Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
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निबन्ध-नवनीत
अर्थात्
।
वर्गीय पं० प्रतापनारायण मिश्न के स्फुट
लेखों का संग्रह।
भाग १
प्रकाशक
-
अभ्युदय 'प्रेस, प्रयाग।
अथम सस्करण
२,०००।
}
मूल्य )
श्रभ्युदय मेस, प्रयाग, में बद्रीप्रसाद पाण्डेय के प्रबन्ध से मुद्रित और प्रक चरित्र-चित्रण 1 - - वंश-विवरण। परिहन प्रतापनारायण ने "ग्राहाण" में अपना चरित मिसना शुरू किया था। आपने उसका नाम रणग्या था "प्रताप- चरित्र" । परन्तु यह प्रा नहीं हुआ। छपा हुभा उसका सिर्फ पहला फार्म, अलग, पुस्तकाकार, स्यङ्गपिलास प्रेस वाफोपुर, से हमें मिला है । उसमें प्रतापनारायण ने अपने पूर्वजों का वृत्तान्त लिखा है। उसके अनुसार श्राप कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के अन्तर्गत वैजेगार के मिश्र थे। आपका गोत्र कात्यापन था। इसीसे आप अपने को “महपि कात्यायन कुमार" लिखते थे। इनकी देखादेखी. और भी दो एक आदमी अपने को "कात्यायन कुमार" कहने लगे है। अवध में एक जिला उनाय । कानपुर से उनाच (शहर) पाच छ कोस है । बेजेगार उसी जिले में है । उनाव से वह थोड़ी ही दूर है। प्रतापना- रायण के पिता का नाम सङ्कटाप्रसाद, पितामह का रामद याल और प्रपितामह का सेवकनाथ था। इनके पितामह रामदयाल मिश्र, सुनते हैं, कवि थे। पर उनकी लिखी हुई कविता प्रतापनारायण के देखने में नहीं आई । इनके पिता सङ्कटाप्रसाद अच्छे ज्योतिषी थे । १४ वर्ष की उम्न में ये अपना जन्मग्राम छोडकर, जीविका के लिए, कानपुर आये। यहाँ, धोरे धीरे, उनकी आर्थिक दशा अच्छी हो गई और ที่ ।
उन्होंने कुछ रियासत भी पैदा कर ली। कुछ दिन तक, गाजि-उद्दीन हैदर के समय में, दीवान फतेहचन्द के यहां उन्होंने नौकरी भी की। प्रतापनारायण की चाची कानपुर- निवासी प्रसिद्ध प्रयागनारायण तिवारी के वश की थी। इस योग के कारण प्रतापनारायण के पिता को कानपुर में रहने में बहुत सुभीता हुमा। लड़कपन और विद्याभ्यास । प्रतापनारायण का जन्म आश्विन कृष्ण ६, स. १९१३, (१८५६ ईसी) में हुआ था। इनके पिता ज्यातिपी थे। इससे उन्होंने अपने पुत्र प्रतापनारायण को भी ज्योतिर्विद् बनाना चाहा । पर प्रतापनारायण को "आदिनाडी वर हन्ति मध्य- नाडी च कन्यकाम् धाले मसले पसन्द नहीं आये। इससे लाचार होकर पिता ने उन्हें अगरेजी मदरसे में भेजा। जिस मदरसे में आपने अगरेजी फा आरम्भ किया उसपर आपकी बहुत दिन तक कृपा नही रही । इस कारण पादरियों के मदरसे में आपने पदार्पण किया। यहा उनका और 'आर्मी प्रेस", (कानपुर) के मालिक वाबू सीताराम का साथ हुआ। बाबू सीताराम से मालूम हुश्रा कि प्रतापनारायण का दिल पढने में न लगता था। इससे वे अपने अध्यापकों के बहुधा कोपभाजन हुआ फरते थे। धीरे धीरे उन्हें पढना पीडाजनक मालूम होने लगा और अगरेजो की बहुत ही थोडी विज्ञता प्राप्त करके आपने, १८७५ ईसवो के लगभग, स्कूल से अपना पिएड छुडाया। इसके कुछ दिनों बाद आपके पिता की मृत्यु हुई। इससे इनकी शिक्षा की इकदमही समाप्ति हो गई। स्कूल में इनकी दूसरी भाषा हिन्दी थी। पर इन्होंने उर्दू में
भी अच्छा अभ्यास कर लिया था । आपने फारसी और
सस्कृत में भी कुछ करिता लिखी है । इमसे जान पडता है
कि इन भाषाओं में भी भापको गति थी । वगला भी इन्होंने
सीप लिया था।
कविता-प्रेम।
जिस जमाने में प्रतापनारायण स्कूल में थे, बावू हरिश्चन्द्र
का “करिवचनसुधा" पत्र सब उन्नत अवस्था में था । उसमें
यदुत ही मनोरजरु गद्य पद्य मय लेस निकलते थे । उसे,
और वानू हरिश्चन्द्र की अन्यान्य रचनाओं को भी, पढ़कर
प्रतापनारायण की प्रवृत्ति करिता की तरफ हुई । उस समय
कानपुर
में लारनीवानों का बडा जोर शोर था । बाबू सीता-
राम कहते हैं कि लावनी गानेवालों की कई जमातें यहां थीं।
लावनी का प्रसिद्ध कवि बनारसी भी उस समय अकसर
कानपुर में रहा करता था। वे लोग अफसर सर्वसाधारण में
लागनी गाया करते थे। उनके दो दल इकठे हो जाते थे और
लावनी कहने में एक दूसरे को परास्त करने की चेष्टा करते
थे। उनमें से कोई काई आदमी रहुत अच्छी लावनी कहने थे
और मौके मौके पर नई लामनी वना भी लेते थे। प्रतापनारा-
यण इन लागों की जमानों में कभी भी जाते थे। इसी समय
फानपुर के प्रसिद्ध करि पण्डित ललिताप्रसाद त्रिवेदी के
धनुप-यक्ष का धूम थी । आर राम लीला-विशेष करके धनुप
यश-कराने में बडे निपुण थे। समयानुकूल अच्छी अच्छो
कविता की रचना करके मोर उमे लोलागत पात्रों के मुह से
सुनाकर सुननेवालों के मन को श्राप माहित कर लेते थे।
प्रतापनारायण भी इस लीला में शामिल होते थ और "ललित"
(४) - , जी की कविता को पाठ फरते थे । हरिश्चन्द्र के लेख पढने, लावनीवालों की लावनी सुनने, और "ललित जी की लीला में योग देने से, सुनते हैं, प्रतापनारायण की हृदय भूमि में फविना का पीज अच्छी तरह अङ्कुरित हो गया। इसके याद छन्द शास्त्र के नियम भी शायद उन्होंने "ललिता जी से सीखे। क्योंकि, सुनते है, इस विषय में घे "ललित" जी को अपना गुरु मानते थे। । र ब्राह्मण। प्रतापनारायण को हिन्दी अखबार पढ़ने का लडफपन ही से शौक था। इसी शौक से धीरे धीरे उत्साहित होकर गोपीनाथ खन्ना इत्यादि की मदद से इन्होंने १५ मार्च १८८३ से "नाहाण" नामक एक १२ पृष्ठ का मासिकपत्र निकालना शुरू किया। यह कोई दस वर्ष तक निपलाता रहा । पर निकलने में यह बहुत अनियमित था। जन्म होने के थोडे ही दिन बाद इसके निकलने में देरी होने लगी। इस देरी का कारण प्राय परिउन प्रतापनारायण की धीमारी थी। माप अरसर चीमार रहा करते थे। विशेप शिकायत आपको बवासीर को थी । १८८७ सदी में "ब्राह्मण" कुछ दिनों के लिए बन्द भी होगया था। इनकी मृत्यु के बाद भी "पग- पिलास प्रेस" (धाकोपुर) के मालिक, बाबू रामदीनसिंह, ने "प्राह्मण" को कुछ समय तक जीवित रखा। पर वह चला नहीं, उन्द ही हो गया। प्रतापनारायण पर छा रामदीनसिंह की विशेष का थी। उसकी बहुत मी पुस्तकों को याबू साहब ने छापकर प्रकाशित किया है। मतापनारायण ने कुछ को
-
1
छोड कर अपनी सब पुस्तकों का अधिकार याबू रामदीन
सिह को ही दे दिया था।
"ब्राहाण" में पण्डित प्रतापनारायण धार्मिक, सामाजिक
और राजनैतिक सभी तरह के लेम्प लिग्वते ये । यहा तक कि
आप खबरें भी छापते थे। कभी कभी कानपुर की बहुत छोटी
छोटी खबर तक भी आप प्रकाशित कर देते थे। "ब्राह्मण" का
पहला अङ्क होली के दिनों में निकला था। उसकी प्रस्तावना
प्रतापनारायण ने, उसकी पैदाइश होलो की पतलाकर,
आगे चलकर, थोडी दूर पर होली पर ही एक रेप लिखा।
लेस दिल्लगी से भरा हुआ है । पर उसके बीच में जो मत
मतान्तर को बाते श्रा गई है, वे जबरदस्तो लाई गई मालूम
होती है।
- "ब्राहाण" में केसे लेग्य निकलते थे इसका अन्दाज़ा लगाने
के लिए कुछ लेखों के नाम हम नीचे देते है-
१। वेगार, २१ होली, ३ । रिश्वत ४ । देशोन्नति, ५ । गुम
उग (दूकानदार), ६ । मुच्छ, ७ । कानपुर माहात्म्य (आरहा),
८शाकाथु (हरिश्चन्द्र के मरने पर कविता), ६ । विस्फोटक
१० । भाग्न रोदन (कविता), ११ । देशी कपडा, १२ । प्रेम पव
परोधर्म , १३ । गगाजी, १४ । मानस रहस्य, १५ । बन्दरों
की सभा, १६ । टेढ जानि शङ्का सय काह १७ । धूरे के लत्ता
चिन, कनातन का टोल नाधे, १८ । सरी बात शहिदुल्ला दहें,
सर के जी ते उतर रहें, १ | जाने न चूमें, कठौता लेके जूझ,
२० हाथी चणे ही जाते हे कुत्ते भौका हा करते है, इत्यादि ।
"माण के जमाने में हिन्दी की तरफ लोगों का ध्यान
नया हो नया गया था। इसम मामिक पुस्तकों में जैसे लेख
होने चाहिये से यहुत कम लेरा'माझए" में निकले। हमने
।
-
इस पत्र के पहले तीन साल के सब अव देख डाले. पर इति
हास, जीवन चरित्र, विज्ञान, पुगतत्व अथवा ओर क्सिी मनो.
रजक या लाभदायक शास्त्रीय विषय पर कोई अच्छे लेख हमें
न मिले । इसमें पण्डित प्रतापनारायण का दोष कम था,
समय का अधिक।
प्रतापनारायण की हिन्दी सूप मुहावरेदार होती थी । वे
अपने लेखों में कहावतें बहुत लियते थे। पर शब्द-शुद्धि की
तरफ उनका पयाल कम था । म्लेक्ष, रिपि, रिपीश्वर, रितु,
ग्रहम्त, लेखणी, औगुण, मात्रभाषा आदि व्याकरण विरुद्ध
शब्द जगह जगह पर देस पडते हैं। सम्भव है ऐसे शब्द
सावधानी से भूफ न देखने के कारण रह गये हो । या हिन्दी
समझ कर प्रतापनारायण ने इन्हें ऐसाही लिया हो। ब्राह्मण
में हमें कितने ही सस्कृत के वाक्य भी व्याकरण विरुद्ध मिले
यथा "अह पण्डितम्" । "खधर्मो निधन श्रेय " | "का
चिन्ता मरणो रणो" । "यथानामस्तधागुणः"। इनको देखकर
परित प्रतापनारायण की सस्कृतज्ञता के विषय में शक्षा
होने सगती है। पर सस्कृत में भी उन्होंने विना लिखी है।
उनकी एक पुस्तक का नाम है "मन की लहर"। उसमें एक
लावनी सस्कृत में है वह यद्यपि निदोष नहीं है तथापि
बुरी भी नहीं है । इसी पुस्तक में पण्डित प्रतापनारायण को
फुर फारसी कविता भी है । पर फारसी के अच्छे जाननेवाले
ही उसपर अपनी रार दे सकते हैं। १५ मई १८८३ ईसवी के
"नाहाण में एक तेग्न गार पर है ! वह अगरेजी में है। पता
लगाने न मालूम हुआ कि वह मिशन स्कृन के अध्यापक
धावू नन्हेमन्त का लिखा हुआ है । प्रतापनारायण ने अपना
उपनाम "ईश्चरावलम्रित रक्सा था और उनके साथी
।
+
-- , मास्टर नन्हेमल "सुखदावलम्बित (1)। "सुखदावलम्बित जी अभी विद्यमान है। प्रतापनारायण के लेखों में मनोरमकता की मात्रा खूब होती थी। हास्य रस के लाने का जहा पर जरा भी मौका होता था वहां वे उसे हाथ से न जाने देते थे। कभी कभी उर्दू की तरह की अनुप्रासपूर्ण बनावटी इबारत भी आप लिखते थे। इनकी कविताबहुत अच्छी होती थी । कभी कभी ये "ब्राह्मण की कीमत तक, दानग्राही ब्राह्मण की तरह, कविता में मांगते थे। देसिए- . विज्ञापन। चार महीने होचुके 'ब्राह्मण की सुधि लेव । गगामाई जे कर, हमें दक्षिणा देव ॥१॥ जो बिन मांगे दीजिये दुहु दिश हाय अनन्द । तुम निर्चित हा हम कर, मागन की सोगद ॥२॥ सदुपदेश नितही करें,# मागें भोजन पात्र । देसहु हम सम दूमरा, कहा दान कर पात्र ॥ ३ ॥ तुर्त दान जो करिय तो, होय महासल्यान । 'बहुत बकाये लाभ क्या ? समुझ साव जजमान ॥ ४॥ रूप राज की कगर पर, जितने होय निशान । तिते वर्ष सुरा सुजस जुत जियत रहो जजमान ॥५॥ ३ - { *", "हमें प्रयोग याट, रसिये ।
+
दही बहुत
(२)
हरिगा।
आठ मास धोने जजमान ।
अब तो रो दच्छिना दान | हरिगना
आजु काल्हि जो रुपया देव ।
मानौ काटि यज्ञ करि लेव ॥ हरिगडा
मांगत हमका लागै लाज ।
पै रुपया पिन नलै न काज ॥ हरिगङ्गा
तुम अधोन ब्राह्मन के प्रान ।
ज्यादा कौन बकै जजमान | हरिगना
पहु
खिझाय।
यह मौनिउं भलमसी आय ॥ हरिगना
सेघादान अकारथ (१) होय।
हिन्दू जानन हैं मय कोय ॥ हरिगना
हँसी खुसी से स्पया देव ।
दूध पून सब हमते लेव ॥ हरिगड्डा
काशी पुनि गया मां पुन्नि ।
वाना वैजनाथ मा पुनि ॥ हरिगङ्गा
प्रतापनारायण के कोई कोई लेस व्यग्य से बेतरह भरे
हुए होत थे। उन्होंने एक दफा भगड ओर फकड का
किस्सा उत्तर प्रत्युत्तर के रूप में लिखा था। वह साद्यन्त
विकट व्यग्यों से पूर्ण है। हसी दिरलगी के लेख लिखकर
प्राहकों को रिझाना इन्हें खूब याता था । तिस पर भी लोग
"ब्राह्मण की कीमत वक्त पर न देते थे। बहुतेरे तो देते ही
न थे। इससे इनको तग होना पड़ता था और घाटा भी उठाना
-
पहता था। एक बार सीमारी के बाद घावू इरिश्चन्द्र से स्नान
करने और अन्त में उनके मरने पर इन्होंने अपने पन में चहुत
अच्छी करिता लिखी थी। अपनी कविता में इन्होंने बाबू हरि-
श्चन्द्र की बात तारीफ की है । एक जगह आप कहते है-
बनारस की जमी नाजा है जिसकी पायसी पर ।
अदब से जिसके आगे चर्स ने गग्दन झुकाई हे ॥
घही महतावे हिन्दुस्ता वही गैरतदिहे नैयर।
कि जिसने दिल से हर हिन्दू के तारीको मिटाई हैं।
सप उसके काम ऐसे हैं कि जिनको देग हेरत से ।
हर एक आकिल ने अपनी दात में उगली दवाई है।
भारतजीवन, भारतेन्दु, उचितवक्ता और फतेहगढ पच
आदि पत्रों और मासिक पुस्तकों से कमी कभी श्राप छेडछाड
भी कर बैठते थे। यदि वे आपकी बात में दश देते थे तो
आप उनको जवाब भी पूर देते थे। पण्डित बदरीदीन शुरु
मकवरपुर (कानपुर) में मदरसों के सब-डेप्युटी इन्स्पेक्टर थे।
उनकी तरकी आदि के बारे में आपने, न मालूम क्यो, घार
बार "ब्राह्मण में नोट लिने है। इनके "ब्राह्मण" की एक
कापी कानपुर के फलेक्टर के नाम से भी जाती थी।
"हिन्दोस्थान" से सम्बन्ध ।
१८८६ ईसवी में प्रतापनारायण कालेकाकर गये शोर
श्रीयुक्त राजा रामपाल सिह के "हिन्दोस्थान" के मम्पादन
में महायता देने के काम पर नियत हुए। परन्तु उनके स्वभाव
में सच्छन्दता अधिक थी। इस कारण वे बहुत दिनों तक
यहा नहीं रह सके। उन्हें वहा से वापस आना पड़ा। उसी
समय हिन्दुस्तान के सच्चे शुभचिन्तक माडला साहब इस
देश में आये। उनके आने के उपलक्ष्य में परिडत प्रतापनारा यण ने "ब्राडला स्वागत" नाम की एक कविता लिखी। इस फैपिता का लोगों ने बडा मादर किया। इगलैंड तक में उसकी समालोचना हुई । इस कविता का आरम्भ इस प्रकार है। स्वागत श्रीयुत प्राडला, प्रेम प्रतिष्ठा पात्र । पलक पांडे करि रहे, तब हित देशीमात्र ॥ म्वागत श्रीयुत चार्ल्स ब्राडला परम पियारे। म्यागत स्वागत टिश-बंश विधु जग उजियारे।। कालेकांकर में इनकी महति से एक ऐसे सजन ने हिन्दी सीखी जिसने पद देहाती होकर भी, और जिसके बदौलत उमने हिन्दी सीखी उसकी जन्मभूमि देहात में थी, यह जान कर भी, देहातियों ही की सिसलाई हुई हिन्दी में देहातियों को निन्दा करके अच्छा नाम पैदा किया है। 'पुस्तक-रचना। इन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी और अनुवादित की। जहां तक जाना गया है इनकी अनुवाद की हुई पुस्तके ये हैं १ राजसिह, २ इन्दिरा, ३ राधारानी, ४ युगलांगुरीय, ५ चरिताएक-यगाल के ८ प्रसिद्ध पुरुष के चरित, ६ पञ्चामत- पाच प्रमिद्धदेवताओं का अभिन्नत्व-निरूपण,७नीतिरतावली- धगला की नातिरतमाला का अनुवाद, - कथामाला-ईश्वर- चन्द्र विद्यासागर की पुस्तक का अनुनाद, हलगीतशाकुन्तल, १०चर्णपरिचय ३ भाग-ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की पुस्तक का अनुपाद, ११ सेनरश-सेन-वशीय राजाओं का इतिहास, १२ सूर्य यगाल का भूगोल !* { पहले चार यदिम पार के रपन्यास हैं। "
प्रतापनारायण की लिपी हुई पुस्तके, जिनके नाम ज्ञात
१ फलिफौतुक (रूपक'), २ फलिप्रमाव (नाटक, ३ इटी
हमीर (नाटक), ४ गो सदर (नाटक), ५ जुश्रारी खुमारी प्रह
सन, ६ प्रेम पुष्पावली, ७ मन का लहर, शुमार विलास,
हगल सड (माल्हा), १० लोकोक्ति शतक, ११ तृप्यन्ताम् ,
१२ जाडला स्वागत, १३ भारतदुर्दशा (रूपक), १४ शैर-सर्वस,
१५ प्रताप सग्रह, १६ रसखान-शतक, १७ माउस विनोद ।
इसके सिवा इन्होंने वर्णसाला, शिशुविज्ञान, और स्वास्थ्य
रक्षा नाम को पुस्तकें भी लिनी है । पर हमने इन पुस्तकों
को नहीं देता, इससे हम नहीं कह सकते, ये अनुवाद रूप हैं
या इन्हीं की लिखी हुई है। शेषसख में आपने शिनालय,
शिव लिङ्ग-स्थापना और शिवपूजन का समर्थन किया है।
"तृप्यन्ताम्" एक विनोदात्मक कविता है, पर उपदेशपूर्ण
है। उसमें देशदशा का अच्छा चिन है । लोकोक्ति शतक भी
अच्छी कविता है। उसमें एक एक कहावत पर एक एक पद्य
है और हर एक पय का अन्तिम चरण स्वयं कोई कहावत है।
इनकी कई एक किताबें विहार के शिक्षा विभाग मे, बाबूराम
दीनसिह के प्रयत्न से, जारी हो गई थी। मालूम नहीं अब ये
जारी है या नहीं। इनकी एक पुस्तक को मुरादायाद निवासी
पण्डित बलदेवप्रसाद ने प्रकाशित किया है, पर उसका नाम,
इस समय, हमे याद नहीं । प्रतापनारायण की पुस्तकों में
हम उनके सङ्गीत शाकुन्तल को सबसे अच्छा समझते हैं।
अपनी अन्तिम बीमारी में उन्होंने परमेश्वर की प्रार्थना में
कुछ पद्यों की रचना की थी चे भी बहुत सरस, और भक्ति
भाव-पूर्ण है।
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te
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(१२)
रूप, रग, आत्मश्लाघा आदि।
प्रतापनारायण का रग गोरा था। नाक बहुत बडी थी
शरीर दुमला था। कमर जवानी ही में सुरु गई थी। आप
सिर के बाल धड़े बड़े रखते थे और आगे दोनों तरफ
काफुलें रखते थे। वे किञ्चित् विलक्षण प्रकार की चेष्टा से
कमर मुकाये हुए चलते थे । कदाचित् इनका दुर्बलर
इसका कारण था। कभी कभी मेले में देखा गया कि पद से
ढके हुए इक में बैठे स्त्रियों की तरह झाते हुए, आप चौं
जा रहे हैं । हम दो दफे इनसे मिले । दोनों दफे हमने इनके
लम्बी डाढी देसी । इनको नास सूघने का व्यसन था। इनकी
नाक दिन भर नास फाका करती थी। इससे इनकी शादी और
मूछों के बालों पर भी थोडा बहुत नास छाया रहता था।
शरीर इनका रोग का घर था । आप अपने रूप आदि की
तारीफ में कहते हैं-
कौसिक कुल अन्तम श्री, मिश्र सङ्कटादीन ।
जिन निज-बुधि विद्या विभव, वश प्रशसित फोन ॥१
तासु तनय “परतापहरि," परम रसिक वुधराज ।
सुघररूप, सतकचिन विन, जिहि न रुचत कछु काज ॥२
प्रेम-परायन सुजन प्रिय, सहवय नव रस सिद्ध ।
निजता निज भाषण विषय, अभिमानी परसिद्ध॥ ३
श्रीमुग्व जामु सगहना, कीन्हीं श्रीहरिचन्द ।
तासु कलम करतूति लसि, लहै न को श्रानन्द ॥ ४
सङ्गीत शाकुन्तल ।
नाटक की प्रस्तावना में कवि का अपने ही मुंह अपनी
तारीफ करना अनुचित नहीं। पर, यहां, पण्डित प्रतापनारा.
