Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Sanskrit Rachananuvada Siksaka

Sri Visvesvara · 2010/12

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THE
HARIDAS SANSKRIT SERIES
133
SANSKRIT
RACHANĀNUVĀDA SIKSAKA
DY
SRI VISVEŠVARA, Siddhanta Siromını
IV.th a Foren oru bi
ĀCHĀRYA INDIRĀ RAMANA SĀSTRI
Edited by
PANDIT SRI ANANTARĀMA SĀSTRI VETĀL, Sahityachārya
Re-edited with Appender
by
JĀNAKIDEVI PATHAKA
Sanskrit Professor Murari Shatri Inter College, Agra
FE
15
पाशर
THE
CHOWKHAMBA SANSKRIT SERIES OFFICE
VARANASI-I
1970

सम्मतयः श्रीमन्माध्वसम्प्रदायाचार्यदार्शनिकसार्वभौमसाहित्यदर्शनाद्या- चार्यतरलन्यायरत्न श्री गोस्वामि-दामोदरशास्त्री प्रथमपरीक्षापाठ्याध्ययनयोग्यानुपचिकीर्षुणाऽतिसरलरीत्या निबद्धस्य 'सस्कृतरचनाऽनुगादशिक्षकस्य प्रथमभागमापाततोऽवेच्याद्यन्ने प्रचल्चू र्यमाणाशुद्धिबहुलमुद्रितपुस्तकापेश्ययाऽवद्यहसिमानचानालोच्याभिमतपू तयेऽलङ्कर्मीणोऽय निबन्ध इति विश्वमिमि । ग्रन्थ महामहोपाध्याय श्री हरिहरकृपालु द्विवेदी ५० श्रीविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिमहोटयेन निर्मितमन्वितार्थनामक मस्कृतरचनाऽनुमादशिक्षकारय सक्लमरिकलमपालोकिपि। सस्कृतरचनाकौशल कामयमानाना कृते उपादेयैपियैर्नितरामगुमपूपुरत् म। यद्यपि शन्दशरीरेण नायमतिदीर्घस्तथाऽप्यर्थात्मगुणेन गरीया नेव, प्ररोचनाप्रत्ययो मा भूदित्यत्मीयगुणगणवर्णन न व्यस्तरिपि । परिशीलितोऽच अन्य स्वयमेव स्व सार प्रकाशयिष्यतीति न तिरोहितम् क्षारतामित्यतोऽपि बहुवाग्विन्यासमा समुपेक्षिपीति शिवम | महाशाब्दिक श्री सभापतिशोपाध्यायः श्रीविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिना सम्पदितोऽय 'मस्तरचनानुवाद- शिक्षक' सस्कृतमापाजिन्नासूना कृते ममुपरिप्यन् स्वीयोपयोगेन नस्कृतज्ञान सन्तोषयन्नतिनरा रयातिमाप्नुयादिति सम्भावयति ।

महामहोपाध्याय श्री चिन्नस्वामिशास्त्री 'मम्कृतरचनानुवाल शिक्षा स्यो लघुमन्यो मया मममोऽवलोफिनोऽ- धानेन सह ! अन्धता च प्रथम-परीक्षाया कृते विद्यार्थिना यात् मारल्य सोकर्य च सम्पादयितु शक्यते नापते तस्मै सुप्रयतितम् । विश्व मिमि तत्र तेन साफयमाप्तमिति । एतादृश तत्परीयोपयोगी प्रन्योऽ- तिविरल एनाय यावत प्रकाश गमित । अतो दृष्ट्येन समतुण्यन्मामक मतितरामन्तरङ्गम् । माणरकाचैन यथावदुपयुज्याऽऽत्मीयम्लेशनिवारण- द्वाराऽनुत्तम फलमराप्नुयु अध्यापयितारच तन ममुचित महाग्यमाधाय पतु फारयितुत्रोत्सामभिवर्धयुरिति मुदृढ विश्वसिमि । श्री परमानन्द शास्त्री (प्रधानाध्यापक -श्री राधाकृष्ण स० महाविद्यालय, खुर्जा, बुन्दशहर) अस्य 'मम्कतरचनानुगादशिपकस्य' रचनया प्रथम-परीक्षा दित्सूना छात्राणा महत्काठिन्यमपाकरोदस्य पुस्तकस्य मुयोग्यो लेखक । मंगरपि प्रथमपरीक्षार्थिभिस्तदध्यापकैश्चास्य पुस्तकस्य यथेष्ट प्रचार विधाय लेग्यकपरिश्रमस्सफलो विधेछ । इद पुस्तक प्रथमपरीक्षार्थिना कृतेऽती- वोपत्रोगीति मे सरम्भ इति । - श्री हरिदत्त शर्मा (प्रिन्सिपल-गुरुकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर, सहारनपुर ) 'सस्कृतरचनानुसादशिक्षक' प्रतिपृष्ठ मया व्यलोकि । अद्यावधि प्रथम-परीक्षोपयोगि, दंग पुस्तक न मल्लोचनपथमनतीर्णम । एतत्पुरतक प्रथमपरीक्षा निसूना महत्साहाय्य विधास्यतीति मे निश्चिन मतम् । अह हृदयेनाऽस्य साफल्य कामये ।

- श्री शिवकुमारशास्त्री ( प्रधानाध्यापक -सस्कृतमहाविद्यालय, आगरा) लोचनगोचरीकृतो मया 'मस्कृतरचनानुवादशिक्षक' प्रथमपरीक्षा- बिना कृते यत्मत्य शिक्षक एवाऽयम् । एनमधीत्य, अध्यापक्सागय्य पिनाऽपि तरीतु शक्यो विद्याथिमि प्रथमपरीभोदधि । श्री कैलाशचन्द्रशास्त्री प्रधानाध्यापक-श्री स्याद्वादजैनमहाविद्यालय, काशी) काशीस्थ हरिदाससस्कृतप्रन्धमालात प्रकाशित 'सस्कृतरचनानुमा- दशिक्षक' समयलोस्तिो मया। अस्या ग्रन्थमालाया सवालका सम्कृत- पद्यानुरागिण मन्ति । त सस्कृतोद्यान विविधप्रन्थकुसुमाकरे पयितु सर्पदैव मन्नद्धा । यद्विना मस्कृतोद्यानमपरिपूर्ण प्रतिभाति ते तत्र तदेव समारोपयन्ति । नदर्थञ्चायमेघ सस्कृतरचनानुवादशिक्षा' प्रमाणीभूत ! अस्य साहाय्येन प्रथमपरीक्षार्थिन प्रथमपरीक्षातरङ्गिणी तरितु समर्था भरियन्तीति मे मति । SURENDRA NATH SHASTRI, M A LL B Principal, Sanskrit College, Indore I have gone through the book by name 'Sanskrit Rachanı nuvada Shikshaka' written by PL Vishuesha ar Siddhanta Siro mani and published by you The book opens with small sentences and with gradual introduction of the Sanskrit grimmatical technicalitics it ends with a few select exercises for translation from and into Sanskrit The book will indeed be useful to the beginners for whom it is primarily meant Though The Scheme of the book is outlined almost similar to Dr Bhandarlar s Margopideshuka, still your book has a variety of fornis especially crusals, Potential participles and specimen letters which will make the students more familiar to the classical Sanskrit I congratulate you for the publication and the author for the compilation प्राकथन सस्कृत भाषा ससार की प्राचीनतम भाषाओं में अन्यतम है और यही सय से प्राचीन है क्योंकि विश्ववाद्यय का सप से पुराना प्र-य पारवेद सस्कृत भारती का ही सर्वोत्तम ज्ञान विनानकोश है । परकृत ससारण्यापो भाषा है, यह भूगोल के प्राय समो सम्प देशों में प्रचरित और सुप्रथित है, भत इसे विश्वमापा यहो में भी कोई भयुक्ति नहीं होगी। आयुग के मासास्कृतधर्मा महपियों के अपरोक्ष भनुभवों से लेकर माधुनिक काल के यदे पढ़े भारतीय तथा अन्यदेशीय मनोपियों के महिचारों से भोस प्रोस होने के कारण मस्कृत पाहमय का महत्व लोकोत्तर हो गया है। भारतीय पुरातात्र के विषय में पूर्ण और यथार्थ जानकारी के लिये तो सस्कृत ही एकमात्र भनन्यसाधारण साधा है, भत यह न केवर भारतवर्ष के ही लिये प्रत्युत सारे ससार के लिए भी ज्ञानवर्धक सर्वज्ञानमय पामय है, यही कारण है, कि समार के अन्यान्य देशों के विमर्शक विद्वान् सरन पाहमय के प्रत्येक अङ्ग का अध्ययन और अनुसन्धान बड़े मनोयोग से करते हैं । विदेशीय विद्वानों में येदों से लेकर पचतन्य ऐसे साधारण नीति प्रयों तक के सुसम्पादन, अनुवाद, पाण्या7, मुसस्करण और प्रकाशन अपने घोर परिश्रम और अमीम अर्थग्यय से किये हैं। इधर भारतवर्ष में भी इसके सम्बन्ध में बहुत कुछ चेष्टायें हुई है, पर, इस देश को अपो विशेष सांस्कृतिक वाडमय सस्कृत के लिये जितना प्रयास करा चाहिये, उतमा अवश्य नहीं हुआ है। यद्यपि उपर्युक्त कारणों से सस्कृत विश्वमापा हो गई है, तथापि भारतीयो-विशेषत हिन्दुजों का इससे धार्मिक, सास्कृतिक और सारा सामाजिक सम्बन्ध है, माथ ही भारत के प्रत्येक हिन्दूप्रधान प्रात की भाषा सस्कृत की ही पुत्री हैं। यहला, मराठी गुजराती और हिन्दी आदि भाषाओं पर आपातत दृष्टिपात करने से भी यह बात स्पष्ट ज्ञात हो सकती है, इन भाषाओं में सम्मति भी प्रतिशत नग्धे सस्कृत शब्दों का ही प्रयोग होता है। भय तो हिन्दी ही भारत की राष्ट्रभाषा होने जा रही है, इसे धन-धाम और मौन्दर्म-सम्पत्ति सस्कृत से हो मिली है, और भागे भी सरकृत से ही इसकी श्रीवृद्धि और समृद्धि हो सकती है। इधर 'हिन्दुस्तानी' के (८) आन्दोलन से हिन्दी के लिये जो मय उपस्थित हो गया है, उसके कारण, हिन्दी में रक्षा का भाव भी हिन्दीभाषियों में प्रबल हो उठा है, और सब लोग यही अनुमा कर रहे हैं कि सस्कृत के 'तमव' और 'तरसम' शब्दों के प्रचुर प्रयोग तथा प्रचार में द्वारा ही राष्ट्रभाषा हिन्दी की रक्षा और अभिवृद्धि की जा सकती है। इन कारणों में यह नि सन्देह सिद्ध होता है कि हिन्दूधर्म, हि दूसस्कृति, प्रान्तीय भाषाओं और हिन्दीमापा की एक ही साथ रक्षा और समृद्धि के लिये सस्कृत का मायया- अध्यापन और प्रचार करना नितान्त अपेक्षित और परम भावश्यक है। पर, इस उद्देश्य की पूर्ति सुशिक्षा के द्वारा ही हो सकती है, और सुविधा के लिये सहज तथा साल शिक्षापद्धति का अवलम्बन फरमा भधिक उपयुक्त और अल्पायास में समधिक फलाद हो सकता है। सन्तोप और प्रमोद का विषय है कि सस्कृत शिक्षापद्धति के सुधार की ओर भी सस्थाओं सथा विद्वानों का ध्यान आकृष्ट हुआ है और अनुदिन हो रहा है। . किसी भी भाषा के द्वारा शिक्षा पाने के लिये सम से पहले उस भाषा पर करना करना आवश्यक होता है, क्योंकि भाषा के द्वारा ही, धर्म, दर्शन, विज्ञान इतिहास, साहित्य आदि विविध विषयों का अपेक्षित ज्ञान प्राप्त किया जा सकत है। भाषाशिक्षण के लिये भाषाविनिमय, एक भाषा के शब्दों का पापयों को दूसरी मापा के शब्दों या वाक्यों यवल मे, परिवर्तित वा अनूदित करने की मुख्य भावश्यकता है, इसकी पूर्ति के लिये 'अनुवाद' पद्धति का आविष्कार प्राय ससार की सभी मापाओं में हुआ है, और इस भाषाविणान के युग म उसकी उन्नति और परिक्रिया दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। दपंको पात है कि सस्कृतशिषण के लिये भी आधुनिक युग की इस परमोपयोगी पद्धति से फाम लेने की प्रवृत्ति लोगों में जागृत हुई है। भापश्यकता भाविष्कार की जनमी होती है', मता जय सस्कृत से हिन्दी में परस्पर अनुवाद करमा सीपने की आवश्यकता उरपक्ष हो गई है, सय विद्वानों ने भी विविध इसिकसम्यतामय, स्वरपश्रम में अधिक लाभप्रद, अनुपाद-प्रन्यों के प्रणयम में यथेष्ट प्यान दिया है, और विनेषों, पात्रों की वर्ग-(श्रेणि) योग्यमा के साम्य, उपयुक्त, पुस्त ..

(६) प्रस्तुत कर रहे हैं। सिद्धातशिरोमणि पण्डित श्रीविश्वेश्वर शास्त्री ने हाल में इधर एक ऐसा ही रसुस्य प्रयल किया है, प्रस्तुत पुस्तक भापके उसी प्रयत का सर्यानसु दर फल है। पुस्तफ की उपयोगिता और उपादेयता के विषय में हमें अधिक कुछ भी नहीं लिखना है, स्वय रेसको भूमिका में इसका सरित परिचय दिया है। सय से अधिक, यह पुस्तक ही स्वय अपना परिचय दे रही है, हमें पूर्ण भाशा और विश्वास है कि यह पुस्तक अपने उद्देश्य में यथेष्ट मफल होगी, मत संस्कृत और साथ ही हिन्दी के शिक्षार्थियों को इससे अवश्य लाभ उठाना चाहिये । हमारा तो यहाँ तक एयाल है कि सरकृतमूलक यगएा, मराठी, गुजराती आदि अन्यमान्तीय मापाभों के द्वारा संस्कृत सोचनेवाले और अग्रेजी के साथ संस्कृत पदोवाले छात्रों के लिये भी ऐसी अनुवादपुस्तकें भात' सहायफ हो सकती है, क्योंकि मस्कृतमूलक हिन्दी क साथ तन्मूलक प्रान्तीय भाषाओं फा सहज सुबोध सम्बध है। अस्तु, 'सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक' इस अन्वर्थ मामवारी पुस्तक के लेखक उपयुक्त पण्डित जी धन्यवादाई है। यहाँ इस पुस्तक के प्राशन के सम्बन्ध में भी दो यात कहना भावश्यक है। वाराणसेय चौग्म्मा सरकून सारीज, उससे सम्बद्ध चौसम्वासस्कृतमयमाला और तदन्तर्गत कई ग्रन्थमालाशों का परिचय देश-विदेश के प्राय सभी सस्कृत प्रेमियों को होगा। जर्मनी आदि घेदेशिक स्थानों म भी चौरसम्या-सस्कृतप्रन्य मालाओं की पुस्तके मगाई जाती है। नवीन युग के बहुत से प्रयकारों ने इन मालाकों में प्रकाशित ग्रन्थों से यथाप्रयोजा उद्धरण लेकर उनका हवाला दिया है। इन बातों से इस संस्था की व्यापकता, लोकप्रियता तथा उपादेयता स्वत सिद्ध है। सस्कृत वाङ्मय के पुरुजीवन मजैसी प्रकाशनसस्थाओं की भावश्यकता है, उनमें काशीपुरी की यह प्रकाशनसस्था भी अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है। इसके द्वारा सस्कृत के प्राचीनतम और दुर्लभ सद्ग्रन्थरस समय समय पर, प्रकाशित भऔर देश-विदेशों में प्रचरित होते भाये है । अवश्य ही वैसे प्रकाशनों से चौसम्म सस्कृत प्रन्यप्रकाशन सस्था के अध्यक्ष और सहालकों को विशेष घाटा नहीं, तो नफा भी नहीं हुआ होगा, क्योंकि एक तो सस्कृत के उञ्चविषयक २स०र० (१०) अन्यों के पाठकों की सण्या ही कम है, दूसरे सस्कृत के अध्येताओं में प्राय निर्धनता होती है, जिसे देसफर हो, 'माम्वती से लथमी के चैर की रात मिर हो गई है, मुतरी भारतीय सालों में क्रयशक्ति पयोह नहीं है, ऐसी दशा में भी चौखम्या सस्कृत सस्था के सुयोग्य अधिकारियों ने अपना व्यवसाय और माहस नहीं छोड़ा है, इसके लिये ये भूरि भूरि प्रशसा के पास है। इधर कई थों से इस सस्था ने परीक्षोपयोगी सामयिक ग्रन्थों का सस्ता प्रकाशन भी किया है, और भय भी कर रही है, प्रस्नुन न य 'सस्टरचनाऽनुवा-शिक्षक ऐसे ही प्रकाशन का एक सुपरिणाम है। कागज, चपाई, सफाई भादि के हुन्दर होने पर भी यह साया अपेजात सस्ते दाम म पुस्तके देता है, सिमे, निर्धन सस्कृती का कुछ उपकार और मुश्यिा हो जाती है, अत इस मम्धा यो पुस्तकों को आवश्यकता के अनुमार अपनाकर सरहतमी सजन इसका उत्साह बढ़ा सकते हैं। यदि सन की परीक्षासंस्थाय-विशेषन पिदासस्वर समिति, गवर्नमेण्ट सम्पत पालेज कानी, और हिन्दूविविधालय कामी-प्रभृति हिन्दीमान्तीय परीक्षासस्थाय-हम पुस्तक को अपनी परीक्षा के पाटयक्रम में रब है, तोरपा और अनुवाद के विषय में छात्रों का उपकार हो, और प्रशासक का उत्साह भी घदे जिससे एनरपिपी पुस्तकों के प्रकाशा और प्रचार के मरकार्य में टोगों की अधिकाधिक प्रवृत्ति को प्रोत्साहन और प्रति मिले। किमधिक विगेपु ? इति राम । चोर ति० ६-११-१७ दिनांक १८-२-४१ श्रीकाशी विद्यापीठ इन्दिरारमण भूमिका प्रथमा परीक्षा के छात्रोको अनुवाद या अन्याम परो-कराने के लिए उपयुक्त तको का प्राय अभाय ही है, जिसके कारण छात्रो और अध्यापयो दोना कठिनाई होती है। इस मठिनाई को दूर परने के लिए अनुवाद की एक को प्रारम्भिर पुस्तक की आवश्यकता थी जो बिल्कुल प्रारम्भ में अनुवाद यमो को सिम्पा सो और उन नियमो के आधार पर अनुपा' परने के अभ्यास सहायता दे सके । इसी पावश्यकता को पूर्ति के लिए प्रान पुस्तक की रचना गई है। इसमे दो शब्दा के प्रारम्भिक पाक्या से रेपर प्रथमा परीक्षा के तुम्प उचतम योग्यता पहुंचाने वाले बडे-बडे पाक्यो और प्रवरणा के अनुवाद रने के नियम अत्यत सरकरूप मे समझाए गए है गौर तदनुसार अनुवादार्थ भ्यास दिये गये है । अभ्यासाथ वाक्यो मे आए हुए पठिन शो के संस्कृत निने का प्रवध भी साथ म ही है। जिसमे यनुवाद यरने म अत्यन्त सरलता गी। पुस्तव के अन्त में मयासाथ संस्कृत तया हिंदी के ९० प्रकरण दिए है। प्रत्येव प्रकरण एक दिन के अभ्यास के लिए पर्याप्त है। इसलिए उसे क दिन में पूरा करना चाहिए। संस्कृत और हिंदी के प्रकरण पर्याय से दिए ए हैं जिसस एक दिन मंस्कृत मे हिदी और दूसरे दिन हिदी से सस्कृत में नुवाद पराया जा सके । इस पुस्तक के पाठो मे दिए हुए नियमा को समझा र और पठिन शब्दो को याद कराकर ही पाठो मे अभ्यासार्थ दिए हुए वाक्यो 7 अनुवाद कराना चाहिए। तभी पुस्तक प्रयोजन सिद्ध होगा और विद्यापियो को यथाथ लाभ होगा। अन्यथा केवल वाक्य अनुवादाथं दे देने से नियमा से नभिश होन से विद्यार्थियो को न योग्यतावृद्धि होगी और न उन पाक्यो का नुयाद ही ये सरलता से कर सकेंगे। अत एव आशा है इन निर्देशो को ध्यान रमते हुए छात्र और अध्यापक अनुवाद का अभ्यास करेंगे और करायेंगे, जससे छात्रो की योग्यतावृद्धि होगी भोर लेखब का श्रम भी सफल होगा। यह पुस्तक न केवल प्रथमा परीक्षा के लिए, अपितु प्राश, हाई स्फूल तथा डवास आदि परीक्षाओ के लिए भी पूर्णतया उपयुक्त है। आशा है इस पुस्तक प्रचार होगा, और सस्कृत के विद्यार्थी इससे यथेष्ट लाभ उठावेंगे। रुकुल वि० वि०, वृदावन माघ पूर्णिमा, १९१७ निश्वर, सिद्धान्तशिरोमणि .

परिवद्धित संस्करण परमात्मा की कृपा से प्रस्तुत पुस्तक का यह परिवर्तित किरण प्रकाशित हो रहा है। अध्यापकों तथा छात्रों ने इसे अपना पर हमें आभारी किया है। प्रारम्भ में यह पुस्तक प्रथमा परीक्षार्थी छात्रों की हष्टि से लिसी गई थी। अतः सधि, शब्दरूपादि नहीं दिय गये थे । पयोंकि वे छान लघुकौमुदी पढते ही है । परन्तु प्रस्तुत पुस्तक हाई स्कृल के छात्रों के उपयोग में भी आ गई है। अत सन्धि, शब्दरूपादि कतिपय विषय आवश्यक समझ कर इस मसरण में बढा दिये गये है। इन विषयों में कुछ नत्रीनशैली या आश्रय लिया गया है। छात्रों को उससे अधिक लाम होगा। प्रस्तुत संस्करण के परिशिष्ट की लेसिका श्री पण्डितपर्य शरदेव जी पाठक की धर्मपती श्री जानकीदेवी जी पाठक है। आप अपने जीवनकाल में २० वर्ष तक आगरा नगरस्थ मुरारी सनी इंटर कालेज व दयालबाग में सस्कृताध्यापिका का कार्य सम्पादा करती रही है और सम्प्रति वृन्दायन हाई स्कूल म काम कर रही है व इस विषय की माप अनुभवी हैं । आपन ही प्रस्तुत संस्करण का सम्पादन भी दिया है। -विश्वधर

॥ भो ॥
संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः
प्रथमः पाठः
क्रियापदानि
वर्तमानकालः ( परस्मैपदम् )
प्रथमगगा. भ्वादि ): पष्टगण ( तुदादि.)
गच्छति - वहजाता
है सृजति - वह बनाता है।
नयति - वह लेजाता है। लिखति - वह लिखता है।
पतति - वह गिरता है। विशति = यह घुसता है।
भवति यह होता है। स्पृशति यह छूता है।
रक्षति - वह रक्षा करता है। दिशति ८ वह बताता है।
वदति - यह बोलता है। इच्छति = वह इच्छा करता है।
वसति - वह रहता है। पृच्छति = वह पूछता है।
सरति = घद सरकता है। मुञ्चति - वह छोड़ता है।
'गच्छति' इत्यादि जिन रूपों में 'ति' प्रत्यय लगा हो उन्हें वर्तमान के
तृतीय पुरुष (प्रथम पुरुष ) का रूप समझना चाहिए।
'ति' यह वर्तमान के तृतीय पुरुष ( पथम पुरुष ) के एकवचन का प्रत्यय
है और इसके साथ स (वह) अथवा कोई सशाशन्द प्रयुक्त किया जाता है।
(स ) के न होने पर भी उसका अर्थ वह समझ लिया जाता है।
स इच्छति - वह चाहता है राम इच्छति - राम चाहता

ति) संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक। गच्छति । गच्छ् + अ + ति) सृजति (सन्+अ+ति) नयति ( नय + अ • ति} लिखति ( भि+अ+ति) पतति । पत् + अ + ति) विशति ( विश्+अ+ति) भवति ( भ +अ+ति ) पृशति ( स्पृश्+अ+ति । रक्षति । रक्ष + भ+ दिशति ( दिश+म+ति ) 'गन्छति' तथा 'सृजति' इत्यादि रूपों में धातु के आगे 'अ' गाया जाता है। यद्यपि दोनों प्रकार के रूपों में अरगाया गया है तथापि इनमें थोड़ा भेद है। 'नयति' आदि रूपों में धातु के आगे अल्गने पर धातु में गुण हो माता है पर तु 'सृजति' आदि में अ लगने पर भी गुण नहीं होता है । जिन घातुओं में गुण होता है वे प्रथम गण तथा जिन में गुण नहीं होता वे पप्ठ गण में समझी घाती हैं। नयति - (नो + अ -ति, नय+ अ + ति - नयति) यहाँ नी को गुण हो कर ने तथा ने से नय बना है। सृजति - (राज + अ + ति - सृजति) स्पृशति = (स्पृश् + म+ति स्पृश्थति, ) यहाँ गुण नहीं होता। यदि सज आदि धातु प्रथम गण की होती तो सर्जति, स्पर्शति आदि रूप होते । धातुकोप प्रथमगण स्पादि.) पटगण. ' तुदादिः) :-- गम (गच्छ। - माना। सम - चनाना, निर्माण करना। नी ( नय) - ले जाना। लिगव - लिखना। पत् - गिरना। विश् = घुसना, प्रविष्ट होना । भु ( भय ) - होना। स्पृश् - सुना। रक्ष - रक्षा करना। दिश - बनाना। घद् बोरना। इप (इफ्ट) चाहना। यम रहना, निवास करना। प्रच्छ (पृच्छ)- पूछना। स(सर) -सरकना। मुच (मुरुच)- छोड़ना। - - - . - ट द्वितीयः पाठः वर्तमानकाल (प्रथमपुरुप ):-- यमत: - वे दोनों रहते हैं। वसन्ति वे सब रहते हैं। वदत वे दोनों बोलते हैं। वटन्ति - वे सब बोलते हैं। पत्तत ये दोनों गिरते हैं। पतन्ति - वे सब गिरते हैं। 'वसत' इत्यादि जिन रूपों में 'त 'स्गा हो उ प्रथम पुरुष के द्विवचन का रूप तथा 'वसन्ति' आदि जिनम 'अन्ति' लगा हो उन्हें प्रथम पुरुष के बहुवचन का रूप समझना चाहिए। 'a' यह वर्तमानकाल के प्रथम पुरुष के दिवचन का प्रत्यय और 'अन्ति' यह वर्तमानमाल के प्रथमपुरुष के बहुवचन का प्रत्यय है। 'त' के साथ 'तो' अथवा सशाशन्द प्रयुक्त होता है तथा सशाशन्द की प्रथमा विक्ति का द्विचनान्त रूप प्रयुक्त होता है । जैसे तो वसता-ये दोनों रहते है । याली वसत वे दोनों बालक रहते हैं। प्रथम पुरुष के बहुवचनान्तीय 'अन्ति' के साथ बहुवचन सर्वनाम 'ते' अथवा सशाधन्द का प्रथमा विमक्ति का बहुवचनान्त प्रयुक्त होता है । जैसे ते वसन्ति - वे सब रहते हैं। नाला वसन्ति - वे सब बालक रहते हैं। चतुर्थगण ( दिवादि.).- नश्यति वह नए होता है। नश्यन्ति - वे सर नष्ट होते है। नृत्यति - यह नाचता है। नृत्यन्ति - वे सब नाचते हैं। कुप्यता- वे दोनों कोध करते हैं। कुप्यन्ति वे सव गुस्सा करते हैं। लुभ्यता - वे दोनों लेम करते हैं। लुभ्यन्ति वे सब लोम करते हैं अध्यतः = वे दोनों कोध करते हैं। ग्रुध्यत्ति-वे सब झोध करते हैं। पुष्यत वे दोनों पुष्ट होते हैं। पुष्यन्ति = वे सन पुष्ट होते हैं। धातुकोप. चतुर्थगण ( दिवादि ) - नष्ट होना। नृत् - नाचना। कुप् - क्रोध करना। क्रुध् - क्रोध करना। लुभ - लोम करना। पुप - पुष्ट होना। - नश मस्कृतरचनाऽनुवादशितक | अनुवाद करो. वे दोनों जाते हैं। वह रहता है। वे सब नाचते हैं। वह गुस्सा करता है। वे दोनों नाचते हैं। वे सत्र रक्षा करते हैं। से दोनों गिरते है। वे सब पनाते है। तृतीय. पाठ वर्तमानकाल. ( मध्यमपुरुप ) कुप्यसि = तू मुद्ध होता है। रक्षध - तुम सय रक्षा करते हो। नश्यसि - तू नष्ट होता है। मजय तुम सब बनाते हो। नृत्यय' - तुम दोनों नाचते हो। लिमय- तुम सब लिम्वते हो। नगथ • तुम दोनों ले जाते हो। स्पृशध तुम सब छूते हो। तुम दोनों गिरते हो। वदध तुम सब बोलते हो। उपरिलिखित वाक्यों को दसने से अधोलिखित नियम निकलता है १ वर्तमानकाल के द्वितीयपुरष ( मध्यमपुरुष ) के एकयनन का प्रत्यय 'सि', द्विवचन का 'थ' और बहुवचन का प्रत्यय 'य' है। इस प्रकार मध्यम पुरुष के रूप एकरचन में 'गच्छसि द्विवचन में 'गच्छथ' पहुवचन में 'गच्छय' पतथ - २ किया के मण्यम पुरुष के रूपों के साथ सर्वदा 'युष्मद्' शब्द के रूपों स्य, युवाम् , यूयम् ) का ही प्रयोग होता है, किसी सशाराम्द कानी । पर तु युष्मद् शद के रूपों का प्रयोग न होने पर भी उनका अर्थ प्रकट हो जाता है। त्वं पुष्यसि - न कुछ होता है, कृष्णमि • तू मुम होता है, यादि । - r घातकोपः प्रथमगण (भ्वादि जि ( जय ) - बीतना। दृश् - (परम् । देखना। त्यन- छोड़ना। करना। मि १ -- । सस्कृवरचनाऽनुवादशिक्षकः । धाव-दौड़ना। पच = पकाना। जोष जीना। स्मृ । स्मर याद करना । पा (पिब । पीना ह (हर)=चुराना, छीनना । द -चलाना स्था ( तिष्ठ )-ठहरना। चतुर्थगण ( दिवादि ): पष्ठगा ( तुदादिः) अस्पंकना। विप=पना । कुस्-आलिङ्गन करना। तुद्-दुस देना। तुप-प्र प्रसर होना, तृप्त होना। सिच-(सिञ्च ) = सोचना । सुठ%D लूटना, लोटना। ऋच-स्तुति करना। शुप् - सूखना। हप- तृप्त होना। अनुवाद करो वदथः। दहति । लुभ्यन्ति । मुम्वन्ति । गन्छन्ति । जीवत । स्पृशथ । विशन्ति । नयथ। नमन्ति । मृजथ । पतत । पुष्यथ । इच्छन्ति । यजत । वसन्ति । नृत्यमि। पृच्छथ। तुष्यथ । संस्कृत में अनुवाद करो तुम (सब) बोलने हो। वे होते हैं। बालक ( सन ) बानते हैं। तुम ( दोनों ) खाते हो। तू ले जाता है। वे ( दोनों ) दुख देते हैं। तू पुष्ट होता है। त् पीता है। 4 ( सब ) नाचते हैं। पूजा करते हैं। वह लोम करता है। वेले जाते हैं। तुम सब छूते हो। तुम फेंकते हो। 'तुम दोनों चुपते हो। वे आलिंगन परते है। तुम ( दोनों) खुश होते हो। वे (दोनों) सूखते हैं। तू सोचता है। भवसि । 3 1 ४ सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक । अनुवाद करो - वे दोनों जाते है। वह रहता है। वे सब नाचते है। वा गुस्सा करता है। वे दोनो नाचते हैं। वे सर रक्षा करते हैं। वे दोनों गिरते हैं। वेसर बनाते हैं। A तृतीय. पाठ वर्तमानकालः (मध्यमपुरुष ) कुप्यसि - तू गुद्ध होता है। रक्षथ - तुम सघ रक्षा करते हो। नश्यसि तू नष्ट होता है । मजथ तुम सब बनाते हो। नृत्यय. • तुम दोनों नाचते हो। लिवथ - तुम सब लिखते हो । नगथ - तुम दोनों ले जाते हो। स्पृशथ तुम सब छूते हो। पतथ तुम दोनों गिरते हो। वदथ - तुम एव बोलते हो। उपरिलिसित वास्यों को देखने से अधोलिखित नियम निकलता है १ वर्तमानकाल के द्वितीयपुरुष ( मध्यमपुरुष ) के एकवचन का प्रत्यय 'सि', दिवचन का 'य' और बहुवचन का प्रत्यय थ' है। इस प्रकार मध्यम पुरुष के रूप एकवचन में 'गच्छसि दिवचन म 'गच्छथा' बहुवचन में 'गच्छय' pa . - २ किया के मध्यम पुरुष के रूपों के साथ सर्वदा 'युष्मद्' शब्द के रूपी त्य, युवाम् , यूयम् ) का ही प्रयोग होता है, किसी रामाचन्द का नहीं। परन्तु युष्मद् शन्द के रूपों का प्रयोग न होने पर भी उनका अर्थ प्रकार हो जाता है। जैसे त्व कुप्यसि - तू द होता है, कृष्णसि - तू मुद होता है, या घातकोप प्रयमगण (मादि):- जि (जय ) - बीतना। यज होम, पूषा करना। देश (पत्य । देखना। नम् - II, HIम करना। त्यज छोड़ना। यह-दोना, माना। M पचन . सस्कृतरचनाऽनुवादशितफः । धाव दौड़ना। पकाना। जो जीना। स्मृ । स्मर = याद करना। पा (पिब। पीना ह. (हर)=चुराना, छीनना । दह -पलाना स्था ( तिष्ठ )-ठहरना। चतुर्थगण (दिवादिः). पष्ठगण ( तुदादिः) असफेंकना। सिप-पेंकना। इस-आलिजन करना। तुद्-दुःस देना। तुप-प्रसार होना, तृप्त होना । सिच-(सिञ्च् ) = सोचना । ठ% लूटना, रोटना। ऋच-स्तुति करना। शुप- सूखना। तृप - तृप्त होना। अनुवाद करो बदथः। दहति । लुभ्यन्ति । मुश्चन्ति । गन्छन्ति । जीवत । स्पृशय । विशन्ति । जयथ। नमन्ति । सृजथ। पतत । पुष्यथ। इच्छन्ति । यजत । वसन्ति । नृत्यमि। पृच्छथ। तुष्यथ । संस्कृत में अनुवाद करो तुम (सब) बोलते हो। वे होते हैं। बालक (सत्र ) जानते हैं। तुम ( दोनों ) खाते हो। तू ले जाता है। वे ( दोनों ) दुग्य देने हैं। तू पुष्ट होता है। तू पीता है। वे (सर) नाचते हैं। वे पूजा करते हैं। वह लोम करता है। वे ले जाते हैं। तुम सब छूते हो। तुम दोनों चुराते हो। वे आलिंगन करते है। वे फेंकते हैं। तुम ( दोनों ) खुश होते हो। वे (दोनों) सूखते हैं। तू सोंचता है। भवसि । 1 तुम फेंकते हो।

. - है चतुर्थः पाठः वर्तमानफाल' ( उत्तमपुरुप.) :- गच्छामि - मैं पाता हूँ। सृजाम -हम सब बनाते है इच्छामि - मैं चाहता हूँ धावाम - हम सब टोदते है पृच्छाप - हम दोनों पूछते हैं। शुष्याम हम सबसे पियाव. - हम दोनों पीते हैं। हराम: -हम सब चुराते हैं। अपर लिखे वाक्यों पर ध्यान देने से नीचे सिखे नियम प्रतीत होते है --उत्तम पुरुष के एकवचन का मि, दिवचन का व और बहुवचन । प्रत्यय म. है। २-मि, व. और मः प्रत्यय के पूर्व अकार को आ (दीर्घ ) हो पाता है। दशमगण (चुरादि) हालयति = यह घोता है। कथयति वह कहता चोरयति - वह चुराता है। चिन्तयामि - में चिता कर रचयाव' - हम दोनों बनाते हैं। हूँ, सोचता हूँ। पीडयाम. - हम दुख देते है। क्षालयति - (क्षाल+अयनति)। चिन्तयामि (चिन्त+अय+मि। उपरिलिखित रूप से विदित होता है कि -दशमगण में धान के आगे अय प्रत्यय बोदा पाता है। २-दशमगश में साधारण गति से प्रयम कार को दीर्घ आफार हो जाता है पर तु कथयति, गण्यति' आदि कुछ धातुओं में नहीं होता। धातुकोप प्रथमगण (भ्वादि) पतुर्थगण (दिवादि.) प्रत्- घूमना। तुम् - सन्तप्त ( दुपी) होना घर-चरना, पाना रिक्षारिसन करना। जाप -वरुपाद करना। कलम (क्रम)पना,शान्त रोना निन्द् - निन्दा करना, युरा काना । म (नाम ) क्षमा करना । भ्रम् । भ्राम)-पूमना । शम् (शाम् ) शान्त हो। . शंस संस्कृतरचनाऽनुषादशिक्षकः। ७ पष्टगण: ( तुदादिः).- न्छ- क्न चीनना। म्फर - चमफना। नकप जीतना, खींचना । धि ० धारण करना। दशमगण (चुरादि.) गण - गिनना । चुरचुराना। घुप् ( घोप् ) माहिर करना, प्रथ-प्रसिद्ध करना। फथ-पहना। चिन्त - सोचना, विचारना । वर्ण : वर्णन करना,स्तुति करना । घोषणा करना। अनुवाद फरो बोरयाव । प्रथयाव । प्रीणयथः। जयथ । कथयत । गच्छत । नश्यतः । गणयाव नयाव। नृत्याव.. विशत.। इन्छ । घोपयथ । नमथ । चिन्तायाम। चिन्तयत । स्मराव । हराप । सस्कृत में अनुवाद करो तुम ( दोनों) चुराते हो तुम गिनते थे। वे सब दुख देते है। हम बनाते हैं। - हम ( दोनों ) कहते हैं। वे (दोनों) इच्छा करते हैं। बेबाहिर करते हैं। हम ( दोनों) बीवित होते है। में विचार करता हूँ, सोचता हूँ। वे वर्णन करते है। तुम दोनों) प्रसिद्ध करते हो, लाते हो। हम मालिङ्गन करते है। वे निदा करते हैं। तुम ( दोनों )बकवाद करते हो। ना इम खुश करते हैं। वहशत कराता है। वे खींचते हैं। वे ( दोनों) प्रशसा करते हैं। ना। हम पृषा करते है । तुम घूमते हो । तुम बोलते हो। वे सोचते हैं। वे (दोनों) सतम होते हैं। हम ( दोनों) जानते हैं। वे लोभ करते हैं। तुम (दोनों) प्रसन्न होते हो। Lu ना - पञ्चमः पाठः वर्तमानकाल ( परस्मैपदम् ) प्रथमगण. ( भ्यादि.) क्षि (क्षय ) - नष्ट होना। रुह, (रोह) उगना, मदन दु (द्रव) = बाना, पिघटना । वे (वय) - धुलाना। चतुर्थगण (दिवादि.):- मद् (माद्) आनन्दित होना। श्रम् (श्राम) दशमगण (चुरादि) प्रो (प्रीण) - प्रसन्न करना । क्षन (शाल ) - धोना। रच बनाना। तड् ( ताड्) - पीटना, ठोक्ना स्पृह चाइना। तुल ( नोल)- तोलना। पूज - पूषा करना। भूप-शोमित करना। - कना। - अनुनाद करो घमत। हराम'। वदय। पुप्यसि । नृत्यामि । लुभ्यथ । विशति । इन्छसि। पूनयामि। तुदसि । घदाम । तुष्यन्ति ! मायति। जयामि। गच्छथ। माम्यसि। इच्छामि। पियाय । क्षयन्ति। वदसि । तोलयति । घोरयन्ति रचयथा प्रथयति। स्मरामि। विशमि। पुच्छन्ति। पोरयति । तोनयमि। तासयन्ति । पघाय। पूजयथ। नृत्यन्ति।

सस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षकः। सस्कृत मे अनषाद करो - यह (त् ) कहता है। ( तुम ) रहते हो। (हम) जानते हैं। (वह ) रक्षा करता है। में) गिरता हूँ। ()ले बाते है। (तू) नष्ट होता है। (१६) नाचता है। (हम) घुसते है। (तुम ) पूछते हो। (वह) क्षुब्ध होता है। (मैं) चाहता हूँ। (म) छोड़ते हो। (वह) छूता है। (तुम) याद करते हो। ( वे दोनों) ले जाते है। (वह) सोचता है। (ये ) लूटते हैं। (मैं) प्रसन्न होता हूँ। ( तुम दोनोक्ते हो। (म) कहता है। (तुम ) प्रशसा करते हो। (त्) पीटता है। ( 2 ) उगते है। ) पूषा करता है। ( मैं ) ठहरता है। (तुम) नाहते हो। ( वह ) दौड़ता है। (दोनो) नष्ट होते है। (इम ) जिन्दा होते हैं, जीते हैं। ( तुम ) दौड़ते हो। (३) पकाते हैं। (म) पुष्ट होता हूँ। ( वे दोनों ) चुराते हैं। (त् ) बीतता है। (३) पीते हैं। (हम दोनों ) देखते हैं। वह । बुलाता है। (1) दुख देते हैं। (हम) जाते है। (मैं) यक्ता हूँ। (तुम ) घोषणा करते हो। ( वह ) गिनता है। (हम) खींचते हैं। ( वे ) पिघलते हैं।

- प्रथमपुरुप मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष पठः पाठः ( वत्तमानमालिक धातुरूपाणि) गम् (गन्छ ) प्रथमगण (भ्वादिः). एक्वचनम् द्विवचनम् पहुवचनम् गच्छति गच्छत' गच्छति गच्छति गच्छथ गच्छथ गच्छामि गच्छाव. गच्छाम' पुप चतुथगण ( दियादि ) पुष्यति पुष्यतः पुष्यसि पुष्यथा पुष्यथ पुष्यामि पुष्यार पुण्यामः चुर् (चोर ) दशमगण. (चुरादि ) चोरयति पोरयत घोरयन्ति चोरयसि घोरयथ चोरयथ चोरयामि चोरयाव चोरयाम. इप । इन्छ । यष्ठगए: ( तुदादिः).. इन्छति इन्छन इन्धन्ति इन्छसि इच्छथ इच्छामि इन्दाष. इच्छामः प्रथमपुरुप मध्यमपुरुषा उत्तमपुरुष. पुप्यन्ति प्रथमपुरुष मध्यमपुरुषः उत्तमपुरुषा प्रथमपुरुष मध्यमपुरु उचमपुरुष शुद्ध परो अह पूजयसि। घय विशामि। त्य रशति। यूय पतामा ते इच्छाय । घय सिचाप यूययाम । तो गन्ध । ते नयय.। स. नश्यसि ।

-॥ . ससमः पाठ. उपसर्गा- गन्यति = पाता है पतामि = गिरता हूँ। 'प्रागच्छति - आता है। उत्पतामि = ऊपर उठता है, कूदता हूँ। उपगच्छति - पास जाता है । वदाम बोलते हैं। नयति- रे लाता है। प्रतिपदाम - उत्तर देते हैं। मानयति - लाता है। मति - सरकता है। अपनयति-दूर करता है, हटाता है । अनुसरति = पीछे पीछे आता है। अपरि लिखित 'गच्छति' धागच्छति' आदि फियाओं में क्रियापद की समानता होने पर भी क्रिया के पूर्व आ, उप आदि अन्य पद छोड़ देने से उनके अर्थ में भेद हो जाता है। ऐसे पदों को 'उपसर्ग' कहते है। इनका सम्बन्ध किया के साथ ही होता है। कुछ मुख्य 'उपसर्ग' अर्थ सहित नीचे दिये जाते है उपसर्ग अर्थ- उदाहरणम् अति - अतिशय तया उत्कर्ष अतिशेते - उकष्ट होता है प्रधानता, समीपता, तथा अधिगच्छति - पाता है। उपरिभाव आदि अभि - पास, सामने अभिगच्छति-पास वा सामने जाता है। अव - नीचे अवतरति नीचे उत्तरता है। उपपास उपगच्छति - पास जाता है। श्रा - सीमा, ग्रहण तथा विरोध आदि पागच्छति - आता है। 'प्रति-प्रत्येक, बराबरी, विरोध, परिवर्तन प्रतिभापते - उत्तर देता है। वि - अभाव, पृथक विश्लिष्यति = पृषक होता है । सम् - मिलना सङ्गच्छते - मिलता है। - अधि R - बुधा. पठन्ति श्रष्टमः पाठ प्रथमा तथा द्वितीया विभक्ति पाल कीडति - पालक खेलता है। वृक्षो पतत = ! दो) वृक्ष गिरते हैं। अश्व चरति - घोदा चलता है या नरता है। विद्वान पढ़ते हैं। देवा जयन्ति - देवता भीतते हैं। चोरी चोरयत दो) चोर जुराते हैं। पणं शुष्यति - पत्ता सूरसता है । पुष्पाणि पश्यन्ति - (वे ) फल को देखते हैं। पापानि नश्यन्ति - पाप न होते है। दुखानि गलन्ति -दुख दूर होते हैं । पन्या पठति की पड़ती है। प्रमदे गच्छतः ( दो स्त्रियाँ बाती है। यालिफा धापन्ति - लद्दपियाँ दौड़ती है। धर्ममुपदिशामि - ( मैं ) पर्म का उपदेश करता हूँ। असत्य घदथ - (तुम) अठ बोलते हो। पालो ताइयति - ( घर दो बाल्फों को वीरता है। वेदान पठाम - हम ) येदों को पढ़ते है । पुस्तकानि लिम्वन्ति (2) पुस्तक लिगते हैं। जानरा वृक्षमारोहन्ति • बन्दर वृक्षों पर चढने ६. वय बाल पश्यामः - हम बालक पो दराते हैं। उपयुक्त वाक्यों को मान से देखिये । इनसे नीचे के नियम प्रतीत होते हैं १-(म) 'मेरने आदि नियाओं को 'यार' आदि करते हैं। ये क्रिया के पर वाले हैं। अतः ये मना है ( मियामम्पादक फी) और उन प्रथमा विमति है। इसलिए कर्ता में प्रगमा विमति होती है। पता फारफ कहा है। (था) 'घास कीदति' इस वाक्य में किया 'होदति तथा का 'याक दोनों एफयनम हैं। 'पृषी परत ' इरा याक्य में पा 'पतत.' ता १३ सरकवरचनाऽनुवादशिक्षकः। की 'वृक्षौ' दोनों द्विवचन है । 'बुधा. पठन्ति' इस वाक्य में किया 'पठन्ति' तथा फर्मा 'बुधा' दोनों बहुपचा है। मा किया तथा का में समान वचन होता है। (T) 'बाल. कीडति, कन्या मोउति, मिनं कीडति, इन तीनों वाक्यों में कर्ता बाता, पन्या और मित्र मम से पुलिस स्त्रीलिङ्ग और नपुसिकलिङ्ग है, परतु मिया 'मीउत्ति' म कोई असर नहीं है । मा लिङ्गभेद का किया पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अर्थात् पर्ता फारफ किसी भी लि का हो किन्तु क्रिया के रूप म परिवर्तन नहीं होगा। २~'पुस्तकानि लिखन्ति' ये पुस्तक लिहते हैं। इस पाक्य में 'पुस्तक' शन्द यहे विना रिसते है' का अर्थ पूरा प्रतीत नहीं होता और 'क्या लिखते है । यह जिशास बनी ही रहती है। इसलिए किया के अर्थ को पूरा करने वाले गन्द को कर्म कहते हैं । 'पुस्तक' कर्म है। कर्मवाचक धन्द में द्वितीया विभक्ति की जाती है। ३-सस्कृत म वाक्यान्तर्गत शन्दों के आगे-पीछे लिखो के विषय में कोई नियम नहीं है। जिस प्रकार हिंदी में पहले 'फ' पीछे 'कर्म' भऔर उसके बाद 'निया' या प्रयोग होता है, सस्कृत म ऐसा नियम नहीं है। इच्छानुसार किसी भी कम से शब्द-वि यास किया जा सकता है। जैसे योध शरी क्षिपति, शरौ तिपति योध' योद्धा (दो) पाण फेंकता है। शब्दकोपः अफरान्तपॅखिशशब्दा बगद - औषध, दवाई। पाद-पैर। श्रोदना-भात । प्राशनुद्धिमान् मनुष्य । किकर-नौकर, भृत्य। बिडाला-मिगव। कोश -खजाना। भार = बोस । गज हाथी। मोक्ष-मुक्ति, छुटकारा । जनक.-पिता। व्याध -शिकारी। देह -शरीर, अना सूर्य घोदा। स्तन चोर। चोर - चोर। अनल अग्नि ३सं०२० MP - सूर्य।

१४ 3 संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षका। मतुप्य। धर्म - फ्छुपा । बुधः-विद्वान् , समझदार आदमी। नृप -राजा । योध:-सिपाही! पवन.म्चायु। वत्स-प्रिय बालफ। मेष मेष, बादल। वीर-वीर, हिम्मती। सूद व रसोइया। शराम्याण। हस्त -दाथा व्याघ्रः वाचा अकारान्तनपुसकलिङ्गशब्दा अरण्यम् - जगल, वन पापम् - पाप, उरा काम । तृणम् - घास मोसम् - मांस। धनम् कपड़ा। विषम् - विए । सुवर्णम् - सोना। ज्ञानम् शान। धनृतम् - मिथा, शुरु फमलम् -कमला असत्यम् -" गृहम् पर। नयनम् त्र, आँखा इदयम्हदय । पर्णम फलम् - -ए। पुस्तकम् - पुस्तक। मित्रम् - मित्र। यनम् - वन, जगल। धान्यम् अनाज। इकारान्तलिङ्गशब्दा- अरिः-श, दुश्मन। पाणि हाथ। थसि. यति. सन्यासी। उदधि व्याधि रोग। पपि जानर, बदर। मतिथि: - पाहुना, अम्पागन गिरि-पति। अधिपति - म्यामी, मालिक। नृपति पनि मोरा पयिः हारि सारंगदा। মায় विधि - दय, माप। रकि-दुर्ग राशि-दे। মাছি -आप सारथिः - गारपि, रए हकिनेगा - 0 सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। समा देना। दुस नश्यति। धातु'- दण्डू (१०) प्रक्षाल (१०) घोना । भन (१.)- सारा दा ( यच्छ)(१)- देना। मार्ग (१०)- तलाश फरना । अभि+नन्द (१)-प्रशमा फरना । आ+नी (१)- लाना। अव्ययम् :- सुप्ठु-ठीफ, अच्छी तरह। घादम् - स्वीकार । हिन्दी में अनुवाद करो:- मूर्खा फुप्यतः। अमृत वदसि । फूर्म. सरति । स्तेनाश्योरयन्ति । हस्ती जल तिपत। ताडयन्ति चोरान् । जनो राम पूजयति । पनि पतन्ति । वालो गृह गच्छति । शरमस्यति धीर। सुख प्रीणयति । पर्णानि गण्यत । नृप. शठान् दण्डयति। देव पूजयामि । रामोऽश्वमारोहति । पुस्तक रचयसि। हरिहस्ती शालयति । धर्ममुपदिशन्ति । योधः शरान तिपति। जना पागच्छन्ति । स्तेनो धान्य चोरयति । फले पतत.। स्मरसि मित्राणि। बन गच्छामः। बुधो ज्ञानमिच्छति। अश्वावुत्पतत.। पुत्रो जनक सान्त्वयति । पाल' स्पृहयति। सुपर्ण तोलयामः। सूदो विशति । फले भक्षयामि। समुद्र शाम्यति । कमलानि पश्यति । कमले विकसत. प्रज्ञान वर्णयन्ति जना । कवयः ऋषीन वर्षयन्ति । रत्नानि इच्छामि। राम फवीन नमति। समुद्रमटति (भ्रमति )। यतयः पर्वतं गच्छन्ति । जनो वह्नि विशति ।

१६ सस्कृवरचनाऽनुवादशिक्षकः। वानरान् ताडयाव। सारथी चिन्तयत अगदा व्याधीन हरन्ति । लोको नृपतीन् पीण्यति। व्याध फरिण पश्यति । नृपा यतीन नमन्ति । हरिररीन ताडयति अश्वी जल पिवता। योधोऽसि क्षिपति। जनो यलिं यच्छति। सस्कृत में अनुवार फ्रो:- पोमा बलि साता है। शिष्य यतियों से पूछते हैं। राजा शनुओं को जीतता है। पीमारी की परवाह नहीं करता। बीमारी हरि को दुरा देती है। नौकर मारियों का अनुसरण करते हैं। राम र सोचता है। इम ( दोनों) समुद्र पर नाते हैं। काल भौरी को प्रसन्न परता है। हम भऽपियों को उमस्कार मरते है। राम सूर्य को प्रणाम करता है। हम सारथियों को बुगते हैं। सिपाही बलधार धारण करते हैं। वे (दोनों ) देर ले जाते है। कवि स यारियों का वर्णन करते हैं। मिसारी अनाज चुराना है। चोर रत्न चुराता है। वे पर्वतों पर चढ़ते हैं। बालक प्रसन होता है। राम यापों को देखता है। ईश्वर बनाता है। निद्वान् स्वर्ग बाता है (चढ़ता है)। (दो) समुद्र क्षुभित होते हैं। छिपाही (दो) भाग सोदया है। विद्वानपत होता। ईश्वर मनुष्यों की रक्षा है। मूर्स मगाद करता है। पुन पिता को प्रसन्न परता है। मित्र सोचता है। माप्प पाये पो साता है। पचे गिरते है। थे पोर पोते हैं। (दो) मलपे रंगते है। (दो) मर्म विप पोरी। मागी रट होते। रामा चोरी पो देवा। फमय मुशोभित करते हैं। गम पो उम गिन पाद परते। १-गाल गएति। २-यालिफामगि -नरार पठति । Y-गमे यथयति ! -म पर्वतारोहति । ६-६ग्निरीन ताब्यात ७-गमा यो नमन्ति । -लोको यहि मिशत । .

