Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Shri Madbhagwad Gita

Bhimanand Ji · 2011/01

PDF Proofread

Front matter

卐
सिध श्री
卐
गत्यं-पिवं-सुन्दरं-मधुरं
सर्वे भवन्तु सुम्पिनः गर्ने सन्तु निरामयः
गवे भद्राणि पश्यन्तु मा नाश्चिद् दुःग भाग भवेत् ।।
श्री भगवान री गिरगा ग ही श्रीमद्भगवद्-
गीता रो ओ' भीमानन्दी राजस्थानी अनुवाद आस
संगार विदवानी भर गीता भगतांगर-नगळी
में गूगनां घणों-मोपलो हरण हुवं । आप लोग
रणनं वाच-गुण धुधकारी घालण जिसो काम बला-
णतो तो श्री भगवान राही सगळा जतन गफल
गिणीजगी।
वैदिर संरत भागाजीमानण बेटी आपणी
करोड़ो री लावीणी मागढ़ भापा ममवाणी
राजस्थानी ! हिन्दी आदि अनेत भाषायां री भी
माँ है जिण शे गवद भण्डारणों लूठो-मोटो है-
घणकरी भाषावा र सबद भण्डार गू!
निन भोनो है-भारत र गंविधान री
आठवीं सूची में बैगी ही गिणत-मानता देणी पदसी
राजस्थानी नै । घावोनी मायड़ रा लाईस ! ऊंडी
मंडी मूअकासुर में ओम उचारां । ॐ तत्मत् ।
सूरजभीमपांडिया
सुगुणी प्रकाशन
विश्वाम्बिका भवन
आशापुरा नयाशहर बीकानेर

স্ত্র স্বাক্ষী ( অঙ্ক)
पो.गंगाशहर (बीकानेर) 3 3 4401
वगीता
सीसानन्दी
राजस्थानी
अनुवाद
toh
Mr
10
N
.
NAMA
-
श्रीडिशा

e भीमपारिया
प्रकाशक : सूरज भीमपाण्डिया
सुगुणी प्रकाशन
विश्वाम्बिका भवन, आशापुरा
नया शहर, बीकानेर 334 001
प्रथम संस्करण : 1984
मूल्य : 40.00
आवरण : कान्तिचन्द्र
मुद्रक : सांखला प्रिंटसं, बीकानेर
SHRI MADBHAGWADGITA
Bhimanandi Rajasthani Anuwad
by BHIMPANDIA
Price Rs.:40.00

भीमपाँडिया : परिचय की परिधि में श्री भीमपांडिया गत तीन दशकों से काव्य-क्षेत्र में अलख जगाये हुए हैं । रचना धर्मिता उनके लिए सुविधा तथा अवसरवादिता नहीं अपितु स्वांस एवं रक्त प्रवाह की तरह स्वाभाविक एवं आवश्यक है। वे अपनी सृजनशीलता के प्रति पूर्णतया समर्पित रहे हैं। - श्री पांडिया एक ऐसे कवि हैं जिनके जीवन एवं कविता के बीच हासिये नहीं खींचे जा सकने । संघर्ष उनका मुख्य स्वर है। कविता का भी और जीवन का भी। उनका जीवन जितने उतार-चढ़ावों, धूप-छाहों, असुविधाओं एवं विपत्तियों में से निकला, कविता भी उतने ही पड़ावों पर चढ़ी-उतरी। संघर्ष का यह स्वर उनका जीवन साथी रहा है। घटनाओं के बदलाव के साथ उनकी आस्थाएं नहीं बदलती और न ही राजनीति के मोड़ कविता के मोड़ ही बनते हैं । क्रांति का स्वर उनकी धमनियों के रक्त प्रवाह की तरह स्वाभाविक एवं हृदय के स्पंदन की तरह स्पष्ट है । वे संघर्षों के माध्यम से सत्य के अन्वेषी रहे हैं । सहानुभूतियों के सहारे जीना उन्हें अभीष्ट नहीं और यही कारण है कि समाज के कथित प्रभावशाली क्षेत्रों की कृपा-कोरों या भृकुटी तनावों की विना परवाह किये वे निरन्तर संघर्षशील बने रहे। उनकी कविता उनके संघर्षों की उपज भी है तो साक्षीऔर सहयात्री भी। जहाँ-जहाँ अन्याय-उत्पीड़न है, पांडियाजी की कविता वहीं-वहीं चोट करती है-निर्णायक चोट । वह अपनी दिशा भी स्वयं चुनती है । निश्चित दायरे, बंधे-बंधाये राजमार्ग और सरकारी-मुद्राएं उनके लिए अपरिचित रहे हैं। इस दृष्टि से देखें तो पांडियाजी युगकवि हैं-उनका स्वर ही जैसे युग का स्वर बन गया है । बीकानेर के इन तीस वर्षों के साहित्य को पांडिया-युगीन साहित्य की संज्ञा दी जा सकती है । श्री भीमपाँडिया का जन्म १६ जुलाई १९२६ आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशी वि. सं. १९८६ को बीकानेर में हुमा। १९४८ में वे कविता की ओर उन्मुख हुए और लगभग उन्हीं दिनों अध्यापक बने । कविता और अध्यापन अाज भी चालू है- संभवतः ये दोनों उनके अभीष्ट हैं। उनकी कविताएं प्रभावशाली, स्वर प्रोजस्वी ।

एवं गति इतनी मामिल रही कि १९५३ मे १६६० तक उनकी कविता " विचल री जोन अब त प्रेक गर्गमी जगती रहजे" पाठवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में सम्मिलित की गई। उनकी मनात राजधान ए भारत ने प्रायः सभी पत्रों में प्रकाशित हैं जिनमें यातागन, मधुमती, जागती जोत; राजस्थान भारती, नवजीवन गंदेश, पाक्षिक तना. लनकार, लोकजीवन, जनता को अावाज, संसार.. गजरथानी वीर, महिन्यारी सेवा, अगदा, मांतिदूत, प्रजा सेवक, गण- राज्य. वर्तमान. लोकमत, राजस्थान विकास. जय चित्तोड़, शिकायत, सीमा- संदेश. पायंगारशी, नवयुग प्रादि, सुछक पर हैं। इनमें वे पत्र भी सम्मिलित हैं जो पूना-हिंगनघाट, दिल्ली, मालमत्ता, जयपुर, जोधपुर उदयपुर प्रादि से प्रकाशित होते रहे हैं। पाकामयागो में भी प्रसारित होते रहे हैं। नया- स्वातम्योत्तर हिन्दी माविता और विशेषत: हिन्दी गीत जितने पायामों में से निकला, पहियाजी ने उन सबको गित ही नहीं पात्मसात भी किया। उनके हिन्दी राजस्थानी गीतों को इतने अधिक विषय-बिन्दु हैं कि कवि-व्यक्तित्व को निदिनत दायरों में बांध मना कठिन हो जाता है। प्रकृति. प्रणय, शृगार, वियोग, प्रांति, विस्फोट, विद्रोह, राजनीतिक चेतना, सामाजिक उत्थान, पारिवारिक परिवेश, बचत, विकास, प्राध्यात्मिक चितन प्रादि सभी विषय-बिन्दुओं पर उन्होंने अपनी कलम उठाई है। - पांडियाजी के अब तक प्रकाशित तीन ग्रन्थ उनकी तीन भंगिमाएं प्रकट करते हैं। पुरुप से क्रूर नंगुल में पिसती नारी की पीड़ा के विरुद्ध जन कवि ने संघर्ष-धोपणा की और उस टकराहट में हित-अनहित को बिना देखे जब वह जूझने लगा तो सन् १६५८ में "हाथ सू कतर लीनो बोरलो" कविता संग्रह प्रकाशित हुग्रा । राजनीति के क्रूर कृमियों ने जब राजस्थान में प्रजातंत्र का गला घोंटना चाहा तथा मानव-रक्त के मूल्य पर सिंहासन-प्राप्ति की कुचेष्टाएँ की तो कवि ने १९६७ में "लोकतन्त्र रा पाळी रोया" कविता संग्रह से अद्भुत जन- चेतना में सहारा दिया। भारत ने जव प्रात्म विश्वास से एक युद्ध जीता और शास्त्रीजी के नेतृत्व में चहुंमुखी प्रगति की तो १९६८ में "गरीब करोड़पति" कविता-संग्रह सामने आया। यों उनकी कविताएं कई संकलनों में हैं जिनमें अलगोजा, बागाँ रा फूल, प्राज रा कवि एवं विजय हमारी है" सम्मिलित है। कवि ने जीवन की व्यापकता एवं अनुभवों की विविधता को अपनी कविताओं में मूर्त रूप दिया है। उनका प्रकृति प्रेम इतना स्पष्ट एवं उससे जुड़ी पारिवारिक मानसिकता इतनी प्रभावपूर्ण है कि रचनाएँ स्वयं ही एक परिवेश बन जाती है । "राजस्थानी नारी ग्रीष्म के ताप एवं वियोग की पीड़ा से जर्ज रित होती है तो गीत उछलता है "मेघा आव रे म्हारोड़े गाँव रे" जब बादळ उमड़-घुमड़ कर वर्षा के लिए जाते हैं तो गीत बरसता है "या बरसाळी बादळी" और जब ऐसी सुहानी ऋतु में एक पत्नी अपने पति को गाँव लौटने का आग्रह करती है तो गीत जन्मता है "म्हारी नणदल वाईसा रा वीर" चाकरी छोड, हजूरी छोड अब थे घराँ पधारो राज । खेत में दयो हलकारो राज । पापणी धरती में बरसी बिरखा मोकळी । फसलों के लहलहाने एवं पति के आगमन का सुख ये दो गीत भी भोगते हैं "पाव रमण री रात रमाँ धरण रेत में" और जद ठंडी मधरी पून चल हूँ हिवड़े में हुळसाऊँ "और अंततः जब पति को कमाई के लिए जाना पड़ता है और तीज-त्यौहारों, मौकों-टोकों पर नहीं आ पाता है तो वियोगिनी के आँसुओं की तरह गीत प्रवाहित होता है" पास मिटै पलकों में गळ-गळ हिवड़ो आज पसीजै राज" । गीत मात्र केवल दाम्पत्य जीवन तक ही सीमित नहीं रहते वरन् पुत्री की विदाई की पीड़ा भी उसमें प्रकट होती है । विदाई के क्षणों में जैसे गीत की आँखें भी नम हो जाती हैं "चिड़कली उड़जा पाँख पसार"। कवि का दूसरा पक्ष संघर्ष, विद्रोह एवं राजनीतिक चेतना के साथ विकास परिक्रमा के स्वागत का है। प्रजातन्त्र के रथ की अगवानी एवं विकास की आशा इस गीत में उदित होती है "उजासो दीस प्राभल कोर" तो भावी पीढ़ी के सुख की परिकल्पना "जीवता रवै रे थारा भूरिया लटूरिया" में उमड़ती है । संघर्ष के स्वर “लीडरिया" एवं “अफसरिया" कविताओं में हैं तो युद्ध-रत सैनिकों का आह वान “मोरचो तकड़ो राखीजो" एवं "सींव रो रुखाळो म्हारो सायवो" में दृष्टिगत होता है। मानवीय पीड़ा “ज्यूं रुळं ठीकरी मिनख रुळं" "कण म्हारो नांव धरयो सिणगारी" "पाँव में पगी नहीं, अंग में झगी नहीं" "हाय मिनख रो ओ-समाज" आदि गीतों में हैं । इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो नै राष्य, अंधकार, भटकाव आदि जीवन के स्वर हो सकते है पर मुख्य स्वर नहीं। जीवन नियन्ता शक्ति कोई और ही है और वह प्राशा, विश्वास, सहनशीलता एवं संघर्ष के माध्यम से जीवन का ताना-बाना वुनती । कवि का यह प्राध्यात्मिक पक्ष है पर भक्ति, ज्ञान एवं कर्म के इस सम्मिश्रण में भी वह प्राडम्बरों को नहीं पचा सकता। प्राध्यात्मिक पड़ाव की कुछ रचनात्रों में ये सभी स्वर सामने आते हैं “लेख लिख्यो दारणे-पाणी रो चुगरणो पड़सी रे/बोज नै उगणो पड़सी रे" "मन में मूरत जमी नहीं तो हिवड़ो है हमपान रे" "जी म्हारा जिबड़ा जी" प्रादि रचनाएं भक्ति के साथ ग्राउंबरों पर प्रहार नियति की शक्ति एवं मानवीय प्राशा के संगरण की पीठिकाएं हैं । बालगीत, लोरिया, प्रगाणगीत प्रादि अनेक क्षेम इन पीठिकानों को पीर अधिक बढ़ता प्रदान करते हैं। कविता और जीवन के बीच की दूरी देखना हो तो भीमपांडिया को नहीं किसी और कवि को ढूंढना होगा। "हाथ टू कतर लीनो बोरलो'' के रचनाकाल में कवि को गाषित सामाजिक शक्तियों से टकराय में पाना पड़ा व कई विपत्तियों का वरण करना पमा पर बहन गुका, न का और न ही टूटा। "लोकतंत्र रा पाळी रोया" के रचनाकाल में राजस्थान के कर कुकर्मी शासन के अंत होने तक वीकानेर में प्रवेश नहीं करने, जूते धारण नहीं करने, व केवल एक वस्त्र में रहने की प्रताप-प्रतिज्ञाएं उसने गी पीर उन्हें अन्त तमा निभाया। बेटी के मेंहदी रचे हाथों की जीत हुई और एक गुकर्मी-गासन के अन्त की घोषणा के साथ कवि ने कन्यादान के लिए बीकानेर में प्रवेश किया। प्रापातकाल के १६ महीनों के अंधकारमय युग में जब अभिव्यक्ति का संकट था, कवि ने खुली, वेवाक व प्रत्यक्ष रचनागों मे भूतपूर्व गासन का विरोध किया व यातनाएँ सहीं। नागार्जुन व रेणु को जेल जाना पड़ा. भीमारिया जेल के फाटक तक पहुँचते-पहुंचते रह गये । "पाची वणजा केंदरी" "इण्डे ने महादेव बताव-जोरामरद पूजाव रे' ग्रादि रचनाएं इसी काल की हैं। । - कवि की इस गृजनशीलता को भारत में ही नहीं एशिया में मान्यता मिली है । Rcfcrcncc Asia (1975) pa Lcaders of India (Who's Who) fifa ग्रंथों में कवि के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के बारे में संदर्भ दिये गये हैं । कवि होने के साथ-साथ वे पत्रकार, सम्पादक. समीक्षक एवं राजनेता भी रहे हैं। "जय जवान जय किसान" के सम्पादक इस कवि ने नौकरी छोड़कर चुनाव लड़ा तथा राजस्थान के सर्वमान्य समाजवादी नेता स्व० लोकनायक मुरलीधर व्यास के साथ राजनीतिक सहधर्मिता का निर्वाह किया। स्वर्गीय व्यासजी के साथ वे पूना, गोग्रा, बम्बई, कलकत्ता एवम् राजस्थान के प्रायः सभी नगरों में गये व समाजवाद का प्रचार-प्रसार किया। उनकी "झाला देव झुपड़ी" की रचना जन- जन की भावनाओं का केन्द्र बन गयी थी। मेघदूत एवं गीता का अनुवाद उनके जीवनगत अनुभवों के निचोड़ की तरह सामने पाता है। राजस्थान के निवासी एवं प्रवासी असंख्य नर-नारियों की आध्यात्मिक प्यास इस अनुवाद से तृप्त हो सकेगी। अधिसंख्यक निरक्षर नर-नारी गीता की ज्ञान गंगा में नहाने का प्रानन्द संस्कृत के माध्यम से नहीं उठा सकते । यदि टीकाओं में भटकें तो उन्हें पद्य की गे यता एवं गत्यात्मकता नहीं मिल सकती और गीता ज्ञान रूखे उपदेशों की तरह केवल नीरस रूप में ही मिल पाता है । आवश्यकता इस बात की है कि गीता का यह गुह्य-ज्ञान अपनी वोलचाल की भाषा में, उसी मिठास और उसी सुपरिचित शैली में जन-जन तक पहुंचाया जाये । हर भाषा के अपने तेवर होते हैं और हर भाषा की अपनी ही लोच, अपना ही लावण्य और अपना ही स्वाद होता है। ये लोच, लावण्य और स्वाद भी बने रहें तथा गीता की शब्द-व्यंजना के साथ न्याय भी हो सके-इन दो कठिनाइयों को पार करने का साहसिक प्रयास भीमपांडिया ने किया है। उनकी यह गीता राजस्थान के निवासी-प्रवासी भाई-बहिनों के लिये लोकगीता या जन- गीता बन जायेगी-ऐसी पाशा तो की ही जानी चाहिये । - भीमानन्दी भगवद्गीता के कुछ अंश केवल वानगी के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ अर्जुन का संताप और भगवान कृष्ण का दिशा निर्देश इन श्लोकों में प्रकट होता है : संजय बतायो- रण भोमी में सोक गळगळो अरजुन इणतर वचन उचार धनुस-बाण नैं नाँख धनंजै रथ में जाय बैसियो लार ।। १-४६ ।। आकळ-बाकळ सोकाकुळ लख अरजुन आँख भरायो ज्यूँ मधुसूदन भगवान दया कर अरजुन नैं समझायो यूँ ।। २-१ ।। भगवान बखाण्यो- अधरम जोग कुजोग अरजुना बेमौके क्यूं मोह करै सरग टाळ अपजस करवावै इसी आँख क्यूँ आज झरै ।। २-२ ।। थारै जोग कायरी कोनी मत बण तूं कायर लाचार हियो दूवळो मत कर अरजुन जुद्ध करणनें हुयजा त्यार ।। २-३ ।। सोक करै पिंडत ज्यू बोलै जका सोक करणे नहिं जोग मरयाँ-जियाँ रो सोक न लावै पण मनड़े में पिंडत लोग ।। २-११ ।। बोदा बसतर त्याग पुरुष ज्यूँ नुआ-निकोरा वसतर धारै त्यू बोदो तन तजै आतमा नुई निकोरी काया धारै ।। २-२२ ।।

अमरी इसी आतमा इणनै नाटण सकै न ससतर पाय गाळ न बाळ राके जल-अगनी सके न इणने पून सुखाय ।। २-२३ ।। अणछेदी-अणबळी आतमा अणभीजी अणसोख बराण अकरूप है रादा रानातन सरवाले व्यापक थिर जाण ।। २-२४ ।। जद-जद धरम घट धरती पर अधरम बढे धरम घेराय प्रगट हुँवू पारथ हूँ ही तो उणी काळ निज रूप रचाय ।। ४-७ ।। साधू पुरुप उवारण जग में पापीड़ा रो करण विनास धरम धजा श्रापण में प्रगटू जुग-जुग में हूँ जुग री आस ।। ४-८ ।। अरजुन सकाळ भूत उतपत रो बीज जको हूँ ही हूँ जाण म्हां बिन भूत चराचर कोनी कोई भी तो समझ सुजाण ।। १०-३९ ।। जठे कृष्ण योगेसर है अर जठ धनुरघर अरजुन मान वठे विजयश्री और विभूती अचळ नीति म्हारो मत जाण ।। १८-७८ ।। भीमानन्दी भगवद्गीता निश्चित रूप से जन-जन तक पहुँचेगी-यह मेरी हढ़ धारणा है। इस गीता के नामकरण के पीछे भी एक विशेष पवित्रता और पूर्ण रामपंगा की प्रास्थावान भावना रही है। बैलूर मठ कलकत्ता के ध्यान कक्ष में स्वामी गमष्ण परमहंस पोर विवेकानन्द की प्रतिमानों के सामने कवि ने अपने पापको भीमानन्द धोपित किया तथा भीमानन्दी भगवद्गीता का अन्तिम स्पर्श वहीं पर देने की बात कही। कवि के शब्दों और क्रियाओं में आज तक अन्तर नहीं रहा है और उनको यह घोषणा भी सफल हुई। 0 भवानी शंकर व्यास 'विनोद' पवनपुरी, बीकानेर भाव भूमिका मैं तो की न लिख्यो मधुसूदन ! ने - . अंक मंतर है "हरेक काम हरेक प्रादमी-लुगाई अर टावर र तावै खावै कोयनी" ओ' मंतर जाणताँ थकाँ अक रात भगवान श्री कृष्ण योगेसर पर वेद- व्यासजी, तथा धृतरासटर-संजय रो नाँव सुमर-गीता रै राजस्थानी अनुवाद तावै अणावरण वासत, गीता प्रेम अर गीता प्रेमियाँ वासते, कलम चाली तो चाल पड़ी-मधुसूदन भगवान भरोसे लिख्यो सो ठीक लिख्यो, प्राछो-फूठरो लिख्यो, घणों प्रोपतो अोळखाण सारू घणों कल्याण करणियो लिख्यो पण जे थे जागसो बतासो, तो भी तो-हूं तो पाही जाणसू-कसूं "मैं तो की न लिख्यो मधुसूदन"- "मैं तो की न लिख्यो मधुसूदन म्हारी कलम विराज्या दियो सो गीता वचन निभावो धरम डूटग्यो वधग्यो पाप" म्हारी कलम सूं लिखीज्यो सो ठीक, पण आप आपरी समझ सूं समझसो सो ठीक । सब ठीक है । जो लिख्यो घण करो श्री कृष्ण जलमण री ठोड़ जेळा में अर मीराँबाई रै चारभुजा सामै मिंदरा में बैठ भगवती सारदा री खैरमर सूं लिख्यो है । गीता है अमरां रा पाखर ! आप भारत रै संविधान में मानी जी घणकरी भासावाँ सूं साँवठी सैंठी अर घणी आगे प्रोपती है अापणी मायड़ भासा "राजस्थानी" । आँपणों घरणों मोटो करतब कि पापा आँपणी मायड़ भासा राजस्थानी नै घगों पोपतो-रूड़ो रूप पर नखचख सोळे-सिणगार समरपा । आपणों पूरो-पूरो फरज निभावतां थकां म्हन पक्को भरोसो है कि आज नहीं तो काल अर काल नहीं तो परतूं-तरतूं पापा करोडाँ नर-नार री मायड़ भासा राजस्थानी' ने भारत र संविधान में बराबरी सूं करोड़ों मोल री भारतीय भासा सिकारणी पड़सी । फळसी-फूलसी भारत में राजस्थान पर राजस्थानी भासा । गाँधी-नेहरू युगांतर री प्रधान मंत्री इन्दिरा गाँधी जे कदास प्रणसमझी- अरणदेखी पर असमाणता र धार में गतागोळी सायपर भारत र संविधान में गाय बराबरी करोड़ों लोई रो मातर भासा "राजस्थानी" में तुरता-फुरती सू मानता देवगा-दिरावण में चूनः करती तो संविधान पेटं असमारणता पर अन्याय गे सगळो मूंड-कानूंडी रो ठोकगे-काळी टीको वीर मार्थ ! पण जदकद वेगोवेग भारत र संविधान में पर्णमान सिकारण जोगी है श्रापणी मायड़ भासा गजस्थानी ! परको भरोसो है, निसने ही भारत रे संविधान में शिकारीजसी पापणी गायढ़ भासा राजस्थानी । पारा है इन्दिरा गाँधी न्याय-रामागता गाथै करोड़ों लोगां गे मातरभासा राजस्थानी ने तुरता-फुरती सूं भारत र संविधान में बराबरी री मानता दिराय अंक मोर्ट जरा री भागरण बणसी। भंड- काळजी रो ठोकरी-काळी टीको कोनी पलाय ली। परको भरोसो है पण भरोस गेस पासोनी ला जद जाणीजसी । सांति वापसी था-म्हा सगळा हियं । ₹ श्रीमद्भगवद्गीता र राजस्थानी अनुवाद करण सारू मूळ सुगरण पर प्रेरणा रो उपाय तो गन्हें म्हारा साध-संगतिया नानाजी श्री मथुरादासजी जोसी, दादी मां सिरदारी, पिता श्री रामरगजी पांडिया, मां श्रीमती सुगुणोदेवी और जोडायत सूरज पाटिया रां मिल्यो जिरण सू गीता रा गीत गूजता-गूजता म्हारै हिवर र माय ऊंटा पंठग्या। म्हारा बटेरा ऋषि-मुनि वसिप्टजी-परासरजी-वेद व्यास जी, सुखदेव जी पर रयामांठियाजी सूं भी घरणी प्रेरणा मिली। मानीता संत महातमा करपात्रीजी, स्वामी रामसुखदासजी, श्री विवेक नाथजी, श्री शंकरनाथजी महाराज, श्री रामगोपालजी मोहता, श्री झमरणसा जोसी, श्री कोटी महाराज गोस्वामी, श्री वेवा महाराज, श्री मघारामजी वैद्य, श्री सोमेश्वरानन्दजी भारती, जनाचार्य श्री नगराजजी, श्री नाना लालजी, श्री पूज्य जिनचन्द्र सूरीजी, श्री लब्धि विजयजी, मुनि श्री कमल विजयजी वामणवाड़जी तूं भी घणी मोकळी प्रेरणा मिली : गीता रे राजस्थानी अनुवाद करण में सुमरण पर प्रेरणा रै सुर में घणों उमाव वधावरण में घणों नामी नाँव राजस्थान रा लोकनायक, जननेता, विधायक म्हारा घणा नैड़ा साथी सुरगवासी श्री मुरलीधरजी व्यास रो है। खाखीबाबा म्हारे बीकाणे रा महाराजा गंगासिंहजी पर महाराजा सादूळसिंहजी सूं भी मन्हें राजस्थानी में गीता लिखण री प्रेरणा मिली जिणन हूँ कियाँ बिसरा सकू हूं। संस्कृत-हिन्दी-राजस्थानी रा घणा प्यारा घण मानीता लिखारा, म्हारा साहित रा अग्रज सेवादार सुरगीय श्री सूरजकरणजी पारीक, श्री नरोतमदासजी स्वामी, ठा० रामसिंहजी, कवि प्रो० चन्द्रदेवजी शर्मा, श्री शम्भूदयाल जी सक्सेना, श्री मुरलीधरजी व्यास 'राजस्थानी', श्री विद्याधरजी शास्त्री, श्रीचंदरायजी माथुर, श्री जगदीश प्रसादजी दीपक, श्री गणेशी लालजी व्यास 'उस्ताद' श्री सुमनेशजोसी श्री भतमालजी जोसी, श्री अगरचन्दजी नाहटा, एल. पी. टैसीटोरी, मनुज देपावत , मस्तान, श्री रामनाथ व्यास परिकर, रविन्द्रनाथ टैगोर और मीराँ आदि सूं भी मन्हें घणों उमाव मिल्यो कलम चलावण में ! बाँ सगळाँ रा नाँव भुलायाँ कद सरै ! ऊपरळी सगळी वातां साँतरी हुँवतां थकां भी आपण बीकानेर रा कळकंत परवासी-निवासी भाई-बंधु सर्व श्री मनूलाल प्रात्मज श्री मगनलालजी पारख श्री चान्दमल आत्मज श्री भीकमचन्दजी अभाणी, श्री बालचन्द प्रात्मज श्री सोहनलालजी साँड, श्री रामबाबू अत्मज श्री छगनलालजी भटड़, श्री नारायणदास पात्मज श्री आसारामजी मुंधड़ा, श्री माणकचन्द पात्मज श्रीसौभाग्यमलजी रामपुरिया, श्री प्रेमरतन आत्मज श्री अमरचन्दजी विस्सा, तथा बीकानेर बसंता घण मानीता डा. करणी सिंह जी ऑफ बीकानेर (महाराजा गंगासिंह जी ट्रस्ट व करणीसिंह फाउण्डेशन ट्ररट) भू० पू० विधायक भाई गोपाल जोसी (छोटू-मोटूजोसी), श्री तुलसीरामजी आचार्य प्रात्मज श्री प्रासूरामजी आचार्य, डॉ० प्रेरमतन प्राचार्य प्रात्मज श्री नन्दलालजी प्राचार्य श्री अक्षय चन्द्रजी शर्मा, भाई श्री द्वारका प्रसाद जोसी अात्मज श्री धनसुखदासजी जोसी पर भाई भंवर लाल कोठारी प्रात्मज श्री मेघराज जी कोठारी री उरळ हियं सू करी मदद बिनां श्रीमद्भगवद्गीता रो भीमानन्दी राजस्थानी अनुवाद प्रापर हाथां में इण रूप में समरपण कर पुगावणो म्हारै बूत में ही कोनी हो । घणे मान सूं धन्यवाद रा पात्र है सगळा मानीता भाई-बंधु अर भीरी-भायला जिका म्हारी साधना नै साधण जोग सफळ बणावरण में लापरै समरथ सारू घणी मोकळी मदद करी। इण रै अळावा म्हारा धाकड़-धाड़फाड़ संगळिया-साथी, भाई-भायला, सगा-परसंगी, साहित्यकारां-कलमकारा, चित्रकारां-पत्रकारों पर समाज रा साचा सेवादारां सगळी सूही घणों लाड़-प्यार अर उमावो मिलतो रेयो जिका सूं ही गीता रो प्रो' अनुवाद-फळ प्रापर श्री हाथ में है । आप सगळा लोगों ने प्रो' फळ किसोक लाग्यो-चाख' र लिख भेज्याँ सू हीज जारणीजसी ! आ घणे हरख री बात है कि साँखला प्रिंटर्स, बीकानेर रा व्यवस्थापक श्री दीपचन्द साँखला गीता नै पाछी सू आछी छापण में घणी-मोकळी लगन लगाई । धन्यवाद पर बधाई रा हकदार है । चाखो अक अमरफल चाखो गीता जिसी मैं जाणी-समझी है गोखतां-गोखता, घरगमान सूं समरपित

कार भेटघा सगळो नै पोगा-गोगा ! श्रीमद्भगवद्गीता गे भीमानन्दी
गजस्यानो अनुगर धीमान सू गावर मोग श्री विद्याधर जी शास्त्री र श्री चरणों
में गारपित गेंट किया है. पगा पाप गगळा गार्ग विश्व ग लोग. जुर्गा-जुगाँ
नई जीवता-जागना परमामांगे माग लेगाना गो' मन में भरोगो है। आप
सगळा पर प्राणी आग प्रावणवाळी गीगार में गीता रो भीमानन्दी
राजस्थानी अनुवाद भेंट है । ' गीता रा गीता पठारे' गांवता रहा तो म्हारी
गागी सात हयगी । गोसा मातमागे रंगी।
गीता में गगळा र प्रमोला गाम बाग में गारवाद हूँ" री मांगलिक
धुन ही राजनीति पर गगा रनगा में भ्र.वी-मरण री धुरी है। जकी मैं पढ़ी-
गोगी पर जागी रामनी । पा ही मांगलिक धुन "वादे-यादे जायते तत्त्व बोध"
में है । नारयार से गुरही कार में गमगण भाव है-"प्राव रे अरजुन ! प्रेक
म्हारी ही सगा में पाय" भगवान गे गैर-मर पुकार- सुणगण पर अकमत
चालय में ही परमानंद अर मोटा है। सारवाद होज श्रेक सांगोपांग सुखी
विश्वराज-समाज जनगा हुय सके है ! प्रागं भगवान जाण-कूकर के हुयसी ?
गीत देवकीनन्दन गायो
अफ सास्त्र ही गीता गान
सुमरण भर आराधण जोगो
देव का श्री कृष्ण सुजान
मंत्र अफ श्री कृष्ण नांव ही
मेवा फरम परम भगवान
भीमपाँडिया
विश्वाम्विका भवन
बीकानेर
दिनांक १४ नवंबर १९८४
नेहरू जन्म दिन-बाल दिवस
ग्रंथ विमोचन परब
अाशापुरा नयाशहर, बीकानेर
२ अक्टूबर, १९८४