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, , थण ने मतलव से कुछ जियादह अपनी तारीफ कर डाली है। ऊपर के अवतरण के आगे भी प्रापने अपनी तारीफ को है और अपने को "पण्डित वर" लिखा है। "परम रसिक," 'सहृदय" और "नवरस-मिद्धा इत्यादि विशेषण तो ठीक ही हैं। पर "सुघर रूप में विलक्षणता हे। आत्मश्लाघा को लोगों ने युग माना है। यद्यपि सस्कृत के किसी किसी करिने आत्मश्लाघा को है, पर फालिदास के सहश विश्वमान्य करिने नम्रता ही दिखलाई है। प्रताप- नारायण सस्रुन कनि श्रीहर्प और जगन्नाथराम के स्कूल के थे। उन्हें अपने को "प्रसिद्ध प्रतापनारायण लिने पिना कल ही न पडती थी। उनकी कितारों के ऊपर तक “प्रसिद्ध" शब्द विराजमान है। "ब्राह्मण" में कई जगह इन्होंने अपने मुह अपनी और अपने पुस्तकों की घडाई की है। अपनी "प्रेमपुष्पावली" के ऊपर आपने एक लेप "ब्राह्मण" में अपनो ही कलम से लिप कर उसकी सूप तारीफ की है। * पर प्रतापनारायण की प्रात्मश्लाघा उर्दू के प्रसिद्ध कवि इन्शा शष्या ना की यात्मश्लाघा के सामने कोई चीज़ नहीं। सैयद साहब ने एक मुशायरे में अपने एक प्रतिपक्षी के जवाब में एस गज़ल कही थी । बसको कुछ पंक्तिया यों है-- एक तिफूल रिस्ता हे फलातू मेरे भागे । क्या मुह दै अरस्तू जो कर चू मेरे भागे ॥ क्या माल मला सूर फोटू मेरे धागे। कापे है पड़ा गुम्यदे गरदै मेरे भागे । बोले है यही प्रामा कि किस किस को मै बापू । बादल से चले भाते हैं मजम मेरे धागे । । - है
॥
-
(१४)
हमारी समझ में इन बातों की ज़रूरत न थी । इनके लेख ही
इनकी प्रसिद्धि के लिए काफी थे। खुश्ही अपने को "प्रसिद्ध"
लिखने से इनकी प्रसिद्धि शायद ही अधिक हुई हो।
आप कविता में अपना नाम प्रताप, प्रतापहरि, और कभी
कभी प्रेमदास देते थे। प्रेम के आप बहुत घडे पूजक
इसीसे आपने अपने नामों में एक नाम प्रेमदास भीरक्खा था।
स्वभाव।
प्रतापनारायण के स्वभाव में स्वच्छन्दता अधिक थी। ये
हमेशा अपने ही रग में मम्त रहते थे। किसी की परवाइनको
म थी। जिन लोगों के साथ ये वैठते उठते थे, अथवा जिनसे
इनका मैत्रीभाव था उनके यहा कभी कभी ये दिन दिन भर
पडे रहते थे। पर कभी कभी रज़ार मिन्नत भार करने पर
भी उनके यहां ये न जाते थे।ये सर्वधामनमौजी थे ।जब कभी
कोई इनकी तबियत के खिलाफ कुछ कह देता या कोई काम
फर बैठता तब उसका जरा भी मुलाहजा न करके ये उसकी
गोशमाली करने लगते थे। इनकी तबियत में जोशथा। इससे
कमी कभी छोटी छोटी यातों पर भी ये विगड उठते थे।
खदेशी चीजों और कपडो'पर इनका अधिक प्रेम था। सादा-
पन इन्हें बहुत पसन्द था ये हमेशा सादे कपडे पहनते थे।
एक दफा कोट बूट पहने एक महाशय इनसे मिलने आये।
उस समय ये बहुत सादी पोशाक में अपनी मिनमण्डली के
पीच बैठे थे। आगन्तुक ने कहा-"हम पण्डित प्रतापनारा-
यण से मिलना चाहते है" । यह सुन कर प्रतापनारायण
अपनी देहाती चोली में पोल उठे-"भाई उनसे मिले की
मातिर पन्द्रह रुपैया का एफु टिकट लेइ का परत है तय नह
1
मिलति है। आपने अपने बैठने के कमरे का नाम रक्खा
था "ब्राह्मण कुटीर। पर बैठते 'श्राप वहा यहुत कम थे।
एक दिन जब हम आप से मिलने गये श्राप वहीं हमको
मिले। दीवार पर एक इकतारा टॅगा था । हमारे साथ एक
और सजन थे। उन्होंने उस इकतारे को उठाकर छेडना शुरू
किया । कोई दो मिनट याद प्रतापनारायण से न रहा गया।
उन्होंने उसे उनके हाथ से छीन लिया। आपने कहा 'यहि
तना नहीं बजाया जाता। यह कह कर आप खडे हो गये
और उसे बजाते हुए लायनी गाने लगे। हमारे साथी सज्जन
ने पूछा-"ब्राह्मण मरि गा कि है ?" आपने कहा--"ब्राह्मण
अथ ना मरी, जी गा । वाजू रामदोनसिंह 'ब्राह्मण' का अमर
के दीन" । हम उनसे दो दफे मिले, पर हमें अफसोस है,
एक दफा भी उनसे साहित्य विपयक वाते अच्छी तरह न
हुई । शायद उनकी तबियत उस समय किसी और
तरफ
रुजू थी।
प्रतापनारायण अव्वल नम्बर के काहिलये। उनके बैठने
फी जगह तक में कूडे का ढेर लगा रहता था । असवार,
चिट्ठिया, कागज, बिसरे पडे रहते थे। उनके यहाभाने जाने
घाले उनके मित्र अगर उन्हें उठाकर जगह को साफ कर देते थे
तो कर देते थे। गुद प्रतापनारायण ने शायद ही कभी उनको
उठा कर यथास्याम रक्या हो । लोगों की चिट्टियों का उत्तर
तफ ये पहुधा नहीं देते थे । पण्डित दुर्गाप्रसाद मिश्र को
इन्होंने एक चिट्ठी लिखी थी । उसे "सङ्गविलास प्रेम" ने
छाप कर प्रकाशित किया है। उसमें, एक जगह, चिट्टियों
का उत्तर न देने के विषय में आप लिखते हैं--"कोसारेन को
सहसि मा परै"
(१६) सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक विचार। प्रतापनारायण को सामाजिक बन्धनों की परवा चहुत कम थी। इस विषय में विधि-निषेध-सम्बन्धी जो नियम प्रचलित है उनसी पावन्दी के वे कायल न थे। उनका श्राहार- विहार अनियत्रित था। शरीर रक्षा के नियमों का वे अच्छी तरह पालन न करते थे। इसीसे उनका शरीर जवानी ही में मिट्टी हो गया था। और इसीसे उनसी अकाल मत्यु भी हुई। कवि ही तो ठहरे। कवि स्वभाव ही से उच्छवल होते हैं। सामाजिक बन्धनों की तरह धार्मिक धन्धनों के भी वे पात अधिक वशीभूत न थे। धर्मान्धता उनमें न थी। आपके सिद्धान्त थे "प्रेम एव परोधर्म:" और "शत्रोरपिगुणाचाच्या दोपा वाच्या गुरोरपि" । किसो विरोधी धर्म,से उन्हें प्रान्त- रिक घृणा न थी।घे आर्यसमाज, ब्रह्मसमाज, धर्मसमाज, सय कहीं अकसर चले जाते थे। शायद कुछ दिन तक किसी पादरी को पढ़ाने की नौकरी भी आपने पर ली थी। उन्होंने एक सनातन हिन्दू धर्मावलम्वी के घर में जन्म लिया था और ऐसे ही धर्मावलम्बी लोगों के साथ वे बैठते उठते भी थे। इसलिए इस धर्म की तरफ उनकी प्रवृत्ति स्वभाव ही से अधिक थी। यह इनके लेपों से जाहिर है। अकेला इनका "शैवसर्चस्व ही इस बात का पका सबूत है । एक दफा कल फत्ते की हाईकोर्ट में किसी जज ने शालग्राम की मूर्ति मंगवाई थी। इस पर प्रतापनारायण विगड उठे थे। आपने कई लेख इस बात के खिलाफ लिखे थे।
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कांग्रेस को ये अच्छा समझते थे। उसके ये पक्षपाती थे।
एक दफा मदरास और एक दफा इलाहाबाद की काग्रेस में
कानपुर से प्रतिनिधि होकर भाप गये भो ये । गोरक्षा के ये
बहुत बड़े हिमायती ये। अपनी कई कविताओं में इन्होंने
गोरक्षा पर जोर दिया है। सुनते हैं कानपुर में जो इस समय
गोशाला है, उसकी स्थापना के लिए प्रयल करनेवालों में ये भी
थे। एक दफा सामीभास्करानन्द के साथ ये कनोज गये।
यहा गोरक्षा पर इन्होंने एक व्याख्यान दिया । व्याख्यान में
इन्होंने एक लायनी कही । उसका आरम्भ इस प्रकार है--
घां या करि तृण दावि दॉन सो दुसित पुकारत गाई है।
इसमें करुणरस का इतना अतिरेक था कि मुसरमानों
तक पर इसका असर हुश्रा और एक माध कसाइयों ने गो.
हत्या से तोया तक किया।
हरिश्चन्द्र पर भक्ति।
हरिश्चन्द्र पर प्रतापनारायण की अपूर्व भक्ति थी । उनका
"कविनचनसुधा" पढ़ते ही पढ़ते हिन्दी पर ये अनुरागशील
हुए थे। हरिश्चन्द्र की इन्होंने यहुत तारीफ की है । "ब्राह्मण"
में का जगह मिश्र महाराज ने हरिश्चन्द्र को ऐसे ऐसे विशे.
पण दिये हैं जो सिर्फ बहुत यडे यडे महात्माओं ही को दिये
जाते है। इन्होंने उनके हाथ तक जोडे हैं। यह बात, उस
समय, किमी किसी को अच्छी नहीं लगी। इसने इन पर
आक्षेप भी हुए । आक्षेपों का म्होंने यथामति उत्तर भी दिया।
हरिश्चन्द्र ने जब से प्रतापनारायण की "प्रेमपुष्पावली" की
तारीफ की, तब से इनका उत्साह यहा बढ़ गया। हरिश्चन्द्र
की आलोचना गोया इनके सुलेखक और सुकवि होने की
.
॥
-
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( १८ )
एक शिलालिपित सर्टीफिकेट हो गई। उसका उल्लेख कर
के इन्होंने कई दफे अपने ही मुह अपनी नारीफ की । हरि
श्चन्द्र के मरने पर इन्होंने "शाकाथु" नामक एक विलापा
त्मक लम्धी कविता "ब्राह्मण" में प्रकाशित की। उस इन्हों
ने बाबू साहब के गुण गाते गाते आकाश पाताल एक कर
दिया । हरिश्चन्द्र को इन्होंने "पूज्यपाद" तक कहा है। अपने
कई ग्रन्थों के श्रादि में "हरिश्चन्नाय नम." लिया है। उनके
मरने पर इन्होंने "हरिश्चन्द्र सम्बत्" लिखना तक शुरू कर
दिया था।
मृत्यु।
.
জুনন্ধা সীৰ খা যা জা বি-নানা ধা। জা
दफे ये सख्त घीमार हुए, पर बच गये । सम्बत् १९५१ की'
आपाढ शुक्ल चतुर्थी, रविवार, (भागस्ट १८६४) इनकी जीधन
यात्रा का अन्तिम दिन था । उसी दिन, ३८ वर्ष की उमर में,
रात के दस बजे के करीब, निका शरीरपात हुा । इनके
मरने पर सभी हिन्दी अखयागें ने शोक सूचक लेख लिखे।
कविताएँ भी बहुत सी प्रकाशित हुई। इनके कोई सन्तति
नहीं । इनकी विधवा अभीतक विद्यमान है। इनके पूर्वजों के
उपार्जित दो तीनम कान कानपुर में हैं। शायद उन्हीं के किराये
पर इनका गुजर हाता है । मरने के पहले कुछ काल के
लिए प्रतापनारायण वांकीपुर चले गये थे । बाबू रामदीनसिंह
की इनपर कृपा थी। इसी लिए ये वहा गये थे । जैसा ऊपर
लिसा गया है, इनकी प्राय, सभी कितायें रागविलास प्रेस के
मालिक ही छापते और चेचते हैं। मालूम नहीं उन्होंने पण्डित
भतापनारायण की विधवा की कुछ मदद की या नहीं।
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प्रतिभा, परिहासप्रीति, नाट्य-कौशल
आदि
कोई कोई कहते हैं कि प्रतापनारायण सस्त भी अच्छी
जानते थे और फारसी भी । किसी किसी के मुह से हमने सुना
। है कि वे अरवी तफ जानते थे। परन्तु जो लाग उनके पास
हमेशा बैठते उठते थे उनका मत हे फिचे अरवी नहीं जानते
थे। उर्दू में तो वे बहुना अच्छी कविता करते थे। मशायरों तक
में जाते थे, दीवाने बिरहमन में उनकी उर्दू कविता सग्रहीत
है। सस्कृत में भी उनके नाम से कुछ लविता छपी है और
फारसी में भी। पर इस बात की तहकीकात करने की हम
कोई जरूरत नहीं देखते कि वे इन भाषाओं में कितनी गति
रसते थे। कवि के लिए जिस बात को सबसे अधिक जरूरत
होतो हे वह प्रतिमा है। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि
प्रतापनारायण में प्रतिभा थी, आर याडी नहीं, यहुन्न थी।
'विद्वत्ता होने से कविता शक्ति में काई निशेपता नहीं था
सकती, उस्टा हानि चाहै उसले कुछ हा जाय ! प्रतापनारा.