.- क नरमः पाठ: तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमी विभक्ति रथेन आगन्छति - रथ से आता है। पादाभ्या चलति पैरों से चलता है। पालो सह कोडामि • म बालकों के साथ खेलता हूँ। रामाय पुस्तके यच्छति = राम को पुस्तक देता है। फतेभ्यो गच्छामि-पलों के लिए जाता हूँ। पल्वलेभ्यो बराहा सत्तिष्ठन्ति-पोसरों सूअर उठते हैं (निकलने हैं)। 'स्थ से आता है इस वाक्य में आने की क्रिया में रघ सहायक है, क्योंकि माना रथ के द्वारा होता है, यत वह करण है। "पैरों से चलता है इस वाक्य में चलने की क्रिया में सहायक है, अन वे फरण हैं। 'राम को पुस्तक देना है। इस बार में राम को पुस्तक दी जाती है, अा. वह सम्प्रदान फहाता है। 'पोखरों से सूअर उठते हैं। इस वाक्य में सूअर पोखरों से पृथक् होते ई, अन वे अपादान बहाते हैं। इसलिए १-जो प्रातिपदिक (शब्द) किया के व्यापार में कर्ता का सहायक हो और जिसके व्यापार के अनन्तर ही किया का फल उत्सर हो अर्थात् जो कर्त्ता के क्रिया करने में साधन हो उसे करण कहते है । करण में प्रायः तृतीया विभक्ति लगाई जाती है। करण तीन प्रकार के होते हैं प्रथम घा, जो किया के व्यापार में कर्ता का आप ही सहायक हो । जैसे - असिना वाडयति = तलवार से मारता है। यहाँ 'मारना किया में तमगार सहायक है। द्वितीय वह, जो स्वय का का सहायक न हो परन्तु जिससे ऐसा कार्य होता हो जो कियाफल की सिद्धि म उपयोगी हो। इसको हेतु भी कहते हैं। जैसे-~दण्डेन घट रचयति - दण्ड से घड़ा बनाता है । यहाँ घड़ा बनाने में दण्ड से स्क्त कोई सहायता नहीं होती, परन्तु चा भ्रमण आदि ऐ कार्य किया माता है जो घड़े के पनाने में उपयोगी होता है। , १८ सस्कृवरचनाऽनुवादशिक्षक । तृतीय वह, जो क्रिया के व्यापार का फल हो । जैसे -अध्ययनेन वसतिः पढ़ने के लिए रहता है। यहाँ अध्ययन 'निवास क्रिया का पल है। २-(फ) मिस को कोई वस्तु दी जाये उसे सम्प्रदान कहते हैं। सम्प्रदान में चतुर्थी विमक्ति होती है। (स) जिस माकांशा से कोई कार्य किया जाने अर्थात् नो क्रिया की महति का फल हो, उसे भी सम्प्रदान कहते है । जैसे --मुक्ये हरि भजति = मुक्ति के लिए हरि का गजन करता है। ३--परस्पर वियुक्त होने वाले पदार्थों में मो स्थिर हो अर्थात् निमें वियोग परने पाली क्रिया हो, उसे धपादान कहते हैं। अपादान में पन्चमी विमचि होती है। जैसे --वृत्तात् पर्ण पततिशृक्ष से पचा गिरता है। यहाँ पत्ता पक्ष से अग होता है, पातु गिरने की निया पचे में ही होती है, वृक्ष से नहीं, मत वृक्ष कियारहित होने से अपादान है। शब्दकोपः शिकम् - आकाश (शम् )- आकाश । निष्क - मोहर । दुर्गः (म) - फिला। पाप. पापी मनुष्य । पाद-पैर। प्रासाद. पुरुषोत्तमः - वि। माप - उद। संमोह अगा। याचर भिग्यारी। व्यान बाघ। वध हत्या, मारना। अलवारः भूपग। सार्थ - कारण, यात्रीसमूह। घराह सूम। सपधारा-मेंट। पत्ति - पैदर सिपाही। याण: तीर। फामार = सरोपर, क्षील। पीपर-किला। नद-पट्टी नदी। मोश नाविक नपुसकलिनम्।- अर्ध्वम् - पूषा का सामान । नरम ( )=नागन । - मातप धूप। - 0 कोय।

शतमसो। "" । खन ( सरकृतरचनाऽनुवादशिक्षक १६ इन्धनम् धिन । (जलाने की पड़ी) शीर्षम् - सिर । खनित्रम् - फायड़ा, सन्ता, कुदाल । पुसुमम् - पुरा चकम् - पहिया। जाड्यम्-मन्दपना, मूना। पदम्-पैर। | पल्पलम् - पोसर, तलैय्या । सिंहासनम्-सिहासन । । मौनम् - चुप्पी, चुप रहना । स्वकृत्वम् - अपना कार्य । योजनम् - - चार कोस। भद्रम - फल्याण। धातुकोपः ; दह (प्रथम गण ) = जलाना। अधि+गम् (प्र० गग ) पाना। ) खोदना । प्रति+मा+गम् - लौटना । - अव+गम् (") - जानना। प्रति+दा (म• गण ) ( यन्च.)- श्रय+नम् (")- शुक्ना । बदले में देना। वि+राज (")-शोमित होना। भज (म० गण )- भजना, पूजना । प्र-+ह (")-प्रहार करना। उद् + भू(")= पर होना । E (दशमगण ) = पाहना, चीरना। उद् + स्था (") (ति)- उठना । धृ (,) धारण करना, पर्ज लेना। उप + दिश् (षष्ठगग) उपदेश करना विशेषणम :- खज लाड़ा प्रभूत मूक- गूंगा। विशेपण पद में विशेष्य के अनुसार ही रिस, वचन और विमत्तियों होती है। अव्ययम् . सह नम-नमस्कार। साथ। स्वस्ति-कल्याण। हिन्दी में अनुवाद फरो:- खनित्रेण सनति। हरये नृपति' कुप्यति। बुधा सुखेन जीवन्ति । निष्फान् धारयति रामाय हरि। नेत्राभ्यां पश्यति जनः। विनय सुखाय भवति । अग्निना गृह दहति । शिखरात्पतन्ति गजा. पादाभ्या घावन्ति वाला। आसनेभ्य उत्तिष्ठन्त्याचार्या । लोभेन बुद्धिश्चलति । प्रासादाज्जन पश्यति नृपः। . - नहुन। साकम - भानु' - सूर्य। २२ सस्कृतरपनाऽनुयादशिक्षक। धनपति. - कुबेर । निधिः -सजाना। पराक्रम' - शरता, यहादुरी। प्रसाद कृपा वर्ण - रंग, जाति । वास'- निवासस्थान। वृपः -ल! श्वापद - हिंसफ बतु। उदय.-उगना निकलना। जन्तु मागी। सगः तयार। अम्मुधि = समुद्र। ईश. - परमेश्वर । तरु-वृक्षा मातलि इद्र का सारथी। शिशु - मचा, पालक । साधु - सजन, अच्छा मनुष्य । नपुसरलिझम् :- औषधम - दवाई। कारणम् - कारण, हेतु। चरितम आचरण। युद्धम् युद्ध। गुथम् - समूह। लागूलम् - पूछ। चरम् - शगुना। सौन्दर्यम = सुन्दरता । हय॑म् महल। थपत्यम् - सन्तान। धैर्यम् = धीरन । विशेषणम् । आझादक -आनन्दकारका दीर्घ - रम्या । गही-निदनीय। प्रथम-पागा चएड - तेज, अत्यात प्रोधी,मयातक । प्रशस्य प्रशसनीय । श्रेष्ठ उचमा पह- बहुत । धनिक- धनयार। पालफ-रारोगाना धोर-गम्भीर। घीर बहादुर धातुकोप शम् । साम) (चना)-समा अति+मम् (म, माम्)(अपमगया- करना। TREET परना, आगे बढ़ना । प्र + Pा (Hom) उगना, माना। प + यिश (AII) पेठना। अव्ययम् :- यपि-2पहाँ। न नहीं। पुत्र हो। .

सस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षकः । स्व-कहाँ। तन्न यहाँ। यन-जहाँ । सदा-हमेशा । पदा - कायदा - तदा - तम । पुन = फिर। अधुना - अब । कथम् - ऐसे । अदा-आग । । -( बीता हुआ ) फल । स्व. - (आगामी ) फल। शीघ्रम् - जल्दी । च = और । हिन्दी में अनुवाद करो समुद्रस्य जल लवणम् । वारीणां निधिरम्युधि.। देवस्य प्रसादेन जीवामि। थासनेपूपविशन्ति । । शास्त्राण तत्त्व प्रज्ञो वोधति । वनेषु श्वापदा सन्ति । । गिरेः शिवरात् गज, पतति । श्राचार्या शिष्यधर्म कथयन्ति । फासारे कमलान्युद्भवन्ति । मनुष्याणामगदेन व्यावयो नश्यन्ति । मृगाणां यूथ परति । रामस्य सारथि सुमन्त्रो रथ चन मीप्मे सूर्यस्य प्रकाशचण्डो नयति । भवति । चन्द्रस्य प्रकाशो जनानामाहादको वर्णाना ब्राक्षणः श्रेष्ठ। भवति । शठाना चरित गर्यम् । अरीणा सैनिकान नृपतिर्जयति । फवयो लोकेपु वीराणा परा- योधस्य पाणी खड्गोऽस्ति । क्रमान प्रथयन्ति । महादेवे यतीना चित्तमस्ति । हरे पुस्तक क्वास्ति? शिशू भाग्य निन्दतः। मेघेभ्यो जरस्य विन्दवः पतन्ति । व्याधिना सगो रिपुर्न । कपी वृक्षेभ्यः फलानि क्षिपत । साघोर्वचनमतिकाम्यति मूखः । अलय पुसुमानो गन्ध हरन्ति । यदा यदा धर्मस्याभायो भवति, मूर्खा सदा वृथा अल्पन्ति। तदा तदा फेनाप्युपायेनाधर्मों वीरयोर्युद्धं भवति। नश्यति । सस्कृत मे अनुवाद करो.. हरि के दोनों पुत्रों का आचरण राजा महलों में रहते हैं। प्रशसनीय है। धनवान् लोग महलो (हर्म्य) में रहते है। पन्दरों की पूँछे लम्बी होती हैं। झीलों का पानी खारा होता है। पवियों में फालिदास पहला है। पर्वतों के शिखरों पर बर्फ है। चोर नाक्षण का धन चुराता है। बादल आकाश में चलते हैं (स.)। - - शुद्ध फरो २४ सस्कृवरचनाऽनुवादशिक्षक। मैं बगीचों की सुदरसा से प्रसन्न हूँ। हे हरि! विनय से लोग प्रसर हो । में अग्नि में घी डालता हूँ। समुद्र में पहुत रत्न है। मूर्स की दवा नहीं है। फूल बगीचे में वृक्षों को भूपित करते हैं कमल जल में उगते हैं। मुदिमान् मनुष्य अपने मन में कोश ! ईश्वर पापियों के पापों को क्षमा करता है। स्पान नहीं देता। थालक पसति । यत्नस्य विना किमपि न भवति । नरान् गच्छति । पुत्रः जनकस्य सह 'गच्छति । फस्यापि साधं कलिर्न करोति हे नृपः 1 मारक्ष। राम। गुरोर्नमः। स पुष्पाणा स्पृहयति। सरामस्य शत धारयति । पापस्य दुखमुत्पद्यते। सराम मिभेनि। मानये हाण, श्रेष्ठ । गुरु निन्दया शिष्य कुरो भवनि दरिद्रस्य धन यति। नही नगरात् प्रिमि. कोथिगते । विद्यार्थियों को विमरियान के लिए अधोलिखित श्लोको। फएठस्थ फर लेना पाहिए :- भवेद्विमषिः प्रथमा फवाच्यस्य कर्तरि । सम्बुद्धी नाममात्रे प फर्मवाच्यस्य कर्मणि । क्वपिदव्यययोगे च प्रयमा फध्यते घुधैः ॥ फास्यप्रयोगे तु द्वितीया फर्मकारये। धिक्प्रतीत्यादिमियोंगे क्रियायाय विगेपणे। एतेविनादिमिशेष द्वितीया संमता सताम् । रानीया करणे पेष फर्मपाल्यस्य करि। सहायश तया देवो महन्यादिभ्य य प ।। स्नाधारशाच मशागतिथेप घ। हाति विकनियो गुतीया स्यात् तदाता। सम्पदाने पनुर्या स्यान् तापय पक्रियायुसे। रुग्ययन प्रीयमाणे नमोयोगे पमा मरेत् ॥ अपादाने स्पपये प योगे पूर्वादिमिनया। १ ५ २५. 11 ६ सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । उत्कर्ष पतमी ज्ञेया हेत्वर्थ तु विभापया। ऋतेविनादिभियोगे पश्चमी च स्मृता युधै ॥ पष्ठी भवति सम्बन्धे दन्ते करकर्मणो । तृतीया स्यात् तथा पष्ठी कृत्याना कर्तृकारके। तुल्यार्थयोगे षष्ठीस्यात् तृतीया च विभापया। आधारे च तथा भावे विभफि सप्तमी भवेत्। शानादरे च निर्धारे षष्ठी स्यात् सप्तमी तथा।। . . . एकादशः पाठः वर्तमानकाल. (आत्मनेपदप्रत्यया ) आकाशे उड्डीय ते शुषा - आकाश में पक्षी उहते हैं । क्से ! मुष्ठ शोभसे विनयेन-प्रिय बाले तू विनय से अच्छी तरह शोभित होती है। असत्य भाषध्वे - तुम रोग झूठ बोलते हो। पहले पाठों में वर्तमानकाल के रूप दिये गये है। अपर दिये गये रूप-- उड्डीयते, शोभसे, भाषणे-में उनसे कुछ भेद दिखाई पड़ता है । धातु से लगने में ये काल्पूचक प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं। कुछ परस्मैपद और कुछ यात्म- नेपद के प्रत्यय हैं। जिन धातुओं से परस्मैपद के प्रत्यय भाते है ये परस्मै. पदी और जिनसे आत्मनेपद के प्रत्यय भाते हैं वे आत्मनेपदी धातु कहलाती हैं। कुछ धातु ऐसी भी हैं जिनसे दोनों प्रकार के प्रत्यय आते हैं वे उभयपदी कहलाती हैं। यात्मनेपद ( वर्तमानकाल) के रूप नीचे दिये जाते है एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् प्रथमपुरुष. शोभते शोभेते शोभन्ते) मध्यमपुरुष शोभसे शोभेथे शोमध्ये उत्तमपुरुष शोभे शोभावहे शोभामहे शब्दकोपः जगत् ( न० - ससार। अर्चनम् (न०) = पूजा ६पद् (पी०) - पत्थर । असख्येय (वि०) - अगणित वलभिद् (पु०)-इद्र। -- बहुत।

२६ सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। मित्रम् (न०) - मित्र। उद्गमः (पुं०) - उत्पति, निशा विद्युत् (स्त्री) - विजली। फरः (पु.)- चटाई। विधिः (पु) - महा। पारितोपिकम् (न०) = नाम | विपश्चित् ( १०) विद्वान् । प्रयल (वि०) - अयान, प्रतिमा वियत् (न०) = आकाश ! निम्नः (म्मम् ) (पुं० न०) मा सम्पद् (स्त्री०) - सपति । मणिका (पु.)- मोहरी। प्राय. (अव्यय) - बहुधा, भरसर । शासनम् (न)- आशा। अपराध (पु०) अपराध, क्यूर । स्वास्थ्यम् (न०)- तन्दुरुस्ती । अध्ययनम (न०)- पढ़ना, अभ्यास ! धातुकोप. (प्रथमगण पात्मनेपदी):- ईच - देखना, फम्प - कॉपा, हिलना। भप+ईच-इच्छा करना । प्रकाश - चमकना। प्र+ईश - देखना। भाप-बोलना। परि+ईन् । परीक्षा करना, सोचना । मुद् । मोद्) = आनन्दित होना रम-रोगना, ग्मना। वि+जि-शीतना। रुच (रोप)- पसद भाना। शुभ (शोभ ) - शोपित होगा। घन्द -मफार करना। वेप - फापता, हिला। लम् - पाना शित सीखना। -रहना। सेय - मेगा परना। जन (जा) (ग) - उन दोना । ग (निय ) ( गग-)- माना अप + धीर (१० गा.)-REार मृग (१० गग-)-गोमना। विन्द् (१) नि सूद (१० :-)- माता। -सिंग (स्मय ) (१ गग) ITITI यार ग) माँगना। वि+गि (गा.) गति से हिन्दी में अनुवाद करो:- देयं चन्द पकि द्रव्य या मिथुनो। भयावेपते पदयम् । सुधा मोर यिमन्ठे। यिने प्रेते। मित्रापामभ्युदये नरा मोदन्ते। JA सरकृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। २७ गुरुन् सेवामहे । वृक्षेपु फुसुमानि वर्तन्ते। असत्य किं भापचे ? पापा न वचनीयमीक्षन्ते। बालाय तीर रोचते। सत्य हितकर च चास्य मापन्ते दानेन पाणि शोभते। प्रज्ञा मणीन परीक्षते मणिकार.। शासनस्य भहन क्षमन्ते नृपतयः। सद्योगाद्धनं लमध्ये। गायकात्समीत शिक्षावहे। मोक्षाय यतन्ते बुधाः। मुर्माण वयात्य न सहामहे । वातेन वृक्षा' फम्पन्ते। प्रबलेनापिघातेन पर्वतो न कम्पते। देवान भोगान् भिक्षन्ते नरा। नारायणे रामस्य स्नेहो धर्धते । सस्कृत में अनुवाद करो:- न्याय का अभ्यास शुरू करता हूँ । व्या घास और वृक्षों के पत्ते नहीं पाते । दास सहता है। दुप और सुवि ससार से उत्पन्न होते है। योधा शनुओं से युद्ध करता है। तुम ( दोनों) बिना कारण लड़ते हो। "त् पारितोषिक यो इच्छा करता है ( अपेक्ष् ) (दो) लड़के बगीचे में खेलने हैं । मनुष्य प्राय पन के लिए यान करता है। हम (दोनों) हरि से भगाई की आशा राम अपने असख्य गुणों से चमकना है। फरते हैं। भक्त को ईश्वर की पूजा अच्छी लगती है । भिसारी चावल माँगते हैं। मैं आचार्य से अपना कर्तव्य सोसता हूँ। हम राजभवन के शिखर पर एक मोर मैं शनुओं को बागों से मारता हूँ। देवते है। हम पसत में फल पाते हैं। बुद्धिमान् ऐश्वर्य में प्रसन्न नहीं होते। पर्वत हिलते हैं जीवन विमी के समान चञ्चल है। तारे चमकते हैं। सम्बर पिपत्ति में दुखी नहीं होते। नारायण के (दो) मित्र ( उसके ) राजा विद्वानों की पूजा करता है। क्याण के लिए यत्न करते हैं। दुष्यन्त इद्र का मित्र है। हम ( दोनों ) राजा की सेवा करते हैं। जगल में पत्थरों पर बैठते हैं। मूर्स के अङ्ग बढते हैं, ज्ञान नहीं । ना - - द्वादशः पाठः भाववाच्य तथा कर्मवाच्यम् - देवदत्त पुस्तय लिसतिदेवदत्त पुस्तक लिखता है। देवदत्तेन पुस्तक लिख्यते-देवदत्त से पुस्तक रिखी जाती है। भद्रे ! गच्छाम्यधुनाऽहम-हे पत्यागिनी ! अर मे बाता हूँ। भने ! गम्यतेऽधुना मया हे पन्याणिीि! अब मुझसे बाया माता वत्स ! इहागासन उपविश=पुप ! यहाँ आमो, भासन पर बेटी पत्स ! दागम्यताम् , आसन उपविश्यताम् त्वया-पुन समसे आपा नाय, आसा पर बैठा जाय। नृपाः = पण्डिरी सह भापन्ते-रामा पण्डितों के साथ बातचीत करते नृपै पहिते सहभाप्यते रामाओं से पण्डितों के साग यातचीत की माती बुधास्तस्यमयगन्छन्ति=विदारतन पानते है। बुप्रैस्तत्वमवगम्यते =पिवानों से तत्व पाना नाता है। सन्जना ग पदाप्यसत्य बदन्ति सान यभी भी योग सज्जनन पदाम्प्यमत्यमुद्यते - सजनौ से कभी झूठ नहीं पोला माता वनदेयता पागो कीर्ति गायन्ति मादेमियाँ राजाओं की बाति गाती घनदेवताभिनुपात कीजियते = यनयताओं से रामानों की मीकि पाती है। यद्यान इति सरसर्यमई करोमि भापमोचाहते हैं यह सत्र में करता यद् भवता इप्यते सन्स कियते मगा- आप पो नाता मा वर राब मुहारे रिमा भाता है। या गरे तिष्ठामि घर म रहता है। मया रहेगीगते गपग पर म रहा जाता है। 'पवान्यादि प्रयोगा ये ग पिम :- पदारया प्रयोगे परमायरम परि प्रधमा गन् । दिनीया फर्नविनया मिशा पधान्पिता॥ परिवारांगद प्रयोग हो सो मचांदपोरानीय पुरा, TET पुणभोर पान भामार हो दो मिति, सामौर पिये मागार ।

। सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। विष्न्त में - 'देवदच पुस्तक लिसति' और कदात में -'सीता मुखिपत्नी वती' फर्मवाच्यम :- प्रयोगे कर्मचाच्यस्य तृतीया स्यात्तु फर्तरि । फर्मणि प्रथमा चेव पिया कर्मानुसारिणी॥ फर्मवाच्यम की विभक्ति तृतीया और कर्म की प्रथमा होती है । क्रिया फर्म के अनुसार होती है, अर्थात् धर्म का नो पुरुष तथा वचन हो, क्रिया के विन्त होने पर वही 'पुस्प और वदी 'यचा होता है । इस प्रकार कृद त क्रियापद के लिङ्ग, विमति और वचन भी फर्म के अनुसार होते है । जैसे तिरन्त में 'देव- दत्तेन पुस्तकानि लिख्यते । यद्यपि यहाँ पत्ता (देवदत्त) एकाचन फा है तथापि फर्म ( पुस्तक ) बहुवचा का है इसलिए किया में बहुवचा हुआ है। कृदन्त में जैसे -'तेन दृष्टा समुद्रा'। भाववाच्यम् फर्माभाव. सदा भावे तृतीया चैव करि। प्रथम पुरुषश्चैकवचनश्च क्रियापदे॥ भाववाच्य में पर्ता में तृतीया विभक्ति होती है और कर्म नहीं होता क्रिया सदा प्रथम पुरुष की एक्वचनात ही होती है। जैसे :-'वय तिधाम', 'भस्माभिः' स्यीयते । इसी तरह -'यूय विद्वास भवत', 'युष्मामि विद्वद्भिर्भूयताम् । फर्तृवाच्यादिप्रयोगों मे क्रियापद के रूप बनाने के कुछ नियम :- १-कर्मवाच्य अथवा भाववाच्य के रूपों में धातु से य लगाकर आत्मनेपद के प्रत्यय लगाये जाते है। इन रचनाओं में धातुसे गणचिह्न (अ, अय आदि) नहीं लगाये बाते। जैसे -गम् = गम्यते । भू-भूयते । २-फारात तथा उकारात घातुओं के स्वर में दीर्घ हो जाता है। वैसे जि- जीयते स्तू - स्तूयते । ३-कुछ आकारात धातुओं के आकार का इकार हो जाता है । जैसे -स्था स्थीयते । दा- दीयते । गा-गीयते ।मा- मीयते । ४-ए, ऐ, ओ तथा औ जिन धातुओं के अत में हो उनको आकारान्त के समान ही समझना चाहिये । जैसे -गै = गीयते । सो सीयते । ५--प्रकारात धातुओं के ऋ का रिहो जाता है। जैसे -- क्रियते। हियते । ४स०र० - - । ।

।वम् उप्यते। सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। ६-कुछ धातुओं के य, व, र, ल, के स्थान में मममी ल हो जाते हैं। इस परिवर्तन को सम्प्रसारण कहते हैं। जैसे पत्र इज्यते धातुकोप: प्र+भर्य (१०गग )-प्रार्थना करना । पा(१ गगः) पीना । क(८ गग)- करना । रुद् (२ गगः)-रोना। शा (६गण) मानना । स्था (१ गग)-स्थित होना, टाला दा (३ गग )-देना। अनु + रुप (७ गगः ) भाग श्रु ( १ गण ) - सुनना। मानना। इन् (२ गग.) मार हारना। आ+दिश् (६ गम )- आदेश पट ( १ )-पढ़ना । फरना, भाग देना। शब्दकोपः भादेश'- आश। ध्वनि आषामा चाप (पम् ) धनुए। पोर नागरिक । म प्रासा- बुद्धिमान् । जवः - येग। फिर ऐक नौकर। पथिमः -रास्वागीर। प्रावीण्यम् (न.)-पगई। हिन्दी में अनुवाद फरो:- निष्का वादाणेभ्यो दीयन्ते । ऋषयो जनेन बनान्वे। नृपस्यादेश. गियते। सूर्येए प्रकाश्य। अग्निना फाष्ठ दखते। ईश्वरेण भूयते । शठी पुसपैस्वादयेते। लोक प्रशस्याये। गुरुमिधर्म उपदिश्यते। शिप्पैनग्यावहे। फिर सेन्पसे। मोदका स्वापन् शिमि। मित्यज्ये। यात्री लोका: पटान्ते। व्याधिमिः पौगये। पोदन पते सदै। भान्यस्य राशयोनीयन्ते। देयो यन्यते। नृपतिना पापनाऽरयो जीयन्ते। प्रभोगदेशोऽरपट बना। उमेषु कपिमि. स्यीयते। कालाय ममेरा प्रहीयते । सारपीदन्पेठे। प्रजा सविता रस्यन्ते। - ।

सजाया सस्कृतरपनाऽनुषादशिक्षकः । सस्कृत में अनुवाद करो:- शत्रु बाण से मारा पाता है। कृष्ण का शरीर आभूषण बच्चे के हाय पानी से धोये जाते हैं। जाता है। नोफरों से स्वामी की सेवा की जाती है। बुद्धिमान् के गुण कवियों से प्रसिद्ध किये तू फवियों से पर्णित किया जाता है। जाते हैं। । हम ईश्वर से रक्षित किये जाते हैं। चोर रानामों से दण्डित किये जाते हैं। तुम (दोनों) लोगों से जाने जाते हो। (दो) फल हरि से लाये जाते हैं। दापियों पर सवारी की जाती है। (दो) बाण छोड़े जाते हैं (मुन् । हम (दोनों) नगरवासियों से प्रार्थित (तुम्हें ) राजा से आधा दी जाती है। किये जाते हैं। सुख मनुष्यों से सदा चादा बातो है। -ससार पतियों छोड़ा जाता है। समुद्र का जल नहीं पिया जाता। शरीर अन्न से पोषित किया जाता है। गुरुजन सदाचार से स तु किये जाते हैं। (दो) घोड़े चोरों से चुराये जाते हैं। सैनिक सेनापति गिने जाते हैं। जल वृक्षों पर छिड़का जाता है। शुद्ध करो पन्य पठ्यते तेन रामो रावणं हन्यते । नृपेण वत्र गच्छति। ता. सुलेख. लिख्यते। तो शीतल पियन्ति । रामस्य जनक. तत्र गच्छन्ति । मोदक बालक रोषते। देवो विजयति । अह त्वा पृच्छयसे। वय नदी गम्यते । कवय. श्लोकान् रच्यन्ते । शत्रून् हन्ति श्रीकृष्णेन । प्रक्षाम् सर्वत्र पूज्यन्ते। हरि जनकस्यादेशः अनुरुध्यते । फपय द्रुमेयु आरुह्यते राम तस्य सह वनं गच्छति । . नगरे पसति जन. बहवः। । . न -- - त्रयोदशः पाठः, भविष्यत्काल- गम पठिष्यति - राम पदेगा। भृत्य माम गामध्यति = नोएर ग्राम नायगा। उद्याने पुष्प द्रक्ष्यसि - गीचे में तुम पूल देखोगे। बापो पुमान् द्रक्ष्यत - दो पिता पुषों को देखेंगे। वय वाणैः शन्न प्रहरिष्याम' - हम वार्गों से शत्रुओं पर मार रंग इन पाक्यों को देतो से प्रतीत होता है कि क्रिया अभी हुई मोर ? हो रही है, रिमागे होगी। 'राम पढेगा' यहाँ राम का पदना भागे होनार, मत. यह भयिष्यत्याल है। इसमें लट् लकार या प्रयोग होता है। हिन्दी में निस क्रिया में गा, गे, गी आता है, उसका अनुवाद सस्था में भविष्यमान में किया जाता है । फ्ता म यिमक्ति आदि परने के सपपिम वर्तमानकाम के समारही हैं। परस्मैपदम् :- एण्यचाम् द्विवचनम् महुवचनम् प्रथमपुरुप. पदिप्यति पदिष्यत. मध्यमपुरुप वदिष्यसि पश्यिय. पदिप्यथ उत्तमपुरुप यदिप्यामि थदिप्याव. यदिप्याग धारमनेपदम् :- प्रथमपुरुष सेविप्यते सेषिष्येते सेविष्यन्त मपमपुरुप सेविप्यसे संघियेथे सेषिप्याने सेविप्यायहे सेवियामहे शब्दकोप पीलिजशन्दा भामा प्रगदा-दुकीरमीलना- करामाग, नर। भार्ता -पटा सर ! पापी - मायदी। जगतमा रामद शमी। शारी-त्री। गई। पी। मदपणेगापिता पती-farm, मारीगन। ये मम। प्रजारियाना, या लता पदिप्यन्ति उधमपुरुष सेविये - - -- श्रेष्ठ सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। पुल्लिंगशब्दा अभ्युदयः-उजति । स्मार्थ. -मतरना समागमः- मेल, मिलना। भारम्भ. ० आरम्म, शुरुआत । प्रासाद. ० महल। भर - बोस। धन्धु भाई, कुटुम्मी । नपुंसकलिङ्गशब्दा.- उपवनम् - बगीचा भूपणम् - अलकार, जेवर । नाटकम् - नाटक। गमनम् - नाना, प्रस्थान । तलम् - तल (ऊपरी भाग) सौधतलम् चलम् = सेना, शकि। प्रासादवलम् त्रिलिङ्गशब्दा. (विशेषणानि) श्रात्मीय - अपना पर - श्रेष्ठ, पड़ा। चतुर-होशियार। परम- निपुण - प्रवीण। सम समान । ( इस अर्थ वाले विशेषण के साथ तृतीया वा षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे --राम पुत्रेण सम -तुल्य , पुत्रस्य सम-तुल्यः) । अन्य - और, दूसरा। तद्- वह। एतत् - यह। यद् जो। किम् - क्या । सर्व - सब। सर्वनामों का प्रयोग किसी सज्ञाशन्द स्थान पर और प्राय विशेषगरूप से होता है। धातुकोपः समू+गम् ( आत्मने)-परस्पर सम्+वृध् = बढना, समृद्ध होना। मिलना। शुच (शोच ) (१ गण , प.), "आ+चर् ( गण ५० ) करना । शोक करना। तु (तर् ) १ गण , प०)पार विद् (४ गण , आ०) मौजूद होना। सम्+ई =(१ गणः, मा०) चाहना। - , उतरना, तैरना सस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षा अव+ उतरना। परि+य (५ गग, प.)-पोज परि+नी (परिणय)-विवाह करना। (फर्मपाप्ये-परिनियो) हिन्दी में अनुवाद फरो:- नार्यो हाणा यातायनेभ्य उत्सव कुमारी सल्यो भापिप्यते। द्रक्ष्यन्ति। पराहाः सहपरी शोचन्ति । कृष्ण. कला शिक्षिष्यते। लज्जा त्यक्ष्यतेऽविनीतः। रामो जनफस्य क्या परिणेप्यति । नृपतिना प्रजा रहिप्यन्ते। गगा यमुनया प्रयागे सहच्छते। ललना. प्राणादवलमारोपन्ति । उद्यानस्य शोभा द्रक्ष्यति प्रगदा। नृपस्या अनुरुम्पेते। नृपठेवक्षस्य भरेण मही फम्पिप्यते। रामस्य फथा श्रोष्यन्ते । वने प्रमरे रश्यते। कुसुमानामाला काठापनीयन्ते। दास्यो महिषी सेलिप्यन्ते। वाप्यो कमलान्युद्वन्ति । शेलेभ्योऽवतरन्ति नया ताभिस्तामिफयामि. रजनी नेष्यामः। अवन्त्या (उज्जयिन्याः) कदा सर्मा रेषता नस्याम प्रतिनियतिघ्यध्वे (प्रतिनिध. अन्यदेवत् फाननम् । स्यय)। फस्मै देवाय नमः क(के) एते याला? फा पेला पर्वते? हरेररयो नहलायन्ति । फोऽन्यो विधया समो पन्यु' केषु पु शाखेषु निपुणारते ? साधूना समागम सर्वपामभ्यु फिमधिफ गुरो सेवाया-१ दपाय। एतस्मिनगरे पसामि। फेभ्यो प्रामणेभ्यो दक्षिणादा. अपवने नृपस्य पन्चे ग्मेवे । स्पसि! संस्कृत में अनुवाद परो- गायों को पारेगा। राबाकी आहारो में नगा मा भरोग में टीपी(दो) मा सामों की पूमा लिए पुरा महा परिनेगा। मापेगा। (हम)मारिलो को देखेंगे। मुमा सियों से गाना बोली। ?

+ ! . संस्कृतरपनाऽनुषादशिक्षकः। .३१ हरि नदी पर जायेगा। रानी दासी को पारितोषिक देगी। प्रजा राजा की आशाओं को मानेगी। मैं अयोध्या की सड़कों पर रय देनूंगा। हरि की पुत्रियों नृत्य सीसेंगी। माता का हृदय अपनी पुत्री के विषय मनुष्य स्त्रियों की रक्षा करेंगे। में बहुत स्नेहमय होता है। = राम अपनी सन्तान की तरह प्रजा को रानी की आश से शठ को दण्ड दिया समालेगा। नायगा। हरि (अपनी) वाणी से मित्रों को मलताओं के फूलों को इकट्ठा करने के शान्त करेगा। लिए जग में जाऊँगा। नगर नदियों से घिरा हुआ है। बह राजा की आगों के पालन करने यह मालाओं से अपना शरीर सखायेगा। में सावधान है। । रानी अपनी दासी पर क्रोध करती है। तुम देवताओं को नमस्कार करते हो ? (दो) योधा हथियारों सहित ( उन दिन दिन वह अनेक विद्याओं में कुशल दोनों) नगरों से रवाना होंगे। होता जायगा। पूर्य के लाल प्रकाश से आकाश भूपित इस आश्रम में अगस्त्य नापि रहते हैं । किया जाता है। यह वाल्फ किसका पुत्र है। वे देवताओं से सुख का लाम चाहते हैं। वह (स्त्री) कौन है ? 7 - - - चतुर्दशः पाठः अनद्यवनभूतकाल:- 1 , सूर्योऽस्तमगच्छत् • सूर्य अस्त हो गया । मेवेभ्यो जलविदयोऽपतन् - मेघ से जल की वूदें गिरी। व्याधी माणेन मृगमविध्यत्-धिकारी ने वाण से हिरन को घायल किया। चिभया चद्र इव रामः सीतया व्यराजत-चित्रा (नक्षत्र ) से चन्द्रमा के समान राम सीता से सुशोभित हुए। उपर्युक्त वाक्यों में किया समाप्त हो चुकी हे अत वे भूवकालिक क्रियाएँ हैं। मिस क्रिया का होना अतीत काल में पाया जाय, उसे भूतकाल की क्रिया कहते हैं। बीती हुई रात के उच्चराध से अर्थात् १२ बजे से पूर्ष का काल भनयतन भूत काल कहा जाता है। इस भूतकाल में रह रूकार का प्रयोग होता है । लड लकार । - - - सिस्कवरचनाऽनुयादशितका। के रूप बहुत कुछ वर्तमानकाल के रूपों के मूल्य होते हैं। केवल थोड़ा सा : । विमति आदि के प्रयोग में कोई भेद नहीं है। इस काल पा आवाद फरने में इस पर विशेष धान रखना चाहिए । हिन्दी में वर्तमाकार के कर्ता के लिए वह का प्रयोग होता है, पर में उसने भोजन किया' इत्यादि यामों में फर्वा तगोपाल दो। किन्तु सस्थत म ऐसा नहीं है। गाय के प्रयोग में कोई भी काम कर प्रथमान्त ही रहेगा। शिकारी ते वागणे पाय में शिकारी प्रथमा विभचि को होगी। से.-'याधो मागेन । भू (परस्मैपदी) एकचनम् दिशचनम् अपग्नम् प्रथमपुरुषः अभवत् अमयताम् সময় मापमपुरुष थमव अमवतम् अभयत उतमपुरुष अमयम धभवाव अभषाम युध् (आत्मनेपदो):- प्रगमपुरष अयुध्यत अयुध्येताम् अयुध्यन्य मध्यमपुरुष अयुध्यधाः अयुधेयाम अयुध्यायम उचमपुरुष' अयुध्ये অধ্যায়ছি अयम्या शब्दकोपः (पु०)- यारा। समरागराम् (न०)-पुरभूमि असारदा (०)-रोग दर्पः (०)-गुणी, मानद । गोधम (10) गोधागा पाशीयां.)-भाची कार उनप (.) गोप (ई.)-दोर, माण। पुरख (भयर) गामो। माम (10)-गा। गलिग ( पुग। पावेगष्टः (40) -राष्ट्रापुर गुष्टि (५० ग्रो)-गुटी। शन (पि०)-Trl पधारा (५०१०)बिदा। एटम (२०)अदिनाई। मदिरा (पी0)-मय, गर । है सस्कृतरचनाऽनुषादशिक्षक। मारुत. (पुं०)वायु। अवधारणा (खी०) - तिरस्कार, मार्ग (पु०)- रास्ता। अपमान। “वसुधा (स्त्री०) - पृथ्वी। आरोपणम् (न०) - लगाना, विरायः (पु०)- चिल्लाहट। पौधा लगाना। शक. (पुं०) मुर्दा। कवरी (स्त्री) - देगी, चोटी । सश्चलनम् (न०)= इधर उधर फिरना । ग्रहणम् (न) - पकड़ना । :ज्योत्स्ना (खी०) - चाँदनी । जालम् (न०) जाल । नायक. (पु०)- मुखिया, अगुआ। दुष्कृवम् (न०)- पाप, दुष्कर्म । पान्यः (पुं०) = रास्तागोर। परम् (१०) = तथापि, लेकिन । प्राश्निक' (पु.)-परीक्षक । प्राची (खो०) पूर्वदिशा। 'रमण ( पु०) प्यारा, पति । भूपः (पु०) = गजा। सचिव (पु०) - मन्नी। वीर्यम् (न०) पराक्रम, वीरता। असुर (पु०) - राक्षस । समूह (पु.) एण्ड । धातुकोपः गै ( १ गण ५०) गाना। नि+मन्त्र (१ गण आ०) ध्वस् (१ गण , आ०) - नष्ट होना। निमत्रण भेजना, न्यौता देना। अब + मन् (४ गण , आ. ) वि + मृश ( ६ गण , ५० ) -विचार तिरस्कार करना। फरना, जाँचना। रम् - क्रीडा, करना, सुख पाना । स्पर्ध ( १ गणः प०) = बराबरी लज्ज (६ गण , आ०) शरमाना । फरना, होड़ करना। सस् (१ गग, आ०) गिरना । उप + हस् ( १ गग', प.)- हँसी अति+सृज् (६ गण , प०) देना। करना। हिन्दी में अनुवाद करो सौता गोदावर्यास्तीरमगच्छत् । दशरथो रामस्य वियोगे प्राणा- बालने छायायामुपाविशताम् नत्यजत् । कलासु पर प्रावीण्यमविन्दः। पुत्रस्य शोकेनाऽनियत । नागस्त वालमदशत् । स्थं समराङ्गणमनयम् । वस्या हृदयमवेपत। जनकस्तनयमाह्वयत् । अरण्ये महिपानपश्यम् । ससारस्याऽसारतामयोधम् । न '- . - ४० मस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षकः। द्रष्ट (नि.) देखने वाला। शीयम् (न०)- परालमा द्वेष्ट (त्रि.)- ट्रेप करने बारा । सन्निधिः ( पुं०) समोर स्त्रीलिजरान्दा अनुरक्ति प्रेम, प्रीति । मुछि-मोश। कान्ति-ज, प्रकार। मूर्ति - प्रतिमा। कृति कार्य, काम। याद • देवरानी, दौरानी, रिट गतिगमन, चाल रवि - विपपतुम्न, प्रेम। दुप्कृति-पुरा पाम। पपू पटू, मार्मा। दुहियेटी, पुषी। पसति - निवासस्थान धृवि= धैर्य धारण । चि धीपिका, व्यापार धेनु गाय । शुवि - मुनना, कान, थे। प्रकृति - समाय, प्रधानमण्डल । सुझवि -अच्छाकामा अतिकृति-प्रतिमा, पदमा स्मृति - रमरग, पर्मचार। भकि-प्रेमपूत सेया। स्पर-पति। भूविऐश्वर्य, यमय। धातुकोपः अनु+पू (र गग', ५०) हिद (गा, 3.)-काय ।। गोपना, पागाना। (कर्मवापे-लियो) निर+चम् (४ मा, प.) म+11-(प्राविमा, देवना, निमर -जिर फरना। पनु + मन (४ गा मा.). गु-मरना, (सपा-पित)। सीकार करा, मीन निर+गाया, उपम करना, पाय ( गमः,.)जका (कमंगाजे-मिमी)। पषि+(m. अभिया१०), पाना (Tirमति नाम पाना, (मपीपी)। -मपिता मा+गम-ममतभरना, पांडे म+र (मरना। पौर मिर-(vr.) मरकर ग ( १६.)- ६ froाना। .

