Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Trelokya Deepika(sangrahni) Hindi Bhashantar

Manak Muni · 2011/02

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Front matter

। कल्पलता श्रीजी आदि ठाणा 4 के दर्शन-वन्दनाः-
विजयजी म. सा. तथा प्राचार्य श्री विजयरामर
ल. सा. का आशानुवातना साध्वाज
तुर्मास सिवाना में हो रहा है। पूज्य
वर्षों से महराज श्री की पुनीत निम्न
विध-विषयों पर बड़े ही प्रभावशाल
प में पधारकर कर्म निर्जरा करें तय
तप का मंगलमय कार्यक
मंगलवार
शुरुवार
भव्य-जिन मन्दिर तथा भव्य जैन दादावाड़ी के
विजय भुवन भानु सूरि जी म. सा. के शिष्य
10
सोज सुदी
सोज सुदी
12
IN

पी उत्तराद्रीय शाा मन्दिर जानुप सेठ पूनमचद वा अजयमालास त्रैसम्म दीपिका सगृहणीला अथात्- स्वर्ग नर्क और भूमण्डल के जीवो का वर्णन (मूल और हिन्दी भाषान्तर) अनुवादक--- श्रीमान् मौणिक मुनिजी महाराज, प्रकाशक-सोभागमल हरकामत-यव- स्थापक, अजमेर गागापमाद ५ प्ररा मे मुखदेवमााग न 1प्रयाप्रम, भामर में मुद्धिा प्रथमावृत्ती । गृय मादक आधारस्य ६०० टाकव्यय गृयर

मोहन मुनि महाराजजी, सदुपदेश दातार ।
दीक्षागुरु पन्यासजी, हर्ष मुनि सुखकार ।।
सरस्वती जिन मूत्र को, वन्दू वारम्बार ।
सज्जन की कृपा हुई, ग्रंथ लिखु श्रीकार ।।
पुण्य पाप का फल जिम, स्वर्ग नर्क का ज्ञान ।
चार गति के जीव का, और शरीर का मान ।।
कहां से वे कहां जान हैं, कहां से फिर कर आय
मुक्ति हो किस रीति मे, वांचो चित्त लगाय ।।
धाड़ीवाल कुटुम्ब के, मदनचन्द गुणवान ।
सुत उनका हर्पचन्द्रजी, प्रसिद्ध हुआ विद्वान् ।।
उनीसो बहनर वदी, चतुर्दशी आसाढ ।
उन चालीस की उम्र में, काले लिया उखाड ॥
उनके स्मरण कारण, वनवायो यह ग्रन्थ ।
साधु साध्वी इच्छुको, मिल से भेट सुसन्त ।।
ज्ञान एक प्रकाश है, बाह्य भीतर लो देख ।
पाप प्रवृत्ति छोड़कर, लेवो मुक्ति लेख ।
कुमति कुकर्म छोड़ के, राखो ज्ञाने ध्यान ।
माणक कहे जिनराज का, वचन होत प्रमाण ।।

त्रिलोक्य दीपिका (संग्रहणी सूत्र) - भीष, अजीच, पुण्य, पाप, आश्रय, सवर, निर्जरा, बन्ध और मोक्ष इन नव तत्वों का वर्णन जैन शास्त्रों में किया है. यो ग्रन्थ छप चुका है, और जीव विचार प्रकरण भी हिन्दी भाषान्तर के साथ अपगया है अब चारगति जैसे देव, मनुष्य, नर्क और तिर्यच आदि का विशेष अधिकार मानने को पूर्वाचार्यों ने सूत्रों में जहा २ अधिकार है उसको सग्रह कर यात्र बताया है जिससे इसका नाम सग्रहणी मूत्र है ३१८ मूल गाथाओं में जो विवरण सूचित किया है उसी का विशेष विवरण भीमसी माणक की मसिद की हुई अपी पति से सार लेकर इस ग्रन्थ की रचना की है, जिसके पढने से पाप से रचने और नर्क निगोट और तिर्यच का दुइस मिटने, और पुण्य उपार्जन करने का रास्ता मालूम होता है. इस लोक और पर- लोक में स्वर्ग का मुख मिलने और समता भाव से मुक्ति मिलने आदि का रास्ता बताया। पाथिमीय शोष से और अपने शानों से पृथ्वी और सूर्य के विषय में इस विषमवार है और उन लोगों के पास से २ सापन भी है कि आज के जमाने मनपर विश्वास परना पड़े, तो भी एप भोर पाप के फलों (२) क का निषेध कोई भी नहीं कर सकता, न मुक्ति का निषेध कर सकता है इसलिये उनके अन्यों के और अपने शास्त्रों के विषम बाद में विवाद छोड़कर मध्यस्थ भाव से यथा योग्य पढकर और समझकर तल केवली गम्य जान के पापों से बचना और धर्म और परोपकार का श्रादर करना चाहिये. इस ग्रन्थ को उपयोगी जान साधु साध्वी, वगेरह को भेट देने के लिये मदनचंदनी धाडीवाल ने अपने सुपुत्र हर्पचन्द्रजी के स्मार्थ १००) रुपये देकर इसकी ४०० कापी वितीर्ण करने को अलग रक्खी है, और १०० कापी हमीरमलजी साहा ने विद्यार्थियों को ।) में देने के लिये खरीद करी है वाकी ५०० कापी ( प्रति ) जैन वा जैनतर समाज के हितार्थ पूनम- चन्द वृद्धीचन्द ढहा हिन्दी जैन पुस्तक प्रचार फंड के द्रव्य से मुद्रित की हुई तय्यार है, आशा है कि एक वक्त भ्राता और भगिनियां इसे, जरूर पढ के लाभ उठावेंगे.. गुजरात में जैसे प्रतिक्रमण, जीव विचार, नवतत्त्व, संग्र- हसी, कर्म ग्रन्थ और त्रिशष्ठिशलाका पुरुष चरित्र आदि ग्रन्थों की परीक्षायें होती हैं और छात्रों को और कन्याओं को उत्ते- जनार्थ द्रव्ये पारितोषिक ( इनामः) देकर जैन तत्व ज्ञान का प्रचार करते हैं, उसी तरह मारवाड़, मेवाड़, ढूंढाड़, मालवा, पंजाब, युक्तप्रदेश (यू. पी. ) और बंगाल आदि देशों में हिन्दी भाषा में परीक्षाओं का उपरोक्त प्रबन्ध किया जाय तो आज जैनों की जो वस्ती पटरही है और जैन में हिन्दी साहित्य विपय जो कम है वह अवश्य बढेगा-इसलिये जैसे वृद्धिचन्दजी दहा, मदनचन्दनी धाडीवाल, सोहनलालजी जालोरी, हमीर- मलजी साहा, वींजराजजी कोगरी, और श्रीरामजी छजलाणी दिल्ली वाले आदि ने जैसे द्रव्य देकर सहाय की है वैसे ही प्रत्येक बन्धु वा भगिनी अपने प्रेमीजनों अथवा बुजुर्गों के स्मार्थ वा पुण्यार्थ द्रव्य देंगे तो उनकी तरफ से अनेक ग्रन्थ मसिद्ध होयेंगे इस हेतु के लिये आप अन्य मगाकर पढ़ें और उसमें सद्दाय करें धर्म रत्न प्रकरण में से श्रावक के २१ गुण, वारानत और १४ नियमों के वर्णन का अन्य केसरीचन्दनी लूणिया की तरफ से उनके पुत्र के स्मार्थ छप रहा है. और भी अनेक ग्रन्थ छपाने की आवश्यक्ता है इसलिये जो तन मन धन देकर नान वृद्धि करना चाहें वे पुण्यात्मा पुरुष सोभागमलजी हरकावत अजमेर को लिखें। अजमेर राखनकोटदी, धावण मुदी १ मगलवार. } मुनि माणिक्य

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ॐ s श्री संग्रहणी सूत्र. मंगलाचरण व अन्य प्रयोजन- नमिउ रिहताई ठिड भवणोगाहणाय पत्तेय ॥ सुर नारयाण वुच्छ नर तिरियाण विणा भवण ॥१॥ उववाय चवणविरह सख इग समइय गमागमणे ।। भावार्य -श्री अरिहताठिक पच परमेष्ठी को नमस्कार करके, देवता और नारकी (नारकी के जीव ) इन प्रत्येक की स्थिनि (आयु ), भुवन (गृह अर्थात् वास स्थान ), तथा शरीर की अवगाहना कहेंगे और मनुष्य निर्यच के विषय में भुवन के ( २ ) सिवाय शेष दो द्वार स्थिनि नथा अवगाहना कही जायगी. क्योंकि मनुष्य व तिथंच के भुवन शाश्वत नहीं है. इस के अतिरिक्त निम्नलिखित बातें भी कही जावेगी. १ उपपात विरहकाल यानि एक देव उत्पन्न होने के पश्चात दुसरा देव उत्पन्न हो उसके विच में कितना अन्तर पड़े ? चवन बिरहकाल अर्थात् एक देव चवने के बाद दूसरा देव कि- तने अर्से में चवता है ? तथा एक समय में कितनी संख्या में देव उत्पन्न होये ? और एक समय में कितनी संख्या में देव चबैं? देव मरकर कितनी गति में उत्पन्न होवे ? और देवगति में कितनी गति में से जीव आसकते हैं ? यह छः वाते जिस प्रकार देवों के विषय में कही जावेगी उस ही प्रकार नारकी, मनुष्य व तिर्यच के सम्बन्ध में भी कही जावेंगी. सब मिलकर देव तथा नारकी के नव नव द्वार तथा मनुष्य और तिर्यच के आठ आठ द्वार इस भांति ३४ द्वार का विवरण इस ग्रन्थ में किया जावेगा. अब पहिला स्थिति द्वार कहते हैं:- दसवास सहस्साई भवणवईणं जहन्नठिई ॥२॥ भावार्थ:-भुवनपति देवता देवियों की कम से कम जघन्य स्थिति दश हजार * वर्ष की होती है। * याद रखना चाहिये कि कोई भी देव या नारकी दश इजार वर्ष से कम आयुष्य में मरने ही नहीं है।

( ३ ) चमर बलि सार महिन ॥ तद्देवीण तुतिरिण चत्तारि ॥ पलियाइ सढाइ ॥ सेसाण नवनिका- याण ॥ ३ ॥ दाहिणदिवढ पलिय ॥ उत्तरो हुति दुन्नि देसूणा ॥ तद्देवी मद्ध पलिय ॥ देसृण पाउसुकोस ॥४॥ अन मुवनवासी देवों के आयु य की उत्कृष्टी स्थिति दते हे भावार्थ -भुवनपति देवों की दश निकाय प्रत्येक नि. पाय म उनगई और दक्षिणाई ऐसे दो दो खण्ड हैं। इस मकार सब मिलकर पीस खण्ड है प्रत्येक ग्वएड में एक एक इन्द्र है उम तरह से भुवनपति के २० इन्ट है इनम से प्रथम तिमाय के दक्षिणार्द्ध में रहने वाले अमुग्छमार देवा के अधि- पति चमन्द्र की उत्कृष्ट ( ज्यादे से ज्यादा ) आयु एक साग- रापम की आर उत्तराई में रहने वाले अमुरकुमार देवा का अधिपति वलेन्द्र की उत्कृष्टी आयु एक सागर से कुछ अधिक है तथा चमरेंद्र की देवी की उत्कृष्ट स्थिति साह,तीन पल्योपम की नया चलेन्द्र की देवी की उत्कृष्ट स्थिति माहे न्यार पत्यो- पम की होती है. इनके अतिरिक्त नागकुमागदि गैप नव H है (४) निकाय में दक्षिण दिशि के धरणेन्द्र प्रमुग्व नव इन्द्रों की आयु देढ़ पल्यापम तथा उत्तर दिगि के भूतानेन्द्र प्रमुग्व नव इन्द्र की उत्कृष्ट आयु कुछ कम दो पल्योपम की होती है. और धर- गद्रादि नब इन्द्र की देवियों की आयु अर्ध पन्योपम की नया भूतानेंद्र प्रमुख नव इन्द्र की देवियों की आयु अधिक से अधिक कुछ कम एक पल्योपम की होती है. अब व्यतर देव देवियों की स्थिति कहने है । वंतरियाण जहन्नं ॥ दस वास सहस्स पलिथ मुक्कोसं ॥ देवीणं पलिअद्धं ॥ भावर्थः-व्यतर देव देवियों की जघन्य आयु दशहजार वर्ष की होती है और व्यतर देवों की उत्कृष्ट स्थिति एक पल्य- ( पल्योपम ) की तथा उनकी देवी की उत्कृष्ट स्थिति अध पल्य की होती है। अब चंद्रमा, सूरै, ग्रह नक्षत्र और सारा इन पांच प्रकार के ज्योतिथी देवो की स्थिति कहते है. पलियं अहियं ससि रवीणं ॥५॥ लकवण सहस्सेणय ॥ वासाण गहाण पलिय मेएसि ।।

ठिई श्रद्ध देवीण ॥ कमेण नक्खत्त ताराण ॥६॥ पलिथदं चउभागो ।। चउ अड भागाहिगाउ दे. वीण ॥ चउ जुअले चउ भागो जहन्न मड भाग- पचमए ॥७॥ भावार्थ -ज्योतिषी देवके दो प्रकार है. पक चर व दूसरे घिर घनमें चरविमान अदी द्वीपके अतगर्त व स्थिर विमान भटी दीप के वाहिर है । उनमें से चद्रमा व चद्रमा के विमान वासी देवों की उत्कृष्टायु एक पन्पोपम पर एक लाख वर्षकी है सूर्य मर्य के विमान वामी देवों की स्थिति एक पल्यापन पर एकसास वर्षकी है ग्रह तथा ग्रह के विमान वासी देवों की उनष्टायु एक पल्यापम की है तथा पूर्वोक्त चद्रमा मूर्य व प्रह विमान वासी देवों की निननी आयुई उममे उनी टेविया की आयु आधी है अर्थाद चद्रमा की देवी की उत्कृष्टायु मर्थ पल्यापम ५० पनाम हनार वर्ष मूर्य की देवी की अध पल्लोपम पानसी वर्ग की नया प्रकी देवी की उत्कृष्ट स्थिति अध पत्यापम को होती है অং সনা, ঘিয় য যা যা না জান ? नक्षत्र व नवत्र फेषिमान वामी देवों की उत्कृष्टायु मी पापापप की नथा उनकी देवियों की पार पन्योपम की भापु

( ६ )
होनी है. तारा और तारा के विमान वासी देवों की उत्कृष्टायु
कुछ अधिक पाव पल्योपम की तथा उनकी देवियों की आयु
पल्योपम के आठवे भाग से कुछ अधिक होती है.
अब ज्योनिपी देव देवियों की जघन्य आयु कहते हैं. चं-
द्रमा, सूर्य, ग्रह नक्षन और तारा के विमान वासी देव नथा
देवियों की जघन्यायु पाव पल्यापम की होती है. और ताग के
विमान वासी देव देवियों की जघन्यायु पल्योपम के आठवें भाग
की होती है.
अव वैमानिक देवों की उत्कृष्ट आयु स्थिति कहते हैं ।
दोसाहि सत्त साहिय ॥ दस चउदस सतर
अयर जा सुको ॥ इकिक महिय मित्तो ॥ जा
इगती सुवरि मेविज्जे ॥८॥ तित्तीसणुत्तरेसु ।
सोहम्माईसु ईंमा ठिई जिट्ठा।
भावार्थ:-सौधर्म नामा प्रथम देवलोक में अखिरी तेरहवें
प्रतर में आयुष्य की उत्कृष्ट स्थिति दो सागरोपम की तथा
दुसरे ईशान देवलोक में दो सागरोपम व पल्योपम के असं-
ख्यातवें भाग अधिक है. तीसरे मनत्कुमार देवलोक में सात
सागरोपम. चोथे महेंद्रे देवलोक में सात सागरोपम धर पल्या-
-
.

पम के असख्यातवा भाग अधिक पाचवें ब्रह्मदेवलोक में दश सागरोपग, छ? लातक देवलोक में चरद सागरोपम, व सातवें शुक्र देवलोक में सतरह सागरोपम की उत्कृष्टी आयु स्थिति जानना शुक्र देवलोक के उपर जो देवलोक है उनम' नवम अवयक तक प्रत्येक में क्रमश एक एक सागर की आयु बढाते जाये जिससे नवम यफ में इकतीस सागर, की आयुष्य की स्थिति होगी जैसे वि-पाठवें सहस्सर देवलोक में अगर सागरोपम, नमें थानत देवलोक में उन्नीस सागरीपम, दशमें प्राणत देवलोक में वाश सागर, ग्यारहवें,अरण देवलोक में टक्कीस सागर, पारह अन्युत देवलोक में चार्डस सागरोपम, प्रथम हेटिम हेठिम ग्रेवयक में तेईस, दुमरी , ठिम म यम ये- यक में चावीस, तीसरी हेठिप उमरिम ग्रेवेयक में पच्चीस, चौथी म पम इंटिम ोया में बनीम, पाचवी मध्यम अवेयक में सत्तार्डम, ठट्टी उरिम अवेयरु में अहाईस, सातनी उपरिम हेटिग अवेयक म उनतीस, आठवी उवरिम मायम ग्रेया में नास और नवमी उम्मि रेयर में इस्तीस सागरोपम की उत्कृष्टी आयुम्थिान होती है पाच अनुतर विमान में तेतीम साग।पम की उत्कृरी भायुस्थिति है इस प्रकार माधर्म देव- लार मे लगार पाच अनुत्तर विमान पर्यंत वैमानिस देवों की उत्कृष्टी आयुम्पिनि कही

अब इन वैमानिक देवों के आयुष्य की जघन्य स्थिति कहते है.
सोहम्मे ईसाणे ॥ जहन्न ठिई पलिय महिग्रं
च॥ ६ ॥ दो साहि सत्त दस चउदस ॥ सत्तर
अयराइं जा सहस्सारो ॥ तप्परग्रो इकिकं ॥
अहियं जाणुत्तर चउक्के ॥ १०॥ इगतीस साग
राई सव्वठे पुण जहन्न ठिइ नत्थि ।।
भावार्थ:-सौधर्म देवलोक में एक पल्योपम की जघन्य
स्थिति. ईशान देवलोक में एक पल्योपम के असंख्यातवें भाग
अधिक एक पल्योपम की जघन्य आयु स्थिति, तीसरे सनत्-
कुमार में दो सागर की जघन्य स्थिति, चौथे महेन्द्र में कुछ
अधिक दो सागर की पांचवें ब्रह्मलोक में सात सागरोपम छड
लांतक में दस सागरोपम, सातवें महाशुक्र में चौदह सागरोपम.
आठवें सहस्सार देवलोक में सतरह सागरोपम की जघन्य आयु
स्थिति जानना. इनके उपर आनतादिक देवलोक में एक एक
सागर बढाते २ यावत् चार अनुत्तर विमान में इकतीस सागर
की जघन्य स्थिति होती है. सो लिखते हैं. आनत में १८,
प्राणत में १९, आरण में २०, अच्युत, में २१, इसी प्रकार
नव वेयक में तीस सागरोपम की जघन्य आयुष्य की स्थिति
।

हाती है, और अनुत्तर चतुष्क में यानि विजय, विजयत, जयन
और अपराजित इन चार अनुसार विमामा मालीस सागगे-
पम की जघन्य'मायु स्थिति होती है किंतु सर्वार्थ सिद्ध नामक
पचम अनुत्तर विमान में अनन्य आयु स्थिति नहीं क्योंकि
यहा अजघन्योत्कृष्ट तितीर्स सपासपम की आयु स्थिति है
अब वैमानिक देवियों को पत्र तथा सष्टे आयु स्थिति कहत हैं
परिगहिप्राणिय राणिय ॥ सोहम्मीसाण
देवीण ॥ ११ ॥ पलिय अहियच कमा ॥ ठिई
जहन्ना इअोय उक्कोसा ॥ पलियाइ सत्त पण्णास ॥
तहय नव पचवन्नाया
भावार्थ -वैमानिक द्रवियों की उत्पत्ति सौस तद ईशान
इन दो देवलोक में होती हव देवियां दो प्रकार है एक
विवाहिना कुलागना समान सो परियता दी और दूसरी
साधारण वेश्या के सदृश अपेरिगृहीता है उनमें से सौधर्म
देवलोक की परिगृहीता व अपरिगृहीता देवियों की जयन्यायु
पर पल्योपम की होती है. और दूसरे ईशान देवलोक की
देवियों की जरन्यायु कुछ अधिक एक पल्यापम की होती है

(१०) अब उनकी उत्कृष्टी श्रायुन्थिीत कहते है। माधम देवलोक की परिगृहीना देवियों की सान पल्यापम की और अपरिगृता देवियों की पचास पल्यापम की, उत्कृष्ट आयुस्थिति जानना. वैसे ही ईशान देवलोक की परिगृहीता देवी की नव पल्योपम की व अपरिगृहीता देवियों की पचपन पल्यो- पम की उत्कृष्ट वायु स्थिति होती है। अब अमुरादिक की ईन्द्राणी अनमहिपी की संख्या कहते है। पण छ चउ चउअय ॥ कमेण पत्तेय मग्ग महिसीनो । असुर नागाइ वंतर ॥ जोईस कप्प दुगिंदाणं ।। १३ ।। भावार्थ:-सर्व अंतः पुर में प्रधान पट्टराणी समान जो देवी होती है उसको अग्रमहिपी कहते हैं. असुरकुमार के चम- रंद्र व बलिन्द्र यह भवन पतिकी पहिली निकाय के दो दिशिके दो इन्द्र हैं उनमें से प्रत्येक पांच पांच अग्रमहिषी है. तथा ना- गकुमारादि शेष जो नवनिकाय हैं उनके धरणरेन्द्र तथा भूताने- द्र आदि अठारह प्रत्येक ईद्र के छः छः अग्रमहिषी हैं. तथा व्यंतर देवकी १६ निकाय के काल; महाकाल आदि ३२ ईद्र है, उन प्रत्येक के चार चार अग्रमहिपी है, और ज्योतिषी के '(११) इंह चद्रमा व सूर्य प्रत्येक के चार चार अग्रमहिपी हैं तथा मां- धर्म व ईशान इन्द कसों के दो इंद्रा के प्रत्यक के आठ पाठ अग्रमहिषी है दूसरे देवलोक से उपर देवी की उत्पत्ति नहा हाती है किंतु सनत्कुमारादि देवलोर के ईट तथा देवा को जब विषय वाचना होती है तर सौधर्म व ईशान दवलोक यी अ- परिगृहीता देवियों से दगयोग्य रीति से उपभोग कहते है अन वा अनमहिपा का अभाव है पहिले वैमानिक देवों की श्रायुस्थिति समुच्चय मे कही है अब प्रत्येक प्रतर की पृथक् २ श्रायु स्थिति कही जायगी और उस लिय प्रथम प्रतर सख्या कहते हैं दुसु तेरम दुसु वारस ॥ छ पण चउ चउ दुगे दुगेय चउ । गेविज्ज णुत्तरे दस ॥ विमष्टि पयरा उवरिलोए ॥ १४ ॥ भावार्थ -जिस मगर घामें उपराउपरी पनि होती है उमी मकार देवलांस में भी उपगउपर्गनर होन,'सौधर्म और ईशान देवलोम के मिले हुए तेरह प्रतर गोलाकार है उनम स मन्येक मतर कतिगार्द या माधर्मन्द्र और उत्तग पर गानेन्द्र कर दोनों देवगर क मिले हप नगा ( १२ ) प्रतर हैं. इसी प्रकार दूसरे भी गोलाकार देवलोक युगल समझ लेना. सनत्कुमार व माहेन्द्र में भी मिले हुए गोलाकार बारह प्रतर हैं यहां भी दक्षिणार्ध खंडों में सनत्कुमारेन्द्र का व उत्तराध खंडों में महेन्द्र का आधिपत्य है. ब्रह्म देवलोक में छः प्रतर है. लांतक में पांच प्रतर है. शुक्र देवलोक में चार प्रतर. सहस्सार में चार प्रतर हैं. आनत और प्राणत इन दोनों देवलोक के युगल में मिले हुए चार प्रतर. और उसी प्रकार आरण और अच्युत में भी मिले हुए प्रतर हैं. एवम वारह देव- लोक के ५२ प्रतर हुए. तथा नव ग्रेवेयक में प्रत्येक का एक एक प्रतर है. यह नव प्रतर हुए. तथा पांचों अनुत्तर विमान एक मनर है. सब मिलकर ६२ प्रतर हुवे. वे सर्व उर्ध्वलोक में हैं. अब प्रत्येक प्रतर में पृथक् २ उत्कृष्ट तथा जघन्य अायु निकालने का उपाय बतलाते हुए प्रथम सौधर्म देवलोक का - बयान करते हैं. सोहम्मुक्कोस ठिइ निय पयर विहत्त इच्छ संगुणिो॥ पयरुकोस ठिइयो। सव्वत्थ जहन्नो पलियं ॥ १५ ॥ भावार्थः-सौधर्म देवलोक की उत्कृष्ट स्थिति दो सागरोपम की है. उसको प्रतर की संख्या से भाग देना जिससे दो सागर

का तेरहवा हिस्सा उपलब हुआ अब जिस प्रतर की उत्कृष्ट
भायु स्थिति निकालनी हो उसके साथ
का गुणा करने से
उस प्रतर की उत्कृष्ट आयस्थिति मालूम होजायगी जसा कि
पथम मतर की उत्कृष्ट आयुस्थिति सागर की दूसरे की
HX7 यानि एक सागर के तेरा भाग करें उनमें से चार
भाग की. वैसेही तीसरे प्रतर की, सागर की. दश की
१. सागर की चारहर की ११ मागर की और तेरहवें की
x२ अर्थात् दो सागर की उत्तर प्रायुम्थिति हुई उसी
प्रकार उसान देवलोक में भी प्रत्येक प्रतर म आयु निकालने
का उपाय करना सिर्फ उतना अतर है कि उसमें प्रथम प्रतर म
- सागरोपम से कुछ अधिक स्थिति है दमो में सागर म
पुत्र अधिक है पैमेही प्रत्येक प्रतर में कुछ अधिक समम लना
और तेरहवें प्रनर में गन्द्र अधिक दो सागगेपम पी उत्कृष्ट
भायुस्थिति समझना
सर्वन यानि सौधर्म देलांफ के तंगही प्रतर में जघन्य
भायुस्थिति एक पल्यापम पी, और ईशान दवलास क
मर प्रतर में कुछ अधिक एक पन्नोपम की नगन्य आयु.
स्थिति
भव सनत्कुमारादिक उपर देवलोक के प्रत्येक प्रसर में मन्य
रनर प्रायम्धिमि निकालने का उपाय पतला,

। ( १४ ) सुरकप ठिइविसेसो ॥ सगपयरविहत्त इच्छ संगुणियो । हिछिल्लटिइ सहिरो ॥ इच्छिय पयरंमि उक्कोसा ॥ १६ ॥ देवों के कल्प ( बारह देवलोक को कल्प कहते हैं और नवप्रवेयक तथा पांच अनुत्तर विमान को कल्पातीन कहते हैं ) की जो उत्कृष्ट आयुस्थिति है उसका विश्लेष कीजिये यानि अधिक स्थिति में से न्यून स्थिति बाद कीजिये. शेष जो बचे उसका नाम सुरकल्पस्तिति विश्लेष है. अब उस विश्लेष का देवलोक के अपने अपने प्रतर की संख्या में विभक्त कीजिये ( वांटिये ) तत्पश्चात् उसे वांछित प्रतर के साथ गुणिये (गु- णा कीजिये ) जो अंक आवे उसमें नीचे के प्रतरकी उत्कृष्ट आयुस्थिति मिलाई ये ऐसा करने से इच्छित प्रतर की उत्कृष्ट आयुस्थिति मिलाइये ऐसा करने से इच्छित प्रतर की उत्कृष्ट आयुस्थिति मालूम हो जायगी । उसका उदाहरण कहते हैं । सौधर्म देवलोक के तेरहवें प्रतर में उत्कृष्ट आयुस्थिति दो सा- गरोपम की है और सनत्कुमार की उत्कृष्ट आयु सात सागर की है उनसात सागरमें से नीचेकी स्थिति के दो सागर बाद किये शेप पांच सागर वचे। उन पांच सागरोपम के बारह भाग पांच 7. सागर (१५) किये (क्योकि सनत्कुमार के बारह प्रतर है ) जर दा पारह सागर हुए। तत्पश्चात् नीचे के प्रतर की यानि सौर्म देवलोक + ते- रहन प्रतर की उत्कृष्ट स्थिति उसके साथ मिलाने से तीसंग देवलोक के पहले प्रतर में २, दो पूर्णाक पाच द्वादशास या. नि दा सागर और पारीया पाचभाग अधिक इतनी उत्कृष्ट आ- युम्थिति हुई इसी प्रकार दूसरे प्रतर में २६ सागरोपम की । तीसरे प्रतर में ३३ सागरोपम की यो प्रत्येक प्रतर में वढाने २ यावत् १० व प्रतर में सपूर्ण सात सागरोपम की उत्कृ- ए आयुम्धिनि होती है । वैसे ही माहेन्द्र देवलाक में अधिक ( कुछ अधिक स्थिति केहना । और उसी प्रकार उपरके मन वर्गक में प्रतकी आयुस्थिति का हिसार निकाल लेना। अब बारहवतोप के इन्द्रों के निवास स्थान कहते हैं कप्पस्म अत पयरे ॥ निय कप्पवडिमया विमाणाम्रो ।। इद निवासा तेसि ॥ऊदिमि लोगपालाण ॥ १७ ॥ भावार्थ:-या देवतांफ के सर से उपर के प्रनर म, मन मगर मायभाग में निनाल्पावतमक ( अपने अपने कल्प (१६) के नाम से ) विमान हैं. जैसा कि:-सौधर्म देवलोक के उपर के तेरहवें प्रतर के मध्य में सुधर्मावतंसक नापक विमान है और इशान देवलोक के तेरहवें प्रतर के मध्य में ईशानावतंसक नामक विमान हैं। और इसी प्रकार सर्व देवलोक में समझ लेना । मगर इतना विशेष है कि नवमा और दशमा देवलोक में इन्द्र एक ही है वहां चतुर्थ प्रतर में प्राणावतंसक नामा विमान है । और ग्यारहवां और बारहवां इन दो देवलोक का भी एक ही इन्द्र है। उस में भी चतुर्थ प्रतर अच्चुतावतंसक नामा विमान में इन्द्र का निवास है । और उस इन्द्र विमान के चारों और चार बिमान-होते हैं उनमें सोम, यम, वरूण और वैश्रमण ये चार लोकपाल देवों का निवास है। अब लौधर्मेन्द्र के चार लोकपाल की उस्कृष्टायु कहते हैं:- सोम जमाणसतिभाग पलिय वरुणस्स दुनि देसूणा ! वेसमणे दो पलिया ।। एस हिइ लोग- पालाणं ॥ १८॥ भावार्थ:-पूर्व दिशिका लोकपाल सोम, और दक्षिण दिशिका लोकपाल यम इन दोनों का एक पल्योपम व एक पल्यापम का तीसरा भाग अधिक (१६ पल्य.) आयुष्य है (१७) और पश्चिम दिशिका वरूण नामा लोकपाल है उसका आयुष्य कुछ कम दो सागगेपम का है । और उत्तर दिशिका वैश्रमण नामा चतुर्थ लोकपाल का आयुप्य दो पल्योपम का है। यह सौधर्मेन्द्र के चारों लोकपाल की उत्कृष्ट आयुस्थिति कही। इति दयों के प्रायुष्य का प्रयम द्वार सम्पूर्ण । यव देवगति में मुग्न सम्बन्धी मरा द्वार कहते हैं असुरा नाग सुवन्ना । विज्जु अग्गीय दीय उदहीय ॥ दिमि पवण थणिय दमविह ॥ भव- एवई तेसु दुदुइदा ॥ १६ ॥ भावार्य-देवों की चार निकाय में प्रथम भुवनपनि सी निकाय में भुवन कहने क लिये प्रथम भुरनपति की दा जात के नाम कहते हैं ? अमुरकुमार, २ नागपुमार, ३ सुपर्णकुमार, ४ विद्युत्भार, ५ अग्निकुमार, ६ दीपकुमार, ७ उदपिकुमार, दिगिकुमार, ६ वायुमार, १० स्तनितकुमार ये दश प्रकार भुवनपति देव है उन में ष एक निकाय में एक ददिय श्रेणी मा और एप उत्तर का या प्रत्येक निसाय में दो दो इन्द्र पर पूर्ण देश निकाय के इन्द्रों के नाम काते- 2 - ( १८ ) चमरे बलीअ धरणे॥भूयाणंदेय वेणुदेवेय।। तत्तोय वेणुदाली हरिकंते हरिस्सह चेव ॥२०॥ अग्गिसिह अग्गिमाणव ॥ पुन्न विसिढे तहेव जलकते ॥ जलपह तहअमिअगई। मिय वाहण दाहिणुत्तरभो ॥ २१ ॥ वेलवेय पभंजण ॥ घोस महाघोस एसि मन्नयरो ॥ जंबुद्दीवं छत्तं ॥ मेरु दंडं पहुकाउं ॥ २२ ॥ भुवनपति की निकाय दश हैं और इंद्र २० हैं क्योंकि प्रत्येक निकाय में एक दक्षिण श्रेणी का इंद्र व एक उत्तरश्रेणी का इंद्र है. अब उनके नाम क्रमशः कहते है. पहली असुरकुमार निकाय के दक्षिण दिशि का चमरेंद्र असुरकुमार १ उत्तरदिशि का वलिंद्र अतुरकुमार. दूसरी नागकुमार निकाय के दक्षिण दिशि के धरणेंद्र और उत्तर दिशि के भूतानेंद्र. तीसरे सुवर्ण- कुमार क दक्षिण दिशि के वेणुदेवेन्द्र और उत्तर दिशि के वणुदालिंद्र, चोथी विद्युत्कुमार निकाय में हरिकतेंद्र और हरि- सहन्द्र. पांचवीं अग्निकुमार निकाय में अग्निशिखेंद्र और अग्नि माणवेंद्र. छठ्ठी दीपकुमार निकाय में दक्षिण पूर्णेद्र और उत्तर विशिष्टेन्द्र, सातवीं उदाधिकुमार निकाय में दक्षिणे जलकतेंद्र ओर उत्तरे जलमभेद्र आठगीं दिशिकुमार निकाय में श्रामिन- गताद आर अमितवाहनेंद्र ।। २१ ॥ नवीं वायुकुमार निकाय म वलपद्र और मभजनेंद्र और दशवी स्थनित कुमार निकाय में दक्षिण घोपेन्द्र और उत्तर महाघोपेन्द्र इन वीस इन्द्रों में से गदि कोई भी इन्द्र अपना सामर्थ्य बताये तो जयुद्वीप को छपा- गार और मेक पर्वत को ढह करने को समर्थ है अर्थात् मेर पर्वत को पारे हाथ पर घरे तो भी उनके शरीर को फुछ परिश्रम मालम न होवे ऐसे ये सर्व इन्द्रो सामथ्र्यवान् है ॥ २२ ॥ अब 'प्रमुखुमारानिक निकाय की दक्षिण श्रेणी की भुवन माया कहते हैं - चउतीमा चउचत्ता । अद्वत्तीमाय चत्त पच- गह ॥ पन्ना चत्ता कमसो। लक्खा भरणाण दाहिणयो॥ २३ ॥ भावार्य -प्रथम नमुर कुमार के चौत्तीस लाप भुवन नाग उमार ४४ लाग्य, मुर्णिमा के ३८ ताप, विघुटमार के के, अग्निकुमार, दीपरमार उदधिकुमार जार दिशिशुमार इन पाच निराय में चालीस लाख भुवन और पवनापार पवाम लारा भुवन है भार स्तनितपुमार फ४० ला भवन ६ ॥ इति दक्षिण श्रेणी की भुवन मग्या ।।

