । ६६ । फिर यह नरोत्तम भी शीघ्रताकरके मृतक घोड़ोंके रथको त्यागकर धनुषको टंकार क्रोधमे लालनेत्र करके सम्मुखं नियंत हुआ। ६७ । और भामसेन को चारोंमोर से वाणों के द्वारा मोहित किया फिर अत्यन्त प्रतापवान् भीमसेन ने बड़े वेग से उनको निष्फल करके धनुपको काटकर तीक्ष्णधारयाले वाणांसे महापादितकिया । ६८ । पराक्रमी शत्रुसे अत्यन्त घायल हुभा वह शत्रुषिजयी शकुनी कुछ माणशेष होकर पृथ्वीपर गिरपड़ा । ६९ । हे राजा इसके पीछे भापका पुत्र उसको अचेत जानकर भामसन के देखतेहुये युद्धभूमि से स्थको सवारीमें बैठेगकर हटालेगया ७०। | फिर उस नगेत्तप के रघपर सवार होने और भीमसेन को वदाभय उत्पा होनेपर और धनुपधारी भीमसेन के हायसे शनी के विजय होनेपर पृतराष्ट्र के पुत्र मुख मोड़ मोड़कर भयभीत होकर दशों दिशाओं को भागे । ७२ । बहे भय से पूर्ण अपने मामाका चाहनेवाला आपका पुत्र दुर्योधन शीघ्रगामी घोड़ों के द्वाराहटगया । ७३ । हे भरतवंशी सेनाके सबलोग रानाको मुखफरकर हटाहुभा देख कर arrows from his great bow, '65.' Then he killed his horses and, driver and cut down bis standard. Shakoni left his car, and with eges red in anger, opposed Bhim, twanging his bow. He made Bhim intensillo by his arrows. The latter then cut down his arrows and bow and wounded bim with sharp arrows. Exceedingly wounded by him, Shakuni tho destroyer of foes, (fell down on earth, nearly dead, Seeing bim iusepsible, your son removed him to a distant place. 70. When Shakuni bad thus been carried away wounded and defeatod by Bhim, the sons of Dhritrashtra turned back and files in all directions. Your gon terrified and fearing for the life of his wnclo Shakuni, went away from the field of battle. Other Farriors too, (६६८) कर्णपर्व himan Parv [66810 समन्ततः ।। ७४ ॥ तान् दृष्ट्वा विद्धतान सर्वान धाराष्ट्रान परोमुचा । जवनाश्यपत भीमः किरन शरशतान पहुन् ॥ ७५ ॥ ते यध्यमाना भीमेन पाराष्ट्रा। परामुषः फर्णमासाध समरे स्थिता राजन समन्ततः ।। ७६ ॥ स हि तां महावी- द्वीपोभूत् मुमहापलः । भिन्ननीका यथा राजन द्वीपमासाय निर्धताः ॥ ७७ ॥ भवन्ति पुरुषम्पाघ्र नाविकाः कालपर्यये । ती कर्ण समासाथ नाचका भरतर्षभ । १८ ॥ समावस्ताः स्थिता राजन संप्रदृष्टाः परस्पर समाजामुश्श युजाय मृत्यु करवा नियनम।। ७२.॥ इति कर्णपर्वणि शनिपराजयेसप्तसमतोऽध्यायः ४७ ॥ चारोंमोर से द्वैरथियों को छोड़कर भागे । ७४ } तब भीमतेनने जन घायल भप भीत मुख मोड़करभागनेवाळे धृतराष्ट्र के पुत्रों को देखकर सैकड़ों वाणोंकी वी करताहुआ वेगसे उन सबके सम्मुख दौड़ा । ७५ । है राजा भीमसन के हाथ से घायल चारोंओर से मुख मोड़नेवाले बह धनराष्ट्रकेपुत्र कर्णको पाकर युद्ध नियत हुये । ७६ । वह बड़ा पराक्रमी बलपान कर्ण उनका ऐसे रक्षकहुमा जैसे कि टूटीहुई नौका टापू को पाकर नियत होजाती है । ७७ । हे पुष्पोतम समय के लोट पोट होनेपर जैशी दशावाली पतवार होती है वैसेही भापक शूर वीर लोगभी पुरुचम कर्णको पाकर उशी दशावाल हुएँ । ७८ 1 हे राजा वह परस्पर में विश्वास युक्त अत्यन्त मसन्न नियतहुये और मृत्युको हथेली पर रख 'कर युद्ध के निमित्त गये • ९ fled away at the flight of their king and were ch used by Bhim and hia dread ful arrows. 75. Chased by Bhim, the sons of Dhritrashtra stood by Karan, who protected them as an island does those who are wrecked in a storm. They turned to Karan for protection like a bout and regardless of their life, they began fighting, relying on mutual help,"79.
- (6683) Mahabharat धृतराष्ट्र धाप । मत्री मानेषु मन्ये भीमसेनन संयुगे। दुरोधमाधीद किन्न सोचलो मापि समय ११॥ फूण या इयतां अटो योशा मामका युधांकपी या कलमाया शणिमासनाऽपियां ॥२ अपद्धतमहं मन्ये पाबंयस्य विक्रमम यदक समसवान पोधयामास मामकन । ३। यसमातित थापाना राधेपः कृतका मपि । करुणामप सुगा कणः शत्र निमूदनः । शमं धर्म प्रतिष्ठा जीवितावाच सजाय भान मला कौन्तयेनामितौजसा । राधणे वाप्याधियः कणः किमको एधि ॥ ५॥ पुत्रा या मम दुईया महाले या महारथाः प्रनामे सर्व माधव कुशलो हासि सम्ञप ॥६॥ सन्जय उवाब मपरान्ह मगराज सूतपुत्र प्रतापयाम् जयान सोमकार लोन भीमसेनस्य पश्यतः ॥ ७ ॥ भीमोऽयति बलं सैन्य अध्याय ॥ ८॥ धृतराष्ट्र लोको समय त युद्ध में भीमसेन के एपस सेनाके पुरातप होने पर दुर्योधन ने मानीने सपा कहा । १ ।विश्य करनेगलों में मेष्ट वर्ग वा मिरे शूरवीर कपामार्य कनवर्मा भयामा और दुश्शाान इन सबने युद्ध में 1 क्या कहा में पास भीमसेन के पराक्रम को अपन महत और अपूर्व माना | कि इस अकेलनेही युद्ध में मेरे सब शूरवीरों से युद्धकिना। ३ । और रात के | पुत्र शत्रुहन्ता कर्ण ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार सरशूरवरि रामन कौरवों को कल्याण रजापिता था जीवन की आभा को नियत क्रिया को सजा बड़े वेनती भीमसेन के हायसे छिन्न मिल्ल होजाबाजी उस सेनाको देखकर वा अवस्थी कर्ण मेरे पराजित पुत्र भोर बड़ेमहारथी राजानि युद्ध में क्या किया यह सब मुझसे कहो क्योंकि तुम बड़े चतुर और सावधानहो । ६। संजय बोले है महाराज मुतापवान कर्ण ने तीसरे पाशमें भीमसेन के रेखाइये सब मोसकों को मारा । ५ | और भीमसनन भा टुप्पोपन की बड़ी पराक्रमी सेना को | सबके देखतेडुपे माग इसके पीछे कर्ण ने शल्पसे कहा कि मुझको पांचालों के समीप लामो । अर्थात् वद्धिमान परापी भीमसेन के मापसे ग्रेनाको -- . १६८३) कसप Karan Party (683) भातरायपोथियती अर्थ कताऽप्रपीच्चल्यं पाजालान् मापर्यस्त्र साम्य माणे घल इदा भीमसनेहधीमता । यस्ता मनवीत कर्णः पाचालानेष मा वहा मद्रराजतमा शल्यतानश्यान मनोजधान मोहिणाञ्चोदि पाञ्चालान काnia मादल घिश्य महत सैन्य शल्पा परबलाईनः पयतुरंगीन इंटोयत्र यत्र छदणीः ॥ ११॥ तर मेघसङ्काश यानपरिवारणम् सदश्य पण्पाचाला यस्ता शासन विशाम्पते ॥ १२ ॥ ततो रथस् निन्दः प्रादुरासीलदाणे पजग्यस मनिष पर्वतस्यई, दीयतः ॥ १३ ॥ ततः शातितक्षिणः कणं आकमिः सनः । जधान पावलं शतशोऽयं ॥ १४ तं तेधा समरे कम कुर्वाणमपराजितम परिषदेवासाः पाण्डवानां महारथाः ॥ १५॥ तं शिवण्डी च भीम निश्च आर्षतः । नकुलः सहदेवर्थ द्रौपदेयाम सत्यकिः ॥ १६ ॥ परिव जिंघांसन्ता राधेयं भरपूटिभिः॥१॥सायफिस्तु तदा कर्ण शित्या निशितैः शरैः ताड़पणे शूरो मागाहुआ देखकर कर्णन, अपने सारथी शत्यस कहा कि 'मुझको पांचालों के सम्मुख लेवलो । १। इसके पीछे बड़े बलवान् मद्रदेश के राजा शल्पने बड़े शीघ्र गामी तपाई को चंदेरी पांचाल और कारुप्य देशियों के सम्मुख पहुँचा। की सेना के पनि करनेवाले अल्यने उस वर्ग सेनामें प्रवेश कर के घोड़ों को ही चलाया जहां उस. सेनापति कर्ण ने चाहायी । ११ । हे राजा पारडव और पाञ्चाल उस बादल के रूप व्याघचर्म से महाय रथको देखकर भय ति हुये । १२ । इसके अनन्तर उस बड़े पद्ध में उत्त रथ का शब्द वादल के अजने के समान ऐसा प्रकट हुभा जैसे कि ' फटते हुये पर्वत का शब्द. होता है। | १३ | इसके पीछे कर्ण ने कानत खेचहये धनुष के छोड़े हुये वाण समों से पाण्डवी सेनाके हजारों मनुष्यों को मारा । १४ । पाण्डवों के महारथी बरधनुष धारियों ने युद्ध में ऐसे कॅम्म करने वाले उस अजेय कर्ण को घेरलिया। १५ । शिखण्डी भीमसेन टयुम्न नकुल सहदेव द्रौपदी के पुत्र और सात्या । १६ पाणों की वर्षा से कर्ण के मारने के मामिलापी इन सब शूरवीरों ने जब कर्ण को Panchals." Sualya the king of Madra at onca'diove the car into the army of Panchal and "Karushya 10. Shalya the desträger of foes drase, the car to the places directed by karan. 'The Patidasks and Panchala were terrified to see that car. lined, by tiger's Hide, scho rumbling of its wheels, was like thánder or the breaking thróugh of a mountain. Then Baran dlew thousands of the Pandao warriors with hia well-aimed arrows The great Pandav "archers. surtbunded] Karav. .15. Shikhandi, Bhim, Dhrishtudyuint, Nakul, saindes, ther, Bons of Draupaai and'sityaki, Mesirous of slaying Karan with their Arrows, surranded him. Satyakir wounded hito wita twenty arrower SHEhandi, Dhrishtadyumurther-song. of_Drgypadi, Sahadev..and - 6684) Mahalharat देश नरोत्तमः ..८ ॥ शिखण्डी पर्यशत्या धेटयुम्नस्तं सतभिः । द्रौपदेयाधत: पर्दया संहदवा सप्तमिः । नफुलश्च शठमाजी कर्ण विव्याध सायकैः ॥ १९॥ भीम सेनतु राधेप नवत्या नतपर्वधाम । विराध समरे को जनुदेशे महाधलः ॥ २०॥ अय प्रहस्याविरधियांक्षिपन धनुरुत्त । मुमोन मिशितान घालान पीडयन सुन हायला । तान् प्रत्यायध्यद्राधेयः पञ्चमिः पञ्चभिः शरैः ।। २१ सत्यस्तु धनु शिलत्या यजय भरतर्षभ। तथैव नवनिर्वाणराजधान समान्तरे "२६ ॥ भीमसेने ततः कुमो विव्याध त्रिंशता शरे । सहदेवस्य भल्लेन जे चिच्छे मारिए । कार विच विरामीणराजधान् परन्तपः ॥ २४ ॥ विस्थान द्रौपदेयांश्च वफार भरतर्षगा. अणोनिमेषमाप्रेण तदरमियामवत् ॥ २५ ॥ चिमुखीकाप तान् सर्वान भारः सनत पर्वभिः । पञ्चालानहनत शरदानाचं महारथान ॥ २६ ॥ ते घध्यमामाः समरे वेदि मस्या विशाम्पते। कमेकमभिद्राय शरसघः समार्पयन् ॥ २७ ॥ तान् जघान शित घरलिया तब नरोत्तम शुर सायकिने तीक्ष्ण वारवाले पास वाणों के कर्ण को युदमें जत्रुस्थान पर घायल किया १८ । शिखण्डी ने पच्चीस वाणोंने धृष्टद्युम्न ने सात वाणोंसे द्रौपदी के पुत्रों ने चौसठ पाणों से सहदेवदेवने सात वाणों से नकुल ने सौ वाणोंसे उस कर्ण को पीड़ामान किया। १९.। और बड़े पगकिमी क्रोधयुक्त | भामसेन ने युद्ध में टेढ़े पळवाले नन्वे वाणोंसे कर्णको नआदि अंगोंपर पादित, किया । ३० । इसके पीछे बड़े वली कर्णन वहुत हँसकर अपने धनुष को टंकारकर बाणोंको छोड़ा हे भातर्षभ कर्णने उन सबका पांच वागोंसे व्यथित किया । २२। और सात्यकि के धनुप ध्वजाको काटकर नौ वाणोंसे उसको छातीपर पायल किया । २१ । फिर उस क्रोधयुक्तने तीनसोचाणोंते भामतेन को पालामाथ किया और भल्ल से सहदेव को धजा को काट उस शत्रुसंतापी ने तीन वाणों से उपके सारथी को मारा । २४ । और एक पलमात्रमें ही द्रौपदी के पुत्रों को विरन कर दिया यह बड़ा प्रश्चियंता हुआ । २५ । टेढ़े पवाले पाणों से उन सवका मुख मोड़कर पांचाल और चंदेरीदेशके बड़ महारथी सूरवारों को मारा । २६ । हे राजा युद्ध में घायल उन चंदेरी दोसयों ने अकेले कर्ण के सम्मुख जाकर उसको Nakul'wounded' him with twenty five, soven, sixtyfour, soven, and hundred arrows respectively. Mighty.Bhimsan, in his rage, wounded, Karan with ninetyiarrows. 20. Then mighty Karan, with a smile, twanged his bow and discharged five arrows at each of them. He wounded Sityaki with nine arrowsand cut his star.dard. , He wounded Bhim with three hundred arrows and haijng cut down the standaad of Sahadev, slow his driver with three arrors: He made the sons,o! Draupadi carless kg : they amazement of all: :25... Havingedefeated, the above'damed warriors, bad destroyed; the brave, 'mon of, Panskal and Chanderi) . The pyarrioràof Chanderi surrounded Karan and wounded कर्णपई Karan Paray (6685) णि मूतपुत्रो महारयः। एतदत्यद्भुतं कर्म हरपास्मि भारत । पदेका समरे शाप सतयुरप्रतापवान् ॥ २८ पत्रमानान परंशापा योधस्वन्धिनः । पाण्डवे पान महाराज पारितधानमे १ २९ । नत्र भारत कर्णस्य लाघवेन महात्मनः । तुतपुरवता सर्वाः सिद्धाश्च सह धारणः ॥ ३० ॥ अपूजयामधासा धार्तराष्ट्र मरातमा कर्ट रथवर श्रेष्ठ श्रेष्ठं सर्वधनुष्मताम । ततः कणों महाराज ददार रिएका हिनीम् । कक्षामित्रोपचा पहिननिहाये पलितो महान ॥१॥ तेषध्यमानाने पायवेयास्ततस्ततः । प्रादयन्त रमे मीता कर्ण रम्या महारथम । ३२ ॥ तत्रा कन्दो महानासीत पराम्बालानां महारणे । षष्यतां सायकैतीक्ष्णः कर्णचापवरच्युतः ॥३३॥ तेन शम्देन विस्ता पाण्डवानां महाचमः कर्णमेक रणे योध मेनिरसत्रशाषा: ३४ ॥ तत्राद्भुतं पुनश्चक राधेयः शत्रुकर्षणः। परेने पाण्डवाः सबै न कुरभिपीक्षि गुम् ॥ ३५॥ पयोषः पर्षत मासायामिदीर्यते। तया तत् पाण्ड सैन्यं कर्णमा साथ वीर्यते ॥ ३६ ॥ कर्णेपि समरे राजन घिमोग्निरियं ज्वलन् । दईस्तस्यो महा। वाणों के समूहों से पायल किया । २७ । हे महाराज को अकेले मतापी कर्ण ने युदो बड़ी सामथ्र्य से उपाय करनेवाले धनुषधारी शूर युद्धकर्ता पाण्डवों को वालों से रोका वहां महात्मा कर्ण की हस्तलाघवता से सिद्ध चारणों समेत सब देवता मसल हुये । २९ । और बड़े धनुषधारी धृतराष्ट्र के पुत्रों ने उस महाधियों में श्रेष्ठ नरोत्तम सब धनुषधारियों में श्रेष्ठ कर्णकी प्रशंसाकरी।३०। महाराज • इसके पीछे कर्पने शत्रुओंकी सेनाका ऐसा नाशकरदिया जैस कि ऊप्म ऋतु में बड़ा धद्धिमान् प्रचपदमग्नि धनको जलाता है । ३१ । उस प्रचण्डअग्नि के समान कर्ण से घायल हुये वह सब पाण्डव महारथी कर्ण को देखकर इधर उधर भयभीत होकर भागे । ११ । वहाँ उस बड़े, युद्धमें कर्ण के उत्तम धनुषसे निकले हुये तीक्ष्ण शायकोंसे घायल पांचाल लोगों के बड़ेभारी शन्दहुये । ३।। उन शब्दोंसे पायडयों की बड़ीसेना अत्यन्त भपभीत हुई वहां शत्रुओंक मनुष्योने युद्ध में अकेले कर्णकोही शूरवीर पुद्धका माना । १४ । तब शत्रुओंके पीड़ा करनेवाले कर्ण ने फिरभीमद्भुत कम्मकिया कि कोई पारन उसकी ओर देखने कोमी सपर्य नहीं हुमा । १५", जैसे कि जलका प्रवाह उत्तम पर्व को पाकर कमाता है उसीमकार बह पाण्डको सेना कर्णको पाकर छिमभिन्न होगई । ३६ । हे राजा युद्ध महावाहु कभी biro with their sharp arrow, Tho Sidhas and gols were pleased with the desterity of Karan, who alone ebecked all tbe Panday warriors. The song of Dhritrashtra prrisod him. 30. Then Karan destroyed the Pandar army, as fire destroys a forest la sormer. ;\Pounded by his ireapons the warriors lled away in all directions wounded by the arrors discharged frota Karan's oscullaat bow, tho Pancñals cried. out in digunay to the preci far of the Pandavas, -The enemies thout' that. Karau was the only warriors... Tuan destingar ef tues did a (6686) Mfahabharat 'बाहुः पाण्डवानों महापमम ॥ शॉसि च महाराज फणीय सहकार धाश्च पारो पौराणों विच्छेप नधु पुलिः ॥ ३८ ॥ हस्तिदन्तसन्द गान घज्ञान शकोईयाम् गजान रियाध पिषिधावाजन् पताका यजमानि ३८ अमञ्च युगयोक्त्राणि चक्रानि विविधानि छ । विन्द बहुधोका पोतमाहिता ॥ ४० ॥ तत्र भारत कर्मन निस्तैगजार्जिभिः । वर्गम्यरूपा विधी सशोणितक ईमा ॥ १ ॥ विषमच समञ्चैव तिरश्यपहातिमा र कुञ्जरेक ने प्रायित किम्चने ॥ ४२ ॥ नापि स्वेने परे योधाः माहात परस्परम । घोरे राधिकारे तु काँखे थे चिम्भिते ॥४३॥ राधेपचापनिर्मुक्तः शरैः काञ्चनभषणेः । सेदिता महाराज पाण्डवानां महारथाः ॥ ४ ते .पाण्डेयेयाः समर राधयेन पुनः पुनः। मर्मज्यत तदा राजन यतमाना महारथाः ॥ ४५ ॥ मृगसंधान पथा : सिंहो द्वार यते बसे । पाञ्चालानो रथश्रेष्ठान द्रावयछात्रवस्तिथा ॥ ४६ । कर्णस्तु समर यो निधूम अग्निके समान प्रकाशमान पाण्डवों की बड़ी सेनाको भस्मकरताओ नियत होकर ।, ३७ । इस शूरवीर ने युद्ध करनेवाले बारों के कुंडल धारण कियेहरे वारोंको और भुजाओं को बड़ी वामतासे अपने वागों के धारा काटडाली ।। हे राजा युद्ध प्रतयारी कर्णने हाथीदांत के कंजा रखनेवाले खड्ग बना और शक्तियोंको घोड़ें हाथी, वा अनेक प्रकार के रथ पताका पजन अक्षयुग योक और बहुत रूपं चक्रोंको बहुत मंजारों से काटा । ४० हे भरतवंशी वहा कर्णके हायसे मारेडुये हाथी घोड़ों के कारण से वह पृथ्वी रुधिर मांसकी पकवाली होकर महानगम्य होगई । ४१ । मृतक घोड़े पदाती रथ और हाधियों के हेतुसे पृथ्वीकी समता और असमता नहीं जानीगई । ११ । अपने और दूसरों के शूरवीरभी परस्पर में नहीं जानेगये हैं महारोन कॅर्गके प्रख और वाणों से घोर अन्धकार होजानेपर उसके धनुषसे छूटेहुये सुवर्ण वाटेत 'पाणों से पाण्डवों के महारथी क | गये । ४४ । और वह सब कर्णसे लड़नेवाले पाण्डवों के महारथी वारम्वार की से पराजित हुये । ५५ । और जैसे कि दनये मृगोंके समूहों को सिंह भगाता है। उसीप्रकार पाञ्चालों के उत्तमरथी और शत्रुओं के मनुष्यों को भगावे भार युद्धमें, woderful deod and none of the Panderas could look him in the tace, 35. Thé Panday array dispersed before Katanisthó waters of a river cortšag i contact with a mountain, Standing in battle like a smokeless fra, ho cát 'oft with arrows the heads of warriors adorned with ear.ringa Ho cut off siyords having iforý handles, standards, spears, "horses, élephanta cars, fans, yokes and wheels. 40. - The ground covered with the bodies of elephants, and horses, had a mira of flesh się blood. The anévenness of 'tho, Ground disappeared on acconht of the dead bodies? The warriors of the two sides were mixed together. Karan's arrowse darkoned the air and covered the Pandar: warriors. The latter were -- -- ForuMANTheRN 0799 Karan Paray 1 सत्र महायशाः फालयामास पापड्नी यथा पशुगणान भृकः ॥ ४५ हटवा तु प्राण्या सेतो धागदाः परमुनीन् ! अभिप्रमुभद्देधासा रुषातो मेरवानपान '1४८ ॥ कुम्योधनो हि राजेन्द्र मुदा परस्यायुतः धावयामास संदृयो मानावापानि सर्वशः ॥ ४५ ॥ पाचालापि महेश्वासा मग्नास्ता नरोत्तमाः म्यवसन्त यधागूरे मायुं कृपा नियतनम् ॥ ५५ ॥ जानिहत्वामणे मान गया अवतापना । अनेकशी महाराय बमक्ष पुरुषर्षमा ५१ ॥ संग भारत फन पावाला विंशती प्रयः। मिता: माययोंधाधेदयश्च परः शताः ॥ ५२ ॥ छत्वा शत्यान सोमस्थान शाम पृष्ठाम भारत । निर्मनुपान गजस्कन्धान पादावांश्चय विद्युतान् । ५३ ॥ आदित्य इस मध्याहे दुनिया पास्तपः । कालावकरपुः शूरसूतपुत्रो परानत ॥ ४ ॥ एय मेवग्मा नगपाजिरपद्विपान् । हवा तस्यौ महेण्यासः करिगणसादनः ॥ १४ ॥ अथा भूतगणार हत्या कालस्तिष्ठेन्मापला तथा स सामोन्हत्या सस्थाको मदा शूरवीरों को डराते बईयशस्वी कई ने उस सेनाको ऐसे भगाया जैसे कि मोडया पभों के समूहों को भगाता है । १५ । फिर बड़े धनुषधारी धृतराष्ट्र के पुत्र पाण्डवी सेनाको मुख मुद्दामा देखकर भयानक शब्दोंको करतेहुये वहां भाये 1 १८ । और अत्यन्त मसलापिच दुर्योधन ने अनेकप्रकार के सब बाजों को बजवाया ।५९ । वहाँपुर पराजिवहुपे नरोत्तम पांचाल देशी भी शरीरकीहास छोड़कर शूरों के समान लौटे ११महाराज फिर कर्ण मे उन लोटेहुये शूरवीरी को बहतकारसे बाजपकिया ! ५१ | उस पद्धमें कोषमुक्त कई के माणों से पांचालों के वीस रसी मोर सैकड़ों यदेरी के वासी मारेगये। ५२ । फिर वह शत्रुसंतापी कप रयोंको रथको बैठक और उत्तम घोड़ों की पीट और हाथियों के कन्धों को सवारों से हितकर पदातियों को भगाता मध्याह्न के सूर्य के समान कोदनवाले दर्शनकयोग्य मृत्यू वा कालक समान शरीरको धारणकिये शोभायमाने हुमा । १४१ हे महाराज इसरीति से प्रायुधों के समूहों को मारनेवाला बड़ा धनुष घारी को मनुष्प घोड़े रम और हाथियों को मारकर ऐसे निमृतसा जैसे कि बड़ा पालमा काल प्तीचों के समूहों को पारकर नियत होता है इसी प्रकार बह साकेला महारथी सोमकोंको मारकर लियतहुआ । १६ । वडापर हमने झापालों again and again raated by the former. He ropted the Panchal warriors fion does & perd of door or as a wolf terrifjeg animals. 47. The sona of Duritrashtra, şezing the Pandavas routed, came op with dreadful yold, Duryodlan in his joy ordered mysical instrųments to to be sounded: The Panchal warriors, losing all hope of life, turned hack, pp. Karan ported them again, Haslev trenty warriors of the Paņobaly and Boodreds of Chanderis That destroyer of foes made the seats on cars, borgeback and elephants shoulders destitute of riders, Patting the foot soldiers to fight, he akong like the qua s6 acon and was dreadful Sababharati {6600) 5 महास्था एसे रक्षन्ति राजानं सूतपुत्रण रक्षिताः। भवभ्यमानास्तस्माभिः पाताव स्यन्ति सोमकान् ॥ १०॥ एम शल्यो रथोपस्ये रश्मिसंचारकोविदः । मतपुर इमा धायस्थ शोभते ॥ ११ ॥ तक मे युधिसत्पमा धाइयान मारमाया सारे कर्ण नितिध्ये कयावत ॥ १२ ॥ राधेयोप्यन्यया पानि सन्जयां महार धान निवासमरे कुर्यात पश्यता नो अनाहुंन ॥ १३ ॥ वत: प्रायादमाशु केश बात घाहिनीम । कर्ण प्रति मोयाप्तं वैरप सम्पप्ताचिमा . १५॥ प्रपात महा वाहुः पाएदवातुश्या हरिः । आश्वासपथैनष पाण्डुसैन्यानि सर्वशः ॥ ५ ॥ घोषः। संग्रामे पाण्डवेयस्य संपभो वासवामितुल्नायू महाघस्यष मारिष् ॥१६॥ मातारपोपेण पाण्डपः सत्यविकमा सभ्यप्रमेयात्मा निर्जियलक्वादिनीम ॥१७॥ शभित होरहाहै । महारथी अश्वत्थामा, कुनबर्मा, कृपाचार्य । ९ । यह सभी कर्ण से रक्षितहोकर राशाको रक्षाकरते हैं वह हम सबसे अवध्य सोमनोंको मारेंगे। १९ । और हे श्रीकएंगजी स्थानों में कुशल यह शल्प स्थके ऊपर बैठा हुआ कर्णक रथको अत्यन शोभित कररहाहै । ११ । वर्ग मैं चाहताहूं कि प्राप मेरे रथको लेवलो में युद्ध में फर्णका मारे बिना किसीमकार से नहीं लौंगा ।१२। हे जनाइनजी दूसरो दशामें यहकर्णहमारे देखते हुये सहारथी पायम और मुनियों का नाशंकरगा । १३ । इसके पीछे केशवजी अर्जुन समेत स्थकी सवारीके द्वारा शीघही देरय युद्ध में बड़े धनुपधारी कर्ण और आपकी सेना के सम्मुख गये १४ । महावाहु श्रीकृष्णजी अर्जुन के कहने से सब पांडवी सेनाको रयपरसेही विश्वास युत करते हो चले । १५ । उस शुभकारी युद्ध में अर्जुन के रथका शब्द दिसा शोधायमान हुआ जैस कि इन्द्र पनके समान बड़े जल के वेगहा पाब्द होता है । १६ । सत्य पराक्रमी महाप्साहसी पर अर्जुन पके बड़े शन्द समे आपकी सेनाको विजय करताहुआ सम्मुख गया । १५ । सद्रका राजा शल्य श्वेत crazred such q liverArjun agaiq egid tq Vasudev, " Yandaş is seen tha baquer of Kuran, and Bhim and other parriors are fighting with himn. The Panchals are afraid of him and run away, Daryodhan yha has iyhite umbrella on his head, Ipoka pery beautiful as he puts to fight the fancbala defeated by - Karan.' Braye Aghwathapas, Krilyarma and Kripacharya, protected by Karan, guard the sing .ang will destroy the invincible fomaks 14. Shalya, suated on the' 'car to drive the horses, skilful in driving horses, looks very.glorious, I request you to drive my far there, for I shall ppt retorn pithout elaying 1.him, If not checked by us, bę wiļl destroy the Fapdayas and &rinjayas, "A$ this Kebay drove the car in your arpy to face Karan. Hereat onercouraging the Pindar urmy from hia car. 15. The prad pi atjan's car. Fbeels was dreadípļ like that of Ladra's YeITA म र (662) Wahalibarat बच समास्य ॥२६॥ संसार: पासवामध्यति परन्त। कोराकक्षमः युओं जियोमः सर्यपार्थिवान् ॥ २७ । स्वरितोभिपतपमा 'स्त्याया सेन्यान्यसपम् । तं की प्रतिपाहोने ‘मासपम्यो हि पदे । • २८ ॥ न त पश्यामि लोकेऽस्मिस्पको धन्य धनुरम् । अर्जुन समरे कुर यो जमघ धारयेत् ॥ २१॥ न पाय रक्षा पश्यामि पाश्वतो न प पृष्ठतः। एक पशभियाति पद सावमात्मनः ॥ ३. हिम्णोरणे शकः संसावपितु मावेश भारो राधेय प्रत्युवाह धनन्जयम् । ३१ । समानो खसि भीष्मण द्रोण दीमिरुपैरपि । सव्यसाधिनमापान्तं निधारय मारणे ॥ ३२ ॥ लेलिहान पया स गर्जत मृषभ था । परिया पपा भ्यानं जति कर्ण धनत्रयम् । ३३ ॥रते पन्ति सम धाराष्ट्र महारथाः । मर्जुनस्य भपातम निरपेक्षा नराधिपाः ॥ ३४ ॥ इन दोनों पार भाइयोंको चापल देव शत्रुओंका वपानेवाला अकेला रथी भर्जुन अकस्माद तेरे सम्मुख आताई यह क्रोध से रक्त नेत्र रोप में भरा मव रानाभोंके मारनेका अभिलापी शीघ्रतासे सेनाओंको त्यागवाहुआ निस्सन्देश हमारे सम्मुख साता । २७ । हे कण तुम शीघ्रही उसके सम्मुख चलो तेरे (सिवाय इसाक में दूसरे ऐसे धनुषधारी को नहीं देखताई । २८ । ओ कि युद्धमें। धियुक्त अर्जुन को मर्यादा के समान रोककर धारणकर । ३९ । में पीछ मोर दोनों दाहें पायें उसकी रताको नहीं देखताहं वह भकेलाही तेरे सम्मुख आतrt हम ने स्थानको देसो । ३०। हे राक्षा के पुत्र तुम्ही युद्ध में श्रीकृष्ण और अर्जुन को अपने साधीन करने को समर्थ हो यह राणी भाररूप कार्य है तू. | अर्जुन के सम्मुख चल।३१। तुम भीष्म द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा और कृपा- चार्य के समानहो इसहेतुसे महायुद्ध में इस आतेहुये अर्जुन को रोको । १२ 18 |कर्ण सर्प की समान होठों के चावनेवाले सुपम के समान गर्ननेवाले वनवासी ध्यान के समान अर्जुन को मारों। यह महारथी धृतराष्ट्र के पुत्र और अन्य राजालांग पुदमें मर्नुनके भय से बड़ी शीघ्रवासे भागते हैं । ३४ । हे भूतनन्दन That destrojor of fou is coming directly against you. With eyes anger, Arjun the destroyer of fors' comes' against ar, learing all other marriors 27. Yoa must lacs hiin, for I 800 no other warrior in the world capable of resisting lima. I 50 do guards on his right, Icft ur back IL is coming alone lo sock you. Inok at lin. You alono can overpower Krishn and Arjun, Tho burden of doing so ljes on you You are equal to Bhistam Drona and Artwathama and 'shou'd therefore chock Arjan. Blay Arjan who is biting his lips roaring like a bull atd'Isracions like a wild tiger. The soos of Diritrashtra sod obber Warriors are aging away for his tear. There is so Warrior red . कर्णपर्व Karan Paray (6693) मामय गस्तु नान्यास्ति युधि मानयः । भपहा यो भवेद्वारस्त्यामृवे सूतनन्दन ३५ ॥ एते त्यो कुरष सर्वे छोपमासाद्य संयुगे। धिष्ठिताः पुरुषव्याघ्र स्वत्तः शरण काक्षिणः। ३६ ॥ देशाम्यष्ठकाम्योजास्तथा नम्नषितरत्यया । गान्धाराध यथा अश्या जिता संपे सुदुर्जयाःति कुराराधेय ततः प्रत्येहि.पाण्यम् ॥ १७ ॥ पारदेवश्चयाणेय प्रीयमाफिरोटेनाप्रत्युद्यारिमहावाशेपासपमहातस्पितः॥३८॥कर्ण उपाधाप्रतिस्थोसिशनपादानासम्मतस्तथाप्रतिमासिमझायाहोयिविधधनब्जयात ॥३९॥पश्यपाइयोर्षल मैपशिक्षितस्यचपश्येमपफायनिहनिष्यामिपाण्डयानांमहासम्म 1४० फष्णोध पुरुषानी तद सत्यं प्रनधीमिते । नाहत्या युधि तो धीरो प्यप पास्प फययन शिष्ये या निहताताभ्यामीनत्यो हिरणे अयः ।।७१। कतार्यो मधि प्यामि दया पायथया इतः । शल्य उवाच । भअयमेने प्रघपन्ति युके महारथाः वार कर्ण तेरे सिवाय भा दूसरा कोई ऐसा मनुष्प नहींहै जोकि उन भागेहुओं के भयको निश्चकरे । ३५ ॥ हे पुरुषोचम यह सब कौरव युद्ध में तुम्न रक्षकको पाकर तेरी रक्षा में प्राश्रित होने की इच्छा से निपत है । ३६ । वैदेह काम्बोज़ अम्बष्ठं नग्नजित भौर पद में बड़ी कठिनतासे विजयहोनेवाळे गान्धारदेशी जिस तेरे धैर्य में विजय कियेगये हे राधाके पुत्र उस धैर्यको करके फिर पाण्डवों के सम्मुख चल । ३७ । हे महावाहो वहीशूरता नियाहोकर उन यादय वासुदेव जीके सम्मुख चलो जोकि भर्जुनके साथ अत्यन्त मीति रखनेवाले हैं। ३८ । कर्ण वोला हेल्प तुम अपने स्वभाव में नियत होजाभो हे महाबाहो अब तुम मुझको अंगीकृत विदितहोतेहो तुम अर्जुन से भयभीत मतहो । ३९ । अव मेरे भुनाओं के वलको और पाईहुई शिक्षाको देखो मैं अकेलाही इस पाण्डवोंकी बड़ी सेनाको मारूंगा 1 ४० । इसके अनन्तर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण और अर्जुनको मारूंगा यह तुम से सत्यही सत्य कहताहूं कि इनदोनों वारोंको विना मारहुये कभी न हटूंगा अथवा चाहे उन्हीं के हाथो मरकर शपन करूंगा क्योंकि युद्धमें सदैवही विजय नहींहुभा करता है। ४१ । भरमै उनको मारकर का उनके हायसे मरकर अपने मनोरथको सिद्ध करूंगा शल्य बोला हे फर्ण महारथी लोग युद्ध में इसरथियों में बड़े वीर except you capable of encouraging them. 35. All the Kauravas ara desirous of seaking your protection. Vaidels, Camboji Amrasht, Nagojit and Gandhar were conquered by you and you should call that same coorgy to face Arjun. 37. Standing in your bravery, face Vasudev tho dear friend of Arjun. Karan said to Shalya, " Bo steady: you appear now well-disposed towards me, Donot be atraid of Arjun. You will now see my strength and training in nrmar. Alone, I shall destroy the Panday array and then I shall destruy Krislin and Arjun, I say truly that { shall nsver rs turn without slaying them or sl.all lie daxa slain by up once moro " (66) Dahabharat कर्ण रयमधीम् । एकाफिन किमु गामि रिजेनुइ करोष मत १२ कप उपाय । वारयो जातु बभूष, लोके योधमो बार वातमी प्रतियोत्स्याति पार्थ महारे पश्य च पोर मे॥४३ परमेश एपपोरः सितस्यैः कौरपराजपुरः । स पाप मां नेम्पति इमेतव त्यान्तादेव दन्ताः स्थ सर्वे ॥ ४४ ॥ सस्पेदिनी राजपुषस्प तापमानी बावकिणी भएको । रदायुषः इतिमान् क्षिप्रास्तो न पाण्डषेयेन समोस्ति योपः ॥ ४५ ॥ गहनापनेकामपि का पत्रानके पया तार प्रतिपोज्य पाशु 1ते कोशमाणे निपतममोपा र योपोस्ति समः पृषिष्याम ४४ मतोषयत् बाजपे पोहता काणमितीयोsfer घातरस्वी । लेभ व या कप्पो महारमा धनुर्गाण्डीवं पारः सम्यमानी।" मजनको सबसे भजय कहते हैं फिर हे कर्ण ऐसा कौनसा मनुष्य है जो इस श्रीकृष्णसे रतिव अर्जुनको विनय करने का उत्साहकरे । ४२ । कण पोमा कि लोकमें ऐसा उचम रथी जहांतक हमनसुना कभी कोई नहीं हुआ ऐस मापी मसिद्ध कीर्तिवाले भर्जुन के सम्मुख होकर पुदको करूंगा उस महायुद्ध में मेरी वीरताको देखो । ४१ । यह रधियों में वहा वीर कौरपरान का पुत्र युद्धभूमि में वित घोड़ो के द्वारा घुमवाद भव यह मुझको बढ़ेदुःख से मिलता है और करवाई कर्णकही दिनपमें मेरीविभप और कर्णकेही नाशमें मेराभी नाश है। ४४ राम कुमारके मवेद और कंपसे रहित दोनों इसप चिन्हों से युक्त होकर ददिमान हैं यह दशम् अर्जुन वहा कर्मी और हस्तलाघवी है इस पांच के समान कोई युद्धका नहीं है । ५५ । वहुत पापों को भी लेताहे और इन सबको एकही बाणके समान धनुपपर चढ़ाकर छोडताहै फिर सकल वाण एक कोशपर गिरते उसके समान इस पृथ्वीपर कौन शूरवीरहे । ४६ । श्रीकृष्ण को साथ रखनेवाले जिस वेगवानमापिरथी भर्नुनने खाण्डव पनमें भग्निको तृप्तकिया यहाही मात्मा भीकपणामी ने चक्रको भोर पापड्य भर्जुन ने गांडीव पको पाया । । them; for one cannot get victory in each caro_· I shall gain my object by slaying him or shall be alain by blm." Shalys said, " Brava warriors say that Arjun is invincible in battle Who can conquer him when bo is assisted by Krisbal " Karan said, " We bare beard of no warrior liko Arjun, yotisball ight with that famous warrior, See my bravery in battle. Tho great warrior is roaming oa his white horgon. He is fryiog tó nas me and thinks hiaqwa Tictory completo aftor conquering mo or to die in tho attempt. Both his hands are engaged in shooting arrows Bo is very dexterous and has no warrior to match him. He takes up many artOws at a time and discharger tham lika 9na Hig arrows fall down at the distance of a mile. What warrior is equal to him on the face of the carth. He gratified Agni in the Kbaodav foleat - कर्णपर्व Karns 'ary (66951 वाश्वयुका मुपोषमुक र महाबाहुरदीनसाथः । मधुधी चाक्षये विम्यरूपे शमाणि दिपानिपपाहात ॥ ३८ ॥ व्येन्द्रलोके निजयानु दापनसम्पयान कासयांस सारालेभे रोज देयद स्म त को नाम तनापधिकः पृषिम्पाय ॥४९॥ महादेव तोरपामास पो वे साक्षात मयुजेन महानुभाषः। हमे ततः पाशु पंत मुधोलोक्यसबारक महासम् ॥ ५० ॥ पृथक् पृषक लोकपाला समेत बायरमेयाणि पापेक्षा अघानाशु रणे नृसिस कालकम्जानमुरान् संमे तान:५६ या पिरम पुरे समेतान तर्धानरमानेफेरणेन निषा । जहारबोधन माजमा सानिमार महारयेम्पः ॥ ५२ ॥ तमीदश बार्यगुणोपपाने करण सायं परमं पाषामा समापन सारसमुचमं पे जाने स्वयं सतलोकस्य शक्य ॥३॥ सधीयन केश नारायगेनतिमेन गुः पायनस्य गुणा- मीद पर पराक्रमी महाबाहुने अग्नितही महा शब्दापमान घोड़ों से युक्त रको या दो अक्षय तुगीरों को और दिल्प शस्त्रोंको पाया । ८ । इसीप्रकार ईन्द्रलोको युदकरके असंख्य कालकेयनाम दैत्यों का मारा और देवदचनाम शख को पापा तथ्वीपर उस से भाधिक कानोसताहै । ५९ । इस महानुभावने उत्तम युदसे अक्षों के द्वारा साताद महादेवजी को पसम किया और उनसे तीनोलो. कोका नाश करनेवाला बहाघोर पाएतनाम महाभमुख अखपाया । ५० । सरें छोकपालों ने इकट्ठे होकर पदमें पृथक् २ प२ मत्रों को दिया जिन प्रस्त्रों के द्वारा इस नरोपम ने युदमें इकट्ठे होनेवाले कालकेप नाम अमरों को बड़ी शीघ्रवासे मारा। ५१। इसीप्रकार इस अकेल भनिन राजा विराटके पुरमें कौरवों समेत इम सब मिलाओं को एकही रयके द्वारा विजय कर युदामे में उस गोधनको हरेण करके उनसब महारथियों के वस्त्रों को भी छीन लिया। ५९रे शल्प इस मंकारक पराक्रमी और गुंगवाले श्रीकृष्णको साथमें रखनवा सरसोक और राजामों में श्रेष्ठ इस म नंको अपने साइससे बुलाताहूं ६३ । हमा with the bolp of Krisha. There he found the Gaodis and Krisha got the discus. He also got from Agui the diving car and two inexhaustible quiver He slow indumerablo Kalkeya asors in heaven, dod got Doradatta. Ha gratifol Mahader himself in fighting and * got from bío the Posbupat woapon that can destroy thatbroo worlds, 50 50. Tbu lokpals separatels gave him weapons by means of which he was able to slay the Kalkayas. Ho alona conquered all of us, Kodravas, al Viratnagar and having rescued too ostile, hd muutó insensible and deprived us of clothes Yet I challenge Arjua thol. but of wation Assistad by Shii Krisba a hoi. Ho is protected big Narigas of impease strength, whose qualitis csaingt be dustibil bý' allibo, world in thousands of goat. Nors cia dachibo' ther, - (6696) Mahabharat शश्या धक्तुं समेतैरपि सर्वलाकैः।। ५४, ॥ महात्मनः शखवाणिपार्विष्णोजिष्णा धमुदेषरमजस्य । भयञ्च मे जायतेसाध्वसच रष्ट्या कृष्णायकरथे समेती ॥५५॥ अतीय पार्थो युधि फार्मुकिन्यो नारायणश्चाप्रति चक्रख । एवंविधो पाण्डववामुदेवी चळेत स्वदेशाधिमधाम छप्पो ॥५६॥ उभौ हि शरौ कृतिनी बढात्रौ महारथी सह ननोपपत्रो । एतादशा फाल्गुनवामुदेषो कोन्यः प्रठीयान्महते तु शल्प ॥ ५७ ॥ मनो रथो यस्तु ममाच तस्य मद्रेश युद्ध प्रति पाण्डपस्य । नैवं चिरादाशु भविष्यतीदमटमः |द्भुतं विषमतुल्यरूपम् । एताप पा युधि पातयिष्ये मां पापि कृष्णी निहनिभ्यतांध ॥ ५८॥ इति ध्रुवन् शल्यमित्रहन्ता कर्णो रणे मेघ इवोन्ननाद । अश्धेत्य पत्रेण तवामि नन्दितः समेत्य चोवाच कुरुपधीरम ॥ ३९ ॥ कृपञ्च भोजश्च महाभुजावुभौ तयेव पराक्रमी अनंत वार्य वाले नारायणसे रक्षित है सब संसार इकट्ठा होकर हजारों चर्पतक भी जिसके गुणों का वर्णन न फरसके । ५४ । ऐसे शंखचक्र गदा पमधारी वसुदेवजी के पुत्र महात्मा श्रीकृष्ण और अजुनके गुणों के कहनेको कोई समर्थ नहीं है एक स्थपर वैटहुये श्रीकृष्ण और अर्जुन को देखकर मुझको महाभय उत्पन्न होवाद । अर्जुन युद्धमें सब धनुपधारियों से थेष्ठ तर है मोर नारायणीभी युद्धमें अद्वितीय हैं ऐसे अर्जुन और वासुदेवजी है हे शरय चाहै हिमाचल अपने स्थानसे चलायमान होजाय परन्तु अर्जुन और श्रीकृष्ण चलायमान नहिसिक्तं । ५६ । यहदोनों दृढ़ शस्त्रधारी शूरवीर महारथी बड़ेकगर शरीरवाले हैं हे शल्प ऐसे दोनों अर्जुन और पासुदेवजी के सम्मुख मेरे सिवाय दूमरा कौनजासक्ताहै यह अत्यन्त अहुत वा आदतीय उनका और मेरापुर शोघही होगा मैं युद्धमें इनदोनोंको गिराऊँगा वा श्रीकृष्ण और अर्जुनही मुझको गिरावेंगे । ५८ । शत्रुओंका मारनेवाला कणे युदमें शज्यते ऐस २ वचनोंको | कहताहुमा बादल के समानगर्जा फिर आपके पुत्रके पास जाकर बड़े प्रेम से मिला उसने भी इसको अनेक प्रकार से प्रसन्न किया.१५९ । फिर वहां qualities of Arjun and Vasudev the wielder of conch, discus, maco and lotus. I ain afraid to see Arjun and Krishn seated on the same car. 55. Arjun is the best of archers and Narayan is a matchless warrior. They cannot be moved back although, the Himalayas move from their plae. Both these warriors have strong bodies andporerful weapons. IVho except myself can withstand them. My battle with them shall be wonderful. Either I shall slay them' or they will slay mo." Having said these words to Salya, Karan the 'destroyer of foag, roared like thurder. Thep' he embraced your son with affection and pleased him in various ways. He then cheerfully, addressed the great Kaurav rarriors, - Duryodhan; Kripacharya KrityarmaShakani and his younger brother as well as Ashwathama । फणपषHaran Pary 1667 गाधारपति सहारमम् । गुरोः मतभ्वायरमन्तवात्मनः पदातिनाप निपसादिन तान् ॥ ६॥ नियन्यताभिद्रयताच्युमाजुनी भ्रमण संपाजता सर्वशः । यथा स्या भंशपिशनापुभ मुपेन न्यामहम भूमिः ॥ ६. ॥ तयेति का स्थरिता. स्म जन मियांसपो धीरतमासम्माययुः। शशि अनुयुधित दारया धनञ्जय कर्णनिदे शफारिणः ॥ १२ ॥ ननद भूरिजलो महायो यथा तथा सानु समाजनीयसत् ॥ १३ ॥ सन्दधानो न तथा शरांतमान प्रमुग्यमानारिपुतिः प्राश्यते । धनन्जयातस्तु सर्वदारिता इता निपेतुनग्याजिकुंजय ॥ ६४ ।' राचि गाण्यचारमण्डलं युगान्तसूर्यप्रतिमानतेजसम् । न फौरवाः पुम्दी क्षित.अयं यथा रपि व्याधितषपो जनाः ॥ ६५ ॥ शरोतमान् सहितान महार प्रसन्न होकर कौरवों में बड़ेवार दुर्योधन कृपाचार्य कृतवर्मा राजा गान्धार समेत उसके छोटभाई इनसबसे वा प्रवत्यामा वा अपने पुत्र और उन: पदाती दाधी और अश्व संचारों से वोला । ६० । श्रीकृष्ण और अर्जुनको रोको प्रथम उनके सम्मुख भाकर शीघ्रही उनको सब प्रकारसे यकाओ मिसते कि हे राजा लोगो आपलोगों से अत्यन्त घायलहुये इनदोनों को मैं सुखपूर्वक मारू।१यर बड़े सब महावीर बहुत अच्छा ऐसा कहकर भर्जुन के मारने के अभिलापी होकर बड़ी शीघतासे उन के सम्मुख गपे कर्ण के भाज्ञाकारी महारार्थियों ने वाणों से | उस अर्जुन को घायल किया । ६२ । फिर भन ने युद्ध में उनको ऐसा निगला जप्त कि पड़ा जल समूह रखनवाला समुद्र नद नदियों को निगल जाता है।६।। यह अर्जुन अपने उत्तम बाणों को पढ़ाता और छोड़ता हुआ शत्रुओं को दिखाई भी नहीं पड़ा फिर भर्जुन के चलायहुये वाणोंसे पायल और मृतक हुपे सब मनुष्य हाथी और घोड़े पृथ्वीपर गिरपड़े । ६४। सच कौरव उस वाणरूप अग्नि मोर | मोगर रूप मुन्दर मण्डल रखनेवाले प्रलय कालीने सूर्य के समान महातेजारी अर्जुन की भोर देखने को ऐसे समर्प नहीं हुये जैसे कि नेत्ररोगी मनुष्य मूर्यके दर्शन करने को असमर्थ होता है । ६५ । इसतेहये गांडीप धनुष रूप पूर्ण his own son and other soldiers of the four denominatiops, “Check Arjug and Vaguder and tire them well, so that I may find them at Dany proy." G. All those warrion, obeyin, bis orders, wept fortfard to slay Arjun and wounded him with their arrows; but the latter gwallowed them up to the ocean does the small and large river. He was nobsoon potting up and discharging his arrows. Arjun's arrows, men, clepbants and hoftes foll down iu large num. bers. The Kauravas could not look at Arjun, who had bis arrons for fire and his box moving in a circle for the Sun. 65, Ha cut down thair, anngs as the summer sur soaks water. With his arrow, Arjan destroyed your army.. Srpscherya procoeded against him Wounded by [6698 ] Malablarat चिच्छेद पायः प्रहसनगधैः । मयश्च तानहनाणसंधान गाण्डीवधायतपूर्णमा ।। ६६ । पयोप्रशिः शुचिशुममध्यगो मुखं विवस्वान हरते जलाधान तथा घाणगगानिरस्य वदाह मेनां तप पार्थिवेन्द्र ॥ ६७ ॥ तमायबापाविषजन् कपः शरार तथेष भोजस्ताव चात्मज रषयम् । महारथो द्रोणमक्ष सायरवारिस्तोपण लचम् । ६८ ॥ जियाशुभिस्तान् कुशलः शरोचमान महाहवे मप्रहितार प्रयलतः। गिरेः प्रचिच्छर सपाण्डवस्थानपरामिनद्वक्षसि शामिलिमिः ॥ १९ ॥ से गाण्डिर यायतपूर्णमण्डलस्तपत्रिपुनर्जुनभास्करो वभाशरोपरहिम शुषिशुकमायगो पेय सूयर्थ: परिवेशवांस्तथा ॥ ७० ॥ अद्याप्रमाणे ईशमिधंनजयं पराभिमदोणमुतो च्युत प्रिमिः । चतुर्मिवाचतुरः कपिन्ततः शरश नारापरवाकिर । ७१। तथापि तं प्रस्फुरदातकार्मुकं त्रिीभिः शरैर्यन्तृशिरः पुरेण यांमभिधतुरखिए मंडलाल अर्जुन ने उन महारथियों के चलायेहुये पाण'जालों का ऐसे काटा जैसे कि ज्येष्ठ मापाद में उग्र किरण रखनेवाला मूर्य जल समूहों को सम पूर्वक | सोखलेता है हे महारान फिर अर्जुन ने वाणों के समूहों. को छोड़ कर भापकी सेनाको भस्म करदिया। ६. फिर कृपाचार्यजी बाणोंको छोड़ते हुये उस के सम्मुख गये उसीमकार कनवर्मा और आपका पुत्र दुर्योधनभी दौड़ा और महारथी | अश्वस्थामा ने शायकों से ऐसे टकर्दिया जैसे कि बादल पहार का हकदेता है । ६८ । उस समय कुशनवुद्धी शीघ्रता करनेवाल पांडव अर्जुन ने उस बड़े युद्ध बड़े उपाग से मारने के इच्छावान् वारों क चलायेहुये उत्तम पाणों को अपने बाणांसें काटकर तीन तीन घाणों से उनको छातीपर पायल किया । ३९ गांव कंप पर पूर्ण मंडलवाला वाणरूपी उग्र किरणों से युक्त मजुन रूपी सूर्य शत्रुओं को संतप्त करताहा ऐसा शोभायमान हुआ जैसे कि ज्येष्ठ आपाद में पार्श मंडल से युक्त मूर्य वर्तमान होता है । ७०। इसके पछि अवस्थामा ने दशउत्तपमाणों से अर्जुन को तीनवाणों से श्रीकृष्णजी को पार पाणों में चारों घोड़ों को पायक करके नाराचनाम उत्तम बाणों से धजास्य हनुमानजी को कंदिया । .१ तौमी अर्जुन ने उस धनुषधारी अमत्यामा को वानही वाणों से कंपायमान करके चरसे dischargiag bis arture and Kritvarma as well as your son rushed against him. Ashwathama' covered Hiin with arrosa liko cloada. Wiss Arjun then cut down their arrows and wounded them with three arrows each on the breast Moving the Gaudiy like the Sun and having arrows for saye, Arjun looked glorious in destroying the foss like the summer sun. 70. Then AstiwatHama' abbt Arjun with ten arrow.Shree Krishn with thret and the four hotada «ity foal, eod.covered the monkey standard" witte skátpt dtrower. Tko gocat arcbor, Arjurshool Antistathama with thibe ertöni, tülli duivat's 60199 Kuralı Paray (6699) पंज धनजया दौणिरपादपातयत् ।। ७२ ॥ स रोपपों मणिपाटकर सक्षक भोगवर्चसम् । महाधने कार्मुकमन्यदायदे यथा मराहिमपर गिरस्तटात ७३ ॥ समायुषचोपनिकीर्प भूले धनुस कस्या सगणं गुणाधिक: समादयताजितो नरोधमो सचमेद्रोनिाविध्यदन्तिकात ॥ ७ ॥ कृपय भोजश्च तपाामजते शरकैर्युपि पाण्डवर्षमम । भारथाः संयुगमूनि स्थितास्तमोनुई पारधारावा प्रवन् । ७५ रुपस्य पार्य: सशरं शमशन यान् स्वजान साधिमेष परिभिः । सपार्षपदासाविकमलपा यथा धनधा पुरा चले.. ॥ ७६. ॥ स पार्थवामिन पातिवायुधोपजायमच रुते महाहो । कृता को वाणसाम्रपत्रिती पथापगंयः प्रपमं किरीरिना ।।.७७॥ यः प्रचिच्छेद वधारमजस्य व धध प्रक सारथा के शिरको चारवाणों से घोड़ों को और तान वाणों से अश्वत्थामा की बजा को रपसे गिराया । ७२ । फिर क्रोध युक्त असत्यामा ने हीरे मणि और मुषण से जटित तक्षकके फणके समान प्रक बड़े मूल्पके दूसरे धनुपको ऐसे उवाया जैसे कि प्रत्यन्त उत्तम बड़े सर्पको पर्वत के किनारेस कोई उठाले । ७३ । उस वड़ेगुणी अश्वत्थामा ने अपने शस्त्रको निकालकर घोहे और सारथी से रहित पृथ्वी के समान स्थपर अपने धनुषको मत्यंचा समेत करके समापसे भाकर उनदोनों अजय नरोत्तमों को उत्तम बाणों के द्वारा पोड़ामान किया । ७४ । युद्धके शिरपर नियत वह महारथी छपाचार्य फतवर्मा और आपका पुत्र दुर्योधन युद्ध में अनेक पाणों समेत अर्जुन के ऊपर ऐसे आकर गिरे जैसे कि बादल, सूर्यको पेरलेते हैं । ७५ । फिर सहसाबाह के समान पराक्रमी भर्जुन ने कपाचार्य के घनुपवाण घोड़े ध्वना भोर सारीको वाणों से ऐसे घायल करदिया जैसे कि पूर्व समय में राजा वलिको गजधारी इन्दने घायल कियाया । ७६ । वह कृपाचार्य.अजुन के पाणोंसे भत्रों से रहित होगये और उस बड़े युद्ध में ध्वजाके टूटने पर हजारों वाणों से ऐसे देगपे जसे कि पूर्वमें अर्जुन के हापसे भांष्मज़ी छदे गयेथे 1 ४७ । इसके पार प्रतापवान अर्जुन ने गजते हुये भापके पुत्रकी ध्वजा और धनुपको वाणोंछे काटकर कृतवर्मा के उत्चम घोड़ों को मार चनाको भी काटाला head with one arrow, killed the four hur&ce with lour and cut down the standard with three, Then enraged Ashwatbami took up sonther jewelled bow, like the lood of Takahak as ona takes up & soake from the side of a bill, From his driver-fnd-horselesą car, clever Ashwathama pierced those tv), warriora with big sbarp arrows, Brave bijpacharge, Kritparna And yoge aon Duryodhan cipeled Arjua with their arropa as the clouds bide the sun, 75. Like Sahasravshu ip, prowber, Arjun hit the bow, arrows, horses and standard of Drona sa Indra had wounded Bali. Arjun deprived Kripacharya of weapons. and wounded bim with arrows $ he had wounded Bhishm. Then, (07001 Mahabharat ! ६७.२) अपिमरापि । गात्राणि प्रारिमोत् पायपिस कर५॥गिनगार्षिक पगियरस्कः समन्ततः । पतितय पतनिय पोपैरामीण समाता ५६ पनप शरापरत: सदनापश्यति। संमिनभित्रपिारस्तम्यापपर्यः मता ॥ मागमा मविपमा घोरारपर्य मधुरंगारणभूमिदान महापतरणी पथा !! ८ ॥ पापापः सा गुपताम् । समतांमध स्पैः सीमाभवर मदी. मयसन्नाहपाँधेः मापनः । मास्थिताः पाषाणो भना निपानिपा.पुरा:महामाया पायगुधप्रवादिताः पितुः पर पोवा: तुः किरीटिना । पयंस्तानीय अत्राणि सप्तरपानि महागिरे ॥ ११ ॥ धमा पराभ्यस्ततानां भूषरयारकः समन्तावरदमपान पारणाग्मायरियाः १२. ममिनिरपी धनान् मिन्दवियागुमान् ॥ १३ ॥ दलगंजमानुपाभिमेश पदुधा रापिखपापयशीण्डंगसामुभिः। मपपियायुधांग: सोपोंभूर काल्ग ने निर्मलमास दुरम भार नागपों से अंगों को ऐदरकर शिरोंको काम।। कटे हुपे मर और कवचों से रहित पर शिर पारोंभोर से गिरे उन गिरनेवाले गूर शरों से पानासादित होगई। ६ । भईनके सायों से मवर अंग भंग पूर्ण | नागपे भगों से रहित दाधी घोर रपी और रयों से भी व्याप्तरोगई। ७ हे रामा पदभूमि पट्टीदुर्गम पिप महापोर दुःस से देखने के पोग्य वैतरणीनदी के समान होगई। ८ । गूरवीरों के घोर मारपी रखनेवाले मृतक पोड़े या मारपी समेत रयोंसे पार ईशा रय च मरा और भलास भी माचितिसी होगा। कायों में भलंकत मेना के सेनाधिप मुनारी कवच गुनहरी भूपण रखनेशले सूरतीरों समेत नियतहुपे । १० । कठोर महतिगाले सवारों की पंरी भोर मगधों से मेरित प्रोषपुक्त चारसाहायी भनके पापों से ऐसे गिरपड़े जैसे कि पम से रो पर्नतों के शिखर गापडले हैं । ११ । रत्नों में पूर्ण वापर अर्जुनके पाणों से नाश होकर गिर उपम हायपोस पृमीमारणादिवशेगई धनरु रपने पादन को पारोंमार से ऐसे मामकिपा जैसे कि पूर्ण पादनों को मात करता है मृतक दापी घोडे मनुप्प भनेक पकार टेरपल सारपी या करयों से राहत युद मनाने मृतक मनुप्पो से और बड़े भयानक W. gruod, & Dised ained worluded by his arros, tho doplanta, berms and ce-warriora lay dent on tho ground. The battly liolavan diculul to bold like the Bailarut. It was full of tha bornos nad divas laia as well at of the paus Ly of the cott, Jarts Anil utler weapont The latestltheaminatantat thohcal of their forces, Und by die baw and lifelic Lovrinara, t..s four buadruckplunto fell down by Arjua's artwo, lito sounlaia pale sluit by vajo, tad cover the field 1: Vis CAP WAT ALIF Anle by clebeals tattrain with crety. Todymitephanti, Informatirvices सहापदरालाले [६७०३) कर्णप, Karan Paray 16703) मेन वै ॥ १॥ परफूजयच्च गाण्डीवं सुमहद्भेरवं परम् । घोरञपिनिप्पेषः स्तन पिरलोरिषाम्बरे ॥ १५ ॥ ततः प्रादीयंत चभूर्द्धनञ्जयशराप्ता । महायात समषिया महानौरिष सागरे ॥ १६ ॥ मानारूपाः प्राणER: 'शरा गाण्डीय चोदिवा । मलातोकाशनिप्रख्यास्तष सैन्यं धिनिहहन् t७॥ महा गिरो.धेषनं निशि प्रज्वलितं यथा । तथा तप महासन्यं प्राइफुटम्छरपीडितम ॥ १८ ॥ संपिएदग्धविश्वस्तं तष सैन्य किरीटिना । कृतं प्रपिस्तं पाणः सर्वतः प्रदुतं दिशः ॥१९॥ महाधने मृगगणा दावाग्निवासितां यथा । कुरवापर्यधर्तन्त निहंग्या सम्यसाधिना ॥२०॥ उत्यज्य हि महाबाहुं भीमसन तथा रणे । घलें कुरूणामुहिम्न सर्षमासीत परामुखम् ॥ २१ ॥ ततः कुरुप, भग्नेषु वीभत्सुरपराजितः । भीमसेन समासाप मुहरी साध्ययचंत ॥ २२ ॥ समागम्य च मीमेन मन्त्रयित्या व फाल्गुनः। शब्दवाले गांडीव धनुपको टंकारते अर्जुन के हाथ टूटेहपे शास्त्रों से युद्धभूमि का मार्ग आच्छादित होगया जैसे कि आकाश घोर वजसे विनिप्पेप स्तनयित्नु होता है। १५ । उसी प्रकारवाला धनुष का शब्दया उसके पीछे अर्जुन के.वाणों से घायल होकर सेना ऐसे पृथकहोकर छिन्नभिन्न होगई जैसे कि समुद्र में बड़ेवाके वेग से चलायमान नौका होती है। १६ । नानाप्रकार के रूपवाले प्राणों के हरने वाले गांडीव धनुपसे छोड़े हुये उल्का और बिजली के रूपवाले वागों ने आपकी | सेनाको ऐसे भस्म करदिया जैसे कि सायंकाल के समय बड़े पर्वतपर भचण्ड अग्नि बातों के वनको भस्म करदेता है इसी मकार वाणों से पीड़ित प्रापकी बड़ी सेनामी महा व्याकुल होकर चलायमान हुई । १८ । और अर्जुन के हाथ से मर्दित और भस्मीभत सेना नाशको माप्तहुई वाणोंसे करीहुई वा घायलहोकर वह सेना सब ओरको ऐसे भागी जैसे कि दावानल अग्निसे भयभीत होकर बड़े सूगों के समूह भागतेहैं इसीमकार अर्जुनके हाथसे भस्महुये । २० ! कौरव उस महापाहु भामसेनको छोड़कर चारों ओरको भागे इस रीतिसे कौरवों की सब सेना व्याकुल होकर मुख मोड़ २ कर भागी । २१ । इसके पीछे कौरवोंके छिन्नभिन्न होनेपर वह अजयं भर्जुन भीमसेन को पाकर एक मुहूर्त पर्यन्त समीप वर्तमान रहा १२ cars, weapons drivers, armourless warriors and the weapons broken by tbo Gaddio bow filled the ground like mountains struck by vajra. 15. The sound otde bow was tremendous The army. pierced by Arjun's arrows, went astray like a boat in i storm. The bright arrows, like lightning, discharged from Gandir, consumed the army as firedestroys a forest of bamboos, and the arroy was dispersed and destroyed. Wounded by his arrows, the warriors fied in all directions like the desr afraid of a burning forest. The soldiers destroyed by arjun, left Bbia and ded in all directions. Thus tbe whole army of, Kauratas turned back, 21. At the dispersion of the Kauravas, drjun approached Bhini and stayed with bim for a short time. Having given him 7 , (6709) Mahabharat ६७.२) पिमलेरपा गात्राणिमाक्षिणोत् पार्यःशिरांसि चकत्तं ॥ ५ निगार्षिक वाशरस्कः समन्ततः । पतितेध पतन्द्रिय योधरासीत समावृता ॥ ६ . धनन्जय पराभ्यस्त स्पन्दनावग्यदिगः । संछिन्नभिनषिध्वस्तभ्यङ्गामायः मता ॥ ७॥ मुर्गमा मुविषमा घोगरय मदुईशा । रणभूमिरवाजन् महापैतरणी पथा॥ ८॥ पाचकाक्षभनय व्यायः साशा युज्यताम् । समतहतमश रयः स्तीर्णाभवन मदी। सुपर्णयसन्नादपोधेः कनकभूषणः । मास्पिवा क्लृप्तधर्माणो भद्रा नित्यमदा दिपाः ॥ १०॥ कुराः श्रीमहामाः पाण्यगुष्ठप्रचादिक्षा चतुः रात भर पता: पेतुः फिरीटिना । पर्यस्तानीष शुमानि ससस्पानि महागिरे ॥ ११ ॥ घना पराज्यस्तैस्तीर्ण भूधरयारः। समन्ताबरदमपान पारणाम्मषिणः ॥ १२ ॥ मभिपदेनरयो धनान भिन्दप्रियांशुमान् ॥ १३ ॥रतगंजमनुष्याश्वभिन्नध पाषा रयैः। विशययफयचंयुयशौण्डगतामुभिः । मपयिसायुधर्मार्गः स्तोपोंभूत काल्गु ने निर्मलमल्ल तुरम भार नागपों से अंगों को छेदश्कर शिरोंको काटा ।। कटे हुये भा और कवचों से रहित यह शिर चारोंभोर से गिरे उन गिरनेवाले शूर- वारों से पृधी आच्छादित होगई। ६ । अर्जुनके पाणों से मृतक मंग भंग चूर्ण नाराहुये खगों से रहित हाथी घोड़े रखी और स्यों से पृथ्वी व्याप्तहोगई। ७ । रामा पदभूमि यहीदुर्गम लिपप महाघोर दुःख से देखने के योग्य वैतरणीनदी के समान होगई । ८ । शूरवीरों के घोर सारथी रखनेवाले मृतक घोड़े वा सारथी समेत रयोंसे और ईशा रप चक्र भरा और भल्लोस पृथ्वी महाचित्रितसी होगई।९। कवचों से भलंकत सेना के सेनाधिए सुनहरी कवच गुनहरी भूपण रखनेवाले शूरवीरों समेत नियतहुये । १० । कठोर प्रतिवाले सवारों की ऍड़ी और अंगुष्ठों से प्रेरित क्रोधयुक्त चारसौहाथी अर्जुनके पाणों से ऐसे गिरपड़े जैसे कि यज से रहे पर्वतों के शिखर गिम्पड़ते हैं । ११ । रत्नों से पूर्ण पृथ्वीपर अर्जुनके पाणों से नाश होकर गिर उत्तम हाधियोंसे पृथ्वीमाच्छादित होगई अर्जुनकं रपने बादल के रूपमद दालनेवाले हाधियों को चारोंमोर से ऐसे प्राप्तकिया जैसे कि ये यादलों को माप्त करता है मृतक हाथी घोड़े मनुष्य अनेक प्रकार के टूटे रथ शस सारपी वा कवचों से रहित युद्ध में मतवाले मृतक मनुष्यों से और बड़े भयानक the ground, 6. Dead and wounded by his arrows, the elephants, borses and car.warriors lay dead on the ground. The battle field was dreadful to bebold like the Baitarvi. It was full of the borros uod drivers slain ez di As of the parts of the mir, darts and otber wapons. The leaders of the armis stoud at the head of their forcea, Urged by the tow and heels of the drivers, the four hundral elephants fell down by Arjun's arrows, lito mountain peaks struck by vajra, 'and coveraditho ticl..1:. Via cor tysk surroundod by clepilool like the Bun with clouds. Thodying cleplants, horsery inen, troken ! ...