श्रीमद्भगवद्गीता
भीमानन्दी राजस्थानी अनुवाद
নিন।
ही
थे हो मात-पिता दोउँ म्हारा
थे
भाई-सखा सुजान
थे ही हो विद्या-धन दौलत
थे ही हो सब कुछ भगवान
ध्यान
परम सांत मुख मण्डळ सोया सेषनाग सैया सिणगार ।
कमळनाभ प्रभु देव-देवाँरा सकळ जगत जीवण आधार ।।
आसमान ज्यूँ सगळे व्यापत मेघवरण सुभ अंग सुजान ।
कमळनैण श्रीवर लिक्षमी रा मिलै जका जोग्याँ घण ध्यान ।।
सकळ लोक रा पाळक स्वामी जलम-मरण भय जका मिटाय ।
लुळ-लुळ नमस्कार उण प्रभुवर श्री विष्णूं मैं सीस निवाय ।।
সালামু
विजै देव गजवदन विनायक चरण कमळ में ध्यान धराय ।
सूरज मेटै जियाँ अँधेरो कर सुमरण सब विघन मिटाय ।।
सुमुख अकदंतो सुभ कपिळो गजकरणो लम्बोदर जाण ।
नित विकटो नित विधन नासणों ध्याय विनायक सदा सुजाण ।।
मंगलाचरण
F

धूमपातु श्री गणाध्यक्ष अर भालचन्द्र गजवदन सुजाण । सुणे-पढे सुमरण नित ध्याचे बारह नांव मांगलिक जाण ॥ विद्यारंभ विवाह गुवेळा घर परवेश-निकारा गुजाण । संकट अर संग्राम घिराणे पड़े विघन नहि निराचे जाण ।। धारण वदन ऊजळा बसतर चाँदवरण परराण चित जाण । ध्याय चतुरभुज रूप विष्णु रो विधन विनासण राकळ सुजाण ।। मन इंछा पूरण सिंध साधण देव-देव राव पूजे ध्याय । सगळा रा राव विधन विनाराण नित गणपत ने सीस नवाय ।। नमूं व्यारा ! नाती वसिष्ठ रो पोतो सक्ति तपोनिध जाण । रिसी परारार जी रो बेटो मुनि सुखदे रो पिता सुजाण ॥ व्यारा विष्णु रे रूप मनीज विष्णु व्यास ₹ रूप सुजाण । नगू ब्रहानिय व्यास देव में निव वसिष्ठ वंसज प्रभु जाण ।। विनां च्यार मुखवाळा ब्रह्मा दो हाथांळा विष्णूं जाण । विना तीसरे नेतरवाळा महादेव साक्षात सुजाण ॥ आतम हेलो हूँ नाती उण आदवंस रो प्रभु किरपा पर घणों गुमान स्यामपांडियै री धरती पर भीमपाँडियो भगत सुजाण ।। जलम जित जगती पर धारूं जगतपती री जोत पसार । जननी जलम भोम रो कण-कण सदा उजाळू वणूं न भार ।। अरज करूँ सुगुणी रो जायो राखीजै नित कलम सुवाव । सुभ पारासर वंस उजाळं नित निरमळियो करम सुभाव ।। जको ब्रह्म जाणे सो ब्राह्मण सबनें दीजै पुण्य फळाव । आखा भूत प्राणियाँ सुख दूं ओ' गीता रो ज्ञान सुणाय ।। सबने निरमळ हरी भजन दूं सगळा नैं दूं प्रभु रो प्यार । सगळां नैं जीवण जस जोती सुभ गुणियाँ मोती सिणगार ।। मुगती रो फळ वीज फळंतो धरती रो करदूं सिणगार । मोटी महर हुवै प्रभु री तो तन मन कदै न आवै हार ।। श्रीमद्भगवद्गीता

भींव भगत नैं सतपथ दीजो फूल-फळे सगळो परिवार ।
प्रभु थारो गुण गाऊँ जगत में मिनख जमारै बारम्बार ।।
भाई-भायेलाँ भेळप दीजो नेह भरयो सगळो संसार ।
सगळे माण-समाण सवायो जलम-जलम रो जस आधार ।।
मा
पू
कुळदेवी म्हारी माँ जगदंवा आ म्हारै सागै आ ।
दुसमणियाँ तूं करी रुखाळी संकट
संकट सभी टळा ॥
पूजा और पुजापो ओ ही धूपू ध्यान धरा ।
छप्पन भोग
दाळ-घी-दळियो
रुच-रुच भोग लगा ।।
छान-झूपड़ा-घर-आसरिया राम कुटैया छा
मुळकतड़ा टाबर आँगणिय अन धन सभी पुरा ।।
सरब ओपमा लायक भाषा वाणी
मधुर गुजा ।
में
गाऊँ सुरीलो इमरत रस वरसा ।।
दिव्य दीठ दै दिव्य तेज दै हिवड़े जोत जगा ।
आखो विस्व अक घर करदूं घर-घर मंगळ गा ॥
कण-कण में सुख सोरम भरदै मारग सुगम बणा ।
पग-पग विजै दान दै जग में लाल
धजा फुरका ॥
सातूं सुर
मंगळाचरण

श्रीमद्भगवद्गीता [ भीमानन्दी राजस्थानी अनुयाय ] १७-२१ श्रीकृष्ण २३-२६ अं गीता रा गीत पठार ध्याय विप री विगत बखाणूं १. अरजुन विपाद योग को पटियां री दोन रोनार्या रा परवान-परधान वीर्ग पर बार संगा री धुनों री विगत तथा सजन-संबंधी का रे पाप सूं गंवरीज्योः अरजुन द्वारा विषाद करणे रो बगागा करणों। २. सान्य योग अजुन नै जुद्ध साम जोस दिरांवता-दिरांवां भगवान द्वारा सांगय योग, करम योग स्थितिप्रज्ञ गे खुलासा बसारण करणों। ३. करम योग श्री भगवान द्वाग ज्ञान योग पर करम योग र सगळा साधनां मुजव करतब-करम करण री जरूरत बतावणी पर प्राप-ग्रापरा धरम पाळण री महमा वखाणनी तथा काम-विरोध र उपावां रो बखाण करणों । ज्ञान करम सन्यास योग मगुरण भगवान र परभाव अर निसकाम करम योग रो बखाण करता-करताँ अनेकू होमायता अर ज्ञान री महमा रो बखाण करणों । करम सन्यास योग सांख्य योग, निसकाम करम योग, ज्ञान योग अर भगती भाव सूं ध्यान योग रो बखाण करणों । ६. आतम संयय योग निसकाम करम योग रो बखाण करता-करता प्रातमा ३१-३४ ४. ३५-३८ ५. ३६-४१ ४३-४७ री मुगती सारू उमाव दिरावणों तथा मन नै काबू कर ध्यान योग करण री गति तथा योग भ्रष्ट री गति रो बखाण करणों। ७. ज्ञान-विज्ञान योग ज्ञान-विज्ञान पर श्री भगवान री व्यापकी रो बखाण तथा दूजा देवाँ री उपासणा रो फळ बताँवता-बताँवताँ श्री भगवान नै परभाव-पूरण नहीं जाणतड़ां री निन्दा अर परभाव-पूरण जाणतड़ाँ री महमा रो बखाण करणों। ४९-५१ ५३-५५ ८. अक्षर ब्रह्म योग ब्रह्म, अध्यातम अर करमाँ रे बारे में अरजुन रा करिया सात सवाल पर श्री भगवान रा दियोड़ा बारा उत्तर, भगती योग तथा सुकल अर कृष्ण मारगाँ गे वखाण करणों। राज विद्या, राज गुह्य योग ज्ञान-विज्ञान अर संसार री उतपती रो वखारण, आसुरी पर देवीसम्पदावाळाँ रो वखारण तथा परभाव पूरण श्री भगवान र सरूप रो बखाण तथा सकाम-निसकाम उपासना पर भगवद् भगती री महमा रो बखारण ९. करणों। ५७-५६ ६१-६४ १०. विभूति योग श्री भगवान री विभूति अर योग सगती तथा परभाव सेती भगती योग रो बखाण, अरजुन र पूछण पर श्री भगवान द्वारा प्रापरी विभूत्यां पर योग सगती रो भळ बखाण करणों। ११. विस्व रूप दरसण योग विस्व रूप दरसण करावरण सारू अरजुन री विनती, श्री भगवान पर संजय द्वारा विस्व रूप रो बवाण, अरजुन द्वारा श्री भगवान ₹ विस्व रूप रो दरसरा, डरूँ-फरूं अरजुन द्वारा चतुरभुज रूप दरसरण देवण सारू श्री भगवान सू बिनती, श्री भगवान द्वारा विस्व रूप अर चतुरभुज रूप रै दरसरण री महमा अर अनन्य भगनी में पी गया में भंग गे गाण ६५-७० १२. भगती गोग माया ममतारी Itart की रो पर Eritri Mammi। १३.निमाम गोग it - मनिपुर से ७१-०२ - ७७-08 ८१-८२ १४. म मनिभाग योग 1 tarhar me ... में, की अदा इन kamar in । १५.. मोना योग माना, यो मारे गं. रोनारमा, माती परार TET रोगया REPोर स्पोमागमाल गंगा, कारणों। १६. गागुर मापद विभाग गांग रमेती सी र पामुगे मागदा से सगाण तगा मागे पापा ने छोटगी पर सारा मुमब पापरप मारमा चमाण करणों। १७. अदापय विभाग योग सरमा री पर सान विपरीत पोर तप करणियां रो बमामा, भोजन, यश, तप पर दान से न्यारो-न्यारी भेद मा ॐ तत् सत्रै परयोग रो बमाण करणों। १८. मोक्ष सन्यास योग त्याग रो, माल्य सिद्धान्त रो, फळ सेती वरण-घरम रो उपासना सेती शान-निसठा गे, भगतो सेती निसकाम परम योग रो, पर गीता र महातमरो बसाण करणों। गीता महातम अर सुभकामना-सम्मतियां ८३.८५ ८७-८६ ६१-६७ ६९ से

r
MARA
सुर संप माँ सारदा सुख सरसै संसार

kum.nA
NOT
7
ournal
महर्षि
परासर

महर्षि वेदव्यास प्रामार 11. आई011ोम याद Hariram ariat में मोहो.. तो गु मोti 14tartो पात मांगे भने। itientitatirf मोमो Stोमा in : मो.FAM भी हो trairi पान कोनो भी सेना eft menon मीन में भाग बालो कालो पो..... १tti iryोग. Eatin मोर 3. भीम मोमोजोमनाने की ममता १. भीमा RER ५. भीमा की मानी ६. श्रीमान श्री गोयाममा म ३. भी 7 भी सामग्री : ५. श्री मानपद शाम को मोमानी गरिमा 1. श्रीराम मारमान भी अगायोटासकार . गलं. हि मागे पद दिनों प्रो' गीना गन्य मा सोमारहाय में दापर युगानागों बार-समय में ही कोनी। प्रो मुगळां री दिगोटी गलतियों में भाग गपद पर उमाल धिन धिन । मागणी मिनी मोगांरी कारभामा गमस्थानी मिग-धिन । धी दादावाड़ी गांव केसरदेगर जाटान पांदियाळो बीकानेर (राजस्थान) गुगुणीदेवी/श्री गमरखजी पांडिया सुगुणी प्रकाशन विश्वाम्बिका भवन पाशापुग नयाशहर, बीकानेर

धीमद्भगवद्गीता
ওয়ানী মালালী সনাক্ত
श्रीमतभावशीला
राजस्थान
अन्याय
श्रीमदभगवद्गीता RTINण्य
24 and
सुगुणी प्रकाशन, बीकानेर
विश्वाम्बिका भवन
आशापुरा नयाशहर, बीकानेर (राज.)

....
*-
समरपरा रा सुर
.
नगगी, जोग
हा....... र जमा
तीन तीन भी
TREE मांगारधारा
गोभी भरमा
...मीओ
ant :- भीमान
मा। ये मानो अर
नामा मागमार मोरठा
FE मांगनगा।
frecert 21
आम पग चीका, नगगन च भिनाई.
विद्यागर विभाग, मानी गालि मुजनः
सिमी ग मार, गंगान--दिल्ली-पानी,
मगाम जग गाग, आगो भाग्न मुकियो ।
नमण-गण-भगर, मिगरी मीठा बोलणा,
गुरणे गरज-उजाग, ऊजळ गांव कमाइयो ।
पन्य गग में पाय, कोजाये मम्पर
लोग नवार्य गाथ, विद्याधर गुरु रा गुरु ।
घणमान मूं
hi

श्रीमद्भगवद्गीता
भीमानन्दी राजस्थानी अनुवाद
घणे मान समरपित
श्री विद्याधरजी शास्त्री ने
AwaommmmmmwarNAay
Jan
जन्म २ अगस्त १६०१
चूरू (राजस्थान)
निर्वाण २४ फरवरी १९८३
बीकानेर (राजस्थान)

श्रीमद्भगवद्गीता
भोमानन्दी राजस्थानी अनुवाद
".
स
.
भीमपांडिया
जन्म १६ जुलाई १९२६
बीकानेर (राजस्थान)
वि० सं० १९८६ पापाढ़ सुदी १३

--

No text on this page.

श्रीमदभगवद्गीता
भीमानन्दी राजस्थानी अनुवाद
पहलो अध्याय
अरजुन विषाद योग
धृतरासटर पूछयो-
धरम भोम कुरुखेत बिचाळ झगड़ो झोय हुया भेळा
कोरू-पांडू-पूत कियो के संजय ! उण जुध री बेळा ।। १-१ ।।
संजय बतायो-
सजी पाँडवी सेना निरखी व्यूह तणी दुरजोधन राय
उण वेळा राजा जा बोल्यो द्रोण गुरू रै ने. जाय ।। १-२ ।।
द्रुपद पुत्र ज्ञानी सिष द्युमणै पाण्डव सेन सजी व्युह ताण
गुरुवर आप निरखल्यो इणनैं दळ-वादळ ऊभी जुध ठाण ।। १-३ ।।
अरजुन-भींव जिसा धनुधारी इण सेना में वीर अनेक
सातक द्रुपद विराट महारथ ऊभा जुध री राखण टेक ।। १-४ ।।
धृष्टकेतु अर चेकितान है पुरुजित कुतीभोज महान
कासीराज सैव्य नर नाहर ऊभा सूर काळजो ताण ।। १-५ ।।
जुधामन्यु उतमौजा ऊभा अभिमन्यू बळवीर महान
पाँचूं पुत्र द्रौपदी रा भी सगळा महावळी मैदान ।। १-६ ।।
ब्राह्मणदेव म्हारळे पख में जोधा जाणो आप प्रधान
म्हारी सेना रा सेनापत थाँ सेती हूँ करूँ वखाण ।। १-७ ।।
थे हो, दादो भीष्म, करण है कृपाचार्य जुध जीतणिया
विकरण अर अस्वत्थामा है सोमदती भूरीसरवा ॥ १-८ ।।

No text on this page.

सुणो महीपत, 'हृषीकेस हे !' कहयो कृष्ण नैं वचन उचार
अरजुन बोल्यो-
हे अच्युत ! रथ नैं थे थामो दोनूँ सेना मध ठहरार ।। १-२१ ।।
नेक निरखलू जुध मद-माता जोधावाँ नैं निजर पसार
जुध करणों लायक किण सागै सावळ करलूँ सोच-विचार ।। १-२२ ।।
दुरजोधन दुरबुध हित आया जका-जका राजा रणमाँय
उण सूराँ मैं हूँ निरखूलो जको भलो उणरो मन चाय ।। १-२३ ।।
संजय बतायो-
धृतरासटर महाराज ! , कृष्णजी सुण अरजुन री सारी बोत
रणभोमी रै वीच-विचाळे उत्तम रथ नैं दीनो थाम ।। १-२४ ।।
भीष्म द्रोण राजावाँ सामैं कहयो कृष्ण रथ नैं ठहरार
जुद्ध करणने आया कौरव निरख पारथा निजर पसार ।। १-२५ ।।
इण उपराँत अरजुनै निरखी दोनें सेना निजर पसार
दादा काका भाई भतीजा मामा पोता गुरुवर त्यार ।। १-२६ ।।
सुसरा सजन सनेही ऊभा जुध भोभी में लड़ण तण्या
निरख्या निजर पसार अरजुनै भाई-बेली सभी जणा ।। १-२७ ।।
सोक व्याप घण हुयो गळगळो अरजुन कहयो कृष्ण भगवान
अरजुन वोल्यो-
सजन सनेही सगळा निरखत जूझण ऊभा जुध मैदान ।। १-२८ ।।
सिथळावै सव अंग म्हारळा मुखड़ो भी सूखंतो जाय
तनड़ो काँप धूजणी छूट रुंआळी सव तणती आय ।। १-२९ ।।
पड़े धनुष गाण्डीव हाथ सू वळे घणी काया री चाम
मन भरमायो-सो है म्हारो ऊमण सकूँ न समरथ राम ।। १-३० ।।
उलटा लछण केसवा निरखू निजर पसारूँ जून जोय
मार जुद्ध में सुजण-कुटुम्बी कुळ में श्रेय न दीसै कोय ।। १-२१ ।।
१६/ अरजुन विपाद योग

नाममा iff :
4
++AN
A } ?..: ।।
ifणा गाना गा माग ।। १८ ।।
.: नागो गाना मांग
नमो ||2-3' ।।
Timi Eti
मागमदर , मागी. मग
मी मामा fami fमा मागे जाम ।। १.३७ ।।
लोग-भाटनिन गा लोग जान माग
far बर: आर माय गे गिणे न लोग 117.३८ ।।
गुळ नागण में दोग लेगो भाषा बाण जमा शिकार
पाप करम में जगणे गानो गा गनिनार || १-१०॥
गुल नारा लगा गमावन नष्ट-भट गगळाग जाग
परम नाम ग सगळे गुन ने काठी के पाप दवाय ।। १.४० ।।
घणों पाए बवियांण माली का सभी विग: गुळनार
जण वरणमंगर गंवानां दुराटण वण ये दोगण नार ।। १-४१ ।।
मुळ्याती गुळ नरक पठायण हुवे वरण मंकर गंतान
पतित हुवै सब पितर लोग भी लोप हुयां जळ-पिण्ड दान ।। १-४२ ।।
वरणसंकरी इण दोसां रे व्याप्याँ सगळा भ्रष्ट हुदै
कुळधात्याँ कुळ धरम सनातन जात धरम सब नष्ट हुवै ।। १-४३ ।।
२०/ श्रीमदभगवदगीता

इसो सुण्यो है म्हे जनारदन कानां करण जोग विसवास
नष्ट हुयो कुळ धरम मानखो अणत काळ लै नरकावास ।। १-४४ ।।
हाय सोक है सुध-बुध धारी बडो पाप करणे म्हे त्यार
राज भोग सुख लोभ कारण सँभिया कुळनैं देवण धार ।। १-४५ ।।
ससतर धारी धृतरासटर रा सुत लेवै जे रण में मार
बिन-ससतर विन कियाँ सामनो मन्हें मारणों घण हितकार ॥ १-४६ ।।
संजय बतायो-
रणभोमी में सोक-गळगळो अरजुन इणतर वचन उचार
धनुष-बाण नैं नाँख धनंजै रथ में जाय बैसियो लार ।। १-४७ ।।
२१/ अरजुन विपाद योग

कृष्ण जीतणो हूँ नहिं चाहूँ और राज सुख री नहिं चाह
राज भोग जीवण तूं गोविंद की परयोजन दीसै नाय ।। १-३२ ।।
राज भोग सुख री म्हे मन में जिणां कारण राखाँ चाह
धन जीवण री आस छोड़ने बै ही आ ऊभा जुध माँय ।। १-३३ ।।
गुरुवर पितर पुत्र अर दादा पोता जुद्ध करण के जोग
मामा साळा सुसरा जुध में खड़ा सामने समधी लोग ।। १-३४ ।।
मन्हें मारियाँ भी मधुसूदन ! मारूँ इणां नहीं मन माँय
धरती तो तुछ तीन लोक रो राज मिले तो भी नहिं चाह ।। १-३५ ।।
धृतरासटर रा पूत मारियाँ खुसी हुवै के म्हाँ मन माँय
इण पापीड़ाँ नैं मारयाँ भी माधव पल्लै पाप वधाय ।। १-३६ ।।
धृतरासटर रा पूत वंधु जण म्हे माराँ म्हारै नहिं जोग
कुटुम-कवीलो मारचाँ माधव कियाँ मिलैलो सुख रो भोग ।। १-३७ ।।
लोभ-भ्रष्ट-चित हुया लोग अ चेताचूक हुया खो होस
मितराँ बैर पाप नहिं जाणे कुळ नासण रो गिणे न दोस ।।१-३८ ॥
कुळ नासण रो दोस हुवै सो आपाँ जाणाँ जको विकार
पाप करम सू बँचण सारू करणो चहियै क्यूँ न विचार ।। १-३९ ॥
कुळ नास्याँ कुळ धरम सनातन नष्ट-भ्रष्ट सगळा हुय जाय
धरम नास · सगळे कुळ – काठो लेवै पाप दवाय ।। १-४० ।।
घणों पाप बधियाँ घण माड़ो कृष्ण सभी बिगड़े कुळनार
जण वरणसंकर संतानाँ दुसटण बण बै दोसण नार ।। १-४१ ।।
कुळघाती कुळ नरक पठावण हुवै वरण संकर संतान
पतित हुवै सब पितर लोग भी लोप हुयाँ जळ-पिण्डाँ दान ।। १-४२ ॥
वरणसंकरी इण दोसाँ रै व्याप्याँ सगळा भ्रष्ट हुवै
कुळघात्याँ कुळ धरम सनातन जात धरम सब नष्ट हुवै ।। १-४३ ।।
२०/ श्रीमद्भगवद्गीता

इसो सुण्यो है म्हे जनारदन कानां करण जोग विसवास
नष्ट हुयो कुळ धरम मानखो अणत काळ लै नरकावास ।। १-४४ ।।
हाय सोक है सुध-बुध धारी बडो पाप करणे म्हे त्यार
राज भोग सुख लोभ कारण सँभिया कुळनै देवण धार ।। १-४५ ।।
ससतर धारी धृतरासटर रा सुत लेवै जे रण में मार
विन-ससतर बिन कियाँ सामनो मन्हें मारणों घण हितकार ।। १-४६ ।।
संजय बतायो-
रणभोमी में सोक-गळगळो अरजुन इणतर वचन उचार
धनुष-बाण नैं नाँख धनंजै रथ में जाय बैसियो लार ।। १-४७ ।।
२१/ अरजुन विपाद योग

No text on this page.

दूसरो अध्याय
सांरव्य योग
संजय बतायो--
आकळ-बाकळ सोकाकुळ लख अरजुन आँख भरायो ज्यूँ
मधुसूदन भगवान दयाकर अरजुन नैं समझायो यूँ ।। २-१ ।।
भगवान बखाण्यो-
अधरम जोग कुजोग अरजुना वेमौकै क्यूँ मोह करै
सरग टाळ अपजस करवावै इसी आँख क्यूँ आज झरै ।। २-२ ।।
थारै जोग कायरी कोनी मत बण तूं कायर-लाचार
हियो दूबळो मत कर अरजुन जुद्ध करण नैं हुयजा त्यार ।। २-३ ।।
अरजुन बोल्यो--
समरभोम में कियाँ चलाऊँ भीषम-द्रोण काळजाँ वाण
पूजनीक दोन ही म्हारै ऊभा समुख काळजो ताण ।। २-४ ।।
वध न करूँ गुरुजन है म्हाँरा बाँने मार कियाँ तरसू
लोही-लिवड़िया भोग न भोगूं भीख माँग भोजन करतूं ॥ २-५ ।।
म्हे नहिं जाणाँ के आछो है जुद्ध करां का माँगाँ भीख
समधी मार जियाँ नहिं इंछा किंण री हार किणाँ री जीत ।। २-६ ।।
ममता मोह घिरायो छतरी चेताचूक न चित्त ठिकाण
हूँ सरणागत सिष्य आपरो भली सीख देवो भगवान ।। २-७ ।।
मनाँ-इन्दरियाँ सोक मिटावै लखू न कोई इसो उपाय
दुसमण देव सकळ वस करलूं तो भी राज-भोग सुख नाय ।। २-८ ।।
सांस्य योग/२३

संजय बतायो--
राजन ! खुलो खुलासा वोल्यो कृष्ण तणों अरजुन मुख खोल
जुद्ध न करूँ बात इतणी-सी मौन हुयो अरजुन यूँ बोल ॥ २-९ ।।
दो सेना रै बीच-विचाळे अंतरजामी सकळ सुजान
सोकाकुळ अरजुन नैं कहियो होळ-सी हँस श्री भगवान ।। २-१० ।।
भगवान बखाण्यो-
सोक करै पिंडत ज्यूँ बोलै जका सोक करणे नहिं जोग
मरयाँ-जियाँ रो सोक न लावै पण मनडे में पिंडत लोग ।। २-११ ।।
किणी काळ हूँ तूं औ राजा कोनी हा अरजुन मत जाण
फेर भळे आगै न हुवाँला आ भी तूं मन में मत आण ।। २-१२ ।।
बाळ जवानी विरध अवसथा भोग है ज्यूँ सकळ सरीर
खोळ बदळ भी करै आतमा मो-माया में फँसै न धीर ।। २-१३ ॥
छिणभंगुर सब भोग इन्द्रियाँ गरम-सरद सुख-दुख संजोग
भरत वंस रा लाल अरजुना करलै सहन सहन रै जोग ॥२-१४ ।।
आकळ-बाकळ कर न सके रे धीराँ नराँ इन्द्रियाँ भोग
सम सुख-दुख समझै सो धीरो अरजुन मोख-मुगत रै जोग ।। २-१५ ।।
अरजुन नहीं असत री सत्ता सत रो कोनी अठै अभाव
ज्ञानी तत्व छाण लख दोनूं निरण कियो खुलासा साव ॥ २-१६ ॥
चेतन तत्व सदा अविनासी अरजुन तूं अविनासी जाण
उण चेतन नैं कूण विनासै कोई भी नहिं समरथवाण ।। २-१७ ।।
नासवाण है देह अरजुना पण नित रैवै आतमा-प्राण
उठ जुध कर बळवीर भारता अजर-अमर जीवातम जाण ।। २-१८ ।।
मरै न मारी जाय आतमा निसचै जो जाणे सो जाणे
मरण-मारणे जोग आतमा जो जाणे सो ठीक न जाणे ।। २-१९ ॥
२४/श्रीमद्भगवद्गीता

जलम न लै नहिं मरै आतमा हुयो न हुयसी भविस सुजाण
तन मरियाँ भी मरै न सासत अमर आतमा नित्य पुराण ।। २-२० ।।
अविनासी अज अमर आतमा पारथ जो नर जाण विचारै
वो नर भलाँ मारण खातर किणमैं तेड़ कियाँ किण मारै ।। २-२१ ।।
बोदा बसतर त्याग पुरुष ज्यूँ । आ-निकोरा वसतर धारै
त्यूँ वोदो तन तजै आतमा हुँ ई-निकोरी काया धारै ।। २-२२ ।।
अमरी इसी आतमा इणनै काटण सकै न ससतर पाय
गाळ न बाळ सकै जळ अगनी सकै न इणनैं पून सुखाय ।। २-२३ ।।
अणछेदी अणबळी आतमा अणभीजी अणसोख बराण
अकरूप है सदा सनातन सरवाळे व्यापक थिर जाण ।। २-२४ ।।
अणभण अणचीत्यो अविकारी इसो आतमा रो है माण
सोक कदै नहिं करणों अरजुन इसड़ो ही मन में तूं जाण ।। २-२५ ।।
नित जलमी अर मरी जु जाणें इसौ आतमा रो जे माण
तो भी तो अरजुन इण तरियाँ सोक न करणों उचित सुजाण ।। २-२६ ।।
जो जलमै सो मरै जरूरी अरजुन तूं निसचै ध्रुव जाण
इणतर अटळ विषै पर भी तो सोक न करणो जोग सुजाण ।। २-२७ ।।
जलमण सूं ले मरण समैं तक दरसण भूत देवै संसार
मरयाँ पर्छ हुय जाय अदीठा वाँरो सोक सफा वेकार ।। २-२८ ।।
इचरज देख सुर्णे पिंडतजण इचरज भरी वखाणे रे
पण कोई सुण पुरुष आतमा भली भाँत नहि जाणे रे ।। २-२९ ।।
सकळ प्राणियाँ री देहाँ में वसी आतमा नहीं समाय
छोटा-मोटा इण जीवाँ हित तूं अनुचित क्यूं सोक समाय ।। २-३० ।।
धरम-करम 1 विचळित होणो भलो न अरजुन लख संजोग
धरमजुद्ध सूं बडो न कोई साधन थेय क्षत्रियाँ जोग ।। २-३१ ।।
सांख्य योग/२५

धरमजुद्ध मुख पोळ सरग री धन्य जका क्षत्री जावै
मीन मेख इण में नहिं अरजुन अवस भोग सुख रा पावै ।। २-३२ ।।
जे तूं धरम जुद्ध नहिं करसी धरम-करम-करतव टळसी
धरम-कीरती नास हुयाँ तूं घोर पाप-भागी वणसी ।। २-३३ ।।
अपजस घणों बखाण्याँ जासी लोग-लुगाई घेर-घिराय
मरण सूं भी घण दुखदायी थिर अपकीरत सही न जाय ।। २-३४ ।।
गुणीं समझ आदर देखै वै नर भी करसी अपमाण
कायर जुद्ध-भगोड़ो कहसी अरजुन तन्हें हीण सब जाण ।। २-३५ ।।
सम जाण
थारै जोग हुवै के अरजुन इण सूं मोटी दुख री बात
दुसमणिया समरथ निंदैला तीखाँ बोल करैला घात ।। २-३६ ॥
जुध में मरयाँ सरग मिल जासी जीत्याँ मिलै राज सुख भोग
"का जीतूं का मरूँ जुद्ध में" दृढ़ निसचै कर जुद्ध सुयोग ।। २-३७ ।।
सुख-दुख हाणी-लाभ सरीसा हार-जीत सगळा
इणतर कोई पाप न लागै अरजुन जुध करलै घमसाण ।। २-३८ ।।
ज्ञानयोग बुध सुणी अरजुना करम योग वुध सुण चित लाय
जिणसूं करम वंधणां छूट राग-द्वेष सव भरम मिटाय ।। २-३९ ॥
इण निसकामी करम योग में दोष न कोय बीज रो नास
थोड़ी-सी भी धरम ध्यावना मेटै जलम-मरण री त्रास ।। २-४० ।।
निसचै बुध निसकामी ज्ञानी अक रूप अरजुन चित लाय
डाळ-डाळ अज्ञानी कामी बिखरोड़ा भटकै भरमाय ।। २।४१ ।।
फळ में कोरी प्रीत अरजुना कामी पुरुष लगावण लोय
घणी ओपती बात दिखाऊ कथै न इणतूं मोटी कोय ॥ २-४२ ॥
जलम करम-फळ सरग बडो है अज्ञानी जण भण बतलाय
भोगण भोग जोग धन दौलत किरिया करम घणा सिखळाय ।। २-४३ ।।
२६/श्रीमद् भगवद्गीता