(२०) श्रम उनर श्रेणी के भुवन की संख्या यहते है:- चउ चउ लक्ख विहणा ॥ तावड्या चेव उत्तर दिसाए, सव्वेवि सत्त कोड़ी॥वावत्तरि हुंति लक्खाय ॥ २४ ॥ भावार्थः-दक्षिण श्रेणी के दशनिकाय की जा भुवन सं- ख्या आगे कही है उनमें से प्रत्येक निकाय में चार चार लाख विमान उसर श्रेणी में कम हैं । यो सब मिलकर दक्षिण दिशि के भुवन चार कोड छ लाग्न हुए और उत्तर श्रेणी के भुवन त्रणकोड़ छासठ लाग्य हुए ! सब मिलकर सात क्रोड़ वहत्तर लाख भुवन है। अब ये भुवन कहां है उनके स्थानक बतलाते है। रयणाए हिड्डुवरि ॥ जोयण सहस्स विमुत्तु ते भवणा ॥ जंबुद्दीव समातह ॥ संख मसंखिज्ज वित्थारा ॥ २५ ॥ भावार्थ:-रत्नप्रभा पृथ्वी का पिंउ १ लाख ८० हजार योजन का है उनमें से एकहजार योजन उपर और एक हजार योजन नीचे छोडिय उसके वीचमें एकलाख ७८ हजार योजन में भुवनपनि देवों के, भुवन है । वे भुवन में छोटे से छोटे -- . . (२१) भुवन भी जवुद्वीप जितने बड़े हैं । और मध्यम भुवन सध्याना कोटी योजन के है । और उदष्ट भुवन असंख्याता कोडा पोटी योजन के विस्तारवत है अय असुगदिक दश निकाय के देवों के मुकुट श्रादि सब प्राभरण में जो चिन्ह होते हैं और जिनसे अपने २ निकाय की पहिचान होती है सो चिन्ह कहने है:- चूडामणि फणि गरूडे । वज्जे तह कलस मीह अस्मेय ।। गय मयर वद्धमाणे ॥ असुरा ईण मुणसु चिधे ॥ २६ ॥ भावार्थ -असुरकुमार के मुकुट में चूडामणि का चिन्ह, नागे कुमार को सर्पकी फणिका चिन्ह, सुवर्णकुमार को गरूड का चिन्ह, विद्युतकुमार को वजका चिन्ह, अग्निकुमार को पूर्ण कल- श का चिन्द, द्वीपकुमार को सिंह का चिन्द, उदधिकुमार को अश्वका चिन्ह, दिगिमार को दृस्तिका चिन्ह, वायुकुमार का मगरका चिन्द, स्तनितकुमार को वर्तमान यानि सराव सपूट का चिन्न ये असुरादिक दश प्रकार के भुवनपति चिन्ह कदेगये अन ये १० प्रकार क भुवनपति के शरीर का वर्ण कहते है। अमुरा काला नागुदहि पडुरा तह सुवन्न ( २२ ) दिसि थणिया।। कणगाभ विज्जु सिहि दीव अ- रूणा वाउ पियंगु निभा ॥ २१ ॥ भावार्थ:-अमुरकुमार के शरीर काले वर्ण के, नागकुमार व उदधिकुमार के शरीर गौरवर्ण के वैसे ही मुपणकुमार, दि- शिकुमार व स्तनितकुमार ईन तिनों के शरीर कनकवर्ण के और विद्युतकुमार, अग्निकुमार व द्वीपकुमार इन तीनों के शरीर रक्त । वर्ण के हैं | और वायुकुमार के शरीर की कांति पायंगु वृक्ष समान यानि नीले वर्ण की है। अव असुरकुमारादिक के वनो का वर्ण कहते हैं:- अनुराण वत्य रत्ता ॥ नागोदहि विज्जु दीवसिहि नीला ॥ दिमि थणिय सुवन्नाणं ॥ धवला वाउण संझरुई ॥ २८ ॥ भावार्थः-असुरकुमार के वस्त्र रक्तवर्ण के हैं. नागकुमार, अधिकुमार, विद्युत्कुमार, द्वीपकुमार और अग्निकुमार इन पांचों के नील वस्त्र होते हैं। दिशिकुमार, स्तनितकुमार व मुपर्णकुगार इन तीनों के वस्त्र उज्वल ( सफेद ) है तथा वायु कुमार के वस्त्र संध्या राग ( संध्या के बाढल ) समान होते हैं. - (२३) अब मुवनपति के इन्द्रों के * सामानिक देवो की तथा + आत्मरक्षक देवों की संख्या कहते हैं.- चउसटि सठि असुरे ॥ छच्च सहस्साइ धरण माईण ॥ सामाणिय इमेसि ॥ चउग्गुणा श्राय- रक्साय ॥ २६ ॥ भावार्थ असुरकुमार निकाय के दो श्रेणी में वीस इन्द्र है उनमें से प्रथम चमरेन्द्र के ६४ हजार और दूसरे वलीन्द्र के ६० हजार सामानिक है शेष धरणेन्द्रादिक इन्द्रों में प्रत्येक के छ छ हजार सामानिक देव है और प्रत्येक इन्द्र के मामानिक देवों स चार गुणे आत्मरक्षक देव होते हैं ( इन्द्र के चारों ओर रहते है। श्रय व्यतर देवों की वातव्यता करते हुए प्रथम व्यतर देवा मुवा महो- रयणाए पढम जोयण ॥ सहस्से हिटुवरि मय सय विहणे ।। वतरियाण रम्मा ॥ भोमा नगरा श्रमखिज्जा ॥ ३०॥ * सामाकिमप ममा धारए 1 सामरतर पन्द्र के शरीर की रक्षा करने वाले देव.

( २४ ) . एक हजार योजन भावार्थ:-रत्नप्रभा* पृथ्वी के उपर के मृतिका पिंड में से सौ जोजन उपर व मा जोजन नीचे छोड़ दीजिये वीच में ८०० योजन रह उसमें व्यंतर देवों के रमणीक गृह है. वे पृथ्वी काय सम्बन्धी नगर असंख्याते हैं. अब व्यंतर के घर के आकार कहते हैं:- वाहिं वट्टा तो ॥ चउरंस ग्रहोअकरिण- यायारा ॥ भवणवईणं तह वंतराण ॥ इंद भवणारा नायव्वा ॥३१॥ भावार्थ:-उन गृहों के बाह्य भाग वृत्ताकार ( गोल ) है. और भीतर से चोखूण हैं. तथा अघांभाग में यानि नीचे से कमल की कर्णिका के आकार में है. व्यन्नर और भुवनपति इन दोनों के भुवन भी ऐसेही हैं. तहिं देवा वंतरिया।वर तरुणी गीय वाइय रवेणं ॥ निचं सुहिया पमुइया । गयंपि कालं नयाणंति ॥ ३२॥ * जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं. रत्नप्रभा एकही पिंड नहीं बीच मे खाली जगह भी है जिसमें देवी के भुवन हैं, '६ 1 (२५) she भावार्थ:-उन भुपनों में जो व्यतरिक देव रहते हैं वे प्रधान यानि अच्छी, सौभाग्यवती, महामणी, अति सुन्दर और कुसु- मलता के समान सुगन्ध जिनकी ऐसी देदीप्यमान तरुणी देवियों के साथ रहते हुए मनसे प्रियकारी ऐसे मधुर वचन से गीत गाते और सुनते है । तथा बत्तीस वद नाटक की रच- ना कर मृगादिक नाना प्रकार के वाजिंत्र बजाते हैं और उन के अन्दादि द्वारा वे देव निरतर मुग्बी है । तथा इतने प्रमुदित यानि हर्षवान रहते है कि जाते हुए काल का भान भी नहीं होता अर उन व्यतर दनों क नगर दा प्रमण तथा नियन नाम कहते हैं - ते जबुद्दीव भारह ॥ विदेह सम गुरु जहन्न मज्जिमग्गा ॥ वतर पुण अष्टविहा ॥ पिसाय भूया तहा जरका ।। ३३ ॥ रक्खस किनर किं परिसा ॥ महोरगा थट्टमाय गधब्बा । दाहिण उत्तर भेया॥ सोलस तसि इमे इदा ।। ३४ ॥ भागार्य -व्यतर देवों से नगर जो बडे है। तो जयुद्धीप में अगर पा राव योजन में गोल आकार में है। और ना ( २६ ) - 4 छोटे नगर है व भरत क्षेत्र के वरावर यानि ५२६ योजन छ:* कला के हैं। और जो मध्यम भुवन हैं वे विटे यानि मावि- दे प्रमाण-३३६८४ योजन ४ कला के हैं। उन नगरों में जो आठ प्रकार के व्यंतर दव रहते हैं उनके नाम यह है:-१ पि- शाच, २ भून, ३ यक्ष, ४ गक्षम, ५ किन्नर, ६ किंपुरुष, ७ महारग और - गंधर्व । व्यंतर देवों की आठ निकाय है और प्रत्येक निकाय में एक दक्षिण श्रेणी के व एक उत्तर श्रेणी के यों दो दो इन्द्र है. सब मिलकर आठ जाति के व्यंतर के १६ इन्द्र हैं। कालय महाकाले ॥ सुरूव पडिरूव पुन्न भद्देय ।। तह चेव माणिभद्दे ॥ भीमेय तहा महा भीमे ॥ ३५ ॥ किंनर किंपुरिसे मप्पुरिसा ॥ महा पुरिस तहय अड्काए ॥ महाकाय गीयरई ॥ गीयजसे दुन्नि दुन्नि कमा ॥ ३६ ॥ भावार्थ:-पिशाच नामा पहिली दो व्यंतर, निकाय के दक्षिण दिशि के कालेन्द्र और उत्तरदिशि के महाकालेन्द्र है, इसी अनुक्रम से भून निकाय के स्वरूपेन्द्र. प्रतिरूपेन्द्र, यक्ष * एक योजन की १६ कला होती है.

- . हैं (२७) निकाय के पूर्णभद्र तथा माणिभद्र राक्षसनिकाय के भीमेन्द्र, महाभीमेन्द्र, किन्नरनिकाय क किन्नरेन्द्र, फिपुरुपेन्द्र फिपुरुप निकार रे सत्पुरपेन्द्र, महापुरप, मारोग निकाय के अतिशय महाकाय, गर्म के गीत रति, गीत यश, यों आठ निकाय के दो दो इन्द अनुक्रम से समझ लेना पर पिशाचादिक पाठ निकाय क देवा की मजा चिन्ह रहते है रे यहत चिध कलव सुलसे॥वड पट्टगे असोग च- पयए ।नागे तुवरून ज्झए । सहगे विवज्जिया रूस्खा ॥ ३७॥ भावार्थ -पिशाच के कन्वतका चिन्ह, भृत के सुलम हदका चिन्ह, राक्षम के खग यानि महाति नाम का तापन विगेय के उपकरण का चिन्ह, किन्नर के अशाक वृतरा चिन्र, किंपुरुष के पकवृत्त का चिन्ह, महोग्ग क नागर का दिन गर्ग के तुरा के वृक्ष का चिन्ह, ईन म एक म्याग र अला- पा गेप मफे वृत्तक चिन्द व विहार देशों की रगा में होन। अपसरा शरीर का तह ( २८) जक्ख पिसाय महोरग ॥ गंधवा साम कि- न्नरा नीला ॥ रक्खस किंपुरिसाविय ।। धवला भूया पुणो काला ॥ ३८ ॥ भावार्थ:-एक जक्ष, दूसरा पिशाच, तीसरा महोरग, चाया गंधर्व इन चारों का श्यामवर्ण ( किंचित् कृष्णवर्ण ) है । और किन्नर अधिक श्याम वर्ण मगर किचित् नीलवर्ण के होते है ! और राक्षस तथा किंपुरूप उज्वल वर्ण के होते हैं । तथा भून निकाय के देव सर्वथा कृष्ण ( काले ) वर्ण के होते हैं । अव आठ प्रकार के व्यतर अर्थात् दूमरे व्यतर विशेष देव कहते हैं. । अणपनी पणपन्नी ।। इसिवाई भूइवाईए चेव ।। कंदीय महाकंदी॥ कोहंडे चेव पयगए॥३६॥ इय पढमें जोयण सए ॥ रयणाए अहवंतरा अवरे ॥ तेसु इह सोलसिंदा रुयग अहो दाहि- गुत्तरो ॥ ४० ॥ भावार्थ:-एक आणपन्नी निकाय, दूसरा पणपनी निका- य तीसरा ऋषिवादी निकाय, चोथा भूतवादी निकाय, पांचवां कंदिन निकाय, छट्ठा महाकंदित निकाय, सातवां कोहंडिक नि- (२९) काय, भाठा पतग निकाय ये आठ निकाय के व्यतर देव रत्नप्रभा पृथ्वी के सो योजन के उपग्के मृतिका पिंडसे दश । याजन उपर आडिये और दशयोजन निचे छोडिये विचमें ८० याजन की पोलार है उसमें रहते हैं । आगे जो आठ प्रकार के व्यतर कहे गये है उनसे ये भिन्न समझना । पाठ रचक प्रदेश से दश योजन निचे के जो८० योजन हैं उसमें रहेहुए दक्षिण और उत्तरदिशि के भेट से सोलह ईन्द्र है जिनके नाम अब रहते है। सनिहिए सामाणे ॥ द्धाइ विहाए इसीय इसिवाले ॥ ईसर महेसरे विय ॥ हबई मुवत्थे पिसालेय ॥४१॥ हासे हास रईविय ॥ मे एय भवे तहा महासेए ।। पयगे पयगवईरिय ॥ सो- लम इदाग नामाइ ॥ २२॥ भावार्थ -एक,सनिहिन इद्र, मग सामान्य इन्, तीसग पाता इन्द्र, चौथा विधाता इन्द्र पाचवा रूपी इन्द्र, हा रूपी पालन्द्र, मानवा ईश्वर इन्द्र, आठवा. महेश्वर इन्द्र, नव्या मुवत्य इन्ट, दशवा विशाल डड, ग्यारहवा हाम्य इन्द्र, पारहवा - म्पति इन्द्र, तेरहवा खत इन्द्र, चौडवा महाम्वत इन्द, पन्द्रावा (३०) पतंग इन्द्र, मोलहवां पतंगपति इन्द्र, ये १६ इन्द्र के नाम के ये सोलह इन्द्र वाण व्यंतर कह गये हैं। सब मिलकर ३२ इन्द्र व्यंतर के हुये. तथा भुवन पति के २० इन्द्र, ज्योनिपी के टो इन्द्र चंद्रमा और सूर्य ( यद्यपि चंमा सूर्य असंख्य होने में न्योनिपी के असंख्य इन्द्र होते हैं तथापि जाति की अपेक्षा से दो इन्द्र गिने जाते हैं ) तथा वैमानिक के दश इन्द्र मिलकर चौसठ इंद्र है (जो तीर्थकों के पांच कल्याणक महोत्सव करने आते हैं). अव व्यंतर तथा ज्योतिषी इन दोनों की समान ही वक्तव्य- दा होने से उनके सामानिक देवों तथा प्रात्मरक्षक देवों को संख्या कहते हैं. सामाणियाण चउरो ॥ सहस्स सोलसय आयरक्खाणं ।। पत्तेयं सबसि ॥ वंतर वइससि रवीणंच ।। ४३ ॥ भावार्थ:-व्यन्तर के ३२ इन्द्रों को तथा ज्योतिषी के चंद्रमा और सूर्य इन दो इन्द्रों को प्रत्येक को चार चार हजार सामानिक देव हैं और सोलह सोलह हजार आत्मरक्षक देव हैं, अव समस्त देवों के कितने प्रकार हैं वह कहते हैं.

(३१) इद सम तायतीसा ॥ परिमातिया रक्ख लोगपालाय ॥ अणिय पइन्ना अभियोगा ॥ फिव्विस दस भवण वेमाणी ।। ४४ ।। भावार्थ:-(१) इद्र, (२) सामानिक देव, (३) नाय निशक देव, (४) तीन परिषद् देव, (५) अगरक्षा देव, (६.) चार लोपाल, (७) संनिर देव, ( ) प्रकीर्ण प्रजा के देव, (6) अभियोगिक याने किंस देव, (१०) किविपीन दर, यह दश प्रकार के देव भुवनपति, व्यतर नया मानिफ में है श्रम पटक ( मैनिन )देवा के मात प्रकार रहते हैं गधब्ब नट्ट हय गय॥रह भड अणियाणि मध इदाण ॥ वेमाणियाण सहा ॥ महिमाय ग्रहोनिवामीण ॥ १५ ॥ भावार्थ -(१) गार्ग ( मृदगधर) (0) ना यानि नाटा करने वाले देर, (३) हय यानि घोड़ का संनिय (2) गय यानि हाथी रा पटा (५) रय ग फटक (६) पटर मा पटक यह छ प्रसार के पटा सर्व उन्नों में होने मोर मानिकप मातरा उपम का कम होना है और (३२) अधीनिवासी देव ( भुवनपति तथा व्यंनर ) के मानवा महिप ( भंसा) का कटक होना है. ( भैमा वगैरह पशू नहीं किन्तु देवों को ऐसा रूप लेना पड़ता है ) अब त्रायत्रिंशकादिक देवा की संख्या प्रत्येक इद की कहते हैं. तित्तीस तायतीसा॥परिसतिया लोगपाल चत्तारि ॥ अणियाण सत्त. सत्तय ॥ अणियाहिव सव्व इंदाणं ॥ ४६॥ भावार्थ:-तेतीस त्रायत्रिंशक देव है. वायत्रिंशक देव, देव नाओं में गुरु समान गिने जाते हैं। इन्द्र के सलाहकार तथा सर्व देवों में पूजनिक है । परिपदा तीन हैं, १ वाह्य २ अभ्यंतर और ३ मध्यम । लोकपाल चार हैं:-१ सोम, २ यम, ३ वरुण और वैश्रमण ( कुवेर ) तथा प्रत्येक इन्द्र सात प्रकार की सेना के अधिपति होते हैं. नवरं वंतर जोइस ॥ इंदाण न हुँति लोग- पालामो ॥ तायत्तीसभिहाणा ॥तियसाविय ते- सिं नहु हुति ॥ ४७॥ भावार्थः-मगर इतना विशेष है कि व्यंतर के बचीस इंद्र के तथा ज्योतिषी के दो इन्द्र के लोकपाल नहीं होते हैं तथा वायलिंगा नामक देव भी व्यतर तथा ज्योतिषी के इन्द्रों के नहीं होते है। अब ज्योतिषी देवों के विमान की वक्तव्यवा करते हैं. ज्यो तिपीदेव तिर्यक्लोक में है यह तिर्यक्लोक मेरुमध्य चकप्रदेश से नवसो योजन उपर व नवसो योजन नीचे मिलकर अठारहसो योजन प्रमाण है उनमें मे उचे के नवसो योजन में से कितने योजन में ज्योतिषी के विमान है सो कहते है समभूतलामो अट्ठहि। दसूण जोयणसएहि भारम्भ ।। उवरि दसूत्तर जोयण ॥ सयमि चि- ट्ठति जोइसिया ॥४८॥ भावार्थ -मेरुपर्वत के मध्य भाग में आर रुचक प्रदेश उसको समभूतल करते हैं । वहा से आठसो योजन में दस योजन कम यानि ७९० योजन उचे से ज्योतिषचक्र का आ- रम्भ होता है । भौर इसके उपर ११० योजन में ज्योतिषी देव रहते है। भर ज्योतिषी देव एामो दश योजन में किस प्रकार हो कात है- तत्य रवी दस जोयण ।। असीइ तदुवरि (३४ ) तथा ससीय रिक्खेसु ॥ ग्रह भरणि साइ उवारं ॥ वहि मूलो भिंतरे अभिई ॥ ४६ ॥ भावार्थ:-ज्योतिए चक्र के प्रारम्भ से १० योजन ऊंचा मूर्य है. उसके ८० योजन उपर चन्द्रमा है, और उसके ४ जोजन उपर नक्षत्र हैं. एक चंद्र और एक मूर्य के परिवार में २८ नक्षत्र होते हैं उनमें से भरणी नक्षत्र सब के नीच चलता है. और स्वाति नक्षत्र सर्व नक्षत्रों से उपर चलता है. भूल नक्षत्र सर्व नक्षत्रों से वाहिर के मंडल में ( क्रांतिवृत्त में ) चलता है. और सर्व नक्षत्र के बीच में अभिजित नक्षत्र चलता है. तार रवि चन्द रिक्खा ॥ बुह सुक्का जीव मंगल सणिया ॥ सग सय नउय दस असिइ ।। चउ चउ कमसो तिया चउसु ॥ ५० ॥ भावार्थः-समभूतला पृथ्वी से ७६० योजन उपर तारा मंडल है. वहां से १० योजन उंचे सूर्य है. वहां से ८० योजन उंचे चंद्रमा है. चंद्रमा से चार योजन उपर नक्षत्र हैं. वहां से चार योजन उंचे बुध नाया गृह है, वहां से तीन तीन योजन के अंतर में उंचे शेष चार गृह हैं अर्थात् बुध से तीन योजन रंचा शुक्र, शुक्र से तीन योजन उपर जीव बृहस्पति, वृहस्पति से

(३५)
तीन योजन उचा मगल और मगल से तीन योजन उपर
शनिनामा
गृह
इस प्रकार समभूतल से सातसो नब्बे योजन
उपर से शरू होकर ११० योजन में ज्योतिप चक्र है सबसे
उचा जो शनिश्वर है वह समभूतल से नवसो योजन उचा
चलता है यहां पर योजन प्रमाणागुल के ( साधारण योजन
से २५० गुणा ) समझने चाहिये
। अब मनुप्य क्षेत्र में चर ज्योतिषी मेरुपर्वत से कितने योजन
दर चलते है और तियक् लोक के प्रस्त्रीर म अलोक से कितने यो-
जन भीतर ज्योविपी के स्थिर विमान है सो कहत है।
इकारम जोयण सय ॥डगवीसिकार सा
हिया कमसो। मेरु अलोगावाहि ॥ जोहस चक्क
चरह हाइ ।। ५१ ॥
भावार्थ-मेरुपर्वत सम्यारटमो इस्कीस योजन से कुछ अ.
धिक ज्योतिष चक्र चलते है । और तिर्यरु लोक के अतस
ग्यारहसो ग्यारह योजन भीतर ज्योतिष चक्र स्थिर है। मनुष्य
धेर ( दाइ द्वीप ) में तो ज्योनिप चक चर और दाई पिके
चाहिर असरयाता द्वीप समुद्रमें ज्योतिष चक्र स्थिर है।

(३६) अद्ध कविठागारा॥ फलिहमया रम्मजोइस वि- माणा॥ वंतर नयरोहिंतो ॥ संखिज्ज गुणा इमे हुंति ॥ ५२ ॥ भावार्थ:-चंद्रादिक ज्योतिषी के विमान अर्ध कोठ फल (कैत ) के आकार के हैं । स्फटिक रत्नमय है। रमणिक यानि देखने योग्य तथा मनको आल्हादकारी हैं । पूर्वकथित व्यंतर देवों के असंख्यात नगरों से भी संख्यात गुणे अधिक ये ज्यो- तिपियों के विमान हैं. ताइ विमाणाइं पुण॥ सव्वाइं हुंति फालिहमयाई दगफालीहमया पुणलवणे जे जोइस विमाणा५३ * यहां कोई ऐसी शका करे कि ज्योतिषियों के विमान अर्ध कविठ फल के आकार के है तो फिर उदय, अस्त और तिर्यक प- रिभ्रमण के समय अर्ध कोठ फलके आकार में क्यों नहीं दिखते हैं ? प्रत्यक्ष में तो वृताकार ही दिखते है इसका क्या कारण ? इस प्रश्रका उत्तर यह है कि:- ज्योतिषियों के विमान सर्वथा अर्ध कोठ फल के आकार के नहीं है। किन्तु विमान की पीठ परिष अर्थ कोठफल के आकार में है। उसके उपर चन्द्रादिक ज्योतिषियों के प्रासाद हैं वे प्रासाद वर्तुलादिक कोई भी संस्था न मे रहे हुए व- ईलाकार दिखते हैं || वक्राकार भी दूरसे वृताकार प्रतिभासते ? ।

(३७) भावार्थ:-ज्योतिषियों के विमान सर्व स्फटिक रत्न के हैं मगर लवण समुद्र में भी ज्योतिषी के विमान हैं वे उदक स्फाटिक रत्नके हैं क्योंकि लवण समुद्रकी शिखा दश हजार योजन चौदी और सोलह हजार योजन उची है । और ज्योतिषी के विमान तो नवसो योजन तक उचे हैं । वे सब विमान लवण समुद्र की शिखा के भीतर चलते हैं परन्तु उदक स्फाटिक रत्न के प्रभाव से पानी फटकर अलग हो जाता है अत उन विमानों को पानी के भीतर चलने में बाधा नहीं होती है। जिस स्फा- टिक के सयोग से पानी फट जाये उसको उदक स्फाटिक कहते है जोयणि गसहि भागा ॥ छप्पन्नऽडयालगाउदु इगद्धाचदाइ विमाणायाम।।वित्थडाअद्ध मुञ्चत्त५४ भावार्थ -एक योजन के ६१ भाग करें उनमें से ५६ भाग जितना लवा तो चन्द्रमा का विमान है और ४८ भाग जितना मुर्य का विमान है । गृहोके विमान दो २ गाउ (कोस) के है। नक्षनों के विमान एक २ गाउके हैं और ताराके विमान प्रर्द २ गाउके हैं कोई कोई लोटे भी हैं। इस प्रकार पाच जातके ज्योतिपर देवों के विमान की लम्बाई और चौडाई समझ लेना और उचाई इसमे आत्री होती है । ये उत्कृष्ट मायु वाले तारों के विमान का प्रमाण समझना ! मगर जरत्यायु वाले वारों के विमान का (३८) प्रमाण इस प्रकार है। लम्बाई और चोड़ाई पांचसो धनुष्य और उंचाई ढाइसो धनुष्य की। अत्र मनुप्य लोक का प्रमाण व मनुध्य क्षेत्र के बहार के धिर चन्द्रादि पांचों ज्योतिपी के विमान का स्वरूप कहते है. पणयाल लक्ख जोयण ॥ नरखित्तं तत्थिम सया भमिरा ॥ नर खित्ताउ बहिं पुण ॥ अ- द्धपमाणा ठिया निचं ॥ ५५ ॥ भावार्थ:-४५ लाख योजन लम्बा चौड़ा मनुष्य क्षेत्र है. उसमें ज्योतिपी के जो विमान है वे सदाकाल भ्रमणशील हैं यानि अनादिकाल से घूमते रहे है और अनन्त काल पर्यन्त धूमते ही रहेंगे. मनुष्य क्षेत्र से वाहिर जो पांच प्रकार के ज्यो- तिपी के विमान है उनका प्रमाण पूर्व कथित चर विमानों के प्रमाण से * आधा है. और वे सब के सब विमान नित्य स्थिर ही रहते हैं. अब मनुष्य क्षेत्र में भ्रमण करने वाले ज्योतिपी देवो की गति तथा उनके विमानवाहक देवो की संख्या कहते है. * स्थिर चंद्र योजन स्थिर सूर्य, योजन, स्थिर ग्रह १ गाउ, स्थिर नक्षत्र अर्ध गाउ और स्थिर तारा पाव गाड़ के लम्बे चोड़े हैं। और उंचाई मे अर्द्धप्रमाण जानना,

(३९)
.
मसि रवि गह नक्सत्ता ।। तारायो 'हुति
जहुत्तर सिग्धा ॥ विवरीयाउ महविग्र.विमाण
वगा कमेणेसि ॥५६॥ सोलस सोलस अड चउ
दो सुर सहस्सा पुरोय दाहिणयो॥ पच्छिम
उत्तर मीहा । हत्थी वसहा या कमसो।। ५७ ॥
।"
भावार्य -चन्द्र, मूर्य, ग्रह, नक्षत्र और ताग इसी अनुरम
से शीघ्रतर गति समझिये चन्द्रमा की चलने की गति मबसे
मद उमसे मूर्य की गति शीघ्रतर-है उमसे ग्रह की गनि
गीत है उमसे नन्ना की गति गीतर और नसन से नारा
दी गति शीलता है उनमें भी डर आदि ग्रहों की गति में भी
न्यूनाधिय मे शिप की गति मा ग्रहों में मर है उसमें
पमा उपर से ग्रहों की गनि गीप्रवर है यया घर से गुन
नी गनिमीत्र गुरमे पगल की शीम, मगल से वृहम्पनि
ती भार वृटपनि में शनिवार दी गनि शीघ्र है शोरगी म
पिगम मादिगा मपझना गहिय जसा बिगास भन्न
पाटिन नाग, तार मे नपत्र मादिर,नजसे प्रामादिक,
प्रदम सामाEिष, और नम गन्द्रमा माहिर

(४४) . प्रायिक ( बहुलता की अपेक्षा कहा हुआ ) है. अतः प्रायिक सन्द निश्चयवाचक नहीं है. जिससे ग्रहों के विमान का जो प्रमाण आगे कहा गया है उससे अधिक भी होना संभवित है. और किन्हीं आचार्यों का यह अभिप्राय है कि राहुका विमान छोटा होने पर भी बहुत काला है जिससे आच्छादन कर सकता है. काली चीज छोटी होवे तो भी उच्चल बड़ी चीज को ढांक सकता है. जिस प्रकार मसी के एक ही बुंद से स्फाटिक का टुकड़ा श्याम दिखता है उसी प्रकार राहु के योग से चन्द्रमा काला दिखता है । अब तारे के विमानों का व्याघात तथा निर्व्याघात अंतर कहते है. तारस्सय तारस्सय ॥जबूंदीवंमिअंतरं गुरुयं ।। बारस जोयण सहस्सा॥ दुनिसया चेव बायाला६१ भावार्थ:-एक तारे के विमान से दूसरे तारे का विमान जंबूद्वीप में ज्यादे से ज्यादा १२२४२ योजन दूर होता है. यह अतर मेरुपर्वत के व्याघात से होता है जैसे कि मेरुपर्वत सम- भूतला के पास दस हजार योजन का चौड़ा है पुनः मेरू से चारों ओर ११२१ योजन दूरसे तारा मंडल शुरु होता है । अतः १०००० योजन मेरूपर्वत के तथा दोनों ओर के ११२१+ (४५) ११२१-२२४२ योजन मिलकर कुल १२२४२ योजन का उत्कृष्ट अंतर तारे के बीच में है अब व्याघात तथा नियाघात से धन्य तथा उग्कृष्ट अतर करते हैं. निसटोय नीलवतो ।। चत्तारिसय उच्च पच सय कूडा ॥ अद्ध उवरि रिक्खा ॥ चरति उभय ह बाहाए ॥ ६२॥ छावठा दुनिसया॥ जहन्नमेय तु होइ वाधाए निव्वाधाए गुरू लहु ॥ दोगाउय घणुसया पंच ॥ ३॥ भावार्थ -निपप तथा नीलवत ये दो पर्वत चारसो योजन ऊचे है। और इन दोनों एर्वतों के ऊपर पाचसो योजन ऊचे तथा उपर में दाईसो योजन चौड़े, मध्य में पोणा चारसो यो. जन चौडे व नीचे पाचमो योजन चौ. ऐसे नव नव कूट (शिखर ) हैं। यों सर मिलकर नवसो योजन की उचाई हुई उक्त शिग्वर के दोनों तरफ आठ आठ योजन की दूरी पर नचत्र के विमान विचरते हैं अतः २५० योजन की शिखर की चौगई तथा दोनों तरफ के आठ २ योजन की अवापा मिलकर दोसो छामठ योजन का जपन्य अतर पर्वतादिक के (४६) .. व्याघान से होता है. और व्याघात रहित उत्कृष्ट अंतर दी गा- उका तथा जघन्य अन्तर पांचसो धनुष्य का है. इस प्रकार श्री मृरपन्नति तथा जीवाभिगम आदि मृत्रों में कहा है. परन्तु बड़ी संघयणी नथा जंबुद्वीपपन्नति में यह व्याघात निर्व्याघात का उल्लेख नहीं है । अब मनुष्य क्षेत्र की वाहिर घंटाकार मे स्थिर रहे हुए चद्र तथा सूत्र का अन्तर बतलाते है। माणुस नगाउ बाहिं । चंदा सूरस्प्त सूर चंदस्स ॥ जोयण सहस्स पन्नास॥णुणगा अंतरं दिलैं॥६॥ भावार्थ:-मनुष्य क्षेत्र की मर्यादा कारक जो मानुष्योत्तर नामक पर्वत है उमस वाहिर की और जो चन्द्रमा व मूर्य है उनमें चन्द्रमा से मूर्य तक और मूर्य चन्द्रपा नक पञ्चास हजार योजन का पूरा अंतर है. ऐसा श्री तीर्थंकर ने देखा है. अव चन्द्रादिक ज्योतिषी के विमान का प्रमाण कहते है। पूर्वकी गाथामें मर्यसे ५० हजार योजन दूर चंद्रमा व चं. द्रमास ५० हजार योजन दूर सूर्य है ऐसा मालूम हुआ अब ' एक सूर्य से दूसरे सूर्य तक व एक चंद्रसे दूसरे चंद्रतक कितना अंतर है ? सो कहते हैं, .

