Sanmati Library, Jaipur
Kanyakubjprakashika
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श्रीहरिः ॥
कान्यकुब्जप्रकाशिका*
SAGE
कवीन्द्रप्रीमुरारिदेवकृता
इटावावास्तध्येन ब्राह्मणसर्वस्वमासिक
पत्रसम्पादकेनश्रीपण्डित
भीमसेनशर्मणा
भाषार्थनोपनिषद्धा ।
JAIPUR.
जयपुर.
Printed by B. D.S. at the Bra.lim
Press Etawah.
प्रथमवार
१०००
सं० १
सन् १९१२
मूल्य :)
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अथ-कान्यकुब्ज प्रकाशित JAIPUR. ग.१२१ प्रस्ताव पाठक वर्ग। यह पुस्तक हमारे मित्र प्रचलित शास्त्री विद्यारत्नोपाधि भूषित वन्दावन धाम निवासी से हम को प्राप्त हुमा है, विक्रमीय संवत् १०१० का बना हुआ है जिसको यने ५ वर्ष बीत गये अब तक यह पुस्तक किसी छापेखाने में मुद्रित नहीं हुअा था। हमारे मित्र पं० दुर्गादत्त की की मुम्नति हुई कि इसका भाषा टीका करके तुम अपने छा- पेखाने में पायो । तथा अन्य भी जिन २ महाशयों ने देखा उन सब की यही अनुमति हुई कि पुस्तक अच्छा श्रुति स्मृति पुराणों के अनुकूने निष्पक्ष और सम्पूर्ण साह्मण जाति का उपकारी है। बात पाठक वर्ग-समस्त पुस्तकका श्रव. लोकन फरने पर खंघमेव जान लेंगे। सब ब्राह्मण जाति का उपकारी होने पर भी इसका नाम "कान्मकुटज प्रकाशिका" इस लिये रक्ला गया है कि इसमें प्रश्न द्वारा कान्यकुछ गोंके विषय में प्रारम्भ और उसी विषय पर इस की समाप्ति है। स्मरण रखना चाहिये कि इस में किसी भी नाम वाले ब्रालय वर्ग की निन्दा नहीं है किन्तु सभी नाम वाले ब्रा- लणों का गौरव गोत्र, प्रवर, वेद, शाखा, सूत्र, शिखा, पाद और प्रास्पदादि का विवेचन इत्यादि के वर्णन द्वारा इस में दिखाया है परन्तु कान्यकुब्जों की कुछ मधिमा विशेष है। बालगों के प्रास्पदों का विशेष विचार इसमें दिखाया है, इस पुस्तक के निर्माता भागरा प्रान्त में वसति ग्राम के. नि- वासी मुरलीधरोपनामक कवीन्द्र पं० मुरारि देव हैं। इन महाशय के बनाये अन्य भी कोई काव्यादि ग्रन्थ हैं। हमने भी इस पुस्तक के लेख को सब ब्राह्मण जाति का उपकारी निष्पक्ष देख समझ कर भाषा टीका करके छपाने का विचार ( = ) । किय पाठक ब्राह्मण वर्ग ! हमने यथामति लोकोपकार बुद्धि से इस पुस्तक को शुद्ध किया और भापा टीका किया है तथापि पाठकों को कहीं मूल वा टीका में कोई त्रुटि वा भूल जान पड़े तो उन महाशयों से हमारा निवेदन है कि उसे ठीक निश्चय करके शुद्ध करलें और दोपग्राही न बनकर गुगाग्राही बनने की कृपा हम पर करें। हम सब ब्रालय जातिमात्रस्थ ब्राह्मण व्यक्तियों को हाथ जोड़ के प्रणाम न- मस्कार करते हुए इस कान्यकुब्ज प्रकाशिका पुस्तकका सब ब्राह्मणों के उपकारार्थ प्रत्येक श्लोकका नागरी भाषा में अर्थ लिखना प्रारम्भ करते हैं। इस प्रकाशिका पुस्तक में छः प्रभा नामक प्रकरणा या अध्याय और २४५ दो सौ पैंतालीश श्लोक हैं। आशा की जाती है कि हमारे मान्य ऋषि मह- र्षियों के शुद्धवंशीय सन्तान ब्राह्मण महाशय इस पुस्तक को सादर ग्रहया करके हमें कृतार्थ करेंगे । ओं तत्सद्ब्रह्मार्पणमस्तु- निवेदक-भीमसेन शर्मा इटावा ।
श्रीगणेशाय नमः
अथ कान्यकुब्जप्रकाशिकारम्भः ।
प्रणम्यजगदीशानं जगदोशात्मजेनवै।
मुरारिणाऽद्य क्रियते कान्यकुठजप्रकाशिका ॥१॥
भाषार्थ-में पं० जगदीश का पुत्र मुरारि देव शिवात्मक
जगदीश को प्रणाम करके आज कान्यकुग प्रकाशिका पुस्तक
बनाता हूँ॥२॥
अथग्रन्थस्यनिर्माणे कारणन्तावदुच्यते ।
वटेश्वरेऽल्पवोधानां विवादात्मकमेवयत् ॥२॥
अब पहिले इम ग्रन्थ के बनाने का कारण कहते हैं कि
बटेश्वर क्षेत्र में मूर्ख व्रालयों का प्रापस में विवाद होना ही
इसके बनने का कारण हुभा ॥२॥
श्रीवटेश्वरसत्क्षेत्रे विततेब्रह्मवादिभिः ।
वाजपेयेमहायज्ञे मुनिभिर्ब्राह्मणोत्तमैः ॥३॥
एक समय बटेश्वर नामक उत्तम क्षेत्रमें वेदवेत्ता मुनि तथा उत्तम
विद्वान् ब्राह्मणों ने वाजपेय नामक महायज्ञ किया ॥३॥
तत्रदेशान्तरेभ्यश्च ब्राह्मणाःकर्मकोविदाः ।
तपायुक्ताश्चवेदानां यथार्थज्ञानसंयुताः ॥४॥
आहूतारिशष्यसहिता बहुमानपुरस्सरम् ।
पूजितादक्षिणाभिश्च यथाकर्मोद्भवबुधैः ॥५॥
उस में देशान्तरों से कर्मकायह के.तत्त्व को जानने वाले
तपस्वी वेदों के यथार्थजान से युक्त शिष्यों के सहित अनेक
विद्वान् ब्राह्मण बहुत मान प्रतिष्ठा के साथ बुलाये गये और
यथा योग्य दक्षिणादि के द्वारा उनका पूजन किया गया ॥४॥
(२) केचित्तत्रागताधूर्ता दम्भाऽहंकारसंयुताः। मूर्खानिरक्षराचार्याः परस्परविरोधिनः ॥६॥ उनी यज्ञ में कुछ दम्भी अहंकारी, परस्पर विरोध फैलाने वाले निरक्षरभ मूर्ख पीर धूर्त ब्राह्मण भी आये थे ॥६॥ सर्वद्विजाःकान्यकुब्जा माथुरान्मागधाविना। इतिवाक्यप्रमाणेन सर्वेऽस्मत्प्रभवाद्विजः ॥७॥ उन में से कोई बोले कि मथुरा निवासी चौवों को और मगधदेश के निवासियों को छोड़के अन्य सभी प्रालय का- न्यकुब्ज हैं इस वाक्य के प्रमाण से सभी ब्राह्मण हम कान्य. कुबूजों में से प्रकट हुए हैं ॥७॥ तानूचुःकेचनोन्मत्ताः क्रोधयुक्तास्तथाविधाः । काणश्चकुब्जकरचैव भ्रातरौद्वीवभूवतुः ॥८॥ महोदयपुरस्थौ ता-वनाहूतौगतीमखे । रामचन्द्रस्यनिन्दन्तौ जगदीशंविचेरतुः ॥९॥ निहत्यरावणंविप्र ब्रह्महत्याप्रशान्तये । करोतियज्ञरघुरा-डग्राह्य दानमस्यतु ॥ १० ॥ उन को उन्हीं जैसे क्रोधी उन्मत्त मूर्ख वा धूर्त किन्हीं अन्य ब्राह्मणों ने उत्तर दिया कि-एक काण [काना ] द्वि. तीय कुबज [ कुबड़ा ] महोदय पुर नामी गांवके रहने वाले दो ब्राह्मण भाई हुए थे वे दोनों मूर्ख बिना वुलाये भगवान् रामचन्द्रजी के यज्ञ में गये और भगवान् की निन्दा करते हुए बिचरने लगे कि -रावण ब्राह्मण को मारके ब्रह्म हत्या महा- पाप की शान्ति के लिये रघुराज रामचन्द्र यज्ञ करते हैं इससे इनका दान किसी को नहीं लेना चाहिये ॥ ८।८।१०॥ श्रुत्वाचशान्तितौतेन भूभुजादानमुत्तमम् । ताभ्यांदत्तंकाणकुब्ज कुलमेतत्तयोस्स्मृत्तम् ११ (३) वैसी निन्दा का वृत्तान्त भगवान् रामचन्द्रजी ने सुनकर उन दोनों काण और कुन ब्राह्मणों को बुलाया और नम्रता से समझा कर (रावण आततायी महा अधर्मी गो ब्राह्मणा हिंसा राक्षस या ऐसे को धर्मानुकूल संग्राम में मारना धर्म शाख के अनुकूल क्षत्रिय राजा का कर्तव्य है अनुचित नहीं) दोनों को उत्तम २ दान दिया, उन्हीं काण और कुबज दोनों भाइयों से पला वंश कान्यकुब्ज कहाया ॥११॥ पुनश्चकालयोगेन कान्यकुब्जेतिकीर्तितम् । इत्येवंकलहंचक्रुर्मूर्खाज्ञानविवर्जिताः ॥ १२ पीछे काल पाकर काण कुब्ज के स्थान में कान्यकुब्ज ऐसा नाम होगा इस प्रकार अज्ञानी मूर्ख ब्राह्मण आपस में कलह करने लगे [ अभिप्राय यह है कि सभी ब्राह्मण का. न्यकुवों से पैदा हुए तथा काने और कुबड़े दो मूर्ख ब्राह्म- गों का वंश कान्यकुवन कहाया ये दोनों ही बातें मूखों की मानी हुई शास्त्र विरुद्ध कल्पित थीं इसी से बटेश्वर के बाज पेय यज में आये हुए विद्वान ब्राह्मणों ने दोनों बातों को मू- खो का तमाशा माना था ] ॥१२॥ येचबालतपोयुक्ताः पञ्चगौडावुधोत्तमाः । यज्ञेस्थितास्तेजहसु-र्मूखंसाहसदर्शनात् ॥१३॥ और जो पंच गौड़ ब्राह्मणों में सपस्वी वेदशास्त्रविद्वा. न लोग वहां विद्यमान थे वे सब मूखों का शास्त्रार्थ देखकर हंस पड़े ॥१३॥ पुनस्तान्वोधयामासु- स्तत्त्वज्ञाबहुयुक्तिभिःो आख्योविप्रेषुसंजाता देशजाअवराइति ॥१४॥ फिर शास्त्रका मर्म जानने वाले विद्वानों ने उन मूखों को बहुतसी युक्तियों से समझाया कि ब्राह्मणों में कान्य (४) कुब्जादि नाम मिन्नर देशों में निवास करने के कारण पीछे से चले हैं इन नामों के होने से छोटाई यहाई किसी को नहीं है ॥१४॥ कान्यकुब्जःशुभोदेश-स्तत्रवासान्महात्मसु । वैदिकाख्ययुतेष्वेव देशाख्यातेपुबुध्यताम् १५ कान्यकुब्ज पुण्य देश का नाम है उस देश में निवास करने से वेद संबन्धी प्रतिष्ठा वाले दीक्षित, प्रायसय्यी [म- वस्थी ] वाजपेयी, शुक्ल, द्विवेद, इत्यादि उपाधि वाले श्रेष्ठला. ह्मणों का नाम कान्यकुब्ज हुप्रा ॥१५॥ गोत्रप्रवरशाखादि-मार्गएकरसनातनः । सएवदृश्यतेसर्व-देशस्थेषुद्विजन्मसु ॥ १६ ॥ परन्तु गोत्र, प्रवर, शाखा, इत्यादि गार्ग सनातन से हैं वही सब देशस्थ ब्राह्मणों में अब तक भी एक सा दीखता है॥१६॥ अतएत्रद्विजास्सर्व-एकएवनसंशयः। यूयंमुधाभूमंत्यक्त्वा.धर्मभजतशाश्वतम् ॥१७॥ इसी से सब ब्राह्मया ऋषि वंश होने से एकही हैं। तुम लोग व्यर्थ के भ्रम को छोड़ के सनातन से चले हुए धर्म का सेवन करो ॥ १७॥ इतिश्रुत्वागतास्तूष्णीं शठास्तेलज्जयान्त्रिताः। यज्ञपूतीबुधास्तेपि सर्वस्वस्वगृहययुः ॥१८॥ ऐसा सुनकर वे व्यर्थ झगड़ने वाले मूर्ख ब्राह्मण लज्जित होकर .चुप चाप चले गये। और यज्ञ के पूरे होने पर वे सब विद्वान् लोग भी अपने २ घर को गये ॥ १८ ॥ अथचाऽस्मत्पितुःपार्श्व-मागतोट्विजसत्तमः। वटेश्वराच्चन्द्रनाथः पप्रच्छातिथ्यपूजितः ॥१९॥ - भेदोऽयंब्राह्मणेवणे कान्यकुब्जादिकाप्रभो ॥ सृष्ट्यारम्भेह्यभूत्किंवा पश्चाज्जोतइतीर्य्यताम्२० इसके पश्चात् हमारे पिता जी के समीप बटेश्वर से चन्द्र- नाथ नामक उत्तम द्रालग पाया और अतिथि सत्कार से पूजित होने पर पिता से पूछा कि हे प्रभो! ब्राह्मया वर्ण में यद कान्यकुरजादि भेद क्या सृष्टि के प्रारम्भ से हुआ है वा पीछे से सो कृपा करके कहिये ॥ १९ । २०॥ व्यवस्थाकीदृशीशास्त्रे कनिष्ठज्येष्ठकल्पने । अथवाऽत्रप्रमाणं हि प्रबन्धपरम्परा ॥ २१ ॥ ब्राह्मणों के बड़े छोटे वा श्रेष्ठ निकृष्ट होने की व्यवस्था शास्त्र में कैसी है? अथवा इस विषय में अन्धपरम्परा ही प्रगाग है ॥ २१ ॥ इतिश्रुत्वामहोप्राज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः । पितामेकथयामास शाखवाक्यैस्समासतः ॥ २२॥ ऐसा सुनकर सर्व शाखवेत्ता महाविद्वान हमारे पिताजी ने शास्त्र के वाक्यों द्वारा संक्षेप से कान्यकुब्जादि ब्राह्मणों के भेद विषय में व्यवस्था कही ॥ २२ ॥ श्रुत्वाप्रसन्नहृदय-श्चन्द्रनाथोमहोमतिः । संक्षेपाग्रन्थकरणे प्रार्थनांचक्रआनतः ॥२३॥ बड़े बुद्धिमान चन्द्रनाथ जी उसको सुनकर प्रसन्न हुए और मन भाव से इस विषय का संक्षिप्त ग्रन्थ बनाने की प्रार्थना पिता जी से की ॥ २३ ॥ एतस्मिन्नन्तरेराजा श्रीमदर्गलवंशजः । कृष्णसिंहस्समायातो मत्पितुःशिष्यउत्तमः ॥२४॥ इसी बीच में अर्गल वंशी राजा कृष्णसिंह जो मेरे पिता
का उत्तम शिष्य था नाया ॥ २४ ॥
प्रणम्यगुरुपादौच मत्पादावपिसत्तमः ।
आज्ञप्तोगुरुणाचास्था-त्तत्समीपेकृताञ्जलिः ॥२५॥
राजा गुरु के और मेरे चरणों में प्रणाम करके गुरू की
प्राज्ञा होने पर उनके समीप हाथ बांध कर बैठा ॥२५॥
तदापुनर्नुपस्याग्रे प्रियोमंत्री विजोत्तमः ।
चन्द्रनाथोऽब्रवीत्स्वामिन्ग्रन्थसिद्धयौकिमुत्तरम् २६
तब फिर राजा के सामने पूत्रोक्त राजमन्त्री चन्द्रगाथ प्रा-
ह्मण ने कहा कि हे स्वामिन् ! ग्रन्थ बनाने के लिये जो मैंने नि-
वेदन किया था उसका क्या उत्तर प्राप देते हैं ॥ २६ ॥
श्रुत्वाप्रहस्यजनको नत्वाराज्ञाऽपियाचितः ।
ग्रन्थन्निर्मातुमाज्ञां मे दत्तवाज्येष्ठसूनवे ॥२॥
साथही राजा की भी प्रार्थना सुनकर पिताजी ने मुझ ज्येष्ठ
को इस विषय का ग्रन्थ बनाने की आजादी ॥२७॥
राजापिमन्त्रिसहितः श्रुत्वाज्ञांस्त्रगुरोर्मुखात् ।
मामर्थयत्प्रसन्नात्मा बहुमानपुररसरम् ॥२८॥
मन्त्रि सहित राणा ने भी गुरुमुख से आजा सुनकर प्रसन्न
हो बहुत प्रतिष्ठा के साथ मुझ से निवेदन किया ॥२८॥
अथचोर्गलदुर्गस्य प्रान्तेसौरोतटेशुभे ।
भगवट्ट वरचिते वसतिग्रामआत्मनः ॥ २६ ॥
संवत्सरेविक्रमस्य खंचन्द्राऽभूधरामिते।
राधाजयन्त्यांमध्यान्हे प्रारम्भोऽस्यमयाकृतः ३०
इसके अनन्तर आगरा किला के प्रान्त में शुभ यमुना तट
पर भगवद्देव के बनाये अपने वसतिग्राम में विक्रमीय संवत्
२०१० राधा जयन्ती तिथि के दिन मध्यान्ह के समय इस ग्रन्थ
के बनाने का प्रारम्भ मैंने किया ॥ २९ ॥ ३० ॥
(७)
चन्द्रनाथमहाप्राज्ञ शृणुप्रश्नाऽनुसारतः ।
पुराणवचनैर्वृद्ध-वाक्यैरपिवदाम्यहम् ॥३१॥
हे चन्द्रनाथ द्विजोत्तम ! तुम अपने प्रश्न के अनुसार सुनो
मैं पुरखों के वचनों और वृद्ध लोगों के कहे प्रमाण वाक्योंके
अवलम्ब से कहता हूं ॥ ३१ ॥
कान्यकुटजादिभेदेतु शास्त्रमस्तिनियामकम् ।
कदापिनीशङ्कनीया त्वयाचाऽन्धपरम्परा ॥३२॥
ब्रालयों के कान्यकुटजादि भेद होने में शाख ही निया.