रण की कविता में प्रतिभा मा प्रमाण श्रोक जगह पर मिलता
है। उनकी कोई कोई उक्लियां बहुत ही अनोसो और नई हे।
उनकी कविता में विशेष करके हास्यरम का यतही थच्छा
परिपाफ हाता था । वे बडो शोनता से छन्दोरचना कर
"सकते थे। जेसा पहले कहा गया है, कानपुर में बहुधा
लावनीवाजों के दो दलों में तावनीवाजी हुशा करती थी।
फमी एकादलवाले उनको अपनी त फ बिठा लेते थे और
उस दल के इच्छानुसार, विरोधीदल का गाना समाप्त होते
होते, वे नई लापनी तैयार कर देने थे। कभी दूसरे दलवाले
।
।
(२०)
भी ऐसा ही करते थे। कई दफे उन्होंने नाटक भी नेता था।
उसमें उन्होंने अपनी हास्यमयी कविता से दर्शकों को सब
ही हसाया था। फागुन मैं इकतारा लेकर वे उपदेशपूर्ण, पर
हास्यजनक, होली, कथीर और पद आदि गाते थे। वे बहुत
जल्द कविता करते थे । यथासमय कविता बनाकर लोगों को
वे मोहित कर देते थे। एक दफा एफ साधु ने यह पद गाया-
"तजहु मन हरि-विमुखन को सग । जिनको सगति सदा
पाय के परत भजन में भग" । प्रतापनारायण ने इस पूरे पद्
के मतलब को बिलकुल ही उलट फर इस तरह गाया-
"तजहु मन हरिभक्तन को सग । जिनकी सगति सदा पाय
के होत रग में भग"। इसी तरह सारे पद के अर्थ को उन्होंने
घदल दिया। ये पूरे मससरे थे।
यदि पण्डित प्रतापनारायण मिथ की जीवनी में यह न
लिसा जाय कि वे बडे ही दिल्लगीवाज और किसी अश में
फकड थे, तो वह जीवनी अवश्य ही अपूर्ण समझो जायगी।
एक बार नाटक में उनको स्त्री का रूप लेना था। इसलिए
मूछों का मुउघाना जरूरी था। आप घडे भक्ति-भाव से अपने
पिता के सामने हाजिर हुए और चोले, "यदि श्राशा दीजिये
तो इनको मुंउवा टालू । इनका मुंडनगना जरूरी है। परन्तु
मैं चनाशाकारी नहीं बनना चाहता" । पिता ने हंसफर
माशा दे दी।
पण्डित प्रतापनारायण नाटक खेलने के विशेष प्रेमी ये
और जब जय वेगातक सेले नय तब उनके चातुर्य की प्रशसा
हुई। एक बार उन्होंने "उर्दू चीनी का पार्ट लिया था। उस
समय उनके और मुमल्मान घेश्या के वेश में कोई अन्तर न
था। दर्शकों में बैठी हुई एक प्रसिद्ध वेश्या से "बुभा सलाम"
P । (२१) कह कर उन्होंने सलाम किया तो वह सहसा योल उठी "बेटी तीती रह"] प्रतापनारायण जी बाजारों में धर्मशिक्षा देने वाले पाद- रयों से बहुत उलझा करते थे। और उनको सूब छकाते थे। उनकी तर्फशक्ति र प्रपल भी। एक बार आप कह बैठे कि दुनिया की प्रथमपुस्तक कोकशास्त्र है । पादरी के प्रश्न पर आपने इस शास्त्र के सिद्धान्तों का परिचय देकर बहुत से सामान्य धर्म, कर्म, उसीके अन्दर कह सुनाये । यह सब सुन- कर पादरी माहब बहुत ही छके । एक दिल्लगी और सुनिए । एक दिन पादरी साइच में और उनसे इस तरह बातचीत हुई- । पादरी-आप गाय को माता कहते हैं। प्रताप०--जीहा पादरी-तो बैल को श्राप चचा कहेंगे? प्रता-प्रेशक-रिश्ते मे क्या इनकार है ? पादरी-हमने ता एक दिन अपनी आन से एक बेन को मेला माते देखा था। प्रताप०-अजी साहर, यह थैल ईसाई हो गया होगा। हिन्दूममाज में ऐसे भी बैल होत है ! पादरी साहर चुप हा रहे, कहते ही क्या ? • एक बार कानपुर की म्यूनीसिपालिटी में इस बात पर विचार हो रहा था कि मेरवघाट में मुर्दे यदाये जाय या नहीं। (गङ्गाजी का प्रवाह उस घाट से कानपुर की वस्ती की ओर है), तरह तरह के प्रस्ताव होते होते किसी ने कहा कि जले दुए मुर्दे की पिएडी यदि इतने इच सेनधिक न हो तो यहाया (२२) जाय। दर्शकों में प्रतापनारायण भी उपस्थित थे। बाप सडे हो. कर बोल उठे-"अरे देया रे दैया । मरेउ पर छाती नापी जाई"! सुनते हैं ये सांस बन्द करके घन्टों तक मुर्दा से पडे रहते थे। जिस अङ्ग को चाहते थे (यथा एक कान या दोनों) उसे ये यथेच्छ हिलाते या फरकाते थे। ऐसा करने में और सद स्थिर रहते थे। इससे किसी किसी का मत है कि ये योगविद्या जानते थे। पर प्रतापनारायण के ऐसे आहार- विहार करनेवाले का योगी हाना कुछ असम्भव सा जान पड़ता है। निदान प्रतापनारायण स्वतन्त्र थे, फकड थे, हिन्दी और हिन्दुस्तान और काग्रेस के परम भक्त थे, अच्छे कवि, लेखक और उत्साही थे, प्रारब्ध ने इनको अधिक नहीं जाने दिया, नहीं तो इनसे समाज को अनेक लाभ पहुचने की प्राशा थी। हिन्दी की हिमायत । यह कहने की जरूरत नहीं कि ये हिन्दी के बहुत बड़े हिमायती थे। हिन्दी के पक्ष में इन्होंने "ब्राह्मण" में बहुत दफे, अच्छे अच्छे लेस लिये एक दफा "फतेहगढ-पंच" ने इनकी हिमायत के खिलाफ कुछ लिसा र हिन्दी में दोपोद्भावना की। इस पर प्रतापनारायण जामे से बाहर हो गये। आपने "पच" की दलीलों वदी ही योग्यता से खण्डन किया। फई महीने तक या विवाद जारी रहा और प्रतापनारायण "प" की चेम्मिर पर सी बाता की अमारता दिखलाते रहे। हिन्दी के विषय में पता उपदेश यहाभा- ( २३ ) चाहु शु साचौ निज कल्यान । तो सब मिलि भारत-सन्तान ॥ जपो निरन्तर एक जबान । हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान ॥ १॥ तयहि सुधरिहै जन्म निदान । ताहि भलो फरिहे भगवान ॥ जय रहिह निशिदिन यह ध्यान । हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान ॥२॥ इससे इनका देशाभिमान भी सिद्ध होता है। कविता के नमूने। पडित प्रतापनारायण की कविता के कुछ नमूने देकर हम इस लेख को पूरा करना चाहते है- नाटला-वागत। नोन, तेल, लकडी, घास पर टिफस लगै जह। चना, चिरौंजी मोल मिलै अहं दीन प्रजा कह ॥ जहां रूपी, घाणिज्य, शिल्प, सेवा सय माहीं। पेशिन के हित कछू तत्व का फैसष्टु नाहीं ॥ १ ॥ कहिय कहा लगि नृपति दये हैं जह न भारन । तह तिनकी धनकथा, कौन जो गृधी सधारन॥ जे अनुशासन करन हेत इत पठये जाही। ते पाधा दिन काज प्रजा सो मिसत लजाहीं ॥२॥ खोकोकि शतक। छौखि नागरी सुगुस आगरी उर्दू के रंग राते।। देशी यस्तु विहाय विदेशिन सो सर्वख ठगाते ।
(२४) . मुरस हिन्दू कम न लहें दुग जिनकर यह ढग दीठा। "घर की साड खुरसुरी लागै चोरी का गुड मीठा ॥१॥ नहि सीखत सद्गुण करिने। निज हट तजिन प्रचारत मेम ।। परदेशिन सेवत अनुरागे। "सय फल पाय धतूरन लागे" ॥२॥ तृप्यन्ताम् । फेहि विधि वेदिक धर्म होत क्य। वाहा बखानत नक, यज, साम ।। हम सपनेह में नहिं जाने। रहे पेट के बने गुलाम ॥ तुमहि लजापत जगत जनम लै। दुदु लोशन में निपट निफाम || कहें कौन मुप लाय हाय फिर । ब्रह्मा यावा तृप्यन्ताम् ॥१॥ देस तुम्हारे फरजन्दों फा। सौरो-तरीक तुप्रासो फलाम ।। खिदमत कैसे फरा तुम्हारी । अकल नहीं कुछ करती काम || पाचे गस नगर गुजरानू। था कि मये गुलगू का जाम ॥ मशी चितरगुप्त लाइव । तसलीम काहू या तिरपिताम ॥२॥ इन नमूनों से प्रतापनारायण का म्वदेश और स्व-भाषा सम्बन्धी प्रेम टपका पडता हे। खदेश दशा का चित्र भी इनमें अच्छा देखापड़ता है। । - ॥ २५) फुटकर कविता। - ग अपने लेखों और चिट्टियों में ये कभी कभी वैसवारे की अपनी ठेट देहाती योलो के वाक्य लिख दिया करते थे। उन में अपूर्व रस भरा रहता था । इस तरह की देहाती योली में इन्होंने कुछ कविता भी की है। ऐसी कविता का एक नमूना सुनिए । एक वृद्ध श्रादमी अपनी दशा का वर्णन करता है- हाय बुढ़ापा तोरे मारे । 7 ។ । भरतो हम नकन्याय गयन । करत धरत कुल्लु बनत नाही कहा जान औ कैस करन। छिन भरि चटक छिन मा मद्धिम जस बुझात खन होय दिया। तैसे निखरख देत्रि परत हे हमरी अधिल के लन्डन ॥१॥ श्रस कुछ उतरि जाति है जीते याजी घेरिया पाजी बात । कैस्यो सुधिही नाही मावति मूडुइ काहे न दे मारन । कहा वही कुछ निकरत कुछु है जीभ रांड है या हालु। फोऊ याको पात न समुझे चाहे पीसन दांय कहन ॥२॥ दादी नाक याक मा मिलि गै बिन दातन मुहुँ मस पोपलान । 7 - -- -- यदिही पर यहि पहिधापति है कौँ समाखू जो फांकन । वार पाकि गेरीरी मुकि मै मूंडी सासुर छालन लाग। हाथ घाव कुछु रहे न आपनि केहिके धागे सुख स्वाधन ॥ ३ ॥ यही लगुठिया के बूते अब जस तस डोलित डालित है। जेहिका लै के सब कामेन मा सदा खखारत फिरत रहन जियत है महराज सदा खो हम ऐस्यन का पालति है। नाही तोश्रय को धौ पूछ केहि के कौने काम के हन ॥ ४॥ इस कविता में वुढापे का बहुत ही अच्छा फोटो है। कविता खूध सरस है । पर हमें डर है कि जो इस बोली को अच्छी तरह नहीं जानते थे इसका पूरा मजा न पावैगे। जिन लोगों का यह खयाल है कि किसी विशेष प्रकार की भाषा या चोली में ही अच्छी और सरस कविता हो सकती है, वे दे कि महा गवारी बोली में भी रसवती कविता हो सकती है पर, हां, फवि प्रतिभावान होना चाहिये । प्रतापनारायण ने माहा तक में कविता की है और वह मी सरस और उदय- हारिणी है। कानपुर के दंगल पर उन्होंने एक पुस्तक ही लिख डाली है । इस पुस्तक में आदि से अन्त तक माल्हा ही है। इसके सिवा, कानपुर पर भी, थाल्हा छन्द में आपने - - (.२७) कविता की है। इस पिछती कविता का गोरक्षाविषयक एफ नमा देखिए- गैया माता तुमका सुमिरों, कीरत सयते घडी तुम्हारि । करी पालना तुम लरिकन के, पुरिखन यैतरनी देउ तारि। तुम्हरे दूध पदी की महिमा, जानें देव पितर संव कोय।' को अस तुम यिन सरजेहिका, गोवर लगे पवित्तर होय र जिनके लरिका खेती 'फरिक, पाले मनइन के परिवार । पेसी गाइन की रछ्या मां, जो कुछु जतन करौ सो प्यार। घास के यदले दूध पिया, मरि कै देय हाड औ. चाम । धनि घह तन मन धन जो लावै, ऐसी जगदम्मा के काम २ मारहास्त्रएड की पोथी ले के,चाखी तक लिखा कस माय । "जहा रोसैंया है ऊदन फै, भुरवा मुगुल - पछारै गाय" । को अस हिन्दू ते पैदा है, जो अस हालु देखि एक साथ। रफत के श्रासन रोय न उठिहै, माथे पटकि दुहत्या हाथ ॥३ सय दुस सुन तो जैले तैसे, गाइव की नहिं सुने गुहार । जब मुधि आवै मोहि गैयन की, नैगन बहै रकत की धार । दियां की बातें तो हिय रहि, अय कम्पू के सुनी हवाल । जहां के हिन्दू तन मनधन ते, निसदिन करें धरम प्रतिपास lite प्रतापनारायण के आरहा का नमूना आप देख चुके । अव उमफी भकि रस में सराबोर कविता का एक उदाहरण खीजिए- आगे रहे गनिका गज गीध सुती अय को दिखात नहीं है। पापपरायन ताप भरे परताप समान म भान कही है। हे सुखदायक प्रेमनिधे जग यों तो भले श्री धुरे सय ही दीनदयाल श्री दीन प्रभो तुम से तुमही हमसे हमही हैं। - -
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(२८)"
इस पथ की हम तारीफ नहीं कर सकते। सरस कविता
का यह बहुत ही अच्छा नमूना है।
उर्दू कविता।
अब इनकी थोडी सी उर्दू कविता सुनिए । यह कविता
एक तरह के समस्यासमूह की पूर्ति है। इसमें पहली पक्ति
इनकी है, दूसरी और फिसी की। पर, मेल दोनों का खय
मिल गया है-
गजल।
वो बद सू राह क्या जाने वफा की।
'अगर गफलत सेप्याज़ पाया जफा की ॥१
न मारी गाय गोचारन किया वन्द ।
'तलाफ़ी की जो जातिम ने तो क्या की' ॥२
मिया श्राये हैं बेगारी पकडने ।
'कहे देती है शोस्त्री नकशे पा की।३
पुलिस ने और बदकारों को शह दी।
'मरज़ बढता गया ज्यों ज्यों दवा की॥४
जो काफिर कर गया मन्दिर में विद्अत ।
'घो जाता है दुहाई है खुदा की' ॥५
शवे कतलागरे के हिन्दुओं पर ।
'हकीकत खुल गई रोजे जजा की ॥६
सपर हाकिम को दें इस फिक में हाय !*
'घटा की रात और हसरत चढा.की॥७
कहा अब हम मरे साहब कलक्टर।
'कहा मैं क्या करू मरजी खुदा की' ॥
~
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(२६) जमी पर फिसके हो हिन्दू रहे अव । 'खयर लादे कोई तहतुस्सरा की ॥ कोई पूछ तो,हिन्दुस्तानियों से। -"कि तुमने किस तवका पर वफा की' ॥ से मोमिन नासमझो ऐ घरहमन । 'सताये जो कोई खिलकन युदा की ॥ ११ यह १५ दिसम्बर १८८३ के "ब्राह्मण" में प्रकाशित हुई थी। उस समय गोरक्षा विषयक पब चर्चा चल रही थी। आगरे में हिन्दू मुसलमानों के बीच झगडा भो' उसी दरमि यान में हुआ था । वेगारी पकडने के विषय में भी "ब्राह्मण" में कई लेख निकले थे। इन्हीं बातों को लक्ष्य फरके "बरह- मन" साहय ने यह गजल गाई थी। उर्दू में आप अपना तख ल्लुस “चरहमन" लिखते थे। इसी तरह की एक और कविता सुन लीजिए- विवादो पड़े हैं यहां कैसे कैसे 'फलाम आते हैं दरमिया फैसे फैसे॥१ जहा देखिए म्लेच्छ सेना के हाथों। 'मिटे नामियों के निशा कैसे कैसे ॥२ बने पद के गोरड भाषा द्विजाती। 'मुरीदाने पोरे मुगां कैसे केसे ॥३ । यसो मूर्खते देवि आर्यों के जी में।' 'तुम्हारे लिए हैं मका कैसे केले ॥४ असुद्योग आलस्य सन्तोप सेवा। 'हमारे भी हैं मिहरवा कैसे कैसे ॥५ T 1 * तपतुस्सरा-पाताल । ।
नाबाई ध्या 1 1 - •गो भक्षियों को। 'तड़पते रहे नीमजा फैसे कैसे ॥६ विधाता ने या मक्खियां मारने को। 'धनाये है खुशरू जवां कैसे फैसे' ७ शमी देखिए क्या दशा देश की हो। 'यदलता है रग प्रासमां कैसे कैसे ॥ निर्गन्ध इस भारती याटिका के । 'गुखो लाल श्री डारगवां कैसे कैसे ॥ हमें यह दुखद हाय भूला है जिसने । 'सघाना किये नाता कैसे फैसे' ॥ १० मताप अपनी (अप तो १) होटल में निर्लजता के। 'मझे लूटती है जां कैसे कैसे ॥११ गार-रस की कविता। कानपुर के कवियों ने जो "रसिकसमाख" नाम का कविसमाज स्थापित किया था, उसके प्रतापनारायण जी पडे उत्साही मेम्बर थे। जब तक वह उनके सामने चला उससे प्राय. समस्यापूर्ति ही का उद्योग रहा। रसिफवाटिका नाम की पुस्तक की एक जिल्द में इस समाज के काव्यकलाप के साथ प्रतापनारायण की जो कविता छपी है, उससे हम उनके कुछ छन्द चुनकर पाठकों की भेट करते हैं। प्रतापना' । * भर सन् १८६० में कानपुर में फविसमाज की स्थापना की गई, तर स्वर्गीय प्रतापनारायण जी की रुचि पर ध्यान रख कर ही उसका पाम "रसिकसमाज" और उसकी परिक्षा का माम "तिक याटिका" रक्ता पया। - 1 . रायण मी रक्षाररस के प्रेमी ये।ये उदाहरण भी उसी रस (पपिहा जब पूछिहैं पीय कहाँ) धन पैठी है मान की मूरति सी मुख मोलति चोल न मादिम हो। तुमही मनुहारि कै हारि परे । सखियान की कौन चलाई कहां । घरखा है प्रतापजू धीर धरो अघ सो मन को समुझायो जहां । यह ध्यारि तवं यदलैगी फडू पपिहा जव पूछिह पीव कहा ॥१॥ (धीर बली धुरवा घमका) घडि म न समुद्र में हाय ये नाहक हाय निछीछे दुखाय ।। का तजि खाजगराज किये मुख कारोलिये इतही उत,धार्थे । मारि धुखारिन पै बज मारे वृथा युंदियान के धान बलाई । योर है तो घल धीरहि आय के योर यली धुरपा धमकावै ॥२॥ (पजनी घुधुरू रजनी उजियारी) पासघ छाफि मुली इतिपै पुलि पेलति जोयन की मतवारी। गात ही गात अदा ही अदा फदै यात ही वाव सुथा सुखशारी। . प न - ( ३२ ) रंग रचै रस राग अलापि नचे परताप गरे भुज डारी । ताछिन छावै अजीर मजा वजनी बुधुरु रजनी उजियारी ॥३॥ (देह धरे को यहै फल भाई) नैनन में वसै सावरो रूप रहे मुग्न नाम सदा सुखदाई । त्या ध्रुति में ब्रज केलिकथा परिपूरण प्रेम प्रताप पडाई । कोऊ कछु कहै होय हूँ कछु पै जिय में परवाहि न लाई । नेह निभै नदनन्दन सो नर. देह धरे को यह फल भाई ॥४॥ (धुरवान की धावन सावन में) सिर चोटी गुधावती फूलन सों मेहदी रचि हाथन पावन में। परताप त्यो चूनरी सही सजी मन मोहती हावन भावन में। निस धोस चितायती पीतम के संग झूलन में श्री मुलावन में। उनहीं को सुहावन लागत है , धुरवान की धावन सावन में ॥५॥ शकन्तला। पण्डित, प्रतापनारायण ने शकुन्तला का जो अनुवाद हिन्दी में किया है वह अनुवाद नहीं कहा जा सकता, के खतन्त्र या खच्छन्द अनुवाद कहा जा सकता है। मूल -- - . ( ३३ ), वों को इन्होंने अनुवाद में यहुत कुछ घटा बढ़ा दिया है। धात फो इन्होंने भूमिका में स्वीकार किया है। ऐसा करने अगर कहीं की मृत कही मज़ा जाता रहा है तो कहीं कहीं चक भी हो गया है। हम यह नहीं कह सकते कि यह नुवाद सब फही अच्छा ही हुआ है, पर इसका अधिक अंश चक, रसपान और मनोहर है । इस अनुवाद का एक बना देकर हम 'प्रेमदास' 'प्रतापहरि' से विदा होंगे- चौथे अद्ध की यात है। करन प्रवास से वापस था गये । उनकी आशा से उनका शिष्य, यह देखने के लिए पुष्टी बाहर निकला है कि कितनी रात बाकी है। इधर उधर सने पर उसे मालूम हुना कि प्रात काल हो गया। तब वह हता त्येकतोऽन्तशिखर पतिरोपीनामाविष्कृतोऽरुणपुर सर एकतोऽर्फ । पोद्वयस्य युगपद्व्यसनोदयाभ्या लोरो नियाम्पत इवात्मदशातरेषु ॥१॥ गन्तहिते शशिनि सैर कुमुद्दती मे दृष्टि न न दयति सस्मरणीयशोमा । बष्टमवासननिता यवमाननम्य दुपानि पूनमतिमानसुदु सहानि ॥ २ ॥ भावार्थ। जिन मोपधियों का सेवन पडे बडे भयहर गों का-नहीं, मृन्यु तक का नाश कर सकता है उन्हीं का वामी, चन्द्रमा, एक तरफ, अस्त हो रहा है। दूसरी तरफ नसके जवायें। (राने) तक नहीं पेसे अनूरु सारथी को रथ के नागे ग्ठिला कर सूर्य उदित हो रहा है। इस प्रकार एक ही साथ, दो तेजखी फ्टिो फीसम्पदा और विपदाको दिखलाकर, नपनी अपनी अवस्था विशेप में, मनुष्यों का मानों नियमन केया जारहा है। अर्थात् सम्पत्ति और विपत्ति के समय किसी को भी हर्ष या विपाद करना उचित नहीं ॥१॥ जो फुमुदिनी अपनी प्रफुल्लित अवस्था में परम शोभामयी थी बही, चन्द्रमा के अस्त हो जाने पर, मेरी बातों को अच्छी नहीं लगती अब उसमें उसकी पहली शोभा नहीं रही। उस शोमा फाश स्मरणमात्र शेष है, वह दिखाई नहीं देती। सच है, अपने प्रिय तम के प्रवासी होने के कारण उत्पन्न हुआ दुस भवलाम को अत्यन्त दुःसह होता है।' प्रतापनारायण ने इसका अनुवाद नहीं किया । सिए इसकी छाया खेकर उन्होंने जो कविता लिखी है वह इस प्रकार है- प्रभावती। कैसी कमनीय है प्रभा प्रभातकाल की। दिनकर फरि त उजास, इत लहि ससि तेज नास, कै रहे दसाप्रकास मानो जग-साल की। कुमुदिनि सोभा-विहीन, विरहिनि इच दुखित दीन, लागसि नैनन मलीन, देखत दिसि ताल की। दरम की फुटीन त्यागि, उठहि मोर जागि जागि, वेदिन ढिग लागि लागि ऐडनि सुगमाल की।। दहि छिन लद धाधु सन्त, प्रेम-पूरि है इकन्त, सुमिरत महिमा मनन्त त्रिभुवन महिपाल फी ॥१॥ दोहा। तो हमह गुरु देव लों करें निवेदन ज्ञाय । नाथ होम बेला भई अरुन उदित दरसाय ॥२॥ यदरि चिरिछ के पात पै श्रोस-वुद छमि छाय। फैसो गति मुहावनी धरुन उदय दुति पाप ॥४॥ सवैया। साई निसापति जोगिरि मेरु पै पांव घरे विचर निसि माहीं। त्योतमठोमहिनासत जासुमरीचिकाषीरिधाम लौ नाही। - - तेज गवाय गिरे नम ते सोउ भोर, समै पधि के रयि पाहीं। या जग माहि बडे बडेन की दीसत हैं थिर सपति माही ॥५॥ प्रतापनारायण का गनुवाद इसी तरह का है। इसीसे उसकी योग्यता का अन्दाजा पाठक कर सकते हैं। पिछला सवैया अपूर्व है, याद रसने लायक है, शिक्षा प्रहण करने लायक है। लिम चुकने पर यह लेख हमने उन सजनों को दिखलाया at प्रतापनारायण से अच्छी तरह परिचित हैं, और जो उनके पास हमेशा बैठा उठा करते थे। उनकी राय से, जहां कहीं सशोधन की जरूरत समझी गई यहां हमने इसमें सशोधन कर दिया। इस पर भी यदि कोई यात भ्रम से ऐसी लिल गई हो जो ठीक न हो तो पाठक क्षमा करें। इस संशोधन कार्य में हमें अपने माननीय मित्रराय देवीप्रसाद, बी० ए०, घो० एल, से बहुत मदद मिली है। इसलिए हम उनके छत हैं । "सरखती से उद्धृत। - इस वेस को पुस्तक में सम्मिग्नि कर लेने की अनुमति प्रदान' परने के लिए हम इडियन पेस शमी के प्रत्यात प्राणीत हैं। मकारक।
। लेख-सूची। ' . ... m- . । ভৰি দ্বিমত आप धोखा बालक युवावस्था नारी दात भी 'दर . ... .. . . .. ... . परीक्षा सोना मिडिलकास स्वडी घोली का पद्य नागरी महिमा का एक चोज मरेका मारै शाहमदार हमारे उत्साहवर्द्धक वाजिदअलीशाह स्वतन्त्र इनकमटैक्स देशी कपडा काग्रेस की जय बालविवाह-विपयफ १-३५ पतिव्रता १ होली है ६ समय का फेर १६ १६ पंच परमेश्वर २०२ २० फिस पर्व में किसकी २३ बन पाती है २५ किस पर्व में किस पर ३० आफत आती है ३४ विलायत-यात्रा ११२ ३७ ऊच निवास नीच कर ४२ तृती ११६ ४६ गंगाजी ४८ गोरक्षा ५० धरती माता १२४ दबी हुई आग १३० ५२ बलि पर विश्वास १३५ ५३ भारत पर भगवान की ५६ अधिक ममता है ६३ उर्दूगोवी की पूजी १४२ ६५.-कलिकोप १४५ ७५ ककाराप्रक ७: पढ़ें पत्थर समझ पर ८१ आपकी समझे तो क्या समझे ८६ मुक्ति के भागी ११८ ૨૨૨ १३६ . . है - एकचोज
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निबन्ध-नवनीत।
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प्रथम परिच्छेद।
साहित्यिक अंश ।
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आप।
ले भला यतलाइए तो आप क्या हैं ? आप कहते होंगे,
घाह आप तो आपही हैं । यह कहा की मापदा आई ? यह
भी कोई पूछने का ढंग है पूछा होता कि आप कौन हैं तो
पतला देते कि हम आपके पत्र के पाठक हैं और आप प्राहारण
संपादक हैं, अथवा माप पडितजी है, आप राजाजी हैं, आप
सेठजी हैं, भाप लालाजी है, आप बाबू साहव है, भाप मिया
साहब, आप निरे साहब हैं। आप क्या है यह तो कोई प्रश्न
की रीति ही नहीं है। वाचकामहाशय यह हम भी जानते
है कि आप आप ही हैं, और हम भी यही है, तथा इन साइवों
'की भी लवी धोती, चमकीली पोशाक, खुटिहई अगरस्त्री,
(मीरजई) सीधी माग, विलायती चाल, लम्बी दादी और
साहवानी हवस ही कदे देती है कि-
।
।
"किस रोग की है आप दवा कुछ न पूछिए,"
अच्छा साहब, फिर हमने पूछा तो क्यों पछा? इसी
लिए कि देखें आप "श्राप को शान रसते हैं या नहींजिस
'आप' को आप अपने लिए तथा औरों के प्रति दिन रात मुंह
पर धरे रहते हैं, वह आप क्या है ? इसके उत्तर में भाप
कहिएगा कि एक सर्वनाम है । जैसे मैं, तू, हम,तुम, यह, वह
आदि हैं वैसे ही आप भी है, और क्या है। पर इतना कह देने
से न हमी सतुष्ट होंगे न आपही के शब्दशास्त्र ज्ञान का परि
चय होगा, इससे अच्छे प्रकार कहिए कि जैसे में का शब्द
अपनी नम्रता दिखलाने के लिए चिल्ली की बोलीका अनुकरण
है, 'तू' का शब्द मध्यम पुरुष की तुच्छता व प्रीति सूचित
करने के नार्थ कुत्ते के सम्योवनकी नकल है । हम तुम सस्कृत
के मह त्वं का अपम्रश है, यह वह निकट और दूर की वस्तु वा
व्यक्ति के द्योतनार्थ स्वाभाविक उधारण हैं, वैसे 'आप' क्या
है ? किस भाषा के फिम शब्द का शुद्ध पा अशुद्ध रूप है, और
भावर ही में बहुधा क्यों प्रयुक्त होता है ?