(४७) ममि ससि रवि रनिसाहिय ॥ जोयण लानेण अतर होड ॥ रवि अतरिया ससियो ॥ समि भतरिया रवि दित्ता ।। ६५ ॥ भाषाय-बद्र चहरे पानमें चार सूर्य मूर्यके वीचमें लगन योजन में पुर पिर अतर है क्योंकि दो मर्यक अतग्में पन्द्रमा और टी चन्द्रमा 7 अता में सूर्य होने से दोनों सूर्यफ पीच १ लाग्य योजन पर योनन यो भतर भार दानों चटपा देवीच लाप योजन पर योजन का मनर है। बहियाउ माणुसत्तर ॥ चदा सूग श्रवटि उज्जो या ॥ चदा अभीय जुत्ता ॥ सूरा पुण हुति पुस्महि ॥ ६ ॥ भाग -मापार पनि के यादिनी रन्द्रमा और सूर्य 27 अम्मित पानि नियार मालमा उपांत परत । यसमा मानन्द्रमा भाषा Tatter पर घमा गदर अभिनित नपण म गुन भार पूर्ण मग पुष नपरोन ? उद्धार मागर दंगे । मह ममगदि तुल्ल दीर:

(४८) दही ।। दुगुणा दुगुण पवित्थर ॥ वलयागारा पढम वज्जं ॥ ६७॥ भावार्थ:-ढाई उद्धार सागरांपम के जितने समय होवे उतने द्वीपसमुद्र हैं. प्रथम जंबुद्वीप से लेकर अखीरी स्वयंभूरमण समुद्र तक वे एक एकसे दुगुने होते चले आये हैं। यानि पहिले से दूसरा दुगुना, दुसरे से तीसरा दुगुना इसभांति द्वीपस समुद्रका विस्तार व समुद्र से द्वीपका विस्तार दुगुना क्रमशः होता चला गया है। उन असंख्य द्वीप समुद्र में मध्यका एक जंबूद्वीप थाली के आकार का है शेष सर्व द्वीप समुद्र वलयाकार अर्थात् चूड़ी के आकार के हैं। पढमो जोयण लक्खं ॥ वहोतं वेढिउ ठिया सेसा ॥ पढमो जंबूद्दीवो ॥ सयंभुरमणोदही चरमो ॥ ६८ ॥ भावार्थ:-सबसे पहिला यह जम्यूद्वीप एक लाख योजन का गोल थाली के आकार का है । शेप सर्व द्वीप समुद्र एक दूसरे को लपेट के रहा है। सर्व में पहिला जम्बूद्वीप है और सबसे अखीर का स्वयंभुरमण नामक समुद्र है. अब कुछ द्वीप और समुद्र के नाम कहते हैं। , { ४६ ) जबुधापड पुक्खर ॥ वारुणिवर खीर घय सोय नदीसरा ।। अरुण रुणवाय कुंडल ।। सख रुयग भुयग कुस कुचा ॥६६॥ भावार्थ -प्रथम जघुद्वीप, दूसरा धातकी ग्वड द्वीप तीसरा पुपर द्वीप, चौथा वारुणीवर द्वीप, पाचवा क्षीरवर दीप, छटा घृतवर द्वीप, सातवा क्षुवर द्वीप, आटवा नदीवर दीप, नरमा अरण दीप (रुणवाय शब्द का दूसरा थर्थ अरुणोपपात ऐसा होता है फिन्त म शब्द से यही अभिमाय समझना चाहिये पि इसके धागे जो जो द्वीप है उनमें एक एफ नाम से तीन २ दीप पा ज्ञान पर भार वरावभास के प्रयोग से होगा) दशवा अरुणवर द्वीप, ग्यारहवा अरुणारारभास दीप, पाग्या कुडल्दीप, तेरहवा कुटलपर दीप, चौदहवा टलपरायभामदीप, पन्द्रामा मग्न द्वीप, मोलहवा मग्ववर दीप, सनरहवां मलवग- पभाम दीप, अगरहवा रुचर दीप, उनीसवा रुचकवर दीप, पासवा चश्वरावभास, इसका मुनग, पाईसवां भुजगवर, नेइसवां भुजगरामाम, चाचीसवा फुस, पचीसवा कुमार, दामना अमरराषभाम, मत्तावीमा फ्रॉन, अदानीमरी पाँचवर, गुन गया गावरावभाम हीप - " - यह समस्त द्वीप एक एक समुद्र से वेष्टित है, उन समुद्रों के नाम कहते हैं:- पढमे लवणो जलहि ॥ वीए कालोय पुक्ख- राईसु ॥ दीवेसु हुँति जलही । दीव समाणेहिं नामेहिं ॥ ७० ॥ भावार्थः-पहले द्वीप के चारों ओर लवण नामक समुद्र है, दूसरे द्वीप से कालोदधि नामा समुद्र है, वहां से आगे पुष्कर- वरादिक समुद्र के नाम द्वीप के नाम समान होते हैं, जैसा कि बारुणीवर द्वीप के बाद वारुणीवर समुद्र इस भांति सर्व द्वीप समान नाम के समुद्रों से वेष्टित हैं यानि द्वीप तथा उसका समुद्र दोनों एकही नामके हैं. और उनके जैस २ नाम हैं वैसे ही उनके गुण भी हैं. यथ जन्यवृत होने से इस द्वीप का जम्बूद्वीप नाम है, लवण के सहा खारा पानी होने से लवण समुद्र नाम है,धातकी (धावड़ी) वृक्षके कारण बानकी खंडका नाम है. इस प्रकार दूसरे भी द्वीप समुद्र के अर्थ सहित नाम जानना। यहां द्वीप समुद्र के अधिपति जो व्यन्तर देव हैं उनकी आयु एक पल्योपम की होती है. अब दूसरे द्वीप समुद्र के कैसे २ नाम हैं सो थोड़े में कहते हैं. श्राभरण वत्थ गंधे ॥ उप्पल तिलण्य पउम निहि रयणे ॥ वासहर दह नईयो । विजया वक्खार कप्पिदा ।। ७१ ॥ कुरु मदर ग्रावामा॥ कूडा ननसत्त चद सूराय ॥ अन्नेवि एव माई ।। पसत्थ वत्थूण जे नामा ।। ७२ ।। तन्नामा दीवु- दही । तिपडो यायार हुति अरुणाई । जबू लवणा ईया ॥ पत्तेय ते अससिज्जा ॥ ७३ ॥ तापतिम सूरवरा भास जलही परतु इविक्का ।। देवे नागे जक्खे ॥ भूए सयभुरमणेय ॥७४ ॥ भावार्थ -हार प्रमुग्व आभूपण के जितने नाम है उन नामों के द्वीप समुद्र ह पत्रों के जितने नाम है उन नामा के द्वीप समुद्र है ट प्रमुग्व के नाम के कुमुद चद्रविकागी कमल प्रयुग्व के नाम के, तिरक नाम मोत तिलक, फलशतिलमादि नाम के, अर्थात तिलफानिक वृक्ष प्रमुख रे नाम के पद्म शतपत्र पुरिमादिक सूर्य पिकासी कमल के नाम के, महापनादिक मानिनि क नाम के कतनादिक रत्न के नाम क अवया चक्र पत्ती वासुदेव के रत्न के नाम के, पर्प पर गानि हिमवतादिक पर्वत के नाम के, द्रह नाम के, गगा प्रमुख नदियों के नाम केन्छादिक विजय के नाम , माल्यवनादिक वनस्कार - " क नाम क है " (५२) ( वक्खारा पर्वत ) के नाम के, सौधर्मादिक देवलोक के नामक गक्रेन्द्रादि इन्द्रों के नाम के, देवकुरु उत्तरकुरु के नाम के, मेरु के नाम के, इन्द्रादिक के आवास कूट पर्वत के नाम के, कृतिकादिक नक्षत्र के नाम के, चन्द्रमा मूर्य के जो नाम उन नामों के इत्यादि प्रशस्त वस्तुओं के जो नाम इस जगत् में हैं उन नामों के द्वीप समुद्र हैं. और पूर्व कथित अरुण आदि त्रिप्रत्ययावतार हैं अर्थात् अरुण से लेकर क्रौंच पर्यंत तीन २ नाम से त्रिरत्ययावतार हैं उसी प्रकार दूसरे आभरणादिक नाम के द्वीप समुद्र में भी सनझलेना चाहिये, जैसे किः-हारदीप, हार समुद्र, हारबर द्वीप, बारवर समुद्र, हारवरावभास द्वीप, हारवरावभास समुद्र इस प्रकार नाम कहना. इस भांति त्रिप- त्ययावतार वहां तक करना चाहिये कि जहां तक देवद्वीप में पहिला मूर्यवरावभास द्वीप, मूर्यवरावभास समुद्र और नंबूद्वीप नामक असंख्याता द्वीप व लवण समुद्र नामक असंख्यात समुद्र हैं. उनमें अंतिम सूर्यवरावभास समुद्र है वहां तक त्रिप्र- त्ययावतार करना चाहिये. इसके बाद फिर सर्व तिर्छलोक के अंत में देवादिक पांच द्वीप और उन्हीं नाम के पांच समुद्र है वे एक एक ही नाम के हैं, अतः उनका त्रिप्रत्ययावतार नहीं होता है. और उस नाम के द्वीप समुद्र असंख्यात भी नहीं है. किंतु यह पांच नाम द्वीप समुद्र के एक एकही है अर्थात् उन नाम . . (५३) के और कोई द्वीप समुद्र नहीं है उन पाचों क नाम कहते हैं १ देवद्वीप व देर समुद्र, २ नागद्दीप व नाग समुद्र, ३ जक्षद्वीप व जनसमुद्र, ४ भूतद्वीप व भूतसमुद्र, ५स्वयभूरमण द्वीप व स्व- यम्भूरमण समुद्र यह पांचों द्वीप के नाम कहे जिस प्रकार जम्बूद्वीप में जम्बूवृक्ष है, सर्व रत्नमय जगती का पाठ योजन उचा कोट है, उसके विजय, विजयत, जयत और अपराजित नामक चार दरवाजे व दरवाजों के देव हैं उसही प्रकार दूसरे जो जम्मू नाम के असंख्याते द्वीप हैं और लवण नाम के असख्याते समुद्र है वहा सर्वत्र यही स्थिति समझना उस जम्बूद्वीप में इस जम्बूद्वीप के अणादीया देव की राजधानी है इसही प्रकार अन्य द्वीप समुद्र आश्रयी भी समझ लेना अत्र ममस्त समुद्रों के प्राणी और मत्स्यों का पिशप स्वरूप कहते हैं वारुणिवर खीरवरो॥घयवर लवणोय हुति भि- नरसा ॥ कालोय पुक्खरो दहि ॥ सयभुरमणीय उदगरसा ।। ७५ ॥ इखुरस सेम जलही। ल- वणे कालोय चरिम वहुमच्छा ॥ पण सग दस जोयण सय ॥ तणु कमा थोव सेसेसु ॥ ७६ ॥ भावार्य -वारणीवर समुद्रका जल मदिरा ममान, ग्वीरस- ( ५४ ) मुद्र का जल तीन भाग गौदुध व चौथा भाग मिसरी इसभांति मिसरी मिश्रित दूध समान, घृतवर समुद्रका जल गायके घृतसे भी अधिक सुस्वादिष्ट और चौथा लवण समुद्र का जल लणके सदृश | इस भांति यह चारों समुद्र के जल भिन्न भिन्न स्वाद के होते हैं यानि जैसा नाम है वैसाही पाणी का स्वाद भी है. . एक कालोदधि, दूसरा पुष्करवर, तीसरा स्वयंभुरमण इन तीन समुद्रका जल स्वाभाविक उदकरस ( वर्षाद के जल ) समान स्वादिष्ट है शेष नंदीश्वर आदि समुद्रसे भूत समुद्र पर्यंत सर्व समुद्रों के जल ईख, गन्ना के रस समान स्वादिष्ट होते हैं. लवण, कालोदधि और अखीरी स्वयंभुरमण इन तीन समुद्रों में अनेक प्रकार के मच्छ कच्छपादिक हैं । उन मच्छों की उत्कृष्ट अवगाहना ( देहमान ) अनुक्रम से पांचसो योजन, सातसो योजन व एकहजार योजन की है यानि लवणमें उत्कृष्ट ५०० योजन के शरीर वाले मच्छ हैं, कालोदधि में उत्कृष्ट ७०० योजन के देहवाले मच्छ हैं और स्वयंभुरण में एकहजार योजन के शरीर वाले मच्छ है । ( यह योजन उत्सेद्धांगुल के मानसे समझना ) शेष जो समुद्र हैं उनमें थोड़े व छोटे मच्छ होते हैं । लवण समुद्र में जलचर जीवों की जाति सातकुल को- डी हैं, कालोदधि में नव कुल कोडी जाति और स्वयंभूरमण १२॥ .

(५५) पुल कोडी जाति है । इसका विशेष विवेचन श्री जीवाभिगम उपाग में है । इति द्वीप समुद्रका अधिकार सम्पूर्ण । अन प्रति होपों व प्रत्ति समुद्र में चद्रमा सूर्य की सरया कहते हैं दो ससि दो रवि पढमे ॥ दुगुणा लवणमि धायई सडे ॥ वारस ससि वारस रवि ॥ तप्पभिइ निदि ससिरविणो ।। ७७ ॥ तिगुणा पुविल्ल जुया ॥ अणंतरा णतरमिखित्तमि॥ कालोए वा- याला ॥ विसत्तरी पुस्खरद्धमि ॥ ७८ ॥ भावार्थ.-प्रथम जम्बूद्वीप में दो चद्रमा व दो सूर्य है, लपण समुद्र में इससे दुगुन यानि चार चद्रमा च चार सूर्य है, धातकी बहमें बारह चद्रमा चारह सूर्य है अब इस धातकी सह प्रमुग्व में चद्र सूर्य की जो सरया है उसे निगुणा करना और पूर्व के सूर्य नद्रकी सरया उसमें मिलाने से उत्तरोत्तर द्वीप समुद्रों के चद्र सुर्यकी सरख्या पिन्ति हो जायगी जैसे कि-धातरी खडमें बारह चद्रमा यारह सूर्य है अब उन बारह को तिगुणा करने मे ३६ हुआ और ३६ में जम्बुद्वीप पे २ नथा रवण के ४ ६ नद्र सूर्य घटाये तो फल मिलकर ४२ चद्रमा और ४२ सूर्य कालोनधि समुद्र में हैं। इसी प्रकार आगे के द्वीप समुद्रों - (५६) में भी चंद्र सूर्य की संख्या निकाल सकते हैं जैसे कि पूर्वोक्त ४२ को त्रिगुणा करने से १२६ हुवे फिर उसमें धातकी खंडके १२ लवणसमुद्रके ४ और जम्बुद्वीप के २ मिलकर कुल १८ मिलाये सब मिलकर १४४ हुए. इस भांति १४४ चंद्रमा व १४४ सूर्य पुष्करवर द्वीपमें हैं परन्तु पुष्कर वर द्वीपका अर्धभाग मनुष्य क्षेत्रमें है इसलिये ७२ चंद्रमा व ७२ सूर्य यहां मनुष्य क्षेत्र की गिनती में लेने चाहियें और इसी कारण उपर लिखित पाठमें " विसंत्तरी पुरकरलुमि " अर्थात् पुष्करार्द्ध में ७२ ऐसा कहा है । मनुष्य क्षेत्रसे बाहिर जो अर्द्धपुष्कर है वहां के चंद्र सूर्य स्थिर हैं और समश्रेणी में भी नहीं हैं इसवास्ते उन्हें गिन- ती में नहीं लिये हैं। लोक मे चन्द्रमा सूर्य की पंक्ति संख्या कहते हैं:- दो ससि दो रवि पंती,एगंतरिया छसठिसंखाया। मेरु पयाहिणंता, माणुस खित्ते परिअडंति ॥७६ ॥ भावार्थ:-दो चन्द्रमा व दो सूर्य की श्रेणी एक एक के अन्तर में है. सूर्य की पंक्ति के अंतर में चन्द्रमा की व चन्द्रमा की पंक्ति के अन्तर में सूर्य की इस भांति कुल चार पंक्ति हैं. एक २ चन्द्र पंक्ति मे ६६ चन्द्रमा हैं और एक २ सूर्य पंक्ति में ६६ सूर्य हैं यह चारों पंक्ति जम्बूद्वीप के मेरू पर्वत की प्रदक्षिणा अब मनुष्य - ( ५७ ) देते हुए मनुष्य क्षेत्र में परिभ्रमण करते हैं यानि जम्बूद्वीप के मेरू से एक मूर्य दक्षिण दिशा में विचरे जब दूसरा उत्तर दि- शा में विचरे इसी प्रकार लवण समुद्र में एक २ दिशा में दो २ सूर्य विचरे धातकी खण्ड में ६, कालोदधि में २१ और पुष्क रार्द्ध में ३६ यो सब मिलकर ६६ दक्षिणदिशि में व ६६ उत्त- रदिशि में विचरते हैं ये दोनों समश्रेणी सूर्य की मिलने से १३२ सूर्य और ६६+६६ चन्द्रमा की दो पक्ति मिलने से १३२ चन्द्र मनुष्य लोक में भ्रमण करते हैं श्रम ग्रह की पक्ति मनुष्य क्षेत्र में कहते है:- एव गहाइणोविहु॥नवर धुव पासवत्तिणो तारा।। तचिय पयाहिणता।। तत्थे वसया परिभमति॥८॥ भावार्थ:-पूर्वोक्त सूर्य चन्द्र की पक्ति की भाति ग्रह और नक्षत्र की पक्ति भी जानना सो इस प्रकार है कि एक २ चद्र- मा के पीछे अट्टहासी ग्रह और २८ नक्षत्र की एक पाक्ति है ऐसी छासठर की दो पक्ति मिलकर १३२ पति के साथ अहासी २ ग्रह और २८, २८, नक्षत्रों की जानना चे सर मेरू की चारों और परिभ्रमण करते है मगर इतना विशेष कि श्री ठाणाग मूत्र में जम्बूद्वीप के चारों दिशि में चार ध्रुव तारे बतलाये है इन ध्रुव तारों के पार्भवति जो तारे हैं यानि भुपनारे के निकट ( ५८ ) जो दुसरे जो सप्तऋपि आदिक तारे हैं वे ध्रुव तारे को ही प्रदक्षिणा देते फिरते हैं वहां ही वे परिभ्रमण करते हैं। अब जम्बूप में चन्द्र सूर्य के मंडल की वक्तव्यता करते है। पन्नास्स चूलतीइसयं ॥ इहससि रविमंडलाई तक्खित्तं ॥ जोयण पण सय दसहिय ॥ भागा अडयाल इगसठ्ठा ॥१॥ भावार्थ:-मंडल याने एक मूर्य दक्षिण दिशि से चलकर उत्तरदिशि में आवै और दूसरा उत्तरदिशि से चलकर दक्षिण दिशि में आवे । एक अहोरात्रि में अर्द्ध मंडल क्षेत्र दक्षिण दिशिका सूर्य और अर्द्ध मंडल क्षेत्र उत्तरदिशि का मूर्य उल्लंघन करता है. दोनों अर्थ मिलकर मंडलाकार होता है इसलिये उसे मंडल कहते हैं. मंडल का क्षेत्र ५१०० योजन है. चन्द्रमा के १५ मंडल हैं और १८४ मंडल सूर्य के हैं। यह चंद्र सूर्य के मंडल का क्षेत्र जम्बूद्वीप में कितना है सो कहते हैं।-५१० योजन पर एक योजन का एक सहीया ४८ भाग अधिक इतने क्षेत्र में सर्व मंडल हैं। अब उनका गिनती से परिमाण करते हैं:- (५९) , तिसि इगमठा। इग इग सहस्स सत्त मइयस्स। पणतीस च दु जोयण, ससि रविणो मडल त- रय ॥ ८२ भावार्थ -३५ योजन पर एक सठीया ४८ भाग तथा एक सठिया एक भाग का पुन सात भाग करें उनमें से चार भाग अधिक इतना अनार चन्द्रमा क पडलों के बीच में है और दो योजन का अन्तर सूर्य के मडलों के बीच में है गिनती उसकी इस प्रकार है-मूर्य के १८४ मडला के १८३ आतरे है और एक २ अतर का परिमाण दो २ या जन है उसको १८३ गुणा करें जन ३६६ योजन आतगेंस हुआ फिर सूर्य क एक २ मडल की चौडाई याजन की है उसको १८४ गुणा करने से १४४ योजन पर योजन हुए उन्दको पूर्वोक्त ३६६ योजन में मिलायें तर सब मिलकर ५१० योजन पर योजन हुये इतना तन जम्बूद्वीप के मूर्य को विचरने का है। अब चन्द्रमा के १५ मण्डल हैं प्रत्येक मण्डल की चाहार्ड योजन का एक सठीया ५६ भाग की है उसे १५ गुणा नग्ने से १३ योजन पर एफ सीया ४७ भाग अधिक होते है फिर (६०) १५ मंडल के जो १४ आंतरे हैं वह प्रत्येक अंतर ३५ योजन और एक योजन का एक सठीया ३० भाग तथा एक सठीया एक भाग के सात भाग करें ऐसे ४ भाग का है (यानि दो चन्द्र मण्डल के बीच इतना अन्तर है ) इसलिये उसको १४ गुणा किया जब ४६७ योजन पर एक सठीया एक भाग होता है उसमें उपरोक्त पंद्रह मंडलों के चौड़ाई के १३० योजन मिलायें जब सब मिलकर ५१०१ योजन हुए. इतना क्षेत्र जम्बूद्वीप के चन्द्रमा को विचरने की है. अब इन चन्द्र सूर्य के कितने मण्डल जम्बूद्वीप में तथा कितने लवण समुद्र में है सो कहते है:- मंडल दसगं लवणे ॥ पणगं निसढंमि होइ चंदस्स ।। मंडल अंतर माणं॥जाण पमाणं पुरा कहियं ॥ ३ ॥ पणसही निसढंमिय ॥ दुनिय वाहा दुजोयणं तरिया ॥ ईगुणवीसंतु सयं ॥ सूरस्मय मंडला लवणे ॥ ८४॥ भावार्थ:-चन्द्रमा के दश मंडल लवण समुद्र में हैं और पांच मण्डल जम्बूद्वीप में निपध पर्वत पर हैं उसके अन्तर का tha . (६१) प्रमाण उपर कह आये है उस प्रकार जानना सूर्य के ६५ मएडल निपध पर्वत पर है आर उनमें से दा मण्डल निपक्ष पर्वत के पाहिर हग्विप क्षेत्र की जिद्दा के अग्रभाग में है इस भाति जम्बद्वीप के भीतर सूर्य के ६५ मण्डल तथा लवण समुद्र में सूर्य के ११६ मडल है सब मिलकर १८४ मडल हुय मण्डल मण्डल के बीच में दो दो योजन का अन्तर अव जम्बूद्वीप मे चद्रमा सूय के चार क्षेत्र कितने योजन है तथा लवण ममुद्र में किन्ने योजन है सो कहत है-- ससि रविणो लपणमिग्र ॥जोयण सय तिन्नि तीम श्रीहयाह ।। असिय तु जोयण सयं । जंयु- हीवमि पविसति ॥ २५ ॥ भावार्य -लवण समुद्र में चन्द्रमा मूर्य का चार (विचरन पा) क्षेत्र ३३० योजन का है और जम्वीप में १८० योजन पर एक सठीया अडतालीस भाग अधिक का चार चत्र ६ मत्र मिलकर ५१० योजन पर एक सठीया ४८ भाग अधिक इनना चद्र मूर्य का चार क्षेत्र है चन्द्र भूर्य जम्बुद्वीप में से निकल कर लवण समुद्र में ३३० योजन तक जाते हैं पुन रापिम लाटकर १० योजन जम्बूद्वीप में प्रवेश करते है ९ ( व्यवहार में सूर्य के इस प्रकार गमनागमन होने को उत्तरायन व दक्षिणायन कहते हैं) नक्षत्र और तारों का एकही मण्डल है जो नक्षत्र जिस मंडल में चार करता है वह नक्षत्र सदैव वही मंडल में फिरता है मगर उनके दक्षिणायन उत्तरायन होवे नहीं. अव द्वीप और समुद्र मे ग्रह नक्षत्र और तारों की संख्या जानने के वास्ते उपाय बतलाते हैं:- गह रिक्ख तार संखं॥ जत्थेच्छसि नाउ मुदहि दीवेवा ॥ तसस्ससिहि एग ससिणो । गुणसंखं होइ सव्वगं ॥८६॥ भावार्थ:-जिस द्वीप या समुद्र के ग्रह, नक्षत्र और तारों की संख्या जानने की इच्छा होवे उस द्वीप या समुद्र में कितने चन्द्रमा है उसका पहिले हिसाब निकालना फिर उसके साथ आगे जो एक चंद्र का परिवार कहा है उनसे गुणा कर लेना जिससे ग्रह, नक्षत्र और तारों की संख्या विदित हो जायगी. अब वैमानिक की बात कहते है जिससे प्रथम उनके विमान कहते हैं:- (६३) बत्तीस हावीसा ॥वारस अउ चड विमाण ल- क्खाइ ॥ पन्नास चत्त छ सहस्स ॥ कमणे सोहमा- ईसु ।।८७॥ दुसुसय चउदुसुमयतिग मिगारसहियं मय तिगेहिटा । मज्जे सत्तुत्तर सय । मुवरितिगे सयमुवरि पच ॥ ८॥ भावारी-सौमि में ३२ लाख, ईशान में २८ लाय, सन कुमार में १२ लास, माहेंद्र में लाख, ब्रह्मदेवलाक में ४ लाख, लाता में ५० हजार, शुक्र में ४० हजार, सहस्सार में ६ हजार, श्राणत माणत इन दोनों में ४०० विमान,पारण तथा अन्चुत इन दोनों के मिलकर ३०० विमान जानना नीचे के तीन रेयक में १११ विमान, मध्य के तीन ग्रंायर म १०७ विमान और उपर नतीन ग्रंवयक म सो विमान है इसके उपर पाच अनुत्तर विमान पाच मिान है पूर्वोक्त विमानों की कुल सग्या और सिमानानिक का मप पहन है चलमीरलस सत्ताणपड । महम्मा विमाण तेवीस ॥ तपस्स मुह लोगमि ॥ इदपा विमढि पररे सु ।। ६६ ।।

- (६४ ). भावार्थ:-८४६७०२३ ( ८४ लाख ६७ हजार और २३ इतने उर्ध्वलोक में वैमानिक देवों के विमान हैं। और उर्च- लोक में जो ६२ प्रतर हैं, उनके मध्य भाग में एक २ इन्द्रक विमान है । वासट प्रतर के मिलकर बासठ इन्द्रक विमान हैं. चउदिसि चउपतीश्रो ॥ वासढि विमाणिया पढमें पयरे । उवरि इकिक हीणा । अणुत्तरे जाव इकिकं ॥१०॥ भावार्थ:-उपरोक्त.६२ इन्द्रक विमान में से प्रथम उडु ना- मक विमान से चारों दिशि में बासठ बासठ विमान की चार श्रेणी ( पंक्ति ) हैं, दूसरे प्रतर के दूसरे इन्द्रक नामक विमान से चारों दिशि में एकसठ २ विमान की चार पंक्ति हैं, इस भांति उपर के एक २ प्रतर में उत्तरोत्तर एक २ विमान कम करते जाइये यावत् सर्वार्थसिद्ध में वासठ प्रतर में एक २ विमान की चार पंक्ति है यानि उसके चार दिशा में ४ विमान है. इंदय वट्टा पंतिसु ॥ तो कमसो तंस चउरंसा वट्टा ॥ विविहा पुप्फवकिन्ना ॥ तयंतरे मुत्तं पुव्व दिसिं ॥ ११ ॥ .