॥ मा [६७०३) कर्णपर्व Karan Parav (6703) मेनचे ॥ १५ ॥ परफूजयच्च गाण्डावं सुमहद्भवं परम । घोरखविनिप्पेषः स्तन पिस्नोरिषाम्बरे ॥ १५ ॥ ततः: प्रादीयंत चभूखंनजयराता .महायात समषिया महानौरिव सागो ॥ १६ ॥ नानारूपाः प्राणहरा: 'शरी गाण्डोष घोदिता. | मलातोकाशनिप्रपास्तय सैन्य विनिहंन । गिरी घेणषन निशि प्रज्वलितं यथा 1 तथा तय महासन्य प्रास्फुटष्छरपीडितम ॥ १८ ॥ संपिएदग्धविश्वस्तं तप सैन्य किरीटिना । कृतं प्रपिस्तं यानः सर्यतः प्रदुतं विशः ॥ १९ ॥ महायने मृगगणा दावाग्नियासितां पथा। कुरवः पर्यन्त निहंग्या सम्यसाचिना ॥२०॥ उत्सृज्य हि महाया भीमसन तथा रणे । पलं कुरूणामुद्विग्न सर्षमासीत् परामुखम् ॥ २१ ॥ ततः कुरुप, भग्नेषु पीभत्सुरपराजितः । भीमसेन समासाच मुह सांभ्ययरत ।। २२ ॥ समागम्य च भीमेन मन्त्रयित्वा व कालानः । शब्दवाले गांडीव धनुषको टंकारते अर्जुन के हाथसे टूटेहुपे शस्त्रों से युद्धभूमि का मार्ग आच्छादित होगया जैसे कि आकाशमें घोर यजसे विनिप्पेप स्तनायित्नु होता है। १५ । उसी प्रकारवाला धनुष का शब्दया उसके पीछे अर्जुन के वाणों से घायल होकर सेना ऐसे पृथकहोकर उिन्नभिन्न होगई जैसे कि समुद्र में बड़ेवायक वेग से चलायमान नौका होती है। १६ । नानामकार के रूपवाले प्राणों के हरने वाले गांडीव धनुपते छोड़े हुये उल्का भौर विजली के रूपवाले पागों ने आपकी सेनाको ऐसे भस्म करदिया जैसे कि सायंकाल के समय बड़े पर्वतपर प्रचण्ड अग्नि वालों के वनको भस्म करदेता है इसी प्रकार वाणों से पीड़ित भापकी बड़ी सेनामी महा व्याकुल होकर चलायमान हुई । १८ । और अर्जुन के हाथ से | मर्हित और भस्मीभत सेना नाशको प्राप्तहुई वाणों से करीहुई वा घायलहोकर वह सेना सब ओरको पेसे भागी जैसे कि दावानले अग्निसे भयभीत होकर बड़े मृगों के समूह भागतहैं इसीमकार अर्जुनके हायसे भस्महुये । २० । कौरव उस महावाह भीमसेनको छोड़कर चारों ओरको भागे इस रीतिसे कौरवों की सव सेना व्याकुल होकर मुख मोड़ २ कर भागी। २१ । इसके पीछे कौरवोंके छिन्नभिन्न होनेपर वह अजेय अर्जुन भीमसेन को पाकर एक मुहूर्त पर्यन्त समीप वर्चमान रहा १२ cars, weapons drivers, arunourless Warriors and the weapons broleft by tho Gandis bow filled theground like mountains struck bo vajra. 15. Tha sound of the bow was tremendous. The army, pierced by Arjun's arrows, went sstray like a boat in a storm. The bright arrows, like lightning, discharged from Gandiy, consumed the army as fire destroys a forest of bamboos, and the army was dispersed and destroyed. Younded by his arrows, the warriors died in all directions like the degr 'afraid of a' lunding forest. The soldiers destroyed by arjun, left Bhim and fled in all directions. Thus the whole army of,Kauratas turned back, 21. At the dispersion of the Kauravas, Arjun approached Bhim and stayed with him for a short times Having given him R २८ (6704) Alahabharat (६७०४) विशपममं घारमै करिया युधिष्ठिरम ॥ २३ ॥ भीमसेनाभ्यनुहावस्ततः प्राया बनानया नादपनयमोषेण पूर्षीि पाच भारत ॥ २४ ॥ ततः परिवृतो वोरंश मियाँधपुरः । दुशासनादबरजस्तषः पुत्रनञ्जयः ॥ २५ ॥ ते मस्यया पाणे काभिरिय कुजरायतेबसनारा नृत्यन्तष मारत ॥२६॥ मपसण्यांत साधक रथेन मधुमपनः । नियुकान हि स ताम्मेने थमायाशु किरीटिना ॥ २७ ॥ तस्प्रादपरापरामुखरपे न ॥ तेषामापततां केतुनबावापानि साय कान् । नाराचैरवंषध शिमं पापों न्यपाठपत् ॥ २९ ॥ मयान्य देशभिर्मः शिर्ष स्पेषां न्यपातयत् । रोपसंरकनेत्राणि सन्दछौष्ठानि भूवले ॥ ३० ॥ तानि बत्राणि विषमः कमलानीव भूरिशा तास्तु मन्महायगईशीमदंशकौरपान कमानदाराम पुंखेहत्वा मायादमित्रहा। पति कर्णपर्वणि संकुलसे मसीततमोध्यायः ८०॥ | वहां भीमसेनसे युधिधिष्ठिर का सब वृत्तान्त भौर भानन्द से होने का समाचार कहकर भीमसेन से भाशा लेकर अर्जुन फिर चलागया हे भरतवंशी वह स्थके शन्दसे पृथ्वी और आकाश को शन्दायमान करताहुआ गया । २४ । इसके पछि शूरवीरों में श्रेष्ठ प्रतापी अर्जुन दुशासनसे. चोटे आपके दृश पुत्रों से पेरागया । २५.। उन्होंने भी उसको वाणोंसे ऐसे पाडामान किया जैसे कि उल्काभों से हायीको पीड़ित करते हैं.भरतवंशी धनुपको मण्डलाकार करनेवाले शूरवीर नकों के समान दिखाई दिये । २६ । उनको मधुसूदनजी ने अपने रपके द्वारा दक्षिण किया और अर्जुनके हायसे मरकर उनको यमराजके पास जानेवाला अनुमा नाकमा । २७ । उसकपीछे अर्जुनके रथके मुड़ने पर उनसूरोंने पढ़ाई करी ।२८ । अर्जुनने धन सम्मुख भानेवालों के घाड़े स्थ सारथी और ध्वजा समेत अनुप और | सायकों को शीघही अपने नाराच और भदचन्द्र नाम बाणोंसे गिराया। २९ । पोबसे दूसरे दश भल्लासे उनकेउन शिरोंको पृथ्वीपर गिराया जोकि बहुत काल से रक्त नेप्रकर कर भागको काटते थे। ३० । वह बहुत से कमलरूपी मुसासमेत शिर बड़े शोभायमान हुपे फिर वह शनुमों का वाला मुनही बाजूवन्द रखनवाला मुनारी पुंसवाले देशभरोस बड़े वेगवान दशों कौरवों को मारकर चलदिपा ११॥ tho nowe of Yudhishthir's welfare, he procedded ootards, rescanding the parth' and air with his car whoela. Then Arjun the best of Warriors YAS surrounded by tho len brotbors younger than Duahasan. 25 They wonnded him with their artows, and moring their bows in circler, they looked liko dancera, Krishn morad bin car round them to the region of Yanı. Othor warriors attacked Arjun, but the lattur destroyed them along with their horses, cars, drivers, standards, bows and arrows. Then ho cut off their heada with biting lips and rod eyes. Those lotus like heads, fallon down on the ground looked beautiful Having slain the ten Kaurares with his arrows, he weat odward.31.
(६७०५) कर्णपर्व Karan Paray (6705) सजय उवाच तिं मयान्तं महावेगैरश्यः कपिघरषजम् । युद्धाया यादव वीराः कुरूणां नवती रथा: १॥ करवा संशप्तका घोर शपथं पारलौकिकम् । परि पवुनरव्याघ्रा नरम्यानं रणे नम् ॥२॥ कृष्ण घेतान् महावेगानभ्वाकाञ्चनभूषणान् । मुकाजाल प्रतिच्छन्नान् प्रैपीतकरयंप्रतिशततः कर्णरवं यान्तमरितं धनम्जयम् । पाणवरमिनन्तः संशप्तकरथा पयुः ॥ ४॥ परमाणांस्तु तान् सर्यान समतेयस मध्वजान् । जघान नवति धीरान नो निशितैः शरैः॥ ५॥ ते पतन्त ता पणिर्माना पैः किरीटिना सषिमाना यथा सियाः स्वर्गात पुण्यक्षये तथा ॥ ६ ॥ ततः सरप मागाधा कुरषः कुरुसतमम् । निर्भया भरतश्रेष्ठमध्यपत फाल्गनम् ॥ ७ ॥ तदा यस्तमनुप्यावमुदोर्णधरधारणम् । पुत्राणान्ते महासैन्यं समरीत्सीयनजय॥८ शक्त्यष्टितोमरमासे गदामित्रंशसायकैः । प्राच्छादयन्मोग्यासाः फुरयः कुरुनन्दनम् अध्याय ८१॥ संजय बोले कि कौरवों के बड़े बेगान नब्बे स्थी घोड़ों के द्वारा उस पाने पाले कपिध्वज अर्जुन के सम्मुख गये । १। और नरोचम संसप्तकों ने परलोक सम्बन्धी घोर शपथको खाकर युद्ध में पुरुषोधम अर्जुन को घरलिया।२। और श्रीकृष्णजी ने बड़े वेगवान सुवर्ण भूषणों से अकृत मोतियों के जालों से ढके हुये श्वेत घोड़ोंको कर्ण के स्थपर हांका ।। इसके पाछे संसप्तकों के स्थ बाणों की वर्षा से प्रहार करते कर्णकी भोरेको नानेवाले उम अर्जुन के सम्मुख गये।।। अर्जुन ने अपने तीक्ष्ण पाणों से शीघ्रता करनेगले उन सब नवे वारों को सारथ। धनुप और ध्वजा समेत मारा । ५। अर्जुन के नानारूप के वाणों से पायलहोकर वह शूरवीर ऐसे गिरपड़े जैसे कि तपके क्षीण होनेपर सिद्धलोग अपने विमान समेत स्वर्गसे गिरते हैं। ६ । इसके पीछे कौरवलोग बड़ी निर्भपतासे रथ हाथी और घोड़ों समेव उस वार अर्जुन के सम्मुख आये । ७। तीवता युक्त मनुष्य घोड़े भार उत्तमहाथी वाली उस आपकी बड़ी सेनाने अर्जुन को घेर लिया।८। वहां बड़े धनुपधारी कौरवों ने शक्ति, दुधारा खड्ग, तोमर, मास, गदा, खड्ग CHAPTER LXXXI Sanjaya said, “Ninety great warriors of the Kauravas faced Arjua tha possessor of monkey standard. The Sansapatak warriors taok a dreadful oath concerning the next world and besieged Arjun Shri Krishn drove the swift horses adorned with gold ornaments and pearls, towards the car of Karan. The Sansaptak yarriors checked him on his way towards Karan; but he slew all the ninety Tarriors and cut down their drivers, bows and standards, Wounded by his arrays, the warriors fell down from their cars like sidhas, at the expiry of their merits. Then the Kauravas attacked Arjun with their horses and elephants and the large army surrounded him. The - .
[67061 Mahabharat (६७.६) ॥ ९॥ तामन्तरीक्षेविततां शस्रष्टिं समन्ततः । व्यधमत् पाण्डवो धणिस्ततः मर्य यांशुभिः ॥ १० ॥ ततो म्लेच्छाः स्थितीतरयोदशशतैगजेः पर्षता व्यहनन पार्थ तय पुस्य शासनात् ॥११॥ काणनानीकगस्तोमामासशक्तिभिः । कम्पने मिरपालेश्वरयस्थ पार्थमादयन् ॥ १२ ॥ तां शस्त्रयिमतुला विभहस्तः प्ररिताम। बिच्छेद निशितललरर्सचन्द्रश्च फाल्गुनः ॥ १३ । भय तान् द्विरदान सर्या जाना, लिङ्ग भारोत्तमैः । सपताकध्वजारोहान गिरीन् परिवाहनत् ॥ १४ ॥ तमपुरि प्रमिाहता हेममालिनः इताः तुमहानागाः साग्निज्वाला इयाद्रपः॥ १५ ॥ तता गाण्डौघनिघोंपो महानासौदिशाम्पते । स्तनता जताचवे मनुष्यगजवाजिनाम ॥ १६ ॥ कुजराथ इता राजन खुट्युस्त समन्ततः 1 अश्याच पय्यंधावान हतारोहा दिशो दश ॥ १७ ॥ रया होना महाराज, रथिमि जिभिस्तया। गन्धर्षनगराकारा और शायकों से कोरवनन्दन अर्जुनको दकादया। ९ । फिर अर्जुन ने चारों भोर से अन्तरिक्ष में फैलीहुई उप्त पाणोंको वर्षाको अपने वाणों से ऐसा छिम भिम करादेया जैसे कि सूर्य अपनी किरणों से अंधेरे को तिर विर करदेता है ।१०। इसके पछि मतवाले तेरहसो हाथियों समेत नियतहुये म्लेच्छोंने आपके पुत्रोंकी आज्ञासे अर्जुनको पासंभागकी पोरसे घायल किया। ११ । और कणि, नालीक, नागच, सोमर, मास, शक्ति, कम्पन और भिन्दिपालों से रय में सवार अर्जुनको पीडामान किया। १२ । अर्जुन ने उन हायीक सवारों से छोड़ेहुये बड़े वाण , जालों को अपने तीक्ष्णधार भल्ल और अर्द्धचन्द्रयाणों से काटा । १३ । इसके पीछे नाना रूपके उत्तम वाणों से उन सब हाथियों को पताका ध्वजा और सवारों समेत ऐसे मारा जैसे कि वजों से पर्वतों को मारत हैं। १४ । वह स्वर्णमय , मालाधारी बड़े | हाथी सुनहरी पुरखवाले वाणों से पीड़ित और मृतक होकर ऐसे गिरपेड़े जैसे कि ज्वालामुखी पर्चत गिरपड़ते हैं । १५ । हे राजा इसके पीछ - हाथी घोड़े समेत । मनुष्पोंको पुकारते और चिंघाड़ते हुये गाण्डीव धनुपका बड़ा शब्द हुआ। १६ । और वह घायल हाथी चारोंमोर मृतक सवारों समेत भागे ।१३ हे महाराज greav Kaurav warriors covered bin with their wcapons, but he destroyed the shower of their arrow as the San destroys darkness, 10. Then the plechas, with thirteen hundred elophants, attacked Arjun from behind by your son's order and woanded him in his car with various sorts of weapons, He destroyed their weapons with, bis artowa Bod killed them and their bannered elephants as lightning destroys mountains. The elephan's adorned with gold garlaide, wounded by gold-featberoul shafte, fell down dead like burning moantains. 15. Then there was a tremendous noise from the wounded elephants, horses and men, mingled with the twangs of Gandiv bow. Tho elephants, whose riders wers dead, fled in all . (६७०७) 91098 liaran l'arv (5707) दृश्यन्तेस्म सहस्रशः ॥ १८ ॥ अश्यादा महाराज धावपानास्ततस्ततः । तत्र तत्रष (रपन्ते निहताः पार्थसायकः ॥ १९ ॥ तस्मिन् क्षणे पाण्यस्य पाइयोलमाश्यत । यत् सादिनो धारणांध स्यधिकोजयण ॥ ५० ॥ तवध्यण महता चलेन भरतर्षभ इप्ट्या परिवृत राजन भीमसेनः किरीटिनम् ॥ ११ ॥ हतापशेषानुत्यज्य स्वंदीयान, कतिचिद्रयान । जवेनास्यद्रघद्राजन् धनम्जयरथं प्रति ॥ २२ ॥ ततस्तत् पाद्यत् सैन्य हतभूपिष्ठमातुरम् । रष्ट्याजुनं तदा भीगी जगाम मातरं प्रति ॥ २३ ॥ इताय शिष्टांस्तुरगानजुनेन महायलान् । भीमो व्यधमधान्तो गदापाणि हाह ॥ २५ ॥ कालरात्रिमिषारयुमा मरनागाबमोजनाम । प्राकारारपुरद्वारदारणमितिधारणाम् । ततो गदा नुनागापाशु भीमाव्ययासुजत् 1.२५ ॥ सा जघान पहनवा नवा ria मार ॥२६ ॥ कायसतनुत्राणामरायांश्च पाण्डघः । पोषयामास.गदया सशद तेपतन हता ॥ २७ ॥ दन्तदशन्तो यमुद्यां शेरते क्षतजोक्षिताः । मग्नमूदास्थि रधियों औरयोड़ों से रहित हजारों रथ गन्धर्वनगर के रूप दिखाई पड़े। १८ भार इधर उपासे दौड़ने वाले अश जहाँ तहाँ अर्जुन के शायकों से मृतक दिखाई दिये । १९ । उस युद्ध में पाण्डव अर्जुनको भुनामों का पराक्रम देखा गया जो अकेलने युद्ध में भश्वसवार हाया और रयों को विजय किया । .. हे भरतर्षभ राजा धृतराष्ट्र इसके पीछे भीमसेन तीन अंगरखने वाली बड़ी सना से घिराहुआ भर्जुनको देखकर । २६ { मरने से शेष बचेहुये आपके थोड़े राधयोंको छोड़कर वेगसे भर्जुन के रथकी औरको दोहा ।२२। इसके पीछे बहुतमृतक और दुरी सेना भागी सव भीमसेन अपने भाई अर्जुन के पास गये बड़े युद्ध में यकावट से रहित गदाको लिपेहुये भीमसेन ने अर्जुनसे वहुये शेपपराक्रमी घोड़ोंको मारा ।२४। इसके पीछे भीमसेन ने कालरात्रि के समान चढे उग्र हाथी घोड़े और मनुष्यों की खानेवाली नगरके कोटोंकी तोड़नेपाली महाभयानक गदा को मनुष्य हाथी और घोड़ोंपर छोड़ा । २५ । हे राना उस गदा ने बहुतस हाथी घोड़े और अवसवारों को मारकर लोहे के कवचधारी मनुष्य और घोड़ों को मारा और वह मनुष्य मृतकहोकर शन्द करते हुये पृथ्वीपर गिरपड़े । २७ । दातों से पृधी को diractions. Many cars, destitute of horses and riders, looked like bo city of Gandharvas, and horsemen, bit by arjun's arrowr, were seen lying dead here and there. By his prowess, . Arjun alone conquered Lorscs, elephants and cars 20. Seving Arjun Surrounded by the army, Bhim left the remnant of your aray Brid sped towards him. Then the army dispersod. Blic approached Arjun and with his maco destroyed the rest of the horsemen. do burled his dreadful maee at mun, elephants and horses. 25. The maca destroyed many and they fell down dead with a crashi. Tearing the carth with their teoth, they fell down, with their beads and bones broken, to be eaten (6703) Mahabharat (६.७०८) घरमा ऋयादगणोजनाः ॥ २८ ॥ ममासमामिव तृप्तिमभ्यागता गामस्थी म्यायनी तथा बालराधिप दुरंशा ॥११ सहस्राणि पायाना वा पत्री मयसा मीमोपचायत संसो गवाराणिरितस्ततः॥ ३० ॥ गरापाणि ततो नीम रष्ट्या भारत तापमाः । मेनिरे समनमा कालदण्डोपतं यमम् ॥ ३१॥ स मत हर मातः समः पाग्नन्दनः । प्रविवेश गजानोकं मकरः सागरं यथा । २२.घिगाख पगानी प्रगृध महठी गदाम् । क्षणेन भीमः संयस्तमिन्ये परसादनम् ।। ३३ || गजान सफहुन्टान मचान मारोहान् सपनाकिनः। पततः समपश्याम सपक्षानिष पर्वतान् ॥ ३४॥ हरपा सगजानकिं भीमसनो मापलः । पुनः स रथमास्थाप पृष्ठ ठोजुनमाययात् || Rनि प्रमुखामापं नियाता पर बलम । पालम्वत महाराज काटो पिर में भरे टूटे मस्तक हाड और चूहाकर मांस भवी जीवों को भसणार्य मृत्यु पाहुपे । २८ । तर गदानेभी करिर मांस भोर मजा से ताहोकर शीत लताको पापा कालरात्रि के समान दुस से देखने के योग्य हाड़ों कोभी खाती हुई नियत हुई । २९ । मत्यन्त क्रोधएक गदा हाय में लिपे भीमसेन दशहजार घोरे और पनेक पत्रियों को मारकर इधर उधरको दौड़ा । ३० । हे भरतवंशी इसके पछि मापके शूरवीरोन गदापारी भीमसेनको देखकर कालदएर के उठाने वाले पमराजको ही सम्मुख भायाहुआ माना । ३१ । मतवाले हाथी के समान अत्यन्त क्रोधपुक्त या पापहनन्दन हाथियों की सेना में ऐसे पहुँचा जैसे कि समुद्र में मगर पहुँनता है । १२ । वहां मत्पन्त फ्रोधभरे भाममेन से बड़ी गदाको लेकर पाथियों की सेनाको मझाकर पा मयार वणमात्र ही पमलक में पहुँचाया।"पण्टों समेव या प्वना पताकापारी सवारों से युक्त मतपाले शाधिपोंको ऐसे गिरवादुआ दखा नेस कि पतधारी पर्मत गिरते हैं। ३४ । पड़े पराक्रमी भीमसेन उसापियों की सेनाको मारकर अपने रपपर सवार होकर भर्नुन के पीछे पले । १५ महारान शभाकी यातसी सेनामारी गई मार पापा by tho linds of proy. The mact, fed by flush and blood, becamu cool and devouru bica Loo, liko to night of Death. Haring slain tog thonnat thers and foot, Bhim rushed hero and there. 30. Scoing Bhim aod his two, tho kausap warriors took hiva for Yarn the wieldoc of stat. Laragod liko n wild eluplaot, Bhim entered the Army as a crocollo caters thoaca. With his buzo mace, lo crushed And killal that army of elephaouia a maibuat, 33.. Yo new thuso mal oloptants, adornod with bells and standardı, fall down with thoir riders liko wiagad mountaian laring alaia thuo soplants, Bhima modabod bis car and lollowed Arjan. 3). A large portion of the trwasawwaliina part fler and manymorcred with weapna songht Trolution Socia: tiat inxecaible army soek polection," Arjun कर्णपर्व Karan Pary 16709) प्रायशः शस्त्रयोत्तम । ३६ ॥ विलम्बमानं तत् सैन्यममगलममयस्थितम्रष्ट्या प्राछादयद्वाणम्जुनः प्राणतापनः ।। ३७ ॥ नपश्यनरमाता युधि गाण्डीवधन्वना । शरवातधिता रेजु कदम्बा इप फेशरैः ॥ ३८॥ ततः कुरुणामभयदानादो महान्नृप। नराधनागासहरघध्यतामर्जुनेपुभिः ॥ ३९ ॥ हाहाकतं मृशं त्रस्त लीयमान परस्परम् । भालातचक्रवत सैन्यं तदानमत तायकम् ॥ ४० ॥ ततस्तपसमभवत् कुरूणां सुमर लावासोदनिर्मिन्नो रथः सादीहयो गजः ॥४१॥ आदीप्तमिव तत् सन्य शर छिन्नतनुच्छदम् । यासीन वाणितक्लिन्न फुल्लाशीफपन यथा ॥४२॥ ते रष्ट्या कुरवस्तत्र विक्रान्त सव्यसाचिनम् । निराशाः समपयात सर्व कर्णस्य जीयिते ॥ १३॥ अविषह्यन्तु पार्यस्पं शरसम्पातमाहये । हत्या न्ययन कुरो जितागाण्डीव धन्वना ॥६५ते विस्पा समरे फर्ण पध्यमानाथ सायकैः ! प्रद्युदिशो भीताश्चुमशुधापि सेनाके लोग खफेरे हुये निकत्साह और बहु तेरे शखों से ढके हुये शरणमें आये॥६॥ अर्जुन ने उसशरण में आहुई अचेतसेनाको देखकर प्राणों के तपानेवाले वाणों से ददिया । ३७ । उस युद्ध में गांडीव धनुपधारी के बाणों से छिदेहुये मनुष्य घोड़े रथ और हाथी ऐसे शोभायमान हुये जैसे कि केशरों करके कदम्ब का क्ष शोभित होता है। ३८.। हे राजा इसके पीछे मनुष्य घोड़े और हाथियों के प्राणोंके हरने वाले अर्जुन के वाणों से घायल हुये कौरवों के बड़े पीड़ावान शब्द हुये । ३९ । सब हाय हाय करने वाली भापकी सेना अत्यन्त भयभीत होकर परस्पर में गुप्त होनेवाले अलानचक अर्थात् वनेटीक समान भ्रमण करनेलगी।४०। इसके अनन्तर वह कौरवों का युद्ध बड़े पराक्रमियों के साथ हुआ जहां रथ अश्वसवार घाड़े और हाथियों में कोई भी विना घायल हुये नहीं रहा । ४१ । वह सेना • चारों ओर से मान रूप धागों से विदीर्ण रुधिर और चर्म से भरे शरीर फूले हुये अशोक पक्ष के बनके समान होगई । १२ । वहां सब कौरव इस पराक्रमी अर्जुन को देखकर कर्ण के जीवन में निराश हुये । ४३ । गांडीव धनुपधारी से मारेहुये कौरस युद्धमें अर्जुन के बाणोंकी वर्षा को असह्य मानकर लौटे । ४४ । शायकों से घायल हुये covered them with his fačal arrows. Pierced by the arrows of;Gandir, men, horses, cars and elephants looked glorious like a kadainb troo, with thistles. There were heard tremendous cries of the Kauravas wagoded with the fatal, arrows of Arjun. Your army moved in a circle, crying out to hide themsolves. 40. In that battio r.one of the Kaurava warriors, cars, borsemen, borses and elephants, escaped untounded. Wounded by the fiery arrows, tbe warriors louked like 'acok'trees in bloom. At the sight of Arjun's prowess, the Kauravas Lecato hopeless of Karan's life. Shot by the arrows of the wielder of Gandiv, the Kauravas unable to with stand him, turned back. The Kauravas vounded by arrows, left Ksran to fly in all directions, some callios , । (6710) Mahabharat (६७) सूतजम् ॥ ४५ ॥ अभ्याधत तान पार्थः फिररशतान् गहन हर्षयन् पाण्डवान योधात भीमसेनपुरोगमान् ४॥ पुत्रास्तु मे महाराज जग्मुः कर्णरर्थ प्रतिमा मन्जतां तेषां वीपः कर्णाभवत्तदा ॥४७॥ कुरवो हि महाराज निर्षिषा पानगा इस। कर्णमेयोपलीयन्त मयागाण्डीयपन्धनः ॥४८॥ यथा सर्वाणि भूतानि मायोीतानि मारिप । धर्मभेषोपलीयन्ते कवन्ति हि पानि च ॥ ४९ ॥ तथा कणे मरेग्यास पुत्रास्तव नराधिप । उपालीयात संत्रासान पाण्डवस्य महात्मनः ॥ ५० ॥ ताछोणित परिक्लिनान् विषमस्याञ्छरातुरान् । मा भैरेत्यधीत कॉमितो माभिततिष ॥५१॥ प्रभग्न हि पलं सप्ट्वा बलात् पायन साधकम् । धनुर्षिस्फारयन् कर्णस्तस्यो शत्रुजिघांसया ॥ ५३७ वाद विद्वान् कुरून पट्वा कर्णः शत्रमताम्बर । साहिब तयित्वा पार्यस्पषधे दधे मनःश्वसन् ॥ ५३ ॥ विस्फार्थ गुमाया तत माघिरयि वह कौरव कर्णको त्यागकर भयभीत होकर चारोमोर को भागे और कर्ण को मा' पुकारे । ४५ ! उस समय अर्जुन हजारों धाणों' को घोड़ताहुआ और भीमसेन भादि युद्धका पाण्डकोंको प्रसन्न करता हुआ- उनके मम्मुख गया। ४६ । हेमहाराज फिर मापके पुत्र कर्ण के रसके पासगपे तक उन अथाह समुद्र | में इवेहुये आपके पुत्रादिकों को भाश्रयरूप टापू होगया । ४७ । राजा निपि सर्प के समानसव कौरव अनके भषस कर्णके पास गुप्तहोकर छिपगये। ४८॥ जैसे कि कर्म की लोग मृत्युसे भयभीत होकर अपनेही धर्म में माश्रित होते हैं उसीमकार आपके पुत्रभी महात्मा पांडव अर्जुनके भय से बड़े धनुपधारी कर्ण के पास शरणागत रूप हुये । ५० । उन रुधिर से भरे पाणों से पीडामान बड़ी आपारी में फंसे हुये . लोगों को देखकर कर कर्ण ने कहा कि मप मतकरो और मेरेहीपास निपत रहे।५१। फिर भर्जुनक पराक्रम से अत्यन्त छिन्नभिन्न और व्याकुल आपकी देखकर कई कर्ण शत्रुनों के मारने की इच्छाले धनुष टंकारताहुमा । ५२ । उस शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ श्वास लेनेवाले कर्ण ने उन भागेहुपे का देखकर चिन्तापूर्वक अर्जुनके मारने में चित्त किया । ५१ । इसके पीछ । out the name of Karan. 47. Discharging thousands of arrows, faced them, cheering Bhim and other Pandavas. "Your sons approached' Karan's car for protection. Like venomlegg serpents, the Ksata78 afraid of Arjun, sought protection of Karan. abby went to Karan for protection like worldly men engaging in the praotice of virtne for feter of Death. 50. Seeing his mon falten in trouble, Karan said, “ Hara no foar, stay with me. Beeing the army routed by Arjun, Karan stood thoro twanging big bow, and seeing the statb of his mon, with siglia ha 1030lved to slay Arjun. Twanging his huge bow Karan rushed again at the Panchals in the presence of Arjun. The faniors with red eyes, shovered their arrows at Karan like rain fall - (१५११) 098 Karan I'ATV (07111 कपाशाला पुनराधावत् पश्यतः सव्यसाधिनः ॥ ५४ सतः क्षणेण शितपाः साप्रतिमेक्षणाकणे पाणीपंथा मेघा महोधरम ॥ ५५ ॥ ततः शरसह माणि कर्णमुकानि मारिप व्ययोजयत पाञ्चालान माणः प्राणभृताम्वर ॥ १६ ॥ सग महामासान पाञ्चालानां महामविश्वमूतपुत्रणीमत्रामगृसिना॥५७॥ इति कर्णपर्वणि संकुलयुद्धएकाशीतोऽध्याया८१ ।। - मम्जय उपाय ततः कर्णः कुरुपु प्रदुतेषु पापिना पेनापन राजन् । पाञ्चाल पुत्रान् पधमत् मूतपुत्रो महामेधांत पानसंधान १॥ मतं रथादलिफनिंपात्य कर्ण बहुत बदभारी धनुषको टंकारकर अर्जुन के देखतेहुये फिर पांचालों को पार को दौड़ा । ५४। उससमय रक्तनव राजाभों ने एक सणभरमही कर्ण के पर ऐसी काणा करी नसे कि पर्चतपर बादल वर्षा करने हैं। ५५॥ हे जीवधारियों में हाराष्ट्र इसके पीछे कर्णफे रगडहुये हजारों वाणों ने पांचामों को माणों से राहेत फरांदया। ५६ । हे बड़े भानी वहां मित्रको पारनेवाले कर्ण के हाथ से (मित्रों की निमित पायस हानेवाले पांचालों के बड़े षब्द हुयं । ५५ । अध्याय८२ संमय पाने कि हे रामा इसके अनन्तर फरच और अंत याड़ेवाल अर्जुन के हाथो कारयों के भागलानेपर मूतक पुत्र कर्ण ने वह बाणों से राजा पांचाल के पुत्रों को ऐसे छिन्नभिन्न करादया जैसा कि वादोंके समूहों को घायु तिर विर करदेता है ।। अंगालिक नाम वाणों के मारा रथसे सारयाको गिराकर पायल over a mountain. Karon's arrows deprivod thousands of tho Panchals of their lives. For the sake of his friend, Karan olew the Panchals ppho lought for their friends, "571 CHAPTER LXXXII Saniays said, "at the flight of the KATAVas from Arjun Karan isporsed the Pancial princes as tho vind does the clouda IIo slow -drivers god lor 60s, and haring covered Sbatanik and Shrutrom with ofrows, be cut their bową, Then he wounded DhrichtsJyumn with - (6712) Mahabharat [६७१२) जधान पाश्वान् अनमेजयस्य । शतानीकं सुतसोमञ्च भल्लैग्याकिरदनुपी चाय कृन्तत् ।। २. ॥ धृष्टद्युम्नं निर्षिभेदाप षभिजधान, चाश्यास्तरसा तस्य सख्ये । हत्या चाश्वान सात्यफः मतपुत्रः कैकय पुत्रं न्यषधाद्विशोकम् ॥ ३॥ तमभ्यधावधि रते कुमारे कैकेयसेनापतिरूप्रकर्मा शर्विधुबन भृशमुप्रगैः कर्णात्मवाश्यहनन' प्रसेनम ॥ ४॥ तस्याईचन्द्रःसिमिकच्चक प्रसङ्ग पाहू व शिरश्च कर्णः । स सन्न नानामगतासुः परश्वधैः शाल इवाबरुग्नः ॥ ५ ॥ हताश्वमन्जोगतिभिः प्रसेनः शिनि प्रवोरं निशितै पृषकैः । प्रच्छाध नृत्यनिय कर्णपुत्रः सैनेयमाणामिहतः पपात । ६ ॥ पुत्र ते शोधपरीतचेताः फर्णः शिनीनामृषम जिधांशुः । हतोसि सेनेय इति भुवन स व्यवासजवाणममित्रसाहम ७ ॥ तमस्य चिच्छेद शर शिखण्डी त्रिमिस्त्रिमिध प्रतु कियहुये घोड़ों को मारा और शतानीक वा श्रुतसोम को भल्लोंसे ढककर उनके | धनुपोंको भी काटा ।२। इसके पीछ छः पाणों से धृष्टद्युन्न को छेदके बड़े बैंगस | उसके घोड़ोंको भी मारा फिर सूतपुत्रने सात्यकी के घोड़ों को मारकर कैकय के विशोकनाम पुत्रको मारा । ३। कुमार के मरनेपर केकैय का सेनापति जो कि महा भयानक कर्म करनेवाला था वह अपने उग्रवाणों से सेना को छिम भिन्न करता हुआ उसके सम्मुख दोड़ा और कर्ण के पुत्र प्रसेनको पापल किया । ४।कर्ण ने इसकर तीन अर्द्धचन्द्र बाणों से उसकी भुजा और शिरको काटा तब वह. मृतक होकर रथमे पृथ्वीपर ऐसे गिरपड़ा जैसे कि फरसे से कांदाहुआ सालका क्षहोता है । ५ । कर्णका पुत्र प्रसेन मृतक घोडेवाले सात्यकि को अपने कानतक बँचे हुये पृषक नाम वाणों से ढककर नाचतामा सात्यकि. के हायसे घायल होकर गिर पड़ा। ६ । पुत्र के मरने से क्रोपयुक्त चित्त करके सात्यकि के मरने की इच्छा करते हुये माराई इस प्रकार वोलतेहुपे कर्णने सात्पी के ऊपर शत्रुघाती याण को छोड़ा।७। उसके उस बाणको शिखण्डीने काटकर तीनवाणों से कर्स को sik'arrows and slow his horses - Then he slew Satyaki'a borseg -and Vishok. the Kaikaya prince. At the death of the prince, the com: mander of the armins, a dreadful warrior, came on dispersing the army and wounded Prasen the son of Karan. With a smile, 'Karan cut his lead and arms with thres 'arrows and he fell down like a sal bree cut downiby an axs. Prasen the son of Karan, having covered Satyaki with his arrowe, fell down wounded with the arrows of Sat. ynki. Eoraged at the death of his son, Karan, desirous of slaying Satyaki, shot a fatal arrow at the latter, saying, "I have slain!" Shikhandi cut that arrow and wounded Karan with three arrows."Haviig eut Karan's bow and standard, Shikbandi's arrows tell down on the ground. , Then brave Karan wounded him with ten arrows and cut dowa the head of Dhriohtadyumna's son and wounded Shrutsom -यह [६७१३) कर्णपर्व Haran | arav (6713) तोद कर्णम् । शिखण्डिनः कामु स यजञ्च' छित्या क्षुराभ्यां व्यधमत् सूतजात: ८ ॥ शिखण्डिन पडभिरविध्यदुनो धातुम्नेः स शिरश्चाच्चकत्त । अथाभिनत मुत सोम शरण सुसशितनाधिराथिमहात्मा । अथाक्रन्दे तुमुल वर्षमाने धाम्नी निहते तत्र कृष्णः । अपाञ्चाल्य क्रियते याहि पार्य कर्ण जहीत्यत्रवीदाजसिंह ॥१०॥ ततः महस्थाशु नरमवीरो रथं रथेनाधिरजगाम । भये तेषण प्राणमिच्छन् सुवाहुरभ्यार तानां रथयूथपेन ॥ ११ ॥ विस्फार्य गाण्डीपमयोप्रघोपं ज्यया समात्य तले भृशश्च चाणाधिकारं सासैव कृत्वा जघान नागाश्वरथध्वनांश्च ॥ १२॥ प्रतिधुतः प्राचरनन्त रीक्षे गुहा गिरिणामपतन धाति । यन्मडयज्येन घिजम्ममाणो रौदे मुहःभ्यपतत् किरीटी ॥१३॥ तं भीमसेनोनुययौ रयेन पृष्ठे रक्षन् पाण्डपमेकधीरः । ती राजपुत्री स्वरिती रथाभ्या. काय यातायरिभिषिको ॥ १४ ॥ तत्रान्तरे सुमहत् सूतपुत्रश्चके पीडितीकया फिर शिखण्डी के बाण कर्णकि ध्वजा और धनुपको काटकर पृथ्वी में गिरपड़े.१८ । तव उग्ररूप महात्मा अधिरथि कर्णने शिखण्डी को छः बाणों से घायल करके धृष्टद्युम्न के लड़के के शिरको काटा और इसी प्रकार बड़े तीक्ष्ण वाणों से श्रुतसोम को घायल किया।९। हे राजाओंमें श्रेष्ठ वहां मवल शूरवीरके वर्तमान होने और धृष्टद्युम्नके पुत्रके मरमेपर श्रीकृष्णजी ने अर्जुन से कहा कि कर्ण इस लोकको पांचलों से रहित किये दताहै हे अर्जुन अब चलकर कर्णको मार । १० । उसके पाछे नरोंमें बड़े वार सुन्दर भुनावाले भयक स्थानमें महारथी से घायल इनलोगों की रक्षा करने के इच्छावान अर्जुनने (मकर शीघ्रही रथकं द्वारा कर्णके रयको पाया । ११ । और महाकठोर उग्र गांडीव धनुपको चढ़ाकर इयेलीपर प्रत्यंचाका शब्द करके अकस्मात् वाणोंका अन्धकार उत्पन्न करके ध्वजारथ घोड़े और हाथियों को मारा अन्तरिक्ष में बहुतसे शब्द घूमनेलगे और पक्षीलोग पर्वतों की गुफाओं में गिरे और एक वीर भामसेन रथके द्वारा अर्जुन को,पोछकी औरसे रक्षाकरता हुआ चला अघुमोसे घिरेहुये वह दोनों रामकुमार रयोंके द्वारा शीघही कर्ण के सम्मुखगये। १४ । वहाँपर अन्तरिक्ष में कर्णके सोमकलोगों को घेरकर उस महायुद्धके नियत रथ घोड़े और हाथियों के with his arrows. Seeing Karan's prowesa and the death of Dhrish- |Pradyumna's son, Shri Krishn said to Arjun, "Karan is clearing the world of all the Panchals. You must slay bin at once. 10. 'Than the best of warriors, wishing to protect his army, approached Karan with a smile, and with a tremendous twang of his bow, he produced a darkness, with bis arrows, slaying elepbanta, horees and car-warriors There was a great noise in air, the birds foll down in mountain caves Bhimson followed Arjun, protecting the rear. Surrounded by enemies |-the two princes soon came lace to face with Karan. They slow the hories and elephants of the Sumak warriors of Karan and covered the . [8714 Malablıurat यु सीमकान संप्रमृद्नन् । रथाश्रमातहागणान् जयान प्रज्छादयामास शरैशिम ॥ १५॥ नमुत्तमौजा जनमेजयश्च द्धौ युधामन्युशिखण्डिनी व । कर्ण विभेदुः साहिता प्रपत्का सनईमाना सक्षपातेन ॥१६॥ ते पश्व पञ्चालरयरधारा कलम कर्णमभि प्रवन्तः । तस्मादधाचच्याययितं न कुर्यात् कृतात्मामभिषेन्द्रियार्या 11, १७॥ तेषां धषि पजधाअिस्तालूण पताकाश्च निकत्यवाणः । तारा पचीमा स्वभ्यहम्पत् पृपरक फर्णस्ततः सिंह योजनाय ।। १८ ॥ .तस्यास्थतस्तानभिनिग्नतम ज्यावाण इस्तस्य धनुः स्यनेन । साद्रिद्वमा स्यात् पृधिषी पिशीर्णस्यातीष मापा जनता यशोवर ॥ १९॥ में शक्रयापप्रतिमेन धना भूशायतेनाधिरधिः शरार.एजन्,,,पभोरणे दीप्तमीधिभरला यथांशुमाली परिवेशवांस्तथा ॥ २०॥ शिपण्डिन द्वादशभिः पाभिमपिछतैः शरैः मभिरयोधमौजसम । त्रिमियुधामायुरषिध्यमाशुगैसिमि सोमकपातापजी ॥ २१ ॥ पराजिताः पान महारथास्तु ते महाहवे मूतमनेन समूहों को मारा और वाणों से सम दिशाभों को. दकदिया । १५ । उतमौजा, जनमेजप, क्रोधयुक्त युधामन्यु, शिखंडी और,पघुम्न इन सपने अपने , परकों से कर्णको छदा. बह पांचाल देशी रभियों में पड़ेवी पांचों कर्णके सम्मुख दौड़े | धैर्य से बड़े सावधान कर्णका यह सबलोग रयस गिरानको ऐससमय नहींईये जसे कि शान्त पौर जितन्दी पुरुष को इन्द्रियों के विषय नहीं गिरासके । १७ । कर्ण ने वाणी से. उन्होंके धनुष ध्वजा घोड़े सारथी और पताकामों को शीघ्रता से काटकर पांच पृपाकों से उनको पायलकरके सिंहनाद किया। १४। उन बाणों को छोड़ते और चारों ओर से मारते उस प्रत्यंचा और वाण रखनाले कर्ण के धनुपके घोरशद से पर्वत वा तादिसमंत पृथयो कंपायमानहोगी. ऐसाजानकर मनुष्यों के समूह पीड़ामान हुये १९ वकर्ण इन्चनुपकै समान अपनेवड़े धनुष से बाणों को छोड़ता युद्ध में सेसा शोभायमान हुआ असे कि मकाशिव ज्योतियों का मण्डल और किरणों के समूहोका रखनवाला पापं माडळसे घिराहुआ.मूर्य होताहै । २० । शिखंडीको तीक्ष्णवारह बाणों से उचमाजसका माणोंसे युषा- | मन्युको शीघ्रगामी तीनवाणों से और सोमकपृष्टद्युम्नके पुत्रोंको तीनरवाणोंसे छेदा, directions with arrows. Uttamauja, Janmejaya, euraged, Fudbemanys, Stakhandi and Dhrisktadyumn piacert Karan with their sharp darts, The firo great Panchal warriors attacked Karan but could not overpower him as the senses cannot overpowop 4 man' who has control over them. Ho cut down thoir bows. standardss, borses, drivers and båpners and roared after wounding them, Sosing 'thé directions recoulding with' his hard arrows, the warriors were much terrified, Discharging arrows from his huge bow like that of Indra ho looked glorious like a circle of fire, wità bright •rays.' 20. Ha #Aurded Shlkhandi will twelve sbarp arrows, Uttamauja with six, . 15.