११ . .- संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक। हिन्दी में अनुवाद करो 'युना तरयः फम्पन्ते। नार्याः कपोलयोनेंत्राभ्यामणि मिरा मधु पियन्ति । गलन्ति । मुभि त्या आदिश्यन्त । पितरो वन्यन्ते पुत्रैः। श्वस्य कर्तार नमामि । पाण्डवा द्वेष्टन् युद्धेऽजयन् । ता लक्ष्मण देवरमन्वगच्छत् । मनुना धर्म प्राणीयत । डागस्य जल मार्गे गन्तृभि धात्रा प्रजाः सृज्यन्ते। रपीयत। याचका दातार नालभन्त । वश्वस्य स्रष्टुरिच्छाऽलनीया। साधवो मृत्योर्भय न गणयन्ति । आधुनि माधुर्यमस्ति । इन्दौ कलको दृश्यते । 'लस्य राशावग्नेरिय मृदुनि फुरुभ्यो दूत आगच्छत् । मृगस्य शरीरे निशितस्य नप्तुर्लाभेऽतीवोत्कण्ठा भारत घागस्य पात। वर्षीयाणाम् । स दुष्कृतेरुत्पद्यते। सुजनस्य कीतिर्लोके प्रसरति । मातु ऋष्यशृङ्गस्याश्रम मात- रामः प्रीत्या पुत्रमाश्लिष्यति । रोऽगच्छन् । बुद्धेः प्रकर्ष कीर्तये भवति । पारायणस्य कृतयो हरे प्रीत्यै मावर्ननान्दर पापृच्छत् सीता न भविष्यन्ति । पञ्चात् पितुरगच्छद् गृहम् । वो नद्या जलमानेष्यन्ति । प्रकृतिभिर्नुप सेव्यते। गेभेन बुद्धिश्वलति गोपो घेनू रक्षिष्यति । फन्याया भर्तार जामातरं वदन्ति । चन्द्रस्य कान्ति द्रक्ष्यति शिशु । स्मृत्या धर्म. कथ्यते। सस्कृत में अनुवाद फरो:- 'भाकाश धूल से भरा जाता है। रावण के सिर वाणों द्वारा राम से राला ने नगर के रक्षकों को बुलाया। फाटे गये। राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ बहुधा विघ्नों के भय से मनुष्यों द्वारा बन जायगा। काम प्रारम्भ नही किया जाता। कुमार्ग से जाने वालों की मनुष्यों दुर्जन की जीभ की नोक पर शहद दारा निन्दा की जाती है। रहता है, परन्तु हृदय मे विष भरा मैंने मन्या से एक पुस्तक पाई। -1 किया गया। -- सस्कवरचनाऽनुवादशिक्षा। विश्वामित्र के साथ राम का वन को यह भोगामों से क्षमा मागता है। घाना ( उसके पिता द्वारा स्वीकृत भायं रुदेव में रहते थे। विष्णु रमा के पति का मित्र है। नारायण हरि के दामाद के पोदे देरोगा। सीता ने (मनो) ननद के पति यह खो (अपनी) माता के घर जाने गमको प्रगाम सिमा के लिए अपने पति से भाशा मा सीता सदा अपनी सास को प्रथम करेगी। रखती थी। उचरी मारत म पुतियों को उम्रका सम्पामो रात्रीयों को मान में प्रशयनीय। करेगा। नारायण का नारा उसके कमों का फल है। मनुष्प का समाव मुकर्मों से। सोना का मुष कान्ति से मन्द्रमा के पाता। समारे। क्षमा मनुप्पो का घरोवम मामूपम परशुराम ने (भाने ) वरियों को करसे मनु को बुद्धि का 7830 से मारा। विण का परिणाम है। मातो का सामोरो माप्रमाणे नियमो पतियों के साप गो पोछेगा। की गई। पिता अपनी पुत्रियों को पद पन देगा। दे पोडशः पाठः १हरि मज-गरिकार। २.सरपवामनार मारे। मोमान मेश, समकी ४ देश!प्रमोद भरा है। मरस मागे ५ नरो गुगनिरनुमान का परमार शेपारकरे এ যদি । सस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षकः। आशा में लोट् लकार का प्रयोग होता है। स्कृत में इस लकार से अधोलिखित अर्थ प्रकट किये जाते हैं 1-किसी को किसी कार्य के करने की भाग देना । जैसे --प्रथम वाक्य में हरि को भवने का आदेश शिष्यादि को दिया गया है। २-किसी कार्य के करने का समय विधान करना । जैसे -द्वितीय वाक्य में नाच प्रारम्म होने का निर्देश है। ३-इच्छा, प्रार्थना और आशीर्वाद । प्रथमगणः, म् (परस्मैपदम् ) एकवचनम् द्विवचनम् बहुषचनम् प्रथमपुरुष भवतु भवताम् भवन्तु मध्यमपुरुष भववम् भवत भवाव भवाम प्रथमगणः, वृत् (पात्मनेपदम् ):- प्रयमपुरुष पर्तताम् वर्वेताम् वर्वन्ताम् वर्वेथाम् पर्वध्वम् उत्तमपुष वते वर्वावहै पर्वामहे शियो मां रक्षतात्-शिव मेरी रक्षा करे । आशीर्वाद के मर्थ में प्रथम और मध्यम पुरुष के एकवचन में एक पक्ष में तात् प्रत्यय लगाने से दो दो रूप भव उत्तमपुरुष भवानि - 1 1 मध्यमपुरुष घर्तस्व प्र० पु. रसतु-रक्षतात् । म. पु. रक्ष-रक्षतात् । .. शब्दकोपः अपराध. (पु०) = फसूर । दुर्गम् (न०) = कठिनता, किला । डिम्भः (पुं०) वालक । सहपर (वि०) साथी । दृढम् (क्रि० वि० ) - दृढ़ता से । (बी० सहचरी)। वशः (पु०)- कुल, खानदान । प्रतिक्रिया (खी०)बदला। वयस्य (पु०) - मित्र, उमर में सत्त्वम् (न०)-सरसगुण, अस्तित्व। बराबरी फा, साथी। सुवर्णफार (पु०) ० सुनार । पार्थिवः (पु.) राजा। असन्तुष्ट (वि०) सतोपरहित।

सस्कवरपेनाऽनुवादशिक्षका विश्वामित्र के साथ राम का वन को" वह श्रोतामों से क्षमा माँगता है। घाना ( उसके पिता द्वारा स्वीकृत आय फरदेश में रहते थे। किया गया। विष्णु रमा के पति का मित्र है। नारायण हरि के दामाद के घोड़े देखेगा। सीता ने (अरनो) ननद के पति का वह स्त्री (अपनी) मावा के घर जाने शृङ्गको प्रगाम किया। के लिए अपने पति से भाशा प्राप्त सीवा सदा अपनी सास को प्रसन्न करेगी। रखती थी। उत्तरी भारतवर्ष में युवतियों को नम्रता सम्पासो रात्रीयों को ध्यान में कोई प्रशसनीय है। करेगा। नारायण का नाश उसके कर्मों का फल है। मनुष्य का समाव उसके कर्मों से धार सीता का मुग्न कान्ति से चन्द्रमा के समान है। क्षमा मनुष्यों का सर्वोतम आमूपयो परशुराम ने (अपने ) वैरियों को फरसे मनुप की मुक्षिका विकास उसको शिक्षा का परिणाम है। बलो का सामी अपने मन्त्रियों से निर्श माने पतियों के साय गोने बोलेगा। को गई। पिता अपनी पुत्रियों को बहुत धन देगा । भाता है। . से मारा। -::- पोडशः पाठः १हरि भजभरि की सेवा र । २ नृत्य प्रवर्वदाम् नाच प्रारम्म हो । ३ लमीबा, मा वा सेवस्वमी पञ्च , उसकी सेवा मत कर । ४ देव ! प्रसीद अपराभान क्षमस्वन्दे देव ! प्रमश हो, अपराध मा करो। ५. नरो दुर्गागि वरतु मद्राणि च पश्यतु मनुष्प कठिनाइयों को पार करे और इस्पाग देखे (प्राप्त करे)। ६ गुरुनभिवादयध्वम् - उपगेग गुरुओं को नमस्कार करो । ७ अस्मिन् पोरेऽरण्ये कप वसानि इस ममान पाउ में में कैसे रहूँ!

४३ -- Ke -- ... भवत उत्तमपुरुष भवानि न सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः।। माझा में लोट् लकार का प्रयोग होता है। पस्कृत में इस लकार से अधोलिखित अर्थ प्रकट किये जाते हैं। १-किसी को किसी कार्य के करने को आग देना । जैसे -प्रथम यास्य में हरि को भजने का आदेश शिष्यादि को दिया गया है । २-किसी कार्य के करने का समय विधान करना । जैसे -द्वितीय वाक्य में नाच प्रारम्भ होने का निर्देश है। ३-इच्छा, प्रार्थना और आशीवाद । प्रथमगणः, भू (परस्मैपदम् ) एकवचनम् द्विवचनम् यहुवचनम् प्रयमपुरुष भवतु भववाम् भवन्तु मध्यमपुरुष. अव भवतम् भवाव भवाम प्रथमगणः, वृत् (धात्मनेपदम् ).- प्रथमपुरुष चर्तताम् वर्ववाम् वर्तन्ताम् मायमपुरुप वर्तस्व वयाम् पर्सध्वम् उचमपुरुष वते वर्वावहै वामहे शिवो मां रक्षतात्-शिव मेरी रक्षा करे । आशीर्वाद के भर्थ में प्रथम और मध्यम पुरुष के एकरचन में एक पक्ष में तात् प्रत्यय लगाने से दो दो रूप होते हैं प्र० पु० रसतु रक्षतात् । म. पु. रक्ष-रक्षतात् । शब्दकोपः अपराधः (पु0) = कसूर । दुर्गम् (न०) - कठिनता, किला। डिम्भ' (पुं०) - पालक । सहघर. (वि.)- साथी । दृढम् ( क्रि० मि०) - दृढ़ता से । (बी० सहचरी)। वशा (पु०)- कुल, खानदान । प्रतिक्रिया (बी०)=बदला। वयस्य (पु०) - मित्र, उमर में सत्त्वम् (न०)-सत्त्वगुण, अस्तिला बराबरी फा, साथी। सुपर्णफारः (पु०) - सुनार । पार्थिवः (पु०) = राजा। असन्तुष्ट (वि०) सतोपरहित । - ।

- सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक । प्रतीकारः(पु.)-उपया। द्विज. (पु.) बादाण, क्षत्रिय, वैर अभिधानम् (न०)-नाम । इन तीनों को द्विज कहते हैं। वेदना (स्त्री०)-पीडा। ब्राह्मण, पक्षी, चन्द्रमा, दाँत । ईश्वर. (पु०)समर्थ, धनान्य । घोर (वि०)-मया। चल (वि०)चपल । पटु ( वि०)-होशियार। पथ्य (वि०)-हितकारफ। लोह(वि०) चञ्चल अस्थिर,तृष्णापुर अव्ययम् इति यह, ऐसा। वत तर पीछे। तथा वैसा। तावन्तन तक, वाक्य में सौदर्य मानही ( यह प्राय आशार्थ के लिए भी इसका प्रयोग होता। बोट ल्फार के साथ आता है।) यथा जैसा । शीघ्रम् जल्दी। स्वैरम्-धीरे, स्वच्छन्दता से। रेरे-हे, थे। धातुकोपः अमि + वाद् ( १० गण', आ०) धा+मन्नू ( १० गण , मा.)- नमस्कार करना। आग, अनुमति देना। प्रति+पद् (४ गण , आ०) प्र+सद् (सी) (१ गणा, प. स्वीकार करना, आचरण परना। प्रसन्न होना। प्र+मद् (४ गण, १०) असावधानी वि + श्रम् (४ गग आ.)-आरा करना। परना, सुताया। अव* गाइ (१ गण, आ०) अनु+स्था (तिष्ठ १ ग० प०) स्नान करना। सिद्ध करना, माना हिन्दी में अनुवाद फरो:- जयतु जयतु देव । स्वैर स्वर गच्छतु भवान् । घफोराश्यन्द्रिका पिरन्तु । चम्नाकि भामन्त्रयस्व सहपरम् याचार वायत प्रतिपद्यस्व । दरिदारभर फौन्तेय मा प्रयच्छे उपविशतु भवान् । वीरापश्वमारोहवाम् । पाय ! इदमासनम, श्वरे धनमा +1 । सरकृतरपनाऽनुवादशिक्षक। गरे।रेमा विनय त्यजत । सख्यौ । पुष्पाण्यानयतम् । बियस्योपवन प्रविशाव नराणा व्याधयो नश्यन्तु । - मयूरी प्रासादस्य शिखरे नृत्यताम् । बासनयोर्निपोदतम् । नृपतयः सर्वदा प्रजा धर्मेण रक्षन्तु शनो प्रतिक्रियामुपदिशत । सत्यान्मा प्रमाद्याम। विधाम्यन्तु पान्थास्तरोश्छाया- मात्मन. पुत्राणा प्रवृत्त्युपरन्धये याम्। दास श्रीनगर प्रहिणु। तपसा फलमनुभवतु। वत कि वृत्तमिति कथय । माऽस्मानवधीरय। सस्कृत में अनुवाद करो:- मालको ! पाठशाला को जाभो । एड़की और लड़कियों को लड्डू दो। अच्छे पुरुषों से देष मत करो। हम बुद्धिमानों के उपदेशों का स्मरण फरें। ईश्वर राजा की रक्षा करे। राम की जीत में सदेह न करो। हरि और माधय वृथा यात मत करो। वह सोमरस पीये। मनुष्यों के शनु इस प्रकार नष्ट हो। बाल्को ! गूगे जीवों को कष्ट मत दो। वह अपने वश के सत्कर्मों का स्मरण (वे दोनों) पुत्र अपनी माता का करे। स्मरण करें। शब्दकोपः ११ अभिलाप (०) इच्छा, कामना। ऋजुता (स्त्री०)- सरलता। खलः (पु०)- दुष्ट, दुर्जन । पात्रम् (न०) = योग्य मनुष्य, वर्तन । प्रश्रयः (पु०)- नम्रता । श्रम (पु०)- परिश्रम, थकावट समृद्धि (बी०) = ऐश्वर्य, विपुल्ता। सूनु (पुं०) - पुत्र, छोया माई । हिन्दी में अनुवाद करो:- गुरुन् वन्दधम् । अपराधिन मा क्षमस्व । फीतये यतामहे । एतेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो दक्षिणा दातु- शृगाली म्रियेताम् । मारभरव। ल एतैरालापैरात्मनः फार्पण्य शत्रुभिः सह युध्यस्त। माऽपवृणुष्व । भर्तार सेवेथाम् । चित्त स्वास्थ्य लभताम् । नरा धान्यस्य समृद्धधा मोदन्ताम। ५ स०२० 은 --- वार्ता श्रूयन्ताम् । । कथ दुःख सहै सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । कन्ये गीत शिक्षताम् । नृपस्य सूनव' पराक्रमेण प्रा शन्ताम्। सगीतमारभामहे। प्रजानां कल्याणाय क्लेशाःस प्रेचस्व वाप्या शोभाम् । न्तो नृपः। प्रवर्ततो प्रकृतिहिताय पार्थिवः श्राचार प्रतिपद्येथाम् । सस्कृत मे अनुवाद करो तुम (दोनों) देवदत्त फो शत्रु मत मान (टो) पुस्तके यहाँ लाई जाय । हम अपने दुकों पर लज्जित होवें मित्रों की उन्नति परमानद मनाओ। दवा के गुण नाय । योग्य मनुष्यों को धन दिया जाय । तुम सदा सत्य की खोज करो। पक्षी उस पृश्न की शाखाओं से उड़ जॉय । शठ सजनों को सरलना पर मुस्करा ब्राह्मणों को गन्न फे देर दिये जाय। स्वामी से सेरस के दोभाराषक्षा तुम ईश्वर की आशा मानो। किये जाय। हम आम चखें। सप्तदशः पाठः (१)क्त, क्तवतु प्रत्ययो १ कुम्मकार घटमकरोत्-कुम्भकारेग घर फत. कुम्हार से घड़ा बनाया गया २ त तुयायेन शारी निर्मिता-जुलाहे ने साक्षी बनाई। ३ वालेन पर मषितम्-पाक पर साया । ४ मया हसितम्-मने हँसा-में है। घृक्षमारूढः फपि समन्दर पेड़ पर चढ़ा। ६ फगतो देवर देवदत कहाँ गया। ७ भा पर वृत्तसार - मैंने धड़ा बनाया। तो पुस्तकमानीववन्ती - उन दोनों पुस्लमलाई। बन गतो राम ऋपोन् मागम - पन म गरे हुए राम ने प्राणियों प्रणाम किया। . - ८ संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । ४७ । उपर्युक्त वाक्यों को ध्यान से देखिये :- १-प्रथम वाक्य में भूतकालिक किया 'अकरोत्' के स्थान पर 'कृत.' का प्रयोग किया गया है। यह 'कृत' का प्रयोग है । प्रथम वाक्य के दोनों मागों की तुलना करने से निटित होता है:-'क' प्रत्ययान्त क्रिया के साथ कर्ता में तृतीया तथा फर्म में प्रथमा विभक्ति होती है, अर्थात् इसका प्रयोग कर्मवाच्य प्रयोग के समान होता है । परन्तु फर्मवाच्य-प्रयोग में कर्म के लिङ्ग का किया पर कोई प्रभाव नहीं होता, बल्कि इस प्रत्यय के प्रयोग में कर्म के लिङ्ग के अनुसार ही 'क प्रत्यया त पद का लिङ्ग होता है। (२-३ वाक्यों को देखिये ) यह सुब त -पद होता है। २-अकर्मक धातुओं से भूतकाल में क्तप्रत्यय प्राय नपुसकलिङ्ग में होता है। इस क्तप्रत्यय के साथ भी कर्ता म तृतीया विभक्ति ही होती है । (मने हँसा अर्थात् में हँसा । ) यहाँ मैने यह तृनीया विमक्ति है । ३-~'क गतो देवदत्त.' इस वाक्य में पूर्वोक्त नियम से फर्ता 'देवदत्त' में प्रथमा विभक्ति है। इसी प्रकार 'वृक्षमारूढ. कपि.' इस वाक्य में कर्ना 'कपि' में प्रथमा विमति है । इससे विदित होता है - कुछ धातु ऐसी भी है जिनसे 'क्त' प्रत्यय कर्ता में होता है । इस तरह के 'क्त' प्रत्यय के प्रयोग में कर्ता में प्रथमा तथा कर्म मे द्वितीया विभक्ति होती है अर्थात् इसका प्रयोग कर्तृ वाच्य के समान होता है। ४-नवम वाक्य में 'वन गत' यह 'राम' का विशेषग है। कभी कमो 'क्त' प्रत्ययान्त शब्द विशेषणा से भी प्रयुक्त होता है। उस समय हनमें विशेष्य के अनुसार ही लिज, वचन आदि होते हैं। ५-'क' प्रत्यय के समान भूनकाल में करतु' प्रत्यय भी होता है परन्तु यह सर्वदा कर्ता में ही होता है और फर्तृवाच्य प्रयोग के अनुसार कर्ता और कर्म में यिमक्तियाँ होती है । 'क्तवतु' प्रययाल मिया मलिङ्ग, वचन कर्ता के समान होते हैं। यह प्रत्यय भी विशेषण रूप से प्रयुक्त होता है, उस समय इसमें भी विरोष्य के अनुसार ही लिङ्ग, वचन आदि होते है। * गत्यर्याकर्मकरिश्पशीदयाऽऽसपसजनिकहजीर्यतिम्पश्च'। ग यर्थक अर्मक, शिल्प, शोह, स्था, आम, वस् , जन् , रुह , जृ (दिवादि ) इन धातुओं से 'क' प्रत्यय कर्ता में होता है।

सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। (२) क्त्वा प्रत्यय. शत्रून् जित्वा निवर्तते वीर = सिपाही शत्रुओं को जीतकर लौट रहा है। मुक्त्वा ग्राम गच्छ - सावर गाँव को जा। अश्वमारध बन गत =घोड़े पर चढ़कर वन को गया। भरीन विजित्य नृपो मही लमते-राजा शत्रुओं को बोतकर पृथ्वी पाना है। १--'सिपाही शत्रुओं यो जीतकर औरता है, यहाँ 'जीतना 'लोटना दो क्रियाएँ है। इनमें से जीतना प्रथम तथा लोटना किया बार होती है । दोनों क्रियाओं का करने वाला भी एक ही सिपाही' है । अत (क) बन एक क्रिया के बाद दूसरी किया की जाती है तन प्रथम । वाली पिया से करवा प्रत्यय क्यिा जाता है। (स) दोनों क्रियाओं का पर्ता एफ ही होना चाहिए। २-'कल्या' प्रत्ययात प्रिया के पूर्व यदि कोई उपसर्ग रखा जावे र परवा के स्थान पर य हो जाता है। जैसे --विजिाय, भाषा आदि । ३-- 'क्त्वा' प्रत्ययात क्रिया अव्यय रूप से प्रयुक्त होती है। जिस्या मुफ्त्वा, पारा, विजित्य-ये सर अव्ययपद हैं। -कावा' प्रत्ययात मियाओं के धर्म आदि भी मुरय क्रियाओं के समान ही होते हैं और उनमें विभक्तियाँ भी उसी प्रकार होती हैं। 'शन्' जित्व यहाँ 'जित्या' प्रिया का शवन्' कर्म है अत यह दितीयान्त है। (३) तुमुन् प्रत्यय.-- इन्द्रियाणि जेतुगुपक्रमते - इन्द्रियों को जीतना प्रारम्भ करता है। भोक्तु यतते - खाने के लिए यान परता है। -अब एफ क्रिया करने के लिए दूसरी प्रिया की पाती है तर प्रथा मिया (लिसके लिए दूसरी क्रिया की गई है। से तुमुन् प्रत्यय होता है इन्द्रियों को जीतो के लिए (जेतु ) प्रारम्भ करता है (उपममते)-यहाँ के लिए प्रारम्भ करना है, अत जीतना किया में सुना प्रत्यय हुआ है। तुमन प्रत्ययात पदों को हेवक पदव पहवे है। ये भी अपय होते हैं। २-मुन्' प्रत्ययात पिया के कमांदि भी मुख्य क्रिया के समान ही से हैं, परन्तु कता का सम्बध मुख्य क्रिया से ही होता है। १ धातु फ्रष्टुम् , कटुम् गम गुद्द प - त्यज सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । कुछ मुख्य मुख्य धातुओं के कृदन्तरूप नीचे दिए जाते हैं। अर्थ पंतप्रत्य० क्त्वाम० तुमुन् प्रत्ययान्त अस् फैकना अस्त अस्त्वा, असित्वा असितम् जोतना कृष्ट्वा चरना, कान्त कन्वा, फान्वा, क्रमितम् जाना, ममित्या फ्लम् पकना क्रान्त क्नमित्वागत्या क्लमितम् खन् सोदा खत खात्या, खनित्वा सनितुम् जाना गत गत्ता गन्तुम् FETTI ट ट्ना, गृहिला गृहितुम् , गोदुम् , जन् उत्पन होना जात जनित्या जनितुम् प्रसन होना तुष्ट तुष्ट्या तोष्टुम् छोड़ना त्यत त्यक्त्वा त्यक्तम् जराना दग्ध ग्मा दग्धुम् दिश दिखाना दिष्ट देष्टुम् देखना दृष्ट्वा द्रष्टुम् धारण करना, हित हिसा घातुम् सपना नम् नमस्कार करना नत नत्या तुम् पच् पमाना पक पत्ता पक्वम् पूटना पृष्ट पृष्ट्या प्रष्टुम् बाँधना वद्ध बा बधुम् खाना भुक्त भुक्त्वा भोक्तुम् मनना, मन मत्वा मन्तुम् यहाँ। मन् मर डूमना मग्न मक्त्वा, मडक्त्वा मडक्तुम् मरना मृत मृत्वा मम् है। यज् पूजा करना यष्टुम् होन! मुन् .

भीडा करना बढ़ना स्वा सुन्ध व दिलघु 4 सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक। धातु अर्थ क्तप्रत्य० क्त्वाप्र० तुमुन् प्रत्ययान्द रम् रत रमित्या, रत्त्वा रह रोदुम् लभ प्राप्त करना लब्ध कामा लन्धुम् लुम लोभ करना लुम्मा लोधुम् , लोमिक्ष बोलना उक्त उक्त्वा वचम् वद् बोलना उदित उदिना वदिसम् वप बोना उत्त उप्त्वा वप्तम् विशू घुसना विष्ट विष्ट्वा वेष्टुम् शस् कहना शस्त शस्त्वा, सित्वा शसितम् आलिङ्गन करना लिष्ट श्लिष्टवा प्लेष्टुम् सहना सोद खोट्या, महित्वा सोदुम् , सहितुम् छूना स्पृष्ट स्पष्टुम् मारना हन्तम् जीतना जित जित्या जेतुम् भिद् चीरना मिन मिना भू होना भूत भूत्वा भवितुम् छिद् टुकड़े करना छिन छित्या छेतुम् शक सकना, शक्त शक्त्या धक्तम् समय होना চীনা मुका मुक्ता मोकाम् दुहना दुग्ध दुगना शब्दकोषः अमङ्गलम् (10)-मल्याण, अशुभ । अर्थ (१०) - द्रव्य, प्रयोजन । आननम् । न.)- मुस। फुजर (पुं०)- हायी। दिनमणि (पु०) सूर्य । पर (पु.) कोचद, पाप । तरकीब अभिपका (पु०) लान। उपाय (पुर्द ब भेतुम { दोधुम् मृगया (सी०) - शिकार । विधि. (पु०) - 4 . संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। मटटज' (पु०)= झोपड़ी कारागृहम् (न०) चदीसाना । * देवायतनम् (न०) = मन्दिर । मदः (पु०)अहकार, नण। नमूलम् (न०) • जह। सारमेय (पु.)-कुचा। विशेषणम् -अखिल = सम्पूर्ण। सम्यक् (क्रिया वि०)-अच्छी तरह। यज्ञिय-यशसम्म धी। क्षेय% नाश करने योग्य। सफल-सत्रा शोचनीय शोक करने योग्य । अचिन्त्यसमा विचार न किया जेय जीतने योग्य। जा सके। अव्ययम् किमर्थम् = किस लिए। तूपणीम् - चुपचाप, चुप । - प्रात.- प्रात काल, सुबह । सायम् - सायपाल, शाम । धातुकोपः - खन् ( गण , उभयपद )सोदना । उद् + धृ (घर) (५०)=यचना, धृ ( १ गण , उ. प.)-पकड़ना । मुक्त करना, ऊँचा उठाना। वि+नी-शिक्षण देना, सिसाना । भज ( १ गण., उ. ५०) -आश्रय प्रति + भाप(१गण ,आ०)- उत्तर देना । पपड़ना, सहारालेना, सेवन करना । प्रति + नि + कृत् (पा०) लौटना। पारुह(१ गण , ५० )-चढ़ना । उप+म्-प्रारम्भ करना (उपक्रमते) परि+ह ( १ गण', उ०) - दूर निर + दिश रताना, दिखाना । परना, हटाना। नि+धा (३ गण', उ०) - रसना। प्र+ यत् (आ०)-कोशिश करना। हिन्दी में अनुवाद करो जल पातु नदी गच्छति । अस्त गतो दिनमणिः। अश्वमारोढुं मतिर्जाता। क्षेय पापम् , जेय मन । सम्प्रदायमनुसृत्य ग्रन्थारम्भे जले निमग्नो देवदत्त । देवता वर्णयामि। अचिन्त्यानप्यर्थान् विधि मटा योद्धमागता । च्छति। प्राम गन्तुमिच्छामि। गृह प्रविश्य क मातेत्यपृच्छत् । माधिमतिकम्य माम्यति । पके पतितां धेनुमुद्धरति । . प्रयan प्र० " प० प० स० प्र० संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। और इनमें विशेष्य के अनुसार लिज, वचा आदि होते हैं। अत एव इ. प्रयोग तीनों रिमों में होता है। पुल्लिङ्गम् :- एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् गन्छन् गच्छन्ती गच्छन्तः गच्छन्तम् गच्छत गच्छता गच्छद्याम् गच्छद्रि गच्छते गच्छद्य गच्छतः गच्छतो गच्छताम् गच्छति गच्छत्सु नपुसकलिङ्गम:- गच्छत् गच्छन्ती गच्छन्ति दि. आगे पुलिस के समान रूप होंगे। स्त्रीलिङ्गम् :- २ गण -गच्छत् गच्छन्ती। ६ गण -तिपत् =क्षिपती, तिपन्ती ४ गग -पुप्यत् = कुप्यन्ती। २ गण स्नात् ३ स्नाती, स्नान्ती। १. गण =क्षालयत् = सालयन्ती। प्रेरणा भाचया-भावयन्ती। ४-तु-शानच पर्वमान। आत्मनेपदी धातुओं से शानच प्रत्यय होकर वर्तमान, वर्षमान सेवमान, विद्यमान आदि रूप होते हैं। रामा भी प्रयोग तीनों लिट्रोम होता है। शब्दकोपः भापद् (स्त्री)-विपति। इपद् (नी0) पत्थर। आयुप्मत् ( वि०)चिरमीवी। भवत् (सर्वनाम) भाप गुणवत् ( वि०)-गुणी। (आदर गफ)। जगन् (न.)-समार। भूभृत् (9) रामा, पहा । " घनी। - सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक। "मरुत् (पु०)- वायु, देव । मृद् (बी०)-मिट्टी। यशस्वत् (वि०)- प्रख्यात, वाच (स्त्री०) वाणी। कीर्तिमान् । शरद् (स्त्री)-शरद ऋतु । वियत् (न०)- आकाश। हुतभुज (पु०)- अग्नि । सुहद् (न०) - मित्र। निशा (खी) - रात। अकाल (पु०) न+ काल। अघमर्ण (पु०) = कर्जदार । अनुपयुक्त समय, बेमौके। उत्तमर्ण. (पु.) - कर्ज देने वाला, अन्तःकरणम् (न०) दय, मन। उद्धत (वि०) अहवारी, उद्दण्ड। चञ्चल (वि० ) = चञ्चल । जीवितम् ( न०)जीवन । निपण्ण (वि० ) - बैठा हुआ । प्रवृत्तिः (खी०)अभिरुचि, बहुश (१०)- प्राय , अक्सर । मन का शुकाव। विकार' (पु०) परिवर्तन, मृदु ( वि०)कोमल। रूपातर। वृन्तम् (न०) = इप्ठल । विहित (वि०)-किया हुआ। अत्यय. (पु०)नाश । सर्वथा (अ.) = सब प्रकार से । कुर्वत् - करने वाला, करता हुआ। गच्छत् = जाने वाला, जाता हुआ जयत = जीतने वाला, जीतता हुआ। पश्यत्-देखने वाला, देखता हुआ। वसत् - निवास करने वाला, निवास शासत् - शासन करने वाला, शासन परता हुआ। परता हुआ। हिन्दी मे अनुवाद करो. नृशसेभ्यो गुणवतामपि भय बुद्धिमन्तो लोके यशस्वन्तो विद्यते । भवन्ति । वत्से । आयुष्मती भव । जयवोऽरीन् मापेक्षस्व । युधिष्ठिरो मूतिमान धर्म इव । पश्यतोगुरो शिष्येणाऽविनयः भवद्भिरादिष्टो भृत्यो नगरमग- कृत । च्छता हुवभुजा दग्घमरण्यमपश्यद् दिनेषु गच्छत्सु देवदत्तो धनवा. युधिष्ठिर। नभवत्। कवीनां वातु माधुर्यमस्ति ।

सस्कृवरचनाऽनुवाद शिक्षकः। और इनमें विशेष्य के अनुसार लिङ्ग, वचन आदि होते हैं । अत एव प्रयोग तीनों रिलों में होता है। पुल्लिङ्गम् एकवचनम् द्विवचनम् पहुवचनम् प्र० गच्छन् गच्छन्ती गच्छन्तः गच्छन्तम गच्छतः गच्छता गच्छद्याम् गच्छद्धि गच्छते गच्छद्य गच्छत' गच्छतो गच्छताम् गच्छति गच्छत्सु नपुसकलिङ्गम् :- गन्छन् गन्छन्ती गच्छन्ति च० " प० " " " ५० स० " " .- " भागे पुलिस के समान रूप होंगे। स्त्रीलिङ्गम् १ गण -गच्छत् गच्छन्ती। ६ गग -तिपत्-क्षिपती, क्षिपन्ता ४ गण-कुप्यत्-पुप्यन्ती। २ गग स्नात् ३ स्नाती, स्नान्ती। १. गण =क्षालयत् = क्षालयन्ती। प्रेरणा भावयन् =भावयन्ती। ४---पृतु = शानच वर्तमान। आत्मनेपदी धातुओं से शानच प्रत्यय होकर वर्तमान, वर्धमान सेवमान, विद्यमान आदि रूप होते है। इनका भी प्रयोग तीनो लिमो में होता है। शब्दकोप आपद् (खी०)-विपचि। हपद् (सी०)-पपर। आयुप्मत् ( वि०) विरगयो । भवत ( सर्वनाम)- आप गुणवत् ( वि०)-गुगी। (आदरसूनफ)। जगत् (न.)=सार। भूमन् (पु0) राजा, पाह धनी। . सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक। मरत् (पु०)- वायु, देव । मृद् (बी०)-मिट्टी। प्रशस्वत् ( वि०)- प्रख्यात, वाच । स्त्री०) वाणी। कीर्तिमान् । शरद् (बी)-शरद ऋतु । वियत् (न०) आकाश । हुतभुज् (पुं०)-अग्नि। -मुहद् (न०) - मित्र। निशा (स्त्री) - रात । अकाल (पु०) न+फाल । अधमर्ण (पु०) = कर्जदार । अनुपयुक्त समय, बेमौके। उत्तमर्ण (पु.) - फर्ज देने वाला, अन्त फरणम् (न०) =हृदय, मन । उद्धत (वि०) अहहारी, उद्दण्ड । चञ्चल (वि० ) = चञ्चल । जीवितम् (न०)-बीवन । निषण्ण (वि० ) - बैठा हुआ । प्रवृत्तिः (स्त्री०)अभिरुचि, बहुश (अ०)- प्राय , अक्सर। मन का मुकाव । विकार (पु०) - परिवर्तन, मृदु (वि०)कोमल। रूपान्तर। वृन्तम् (न०) =डप्ठल । विहित ( वि०)-किया દુબr अत्यय. (पु०)-नाश । सर्वथा (१०) - सब प्रकार से । कुर्वत् = करने वाला, करता हुआ। गच्छत् - जाने वाला, जाता हुआ। जयत - जीतने वाला, जीतता हुआ। पश्यत्-देसने वाला, देसता हुआ । वसत् - निवास करने वाला, निवास शासत् - शासन करने वाला, शासन परता हुआ । करता हुआ । हिन्दी मे अनुवाद करो. नृशसेभ्यो गुणवतामपि भय बुद्धिमन्तो लोके यशस्वन्तो विद्यते । भवन्ति । वत्से । आयुष्मती भव। जयवोऽरीन् मापेक्षस्व । युधिष्ठिरो भूविमान धर्म इव । पश्यतो गुरोः शिष्येणाऽविनयः- भवद्धिरादिष्टो मृत्यो नगरमग. कृत.। च्छता हुतभुजा दग्धमरण्यमपश्यद् दिनेषु गच्छरसु देवदत्तो धनवा युधिष्ठिरः। नमवत् । कवीनां वानु माधुर्यमस्ति ।

सस्कृवरचनाऽनुवादशिक्षकः । वटा मृदो विकारा बलङ्का- भवन्तः पु. सहागच्छन्ति: राश्च सुवर्णस्य । श्रीमतो देवस्याला। हपदि निपएणो गुरु शिष्यान् प्राणानामत्ययेऽप्यसन्तः सदिन धर्ममुपादिशत् । ध्यय॑न्ते । अधम. परवन्तो भवन्ति । सता हि सन्देहपदेषु यस्तुषु पद्रस्य प्रकाश शरद्याहादको प्रमाणमन्त करणप्रवृचयः। भवति। अकालो नास्ति धर्मस्य जीविते वियति मेघा वायुना निरस्ताः । पन्चले सति। सस्कृत में अनुवाद करो.- उद्योगी पुरुष पराधीन नहीं है। कृष्ण ने सारथियों को घोड़े हाँक्ने इन्द्र देवताओं के स्वामी हैं। विपत्ति में मनुष्य को (उसके) मित्र मैने पाठशाला जाते हुए विद्यार्थियों छोड़ देते हैं। को देखा। मुनि ससार को जगल के समाा सम. पुदिमान नवीनचन्द्र से पुस्तक डि शते है। माती है। मगनान् मनु से ऐसा रिखा गया है। नारद याकाध से उतरे। बन में निवास करने वाले राम और स्वर्ग को जाने वाले (हमारे) आचार्य रमण से बहुत से राक्षसों का ऐसा उपदेश दिया था। विनाश किया गया। मापके दर्शन से मैं बहुत प्रछा हूँ हवा इण्ठन से छूटे हुए ले जाती है। मुख भोगने वालों को मुरकी इन दशरय समृद्ध पयोग नगरी में मुख के भोग से बारमार पदतीने निवास करते थे। राबाओं की सभाओं में पति ने मुनि लोग वन में पायरों पर बैठते हैं। भावे। हुए देखा।

एकोनविंशः पाठः विधिः- १ अपि नामानुरूप व लभेय-क्या यह सभव है कि मैं योग्य वर प्रास फर स।। २ सम्पत्तो न हयेत् विपत्ती च न विपीदेत् प्राश = बुद्धिमान पुरुष को सम्पत्ति में प्रसन और विपत्ति में दुखी न होना चाहिए। ३ न्यायशास्त्र शिक्षेवहि इतीच्छामि - मैं चाहता हूँ कि हम दोनों न्यायशास्त्र सीखें। ४ प्रपी मापदाप्यवधीरये तुम कमी भी अपियों का तिरस्कार मत करो। ५ प्रवासाझटिति न प्रतिनिवर्तेयाश्चेन्नियेय - यदि तुम प्रवास से शीघ्र न तोटोगे तो मैं मर पाऊँगी। १-विधि को प्रेरणा कहते हैं । इसका अर्थ 'चाहिए' ऐसा होता है। इसमें ल्ड् िलकार का प्रयोग होता है । कहीं कहीं सम्भावना के अर्थ मे भी यह लकार 'प्रयुक्त होता है। जैसे महाराजस्य यश पृथिव्यां प्रसरेत्-महाराज का यश पृथ्वी पर पैले। भू (१ गणः, १०) एकवचनम् दिवचनम् बहुवचनम् प्रथमपुरुष भवेन् भवेताम् भवेयु मण्यमपुरुष भवे भवेवम् उत्तमपुरुष भवेयम् भवेव भवेम वृत् (१ गणः धा०) प्रथमपुरुषः वर्तत वर्तयाताम् वर्तरन् मध्यमपुरुष वतेथाः यतयाथाम् वर्तेध्वम उत्तमपुरुष वर्तय वर्तवहि वर्तमहि शब्दकोपः मलीमस (वि.)-(मलीमसा सुरभि (वि०)- सुगन्धित । स्त्री०) मलिन, निन्दित । अर्थकृच्छ (पु० न०)-गरीबी पद्धति (स्त्री०) मार्ग, आचरण । धनसपट न्याय्य (वि०)-न्याययुक्त, सचित । अभिभूत (वि०)पराजित, जी भवेत 1 3 सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । वृत्तम् (न०)= आचरण । अहितम् (न०)हानि, उमर।। तृपित (वि०) प्यासा । तमिस्रा (स्त्री०)=अधेरी रात । धीर ( पि०) = पण्डित, धैर्यवान् । दारिद्रयम् (न०) -दरिद्रता, गणे: परकीय (वि.) पराया। न्यायसमा (बी०)- कचहरी प्राप्त (वि.)=मिला हुआ। प्रतिदिनम् (प.)रोम । विमार्ग. (०)कुमार्ग, दुराचरण । रज्जु (सी० ) - रसो। हेतु (पु०) - कारण । विमुख (वि०)पराहमुख । मुँह समाज (पु०)सभा, जनसमूह । मोहनेवाला । सुकृतम् (न० 0) सत्कर्म, अच्छा शोभन (वि.) - अच्छा। व्यपदार। सातिन् (पुं०) - गह। अनुरखनम् (न०) - प्रसन्न करना। सुपरितम् (न०) - सत्कर्म । अपाय' (पु०) - अपकार, हानि । अछापाव। विस्मय (पु.) आचर्य। सुवृत्त (वि०)- सदाचारी। घातकोप: अनु+इप (इच्छ)- सोनना। नि+त् (प्रा.)- लौटना। अव+धीर - तिरस्कार करना। अव+गाह (१ गगा, मा.नहाना 'प्रव+लम्र (१ गग , आ.) आभय तम् (१ गग ,६०) तपना गरम होना लेना, स्वीकार करना। दुइ (४ गण प.)-द्रोह करना, अधि+वस् - निधास करना, ऊपर देष फरना। दि+स्म (स्मर)- भूलना। अव्ययम् :- उत=अयया । किम्त्या। पाचित् कही । सर्वत र ओर से अपि नाम- सम्मानायोनक । पुन फिर, लेकिन, यापयोभाषनक हिन्दी में अनुवाद करो स्त्रीभ्यो नमध्येन। विपदामिभूतोऽपि नाद धर्म पुत्रा. मुपरित पितरी प्रीण्येयु । त्यजेयम् । मुपत्ताय शियाय गुरयो विद्या र सर्प न मन्येयम् । प्रयच्छन्ति । यसी मातुराशामनुगम्येयायाम् ईश्वरस्य पूजया शान्ति विन्देवदि। प्रजानामनुरखानाय रामानो यसेर . . बैठना। । - सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। ५६ *कि भो । नृत्य शिक्षेयोत गानम् ? भूयात् पतिर्म भगवान मुकुन्दः । धैर्यमवलम्ब्य शत्रुभि सह यूय साधुभ्य कदापि न द्रुह्येत् । युध्यध्वम्। घर्धमान व्याधि जयन्त शत्रु च शिष्यस्याऽविनय गुरुर्न सहेत । नोपेक्षेत । इच्छामि दुग्ध पियेद् भवान् । दुर्दशा गते नरि क्षुद्रोऽप्यदित- । यद्यधर्मानिवर्तथा शोभन भवेत् । माचरेत्। जन मुखेदर्थकृच्छ्रेषु न च धर्म परि. मलीमसा पद्धति कदापि नाव त्यजेत् । लम्चेमहि । विषमप्यमृत क्वचिद्भवेदमृत वा शाम्येत् प्रत्यपकारेण नोपकारेण विपमीश्वरेच्छया। दुर्जनः। राजानो धर्मेण वसुधा शिष्युः । । सतो जयमन्विच्छेत् पुत्रा परिडतानां समाजे अपण्डिता दिच्छेत् पराजयम्। भजेयु । सूर्ये तपत्यावरणाय दृष्टेः कल्पेत 'भूयाद्गति भंगयान् परेशः। लोकस्य कथ तिमस्रा। सस्कृत में अनुवाद करो --मनुष्य को मित्रों को न भूलना चाहिए । तुम्हें उयोग कभी न छोड़ना चाहिए। हमें निष्कपट हृदय से ईश्वर की पूजा राजा प्रजाओं को कारों से बचा। परनी चाहिए। दोनों पुस्तके दोनों हाथों से लावें। हमें वृक्ष की छाया म वैठना चाहिए। तुझे दरिद्रों को धन देना चाहिए । किसी को दूसरे के धन की इच्छा नहीं तुम अपने कर्तव्य से न चूको । परनी चाहिए। मनुष्य मिना कारण क्षोम न करें। तुम दोनों को गुरु से न्याय पढ़ना फचहरी में गवाह सदा सत्य चाहिए। बोले। यदि हम अपने धर्म की रक्षा में मरेंगे (वह अपने) शुओं से युद्ध कर सके तो हमें कीर्ति प्राप्त होगी। इसलिए सैनिकों को नगर के बाहर लेगा। यदि म काशी गया तो पुस्तकें लाऊँगा। जो धर्म का आचरण नहीं करेगा उसका तुम्हें अपने गुरु की आज्ञा माननी चाहिए। नाश होगा। । मत्री के स्थान पर मुझे किसको नियुक्त करना चाहिए ।

} ६२ सस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षकः । पुत्रका (पु०) प्यारा पुत्र । प्रतनु( वि०)-अप, सूक्ष्म, से भूतार्थः (पु०) - ययार्य, सत्य । मार्गदर्शक (वि०) लव (पु०) अश, कण । मार्गोपदेष्ट बतानेवाला। वियोगः (पुं०) विरह, जुदाई। शिवम् (न०) - कल्याणा हिन्दी में अनुवाद करो। एते वयमयोध्या प्राप्ताः। फियती वेला सखाता तय गवाया के आवां त्वा परित्रातुम् ? गच्छवा भवत्यो, अहमप्यनुग उत्ताम्यति मे हृदय वत्सस्य मागत एव। दर्शनाय । वत्से ! न ते मङ्गलकाले रोदि जनक स्निह्यति युवयो । मुचितम् । माऽस्मानवधीरय। फुत्रास्ति मे पुत्रक ? आर्य ! कथयामि ते भूतार्थम् । त्वया सहोपषन गन्तुमिच्छागि मा धन न यच्छति। शियो व शिवाय भवतु । स्वरते मम मनो गृहगमनाय । पालको ! युवयो. पिता कान्ति फगता ते जननी? महीं रतसु भस्मासु पुतो ग एतस्य वृत्तान्तस्य श्रवणेन पर्याकुल नो मन । आप किं गच्छेव ? कमपराधलवं मयि पश्यसि तस्य पीडा परिहतुं, युप्मामिति त्यजसि मानिनि दासजन यतः। न्तित उपायो निष्फलोऽमवन् दीनेष्वस्मास्वप्येताहशो भवत: स्नेह । संस्कृत में अनुवाद फरो र बुद्धिमान पुरुष है। पही को हुआ सो हम से फहो। उस ग्राम की बाते हुए तुम्हारा मार्ग- हमारे विमम शोक मत करो। दर्शफ कोन या इंधर की कृपा से इम एप सहटी- मेरी पुस्तक कहा , पर मैंने तुमसे पूर्ण । पार हुए। तुमने उस समय भो क्यिा यह मुझे सोमवार के दिन माने के रिए मुझ साधियों को माग दी गई थी तेरे पराजित होने पर तेरे सिपाही हम दोनों ने शपियों के अनेक माम बनने पालेकी परागपे। देगे। मयम् ? पाद।

झता है ? - मा सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक। से यह खबर मुझसे मिली। ये फूल तुम दोनों के द्वारा लाये गये हैं। ने मुझसे बुद्धिमान् लोगों का मार्ग वे दोनों सब मनुष्य को निन्दा करते जाना । हैं। या यह तुझे अविश्वास के योग्य सम अपराध के बिना ही गुरु ने मुझे मारा। उस कुत्ते को मारने में तुम से अनुचित ससे यह कहानी किसने फही ? फाम किया गया है। सर्वनाम (२) अदस = यद्द । इदम् - यद । एतद् - यह । तद् = यह । T 'इदम्' शन्द पास में स्थित किसी मनुष्य या वस्तु के लिए प्रयुक्त होता है और 'एतद्' शब्द अत्यन्त समीपवर्ती मनुष्य या वस्तु के लिए प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार दूरस्थित किसी मनुष्य या वस्तु के लिये 'श्रदस्' शब्द प्रयुक्त होता है | अपत्यक्ष मनुष्य या वस्तु के लिए तो 'तत्' शब्द का प्रयोग होता है। जैसे कहा गया है इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति चैतदो रूपम् । असस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् ।। 11 अदस् (पु०) एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् प्रसौ স্মমু अमी द्वि० अमुम् अमुन् अमुना अमूभ्याम् अमोभि. अमुष्मै अमीभ्यः অনুদান अमुष्य अमुयो. अमीषाम् अमुष्मिन् अमीषु अदस्( न०) म.द्वि. अद्' अगू अमूनि शेष रूप पुलिङ्ग के समान । - - THIS । च. " प० निस० गई। .