(६५). भावार्थ:-उस पाक्ति में जो इन्द्रक विमान है वह गोलाकार है और सर्व के मध्य में है, उसके बाद क्रमशः श्रेणी में त्रिकोण विमान है, उसके बाद चतुष्कोण विमान है इसके बाद फिर गोल विमान है। इस प्रकार अनुक्रम से पक्तिगत विमानों के आकार हैं और पुष्पावकिर्ण विमान नदावर्त स्वस्तिक आदि विविधप्रकार के भाकार के हैं ये विमान पूर्वोक्त चार पक्ति के अनन्तर के बीच में पूर्वदिशि के सिवाय शेष तीन दिशि में ऐसे पुष्पावर्स विमान हैं । जिस प्रकार रायण (खिरणी) पुष्प चूटे बिखरे हुए होते हैं उसी प्रकार ये पुष्पावकिर्ण विमान भी पक्तिवध नहीं हैं मगर बिखरे हुए है। अब पहिले प्रतर की एक एक पक्ति के वासठ२ विमान पारी दिशि में कौन २ स्थानक में है सो करते है. एग देवे दीवे ॥ दुवेय नागोदहीसु वोधव ।। चत्वारि जक्खदीवे ॥ भूय समुद्देसू अद्वैव ।। ६२ ।। सोलसं सयभुरमणे ॥ दीवेसु पइट्ठियाय सुरभ- वणा ॥ इगतीसंव विमाणा ।। सयंभुरमणे स- मुद्देय ॥ ३॥ भावार्थ:-प्रथम अनर का प्रयम पक्ति विमान देवद्वीप में है, . (६६) दो विमान नांग समुद्र में है, तथा चार विमान जंबूद्वीप में है, आठ विमान भूत समुद्र में है और सोलह विमान स्वयं- भुरमण नामक द्वीप में रहे हुये हैं वहां देवों के भुवन हैं तथा ३१ विमान स्वयम्भुरमण समुद्र में है, सब मिलकर एक एक पंक्ति में के ६२ विमान होते हैं. इसी प्रकार चारों दिशा में जानना. अब चारो दिशि मे दूसरे प्रतर मे ६१ विमानो की समश्रेणी किस प्रकार है सो कहते हैं:- बटुं वट्टे स्सुवरि ॥ तंसं तंसस्स उवरिमं हो ॥ चउरंसे चउरंसं ॥ उठेंतु विमाण सेढीए ॥४॥ भावार्थः-गोलाकार विमान पर गोलाकार विमान है और त्रिकोण विमान के उपर त्रिकोण विमान है तथा चोखूण के उपर चोखूण विमान है. इस भांति उपरा उपरी उर्ध्वलोक में विमान की श्रेणी है. इसके छेड़े से ( अखिरी विमान से ) एक एक कमती करते जाइये यावत् वासठवें प्रतर के सर्वार्थ सिद्ध नामक इंद्रक विमान से चारो दिशि में एक एक त्रिकोणाकार विमान देवद्वीप उपर है. सर्व प्रतर में चारों पंक्ति के मध्य भाग में गोलाकार इंद्रक विमान है वहां से चारों दिशि की विमान की पंक्ति में अनुक्रम से त्रिकोणाकार चार विमान, तत्पश्चात् (६७) चतुष्कोणाकृति चार विमान, वाद मागोलाकार चारों दिशि के चार विमान, पुन निकोण, चतुफोण, गोल इस भानि जब तक श्रेणी पूरी होवे वहा तक क्रमश. समझ लेना सव्वे वट्ट विमाणा॥ एग द्वारा हवंति नाय- या ॥ तिणिय तस विमाणे । वत्तारिय हुति चउरसे ॥ १५॥ भावार्थ -सर्व गोलाकार विमान में एक एक द्वार होता है और त्रिकोण विमान में तीन तीन दरवज्ज होते हैं तथा चतु पोण विमान में चार चार टसज्ज होते है पागार परिक्खित्ता ॥ वट्ट, विमाणा हवति मवेवि ॥ चउरस विमाणाण ॥ चउदिमि वेइया होइ ॥६६॥ भावार्थ -सर्व गोल विमानों मामार (गढ) से वेष्टित ई आर जो चतुष्कोण विमान हे उनके चागें और वेदिका होती है (पिना कागरे का जो गढ होता है उसे वैदिका' कहते है । जत्तोवट्ट विमाणा। तत्तो, तसस्स वेडया होइ । पागारो वोवब्यो ।। अवसेसेहि तुःपामेसु ।।६७|| -- (६८) भावार्थ:-जिस दिशिम गोलाकार विमान है उस दिशिम त्रिकोण विमान को वेदिका होती है और शेष वाजुमें प्रकार यानि गढ होता है। प्रावलिय विमाणाणं ॥ अंतर नियमसो असं. खिज्जं संखिज्जमसंखिज्ज । भणियं पुष्फाव कि- नाणं ॥ १८॥ भावार्थ:-आवलिका (पति) गत बासठ विमान हैं उनमें-परस्पर एक दूसरे से निश्चय पूर्वक असंख्याता योजनका अंतर है. तथा पुष्यावकिर्ण विमानों में संख्याता योजन का तथा असंख्याता योजनका अंतर कहा है अर्थात् एक पूर्वदिशि को छोडकर शेष तीन दिशी में जो पुष्यावकिर्ण विमानों हैं उन से कइयों का परस्पर अंतर संख्याता योजन का है और कित्तेक विमानों का अंतर असंख्याता योजन का है। अञ्चंत सुरहि गंधा ॥ फासे नवणीय मउय सुहफासा ॥ निच्चुज्जोया रमा ॥ सयंपहा ते विरायति ॥६६॥ भावार्थ:-उपरोक्त विमान अत्यंत सुरभिगंध मय हैं, तथा उनका स्पर्श मक्खन के सदृश मृदु यानि सुकुमाल है तथा सुह- (६९) फासा यानि सुखकारी स्पर्श है । वे विमान सदैव उद्योतवत सया रम्य-मनोहर है और अपनी ही प्रभा से विराजमान हैं। जे दक्खिणेण इंदा ॥ दाहिणयो श्रावली मुणेयन्वा ॥ जे पुण उत्तर इदा ॥ उत्तरयो पा. वली मुणे तेर्सि ॥ १० ॥ भावार्थ:-दक्षिण दिशिकी श्रेणी के जो विमान है वे दक्षिण दिशि के सौधर्मेंद्र तथा, सनत्कुमारेंद्र के हैं और उत्तर दिशिके विमान की यणी ईशानेंद्र तथा माद्रकी है पुरण पच्छिमेणय ॥ सामणा आवली मुणे- यबा । जे पुण वट्ट विमाणा ॥ मज्झिल्ला दा- हिणल्लाएं ॥ १०१॥ भावार्थ:-पूर्व और पत्रिम दिशिके विमान की श्रेणी, सौ- धर्म तथा ईशान इन दो देवलोक में सामान्य हैं और जो गौला- कारविमान मध्यभाग में हैं सो दक्षिण दिशिक साधर्मेद्रके जानना. पुब्वेण पच्छिमणय जे वट्टा तेवि दाहिणिल्ल- स्मातस चउरंसगापुण। सामणाहुति दुण्डपि१०२ ( ७० ) भावार्थः-पूर्व और पश्चिम दिशि के विमान की श्रेणी में जितने गोलाकार विमान हैं वे भी दक्षिण दिशिक सौधर्मेंद्र के हैं और जो त्रिकोण तथा चतुष्कोण विमान हैं वे सामन्य याने दोनों ईन्द्र के है अव प्रति देवलोक मे श्रेणीक विमान की संख्या जानने का उपाय बतलाते हैं। पढमं तिम पयरावलि ॥ विमाण मुंह भूमि तस्समासद्धं ॥ पयर गुण मिट्ट कप्पे ॥ सव्वग्गं पुष्फकन्नियरे ॥ १०३ ॥ भावार्थः सौधर्म और ईशानादि. देवलोक में जो प्रथम प्रतरकी पंक्ति की विमान संख्या है उसे " मुख" कहते है, और अंतिम (आखरी) प्रतर की पंक्ति की विमान संख्या को भूमि " कहते हैं । उस मुख और भूमि के विमानों को एकत्र करने से जो अंक उपलब्ध होता है उसको समास कहते हैं। उस समास का अर्द्ध करके उसको इच्छित देवलोक के प्रतरके साथ गुणा करना चाहिये ऐसा करने से जो अंक उपलव्य होवे उतनी उस देवलोक में पंक्तिगत विमानों की सर्व संख्या जानना । उदाहरण- जैसे सौधर्म और ईशान इन दो देवलोक में मुख २४६ विमान और भूमि २०१ विमान । इन दोनों को ..

(७१) एकत्र करने से ४५० हुआ । उसका अर्द्ध करने से २२५ हुवा उसको इन दो देवलोक की प्रतर सग्या (१३) के साथ गुणा किया जब २६२५ हुआ । इतनी सरया सौधर्म ईशान देवगेको श्रेणीगत विमानों की जानना । अब उन दोनों देवलोक क सर मिलकर ६० लाव वि- मान हैं उनमें से.२६२५ वाद करें तो शेप ५९६७०७५ रहें इनने पुष्पावपिर्ण विमान हैं । इसी प्रकार उपर के देवलोक में भी ममन लेना। अब कौनमे देवलोप में, कौन प्रत्तर में किसी पति में कितने प्रियाण विमान, क्तिने धनुष्योग विमान और किमने गोत्र विमान है उनपी मरया जानने का उपाय कहते है।। इगदिसि पंति विमाषा । तिविभत्ता तस चउ- रसा वहा । तैसेसु मेम मेग ॥ खिवसेस टुगस्स इकिक ।। १०४ ॥ तमेसु चउरमेसुय तो रासि तिगपि उगुण काउ ।वहेसु इदय खिव ।। पयर घण मीलिय कणे ॥ १०५ ॥ भार्य-इन्दिन देवगैक में परिमन प्रनरी पर रिगि ही पनि मानिने विमानाने उनको नान हिम्मे बांगना (७२) इससे अनुक्रम से त्रिकोण, चतुष्कोण और गोल ऐसे तीन विभाग होंगे. इस भांति तीन का भाग देने से शेष जो एक बचे तो उसको त्रिकोण में मिला दीजिये, दो बचे तो एक त्रिकोण में व एक चतुष्कोण में मिलाइये. इस भांति एक दिशि में त्रिकोण, चतुष्कोण तथा गोलाकार विमान की संख्या हुई. उदाहरण-सौधर्म तथा ईशान देवलोक के प्रथम प्रतर में प्रत्येक दिशि में ६२ विमान हैं. उनको तीन भाग में विभक्त करने से एक २ भाग वीस वीस हुए और शेष दो बचे उनमें से एक त्रिकोल में व एक चतुष्कोण में मिलाइये तब २१ त्रि- कोण, २१ चतुष्कोण और २० गोलाकार विमान हुए. तत्प- थात् वे इन ३ राशी के ६२ विमान को चौगुणा करके गोला- कार विमान में एक इन्द्रक विमान मिलाइये तब प्रथम प्रतर के चारों पंक्ति के मिलकर ८४ त्रिकोण, ८४ चतुष्कोल तथा ८१ गोलाकार विमान सब मिलकर २४६ विमान हुए. वैसे ही दूसरे प्रतर में उपरोक गिनती अनुसार ८४ त्रि- कोण, ८० चतुष्कोण तथा ८१ गोलाकार सब मिलकर २४५ इसी प्रकार सर्वत्र समझ लेना. अब सौधर्म ईशान देवलोक की विमान संख्या कहते है. सत्तसय सत्तचीसा,चत्तारि सयाय हुंति चउपउया। .

(७३) चत्तारिय बासीया। सोहम्मे हुंति वद्याइ ॥१०॥ भावार्थ:-सौधर्म देवलोक में ७२७ गोलाकार विमान है, ४६४ त्रिकोण विमान है, तथा ४८६ चौखूण विमान है सब मिलकर १७०७ विमान पक्ति बद (श्रेणीगत ) है तथा ३१९८२६३ पुष्पावकिर्ण विमान है सब मिलकर बत्तीस लास विमान हुए। एमेवय ईसाणे ॥ नवर वट्टाण होड नापत्तं ॥ दोसय भट्टत्नीसा ।। सेसा जहचेव सोहम्मे ||१०७॥ भावार्थ -भान टेवलोक में इतना विशेष कि जो गोला. कार विमान २३८ । सौधर्म है महश है। गानि ६४ त्रिकोण तथा ४८६ चतुष्कोण विमान है मर मिलार १२१८ पशिगन रिमान तथा २७६०७२ पुप्पावरिण रिमान मा पिसर २८ लाम्ब विमान शान देवलोक में। भाष कृष्णराजी का ययात करत पुब्यापरा बलमा । तमा पुण दाहिणुनग वाभा भभितर उरंमा। मब्बाविय कगहराइयो ।१०। भायं -पांच देवलोक में गिर नागर नाम नाक के उपर ( ७४ ) चारों कोण में दो २ कृष्णराजी है. तमस्काय ( अंधकार के समूह ) से विष्टित होने से उन्हें कृष्णराजी कहते हैं । इस जंबूद्वीप से तिळ लोक में असंख्याता द्वीप समुद्र उल्लंघन करं- ने के बाद जो अरुणवर नामक द्वीप आता है उस द्वीप की वैदिका के छेड़े से अरुणवर समुद्र में वेंतालीस हजार योजन दूर समुद्र के तलसे अपकायमय यह तमस्काय निकली है. सो ११०० योजन तक भीत समान होकर फिर तिही फैली हुई है सौधमादि चार देवलोक की अपने उदर में लेकर पांच- वां ब्रह्मलोक के तीसरे प्रतर तक पहुंची हुई है. पूर्व और पश्चिम दिशि की बाहिरली कृष्णराजी के छः खणे हैं और दक्षिण व उत्तर दिशि की वाहिरली कृष्णराजी त्रिकोण है तथा. भीतर की चारों कृष्णराजी चतुष्कोण हैं. अब देश वैमानिक इन्द्रों के सामानिक तथा आत्मरक्षक देव कहते हैं. चुलसी असिइ वावत्तरि ॥ सत्तरि सठ्ठीय पन्न वत्ताला ॥ तुल्ल सुर तीस वीसा ॥ दससहस्स प्राय रक्ख चउगुणिया ॥ १०६ ।। भावार्थ:-सौधर्मेंद्र के ८४ हजार सामानिक, ईशानेंद्र के ८० हजार, सनत्कुमारेन्द्र के ७२ हजार माहेन्द्र के ७० हजार -

-
(७५)
ब्रमेन्द्र के ६० हजार, लातकेन्द्र के ५०, इनार, महाशकेन्द्र के
४० हजार, सहस्सरेंद्र के ३० हजार, आणत माणनेंद्र के २०
आरण अच्युतेंद्र के १० हजार सामानिक देव है और इन से
चार गुणे आत्मरक्षक देव प्रत्येक इद्र को होते हैं
अय बारह देवलोक के देवों के चिन्ह कहते हैं
कप्पेसुय मिय महिसो ॥ वराह सीहाय छगल
सालुरा ॥ हय गय भुयग वग्गी ॥ वसहा
विडिमाइ चिधाः ॥ ११०॥..
भावार्थ -सौधर्म देवलोक में मूग का चिन्द, इशान में
भंसा का चिह्न, सनत्कुमार में मुअर का चिन्द, माहेंद्र में सिंह
का चिद, ब्रह्मदेवलोक में बग का चिह, लाना में देडया
का चिड, शुक में घोडे का चिह्न, मास्सार में हाथी का विड,
आणत में सर्प का चिन, प्राणत में गेंडे का चिन्द, आग्ण में
वृषभ का चिन्त, अच्युन में चिडि में ( मृग विश नाति ) या
निन्द ये सब चिन्ह मुकुट में होते हैं.
अप विमान पिस अाधार पर रददै सो यादत
दुसु तिमु तिसु
कप्पेसु ॥ घणदहि घणवाय
हैं

G तदुभयं च कमा ॥ सुरभवण पठाणं॥ श्रागास पइठिया उवरि ॥ १११ ॥ भावार्थ:--सौधर्म तथा ईशान ये दो देवलोक घनोदधि के आधार पर है, तीसरा, चौथा तथा पांचवां ये तीन देवलोक धनवात के आधार पर है. छहा, सातवां व आठवां ये तीन देवलोक घनोदधि तथा धनवात इन दोनों के आधार पर इनके उपर के देवलोक आकाश के आधार पर (अर्थात् बिना किसी आधार ) है. सत्तावीस सयाई॥पुढवी पिंडो विमाण उच्चतं॥ पंचसया कप्प दुगे । पढमे तत्तीय इकिकं ॥ ११२ ॥ हायइ पुढवीसु सयं ॥ वढई भवणेसु दु दु दु कप्पेसु चउगे नवगे पणगे ॥ तहेव जाणु- त्तरे सुभवे ॥ ११३ ॥ इगवीस सया पुढवी ॥ विमाण मिकार सेवय सयाई ॥ बत्तीस जोयण सया । मिलिया सव्वत्थ नायब्वा ॥ ११४ ॥ भावार्थ:-प्रथम दो देवलोक में २७०० योजन का पृथ्वी पिंड है, और विमान की उंचाई पांचसौ योजन की है. तीसरे

(७७)
चोये देवलोक में इससे एक सो पोजन कम यानि २६००
पोमन का पृथ्वी पिंड और १०० योजन अधिक यानि ६००
योजन विमान की उचाई पाय छठे देवलोक मं२५०० योजन
पृष्जी पिंड और ७०० योजन विमान की उचाई. सातवें आठचें
देवलोक में २४०० योजन पृथ्वी पिण्ड और ८०० योजन
विमान की उचाई, नवमे, दशर्वे, ग्यारहवें और वारहवें देवलोक
में २३०० योजन पृथ्वी पिएड और ६०० योजन विमान की
उचाई, नव ग्रैवेयक में २२०० योजन पृथ्वी पिंड और १०००
योजन विमान की उचाई, पांच अनुत्तर विमान में,२१००
योजन पृथ्वी पिंड और ११०० योजन विमान की उचाई, सब
जगह पृथ्वी पिंड के और विमान की उंचाई के योजन की
जोर लगाने से कुल ३२०० योजन होते हैं
पण चउ तिदुवणण विमाण ।। सधय दुसु दु.
सुय जा सहस्सारो ॥ उवरि सिय भवण चतर ।।
जोइ सियाण विविह वगणा ।। ११५ ।।
मावार्थ -सौधर्प तथा ईशान देवलोक में वना सहित
पांचों वर्ष के विमान है, और सनकुमार तथा माहेन्द्र में एक
पाला रा छोड़ कर श्रेष चार वर्ण के विमान है, ब्रह्म नया
।

( ७८ ) लांतक देवलोक में काला तथा नीला वर्ण के अलावा शेप नीन वर्ण के विमान है, शुक्र तथा सहस्सार पील नया शून वर्ण के विमान हैं. वहां से उपर आणतादिक चार देवलांक नथा नव अत्रेयक और पांच अनुत्तर विमान तक श्वेत वर्ण विमान है. भुवनपति के भुवन, वाण व्यंतर के नगर नया ज्योतिषी के विमान ये सब विविध वर्ण के होते हैं. रविणो उदयत्थंतर ॥ चरणवइ सहस्स पणसय छवीसा ॥ वायाल सठिभागा ॥ ककड संकंति दियहमि ॥ ११६ ॥ एयंमिपुणो गुणिए ॥ ति पंच सग नवय होइ कममाणं । तिगुणमिय दो लक्खा ॥ तेसीड़ सहस्स पंचसया ।। ११७ ॥ अ- सिई छसठि भागा॥ जोयण चउलक्ख विसत्तरि सहस्सा ॥ छच्चसया तेत्तीसा ॥ तीस कलायंच गुणियमि ॥ ११८ ॥ सत्त गुणे छ लक्खा ॥ इगसठि सहस्स छसय छासीया ॥ चउपन्न कला तह नव। गुणंमि अड लक्ख सढायो॥११॥ सत्त सया चत्ताला ॥ अठारस कलाय इय कमा (७१) चउरो॥चढा चवला जयणा॥ वेगाय तहागई चउरो॥ १२०॥ ॥ इत्थय गहं वउत्यिं ।। जयण- यरिं नाम केइमन्नति ॥ एहिं कमेहि मिमाहिं ।। गहहिं चउरो सुरा कममो ॥ १२१ ॥ विक्खम थायाम ॥ परिहिं अभिंतरच वाहिरिय ।। जुगर मिणति छम्माम ॥ जार न तहावि तेपा- र ॥ १२ ॥ पावति विमाणाण ॥ केमिंपिहु अ. हर तिगुणयाईए । कम चउगे पत्तेय ।। वडाइ गर्दउ जोहब्जा ॥ १२३ ॥ तिगुणण पप्प चउंगे पत्र गणेणतु ग्रह समुणिज्जा ॥ गपिज्जे मत्तगु- पण नवगुणेणुत्तर चउप ॥ १२ ॥ मार्ग पूर्ण पारदगाहोर भन रानायमति४५०६ मागागा भर पर पानि पनि दिन में नाप रम पार मानिमगाव पालन पोगांत माननरी पा सानगुण, पारगुण, मागुग नपा नागुण पाने से को घरमा पपमान र पानि मानिरल पाटा (८०) कर दुमरा कदम रक्खें उसको इतने योजन का प्रमाण है सो कहते हैं। सूर्य के तापक्षेत्र को त्रिगुणा करने से २८३५८०१ योजन तथा पांच गुणा करने से ४७२६३३॥ योजन होवे तथा सान गुणा करने से ६६१६८६ योजन होवे तथा नव गुणा करने से ८५०७४०१. इस भांति क्षेत्रमान करके वैमानिक देवों की चार प्रकार की गति जानना. उस गति के नाम चंग, चपला, जयणा और वेगा है. ये चारों गति एक एकसे शीघ्र- तर, शीघ्रतम जानना. यहां कोई आचार्य चौथी वेगवति नामा गति का यवनंतरी ऐसा नाम मानते हैं. ये पूर्वोक्त चारों गति से चार देवता अनुक्रम में इस प्रकार विमानों को नापे एक देवता त्रिगुणीक्रम (चंडागति से) विमान की चौड़ाई को नापे, दूसरा पंचगुणे क्रम से (चपला गति से ) विमान की लंबाई को नापे, तीसरा देव सातगुणे क्रम से ( यवनागति से) विमान की भीतरी परिधि का नाप, तथा चौथा देवता नवगुणे क्रम से ( वेगवति गति से ) विमान की बाहिर की परिधि को नापे. इस प्रकार समकाल में ये चारों देव अनुक्रम से छः मास तक निरंतर विमान को नापे तथापि कितनेक विमानों का पार पावे नहीं. और कितनेक का पार पावे. प्रथम चार देवलोक में चंडादिक गति से पार पावे तथा उपर के आठ देवलोक में

पांचगुणे क्रम से पार पावे तयामात गुणे क्रम से चढादिव चारों-
गति से नववेयक के तथा चार अनुत्तर विमान का पार पावे,
पढम पयरंमि पढमे ।। कप्पे उडु नाम इदय
विमाए ॥ पणयाल लक्ख जोयण ॥ लक्ख
सन्चुवरिसबर्से ।। १२५ ॥
भावार्थ -प्रथम देवलोक के प्रथम मतर में उ नामक इन्द्र
फदिमान है सो वृत्ताशर स्थाली समान ४५ लाख योजन
प्रमाण तथा सर्वक उपर श्रीखरि वामठा अनर में एक लाम्म
पोनन का सर्वार्थ सिद्ध नामक रिमान गोलाकार ?
अप ६२ इटर विमान पे नाम कदम
उडु पद रयण वग्गु।। वीरिय वरुणे तहेव था.
पदे ।। वभे कराण रुहो ॥ वद अरुणेय व.
रुपय ।। १२६ ॥
भारार्थ - प्रथम विमान, पर वि० ३ ग्ल पिक
४मरगुपि० ५वापसी०६ रूग पि०७ मानद मि०८ प्रम
वि.सन वि.निम दि.१2 पि०१२ अरूण
१३ पण ये संग रिमान मापम त्रिन लोकम।

(२)
वेरूलिय रुयग रूइरे ।। अंके फलिहे तहेव त-
वणिज्जे ॥ मेहे अग्ध हलिदे ॥ नलिण तह लो-
हियंक्खेय ।। १२७ ॥
भावार्थ:-१४ वैडुर्य, १५ रूचक १६ रूचिर, १७ अंक
१८ स्फाटिक, १६ तपनीय, २० मेघ, २१ अर्ब, २२ हालिद्र,
२३ नलिन, २४ लोहिताच,
वहरे अंजण वरमाल || रिट्ट देवेय सोम मं-
गलए ॥ बलभद्दे चक्क गया ॥ सोवत्थिय दि.
यावत्ते ॥ १२८ ॥
भावार्थ:-२५ वज्र, (ये चारह तीसरे चोथे देवलोक में
हैं ) २६ अंजन, २७ वरमाल, २८ रिष्ट २६ देव, ३०. सौम्य,
३१ मंगल, (ये छः विमान ब्रह्म देवलोक में हैं ) ३२ वलभद्र
३३ चक्र, ३४ गदा, ३५ स्वस्तिक, ३६ नंदावर्तक ( ये पांच
छष्ट देवलोक में हैं)
प्राभं करेय गिद्धी । केऊ गरुलेय होइवोधव्वा ।।
बंभे वंभहिए पुण ॥ वंभुत्तर लतए चेव ॥१२॥

. । । भावार्थ:-३७ प्राभकर ३८ गृधी, ३९ केतु, ४०: गांड (ये चार महाशुक्र में ) ४१ ब्रह्म, ४२ ब्रह्माहित, ४३ ब्रह्मोत्तर, ४४ लातक ( ये चार सहस्सार में है)।' महसुक सहस्सारे ॥ ग्राणय तह पाणएय बोधब्बे ॥ पुप्फेलकार धारण ॥ तहाविय श्र- च्चुए चेव ॥ १३० ॥ ॥ भानार्थ.-४५ महाशुक्र, ४६ सहस्सार, ४७ आणत, ४८ माणत (ये चार नवमै दशमे कल्प में) ४६ पुष्प, ५०ीअलकर, ५१ आरण, ५२ अनुन ( ये चार आग्ण तथा . अच्चुन देवलोक में सुदमण सुपडि बढे ॥ मणोरमें चेव होइ पढम तिगे ॥ तत्तोय सबभद्दे ॥ विमालए सुमणे चेर ॥ १३१ ॥ भानार्थ -५३ मुन्शन,,५४ मुमतिपद, ५५ मनोरम, (,ये नीन प्रेयय की पहिली निस्म) ५६ सर्वनाभद्र, ५७ वि. गाल ५८ गुमनम, (ये नीत दगै मित्र ) सोमणने पीडकरे । पाइने र होह तहसे त (८४) तिगे॥सव्व सिद्धि नामे ॥ इंदया एव वासठी१३२ भावार्थः-५६ सोमनस, ६० प्रीतिकर, ६१ आदित्य (.ये तीन तीसरी त्रिकमें हैं ) और ६२ वां पांच अनुत्तर विमान का सर्वार्थ सिद्ध नामक एक इंद्रक विमान है. ये इंद्रक विमान के वासठ नाम कहे. पणयालीसं लक्खा ॥ सीमंतय माणुसं उडु सिवं च ॥ अपयठाणी सव्व ॥ जंबुद्दीवो इमं लक्खं ॥ १३३॥ भावार्थ:-१ सीमंत नामा नरकावास, २ मनुष्य क्षेत्र, उड़ विमान और सिद्ध शिला ये चार पदार्थ ४५ लाख योजन के हैं. तथा १ सातवीं नर्क का अपडहाण नरकावास, सर्वार्थ सिद्ध विमान ३ जंबूद्वीप ये तीन पदार्थ लाख योजन के है. अब उर्वलोक अधोलोक का विवरण कहते है:- अह भागासग पुढवीसु ॥ रज्जु इकिक तहय सोहम्मे ॥ माहिद लंत सहस्सार ॥ अच्चुय गेविज्ज लोगंते ॥ १३४॥ ,

.
-
(८५)
भावार्थ:--मेरू के रूचक प्रदेश से सात राज उचा उर्व
लोक है, तथा सात राज नीचा अधोलोक है, सब मिलकर
चौदह राज का लोक है । अधोलोक में एक २ नरक धनोदधि
धनवात, तनवात व आकाश समेत एक २ राज में है इस भाति
७ नरक के ७ गज होते हैं. और उर्वलोक में सौधर्मदेवलोक
के १३.३ प्रतर तक एक राज, माहेन्द्र देवलोक के अतिम मतर
तक दसरा राज, लतक देवलोक के अतिम प्रतर तक तीसरा
गज, सहस्सार तक चौथा राज, अच्युत तक पाचवा गन,
अवेयक के अत तक छटा राज और लोकात तक सातवां राज
जानना ( राज असरयात जोजन' का माप है )
सम्मत्त चरण सहिया,सब लोग फुमे निरवसेस।।
सत्तय चउदसगाए, पचय सुय देस विरइए।१३५॥
भावार्थ:-सम्यक्त्व चारित्र सहित केवली केवल समुद्-
पात समय मम्पूर्ण लोक को फरसते है और सम्यक् चारित्र
महित उत्कृष्ट श्रुत'झानी तपस्वी अनुत्तर विमान में उपजे तंत्र
चौट भाग में में सात भाग सात राज') स्पर्श (फरसे)
तथा
सम्यक
चारित्र पाने के पेस्तर नरकायु का यदि वध होवे
तो छडी नर्क में उत्पन्न होवे तवाथुत ज्ञानी देशविरती साधु
-

(८६) . - पांच राज फरसे उसका अधिकार ग्रंथांतर से जान लेना. इति दूसरा द्वार समान | 'अब टीसरा द्वार देवों की अवगाहना की कहते हैं. भवण वणं जोई सोहम्मी साणे सत्त हत्थ तणा- माणं ॥ दु दु दु चउक्के गेविज्ज गुत्तरे हाणि इकिक ॥ १३६ ॥ भावार्थ:- भवनपति, व्यंतर, ज्योतिषी, सौधर्म तथा ईशा- न देवलोक तक सात हाथ का देहमान, तीसरे चोथे में छ हाथ, पांचवे छठे में पांच हाथ, सातवें आट में चार हाथ, नव, दशग्या- रह तथा वारहवें तीन हाथ ग्रेवयक में दो हाथ और अनुत्तर विमान में एक हाथ का देहमान जानना। ... . कप्प दुग दु दु दु चउगे पुणगेय जिछिइ अ- यरा॥ दो सत्त चउदहारस॥वावीसिगतीसति तीसा ॥ १३७ ॥ विवरे ताणि कुणे ।। इक्कारस गाउ पाडिए ऐसा ॥ हथि कारस भागा-॥ अयरे अयरे समहियमि ।। १३८ ॥ चयः पुब स- (८७) रीराभो ।। कमेण ईगुत्तराइ बुड्ढीए । एव लिई विससा ॥ सणकुमाराइ तणुगाण ॥ १३६ ॥ 11 भावार्थ:-पहिले दूसरे देवलोक में दो सागरोपम, तीसरे चौथै सात सागगेपम, पाच में छठे चौदह सागरोपम, सातवें मआठवें में १८ सागरोपम नवमें से १२ तर्क २२ सागरोपम तथा नव वेयक में ३१ सागरोपम और पाच अनुत्तर विमान में ३३ सागरोपम की उत्कृष्टी स्थिति है। हम 17 mins अब अधिक स्थिति में से कम स्थिति बाद करें ( उसको विशेष कहते हैं ) शेप जो रहे उसमें से एक कपी, फरे लाटमें एक हाथका ग्यारह भाग करें उस भाग से विश्लेप करके एक कमती करने से जो आक बचा है उसके मुताबिक हायक शेष भाग एक एक सागरोपम की वृद्धि होते एक भाग कमती करते जाइये ईससे सनत्कुमारादि देवों का देहमान मालूम होगा । , उदाहरण-जैसे सौधर्म ईशान देवलोक में उत्कृष्टी स्थिति दो सागरोपम की है और सनत्कुमार माहेन्द्र में सात सागर की है अब सात में से दो वाद करें शेषापाच रहे उनमें से एक कमती किया जब चार रहा । अब सौधर्म ईशान में जो ७ हाथ का देहमान है। उसमें से छ हाथ रकवे और सातवें हायके ग्या- ।

. (८८) रह भाग करें उसमें से चार भाग निकाल लीनिय शेप जो सात भाग रहे उन्हें छोड़ दीजिये जिससे सनत्कुमार महेन्द्र देवलोक के ३ सागरोपम की आयु वाले देवों का देहमान छ हाथ पूरे और एक हाथ के ग्यारह भाग में चार भाग अधिक देहमान वैसे ही एक एक सागरोपमवढे जब एक एक भाग कमती करते जाइये जैसे ४ सागरोपम की आयुवाले की अवगाहना , हाथ की ५ सागरोपम वाले की ६, हाथ की छ सागरोपम वाले की ६३, हाथकी तथा सागरोपम वाले की पूरे छ हाथ की ईसभांति सर्व देवलोक में समझ लेमा. भवधारणिज्ज एसा ॥ उत्तर वीउब्बि जोयणा लक्खं ॥ गेविज्जणुत्तरेसु ॥ उत्तर वेउब्बिया नत्थि ॥ १४०॥ भावार्थ:-उपरोक्त देहमान भवधारणीय शरीर का कहा ममर कारण वशात् जब विकुर्वणा करके वैक्रिय शरीर करे तो उसकी उत्कृष्ट अवगाहना एक लाख योजन की है. नव ग्रेवेयक तथा पांच अनुत्तर विमान में सिर्फ भवधारणीय शरीर ही होता है उनमें उत्तर वैक्रिय करने की शक्ति तो है मगर उनको उत्तर बैंक्रिय करने की कोई आवश्यकता होती ही नहीं.