भरम भरी वाणी भटकाया धन-दौलत चित चेतो खोय
जका भोग पर लट्टू हुयरया मन सुध बुध व्यापै नहिं कोय ।। २-४४ ।।
वेद काम तिगुणाँ जग व्यापै अरजुन तूं हुयजा निसकाम
सुख-दुख योग-खेम टंटै तूं टळजा बणजा आतमराम ।। २-४५ ।।
नदी नीर मिलियाँ कद भावै ताळ-तळाव छिलरियाँ नीर
ज्यूँ ही ब्रह्मानन्द मिल्याँ नर तजै परोजन वेद सरीर ।। २-४६ ।।
फळ में नहीं करम में थारो अरजुन तूं करलै अधिकार
छोड़ वासना करम फळाँ री धरम करम करलै प्यार ।। २-४७ ।।
फळ अभिळाषा त्याग धनंजै धारण करलै तूं थिर योग
सिध अर असिध दोऊँ सम जाणो धरम करम ही योग सुयोग ।। २-४८ ।।
फळ री आस करम करियो नर दीन-हीन अर हेठो जाण
समत योग री सरण जाय कर करम अरजुना सकळ सुजाण ।। २-४९ ।।
समत योग धारी निसकामी पाप-पुण्य दोउँ नाँ लिपटाय
जलम-मरण रा बंधण टूटै अरजुन परम मोक्ष पद पाय ।। २-५० ।।
बुध योगी ज्ञानी जन अरजुन करम जण्या फळ त्योग जरूर
जलम-बंध सू छूट परम पद पाय अमर रस सू भरपूर ।। २-५१ ।।
मोह रूप दळ-दळ तूं तरसी जद अरजुन थारी बुध लाग
उण बेला निसचै तूं पासी सुणण जोग सुणियो वैराग ।। २-५२ ।।
भाँतरका सिद्धांत सुण्याँ तूं बुध विचळित घण हुई अजोग
थिर सुध बुध कर लियाँ समाधी तूं पासी रे समत-सुयोग ।। २-५३ ।।
थिर
अरजुन पूछयो
बुधवाण पुरुप रा लक्षण लिंयाँ समाधी के बतळाय
केसव ! कियाँ बो वोल-चालै वैठे सभी देओ समझाय ।। २-५४ ।।
सांस्य योग २७

भगवान वखाण्यो-
मन री सभी कामना त्यागै जिण वेळा अरजुन तूं जाण
आतम आतम संतूठे उण वेळा थिर सुध-बुधवाण ॥२-५५
दुख आयाँ मन पीड़ न व्यापै सुख आयाँ मन करै न कोड
थिर बुधवाण मुनी कहळावै त्यागै जको राग भय क्रोध ।। २-५६
सुभ अर असुभ न सुख-दुख संपै मन में नेह न राखै कोय
बो नर थिर बुधवाण अरजुना सरव काळ सरवाळे होय ।। २-५७
थिर बुधवाण जको नर होवै विषै भोग सव देवै मेट
काछबियो ज्यूँ अंग समेटै सभी इन्द्रियाँ लेय समेट ।। २-५८
विषै-भोग तज दियाँ इन्द्रियाँ विषै मिटै पण मिटै न राग
पण मिलियाँ परमातम छूट सुण अरजुन उण री रस राग ।। २-५९
जतन करै बुधवाण घणा पण जीत न सकै पुरुष री जात
मन-मथणी मन मथै इन्द्रियाँ अरजुन चित नैं हरै बलात ॥ २-६०
उण नर री बुध थिर है अरजुन जो वस करलै सकळ सरीर
संयम धार इन्द्रियाँ योगी भगत हुवै म्हारो ही धीर ।। २-६१
ध्यायाँ विषै आसकी व्याप मन में उठे काम री सोध
मन-इंछा जद हुवै न पूरी अरजुन उपजै भारी क्रोध ।। २-६२
उपज्याँ क्रोध मूढपण व्यापै खोय विवेक भरम भरमाय
भरमजाळ फँस सुमरण सगती सुध बुध साधन सभी गँवाय ।। २-६३
राग-द्वेष तूं मुगत आपवस भोगत विष इन्द्रियाँ भोग
पा लेवै परसाद अरजुना मन पर काट न लागै रोग ।। २-६४
निरमळ मन सगळा दुख हरदै चित व्यापै आनंद सवाय
अरजुन जिण रो चित परसण है उणरी सुध बुध थिर हुय जाय ॥२-६५ ।
साधन हीण पुरुष नहिं पावै सुध बुध और आसतिक भाव
बिनाँ आसतिक भाव न साँयत बिन साँयत सुख कूँ कर आय ।। २-६६ ।
२८/श्रीमद्भगवद्गीता

विषै-इन्द्रियाँ विचरण करताँ मन सुध बुध रो हरण करै
पवन विचरतो ज्यूँ जळ माँही तिरती-फिरती नाव हरै ।। २-६७ ।।
जकै पुरुष री सकळ इन्द्रियाँ सगळा विषयाँ तूं नित दूर
अरजुन जो राखै मन काबू उणरी सुध बुध थिर सैंपूर ।। २-६८ ।।
जोगी बुद्ध जागरण जागै हुवै भूत प्राणी री रात
नासवान सुख भूत जगै जद तत्वमुनी समझै सम रात ।। २-६९ ।।
नदियाँ नीर मिलै समदर ज्यूँ अचळ सांति सू जाय समाय
भोग भिळयाँ थिर बुध धारी ही पाय सांति पण कामी नाँय ।। २-७० ।।
जको कामना ममता त्यागै छोडै अहंकार रस-राग
अरजुन वो ही पुरुष आतमा मन में पावै सांति सुभाग ।। २-७१ ।।
ब्रह्म मिलण री आही पोड़ी मिलियाँ मोह न फँसै सुजाण
अंतकाळ तक थित रैवै तो अरजुन वो पावै निरवाण ।। २-७२ ।।
--
प
माल्य योग

**

तीसरो अध्याय
करम योग
अरजुन पूछयो-
प्रभु जनारदन जे थे मानो ज्ञान करम श्रेष्ठ बताय
तो फिर थे क्यू घोर करम में केसव देवो मन्हें लगाय ।। ३-१ ।।
फोर-बदळ कह मोटो-छोटो ज्ञान-करम-बुध मोह फँसाय
प्रभु म्हाँरो कल्याण करै सो निसचे अक कहो समझाय ।। ३-२ ।।
भगवान वखाण्यो-
दोय भाँत री निष्ठा अरजुन भाखी पहली लोक बखाण
ज्ञान योग सूं ज्ञानी मोखै करम योग तूं योगी जाण ।। ३-३ ।।
करम न करणे सूनिसकरमी हुय अरजुन सिद्धी नाँ पाय
और न करम त्यागणे मातर तूं भी कोई सिद्धी आय ॥ ३-४ ।।
निसचे जाण समझलै अरजुन कुदरत रो गुण धरम वण्यो
करम बिनाँ क्षण टिक न प्राणी जो कुदरत तूं जलम जण्यो ।। ३-५ ।।
काम रोक जो जबर इन्द्रियाँ विषै भोग मन चावै रे
अरजुन वो ही मिथ्याचारी दंभी पुरुष कवावै रे ।। ३-६ ।।
मन ा वस में करै इन्द्रियाँ अणआसक होयो वो जाण
करम इन्द्रियाँ करम योग रो कर आचरण श्रेष्ठ सुजाण ॥ ३-७ ।।
करम श्रेष्ठ कर करम अरजुना नीती नियत वखाणी रे
करम विना काया नहिं चाले कट नहीं जिनगानी रे ।। ३-८ ।।
करमयोग/३१

यज्ञ करम सू करम दूसरा लग्याँ पुरुष ही करम बँधाय
छोड आसकी सदाचरण कर पारथ करम परम हित लाय ।। ३-९ ।।
प्रजा यज्ञ सँग रच परजापत आद कळप में कहयो उचार
इष्ट कामणा थां देवणियो यज्ञ बधेपो दै विसतार ।। ३-१० ।।
उनती करो यज्ञ देवाँ री थाँरी उनती देव कराय
इणतर फरज समझ आपस में परम श्रेय वध लेसो पाय ।। ३-११ ॥
यज्ञ बधायाँ देव तूठियाँ थारै हित देसी प्रिय भोग
निसचै चोर जाण जो भोगै विना दियाँ ही दीना भोग ।। ३-१२ ।।
यज्ञ सेष ही जो अन खावै श्रेष्ठ पुरुष सब पाप छुटाय
पापी लोग पेट पोखण हित पाप पकाय पाप ही खाय ।। ३-१३ ।।
यज्ञ करम और यज्ञ हूँ बिरखा वरस्याँ अन उपजाय
सगळा भूत अन्न उपजै सव प्राण्याँ नै अन्न पळाय ।। ३-१४ ।।
वेद उपजियो अविनासी सू करम वेद सू उपज्यो जाण
इंयाँ सरब व्यापी परमेसर सदा यज्ञ थित समझ सुजाण ।। ३-१५ ॥
सृष्टिचक्र अनुसार न बरतै लोक चलायै इण परकार
पुरुष इन्द्रियाँ सुख भोगणिया पाप उमर जीव वेकार ॥ ३-१६ ।।
पण जो राख आतमा प्रीती तूठै तिरप आतमा माँय
अरजुन जाण उणाँ पुरुषाँ हित दूजो कोई करतब नाँय ।। ३-१७ ।।
कियाँ-अणकियाँ भी इण जग में पुरुष कोय परयोजण नाँय
स्वारथ-समध सकळ भूताँ में उण रो अरजुन की न लखाय ।। ३-१८ ॥
अणआसक होयो सैलँग कर करतब करम भलाँ आचार
अणआसक हुय करम करतो अरजुन पुरुष परम साकार ।। ३-१९ ।।
जनक जिसा ज्ञानी जन भी तो करयाँ करम ली सिद्धी पाय
लोक संगरै लखताँ भी तू अरजुन जोगो करम कराय ।। ३-२० ।।
३२/श्रीमद्भगवद्गीता

श्रेष्ठ पुरुष जो करै पारथा आप आचरण नैं वरतार
वो जिसड़ो परमाण वतावै दूजा बरतै उण अनुसार ।। ३-२१ ।।
अरजुन जदी कोई भी करतब म्हारो तीन लोक में नाँय
मिलणजोग-अणमिली न बसतू तो भी करम करूँ वरताय ।। ३-२२ ।।
सावधान हुय करम न बरतूं तो दूजो कुण करम कराय
ज्यूं बरतूं हूँ दूजा बरतै म्हारी नकल करंता जाय ।। ३-२३ ।।
छोड चलूँ जे करम पारथा सगळा लोक भ्रष्ट हुय जाय
जणक वरण संकर मैं होऊँ अर परजा रो नास कराय ।। ३-२४ ।।
मूढ करम ज्यूँ करै रात दिन आसक मन इंछा फळ चाय
त्यूं ही करण जोग विदवानाँ छोड आस की फळ विसराय ।। ३-२५ ।।
ज्ञानी छूट करै मतिहीणाँ किरथीणां बुध भेद न लाय
मूढाँ सूं विदवान विवेकी सदाचरण कर करम कराय ।। ३-२६ ।।
कुदरत रै गुण धरम करम सब आपोआप हुवै आ जाण
मोह जाळ पण उळझ बावळा जाण "हूं करूं' चाडै पाण ।। ३-२७ ।।
गुण करमाँ रै रूप-भेद नैं जाणणियो ततवंत सुजाण
हुवै नहीं आसक बावळियो गुण में गुण वरते आ जाण ।। ३-२८ ।।
कुदरत गुण मोहयो जण अरजुन गुण करमाँ आस कती छाय
पण ज्ञानी उण अणसमझाँ रा मन विचळण नहिं करै उपाय ।। ३-२९ ।।
अरजुन तू सुध बुध अध्यातम म्हाँ अरपण कर करम सुजान
मो-माया ममता आसा अर सोक त्याग कर जुद्ध महान ।। ३-३० ।।
मानै मत निरदोस म्हारळो बरतै नित इण मत अनुसार
पुरुष सकळ करमाँ रै फळ तूं मुगत हुवै पावै छुटकार ।। ३-३१ ।।
दोसी जका न ओ' मत पाळे वै कल्याण भटकिया जाण
चेताचूक मूढ वै प्राणी समझ
पारथा अवुध अजाण ।। ३-३२ ।।
करम योग३३

कुदरत भाव-सभावाँ चालै सव परवस हुय करम करै
ज्ञानवान भी टळ न कुदरत हठ कर वो के करै-धरै ।। ३-३३ ।।
इन्द्री-इन्द्री रै अरथा में राग-द्वेष रा भोग टळाय
मोक्ष-मुगत रै मार गिय में बै ही बैरी विघन कराय ।। ३-३४ ॥
अरजुन गुण हीणो स्वधरम भी परधरमाँ उत्तम घण जाण
स्वधरम चरण मरण कल्याणी पर धरमाचर नरक समान ।। ३-३५ ॥
अरजुन पूछयो-
तो फिर कृष्ण कियाँ बिलमायो भँवरजाळ किण रै भटकाव
लाग्यो पुरुष बलाती ज्यूही पापाचार करै अणचाय ॥ ३-३६ ॥
भगवान बखाण्यो-
अरजुन काम रजोगुण उपज्यो वो ही तो है क्रोध सुजाण
भोगाँ तिरपै नहीं अगन ज्यूं घण पापी वैरी तू जाण ।। ३-३७ ।।
आग धुंऔ सू मळ सू दरपण जर सू ढकियो गर भ सुजान
बींतर अरजुन उणीं काम । इण जगती में ढकियो ज्ञान ।। ३-३८ ।।
काम कठण तिरपै अर पूरै समझ अरजुना अगन समान
काम ज्ञानियाँ रो नित बैरी उण सू ही ढकियो है ज्ञान ।। ३-३९ ।।
मन बुद्धी अर करम इन्द्रियाँ काम रूप घर करै निवास
जीव आतमा नैं उळझावै ज्ञान ढकै मो-माया फाँस ।। ३-४० ।।
भरत वंस रा लाल अरजुना काबू पैल इन्द्रियाँ धार
ज्ञान और विज्ञान विनासक पापी काम मिटादै मार ॥ ३-४१ ।।
तन सू श्रेष्ठ इन्द्रियाँ अर मन मन, सूबुद्धी श्रेष्ठ सुजान
बुद्धी सू भी घणी श्रेष्ठ है अरजुन सदा आतमा मान ।। ३-४२ ॥
इणतर बुध सू श्रेष्ठ आतमा तू वुध सूमन वस करजाण
अपणी सगती समझ अरजुना मार काम बैरी बळवाण ।। ३-४३ ॥
३४/श्रीमद्भगवद्गीता

चौथो अध्याय
ज्ञान करम सन्यास योग
भगवान वखाण्यो-
आदकाळ सूरज रै सेती भाख्यो मैं अविनासी योग
सूरज मनु नैं मनु इक्ष्वाकु नैं कह बतळायो बो ही योग ।। ४-१ ।।
पीढ़ी दर पीढ़ी यू चलताँ जाण्यो राज रिस्याँ जो योग
पण वीत्यो घण काळ, लोक सू अरजुन लोप हुयो बो योग ।। ४-२ ।।
वो ही योग पुराणो भाख्यो मैं अरजुन थारै हित जाण
जको घणो उत्तम रहस्य पण तू है भगत'र सखो सुजाण ।। ४-३ ।।
अरजुन पूछ्यो-
जलम आपरो अब हुयो है पण सूरज रो जलम पुराण
आदकाळ में आप बतायो आ हूँ मानू किंयाँ सुजाण ।। ४-४ ।।
भगवान बखाण्यो-
थारा-म्हारा जलम घणाँ ही हुय-हुय बीत्या काळ पुराण
पण तू जाण सकै नहिं अरजुन उणरी हूँ ही राखू जाण ।। ४-५ ।।
हूँ अविनासी अर अणजणियो भूतेसर हूँ तो भी जाण
पारथ योग माया सू प्रगढूँ हूँ म्हारी कुदरत रै ताण ।। ४-६ ।।
जद-जद धरम घटै घरती पर अधरम वढे धरम घेराय
प्रगट हुँवू पारथ हूँ ही तो उणी काळ निज रूप रचाय ।। ४-७ ।।
साधू पुरुष उवारण जग में पापीड़ाँ रो करण विनास
घरम धजा थापण नैं प्रगटू जुग-जुग में हूँ जुगरी आस ।। ४-८ ।।
--
नान करम सन्यास योग/35

जलम करम बो दिव्य अलोकी अरजुन जको तत्व ले जाण
काया त्याग कदै नहिं जलमै पूगै म्हारी ठोड़-ठिकाण ।। ४-१ ।।
छोड राग भय क्रोध घणकरा आय सरण हुय अकारूप
पावन हुया ज्ञान रै तप सू पायो म्हारो साँत सरूप ॥ ४-१० ।।
जो म्हाँने ज्यू भजै अरजुना हूँ भी बीनै भजू बियाँन
म्हारो ही मारग सब भाँती बरत्याँ चलै पुरुष बुधवान ।। ४-११ ॥
जका करम फळ लोक चाँवताँ इण धरती पर पूजै देव
बै नर तुरता-फुरत जगत में करम जणीं बा सिद्धी लेय ।। ४-१२ ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैस्य सूद्र सव गुण-करमाँ मैं रच्या सुजाण
मैं अविनासी करता नैं भी अरजुन तू अणकरता जाण ।। ४-१३ ॥
हूँ करमाँ रै फळ नहिं लेपू करम फळां पर मोहित नॉय
म्हाँनै जको तत्व सू जाणें वो भी करमाँ नहीं बँधाय ।। ४-१४ ।।
म्हारी सरण बडेराँ पुरुषाँ करियो इयाँ इणीतर जाण
सदा कियो जो करम बडेराँ बो ही अरजुन कर चित लाण ।। ४-१५ ।।
के है करम और के अकरम मोहित है सगळा बुधवाण
इण कारण थारै हित करस्यू बंधण-मुगती करम वखाण ।। ४-१६ ।।
अकरम करम निषिध करमाँ रो भलो जाणणे जोग सरूप
कहूँ ध्यान सू सुणले अरजुन जाण करम गत गहरो रूप ॥ ४-१७ ।।
जको करम में अकरम देख अर अकरम में लखै करम
वो बुधवाण पुरुष मिनखाँ में योगी करतो करम धरम ।। ४-१८ ।।
बिनाँ कामणा अर सँकळप है जिणीं पुरुष रा सकळ करम
ज्ञानी भी
उणनैं पिंडत कह ज्ञान जगाया करम-धरम ।। ४-१९ ।।
छोड आसरो संसारी रो परमाणद नित तिरपत होय
त्याग करम फळ संग करम नैं भल बरत्याँ की करै न कोय ।। ४-२० ।।
36/श्रीमद्भगवद्गीता

भोग लालसा सगळी त्यागी जिण जीत्यो चित और सरीर
विन आसा तन करम करंताँ पाप न व्यापै पुरुष सरीर ।। ४-२१ ।।
आपोआप मिल्याँ संतूठे झगड़ाँ-टण्टाँ जको न जाय
सिंध-अणसिध दोनू सम समझै करताँ करम न करम बँधाय ॥ ४-२२ ।।
जको ज्ञान में थिर चित लावै आसकती नै देय मिटाय
यज्ञ आचरण करै मुगत नर उणरा सगळा करम नसाय ।। ४-२३ ।।
हवि अरपणिया ब्रह्म अगन भी है रे अरजुन ब्रह्म समान
ब्रह्म समाधी लिंयाँ जु पावै बो भी तो है ब्रह्म सुजाण ।। ४-२४ ।।
योगी पूज
पूजै देव यज्ञ नैं आछीतराँ उपासै मन
अर ज्ञानी जण ब्रह्म अगन में करै यज्ञ सू यज्ञ हवन ।। ४-२५ ।।
वस में करै विषै योगीजण तप संयम रै ताप तपाय
श्रोत सबद काबू कर सगळा होम हवन कुण्ड भसमाय ।। ४-२६ ।।
करम इन्द्रियाँ अर प्राणाँ रा योगी कई ज्ञान दीपाय
आतम संयम योग अगन में सगळा होमै होम कराय ।। ४-२७ ।।
होमै द्रव्य लोक सेवा में स्वधरम पाळ तपै की लोग
ज्ञान यज्ञ स्वाध्याय अहिंसा रा व्रत बरते जतनाँ जोग ।। ४-२८ ।।
प्राणवायु होभै अपाण में करै प्राण में होम अपाण
प्राण अपाण दोऊँ गत थामै प्राणायाम करै पाराण ।। ४-२९ ।।
.
खाण-पीण रो नेम निभावै होम करै प्राणां में प्राण
जकाँ यज्ञ कर पाप नसायो सकळ पुरुष है यज्ञ सुजाण ।। ४-३० ।।
ज्ञान अमरफळ भोग यज्ञ रो अरजुन ब्रह्म सनातन पाय
यज्ञ विना नर लोक न सोखो वो परलोक कियाँ सुखदाय ।। ४-३१ ॥
भाँत-भाँत रा यज्ञ घणाँ ही वेदाँ री वाणी विसतार
तत्व जाण निसकाम करम कर उण करमाँ हुयसी निसतार ।। ४-३२ ।।
---
ज्ञान करम सन्यास यो

ज्ञान यज्ञ है श्रेष्ठ अरजुना द्रव्य यज्ञ सू मोटो जाण ज्ञान यज्ञ में परा समावै आखा-सगळा करम सुजाण ।। ४-३३ ।। तत्व जाणिया ज्ञानी जण री कर सेवा दण्डोत प्रणाम कपट भाव तज ज्ञान पूछियाँ कर उपदेस वतासी ज्ञान ।। ४-३४ ॥ जिण जाण्याँ तू मोह न उळझै आतम में लखसी सव भूत उण उपराँत लीण हुय आँणद मन्हें लखैलो पाण्डू-पूत ।। ४-३५ ।। जे तू सब पाप्याँ सू पापी तो भी अरजुन निसचे जाण ज्ञान रूप इण नाव वैठियाँ तरजासी सब पाप सुजाण ॥ ४-३६ ।। अगनी भसम करै ईन्धण नै त्यू ही अरजुन निसचे जाण भसम करै सगळा करमाँ नैं अगन ज्ञान री समझ सुजाण ॥ ४-३७ ।। ज्ञान बराबर की नहिं जग में निसचै पावन करै सुजान सिध योगी जण कितै काळ सू अनुभव करै आतमा ज्ञान ।। ४-३८ ॥ जको जितेन्द्रिय सरधा लाग्यो बो ही पुरुष लाभलै ज्ञान झटपट परम साँति नैं पावै अरजुन निसचे समझ सुजान ।। ४-३९ ।। बिन सरधा संसै में भटक्यो भ्रष्ट हुवै वो पुरुष अजाण लोक और परलोक न सुख है संसै में विनसै सब जाण ।। ४-४० ।। जकै ज्ञान सू संसै मेटयो अरप करम नैं योग सिधाय पुरुष आतमा बँधै न अरजुन उणनैं करम कदै न बँधाय ॥ ४-४१ ।। समत योग थिर हुयजा भारत उठा ज्ञान रूपी तलवार हिय संसै अज्ञान उपजियो काट ऊभ लड़ जुध ललकार ।। ४-४२ ।। 38/श्रीमद्भगवद्गीता

पाँचवों अध्याय
करम सन्यास योग
अरजुन पूछयो-
कृष्ण ! करम सन्यास वखाणो करम योग निसकाम बखाण
दोनाँ माँयलो अक बखाणो कर निसचे कारक कल्याण ।। ५-१ ।।
भगवान वखाण्यो-
करम योग सन्यास दोउँ ही जाण परम कल्याण करै
करम योग पण श्रेष्ठ अरजुना सुगम साधणां श्रेय करै ॥ ५-२ ।।
द्वेष ध्यावणा करै न अरजुन वो योगी सन्यासी जाण
राग-द्वेष रो दुंद न राखै बंधण मुगत हुवै सुखमान ।। ५-३ ।।
साँख्य योग सन्यास करम नैं मूरख न्यारोन्यार बताय
दोनों माँ सू किंणी अक में भी थिर पुरुष परम फळ पाय ।। ५-४ ।।
ज्ञान योग जो करम योग सो वो ही परम धाम फळ पाय
जको पुरुष दोनों रै फळ मैं अक लखै सो ठीक लखाय ।। ५-५ ।।
करम योग विन मिलणो मुसकल पण अरजुन सन्यास सुजाण
मुनिवर करम योग लाग्यो पाय ब्रह्म नैं झटपट जाण ।। ५-६ ।।
आतमजीत जितेन्द्रिय योगी सुध अंतर सू लगन लगाय
अकाभाव परम में लाग्यो करम करंतो भी न लिंपाय ।। ५-७ ।।
तत जाणणियो योगी मानें हूँ तो की नहिं करूं सुजाण
लखत सुणत परसत अर सूघत खाँवत जावत सोंवत जाण ।। ५-८ ।।
करम सन्यास योग/39

साँस लेवताँ और बोलताँ त्यागत ग्रहण करताँ भी
खोलत मीचत आँख इन्द्रियाँ करम वरतताँ करूँ न की ।। ५-९ ।।
कर अरपण सब करम ब्रह्म रै पुरुष आसकी जो छिटकाय
जळ सू कमळ पात री तरियाँ करताँ करम न पाप लिंपाय ।। ५-१० ॥
इन्द्रिय मन बुद्धी काया सू आसक भाव छोड छिटकाय
करम करै योगी ही केवळ आतम सुध हित लगन लगाय ।। ५-११ ।।
योगी
प्रभु
नैं अरप करम फळ भगवत रूप सांति नैं पाय
फळ पर लटू पुरुष सकामी पणे कामणा सू बँध जाय ।। ५-१२ ।।
नव दरवाजा रूपी घर में सकळ करम मन सू छिटकाय
निसचे बो करतो न कराँतो तनकाबू थिर सुखाँ समाय ।। ५-१३ ॥
प्रभु नहिं रचै लोक करतापण नहीं करम अर करम सँजोग
पण कुदरत गुण में गुण वरतै है सगळो कुदरत रो योग ।। ५-१४ ।।
ग्रहण करै नहिं प्रभू किंणीं रा सुभ अर पाप करम आ जाण
पण माया तूं ज्ञान ढकायो मोहित जीव हुवै सब जाण ।। ५-१५ ।।
आतमज्ञान पणे जिण अंतर मिटिया मेट कियो अज्ञान
सचिदानन्द परम पळकावै उणरो बो सूरज-सो ज्ञान ।। ५-१६ ।।
मन बुद्धी उण रूप जिणाँ री उण में ही थिर अकाभाव
खोय पाप नै ज्ञान परायण वो ही पुरुष परम गत पाय ।। ५-१७ ।।
विद्या-बिनै साँपियो ब्राह्मण गौ हाथी कुत्तो चिण्डाळ
ज्ञानी जण समदरसी देखै बाँ सगळा – अक समान ।। ५-१८॥
मन जिण रो थिर समत भाव में बाँ जीत्यो जींवत संसार
कारण सम निरदोस ब्रह्म है बो थिर सचिदानंद आधार ॥ ५-१९ ।।
प्रिय नैं पाय न हरखै-कोडै अणप्रिय पाय न मन दुख लाय
थिर बुधवाण न संसै राखै पुरुष ब्रह्म थित अका भाव ।। ५-२० ।।
40/श्रीमद्भगवद्गीता

विष भोग अन्तर नहिं आसक जो भगवत सुख पाय सुखी
ब्रह्म योग में पुरुष लागियो आणद अनुभव करै अखी ।। ५-२१ ।।
विषयाँ योग भोग सुख भासै पण निसचै दुख हेतू जाण
आद अन्त होवणिया अरजुन सुध-बुधवाण न रमै सुजाण ।। ५-२२ ।।
काया नास हुवण पैली ही काम क्रोध रो वेग मिटाय
वो नर ही योगी है अरजुन सुखी हुवै इण लोकाँ माँय ।। ५-२३ ।।
सुख आराम आतमा राखै निसचे आतम जोत सुजाण
अकीभाव परम बो योगी अरजुन पाय ब्रह्म निरवाण ।। ५-२४ ।।
जिण रा सगळा पाप विनास्या दियो ज्ञान तूं संसै मेट
भूत प्राणियाँ हित चित लाग्यो लाभ ब्रह्म सांति तूं भेट ।। ५-२५ ॥
काम क्रोध तूं रहित जीत चित परम ब्रह्म करियाँ साख्यात
च्याळं दिस वै ही ज्ञानी नर बरतै परम ब्रह्म में सांत ।। ५-२६ ।।
कर भँवराळी बीच नैंण थिर विषै भोग वारे ही त्याग
प्राण-अपाण नासिका विचरै सम कर अरजुन साँस सुभाग ।। ५-२७ ।।
मन बुद्धी अर जीत इन्द्रियाँ मोख-परायण मुनी सुजाण
इंछा भय अर क्रोध विहूणो बीनै सदा मुगत ही जाण ॥ ५-२८ ॥
मन्हें यज्ञ तप भोगी जाणे लखै महेसर लोकाँ माँय
सकळ भूत प्राण्याँ रो प्रेमी जाण तत्व तूं साँयत पाय ।। ५-२९ ।।
.
करम सन्यास योग/41

No text on this page.