६४ संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। प्रक श्रम " तृ० अ प० प० " स० अमूष अमूप प्र० अदस् (सी०) एकवचनम् द्विवचनम् असो श्रमू अमूम् अमुया अमूभ्याम् अमुष्य अमुष्या' अमुयो अमुष्याम् इदम् (पु०) अयम् इमम् अनेन थाभ्याम् अस्मै पाभ्याम् अरमात यस्य मनयो अस्मिन् इदम् (न०) समे शेष रूप पुलिस के समान । इदम् (सी.) इयम श्माम् अनया आभ्याम अस्यै अस्या इमे इमान् एभिः एभ्य प० " प. एपाम् स० प्र.नि. इमाः भाभि सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । ६५ द्विवचनम् अनयो. एकवचनम् अस्या. अस्याम् बहुवचनम् आसाम् आसु एतद् (पु०) एतो एते एतान् एतेः एताभ्याम् एप एतम् एतेन एतस्मे एतस्मात् एतस्य एतस्मिन् " एतयो एतेषाम् एतेपु एतानि द्वि० पतत् एतद् (न०) एते शेष रूप पुलिन्न के समान । एतद् (स्त्री०) एते एता. एषा एताम् एतया एतस्यै एतस्या एताभ्याम् एताभि एताभ्यः " " एतयो एतासाम् एतासु एतस्याम् " तद् (पु०) तौ ते - ते तान् '० तम् ताभ्याम् . तेभ्यः '० तस्मै १० ५० प. सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक। एकवचनमू द्विवचनम् महुवचनम् तस्मात् वाभ्याम् तेभ्यः तस्य तयोः तेषाम तस्मिन् ठेप तद् (न०) प्र० वि० तत् ते तानि शेष रूप पुंलिङ्ग के समान । तद् (स्त्री) सा ते ता. ताम् तया ताभ्याम वाभि वस्यै ताभ्य' तस्याः चयो तासाम् तस्याम् तासु शब्दकोपः फदर्य' (पु०) पस, क्षुद्र । द्वतम् (कि० वि०) चीन कयीशा (पु०) - पवियों में भेट। पुष्पधारिन (वि०)नदार, गर्व' (पु.) गटा। पुल्पित । छन्न (वि.)- Eका हुआ। प्रभन (१०) उत्पतिस्थान, दुखित (वि०)- दुसी, पिन निकाय भीक ( वि०) हरपोक । भिक्षा (खी०)-भीग्य। मधुकर (0) - भाय। सत्यम् (१०) मिvart वासा (पु.) यासस्थान । मुझम (पुं०) सयोग, मिना । विप्रिय ( पि०)- अमिय । सारमा (पु०) धाता, हरिन । विप्रियम (न०) -अपराध साहसम (न०)-हिमत, बोशिश एन्गुण (पि.)-उत्सुफ। का काम। त्याग्य (यि०)ोदने योग्य । स्यादु (वि.)रमादिए, मोटा। स० , a 7 संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। रणका ( पु०)-आतुरता अभिजाव (वि०) - उत्तम कुल में उत्कण्ठा। उत्पन्न। ग.(पुं०) साय। व्यवसितम् ( न०) निश्चित । श्य (वि.)-प्रत्यक्ष दिखाई अतिभूमि (स्रो०) - अत्यधिक । देने वाला। अव्ययम् :- प्रति अस्यात। अथवान्या, वा। प्रद्य-आज। कृते-लिए। ति.तव, वहाँ से। तूर्णम्भल्दी। पत क्योंकि, जब से। नु प्रश्नवाचक। इला-ससी के लिए सम्बोधन (१०) । ह्य बीता हुआ फल । हिन्दी में अनुवाद करो:- अमी अश्वास्तूर्ण धावन्ति । अमूपा ललनाना मध्ये फासौ रूपे अतिभूमि गतो रणरणकोऽस्या १ रतिमप्यतिकाम्यति ? इला! अमू सरय व नु भवेयु । अमूपा क्न्यानां विवाहा ह्यः अमूनि नलिनानि सर्वत. प्रका समपद्यन्त। गन्ते । लक्ष्मण पश्यामूनि । अभिजातममुष्य वचनम् । अथवा अमु प्रेक्षितु त्वरतेऽस्य हृदयमद्य । चन्द्रामृतमिति किमत्र वत्स ! विरमाऽस्मात्साहसात् । चित्रम् ? अस्मै विदुपे छात्राय पारितो इदमासनमलक्रियता भवता । अमू तौ तरू, यौ ह्योऽपश्यम् । अस्मिन्नेव लतागृहे त्वमभवः । अनयो कन्ययो सङ्गत मे रोचते । अस्यैवासीन्महति शिखरे गृध्र हस! प्रयच्छ मे कान्ता गति- राजस्य वास:। रस्यास्वया हृता। पुयां क्लिास्या किल कालिदासो अगच्छदमुया वोध्या दास्यमु नाम्नाऽभवद्योन्यवसत् कवीश । दुवमानयत् । एभिर्वघोभिः सान्त्वय मे दु.खित कृतं किमभिस्तव विप्रिय यदनिष्ट- पितरम् । मेषामसि फतुमुद्यतः। पिक प्रयच्छ।

.- ६८ सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। कथं पुन' सर्वे राममेव अस्मिल्लोके यस्मियते तस्य र वर्णयन्ति? ममुष्मिलोकेऽनुभूयते। सीते । पुत्राविमो ते। संस्कृत में अनुवाद करो यह मेरी पुस्तक है। इस वृक्ष पर एक मोर है। ये मनुष्य अपने राजा की विजय पर इस यमुना म मानकर पानी को प्रसन्न होते हैं। इन पर्वतों से बहुत परपर गिरे हैं। ये कन्यायें नृत्य सीखती है। मैने इस छड़ी से चोर को पीटा। इन ग्रामों में बहुत से धनवान् मैने एक व्याम को उस पर्वत करे इन नदियों के निवास हिमालय में हैं। से उतरते हुए देवा । मैंने उस सिपाही को युद्धस्थल से पपिक उस मार्ग से गया। मागते हुए देखा। इन (दोनों) गडी को मिही से मरो' मैं कृपण से दान की आशा नहीं करता । रानाका महल इस नदीसे दो कोस पर ये (दोनों) कन्यायें भी विवाद में देने इन (दोगों) नदियों का सनम पयित्र । योग्य है। माई! ( यस) तपोयन में यह बोये ( येऽमी) प्रसिद्ध चोर हैं, वे जा रहा है। राणा के मनुष्यों से पकड़े गये । मुझे जो पन मिले यह मैं गरीबों को है। तुम को इस पुरुष का आदर करना इस नदी में यहुत पानी है। चाहिए क्योंकि यह यहा विधान है। यह उस आदमी पानी पीना चावा? मैं इन कानों से नहीं मुनता है। यति लोग गसार छोर सगरम रहने । शुद्ध करो श्रय गृहम् । अस्मिन नगर्याम् । वस्मै मालिकाये। मर्याणा पर्यवान हिमालय भेष्ठ । सर्येपी नदीना गमा श्रेष्ठा । इम स्थान गम। वः। श्वद् वृक्ष । अहमिदं गृहे घसामि । अस्मिारजन्याम मन्यान नाविष्ठत । इय पालको मम शिष्य. ! आप पालिका पुदिमती। घरमा वटिन्या अल निर्मलम् । ता जलमानय । इन्द्रः पूर्वाया दिशोऽधिम अन्य गृहम् । ते असो वने विष्ठति । अय मंमारस्य नीतिः। राम पूर्वस्मादिश भागव । अयं पपिने भाममे एका विदुपी नारी अस्ति।

द्ववालिके . पपूछ। द्वारिंशः पाठः सख्यावाचका' शब्दा को पालक - एक पालक । द्वौ वालकी - दो बालक। एका बालिका = एफ लहको । - दो लड़कियाँ। एक फलम् - एक फल । द्वे फले = दो फल । यो वेदा तीन वेद । चत्वार छाना - चार विद्यायीं। - तिस्रो विद्याः - तीन विद्याएँ । पतम्रो गार - चार गायें। प्रोणि मिनाणि तीन मित्र। चत्वारि कलत्राणि - चार पत्नियों। पश्च मनुष्या पाँच मयुष्य । पञ्च गाव. - पाँच गायें। पत्रफलानि - पाँच फल । सस्कृत में १ से २८ तक सख्यावाचक शब्द नीचे लिखे अनुसार एक-एक। द्वि-दो त्रि-तीन । । चतुर् , चार । पश्चन - पाँच। मतन् सात अष्टन्-आठ। नवन्नो। दशन् - दस। एकादशन् ग्यारह । द्वादशन - बारह । त्रयोदशन - तेरह चतुर्दशन् = चौदह । पञ्चदशन् प द्रह । । योहशन = सोलह । सप्तदशन् = सत्रह । अष्टादशन् = अठारह । १-सख्यावाचफ शन्द कहीं 'विशेषण' और यही 'विशेष्य' होते हैं । एक से 'अष्टादशन' तक सब सरयावाचक विशेषण ही होते हैं। ११ से परार्ध तक की सजयायें कमी विशेष्य और कभी विशेषणभाव से प्रयुक्त होती हैं। -एक से चार ( चतुर ) तक की संख्याओं का लिग अपने विशेष्य के अनुसार होता है अर्थात् अपने विशेष्य के अनुसार उनका लिङ्ग बदलता रहता है। पञ्चन से आगे सख्यावाचक शब्दों के रूप तीनो लिङ्गों में समान ही होते है। १६ से आगे सरयावाचक शब्द ऊनविंशतिः पष्टिः ६० विशति. २० सप्तति त्रिंशत् ३० अशीति - ८० ४० सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। चत्वारिंशत् नवतिः সাহান शतम् १८० ३-'विंशति आदि शब्दों के पूर्व 'एक, द्वि' आदि शन्द घोड़ने से २५ २२ आदि शन्दों के वाचक बन पाते हैं- एकविंशति. २१, द्वाविंश २२, बयोपित २३ । परन्तु इस प्रकार २६, ३९ आदि नौ मुख्याने युक्त शन्द 'कोन' शब्द अथवा 'उन' बाद मोड़ने से पनते हैं--कोन त्रिंशत् , एकोनचत्वारिंशत् अथवा 'ऊनविंशत्', 'ऊनचत्वारिंशत् आणि इस प्रकार के शन्द बनने में नकारान्त शन्दों के नकार का शेप, दि द्वा, त्रि को घय. और अष्टन को अष्टा हो जाता है। -विशति' आदि शन्द सदा स्त्रीलिङ्ग तथा एफरचन में ही प्रयुक्त होता है। जिन शब्दों के ये विशेषण होते है वे भले ही किसी भी लिन और किसी * पचन के हो! जैसे-विंशतिधाणा-२० मादाण ! हिन्दी में अनुवाद फरो दशरथस्य तिम्रो भार्या पोसल्या सुमित्रा कयी घ । भ्रमरशन्दे द्वी रेफी स्तस्तस्माद् द्विरेफ इत्युच्यते। म्यागो वैशेषिकं साइरय योगो मीमांसा वेदान्त इति पद दर्श मानि। अमीषा चतुणां फ्लाना मध्ये यते तद् गृह्यताम् । विस्पु पन्यास्विय लावण्ये श्रेष्ठा। अष्टाभिस्तनुमि. प्रपन्न शियोऽपता । प्राहाण त्रियो वेश्यलयो य द्विजातय । ससारविपक्षस्य द्वय ग्मवत्पते । काव्यामृतरमारवादः सद्गय सुनने सह। पपाशते मातोश्य प्रत्यद एयर्माऽन्न यच्छति । गुरो परिचयां पुर्वरितम्य द्विघरवारिंशदहानि व्यतीयुः। घरसो विधाः पतु पष्टि फ्लाश्च पन्द्रापोटोsशिव । पत्यारिला प्रयो भस्य पादा शो सम हस्या सो भय। भाद्रपदस्य कृष्णपक्षेऽम्या तियो दषकी छत माये । प्रयस्त्रिंश या अष्टी धमय एकादश भावाशादित्या ।

- वैयाकरण सिद्ध हुए। संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । सस्कृत में अनुवाद करो सूर्य के सात घोड़े। राम २५ लड़कों के साथ सेला करता है। सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण है । उस समय ९६ मनुष्यों की परीक्षा की शिव के तीन नेत्र है। गई जिनमें से ५४ मनुष्य अच्छे भारम्भ में पेवल चार वर्ण थे। राम ने २१ सुदर पर लिये है। पण्डित रोग कहते हैं कि १८ पुराण वह एक वर्ष में १०० पुस्तकें नहीं पढ़ और २४ स्मृतियां है। सफ्ता। आजकल यजुर्वेद की २ शाखाएँ मिलती है। द्र ने १०० यश किये थे। पाँच पाण्डवों से सर शत्रु मारे गये। मनुस्मृति म १२ अध्याय है। उसने ४ विद्याओं, ६ शास्त्रों और ६४ राम ने रावण के १० सिर फार दिये। कलाओं में योग्यता प्राप्त की। हिंदुओं का विश्वास है कि ८ दिशाओं महाभारत के १८ पर्यो में तीसरा के पृथक् पृथक् ८ सामी है। (तृतीय) सबसे अच्छा है क्योंकि डाक्टर ने ४२ दित तफ इस दवाको इसमें अनेक रोचक कथायें हैं। लेने के लिये मुझे आदेश किया है। मैंने रघुयश के १७ सर्ग, कुमारसम्भर राम पाँच महीनों में इस पुस्तक को पढ के ७ सर्ग, ९ नाटक और महा- सकता है ( पठेत् )। भाष्य के ८६ पृष्ठ पढे है। त्रयोविंश पाठ कविषु कालिदास प्रथम = कवियों में कालिदास पहा है। भ्रातृ मरतो द्वितीय =माइयों में भरत द्वितीय है। दशरथस्य भार्यासु कौसल्या प्रथमा सुमित्रा द्वितीया कैकयी च तृतीया- ददारपकी गलियों में कौसल्या पहली, सुमित्रा दूसरी और बैकयी तीसरी थी। देवरत्तो दिवा सकृद् भुड्क्ते देवदत्त दिन में एक बार खाता है । समासस्य द्वि निर्वा अधोते - वह महीने में दो या तीन बार पढ़ता है। सहस्रधा विदीर्ण तस्य हृदयम् = उसके हृदय के सौ टुकड़े हो गये । पोडशवर्षीयो हरिदृन्दावन गतवान् सोलहवर्प का हरि वृदावन गया था। सप्ततिवार्षिक स प्राणान् तस्याज=७० वर्ष का वह मरा। .

- सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक । १-कपर लिये यास्यों से प्रतीत होता है कि सख्यावाचा घन्दो काम पहला, दूसरा, तीसरा आदि मार प्रकट करने के लिए मो होता है, दान) उस समय उनके रूपों में कुछ भेद हो जाता है। इस प्रकार के सर पर शन्दों को पूरणी सख्या अथवा प्ररणार्थक सख्या कहते हैं। ये पूरणार्यक हर याचक शब्द विशेषणरूप से प्रयुक्त होते हैं मत इनके लिश और वचन दिन के अनुसार होते है। पूरणार्थक मरया नीचे लिखी जाती है. पु० स्त्री គ័ង धादिमः आदिमा आदिमम् प्रथम प्रथमा प्रयमम् अप्रिमः अमिमा अनिमम् द्वितीय द्वितीया द्वितीयम् तृतीयः मृतीया तृतीयम् चतुर्थ'-तुरीया चतुर्थी पश्चमः पदमी এমনু पष्ठी पष्ठम् सप्तम सप्तमी सप्तमम् अष्टमः अष्टमी चष्टमम् नयमी नवमम दशम दशमी परामम् आगे 'घष्टादश राफ इसी प्रकार शन्द पनेंगे। विशतितमी विशवियमम् विश विशी বিৰামু पविशतितमः एपविशतिवमो एफपिशवितमम पफपिशा एकलिंगी एफविंशम् দ্বিামঃ विशत्तमी शिचमम निश निशी निशम् शेष मुल्ला में इस प्रकार समारो। इनमें से द्विनी तपा मृीय सम्म गमनाम हैं। उन पर चतुर्धम चष्ठ {विंशतितमः है " -- .. संस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षकः समान होंगे, परतु चतुर्थी, पन्नमो और सप्तमी एकवचन में राम शन्द के समान भी होंगे। 'वार' अर्थ में नीचे ल्पेि अनुसार सरयावाचक शब्द बनते हैं सत् - एक बार। द्वि -दो बार त्रि = तीन बार। - चार बार पत्त पाँच गर । पट्कृत्व -छ बार। आगे सरयायाचफ शन्द मे 'कृत्व' बोड़ देने से 'पर' वाचक शन्द नन पाते हैं। इस प्रकार के शद पनाने में नकारान्त शब्दों के तकार का लोप हो जाता है। ३-मायु का परिमाण सूचित करने के लिए सख्यावाचक शन्द के आगे वर्षीय, पापिक, वर्षीण और वर्ष शब्द का प्रयोग होता है। ४-गमग दो वर्ष फा, लगभग तीन वर्ष का इस प्रकार के वाक्यों का अनुवाद परने के लिए सख्यावाचक शब्द से वर्षदेशीय शन्द का प्रयोग करते हैं । त्रिवर्षदेशीयः सप्तवर्पदेशीय. . लगभग तीनवर्षका,ल्गभग सात वर्ष का । हिन्दी में अनुवाद करो अयि वत्स ! उपित त्वया प्रथम आश्रमे द्वितीयमध्यासितुमिदानी समयः। त्रिसप्तकृत्व परशुरामः पृथिवीमक्षत्रियामकरोत् । सप्तदश मामिधेनीरनुयात् । गाष्टमेऽन्दे कुर्वीत ब्राझणस्योपनायनम् । गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः । त्रिराचामेदप पूर्व द्वि' प्रमृज्यात्ततो मुखम् । अनारम्मो हि कार्याणा प्रथम बुद्धिलक्षणम् । प्रारब्धम्यान्तगमन द्वितीय बुद्धिलक्षणम् ॥ एकादश्यां तिथी लोका. फलाहार कुवन्ति । अत्र रथ्याया मम गृह पञ्चविंशतितममस्ति । सस्कृत में अनुवाद करो- रघुवंश में दस से अधिक सर्ग हैं। मैंने उससे पाँचबार फल गिनने को कहा। अगली आश्विन की अष्टमी तिथि को महीने की २७ वी तारीख को पण्डितों दुर्गा पूजा उत्सव होगा। को एक सभा हुई। - ।

होगा। सस्कृतरचनाऽनुषादशिक्षका। आधिन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी मैंने उससे तीन बार अलग होने के तिथि को दक्षिण में सब मनुष्य एक पहा परन्तु मघ उसने नही दूसरे को शमीपत्र देते हैं। तर मैंने उसे एक बेत मारा। मैने उसे १५ वी वारीस के बजाय आशा है कि यह फिर यहाँ चीन १३ वो तारीख को १३५ दिये। आमायगा। राम का विवाह सरकार पिछली २२ उसके पिता का भाद २३ वी ) तारीख को समाप्त हो गया। शुद्ध फरो:- तस्य चत्वारिंशत पुग्वक विद्यते । मम सुन्दर शत वसरिता भवान् इमान् सप्ततीन प्रजान पानय । अशीवे पुनस्य ना। एकपञ्चाशत मित्रा मम । अह तस्य शत सङ्गीत श्रुतवान् । रावण लत पुन आसीत् । अस्मिन् सरसे सहस्र पद्ममस्मि । इन्द्रस्य महने परासीत् । रामः अष्टानि फलानि भक्षयति । स पटादशः वानी सह क्रीडति । त्रयोदशेभ्यो पालभ्य पयोदशान् प्रन्यार ददावि सहस्र मुद्राम् आनयति । लक्षाय मानकाय पुरस्कार ददाति । चतुविशः पाठः विशेषणों का तर सम माय देवदचात् यशदत्त माधुवर देवदर से यशदत अच्छा है। देवदासदासयो यच साघुवर देवदत्त और पदप्तर या है। सय मतप्पे पण साघुतमा • सप मानौ में FM मा গম ও কি চায় যমুন্সী ফী হয়। সে কী আখী ? বর ২ यह ना दो यमों में की गई हो और उसमें से एक की मेहता अथपा होना प्रदचिव परनी हो तो विपा शम के अन्त में 'सर' भयया 'ईयर' प्रदान बौदा पाता। और या या तुमानेसे अपिफ म्पनियों या बाद में मापसी उनमे किमीको भेापानता पक्षविरमा 'इ' प्रत्पप गोमा भाता है। इस प्रकार पने हुए विषयों में गिat मान पिरोपामार होते हैं।

- अच्छा छोटा हरका बड़ा, भारी - प्यारा प्रियतम, दीर्घः सम्पा - कृशतम, सस्कृवरचनाऽनुवादशितकः। कुछ शब्द नीचे दिये जाते हैं- अथ अधिकतावाचकरूप साधु साधुतर साधुतमः धुरा दुष्टतर. दुष्टतमः चतुर चालाक पटुतर, पटीयान् पटुतमः, पटिष्ठ लघु लघुतरः, लघीयान् लघुतम , लघिष्ठ गुरु गुरुतर, गरीयान् गुरुतमः, गरिष्ठ प्रिय प्रियतम ,प्रेयान् प्रेष्ठ दीर्घतर , द्राधीयान् दीर्घतम , द्राधिष्ठ मृदु फोमल मृदुतर., म्रदोयान् मृदुतम, म्रदिष्ठः कृश दुर्बल कृशतरः, मशीयान् शिष्ठ प्रशस्य. प्रशसा के योग्य भेयान् , ज्यायान् श्रेष्ठ, ज्येष्ठः बूढ़ा वर्षीयान् ज्यायान वर्पिष्ठ , ज्येष्ठ अल्पः थोड़ा अल्पतर., फनीयान् अल्पतम. कनिष्ठ. अल्पीयान् अल्पिष्ठ. युवा फनीयान् , यपीयान् । फनिष्ठ., यविष्ठः नवान युवतर युवतम. स्थूलतर, , स्थवीयान् स्थूलतम, स्थविष्ठ. दूरतर, दवीयान् दविष्ठ बहुतर, भूयान् बहुतमः, भूयिष्ठ हरष छोय हस्वतर, हसीयान् हस्वतम , हसिष्ठ हिन्दी में अनुवाद करो अयमनयोः लघीयान् ( लघुतर.)। भीमो दुर्योधनात् बलीयान (बलितर)। सर्वेभ्य पाएडवेभ्यः ( सर्वेषु पाण्डवेषु ) भर्जुनः श्रेष्ठ. (प्रशस्य- तम ) आसीत् । कृष्णस्य सुभद्रा यवीयसी स्वसा। सर्वेषु फुसुमेषु शिरीपकुसुम म्रदिष्ठम् । निश्रेयसाय कर्मपधाज्ञानमार्गः साधीयान् । श्रेष्ठस्तु सर्वेषां भक्ति- { स्थूल. मोटा दूरतम, मार्गः।

सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । धार्तराष्ट्रभ्य. पाण्डया कृष्णसाहाय्याद् यलीयोस: रिनु योधसमाजो गरीयान् । विष्णुशर्मण एकपञ्चाशत्पुत्रा आसन् । तेपो ये मध्यमाद् देवदार ज्वायांस पञ्चविंशतिस्ते कनीयोभि पश्चविंशत्या फालह पा.। सर्वातु नदीपु भागीरथी द्राघिष्ठा विस्तारे वरिष्ठा पदार सलिल यमुनाया. शुचितरम् । पर्वतेपु हिमालय' प्रथिष्ठ । न चैतद्विष्ट्य. फतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि या नो जयेयुः। प्रियतमन्य पुण्डरीकस्य मरणेन सशोफया महाश्वेतया विरह विषया, दूरीकृतो यान्धवजनश्यामीकृतमरग्येऽप्रस्थानम् । एकः पुरुषः प्रियतमायाः प्रासादरयोपरितनी भूमि प्रवेष्टुमिन वायनादधोऽवलम्बमानमहि रज्जूफरयागरोह । सम्पत में अनुवाद करो या विद्यार्थी उस विद्यार्गी से छोटा अधिक भोर कम बराबर है, म नही है। सनात है। सय जन्तुओं म हाथी बड़ा होता है। धीमन् । तुसे तो धन मे धर्म ही भाई म मनुप्प मुखी होते है और ये दौड्ने पाले राम बानयरों में घोड़ा आदर के पास है। (मा)। पर देवताओं में इन्द्र तेजस्वी और प्रत्यमामा की अपेमा कनिमकी मार पलपार था इयरिए वह राणा अधिक प्रिय थी। जर मनुष्प का माग्य प्रतियन होता इस गाड़ी में चुदे हुए र अन्य तर उसके घर सोग मौत मे मोटे ( पीचर ) (पि) पाते। दारय की तीनो पतियों में जोशम्या उस समय में हम सप से पटरी ( TR) और देहपी मदर (गाय, मन्दरी) पी को सबसे जेग (युवर ) भो। अपने पतिपर अमल भार। पय सयोपरिम। एा नासु यत्तीयमी। এমন প্রবে। रामो मरता यनिष्ठ । गिरिपु मुमेरुममनर रामग्ठेपा पुदिमधर। गोमो भान पलवसर । कृष्ण पनदेवा बुद्धिमनमः। यनाया गया। शुद्ध फगे GION

पञ्चविंशः पाठः
प्रयोजक (णिजन्त)
१ सराम पश्यति = वह राम को देखता है।
स त राम दर्शयति - वह उसे राम को दिसाता है।
२ स माम गच्छति - वह ग्राम को जाता है।
हरिस्त ग्राम गमयति - हरि उसे ग्राम को भेजता है।
३ यह पठामि = मैं पढ़ता हूँ।
गुरु मा पाठयति - गुरु मुझे पढ़ाता है।
४ स भारते - वह बैठता है।
यज्ञदत्तस्तम् पासयति-ते - यशदत्त उसे बैठाता है।
५ भृत्य पति-नौपर पाता है।
स भृत्येन पाचयति वह नौकर से पफयाता है।
इन वाक्यों को देखने से प्रतीत होता है -प्रथम वाक्य से क्रिया के करने
ले का गेप होता है और दूसरे वाक्य से किया के करने वाले को उस क्रिया में
[त (प्रेरणा ) करने वाले का बोध होता है। यह दूसरा वाक्य ही प्रेरणार्थक
जन्त कहलाता है।
-- प्रेरगार्थक क्रिया के रूप दशम गण की क्रियाओं के समान होते हैं ।
-~गित (प्रेरणार्थक ) क्रियाओं में प्रायः आत्मनेपद तथा परस्मेपद दोनों
होते है । जैसे-स पाठयति पाठयते वा।
-अकर्मक धातुएँ प्रेरणार्थक (गिजन्त ) होने पर सकर्मक हो जाती हैं।
'सास्ते' यहाँ 'पास' घात अकर्मक है पर तु 'स वम् श्रासयति' इस
प्रेरणार्थक वाक्य में यह सकर्मफ हो गई है। और प्रथम क्रिया 'आस्ते'
का पता 'स" यहाँ (गिजन्त में ) फर्म हो गया है। अत यह ध्यान में
रसना चाहिए कि अण्यन्त ( णिच होने से पूर्व) क्रिया का कर्ता ण्यन्त
(प्रेरणार्थक) चाक्य में फर्म हो जाता है ।
-'स राम पश्यति' यहाँ 'पश्यति' क्रिया सकर्मक है जिसका कर्म, 'रामम्'
है। यही वाक्य जब प्रेरणार्थक बनाया जाता है तब स त राम दर्शयति'
यह होता है। यहाँ दो कर्म 'त, राम' दृष्टिगोचर हो रहे हैं। एक तो वही
है जो प्रथम वाक्य में भी फर्म था और दूसरा वह है जो प्रथम वाक्य में
७सं०१०

सस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षकः। पाया। अन साधारणतया यह ध्यान में सपना चदिर - धानुए प्रेरणार्थक क्रिया होने पर द्विकर्मक हो जाती है। ५-अ पन्त मिया के फर्ग को प्रयोज्य कर्ता तथा प्य क्रिया के प्रयोजक फर्ता कहते हैं। ६-अकर्मक, नानार्थक, गत्यर्थक, भक्षणार्थक, शन्दकर्मक और रस इन धातुओं का प्रयोजक रूप बनाने पर मूल किया (अन्य ) मई द्वितीया विमवत्पन्न प्रयुक्त होता है। ह तथा कृ धातुओं में पानि विकम्प से लगता है और नी तथा यह पातु में दिमुल नहीं माने भिम धातुओं का प्रयोनक रूप पनाने पर मूल फर्ना (प्रयोग का ) तृतीया विमति होती है। हिन्दी में अनुवाद फ्रो पुष्यमित्रो यजते याजकास्त याजयन्ति । कृष्णयर्मा पुत्रेण प्रत्यहं शत गा दापयति । जानकी रथमारोप्य जादपीवीरमासाय रामासापितो लक्ष्मण विजहो। असुरस्य प्रचण्डेन तपसा प्रसन्नो भगगन शहरा खोयं का समदर्शयत्। नगेन्द्रसका दृष्टिं पा फस्यापि सन्धिसमाफर्य राजान्यवर्तयन् । अस्मिलोकेऽनुष्ठितो धर्मस्तस्य फार स्वर्गलोक गमयति । प्रोमकाले धर्माऽनानि ग्लश्यति, स्वेदं प्रपयति एप्पा परि वर्धयति । पदिारि प्रवृत्तमृपियुमारक प्रवेशयितुं प्रतीहारीमासारयन्- राजा। देवदचो थलोपर्दै. मस्य मायति । मुमपुर फरिगरगृहे शत्रुणापावितमग्निकरणमा निरयारपत्। साधारमामाया मनोरमयति। सम्मत यारा फेर सायं दमको जित । ने गोरप पर गालि मारा मन को रसगं पुवाया (मा+मो)। - भादाद परो --- सस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षः। ७६ गुरु ने उसे आग दी कि यह प्रतिदिन उसको गो को चराये ( चर) और पानी पिलाये। पहले वह अपनी प्रात फाल की सप्या समाप्त करता फिर १६ मादाणों को मोजन कराता और बाद में स्वय साता था। पाण्डव और धृतराष्ट्र के पुत्र नहीं युद्ध करते थे वहाँ जो मो होता या वह सब संजय धृतराष्ट्र को सुनाता था। । दुर्भाग्य कमी कभी भाई एव मित्रों को आपस में लड़पाता और एक दूसरे का सिर फटयाता है। पिता को अपनी पुत्री का विवाह, सजन, कुलीन और युवक पुरुष से करना चाहिए । (परि +नी, वि+वह , उद् + वह ) । ये इक जो इस लड़के ने गाये वे मुझे उस समय को याद दिलाते हैं जब मैं अपनी पिया तथा भाई लक्ष्मण के साथ प्रसार पर्वत पर रहता था। राम गोविद से धन चुरवाता है । राजा गरीयों पर दया दिखाता है। ग्वाला धेनु को घास सिलाता है। लक्ष्मण सीता को रथपर चढ़ा कर गनापार ले गया । राजा बाह्मणों से धन प्रहग फरवाता है ( प्रति + ग्रह) वसिष्ठ दशरथ को यश करवाता है ( यज् ) । शब्दकोपः किन्नर (पु.) - देवयोनिविशेष । धर्म' (पु.)- पसीना, घाम । ऋन्दितम् (न०) चिल्लाहट । तृष्णा (खो०)-प्यास। जाहवो (स्त्री०)गङ्गा। पुष्यमित्र (खो०)- एक राजा का नगेन्द्र. (पु० ) पर्वतरान हिमालय | प्रतीहारी (स्त्री० ) - द्वारपालिका । स्वेद.(पु० ) - पसीना । काले काले, प्रसङ्गवशात् , कदा = कभी कभी । विद्वान् (पु०) कृतविय, सस्कृतविच, मुविनीत । प्रस्रवण (पुं०)एक पर्वत का नाम, (न) सोता । नाम।

सस्कृतरचनाऽनुवादशितकः। फर्ता था। अत साधारणतया यह ध्यान में रखना चहिए कि'-- धातुए प्रेरणार्थक क्रिया होने पर द्विकर्मक हो जाती है। ५-अण्यन्त क्रिया के फर्ता को प्रयोज्य फर्ता तथा यत निया के कर्ज के प्रयोजक कर्ता कहते हैं। ६-अकर्मक, ज्ञानार्यक, गत्यर्थक, भक्षणार्थक, शब्दकर्मक और दृश इन घातुओं का प्रयोजक रूप बनाने पर मूल मिया (अण्यत) का को द्वितीया विभक्त्यन्त प्रयुक्त होता है। हतया कृ धातुओं में यह निया- विकल्प से लगता है और नी तथा वह धातु मैं बिलकुल नहीं लगता इनके मिन धातुओं का प्रयोजक रूप बनाने पर मूल फर्ना (प्रयोज्य कर्ता ) म तृतीया विमति होती है। हिन्दी में अनुवाद करो पुष्यमित्रो यजते याजफास्त याजयन्ति । कृष्णवर्मा पुत्रेण प्रत्यहं शत गा दापयति । जानकी रथमारोप्य जाह्नवीतीरमासाद्य रामाज्ञापितो लक्ष्मणस्ता विजहो। असुरस्य प्रचण्डेन तपसा प्रसन्नो भगान् शङ्कर. स्वीय रूप तमदर्शयत् । नगेन्द्रसका दृष्टि पार्श्वे फस्यापि क्रन्दितमाफर्य राजा न्यवर्तयत् । अस्मिल्लोकेऽनुष्ठितो धर्मस्तस्य कार स्वर्गलोक गमयति । प्रीष्मकाले घोऽङ्गानि ग्लपयति, स्वेद प्रवर्तयति तृष्णा व परि वर्धयति । बहिर्वारि प्रवृत्तमृपिकुमारक प्रवेशयितु प्रवीहारीमाज्ञापयत्- राजा। देवदत्तो वलोवर्दै सस्य भक्षयति । कुसुमपुर एकस्मिरगृहे शत्रुणापातिवमनिकृष्णवर्मा निरवापयत्। सापारिका भावा मनोरमयन्ति । सस्कृत में अनुवाद करो वामीराब के दुष्ट कार्य हम को लजित करते हैं। इद्र ने अपने रय पर मातलि द्वारा अर्जुन को स्वर्ग बुलवाया (आ+ नौ)। - सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षफः। ७६ गुरु ने उसे आशा दी कि वह प्रतिदिन उसको गो को चराये (चर् ) और पानी पिलाये। पारले यह अपनी प्रात फाल की सध्या समाप्त करता फिर १६ नातागों को मोजन करावा और पाद में घय खाता था । Et पाण्डव और धृतराष्ट्र के पुत्र नहा युद्ध करते थे वही जो जो होता था वह सब सञ्जय धृतराष्ट्र को सुनाता था। " दुर्भाग्यवश फमी कभी भाई एव मित्रों को आपस में लड़वाता और एक -दूसरे का सिर फटवाता है। पिता को अपनी पुत्री का विवाह, सजन, कुलीन और युवा पुरुष से करना चाहिए। (परि+नी, वि+वह , उद् + वह )। ये श्रोक का इस लड़के ने गाये ये मुसे उस समय को याद दिलाते हैं जब मैं अपनी पिया तथा भाई लक्ष्मण के साथ प्रसाग पर्वत पर रहता था। राम गोविद से धन चुरपाता है । राजा गरीबों पर दया दिखाता है । ग्वाला धेनु को घास खिलाता है। लक्ष्मण सीता को रथपर चढ़ा कर गन्नापार ले गया । राजा बालगों से धन प्रहग फरमाता है ( प्रति + ग्रह) वसिष्ठ दशरथ को यश फरवाता है ( यज्) । शब्दकोपः 'किन्नर (पु० ) - देवयोनिविरोष। धर्म (पु०) = पसीना, घाम । कन्दितम् (न०)चिल्लाहट । तृष्णा (स्रो०)-प्यास । जादवी (बी०)गा। पुष्यमित्र (सो०)- एक राजा का नगेन्द्र (पु.) पर्वतराज हिमालय । प्रतीहारो (स्त्री०) = द्वारपालिका । खेद.(पु०) - पसीना । काले काले, प्रसङ्गवशात् , कदा = कभी कमो । विद्वान् (पु०) कृतविय, मस्कृतचित, मुविनीत । अरवण (पुं०)=एक पर्वत का नाम, (न. ) सोता । नामा . . पड्विंशः पाठः -यदि वाक्य में दो अथवा दो से अधिक फर्ता च शन्द से जुड़े हुए हो और उसमें एक उत्तम पुरुष, दूसरा मध्यमपुरुष तथा तीसरा प्रथमपुरुष हो तो किया उत्तमपुरुष के अनुसार होगी और क्रिया में वचन फर्ताओं की संख्या के अनुसार होगा। अर्थात् वाक्य में दो से अधिक कर्ता होने पर किया बहुवचनात तथा दो कर्ता होने पर द्विवचनान्त होगी। (१) कृष्ण, तू और मैं यहां खड़े है- कृष्ण , त्वम् अह च अत्र तिष्ठाम.। (२) तुम, मैं और गोविद शिकार के लिये क्यों न नावें । - पथ नाह त्व गोविन्दश्च मृगयाथं गन्छेम ? २-यदि वाक्य में एक कर्ता मध्यमपुरुष तथा दूसरा उत्तमपुरुष का हो और दोनों र्ता 'च' शन्द से जुड़े हो तो किया उत्तमपुरुष की होगी और उसका घचन उपर्युक्त नियम के अनुसार होगा। त् और मैं पकाते हैं त्वमह च पचाव । ३-यदि वाक्य में एक पर्ता प्रथमपुरुष का और दूसरा मध्यमपुरुष का हो तो क्रिया मध्यमपुरुष के अनुसार होगी। - तुम, यशदत्त और वर्ण यहीं रहो - त्व यज्ञदत्तः कर्णश्चात्रैव तिष्ठत । ४-वाक्य मे भिन्न २ पुरुषों के कर्ता 'च' से न मिल पर 'वा' शब्द से मिले हो तो सम से अन्तिम कर्ता के अनुसार प्रिया में पुरुष और वचन होंगे- (१) वह या तुम सब यह काम करो=स यूय वा एतत्कर्भ कुरुत। (२) वह तुम या में इस कठिन काम को कर सकते हैं। • स, त्वम् अह वा पतद् दुष्कर फर्म सम्पादयितु शक्नोमि । (३) मम या तुम्हारे माई कचहरी में जावें। त्व तप भ्रातरो वा राजद्वार गच्छेयु । Y--'युष्मद्' शन्द के स्थान पर भी सम्मान सूचित करने के लिये 'भवत्' शब्द का प्रयोग करने पर 'भवत्' शब्द के साथ मध्यमपुरुष न आर प्रथमपुरुष ही माता (१) आप क्या करते हैं = किं करोति मवान् ? . है -- ससवरपनाऽनुषादशिक्षक। (२) आप किसको ढूँट रहे हैं - कमधिप्यन्ति भवन्त ? संस्कृत में अनुवाद फरो माई सुधीर । तुम और में पड़ेंगे। तुम और राम विद्यालय जाभो । तुम और मैं उस स्थान पर नहीं जायेंगे। भद्र ! गोपाल और तुम उस नगर में रहो । वह और मैं आजकाल स्कूल में नहीं पढ़ते । वह और तुम आजकाल कहाँ पढते हो? नया हरि और तुम दरिद्वार में रहते हो ? फल तुम और मैं पढेंगे माधव और तुम येदात पढ़ो । श्याम भोर तुम आजकल कहाँ हो ? शुद्ध करो - वत्त । अह च त्वं च दण्डकारण्य गच्छथ । भरत व शत्रुघ्नश्च अयोध्यायो तिष्ठताम् । वय यूय घ कुन स्थास्यथ । मह स च तत्र । गमिष्यतः । यय घ ते घ वाराणसीमपश्यन् । अह वा त्व वा वेदम- • पठम् । स त्व रामश्च सगोत एवन्ति । भद्र व दमनकश्च तत्सकाशे गच्छताम् । स्व रामचन्द्रश्च राजधानी गच्छत्वाम् । वत्स ! न वयं वा यूय वा कसझे स्थास्यामि । त्वम् एषा च समाज्ञापयति । युवा मम - त्रयो मृत्याच राजद्वार गच्छन्ति । सप्तविंशः पाठः [नीचे लिखे वाक्यों को शुद्ध करो। साथ प्रमाणपूर्वक सिद्ध करो कि किस वाक्य मे फोन कोन अशुद्धियाँ हैं ] सो हि मे मित्र । सा नारी सन्त कर्म कृतवान् । पितुःसाथ पुत्रो गम्यते । मत्कर्मेभ्यो नमः । यूयमेत कर्म कुछ । सो धर्मात्मा पितां दृष्ट्वो- वाच । स एकाकी गच्छनुक्तवान् । तत्रैको पौराणिक वसनास्ते,। सो यदि आगच्छेयुस्तदा वयं गमिष्यन्ति । अहं मानाय कौश्चित् फलानि दास्यति । पालकारस्मात् स्थाने तिष्ठत । यूय पय पिरन्तु । नरपरया इद कृतवान् । श्रह सम्वये एतत् निवेदितवन्त । स्व त बालक एक पब ददातु । अहमे को सादु फल प्राप्नोति । ज्ञानिन गच्छन्ति । यूय धना गृहन्तु । चालका तान् पश्यन्ति । अह तान्नवलोकयित्वा विस्मिता वाम. ! सो मातां दृष्ट्वा पानन्दितो मनुवाच । हिरण्यकशिपुस्य एको पुनरासीत् । सस्त दृष्ट्वा प्रोतो भवन्ति । अह दरिद्रस्य व ददाति । त्व ८४ संस्कतरचनाऽनुवादशिक्षकः। बालिका धन वर्तसे । महतोऽय वृत्तो पश्यते । क अपि कुमारो सुधया ग्लिश्यन रुदति । त्व एकाकिरन किं करोति । युधिष्ठिरोवाच-भ्रातर आगच्छ मातार प्रनमामः । सो पितार दृष्ट्वा अभिवादयित्वा चार ध्रवीत् । तस्मिन्नेव समये एक वालको भाजगाम । त्व यदुच्यते तदई। करिष्यते । चत्वार• स्वसर एकत्रे निवसन्ते । भगवानस्य वाल्माके आश्रम पश्य । ईश एव पुनो रामायनकथा। कोश असौ पुनो देशः । तान युवानः क्रीडन्तः पश्यामि । देशो चेपा कर्पूरद्वीपो स्वर्गोपमा। धिक् , प्रतिनिवृत्ताः सर्वतो सैन्यानि मम, अतो, को एपो बाल., क वा भवान , अथवा भवितव्य तैव बलवान् । अस्ति सौराष्ट्र वेत्रवती नाम नगर । पासोत् मगर देशेषु पाटलिपुत्र नाम नगरी। पूर्व दिशि भानु उदेति । अस्तमिताया भानी प्रस्थितो वयम् । एव विचारयित्वा तेन वाराणस्यो गत । सुत वत्सला सातमसमारोपयित्वा गाढमाश्लेपयित्वा च इति वाक उवाच तस्य वधनमाकर्णयित्वा राजा प्राम नहिरैव स्थिता। सखाया वचन श्रुत्वा रामोवाच एप एवायुक्तम् । भगवानस्य नाम उधारयित्वा शय्या मुश्च । महता सुधाया पीडिता हि सः। कर्मण विना किमपि सिद्धि न भवति । य एक फल भविष्याम । सहो पृच्छते कथमेतत् । आत्मा. सर्वात् प्रिय । पितां प्रति भक्ति कर्तव्या। कथ भवान् घाव नागच्छसि । त्रुहि मा के के वस्तूनि विद्यामन्दिरे सन्ति ? ईश्वरस्य महिमाया व्याप्ता जगत् । हे वत्स ! मे धनुमानीहि त्यो यद् रोचति तत् कुरुताम् । धिक मूर्स तव सार्ध मैत्री न कार्य। शरति मेघा पश्यन्ते । ह्योऽह राजमार्गन गच्छन्तस्त्रयो जनानपश्यत् । सर्वे दिवायो कम फुर्वन्ति रात्रे विश्राम्यन्ति । स अधुना भवनस्य वहिर्गत्वा आसने अध्यासते। अह एवं कथिते ते अन्य स्थान गतवान् । पक्षा निरी क्षन्त मामवलोकयित्वा स हसनुवाच । महाराजा दशरथो कैकयी द्वे घरो दत्तवान् । तस्य जिहा मधुस्तिष्ठति वचे हलाहले विषम् । स कदापि मिथ्या न वदति न वा कटु भाषति । ते गृहस्य प्रतिनिवर्तते। राजा दशरथस्य त्रय पत्न्य आसीत् । तेषां कौशल्या ज्येष्ठा सुमिना च कनिष्ठा बभूवु । कौसल्या राममजायत । सो व्यानस्य भयेन कम्पति ।

। सस्कृतरचनाऽनुषादशिक्षफः। 'दुष्कर एपा मम । दरिद्र धनं देहि । अथैकदाराने गते उदिते भग- * याने भारफरे वयमेफ धावन्तमश्वमपश्यम् । अश्व अश्वमिति शिशु- भिर्महत् शब्द कृतम् । जयात् धावन्तेन तेन काप वृद्धा योपिता आइता । ते दुहिताया ३ महान् दोप- यत् सा सत्यवान पतित्वे वृत- वान् । सदेव धर्माचरण साधुभिर्मतः । पुण्य नराना दुर्लमम् । राज- पुरुस्त धर्माधिकरण नीतम् । धन दत्त्वा दत्त्वा दरिद्र त हरिरप्रवि- शत् पुरम् । एकदा मृगयाप्रसङ्गन पन परिभ्रमनह महतो क्लेशेन शान्तमालमपदमैतत् । दण्डकारण्य अधिवसत राम खरादया राक्षसाः आक्रमण चकार । यापार्य बासने अधिस्थित्वा प्रेयान छात्रानध्या- पयामास । आसनादुतिष्ठमानस्य यन्धोः सह श्रह रामश्च ते गृह गच्छति । यम. सावित्री निवर्तयित्वा स्वकीये भवने प्रातिष्ठत् । परस्परं विवदन्तस्ते धर्माधिकरणे गत्वा राजाण न्यवेदयत । युवा गृह गता। अस्माक सायं यूयमागच्छ । परोने कार्यहन्तार प्रत्यक्षे प्रियवादि मित्र वर्जयेत् । सो राजायाः पुत्रोऽस्मान् चतुराण फलानि प्रदत्वा गुरूण प्रणम्य च गृहमागच्छाम । पितो !रक्षमाम् । विदुप धर्म पृच्छ । सिंह- नौमन्विष्यति सिंह । धर्मस्य विना कुत. सुसम् । यथाशक्ति कर्म कुरु । प्रावो गतो मे पुत्र । भ्रातारो न विवाद फुयुः शिशु सणामा- नन्द करोति । मनोहारी घस्य बालकस्य कथा । सूर्यस्य सह चन्द्रस्यो- पमा नास्ति । नक्षत्राणि दर्शसि किम् १ रामलक्ष्मणस्य द्वयोरेव यशः गीयते । भवान भिक्षा देहि । छात्रों को सूचना '- इस माग में दिये हुए कृतसदों का हिनी में तथा हिन्दीस दर्मों का उस्कृत में प्रतिदिन एक के हिसाब से अनुवाद करो। कठिन सस्कृत शब्दों का अर्थ अथवा हिन्दी के अशात शन्दों का सस्कृत, पुस्तक के अन्त में दिये हुए धन्दफोप में देखो। बो शन्द उसमें भी न मिले उनके लिए अपने अध्यापक भयवा कोष से सहायता ले।

८६ सस्कृवरचनाऽनुवादशिक्षक। यथायोग्य हिन्दी तथा सस्कृत में अनुवाद करो , वत्स ! कुशल ते भवतु । वत्स । पुरखन। इद पुनः पृच्छामि, कोऽय ते व्यामोह ? किं त्वमेवमस्थाने कुप्यसि ? किं त्वमेवमु मा, घसीव १ न व पेनापि पाल्पसि, न पेनापि क्रीडसि, न ध किश्चित् अनुतिष्ठसि । पश्यैते ब्रह्मचारिण सानन्द नृत्यन्तीय । त्वमेवैक इत्य विपणस्तिष्ठसि । न ते चित्त सन्तुष्यति । वत्स । फिमेव मुह्यसि । कस्तवापराध्यति ? महन्तु न कस्याप्यपराध पश्यामि । नहि सर्वे ब्रहाचारिणस्तव शनय । स्निात्येव तेपाश्चित्तम् । आयुष्मन् ब्रह्म चारी त्वम् । नहि ब्रह्मचारी एव कुप्यति। तदलमेतेन कोपेन मुश्चन शीघ्रम् । त्यजेद दौमनस्यम् । वास । यदि त्व न प्रसीदसि, सन्तुष्यसि, वहिं कथमय सारस्वतोत्सव सिध्यतु । तद्विसृजेम निर्म न्धम् , सङ्गच्छत्व च सर्वे सुहृद्धिः। गच्छ त्वमधुना शान्तिनाथेन सह । प्रत्यासीदति मे कार्यान्तरफाल इत्यहमपि गच्छामि । एक चार पेट और दूसरे अक्षों में झगड़ा हो गया। शरीर के दूसरे अनौ कहा कि पेट कुछ काम नहीं करता, चुपचाप बैठा रहता है। एक दिन सला कर के उन सबने अपना अपना काम करना छोड़ दिया। यह हाल देख पेट रह गया। पहले हाथ ने कान से कहा कि-'मैं आगे से तुम्हें ही भोज खिलाया करूँगा। एक दिन हाय ने गरमागरम दूध लेकर कान में डाल दिय= गरम दूध से कान जल गया । उस दिन से कान ने सभी अलों का साथ दिया इसी तरह कई दिन बीत गये । पेट में खाना न पहुंचने से सभी अङ्ग शिथि हो गये, उनकी यह दशा ही गई कि कान सुन नहीं सकता था, जबान बोल न सकती थी, हाथ काम नहीं कर सफ्ते थे, पॉव चल नहीं सकते थे, आँखों दिखाई नहीं देता था। एक दिन पेट ने उनकी यह दुर्दशा देखकर कहा- 'भाइयो तुम बड़ी भूल में हो। तुम समझते हो कि मै कोई काम नहीं कर पर वास्तव में यह साप नहीं जो कुछ तुम मुझे खिलाते हो मैं उसमें से हर को हिस्सा पहुंचा देता हूँ।

संस्कृवरचनाऽनुवादशिक्षकः । १ तथा बदन्त तु त पुनरवदम्-'सखे ! कपिल किमधुना शोके- न। समुपविश्य तावत्पथय यथावृत्त तस्य वृत्तान्तम् । अपि कुशल सातस्य १ स्मरति वा माम दुःखितोवा मदीयेन दुखेन । मवृत्तान्त- मार्य किमुक्तवाम् । इपितो न चैति । ससे कुशल गावस्य । पय पास्मवृत्तान्तः प्रथमतरमेव तातेन दिव्येन पशुपा रटः। दृष्ट्वा १ प्रतिक्रियाय पर्म प्रारब्धम् । वत्स, कपिछल। परित्ययवा स्वदोपशमा। ममैवाय एलु शठमतेः सर्व व दोष या सुन पस प्रसर से गोला-'अफर भी ! आज तुमने बड़ा काम किया यो राम- रण को ले माये । अब घर वापर विश्राम करो' स की आशा पाफर भर अपने घर चले गये। इधर, स चित्त म बड़ा प्रसा हुआ कि आज मैरी र म आगया ! अब मेरे हाथों से बीता से बचेगा' घर से चरते समय कृष्ण गम ने नद से पूछा-'आपफी आश हो तो हम नगर देख आवे'। यह न ले तो नाद ने खाने को कुछ मिठाई दी, पीछे बोले- 'अच्छा, जाओ अब वसम्म मत करो' । यह सुनते ही दोनों भाई अपने मित्रों को साथ ले नगर देखने ले। नगर के पास जाकर देखा कि चारों ओर वन-उपवन-फूल रहे है वृक्षा र बेटे पक्षी चहचहा रहे हैं। बड़े बड़े सरोवर बल से भरे हैं । शीतल हवा चल ।। है । वन की शोभा देखते देखते दोनों भाई मथुरा को चले । (३) एव वादिनो वचनमाक्षिप्य नरपतिरप्रवीत्-'अपनयतु न• कूतूह- एम, आवेदयतु भवान् मय जातः ? केन वा नाम पृतम् ? का माता ग्ते पिता ? फथ वेदानामागम ? कथ शास्त्राणां परिचयः १ कुतः ला समासादिताः १ पा पूर्षमुपितम् । फ्यिद्वा वय. १ कथ पक्ष- बन्धः १ ह वा फथमागमन मिति'। वैशम्पायनस्तु सबहुमानमव. नपतिना पृष्टो मुहूर्तमिव ध्वात्वा सादरमप्रवीत्-देव ! यदि कौतुक- नाफाले म्रियते जन्तुर्विद्ध. शरशतैरपि । शकस्टकषिद्धोऽपि प्रातकालो न जीवति ॥ किएयताम् ।