--
(28)
साहाविय वेउब्विय ॥ तणू जहन्ना कमेण पा.
रंभे ॥ अगुल अमख भागो ॥ अगुल 'सखिज्ज
भागोय ॥ १४१ ।।
भावार्थ:-स्वाभाविक यानि भवधारणीय तथा उत्तरक्रिय
इन दोनों शरीर का 'जघन्या अवगाहना कहते हैं भारम्भ में
भवधारणीय शरीर की जघन्य अगुल के असख्यात भाग
की तथा उत्तर वैक्रिय की जघन्य अगुल के सख्यात भाग
की होती है 'जयन्य शरीर भारम्भ काल में ही होता है
४
अन्यथो नहीं
इति 'देवों की अवगाहना का द्वार समाप्त
'अब उत्पात विरहकाल तथा चयन विरह काम कहते हैं: ।।
सामन्नेण नउविह ।। सुरेसु वारस मुहुत्त उको-
सा ।। उववाय 'विरह कालो ॥ अह भवणाईसु
पत्तेय ।। १४२ ॥
भावार्थ. सामान्यत चारों निकाय के देवों में समुच्चय
१२ मुहुर्त का उत्कृष्ट उपपात विरहकाल जानना अर्थात् चाग
निकाय के देवता निरन्तर उत्पन्न होते है उनक उत्पन्न होने में
।
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R
1 AM
-

(१०) उत्कृष्ट अन्तर वारा मुहूर्त का होता है. वारा मुहूर्त के गद अवश्य दूसरा देव उत्पन्न होता है. यह वात तो समुच्चय से कही अव भवनपत्यादिक प्रत्येक निकाय का विरहकाल कहते हैं. 4 - भवण वण जोइ सोहम्मी ॥ साणेसु मुहुत्त चउवीस ॥ तो नवदिण वीस मुहु॥ वारस दिल दस मुहुत्ताय ॥ १४३ ॥ वावीस सढदियहा । पणयाल असीइ दिण संयं तत्तो संखिज्जा दुसु मांसा ।। दुसुवासा तिसु तिगेसु कमी ॥ १४४ ॥ वासाण सया सहस्ला॥ लक्ख तह चउसु विजय माईसु ॥ पलिया असंख भागो ॥ सवढे संख भागोय ॥ १४५ ॥ भावार्थ:-भुवनपति, व्धनर, ज्योतिषी, सौधर्म तथा ईमान देवलोक में प्रत्येक में २४ मुहुर्त उत्कृष्ट उपपात विरहकाल तत्पश्चात् निश्चय दूसरा देव आकर उत्पन्न होव. सनत्कुमार में नव दिन वीश मुहूर्त का विरह काल, माहेन्द्र में बार दिवस दश मुहूर्त ब्रह्मलोक में - २२॥ दिवस, लांतक में ४५ दिवस, शुक्र में ८० :दिवस; सहस्सार में सो दिवस, आणत और 7 . M

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(६१)
माणत में सरयाता मास पानि आणत में १० मास और माणत
में ११ मास, आरण और अच्युत में सरयाता वर्ष का विरह
काल यहा सो वर्ष तक सख्याता जानना सो 'वर्ष के बाद
अवश्य दूसरा देव उत्पन्नाहोवे अवेयक की प्रथमानिमें सख्याता
शत-वर्षामन्यम् निको संख्याता हजार वर्षाऔरा उपरकी
त्रिको सख्याता लाखावर्ष-कारपपाताविरहकाल, चार अनुसर
विमान में पल्योपम के असख्यातवें भाग का विरहकाल तथा
सर्वार्थ सिद्ध में पल्यापम के सख्यातवें भाग का विरहकाल होने
• 1 x * lif
सव्वेसिपि-जहनो, समश्रो ए मेव चवण
विरहोवि ॥ इगदुति सख मसखा-॥ इगसमए
हुतिय चवति ॥ १४६ ॥ - - -
1 अबवगति में कौन कौन उत्पन्न होते हैं पर वर्तलाने को
7 प्रागतिद्वार कहते - ITTER
भावार्थ:-संस्त देवों में जघन्य एक समय का उपपात
विरहकाल है और इसी प्रकार चवर्ण 'विरहकाल भी समझ
लेना एक, दो, तीन, सख्याता अथवा' असख्याता देव पक
समय में उत्पन्न होवे अथवा चत्र
नर पबिंदियातिरिया॥ गुपत्ती सुरभवे पज्जु-
-

(१२) नाणं ॥ अज्झवसाय विसेसा ॥ तेसिं गई तारतम्मंतु ॥ १४७॥ भावार्थ:-पर्याप्ता मनुष्य तथा पर्याप्ता नियंच पंचेन्द्रिय ही देवगति में उत्पन्न होते है. देवगति में ऋदि आयुष्य आदि में जो तारतम्यता है उसका कारण अध्यवसाय यानि मनो व्यापार की विचित्रता का है. नर तिरि असंखजीवी ॥ सव्वे नियमेण जंति देवेसु, निय श्राउय समहीणा ॥ उएसु ईसाण अंतसु ॥ १४८ ॥ भावार्थ:-असंख्यात आयुष्य वाले युगलिक मनुष्य, वे तिर्यच सब निश्चय से देवगति में से उत्पन्न होते हैं। युगलिक पणे में उनका यहां जितना आयुष्य होता है उतने ही आयुष्य से अथवा उसस कम आयुष्प से वे देवगति में उत्पन्न होते हैं। उत्कृष्ट से युगलिक ईशान देवलोक तक उत्पन्न हो सकते हैं क्योंकि उनकी उत्कृटायु तीन पल्यापम की है और इतनी आयु ईशान देवलोक तक ही है. जंति समुच्छिम तिरिया ॥ भवण वणेतु न 3 (६३) जोइमाइसु । जंतेसिं उपवाग्रो ॥ पलिया सखस श्राउसु ॥ १४ ॥ भावार्थ -समूच्छिम तिर्यच मरकर उत्कृष्ट पणे भुवनपति तथा व्यतर में उत्पन्न होवे मगर ज्योतिष्पादिक में न जावे क्योंकि समृच्छिम तिर्यच उत्कृष्टपणे पल्योपम के असख्यातवें भाग की आयु वाले ही देव होते हैं वालतवे पडिवद्धा, उकड रोसातवेण गारविया। वरेण्य पडिवद्धा, मरिउ असुरेसु जायति ।१५०। भावार्थ -बालतप ( मिथ्याची जीवों के पचाग्नि प्रमुख वप ) में आसक्त होवे, तपस्वी होने पर भी उत्कृष्ट रोप करे. तपका गर्व (मट ) करे अथवा तपस्वी होकर भी कृष्ण द्वैपायन की भाति वरभार वाधे ऐसे जीव मरकर असुरकुमार सुवन- पनि में उत्पन्न होते है। रज्जुगाह स भक्षण ॥ जल जलण पवेस तरह लुह दुहयो ॥ गिरिमिर पडणाउ मुया ॥ सुहभावा हुति वतरिया ॥ १५१ ।। भावार्थ.-रसीवी फामी गले में दादर, अथवा विप (६४) . . भक्षण करके या जलमें डूबकर या अग्निमें प्रवेश करके या दृषा से या क्षुधा से पीड़ित होकर के या विरहादिक से व्याकुल होकर के अथवा पर्वत के शिखर परसे गिरकर मरे. इन स्था- नक में आत्मघातादिक करते हुए अभ्यंतर रौद्र परिणाम के अभाव से और मंद शुभ परिणाम से भरकर जीव व्यंतर देव की गति पावे तावस जा जोइसिया ॥ चरग परिव्वाय बंभ- लोगो जा ॥ जा सहस्सारो पंचिंदि ॥ तिरिय जा अच्चुत्रो सड्ढा ॥ १५२ ॥ भावार्थ:-तापस जाति मरकर ज्योतिषी पर्यत जावे तथा चरक ( चार पांच का समुदाय होकर भिक्षा से निर्वाह करने वाले ) और परिव्राजक ( कपिलमति त्रिदंडक ) मरकर उत्कृ ष्ठसे ब्रह्मदेवलोक पर्यंत जावे. गर्भज पर्याप्ता पंचेंद्रिय हाथी बलद प्रमुख तिर्यच संवल कंवल सदृश सम्यक्त्व देशविरति मर कर सहस्सार देवलोक पर्यंत जावे. देशविरति श्रावक मरकर वारहवां अच्युत देवलोक तक जावे' जइ लिंग मिच्छ दिछी | गेविज्जा जावं अंति उक्कोसं ॥-पयनवि असइहंतो। सुत्तत्थं मि- . .

I F । (६५) च्छदिहिनी ॥ १५३ ॥ भावार्थ' रजोहरणादिक साधु के वेषधारी ; साधुके वेपम मिथ्या दृष्टि होवे वह क्रिया के बलसे उत्कृष्ट से नवमी ग्रेवेयक तक उपजे ऐसे साधु द्वादशागी मूत्र पर श्रद्धावान होते तो हैं मगर यहा सूत्रोक्त एक पद पर भी यदि अश्रद्धा लावे तो उनको भी देशतः मिथ्यात्वी कहे हैं सुत्त गणहर रइय ॥ नहेव पत्तेय वुद्ध रइयंच॥ सुय केवलिषा रइय,अभिन्न दस पुब्बिणा रइय१५४ भावार्थ -सुधर्म स्वामी प्रमुख गणधर,के बनाये हुए आ- चारागादिक मूत्र तथा नमिराज प्रमुख प्रत्येक युद्धके रचे हुए नेमिप्रवादिक सूत्र तथा चौदह पूर्ववर श्रुत केवली सग्यभवमूरि प्रमुख के रचे हुए दशवैकालिकादिक सूत्र और सम्पूर्ण दश पूर्वधर के रचे हुए जो शास्त्र हैं उन सर्व को सून' कहते हैं. १, छउमत्य सज़याण ॥ उववा उकोसो, सबठे ।। तेसिं सढाण पिय ॥ जहरणो होह सोहम्मे ॥ १५५.।। । 1 T 1 -

(६६)
भावार्थः-छद्मस्थ साधु उत्कृष्ट से सर्वार्थसिद्ध विमान तक
उत्पन्न होवे और छमस्थ साधु तथा श्रावक जघन्य सौधर्म देव
-लोक में उत्पन्न होवे मगर इतना विशेष है कि छामस्थ साधु की
आयु सौधर्म देवलोक में पृथक्त्व २ से ६ पल्योपम की तथा
श्रावक की एक पल्योपम की प्रायु होती है.
लंतमि चउद पुव्विस्त तावसाईण वंतरेसु
तहा । ऐसिं उववाय विहि ॥ निथ किरिय ठि-
याण सम्वोवि ॥ १५६ ॥
भावार्थ:-चौदह पूर्वधर साधु जघन्य लांतक देवलोक में
उपजे, तापस, सन्यासी, शाक्यादिक जघन्य व्यंतर में उपजे
मगर उन सबके उत्पन्न होने की जो विधि बतलाइ है वह उन
की अपेक्षा से है कि जो अपनी क्रिया में स्थित यानि सावधान है.
अब संघयण का स्वरूप कहते हैं.
वज्जरिसहनारायं । पढमं वीयं च रिसह
नारायं ॥ नारायमद्ध नाराय ।। कीलिया तहय
छेवळं ॥ १५७ ॥ एए छ स्संघयणा ॥ रिसहो
पट्टोय. कीलिया बज्जं ॥ उभो मकड़ बंधो.॥
नाराम्रो होइ विन्नो ॥ १५८ ॥

(९७)
भावार्थ:-गरीर में हड्डीयों का दृढ दृढतर जो वध है, उसे
समयण कहते उसके छ प्रकार है:-१ वजम्पम नाराच, २
अपभनाराच, ३ नाराच, ४ अर्द्धनाराच ५ कालिका और ६
छवह अर्थात् सेवा अब उसका अर्थ कहते हैं, हडिकी सधिपर
जो पाटकी भाति लपेटा हुआ रहता है उसे ऋषभ कहते, उसके
उपर जो कीला होता है उसे वज्र कहते हैं और इडी की दोनों
सधि को महँदासार जो र अन्दर २ मिलित होता है उसे
नाराच कहते हैं उपरोक्त तीनों सम्मिलित होने से वज पभ
नाराच सघपण कहलाता है कीलिका रहित दूसरा रूपम
नाराच सघपस केवल मर्मट बध सो तीसरा नाराच सयपण,
पक तरफ मर्कटवध और दूसरी तरफ कीलिका वह चौथा अर्थ
नाराच स०, जिसमें हड़ी का बध सिर्फ कीलिका से (फीलीस)
होते हैं वह पाचवा पीलिका स० तथा जिसमें दोनों हड्डी का
बेटा एक दूसरे मे यों ही लगा २ जुड़ा हुआ हा मगर पिसी
तरह की रघन दो उमे सेवार्च सघपण करते है सेवात का
छेद पृष्ठ ऐसा नाम भी टीका में पाया जाता है
ब गम्भ तिरी नराण ॥ समूच्छिम पर्णिदि
विगल छेवट । सुरनेरडया एगिदियाय ॥ सब्बे
भसघयणा ॥ १५६ ।।

(६८) भावार्थ:-गर्भज तियेच तथा मनुष्य को छहाँ संघपण हात हैं, समूच्छिम पंचेन्द्रिय तिर्यंच तथा समूचिम मनुष्य को एक छेवट संघपण होता है, तथा तीन विकलेन्द्रिय (बद्री, तेंद्री, चौरेन्द्री) को भी छवह संघपण होता है. देवता, नारकी तथा समस्त एकेद्रिय को असंघपणी कहे हैं अर्थात् उनमें अस्थि की रचना न होने से संघपण भी नहीं है. छेवणं उगम्मई ॥ चउरो जा कप्प कीलिया- ईसु ॥ चउसु दु दु कप वुट्टी ॥ पढमेणं जाव सिद्धीवि ॥ १६०॥ भावार्थः-छेवट संघयण के धारक भुवनपति, व्यन्तर, ज्योतिषी तथा वैमानिक में यावत् चतुर्थ देवलोक तक उत्पम होत हैं, कीलिका सं० धारक छठा देवलोक पर्यत, अर्ध नाराच वाले सहस्सार तक, नाराच वाले प्राणत पर्यंत, ऋषभ नाराच वाले अच्युत नक, और वज्र ऋपभ नाराच वाले सर्वत्र अर्थात सिद्ध गति में भी उत्पन्न होते हैं. अव छ स्थान कहते हैं. समचउरंसे नग्गोह ॥ साइ वामणय खुज्ज J ANIPRITTA हुडेय ॥ जीवाण छ सठाणा ॥ सव्वत्थ सुलक्ख- ण पढम ।। १६१ ॥ नाहीए उवरि वीयं ॥ तइय महो पिट्टि उयर उरवज्जं ॥ सिर गीव पाणि पाए । सुलक्खण त चउत्थंतु ॥१६२॥ विवरीय पंचमग ॥ सम्बत्थ अलक्खण भवे बह ॥ गम्भय, नर तिरिय छहा ॥ सुरासमा हुडया सेसा॥१६३॥ भावार्थ -१ समचउरस, २ न्यग्रोध परिमडल, ३ सादि, ४ वामन, ५ कुब्ज और हुडक इस प्रकार जीव के छ सस्थान होते हैं और अजीव के पाच सस्थान है -१ परिमडल, २ वह, ३ निस, ४ च उरस,और आयत हैं शरीर के सर्व अवयर प्रमा णोपेत होवे और पद्मासन बैठे हुए दो कप और दो घुटण यों चारों के खूणे नापने से समान अन्तर होवे सो समचउरस माण और जो बटमृत के सदृश , नाभी के नीचे तो हीन (दुल ) होवे और उपर लवणोपेत होवे सोन्यग्रोध परिमंडल सस्थान जो नाभी के उपर हीन और नीचे लक्षणोपेच सो सादि सगण पीठ उदर और इदय ये हीन लक्षण युक्त । हो और शेष भग मस्तक, ग्रीवा, हाथ पैर सुलक्षण युक्त सो कुब्ज (१००) भी हरतरगच्छीय शान मन्दिर, बाणा संस्थान, तथा समस्त शरीर के अवयव विपरीत लक्षण युक्त होवे सो हुंडक संस्थान. अब ये छट्ठों संस्थान किस किस जीवों के होते हैं सो कहते हैं, गर्भज तिर्यच में छहों संस्थान होवे, देवों में एक समचउरंस संस्थान होवे. नारकी, एकेन्द्री, बेंद्री, तेंद्री, चउरिंद्रिय समृचिम पंचेन्द्रिय तिथंच और समूछिम मनुष्य इन सब में हुंडक संस्थान होते हैं. अब देवों का श्रागति द्वार कहते हैं, गर्भज मनुष्य तथा जति सुरा संखाउय गम्भय पज्जत्त मणुय तिरिगसु ॥ पज्जत्तेषु य वायर ॥ भूदग पत्तेय गवणेसु ॥ १६४ ॥ भावार्थ:-चारी निकाय के देव देवगति में से चवकर संख्याता वर्ष की आयु वाले गर्भन पर्याप्ता, मनुष्य तिर्यंच में उत्पन्न होते हैं (युगलिक नहीं होते ) इसके अतिरिक्त पर्याप्ता बादर पृथ्वीकाय, अपकाय और प्रत्येक वनस्पनि काय इन तीनों में भी देवता मरकर उत्पन्न होते है शेष स्थानक में उत्पन्न नहीं होते है.

(१०१)
तत्यवि संणकुमार ।। पभिई ऐगिदिएसु नो.
जति ॥ प्राणय पमुहा चविउ ॥ मणुएसु चेव
गच्छन्ति ।। १६५ ॥
भावार्थ:-उपरोक आगति में इतना विशेप कि सनत्कुमार
से लेकर सहम्मार तक के देव चंवकर पकेन्द्रिय में उत्पन नहीं
होते हैं. और आणत से लेकर सर्वार्थ सिद्ध पर्यंत के देव घर
कर गर्भन पर्याप्ता सरूयात वर्ष की आयु वाले मनुष्यही होते हैं.
अथ देवों के सभोग की रीति फाय है।
दो कप काय सेवी ॥ दो दो दो फरिस रूव
सद्देहि ॥ चउरोमणेणु वरिमा ॥ अप्प वियाग
अपत सुहा ॥,१६६ ॥
भावार्थ -भुवनपति, व्यतर, ज्योतिषी तया सौधर्म ईशान
देवलोक के देव काय मेवी हाते । अर्थात् भोगकी वांछना होने
से देवागना के साथ मनुष्य के माफिक भोग करते हैं । सनर
मार तथा माहेंद्र इन दो देवलोक फे 'देव देवागना के स्तन
भुना आदि के मालिगन से ही मभोग मुग्य मानते है ब्रह्मलोक
देवागना के रूप को देखन
तथा लातक

(१०२)
दृप्ति पाते हैं । शुक्र और सहस्रार के देव अपने भांग योग्य
देवांगना के गीत, हास्य, विलास, भाषित, भूषण, नेपूर प्रमुख
के शब्द श्रवण कर काम सुखका अनुभव करते है. तथा श्रा:
णतादिक चारों देवलोक के देव अपनी भोज्य देवी का मनमें
चिन्तवन करते हैं जब वह देवी भी अपने स्थानक में रही हुई
श्रृंगारादि सजकर मनमें भोगकी अभिलाषा उन देवसे करती
है और मनोव्यापार से ही दोनों व्यक्ति को तृप्ति हो जाती हैं.
नव ग्रैवेयक तथा पांच अनुत्तर विमान के देव अप्रवीचारा यानि
विषय सेवारहित होकर भोगकी इच्छा नहीं करते हैं, गुरुमुख
से विरति न लेने से और अविरति कर्मोदय से उनको
चारित्री ब्रह्मचारी नहीं कहते. 'कायसेवा की अपेक्षा स्पर्श
सेवा का सुख अनंतगुणा अधिक होता है इसी प्रकार
स्पर्श सेवा से रूप सेवा का सुख अनंत गुण अधिक
रूप सेवासे शब्द सेवा का सुख अनंत गुणा अधिक. और
शब्द सेवा से मनसेवा का सुख अनंत गुणा अधिक होता है.
जंच कामसुहं लोए ॥ जंच दिव्वं महासुहं ॥
वीयराग सुहस्सेय ॥ एंत भागंपिनग्घइ ॥१६७।।
भावार्थ:-लोक में जो काय सेवा रूप काम सुख है तथा
देवता सम्बन्धी जो परमसुरत सुख है वह सर्व सुख श्री वीतराग

-- . , ग ३ (१०३) यानि गगष रहित मुनीश्वरों के प्रशमसुख के अनत वे हिस्से में भी नहीं है अब देवीका उत्पत्ति स्थान कहते है -उववानोदेवीणकप्प दुगंजा परोसहस्सारा॥ गमणां गमणे नत्थिा। अच्चुयपरयो सुराणपि१६८ र भावार्य- भुवनपति, व्यतर, ज्योतिपी, सौधर्म और ईशान देवलोक इन स्थानों में देवियों की उत्पत्ति होती है उसके उपर देवियों उत्पन नहीं रोती है परन्तु देवों के भोगके लिये उपर के देवलोक में सहस्सार देवलोक तक माधर्म, तथा ईशान द. चलोफ की अपरिगृहिता देवी जा सकती है महस्सार से ऊपर के आणतादि देवलोकों में देवियों पागमनागमन (जाना प्रा- ना) नहीं है तथा अच्युत दवर्गक से उपर के देवों के गम- नागमन (जाना आना ) नहीं देयक तया अनुचरविमान व मी दा अपनी अग्या मे पर तर भी नीचे नहीं रखते और न कोई कल्पवासी देव वहां जा सानो अब रिचपा देवी के स्थान फस तिपलिय तिमार तेरस ॥ सारा कप दुगतल्य (१०४) लंत अहो ॥ किदिवसिय न हुंति उवरि ।। अच्चुय परोभि ोगाई ॥ १६६ ॥ भावार्थः-अशुभ कर्मोदय से देवगति में भी चंडाल सहस देव उत्पन्न होते हैं उन्हें किलिपी कहते है. तीन पन्योपम के आयुष्य वाले किन्चिपी देव सौधर्म ईशान देवलोक के नीचे रहते हैं और तीन सागरोपम के आयुष्य वाले किल्विष देव सनत्कुमार के निचे रहते हैं और तेरह सागर के आयुष्य वाले किल्विषी देव लांतक देवलोक के अधोभाग में रहते हैं. इसके ऊपर किलिपी देव की उत्पत्ति नहीं हैं. अच्युत देवलोक से उपर अभियोगि का दिक देवों ( आ- मरक्षक, सामानिक आदि ) उत्पन्न न होवे किन्तु इन ग्रेवे यक तथा पांच अनुत्तर विमान में समस्त देव स्वयमेव इन्द्र समान ही है. अपरिग्गह देवीणं ॥ विमाणलक्खा छ हुंति सोहम्मे ॥ पलिया ई समयाहिय ॥ ठिइ जासि जाव दसपलिया॥१७०॥ तापोसणं कुमारा ॥ णेवं वदति पलिय दसगेहिं ॥ जा बंभ सुक्क आणय ॥ श्रारण देवाण पन्नासा ॥ १७१ ॥ ई.

है -- . (१०५) साणे चउलक्खा ।। साहिय पलियाइ समय श्र- हिअ ठिइ ।। जा पनर पलिय जासि ॥ तामो माहिंद देवाण ॥ एएण कमेण भवे ॥ समयाहिय पलिय दसग वुढीए । लत सहस्सार पाणय ॥ अच्चुय देवाण पण पन्ना ॥ १७३ ॥ • - भावार्थ.-केवल अपरिगृहिता देवियों के ही छ• लाख वि- मान सौधर्मदेवलोक में हैं, उनमें से जिन देवियों की घायु एक पल्पोपम की है वे देवीया सौधर्मवासी दवों के भोग योग्य और जिन देवियों की आयु एक पल्योपम से एक समय भी अधिक है ऐसी यावत् दश पल्योपम की आयु वाली सर्व, अप- रिगृहिता देवी सनत्तुमारवासी देवों के उपभोग योग्य है परतु वे देविया इससे ऊपर के देवों की वाला न करे जैसे ही दस पल्योपम से एक समय, दो समय अधिक यावद स पल्या पम तक के आयुष्य वाली देविया ब्रह्मलापवासी' दवा भोग योग्य जानना उसी प्रकार एक समय से लेकर दश पल्यापम का फेर वृद्धि करने जाना यानि समयाधिक बीस पल्योपम से ३० पल्योपम ता क आयु वाली देविना शुक्रवासी देवों में भाग योग्य हैं तथा समयादिक वृद्धि में ४० पल्योपम तक

(१०६)
श्रायुष्य वाली देवियों आणतवासी देवों के भोग योग्य हैं. पुनः
समयादिक वृद्धि से ५० पल्योपम तक की आयु वाली देवियां
प्रारणवामी देवों के उपभोग योग्य हैं.
अव ईशान देवलोक में अपरिगृता देवियों के ४ लाख
विमान हैं, उनमें से जिन देवियों की कुछ अधिक एक पत्यो-
पम की आयुष्य है व देवियां ईशानवासी देवों के भोम योग्य
हैं. नत्पश्चात् समयादि वृद्धि से यावत् १५ पल्योपम की आयु
वाली देवियां मौद्रवासी देवों के भोग योग्य है. पच्चीस पल्यो-
पम के आयु वाली देवियां सहस्सारवासी के भोग योग्य है. पता-
लीप्त पल्यापम की आयु वाली प्राणतवासी के भोग योग्य तथा
पचपन्न पल्यापम की आयु वाली अच्युत देवलोकवासी देवों
के भोग योग्य हैं.
अब देवों को लेश्या कहते हैं.
किन्हा नीला काऊ ।। तेऊ पम्हाय सुक्क
लेसारो ॥ भवण वण पढम चउलेस,जोइस कप्प
दुगे तेऊ ॥ १७४ ॥ कपतिय पम्ह लेसा ॥ लंता
इसु सुक्क लेस हुंति सुरा ॥
भावार्थ:-कृष्ण, नील कापोत, तेजु, पम और शुक्ल
वे

. " . - (१०७) छलग्याए हैं, उनमें से,भुवनपति और व्यतर को कृष्ण, नील कापीत और तेजु ये चार लेश्याए होती है। ज्यातिषी में और मोधर्म ईशान इन दो देवलोक में एक तेजुलेश्या होती है । मनकुमार, माहेंद्र और नाम लोक इन तीन देवलौग में पद्म लेश्या होती है । तथा लातक से लेकर सर्वार्थसिद्ध पर्यंत के देवों को एक शुक्ल लेश्या ही होती है । अब वैमानिक देवों का पर्म कहते हैं । कणगाम पउम केसर ॥ बन्ना दुसु तिसु उवरि धवला ॥ १७५ ॥ भावार्थ-मोधर्म, ईशानवामी देशों के शरीर रक्त मुवर्ण जैमी कांति वाले तीसर चीये और पाचवे देवलोक के दयों करीर कमल पुष के पगग (पसर) सदश: ऊपर के लांतक आदि देवलोक में देशों के शरीर परल पानि शुक्ल, गुरलतम उत्तरोतर जानना भर देवों के माहार तथा ग्रामोश्याम का स्वरूप कति ? दमवास महस्साह ।। जहन्नमाउं घरति जे 7 (१०८) देवा ॥ तेसिं चउथा हारो ॥ सत्तहिं थोवेहि ऊसासो ॥ १७६ ॥ भावार्थ:-भुवनपति और म्यन्तर में १० हजार वर्ष की जघन्यायु वाले जो देव है उनके चउथभक्त में यानि एक अहो- रात्रि के अंतर से आहार की इच्छा होवे और सर्व इंद्रियों को आल्हादकारी मनोज पुद्गल से इच्छा को तृप्त करें. और सात स्तोक में श्वासोच्छ्वास होवे ( सात स्तोक में उंचा भास लेके और सात स्तोक में नीचा श्वास ) छोड़े, अव पूर्वोक्त स्तोक का प्रमाण कहते हैं. आहि वाहि विमुक्कस्स ॥ नीसासूस्सास एगगो ॥ पाणुप्तत्त इमो थोवो ॥ सोवि सत्तगुणो लवो ॥ १७७ ॥ लव सत्तहत्तरीए ॥ होइ मुहुत्तो इमंमि उसासा ॥ सगतीस सयतिहुत्तर ॥ तीस गुणा ते अहोरत्ते ॥ १७८ ॥ लक्खं तेरस सह- स्सा ॥ नउयसयं अयर संखया देवे ॥ पक्खेहि ऊसामे । वास सहस्सेहिं आहारो॥ १७६ ।। ।

"
(१०६)
भावार्थ:-आधि ( मन की पीड़ा ) और व्याधि (शरीर
पीपीग ) से विमुक्त अर्थात् चिंता भार श्रम से रहित मनुष्य
एक निधास उश्वास को प्राण कहते है और ऐसे सात
माण का एक स्तोक होता है, सात स्तोक फा एक लव होता
है, ७७ लव का एक मुहूर्त होता है, एक मुहूर्त में ३७७३
भासोश्वाम होते हैं, और एक अहोरात्रि में ११३१६० पासो
भास होते हैं अब जिस देव की जितने सागर की आयुष्य है
उस देव का उतने ही पक्ष का श्वासोश्वास होता है और उतन
ही इनार वर्षों के बाद उसको आहार की इच्छा होती है जिस
व की एफ सागर की आयु होवे उसको एक पक्ष में ना
उभास होवे और एक हजार वर्ष के बाद आहार की इच्छा
हावे वैसेही सर्वार्थ सिद्ध में तेतीश सागरोपम की आयु है ता
मनीस पक्ष में पासायास और तेतीस हजार पर्प में आहार
की रस्या होती है
दम वास सहस्सुपरि ॥ समयाई जाव सागर
अण, दिवस मुहत्त, पहुत्ता थाहारूमास मेसाण
भावार्थ -निस देव की मायु दशहनार पर्प से पक समय
अपिक में लकर कुछ पम एक सागरोपम की उस देर का
॥ १८०॥

में - (१०) दिवस पृथक्त्व में आहार की इच्छा और मुहृत पृथक्त्व श्वासोश्वास होवे. दो से नव तक की संख्या को पृथक्त्व की संज्ञा दीगई है. अब आहार के तीन भेद कहते हैं. सरिरेण उयाहारो॥ तयाइ फासेण लोम आहारो ॥ पक्खे वा हारो पुण ॥ कावलियो होइ. नाइव्वो ॥ १८१॥ भावार्थ:-केवल तैजस शरीर से ही जो आहार किया जाता है उसको ओज आहार कहते हैं, स्पर्शद्रिय से जो आहार होता है ( तेल मालिसादि द्वारा ) उसको लोम आहार कहते हैं तथा कवल आदि जो आहार मुख में डाले जाते हैं उसको प्रक्षेपाहार अर्थात् कवल आहार कहते हैं. ोयाहारा सव्वे ॥ अपजत्त पजत्त लोम श्राहारो॥ सुर निरय इगिदि विणा ॥ संसा भवत्था स पक्खेवा ॥ १८२॥ --- भावार्थ:-एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय प्रमख सर्व अपर्या- i - (१११) सा जीव उत्पत्ति समय में ओज आहारी होते हैं और पर्याप्ता. बम्या में लोम आहार होवे तथा देवता, नारकी और एकेंद्री के अगवा शेष समस्त ससारी जीव केंद्री, तेंद्री, चौरेंद्री, पचे. दी, तिथंच और मनुष्य ये सब कवलाहारी होते हैं देवता नारकी और एकेंद्री को पलाहार नहीं है किन्तु पर्याति पूर्ण होने के बाद लोमाहारी होते है सच्चित्ता चित्तो भय' ।। रूवो आहार सब तिरियाण ॥ सव्व नराण च तहा सुर नेरझ्याण प्रच्चित्तो ॥ १३ ॥ भावार्य सर्व तियंच और सर्व मनुष्य सचित्त, अचित मार मिश्र ये तीन प्रकार के आहार करते हैं तथा देवता और नावी मदेव अचित आहार करते। ग्राभोगा पाभांगा ॥ सबेमि 'होड लोम भाहारो ॥ निरसाण अमणुनी ॥ परिणमड सु. राण ममणुनी ॥ १४॥ - भावार्थ-पर्यापारम्पा में जानते हुए या अनजान पने लाम भागार पग्ने । यथा वाल में शीनस पहन सा (११२) से अधिक मूत्र श्रवता है वह लोम आहार का परिणाम है. वह लोमाहार नारकी को अशुभ कर्मोदय से अमनोज्ञ रूप से परिणमता है और वही लामाहार देवों के शुभ कर्मोदय से मनोज्ञ रूप से परिणमता है। तह विगल नारयाणं ॥ अंतमुहुत्ता सहोइ उक्कोसो ॥ पंचिंदि तिरि नराणं ॥ साहाविरो छ8 अहमश्रो ॥ १-५॥ भावार्थ:-तीन विकलेन्द्रिय तथा नारकी को उत्कृष्टपणे अंतर्मुहूर्त में आहार की इच्छा होवे और तिर्यंच पंचेंद्री को स्व- भाव से (ताप रोगादिक के अभाव में ) दो अहोरात्रि के बाद आहार की अभिलाषा होवे और मनुष्य को तीन अहोरात्रि के बाद आहार की अभिलाषा होवे ये दोनों आहारांतर उत्कृष्ट रूप से बतलाया गया है सो देवकुरु उत्तरकुरु में तथा भरत एरव्रत में मूषम सूपम. कालमें तीन -पल्योपम की आयु वाले मनुष्य तिर्यंच आश्री समझना चाहिये । अव कौन आहारक और कौन अनाहारक ? सो कहते हैं. विग्गह गइ मावन्ना ॥ केवलियो समुहया श्रजोगीया ॥ सिद्धाय श्रणाहारा ॥ सेसा अहा- रगा जीवा।। १८६॥