छठो अध्याय
आतम संयम योग
भगवान बखाण्यो-
जको करमफळ नहीं चाँवतो करण जोगो करै करम
वो सन्यासी-योगी है पण नहीं जु त्यागै अगन करम ॥ ६-१ ।।
जिणनैं यूँ सन्यास बखाणे अरजुन योग उणीं नैं जाण
सँकळप त्याग्याँ बिनाँ न योगी पुरुष न कोई समझ सुजाण ।। ६-२ ।।
जको समत बुध योग चढण री इछा करै मुनी मन माँय
योग हेतु निसकाम करम अर योगी हित संकळप अभाव ॥ ६-३ ।।
करम इन्द्रियाँ रै भोगाँ में आसक नहीं हुवै जिण काळ
सव संकळपाँ रो त्यागी ही योगी पुरुष बजै उण काळ ।। ६-४ ।।
आपोआप आतमा तारै आप आतमा नहीं गिराय
वैरी-सजन आतमा अपणो दूजो नहीं कोई जग माँय ।। ६-५ ।।
जको जीतलै आप आतमा बंधु आतमा उणरी जाण
जको न जीते आप आतमा बैरी ज्यू बरत आ जाण ।। ६-६ ।।
सरदी-गरमी अर सुख दुख में साँयत भली माण-अपमाण
जको आतमा जीत अरजुना सचिदानन्द समोयो जाण ।। ६-७ ।।
लिवी इन्द्रियाँ जीत आतमा तिरपत हुई ज्ञान-विज्ञान
कूड़ न कपट
कपट कहीजै योगी माटी-सोनो जिणाँ समान ।। ६-८ ।।
हीयाळू-वैरी अर मितर द्वेष बंधु मध-भाव उदाँण
धरमी अर पापी सम समझै वो अरजुन घण श्रेष्ठ सुजाण ।। ६-९ ।।
प्रातम संयम योग/43

चित मन आतम जीत्यो योगी विनाँ वासना-सँगरै ध्याय
थिर अकलड़ो अकाँयत में ध्यान लगोलग परम लगाय ।। ६-१० ।।
सुद्ध भोम में ऊपर-नीचे
सुद्ध वसतराँ कुस-मृगछाळ
आसण घणो न ऊँचो-नीचो बैठे थिर थित आसण ढाळ ।। ६-११ ।।
उण आसण पर बैठ करै वो अकागर मन योगाभ्यास
चित इन्दरियाँ किरिया काबू आतम सुध हित योग उजास ।। ६-१२ ।।
सिर-नस अर काया सम करलै अरजुन अचळ दिढाई धार
दूजी दिसा न देखै कोई निजर नासिका नोक पसार ।। ६-१३ ॥
थिर बुध ब्रह्मचारी व्रतधारी निरभै सावधान घण साँत
मन वस कर म्हारै में लाग्यो परम परायण थिर चित थाँत ।। ६-१४ ।।
इयाँ आतमा लगा लगोलग परम रूप योगी स्वाधीण
परम साँति निरवाण लाभलै जिणरो मन अपणे आधीण ।। ६-१५ ।।
जो अणखाऊ का
घणखाऊ जागै घणो और घण सोय
निसचे जाण उणाँ पुरुषाँ रो पारथ योग सिद्ध नाँ होय ।। ६-१६ ।।
जथा जोग आहार-विहाराँ करम चेसटा करै सुजाण
जथा जोग सोवै-जागै तो योग सिद्ध दुखनासी जाण ।। ६-१७ ।।
इणतर योग परम थित करियो काबू कियो चित्त जिण काळ
बिनाँ कामणा और लालसा योग युगत बाजै उण काळ ।। ६-१८ ।।
हीण पून थित थाँह सँजोई हिलै न ज्यूँ दीपक री लोय
परम ध्यान लाग्यै चित जीत्यै योगी री उपमा ही सोय ।। ६-१९ ।।
सेयाँ योग पुरुष जिण वेळा कर काबू चित मुगत समात
सचिदानन्द मिलै संतूठे सुध-बुध पाय परम साख्यात ।। ६-२० ॥
जको अणत आणंद आतमा सुध-बुध ग्रहण करण रै जोग
भगवत रूप थितै जिण बेळा योगी अनुभव करै सुयोग ।। ६-२१ ।।
44/श्रीमद्भगवद्गीता

घणों लाभ दूजो नहिं मानें अरजुन परम लाभ नै पाय
भगवत रूप हुयाँ थित योगी घोर दुखाँ भी नाँ विचळाय ।। ६-२२ ।।
दुख-संजोग-विजोगाँ अरजुन जाण्यो चाव कहीजै योग
लगन लागियै चित तूं निसचै है करतव्य धारणो योग ।। ६-२३ ।।
सँकळप उपजी सकळ कामना आसक भाव छोड-छिटकार
मन तूं वस कर सकळ इन्द्रियाँ चारूँ मेर भली परकार ।। ६-२४ ।।
होळ-होळ मिलै मुगत में पारथ परमाँ परम समाय
धीरज धार बुद्धि तूं मन में थित कर परम-परम चिंताय ।। ६-२५ ।।
जिण-जिण कारण तूं मन चंचळ भोगाँ फिरै-घिरै-विचरै
वारंबार रोक उण-उण तूं योगी परम अधीण करै ।। ६-२६ ।।
जिण रो मन भल साँत अरजुना और पाप तूं रहित सुजाण
घण उत्तम आणद लै योगी हुयाँ साँत रज ब्रह्म समाण ।। ६-२७ ।।
लगा लगोलग परम आतमा पाप रहित योगी इण भाँत
अनुभव करै अणत आणद नैं पारथ परम ब्रह्म सुख पाँत ।। ६-२८ ।।
योग युगत समदरसी योगी लग्यो परम में पाण्डू-पूत
लखै आतमा सब भूतां में और आतमा में सब भूत ।। ६-२९ ।।
लखै सकळ भूताँ नैं मैं में सब भूतां व्यापक म्हाँ जाण
वो म्हारै तूं नहीं अदीठो अर हूँ उण तूं नहीं सुजाण ।। ६-३० ।।
सगळाँ भूताँ मन्हें व्यापियो अका भाव भजै सो आण
सव भाँती वरतंतो वरतै वो योगी मैं में ही जाण ।। ६-३१ ।।
आप जिसो ही सब भूताँ में अरजुन सम जो लखै सुजाण
वो ही परम श्रेष्ठ योगी है सुख-दुख देखै सम परमाण ।। ६-३२ ।।
अरजुन बोल्यो
समत भाव तूं ध्यान योग रो आप प्रभू जो कियो वखाण
मन चंचळ मधुसूदन इण री थिर थित कोनी लखू सुजाण ।। ६-३३ ।।
-
ग्रातम संयम योग/45

मन चंचळ घण मथण स्वभावी कृष्ण घणों द्रिढ़ अर बळवाण
बायरियै ज्यूँ मन बस करणों हूँ जाएँ घण कठण सुजाण ।। ६-३४ ॥
भगवान वखाण्यो-
मन चंचळ वस करणों मुसकल अरजुन इण में संसै नाँय
पण बैराग करत अभ्यासाँ वार-वार वो वस हुय जाय ।। ६-३५ ॥
योग परापत होणों मुसकल जो मनड़ो वस कर न सकाय
सहज साधनाँ जतन करंताँ हुवै आपवस म्हारी राय ।। ६-३६ ।।
अरजुन पूछ्यो-
सरधा थकाँ सिथळ जतनाँ पण जिण रो योग न सिद्धी पाय
डिगै योग सू मनड़ो उणरी कृष्ण गती के हुवै बताय ।। ६-३७ ।।
के न प्रभू मोहित ब्रह्म मारग पुरुष विनाँ आश्रम भटकाय
भ्रष्ट भोग-भगवान दोवाँ · ज्यू बिखरया वादळ मिटजाय ।। ६-३८ ।।
म्हारो संसो साफ मिटावण कृष्ण जोग ही आप सुजान
मिल नहीं संसो मेटणियो दूजो कोई आप समान ।। ६-३९ ॥
भगवान वखाण्यो-
पारथ पुरुष विनासै कोनी लोक और परलोकाँ माँय
कारण सुभ प्रिय करम करणियो कोई भी दुरगत नाँ पाय ।। ६-४.० ।।
योग भ्रष्ट वो पुरुष पारथा पुण्य लोक पण पाय निवास
सुधचारी भाग्याँ घर जलमै उण लोकाँ कर बरसाँ वास ॥ ६-४१ ।।
ज्ञानी अर योगी कुळ जलमै बैरागी उण लोक न जा'र
पण अरजुन इण भाँत जलमणो निसचै घण दुरलभ संसार ।। ६-४२ ।।
बढ़ साधिया पूरब देही लाभै पुरुष बुद्धि संयोग
उण सू जतन करै फिरु आछा पारथ परम परापत योग ।। ६-४३ ।।
वो निसचे वस विषै हुयो भी तजै परम पूरण अभ्यास
समत योग रो जिज्ञासू भी लाँघु सवद ब्रह्म परकास ।। ६-४४ ।'
46/श्रीमद्भगवद्गीता

घण जलमाँ पायोड़ा सिध अर योगी घण जतना अभ्यास
धोय पाप सगळा उण साधण पावै परम गती परकास ।। ६-४५ ।।
तपियाँ और पिंडताँ तूं भी मानीजै योगी घण श्रेष्ठ
करम सकाम करणियाँ आछो अरजुन तूं योगी हुय श्रेष्ठ ।। ६-४६ ।।
योग्याँ में सरधाळू योगी जो म्हारै में लोय लगाय
परम श्रेष्ठ बो योगी मानें निस-दिन मन हूँ मन्हें भजाय ।। ६-४७ ।।
प्रातम संयम योग/47

No text on this page.

सातवों अध्याय
ज्ञान विज्ञान योग
श्री भगवान बखाण्यो-
तूं आसक मन प्रेम परायण हुय म्हारै में योग लगाय
सव रो आतम रूप समझसी सुण तूं संस जियाँ मिटाय ।। ७-१ ।।
तत्व ज्ञान रै बों रहस्य नैं हूँ थारै हित कयूँ खुलास
उण जाण्याँ अरजुन इण जग में जाणण जोग न सेस जरास ।। ७-२ ।।
कोई अक हजाराँ मिनखाँ सिद्धी पावण जतन कराय
जतन करणियाँ विरळा जोगी मन्हें तत्व तूं जाण सकाय ।। ७-३ ।।
अंगन पवन जळ-थळ-नभ अरजुन मन बुद्धी अर अहंकार
इयाँ जाण आ म्हारी
कुदरत पारथ बँटी आठ परकार ।। ७-४ ।।
आठ भाँत री अपरा कुदरत समझ अरजुना जड़ परकार
दूजी परा जीव कुदरत है जिण तूं जग धारीजै धार ।। ७-५ ।।
आँ ही दो कुदरत तूं उपज्या सकळ भूत तूं समझ सुजाण
ही सरजूं और विनायूँ इण सगळे जग नैं आ जाण ।। ७-६ ।।
निसचे जाण धनंजै जग में म्हारे सिवा न दूजो कोय
अक सूत गुथियो जग म्हाँ में सूताळा मिणियाँ ज्यूं पोय ।। ७-७ ।।
जळ में हूँ रस जाण अरजुना चाँद-सुरज में हूँ परकास
वेदों में ओंकार, पुरुष में पौरस हूँ, हूँ सबद अकास ।। ७-८ ।।
धरती री पुण्य सुगंधी और अगन रो तेज सुजाण
सकळ भूत प्राण्याँ रो जीवण हूँ तपस्याँ रो तप हूँ जाण ।। ७-९ ।।
2016
नान विज्ञान गंग/४६

सकळ भूत प्राण्याँ रो कारण सदा सनातन
सनातन हूँ हूँ जाण
बुधवाणाँ री बुध हूँ अरजुन तेज्याँ रो हूँ तेज सुजाण ।। ७-१० ।।
बिनाँ कामणा अर आसकती सबळाँ रो हूँ समरथ सार
हूँ ही सकळ भूत प्राण्याँ में अरजुन काम धरम अनुसार ।। ७-११ ।।
सत रज तम गुण भाव उपजिया सगळा मैं तूं उपज्या जाण
पण हूँ आँ में अर बै मैं में नहीं असल में समझ सुजाण ।। ७-१२ ।।
सत रज तम तीनों गुण भावाँ मोहित है सगळो संसार
तत सूं लखै न अविनासी नैं तीन गुणाँ सूं परियाँ-पार ।। ७-१३ ।।
तीन गुणी म्हारी आ माया घणी अलोकी अपरंपार
पण जो सैलँग भजै मन्हें ही तिर निसतारै परलै-पार ।। ७-१४ ।।
माया मोहित ज्ञान गँवाया धारण करिया असुर स्वभाव
दोसी करम करणिया मूरख मन्हें न अरजुन इता भजाय ।। ७-१५ ॥
उत्तम करमी अरथ लागिया आरत जिज्ञासू अर ज्ञानी
च्यार भगत जण भजै मन्हें ही अरजुन जो न असुर अज्ञानी ।। ७-१६ ।।
बाँ में भी नित लग्यो भाव तूं अनन-भगत जो सुज्ञानी
हूँ उण ज्ञानी मैं घण प्यारो और मन्हें बो ही ज्ञानी ।। ७-१७ ।।
भजन भाव ध्यावै सो उत्तम पण ज्ञानी साख्यात सरूप
है म्हारो मत थिर बुध ज्ञानी उत्तम गत थित म्हारै रूप ।। ७-१८ ।।
घण जलमाँ में जलम आखरी सब कुछ वासुदेव ही जाण
दुरलभ इसो मातमा अरजुन भजै मन्हें ही इयाँ सुजाण ।। ७-१९ ।।
आप आपरै भाव सभावाँ बाँ-बाँ भोगाँ ज्ञान गँवाय
बै-बै नेम धार जो अरजुन ध्यावै दूजा देव भजाय ।। ७-२० ।।
जो-जो भगत सकामी मनसा सरधा पूजै जो-जो देव
उणीं भगत री सरधा अरजुन हूँ थिर कर, उण ही देव ।। ७-२१ ।।
५०/श्रीमद्भगवद्गीता

पुरुष जको सरधा सूं लाग्यो करे चेसटा पूजन देव
उणी देव तूं म्हाँरा सरज्या निसचे भोग बैही लै लेय ।। ७-२२ ।।
पण उण ओछी बुधवाळाँ रा नासवाण है फळ जो चाय
वाँनें मिलै देवता बैही म्हारा भगत मन्हें ही पाय ।। ७-२३ ।।
म्हाँरो परम भाव अविनासी तत्व न लखै पुरुष बुध हीण
सरवोतम परा न समझै मार्ने पुरुष भाव ही लीण ।। ७-२४ ।।
हूँ म्हाँरी माया सूं लुकियो सबनै पिरतक नहीं लखाय
मूढ पुरुष अणजण अविनासी मन्हें न अरजुन जाँणण पाय ।। ७-२५ ।।
काल आज अर काल आँवताँ सब भूताँ हूँ राखू जाण
सरधा भगती हीण पुरुष पण मन्हें न कोई पावै जाण ।। ७-२६ ।।
इंछा-द्वेष उपजियाँ सुख-दुख दुंद मोह घिरिया सब प्राण
भरत वंस रा लाल अरजुना प्राणी पावै घण अज्ञान ।। ७-२७ ।।
पण जिण पुरुषाँ धरम करम तूं पारथ दीनो पाप नसाय
दुंद मोह तूं मुगत हुया बै द्रिढ़ बरती सव मन्हें भजाय ॥ ७-२८ ।।
जरा मरण छुटकारो पावण म्हारी सरणाँ जतन
परम करम सगळो अध्यातम जाणे पुरुष ब्रह्म बो पाय ।। ७-२९ ।।
भूत देव अधियज्ञ सभी में जाणे पुरुष मन्हें ही जोय
अरजुन निसचे वै नर चेत्या अंतकाल भी पावै मोय ।। ७-३० ।।
कराय
--
ज्ञान विज्ञान योग/५१

No text on this page.

आठवों अध्याय
अक्षर ब्रह्मयोग
अरजुन पूछ्यो-
के है ब्रह्म करम अध्यातम पुरुषोतम जो कियो बखाण
के है जो अधिभूत बतायो अर के है अधिदेव सुजाण ।। ८-१ ।।
मधुसूदन अधियज्ञ कूण है अठै कियाँ बो इणाँ शरीर
अंतकाळ थे कियाँ लखावो लगन लग्यै चित पुरुष सरीर ।। ८-२ ।।
भगवान वखाण्यो-
आखर परम ब्रह्म है अरजुन जीवातम अध्यातम जाण
भूत भाव उपजणियो, करियो यज्ञ-दान ही करम सुजाण ।। ८-३ ।।
उपजै-विनसै सकळ पदारथ बै अधिभूत भाव है जाण
समझ पुरुष अधिदेव अरजुना हूँ देहाँ अधियज्ञ सुजाण ।। ८-४ ।।
अन्तकाळ में मन्हें सुमरतो ही जो त्यागै पुरुष सरीर
इण में संसै नहीं अरजुना बो खुद म्हाँ. पाय सरीर ।। ८-५ ।।
अन्तकाल में जिण-जिण भावाँ सुमरण करतो तजै सरीर
जकै भाव नैं सदा चीततो पावै बोही भाव सरीर ।। ८-६ ।।
सलंग सुमर मन्हें ही अरजुन इणतर लाग जुद्ध भी कर
निसचे जाण मन्हें ही पासी मन बुध सूं म्हाँ अरपण कर ।। ८-७ ।।
परम ध्यान अभ्यास योग लग चित नाँ डाँवाडोळ कराय
परम दिव्य परमातम पावै अरजुन जो सैलँग चिंताय ।। ८-८ ।।
अक्षर ब्रह्मयोग/५३

रै
सरव जाण अणु अणु
मैं जो उण अनाद सासक सबरै
रवि बरणे दाता अचित्य नैं परा अविद्या नैं सुमरै ।। ८-९ ।
अंतकाळ बो भगती भायो योग बळाँ भौं मध थित प्राण
निसचळ मनाँ सुमरतो अरजुन परम दिव्य ही पुरुष समाण ।। ८-१० ।
ओंकार कह परम वेद विद जती वीतरागी जिण जाण
परम चावणा रह ब्रह्मचारी सो पद सुण संखेप बखाण ।। ८-११।
काबू कर बै सगळा मारग मन हिरदै रै माँय थमाय
योग धारणा थित कर अरजुन मसतक में निज प्राण थपाय ।। ८-१२ ।
ॐ अक आखर उण ब्रह्म नैं जो उचारतो म्हारो रूप
त्याग जाय तन जको चींततो मुगत पाय बो परम स्वरूप ।। ८-१३ ।
अनन चित्त तूं सदा लगोलग अरजुन जको मन्हें सुमराय
बी नित युगत हुयै योगी हित हूँ हूँ सुलभ सहज बो पाय ।। ८-१४ ।
परम सिद्धि पाया महातमा पारथ मन्हें परापत होय
दुख रो थान जिको छिणभंगुर पुनरजलम पावै नहिं कोय ॥ ८-१५ ।
ब्रह्म लोक सूं ले सब लोकाँ सगळा पुनरजलम ही पाय
पण अरजुन जो मन्हें पायलै बो प्राणी न पुनरजलमाय ।। ८-१६ ।।
ब्रह्मा रो दिन और रात भी सैंस चौकड़ी युग परवाँण
काळ तत्व वै योगी जाणे जका तत्व सू राखै जाण ।। ८-१७ ।।
ब्रह्मा रो दिन जद परवेसे उणसू ही जलमै सब भूत
और रात उणरी परवेस्याँ उण में ही लय होवै भूत ।। ८-१८ ।।
उतपन हुय-हुय वस कुदरत रै बो ही सकळ भूत समुदाय
आयाँ रात हुवै लय पारथ दिन आयाँ फिर जलम धराय ।। ८-१९ ।।
अरजुन ब्रह्म अनोखो है पण उणीं ब्रह्म सूं धणों पर
परम भाव जो सदा सनातन भूत मरयाँ भी नहीं मरै ।। ८-२० ॥
५४ / श्रीमद्भगवद्गीता

आखर ब्रह्म कहयो इण भाँती बो ही परम गती रो भाव
वो ही परम धाम है म्हाँरो मिल्याँ सनातन फेर न आय ।। ८-२१ ।।
सकळ भूत जिण में अर जिण तूं परिपूरण है सगळो लोक
परम सनातन पुरुष अरजुना अनन भाव तूं पावण जोग ।। ८-२२ ।।
त्याग गयाँ तन जिणी काळ में योगी जण जो पाय सुजाण
पूठा आण न आवण री गत उणी काळ नैं कहस्यूँ जाण ।। ८-२३ ।।
अगन जोत दिन अर चानणपख छव महिनाँ उतरायण माँय
गयाँ ब्रह्म जाण्या योगीजण पारथ परम ब्रह्म ही पाय ॥ ८-२४ ।।
धूम रात अर अंधारैपख छव महिनाँ दिखणायण माँय
गयाँ सकामी करमी योगी चाँद जोत पा पूठा आय ।। ८-२५ ।।
सुकळ-कृष्ण दो भाँत जगत गत मारग लिया सनातन मान
अकाँ पाय परम गत दूजाँ जलम-मरण फिर पूठा आण ।। ८-२६ ।।
जको तत्व जाणें दोउँ मारग योगी मोहित हुवै न जाण
इण कारण हुय योग युगत तूं सरबकाळ ही साध सुजाण ।। ८-२७ ।।
परम सनातन पद ही पावै योगी लेय तत्व तूं जाण
वेद पढण तप यज्ञ दान रो निसचे पुन-फळ लाँघ सुजाण ॥ ८-२८ ॥
अक्षर ब्रह्मयोग/५५

No text on this page.

नवों अध्याय
राज विद्या राज गुह्य योग
+
भगवान बखाण्यो-
तें निरदोस भगत नैं कहस्यू गोपण परम ज्ञान-विज्ञान
दुख संसार मुगत हुयजासी अरजुन तूं निसचे जिण जाण ।। ९-१ ।।
राज रहस विद्या रो राजा अविनासी धरमी बो ज्ञान
सुध उत्तम पिरतक फळदायक सुगम साधना घणो सुजान ।। ९-२ ।।
ज्ञान धरम सरधा नहिं जिण री बो नर अरजुन मन्हें न पाय
मिरत लोक संसारी चकरी भुंवतो फिरै अँवाळी खाय ।। ९-३ ।।
परम आतमा सचिदानंद सूं सराबोर सगळो जग जाण
: सकळ भूत सँकळप थित म्हाँ में पण हूँ थित बाँ में न सुजाण ।। ९-४ ।।
पण लख असर योग माया रो सकळ भूत म्हाँ में थित नाँय
भूत जणक धारक पोषक री थित न आतमा भूताँ माँय ।। ९-५ ।।
ज्यूँ सरवाळे सदा विचरणो आभै में थित पवन महान
सँकळप जण्या भूत बै सगळा म्हाँ में थित नित समझ सुजान ।। ९-६ ।।
बीत्याँ कळप हुवै सब अरजुन भूत म्हारळी कुदरत लीन
भळे कळप रो ऊदो आयाँ हूँ बाँनै करर्दू सरजीण ।। ९-७ ।।
माया वारंवार रचूं सरजाय
परवस हुयै सुभावाँ कारण अरजुन सकळ भूत समुदाय ।। ९-८ ।।
विना आसकी अणमणिय ज्यूँ वाँ करमाँ थित हुयै थिताय
मैं परमातम में वै सगळा करम पारथा नहीं बँधाय ॥ ९-९ ।।
अंगीकार तिरगुणी
राज विद्या राज गुह्य योग/५७

म्हाँरी देख-रेख में अरजुन इण हेतु माया गरणाय
सकळ जगत सचराचर सरजै जलम-मरण रो चक्र चलाय ॥ ९-१० ।।
भूत महेसर परम भाव नैं नाँ जाणणिया मूढ जणाय
मैं मिनखा देही धारणिय परमातम ने तुच्छ गिणाय ।। ९-११ ।।
बिरथा करम ध्यान धर आसा निपट अनाड़ी राखस जाण
असुर राखसाँ जिसी मोहणी तामस बिरती धरी अजाण ।। ९-१२ ।।
पण कुती सुत बै महातमा जिका देव बिरती रै ताण
भजै अक मन लगन लगायाँ समझ सनातन अमर सुजाण ।। ९-१३ ।।
सदा कीरतन करै भगत जण द्रढ निसचै भगती मन धार
जतन करंताँ निवै ध्यान सू भज मन म्हाँनै बारंबार ।। ९-१४ ।।
ज्ञान यज्ञ सू पूजन करता भजै उपासै अकाकार
परम विराट रूप नै म्हाँनै भाँत-भाँत मन भाव विचार ॥ ९-१५ ।।
यज्ञ करम हूँ अन्न औषधी अगन घिरत हूँ मंत्र सुजाण
हूँ ही होम होमायत किरिया अरजुन तूं निसचै मन जाण ॥ ९-१६ ।।
मात पिता दादो हूँ जग रो हूँ ही हूँ धाता संसार
साम यजुर रिग वेद हूँ ही हूँ जाणण जोग सुद्ध ओंकार ।। ९-१७ ।।
हूँ स्वामी सुभ लाभ लखणियो गत मुगती सब रो भरतार
वास सरण हित उतपत परळ थान मुकाम अमर आधार ।। ९-१८ ॥
हूँ सूरज तप बिरखा बरसू अमरत और मरत हूँ जाण
सत अर असत हूँ ही हूँ सब कुछ समझ पारथा इयाँ सुजाण ।। ९-१९ ॥
तीनूं वेद विधान करम सुभ साध सोम रस पान करै
जका सरग इंछा जिग पूजै दिव्य लोक पुन भोग करै ।। ९-२० ।।
सुरग भोग पुन खीण हुयाँ बै मिरत लोक भोगै नर-नार
जका भोग री करै कामना जलम-मरण लै बारंवार ॥ ९-२१ ।।
अक लगन सूजका भगत जण भजै भाव सू मन्हें चितार
हूँ खुद आप उणाँ पुरुषां रै खेम-कुसळ कर, संसार ।। ९-२२ ॥
हूँ
५८/श्रीमद्भगवद्गीता

जका भगतजण सरधा पूजै दूजा देव बिना विध ज्ञान
तो भी बै म्हांनै ही पूजै सुण अरजुन तूं समझ सुजान ।। ९-२३ ।।
सकळ यज्ञ भोगणियो स्वामी हूँ ही हूँ अरजुन तूं जाण
वै नर मन्हें तत्व नहिं जाणे इणतर पाय पुनर-जलमाण ।। ९-२४ ।।
पूज्याँ देव देव ही पावै पितर पूजियाँ पितर समाय
भूत पूजियाँ भूताँ भेळा म्हारा भगत मन्हें ही पाय ।। ९-२५ ।।
पान फूल फळ जळ अरपण कर प्रेम भाव तूं भेट चढ़ाय
वो अरपणियो भोग भगत रो भोगूं पिरतक प्रीत लगाय ।। ९-२६ ।।
जो कुछ करम करै तूं खावै करै हवन तप देवै दान
कर म्हारै अरपण ब सगळा अरजुन तूं मन में सुभ मान ।। ९-२७ ।।
सुभ अर असुभ करम फळ बंधण इणतर जोग धार तरसी
मुगत हुयो मतवाळो मनवो अरजुन तू म्हांन पासी ।। ९-२८ ।।
समभाव सकळ भूताँ में व्यापक हूँ सगळाँ मन माँय
नाँ कोइ प्यारो नाँ कोइ खारो भजै सो म्हाँरो हूँ उण माँय ।। ९-२९ ।।
जो कोइ घणो दुराचारी भी अक लगन तूं मन्हें भजाय
वो साधू ही जाणण जोगो भली भाँत निसचै मन माँय ।। ९-३० ।।
इणतर तुरत हुवै धरमातम परम साँयती सदो समाय
निसचे साच जाण तूं अरजुन बै ही परम मोक्ष फळ पाय ।। ९-३१ ।।
नारी-वैस्य सूद्र सब कोई जो कोइ पाप जूण में आय
म्हारी सरण हुया जो अरजुन बै ही परम मोक्ष फळ पाय ।। ९-३२ ।।
ब्राह्मण राजरिसी के कहणो भगत परम गति पुण्य समाय
छिणभंगुर सुख हीण लोक नर-देह पाय तू मन्हें भजाय ।। ९-३३ ।।
अकमनो हुय भज म्हाँनें ही लुळ-लुळ सरधा भाव पुजाय
इणतर सरण आतमा कर तूं मन्हें पारथा लेसी पाय ।। ९-३४ ।।
2016
राज विद्या राज गुह्य योग/५६

No text on this page.

दसवों अध्याय
विभूति योग
भगवान वखाण्यो-
अजूं भलै सुण रे भुरजाळा म्हारा परम रहस रा बोल
घणों प्रेम राखणियै तें हित कहस्यूँ जका खुलासा खोल ।। १०-१ ।।
देव महरिसी लोग न जाणे म्हारो उतपतियो अवतार
कारण देव महरिस्याँ री भी उतपत रो हूँ ही आधार ।। १०-२ ।।
मन्हें अजलमो और अनादी भळे जु जाणे लोक महेस
मुगत हुवै सगळा पापां तूं वो ज्ञानी मिनखाँ मरतेस ।। १०-३ ।।
सुध वुध ज्ञान खमाँ सत धारण दमण समण अणमोह सुजाण
डर अर निडर भाव सुख दुख रा उतपत-लय म्हाँ तूं ही जाण ।। १०-४ ।।
तप संतोष अहिंसा समता दान किरत-अपकिरत बखाण
घण विध भाव भूत-प्राण्याँ रा हुवै सभी म्हाँसूं ही जाण ।। १०-५ ।।
च्यार सनक मुनि सात महरिसी अर चवदह मनु सभी सुजाण
म्हारै भाव जण्या सँकळप सँ बाँरी प्रजा लोक सव जाण ।। १०-६ ।।
जो नर योग-विभूती म्हारी तत तूं जाणें समझ सुजाण
निसचळ ध्यान योग लग निसचं अक लगन म्हाँ में थित जाण ।। १०-७ ॥
हूँ ही जग उतपत रो कारण सकळ चेसटा रो आधार
तत्व जाण सरधा भगती तूं भजै लगोलग मन्हें भजार ।। १०-८ ।।
चित मन प्राण मन्हें नित अरपै आपस परम प्रभाव बखाण
तूठ रमै म्हारो गुण गावै वे म्हाँने ही पाय सुजाण ।। १०-९ ।।
विभूति योग ६५

लगन प्रेम तूं लगा लगोलग जका भगत जण मन्हें भजाय
हूँ देऊँ बुध योग उणाँ नैं जिण सूं वै म्हाँने ही पाय ।। १०-१० ।।
बाँ भगताँ पर किरप करण ही हूँ उण घट बैठू थित थान
जगमग जोत ज्ञान दीपक तूं मे, अंधकार अज्ञान ।। १०-११ ।।
अरजुन बोल्यो-
परम ब्रह्म हो परम धाम हो आप परम पावन भगवान
सदा सनातन दिव्य पुरुष हो आदि देव अणजण्या महान ।। १०-१२ ।।
देवल असित व्यास अर नारद देवरिसी सब करै बखाण
आप सरब व्यापक अणजणिया कहो आप खुद मन्हें सुजाण ।। १०-१३ ।।
केसव आप कहो जो म्हाँनै हूँ सब सत जाणू सत मान
दानव देव कोय नाँ जाणे थाँरोड़ी लीला भगवान ।। १०-१४ ।।
हे देवाँ रा देव जगत पति भूत जनक भूतेस महान
खुद ही आप आपनैं जाणो हे पुरुषोतम आप सुजान ।। १०-१५ ।।
आप आपरी दिव्य विभूती पूरण रूप बखाणण जोग
जकी विभूत्याँ व्याप आप प्रभु थित व्यापक हो सगळाँ लोक ।। १०-१६ ।।
कूँकर सदा चितारूँ थाँनै योगेसर जाणूं थाँ जाण
किण-किण भाव चितारण जोगा थे म्हारै तूं हो भगवान ॥ १०-१७ ।।
योग सक्ति अर परम विभूती भळे बखाणो कर बिसतार
अमर वचन सुणताँ नहिं धायूं हे जनारदन बारम्बार ।। १०-१८ ।।
भगवान बखाण्यो-
अरजुन अन्त नहीं बिसताराँ जाण समझ कुरुश्रेष्ठ सुजाण
मोटी-मोटी दिव्य विभूत्याँ ते हित करस्यूँ अबैं बखाण ।। १०-१९ ।।
सब भूतां रै हियै बिराजूं हूँ सगळाँ रो आतम जाण
आदि मध्य अर अन्त हूँ ही हूँ ओ अरजुन तूं समझ सुजाण ।। १०-२० ।।
६२/श्रीमद्भगवद्गीता

፪ हूँ अदीत रो वेटो विष्णूं जोत किरण सूरज हूँ जाण पवना में हूँ पवन मरीची अर नखताँ में चन्द्र सुजाण ।। १०-२१ ।। वेदाँ में हूँ सामवेद हूँ देवाँ में हूँ इन्द्र सुजाण सकळ इन्द्रियाँ में हूँ मन हूँ भूताँ रो चेतो हूँ जाण ।। १०-२२ ।। यक्ष राखसाँ में कुबेर हूँ रुद्राँ में संकर हूँ जाण सिखराँ में हूँ मेरु-सुमेरू वसुआँ में हूँ अगन सुजाण ।। १०-२३ ।। मुख पुरोहिताँ में विसपत हूँ सेनापत्याँ कारतिक जाण जळा-सरवरों में सागर हूँ मन्हें पारथा समझ सुजाण ।। १०-२४ ।। । महरिसियाँ में भृगू रिसी हूँ वाणी अकाक्षर ओंकार यज्ञाँ में जप यज्ञ पारथा थिराँ हिमाळो हूँ थिरथार ।। १०-२५ ।। बिरछाँ-माँय विरछ पीपळ हूँ देव रिस्याँ नारद मुनि जाण गंधरवाँ में समझ चित्ररथ कपिल मुनी हूँ सिधाँ सुजाण ।। १०-२६ ॥ घोड़ाँ अमर उचैसरवा हूँ हाथ्याँ में अरावत जाण नराँ माँयलो निरप पारथा म्हाँने ही तो समझ सुजाण ।। १०-२७ ।। ससतरियाँ में बजर अरजुना कामधेन धेना रै माँय पूत जणण हित कामदेव हूँ सरपराज सरपां रै माँय ।। १०-२८ ।। नागों में हूँ सेसनाग हूँ जळ जीवाँण वरुण हूँ जाण पितरों में करयम पितरेसर राजाँ में जमराज सुजाण ।। १०.२९ ।। दैत्याँ में पैळाद पारथा काळ गिणतकाराँ हूँ जाण पसुआँ में हूँ सिंघ अरजुना पाँखीडाँ में गरुड़ सुजाण ।। १०.५॥ || सुद्ध करणियाँ पवन पारथा ससतर धारयाँ राम सुजाण माछलियाँ में मगरमच्छ हूँ नदियाँ में हूँ गंगा जाण ।। १.१ ।। आद अंत मध हूँ सिसट्याँ रो विद्या में ब्रह्म विद्या 'ना सारवाद हूँ अरजुन आ ही गगहा गाण || १ : वादाँ में हूँ Sainik आखरियाँ में हूँ अकार हूँ और समासाँ दुंद समास काळाँ में हूँ महाकाळ हूँ धाता रूप विराट उजास ।। १०-३३ ॥ मौत सरवनासी हूँ ही हूँ अर भावी उतपत हूँ जाण नारयाँ श्री धृति वाक कीरती स्मृति मेधा अर क्षमा सुजाण ॥ १०-३४ ।। श्रुतियाँ में हूँ वृहतसाम हूँ छंदाँ में गायत्री जाण मिंगसर मास हूँ ही मासाँ में रितुआँ माँय वसंत सुजाण ।। १०-३५ ।। छळगारों में हूँ जूवो हूँ तेज तेजस्याँ में हूँ जाण जीत जिताराँ नेहचाँ नेहचो सत पुरुषां सत भाव सुजाण ।। १०-३६ ॥ वृष्ण वंसियाँ वासुदेव हूँ पाण्डू-सुताँ धनंजै जाण मुनियाँ में हूँ वेदव्यास हूँ कवियाँ सुकराचार्य सुजाण ।। १०-३७ ।। दमण करणियाँ रो हूँ डंडो नीत जीत चावणियाँ जाण हूँ ही मौन गुपत भावाँ में ज्ञानवान रो ज्ञान सुजाण ।। १०-३८ ।। अरजुन सकळ भूत उतपत रो बीज जको हूँ ही हूँ जाण म्हाँ बिन भूत चराचर कोनी कोई भी तो समझ सुजाण ।। १०-३९ ।। अंत परंतप नहीं म्हारळी दिव्य विभूत्याँ रो तू जाण थोड़े में बिसतार उणाँ रो ते हित कहियो समझ सुजाण ।। १०-४० ।। दीसै जठै विभूती जोती कांति सक्ति बीने ही जाण म्हारै तेज अंस सू उतपत सकळ पारथा समझ सुजाण ।। १०-४१ ॥ घण जाणण सू के परयोजन जाण तत्व सू मन्हें सुजाण अक अंस माया सू सगळो धार जगत थित हूँ नित जाण ।। १०-४२ ॥ ६४/श्रीमद्भगवद्गीता