मक, अम्ध परम्परा से कान्यकुछ नादि भेद होने की शङ्का
तुम को कदापि नहीं करनी चाहिये ॥ ३२ ॥
शाखीयवचनैःपुष्टैर्वर्णयाम्यनुपूर्वशः ।
प्रणास्तेसरलोक्तचाऽहं कान्यकुब्जशिरोमणे ॥३३॥
है कान्यकुटनों में शिरोमणि ! चन्द्रनाथ ! शास्त्रों के पुष्ट
प्रमाणों से सरलतापूर्वक तुम्हारे प्रश्नों के उत्तरों का क्रम से
वर्णन करते हैं ॥ ३३ ॥
इति श्री महामहोपाध्याय श्रीमुरलीधरोपनामक श्री
जगदीशदेवात्मजकवीन्द्रमुरारिदेवकृतायां कान्यकुठजप्रका-
शिकायामुपोद्घातवर्णानात्मिका प्रथमप्रभा ॥१॥ *
यह कान्यकुष्ज प्रकाशिका की उपोद्घात रूप प्रथम प्र-
भा पूरी हुई।
सृष्ट्यादौभगवान्विष्णुः परमात्मासनातनः ।
उत्तस्थौशयनात्तू णं स्वयंसंक्रीडनेच्छया ॥१॥
सृष्टि के प्रारम्भ में परगात्मा सनातन विष्णु भगवान्
स्वयं क्रीडर करने की इच्छा से स्वयमेत्र शीघ्रता पूर्वक शेषशय्या
से उठे ॥१॥
(८) तस्यनाभेरभूत्पदमं लोकसंस्थानलक्षणम् । तद्योतयामासहरि-र्योगमायामुपाश्रितः ॥२॥ उन नारायण की नाभि से भूमण्डल का पूर्णरुप संसार की संस्थिति का चिन्द कमलाकार हुमा (इसी को मनु आदि महर्षियों ने अयडाबार लिखा है) उस प्रयहाकार वा कमलाकार को योगमाया का प्राश्रय धाले इरिभगवान् प- रमात्मा ने अपने तेजसे दीसियुक्त किया (सी से मनु जीने सूर्य के तुल्य तेजोयुक्त रक्त अण्डे को लिखा है) ॥२॥ तस्मिजज्ञेवयन्देव स्वयंभूश्चतुराननः । तत्रैवाधिष्ठितस्तूर्णन्तपोऽतप्यतदारुणम् ॥ ३॥ उस कमलाकार अड में से चार मुखों वाले स्वयंभू ब्रह्मा जी स्वयमेव प्रकट हुये, उसी जगह ठहरे हुए ब्रह्मा जी ने शीघ्र ही घोर तप किया ॥३॥ ततोब्राह्मणतपसा संयुक्तस्यप्रजापतेः । आदौतपोमयासृष्टि-रासीत्सत्वगुणाश्रया ॥४॥ तदनन्तर ब्रह्मत्व संबन्धी तपसे संयुक्त प्रजापति ब्रह्मा से पहिले २ तपोमयी सत्वगुण युक्त सृष्टि हुई ॥ ४ ॥ मुखबोहूरुपादेभ्यो वर्णाश्चत्वारउद्गताः । एतेषांवृत्तयःशुद्धा आत्रमाश्चयथाक्रमम् ॥५॥ ब्रह्मा जी के मुख, बाहु, जंघा भौर पगों से क्रमशः चारों वर्ण हुए इन ब्राह्मणादि वर्गों की शुद्ध शास्त्रानुकून जीवि- का और ब्रह्मचर्यादि प्राश्रम क्रम से नियत हुए ॥५॥ एकाब्राह्मणजातिश्च तदासीद्विधिनाकृता । ब्राह्मेनतपसायुक्ता यन्महत्त्वरविर्यथा ॥ ६ ॥ पहिले सरम्भ में विधाता ने एक ही ब्राह्मण जाति की थी उस में पञ्च गौड़ादि कोई भेद नहीं था वह ब्रालय
जातिं ब्रह्मत्व के तप से युक्त सूर्य के तुल्य तेजस्विनी थी ॥६॥
तल्लक्षणन्तुकथितं पुराणेषुमहर्षिभिः ।
कोशेषुशृणुतनाम चन्द्रनाथमहामते ॥ ७ ॥
सी हे महामति चन्द्रनाथ! पुराणों और कोशों में महर्षियों
ने कहा उस तपोयुक्त ग्रालण जाति का लक्षय तुम सुनो ॥७॥
ब्राह्मन्तपोब्रह्मधनं सनच्चपरमन्तपः ।
ब्रह्मतेजोमहामूलं सत्तत्त्वंनेंगराकरम् ॥ ८॥
स्वस्ववेदेोक्तमार्गेण साक्षात्कारात्मकंहरेः ।
ब्राह्मणैस्सेव्यमेवैतद्-ब्राह्मतपइतीरितम् ॥ ६ ॥
ब्रह्मत्व का रक्षक बाल तप, ब्रल धन, सन, परमतप,
ब्रह्मतेज, इत्यादि नामों वाला तप ब्राह्मणापन का मूल है
और इस तप की खान वेद हैं, अपने २ वेद वा शाखा में
कहे प्रकारानुसार परि भगवान् का भाराधन ही उस तपका
स्वरूप है। ब्राह्मणों को इसी बाल तप.का अवश्य सेवन
करना शास्त्रों में कहा है ॥८॥
स्वाध्यायताशौचताच साम्यादिव्रतधारणा ।
विज्ञानानन्दसन्तुष्टि-रेवमाद्यङ्गसंयुतम् ॥१०॥
नियन से वेदाध्ययन रूप स्वाध्याय, सम्यक् शुद्धि, सम-
तादि रखने का व्रत धारण करना, विज्ञान, प्रानन्द और सं-
तोप इत्यादि उसी तप के अंग हैं ॥१०॥
शमोदमस्तपरशाचं सत्यंज्ञानंदयाश्रुतम् ।
विद्यास्तिक्यंहिविप्राणां परमन्तपउच्यते ॥११॥
शम, दम, सपः शौच, सत्य भाषण, ज्ञान, दया, वेदादि
शाखाध्यपन, विद्या, और आस्तिकता इन का . सम्यक् प-
रिशीलन करना ब्राह्मणों का परम तप है ॥११॥
(१०)
वेदमेवसदाऽभ्यस्ये-त्तपस्तप्स्यद्विजोत्तमः ।
वेदाभ्यासाहिविप्राणां परमन्तपउच्यते ॥१२॥
ब्राह्मण को चाहिये कि तप का अनुष्ठान करता हुभा
वेद का सदा ही अभ्यास करे। क्योंकि वेदाभ्यास ही ब्राह्मणों
का परमतप है ॥१२॥
इत्युक्तलक्षणतपः संश्रयोधर्मएवहि।
मुख्याब्राह्मणजातेहि मनुरित्येवमब्रवीत् ॥१३॥
इस प्रकार के लक्षण वाले तप के साथ ही ब्राह्मण जाति
का मुख्य धर्म है यही बात मनु जी ने कहीं है ॥१३॥
एवंजातिविभागाख्ये ग्रन्थेऽपिप्रतिपादितम् ।
पुराब्राह्मणजातिस्तु सनयुक्ताह्यभूत्परम् ॥१४॥
जाति विभाग नामक ग्रन्थ में भी ऐसा ही प्रतिपा-
दन किया है। पूर्वकाल में ब्राह्मण जाति सन नामक तप से
परमयुक्त होने के कारण सनाढ्य कहाती रही अर्थात् तपो
होने से ब्राह्मण जाति का द्वितीय नाम ही सनाढय
हो गया था ॥ १४ ॥
ततस्तुगोत्रप्रवर-शाखासूत्रादिसंयुत्ता।
मुनिभिःकल्पितासम्यग् व्यवहारप्रवृत्तये ॥१५॥
तदनन्तर ऋषि मुनियों ने गोत्र, प्रवर, शाखा, सूत्रादि
के साथ ब्राह्मण जाति की उपाधियां सम्यक् व्यवहार सिद्धि
के लिये चलाई ॥१५॥
यआदिपुरुषोवंशे पुरासीत्कीर्तिभाजनम् ।
कुलप्रवर्तकाचार्य-स्तनाम्नागोत्रमुच्यते ॥१६॥
जिस वंशमें जो आदि पुरुष परम कीर्ति वाला प्रतापी
सिद्ध तपस्वी ऋषि महर्षि कुल प्रवर्तक आचार्य हुआ उसके
नामसे गोत्र कहाता है ॥१६॥
(११)
तस्यमुख्यःसुतश्शुद्ध-शिशष्यावाधर्मतत्पराः ।
एकद्वित्रिचतुस्संज्ञा- स्तन्नामप्रवरंस्मृतम् ॥ १७ ॥
उस गोत्र ऋषि के मुख्य पुत्र वा धर्म परायण उसके जो
शिप्य हुए वे ही एक दो तीन वा चार प्रादि संख्या वाले
उस २ गोत्र के प्रवर कहे गये ॥१७॥
कुलप्रवर्तकाचार्यों यंचवेदमधीतवान् ।
सएषकुलवेदेोहि तत्कुलेसंप्रकीर्तितः ॥ १८ ॥
और कुम्न प्रवर्तक गोत्र ऋषिने जिस वेद को पढ़ा वही
उस कुल का बेद बहाने लगा ॥१८॥
सत्रवैप्रवराचार्य -र्याशाखानिगमस्यच ।
निजस्यैवमुदाऽधीता साशाखातत्कुलेस्मृता ।१९॥
और उस २ कुल के प्रवराचार्यों ने वेद की निस शाखा
कर पठन पाठन अपनी रुचिसे चलाया उस कुल के ब्राह्मणों
की वही शाखा कही गयी ॥१९॥
सूत्रंतुद्विविधंग्रोक्तं श्रौतस्मार्तव्यवस्थयो ।
सयोश्चलक्षणशास्त्रे प्रोक्तविःपृथक्पृथक् ॥२०॥
वेद के भङ्ग कल्प सूत्र दो प्रकार के हैं एक श्रौत द्वितीय
स्मार्त, उन द्विविध कल्पसूत्रों के लक्षण शास्त्र में विद्वानों ने
पथक २ कहे हैं ॥२०॥
केवलंश्रुतिवाक्यानां पद्धतिःौतलक्षणम् ।
स्मृतितात्पर्यसहितं तदेवस्मार्तमुच्यते ॥ २१ ॥
केवल अति वाक्यों की पद्धति क्रम से कहना श्रौत सूत्रों
का नक्षल है और स्मृतियों का तात्पर्य साथ में मिला कर
गृहकों की पद्धति का वर्शन करने वाले स्मार्स वा गृह
सूत्र कहाते हैं ॥२१॥