पी
मुलाजमत से अल्ल ने इस्तेधफा दे दिया हो
तो दूसरी बात है, नहीं तो आप यह कभी न कह सकेंगे कि
"आप लफो फारसी या अरबीस्त," अथवा "ओ टिज पना
इंगलिश बर्ड," जय यह नहीं है तो खाहमवाह यह हिन्दी
शब्द है, पर कुछ सिर पैर मुड गोड भी है कि याही श्राप
छूटते ही सोच सकते हैं कि सस्कृन में आप कहते है जल
को, और शास्त्रों में लिखा है कि विधाता ने सृष्टि के यादि में
उसी को बनाया था, यथा-'अपएच लसर्जादौ वासुचीयमया
सृजत,' तथा हिन्दी में पानी और फारसी में शाप का अर्थ
शोभा अधच प्रतिष्ठा आदि छुरा करता है, जैसे "पानी उतरि गो
तरघारिन को उइ करछुलि के मोल विकाय", तथा “पानी
उत्तरिंगा रजपूती का उह फिर विसुऔते (वेश्या से भी) पहि
जाय, और फारसी में 'आवरू खाक में मिला पैठे' इत्यादि।
इस प्रकार पानी की ज्येष्ठता और श्रेष्ठता का विचार करके
लोग पुरुषों कोभी उसी के नाम से आप पुकारने लगे होंगे। यह
आपका समझना निरर्थक तो न होगा, वडप्पन और श्रादर का
अर्थ अवश्य निकल भावेगा, पर पाँचखाच कर, और साथ ही
यह शझा भी कोई कर बैठे तो अयोग्य न होगी कि पानी के जल,
बारि, अम्बु, नीर, तोय इत्यादि और भी तो कई नाम है उनका
प्रयोग क्यों नहीं करते, "प्राप” ही के सुर्खाब का पर कहा लगा
है ? अथवा पानी की सृष्टि सबके आदि में होने के कारण
वृद्धही लोगों को उसके नाम से पुकारिए तो युक्तियुक हो
सकता है, पर आप तो अवस्था में छोटों को भी आप आप
कहा करते हैं, यह आपकी कौन सी विक्षता है ? या हम यों
भी पद सकते ई शिपानी में गुण चाहे जितने हों, पर गति
उसकी नीच ही होती है। तो क्या आप हमको मुह से आप
भाप करके सधोगामी बनाया चाहते है ? हमें निश्चय हे
फि धाप पानीदार होंगे तो इस बात के उठते ही पानी पानी
हो जायगे, और फिर कभी यध शन्द मुह पर भी न लायगे।
सहृदय सुहइगण आपस में आप आप की बोली योलते
भी नहीं है। एक मारे उर्दूदा मुलाकाती मौषिक मित्र गनने
की अभिलापा से आते जाते थे, पर जब ऊपरी भावदार
मित्रता का सा देगा तो हमने उनसे कहा कि यादरी लोगों
के सामने की यात न्यारी है, अकेले में प्रथया शायतवालों
के मागे आर आप न दिया परो, इसमें मिमता की
.
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भिनर्मिनाहट पाई जाती है। पर यह इस थात को में
माने, हमने दो चार घार समझाया, पर यह 'आप' थे क्यों
मानने लगे १ इम पर हमें झझलाहट छूटी तो एक दिन उनके
आते ही और 'आप' का शब्द मुह पर लाते ही हमने कह दिया
कि आपकी ऐसी तैसी? यह क्या यात हे कि तुम मित्र यन
फर हमारा कहना नहीं मानते ? प्यार के साथ तू कहने में
जितना स्वादु आता है उतना वनावट से आप सांप कहो तो
कभी सपने में नहीं श्राने का । इस उपदेश को यह मान गये।
सच तो यह है कि प्रेम-शास्त्र में, कोई यधन न होने पर भी, इस
शब्द का प्रयोग बहुत ही कम, बरच नहीं के बराबर होता है।
हिन्दी की कविता में हमने दो ही कवित्त इससे युक्त पाए
है, एक तो 'आपको न चाई ताके याप को न चाहिये', परयद
न तो किसी प्रतिष्ठित ग्रन्थ का है, और न इसका प्राशय स्नेह
सम्बद्ध है। किसी जले भुने कवि ने कह मारा हो तो यह
कोई नहीं कह सकता कि कविता में भी "आप" की पूछ है।
दुसरी घनानन्दजी को यह सवैया है-"आपही ती मन हेरि
हरयो तिरछे करि नैनन नेह के चाव में” इत्यादि । पर यह भी
निराशापूर्ण उपालम्भ है, इससे हमारा यह कथन कोई सडन
नहीं कर सकता कि प्रेम-समाज में "माप" का श्रादर नहीं है,
तू ही प्यारा है।
सस्कृत और फारसी के कवि भी त्व मौर त के भागे
भधान और शुमा (तू का बहुवचन ) का बहुत आदर नहीं
करते । पर इससे आपको क्या मतलब आप अपनी हिन्दी
के 'श्राप का पता लगाइये, और न लगै तो इम यतला देंगे।
सस्कृत में एक आप्त शब्द है, जो सर्वथा माननीय हो अर्थ में
ग्राना है, यहा तक कि न्यायशास्त्र में प्रमाण चतुष्टय (प्रत्यक्ष,
अनुमान, उपमान और शब्द) के अन्तर्गत शान्द प्रमाण को। लक्षण ही यह लिखा है कि 'आप्तोपदेश शब्द ' अर्थात् प्राप्त पुरुष का बचन प्रत्यक्षादि प्रमाणों के समान ही प्रामाणिक होता है, वा यो समझ लो कि प्राप्त जन प्रत्यक्ष, अनुमान ओर उपमान प्रमाण से सर्वथा प्रमाणित ही विषय को शब्द पर करते हैं। इससे जान पडता है कि जो सब प्रकार की विद्या, । बुद्धि, सत्यभाषणादि सद्गुणों से सयुक्त हो घद्द भाप्त है, और देवनागरी भाषा में प्राप्त शन्द सब के उच्चारण में सहजतया नहीं आ सकता, इससे उसे सरल करके आप पना लिया गया है, और मध्यम पुरुष तथा अन्य पुरुप के अत्यन्त भाटर का द्योतन करने में काम आता है।' 'तुम बहुत अच्छे मनुष्य हो' और 'यह बडे सजन है --पेमा कहने से सच्चे मित्र यनापट के शत्रु चाहे जैसे “पुलका प्रफुल्लित परित गाता" हो जायें, पर व्यवहार कुशल तोफाचारी पुरुष तभी अपना उचित सन्मान समझेंगे जर कहा जाय कि आप का क्या कहना है, "आप तो बस सभी बातों में एक ही है" इत्यादि।। अब तो आप समझ गये होंगे कि आप कहा के हैं, कौन हैं, कैसे हैं, यदि इतने घडे बात के पतगड से भी न समझे हो तो इस छोटे से कथन में हम क्या समझा सकेंगे कि 'श्राप सस्कृत के आप्त शब्द का हिन्दी रूपान्तर है, और माननीय अर्य की सूचनार्थ उन लोगों ( अथवा एक ही व्यक्ति ) के प्रति प्रयोग में लाया जाता है जो सामने विद्यमान हो चाहे याते करते हों, चाहे वात परनेवालों के द्वारा पूछे बताये जा रहे हो, अथवा दो घा अधिक जनों में जिनकी चर्चा हो रही हो। कमी कमी उत्तम पुरुप के द्वारा भी इसका प्रयोग होता है, वहां भी शब्द और अर्थ बही रहता है, पर विशेषता यह रहती है - .
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कि एक तो सब कोई अपने मन से आप को (अपने तई),
आप ही (आत ही) समझता है, और विचार कर देखिये तो
आत्मा और परमात्मा की अभिनता या तद्रूपता कहीं लेने
भी नहीं जाने पडती, पर चाहा व्यवहार में अपने को आप
कहने से यदि अहकार की गध समझिये तो यों समझ लीजिये
कि जो काम अपने हाथ से किया जाता है, जोर जो घात
अपनी समझ स्वीकार कर लेती है उसमें पूर्ण निश्चय अवश्य
ही हो जाता है, और उसी के विदित करने को हम और आप
तथा यह एव वे कहते हैं कि 'हम आप कर लेंगे" अर्थात्
कोई संदेह नहीं है कि हमसे यह कार्य सम्पादित हो जायगा,
'हम आप जानते हैं', अर्थात् दूसरे के बतलाने की आवश्य
कता नहीं है. इत्यादि।
महाराष्ट्रीय भाषा के पापाजी भी उन्नीस विस्वा आप्त
और आर्य के मिलने से इस रूप में हो गये हैं, तथा
कोई माने या न माने, पर हम मना सकने का साहस रखते
हैं कि अरची के अञ्च (पिता चोलने में अद्या) और यूरोपीय
भाषाओं के पापा (पिता) पोप (धर्म-पिता) आदि भी इसी
आप से निकले हैं। हा, इसके समझने समझाने में भी जी
को तो अग्रेजी के एयाट ( Abot महत) तो इसके हई हैं,
क्योंकि उस चोली में हस्व और दीर्घ दोनो श्रकार का स्थानापन्न
A है, ओर "पफार" को "चकारण से बदल लेना कई भाषाओं
की चाल है। रही टी (T) सो वह तो "तकार" हई है। फिर
क्या न मान लीजियेगा कि पवाट साहब हमारे 'पाप' घरच
शुद्ध आप्त से बने हैं।
हमारे प्रान्त में बहुत से उच्च वश के बालक भी
अपने पिता को अप्पा कहते हैं, उसे कोई २ लोग समझते
.
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हैं।कि मुसलमानों के,सहवास फा फल है, पर यह उनकी
समझ ठीक नहीं है, मुसलमान साइयों के लड़के कहते हैं
शमा, और हिन्दू सन्तान के पक्ष में 'बकार' का उच्चारण
तनिक भी काठिन नही होता, यह अंगरेजों की तकार और
फारस वालों की ,टकार नहीं है कि मुहीं से न निकले, और
सदा मोती का मोटी अर्थात् स्थूलागा श्री मोर खप्त की ही
का तत्तो अर्धात् गरम ही हो जाय। फिर अब्धा को अप्पा
प्रादना किस नियम से होगा! हा, आत से आप और अप्पा
तथा आपा की सृष्टि हुई है, उसी को नरव वालों ने अम्मा में
रूपातरित कर लिया होगा, क्योंकि उनकी घर्णमाला में
"पकार (पे) नहीं होती। सौ विस्था थप्पा, बाप, धापू,
यच्या, यावा, यावू आदि भी इसी से निकले हैं, क्योंकि जैसे
एशिया सी कई योलियों में 'पकार' को 'वकाए घ 'फफाए
से वरल लेते हैं, जैसे पादशाह-बादशाह और पारसी-
फारसी आदि, वैसे ही कई भाषाओं में शब्द के मादि में
'षकार' भी मिला देते हैं, जैसे बके शव-धवके शव तथा
तगाम-पतगामद इत्यादि, और शब्द के आदि की
हस्व अकार का लोप भी हो जाता है जैसे अमावस का
मावस, (सतसई आदि प्रथों में देखो) इस अकारात शब्दों
में कार के बदले इस घा दीर्घ उकार भी हो जाती है, जैसे
एक--एकु, स्वाद्- स्वादु आदि । अथच इस्व को दीर्थ,
दीर्घ को हस्व भर, उ, आदि की वृद्धि चा लोप भी हुषा
ही करता है, फिर हम क्यों न कहें कि जिन शब्दों में प्रकार
और पकार का सपर्क हो, एघ अर्थ से श्रेष्ठता को ध्वनि
निकलती हो यह माय समस्त ससार के शब्द हमारे प्राप्त
महाशय चा मापदी के उलट फेर से बने हैं।
अब तो पाप समझ गये न, कि माप स्सा है? अब भी
म समझो तो हम नहीं कह सकते कि आप समझदारी के
कौल है ! हां, आप ही को उचित होगा कि दमडी छदाम
की समम फिसी पसारी के यहा से मोल ले आइए, फिर
पापही समझने लगियेगा कि आप "को हैं? कहां के हैं।
कौल के हैं ? यदि यह भी न हो सके, भौर लेख पढ के बापे
से बाहर हो जाइये तो हमारा क्या अपराध है ? हम केवल
जो में कह लेंगे "शाव! आप न समझो तो आपां को के पडी
"अब भी नहीं समझे ? वाह रे आप!
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धोखा।
M
इन दो अक्षरों में भी न जाने कितनी शक्ति है कि इनकी
सपेट से वचना यदि निरा असम्भव न हो तो भी महा कठिन
तो अवश्य है । जब कि भगवान रामचन्द्र ने मारीच राक्षस
को सुवर्ण मृग समझ लिया था तो हमारी आपको क्या
सामर्थ्य है जो धोखा न स्नाय ? बरच ऐसी ऐसी कथाओं से
विदित होता है कि स्वय ईश्वर भी केवल निराकार निर्विकार
ही रहने की दशा में इससे पृथक रहता है, सो भी एक रीति
से नहीं ही रहता, क्योंकि उसके मुख्य कामों में से एक काम
सृष्टि का उत्पादन करना है, उसके लिए उसे अपनी माया का
आश्रय लेना पडता है, और माया, भ्रम, छल इत्यादि धोखे
ही के पर्याय है, इस रीति से यदि हम कहें कि ईश्वर भी
धोखे से अलग नहीं है तो अयुक्त न होगा, क्योंकि ऐसी दशा
में यदि वह धोखा खाता नहीं तो धोखे से काम अवश्य लेता
है, जिसे दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि माया का प्रपच
फेलाता है व धोखे की टट्टी खडी करता है।
अतः सब से प्रथा, रहनेवाला ईश्वर भी ऐसा नहीं है,
जिसके विषय में यह कहने का स्थान हो कि वह धोसे से
अलग है, बरच धोखे से पूर्ण उसे कह सकते हैं, क्योंकि वेदों
में उसे आश्चर्यास्य वक्ता "चित्रन्देवानमुदगातनीक"
इत्यादि कहा है, और आश्चर्य तथा चिमत्व को मोटी भाषा
में धोखा ही कहते है, अथवा अवतार धारण की दशा में
उसका नाम माया यपुधारी होता है, जिसका अर्थ है-धोखे
का पुतला, और सच भी यही है, जो सर्वथा निराकार होने
पर भी मत्स्य, कच्छपादि रूपों में प्रकट होता है, और शुद्ध
.
। १ . (०) निर्विकार कहलाने पर भी नाना प्रकार की लीला किया करता है वह धोखे का पुतला नहीं है तो क्या है ? हम आदर मारे उसे भ्रम से रहित कहते हैं, पर जिसके विषय में कोई निश्चयपूर्वक 'इदमित्था फही नहीं सकता, जिसका सारा भेद स्पष्ट रूप से कोई जान ही नहीं सकता वह निर्भम या भ्रमरहित फ्योंकर याहा जा सकता है। शुद्ध निर्धम वह कह लाता है, जिसके विषय में भ्रम का आरोप भी न हो सके, पर उसके तो अस्तित्व तक में नास्तिकों को संदेह और आस्तिको को निश्चित ज्ञान का प्रभाव रहता है, फिर वह निर्धम कैसा? और जब वही भ्रम से पूर्ण है तब उसके चमाये। ससार में भ्रम अर्थात् धोखे का अभाव कहा वेदान्ती लोग जगत् को मिथ्या भ्रम समझते हैं। यहा तक कि पफ महात्मा ने किसी जिज्ञासु को भलीभाति समझा दिया था कि विश्व में जो कुछ है, और जो कुछ होता है, सय भ्रम है। किन्तु यह समझाने के कुछ ही दिन उपरान्त उनके किसी प्रिय व्यक्ति का प्राणांत हो गया जिसके शोक में वह फूट २ कर रोने लगे। इसपर शिष्य ने आश्चर्य में पाकर पूछा कि आप तो सब बातों को भ्रमात्मक मानते हैं, फिर जान यूम कर रोते क्यों हैं ? इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि रोना भी भ्रम ही है। सच हे! भ्रमोत्पादक भ्रम स्वरूप भग- वान के बनाये हुए भव (ससार) में जो कुछ है भ्रम ही है। जवतक भ्रम है तभी तक ससार है, घरच ससार का स्वामी भी तभी तक, है, फिर कुछ भी नहीं ! और कौन जाने हो तो हमें उसने कोई काम नहीं। परमेश्वर सबका भरम पनाये रक्ये, इसी में सय कुछ है। जहा भरम खुल गया, वही लाख की भलमसी स्वाक में मिल जाती है। जो .
लोग पूरे ब्रहमानी वनकर लसार फो सचमुच माया की कल्पना मान बैठते हैं वे अपनी भ्रमात्मफ युधि से चाहे अपने तुच्छ जीवन को माक्षात् सर्वेश्वर मान के सर्वथा सुग्वी हो जाने का धोखा पाया पर, पर संसार के किसी काम के नहीं रह जाते हैं, परच निरे अक्र्ता, अगोका बनने की उमग में अकर्मण्य और "नारिनारि सब एक है जम मेहरितस माय," इत्यादि मिद्धान्तों के मारे अपना तथा इसरों का जो अनिष्ट न कर प्रै वही थोडा है, क्योंकि लोक और परलोक का मज़ा भी धोने ही में पड़े रहने से प्राप्त होता है। बहुत छान छाटना सत्यानाशी की जड़ है। शान की दृष्टि से देखें तो आपका शरीर मतामूत्र, मास, मजादि घृणास्पद पदार्थों का विकारमात्र है, पर हम उसे प्रीति का पात्र समझते हैं, और दर्शन स्पर्शनादि से आनन्द लाभ करते हैं।। हमको वास्तव में इतनी जानकारी भी नहीं है कि हमारे शिर में क्तिने याल हे घा एक मिट्टी के गोले का सिरा कहा पर है, किंतु पाप हमें बड़ा भारी विक्ष और सुलेखक समझते है, तथा हमारी लेखनी या जिह्वा की कारीगरी देस २ कर सुम्प प्राप्त करते हैं ! विचार कर देखिये तो धन-जा इत्यादि पर किसी का कोई स्वत्य नहीं है, इस क्षण हमारे काम आ रहे हैं, क्षण ही भर के उपरात न जाने किस के हाथ में चा किस दशा में पड के हमारे पक्ष में कैसे हो जाय, और मान भी लें कि इनका वियोग कमी न होगा तो भी हमें क्या ? आग्निर एक दिन मरना है, और 'मूदि गई आयें तव ला फेहि काम की। पर यदि हम ऐसा समझकर सब से सम्बन्ध तोड दें तो सारी पूंजी गवार निरे मूर्ख, कहलायें, स्नो पुत्रादि का प्रबंधन करके उनका जीवन नष्ट करने का पाप मुडिया! (
( १२ )
'ना हम फाह के कोऊ ना हमारा' का उदाहरण बन के
सब प्रकार के सुख-सुविधा, सुयश से वचित रह जावें!