इग्यारवों अध्याय
विस्व रूप दरसण योग
अरजुन बोल्यो-
गुपत ज्ञान रा वचन वखाण्या भारी महर करी भगवान
परम ज्ञान री जोत जगाई मिटा दियो म्हारो अज्ञान ॥ ११-१ ।।
श्रीमुख मैं सुणी खुलासा भूत जगत उतपती विनास
अविनासी हो आप प्रभुजी परम जोत हो परम उजास ।। ११-२ ।।
आप बखाणो सो सव साचो हे परमेसर है विसवास
पण पिरतक दरसण करणे री म्हाँरो. मनडै अभिलास ।। ११-३ ।।
दरसण देण जोग जे जाणो तो योगेसर परम सुजान
परम रूप रो पिरतक दरसण अविनासी देओ भगवान ।। ११-४ ।।
-
भगवान वखाण्यो-
भाँत-भाँत रा वरण हजारू दिव्य रूप थारै हित धार
हूँ ऊभो निजराँ रे सामो निरख पारथा निजर पसार ।। ११-५ ।।
भरत वंस रा वीर अरजुना देख अदित हूँ वसू सुजाण
रुद्र असविनी पवन सभी हूँ अणलखियो इचरजियो जाण ।। ११-६ ।।
गुडाकेस थिर निजर निरखले सकळ चराचर जगत निहार
भळे जको भी निरखण चावै भली भाँत लख निजर पसार ।। ११-७ ।।
पण तूं थारी इण निजराँ सू निरख सकै नहिं म्हारो रूप
इण कारण दूं दिव्य-नेतरा निरख पारथा दिव्य सरूप ॥ ११-८ ।।
विस्व रूप दरसरग योग/६५

संजय बतायो-
संजय बोल कह्यो राजा नें, इण उपराँत कृष्ण भगवान
अपणो दिव्य रूप दरसायो अरजुन नैं प्रभु परम सुजान ।। ११-९ ॥
अणगिण मुख नेतर उदबुदिया भाँत-भाँत रा रूप सँवार
दिव्य भुजावाँ दिव्य भूषणाँ अणगिण दिव्य ससतराँ धार ॥ ११-१० ॥
दिव्य माळ सुभ वसतर सोभै दिव्य सुगंधी री महकार
अरजुन दरस प्रभु रो करियो इचरज भरियो अपरंपार ।। ११-११ ।।
आभैयै में ऊग हजारू सूरज सागै करै उजास
तो भी राजन इसो न जिसड़ो विस्वरूप रो परम प्रकास ॥११-१२ ।।
इचरज भरियो रूप देखताँ अरजुन निरख्यो निजर पसार
परम प्रभू री काया में थित न्यारोन्यार सकळ संसार ॥११-१३ ।।
उण उपराँत आँ फुरकंताँ इचरज सू अरजुन हरषाय
हाथ जोड़ सरधा सू बोल्यो लुळ-लुळ प्रभु ने सीस नवाय ॥ ११-१४ ॥
अरजुन बोल्यो-
प्रभु थाँरी काया में दीसै सकळ देव-भूतळ समुदाय
कॅवळ आसणाँ ब्रह्मा राजै महादेव रिसि साँप सुझाय ॥ ११-१५ ।।
हाथ पेट मुख नैण अनेकू अणत रूप स्वामी दरसाय
आद मध्य अर अंत न दीसै विस्वरूप रो पार न पाय ।। ११-१६ ।।
गदा मुगट अर चक्र प्रकासै दसू दिसा में जोत पसार
सूरज अगन जिसो पळकारो रूपळ रूप पड़े भळकार ।। ११-१७ ।।
जाणण जोग परम आखर हो परम ब्रह्म परमातम आप
पुरुष सनातन धरम रुखाळा जग रो ओक आसरो आप।। ११-१८ ।।
आद मध्य अर अंत बिनाँळा लखू अणत प्रभु समरथवान
सूरज चाँद नैण जग तापै अगण भुजा मुख अगन समान ॥ ११-१९ ।।
६६/श्रीमद्भगवद्गीता

सरग धरा मध आसमान अर दसू दिसा परिपूरण आप
तीनूँ लोक डरंता काँपै निरख भयंकर अद्भुत आप ॥ ११-२० ।।
सकळ देव परवेस आप में डर कर जोड़ करै गुणगान
सिद्ध महरिसी मंगळ गावै विनती करै हुवो कल्याण ।। ११-२१ ।।
रुद्र अदित वसु और साधगण मरुत असविनी विसवेदेव
सिद्ध पितर गंधर्व यक्षगण राखस लखै अचूँभा लेय ।। ११-२२ ।।
अणगिण हाथ पाँव मुख नेतर उदर जाड़ सब करुड़ कराळ
हूं डरपू सब लोक डरपिया निरख रूप थाँरो विकराळ ।। ११-२३ ।।
हे विसर्यों गिगनार परसता गमकतड़ा थाँरा बहुरूप
जगमग मुख मोटा नेतर लख डरगूं धीर न सांति अनूप ।। ११-२४ ।।
परळ री अगनी मुख जगता विकराळी जाड़ाँ लख माँय
दिसा न सूझै मिलै न सुखड़ो जगदाधार प्रभू तूठाय ।। ११-२५ ।।
Phcc
भीषम द्रोण करण सब जोधा धृतरासटर-सुत नृप समुदाय
सब लखू करै परवेसो बेगोबेग आपरै माँय ।। ११-२६ ।।
म्हारे भी पख रा मुख जोधा विकराळी जाड़ाँ मुख माँय
भळे केई भुरभुरिया माथां लखू आप दाँताँ लिपटाय ।। ११-२७ ॥
ज्यूँ नदियाँ रो नीर वेग सू जाय समँदराँ माँय समाय
विस्व रूप मुखड़ाँ परवेसै सूरवीर नर रा समुदाय ।। ११-२८ ।।
ज्यू मो-माया पड़े पतंगा नष्ट हुवणर्ने वळती लाय
त्यू सगळा ही लोग विनासण धणे वेग तूं आप समाय ।। ११-२९ ।।
आप सकळ लोकाँ नैं चाटो जगमग मुखड़ाँ माँय असाय
जवर जोत दू विसणू जगनैं दिव्य तेज सू ताप-तपाय ।। ११-३० ॥
करुड़ रूप धारी थे कुण हो प्रभु म्हारै हित करो वखाण
नमूं तत्व पिरकरती जाणण हे देवा-रा देव तुठाय ।। ११-३१ ।।
विस्व रूप दरसरण योग/६७

भगवान बखाण्यो-
सब लोकाँ रो नास करणियो महाकाळ बधियो हूँ जाण
प्रगट हुयो हूँ लोक विनासण तें बिन मिटसी विपख सुजाण ।। ११-३२ ॥
जसरी जोत जगा उठ अरजुन दुसमण जीत राज सुख भोग
सूर सव्यसाची मैं मारया निमित मात्र बण समझ सुयोग ।। ११-३३ ।।
भीषम द्रोण करण जयद्रथ सब जोधा म्हाँ मारया तू जाण
डर मत मार जीतसी निसचे उठ अरजुन कर जुध घमसाण ।। ११-३४ ।।
संजय बतायो-
सुण केसव रा वचन काँपतो डरतो अरजुन कर जोड़ाय
नमसकार कर घणों गळगळो प्रभु सूं बोल्यो सीस निवाय ।। ११-३५ ।।
अरजुन बोल्यो-
नाँव कीरतन सू जग प्रभुवर हरख-हरख अनुराग लगाय
दिस-दिस में राखस डर भागै नमै सिद्धगण रा समुदाय ।। ११-३६ ।।
आद देव ब्रह्मा रा करता नमसकार वै क्यूँ न कराय
आप अणत देवेस जगत रा ब्रह्म आखराँ सभी समाय ।। ११-३७ ।।
आद सनातन पुरुष आप प्रभु परम अणत हो जगदाधार
ज्ञानी आप जाणणे जोगा परम विस्व व्याप्यो परसार ।। ११-३८ ।।
अगन पवन अर वरुण चन्द्रमा आप प्रभू ही हो यमराज
ब्रह्मा रा भी आप ब्रह्म हो नमूं हजारू वार प्रणाम ।। ११-३९ ।।
नमसकार है सकळ दिसा तूं आगै-लारै तूं सब रूप
आप अणत समरथ विकरम हो जग व्याप्यो है विस्व सरूप ।। ११-४० ।।
प्रभुवर मैं महिमा नहिं जाणी सखा भाव सू समझ सुजाण
कहयो प्रेम का आळस सू कृष्ण सखा यादव अणजाण ।। ११-४१ ।।
हँसी मसखरी आसण सैया अपमाण्यो आहार-विहार
अकलड़ाँ का सखाँ सामने करी भूल दो प्रभू विसार ॥ ११-४२ ।।
६८/श्रीमद्भगवद्गीता

पूजनीक गुरुवर विसवेसर जगत चराचर पिता सुजान
तीन लोक में थाँसू मोटो कोनी दूजो आप समान ।। ११-४३ ।।
पिता पुत्र रा सखा सखा रा पति पतनी रा सह अपराध
प्रभु तूठण निव करूँ वीनती सहण जोग म्हाँरा अपराध ॥ ११-४४ ।।
प्रभु इचरजियो अलख रूप लख हरखू पण मनडै भय लाय
जगदाधार प्रभूजी तूठो रूप चतरभुज ही दरसाय ।। ११-४५ ।।
विस्व रूप हे सहसबाहु प्रभु विष्णू रूप धरो प्रगटाय
रूप चतरभुज दरसण चाहूँ गदा चक्र धर-मुगट धराय ।। ११-४६ ।।
भगवान बखाण्यो-
आद अनंत तेज दरसायो अरजुन किरप योग बळ रूप
तें सिवाय दूज नहिं लखियो ओ' विराट अर परम सरूप ।। ११-४७ ।।
वेद यज्ञ रा पाठ करो या दान करम कर तपो अनूप
तें सिवाय लख सकै न दूजो मिरत लोक में विस्व सरूप ।। ११-४८ ।।
लख विकराळ रूप मत घबरा मूढ भाव अरजुन मत लाय
संख चक्र अर गदा पदम धर निडर प्रीत मन भले लखाय ।। ११-४९ ।।
संजय बतायो-
इण तरियाँ भगवान बोल फिर रूप चतरभुज दियो दिखाय
आकळ-वाकळ अरजुन नैं प्रभु साँवर सूरत धीर बँधाय ।। ११-५० ।।
अरजुन बोल्यो-
प्रभु थारो लख रूप साँवरो हुयो सांत चित हूँ चित लाय
हे जनारदन निरख आपनें अब पायो मैं निजू सभाव ।। ११-५१ ।।
भगवान बखाण्यो-
तें निरख्यो जो आज अरजुना दुरलभ धणों चतरभुज रूप
देव सदा दरसण नैं तरसै निरखण म्हारो इसो सरूप ।। ११-५२ ।।
--
-
---
.
विस्व रूप दरसण योग/६६

अरजुन मन री अचळ थापना कर न सकै जे म्हारै माँय तो तूं कर अभ्यास जोग तूं म्हाँ पावण इछा मन लाय ।। १२-९ ।। जे न सकै अभ्यास करण तूं म्हाँ हित परम करम अपणाय म्हारै अरथ करम करतो भी तूं सिद्धी ही लेसी पाय ।। १२-१० ॥ भळे जदी कर सके न ओ भी तो तूं म्हारै सरणें आय सरब करम फळ त्याग जोग तूं मन जीत्योड़ो म्हांनै पाय ।। १२-११ ।। ज्ञान बडो अभ्यास जोग तूं और ज्ञान तूं ध्यान विसेस बडो करम फळ त्याग ध्यान तूं ततखण हुवै साँति परवेस ।। १२-१२ ।। बैर भाव बिन सब भूताँ में बिन स्वारथ मिंतर किरपाळ अहंकार ममता नहिं व्यापै सम सुख दुख नर जको खमाळ ।। १२-१३ ॥ जको रात दिन ध्याय ध्यान तूं हाण-लाभ राखै संतोस द्रिढ़ निसचै मन वस राखणियोअरपणियो प्रिय भगत निदोस ।। १२-१४ ।। जिण तूं कोई जीव न बिदकै आप किणीं तूं नाँ बिदकाय हरख क्रोध भय बिदक बायरो सो ही म्हाँनें भगत सुहाय ।। १२-१५ ।। भगत पुरुष म्हाँने बो प्यारो जिण मन नाँ कोई इंछाळ माँय-बार सुध चतर निरपखो दुख टळियो त्यागी सरबाळ ।। १२-१६ ।। हरख सोच अर बैर न व्यापै जको कामना करै न कोय सुभ अर असुभ करम फळ त्यागी सो ही भगत मन्हें प्रिय होय ।। १२-१७ ।। संतरू-मितर भेद न राखै जको मान-अपमान समान जगत आसकी भाव न व्यापै सरद गरम सुख दुख सम जाण ।। १२-१८ ।। निन्दा अर इसतुति सम समझै मौन तूठ ज्यूँ-त्यू निभ जाय थान-मुकाम न राखै ममता थिर बुध भगत मन्हें वो भाय ।। १२-१९ ।। धरम धार निसकाम भाव भर कर सरधा इमरत लै पाण परम भगत जो इयाँ बखाण्या पण प्यारा तूं समझ सुजाण ॥ १२-२० ।। ७२/श्रीमद्भगवद्गीता

तेरवों अध्याय
क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग
भगवान बखाण्यो-
आ काया ही क्षेत्र कहीजै जो इणनैं जाणे क्षेत्रज्ञ
अरजुन जका तत्व नैं जाणे बै ही इयाँ बखाणे विज्ञ ।। १३-१ ।।
सब क्षेत्राँ क्षेत्रज्ञ अरजुना म्हाँ. ही तूं समझ सुजाण
तत्व क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ जाणणो म्हारै मत है बो ही ज्ञान ।। १३-२ ।।
जो है क्षेत्र जिसो जिण कारण जिणाँ विकाराँ जिसै सभाव
थोड़े में सब सुण म्हारे सूं बो क्षेत्रज्ञ जिसै परभाव ।। १३-३ ।।
भाँत-भाँत रा वेद मंतराँ रिसियाँ तत्व को समझाय
और जुगत तूं कर भल निसचै ब्रह्मसूत्र पद में भी गाय ।। १३-४ ।।
पाँच भूत बुध अहंकार अर तीन गुणी माया तूं जाण
दसूं इन्द्रियाँ मन अकलड़ो पाँच इन्द्रियाँ विष सुजाण ।। १३-५ ।।
सुख दुख इंछा द्वेष देह अर धृती चेतना अरजुन जाण
इणतर क्षेत्र विकाराँ भरियो मैं थोड़े में कियो बखाण ।। १३-६ ।।
बिना दंभ रै खमा अहिंसा ऊँचपणे रो नहीं गुमान
घणमान सरधा गुरु सेवा थिर सुध बुध सूं आतमवान ।। १३-७ ।।
भोग लोक परलोक विरागी और न राखै अहंकार
जलम मरण अर ज़रा रोग में लखै दोष दुख वारंवार ।। १३-८ ।।
पतनी पूत न घर दौलत में ममता और आसकी लाय
हरख-सोक अरजुन नहिं व्यापै प्रिय-अप्रिय नित सम चित चाय ।। १३-९ ।।
क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग/७३

अक भाव थिर ध्यान जोग यूँ प्रभुवरता भगती तूं ध्याय सेवै सुध अकाँत न रीझै विष डूबियाँ नर समुदाय ।। १३-१० ।। नित थित रह अध्यात्म ज्ञान में तत्व ज्ञान सगळे दरसाय ओ ही ज्ञान कहीजै इणा उलटो सब अज्ञान कवाय ।। १३-११ ।। कथV जाणण जोग जाण जिण पुरुष परम आणद ही पाय अकथ अनादी परम ब्रह्म है सत अर असत कह्यो नहिं जाय ।। १३-१२ ।। च्यारू मेर हाथ पग नेतर च्यारू मेर सीस मुख कान कारण सकळ लोक कर व्यापत थित है परम आतमावान ॥ १३-१३ ॥ सकळ इन्द्रियाँ रा गुण जाणे पण सगळयाँ तूं निपट वियोग निरगुण हुयो योग माया तूं भोगै धार पोख गुण भोग ।। १३-१४ ।। माय-बार सगळा भूताँ में सकळ चराचर परम सरूप सुखम तत्व अणदीठो बो ही घण नैडो-अळगो थित रूप ।। १३-१५ ॥ अकल और सकळ भूताँ थित दीसै न्यारोन्यार सुजाण धार पोख संहार करणियो जलम देणियो ब्रह्मा जाण ॥ १३-१६ ।। जोताँ माँली परम जोत पण माया सूं घण श्रेष्ठ कहाय जाणण जोगो परम ज्ञान थित तत्व ज्ञान सब हियाँ समाय ।। १३-१७ ।। इणतर क्षेत्र ज्ञान अर ज्ञेयम मैं थोड़े में दिया बताय परम रूप नैं जाण तत्व सू म्हाँरो भगत मन्हें ही पाय ।। १३-१८ ।। तिरगुणती माया जीवातम दोनॅ रूप अनादी जाण गुण विकार सागै उतपतिया कुदरत सू ही समझ सुजाण ।। १३-१९ ॥ करम करण उतपती कारणे कुदरत हेतु बखाणी जाय अर अरजुन आ पुरुष आतमा सुख दुख भोगण हेतु कहाय ।। १३-२० ।। कुदरत में थित हुयो पुरुष ही कुदरत रा गुण भोग लगाय गुण संगत सू ही जीवातम भली बुरी जूणी अलमाय ॥ १३-२१॥ ७४/श्रीमद्भगवद्गीता पुरुष भोगता अणदीठा अर मंता भरता परम बताय इण काया थित हुयाँ भी पर है सब देवाँ रा देव कहाय ।। १३-२२ ।। इणतर पुरुष और गुण कुदरत जो नर लेय तत्व सू जाण वो इण. हरज्यू बरतंतो पुनरजलम भी लै न सुजाण ।। १३-२३ ।। सुध बुध ध्यान हियै धर देखै कइयक पुरुष योग कर ज्ञान कइयक देखै करम योग सू परम आतमा परम सुजान ।। १३-२४ ।। पण कइयक अणजाण जीवड़ा तत्व ज्ञानियाँ सूसुण ध्याय इणतर कान लगावणिया भी निसचै भवसागर तिर जाय ।। १३-२५ ।। जियाजूण सब थावर जंगम अरजुन जो उपजै तूं जाण क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ योग सू हुई सकळ उतपती सुजाण ।। १३-२६ ।। पुरुष नासता भूताँ देखै अविनासी प्रभु थित सम भाव जको लखै सो लखै अरजुना परम आतमा सही लखाय ।। १३-२७ ।। सगळाँ में समभाव व्यापियै परमेसर नैं लखत समान आप नष्ट नहिं करै आपने पुरुष परम गत पाय सुजान ।। १३-२८ ।। जको पुरुष सगळा करमाँ नैं कुदरत सू ही हुया लखाय अण करता जो लखै आतमा बो ही अरजुन ठीक लखाय ।। १३-२९ ।। न्यारोन्यार भाव भूताँ रो अंक परम थित जणाँ लखाय और परम में भूत पसारो निरखै तणाँ ब्रह्म नैं पाय ।। १३-३० ।। अरजुन हुयाँ अनादी निरगुण ओ' अविनासी परम लखाय काया में थित हुयाँ थकाँ भी की न करै बो नाँ लींपाय ।। १३-३१ ।। आभैयै ज्यू सरब व्यापतो सुखम कारण नाँ लींपाय त्यूँ थित सकळ देह में आतम देह गुणां ना लींपाय ।। १३-३२ ।। अरजुन जियाँ अकलो सूरज सकळ लोक में करै प्रकास वींयाँ ही तो सकळ क्षेत्र में अक आतमा करै उजास ।। १३-३३ ।। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ भेद नैं भूत-प्रकृति तूं मोक्ष उपाय ज्ञान नेतराँ जो जन जाणे बो ही परम ब्रह्म पद पाय ।। १३-३४ ।। क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग/७५

No text on this page.

चवदवों अध्याय
गुण त्रय विभाग योग
भगवान बखाण्यो-
ऊँचो परम ज्ञान ज्ञानाँ में करतूं थारै काज बखाण
मुनि सब परम सिद्धि ले तरग्या भव तूं मुगत हुया जिण जाण ।। १४-१ ।।
धार आसरो इणी ज्ञान रो म्हारो परम रूप नर पाय
जलमै नहीं सृष्टि रै उदै परळे में भी नहिं अकुळाय ।। १४-२ ।।
म्हारी ब्रह्मजूण घण मोटी हूँ उण में दूं बीज थपाय
जड़ चेतन संजोग भारता सकळ भूत उतपती उगाय ।। १४-३ ।।
भाँत-भाँत री सव जूण्याँ में जिती मूरत्याँ धरै सरीर
वाँ सबरी माँ तिरगुण माया अर हूँ बाप वीज रो हीर ।। १४-४ ॥
सत रज और तमो गुण अरजुन जण्या प्रकृति तीनूं गुण जाण
अविनासी जीवातम बाँधै गुण देही रै माँय सुजाण ।। १४-५ ।।
वाँ तीनों में जोत करणियो निरविकार निरमळ सत जाण
सुख अर ज्ञान आसकी भावाँ बो वाँधै निसपाप-सुजाण ।। १४-६ ।।
राग रूप तिसणा रज उपज्यो है अरजुन म्हाँसू तू जाण
करम करमफळ री आसकती जीवातम लै बाँध सुजाण ।। १४-७ ।।
अरजुन सकळ देह मोवणियो तम अज्ञान उपजियो जाण
घण गुमान आळस निंदरा सू जीवातम लै वाँध सुजाण ।। १४-८ ।।
अरजुन सत्व लगावै सुख में और रजोगुण करम लगाय
ढक ज्ञान नैं अंध तमोगुण घण गुमान में दै उळझाय ।। १४-९ ।।
गुण त्रय विभाग योग/७७

रज तम दबा सतोगुण छावै सत रज दबा तमोगुण छाय
कदै रजोगुण बधै अरजुना तमो-सतोगुण वियाँ दबाय ॥ १४-१० ।।
इण देही अर सकळ बारणाँ हुवै चानणो जद ही जाण
और ज्ञान सगती जद उपजै बध्यो सतोगुण समझ सुजाण ॥ १४-११ ॥
बघयाँ रजोगुण लोभ प्रवरती सकळ काम आरंभ कराय
अरजुन मन चंचेड़ असाँयत विषे भोग री लाळ लगाय ।। १४-१२ ।।
बधयाँ तमोगुण घुटै अँधारो अरजुन नर करतब भटकाय
अन्तरकोर इन्द्रियाँ विगडै अहंकार अर मोह धिराय ।। १४-१३ ।।
मरै सतोगुण री बिरधी में अरजुन जद जीवातम जाण
ऊँचा थान मुकाम निरमळा सुरग लोक ही पाय सुजाण ।। १४-१४ ।।
मरयाँ रजोगुण री बिरधी में करमी-जणाँ माँय जलमाय
और तमोगुण री बिरधी में मूरख-जणाँ उतपती पाय ।। १४-१५ ।।
सात्विक करम करयाँ तो सात्विक अर निरमळ फळ कहयो सुजान
राजस करम करयाँ रो फळ दुख तामस रो फळ है अज्ञान ।। १४-१६ ।।
समझ सतोगुण ज्ञान ऊपजै लोभ रजोगुण निसचे जाण
उपजै मोह गुमान तमोगुण और भळे अज्ञान सुजाण ।। १४-१७ ।।
सुरग लोक में जाय- सतोगुण मिरत लोक में राजस जाय
और नीच भूडी बिरती रा तामस नरक लोक ही पाय ।। १४-१८ ।।
दरसक तीन गुणाँ सू न्यारो दूजो करता जद न लखाय
तीन गुणाँ सू श्रेष्ठ परम तत जाण पुरुष म्हाँ रूप समाय ।। १४-१९ ।।
पुरुष देह इण उतपत कारण गुण तीन सू जद लंघाय
जलम मरण अर जरा दुखाँ तूं मुगत हुयो परमाणंद पाय ।। १४-२० ।।
अरजुन पूछयो-
औ ती गुण पुरुष लँधै जद किसा-किसा वो लक्षण पाय
और करै वो किसा आचरण प्रभु लाँघे वो किरौ उपाय ।। १४-२१ ।।
७८/श्रीमद्भगवद्गीता

भगवान वखाण्यो-
सत उजास रज री परवरती अरजुन तम रै मोह भराव
पुरुष हुयाँ रत बुरो न समझे विरत हुयाँ मन करै न चाव ।। १४-२२ ।।
जको विरत थित गुणां न विचढ गुण में गुण बरतै आ जाण
अकाँभाव परम थित रैवै हिलै न डोले पुरुष सुजाण ।। १४-२३ ।।
सुख दुख में सम हुवै निरोगो भाटो धूड़ हेम सम जाण
धीर गिणे सम खारो-मीठो सम निंदा इसतुती सुजाण ।। १४-२४ ।।
गिणे मान-अपमान बरावर वैरी-मितर अक समान
गुणाँ लाँघियो पुरुष कहीजै करतापण नहिं गरव-गुमान ।। १४-२५ ।।
जो सत पुरुष सदा ही सेवै भगत योग तूं म्हांने जाण
परम लीण हुवणे हित जोगो वो तीनूं गुण लाँघ सुजाण ।। १४-२६ ।।
अविनासी पर ब्रह्म सनातन धरम और इमरत रो थान
अखण्ड आणन्द आसरो ओ अरजुन तूं समझ सुजान ।। १४-२७ ॥
Phch
गुग्ग प्रय विभाग योग ।
.

No text on this page.