(१२) तानिसूत्राणिगोत्राणां संप्रोक्तानिपृथक्पृथक् । एकंधौतपरंस्मात प्रतिगोत्रमितिस्थितिः ॥२२॥ सब गोत्रों के वे सूत्र पृथक् २ माने गये हैं एक प्रीत द्वितीय स्मात वा गृह्य प्रत्येक गोत्र के दो सूत्र हैं [जैसे शुरु यजुर्वेद की माध्यन्दिनीय शाखाध्याथियों का.कातीय श्रोत सूत्र और पारस्कर गृह्यसूत्र है ] ॥२२॥ ऋग्यजुस्सामाथर्वाणां यज्ञद्वारउदाहृताः । पूर्वाद्या:क्रमशोविज्ञैर्यथावेदोद्भवस्फुटम् ॥२३॥ ऋग्वेद का पूर्वद्वार, यजुर्वेद का दक्षिण द्वार, सामवेद का पश्चिम द्वार और अथर्ववेद का उत्तर द्वार ऐसे चार घेदों के चार यज्ञ द्वार विद्वान् ऋषियोंने नियत किये हैं ॥२३॥ यायस्यवेदस्याध्येता तद्द्वाराप्रविशेन्मखे। तस्यामेवदिशिस्थित्वा स्वकार्यसाधयेदयुधः ॥२४॥ जो ऋत्विज् ब्राह्मण जिस वेद का अध्येता दो वर या में उसी.दिग्द्वारसे प्रवेश करे और उसी दिशा में स्थित रहता हुआ अपना काम करे यह प्राचीन चाल है ॥२४॥ त्रयोग्नयोहिमुख्याश्च गार्हपत्यादयश्शुभाः । प्रतिगोत्रेऽधिकारस्तु तेषांज्ञेयःपृथकपृथक् ॥२५॥ गार्हपत्य, आश्वनीय और दक्षिखाग्नि ये तीन श्रोत अग्नि मुख्य हैं। प्रत्येक गोत्र वाले ब्राह्मणों को उन तीनों अग्नियों को पृथक् स्थापन करने का अधिकार है ॥२५॥ वामदक्षिणभेदेन शिखाबन्धनमिष्यते । पादप्रक्षालनंतद्व-त्प्रतिवेदविबुद्धये ॥ २६ ॥ मध्य शिरके वाम दक्षिण भाग में दो शिखा में पहिले गांठ देवे वा दक्षिण शिखा में अथवा द्वितीय यह भी हो - समता है कि एक ही शिखा के वाम दक्षिणा दो भाग मान कर ग्रन्थि देने का भेद ब्राह्मणों में पहिले से चला हो परन्तु कई शिखा रखने की चाल प्राचीन है पंच शिखा- चार्य के पांच शिखा थीं। और मधुपर्क के समय धाम वा दं- क्षिण पाद के प्रक्षालन का भेद भी भिन्न २ वेद वाले ब्राह्म- गों में पहिले से ही भिन्न २ है ॥ २६ ॥ कुलदेवस्स्वयंब्रह्मा प्रतिगोत्रनिगद्यते । उमाकान्तरमोकान्त-मूर्तिभेदेन सिद्धये ॥२७॥ ब्राह्मण जाति के कुल देव ब्रह्माजी मुख्य पस लिये हैं कि ब्रह्माजी ने प्रारम्भमें तपोमयी सृष्टि बनायी वही तपो युक्त ब्रा- लख जाति हुई तथा [ब्राह्मणोऽपत्यं ब्राह्मयः] इस प्रकार ब्रह्मा पदसे दी ब्राह्मण पद सिद्ध होता है। वैष्णव शैव सब जातियां हो सकती हैं परन्तु ब्रह्मा जी से सनकादि वा मरीच्यादि ब्रा- हम ही हुए उन्हीं मरीच्यादि के सन्तान ब्राह्मण कहाते हैं। पद्यपि शिव जी और विष्णु भगवान् भी मूर्ति भेद से ब्राह्मण कुन के देवता होते हैं तथापि ब्राह्मणों का खत्व ब्रह्मा जी के साथ संबद्ध होने से और ब्रह्मा जी की सरस्वती देवी ब्रह्मविद्या के साथ ब्राह्मणों का विशेष सम्बन्ध होनेसे ब्रह्मा जी का.अन्ताङ्ग कुल देव होना ब्राह्मणों से निवृत्त नहीं हो सकता ॥२७॥ प्रवराणितुदेयानि ब्रह्मसूत्रेयथाकुलम् । ओंकारब्रह्मस्मृतये धारणेऽस्यप्रयोजनम् ॥२८॥ जिस कुल के ब्राह्मणों के जितने प्रवरहों उतने यज्ञोप- वीत में देने चाहिये । ओंकार सहित वेद का स्मरण दिला- ने के लिये यज्ञोपवीत धारण का प्रयोजन है अर्थात् वेदा- ध्ययन करना ब्राह्मण जाति का मुख्य काम है उसी का (१४) स्मारक चिन्ह यज्ञोपवीत ॥२८॥ पृष्ठवंशंसमारभ्य धृतंयद्विन्दतेकटिम् । एतावदुपवीतंस्यानातिनीचंनचोच्छितम् ॥२९॥ बाम कन्धे पर से पृष्ठ वंश पर होता हुमा कटि भाग तक पहुंचने वाला यज्ञोपवीत धारण करे अधिक लम्बा वा और छोटा न हो ॥२९॥ अगुल्यग्रेतुविप्राणां मध्यपर्वणिभूभुजाम् । मलपर्वणिवैश्यानां ब्रह्मसूत्रमितिःस्मृतम् ॥३०॥ यज्ञोपवीत बनाने के लिये अंगुलियों के अग्रभाग में ब्रा- ह्मण सूत के लपेटों को गिने बीच के पर्यों में क्षत्रिय गिने और तीसरे मूल पर्व में वैश्य गिने यही ब्रल सूत्र का प्रमा. या है ॥३०॥ षटकक्षीब्राह्मणीभूयो-च्चतु:कक्षीतुबाहुजः। द्विकक्षीवणिजोज्ञेय एककक्षीतुपादजः ॥३१॥ ब्राह्मण खः कांछ वाला हो, छ स्थानों में धोती के अंशों को खोंस लेना : कांक कहाती है । एक लंगोट की, दोनों पाश्र्व में धोती के दो प्रान्त, एक २ आगे पीछे और एक प्रागे संकुचित किये भाग को द्वितीय वार खोंसना इस प्रकार दो पीछे दो भागे और दो दोनों पाश्वों में छः हो गयीं । क्षत्रिय चार कांबों वाला, वैश्य दो कांगों वाला और शूद्र एक कांछ वाला हो ॥३१॥ आकेशान्तंब्राह्मणस्य ललाटान्तंमहीभुजः । कर्णान्तंचैववैश्यस्य दण्डप्रमितिरुच्यते ॥३२॥ शिखा की उंचाई तक लम्बा ब्राह्मणा ब्रलपारी का पालाश दण्ड, ललाट पर्यन्त, क्षत्रिय का वट वा खदिर जन्य दण्ड, और कर्ण पर्यन्त वैश्यता उदुम्बर जन्य दगड होना चाहिये ॥३२॥ -
की है ॥३३॥
इत्यादिव्यवहारस्तु जातिबोधायकल्पितः ।
गुणकर्मानुरूपेण बुधैःशास्त्रानुसारतः ॥३३॥
पत्यादि व्यवहार की कल्पना विद्वान् ऋषियों ने जाति
भेद जताने के लिये जातीय गुण कर्म देखकर शास्त्रानुसार
एषस्सनातनःपन्था धर्मशास्त्रेविलोक्यताम् ।
गोत्रावलीप्रभृतिषु गोत्रादीनांविवेचनम् ॥३४॥
ब्राह्मवादि वर्गों का यह पूर्वोक्त व्यवहार सनासन
मार्ग धर्मशास्त्रों में देखना चाहिये और गोत्रावली आदि
पुस्तकों में गोत्र प्रवरादि का विवेचन देखना चाहिये ॥३४॥
ग्रन्थभूयस्वभयतो मयानात्रप्रकोर्तितः ।
विस्तर:केवलंज्ञप्त्यै दिङमात्रंचप्रदर्शितम् ॥३५॥
ग्रन्थ बढ़ जाने के भय से हमने यहां नहीं कहा केवल
जता देने के लिये नमूना मात्र दिखा दिया है ॥ ३५॥
इति श्रीमहामहोपाध्याय मुरलीधरोपनामक श्रीजगदीश-
देवात्मनकवीन्द्र श्रीमुरारिदेवकृतार्या कान्यकुब्जप्रका.
शिकायां बालशजातिवेदादिश्यवस्थानियमात्मिका
द्वितीयप्रभा समाप्ता ॥ २॥x
.
यह कवीन्द्र मुरारि देव कृत कान्यकठा प्रकाशिका में
वेदादि शाख की व्यवस्था ही ब्राह्मण जातिकी नियामिका
हैस अंश को द्वितीय प्रभा समाप्त हुई।
उक्तलक्षणसम्पन्ना ब्राह्मणीजातिरुत्तमा ।
सर्ववर्णोत्तमाह्यासीद् भुक्तिमुक्तिप्रसाधिका ॥१॥
उक्त लक्षणों से युक्त उत्तम ब्राह्मण जाति भोग और
मोक्ष को सिद्ध करने वाली सत्र वर्गों में पहिलेसे उत्तम है ॥१॥
वैदिकाख्याभिरुघुष्टा बभूवचयथार्थतः ।
आख्याप्राप्तौपरंयत्नं चकाराऽव्ययसिद्धये ॥२॥
यह जाति पहिले वेद सम्बनिधनी यथार्थ उपाधियों से
पुकारी जाती थी। ब्राह्मण लोग वैदिक उपाधियां राज प्र-
बन्ध से होने वाली विद्वत्सभा से मिलने के लिये बड़ा प्रयत
किया करते थे क्योंकि इस भास्पद उपाधि के अनुसार ही
लोक में अटल मान प्रतिष्ठा हुआ करती थी ॥२॥
तत्रतुप्रथमैकासीद् ब्राह्मणतपसान्विता ।
तस्याऽवान्तरभेदैश्च नानाख्योसंयुतापुनः ॥३॥
पहिले सर्गरम्भ के पश्चात् ब्राल तप से युक्त ब्राह्मण
जाति एक ही थी, तब तुम कौन ब्रालय हो। ऐसा पूछने
की आवश्यकता नहीं होती थी । उस ब्राह्मण जाति में नाना
प्रकार के अवान्तर भेद पीछे से हुए ॥३॥
तेभेदाःकेचनोच्यन्ते मयोशास्त्रसमीक्षया।
वेदाध्ययनयज्ञादि सेवयादवमागताः ॥४॥
उन में से कुछ अवान्तर भेद शास्त्र को देखकर हम यहां
कहते हैं कि जो भेद वेदाध्ययन और यज्ञादिका अनुष्ठान
करने से प्रकट हुए हैं ॥४॥
साङ्गोपाङ्गन्तपोब्राह्म सनशब्देनलक्षितम् ॥६॥
तस्यसंसेवनाच्छु हस्सनाढयइतिकथ्यते ॥५॥
ब्रह्मत्वका उत्तेजक साङ्गोपाङ्ग तप का नाम सन है उस
तप का सम्यक् सेवन करने से शुद्ध हुए बालक सनाढय क.
'हाते हैं॥५॥
सनऊढइतिप्रोक्तया ससनोढउदाहृतः।
सनत्कुमारस्यमुनेस्संहितायाम्प्रकीर्तितम् ॥६॥
(१७)
और तप करने में जो उढ़ नाम प्राप्त हुए वे सनोट क-
हाये यह बात महर्षि सनत्कुमारकी वनाई सनत्कुमार संहि-
ता में कही है॥६॥
श्रोत्रियाश्रुतितात्पर्य-ज्ञानेनैवसुलक्षितः ।
श्रोत्रियःश्रुतितात्पर्य-ज्ञइतिस्मृतिवाक्यतः ॥७॥
इसी प्रकार श्रुतियों का तात्पर्य जानने के कारण ब्राह्म-
बों का नाम प्रोत्रिय हुमा, श्रुतितारपर्यत को श्रोत्रिय कहते
है ऐसा स्मृति में लिखा है॥७॥
यजुषांसेवनाद्विमो याजुषःपरिकीर्तितः ।
द्विजंयाजुषमभ्यर्चदितिसूत्रनिदर्शनम् ॥८॥
यजुर्वेदका विशेष अभ्यास करने से याजुष नाम हुमा,
पाल्प सूत्र में लिखा है कि याजुष ब्रालयका अच्छे प्रकार पू-
बन करे॥८॥
केवलंशुक्लयजुषा पठनाच्छु क्लइत्यपि ।
पठनातैत्तिरीयाणां तैत्तिरीयइतिस्मृताः ॥६॥
केवल शुक्ल यजुर्वेद के पढ़ने से ब्राह्मणोंका शुक्स ऐसा
नाम पड़ा, तैत्तिरीय शाला के पढ़नेवाले ब्राह्मण तैत्तिरीय
बहाये ॥
ऋग्वेदाऽध्ययनादेव बहुपश्चश्विलायनः ।
ऋग्वेदीतिप्रभृतय आसन्सूत्रेषु लोक्यताम् ॥१०॥
ऋग्वेदके पढ़ने से बहुर और आश्वलायन कंहाये, ऋ.