+
भावार्थ:-विग्रहगति में रहा हुआ जीव उत्कृष्ट चार समय
अणाहारी होवे, केवली भगवान् केरल समुद्घात करते परत
तीसरे, चौथे और पाचवे समय में अणाहारक होते है क्योंकि
उस समय सिर्फ एक कार्मणकाय योग ही होता है और चौ-
दहवां गुणस्थानावर्ती अयोगी केवली तथा सिद्ध भगवत भी
अणांहारक होते हैं शेप सर्व जीव आहारक होते हैं
भय देवता का स्वरूप कहते हैं।
केसहि मस नह रोम ॥ रुहिर वसं चम्म मुत्त
पुरिसे हि ॥ रहिया निम्मल देहा ॥ सुंगध नी-
सास गय लेवा ॥ १८७॥
भावार्थ - मर्म देवों के पूर्णकृत शुभकर्म के उदय मे केश,
गडी, मास, नग्य, रोम, रूधिर, सा ( मास की चपी) चम-
दी, मूग, विष्टा इनसे हित निर्मल शरीर होते है । उनके नि
भास की गुगर'कपूर तथा कस्तुरी की सुगन्य समान होती है
तथा रज पसीना आदि दुर्गधी रहित होने है
थतमहत्तणचिय पज्जत्ता तरुण पुरिस सका-
सा ॥ सम्यग सूपणपरा ॥ अजरा निरुया समा
देवा ॥ १०॥

(११४) भावार्थः-उत्पन्न होते ही अंतर्मुहूर्त में पर्याप्ति पूर्ण होजाने के वाद तरूण पुरुप के समान सर्वांग में आभूपण धारण किये हुए जरा रहित, रोग रहित तथा समचतुरस्त्र संस्थानी सब देव होते हैं. अणिमिस नयणा मण ॥ कज्ज साहणा पुष्फ दाम अभिलाणा ॥ चउरंगुलेण भूमि ॥ न छिवंति सुरा जिणा विति ॥ १८ ॥ भावार्थ:-देवों के नेत्र अनिमिष होते हैं यानि आँखों का टीमकार नहीं होता है और सर्व कार्य मानसिक शक्तिये सिद्ध करते हैं. उनके केशमें फूलों की माला निरंतर अम्लान (निक सी हुइ.) रहनी है, वे जब मनुष्यलोक में आते है तब पृथ्वी से चार अंगुल उंचा पैर रखते हैं किन्तु भूमिका का स्पर्श नहीं करने श्री तीर्थकर देव ने ये बातें कहीं हैं. पंचसु जिणकल्लाणे सु ॥ चेव महरिसि तवाणु- भावाप्रो ॥ जम्मंत्तर नेहेणय ॥प्रागच्छंति सुरा इयं ।। १६०॥ भावार्थ:-श्री तीर्थकर के जन्मादिक पंच कल्याणक में, कि- सी महर्षि के तपके प्रभाव से तथा जन्म जन्मांतर के स्नेह से

(११५)
(गालिभद्र के पिता जी गांभद्र की भाति ) अथवा रोप से
( सगम देवकी तरई ) इन कारणों से देव यहा आते हैं किन्तु
विना प्रयोजन नहीं आते है
सकति दिव्बपेमा।विपय पसत्ता समत्त कचवा।।
अणहीण मणुयकज्जा ॥ नरभव समुह नइति
सुरा ।। १६१॥
भावार्थ -देनों का-देवगति में उत्पन्न होते ही-देवगना के
माय परस्पर दिन्प प्रमका संचार होता है और उन देवियों के
माय गन्दादिक विषय में अत्यत आसक्त होजाते हैं कि एक
मुहत मानका भी उनमे वियाग सहन नहीं हो ममता, इसके
अलावा म्नान, वनविकार, नाटक विलोकन प्रमुख देर पार्य
पूर्ण होते नहीं तथा मनुष्य के साथ फिमी प्रकार का कार्य
प्रपोजन नहीं है इन कारणों में भयुभ दुगंधमय ऐसे मनुष्प
लोक में देव नहीं भात
चत्तारि पचे जोयण ॥ सयाड गहोय मणुय
लोगस्स ॥ उद वह जेण ।। नहु देवा तण
भावति ॥ १२॥

(११६) भावार्थ:-मनुष्य लोक संवन्धी मून कलेवर, मलमूत्र आदि की दुर्गंधी ( बदबू ) चारसो पांचमा योजन पर्यन उंच फैलनी है उन कारणों से देवना मनुष्य लोक में नहीं आते हैं. अब देवों के भवप्रत्यायिक अवधि ज्ञानका विषय क्षेत्र कहने है. दो कप्प पढम पुढवि॥दो ३वीय तहयगं चउधि चउ उवरिम प्रोहीए ॥ पासंति पंचमं पुढवि१६३ भावार्थ:-प्रथम के दो देवलोक के देव पहिली नर्क पृथ्वी पर्यत अवधिज्ञान से देख सकते हैं, सनत्कुमार और माहेंद्र के देव दूसरी शर्करा प्रभा तक देख लकते हैं । ब्रह्म और लोक वासी देव तीसरी बालु का प्रभा पर्यंत देखे, शुक्र और सहस्रार वासी देव चौथी पंक प्रभा तक देग्वे, आणत, प्राणत, आरण और अच्युतवासी देव पांचवी धूम्र प्रभा तक देखे । छट्टि छ विज्जा ॥ सत्तमीयरे अणुत्तर सुराऊ॥ चूण लोगनालिं॥असंख दीवुदहिं तिरियंतु ॥ १६४ ॥ भावार्थ:-तीन नीच के और तीन मध्य के एवं छ ग्रेवेयक के देव छछी तमप्रभा तक देखे और उपर के तीन ग्रेवयक के देव सातवीं तमस्तमप्रभा नर्क पृथ्वी तक देखे और पंच अनुत्तर تیل

-
(११७)
विमान वासी देव कुछ कम समस्त लोकवासी को देखते हैं
यानि उचे तो अपनी रिमान की ध्वजा पर्यंत ही देख सकते हैं
किंतु नीचे सातवी नर्क के आखिरी चरमात तक सपूर्ण लोक
को देख सकते हैं । अव तिची दिशा में कौन कहता देख
सकते हैं वह कहते हैं। सौ धर्म ईशान वासी देव असख्यात द्वीप
समुद्र को देख सकते हैं।
बहु अंरगं वरि-मंगा । उढेस विमाण
चूलिय धयाइ ॥ ऊणद्ध सागरे सख। जोयणा
तप्पर मसंखा ॥१६५}} FREE
भावार्थ -वहा से ज्यों ६ उपर जायें त्यों अधिक अधि-
कतर तीच्छी ज्ञान होता है।और-उचे तो समस्त देवलोक के
देव अपने विमान की चूलिकाकी धना तक ही देखते हैं।
यह उन्कर अवधिज्ञान कहा जन्य से तो सर्व वैमानिक देव
में अंगुल के असरयात भाग का अवपि झान होता है । अब
भुवनपति, व्यतर, और ज्योतिषी दवों में से जिनकी आयु कुछ
अर्थ सागगेपम की है वे अवधि ज्ञान से सख्याता योजन तक
देख मक्रते हैं, और जिनकी आयुष्य इससे अधिक है। देव
असख्याता याजन तक देखते हैं आयुद्धि के साथ अवधिज्ञान
भी वृद्धिंगत होता है।
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(११८) पणवीस जोयण लहु ॥ नारय भवण वण जोइ कप्पाणं ॥ गेविजणुत्तराणय ॥ जह संखं ओहि श्रागारा ॥ १६६॥ भावार्थ:-दश हजार वर्ष की आयुवाले भुवनपति तथा व्यंतर जघन्य २५ योजन देखे । १ नारकी, २ भुवनपति, ३ व्यंतर, ४ ज्योतिषी, ५ वार देवलोक के देव, ६ नव अत्र- यक वासी देव तथा ७ पांच अनुत्तर विपान वासी देव इन सातों के क्रमशः अवधिनान का संस्थान ( आकार ) कहते हैं। तप्पगारे पल्लग ॥ पडहग जल्लरि मुहंग पुप्फ जवे ।। तिरिय मणुएसु श्रोही॥ नाणाविह संहियो भणियो ।। १६७ ।। भावार्थ:-नारकी का अवधिज्ञान पाणी के ऊपर तिरने त्रापे के आकार में है, भुवनपीत का अवधिज्ञान वाला के आचार में है, व्यंतर का अवधिज्ञान ढोल के आकार का है, ज्योतिषी का झालर के आकार में है, बारह देवलोक में अवधिज्ञान मृदग के आकार में है, अवेयक में फूलों से भरी हुई चंगेरी के आकार में है और अनुत्तर देवों का अवधिज्ञान कुमारी कन्या के गलकं चुआ के (उसर कंचुक के) आकार में है । तिथंच और मनुष्य का अवधिज्ञान अनेक प्रकार का कहा है. -- 1११६) । . उढ्ढ भवण वणाण ।। बहुगोवेमाणियाण हो थोही । नारय जोइस तिरिय ॥ नर तिरि- याण अणेगविहो ॥ १६ ॥ भावार्थ:-भुवनपति और व्यतर इन दोनों का अवधिज्ञान उचे अधिक है और तिर्छा कम है, वैमानिक का अवधिज्ञान नीचा अधिक है और तिर्चा तथा उचा कम है, नारकी और ज्यो- तिपी का अवविज्ञान तिळ अधिक है तथा उचा नीचा कम है, और मनुष्य तिर्यंच के अवधिज्ञान अनेक प्रकार के होते है। इय देवाण भणिय ॥ ठिइ पमुह नारयाण बुच्छामि ।। इग तिन्नि सत्त दस सत्तर ॥ अयर वावीस तित्तीसा ॥१६६॥ मत्तय पुढवी सुठिई ॥ जिठो परिमाह हिह , पुढपीए ॥ होइ कमेण कपिट्ठा । दसवास सहस्स पढमाए ॥ २००॥ भावार्य -इति पूर्वोक्त प्रकार देशों के स्थिति प्रमुग्व नव द्वार करे अब वही नव द्वार नारकी के सम्बन्ध में करने, मथम साती नरक की जपयों कृष्ट भायु स्थिति करते है। रत्लममा पृथ्वी में एक सफराप्रभा में ३ बाल ममा में ७पकममा (१२०) में १० धूमप्रभा १७ तमः प्रभा में २२ और सानवीं तमः तम प्रभा में ३३ सागरोपम की उत्कृष्ट आयुस्थिति है। अब उपरकी नरक पृथ्वी में जितनी उत्कृष्टी आयुस्थिति होती है उतनी ही नीचे की नर्फ पृथ्वी में जघन्य आयुस्थिति होती है । यया रत्नप्रभा की उत्कृष्टी आयुस्थिति भी एक सागरोपम की है तो शर्करा- प्रभा की जघन्य आयुस्थिति भी एक सागरोपमकी जानना इसी प्रकार यावत् छट्टी नर्क पृथ्वी की उत्कृष्ट आयुस्थिति २२ साग- रोपम की हें तो सातवी नर्क में जघन्य आयु २२ सागरोपम की है और पहिली नर्कमें जघन्य आयु दश हजार वर्षकी है। अव प्रत्येक प्रतर में जघन्योत्कृष्ट प्रायुस्थिति कहते है। नवइ सम सहस लक्खा ॥ पुव्वाणं कोडी अयर दस भाग ॥ इकिक भाग वुढी ॥ जा अयरं तेरसे, पयरे ॥ ,२०१ ॥ इय जि जहरणा पुण॥ दसवास. सहस्स लक्ख पयर दुगे !! सेसेसु उवरी जिष्ठा ।।.अहो कणिछाप्रो पइं पुढवी ॥ २०२ ।। भावार्थः-रत्नप्रभा पृथ्वी के प्रथम प्रतर निव्वे १० हजार वर्ष, दूसरे प्रतर में ६० लाख वर्ष, तीसरे प्रतर में एक पूर्व कोही वर्ष, चौथे प्रतर में सागरोपम. पांचवें प्रतरमें, सा० छठे - १॥ (१२१) सातवें, आठवें नव दश ग्यारहवें- वारव और आखिरी तेरहवें प्रतर में १ सागरोपम की उत्कृष्टी आयुस्थिति जानना अब जघन्यस्थिति, कहते हैं प्रथमें प्रतर में १० हजार वर्ष आगे के प्रतर में ऊपर के प्रतरत्की जो उत्कृष्ट स्थिति है वहीं उसकी जघन्य स्थिति समझ लेना उर्वरि सिड ठिई विसेसो । सग पयर चिहत्तु इत्थ सगुणियो ॥ उवरिम खिइ ठिई सहियो॥ इ- च्छिय पयरंमि उक्कोसा ॥२०३ भावार्थ:-ऊपर की पृथ्वी जो उत्कृष्ट स्थिति है उसको इच्छित नर्क पृथ्वी की उत्कृष्ट स्थिति में से वाद'करना फिर उसको प्रतर की सख्या में हिस्सा करना जो अक आर उसका वादित प्रतरके साधःगुणा करना जो अक आवे उसमें उपरकी उत्कृष्ट स्थिति मिला देना इससे वाछित प्रतर मी उत्कृष्ट स्थिति का अक आजावेगा. : पदाहरण-जैसे शर्करामभा की उत्कृष्ट स्थिति ३ सागरो- पमे की है और ग्लपमा की एक सागरोपम की है अब चाट करने से शेष दो रहे । उन दो सागरोपम को शर्कगममा के ११ मतर से भाग, दिया जब सागर हुआ उसको वलित प्रतर कोसाय गुणा किया तो प्रथम प्रवर में तो, सागर ही (१२२) ॥ रहा उसमें उपरकी रन्नममा पृथ्वी की उ० स्थिति के एक मा गरोपम मिलाने से १, हुआ उननी ३० स्थिति सकरापमा के प्रथम प्रतर में है इसी प्रकार प्रति प्रनर में: मागरोपम वहाने जाइये जब अखिरी ग्यारहवें प्रतर की उत्कृष्ट स्थिति पूरे तीन सागरोपम की होजावेगी। और प्रथम प्रतर की जि- तनी उत्कृष्ट स्थिति है उतनी ही दूसरे प्रतर की जघन्य स्थिति होती है। इसी प्रकार सातों नर्क पृथ्वी में समझ लेना । बंधण गइ संठाणा ॥ भेया वरणाय गंध रस फासा ॥ अगुरु लहु सद्द दसहा ॥ अमुहा विय पुग्गला निरए । २०४॥ भावार्थ-नारकी जीवों को सभाव से जो क्षेत्र वेदना होती है सो कहते है। पतिक्षण जो आहारादि पुद्गलों का जो बंधन है सो प्रदीप्त अग्निके सदृश अत्यंत दारुण होता हैं । ऊंट के सदृश उनकी अशुभगति होती है और चलते समय तप्त लोह के समान धरती का स्पर्श अत्यंत दुःखदायी होता है. नारकी को महाउद्वेगकारी हुंडक संस्थान होता है। भीत भादि के पुद्गलं का स्पर्श उनको खड्ग की धारावत् दुःखदायी होता है । वर्ण, गंध, रस स्पर्श भगुरु लघु परिणाम और शब्द ये दस बोल बहुत ही अशुभ और अत्यंत कष्ट कारक होते हैं ।

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(१२३)
नरया दसविह वेयण ॥ सी श्रोसिण खुह
पिवास कडूहि ॥ परवस्स जर दाह ॥ मय सोगं
चेव वेयति ॥ २०५॥
भावार्थ:-नर्क में दश प्रकार की वेदना, है १ शीत, २
उष्ण, ३ क्षुधा, ४ तृष्णा, ५ खाज, (खुजली आदि ), ६
पराधीनता, ७ ज्वर, ८ दाह, ९ भय और १० शारू ये टश
प्रकार की अनती वेदना नारकी के जीर वेदते है
।। सत्तसु खित्तज वियणा ॥'अन्नन्न कयावि
पहरणे हिविणा ॥ पहरण कयावि पचसु । तिम
परमाहम्मिय कयाविं ॥ २०६ ॥
भावार्थ -सातों नर्क में क्षेत्र वेदना स्वभाव से ही अनता
होती है अन्योन्य कृत वेदना दो प्रकार की है एक शरीर
द्वारा और दूसरी महरण द्वारा शरीर द्वारा होती हुई अन्योन
कत वेदना पहिली पाच नर्क में परमाधामी कृत वेदना
पहिली तीन नर्क में होती है
रयणप्पह सकरपह ॥ वाल्यपह पकपय
घूमपहा । तमपहा तमतमपहा ॥ कमेण पुढवीण
गोत्तइ ॥ २० ॥

है । (१२४) भावार्थ:-सात नर्क के सात गोत्र ( अर्थ सहिन नाम ) कहते हैं. पहिली नर्क में प्रथम कांड में अनेक रत्न होने से रत्नप्रभा गोत्र, दूसरी पार्करा प्रभा वहां कंकर वहान है. नीसगै वालुप्रभा में बालु अधिक है. चौथी पंकप्रभा में कादा बहुत और मानवी तम नमाप्रभा में अंधकार बाहुत है ये सातवें नर्क के गुण निष्पन्न नाम अर्थात् गोत्र कहे. अब नर्क के नाम तथा प्राकार कहते हैं. धम्मा वंसा सेला ॥ अंजण रिठ्ठा मघाय माधवई ॥ नामेहिं पुढवीओ ॥ छत्ताईछत्त संठाणा ॥ २०८ ॥ भावार्थः-१ धमा,२ वंशा, ३ शेला, ४ अंजणा, ५ रिटा, ६ मघा, ७ माघवती ये सात नर्क के नाम कहे. ये सातो नर्क पृथ्वी छाता निचे छाता के संस्थान में स्थित हैं. अव पृथ्वी का पिंड तथा श्राश्रय कहते हैं. असीय वत्तिस अडविस । वीसा अठार सोल अडसहस्सा ॥ लक्खुवरि पुढवि पिंडो ॥ घणुदहि घणवाय तणवाया ।। २०६ ॥ गयणं च पइठाणं । वीस सहस्साइं घणुदही (१२५) पण तणु वाया. गासा।। असख जोयण जुया पिंडो॥ २१०॥ ।। भावार्थ:-रत्नप्रभा का पृथ्वी पिंड एक लाख ८० हमार याजन, शर्कराप्रभा का एक लाख ३२ हजार योजन, वालुप्रभा का १ लाख २८ हजार योजन, परमभा का १ लाख २० हजार योजन, धूमप्रभा का १ लाख १८ हजार योजन, तम प्रभा का १ लाख १६ हजार योजन और तम ,तमा का १ लाख ८ हजार योजन का पृथ्वी पिंड है और प्रत्येक पृथ्वी क नीचे २० हजार योजन का घनोदधि, असख्यात योजन का घनवात, असख्य योजन का तनुवात, और असरय योजन का आकाश प्रतिष्ठित है नफुसति अलोग। चउ दिसपि पुढवीयवलय सघहिया ॥ भावार्थ -७ नई पृथ्वी घनोदधि, धनवान तथा तनुवान के वलय से वेष्टित होने से अलोक का नहीं फग्मनी है रयपाए वलयाण ॥ बद्धपचम जोयण स- इट् ॥ २११ ॥ विस्खभो घण उदही ॥ घण त. पवाया होइ जह मव ।। सत्तिभाग गाऊय ।।

न (१२६) गाऊयंच तह गाउय तिभागो ॥ २१२ ।। पढम महीवलए सु ॥ खिविज्ज एयं कमेण चीयाए । दुति चउपंच च्छगुणं ॥ तड्याइसु तंपि खिव- कमसो ॥ २१३ ॥ भावार्थ:-रत्नप्रभा पृथ्वी के तीन वलय की चौडाई इस प्रकार है धनादधि का छः योजन की चौड़ाई, धनवान की ४।। योजन की और तनुवात के १॥ योजन की चौड़ाई है इन तीनों को मिलने से १२ योजन हुए-पहिली नर्क से चारों और १२ योजन दूर तीर्छा अलोक है. आगे की नर्क पृथ्वी के घनोदधि के वलय में ११ गार वढाते जाना इस हिसाब से सातवीं नर्क का घनोदधि वलय ८ योजन का होगा. रत्नप्रभा के धनवात के वलय में १ गाउ वढाते जाना जिससे सातवीं नर्क पृथ्वी के धनवात का वलय छः योजन का होगा. और रत्नप्रभा के तनुवात वलय मेंई गाउ बढाते जाना जिससे सातवी नर्क के तनुवात का वलय २ योजन का होगा. ये सब मिलकर सातवी नर्क पृथ्वी से १६ योजन दूर अलोक है. मझे चिय पुढविअहे ॥ घणुदहि पमुहाण पिं- डपरिमाणं ॥ भणियंतो कमेणं ॥ हायइ जा (१२७) बलय परिमाण ॥२१४ ॥ भावार्थ:-" वीस सहस्साइ घणुदहि पिंडो" इस पाउका अर्थ नर्क पृथ्वी के नीचे मन्य भाग में धनोदधि प्रमुख का पिंट परिमाण कहा है उसमें से चारों ओर क्रमश' कमी होते होते अतमें उपर कहे अनुसार वलय रह जाता तीस पणवीस पनरस ॥ दसतिन्नि पएरण एग लक्खाइ ।। पचय नरया कमसो॥चुलसी लक्खा- इ संत्तसुवि।। २१५ ॥ भावार्थ:-पाहिली नर्क में ३० लाख नरकावास है, दूसरी २५ लाख, तीसरी में १५ लाख, चौथी में दस लाख, पा- ची में ३ लाख, छट्ठी में पाच कम एक लाख और सातवीं में पाच नरकावासा है सर्व मिलकर ८४ नाख नरकावासा है. अय प्रतर सम्म्या कहते हैं तेरिकारस नव सग ॥ पण तिन्निग पयर स. व्विगुणवन्ना ॥ सीमताई अप्पइ ॥ ठा पता इद- यमाझे ॥ २१६ ॥ " भावार्थ:-पहिली नर्क में १३ दूसरी में ११, तीसरी में ९, चौथी में ७, पाचवीं में ५, छठी में ३, और सातवीं में एक में

(१२८)
प्रतर है ये सब मिलकर ४६ प्रतर हुए, इन प्रत्येक प्रतर के
मध्य भाग में.४५ इंद्रक (बड़े ) नरकावास हैं. प्रथम प्रनर में
सीमन और अखिरी प्रनर में अपइठाण नामक नरकावास है.
अब श्रेणीगन नरकावास कहते है.
तेहिंतो दिसि विदिसिं॥विणिग्गया अनिरय
प्रावलिया ॥ पढमे पयरे दिसिगुण ।। वन वि.
दिसासु अडयाला ॥ २१७ ॥ वीया इसु पयरेसु
इग इग हीणाउ हुंति पंतीग्रो ॥ जा सत्तमि
मइ पयरे ।। दिसि इक्विको विदिसि नत्यि ॥२१८||
भावार्थ:-उन नर्क में इंद्रक नरकावास से चार दिशि और
चार विदिशि में इस भांति आठ पंक्ति हैं, प्रथम प्रतर में प्रत्येक
दिशि में ४६ और प्रत्येक विदिशि में ४८ नरकावार है इस
के नीचे के जो प्रतर हे उनमें क्रमशः एक २ कम नरकावास
है यावत् सातवी नर्क में ( ४६ वे अंतर में ) दिशि में तो एक २
प्रतर है मगर विदिशि में एक भी नहीं है.
इट्टप्पयरेग दिसि ॥ संख अढंगुणा चउविण
सइगसंखा ।। जह. सीमंतय पयरे.॥ एगुणनउया

(१२९)
सया तिन्नि ।। २१६ ॥ थपयठाणे पचउ। पढमो
मुहमतिमो हवइ भूमी ॥ मुहभूमि समासद्ध ।
पयर गुण होइ सम्बधण ॥ २२० ।
भावार्थ -इच्छित प्रतर की एक दिशि के नरकावास का
(आठ पंक्ति हाने से ) आठ गुणा करे फिर उन में से चार
कम करे ( क्योंकि विदिश में एक एक फम है ) पुन उनमें
एक पदक मिलाइये इस तरह करने से एक प्रतर के नरकावास
की सख्या विदित होगी प्रथम सीमत प्रतर में एक दिभि में
४६ नरकवासा है उसको ८ गुणा क्यिा जब ३६२ हुआ उस
में से चार कम किया जब ३८८ रहा फिर उसमें एक मिलाय
नब ३८६ हुआ इतने पक्ति गत नरकावास प्रथम प्रतर में हैं
अब सीमत फे ३८६ का जो अफ आया उसको तो मुग्व
कहीए और भतिम प्रतर के जो ५ नरफावास है उनको भूमि
फही उन दोनों समास ३६४ और उसका अर्द १६७ हुआ
उसका ४६ प्रतर मे गुणा फिया नव ६६५३ हुआ इतने मातों
नर्क के मिलकर पक्ति गत नरकावासद शेप ३६० ३४७
मरकापास पुष्फावर्णि है
दगण वइसय तिवण्णा ॥ सत्तसुपुढवीसु

(१३०) श्रावली निरया ॥ सेस तियासीलक्खा तिसय सियाला नवइ सहसा ॥ २२१ ॥ भावार्थ:-सातों नर्क के आवलिकागत ( पंक्तिगत) नर- कावास ९६५३ है और पुष्पावकीर्ण नरकावास ८३६०३४७ है दोनों मिलकर ८४ लाख मे. तिसहस्सुच्चा सके ।। संखमसंखिज्ज वित्थ. डायमा ॥ पणयाल लक्ख सीमं ॥ तोय लक्खं अपइटाणो ॥ २२२ ॥ भावार्थः-समस्त नरकावास ३००० योजन के उंचे हैं और विस्तार में कई संख्याते और कई असंख्याते योजन के हैं. सीमन्त नामक प्रथम नरकावास ४५ लाख योजन का लम्बा चौड़ा है और अपइठाण नामक अन्तिम नरकावास एक लाख योजन का लम्बा चोड़ा है. छसु हिटोवरि जोयण ॥ सहस्स बावन्न सढ्ढ चरिमाए ॥ पुढवीए नरय रहियं ॥ नरया सेसंमि सव्वासु ॥ २२३ ॥ भावार्थ:-पहिली छ नरक पृथ्वी में उपर नीच एक एक 1

(१३१)
पजार योजन क्षेत्र नरकावास से रहित है और अखिरी सावनी
नर्क में ५२।। हजार योजन उपर व ५२॥ हजार योजन नीच
इतना क्षेत्र नरकावास से रहित जानना शेप समस्त न पृथ्वी
में नरकावास है.
विसहस्सूणा पुढवी ॥ तिसहस गुणिएहिनियय
पयरेहि ॥ ऊणा रुवुण निय पयर ॥ भाईया
पत्थडतरय २२४॥
भावार्थ -पहिली नर्क पृथ्वी के पिंढने से दो हजार योजन'
कमी करें ( एक हजार उपरके व एकहजार नीचे के ) वाद जिस
पृथ्वी में जितने प्रतर होवे उतने प्रतर तीन हजार गुणा पृथ्वी
पिंड कमती करें तत्पश्चात् अपने २ मतरमें से एक कमती करके
( क्योंकि प्रतर से अतर एक कम होते है ) उत्तने से भागदेरे
जा अक उपलब्ध होरे उतना अतर एक प्रतर से दूसरे प्रतर
तक समझना जैसे रत्नप्रभा का पिंड १८०००० योजन का है
उन में से २००० वाट किये शेष १७८००० योजन रहे अव
उसमें ३००० योजन के तेरह प्रतर हैं अत. १३ को ३०००
गुणा किया जब ३६००० योजन हुये सो १७:००० में से
वाद किये शेष १३६००० योजन रहे अन तेरह प्रतर के विचमें
अवर वार, उसवास्ते उसको १२ से भागदिया जब ११५८३६

(१३२) योजन का अंतर रत्नप्रभा के एक प्रतर से दूसरे प्रतर के विचमें हैं. इसी भांति छ नर्क में गिनती कर लीजिये. पउणड धणु छ अंगुल ॥ रयणा ए देहमाणमु- कोसं ॥.सेसासु दुगुण दुगुणं ॥ पण धणुमय जावचरमाए ॥ २२५ ॥ भावार्थः-रत्नप्रभा में उत्कृष्ट देइमान ७धयुष्य छ अंगुल का हे, शेष नर्कमें इससे क्रमशः दुगुणा करते जाइये यावत् सा- तवीं नर्क में ५०० धनुष्य का उत्कृष्ट देहमान है. रयणाय पढम पयरे हत्थतिय देहमाण मणुप. यछप्परणं गुल सड्ढा बुढीजा तेरसे पुरणं२२६ भावार्थ:-रत्नसभा के प्रथम प्रतर में ३ हाथका उत्कृष्ट दे- हमान है फिर प्रत्येक प्रतर में दो हाथ ८|| अंगुल की वृद्धि करते जाइये यावत् १३ वें प्रतर में ७।। धनुष्य ६ अंगुल का देहमान है. जंदेह प्रमाण उविरि ॥ माए पुढवीइ अंतिमे पयरे ॥ तंचिय हिंटिम पुढवी ॥ पढमं पयरंमि बोधब्वं ।। २२७ ॥ तंचे गूणग सग पयर. ॥ भइयं * - - (१३३) बीयाइ पयर बुढिभवे ॥ तिकर तिअंगुल कर- सत ॥ अग्ला सढि गुणवीस ॥ २२८ ॥ पण घणु अंगुल वीस ॥ पनरसं घण दूणि हत्य सड्- ढाय॥ वामष्ट्रि' घणु हसड्ढा ॥ पण पुढवी पयर बुढि इमा ॥ २२६ ॥ भावार्थ:-जो दरमान उपर पीन पृथ्वी के अतिम प्रतर का पहरी देहमान नीच की नर्फ पृथ्वी के प्रथम प्रतर का ना. नना पुन गर्करादि के प्रथम प्रारमें जो देहमान मात्र उससे एककमती अपने २ प्रतरमें भाग दीजिये जो आंक उपलन्य होवे उतनी शर्करादिव पृथ्वी के दूसरे भादि प्रतर में वृद्धि होते. या दि छही नक नक अनुक्रम में जानना भर्षगर प्रथम मतर में ७॥ पाप्य छ अगुल या देउमान है उनमें तीन पय तीन अगुर मिलाइये । नीमरी नर्क के प्रथम मतर में १५॥ भनुष्य १० भगुल का दहमान है उसमे ७ हाय १६॥ अगुल प्रपर (मिग जापान के प्रथम प्रार ३१ पनुप्पका *मान उसमें पांम धनुष्य २० अगुल मिलारे पापा न फे प्रथम प्रनर में ६२॥ धनुष्य देहमान है उसमें १५ घनुप्य भार साथ मिला रही नई पदिल प्रतर १०५ पनुपका देहमानो उममें ६२॥ अनुप्प मिला पांचों पृथ्वी मी महार f (१३४); वृद्धि करना. और सातवी नर्कमें प्रतर एकही है अतः वहां प्रतर गत वृद्धि न होवे. इय साहाविय देहो ॥ उत्तर वेउविमोय तददुगु- णो ॥ दुविहोवि जहन्न कमा ॥ अंगूल असंख संखंसो ॥ २३०॥ भावार्थः-इति पूर्वोक्त प्रकार सातों नर्क में स्वभाविक देह ( भवधारणीय शरीर ) का मान कहा. उस देहमान से दुगुणा देहमान उत्तरवैक्रिय शरीर का जानना. श्रवं दो प्रकार के जघन्य देहमान भी कहते हैं भवधारणीय शरीर की जघन्य अवगाहना सातों नर्क में अंगुल के असंख्यातवें भाग की तथा उत्तर वैक्रिय की जघन्य अवगाहना सातों नर्क में अंगुल के संख्यातवें.भाग की है.. सत्तसु चउवीसमुह ॥ सग पनर दिणेग दु चउ छम्मासा ॥ उववाय चवण विरहो॥ोहे बारस मुहुत्त गुरू ॥१३१॥ लहुप्रो दुहावि समो सं- खापुण सुरसमा मुणेयव्वा ॥ संखा उ पजत्त प- पिदि ॥ तिरिनरा जंति निरएसु ॥ २३२ ॥ .. r . भावार्थ:-साता नर्क में प्राय निरतर नारकी उपजते और चवत है परतु कभी २ विरह पडे तो जपन्य एक समय का विरह पड़े और उत्कृष्ट सातो नर्क में सामान्य पणे १२ मुहूर्त का विरह पढे इसके बाद ७ में से किसी भी नर्क में कोई भी नीचे अवश्य उत्पन्न होवे अथवा चवे 'अब पृथक् २ उपपात चवन विरह काल कहते हैं-रत्न प्रमा में २४ मुहूर्त शर्करा प्रया में ७ दिन वालुका में १५ दिन, पकममा में १ मास, धूम प्रभा में दो मास, तम प्रभा में चार मास, और तमस्तमा में छ मास, उपपात चवन विरहकाल जानना नागकी के उपपात और चवन की सख्या देवता के अनुसार जानना जैसे देवता एक समय में एक, दो, तीन सख्याता और असख्याता उपजे और चवे वैसे ही नारकी के विषय में भी समझ लेना सख्याता आयुष्य वाले पर्याप्त पचेद्रि तिर्यच तथा पचेन्द्रि मनुष्य जो नरकायु वाधना है वही नर्क में जाकर उत्पन्न होता है दूसरे जीव नरकायु नहीं बाधते हैं और नर्क में नहीं उपजते है मिच्छादिट्टि महारभापरिग्गहो तिव्वकोह नि- स्मीलो ॥ नरयाउयनिबधह ॥ पावमई रुद्दपरि- पामो ॥ २३३ ॥ .