wn - कर्णप! Karan Pariv (13) मारिला निरुधमा तस्थुमित्रमन्दना यन्द्रयायोग्यता पगभिसा ॥ २२ ॥ मिल तस्तानप कसागरे विषमनावो वणिजो यथार्णय । उदधिरे मौभिरपा वादयः महरिपतापदिनाः स्थमावलम् ॥ २३ ॥ ततः शिनीनामृषभः शितः शनिहाय कणे प्ररितामिवून बहने । विधार्य कण निशितैरयस्मयालयामध्येष्ठमाध्यदधामः । २४॥ होय भाषेध पामजस्तथा स्थच कर्णानिशिरताव्यम् । स तामयुयुधे संचमी विश्वरदयपतियथा तथा ॥ २५ ॥ समाततेनेयसनेन फूजा सापतना मितवाणपिणा । बभूव दुर्दता स सात्यकिः शरभोमध्यगतो यथा रविः ॥ २६ ॥ पुनः समाथाय स्थान सेदशिता:शिनिप्रारं जगईं; परन्ताः । समय पानामा स्पारणे भवनणाः शक्रमिवारिनिमहे ॥ २७ ॥ ततोभवाखमा दारुणं तयाहितानां हे श्रेष्ठ फिर युद्ध में कर्णके हाथत्ते पराजित शपुओं के प्रसन्न करनेवाले पांचों महारथी कर्म रहितहोकर पेसे नियतहुये मैसे कि मानी से जीतहुये इन्द्रियों के विषय होते हैं । २२ । जैम कि नौकामे रहित व्यापारी लोग समझमें ड्वत हैं इसी प्रकार कर्णरूपी समुद्र दूबनेवाले उन अपने मामाओं को द्रोपदीक पुत्रोंने अ) अलंकृत रथरूप नौकाओं के द्वारा उस समुद्रसे निकाली । २३ । उसके पछि सात्पकिने कर्णके चलायेदुपेबहुलपागोंको अपने साणवाणोंसे काटकर और तीक्ष्ण लोहे के बाणों से कर्ण को घायल करके आप पाणों से आपके बड़े बेटेको छैदा । २४ । इसकेपीछे छपाचार्य छतमा दुर्योधन और भाप कर्णने तीक्ष्णवाणों से घायल किपा पर अप्ठ पादप इनषारोंक साथ ऐसे युद्ध करमेलगा जैसे कि दैत्यों का स्वामी दिग्पालोंके साथ लड़ता है । २५ । बड़े सच्चशम्दवाले बहुत लम्ब असंख्याण वर्षानेवाले बड़े धनुषसे वह सात्याक उसपर ऐसा प्रवखहुआ जैसे कि शरद्मृतु में आकाशमें वर्धमान सूर्य प्रवल होताहै । २६ । शत्रुसंतापी बड़े अफत शस्त्रधारी पांचाल देशी महाधियोंने फिर स्थापर सवारहोकर सात्यकिकों ऐसे रतिकिया जैसे कि शत्रुओं के मारने में मरुद्रणलोग इन्द्रको रसित करते हैं १९७१ Yudhamanyu with tree and thy sons of Dhrisktadyumo with three arrows each. Defeated by Karan, tho five great warriora stood motionlen like the senses kopt under control by a wise man, Drowning liko merchants in the ocean of Karad, they were rescued by thu sous of their sister Draupadi. Then Satyaki cut down many of Karan's arrows and wounded him and his son with bright arrows, Thon Kripacharya, Krit varma, Duryodhan and Koran fought with Satyaki as the guardians of the directions fight with the lord of daityas. 25. Shooting long artows from his huge bow, to overpowered them as the Sun overpowers cold. The Panobal warriors riding new cars, protected Batyoki as Morutas protect Iodra. The battle from both sides was dreadful and dustructive of elephants like that of gods and 10716) Alahalhurat तब सैनिकः स रायमातंगविनाशन तथा यथा सुराणाममुरेः परामवत १८ ॥ रविपा घाजिपदातपस्तथा भ्रमन्ति नानाविधशत्रवेष्टिताः । परस्पोनाभिहताश्च चम्बलुधियदुपर्चा व्यसयोपतस्तथा ॥ २९ ॥ तथागते भीमममी स्तवात्मजः ससार राजाघरजः 'फिरः । तमघायस्त्वरिती वृकोदरो महारुरं सिंह इवाभिगेदिक्षान् ।। ३०॥ ततस्तयायुद्धमतीयदारुणं प्रदोम्यतोःप्राणदुरोदर द्वयोः। परस्परेणाभिनिविएगेपयोयथा पुरा शम्बरशफयोरभूत् ॥ ३१ ॥ शरैः शरीगचिकरः सुनेजनर्निजनतुस्तापितरंतर भृशम् । सकत् मभिन्नाविध धासितान्तर महाराजा मम्म यसकतसौ ॥ ३२ । तवामजस्थाध वृकोदरस्वरन् धनुः क्षुराभ्यां ध्वजमेप चाच्छि नत् । । ललाटमप्यस्थ विभेद पत्रिणी शिरश्च कायात् प्रजहार सारथः॥ १३ ॥स. रोजपुत्रोन्पदचाप्य कामुकं पृकोदरं द्वादशभिः पराभिमतं । पयं. निपच्छस्तुरगानति मगैः शरैश्च भीम पुनायवीपत् ॥ ३४ ॥ ततः शरं समरीचितप्रभ सुधपायोत्त इसकेपीछे भापकी सेनाओंक साथ शशुओंका वहयुद्ध महाभपकारी हुआ जो कि जनरथ घोड़े और हाथियोंका विनाशकारीया जैसे कि पूर्वसमयमें देवतामाका युद दैत्यों के साथहुआ। २८ । उत्तीमकार रथहाथी घोटे और पदातियों समेत सबसना शमोंसे ढकगई और परस्पर शब्दों को करतहये मृतकहोकर गिरपड़े । २९ । उस दशामें राजा दुर्योधन से छोटा आपका पुत्र दुश्शासन धाणों से भीमसेन को ढकता सम्मुखगया भीमसेनभी बड़ी शीघ्रतासे उसके सम्मुखगया और उसको ऐसे सम्मुखपापा जैसे कि सिंह बडे रुरुको सम्मुख पाताहै । १० । इसकपछि प्राणोंका यूतखलनेवाले परस्परं क्रोधभरे हुये उन दोनोंका ऐसा महामारी युद्धहुमा जैसे कि बड़े साहसी संवरदैत्य और इन्द्रकाहुभाधा । । उनदोनोंने शरीरको पीड़ित करनवाले सुन्दर चेतवाल वाणों से परस्पर में ऐसाकठिन घायल किरण जसे कि इपिनियों के मध्मये कामदेवसे प्रवृत्तीचचवारंवार घायलहुये दो बड़े हाड़ते हैं ।। १२ । इसकेपीछे शीघ्रता करनेवाल मायसेन ने आपके पुत्र ध्वजाया को दो चरमों से काटा और उसके ललाटको वाणसे छेदकर सारथी कैसाको Daityas in the days of yore. 28. The armio, were cover arrowt, and men and beasts fell down dead. Then Dushasarls younger brother of Daryodhan, faced Bhim as a largo deer fachged lion. 30. . Plaging a game of life, both the warriors fougni furionith like Sambar and India. They wounded each other with their arrowho like two mad elephants for the sake of femaler, Tben Bhim cut the bow and standard of your son with two atrams and having wounded him on the head, cut off the bead of bis driver. He wounded Bhim with twelve arrons, and himself driving the horses, sept forth other, arrows at him. Then he discharged bright arrows, sludded with gold And jewels and swift like lightning to pierce the body of Bhim, Wounded by that arrow, Bhim fell down like epe dead and beld tbe (६७१७) कर्णपर्व Karan Parv (07171 मरमभूषितम् । महेन्द्रवमाशनियतदुःसहं मुमोच भीमांगविदारणक्षमम् ।। ३५ ।। स तेन निर्यिरतनुवृकोदरो निपातितः सस्त तनुर्गतासुबत् । प्रसार्य बाहु रपषमा धितः पुनः स सनामुपलभ्य घानदत् ॥ १६ ॥ इति कर्णपर्वणि भीम दुश्शासनयुद्धे शीतोऽध्याया८२ ॥ 'सम्जय उवाच । तमाकरोदुष्करं राजपुत्रो दुःशासनस्तुमुलं युध्यमानः चिच्छेद भीमस्य धनुः शरेण पद्भिः शरैः सारथिमध्यविध्यत् ॥ १ ॥ स तत् कृत्वा राजपुत्रस्त स्था यिन्याधभोम नपभिप्रपत्तताभिनभिःक्षिप्रमेयधेरपुभिभीमसेनं महात्मा २५ ततःचो भीमसेनस्तरस्थी शक्तियोमा प्राहिणोचे मुतायतामापतन्ती सहसातिधोरा शरीरसे पृथक् करदिया । ३३ । उस राजकुमार ने दूसरे धनुपको लेकर भीमसेनको वारहवाण से छदा भौर आपही घोड़ों को चलाताहुमा भीमसेनपर चाणोंकी वर्षा करनेलगा। ३४ । इसके पीछे मूर्यको किरणके समान प्रकाशमान सुवर्ण होरेआदि उत्तम रनों से अलंकृत महाइन्द्रके वजरूप बिजली के गिरने के समान कठिनता से सहनेके योग्य भीमसेन के अगों के चीरनेवाले वाणको छोड़ा । ३५ । 'उस वाण से घायल शरीर व्यथितरूप भीमसेन निर्जीवके समान गिरा और दोनों भुजाओंको फैलाकर उत्तम रथपर माश्रितहुआ और थोड़ेही काल में सचेतहोकर गी । ३६ । अध्याय ८३, , . संजय बोले कि उस युद्धमें कठिन युद्धकरने वाले राजकुमार प्रशासन ने ऐसा कठिन कर्मकिया कि एकचाणसे सो भीमसेनके धनुपको काटा और छ वाणों से | सारथीको छेदा । १ । उस वेगवान् राजकुमार ने उम कर्म को करके भीमसेनको नौ पृपकों से पीड़ितकिया इसके पीछे बड़ी शीघ्रता करके उत्तम बाणों से फिर भीमसेनको छेदा १२ । फिर महाक्रोधरूप भीमसेनने आपके घपर उग्रशक्तिको चलाया तब आपके पुत्रने उस जलतीहुई उग्र शक्तिको अकस्मात् आतेहुये देखकर car with both hands outstretched; but he soon regained conscious. nees."36. CHAPTER LXXXIII Sanjaya said, "Fighting severely, Prince Dushasan did a brare doed. Be cut tbo bow of Blıim with one arrow and pierced the driv. er with six. Having done that deed, he wounded Bhim with ar- (8718), Mababharat सदमा सुतस्ते ज्वलितामियोलकाम् । आकर्णपूर्णारमिमहामा चिच्छेद पुत्रौ वनमः पृषकैः ।। ३. ॥ एष्टवा तु तत् कर्म कृतं सुदुष्करं प्रापूजयन सर्वयोधाः महशः। मयाशु भीमञ्च शरण भयो गाद सावम्याथ सुतस्त्वदीयः ॥ ४ ॥ चक्रोध मामः पुनराशु तस्मै मशं प्रजज्बाल कृषाभिवीक्ष्य । विशेस्न धाराशु श त्ययाच सास मयोपि गदाग्रहारम् ॥ ५॥ उरवमुञ्चैः कुपितोय मीमो जग्राह at भीमगदा पाप उवाव चाद्याहमहं दुरात्मन पास्यामि ते शोणितमाजिमध्ये॥ ३ ॥ यथयमुस्तमय स्तघोनां शफि घेगात् प्राहिणोन्मृत्युरूपाम् । आषिध्य भीमोपि गर्दा सुघोर ये क्षिपे रोपपरीतमूर्तिः ॥ ७ ॥ सा तस्य शर्ति सहसा विरुज्य तपासी ताइपामास मनि । स यिस्फुरमांग इध प्रभिन्नो गदामस्मै तुमुलं प्राधिणावे ॥ ८ तयारमय धन्वन्तणि दुःशासन भीमसेनः प्रसघ । या हतः पतितो पेपमानो दुशासनो गया धेगवत्या ॥ ९ ॥ हपाः समप्रा निहता नरेन्द्र सूर्णीकृतश्चात्य र पतारमा । कानतक खेंचेहपे दश पृपक वाणों से फाटा । ३ । उस समय सब शूरवीरों ने प्रसन्न चित्त होकर उसकी प्रशंसाकरी इसके अनन्तर शीघ्रहीः भापके पुत्रने भीमसेनको फिर कविन पाड़ित किया। |व भीमसेन उसपर अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसको देखकर क्रोधसे अत्यन्त कोपयुक्त होकर कहनेलगा कि हे वीर मैं सेरे वाणसे घायलई अव तुम मेरी गदाको सहो । ५। तब क्रोधयुक्त भीमसेन ने बड़े शम्से यह कहकर उस भयानक रूप गदाको मारने के निमित्त लिया और कहा कि बरे दुरात्मा अव में इस युद्धभूमि मेंही तरे रुधिरको पानकरूंगा । ६ । यह वचन मुनकर आपके पुत्रने मृत्युरूप उप्रशक्तिको अकस्माद फेंका तब शोध में पूर्ण ममिसन ने भी बढ़ी उग्ररूपगदाको घुमाकर फेंका उसगदा ने उसकी शक्तिको अकस्मात् वोड़कर आपके पुत्रको मस्तकपर घायल किया । ८ । मदझाड़ने वाले हाथी के समान रुधिरको गिरातेहुथे उस दुशासनपर फिर भीमसेन ने उस कठिनगदा को चलाया उस गदाके द्वारा भीमसेन ने बड़े हठपूर्णक दुशासन को दक धनुपकी दूरीपरडाला । ९ । अर्थात उस वेगवान गदासे घायल और कंपिकाकर TOTS again and again. Bhim moch enraged, discharged a dreadful spear at him, Seeing it come towards him, Dushasan cut it down with sharp arrows. All the warriors, much pleased, praised him. He again wounded Bhim. The latter was much enraged and said, "I' have been much wounded by your artows, you must bear wy maco, Bhim took up bis mace of dreadful aspect to slay him, and crying out loudly, said, "I shall drink your blood to day in the field of battle." At this your son burled at him his dreadful spear. Bhim þurled his maca It broke the spear and wounded your son on the head. Dropping blood like a mad elepbant, Dushasan was attacked by Bhim's mace, which sent him away at a distance of ten bowr. Wound- कर्ण! Karan Paray (0712 विश्वस्तधर्माभरणाम्वरग्विनेटमामो भूशधेदनातुरः ॥ १० ॥ ततः स्मृत्वा मीमसेमन्त रस्ता सापरमया या प्रयुक्त सुतस्ते । तस्मिन् घोरे तुमुले घरमाने प्रधान भूयिष्ठतरें समन्नात् ॥ ११॥ दुःशासनं तत्र समीक्ष्य राजन भीमा महावाहुरीचनपकर्मा । स्मरवा केराहणञ्च देव्या धनापहारञ्च रजस्वलापाः ॥ १२॥ अनागो मर्पपरांमुखाया दुःखानि तान्यपि विचिन्त्य । जज्याल कोपादप मीना आज्यप्रसिक्कोहियथा हुताराः ॥ १३ ॥ तपाई कर्मच सुयोधनञ्च कृपं श्री कृतवर्माणमेघ । निहन्मि दुशासनमध पाप संरक्षतामय समस्तयोधाः ॥ १४ ॥ इत्येवमुफ्त्या सहसाधाष विहन्तुकामगीतपालस्तरस्वी ॥ १५ ॥ तथा तु विक्रम्य रणे कादरी महागज केशरी बोरवेगः । निगृहा दुशासन कधीरः सुयोधनस्याधिरथे: समक्षम् ॥ १६ ॥ रथादव दुशासन गिरपड़ा हे महाराज गिरतीहुई गदासे सारथी समेत घोड़े मारेगये और इसका रथभी चूर्णहोगा टूटेकवच भूपण मार पोशाकवाला फड़कताहुआ दुशा- सन कठिन पाड़ा से दुःखी हुआ । १०। यह शत्रुता जो आपके पुत्रोंकी ओर से की गईधा उसको स्मरण करके हे राजा चारों ओरसे उत्तम पुरुषों समेत उस घोर और कठिन युद्धके मर्तमान होनेपर । ११ । वहांबुद्धि से बाहर कर्मवाला महा. बाह भीमसेन दुश्शासन को देखकर देवी द्रौपदी क केशका पकड़ना और उसr रजसलाके वस्त्रोंका पृथक् करना इन दोनों रातोंको स्मरण करता हुआ। १। उस निरपराधिनी पतियों से जुदीई को दुःखोके देनको शोचकर फिर भीमसन क्रोध ऐसा भनिरूप होगया जैसे कि धुन साँचाहुआ अग्नि प्रज्वलित होग है । १३ । ऐसा होकर उसने उस स्थानपर खड़ाहोकर कर्ण दुय्योधन, कृपाचार्प, अश्वत्थामा और कृतवर्मा से कहा कि अब मैं इस पापी दुश्शासन को मारता हूँ अब सक युद्ध करनेवाल शूरवीर इसको रक्षाकरनेको आयो ।१४ । ऐसाकहकर मारनेको उत्सुक महापराक्रमी और वेगवान भीमसन सम्मुख दौड़ा । १६। इसरीति से भामेसन ने युद्ध में पराक्रम करके जैसे कि केशरी सिंह हाथी को पकड़ना ed by that muce, Dusbasan fell down quivering. The mace killed tosariver and horses and broke the car. Dushasan's armour, ornaments and clothes were destroyed and he lay quivering with Foundar 10. Remembering the old enmity contracted by your sons, in that dreadful battle, in the midst of warriors, Bhimsen the wonder workor saw Duebasan lying there, He remembered that Dract. pedi was dragged by the hair and her clothes removed' while she was in hor monthly course. He remembered her wrongs and becams. enraged like fire over which libations are poured forth Standing there, be said to Karani, Duryodhan, Ķripacharya, Ashwathama'and Kritvarsna, " I shall now sluy this wretch, let allthe warriors protect him." Haviog said this, he rushed on: to slay him; 15: Bhim' did;
[61201 Mahabharat (६७२०) लुरष गतःस भूमौ यत्नेन तस्तिन् प्रणिधाय चक्षुः। आस समुदगृह्य शितं सुधार कण्टे पदाक्रम्प च घेपमानम उत्कृत्य वक्षः पतितस्य ममाश्याविषच्छोणितमस्य कोणम् । १७॥ ततो निपात्यास्य शिरोपकृत्य तेनासिना तव पुत्रस्य गजन् । सत्या चिकापमंतिमान प्रतिज्ञा भीमोपिवच्छोणितमस्य काणम् ॥ १८ ॥ भास्वाध चाम्पाद चीक्षमाणः कुरो हिचं निजगाद घाफ्यम् ।। १२ । स्तन्यस्य मातुमधुसर्पिषोध माधीकपानस्य च सरहतस्य । दिव्यस्य घा तोयरसस्प पानात् पयोदाभ्यां मथि ताच मुख्यात् ॥ २० ॥ श्रन्यानि पानान च पानि लोके सुधामृतस्वादुरमानि तेभ्य । सर्वेश्य पयाभ्यधिको रसोपं मतोममाद्याहितलोहितस्य ॥ २१॥ अथाह भीमः पुनरुप कर्मा दुःशासन क्रोधपरीतचेता: गतामुमालोक्य विहस्य सुस्वर पा फुयाँ मृत्युंना रक्षितोसि ॥ २२ ॥ एवं मुवाणं पुनराद्रवन्तमास्याद्य रक्तं तमतिप्रहटम् । ये चाहताहै उसीप्रकार वह अकेला भीमसेन वीर दुय्योधन और कर्णके, समक्ष में दुश्शासनको पकड़नेकी इच्छाकरके ।१७! बड़े उपायसे उसमें दृष्टीको लगा रथसे कूद पृथ्वीपर गया और मुन्दर धारवाले उत्तम खड्गको उठाकर उस. कँपते हुये पृथ्वीपर पड़डेये कंठको दवा छातीको और जंघाको काटकर थोडासा गरम रूधिर पिया उसके पीछे गिराकर उसके शिरको भी काटने की इच्छासे अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिये उस बुद्धिमान भीमसेन ने फिर थोडासा गरमलोहु । पिया १८। और उस हाधेिरके स्वादुको लेकर महा क्रोधित होकर सबकं सम्मुख यह वचन कहा ।१९। कि माता के स्तन्य मधु घृन अच्छा बनीहुई दिव्य माध्वी मादेरा अथवा दुग्ध दाधे व दुग्ध दधिको मथकर मो तक्रहोताहै इनके सिवाय जो संसारमें सुधा अमृतके स्वादुयुक्त पानकरनेवाल रसहैं उन सब पदारों से अब इस शत्रुके रुधेिरैमें मुझको अधिक स्वाद आवाहै । २१ । इसके पीछे महा- घोर कर्मी क्रोधमें भराहमा भीमसेन बड़े शब्दसे इंसा और दुश्शासन को निर्भाव देखकर यह वचन वोला कि मैं क्या करूं तू मृत्युसे रक्षित है । २१ । उसममय a deed of a prowes, and as a liou rushes on an elephant, he rushed ou in the presence of Duryodhan and Karan. Looking carefully & bim, Bhim came down from his car and taking up his good sword, he cut the breast and thigh of Dashasan, drinking the hot blood coming out from the wouads. Then wishing to cut off his head, he sgain drank Lis blood to fulfil his yon. He was much enraged and after tasting the blood, be said, " Neither milk nor its compounds or hones and other things found in the world are so delicious as the blood of this énemy of mine. 21. Then that dreadful warrior, Bhim, seeing Dushasan lifeless, suis with a langb, * I can do nothing, for you are protected by death. " Whoever say Bhim thus talking, ranning. tasting blood and expressing joy, Jan away in fear. Those who remained, standing, (674 " (६७२१) कर्णपर्व Baran Paray भीमसन दहशस्लदानी भयेन तेपि व्यथिता निपेतुः ॥ २३ ॥ ये चापि तत्रापतिता मन थास्तेषां करेभ्यः पतितं हि शस्त्रम् । भयाच्च सञ्चुकुरस्वरस्ते निमीलितामा दशश्च त ततः ॥ २४ ॥ ये तत्र भीमं दशः समन्ताहौः शासनं तदुधिरं पिषन्तम् । सपला पन्त भयाभिपन्ना नाय मनुष्य इति भाषमाणाः ।। २५ ॥ युधामन्युः प्रद्रुतं चित्रसेन सहानीकस्त्वम्यवादाजपुत्रः । धिम्याध न निशितैः पृपरफेव्योतभीः सप्तभिराशुमुक्तः I॥ २६ ॥ संक्रान्तभोग इव लेलिहानो महारगः क्रोधावर्ष सिसृक्षः । निवृत्य पाञ्चाल जमश्यविध्यत्रिभिः शरैः सारथिमस्य पड्भिः ॥ २७ ॥ ततः सुपंखन सुप्रितेन मुस शिताग्रंण शरेण शरः । माकर्णमुक्केन समाहिनेन युधामन्युस्तस्य शिरोजहार ॥ २८ ॥ तस्मिन इते मातरि चित्रसने ऋद्धः कर्णः पौरुष दर्शयानः । व्यद्रावयत् पाण्डवानाम मार्क प्रत्युधातो नफुलेनामितीजाः ॥ २९ ॥ भीमोपि हत्या तत्रैष दु शासनममर्पणम् । पूरयिस्वालति भूयो रुधिरस्योमनिस्वनः । शृण्वतां लोकधीराणामिप यचनमब्रवीत जिन जिन लोगोंने इसपकार से बोलनेवाले वा दौड़नेवाले स्वादुलेनेवाले अत्यंत प्रसन्न होनेवाले उस भीमसेनको देखा वह सब .मभाभयभीत होकरभागे । २३ । और जो लोग कि दृढ़तासे नहीं भागे उनके हाथों से शस्त्र गिरपड़े और वहुतेरे भाखोंको बन्द करके भयके कारण धारेसे पुकारे और चारों ओरको देकर । २४ । कहनेलगे कि यह मनुष्ध नहीं है कोई उग्रराक्षस है इस प्रकार कहकर भयभीत होकरभागे । २५ । और राजपुत्र युधामन्यु अपनी सेना समेन उस भागेहुये चित्रसेन के सम्मुखगया और बड़ी निर्भयतासे तीक्ष्ण धारपाल सात पृपत्कों से उसको पीडामान किया । २६ । उंचाफल करनेवाले जिह्वा के चाटनेवाले क्रोधरूप विपके छोड़ने को भाभिलापी बड़े सर्पके समान चित्रसेनेने लोटकर उस युधामन्युको तीन वाणोंसे और उसके सारथो को छ.वाणों से छेदा । २७ । इसके पाछे शूरवीर युधामन्युने अन्दर पुंख और नाकवाले अच्छे प्रकार धनुपपर चढायहुये कानतक खेचहुये वाणसे उसके शिरको काटा । २८ । उत्तभाई चित्रसेन के मरनेपर बड़े तेजस्वी शूरताको दिखलाते क्रोधयुक्त कर्णने पाण्डवीसेना को भगाया और नकुलके सम्मुखगया । २९ । वहां परभीमसेन भी दुश्शासनको मारकर बड़ा क्रोधयुक्त कठोर शब्द करता अपनी रुधिरकी अंज- Jot their weapons drop: many shut their oyes, cried with fear, and looking round, said, " He is not a man; he must be a rakshas " Thus saying, thoy ran away. 25. Prince Yudhamanyu, with his army, faced Chitrasen and wounded bim with sixty, sharp arrows. Chitrasın came round. biting his lips and enraged like a serpent, and wounded him with three and the driver with six arowr. Then with a well-discharged arrow, Yudharnavyu cut down Chitrasen's head. At the deatb at Chitrasen, Karan, much enraged, routed the Panday. army and faced Nakul. 29. Bhimsen toor having slain Dushisan (672) Slanallurad (६७२२ ४३१॥ एप ने रुधिरं कण्ठात पिकवाभि पुरुषाधम । मुशिधानी मुसहएः पुमारिति गौरिति ॥ ३२ ॥ ये तास्मान न्यन्ति पुतगरिति गारति। तान् वयं प्रति नृत्यामः धनगौरिति गोरिति ॥ ३३ ॥ प्रमाणकोटयां शयनं कालकूटस्य भोजनम् । दशनम्मा हिभिः शाहश्च जतुश्मनि ।। ३४ ॥ म राज्यहरणमरण्ये वसतिश यादोपया केशपक्षस्य ग्रहणश्च मुदारुणम् । ३९ वाणिव संप्रामप्यतुःखानि च घमति। विरारमधा पश्च पलेशमार्फ पृषद्विधः ॥ ३६ ॥ शकुनर्धाराष्ट्रस्य राधेयस्य व मन्धिते । अनुभूतानि दुःखानि सेवा हेतुस्त्वमेव हि ॥ ३७॥ दुःखान्येतानि जानीमोन सुसान कदाचन । धृतराष्ट्रस्य दोराम्यात् सपुत्रस्य सदा म ॥ ३८ ॥ इत्युपरवा पवन राजन जय प्राप्य फोदरः । पनराह माराज स्मयस्तो केशार्जुनी ॥ ३९ ॥ मसूदिगो विनयललेगहनास्यः कुद्धोत्पर्य भीमसेनस्तरस्थी । दुःशासनो यद्रणे सश्रुतं में बलस्य कृतम पारी १४० मष दास्याम्परं द्वितीयं दुर्योधन यशपर लीको पूर्णकर । ३० । सब लोकोंक वारोंको एनासर यह बचन बोला । । । कि हे नाच पुरुष मैं इस तेरे रुधिरको काउस पीताई अबतुप अस्पन्त प्रसन्न होकर फिर कहो कि हे गौ हे गी । ३२ । उससमय जो जो लोग हमको देखकर नाचते थे वह हे गी हे गौ इस शब्दको फिर कहें हम उनके सम्मुख नाचत यह फिर कहें किगी है गौ । ३३ । प्रमाणकाटीगाम स्थानमें सोना कालकूटनाम विषका भो. जन'काले सोसे काटना लाक्षागृह में भस्महोना । ३४ । द्यूतविद्या से राज्यका हरना वनमें निवास द्रोपदीके केशोंका भयानक पकड़ना । ३५ । भौर युद्धमें वाण अब भौर स्थानपर अत्यन्त दुःख विराट भयनमें नवीन प्रकारके दुःख जो हमको हुये । १६ । और जो वास कि शनि दुर्योधन और कण मनसेछुपे उनसब कारणों का हेतुरूप तुही है । ३७ । हमने इन दुःखों के सिपाय कभी सुख को नहीं पाया पुत्रसमेत धृतराष्ट्रकी दुर्युदीसे इस्लोग सदैव दुःखीहुये । ३८ । हे महा- रान रागातराष्ट्र यह कहकर विजपको पाकर भामसन अर्जुन और केशवजी से | वोला । ३९ । किहे वीरो पुदमें दुशासन के सापजो प्रतिज्ञाकरी थी वह यहांभव मैंने सत्य २ करके पूरीकरी । ४० । इस स्थानपरपन्न पशुरूप दुर्योधनको मारकर and filled bis hand with his blood in great rage, said within hearing of all the warriors:." I drink thy blood, wretch. Say again, “ CON "Those who dsaced before, saying "Cow, cow," let them say again. We danco in their presence and say.Cow, cow.!" You are tho root of all aril: my skep at Pramanakoti, poisoning, the biting of black Berpente, burning in the houso of lac, tbe deprivation of our kingdom in gambling, our exit, tło drapging of Dranpadi ty tho bair, this great war, our troubles at Viratnagar and other injuries caused by Shakuni, Duryodlab and Karab. 35. We Lever got any good from you except trouble. Harirg kuid this und got victory, Bhim said ४ COW.
[६७२३) कमhuran Pure 73 विसस्य ।हिरी मृविम्याच पक्षातुरामन त पारपाण मनाम ५.4 एतापमं प्रहरी ननाद धो गभिरागान यातितो महाम, मिस्र सहसंप्रः ॥ १२ ॥ इति कर्णपर्वणि दुगमन पोतोध्यायः ८३ ॥ सअप उगाच । दुःशासनानु निहते पुत्रालय मदारयाः। महाशापारी समरेप्यापलायिनः राशन महाया भी प्रासादर नियही करती पाशा पधारो मन रमलोपा सगरो शतगमुश्ती २२ए समय यमपनी दूसरी मनिशाको भी पूरीकरूंगा नय कौरवों के समतमें इसके धिरको कादंगा तभी में शान्तीको पाऊंगा । ४१ । फिरवा रुधिर, दूवाहमा भत्यन्तममान चित्त भीमसेन इस पचनको कहकर वह शब्दो ऐसा गी से कि तहमा इन्द्र हषासुरको मारकर मसनतासे गर्माया ४२ ॥ अध्याय ८४॥ सनप योले कि हे राजा फिर दुरशासन के पानपर कोपरूती पर रिप के रमनगसे युदोंमें पुख नफेरनेवाले महापराक्रमी भापके शूरवीर दश पुत्रोंने पागों से धामसनको दकदिया उनके नाम या नितंगी कवची पाशी, दरापार, पर्दर अलोलप, सा, पगड, वातवेग मुर्ग: । २ । भाई के दुःससे पाडापान इनदयों ने to Arjua and Kesbar, " !!*vo trday lulllled my row 18631 dinas Durbacan; baviog slain Duryodhan likes victim of scnfice, I shall fulfi mysccond ror. Isball got reaco of mind after cutting of this head, laying wid this with a chtoful nind, Bhiw, with his blood-stained body, roaralaslndra holdous after slaying Vritrasur."42. your farliko CIIAPTER LXXXIY Banjaya said, "Atthodeath ol Dushasan ten of Las opraad Bhip with their arrowThey rere Niebaugi, Barachi, I'msbi, Dandadhar, Dhanunibas. Slulup, Sula Slanj, l'alates 0 Suvarcbas Afliicle with the grief of their brother, they clucia mighty Bhina. Catched with their towe, with eyes tu in Est, - (6724) Dalabharat ! १७२४) सहिना भ्रातृसाकर्पिता: । भीगसन महावाहुं मागंगः समधारयन् ॥ ३॥ स वार्य माणो पिशितैः समन्तामझारथैः । भीमः क्रोधाग्निरकाक्षः खः काल इबारमी ॥ ४ ॥ तास्तु भल्लैमहापगईशीभईश भारतान्। रुषमाङ्गदाघ्रषमएखैः पायों निम्ये पमक्षयम् ॥ ५॥ इतेपुतेषु धीरेषु प्रदुद्राय पलं तप । पश्यतः सतपुश्स्य पाण्डवस्थ मयादितम्॥६॥ततानि महान प्रधिवेश महद्भयम्। हप्ट्यामीमस्य विक्रान्तमातफस्य प्रमाविषतस्य षाकारभाषः शल्यः समितिशामनः। उवाच वचन कर्ण प्राप्तफालमरिन्दमम् ॥ ८ मा व्यथां कुरुराधय नैतत्वय्युपपद्यते । एते द्रयन्ति राजानो भीमसनभयार्दिताः ॥ ९ ॥ दुरोधनध समूढो भ्रातृम्यसनकर्षितः । दुःशासनस्य रुधिरे वीयमाने महात्मना ।। १० । मापनचेतसश्चैव शोकोपातमन्यवः । दुर्योधन मुगसन्ते परिवार्य समन्ततः । कृपप्रभृतयः कण. हताश्च सोदराः ॥१२॥ पाण्डपा मिलकर महावाहु भामतनका रोका । ३ । फिर चारोंमारसे उन महारथियों के | बाणों से रोकाहा क्रोधअग्नि से रक्तनेन वह भीमसन क्रोध भाहुआ कालके समान शोभायमानहुआ । ४ । उस समय पाण्डव भीमसेन ने मुनहरी पुंखवाले दश भल्लों से उनसुनहरी वाजूवन्द रखनेवाले दशों भाई भरतवंशियों को. यमलोक में पहुँचाया । ५ । उन वीरों के मरनेपर मामसनक भयो पादित आपकी सेना कर्णके देखते हुये भागी।६।हे.महाराज इसक अनन्तर कर्ण मजाओंपर पराक्रम करने वाळे काल मृत्यु के समान भामसनके पराक्रमको देखकर बड़ा भयभीत हुआ।७। उसके रूपान्तर से वृत्तान्त के जाननेवाळ युद्ध में शोभायमान राजा शल्य ने उस शत्रुविजयी कर्ण से समयफे अनुसार यह वचन कहा । ८ कि हे राधा के पुत्र पादा मतकर तुझको ऐमी पीड़ा करना उचित नहीं है भीमसेन के भयं से पीड़ा मान होकर यह रानालोग भागते हैं।९। और भाईके दुःखसपाड़ामान दुर्योधन अचेत | हारहाहै बड़े साहसीते दुश्शासनका रुधिरपीनेपर । १० । अचेत और शोक घायल | चित्त कृपाचार्य आदि और मरनेसे वाकी बचेहुये सगेभाई चारों ओरसे दुर्योधन के पास बैठे नियतहैं । १२ । और लक्षभेदी शूरवीर पाण्डव जिनमें अग्रगामी enraged Bhimnsen looked like Destb. Yith ten sharp ertows, he sent the ten brothers to the region of Yam. 5. At the death of those warriors your army fled away for the fear of Bhim. Karan himself Tas terrified at the prowess of Bhim. Knowing the state of his mind from his Altered looks, Sbalya said to him, "Donob be grieved, son of Radha. You should not be grieved. These warriors are running away from Bhim and Daryodban is insensible for the grief of his brother. Insensible and grieved at the drinking of blood by that warrior, Kripacharya and the remaining sons of Dhritrasb tra, have came round Duryodnan. 12. The Pandav marksmen, led by Arjun, are ready to fight with you. You should bravely face Arjun. 'Dur- 1(६७२५, कर्णपर्ष Karan Pary 107251 लघरच्याच धनन्जयपुरोगमाः । स्यामेषाभिमुखाः शूरा युखाप समुपस्थिताः ॥१३॥ सवं पुरुषशार्दूल पौष मति स्थितः । क्षत्रधर्म परष्कृत्य प्रत्युचाहि धनजयम् ॥१४॥मागेहि धार्तराष्ट्रेण त्यपि सर्पःसमर्पितः तमुहमहापाहो यथाशक्ति पयोधलम् ॥ १५॥ अयेस्यानिएला कीर्ति षः स्वर्गः पराजये । वृषसेनश्च राधेय संकुद्धस्तनय स्तप । स्वपि मोहं समापन्ने पाण्डवानभिधावति ॥ १७ ' पतच्छुत्वा तु पचनं गन्य स्वामिततेजसः ।.हदि चापश्यर्फ भावं चक्रे युवाय सुस्थिरम् ॥ १८ ॥ ततः कुद्धो कृपसनोभ्यधावत्यस्थितः स्वरथे पाण्डयं तम् । वृकोदरं कालमिवात्तदण्डं गदाहस्त पोषयात पदीयान् ॥ १९॥ अथा पधायन्नकुलः प्रधीये रोषादर्मिय प्रतुदन् पृषकः । कर्णस्य पुन समरे प्रष्टो जिजिघांसमययेव जम्मम् ॥ २० ॥ ततो ध्यजं स्फाटिक विन्दुधिविच्छेद वारो नकुलः क्षुरेण । कर्णामजस्येवसनञ्च चित्रं भल्लेन जाम्बू मदपट्टनबम ॥ २१ ॥ मचान्यदादाय धनः मुशीघ्रं कर्णात्मजः पाण्डयमभ्यषिध्यत् । अर्जुनहै वह युद्धके लियतरे सम्मुख वर्तमानहै । १५ । ई पुरुषोत्तमः इससे भय तुम शूरवीरतासे नियंत होकर क्षत्री धर्मको आगे करके अज्जुन के सम्मुख भायो । १४ ।.गजा दुयोधन ने सब युद्धकाभार तुझीप नियत किया है हे महाबाहो उस भारको तुम अपने क्ल और पराक्रम मे उठावों । १५ । विजय करने में तो भवल्प कीर्ति होगी और पराजय में निश्चय स्वर्ग है है राधाके पुत्र अत्यन्त क्रोध- युक्त तेरा पुत्र पसेन तेरे मोहित होनेपर पांडवों के सम्मुख दौड़ता है ।१७ । बड़े तेजस्वी शल्प के इस ववनको मुनकर कर्ण नेयुद्ध करनेका दृढ़ विचार अपने हृदय में नियत कियाnicउसकपीछेकोषयुकंवृपसेन उससन्मुखवर्तमान भाभिसेन के सम्मुख दौड़ा जोकि दण्डधारी कालकेसंमान गदां धारण करनेवाला आपकैशूरोंसे युद्धकर रहाथा॥२९॥और वहाभारी नकुल पृषकोंसे शत्रुओंको पीडामान करता दौड़ा युद्धमें प्रसन्नचित्त उस कर्ण के पुत्र वृपतेनके सम्मुख ऐसे गया जैसे कि पूर्वममय में जम्भ के मारनेकी इच्छा से इन्द्र उसके सम्मुख गयाथा । २० । वहां पहुँचकर वार नकुळने चरमसे उसकी उस ध्वजाको काटा जोकि श्वेतरंगके अपूर्व कपचवाली था और मुनहरी चित्रोंसे चित्रित अत्यन्त अद्भुत वृपसेनके धनुपको का॥२१॥तवतो "yodhan has laid the whole burden of war on you; lift it with all your wight. You will secure tame in case of victory and heaven in defeat. Sveing you terrified, your onraged son is fighting against the Pandavas, Hearing the words of glorious Sbalya, Karan resolved to fight. Then euraged Vrishasen rusbed against Bhíor who was fighting, with your warriors aid' using his mace like the staff of Yani Nakul ran on wounding the cnemies with his sbarp weapons. He faced Vrishlasen in battis is lodra had faxed Jambh in the days de goro. Nakul cut down bis banner with a sharp arroy and with another, ho cut his gold-decked bow. Karan's son took another boy. case of णातच [6726} Dlahabharat (६७२६) दिव्यमहास्त्रनकुल महाम्रो दुशासनस्यापचितिपिपामुः ॥ २२ ॥ ततः स कुरो नकुलो महात्मा शरैमहोल्फाप्रतिभैरविध्यद । दिव्यैरवैरभ्यर्ष सोपि कर्णस्य पुत्रो नकुल कृतास्त्रः ॥ २३ ॥ शयभिधाताच्च या राजन्! स्वाब भासासमार जज्वाल कर्णस्य सुतोऽतिमाश्रमियो यथाया हुतिभिर्हताशः ॥ २४ ॥ कर्णस्थ पुत्रो नकुलस्य राजन् सनिभाना मोसमात्रैः पनायुजान सुकुमारस्य शुमानभंकृताम् जातरूपेण चित्रान् ॥ २५ ॥ ततो इतादयादपरुह्य पानादादाय चर्मामलामवन्द्रम् । माकारासमथर्मास सहसा पोळ्यमानः खगच्चचार ।। २६ ॥ ततोन्तरीक्षे नुवरावनागांश्चिन्छन् मागोषिपर नियचित्रान् । ते प्रापतनप्तिता गो विरास्ता यथाश्वमेधे पराषः शमित्रा २७ ॥ विसा हना बिदिता युबशेण्डा नानादेश्याः सुभृताः सत्यसम्धा। एकेन शी नकुलेन कर्णकं पुनने शीघ्रही दूसरे धनुपको लेकर नकुलको छेदा दुशासन का बदला | लेने के अभिलापी कर्णके पुत्र पसेनने दिग्य महा मस्त्रोंसे नकुलको घायल किया । २२ । उस के पीछे क्रोपयुक्त महात्मा नकुलने यही उस्काके समान वाणोंस उसको घेदा फिर अखज्ञ कर्णका पुत्र दिव्य भलों से नकुलपर वर्षा करमेलगा 1 २३ । हे राजा वह कर्णका पुत्र वाणोंके महार वा क्रोध वा अपने तेज अपमा भोंक चलानेसे ऐसा अत्यन्त क्रोधरूप हुआ जैसे कि घृतको माहुतियों से बड़ी हुई अग्निहोती है हे राजा कर्णके पुत्रने अपने उत्तम भबों से नफुलके उन सब घोड़ी कोमारा जो कि श्वेतरूप बड़े ऊंचे मनहरी जालों से अलंकृत बनायुज नाम के | २५ । उसके पीछे मृतक घोड़ेवाले रथसे उतरकर सुवर्णमपी चन्द्रमावाली निर्मल दालको लेकर प्राकाशरूप खड्गको पकडकर चलायमान पक्षीके समान घूमा । २६ । उस समय अपूर्व युद्ध करनेवाले नकुछने शीघ्रतासे अन्तरिक्षमें रप घोड़े और हाथियों को मारा खड्गसे कटकर वह सब पृथ्वीपर ऐसे गिरपड़े जैसे कि अस्वमेध यज्ञ में मारनेराले के हायसे यज्ञपशु गिरपदताहै । २७ । नानादेशों में उत्पन्न होनेवाळे अच्छी जीविका पानेवाले सत्यसंकल्पी दोहजार शूरवीर गिर पड़े युद्ध में विजयामिलापी चन्दनप्स युक्त शरीर उत्तम शूरवीरलोग अकेले and wounded Nakul. Wishing to bo rovengod for Dashasan's death, Vrishason wounded Nakul. -Nakul wounded him in return. Karan's, Bon, clever in tho uao of arms, discharged divine weapons at Nakul In his anger and glory, ho was enragod as fire poured over by libations, Ho sler all tho horses of Yakul which were white, deokod with gold ornaments and of. Banayuj broad. 25. Coming down from the car of which the horscs wero dead, with his mooned abield and kuge sword, ba roaned liko a bird. Ha slay car warriors, borsos sod 'olephants. Cut by his grord they feil down on the ground: like victims of sacritice. He slese two thousauds of thi best warriors -- 6730) Mahal harat (६७३०) घन्तिान् दर्शकाच धीरान सुपर सरपरांप्रतारपस्तोयसम्धन् । मवालदसपने है स्तिभिस्तानदीयुगीशिवरीनकाशै मधेगैः कुलिन्दाः॥ ४ ॥ सुकल्पिता मषता मदोत्कटा रणाभिकाः छतिभिः समास्थिताः । मुबर्णजालाचतता भुर्गजास्तथा पथा खे जलदाः सविद्युतः॥ ५॥ विखदिपुत्रो दशनिमहायसःको समूताश्रमपोर शम । ततः शरदतमनसायकतिः सहब नागेन पपात मतलं ॥ ६॥ विचित्र बरजश तोमरर्दियाकाांशुतमरयामयः । रथच विक्षोभ्य ननाद नईवस्तसोस्य गान्धारपतिः शिरोऽहरत् ॥ ७॥ तनः कलिन्देषु इतेषु तेप्पथ प्रहरूपास्तव ते महा रथाः। भूशं प्रामुलंयणाम्बुमम्भवान परश्च वाणासनपाणयोभ्ययुः।। ८.1 अयाम अत्यन्त उत्तम बानो घायल करते कुलिन्ददेशी वादल और पर्वतके शिखरों समान भपानक चगवाले हाथियों समेत उनके सम्मुख गये । ४ । और अच्छे प्रकारसे अलंकृत मदसेमतवाले युदाभिलाषी कर्मका पुरुषों से युक्त नहरी जालों से अलंकृत हाथी ऐसे शोभायमान हुये जैसे कि भाकाश में, विमली रखनेवाले | वादल होते हैं । ५ । वहां कलिन्दके पुत्रने दशलोह के बाणों से कृपाचार्यको सारथी और घोड़ों समेत अत्यन्त घायल किया इसके पीछे कृपाचार्य के बाणों से वह माराहुआ कलिन्दका पुत्र हाथी समेत पृथ्वीपर गिरपड़ा । ६ । तब उसका छोटा भाई सूर्यको किरणके समान प्रकाशित लोहके तोमरोंसे रथों कंपायमान करके गी इसके पीछ राजा गा.धार ने इस गजनेवाले के शिरको काटा । ७ । तदनन्तर उन कलिंग देशियों के मरने पर अत्यन्त प्रसन्न रूप आपके उन महा रथियों ने शंखोंको बड़ी धनियों से वजापा और धनुपको हायमें रखनेवाले डोके शों के सम्मुखगये । ८ । इसके पीछे मुञ्जियों समेत पाण्डव और कौरवों का Sutuvrish, Krath and Devayridh, your warriors came on with their cars and elephants thundering like clouds and obecked the eleven Warriors with their nrrowe. The warriora of Kulind, with their dmad fal elephants like mountain clouds, encountered them. The elephants decked with gold trappings and mounted by brave warriors, looked glorious like clouds charged with lightning. Kulind's son'wounded Kripa. charya and his ,driver and horses, with ten arrows, and fell down dead on earth, with elephanta pierced by the arrows of Kripacharya. Shaking the car with bright iron tomars like the rays of the Soo, his younger bro:ber roared a loud roar; but his head was cut off by the king of Gandbar. As the death of the Baling men, your warriors sent forth blasts from their conchs in great glee and faced tte enemies with their. bowa8. Then the Bridjayas and l'andavas fought with the Kauravas a dreadful battle which was destructive to the lives of men, borsea and elephants Then thousands of cara, horseblephants and foot fell down (६७३१) कंप. Karan Paray (66731 पाबमनीव दारण पुनः कुरुणा सह पाण्डएजः । शरासिशमशृष्टिगवापरयों राधानागासु हर भूशाकुलम् ॥ ९ ॥ रथाश्चमाता पदाप्तिभिस्ततः परस्पर विमहताः पतम् क्षिती । यथा सविद्युतस्तनिता बलाहका: समाहता दिग्भ्य घोग्रमारः ॥ १० ॥ ततः शतानीकमतान्महागजांस्तथा रथान पत्तिगणांश्च तान घहुन् । अधान मोजातु इयागथापतन् क्षणविशताः कृतधर्मणः शरैः॥ ११ ॥ अथा परे दीणिशराहता द्विपालयः ससर्वायुधयोधकतनाः । निपेतुरागी व्यसवः प्रगति वास्तथा यथा पत्रहता ॥१२॥ फलिराजापरजादनम्तरा स्तनान्तरे पत्रिरताडयत् तपारमज तस्य तात्मजः शरैःशितः शरीरं विभिदे विपश्य तम् ॥१३॥ सनागराजः सह राजसनना पपात रक्त यतु सर्वतः क्षरन् । शचीशयजमहताम्बुदागमे यथा जल गरिक पर्वतस्तथा।। १४ ॥ कुलिन्दपुत्रप्रहितोपरो द्विपः शक समतादधरय व्यपाययत् । ततो महाघोर भयकारी वह पुद फिर हुभा नाकि वाण लग शक्ति धुधारे खड्ग गदा और फरसों से मनुष्य हाथी और घोड़ों के प्राणोंका हरनेवाला था ।९ । इसके अनन्तर हजारों रथ घोड़े और हाथी पदातियों से परस्पर में पायल होकर पृथ्वी पर ऐसे गिरपड़े जैसे कि विजली और गर्जना रखनेवाले धुसेयुक्त वादल दिशाओं से गिर । १० । उसके पीछे सैकड़ों सेना रखनेवाले हाथी स्थी और पतियों के समूहों को और घोड़ों को भोजवंशी कृतवर्मा ने मारा ११। यह सब उसके धाणों से मृतक होकर एक क्षणही गिरपड़े उसके पीछे अत्यामा के वाण से सब शस्त्र और वजाओं समेत घायल शूरवीर और निर्जीव मन्य बड़े हाधी ऐसे पृथ्वी पर गिरपड़े जैसे कि वजसे ताहिरा बड़े २ पर्वत गिरते हैं । ।२। राजा कुसिन्द के छोटे भाई ने उत्तम याणों से आपके पुत्रकको छामीपर घायल किया फिर भापके पुत्रोंनेभी तीक्ष्ण वाणास उसके शरीर समेत हाथीको मारा॥१॥ तव बह गजराज उस राजकुमार समेत सय ओरको रुधिर को गिराता ऐसे गिर 'पढ़ा जैसे कि बादलों के भान इन्द्र के वज्रसेटूटा धातुवान पर्वत जलको गिराता गिरपड़े । १४ । फिर कुलिन्दके पुत्रके भेजहुये दूसरे हाथीने किरात को सारथी wounded on eurth by thousands like clouds with snioke and lightning. 10. Then Kritvarma sley numerous elephants, car-warriore, horsemen and foot soldiers. They tell down in an 10stant wounded by his arrows, The warriors wounded by his arrows and the ele pliants fell down dead like hills struck by liyhting. The younger brother of Kaliod Wounded your con on the breast with his good arrows. Your rons too, killed him and his elephant witb sharp arions The blerding elephant, with the Princo on it, fell down like a hill, with its raters, struck by lighting. Another elephant sent by Kulind's son, killed Kirat with the driver and horses. The elephant with lsis rider, foll down wounded by, arrows like a hill. 15. Tho invincible Kirat king, with his elephant (६७३३) कर्णपर्व Karan Pary 16733) ॥२१॥ तदस्य कर्मातिमनुप्यकर्मणः समीप हयाः कुरघोश्यपूजयन । पराक्रमझास्तु धनजयस्य ये हुतोयमग्नाविति ते तु मेनिरे ॥ २२ ॥ ततः किरीटी परवीरघाती इता समालोक्य नरमधीरम् । माद्रीसुतं नफुलं लोफमध्ये समीक्ष्य कृष्णं भृशविक्षतञ्च । तमभ्यधाववृषसेनेमाह से सतजस्य प्रमुखे स्थितं तदा ॥ २३ ॥ तमापतन्तं नरवी रमु महाहवे घाणसहस्रधारिणम् । मध्यापत कर्णसुतो महारयो यथैव घेन्द्र न, चिस्तव तम् ॥ २४॥ ततो दतं चैकरयन पार्य शरेण विध्या युधि कर्णपुषः। ननाद नाद समदानुमायो विधेय शक नमुविः परार्धे ॥ २५ ॥ पुनः स पार्थे वृषसेन उप्रै गिरषिध्यनजमूले तु सत्ये । वयव कृष्ण नमिः समापन पुनश्च पार्थ दशभिः परकः ॥ २६॥ पूर्व तथा वृषसेनेन वियो महाजषैः श्षेतहः शरस्तः। सरम्ममीषद् | लोहे के वाणोंसे शतानीक को और तीननाणोंसे अर्जुन को वानप्ते भामसेनको सात से नकुल को और बारहसे श्रीकृष्णजी को घायलकिया। २१ । तदनन्तर प्रसन्न चित्त कौरवों ने बुंदिसे बाहर कर्म करनेवाले कर्ण के पुत्रके उस कर्म को देखकर वड़ी प्रशंसाकरी परन्तुं जो अर्जुनके पराक्रम क जाननेवाले थे उन्होंने यईमाना कि भव यह अग्निमें होमांगयां । २२ । इसके पीछे नरों में बड़ा शूरवीर शत्रुओं के वारों को मारनेवाला अर्जुनं माद्री के पुत्र नकुल को मृतक घोड़ेवाला देखकर और लोक में श्रीकृष्णजी को भत्यन्त घायल विचारकर युद्धमें घुपसेन के सम्मुख दौड़ा । २१ । वय पूर्ण का पुत्र उस आनेवाले नरवीर गुरुरूप महा युद्ध में हजारों वाणधारण करनेवाल महारथी अर्जुन के सम्मुख ऐसगया जैसे कि पूर्व समय में नमुचि महाइन्द्र के सम्मुख गयाथा । २४ । उसके पीछे कर्णका पुत्र शीघ्रता पूर्वक बडेतीन और स्वच्छ वाणों से अर्जुन को छेदकर युद्ध में ऐस महाशब्दसे गर्ना जैसे कि वह महानुभाव वीर नमुचि इन्द्रको छेदकर गर्जाथा । २५ । फिरउस पसेन ने उग्रमाणों से अर्जुन की वाम भुजा की ज.में छेदा और इसीप्रकार नौ वाणों से श्रीकृष्णजी को पीडामान किया इसके पीछे फिरभी अर्जुनको दशवाणों से घायल किया । २६ । जैसे कि वृपसन के पहले वाणों से अर्जुन घायल हुआ और कुछ क्रोधयुक्त हुआ फिर दूसरी पारके वाणोंसे उसके मारने का मनमें विचार ed Shatzik, Bhim and Arjun with three arrows each, Nabul with seven and Krishu with twelve. The Kauravas praised tho wonderful deed of Karan's son, but those who knes Arjun's prowess, thought that Karan's son was his next victim. Then Arjun the bravest of war. riors and destroyer of foes, seeing Nakul destitute of horses nad Shri- Krishn wounded, rushed at Viishasen. The latter faced mighty Ar. jun and his thousands of arrows as Namuchi bad done India. Kalau's Bon #ounded Arjun with his sharp arrows and roared as Namuchi had done aftor wounding Indra. 25. Then Vrishasen hit Arjun with sbarp arrows, .in. the left arm, Shri Krishn wiha nina arrone (6734) Mababharat मितो पधाय कर्णात्मजस्याय मनः प्रदः॥ २७ ॥ ततः किर्गटी रणलिकोपार करवा त्रिशास्त्रा सुकुर्दि ललाटे । ससर्ज पूर्ण विशिस्खाग्महारमा धाय राजन् कर्णमुतस्य संक्षे ।। २८ ।। विम्याध चेन दशभिः पृपत्कमर्मस्पर्क प्रस किरीदी । विद, चास्ये वसतं सुजी.च क्षुरैचतुर्मिः शिर एष चौः ॥ २९ ॥ स पार्यवाणामित पपातः रयाद्विवार्विशिरा घरायाम। सपुष्पितो सूक्षयरोतिकायो पातेरितः शाल वाद्रिशनात् ॥ ३० ॥ तं प्रेक्ष्य वाणामिहर पतन्तं रथात् सूतजः क्षिप्रारी । ररपे नाशु जगाम रोपात किरीदिनः पुत्रवधाति तप्तः ॥ ३१ ॥ इति कणपर्वणि पसेनवधे पञ्चाशीताध्यायः ८५ ॥ - किया ! २५ । फिर अर्जुन ने युद मुखपर अपने क्रोघसे ललाटपर भृकुटी को वानरेखावाली करके उस बड़े साहसीने कर्ण के पुत्रके मारने के लिये विशिखनाम वायोंको छोड़ा ।२८। हेराजा इसतेहुये अर्जुनने दशपत्कोंसेवृपसनको मर्मस्थलों में वघा. और पुरमनाम तीक्ष्ण चार वाणों से धनुप समेत उसकी दोनों भुभाषासमेत शिरको कादा । २९ । अर्जुन के बाणों से घायल और वेशिर होकर वह कर्णका पुत्र रथसे पृथ्वीपर ऐसे गिरपड़ा जैस कि बहुत लम्बा और फूलाहुभा मालका दृक्ष वायुके वेगसे पर्चतके शिखरसे गिरपड़े ।२०। फिर शीघ्रता करनेवाले कर्णने वालों से.मरे हुये रथसे गिरते हुये पुत्रको देखकर शीघ्रही पुत्रके मारने से अर्जुनपर माय युक्त होकर अपने रपको उसके सम्मुख किया । ३१ । and Arjun again with ten. Enraged someweat by the former arrows of Vrishasen, bis wrath tras enkindled by again being hit, and he thought of slaying him. Contracting his brows and showing three liries on the forehead, the discharged sharp arrows to slay Karan's son. Arjun | with a smile, Founded Vrisbasen on the vital parts and cut off both his arms and head. Wounded by Arjun's arrows, the headless trunk of Karan's fog fell down on earth like a huge sal tree struck down by the Find from the top of a hill. Seeing his sop fallen from the car, Karan, much enraged, faced Arjun in his car:"31.