इतना ही नहीं, वरंच और मो सोच कर देखिए तो किसी को
कुछ भी खबर नहीं है कि मरने के पीछे जीव की क्या दशा
होगी?
बहुतेरों का सिद्धान्त यह भी है कि दशा किसकी होगी,
जीव तो कोई पदार्थ ही नहीं है। घडी के जब तक सब
पुरजे दुरुस्त हैं, और ठीक ठीक लगे हुए हैं तभीतक उसमें खट
खट, टन टन आवाज पा रही है, जहा उसके पुरजों का लगाष
विगडा वहीं न उसकी गति है, न शब्द है। ऐसे ही शरीर
का फ्रम जब तक ठीक २ बना हुवा है, मुस से शब्द और मन
से भाव तथा इद्रियों से फर्म का प्राकट्य होता रहता है, जहा
इसके क्रम में व्यतिक्रम वहीं सब खेल बिगड गया, बंस
फिर कुछ नहीं, कैसा जीव ? कैसी आत्मा ? एक रीति से यह
कहना झूठ भी नहीं जान पडता, क्योंकि जिसके अस्तित्व का
कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है उसके विषय में अंततोगत्वा
योही कहा जा सकता है । इसी प्रकार स्वर्ग नर्कादि के सुस
दुःखादि का होना भी नास्तिको ही के मत से नहीं, किन्तु बडे
पडे आस्तिकों के सिद्धान्त से भी 'अविदित सुख दु.ख
निर्विशेष स्वरूप के अतिरिक्त कुछ समझ में नहीं आता।
स्कूल में हमने भी सारा भूगोल और खगोल पढ डाला
है, पर नर्क और वैकुठ का पता कही नहीं पाया। किन्तु भय
और लालच को छोड़ दें तो पुरे कामों से घृणा और सत्कर्मों
से रुचि न रख कर भी तो अपना अथच पराया अनिष्ट ही
करेंगे। ऐसी २ बातें सोचने से गोवामी तुलसीदासजी का
'गो गोचर जहँ लगि मन जाई, सो सब माया जानेहु भाई'
. ( १३ ) और श्री सूरदास जी का 'माया मोहनी मनहरन' कहना प्रत्य. क्षतया सञ्चा जान पडता है। फिर हम नहीं जानते कि धोखे को लोग क्यों बुरा समझते हैं ? धोखा खानेवासा मूर्स और धोखा देनेवाला ग क्यों कहलाता है'१ जय सब कुछ धोया ही धोखा है, और धोखे से अलग रहना ईश्वर की भी सामर्थ्य से दूर है, तथा धोखे ही के कारण ससार का चर्या पिन्न २ चला जाता है, नहीं तो ढिश्चर २ होने लगे, वरच रही न जाय तो फिर इस शब्द का स्मरण वा श्रवण करते ही आपकी नाक-मौह क्यों सुकुड जाती हैं ? इसके उचर में हम तो यही कहेंगे कि साधारणत जो धोखा खाता है यह अपना कुछ न कुछ गवा बैठता है, ओर जो धोखा देता है उसकी एक न एक दिन कलई खुले यिना नहीं रहती है, और हानि सहना वा प्रतिष्ठा खोना दोनों बातें बुरी हैं, जो बहुधा इसके सम्बन्ध में हो ही जाया करती हैं। इसीसे साधारण श्रेणी के लोग धोखे को अच्छा नहीं सम- झते, यद्यपि उससे बच नहीं सकते, क्योंकि जैसे काजल की फोठरी में रहनेवाला बेदाग नहीं रह सकता वैसे ही भ्रमात्मक भवसागर में रहनेवाले अल्प सामर्थी जीव का भ्रम से सर्वथा बचा रहना असम्भव है, और जो जिससे बच नहीं सकता उसका उसकी निंदा करना नीति विरुद्ध है। पर क्या कीजिये, कची खोपडी के मनुष्य को प्राचीन प्राशगण अल्पज्ञ कह गये है, जिसका लक्षण ही है कि आगा पीछा सोचे विना जो मुह पर पाये कह डालना और जो जी में समावे कर उठना, नही तो कोई काम वा घस्तु धास्तर में भली अथवा बुरी नहीं होती, केवल उसके व्यवहार का नियम बनने बिगडने से बनाय बिगाड दी जाया करता है। .
परम्हि हो जायगा। फिर यदि हम कहें कि चालकों का नाम,
रुप, गुण, स्वभाव सभी भानन्दमय है तो क्या झूठ है । दुन्य
का तो इनके पास एक दिन भी गुज़र नहीं। कोई
इलौना टूट गया, अथवा खाने को न मिला तो घडीमर रो
लिए, जहा दूसरी ठोर चित्त चल दिया, फिर मगन के
मगन । बुद्धिमानों का सिद्धान्त है कि दुल्न पाप का फल है,,
उस पाप का वे नाम भी नहीं जानते। फिर इनसे और तुम,
से क्या मतलव।
कभी २ यह किसी मनुष्य वा बिल्ली अधवा 'कुत्ता के पिल्ले
को बुरी आदि भी मार दें, कभी कोई बहुमूल्य वस्तु भी नष्ट
कर दें तो भी यह निर्दोष ही हैं, कभी किसी पर मलमूत्र कर,
तो भी निरपराध ही हैं। क्योंकि इन्हों ने तो,ऐसा काम क्रीडा
मात्र केलिए किया है। इन्हीं कारणों से सर्कार भी इन्हें दर
योग्य नहीं ठहराती। बहुधा दुष्ट पुरुष वा नियां गहने के नोम
अथवा अपने व्यभिचार की यदनामी के डर से इन दयापात्रो
“पर राक्षसत्व दिखलाते हैं । उनको हमारी न्यायशीला गर्न
मेन्ट दड भी ऐसा ही कठिन देती है जो दूसरे चोरों और
बारों को नहीं मिलता। हमारी समझ में यदि ऐसे माता
पितामों को कुछ दंड दिया जाय जो अज्ञान वालको को
पहिराय ओढाय के विना तकवैया छोड़ देते हैं। इसी प्रकार
ऐसे लोगों की भी सजा ठहरा दी जाय जो कामवती बाल
विधयानों के पुनर्विवाह में बाधक होते हैं तो सोने में सुगध हो
जाय । व्यभिचार, चोरी और और ऐसा ही कुकर्म तो श्री
पुरुष करें, प्राण जाय विचारे दूध के फोहों का ऐसे 'पापियो,
को तो कुचों से नुचवाना भी अयुक्त नहीं है। फासी आदि
वो सर्कार की कोमलचिचता है।
*
.
.
. (१६) हमारे जगन्मान्य महर्पियों ने भी बाल-हत्यारों को भात. यो कहा है, और 'नाततायि वधे दोष यह माझा दी है श्वर ने भी हमको भविष्यत् का शान कदाचित् इसी लिए ही दिया कि यदि हम जान लेंगे कि यह लडका बडा होने र अयोग्य होगा तो उसका सभार एव प्यार न करेंगे ।। इमारी इन सब बातों का तात्पर्य यह है कि ऐसे निष्पाप, प्रेम- ग्य दयापात्रो की भलाई पर ध्यान न देना देशहितैपिता के विरुद्ध है, परच मनुष्यता से भी दूर है। अतः सामर्थ्यभर लसको तन-मन धन से इस नई पौध को उत्तम पथगामी, योगशील, स्वत्वाभिमानी बनाने का और आर्यजाति के मनाय वालको को आर्य-धर्म-द्वेषि पादरियों की रोटी खाके जन्मभर के पछिताने से बचाने का पूर्ण प्रयत्न करते रहना चाहिए। हमारे कानपुर में तो जैसे हिन्दुओं की गौशाला में लाखों गौए पलती है वैसे ही मुसलमानों की अनाथशाला में करोडों' मातृ पितृहीन मालको की रोटी चलती हैं। यदि कोई अन्य नगरवासी पुरुष रन कुछ उद्योग करें तो भी हम यह समझ के कृतकृत्य होंगे कि घरवालों ने न सुना तो पड़ोसियों ही ने इमारी बात पर ध्यान दिया। अरे भाई शीघ्रता में कुछ अधिक न हो सके तो अन्य स्थानों की गोरक्षिणी समाओं अथवा मनायाकायों ही को कुछ सहायता दो। -
( २० )
।
युवावस्था।
जैसे धरती के भागों में वाटिका सुहावनी होती है, ठीक
घेसे ही मनुष्य की अवस्थाओं में यह समय होता है। यदि
परमेश्वर को कृपा से धन-बल और विद्या में श्रुटि न हुई तो तो
स्वर्ग ही है, और जो किसी यात की कसर भी हुई तो मावश्य
कता की प्रायल्यता यथासाध्य सब उत्पन्न कर लेती है। कर्त
व्याकर्तव्य का कुछ भी विचार न रख के आवश्यकता-देवी जैस
तैसे थोडा बहुत सभी कुछ प्रस्तुत कर देती हैं । यावत् पदार्थों
फा शान, रुचि और स्वादु इसी में मिलता है। हम अपने जीवन
को स्वार्थी, परोपकारी, भला, बुरा, तुच्छ, महान् जैसा चाहे
वैसा इसी में बना सकते हैं । लडकाई में मानो इसी अवसर
के लिए हम तय्यार होते थे, बुढापे में इसी काल को बचत से
जीवन यात्रा होगी। इसी समय के काम हमारे मरने के पीछे
नेकनामी और यदनामी का कारण होंगे।
पूर्व पुरुषों के पदानुसार बाल्यावस्था में भी यद्यपि हम
पडितजी, लालाजी, मुन्शीजी, ठाकुर साहर इत्यादि कहाते
हैं, पर वह ख्याति हमें फुसलाने मात्र को है । बुढापे में भी
वुढऊ बाबा के सिवा हमारे सब नाम साप निकल जान
पर लकीर पीटना है । हम जो कुछ हैं, हमारी जो निजता है,
हमारी निज की जो करतूम है, वह इसी समय है।
हमें आवश्यक है कि इस काल की कद्र करने में कभी न
चूके। यदि हम निरे आलसी रहे तो हम युवा नहीं जुबां हैं,
अर्थात् एक ऐसे तुच्छ जन्तु हैं कि जहा होंगे वहा केवल
मुत्यु के हाथ से जीवन समाप्त करने भर को और यदि
निरे प्रह-धधों में लगे रहे तो भी यैल की भाति जुबा
3
.
आता
- M . 'युवा फाल) ढोया । अपने लिए श्रम ही श्रम है, स्त्री पुनरादि स पांच हमारे किसान चाहे भले ही कुछ सुपानुभव करले। यदि, ईश्वर बचाए, हम इद्विवाराम हो गये तो भी,यद्यपि छ माण के लिए, हम अपने को सुखी समझेंगे, कुछ लोग उपने मतलर को हमारी प्रशम्मा और प्रीति भी करेंगे, पर गोडे ही दिन में उस सुख का लेश भी न रहेगा, उलटा पश्चा- ताप गले पडेगा, परंच तृष्णा-पिशाची अपनी निराशा नामक सहोदरा के साथ हमारे जीवन को दुखमय कर देगी। काम, कोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य यह पड्वर्ग यद्यपि और अप स्याओं में भी रहते ही हैं, पर इन दिनों पूर्ण चल को प्राप्त हो के मात्म-मन्दिर में परस्पर ही युद्ध मचाए रहते है, बरच कमी२ कोई एक ऐसा प्ररल हो उठता है कि अन्य पाच को दना देता है, और मनुष्य को तो पाच में से जो बढता हे वही पागल पना देता है। इसी से कोई २ धुद्धिमान कह गए हैं कि इनको बिरकुल दबाए रहना चाहिए, पर हमारी समझ में यह असम्भव न हो तो महा कठिन, परच हानिजनक तो है ही। काम शरीर का राजा है, यह सभी मानते हैं, और मोधादि पाचो उसके भाई चा सेनापति हैं । यदि यह न होने के बराबर हों तो मानो हृदय, नगर, अथवा जीवन, देश ही कुछ न रहा ! किसी राजवर्ग के सर्वथा घशीभूत होके रहना गुलाम का काम हे घेसे ही राज पारिपद का नाश कर देने की चेष्टा करना मी मूर्य, अदूरदर्शी अथवा श्रात तायी का काम है। सद्या बुद्धिमान, वास्तविक पीर था पुकारत हम उसको कहेंगे जो इन छहों को पूरे बल में रबफे उनसे अपने अनुकूल काम ले। यदि किसी ने बल- नाशक औषधि आदि के सेवन से पुरुषार्थ का और "नमसत्य (२०) - J युवावस्था। " . जैसे धरती के भागों में वाटिका सुहावनी होती है, ठीक धेसे ही मनुष्य की अवस्थानों में यह समय होता है। यदि परमेश्वर की कृपा से धन-बल और विद्या में श्रुटि न हुई तो तो स्वर्ग ही है, और जो किसी बात की कसर भी हुई तो भावश्य फता की प्रायल्यता यथासाध्य सव उत्पन्न कर लेती है। कर्त व्याकर्तव्य का कुछ भी विचार न रखके आवश्यकता देवी जैसे तैसे थोडा बहुत सभी कुछ प्रस्तुत कर देती हैं। यावत् पदार्थों का शान, रुचि और स्वादु इसी में मिलता है। हम अपने जीवन को स्वार्थी, परोपकारी, भला, बुरा, तुच्छ, महान् जैसा चाहे वैसा इसी में बना सकते हैं । लडकाई में मानो इसी अवसर के तिए धम तय्यार होते थे, बुढापे में इसी काल की बचत से जीवन यात्रा होगी। इसी समय दो काम हमारे मरने के पीछे नेकनामी और यदनामी का कारण होंगे। पूर्व पुष्पों के पदानुसार बाल्यावस्था में भी यद्यपि हम पहितजी, लालाजी, मुन्शीजी, ठाकुर साहन इत्यादि कहाते हैं, पर वह ख्याति हमें फुसलाने मात्र को है। बुढापे में भी बुढऊ बाबा के सिवा हमारे लय नाम मांप निकल जाने पर साकीर पीटना है । हम जो कुछ हैं, हमारी जो निजता है, हमारी निज की जो करतूत है, यह इसी समय है। मत. हमें भावश्यक है कि इस काल की कद्र करने में कभी न चूके। यदि हम निरे आलसी रहे तो हम युवा नहीं जुबां है, अर्थात् एक ऐसे तुच्छ जन्तु हैं कि जहां होंगे वहां केवल मुत्यु के हाथ से जीवन समाप्त करने भर फो! और यदि निरे प्रह-धधों में लगे रहे तो भी यैल की भाति जुवा , - . युरा-काता) ढोया। अपने लिए श्रम ही श्रम है, स्नी पुनादि इस पाच हमारे किसान चाहे भले ही कुछ सुखानुभव करलें। । यदि, ईश्वर यचाए, हम इद्रियाराम हो गये तो भो,यद्यपि कुछ काम के लिए, हम अपने को सुग्वो समझेंगे, कुछ लोग अपने मतलव को हमारी प्रशमा और प्रीति भी करेंगे, पर घोडे ही दिन में उस सुख का लेश भी न रहेगा, उलटा पश्चा- ताप गले पडेगा, बरंच तृष्णा-पिशाची अपनी निराशा नामक सहोदरा के साथ हमारे जीवन को दु खमय कर देगी। काम, शोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य यह पड्वर्ग यद्यपि और अष स्याओं में भी रहते ही हैं, पर इन दिनों पूर्ण बल को प्राप्त हो के -यात्म मन्दिर में परस्पर ही युद्ध मचाए रहते हैं, वरच कभीर कोई एक ऐसा प्रपल हो उठता है कि अन्य पाच को दबा देता है, और मनुष्य को तो पाच में से जो बढ़ता है वही पागल यना देता है। इसी से कोई २ बुद्धिमान कह गए हैं कि इनको बिल्कुल दयाप रहना चाहिए, पर हमारी समझ में यह असम्भव न हो तो महा कठिन, वरच हानिजनक तो है ही। काम शरीर का राजा है, यह सभी मानते हैं, और मोधादि पाचो उसके भाई चा सेनापति हैं। यदि यह न होने के बराबर हों तो मानो हृदय, नगर, अथवा जीवन, देश ही कुछ न रहा । किसी राजर्ग के सर्वथा घशीभूत होके रहना गुलाम का काम है वैसे ही राज पारिपद का नाश फर देने की चेष्टा करना भी मूग, अदूरदर्शी अथवा श्रात तायी का काम है । सशा' बुद्धिमान, पास्तविक पीर वा पुरुषरता हम उसको कहेंगे जो इन छदों को पूरै बल में रखके इनसे अपने अनुकूल काम ले। यदि किसी ने पल- नाशक थोपधि भादि के सेवन से पुरुषार्थ का और "ग्रामसत्य
(२४ )
कारिणी मान लो, चाहे मुसलमानों और किस्तानी के मता
नुसार सदा के लिए आत्मा को फूकनेवाली ठहरा लो।
हेर फेरके मिद्धात यही निकलेगा कि यह न हो तो हमारा
निर्वाह न हो, या यों कहो किन हो तो भल्लामिया की कुदरत
को वर्तमान कानून वदलनी पडे । हों, और नियमबद्ध न हो
तो हमारी जीवन यात्रा नर्कमय हो जाय, इसलिए यही उचित
है कि जैसे घने वैसे हिकमत के साथ इनसे वर्ताव रखें।
न का अर्थ है नहीं और अरि कहते हैं शत्रु को,भावार्थ यह
हुआ कि न यह शत्रु हे न इनसे अधिक कोई शत्रु है। जहा तक
हो, इन्हें खतत्रता न सौंपो । अच्छे वैद्यों के द्वारा, पथ्यापथ्य
विचार-द्वारा, म्यूनिसिप्यलिटी द्वारा, सदुपदेश द्वारा नारी
मात्र को अनुकूल रखना ही श्रेयस्कर है। तनिक भी व्यतिक्रम
पाओ तो वैद्यराज से कहो, महाराज नारी देखिए, मुहल्ले
के मेहतर से कहो कि चिलम पीने को यह पैसालो, और नारी
अभी साफ़ करो, घर की लक्षी से कहो नारी! ऐसा
उचित नहीं । कोई अफीम खा गया हो तो उसके सबंधी ले
कहो कि नारी का साग पिलाना चाहिए । इसी प्रकार सदैव
मारी का विचार और भगवान् मदनारी (फामदेव' के नाशक
शिव) को ध्यान रक्सा फरो, नहीं महामनारी हो जाओगे।
.
-
( २५ )
दांत ।
इस दो असर के शब्द तथा इन थोडी सी छोटी २
हियों में भी उम चतुर कारीगर ने यह फोशल दिललाया
::कि किस के मुह में दांत हैं जो पूरा २ वर्णन कर सके।
गुस्स की सारी शोमा और यावत् भोज्य पदार्थों का स्वादु
नहीं पर निर्भर है। कवियों ने अलक, (जुल्फ़) भू (भौं)
था यरुणी आदि की छवि लिखने में बहुत २ रीति से पाल
की खाल निकाली है, पर सच पूछिए तो इन्हीं की शोभा से
अव की शोभा है। जब दांतों के यिना पुपला सा मुद निकल
प्राता है, और चिबुक (ठोढी ) एव नासिका एक में मिल
जाती हैं उस समय सारी सुघराई मट्टी में मिल जाती है।
म-वाण की तीक्षणता, भ्रूचाप की खिंचावट और अलक
रोगी का विप कुछ भी नहीं रहता।
कवियों ने इसकी उपमा हीरा, मोती, माणिफ से दी है,
ग्द यहुत ठीक है, यरच यह अवयव कथित वस्तुओं से भी
अधिक मोल के हैं। यह यह अंग है जिसमें पाकशास्त्र के छहों
स एव काव्यशास्त्र के नवों रस का आधार है। खाने का
राजा इन्हीं से है । इस यात का अनुभव यदि आपको न हो तो
केसी बुड्ढे से पूछ देखिए, सिवाय सतुश्रा चाटने के और
रोटी को दूध में तथा दाल में भिगोके गले के नीचे उतार
देने के दुनियाभर की चीजों के लिए तरस ही के रह जाता
होगा। रहे कविता के नौ रस, सो उनका दिग्दर्शनमात्र हमसे
सुन लीजिए
श्रङ्गार का तो कहना ही क्या है। ऐसा फवि शायद कोई
ही हो जिसने सुन्दरियों की इन्तावली तथा उनके गोरे
-
-
( २८ )
कारण-विशेप से मुंह के बाहर रह जाते हैं, और सारी शोमा
खोके भेडिए कैसे दांत दिखाई देते हैं। क्यों नहीं, गाल और
होठ दातों का परदा है, जिसके परदा नरहा, अर्थात् खजातित्व
की गैरतदारी न रही, उसकी निरलज जिंदगी व्यर्थ है। कभी
आपको दाढ की पीडा हुई होगी तो अवश्य यह जी चाही
होगा कि इसे उखडवा डाले तो अच्छा है। ऐसे ही हम उन.
स्वार्थ के अधों के हक में मानते हैं जोरहें हमारे साथ, बने हमारे
ही देश भाई, पर सदा हमारे देश जाति के अहित ही में तत्पर
रहते हैं। परमेश्वर उन्हें या तो सुमति दे या सत्यानाथ
करे। उनके होने का हमें कौन सुख ? हम तो उनकी जैजेकार
मनावेंगे जो अपने देशवासियों से दातकाटी रोटी का
पाय (सथी गहरी प्रीति) रखते हैं ।परमात्मा करे कि हर हिन्दू
मुसलमान का देशाहित के लिए चाव के साथ दातों पसीना
माता रहे । हमसे बहुत कुछ नही हो सकतातो यही सिद्धान्त
कर रक्खा है कि-
'कायर कपूत कहाय, दांत दिखाय भारत तम हरी',
कोई हमारे लेख देश दांतों तले उगली वाफे सूझबूझ
की तारीफ करे, अथवा दांत चाय के रह जाय, या भरसिकता
घश यह कह दे कि कहा की दांताकिलकिल लगाई है तो
इन पातों की इमें परवा नहीं है। हमारा दात जिस ओर लगा
है, वह लगा रहेगा, औरों की दतकटाकट से हमको पया?