ग्वेदी इत्यादि कल्पसूत्रों में लिखा देखो ॥ १० ॥
सामवेदस्य पठना-च्छन्दोगः सामगायनः ।
सामगस्सामवेदीचे-त्यादयः परिकीर्तिताः ॥१९॥
सामवेदने पढ़नेसे छन्दोग, सामगायन, सामग और सा-
मवेदी इत्यादि नाम कहे जाते हैं ॥ ११ ॥
(१०) 1 अथर्ववेदाध्ययना-त्प्रोक्तआङ्गिरसोद्विजः । आथर्वणीयोऽथर्वज्ञोऽ-थर्ववेदीतिसंज्ञया ॥ १२॥ और विशेष कर मकल्प अथर्ववेद के पढ़ने से ब्रालणकी उपाधि आशिरस, प्रापर्वणीय, अथर्वज्ञ, अथर्ववेदी इत्यादि होती हैं ।। १२ ॥ वेदवयस्यचाध्येता-द्विवेदइति गद्यते । वेदत्रयज्ञःकथित-त्रिवेदो वा त्रिपाठिकः ॥१३॥ दो वेदोंको कल्प महित पढ़ने वाला ब्राह्मण द्विवेद या द्विवेदी काहाता भीर करप सहित तीन वेदका जानने वाला त्रिवेद त्रिवेदी वा त्रिपाठी कदाता है ॥ १३ ॥ त्रिवारं पठनाद्वापि त्रिवारीति निगद्यते । काण्डत्रयज्ञः काण्डी च त्रिगुणायतइत्यपि ॥१४॥ और कल्प सहित घेद को तीन बार पढ़ने से त्रिवारी कहोगया जिसका तिवारी अपभ्रंश हुआ है । वेदके कर्म उ- पासना ज्ञान तीनों कायद्यों को जानने वाले ग्राला काही वा त्रिगुणायत्त कहाने लगे ॥ १४ ॥ चतुर्णाञ्चैववेदानां ज्ञाताज्ञेयश्चतुर्द्धरः । चतुर्वेदश्चतुर्वेत्ते-त्यादयः परिकीर्तिताः ॥१५॥ चारों वेदोंको जानने वाले ग्राह्मण चतुर्द्धर, चतुर्वेद, च- तुर्वेदी, चतुर्वत्ता वा (चौवे) इत्यादि उपाधियों वाले कहेगय॥१५॥ पाठकोवैदिकोवेद-वेत्तानैगमिकस्तथा। वेदज्ञोवेदवान्वेद-पात्रोवेदनिधिःपरः ॥ १६ ॥ वेदार्थविद्वेदबुध इत्येवं बहवःस्मृताः। पुराणेषु प्रलभ्यन्ते प्रसिद्धाअपि भूतले ॥ १७ ॥ सामान्य तथा वेद भागोंके पढ़ने जानने वाले ब्राह्मणों की पाठक, वैदिक, वेदवेत्ता, नैगमिक, वेदज्ञ, वेदवान्, वेदपात्र, बेदनिधि, वेदार्थ वित्, वेदबुध, वेदतत्वज्ञ, इत्यादि वहुत उपा- धियां पुराणों में मिमाती और भूमण्डल के आर्यावर्त में भी प्रसिद्ध हैं ॥ १६ ॥ १७ ॥ एकदेशन्तुवेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुनः . योऽध्यापयति वृत्त्यर्थ-मुपाध्यायस्सउच्यते ॥१८॥ जो वेद का कोई एक अंश वा वेदके अगों को जीविका लेकर पढ़ाता है वद उपाध्याय कहाता ॥ १८ ॥ क्षीयतेपतिहोनास्त्री ह्यऽनुपाध्यायकोनृपः । भारतादिषुचेत्यस्य प्रतिष्ठामहतीक्ष्यते ॥ १६ ॥ जैसे पति से हीन स्त्री क्षीण हो जाती है वैसे जिम के पास उपाध्याय ब्राह्मण नहीं रहता वद राजा भी क्षीगा हो जाता है इस प्रकार के प्रमाण से नहाभारत में उपाध्यायकी महती प्रतिष्ठा देखी जाती है ॥ १९ ॥ नित्याग्निसेवनाद्विप्र आहिताग्निः प्रकथ्यते । अग्निहोत्र्याग्निकश्चैव होताहोतृकएवच ॥ २०॥ विधि पूर्वक अग्निको स्थापित करके जो नित्यांग्निहोत्र करता वह माहिताग्नि तथा श्रग्निहोत्री, भाग्निक, होता, होतृक भी कहाता है ॥ २० ॥ पञ्चाग्न्यादितपस्तप्स्यं-स्तपस्वीतापसस्तथा । तपश्चरस्तपःशाली तपोवानिति भण्यते ॥ २१ ॥ नित्यनैमित्तिकंकर्म ह्यनुसेवन्यथाविधिः । कर्मठीकार्मिकश्चैव कर्मीधार्मिक उच्यते ॥२२॥ पञ्चाग्नि मादिका तप करता हुआ, तपस्वी नाम तापस क- हाता, सामान्यतया तप करता हुआ तपः शाली तथा तपो- (२०) वान् कहाता है ॥ २९ ॥ नित्य नैमित्तिक कर्म का यथाविधि सेवन करता हुमा कर्मठी, कार्मिक, और धार्मिक कहता है ॥२२॥ नानायज्ञानसमारम्भन् दीक्षितःकथितोद्विजः । वाजपेयमनुष्ठाय वाजपेयीति कथ्यते ॥ २३ ॥ अनेक प्रकारके यजों का प्रारम्भ करके दीक्षा लेता था ब्राह्मल दीक्षित कहाता, और वाजपेय यज्ञका अनुष्ठान कर लेने पर वाजपेयी कहाता है ॥ २३ ॥ सोमयज्ञसमारम्भात् सोमयाजी च सोमपाः । सोमसूस्सोमक च सौमिकश्चापिकीर्त्यते॥२४॥ सोमयाग का प्रारम्भ करके सोमयाजी व सोमपी, सो- मसूः, सोमकर्ता, और सौमिक कराता है ॥ २४ ॥ यजतेयाजुलैर्मन्त्र-स्सर्वयज्ञेषु सिद्धिदः। यज्ञाङ्गभूतोयोविप्र-स्सचाध्वर्युःप्रकोर्तितः ॥२५॥ सब यज्ञोंमें सिद्धि देने वाले यजुर्वेद के मन्त्र ब्राह्मण से जोयज्ञ करता है वह यज्ञावलेप ब्राह्मण अध्वर्युकदाता ॥२५॥ ब्रह्मोद्गाताहोताध्वर्यु-श्त्वारोयज्ञवाहकाः । इतिस्मृतिप्रमाणेन चाख्यैषा प्रवरास्मृती ॥२६॥ ब्रह्मा अथर्व से, उद्गाता सामसे, होता ऋग्वेदसे और अध्वर्यु यजुर्वेद से यज्ञ करने वाला कहता है ये ब्रह्मादि चारों या को मिलकर पूरा करते हैं । स्मृति के प्रमाण से ब्रह्मादि उ- पाधि श्रेष्ठ मानी गई है ॥२६.॥ सामाध्वर्युर्ऋगध्वर्यु-स्थर्वाध्वर्युरेवच । शुक्लाध्वर्युस्तथाकृष्णा- ध्वर्युरध्वर्युभेदतः ॥२०॥ सामाध्वर्यु उसे कहते हैं जो सामवेद और यजुर्वेद दोनों के विधानसे यज्ञको जानता हो, जोग यजु दोनोंके विधान
( २१)
।
से या करासके वह ऋगध्वर्य, जो अपर्व तथा यजद इन दोनों
के विधान से यज को बरमके वह अथर्वाचई के कोनो नमेर
शुक्ल यजुसे यज्ञविधि करे वह शुक्लाध्वर्यु और जो कृष्ण
से करे वह कबाध्वर्यु कहाता है ये यजु के दो भेद होने से
दो प्रकार के अध्वर्यु हैं ॥ २७ ॥
याज्ञिकाऽवसथी याज्ञ-स्स्नातकःक्रतुकोमखी।
मखयाजीनौतिकश्च स्मार्त्तपाण्डेयमित्रकाः॥२८॥
माध्यन्दिनीयःकातीयः कठकःशाकलीयकः ।
मौद्गलीयःकौथुमोयो गोभिलीयोहिरण्यकः ॥२६॥
इत्यादिवहवोभेदा-श्शाखासूत्रसमाश्रयात् ।
जाताजिज्ञासुभिरिति चरणव्यूहईक्ष्यताम् ॥३०॥
शाखा और कल्प सूत्रों के मित्र विधानों से यज्ञ करने
वाले ब्रामखोंके याजिक, भावसथी, यान, स्नातक, क्रतुक, मखी,
मलयाजी, श्रीतिक, स्मातं, मित्रक, माध्यन्दिनीय, कातीय,
कठक, शाकलीपक, मौद्गलीप, कौथुमीय, गौमिलीय, हिरण्यक
मा हिरण्यकेशीय, इत्यादि बहुत उपाधि हुई हैं जिनका व्या-
रूयान निजामु लोगों को चरण व्यूह-ग्रन्थ में देखना चाहिये
अन्योपाख्यातयस्तेषां विद्याबहुगुणात्रयात् ।
समुद्भूताद्विजोग्यषु विख्यातास्सन्तिभूतले ॥३१॥
विद्या और अनेक गुणों के कारण बालों को-अन्यभी
अनेक उपाख्यातियां हुई हैं जो भूमण्डल के मि २..प्रान्तों
में प्रचलित हैं सब उपाधियों को अब नहीं जानते ॥ ३१ ॥
तभेदाचप्रकथयन्ते संक्षेपादेवकेचन ।
विद्यारत्नस्तत्वनिधि-वैदान्तीतार्किकस्तथा ॥३२॥
तर्कपञ्चाननस्तर्को तर्कालङ्कारएवषः।
॥ २८ ॥ २६॥३०॥
( २२ ) शाब्दिकश्शव्दवेत्ताच वैयाकरणकेशरी ॥ ३३ ॥ कविराशुकविःकाव्य-कत्त कर्ताकाव्यकलानिधिः । कवीन्द्रःकाव्यसिन्धुश्च कविराट्काव्यसागरः ॥३४॥ शास्त्रीभहोभहभहो विद्यासागरउद्भवतः । चक्रवर्तीसार्वभौमो विद्यावागोश एक्वा ॥३॥ महामहाद्युपाध्याय- वण्डोपाध्याय ईश्वरः । घटिकाशतकोवारमो विद्यानिधिरपिस्मृतः॥३३॥ इत्येवंवैदिकाआख्या--रसभेदा:कथितामया । संक्षेपादेवशास्त्रोक्त्या कान्यकुटजशिरोमणे ॥३४॥ इति श्री महामहोपाध्याय मुरलीधरोपनामक श्री- जगदीशदेवात्म-करीन्द्रीमुरारिदेवकृता- याङ्कान्यकुब्जप्रकाशिकायां ब्राह्मण जातो मलग्नवैदिकाख्यासूचना- त्मिका तृतीय प्रभा ॥३॥* ॥ उन उपाधियों के संक्षेप से कुछ थोड़े भेदोंको हम कहते हैं-विद्यारत्न, तत्त्वनिधि, वेदान्ती, नार्किक, तर्कपञ्चानन, तर्का- लङ्कार, शाब्दिक, शब्दवेत्ता, वैयाकरण केशरी, कवि, पाशु- कषि, काव्यकर्ता, काव्यकलानिधि, कवीन्द्र, काव्यसिन्धु, क- विराज, काव्यसागर, शास्त्री, भह, भदृभह, विद्यासागर, उद्- भट, चक्रवर्ती, मार्वभौम, विद्यावागीश, महामहोपाध्याय, च- गडोपाध्याय, ईश्वर, घटिकाशतक, वाग्मी, विद्यानिधि, हे का. त्य कुबज शिरोमणि चन्द्रनाथ ! शास्त्रप्रमाणानुमार पूर्वोक्त उपाधियां भेदों सहित संक्षेप से हमने कही है इनका विस्तार अन्यभी बहुत साहित्याचार्यादि हो सकता है ॥ ३२ । ३३ । ३४ । ३५ ३६ ॥ ३७॥ यह मुरारिदेव कृत काम्यकुब्नप्रकाशिका में वैदिक उपा- धियों की सूचनारूप तीसरी प्रभा समाप्त हुई ।
(२३)
अथ वैदेशजख्याति-संयुक्तासीत्ततः परम् ।
यथाचब्राह्मणज्ञाति-स्तथासाऽद्यप्रकाश्यते ॥१॥
इसके अनन्तर ब्राह्मण जाति के साथ देशके वाचन शब्दों
से बनी उपाधियों का सम्बन्ध हुआ अर्थात् अनि प्राचीनकाल
में तपोधनादि ब्राह्मणों की उपाधियां हुई तदनन्तर द्विती.
य काल में श्रोत्रिय अग्निहोत्री प्राहिताग्नि मादि वेद और
यज्ञों के प्रचार से बालों के उपनाम हुए और सब से
पीछे देशोंके नाममे मालगोंके पञ्चगौड़ तथा कान्यकुब्जादि
नाम पड़े उन देशोगाधियों को उमभकारया प्रकाश करते हैं ॥१॥
स्वायम्भुवोमनुश्चासी त्तत्पुत्रश्चप्रियव्रतः ।
ताभ्यांकृतादेशसीमा व्यवहारप्रवृत्तये ॥२॥
सृष्टि के प्रारम्भ में परिले स्वायम्भुव मनुनी हुए और
उनके
पुत्र प्रियव्रत हुए सम दोनों ने व्यवहार चलने के लिये
देशोंकी मोमा नियतकी ॥२॥
देशकालानुरोधेन प्रेक्ष्यतत्त्ववलाऽवलम् ।
ब्रह्मविद्यादिलाभाय मुख्यंदेशप्रयोजनम् ॥ ३॥
देशकाल के अनुरोध में भूमिके शुद्धाशों का बजावान दे-
खकर ब्रह्मविद्यादि लाभ करने के लिये देश विभाग का प्र-
योजन माना गया ॥३॥
तत्तद्देशगतेष्वेव ब्राह्मणेषुसनात्मसु ।
याआख्यादेशजाख्याताः सन्तितारूढिमागता:४।
उस २ देश में जाकर निवास करने से सन नामक तपसे
से युक्त ब्रालयों में जो २ देश के नाम चले वे पीछे से रुटि
रोगये ॥४॥
आख्याहिदेशसंयोगा-दितिजैमिनिनास्फुटम्
मीमांसाशाखउक्तंच पुराणेष्वपि दृश्यते ॥ ५ ॥
( २४ )
देशके संयोगले नाम पड़ते हैं यह बात मीमांमा भास्त्र
में जैमिनि आचार्यने स्पष्ट कदी और पुराणों में भी दीखती है।
सारस्वताः कान्यकुब्जा गौडामैथिलकोत्कलाः ।
पञ्चगौडाइतिख्याता विन्ध्योत्तरनिवासिनः ॥६॥
सारस्वत, कान्यकुवज, गौड़, मैथिल और उत्कल ये पांच
बिन्ध्याचलसे उत्तर देशमें निवास करने वाले पञ्चगौड काये ॥६॥
कर्णाटकामहाराष्ट्रा-स्तैलङ्गाद्राविडास्तथा ।
गुर्जराश्चैवपञ्चैते द्राविडाविन्ध्यदक्षिणे ॥७॥
कर्णाटक, महाराष्ट्र, तैलङ्ग, द्रविड़, और गुर्जर ये पांच
विन्ध्याचल से दक्षिण प्रान्तोंके निवास करने वाले पञ्चद्रा-
विड़ वाहाये ॥७॥
ग्रन्थेजातिविभागांख्ये विशेपश्चाऽत्रसूचितः।
चन्द्रनाथमहायुद्धे त्वयासोपिविबुध्यताम् ॥८॥
हे महामति ! चन्द्रनाथ ! जाति विभाग नामक ग्रन्थ में
इस विषयं का विशेष विचार किया है को भी तुम सुनो ॥८
सृष्टयारम्भे ब्राह्मणानां जातिरेकाप्रकीर्तिता।
ब्राह्मणतपसायुक्ता देशभेदाद्विधाह्यभूत् ॥९
गौडद्राविडभेदाभ्या-न्ताभ्यांभेदादशस्मृताः ।
चतुरशीतिभेदाश्च दिग्भेदेभ्योऽभवन्पुनः ॥१०॥
सृष्टिके आरम्भ में ब्रह्मरबके तपसे युक्त ब्राह्मणोंकी एक
ही जाति थी वह देश भेद से पहिले दो प्रकार की हुई एक
गौड़ द्वितीय द्रविड़, उन दोके पांच २ करके पीछे दश भेद
हुए, उसके पश्चात् दिशाओं के भेद से ब्राह्मणों के ४ चौरा-
सी भेद हुए ॥ । १०॥
तेभ्योऽवान्तरभेदाश्च बहवोदेशवासतः ।
ग्रामवासादप्यभूवं-स्तेख्यात्तास्सन्तिभूतले ॥१९॥
(२५) .
देशवास के कारण उन चौरासी से भागे और भी बहुत
अवान्तर भेद हुए, तथा भिन्न २ ग्राम नगरों के नाम से भी
ब्राह्मणोंके अनेक नाम हुए जो भूमण्डल में विख्यात हैं ॥१९॥
मयातुकोन्यकुब्जाख्या त्वन्मुदेप्रोच्यतेऽधुना ।
कान्यकुब्जस्यदेशस्य प्रमोणंतावदाकल ॥ १२ ॥
उन सबका विचार छोड़के हे चन्द्रनाथ ? तुम्हारी प्रस.
बता के लिये हम कान्यकुबज नाम पर संप्रति विचार दि.