सस्कवरपनाऽनुवादशिधक। देहे पातिनि का रक्षा यशो रक्ष्यमपातवत् । नर पतितकायोऽपि यश. कायेन जीवति ।। मीरा एक राठौर सामन्त को कन्या थी। दो बात के लिए तो वह बचपन रही विख्यात हो गई थी । एक तो मौकिक रूपसौन्दर्य के लिये और दूसरे म वाणी के लिए। उसके ये दोनों गुण देश-विदेश सब जगह फैल गये । यही कि उसकी सुदरता को देखने और उसके सुरोले गाने को सुनने के लिए दूर से लोग उसके पिता के पास आया करते थे। मीरा अपने रूपलावण्य और तमाधुर्य के द्वारा सबको मुग्ध कर देती यौ। मोरा देवो बचपन से ही ईश्वर भक्ति में लीन रहती थी। उसके नी में सांसारिक भोग-विलास की लालसा नहीं। अपने पिता के घर मौरा सारे दिन सब को साथ लिये भगवान् के न और गुणों का ही गान किया करती थी। तत. पतिभिरुक्तम्-'परे पाप! दुष्ट चक ! अस्माकम्भूमौ च स्माकं स्वामिनमधिक्षिपसि! तन मन्तव्यमिदानीम् । इत्युक्त्वा सर्वे चन्चुभिहत्वा सकोपा अवदन्-'पश्य रे मूर्ख । स हसस्तव र सर्वथा मृदुः। तस्य राज्येऽधिकार एव नास्ति यत एकान्ततो मृदु । तलगतमत्यर्थ रक्षितुमक्षम । कथ स पृथिवी शास्ति राज्य वा। 'किम् ? त्वश्च कूपमण्डूक, तेन तदाश्रयमुपक्षिपसि' । क नु तेऽद्य पिता राजन् । क नु तेऽद्य पितामहाः । नवम्पश्यसि तानद्य न त्वाम्पश्यन्ति तेऽनय॥ अनित्य यौवन रूप जीवित द्रव्यसश्चयः । ऐश्वर्य प्रियसवासो मुह्येत्तत्र न पण्डित. ॥ पादरेण यथा स्तौति धनवन्त धनेच्छया । तथा चेद्विश्वकार, को न मुव्येत बन्धनात् १ ॥ 'बेटा दुर्योधन । काम और लोधके वश होनेसे तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई इसी से तुम गुरुजनों का कल्याणकारी उपदेश नहीं सुनते । किन्तु हे पुत्र ! जब अपनी अधर्म बुद्धि को हो नहीं जीत सकते तब राज्य जीतने या राज्य को करने की तुम किस तरह आशा करते हो। बेय! भापक पाण्डवों के साथ तु संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। ८९ । बुरामवहार किया है उसका प्रायमित उन्हें उनका राज्य देफर कर डाले। म समझते हो पियुद्ध होने पर मीम, द्रोण आदि सब तरह तुम्हारी ही तरफ गे। यह बात भी नहीं दो सपती । पाण्डवों का भी राज्य में हफ है और मात्मा होने के कारण सब रोग दीको अधिक चाहते है। इसलिए हे पुत्र । भि स्यापन परफे सकी रक्षा करो और पाण्डयों के साथ मेल करके सुख . करहो। निद्रा नाम जीवाना हितकरी पृत्तिः शरीरस्थिते सहायभूता । इय यथाकाल सेविता परमानन्द जनयति, क्लेशानपहन्ति श्रान्तिश्चापन ति, शोक दूरीपरोति, शरीरावसाद नाशयति, वातादिधातुसाम्यं चित्ते, चेतसि प्रसाद तनुते, अन्तः फिमप्योज' सन्दधाति, दुश्चिन्ता वारयति, विस्मारयति व चिरवेरम् । फिम्बहुना--कुरुते हि स्वा साने सर्वथा जीवान पुनर्नवीभूतानेव । निद्रानिष्ठ जीव सुधा न याधते,न तृष्णा तापयति । निद्रितस्य न पंचते कापि शक्का, नैव मनोव्यथा। निद्रा नाम स्नेहमयी जननीव र्वथा जीवान पुत्रानिव सुखयत्ति फान्तेव च प्रेममयी लोचने दृढ रिचुम्य समानन्दयति नितरी जीपसमूहम् । अपनी चिघवा पुत्री को अपने पास रखकर मास्कराचार्य उसको ज्योतिर्विद्या ढाने लगे। कहा जाता है कि लीलावती विद्या में इतनी प्रवीण थी कि वह वृक्षके तो की टोक सस्या तक पता देती थी। लीलावती ने अपना सारा जीवन विद्या शक्षा के ही काम में व्यतीत किया। पञ्चयटी की शोमा देखकर रामचन्द्र पी वहुत प्रसन हुए । वास्तव में पञ्चवटी गनी ऐसा था। वाल्मीपिने पनवटी का बहुत विस्तार के साथ वर्णन किया है। मुनिए मेरे चार भाई और गत पहिने हैं। मैं तो अपने सर छोटे माई के साथ पञ्चीस दिन के बाद फिर यहाँ आ जाऊँगा रन्तु मेरी चार पहिने यहाँ पर ही रहेंगी। (६) श्रासीदुत्तरापथे पफ पण्डितमामः । तस्य दक्षिणस्यां दिशि एको नहान् वटवसरशोभत । एकदा तस्य तरोरघस्तादनेके महापरायणा महा- सस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षका। मानो विचारगोष्ठी रचयामासुः। वनोत्रम्-नास्ति कविता नाम जगतो नियन्ता। कर्मेव प्रधानम् । विधार्यन्ता तावकर्मणों के शोऽस्ति महिमा। ईश्वरावतारोऽपि रामो निन भ्रात्रा सोक्याच सह बने परिभ्रमन् हैम हरिणमन्वयात् । रावणव वस्य प्रियां भार्थ जहार । तदासी बहु विलपन वानरैः सह सख्यमकरोत्। अतो मन्वय यमिदम् यत्रैव येन सुख दुःखं वा भोक्वन्य भवति तनवासी राज्ये बद्धो बलाद् दैवेन नीयते । यथा यथा येषां येषां जोवानां याहर याशी भवितव्यतोदेति, तथा तथा तेपातेपा ताडशो वाटशो बुद्धि रपि स्वत एव सम्पद्यते । भद्रसेन ने कहा--'उठो माई ! रात्रि के चार बन चुके हैं। ब्राह्ममुहूर्व गया है। सब से प्रथम भगवान् का चितन करो। फिर आवश्यक योचादि निवृत हो । उसके बाद स्नान-सभ्या करके अपने स्वाध्याय का पार फरो'। यह सुन सब ब्रह्मचारी अपने अपने विस्तरे को छोड़ कर यथावत् । विधि समाप्त करने में तत्पर हुए । उसी समय उनके गुरु भा गये । आते गुरुजी ने कहा कि सर छात्र मेरी बात सुने 'मान नौ बजे के लगमग दरमा नरेश पाठशाला का निरीक्षण करेंगे। उनके माय भनेक सब शास्त्रों के वित भी आ रहे है, वे योग्यतानुसार परीक्षा लेंगे। ऐसा मुना माता है। किंतु निश्चित बात है कि उनकी आशा के अनुसार उनके प्रधान मन्त्री प्रत्येके । को पाँच पाँच मुद्रा, एक एक धोतवन, एक एक अगोछा देंगे। सबको । स्वर से वेद पाठ सुनाना होगा। अपर माह-ईश्वर पिना जड कर्म स्वय फन दातु नैव समर्थः यथा राजाशुभकर्मकारिणो नरान दृष्ट्वा प्रसोदति, घशुभकर्मकारिभ्य कुप्यति यथार्म यथाश्रुत १ तेभ्यः फलं ददाति, एवमेव ईश्वरोऽ सुकताऽसुनकारिभ्य कर्मानुरूसमेव फलं विवाति । अन्यथा कृत्वा कोऽपि दुखभागो न स्यात् । नहि चौयं कथा कश्चियोर स मेव कारागार विशति । तस्मादस्त्येवेश्वरो नाम जगभियन्तेति । अस्ति पुत्रो वशे यम्य भृत्यो भार्या तथैव च । प्रभावे सति सन्तोषः, स्वर्गस्योऽसो महोतले ।। ।

। सरकवरचनाऽनुवादशितकः । मातर पितर पुन दारानतिथिसोदरान् । हित्वा गृही न मुजीयादेकाफो न फदापन । पाप दिसाये पदापि नही पिता! पाप का पर अपश्य भोगना पड़ता है। गाँसी की तरह पाप अवश्प प्रकट हो दो बाता है। किसी कालेज के होस्टल के 'एक कमरे म तीसरी श्रेणी के दो विद्यार्थी रहते थे। एक दिन का वृचान्त मुनिये। जिले के सेम्पों से कारा नगमगा रहा था पृथक् पृथक् मेज, कुर्सी रगी थी। दो बड़े बहे परग सफेद विस्तरों सजे थे। दोनों छान अपने २ पग पर लेट कर स्याध्याय में दवचित थे। प्राय दोनों की आयु समान थी। दोनों बहुत मुन्दर, तरुण और मेघावी थे। एक का नाम 'चन्द्रशेखर' और दूसरे का नाम 'निरक्षन' या। चन्द्रशेसर शान तपा गम्भीर प्रकृति था। निर- पिन का स्वभाव कुछ तर्क वितर्फ फरने का था। (८) फस्मिंश्चिद् प्रामे सक्तुधनो नाम प्राप्माण प्रविनसति स्म । कदाचि तेन इतस्ततो मिक्षा त्या शने शनै सक्तुभिरेको घट. पूर्णाता नीत.। अयेकदा सक्तुपूर्ण घट दृष्ट्वा प्रसन्नमनाः तस्य गल रज्या बवा उच्च कुडरफीलकेन सहायमन्ध । स्वयञ्च तदध. सट्वोपरि शयितो हस्तेन दण्ड परिभ्रमयन मनस्येवमचिन्तयत्-यदह वैशाखसका- तिवेलाया सक्तुघट विकीय रूप्यकाणां विंशति लब्ध्वा पुनस्तै रूप्य- कर्नानावस्तूनि फीत्वा व्यापार फरिष्यामि । तेन व्यापारण शनै, शने' कालान्तरे श्रेष्ठो भूत्वा अनेकाः सुन्दरीविवाहयिष्यामि । तासु च ममै काऽतिप्रिया भविष्यति । यदा घेवं, तदेतरा परम्परमोlया कलह करिष्यन्ति । अहश्च उचित मत्वा कोपाविष्टो भूला ता इत्थ लगुडेन हनिष्यामि । 'उमेर घट लगुडेन ताहितवान् । तदा स घटः दहाघातेन भग्न मकवो विशरामता भेजु । पढ़ते पढ़ते अचानक निरजन ने इद्र शेखर की ओर देकर कहा भाई ! पाप क्या वस्तु है ? चन्द्रशेखर बोला-'आश्चर्य' तुमका आज तक यहो शात न हुआ कि पाप का वस्तु है ? निरजन-क्या हुआ आप हो बतादें-पाप किसे . १२ सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। कहते हैं " चन्द्रशेखर-'बुरे काम का फरना पाप है'। निरजन-'यह ठीक नही कभी कभी बुरा काम भी किया जाता है पर वह पाप नहीं होता | क्या झूठ योग परगो की जान बचा लेना पाप है। नहीं, कदापि नहीं । यह सुनकर चद्रशेखर ने कहा-'तुम्हें तर्क वितर्क करने की बहुत बान है, कभी धोखा खाओगे, सुरु रहो अपना काम करो' । निरचन-'अस्तु, मैं चुप रहता हूँ, तथापि यह अवरस पहूँगा कि जिससे अपने वा दूसरे को हानि पहुंचे वही पाप है। कस्मिश्चिन्नगरे एक महत् मन्दिरमासीत् । तत्रैको महात्मा निव सति स्म । स सदा वेदान्तशास्त्राभ्यासमकरोत् । लोकानों कल्याणाय शास्त्रकथाश्चाऽश्रावयत् । तत्र अनेके नरा भनेका नार्यश्च श्रद्धया की श्रोतु सट्वीभूय प्रतिदिन प्रयान्ति स्म । देवप्रतिमाञ्च पूजयन्तिम । कथामन्दिरस्य वहिरि कश्चन वैश्य कान्दविको (कन्दुमा, हलवाई) भूत्वा पेटान् , पूरिका, पोलिका , कुण्डलिनी., कलाकन्दान, मुक्तामोदकान, लड्डुकान, अन्यांश्चापि विविधान् भक्ष्यान् भोज्यांश्च पदार्थान् विकीय स्वपरिवार पालयामास । समये समये च तस्य क्यामप्यशृणोत् । क्षमातुल्य तपो नास्ति सन्तोपान पर सुखम् । न च तृष्णापरो व्याधिनच धर्मो दयापर ।। नास्ति सत्यात्परो धर्मो न सत्याद्विद्यते परम् । नहि तीवतर किनिदन्तादिह विद्यते ॥ कुछ समय बीत गया। दोनों विद्यार्थी अपने अपने कामों में लगे रहे। परन्तु निरसन ने अपने भाव के अनुसार पड़ोस में रहने वाली एक कुलीन स्त्री को देखना प्रारम्भ कर दिया। क्योंकि वह स्त्री बहुत सुन्दरी थी। निरञ्जन जानता था कि मेरे देसने से इस स्त्री को कोई हानि नहीं पहुँचती, किसी को मालूम तो है ही नहीं । एक दिन कामा-ध होकर उससे उस स्त्री पर कङ्कर फेंका। स्त्री ने अपने पति को उसकी दुष्टता का वृत्तान्त सुना दिया। स्त्री के पति ने प्रिंसिपल के आगे उसकी शिकायत की। प्रिन्सिपल ने मले प्रकार तहकीकात करके निरञ्जन को कालेष से बाहर निकाल दिया। तब उसको कई एफ दुर्व्यसनों ने घेर - 1 . सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। लिया भात में उसे राजयक्ष्मा हो गया और वह सदा के लिए ससार से विदा हो । गया। सच है, पाप छिपाए नहीं छिपता। (१०) एवं बहुतिथे काले याते एकदा सत्सवेलायां प्राञ्जलि वा तस्यैन : साधोः पादारविन्दयुगल प्राणसीत् , निवेदनचाकार्षीत् यद् भगवन् । साधो चिररात्राय भवतः सकाशादहं वेदान्तकथामीपम् ,अनेकवा. रव भयदुपदिष्टमार्गेण देहादिभ्योऽनात्मपदार्थेऽभ्यो भिन्नमात्मान निर- चैषम् । परमद्यापि ममानन्दलाभो नाभूत् । तत्कि कारणमिति विन येन श्रीमन्त पृच्छामि'। अथासौ महात्मा तस्य तादृशं विनयमालोक्य a श्रद्धान्वितच निश्चित्याप्रवीत्-'अयि सौम्य ! तव पूर्वजन्मकृत फिठिचत् पापफमस्ति, तस्य प्रतिबन्धेन श्रुते मननेऽपि प शाखार्थे आत्मानन्द न लब्धवानसि । धैर्य धर। केनापि सत्पुण्येन तस्मिन् ' पापफे विनष्टे नूनं ब्रमानन्द ल्प्स्यसे' । अथासावेतत् साधुवचः श्रुत्वा तूष्णीं तस्थौ । स्वव्यापार धर्मफर्म च पूर्ववदेव व्यधात् । एफ नगर में कोई साहूकार रहता था। उसके पांच पुत्र थे। समय पाकर साहूकार बूढ़ा हो गया । उसका सब धन पुत्रों ने ले लिया और पिता से नम्रता पूर्वक निवेदन किया-'अब आप कोई काम न करें। मानन्दपूर्वक ड्योढ़ी में मासन षमा ले। यथेष्ट भोजनादि सेवा हो जायगी। पर ध्यान रहे कि कोई अपरिचित आदमी अन्दर न आ सके पिता ने अपने पुत्रों की बात मान ली। पुछ दिवस बीतने पर उसके पुत्रों की स्त्रियों ने अपने पतियों से कहा-तुम्हारा पिता बहुत धूपता है, सब स्थान खराब कर देता है। मालूम नहीं यह कब मरेगा ! इस फो पर फे चौबारा में ले बामो। वहां इसके पास एक घण्टी रख दो । जब इसको भूख प्यास लगे अथवा और आवश्यक्ता हो तो घण्टी बजा दिया करे, हम इस की इच्छा के अनुसार सेवा पर दिया करेंगी । पुत्रों ने ऐसा ही किया। पिता ने यह भी मान लिया। (११) अथैकदा पश्चन भारवाही पान्यश्चर्मकारो धर्मातः सन् तस्य विप- णिपार्थे पतित्वा मुमूर्छ । सच वैश्योऽस्पृश्यमपि त तदवस्थ दृष्ट्वाऽऽ- ८सं०र० सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । पत्कर्तव्यानुसारेण क्षिप्रमेव फूपात् शीतल जलमुद्धृत्य तस्य मुखे चिन्दुशः पातयामास । सच चर्मकारस्तेन शीतलोपचारेण लम्धसज्ञ. शान्तो भूखा यया भीष्ट दिशमगच्छन् । तदिनादारभ्य तस्य वैश्यस्य हदि ब्रह्मानन्दानुमवः समुत्पन्नः । तदा महात्मान सर्व वृत्तान्तमश्रावयत् । स चोवाच-सत्य सौम्य ! 'दया हि परमो धर्म । अनेनैव तर पूर्वपापक प्रनष्टम् । प्रवृत्ते च प्रतिवन्धे ब्रह्मानन्दमाप्तवानसि' एक दिन का वृत्तान्त है कि उस बूढे का पोता अपने बाबा के पास चौबारा में पहुंच गया । वह अपने बाबा के पास खेलने लगा। बाबा भी उसे प्यार कर बहुत प्रसन हुआ। अतत वह बाल्फ अपने दादा की घण्टी ले कर नीचे चण आया। पर किसी का इस पर ध्यान न गया । नत्र बूढ़े को भूप प्यास सताने लगी तो उस ने इधर उधर घण्टी की तलाश की, पर वह न मिली। कोई उसको आवाज सुन न सका। क्योंकि, चिल्लाने की शक्ति उसमें थी ही नहीं। यह भूख प्यास से तड़प तड़प कर मर गया। उसके पुत्र घर आये तो उन्होंने स्त्रियों से पूछा- 'क्या पिता जी भोजन कर चुके ?' स्त्रियों ने कहा-'आज उनको भूख-पास नही लगी, यदि लगनी तो घण्टी बजाते'। यह सुन सब पुत्र कर गये, देखा तो पिता जी सदा के लिए सो गरे है। ससार म प्राय निर्धन पूढों की यही दशा होती है । (१२) एकदा भोजराजो धारानगरे विचरन् कचित् शिवालये प्रसुप्त पुरु पद्वयमपश्यत् । तयोरेको विगतनिद्रो वक्ति-अहो, ममास्तराऽसन्न पत्र फरत्वं प्रसुप्तोऽसि, जागर्षि नो पा ?' ततोऽपराहविप्र! प्रणतोऽस्मि । अहमपि ब्रामणपुत्ररत्वामत्र प्रथमरात्रौ शयान वीक्ष्य प्रदीप्ते प्रदीपे कम एडल्पवीतादिमि क्षण शाखा भनदास्तराधन एव निद्रितोऽभूवम् । इदानी भषगिरमाकण्यं प्रयुद्धोऽस्मि' । प्रथम भाइ-बस ! यदि त्वं प्रणतोऽसि, दीर्घायुभव वद, कृत भागम्यते ? किं ते नाम ? अन च किं कार्यम् ?' अपर आह-'विप्रवर भास्करशर्मास्मि नामत , पश्चिम समुद्रतीरे प्रभासतीर्थसमीपे मे वसतिः। तत्र भोजराजस्य दानशीलता । - -- संस्कवरपनाऽनुवादशिक्षकः। ९५ बहुभियावय॑मानां पहुशोऽौषम् । तदहमपि याचितुमागतोऽस्मि । त्य मम वृद्धत्वात् पितृकल्पोऽसि, तत् त्वमपि स्वपरिचय दि' इति । सुनिये, इस बात पर मैं पार के पुल का वृत्तात भाप लोगों को सुनाता हू- प्रतिष्ठान नगर में तपोदव नामक एक बाहाग था । उसने पाल्यावस्था में पिता के बहुत समसाने और ताड़ना करने पर भी विद्या नहीं पढ़ी। जब मास्था अधिक हुई तब सम लोगों से अपनी निन्दा सुन कर पश्चाताप करने लगा और विद्या की प्राप्ति के लिए गङ्गातट पर जाकर तपस्या करने लगा। चिरकाल के 'अन तर उसे उग्र तप करता देखकर, इद्र बालग का रूप धारण करके उसके पास आये और उसीके भागे गलाकिनारे को बार ले लेकर जल प्रवाह में फेकने लगे । यह देख वह तपोदत मौन सागकर बोला- हे बाहाग ! तुम यह क्या कर रहे हो ।' उसके बार बार पूछने पर इन्द्र ने कहा लोगों के पार जाने के लिए मैं गया में पुल बना रहा हूँ। जब यह पुल बन जायगा तब सर लोग अनायास हो । सुखसे गहा पार हो जाया करेंगे। सोऽप्याह-वस शारुल्य इति मे नाम । मयैकशिलानगर्या आगम्यते भोजराज प्रति द्रविणाशयैव । वरस भास्करशर्मन् मयाs. नुकमपि त्वन्मनोदु स बचोभनयैव सष्ट प्रतीयते । तद्वद, कीर्श तदिति' । सतो भास्करः प्राह-'तात । किं प्रवीमि श्रूयवाम्-- शुरक्षामा शिशष शवा इव, भृश मन्दाशया बान्धवा लिप्ता जर्जरगर्गरी जतुलौनों मां तथा बाधते । गहिन्या त्रुटितांशुक प्रथायितु कृत्वा स काकुस्मित फुप्यन्ती प्रतिलोकवेश्मगृहिणी सूची यथा याचिता ॥ तच्छुत्वा राजा सर्वामरणान्यरतार्य तस्मै दत्वा प्राह-भास्कर सीदन्त्यतीव ते पाला, तत्-शीघ्र स्वदेश प्रयाहीति' । यह सुन फर तपोदत्त ने कहा '२ मूर्स यह बालू तो जलमे वहीं जा रही है। भगा इससे कभी गङ्गा नी में पुल बन सकता है। कदापि नहीं, यह तेरा प्रयत्न सर्वथा निष्फल है । तब इन्द्र ने हँस कर कहा-'जो तुम यह जानते हो तो बिना पढ़ने और परिश्रम करने के केवल व्रत उपवासादि करके विग्रोपार्जन करने का उद्योग क्यों कर रहे हो? अशर सीखे बिना लिखना और अध्ययन के बिना विद्या ९६ संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। बिना मित्ति के चित्र के समान है। तव तुम्हाग भी यह यान मेरी ही तरह निया है। इन्द्र के वचन सुन पर तपोदत्त ने उन पर विश्वास दिया। यह का त्याकर अपने घर चला गया और गुरु के पास ४क्षराभ्यास, और पढ़ने में कठिन परिश्रम घर के थोड़े ही दिनों में य छा विद्वान हो गया। साRN यह for अभ्यास के विद्या प्राप्त नहीं होती। (१३) अथ पाण्डय॑चिन्तयत-किमिदमन्यदाचरतो मेऽन्यदापतितम् नहि निरङ्कुश कार्यमकार्य वा विमृशति । ईश्वरो हि पुरुषः परस्य सुख दुखे न संवेदयते । नाण्यामनो हिताहिते पश्यति । मदा-धो गज । परिभ्रमन् यन्त्र कुनापि व्यसनमहागते निपत्य सीदति । मदस्य मूल प्ररत्व न घेवल मदम् । इत. प्रभुत्वस्य क्षपणेन तपसेवायुष. शे मया यापरित यो न भोगेन' । इति निश्चिमतिरतीव दुसित व पनि वार पयपथमपि नगराय निवर्तयामास । ततश्च नागररभ्यथितो धुर राष्ट्र स्वपिना गाङ्गेयेन पनीयसा भ्रात्रा विदुरेश चानुनयः स्वय रार मकरोत्। एक पहाड़ के नीचे एक नदी बहती थी। नदी के किनारे किनारे पहाई मिला हुआ एक त्ग रास्ता जाता था। सयोगवश दो बफरे एक ही समय : राह से आ निकले, एफ इधर से और एक उधर से । जब एक दूसरे के साम आये तब बड़ी फटिनाई में पड़ गये । न कोई मुह पर लौट सक्ता था और दूसरे के पास से आगे निकल सकता था। एफ और उँचा पहाड रोकता या श्री दूसरी मोर नदी का भय था कि पैर फिसलते ही नदी में गिर जायेंगे। तब उ में से एक बारा गह में लेट गया और दूसरा धीरे धीरे उस पर पाँव रखर उतर गया । अब जो रेटा हुआ था उसके लिए मार्ग साफ हो गया। माना ६ उठ पर चला गया । मेल जोल से दोनों ने अपनी मान पचारी। (१४) पुरा हस्तिनाग्नि नगरे महमदनामा यषनेश्वरो बभूव । तस्मिन्न समुद्र घरणीवन प्रशासति तदुत्कर्षासहिष्णु: फाफरनरपतिस्तममि योधु सक्लबलसहितस्तत्राजगाम । यबनेश्वरस्तमायान्तं दृष्ट सस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षकः। ससैन्या पुराद् वहिर्भूय तेन सममयुध्यत । तयोर्युद्वे समारो महोयता काफरसैन्येन हन्यमाना महमदयोधा. पलायिता।। ततः पलायमान खपल दृष्ट्वा यवनेश्वर आच-रेरे मम सैन्यसुभटा। युमाक मध्ये कोऽप्येनाहशो नास्ति य इहाना रितुभयेन पलायमानाया में सेनाया गति निरुध्यात्' यवनराज वन अबा ते मधे द्वौ रानपारा चतु:-'महाराज ! अल विपादन । अनेरा भरतो विज्ञ सगग- प्रहारश्छिन्न शिरस करवाव' । यवनेवर आध-'सानु कुमारी । युवाभ्यामन्यः क प क क्षमः ? नाय विज वय काऊ। भचुनैत्र विपतपत प्रविश्य प्रसिपहारे हस्तलाधर दरायतम् । अहमति भवन- न्वर स्वल्पपल गृहोबा भवत्साहाय्याय प्रस्तुत एव । हरिद्वार हिन्दुओं का परमपवित्र तीर्थ है । ऋषियगोत म-यों में इसकी बहुत महिमा गाई गई है। मनु जी का कपन है कि-'यदि तुम माने हदय में अतर्यामी को साचो मानते हो तो पुन असत्य माग से होने वाले पार को शुद्धि के लिए गया पर नाने की कोई आवश्यकता नहीं। जो लोग शास्त्रोक विवि के अनुसार श्रद्धाभक्तिपूर्वक उक्त तीर्थ का सेवन फरते हैं वे ही उचित फर प्राप्त कर सकते हैं, अप नहीं। प्रायुत, तीर्थ निषिद आवरण करने वालों को मपकर नारको गति मिलती है। 'भो. पक्षिण ! केन किं किं कौतुक दृष्टम् ?' एकेन पक्षिणोक्तम्- चम्पायर्या नगयाँ जितशनुर्नाम महीपति । तस्य पुत्री पुष्पवती नाम । दैवयोगात पुनर्भत्रकर्मवंशात् सा नयनविना जाता । पाणिप्रइ एयो- ग्या पितुर्मनसि सा जीवितशल्य वर्तते। अन्यहा राज्ञानगरीमध्ये पटाहो दापितः । य. कश्चित् जितशत्रो पुरस या पुरुषालोचने ओपन मन्त्रमनेन वा नीरुने करोति, राजा तस्मै निज राज्यस्य अध कन्याश्च दास्यति' 'पकेल लघुपक्षिणा वृद्धपत्तो पृष्ट.-'तात ! आया कोऽप्यस्ति ? येनोपायेन तस्या नेने पुनर्नवे भवतः। रश्मिश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान् वा हिम त्यजेत् । भतीयासागरो वेला न प्रतिज्ञामह पितुः ॥ पर सस्कृतरचनाऽनुवाद शिक्षकः । विचारशील मनुष्यों से ऐसा सुना जाता है कि कविता और मानवजाति का भनादि सम्म ध चला भाता है। मनुष्य के विना अन्य कोई प्राणी कविता में रचने वा सुनने में समर्थ नहीं । मनुष्यों में भी कोई सहृदय पुरुष ही उसके मन को बान सकता है। कविता ज्ञान से रहित मनुष्य पशुवत् होते हैं । ससार की ऐसी कोई भाषा नहीं जिसमें कुछ न कुछ कविता न पाई जाय । सङ्गीत मी कविता मा सखा है। सङ्गीत कविताप्रेम का बड़ा भारी सहायक है और प्रेम ही शष्टि का मूल्म भ है। आजकल के नवशिक्षित युवकों में से कई एक अपनी मातृभाषा की कविता से घृणा करते है। इसका कारण यही प्रतीत होता है कि वे कविता के मम्ज्ञ तथा मातृभाषा के सही नहीं । दूसवचनं श्रुत्वा दशनाप्रै ओष्ठौ छन्तन कदम्बराजा दूतं प्रति माह 'रे दूत । तव स्वामी किं वालोऽथवा किं प्रमत्तोऽथवा पातमस्त.. या सकलशत्रुहन्तारं मां न जानाति ! अथवा किं तस्य गुणदोषविचारज्ञा केऽपि मन्त्रिणो न सन्ति ? 2 एवम् असम जल्पन नलो न निषिद्ध अहो दूत ! गच्छ, यदि तव स्वामी जीवितस्य अतीव निर्विरण, तक सस्मामाय सज्जो भूत्वा स्वरितम् आगच्छतु । अहमपि सज्जीभूय स्थितोऽस्मि ।' ततो दूतेनापि भागत्य कदम्बोक्त फथित नलस्याने। वव कोपारुणितलोचनश्चतुरङ्गसेनायुक्तो नलराजश्चचाल । क्रमेण प्राप्तस्तक्ष शिलाम् । पिछले समय में एक क्षनिय राजा या, जो ससार में विख्यात था। उसका नाम गाघि था। उसका लड़का विश्वामिन था। गाधि ने विश्वामित्र को प्रकार की शिक्षा दी और जब वह जवान हो गया तब उसे राज्य दे दिय और उसने खुद अपना शरीर योगबल से त्याग दिया। जब विश्वामित्र रामा बन तब उसने देखा कि राक्षसों ने उसकी प्रना को अत्यात पीड़ित कर रक्खा है इन राक्षसों को मारने के लिए उसने एक बड़ी सेना अपने साथ ली और एक व से दूसरे वन में जाकर बहुत से राक्षसों का नाश कर दिया। इसी तरह धा चलते चरते वसिष्ठ के आश्रम के पास पहुँचा। उसके सैनिकों ने वहाँ ठहर क भौर वन को काटकर बहुत से घर बना लिये। वसिष्ठ ने इससे क्रुद्ध होकर अपने कामधेनु को आशा दी कि शनरों की एक सेना उत्पन्न करो।

६६ संस्कृवरपनाऽनुषादशिक्षफः । (१७) (क) ममेण ध्वान्त गाढतरं जातम् । अश्रुभिः कपोलो क्षालयन् स समचिन्तयत् , यन्मया पथि एवेपा रजनी यापनीयेति । अथ स एरः रोदितुमुपचक्रमे । तमेव मार्गमतिकामता दयालुना केनचिनि. पारितो दुःखफारण पृष्टश्चासौ बालकस्तस्मै सर्व निवेदितवान् । अथ सक्षातयपेण तेन दयावताऽसौ निर्विघ्न स्थगृह प्रापितः । (ख) फश्चिद्रासभ सिंहचढंफमासाद्य परिहितवान् । अथ स क्षेत्रेषु गत्वा यानि सत्तानि अवलोकयामास, तेषां भयोत्पादनेन आनन्द लेभे। अथ जम्युफमवलोक्य तमपि त्रासयितु चेष्टते स्म । जम्बुवस्तु वस्य दीपों पौँ उन्नतापवलोक्य, स्वरमाफर्य च कोऽसाविति तरपणादेव ज्ञातवान् । थाह प-' -'महो। यद्यल त्वा शब्दायमान नानोध्यम् तदाऽहमप्यभेष्य'मिति । कामधेनु ने उसी क्षण एक शबरसेना उत्पन्न कर दी जिसने विश्वामित्र के सारे सैनिकों को भगा दिया। विश्वामित्र, प्रधार्पि पसिष्ठ का यह अद्भुत पल देखकर चक्ति रह गया। उसी समय से ब्रह्मर्षि बनने के लिये उसने तप करना शुरू कर दिया। बहुत फाल तप करने के बाद वह ब्रह्मर्षि पद को पहुँच गया और सारे जगत् में देवता के समान भ्रमण करने लगा। मैं कल ही कलकत्ते से लौट कर आया हूँ। महात्मा परोपकार के लिए तन, मन, धन अर्पण कर देते हैं । जैसे पहाड़ पृथिवी को धारण करते है, वैसे ही राजा प्रजा का पालन करते है। क्सिी साधु ने कुत्ते से पूछा-'तू रास्ते में क्यों सोता है " उसने जवाब दिया-'में भले बुरे की परीक्षा करता हूँ। इस विषय में तुम्हें कुछ चिता नहीं करनी चाहिए। माता पिता की सेवा परो । पल पाओगे। (१८) (क) एकदा तमसाच्छन्नाया निशायां नृपतिः करुणं परिदेवितम. शृणोत् । तदा हि स्वभृत्यानाय 'रुदितस्य कारणं निर्णयतेत्याज्ञापया मास । अथ तेषामेकतमा शब्दानुसारेण तत् स्थान गत्वा सुन्दरी . १०० सस्कृतरचनाऽनुवाद शिक्षकः। युवतीमकामयलोकयामास । अथ सोवाच-'बह हि नृपतेरस्य राज्य लक्ष्मी । साम्प्रत मयाय त्यक्तव्यः, अवो दुःखितास्मीति । (स) स हि विद्यया देवगुरुरिव, तेजस्वितया सूर्य हव, धैर्य जननी धरित्रीय, तथा साहसेन इन्द्र इव वर्तते । स हि सत्यपरायणे महात्मा च । वदान्यो विनीतश्च जितेन्द्रिय सर्वेषामेव प्राणिनां प्रिय। धर्ममार्गचारी साधुससर्गवान् साधुरिव पवित्रहदयो धर्मामा छ। फिन्तहो । इतः संवत्सरात् स मरिष्यति । एव हि तस्य नियतिः । सूर्यवश में दिलीप नामक एक विरयात राना था। वह प्रजापाउन में सदैव रत रहता था और सम शुम गुणों से अलत पा, परन्तु पुत्र के अभाव से सदा उसका हृदय दुखी रहता था। एक समय वह पत्नी सहित अपने गुरु वसिष्ठ के आश्रम को गया गया और प्रणाम करके उनसे बोला-'हे ब्रह्मान् ! मुझसे स्या हुआ कि मैं पुत्रनिहीन हूँ' । वसिष्ठ ने विचार फर कहा-'हे पुन नदिनी नामक मेरी गाय की सेवा कर उसके प्रसन्न होने पर तुझे पुत्र उत्पन्न होगा। गुरु से ऐसा सुनकर वह राजा नन्दिनी के पास गया और उनकी सेना करने का एक बार नन्दिनी राजा सहित हिमालय की गुफा में चरी गई और वहाँ एक सिंह ने उसे पकड़ लिया। राजा ने तीर निकालना चाहा परन्तु उसका हाथ शिथिल हो गया। सिंह ने हँस कर राजा से कहा-'हे राजन् ! तेरे तीर से मैं नहीं मर सकता। मेरे भोजन के लिए यह गाय मेरे पास आई है। मैं इसे नहीं छो गा । राजा ने कहा-'हे सिंह ! गायको छोड़ दे और मुझे खा ले। (१६) एकदा गुर्जरदेशीयः कश्चित् कविः कश्वित्मलं काशिराज द्रष्टु काशिदेशमगच्छत् । गत्वा च तत्र राजभवन प्रविवितुःस्थेन दौत्रा रिक्णान्त: प्रवेशात् न्यरुध्यत । सप्रश्रयमनुनीयमान स दौचारिक 'यदि त्वमन्त प्रवेष्टुमिच्छसि तहि मह्य यत् किग्निदेहि । अन्यथा दुर्लभस्ते प्रवेश.' इत्यवोचत्त ५ तच्छुत्वा कविः प्रत्यवदन् 'भद्र ! अधुना सहमकिश्चन , मत्पावें पराटिकापि न विद्यते । किन्तु राज्ञा सकाशात यदि मे किचिदपि लभ्येत वस्या ते दास्यामि'। तद्वचः श्रुत्वास द्वारपालको हष्टस्तस्मै प्रवेशायाऽनुज्ञामदत ।

7 संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षका। १०१ तता कोप्यान्तर प्रमिशन सोऽन्येन द्वारसाल केन तथैव निवारितः । उस्मै अपि 'राज्ञः सकाशालभ्यमानस्याचं दास्यामोति प्रतिज्ञाय स कविस्तेनानुमतः कश्चित्-राज्ञ सविध प्राप्नोत् । प्राप्य च तत्रात्मनः कवितानिर्माणचातुर्य कतिपये. सरसः पद्ये राजानमस्तोत् । तेन प्रीतो नरपविस्त सत्कृत्य तस्मै वारण मेक दापयितु मन्त्रिणमादिशत् । ब्रहारण्य में एक कर्पूरतिक नामक हाथी रहता था। उसको देखकर उस वन के रहने वाले गीदड़ों ने सोचा कि यदि यह मर जारे तो इसकी देह से हमारे लिए चार महिने का भोजन हो जायगा । उनमें से एक बूढ़े गोदड़ ने प्रतिशा की कि-'मैं आनी बुद्धि के प्रभाव से इसको मार डालूंगा'। यह कह कर वा धूर्त 'रतिलक के पास गया और साष्टाङ्ग प्रणाम कर बोला कि 'हे देव ! भरा इधर ध्यान दीजिये। हाथी ने कहा 'तू फोन है ? और कहाँ से आया है !' उसने कहा-'मैं गोदड़ हूँ और इस धन के रहने वाले समने मुझे आप के पास भेना है और कहा है कि-'चिना रामा के रहना ठीक नहीं, इस बन का राज्य करने के लिए आप में सब राजोचित गुग मौजूद है, इसलिए प्रार्थना है कि जल्दी से आप आ जाय कि मानवेलान टल नाय' । यह कह गीदह उठकर चला और हायो उसके पीछे पीछे चलने लगा। रास्ते में वह बड़े कीचड़ में फंस गया । कीचड़ में फंसकर हाथी ने कहा 'मिन गोदद ! अब मैं क्या करूँ, मैं तो मरा जाता हूँ' । गीदड़ ने हँसकर कहा-'हे देव ! मेरी दुम पकड़ कर ऊपर आ, तूने मेरी बात का विश्वास किया इसलिए दुस भोगा'। (२०) अस्ति मगधदेशे चम्पकवती नामारण्यानो। तस्यां चिरान्महता स्नेहेन मृगकाको नियमतः । स च मृगः स्वेच्छया भ्राम्यन् हरपुष्टाङ्ग केनपिच्छृगालेनावलोकितः । त दृष्टा शृगालोऽचिन्तयत्-'मा । कय- मेतन्मास सुललित भक्षयामि । भवतु, विश्वास तावदुत्सादयामि' इत्या- लोच्योपसृत्यावीत्-'मित्र! कुशल ते " मृगेणोकम्-'कर पम् ?' स मते-'द्रपुद्धिनामा जम्बूकोऽहम् , अत्रारण्ये धन्धुहीनो मृतवन्निव- सामि । इदानीं त्वा मित्रमासाद्य पुनः सपन्धु विलोक प्रविष्टोऽस्मि । मधुना तषानुचरेण मया सर्वथा भवितव्यमिति । मृगेणोकम्-एवमस्तु --- - १०२ सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। ततः पश्चादस्तङ्गते भगवति भास्करे तो मृगस्य वासभूमि गतौ । तर चम्पकवृक्षशाखाया सुबुद्विनामा काको मृगस्य चिरमित्र निवसति । किसी राजा का मन्त्री पड़ा चतुर और सुशील था । वह सबका हित चार वाला था । वह वैरी की भी निदा नहीं करता था। एक समय किसी कारण राजा ने उससे क्रुद्ध होकर उसे कारागार में डाल दिया। उसकी सानता म होशियारी दूर दूर तक विरयात थी। इसी कारण किसी समीप के राषा ने उ लिखा कि-'आप जैसे बुद्धिमान् के अनादर को सुनकर मुझे बहुत दुस हुमा आपके स्वामी ने आपके गुण न पहचाने । यदि आप मेरा राज्य अपने चातुये सुशोभित करें तो मैं आपका बड़ा सत्कार करूँगा'। मन्त्री यह पत्र पढ़कर ए क्षण चुप रहा, फिर उसने उत्तर लिप कर दूत को दे दिया। इसी समय सिर मनुष्य ने राजा के पास जाकर कहा-'महाराज का मनी कारागार में पड़ा भी गुप्त पत्र द्वारा अन्य राजाओं से सन्धि करता है। अभी उसने समीप के राग के पास दूत भेजा है।' (२१) वौ दृष्ट्वा काकोऽवदत्-'सखे । कोऽयं द्वितीयः मृगो मते-'जन्: कोऽयमस्मत्सख्यमिच्छन्नागतः' । फाको नृते-'भकरमादागन्तुनास मैत्री न युक्ता' । जम्बूफ पाह-मृगस्य प्रथमदर्शने भवानप्यासात शलशील एव । तत्कथ भवता सहैतस्य स्नेहानुवृत्तिरुत्तरोत्तर वर्धते यथाय मृगो मम बन्धुस्तथा भवानपि । मृगोऽब्रवीत्-'किमनेनोतरेण सर्वैरेकत्र विसम्भालापैः सुखिभिः स्थीयताम्' । 'काफेनोक्तम्-ए मस्तु । मथ प्रातः सर्वे यथाभिमत देश गताः । एकदा निभृत शृगाल व्रते-सखे ! अस्मिन वनैकदेशे सस्यपूर्ण क्षेत्रमस्ति । तदह त्वां नीटन दर्शयिष्यामि । तथा कृते सति मृग. प्रत्यह तत्र गत्वा सस्य खादति अथ क्षेत्रपतिना क्षेत्र दृष्ट्वा पाशो योजित.। मनन्तर पुनरागवो मृग पाशैद्धोऽचिन्तयत् को मामितः फालपाशादिव व्याधपाशात् श्रा समर्थो मिनादन्य. ? यह सुनकर राजा ने तुरन्त ही रक्षकों को भेजा । ये उस दूत को बाधकरशी हो ले आये। उसके हाथ से पत्र लेकर राणा ने पढ़ा-'महाराण! मैं ऐसी प्रक्ष में - . -- संस्थवरचनाऽनुवादशिक्षकः। १०३ के योग्य पदापि नही हूँ जैसी आपने मेरी की है। वस्तुत में गुणहीन ही हूँ। आप देवल अपने अनुमह से मुझे ऐम समझते हैं। बम ही से मेरा इस राजकुल में पोषण हुआ है और अपने स्वामी के अनुमह से मैने इतना यश प्राप्त किया है । अन्न थोड़े से विरोध से मैं अपने उपकार करने वाले स्वामी की न निन्दा कर सकता हूँ और न उ छोइ सक्ता हूँ। यह पत्र पदपर रामाने उसी समय मन्त्री को बधन रहित कर दिया और उसकी पहली ही सी प्रतिष्ठा की। (२२) भरत्युत्तरापथे गृधफूट नाग्नि पर्वते महान् पिप्पलवृक्षः। तत्रानेफ- बका निवसन्ति । तस्य वृक्षस्य विवरे सो बालापत्यानि सादति । अथ शोकार्वाना पकाना पिलाप श्रुत्वा फेनचिद् घनाभिहितम्-'विलापोन कार्य: । यूय मत्स्यानुपादाय नकलविवरादारभ्य सर्पविवर यावत् परतिक्रमण विकिरत । ततस्तदाहारलुब्धैर्नयुलैरागत्य सर्पो द्रष्टव्यः स्वभाववैराद्धन्तव्यश्च । तथानुष्ठिते सवृत्तम् । ततस्तन वृक्ष नकुलैर्वक- शावफान विरावः श्रुतः । पश्याचे क्षमारा यकशावकान् खादन्ति स्म । अत उच्यते- उपाय चिन्तयन् प्राज्ञो हापायमपि चिन्तयेत् । पश्यतो यफमूर्खस्य नफुलेन हता षका ॥ विदर्मदेश में धर्मधु नामक एक विख्यात गजा था जो सदैव प्रजा के हित के लिए यत्न करता रहता था। उसने स्थल में बावड़ी, तालाब आदि खुदवा दिये फि अनावृष्टि के समय उपयोगी हो। प्रजा की शिक्षा के लिए प्रत्येक ग्राम में पाठ- शालाए खोल दी कि वाल्क और बालिका दोनों पढें । एक समय उसके राज्य में टुण्डा नाम की एक महाराक्षसी आई। उसने प्रजा के बालक और युवकों का नाश परना प्रारम्भ कर दिया। प्रखा ने बहुत यत्न किया कि किसी उपाय से इस दुष्ट राक्षसी को मारें । परन्तु उनके सब उपाय निष्फल रहे। अत में मायन्त दुसी हो उहोंने अपने क्ष्यालु राजाके पास जाकर विनयपूर्वक निवेदन किया कि- 'गनन् ! प्रतिदिन हमारे बाटक और युवक मौत के घाट उतर रहे हैं, पर यह टुण्डा गक्षसी नष्ट नहीं होती' | राजा बहुत चिन्ताकुल हुआ पर कोई उपाय उसके नाश का उसकी समझ में न आया।

सस्कृवरचनाऽनुवादशिक्षकः। (२३) अस्ति गौतमस्य महर्पस्तपोवने महातपा नाम मुनिः । तेन मुनिना काकेन नीयमानो भूपिकशावको दृष्टः । ततो दयया तेन मुनिना स शावका काकान्मोचितो नोवारकणैः संवर्धिवश्व । ततो 'विहानरत मूषिकं खादितुमनुधावति । तमवलोक्य मूपिकस्तस्य मुनेः क्रो प्राविशत् । ततो मुनिनोक्तम्-'मूषिका व मार्जारो भव' । ततःस विडाला कुक्कुरं दृष्ट्वा पलायते । दतो मुनिनोक्तम्-'कुक्कुरा भोवोऽ सि त्वमेव कुक्कुरो भव' । सच पुन. कुक्कुरो व्याघ्रागोवो भवति ततस्तेन मुनिना कुक्कुरो व्याघ्रः कव । अथ त व्याघ्र मुनिर्मूपिकोऽर मिति पश्यति । अथ त मुनिं दृष्ट्वा व्याघ्र प सर्वे पदन्त्यनेन मुनिना मूपिको व्याघ्रता नीतः। एतनिशम्य स व्याघोऽचिन्तयत्-यावदने मुनिना स्थातव्य तावन्ममैपाऽपकोति पगच्छति । इति मत्वा व्यानर मुनिं हन्तु गतः । ततो मुनिना तज्ज्ञात्वोक्तम्-'पुनर्मूषिको भवेति एव स व्याघ्रो मूषिकः फत.1 निषध देश का रामा नल एक बार चन-विहार को निकला। नगर से कुछ दूर निकल जाने पर एक उपवन में उसने एक मनोहर तालाव देखा। उसमें स्तु फमल सिले हुए थे, मछलियाँ खेल रही थी और अनेक प्रकार के जलपक्षी कोल कर रहे थे। वहाँ पर उसने एक बहुत ही मनोहर ईस देखा । राजाको वह ऐस लगा कि उसने उसे पकड़ना चाहा। इसलिए उसने अपने तरका से एक सम्मोहन बाण उस पर चलाने के लिए निकला। उसने वाण धनुष पर रखा है। था कि एक मक्षित वाणी उसने सुनी। उसका मावयह था कि-'हे राजन् ! इस पर पाण मत छोड़ । यह तेरा अभी सिद्ध करेगा। यह तुझे तेरे हो समान गुग बती निमुवामोहिनी राजकया प्रास करावेगा। उसे तू अपनी पनी बनाना। (२४) अस्ति कस्मिंश्चिद्वनोद्देशे घटकदम्पती तमालवरी निलय निर्माण प्रतिवसत स्म । प्रथ तयोर्गच्छता कालेन सन्ततिरमवत् अन्यस्मिन्न- -हनि प्रमत्तो वनगजः कश्चित्त तमालवृक्ष धर्मार्चश्छायार्थी समाश्रितः । चतो मदाधिक्याचा वस्य शाखा घटकाप्रिया पुष्कराप्रेणाकष्य वमक्ष।

-- संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। १०५ तस्या माङ्गेन घटफाण्डानि सर्षाणि विशीर्णानि । आयुःशेषतया घ चटको पथमपि प्राणैर्न वियुचो । अथ घटका स्वाएडभनात् दुि खामिभूता प्रलापान पुर्याणा न किन्चित्सुखमाससाद । अत्रान्तरे तस्यारवान् प्रलापान श्रुत्वा फाटफुटो नाम पक्षी तस्याः परमसुहृत् तदुःखितोऽभ्येत्य तमुवाच-भगववि ! किं पृथा प्रलापेन ?' घटका प्राह 'परत्वेतत् । पर दुष्टगजेन मदान्मम सन्तानक्षय कृतः । यद्यदि । मम त्व सुहत सत्या, सदस्य गजापसदस्य कोऽपि वधोपायश्चिन्त्यता यस्यानुष्ठानेन मे सन्ततिनाशदुःखमपसरेत् । एक दिन एक राजा अपने मन्त्री और नौकर के साथ घूमते घूमते एक बन में जा पहुँचा । राजा ने प्यास से व्याकुल हो नौकर से कहा-'नल लामो' । सामने एक कुटी थी। यहाँ एक अपा तपस्वी कुए पर बैठा था। उसे देख कर नौकर बोला-'अरे अन्धे । हमें पानी दो'। यह वचन सुनकर यह तपस्वी बोला- 'यहाँ से दूर हो जा । मैं नीच को पानी नहीं दूंगा'। नौकर राजा के पास आया और बोला-'अधा पानी नहीं देता' । तव मत्री ने जाकर कहा-'माई अन्धे ! योदामा जल दो। उस तपस्वी ने उत्तर दिया-'आप राजा के मन्त्री हैं तो मुझे क्या मैं जल नहीं देता। मत्री के लौट माने पर राजा स्वय गया और उसने मधुर वचनों से प्रार्थना की-'महारमाबी, मुझे पहुत प्यास लगी है, कृपया थोड़ा मल दीजिये। वह बोला-राजन् ! आप मैठ जाइये, मैं अमी जल देता हूँ। राजा ने आवर्य से कहा-'महाामा ची जल तो मैं पीछे पीऊँगा। पहले यह बताइये कि आप देस तो सक्तै नहीं, तब मापने कैसे जान लिया कि पहला आदमी नौकर था और दूसरा मन्त्री' । तपस्वी ने उत्तर दिया 'मैंने यह सब कुछ वाणी से जान लिया। केवल आपके ही वचन सादर और सत्कारपूर्ण थे, जिनसे आप की योग्यता और कुलीनता प्रकट होती थी। (२५) कापूद आह-'भगवति । सप्यममिहित भवत्या । यत् पश्य में धुद्धिप्रभावम् । परं ममापि सुहृभूता वीणारवा नाम मक्षिकास्ति । उत्तामाहूयागच्छामि, येन स दुरात्मा दुष्टगजो बध्यते । अथासौ घट. क्या सह मक्षिकामासाथ प्रोवाच-'भद्रे ! ममेष्टेय चटका केनचिद् दुष्टगजेन पराभूताऽण्डस्फोटनेन । तत्तस्य धधोपायमनुतिष्ठतो मे साहा १ - - १०६ संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। स्य कर्तुमर्हसि । मक्षिकाप्याह-भद्रे ! किमुच्यतेऽत्र विषये। पर ममारि भेको मेघनादो नाम मित्र तिष्ठति । तमप्याहूय यथोचित कुर्मः। अथ ते त्रयोऽपि गत्वा मेघनादस्याने समस्तमपि वृत्तान्त निवेद्य तस्थुः । अथ स प्रोवाच-"कियन्मानोऽसौ वराको गजो महाजनस्व 'कुपितस्यामे तन्मदीयो मन्त्र. कर्तव्यः' । अपना कर्तव्य प्रसन्नता से करो। उसके करने में उदास या निराश मत हो। अपने कार्यको मनोरञ्जक बनायो । इस प्रकार वह कार्य आसानी से सिद्ध होगा। कुछ न कुछ कार्य करते रहो । किछी उद्देश्य को हृदय में रक्खो। इसी में जोवन का आनन्द है । अनेक मनुष्य अपने आनद के समय को भी मिथ्या भय और निर्मूल चिन्ताओं में व्यतीत करते हैं। मिथ्या कल्पनाओं से दूर रहो और सदैव शुभ कार्यों के फरने में प्रवृत्त रहो । बुद्धिमान् पुरुष के लिए प्रत्येक स्थान स्वदेश है और शातचित्तवाले के लिये प्रत्येक स्थान उसका प्रासाद है। जो धर्मात्मा हैं वे शरणागत का त्याग नहीं करते । विपत्ति में भी धर्म में दृढ रहते हैं। इसी कारण उनका यश वृद्धि पाता है। बड़ों का निरादर करने से मनुष्य नीच दशा को प्राप्त हो जाता है और कष्ट भोगता है। विद्वान् चारे बालफ हो अथवा कुरूप, सदैव भादर के योग्य है। परन्तु विद्वान को अपनी विद्या का अहकार कभी न करना चाहिए । पढी हुई विद्या सफल हो अपना निष्फल अधर्माचरण तो कभी भी उचित नहीं। (२६) कस्मिंश्चिद्वने भासुरको नाम सिंहः प्रतिवसति स्म । अथासी वीर्या तिरेकात् नित्यमेव अनेकान् मृगशशकादीन् व्यापादयन्नोपररामा भया न्येद्युस्तद्वनजाः सर्वे पशवो मिलित्वा तमभ्युपेत्य प्रोचा-स्वामिन् । किमनेन सकलमृगवघेन नित्यमेव, यतस्तवैकेनापि मृगेण दृप्तिर्भवति । तत् क्रियतामस्माभिः सह समयधर्मः। अद्यप्रमृति तवानोपविष्टस्य जातिम्मेण प्रतिदिनमेको मृगो भक्षणार्थ समेष्यति । एव कृते वक तावत् प्राणयात्रा क्लेश विनापि भविष्यति, अस्माफ सर्वोच्छेदन न स्यात् । वदेप राजधर्मोऽनुष्ठीयताम् । भय तेषा सघनमाकएय भासुरक बाह-'अहो । सत्यमभिहित भवद्भिः। पर यदि ममोपविष्ट - - - सस्कवरचनाऽनुवादशिक्षः। स्थान नित्यमेव नैक श्वापद. समागमिष्यति तन्नून सर्शनपि भक्षषि- 'ज्यामि' । अथ ते तथैव प्रतिक्षाय सुखिनस्तत्रैव पने निर्भयाः पर्यः 'दन्ति । एकच प्रतिदिन तेपी मध्यात्-तस्य भोजनार्थ मध्यानमये "छमेणोपविष्टने। सूर्य की किरणों से व्याकुल होकर दो कुत्ते एक मृक्ष को छाया में बैठ गये और बातचीत करने लगे। एक ने फरा-भाई । असार म पूर्सलोग पर्थ ही रहते और दुःसित होते हैं। दूसरे ने उत्तर दिया-'मित्र ! तुम सत्य कहते हो । कह करना अनुचित है । सदा यम से प्रेम के साथ रहना चाहिए । इस प्रकार जगत् में आनन्द फी वृद्धि होगी और दुःस का नाश होगा | आभो, हम दोनों प्रतिशा करें कि परस्पर फलह कभी न करेंगे। तब दोनों ने परमात्मा का "पान कर उक्त प्रकार से प्रतिज्ञा की। उसी समय मांस का एक टुकड़ा ऊपर से उनके सामने गिरा। दोनों कुत्ते उसे देखकर दौड़े। क्योंकि दोनों ही मांस को 'साना चाहते थे, इसलिए उनमें लड़ाई होने लगी । यहाँ तक कि दोनों के शरीर सून से सन गये । एफ कीया उनकी यह दशा देसार वृक्ष से उड़ा और मांस का कहा चोंच से पक कर ले गया। समार में मित्रता उसी समय तक रहती हे व तक स्वार्थ नहीं होता। स्वार्थ होनेपर स्नेह और मित्रता का नाश हो जाता है। (२७) आसीत् कुसुमपुरे नन्दो नाम राजा। तस्य कायस्थ शकटारो नाम मन्त्री बभूव । स च फेनाप्यपराधेन सर्वस्व गृहीत्वा सपुत्रकलत्रो गिला कारागृहे निक्षिप्तः । तत्रापि तस्मै सपरिवारायैकशरायपरिमिता एव सक्तवः प्रतिदिन भक्ष्यत्वेन दीयन्ते । तद्-दृष्ट्वा तेन शकटारेण परिवारेपमिहितम्-'यदय राजा करालहृदयो विनाऽरावेनास्मान दुःख दत्त्या वापयति । शरापमान सस्तुभिः सर्वपामस्माकमाहार- सिद्धिर्न सम्भवत्येव । ततः स सादतु सस्तुशराव योऽस्य प्रत्युद्धारे समर्थो भवति' । परिवारस्तम्-'यदि भवान् जीवति तदैतस्य वैरस्य परिवारसहारमम्भवस्य प्रत्युद्धारः सम्भाति' । ततः सफल परिवाराण परामर्शन शकटार एव तदन्न खादित्वा स्वकीय नोपन रक्षितान् । परिवारस्तस्य मृत एव ।

१०६ सस्कृवरचनाऽनुवादशिक्षकः। व्य कर्तुमर्हसि । मक्षिकाप्याह-'भद्रे ! किमुच्यतेऽत्र विषये। परममा भेको मेघनादो नाम मित्र तिष्ठति । तमप्याहूय यथोचित कुर्मः ।। अथ ते त्रयोऽपि गत्वा मेघनादस्या समस्वमपि वृत्तान्त निवेर तस्थुः । अथ स प्रोवाच-कियन्मानोऽसौ वराको गजो महानन कुपितस्याने तन्मदीयो मन्त्रः कर्तव्य'। अपना कर्तव्य प्रसन्नता से करो । उसके करने में उदास वा निराश मत हो। अपने कार्यको मनोरक्षक बनायो । इस प्रकार व कार्य आसानी से सिद्ध होगा. कुछ न कुछ कार्य करते रहो । किसी उद्देश्य को हृदय में रक्खो। इसी में प्रोवर का आनन्द है । अनेक मनुष्य अपने आनन्द के समय को भी मिथ्या भय और निर्मूल चिन्ताओं में व्यतीत करते हैं। मिथ्या कल्पनाओं से दूर रहो और सदै शुभ कार्यों के करने में प्रवृत्त रहो । बुद्धिमान् पुरुप के लिए प्रत्येक स्थान स्वदेर है और शातचित्तवाले के लिये प्रत्येक स्थान उसका प्रासाद है। जो धर्मात्मा हैं वे शरणागत का त्याग नहीं फरते । विपत्ति में भी धर्म । दृढ रहते हैं। इसी कारण उनका यश वृद्धि पाता है । बड़ों का निरादर करने । मनुष्य नीच दश को प्राप्त हो जाता है और कष्ट भोगता है । विद्वान् चाँ चालफ हो अथवा कुरूप, सदैव आदर के योग्य है। परन्तु विद्वान् को अपनी विद्या का अहङ्कार कमी न करना चाहिए । पढी हुई विद्या सफल हो अपा निष्फल अधर्माचरण तो कभी भी उचित नहीं। (२६) कस्मिंश्चिाने भासुरको नाम सिंह प्रतिवसति स्म । अथायौ वीर्या तिरेकात् नित्यमेव अनेकान मृगशशकादीन व्यापादयन्नोपररामा प्रथा न्येद्युस्तद्वनजा सर्व पशवो मिलित्वा तमभ्युपेत्य प्रोचुः-स्वामिन् । किमनेन सकलमृगवधेन नित्यमेव, यतस्ववैकेनापि मृगेण तृप्तिभवति । तत् झियतामस्माभिः सह समयधः। अद्यप्रति ववानोपविष्टस्य जातिामेण प्रतिदिनमेको भृगो भक्षणार्थ समेष्यति । एव फवे तव तावत् प्राणयात्रा क्लेश विनापि भविष्यति, अस्माकं सर्वोच्छेदन न स्यात् । तदेष राजधर्मोऽनुष्ठीयताम् । भय तेषा तद्वचनमाकएर्य भासुरक आइ-'अहो । सत्यमभिहित मवद्भिः। पर यदि ममोपविष्ट . सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षका। १०६ फल मिलता है । सत्य के पालन से क्या लाम और असत्य के आचरण से कैसी हानि होती है। प्यारे बालकों ! परमपवित्र रामायण का पढ़ना और उसके अनुसार सुनीति का बर्ताव करना, तुम्हारे लिए परमहितकारी होगा और तुम अपनी ससारयात्रा का निर्वाह सुस से कर सकोगे। सर्पः -कथय फरमाते परिभवः । गङ्गदत्त -दायादेभ्यः। सा-फते आश्रयो वाया कूपे तडागे हदे वा तत् कथय स्वाश्यम्। ग-पाषाणचयनिनद्धे फूरे ममात्र य । ..अहो । अपदा वयम् । तत्रास्ति तत्र में प्रवेश । प्रविष्टस्य च स्थान नास्ति, यत्र स्थित तत्र दायादान व्यापाद्यामि । तद्गम्यताम् । ग०--भोः । समागन्छ त्वम् । अह सुखोपायेन तम तव प्रवेश कारयिष्यामि, तथा तस्य मध्ये जलोपान्ते रम्यतर फोटरमस्ति यत्र स्थितस्त्व लीलया मे दायादान् व्यापादयिष्यसि । तच्छु वा सो व्यचिन्तयत् -'अह तावत् परिणतवया कदाचित् कथञ्चित् मूषिकमेक प्राप्नोमि । तत्सुखावहो जीवनोपायोऽयमनेन कुलागारेण में दर्शित । तद् गत्वा तान् मण्डूकान भक्षयामोति । एव विचिन्त्य तमाह-'भो गङ्गादत्त ! यद्येव तदने भव, येन गच्छाव। उस पर्वत की फन्दरा में सिंह रहता था। उसी फन्दरा में एक बिल था जिसमें एक चूहा रहता था। मम सिंह सोता तब चूहा बाहर आकर सिंह के पाल फाटने लगता और जब सिंह जागता तो वह तुरत बिल में घुस जाता। सिंह ने विचार किया कि-'इस क्षुद्र चूहे को मारने से मेरे यश में बट्टा लगेगा, अत इस जैसा ही इसका एक शत्रु लाकर इसका नाश करना चाहिए। यह विचार कर वह सिंह एक दिन माम में गया और वहाँ से एक विडाल ले आया। सिंह के सोने पर वह विडाल कदरा के द्वार पर बैठ कर रक्षा करता या। एक दिन विडालने या चूहा मार डाला । तब सिंह ने विचार किया-कि 'जिस काम के लिए मैंने इस विडाल को लाया था वह सिद हो गया अब इसको यहा रखना व्यर्थ है। इस०र० - - १८८ संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । प्राचीन काल में सुदर्शन नामक राजा था। उसके कई पुत्र ये पर सम मूर्स थे । वे न पढ़ सकते थे और न लिख सकते थे। राजा ने अनेक उच्च किये परन्तु सफलता न हुई। एक दिन वह मन में विचार करने लगा-मैं मूर्स पूत्रों को क्या करूँ? ये पढे लिखेंगे नहीं तो राज्य कैसे करेंगे ? १३. मर जाऊँगा तो इनकी क्या गति होगी। राजा को उदासीन देख कर ए पण्डित, जिसका नाम विष्णुशर्मा या, बोला-'महाराष, मैं राजकुमारों को मास के भीतर नीति निपुण बना दूंगा। मैं इनको पुस्तक न पढ़ाऊँगा कि क्या सुनाऊँगा। गीदड़, सिंह और अन्य बन के पदों की बात बताऊँगा कुछ जतु चतुर होते है । कुछ मूद कुछ विश्वास के योग्य, कुछ धूर्त । मनुष्प में ऐसे ही होते हैं । इस प्रकार मैं राजकुमारों को अवश्य बुद्धिमान बना दूंगा। (२८) कस्मिचित्तूते गङ्गदत्तो नाम मण्डूकराज प्रतिवसति स्म । स कर चिद्-दायादैरुद्वेजितोऽरघट्टघटीमारुप निष्क्रान्त । अथ तेन चिन्ति 'मया दायादाना प्रत्यपकारः कर्तव्य" इति । एव चिन्तयन् स प्रविशन्त कृष्णसर्पमपश्यत् । त दृष्ट्वा भूयोऽप्यचिन्तयत्-'यदेन धन कूपे नीत्या सक्लदायादानामुच्छेद फरोमि। एव विभाज्य पिलद्वार गत्वा तमाहूतवान्-'एहि पहि, प्रियदर्शन । एहि' । तच्छुत्वा सर्पश्चि न्तयामास-'य एप मामाहयति स स्वजातीयो न भवति, यो नेपा सर्पवाणी। तदत्रैव दुर्गे स्थितस्ताव मि फोऽय भविष्यतीति । भाइ च-'भो ! को भवान् ?' स ाह-'अह गङ्गदत्तो नाम मण्डू काधिपतिस्त्वत्सकाशे मैञ्यर्थमागता' तच्छ्रुत्वा सर्प आह-भो। अश्रद्धेयमेतत्-यत्तणाना वहिना सम सङ्गम:' । गङ्गदत्त आह-'सत्य मेतत् स्वभावरी त्वमस्माकम् पर परिभवात् प्राप्तोऽह से सकाशम् । हम सब के एक रामचरित एक निर्मल दर्पण है । इसमें हम देख सकते हैं कि-पालकों को माता पिता की आशा का किस प्रकार पालन करना चाहिए। माइयों को आपस में किस प्रकार प्रेम रसना चाहिए। पतिता स्त्री को अपने पति की सेवा से फरनी चाहिए। अमिमानी और हठी मनुष्यों को हठ काम सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । १११ विचक्षणा चाव सर कथितवती । शकटार उवाच-त्व कथयसि यन्मूत्रप्रवाह वा पश्चादश्वत्थवृक्ष पश्यन् राजा जहास । वर्हि पूर्व- दृष्टस्य कस्यापि वस्तुनो न हासनिमित्तत्वम् । श्रा. शावम् । मूत्रप्रवाहे प्रवहदश्वस्थवीज क्षुद्रतर दृष्ट्वा तदद्भुत महापरिमाण वृक्ष पश्यन् पशमृष्टवान् राजा यदहो ! वैकृत्य विधातु प्रपञ्चस्य । क्वेद धीजम् , काय च तरुस्त सम्भव. इति हसित भूपालेन' । पुनः पुन' परामृश्य शकटारस्तदेव निर्धारितवान् अप्रवीज । विचक्षणया वदेव वचन · राज्ञ' पुरस्तादुतम् । सदा सत्पथ का अनुसरण करो और दृढता के साथ अपने काम में रगे हो । ससार के सभी लोग बहुत बड़े विद्वान् , दार्शनिक, आविष्का या करोड़पति नहीं बन सक्ते । परन्तु सभी लोग अपना जीवन प्रतिष्ठा और सुख से पूर्ण अवश्य इना सकते हैं। इसके अतिरिक्त यह बात मी ज्यान में रखने योग्य है कि अप्रतिष्ठा और विफलता उन कामों में नहीं है, जिनको लोग छोटा अथवा तुच्छ मशते हैं, किन्तु उन कामों को अपनी पूर्णशक्ति से न करने में है । जूता सीना निन्दनीय नहीं है, निदनीय है मोची होकर खराव जूता सीना। बहुत लोग कहते हैं कि उद्यम व्यर्थ है, क्योंकि प्रत्येक प्राणी सुख की प्राप्ति के लिये यत्न करता है परन्तु उसे दुख की प्राप्ति होती है। इससे स्पष्ट है कि ईश्चर चाहे जिसे सुख वा दु ख का पात्र बना दे। ससार के सब प्राणी ईश्वर के वश में होफर सुख वा दुःख का अनुभव करते हैं और विद्या से अविद्या का नाश होता है। प्रयत्न से विद्या की प्राप्ति होती है, इस कारण समस्त दुखों का नाश प्रयल से होता है । यदि इस जगत् में सारे अनर्थों का मूल आलस्य न होता तो कौन धनवान् अथवा नलवान् न होता? (३२) त दृष्ट्वा शफटार उवाच-'बटो। कस्त्वम् , किमत्र कुरुपेच ? माह्मण उवाच-'चाणक्यशर्मा ब्राह्मणोऽहम । साइवेदमधीत्याऽनेन पथा विवाहाथितया गच्छतो मम कुशाङ्कुरेण पादे क्षत वृत्तम् । तेन तेन विवाहभङ्गाऽमर्पितः प्रतिज्ञातवानस्मि यदस्याः स्थल्या कुश सस्कृवरचनाऽनुवादशिक्षक। (३०) एकदा स राजा नन्द. प्रस्रावगृहान्मन्दस्मित कुर्वन् बहिर्वभूव। त हसन्त दृष्ट्वा पानीयपरिचारिका तदानीं तत्रावस्थिता विचक्षणानाम्नी चेटी जहास । ता हसन्तीं दृष्ट्वा राजोवाच-रे विचक्षणे! कुतो हससि।' विचक्षणोवाच-'यतो देवो हसति' । राजोवाच-'मया कुतो हस्यते ।' विचक्षणोवाच-तदह न जानामि'। राजोवाच-'पा: पापे कपटिनि! त्वयैवोक्त यतो देवो हसति तवोऽहमपि हसामि । पुनरिदानी त्वमेवा भिदधासि यदह देवस्य हासकारण न जानामि । किमेते परस्परविरो धिनी वचने कथयसि?यदि स्व हितमिन्छसि तदा फथय मे सत्वर हास बीजम् । नो चेदधुना तव शासन फरिष्यामि ।' ततो लब्धारधिः सा दासी चिन्तयामास-यत्सुबुद्धिपरामर्शपरिच्छेद्यमेतत् । ततः सुबुद्धि कमपि पृच्छामि । सुवुद्धिषु प्रथम गणनीयः शकटार । ततस्तमेव गत्वा पृच्छामीति परामृश्य तत्र गतवती। तत्र च कारागृहदु खनियंत शकटार मिष्टान्नपाने परितोष्य प्रश्नोत्तरमपृच्छत् । बोपदेव बाल्यावस्था में बहुत मन्दबुद्धि था। पार गर अभ्यास करने पर भी अपना पाठ याद न कर सकता था। उसने बड़े परिश्रम से व्याकरण के अनेक अथ पढ़े परन्तु उसे ज्ञान प्राप्त न हुआ। एक दिन वह निराश हो, पाठशाल त्याग कर सरोवर के तट पर जा बैठा और विचारमग्न हो गया। थोड़ी देर बाद उसने एक युवती देखी, जिसने घड़ा जल से भरकर एक पत्थर पर रखा और वह स्नान करने लगी। स्नान करने के बाद घड़ा उठाकर वह घर को चरी गई। प्रतिदिन घड़े की रगड़ से उस पत्थर में एक गड्दा हो गया था। या देखकर बोपदेव के हृदय में एक नवीन भाव उदित हुआ और यह प्रसन्नचित गुरु के पास गया और बोला-'गुरु जी ! यदि प्रतिदिन घड़े की रगड़ से पत्थर में भी गड्दा हो सफता है तो अवश्य निरतर परिश्रम से मेरी बुदि भी तीश हो जायेगी। शकटार वाच-विचक्षणे। विना देशकालानुसारिणा प्रकरण सुंज्ञानेन परिच्छे न शक्यते राज्ञ स्मितकारणम् । वदवसर फ्थय ।

सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षफः। १११ विचक्षणा चावसर कथितवती। शफटार उवाच-त्वं फथयसि यन्मूत्रप्रवाह दृष्ट्वा पश्चादश्वत्थवृक्ष पश्यन् राजा जहास । तर्हि पूर्व- दृष्टस्य कस्यापि वस्तुनो न हासनिमित्तत्वम् । श्राः ज्ञातम् । भूनप्रवाहे प्रवहदश्वस्थवीज सुद्रतर दृष्ट्वा तद्भुत महापरिमाण वृक्ष पश्यन् पशमृष्टवान् राजा यदहो । वैकृत्य विधातु प्रपत्रस्य । क्वेद घीजम् , काय च तरुस्तरसम्भव. इति हसित भूपालेन' । पुनः पुनः परामृश्य शक्टारस्तदेव निर्धारितवान् अमवीश । विचक्षणया तदेव वचन राज्ञ पुरस्तादुतम् । सदा सत्पथ का अनुसरण करो और हदता के साथ अपने काम में लगे रहो । ससार के सभी रोग बहुत बड़े विद्वान् , दार्शनिक, आविर्ता या करोड़पति नहीं बन सफ्ते । परतु सभी लोग अपना जीवन प्रतिष्ठा और सुख से पूर्ण अवश्य पना सफ्ते हैं। इसके अतिरिक्त यह यात भी ध्यान में रखने योग्य है कि अप्रतिष्टा और विफलता उन कामों में नहीं है, जिनको लोग छोटा अथवा तुच्छ समझते हैं, किन्तु उन कामों को अपनी पूर्णशक्ति से न करने में है । जूता सीना निदनीय नहीं है, निदनीय है मोची होफर खराब जूता सीना। बहुत लोग कहते हैं कि उद्यम व्यर्थ है, क्योंकि प्रत्येक प्राणी सुख की प्राप्ति के लिये यत्न करता है परन्तु उसे दु ख की प्राप्ति होती है। इससे स्पष्ट है कि ईश्वर चाहे जिसे सुख वा दु ख का पान बना दे। ससार के सब प्राणी ईश्वर के वश में होकर सुख वा दुस का अनुभव करते हैं और विद्या से अविद्या का नाय होता है। प्रयत्न से विद्या की प्राप्ति होती है, इस कारण समस्त दुाखों का नाश प्रयल से होता है। यदि इस जगत् में सारे अनयों का मूल आलस्य न होता तो कौन धनवान् अथवा बलवान् न होता? (३२) त दृष्ट्वा शफटार उवाच-'यटो। कस्त्वम् , किमत्र कुरुपे च प्राह्मण उवाच--- 'चाणक्यशर्मा ब्राह्मणोऽहम । साङ्गमय पथा विवाहार्थितया गच्छतो मम कुशाकुरेण पादे क्षत्त . क्षतेन विवाहभङ्गाऽमर्पितः प्रतिज्ञातवानस्मि यदस्याः m ११२ सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। निर्मूल करिष्ये । ततो वृक्षायुर्वेदाधिगमादयमुपायः सुकरो निर्धारित यत्तऋण कुशा विनश्यन्तीति । तथा समाचरन् पूर्णप्रतिज्ञो भविष्यामि । शकटार उवाच-'दिष्टया भवता वृक्षायुर्वदाधिगमः कवो नो चेत्प्रतिज्ञापूरणं कथ स्यात् ? चाणक्य उपाच-'यद्ययमुपायो न स्यान दाभिचारिके कर्मणि प्रबोद्धाऽस्मि, कुशविनाशकामनया होममेर फरिष्ये ।' वदाफयं शकटारश्चिन्तयामास-'अहो । मस्य प्रामणस्या मर्षातिशय । अहो । उपायप्रवीणता यद्यय मम वैरिणो वैरी भवति तदाऽह वैरोद्धार करवाणि, विनाऽऽयासेनैव कृतार्थो भवामि ।' यह सुन कर वह बुढिया बोली-'मेरा तो और कोई नहीं है, केवल एक पुन है। किन्तु वह मूर्स बेटा भी लगभग बारह वर्ष से इस बूढ़ी गरीब माना को छोड़ फर न जाने कहाँ चला गया' । अब सुना है कि-'जयपुर के महाराज रामसिंह के पहाड़ी किले में वह मेरा पुर कुछ काम करता है। रास्तागीर लोग यहाँ आकर पानी पीते है और मुझे कुछ देना चाहते हैं कि तु पानी पिला कर मैं क्सिीसे कुछ नहीं लेती, क्योंकि मैं यह जानती हूँ कि प्यासे को पानी पिला कर और भूरों को भोजन खिला फर उसके बदले में कुछ लेना मारी पाप है । जगड की लकड़ी, मृगचर्म और जगली दवाइयाँ बेच कर किसी प्रकार मैं वेट मर लेती हूँ। परन्तु अन अत्यन्त यूढ़ी होने के कारण मुझसे परिश्रम नहीं हो सकता तथापि और क्या करूँ ? वृद्धावस्था में ऐसा निर्वाह बड़ा फष्टदायक है । मैं अपने जीवन का शेष समय पड़े ही दुस से मिता रही है। इस अवस्था में पुत्र का वियोग तो मार ही डालता है। यह कह कर वह रोने लगी । (३३) फस्मिंश्चिद्देशे शूरसेनो नाम राजासीत् । स पुत्रतुल्य प्रकृतीः पालयन सुखेन फाल निनाय । सुमति म तस्य मन्त्री । नृपतिस्तस्मिन्नत्यर्थ प्रीतिमानासीत् । तस्य सचिवस्य ईश्वरे परमा प्रीतिर्वभूव । 'जगवीह अहर्निश यत्किश्चित् घटते तत् सर्वमेव शुमाय' इत्येव तस्य बुद्धिरा सीत् । शुभ वाप्यशुभ किश्चित् धीरस्यास्य चित्त विकलयितु न प्रभवति स्म । परमात्मविहित सर्व सन्मङ्गलाय एव मन्यते स्म । 'भगवता विधात्रा यदेव विधीयते तत् सर्वमेव शुभाय' इति स सर्वदेवाकययत्।

संस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षकः । ११३ नृपतिरपि तस्य मुखादनिशम् एषमाकर्णयन् कदाचिदचिन्तयत्- 'अहो । क्मिप्येन पीतधेयं कर्तुं नालम् । भवतु तावत् । अहमस्य धैर्य परीक्षिष्ये। विध्याचल के घने बाल में मरीचि ऋषि का आश्रम था, जहाँ बहुत से शिष्य प्रतिदिन पदने के लिए आते थे। एक दिन एफ शिष्य अपने साथ एक तोते का बच्चा ले आया। ऋषि ने उसे देख कर और कुछ विचार कर कहा कि-'यह तोता पहले जन्म म विद्वान् ब्राह्मग था, एक महर्षि के शाप से इस दशा को प्राप्त हुआ है। अब शिष्प यह सुन कर विस्मित रह गये। उ होने गुरु से सविनय निवेदन किया कि इसके पूर्व नाम की कया कह कर मृतार्थ कीजिये और कृपा कर कोई उपाय बताइये जिससे यह तोते का बच्चा अपने शाप से छूट कर पुन• ब्रामण जन्म प्राप्त करें। यह सुन कर ऋषि ने इस प्रकार कहना प्रारम्भ किया-'कुरु देश के प्रधान नगर हस्तिनापुर में सब शास्त्रों में कुशल, सब विद्याओं में प्रवीण, सब फलाओं में निपुण एफ विद्वान् ब्राह्मण रहता था। उसका एक पुत्र या पो पिता के समान ही गुणी और विद्वान था। उसके मन में वैराग्य उत्पन हुआ और वह हिमालय पर तपस्या करने चला गया । बदरि- काश्रम पहुँच कर उसने घोर तप किया। उसी समय वहा एफ कन्या आई और इसकी सुदर आकृति और अद्भुत रूप को देख इसकी सेवा में प्रवृत्त हुई। थोड़े ही दिनों में उनकी प्रीति दृष्ट हो गई। (३४) प्रायेण सार्धद्विसहन वर्षाणि व्यतीयुर्यद्-बभूव कपिलवस्तु नाम नगरी राजधानी,याक्लि वाराणस्या उदीच्या निशिसप्तदशयोजनेष्वा- सीत् । तत्र गौतमनाम्नि गोत्रे शाक्यवश्या क्षत्रिया राजानो बभूवुः । तेपु शुद्धोदनो नाम राजा विषिदे । तस्य धर्मपत्नी मायादेवी नाम पुत्र सुपुवे । पिता तस्य 'सिद्धायें' इति नाम चकार । तज्जन्मन सप्तमेऽहनि तस्याम्बा ममार। तस्मान्मारवसा तस्य पालन पोषण च चके । यदाय घघे स्वगोत्रनाम्ना गीतम' इति प्रसिद्धिं जगाम । एष बुद्धिमान गुणी शूरो वीर्यवाश्च प्रतीत । ततो यूनि सञ्जातेऽस्मिन् यशोधरा नाम कापि राजकन्या सौन्दर्यादिगुणसम्पन्ना त पति बने।

1 . . . सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । बहुत दिन हुए एफ चक्रवर्ती राजा बड़ा प्रतापी धर्मात्मा और बुद्धिमान् हो गया है । उसका नाम शूद्रक था । एक दिन वह मन्त्रियों के साथ राममा में बैठा था कि द्वारपाल ने आकर निवेदन किया-'महाराज | स्त्री और पुत्र समेत एक रामकुमार दक्षिण से आया है। वह नौकरी करना चाहता है। यदि आशा हो तो आपके सम्मुस उपस्थित फरूँ । राजा ने कहा- आओ! पत्र वीरवल सभा में आया तो राना ने उससे पूछा-'यहाँ आगमन फैसे हुआ।" बीरबल बोला-'महाराज ! आपका यश सुनकर नौकरी के लिए आया हूँ। राजा ने पूछा-'तम क्या महीना लोगे ?' वह बोला-'प्रतिदिन सहस मुद्रा लंगा' । राजा ने पूछा-'तुम्हारे साथ कितने मनुष्य हैं ? उसने कहा-'एक स्त्री, दूसरा बेटा, तीसरी बेटी और चौथा मैं, पाँचवाँ मेरे साथ कोई नहीं है। उसकी यह बात सुनकर राजसमा के लोग मुंह फेर कर हँसने लगे। (३५) विवाहादशमे वर्षे सा सुतमेक जनयामास । 'राहुल' इति तस्य नाम बभूव । दयालुम्वभावो गौतम कस्यापि दुःख न सेहे । यद्यप्यस्य पिना एप प्रवन्ध कृतोऽभूद् यदेतस्य दृश्पथे किमपि फरुणोत्पादक दृश्य नावतरेत्तथापि देवादेकदाऽय फमपि वृद्ध यष्टिनलेन चलन्तं ददर्श । तेदाऽस्य हृदि महती करुणा स्थान लेभे। तत. कालिदासरतत्रैव रानौ विलाससदनोद्याने यसन् पथि गच्छता तेपा गिरं श्रुत्वा चेटी प्रेषितवान्-'प्रिये । पश्य, फ एते प्रामणा इव गच्छन्ति ?' ततः सा समेत्य सर्वानपश्यत् । उपेत्य व कालिदास प्राह- एकेद राजहसेन या शोमा सरसोऽभवत् । न सा बकसहस्रेण परितस्तीरवासिना ॥ सर्व च पाणमयूरप्रमुखा पलायन्ते, नात्र संशय इति । फालिदासः प्राह-'प्रिये । वेगेन वासांसि भवनादानय, यथा पलायमानान् विमान रक्षामि। परन्तु राजा ने अपने जी में सोचा कि-'इसने जो इतना धन मांगा इसमें कुछ भेद है। फिर उसने सोचा कि-'बहुवा दिया हुआ धन व्यर्थ नहीं पाता। किसी न किसी दिन सफल होता ही है। अपने भण्डारी को बुलाकर आदी कि--'इसको प्रतिदिन सहस रुपये दिया करो'। मीरवर उस दिन रुपये पाकर ~ सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक। ११५ अपने घर गया और आधे रुपये उसने ब्राह्मणों को बाटे । चौथाई से अन्धे, लगड़े आदि को भोजन कराया। और जो बचा उससे अपना और अपने कुटुम्ब का पालन किया। इसी रीति से वह प्रतिदिन अपना पालन करता और रात को दालतबार बाँधकर राजद्वार पर पहरा देता था। (३६) ततः स कालिदासञ्चारणवेप विधाय खड्गमुद्वहन कोशार्धमुत्तर तेपा सम्मुसमागत्य सानिरूप्य 'जयेत्याशीवचनमुदीर्य पप्रच्छ चा- रणभापया-'अहो भोजसभापण्डिता ! सम्भूय कुत्र जिगमिषवो भव. न्तः ? कच्चित् कुशल वो राजा च कुशली? अस्माभिः काशीदेशादा गम्यते भोजदर्शनाय वित्तस्पृहया'। ततः परिहास फुर्चन्त सर्वे निष्का- न्ता । ततस्तेषु कश्चित् विपश्चित् तगिरमाकर्य त घ चारण मन्यमान कुतूहलेन आह --अहो धारण । शृणु त्वया पश्चादपि श्रोष्यत एव प्रतो मयेदानीमेयोच्यते । राज्ञा किलैभ्यो विद्वद्धय पूरणाय समस्योक्ता। तत्पूरणाऽशक्ता कुपिता देशान्तरे फचिज्जिगमिपव एते निश्चक्रमु । चारणः प्राह-'राज्ञा का समस्या प्रोक्ता ?' तवः पठति स विपश्चित् । तो च समस्या पूरिता श्रुत्वा सर्वे चमत्कृता । तत. पारण सर्वान् प्रणि- पत्य निर्ययो। एक समय फ्रांस के चादाशह नेपोलियन बोनापार्ट ने किसी स्त्री से पूछा- 'बताओ। किन किन बातों को आवश्यकता है, जिनसे मनुष्य ठीक ठीक शिक्षा पाये स्त्री ने उत्तर दिया-'केवल पढी लिखी माताओं की आवश्यकता है। स्त्री ने बहुत ठीक कहा । सच तो यह है कि बालकों को मुख्य शिक्षा घर पर ही होती है। मच्चों का स्वभाव है कि जो काम वे अपने माता, पिता, माई, बनि को करते देखते हैं वहीं वे आप भी करने लगते हैं। बहुधा छोटी अवस्था में बच्चा अपनी मा के पास रहता है और इसी कारण अपनी बहुत सी बातों में माता का अनुकरण करने लाता है । देखो २-३ वर्ष की अवस्था में पन्चे मा की बोली बोलने लगते हैं। इसका कारण यही है कि जिस बात को वे माता से सुनते हैं उसी को आप भी बालने लगते हैं। आसीजयन्तो नाम पुरो। तस्यामुपको नाम राजा बभूव । स प संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। शोर्योपार्जितबहुवित्तो नीतिनेत्रो बहुपुत्रश्च परमकृतार्थो वभूव । एकः रात्री निजगृहे सुख शयानः स्त्रीनन्दन शुनाव । पश्चादुत्तमस्त्रीकन्द निश्चित्य बहिनिर्जगाम । रोदनरवानुसारेण गच्छन् नगराद् घहि कि त्यपि दूरे सर्वावयवसुन्दरी स्त्रियमेका रुदतीं ददर्श । राजोवाच-'आर्ये सुन्दरि ! केन दुःखेन रोदिपि ।' सुन्दर्युवाप- राजन् ! तवाह लक्ष्मीरियदिनपर्यन्तं शूरस्य नयर लिनस्तव मुजच्छायायां स्थितास्मि । इदानीमन्यत्र गच्छामि । रोदिमि। राजोवाच-'तहि रुद्यते कुतः ?' लक्ष्मीरुवाच-तवानुरागेण'। राजा-न्यधनुरागस्तया त्यागे को हेतुः १ लक्ष्मी -'त्व न जानासि लक्ष्मीरह चलप्रकृतिर्नेकन चिर वस्तु च्छामि। तोर का स्वामी रामा रघुनाथ बड़ा विद्याप्रेमी था। उसकी राजसमा में अनेक पण्डित रहते थे। वह पण्डितों के साथ धर्म और काव्य के मर्मों का विच क्यिा करता था। कवि लोग नित्य नये काव्य रचकर राजा को सुनाया करते । पुरुष कवियों के सय स्त्रियां भी उस सभा को सुशोभित करती थीं। वे भी पण्डि के साय धर्म और काव्य की आलोचना में भाग लिया करती थी। वे भी नि रचनाएँ बनाकर रामा को सुनाया करती थीं। उन विदुषी देवियों में मधुरवा मुख्य थी। राजा की सभा में जितने पण्डित ये उन सब से अधिक प्रतिष्ठा म वाणी की होती थी । उसफी कविता से राजा बहुत प्रसन्न होता था। विदितमे वेद सर्वेषा सूक्ष्मदृशा स्थूलदृशां च यत् - मस्कृतभा सर्वाभ्यो लोकप्रसिद्धाभ्यो भाषाभ्योऽतिप्राचीना दोपगन्धेनापि रहि सर्वे समाहतावर्णनीयविषयानुमारेण यथोपयोग ललिता मधुरा पर प्रसन्ना चेत्यादिमहासौष्ठवा । तम्या च नानाविधा व्याकरण साहिर वेदान्त-न्याय-नीति-काव्य-धर्मशास्त्र-गणित-वैदाक्प्रभृतयोऽगणि विद्या सन्ति । यद्यपि ता दी थपिदिया स्वम्वविषयनिरूपणाय ऽनुपमा एव, तथापि पदार्थ निर्वचने उहापोहसौर्यसम्पादनेन युद्धिर पणीकरणे यस्य पश्यचिदिपयस्य सम्यनिरूपणे च धर्मशालमें - सस्कवरचनाऽनुवादशिक्षक। सर्वोपरि विद्यते । वदन्ति च वृद्धा:-'काणादपाणिनीये च सर्वशास्रो- पकारके इति। (क) एक दिन सफड़ों विदुषी रमणियों के साथ राजा समा में बैठा था। कोई स्त्री उसको रामायण गाकर सुना रही थी, कोई सङ्गीत सुना रही थी । एक स्त्री ने महाराज के विषय में एक कविता बनाकर सुनाई । राजा रामचन्द्र जी का अनन्यभक था। उस कविता में राजा की उस रामभक्ति का ही वर्णन था । पूरी कविता सुन चुकने पर राजा ने कहा 'मैं इस कविता को जितनी बार सुनता हूँ उतनी ही धार अधिक आनन्द पाता हूँ। (ख) जो सब मनुष्यों की भलाई चाहता है, जो सदा और मीठा बोलता है, जो योग्य पुरुषों का मान करता है, जिसका हृदय शुद्ध है, वह मनुष्य अपने कुटुम्ब में शिरोमणि होता है। (३९) यद्यप्यत्र उभे शास्त्रे समानोपकारके पठिते, तथापि शब्दशुद्धिमान. फलफाद् व्याकरणाद् वाक्मागल्भ्यादिबहुफलं तकशास्त्रमेव । कि बहुना- "विना व्याकरणेनान्धो, यधिस कोपवर्जितः । छन्दःशास्त्र विना पगु, मूकस्त फेषिवर्जितः ॥ इति लोकोक्त्यापि 'व्याकरण विनान्धतुल्येन गानपठनपाठनादिभिः किमपि सम्पादयितु न शक्यम् , न तु तर्फशाख विना मूफतुल्येनाकि- विकरणेति धोतितम् । यद्यपि तर्फभापादय प्राचीनाप्रथा अपिबहवः सन्ति तथापि तेषु सबै विषया भाषश्यका न सन्तीत्यतो मन्दमतिना. ऽनयबुद्धशास्त्राशयेनापि मया स्वसुताना भ्रातुष्पुत्राणां च सुखेन बोधाय अन्यमन्थेभ्यः, किश्चित् भितित्वा प्रायः सर्वानप्यवश्यलेख्यान् विष- यान सुगमया रीत्या यथामति सगृह्य न्यायप्रदोपोऽय रचित । (क) जो अपने ही सुख में सुखी नहीं होता कि तु दूसरे का भी सुस चाहता है, जो दूसरे के दुस यो देशखर प्रसन नहीं होता और जो दान देकर पीछे पछ तावा नहीं करता, उसे आर्यशील सजन कहते हैं। (ख) बुद्धिमान् मनुष्य देश के समस्त व्यवहारों को, समय को तथा जाति के धर्मों को जानकर उसके अनुसार बर्ताव करता है। वह आदि और अन्त को T संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । जानता है। वह जहाँ कहीं भी चला पावे वही श्रेष्ठ मनुष्यों का अधिपति । जाता है। (ग) बो विना विचारे काम नहीं करता, जो पूछने पर ठोक हो उन देता है, जो मित्रों के साथ लड़ाई झगड़ा नहीं करता और तिरस्कार पाकर मोघ नहीं करता, वह बुद्धिमान है। (प) जो विपत्ति पड़ने पर कभी दुसी नहीं होता, नो आलस्य त्याग उद्योग करता है, जो समय आनेपर दुःख भी सहता है, वही मार को उठाने व महात्मा है । वही धुरन्धर वीर शत्रुओं को जीतता है। (४०), बभूव गौडविषये श्रीहर्पो नाम कविः। स च नलचरिताभिध काव्य कृत्वा परामृष्टवान्- 'अग्नी परीक्ष्यते स्वर्ण काव्य सदसि तद्विदाम् किं फवेस्तेन काव्येन सद्भिर्यन्नानुगृह्यते ॥ ततस्तत्काव्य दर्शयितुं पण्डितमण्डलीमुद्दिश्य वाराणसी जगा तत्र घ कोकनामान पण्डित श्रावयामास । फोकस्तु यदा मध्याहसा मणिकर्णिकायां स्नानार्थ गच्छति तदा गच्छन्नेवार्णयति । श्रीहर्ष तमनुगच्छन् पठवि प्रत्यहं, पर तदुत्तर किमपि न प्राप्नोति । एकदा श्रीहर्षेणोक्तम्-'आर्य । महाकाव्ये मया महान् श्रम तत्परीक्षार्थ त्वामुद्दिश्य महतो दूरादागतोऽस्मि । पथि गच्छतो मः पुरस्तात् सदसद्विवेकप्रत्याशया पठामि। भवान् न निन्दति न घा नन्दति, तन्मध्ये फर्णमेव नार्पयति। महाकवि अश्वघोष ने अपने प्रसिद्ध काव्य 'बुद्धचरित' में एक जगह पर है कि-'वारमीकि के नाद ने वह उपनाया बोध्ययन महपि नहीं बना सके। इस पर एक प्रसिद्ध पण्डित ने लिखा कि-'इस प्रकार के उल्लेस से यह अनु करना कि, वैदिक अपि च्यवन की बनाई हुई कोई रामायग गर में यी और घाल्मीकि, की पद्यमय रचना प्रचलित होने पर खुश हो गई, बहे साहस का है। उस विद्वान् का यह कहना था कि-'हवाही चल गई कि च्यवन को राम वाल्मीकि के पहले थी । एक दूसरे विद्वान ने भी अपनी रघुवंश को भूमिय यह माना है कि 'व्यवनरचित रामायण यो। म एव पर विचार करना मनु न होगा कि-'बुद्धचरित के इस उस्लेख से यह कहाँ तक निकल पकता है।

सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक.। (४१) फोक उवाच-'श्रा. । कथमह मध्ये कर्ण नार्पयामि, किन्तु सम्पूर्ण श्रुत्वा तद्गुणदोपान वक्ष्यामि । काव्य तु मया कर्णे फतम् , मनसि विचारितश्च । भवान् न प्रत्येति तदा शृणोतु। सतो मासमाकर्णितानि पद्यानि पपाठ । तदाकय साश्चर्य सानन्दश्व श्रीहर्षस्तपादयो पपात । श्रीहर्प उवाच- F-'भो. फोकपण्डित ! परितुष्टोऽस्मि तव महत्त्वेन' । कोक- पण्डितस्तु काव्यस्य गुणान् प्रदये दोपान समाधाय त श्रीहर्पकविराज प्रसन्न कृत्पा गृह प्रस्थापयामास । प्रसिद्ध कादम्बरी का पूर्वमाग हो लिवकर महाकवि बाणभट्ट वर्ग में जा विराजे और उस अद्वितीय का कपा उत्तरार्ध वाग के पुत्र ने पूरा किया। उसने पिता के अपूरे काम को पूग करने के लिए ही अपना उद्योग बनाया है और सजनता से कहा है कि-पिता के चोये बीजों की फसल ही मैं इकट्ठा कर रहा हूँ।' इस पितृभक्त और पितृतुल्य कनि का नाम क्या था-इस पर पुराने विद्वानों ने ध्यान नहीं दिया। काश्मीर को हस्तलिखित पुस्तकों के सूचीपन में कादम्बरी के E उत्तरार्ध के फर्ना का नाम 'पुलिन' दिया है। श्रीनाय द्वारा निर्मित सूचीपत्र में तपा उदयपुर सूचीपन में 'पुलिद' नाम है। अथ गच्छता कालेन राज्ञि दिवङ्गते राज्य लब्ध्या मुञ्जो मुख्या- - मात्य बुद्धिमागरनामान केनापि मिपेण दूरीक य तत्पदेऽन्य नियोज- यामास । एकदा सकलविद्यासु प्रवीण कोऽपि विशेषतो ज्योति • शास्त्रवेत्तामाझगो राजसभामागत्य 'स्वस्ति देवाये' ति गदित्वोपविष्टः। स उवाच-राजन् । जना मा सबज्ञ कथयन्ति । तस्मात् किमपि पृच्छ। यत -'कण्ठस्था या भवेद्विद्या सा बुधै. सदा प्रकाश्ये' ति । राजापि विप्रस्याहकारेण विस्मितम्त वभापे -'मम जन्मन प्रभृति यन्मया • कृत तत्सर्व यथावद् वदमि चेत्तदा भवान् सर्वज्ञ एवेति । ततो • ब्राह्मणोऽतिगुमान्यपि राज्ञ चेष्टितानि प्रोवाच । तस्य शास्त्रज्ञानेन राजा परां मुमवाप । ततो विप्राय दश उत्तमाश्वान् ददो। उस दिन जैसा घोर समाम सात्यकि ने किया उसे फौरव बहुत दिन तक न भूल सकेंगे। द्रोण, मोज और कृतवर्मा को हराकर सात्यकि ने बराम और १२० संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। महामात्य का वध किया । उनको मारकर सात्यकि आगे बढ़ा । इतने में द्रोग रिस आकर उनके सामने खड़े हो गये । साथ ही साथ दुर्योधन, विकर्ण आदि कौरवो ने एक साथ सात्यकि पर आक्रमण किया किन्तु अर्जुनशिष्य सात्यकि को हराना क्या आसान या ? दुर्योधन माग गया । कृतवर्मा मूञ्छित होकर गिर पड़ा। मन्द में द्रोण ही सात्यकि का सामना करने को रह गये। घमासान लड़ाई के बाद द्रो को भी हार माननी पड़ी । उसके बाद सात्यकि के हाथ से मुदर्शन मारा गया। कम्बोज, शक और यवनों की सेना हारकर मागी । दुर्योधन फिर आया, पर इस बार उसे दण्ड भी पूरा पूरा मिला। (४३) ( क ) वत' शमिष्ठायां जात स्वस्त द्रुघु जराग्रहणमयाघत । सोऽ भाषत--जरया नरोऽसमर्थो भवति विषयानुपभोक्तुमतो नाह जरामि च्छामी'ति । ययाविरुवाच-'यस्मात्त्व मम वचन न करोपि तस्मान्त तष कोऽपि काम सम्पत्स्यत' इति । ततोऽपर पुत्रम् अनुमुवाप-मम जरा गृहाणे'ति । अनुरुवाच-'वृद्धो नरो वालवद् वर्तते । तस्मान्न रोचते मे जरेति । ययातिरुवाच-'अतस्तव पुत्रा यौवन प्राप्य विनाश गमिष्यन्तीति। (ख) 'अहो ! निवर्तध्व यूयम् । अहमेवास्य शत्रुपक्षपातिनो दुरा स्मन स्वय निग्रह कृत्वा यमसदन प्रेषयामि ।' इत्यभिधाय तस्योपरि समारुह्य, लघुमि चन्चुप्रहारैरत प्रहत्य,समानीतरुधिरेण प्लावयित्वा तदुपदिष्टमृध्यमूकपर्वत सपरिवारो गत । सूक्ष्मरीति से देखने पर मालूम होता है कि सब मापायों की माता निःसन्देश यह सस्कृतमाषा ही है । मूलस्थान भारतवर्ष से उसका प्रचार पैसे कैसे दूर देशों में होता गया वैसे वैसे उसका अपभ्रश होकर दूसरी मापाए धनती गई । पत्रादिलेखनप्रकार: (१) पित्रे पत्रपणप्रकार । श्रीमासु पूज्य पितृघरोघु मादर प्रणय सन्तुतगम् । अत्राह एशली, आशासे श्रीमन्तोऽपि सर्वे कुशलिनो भविष्यति । भषदनुमत्याऽहमन्नत्ये 'सेंजासकालेजा' भिघे महाविद्यालये प्रविष्टोऽ अर्गत्पुरत । २८९ । -- सस्कतरचनाऽनुवादशिक्षकः। १२१ स्मि । परमत्रान्यत्रापेक्षया व्ययाधिक्य वर्तते । प्रवेशशुल्क पाठनशुल्क- चापि अन गृह्यते। भोजनव्ययोऽपि साधारणतः प्रतिमासस्याष्टी रूप्यकाः । अतो भवद्भिर्यद्धन पूर्व प्रहिवमासीत् तत्सर्व समाप्तिम- गच्छत् । सम्प्रति कृपया चत्वारिंशद्रूप्यकाणि धनादेश ( मनी. आर्डर )-द्वारेण शीघ्र प्रेषणीयानि । येनाह सकीय सर्व कार्य निर्वोढ प्रभवामि । अस्तु, मदीय पठनकार्यमपि साधु भवति । न । कापि चिन्ता श्रीमद्धि करणोया। अत्र सर्वासु परीक्षासु प्रथमश्रेण्यां समुत्तीर्णो भवामि । अतो नूनमऽपि तथैव स्यादीशकपातो मे परि- णामः। माने सप्रश्रय मदीय प्रणामो वाच्यः। तत्रत्यवृत्तान्तपूर्ण शीघ्रमेव देय पत्रम् । अन्यत्म भव्यम् । म पुत्रो- नवानचन्द्र। (२) गुरवे पत्रम् । वृदावनत । श्रीमत्सु गुरुचरणपङ्कजेपु अनेकशो नतयः समुल्लसन्तुतमाम् । भगवन् ! मासचतुष्टयतोऽद्यापधिभवद्भिन किमपि पत्र प्रेपित सेव- कसनिधावतोऽतीवोत्कण्ठितोऽस्मि श्रीमता श्रेयो ज्ञातुम् । अधुना झटि- त्येव पत्र प्रेषयिष्यन्ति तत्रभवन्तो गुरव । विशेषत आन्तव्योऽस्मि किमन्यत् । गुरुचरणाश्रित मुकुन्दशर्मा। (३) अनुज प्रति पत्रम्। चिरञ्जीव ! सस्नेह शुभाशीर्वादा विलसन्तु मे त्वयि । स्वत्कोमलकराङ्किता प्रहितपत्रिका यथाकाल मे करगताऽभूत् । ताम्बाधीत्य महानानन्दो जात' साम्प्रत त्वया मासचतुष्टय यावत्तत्रै- वाध्युष्य पठनीयम् । शीघ्रमेव त्वदर्थ किश्चिद्धनं प्रेषयिष्यामि । भ्राता अस्माक कुशल जानीहि । स्वकुशल च सर्वदा प्रदेयमेव । इदानीमहं जन्मभूमि द्रष्टुमनाः स्वगृह यामि। तत आगत्य तत्रत्योदन्तेन सूचयि- तव शुभेच्छु सतीशचन्द्र। - ज्यामि त्वाम् । - १२२ सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षका। (४) प्रधानाध्यापकायावकाशविषयकपत्रम् । श्रीपूज्यप्रधानाध्यापकेषु सतत नतिततयः सन्तुतराम् । पूज्या गुरव ! सादर सानुनय विनिवेदनमिदं मामकीन या गेहे कनिष्ठभ्रातु सच्चिदानन्दस्यास्मिन्नेव मासे चतुर्विशतितम्यादि विवाहो भविता, वरयाना च श्रीनगरं यास्यति । वत्र च मदुपस्थिति वरामावश्यकी। अतश्चतुणां दिवसानामवकाशप्रदानतोऽनुप्राहोऽति भाशासे च मद्विनम्रनिवेदन स्वीकृत भविष्यति। मवत सेवक- पुष्पानन्द व्याकरणमभ्यमाप्रथमखण्डर (५) अन्यविषयकावकाशपत्रम् । श्रीमता पाठशालाप्रधानाध्यापकमहाभागानामप्रेऽभ्यर्थनेयम् । प्रभो अस्ति सविनय निवेदनमेतत्-यदह गतार्धरात्रितो ज्वरम शिरोवेदनया व पीडितोऽस्मि, अतोऽद्य पाठशालामागन्तु तत्र स्य वासमर्थोऽस्मि । कृपयायवनस्य दिषसस्यावकाश स्वीकर्तुमई श्रीमन्तः। भयता घशरदः- सुमित्रानन दशमगोरु (६) भारते भातु भारती। सुरमारतीकार्याल्पत । अयि श्रीमन्तो माननीयाः। सहर्षमिदमावेद्यते यदय 'सुरभारती'नामफपत्रमिदं श्रीमत्सेवाया दर्शरूपेण सादर सम्प्रेष्यते । एतस्य त्रिंशत्तमे पत्रे सुरमारतीसन्देश प्रकाशितोऽस्ति, स च भवद्धि कृपया सावधान पठ्यताम् । अतथा स्पते-सुरभारतीपत्रस्यास्य सरक्षणार्थ माहयत्समम्योररीकृत्य मामर हेकभाजन नयेयुस्तन्न भवन्तो लेखादिप्रेषणमाहाय्यत फाले कुर्युरिति ।