यदि दातों के सम्बन्ध का वर्णन किया चाहें तो बडे बडे
अन्य रग डालें, और पूरा न पडे । श्रादि देव श्री एकदत गणेश
जी को प्रणाम करके श्री पुष्पदताचार्य ने महिम्न में जिनकी स्तुति
की है, उन शिवजी की महिमा, दतवक्न शिशुपालादि के
संहारक श्रीकृष्ण की लीलाही गा चले तो फोरि जन्म पारन
-
-
।
( २६ )
पावें । नाली में गिरी हुई कौडी को दांत से उठानेवाले मपनी-
चूसों की हिजो किया चाहें तो भी लिखते २ थफ जाय । हाथी
दांत से क्या २ वस्तु पन सकती हैं फलों के पहियों में
कितने दात होते हैं ? और क्या २ फाम देते हैं ? गणित में
कौडी २ के एक २ दात तक का हिसाय कैसे लग जाता है ?
वैद्यक मोर धर्मशास्त्र में दतधावन की क्या विधि है, क्या
फसा है, क्या निषेध है, क्या हानि है ? पद्धतिकारी ने 'दीर्घ
दताकचिन्मूर्खा' आदि पयों लिखा ? किस २ जानवर के दात
किस २ प्रयोजन से किस २ रूप, गुण से विशिष्ट बनाए
गए हैं ? मनुप्यों के दांत उजले, पीले, नीले, छोटे, मोटे,
लम्बे, चौडे, घने, खुडहे के रीति के होते हैं १ इत्यादि, अनेक
पाते हैं, जिनका विचार करने में बडा विस्तार चाहिए । बरच
यह भी कहना ठीक है कि यह पडी २ विधाओं के घडे २
विषय लोहे के चने हैं, दर किसी के दातो झूटने के नहीं।
तिसपर भी अकेला श्रादमी पया २ लिखे?
अत हम इस दंतकथा को केवल इतने उपदेश पर समाप्त
फरते हैं कि आज हमारे देश के दिन गिरे हुए है, अत हमें
योग्य है कि जैसे पचिस दातों के बीच जीभ रहती है वैने रहें,
और अपने देश की भलाई के लिए किसी के आगे दातों में
तिनका दवाने तक में लजित न हो, तथा यह भी ध्यान रपके
कि हर दुनियादार को पात विश्वाम-योग्य नहीं है। हाथी के
दान साने के मोर होते हैं, दिखाने के और।
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J
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- भौं। . और निश्चय है कि इस शब्द का रूप देखते ही हमारे प्यारे पाठकगण निरर्थक शब्द समझेंगे, अथवा कुछ और ध्यान देंगे तो यह समझेंगे कि कार्तिक का मास है, चारो ओर कुसे तथा जुवारो भी भी भौंकते फिरते हैं, सम्पादकी की सनक में शीघ्रता के मारे कोई और विषय न सूझा तो यही "भौं। अर्थात भूकने के शब्द को लिन मारा ! पर बात ऐसी नहीं है। हम अपने चाचकवृन्द को इस एक प्रक्षर में कुछ दिनाया चाहते हैं । महाशय!दर्पण हाथ में लेके देखिये, आखों की पलकों के ऊपर श्याम-वर्ण-विशिष्ट कुछ सोम है। बरुनी न समझिएगा, माथे के तले और पलकों के ऊपरवाले रोम- समूह । जिनको अपनी हिन्दी में म भौं, भौंह, भौहैं कहते हैं, संस्कृत के पडित भ्र बोलते हैं। फारसयाले अबरू और मंगरेज लोग 'आईब्रो' कहते हैं, उन्हीका वर्णन हमें करना है। यह न कहिएगा किथोडे से रोए हैं, उनका वर्णन ही क्या? महीं। यह थोडे से रोएँ बहुत से सुवर्ण के तारों से अधिक है। हम गृहस्थ हैं, परमेश्वर न करे, फिसी बडे बूढे को मृत्यु पर शिर के, दाढ़ी के और सर्वोपरि मूछौं तक के भी बात बनवा डालेंगे, प्रयाग जी जायँगे तो भी सर्वथा मुंडन होगा, किसी नाटक के अभिनय में स्त्री भेप धारण करेंगे तौभी घुटा डाले गे, ससार-विरत होके सन्यास लेंगे तो भी भद्र कराना पड़े। गा. पर चाहे जग परलौ हो जाय, चाहे लाख तीर्थ घूम आये, चाहे दुनियाभर के काम बिगड़ जाय, चाहे जीवनमुक ही का पद क्यों न मिल जाय, पर यह हमसे कभी न होगा कि एक छुरा भौहों पर फिरवा लें । सौ हानि, सहन शोक, लक्ष अन - तिष्ठा हो तो भी हम अपना मुह सब को दिखा सकते हैं, यदि किसी कारण से भोहै सफाचट्ट हो गई तो परदेनशीनी ही स्वीकार करनी पडेगी। यह क्यों ? यह यों कि शरीरभरे की शोभा मुख-मडल है, और उसकी शोभा यह हैं। उस परम कारीगर ने इन्हें भी किस चतुरता से बनाया है कि बस, कुष्ठ म पूछो । देखते ही बनता है । कविवर मह हरिजी ने- "धूचातुर्य कुंचिताक्षा, कटाता, जिग्धा,वाचोलजिताचैपहास, तीला मद प्रस्थित च स्त्रीणां मेराद्भूषण चायुधच" लिखकर क्या ही सची यात दिखलाई है कि घस, अनुभष ही से काम रखती है। कहे कोई तो क्या कहे, निस्सदेव, त्रियों के लिए भूपण है, क्योंकि उनकी परम शोमा है, और रसिकों को घशीभूत फरने के हेतु सुन्दरियों का शत्र है। यह बात सहदयता से सोचो सो चित्त में भगणित भाव उत्पन्न होंगे, देखो तो भी भनेक स्वादु मिलेंगे। पर जो कोई पूछे कि यह क्या है तो भूचातुर्य अर्थात भौंहों में भरी हुई चतुरता से भधिक कुछ नाम नहीं ले सकते। यदि कोई उस मू-चातुर्य का लक्षण पूछे तो बस, चुप । हाय २ फवियों ने तो भौंह की सरतमात्र इनके कही दिया है, पर रसिकों के जी से कोई पूछे । प्रेमपात्र की मौह का तनक हिल जाना मनके ऊपर सचमुच तलवार ही का काम कर जाता है। फिर प्रकटी- रूपाण क्यो न कहें। सीधी चितवन धान ही सी कलेजे में भुम जाती है। पर इसी भू-चाप की सहाय से श्री जयदेव. सामी का यह पवित्र पचन- 'शशि'मुनि सघ भाति भगुरचू युधजन मोह कराल कालसपी,
-
( ३२ )
-टनको श्रायों से देखना चाहिए, जिनके प्रेमाधार
कोप के समय मोह सकोड लेते हैं। आहा हा, कई दिन
दर्शन न मिलने से जिसका मन उत्कण्ठित हो रहा हो उसे
यह दृदयाभिराम की प्रेमभरी चितवन के साथ भावभरी
भृकुटी ईद के चाद से अनंत ही गुणी सुखदायिनी होती है।
कहा तक कहिए, भृकुटी का वर्णन एक जीभ से तो होना ही
मसभव है । एक फारसी का कवि यह वाक्य फहके कितनी
रसशता का अधिकारी है कि रसिकगण को गूगे का
गुड हो रहा है-भृकुटी-कपी छद-पक्ति के सहनों सूक्ष्म
मर्थ हैं, पर उन अर्थों को विना पाल की साल निकालनेवालों
अर्थात् महा तीव बुद्धिवालों के फोई समझ नहीं सकता !*
जब यह हाल है कि महा तीव-वुद्धि केवल समझ सकते
है तो कहने फी सामर्थ्य तो है किसे ? संस्कृत, भाषा, फारसी
और उई में काव्य का ऐसा कोई अन्य ही नहीं है जिसमें इन
लोमराशि का वर्णन न हो।
अत हम यह अध्याय अधिक न बढाये इतना और निवेदन
करेंगे कि हमारे देश-भाई विदेशियों की वैभवोन्मादरूपी घायु
से सचालित भ्रकुटी-लता ही को चारो फलदायिनी समझले
न निहारा फरें, कुछ अपना हिताहित बाप भी विचार।
यद्यपि हमारा धन, बल, भाषा इत्यादि सभी निर्जीव ले हो रहे
हैं तो भी यदि हम पराई भौंह ताकने की लत छोड दें,
में घात २ पर भौंहैं चढाना छोड दें, दता से कटिवद्ध होके,
थीरता से भौहें तानके देश-हित में सन्नद्ध होजाय, अपने देश
** हमारा मानिए बारीक बाशद वैते धनुरा । पौरन मुशिगाफा
कसन महमद मानिए जरा।
आपस
an
( ३७ ) 'ट। पर इस अक्षर में न तो 'लकार' का सा लालित्य है, म'दकार' फा सा दुरूहत्व, न 'मफार का सा ममत्व-बोधक गुण है, विचार कर के देखिए तो शुद्ध खार्थपरता से भरा हुवा है सूक्ष्म विचारके देखो तो फारस और अरब की ओर के लोग निरे छल के रूप, कपट की मूरत नहीं होते, अप्रसन्न होके मरना मारना जानते हैं, जयरदस्त होने पर निर्यलों को मन मानी रीति पर सताना जानते हैं, पडे प्रसन्न हो तो तन, मन, धन से सहाय फरना जानते हैं, जहा और कोई युक्तिन चले वहा निरी खुशामद करना जानते हैं, पर थपने रूप में किसी तरह का पट्टा न लगने देना और रसाइन के साथ धीरे धीरे हसा खिलाके अपना मतलय गांठना, जो नीति का जीव है, उसे बिलकुल नहीं जानते। इतिहास लेके सब बादशाहों का चरित्र देख डालिए । ऐसा कोई न मिलेगा जिसकी मली या बुरी मनोगति बहुत दिन तक छिपी रह सकी हो। यही कारण है कि उनकी घर्ण- माला में स्वर्ग हई नहीं। किली फारसी से टट्टी कहलाइए तो मुह पीस कोने का यनावेगा, पर कहेगा तत्ती। टट्टी की ओट में शिकार करना जानते ही नहीं, उन विचारों के यहा 'टा' का प्रक्षर कहा से आवे। इधर हमारे गौरागटेव को देखिए । शिरपर हैट, तन परे कोट, पावों में प्येंट, और यूट, ईश्वर का नाम आल्माश्टी, (सर्वशक्तिमान) गुरू का नाम स्यूटर मास्टर (स्वामी को भी कहते हैं) या टीचर, जिससे मीति हो रसकी पदवी मिस्ट्रेस, रोजगार का नाम ट्रेड, नफा कवि का नाम 'पोयट, मूर्स का नाम . का t
(३६)
डालते हैं ! हम प्रजागण कुछ उपाय ही नहीं करते, इसका क्या
हेतु है ? इन सब यातो का यही कारण है कि इन सब नामों के
आदि में यह दुरूह 'दकार है।
हमारे श्रेष्ठ सहयोगी "हिन्दी प्रदीप सिद्ध कर चुके हैं
कि 'लकार' बडी ललित' और रसीली होती है। हमारी
समझ में उसी का साथ पाने से दीनदयाल, दिलासा,
दिलदार, दालमात इत्यादि दस पांच शब्द कुछ पसंदीदा
हो गये है, नहीं तो देवताओं में दुर्गाजी, ऋषियों में दुर्यासा,
राजानों में दुर्योधन महान् होने पर भी कैसे भयानक हैं।
यह दहा ही का प्रभाव है। कनवजियों के हक में दमाद और
दहेज, खरीदारों के हक में दुकानदार और दलाल, चिडियों
के हक में दाम (जाल) और दाना आदि कैसे दुखदायी
है ! दमडी कैमी तुच्छ सका है, दाद कैसा बुरा रोग है, दखि
कैसी कुदशा है, दारू कैसी कडवाहट, वदवू, बदनामी और
बदफैली की जननी है, दोगला कैसी खराब गाली है, दगा
बस्नेडा केसी बुरी आदत है, दश (मच्छड या डास) कैसे
हैरान करनेवाले जतु हैं, दमामा केसा कान फाडनेवाला बाजा
है, देशी लोग कैसे घृणित हो रहे है, दलीपसिंह फैसे दीवानापन
में फस रहे है । कहा तक गिनावें, दुनियामरे की दन्त कटा
कट 'दकार' में भरी है, इससे हम अपने प्रिय पाठकों का
दिमाग चाटना नहीं पसन्द करते, और इस दुस्साह अक्षर की
दास्तान को दूर करते हैं।
-
,
( ३७ ), 'ट। इस अक्षर में न तो 'लकार' का सालालित्य है,न'दकार' फा सा दुरूहत्व, म 'मकार का सा ममत्व गोधक गुण है, पर विचार कर के देखिए तो शुद्ध स्वार्थपरता से भरा हुवा है सूक्ष्म विचारके देखो तो फारस और अरब की ओर के लोग निरे छल के रूप, कपट की मूरत नहीं होते, अप्रसन्न होके मरना मारना जानते हैं, जयग्दस्त होने पर निर्वलों को मन- मानी रीति पर सताना जानते हैं, यडे प्रसन्न हो तो तन, मन, धन से सहाय करना जानते हैं, जहा और कोई युक्तिन चले यहा निरी खुशामद करना जानते हैं, पर अपने रूप में किसी तरह का पट्टान लगने देना और रसाहन के साथ धीरे धीरे हसा खिलाके अपना मतलय गांटना, जो नीति का जीव है, उसे बिलकुल नहीं जानते । इतिहास लेके सब बादशाहो का चरित्र देख डालिए । ऐसा कोई न मिलेगा जिसकी मली या धुरी मनोगति बहुत दिन तक छिपी रह सकी हो । यही कारण है कि उनकी वर्ण. माला में स्वर्ग हई नहीं। किसी फारसी से टट्टी कहलाइए शो मुह घीस कोने का यनावेगा, पर कहेगा तत्ती। टट्टी की बोट में शिकार करना जानते ही नहीं, उन विचारों के यहा 'टा' का प्रक्षर कहां से आवे। इधर इमारे गौरागटेय को देखिए । शिरपर हैट, तन पर कोट, पावों में प्येट, और यूट, ईश्वर का नाम आल्माइटी, (सर्वशक्तिमान) गुरू का नाम ट्यूटर मास्टर (स्वामी को भी कहते हैं) या टीचर, जिसमें प्रीति हो रसको पदयो मिस्ट्रेस, रोजगार स नाम ट्रेड, नफा पा नाम येनीफिट, कवि का माम पोपट, मूर्य का नाम .
- सकेगा। - 4 ( ३८ ) स्टुपिड, खाने में रेविल, कमाने में टेक्स । कहां तक इस टिटिल-टेटिल (घकवाद) को पढावें, कोई बडी डिक्शनरी (शब्द-कोप) को लेके ऐसे शब्द दिए, जिनमें 'टकार' न हो तो बहुत ही कम पाइएगा! उनके यहां 'ट' इतना प्रविष्ट है। कि तोता फहाइए तो टोटा फहेंगे। इसी 'टकार के प्रभाव से नीति में सारे जगत् के मुकुट-मणि हो रहे हैं। उनकी पालिसी समझना तो दरकिनार, किसी साधारण पढ़े लिखे से पालिसी के माने पूछो तो एक शब्द ठीक ठीक न सममा इससे बढके नीतिनिपुणता क्या होगी कि रुजगार में व्यवहार में, कचहरी में, दरवार में, जीत में, हार में, बैर में, प्यार में, लल्ला के सिवा दहा जानते ही नहीं ! रीझेंगे तो भी जियाफत होंगे, नजर लेंगे, तुहफा लेंगे, सौगात लेंगे, और इन सैकड़ों हज़ारों के बदले देंगे क्या, 'श्रीईसाई (सी० एस० आई० ) की पदवी, या एक कागज के टुकडे पर.सार्टिफिकेट, अथवा कोरी थैफ, (धन्यवाद ) जिसे उर्दू में लिखो तो उँग अर्थात् हाथ का अगूठा पढा जाय । धन्य री खार्थसाधकता ! तभी तो सौदागरी करने आए, राजाधिराज यन गए । क्यों न हो, जिनके यहां चाव २ पर 'टकार' मरी हे उनका सर्वदा सर्वभावेन सब किसी का सब कुछ डकार जाना क्या आवर्य है ! नीति इसी का नाम है, 'टकार का यही गुण है कि जब सारी लक्ष्मी विलायत दो ले गए तब भारतीय लोगों की कुछ कुछ आपुली हैं। पर अभी बहुन कुछ करना पहिले अच्छी तरह आखें खोल के देखना चाहिए कि यह अक्षर जैसे अंगरेजों के यहां है वैसे ही हमारे यहां भी है, पर भेद इतना है कि उनकी "टी" की सूरत ठीक एक । है (३६) ऐसे फाटे की भी है कि नीचे से पकडके फिसी घस्तु में डाल दें तो जाते समय कुछ न जान पडेगा, पर निक- लते समय उस वस्तु का दोनों हाथों अपनी घोर खींच लावेगा। प्रत्यक्ष देस लो कि यह जिसका खत्व हरण किया चाहते हैं उसे पहले कुछ भी नहीं ज्ञान होता, पीछे से जो ६ सो इन्हीं का! और हमारे वर्णमाला का "ट" एक ऐसे आंकड़े के समान है, जिसे ऊपरसे* पफड सकते हैं, और हर पदार्थ में प्रविष्ट कर सकते हैं, पर उस वस्तु को यदि सावधानी से अपनी भोर पोचे तो तो फुशल है नहीं तो फोरी मिहनत होती है। इसी से हम जिन यातों को अपनी ओर खींचना प्रारम्भ करते हैं उनमें 'टकार के नीचेवाली नोक की भाति पहिले तो हमारी गति सूब होती है, पर पीछे से जहां दृढता में चूके वहीं संठ के सठ रह जाते हैं। दूसरा अन्तर यह है कि अगरेजो के यहा "टी सार्थक है और हमारे यहां एक रूप से निरर्थक । अगरेजी में "टी के माने चाह के हैं, जो उनके पीने की चीज है, अर्थात् वे अपना पेट भरना सूय जानते हैं । पर हमारे यहा "ट" का कुछ अर्थ नहीं है। यदि टट्टा कहो तो भी एक हानिकारक ही अर्थ निकलता है, घर में टट्टा लगा हो तो न हम बाहर जा सकते हैं, अर्थात् अन्य देश में जाते ही धर्म और विरादरी में बदनाम होते हैं, और याहर की विद्या, गुण भादि हमारे हृदय-मदिर के भीतर नहीं आ सकते । यावें भी तो हमारे भाई चोर२ कहके चिल्लाय यह अनर्थ ही तो है। - । * नीचे से पकड़ना श्रर्याद उसके मुल को दुइ के काम में खाना और ऊपर से पकडना अर्थात दैवाधीन समझ कर कर बठाना । S
(४०)
तीसरा फर्क लीजिए, जितना उनके यहां "2" का मस
है उतना हमारे यहा है नहीं । तिल पर भी हम अपने
यहा के "ट" का यर्ताव बहुत अच्छी रीति से नहीं करते।
फिर कहां से पूरा पड़े। 'टकार' का अक्षर नीतिमय है,
उस नीतिमय अक्षर को धुरी रीति से काम में लाना
बुरा ही फल देता है । हम ब्राह्मण हैं तो टीका (तिलक) और
चोटी सुधारने में घटों विता देते हैं, यह काम नियों के लिए
उपयोगी था, हमें चाहिए था, वास्तविक धर्म पर अधिक जोर
देते । यदि हम क्षत्री हैं तो टटा-बखेडा में पड़े रहते हैं। यह
काम चाहिए था शत्रुओं के साथ करना, नकि आपस में।यदि
हम वैश्य हैं तो केवल अपना ही टोटा (घटी) या नफा विचा
रेंगे, इससे सौदागरी का सच्चा फल नहीं मिलता। यदि हम
अमीर है तो सैकडों रुपया केवल अपना टिमा बनाने में
लगा देंगे, टेसू बने बैठे रहेंगे, इससे तो यह रुपया किसी
देश हितकारी काम में लगाते तो अच्छा था । पढे लिखे हैं तो
मतवाद में टिलटिलाया करेंगे, कोई काम करेंगे तो अटट
रीति से, सरतारे होंगे तो टालमटोला फिया करेंगे।
इस ऊटपटांग कहानी को कहा तक कहिए, बुद्धि
मान विचार सकते हैं कि जब तक हमारी यह टेवन सुधरेगी,
जय तक हमारे देश में ऐसी ही टिचर्र फैली रहेगी तव तक
हमारे दुःख-दरिद्र भी न टलेंगे। दुर्दशा योही टेंटुआ दयाए
रहेगी! हमें अति उचित है कि इसी घटिका से अपनी टूटी
फूटी दशा सुधारने में जुट जाय। विराट् भगवान के सन्ने
भक बनें, जैसे ससार का सब कुछ उनके पेट में है वैसे ही
हमें भी चाहिए कि जहा से जिस प्रकार जितनी अच्छी बाते
मिलें सब अपने पेट के पिटारे में भर लें, और देशमर को
.