खाते हैं सो तुम पहिले कान्यकुवा देशका प्रमाण सुनो ॥१२॥
शृङ्गिणस्थलमोरभ्य दालभ्यौकोन्तलायतः ।
कोशलादृक्षिणेदेशः कान्यकुब्जस्सनाकरः ॥१३॥
शृङ्गिस्थल नाम शृङ्गी रामपुर से दाल्भ्य ऋषि के मा-
श्रम पर्यन्त [ यह पाश्रम कहीं पूर्व में होने का अनुमान है ]
लम्या, कोशल देश नाम अयोध्यापुरी से दक्षिण में ब्राह्म
सनात्मक तप की खान कान्यकुब्ज देश कहाता है। यद्यपि
कानपुर, फतेपुर फर्रुखाबाद इटावादि अन्य जिलों में भी
कान्यकुटा ब्राह्मयों का निवास दीखता है तथापि लखनऊ
वारावंकी तनात रायबरेली हरदोई शाहजहांपुर आदि न-
गरों में अब भी अधिक निवास है संभव है कि ममीप २
नगर कानपुरादि में पीछे से फैल गये दो चा क्रमशः गंगाजी
उत्तर की अधिक हट गयीं हों ] ॥१३॥
अत्रापिप्रोच्यतेकिच्चिं-त्तोत्पर्य्य तनिशामय ।
अस्मद्विपूर्वकालीनं यत्पुराणेषु पठ्यते ॥ १४ ॥
इस अंश पर भी कुछ और अभिप्राय पाहते हैं सो हे
चन्द्रनाथ ! तुम सुनी गो वृत्तान्त हम लोगोंके होने से पहिले
ही पुराणों में पढ़ा गया है ॥ १४ ॥
आर्यावर्तकभागस्य जान्हव्युत्तरवर्तिनः।
पञ्चालसंज्ञासीत्पूर्व कान्यकुब्जेत्यतःपरम् ॥१५॥
( २६ ) आर्यावर्त देश का एक भाग जो गंगा जी से उत्तर में है उसको पहिले पञ्चाल संजा पी पीछे मी पञ्चास देश का नाम कान्याउन देश हुभा ॥ १५ ॥ पञ्चालसंज्ञाहेतुश्च तत्रतावन्निगयते । श्रीभागवतमाश्रित्य चान्द्रीयनृपयोगतः ॥ १६ ॥ पञ्चाल देश की संज्ञा होनेका हेतु भी हम करते हैं श्री मद्भागवत में कहे चन्द्रवंशी राजाओं के योग से इस देश का पञ्चाल माम हुमा है ॥ १६ ॥ आसीच्चन्द्रान्वयेराजा पूरुःपरमधार्मिकः । जनमेजयआसीत्त-त्मचिन्वांस्तत्सुतस्ततः ॥१॥ प्रत्रीरोथनमस्युर्वै तस्माच्चारुपदोऽभवत् । तस्यसुद्युरभूत्पुत्र-स्तस्माद्वहुगमस्ततः ॥ १८ ॥ संयातिस्तस्याऽहंयाती रौद्राश्वस्तत्सुतःस्मृतः । ऋतेयुस्तस्यपुत्रोऽभू-द्वीरःपरमधार्मिकः ॥ १९ ॥ ऋतेयोरन्तिभारोऽभू-त्तत्सुतस्सुमतिस्स्मृतः । पुत्रोऽभूत्सुमतेरैभ्यो दुष्यन्तस्तटसुतोमतः ॥२०॥ दुष्यन्तामृगयांयातः कण्वाश्रमपदंगतः । तत्रासीनां स्वप्रभया मण्डयन्तीरमामिव ॥२१॥ विलोक्यसद्योमुमुहे देवमायामिवस्त्रियम् । पप्रच्छ कामसन्तप्तः प्रहसन्शलक्ष्णयागिरा ॥२२॥ कात्वंकमलपत्राक्षि कस्यासिहृदयङ्गमे । किंवाचिकीर्षितत्वत्र भवत्यानिर्जनेवने ॥२३॥ व्यक्तंराजन्यतनयां वेदम्यहंत्वांसुमध्यमे । नहिचेत:पौरवाणा-मधर्मेरमतेक्वचित् ॥ २४ ॥ चन्द्रवंशी राजाओं में परमधार्मिक राजा पूरु हुआ उस
(२७)
का पुत्र जनमेजय, जनमेजय का प्रचिन्धान, उनका प्रबीर,
प्रवीरका नमस्यु, नमत्युका चारुपद, उसका सुद्य, सुधमा बहुगन
उमसे संयाति संयतिका अहंयाति उमका सैद्राव, रौद्राश्वका
ऋतेयु परम धर्मात्मावीर पुत्र हुमा ऋतेयुग्ने रन्तिभार उसे सु-
मति, सुमति से रैभ्य हुआ।रैभ्यका पुत्र राजा दुष्यन्त हुभावह
दुग्यन्त वनमें शिकार खेलने को गया हुमा कराव महर्षि के
माश्रम पर पहुंचा वहां लक्ष्मीके तुल्य शोभित बैठी हुई रूप
यौवन वती देवमाया के तुल्य कन्या को देखकर राजा शीघ्र
मोहित हो गया। कामसे संतप्त होकर राजाने हंसते हुए
न्या से कोमल वासी द्वारा पूछा कि हे कमलनयनी ! तुम
कौन हो किन की हो इस मिर्जन बनमें तुम पपा करना चा-
इती हो? हे सुश्रोणि ! मैं जानता हूं कि तुम किसी रानाक्षी
कन्या हौ पौरय वंशके राजाओंका चित्त कभी अधर्म पर नहीं
जाता और मेरा चित्त तुम पर गया तो अनुमान है कि तुम
राजकन्या हो ॥१७॥-२४ ॥
शकुन्तलोवाच ।
विश्वामित्रात्मजैवाहं त्यक्तामेनकयावने।
वेदैतद्भगवान्कण्वो वीरकिंकरवोणिते ॥ २५ ॥
तब शकुन्तला बोली कि मैं महर्षि विश्वामित्रसे पैदा हुई
हूं मेरी माता मेनका अप्सराने मुझे बन में छोड़ दिया था इस
बातको भगवान् कान ऋषि जानते हैं उन्हीं ने मेरा पालन
पोषण किया है हे वीर ! भाप कहिये मैं भापका क्या मा.
तिथ्य करूं ॥२५॥
श्रुत्वाहृष्टायथाधर्म-मुपयेमेशकुन्तलाम् ।
गान्धर्वविधिनाराजा देशकालविधानवित् ॥२६॥
अमोघवी?राजर्षि-महिण्यांवीर्यमादधे ।
श्वोभूतेस्वपुरयातः कालेसाऽसूतचात्मजम् ॥२०॥
(२८) ऐसा सुनकर राजा प्रमन्न हुआ और देश काम्न का वि. धान मानते हुए राजाने शकुन्तला को प्रसन्नता देवकर उप के साथ गान्धर्व विना कर लिया राशर्षि दुष्यन्त के प्रमो. घ वीर्य होने से शकुन्तला गर्भवती हो गयी अगले दिन राजा अपने नगर को गया दश महिने भकुन्तला के पुत्र हुमा ॥ २६ । २७॥ भरतानामतेजस्वी सचाऽभूत्पृथिवीपतिः । वितथस्तस्यपुत्राभू-द्यादेवैःपालितामुदा ॥२८॥ वितथस्यसुतोमन्यु-वृहत्क्षत्रस्तदात्मजः । वृहत्क्षत्रस्यपुत्रोऽभू-द्धस्तीयद्वंस्तिनापुरम् ॥२६॥ उसका नाम भरत हुभा दुप्यन्त के अनन्तर वही तेजस्वी रामा हुमा जिस के नाम से भारतवर्ष धिरुपात है भरतका पुत्र वितथ हुशा शिसका सहर्घ देवताओं ने पालन किया वितध का पुत्र गन्यु मन्युगा इदक्षत्र और वृक्षत्र का पुत्र राजा हस्ती हुमा जिमके नाम से हस्तिनापुर नगर का नाम विख्यात है ॥ २८ ॥ २९ ॥ अजमीढोट्विमीढश्च पुरुमीढश्चहस्तिनः । नलिन्यामजमोढस्य नीलःशान्तिस्तुतत्सुतः॥३०॥ शान्ते:सुशान्तिस्तत्पुत्रः पुरुजोऽस्ततोऽभवत् । राजनीतिगुणैर्योहि मार्तण्डइवसम्बभौ ॥३१॥ भाश्वस्तत्सुतस्तस्य पञ्चासन्मुद्गलादयः । यवीनरोवृहदिषुः कांपिल्यःसञ्जयस्सुताः ॥ ३२ ॥ हस्ती के अजमीढ़ द्विनीढ़ पुरुमीढ़ तीन पुत्र हुए नलि- नी नामक राणी में मामीढ़ का पुत्र नील और उसमा शा- न्ति नामक पुत्र हुप्रा शान्ति क्षा सुशान्ति उपका पुतज पुरुश हुमा जो राजनीति सादि गुणों में सूर्य के समान तेणखीघा अर्कका पुत्र मर्याश्च हुआ उस भाश्च के मुद्गल का पुत्र (२९) यवीनर बददिषु काम्पिल्य और संजय ये पांच पुत्र हुए कास्पिल्य ने काम्पिल्य नगर वसाया जो पारखावाद के जिले में क्षम्पिला नामसे प्रसिद्ध है। इसी काम्पित्य वंशमें राजा द्रुपद हुन्ना जिस की पुत्री का गाम पांचाल वंशी राजा की पुत्री होने से पां चाली हुश्रा राजा द्रुपदके किले का चिन्ह फर्रुखाबाद के जिले में सुना जाता है ॥ ३० ॥ ३१ । ३२॥ भाश्वःप्राहपुत्रामे पज्जानांरक्षणायहि । विषयाणामलमिमे इतिपञ्चालसंज्ञित्तोः ॥३३॥ राजा भावने कहा कि मेरे पांच पुत्र पांच प्रदेशों की रक्षा करने को अलं नाम समर्थ होंगे इस से मुद्गलादि पांच क्षत्रियों की पञ्चाल संज्ञा हुई और उनके निवास स्थान देश का नाम भी पञ्चाल उसी समयसे हुआ ॥ ३३ ॥ ततःप्रभृतिभूभाग-स्सःपउचालइतीरितः। यज्ञोपस्करसंयुक्तः सर्वसौख्यविधायकः ॥ ३४॥ विस्तरस्तस्यकथितः कोशलादेवदक्षिणे। भूगोलवर्णनेवि - ज्योतिर्विद्भिर्विनिश्चितः ॥३॥ तब से लेकर पृथिवी का वह भाग पंचाल देश कहाया जो 'यज्ञोंके साधनों से युक्त और सर्व विध सुख संपत्ति का विधायक था और है। कोशल नाम अयोध्या अवधके राज्य से दक्षिणमें इस पंचाल देशका विस्तारज्योतिर्विद् विद्वानोंने निश्चित किया है ॥ ३४ । ३५ ॥ इति श्रीमहामहोपाध्याय श्रीजगदीशदेवात्मजमु- रारिदेवकृतायां कान्यकुब्जप्रकाशिकायां देशा- ख्यावर्णने पञ्चालदेशोत्पत्तिवर्णनामिका चतुर्थी प्रभा समासा ॥४॥ यह पं० मुरारि देवकृत कान्यकुब्जप्रकाशिका में देश नाम वर्णन के साथ पंचाल देश की संज्ञा वर्णन रूप चौथी प्रभा समाप्त हुई ॥
तदवान्तरभेदस्य जान्हव्युत्तरवर्तिनः । कान्यकुल बजेतिसंज्ञासोत्त-त्सीमाकथितीमया ॥१॥ स्वायम्भुवस्यचमना--षियमत्रनियामकम् । द्वितीयाध्यायइतितद् व्याख्याञ्चक्रगुणाकरः ॥२॥ गंगा जो से उत्तर में वमे इमी पंचाल देश के प्रवान्तर देश की कान्यकुवा देश संज्ञा हुई उपकी सीमाओं की प्रव. घि म पहिले कह चुके ॥१॥ और इस में स्वायंभुव मनुका वघन ही नियामक है महा गुगवान् मनु जी ने मानवधर्म शास्त्र के द्वितीयाध्याय में व्याख्यान किया है ॥२॥ तदद्यश्रूगतांब्रह्मन्सव्याख्यानं त्यामुदा। यविचारेणवालानां भ्रान्तिलोपोभत्रिष्यति ॥३॥ हे चन्द्रनाथ ! तुम उसे प्रसन्न चित्त से सुनो निस वि- घार से अज्ञानियों का भ्रम दूर हो जायगा ॥३॥ कुरुक्षेत्रंचमत्स्याश्च पञ्चाला:शूरसेनकाः । एषब्रह्मर्षिदेशी ब्रह्मावर्त्तादनन्तरः ॥४॥ कुरुक्षेत्र मत्स्य पंचाल और शूरसेनक ये चारों ब्रह्मर्षि ब्राह्मणोंके निवास स्थान देश हैं जो ब्रह्मावर्तके अन्तर्गत हैं ॥४॥ पउचालाश्चकान्यकुब्ज देशोव्याख्यातवानिति। आदिगौड़ेषुविख्यात-ससुग्रीधिन्यांगुणाकरः॥५॥ ब्रह्मावर्त के अन्तर्गत पञ्जाव कदापि नहीं पाता संस्कृत में पचावका नाम पंचनदतो अवश्य है पंजाव ब्रालय प्रधान देश नहीं किन्तु खत्री प्रधान है इससे वहां प्रायः खत्री गुरु होते हैं, सुबोधिनी ग्रन्थ में ऐसा व्याख्यान दिया है कि गुणों की खान पञ्चाल ही मादि गौड़ों में कान्यकुला देश कारके विख्यात है॥५॥ .
(३१)
अथैवमन्यवाक्यैश्च महर्षीणांविशेषतः।
त्वज्ज्ञप्त्यैकान्यकुब्जाख्यो सबीजाऽधप्रकाश्यते
अब हम महर्पियों के अन्य वाक्यों से विशेष कर तुम
[चन्द्रनाथ ] को जताने के लिये कान्यकुश नाम का आज
मूल सहित प्रकाश करते हैं ॥६॥
ग्रन्थेजातिविभागाख्ये देशप्रस्ताववर्णने ।
यदुक्तंतन्मतस्यैव संक्षेपोऽत्रविबुध्यताम् ॥७॥
जाति विभाग नामक ग्रन्थ में देश का प्रस्ताव वर्णन
करते समय जी कहा है उसी के मत का संक्षेप से यह वर्णन
जानो ॥ ७॥
कान्यकुब्जेतिसंज्ञातु सोमवंशीयभूभुजः ।
कुशनाभस्यकन्याभि-र्जातापञ्जालसंज्ञिनः ॥८॥
पंचाल संचिक मोमवंशी राजा कुशनामशी कान्यकुबन
संजा कुठग कन्याओं के कारण पहिले हुई उस दशा में अर्थ
यह होगा कि-"कान्याकुमो यस्य स कान्यकुब्ज़ः, जिस क्ष.