परिशिष्टम् शब्दार्थकोपः- पाठ १ (अ) पुरजन (पु०)-एक मनुष्य का नाम । आ+ लप ( १ गण, पर०) - वात अस्थाने (अ०) - अकारण । चीत करना। विपरण (वि०)-उदास । सम् + तुप् (४ गणा, पर०)- आयुष्मत् (वि.)-चिरजीवी । सन्तुष्ट होना, प्रसन्न होना। अलम् (अ०)-निषेधार्थफ । मुच् ( ६ गणा, पर०)-छोड़ना। दौमनस्य (न०) खिनता, सारस्वतोत्सव. (पु०) (सार- उदासीनता। स्वत - सरस्वतीसम्बधी उरसव) निर्वन्ध (०) आप्रह, हठ । सरस्वती का उत्सव। व्यामोह (पु०)-मोह। (य) एकवार=एकदा, कदाचित् । सलाह करके सम्मन्य। चुपचाप-तूष्णीम् , मौनम् । आगे से - अतः परम्, इत. परम् । हाल-देशा। भविष्यति । गरमागरम-अत्युष्णम् । जल गया - दग्धमभवत् ( दह, भूलमें हो भ्रान्ताः ( यूयम् )। १ गण., वर०, जलना।) हर एक प्रत्येकम् । हिस्सा-माग., अश । झगड़ा होना-विग्रह । पाठ.२ (थ) अधुना (अ०)-अब । यथावृत्तम् ( क्रि० वि० ) - जैसा प्रथमवरम् (१०-बहुत पहले। प्रतिक्रिया (स्त्री०)-दूर फरने दिव्य (वि०)-मलौकिक । का इलाम, उपाय । शठमति (वि०) दुर्बुदि। . हुआ हो।

१२४ सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । (ब) चैरी-शत्रु , मरिः। मेरे हाथों से - मम हताम्यान, चलते समय-प्रस्थानकाले, प्रस्थाना मत्सफायात् , मत्त । ऽवसरे। मिठाई-मिष्टान्नम्। चारों ओर-सर्वत समन्तात् । चहचहाना = कूज् ( १ गम, हवा चलना-वा (२ गण, पर०, कूजति)। वाति)। देखते देखते-पश्यन् , ईक्षमाग । पाठः३ (१०) आक्षिप्य (40) रोककर | भावेदयतु बनामो। (आ + क्षिप् १ गणा, पर० रोकना)। आगम (पु.)-प्राप्ति । परिचय (पु०)शान । समामादन (न०) (सम्+आ+ उपित (न० =(वस्+क,भूत- सद् + णिच् +त) प्राप्त करना। फालिक कृदन्त) रहेना । सबहुमानम् (कि० वि०)- आदर जन्तु (पु०)प्राणी। पूर्वक (बहुमान = मादर, सह- विद्ध (वि०)-(व्यच् + क्त, भूत साथ) कृ.) वेघा गया। प्राप्तकाल (वि०) - (प्रातः कागे येन पातिन् (नि०) - विनाशी। स ) जिसका समय आ गया है । यशाकाय (वि०) यशरूपी अपातयत् अविनाशी। शरीरवाला (मृत)। (य) दो वात के लिए-गुणदयेन, द्वाम्या' फैल गये प्रसिदान गुणाभ्याम् । विश्रुता । इतना-एतावत् सुरीला- मधुर (वि." बचपन - पास्य (न.)। लालसा - तृष्णा। पाठ.४ (अ) मृदु (वि०) - सरल, मुगयम, पाप (वि०) - पापी। पिसका प्रभाव न हो। अधि+क्षिप-निन्दा फरना (311 फरतलगत (वि०) हाय में माया पर०)। हुमा। एकान्तवा (प्र०) =विजाल सपा। म ख्याति गता, १२५ स्निह्यति)। सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः । कूपमण्डूक (पु०)-कुए का मेंटक, अर्थ ( पु० ) वस्तु । मूर्म। उप + क्षिप-छेहना (उपस्थित करना)। (व) जीत सकना-जेतु एक ( ५ गण , भाशा फरते हो आशास्से (आ+ पर०)। शास् २ गणा, आ०)। आजतकम्अध यावत् । तरफ-पक्ष (पु.)। सब तरह - सर्वया, सर्वप्रकारेण, हो सकता है-सम्भाति । सर्वात्मना। चाहना=स्लिह ( ४ गण , पर०, इक=अधिकार (पु०)। पाठ:५ (अ) शरीरस्थिति (खी.)-(शरीर की जन् ( णिच् )-उत्पन्न करना। स्थिति-निर्माह) जीवित रहना। श्रान्ति (स्त्री० )-यकावट । अपहन्ति = ( अप + हन् ) मिटाता अप + नी-दूर करना । है, दूर करता है। साभ्य (न.)-समता। शरीरावसाद (पु०)- ( शरीर + वन्-(६ गण , उ० ५०-तनोति, अवसाद थकावट ) शरीर की तनुते ) करना। थकावट या कमचोरी। प्रसाद (पु.)-प्रसन्नता । भोज (10)-बल, तेज । स्वायमान (न०)-(स्व-अपना, निद्रानिष्ठ (व०)=निद्रा में अपसान-समाति) अपना अन्त । स्थित, सोया हुआ। (घ) ज्योतिर्विद्या ज्योति शास्त्रम् , इतनी-एतावती, इयती। प्यौतिषम् । व्यतीत करना - वि+ अति + इण वास्तव में वातुन । (२ गण, पर०)। छोटा कनीयस् । बहुत-भूयस् ( अ०)। (अ) उत्तरापथ (पु०)-उत्तरी ब्रह्मपरायण (वि.) ब्रह्मा में लगा हिंदुस्तान । हुआ, ब्रह्मासक्त। १० स०र० पाठ.६ -- १२६ सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। नियन्तृ(पु०) नियम में रखने वाला। हैम (वि०) सोने का बना हुआ । महिमा (महिमन पं०) गौरव । है [१ गगः, पर०) चुराना। अनु + इण-पीछे पोछे घूमना । भवितव्यवा-होनहार, भाग्य । सस्य (न०)-मित्रता। (ब) चार बज चुके हैं - चतुर्वादन आवश्यक-नैरियफ (वि.)। अक्षातम् । लगभग-प्राय , प्रायेण, प्रायशा (५०) विस्तर - शय्या, आस्तरण (न०)। अगोछा-उपवस्त्रम् । योग्यतानुसार- योग्यतानुकुलम् । पाठ ७ (अ) यथाकर्म(नि०वि०)-कर्म के अनुसार । सुकृत ( न० }-पुण्य, उत्तम कर्म । वि-त-देना। असुकृत (न०) = पाप, दुष्कर्म । कारागार (पु.) पैदखाना । अमाव (पु.)- न होना, न रहना। दारा (पु०)-(नित्य बहुवचनान्त) स्त्री० । हित्वा छोड़कर (हि- काया) (ब) छिपाना- गोपनम् । छिपना तिरस् + धा, तिरोधा, खासी-फामा (३ गण., उभयपदी)। बिजली विद्युत् (सी०)। होस्टल मेज-लेम्वनाधार । जगमगाना-दीप , (४ गग , का) पलङ्ग-पर्य। कुर्मी - पीठफ (न०), आनन्दी वडा-विपुल (वि.)। (स्त्री.)। -छात्रावास । पाठ. कुख्य (न०)-दीवार । पन्ध-(६ गण १०) पांधना। श्रेष्ठिन् (पु.) सेठ । दण्डाघात (पु.)-दण्ड+आपात) सण्डे की चोट कीलक (न)-पील। परि + भ्राम् घुमाना। इतरा-दूसरी। विशरास्ता-पेसना, पेटार, विखरना।

सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। १२७ (व) अचानक अकस्मात् । उचाना-रक्षणम् । चान अभ्यासः॥ धोखा खाना-पञ्च् , प्र+त । पाठ.९ (अ) कान्दविक (पु०) हेलगाई। पोलिका ( बी० )-गेहूँ के आटे की मुक्कामोदक (पुं०)-मोतीचूर के लड्डू। पूरी। (व) शिकायत करना आ + क्षिप् , पढौसमे रहनेवाली प्रतिवेशिनी । (६ गणा, पर०)। कसर-पत्कण (पु०)चूर्णखण्ड(पु.)। पाठ १० (व) साहूकार श्रेष्ठी। समय पाकर कालेन, समय प्राप्य । डयोढ़ी-देहली दारपिण्डी (स्त्री०)। यूकना=टिव् ( ४ गण , पर०) । चोवारा अट्ट ( पु० न०)। घण्टी-घण्टिका। पाठ. ११ (अ) पान्ध (पु०) रास्तागीर । लव्धसज्ञ. ( लब्धा सश येन स.) : 'धर्मात = (धर्म + आत) धूप होश में आया हुआ। व्याकुल। विपणि. (स्त्री० )-दूकान। तदवस्थम् ( मा अस्थायस्य स उद्धृत्य (१०) निकाल कर । तदवस्थ तम् ) उस दशा में विन्दुश. ( अ )-बूंद बूंद । पड़े हुए (को)। प्रतियन्ध (पु०) रुकावट । चर्मकार, चमार । (ब) पोता-पौत्र बाबा-पितामह मवाना-पीड् (१० गण , पर०)- इधर उधर-इतस्ततः । पीडयति । तलाश करना-अनु + इष् (४ गण , 'चिल्लाना कन्द ( १ गण पर०)। प.), मार्ग (१० गण, प.) सदा के लिये सोना - मरणम्, (अन्विष्यति, मार्गपति)। (म १ गण , आ०)। -- ।

१२८ सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। । पर.) पाठः१२ (अ) विगतनिद्रा (विगता निद्रा यस्य स) पास्तरासन्नम् ( भास्तर विभेना, जगा हुआ। आसन्न समीप विस्तरे के पास। उपवीत (न०)-यशोपवीत । वसति (स्रो०) निवासस्थान । वहुश (अ.)-अनेकवार । पितृकार-पिता के तुल्य । (य) घालू का पुल-मालकासेतु (पु.)। बहना-प्र+वह ( १ गण , फेंकना-क्षिप् (६ गण , १०), बारबार - पुन पुनः, भूयो भूय । अस् ( ४ गण , व०)। अनायास ही अनायासमेव, सारल्येनैव, लीलयैव । पाठ. १३ (श्र) द्रविण (न०) धनम् । वचोभगि. (स्त्री०) कहने का दग। अवतार्य (अ.)-उतारकर (अव-त सीद् - ( १ गणः, पर०) पोरिस णिच् , उतारना)। होना। पाठ १४ (अ) निरहुशः स्वाधीन, पत्र, विना वि + मृश् ( ६ गण , पर० ) रोक रोक का। विचारना। ईश्वर समर्थ, सम्पर। सम+ विद् + णिच-समझना । व्यसनमहागत -( व्यसाम् एव नपणम् (न०)-विनाश। महागत तत्र) कटरूपी बड़े गड्ढे में। यापयितव्या-बिताना चाहिए, गाङ्गय (पु.)-भीष्म । (या + णिच् + त य.)। नीये अपस्तात्, अध (अ.)। तन-गचित (यि०)। फिनार-फिनारे-तटेन, तीरेण । सयोगवश सयोगाय, वयोगान एफ दूसरे के सामने अन्यो यत्य मुड फर परिभूत्य (परि + + स्य। पुरत ।

दूसरी ओर सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। १२९ एक ओर एकत (म.)। - अपरतः (०)। फिसलना = स्खलनम् । धीरे धीरे - शनै शनै (०)। पाठ १५ (अ) आसमुद्रम् - समुद्रपर्यन्त । प्रशासति - शासन करते हुए (Br तदुत्कर्षासहिष्णु - (तत् + उत्क शास+तृ, सप्तमी वि०)। पं+मसहिष्णु ) उसकी बुद्धि विपाद (पु.)- दुख । को न सहने वाला। हस्तलाघवम् = हाथ की सफाई, प्रस्तुत ( वि०) तयार। कौशल | (घ) महिमा (महिमन ) (पु०)-गौरवम् । गाई गई है-यनिता, गीता । चर्चा - प्रसङ्ग (पु.)। होनेवाला जायमान,उत्पद्यमान(वि०)। पाठ १६ (अ) कौतुकम् =आश्चर्यजनक गत । अपेयात् -पृथक् हो जावे ( अप + जीवितशल्यम्-नीवन का काँटा, इण+लिह। दु सदायिनी। पटहो दापित =घोषणा कराई। नयनत्रिफला - अन्धी। नीरुज - रोगरहित । पाठ:१७ (अ) प्रमत्त': (वि० पागल। वातग्रस्त (वि०) उमादी । असमम् ( क्रि० वि० )-अनुचित । निर्विएण. (वि०) = ऊब गया, सज्ज ( वि०) (निर+विद्+क्त)। कोपारुणितलोचन = ( कोप + चतुरङ्गसेना-हाथी, घोड़े, रय और अरुणित लोचन) गुस्से से लाल पैदल सिपाही वाली सेना। हैं नेत्र जिसके। (व) पिछले समय मे - पुरा । हर प्रकार की - सर्वविधा (वि.)। खुदम् स्वयम् । एफ वन से दूर वन मेनादनम् । चलते चलते-कमेण गन्छन् । काटकर-कर्तित्वा। - तयार।

सस्कृवरपनाऽनुवादशिक्षकः। सद वृत्तम् - वह हो गया। अपाय ( पु०) - विनाश । विराव (पु०)- शन्द । यत्न करना - यत् (१ गण ,आ०) पापडी-वापी। तालाय - तडाग (पु.)। खुदवाना - खनु+गिच , पास - समीपम् , सविधम् । ( खानयति)। पाठ २५ क्रोड (पु०) - शाषक ( पु०)- बच्चा । नीवार (पु.)- एक प्रकार का चावर गोद। का अनान ( मुनियों का मन)। स्थातव्यम् - जिन्दा रहेगा। अपफीति (बी०)- अपयश, नि। (ब) खिलना = वि + स् (१ गणः, ५०)। मछली - मत्स्य, मीन (५० ।। खेलना-वि+ ह (१ गणः, पर० ) ऐसा लगा तथाऽमात् । विहरति । मत छोड़ - मा मुश्च । तरफस- इषुषि (१०)। पाठ २१ (8) चटकदम्पती - चिड़ियों का जोड़ा। निलय (१०) = घर, घोसला । धर्मात =घाम-धूप से पीड़ित । पुष्कर (न०) रह। विशीर्ण (वि०) (वि++क्त), अभ्येत्य ( अमि + इ + स्य विग्रर गया। पास जाकर। सत्य (वि०) -सन्चा गजापसद - नीच दुष्ट पायी। (घ) घूमते घूमते . परिनमन् । पिपासा, तृषा। अन्धा - अन्य , नेत्रहीन । दूर हो जा = असर (प+ थोड़ा- अल्पम् , किञ्चित् । १ गग ,पर०)। अभी सत्वरम्, इदानीमेव, अधुनै । घाणी से - वचनादेव । पाठा २६ (अ) पावर, जाकर इटा प्रिया। भेक (०) - मेंढक। पियन्मान । प्यास- , t आसाद्य 2 फितना, या हरी सरकवरपनाऽनुषादशिक्षफः । १३३ बराक (वि०) = बेचारा। मन्त्र (पु०) सलाह । (घ) पासानी से अनापाठेन । कुछ कुछ यत्किमपि, परिकञ्चित् । निरादर करने से तिरस्कारेण । पाठ २७ (ब) वीर्यातिरेक (पु०)=(वीर्य+ समयधर्म = ठहराव, समझौता । अतिरेक) पराक्रम की अधिकता। प्राणयात्रा जीवननिर्वाह, भोजन । उच्छेदन (२०)- विनाश । श्वापद ( पु०)-व्याघ्र आदि जानवर । ।) च्याकुल होकर-व्याकुलीभूय, वातचीत करना = आ+लप , सन्तध्या (१ गण , पर०)। व्यर्थ ही = व्यर्थमेव, पृथय । प्रतिज्ञा करना-प्रति + ज्ञा (जा), ऊपर से उपरिटात् (अ.)। (६गण पर)। - चोंच = चञ्चु (स्त्री.)। टुकडा -सण्ट (पु.)। पकडकर आदाय, गृहीत्वा । उड़ना उद्+डी, (४ गण , आ० )। पाठ..८ शराव (पु०) कुल्हड़ । फराल (वि०) नीच, मयहर शक्तुशरावम्-शराव भर सत्त् । परिवारसहारसम्भवस्य परिवार प्रत्युद्धार (पु.) बदला लेना। के नाश उत्पन्न। पाठ २६ दायाद (पु०)-हिस्सेदार, कुटुम्बी । उद्वेजित (उद् + विज् + णिच्+क्त) अरघट्टघटी =-अरहट । सताया हुआ। अश्रद्धेय (वि०) विश्वास के विभा य-(वि + भू+णिच + ल्यप् ) अयोग्य । सोचकर। परिमव (पु०) - तिरस्कार । सगम (पु) - मेल । (घ) दर्पण-दर्पण, मार्श (पु)। किस प्रकारकथम् । पाठ ३० आश्रम (पुं०) स्थान । हद (पु०)-गद्दा, कुण्ड,गहरा तालाब ।

१३६ सस्कतरचनाऽनुवादशिक्षकः। फाले। विद् = होना ( ४ गण , आ०)। योजन (न.)- ४ कोस, ८ मील । प्रतीत (वि०)-विख्यात (प्रति + स- उत्पन्न करना (२ गग आ०) इण+क)। मारवसा (स्त्री०)-मौसी । (घ) यहुत दिन हुए - भतीते बहुतिये द्वारपाल-द्वारपाल, नास्थ (पु.) यदि आक्षा हो तो - आजपर्या नौकरी सेवा वृत्ति। चेत् मादेशश्चेद् भवताम् । महीना लेना-वर्तन (न०), मासिक मुंह फेर फर - मुख परावर्त्य । (वि०)। पाठ ३६ दृक्पथ (पु०) दृष्टि के सामने । दृश्य (न०)- देखने योग्य यम: यष्टि (स्त्री०)-छड़ी, आयको लकड़ी। नखारा। प्रमुख (वि०)- मुरय, पिलाससदन (न०)-विरासरह । वासस् (न०)- वस्त्र । (ब) भेद - रहस्य (न)। वॉटना वि+मज, (१ गग, भण्डारी फोपाध्यक्ष,कोषपाल (पु.)। रिमति)। चौथाई-अर्धा (न०), चतुर्थीश ढाल = चर्मफलकम् । (पु.), दर्यभाग (पु.)। पहरा देना-उप + स्या,(गण पर०) किसी न किसी दिन - कदाचित् । लूला- ग्वा (वि.) पाठ ३७ . आदि। प (अ) चारण ( पु०)- भार। विपश्चित पु०- विदा। उदीय - कहकर । निरूप्य = टेलर। जिगमिपु (वि० )= जाने की सम्भूय - मिरकर, इकट्ठे होकर । इच्छा वाला स्पृहा-इन्। (घ) बादशाह -नृप अधिपति । योलीबागी, बार (स्त्री)। छोटी अवस्यावाल्या, याल्या पढ़ी लिखी यिदुषी (स्त्री.)। यस्या, रोपवायाया। यथा-शिशु संरकतरपनाऽनुयादशिक्षकः। १३७ । पाठ:३० मर्म रहस्य (न०) शौर्योपार्जित पहुवित्त'पराक्रम नीविनेत्र नीति ई ने बिसके, से कमाया है बहुत धन जिसने । नीतिश। चलप्रकृतिः चञ्चल स्वभार की। फ्रन्दन (न०)रोना। (च) रचना-वि+ रच। भाग लेना-सहयोगदान (दा, ३ गण , बनाकर-निर्माय, विरचय्य । उ०प०)। पाठ ३९ सूक्ष्म-श (क)(वि०)% विचारशील, स्थूलदृश (क) (वि०) %3D साधारण बुद्धिमान । बुद्धि वाला। दोपगन्ध (पु०) = थोड़ा भी दोष । परुप (वि०)- कठोर । उहाह (पु.) = कल्पना, तर्क तर्कशास्त्र (न०)न्यायशास्त्र । रितर्फ। पाणिनीय (न०) पाणिनि मुनि काणाद ( वि०)= कणादमुनि विर विरचित व्याकरणशास्त्र। चित तर्कशास्त्र। (घ) जितनी बार= यावत्कृत्व (अ.)। उतनी बार तावत्कृत्व (अ०)। भाई-हितम् (न)। मीठा-मधुर (वि.)। पाठ ४० (अ) पगु (वि)=लाहा। मूक (वि)-गूंगा। धातितमः -प्रकट किया। भ्रातुप्पुत्र (पु०) = भतीजा। (व) पडताना करना- पश्चात्ताप, बर्ताव करना-त् (१ गणः,पर०) । ( ४ गण , आ०): लडाई झगडा-फल्ह (१०), जहा कहीं = यर कनापि। कलि (पु.)। भार उठाने वाला भारोदाही (वि०)। पाठ ४१ गोडविषय ( पु०)-गौड़ देश, कर्ण मेव नार्पयसि-सुनते ही नहीं हो। (यह देश बङ्गाल में है )। सदस् ( न०)-समा।

। . -- सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक। (घ) एक जगह-एकस्थले। उपजाना-उत्+पद् ( गिअन्त)। हवा चलना प्रवातोऽभवत् । निकलना - सिघ , (४ गण, पर० सिध्यति)। पाठ.४२ (प्र) प्रत्येषि विश्वास करते हो। समाधाय समाधान करने । (ब) पूरा किया - पूरयामास, अपूरयत् । इक्ट्ठा करना सहमह । ( सम् + फ्सन्त कृषिफलम् । ग्रह, ९ गग, उ.प.)। अधूरा- असम्पूर्ण, असमाप्त (वि०)। पाठ.४३ (अ) दिवगत (वि०)मृत । मिप (न०)बहाना। मुद् ( स्वी०) प्रसन्नता । (ब) भूलना= वि + स्मृ, (गण, पर०)। हराकर-पराधिस्य । इतने मे-तदेव । सामने = पुरत',अमे, मामुपम् (प्र०)। भाक्रमण करना=मा+कम् । मामना करना-प्रति + युष , घमासान-तुमुल (वि.)। (४ गण , मा०) पाठ ४४ . फाम (पु)= अभियप, इच्छा ! निग्रहं (पु)दण्ड । यमसदन (न०)- (यम मृत्यु, लघु (पि०)- हरका। मदनगृह) मृत्युक। प्लावयित्या भिगोकर। सूक्ष्म रीति से सूक्ष्मया दृष्टया । मालूम होता हे प्रतीयते । जैसे जैसे-या यया। भीख मांगना-मिभाति (सी.)। जहाकविक्रेता, शामगिक ।

-- परिशिष्टम् अक्षरमाला ( वणमाला) ह उ - आ ऊ ३ क ग च ज ५ to ड द 23 त थ द ध ७ प घ म य र व स इ ना हस्व स्वर। २ म-ए ऐ ओ औ - दीर्घ स्वर । घ वर्ग (कु) चवर्ग (चु) ण - टवर्ग (?) न - तवर्ग ( तु) म पवर्ग (पु) ८ ० अन्तस्थ ६ -ऊष्म साकृत तथा हिदीभापा को यह अक्षरमाला लौकिकी है ! सस्कृत भाषा के समस्त पद अक्षरों से निर्मित है। प्रत्येक भाषा वाक्य रूप होती है । वाक्य पदों से, पद अक्षरों से और अक्षर वा से कल्पित है। इस प्रकार भाषा के उपादान कारण वर्ण ही ठहरते हैं। असण्ड एफरव व्यवहार के योग्य स्पष्टध्वनि को 'पर्ण फहते हैं। जिस वर्ण का बिना किसी की सहायता के उच्चारण किया जा सके, उसे 'स्वर' कहते हैं। तथा जिसका उच्चारण ( १) स्वर की सहायता के बिना न किया जा सके उसे २) यक्षन' कहते हैं । ऊपर प्रदर्शित अक्षर माला में प्रथम तथा द्वितीय पक्ति में स्वर लिसे गये हैं। शेष व्यञ्जन है। केवल व्यजनों का उच्चारण न किया जा सक्ने के कारण उनमें प्रथम स्वर 'अकार' जोड़ा गया है । इस प्रकार यह स्पष्ट है कि हम अक्षर ही लिसते है न कि वर्ण और इसीलिये हमने 'अक्षरमाल' शब्द का व्यवहार किया है । यद्यपि अक्षरों का निर्माण वर्गों से शेने के कारण वर्गों को ही लिपि (घनिरूप अक्षरों का स्मरण कराने वाले रेखारूप चित) होनी चाहिये । तथापि स्वर-परतत्र व्यजनों का (१) स्वय रामत इति स्वरा । (२) अन्वग भवति व्यञ्जनम् ।

१४० संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। उच्चारग स्वत. नहीं किया जा सकता अतः अक्षरों के ही चिह्न लिपि' नाम से कल्पित किये गये हैं । इगलिश भाषा में वर्गों का ही प्रयोग किया जाता अक्षरों का नहीं । यदि श्री लिखना होगा तो Sri ये तीन वर्ण टिरो मायगे। जिसका विभाग न हो सके ऐसे एक नाद (पनि ) को 'वर्ण' कहते हैं। केवर अथवा व्यसन मिश्रित स्वर को 'अक्षर' कहते हैं। यह वर्ण और महार में परस्पर भेद है । इस प्रकार यह स्पष्ट है कि केवल स्वर के कर्ण या अक्षर दोनों नाम हो सकते हैं । केवट व्यञ्जन वर्ण ही होता है । लिपि में अपने अपने चिों से फेवर घरों का निर्देश किया जाता है, न्यशन मिश्रित स्वरों का निर्देश करने के लिये भय चिह कल्पित किये गये हैं। यया क + अ = क क् +भा - का क +5- क् + - क् +ए-2 क् +ऐसे फ +ओको क् + औ-को क् +-फि क् +ई की क् + - इत्यादि । 'क' इसके समान व्यसनों के नीचे तिरछी रेखा, उनसे स्वराय की पृथक्ता को पूचित करती है । यद्यपि लोक में अक्षरों का व्यवहार होता है तथापि वैयाकरण वर्गों का ही व्यवहार करते हैं । इसलिये 'क' कि 'कु' इत्यादि लिपिया एक अक्षर का शोघ फराने पर मी दो वर्षों से निर्मित मानी जाती है। एक हाको गाकरण में दो वर्ण माना जाता है। अक्षर-विभाग (स्सर-विभाग) वों के स्वर तपा ध्यान में दो महाविभाग प्रथम या युके हैं। टान मल की मात्रा के अनुसार स्वर तीन प्रकार के हैं- २-एक माला से म,, उ इत्यादि के समान वितका उभारा विष काय पे इस स्वर कहाते हैं। २-आ, इ, ऊइत्यादि के समान मात्राओं से उमार्यमार र दीय स्वर पहाते है। ३-२, १३, उ ३ इत्यादि के समान तीन मानाओं से उधामग का स्वर को पाते है। इन वर्गों में इस तया दीर्प यता से ही पद बनाये आते हैं। इन स्वरों में . सस्कृवरचनाऽनुवादशिक्षकः। १४१ ' वर्ण का प्रयोग बहुत कम होता है। दीर्घ तो कहीं भी प्रयुक्त नहीं होता है। ए, ऐ, ओ, औ इन चार वर्णों के हस्य हिदीभाषा में प्रयुक्त होने पर भी स्कृत में उपयुक्त नहीं है । शेष अ, इ, उ, ऋ ये चार ही तीनों प्रकारके काम में लाये जाते हैं। व्यजन-विमाग स्वरों के समान न्यानों में जाति भेद नही है। उनका विमाग उनको समु दाय से पृथक् करके पृथक् पृथा नाम रसना ही है । उनमें से क से म पर्यत २५ वर्ण 'म्पर्श' अथवा 'वयं' कहे जाते हैं। य र ल व (४) 'मध्यम' अथवा 'अन्तस्थ और श ष स ह ये चार वर्ण 'ऊप्म' कहे जाते हैं। स्पर्श अक्षरों में पाँच वर्णों का एक २ वर्ग माना गया है । अत पाँच वर्ग होते हैं और वे कवर्ग, चवर्ग इत्यादि आदि वर्ण के नाम से पुकारे आते हैं। इन वर्गों के तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम, वर्ण तथा मध्यम वर्ण मृदु व्यसन कहाते है, शेष कठोर व्यञ्जन । व्याकरण शास्त्र में वर्गों के कुछ सांकेतिक नाम रखे गये हैं जिनको 'प्रत्या- हार' कहते हैं। उनमें से मुख्य २ अत्युपयोगी छ 'सांकेतिक' नीचे दिये -अल--समस्त वर्ण -अच--स्वर मात्रा ३--अक- अ इ उनल। -हल--सम्पूर्ण व्यञ्जन । ५-हश -मृदु व्यञ्जन। ६--अश-~सापूर्ण स्वर तथा मृदु व्यञ्जन । ७-यण --अतस्थ वर्ण ८-यर- कार के अतिरिक समस्त व्यञ्जन । -ऊष्माक्षरों के अतिरिक्त शेष व्यअन । -मल्-वर्गों के पश्चमाक्षर रहित व्यञ्चन । साकतिक नामों को स्कूल में छात्रों को भी ध्यान से यादर रेना उनको मधिनियम याद करने में सरलता होगी। जाते है २ १४२ संस्कृवरचनाऽनुवादशिक्षकः । ११-मय-अनुनासिक तथा ऊष्मापर रहित समस्त पञ्जन | १२-सर-वों के प्रथम द्वितीयाक्षर तथा श ष स | स्थान विचार अविसर्जनीयाना षष्ठ | चुयशाना ताछ । उपप्मानीयानामोहौ । रपाणां मूर्घा | लालसाना द ता । एदेतो कटनाष्ठ । ओदोतो कण्ठोधम् । वका रस्य तोष्ठम् | महणनाना नासिका व नासिकानुस्वारस्य । विसर्गसक विस जनीय, जिसका उच्चारण अर्धहकार के सहय क्यिा जाता है। पदमा उच्चारण भेद है। अर्घ मकार के सदृश ध्वनि विशेष अनुस्वार' पाया है। विसर्ग और मनुस्वार कोई स्वान्त्र वर्ण नहीं है क्योंकि इनसे किसी पद का निर्माग नहीं होता, पेवल स्वरों के अत में उनका प्रयोग होता है। अवएव इनका का मालामे पाठ नहीं है। वर्गों का स्थान विमाग निम्न चित्रद्वारा प्रदर्शित किया जाता है- कण्ठ | ताल | ओर मूषो दान का कण्ठवाल ए रे अ ६ उ ओ श्री खर क प ट अविसर फ 10 य ग ज ब पोप घ म द घ अनुनासिक म म न न मध्यम य र . to दा प्रयत्न पिचार सम्पूर्ण या मुलगा उन उन स्थानों में सास निकलने से उसमोर, मत वाट प्रक्षेपण के लिये किया हुमा प्रयायही 'प्रयल' चन्द मरा 1 सस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षकः । १४३ होता है। वह दो प्रकार का है-आभ्यन्तर और वाह्य । प्रथम भाभ्य तर प्रयत्नों का विचार किया जाता है-स्वरों के उच्चारण में शामवायु स्वच्छ दता से (बिना किसी रुकावट) के निकलना है अतः स्वरों का विवृत' प्रयत्न है। व्यसनों के उन्चारण में श्वास अदर नियन्त्रित हो जाता है और बाहर नहीं निकलना, इसी कारण व्यजनों का उच्चारण सत नहीं हो सकता (स्वर की सहायता बिना ) यह कहा गया है । ऊष्माक्षरों के उच्चाराम भी श्वास कुछ थोड़ा सा निकरता है, इसलिये उनका 'ईपयिवृत' प्रयत्न है । स्पर्शाशर (क से म पर्यत ) उन उन स्थानों में वायु के बल के साथ स्पर्श होने से उत्पन्न होते हैं, अन उनका स्पृष्ट प्रयत्न है । और इसी कारण उनकी 'स्पर्श' सशा है। अन्त स्थ वर्ग के उच्चारण में श्वास घायु का योदा ही स्पर्श होता है, अत उनका 'ईपतस्पृष्ट' प्रयत्न है । इस प्रकार 'विवृत' 'ईपविघृत' 'स्पृष्ट' और 'ईपत्- स्पृष्ट' ये चार आभ्यन्तर प्रयत्न हैं। स्वरों में हस्त अफार का सकृत प्रयत्न माना जाता है । बाघ प्रयत्न ११ प्रकार का होता है । उसी के आधार पर वर्गों- के 'खर' आदि भेद किये गये हैं। ये अत्यात उपयुक्त नहीं हैं, इनका यहाँ विस्तृत उल्लेख नहीं किया जाता है । उक्त स्थान और प्रयत्न जिन यों के परस्पर समान होते हैं वे 'सवर्ण' कहलाते हैं । स्थान और प्रयत्न की सहायता होने पर भी अच् और हल् (स्वर और व्यजन ) सवर्ण नहीं माने जाते। इसका साराश यह है-स्थान और प्रयत्न रूप उपाधि के द्वारा जिन वर्णों के अनेक भेद हो जाते हैं, उन वर्गों में वे सब भेद परस्पर सवर्ण माने जाते हैं। इस प्रकार के भेद स्वर और अत्तस्थ वर्गों के ही होते हैं। इसलिये एक ही स्वर के हस्व, दीर्घ आदि भेद सवर्ण होते हैं। इसी प्रकार अनुनासिक और अननासिक य, व, ल वर्ण परस्पर सवर्ण है। सवर्ण वर्गों में एक भेद को विधान किया हुआ कार्य, अन्य को भी करना चाहिये । जैसे-अफार को जो कार्य विधान किया जाय वह आकार को मी करना चाहिये । इकार को विधान किया हुआ कार्य ईकार को भी करना चाहिये, इत्यादि । जहाँ एक ही भेद को कार्य करना अभिप्रेत होता है वहाँ पाणिनि सरों म 'त्' वर्ण मोड़ देते हैं। जैसे -अत्, इत्, उत् इत्यादि । इस प्रकार असर्व प्रकार का अकार । अन् = ह.म अकार। इस प्रकार का कार। इत्-हस्स - इकार इत्यादि।

परिशिष्टम् २
सन्धिप्रकरण
'सध' शब्द का अर्थ मेल अथवा मिलना है, परन्तु यहाँ दो अरों
मिलाने वाले कार्य सधि शब्द से अभिप्रेत है। प्रकृति प्रत्यय अथवा दो पदों
परस्पर मिलाने में पूर्व शन्द के अत्य वर्ण, पर शब्द के आदि वर्ग अथमा दोन
(पूर्व पर वणों के स्थान में) के स्थान म बो विकार उत्पन होते हैं। ये सध
कार्य कहे पाते हैं। वह शिकार आदेश, भागम, द्वित्व और लोप इन में से का
एक होता है । सन्धि तीन प्रकार की सम्भव हो सकती है।
१ पद मध्य मात्र में होने वागे,
२ पदात में की जाने वाली,
३ पद मध्य तथा पदान्त दोनों स्थानों में की माने पारीधा
इनको हम क्रमश अन्नरसघि, बहिस्सधि और उमयसघि म ऐ पप
दिष्ट करेंगे। इन म से अताधि का विषय बहुत न्यून है । यहिस्सपि यो
उभयसधि का ही अधिकार प्रयोग होता है। इन दोनों सन्धियों को भी य
'मम के अनुसार 'स्वरसन्धि व्यसन सन्धि' और 'उभयसन्धि' नामक टी.
विभाग होते है।
स्वर-मन्धि
जी र स्वर मात्र में रिकार होता है, उसे 'स्वर सन्धि' परते हैं
स्यरसधि म उमयसधि ही अधिक व्ययरत होती है। यदिपिका
धम ।
उमर पर सन्धि को 'सवर्ण (समान )म्बरसन्धि' और 'ममा
(अयमान ) घरमधि' मागों में भिषा पास है।

१४१ है है। अत संस्कत्तरपनाऽनुवादशिक्षकः। सवर्ण ( समान ) स्वर-सन्धि अ इ १ मुर+रि - मुरारि । १ रनि+द्र-खीन्द्र । २ गुण + आन्य - गुणाव्य। २ अधि+ईशः अधीश । ३ महा + अर्णव महार्णव । ३ कुमारी+इति = कुमारीति । ४ रमा+ आलय करमाल्य । ४ नदी+ईश नदीश । म १ यदु+उदह - यदूदह । १ पातु + ऋषम - पातृपभ । २ वायु+ऊद यायूद । २ पितृ + ऋणम् =पितृणम् । ३ वधू+उदहा-वधूदइ । ३ होत + ऋकार = होतृकारः। ४ स्वभू+ऊन - भूना। ४ + अषि - नपि । उपरि लिखित शन्दों में हम देखते हैं कि जो अक्षर पूर्व है वरी और उन दोनों के स्थान पर उसी वर्ण का दीर्घ अक्षर प्रयुक्त हुआ नियमः- यदि अक् ( अ इ उ अटल ) वर्ण से आगे वही वर्ण हो जो प्रथम हो तो उन दोनों के स्थान पर उसी वर्ण का दीर्घ अक्षर हो जाता है । असमान स्वर-मन्धि (१) रमा+रमेशः । गगा + उदकम् + गगोदकम् । कुल + उचि तम कुलोचितम् । महा + ऋषि महर्षि । लुत + लकार - प्लतल्कारः। इद उदाहरणों में अवर्ण से आगे इ, उ, ऋ, ल. वर्ण है, और 'म' तया उसके परवर्ती '' आदि के स्थान में क्रमश ए, ओ, अर् , अल् परिवर्तन हुए हैं, अत नियम -यदि अवर्ण से आगे इ, उ, ऋ, ल, इन वर्गों में से कोई वर्ण हो तो पूर्व-पर वर्गों के स्थान में क्रमश ए, ओ, अर्, अल आदेश होते हैं । अर्थात् अ+-ए। अ+ उ = ओ । य+ 5 = अ । अ+ल - अल् । (२) तस्य + एव-तस्यैर । महा + ओज =महोन । नृप + ऐश्वर्यम् - रूपैश्वर्यम् । धन+औत्सुक्यम् = पनौत्सुक्यम् , इन उदाहरणों में हम देखते हैं कि अवर्ण से भागे ए, ओ, ऐ, औ वर्ण हैं और उनके स्थान पर क्रमशः ऐ, औ, ऐ, औ परिवर्तन हुए हैं । अत:- •मक सवर्ण दीर्घ । ६६६ . आद्गुण ६.१७ - - IA १४६ संस्कृतरचनाऽनुषादशिक्षकः। निगम-यदि मरण से आगे ए, ऐ और ओ, ओ हो वो पूर्व पर दोनो वर्णी के स्थान में मश' ऐ तथा यो आदेश होते हैं । अर्थात्-म+९, ऐऐ। अ+ओ, पीओ। (३) दघि+अर्थ मध्यर्थम् । सुधी + हित-सुभ्यदितम् । मधु+अर्थ मध्यर्थम् । वधू+आना-पाननम् । पितृ + अर्थ +पित्रयम् | आरन झापति । गम्ल + अर्थ = गम्यम् । ल+आपति-पति । प्रथम उदा हरण में दधि इन्द के अत में इकार है और उसमे परे 'महै। और प्रथम वर्गक स्थान में 'य' परिवर्तन देखा जाता है। इसी प्रकार अन्य उदारनी म उल पूर्ववर्ण है, तथा उनके स्थान में झमा , २, ल परिवर्तन से जाते हैं, इसरिये- नियम -यदि इफ वर्ण (इ, उ गाल) से आगे योइ असवर्ण स्वर हो तो प्रथम वर्ण 'इ' आदि ये स्याउ म मम य, व, र, ल आदेश होते हैं। यह प्या7 में रखना चाहियफ परवा के स्था में कोई परिवन नही होता, वह येवल निमित्त मात्र होता है। नोट :-उपर्युक्त अधियों में यह स्मरण रखना चाहिये कि म आदि कई हस्य तथा दीर्घ दोनों ही प्रकार के लिये पाते हैं, अत: ये साधियों इभ्य दार्थ वों में समान रूप से प्रवृत्त होती हैं। (४। हरे+ ए - हरये। गुरो-ए-गुरवे । * + A नायक । पो+ अक पायफ । उपरि लिखित उदाहरणों में देह बात कि प्रथम मरे अन्त में समश ए, ओ, ऐ तथा भी यर्ण हैं और उनके भागे कम ए, ए,., अ वर्ग है और शन्दा प यों के स्थान में मशः अय, अयू, आय, आव आदेश हुए है । इस प्रकार- नियम- यदि एच ( ए, ओ, ए, ओ) वर्ग स पर कोई भी हो तो 'ए' के स्थान , 'यय', 'यो' के स्थान में 'भव', 'ऐ' के स्थाा में भाव और'मी स्थान में 'आय' आदेश होता है। नोट :-उपरि लिखित समस्त सन्धियों पद-मध्य सपा के TE समान रूप से प्रत्त दोसी।मत ये 'उभयमन्धि' भागती हैं। (५) नियम का अपाद-हरे+Rara । णिो+यो गरिरेनि ६।१।८८ कोचि | पचोऽपवासाः . .

सस्कृवरपनाऽनुवादशिक्षकः। न उदारणों में पूर्व शन्द के अन्त में 'ए' तथा 'यो' वर्ण हैं और आगे 'अ' व है, अत नियम ४ के अनुसार ए तथा ओ के स्थान में क्रमश 'अ' तथा 'म' आदेश होना चाहिये था, परन्तु ऐसा नहीं हुआ, इसलिये~ नियम - यदि पद के अ त म माये हुए ए तथा ओ वर्ण से आगे हस्व 'अकार' पर हो तो हाय 'अफार' अपने से पूर्व वर्ण में मिल जाता है। भाष फल उसका पहिचान के लिये चिह्न लगाते हैं। पर तु यह केवल चिह मात्र है कोई षर्ण नहीं है। (६) अग्नी + अ - अग्नी अत्र । वायू+इति - वायू इति । गो+ अम् - गले अमू। इन उदाहरणों में शन्दात्य में ई, ऊ, तथा ए वर्ण हैं और उनसे आगे स्वर वर्ण अत क्रमश' नियम सरया ३ और ४ के अनुसार सधि होनी चाहिये, परन्तु होती नही। क्योंकि- नियम -यदि किसी शब्द का द्विवचना त रूप '' 'ऊ' अथवा 'र' में समाप्त होता हो तो ऐसे शब्द की सधि नहीं की जाती। यहाँ अग्नी, वायू और गले शब्द कमश अग्नि, वायु और गला शब्द के प्रथमा विभक्ति के द्विवचना त रूप है। हल् ( व्यञ्जन )-सन्धि टोमनी के परस्पर मिलने को व्यजन सघि अथवा 'हल मन्धि' कहते हैं। इस सधि के भी स्वर सन्धि के समान 'अतरसन्धि', 'बहिस्सन्धि' तथा 'उमयधि' नामक तीन भेद होते हैं। पहिस्सन्धि बन किसी पूर्व पद के मतिम वर्ण के स्थान में अयया पर पद के आदि वर्ण के स्थान में कोई विकार होता है, तब उसे 'बहिस्सधि कहते हैं। (१) वाक्+अन बागन गो धुघ् = गोधुन् । अच+अत अजता । मित्रध्रुद्+गच्छति-मिनध्रुड् गच्छति । ककुभ् +रम्या=ककुभम्या । दिप् + रायते - द्विड्रागते । दिश् + आदि दिगादि। ७ एडः पदान्तादप्ति ६११९०६ हिदूदेद् द्विवचन प्रगृह्यम् ||११, प्लुतप्रया अघि नित्यम् ६।१।१२५ .