(४१)
नसे पाट दें, भारतवासीमात्र को एक पाप के बेटे की तरह
थार करें, अपने २ नगर में नेशनल काग्रेस की सहायक
मेटी कायम करें, ऐंटी काग्रेसवालो की टाय २ पर ध्यान
।। यस नागर नट की दया में सारे अभाव झट पट हट
जायगे, और हम सब बातों में टच हो जायगे। यह 'टकार'
मेरस सी होती है, इससे इसके सम्बन्धी आरटिकिख में
केसी नटबाट सुन्दरी की चटक मटक भरी चाल और गालों
र लटकती हुई लट, मटकती हुई आंखों के साथ इट! अरे
इट! की बोलचाल का सामना तो लान सकते थे, केवल
टोल स्टाल के थोडी सी पटीटरी की टेंक निमा सही है।
प्राशा है कि इसमें की कोई यात टेंट में पोस राखिएगा तो
का पंचामर गुण ही फरेगी। योखो टेढी टागवाले की
-
--
.
(४२)
परीक्षा।
यह तीन अक्षर का शब्द ऐसा भयानक है कि प्रैलोक्य
की पुरी बला इसी में भरी है। परमेश्वर न करे कि इसस
सामना किसी को पडे ! महात्मा मसीह ने अपने निज शियों
फो एक प्रार्थना सिखाई थी, जिसको आज भी सब किस्तान
पढते हैं, उसमें एक यह भी भाव है कि "हमें परीक्षा में
डाल, बरंच बुराई से बचा। परमेश्वर करे सब की मुई
भलमसी चली जाय, नहीं तो उत्तम से उत्तम सोना भी जा
परीक्षार्थ अग्नि पर रक्खा जाता है तो पहिले कांप उठत
है, फिर उसके यावत् परमाणु, सब छितर वितर हो जाते
है । यदि कहीं कुछ खोट हुई तो जल ही जाता है, घट जाता है।
जय जड पदार्थों की यह दशा है तय चैतन्यों का क्या कहना
है ! हमारे पाठकों में कदाचित् ऐसा कोई न होगा जिसने
बाल्यावस्था में कहीं पढ़ा न हो। महाशय उन दिनों का
स्मरण कीजिए, जय इम्तहान के थोडे दिन रह जाते थे। क्या
सोते जागते, उठते धैठते हर घडी एफ चिन्ता विच पर
चढी रहती थी। पहिले से अधिक परिश्रम करते थे तो भी
दिनरात देवी देवता मनाते वीतता था। देखिए, क्या हो,
परमेश्वर कुशल करे । सच है, यह अवसर ही ऐसा है । परी
क्षा में ठीक उतरना हर किसी के भाग्य में नहीं है।
जिन्हें हम आज बढा पडित, धनी, वडा बत्ती, महा देश
हितैषी, महा सत्यसघ, महा निष्कपट मित्र समझे बैठे हैं, यदि
उनकी ठीक ठीक परीक्षा करने लगें तो कदाचित् फी सेकड
दो ही चार ऐसे निकलें जो सचमुच जैसे बनते हैं वैसे ही
बने रहें ? वेश्याओं के यहा यदि दो चार मास आपकी बैठक
L
1
- (४३) रही हो तो देखा होगा, फैसे २ प्रतिष्ठित, कैसे २ सभ्य, कैमे कैसे धर्मध्वजी पा जाकर क्या क्या लीला करते हैं! मदि महाजनों से कमी काम पडा हो तो आपको निश्चय होगा कि प्रगट में जो धर्म, जो ईमानदारी, जो मलममी दीख पडती है यह गुप्तरूपेण के जनों में कहां तक है! जिन्हें यह विश्वास हा कि ईश्वर हमारे कामों की परीक्षा करता ६, अथवा ससार में हमें परीतार्थ भेजा है उनके अन्त करण की गति पर हमें दया आती है। हमने तो निश्चय कर लिया है कि परीक्षा परीक्षा का क्या काम है, इम जो कुछ हैं उस सर्व सर्वातरयामी से छिपा नहीं है। एम पापात्मा, पाप | समव, भला उसके मागे परीक्षा में के पस ठहरेंगे? ससार में ससारी जीव निस्सन्देह एक दूसरे की परीक्षा मकर तो काम न चले, पर उस काम के चलने में कठिनाई यह है कि मनुष्य की बुद्धि अल्प है, अत प्रत्येक विषय का पूर्ण निश्चय समव नहीं। न्याय यदि कोई वस्तु है, और यह घात यदि निस्सन्देह सत्य है कि निर्दोप अफेला ईश्वर है तो हम यह भी कह सकते हैं कि जिसकी परीक्षा १०० थार कर खोजिए उसकी ओर से भी सन्देह यना रहना कुछ भामर्य नहीं है। फिर इस बात को कोन कहेगा कि परीक्षा उरझन का विषय नहीं है । करटी ही लोग पहुधा मिष्टभाषी और शिष्टाचारी होते हैं, थोड़े ही मूल्य क्री धातु में अधिक उनठ- नाहट होती हे, थोडीही योग्यता में अधिक प्राडम्बर होता है, फिर यदि परीक्षक धोखा खा जाय तो क्या अचमा है। सय गुणों में पूरा अफेला परमात्मा है, अत ठीक परीक्षा पर जिस- की कलई न खुल जाय उसी के धन्य भाग! हमने भी स्वय अनुभव किया है कि यरसों जिनके साथ बदनामरहे, घोसियों
.
(४४)
हानियां सही, फई पार अपना सिर मुडवाने को और
प्राप्प देने या कारागार जाने को उद्यत हो गये, उनके दोष
अपने ऊपर ले लिए, और घे भी सदा हमारीघात २ पर अपना
चुल्लू भर खोह सुखाते रहे, सदा कहते रहे, जहां तेरा पसीना
गिरेगा वहां हमारा मृत शरीर पहिले गिर लेगा, पर जब समय
थाया,
कि गैरों के सामने हमारी इजत न रहे, तो उन्हीं महा'
शयों ने फटी उगली पर न मूता!
यदि कोई कहे कि तुम कौन बड़े बुद्धिमान हो जो तुम्हारे
तजरवे (अनुभव) पर हम निश्चय कर लें, तो हम मान लेंगे।
पर यह कहने का हमें ठौर वगा है कि मुद्दत तफ राजा शिष
प्रलादली को सहतों ने क्या समझा, और अन्त में क्या निकले।
सैयमहमद साहब फो पहिले बहुतेरों ने निश्चय किया कि
देशमात्र के हितैषी हैं, पीछे से यह खुला कि केवल निज सह
धर्मियों के शुभचिंतक है। यह भी अच्छा था, पर नेशनल काप्रेस
में यह सिद्ध होगया कि "योसिसोसि तव चरण नमामी
"हिन्दी प्रदीप से ज्ञात हुआ कि दिहाती भाई भी सैयद बाया
पर मधुर वानी की शोगेनी चढ़ाते हैं । हम भी मानते हैं कि
कांग्रेस अभी ३ वरस की बच्ची है, उस पर रक्षा का हाथ
रखना ही उन्हें योग्य है, क्योंकि यह हिन्दू-मुसलमान दोन
को हितैषिणी है, ऐसे बहुत मे दृष्टान्त अनुमान है कि
सभी को मिला करते होंगे, जिनसे सिद्ध है कि परीक्षा का नाम
बुरा राम न करे कि इसकी प्रचड आच से किसी के
कलई खुले एक आर्य कवि का अनुभूत वाक्य है-
'परत सायिका सावुनहि देत स्वीस सी काढि'
एक उर्दू कवि का यह वचन कितना हृदयग्राही है-
'इम शर्त पर जो लीजे तो हाजिर है दिल अमी,
'रजिश न हो, फरेष न हो, इम्तिहां न हो।'
- (४७ ). पाला, (दुष्कर्मों से घृणा करनेवाला) और मनोरयों का पूर्ण करनेवाला है-- "ऐ जर तु सुदा नई योकिन यखुदा, सन्तारो गुफूरो काजी उल हाजाती। । हम भी कह सकते हैं कि मरने जीने, दुख-सुम्न और नर्क- वर्ग की एक 'कुजी भगवती लक्ष्मी (जरे अलेस्साम) के हाथ में भी है। लोग कहते हैं-"जन (स्त्री) जमीन और जर, सय झगडे का घर पर सच तो यह है कि जमीन तो जर ही का रूपान्तर है, और जन भी पेटमरों के अलवल है। ठीक पूछो तो अनर्थ का मूल गही है। प्रल-देश के विषय में हमारी सरकार ने इतनी बदनामी और मुडधुन सहके इस यात को लिखकर दिया कि रुपये के लिए बडेबडों की नियत 'डिग जाती है। बाप-बेटे, स्त्री-पुरूप,भाई भाई में महा विरोध हो जाना इत्यादि अनर्थ लोग सहज फर डालते हैं। फिर "याप पडा ना भइया, सब से बडा रुपच्या" में क्या सन्देह है। सौ आर्य कर डालो, एफ माघ मदिर यनवा डालो या भोजन करा दो, कोई कुछ न कहेगा, वरच चाहे सो करो, मुह पर सव चुटकी ही घजायेंगे। फिर "सारे नौगुन छिपत हैं, लछमिनिया की पोट", कोग का डर है। इस दो अक्षर के शब्द से लोग ऐसा गिधे हैं कि जिससे कह दो, लो ना, (सोनो मत) देखो कैसा सीक पार होता है, कोई तुम्हारा आश्रित है जो डर के मारे तुम्हारी आशा मानेगा, पर कमी २ कोई २ आक्षा सुनके भीतरी भीतर पच जाता है, पर रात को कुछ काम देर तक करने के पीछे कह दीजिए-सोना, (सोरहो न) देखो कैसा मगन हो जायगा। . 1 .
(४६ ) सोना। t यद शब्द भी, हम जानते हैं, ऐसा कोई न होगा जिसे परम सुखदायक न हो। यदि दिनभर के श्रम से थके मादो को यह न मिले तो दूसरे दिन के काम के न रहे। दिन रात ऐश करनेवालों को यदि एक दिन न मयस्सर हो तो वैद्यों फी चांदी है । योगी, कामी, कवि, जुवारी, चोर- इनको लोग कहते है नहीं सुहाता, पर हमारी समझ में ये भी केवल अपना व्यसनमान निवाह लें, नहीं तो एक रीति से सोते वे भी है । कोई ससार से सोता है, कोई परमार्थ से गाफिल रहता है। फिर क्योंफर फाहिए कि सोने से को विरक्त है। इसके बिना मनुष्य का जीवन ही नहीं रह सकता।' इधर दूसरे अर्थ में भी लीजिए, ऐसा प्यारा है कि स्त्रिया इसके लिए कानों को चलनी करा डालती है। यदि कोई ऐसा गहना हो जिसमें घरमे से हाथ पांव की हडिया लिदानी पडें तो भी, हम जानते हैं, सौ में दो ही चार इन्कार करेंगी। मर्द तो इसके लिए धर्म, प्रतिष्ठा, वरच प्राण को भी नाश कर देते हैं । ससार में ऐमा कोई देश नहीं, जिसमें इसकी इज्जत न हो। हमारे पुराणों में भगवान् की स्त्री का नाम लक्ष्मी है, इस नाते जगत् की माता हुई। अत: उनकी जो प्रतिष्ठा की जाय, थोडी है। हमारे सिद्धांत में परमेश्वर को बिना प्रेम बेअदयी का कोई शब्द कहना महापाप है, पर एक फारसी कवि ने द्रव्य (सोना) की प्रशंसा में बहुत ही ठीक कहा है कि "हे सुवर्ण तू स्वय ईश्वर तो नहीं, पर ईश्वर की शपथ तू प्रतिष्ठा का रक्षक, (पर्दा रखनेवाला) पापों गा क्षमा करने
(४७)
वाला, (दुष्कर्मों से घृणा करनेवाला) और मनोरथों का पूर्ण
करनेवाला है
"ऐ जर तु खुदा नई यलेकिन वजुदा,
सन्तारो गुफरो काजी उल हाजाती।
• हम भी कह सकते हैं कि मरने जीने, दुख-सुन और नर्क
वर्ग की एक कुजी भगवती लक्ष्मी (जरे अलेदुस्साम) के हाथ
में भी है। लोग कहते हैं-"जन (स्त्री) जमीन और जर, सव
झगडे को घर, पर सच तो यह है कि जमीन तो जर ही का
रूपान्तर है, और जन भी पेटभरों के अलवल हैं।
ठीक पूछो तो अनर्थ का मूल यही है। ब्रह्म देश के विषय में
हमारी सरकार ने इतनी बदनामी और मुडधुन सहके इस
यात को सिद्ध कर दिया कि रुपये के लिए यडेचडी की नियत
'डिग जाती है। वाप-बेटे, स्त्री पुरूप,भाई भाई में महा विरोध हो
जाना इत्यादि अनर्थ लोग सहज कर डालते हैं । फिर "बाप
पडा ना भइया, सब से बडा रुपय्या" में क्या सन्देह है। सौ
अनर्थ कर डालो, एक आघ मंदिर यनवा डालो या भोजन
करा दो, कोई कुछ न कहेगा, वरच चाहे सोफरो, मुह पर सव
'चुटको ही यजायेंगे। फिर सारे श्रीगुन छिपत हैं, लछमिनिया
की ओट", कौन का डर है। इस दो अक्षर के शब्द से लोग
ऐसा गिधे हैं कि जिससे कह दो, सोना, (सोधो मत) देखो
कैसा सीक पांव होता है, कोई तुम्हारा माश्रित है जो डर के
मारे तुम्हारी आज्ञा मानेगा, पर कमी २ कोई २ भासा सुनके
भीतरी भीतर पच जाता है, पर रात को पुछ काम हेर तक
करने के पीछे कह दीजिए-सोना, (सो रहो न) देपो कैसा
मगन हो जायगा।
,
1
(४८)
T
मिडिल-छास।
जो लोग सचमुच विद्या के रसिक हैं उन्हें तो पम० ५५
पास करके भी तृप्ति नहीं होती, क्योंकि विद्या का अमृत पेस
ही स्वादिष्ट है कि मरने के पीछे भी मिलता रहे तो अहो भाग्य
पर जो लोग कुछ क, म, घ, सीस्त्रके पेट के धंधे से का
जाना ही इतिकर्तव्यता समझते हैं उनके लिए यह मिडिल
भी ऐसी छत लगा दी गई है कि झींसा करें बरसों! नहीं ।
इन विचारे दस २ रुपया की पिसौनी करनेवालो को क
जहाज पर चढके जगज्जात्रा करने का समय मिलता
जो जुगराफ़िया रटाई जाती है? कौन दिल्ली और लखन
के बादशाह बैठे हैं जो अपने पूर्वजों का चरित्र सुनके लिए
अस बखूश देंगे, जो तवारीख में समय की हत्या ली जाती है
साधारण नौकर को लिखना-पढना बोलना-चालना, हिसा
किताय बहुत है । मिडिलवाले कोई प्रोफेसर तो होते ही नद
इन बेचारे पेटार्थियों को विद्या के वडे २ विपयों में श्रम करा
मानों चीटी पर हाथी का हौदा रखना है । विचारे अपने ध
से भी गए, बडे विद्वान भी न भए ! 'मिडल' शब्द का अर्थ
है अधविच, अर्थात् आधे सरग, त्रिशकु की भांति लटके र
न इतके न उत के! इससेतोसरकार की मशायी पाई जा
है कि हिन्दुस्तानी लोग नौकरी की प्राशा छोडें, पर
गुलामी के श्रावियों को समझाये कौन ?
यदि प्रत्येक जाति के लोगमपने सन्तान को मय के पहि
निज व्यापार सिखलाया करें तो वे नौकरी पेशो से फिर
अच्छे रहें। इधर नौकरों की कमी रहने से सरकार भी यह इस
छोड़ धैठे। जिनको स्थानेपन में पढ़ने की रुचि होगी पे क्या
।
(४)
और धंधा करते हुए विधा नहीं सीख सकते ? पर कौन
मुगता
है कि "व्यापारे वसते लक्ष्मी", यहां तो यावूगीरी के नाती भाई
कुछ हो, अपनी चाल न छोडेगें।
भगवति विद्ये तुम क्या फेवल सेवा ही कराने को हो?
हम तो सुनते हैं, तुम्हारे अधिकारी पूजनीय होते ये मस्तु,
सो अच्छा ही है। अमागे देश का एफ यही साक्षण क्यों
'जाय फि सेवावृति में भी थाधा! न जाने हर साल खेप की
मेप तैय्यार होती है, इन्हें इतनी नौकरी कहां से आवेगी!
सरकार हमारी सलाह माने तो एक और कोई मिडिल पास
फी पख निकाल दे, जिसके बिना पहरागीरी, खानसामा-
गीरी, भासकटगीरी आदि भी न मिलें । देखें तो कब तक
मौकरी के पीछे सच्ची होते हैं। अरे वाया पदि कमाने ही पर
कमर बांधी है तो घर का काम फाटता है? क्या हायके
कारीगर और चार पैसे के मजूर दस पद का महीना भीनहीं
पैदा करते ? क्या ऐसों को घायुनो के से कपडे पहिनना मना
हैं घरव देश का पहा हित इसी में है कि सैकडों तरह का
काम सीखो। सार्टीफिकट लिये पगले २ मारे २ फिरने में
पया धरा है, जो सरकार को हर साल इमतिदान अधिक
कठिन करने की चिन्ता में फंसाते हो! यावूगीरी कोई सणं-
गीरी (सोने का पहाड ) नहीं है। पास होने पर भी सिफा.
रिश चाहिये तब नौकरी मिलेगी, और यह कोई नियम नहीं
है कि मिडिलवाले नौकरी से बरखास्तम होते हो वा उन्हें
बिना फिक नौकरी मिल ही रहती हो। क्यों उतना ही धम
भौर काम में नहीं करते
-
N, 4.