पनरवों अध्याय
पुरुषोतम योग
भगवान बखाण्यो-
ऊपर जड़ा डाळियाँ नीचे जग पीपळ अविनासी जाण
पत्ता वेद तत्व जो जाणे बो जाणणियो वेद सुजाण ॥ १५-१ ।।
ऊँची-नीची साख पसारी विष कूपळयाँ तिरगुण छाय
मिरतलोक में करम बँधाणी जड़ाँ जमीं सब लोकाँ माँय ।। १५-२ ।।
आद-अंत थिति नाँ जग-पींपळ अठै न इसई रूप लभाय
द्रिढ मूळाळे उण पींपळ नैं द्रिढ़ ससतर बैराग कटाय ।। १५-३ ।।
पछै परम पद नैं भल सोधो सोधणिया फिर नाँ जलमाय
घण पुराण परवरती पसरी उणीं परम री सरण धराय ।। २५-४ ।।
मोह मिटयाँ सब दोस जीतियाँ नित थित हुयाँ परम नैं ध्याय
सुख दुख मुगत कामनाँ छोडयाँ ज्ञानी पद अविनासी पाय ॥ १५-५ ।।
सूरज चाँद न अगन उजासै जोत प्रकासै आपोआप
पाय परम पद फेर न जलमैं बो ही परम म्हारळो धाम ।। १५-६ ।।
म्हारो ही तो अंस सनातन इण देही जीवातम जाण
थित तिरगुण माया मन पाँचूँ इन्दरयाँ करपै समझ सुजाण ।। १५-७ ।।
पवन गंध लै जियाँ अरजुना जाम गंध रै थान मुकाम
त्यू जीवातम देह-त्याग तूं ले इन्दरयाँ जा नूंई जाम ।। १५-८ ।।
कान आँख अर जीभ चामड़ी और नाक मन साथ लगाय
नुई देह में जा जीवातम विषयाँ नैं सेवण में लाय ।। १५-९ ॥
पुरुषोतम योग/८१

तजताँ देह धारताँ देही विषै भोगताँ तिरगुण माँय
ज्ञान नेतराळा तत जाणे पण अज्ञानी जाणे नाँय ।। १५-१० ॥
जोगी हियै माँय थित आतम करताँ जतन तत्व लै जाण
असुध आतमा अज्ञानी तो जतन करंता भी अणजाण ॥ १५-११ ॥
जको तेज सूरज में थित हुय सकळ जगत परकासै जाण
चाँद-अगन में थित है बो भी म्हाँरो ही है तेज सुजाण ।। १५-१२ ॥
हूँ धरती में बड़ सगती तूं सब भूताँ मैं धारू जाण
चाँद रसीलो हुय, सगळी ही औषध पोखू समझ सुजाण ॥ १५-१३ ॥
हूँ थित सकळ प्राणियाँ देही वैस्वानर रो रूप धराय
हूँ ही प्राण-अपाण जुगत हुय, देऊँ च्यारूँ धान पचाय ॥ १५-१४ ॥
हूँ थित सकळ जियाँ रै हिवड़े हूँ उँपणण अर सुमरण ज्ञान
हूँ ही वेद रचणियो ज्ञानी वेदाँ जाणण जोग सुजान ॥ १५-१५ ॥
दोय भाँत रा पुरुष जगत में नासवान-अविनासी जाण
सब भूतां री काया नसवर अविनासी जीवातम जाण ।। १५-१६ ।।
उत्तम नर दोनों सूं न्यारो तीन लोक धार पोखाय
अविनासी ईसर परमातम कहियो इयाँ अरजुना जाय ।। १५-१७ ।।
नासवान सूं जाबक न्यारो अविनासी सूं उत्तम जाण
इणीं कारण हूँ पुरुषोतम लोक-वेद में नाँव सुजाण ।। १५-१८ ।।
ज्ञानी पुरुष तत्व तूं म्हानैं पुरुषोतम ही जको जणाय
सरव जाण बो सव भावाँ सूं जाण भारता मन्हें भजाय ।। १५-१९ ।।
ओ निसपाप अरजुना! इणतर गुपत सास्त्र में कियो बखाण
इणनैं जाण तत्व तूं ज्ञानी धन्य-धन्य हुय जाय सुजाण ।। १५-२० ।।
shcc
८२/श्रीमद्भगवद्गीता

सोळवों अध्याय
देवासुर सम्पद विभाग योग
भगवान बखाण्यो-
निरभै अंतसकरण सुधारै ज्ञान योग द्रिढ़ धार विचार
दान इन्द्रियाँ दमन हवन अर तप स्वाध्याय सरल चित धार ॥ १६-१ ।।
सत्य अहिंसा त्याग सांति धर निंदा और क्रोध नहिं लाय
अळी चेसटा विसै लजाळू भूत हिंयाळू दया सुभाय ।। १६-२ ।।
अरजुन तेज क्षमा धर धीरज तन मन राखै सुद्धी जाण
हिवड़े बैर गरब नहिं पाळे देव सम्पदा पुरुष सुजाण ।। १६-३ ।।
पारथ जाण भळे अ लक्षण जठै दंभ धण गरब-गुमान
असुर सम्पदा पाया पुरुषां करड़ा वचन क्रोध अज्ञान ।। १६-४ ।।
देव सम्पदा मुगती खातर बाँधण असुर सम्पदा जाण
तूं है देव सम्पदा पायो अरजुन मत कर सोच सुजाण ।। १६-५ ॥
अरजुन इयै लोक में मान्या दोय भाँत रा भूत स्वभाव
देव
असुर में देव वखाण्यो अब म्हाँसूं सुण असुर स्वभाव ।। १६-६ ॥
करतवलग अण करतब टळणो नाँ जाणे नर असुर स्वभाव
सूध न श्रेष्ठ आचरण साँच कैण रो सफा अभाव ॥ १६-७ ।।
असुर कवै जग सफा झूठ है ईसर और आसरो नाँय
नर-नारी संजोग जण्यो है हेतु न भोगण भोग सिवाय ।। १६-८ ।।
मिथ्या ज्ञान आतमा खोया बुधमंदा अपकार कुभाव
करम करूड़ा मिनख जगत नैं नास करणनैं ही जलमाय ।। १६-९ ।।
वों में
दैवासुर सम्पद विभाग योग/८३

दंभ मान मद सूं भरियोड़ा अड़क कामणा हिय धराय
ले मिथ्या सिद्धान्त मोह तूं भ्रष्ट आचरण जग बरताय ।। १६-१० ॥
चिता न छूट इसड़ी चिन्ता अणत आसरो हियै जड़ाय
विषै भोग भोगण में लाग्या इणीं मान आणंद बिलमाय ।। १६-११ ॥
आसा फाँस सैकड़ाँ बँधिया काम क्रोध में घण उळझाय
विषै भोग पूरण री खातर अधरम धन संचण घण धाय ॥ १६-१२ ।।
ओ' पायो मैं आज मनोरथ अजूं पायसू आ' मन माय
म्हारै हाथ इतो धन आयो और भळे भिळसी धन आय ।। १६-१३ ॥
बी बैरी नैं मार लियो मैं अर बीन भी लेसू मार
हूँ ईसर भोगाँ भोगणियो सिद्ध सुखी हूँ जोराँदार ।। १६-१४ ।।
घण धनवान बडो परवारी म्हाँ जिसड़ो दूजो नहिं कोय
हवन दान करतूं हरखातूं इणतर बो अज्ञान विमोय ।। १६-१५ ॥
चित भरम्या अर मोह उळझिया विषै भोग में घण डूबाय
भाँत-भाँत तूं पुरुष पड़े रे इणतर घोर नरक में जाय ॥ १६-१६ ।।
आपोआप फुटाणी फोड़े पुरुष गुमानी धन मद माण
बिनाँ सास्त्र विध करै होमड़ा जका दंभ सूं यजण-यजाण ॥ १६-१७ ॥
अहंकार बळ गरब कामणा और क्रोध में जका भराय
बै पर निंदक देही-देही थित म्हाँसूं ही द्वेष कराय ॥ १६-१८ ॥
बाँ बैरी पापी नीचाँ नैं करम करूड़ों में छिटकार
असुर जूण में ही हूँ नाँवू इण जगती में वारंवार ॥ १६-१९ ॥
बै नर मूढ़ असुर जूणी में जलम-जलम ही भटका खाय
मन्हें न पाय भळे घण नीची दुरगत घोर नरक में जाय ।। १६-२० ।।
काम क्रोध अर लोभ तीन विध अरजुन तीन नरक रा वार
वै तीन ही आतमनासी वाँ सू टळणो ही हितकार ।। १६-२१ ॥
८४/श्रीमद्भगवद्गीता

अरजुन तीन नरक दरवाजाँ मुगत हुयो नर निसचे जाण
करै आत्म कल्याण आचरण परम गती लै पाय सुजाण ।। १६-२२ ।।
सास्त्र विधी – त्याग जको नर आपोआप करम बरताय
सिध पावै न परम गत पावै भ? न बो सुखड़ो ही पाय ।। १६-२३ ।।
ओ' निरणो करतब-अण करतब तें हित जाण सास्त्र परवाण
अरजुन सास्त्र विधी निरणीज्यो करम करण ही जोग सुजाण ।। १६-२४ ।।
दैवासुर सम्पद विभाग योग/८५

No text on this page.

सतरवों अध्याय
श्रद्धा त्रय विभाग योग
अरजुन पूछयो-
सास्त्र विधी तज सरधा ध्यावै पूजे जका कृष्ण भगवान
सत रज और तमोगुण माँसू बाँरी कुणसी थिती सुजान ।। १७-१ ।।
भगवान बखाण्यो-
देह स्वभाव ऊपजी सरधा सत रज तम तिरभाँत सुजाण
इणतर तीन गुणी बा सरधा अरजुन तूं म्हाँ सूसुण जाण ।। १७-२ ।।
अरजुन सकळ जणाँ री सरधा बाँरै ही मन माफक जाण
जिसड़ी सरधा हुवै जिणाँ री बिसड़ो समझ स्वरूप सुजाण ।। १७-३ ।।
सात्विक पुरुष देवता पूजै राजस पुरुष राखसाँ जाण
और जका तामस जण पूजै भूत प्रेत गण समझ सुजाण ।। १७-४ ।।
विनां सास्त्र विधि रै मन मान्या जका घोर तप तपै तपाय
वै नर दंभ घणा गरबीज्या काम राग अभिमान भराय ।। १७-५ ।।
देह रूप थित काया रोसै मन में थित म्हाँने भी ताण
वाँ पुरुषाँ नैं समझ अरजुना असुर भाव अज्ञानी जाण ।। १७-६ ।।
भोजन भी सगळाँ नै प्यारो आप आपरै तिरविध भाव
त्यूँ ही यज्ञ दान तप तिरविध सुण तू भेद कयूं समझाय ।। १७-७ ।।
वुध बळ और निरोगी आयू सुख अर प्रीत वधावण सार
थिर रस भरियो घणों चीकणो सात्विक मन प्यारो आहार ।। १७-८ ।।
श्रद्धा त्रय विभाग योग/८७

खारो खाटो गरम लूणियो तीखो लूखो दाह भराय
सो भोजन राजस जण प्यारो दुख भय सोक जको उपजाय ।। १७-९ ॥
अधपकियो गतरसियो कोझो बासी-कूसी जो गिंधाय
बो अँठो-चूंठो ही भोजन तामस जण रुच-रुच नैं खाय ॥ १७-१० ।।
यज्ञ सास्त्र विधि ही करणो करतब है मन धार सुजाण
करै बिनाँ फळ री इंछा जो जिग बो ही है सात्विक जाण ।। १७-११ ।।
दंभ अरथ हित करै यज्ञ जो फळ री ताक राख मन जाण
बो राजस रो यज्ञ अरजुना तूं उणनैं यूं समझ सुजाण ।। १७-१२ ॥
अन्न दान बिन दान दक्षिणा बिना मंत्र बिन सास्त्र विधान
बिन सरधा सू यज्ञ कियोड़ो तामस यज्ञ कहीजै जाण ।। १७-१३ ।।
ब्रह्मचर्य व्रत भाव अहिंसा सूध-सुधाई धार सुजाण
पूजण ब्रह्म देव गुरु ज्ञानी तन-तप करण कहीजै जाण ।। १७-१४ ।।
मन में वेग नहीं लावणियो प्रिय हितकर जो सत्य वखाण
वेद सास्त्र पाठण अभ्यासण वाणी-तप निसचै कह जाण ।। १७-१५ ।।
सांत मगन मनडै नैं राखै मून धार आतम तूठाय
हिरदै में सुध भाव संपजै बो मानस-तप कहियो जाय ।। १७-१६ ।।
--
फळ न चाय निसकाम नराँ जो घण सरधा सू करियो जाय
इणतर जको बखाण्यो अरजुन तिरविध तप सात्विक कैवाय ।। १७-१७ ।।
आदर मान और पूजा हित घणे दंभ तूं करियो जाय
जको न निसचे और नहीं थिर वो राजस तप कहियो जाय ।। १७-१८ ।।
जो तप करै मूढपण हठ सूं आप आतमा नैं पीड़ाय
अर दूजाँ रो अहित करण नैं वो तप तामस तप कैवाय ।। १७-१९ ।।
--
---
देस काळ अर मिल्याँ सुपातर करतब जाण करीजै दान
वदळ-भाव री आस न राखै कहियो सात्विक दान सुजाण ।। १७-२० ।।
--
८८/श्रीमद्भगवद्गीता

बदळ-भाव री आस राखताँ दुख तूं जको दिरीजै दान
फळ पावण री इंछा राखै कहियो राजस दान सुजान ।। १७-२१ ।।
बिन आदर बिन देस काळ रै दान कुपातर करियो जाय
वोही तामस दान अरजुना इणतर समझ बखाण्यो आय ।। १७-२२ ।।
तीनू सवद ॐ तत सत तूं परम ब्रह्म रो धरियो नाँव
ब्राह्मण वेद यज्ञ सब रचिया आद सिष्टि में ब्रह्म रचाय ।। १७-२३ ।।
ब्रह्म बखाणणियाँ पुरुषां री नियत विधी सू करी विचार
यज्ञ दान तप री सब किरिया आरंभै नित ॐ उचार ।। १७-२४ ।।
तत रै भाव बिनाँ फळ चायाँ भात-भाँत री किरिया जाण
यज्ञ दान तप रूप करम सब मोक्ष चाणिया करै सुजाण ।। १७-२५ ।।
सत्य भाव अर साधु भाव में सत परमातम नाँव सुजाण
उत्तम करम करंता अरजुन सत रो सबद जुड़े नित जाण ।। १७-२६ ।।
यज्ञ दान तप में जो थिति है बा भी सत ही जाय बखाण
इणतर करम परम हित करिया निसचै सत है समझ सुजाण ।। १७-२७ ।।
विन सरधा रै हवन होमियो दियो दान तप कियो तपाय
कियो करम सब असत कहीजै लोक और परलोक गँवाय ।। १७-२८ ।।
श्रद्धा वय विभाग योग/८६

No text on this page.

अठारवों अध्याय
मोक्ष सन्यास योग
अरजुन पूछ्यो-
वासुदेव हे अंतर जामी महाबाहु प्रभु तत्व बखाण
न्यारोन्यार जाणणों चाहूँ त्याग और सन्यास सुजाण ।। १८-१ ।।
भगवान बखाण्यो-
कामण करम त्याग नैं पिंडत जन जाणे सन्यास सुजाण
सकळ करम फळ त्याग अरजुना कुसळ पुरुष कह त्याग बखाण ।। १८-२ ॥
दोस भरया सब करम बखाणें त्यागण जोग केई विदवान
कई कैवै नहिं त्यागण जोगा यज्ञ दान तप करम सुजाण ।। १८-३ ।।
हे अरजुन उण त्याग वि में तूं म्हाँरो निसचै सुण जाण
पुरुष श्रेष्ठ है सत रज तामस तीन भाँत रा त्याग सुजाण ।। १८-४ ।।
त्यागण जोग नहीं पण करतब यज्ञ दान तप करम सुजाण
बैं तीनूं ही यज्ञ दान तप परम पुनीत करै बुधवान ।। १८-५ ।।
यज्ञ दान तप करम समूचा फळ आसकती त्याग कराय
निसचे जाण अरजुना करतब आ म्हारी है उत्तम राय ।। १८-६ ॥
नियत करम रो त्याग अरजुना उचित कोयनी रे तूं जाण
हियै मोह भर करम त्यागणो कहियो तामस त्याग सुजाण ।। १८-७ ।।
करम जिता है दुखदायक है काय-काँस डर त्याग कराय
तो नर राजस त्याग कियाँ भी नहीं त्याग रै फळ नैं पाय ।। १८-८ ।।
मोक्ष सन्यास योग/६१

सास्त्र विधा सू नियत कियाड़ा करम कर जो करतब जाण
फळ आसकती त्याग अरजुना मान्यो सात्विक त्याग सुजाण ।। १८-९ ।।
हितकर करम नहीं आसकती और अहितकर नाँ दुखराय
निसचै ही ज्ञानी त्यागी है पुरुष सतोगुण सूं सुळझाय ।। १८-१० ।।
कारण पुरुष देह धारी तो सकळ करम नहि त्याग सकाय
जको करम फळ त्यागै अरजुन बो इणतर त्यागी कैवाय ॥ १८-११ ।।
पुरुष सकामी रै करमाँ रो तिरविध फळ मरियाँ भी आय
बो आछो मंदो रळकटियो फळ सन्यासी कदै न पाय ॥ १८-१२ ॥
सकळ करम सिध साधण सारू पाँच साँख्य सिद्धांत सुजाण
बै पाँचूं ही कारण म्हाँसूं अरजुन भली भाँत तूं जाण ॥ १८-१३ ॥
भाँत-भाँत रा न्यारा-न्यारा करता करण जतन आधार
और पाँचवों देव कहीजै इणीं विष में न्यारोन्यार ।। १८-१४ ।।
जो नर मन वाणी काया तूं अरजुन सास्त्र गीत-विपरीत
जका अगैरै काम उणाँ रा ही झै कारण पाँच पुनीत ।। १८-१५ ॥
इयाँ हुयाँ भी पुरुष असुध बुध कारण उणीं विषै रै माँय
केवळ करता लखै आतमा सो दुरमत नहिं सूल लखाय ।। १८-१६ ॥
"हूँ करता हूँ" भाव न राखै जको पुरुष हिरदै रै माँय
जिण री बुध नाँ करम लिंपावै लोक मार नहिं पाप बँधाय ।। १८-१७ ।।
ज्ञान ज्ञेय अर ज्ञाता तीनूं अरजुन हियै करम उपजाय
करता करम करण मिल तीनूं करमाँ रो भण्डार भराय ।। १८-१८ ।।
करता करम करण गुण भेदाँ तिरविध साँख्य शास्त्र कैवाय
बै भी तूं म्हारै सू अरजुन भली भाँत सुण कान लगाय ।। १८-१९ ।।
न्यारोन्यार सकळ भूताँ में लखें अक अविनासी ज्ञान
परम भाव समभाव हुयो जो लखै सु सात्विक ज्ञान सुजान ।। १८-२० ।।
६२/श्रीमद्भगवद्गीता

भात-भाँत सू सब भूतां में न्यारोन्यार अनेकू भाव
जक ज्ञान सू जाणे अरजुन बो ही राजस ज्ञान जणाय ।। १८-२१ ।।
काया मेक करम ज्यू पूरै जको आसकी में भरमाय
बिनाँ जुगत अर तत्व बायरो तुच्छ ज्ञान तामस कैवाय ।। १८-२२ ।।
सास्त्र विधी तूं नियत करम जो करतापण रो नहीं गुमान
बिन फळ चायाँ राग द्वेष बिन कियो सु सात्विक करम सुजाण ।। १८-२३ ।।
घणे परिश्रम सूं जो जुड़ियो अहंकार तूं करम घिराय
फळरी चाह गरब सूं भरियाँ कियो सु राजस करम कवाय ।। १८-२४ ।।
फळ हाणी हिंसा निज-समरथ बिनाँ विचारयाँ मोह भराय
करम जको आरँभियो अरजुन बो ही तामस करम कवाय ।।१८-२५ ।।
बिनाँ आसकी अहंकार बिन मन धीरज धर कर उमगाव
हरख सोक सिध असिध न राखै बो सात्विक करता कैवाय ।। १८-२६ ।।
आसक हुयो करम फळ चावै हिंसा लोभ असुध आचार
हरख सोक तूं लीप कळीज्यो सो राजस करता-करतार ।। १८-२७ ।।
सीख हीण चितभंग आळसियो धूत घमंडी सोक सभाव
दिरघ-सूतरी रोजी खोसक सो तामस करता कैवाय ।। १८-२८ ।।
अरजुन बुध धारण सगती भी गुणाँ कारण तिरगुण जाण
न्यारोन्यार भेद सैंपूरा सुण म्हारे सूं किया बखाण ।। १८-२९ ।।
परवरती-निरवरती मारग करतब-अणकरतव तत जाण
भै-निरभै मुगती अर बंधण बा बुध सात्विक समझ सुजाण ।। १८-३० ।।
धरम और अधरम नहिं जाण करतब अणकरतब नहिं जाण
पारथ जो न यथारथ जाणै बा बुध राजस समझ सुजाण ।। १८-३१ ।।
अरजुन जो बुध घिरी तमोगुण अधरम गिण धरम ही जाण
ऊँधा अरथ लगावै सगळा बा बुध तामस समझ सुजाण ।। १८-३२ ।।
मोक्ष सन्यास योग/६३
RAMA

ध्यान योग धर सुद्ध धारणा करम इन्द्रियाँ मन अर प्राण अरजुन जको पुरुष यूँ धारै धरी धारणा सात्विक जाण ॥ १८-३३ ।। फळ इंछाळू राख आसकी अरजुन जको धारणा पाण धरम अरथ अर काम धरावै धरी धारणा राजस जाण ।। १८-३४ ।। पारथ पुरुष दुष्ट बुध धारी धरै धारणा तजै न बाण भय निंदरा चिंता दुख मद में धरी धारणा तामस जाण ॥१८-३५ ।। अरजुन तूं म्हाँसूं अब सुणलै सुख भी तीन भाँत रो पाय जिण सुख में साधक अभ्यासाँ रमण करै दुख अंत कराय ॥ १८-३६ ।। पहला जो सुखड़ो विष भासै पण फळ में इमरत ज्यूँ जाण आतम बुध परसाद उपजियो बो सुख सातविक कियो बखाण ।। १८-३७ ।। भोगण काळ लखावै इमरत जो सुख विषै इन्द्रियाँ भोग पण फळ में विष है जो अरजुन बो सुख राजस कह्यो सुयोग ।। १८-३८ ।। जो सुख भोगकाळ अर फळ में आतम नैं मोहणियो जाण आळस नींद गुमानाँ उपज्यो बो सुख तामस कह्यो सुजाण ॥ १८-३९ ।। धरती सुरग और देवाँ में अरजुन इसो न कोई जीव कुदरत जण्याँ तीन गुण न्यारो गुणाँ बायरो जको सजीव ।। १८-४० ।। ब्राह्मण क्षत्री वैस्य सूद्र भी समझ परंतप इयाँ सुजाण करम सुभाव उपजियै गुण सूं न्यारोन्यार वाँटिया जाण ॥ १८-४१ ।। सम दम खमा ऊरमा अर तप सुद्ध आसतिक सुध बुध जाण ज्ञान और विज्ञान कुदरती ब्राह्मण रा सुभ करम सुजाण ।। १८-४२ ।। सूरापण अर तेज धीरता दान चातरी स्वामी-भाव जुध सूं कदै न मुखड़ो मोड़े औ क्षत्री रा करम सुभाव ।। १८-४३ ।। विणज और खेती गोपाळण करम स्वभाव वैस्य रो जाण सव वरणाँ री सेवा करणी सूद्र सुभावी करम सुजाण ।। १८-४४ ।। ६४/श्रीमद्भगवद्गीता

आप आपरा करम करताँ पुरुष परम सिध पाय सुजाण
जियाँ करम करता सिघ पादै बा विध तूं म्हाँसूं सुण जाण ।। १८-४५ ।।
जिण परमातम भूत जलमिया जिणा सकळ जगत प्रगटाय
करम सभावाँ ही सिध पावै उणीं परम नैं पुरुष पुजाय ।। १८-४६ ।।
सुध आचार धरम दूजै सूं अपणों धरम श्रेष्ठ गुणबार
नियत सुभाव करम करतो नर पड़े न अरजुन पाप फळार ।। १८-४७ ।।
दोस भरया भी करम आपरा नहीं छोडणा समझ सुजाण
आग धुवै ज्यूँ दोस घिराया सगळा करम अरजुना जाण ।। १८-४८ ।।
विना आसकी और कामणा सरव सुबुध जीवातम जाण
साँख्य योग सूं भी पाजावै करम हीण सिध परम सुजाण ।। १८-४९ ।।
सिध पायोड़ो पुरुष अरजुना परम ब्रह्म में जियाँ समाण
तत्व ज्ञान री विद्या सरधा वा थोड़े में म्हाँसू जाण ।। १८-५० ।।
तात्विक
सुध बुध धरै धारणा जो मनड़ो काबू कर पाय
सवद विष सगळा तज देवै राग द्वेस सव देय मिटाय ।। १८-५१ ।।
सुध अकाँत सेव मितहारी मन वाणी काया लै जीत
ध्यान योग में लीण हुयो चित द्रिढ बैरागी पुरुष पुनीत ।। १८-५२ ।।
अहंकार वळ गरव परिप्रै काम क्रोध सब देय तजाय
ममता हीण सात चित राखै जको ब्रह्म में जाय समाय ।। १८-५३ ।।
ब्रह्मलीण होयो परसण चित करै न इंछा करै न सोग
सब भूताँ समभाव हुयोड़ो परम भगति वो पाय सुयोग ।। १८-५४ ।।
परम भगति हूँ तत्व रूप जो भली भाँत लै म्हांने जाण
और तत्व सू जाण-पाणता म्हाँ में आय समाय सुजाण ।। १८-५५ ।।
जको करम योगी निसकामी सरव करम नित करतो जाय
वो भी तो अविनास सनातन म्हारी महर परम पद पाय ।। १८-५६ ।।
मोक्ष सन्याम योग

सकळ करम मन सू म्हाँ में ही अरपण कर तू मन्हें भजाय बुद्धि योग रो राख आसरो म्हाँ में ही चित सैलँग लाय ॥ १८-५७ ।। म्हाँ में सैलँग लाग्योड़ो चित म्हाँरी महर दुखाँ तिरजाय जे न सुणैलो अहंकार में तो मिटसी तूं नास मिलाय ॥ १८-५८ ।। अहंकार कारण जे माँनें "हूँ जुध नहीं करूं", तो साव झूठो है थारोड़ो निसचे जुध जूझासी तन्हें स्वभाव ।। १८-५९ ।। अरजुन मोह घिरायो भी तूं जको करम करणों नहिं चाय उणनें भी परवस हुय करसी बँध्यो आपरै करम स्वभाव ।। १८-६० ॥ काया-कळ रै माँय बिराज्या सकळ प्राणियाँ नै भरमाय परमेसर अपणीं माया सूथित है सरब भूत हित माँय ॥ १८-६१ ।। सरव भाँत उण परमेसर री अरजुन अक सरण ही जाय परम साँति अर धरम सनातन उणरी ही किरपा सू पाय ।। १७-६२ ।। ज्ञान गुपत सू गुपत घणैरो मैं थारै हित कियो बखाण जो चावै सो ही कर अरजुन ! भली भाँत सब सोच सुजाण ।। १८-६३ ।। सरब गुपत सू गुपत अरजुना म्हाँरा परम वचन सुण जाण कारण तू म्हारो घण प्यारो नै हित करतूं हितू वखाण ।। १८-६४ ।। म्हाँने ही कर नमसकार तू अकमनो हुय पूज-भजाय लू सत प्रण म्हाँ में ही मिलसी तू म्हाँरो प्यारो इधकाय ।। १८-६५ ।। धरम करम सब त्याग अरजुना अक म्हारळे सरणे आय सोक मती कर सब पापा सूतन्हें मुगत करसू चितलाय ।। १८-६६ ।। जठे न तप भगती मत वाँचो परम ज्ञान ओ' कदै सुजाण म्हाँ निंदै जो सुण्यो न चावै उण आगे मत करो वखाण ॥ १८-६७ ।। म्हाँ में परम प्रेम कर जो नर परम गुपत ओ' ज्ञान सुजाण म्हारै भगताँ में वखाणसी निसचे बो मिलसी म्हाँ जाण ।। १८-६८ ।। ६६/श्रीमद्भगवद्गीता

म्हारो प्यारो काम करणियो उण सू बडो न मिनखाँ माय
इण धरती पर उण सू मोटो दूजो कोय हुवैला नाँय ।। १८-६९ ।।
ओ' धरमी संवाद आपणों जो नित करसी पाठ सुजाण
ज्ञान यज्ञ पूज्यो जाऊँलो हूँ उणसू म्हारो मत जाण ।। १८-७० ।।
सुद्ध नजर सरधा सू जो नर ओ' सुणसी निज कान लगाय
वो भी मुगत हुयो पापाँ सू पुन करमाँ सुभ लोकाँ जाय ।। १८-७१ ।।
पारथ के अकागार चित तूं तें सुणियो ओ' वचन सुजाण
मोह मिटयो के थारो अरजुन जो उपज्यो अज्ञान-अजाण ।। १८-७२ ।।
अरजुन बोल्यो-
हे भगवान आपरी किरपा मोह मिटायो सुमरण पाय
संसै मिटयो हुयो थित थाँ में पाळू थाँरा वचन फळाय ।। १८-७३ ।।
संजय बतायो-
सुणो महीपत हे राजन मैं इणतर बो सुणियो संवाद
घणों उदबुदो रू-फुरकाऊ वासुदेव अरजुन संवाद ।। १८-७४ ।।
महर व्यासजी री मैं सुणियो परम गुपत घण योग सुजाण
खुद साख्यात कृष्ण योगेसर श्रीमुख करताँ योग बखाण ।। १८-७५ ।।
घण उदबुद कल्याण करणियो प्रभु-अरजुन रो ओ' संवाद
हूँ सुमरण कर बारंबाराँ राजन हरखू खोय विषाद ।। १८-७६ ।।
रूप घणों अदभुत श्री हरि रो राजन सुमरचा वारंवार
चित में इचरज हुवै घणैरो हूँ हरखाऊँ बारंवार ।। १८-७७ ।।
जठे कृष्ण योगेसर है अर जठै धनुरधर अरजुन जाण
बठ विजय श्री अर विभूति है अचळ नीति म्हारो मत मान ।। १८-७८ ॥
- ॐ तत्सत् -
मोक्ष सन्यास योग/६७

-- गीता महातम সান पुरुष हुयो पावन चित ध्यावे जो भी गीता सास्त्र सुजाण प्रभु विष्णूं रै पद नैं पावै भय अर शोक हीण हुय जाण ।। १ ।। जो गीता ही पढे लगोलग प्राणायाम करै नित जाण बाँ पुरुषां रा पाप मिटै सब पुरब जलम रा समझ सुजाण ।। २ ।। जळ तूं स्नान नितूको कर नर काया रो तो काट धुपाय पण गीता-गंगा में अकर न्हायाँ भवसागर तिरजाय ।। ३ ।। प्रभु विस्णूं रै मुख सू निसरयो महाभारत सब इमरत जाण पान करयाँ गीता-गंगाजळ पुनरजलम नहिं हुवै सुजाण ।। ४ ।। गौ माता ज्यूँ सब उपनिषदा दूध दुहणियो श्री गोपाळ बाछड़ियो पारथ बुध ज्ञानी दूध पियै गीतामृत ढाळ ।। ५ ।। 卐卐 卐 नर क्यूं दूजा सास्त्र संगरै के परयोजन पुरुष सुजाण खुद भगवान विष्णु री वाणी अठै अमर गीता रो गान ।। १ ।। सरब वेद तूं जड़ी मनुस्मृति सरव सास्त्रमय गीता ज्ञान गंगा में सब तीर्थ समाया सरव देव विष्णूं भगवान ॥ २ ॥ गीता अर गंगा गायत्री अर गोविंद औ च्यार गगार जिणरै हिवड़े माँय विराजै बै नहिं आय पुनरजलमार ।। ३ ।। सार महाभारत रस इमरत साररूप मथ गीता ज्ञान होम दियो अरजुन रै मुख में परम प्रभू श्री कृष्ण सुजान ।। ४ ।। गीता महातम/६६ 1 स्कन्द पुराण बंधण मोक्ष नहीं रे अरजुन ब्रह्म निरामय विस्व सुजान द्वैत और अद्वैत न कोई सचिदाणंद सरब तूं जाण ॥ १ ॥ गीता सकळ सास्ताँ रो रस सकळ सास्त्र सिद्धांत सुजाण कियो वेद-सास्त्राँ जो निरणे ब्रह्मज्ञान बो ही तूं जाण ॥ २ ॥ गूढ़ अरथ वेदाँ रो दरपण गीता सास्त्र बखाण्यो जाण मन काबू कर पढे जो पारथ पाय सनातन विष्णु सुजाण ॥ ३ ॥ पढे विष्णु रो उत्तम महातम और सुणे जो ध्यान लगाय पुण्य बढा नित पाप घटावै धन्य करै दुख देय मिटाय ॥ ४ ॥ च्यार वेद नव व्याकरणाँ मुनि व्यास अठारूँ मथ्या पुराण जद रचणा इण महाभारत री घणे जतन सूं हुई सुजाण ।। ५ ।। मथ्यो समंदर महाभारत जद प्रगट हुई आ गीता जाण कृष्ण आप अरजुन रै मुख में धरचो अमर रस सार सुजाण ।। ६ ।। गंगा स्नान नितूको कर नर काया रो तो काट धुपाय पण गीता गंगा में अकर न्हायाँ भवसागर तिर जाय ॥ ७ ॥ गीता सहस्र नाँव रस रचियो राजै राज स्तवन रूप हियै धार मन ही मन सुमरै नारायण साक्षात स्वरूप ॥ ८ ॥ सरब घरम तूं जड़ी मनुस्मृति सरब वेद मय गीता ज्ञान गंगा में सब तीर्थ समाया सरव देव विष्णू भगवान ।। आधो चरण चरण इक धारै अक सिलोको आधो धार जो नर पढे नितूको गीता मोक्ष लाभ करलै संसार ॥ १० ॥ कृष्ण रूप इण बिरछ नीपजी क्यूँ न हरड़ गीतामृत खाय सेवण करयाँ मिनख री काया सकळ काळमळ काट मिटाय ।। ११ ।। कळजुग में गंगा अर गीता सन्यासी अर कपिळा गाय पींपळ पूजण करण इग्यारस तूं घण पावन किसो उपाय ।। १२ ।। नर क्यूँ दूजा सास्त्र विसतरै के परयोजन पुरुप सुजान खुद भगवान विष्णु री वाणी जठै अमर गीता रो ज्ञान ।। १३ }} गीता रो नित पाठ करणियो आपद घोर नरक नहिं जाय ।। १४ ।। ܢ ܝܐ १००/श्रीमद्भगवद्गीता নায়াগু হTO धरती पूछयो- हे भगवान प्रभू परमेसर देव देओ थे मन्हें बताय भाग्य भोग करता मिनखाँ नैं अनन भगति कूकर मिल पाय ।। १ ।। श्री विष्णूं बखाण्यो- परालबध रो भोग करंताँ जको सदा गीता नैं ध्याय वो ही मुगत सुखी नर जग में कदै न करमाँ तूं लींपाय ।। २ ।। गीता ध्याय करणिय तूं जे कोई महापाप हुय जाय देव योग बो पाप न परसै ज्यूँ न कमळ दळ जळ लींपाय ।। ३ ।। जठे ग्रन्थ गीता पूजीजै गीता पाठ सदा सरसाय वठे सकळ तीरथ प्रयाग-सा इण में कोई संसै नाय ॥ ४ ।। जठे पाठ गीता रो निसदिन सणे पारसद वास कराय सकळ देव रिसि नारद ऊधव गोपा-गोपी नाग जुड़ाय ॥ ५ ॥ जठे पठण-पाठण अर सुणवण गीता पर ही हुवै विचार सुण धरती हूँ बढ़ निवासू निसचै सदा जाण आधार ।। ६ ।। हूँ गीता रै रहूँ आसरै गीता म्हारो उत्तम गीता ज्ञान आसरै पूरूं तीन लोक पाळण रो काम ।। ७ ।। गीता जाण परा विद्या है निसचै ब्रह्म स्वरूपा जाण अणनासाणी अरध मातरा अणभण रूपा समझ सुजाण ।। ८ ।। चिदानन्द भगवान कृष्णजी निज श्रीमुख सू कियो वखाण अरजुन हित परमाणद रूपी तत्व ज्ञान तिरवेद सुजाण ।। ९ ।। थिर चित हुयो पुरुष जो नित ही ध्याय अठारै जपै सुजाण ज्ञान रूप सिद्धी झट पावै अर लेवै परमाणद जाण ।। १० ।। पूरो गीता पाठ न संपै तो नित आधै नैं ही ध्याय इणतर पाठ कियाँ नहिं संसै बो गोदान जिसो फळ पाय ।। ११ ।। गीता महातम/१०१ phics धाम भाग तिहाई पाठ करणियो गंगा रो न्हावण फळ पाय छठे अंश रो जाप करणियो सोमयाग फळ लाभ लभाय ॥ १२ ॥ ओक ध्याय नित भगती ध्यावै रुद्रलोक नै पावै जाण बठै रुद्र रो गण बण बो नर अणत काळ सुख बसै सुजाण ॥ १३ ॥ अक ध्याय रै अक स्लोक रो अक चरण ही जो नित ध्याय मनवंतर भर सुभ वसुंधरा आछो मिनख जमारो पाय ।। १४ ।। अक-दो-तीन-च्यार पाँच-सात-दस अर आधो स्लोक जको ही ध्याय निसचे दस हजार बरसाँ तक बो नर चन्द्रलोक बस जाय ॥ १५ ॥ जो नर गीता पाठ सुणतो मरै सो जलमै मिनख जमार फेर भळे गीता अभ्यास्याँ उतमी-गती मोक्ष मुगतार ॥ १६ ॥ गीता सबद मात्र उचरंतो मरै जको नर सदगत पाय ।। १७ ।। गीता अरथ सुणण चित लाग्यो पापी भी बैकुण्ठ सिधाय प्रभु विष्णू भगवान संग बो आणद ही आणद फळ पाय ॥ १८ ॥ करम घणा करतो भी जो नर गीता अरथ नीतूको ध्याय वीनै जीवण मुगत समझणो मरचाँ परम पद ही तो पाय ॥ १९ ॥ राजा लोग जनक-सा कोई गीता रो आसरियो धार पाप मुगत हुय जस जगती में सुणियो आप परम पद सार ।। २० ।। गीता पाठ करणियो जो नर पछै महातम जको न ध्याय उण रो पाठ हुवै विरथा ही श्रम करियो सब अळियो जाय ।। २१ ।। गीता पढे महातम सागै बो ही पूरै फळ नैं पाय इणतर जो नर करै ध्यान धर दुरलभ परम मोक्ष पद पाय ।। २२ ।। सदा सनातन गीता महातम मैं जिण रो नित कियो वखाण जो गीता पढ़ पढे अन्त में वो नर लभै सकळ फळ जाण ॥ २३ ।। १०२/श्रीमद्भगवद्गीता