- सरकतरपनाइनुवादशितकः । हम इन उदाहरणों में देखते हैं कि प्रथम पद 'या' आदि के अनम यजनों के स्थान में उसी वर्ग का तृतीय अवर 'ग' आदि र । तर पद का आदि वर्ण कोई स्यर अपश मृदुव्यम्न है । इसन्यि- नियम :-पदि किसी शब्द के अत में फोई शन् ( वर्गों के दिवीर, तृतीय तया चतुर्य अक्षर) यर्थ हो और उसके आगे कोई स्वर मया 1 व्यनन हो तो पूर्वपद के अतिम व्यजन के स्थान में उसी वर्ग का तृतीय भवर होता है। परतु यह ध्यान में सपना चाहिये कि यदि श यर्म के आगे फोर अक्षर न हो तो यह परियन विवस होता है। जैसे पाक्-। अच्न इत्यादि। (६) प्रत्यष्ट+मारमा - प्रत्याहारमा। मुगा +1 = मुगणोध । रिसन्+यास्ते - लिप्यन्नास्ते । उपरि लिखिर उदाहरणों में पूर्व पर मन में क्रमश '' '' '' वर्ण है। और उनके आगे 'आ' ' आदि सर वर्ग है, तथा सिरों में एक एक 'हु.' '''' अक्षर बढ़ गया है। अत - नियम -यदि किसी शन्द के अन्त में '' '' '' इनमें कोई धर्ण हो, और उसके आगे कोई स्वर हो तो प्रथम वर्ग 'कार' आदिको दित्व हो गता है। परन्तु यदि शम्दाय 'टकार' आदि पों के पूर्व मर हस्य धर्ण न हो तो यह परिवती नहीं होता । जैसे पाय + आ = प्रायसे। मवान्+आले - भवानास्ते । अर्थात् शिव किरे मानेवाले कार मादि या के पूर्व हर स्वर होना आवश्यक है। (३) पदान्ते-सम्पद्+कामा - हामः । विराष्ट्र + पुष विपद पुरए । उद् + चिन-नन्+चित्र=चित्रम् । तद्- टोका-टोका. तहीका । काभ+कोग = कार कोग । मि +8 जमा । अपदान्ते-भेद् + नु=भेत्तम् । एभ+स्परपरे । पचति पश्यति। इन उदाहरणों में हम देखते है, हम दो से अपने पार' आदि राय है और उनसे आगे 'क' आदि कोर ( यणे के अपम, .धोन्ते दारा मोहतारिनामम् ॥

. संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक। १४६ वर्ण तया ध प स ) वर्ण है, तथा 'द्' आदि वर्गों के स्थान म उसी वर्ग के प्रथ माक्षर '' आदि परिवर्तित हुए हैं। इसलिये- नियम.-'यदि झल वर्ण से आगे कोई कठोर वर्ण परे हो तो प्रथम झल चणं के स्थान में उसी वर्ग का प्रथमाक्षर होता है। यह सन्धि पद मध्य में तथा पदान में, दोनों स्थानों में समान रूप से प्रवृत्त होती है, अत यह उभयसाध के अतर्गत है। तथापि इसका प्रथम नियम के साथ विशेष सम्बध होने के कारण इसको यहाँ लिया गया है। यह प्रथम निपम का विपरीत नियम है। (४) वाग+माधुर्य ज्वाइमाधुर्य , वाग्मार्यम् । चित् + मय-चिन्मयम् । अप् + मय-अम्मयम् । उपरि लिसित शब्दों में पूर्व पद के अत में झल वर्गों में से कोई वर्ण तथा उसके आगे 'म्' आदि अनुनासिक ( वर्गों के पचम वर्ग) अक्षर तथा प्रथम झल वर्ण के स्थान में उसी वर्ग का पचमाक्षर देखा जाता है। नियम -२यदि प्रथम पद के अन्त में 'य' (हकार के अतिरिक्त समस्त व्यचन ) में से कोई वर्ण हो और उसके आगे किसी वर्ग का पचमाक्षर परे हो तो उस 'य' वर्ग के स्थान में उसी वर्ग का पञ्चमाक्षर होता है। पर तु यह नियम विकल्प से प्रवृत्त होता है, अर्थात् उपर्युक्त परिवर्चन किया जाय अथवा न किया जाय, दोनों ही टीक हैं। (५) इदम् + वनम् - इदवनम् । सायम् + सध्या-सायसध्या । किम् + इसति - हिसति । सम् + रक्तम्-सरतम् । उपर्युक्त उदाहरणों में 'इदम्' आदि मफारान्त पद है, और उस मकार से परे ध्यान वर्ण हैं। उस मकार के स्थान में अनुस्वार देखा जाता है, अन नियम -यदि पदात मकार से पर कोई हल वर्ण हो तो मकार के स्थान में अनुस्वार हो जाता है। यदि पदान्त मकार से आगे कोई स्वर वर्ण हो तो उस मकार को परवी अच् में मिला देते हैं जैसे- इदम्+अरण्यम् इदमरण्यम् । सुसम् + इति-सुसमिति । (६) तद् + लक्ष्यम् - तल्श्यम् । चित् + लय -चिल्ल्य । तस्मिन् + लय - तस्मिल्लय । १ खरिच८४१५३ २ यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा ८४१४५ ३ मोऽनुस्वार ८३३२२३ - - 9 १५० संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक । उपर्युत शन्दों में 'द''''न्' वर्गों से आगे 'B' वर्ण है, और 'द' भादियों के स्थान में शिपाई देता है, अंत नियम -- 'यदि तवर्ग (२, ५, , ७, २) ल य पो सेवा तवर्ग के स्थाा मर हो जाता है। यह यान में रखना चाहिये, कि '' अनु- नासिक वर्ण है अतः उम्फे यान में होता है और शेष चार यों के स्थान में होता है। अन्तरसन्धि (७) मुन् + चति - मुचति = मुञ्चति । शन् + फने - शमने पहले। शम् + यु:- शयु - सँयु । उपर्युक्त छन्दों के दिती रूप में अनुस्वार से आगे कमश 'च''' 'य' वर्गों के परे होने पर तृतीय रूप में अनुरधार मा क्रमशरण और ये परिवर्तित रूप देवा पाता है। इसलिये- नियम-'यदि अनुम्बार से आगे कोई 'यम्' (मार दित म्पान) यो तो उस मनुस्वार के स्थान में पर वर्ग के वर्ग का पनमार होता है। परन्न 'य' '' 'ल' परे होने पर अनुनासिक 'यो । प्रथम उदाहरण- 'मुशति' में त्वार से आगे 'च' हैं और यह यर्थ ' प्रथमार है। आ अनुस्वार के स्थान में 'सवर्ग' का पयमार हुआ है। इसी प्रकार सर्वत्र समसना चाहिये। यदि मनुस्वार किसी पद के यन्त म आया तो उस स्थान पर परिवर्तन विकल्प से होता है। जैसे- स्य+फरोपिरोपि. व रोपि । २५+ पानसे त्याँचो, र याचरो। +प सम्पणिय पछि । स+पर Dरान्यासर , संवसर । पु+fre - लिग जित । (4)पा + सिपाहियान + मिनि माकम् + मो. मार अधिमिगार+मति मषिविगायति । सोhिells. ३ या पटान्तम्ब ५६ २ मनुस्वारस्य यपि परसय ५८ - सस्छतरपनाऽनुवादशिक्षकः। उपर्युक्त उदाहरणों में प्रथम उदाहरण 'पयासि' एक पद (प्रथमा बहु- वचन ) है । इसके मध्य में 'न्' वर्ण है उस '' के आगे 'स्' शल वर्ण है । उस नफार को अनुरचार हुआ है। इसी प्रकार 'आमस्यते' यह भी एक पद ( लट्, प्रथम पुरुष, एक वचन ) है। उसके मध्य में 'म' वर्ण है निसको अनुस्वार हुमा है । अत नियम-'यदि पद मध्य में 'न्' अथवा 'म्' वर्ग हो और उनके आगे कोई इल व हो तो उनके स्थान में अनुस्वार हो जाता है। उभय-सन्धि पीछे लिखा जा चुका है कि मि सधियों में पद मध्य अथवा पदा त का विचार नहीं किया जाता-दोनों स्थानों में समान रूप से प्रवृत्ति होती है-- उभयसन्धि बहाती हैं। (६) पयस + शीत - पयशीतम् । रामन लय - रामाय । तपस+चिनोति - पधिनोति । वृक्षस् + छियते - वृक्षश्छिद्यते । सत् • नित् - सभित्। तद् + शान तज्ञानम्। परिषद् + बन •परिषजन । यज न यज्ञ । यहाँ प्रथम उदाहरण में 'पयस्' शब्द के सकार से आगे 'श्' वर्ण है अत' यहाँ 'स' वर्ण को 'श' वर्ण हुआ है। इसी प्रकार 'सत्+चिन्' इत्यादि शब्दों म तवर्ग वर्ण के स्थान में चवग का कोई अक्षर हुआ है। अल- नियम - यदि सकार और तवर्ग के समीर में ( पूर्व प्रथा पर ) 'श' अपवा चवर्गातर्गत कोई वर्ण हो तो 'स' के स्थान में 'श' और तवर्ग के स्थान में क्रमश चपर्ग होता है। विशेष स्मरणीय-- यहाँ सबार और तवर्ग स्थानी और '' तथा चवर्ग आदेश हैं। इनमें क्रम विवक्षित है परतु निमित्त वर्ण ( समीप वाले वर्ण) में क्रम विवक्षित नहीं है। अर्थात् 'श' तथा चवर्ग में से किसी भी वर्ण के समी- पस्थ होने पर उपर्युक्त आदेश होते हैं। (१०) महस+पण्डा - महथ्यण्ड । रामस् + टीकते - रामटीकते। उत्+ङ्कनम् - उदृतनम् । महान् + दौकते = महादोकते । पिप् + त - पिष्टम् । तद् + डिण्डिम - तडिण्डिमम् ।। १ नश्वापदा तस्य शाल ८३।२४ २स्तो चुना चु८४४० 7 २५२ सस्कृवरचनाऽनुवाद शिक्षक। नियम - 'यदि 'स्' बोर वर्ग के समीप 'ए' कार अथवा वर्ग में पोई पदोन सकार और तवा फो क्रम पार और टषम होता है। इस नियम के विषय में नियम के समान सब बातें समझनी चाहिये । (११) अपनाद-(पड्+न्त ) पट् +11 - पदसन्त । वरष = पट्तरव । समाद+दयते - रामादयः । हम इन उदाहरणों में देखते हैं कि 'स', '', 'द' यों के '', '' वर्ग समीप होने पर भी नियम स. १. लागूनही हुमा इसलिये नियम --'यदि पदान्त वर्ग से परेसकार और तार्गदौती उनके स्थान में पकार और टयर्ग आदेश नहीं होते। ( १२ ) प्राफ+ोते- प्रान्छेते, प्राक् शेते । भित् + दो दिन फश्चिच्छेते, कमियो । अप् + शम- अप्सन्दा, अपसन्द । ट् ि+ शत्र- दिट्छन दिट्शयम् । तद् + श्ोक सन्मोक = लोक म. सम्छमथु, तमभु । नियम --पटि म ( वर्गों के पक्षमाक्षर तथा अम्मार रहित यमन ) पर्ग से परे शकार हो और उमसे आगे सर, माप अपक्षयों के मार में से कोई यर्थ हो तो उस 'श' को ''यिकरूप से होता है । (१३ ) तुग्विधि-विधि (गन्धि ) का सारोच यह है कि पर यास्य के मध्य में प्रशार आये तो उ8 Bार को दिप दो माता, और प्रथम एकार को 'सरि च' सूप से (हमन्धि नियम ४. २ ) 'न' हो पा है। परि+जिन परिस्छिन्न | तरु+छापा - arrपा । मा+ITI भान्सादनम् । विनोद -वि।। परत यदि वाक्य के आदि में छहार हो तो उसे रिय नहीं होता। से-'छन्नोपान्त परिणामोतिमि कानमा तापयंसर है। पाप के आदि में दो मेवर हर का भाग रोग अस सयंत्र को सिर होकर प्रथम छहार को हारमा। १.ना २ न पदासाहोरनाम् ८11. Ete ८1१६५ ४ टेन ११ आमा पनि ६.१५ नादायममीति पाप्यम् (म.) - संस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। इस प्रकरण की मुख्य मुख्य सधियाँ निम्न कारिफाओं में संग्रहीत की जाती है। छात्रों को उन्हें याद कर लेना चाहिये। मना जशोऽन्ते मशि घ, खर्यपा सर्वदा घर । स्तो चुना श्चुः, ष्टुना ष्टुश्श द्वयमप्यन्तमध्ययो ॥१॥ मयि पूर्ये तस्य घोषो, मय शोऽमिन्छता ब्रजेत् । वोलि लो, हलि मो बिन्दुः पश्चमे पञ्चमो यर । मायनन्ते नमोबिन्दु-निन्दोर्यय्यनुनासिकः ॥ २ ॥ भवाक्यादिस्थसयोगे द्विर्वाच्यो वर्ण आदिमः । रहादी तु परद्वित्व द्विर्याच्यश्लोऽप्यनादिम ॥ ३ ॥ विसग सन्धि प्रकरण यद्यपि इस मधि का नाम विसर्ग सधि है तथापि यह 'स' तथा 'र' वर्ण पर आभित है। पदान्त सफार मी 'र' वर्ण में परिवर्तित होता है, उस 'र' वर्ण का परिवर्तन कही विसर्ग रूप में होता है और यही यह अपने असली रूप में रहता है । विसर्ग भी कहीं-कहीं फिर 'स' आदि रूपों में परि- वर्तित हो जाता है। परन्तु छात्रों की सुगमता के लिये विसर्ग को ही मुख्य मानकर इस सधि के नियमों का निर्देश करेंगे। (') पुनर - पुन । उच्चैस = उच्चैर् = उच्चे । पितुर=पितः। अतर-अतः। दोस्-दो-दो। -प्रात । नियम -यदि विसर्ग के आगे कोई वर्ण न हो तो विसर्ग को कोई परिवर्तन नहीं होता (अर्थात् उक्त दशा में रेफ को विसर्ग हो जाता है और उस विसर्ग को फिर कोई परिवतन नहीं करते। गोविन्द +अहम् = गोविन्दोऽहम् । गम + रात्र - रामोऽत्र । [अ+ विसर्ग+अर-ओs ] अश्वा+धावति = अधो धावति । बाल. + जल्पति- वालो बल्पति । [अ+विसर्ग +मृदुव्यचनम् - ओ । ] यदि विसर्ग से पूर्व १. समजुषो र दारा६६ २ सरवसानयोर्विसर्जनीय ८१३३१५ विरामोऽवसानम् ॥1॥११. ३ अतो रोरप्लुतादप्लुते ६।१।११३ ४. हशिन श११४ प्रात:

1 1 सस्कृवरचनाऽनुवादशियक। और विसर्ग के पश्चात् वर्गों के तीसरे, चौथे, पांचवें वपा य, र, ल, प, में से कोई वर्ण हो तो विसर्ग का 'यो' हा पाता। 'सूर्य+उनि - सूर्य उदेति | मन +ति -पनाति । पर + ऐश्वर्यम् - प ऐश्वर्यम् । वैद्य + औषधम् - वैध औषयम् । पर न प्रालि गृद अपि । छात्र + एष - छात्र एप । इन उदाहरणों से शात Eart 1 यहाँ विसर्ग का रोप दुआ है। अत यहाँ विवर्ग से पूर्व अ, और पिसर्ग बाद अफार भिन कोई स्वर हो तो विसर्ग का लोपो भाता है। राम + पश्यति राम पश्यति । राम +करोविराम करोति । शहि उगाहरणों में विसगों को कोई परिवान ही हुआ। प्रत पिर वायों में विसर्ग से पूर्व 'म' वथा विसर्ग के माद फ, स, और प, पा, में से कोई यो तो पियर्ग को विसर्ग ही रहता है। 'मृग' + चरति-मृगमरति । नर + तीनवरति । पुरुष + सम्. पुरुषरछपम् । राम + टीकते-रामप्टोकरे । विस को यदि विसर्ग से पूर्व भ, तथा विसर्ग से परे च, छ में से कोई यर्ण दो, तो विसर्ग को 'श' और सिर बाद ट. 8 में से कोई हो तो 'ए' तथा महात, प, में से कोई हो तो ए होता है। "मार + सरति कुमारसरति, कुमाररामरति । पाल +-बार net, बामशालाम् । छात्र + पट पुष्पाणि - छात्र पर मागि, अपर पुलि। यदि विधर्म से पूर्व अ, गया उ के गदस, अपाप में से कोई पासो क्रमश विसर्ग के स्थान में विन्प '' '' तथा 'पहाता भन्म मदों ये आदेश नहीं रोते वहाँ कोई विर्ग के पान में परिण- नौरोता। * एप कुमारा%D8 एप कुमारः। स एपहर म्स पर इल । स एप उष्ट्र.-स एप उष्ट्र । रा माम्यम् । एप महर पोशा। १ भोमगोमोमपूर्वस्य योऽशश सोसार ८१६ २ सरसानयो. ३ मिस UR ४ या UR३६ सोमा ८. ५ एतत्तदो पुगेपोकोपा मारेको ६१२ मामा मो. wal रोरतात. . . --- .

विसगा सस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षक। १५५ यदि 'स' अथवा 'एप'शद के आगे कोई व्यजन अथा'म मिन स्वर पर हो तो इनके विसर्ग का लोप हो जाता है परन्तु यदि इनसे प्रकार परे हो तो विसर्ग को 'ओ' हो पाता है। १२) मुमारा + अप्रतिष्ठन्ति-कुमारा मन तिनि । मृगाः+ उपविध न्ति = मृगा उपविशति । बाला+ofत = बाला इच्छन्ति । नृपा + एवं प्रजा+रक्षति-पा एवं प्रजा रक्षन्ति । सना+गन्ति - जना गम्छन्ति । [आ + विसर्ग + स्वर - विसर्गस्य लोप] [आ + विमर्ग + मृदुव्यञ्जनम्- विसर्गस्व लोप ] मना + पंन्ति - अधा कति । नरा+पाल्यन्ति - नरा पालयन्ति आ+विसर्ग +, ए, अथवा , ५, तो कोई विकार नहीं होता ] मरस्या + तरन्ति-मस्यास्तरन्ति । दलीयर्दा + चरन्ति । बगेवचरन्ति । लेखका+टोकन्ते लेखकाष्टीफन्ने [आ + विसर्ग । त् , थ्, । आ+ +च , छ् । आ + विसर्ग ८३,६५।] (३) मुनिः + मजति-मुनिषति । धेनु + यच्छति धेनुर्यच्छति । कवे + बुद्धि कवेर्बुद्धि । गुरो.+गृहम् गुरोर्यहम् । सप्तमि + अपूर्व + सप्तभिरपू । वस्त्रे + आहतम् वराधृतम् । पितु +इच्छा। पितुरिन्छा। पते + उद्या- नम्-पतेरुद्यानम् । ['अ' अथवा 'आ' को छोड़कर कोई घर+विसर्ग + मृदु- व्यान अथवा स्वर-विसर्ग के स्थान में रेफ होता है ] ४) धेनु + चरति - धेनुश्चरति । रवि +तपति = रविस्तपति । कवे + टीकाकवेष्टीका । नृपते + छर-नृपतेरछत्रम् । [ कोइ स्वर + विसर्ग + क्, छ । कोई सर + विसर्ग । त् , य-स् । कोई सर+निसर्ग+, प्] वायु + प्रोणाति वायु प्रीणाति । तरो+फत्रम्-तरो फलम् । ऋषे + कार्यम् प्रापे कार्यम् । कपि. + सनति - कपि खनति [ कोई घर+विसर्ग+ फ-सू+प्-कोई परिवर्तन नहीं होता] सक्षेप में हम इस मधि को निम्न प्रकार से समझ सकते है- १ (अ) यदि विसर्ग से पूर्व कोई मी सर हो और उसके बाद 'क' 'स्' अथवा '' '' में से कोई भी वर्ण हो तो विसर्ग को कोई परिवर्तन नहीं होता। (आ) यदि 'च'' परे हों तो विसर्ग को '' होता है । .

२ ११६ सस्कवरपनाऽनुवादशिक्षक। (1) यदि परे हो तो विमर्ग को 'पदोता है। (६) यदि '' '' परे हो तो '' होता है। २ () यदि विमर्ग से पूर्व 'अ' और उसके बाद कोई वर मारा मृदु न्यान दो तो विसर्ग को 'ओं दो पाता है। (आ) यदि विसर्ग से पूर्य 'म' अथरा 'आ' हो और उसके उत्ता अकार मि न कोई स्पर अध्या मृदुम्यान हो तो विसर्ग या लोप हो पाता है। १. यदि मिर्ग से पूर्व 'अ' 'आ' के अतिरिक्त कोई स्वर हो और उसने या कोई वर अथवा मृदुष्यापन हो तो विसर्ग को 'र' होता है। भात र को वि नहीं होता वह अपने अमली रूप में ही रहता (५) घर + रा राग्यम्, स्वा०पम् । निर+गग-निराग, नौराग । दुर् + रक्ष = रकम् , रकम् । यस + रम्यम्पपुर रम्प 4 रम्य वा रम्यम् । इन उदाहरणों म दारे पास पास मा पनु सिद्ध रूपों में प्रथम २८ दिराग नही १६ता है और उमछे पूर्ति स्वर अपने दोध रूप में दिख साई पड़ता है। अत नियम-पदि से परे रेप हो सो पूर्य रेफ का सोप हो पातारे और इस रेफ से पूर्व स्वर को दीप हो जाता है। महफारिका- विमो रस्यावसाने मला घवं धा धया। पदान्ते मत्य कत्व स्थादिमादायशिवपतिः ।। असि रोरति हरयुत्यम् , प्रामासो राति यानि गा। कायुप्रयत्नो या मोऽयम , प्रासिनोपोऽविदम्यपि रोरिसोपे पूदीघों, रो विस को सफो । पीपकाम्यावा, शर्षिमी तथा गरि। विसगस्य सकार स्याा पुभिन्ने परे परि। रघुष्ट पास्य पुष्टुयोगे, सस्मात् स्वायत्र साधि । - . - - गरि १ ट्रगरे पूर्व- दोशम ६११११११ पहुचन हे राम हे रामा. क्ने सुबन्त प्रकरण व्याकरण-पाठ नाम (अजन्त अथवा स्वरान्त) अकारान्त पुंल्लिन(१)राम-शब्द । एकाचन द्विवचन प्रथमा राम गमी रामा द्वितीया रामम् राकी रामान् तृतीया रामेण रामाभ्याम् रामे चतुर्थी रामाय रामाभ्याम् रामेभ्य पञ्चमी रामात् द् गमाभ्याम् रामेश्य पष्टी रामस्य रामयो रामगणाम् सप्तमी रामे गमयो रामेषु सम्बोधन हे रामो (एवमेव ब्राह्मग , धनक , आचार्य , सूर्य , सिंह , हत्यादि ) अफारान्त नपुसलिग(न) 'वन'-शब्द । प्रथमा वाम् वनानि द्वितीया वनम् बने वनानि तृतीया बनेन वनाभ्याम् बनेः चतुर्थी बनाय स्नाभ्याम् बनेम्य पञ्चमी वनात् घनाभ्याम् वनेभ्य पष्टी घनस्य चनयो घनानाम् सप्तमी वनयो वनेषु सम्बोधन हे वने हे वनानि (एव फ्लम् अरण्य, नगर, मुख, तृणम् , अस्त्र, सुवर्ण, मित्रम्-आदि) नोट.-सुवत='सुप' जिसके अ तमें हो उमे सुबन्त कहते हैं । (१)विभक्ति प्रत्यय-पुल्लिङ्ग में- स मो अस् (एथमा) अम और आन् (द्वितीया ) इन् भ्या ऐस् (तृतीया) य भ्याम ग्यस् (चतुर्थी) मात् भ्याम् भ्यस (पञ्चमी )स्यओस् नाम् (पठी)द ओस् सु (सप्तमी-) बी अस् (स०) (२) विभक्ति प्रत्यय-नपुसकलिङ्ग में- म ई मानि (प्रथमा ) म ई आनि (द्वितीया) तृतीया से मत तक पुल्लिङ्ग 'राम' शब्द के समान जानो। १२ स०र० हे वन - मुनेः (2.) मधु सहनरचनाऽनुवादशिक्षक। इकारान्त पुस्लिम मुनि शन्द (1) नपुसकशिल पारि शन्द (२) मुनि मुनी मुनया (म.) पारि যালি मारी मुनिम् मुनी मनोर (दि०) वारि यारिगे मुनिना मुशिम्याम् मुनिभि तु.) पारिता पारिम्यान यातिम मुनये मुशिया मुनिभ्यः (न.) यारिगे पारिम्याम् पारिता मुशियाम् मुनिम्प (१०) पारिंग यारिम्पाम् पारित मुयो: मुनी राम् (५०) यारिण यारिणो पाशान मुनी मुयोः मुनिशु (प.) पारिगि पारिगा पारि हे मुने हे मुनी हे गुनय (०) हे यारे पारिवारिको पानि [एहरि , पि, अतिथि इत्यादि] (एय मुरभि, , ank) उकारान्त पुलिलम गुरु शब्द नपुसकलिम मधु शम गुरु गुरया मधुनी गुरुम् गुरू गुरून् (दि.) मा मधुनी मनि गुरुणा गुरुभ्याम् गुम त) माना मधुम्याम् मधुमि गुरये गुरुम्याम् गुरुम्य (च.) मधुने मधुम्पार मधुर गुरो गुरुग्याम् गुरुम्पा (प.) मधुन मधुम्माम् गाम्पा गुर्मा। गुरूणाम् (५०) मधुन मधुनो मनान गुरी गु. गुरु (स.) मी मानो मा गुरो २ गुरू हे गुरय. (४०) हे मधु-भो हे मधुनो हे मनि [एप भानु , साधु, यायुः इत्यादि] [एव पठ, अभु समुहमादि) (१) विमरिच प्रत्यय-पुलियन में- (२) मिEि-सस गर्नुगकमि में ७-१ ( ममगा) -: ( HAI) म्-न (द्वितीया) -(iii) मा म्याम् मिग (सृतीया) मा साम मि ( रोमा) एमार परामपुपों) (ग) (म) (4) (पापमो) Form fET TRA मर माम नाम (पी) गु (मो ममयमा) मम् (सम्योपा) - - - 1 शब्द के ने नेतु कर्नु माला क्त णि माला संस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षकः। १५६ कारान्त पुलिज 'ने' शब्द पुं "पित शब्द नेता नेतारी नार. (प्र०) पिता पितरी पितर नेतारम् नेवारी नेतृन् (दि०) पितरम् पितरौ पितृन् नेत्रा नेतृभ्याम् नेतृभिः शेष रूप 'नेत नेतृभ्याम् नेतृम्य. (१०) समान होंगे। नेतृभ्याम् नेतृभ्य (५०) नेत्रो नेतृणाम् (प.) नेतर नेयो नेतृपु (स.) हे नेत हे नेतारी हे नेतार (स.) हेपित हे पितरी हे पितर नपुसकलिङ्ग 'फर्तृ' शब्द स्त्रीलिङ्ग 'माला' शब्द (१) फर्तृगी फत गि (प्र०) माला माले कर्तृणी (दि०) मालाम् माले कर्म कर्तृणा फ्र्तृम्पाम् पतीम (१०) मालया मालाभ्याम् मालाभि कः कर्तृणे फर्तुभ्याम् क्तुंम्य (च.) मालाये मालाभ्याम् मालाम्प का पतॄणः कर्तृभ्याम् कर्तृभ्य (१०) मालाया मालाभ्याम् मालाम्प कर्तृग को कर्तृगो फ्णाम् (५०) मालाया मालयो मालानाम् फर्तरि पर्तृणि,, फर्गुणो फर्तृषु (स०) मालायाम् मालयो. माग हे कर्त कर्तृ हे कर्तृणी हे फणि (स.) हे माले हे माले हे माला एव दात, गन्तु, द्रष्ट इत्यादि) [एव क या, शाला, कीडा, देवता आदि] इ० स्त्रीलिङ्ग 'भूमि' शब्द। ई० स्रोलिङ्ग 'नदी' शब्द (२) भूमिः भूमी भूमया (प्र०) नदी नद्यौ (१)विभक्ति-प्रत्ययः (२) विभक्ति-प्रत्ययः ई अस् (प्रयमा) मो यस् (प्रथमा) (द्वितीया) (द्वितीया) मा भ्याम् भिस् (तृतीया) ओ म्याम् भिस् (तृतीया) भ्यस् (चतुर्थी) म्पस् (चतुर्थी) (पञ्चमी) (पन्धमी) ओस् नाम् ( पाठो) ओस नाम् ( पठी) सु ( सप्तमो) आम् सु (सप्तमी) अस् (सम्बोधन) मो अस् (सम्बोधन) ग नद्य " " ए अम अस् । " आम " १६० संस्थवरपनाऽनुगदशिरप । દે છે - . धेनु मैया धूम्मार धूमि भूमि भूमी (दि.) टीम भूम्या भूमिभ्याम् मिमि (.) नया भोपान नाम भूमय- ये भूमिग्वाम् भूमिप (च०) नन नीम् I भूमे भूया भूमियान भूमिम्य (५०) नया नदीमाम् नगर भूमे-भूम्याम्पो भूगीनाम् (१०) नया :|ཀག भूमो-याम् भूयो भूमियु (20) नया पो नदी २ भूमी हेमय '.) हेनदि देनजो है न [एवं मति, मति:, सारी आदि) [एर पनी यात्री, मही यादि] २० स्त्रीलिज 'धेनु' शब्द । अ. नीलिदयरामा धे भनय (प्र०) या यमी ইমুম धेर (दि०) यधूम् यानी पर धेनुभ्याम् धेनुमि (1.) वश भये- ये धे म्याम् धेन (१०) पार्ष पम्पाम् गम्पा नो-या अभ्याम् गुम्ग' (५०) यम्मा पस्मार पप धेनो-धेचा थे यो धार (५०) पया यात्री साम् धेनौ-धेशामधेन्या धे (२०) यमाम् यप्पो यम २ नो घे हे धेनय हे यगो मार मादि] [एपमेय श्शम घम् आ]ि शपागन्त सीलिमाए शब्द (4.) माला मावरी मातर (प.) मात्र मातम्मान माय (दि.) मातारम् मागे मार (4.) माठ मानो (१०) मात्रा माप म मामि (म.) मारि मामी (10) मारे मादम्माम् माया (१०) मान मारी मार [एयमे-तु-ना-त्यादि] स्यम्-(मगिनी) (4.) : ये पसार (..) पप गे सा जारि (मा) [पयमेव त, पतय सस्कृवरचनाऽनुवाद शिक्षकः। ३० पुनित 'पति' शब्द। इ. पुझिा 'मति' शब्द। पति पतो (५०) ससा सपायो सखाया पतिम् पनी पनीर (दि०) सायम् सतायो सखीन् पत्या पतिभ्याम् पतिमि (१०) सख्या सखिभ्याम् सरिसमि पत्ये पतिभ्याम् पसिम्म (च०) सले राषिप्याम् मसिम्य पत्यु पनिम्याम् पतिभ्य (५०) सत्यु सखिभ्याम् ससिम्म पत्यु: पायो पनौशाम् (प०) सप्युः सरो सतीनाम् ત્ય पत्यो. पति (स.) सख्यो मरयो सरिया हे पते हे पती हे पतय (स.) हे ससे १ ससायो है ससाय ई० स्त्रीलिङ्ग स्त्री' शब्द । ई० स्त्रीलिङ्ग 'श्री' शब्द श्री जियो त्रिय (प्र०) श्री नियो भिय नियम् स्त्रीम् स्त्रियो त्रिय स्त्रो (दि.) श्रियम् भियो प्रिय जिया स्त्रीभ्याम् स्त्रोमि (१०) श्रिया श्रीम्याम् श्रीमि स्त्रिय स्त्रीभ्याम् स्त्रीम्य (च०) मिये-ये श्रीभ्याम् श्रीभ्य स्रोम्याम् स्रोम्या (५०) धिप या श्रीम्माम् श्रीभ्य त्रिया नियो स्त्रीणाम् (५०) श्रिय या धियो भियां श्रीणाम् स्त्रियाम् स्त्रियो स्त्रीषु (स.) मियां यि थियो हे नियो हे स्त्रिया (स०) हे श्री हे प्रियो हे श्रिय ('लक्ष्मी', 'तरी' इत्यादि शन्दों के प्रथमा के एकवचन में 'लक्ष्मी', तरी आदि होते हैं शेषरूप 'नदी' शब्द के समान होंगे।) इ० नपुसक 'दधि' शब्द । (प्र०) दघि दधिनी दघोनि (१०) दप्न दधिम्याम् दधिम्य (दि०) दघि दधिनी दधीनि (प०) दग्नि दनो दनाम् (१०) दना दधिम्याम् दधिमि (स०) दनि दधनि दमो दधिषु (च०) दम्ने दधिभ्याम् दधिभि (स०) हे दधे घि हे दधिनी हे दधीनि (सस्थि, अस्थि, भक्षि आदि शन्दों के रूप भी इसी प्रकार से होंगे।) ভিখা संस्परचनाऽनुवादशिक्षण । ( सर्वनाम शन्द) (म.) सर्य: 'युग्म' शब्द 'परमद् शन्द स्वम् पुकाम मि.) अहम् यायाम पदा गोरा युयायी गुम्माय (दि०) मामा माम् ती रमादम सुतम्याम् युप्मामि x.) मया आवाम्मान प्रामा पर युगम्य या म्यय (1.) मयागा REALE: स्वत् युवाम्या गुम्मद (प.) मत् आयाम्पार अरमा युषयो को गुराग (प.) मम मे आपयोगी अामान' तमि युपयो गुप्मान (५०) मयि आयमी अरमाम 'मर्य' शब्द (पुलिस) सा राय (प.) सर्परमा पर्यायाम पर (नि.) सम् मा बार ११.) राय उपयोः रापान (a.) म साम्याम् 64 (स.) सर्वस्मिन् सवी (२०) सप स्याम्याम् राय 'मर्य' शब्द (बोलित) (प्र.) समा सपाः (१०) सपा म्या (दि०) सम् सर्ने मा (२०) सपा सयो समाचार (४.) सगा याम्याम् मामि (स.) सपंरपार गांपा समान (1.) मी यापाग माय 'राम (नमासिक) (2.) 1 साँ सानि () मग (शेपम्पमान 'यशप (पति) प १ म पापा ६ पवार देर (प्र०) यद् क फा सस्कृवरपनाऽनुवादशिक्षकः। १६३ यस्मात् याम्या येभ्य (प.) यस्या याम्या याभ्य यस्य ययो (५०) यस्याः ययो याणम् यरिमन् ययो येपु (१०) यस्या ययो यासु 'यद' शब्द ( नपुसकलिङ्ग) ये पाति (द्वि०) यद् ये यानि (शेगमा पुलित 'यद्' शब्द के समान होंगे) 'विम' शब्द (पुंलिङ्ग) 'किम्' शब्द (खोलिङ्ग। की के (प्र.) के का कान् (दि०) काम् के केन काम्या (४०) कया काम्या फाभि काभ्या केभ्यः (च०) पस्यै काम्या काभ्य परमात् पाभ्या (प.) कस्या काभ्यां काभ्य पस्य फयो पाम् (प.) पस्या फयो कासाम् फस्मिन् कयो फासु 'किम्' शब्द ( नपुसकलिङ्ग) (१०) किम् के कानि (द्वि०) विम् के ( शेषरूप पुल्लिङ्ग 'स' शब्द के समान होंगे) ['भय' विश्व आदि सर्वनाम शनों के भी रूप इसी प्रकार पानो] 'एतद्' शब्द (पुल्लित) (प्र०) एथ एतो एते (दि०) एतम्-एनम् एतौ-एको एतान्-एनान् (४०) एतेन-एनेन एताभ्याम् (च.) एतस्म एताभ्याम् एतेभ्य (१०) एतस्मात् एताभ्याम् एतेभ्य एतस्य एतयो-एनयो ঘোম एतस्मिन् एतयो-एनयो फस्याम् कयो कानि (५०) एतेषु ख्या त्वते (प्र०) सर्व १६२ सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षक । ( सर्व-नाम शब्द) 'युष्मद्' शब्द 'अस्मद् शब्द त्वम् युगाम यूयम् (प्र०) अहम् आवाम् वयम् स्वाता युवा वा युष्मान् व (द्वि०) मा मा आवाम् नो भरमान युगम्याम् युष्माभिः (तृ.) मया भावाम्याम् यामामि तुभ्य ते युवाम्या वा युष्मभ्य व (च०) मह्य मे आवाभ्या नौ अस्मन्य न खत् युवाम्या युष्मत् (५०) मत् यावाभ्याम् अस्मत् युवयो वा सुष्याव (प.) मम मे आवयोः नौ अस्माक न स्वयि युग्यो युष्मासु (स०) मयि आवयो अस्मासु 'सर्व' शब्द (पुल्लिङ्ग) सी सर्वे (५०) सर्वस्मात् साम्याम सर्वेश्य' (द्वि०) सर्वम् सर्वा मवान् (प.) सर्वस्य सर्वयो। ধনগ্ন (१०) सर्वेण सर्वाभ्याम् सवै (स०) सर्वस्मिन् सर्वयो सर्वे (१०) सर्वस्मै सर्वाभ्याम् सभ्य 'सर्व' शब्द (स्त्रीलिङ्ग) सवें सर्वा (१०) सर्वभ्या सर्वाभ्यां सभ्य (दि०) सर्वाम् सर्वे सर्वा (प०) सर्वस्या सर्वयो सांसाम (तृ.) सर्वया सर्माभ्याम् सर्वामि (स०) सर्वस्याम् स सयो सनु (च०) सर्वस्यै सम्यिाम् सर्वाम्य 'मन' शद (नपुसकलिङ्ग) (प्र०) सर्वन् सये सर्वाणि (द्वि०) सर्वम् स सदागि (शेषरूप पुलिङ्ग सर्व शब्द के समान होंगे।) 'यट' शन्द (पुल्लिङ्ग) 'यद्' शब्द ( रीलिङ्ग) यो ये (प्र.) २ यम् यो या याम् ये येन याम्याम् ये (१०) यपा याम्या यामि याम याम्याम् येन्य याये याम्प (प्र.) सर्वा य या या या (प्र०) यद् कान् सस्कृतरचनाऽनुवादशिक्षकः। १६३ यस्मात् याम्या येभ्य (प.) यस्पा याम्पस याम्य यस्थ यो येश (५०) यारा यो यामम् यस्मिन् ययो येषु (स०) यस्या ययो यासु 'यद' शब्द ( नपुसकलिङ्ग) यानि यद् ये यानि ( शेषरूर पुलिङ्ग 'यद्' शब्द के समान होंगे) 'किम' शब्द (पुलिस) 'झिम्' शब्द (स्त्रीलिङ्ग) क के (प्र०) फा के की (दि०) फाम् का केन काभ्यां (४०) कया काभ्या फाभि कामे काभ्या मेन्या (च०) काम्या काम्य परमात् काभ्या पेभ्य (प.) कस्था फाभ्या काम्या क्स्य फयो. ঈশ্বমু (प.) पस्या फपो फाणम् फस्मिन् कयो कामु 'किम्' शब्द (नपुराकलिङ्ग) (प्र०) किम् के कानि (द्वि०) पिम् के कानि (रोपरूप पुल्लिङ्ग 'सर्व' शब्द के समार होंगे) [ 'अय' विश्व आदि सर्वनाम शनगे के भी रूप इसी प्रकार जानो] 'एतद्' शब्द (पुलिन) (प्र०) एथ एतो एते (दि०) एतम्-एनम् एतो-एनौ एतान्-एनान् एतेन-एनेन एताभ्याम् (च.) एतस्मै एताभ्याम् एतेभ्य (प.) एतस्मात् एताभ्याम् एतेभ्य (५०) एतस्य एतयो-एनयो एतेषाम् एतस्मिन् एतयो-एयो एतेषु येषु फस्याम् कयो (४०) सस्कृतरचनाऽनुवाद शिक्षकः । 1 'एतद्' शब्द ( घीलिङ्ग) एपा एते एता (दि०) एताम् एनाम् एते-एने एता-एना. (तृ.) एतया-एनया एताभ्याम् एतामि (च०) एतस्ये एताभ्याम् एताभ्यः (प.) एतस्या एताभ्याम् एताभ्या (प.) एतस्या एतयो:-एनयो एतासाम् (स०) एतस्याम् एतयो-एनयो एतासु 'एतद्' शब्द ( नपुसक-लिङ्ग (प्र.) एतद् एते एतानि एतद्-एनद् एते-एने एतानि एनानि (शेष रूप पुलिङ्ग 'एतद्' गन्द के समान होंगे) 'तद्' शब्द (पुल्लिज) 'तद्' शब्द (स्त्रीलिङ्ग) तो ते (प्र०) हा ता तम् तो तान् (द्वि०) गम् ता तेन ताम्बाम् (तृ.) तया तस्मै ताम्याम् तेभ्यः (च०) तस्यै ताम्यान ताम्य' तस्मात् (प.) तस्या ताभ्याम् तत्य तमोर तेषाम् (५०) तस्या तयो तासामू तस्मिन् तयो. तेषु (स०) तस्याम् तयो वेयु 'तद्' शब्द ( नपुसकलिङ्ग) (प्र.) तद् तानि (दि.) ते तानि (शेष रूप पुरित' शब्द के समान होते हैं) ताभ्याम् तामि ताम्याम् तेभ्य तिङन्त प्रकरण द्विवचन बहुवचन भ्वादिगण 'वद' धातु (परस्मैपद) लट् लकार (वर्चमानकाल ) (१) लट् लार (भूनकाल) (२) एकरचन एक्वना द्विाचा नवन वाति घदत पति (पपु०) आत् अवदताम् अनदन् वदसि वदथ वय (म.पु.) आद अवदतग अवदत यदामि पदाव पदाम. (उ.पु०) अपदम् अपदाव अगदाम (३) लोट् लकार (आशावाचक) तिड लकार (विधि अर्थ में)(४) वदतु ( वदतात् ) पदताम् वदतु (प्र.) वदेत् वदेताम् वदेयुः -( वदतात् ) बदतम् वदत (म.) यदे वदेतम् चदेत वदानि वदाव पदाम (उ.) यदेयम् वदेर घदेम सृट् लकार ( भविष्यत् ) (५) (प.) वदिष्यति वदिश्यत वादिष्यन्ति (म.) वदिष्यसि वरिष्यथ वदिष्यथ (30) वदिष्यामि वदिध्यार यदिध्याम. (१)वतमाल काल प्रत्यय (२) भूनकाल अनधननभूनमय वाले प्रत्यय ति तस् मन्ति (प्र०) त् वाम् मन् (प्र०) सि थस् ५ (म.) (म.) मि यस् मस् (उ०) अन् घ (उ०) (३) मा वाचक-विधि, आशीर्वाद और प्राथना अथ चाले प्रत्यय- (प्र०) तु, ताम् , अातु (म०)-तम् त (उ०) आनि आव आम । ( ४) विधिलिड्-विधि प्राथमा आदि अर्थों को सूचित करने वाले प्रत्यय-- (प्र०) ईत् , ईताम् , ईयुस् (म०) ईस् ईनम्, ईव (उ०) ईयम् , ईत्र, ईम । (५) भविष्यत्काल के प्रत्यय (प्र.) स्यति,स्यत ,स्यात (म०) स्पसि,स्यय , स्यप (उ०) स्यामि, स्पाव स्थाम । इडागम कि ही धातुओ में होता है । सब धातुओ को नहीं होता- कर मद तयाँति रदणु शीड स्नु नु क्षु शिव डीट् धिभि । वृनभ्या च विनकाचोऽजतेषु निहता स्मृता ।। म - , . । सस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षक। इसी प्रकार-रक्ष, त्य, नम्, वस् , दह, पच, पत् , ३ , खन्, शस, भ्रम् , चल, चर इत्यादि (१)। 'रम' धातु आत्मनेपद) लट् लकार ललकार रमते रमेते रमन्ने (प.) अरमन अरमेनाम् अरमत रमसे रमेधे रममे (म.) अरमयाः अरमेयाम् अरमध्वम् रमे रमावहे रमामहे (उ०) अरमे अरमावहि अरमामहि लट्लकार ( भविष्यत्काल) (प्र.) रस्पते रस्ते रस्य ते (म०) रस्येसे रस्येथे रस्पध्ये रस्ये रस्यावह रस्पामहे काराव, ऋकारात, यु रु, दणु, शी, स्नु न, रि, डी, नि, यूङ, पून इन धातुआ में भविष्यत कार 'लूट' सार में इहागम होता है । अन्य स्थरात- स्वर - अच्= अ, इ, उ, ल, , ए, ओ, ऐ, मी धातुओं में नहीं होता। यह नियम सब जगह माधधातुक लकारों में उपयोग होता है। (१) (अ) कुछ घातुनों में विकार होता है जैसे-गम् (गच्छति) धा । (जिघ्रति) दा (यच्छति) दृश् (पश्यति ) पा (पिवति) मा (भमति ) स्पा । (तिछति ) दश (दशति) ब्रम् (क्रामति)। (आ) किही धातुआ के अतिम अक्षर के समीप हस्व स्वर को गुणादश हो जाता है-युम् (बोरति) रह (रोहति ) १ ( फपति ) श (मोति)। (इ) किही घातुमा के अन्तिम स्वर को गुणादेश हो जाता है-भू (भयति) । जि ( जयति ) नी (नयति) द्र (द्रवति) म (सरति) ह (हरति) स्म (स्मरति )। । (ई) किही धातुमा के स्वर म पाई विशार नहीं होता-निद (निदति) पूज (एजति) भूपू ( चूपति ) खाद (खादति) क्रीड् (फ्रीडति) जीव (जीपति) घाव (धावति)। (उ) विही धातुयो के स्वर में 'यय' माय, आदि का विकार होता है- हे (हपति) गै (गायति) ग्ल (ग्लायति ) ( घ्यायति ) म्ल ( म्लायति ।

मवेथाम् मन्पत्यम् सरतरचनाऽनुवाद शिक्षकः। दिवादिगण (१) 'नृत्' धातु ( परस्मै पद) पद्) 'मन्' धातु (आत्मनेपद) (0) हि-त्यति स्पत रस्यन्ति (प्र०) मन्यते मन्येते म य ने त्यसि तत्यथा मृत्यथ (म०) मन्यसे मयेधे मायावे रत्यामि प्रत्याय त्याम (30) मन्ये मन्यावहे इ-आत्यत् अत्यताम् असत्य (प्र.) अमन्यत अम येताम् अमन्यत अत्य: अत्यतम् अस्यत (म.) अमन्यया अमन्येथाम् अमन्ययम् अत्यम् अत्याय अत्याम(उ०) अम ये अम यावहि अमयामहि लोट-मृत्यतु नात मृत्यताम् कृत्य तु (प्र०) म यताम् म येताम् म य ताम् नृत्य तात् त्यतम् इत्यत (म.) मयस्व गृत्याग नृत्याव नृत्याम (30) मये म याच मयाम लिम-गयेन् नृत्येताम् नृत्येयु (प्र०) मारोत मायाता मयेरन् नृत्येतम् इत्येत (१०) मन्येया मयेयाय म येस्वम् गयेयम् मृत्यत्र नृत्येम (उ०) म येय म येदि लर-नतिष्यति नतिष्यत नहियति(५०) मस्यते मस्येते नतिष्यसि नतिष्यथ नर्तिध्यय (म०) मस्यसे मस्येथे मस्यचे नतिष्यामि नतिध्याय नतिध्याम (उ०) मस्ये मस्यारहे मस्यामहे पो-नस्यति नय॑त नस्यन्ति (प्र.) नरस्यसि नर्यय नस्यय (म.) नस्यामि नाप नस्याम (30) (१) इस गण में पातु के स्वर को गुणादेश नहीं होता। (२) वतमानकाल-मयय-(मा० ) भूनकाल-प्रत्यय-(बा.) (प्र०) ते इते मते इताम् (म.) से इथे दे (म०) पास इथाम वहि माज्ञावायव-प्रत्यय (आ.) विध्यर्थप्रत्यय (मा.) भविष्यदर्थप्रत्यय (आ.) (प्र.) ताम इताम् अन्ताम् ईत ईयाताम् ई स्यते स्येले स्यान (म०) स्व इथाम् ध्वम् ईचा ईयाथाम् ईध्वम् स्यसे स्येथे स्यध्ये (उ०) ऐ भावहै बामहै ईय ईवहि ईमहि स्यै स्यावहै स्यामहे म महि मस्त ते ध्यम स्थ -- स्म १७० सस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षकः । 'प्रस्' धातु (परस्मैपद) लटलकार लडल कार अस्ति स्त सन्ति (प.) आसीत् भारताम् मान असि स्थ (म.) श्रासो आस्वम् आत अस्मि स्व. (उ०) आसम् आस्व आत्म लोट्लकार लिङ्लकार अस्तु-स्तात् स्ताम् सन्तु (प्र०) स्यात् स्थाताम् स्यु एघि-स्तात स्तम् रत (म०) स्थाः स्यातम् ध्यात अमानि असाव असाम (उ.) स्याम् स्याव स्याम 'ध्रु'धातु ''धातु लट्-शृणोति पृणुत' शृण्वन्ति (प.) करोति कुरुता कुन्ति शृणोधि गुष शृणुथ (म०) क्रोषि कुरुप पुरुथ शृणोमि शृणुव शृणुम (3.) फरोमि कुर्व शृण्व शृण्म लड-मणोन् अश्णुताम् अण्वन् (५०) अकरोत् अकुयताम् अकुर्वन् अशृणुष अणुम अपवम् अशृग्य । 리며 (8.) मकरवम् अकुर्व अकुर्म (पा ) कुछ धातुएँ विकृत होती हैं, जैसे-त्री (प्रीणपवि-ते ) मृग (माजयति-ते ) धू (धूनयति ते ) कृत् (पोर्तयति-वे )। (६) ही धातुओ के उपपा को गुणादेश होता है। उपध-असो त्या पूव उपधा' अतिम अल अक्षर के पूर्व जो हो उसे उपपा कहते हैं। जैसे- पुर (चोरयति-ते) धुप (पोपयति-त) चुद् (चोदयवि-ते) तुल् (घोलपति) (६) अलिम अक्षर के समोर जो गधार पातुओं में हो चनकी वृद्धि होती है, जैसे-~-क्षल (क्षालयति ते ) तह ( वाहपति ते ) (धारयति-त) (जारयति ते)। (उ) अकमक्चातुओं के प्रयोजन रूप विद् (वेदांत ते ) युग (पोजपति- से) तुप (तोपपति ते) नर (नाशर्यात- ) म (मारयति-त) स्था (पापपति-) दर्श (दर्शयति-ते) यूप ( वधपति-ते) शिस् (विपति-)। - - - १७१ सस्कृतरपनाऽनुवादशिक्षक। लोट- शृणोतु-तात् शृणुताम् शृण्य तु (प्र०) करोतु कुरुतात् कुरुताम् कुर्वन्तु शृणु तात् शृणुतम् शृणुत (म०) कुरु-नात् कुस्तम कुरुत शृणगानि शृगनाव शृगवाम (उ०) करवाणि फरवाव करवाम लिड- शृणुयात् शृणुयाताम् शृणुयु (१०) कुर्यात् कुर्याताम् कुर्यु शृणुया शृणुयातम् शृणुयात (म०) कुर्याः कुर्यातम् कुर्यात "पुणुयाम् शृणुयाव शृणुयाम (उ०) कुर्याम् कुर्याच कुर्याम 'श्वस्' धातु परस्मैपद श्वसिति श्वसिषि श्वसिमि सित श्वसिथ श्वसिवा श्वसति श्वसिथ श्वसिम लड- (प्र.) (म.) (उ०) अश्वसन (प्र.) अधसत् অধীন अश्वमा अश्वसी अधसम् } अश्वसिताम् } अश्वसितम् অবির (म.) (उ०) अधसिव श्वसित्-तात् श्वसिताम श्वसिहि-तात् श्वस्तिम् असानि श्वसाव अश्वसिम लोट- श्वसित श्वसित श्वसाम (म०) (म०) (उ०) लिइन श्वस्यात् श्वस्या श्वस्याम् श्वस्याताम् श्वस्यातम् श्वस्या श्वस्यु श्वस्यात श्वस्याम (प्र.) (म०) (उ०) १७२ सस्कृवरचनाऽनुनादशिक्षकः। 'ना' धातु परस्मैपद लट्- जानाति मानासि पानामि पानीत. जानीय जानीय धानति बागीय जारीम (10) (म.) (उ.) - अमानात् अपागेताम् अनानन् (प्र.) अनाना अजानीतम् अजानीत (म.) अजानम् अजानीव अनानीम (उ०) इसी प्रकार स्वप् (स्वपिति ) रुद् (रोदिमि, रोदिर , रोदिम )। (म और भाव मे ) [ रक्ष-रक्ष्यते, भूष-भूष्यते, विद्-विद्यते, नी-नीयते, जि-मीयते, भू-भूय कृ-क्रियते, ह-हियते, मृ-नियते, भ-भ्रियने, स्या-स्थीयते, क्षा-दीयते, पा पोयते, दृश-दृश्यते, गम्-गम्यते, उध्-नुष्यते, विप्-क्षिप्यते, रक्-नृत्य रम्-रम्यते, मन्-मयते, चुर-चोर्यते, तड्-ताडयने, नुल-तौल्यवे ] . . . धातु + 'य' + आत्मनेपद-प्रत्यय

Sanskrit Rachananuvada Siksaka

Author
Sri Visvesvara
Title
Sanskrit Rachananuvada Siksaka
File name
Sanskrit Rachananuvada Siksaka
Text
OCR done
Citation
1965
Published
2010/12
Publisher
The Chowkhamba Sanskrit Office Varanasi Varanasi,
Language
Sanskrit
Pages
179
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
History
DLI number
545981
Barcode
99999990024176.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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