(१३६) भावार्थ:-मिथ्यात्वी, महारंभी, परिग्रही, तीव्र क्रोधी निः शील, पापरुची, और रौद्र परिणामी ऐसे जीव नरकायु बांध कर नर्क में उत्पन्न होता. है. असन्नि सरिसिव परकी ।। ससीह उरगिं स्थि जति जाठिं॥ कमसो उक्कोसेणं ॥सत्तम पुढवी माय मच्छा ।। २३४ ॥ भावार्थ:-असंज्ञी समूच्छित पंचेन्द्रि पर्याप्ता तियेच यदि नरकायु वांधे तो पहिली नर्क तक जावे. भुजपरिसर्प, गोह, नोलादिक गर्भज प्रमुख दूसरी नर्क तक उपजे, पक्षी मांसा- होरी गृद्ध, सींचाणा, समली, और नीलचास प्रमुख रौद्र अध्य व साय वाले पक्षी तीसरी नर्क तक जावे. सिंह प्रमुख हिंसक जीव चीतरा, कुत्ता, विल्ली प्रमुख चौथी नर्क तक जावे. उरपरि सर्प पांचवी नर्क तक जावे. स्त्री वेद में नरकायु बांधने वाले स्त्री रत्न प्रमुख छठी नरक तक जावे. और गर्भन पर्याप्ते, मनुष्य और मछली सांतवीं नर्क तक जावे. वाला दाढी पक्खी ।। जलयर नरगा गयाउ अकूरा ॥जंति पुणो नरएसु.॥ बाहुल्लेणं नउण नियमो ॥ २३५ ॥ -

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(१३७)
भावार्थ:-ब्याल ( सादिक) दाढ वाले - ( सिंहप्रमुख )
पक्षी (मृद्ध प्रमुख ) जलचर (मत्स्यादिक ) इन जातियों के
जीव माय. (अफसर कर । नर्क गति में से आते हैं और
अत्यत फ्रअध्यवसायसे पुन नर्क में जाते हैं यह बात बाहु
ल्यता से कही गई है मगर ऐसा ही नियम नहीं है क्योंकि उन
जाति में से कोई २ जीव शुभ अध्यवसायसे सम्यक्ल पाका
देवगति में भी जाते
दो पढमे पुढवि गमण ॥ छेवठे कीलियाइ स-
घयणे॥ इकिक पुढवि वुढी ॥ श्राइतिलेस्साउ
नरएसु ॥ २३६ ॥
भावार्थ -देवडा सघयण वाले जी पहिली दो नर्फ तक
जाने कीलिका सधपणी तीसरी तक जावे अर्ध नागच वाले
पांचवीं तक जावे, ऋषभनाराच छठी तक जाये और वज
पभनाराच सातवीं नर्क तक जारे यह उत्कृष्ट गति कही
नकों में पहिली तीन लेण्या ( कृष्ण, नील, पापान )
दुसुकाऊ तइयाए॥काऊनीलाय, नील पकाए
धूमाय नील किरहा' ॥ दुमु किराहा हुति ले-
स्सायो ॥ २३७ ॥

(१३८) भावार्थ:-पहिली दो नर्क में कापोत लेश्या है, तीसरी नक में कापोत और नील ये दो लेश्या है, चौथी नर्क में नील लेण्या है, पांचवीं में नील और कृष्ण ये दो लेश्या है, और छठी सातवीं नर्क में कृष्ण लेश्या है. सुर नारयाण तात्रो॥दव्वलेसा अवठ्ठिया भ- णिया ।। भावपरा वत्तीए ॥ पुण एसि हुंति छ लेस्सा ॥ २३८॥ भावार्थः-सुर यानि सौधर्मादिक देवलोक के देवों को तेजु, पद्म और शुक्ल ये तीन लेश्या कही और नारकी में कृष्ण, नील, कापोत ये तीन लेश्या कही सो अवस्थित यानि क्षेत्र की अपेक्षा से द्रव्य लेश्या आगम में कही है. ये लेश्या द्रव्य अव- स्थित जानना परन्तु बाह्य वर्ण रूप नहीं समझना- क्योंकि भाव के परिवर्तन से परिणाम के विपर्यास से भाव की अपेक्षा से छहों लेश्या देवता और नारकी के होती हैं. निरउ वट्टा गप्भय ॥ पजत्त संखा उलदिए ए- सिं ॥ चक्कि हरि जुअल अरिहा ॥ जिण जइ दिसि सम्म पुहवि कम्मा ॥ २३६ ॥ भावार्थ:-नर्क में से निकल कर गर्भज होवे परन्तु समू- .

. (१३६) निमन होवे, पर्याप्ता होवे पर अपर्याप्ता ने होरे, सग्याता पप की आयु पावे परन्तु युगलिया में न उत्पन्न होवे अन नारकी में निकल कर जहातक लाभ पारे सो कहते है रत्नप्रभा के निकले हुए चक्रवर्ति होवें, दूसरी में से निकले हुए वासुदव बलदेव हावे, तीसरी म से निकले हुए तीर्थकर होवें, चौथी में सं निकले हुए सामान्य केवली हो, पाचवीं में से निकले , सर्व विरति साधु हो, छठी में से निप्ले हुए देश विरति ('श्रावक ) हो, सातवीं में से निकले हुए सम्यक्त्व पावे ये उपरोक पदविया नारकी में से निकले हुए जीवों के लिय पानी सभवित है मगर सर्व नारकी जीव पावे सा नियम नहीं है रयणाए भोहि गाउन ॥ चत्तारि ग्रहु गुरु- लहु कमेण ॥ पइ पुढवि गाउ यद्ध ॥ हायड जा मत्तमि इगद्ध ॥ २४०॥ भावार्थ - रत्नप्रभा में उत्कृष्ट आधिचत्र चार गाउ और जयन्य ३॥ गाउ है, मरी में उ० ३॥ गाउ और न०३ गाउ २० २।। गाउ, चॉपी में उ० २॥ और ज०२ गाउ, पाचवीं में उ०२ ज० शा गाउ ली में 3०१॥ और ज० १ गाउ तथा सातवीं में 30 गाउ तथा नरन्प आधा गाद का (१४०) अवधिक्षेत्र हे यानि नारकी जीव अवधिज्ञान से इतना छत्र चारों और देख सकता है. इति नरक द्वार समाप्त. अवे मनुष्य द्वार कहते हुए प्रथम स्थिति और अवगाहमा द्वार कहते हैं. गप्भ नर ति पलियाऊ॥ तिगाउ उकोस तेज- हन्नणं ॥ मुच्छिम दुहावि अंत मुहु ।। अंगुल असंख भाग तणू ।। २४१ ॥, भावार्थ:-मनुष्य के दो प्रकार हैं गर्भज व समूच्छिम उन में गर्भज मनुष्य की उत्कृष्ट आयु तीन पल्यापम की व उत्कृष्ट अवगाहना तीन गाउ की है तथा उन दोनों की जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त की है तथा दोनों की जघन्य अवगाहना अंगुल के असख्यातवें भाग की है. वारस मुहुत्त गाभे ॥ इयरे चउवीस विरहउ- कोसो ॥ जम्म · मरणे सुसमभो ॥ जहरण संखा सुरसमाणा ।। २४२ ॥ भावार्थ:-गर्भज मनुष्य में जन्म आश्रयी तथा मृत्यु आश्रयी उत्कृष्ट विरहकाल बारह मुहूर्त है और समूछिम मनुष्य में . . .

१ उत्कृष्ट २४ मुहूर्त का विरहकाल है तथा जघन्य विरहकाल दोनों में एक समय का है देवों की भाति मनुष्य गति में भी एक समय में एक, दो तीन यावत् सम्ख्याता तथा असख्याना मनुष्य उपजे और मृत्यु पावे मगर गर्भज मनुष्य उत्कृष्ट काल में २६ अक पर्यंत सरयाता होरे और गर्भज तथा सच्छिम दोनों की अपेक्षा से असख्याता पर्यंत जानना. अब कौन जीव मरकर मनुष्यगति में आवे सो कहते हैं सत्तमि महि नेरइए । तेऊ वाऊ असंख नर- तिरिए । मुत्तूण सेस जीवा ॥ उप्पज्जती नर. भवमि ॥ २४३ ॥ सातवीं नर्क पृथ्वी के नारकी, तेऊकाय, वाऊसाय तथा भसरयाता आयुष्य वाले मनुष्य तिथंच (युगलिक ) इनको छोरकर शेष सर्व जीव मनुष्य गतिमें उत्पन्न हो सकते हैं । सुर नेरइएहिं चिय ।। हवति हरि रिह चकि बलदेवा ॥ चउविह सुर चकिाला ।। वेमाणिय हुति हरि अरिहा ॥ २४४ ॥ भावार्थ:-वामुखव, अरिहत, चक्रवर्ति तथा बलदव यचा- रो श्लाध्य पुरष देवता और नारकी इन दो गतिमें से ही भात - - - (१४२) हैं पर मनुष्य तियेच गतिमें से नहीं आते हैं। तथा चारी नि. काय के देवों में से निकले हुए चक्रवर्ति और बलदेव होसकते हैं. परंतु अरिहंत तथा वासुदेव तो सिर्फ वैमानिक देवगति में से निकले हुए ही होसकते हैं । हरिणो मणुस्स रयणाइ ॥ हुंति नाणुत्तरेहिं दे- वेहिं ॥ जह संभवं मुक्वात्रो ॥ हयगय एगिदि रयणाएं ॥ २४५ ॥ भावार्थ:-अब बैमानिक में जो विशेषता है सो दिखाते हैं। वासुंदव, तथा चक्रवर्ति के पांच मनुष्य रत्न, ( १ पुरो- हित, २ सेनापति, ३ गाथापति, ४ वार्धिक ( सूत्रधार-खाती), ५ स्त्री रत्न) ये छः पदवी में अनुत्तर विमान के देव नहीं उप- जते हैं। तथा हाथी व अश्व ये दो रत्न तथा सात एकेन्द्रिय रत्न (चक्र, छत्रादि ) ये चक्रवर्ति के शेष नवरत्न में यथा सभव आगति जान लेना. अव इन रत्नों के नाम व प्रमाग कहते है. वाम पमाणं चकं ॥ छत्तं दंड दुहत्थयं चम्म ।। बत्तीसंगुल खग्गो ॥ सुवएण कागिणि चउरंगु- लिया ॥ २४६ ॥ चउरंगुलो दुअंगुलापिहुलो य

(१४३)
मणी पुरोहि गय तुरया ॥ सेणावइ गाहावइ ।।
बढ़ इत्थी चक्कि रयणाइ ।। २१७ ॥
भावार्थ-चक्र छत्र और दह ये तीन रत्न वाम प्रमाण
होते हैं (दोनों हाथ दोनों तरफ पसारने से वाम होती है।
नर्म रत्न दो हाथ का होता है और खहग रत्न ३२ अगुल का
लम्बा होता है । सुवर्णमय कागिणी रत्न चार अगुल का ल.
म्बा और दो अगुल का चौदा होता है। ये सातों एन्द्रि रत्न
चक्रवर्ति के श्रात्मागुल प्रमाण जानना। और पुरोहितादिक
जो मात पन्द्रिय रत्न वे जिस काल में जितना पुरुप शरीर
का प्रमाण होता है उतन ही बड होते हैं
अय वासुदेव के ७ रत्न कहते :-
चरक धणह खग्गो॥ मणी गया तहय होह
वणमाला ॥ संखो सत्त इमाड ॥ रयणाइ वासु.
देवस्म ।। २१८।।
भावार्य -१ चत्र, • धनुष्य, ३ सग, ४ मणी, ५ गढा
६ रनमाला भार सातवां गरख ये मात रत्न वासुदेव के होते है
भय मनुष्य मरकर स्वमान से कहा ता उपन होते हैं
सब नरा चउर गई ।। जति पचसुवि पढम

(१४४) संघयणे ।।इग दुतिजा अष्टसयं ।। इगसमए जति ते सिद्धिं ॥ २४ ॥ भावार्थ:-संख्याता आयुष्य वाले मनुष्य (स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक ) वे नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवता इन चारों गति में नावें और प्रथम संघपण वाले मनुष्य मोक्ष गति में भी जा सकते हैं. एक समय में एक, दो, तीन यावत् १०८ मनुष्य सिद्ध हो सकते हैं. अब तीन वेद श्राश्रयी सिद्ध गति कहते हैं. वीसित्थि दस नपुंसग ॥ पुरिसह सयं तु एग समएणं । सिज्जइ गिहिअन्न सलिंग॥ चउदस अष्टाहिय सयंच ॥ २५० ॥ भावार्थ:-एक समय में उत्कृष्ट स्त्री वेदी २० मोक्ष में जा सके, नपुंसक वेदी १० जा सके और पुरुष वेदी एक समय में १०० मोक्ष में जासके, अन्य लिंगी तापसादिक एक समय में १० मोक्ष में जासके और स्वलिंगी ( साधु के वेष में ) एक समय में १०८ मोक्ष में जासके. गुरुलहु मज्झिम दो चउ ॥ अठ्ठसयं उड्ढहो तिरिय लोए ॥ चउ बावीसडछ सयं ॥ दुस- मुद्दे तिनि सेंसजले ।। २५१ ॥

(१४५)
.
भावार्थ'-उत्कृष्ट अवगाहना वाले यानि ५०० धनुष्य के
शरीर वाले एक समय में उत्कृष्ट दो जावं. जघन्य अवगाहना
थाले यानि दो हाथ के शरीर वाले उस्कृष्ट एक समय में चार
मोक्ष में जारे आर मध्यम अवगाहना के एक समय में उत्कृष्ट
१०८ मोक्ष में जावे उर्घलोक में एक समय में उत्कृष्ट चार
मोक्ष में जावे अपोलोक में २२ पोक्ष में जावें और तिर्यक
लोक में १०८ मोक्ष में जावें. एक समय में समुद्र में से दो
मोक्ष जावे शेप पानी नदी, द्रह आदि में से तीन मोक्ष मे जावे,
यहा उग्रलोक मेरुचूलिका और नदनवन तक जानना और
अधोलोक अधोग्राम के प्राययी जानना
अब चारों गति में से पाये हुए कितने २ मोक्ष में जाते
सो कहते हैं.
नरय तिरिया गयादस । नरदेव गईउ वीस
अहसय ।। दस रयणा सकर वालुयाउ चउ पक
भू दगयो ॥ २५२ ॥ छञ्च वणस्सइ दसतिरि ।।
तिरित्थि दस मणुय वीस नारीप्रो ।। असुराइ
चतरा दस ॥ पण तद्देवीउ पत्तेय ।। २५३ ॥ जोह
दस देवि वीस विमाणिय छसय वीस देवीयो।

(१४६)
भावार्थ:-नक गति में से निकल कर मनुष्य गति में आय
हुए एक समय में दश सीज, नियंच गति में से आये
हुए
भी
१० सीजे, मनुष्य गति में से आये हुए २० सीजे और देवगति
में से आये हुए १०८ सीजे.
रत्नप्रभा, शर्करामभा और वालुका प्रभा में से आये हुए
प्रत्येक में दस दस दस सीजे, पंकममा से आये हुए चार सीजे
धूमादिक से आये हुए सीजे नहीं. पृथ्वीकाय में से भाये
हुए
चार सीजे, वनस्पनिकाय में से आये हुए छः सीजे, तिर्यच
पंचेन्द्रि में से आये हुए दश सीजे, तिर्यच स्त्री में से आये हुए
भी दश सीज, मनुष्य नर से आये हुए १० सीजे तथा मनुष्य
स्त्री से आये हुए वीश सीजे ।
असुरादिक दश निकाय में से आये हुए दश सीजे, व्यं-
तरगति में से आये हुए भी दश सीजे, असुरकुमारादि दश
निकाय की देवी में से पाये हुए पांच सीजे वैसे ही समः
स्त व्यंतर देवीमें से आये हुए भी पांच सीजे, ये देवी का
वोल प्रत्येक में अलग २ पांच जानना । ज्योतिषी पुरुष में से
आये हुए १० सीजे, ज्योतिषी स्त्री में से आय हुए २० सीजे
वैमानिक देवम से आये हुए- १०८ सीजे, वैमानिक स्त्री में से
आये हुए २० सीजे यहां सर्वत्र एक समय जानना. सिद्ध
त्रामृत में देव, नारक, तिथंच व मनुष्य इन चारों गतिमें से

(१४७)
प्रत्येक कनिकले दशर सीजे ऐसा कहा हुआ है तत्व केवली गम्य
अन वेद प्राश्रयी सिद्धि और सिद्धगतिमें उपपात बिरहकाल कहते हैं
तह पुवे एहितो ॥ पुरिसो होऊण अट्ठ
सय ॥ २५४ ॥ सेस भगएसु ॥ दस दस सि.
ज्झति एग समएण ॥ विरहो छमास गुरुयो
लहु समओ चवण मिह नस्थि ।। २५५ ॥
भावार्थ:-पुरुषवेदी देव, मनुष्य तग तिर्यंच गति में मे
निकल कर कोई जीव पुरुष होचे, कोई स्त्री हो और कोई
नपुसफ होने, वैसेही नपुसक वेदी नारकी प्रमुख में से निकल
पर कोई नपुसक होवे, कोई स्त्री होवे और कोई पुरुप होव,
बसेही स्त्री वदी देवी प्रमुख में से निकल कर कोई स्त्री कोई
पुरुष या कोई नपुमक हो इस प्रकार नव भग (विकल्प )
हुए उनमें से पुरुप वेद मे से आये हुए पुरुप वेदी उत्कृष्ट से
एक समय में १०८ सीजे शेष ८ भग में से प्रत्येक में एक
समय में उत्कृष्ट १०० सीजे
मोक्षगति में उत्पन्न होने का उत्कृष्ट विगकाल छ मग्नेि
का है और जघन्य पिरहकाल एक समय का हे सिद्धगति में
चवन है ही नहीं उनकी स्थिति एक सिद्ध की अपेक्षासे सादि
अनन्त और. सर्व सिद्ध की अपेक्षा से अनादि अनन्त ।

(१४८)
अड सग छ पंच चउ तिन्नि दुन्नि इकोय
सिज्जमाणेसु । बत्तीसाइ सुसमया ॥ निरंतरं
अंतर उवरिं ॥ २५६ ॥वतीसी अडयालासही
बावत्तरी य वोधबा ॥ चुलसीई छण्णवह ॥
दुरहिय मछुत्तर सयं च ।। २५७ ।।
भावार्थः-आठ, सात, छ, पांच, चार, तीन, दो और एक
समय में सीजते हुए बत्तीस आदि निरन्तर सीजे इसके बाद
अन्तर पडे एक से लेकर बत्तीस पर्यंत निरन्तर सीजे तो
उत्कृष्ट आठ समय तक सीजे यानि प्रथम समय में एक दो,
तीन यावत् बत्तीस सीजे, दूसरे समय में भी एक, दो, तीन
यावत् बत्तीस सीने इस भांति लगातार आठ समय तक सीसे
मगर आठ समय के बाद एकाहि समय का अन्तर पड़े. और
जब तेत्तीस लेकर ४८ तक एक समय में सीजे तव उत्कृष्टा ७
समय तक निरन्तर सीजे इस वाद अन्तर पड़, और जव ४६
मे लेकर ६० पर्यंत एक समय में सीजे तब छ समय तक
निरन्तर सीजे बाद में अन्तर पड़े जब ६१ से ७२ पर्यंत सीज
तव पांच समय तक निरन्तर सीजे, ७३ से८४ तक एक समय
में सीजे तव चार समय तक निरंतर सीजे, ८५ से १६ तक
सीजे तब तीन समय तक निरंतर सीजे, ६७ से १०२ तक

(१४६) सीजे तवं दो सपय तक निरतर सीजे बाद में अतर पडे और जब एक समय में १०३ से १०८ तक सीज तब दूसरे समय में अतर अवश्य पड़े अत्र सिद्ध क्षेत्र की वक्तव्यता करते है पणयाल लक्ख जोयण ॥ विक्खभा सिद्ध- मिल फलिह विमला ॥ तदुवरि गजोयणते ॥ लोगंतो तत्य सिद्धठई ।। २५८ ।। भावार्थ -सर्वार्थ सिद्ध विमान ध्वना से १२ यांज उच सिद्ध शिला है वह शिद्ध शिला ४५ लाख योजन की लषी चांडी गोलाकार त अर्जुन मुवर्णमय साटिक की माफिक निर्मर इसके उपर पक योजन दगलोकात है नहापर सिद्ध की स्थि नि है यानि मिद वहांपर स्थित है मिद्ध शिला और व आलोक कवि जो पर योजन का वारी प्रदेश है उम यो- जन से उबर के ३३३, धनुष्य में मिद भगवत रोहुए प्रसि मनुप्पद्वार समाम । प्रय तिर्यग का फाते हुए प्रथम स्थिति द्वार करत ! बावीस मगति दस वास ॥ सहस गिणिति टिण (१५०) बेंदियाई सुग वारस वासुण पण दिण ॥ छम्मास तिपलिय टिइ जिहा ॥ २५६ ॥ भावार्थः-पृथ्वी कायकी उत्कृष्ट स्थिति २२ हजार वर्ष की, अपकाय की ७ हजार वर्षकी, तेस्काय की ३ दिनकी, वा- उकाय की तीन हजार वर्ष की और वनस्पति कायकी उत्कृष्ट स्थिति १० हजार वर्षकी, वेद्रिय की उ० स्थिति १२ वर्षकी तेंद्रिय की ४९ दिन की और चौरेंद्रि की उत्कृष्ट स्थिति ६ महिने की पंचेंद्रि की उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्योपम की है यह उत्कृष्ट स्थिति निरुपद्रव स्थानक में रहते हुए जानना. और जघन्य स्थिति तो इन सबकी अंतर्मुहूर्त की जानना. अब पृथ्वी कायके भेद कहते हैं। सएहाय सुद्ध वालुय ।। मणोसिला सकरायखर पुढवी ।। इग बार चउद सोलस ॥ हारस बावीस सम सहस्सा ।। २६०॥ भावार्थः -मुंहाली मिट्टी की उत्कृष्ट आयु एक वर्षकी, शुद्ध यानि गोपीचंदन आदि की १२ हजार वर्षकी, नालु की आयु १४ हजार वर्षकी, मनसील की १६ हजार वर्षकी, शर्करा, हरताल आदि की आयु १८ हजार वर्ष की, और खर पृथ्वी - - ha (१५१) मीला, पाषाण, रत्न आदि की आयु. २२ वर्ष की ये प्रमाण उत्कृष्ट आयुका समझना। गम्भ भूय जलयरोभय ।। गम्भोरग पुव कोडि उकोसा ॥ गभ चउप्पयः पक्खिसु॥ तिपलिय पलिया असखंसो ॥ २६१ ॥ भावार्थ -गर्भज भुजपरि सर्प-गोह नकुल आदिक तथा जल चर--मृत्स्यादिक ये दो प्रकारक हैं एक गर्भज उरपरि सर्प इन- की उत्कृष्ट आयु एक पूर्वकोडी पी जानना गर्भज चतुष्पद गाय, महिपी, उट, दाथी घोडे आदि की उत्कृष्ट आयु तीन पल्योपम की है गर्भन पक्षी सारस, मोर, चीडिया,' प्रमुख की उत्कृष्ट आयु पल्पोपम ये असरयात वें भागकी ही है. अय पुर्वका मान कहते है। पुवस्स उपरिमाण ॥ सय्यरि खलु वास कोडि लक्खायो । छप्पन्न च सहस्सा ।। बोधव्या वास कोडीण ॥ २६२ ।। भावार्थ:-८४ लाख वर्षका एक पूर्वाग होवे और ८४ लाख पूर्वाग का एक पूर्ण होवे दोनों का गुणा करने से एक पूर्वरे .

प्रमुख,
(१५२)
वर्षकी संख्या सीतर लाख कोडी वर्षपर छप्पन हजार कोडी वर्ष
हुई यानि एक पूर्व के ७०५६०००००००००० वर्ष होते हैं.
संम्मुच्छि पणिदि थलखयर ॥ उरग भूयग
जिट्ठ टिइ कमसो ॥ वास सहस्सा चुलसी ॥ बि-
सत्तरि तिपण्ण बायाला ॥ २६३ ॥
भावार्थ:-समूच्छिम पंचेन्द्रि " स्थलचर "-गाय, महिषी
"खेचर" पक्षी वगला प्रमुख,
"उरपरि सर्प" अजगर
प्रमुख तथा भुज परिसप्र्प-गोह नोलिया प्रमुख जो समुच्छिम
जीव हैं उनकी उत्कृष्ट आयुस्थिति अनुक्रम से ८४ हजार ७२
हजार वर्ष, ५३ हजार, और ४२ हजार वर्ष की जानना. अर्थात्
समूछिम गाय प्रमुख की उत्कृष्टायु ८४००० वर्ष, समूच्छिम
पक्षी की ७२००० वर्ष, समूच्छिम सर्प प्रमुख की ५३०००
वर्ष, समूच्छिम गोहं नकुल की ४२००० वर्ष की ये उत्कृष्टी
भवस्थिति कही।
अब तियेच की कायस्थिति कहते हैं.
एसा पुढवाईणं ॥ भवढिइ संपयंतु काय-
ठिइ ॥. चउ एगिदि सुणेया ॥ उसप्पिणीयो
असंखिज्जा ॥ २६४ ॥

(१५३) भावार्थ. यह पृथ्वीकायादिक की भवस्थिति कही अब इसी पृथ्वीफायादिक की कायस्थिति ( मृत्यु पाकर उसी काय में फिर उत्पन्न होवे सो) कहते हैं । पृथ्वी, अप, तेउ, और वायु इन चार एफेन्द्रिय में प्रत्येक में उत्कृष्ठी कायस्थिति असरयाती उत्सबिणी अवसर्पिणी प्रमाण जानना । इसका भावार्थ यह है कि पृथ्वीकाय जीव मृत्यु पा पा कर फिर पृथ्वीराय में ही उत्पम होता रहे तो अमख्याती अवसर्पिणी उत्मर्पिणी काल पर्यंत उत्कृष्टसे इसी काय में रहे। इस प्रकार अप, तेज, वाउका भी जानना । दश कोडा कोडि सागरोपम की एक अपसपि- णी और दश कोडा कोडी सागरोपम की एक उत्सर्पिणी हो ती है एवं वीश कोडाकोडी सागरोपम का एक कालचक होता है वाउ वणमि श्रणता ।। सखिज्जा वास सह- म विगलेसु ॥ पचिंदि तिरि नरेसु ॥ सत्तट्ठ भवाउ उकोसा ॥ २६५ ।। भावार्थ-वनस्पति की कायस्थिति अनती श्रयमभिणी उत्सप्पिणी की जानना । चंद्रियादिक चिरलेन्द्रि की सरपाता वर्षकी यानि प्रत्येक की उत्कृष्टमायम्थिति मख्याता सहस्त्र पर्प की है। तियंच पवेन्द्रि तथा मनुष्य पन्द्रिय की कायम्थिति सात आठ भव करे और पायें भव युगनिक हो। इन मा- - (१५४) टों भवका उत्कृष्ट कालमान तीन पल्यापम पर सात पूर्व कोडी जानना । यह उत्कृष्टीकायस्थिति कही। अब जवन्य भवस्थिति वथा कायन्धिति कहते हैं. सव्वेसिपि जहण्णा ॥ अंतमुहुत्तं भवेय काए य॥ भावार्थ:-पूर्वोक्त पृथ्वीकायादिक सर्व की जघन्य भवस्थि- ति तथा कायस्थिति अंतर्मुहृत प्रमाण जानना । यहां काय- स्थिति के प्रस्ताव में मनुष्य की भी कायस्थिति कही, किन्तु देवता, नारकी न कही, क्योंकि देवता नारकी मृत्यु पाकर पुनः देवता नारकी में उत्पन्न नहीं होते हैं अतः उनकी कायस्थिति नहीं होती है । श्रव तिथंच का अवगाहना द्वार कहते हैं. जोयण सहस महियं ॥ एगिदिय देह मुक्को- मं ॥ २६६ ॥ वि ति चरिंदि सरीरं ॥ वारस जोयण तिकोस चउकोसं ॥ जोयण सहस पणिं- दिय ॥ पोहे बुच्छ विसेसंतु ।। २६७ ॥ भावार्थ:-सामान्य रूप से एकेन्द्रिय को गरीर की उत्कृष्ट अवगाहना एक हजार योजन की जानना । बेंद्रिय शंखादिक की उत्कृष्ट अवगाहना वारह योजन की, तेइंद्रिय चींटी, मकोड़े . (१५५) जातिकं जीवों की तीन गाउकी और चारोन्द्रिय भ्रमरादिक जाति की चार गाउ की उत्कृष्ट अवगाहना जानना | पचेंद्रिय की शरीर उत्कृष्ट एक हजार योजन की जानना। ये शरीरमान ओघ से यानि मामान्य रूप से रह गये हैं। अब विशेप रूप से कहते है। अगुल असख भागो । सुहमनिगोयो श्री सख गुणवाऊ ।। तो अगणितो ग्राऊ तत्तो सुहुमा भवे पुढवी ॥ २६८ ॥ तो वायर वाउगणी श्राऊ पुढवी निगोय श्रेणुकमसो ॥ पत्तेयवण सरीर ॥ महियं जोयण सहस्सतु ॥ २६६ ॥ भावार्थ-वनस्पति के दो भेद है १ प्रत्येक २ साधारण, माधारण शन्द से निगोद अनतकाय समझना। इसका ( मून्म निगोद का ) शरीर अगुल के असग्ल्यातवें भागका है, इसम असख्यात गुण मून्म वारफाय का शरीर है, असण्यात गुणा मुत्म तेउसाय का शरीर, इस से असम्यान गुणा मूक्ष्म भपकाय या गरीर, इसमे असरयात गुणा सूक्ष्म पृथ्वीकाय का शरीर, इससे असख्यात गुणा एक गाटर बाउकाप का शरीर, इसमे असख्यात गुणा बादर अग्निकाय का शरीर, इमसे थमायात गुणा बादर अपकाय (१५८) उत्कृष्ट प्रमाण सामान्य विशेष रूप से कहा. अब जघन्य प्रमाण इन सब का (एकेंद्रिय, केंद्री, नेंद्री, चौरेंद्री, और पंचेंद्रिय तियंच का शरीर अंगुल के असंख्यातवें भाग का उपपात समय में शरीर पर्याप्ति के वक्त होता है. अव प्रसंगागत वैक्रिय अवगाहना का प्रमाण कहत हैं. बैंक्रिय शरीर वादर वाउकाय पर्याप्ता जीव तथा संख्याता आयुष्य वाला गर्भज तिर्यच पंचेंद्रिय में से भी कोईक जीव करे तो उनमें बाउकाय का जीव जघन्य उत्कृष्ट अंगुल के असं- ख्यात भाग तथा पंचेंद्रिय तियच जघन्य से उतना ही और उत्कृष्ट से नवसो योजन तक का वैक्रिय शरीर करे. इति तियेच का अवगाहना द्वार सम्पूर्ण । अब उपपात विरह और चवन विरह ये दोनों द्वार साथ में कहते हैं एकेद्रि प्रति समय उत्पन्न होत व चवते हैं इसलिये इनको य द्वार नहीं होते है अत: द्वींद्रियादिक का उप- पात व च्यवन विरहकाल कहते हैं. विरहो विगला सन्नीण जम्ममरणेसु अंत- मूहु ॥ २७३ ॥ गम्भे मुहुत्त बारस ॥ गुरुप्रो लहु समय संखसुर तुल्ला ॥ - 14 (१५६) भावार्थ:-वेंद्री, तेंद्री, व चारिन्द्रिय ये तीन विकलेंद्रिय और समूछिम पचेंद्रि तियेच इनका जन्म मरण आश्रयी विरह फाल प्रत्येक में उत्कृष्ट अतर्मुहूर्त का जानना और गर्भज तिर्यंच पचेंद्रिय का उपपात चवन विरहकाल उत्कृष्ट बार मुहूर्त का मानना और सर्वत्र जघन्य विरहकाल एक समय का जानना और ये वेंद्रियादिक एक समय में उपजे तो सख्या में देवता के समान एक, दो, तीन यावत् सरयाता असख्याता तक उपज और चवे द्रिय का कहते हैं अणुसमय मसखिज्जा ॥ एगिदिय हुतिय चवति ॥ २७४ ॥ वणकाइयो अणता ॥ इक्कि. का प्रोविज निगोयाओ ॥ निच्चमसखो भागो, श्रणत जीनो चयह एइ॥ २७५ ॥ भावार्थ -प्रति समय एकन्द्रिय जीय असरयाते उपजे और चचें परन्तु एक समय में सरयाता उपजें या चवें नही और वनस्पतिकाय के नीकले हुए जीव वनस्पतिकाय में उत्पन्न हो तो एक समय में अनते उपजें और चॉ. तथा पृथ्वीका- यादिक परम्थानक में से आकर बनस्पति में उपनें तो असख्याते उपजें।