त्रिय राजा की कन्याओं का समूह [ कान्य ] कुश हुआ वह
कान्यकुब्ज कराया ॥८॥
तदभमविबोधाय राज्ञःपूर्वपरम्परा ।
स्वल्पामेकथ्यतेब्रह्म-श्वन्द्रनाथनिशामय ॥ ६ ॥
हे चन्द्रनाथ ब्रह्मन् ! उम बात को निर्मन जानने के
लिये राजा कुशनाभ की पूर्वसे थोड़ी वंशपरम्परा मैं कह-
ता हूं. सो तुम सुनी ॥९॥
आसीच्चन्द्रान्वयेराजा बुधःपरमधार्मिकः ।
तस्यपत्न्यामिलायान्तु संवभूत्रपुरूरवाः ॥१०॥
ऐलस्यचोर्वशीभार्या विजयंसुषुवेसुतम् ।
विजयस्यसुतोभीम-स्तस्यपुत्रस्तुकाचनः ॥११॥
(३२) होत्रकस्तनयस्तस्य जन्हुस्तस्यापिचात्मजः । जन्होस्तुपूरुस्तत्पुत्री बलाकोनाम पार्थिवः ॥१२॥ बलाकस्यसुतश्चासी-दजकोनामवीर्यवान् । ततःकुश कुशस्यापि कुशनाभश्ववंशकृत् ॥ १३ ॥ चन्द्रवंश में परमधर्मात्मा राजा चुघ हुना, उस राजा वुध की इलानामक पत्री में राजा पुरुरवा उत्पन हुमा, पु- रूरवा की उर्वशी नामक दिव्याङ्गगा पनो ने विजय को . त्पन्न किया, विजय का पुत्र राजा भीम और भीम का पुत्र काञ्चन हुआ, उसका होत्रक, दोत्रक का जगहु, उसका पुत्र पूरु पूरुका पुत्र राना बलाक प्रा, बलाक का पराक्रमी पुत्र प्र- जक हुआ, उस का कुश और कुश का पुत्र वंश वर्धक कुश नाम हुआ ॥ १० । ११ । १२ । १३ ॥ कुशनामश्वधर्मात्मा पञ्चालाधिपउदयभो। नोगुरोराज्ञयायश्च पुरंचक्रेमहोदयम् ॥ १४ ॥ पश्चाला देश का शासक राजा कुशनाम उनतिशाली धर्मात्मा हुभा जिसने अपने श्री कुलगुरु की आज्ञा से म. होदय नामक एक विशाल नगर बसाया ॥ १४ ॥ तस्यजाताघृतोच्यांहि सौन्दर्यःशतकन्यकाः । यद्वायुनाचताःकन्या स्तनकुटजीकृताःपुरा ॥१५॥ रामी पृताचीमें उस राजाकी सुन्दर रूपवती सौ कन्या हुई । जिस कारण वायु देवता ने शरीर में प्रविष्ट होकर उन कन्पात्रों को कुटन कर दिया इस कारण राजा के वमा. ये उस नगर का नाम कान्यकुठन हुमा [ कन्यानां समूह कान्यः स कुठको यस्मिनगरे सन्नगरं कान्यकुजम् ] जिस নার कुबजकन्या रहीं उसका नाम कान्यकुब्ज हुआ ॥१५॥ कान्यकुब्जेतिविख्यातं-ततःप्रभृतितत्पुरम् । कान्याकुब्जोयस्यसोपि कान्यकुंजस्स्मृतीनृपः १६
( ३३ )
तब से लेकर वह मगर कान्यकुयन कहने लगा और
कन्याओं का समूह मुण्ड निसंका कुबज होगया ऐसे अर्थसे राजा
कुशनाभ का भी नाम कान्यकुब्ज होगया ॥ १६ ॥
देशोपिराज्ञस्संबन्धा-त्कान्यकुब्जाख्ययायुतः ।
ततःप्रभृतिसज्जातो यज्ञोपस्करसंयुतः ॥१७॥
और जैसे कुरूपंचालादि क्षत्रिय राजाओंके मामसे देशके
भी वेसे ही नाम पड़े हैं वैसे ही कान्यकुब्ज रानाके नाम से
उसका पाल्यदेश भी कान्य कुब्ज नाम से विख्यात हुमा,
तभीसे वह देश यसके साधनोंसे भरा पूरा सुशोभित हुभा ॥१७॥
यज्ञसंसिद्धिलोभेन तत्रोपुर्बाणाश्चये।
कान्यकुब्जाख्ययातेपि युतादेशप्रसंगतः ॥१८॥
या करने के लोभसे जो ब्राह्मण विशेषकर उस कान्य
कुबज देश में बसे उनका नाम भी देशके प्रसंगसे कान्यकुवन
हुमा ॥ १८ ॥
मुख्याख्यामवराख्योति रन्तञपयतिस्फुटम् ।
भूतलेकिंवदन्तीति राजतेदृश्यतेपिच ॥ १६ ॥
पिछला गौणनाम पहिले मुख्य नामको दधालेता है यह
किंवदन्ती भूमण्डल पर प्रसिद्ध है तथा ऐसा हो दीख पड़ता
एवंवेदुर्बलोजाता याआख्यावैदिकास्स्मृताः ।
देशाख्याप्रवलाजाताः सर्वत्रैवेतिबुध्यताम्॥२०॥
इस प्रकार जो पहिले वैदिक उपाधियों से नाम पड़े थे
वे दुर्बल होगये और देशके निवास से पीछे हुए नाम कान्य.
कुबजादि प्रबल पड़ गये यह बात सर्वत्र ऐसी दी जानी ॥२०॥
अतोवैकान्यकुब्जाये विप्राब्राह्मतपोधनाः।
तपोदेशनिवासेन यज्ञैःसर्वोत्तमास्स्मृताः ॥२१॥
.(३४)
इससे जो ब्रह्मत्वके तपने युक्त कान्यकुवत ब्राह्मण हैं वे
तपः प्रधानदेश के निवाम से और उत्तम २ वेदोक्त यज्ञ करने
से ब्राह्मणों में उत्तम माने गये हैं ॥ २१ ॥
एवंयेऽन्येपिविप्रेन्द्रास्सनयुक्तास्सुधर्मिणः ।
वसन्तोधर्म्यदेशेपुतेपिसर्वोत्तमास्स्मृताः ॥२२॥
इसी प्रकार अन्य भी जो सुधर्मी तपोयुक्त धर्म प्रधान
देशों के निवासी बालगा हैं वे भी सर्व साधारण से श्रेष्ठ माने
गये हैं ॥ २२ ॥
अत्तोवैबुद्धिहीनानां परस्परविरोधिनाम् ।
रूक्षावाचोनसंग्राह्यो द्वैस्सिद्धान्तकोविदः ॥२३॥
इससे परस्पर विरोधी बुद्धिदीन मूर्ख ब्राह्मणोंकी रूखीवायी
सिद्धान्त जाननेवाले विद्यावद्ध गदाशयोंको गन्तव्य नहीं है ॥२३॥
अथाऽन्यदपिवक्ष्यामि चौक्तवृत्तान्तपुष्टये ।
वाल्मीकिमतमानित्य विशेषत्वंनिबोधतम् ॥२४॥
हे चन्द्रनाथ महर्षि वाल्मीपिाणी दो मतले उक्त वृत्तान्तकी
पुष्टिके लिये शाब दंम और सी कुछ कहते हैं उस विशेष वि.
चारको तुम सुनो ॥२४॥
ब्रह्मयोनिमहानासीत्कुपोनाममहातपाः ।
अलिष्टब्रततत्वज्ञासज्जनप्रतिपोषक: ॥ २५॥
लल्ल है कारण जिसका ऐसा महातपस्वी, अतिक्लिष्ट
व्रतों के तत्व को जानने वाला, सज्जग महात्माओंका रक्षक
पोषश राजा कुश हुभा ॥ २५ ॥
समहोत्माकुलोनीयां युक्तायांसुमहाबलान् ।
चैदाजनयामास चतुरस्सदृशान्सुतान् ॥२६॥
कुशांबंकुशनामंच असूर्तरजसंवसुम् ।
दीप्तियुक्तान्महोत्साहान क्षत्रधर्मचिकीर्षया ॥२७॥
(३५)
उस महास्मारामाने विवादिता कुलीना वैदर्भी रानी में
क्षत्रियधर्म की इच्छा से बड़े उत्साही अपने तुल्य बलिष्ठ ध-
र्मात्मा कुंशाम्ब, कुशनाभ, प्रसूर्तरजम और बसु इन चार प्र-
तापी उत्पाही पुत्रोंको उत्पन किया ॥ २६ ॥ २ ॥
तानुवाचकुशःपुत्रान्धर्मिष्ठान्सत्यवादिनः ।
क्रियतांपालनपुत्रा धर्मप्राप्स्यथपुष्कलम् ॥२८॥
कुशस्यवचनं श्रुत्वा चत्वारोलोकसम्मताः।
निवेशंचक्रिरेसर्व पुराणनृवरास्तदा ॥ २६ ॥
कुशांवस्तुमहातेजाः कौशाम्बीमकरोत्पुरोम् ।
कुशनाभस्तुधर्मात्मा पुरज्जक्रमहोदयम् ॥ ३०॥
असूर्सरजसोनाम धर्मारण्यम्महामतिः ।
चक्रेपुरवरंरोजा वसुर्नामगिरिव्रजम् ॥ ३१ ॥
उन धर्मनिष्ठ सत्यवादी चारों पुत्रोंसे राजा कुशने कहा
कि हे पत्रो 1 ठीक २ न्यायसे प्रशाका पालन करो तुम सब
पुष्कल धर्मको प्राप्त होगे ॥ २८ ॥ राजा कुशमा वचन सुनकर
चारो प्रजाहितैषी श्रेष्ठ राजपुत्रोंने अपनी राजधानीके चार
नगर बसाये, महा प्रतापी कुशाम्बकी बसायी पुरी का नाम
कौशाम्बी हुमा, राजर्षि कुशनामने नहोदय नामक नगर
वसाया, महाबुद्धिमान् प्रसूर्तरनस राजाने धर्मारण्य नामक
'नगर बसाया और राणा
वसु
ने गिरिव्रज नामक उत्तम न.
गर में अपनी राजधानी स्थापित की ॥.२९ ॥ ३०॥३१ ॥
कुशनाभस्तुराजर्षिः कन्याशतमनुत्तमम् ।
जनयामासधर्मात्मा घृतांच्यांरघुनन्दन ॥३२॥
विश्वामित्र जी भगवान् रामचन्द्र जी से कहते हैं कि-
हे रघुनन्दन | धर्मात्मा राजर्षि कुशनाभने घृताची नामक म-
हारानी में
अत्युत्तम
सौ कन्या उत्पन्न कीं ॥ ३२॥
तास्तुयौवनशालिन्या रूपवत्यस्स्वलंकृताः । उद्यानभूमिमासाद्य प्रावृषीवशतहूदाः ॥३३॥ गायन्त्योनृत्यमानाश्च वादयन्त्यश्चराघव । आमोदंपरमंजग्मुर्वराभरणभूषिताः ॥ ३४ ॥ वे प्रति सुन्दरी, रूप यौवन से युक्त उत्तम अलङ्कारोंसे शोभित सौ कन्या वर्षा ऋतु, विद्यत् के समान राज्यके सा- धारणा उपवन में चमकती, अत्युत्तम आभरणोंसे भूषित गाती बजाती नाचती हुई परम प्रसन्न हो रही थीं ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ तोस्सर्वागुणसम्पन्ना रूपयौवनसंयुताः। दृष्ट्वासर्वात्मकोवायु-रिदंवचनमब्रवीत् ॥ ३५॥ अहंवःकामयेसर्वा भार्याममभविष्यथ । मानुषस्त्यज्यताम्भावो दीर्घमायुरवाप्स्यथ ॥३६॥ चलंहियौवनंनित्यं मानुषेषु विशेषतः । अक्षयंयौवनंप्राप्ता अमर्यश्चभविष्यथ ॥ ३७ ॥ उन रूपयौवन युक्त सर्व शुभ गुणों से संपन्न कन्याओं को देखकर सर्वान्तर्यामी वायुका अधिष्ठातृ देव विग्रवान् हो कर यह वोला कि हे कन्यानो ! हम वायुदेव तुम सब को चाहते हैं कि तुम सब हमारी पत्नी होजामो। तुम्हारा म- नुष्यपन छूट जायगा, तुम सब अमर दिव्याङ्गना होजानोगी मनुष्य योनि में विशेष कर यौवन मुख बहुत ही कम म. नुष्य युवावस्या का मानन्द वीस पच्चीस वर्षसे अधिक प्रायः प्राप्त नहीं होता परन्तु देवयोनि में करोड़ों अौं खों 'वर्षों तक अविनाशी यौवन तुम सबको प्राप्त होजायगा तुम .सब अंमर होजायोगी ॥३५ । ३६ । ३७॥ तस्यतद्वचनंश्रुत्वा वायोरक्लिष्टकर्मणः । 'अपहास्यततोवाक्यं कन्याशतमथाऽब्रवीत् ॥३८॥ को
पिताहिप्रभुरस्माकं देवतंपरमञ्चसः ।
यस्यनोदास्यतिपितो सनोभर्ताभविष्यति ॥३६॥
भोपरिबिलष्ट कर्म वाले उम वायु देव के उस वचनको
सुनवार सौ सम्या वायुदेव का उपहास करके बोली कि ह.