(६७३५) कर्णपर्व Karan Paray (0735 सम्ञप उषावातमायान्तमभिप्रेक्ष्य घेलोवृत्तमिघाणेषम ! गंमत सुमहाकाय दुनिमार मुरैरपि । अर्जुन प्राह दाशाहः प्रहस्य पुरुषर्षमः॥ अयं स रयं भापति वाषः शल्पखारपिाय ते सहयोमुव्यं स्थिरी भष धनंजयः ॥ २ ॥ पाप बैन समायुकं रथं फर्णस्य पाण्डय । श्वेतपाजिसमायुफ युकं रामामुतेन ॥३॥ मानापाकाकलिलं किङ्किणीबालमलिन म । उशमानमियाका विमानं पाणयः .४॥सार पश्य कर्णस्य नागर महात्मनः । भाखण्डलधनु-मण्यमुळिस्यामि वाम्बरम् ॥ ५॥ पदय कर्ण समायान्तं पाराष्ट्रप्रियेषिणम | शरायविमुचन्तं शपसारामिवाम्मुदम् ॥ ६॥ एष मये, राजा रयानं पप्यवस्थितः । नियष्यति पानम्प संधयस्यामिवोजसः । ७५ श्रृणु दुन्दुभिमिर्धोष बराब्दश्च दादणम। सिंहनादांश मिविधान अणु पाण्डप मशः ॥ ८॥ मन्तीय मायान् कर्णेनामि अध्पाप ८५ समय बोले कि मर्यादाके उसंघन करनेवाले समुद्र के समान हॉल खेल युरू उस गर्ननवासे आय कर्णको देखकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णजी सकर अर्जुन से बोले । २१ । पहपत घोड़ेवाला शल्यको सारथी बनानेवाला अधिरयो आव है इसके साय तुमको लड़ना चाहिये हे अर्जुन अब हद होकर नियतहो ।२ । है पाएर इसरथको देखो जोकि अच्छे प्रकार से पनामा पेत घोडों से युक्त राधाकटे की सरी से शोभित नानामकार की ध्वजा पताका और क्षुद्र पपिटकाओं के जालोंका रखनवाला और वत घोडेप थाकाश में चलने वाला चित्रविचित्ररूप भाकाशके विमानंकसमानासमोर महात्मा कर्णके नागकी कसाका चिहन रखनेवाली धजाको देखो और इन्के समान धनुप से मानो भाकाश में लिखनेवाले दुर्योधनका अभीष्ट चाहने वाले वाणों की वर्षा से युक्त भावे हुये कर्नको ऐसे देखो जेस कि जळकी धाराओं के छोड़ने गले वादस को देखते । ६ । रयके भागे नियत यह मद्रदेशकारामा उस बड़े सेजस्वी कर्ण के घोड़ो को हाँकताहै । ७। दुदुभियों और शंखों के भयानक शब्द और नानासकार के सिंहनादों को सव भोर से धनो । ८॥ हे पाण्डव पड़े तेजस्वी कर्ण के द्वारा बड़े CHAPTER LXXXVI Sanjaya said," Seeing Karan advance, with a ndise liku įthat of the rising ocean, Shri Krisha said to Arjun with a smile, Here comes Karan, with his white borzeš driven by Shalya. You must fight with him steadily. Look at his well-made car drawn by wbito hores, adorned with bapners and bella and wonderful like a celebtigi car. Look at the standard of Raran, having the device of elephant's rope, Look us this bow, like that of Indra's bow, with which he is sending forth thousands of arrota as if he would wiite iu the sky. That well-wisher of Duryodhan is showering struwa liko rain, Tbo [6736} Mahabharat (६७३६) ततेजसा ।दोधूयमानस्य भध-धनुषः शृणु निस्वनमः ९ ॥ एते दीरन्तिसगणाः पावालानां महारथाः । एष्ट्वा केशरिण कुछ मृगा इस महायने, १० ॥सर्व यलेन कौन्तेय हन्तुमईसि सूतजम् । नहि कर्णशरानान्यः सीदम सरते नरः ॥ ११ ॥ सह देवान् सगन्धर्चा स्त्रीलोकान् सधरा वरान् । त्यहि जेतु रणे शकस्तयेष षिदिवं मम ॥ १२ ॥ भीममुग्रं महादेव घ्यक्षं सर्प फपाईनम् । न शका द्रष्टुमीशानां किं पुनयों धितुं प्रभुम् ॥ १३ ॥ त्वया सातामहादेवः सर्वभूताशवः शिवः । युद्धनाराधितः स्थाणुर्देवाक्ष परदास्तव ॥ १४ ॥ तस्य पार्य प्रसादेन देवदेयस्य शीलनः । जहि कर्ण महापाहो नमाचे वृत्रहा यथा । धेयस्तेस्तु सदा पार्य युद्ध जयमवाप्नुहि ॥ १५॥ अर्जुन उवाच । ध्रुव एव जयकृष्ण मम नास्त्यत्रसंशयःसयलोकगुरुर्यचं तुष्टोसियो मधमदन ॥ १६ ॥ चोदयाश्यान हपीरुच रयं मम महारय । नाइत्वा समरे कर्ण सान्दों को गुप्तकरके कठोर कंपापमान धनुप के शब्दको, सुनो। ९ । यह पांचालों के महारथी अपने सेना समूहों समेत छिन्न भिन्न होकर ऐसे पृथक् होते हैं जैसे कि महावन में क्रोधयुक्त केशरी सिंहको देखकर उिन्नभिन्न होकर मृग पृथक् होते हैं । १० । हे अर्जुन तुम सब उपायों से कर्ण के मारने के योग्यहो तुम्हारे सिवाय दूसरा मनुष्य कर्ण के वाण सहनेकी सामर्थ्य,नहीं रखता है... ११ देवता अमरगंधर्व और बढ़ चैतन्य जीवों समेत तीनोंक के विनय करने को तुम्ही । समुही यह मैं निधय जानता हूं । १२ । भीम उग्ररूप महात्मा त्रिनेत्रं. पारी कपी प्रभु शिवजी के देखने को भी कोई समय नहीं होसक्ता है फिर पद्ध करनेकी किसको सामर्थ्य होसक्तीहै। १३ । तुमने सब जीवमात्रके फल्पारण रूप साक्षात् महादेव की युद्धकेही द्वारा भाराधनाकरी और देवता भी तुमको वरदेनेवाले हैं । १४ । हे महाबाहो अर्जुन उस देवताओं के भी देवता शूलधारी | शिवजीकी कृपास तुंम कर्णको ऐसे मारो जैसे कि इन्द्रने नमुचिको माराधा अर्जुन सदैव तराकल्याण होय तू युद्धमें विजयको पावेगा । १५ । अर्जुनने कहा हे कृष्ण जो जो सब लोकके गुरु और स्वामी आप मेरऊपर प्रसन्न हैं तो निश्च करके मेरी अवश्य विजयद इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है । १६ । हे. महारथी भीकृष्ण king of dIadra, seated on the car, is driving Karan's borses. 7. Hear the dreadful noise coming from conchs and drums and the roart of warriors. Hear the sound of his boy rising above all other noise The Panchal warriors are being routed by his arrots "like dear by the presence of a lion. 10. You must slay Karan by all means. None oxcept you can bear his artOWS. The gods," asurr, gandharvas and all tba movables and immovables of the world can come undor your subjection. Itbeliers that none can look threr-eyed Shir in the face; who çan encountri him? But you worshipped himn through fighting. You Have got binns from other gods too. By the grace of Shiv the god - [६७३७ कर्णपर्व Karan Parav ( 6737) निति यति फाल्गनः। १७॥ अद्य कर्ण हतं पश्य मच्छरः शकली कृतम् । मांधा दस्यसि गोविन्द कर्णन निहितं शरीः ॥ १८ ॥ उपस्थितमिदं घोर युद्ध त्रैलोक्यमो हनम् । यज्जनाः कथयिष्यन्ति यापद्धमिरिष्यति ॥ १९ ॥ एवं अधस्तदा पार्य कृष्ण मक्लिएकारिणम युधयो रचनाशु गज प्रतिगजो तथा ॥ २० ॥ पुनश्वाह महा तेजाः पार्थः कृष्णमरिन्दमम् । चोदयावान हृषीकेशफालोयमतियत्तेते ॥ २१ ॥ एवं मुक्तस्तदा तेन पाण्डवेन महात्मना॥२२॥जयेन सम्पूज्य स पाण्डवंतदा प्रचोदयामास हुयान्मनोजवान् । से पाण्डुएषस्य रथो महाअषः क्षणेन फर्णस्यरयामतोमवत् ॥२३॥ इति कर्णपर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये पड़शातोऽध्यायः ॥ ६॥ जी मेरे रथ और घोड़ों को चलायमान को भष अर्जुन कर्णको विना मारहुये. युद्धसे नहीं लौटेगा! १७, । हे गोविन्दजी भव मेरे वार्कोस कर्ण को मृतक और । सगड २ देखोगे अथवा कर्ण के वाणों से मुझको मृतक और खण्ड २ देखोगे । १८ । यह तीनों लोकों का मोहनेवाला घोरयुद्ध भच वर्तमानहुआ जिसको पृथ्वी जवतक रहेगी. तबतक मनुष्य वर्णनकरेंगे । १९ । तव सुगमकर्मी श्रीकृष्णनी से ऐसा कहताहुआ अर्जुन स्थकी सवारी के द्वारा ऐसी शीघ्रतास सम्मुखगया जैसे कि हाथी हाधीक सम्मुख जाताहै । २० । तेजस्वी अर्जुन फिरभी शत्रुसंहारी श्रीकृष्णजी से बोला कि हे पीकेशनी भाप शीघ्र घोड़ों को तायकरो यह समय क्यतीत हुआ जाताहै । २१. । उप्त महात्मा अर्जुन के इस वचन के कहतेही श्री कृष्णाजी ने उसको विजयका आशीर्वाद देकर चित्त के सपान शीघ्रगामी घोड़ोंको तीक्ष्ण किया चिचके समान शीघ्रगामी यह अर्जुनकारय. क्षणमानमेंही कर्णके रपसे आगे होगया २३ ॥ of gods and bearer of trident you will slay: Karon ng Indra had slain Namuchị. May you be happy, Arjun! You will gain victory./' 15, " I must win," said Arjun," when you, lord of the world, are kind to mo. Pray drive my horses. Arjun will not return without slay. ing Karan. You will now see Karan cut into pieces by my arrows, or you will see me killed by him, 18. A dreadful battle bas come aboub which will be the talk of the world as long as the Earth exists." Having said this, brave Arjun faced Karan as an elephant faces anatber, 20. Glorious Arjun again addressed Shri Krisha, saying, " Drive the horren fast, Hrishikesh. Tinie is Alging fast." At this Buri Krisbn predicted his victory and drove the. borses fast lika the wind, and brought his car woon near that of Karan." 23.
6738) Siglialsharat सम्जय उवाच । पसनं हतं पुष्ट्रश शोकामसमयित: पुत्रशोको वारि नेत्राच्या समाजर ॥१॥ रथेन. प.पस्तेजस्वी बगामाभिमुखो रिपुम युवाशा मपताम्राक्षः समादयः पनजदम् ॥ २॥ तो रयो मर्यसलामो यात्रपरिषारणो। समेनी दहशुस्तम शयिया समागतो घेतायो पुस्पादित्याधास्थितापरिम ईनी । शुभाते मांपासी बन्दादियो यथा विधि ॥ ४ ॥ तो अष्ट्या विस्मय जग्मुः सर्वभूमानि मारिए । त्रैलोक्यपिजये यत्तापिन्द्रयरोधनाविष। ५ ॥ रथज्यात सनिघापणिबरवैरपि ! तौरपापमिधामन्ती समालोक्य मीक्षिताम ॥६. जो घरट्या संयुगे विस्मयः समपचत हस्तिकक्ष्याऽच फर्णस्य पER किरीटिन: to वीरयोः संप्रयुक्ती तुरट्या मारत पापियाः सिंहनादरवांध: मायाम पुग्छलान् ॥ ८॥रममाव हरयं नाभ्यो तर योधाः साशः बिषांनुस्वांधव भन्याय८७॥ संजय बोले कि पसेनको मृतक देखकर शोक संतापसे युक्त कर्ण ने पत्रके शोकसे उत्पन गेनवाले जलको नेत्रों से छोड़ा। फिरकोपसे रक्तने विजयी कर्ण युद्धकै निमिच मर्जुन को बुलाता स्यकी सवारी के पारा शत्रु के सम्मुखगया । २ । सूर्य के समान प्रकाशमान व्याघ्रचर्मते मदइये. वह दोनों और दानाके रथ मिलहुगे ऐसे दिसाइदिये जैस कि भाकाशमें वर्चमान दा मूर्य होय ।।वार सभा के महन करनेवाले दिव्यपुरुप शेत पोदेवाले दोनों महास्या युद्धभूमि में नियत होकर ऐसे शोभायमान हुये जसे कि स्वर्ग में चन्द्रमा और सूर्य शोभादेव । ४ । हे श्रेष्ठ तीनोलोक के विजय करने में उपाय करनेवाले इन्द्र और वैरानी अमरकं समान वनदानोंको देखकर सरसेनाकै मनुष्यों को पा माश्चर्यता हम १५ रप कवच प्रत्यंचा और पाणों के शब्द भार इसी मकार सिंहनादो सपेर । सम्मुख दौड़नेवासे उन राधियों को देखकर। ५ । और मिली ध्वनाओं को भी देखकर रानामों को भाश्चयं उत्पन हुमा गजकी रक्षा बिन वाली कर्णकी धना और हनुमानजी के रूपको धारण करनेवाली अर्जुन की जमा था। ७ । भरतवंशी फिर सब राजाभों ने उन मिलहुये रपियों को देखकर CHAPTER LYSXVII Sanjars said, "Beeing Vrishanea deed, Karea dropper tearnot grief for his son. With eyes red ju anger, glorious Borao challenged Arjun to fight. Bright like the Sun, liged with tiger bide, both the warriors and their wars lookedd glorious like to Sans in the sky. Tho two great warriors, divine beroce, with white horas, standing i: bo beld of battle, looked glurious like the Sun and the ruoon. Seing the two warriors, capablo of cosqarring the three world, like ladra aod Viruclao, to people of the army kere filled with woodes. 5. Tbo wale of care armours, tortringe 104 AITONE wers mixed with कणपर्य Karan Pary (67391 तपा बेलायधूननम् ॥ १॥ मानानुः पुरयता वादिप्राणि समन्ततः । काणं प्रप विध्यता राखान मध पुष्कलान् ॥ १०॥ तथैव पाण्डवाः स हर्षयन्तो धम्ज यम् । तपशवनिनादेन दिशः सर्या धनादयन् ॥ ११ ॥ वेडितास्फोटितोत्कुटैस्तु मुलं सर्वतोमवत् । घाशब्दध शूराणां कर्णार्जुनसमागमे ॥ १५ ॥ तो या पुरुष पाम्रो स्पस्यौ रथिनां धरी । प्रगृहीतमाधापी शरतिध्यज्ञायुभी १३ मिपी बहनिखिशी श्वेताश्पो शखशोभिती । कृष्णशल्यरपोपेती तुल्यरूपी महारयो ॥ १४ ॥ सिंहस्वन्धी दायभुजी रक्काक्षी हेममालिनी ॥ १५ ॥ सिंहस्कन्धमतीकाशी म्यूटी रएको महायलो॥ १६ ॥ भन्योपानी राजमन्योम्यस्य पधेपिणी । अन्यायमभिधा पम्ती गोष्टीयव मईपभो ॥ १७ ॥ प्रभिप्राधिक मातङ्गो मुसंधाविशावली । पाशी सिंहनाद पूर्वक बड़ी प्रशंसाकरीचावहां हजारों शूरवीरोने उनदोनोंक साथ रथ युद्धको देखकर भुजाके शन्द भर्यात् खम्भोंको फटकार कर हुपट्टों को घुमाया । ९ । और कर्णके प्रसन्न करने को कौरप लोगोंने चारोंभोर से वाजों को बनाकर सपने शंखों को बनाया । १० । इसी प्रकार अर्जुन की प्रसन्नताके लिये सब पाएडवों ने तूरी और शख के शब्दों से सव दिशाओं को शब्दायमान किया । ११ । सिंहनाद वालोंकाठोकना शूरोंकापुकारना और शूरोंकी भुजाओंके महाकठोर शब्द अर्जुन और कर्णकी सम्मुखतामें सब भोरकाहये । १२ । हेरामा जन रयपर नियत रथियों में श्रेष्ठ बड़े धनुपधारी बाण शक्ति ध्वनास युक्त ॥१३॥ चमर और व्यजनों से युक्त श्वेत घोंसे शोभित श्रीकृष्ण और शल्पका सारथी स्थनेवाळे एकसे रूप पहारथी। १४ । सिंहके समान स्कन्ध लम्पी भुजा रक्तनेत्र सुवर्ण की मालाओं से भूपित । १५ । सिंहके समान शरीर बड़ेहृदय और पराक्रम वाले । १६ । परस्पर एक दूसरेकामरण चाहनेवाला दोनोंपरस्पर विजयामिलापी गोशाला में उत्तमाली वर्षों के तुल्य परस्पर सम्मुख दौड़नेवाले । १७ । मतवाले Iconine roars. The kings wondered at their standards--that of Kalan with the device of elepbanta's rope and that of Arjun with thu figure of ape on it. Seeing those two warriors face to face, the kinys praised them with Jeonino roars. Thousands of warriors, secing ther engaged in duel, best their arms and furled their sbeets. They beat nusieul instruments and sent forth blasts from their concha to please K ar'un, 10. Similarly, the Pardayas filled the directions with the sounds of concha apd trumpets to please Arjun. Leonine roais, beat of arms and cries of the warriors were heard before Arjun and Karan. Standing un their cars, the two best of archers, with standards, banners, spears, fans and umbrellas, with Sbri Krisbn and Shalya to drive their cars, baving shoulders like those of lions, long nrms, red eyes, gold chaplets, with bodies like lions, large breasis, full of prowess, desirous of saying' .
(674) Wahahbarat - ५ ३६ ४ देपदानषगन्धर्ण; पिशाबोरगराक्षस प्रतिपक्षामहस्य कर्णनगमागमे ॥३७॥ चौरासीव कणतो म्पप्रा सक्षा विशाम्पते भमिशिला पायस्प माता पुत्रस्प वे यया ॥ ३८ ॥ सरिता सागराव गिरपम नरोधम । वृक्षाधीपयले | प्राधयन्त फिगदिनम् ॥ ३९ ॥ ममप यातुधानाध गुणकाम परम्तप । फर्णतःसा पपंत खराब पांसि ॥४. रत्नानि निधय: स घेदाधापानमा सोपदोनिषदः सहस्पा ससंप्रदा ॥४१॥षामकिक्षित्रसेनम तक्षकोयोपतक्षक पवा तथा सर्वे कावेपाभ साम्बया। पिपधन्वा महाषा मागापाचनतोमवर ॥ ४२ ॥ राषता सौरभेपा पेगनेयाय भोगिनः । पतेभषयगतः क्षुदसारख कर्णतः ॥४३॥ हामृगा स्याडमृगा माइलबास मृगदिमाः । पार्थस्य विजये राजर सई एवाभिसंधिवा ४४॥ यसको ममता साध्या कदा विश्वश्विनी तथा मनि परसर में निन्दा स्तुति करने के शास्त्रार्थरूप वादहुये । ३ । पिशाम सर्प और राक्षस दोनों भोर को परस्सर में मनेगये उन सबोंने कर्ण और अर्जुनके पक्षपातों में विचको पहचकिया । १२ । स्वर्ग उसकर्ण की मोरके पक्ष में निपत दुमा आर पृथ्वी माताके समान अर्जुनकी विजय पाइनेवाली हुई।१८। इसीप्रकार पर्वत समुद्र नदोभी ज़लों समेत अर्जुन के पापाती हुये क्ष और आँपपिपायर अर्जुन । केही पाये यह सप परस्पर दोनों ओरों को पुनेगये.हे शधुसंतापी धृतराष्ट्र भार यातुधान भौर गमक इन स्वरूपवानों ने पारों भोर से कर्ण को प्राप्तीकया गर, पक्षी, ४० । रल सब साने, चाविद जिनमें पांचवां इतिहास है उपवेद, उपनिषद इरस्प और संग्रहसमत । ४१ । बामुकी, चित्रसेन, तक, पर्वत, सब कमुके पुष सर्प और विपैले सर्प यहसव बर्जुनकी औरहुये । ४२ | ऐरावतवंशी घरभीषशील वैशाळी भागीनामा सर्प यहसब अर्जुन की भोरइये और नीच सर्प कर्ण की ओर हुये । ५३ । हामृग, पालमृग और मंगली पशुपक्षी यहसब अर्जुनकी विजय में प्रस्तावितहुपे । १४ । भाव मु, म्यारोरुद्र, साध्यगण, परुद्रण, विश्वेदेवा दोनों á Jiscussion about tho merits and demerits of the oro parriors Tho pishaches, serpents and rakshses talkod together. They made the Belves into parties for the sake of Koran and Arjun. Hearen itaelli was on the side of laran, whi's Mother Earth wished for di' victory, Vountaior seas, rivers and lakes, with medicinal berba and trees trera ou tha sido of Arjun Asurg, Patudhaos and Gubyaka wers foş Karad, Birds of the air, jewelo, tbo foar Vedas, with History All the fifth, Upvedas, Upishads, Vesuki, Chitrased, Takahal, moun. Laine, all the song of Badrum poisonous serpente all these sided with Arjun. The aescendanta of Airarat, Surabhi, Vishali, Biogi sod Othor saates word og the side of Arjun. The lower borts anakes were on the side of Haran.. Quadropeds and birds were कर्णपर्व Karan Parv 1548) विश्व सोम पपनाप दिशो दश । धनत्रयस्थ से पक्षे मादिश्याः कर्णतोमवन् ॥४५॥ विश पास मताच ये व सदरजातयः । सशस्त महाराज राधेपमम mar in u देवास्तु पितृभिः सार्च सगणाः 'सपदानुगाः । पमो श्रवणश्रेष परणा पतोर्जुनः । प्रा स यज्ञाध दक्षिणाश्चार्जुनभिवा ।। ४७ ॥ प्रेहायक पिशाबा ऋष्पादा मृगाडजाः । राक्षसाः सह यादोमि: बभृगालाध कर्णतः १४८५ देयनान्नुपर्धान गणाः पापरतोभयन् ! तुम्मुरुपमुखा राजन गन्धर्षात येतो जुनः ॥ १९ ॥ प्राधेयाः सह मौनयगन्धप्सरसा गणेः । हामृगा पाडमृगायाम रातिमः ॥ ५० ॥ उधमामालया मेघवायुना व मनीषिणः विरक्षवः समाजग्मुः कार्जुनसमागमम् ॥ ५१५ देषदानवगन्धर्वा नागयक्षाः पतषिणः । मायो घेषितः पिताध स्वधामुजः ॥ १२॥ तपोनिष्ठालपोषध्यो नानारूपाम्बरमजा अन्तरीक्षे महा राजविनवम्ठायतस्पिर ।। ५३ ॥ प्रक्षा प्रवर्षिभिः साद प्रजापतिमिव ब भियना अश्विनीकुमार अग्नि इन्द्र, चन्द्रमा, दोदिया. वाय यहसब अर्जुनकी भारहुये और बारहमूर्य कर्णकीओरहुये । ४५ । हे महाराज तप वैश्य शूद्र मूत और जोजा कि शंकर मातिबाल । इन सबने कर्णको संवनाकेया । ४३ । पाछे चलनेवाले समूहों समेत पितरों से युक्त देवता यमराज और कुबेर भर्जुनकी भोरहुये ब्राह्मण वत्री य दक्षिणा अर्जुनको भोरहुये । ४७ । प्रेत पिशाच मांसभक्षी राक्षस आदि पशुपती और जल के जीव, शान श्रृगाठ कणकी और ये । ४८ ॥ देनर्पि ब्रह्मर्षि और राजनपियों के समूह पांडवोंकी ओरडुप हे राजा और तम्बुरु भादे गन्धर्वभी धर्जुनकी औरहुये । ४९ । मनुके पुत्र गन्धर्व और अप्सराभों के समूह कर्णकी भोरहुये। ५० । भेड़िये आदि पशु और पाक्षियों के समूह हायी घोड़े स्य और पति इसीमकार मेयापर भाकड पिग कर्ण और अर्जुनके युद्ध के देखनकी इच्छा से भाप । ५१ । देवता दान ग नाग यक्ष गरुड़ आदि और वेदझं मह लोग बधाके भोजन करनेवाले पितर और अनेक प्रकारकप पराक्रमों से युक्त तप विधा आपधी हे महाराज. यह सब शब्दों को करतेहुपे आकाश में नियतहुये १५३ । नर्षि और प्रजापतियों समेतयहाजीपौर विमानपर विराजमान शिवजी Raran. Verus, Rudras, Sedhyary Marutas, Vishwedavas, Ashwinikumarsh Agni, Indra, the moon. the ten directions and Vayu were on the side of Arjan, while the suns were for Karan. 45. The Vaisbgas, the Skudras and the people of mixed descont were for Karans The pitris following the gods, Yam and Kuver were for Arjun. Brabmans, Kshatryas, Sacrifices and Donations were for Arjun, and the Pretas, the Pisbaches, flesh-eating raksbasos, animals :and birde, aquatic animals dogs and jackals were for Karan. Deva. rishis, Brahmrishis and royal sages port on the side of the Pandavas Turvuru and other Gandbaryas Fore lot Arjon, while the sons of " - [6744} Mahabharat (.६७४४) स्थितो यानं दिव्यं ते देशमागमत् ।। ५४ समेतो तो महात्मानौ दृष्ट्वा कर्णधन जयो। अर्जुनो जयतो कर्णमिति शोधीत स्श्यम् । जयतामर्जुनं कर्ण इति मुयोग्य भाषत । ५५ ॥ एत्याजुनं मम सुतः फर्नी जयतु संयुगे । इत्या फर्ण जयत्यय मम पुत्रो धनन्जयः ॥ ५६ । इति सूर्यस्य वासीविवादो घासवस्य धपक्षन:स्थितयो स्तत्र तयोः पुरुषसिंहयोः ॥५७॥ द्वैपक्ष्यमासीहेपानाममुराणान्तथैव च । समेतो तो महात्मानौ हप्टवा कर्णधनञ्जयो । ५८ ॥ अकम्पन्त यो लोकाः सहदेवर्षिचारणाः 1 सवें देघगणाश्चैव 'सर्वभूतानि यानि च यतः पार्थस्ततो. देघा यतः कर्णस्ततोमुखः । रपयूयंपयो पक्षी कुरुपाण्डयधारयो । ६०॥ दृष्ट्या प्रमा पति देवाः घयभुधमचोदयन् । समोस्तु देव विजय एतयोर्नरसिंहपोः ।। ६१ कर्ण | उस दिप देशको आये तपउन भिड़ेहुये महाला कर्ण और अर्जुनका देखकर इन्द्र देवता बोले कि अर्जुन कर्णको मारकर विजयकरो और मूर्य देवताने कहा कि कर्ण अर्जुनको विजयकरो । ५५ । मेरा पुत्र कर्ण युद्धमें अर्जुन को मारकर विजयकरे और इन्दनकहा कि मेरा पुत्र अर्जुन कर्ण को मारकर' विजय करे । ५६ । यहाँ देवताओं में श्रेष्ठ पक्षपातमें युक्त इनदोनों मूर्य और इन्द्रका परस्पर वादहुआ। ५७ । हे भरतवंशी देवता और अकि दो पक्ष हुये भिडेथे उनदोनों महात्मा कर्ण और अर्जुनको देखकर देवता सिद्ध चारण आदिक समेत धानोलोक कंपायमान हुये सब देवताओं के गण और 'जीवमात्र जितनेहैं। ५९ । उनमें देवता अर्जुनकी औरहुये और भमुरकर्णकी भोरहये देवतामों ने कौरव और पापडया के वार महाधियों के दोनों पक्षों को देखकर सयंभू ब्रह्मानी से कहा कि हे ब्रह्माजी महाराज इन कौरव और पाण्डवों के दोनोंपद कचर्चाओंमें किसकी विजय हांगी हे देव इनदोनों नरोचमों की वारम्बार विजय होय हे मभु नमानी कर्ण और अर्जुनके विवाद युद्ध से सब जगत् संदेह युक्तहै इनदोनोंकी विजयको Manu, Gandharvas and apsaras were for Kara 52. Wolves and other animals and birds, cieplants, horses, cars and foot, clouds, the rishis living on air came to see the battle between Karau und Arjun, The gods,,danaras, Gandharvas, nagas, yakshes, garurs, the rishis Acquainted with the Vedas, the pitare, living upon libations, Tap, Knowledge and afedicines were seen talking in the air. 53, Brahm. risbis, Brahma with the Prajapatis, and Shir on his celestial car cama to that holy, region. Beeing Arjun and Karan engaged in byht, Indra said, " May Arjunslay Karan and gain victory.over him." Then Surya said, “Let Karan - gain victory ofor Arjan. My son Karan will şlay Arjun and gain victory.” Indra again suid, “ Alyson Arjun will elay Karan and gain victory. 38. Srya and Indra, the two Luust pf gods, discuss d about the Fictory of the two sides. The gods - Karan Pary (67155 जनपिपादन मा नपरयपिल जगत् ।पयम्मा गहि तद्वाक्यं समोऽस्तु विभये ऽनयो ॥६॥ तदुपरप मघवा प्रणिपत्यं पितामहन । यसापयत देवेशमिदं मतितां घर ॥.६३ ॥ पूर्ण भगयता प्रासंफगयोविजयो भूयः । तत्तथास्तु नमसंस्तु प्रसाद भगधाममा ४ || प्रसंशानाषयो पाक्यमच विदशेश्वरम् । विजयाध पंयास्तु विजयस्य महात्मनः ॥६५॥ पाण्डेय ये तभ तोपितः सन्यसाचिना । स्थगच समनुपात साहाय्यं शमते रुवम् ॥६६॥ फगंध दानवः पक्ष अतः पायः पराजयः एवं फते मपेत् कार्य देवानामेय निधितम ।। ६७ ॥ भारमफायच संग गरयलि शेयर । महारमा फाल्गु नश्चापि सरपधर्मरतः सदा । विजयस्तस्य नियतं जायते मात्र संशयः॥ ६॥ तापितो भगवान् पेन महारमा पृपमध्यजः । फयं पा वस्पन सत्यसस्प हमसे कहिये हेमलानी आप इसीयचन को कहिये जिस में इनदोनों की विनय समानहो । ६२ । इन वचनों को मुनकर पितामहनी को प्रणाम करके पड़े झानी इन्दने देवताओं के ईश्वर ब्रह्माजी को यह जवलाया कि प्रथम आप भगवान नजीकृष्ण और भर्जुनकी पूर्ण विजय वर्णन करी यह जसा मापन कहाहै वैसेही होय मैं भापको नमस्कार करताहूं माप मुझपर प्रसन्न हाजेयं । ६४ । इसके पीछ महाभी भोर शिवजी इन्द्रसे यह वचन बोले कि इस महात्मा' अर्जुनकीही निश्चय विजय होगी । ६५ । जिस अर्जुन ने किसापडव वनमें भाग्निको प्रसन्न किया और हे इन्द्र उसने स्वर्ग में भाकर तेरी सहायताकरी । ६६ । भौर कर्ण दानवों के पक्ष में इस हेतुसे या पराजय होने के योग्यहै ऐसा करने से देवतामों का कार्य निश्चय होताहै । ६७ । हे देवराज सबका निजकार्य पढ़ाई महात्मा अर्जुनभी सदैव सच्चे धर्म में प्राति रखनवालाहै इसी की अवश्य विजयहोगी इसमें किसी मकारका सन्देह नहीं है । ६८ । भौर जिसने भगवान महात्मा शिवजी को प्रसन्न and asurs were divided into two parties. S.eing Karan and Arjun there, tlı gods, eidbos and charaba of the three worlds shook. Out of all the living beings of the world, the gods were on the side of of Arjun, while the asure were for Karan. Secing the warriors of the Pandavas and the Kauravas, the gods said to Brahms, "Shal) the Kauravas win or the Pandavas ? All tba world is in a state of muspor su about the encountor of Karan and Arjun, Lot 118 kpop the exact result of their fighting. Let their victory be equal." Qn hear. ing this, wiso lodra prostrated before the grandfather and said, “You baro already predicted the completo victory of Krisbn and Arjun. Iot it be as you latesaid, I how to you. May you tepleased. Then Bialma anu Shivraid to Indir, " Arjtit's ticterjisture. G5. He gratified Agut in the Klauday forest and helped you in heared. Karan bas friendslip with tho Djuaras and is therefore worthy of defeat [6746) Mahalıharat (१७४६) जयो जायते शालोम ॥ ६९ ॥ यस्य चक्र स्वय विष्णः सारथ्य जगतः प्रभः । मनस्वी वलपान शरः कृतालश्च तपोधनः । । ७० ॥ विमा व महावेजा धनुर्वेदमरो' पतः । पार्थः सर्वगुणोपेतो देवकार्यमिदं यतः॥ १ ॥अतिक्रमेच माहास्मानियम प्यस्य पर्षयम् । अतिक्रान्ते लोकानाममाषो नियतं मरेत् ॥ ७२ ॥ न वियते व्यष स्थान कुवया उष्णयो पवित् । मटारो यसततो सम्म पुरुषर्षकी.. ७३ ॥ मरमा रायणापतो पुराणापूपिसावमा । भनियम्यो नियातायभीती स्म परन्तपी. ॥ नैतयोस्तु समः कशिविचि या मानुषेष पा । अनुगम्य त्रयो लोका:सर देवर्षिधारणे "७५ ॥ सर्ने देषगणाचापि सर्वभूतानि पानि च । अनयोस्तु प्रमाण पत्ते निखिल जंगत् ॥ ७६ ॥ो लोकानयं मुख्यान प्राप्नातु पुरुषर्षभः । वमनात सलोकर किया है इन्द्र उसकी विनय कैसे न होगी अर्थात् अवश्य होगी। ६९ .। जगद के प्रभु विष्णु भगवान ने जिसकी आप रयवांनी करी और जो साहसी पराक्रमी असा तपोधन । ७० । बड़ा तेजस्वी. सब गुणों से युक्त अर्जुन सम्पूर्ण धनुर्वेद को धारण करताहै इसीसे यह देवताओंका कामहोगा। पारस्व सदैवसे. पनवास आदि से दुखिपाते हैं तपसे युक्त वह पोय पुरुष मर्जुन अपनी प्रतिष्ठा से 'वांछित मनोरयों की अमर्यादाओं को उल्लघन करे उसके, उल्लंघन करने पर गेकोंका अवश्य नाश होभाय । ७२ । क्रोधयुक्त जीकृष्ण और अर्जुनकी पराजय कहीं नहीं वर्तमानी यह दोनों पुरुषोत्तम सदैव से संसार के स्वामी हैं अर्थात् इन दोनों परमात्मा और आत्माक जसेसिब जगत् प्रकट होता । पह.दोनों नरनारायण पुराण पुरुष ऋषिपों में श्रेष्ठ अमेय सबके ऊपर मुख्य हैं इसी ईद से यह दोनों शत्रुओं के संतप्त करनेवाले हैं। ४ । स्वर्गमत्य पाताल इन तीनोलोकों में इन दोनोंके समान कोई नहीं हैं। ०५ । सब देवगण और जीवोंकेगण जितने (इनसब समेत सब संसार इनदोनों से मिलकर उन्हीं के प्रभावसे प्रकट होता है | The cause of the gods is sure to be promoted by so donng.. One's own cause is the best of causes. Arjun is lover of dharza and therefore be is sure of victory. How shall ha not wig who pleased Shiva ; He is driven by Vishau, the lord of the world himself; and who courageous, full of protess, clever in the use of arme, glorious, virtuous and best of Archers, will do the work of gods. The Pandavas have suffered much in exile. The great ascetic Arjao by his greatness tringresses tbo. bounds and destroys the world. Shri Krishn and Arjun, when enraged, cannot suffer defsat. They are eternal lords and creators of the world. 73. Both these ancient ribis, Nar and Narayan are inx.ncible by all and are destroyers of fore,. They haro no qual among the residents of beafea, earth and aether regions. All the gods and other living beings unive in them and aro . whose jg car - 1.६७४७) कर्णपय Karan Paray ममतावा समाप्नुयात् ॥ ७ ॥ सहितो द्रोणमीमायो नालोके महीयतामागे तशी विजयस्वस्तु कृrrius८ ॥ इत्युको देवदेवायो सहमाझीवी मामन्य सर्वभूतानि प्रशामानुशासनम || ७. भुतं भनियत प्रोक्त भग भ्या जगक्षितम् तत्तथा नाम्यथा समितिभ्यं गतमम् ॥ ८० ॥ इति शुरन्द्र सर्वभूतानि मारिष। विस्मितान्याजम पूजपाशिष तम् ॥ ८ ॥ पज मगन्धोनि नानारूपाणि खासदा। पुष्पाणि पियुपा देवतापयवाद पर ८२ ॥ दिक्षपचाप्रतिम हरयं नरसिंहयोः। देवदानवाधिर्याः सर्प पचायत स्पिरे।। ८ स्यौ तयोः खेतहया युककेतू महाजनी । यो तो कर्णार्जुनो गजन मह पश्यतिष्ठवाम ।। ८४ । समागता नोकबीराः शलान् दध्मुः पृथक प्रथा । वामदे पार्जनी बीरी शल्पकर्ण व मारत ।। ८५ ॥ तद्भीरत्रामनकर यूवं समभवत्तदा । यह पुरुषोतम कण, उत्तम लोकों को पावे कर्ण वानों की सालोक्यता को और मस्द्रयों के स्थानों को पावे । ७७ । और द्रोण वा भीष्मपितामह के साथ स्वर्गलोक को पार कर्णशूरवीर है परन्तु विजयहिष्ण और अर्जुनकीहोगी । ८० देवदामोंक देवता ब्रह्माजी और शिवनी के इस पचनको नकर इन्दने सवनीवमात्रों को समझाकर ब्रह्माजी पौर शिवमीके भावारूप इसवचनकोकहा। ७१ किो सब जीयमानो भापसष लोगों ने मनाजो जगक हितकारी भगवान माजी और शिवजओने कहाई यह वैसा होगा इसमें अन्यथा कभी न होगा तुम निस्संदेहरहो १८० । श्रेष्ठ रामा धृतराष्ट्र सपनीय इन्द्र के इसाचनको पुनकर आश्चर्पयुक्तहुये इन्द्रका पूजन किया और देवताओं ने प्रसम चिच होकर सुगन्धित पुष्पों की वर्षाकरी और नानारूपके देवताओं के वानों को बनाया. । ८२ । इन दोनों नरोधमों को भनूपम द्वैस्य युद्धके देखने की इच्छा से देवता दानष और गन्धर्व संव नियत । ८३ । उन दोनों महात्माओं के वह दोनों दिध्य घोड़ों से युक्त ये जिनपर पह दोनों महात्मा सवार थे। ८४ । सम्मुख आये हुये लोकों के वारोंने अपने शेखोंको पृथक २ बनाया है भरतवंशी फिर षादवजी अर्जुन कर्ण भार शल्पने भी शेखों को बनाया ८५ व परस्पर इप करनेवाले दोनों बीरों created by their greatness: Lot Karao enter the regions of Parus and Maruttas and go to heapon along with Bhishnu and Drops, for baja a brate man, though the victory Bball lip with Krishn and Arjun. Hearing the words of Brahma, the god of gods, and Shiv. Indra announced the order to all beings, saying, ".You have heard what Brabina and shir said snd itshall nob be otherwise.80 All the beings were amazed as they beard Indra's announcement. They Horshipped Indra. The gods wore pleased and showered flowers over him and beat the divine musical instruments. The gods, Donayas and gandharvas stood there to witness the baltlo of the two great (6748) Jlaliabbarat ( ६७६८) अन्यान्यस्पचिनोरनं शनशम्परयोगिय ॥ ८॥ तयो जो चीतमला शुशुमाते रथे स्थिती । राहुकेतु पथालाश उदिती जगता- क्षये ॥ ८१ ॥ कणस्थाशविनिभा रल सारमयों रहा। पुरन्दरधनु प्ररया हस्तिकक्षा व्यराजत ॥ ८८ ॥ काश्रेिष्ठस्तु पार्यस्य व्यादितास्या भयङ्कारः भाषयन्नेय देष्टाभिर्दुनिरीक्षो रविषश ॥ ८९ ॥ युद्धाभिला पुको भूत्वा धजो गाण्डीवचन्दनः । फर्णयामुगतिष्ठत स्वस्थानागान कपि। ९०॥ उत्पत्य-तु महायंगः फक्षामध्यरातकपिः। खैध दशनश्चय गरुडः पन्नगं यथा ॥९॥ सफिकणीकाभरणा काबपाशोपमायसी. अभ्यद्रवत् सुसंकुधा नागकक्षाथ ते कपिम् । ९२ ॥ तयोरसमे युसे रथ छूत आहिते प्रकुर्वात धजो युद्ध प्रत्यासिन का युद्ध भयानकों का भी भयंकारी ऐसा कठिन हुन्मा जैसे कि इन्द्र और शंवर | दैत्यका पुद्ध हुमाया । ८६ । उन दोनोंकी निर्मल ध्वना स्थपर नियत होकर एसी शोभायमान हुई जैसे कि संसारकी प्रलय होने के समय में आकाश में उदय होने वाळे राहु और केतु होते हैं। ८७॥ विषवाले सर्पकी समान रनतारं मे जाटत बड़ी दृढ़ इन्द्रधनुप के समान हाथीकी कक्षा के चिह्नवाली कर्ण की सजा शोभा.देरही थी और खुले मुखवाले यमराज के समान विकराळ'दंष्ट्रावाले हनुमानजी से शोभित अर्जुनकी ध्वजा ऐसी भयकारी देखने में आता था जैसे कि मूर्य अपनी किरणों से दुख देखनेके योग्य होता है ।०२। गांडीव धनुपधारी की ध्वना में से युद्धाभिलापी हनुमान जी अपने स्थान से उछलकर कर्णकी ध्वनापर नियतहुये । १० । बड़ेवेगवान हनुमानजीने उछलकर कर्णके ध्वजाकी नागकक्षाको | अपने दाँत और नखोसे ऐसे घायल किया जैसे कि सर्प को नरूद करता है । ९१ | इसके पीछ क्षुद्रघंटिका भौर भूपण रखनेवाली कालपाश के समान अत्यन्त क्रोध रूप वह नागकी कक्षा- हनुमान जी की ओर दौड़ी।९। व उन दोनों का warriors. Both the care of thoso great warriors were drawn by white horses. They soundod their conchs separately. Vasudev, Arjun Karan and Sbalya sent forth blasts from their corclis. The battle between those two great warriors' was dreadful like that between Indra and Samvar. The standards on their cars looked gand like Rahu and Ketu at the time of pralaya. Karan's stundarad bore to desíce of an elephant's mpo, sendưed with jowele, like a renomous serpent. Arjun's standard, with Hanuman. having dreadful fangs like Yamraj scorched the lookeri-on like the rays of the Sun. The apo on the standard of Arjua left his place and perched on that of Karun. 90. Hanuman jumped up with great furco and with his teeth and nails mutilated the elepbant's rope on the standard of Kamu 23 a garur dous a serpent. The rope, adorned with bells and ornaments rushod in rage at tto ape.. When the standards of the trio warrwrs . 5749) (६७४) कर्णपर्व Karan Pary हपान हयाः ॥ ९३ ॥ मषिभ्यत् पुण्डरीकाक्षः शल्पं नयनसायकैः । चापि पुण्डरी काम शल्य नयनसायफैः । सचापि पुण्डरीकाक्षं तथैधाभिसमक्षत ॥ ९४ ॥ ताज यवासुदेषः शल्यं नयनसायकैः । कर्णशाप्यजयन्दुष्ट्वा कुन्तीपुत्रोधनञ्जयः॥ १५ ॥ मयाब्रवीत् मतपुषः शल्यमामाप्य सम्मितम् । यदि पार्यों रणे हन्यादय मामिह कर्दिचित् ॥ ९६॥ किमुत्तरं तदा ते स्यात् सौ.सत्यं प्रवाहि मे।।९७॥ शल्य उवाच । पदि कर्ण रणे हन्पादद्य स्वां घेतषाहनः। उभाषेकरपेनाई हन्यां माधवफागुनौ९८॥ सजय उवाच । एवमेव त गोविन्दमगुनः प्रत्यमापतः। प्रहस्यावधीत कृष्ण पौर्य परमिद पधः ॥ ९९ ॥ प्रतेहिधाकरः स्थानात् दायेतानेकधा क्षिीतः । शैत्यमग्निरि पापम्न त्वां कों हम्पायनञ्जय ॥ १० ॥ पदि त्वषं कषिव स्यात् लोकपासनं मत्पन्त घोररूप द्वैरथ युद्ध होनपर उन दोनों ध्वजाओं के युद्ध करनेपर परस्पर पो..करनेवाले घोड़े घोड़ो से भिड़े । ९३ । और, कमललोचन भीकृष्णजी ने नेत्ररूप वाणों से शल्प को छेदा इसी प्रकार शल्यने भी भीकृष्ण जी को देखा । ९४ । वहां वासुदेवजी ने नेत्ररूपी पापों से शल्प को विजय किया और कुंती के पुत्र अर्जुनने भी कर्ण को देखकर विजय किया । ९५ । इस के पीछे मूतपुत्र कर्ण ने अल्प से समक्ष होकर मन्दमुसकान समेत यह वचनकहा कि अब युद्ध में किसी समयपर जो कदाचित अर्जुन मुझ को मारडाले तब हे शल्य तुम क्या करोगे यह सत्य सत्प हमसे कहो ।९७ । शल्पने कहा कि जो श्वेतघोड़े वाला भर्जुन तुझको युद्धमें मारडालेगा तो मैं एकही रथके द्वारा उनदोनों श्रीकृष्ण और अर्जुन को मारूंगा । ९८ । संजय बोले कि इसी प्रकार अर्जुन ने गोविन्दनी से कहा तब श्रीकृष्णजी ने भी हँसकर उस मर्जुन से यह सत्य २ वचनकहा ।१ कि हे अर्जुन चाहै सूर्य अपने स्थान से गिरपड़े और समुद्र भी मूख नाय और भग्नि शीतलताको पावे परन्तु कर्ण तुझको नहीं पारसक्ता है ।१००। जो यह किसी प्रकार से होजाय और इन लोगोंका निवास होपतो मैं कर्ण और. शल्यको युद्धमें अपनी भुजाओं से ही मारडालूंगा । १०१। श्रीकृष्ण जी के इसवचनको सुनकर were thus engaged in Combat, thore borses joined in battle with loud neighing. Lotus-eyed Shri Krishn piercod Sbalya with the arrows of eyes and Shalya gazed at Krislın. Vasudev conquered Shalya with his eyes and Arjun tw, vanquished Shalya with his glances, Then Karan said to Shalya with a smile, "\Vhat will you do, it :I'aig elain by Arjun Tell ine truly:" Shalya said, "If Arjun the possassor of whita horses kills you, I shall singly slay both Arjun and Krishn.' Sanjaya says that in the same manner Arjun put the same question to Govind and the latter said to him with a smile, "Karan can not slay you, though the Suo fall dosen from his place, the ocean become dry and fire become coal. 100. However, it such a calanıty happens - 16750) Msliabharat वया कर्ण तया सल्यं बाहुभ्यामेय संयुगे ॥ १०१ ॥ पति कृष्णवचः भत्ता प्रह सद पिकेतनः । अर्जुनः प्रत्युवाचेद कृष्णमक्लिएफारिणम् । १०२ में ममेष ताप परयांप्ती माल्यकी जनाईन । सपनायज कर्ग सशल्यरथवाजिनम् १०३ सय पचव समातिचरकामुकम् । टास्ध रणे कृष्ण शरमिकममनेकधा ॥ १०॥ अप्रैन बर साव सक्रिकवचायुधमा संहितामधारण्ये पादपं दन्तिना यथा ॥१५अपराधेयमार्याणां वैधव्यं समुपस्थितः । ध्रुषं स्वप्नेशानिहानि तामियानि माधय । १०६॥ पमपर इप्टासि विधयाः फर्णयोरितः । न शाम्यते हि मे मम्युर्पद नेन कृत पुरा २०७० फष्णां सभागता या मुढेनादीर्घदर्शिना ! अस्मास्तदोपहस ताक्षिपता च पुनः पुनः ॥ १०८ !! गद्य द्रष्टासि गोविन्द फणमुमति मया । पारणे नव मन पुष्पितं जगतीयहम् ॥ १०९ ॥ बव ता मधुरा बाधा भोतास मधुमपन। ाँसते हुये कपिध्वज अर्जुन ने उन मुगमकर्मी श्रीकृष्णजी को यह उत्तरदिया कि । १०२॥ई जनाईनभी जव भापकी मेरे ऊपर ऐसी छपा है तो कर्ण और शल्प मुझको युदमें विगय करने को असमर्थ हैं हे श्रीकृष्ण भी अब युद्धमें मेरे हाय के कामों से पताका ध्वजा शल्प रख यो २ करव शक्ति वाम मोर धनुष सहित यहुत प्रकार से घायल हुये कर्णको देखोगे ।१०४ । अवहीं स्य घोड़े शाक्त कवच और शास्त्रों समेत ऐसे अच्छोरीति से चूर्ण होगा जैसे कि वन में साधा से वृक्षों का चूर्ण होता है । १०५ । भव कर्ण की त्रियों को वैधव्यता प्राप्त हुआहे माधवजी निथप करके उन सियों ने सोतेहुये अशुभ स्वा.को देखाहोगा। १०६। अभी आपकर्णकी सियोंको विधवा देखेंगे क्योंकि मेरा क्रोध शान्त नहींहोताहै जो इस प्रकार से हमको हँसकर और यारम्पार हमारी निन्दा कर के इस अमाना अदीपदी ने पूर्व समय में सभा में पर्तमान द्रौपदी को देखकर कर्म कियाथा । १०८॥ हे गोविन्दजी अब मेरे हाथ मथन किये घुये कर्णको ऐसे देखोगे जैसे कि मतवाल दाधीसे मना किया हुआ पुष्पित सा होता हेमधुसूदनजी भत्रकर्ण के पछा उनपर उनमधुर वचनोंकोआप मुनेंगे कि हेधीकष्णनी भापमारब्धसे विजयकरनेही I shall slay both Shalya and Karan with my owa armia." Having heard the tyords of Krisha, Arjun said, "Karan and Bhalya connot, conquer me when you are kind to mo. You will seo Karan and his atandard, car, borses, umbrella, armour, spear, arrows and bow, hit by my arrows His car, borscs, spoar, Armours and body, will be be crushed like plants under the fest of dephants. 105. Karan's wiros shall be widows; surely they must havo drcamed evil dreams. You will see his wirea widowed. My anger docs not subside, because he laaghod 40 us and was the cause of the wrongs done to Draupadi. You will see limrad crushed by to ns .& 'flowering plant is crusbod by an elepbant. You will hear the pleasant nows of the defeat of (१७५१) पर्व Karan Parav (6751) दिष्ट्या जयसि पाणेय इति करें निपातिते ।। ११० ॥ भीममन्युजननीमनुणः साबविण्यासाकुन्ती पितृप्पसारव्य संग्रहम्टो जनार्दन ।। ११९ । म वास्पमुखी कृष्णा सारयपिंप्यास माधव । धाग्मियामृतकल्पामियमराज युधिष्ठिरम ॥ १२ ॥ इति कणि कर्णाजुन ट्रैर सप्ताशीतोध्यायः ८७ ॥ सजय उवाच । तदेवनागामरसिद्धयक्षगन्धवरक्षोप्सरसाइच संधैः । ब्रह्मर्षिा बिसुपणंजुएं भी विहिस्मयनीयरूपम् ॥ १॥ नानधनाने निनदैमासादिगतस्तु तिहासनस्यः । सर्वम्तरीक्ष दाशुमनुष्याः खस्पांव मान्षियरमनीयापान २ : प्रहा: कुस्पा पोधा पादिवशस्यनसिंहनादैः । निनादयन्तो वसुधा विराध स्वनेन ११.हेजनाईनजी अवमा अत्यन्त मसन्नहोकर अभिमन्युकीमाताकों और अपनी फूफी कुन्तीको विश्वास युक्तकरागे ।१.११ । हे माधव जी भवतुम अमृत के समान वधनासे अश्रुभौस प्रित मुखपाली द्रौपदांको और धर्मराज युधिष्ठिरको विश्वास युक्त करके शान्तकरोग ११२ ॥ अध्याय ॥८॥ संजयबोले कि आकाश देवता नाग असुर, सिद्ध,यक्ष राक्षस,गन्ध और भास रामोंके समूहसि और रामपि ब्रह्ममृषि और गाड़से सेविकहोकर अपूर्वशोभित हुमा ।।। भौर सव मनुष्य भर पतियोंने नाना प्रकार के वाजे गान प्रशंसा नृत्य हास और भनक चिचरोचक शब्दोस अन्तरित को भपूर्वरूपका शब्दायमान देखा ।.२ । तदनन्तर बाजेशंख और सिंहनादोंके शब्दोंसे पृथी भोर दिशामों को शन्दायमानकरते अत्यन्त मसन्नचित्त कौरवी और पाण्डवी सेना के शूरवारों Karat. People will say that Karan bas boon defeated by your fovour, You will be able to console Abbimanyu's mother and your aunt. You will also be able to console Yudhishthir and weeping Draupadi CHAPTER LXXXIII Sanjaya said, " The gods, agar, asara sidhas, yakabes, rakshassis gandharyas sad apsaras, with rogal sages and Brahmrishis beautified the sky. They filled tha air with the sounds of music, praises, laughter And others pleasing to the ear. The Panday and Kauray warriors, . [2} Alahabharat सद्विषतो निजानुः ३ ॥ नराश्षमातङ्गरयायुधाकुलं गदासिशत्पष्टिमिगोतः साम् । अमीरुजुष्टं इततेरसंकुलं रणाजिर लोहितमाघमौ वा बभूष युद्धं कुरुर्ण स्थान या मराणाममुरः सहामवत् ॥ ४ ॥ तथा प्रवृत्तेखमृता, पराम धनजर स्याधिरच सायकैः। दिश सैन्याच शितरजिह्मगः परस्पर प्राणुता सुदंशिती ॥ ५ ॥ ततस्त्वदीयाध परेच सायकैः कृतेन्धकारे विधिदुने किम्सना भयातु तापक रयो समाभयंस्लमोनुदी प्रपता इवांसपः॥६॥ ततोलमत्रेण परस्परस्य तो विध्य पाताविष पूर्वपधिमौ । धना धकार वितते तमोनुदो यघोदितौ तददतीय रेषतः ॥७॥ न धाभिसरन्यमिति प्रोदिताः परे त्वदीपाश तदायतस्थिरे । महारथी तो परि पार्य समयमुराः शम्बरबाबमाधि ॥ ८ ॥ मृदा मेरोपणयानकस्वननिमादिवी ने मन्त्र शत्रुओंको मारा । ३ । सब युदभूमि मनुष्य घोड़ेहाथी और रथोसे व्याप्त माय खड्ग शक्ति और दुधारे खड्गोंक प्रहारोसे महामसम और निभय शूरवारों से सेवित वा मृतक योदामों से परित होकर रकवर्ण को धारण किप अत्यन्त शोमायमान इसरीति से कौरव और पाण्डवोंका ऐसा युद्धहुआ जैसे कि भारों का और देवताओं का हुआया । ४ । इसमकार महा भपकारी घोर युद्धके जारी होनेपर अर्जुन और कर्णके महातीक्ष्ण सीप चलनेवाले अच्छे भलंकृत उत्तम | शापकों से दिशाभों समेत सम्पूर्ण सेना ढकगई। ५। तदनन्तर अंधकार होजाने पर आपके और पाण्डवोंके युदकर्ताओं ने कुभी नहीं देखा रधियों में श्रेष्ठ वह दोनों कर्ण और अर्जुन भयो दुःखी होकर सम्मुखहये फिर सवभोरसे अपूर्व युदामा । ६ अर्थात् पूर्वीप पश्चिमीप घायुके समान परस्पर में शस्त्रोंसे को हटाकर ऐसे शोभायमान हुपे जैसेकि वादलोंसे अंधकार होनानपर उदय होनेगाने 'मूर्य और चन्द्रमा इटना नहीं चाहते । ७ । इस नियम से प्रेरित आपके मोर | पाण्डवों के शूरवीर लोग सम्मुख नियतहुये वह दोनों मारथी नरोत्तम सवार with the sounds of music and leoninc roars, slow their enemies. The field of battle, full of men, horses, elepbantand cars was made red by arrows, swords, spears and double edged swords of the warriors The battle botween the Kauravas and Pandavas was like that of gods and aburs. The field of battle was spread over with the sharp and straight-going arrots of Karan and Arjun. 5. Then the darknes was intensa and both sides were unable to see any thing. Both the Warriors fought with wonderful skill. Like the East and West winds they repelled the weapore and loaded glorious like the Sua and the main coming out from the clouds The Káuray and Pandar warriors foughthuril. The soundeoidnim.and trumpata mixed with their lendine niarn were liko those of gouds and sun in the war of Indra and Sum var. loring their bora in circles, the glorious karriors shot thousands of .
(६७५३). कप Karan Pary (6753) भारत शृङ्कनिस्वनः । ती सिंहनाद नतुनरोसमी शशाङ्कमयांविष मेधसप्लये ॥ ९॥ महाधनुमण्डलमायगामी सबञ्चंसी वाणसहनश्मिनी । विद्यक्षमाशी सचरावर अगत् युगान्तमर्याषिध दुसहो रणे ॥ १० ॥ उभाजपारितास्तकावुभावुझी जिघांम कतिनी परस्परम । महाहवे वारतरी समीयतुर्महेन्द्रजम्माविष कर्णपाण्डको ॥ १९ ॥ ततो महामाणि महापदरी धिमुसमानाविशुभिर्भयानमः । नगषनाग ममितानिजम्नतुः परस्परम्चापि महारथी नए ॥ १२ • ततो विसमा पुनर्दिता करा नरोत्तमाभ्यां कुरुपाण्डवाशयाः । सनापस्यश्यरथा विशो दशस्तया यथा सिंहहता मनोकसः:१३ ॥ ततस्तु, दुधनमोजसोषला रुपम शारतमननासह महा स्थाः पच पनपाच्युता शरैः शरीगन्तकारतारयन् ॥ 1 ॥ धपि गमिषु से घेरकर मृदंग भेरी पणव और मानकनाम थानों के और सिंहनादों के शन्दोंक मारा ऐसे शब्दवालहुपे जसे कि देवता अधर संवर और इन्द्रहुयेथे । यह दोनों पुरुषोचम व धनुष मण्डल में वर्तमान बड़े तेजस्वी वाणरूप हजारों किरणों के रखनेवाले होकर पेसे दुस्सह हुये जैसे युगके अंतमें से चन्द्रमा और सूर्य होते हैं । १० । पदोनों मायकारक सूर्य के समान पुदमें कठिनता पूर्वक सहने के योग्य जर पैतन्यों समेत संसारन के छापान मा अप शनुभो का नाश करनेवाले पासर मारनेके भमिलापी कर्ण और अर्जुन निभपता पूर्वक उप्त यो पुदर्भ ऐसे सम्मुसहप जैसे कि महाइन्द्र और जंभ सम्मुखंहुगेपे ।।।। उसकेपछे बड़े धनुषधारी भपके उत्पन्न करने वाशों के दाग पड़े अस्रोंको छोड़तेहुये दोनों महारथियों ने बहुत मे मनुष्य पांडे और हाधियों समेत पास्पर में एकने दूसरे को पायल किया हे राजन इसकेपछि उनदोनों नरोचमों से पीडामाग कौरवीय और पांडवीय मनुष्य हाथी पाते घोड़े और रथोंसेयुक्त ऐसे दशोंदिश भी में भागे जैसे कि सिंहसे घायलये बनवासी जाँच भागते हैं। १३ । इसकेपी दुर्योधन, कसपर्मा, शकुनि, कपाचार्य और शारवतका पुत्र इनपांचों महाधियों ने शरीर के छेदनेवाले बाणों से अर्जुन भार श्रीकृष्णजी को पीड़ितकिया । १४॥ arrors like ths rays of the Bun. 10. Like the Sun of pralaya, desirous of burning all the movables and immovables, the two destroyers of foes encountered like Jambh and India. Then the two great archers, diacharging dreadful arcons, wounded each other. with tho help of their men, horses and elepbants. Wounded by their urrows, the Kaurap and Pandap armies, consisting of elephants, foot, horse and cars, ran in all directions like animala afraid of a lion. Then Duryo dhan, Kritrarma, Bhakuni, Kripacharya and the son of Shardwat Founded Arjun und Krirla with their x) arpai?ows. Arjun'cut down their bous, quiverr, bsoners, borses, cars and drivers, and piorced .