।
श्रीमद्भगवद्गीता भीमानन्दी राजस्थानी अनुवाद
सम्मतियां एवं शुभकामनाएं
राजस्थानी भाषा रै गौरव री घणी श्रीवृद्धि
श्री भीमपाँडिया बीकानेर री लेखणी तूं लिख्योड़ो श्रीमद्भगवद्गीता रो
भीमानन्दी राजस्थानी अनुवाद सुण्यो । घणों-घणों आणंद हुयो। अनुवाद
मूळ रै घणो नेडो है । इण अनुवाद सूं राजस्थानी भासा रै गौरव री
घणी श्री वृद्धि हुयसी, ओ म्हारो भरोसो है ।
करणीसिंह
1 जनवरी 1984
डॉ० करणीसिंह अॉफ बीकानेर
कोई सामान्य कवि नहीं
कविवर श्री भीमपांडिया केवल बीकानेर के ही नहीं अपितु समस्त
राजस्थान के प्रख्यात राजस्थानी के सुकवि हैं। आपकी यह विशेषता
कि आप केवल राजनीतिक और सामाजिक गीतों के ही नहीं अपितु गहन
से गहन आध्यात्मिक विषयों के भी रहस्यों के प्रतिपादक काव्य-प्रणेता
हैं । आपने श्रीमद्भगवद्गीता के गहन से गहनतम भावों को जिस मधुर
और सुगम भाषा में अपने मनोहर गीतों में अभिव्यक्त किया है वह इस बात
को स्पष्ट रूप से प्रमाणित कर देता है कि श्री भीमपांडिया कोई सामान्य
कवि नहीं है । इनके काव्य से राजस्थानी भाषा और राजस्थान का साहित्य
निश्चित रूप से समृद्ध होता है ।
विद्याधर शास्त्री
24.5.1978
माँ राजस्थानी भासा रै भंडार नै भरता रसी
वीकानेर रा रैवरिणया मां राजस्थानी रा जाणीता मांणीता कवि पर
गायक श्री भीमपांडिया जी गीता रो सोरी-सोवणी कविता में भावानुवाद
कर' र एक घणी खटकती कमी नै दूर की है ।
सम्मतियां/१०३

गीता प्रेस गोरखपुर सूं छपियोड़ी गीता रो सोरै सू सोरो हिन्दी अनुवाद लागत मात्र री कीमत ऊपर बांटण पर भी राजस्थान रै, खास कर लुगायाँ अर टावरों ने सोरप सूं समझण में कठिनाई ई लागी । कारण बारी मातरी भासा राजस्थानी होवरण सूं बै राजस्थानी बैगी समझ सके है । आ कमी भीमपाँडियाजी पूरी करदी जिणसूं बै बधाई रा पूरा हकदार है । विसवास करूं हूँ के श्री भीमपाँडियाजी इसी ही अमोलक रचनावां तूं मां राजस्थानी भासा रै भंडार नै भरता रैसी, इणी शुभ कामनावा व आसीप देवते विनयावनत मुरलीधर व्यास राजस्थानी निजी पर अनोखी कळा श्री भीमपाँडिया घणा बरसा सू माँ राजस्थानी री सेवा करता पाय रेया है। जनकवि रै रूप में बां पाछी प्रसिद्धि पाई है। वारी रचनाशैली और उरण री रचनावां नै गाय' र सुणावणरी कळा निजी अर अनोखी है । घण हरख री बात है कि वाँ भारत र सर्वश्रेष्ठ और सिगला सूं घणो प्रचलित भगवद्गीता जिस नथ रो पद्यानुवाद किया है। आ जीवण री एक बड़ी सफलता है । गीता जिसो बडो ग्रंथ अब पापारी मातृभासा में सर्वसुलभ हुयग्यो है। पासा है इणरो आछो प्रचार हुसी घणा लोग लाभ उठासी। अगरचंद नाहटा 4.6.78 भगीरथ प्रयास श्रीमद्भगवद्गीता जैसे तत्व प्रधान ग्रंथ का राजस्थानी जैसी विकासशील भाषा में यथार्थ अनुवाद बहुत ही दुरूह कार्य है तथापि राजस्थानी मंचों के सुप्रसिद्ध चित्ताकर्षक कवि श्री भीमपांडिया ने राजस्थानी में गीता-- गङ्गावतारण का भगीरथ प्रयास किया है। स्वामी सोमेश्वरानंद भारती अधिष्ठाता धनीनाथ गिरि पंच मंदिर, बीकानेर 14.7.78 साहित्य जगत की अपूर्व सेवा राजस्थानी भाषा के जाने माने कवि श्री भीमपांडिया ने श्रीमद्भगवद्गीता को अपनी जनभाषा में लाकर अनुदित कर साहित्य जगत की अपूर्व सेवा की है। श्री भीमपाँडिया ने गीता जैसे श्रद्धा और प्रेरणा स्रोत ग्रंथ को अनुदित कर मारवाड़ की शुष्क धरा को भी सरस और हरा भरा करने का भगीरथ प्रयास किया है। जिनचन्द्र सूरि बड़ा उपासरा, बीकानेर 10.6.83 जन्मजात कवि श्री भीमपाँडिया से मैंने राजस्थानी भाषा में श्रीमद्भगवद्गीता का छंद बद्ध अनुवाद सुना। कई वर्ष पूर्व हिन्दी के विख्यात विद्वान कवि बच्चन की "नागर गीता" खड़ी बोली में और "जनगीता" अवधी में देखने का सुअवसर मिला था। तब मन में सोच आया था कि क्या ही अच्छा हो यदि कोई राजस्थानी का कवि इस पुनीत भगवद्वाणी को हमारी जनवाणी में अनुदित कर दे । श्री भीमपाँडिया जन्मजात कवि हैं। राजस्थानी भाषा पर उनका सहज अधिकार है और छंद उनके श्वास-प्रश्वास का सहयोगी है । राजस्थानी में यह प्रथम सार्थक प्रयास है और श्री भीमपाँडिया इसमें सफल हुए हैं। छगन मोहता 27.7.78 भाषा की असाधारण मधुरता इस अनुवाद में "श्रीमद्भगवद्गीता" के गंभीर भावों की पूरी पहुँच के साथ ही भाषा की असाधारण मधुरता भी मिश्रित है। मैंने स्वयं श्री पांडियाजी के मुख से प्रस्तुत अनुवाद के बहुसंख्यक प्रसंग सुने हैं और विषय के साथ ही कवि की अनुपम काव्य-पाठ शैली का भी आनंद लिया है। मुझे विश्वास है कि यह अभिनव अनुवाद और भी अधिक ख्याति तथा लोकप्रियता प्राप्त करेगा। डॉ. मनोहर शर्मा 31.5.78 सम्मतियां/१०५ प्रवाहपूर्ण प्रासादिक एवं प्रेषणीय अनुवाद कालजयी गीता का राजस्थानी भासा में रसानुवाद लोककवि भीमपाडिया ने किया है । कवि राजस्थान के लोकजीवन से, यहाँ की धरती से भाषा- परम्परा से जुड़ा हुआ है इससे यह अनुवाद प्रवाहपूर्ण, प्रासादिक एवं प्रेषणीय हो सका है। अक्षय चन्द्र शर्मा 17.7.83 सृजनात्मक कुशलता का निर्वाह श्रीमद्भगवद्गीता का राजस्थान के यशस्वी कवि-शिक्षक श्री भीमपीडिया द्वारा रचित राजस्थानी अनुवाद सुना। बहुत पसंद आया। बड़ी सशक्त अभिव्यक्ति है । इनका यह अनुवाद मूल के इतना निकट रहा है कि श्रोता या पाठक को लगता ही नहीं कि वह किसी अन्य कृति का अनुवाद है । शुरू से अंत तक आपने इस सृजनात्मक कुशलता का बराबर निर्वाह किया है। शिवरतन थानवी 13.7.79 पंजीयक शिक्षा विभाग परीक्षाएं राजस्थान माँ राजस्थानी रो लूँठो सपूत सावण री ऊजळी तेरस, विसपतवार, अर वो घोळो दोपारो। बड़ी अस्पताल र कोटेज-वार्ड में पूज्यपाद पितरदेव नरोत्तम दासजी स्वामी छेकड़ला सांस लेवै हा। राजस्थान-सरस्वती रै लाडल री बोली उरण वगत चिर विराम लेवं ई ही के आप उरणाँ रा आखरी दरसण करण न वठं पधारया हा । गीता सुणावण री वात चाली जद आप उणांसू प्राशा लेय नै आपरो ताजो त्यार करयोड़ो श्रीमद्भगवद्गीता रो राजस्थानी अनुवाद सुरणावणो सरू करयो। प्रापरै मधुर कंठा री सुमधुर गूंज शब्दा रो लालित्य, भावां री गहनता-काँई-काई सरावू-से प्रापरं जिसा एक ही है। मां राजस्थानी र अप्रतिम पुजारी री जीवणसाध पूरी हुवरण में इणसं वत्तो कोई सुयोग हुय सके है के उणां ने अंतिम शयन री वेळा-गीता भी सुरणायीज़ है तो राजस्थानी में अर सुणावण पाळो भी है तो मां राजस्थानी श्रीमद्भगवद्गीता/१०६ रो ई लूंठो सपूत भीमपाडिया । सनत कुमार स्वामी सावण सुदी तेरस २०४० घणे मान सूं बधाई वाकई अनुवाद बड़ो फूठरौ नै प्रभावी बण्यो है । हूँ क्या कवू-भासा सूं भाव खुद ही फूट-फूट पड़े । इसी सुन्दर रचना खातर पाँडियाजी नै म्हारी तरफ सूं घणं मान सूं बधाई है । जतीन्द्र कुमार जैन 20.10.83 निर्देशक राजस्थान राज्य अभिलेखागार हिंयाळे सो मोटो करम पूरो हुयो राजस्थानी भासा में घणी खिमता है ई वास्तै गीता दरसण रो पद्याँ में भी अनुवाद कियो जाणो चाईज । कवि भीमपाँडिया रो हिवड़ो जाग्यो और लगन लागग्यो । हिंयाळ सो मोटो करम पूरो कियो । अनुवाद आपरै करकमळां में है । कवि री कलम रो कमाल है के पूरी गीता रो भो राजस्थानी पद्यानुवाद प्राछो-फूठरौ अर घणो मधुर हुयो है। आ भारी गौरव री बात है। डॉ. पी. आर. आचार्य 9.6.78 महासचिव, अंतरराष्ट्रीय विचार विहार गीता री आ गीतिका भीमपांडियाजी रो गीता रो पो अनुवाद राजस्थानी भासा में एक जागा राखेला क्यूंकि भासा सरस व बोलचाल री है। “गीता" री आ गीतिका है-गीत सुणो अर झूमो, गीत सुणो और अरथ लगावतां चिंतण में खो . जावो। आनंदराज थानवी 15.6.78 उपजिला शिक्षा अधिकारी बीकानेर बेलूर मठ (गंगा किनारे) गीता का अंतिम स्पर्श आज दिनांक 20 जनवरी सन. 1984 की सुबह मैंने वेलूर मठ गंगा 1 सम्मतियां/१०७ (हुगली) किनारे पर श्री भीमपांडिया रचित "भीमानन्दी गीता" के अंतिम स्पर्श रूपी पठन का आनंद लिया। मैंने पूरी भीमानन्दी गीता कविश्री के मधुर कंठ से ही सुनी । गंगा किनारे शांत वातावरण में सुर, स्वर, छंद और भाव का मेला सा लग गया। करीब चार घण्टों तक मैं मंत्र मुग्ध सा सुनता रहा। प्रकाश पारख बी. एस. सी. एल. एल. वी. प्रकाश टैक्सटाईल एजेन्सी कलकत्ता गीता रो घणों फूठरो अनुवाद श्रीमद्भगवद्गीता रो राजस्थानी भासा में कवि श्री भीमपांडिया रो कियोड़ो “भीमानन्दी राजस्थानी अनुवाद" घणों अोपतो अर घणों फूठरो अनुवाद बजसी। राजस्थान ही नहीं पाखं भारत में लोग गीता रंई अनुवाद नै गा-गा घणों-घणों आणंद लेसी। राजस्थानी भासा फळसी फूलसी । श्री भीमपांडिया नै घणे राम स्नेह सूं बधाई है। हरिनारायण शास्त्री रेण पीठाधीश्वर रामस्नेही धर्माचार्य दरियाव नगर, रेण (नागौर) अनुभव रो धन भीमजी राजस्थानी में गीता रो उलथो कर भासा अर साहित्य री सेवा करी है । म्हारै वास्तै ई गीता नै सुणनो अनुभव रो धन लेणो रैयो है। घणे हरख साथै हूँ भीमजी री ई गीता रो स्वागत करूं। हरीश भादानी लोकगीता के रूप में श्रीमद्भगवद्गीता का राजस्थानी अनुवाद साहित्य जगत में महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जायेगी। भाई भीमपांडिया ने गीता का यह अनुवाद गेय- रूप में किया है और लोकमानस पर लोक गीता के रूप में ऐसा मेरा विश्वास है। भाई भीमजी ने यह श्रमसाध्य कार्य कर राजस्थानी साहित्य जगत का ही उपकार नहीं किया अपितु लोक जीवन को भी कृतार्थ किया है। वास्तव यह व्यापेगी श्रीमद्भगवद्गीता/१०८ में यह कार्य भीमजी जैसा व्यक्तित्व ही कर सकता था। शुभू पटवा जी सोरो हुयग्यो श्रीमद्भगवद्गीता रो भीमानन्दी राजस्थानी अनुवाद सुण'र जी सोरो हुयग्यो । प्राछो-फूठरो लिखीज्यो है । म्हाँ सगळा नै प्रेरणा देसी। मोहम्मद सद्दीक प्राभार मायड़ भासा राजस्थानी री श्रीबिरधी अर संविधानी मानता सारु श्रीमद्भगवद्गीता रै भीमानन्दी राजस्थानी अनुवाद री रचणा-परकासण जोग घणी मोकळी बधाई दिवी अर घणों उमाव दियो। १. डॉ० करणीसिंहजी ऑफ बीकानेर (डॉ. करणीसिंह फाउण्डेशन ट्रस्ट, वीकानेर) २. श्री मनूलाल आत्मज श्री मगनमलजी पारख बीकानेर-कलकत्ता ३. श्री चांदमल आत्मज श्री भीकमचंदजी अभाणी ४. श्री बालचंद आत्मज श्री सोहनळालजी साँड ५. श्री रामदेव आत्मज श्री छगनलालजी भट्टड़ (भट्ठड़ सेवानिधि ट्रस्ट) ६. श्री नारायणदास आत्मज श्री आसारामजी मुंधड़ा ७. श्री माणकचन्द आत्मज श्री सौभाग्यमलजी रामपुरिया ८. श्री भंवरलाल आत्मज श्री मेघराजजी कोठारी बीकानेर ९. श्री कन्हैयालाल आत्मज श्री जेसराजजी राठी १०. श्री गोपाल जोसी आत्मज श्री छोटूजी जोसी छोटू मोटू जोसी, होटल जोशी, बीकानेर) ११. श्री हरिबाबू आत्मज श्री रावत जी (विश्वज्योति) सुगुणी प्रकाशन रै सहयोग वास्तै धिन-धिन ! राजू रमेस पांडिया सुगुरणी प्रकाशन वीकानेर प्राभार/१०६ श्री स्यामपाँडिया लगभग १२१वीं पीढ़ी में भीमपाँडिया री वंसावळी (राव वही रै आधार माथ) आदिमूळ श्री भगवान ब्रह्मा-→वसिष्ठ-→सक्ति-परासर->वेद व्यास-→सुखदेव→उपमन्यु→उपनस्य-→काहल->कविदेव : स्यामपांडिया→ भदेसर-→देहदड़े : राहू-हरपत-ऊदा→गीगा→राघा→मेहापाडिया आपरा तीन बेटा-श्री रुघा, काना, कुसळा सागै वि० सं० १७०५ में भरणापा (लाडनूं) सूं रामसर (बीकानेर) वस्या । पांच दस बरस वाद श्री कुसळापांडिया रा वेटा हरजीपांडिया गांव केसरदेसर जाटान (बीकानेर) वस्या । (पारीक पांडिया आदिमूळ सूरज-चन्द्रवंसी क्षत्रियां रा कुळ-गुरूपद परम्परा में पल्लू कोट कलूर रा बाजे) श्री कुसळापांडिया (पारीक ब्राह्मण, दादावाड़ी, रामसर-बीकानेर) -- श्री रामसीपांडिया (रामसर.बीकानेर) श्री हररूपपांडिया (गजरूपदेसर-बीकानेर) श्री हरजीपांडिया (दादावाड़ी केसरदेसर, बीकानेर) श्री चतरापांडिया श्री भवानीपांडिया श्री किसनापांडिया थी टीकूपांडिया श्री हरलालपांडिया श्री किरता श्री होरा श्री ज्ञाना श्री रामचन्द्र श्री गोपाळपांडिया श्री ना, श्री बाधरपीडिया । श्री दूला । श्री लाखा श्री रामरखपांडिया श्री रणजीतपांडिया । श्री सिवदासपीडिया ज श्री भागीरथपांडिया 卐 । श्री हजारीपांडिया ईसरपांडिया 卐 भीमपीडिया छोटूपांडिया (जन्म वि.सं. १९८६) (गोद : श्रीकाळूजीपांडियार) १९ जुलाई, १९२९ बीकानेर रामकिसनपांडिया सतनारायणपांडिया म्व.हरीरामांडिया (गोद : श्रीकानाजीपांडियार) 卐 असाक राजेस बलदेव मुकेस । स्याम मनोज जीतेन्द्र - सुरन्द्र । मनोज राजू भंवरप्रमोदपीडिया । उमेसपांडिया रमेसपीडिया अनन्तराजूपांडिया महेशपांडिया दिनेसपीडिया

No text on this page.

No text on this page.

No text on this page.

बाखल-आँगण-बाड़ी
जीवण रा चितरामाँ में
भीमपाँडिया
अक सरजणा रो सुर
दालूगीता
सपास्की
बीमदस्मीता meanings
AAR
भीव भणे, 'श्री भगवद्गीता' ज्ञान-ध्यान-परसाद चखावं
करण जोग के धरम-करम है सीघोड़ो मारग दिखळावै ।
पढे सो पिंडत घरम-करम कर मुगती-मोक्ष परम पद पावै
गीता ज्ञान गंग रो पाणी पियै सो नर-नारी तर जावै ॥

MA
भीमपांडिया के पिता
श्री रामरखजी पांडिया
भीमपांडिया की मां सुगुणी देवी
पोते-पोती के साथ
--
१५७
है।
भीमपांडिया
भीमपांडिया की पत्नी मरज
पीडिया

केसरदेसरजारान निगासी-
पितामह भी बाधरजी-पिता श्री रामार रवी माता भी मुगुणादेवी
जन्मांग भीमपॉडिया
वृक्ष
.
११
शा
re
१०
बीकानेर
नक्षत्र - मूल पदर्भमाद चरण)
सभम रात्री ११-५४
१२.
है
लि मालिका भवन
भीमा
आपरापुरा
नमाराहर, जीकानेर
S
राजस्थान. भारत
त
३
जन्मिस्थान.
tandee
मैन
जन्म: वि.सं.१९८५ आषाढ शुक्ला जोशी
तदनुसार R.19 जुलाई 19२१ शुक्रबार
भीमपांडिया की जन्म कुण्डली

भीमपांडिया दादाबाड़ी माताथान केसरदेसर जाटा- (पैतृक गांव में) जिसे आजादी के बाद जुलमी जाटों ने नष्ट भ्रष्ट किया SMod elete भीमपांडिया संत पगला वावा के दर्शनों में, बीकानेर mix on- - मा भीमपांडिया अपने अध्ययनका बीकानेर में

C
T
भीमपाँडिया को माँ सुगनीदेवी अपने
पोते-पोतियां के साथ
नवजात पोता दिनेश पांडिया
(पुत्र श्री रमेश पांडिया)
mawat
भीमपांडिया का सबसे छोटा
पुत्र अनन्त राजू पाँडिया व
पोते पोतियां और
दोहीते-दोहीतियां
.
भीमपांडिया के पुत्र पुत्रियां
प्रमोद, कृष्णा और उमेग

भीमपांडिया डफली बजाते
हुए, किसान सेवा में
सूरतगढ़
ruarri
भीमपांडिया अपने पुत्र
उमेश के साथ किसानों
की सेवा में, सूरतगढ
माइक और कैमरा लिये
भीमपांडिया किसानों के
प्रदर्शन के नेतृत्व में
सूरतगढ

mumhika
आदय साहित्या कला संस्थान
भीमपांडिया अभिनन्दन मंच
पर श्री हरीश भाटानी व
श्री चन्द्रदान चारण के साथ
श्री गौरीशंकर प्राचार्य 'अरुण'
अभिनन्दन कर रहे हैं ।
MA
भीमपाँडिया की माँ सुगुनीदेवी अपनी
भजन मंडली के साथ
मीरा, सूवटी व मनोहरी
000
भीमपांडिया अभिनन्दन
के क्षणों में श्री हरीश
भादानी के साथ
.
ਖ
भोमांडिया रेणूता दजाते हम

भीमपोडिया स्व० श्री मुरलीधर जी व्यास 'राजस्थानी' की चिता के पास समूह में -and- भीमपाडिया कविता पाठ करते हुए जननेता श्री मुरलीधर व्यास मूर्तिमंच पर भीमपांडिया द्वारा माल्यापंगा श्री मोहनलाल मुखाडिया के गव पर बड़ी अस्पताल, बीकानेर भीमपाँडिया एक भाव भूमिका में .

आद्या साहित्य संस्थान बीकानेर द्वारा अभिनन्दन के क्षणों में
भीमपाँडिया और श्री भंवरलालजी स्वर्णकार ।
*
"
--

卐
卐
मीमानन्दी राजस्थानी गीता सार
Rareer
Paisa
गजट तणीं मनवार और कई नहिं चावणा
सव रस । भरपूर गुटका-गुटको प्रेमसा !
-भीमपांडिया