मारा पिता ही परम देवता भीर हमारा प्रभु है वर पिता
निसके लिये हमें देगा वही मारा पति होगा ॥३८ । ६॥
तासांतुवचनं श्रुत्वा हरिःपरमकोपनः ।
प्रविश्यसर्वगात्राणि बभञ्जभगवान्प्रभुः ॥४०॥
समस्याओं का बचन सुनकर परम कोप करने वाले
वायुदेवने सब कन्याओं के शरीरों में प्रविष्ट कर सबको
मा भर इत्र कर दिया अब भीकम्या, कुण्डी हो गयी ngen
सचतादयितामग्नाः कन्या:परमशोभनाः ।
दृष्ट्वादीनास्तदारोजा सम्भ्रान्तइदमब्रवीत् ॥४१॥
किमिदंकथ्यतांपुश्यः कोधर्ममवमन्यते ।
कुटजा:केनकृतास्सर्वा-श्चेष्टन्त्योनाभिभाषथ ॥२॥
सन परम सुन्दरी अपनी पारी दीन कन्याओं को मङ्ग
भङ्ग कुएं देखकर संभ्रान्त हुप्रा राजा योता कि हे पु-
त्रियो । यह पाहुमा कही तुम्हारे धर्म का अपमान कौन
करना चाहता है तुमको किसने कुन कर दिया ? तुम घंटा
करती हुई भी अपना वृत्तान्त प्यों नहीं कहतीं ॥ ४९ । ४२ ।।
तस्यतद्वचनं श्रुत्वा कुशनोभस्यधीमतः ।
शिरोभिश्चरणौस्पृष्ट्वा कन्याशतमभाषत ॥४३॥
वुद्धिमान् राना कुशमाभ के उस वचन को सुनकर अप-
ने शिरों से रानाके चरणोंका स्पर्श करके भी कन्या बोम्नी॥४३॥
वायुस्सर्वात्मकोराजन्प्रर्पयितुमिच्छति ।
अशुभंमार्गमास्थाय नधर्मप्रत्यवेक्षते ॥ ४४ ॥
(३८) । कि हे राजन् ! सर्वान्तर्यामी वायु देव धर्म विरुद्ध अशुभ मार्ग पर प्रारूढ़ होकर हम सब को धमका लेना चाहता है और वह देवता होकर भी धर्म को नहीं देखता ! [पाठक कामदेव ऐमा यली है जो देवों को भी हिगा देता है तब मनुष्य की क्या शक्ति है ] ॥४४॥ तासान्तुवचनंन्त्रुत्वा राजापरमधार्मिकः । प्रत्युवाचमहातेजाः कन्याशत्तमनुत्तमम् ॥४॥ क्षान्तक्षमावतांपुत्र्यः कर्त्तव्यंसुमहत्कृतम् । ऐकमत्यमुपागम्य कुलचावेक्षितंमम ॥४६॥ अलङ्कारोहिनारीणां क्षमातुपुरुपस्यवा। दुष्करंतच्चवैक्षान्तं त्रिदशेषविशेषतः ॥ १७ ॥ मदा तेजस्वी परमधार्मिक राजा ने उन कन्याओं का वचन सुनकर परम रूपयती सी कन्याओं से कहा कि हे पु- त्रियो ! क्षमाशील पुरुषों का महान् कर्तव्य क्षमा है सो तुमने एक मत होकर तसा की, यद बहुत अच्छा किया तुमने इ- मारी कुन्लनर्यादा की बड़ी रक्षा की, यद्यपि पुरुषों का भी दुष्कर भूषण क्षमा है तथापि विशेष कर खियों का परमभ- षण क्षमा है सो तुम ने क्षमा की देवों के साथ विशेष कर क्षमा ही उचित थी ॥ ४५ । ४६। ४७ ॥ विसृज्यकन्या:काकुत्स्थ राजात्रिदशविक्रमः। मन्त्रज्ञोमन्त्रयामास प्रदानंसहमन्त्रिभिः ॥४॥ सुबुद्धिं कृतवानाजा कुशनोभस्सुधार्मिकः । ब्रह्मदत्तायकाकुत्स्थ दातुकन्याशतंतदा ॥४॥ विश्वामित्र जी कहते हैं कि हे काकुत्स्थ रामचन्द्र जी ! देव तुल्य पराक्रमी राशा कुशनाभ ने कन्याओं को वहीं छोड़ के कन्याओं के दान करने की सलाह सम्मति मन्त्रियों के
साच की, सबको सम्मति से उत्तम धर्मनि राजा कुगनाभ
की सुबुद्धि महर्षि प्रलदत्त को भी कन्यादान कर देने की बम
भारतक्ष कि
कन्याओं के माथ कोई राजा विवाद
नहीं करेगापोंकि राजामों में बालगोंके तुल्य नपोबल नहीं
होता पा को कुन भाव को मेट सकते ॥ ४० ४ ॥
तमाहूयमहातेजा ब्रह्मदत्तमहीपतिः ।
ददौकन्याशतंराजा सुप्रीतेनान्तरात्मना ॥५०॥
महातेजस्वी रात्रा ने काम्पिल्य नगर में महर्षि प्रदत्त
को राजदूतों द्वारा प्रादर के साथ बुलवाके सुप्रसन्न अन्तःक-
से भी पात्रों का दान करदिपा ॥५॥
स्पृष्टमात्रेतदापाणी विकुजविगतज्वरम् ।
युक्तंपरमयालक्ष्म्या बभौकन्याशतंतदा ॥५१॥
ब्रह्मर्षि ब्रह्मदत्त के पाणिग्रहण करते ही स्पर्श मात्रसे
उनसी कन्याओं का कुबडापन नष्ट होगया और वे पूर्ववत्
परम शोभावती हो गयीं ॥ ११ ॥
इत्यादिविस्तरःप्रोक्तो विश्वामित्रेणधीमता ।
रामायकान्यकुब्जेति देशाख्यामूलकारणम् ॥५२॥
इत्यादिकथा वालमीकीय रामायणके वालकाय इस्य ३४॥३५
भगों में विस्तार से दिखी और प्रातर्षि विश्वामित्र ने
भगवान् रामचन्द्र जी को कान्यकुन देश के नाम का मूल
कारण सुमाया है॥ ५२ ।।
एतत्तेकथितंब्रह्मन्मयातु सप्रमाणकम् ।
पंचालेकोन्यकुटजाख्या प्राप्तिकारणमुत्तमम् ॥५३॥
है चन्द्रनाथ ! हमने प्रभाव सहित यह विचार तुम
से कहा जो कि पचाल देश में कान्यकुडग देश गाम होनेका
उत्तम देतु ॥ ५३॥
आर्यावर्तकभागोयं देशःपरमपोवनः ।
अन्तर्वदोत्तरेरम्यस्सर्वसौख्यविधायकः ॥५४॥
(४०) भार्थ्यावर्त महान् देशका एक भाग परमपवित्र अन्तर्वेद में रमणीय भव सुखों का स्थान कान्यकुछ देश है ॥५॥ एतन्निवासिविप्राणां प्रतिष्ठासीत्पुरावरा । वृहदारण्यइत्यस्य प्रमाणपश्यसन्मते ॥५॥ हे सत् वुद्धि वाले चन्द्रनाथ ! इस देश के निवासी ब्रा- ह्मणों की प्रांत प्राचीन काल में वही प्रतिष्ठा थी इस का प्रमाण सहदारण्यक उपनिषद् में देखो ॥५५॥ जनकस्यमहीपाल चक्रचूड़ानणेनिमे। यज्ञगोदानवृत्तान्ते दृष्ट्वाहमवानुहि ॥५६॥ रामानों की शिरोमणि राजा जनक के यज्ञ में गोदान प्रसंग पर ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा देखकर तुम प्रसन्न मानन्दित हो जामी ॥ ५६ ॥ काणश्चकुवजकश्चैव भ्रातरावितियाकथा। मूर्खास्थनिःसृतासातु हेयानिर्मूलभाषणात् ॥५०॥ और जो पहिले लिखा था कि काश तथा कुन दो भा. इयों का बंश कान्यकुब्ज करायो यह कथा मूखों के मुखसे निकेली शास्त्र प्रमाण से विरुद्ध निर्मूल भाषण होने से मि- च्या है ॥ ५७ ॥ अतस्तेकान्यकुब्जानां ब्राह्मणानांविशेषतः । प्रतिष्ठामहतीज्ञेया विज्ञैर्नित्यंमहात्मनाम् ॥५॥ इति श्रीकवीन्द्रमुरारिदेबकृतायां कान्यकुब्जप्रकाशिकायां कान्यकुठजदेशोत्पत्तिवर्णनात्मिका पञ्चमीप्रभा समाप्ता ॥५॥ इस से तुम्हारे साथी महात्मा कान्यकुब्ज पदवाच्य ब्रा- ह्मणों की महती प्रतिष्ठा विद्वानों को जामनी माननी चा- हिये यह हमारी [मुरारि देव की ] समाति है ॥५॥ यह कवीन्द्र मुरारिदेवकृत कान्यकुठा प्रकाशिका में कान्यकुब्ज देशोत्पत्ति वर्णन रूप पांचवीं प्रभा समाप्त हुई ॥५॥ :
(४१)
अथतेकान्यकुब्जानां प्रतिष्ठां संवदाम्यहम् ।
तवंशमोगधानांहि वंशपुस्तकलेखतः ॥९॥
हे चन्द्रनाथ ! वंश मागध नागया वंश पुस्तक के लेख मे
काम्पकुठन ब्राह्मणों की और भी प्रतिष्ठा हम कहते हैं.॥१॥
एकदाकालयोगेन दुर्भिक्षादिप्रपीडिताः ।
देशंत्यक्त्वा कान्यकुब्जं प्रजादेशांतरंययुः ॥२॥
एक समय दैवयोग से दुर्भिक्षादि से पीडित होकर तथा
कान्यका देश को छोड़ के अधिकांश प्रजा देशान्तर को भाग
गयी ॥२॥
एवंकालान्तरेजाते विश्वामित्रोमहामुनिः ।
निशम्यरामागमनं घनानिवृत्यधर्मतः ॥३॥
राज्याभिषेकं सुखदं चापिश्रुत्वामहर्पितः ।
श्रीरोमदर्शनाकांक्षी राजधानीसमाययौ ॥2॥
बम प्रकार काल बीतने पर महामुनि विश्वामित्र भ-
गवान् राम जी का बनबास से धर्मानुकूल निवृत्त होके पुन-
रागमन सुनकर और सुखदायक राज्याभिषेक हुशा तुनो प्र-
सन्न हुए श्री राम जी के दर्शन की इच्छा से राजधानी सदध
में गये ॥३४॥
दृष्ट्वातमागतंहीदगवाजानकीपतिः ।
सिंहासनात्समुत्थाय प्रणनाममुहुर्नुहुः ॥५॥
जानकी पति भगवान राम जीने उन विवामित्र जी को
माया देखकर सिंहासन से उठ घो घार २ प्रणाम दिया ॥५॥
तमासनेसमावेश्य समस्रर्यविधानतः ।
पप्रच्छकुशलंविन स्वागतंचानवीन्मुदा ॥६॥
उन को शुभामन पर वैटाचार विधिपूर्वक पूजन सार
कुशल शेग पूछा और वर्ष से स्वागत फहा ॥ ६ ॥
(४२)
कृतातिथ्योमहातेजा विश्वामित्रोऽब्रवीद्वचः ।
कुशलंसर्वदाराम त्वयिराज्यप्रशासति ॥७॥
आतिशय सत्कार हो जाने पर महातेजस्वी विश्वामित्रजी
बोले कि सुभाग्य से आपके राज्य करते हुए सर्वदा कुशलही है।।
दिष्ट्या दिष्ट्यात्वयाराम रावणस्सानुजोहतः ।
दिष्ट्याऽनंतेनवीरेण रावणिर्विनिपातितः ॥८॥..
सुभाग्य से दी मापने सपरिवार रावयाको मारा सुभाग्य
से लक्ष्मगा वीर ने रावया के पुत्र को मारा ॥८॥
दिष्ट्याविभीषणोभक्तस्त्वयाराज्येप्रतिष्ठितः ।
दिष्ट्योयज्ञभुजोदेवा जाताधर्मःप्रवर्तते ।।
देवेच्छा से आपने विभीषण को लंका का राजा बना-
या तथा दैवगति से ही देवता लोग या भागों के भोगी हुए
जिम से धर्म की प्रवृत्ति हो रही है ॥॥
महाभाग्योदयवाऽद्य रघुवंशस्यराघव ।
पितृपैतामहराज्यं धर्माद्यत्त्वंसमाश्रितः ॥१०॥
हे राघव ! रघुवंश का बड़ा भाग्योदय हुआहै जो श्राप
वाप दादों के राज्यासन पर धर्म से प्रारूढ़ हुए हौ ॥१०॥
वाञ्छापूर्ति प्रजानांच ब्राह्मणानांविशेषतः ।
त्वयाराघवनाथेन क्रियतेपरयामुदा ॥११॥
अवध की प्रजाकी वांछा पूरी हुई, हे नाथ! राघव! राम!
आप बड़े वर्ष से विशेष कर ब्राह्मणों की अभिलाषायें पूरी
करते हो ॥ ११॥
किंचिन्मेवोज्छितंराम हृदयेपरिवर्तते।
श्रुत्त्वाचतत्त्वयातूर्णकार्यधर्मार्थसंयुतम् ॥१२॥
हे राम ! कुछ वाञ्छा हमारे हृदयमें भी वर्तमान है उम
धर्मार्थ
युक्त हमारी इच्छा को सुनकर आप शीघ्र पूरी करेंगे
ऐसी माशा है ॥ १२॥
(४३)
आर्यावर्तान्तरालेये देशा:पञ्चालसंज्ञकाः ।
मत्पूर्वजानांतराम समासन्राज्यभूतयः ॥ १३ ॥
पार्यावर्त के अन्तर्गन जो देश पंचाल संजक हैं हे राम ।
वे हमारे पूर्वजों की राज्य विभूतियां हैं ॥ १३ ॥
तत्रवैकान्यकुब्जाख्ये देश:परमपावनः ।
राजर्षेः कुशनाभस्य कन्यायोगादभूत्स्फुटः॥१४॥
उसी पंचाल में परमपवित्र कान्यकज नामक देश है
निसका नाम राजर्षि कुशनाग की कुठग कन्याओं के कारण
प्रकट हुधा है ॥ १४ ॥
अथेदानीकालयोगात्सोच्छिन्नोदेशउत्तमः ।
स्वयियातेवनराम स्वर्गचक्रवर्तिनि ॥ १५ ॥
अब समय पाकर मापके वनवास में जाने पर और च.