6754) Jahabhaias (१७५४) मान् हयान् गहायान समूतच घनज्ञयः शरैः । सम प्रविच्छेदपभिमान सम्छरोतमेदिभिश्व मनजम् ॥ १५ ॥ अशा पधावस्यानि शतं रया शतं गया इन्चाईनमाततापिनः । शफास्तुणारा यानाइच सादिनः सहैव काम्बोजवनिज सपः ॥ १६ ॥ धगयुधान् पाणिगतः शरैः सह क्षतिस्परितः शिरसि । इयां मागास राव युध्यतो धनम्जग: राभुगतान क्षिती क्षिणात् ॥ १७ ॥ ततोत रोक्षे सुरनिस्यता ससाधुयादा हृषितः समीरिता: न पेनरप्युतमपुष्पवृष्टप सुगन्धिगन्यापधरिताः शिवततं देवमनुष्यसायिकंसमोश्यभूतानि विसि सिमपुप तधारमा मतसुतश्च न म्ययां न विस्मय जम्मतरक निश्चयो । १९ अपानवाहोणमुतस्तपारमजं करं करेण प्रविपीय सान्त्ययन् ॥ २०॥ प्रसीद सुयोधन नय भजनने उनके पप, तूगीर. ध्वजा, पाई, रथ और सारथियों, सतेत चारों आरसे इन शत्रुओं को मधनकरके शीघ्रही उसम बारहमाणों से कर्णको घायल किया। १५ १.इसके पीछे शीघ्रता करनेवाले मारने के अभिलाषी लोग सम्मुख दौड़े और अर्जुनके मारने के उत्सुक सौ रथ सो हार्थी भौर अश्य सबार शक, नुषार, पवन, कांबोजदेशियों समेत इन सवों ने हाथों में पुरम लेकर सब शखों को काटकर शिरोंको भी काटा उसमय वहां अनेक शिर पृापर गिरपड़े तब उस युद्ध करनेवाले अर्जुन ने घोई हाथी और रथों समेस उन शत्रुओं के समूहोंको काटा । १७ । इसके पाछे भन्तरिक्ष में दवाभों ने इन दोनोंकी की समेत | वानों से स्तुति करी और आकाशसे सुगन्धित पुष्पोंकी वर्षा होनेसी । १८.! तब उम आश्चर्य को देखकर दवता और मनुष्यों के समक्षमे सब जीवमात्र अचम्भासा करनेलगे फिर उत्तम निश्चय रखनेवाले भापके पुत्र मार कर्णने न पाड़ाकरीन आश्चर्य को पापा ११९। इसके पछि मधुरभापी अश्वत्थामाजी हायात हाथ को मसकर भापके पुत्रसे बोले । २० । हे दुर्योधन अब तू मसबाकर पांडवों से सन्धिकर लड़नात्यागो भार युद्धको धिक्कार के बड़े अखा माजी के Karen with twelrs arrows 15. Thon desirous ok slaying arjun; hundreds of elephants, care, horsemen of shak, Tushar and Camboj attacked himo; but he cut off their weapons and heads with bis arrow Heads Wero seen lying here and there to earth. Lle blew the enemies and destroyed their bolsas, elephants and cars in large numbers, The gods in bearon expressed the praises of the two great warriors with the beat of their musical instruments, agd showered scented flowera over them. The gods and den werd amazed at the sigat of their wonderful prowess. But Karan and Arjun slood resolutely. Rube bing bis hands. Aaliwathana said to Daryodaanid arcot korda, "Cendo fighting with the Pandavas. Fie on this war ia which the gret Preceptor, liko Brahma himself, and Warriors like Bhisho laro been कर्णपर्व katin Paray (1755) शाम्य पावरल विधिन धियस्तु धिप्रामा हतो गुरुनाममो महातपितमधेष भीष्मप्रमुखा मरणमाः ।।२१। मह म्ययायां मम वापि मातुल: प्रसाध राज्य सह पापहवनिरम । धनजयः शाम्यति पारितो गया जनाईनो नैव विगंधमिच्छति ॥ २२॥ युधिधिरो भूनहित समारतो पुकादशगस्तथा पमा । श्या तु पात्र कृते पिदे प्रजा:शिय मानु युरिया ना ॥ २३ ॥ प्रमन्त शाम पार्थिषा निवृत्तवेरास्त मषन्तु सनकाः निचंद्वचः श्रोप्यास में नगाधिप धुध प्रतता से हतोऽरिभियुधि ॥ २४ ॥ ३६च हई जगता साह क्या कृतं य देकन फिराटालना। पमान कुख्याल मिश चाम्सको मच प्रधेता भगवान यक्षराट ॥ २५ ॥ मताधि भूयाध गुणेनजयो म चातिपतिष्यति में पचोऽखिलम तिवानुपाठच मदा करिष्यति प्रसीद राजन जगतः शिवाय ये ॥ २६ ॥ ममापि मानः परमः सदा विधि समान गुरुजी और वैसही भीष्म सरखेि प्रतापी वार मारेगगे । २१ । में और मेरामामों चिरंजीबी पायरयासमातुम बहुत काल तक राज्यकरो मुझसेनिषेध किया हुमा अर्जुन सन्धिको करना मार श्रीकृष्णानाभी शत्रुताको नहीं चाहतेहैं ।२२। युधिष्ठिर सदैव जीवधारियों के पनोरथ में प्रवृत्त है और इसी प्रकार भीमसेन समेत नकुल और सहदेव भी मेरे स्वाधीन है तेरी इच्छा से पाण्डवों से भार तुमसे सन्धि होनेपर प्रमालोगों का कल्याण होगा और मुखको पायेंगे बाकी पहुये पावलांग अपने २ पुरोंको जायँ और सेनाके मनुष्य भी शुद्ध करना छोड़े हे रामन् जो मेरेषचनको नहीं मुनोगे तो निश्चय जानोंकि अवश्य तुम शत्रुओं से पायल और पीड़ित होकर दुखोंको पाचोगे । २४ । तेरेसाथ सब जगत् ने देखा जा सकेले अर्जुन ने किया ऐमा कर्म न यमराज न इन्द्र न भगवान ब्रह्मा और यतोंका राजा कुवेरभी नहीं करसक्ताई । २५ । अर्जुन अपने गुणों से इन सबसेभी अधिकहै परन्तु यह मेरे किसी यचनको भी उल्लयन नहीं करेगा अधीद मेरे कहनको अवश्य करेगा और सदैव तेरे पछि चलेगा हे राजन्द्रतुम प्रसन्न होकर शांतता में युक्तहोजावो तुझमें मेरासदैव बहामानहै इसी हेतुसमैं बड़ी शुभचिन्तकता slain. 21. I and my uncle are yet alive. You may rule the land > for many days conjointly with the Pandavar. Forbidden by me Arjun shall fight no more and Shri Krishn coo, does put like bloodshed. Yudhishthir is always kind to living brings and Bhim, Nakul and SA hader obey me. All inen will be happy on your consenting to make peace with the Pandavas. Let the rest of the allies go back to their respective homes and the armies cease fighting. You will fall into great trouble and will recieve wounds, if you donot pind me. Yog and all the world have seen what Arjun alone did, Even, Indra, Brabma and Kuver cannot do such things. 25. Arjun is superior to them but he will do my bidding and follax you, if you wako peace - (6754) Mahabharat भान पान गमाप्रधान समनाम धनन्जयः शरैः । समं परिच्छेनारामिमष्य तरोत्तमद्वादशभिपच मनजम ॥ १५ ॥ अथाभ्यधावस्थान शतं रथाः शतं गा इचानमाततापिनः । शफास्तुखाप यांनाच सादिमः सहेर काम्बोजवशि सपः ॥ १६ ॥ धगयुधान पाणिगतः शरैः सह सहितस्त्वरितः शिरसिया हयांम नागाधरधाश्च युध्यसो धनम्नाराभुगतान क्षितीक्षिणात् ॥ १७ ॥ ततोत राक्षे मुरतूनिष्यमाः सप्ताधुयादा हरितः समीरिता न पेरप्युत्तमपुपपप मुगन्धिगया पधनीरता शिवसदनतं देवमनुष्यसायिकसमरियभूतानि विलि स्मियुप। तपारमजः मतमुतश्च म पो न विस्मय जग्मतुरक निश्चयो । १९ मयाब्रवीदाणमुतस्तपारमजे कर करेण प्रतिपीय मान्ययन् ॥ २०॥ प्रसीदपुग्योधन नए भजनने उनके पप, तू गीर. धजा, घाई, रथ और सारथियों. सतेत चारों औरसे इन शत्रु को मपनकरके शाही उपम बारहबायों से कर्णको घायल किया। १५ ।इनके पीछे शोधता करनेवाले मारने के अभिलापी लोग सम्मुत दौड़े और अर्जुनके मारने के उत्सुक सौ रथ सो हाथी और प्रश्न सवार सक, पार, पवन, कांबोजदेशियों समेत इन सबों ने हाथों में पुरम लेकर सब शखों | को काटकर शिराको भी काटा उससमय वहाँ भनेक शिर पृसपर गिरपड़े तब उम.युद्ध करनेवाले अर्जुन ने घोढ़ हाथी और रयों समेत उन शत्रुओं के समूहोंको काटा । १७ । इसके पीछे अन्तरिक्ष में देवताओं ने इन दोनोंकी कीरि समेत वाजों से स्तुति करी और आकाशसे मुगन्धित पुष्पोंकी वर्षा होने लगी । १८ । तब उस भाषर्य को देखकर दवता और मनुष्यों के समक्ष सब जीवमात्र अधम्मामा करनेलगे फिर उत्तम निश्चय रखनेवाले मापके पुत्र मार कर्णन न पीडाकरी न आश्चरपं को पाया ।१२। इसके पीछे मधुरभापी अश्वत्थामाजी हायस प को मानकर भापके पुत्रसे बोले । २० । हे दुर्योधन मब तू मसनोकर पांचों से सन्धिकर बदनात्यागो और युद्धको धिक्कार में पड़े असायमानी के Karen with twers arrows 15. Then desirous of alkying arjun, hundreds of elephants, cars, horsemen of Bhak, Tusbor and Camboj attackod him; but he cut off their worpons and heads with his arrow Heads were seen lying here and there in earth. Is slow the econies and destroyod their horses, oleptants and cars in large numbers, The soda ia bearon espressed the praises of the two great warriors with the beat of their musical instrumeals, and showered scented dowors over them. The gode and wen wero emazed at tho sight of their But Karao and Arjun stood resolutely. Rube biog bia bande, Ashwathnma mid to Daryodaatid weet word, Comuna fighting with this Pandatis, Fis on this war in which tkw 8106 preceptor, uko Brahma himself, and wution like Bbiskot tisto 1280 wonderful prown ।६७५५) coga haran l'aray (in55) शाम्य पावरल विहोधेन धियस्तु विप्राहम । तो गुरुह्याममो महारतापितमधेर भीमप्रमुखा मरमाः ॥ २११ महस्यमय मम चापि मातुल प्रसाध गस्य सप पाणयविरम । धनन्जयः शाम्यति पारितो गया जनाईनी व विरोधमिति २२ ॥ युधिरो गनहिसे सारतो पुकारनाAATER या तु पात्र कते व पिदे प्रजाशियं प्राप्न युरिया नय। २३ ॥ प्रसन्न रोगः पण पाधिषा निवृास्त पन्तु सनकाः [नचंद्वतः घोप्यास ममगाध ध प्रतलास हतोऽरिभियुधि ॥ २४ ॥ श्वएं जगता सप रक्षया कृतं य ईकन फिराटालिना। पपान कुख्याल भिन्न चाम्सको । प्रचेता गात्र यक्षराट २५ । मोति मयाध गुणेनन्जयो म चातिपतियति में पचोऽखिलम धानुयायाध माया करिष्यति प्रसीद राज जगतः शिवाय पै ॥ २६॥ ममापि गानः परमः सदा यिथि समान गुरूना और पैरोडी भीष्म सरखि प्रतापी वीर मारेगमे । २१ । मैं और मेरामा चिरंजीय हैं पायरयोसमातम बहुत मालतक राज्यकरो मुझसेनिषेध किया हुमा भर्जुन सन्धिको करना है और श्रीकप्पानीभी शताको नहीं चाहते ॥२२॥ अधिहिर सदेव जीवधारियों के मनोरथ में प्रवृत्त है और इसी प्रकार भामसन समेत नकुल और सहदेव भी मेरे स्वाधीन है तेरी इच्छा से पाण्डवों से भार तुझसे सन्धि होनेपर मजालोगों का कल्याण होगा और मुखको पात्रगे याकी पचहुपे शापवलांग अपने २ पुरोंको गाय और सेनाके मनुष्यभी पद करना छोड़ें हे राजन् जो मेरेरचनको नहीं मुनोगे तो निश्चय जानोंकि अवश्य नुम शत्रुओं से पायल और पीड़ित होकर दुखोंको पावोगे । २५ । तेरेसाथ सब जगत ने देखा जो अकेले अर्जुन ने किया ऐसा कर्म न यमराज न इन्द्र न भगवान ब्रह्मा भौर पत्तोंका राजा कुवेरभो नहीं करमताई । २५ । अर्जुन अपने गुणोंसे इन सबसेभी अधिकहै परन्तु यह मेरे किसी यचनको भी उल्लघन नहीं करेगा अर्धाद मेरे कहनेको अवश्य करेगा और सदेव तेरे पीछे चलेगा हे राजन्द्रतुम पसनहाकर शांतता में युक्तहोजावो तुझमें पेरासदैव वटामानहै इसी हेतुसमें बड़ी शुभचिन्तकता slain. 21. I und my unde aro yet alive. You may the Jand for many days conjointly with the Pandavaa. Forbiddon by me ar jun shall fight no more and Shri Krisho too, does but like blooushed, Yudbishtbir is always kind to living brings and Bhim, Nakul and 8Hhader obey me. All men will be happy on your consenting to mako poaco with tho Papdavas. Let the rest of the allies go back to their respective homes and the armies cease fighting. You will fall into great trouble and trill recievo vouods, if you donot mind me. You and all tho world baso been what Arjun alone did. Even, Indra, Brabma and Kuscr cannot do such thinge. 25, Arjun is superior to them but he will do my bidding and follow you, if you wako pxaco -- rule Jlahabharat (6156) (१७५६) प्रयीम्पतबा परमाच्च मे दात् । नियायिष्याम्यय कर्णमप्यहं यदा भवान् सप्रणषो भविष्यति ।। २७ । यदस्ति मित्रं सहज विवक्षणास्तथैव साम्ना च धनेन वाजितम। प्रतापतचोपनतम्चतुर्विध तदस्ति संयं तव. पाण्डयेषु च ।।:२८ ॥, निसातस्ते तब पोर.वाघयाः पुनथ साम्ना समाप्नहि स्थिरम् । त्यपि प्रसन्मे यदि मित्रतामियुर्व नरेन्द्र तथा रयमाचरे ॥ २९ ॥ स एवमुक्तः महदा वयो रित विधिनय निश्वस्य च दुमनाप्रवीत् । पथा भवागाह सखे तथैव तन्ममापि विनायतां पयः शृणु ॥ ३० ॥ निहस्य दुशासनमुक्कयान बचः प्रसह्य शालदेष दुर्मतिः । वृकोदरस्तरये मम स्थितं न तत् परात मपतः कुतः रामः । ३१ गन पापिकणे प्रसहेद्रणेजनो महागिरि मेलमियोप्रमायतः । न पाश्चातयन्ति पृथात्मजा मपि प्रसघ र, यदुशो विचिन्त्य से मर्यात वेरे भलेके लिये तुझसे कहताई जवाप मृदुहोगे तवमैं कणकोभी निषध करूगा । १७ । पण्डित लोग सायं उत्पन्न होनेवाले को मिस करते हैं इसीप्रकार माति और धनक द्वारा माप्त होनेपाला और अपने प्रताप से नम्रीभूत होनेवाळेको मित्र कहत यह चार प्रकार की मित्रताहै वातेरी चारोंमकारकी मिनतापापायों में है । २८ । हे प्रभु तेरी उत्पत्ति से तो तेरे को समेत उनको माप्तकरी और वेरी प्रसमता से अति आधाराज्य ने वो विलोमान्स दशामें तरे. कारण मे जगदका बड़ाहित होगा । २९ । उस शुभ पन्धक के ऐसे हितकारी पचनों को मुनकर वह दुःखी चित्त दुर्योधन बहुत शोचस श्वासों को लेकरवाला हे मित्र जैसा आपने कहा वह सब इसीप्रकार है परन्तु मुझजताने वाले के भी वचनों को सुना कि । १० । इस दुर्बुसी भीमसेन ने शार्दूल के समान अपना हठकर क दुशासनको मारकर जो बचनकहा है वह मेरे हृदय में नियत है यह सब आपके समक्ष में ही हुमा है कैसे शान्ती होसकी है । ३। । अर्जुनभी युद्धमें कर्णको एसे नहीं सहसकेगा जैसे कि कठोर पवन मेग्नाम पर्वतको नहीं सहसता है कुन्ती के with the Pandavas, I have always been respectful to you. Wishing you well, I say this to you that if you soften your heart, I shall turn Karan too from fighting. Wise wien havo classified friends into four forts: those who are boro togother; those who are acquired by love or wealth; and those wbo obey your superior authority. The Pandavas are your friends in all those respects. They are your kinemen, Win them by love and please them by giving them half the kingdom, You will thus do good to all the world." Hearing the words of his well-wisher, Duryodhan, with a distressed mind, beaving deep sghie, said, "I: is trus what you say, friend; but hear me.30. "Bhim, lilo tiger slew Dusbasan and raid harsh words which raukle in my breast. You have seen all; how is peaca possible ! Arjun cannot withstand [६७५७) कर्णपर्ष Karan Paray (6757) * १२ ॥ न चापि कर्ण गुरुपुत्र संयुगातुपारमेस्यहसि वक्तुमव्युत । श्रमण युक्तो मह ताच फाल्गुनस्तमेष कर्णः प्रसाहनिष्यति ॥ ३३ । तमवमुक्रवाश्यनुनीय चासकृत तबारमजः स्थामनुशास्ति सैनिकान् विनिम्नताभितषसाहितानिमान सघाणहस्ताः किमु जोषमासत ॥ ३४॥ इति कणपर्वणि. अश्वत्थामा वाक्ये अष्टाशातीध्यायः ८८ ॥ सम्जय उवाच । ती शंख, मेरी गिनदं समृद्ध समीयतुः श्वेतापी नराप्रयो। वैकनः सूतपुत्रोर्जुन, दुमीत्रते तव पुत्रस्प राजन् ॥ १॥ यया गजी हेमवती प्रभित्री प्रयदन्ताविध पासितायें। तथा समाजग्मतुपुप्रवेगी धनञ्जयधाधिरयिक्ष पुत्र इठकर के और बहुधा शत्रुताको शोचकर मेरा विश्वासनहीं करेंगे। ३२ । । गुरुजी के पुत्र तुम होकर इसवातको अजेय कर्ण से कभी न कहिये कि तुम युद्ध को त्यागदो भव अर्जुन बहुत थकावटसे युक्त है इसी से यह कर्ण बड़े इठसे उस को मारेगा । ३१ । आपके पुत्रने उस से एसाकहकर और वारंवार समझाकर अपने सेनाके लोगोंको आजादी कि तुम हाथों में वाणों को लेलेकर मेरे शत्रुओं के सम्मुख जावो क्या मौन होकर नियतहो । ३१ । अध्याय ८९॥ संजय बोले कि हे राजन मापके पुत्रके दुन्त्रित होने वा शंख और भेरी के शब्दों की प्राधिक्यतासे श्वेत घोड़े रखनेवाला नरोत्तम अर्जुन और मूय्यर्का पुत्र कर्ण दोनों ऐसे सम्मुख हुये जैसे कि मदझाड़ने वाले दर्घिदन्ती हिमालय पर्वतके Karan in battle as the furious wind cannot withstand Meru. The song of Kupti, remembering my long enmity with them, will not trust to Never ask invincible Karan to leave fighting. Arjun is noir much tired and Karan will easily slay him," Having said this to him, again and again, your son ordored his warriors to attack the enemy with arrows and not to stay idle." 34, CHAPTER LXXXIX Sanjaya said, “Through the evil policy of your sou, when coachs and drudis were sounding their loudest, Arjun and Karan cane face to face like two mad elephants of the Himalayas, with longe काय Karan Party (6752 अपामरणाचरायुधे । कम्पतधोधमतुध विस्मयाहियद्गताधार्जुनकणसयुग ॥८॥ भुजाः स नांगुल्या समुच्छ्रिताः ससिंहमा हुपितरिक्षभिः । यदर्जुन मत्तमिवरिपो विप समाययादाधिरधिधियांसया ॥९॥ उदकोश सोमकास्तत्र पार्यं परस्त्र याय जुन भिधि कर्णम् । यिस्य मशीनमी सरेण श्रद्धाञ्च राज्यापराष्ट्रमनोः' १०॥ यास्माकं पहषस्त योधाः कण सदा या यादीत्ययोच । जबाजुने का असतीण पुनम यान्नु चिराय पार्थाः ॥ १९ ॥ ततः कर्णः प्रथमं तत्र पार्थ मरे भूमिणमिः प्रत्यविध्यत् । तमर्जुनः प्रत्यविस्यच्छितागैः कक्षान्तर दशभिः संसा ॥१२॥ परस्परं वो शिखमुखस्तत: सूतपुत्रोजनध । परस्तरस्पान्तरेष्म किमरे सुभीममभ्यापततुझं दृष्टी। १३॥ तसोमः प्राएजधयां भुजावुभी गाण्ड देवापुज्य । मारामनालीकवराहक मुरांस्वा सामलिकाखाद्वान् ॥ १५ ॥ हाथी पति पोडे रथ और चित्रविचित्र कवच भूषण स्त्र और शस्त्रोंकी धारण करने पाली पर अपूर्व रूपवाली दोनों पिरिमत सेना कंपायमान हुई उस अर्जुन और कर्णके पुरमें बस्त्र और अगालियों से युक्त ऊंची २ भुजा प्रकाश में वर्तमान हुई मतबारे हाथीके समान प्रसारित अर्जुन तमाशा देखने वालों के सिंहनादों समेत | मारनेकी इछासे कर्णके सम्मुख ऐसे गया जैसे कि मतवाला हाथी मतवाले हाथी के सम्मुख जाता है । ९ । वहां आगे चलने पाले. सामक लोग अर्जुन को पुकारे कि हे अर्जुन कर्ण को छेदकर इसके मस्तक को कारो और धृत- राष्ट्र के पुषकी श्रद्धाकों राज्य से पृथक्करो इसमें विलम्म मतकरो। ..'। इसी प्रकार हमारेमी बहुत से शूरवारों ने कर्णको मेरणाकरी कि चलोर हे कर्ण अत्यंत ताण पाणों से अर्जुन को पारो और पांडव फिर बहुत कालके लिये वनको जाप । । इसके पीछे पथम तो कर्ण ने उत्तम दर्शायासे अर्जुन को छेदा और अर्जुन नेसकरतीक्ष्ण दावाणों से कर्णको कुतमें वेधा ।१२। फिर उन दोनों कर्ण और अर्जुन ने सुन्दर पुंखपाले बाणों से परस्पर घायल किया और बड़ी प्रसन्नता से एकने दूसरे को छेदा और भएकारी रूपों से सम्मुखगये । १३ ॥ इसके पीए उन पनुपधारी अर्जुन ने दोनों भुजाओं से गांडीव घनुपको ठीक करके नाराचं, नालीक, पाराहक, धुरम, आंजुलिक, अर्द्धचन्द्र इन बाणों को छोड़ा wholephant. The Somals cried out, "Go Ariyn. Pierss Karan and strike off his head, making Duryodhan hopeless of getting the kinga darm. Thosa no time." 10• Similarly, our warriors urged Karan, baying Go, go, , slay, Arjun with sharp arrows and send tha Paadavas again into a long exile" Then Keran piercent Arjua with ten sharp arrows and the latter pierced the former with the same number. Both Arjun and Kaian wounded each other with afro»8. baring beautiful fearlars. Tien setting Gandir siglit with, both hands, Arjun discharged various sorts of a crows wlich.buterod ka: ।
- 16763) dishabharat (६७६२१, २८ ॥ पायालाना भयराबाप याधान काधाषिरः मतपुत्रस्तास्वा धाविम्याधा हवे मुप्रयुक्तःप्रास्य कृष्णा तु नरप्रवीरः ॥ २९ ॥a: पाचाला: सोमकामापि राजन कणेनाजोपाध्यमानाः शरीधेः। क्रोधाषिया विविधस्ते समन्तात वायोगः सूतपुत्रं समेताः " ३०॥ तांस्तांस्तस्तैः सनिकृत्यांशु वाणान पारालाना रचनामा संघान् । मायाणगणैः प्रसध विक्षोभएन् समरे भूतपत्रः ॥ ३१ ॥ से मिटा यसयो निपेतुः कषभिभूमितल स्तनन्तः । कुवेन सिदन यथेष नागा महायला भीम घलेन तद्वत् ।। ३२ पाञ्चालानां प्रवरान् सानिहाय संस्पर्वमानाम् बलिमो पोध मुस्थान् । ततः सं राजन् पिरराज कर्णः शरान सुजन्मेघ इमाम्बुधाराष या त जयं त्वदीयातलानिजनः सिंहनादांध झु: । स ससम्बन्त बराकृत तो कौन कृयामिति कौरधेन्द्र ॥ ३५ ॥ तचार प्रेक्ष्य महारपस्य कस्य काम्यन्तु पौरसमम । रष्ट्या चकन धमजयस्य संग्राममध्ये विहतं सत्रम् ॥३५॥ तहसव कंपकिया। २८ । इसको करके फिर क्रोधयुक्त मूतके पुत्र कर्ण ने युद्धमें पांचाल। के अस्पन्त उत्सम शूरवीरोंको रोककर अच्छी रीतिसेछोड़ ये तीक्ष्ण,पार मुनहरी मुखवाले वाणोंसे पीड़ामान किया | २९ । हेराजन युद्धभूमिमें कर्णकवाणसमूहों से पीडित पांचाल और सोमकोंनेभी हठकरकेमसन्नतासे कर्णको बाणोंसेंधखकर पीडामान किया । ३० । फिर कर्णन वाणोंस पांचालों के उन रथ हाथी आर घोड़ों के साहों को मारा और मारे बाणों केसवको पीड़ित करडाला । ३१ वह कर्ण के वाणास निर्जीव होकर 'शब्दों को करतेहुये ऐसे गिरपड़े जैसे कि महावन में क्रोधपुक्त भयानक सिंह से हाधीयों के समूह गिरपड़ते हैं । १२. राजन इसके पीछ वह बड़ा साहसी और बड़े उत्साहका करनेवाका कर्ण अत्यन्त उत्तमरं शूरवीरों | को मार कर. ऐसे शोभायमान हुभा जैसे कि प्राकाशम तीक्ष्ण किरणों का रखने वाला मूर्य होताहै । ३३ । कौरवेन्द्र फिर भापके शूरवारों ने कर्ण की विजय के मानकर बड़ी मसनवा मनाकर सिंहनादों को किया और सबने कर्णके हाथ से श्रीकृष्ण और अर्जुन को विधायक माना । १४ । फिर यह माहारथी कर्ण के पराक्रम को दूसरोंसे असम जानकर और इसतिसे अर्जुनके उस अखको निष्फल हुआ देखकर । १५ । क्रोयसे रकत्र असा कोषपुक्क पापुपुष भीमसन शासों the Panchals, The Panshala and somaks, wounded by Karan's arrows pierced him with arrows 30. They pierced with their arrows, his Cars, elephants and brees, which fell down on earth with cries, lika elephants falling down in a forest before an angry lion. Then mighty Karan, having slain good warriors, looked glorious like the Sun with hig raya, Sesiog that Karad was victorious, your warriors roared like lions and thought that be bad mortally wonoded Krishn and Arjun. Seeing Karan's prowess unbearable by others and Arjua" Weapon made useless, Bhiio, with.eyes red is anger,rubbing his hande 137631 कर्णपर्व mm ! nrv (६७६३" माँ कोघसंदाप्तनो पातात्मजः पाणिना पाणिमाच्छत । भोमोप्रधादजनं सरपसाब ममर्षितो निषसम् जातमम्युः ।। ३६ ॥ कथन्नु पापायपेतधर्मःमतारमः समरध प्रशन पाम्चालामा योधमुख्याननेकानिजनियस्तष जिष्णा समक्षम ॥ ३७ ।। पूर्व 'देवरजित कालकेयः साक्षात स्थाणोषांहुसंस्पर्शमस्य! कथन वा मतपत्रः किरीटि प्रयेभिर्दशामिः प्रागार्षियत् । ३८ वषा क्षिप्त प्रसाण संघानाश्चय्यमतत् प्रति माति मेघ कृष्णारिफ्लेशमनुस्मरत्व यच्चाप्रपीत् पाडतिलानिति स्म । ३९ वान: इतीक्ष्णस्पिमिमनोदोक्षाः मनास्मजोय गतभीगरमा । अस्मृत्य तत् सर्वतिहाच पापं जधाशु.कर्ण युघि सव्यसाधिनम् ॥ ४० ॥ कस्मापेक्षा, कुरुषे किरीटिन्नुगेक्षिनु नाय मिहाए कालः । यया स्या सर्वभूतान्यजेवीस वदबहनये खाण्डवे यम । तथा भूत्या सूतपुत्रं जहि त्यमहञ्चन गदया पापयिष्ये ॥ ४१ ॥ अथाब्रवोद्धामुदेवोपि को लेताामा हायसे हायको मलकर सत्यसंकल्प अर्जुन से बोला । ३६ । भवयुद्धमें, तेरे मार विष्णुजी के सम्मुख किस प्रकार उस पापी अधर्मी मूत के पुत्र कर्णन भवन होकर पांचालोंके उधम शूरवीरों को मारा । १७ । हे भनुन साक्षात् शिवजी की मुभा के पर्श को पाकर- काळकप नाम भमुरों से अजय रूप तुझको इसकल ने प्रथम दशवाणोंसे कैसे छेदा । ३८ । और तेरे चलायेहुये वाणसमूहोंको सहगया, इससे. यह कर्ण मुझको अपूच्चे दिखाई देता है तुम द्रौपदों के उन दाखोंको स्मरण. करो कि इसने कैसे २ वचन कहेये.! ३९ । हे अर्जुन इसपाप वृद्धी दुर्मति दुष्टहृदय. मूतपुत्र ने रूखे २ अत्यन्त तीब्रवचन कई भवतुम उनसब वचन को स्मरण करके उसपापी कर्णको युद्धमें शीघमारो । ४०. । हे अर्जुन उसको कैमे छोड़ रखा है. अब यहां यह समय तेरे त्याग करने का - नहीं है खांडव वनमें जिस,धैर्यतामे ने सपजीवों को विनय किया उसी धैर्यतासे इस दुर्मति सूतपुत्रको मारो मैं उमको, गदासे मारूंगा उसके पछि वासुदेवजी भी वाणों से न्यायित देखकर अर्जुनसे बोळे and heaving sighs, said to Arjun, "How is it that the despciable son of Sut was able to slay the best warriors of the Panchala in the presence of you and Vishnu! 37. Having felt a toach of Shiva's arms and slain tho Kalkoya asure, how was it that you received ten artorwounds from Karan? He bore your arrors, this to me is sponderfal.. Reinombor the #TODES done to Draupadi and Karan's harsh words, Why do you make delay in slaying him? 40. Wby hare you spared his life! He should no longer be sparad, Slay bin with the fortitudo like that sbown by you in slayiog all beings at the Khandar forcst. I shall slay him with my mace." Then Yasader said to Arjan " Saran lias made your weapons useless by his ow. Fby are youlazy, Arjun ! Why do you not wake up! 8:e, the Kaurazasſane ' roaring gleefully. All the people beliere that Karan's weaporn are (6764) Jahabharat 1६७६४] पार्थ इष्टया रयेपूर प्रतिहन्धनानान । ४२ ॥ अमीमुदत संयथा तेच कणों खरवं किमिद भोः फिरोटिन् । स धीर कि मुखसि नावास नदस्यते कुरुवः सदृष्टाः ॥ ४३ || कर्ण पुरष्कृत्य विदुई सबै तपानमस्तबिमिपात्यमान । यथा धृत्या निहतं तामसास्त्र युगे युगे राक्षसाचापि घोराः । दम्भोड्याश्याममराक्षाहवेषु तया त्या जहि कर्ण स्वमद्य ॥ ४४ । अनेन चास्य क्षुरनेमिनाथ संसिन्धि मुसानभरेः प्रसव । विटन सुदर्शनेन पञण शो नमुचेरिकारे ।। ४५ ॥ किरातकपी भगवान याय षया महारमा परितोपितोभूत् । तात्वं धृति चार पुनगृहीत्वा सहानु धन्वं अहि सूत पुत्रम् । ततो मही सागरमेखला पं सपचनो प्रामवती समृदाम् ॥ १७ । प्रयाछ राजे निहतारिसंघां पशम पायांतुलमा नुहि स्यम् । स एवमुक्तौतिबलो महारमा पारधुद्धिहि ययाय सौतेः ॥४८॥ स बौदिता भीमजनाईनाभ्यां स्मृत्वा तयारमान । कि भवइस कर्णने तेरे शस्त्रको अपने शखों से सवमकारसे मर्दन कियाई हे अर्जुन यहक्या वातहै इं वीर तुम क्यों मोहित होरहेहो क्योंनहीं सचेत होतेहो देखो, यह कौरव लोग अत्यन्त प्रसन्न होकर गर्नते हैं । ४३ । सबने कर्णको आगे करके तिरसस्त्रों से गिरापाहुआ जानाद निप्त धैर्यतासे तेन तामस अस्त्रका दूकिया और युग २ में भी दंभोजवनाम घोर राक्षसों को युद्धों में मारा उसी धैर्यसे अब हमकर्णको मारो। ४४ । अब इठकरके परे दियहृय नैमियोंपर छुरेवाले मुदर्शन चक्रसे इसशत्रुके शिरको ऐसेकांटो जैसे कि इन्द्रने अपने शव नचि के शिरको | काटा था । १५ । किरातरूपी भगवान शिवजी भी तेरे धैर्य से प्रसन्नहुये ईवीर तुम फिर उसी धैर्य को धारण करके कर्णको उसके उसके सब साथियों समेत मारो। ४६ । इसके पीछे तुम सागर रूप मेखला रखनेवाली नगर ग्रामों से युक्त और धन रत्नों से पूर्ण उस पृथ्वी को जिसमें कि शत्रुओंके समूह मारेगये हैं अपने | राजा युधिष्ठिरके सुपुर्दकरो । ४७ । यहवचन सुनकर उस बुद्धिमान महा पराक्रमी महात्मा अर्जुन ने कर्णके मारने के निमित्त पुद्धिकरी । ४८ । भीमसेन और more powerful than yours. Slay him with the fortitudo with which you have, ages after,ages, chicked the weapons of darkness &nd slain proud and dreadful rakshases. Slay bim with my razor-edged discaa as Indra bad done Namuchi. 45. You gratified Shiv, disguised as a aunter, with your patienes. Slay Karan and his followers with, the same patience and then you will be able to present the sea-girt land, with her cities, villages and wealth, to Yudhishthir.". At this, wish and valiant Arjua resolved ta slay Karan. Urged by Shri Krisha and Bhim, Arjun meditated within his mind, and knowing the object, of his being sent by Indra iata the world, said to Keshav, "I produce to slay Karan and to make the world bappy. 'You as well as Brahma, Sliv, gods and the Veda kpoving rislis give' me this weapon (6765) [६७६५) कर्णपर्व Karan Parav माय मम । इदात्मनमा गमने विदित्वा प्रयोजन केशमिन्युषाय ॥ ४२ ॥ प्रादु स्कराभ्येष महासमन शिवाय लोकस्य पधाय मौतेः। तन्मऽनुजानानु भयान् मुराश जमा भयोमहा विदर्भ सघे ॥ ५० ॥ इत्युच्य देवं सत सम्यसाची नमस्कृत्या ब्रह्मण मोऽमितारमा । तदुत्तमं प्रालयमसहमस्र प्रादुश्चक्रे मनसायविधयम् ॥ ५१॥ तदस्य हरपा पिरराज कणों मुक्या शरान्मंघ इवाम्बु घाराः । समीक्ष्य कर्णन किरीटिनस्तु तपाजिमध्ये विहितं तदसम ॥ ५२ ॥ ततोऽमी पलधान शोधदीप्तो भीमोऽप्रवी पर्जन साथसम्धम । ननुवादितारं महालं नालंय विधेयं पाम जनास्तत् । तस्माद ग्यधाजप सम्यसाचिप्रिति स्मोकोऽयोजयत् सम्यसाची ॥ ५३ ॥ ततोदिशश्च प्रदिशा सर्वाः समावृणोत सायकरितेजाः । गाण्डीयमुक्त जगै रिवा दियारा शुप्रतमपलब्रिः ॥ ५५ ॥ यथास्तु पाणा भरतर्षभेण शतं शतानीय मुघर्णपुंषाः। पाहणजी से प्रेरणा कियेहुये उसभर्जुनने भागको ध्यान करके भार सवधाता को विषारकर इसलोकके इन्द्र अपने मानेमें प्रयोजन को जानकर केशव से यह वचन कदा । । कि हे केशवनी में लोकके मानन्द और कर्ण के मारने के निमित्त इस उग्र महाअस्त्रको प्रकट करताहूं सो आप ब्रह्माजी शिवनी देवता भोर वेदोंक सब जाननेवाले ऋपिलोग मुझको माज्ञादो । ५० । उस महासासी अर्जुन ने इसमकारसे कहके और ब्राह्मणों को नमस्कारकर के उसन महामको प्रकटीकया जो कि असह्य और चित्त से प्रकट करने के योग्य या । ५१ । जैसे कि यादल शीघ जलबाराओं को छोड़ताहै उसप्रिकार :कर्ण वाणों से इसके उस भत्रको दूरकरके शोभायमान हुमा तव क्रोधयुक्त पराक्रमी भीमसेनने इस गीतस युद्भाममें कर्णके हायसे अर्जुनके उस अस्त्रको दूरकिया हुआ देखकर सत्यसंकल्प अर्जुन से कहा कि निश्चयकरकं मनुष्यों ने तुमको बड़ा उत्तम पौर ब्रह्मास्मनाम बड़े अस्त्रका जाननेवाला कहा? हे अर्जुन इस हेतुमे आतुम दूरम मस्त्रको चाभो । ५।। ऐस कहेहुये अर्जुन ने अस्र का प्रयोगकिया तदनन्तर बड़े तेजस्वी प्रज्जुन ने गांडीवधनुप और भुगामों से छोड़हुये भयकारी मूर्य की किरणों के समान प्रकाशित वाणों से सर्वदिशा और विदिशाओं को ढक दिया peruiission to do sv. 50. Having said this and bowed down to Brahpans, Arjun produced the great wcapon which was unbearable and capable of being produced by the mind. Sending forth luis arroups liko rain, Karan looked glorious alter making Arjun's weapons furtile. Scuing Arjun's weapon cut by Koran, Bhim said to Arjun, "Surely wwa think you to be the greatest of warriors and passesor of Brarınastia. You should discharge another weapon." At this Arjun, dircltirged anothor weapon and filloi thu dis octions will las fiery anong mods of arrows liid Karan's car in a nument like the rays of the Sun Rat pralays. : Hundrels of rpearr, darts,axes, discuses and 'airiral Thour 14 (0766) Lahalıbarat प्राच्छादपत् फर्णग्य कणेन युगान्तयाइन्पर्ककरप्रकाशाः ॥ ५५ व धानि च क्राणि नाराचं शतानि चैघ । निश्चमामारराणि योधालतो सुतोपि ॥५६॥ छिन्न शिरैः कस्यचिदाजमध्ये , पपात योधस्य परस्थ भयेन सोयाशु पतं भूमाघन्यः प्रनष्टः पतित विलोक्य ॥ ६७ ॥ अयस्प पात कत्यो याधस्प पाहु. करिहस्ततुल्यः । अयस्य सध्यः सह धर्मकार | पतितो परश्याम ॥ ५८ ॥ एवं समस्तानपि पोधमुख्याधिसयार्मास शरा शरीरान्तकः सुयोरदोश्योंधन सन्यमशेप मेष ॥ ५२ ॥वैकतननापि मध्ये सहवशो पाणगणा मिष्टा । ते घोषिणः पाण्डेयमभ्यपेयः पन्चमुक्ता धारिधागः ॥ ६ ॥ स भीमसेनञ्च जनाईनभ्य किरीटिनचायत यां। खिमिर्मीमपलेमिहत्य ननाद पोरं महता स्वरेण ॥६१ ॥ स कर्णवाणानिहता. १,५४ । उस भरतर्षभं अर्जुनके छोड़हुये मुवर्ण (खगालेहजारों वाणोंने में कर्णके स्थको दकदिया यह वाण प्रलयकालके मूर्यको किरणों के समान । ५५ । इसके प.छे सैकड़ों गालफरसे चक्र और नाराच भी महा भकारी उससे बहुत से शूरवीर चारों ओर से मारेगये । ५६ । युदभूमि में किसीका , | धड़ से कटकर गिरा और कितनेही उन गिरेहुओं को देस र भयभीत जल्दी से पृथ्वापर गिरपड़े । ५७ । और किसी शूरवीर की पीकी सूरक अजा टूटकर खड्ग समेत पृथ्वी पर गिरपड़ी किसीकी याचना धुरमसे टकर जिसमेत गिरी । ५८ । अर्जुन ने इसरीति के नाश करनेवाले भयकशि बालासे उन सय उम २ शुरवीरों समेत दुर्योधन की सम्पूर्ण सनाको मारा और वापस किया। ५९ । इसीप्रकार कर्णने भी पद्धभूमि में अपने धनुष से हमारी नाणों को छोड़ा वह शब्दापमान वाण अर्जुन के सम्मुख ऐसेगये कि पन्न | मपसे छोड़ीहुई जलकी धारा होतीहै।६०।इसके पीछे यहअनुपम प्रभार मौर भवानक रूपवाला कर्ण श्रीकृष्ण अर्जुन और भीमसनको तीन १ वाणों से घायल करकपा स्वरसे घोर शब्दको गन । ६। फिर अर्जुन ने उस असाख कर्णके पापों से arrows came out and slew the warriors all rouad, Heads were severe from trunks while others fell dow with Tear. 'Arms like the trunki of clopbants fell down with sifords wlich they hold Tho left árons of others fell down with sliolds. With his dreadful knd fatal arrows Arjun slet the army of Durgodbart. Karan too discharged thotsando of anows which fell down like a torront of rain. 60. Having wounded Krishi, Arjur and Bhim, with three arrows jacli, Karan roaroda loud roar. Sceing Bhiin and Krialin rounded with Karán's atton, Arjun look up'eightosa átrows at once, 'and hit tho standard with orie,arrow, Shalya with four and Karan with three. Then with tañ.trell-ai acd arguns, le blow. Sabhapati whose body was "decked, - Gr63) Mahabharat (६७६८) लापुत्तमौ सर्वधनु राणा महावली संबंसपत्नसाहौ। निजध्नतुवाहितसैन्यगुभाष ग्योन्यमयस्त्रविदी महासः ॥ ६९.५ अयोपयातस्परितो दिह मन्त्रीपधिम्यां विकतो.. विशल्पः । कतः मुंहनिर्मिपजांवरिष्ठेयुधिष्ठिरस्तत्र मुबर्णयमा ॥ ७२ ॥ तत्रोपचात युधि धर्मराज इवा मुदा बर्ष भूतान्यनन्दन् । राहोविमुकं घिमलं सम धादं पये वाम्युदित तथैव ।। ७१ ॥ रष्ट्वा तु मुस्पायथ युध्यमानी दिक्षपः शरबरामी। कर्णञ्च पाच नियम्य पाहान सस्था महीस्थाच जना वितस्थः। ७२ ॥ स कामुक स्पातलसनिपातः समक्तयाणस्तुमुलो बभूघ । नतोस्तथान्योन्यमिपुप्रवर्द्धनम्जय स्थापिरधश्च राजन् ॥ ७३॥ ततो घना सहसातिमा सघोपमच्छित पाण्डवस्प तस्मिन क्षणे मूतपुत्रस्तु पाएं समाचिनोत् जुद्रकाणां शतेन ॥ ७ ॥ निर्मक्तसपप्रति धारियों में श्रेष्ठ बड़े पराक्रमी सव शशुओं के पराजय करनेवाले महा अवयं उन दोनोंने महाअसे शत्रुकी उग्रसेनाकों और एकने दूसरेको पायलोकपा६९ इसके पछि शीघ्रता करनेवाला युद्धके देखनेका अभिलापी वह युधिष्ठिर पासयाग जो कि भत्रिकुल में उत्पन्न होनेवाली अष्टांग विद्याके आसनपर बैठनेवाले अश्विनीकुमार मुरवैद्यों के मन्त्र भापधियों के द्वारा पीड़ा से रहित भालों से पत्रक् शुभचिन्तक चिकित्सा करवाले उत्तम पुरुषों से मईम पट्टी बांधाहुआ मुवर्ण के कवचको पहिर हुये था । ७० । इस प्रकार के रूपवाले धर्मराजको युद्धमें समीप आपाहुमा देखकर सय जीवमात्र बड़े प्रसन्न हुये जिस मकार राहुसे छुटेहुये निर्मल और पूर्णचन्द्रमा को देखते हैं उमीप्रकार उदय होनेवाले उन युद्धका उत्सम श्रेष्ठ शत्रुनों के मारनेवाले दोनों पुरुषोत्तमों को देखकर देखने के इच्छावान भाकाश के देवता और पृथ्वी के मनुष्य कर्ण और अर्जुनको देखतेहुये नियतया७२।वहा वाणोंके जालोर परस्पर भारनेवालं अर्जुन और कर्णके छोड़पे वाणों से उस धनुष रोदा और प्रत्यंचाको गिरना कठिन हुआ इसके पीछे अरसीसिंची हुई अर्जुन के धनुपकी जीना अकस्मात मन्द करके टूटी उसी समय मृतके पुत्रने सो क्षुद्रक बाणोंस अर्जुनको छेदा । ०५,और सर्प रूप तैलसे साफ गृध्रपक्षसे जटित भावर छोड़े सार ul war, there came Yudbishtbir, whoso body was cured of wounds and rain by the application of medicine and aphorisms of good physicians liho Ashwinikumars and who wole gold arhotir over his body covered with ointments and landages. 70. All the prople who ssx Yudhishthir the jilat there are pleased as if he were the full 2000 rescued from Pniu. Žiniais, the goals of heaven and quia jusople of carth samlturn the fight of Karan, and, Arjun the best or warriors.. Striking all other with arrows, their boxstrings made & stranke 11 lojun's buvusing sapjual with a crash wvl the in! Sutindine martunity. pierced Arjun nitli u handred arriwa He sutra! Vaaniler uít's risty arru.rs like puisnii '14. repente, vell .