। (१६०) अव निगोह शरीर का अर्थ कहते हैं-जो अनन जीव का एक साधारण प्रौढारिक शरीर स्तिबुकावार (पाणी के बुदबुद फ समान उसको निगाद कहते हैं वे अनंत जीव एकी साथ चासो श्वास लेते हैं, एकी साथ आहार करते हैं। असंख्यात निगोद के समुदाय को गोला कहते हैं। ऐसे असंख्यान गोले चौदह राजलोक में हैं। गोलाय असंखिज्जा॥असंख निग्गोयो हवइ गोलो ॥ इकिमि निग्गोए ।अणंत जी- वा मुणेयव्वा ॥ २७६ ॥ भावार्थ:-संसार में असंख्यात गोले हैं, एक २ गोले में भसंख्याते निगांद शरीर हैं, एक २ निगोद में अनंत २ जीव हैं, ये निगोद जीव के दो भेद हैं एक संव्यवहारी और दूसर असंव्यवहारी उनमें से जो अनादि निगोद से निकल कर पृथ्वी- काय प्रमुख में उपजे उनको संव्यवहारी जीव कहते हैं कदा- चित् वह जीव पुनः निगोद में जा उपजे तो भी वह संव्यव हारी ही कहा जाता है, और जो जीव अनादि निगोद से निकले ही नहीं है अनादिकाल से सुक्ष्म निगोद तथा बादर निगोद में ही रहते हैं उनको असंव्यवहारी कहते हैं । और जितने जीव मोक्ष में जावे उतने ही जीव निगोद से निकल कर पृथ्वीका- यादिक में आकर उत्पन्न होवे यह विशेषार्थ है।

(१६१) अयि श्रणता जीवा जेहि न पत्तो तसाइ परिणामो ॥ उप्पज्जति चयतिय ॥ पुणोवि तत्थेव तत्थेव ॥ २७७॥ भावार्थ -अनत जीव ऐसे है कि जो त्रसादिक पर्याय पाये ही नहीं है वे जीव पुनः पुन निगोद में से निकल कर निगोद में ही उत्पन्न होते है वहा के वहा ही रहते हैं। सब्बोवि किसलो खलु ॥ उगाममाणो श्रणतयो भणिो ॥ सोचेव विवहतो ॥ होइ परित्तो अपतोवा ॥ २७८ ॥ भावार्थ:-समस्त वनस्पति काय ( प्रत्येक तथा साधारण) उगते समय किसल्य रूप होती है उसको अनत काय ही नानना और किसलय घढते २ ना अतमुहूर्त के पाद कोई प्रत्येक शरीरी और कोई साधारण शरीरी होता है जया मोहोदयो तिब्बो॥ श्रन्नाणखु महाभय ।। पलव वेयपीयतु । तया एगिदिय तण ॥२७॥ भावार्थ -जर ती महोदय-विपयामिलाप, मैथुन परिणाम होने अथवा अज्ञान रूप महाभय मे जीव सचेतन का अचेतन

(१६२)
हो जावे, तथा असार अशाना बंदनीयका उदय हो नव प्रेम
परिणाम आरं संज्ञा के कारण एकेंद्रिय नाम कय जीव उपजिन
करता है.
1
अब कान जीव तियेच में जावे सा कहते हैं।
।
तिरिगसुति संखां ॥ उतिरिनराज्जादु
कप्पदेवाश्रो ॥ पज्जत्त संख गाभय ॥ बायर
भूदग परित्तेसु ॥ २८० ॥ तो सहसारंत सुरा ।।
निरया पज्जत्त संख गाभेसु ॥
भावार्थ:-एकेंद्री, केंद्री, तेंद्री, चउरिन्द्री तथा संख्याता
बपकी आयु वाल पंचेंद्री तिर्यच और संख्याता वर्षायु वाले
मनुष्य इन स्थानक वाले जीव मृत्युपाकर एकेंद्री वेंद्री, तेवी,
चरिंद्री और तिर्यंच पंचेंद्रिमें उपजें। भुवनपति, व्यंतर ज्योति-
पी यावत् सौधर्म ईशान कल्प वासी देव मृत्युपाकर पर्याप्ता
संख्याता आयु वाले गर्भज तिर्यच में उपजें तथा पर्याप्ता बादर
पृथ्वीकाय, अपकाय तथा प्रत्येक वनस्पतिकाय में भी उपजें ।
धनत्कुमार से लेकर सहस्सार पर्यत छः देवलोक के देव तथा
नारकी चवकर पर्याप्त संख्याता आयु वाले गर्भज तिर्यंच में
उपजें, शेष जाति के जीव तिर्यच में जा उपजें नहीं।

(६१६३)
। सस्त्र पणिदिय तिरिया ॥ मरिउ चउसु
विगइ सुज्जति ॥ २८१॥थावर विगला नियमा ।।
संखाउयतिरि नरेसु गच्छति ॥ विगला लभिज्ज
विरह ॥ सम्मपि न तेउवाउ चुया ॥ २८२ ।।
भावार्थ:-सख्याती आयु वाले पचेंद्रिय तिर्यंच परकर
सिर्फ एक मोक्षगति के अलावा चारोंगति में जावे और स्था-
व तथा विगलेंद्री मृत्यु पाकर पिछे सख्याते आयु वाले मनु-
प्य और तिर्यंच में उपजे परन्तु देव, 'नारकी तथा युगलिक
मनुष्य तिथंच में 'उपजे नहीं । विगलेंद्रि मरकर मनुष्य होवे
तथा सर्व सावध विरतिरूप चरित्र पारे परन्तु सीजे नहीं।
तउ और वाउ मरकर मनुष्य न होवे परन्तु कदाचिद् तियंच
पष्ट्रिय होवे तो भी सम्परत्व पावे नहीं शेष समूमि गर्भज
तिर्यंच, तथा समूच्छिम गर्भज मनुष्य तथा पृथ्वी, अप, और
वनस्पति ये मरकर मनुष्य होवे और मनुष्य होकर चारित्र पाकर
मरूदेवी माता की तरह मोक्षगति में भी जासकें।
पुढवि दग परितवणा । वायर पज्जतहुति
उलेसा ॥ गम्भय तिरिय नराण -॥ छल्लेस्सा
तिनि सेसाए ॥ २८३॥

, (१६४) भावार्थ:-बादर पर्याप्त पृथ्वीकाय, अपकाय तथा प्रत्येक वनस्पतिकाय में ४ लेश्या होवे क्योंकि भवनपति, व्यंतर, ज्यो- तिषी सौधर्म और ईशान देवलोक के देवता तेजोलश्यावंत होवे सो मरकर पृथ्वी, अप, वनस्पति में उपजे व जीव पर्याप्ता होने के बाद अंतमहत पर्यंत कुछ काल तेजुलेश्यावंत हो। अतः उनमें कृष्ण, नील, कापोत और तेजु ये चार लेश्या होवें । गर्भन तिर्यच और गर्भज मनुष्य के छः लेश्या होवे । शेष तेउ काय, वाउकाय, सूक्ष्म पृथ्वीकाय, सूक्ष्म अपकाय, साधारण अपर्याप्त वादर पृथ्वीकाय, अपर्याप्त वादर अप्पकाय, अपर्याप्त प्रत्येक वनस्पतिकाय, केंद्री, तेंद्री, चउरेंद्री, समूर्छिम पंचेंद्री तिथंच तथा समृच्छिम पंचद्री मनुष्य इन सब के कृष्ण, नील और कापोत लेश्या होवे । अंत मुहुत्तमि गए ॥ अंत महत्तंमि सेसए चेच ॥ लेसाहिं परिणयाहि ॥ जीवा वच्चंति परलोयं ॥ २८॥ तिर्यच परभव की लेश्या आने के वाद अंतर्मुहूर्त में मृत्यु पाव और देवता तथा नारकी अपनी मूल लेश्या का मुहूर्त बाकी रहे तब मृत्यु पाकर परभव में जावं वहां उत्पन्न होने के बाद मूल लेश्या अंतर्मुहूर्त तक भोगवे उन भावार्थः-मनुष्य तथा (१६५) में पर्याप्तिका अतर्मुहूर्त छोटा है और लेश्या का अंतमुहूर्त बड़ा है अत पर्याप्तावस्था में भी परभव की तेजुलेश्या सभवे अत- महत के भी असख्यात मेट होते है। तिरिनर आगामि भवे, लेस्साए अडगए सुरानि- रया,पुबभव लेस्ससेसे तमुहुत्ते मरणमिति२८५ भावार्य -तियेच तथा मनुष्य आगामी भव की लेश्या का अंतर्मुहूर्व जाने के बाद मृत्यु पात्रे देव तथा नारकी पूर्वभव की लेश्या का अतमुहूर्त बाकी रहे तब मरकर परभव में उपजे । श्रत मुहुत्त ठिइओ,॥ तिरिय नराण हवति लेस्सायो ।चरिमनिराण..पुण नव ॥ वासूणा पुन कोडीवि ॥ २८६ ॥ ।' : { - HTT भावाध' पृथ्वीकायादिर तियर्च और समूछिम तथा मर्भज मनुष्य को जो २ लेश्या होती है उनकी स्थिति अतर्मुहुत प्रमाण जानना । पृथ्वीकाय में जो लेश्या है वह 'जघन्य तथा उत्कृष्ट से अतमहत पर्यंत रहकर सज्ञा के कारण पलट कर दसरी लेश्या भी होजाती हैअितर्मुहूर्त से अधिक लेश्या नहीं वारती है इसी प्रकार भपकाय } प्रमुख तिर्यंच के तथा सम्- दिम नर्भन मनुष्य को भी जानना और अस्लिरी जोशुक्ल - है (१६६) लेश्या वह मनुष्य को नव वर्ष कम एक पूर्व कोडी पर्यत ठहरती है ( केवली आश्रयी). तिरियाणा ठिइपमुहं ।। भणिय मसेसंपि संपई वुच्छं ॥ अभिहिय दारज्झहियं ॥ चउगइ जीवाण सामन्नं ॥ २८७ ॥ भावार्थ:- -शुरू से लेकर तिर्यच की स्थिति प्रमुख समस्त आठ प्रतिद्वार सह तिर्यंच का द्वार कहा. प्रस्तुत चारगति के द्वार में कुछ वोल आगे कह आये हैं और कुछ बोल अधिक सो नहीं कहे हैं अतः चारोंगति के जीवों के सामान्यरूप से कहते हैं. ... देवा असंख नरतिरि ।। इत्थी पुवेय गम्भ नर तिरिया ॥ संखाउया तिवेया ॥ नपुंसगा नारयाईया ॥ २८८ ॥ :- भावार्थ:-देवता और असंख्यात आयुवाले युगलिक मनुष्य तिथंच उनमें स्त्री वेद तथा पुरुष वेद ये दो वेद होते हैं. संख्यात वर्ष के आयु वाले गर्भज मनुष्य तिर्यंच में तिनों वेद होर्वे तथा नारकी आदि शेष जीवों को एक नपुंसक वेद ही होवे. प्रायंगुलेण वच्छं । सरीर मुस्सेह अंगुलेण तहा ॥ नगपुढवि विमाणाई ॥ मिणसु पमाणं गुलेणंतु ॥ २ ॥ . -- . ग - . (१६७) भावार्थ:-अगुल के तीन प्रकार है एक श्रात्मागुल, दूसरा उत्से पागुल और तीसरा प्रमाणागुल उनम से आत्मागुल से वस्तु (धवलगृह, भूमिगृह, तहखाना, कूप, तालाव प्रमुख का परिणाम होवे जिस काल में जितना शरीर प्रमाण होवे उसके अनुसार घर, घट कूपादि को नापते हैं. देव प्रमुख शरीर उत्सेधागुल से नापे जाते हैं तथा पर्वत, पृथ्वी, विपानादिक का परिमाण प्रमाणागुल से किया जाता है सत्येण सुतिक्षावि ॥ छित्तु भित्तु च ज. किरन सका ॥ त परमाणु सिद्धा ।। वयति श्राइ पमाणाप ॥ २६०॥ भावार्थ -अत्यन्त तीक्ष्ण खड्गादिक से भी जिसके दो खड न हो सके तथा चिद्रादिक भेदन भी न हो सके उसको श्री क्षेवली भगवान ने परमाणु कहा है उस परमाणु को अगुल हस्तादि परिमाण में आदि कहा है परमाणु के दो भेद है..१ भून्म परमाणु २ व्यवहारिक चादर परमाणु अनता मूक्ष्म पर- माणु विखमा परिणाम से इकटे होते हैं जब एक व्यवहारिक परमाणु होता है. परमाण तसरेणू ।। रहरेणू वालअग्ग लि. क्खाय ।। जय जवो अष्ट गुणो ।। कमण उस्सेह (१६८) - । १ अंगुलयं ।। २६१ ॥ अंगुल छक्कं पायो । सादु- गुण विहत्थि सादुगुण हत्था ॥ चउहत्थं धणु दुसहस्स ॥ कोसो ते जोयणं चउरो ॥ २९२ ॥ भावार्थ:-आठ, व्यवहार परमाणु का एक त्रसरेणु, आठ त्रसरेणु का एक रथरेणु, आठ रथरेणु का एक वालाग्र, आठ वालाग्र की एक लीख, आठ लीख की एक युका, आठ युक्त का एक यव, आठ यव का एक उत्सेधांगुल होवे. छ उत्सेधां- गुल का पाद ( पैर), दो पैर का एक वेत, दो वेंत का एक हाथ, चार हाथ का एक धनुष्य, दो हजार धनुष्य का कोश और चार कोश का,एक योजन होता है. अव प्रमाणांगुल का स्वरूप कहते हैं. चउसयगुणं पमाणं ॥ गुलमुस्सेहं गुलाउ बोधब्बे ॥, उस्सेहं गुल दुगुणं ॥ वीरस्सायं गुलं भणियं ।। २६३ ॥ भावार्थ:-उत्सेधांगुल का एक प्रमाणांगुल जानना. इन प्रमाणांगुल से ऋषभदेव तथा भरत चक्रवर्ति का शरीर-१२० अंगुल उंचा था. १२०x४००=४८०००:१६५०० धनुष्य की उनकी अवगाहना थी. . . SA N २ (१६६) उत्सेधागुल का दुगुणा करने से श्री महावीर प्रभु का एक आत्मागुल होवे एसे ८४ अगुल का श्री महावीर का शरीर था ४ का दुगुणा, करने से, १६८ उत्सेंधागुल होव चोवीस मगुल का एक हाथ होता है अतः १६८ उत्सैंधागुल क ५ हाय हुए। अर्थात् ७ हाय का देहमान श्रीवीर प्रभु की या सो भव' लाख जोवायो के भेद कहते है। पुढवाइसु पत्तेय ॥ सग-वणपत्तेय णत दस चउद । विगले दुदु सुरं नारय ।। तिरि चउ चउ चउदस नरेसु ॥ २६४ ॥ भावार्थ:-पृथ्वी, भप, तेउ और वाउ इन चार के सात सात प्रत्येक वनस्पतिकाय के १० साधारण बनस्पति के १४ द्री, केंद्री, चोरेंद्री के दो दो देवता, नारकी तया तिर्यच पंचेंद्रि के चार चार तथा मनुष्य के १४ लाख जीवायोनि होने से ये सर मिलकर ४ लाख जीवायोनि हुई जिसके वर्ण, गप, रम, स्पर्श एक सरीसे होवे सो एक योनि ऐसी ४ोस प्रकार की जीवायोनि (जीवों के उत्पत्ति स्थान) है. जिस प्रकार गोचर के एक छाणे में पीछु, ऋमि, कीडे प्रमुख अनेक जीव उत्पम होवे उन सर के कुल अलग, होते हैं मगर योनि एक दी गिनी जाती (१७०) एक योनि में अनेक कुल होते हैं सो कहते हैं. एगिदिएसु पंचसु ॥ वारसगति सत्त अठ- वीसाय ॥ विगलेसु सत्त अड नव ।। जल वह चउपय उरग भुयगे ॥२६५॥ अद्धत्तेरस बारस ॥ दस दस नवगं नरामरे निरए ॥ बारस छवीस पणविस ॥ हुंति कुलकोडि लक्खाइं ॥ २६६ ॥ इगकोडि सत्त नवई ॥ लक्खा सहा कुलाण कोडीणं ॥ भावार्थः-पृथ्वी आदि ५.एकेंद्रिय के अनुक्रम से १२, ७, ३, ७, और २८ कुलकोडी है. विगलेंद्रिय के अनुक्रम से ७, ८, और ६, लाख कुलकोडी है. जलचर, खेचर, स्थलचर, उरपरि और भुज परि के अनुक्रम से. १२॥, १२, १०, १०, और ह लाख, कुलकोडी हैं. मनुष्य, देवता और नारकी के अनुक्रम से १२, २६ और २५ लाख, कुलकोडी है. ये सब मिलकर एक कोडाकोडी १७ लाख कोडी ५० हजार कोडी इतनी संख्या हुई ( १६७५००००००००००० ) कुल कोडी ८४ लाख जीवायोनि में है. अव दूसरी रीति से योनि कहते हैं। N - (१७१) 'सवुडजोणि सुरेगिदि ॥ नारया विपड विगल गाभुभया ।। २६७॥ भावार्थ:-देवता, एकेंद्री, नारकी इन की योनि ( उत्पत्ति म्यान ) सवृत्त यानि आन्छादित ढकी हुई होती है देवता देवदुण्य वस्त्र से ढकी हुइ पुष्प शग्या में उपजे, एफेंद्रिय की योनि अस्पष्ट होवे तथा नारकी ढके हुए गोख के भाति आला हैं उनमें उपजे, तीन विगलेंद्रि, समृच्छिम पचेंद्रि तिथंच तथा स- मूर्तिम पचेंद्रि मनुष्य की योनि विवृत यानि, सरोवरप्रमुख प्रगट उत्पत्तिस्थान होते है तथा गर्भन तिर्यच व गर्भन मनुष्य की योनि सवृत्त विवृत्त यानि कुछ प्रगट अप्रगट होती है.. 1, पुनः योनिभेद कहते है। अचित्त जोणि सुरनिरय ॥ मीस गाभे तिभेय सेसाण ॥ सी उसिण-निरय सुर गभ ॥ मीसत्ते उसिण सेस तिहा ।। २६८॥ भावार्थ -देव नारकी के उत्पत्ति स्थान अचित्त (निर्जी- व ) होते है गर्भन तियंव व गर्भन मनुष्य की योनि मिथ यानि कुछ सचेत व कुछ अचेत होती है। शेष सबको, तीन प्रकार की योनि ( सचेत, अचेत और मिश्र) होती है. 14 4 - (१७२) हय गम्भ संखवत्ता ।जोणी कुम्मुन्नयाइजायति।। अरिह हरि चकि रामा।। वंसी पत्ताइ सेस नरा२६६ भावार्थ:-मनुष्य की योनि वाघ अभ्यंतर तीन प्रकार की है १ शंखावर्त्त, २ कूर्मोन्नत, ३ वंसी पत्रा उनमें प्रथम जो शं- खावत योनि में गर्भ कदापि उपजे नहीं अतः उसको हतगी योनि भी कही है. ऐसी योनि चक्रवर्तिकी स्त्री रत्न की होती है. दूसरी काचवा की पीठके सहश. उन्नत यानि उंची होवे उसको कर्मोन्नत कहते है उसमें अरिहंत, चक्रवर्ति, वासुदेव बलदेव उत्पन होते हैं। तथा तीसरी बांसके पत्चे के युगल सदृश नो बंसीपत्रा योनि है उसमें शेष सामान्य मनुष्य उपजे. अव आयुष्य सम्बन्धी विशेप कहते हैं। भाउस्संबंध कालो ॥ प्रवाह कालोय अंत स- मओय ॥ अपवत्तण णपवत्तण ॥ उवक्कमणुवकम्मा भणिया ॥ ३००॥ भावार्थ:-आयुष्य बंधनकाल और आयुष्यः कर्म के उदय आने का काल इन दोनों के बीच जो अंतर पड़े उसको अवाधा काल कहते हैं. और पूर्वभव की बांधी हुइ आयु जिस समय पूर्ण होवे उसको अंतसमय कहते हैं जो आयु बहुत काल पर्यंत - बोगने योग्य । उसको अल्प कालमें वेदे यानि सो वर्षकी आयु अतर्मुहूर्त में वेदे उसको अपवर्तन कहते है जो आयु विचमें से उपक्रम वशात् तूटनावे उसे सोपर्म कहते है और जो आयु कारण मिलने पर भी तूटे नहीं उसको निरूपक्रम कहते हैं ये सातोंद्वार का अनुक्रम से विस्तार कहते हैं बधति देव नारय ॥ असख नर तिरि छ मास सेसाऊ ॥ परभवि श्राऊ सेसा ।। निरुवकम ति- भाग सेसाऊ॥३०१ । सोवकमाउया पुण ॥ सेस तिभागेहव नवम भागे । सत्तावीस इमेवा ।। अतमुहुत्त तिमेवावि ॥ ३०२॥ भावार्थ:-देवता, नारकी, असख्याती आयु वाले मनुष्य, नियंच ( युगलिक ) ये सब छ मास आयु वाकी रहे तर पर- भव की भायु वाधे शेप,सख्याती आयु वाले मनुष्य,-तियंच एकेंद्रि, विगलेंदी जो निरूपक्रम आयु वाले हैं वे अपनी आयु फा तीसरा दिस्सा बारी रहें जा निश्चय परभवकी आयु वा और सौपक्रमायु वाले एकैदि, 'विफलेंद्रि तिथंच पदी तथा मनुष्य अपनी आयुका तीसरा हिस्मा नवमा हिस्सा या सजा. वीसा हिसस्सा नाकी रहे तब अथवा अतिम भतर्मुहूर्त में अ. --

(१७६)
नव प्रथम समय में अधोलोक की विदिषि से अधोलोक
की दिशि में श्रावे और दूसरे समय में सनांडी में आवे, ती-
सर समय उर्वलोक में आ चौथ समय में उर्वलोक में उत्प.
त्ति स्थान की सीधी दिशा में आवे और पांचवे समय में विदिशि
ना उपजे यहां पांच समय लगे उनमें चार समय की वक्रगति
जानना. यहां जितने समय वक्र उतने समय अण्णाहारक जानना.
इग दुति चउ बकासु ॥ दुगाइ समएसु
परभवाहारो॥ दुग वकाइ सुसमया ॥ इग दो
तिन्निय प्रणाहारा ।। ३०५ ॥
भावार्थ:-एक दो तीन और चार समय की वक्रगति में
अनुक्रमे दो आदि समय में परभवाहार कर अर्थात् एक समय
की वक्रगति में दूसरे समय में परभवाहार करे, दो की वक्रगति
में तीसरे में परभवाहार करे, दो की वक्रगति में तीसरे में
परभवाहार करे, तीन-की वक्रगति में चोथे में परभवाहार करे,
और चार समय की वक्रगति में पांच समय में परभवाहार करे।
दो आदि वक्रागति में एक, दो तीन समय अणाहारक होवे ।
यहां बात बहुत विस्तृत है सो श्री भगवतिसूत्र की वृति से
देख लेना उसमें चार समय अणाहारक तथा पांचवें समय में
माहारक कहे हैं।
-

7
(१७७)
-.; बहुकाल वेयणिज्ज ॥ कमर्म अप्पेण जमिह
कालेण ॥ वेइज्झइ जुगवं चिय' ।। उइन्न सबै-
प्पए सग्ग ॥ ३०६ ॥ अपवचणिज्जमेयं । प्राउ
अहवाअसेस कम्मंपि, बंध समयवि वध । सिढि-
ल चिय तंजहा जोगं ।। ३०७ ।।
भावार्थ:-जो आयु अधिक काल में वेदने योग्य है उसे
थोडे काल में मात्मा के सर्व प्रदेश के अन :भाग में उदय में
लाकर समकाल में वेदे भनुभव कर निर्जरे सो आयुष्य कर्म
अपवर्तन कहा जाता है। यहां शिष्य प्रश्न करते हैं कि जिस
प्रकार कर्म वाथे उसी प्रकार वेदे नहीं, अन्य रीति से वेदे तो
फिर बधन अवधन में क्या विशेष ? 'गुरू' कहते हैं कि वध
समय में भी वैसे ही अध्यवसायादि कारण मिले हैं कि जिस
के प्रभाव से वैसा ही शियिल (टीला) बंध हुमा है जो देश
कालादिक कारण मिलने पर अवश्य थोरे काल में ही वेदे
उसे सौपक्रम, कहते हैं।
अध अनप्रवर्तक कहते हैं
ज पुण गाढ -निकायण-॥ वघेण पुनमेव
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(१७८) किल बद्धं ॥ तं होड अणपवत्तण ॥ जुग्गंकम वेयणिज्ज फलं ॥ ३०८ ॥ भावार्थ:-फिर जो आयुष्य अथवा शेष कमों का गार अत्यन्त अवश्य वेद्य निकाचित बंधन द्वारा पहले से ही निश्चय रूप से बंध हो चुका है उसको अनपवर्तन कहते हैं अत: अनु- क्रम से जिसका भोगने योग्य फल हैं उसको निरुपक्रम करते हैं. उत्तम चरम सरीरा ॥ सुरनेरड्या असंख नरतिरिया ॥ हुंति निरुवकमाओ ।। दुहावि सेसा मुणेपव्वा ॥ ३०६ ॥ भावार्थ:-उत्तम पुरुष (त्रिषष्ठि शला का पुरुष ), चरम शरीरी ( तद्भव मोनगामी) देवता, नारकी, युगलिक मनुष्य तिर्यंच ये सब निरुपमी आयु वाले हैं. शेष जीवों में कोई सोपक्रमी है. और कोई निरुपक्रमी भी हैं. झेणाउ मुक्कमिज्जइ ॥ अप्पसमुत्थेण इयर गणावि ॥ सो अन्झवसाणाई ।। उवक्कम- ऽणुवकमो इयरो ।। ३१०॥ भावार्थः आत्मा के अध्यवसाय से अथवा बाह्य कोई ।

- . (१७६) कारण से यानि विष, अग्नि, शस्त्र प्रमुख के उपक्रम से दीर्घ काल की आयु अल्पकाल में वेदे अपवर्तन हेतुफे मध्यवसाय से जो उपक्रम होवे उसको उपवर्तन सोपक्रमायु कहते हैं और इतर माने विपरीत पणे अनुपवर्तन सो अनुपक्रमायु जानना. ॥ श्रज्झवसाण: निमित्तै ।' पाहारे वेयणा पराधाए ॥ फासे आणा. पाणू ॥ सत्तविह झिज्झए अाउ ॥ ३११ ॥ भावार्थ:-सात प्रकार से आयु क्षय होता है, सो सात प्रकार कहते हैं १ अध्यवसाय-राग स्नेहमय रूप मानसिक विकल्प से या मन रहित प्राणी सझा से मृत्यु पाये. जैसे कोई स्त्री तरुण पुरुष। पर अनुरागिनी होने वाद में उस पुरप की माप्ति न होवे तो रागवेश मृत्यु पावे अथवा जिस प्रकार किसी 'सार्थवाहिनी को किसी ने कहा कि तुम्हारा पति परदेश गया था वहां मरगया ऐसा सुनकर स्नेह वश मृत्यु पागई. तथा जैसे श्रीकृष्ण को देखकर सो मील ब्राह्मण भय से मरगया इस प्रकार भय से भी मृत्यु पावे. २ निमित-दड, चाबुक, शस्त्रा दिक से मृत्यु पावे. ३ आहार-(प्रति आहार) करने से 'मृत्यु पाये ४ वेदना सघघाती शूलादिक की वेदना से भी मृत्यु पावे. ५ परापात-गदढे में गिरने से मृत्यु पावै ६ स्पर्श-सर्प । (१०) अग्नि तथा विप प्रमुख के स्पर्श से मृत्यु पावे. ७ आणापाणु श्वास उन्चार त्यूनाधिक वहने से अथवा श्वासोच्छ्वास रोकने से मृत्यु पावे, इन सात कारणों से सोपक्रमायु कमती होती हैं और निरुपक्रम जो निकाचित आयु हैं सोकमती होवे नहीं. सा आहार सरीरिंदिर ॥ पज्जत्ती बाणपाण भासमणे यारचउ पंच पंच छप्पिय ॥ इग विगला सनि सन्नीण ।। ३१२॥ भावार्थ:-आहार प्रमुख के पुद्गल ब्रहण परिणमन हेतु जो आत्मा की शक्ति विशेष उसको पर्याप्ति कहते हैं. यहां १ आहार पर्याप्ति, २ शरीर पर्याप्ति व ३ इंद्रिय पर्याप्ति (ये तीन बिच में जो पर्याप्ति शब्द गाथा में कहा है उसका कारण यह है कि कोई भी जीव अपर्याप्तावस्था में मरे तो भी ये तीन पर्याप्ति पूर्ण करने के बाद ही मरे इसलिये यहां इंद्रिय पद के साय पर्याप्ति की योजना की है),४ श्वासोश्वास पयाप्ति ५ भाषा पर्याप्ति ६ मन पर्याप्ति ये छ पर्याप्ति में से उत्पन्न होने के प्रथम समय से जिस जीव को जितनी पर्याप्ति करने की हैं वह जीव उतनी ही पर्याप्ति करने लग जावे फिर अनुक्रम से आहार, शरीर या सर्व पर्याप्ति यथायोग्यः पणे करे. आहार प्रथम समय में ही करे शेप सर्व पर्याप्ति प्रत्येक असंख्यात समय

Trelokya Deepika(sangrahni) Hindi Bhashantar

Author
Manak Muni
Title
Trelokya Deepika(sangrahni) Hindi Bhashantar
File name
Trelokya Deepika(sangrahni) Hindi Bhashantar
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/02
Publisher
Ajmer Sobhagmal Harkawat
Language
Sanskrit
Pages
179
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
549826
Barcode
99999990030675.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
0ViJ1PXnYIZ
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