क्रवर्ती दशरथ के स्वर्गवास हो जाने पर वह उत्तम कान्यक-
उन देश उच्छिन हो गया है॥ १५ ॥
तस्मिन्मममहत्सत्वं वर्ततेराघवोत्तम ।
स्वपूर्वराज्यभूमित्वादतस्त्वामर्थयाम्यहम् ॥१६॥
हे राघव ! उस देशमें हमारा बहा स्वत्व है क्योंकि पूर्व-
काल में ही लोगों की वह राज्य भूमि थी इस कारण हम
माप से निवेदन करते हैं ॥ १६ ॥
मत्पूर्वजैर्मयाचापि पूजितादानमानतः।
वसन्तीविषयेऽस्माकं विप्राब्राहलतपोधनाः ॥१०॥
हमारे उस कान्यकुन देश में वसते हुए तपस्वी बाल-
बों का हम ने और हमारे पूर्वजों ने दान भान से सम्यक
पूजन
किया था ॥ १७ ॥
कालोपद्रवतस्तेषु केचिद्देशान्तरङ्गताः ।
दुःखिताअपिकेचित्तु तत्रैवनिवसन्तिहि ॥१८॥
(.४४) मन्यमानस्तपोदेशं मुक्तिदायकमुत्तमम् । तेषांमानःप्रकर्त्तव्यस्त्वयाब्राहातपायुजाम् ॥१९॥ काल पड़ने से अनेक ब्राह्मण देशान्तर को चले गये और कोई २ दुःखित हुए उस कान्यकुब्ज देशको तप का स्थान मुक्ति का हेतु मानते हुए वहीं निवास करते हैं हे राम! उन सपस्वी कान्यकुब्ज ब्राह्मणोंका सत्कार प्रापको करना चाहिय॥११॥ प्रतिष्ठाचापिदातव्या राजन्सर्वोत्तमा त्वया । विप्रेभ्यस्तेभ्यआद्वत्य जहिक्लेशंमहात्मनाम्।२०। हे राजन् ! उन ब्राह्मणों को श्रादर पूर्वक सर्वोत्तम प्र- तिष्ठा देनी चाहिये और उन महात्माओं के क्लेश. को श्राप दूर कीजिये ॥ २० ॥ त्वंगतिस्त्वंमतिस्तेषांत्वंभूत्तिस्त्वंरतिःपरा । त्वत्प्राप्तयेपरंयैस्तु देहःकामैरनर्चितः ॥२१॥ उन ब्राह्मणों की तुम गति अति रक्षक और परम सुख देने वाले तुम्ही हो, उन ब्राह्मणों ने तुम भगवान की प्राप्ति के लिये ही काम भोगों से चित्त को हटाया है ॥ २१ ॥ शुभाऽशुभानांसर्वत्र कर्मणांफलदीभवान् । . किन्तहिकरुणासिन्धो भक्तांस्तान्समुपेक्षसे ॥२२॥ जब कि शुभ अशुभ कर्मों का सर्वत्र फल देने वाले आप ही हैं तन हे करुगा निधान ! उन भक्त ब्राह्मणों की उपेक्षा वयों करते हो ॥ येचदेशान्तरंप्राप्ता दुःखितोस्सनभूतयः । तानप्यानीयतत्स्थान संस्थापयितुमर्हसि ॥२३॥ अन्यानपिमहावाहो स्वधर्मनिरताजनान् । वाहुजानूरुजान्पादान्संस्थापयितुमर्हसि ॥२४॥ जो सगनाम तपोरूप विभूतियों वाले ब्राह्मण दुःखित होकर --
(४५)
देशान्तरों में चले गये उन को भी
बुलाकर
फिर उनके पूर्वजों
के स्थानों पर स्थापित कीजिये ॥ २३ ॥ तथा हे महाबाहो
राम ! भन्य क्षत्रिपादि स्वधर्म मेनी मनुष्यों को उन २ के पू-
वस्थानों पर प्रतिष्ठित कीजिये ॥२४॥
कुरुयशंकृपोसिन्धो नीरमुत्तरमाश्रितः ।
जान्हव्यास्तत्रसबास्त्वमाहूयार्चयमांचिरम् ॥२५॥
हे कृपासिन्धु ! गंगागीके उत्तर तट पर भाप यज्ञ करो वहां
सबभगे हुए ब्राह्मणों को बुलाकर यज्ञमें शीघ्र पूजन करी॥२॥
ब्रह्मण्यदेवधर्मात्मन् गच्छमाचेतसाश्रमम् ।
वाल्मीकर्मतमानित्य यज्ञात्मन्यज्ञमाचर ॥२६॥
श्रुत्वाब्रह्मण्यदेवस्तदाषितंधर्मसंमतम् ।
आमित्युक्त्वानमश्चक्रे मन्त्रयामासमन्त्रभिः॥२७॥
हे ब्रह्मण्यदेव ! हे धर्मात्मन् ! प्राचेतसाम्रग को जाये
हे यज्ञस्वरूप विप्यो ! वाल्मीकि महर्षि की अनुमतिसे यज्ञ
कीजिये ॥२६॥ ब्रह्मण्य देव भगवान् रामने महर्षि विश्वामित्र
का धर्म युक्त भाषण सुनकर ओं इस प्रकार स्वीकार करके
मन्त्री लोगों से सम्मतिली ॥ २० ॥
ततोपहिश्वरणप्राणर्मातृभिस्साकमव्ययः ।
जगामगुरुणासाई बाल्मीकेरानमहरिः ॥२८॥
तदनन्तर बाहर त्रिचरने वाले प्रारूप धाताओंके साथ
और गुरु वसिष्ठ जीके सदित अविनाशो हरिराम.जी वाल्मी-
किजी के प्राश्रमको गये ॥२८॥
विश्वामित्रस्यवचसा तत्रस्थान्ब्राह्मणोत्तमान्।
तावदाकारयामास बहुमानपुरस्सरम् ॥२९॥
विश्वामित्रजीके कथनानुमार रामजी ने कान्यकुबन देशके नि-
वासी उत्तम वालगोंको सम्मान पूर्वक बुलाने की सूचना करायी९॥
तत्राजग्मुर्महात्मानो यज्ञविस्तरकोविदाः ।
येस्वदेशंतपोन्मूलं विपत्तावपिनोजहुः॥३०॥
यज्ञ करने कराने में प्रवीगा महानुभाव वे ब्राह्मण प्राये
जिन्दोंने तपः प्रधान दोने से अपने देश को विपत्ति में भी
नहीं त्यागा था ॥ ३० ॥
भारद्वाजाश्चकातीयाः काश्यपाऔपमन्यवः ।
शाण्डिल्यास्सांकृताएतेकान्यकुब्जौकसस्सदा॥३१॥
एतान्संपूज्यत्रिप्रेन्द्रान् भगवान्भक्तवत्सलः ।
यसंवर्तयोमास तानाचार्यान्विधायच ॥३२॥
भारद्वाज, कात्यायन, काश्यप, औपमन्यव, शापिहल्य,
सांकृत, इन गोत्रोंवाले ब्राह्मण सदा ही कान्यकुवन देश के
अटल निवासी रहे ॥ ३१ ॥ भक्त वत्सल भगवान् राम जी ने
इन उक्त उत्तम ब्राह्मणों का पुजन कर उनको प्राचार्य बना
के यज्ञका प्रारम्भ किया ॥ ३२ ॥
देशान्तरंगतायेच सतानप्याजुहावह ।
निमन्त्रणंचोकलय्य तेऽपितूर्णसमाययुः ॥३३॥
गर्गश्चगोतमोवत्सो भरद्वाजोधनञ्जयः ।
पराशरोवशिष्ठश्च कविस्तःकौशिकोमुनिः ॥३४॥
काश्यपश्चेतिवंशीया-स्तेप्रोक्ताब्राह्मणोत्तमाः ।
एतैश्चशुशुभेयज्ञाविधिवत्परिकल्पितः ॥ ३५ ॥
और जो कान्यकुब्ज दुर्भिक्ष विपत्तिके कारण देशान्तरों
को भाग गये थे उनको भी भादर पूर्वक बुलवाया, निमन्त्रण
सुनकर वे भी देशान्तरों से शीघ्र माये ॥ ३३ ॥ गर्ग, गोतम,
वत्स, भरद्वाज, धनञ्जय, पराशर, वसिष्ट, कविरत, कौशिक
और काश्यप इन गर्गादि ऋषियोंके गोत्रों वाले ब्राह्मण उत्त-
भ कुलीन माने जाते हैं इन सब गोत्रोंवाले ब्रालयोंसे विधि
पूर्वक रचा हुश्रा यज्ञ परम सुशोभित हुभा ॥३४ ॥ ३५॥
देवाश्चपितरश्चैव मुनयश्चतपोधनाः ।
पूजितादानमानैश्च पानानश्चयथोचितम्॥३६॥
(४५) . देव, पितर, ऋषि मुनि तपस्वी इन सब का यथोचित दान मानों से पूजन किया गया ॥ ३६ ॥. येचयझेसमाहूता ब्राह्मणा:षटकुलोद्वाः । तेषांप्रतिष्ठांमहती चकार रघुनन्दनः ॥ ३७॥ ग्राभानश्वान्गजान्थानान्यदादामोधनानिच॥ नित्यनिवासं स्वेदेशे कान्यकुब्जेवरंपरम् ॥८॥ और भारद्वामादि छः मुन के ब्राह्मण जो यज्ञमें बुलाये थे उनकी बड़ी प्रतिष्ठा भगवान् रामजी ने की, घोड़े, हाथी रथादि सवारियां, गांव और धन उन संबं को दिये और नित्य कान्यकुब्ज देशमें निवास करने की आज्ञा सबको दी ॥३७॥३८॥ येचदिक्कुलजाविप्रा-स्समाहूतास्तपोधनाः । देशान्तरात्पुनस्तेषां विषयेवासमादिशत् ॥३९॥ ददौधनानिदानानि ग्रामानश्वान्पशूनथान् । विविधान्भौमभोगांश्च तेभ्यश्त्रीरघुनन्दनः ॥४०॥ और जिन तपोधन कुलीन ब्राह्मणों को देशान्तरसे - लाया था उन को भी कान्यकुब्ज देश में निवास करने की आज्ञा दी । उनको भी धन, ग्राम, घोड़े, रथ, पशु, मोर भूः मिको अनेक जागीरें भगवान् रघुनाथ जी ने दी ॥३९।४० ॥ तेषामेवानुसेवार्थ क्षत्रियान्वणिजोऽनुगान् । निवासयामासहरि-स्तान्सन्तोष्यधनादिभिः ॥४१॥ इस प्रकार कान्यकुवन ब्राह्मणोंको भगवान् रामने धना- दिसे संतुष्ट करके उन ब्राह्माणों की सेवा तथा रक्षा करने के लिये क्षत्रिय वैश्यादि को भी उस देश में बसाया ॥ ४१ ॥ ततश्चकौशिकोदृष्ट्वा स्वदेशंपूर्ववस्थितम् । प्रशशंस मुदायुक्तो रामं राजीवलोचनम् ॥४२॥ सदनन्तर कौशिक मुनि विश्वामित्र ने अपने देशको
(४८)
पूर्यजत् सम्पन्न देखकर बड़े वर्षसे कमलनयन भगवान् रामजी
की प्रशंसा की ॥ ४२ ॥
समाप्ययज्ञश्रीरामस्स्नात्वाऽवभृथमेकराट ।
आज्ञप्तःकौशिकाद्यैश्च स्वापुरीमगमत्प्रियैः ॥४३॥
इम प्रकार भूमगहलके एक ही राजारामचन्द्र जी ने यज्ञ
को समाप्त कर अवभृथ स्नान किया तब कौशिक मुनि विश्वा-
मित्रादि से प्राशा लेकर अपने प्रिय भ्रातादि के सहित अ-
योध्यापुरी को गये ॥ ४३ ॥
इत्येवंकान्यकुब्जाख्यो देशश्चपुनरुद्धृतः ।
प्रतिष्ठिताराघवेण कान्यकुब्जाश्वभूसुराः ॥४४॥
इस प्रकार कान्यकुब्ज नामक देश का पुनः जीर्णोद्धार
हुमा अर्थात् उन्नति को प्राप्त हुआ और कान्यकुवत बाल-
गो को भगवान् रामजी ने प्रतिष्ठादी ॥४४॥
इत्तितेचार्थिताःप्रश्नामयाशास्त्राऽनुसारतः ।
एकैवब्राह्मणज्ञाति-देशाख्याभिर्विकल्पिता ॥४॥
कवीन्द्र मुरारि देय कहते हैं सि हे चन्द्रनाथ ! इस प्र.
बार आपके शिये प्रश्नोंका उत्तर हमने शार प्रमाणों के प्र.
नुभार दिया है। वास्तवमें सब नामों वाले ब्राह्मण एक ही
जाति हैं । देशके नामों से इनके अनेक नाम होगये हैं ॥४॥
नकोऽप्यवरजोज्येष्ठो जात्यात्वंहीत्यवेहिभोः ।
कमैवमुख्यमत्रास्ति ततोवेदानयोभवेत् ॥४६॥
हे चन्द्रनाथ ! इन नामोंके होने मात्र वा जाति मात्र
कोई ब्राह्मण छोटा वा बहा मर्यात् श्रेष्ठ वा निकृष्ट नहीं है यह
ध्यान रक्खौ किन्तु मानवादि धर्मशास्त्रों में कहे ब्राह्मणों के
धर्म कौमें जो जितना चढ़ा बढ़ा व उत्तना ही श्रेष्ठ है
इससे ब्राह्मणको चेदाभ्यामी होना चाहिये ॥४६॥
नित्यं नैमित्तिकंकर्म विमोनिष्काममाचरेत् ।
ज्ञानभक्तयाश्रयं कुर्वन्नुत्तमत्त्व नचान्यथा ॥४॥
(Ye) ब्राह्मण को चाहिये कि अपने नित्य नैमित्तिक कर्मको निकाम चोकर करेजान और भक्तिके आश्रयसे स्वधर्म सेव- न वारता हुआ ब्राह्मण श्रेष्ठ होता है अन्यथा नहीं ॥४७॥ इतिमदचसांवेगादन्तर्यामीप्रसीदतु । भूमन्धुनोतुवालानां तस्मैधर्मात्मनेनमः ॥४८॥ ओ३म्-तत्सत् ॥ इति श्रीमहामहोपाध्याय श्रीमुरलीध- रोपनामक श्रीजगदीशदेवतनूनकवीन्द्रश्रीमुरारिदेवकृ. तायां कान्यकरजप्रकाशिकायां कान्यकुब्जभूदेवमान- प्रतिष्ठावर्शनात्मिका षष्ठीप्रभा समाप्ता ॥६॥ समाप्तोऽयंग्रन्थः। श्रीकृष्णार्पणमस्तु शुमम् ॥ आश्विनशुक्ला १५ भौमे संवत् १९६३ मिते वैक्रमेदुर्गादत्तेन लिखितमिदम्पुस्तकम् * ॥ मुरारिदेव ग्रन्थकार अन्तमें भगवान् से प्रार्थना करते हैं कि हमारेन वचनों से भगवान् अन्तर्यामी प्रसन्न हों और वे भगवान् मूर्ख व्राह्मणोंके [नाम मात्र से कल्पित मिथ्या भिमानकी प्रतिष्ठा के ] भमको नष्ट करें उस धर्म स्वरूप भग- वान्के चरणों में मेरा नमस्कार है ॥४८॥ यह मुरारिदेव कृत कान्यकुब्ज प्रकाशिका में कान्य- कुवज्ञवालयों की मान प्रतिष्ठा वर्णनरूप छठीप्रभा समाप्तहुई। ओं तत्सत् परमात्मने नमः ।। समाप्तोग्यंग्रन्यः ॥ श्रीवृन्दावनकुंजविहरतश्यामाश्यामनव । हरहुनिवारकपुंज करहु मनोरथ पूर्णसब ॥१॥ हमारी प्रार्थना- पाठक ब्राह्मण वर्ग ! इस पुस्तकसे दो बातें प्रकट होती हैं एक तो यह कि कान्यकुब्ज ब्राह्मणों को जो लोग काने तथा कुबड़े दो मूख भाइयोंके सन्तान कहकर निन्दा करते हैं
(५०)
करवातमिथ्या निर्मूल है । द्वितीय कान्यकुबजादि नाम
होने मात्र से जो अपने को स्वयं बड़ा मान बैठे हैं यह भी
युक्ति प्रमाणसे विरुद्ध मिथ्या है परन्तु कान्यकुबजादि की
जो वेदाध्ययनयज्ञानुष्ठानादि सदाचारों के द्वारा प्रतिष्ठा हुई
वा होगी वह सब शास्त्रानुकूल ठीक है। अब ऐपा ममय भा-
गया है कि सब नामों वाले ब्रालयको नाम मात्र मागी
प्रतिष्ठाका अहंकार छोड़के अपने २ कुलों वा जातियों में जो२
कुरीतियां काल पाकर चल गयीं हैं उनको जातीय सभादिके
द्वारा हटाके मन्धादि महर्षियोंके कहे प्रतिष्ठा के . मार्ग का
प्रचार अपने २ कुलोंमें प्रारम्भ करदेना चाहिये ।
विप्राणांशोनताज्यैष्ठयं क्षत्रियाणांतुवीर्यतः ।
वैश्यानांधान्यधनतः शूद्राणामेवजन्मतः ॥
ब्राह्मणेषुचविद्वांसो विद्वत्सुकृतबुद्धयः ।
कृतबुद्धिषुकर्तारः कर्तृषुब्रह्मवेदिनः ॥
भा०-ब्राह्मयों में जो जितना अधिक ज्ञानी है वह वैसा
ही अधिक माप तथा श्रेष्ठ है, क्षत्रियों में अधिक पराक्रमी,
वैश्योंमें अधिक धनी और शूद्रोंमें बड़ी आयु वाला मान्य है।
अन्य वर्णासे सभी ब्राह्मण श्रेष्ठ, साधारण ब्रालगोसे विद्वान्
श्रेष्ठ, विद्वानों में अनुभवी विद्वान् श्रेष्ठ, अनुभवियों में धर्म
कर्म निष्ठ विद्वान् श्रेष्ठ, और उनमें भी ब्रह्मज्ञानी विद्वान् ब्रा-
लगा सबसे अधिक श्रेष्ठ और मान्य है। जब तक ब्राह्मणों
में श्रेष्ठ मानने की यही प्राचीन रीति विद्यमान रही तब
तक इस जाति की बड़ी उन्नति थी अब भी यदि इमी वि-
चार का नवलम्बन,
किया जायगा तो महा प्रतापी तेजस्वी
अझर्षियों के सन्तान ब्राह्मण फिर भी कभी उन्नतिके प्रिखरपर
मारूढ़ हो सकते हैं।
निवेदक-ब्राह्मणानुचर
भीमसेन शर्मा सम्पादक ब्रा० स०
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पुस्तक मिलने का पता-
मैनेजर ब्रह्मप्रेस
इटावा।
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