- [६७६९) कणपय Karan Pare (7562] मैश्च नाणस्त लमधीतः खगपत्रयाजः । पप्पया विभेदामच घाम देव मनन्तरं फाल्गम मभिश्च । कृष्णं व पार्थच तथा ध्वजंच पार्यानजान्सोमकान्पातयं ॥ ५॥ प्राध्या दयस्ने निशितः पृषीमतसंघा नमसीब सय्यम । भागएतस्तान विशिखरने दम्भयत् सूतपत्रः कृतास्त्रः ॥ ७६ ॥ तैरस्त्रमस्त्रं विनिहाय सर्व जघान का रक्षा जिनागान् । तथा तु सैन्यप्रवरांध राजन्नभ्याईयामागंणः मूतपुत्रः॥ ७ ॥ तेभिप्रदेश व्यंसपो निपेतुः कणेपीमभीमतले स्तनन्तः । कुवेन सिंहन यथाश्क्यूपा महायला भीम बलेन तद्वत्॥७८॥ पुनध पावालपरास्तथान्ये तदन्तरे कणधन जपाश्याम प्रस्कन्दतो पलिनः साधुमुक्ता कर्णेन पागनिहता प्रसा ॥ ७९ ॥ जयन्त मस्या विपुखं त्वदीयास्त लाप्रिजन: सहनादाभ नेदुः । स यतम्यन्त यो कतो तो कर्णन णानिति ते पिमः ॥ ८॥ ततो भनुम्पामपना शीघ्र शगनस्तानाधिविधम्र मरम्माण बाणों से शीघ्रताकरके वासुदेवजी को छेदा इसके पीछे फिर माठ वाणों से भर्जुन को छदा तदनन्तर मूतपुत्र कर्ण ने हजार माणों से भीमसेनको मर्मस्थलोंपर छेदा १७५। और सोमकों को गिरातेहुये उस ने विशिख वा पृषत्कनाम बाणोंसे भीकष्ण मन की बना और उनके छोटे भाइयों को वाणोंसे ऐसे दकदिया जैसे कि बादलों के समूह सूर्यको दकदेते हैं । ७६ । फ़िर उस असा कर्णने उन सबको विशिखनाम वाणोंसे रोककर अपने अस्रों से सब अखोंको हटाकर उनके रथ घोड़े मार हाधियों कोभी मारा । ७७ । हे राजा इसी गति से मूतपुत्रने वाणोंसे सेनाके उत्तम शूरवीरों को पीड़ितकिया फिर कर्ण के बाणों से घायल और मृतकहोकर शब्दोंको करते हुये पृथ्वीपर ऐसे गिरपड़े जैसे कि बड़े पराक्रमी कुत्तों के समूर क्रोधभरे बड़े पगक्रमी सिंहसे गिरते हैं । ७८ | फिर पांचालदेशियों के उत्तम लोग मोर अन्य शूरवीर इस स्थानपर कर्ण और अर्जुन के लिये चेष्टाकरने वाले उस पराक्रमी कर्ण के अच्छरिशीत के छोड़े हुये बाणों से मारेगये । ७९ । और आपके शूरोंने बड़ी विजयको मानकर तालयां बनाई और वारंवार सिंहनादको किया उन संघोंने युद्धमें श्रीकृष्ण और अर्जुन को कर्णकी स्वाधीनता में माना। ८. । oiled and fitted with Kank fonthers. He then wounded Arjun with eight arrows. He hit the smaks, with Shri Krishn, Arjun, his banner and younger brothers, and hid them with Arrows Eclouds hide the sin.76. Having checked them and their weapon with his arrors, ho slow horeos and elephants too.7.. Thus the son of Sut wounded goud warriors of the my with his arrows and they foll down on earth with cries like a pack of dogs, falling a prey to an augry lion. Then the warrions of Panchal and other countries, exerting tur xam nudl Arjnn, waru sain by Kavan's arouwd. Your Tarriors, llicenx in the victory u Kurur, best thicir palmo, svared like lions and thought that Krislia aud Arjuu weru, overpowered by as tho 1,6779) Mahabharat गरसेताकारणे पार्यः कोरगान प्रायगृहनात् ॥ ८१ ॥ जयाराममाया पहनने पाणान्धानको क्षणेस । गल्यश्च कर्णश्च कुच सर्वान् पारिषिध्यपुगपद किरोले २ ॥ न पक्षिणी ग्यपतन्यातले पापसास्त्रण कयायकारे वायुर्वि यालिो भूतसंघरुवाह दिपा सरमिस्त दानीम् ॥ पल्यन्तु पाथों राभि पृषकश.दत रसभविष्यत् । ततः कर्म मादयासः मर्षिमा पुनः संगरिक वियत ॥ १४ ॥ स पार्यवाणासनषेममुकंवाहतः पशिसिराविमिमात्रः सता शोभिताक पभी सद, पाततंगः । प्रडिमाण मशान मध्ये रौदे माह वधिगईगाःतस्विमिस्त निदेशाविपोपमं पौर्णिमेदापिपिनअपमान पाच पयलितामियांग प्रवेस्थामास जियोमरव्युत ॥८६संमिषा पूर बोतमस्य मुवचिका पतन समायोः दिगम गामापिषित: मुगामाया फिर तो कर्ण के माणा स अस्पन्त घायल शेररिवाल क्रोषयुक्त अर्जुन ने परकी प्रत्यक्चाको भवाकर प्रतासे के नामों को हटाके कौरवोंको रोका ।। अत्यंना को दीककरके सलको नरमें दवामा और अकस्मात पाणोंका अन्धकार उत्पन किमा ससमय बोरसे अर्जुनने कामों में हारा कर्ष अल्प मौर माकी: खों को छदादर । तर मामलसे भयकार 'धुतपा होजानेपर अन्तरिक्ष में पक्षीभीनी ने और भाकामवती जीवों के समूहों से मेरितरायुने दिव्य पुणे:- षिों को फेवाया । ८३ । फिर हँसतेहुवे भर्गुनने शपृषकोंसे शरयक पदको छेदा इसके पीछे अच्छपकार छोड्दु पारह वरणोंसे कर्णको दकर दुबारीमी सात बाणों से छेदा । ८४ । अर्जुनके पचपसे टूटेहुये महावेगवाले वायोंसे बपन्न पायन विदीर्ण और अधिरसे भराभंग वह कर्म जिसके कि वाया फैलाके में रुजी समान शोभायमानसा इसकेपोरे श्मशानभूमिमें प्रसाईनमें कीड़ा करनेवाले रूपिर से सितारी अधिरपी कर्णने उस देवराजक समान रूमवाले मर्मुनको शानदायों से पेशा फिर मारने की मासे समाके समान अग्निरूप पासवाणोंको श्रीकृष्णमी के शरीर मावलिया। माषण अदिव अग्नीरीतिसे छोग वाण पोचमजी के कवचको छैदकर गिरपड़े और बड़े बैगसे पृथ्वीम मवेज कणये Kalpn. 80: Exceedingly wounded by arrows, Arjun was much enraged and checked Karan'e gruqyq and the Kaurayu by bie arrows Ho praduced a darkness by his arrows and pierced Karap, Shalyą apd the Kaur4885Bịrdı çoaged to fly in the air of 46094nt of darkness, There ressorse smell in the air astho danions of the sky roampd in it. Then Arjan with a smile, pierosd the imouc of abalge with ten arrows and pierced Karen with twelve and geven afroy Wound. ed by:Arjun's arfqwa and bleeding from his body, Karan, lookford dreadful like Rudra. He pierced Arjun with three fiery arrowe like sorpenta and wounded Krisbị with five. 86. The gold decked arrow, - (1) warga Karan Paray कमिमा प्रतायुः । १७ तान पर मलेभिः सखिया कम योग्य क! धनपस्ते पतन पृथियों मचायतकपुत्रपक्षाः ।।८८ । लतः सवाल किरीटमाली कौन कक्ष प्रदर्शनामः या चितwin मध्य कृतिपभि कण भुजप्रसाद ८९ ॥ स-माणे विमर्टस्टः शरैः शरीरावर मर्म पविध्यत् संवर्षाल माईय्या संस्थापतिमपिरयः ॥९ इति कणपर्वणि रुगीन को एकाननहीन्यायः ४५ ॥ और पातासंगंगा में स्नान करके कर कसे मुखफेरकर पेलेगये । २७ । इसके पोछ अर्जुन ने उनमाणों को अच्छी से छोडिंय पन्द्रह भल्लोंसे तीन रख करदिया इनवागांसे पाप तक पुर्व साथी वहे सर्ष वापर भावे it फिरतो बर्जुन ऐसक्रिोधाभा जैसे कि मुखनको जली ताहुआ ऑन होता उस अर्जुन ने कलेकी अमा से छोये पाणी इसमकार धापलं शरीर श्रीकृष्णको को देखकर कानोंक रचकर शरीर के नाश करनेवाले अग्निष्प वाणोंस कनकी मम्मस्थलों में छेदा वह दुःख से तो पिताजा परंतु नही दधिरी ध्यं युक्त कर निपद हा १०॥ LANLL Hotl'dischiatgket, Fidving Nierced through Krishida's arësotr fall doria oh'earth and having entered the ground, they låthed themselves in the waters of the Cithges and carte back to Rarati. Then Arjun, with bis jell discharged arrdys, cut each of them into three. Wounded 'dý those arrows the cocpanions of Takishak's son came dérani Arth and Arjat tras enragad like the burning firé. Szing Krishn wounda od by Karan's arrots, Arjud pierced, Karan with fiery arrows it the fita! parte. He glicok trith pain bat atodd Tesolately. 90. भ [67723 Alalinblixrat सजप उपाय ततोऽपयाताशपातम मयस्थिताः कुरथो मिनसनाः। वित् प्रकाश दरपुः समन्तासनञ्जयास्त्र समुदीर्य माम् ॥१॥ तदर्जुनार प्रसति स्म की पियरत घरतरः शरौधेः सुखंग पार्शन भृशाभिम बधाय कणस्य महाविमा । २॥ उदीयमाणं स्म कुरून वहन्तं मुवर्णहर्षिशिखति म । कर्ण: मुघोपेप्यसम बदस्य पिस्कारविरमा व्यस्जच्छरोधान् ॥३॥रामाधुपांत्तन महामाहेम्ना बायपणे नारिपिशातनन । दर्जुनारंब व्यधमदहन्तं पार्यच वाणनिशितैनिजध्ने ॥ ४॥ ततो घिमई ममहान् बभूव तत्रार्जनस्याधिरय राजन् । अन्योन्यासादयतोः प्रपतके सिपाणघात विपयोरियोग्रेः ॥ ५ ॥ सतोत्रसंघात समावृतं सदा भय दिफलक मरम्प भास्करम । यत् कणगाण गरजालवृएमा निरन्तर वक्रतुरन्तरीक्षम् ॥६॥ ततोलाल, वाणमय मदान्त सर्षेऽद्राक्षः कुाघः मामकारच । नान्यत् किश्चिदरः अध्याय ९० ॥ संजय बोले.इसके पीछे पृथक् २ सेनावाले एकवीर के अन्तर पर जानीवाल कोरल नियतहो और अर्जुन के प्रकट कियेहुये प्रखको चारों ओर से बिजली के समान प्रकाशमान देखा । १.। तब कर्ण ने उस अर्जुन के आकाशमें वर्तमान महाशस्त्र को पड़े घोर वाणों से दूरकिया जो कि बड़े युद्ध में अत्यन्त क्रोधयुक्त भर्जुन ने कर्ण के मारने को छोड़ाया । २ । उस कौरवों के भरम करनेवाले उदय रूप अत्रको मुनाही पुखवाल विशिखों से मईनकिया फिर दृढ़ प्रत्यंचायुक्त मफल धनुप को उठाकर वाणों के समूहों को छोड़ते हुये कर्णने । । । परभुरामजी में पायहुये शत्रुनोंके नाश करनेवाले अथर्ववेदसम्बन्धी मन्यसे आर्भमंत्रित किये हुये तीक्ष्णधारवाले वाणसे उस संस्म करनेवाले अर्जुनके अखको दरकरीदया ।। हे राजा इसके पीछे वहां प्रपरकों से परस्सर युद्ध करनेवाले कर्ण और अर्जुन का ऐसा घोर युद्धहुआ जैसे कि दांतों के काटन महारों से दो हाथी युद्ध करते होय। ५ । उस समय वहां सब भोरसे प्रमों के महारों से बड़ा कठिन युद्धहुआ और दोनोंने अपने अपने बाण समों से प्राकाशको पूर्णकर दिया । ६.. CHAPTER XC Sanjaya said. “Theo Kuuruvas stood sepurate and saw Arjun'. Frespons shiningiks lightning. Then Karin checkut Arjun's tirint weapa with his droadful arrow3. Having destroyed the destroying weapon, ho took up again lis hard bow, and discharge sharp weupons received from Pacasburam, ho proaounded over **- tho foc.dostroyiug aphorisms of Sumdeva and with them destroy" Arjun's weapon. Fighting with sharp arrows, Karan and Arj Fought liard like two clephants with large tusks, J. I'lim was a furious Lattle with dreadful weapons and both of thient ! the ait with thicir arrowr. Then all the hawavas und Somahs ।
parrow, haentorod Karan'squirer. At that time thesclaili (6773) ६७१) कणपर्व Karan Paray सम्पत वाणाधिकारे तुमले तस्मिन् ॥ ७ ॥ ती सम्बधानावनिशं स्म राजन भास्पगी धपि शरामकान् । सन्दशंपन्ती युसमानिचित्रान धनुराणा प्रहरी कृतांनी ८॥ तयोरेयं युपता गजिमय सूतारमोऽभू पधिकः कदाचित् । पाय: कदायिधिकः किरीटी पोयाखसम्पल लाघवस्तु ॥॥ रक्षा तया युधि संप्रहारपरस्पस्पात रक्षिणास्त । पोरं तदा युपिंपरणेऽन्ये पांघाः सय विस्मय मध्यगाएन् ॥ १०॥ ततो भूतान्यतयक्षस्थितानि कणांनी at प्रशमनंद। मोः कर्ण साजन साधु ति या मोचुः संपराः प्राप्तिमन्ताः ॥ ११ तसिन् विमरयपाजिनार्ग मादाभिवति दलित मतले पततस्तु पातालतले शयानी माणेऽव सेगः प्ररोजनन, ॥ १२ ॥ राजस्तदा याण्डयदामुको विधेश फौपान मधातळं स नागारोप समुस्थितीप्रतो मातु सस्मरंच एम परम् । भयोध्य पाताधंगसियेन सत्य काहायोपिमईम ॥ १३ ॥ अयं हि कालोऽस्य पाछे सब कौरव और सोमकों ने बड़े वागनालों को देखा और वाणों से अन्धकार होनेपर अन्तरिक्ष में किसी जीवमात्र को भी नहीं देखा है राजा तब उन भनेक वाणों के छाइने और चढानेवाले दोनों धनुपधारियों ने अनेक प्रकारकी अपनी. अक्षमताओं के साथ युद्ध में विचित्रमार्गों को दिखलाया । ८ । इससीत से कभी अर्जुन.कभी कर्ण मंपलहोते हुये देसके। ९ । अन्य सब पूरपरि ने युद्धभूमि में परस्पर पाव इंदनेवाले उन दोनों के असम और घोरयुद्ध को देखकर बड़ा आश्चर्थ, किया है.नरेन्द्र इसके पीछे भन्तरिक्षपी जीयों ने उन कर्ण और अर्जुन दोनों की मासाकरी कि हे कर्ण पन्य दे मर्नुन धन्य धन्य है यह शब्द सब औरसे सुनेजाते थे ।११ ! तय उस युद्धमें रथ घोड़े और हाथियों के मारों से पृथवी के धसकने पर पातालतल में विभाम करनेवाला भर्जुन का शत्रु अम्बसेन सर्प । १३ । गो कि खाण्डवयनकी भग्नि निकळकर क्रोषयुक्त होकर पृथ्वी में गुसगयाधा पह फिर ऊवगामी होकर कर्ण भौर थर्जुन का युद्ध देसार अपर को भाषा-1 १३ । हे राजा उसने शोचा कि इस दुष्ट अर्जुन से अपना बदला tbo network of arron's and nu living being was duxonible in dasheet Putting and discharging their arrows, to two warriors tored in difforuot ways slowia: their skill. Sucing Karan and Arjua get the upper hand at times, the warriors wondered at their skill and praised thata. " Well done Karan and well done Arjun" werette words heard on nil vidus lloaring the trcal of horses and clepinots, nāca ile earth was being pissed down, Ashwasso, the caumy of Arjoa, who bunny vecaped thio firo of Khandar bad entered the ground and emragende camo np to witaw the lighting of Karan nod Srjo. He thougbea was tinid to be usenged on bim, Having trauslom himself, - -- am) Jinbabbarat दुशमनो ५ पापस्य परमविघातमाधम । समय से प्रविषेशभक पर पररूपपारी. १५ ॥ तोऽसपासमाकुलं तदा मूष जा foanty जानम । ती पायर्या शरसंपवृधिमिनिल्वरं वक्रतुरमतवा १५ बान बालेसमयं महाव सप्रसन् कुरया सोमकाम । माम्पत् किरिया: सो बापाग्यकार तुमनेऽतिमात्र १६ ॥ ततस्तो पम्पात्री सवलोकgt! पमापो रणे धीरो युयभ्रममुपागतो ३.१७. समुरक्षेपपीज्यमामो सिको पान परिणा। सपालापजनी ग्यारीवातरोगः । शकमध्यकाजाश्या प्रमाति मुवायुमो ॥ १८॥ काय पाप न विरोधपेपदा भृशम्य पान पमितता : भारत विपासो व ममा एकरापस्यठस्य १९॥ ततो रिपु समका सितं सर्पमुवं जबसम्मम् । शरपतिमुप्रघात पाणयमरपपिरामि गुममा | बनेका यही समय है इसीहेतु से वाणरूप बनकर कर्णके नूगीर में आपा इसके पीले मलों के महारों से संयुक फैसहये पाणों के सम्॥ रूपी किरणोंसे पूर्ण हुमार उन दोनों कर्ण और अर्जुन ने घाणों के समूहों की वर्षा से आकाश के अन्दरको निरन्तर पर दिया उस समय यह माकाग बड़ी दूरतक वाणसमूरों से एक सेही रूप काया उसको देखकर सब कौरव और सोमक भपभीत हुये। इस पाणों के बड़े अधिकार में दूसरा कोई जी आताभा नहीं देखा पर- नन्तर मन कोकले पनुपारी महावीर यह दोनों पुष्पोतम युद्ध में माणों के स्थाग ने बाळ युद्ध के परिश्रय में मच । १७॥ निन्दित पचनों को परस्पर कानासे हुये फिर वर देखनेवालों से म्याप्त जस पन्दन से सीप हुये दिम्पमा पननों की रसने पाली वर्गवासिनी अफाराभों के समूों समेत इन्दौर पूर्व के करकमलों से सब मुगवार्ड हुये। १८ 1 ग भनके पाणों से भरपन वाड़ामान कर्ण भर्जुन को न पारसका हर बाणों से भत्सन्त पायम शरीर का उसरीरन उसभर तरकसमें रहनेवाले सपंप पापके पानेको पित किया। और बड़े शोधपूर्वक जप्त अगरीतिसे मातहोनेराने पक्काम्से गुरूप सर्प मुस्तानको भर्नुन के वास्त धनुपपर पापा अर्पाद पई नस्त्री कर्णन वा सर *All full of fiery Arrowd so that there was ou opaco left Arrow. oals were tubaanemall over and ths Kararamand Samake was territal Al thought of them. No living being u lo bo ven in the darknes callsed by the arrox. To two famous wurion of tho world; coz*600 la gortal combat, abrised cook olher with words, Facued by dearsals sparnt mod sprinklalaror by fragraad water, their facce ware warded by lairmand Surya When karawnuable to shyarjumansion woorded by lix arroni te intended to discharga tikspont arrow kept ringla in a quiror. Ile pot to his bow to Kipeat abaped Astowwhich *** kept lon; it undil powder and gold quiver to lay Arjuo, 31;
11. कंणपद Kuran Pary (677511 सातं चाइनपूर्णशयित सुवर्णतीर खयं महाविषम् । मार्ग पूर्ण प्रविष्य क. पार्योन्मुझे सन्द तिग्ममायुम ॥ २१ ॥ प्रदीप्तमरावतवंशसम्म शिरोभीर्ष मुधि काल्गुनस्य । तत: प्रजवास दियो नमधं उनका धोरा घशमिनिपेतुः ॥ २२ ॥ बस्मिर मागे धनुषि प्रयुक्त हाहाकता लोकपाला सशक्षाः। म चापि तं युयुधे मत पुषवाणे प्रविष्ट योगवलेन मागम् ।। २३ ॥ ततोपोन्मद्रराजो मरिमा वैकलन प्रेष सिग्धितेयम् नि कर्ण प्रीधामिपुरेष लप्स्यते समीक्ष्य सन्धास्थ शरं शिरोनम *२५ ॥ जयाप्रवीत् क्रोधसंदीप्तनेत्रो महाधिपं सूतपुत्रस्तरस्थी । न सम्पत्ति विशिर शाकणे न मारशा जिह्ययुवा भवन्ति । २५ ।। इतीदमुफ्षा विससज्जतं शरं प्रपलतो वर्षगणाभिपूजितम् । तसि कारगुन इत्येषोषत्वरन स राजन विजया भूषतः ॥ स सायकः कर्णभुजामिस्टो हुनाशनार्कप्रतिमः सुघोषः । गुणम्युतः से पूजित चन्दनचूरे में रहनेवाले मुवर्णके तूणीर में नियत बहमकाशित वाणको कानतक बैच अर्जुनके मुखकीमोर धनुषपर चढ़ायां । २१ । मर्जुनके शिरकाटने को अभिलापी उसऐरावतके वंश में उत्पन्न होनेवाले अत्यन्त प्रकाशमान वाणको बढ़ातही सबदिशा और आकाशमें भग्निज्वलितहुई और आकाशसे सैकड़ों घोररूप उल्कापातहये । २२ । धनुपमें उस सर्परूपवाणके चढ़ाने पर इन्द्रसमेतसब लोकपाल हाहाकार करनेलगे और सूतपुत्र कर्णने योगवलसे उस बाणमें प्रवेश करनेवाले सर्प को न आना । २१ । इसके पछि मन्द्रके राजा महात्मा शल्यने उस उग्रवाण के पलानेताले कर्णसे कहाकि हे फर्ण यहवाण अर्जुनको नहीं पायेगा इस शिरकाटने पारे बाणको तुमभच्छीरीतिसे देखकर चढ़ाभो । २४। इसकेपछि क्रोधसे रकनेत्र बागवान कर्ण राजामद्रसे बोला कि हे शल्प कर्ण दूसरी पार वाणको नहीं माना है मुझसे मनुष्य उससे युद्धनहीं करते हैं। २५ । हे राजा उस शीघ्रताक रनेवाले उद्युक्त कर्णने यहकहकर विजयके निमित्त बड़े उपायसे उस वाणको छोड़ा भार कहने लगा कि हे अर्जुन अवतुझको माराहे । २६ । कर्णकी भुजासे धनुष Desirous of cutting Arjun's bead, that serpent of Airavat family in the shape of an arrow, illumine) all the directions when it was put to the bow and meteors fall down from the sky. Indra and other lokpale cried 'in diezay, when the arrow was put to the bow; but Karan did not 6 knew that the serpent had entered it by the poster of yog. Then Shalya the kirg of Madra, seeing the arrow put to the bow, said to Karan, This arrow will not touch Arjun. Look it well agaia before you discharge it." - L'oragod Karan, with red eyes, said to the king of Madra, “ Karan does not apply an arrow to his bow a second tiles People like me doäot figlio deceitfully." 25. Having said this bar caraíalls discharged that arrow to gain victory, saying, "ibero elain thes, Arjun." Discharged from Karan's bow and sitated bs.
(68) MahalharAL (८: मइम्ति मारत । पार्ष ममत तदा जमा म्यमापन म्मपिता Telu नाकिर सामनपाया श्यामो पुवारीजापास्य उमप्पमितनवासमा सामानवितास्पY गोडयांमुमुलोहन मागसमेषिता गणेश मात्मसमर मूपिहिमापागामुमममारप्पागोगजहारमुरंगोशम्गारिक गोसमासनमनधन पायाप्य प्रायोयंगम ॥ स सापकर्णपणे दुसानातिमो मा मरगः सरोजन किरीटमहरप ततो म्पती यात • ४. शापि मापनीय विटिमविकत ममस्या पेप गत पुल. पूर्ण राम कर लोपीविरम ३. मुकरमपान समाप कणं शिगे पर पाप समय मो मुख रमे स्वमा हतास्मि उतष चारमा पुक होकर कामन होते हैं उसीमकार वा उपमुकुट इटकरके भारत घूर्ण हुभा उस समय तीनोलाको भौशन्दोंको मनुष्योने सना और मुनकर सब पाहता गिरहे । १ ९ना सिटीभीवाश्यामरंगवाता पार्थ ऐसा शोभायमानामा मैसेकि नगीन सन्दुमा पर्वतका ऊंचा विसर. होताई.इसके अनन्तर पहा से सीत भर्नुन अपने शिरके बालोंको अतरसमे पाकर पंसा प्रकाशमान दुभा जैसे कि शिरपर वर्मपान सप्पैकी किरणवाला उदयामल पमंतवाद । ४० । मुपके पुत्र कर्णके भेनेपे नेत्र रुप कान रखनेवाले दुःखसेरदा करनेपाल सर्प पुत्र प्रमोन सपने मस्सा बोनसी वागोरोंके समीर शिर खनेकामे भर्नुन को देखकरभी वहीतीमता से नापको भरने से असामर्थ होकर उम इन्द्रक पुष अर्जुन के मुकुटो जो कि भगीतसे भलंकन भूकसमान महाशमानया रणकिपा भार वाणोड़नसे सपंको मानकरनेराला भजन सर्पको न पायर मृत्यु पापीन न मा II कणको भुनामे गंदामा भाग्न मूर्यरूप को गरतीर में पाप का शायक मोर उसमें परेश करनेवाला अर्जुन का शत्रु पुकुट को पार करके पनागपातर मर्जुन कंउस पुर्ण नटिव पुगुटको समका Dain, the dialele fejl down on curtha aad sus broken into puxva. The people of the tbred worlds heard a crah od loll down. Depriroud to Jislem, Arjoa of dark alour lokal glorious liko a wowotain ao lo tiada wbito cloth to his bair and then lokal lito mogat Here with tas jo shiaia, orce it, in. The terpeat sont witbese rror UKam, cono by Arjun's head, but being unable to touch it by lumina Jardi, lo louk oT 1.19 d'adow which was bright like Mussia. Arjua manthasahle to oucip death. Thoamwbright and tho Sia or Ers, dixebvzal by Kanan, and tho cesag hijos is it, Wok Arjaa'. dicam Ilavio, warnt Wodielen mod dcsirous of ackrivatta griter zin, he nid to Karan " I was discharget aarakesatsbygustthniore could not catorArjua's best Hit (0719) (६७७१३ कर्णपक्ष Karan :'ars ॥ ४ ॥ स धमका युधि ममपुत्रस्तमप्रचीत फोमवानुग्ररूपा । नागाँनयोविधि Fame मां पान मातुर्घघजातघरम् ॥ ४५.॥ पंदिस्वयं पधरोस्स गाम तथापि थाना पिहराजवेश्म मावमस्थाः कुरु मे -यचाय. निम्मि सधु तब मुञ्च मो दुतम i) ५६ ॥ कण उघाच! न नाम कर्णोध रणाय बायबलं समास्थाप जयं दुगतान सन्दध्यां द्विः शर क्षेष नाग यघर्जुनामां शतमेष हग्याम ॥ ४७ ॥ समाह 'कणः पुनरक नांग सदाजियध्य रविमनुसतमः । व्यालाल साँसमयस्तमम्युम्बिास्मि पार्थ समुखो प्रजत्यम् ॥ ४८ ॥ इत्येवमुको युधि नाग राज कम रोशवसहस्तु पाक्यम् । स्वयं माया पायवधाय राजन करवेपुरूष विजि बांसुरुमः ॥४९॥ कृष्णस्ततः पार्थमुधावसंख्ये महारग इतर जहि स्वम् । स पष भरमकरके उसने फिर तूणीरमें जानाचाहा और कणसे बोला कि कर्णमैं दिना विचार कियहुये तेरे हाथसेछोड़ागया था इसी अर्जुनके शिरको न काटसका अव तु यद्धमें अनुनको अच्छेमकारस लसकरके शीघ्रता सेमुझको छोड़ मै अपने और तेरे शत्रु अर्जुन को अभी मारूंगा । ४४ । यह बचन सुनतही कर्ण उससे पोलादे श्रेष्ठ म कोनहो सर्प ने कहा माता के मारने से मुझ शत्रुता करनेवाले को अर्जुन का शत्रु भानों । ४५ । चाहे उसका रतक इन्द्रभी होजाय तौभी मैं उसका यमलोक में पहुंचाऊंगा । ४६ । कर्ण योला हे सर्प अब कर्ण युद्ध में दूसरेके बलसे अपनी विजयको नहीं चाहता है और एक बार वाणको चढ़ाकर उसको फिर दूसरी बार नहीं चढ़ाऊगा में अकेलाही एक अर्जुन नहीं जो ऐसे २ सौ अर्जुनभी होय उनको भी मारसंक्ता हूँ। ४७ । यहकहकर सूर्य के पुत्रों में श्रेष्ठ कर्ण युद्धभूमि में फिरभी उस सर्पसे बोला कि हे सर्प मैं अखक वा क्रोधयुक्त किसी उत्तम उपायके द्वारा अर्जुनको मारूंगा तुम खुशी से चलेजाओ । ४८ । कर्ण के इस वचनको उस सर्प ने क्रोधयुक्त होकर नहीं बना और अर्जुन के मारने की इच्छा से वह सर्पराज अपने निज स्वरूपको धारणकरके. भापही अर्जुनके मारने कापला । ४९ । तदनन्तर श्रीकृष्णजी उस युद्ध भूमि में अर्जुन से बोले कि तुम Arjun again with a good mark and I shall kill your enemy. ing board this, Karan' said to him, " Who are you !" To this the serpent replied, " My mother tas slain by Arjun and therefore I am 45. I shall send him to the region of Yam, even if ha is protected by lodra, " At this Karan remarked, " Karab dhe pot like to gain victory with the help of others. I donot use the same arrow again. Alone loan slay hundred Arjnas." Having said this, Karan further said.to him, I shall slay Arjun with some other weapon. You may go away with pleasure. The enreged-serpent did not hsar Karan's words and in his natural form he went on to siny Arjun. Then Shri Krishn said to Arjun, " Slay the serpent » Hav- 'bis enomy.
. . (6730) Maliabharat !६७८०] मृतो मधुसदनन गाण्डावधन्या निधन्या : उवाच कोन्धेष ममाद्य नागः स्वर्ष र भायात् गरहस्य धक्तम् ॥ ५०॥ कृष्ण उवाच । योसी त्वया ब्राण्ड चित्रभानु सम्त, पंणन घरंपा । वियतो जननीगुप्तवेदी मत्वरूपं निहवास्पमाता ॥५१॥ स एक ते रमनुस्मान ये स्वागध धागाति पाय पार्य । नभश्च्युतां प्रज्वलिमा मिगलका पश्यनमायान्त ममित्रसाह ॥ ५२ ॥ ममय सपाघ । नतःस जिष्णुः परिवृत्त रोषा धिरंदण्ड गिनिशितः पृषमा मागं पियनियंगियापमं सछित्रगाश्री निगपात भूमी ॥ ५३ ॥ एते तु तस्मिन् भुजगे किरीटिना स्वयं धिमः पार्थिव भूतलाथ । समुजदागशु महाभुजः स तं रथं भुजाभ्यां पुरुषोत्तमः पुनः ॥ ५४॥ तस्मिग्मुहूर्ते दशभिः पत्फःशिलाशित पहिणघयोजितः । विव्याध फर्ण- पुरुषप्रवीर धनञ्जय इस शत्रुता- करने वाले पड़े सर्पको मारो श्रीकृष्णाजी के इस वचन को सुनते ही शत्रुके बलका न सहनेवाला बह: गांडीव धनुषधारी अर्जुन यह वचन बोला कि यह सर्प मेरा कौन है जा आपन भाप गरुड़ के मुखमें आया है ।। ५० ! श्रीकृष्णजी ने कहा कि सांडववन में अग्निके सप्तकरनेशले तुन धनुषधारी ने इस आकाशमें वर्तमान अपनी मातासगुप्त शरीरवालेको एकरूप जानकर इसकी | माताको मारा था उसीके कारण से उस शत्रुताको स्मरणकरता निश्चयकरके मारन के लिये तुझको चाहता हे शत्रुके हँसनेवाले . तुम प्राकाशसे प्रज्वलित उल्कापातके समान उस पानेवासे सर्पकोदेखो। ५२ । संजय बोले कि इसके पछि उस अर्जुनने महा क्रोधक होकर बड़े तीक्ष्ण उत्तम छ.वाणों से उस सर्पको जो भाका से तिरछा होकर पा रहाया काढाला. फिर वह अंगों से कटाहुमा पृथ्वीपर गिरपड़ा । ५३ । अर्जुन हाथसे उस सर्प के मरनेपर आप समर्थरूप पुरुषो चमनी ने उस गिर भौर घुसेहुये रथको शीघही अपनी दोनों भुजाओं से ऊपरको उठाया । ५४ । उसी मुहूर्त में मर्जनको तिरछा देखनेवाले पुरुषों में बड़ेवार कर्ण ने उपपेक्षधारी दशपृषकों से फिर भर्जुन को व्यथित किया। ५५ । तब अर्जन ने भी अच्छेप्रकार से जोड़ेहुये वराह कर्णनाम वारह तामणवाणों से कर्णको घायल which is your enemy. " Arjun the destroyer of foes and bearer of the Gandiv, said, "Who is this snake to me ? Why. is he falling in the mouth of a garur?" To this shri Krishn replid, " Trying togratify Agni ia the Khandar forest, you hit his mother who was hiding bım. Remembening that enmity, he is coming on to slay you, Jhook at it coming down in air like a meteor." Sanjaya said, ":Arjun in. great rage, cut down the serpent with six sharp arrowe, and it fell down on the ground. At the fall of the spake,. Krishn raised up the car with his armis. In the meantime, brave Karan-throwing side gladeus at arjun, wounded bim witá ten sharp arrows.'Arjun waunded hing with twelve arrots in return and discharged anothor":from his bow drawn (6781) (६७८१) कर्णपणे Karan Paray तिववक्षामाणः ॥ ५५॥ ततो नो द्वादशभिः सुमुक्त राहणे निशिता. समय । माराधमाशीविषतुल्यषेगमार्ण पूर्णायत मुरसस । ९६ ॥ स चित्रवर्भपुषरो विदार्य प्राणास्थितिष साधमुकः। कर्णस्य पारषा रुमिर. विषेश धमाघ शोणितदिग्ध पाज:॥५७वत पूषो वाणनिपातकोपितो महारगो दण्डषिहितो यया तदाशुकारी भ्यरातमान महाधिषः सर्प घोडमन पिपर॥५८३ जनाईनं वादभिः परा भिननवाया व शरैस्तथानुनम् । शरेण धोरण पुनश्च पाण्यवं विभिध कायन दरजहास व ॥५९॥ तस्य हर्ष ममृषे न पाण्डयो विमेद मीणि ततोस्य मर्मवित् । परशतैः पत्रिमिरिन्द्रविक्रमलया पधेन्द्रो पलभोजसाहनत् ।। ६०॥ ततः शराणां नर तीनवार्जुनः ससकर्णेन्तकदण्डसभिमास शाधिवतनुः प्रविन्धये तथा पया पविदारितोषकः मणिप्रषकोसमनहाटकैरलंकृतं पाप परामस्षणम् । करके विषया सर्प की समान शीघ्रगामी कानातक बँचेडुये नाराचनाम बाणको छोड़ो। ५६ । वह अच्छीरीतिसे छोड़ाहुआ उत्तम वाण कर्ण के जड़ाऊ कवचको चरिकर मानो प्राणोंको घायल करबाहु आ कर्ण के रुधिरको पकि रुधिरमें लिसहोके पृथ्वी समागपा५७।इसके पोछ वाणके भायातसे कर्ण ऐसा क्रोधयुक्तहुआ जैसे कि दाहस मेरित होकर यहां सर्प मोधरूप होताहै तबतो शीघंता करनेवाले कर्याने उत्तमबाणोंको ऐसे छोड़ा जैसे कि विषधर सर्प अपने विपको छोड़ता है।५८ाउस समय कर्णने बारह पाणसे तो श्रीकृष्णजी को और निम्नानवे वाणों से अर्जुन को छेदा फिर कर्ण घोर वाणों से अर्जुन को घायलकरके गर्जना पूर्वक हंसा । ५९ । वय उसके उस हास्यको न सहकर उस मर्मज्ञ अर्जुन ने उसके मयों को छेदा इस इन्द्र के समान पराक्रमी भर्जुन ने सैकड़ों वाणप्ति ऐसे बेगसे छदा जैसेकि इन्द्र ने राजा वलिको छेदाधा । । इसके अनन्तर अर्जुन ने यमराजके दण्डकी समान नव्वेवाणों को कर्ण के ऊपर छोड़ा इन भर्जुन के वाणों से विदीर्ण शरीर वहकर्ण ऐसा पीडामानामा जैसे कि वज्रसे कगाआ पर्वत पीड़ित होता है । ६१ । और अर्जुन के बाणों से टूटाहुआ इसका सुवर्ण हारों से जटित मकाशमान मुकुट वा 56. That arrow, carefully discharged, priorced Karan's armour and wounding as if it were his very soul, drank his blood and fell down on the ground. Boing bit by that arrow, Karah yaa. enraged like a serpont kit by a stick anu discharged arrows.lika, poisonous serpente. He pierced Krishn with twelve arrowa and Arjun: with ninety pine, Having wounded Arjun with arrows, ho laughods with a loud roar, Unable to bear his oremy's laughter, Arjun bit, him with bundieds of as rows as Indra had picrced Bali, 60. Then Arjun discharged ninety arrops at Karan. Wounded by Arjun's arrows,* Karan yas afflicted like a mountain bit by vajra, His jewelled diadem broken down by Arjun's arrows and his well-made to tho car:
[6782] Mahabharat (६७२ मामु यो निपपात पैत्रिमिदम्जयमोत्तमकुण्डलEिRAमहाधम स्लिप प्रयत्नतः कृतं तदस्योरमबर्म भास्वरम् । मुदीर्घकालेन ततोष पारमा समेत पाने बहुधा यशातयत् ॥ ६३॥ सते विधर्माणमयोहममिः शिवधातुभिः कुपितः परामि मत् । स विध्यपत्ययमारप्रसारितो पथातुरः पिचकफानिलः । १४॥ महाधनुमण्ड जानिास्तः शितः क्रियामयलपस्तिवलेन च वक्ष कर्ण: वाभिः रोचमेविमर मर्म स्वपि वाजनस्वरन् ।। ६५ । राहतः पत्रिीमरुप्रवेग: पान कों विविधः पिता कमी गिरिगरिकधातुंरत क्षरन प्रपातरिव रकमम्मः ॥ ६६ नि बर्ष मम ने मुवर्णपुर मारपस्मयः। पमाग्निदण्डप्रतिमः स्तनास्तरे मिनद कोथमि पादिमाग्नः ६५.: ततः शराषामपास्म सतजो धनश्ध सशरासनोपमम् । ताप अस्पो र मुमोडास्त्रले प्रशाणमुधिः ममशातुरस्तदा ॥ ६८ ॥ अर्जुनस्तं. संमत दोनों कुण्डल और बड़े मूल्यवाला घड़े उपायों से अाई कारीगरों का बनाया हुमा कवचं यह सीनों कटकर पृथ्वीपर गिरे इसके पीछे फिर कोषभरे अर्जुन ने बस कवच रहित खाली शरीरयाले कर्णको चार वाणवाणों से दा किर शत्रु के हायसे अत्यन्त घायल कर कर्ण ऐसा अत्यन्त पीडामान हुआ जैसाक बात पित्त कफैसे ग्रसित रोगीपीड़ित होताहै । ३४ । उस समय बीप्रवा करनेवाले अर्जुन ने बड़े धनुष मंगलसे निकलेहुपे और बड़ेउपाय पूर्वक कर्मसे बनाये । बहुतसे उत्तम वाणों से घायल करके मर्मस्थलों कोभी छेदा। १५ । मर्नुन के बड़े भगवान तीक्ष्ण नोकवाले नानाप्रकार के बाणों से अत्यन्त पाप कर्ण ऐसा गोमा पमान हुआ जैसे कि पहाड़ी धातुओं से लासपी का पर्ववपनों के प्रभारोंसे रक जिलों को छोड़बाहुआ शामित होताहै । ६६ । इसकेपाछे अर्जुनने सीधे चलनेवाले बड़े बदरूप धन्दरतसे छोड़ेहुये लोहे के यमराज और भग्निके दणके समान नौवागोंसे कर्णको ऐसे छातीपर छेदा जैसे कि भग्निके म स्वामिकालिंजी में चपर्वत को छेदा था। ६.1 जप्त समय सूतपुत्र तूणीर को और इन्द्रधनुष के समान उस धनुपको त्यागकर रथके ऊपर अचेतहोकर गिरतानुमा नियम हुमाजिसकी बटूठी फेसगईथी और अत्यन्त घायल था.१६८॥ तव उधम पुरुषों के व्रतमें नियंत्र armbur and ear- rings fell down on eartb. He then pierced the ormaatiess body of Karan with four arrows and afficted him and dor pid nad af do a aick zaz.' 64 Arjoa quickly discharged taany more fowa from his bose and wounded him in the tital parts. Wounded by his barp arrows, Keran looked glorious like a mountain, fronte bich red mineral water Howe. Then Arjun wounded hit with nine iron arrows, like the staff of Yam or firo, on the breast, is the son of dgni bad piérred Krannch mountain. Having laid mida bis 'quivor and tor, Karan became insonsible wilh betatretched hands. Arjun did not lika to slay bisenemy in trouble. Brisbnthen said bím . - (6784) Mahabharat (६७८५) गरैः शरीरे पहुभिः समर्पितो विभाति कर्णः ममरे विशाम्पते । महादेवि तसान कन्दरो यथा गिरीन्द्रः स्फुटकर्णिकारवान् । ७५ ॥ स बाणसंधान बहुशो व्यास खन विमाति कर्णःशरजालरश्मियान् । सलोहितो रतगतिमण्डलो विषाकरोली भिमुखो यथा तथा ॥५६॥ बाध्यतरादाधिरयोर्षमुकार बाणान्महाहीनिष दीप्यमानार ग्यध्वंसपनार्जुनवाहुमुताः शराः समासाद्य दिशः शितामाः ॥ ७७ ॥ सर्णः समबाप्य धैग्य वाणान् विमुञ्चम कुपिताहिकल्पान् । विव्याध पाय दशभिः पृषत्केः कृष्णञ्च पभिः कुपितारिकल्पैः । ७८ ॥ ततो महेन्द्राशनितुल्यनिस्वन महाशरं सर्प विधानलोपमम् । मयस्मयं रौद्रमहाखसम्मत महापेक्षेप्तुमना धनन्जयः।। ७ कालो झवश्यत्वप यिप्रशापं निदर्शयन् कर्णरयं वाणम् । भूमिश्चक प्रसतीत्यवोचत कर्णस्य तस्मिन् यघकालेप्युपान्ते ॥ ८ ॥ ब्राझ महासं मनास प्रनष्टं पन्नागपोस्मन ददी महात्मा । बामञ्चकं प्रसते मेदिनी स्म प्राप्त तस्मिन् पघकाळे नवीर ८१ शोभायपान हुआ जैसे कि सोसे पूर्ण वन अथवा कन्दरा और प्रफुल्लित कर्णिकार के वृक्षों से युक्त गिरिराज शोभित होता है । ७५ । वह वाणं जालरूप किरणोंका रखनेवाला कर्ण वाणों के समूहों को छोड़ताहुआ ऐसा प्रकाशमान था जैसे कि अस्ताचल के सम्मुख रक्तमंडळवाला मूर्य होता है । ७७ । अर्जुनकी भुजाभों से छोड़े हुये तक्षिण नोकबाले घाणों ने दिशाओं को पाकर । ७७ । कर्णकी भुजाओं से छूटेहुये सर्परूप. प्रकाशित वाणों को पराजय किया इसके पीछे क्रोध युक्त सो के समान पाणों को छोड़ते हुपे उस कर्ण ने धैर्यको पाकर क्रोपयुक्त सर्पकी समान दशवाणों से अर्जुन को और छः वाणों से श्रीकृष्णजी को पाड़ित किया 1.८ । इसके पीछे बड़ा बुद्धिमान अर्जुन कठोर शब्दयुक्त सर्प विष और अग्नि के समान लोहे के भयंकर वाणों के फेंकने में प्रवृत्तहुआ। ७९ । हे राजा फिरतो भदृष्टगुप्तरूपकाल ब्राह्मण के क्रोधसे कर्णके मरने को कहनेवाला हुमा कर्णके मरने का समय मानेपर यह वचन बोला कि पृथ्वी स्थकेपहियको निगलती है.१८०। इसके पीछे वह. महात्मा परशुरामजी के उस दियेहुये अस्त्रको भी चिचसे भूलगया हे.वार धृतराष्ट्र उसके मरणका समय आनेपर उसके स्थके पहियेको पृथ्वी न पकड़ा। ८१ । तंव उस उत्तम ब्राह्मणके शापसे उसका स्थ घूमगया और रथका arrows for ays, Karan' was glorious to behold like the red orb of the Sun at sunsento Discharged from Arjan's arms, the sharp pointed arrows overcame those discharged by Karan. Discharging serpont liko arrows in bis rage, Karan Founded him with ten arrors and Krislin with six Wise Arjup thend scharged hard-sounding arrows,like serpents or fire, ma le ofiron. An, yaseen voice predicted the death of Karan by the curse of the'Brahman. At the approach of Karan's death, he said, Mlub the earth take hold of the wheel of Karan's car.180. At this, Karan.forgot the use of the weapon given to him by Parashuram. At .
[६७८५) 16785 कर्णपर्व Karan Paray 5) ततोरणे विवानरेन्द्र शापाचवा प्रामणसत्तमस्य । सबैतिकीय सातिमा मुपपिसो भूमितले निमग्ना८२ ! अणे रये माणस्यामिशागदामादुपासप्रतिमाति पा। छिन्ने शरे सर्पमुख व घोरे पार्थेन तस्मिन विषसाद कर्ण मृष्य माणो व्यसनानि तानिरस्ती विपुषन् स विगईमाणः धर्मप्रमामानाभिपातिधर्म हब हवन धर्मपिता सदैव ।। ८४ ॥ अयम्घ निरय प्रयतम धर्म धर्नु पधाशपिरष यथाभु तस्पसबापि निघ्नाति न पाति मकान्मन्येन नित्य पारपाति धर्मः॥ ८५ ॥ बन प्रावलिताश्यसूतो पिचापमानोर्जुनधाणपातः । मभिधाताछिपिलक्रिया पुनः पुनर्षममगईदाजी ।। ८६ ॥ ततः शरीमतरंगविष्यत्रिभिराए । रस्ते कृष्णं तथा पार्थमपीवध्यद सप्तभिः॥८७॥ ततोर्जुनः सप्तदश तिग्मगानाजिह्मगार हा पहिया पृथ्वी पर गिरपड़ा तब तो वह कर्ण युद्धमें ऐसा व्याकुल विच हुआ मैसे कि अच्छेपुष्पवाला वेदिकासमंत पेसनाम वृक्षभूमि में डूबनाता है । ८२। ग्राम के शपसे रथ के घूमने और परशुरामजी से पापहुये अनके विस्मरण होनेपर 1८१और अर्जुन के शयते सर्प मुख प्रकाशित घोरयाण के गिरनेपर न दुखों को न सहनाला कर्ण दोनों हाथों को कंपायान करके इसवावकी निन्दा करनेलगा कि धर्मश लोग सदैव इसवातको कहाकरते हैं कि धर्मकरने वाले का धर्म उस धार्मिक पुरुषकी सदैव रताकरताहै । ८४ । और हम पराक्रमी लोग उनके कहने के अनुसार विश्वास पूर्वक धर्मकाने में उपायों को करते हैं सो मेरी बुद्धिगे वह कियाहुया धर्म रसानहीं करता है किन्तु अवश्यमारता है किन्तु अवश्यमाता है भक्तों की रक्षा कभी नहीं करता है यह मैं मानता कि धर्म सदैव रक्षा नहीं करता है । ८५ । इमरीति से घोड़े और सारथी से १५ और अर्जुन के घाणों से प्रत्यात चेष्टा- वान मौर मर्मस्थलों में अत्यन्त घायल होने से कर्म करने में शिथिल हो. का वारम्बार धर्मको निन्दाकरी । ८६ । इसकेपछि अत्यन्त भयकारी तीनवाणोंसे युद्ध में श्रीकृष्ण जी को हायपर ऐदा और अर्जुनको भी सातवाणों से । ८७ । the approach of the time of his death, the partis caught hold of the wheel of his care. By the curse of the Brahman bis car reeled and the wheel went down into the earth. Beset vith that calamity, Karun looked like a Chaitya tree in Lloom standing on a platform. When the car hud reeled by the curse of the Brahman and Karan had forgot thouse of Parasburam's wonpin and Arjun had slain thoserpent, Karan, unable to bear the weight otcalamitice, wirod his hands, saying, "Virtaous,msa always say that dharu protects, We try our best to practixa dharw, but I am of opinion that dharro, instead of protecting, Acculerates the death of him wbo practices it,85.. It perer protects ius dopoteeg." Thas deprived of horses and driver and escoedingly wounde od by Arjun's arrows with tired limbs be again aod again abased -. (6786). Wahahbarat शनिसमान घोरानसजत् पापकापमान् ॥ ८८.। निभियत भीमदेगा पतन पषिषी तलं । पितारमा तत: शक्रया धामशेषत् ॥ ८ ॥वलेलाय संतान ब्रह्मासं समुभीरपत् । ऐन्द्रं नताजुनवापि तदरवाभ्युपमानयत् ॥ ९० । गाडी ज्या वाण सानुमन्य पापा असारमानि वाणीष पुरस्परः ॥ ११ तयलेजोमया वाणा रपान पार्थस्य निस्ताः । प्रादुरासम्महावी-कर्णस्वायत कात् तान् कासवप्रतो म्यताम्माधिक महारय । ९९ ॥ तताबारपणिवीरता स्मित विमाशित विज्ञान परंपार्थ राधेयां प्रसत शराम् ॥ १३ ॥सता झाला मध्यमः समन्य समयोजयत् । खादविरवा दियो चाणक प्रत्यस्यदर्जुनः ।। १४॥ सतः कर्णः शिनाणेविच्छेद ज्या मुतेजनः ।हितीयार तायामों परचमी इसके पीछे भर्जुगने कठिन वेगयुक सीधे चलनेवाल इन्द्र बजके समान घार पग्निके समान सन्चर पाणाको छोड़ा यह भयानक वेगवाले वाण उसको अंदकर पृथी पर गिरपड़े। ८८ । तदनन्तर अपने शरीरको कम्पायमान करते हुये कर्णने अपनी | सामध्यसे चेष्टाको दिखाया। ८९ । फिर इससे अपनकोसायका प्रयासकोसकट- किया फिर अजुनने भी उस अमको देखकर ऐन्द्रासके मन्त्रको प्रहा फिर उस धन नपानेवाले ने गांडीवधनुष मत्ांपा और वापर मन्त्रको पदकर वाणों की ऐगी वांकरी जैसे कि इन्द्र जलकी दृष्टिको करताहै । ९१ । इसकेपी भर्जुन के इथसे निकलहुये तेनरूपी पराक्रमी वाण कर्णकं रयके समीपमाकर मकट हुये फिर महारथी कर्णने अपने छोड़ेये बाणों से उन घाणों को निष्फल करदिया ॥ ११ ॥ इस पीछ उस भटके दूरहोनेपर वह वृष्णी वार श्रीकृष्णभी बोळे हे अर्जन तू परम अन को छोड़ क्योंकि कर्ण वाणोंको निष्फल करेदेता है। १३ । इसके पीछे ब्रह्मास्त्र के ग्रमन्त्रको पढ़कर चाणको क्षमपर भड़ाया और कर्णको बाणों के हकर उसपर फिर वाणों को फेंका । ९४ । तपकर्णने, मन्दर वेतपाल तीक्ष्ण पाणों से उसकी प्रत्यञ्चाको काटकर पाली दूसरी तीसरी चौधा पांचवी छठी सावी भाठवीं नामी दशवीं ग्यारावी प्रत्यञ्चाको काटा परन्तु ग्रहकर्ण उसहजारों Dharur. Then h: pierced Shri Krisha with three arrows on the arms and Arjun with seven, Then Arjun discharged seventy dreadful arrowa like file, going straight like the vajra of Indra. They pierced him and fell down to the grourd. With trembling body, Karan displayed bis activity to the utmost of his power, Steadying him. self with great exertion, he isvoked the Brabmastra, Boeing this. Arjun invoked the weapon of Indrs, and muttering aphorisme over the arrows and bowstring of the Gacdiy bow, bowerod kis darts like rain... The gloriona snd powerful arrows coming out of Arjun's car, pronred near thator Karer, bus they were made-amlenby the batter. At this Shri Krishn the Vrishni varrior mide Wiecher go [१७८७) कर्णप, Karan Pary (6787] वणा ॥१५॥ षष्ठी मशास्य विपद सी सी न सयाकारणी ताज्यात शतसम्यान सकायत १६ । नो माग भाषापामार पासवः शरैरवाकिात कर्ण दातार रुगरिय ९७ • तस्य स्थापनको पारमामा संयुगे । नायबुध्यत शीरया सबझन मियामपत १८. भरमाणिराधेया प्राइना सम्पहा: बभ्यधिकमामानं माय प्रतिमन ॥ ९९ ॥ ततः कोऽर्जुन एषाकर्णालणाभिपीड़ितम | मध्यमत अबीद पायमातिष्ठान मतमम tornamsrयमासाश सपिशोपमम् । मामलारमपं दिसमनुमध्य पनमः ॥१०॥ द्रमा समाधाय झेप्नुकामः किरीट पार सोमसम्महीप राधेप तदा नप ५१.२॥ प्रस्तषस्तु राधेपः कोपावर समय । ममम्मामी को मा सम पाडय ॥ १॥ सन्य कामही प्रत्यंचा चढ़ानेवाले को नहीं जानताया। १६ । वदनन्तर मनुन ने दूसरी प्रत्यंचा को अनुपपर पाकर मन्त्रों से भाभमन्त्रितकर सो की समान प्रकाशित बाणों से कर्णको कदिया । ९७ । कर्णने उसकी मत्यंचाके टूटने और भदाने को इस्त लापरता के कारण नहींजाना यहमी भाभर्पसा हुआ । ९८ र कर्ण ने अपने बासे मन के को रोककर पापळकिया और अपने पराक्रमका Ram दिखाकर उसने मनसभी भकिमकिया । ९९. इसकेपछि श्रीहष्णजी कणिक भबसे भजनको पालामान देखकर पोले कि चलो अन्य पाणों को मेरित करके चलाओ । १०० । इसकेपछि शत्रुसवापी मर्जुन भानि की समान पोरपिंक समान गोके दिग्प पायोंको भभिमन्त्रित करके । १०। ट्रभक्षको चामर शेरने को उपस्थित हुभारेमा उसीसमप पृथ्वी ने कणके रप चक्रको निगला .१०२॥ घकपात कर्णने कोषकरके अश्रुपावों को डाला और अर्जुन से कहा कि पारव थोड़ी देर क्षमाकरो । १०३ । मर्जुन देवयोगस इसमेरे वामरपकं पफको पृथ्वी the best of your weapons. Arjus, for Karan makes your arrowa fruitless." Then he uttered the mantra of Brabmastra and put an arrow to his bow. Ho again covered Karan with arrows. The latter cut olevon bowatrings of Arjun ia succession, but each timo ho say hin ready with a non ona96. Then Arjun putting a new tring to bin bow he covered bis ad pertory with arturf, Borso did not know how Arjun was able to pat dow stringe to his bow and this is a Turdar Kuran agaia chinoked Arjun's weapons with his own and wounded him. He showed bis prowess superior to that of Arjun 8:0ing beim wounded by Raran's arroRI, Vasuder aid. "Di-c'arge oilier Feapons," 100. Having utlarad mantrat over his icin arrow jika tonomous sorpcata, Arjun was ready to discharge Rudra's weapor, when the wheel of Karan'a cor stuck iato the earth At this Karan (6736) .. Alahabuarat शनिसमान धारानहत् पाएकोपमा ८ निर्मित भीमवेगा पपतन पपिपी तलंपितामा तत: शाशमापद ८१ ॥रसेनापस संतान ब्रह्मासं समीरगत । कै नाजुनवापि तामाभ्युपमानयत् ॥९० गाणी ग्याध बाग सानुमन्मय पान मसारमषाणि वराणीप पुरदर॥ १. सपनेशीमया पाणा रपात् पार्यस्य निस्ताः प्रादुरासम्महावीच्या कर्णस्परपर्मलित भारतान कसषमतोम्यतामांचक महारप ॥ ११ ॥ सताबोष्णिवीरत स्मिन्न विनाशित विषमान परं पाई राधेयो प्रसते शान ॥ ५५ ॥ तमासा मम्पमा समय समयोजयत् । सारपिया दियो बाणःसणे. प्रत्पस्यदनः ॥ ९॥ वतः कर्णः शिनलिमिद या मुजरतीयास तीमाओं पथमी इसके बारे भने कठिन वेगक सीधे चलनेवाल इन्द्र गजके समान घार मग्निके समान सघर पाणाको छोड़ा सा भयानक वेगवाले वाण उसको दर पक्षी पर गिरपडे । ८८ । वदनन्तर अपने शरीरको कम्पापमान करताये कर्णने अपनी सामध्यप्ते पेष्टा को दिखाया। फिर पससे अपनकोसाभकर प्रमाको प्रकर- किया फिर मजुनने भी उस अमाको देखकर ऐन्दास मन्त्रको प्रा फिर उस शन नपानपाल ने गांडीरवनुष मत्था और वायपर मन्त्रको पाकर वाणों की देशी पाकरी जैसे कि इन्द्र जलकी सृष्टिको करता है । ९१ । इसकेपी अर्जुन के श्यस निलये नरूपी पराक्रमी वाण कर्णक रपके समीपनाकर मकट हुये फिर महारथी कर्णने अपने छोड़ाये बाणों से उन पाणों को निष्फल करीदिया । ११ । इस पछि उस मटके दूसरोनेपर वह कृष्णी बार श्रीकृष्णभी बोळे अर्जुन परम | अन्नको मोड़ क्योंकि कर्ण वानाको निष्फल करेदेता है। इसके पी बहन के उग्रमन्त्रको पढ़कर वाणको पक्षपपर. बापा और कर्णको प्राणों के बाकर उसपर फिर वाणों को फेंका । १४ । तबकर्णने सदर येतात तीक्ष्ण पाणों से ही प्रत्यञ्चाको काटकर पाली दूसरी सीसी चौधा पचिर्वी श्री सावी भाठवीं नामा दशनी ग्यारा मत्सम्याको काटा परम्नु बारूर्ण उसमारों Dharm, Thea h: piorced Sbri Krisha with throe arrows on the armu and Arjun with saved. Then Arjon discharged sorenty draadlul arrows like fine, going straight liko tho vajra of Indra. They pierced hira and fell dong co the groued. With trembling body, Karna displayed his activity to the utmost of his power, Sleadging him. wil with great exertion, be invoked the Brahmutra. Swing this Arjun invoked lha wespon of Indra, sad muttering aphorisms over tha arrows and towstring of the Gardiy bow, showerod his duto like ruin. 91. The gloricua sad powerlal arrows coming oat of Arjan's Cr, Preord boar that of Karus, but they were made by the botin. At thia Shri Krishn tbs Vriskai varrior wide Discurgo ।
[१७८७) कर्णपy Karan Pary (6787] तया ॥१५॥ बही मयास्य विकलंद सजन तथा . REHTM उपायकादशीं । ज्याशतं शतसम्मानः स कण नाधयुध्यते । ९६ तो जाम भाषायाम पाराशरणादि कर्ण होताव रुगरिय ९७ ॥ तस्य स्पादन कणों स्पावधान संयुगे । नाम्यम्पत शीघ्रस्खा तरसत मियाभवत xse मरमाणि राधेमा प्राहमत सम्यसाधना! चयधिकमात्मानं स्वार्थ प्रतिवमन् ॥ १९ ॥ ततः कोऽर्जुन रप्टमा कर्णालणा भिगोदितम् । मायस्पत्य जीव पायमातिष्ठान मनुत्तमम् ॥ १॥ ततोऽन्यमालिश कुछ सपंपिशापमम् । भश्मसारमपंबिम्बमनुमय धमाजपः ॥१०१॥ तंद्रम समाधाय क्षेप्नुकाम: किरांट बाद तोरसम्मही वक्र राधेयरुप तदानप ॥१.२॥ मस्तचक्रस्तु राधेयः कोपावर परपिता म मम्मामात कणों मुह सम पाण्डप ॥ १३॥ सम्यं च मही प्रत्यरा बढानेवाले को नहीं जानताथा । ९६ । तदनन्तर अर्जुन ने दूसरी प्रत्यंचा को धनुषपर पढ़ाकर मन्त्रों से आममान्त्रतकर सो की समान मकाशित वाणों से कर्णको कदिया । ९७ । कर्णने उसकी मत्यंचाके टूटने मौर कढ़ाने को इस्त लापरता के कारण नहींजाना पहमी आमर्पसा हुआ। २८ । पार कर्णन अपने शबास भर्जुन के अलोको रोककर पायलकिया और अपने पराक्रमको प्रभ दिखाकर उसने भर्जुनसभी भकिमकिपा । ९९ । इसकेपछि श्रीहष्णाजी कर्णक भतसे भजनको पीडामान देखकर बोले कि चलो भाप पाणों को मेरित करके चलाओ। १००। इसकेपछि शत्रुसंतापी भर्जुन भानि की समान पोरसपके समान गौके दिग्य पापोंको भभिमन्त्रित करके । १० । रुद्रअखको चढ़ाकर छोड़ने को उपस्थित दुमा रे रामा उसीसमप पृथ्वी ने कर्ण के रथ चक्रको निगला .१०२॥ चक्र मस्त कर्णने कोषकरके अश्रुपातों को डाला और अर्जुन से कहा किहे पांडव थोड़ी देर समाकरो । १०१ । हेमर्जुन दैवयोगसे इसमेरे वामरपके चक्रको पृथ्वी the best of your wespons, Arjun, for Karan makes your arrora fruitleas." Then he uttered the mantra of Bralwnatra and put an arrow to his bow. He again covered Karan with arrows. The latter cut eleven bortstrings of Arjun in succession, but each time he saw blm ready with a now one 96. Then Arjun putting a new string to his bow bo covered his adversary with arrowr. Karan did not know how Arjun was able to put dar strings to lsis bow And this r18 a Wurder Kuran again cheoked Arjua's Weapons with his own and wounded him. He showed his prowest superior to that of Arjun &seing him rounded by Karan's arrors, Vasuder said, "Di-charge other weapons, " 100. Having uttered mantras over luis iron arrow lille Venomous serpents, Arjun was ready to discharge Rudra's weapbe, when the wheel of Karan'a car stuck into the earth. At this Kami (6788) Alaliablicat प्रस्त रष्ट्या देवाधिद मम । पार्थ कापुरुषाधीर्ण. मभिसा विसर्जय। १० कीर्णको धिमुल ब्रह्मपाकृतांजली । शरणागते याचमाने न्यसयस तव प. ॥ १०५ | मघाण भ्रष्टकर भ्रष्टममायुधे तया न विश्वन्ति शस्त्राणि शराः साधु मवे स्थिताः॥ १० ॥ सच परवमो लोकं साधुवृत्तश्च पाण्डव । अभिमो युद्धधर्माण तस्मात् सम मम क्षणात् ॥ १० ॥ यावरचमिदं भूमेरुदरामि धनन्जया न मां रथस्यो भाभेठ मसज हन्तुमहति ।। १०८ नाबामदेवाचावो पा पाण्डषेय विमे पई । व हि क्षाप्रपदापादो महाकुलाषर्द्धनः । स्मृत्वा घोपदशं त्वं मुहर्स क्षम पाण्व ॥ १.१.। हात कोण करयचक्रनामे नवीनतमोध्यायः ॥ ९०. में गड़ाहुमा देखकर नपुंसकों के युद्ध को त्यागकरो । १०४। जो शूरवीर लोग कि साधुमों के प्रतमें नियतहैं वह केशों के फैलानेवाले शरणागत होनेवाल अखों के त्यागनेवाले अथवा मार्थना करनेवाले वा वाण न रखनेवाल कवच से रहित और टूटे शनवाले पर अपने शस्त्रो को नहीं छोड़ते हैं... १०६.। हे पाहव तुम लोकमे बडे शूरवीर साधुवतवाले युद्धके धम्मोको उत्तम सविसे जाननवाल हो इस किये थोड़ी देर तमाकरो । १०७ । हे महाबाहो जक्तक मैं इस गड़ पाये को नं निकाललू ववतक तुम स्यपर सवार होकर पृथ्वीपर नियत मुझ व्याकुल चिल के मारनेको, योग्य नहींहो । १०८॥ हे अर्जुन मैं तुमसे और वासदेवजीसे नहीं डरता हमार तुमक्षत्री के पुत्र और बड़ेवंशक बढ़ानेवाले हो । १०१ । इसहेतुसे तुमसे में करताई पे पाडवं एकमुहूर्च तक ठहरनामो ११० ॥ pped tears in dismay aod grief and asked Arjun to wait awhile, saying, " Seeing that by the disfarour of gods my wheel har stuck to earth, you should dot act like a cuward. Those wbo are firm on the path of virtue, do not strike people who ask for relage with dishevelled bair, or who bere laid down arms, or whose weapons are exhausted or broken and ask for shelter.' 108. You are the, best of warriorsy and knowing their dutios well, are firma on your dharm, you, may. therefore be pleased to stay awhile. Wait till I take out the wheel. Being mounted on your or, you should not strikoode wbo is standing on the ground. You should not slay me while I am in distress. I, am not afraid of you or Vasudev and you are a noble.kshastrga., I therefore request you to wait for a short time." 110. .