ओ' गीता रो सार शिवलिंगी पर हाथ फेरलै जळजूणों तूं आँख्याँ खोळ भींव भण सागरियाँ पाळा टावरियाँ में तन-मन घोळ भींव वजावै चंग प्रेमसा संगत साज वजावै रे टावरिया रमावै सो हो वे। ठाँ में जादै रे ओ' गीता रो गीत प्रेमसा ! ओ' गीता रो सार अक पुरुष रो पुरुषो माया आपा सगळा बाळ गोपाळ अक खून रग रग में रमतो जळ सागरियाँ छोळमछोळ ओ' गीता रो सार घरमखेत कुरुक्षेत मुळकतो घरम करम ही जग रो सार मेक सनातन धरम मिनख रो अग जग उरलै-परळे पार ओ' गोता रो सार हूँ मिंदर मसजिद गुरुद्वारा चरचा में सरवाळ हूं अगन पवन जळ थळ नभ व्याप्यो है सगळा में हूँ ही हूँ ओ' गीता रो सार हूँ भारत भारतदेसम हूँ जाण भारता न्याय निचोड़ मिनखपणों राखण जग व्याप्यो मिनखापण ही म्हारो मोड़ ओ' गीता रो सार सांस जितो ही दाणों-पाणी सांस जितो हो है संसार माँस अमर धन सुख-दुख सम्प अमर आतमा जग आधार प्रो' गीता रोसार हूँ धाकड़ हूँ धाडफाड़ हूँ भगतां रै बस में हूँ जाण जग जीत म्हारै हो सरण धरम धजा थरपै जस माण ओ' गोता रो सार ममता आँधी घणी बावळी पण ममता मत पाप झकोळ जो माया महकाबै म्हारी वो ही म्हारो म्हारी ओळ ओ' गोतारो सार धाकड़-धाडफाड़ जग जाण्या गीता रा उपदेस सुजाण जठे कृष्ण योगेसर अरजुन बढ़ जीत निसचै जग जाण ओ' गीता रो सार सारवाद वेदाँ रो सुर है मिनखपणों ही धरम सुजाण जद-जद कृष्ण जलमसी सागै वीर धनंजै अरजुन जाण ओ' गीता रो सार मिनखा घरम घटै जद जग में प्रभु अरजुन साग जण आण मिटा अनीती नीति घरावै ध्रुव निसचे नित अटळ सुजाण ओ' गीता रो सार भीव रे ! ओम हि ओम उचार कण-कण सिरजणहार, भाव भर भंवरा रो भणकार रगोरग रुरु में रणकार भींव रे ! ओम हि ओम उचार ओम नांव रो जग निसतारो चमके अपरंपार सारवाद रो सुर संदेसो ऊंडे मनई धार भोंव रे ! ओम हि ओम उचार सू धाकड़ धाडफाड़ जग जाणे नारायण आकार घटी-बढ़ी री घड़ी बतावै नित टणकाँ टणकार भींव रे ! ओम हि ओम उचार काळ पुरुष नित काळ जीतिया विजिया रा असवार सुख-दुख रा संजोग सनातन करमाँ रा आधार भींव रे ! ओम हि ओम उचार आतम हेलो करै ओम खुद अन्तस में गरणार आखो विश्व सरण सुख सम्पै मिनखपणे – धार भींव रे ! ओम हि ओम उचार ओम नाँव ही मुगती मिणियो ओम नमो ओंकार रिध-सिघ साथ गजानंद गजै अक ओम ही सार भींव रे ! ओम हि ओम उचार ओम ताज अर तखत सजावै राज काज सरकार ओम चढे अंडी तूं चोटी ओम बिनाँ अँधकार भींव रे ! ओम हि ओम उचार ओम सदा सगपण रो साचो सँगळियाँ रो प्यार ओम नाम अल्ला रो अपणो सरबाळे संसार भींव रे ! ओम हि ओम उचार ऊँडी सूडो ओम उचरलै लाल धजा फरुकार अक ओम ही नेता जगरो धरलै सत्य विचार भींव रे ! ओम हि ओम उचार मन रे ! मिनरखपणों आधार मन परमातम दियो चाव मन री मन में धार जो मन सूमन री गत जाण वो ही मिनखाचार मन रे ! मिनखपणों आधार बो मिंदर, मसजिद में वो ही चरचा अर गुरुद्वारों में अक हि राम रहीम सनतान कण-कण कोर किनारों में परस जठे परमातम परस निसचे मन में धार मन रे! मिनखपणों आधार कवळ नाळ सू कवळ कुळकियो आद पुरुष अवतार लियो गरभ वीज धरती धण धारयो सिसटी रो सिणगार कियो मायड़ कूख कळी घण फूली काढ भाग री कार मन रे ! मिनखणों आधार अक रंग रग-रग में रमतो जीवण रो संचार कर हियै-हियै में अक अलख सुर सुख-दुख सब संसार भर आखो विश्व ओक ही माया प्रभु ही पाळणहार मन रे ! मिनखपणों आधार री जोत सकळ जग पळके दसू दिसा पळकार कर अगन पवन जळ थळ नभ कणकण जिया नँण रो पेट भरे हद-अनहद प्रभु री किरपा जग पावै तप्या-तपार मन रे ! मिनखपणों आधार प्रभु अकामेक आपणों फळसो मिनखपणे री कार. कमसल ही कळमस में रळसी मिनखापण नित मार मन रे! मिनखपणों आधार ओम नाँव ही अक मंत्र है जीवण रो आधार ॐ ओक आखर गीता में सारवाद रो सार मन रे! मिनखपणों आधार मान सरोवर थारै-म्हारै आ रे राम-रहोम पुकारू वाँथ भरूं उमराव उचार भँवरजाळ में जीवण नैया जूझ-j झ लग जाय किनारै अक सुखद साँयत ही ओखद लाख-किरोड़ रोग नसटावै मुळक अक गुटको पी जहरी सात समंदर जहर सुखावै उगायो भोर रो तारो जीवरग अकझपक पळकारी जीवण ओक झपक पळकाँ रो साँस-नळी रुणझुण रळकावै कदै हियै री कोर किलोळा कदै अघर रूँ-रू फुरकावै सुख-दुख रो संजोगी जोड़ो धीर-वीर सव विधन टळाव काळजियाँ रा खुला-किंवाड़ाँ सदा सनातन साख निभावै नित निरभ निधड़क जीवणियो नर नाहर संज्ञा जग पावै संकर ही पर कॅकर नाच तीन लोक में धूम मचावे जातक अक जात मिनखारी सुरखी लाल लोही लहरावै कण-कण अक ॐ रो कुण्डळ अगन-पवन जळ थळ नभ छावै विप इमरत री ओक जळेवी रस ही रस में रास रचाव आखर ब्रह्म अक ही मंतर सुर-सुर सरस-सरस सरसावै सकळ अक प्रभु रो पळकारो जियाजूण री जोत पसार रग-रग राम रमै रुणझुणतो उगायो भोर रो तारो समैं रो कण सुरोलो कर अमर आसीस लै प्रभु री हिये में चानणों भर-भर उगायो भोर रो तारो सबधवेधी चलै पग-पग दसू दिस बाण रो धेरो उठा गाण्डीव तू अरजुन अमर कर मृत्यु म वर-वर उगायो भोर रो तारो सधी है साख साँसाँ री हवा रा लरका आव समैं रो वायरो चाल अजळी फूलडाँ झर-झर उगायो भोर रो तारो गिण्या अर अणगिण्या सगळा नांव अर काम प्रभु रा घर अलख ही विश्व आखे में अंक ही धाम है घर-घर उगायो भोर रो तारो ਮੀਆਂ सिध श्री म्हारी राजस्थानी रा हेताळू आगूंचा उमावक गाहकगणों , लाड-प्यार सू गीता रो ओ' भीमानन्दी राजस्थानी अनुवाद रचीजो-जेपीज्यो भीतड़ा ढहजासी-गीतड़ा रहजासी . श्रीमद्भगवद्गीता रो भीमानन्दी राजस्थानी अनुवाद आप मानीता लोगां रै हाथां में सूपता घणो हरख हुदै । इण अनुवाद - घणां विद्वानां सरायो तो घणी आछी वात, पण बडा बोल भगवान नै छाजे । इण अनुवाद रै परकासण में घणां लोगों मदद करी श्री मोमेश्वरानंदजी भारती, श्री पूज्यजी जिनचंद्र जी सूरी, श्रीशंकरनाथजी महाराज, रा. गायत्रीदेवीजी जयपुर, डा. करणी सिंह जी बीकानेर, श्री मन्नुलालजी पारख, श्री चांदमलजी आभाणी, श्रीवालचन्दजीसांड, श्रीभवानी- शंकरजी व्यास'विनोद' श्रीभंवरलालजीकोठारी, श्रीमाणकचन्दजीरामपुरिया श्रीना- रायणदास वजाज, श्रीरामदेव भट्ठड़ श्रीनारायण दास मूधड़ा, श्री कन्हैयालाल जेसराज जी राठी, श्रीमाधोदास नरसिंहसामूधड़ा श्रीमांगीलाल वागड़ी, श्री भागीरथ राठी, डॉ. भीमराज शर्मा, डॉ. देवी प्रसाद गुप्त, श्रीमहबूब अली, श्रीनन्द किशोरआचार्य, श्री हरीश भादानी, श्री शुभूपटवा, श्री राम प्रसाद जी सहल, श्रीशिवकुमारजी किराडू, श्री प्रकाश पुरोहित, श्री हनुमान प्रसादजी पुरोहित, श्री गिरघरजी आचार्य, श्री विद्या सागर आचार्य, सरदार मोहकम सिंह, श्री नमामी शंकरजी आचार्य श्री रघुपतसिंह वैद, श्री वृजूभा, श्रीद्वारका प्रसाद पुरोहित श्री लाल नथमल जी जोशी, श्री गौरीशंकर जी पारीक, श्री रुद्र कुमारजी स्वामी, चौधरी बद्री प्रसाद जी, श्री गोपालजी आचार्य एडवोकेट, श्री विनोदचन्द्रजी पाण्डे, श्री भगवानसहायजी जोशी, श्री जगन्नाथसिंहजी मेहता, श्री अजीतसिंहजी सिंघवी, श्री युगलनारायणजी पुरोहित एडवोकेट, श्री सत्यनारायण जी पारीक, श्री वासुदेव प्रसादजी विजयवर्गीय, श्री रामेश्वर जी पांडिया, धीमंवरलालजी स्वर्णकार, श्रीमूलचन्दजीपारीक, श्री सूर्य शंकर जी पारीक, डा. प्रेमसा आचार्य श्री चन्द्रदानजी चारण, श्री मांगीलालजी माथुर, श्री सुन्दरदास अवतररमाणी, वंद्य श्री गोविन्द नारायणजी, श्री महेश सिंह तंवर धूड़ाराम जी जोगी कालूराम हटीला श्रीदेवकृष्णजी व्यास, श्रीरामचन्द्रजी कल्ला, सरदार मवयन सिंहजी, श्रीगौरीशंकर जी आचार्य, श्री दुर्गा शंकरजी आचार्य, डा० जय चंद्र जी शर्मा, श्री गंगा दतरंगा श्री भवानी भाई शर्मा, श्री भंवरलाल शर्मा, श्री मोहन पूनमिया, श्री हनुमान मोदी श्री रामआचार्य, श्री मुकुनसिंह राठौड़, श्री लक्ष्मीकान्त शर्मा, श्री चम्पालालांका . - , - - श्री रावत सारस्वत, श्री किशोर कल्पनाकान्त, श्री रेवत दान चारण कलपित, श्री मुकुलजी, श्री कल्याण सिंह शेखावत श्री हणूंतसिंह देवड़ा श्री गोविन्द श्रीमाली, श्री मोहनसिंह निर्वाण श्रीगिरधारीलाल व्यास, श्री के० राज, श्रीप्यारे मोहन जे. वगरहट्टा, श्री अम्बालाल माथुर, श्री अभय भटनागर, श्री पदम मेहता, श्री नृसिंह राजपुरोहित, श्रीरायचन्दजी जैन, श्रीमालचन्दजी जैन, श्रीदिलातम जैन, श्रीहीरा- लाल जी सत्यवादी, श्रीओमप्रकाश मिश्रा, श्री सोहनलाल सेकसरिया, श्री सोहन- लालजी डागा, श्री मोतीलाल जी चाण्डक, श्री नारायणसिंहजी घंटेल, श्री दिलीप- सिंहजी, श्री भागीरथ रायजी विश्नोई, श्री एम. पी. त्रिपाठी, श्री महेन्द्रनाथ धवन,श्री रोहिताश्व कुमार, श्री जीवराजसिंह राठौड़, श्रीजे. पी. मिश्रा, श्री रमेश चन्द्रजी गुप्ता, श्री पनेचन्दजी सिंघवी, श्री सुदर्शन चोहड़ा, श्री दीनदयाल जी सूद, श्री अमृतलाल विसानी, श्री राजेन्द्रराय मिश्रा, श्रीगोपालराम गोदारा, श्री देवी सिंह भाटी, श्री रामकृष्णदास गुप्ता, श्रीनारायणजी पुरोहित, श्रीगोकुलजी पुरो- हित, डॉ. एस. एस. पुरोहित, श्री हीरा लाल आचार्य, श्री सत्य नारायण अमन, श्री मनोहर चावला, प्रो. केदार, पं. टेकचंद शर्मा, श्री दीपचन्दजी भूरा, श्रीमंतकुमार व्यास, श्री त्रिलोक शर्मा, श्री हनुमानदत्त व्यास, श्री मंगतराम गुप्ता, श्रीपूर्णानंद व्यास, श्री कांतिभाई, श्री ठाकुर प्रसादजी वैद्य, श्री झमण लालजी व्यास, श्री पूनमजी मिस्त्री, आचार्य विश्वनाथजी शास्त्री, डा. मदनकेवलिया, डा. पुरुपोत्तम आसोपा, श्री सूर्यप्रकाश विस्सा, श्री शिवजी जोशी, इंद्र नारा- यण मूथा, श्रीरामनरेश सोनी, श्रीसूरजमालसिंह राठौड़, श्री ऋषिकेश शर्मा, श्री शिवनारायणजी वोहरा, श्री गोपाल जोशी, श्री हरि बाबू, श्री हिम्मत भाई पारीख, ठा. दीपसिंहजी, श्रीबाबू खाण्डा, श्री जोशी 'निर्भीक' श्री गीधामहाराज कल्ला, श्री मक्खन जोशी, कन्हैयालाल झंवर (नोखा)। जोशी श्री हजारी जी पंडित नरसीजी, रामदयाल जी, भंवर लाल जी, अमरचन्द जी, खेताराम-सतनारायण जी जोशी और श्री भीखारामजी पांडिया नापासर । वैद्य श्री ठाकुर दत जी तिवाड़ी, श्री हड़मानजी जोशी राजलदेसर, श्री नत्थूजी व्यास पहलवान सांडवा-कलकत्ता। पुरोहित श्री गंगाविशनजी, खुमाणजी, सोहनलालजी, फूसराजजी, तोळारामजी, अर्जुनलालजी मालचन्दजी, जगदीशजी मदनलालजी जेसराजजीपूर्णारामजी। जोगी श्रीरामरखजी। 'पांडिया श्रीलिखमा रामजी सीताराम, कानीरामजी, सुगनारामजी, श्री डूंगरगढ़ । श्री केसरारामजी वोहरा पूलासर-सरदार शहर । जोसी श्री माली रामजी, रामदयालजी, भैरुजी, हिमटसर । जोसी श्री ईमरमहाराज, चम्पादेवी लूणारामजी। तिवाड़ी घासीरामजी साळगरामजी । पांडिया गंगादेवी काढरामजी, छोटलाल, और श्रीरामकृष्ण खत्री नोवामंडी, । तिवाड़ी धीमोहनलालजी, बद्रीना- रायणजी-शिवनारायणजी सूरतगढ़ । श्री धरमचन्दनी चोपड़ा गंगाशहर । जोशी धीमेघराजजी, मद्रान । जोशी श्रीनन्दलाल जी, दाऊलालजी, चुलाकीजी, लालबन्द ओ, मवारामजी, सुरजमलजी. नरमंगजी, रमणलालजी, गमनापजी, भागीरथ . , - - - जा, फकारचन्दजा, दाऊलालजा मेघराजजा, गकिल-भागीरथजी लावूरामजी-चूड़ा- रामजी । व्यास श्रीवृजूजी बुलाकीजी वकील शिवरतनजी तीवाड़ी । घमजी-शिवजी हड़मानजी-लाधूरामजी व्यास । पाँडिया श्रीवगसीरामजी, सोहनलालजी, तोळाराम जी, गोरधनजी खाजू जी, भँवरलालजी-चम्पालालजी, गंगादेवी-भागीरथजी, राम गोपाळजी, हड़मानजी-गोपाळजी, चेतरामजी, अंणतलालजी । तिवाड़ी श्री रासमेर जी, रतनलालजी श्री सुखा रामजी। श्री गौरीशंकरजी पुरोहित, चाँद रतन आचार्य नन्द किशोर जोशी, वैद्य भंवर लाल आचार्य, गोपालजी व्यास, लक्ष्मणजी सुथार, हरीराम वर्मा, शिवनारायण जोशी, श्री रतनलाल-किसन लाल चाँडक, श्रीमोतीलाल चांडक, नथमलजी चाँडक, खींवराजजी राठी, श्रीलालचन्दजी, कोठारी उपध्यानजी कोचर, श्री सुरेश कटारिया, रामकृष्ण लोहिया, श्री वेदनिधि, कमल नयन पुरुषोत्तम शर्मा, श्री काशीरामजी बोहरा, श्री नन्दरामजी-नथमलजी राव श्रीविष्णु आचार्य, जुगलकिशोर जोशी, सुभाष पुरोहित बीकानेर । श्री शिवचरण कश्यप, श्री जसकरण गोस्वामी श्री उमेशआचार्य, डॉ. दिवाकर शर्मा, इब्राहीम गाजी, गुलाम शाद, सदीक, रफीक-मुनीर मो० जफर, मुश्ताक भाटी, लियाकत अली, अजीज आजाद-अब्दुलवहीद कमल, शिवराज छंगाणी-गौरीशंकर अरुण, गौरी शंकर मधुकर लालचंद भावुक-बुलाकी वावरा, नवल बीकानेरी विशन मत- वाला-कृष्णजनसेवी दिनेश रंगा। माणकवंधु, भंवर व्यास, श्रीराजेन्द्रमित्तल चौधरी शिवकुमार सिंह-बद्री प्रसाद गहलोत वृजगोपाल पुरोहित-असरफ अली, सरस्वती स्वामी, मक्खन स्वामी, रामेश्वर साध डॉ. सत्यनारायणस्वामी । रमेश खन्ना, पन्नालाल पहलवान. डॉ. डी. पी. पुरोहित । सोहन कँवर-मेजर पूर्णसिंह राठौड़ मॅवर लालजी जीतमलजी पुरोहित, श्री भंवरलाल हर्प (ज्योतिष वैज्ञानिक) श्री छगनजी माली, श्री काशी नाथ व्यास, श्री हीरालाल आचार्य, श्री कुजी लाल जी गहलोत, श्री शिव कृष्ण-डूंगरमल जी जोशी, श्री रामू-कृष्ण-अनंतलाल जी व्यास श्री अद्भुत शास्त्री श्री कृष्ण कुमार मूधड़ा श्री हनुमान दास धनसुग्वदान रामदयाल जी चाँडक श्री भतमल ऊधोदास जी चाँडक श्री दाऊजी-आसारामजी आचार्य श्री मेधराज जी आचार्य, श्री मंगल चन्द जी आचार्य, श्री चकोर-मकोर पुरोहित, श्री कृष्णजी विसनोई श्री ईसरदासजी स्वामी श्री सोहन लाल जी मोदी श्रीभगवान सहायजी बोहरा । श्रीजयनारायण हनुमानजी श्रीतुलसीराम-मॅवर पांडिया । डॉ. काली चरण माथुर, श्री देव कृष्ण पांडिया श्रीसुरपति सिंह, श्रीपूनम चंद खड़गावत, श्रीमुन्नालाल गोयल श्रीमोतीलालजीपांडिया, श्रीदीना नापजीव्यान श्री केदार बद्री प्रसाद जी व्यास, श्री रमणसा विस्सा, श्री आनन्द चन्द्र कल्ला, श्री बाबूलाल सोमदत्त श्री माली, श्री भंवर लाल चोरड़िया, श्री हनुमान प्रमाद, श्री कांति कोचर श्री नारायण रंगा श्री गिरधरजी व्यास (अध्यापक) श्री मनूलाल डागा श्रीभवरलालजी ताराचंदजीबोथरा, श्रीकेसरीसिंह आचार्य, श्रीरामकृष्ण मा, सतीशशर्मा । पांडिया श्रीमुळतानजी हजारीजी नन्दरामजी केमरदेवर जाटान, श्री मोहनलालजी पांडिया भरणावा (लाडण )धीकिसनसिंह गहलोत, श्रीद्वारका प्रसाद - . सोलंकी श्री माणकचन्द सेठिया, रामचन्द्रजी व्यास (नगजी) और स्वं. चम्पादेवी मुरली धरजी व्यास डा. राजानन्द श्री आर. जे. मजीठिया, श्रीमुन्नालालजी गोयल श्री वृज भूपण शर्मा, श्रीकन्हैयालालजीसेठिया श्रीमानसिंह जी-दिलीपसिंहजी शिव- चरण कश्यप, अमरनाथ कश्यप, हर प्रसाद बगरहट्टा श्रीहरिश्चन्द्र तिवाड़ी श्री प्रेम- प्रकाश अवस्थी, श्री वृजलाल ओमप्रकाश मिश्रा (सूरतगढ) श्री लाजपत भान श्रीहनुमान जी पुरोहित, श्री गणेशी लाल माथुर श्री चिरंजी लाल पुरोहित श्री के. के. व्यास श्री शिवरतन डावाणी श्री सुखजी पुरोहित श्री दाऊदयालजी शर्मा स्वं. वगतावरीधी कानीरामजी पाँडिया। जोसी हरनाथजी। श्रीप्रेमनाथ सोनी, श्री जयप्रकाशजीगुप्ता श्री रामकरणजी पाँडे, श्रीजनार्दन व्यास, श्रीहीरालालशर्मा, का. हीरालालआचार्य, एन. डी. प्रकाश । श्री भंवरलाल आनन्दमलजी डागा श्री साँगी। स्व. सूवटी श्री कृष्णजी तिवाड़ी, पार्वती शंकरलालजी पुरोहित । वाई सिरिया-- पानां-लिछमी । स्व. मनोहरी रावतमल जी पारीक, स्व. मीरां धनसुख दासजी तिवाड़ी, गोगीदेवी पेमारामजी तिवाड़ी। श्री लेखारामजी पाँडिया, श्री हुकमचन्द मंगतराम पाँडिया, श्री शिवप्रतापजी चाँडक, सिरियादेवी- शिननाथजी व्यारा. श्रीमती वाचूदेवी जेसराजजी राठी, श्री कन्हैयालाल, श्री मुरलीधर, अमृतलाल, मांगीलाल, दाऊलाल राठी। श्रीमती कस्तूरी धूड़जी जोसी; श्री रामेसर लाघुजी जोसी, श्रीपगला बावा, श्री पुरुपोत्तम दाधीच,श्री प्रेमरतनजी विस्ता, श्रीवल्लभेरा दिवाकर, श्रीहर्ष, सरल विशारद, श्री चंचल हर्प, अरविन्द गोस्वामी, श्री अरविंद आचार्य श्री द्वारकाप्रसाद धनसुखदासजी जोसी । श्री रामरतन हर्प, श्री द्वारका प्रसाद हर्प और श्री द्वारका प्रसाद स्वामी (वावा)। श्री मुकेश राजस्थाती । श्री जयनारायणजी व्यास, दीनदयालजी शर्मा । श्री गजानन वर्मा-श्री धनंजय वर्मा । श्री वी. के. मोहन । श्री गोपालजी पॉडिया, श्री सोहनलाल धनसुखजी तिवाड़ी। वैदिक संस्कृत भापा री बेटी अर हिन्दी आदि अनेकू भाषावाँ री माँ आगणी राजस्थानी भाषा है । श्री मद्भगवद्गीता रै भीमानन्दी राजस्थानी भाषा में छपण री जाणकारी मिली जद जी सोरो हुयग्यो । मन में उमंग उछाला भर अर हियो कोडावे । बो दिन बैगो आव-श्री भगवान रा वचन आपणी लागीणी रागर- थानी भाषा में बाँचा-सुणां तो घणों आँणद-उछब हुवे । श्री शुभ मंगळ भावनामू श्री कानीरामजी पाँडिया, श्री हीरालालजी देरासरी और श्री नानकरामजी जोगी सरावण जोगी मदद सुगुणी प्रकाशन र परकानया में सूरत रूप में दी। घणा चमतकारी रूड़ो-रम्पाळी रूप गिणीजसी तो घणे हरख री बान हुमी टण ग्रंथी। विनीतगणः- मुगुणी प्रकाशन श्रीमती मुगुणीदेवी रामरखजी पांडिया श्रीहजारी गमरावजी पांटिया, 1 मुरजदेवी भीमपांडिया । सम्पत-प्रमोदपांडिया पूनम और लता, । शांति-उमेशपांडिया, महंग- पांडिया राखी एवं वसन्त । तारा-रमेश पांडिया, दिनेग मांदिया और अगल गन पांडिया, कृष्णा श्री मदनजी पुरोहित,गायत्री, योगेशर व पवन। पुष्पा श्रीगोकुलत्री जोगी, व गोपालजोनी और नूतन, । मन्तोष श्री भरजी जोगी और बि. rand सुमरा रा सुर किता साँतरा - - - घण लाखीणी राजस्थानी भापारी वढोतरी अर संविधान में मानता वासते राजस्थान-कळकतै रा घणाँ मानीता लोगां भीमानन्दी राजस्थानी अनुवाद श्रीमद्भगवद्गीता रै परकासण सारू उमाव दियो घणों सरावणजोग ! सर्व श्री किरपाचन्दजी शांतिलालजी सुराणा, नथमलजी-रिखवदासजी भंसाली, लूणकरणजी जेठमलजी सुराणा, पीरदान प्रकाशचन्द आत्मज अजीतमलजी पारख, भँवरलालजी सेठिया जझ्झूवाला, भंवरलाल गिरधरलाल आत्मज गोविदलालजी वंद, जतनमलजी सुरेन्द्रकुमारजी डागा, भगवान भाई नरेन्द्र भाई जरीवाला-सूरत, भँवरलालजी झंवरलालजी रिखवचन्दजी वैद, शिखरचन्दजी आत्मज ज्ञानमलजी मिन्नी, जगन्नाथ रामगोविंद, राजकुमार आत्मज मँवरलालजी पारख, मोहनलालजी पूनमचन्दजी कोठारी, आनन्दमलजी भंवरलालजी डागा, हीरालालजी जतनमलजी लूणिया, श्रीमती स्व० लोकनायक मुरलीधरजी व्यास । सर्व श्री सरदारमलजी कांकरिया, सूरजमल माणकचन्द आत्मज फूसराजजी बच्छावत, भँवरलालजी सामसुखा, झवरलालजी आत्मज पूनमचन्दजी मंडावत, गोपालचन्दजी बोथरा, झवरलालजी बोथरा, कन्हैयालालजी वछ राजजी फागमलजी अभाणी, शिखर चन्द प्रकाशचन्द पूनमचन्द लालचन्द साँड, मोहनलालजी पुरोहित, जयचन्दलालजी कोचर, शांतिलालजी वाँठिया, प्रेमचन्दजी दूगड़, सम्पतलालजी मिन्नी, रामरिछपालजी अग्रवाल, गांतिलालजी धनराजजी डागा, चूनीलाल नंदलाल श्रीगोपालजी सोमानी, आसारामजी जयकिसनजी सादाणी, शंकरदाबू तोदी, टहलराम बाबू, जीवतबाबू, जगन्नाथ सत्यनारायण, दीनानाथ नन्दकिशोर चाँडक, माणकचन्द इन्दरचन्द जयचन्दलाल मिन्नी, विस्सूबाबू सी. वी. एण्ड संस, शक्ति ट्रांसपोर्ट ओरगेनाइजेशन, वी. के. व्यास भारत ट्रांसपोर्ट, दीपचन्द सुन्दरलाल गोलछा, महावीर प्रसाद नारसरिया, कन्हैयालालजी सिखवाल, मोतीलालजी धनराजजी सिरोहिया, धनराजजी कोठारी, रामचन्दजी वैद, चांदमलजी बरडिया इन्दरचन्दजी सुभागमलजी वेगानी, दूलीचन्दजी पुखराजजी सिरोहिया, इन्दरचंदजी वोथरा, वृद्धिचन्दजी रामपुरिया, सम्पतलालजी गोलछा, सम्पतलालजी झवरी, शिवकरण शांतिचंद तोलारामजी डोसी, कन्हैयालालजी वोथरा, मुकुटवावू आत्मज लाधूरामजी गंडेरीवाल, नथमलजी मीमाणी, मूलचन्दजी आत्मज किरपाचन्दजी सुराणा, डा० विनोद वियाणी, डा० साविर, शिवदयाल व्यास बूई बंका, . . - - - सत्यनारायण हर्प, चन्द्रकुमार आत्मज गुलाबचंदजी कोचर, जयचंदलालजी पन्नालालजी नाहटा, अन्नारामजी सुदामा, रेवतीरमणजी भगवानदत्तजी गोस्वामी कन्हैयालालजी गोस्वामी, सूर्यनारायणजी बोहरा, दुर्गादत्तजी शर्मा एडवोकेट सूरतगढ़, पं. भंवरलाल किसनलालजी व्यास, शंकर सेवग, जीवणलालजी डागा सोहनलालजी डागा (सरदारशहर), गौरीशंकरजी आत्मज उदयलालजी पारीक रिश्चन्द्रजी तिवाड़ी जयपुर, ईसरजी सुथार, पं. लक्ष्मीनारायणजी पुरोहित एडवोकेट, वैद्य झमणलालजी पाँडिया, मोडारामजी पंवार सूरतगढ़, शिवकिसन कजळसा आचार्य, राजू राहुल संगीता टैक्सटाइल कलकता। - श्री लहरचन्द कमलचन्द मुकीम. जसकरण गोस्वामी, श्री कन्हैयालाल जी मालू, भंवरलाल जी आत्मज जोरावरमल जी बांठिया, प्रकाशचन्द आत्मज सम्पतलाल जी खचांची, जीवणबाबू आत्मज, गोपालदास जी बजाज, सूरजमल आत्मज जीवणमल जी पूगलिया, श्री शिखरचन्द हेमराज छाजेड़, रामदेव आत्मज कोडूराम जी प्रजापत, सन्नू जोशी, सन्नू हर्प, रामसा मोदी, रमण जी माली, श्री सत्यनारायण आचार्य, गोपाल जी व्यास, दाऊ जी जोशी, डॉ. गिरिजाशंकर शर्मा, सत्संग प्रेमी पं. बनवारीलाल जी शर्मा । एडवोकेट मरुधर मृदुल, रतनलाल जी पुरोहित, मँवरलाल जी पुरोहित श्रीभावुक जोधपुर, हेमराज जी पारीक मूरतगढ़ । - राजू रमेश पांडिया सुगुणी प्रकाशन विश्वाम्बिका भवन आशापुरा नयाशहर, बीकानेर

30
पुष्पाँजळी-
बड़भागी बाप!
री
बड़भागण बेटी!

. जगनासी भारत: प्रधानमंत्री साभारत दिवंगता इन्दिरा गांधी ने पुष्पांजळी पूरबाभास साचो इतिहास बणग्यो रक्षक ही भक्षक वणग्या है वाड़ खेत में : खावै है। अंग रक्षक सबद रो राम ही निकळग्यो भरोसो ही कॉई रयो ? ३१ अक्टूवर १९८४ नै श्रीमद्भगवद्गीता रै भीमानन्दी राजस्थानी अनुवाद रै अठारवें अध्याय रो छेकड़लो पानो अर गीता महातम छपता छापता . अरर ! अचाणचक मूंडी तूं मूंडी मिनखपणे नैं दागल करण वाळी खून सूं लथपथ खूनी-खवर कानों में पड़ी-इन्दिरा गाँधी ने गोळयाँ वींधनाखो चालणीवेझ करनाँखी काळाँ-हत्यारों । काळजो काँप्यो अर धरतो गिगनार दोन धूजता-सा लाग्या ! भगवान ! ओं काँई कियो ? हे राम ! थारी आ' के माया अवै तो खाली, औ' अनादी सासवत सबद ही धरती-प्रासमान में गूजै "देस री सेवा करता थका जे म्हारा प्राण-पॅखेरू भी उड़जावं तो घणे गौरव-गुमान री वात हुयसी । म्हारै लोही रौं अक अंक बूंद देस रै विकास में मदद देसी अर देस ने घणों-घणों बळयाण वणा आगं वधासी।" . . ? " । न . . । आरवर बल्ल, अमर आतमा चावं कोई कितरों ही राजनीत विरोधी हुदै लोकराज में हत्यारी वात सोचणी ही खोटे सूं खोटे अबरम-अपराव अर मिन- खापण माथे घणे कळंक री कोझी मूं कोझी-माड़ी सुं माड़ी बात है। .

+ लात पळ फूला में कोई जाखर राख रमाणी है न्याय परम दिन भींद जिन्दगी कोई न लाणी जाणी करडो लेख लियो कुदरत रो दुरगत नहीं टलाणी है जतन लेक भी काम न आवै ला' संता री वाणी है नागफणी पर गदा भोंद रो कलम करूड़ो कड़ली हत्यारा जुलमी मिटजासी पग-पग घाती धड़कली आजादी ₹ बाद-देस में नापळंनी अर काळा-कूड़ियाँ रै कुण्डाळिये री घेराबंधी में भारी गुण्डा-गरदी, च्यारसौ-बीती, आतंक धोखाधड़ी, लूटपाट, जमीन हड़पा-हड़पो, हत्या अर खून खराबी रो जोर रयो है पापी पूज्या जावता रया है-घायल रया है ारां-म्हारा प्राण, प्रभु री मरजी ! कुण काई कर जोर काई ? आखरकार धीरज ही मोटी बात है पण धीरज भी तो प्रभु रो घरायो ही घारीजै ! प्रभु ही आछो-मंदो निसतारो अर मोक्ष करै । हे राम ! हे प्रभु ! पंचभूतों में लीण दिवंगता में सांयत अर मोक्ष दीजो ! आ' म्हारी भी अरज है-लुळ-लुळ वीनती है, पुष्पांजली है। आरवारकार गीता गंज-गीता में सो जो जलमै सो मरै जरूरी अरजुन तं निराचे प्रम जाण इणतर अटळ विपै पर भी तो सोकन कारणो जोगगुजाण ॥२-२७॥ जलमण झूले मरण समें तक दरमण भूत देवे रासार मरचा पछै हुय जाय अदीठा बारो साफ सफा बेकार ।२-२८॥ फळ में नहीं करम में थारो अरजुन तं कारलं अधिकार छोड वासना करमफळा री घरम गरम गरी प्यार ।२०४५। फळ अभिळासा त्याग धनंजे धारण कर मर गोग सिध अर असिघ दोसगजाणोपरम-गारगती योगगयांग। २.४.८। -ॐ जनसत्- भीमाया

भीव भणे सागर री पाल
राज विरोधी हाँ तो
लोकतंत्र में मिनखपणो राखाँ
आंगणे में गोळी क्यूं गड़कावा
चक्कू छुरी क्यू चलावां
खून खरावा क्यूं कराँ
अको कराँ-राजवदळाँ
ताज तखत वदळा
जुलम मिटावाँ
साँयत सूं न्याय वाँटाँ
सुख सम्पाँ
चेतण हाँ चेतो राखाँ
अचेतण क्यूँ वाँ
परालवध पाळा-
पुरसारथ कराँ
मिंदर में बो, मसजिद में वो
चरचाँ में बो, गुरुद्वारों में वो
हियो टॅटोळ देखा तो
ओक ही राम रहीम रमै
थारै म्हारै हियै रै माय
भींव री काया-
कलम अर कविता
कॉई काम आसी
साँयत विना सुख कठ
भींव भणे सागर री पाळ
जय योगेसर !
३१ अक्टूबर १९८४

No text on this page.

No text on this page.

- भीमपांडिया- आत्मज श्री राम- रखजी पांडिया, मां श्रीमती सुगुणी देवी पांडिया पुत्री श्री मयरादासजी जोशी, जोड़ायत मूरज देवी पांडिया पुत्री श्री मुरलीधरनी व्यास - जन्म स्थान बीकानेर विक्रम संवत १६८६ आपाढ़ शुक्ला प्रयोदशी दिनांक १६ जुलाई १९२६ शिक्षा-प्रभाकर मैट्रिक । कार्य-अध्यापन, लेखन व कृषि संतान-चार पुत्र प्रमोद, उमेश, रमेश,/तीन पुत्रियां कृष्णा-मदनजी पुरोहित, पुप्पा-गोकुलजी जोशी, संतोप-भेरू जी जोशी । अध्यापन कार्य १६४६ सू अवारताँई छपियोड़ी पोथ्यां- (१) हाध सूकतरलीनो वोरलो १६५८ (२) लोकतंम रा पाळी रोया १९६७ (३) गरीव करोड़पती १६६८ (४) श्री मद्भगवद्गीता भोमानन्दी राजस्थानी अनुवाद १९८४ अनेक कवितावां हिन्दी (राजस्थानी माहित्यिक लोक संकलना, पर पमितावां विशेषांकांबर शिक्षा विभाग तथा अकादमी प्रकामपा में बराबर हरे । रेफरेन एनिमा अर लो ऑफ इण्डिया व माहित्य बीमार संभ। साकारावाणी पर अने नीत सबिताया परमारिन । अगलपियोड़ी पोप नथा मररका में मेषता (राजस्थानी अनुवाद), यही बोनी वादा (नाद), दिनही मेरी में आग (टायर टोली गीन) मीनाला रा गुटग (नीत काय) नन गर्दन म जापं । पीर गार) दुगड मार (भीमान:-73. मानी भावानुवाद)। सानोमान-विज्ञान :-

Shri Madbhagwad Gita

Author
Bhimanand Ji
Title
Shri Madbhagwad Gita
File name
Shri Madbhagwad Gita
Text
OCR done
Citation
1984
Published
2011/01
Publisher
Sugarni Prakashan Bikaner
Language
Sanskrit
Pages
154
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548871
Barcode
4990010028956.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
0i5bUd2Z1NR
Download PDF

Shri Madbhagwad Gita