। (६७८२) पाप Karan Paray (67831 मजय उपाच । तमधीला मंदपो रथस्यों राधेय दिष्ट्या स्मरसीह धर्मम् । मनीषा व्यसन मिना निदन्ति देव कुटसं न तु स्थम् ॥ १॥ यत्रोपदीमक ग्राममापनायपत्यश्च सपोनराशासनानि.सीपलथन ते कण प्रत्यमा सत्र धर्मः ॥२५॥ यदा समायो कौन्तयमस युधिष्ठिरम । बक्षपशकुनि वाक्य यस्ता गरः ५३ ॥ पत्रीमसेन सघ पिपयुक्ता मोलनः वारस्यरसते राजा पर धर्मादाग धनयासे व्यतीव च फणं त्रयोदशीम प्रयच्छसि पदार क्य रो परसदा गमः ॥ ५५ पदारणापते पापनि सन्तान अमुगृहं तपा। मादीपपस राधेपासे परसबागः ॥६॥ यदा रजस्वला हा शासनको स्पिताम्। सभायां साफ व से धर्माया गत: ५७ ॥ पदा नागपुरे छप्पो कृपमाणाम अध्याप ९१ ॥ संत्रय पोले कि स्थपर चढ़े हुये वासुदेवनी उससे बोले हे कर्ण भव यहां तू पर्मको पाद करताहै आपचिमें डूबेहुये नाचलोग बहुधा सिरकी निन्दा किया करती परन्तु भपने दुष्ट कर्मको नहीं कहत ।।। हे कर्ण जव दुशासन पाकुनि दुग्योधन और तुमने एक बन्न रखनपाली द्रौपदी को सभामें मुलाया तप पा) मो धर्म नहीं दिखाई दिया । २ । जय शकुनी ने पूतविधा न जाननेवाले राजा युरिधिर को अधर्म से सभा विजयकिया सब तेरा धर्मकहा गयाथा । । । जब रामा दुर्योधन ने तो मतसे भामतन को सपोंसे और विपमिले अन्न खाने से मारना ना तब तेरा धर्म कहां गयाथा। 1हे कर्ण वनवास के व्यतीत होनेपर तेरह वर्षगांमा पाकर आधा राज्य नहीं दिया पर तेरा धर्म कहांगयाथा । ५ । अप कि कारणाम नगर में साक्षागृह में सोतेहुपे पाएडवों को अग्नि जलापातंत्र तिधर्म कांगपापा । ६ : कण जर समामे बैठकर दुरशासन के आधीन हुई द्रौपदी को मानव राधर्ष कहां गयाया। 1रेकर्ण जवपूर्ण कालमें नामों से CHAPTER XCI Sanjayn cotninudd, " Vasudor froin his car, said to Kuran, "Yol are talking of dharth Pooplo in distress and often apt w blavu God nou forget their own wickedness. Where was your dbarn gune, when you, with Bhakuri, Dushasan and Daryodhan, brought Draupadi, with only a singlu garment on her body, in the court ! \Vliese 784 pour dharm gone, when Shakuni the master of the art of gambling defeated Yudhiahllir who did not know it! Where was your daart, than Duryolza wisonal Bhim's food and caused him to be bitten by krpeats by your jostigation ? Was it dharia that the L'andarne were relusel their kingo:n eren after thirteea years of Exilhi. Wha ras your daaru, when fire was set to the hourna lewerbsrt tim Patrezrat vero elo:plug? Where was soar dan (0790) dlauablarat नाIBE! उपवासि राय पंव के धर्मस्तदा गतः ।। ८ विनाः पाण्याने शाश्वतं नरकं गताः। परितमन्य वृणीज्वेति पदस्थ गजगामिनीन। उप प्रेक्षितकारक हिषय से धर्मस्ता गत ॥ ९ . राजलुब्धः पुनः कर्ण समाहवयसि पाण्डमार। गाधारराजमाभिस्य पप ते धर्मस्म्दा गतः ॥१०॥ पदाभिमन्यु यहषो युबमा रणः परिगार्य रणे पालं वय ते धर्मस्तदा. गतः ॥ १॥ यथेष धर्ममपिने विकि सर्पया तालपिशोषणेन । अयेद धर्माणि विधा मूत समापि श्रीषा विमो यस्त हि ॥ १२ ॥ नलो क्षनिजिता पुष्करेण पुनर्यया राज्यमघाप पीरपात ! HAI स्तपा पाण्डी पाहुवीय्यांस स समस्ताः परिवृत्तलोमाः ॥१३॥ निहस्य शबून समरे प्रथजान ससोगका राज्यमघाप्नुयुस्त । तथा गता धार्थराधा विनाशं मामिगुतः दुःखित निरपराधिनी द्रौपदी को दुर्वाक्य कहेधे तब तेरा धर्म कहां गयाथा । ८ । नप द्रौपदी से तूने यह कुत्सित् अभद्र वचनकहे ये कि हे कृष्णा पाण्डवोंका नाश होगया और सनातन नरकमेगये तुम दूसरे पतिको घरो उस हाथी के समान पसने | वाली को ऐसे दुवास्प फई तबतेरा धर्म कहां गयाथा । ९ । रेकर्ण फिर जा तेन शकुनी से मिलकर राज्यका लोभी होकर पांडवों को बुलाया तेरा धर्म कहांपा जब बहुत पोबाओंने पालक अभिमन्यु को मारा तब तेराधर्ष कहांगपाया जो याधर्म ने पारण नहीं कियाथा तो अब गालबजाने से पया लाभ है मत भर चाहे जितना तू धर्म वर्णनकर परन्तु जीत नहीं पचसक्का।१२। जैसे कि पूतमे अपने भाई पुष्करसे हारेहुपे पराक्रमी नलने भाईको विजय करके फिर राज्यको पाया समिकार निर्भोभ होकर सबको जीतकर पाण्डवों ने भी अपनी प्राओं के वलसे राइपको पापा । १३ । इन पांडवों ने युदमें घड़े २ वृदियुक्त शनुमों को सोमा समेत अनेक पराक्रमासे मारकर राज्यको पाया और धर्मघारि तरोत्तमों Dushasan laughed at Draupadi in the court ? Where was your dhura when abusive laugnage was used to innocent Draupadi in the court ! Where was your dbarm when you spoke harsh worda to Draupadi and said to her that the Pandavas were dead and gone to hell and that she should choose another husband ? With the advico of Skakuni you again invited tho Pandavas for the sako of getting their kingdom. Where was your dharm, when child abhimanyu was bisin by many warriors? 11. What is the use of your nonsense talk, wher you disregarded dharm before 1 You may talk of dharm as long as you plense, but you cannot escape death, The Pandavat bara rogainel the kingdon by the streogth of their arms as Nal bad. obtained his kingdom, lost in gambling, from Pushkar his.brother. The Pandavas have got their kingdom after alaying strong foce with the help of their allies, while the gone of Dhritrashtra hare boci ६७९१) fuga Karan Pary (6791 सतत सिंह ॥ १४ ॥ साया उधाच । एवमुस्तदा की धासरेयेन मारने । लग्जामतो भूत्वा मातरं किदुकवान् ।। १५ । क्रोधात् प्रस्फुरमाणोठो यमुह स्प भारत । योधयामास वै पार्य महावेगारामः ॥ १६ ॥ ततोषीवासुदेवः कानन पुषमम दिव्यारणव निभिप. पातपरब मान । १०॥ पवमुक्तस्तु देन कोषमागासदा नः । मन्युम पशिधार स्मृत्वा स धनजपः॥ १८ तस्थ दुरपसा स्रोतोश्यस्तेजसोधिः । प्रादुरासंतदा राजस्तदद्भुतमिधामवत ॥ १९ वह समाप तत: कों ब्रह्मास्त्रेण धनाथम् । अध्ययन पुनर्यनमकरोद्रय सजने ॥ २० ॥ प्रशारणेव पार्थो घघर्ष शरपपिमिः । मखमस्त्रेण संषार्थ प्रजदार पपा २१॥ तसोन्यवयं कोन्तेपो दायतं सातवेवसः। मुमोच कर्णमुद्दिश्य तत् भजपाल तेजता ॥ २२ ॥ वारुणेन तसः कः शमयामास पापम् । जीमूतश्च विशः समेत दुष्टारमा धृतराष्ट्र के पुत्रोंन पराजयको पाया। १४ । संजप वोल कि है भातवंशी वासुदेवजी के ऐसे २ वचनों को मुनकर फर्ण ने लेज्ना से नीचा शिर करक कुछ उत्तर नहीं दिया। १५ । भौर कोधत होठोंको चाट हाथमें धनुष लेकर उस पराक्रमी घेगवान ने फिर अर्जुन से युद्धकिया । १६ । इसके पीछ पामुदेव जीपुरुषोत्तम अर्जुन से बोले कि हे महावली भव इसको दिव्य अव से छेदकर गिरामे । १७ । श्रीकृष्णजी के इस वचनको गुनतेही अर्जुन क्रोधयुक्त हमा उन पूर्ण बातों को स्मरण करके महाकोधित हुआ । १८ ॥ हे राजा तब तो को उसके सब शरीरके छित्रों से तेजकी माग्नयां मकटहुई यह बड़ा पाश्चर्य सा धुमा । १२ । इसके पीछे कर्ण उसको देखकर घलांच से बाणों की व करनेछगा फिर रथको पृथ्वी से निकालने का उपाय किया । २० वर अर्जुन भा प्रहास से उसपर बाणों को वर्षा करनेलगा फिर पाण्डवने मर्ग के अस को अपने अस्त्रले रोककर दूरकिया । ३१ । तब कुन्तीनन्दनने अग्निक अति प्रिय दूसरे प्रखको कर्ण के लक्ष बनाकर छोड़ा यह अस्त्रं तेज से देदीप्य हुमा defeated." 14, Sanjayit said that hearing Vasudava's words, Kiran hung down bis head stitla sitame and gave him no reply: Liching his lips in atgur lie took his bow and again fought with Arjun. Then Vasuddy said to Arjun; “Pierce him down with a divine weapon Remembering the former wrongs, Arjun pas mücli enraged at the words of Krishd. Sparks of tire came out from the poros of his body to the dwatendent of wl. Then Karati showered artows with the help of Brahmartra and again tried to extricate his «lieel froin the ground, 20. Arjun too, discharged on him atrows with the help of Brahimnastri and checked kis weapon with bia owie, Buntis.son discharged his fiery waipon at Káran and it shons in its glory. Karan diſcharged the woá por of water and put out the fire with it. Covering all tắe directionis -- (6794) Mulabbarat साफ दुरुणा दयाणि कापतान् महादति च निस्वनी महान् ॥ ३७ ॥ मया भवज पानिवमाशुमारिणा कुरुप्रोग्ण निकृत्तमाहो । नागीसरे मनपुत्रस्य स अयं तदा भारत येत्वदीपाः॥३८॥अथ धान् कंगवधाय पार्थो महादयत्रामलदण्डलसचिों भारच पार्थोलिक निषङ्गात् सहघरमारष रश्मिमुत्तमम् ।। ३९ । ममीच्छद शोणितमांसदिग्धं वानरार्फप्रतिम महाईम् । नराश्वनागामुहरं उथरवि पराज मोगति नुप्रयेगम ॥ ॥ सहनना शनितुल्यतजसम निशामु कम्याद मिति दु'महम् । पिनाकनारायण धक्रसाग्निभं,भयङ्कर माणभृतां विनाशनम् ॥ ४१ 0 जसाह पाय: स्वशर प्रहरी पो देघसंघ रापिदुनिधार्यः । संपूजतो यः सतत महारमा देखा मुरान् यो विजयेन्महेषुः ॥ ४२ ॥ तं प्रमृष्टं समीक्ष्य युद्ध चचाल मई सपरावर जगत् । स्वस्ति जगत् स्याहषपः प्रचक शुस्तमुघत-प्रेक्ष्य महाहवेषु ॥४३॥ ततस्तु और सब मनके मनोरथों सहित दप टूटगपे और महा माहाकार शब्दहा ॥३॥ हे भरतवंशी उससमय और आपके युद्धकर्ता शुग्बीर थे उनसर्कन और कौरवों के बड़े वीरोंने अर्जुन के हाथ से पार्टी और गिराई धजाको देखकर कर्णके विजयी होने की भाशा छोड़दी। १८ । फिर कर्ण के मारने में शीघ्रता करनेवाले .पांडव अर्जुनने माा इन्द्रके वज्र वा अग्निके दण्ड की समान हजार किरण रखनवाले मूर्य की उत्तम किरण के समान आजुलिक नाम वाणको अपने तूणीरसे निकाला३९ वह मर्मभेदी रुधिर मांस से लिप्त अग्नि मूर्य के रूप वड़ोंके योग्य मनुष्य पाई और हाधियोंके भागों का हरनेवाला तीन अर्तिनी लम्बा छः पक्ष रखनेवाला' सीधा चलनवाला महा वेगयुक्त । ४० । इन्द्रवजके समान पराक्रमी कालकामी काळ अग्निकी समान बड़ा घोर पिनाक धनुप और. नारायणनी के सुदर्शन चक्र की समान भयकारी और जीवमात्र का नाश करनेवाला था। १ । जो देवगणोंसेमी हटाने के अयोग्य महात्माओं से सदैव पूजित देवासरों का भी विजय करनाला था उसको अर्जुन ने अपने हाथमें लिया । ४२ । युद्धमें उस भर्जुन से पकड़े हुये उस वाणका देखकर सब जह पैतन्य स्थावर जंगम जीवों समेत सब जगत् कंपायमान हुमा अर्जुनको उस वाण को उठाये हुये देखकर ऋपि लोग पुकारे कि संसारका | कल्याण हो । ४३ । इसके पीछे उस गांडीव धनुषधारी ने उस अचिन्त्य प्रभाव his quiver a sharp arrow like the vajra of ladra or staff of Yapi, glorious like the Sun of thousand rays. That arros destructive of men and beasts, was thres cubits long atted with six feathers, swift going, lika Indra's vajra in prowess, destroyer of oven Death, dreadful like fire, dreadful like the bow of Shiv or tbe djecus of Visbau, capable of destroying all beings, irresistible by gods, worshipped by great men and capable of conquering gods and asurs. All the movables and inmorables shook with fear as he took it in his hand and the rishis " God's merey on the world.." 43. The possessor of Gandiv criod out, (6795 [६७९५) कंप Karan Paray तं शरमप्रमेयं गांडविया धनुधि व्ययोजयत् । युवा महाग्ग्रेण पण चाप विष्य गाण्डीपमुघाच सत्यरम् ॥ ४४ ॥ भय महामतिमोन्तु मेशरः सहच्चाम हरथ युदः । वपोस्ति त गुग्यश्च तोपिता गपा यदीष्ट सुहृदां तथा श्रुतम् ॥ ४५ ॥ अनेन सस्यन नियमवयं शरः सुसंशितः कणरि मयाचितः । इत्यूचिवांस्तं प्रमुमोध पाण धनन्जयः कर्णयधाय घारम ॥ ४६ ॥ कृत्यामोंगिरसतिया दीनाममयां युधि मृत्युनापि । यन् किरीटीवतिसो यं शरो मे. विजयायहोस्तु । जिघांस कन्दुसमप्रभावः कर्ण मयास्तो नपता यमाय । ४७ ॥ तेषुपयेण किरीटमालो एम्पो विजयापहन । जिघांसरन्दुसमप्रमेण च विषकं रिपुमावतायो॥ ४८ | तथा चिमुको यक्लिनतिजाः ज्यालयामास दिशो नम ॥ ४९ ॥ ततोजनस्ताप शिगे जहार पजेण वृतस्य यथा महेन्द्र पार्थो पराहो शिर उच्चफत वैकनस्याय बाले वाणको पनुप में लगाया और उत्तम महाअखत संयुक्त कर गांडीव अनुपको संवकर शीघ्रतासे वोला । ४४ । यह महाअस्त्र से संयुक्त वड़ायाण शत्रुके शरीर और प्राणोंका हरनेवालाहो जो मैंने तपस्या करी है वा गुरुभोंको प्रसन्न करके पहोंको किया है और शुभचिन्तक मित्रोंकी भाज्ञाको मानाई । ४५ । इससत्यतासे सेरित यह कठिन और उग्रवाण मेरेयड़ शत्रुकर्ण के शिरको काटो यह कहकर भर्जुनने उसघोर उग्रवाणको कर्णके मारने को छोड़ा । ४६ । और अत्यन्त प्रसन मन अर्जुन यह कहताहुआ कियह भय गिरसस कत्याके समान उग्रप्रकाशित और युद्धमें मत्युसे भी भसह्यरूप वाण मेरी विजय का करनेवाला हा कर्णके मारने का भभिलापी मूर्य चन्द्रमाक समान प्रभाववाला मर्जुन यहवोला कि मेरा घलापाहुआ बाण कर्णकोमारकर यमपुरकोभने । ४७ । यहकहकर मारनेके इच्छाबान शस्त्रधारी अत्यन्त मान्नतिन अर्जुन ने उस उत्तम विनय करनेवाले मूर्य चन्द्रमाक समान प्रकाशित वाणसे चक्रके उठाने में प्रत्त शत्रुको मारना चाहा । ४८ । तब उस छोड़ेहुये मूर्यकी समान प्रकाशमान वाणने भाकाश और दिशाओं को अग्निरूप किया । ४९ । फिर इन्द्रके पुत्र अर्जुन ने दिनके समाप्त होनेपर उसवाणा से उसके शिरको ऐसे काटा जसकि महाइन्द्रले अपने वजसे घाहर के 'bow put that arrow to his bow ani drawing his bow, remarked. " Let this arrow take away life out of Karan's body. If I have performed ascetism or pleased my elders by sacrifices or obesed my friends and well-wishers, then led this arror cut off the head of Karan." Having maid this, ha discharged the arrow, saying “Let this glorious arrow cause my victory. " Desirous of slaying Karan, glorious Arjun again said, - Lot my arrow sond my enemy to the region of Yam." 47. Having said this, Arjua desired to slay, with that glorious arrow, his enemy Karin who was engaged in lifting up the wheel. The glorious arrows, sbining in tho sky, illumined all the diroctions, 7 . At the close of the 16796) slalaliharat महेन्द्रमनः । ५०॥ तद प्राञ्जलिकन छिन्नमथास्य फायो निगपात पश्चात् ॥५१॥ तदुचनादिस्यसमानयजम शम्ममामध्यगभास्करोपमम् । वर्गगमुध्यांमपतरामू पदिपा रास्ताविय रक्तमण्डल । ५२ ३ समस्प देहं सततं ससोषितं सुकपमावर्थ अदाकर्मणः । पोप इच्छेग शिरः समाजद्गृह महीय मसगीश्वरः॥ ५३ ।। शोधितुन यम त् मघच्चस: पपात फर्णय शरीरमुचितम् । सबवणे गैरिक तोषिक गिग्यथा पलहा शिरस्तथा ॥ ५४॥ देशातु कणस्थ निभर्तितस्य तेजः सूर्य वं-यिग शाविधेश । उक्त समाष्पयोधाः पश्यन्ति गजभिऽते स्म कणे ५ ५५ ॥ अतः शलान् पांडया दध्मुरारष्ट्रया फर्ण पातितं काल्गनेन । तथैव, कृष्ण धनञ्जयव दृष्टी मदा दध्मतुराशु संधी ॥ ५६ ॥ त सांसफा मेश्य हतं भयान प्रीता नादान सान्य रयन् । न्याणि चाजधनुरतीय दृष्टा पासांसि यादुधयु जांच शिको काटाया । ५० । इसके पीछे भाजुलिकसे कटादुथा उसका शिर गिरपड़ा तदनन्तर उसका धड़ भी मिरवडा वह उदयमान मूर्य के समान जाती भाकाशाथ ऐसे मूव्य के समान था उसका शिरकटकर पृथ्वीपर ऐसे गिरपड़ा जैसे कि रक्त मण्डलवाला मूर्य अस्ताचल से गिरत है ॥५२॥ तदनन्तर इसमहा कर्मी के रुदैव सुरसके योग्य सुन्दर शिरने अपने शरीर के रूपको बड़े कष्टसे ऐसे त्याग किया जैसे कि बड़ा धनवान अपने धन से पूर्ण 'घर, को बढ़े दुखों से | त्यागता है। ५३ । उस वड तेजस्वी कर्ण का उन्नतशरीर वाणों से भिदाहुभा निर्जीव होकर वाणों के घावास रुधिर गिराताहुआ ऐसे गिरपड़ा जैसे कि बलू से घायलहोकर पर्वतका वड़ाशिर रक्तधातु से युक्तमळ को छोड़ता गिरताहै 1५४ । उसगिरेहुये कर्णके शरीरते निकलाहुआ वेज अाकाशको व्यासकरके मूर्यमें प्रवेश करगया कर्णके मरनेपर सब पीर युद्धका मनुष्योंने इस आधर्यको देखा ३.५६ । इसकेपीछे अर्जुनके हायसे गिरापहुये कर्णको देखकर पाण्डवों ने ऊंचेस्वरों से शवों को पनाया इसीप्रकार प्रसन्नचित्त श्रीकृष्ण और अर्जुन नकुल और day, Arjun cut Karan's head with that arrow as Indra had cut of Namuchi's head. 50. Cut off by that arrow, Karan's head and body, fell down. The head of that warior, glorious like the rising Sun.' fell dorn on (arth like the settiog Sun. If left tlie body with great pain like a wealthy man forced to leave his hous» full of wealth. The kuge body of Karan, pierced by aniows, fell down like a mountain crog, with its red waters, struck down by vajra. A glory, coming out of Karan's body, having illumined the sky, united with that of the Sun. All the Warriors say this wonderful phenomenon ad his death. 55. Socing Karan overthrown by Arjun, the Pandavas sent forth loud blasts from their conchs. Shri Krishn, Arjun, Nakul and Salade Beat lorth blasts from the conclus. Too Sonaks tuo, sceing (.६७१७) कणपर्व Karan Paray .५७ ॥ संवयातच मरेन्श्योधा पाप समाजापुरतीय धाः ५८ पलानियामा स्यारे धनुयभन्योऽभ्यमालिप मदन्त उनः । रमवा तु कर्ण माष निधनम्तं तं तपा शायनातिभित्रम् ॥ ५९॥ महामिना मिषापषिवं पहावसानेनिमिष प्रशान्तम् पराज कर्णस्प शिरो नितमस्ते भास्करस्येष पिम्पम ॥६॥ प्रताप सेना मामित्रों वीतः सरममलिभि! बलिमार्जुन काळेन माताऽस्तं फर्णमाका. मस्त गारन् ययादित्या प्रमामादाय गन्यति । एवं जीवितमादाम कर्णस्येपुरजगामह ॥ ६२॥ मपराई पराम्हस्य सूतपुत्रश्य मारिप । छिन्नमलिकेनाजी स्पोरसेष मपE६३ ॥ उपयुपरि सम्यानां तस्य सोत्तपञ्जसा शिरः कर्णस्प सोरो घमियु सोपाहरतम ॥ १४ ॥ कर्णन्तु शूर पतितं पुषिव्यांगचितं शोणित दिग्ध सन्देख्नेभी शंखकोबनाया५६फिर सोमकोंने उस मरे ये कर्णको पृषीपर पहुआ देखकर. सेनामों समेत शंखोंके नादकिये और अत्यन्त प्रसन्नहोकर नूरीमादि भनेकपाजों को भी वमबापा और बसों को हिला कर अपनी भुजाओं को ठोका और अत्यन्त प्रसन्न आशीर्वादों को देतेहुये अर्जुनके पासगपे । ५८ । और अन्य २ शूरवीर लोग भी अर्जुनके हायसे मराईमा रथसे पृथ्वी में पड़ा हुआ कर्णको देखकर नृत्य करनेलगे और परस्पर में गर्मना पूर्वक एसी वाचाला करनेलगे जोग किं कठिन वायुके अंग से घायाळ पर्चत होस ।५९ । उस समय वह कर्णका पृषीपर पहामा शिर ऐसा शोभायमान हुमा मैले कि पाके अन्त में शांत भग्नि अथवा जैसे कि अस्ताचलपर पहुंचाहुमा मूर्यका विम्बहोताहै । ६० । वह मूर्यके समान तेजस्वी पद्धमें पाइयों की सेनाको भपनी घाणरूपी किरणों से भावी रीतिसे ताकर अन्तको अर्जुनरूपी कालके द्वारा अस्त रोगया । ६१! सब अंगों में वाणों में बिदा भिर में भराहुमा कर्णका शरीर ऐसा मकाशित था असे कि सूर्य अपनी किरणों से शाभित होता है । ६२ । हे श्रेष्ठ दिवप्त के पन्त भागमें कर्ण के मान के दिन कर्ण का शिर शरीर समेत आउजुलिक वाण से जब पुदभूमि में गिरा तब उस पाणने भी सेनामों से पृषक भर्जुन के पात्रका वह शिर शरीर समेत' शीघ्रता पूर्वक अपने घेगसे हर लिया । ६४ । Karan fallen down on earth, blew their conchs, trumpets and other musical instruidents. They waved their, garments and beat their armia and wont to Arjun with benedictions. Tha other warriors tro, seeing Karan fallen from his car danced and roarod with n loud noiso. Kmro's Lead lying on the ground, looked glorious like fro at the cod of & sacrifice or like the orb of tho Sun at sunsot reflected on the Weat. era pountain. GO.. Having beated the Paoday army well with his arrow Le set down as he camo in contact with death in the slope of Arjun, Pierced with arroirs in all parts of his body, he looked glorimuslike the Sup with his About sunnest on tust day, Karan's Tays (6793) Vabalharat गाश्रममा शयाम मुवि मद्रराज निनाए रयेत ॥ १५॥ करें कुरक्षा प्राद्रसम्म मयाहिंसा विज्ञान संस्य । मोसमान मारना महासंषपापलन्तम् ॥ १६ ॥ सरस मेप्रतिमा सालवालिमा अमर । सानासिमस्निसंपये तथा तथा पात कायरोममुम्बएम. होत कर्णपण कधधै एकनवतोऽध्याय ॥ ९१ । 'साजय जय बस्तु कार्जुनपारिमा पसानि र माता यो पोतोभूशनायु मासो रपेन सछिनपरिषदेन। १५ मिपातितस्सनाजिमा पनामावसपुत्रम । दुर्योधनोऽभु परिपूर्णत्रो मुहार्मसात फिर उसशूर वा बाणों से छिदेहुये रुपिश से सिम स्वीपर गिरकर पायन करनेाले कर्ण को देखकर रामा म धमापासे पकी सारीपण । ६५ । और कर्णके मरनेपर मयसे पारित युद्ध में भरपन्त पापमहुवे कोरसंवार पार भर्जुन के क्रोधरुपी मुखको देखेसहुये अचेत हो होकर भागे । इसके समान कम करनेवाले कर्णका शिरजो कि इसकी शुभ मुख समान से पीपर गिरपड़ा नेस कि दिनक मम्त सहसाशु मर्प मस्त होना in अध्याय ९३ संजय बोले कि अर्जुन के हापसे कर्णके मरनेपररामाधल्य सेनाको मपनील और पारामानरूप देखकर अपने साथी अपिरथी कल के मरनेपर टूटे सामानगडे स्यकी सवारी के द्वारा पनदिया। जिसके रपया और बापी गिरापर वह सेनापति कर्णभा मारागया घस सेनाको देखकर अनुपायों से पूर्ण मालिक bood and body, were separated by Arjua's sharp attor. Soring. Km rag'a body pierced by arrows and lying on cartb, the king of Madna drovo away ia bis car. Tbo Kauravas, Wogadod ia battia, rua from ths dreadful presence of Arjua after the death of Keras.kr raa's dead, of Indra like prowess and beautiful like the face of ladra fell dowalika tha sotting sunatorening." 07. CHAPTER XCII Sanjasa continuo I, "At to fall of Karan by Arjun's arrow, Bbalys, seios the Kagrar array terrifia, Font anny, on bis car of which will the paru wore kokoa. Karau the commander wu alait along with his --- कणपर्व Karah Patav 16799) १॥ कानु र पतित पृथिव्यां शराखितं शोणितदिग्धगात्रम् | याच्या मर्य मिनिस् मिस परिवायंतस्थुः ॥ ३ ॥ प्रहृष्टविधस्तविषाण विस्मितालापरे जोकपरापमा पर । परेसायाश्च परस्परं जना पपा यषो प्रतिस्तथा भवन ॥४॥ प्रविषो मरणाम्बरायुघा धनम्नयनामिाता महौजसा । निशम्य कर्ण उरका प्रमतर्षमा गाव इवाकुवा कुलाः ॥५॥ भीम भीम महायमेन नार समारोपसी कम्पपानः । मास्फोटयन् बलासे नुस्यते व ते फणे त्रालयन पास राष्ट्रर॥३॥ष जर सोमकार सुजयाध सङ्कान् दम्मुः साबजुमापि सर्वे परस्पर भत्रिपा एमाःस्वारमजे वै मिहते तदानीम् ॥ करवा विम शमर्जुन बोंदवशरिद मागः ती प्रतिज्ञा पुरुषर्षभेण बैरस्यान्तं गतचिव पापः ।। मद्राधिपषिदचेसास्तूर्णरयेनापतषजेन दुग्योधनस्यान्तिकमेत्यराज समाप पीडापानप दुय्योधन ने परावर श्वासों को लियाराफिर पृथ्वीपर गिर बाणों से विदेशतिर भो देवाच्यासे सूर्यकेसपान प्रतापी पृथ्वीपर नियत कर्णकेदेखने के | अभिलाषी मनुष्यनको पारोंओरसे घेरेहुपे ।। अत्यन्त भयभीत व्याकुलचित्तापर्य धुलोकर शोकसपीडामानहुपे इनके सिवायआपके और सदशूरवीरथीपरस्परमें वेसाही दशाको मात समकारका कि उनका स्वभावथा । ४ । कौरवलोगबहे तेजस्वी बर्षको भनकायसे टूटे कवच भूपण वस्त्र और शवों से रहित देखकर और बतक इनकर ऐसे भागे जैसे कि निजनवनमें मृतकं वैळपाली गौवें भागती है ।५।तर भामसेन भयानक शब्दों से गर्जना करकं पृथ्वी और भाकांपा को कम्मापमान करता भुशामाको ठोकताहुमा गर्भकर उछला और कर्षके मरनेपर धृतराष्ट्रके पुत्रों को अपभाल करता नृत्य करनेलगा।६। राजा इसी प्रकारसम सोमक और मंत्रियों ने संखोंको बजाकर एक एकसे मोतिपूर्वक मेल किया और अन्य सभीलोग भी कर्ण के मरनेपर परस्पर में प्रसन्नरूप हुये। ७ । सूतपुत्रकर्ण मनसे महापोर युद्ध करके ऐसे मारागपा जैसे कि केसरी हाथसे हापी मारामास पुष्पोचम अर्जुनने अपनी प्रतिज्ञाको पूर्णकरके शत्रुता के अन्तको पाया। रेरामा फिरपाकुलाचच मद्देशके राजाशपने भाशीमही जमा borbes, cans and elephants. Duryodhan dropped tears at the sight of bia srmy and sighed with pain. Peopla focked in a cricle to see Karup'a body lying on earth. They were filled with grief at the right of it. All your sona were' melancholy according to their nature. They led at his fall like cows at the fall of the bull. 5, Bhim Giled the air with bią leonine Toats and jumped and frisked with the beating of his appa. Ho terrified the sons of Dhritraahtra by his (wild dance. The Srinjayas and Somaks sounded their concha and embraced ono saother. Other Warriors too were pleased at the death of garan. He was slein in battle by Arjua hke an elephant by : -- -- 4 (6800) Mahabharat (६८00 सुम्णा उवाज वाफ्यम् ॥ ९ ॥ विशीर्णनागाश्वरपप्रचार धनं रषदीयं यमराप फपम । अन्योन्यमासाध दतमहद्भिनरावनागैगिरिफूटकल्पः । १७ । नेतार भारत धुरमातीपथाव नियोधभूध । प्रस्तौ हि कर्णेन समेत्य हाधन्ये बर्षे सब सोये ॥ १९ ॥ देवन्तु यत्नात स्वषये प्रवृ सत पायवान् पाति हिनस्ति चास्माना सपार्थसिधंफरास्तु सधैं प्रसधारा निहता विषभिः ॥ १२ ॥ याना नुस्यममायाम्पोथ धीराः धीर्येण शोरण पोन व तस्तथ युक्ता विविध गुणोधः भपकल्पा निहता नरेन्द्रास्तपार्थकामा युधि पाण्डवेयः॥ १३ ॥ सम्मानुचो भारत विष्टोमन परायसिचिन सदास्ति सिद्धिः॥ १५ ॥ एतची मद्र पशिम्य स्व पापनीत मनसा निरीक्ष्य । दुर्योधनी दोनममा विसंगः पुनः पुनम्प श्यसदासरूपः॥१५॥ इति फर्णपण शरयवाक्ये विनवताध्यायः.९२ रहित रथकी सवारीक द्वारा दुयोधन के पास जाकर अश्रुपातहालकर यह वचन कहा । ९ । कि भापकी सेना परस्परमें सम्मुख होकर गिहुपे हाथी २५.बोडे वा बड़े २ शालीवाली यमराज के देशको समान और बड़े मनुष्य और घोड़े पर्वत के शिखरके समान हाथियों से मारेगये । १० हे भरतवंशी यह सवालो और मरे परन्तु ऐमायुद्ध कोई नहीं हुआ जैसा कि कर्ण और अर्जुनका हुआ है कर्णने सम्मुख होकर श्रीकृष्ण अर्जुन को और अन्य बड़े २ तेरे शत्रुओको अपने साधान किया। ११ । निश्चय करके पाण्डवों की रक्षाकरने वाला देवही अर्जुन आधान पोकर कर्मकती है जो पाण्डवों को बचाकर हमलोगों को. मारता तेरे | मनोरथ सिद्ध करनेवाले सय शूरवीर युद्धकरके शत्रुओं के हायसे मारेंग । १२ । हे ना वह उचमवीर कुवेर यमराज और इन्द्र के समान प्रभाववाले भौर पराक्रम पल और तेजमें भी इन्हीं देवताओं के समानु नानाप्रकारों के गुणों से युक्त होकर भाभ्यों के समान तेरे प्रभों के पाइनेवाले राजालोग पुद्धमें पाण्डवों के हायसे. मारेगमे।। । हे भरतवंशी सो तुम भव मोच मतकरी यह होनहारद निश्चय, समझो कि सदैव किसीकी विजय नहीं होती । १४ । राजा शल्यक इम पचनको पुनके और अपने धन्यायको विचारमहा दुखीचित अधेत और पादितरूप दुयों धनने वारम्बार तासांभाकोलिया १५॥ tiger. Arjun fulfilled his yow and made an end of his so mity. Shelyett went to Duryodhar, with tears in' his eyes, and said, 10. great warriure ale slain and your army looks like the city of death. No other warriors ever fought like Karan and arjua.Karan repeated: ly vanquished, Shri Krishn, Arjun and other ivairiors. Surels, goday proterithe Pandavsy and fight for Arjan. All our well wishers is aro sluin. The good warriors, like Kurer, Indra and Yam ia prowess, invincibe by other warriors, have been alain by the Pandares, Thinking that all this lies been brought aboout by Fate, you should aut he sorey. You must remember that victory is never on ons side". Having heard the words of Shalya’and thinking of his own injustice, Karan sighed again and again. 15. - "Your 20228 [६८०१) कर्णपर्व Karan Pary (6801 तराष्ट्र उवाच । तस्मिस्तु का नयोपिमर्दे दग्धस्य रोहीन विद्रुतस्य विश्व कुरुम्जयानां बलस्य वाणोन्मपितस्य की "सञप उपाय । भृणु राज चबहितो मावृतो महाक्षयः घोरो मनुष्यदेहानामाजी नरवरक्षयः ॥ २ यरून कहते पाय सिंहनादमयाकरोत् । तदा तप मताप्राजभाविवेश महद्भयम् ॥ ३ ॥ नसधातुमनीकानि न प धाय पराक्रमे। मासौदावि फणे तर योधस्य कस्य nि पणिजो नामिभिन्नायामगाधे घलया यथा अपारं पारमिच्छन्ती ६ किरीटिना ॥५॥ सूतपुत्र हते राजन पियस्ता शरविक्षताः। मनायानाथमिसन्तो नागा: सिंदरियाहिता५॥ मनाइप वृष्ण भग्नदंष्ट्राइकोरगा, ६ माया पाम सायादे निजिता सम्पसापना हितको विश्वस्ता निकृया निशितः शोः। সুবৰ বেজন্তু যুগাল মাখন মাখিয়ায় স্ক: ক্ষাবি শিৰ अध्याय ९३॥ धृतराष्ट्र बोले कि रुद्ररूप कर्ण और अर्जुनके युद्ध में दग्यरूप बाणो मथित और भागहुये कौरव मौर मंजियों की सेनाके लोगोंका कप' कैसा होगया ।१ । संजय बोले कि हे राजा सावधान होकरसुनों जैसे कि युद्धभूमिमें मनुष्यों के शरीरोंका अत्यन्त घोर नाश वा राजाओंकी हानिहोजाने और कर्णके मानेपर पागांवों ने सिंहनाद किये तय मापक पुत्रों में बड़ामारी भय उत्पन हुमा । ३ । कर्ण के मरनेपर आपके किसी शूरवीरकी भी सेनाओंकी चढ़ाई और भीम पराक्रम करने के साहस की बुद्धी नहीं हुई। ४ 1 जैसे कि नौका रहित भधाह मल में नौकाके टनपर व्यापारी लोग अपार जलके पाहानको इच्छा रखनेवाले होते हैं उसीप्रकार भर्जुनके हाथ सेनापति कर्णके मरनेपर आपके लोग रताके पाहनेवाले हुये ।'५ । हे राजा सूतपुत्र के मरनेपर भपभाव शस्त्रों से घायल भापके भनाथ लोग नायके ऐसे चाइनेवाले हुये जैसे कि सिंहों से पाडापान हाथी टूढी शाखावाले वेल और टूटी डायाला सर्व रक्षाको चाहते हैं । । । सार्यकाल के समय भर्जुन से पराजित मृतकवीखाले ताण वायोंसे पायल होकर लोग इटायेाराजां कणके मरतेही पंधवा कवचों से रहित अचेत भयभीत और CHAPTER I.XIII Doritrashtra said, “Wounded and flying by the arruits of Arjun and Karan, how did the Srinjaya. and the Kauravas behave" Sanjaya said, " Hear ic carefully, king, how at the death of Karan and other warriors the Pandavas roared and the. Katrayas fled for, feas, None of you great warriors intended to face the Pandavas at the death of Karan. Your meg sought protection after the death of Karan Rw merchants wish for land when their ship is wrecked in the midst Laf watere. 5. .,Terrized, ab the death of Karant wounded by weapons your mea wished for a protáctor like elephant attacked; by a lion,azoa (602) Mshalberat वसः। भग्योन्यमवमृदनन्तो वोयमाणा भयादिताः ॥९॥ मामेव सूर्ण वामरसमामेवा कोदरः। मभिपातीति मवानाः पेतुर्मम्लुचसम्ममात्॥९॥हयानन्ये रयानम्ये गजामाये महारथाः । मारुह्य अवसम्पन्नाः पादाता प्रादयन् मयात् ॥ ११ ॥ पदका चुगा सादिन महारा। पदातिसंघामाघौधेः पलायद्भिर्भयाहिता ११ म्या तस्करमका सायहीना यथा बने तथा खदीया निहते मतपुतदा भान् ॥ १६ हतारोधास्तवा नागाछिन्नास्तास्तथा सर्व पार्थमय लोकसंपश्यसोभानुरा ।। १३॥ तान प्रेक्षक यतः सर्वान् भीमसनमयादितान् ॥ १४ ॥ तान दवा विता सर्वान योषांसहसः। प्योंधनोप पंसतंबाहेत्युवेदमासीत् । १५ ॥ धुवाधन उपाच मासिकमिपणे पायों धनुष्पानियवरिपतः । अयम ससाना परस्पर महनकरनेवाले पौर भपसेव्याकुळ होकर देखनेवाले आपकेपुत्र महामयातुर होकरभागेदा और यहनिश्चय जानकर किर्भजुन औरभामहपारेही सम्मल भात पर मानते हुये महा व्याकुलतासे गिरकर मृतक मायहोगयो।किसी महाररधीनेपोड़ों पर किसीने हाथियों पर किसीने रोंपर चदकर रहें. वेगसे भयभीत होकर अपने पदातिपोको त्यागाका ६.१० । हाथियों से रथ महारथियों से प्रश्न सवार और अपसे व्याकुम भागनेवाले घोड़ों से पदातियों के समूह मारेगये । ११ । जैसे कि सर्प और चोरोसे भरहुये वनमें अपने संगके लोगोंसे पृथक होकर मनुष्यों की जो दशा होती है हे राजा उसीपकार कर्ण के मरनेपर मापके गुरवीरों की भी वही दशा।। १२ । अथवा जसे कि मृतक सवारवाले हाधी और टूटे राय, डारे | मनुष्य होते हैं इसी प्रकार मापके सव मनुष्य संसार भरेकाही अर्जुन रूप देखते भपसे पीडामान हुये । १३ । भीमसेन के भय से पारित होकर भागता हुआ सरको देखकर और उन हजारों शूरोंको भी भागते देखकर दुर्योधन ने बड़ा हाहाकार करके फिर अपने सारथी से यह वचन कहा । १५ कि प्रर्शन सम्सना के मारने को मुझ धनुषधारी के होते ये नी.भासकार इससे अपने घोड़ों को with broken boros or serpents with broken teeth, Wounded. and defeated by Arjun's arrowe, your 'men retreated by tha evening, Deprived of arms and armour, foolishly charging one apother and terrified, yoor sons fled in terior.' Believing that Arjun And Bhim were overywhere encountering them, they were nearly dead." They rode their horsos, elephants and cars and fled in terror, leaving their foot. 10. Cars, horses and men word destroyed by the flying war. riors. Your men'were in confusion like those who are separated from their companions in a forest full of thieves and serponts. At the dexth of Karns, they were like riderless elephants or men with broken arm. They thought that they saw Arjaa overywhere and wore confused with terror. Besing then running away for floor of Bhiary - 'कर्णपर्व Karan Pary (3803) शनेगरपान प्रयोदय । १६ ॥ जघने युध्यमान हि कौन्तेया मां म संशयः । नोस्महत प्पविकाळामिव मोदधिः ॥ १७॥ अद्यार्जुमं सगोविन्द मानिनच कादरम् । नित्य शिक्षा मधुश्च कर्णस्यानुण्यमाप्नुयाम् ॥ १८ तब शुत्वा कुमाजस्य शराये खरबःमतो मरिच्छन्नान शनैरश्वानचादयत् ॥ १९ । रथावाजहीनास्तु पातास्त मारिष पञ्चविंशतिसाहसा युवायध ध्यपस्थिताः ॥ २० ॥ वान भीम सेमा सकुडोभषामा पार्षतः । वलेन चतुरङ्गन संवृत्याजन्ननुः शरैः॥ २१ ॥ प्राय गुष्पम्त ते सबै भीमसन सपार्षतम् । पार्थपापंतपोधाम्ये जगहुस्ता नामनी ।। २९ ॥ मापत तदा श्रीमस्तै रणे प्रत्युपस्थितः । सोषतीर्थ रथातर्ण गडापाणिरयुज्यता॥२३॥ रोको । १६ । मैं निस्सन्देह उस युद्धकरनेवाले अर्जुन को अवश्य मारूंगा पा मुझको ऐसे उल्लंघन नहीं करसता है जैसे कि महासमुद्र अपनी मर्याद नहीं उत्संषन करसका है। १७ । मब मैं श्रीकृष्ण जी समेत अर्जन को वा बड़ भावारी भीमसेनको भऔर इसी प्रकार सब वाकी बचेहुपे शत्रुओं को मारकर कर्ण के ऋण से उद्धार हूंगा। १८ । सारथी ने कौरवों के राजा दुर्योधन के उस वमनको जो कि शूर और भेष्ठ लोगोंके कहने के समान था सुनकर सुवर्ण के सामानों से आच्छादित पोड़ोंको बड़े धोरपने से चलायमान किया । १९ । श्रेष्ठ फिर एयघोड़े और हाथियों से राहत भापके पच्चीस हजार पदाती युद्धके निमित्त निपतहुये । २० । फिर मस्पन्द क्रोधयुक्त भीमसेन और धृष्टद्युम्नने चतुरंगिणी सेना समेव उन पदातियोंको घेरकर मारा । २१ । बहसव भामसन और पृष्टपुम्न के सम्मुख होकर युद्ध करनेलगे और किसी १ ने पाण्डव और धृष्टद्युम्न के नामों को लेकर पुकारा । २२ । तरउन सम्मुख पायेहुपे पदापों से युद्ध में भीमन क्रोधरूप हुये और बड़ी शघितासे अपने रथसे उतर हायमें गदा लेकर युद्ध करने लगा। २३ । अपने भुभरलमें रूप धर्मको चाहनेवाले स्थमें सवार Duryodban said to the driver," Arjun cannot destroy the whole army as long alam alive, Check your horses so that I may slay Arjun.. Ho canaot withstand ine is the ocean can not pass over the coast Having slaia Shri Krishn with arjun and the rest of the enemies, together with Bhim, I shall.satisfy the debt of Karan." Hearing the warlike language of Duryodhan, the driver gently drove the gold decked horses, Dostitute of horses and elepbants, twenty five thousands of your warriora stood by. him. 20. Then Bhim and Dhrishtadyumn, mach enraged, surroundod tbem with their armies and slew them. Thoy faced Bhim and Dhrishtadyuma in battle and challenged thera to fight. Bbim was enraged at this anil coming down from his car, be fought them with his mace. Firm on his duty and relying on the strongth of bia arms, he did not like to slay them from his car. Liko Malabhrat - [6304]: . [३८०४ न तामस्थो भूमिष्टान धर्मापेक्षी कादर । योधयामासकोम्तेयो - मुजवीर्यसमा धितः ॥ २४ । जातरूपपरिच्छन्नां प्रगृद्य महतोगदाम् । अवधीसावकार सान पंग पाणिरिषान्तकः ॥ २५ ॥ पदातिनापि संरब्धास्थक्रया जोषितमात्मनः । भीममध्य धन संस्ये पतंगा इव पापकम् । २६ ॥ भासाय भीमसेनन्तु सरन्धा युगदुर्मदाः । विशुः सहसा इप्ट्या भूतमामा यातकम् ।। २७ ॥ वनवावचरन् भीमो गदाहस्तो महाबलः । पचविंशतिसादांतापकानामपोधयत् । २८ ॥ हत्या तत् पुरुषानीक भीमः सत्यपराक्रमः । धृष्टद्युम्न पुरस्कृत्य पुनम्तस्यौ महाबलः ।। २९ । माद्रीपुत्रातु शकुनि सात्यकिश्च महारयः । जवनाभ्यपतन हुष्टा निघ्नन्तः सौषल बलम् ॥१०॥ वस्थायांश तानाजी विनिहत्य शितैः शरैः। तमभ्यधावस्वारतास्ततो युबममूत्दा ॥ ३३ ॥धनम्जपोपि चाभ्यस्य रयानीक तय प्रभो। विश्रुतं त्रिषु लोकेषु व्याक्षिपत् कुन्तीपुत्र भीमसेन ने स्थपर चढ़कर उन पदातियोंसे युद्ध नहीं किया ॥२४॥ हाथ में दण्डधारी यमराज के समान भीमरोन ने मुवर्ण से मण्डित अपनी गदाको हाथमें लेकर पदाता होकर मापके सर पदातियों को मारा । २५ । फिर वह सब पदाती भी अपने प्यारे जीवनको त्याग करके.युद्धमें भीमसेनके सम्मुख ऐसे गये जैसेकि | अग्नि में पतंग जाते हैं । २६ । वह सबलोग युद्धमें क्रोपयुक्त युद्धदुर्मद भीमसेन को पाकर अकस्मात ऐसे नाशहोगये जैसे कि जीवोंके समूह · मृत्युको देखकर नाशहोजाते हैं । २७ । फिर पाजकी समान गदा हाथर्मेलिपे घूमनेवाले भीमसेनने मापके पचीस हजार पदातियों को मारा॥२८॥ फिर,वई महापराक्रमी अनुलालभी पसेन उस पदातियों की सेनाको मारकर धृष्टयनको प्रागे करके वहाँपर नियत हुआ। २९ । महारपी नकुल सहदेव और सात्यकी.शकुनी के सम्मुख हुये भौर बड़े प्रसन्न चित्त होकर दुर्योधनकी सेनाको , मारते हुये बड़ी शीघता से सम्मुख दौड़े। ३० । अर्थात वह अपने तीक्ष्ण चाणोंसे बहुत से सवारों को मारकर शीघ्रता में उसके सम्मुख . दौड़े और बड़ा युद्धहुआ । ३१ । हे.प्रभु फिर अर्जुन ने भी प्रापकी रथवाली सेनासे सम्मुख नाकर तीनों लोकों में प्रसिद्ध अपनेगाण्डीव Yam the wielder of staff, Bhim taking his gold mace in his band, tlew'your foot soldiers. Not caring for their life, they faced Bhim ess insecta fall into firo. 26. They were destroyed by Bhim as if they, bad faced Death bimself. Roamicg like a hawką mice in haid, Bbim slow twenty five thousards of your foot.. Having alain the foot soldiers, Bhim stood by Dhrishtadyums. "Nakul, Sahadev and sats yaki faced Shakuni and blew the army of Duryodhan with cbeerfni minds. They blew numerous horsemen and fought a hard fight. Ar. jun too, entered the field of battls and tranged ,Gandiv. bow.,33. Seeing the car driven by Shri Ksisha and drawn by wbito horsep, your warriors fied away from Arjun. 'Destitute of cars and rounded by (६८०५) कर्णपंच Karan Parav (8805" गीय घर्नु: ॥ ३२ ॥ कृष्णसारथिमायान्तं दृष्टया श्वेतइयं रधम् । अहुंनचापि पोगारपदीया: प्रादयन् भयात् ।। ३३ । विप्रहागरधाश्चय शरच परिकर्षिताः। पविशतिसाहमाः कालमाच्छन् पदातयः ॥ ३४॥ हायातानू पुरुषव्याघ्र. पाया ला महारथः पुत्रः पांचाळराजस्यपद्यम्नो,महामनाः ।। ३५ ॥ भीमसेन पुरस्कृत्य नाराद प्राय हश्यत ! ३६ ॥ पारायसवर्णा कोविदार महाभ्वसम् । घुम्नरयं रष्ट्या प्राद्रवन्त भयाद्दाम । ३५ । गान्धारराजं शीघ्रात मनुसत्य यशस्विनी नांचरातू प्रत्यहस्यता माद्रीपत्री ससात्यकी ॥ ३८ ॥ चेकितानः शिखण्डी च द्रोपदे याच मारिप । हरपा त्वदीयं समात् सन्यं शहानयाधमन् ॥ ३९ ॥ ते सर्षे तावकान जय ततोऽपि परांमुम्नान् । अध्यन्त संरब्धानपान जित्वा यथा घृषाः ॥ ४०॥ सेनावशेष तं वा सभ्यस्प पाण्य । प्यपस्थितं सत्यसाची चुकाध बलवानप ॥ ११ ॥ धनजयो ग्यामीक मायवत पार्यवान् । विधुतं त्रिषु लोकेषु व्याक्षिपन् धनुप को टंकारा । ३२ । भाप के युद्धका शूरवीर उस रथ को जिस में कि श्रीरप्पनी सारथी और श्वेत घोडों से युक्त था.देखकर और युद्ध करनेवाले भर्जुनकोमा देखकर भागे । २५ रयोंसे रहित भौर वाणों से पीडामान पच्चीस इनार पदातियोंने कालको पाया । १४ । पांचालों का महारथी अत्यन्त साहसी पुरुषोत्तम श्रीमान् धृष्टद्युम्न उनको मारकर । ३५। थोड़े कालमें भीमसन को आगे करके दिखाई दिया । ३६ । तब भापके शूरवीर उस कपोत वर्ण घोड़े और कोरिदाररूपी धनाधारी धृष्टद्यम्न को युद्धमें देखकर भयभीत होकर भागे । १७ और यशस्वी नकुल और सहदेव उस शोर भत्रों के चलानेशले गान्धार पति को स्मरण करके सारक समेत थोड़ीही देरमें दृष्टिपड़े । ३८ । हे श्रेष्ठ इसी प्रकार चिकितान शिखरी और द्रौपदी के पुत्रोंने भापकी बड़ी सेनाको मारकर बड़े शसोंको बनाया।३९ । फिर वह आपके शूरवीरें! को मुख मोडकर भागतेहुये देखकर ऐसे सम्मुख भाकर वर्तमान हुये जैसे कि बैलोंको विजाकरके क्रोधयुक्त विल वर्तमान होते हैं ।४। हेरामा इसके पछि महा पराक्रमी पाण्डव अर्जुन भापकी वाकी चहिई सेनाको देखकर झोपयुक्त हुमा । ४१ । और आपकी रपकी सेना - arrowr, the twenty five thousands of foot soldiers met their death, Haying slain then, the brave leader of the Panchals, Dhrishtadyumn was accompanied by Bhim, Your warriors fled at the sight of Dhrishtadyumn the possessor of pigson- cloured horses and kobidar standard. Nakol and Sahadev, with Satyaki, hastened to face-Shakuui. • Similarly, Chhekitan, Shikhandi and the sons of Draupadi hlony their conchis after slaying your warriors. Seeing your son turn face, they stood like bulle alter conquering ather bully. 10. Saving tha rest of your army before bim, loravo Arjun wag enraged and prepared bia Gandiy boi to cnoounter them, We covered the whole army with . .
(080G) Mahabharat माडि धनुः ॥ ४२ ॥ स पन शरमात सहसा ममाकिरत् । रजसा चोवृतनाप नस्म फिश्चियश्यत ॥ ५३॥ अन्धकारी इतेलो रजोभते महीतले। विकसक महाराज सापका माद्रधन भपात ॥ ४५ ॥ भज्यमानेषु सैन्येषु कुरुराजे :विशाम्पते। परानभिमुधिषमतरते समुपादयत् ॥ १५॥ ततो दुयोधन समानामुषायं पर. धान पुयाय भरतश्रेष्ठ देवानिष पुरा बाहिः ॥ ४६॥ त निसभिवम्त सहिता - पादधन् । नानाशवसुजः सधै भसंपतो मुर्महुः ॥ ४५ ॥ दुर्योधनव.सधान्तला मशितः शरैः। तत्रावधीचतः शुषः शतशोय सहस्रशः॥४८॥ तत्रासमपश्या म तम पुत्रस्य पासपम् । यदेकः साहितान् सर्वान रणेयुक्त पाण्डवान् दुयोधनः घसम्यमपश्यच्छर विक्षतम् ॥ ५० ॥ यतोऽवस्थाप्य गजेन्द्र कृतशिलपात्मनः। हर्षयनिष तान योधानिदं वचनमयात् ॥५१॥न में देशं प्रपश्यामि पृथियो ! कि सम्मुख पर्तमान हुआ और अपने विख्यात गांदीय धनुषको समंद किया। गाणों को वर्षा करके उससना को दकदिया फिर अन्धकार मोमाने पर कुछ दिखाई नहीं दिया।४।। हे महाराज लोकके हत तेज होने और पृथ्वीको धूलक होनेपर मापके सपा शूरवीर भयभीत होकरभागे । ४४ । हे राजा सताके जिन्न मिन्न होनेपर आपका पुत्र दुर्योधन सम्मुख' आनेवाले शत्रुओंकी मोरको दौड़ा ४५ ॥ इसके पछि दुर्योधन ने सब पाण्डवों को युद्धके लिये एस बुबाले कि भरतर्षभ पूर्व समप में राजा बलिने देवताओं को बुलाया था। ४६॥ नाना प्रकार के शस्त्रोंसे युक्त कोपयुक्त बारस्कार'घुड़की देते और गर्भना करतेपे एक साथही उसके सम्मुखमये । ४७ । इसकेपीछे वा भपसे अपाकुस' चित्त श्रीयुक्त दुर्योधन ने युदमें अपने तीक्ष्ण वार्गों से हजारों सेना के लोगों को मार उस स्थानपर हमने आपके पुत्र की अपूर्व वारसाको देखा कि भला उनसब इकडे होनेवाले पाण्डवोंसे युद्धकरने लगा ।५० । इसके पीछे उस महात्माने अपनी सेनाको अत्यन्त दुखीदेखा हे राजा' उसप्तमय आपका बुद्धिमान 'पुत्र'उन'कुली चिरंधीरों को खड़ा करके उनको प्रसन्न करताना यह वचन बोला। ५१ the shower of arrows. Nothing was to be seen in the dark. 'At 'Ite; alaughter of their people, while the field was enreloped in dust, your yarriors turned back. 44. At the dispersion of the army. your ana Duryodhan rushed against the foes. De challenged tho Pandataa, ko fight as Bali had done the gods. They came on together, daunting and roaring in anger. Intrepid in danger, Duryodhat alour thousands of Warriors with his sharp, arrows. We saw there the wonderfal prowoso of your son who alone fought with many warriors of the Peadarar: 50. Sising. .bia warriors in great distress, , he said to them, * 1 889 po place where you can bida yourself and be safe from the Pandavas. What is the use of your running away. Their army (6907) - - [६८०) agu Karan Pary बापातार नबोस्ः पाण्याः फि सतेन ॥ ५२ । भपक्षमता होषिक्षती। यदि सऽत्रतिष्ठामो धुर्ष नो विजयो गषेत् । ५५ ॥ विप्रा ategमो निमार पा दिल्यवान् । मनुसूरपाधिप्यस्ति भयानः समर गया .५४ मा सामामिका मृत्यः सत्रधर्मण युध्यताम् । मृतो:दुःजन वानीत प्रत्य पानम्मत-1 ५५ ॥ भाव झप्रियाः स पापः स्म समागताःपदा शराब मीराध मारवयातको यमः ॥ ५६॥ को तुमूदान युध्येत माश: सप्रियमत ॥ ५७ । वितो मीपसमाप कुवस्य परामप्यप। पितामरावरित नभम हातुमय ॥५८ गरिधर्मोति पाणीपान भत्रियस्य पलायने । न पुदधा योग्यः पन्थाः सर्गस्प कौरवारिणता लोक सर्षे पोधा समश्नुतः। ५९ ॥ सम्प्रयासमा में सदेशको नहीं देखताहूं जहाँपर म भयसे पीड़ित होकर भाभो, भार वहाँ पाययों के हाथ से बचने पाभो तुमको भागने से क्यालाभो । ५२ । उनकी सेना बहुत कम रहगई है भार श्रीकृष्णं भर्जुन अत्यन्त घायल यदि तुम सरठहरो तो .पेरी पूरीरिजय। ५३ । जो तुम भागोगे या पृथक् होगे तो पांडवलोंग अपराधी जानकर तुमलोगों को पाछाकरके मारेंगे इस्मे हमारा और तुम्हारा युद्ध में ही मरन श्रेष्ठहै । ५४ । क्षमी धर्मसे युद्ध में सड़नेवालों की मृत्युकाहाना सुखरूप है पोका मरने के दुःखों को नहीं भोगताई शीघही परकर आविनाशी गतिको पाताई ५५। तुमानाने. क्षत्री भरकटूंट हुपेहो सब चिलगाकर सुनो किजव नाश करनेमामा मावली यमराजही भयभीत बोगों को मारताहे । ५६. तो फिर मेरे समान सी मतका रखनवाला कौनमज्ञानी युद्धको नहीं करेगा । ५७॥ देखो भागनसे. एकतो. मेषरूप हमारेशत्रु भीमसेनके आधीनहोंगे दूसरे इस संसार में अपकीर्तिपाकर स्वर्ग मासान होगे इसहंतुसे तुमलोगों को अपने पूर्वजों के कियेहुये धर्मका त्यागना उचित. नहीं है । ५८ । भागने से अधिक और कोई पापरूप संत्रीका धर्म नहीं है कोरस लोगों युदसेवढ़कर क्षत्रियों का कोई उत्तमधर्म नहीं है हे रोरो जोपरमी जाभोग तो थोड़ेही दिनों में शीघ्रलोकों को भोगोंगे । ५९ । मापके पुत्रके इसीनि के his excordingly reduod in number aud Krishti and Arjun ars badly Frounded. I can yot win a complsta victory, if you stand firmly. They will chase you run away or disperse. It je thorofore butter to die fighting. A kshatrya falling down in battle, does not feel the pange of death and soon attains to an industructiblo st t:.55. Her noe attontiroly all the warriors hero assembled : wlly should you not fight, when you know that powerful Yam slays lliose that ars torrided 7. You should not dorinte froia the practice of your furolathers; for if you run away from battle, you will fall a prey to Bhim and sball forego haaraa Thero is a greater gia for a kshatrya than his roaning away from battle and do duby is more proferable to him than fighting. You NA you, if - । Foglianuary 330) वः सोमबालगीधरौघसंप्लुतः । शरायमित: पतितैध पाजिभिः सदिरात मतअंधमद्रि ॥ ४॥ दीन स्तनादः परिवृत्यनेमही दशनि कपणे नदनि । तथाप शिवगंजपानियोधपलापविरथरसः ॥ ५॥ मन्दामुमिशेव गतामुभिश्च नराश्य मागम र मस्तिः । महो महावैतरणीप दुर्दशा गनिहनिहस्तगात्रैः॥ ६॥ उपमानः पतितः धिम्या विशीर्णदत क्षत वाद्भि। फुरदिरातः करुणं रणा निमितोमायुधपादोत्तृभिः ॥ ७ ॥ प्रकीर्णमणोरपनाककेतुभिः सुषण जालासत भशादतः ।महो वी पीजलदेरियाता यशस्मिनांगरयावयोधिभिः ॥ ८॥ यदा तिमिवाभिमुखरतैः परविशोणधर्माभरणारायुधे । शप्रहागमिहतोहावलरवेक्ष्य माणः पतित सहस्रशः। नएसः पुनरुध्वद्भिर्मदोषभूषानुगततयाग्निभिः ॥९॥ कांडनाया शरभिनगाईतः मधीर कुमघजातामा दिपश्च्युतभूतियोप्तिमनि प्रचारमलैथ दतिः ॥ १०॥ शराच कार्जुनवाहुनुमा विदार्य नागागमन प्य लिमों से दूंट अंग यासा लेनेवाल रुधिर को बमन करनेवाले पीड़ामान पडहुये घोड़ों सेभी भरोईई पृथ्वी को देखो कहित शम्दों को करते भग्न नेत्र पृथी को काटनेबाळे महादुखी गर्जते हुये हाथी घोड़े शूरवीर मनुष्य और सेनाही से घायल पारों के समूहों से युक्त इस युद्धभूमिको दखा । ५ । निश्चय करके इसघोर युद्धमें पहपृथ्वी मन्द प्राणवाले युद्धाकामों से पैतरनीनदी के समान शोभायमान होसी है। ६ । कटेहुये हाथी कम्पायमान और दूदेहुये दांत रुधिर के वमन करनेवाले फड़कते पीड़ित वान्दों से दुखभोगले पृथ्वीपर पड़ेहुपे मनुप्प वा हाथियों के शरीरों से पृथ्वीपूर्णहोरदोहे । ७ । हटेपहिये, पान, जुये, योक्तर, पाछिदेहये तूणीरपत्ताका धमा भया सुवर्ण के बालों से युक्त अत्यन्त इंदापे बड़े र रथों के समूहोंसे एसी भरीहुई है जोकि बादलोंसे भरीहुई होती है। जिनके कवच सणभूपण और शस्त्र टकर गिरपड़े उन सम्मुख होकर शुत्रुओं के हाथ मरं उत्तमनामा हाथी घोड़े भोर शूरवीर लड़ने वालों से पृथ्वी एमी व्यासह जस ाक शान्तरूप आग्नयों से न्यातदोती है । ९ । वाणों के महारों से घायल देखनेवाले और गिरे हुये हजारों पराक्रमियों से एसी. संयुक्तहै जैसे कि रात्रिके समय स्वर्गसे गिरेप अत्यन्त प्रकाशित स्वच्छ और देदीप्यमान ग्रहोंसे संयुक्त पृथ्यो आर अकाश होते हैं । १०॥ bleeding, pierced by arrows, and dropping down blood, the horses are seen lying on the ground which is coverol by the sluicking. elephants, houses and men of the army. 5. The field of battle looks like the Vaitarni The elephants with broken tasks and bleeding bodies, are lying on Barth. This broken wheels, yokes, quiveis, standards and other parts of cars fill the earth like alouds. With broken Arms and armours mon are lying on the ground like heaps of queuched fire Wound. ed by arrows, thousands of, warriors are iying down like, ature faller down from the sky; 10. The 'srrows , discharged by - कर्णपर्व Karan Paray (0813) शासन वीर विक्षसने एतम् । गतासमपि राधेयं न लक्ष्मीः प्रतिमुडीत ३२, सोयनासमप्रभम् । नीयती मय सुरुच सर्वभूतानि मेनिर । ३३ १४ मतस्यापि महाराज मलपुषस्य संयुगे। वित्रसुः सर्वतो पोशा सिंहचतरे मृगाः .. ३... ॥ इतोऽपि पुराणायामो याहरतिय पश्यते । नामधिकृत किस्सिा मुनस्यापि महात्मनः ।। .३५ ॥ चारुशवरं राजन् चारु मौलिशिरोधाम । मुसं मूत्रस्य पूर्णचन्द्रसमशुति ॥ ३६॥ नानामरवानाज लसनाम्धु नदादाः । हतो करता येत पादयों पुरधानिय ॥ ३७॥ कासिमसंकाशो ज्यलाय विभावसुः। एतात. पुरषायाम. पार्थसायकारिणा ।। ३८॥ यथादि ज्वलनोदीप्ता जलमासाप. साम्मति । फर्णानि शामितस्तद्वत :पाथमपेन संयुगे ॥ ३९ ॥ भगृध च यशादीत सो मामनो भुधि । विस्य शरयवाणि प्रताप्यच दिशो दश सपुत्रः पुरुषापाम. संशाता पार्वतेजसा ॥४०॥ प्रताप्य पाण्डया ग्राजन् पाऽचाहान् स्ततेजसा । बर्षिया । ३२ । ससस सुवर्ण अग्नि और सूर्य के समान प्रकाशमान उस शूरवीर को सब जीवोंने शविते के समानही माना। ३३ । हे.महाराज युद्धमें उस परेड्ये कर्ण रो भी युद्ध कत्ती लोग सब ओरसे ऐसे भयभीत हुये जैसे कि दूसरे मृग सिंह से भयभी होते है । ३४ । क्योंकि वह मृतकहआ भी पुरुषोत्तम जीवते के समान दिखाई देताया मरने परभी उसमहात्माके रूपमें भन्तर नहीं हुमा । ३५ । इसीसे उस मुन्दर पोशाक मुकुट और ग्रीवा धारण करनेवाले वीर पुरुप को जीवतेके है समान नारा कर्णका मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रकाशमान नाना भूपण नक्ष कांचनमी बाजूवन्द धारण किये महा प्रकाशित होकर शोभासे पुक्त वह सूटपका पुत्र ऐसे मृसंफ होकर सोता है जैसे कि अंकुर रखनेवाला वृक्ष उत्तम मूर्य के समान प्रकाशमानहो । ३७ वह पुरुषोत्तम कर्ण अर्जुन के शायकरूपी जलसे ऐसे शान्त होगया जैसे कि भाकाशमान देदीप्य जलको पाकर शान्त होजाता है ।१८। इसीप्रकार कर्णरूप अग्नि पद्धमें अर्जुनरूप वादलसे शान्त कीहुई पृथ्वीपर उत्तम पुदमें अपने प्रकाशित यशको प्राप्त करके वाणों की वर्षा को छोड़ दशकों दिशाओं को पाती दुई अर्जुन के तेजसे शान्तहुई। ३९ । वह मूर्यका पुत्रकर्ण भषोंके तेज से संघ पाएरप और पांचालोंको तपाकर वाणोंकी से शत्रुओंकी living' man after death and his appearanco , was not changed. 35. Possussed of fine clother, diadem and neck, he was looked upou like a living man. With his face like the full moon and gold ornaments, he is glorious like the Sun in his sleep. He has become cool by Aijan's arrows as fire is quencbod by a shower of rain, Karan's fire which spread its heat in all directions has been quenched by tho slower of Arjun's arrowr. Having wounded the Panchals and Pandavas by his arrows and terrified the world, he has been destroyod logethor with his son and ear, 42. Ho was charitable to all and used to satisfy, 168141 Atalabharat [६८१४) शरवण ताप्य रिपुयादिनीम् ॥ १॥ श्रोमामिर) सहखांशु जगात सर्व प्रताप तविकतनः कर्णः सपुम. सहवाहनः ॥ ४२ ॥ भर्थिना पक्षिसंघस्य कल्पासोनिपा- तितः ददानात्यंध योऽपोधन नास्तीत्यर्धितोथिमिः । ॥ सामः सदा सत्पुरण स इतो निरय कृपः। यस्प ब्राह्मगसात् सर्व विस्तमासीम्महात्मनः । मादे मामले चाधिस्य स्वमपि जीवितम् ॥४४॥ सदा मृणा प्रियो दाता प्रिपदानो प्रियगतः। स पार्धाधिनग्यो गतः परमिकां गतिम् ॥४५॥ यमाधिस्याकरो र मुतरतेस दियम् । मादाय तब पत्राणां जयाशी शर्म धर्म ॥५६॥ हंत को मारतो, सर्वाजगाम पास्त कलयो विषाकरः । प्राय तिवराज्यमितावर्णः सोमस्य पुत्रो ज्युनियाय सिर्प ०४७ ॥ मभ पंफा हाथ पचाल पार्षी बन पातापापोरा दिशा मधमाश्च भ प्रजधल महाका भिरेर सस्थना: < सकामना सेना को व्यमितकर सीमान् मूर्य के समान सब संसार को तपाताभा पुत्र मार सवारी समेत मारागया। ४६। यहकर्ण आकांता करनेवाले तनष्प भार पक्षियों का कल्पत पा जो कि आकांता करनेवाले सस्पुरुषों को सदेव की ययेप्सिय दानदिया करताया ।। कभी किसीमकारकेभी याचना करनेवाले से पहवस्त नहीं है इस पकनको नहाँकहा ऐसारत्पुरुष कर्ण रय युद्धमें पारागपा जिस महात्माका सवधन याह्मणों केही देनेके योग्य हुमा जिमका सर्वजीवन सामयों को किसी वस्तुको अदेयरूप नहींहुमा । ४४ । सदेव वियोंके प्योरदाना अर्जुनके अनस मरेहुये उस महारथीने परमगतिको पाया जिसके आश्रयमें होकर आपके पुत्रने माताकरीयो । ५५ । वा आपके पुर्की विज्ञपकी भाशा मसभा और रखाको साथ लेकर सर्ग कोगया कर्णके मरनेपर नदियों ने चलना वन्द किया और मय समार का प्रकाशक सूर्य भी प्रस्तहोगया तिय्यंग प्रह भार मान मूर्य के वर्ण समान हुये और चन्द्रमा पुन चुप' उदयहोने के निमित्त तिरछा होगपा । १४ । कांश चलायमान हुआ पृथ्वी शब्दायमान हुई सूक्ष्म महाभयकारी वायु चली दिदा चलित रूपहुई और महा समुद्र धूम और शन्दसे युक्त होकर पलाय मानहुँमा काननों समेतसब पर्वतों के समूह कंपायमानापे और संजीयों के समूह tho desirou of good mon. He never told a beggar that he had nothing to give.'1who dedicated all bis irealth to Brahmany, has been slain in battle. He never held his property and lifo dear in the cause of Brahmaus. He had dedicated his whole life for their sake. That ganerous and popular nan bis been alain by Arjua's arrors. He, on, the strength of sxhoso help your sons had made the Pandavas their, enernies, has gone to hamren. 45. He took with him tha happiness, refuge and the hope of victory to your 80ns. Rigert coad to flow ** his feath and tho Suu wlio gives light to the world, went down. The obliquo and Woden tbe -- cuurse of stars Vilk (als - कपhurmuary विचमा बिदरे प्रविम्य भतगणाच मारिष । हसति राधिणा,सपीब्ध बम्ब पाहा समामणः॥११ इपिणे शिदिशाप मल स्मोवृता घोषिषधाम মুমি:গুণাৰ বা সামালিয়াঘাযেমৰমাৎ বিলোৱাৰ मनोपदा भोक.कस्य शिरोन्यपातयत् । तदासगी पियिचद राजन पवहारात बमम्ब निस्वमः ॥ ५१॥ स देवगावं मनुप्यजित निदस्य कर्ण रिपुमाइर्डमः । रराज पार्थः परमेव तेजसा निहत्येव मनिलोधनः । ५२ ॥ ततो रथमावुन लनादिनाशरबमोमवगमारकराषिपापनाकिनाभीमाननादकोतुनामिन्दुशसफांट कानमासिना३ मोवाहामतिमेनतायुमो मधेन्द्रीय प्रतिमानपीपी मुनमुका मणिप्रसमिकतावाप्रतिमेनरंहसा १,५४ ॥ नरोत्तमौपाण्याशीदनातदरता पनिदिकरोपमो। रणजीतमयो पिचरतुःसमानयानापिययिष्णुपासवा ॥५५ ॥ पाहामानहुये और रे रामा वृहस्पतिजी गरिगीको घेरकर पन्द्रमा और सूर्य समानहुये। ४९ । कर्णके मरनेपर विदिशा मी प्रज्वलितहोगई भाकाश अन्धकारसे युक्त हुमा अग्निके समान प्रकाशमान उल्कापातबुये राक्षसभी अत्यन्त प्रसन्नहुपे । ५० । जय भर्जुनने छन्दसखाते मकाशमान कर्ण के शिरको अपने क्षुरमे काटा तर पाकाशमें देवतालोग अकस्मात हाय हाय ऐसाशन्द करनेलग । ५१ । वह अर्जुन देव गन्ध और मनुष्यों से पूजित अपने शत्रु कर्णका युद्धमें मारकर पड़े मसे शोभायमान मा जैसे कि पूनसमयमें हवामुर को मारकर इन्द शोभापमान हुभाषा ! ५२ । इसके पाणं महाइमके समान पराक्रम करनपाल पहदोनों श्रीकृष्ण और अर्जुन वादों के समूह के समान शामापयान आकाकस्य मध्पाइ के मूर्य के समान प्रकाशित पताका और भपानक शम्दवाली धजा रखनेवाले रिपचन्द्रमा मौर शखके सपान श्वेत उपम महाइन्द्र रथके तुस अनुपम सवारी बैठे हुये पद विष्णु पार इन्द्रके समान शोभायमानये अर्थात् मुवर्ण मणि दीरे मोती और भूगोंसे असंकत अग्नि और मूर्य के समान तेजस्वी दोनों नरोत्तम केवानी और पायडय भर्जुनथे इसके पीछे उन गरुडध्वन और वानरध्वज son of the moon changed its curse. Toky moved; the earth was filled with noise and the wind storm was dreadful; the directions were illumined and the Oceaa was full of ruuku and noiso. The mountains with their forests shook, and :Vrihaspati, coming round Rohrni, thone like the sun and moon. The directious became bright and the sky became dark at the death of Karau. Meteors fell down like fire and tha rakabsses were pleased. 50. The gods in henven cried with gricſ, when Arjun out of Karun's bond with his arrowr. Having alaia his toe, Arjun, respected by gods, gaudbarras kod men, lookod glorious liko Indra after slaying Vritrosur. Shri Krisha and Arjun of Iodru like prowess, with tbeir standard thundering like clouds and bright like the * 16816) Mabalsharat तषो धनुयातनधानिस्पनः प्रसाध कृत्वा च रिपुं हतप्रभम् । संसाधयित्वैष कुरुन् शरोध: कपिध्वजः पक्षियरम्घजय ॥५६॥ कृष्टी ततस्तायमितप्रभाषौ मनायरीणाम पदारयन्ती सुवर्णजालायततो महास्वनी हिमावदाती परिगृध' पाणिभिः । गुथु पतुः शखबरी नृणांवरी धराननाश्या युगपञ्च दध्मतुः ॥५७॥ पाञ्चजन्यस्य नि|यो देवदत्तस्य धोभयोः । पृथिषीञ्चान्तरीक्षम्य धिच समपूरयत् ॥ ५८ ॥ विस्ता स्वाभवन सर्व कुरयो राजससम। शवशम्देन शरस्य माधवस्थार्जुनस्य च ॥ ५९ ॥ तो राशब्देन निनादयन्ता पनानि शैलान् सरितो दिशश्च । चित्रासयन्ती तव पुत्र सेनां युधिष्ठिर नन्दयतां धरिष्ठौ ।। ६० ॥ ततः प्रयाताः कुरषो जघेन श्रुत्वैव शंखस्वम मीर्यमाणम् । विहाय मद्राधिपति पतिश्च दुय्याधनं भारत भारतामाम् ॥ ६१ ॥, महाहवे तं बदुशोभमाने पनअयं भूतगणाः समेताः । तदानुमोदन्त जनाईनच प्रमा कराष¥युदिती यथैध ।। ६२ ॥ समाचि तो कर्णशरः परन्तपावुभी ग्यमातां समरेच्यु श्रीकृष्ण और अर्जुन ने हठ करके धनुप प्रत्यंचा और बाणों के शब्दों से शत्रुमा को प्रभा राहत करके कौरवों को उत्तम वाणों से ढककर उन. प्रसन्न चित्त भल मभाव वाले शत्रुभों के मनको संदेह करनेवाले, नरांचोंने मुनणं जालसे युक्त बड़े शब्दवाले उत्तम शंखोंको हाथ में लेकर मुखसे चुम्बनकर अकस्मात् अपने मुखों से बनाया । ५७ । उन पांचजन्य और देवदास नाम | दोनों शाखों के शब्दोंने पृथ्वी दिशा विदिशाभों समेत आकाश को शब्दापमान किया । ५८। हे राजामों में श्रेष्ठ अर्जुन और माधवजीके उन शंखोंके: शनों से सब कौरव लोग भयभीतहुये । ५९ । शखों के शब्दों से वन पर्वत नदी मार पर्वतोंकी कन्दराओं को शब्दायमान करनेवाले उन दोनों पुरुषोचमोने आपके वेटेकी सेनाको भयभीत करके राजा युधिष्टिर को प्रसन्नकिया। ६० । हे भरस वंशी इसके मनन्तर उनके शंखोंके शब्दों को नुनकरसव कौरय लोग भरतवंशियों के रागा दुर्योधन को और राजामद्रको छोड़कर • बड़े बेगसे भागे तब श्रीवों के भागनेवाले बड़े समूहों ने उस घड़े युद्धमें बढ़तेजस्वी श्रीकृष्ण और अर्जुन को ऐसे प्रसन्न किया जैसे कि उदय होनेवाले दो सूर्य को सन मसन्न करते है। Sin, in their good car drani by silier white horses, looked gloring Itho Vishnu and Indra Decked with gold and precious stones, liesile and Arjup looked glorious liha Sun and fire. Haring mada the forec iose heart by the sbunds of their buwstring aud arrows, the two karriors covered and terrifiod the Kauravas with their arrows. They took their gold deched coachs in their bands and sent forth slırill no es which raug through lieaven and earth. The lauravas were terrified ou hearing those blasts which echoed through biils, rivers and cares terrifying the army of your sons and pleasing that of Yudhish. thir. 60. On hearing the sound of those conchs, the Kauravas fed away, leaving Duryodhan'and Shalya alone. Arjan and Krisho were (0817 । [६८९७) कणपर्व Karan Paray मार्जुन तो विहत्यायुदिती ययामली शाहुमण्यांविष दिनमालेनौ ॥ ६३ ॥ विहाय तान् वाणगणान्महाबली मुहगना प्रतिमापिकती। मन प्रविष्टा शिविर समीपरी सदस्यनिन्याविष पासवाच्युती ॥ १४ ॥ तो दयगन्धर्व मनुष्यत्रारणेमंदर्षि मिक्षमहारंगरपि । जयाभिवृद्ध्या परयाभिपूजिती हो तु कर्णे परमाइये ता॥६५॥ श्योभिरूपं प्रशिगहा नानथ प्रशस्यमानावतुलैव कर्मभिः । नन्दतुस्सी समुइन्द्रणी तदा पालं नियम्यव सुरेश शो। ६६ ।। इति कर्णपर्वणि शिविरमयशे चतुर्नवतोध्यायः ९४ ॥ हैं। ४१ उस युद्धमें कर्णके वार्णो से फितेहये शत्रुओं के संतस करनेवाले दोनों श्रीकृण और अर्जुन ऐसे प्रकाशमानहुये जैसे कि किरण समूहों करखन वाले निमल चन्द्रमा और सम्य उदयहोकर अंधकार को दूर करके प्रकाशमान होत, वह अनुपम पराक्रमी दोनोंईश्वर उन वाण सपूहों को छोड़कर पित्रो को माधर्मे लियेहुगे सुख, पूर्वक अपने डेरोंमें ऐसे पहुँचे जैसे कि सदस्यों के बुलायेड्डये विष्णु और इन्द्रजाते हैं । ६४ । ३ कणके मरनेपर उत्त बड़े युद्ध में वह दोनों श्रीकृष्ण और अज्जुन देवता गन्धर्व मनुष्य चारण महर्षि यक्ष राक्षस भोर महासपीकभी अपूर्व उत्तम विभप के आशीर्वादों से पूजितहुये । ६५ । फिर वह योग्य भाशोर्वादोले युक्त दोनों अपने गुणोंस स्तुतिमान होकर अपने मित्रासमेत ऐसे प्रसन्नहुये जैसे कि राजा वलिको विजय करके देवगणों समेत इन्द्र भार विष्णु प्रसन्नहुये थे । ६६ ॥ pleased at their Right. Pierced by Karan's árrows, g'iree Krishn and. Arjun, the destroyera of foes, looked glorious like the Sun and woon the destroyer of darkness with their rays. Accompanied by their friends, they entered their tents like Violinu and Indra, Boil Shri Krishn and Arjun were blessed by guide, gandlarvas, men, cba. rane, rishis, yakshes and serpents Having recioved their bapedictions, they were pleased like Vishnu and laure at their conquest of Bali." 65.
'- - (6918) Mxbixlibaret !५८.८ सञ्जय उवाच ।हते वैक ने कर्ण कुरवो भयपीरिमाः । बीक्षमाणा विशः समाः पठायो स्मनः॥१॥ धीरे तु नि अत्याधुभिः परमाहः । स विशोच, जनसायका मम्मोहिताः ॥ २॥ ततोयहा बने राजन् बोचाः समन्ततः। वार्य गणा भयोनिग्नालय पुत्रेण भारत ॥ ३॥ तेषान्तु RARIALय पुमले भरतम। अपवार तन केल्यस्यानुमते नृप ॥ ४ ॥ योधैर्महारथैः सई तो भारत तापक) सास्वरित शिीषगप दुहवे ॥५॥ गाग्घाराणी सहस्रेण शकुनिः परिगरितः। नमाधिरधि सप्ट्या शिषिराव दुवे ॥ ६ ॥ कृपः शारदतो राजन् मागानीकेन संवृतः । महता मेघकल्पेन शिधिरायैव हुदधे ।। ७ । बषरधाम : रोविनि इसस्प मुर्मुहः । पाण्डशन जयं दृष्ट्वा शिविरादेव दुये ॥ ८ ॥ संशप्तकावशेषण कोन महता वाः । मुशर्मापि ययौ गजन् वीक्षमाणो भयानुराम् ॥ ९दुग्योधनातु अध्याय ९५॥ संजय बोले कि हे राजा कर्ण के मरनेपर भयत. पोइतहो सत्र दिशाओं को देखतेहये कौरवलोग भागे । १ । अर्थात् घोर पुदमें अर्जुन के हाथो कर्णको | मराहमा दखकर आपके सर शूरवीर वायल और भयभीत होकर दिशाओं में छिन्नभिन्नहोराइसके पीछे चागओर से व्याकुल और गहा दुःखी होकर पाप के उन स शूरोने विश्राम किगा हे राजा इसके पीछे भापके पुष योधनने उनसब के उसमतको जानकर शल्यके मासे विश्राम किया । हे भरतवंशी आपके शीघ्रगामी रथ और शेषपचीहई नारायणी सेनासे युक्त कृतवर्मा की भोरको पला । ५ । हजारों गन्धार देशियोंसे व्याप्ताकानि भी कर्ण को मृतक देखकर मेरे की ओरपला । ६ । हे भरनवंशी राना धृतराष्ट्र शाईस पाचायनी भी बड़े बादलोंके समान हाधियों की सेनाको साथीलये डेरेकी भोरको चले।। फिर पड़े शूरवीर अश्वत्थामा गरम्बार रासलेले पाण्डवों की विजय को देखकर दरेकी ओरको चसे । ८ । हे राजा शेष बचीहुई संसप्तकों की सेनाको सायालय हुये सुशर्मा भी भय से पीड़ित पारोंऔर को देखता हुआ चलदिया । ९ । CHAPTER XCV Sadjays aid, "The Kauravas fied in all directions at the death of Karan. Seeing bit wounded by Arjun's arroj, tbey dispersed on all sides. They went away to take rest and Duryodhan too, retired for the night by the entreaties of Shalya Kritvarma too, went away to the camp accompanied by the rest of the army. 5. Shakuni, accorr.panied by the Gaudhar forces went to the camp. Kripacharya, followed by the army of elephants, huge ag clouds, went towade the camp. Seving the victory cf the- Paudavas, Ashwathama, with deep sigba, want to the camp. Susharma, with the rest of the Sansaptak army went away looking in all directions, Duryodhen too, who hadi [६८१.) Frigg kinan Pary (6819) नृपतितसर्वस्वमातुः । ययौ शोकसमाविष्टचिन्मयन विमना पहु॥ १० ॥ हनन मेन शस्यस्तु स्पेन रथिनाम्बरः प्रययो शिपिराध वीक्षमाणो विशो दश ॥ ११ ॥ ततोपरे मुषायो भारताना महाराः । प्रायन्त मयस्ता इियापिटा विचेतसः ।। १२ । मभुकण्ठा मयोद्विग्नापमाना मयातुराः । कुरष प्रताः सः इष्ट्वा कर्ण निपातितम् ॥ १३ ॥ प्रसंसातार्जु केचित् चित् कर्ण महारयोः । ध्यद्रधन्त दिशो भीताः कुर: राससचम ॥ १४॥ तेषां योपसहनाणी तापकानो महामृधे। मामीस पुमान कधियो यो मन मादधे ॥ १५॥ ते करें महाराज निराशाः कुरघोभवन । जीपिपथ राम्येषु दारेषु च धनेषु च ॥ १६ ॥ तान् समानीय पुरस्ते यत्नेन महता ममो। निषेशाय मनोदधे दुःपशोकसमन्वितः ॥ १७ ॥ तस्या शिरसा सेपि प्रति गम पिशाम्पते । विषर्णपदना पीना यन्त महारथा ॥ १८ ॥ इति कर्णपर्वणि कौरवपलायने पञ्चनवताध्यायः ९५ ॥ maste फिर निप्तके सब वाधव मारेगये वा शोकमें हुआ अमसन्नचित्त राजा दुर्योधन भी पड़ी चिन्तामों करताहुआ चलदिया । १० । रथियोंमें श्रेपशल्यभी दो दिशामों को देखता दूटी ध्वजावाये रथकी सबारीसे डेरेकी भोरका नसा । ११ । | इसके पीछ भरतशियों के बहुत से अन्य महारथीभी भयसे पीड़ित लग्ना से युक्त उदास चित होकरभागे । १२ । इसीप्रकार साघर पटकते व्याकुल कैपित महा दुःखी सप कौरख कर्णको गिरादुआ देखकरभाग । १।। हे कौरव्य को कौरव तो महारथी अर्जुनकी भोर कोई कणकी प्रशंसा करताप दिशाभों को भागे। १४! फिर वहां बड़े युद्धमें मापके हजारों शूरवीरों के मध्यमें कोई एला मनुश्य नहींरहा जिसने कि फिर युद्ध के निमित्त चित्त क्रियाहो । १५ । हे महाराज कर्णके मरने से कौरखलोग जोपन राज्य और स्त्रीको आशा भी निराश होगये । १६ । दुःख शोक से युक्त आपके समर्थ पुत्रने बड़े २ उपार्योसे उनको इकट्ठाकरके निवास के सिपे चित्तीकया फिरवह रूपांतर दशावाले महारथी शूरवरि उसकी मामाको शिर (अंगीकार करके ठहरे १८ ॥ lost all lis kinanner, wont on with a dejected mind.10 Shalya the best of Warrivre, went oa looking in all directions, from his car of whiula tha standard had fallen dono. The other Kaurat warriors, tertified ashamed and dejected, fed away from the field, bleeding and terror strikon. at the night of Karao's fall. Some prajeed Arjun while others soat on giving praises to Batan. Out of our thousands of warriors none desired to join again in battle. They lost all hope of their kingdom, life and women. Full of grief and sorrow, your son rallied them to go to the cainp aded thoy obeyed his order," 18. -- 6820) 1 - Jlahabhardt (६८२०) माय उपाच । तथा निपातिते कर्णे तय सैन्पच पिटुत । आश्लिप्य पाय दाशाहों वर्षाचनमब्रवीत् । १ ॥ इतो बनभृता वृधत्वया को निपातितः वर्ष कश्यां फयिष्यन्ति मानवाः ॥ ॥ जण मिहता प्रयुगे भूरिजेजसा यया. तु निहतः को धनुषा निति शरः । ६॥ तमिमं विक्रमं लोकप्रथितन्त यशस्कर निघदय धं कौन्तेय धर्मराजाय भारत ॥ ४ ॥ २धं कर्णस्य संमाने दीर्घकालाकीर्षि तमा निवेद्य धर्मर जाप स्वानुण्य गमिप्यसि ॥ ५॥ वर्तमान त युद्ध तप कर्यास्य, बाभवाः । द्रायोधन पर्वमागता धनादनः ॥ ६ ॥ मुभृश गाविद्धवान शक्तः स्थातुमाहवे । ततः स्व. पातः स राजा पुरुषमः। ॥ ७ ॥ तथायुक्तः केशवर पायन यदुपुङ्गव । पर्यायस यदव्या रश स्थषस्य तम् ॥ ८॥ एवमुक्त्वार्जुन कृष्ण - अध्याय ९६।। संजय बोले कि इसमकारसे कर्णके गिराने और शत्रुओं की सेनाके भागने पर श्रीकृष्गनी अजुन से प्रति पूर्लक मिलकर बड़े आनन्द से इस वचनकोबोल । १. हे अर्जुन जैसे इन्द्र हायमे वृत्रासुर मारागगा वैसेही तेरे हायसे कर्ण मारा नमान मनुष्य कर्ण और त्रासुर के घोर मरण को सदैव करेंगे। २१ पद में बड़ा मस्ती कामुर जैन पजसे मारागया उनीप्रकार तुम्हारे धनुष से छूटेहुये निशाणों से कगं बारागया । । हे कुन्ती के पुत्र लोक में विख्यात यश करनेश अर्जुन तेरे इस पराक्रम को उम बुद्धिमान राजा. युधिष्टिर से वर्णन करें 1 . । युद्धम कर्ण के मारने को बहुत दिनसे कहनेवाले धर्मराज राजा युधिष्ठिर से यह वचन कहकर दुम उपके ऋण प्रमाण होगे । ५। तेरे और कर्ण क बड़े घोर और अपूर्व युद्ध हने ार धर्मनन्दन रानायुधिष्टिर पूर्वही युद्धभूमि देखने को माये । ६, फिर भत्यन्त घायल होने से युद्धमें नियत होनेको समर्थ न होकर वह पुरुषोत्तम अपने ढरे में पहुँचकर नियतहुये । ७ । अर्जुन से बहुत अच्छा करे हुप बड़े सावधान यादपेन्द्र केशवनी ने उस उत्तम रथीक श्रेष्ठ स्थकोलाटाया। बागनी. अर्जुन से इसप्रकारकी बात कहकर सेना के मनुष्यों में बोले कि हे उत्तम शूरवीर लोगोतुम सावधान होकर शत्रुमा के सम्मुख होकर लड़ो तुम्हारा CHAPTER.XCVI Sanjage svid, "At llie death of Karai, Siri Krishn etabraced Arjun affectionately and said, “ Karan has been siain by you as Indra slow Vritrasur and this will be the talk of the world for ever. Hobas been slain by your arrow 38 Veitrasur was slair by vajra. Let us 'introm Yudhishthir of your famous deed el prowess, Thus we shall be ablo to satisfy h's long port up desire, 5. H2 came tri ece tbe stata of affairs wbea your were figbting with Karan, but unable to stay | Hong on nccount of his wound, he returned to his tent. " Then, with the consent of Arjon, Krishn turn:d back the good car. Tlou turniag - कप Karan Paray 16821) मनिकानि दमयति । पराननिगुस्सा या निष्ठव भद्रमस्तु वः ॥९४ पुग्न युधामन्यु माई फादरम् । युयुधानब गोविन्द इदं पवनममर्थात् ॥१.. यापदाधना राज हतः कोऽहमा । तापन्नियंचम्नु भषितम्य नराधिपः ११५ 'रात मानो या राशनियशनम् । पार्धमादाप गोषिदों ददर्श युधिष्ठिरम ॥ १२ सयान राजाल साम्चने शयनोसमे । भगृहणीताम्च मुदितीपरको पाधिषस्य ॥ १३ ॥ सयो: प्रहपमालोक्य प्रहाराया तिमानुपान् । गम्यं निहनं मस्या समुत्तस्पो युधिष्ठिः ॥ १४॥ समुत्थाय महयागुर पुनः पनारिन्दमा वामदेवा सुनो ना गम परिषस्यो । वासुदेवाय पाणेष १५ कुरुनन्दनः ॥ १५ ॥ ततो री पार पामुदेवः प्रियम्बदः । फपपामास फणस्पनिय यदुनन्दनः।। १६ ॥ इंगदुत् समयमानस्तु रुष्णो राजममधीत । युधिष्ठिरं हतामित्रं कृतान्जाल स्याच्युतः .॥ १७॥ दिया शेरधन्याच पाण्यय पृकोदरा स्वचापि कुशली रामा माई कल्याण होगा.। ९ । गोविन्दनी, धृष्टद्युम्ना युधामन्यु, नकुल, सहदेव. .भीम सेन और युयुधान से यह वचन बोले कि हम जबतक भर्जुन के हायसे कर्ण का ए राजा युधिष्ठिर से वर्णन करें तबतक सब लोगों को राजाभा' समेत निवास करना योग्य है । ११ । तर उन गुरों की आज्ञा पाकर गोविन्दजी मीन को साप लेकर देरेको गये और राजेन्द्र राजा युधिष्ठिर को सुबर्ण रचित अच्छे शयन स्थान में सोवामा देखा सप उन दोनों श्रीकण भौरभर्जुन ने राजा के दोनों चरणों को स्पीकिया । १३ । उस समय युधिधिर नेउन दोनों को प्रसन्न देखकर बड़ी मसमता के अश्रुपातों को डाला मोसुकर्ण को मृतक मानकर महावामु शश्रृंजय राजा पुधिष्ठिर उठफर पारम्बार दोनों अनुन भौर वासुदेवजी को अत्यन्त प्रेमते मिळे फिर यादवों में श्रेष्ठ पामुदेवजी ने असलि मन ने युद्ध करके उस कर्णका वध किया था सब रचाव धस वर्णनकिया ।१६। फिर मन्द मुसकान करते अविनाशी श्रीकृष्णजी हाथ जोड़कर भनात शनु राना मुधिष्ठिर से यह वपन योले हे रामा मारब्ध से गांडीव भनुप धारी भर्जुन भीममेन नकुल सादेव और तुम कुशन पूर्वक हो भव तुम इन to the warriors of the army, he said, "Good warriors, faes the enemies will be happy.". Thou turning to Dhrishtadyuwa, Yudhamanyu, Nakul, Sabadov, Bhim and Satyaki, he said, ".You may tako rana whilu Arjun and I alo going to inforza Yudhishthir al Karan's fall" 11, Saying good night to shom, Shri Krishn and arjun entercu the tont and san Yudhishthir lying on a comfortable, beda Tbuy touched his loete Sueing tham full of cheer be about tears of joy. Deliving tliet Karaa was slain, be embraced Arjun and Yusuduy again wou again. Then Vasudev told him how Arjun iat-tain Karan. With jomed ratne he said to Ynabishthir, " bravely and you - (6820) Jababharat (६८१०) भय उवाच । तया निपातिते कर्णे तय सैन्यच विनुते । मालिप्य,पायवाशा वर्षापनममधीत् ॥१॥ हतो वनभृता वृधवपा कों निपातितः । वाम कणांपा कर्यायप्यन्ति नानवाः ॥ण निहसा पृषः स्युगे भूरितजसा वया, ननिहतः पो धनुगनिधित. शर. ! ३॥ तमिमं विक्रमं लोकप्रथितन्त यशस्कर निदय कौन्तेय धर्मराजाय भात ॥४६ वध कणस्य संग्राने दीर्घकालाकीर्षि तमा निवेद्य धर्मर जाप मानण्य गमिष्यसि ॥५॥ यसमाने त युद्धतष कर्णस्त चांभया दप्टमायोधन पर्वमागता निम्पनः ॥ ६ ॥ मुभृशं गाडीवडावात्र शकः स्पातुमाहये । ततः स्व. यातः स राजा पुरुषर्षमः ॥ ७ ॥ तपायुक्त के शास्त्र पायन यदुएङ्गय पर्यावत यदप्यमी रणरथस्य तम् ॥ ८५ एघमुफ्त्यार्जुन कृष्ण अध्याय ९६॥ संजय बोले कि इसमकारसे कर्गके गिराने मौर शत्रुओं की सेनाके भागने पर श्रीकृष्णजी अजुन से प्रेनि पूर्वक मिलकर बड़े आनन्द से इस बचनकोषोल । १ . हे भर्जुन जमे इन्द्र के हायमे त्रामुर मारागगा वैसही तेरे हायसे कर्ण मारा गया मा मनुष्य कर्ण और हवानुर के घोर मरण को सदैव करेंगे।२। पदमें वह नस्ती त्रासुर नेग वजते मारागया उसीपकार तुम्हारे धनुष से छूटेहुये शिमों से कन पारागया । । हे कुन्ती के पुत्र लोक में विख्यात यश करने भजन तेरे इस पराक्रम को उम बुद्धिमान राजा, युधिष्टिर से वर्णनकरें । पदम कर्ण के मारने को बहुत दिनसे कहनेवाले धर्मराज राजा युधिष्ठिर से पह वचन कहकर तुम उसके ऋणर भषण होगे । ५ तेरे और कर्गा कवरे गोरे भोर भर्म युद्ध हने ार धर्मनन्दन राजायुधिष्टिर पूनही युद्धभूपि देखने को चाये । ६.। फिर अत्यन घायल होने से गुदमें नियत होनेको समर्थ न होकर वह पुरुषोत्तम भपने डेरे में पहुँचकर नियनहुये । ७ । अर्जुन से बटुन अच्छा को हुय बड़े सारधान यादवेन्द्र केशवजी ने उस उत्तम रथीके प्ठ स्थकोलाटायादा पाणनी अर्जुन से इसमकारकी बात कहकर सेनाके मनुष्यों में बोले कि हे उत्तम शूरवीर लोगोम सावधान होकर शत्रुमोंके सम्मुख होकर बड़ी तुमारा CHAITER.ICTI Sadjaya suid, " At the death of Rara., Sri Krisun cinbraced Arjun affectionats.y and said, “ Karan has won alain by you as Indra slow Vritrasur and this will to the talk of the world torcyer. Ho bas born slaia by your arrow as Vritra ur was slai: by vajra. 'Let us infrom Yodhishthir of your famous deed of prowes, Thue ru sbal}, be able to rat'sfy lis!ong pett ur desire 5, H2 came to nec tbo state of Mairs bea your weru fightio: with karaa, but unalle tuntay long ou acoust of his wouad, to returned to his wint. Then with the copsat of Arjud, Krithn tara:d besk the good car. Tlou curuing M " [६८२१) कर्णपर्व Karan Paray 16821) सनिकाल गिधीत् । परानभिमुखा यत्ता स्तिष्ठध्य मदमस्तु घः ॥९॥धुएधुग्नं धुधामन्यु माझीपुमौ वृकोदरम् । युयुधानन्च गोविन्द इदं वचनमीत् ॥१०॥ यायपाद्यतां राने इतः कर्णोईनन । तापयन्निर्यस्तु भवितव्य नराधिपः ॥११॥ रातः शौरनुज्ञातों ययौ राजनियेशनम् । पार्यमादाय . गोबिंदो ददर्श ष युधिष्ठिरम ॥ १२ ॥ शयानं राजशार्दूल काम्चने शयनोत्तमे भगृहणीताञ्च मुदिती चरणो पाधिपत्य तो॥ १३ ॥ सपोः प्रहर्पमालोक्य प्रहारांचा तिमानुपान् । राधेयं निहतं मस्या समुचस्पो युधिष्ठिः ॥ १४॥ समुत्थाय महपाहुः पुनः पुनारिन्दमः । घामुदेवा जुनी ना पुन परिपस्पते । वासुदेवञ्च घाणेय पप्रच्छ कुरुनन्दनः ॥ १५ ॥ ततो स्मै यद्यधावसं पासुदेवः प्रियम्बदः । कथयामास फणस्प निघतं यदुनन्दनः ॥ १६ ॥ ईदुत् समयमानस्तु रुष्णो राजनमवधीत् । युधिष्ठिरं हतामित्र तान्जाल स्थाच्युतः . ॥ १७॥ दिष्ट्या गाण्डीवधन्बाच पाण्डवश्व वृफोदरः स्वञ्चापि कुशली राजा माद्री कल्याण होगा.। ९. गोविन्दजी, धृष्टद्युम्न, युधामन्यु, नकुल, सहदेवा .भीम सेन और युपधान से यह वचन योले कि हम जबतक अर्जुन के हायसे कर्ण का वध राजा युधिष्ठिर से वर्णन करें तवतक सघ लोगों को राजाभों समेत निवास करना योग्य है । ११ । तप उन शुरों की आज्ञा पाकर गोविन्दजी मर्जुन को साथ लेकर देरेको गये और राजेन्द्र राजा युधिष्ठिर को सुवर्ण रचित अच्छे शयन स्थान में सोताहुभा देखा सय उन दोनों श्रीकृष्ण और अर्जुन ने राजा के दोनों चरणों को स्पर्शकिया । १३ । उस समय युधिष्ठिर नेउन दोनों को प्रसन्न देखकर बड़ी प्रसन्नता के अश्रुपातों को डाला और कर्ण को मृतक मानकर महापाष्ठ श|जप राजा युधिष्ठिर उठकरं पारम्बार दोनों अर्जुन भौर वासुदेवजी को अत्यन्त प्रेमसे मिले फिर यादवों में श्रेष्ठ वासुदेवजी ने जैसे कि अर्जुन ने युद्ध करके उस कर्णका वध किया यह सव चांत उस से वर्णन किया।१६. फिर मन्द मुसकान करते अविनाशी श्रीकृष्णजी हाथ जोड़कर अजात शत्रु राजा युधिष्ठिर से यह वचन बोले हे राजा प्रारब्ध से गांडीव भनुप थारी अर्जुन भीममेन नकुल सादेव और तुम कुशल पूर्वक हो भव तुम इन to the warriors of the army, he said, "Good warriors, face the enemies bravely and you, will be happy.". Then turning to Dhrishtadyumn, Yudhamanyu, Nakul, Sahadev, Bhim and Satyaki, he said, ". You may take rast while Arjun and 1 ale going to informa Yudbisbthir of Karan's fall" ii. Saying good night to them, Shri Krishnand Arjun entered the tont and saw Yudhishthir lying on a comfortable, bed. They touched his foet. Seeing them fúll of cheer da shed tears of joy, Beliving thiab Karaa vas slain, be embraced .Arjan" and Vasudov again and again. Then Vasudev told him how Aijun liad slain Karan. With jomed palus he said to Yudhishthir, 'iitit 16822) Mabalharat पुत्रोच पाण्डवी ॥ १८॥ मुक्या बारक्षयास्मात संभामायोमहर्षयात् ॥१९॥ लिए मंचरकालानि कुरु कार्याणि पहिच । हतो वैकत्तनः मतपुत्रो भाष: विश्मा अयति राजेन्द्र विष्ट्या पीस पारया ॥ २० ॥ प्रस्तुपूजित सभासद पुषाधमः । तस्यांच मूतपुत्रस्य भूमिः पिपति शोणिवम् ॥ २१ ॥ शेतसी परपूर राम कुरुपुनव सं पश्य पुरुषव्याघ विभिध बहुधा शरैः ॥२२५ तामिमा मिमा मुर्गा मनशाधि महाभुज । यचो मृत्वा सहास्माभिर्भश्व भोगांभास्कलान 4.१३॥ सम्जप उपाय । इति अत्वा बचतस्य केशवस्य महात्मनः । युधिष्ठिरस्तु सगाई यः प्रत्यपूजयत् । दिष्ट्या विष्ट्रपति राजेन्द्र शाक्यं चेदान नैनस्चि महामाहो त्वयि देवकिनन्दन । स्वया सारथिना पाएँ एव फय्यांसमानु कम ॥ ३५ ॥प्रमह्य च इरभेष्ठः साद दक्षिण मुजम् । ष मत पाच गयी वारों के नाश करनेवाले सौर रोमाच खड़े करनेवाले महापौर बसे निच हुपे । १५ हे पाण्डद् अब तू वही शीघ्रता से भागे करनेवाले को को करों रागा सूतका पुत्र महारथी कर्ण मारागया हे राजेन्द्र तुम अपने पार से पिनय करतेही और माग्यसेही इदि पावहो । २० । और भी नीच पापात्मा 'पुष्प शूत में हारी ई प्रोपदी को इंसाया उस मूत के पुत्र के पिरको भर पृषी पान कररही है। ३।। कौरवमि भेष्ट यह तेरा शव बाणों से भरे पे मार से पृथ्वीपर पदाहुभा सोता है, पुरुषोतम इस बहुत पायों से टूटेगा पं को देखो । २री हे मृतक श वाले महाबाहो तुम इस. पृथ्वीपर राज्यकारे मार. हम. समेत सावधान होकर उसम भोगों को भोगो । २३ । समय बोले कि, पद परयन्त प्रसन्न चित्त वर्ष पुत्र राना धिष्ठिर ने इन बचनों को सुनकर एन: महात्मा के पार जी से कहा हे महावाहु थापने जो मारपसे हुआ यह वचन. कहा १.२४। सो हे मशवाहों देवकीनन्दन यह पात आपमें कुछ अपूर्ण नहीं है आपकी यह योग्यता सदैव से चली आई है उपाय करनेवाले. अर्जुनने तुम सारथी के सायहोकर उसको मारा । २५ । यहकहकर वह धर्मपारी कौरवों में थेप्ट युधिष्टिा. पाचन्द by good luck that Arjun, Bhim, Nakul, Sahader, and ypuraaNe and sound. You have practically won this dreadful battle INow.yon may do what is next to be done, for Karau is slain. You win and grow.by, good fortune. 20. The despicable wrotch who laughedla, Draupadióliea bleeding on carth. Your enemy sleeps on earth with his body.full of. RTORS. - You will ses hin pierced all thrpuge with.] Arrows You will now rule the earth and enjoy it, blessings. HAring, heard thoss words, Yudhishthir said to Kesbav, "You, aay, that all thia bas been done by Fate, but aothing is strange te, you, son of Devaki. Arjan ens abio to slay Karan,, because you drovo Arjun's, car." 25. Haring said this, Yudhishthir held. Vasuder-by.the right, फाल्गुनी १८२ कर्णपय Karan Parav (8823 केशवानुनी ॥ २६ ॥ मरवारायणा दयो कथिती नारदेन मे। धर्मसंरक्षण युक्ती. राषिसमी ॥२ संकुच्चापि मेधावी हष्णवैपायनो मम । कयामता महो भागो दिपाययत् प्रभुः ॥ २८ ॥ तष कृष्ण प्रभावन पापोये धमजयः । जिंगाबाभिमुख शांग बासीदिमुत्रः पचित । २९ ॥ जयशेष ध्रुधास्माकंन स्वस्माई परायः । यदा व युघि पार्यस्य सारथ्यमुपजग्मियान् ।। ३० ० इयुकावा मेरास्नु त र हेममूर्षितम् । दन्तयनें हंपर्युकं कालघालमनोजः ॥३॥ मास्थाप पुरुषायाः स्यषलेमाभिसंघृतः । छप्णा नाश्यां धाराभ्यामनुमन्यः, तत: प्रियम् । मार्गता मारमा रमायोधन तदा ॥ ३२॥ आमांपमाणस्तो पारामी माघय विवरणे फणे शयाने पुरुषर्षमम् ॥ ३३ ॥ यथा कदम्बकुममं केशरः सर्वतो समावि परशतैः कणे धर्मराजो पद सः ॥ ३४ ॥ गन्धतेलापसिकामिः रखनेवाली दक्षिण भुभाको पकड़कर जनदोनों अर्जुन और केशवजी से बोले । २६॥ कि नारदजी ने तुमदोनों को धर्मात्मा महात्मा और प्राचीन ऋपियों में श्रेष्ठ र मारायणास्प देवता पुकसे वर्णन किया है और पुदिमान सिद्धान्तों के माता गांसदसमी ने भी इसमाभाग कथाको वारम्वार मुझसे कहा है । २८ । हे कृष्ण की इस पागड मर्नुनने भांपकी फंपासें सम्मुख होकर शंत्रों को विजय किया मार किसी स्थानपर मुख नहीं फेरा । २९ । निवर्य हमारी विजय हैं इमारी पराय नहीं होगी अपमापने भर्जुनकी रथयानी अंगीकार करी ।२०। तर पुरुषो नाम महाराज धर्मराज या करकर श्वेत पूर्ण काले घाल पित्तके अनुसार शीघ्र गामी पोड़ों में युक्तं सुपर्ण पूजसे निर्मित रबंपर सबारहों अपनी सेना को साथ लेकर पुदभूमि के देखने को प्रवृत्तहुये धीर श्रीकृष्ण और अर्जुन से पूछकर भार दोनों से प्यारे भिष्ट वसनों को कहते हुये पलदिये बहानाकर उस राजा युधिष्ठिर ने युद्धभूमि में शयन करते हुये कर्णको ऐसा देखा जैसे कि सत्र भारसे केसरों से युक्त कंदम्पका फूलहोता उसधर्मराजने हजारों वाणोंसे चिताये कर्णको देखा। ४ मुन्धित तेलोंसे सिंहहुपे भौर हजारों मुनहरी मशालों से find and thus nddressed Aijun and Keshav, " Narad bas infornded: ins that you two are the ancient gode, known as Naia and Narayad. Vyas too, has often told wo about you. Arjun has by your grace Inlain the foes without fail. We are sure always to win and dever to: love since you have takon upon yourself to drive Arjup'o' car. 30 Then Yudhishthir was ready with his army to go and nea tho isluof battle in his gold-docked car drawn by white bordos haviug black hair and wilt like the mind. Krisha and Arjun komt on' with hitti con ver's ing in sweet langauge. There Yudhishthir saw Karsa lying on eartawith this body piosced through by arrows. In torch light, fed by swant scented oil, he saw thodead body of Ksran pierced by arrows and cat -- ....
6825 [६८२५) Foga Karan Parya तिमिधानानं भेने कुरुकुलोद्वहः ॥ ४४ ॥ समेत्य च महाराज कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम । हर्षयन्ति स्म राजानो हर्षयुक्ता महारथाः ॥ ४५ ॥ नकुलः सहदेयश्च पाण्डवश्च वृको दः । सायकिय महाराज वृष्णानां प्रघरो रथः ॥ ४६ ॥ धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च पाण्डपांचालसूजयाः पूजयन्ति स्म कौन्तेयं निहते पूतनन्दने ॥४७॥ ते वदीयस्था नुपति पाहुपुत्रं युधिष्ठिरम । जितफाशिको लघलक्ष्या युद्धशौण्डा प्रहारिणः ॥४८॥ स्तुवन्तस्तपयुकाभिर्वाग्भिः कृष्णा परन्तपो । जग्मुः स्वशियिगयेव मुदायुक्ता महा रथाः ॥ ४९ ॥ परमेष क्षयो वृतः ममहांलोमहर्षयः । तप दुर्मन्विते राजस्तर किमनु शोचसि ॥ ५० ॥ वैशाम्पायन उनाच । श्रुत्वेतदप्रियं राजा धृतराष्ट्रो महीपतिः । पपात भूमी निश्चेष्टः कौरव्यः परमासगात् ॥ ५१ ॥ तथा सा पतिता देवी गान्धारी दोघदर्शिनी । शुशोच बहुलालापैः फर्णस निधनं युधि ।। १२ ॥ तं प्रत्यगृहनाहिदुरी नवति स यस्तथा। पर्याश्वासयताञ्चैध ताघुभाघेव भूमिपम् । तथैधोत्थापयामासु मंजय बोले कि अर्जुन के शापकों से कर्णको मृतक देखकर उस राजा युधिष्ठिर ने अपना पुनर्जममाना। ४४ । हे महाराज फिर बड़ी प्रसन्नता भरेइये महारथियों ने कुन्तोके पुत्र राजा युधिष्ठिरको मिलकर बड़ा प्रसन्नकिया और पाण्डव नकुल सहदेव भीमसेन और वृष्णियों में बड़े श्रेष्ठरधी सात्यकि, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी पांचाल और सब्जियोंने कर्णके मरनेपर युधिष्ठिरकी स्तुतिकी । ४७ । फिर वह | सब धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरकी स्तुतिकरके महा विजयसे शोभायमान सभेदी युदमें कुशल सावधानी से युद्ध करनेवाले प्रशंप्तायुक्त उन श्रीकृष्ण और अर्जुन, की कीर्तिगानेवाले प्रसन्नता में डूबेहुये सब महारथी अपने डेरोंको गये । ४९ । हे राना आपके दुर्विचारों से यह बड़ाभारी घोर रोमहर्पण करनेवाला विनाशकाल | नारीहुआ अब तुम किस निमित्त शोचकर तेहो । ५० । बैशम्पायन बोले कि अम्बिकाके पुत्र राजा धृतराष्ट्र हसशोक और दुःखदायी वृत्तान्तको पुनकरभचेत और निश्चटहोकर पृथ्वीपर ऐसे गिरपड़ा । ५१ । उसीमकार वह वरदार्शनीदेवी गांधारीभी गिरपड़ी और युद्ध में कर्णके मरने को बहुत विलाप करकरकें शौचा ॥५२॥तवविदुरजी और संजयने उसराजाको पकड़ालेया और दोनोंनेराजाको विश्वास badev and Bbım, with Satyaki the best of Vrisbnis, and Dbrisbane dyumn and Shikhandi ot Panchal congratulated Yudhishthir un Ko ran's death. 47, daving given praises to Yudhishthir, the great warriors praised Shii Krishn and Arjun and then went to their res pectivs tents. All the destruction has caused by your sul policy, and you must not be grieved at it, Prince Dhritrash tra!" -50. Vai shampayan continued that on hearing the dreadfal news, Dhr.tri abtra foll, down senselese on earth. ble with grief,for Ka'an. Then Vidur and Sanjaga held the king and consoled bim. Similarly, Gandhari was liſted up by the Kaurav Wise Gandhari too, became insanine (१८२७) कर्णपर्व Saran !'arv 15827 युधि । बायेष्ठश्चापि मन्ति देवाः दारोग्यं प्राप्नुपमाह स॥ ६॥ ॥ तथैव विष्णभंगवाम् समातमः स पात्र देवः परिकोपले यतः । ततः स कामालमते मुली मरो महामुनेतस्थचोषितं पथा॥ १ ॥ कपिलानां सपासामा वर्षक निरमतरमा यो पात मुहत सद्धि प्रवणात् कर्णपर्वणः । ६२ ।। इवि कर्णपरीण युधिष्ठिर हर्षे, पणतोऽध्याय ॥ ९६ ॥ cor में प्रामण को वेदों की माप्ति भोर युद्धमें क्षत्रियों को पराक्रम वा विजयकीमाप्ति वयों को पनकीमाप्ति और शूद्रों को नारोगनाको प्राप्ति होती है । ६० । जो कि इसमें भगवान सनावन देवता विष्णुजोका वर्णनई इसहनुप्से वहमनुष्य सुखी होकर मनोभी को पात । ६१ । यहउस महामुनिने वचन कहा कि जो इसकर्णपर्व को मुनताद वह एक पर्पतक सवत्सा कपिला गौ के प्रतिदिन दान करनेक समान फलको पाताहै ६२॥ । कर्णपर्व समाप्तम् ।। and health rozpsctively: Tho reader of this book, gains the object of his desiro because it contains an account of Vishnu in it. The great riabis say that the rendor of this book grips the fruit of giving a mitch cow crery day for ayear." 92.
(१८२७) कर्णप; Kaan Pary 138271 युवि । धनज्येष्ठश्चापि भन्ति वेषाः सदारोग्यं प्राप्नुवन्तीह स॥ ६॥ " तथैव विष्णभंगवाम् सनातमः स पात्र देवः परिकीमत यतः । ततः स कामालमते मुली मरो महामुनेलस्य वोचितं स्था॥ १ ॥ कपिलानां सपस्सामी वर्षक निरसरमा यो रयात सुकृतं सद्धि प्रयणात् कर्णपर्वणः । ६२ ।। इति कर्णपीण युधिष्ठिर ह.पणवतोऽध्याय ॥ ९ ॥ में प्रामण को वेदों की प्राप्ति और युद्ध क्षत्रियों को पराक्रम वा विजयकी प्राप्ति वैश्यों को पनकीमाप्ति और शूद्रों को नीरोगनाकी प्राप्ति होती है । ६० । जो कि इसमें भगवान सनासन देवता विष्णुजोका वर्णनई इमहतुसे वहमनुष्य मुखी होकर मनोभीटों को पाते हैं । ६१ । यहउस महामुनिने वचन कहा कि मो इसकर्णपर्व को मुनताई वह एक वर्षतक सवत्सा कपिला गौ के प्रतिदिन दान करने के समान फलको पाताहै ६२॥ । कर्णपर्व समाप्तम् ॥ and health rospectively. The reader of this book, gaias the object of his desire because it contains an account of Visbnu so it. The great rishis say that the reader of this book gaip, the fruit of giving a mitch ror opery day for a year.' 92.