(५०)
खड़ी बोली का पध।
इस नाम की धावू अयोध्या प्रसाद जी खत्री मुजाहरपुर,
पासी छत पुस्तफ के दो भाग हमें हमारे मुहद्धर श्रीधर
पाठक द्वारा प्राप्त हुए हैं । लेखक महाशय की मनोगति तो
सराहना योग्य है, पर साथ ही असम्भव भी है। सिधार
फारसी छंद और दो तीन चाल की लावनियों के और कई
छद उस में मनाया भी है तो ऐसा है जैसे किसी कोमलांगों
सुन्दरी को कोट बूट पहिनाना । हम आधुनिक कवियों के
शिरोमणि भारतेन्दुजी से घढके हिन्दी भाषा का आग्रही दूसरा
न होगा। जब उन्हीं से यह न होसका तो दूसरोकायन निष्फल
है। पास को चूसने में यदि रस का स्वाद मिल सके तो ईस
बनाने का परमेश्वर को क्या काम था। हा उरदू शब्द अधिक
म भरके उरदू के ढग फासा मजाइम पा सकते हैं, और उस
कविताभिमानियों से हम साहकार कह सकते हैं कि हमारे
यहां फा काव्य भी कुछ कम नहीं है । यद्यपि कविता के लिए
सरयू धुरी नहीं है, कवित्व-रसिकों को यह भी धारललना थे
हाघमाय का मजा दे जाती है, पर कवि होते हैं निरकुश
उनकी बोली भी स्वच्छद ही रहने से अपना पूरा यल दिन
सकती है। जो लालित्य, जो माधुर्य, जो लावण्य कविय
की उस स्वतंत्र भाषा में है जो ब्रज भाषा बुदेलखडी, बैसवार
मौर अपने दंग पर लाई गई संस्कृत वफारसी से बन गई ।
जिसे चन्द्र से लेके हरिश्चन्द्र तफ प्राय. सव कवियों ने आदर
दिया है, उसका सा अमृतमय चिचचालक रस सडी और
बैठी घोलियों में ला सके, यह किसी कवि के धाप की मजाल
माहीं । छोटे मोटे कपि हम भी है, और नागरी का कुछ वाया
(५५) भी रखते हैं, पर जो पात हो ही नहीं सकती, उसे क्या करें। बहुतेरे यह कहते हैं कि प्रजमाया की कविता हर एक समझ नहीं सकता। पर उन्हें यह समझना चाहिए कि आपकी बासी योली ही कौन समझे लेता है। फिर, यदि सयको समझाना मात्र प्रयोजन है तो सीधी २ गच लिखिए। कषिता के कर्ता और रसिक होना हर एक का काम नहीं है। उन विचारों की चलती गाडी में पत्थर अट- काना, जो कविता जानते हैं, कभी अच्छा न कहेंगे। प्रजभाषा (मोनागरी-देची की मनी बहिन है, उसका निज-स्वत्व दूसरी बहिन को सौंपना सहदयता के गले पर छूरी फेरना है ! हमारागीरव जितना इसमें है किगध की भाषा और रफ, पध झी भौर, उतना एफ को घिसकुल त्याग देने में कदापि नहीं। कोई किसी की इच्छा को रोक नहीं सकता। इस न्याय से | कविता नहीं मानते थे अपनी पोती चाहे असी रखें चाहे फुदाय, पर कषि लोग अपनी प्यार की हुई पोली पर हुपम चलाके उसकी स्वतन्त्र मनोहरता का नाश नहीं करने के। जो कविता के समझने की शक्ति नहीं रखते वे सीखने (का उद्योग करें। फपियों को क्या पड़ी है कि किसी के समझाने को अपनी घोली बिगा।
( ५२)
नागरी-महिमा का एक चोज।
हमारे यहां की घोली का एक यह भी ढग है कि बहुत
शब्दों के साथ आदि में अ, स और कमी कमी फ मिला देते-
हैं, जिससे एक निरर्थक शब्द बन जाता है, पर अच्छा लगता
है। रोटी प्रोटी, आदमी सादमी इत्यादि । इस रीति से का
भापाधों के निरर्थक शब्द उन भाषाओं फी कला खोल देने
दें,पर हमारी नागरीदेवी की महिमा ही गाते हैं।
देखो न, अंगरेजी सगरेजी-संगरेजा कहते हैं पत्थर का
महीन टुकडा या फकड, उसका भी लघु रूप सगरेजी समझ
लो, न मानो तो माधुर्य का गुण दृढ़ो, उसमें कहीं है । टि
फ्यटय्यट का खर्च है। फारसी-आरसी, (आलसी) सैकग
पाथो छान डालो, उद्योग की शिक्षा बहुत कम, जोफ नात
धानी के मजमून लाखो ! अरयी-सरयी (मानी नदारद )
उरदूःसुरदू, (मानी नदारद ) पर 'पिणी जोड़ लो तो हर
दूपिणी हो जाय।
लेकिन संस्कृत अस्त-जिसमें ईश्वर की महिमा
अपियों की उदार मुद्धि का अश हर तरह मौजूद । नागरी
आगरी-आगर सद्व्यक्तियों का गुण अथवा सागरी। रा
झूठ न बुलावै तो इस दीन दशा में भी सब गुण का बोट
सागर ही है। क्यों, कैसी कही
11
।
मरे का मार शाह मदार। चार वर्ष से हम देख रहे हैं कि देशी समाचारपत्रों में, विशेषत, हिन्दी के पनों में, जो कुछ धन लाभ होता है, विचारे सम्पादकों का जी ही जानता है । दुःख रोना मोति-प्रन्यों में पार्जित है, पर हम सम्पादक हैं, जब दूसरों के दुख-सुख, गुण भौगुन छाप डालते है तो अपने क्यों न कह? जो सम्पादक अखबार की आड में भिक्षा-भवन करते नहीं शरमाते, धनिकमान की झूठी प्रशसा से पत्र भरके सहायता के नाम से मांग जाचकर अपना धृणित जीवन भी निभाते है धनकी तो हम कहते नहीं, पर जिन्हें अपनी लेखनी के बल का घमंड है, और यह सिद्धान्त है कि “को देहीति पदत्स्वदग्ध अठरस्यायें मनस्वी पुमान", उनको राम ही से काम पडता है। । 'रसिक पंच, भारतेन्दु','उचितयका इत्यादि उत्समोठम पर इसी घाटे की छुन के मारे थोडे ही दिन पलके यद हो गए। हमारे 'प्राक्षण' का यह हाल है कि हदय का रक सुखा २ के मम तक बनाए जाते हैं। वर्ष भर में डेढसौ रुपया छप. पाई और साफ महसूल को चाहिए, और आमदनी इस वर्ष भाड़ मास में केवल २०१० की हुई है। चार वर्ष में दोसी का फर्जा इषा है, उसे कुछ भुगता धुके हैं, १५०) भुगतना बाकी है। महीनों से तकादा करते हैं, प्राहक सुनते ही नहीं। गाजे २महापुरुषों ने चार बरस में कौष्ठीनहीं दी, याजेरस दस पन्द्रह पन्द्रहरुपप यो लिए बैठे हैं। महीना दो महीना और देखते हैं, नहीं तोसयकी नामावली छापनी पडेगी। कहा तक मुला- हिजे के पीछे भार सहे । प्रेसवाले जानते हैं, सम्पादक जमा- मार है। सम्पादक विचारा नाविहंदो की हत्या अपने सिर - -- t तो . (५४ ) मुडियार है ! छापनेपालों का तगादा सुनके लजा, क्रोध- और चिन्ता खाए लेती है। अपनी गृहस्ती के खर्च में हज सह २ के कुछ देते जाते हैं, और झूठे वादे तथा मनको मार के खुशामद से टाले जाते हैं। भविष्यत् का ज्ञान परमेश्वर को है, क्या जाने, उसकी इस लीला में फोन गुप्त भेद है। पर हमारा विचार यह है कि जैसे तैसे यह पर्प 'ग्राह्मण को ब्राह्मलोक भेजें, और यथासाध्य नाविहदों से रुपया वसूल करें, फिर घर्ष छ महीने में धीरे २ ऋण हत्या बुडाथे। खुशामद होती नहीं, मांगना माता नहीं, फिर यह भाशा कैसे करें कि कोई हमारा बोझ हलका करेगा। हंसी-खुशी हमारा मूल्य ही दे दें तो उन्होंने मानो सय कुछ दे दिया। यह सम्पादकों की महाकथा का एक अध्याय सोप से इसलिए सुनाया है कि हम लोगों की दशा सबको विदित हो जाय । हम गगा में पैठ के कह सकते हैं कि यह झूठ नहीं है। जयकि हमारे छोटे से पत्र की केवल चार धर्ष में यह गति है तो हमारे मान्यवर "हिन्दी-प्रदीप" का राल,दम सम सते हैं, हमसे भी बुरा होगा। "ब्राह्मण" से दूना उसका आकार है, चौगुनी उसकी आयु है, उसके सम्पादक श्रीबालकृष्ण भट्ट हैं, यह हमसे भी गई चीती दशा में ठहरे, कुटुम्ब धडा, सर्च यडा, सहायक सगा धाप भी नहीं, स्पष्टवक्तापन के मारे, जधानी दोस्त भी फोई नहीं। ऐसी हालत में सरकारने १०) 7. टैक्स के ले लिए। हम क्यों न कहें.-"मरे को मारें शाह मदार । यह विचारे कौन धंधा करते हैं, जो उनपर रिकस! दस रुपये में क्या सर्कार का खजाना भर गया ! कर्मचारियों को कौन बडी नामी हो गई। कौन तनखाह बढ़ गई, कौन पदयी, (बिताय), मिल गई। हाय क्या ज़माना है कि
( ५५ )
राजा प्रजा कोई गरीयों की हाय से नहीं डरता! चार परस
हुए, कुछ बदमाशों ने हमारे भट्टमहोदय पर अपनी बदमाशी
दरसाई थी तय सहायता किसी ने न की। आज रुपया
चूसने को सब तैयार हो गए । इन्साफ यदि कोई वस्तु है
तो हम लोगों का रजिस्टर देख लिया जाय । पर कौन सुनता
है। हमारी समझ में यह किसी धूर्त कर्मचारी ने किसी गुप्त
बैर का बदला लिया है।
हमारे उत्साह-वईक।
-
।
हम पास्तव में न विद्वान हैं, न धनवान, न यलवाना पर
इमारा सिमान्त है कि अपने जीवन को तुच्छ न समझना
चाहिए, क्योंकि इसका वनानेवाला सर्वशक्तिमान सर्वोपरि
परमात्मा,है। इसीसे कभी २ हमारे मुल से मुसहफी का
यह वचन उमंग के साथ निकल जाता है फि:-
"जिस तरह सब जहान में कुछ हैं,
हम भी अपने गुमान में कुछ हैं,"।
कुछ न सही, पर कानपुर में कुछ एक बातें केवत ही पर
परमेश्वर ने निर्भर की हैं, जिनकी कदर इस जमानेवाले नहीं
जानते, पर हम न होगें तय शोक करेंगे? यदि लोग हमको
भूल भी आयगे तो यहां की धरती अवश्य कहेगी कि हम में
कभी कोई खास हमारा था!
पर आज जहां हमको यह सोच है कि हाय कानपुर के
हम कौन हैं, इतना भी कानपुर नहीं जानता! वहा इस बात
का हर्ष भी है कि षाहरपालों की दृष्टि में हम निरे ऐसे ही
वैसे नहीं है। बाजे २ लोग हमें श्रीहरिश्चन्द्र का स्मारक
समझते हैं। याजों का खयाल है कि उनके बाद उनका सा
रग ढङ्ग कुछ इसी में है। हमको स्वयं इस बात का धमंड है
कि जिस मदिरा का पूर्ण कुम्म उनके अधिकार में था उसी
का एक प्यासा हमें भी दिया गया है, और उसी के प्रभाव
से बहुतेरे हमारे दर्शन की, देवताओं के दर्शन की भांति, इच्छा
करते हैं। बहुतेरे हमारे वचनों को ऋषि-वाक्य सहश मान्य
समझते हैं। बहुतेरे बडे २ प्रतिष्ठित शब्दों से नाम लेते हैं।
यातेरे हमें पत्र लिखते हैं तो गद्य पद्यमय लेखों से अलकृत
।
-- करके लिखते हैं। इस ढल के पत्रों में एक यह है, जिसके प्रेपक महाशय को हम जानते भी नहीं है। : "श्रीयुत कविकुल-मुकुटमणि, पडितवर, हिन्दी भाषा भूषण, प्रतिभारतेन्दु रसिकराज, श्री प्रतापनारायण मिथ समापेषु निवेदन मिदम्- हेमापाचार्य! "आपसे हिन्दी भाषा-वृहस्पति की स्तुति मुझ सा मदमनि क्या कर सकेगा? नहीं नहीं नहीं! फिर वस! उस परम हदयगम विषय की इतिधी यहीं सही! "आपकी चमत्कृत कृति प्रापकी केवल एक ही पुस्तकं "प्रेमपुष्पावली" में देख पडी; पर उसके पढ़ने से मेरी प्रेम- सम्णा शतगुणित बढ़ी, अर्थात् आपके अनेक रसमय लेस्त्र देखने की प्रत्युत्कट इच्छा प्रगट हुई है। सो तृप्त करना आप ही से महाशयों का काम है। "अब मेरी आपसे इतनी ही विनती है कि आपके समान लेख, जो "ब्राह्मण," पुस्तक, अथवा अन्यत्र प्रकाशित हुए हों सो सय इस पत्र के देखते ही 'येल्यूपेयिल पोस्ट' द्वारा इस पते पर भेजिए, और अपना अद्वितीय पत्र "प्रामाण" भी सवय भेजा कोजिए" कोल्हापुर आपका दासानुदास, २६-३-८ रायसिंह देव वर्मा। पता--रावसाहय रायसिंह रावस्टेट सरयेयर कोल्हापुर, (Decian) इन्हीं राप साहब का दूसरा पत्र नीने मेश्वर मेसे सज्जनों का भला करे । हम सुशामदी नहीं है कि . - -- - ( ५८ ) किसी की झूठी प्रशसा करके कुछ ऐंठा चाहें, पर हम कृतम भी मही हैं जो अपने हितैपियों को धन्यवाद न दें! इन पत्रों से लोग समझ सकते हैं कि साहदय, प्रेमी, उदार और सई सजन "ब्राह्मण" को फैसा समझते हैं- "खस्तिश्री कविकुल गौरव, भाषाचार्य, प्रतिभारतेन्दु, रसिकमडलीमंडन श्री प्रतापनारायण मिश्र समीपेषु निवेदन मियम्-हे प्रेमदेव भक्तशिरोमणे। "आहा हा ! आनन्द ! आनन्द !! आनन्द ! सहदयों ने काव्यानन्द को "परमानन्द सहोदर" कहा है, सो सत्य है ! धन्य आज का दिन ! धन्य श्राज की घडी ! कि जिसमे "ग्रामण" की धगी (पारसल) आन पहुंची । खालके देखते ही उसके चतुर्थ लंड की द्वितीय सख्या हाथ लगी। प्रथम पृष्ठ ही पर "द" देखकर पढना प्रारम किया ! क्या कर, उसकी लिखावट को कुछ कहते धनता ही नहीं। ऐसी अनूठी हिन्दी पद्मिनी मैंने-अर्थात् महाराष्ट्ररूपी हफ: सान बासी हतभागी ने कि जो सदा सर्वदा काली कलूटी, कुरुपा हिन्दुस्तानी, जो न हिन्दी न मुसलमानी, मुंह में खाने की निशानी देखता भालता और वोलता है-काहे को कभी' देखी थी! "महाशय आपको तो "की दास्तान दुःसह जान पडी, पर मुझको तो उसने ऐसे रूप, रग, राव, चाव, हाव, भाष दिनलाए कि मेरा मन भ्रमर सव सुध भूल गया ।वह प्रत्यक्षर में मधुपान करते २ छक गया। यहां तो ऐसी उलटी गति चल निकली कि"या कांटेमो पाय गडि लीन्हीं मरत जिप्राय"! "८" की जादूमरी दास्तान दूर होते ही 'उर्दू धीवी की पूजी' देख पड़ी। उस सडी देसवा के अन्दर की भीतरी पोल . 4 -
( ५ )
जान एसी, और उसी के साथ नागरी देवी की प्रभा खुल
पडी । द्वितीय संख्या अधूरी छोड तृतीया को हाथ में लिया।
मयम पत्रके उलटते ही नागरी की "मी" पर टिपही, फिर
क्या पूछना ? नागरी गुण-प्रागरी की मन मोहफता खयर
पडी पसअप तो मेमन्यधन में यध गए। अब न इससे
दुटकारा है, न कुछ धारा है !
"मेरी प्रेमेच्छा इस प्रेमाधिकारी "बामणा के गरते पड़ी।
मैं हझा धमा हो मुह ताकते ही रह गया । जय होश में आया
तर रस (प्रेमेच्छा) से फहा हे निमजे कुछ वो धीरज
धरती, थोड़ा तो विचार फरती, भरी गवारी कहा तो यह
प्राक्षणोचम, और कहा तू 'क्षत्रालजा, लघुतमा' 'कहां राजा
भोज कहां भोजवा तेली' | उसने (अर्थात् प्रेमेच्छा ने) उत्तर
दिया कि "क्यों कलिकाल के फेरे में पडकर प्रेमरस में विष
मिलाते हो ? प्रय, क्षत्र का मूल तो एक है न । आज तक
कितनी पत्र-कन्याए प्रमादागिनिया होती आई है। तिस पर
इस मेम पथ में जात पान का खेडा क्या ?
"इसके सुनते ही मैं निरुत्तर तो हुवा सही, पर इसादुरले
पतले 'ब्राह्मण' का डील-डौल देखके और उसके दुखोद्गार
सुनके सशंक होके मैंने कहा, "अरी लडकी ! इस परदेशी
बिजवर का कुम्हलाया हुया कमल-बदन भी देनती है कि
उसके प्रेम ही पर लटू हो अपना सर्वस्व खोती है । यह वो
अय तय का हो रहा है, क्यों नाहक सौभाग्य के साथ ही
धंधव्य को धुलाती है ? तेरे लिलार ही में पति का सुख नहीं
लिखा सो तुझको कैसे प्राप्त होगा? इससे तो सदा कुमारी
हो रहना बेहतर है।" पालिका बोल उठी-"क्यों ऐसे कुतर्क
करते हो ? सावित्री के पति प्रेम पुनीत्व हो ने उसके माया
।
- 1 . ॥ J - (६०) प्यारे को जमजाल से छुडाया था, परन् दीर्घायु कर छोडा था। फिर मेरे भाग्य का लिखा तुमने कैसे बचा ? प्रेमदेव की कृपा से मेरा भी अहिवात अवश्य ही अचल होगा, यस हो चुका, टटरा मिटा "हे प्रेम सवस्व प्रताप मिश्रजी आपके घालण' अपी पुत्र पधू मेरी हदयजा प्रेमेच्छा हो चुकी। लीजिए, यह मेरी लाली पाली हुई बालिका आपकी सेवा में भाती है । यद्यपि आप कनौजिया है तो भी 'दहेज' की आशा छोड इस प्रेम विवाहिता पतोहू को प्रेम पुरस्सर स्वीकार कीजिए । भर आप हमारे समधी ठहरे, इसलिए इस बार प्रथम भेट आपके लिए पांच रुपया भेजता है, और अपने दामाद' (अर्याद 'प्रामण') के वास्ते हर साल पांच से पचासतक दिया करूगा, क्योंकि अपनी यालिका आपके वाले की है। अब आपको भी यही उचित है कि अपने पुत्र का पूर्णोत्साह से प्रतिपादन करें, नहीं तो भापके माथे ब्रह्म हत्या तथा पुत्र हत्या का पातक पढ़ेगा। जन्म देना सहज है, पर उस जन्मे हुएं का भरप. पोषण, प्रतिपालन करना परम कठिन है। "यद्यपि मुझको दो ढाईसौ रुपया मासिक मिलता है, सथापि बड़ा परिवार रहने के कारण आय-व्यय बराबर हो जाता है। नहीं तो मैं अकेला ही अपने दामाद को पोसता। अस्तु, यह प्रेम-कहानी यही समाप्त करता है। इस तुम्तम खेल को यदि माप छापना चाहे तो शुद्ध करके छापें ।" आपका परम हितेन्दु- प्रेम दासानुदास, रायसिंह देव वर्मा। कोल्हापुर (दक्खिन) - .
-
परम धन्य है ऐसे पुरुष रत्नों के पवित्र जीवन को सो
मांगरी-देवी के इतने बढ़े चढ़े मक है, और प्रेम के इतने
तरवा है कि एक एक लेख पर इतना शीघ्र प्रेम जाण में फस
जाते हैं। धन्य प्रेम
यद्यपि हमें अपनी ओर से कुछ भी आशा नहीं है, पर
हम प्रेमी है, इससे पढ़ विश्वास रखते हैं कि महानुभाष राष
माइए की मेमेच्छा-देवी के फेवल आशीर्वाद से 'माह्मण' के
चिरायु होने की कोई सूरत निकल आना माश्चर्य की बात
पाच या पचास के लिए हाथ फैलाते हमें लज्जा आती
है, पर ऐसे प्रेम से कोई एक कौडी भी दे तो हम क्या है,
शायद परमेश्वर भी हाथ पसारके संगे ! दूसरा पांच हज़ार
भी दे तो हम माजकल की सी दशा में ले तो लेते, पर इस
पाप से कमी न लेते, पयोंकि हम प्रेम-भिक्षुक है।
"ब्राह्मण को रन्द करने में परमेश्वर साक्षी है कि हमें
पुत्रशोक से कम शोक न होगा, पर हत्यारे नाविहन्दों ने हमें
लाचार कर दिया है। इसकासविस्तर हाल "ब्रह्मघाती" नामक
पुस्तिका में लिख रहे है, पर दो महीने बाद छपावेंगे।
ममी इससे नहीं छपा सकते कि शायद पीछे से दो चार
नाम काटने पडें । "प्राक्षब" को जिस तरह भाजतक चलाया
है, हमी जानते हैं।
सहदयों और प्रेमियों का प्राय-व्यप तो सदा ही बराबर
हो जाता है। रुपया जोडने के लिए चाहिये-धर्म, कर्म,
बज्जा, प्रतिष्ठा, प्रामोद, प्रमोष, शील, संकोच सर मासे पर
रख दिये जाय, सो प्रेम सिखाती सेदोनहीं सकता।
। (६२) इम कदापि नहीं चाहते कि कोई महाशय अकेले "ग्रामय का भार अपने माथे ले लें, पर केवल हमारे ही माथे रहना भी असध है। यदि कोई भी सचमुच कटी अगुली पर मूतने पाला होता तो हम क्यों झीखते । परमेश्वर रावसाहब का मला करें, जिन्हों ने हमें इस महाविपत्ति में सहारा दिया। इम ऋपि नहीं हैं कि अपनी स्तुति से प्रसन्नान हो, हम ऐसे बौडम, उजडु, असभ्य नहीं है कि अपने दयालुओं को धन्यवाद-आशीर्वाद न दें। हमारा उत्साह बढ़ता है, और चित्त को चाव होता है कि हमारे गुणग्राहक भी हैं; और- साधारण लोग नहीं घडे २ सत्पुरुष हम पर अनुग्रह करते. हैं ! बहुत थोडे से, पर बडे बडे लोग हमें नीचा दिखाने की फिक में भी रहते हैं। हम पर साह भी करते हैं ! पर हमारे हृदयविहारी की दया से आजतक कुछ कर नहीं सके ! यद्यपि हमको देव ने इतनी सामर्थ्य नहीं दी कि हम अपने मनोर्थ को ठीक २ पा सके, पर इस दीनहीन दशा में हम कुछ है, इसका कारण जहा तक सोचते हैं यही पाते हैं कि प्रेम के रोअक्षर! और कुछ नहीं अहह ! पया क्या करूं मैं शुक्र खुदाए यखशा है मुझ फकीर को तया अमीर का। धन्य, प्रभो !! प्रेम देव ॥ दीर का, 1 । ( ६३ । वाजिदअलीशाह । हाय ! आज इमी नहीं रो रहे हैं, हमारी लेखनी का भी हदय विदीर्ण हो रहा है ! मसी मत समझो, मारे दुख के उन्माद दोरहा है, इससे रक्त काला पड़ गया है, और आसुओं के साप नेत्र-द्वारा यहा जाता है ! हमारा कानपुर यवनों का मगर नहीं सही, पर लखनऊ यहां से दूर नहीं है, परच यहां से सहस्रो सम्बन्ध रखता है। फिर क्यों न लपनऊ के साथ इसे भी शोक हो । सम्पादक और उसके मित्र श्री यायू राधे- ताल प्रादिक कई लोग प्रत्यक्ष प्रभु-वर्षा कर चुके हैं। यह पात किसी के देखाने को नहीं, घरंच हृदय के सच्चे सताप से थी। हाय शाह वाजिदमलो ! हा मुलताने आलम ! हा अस्त्र- तर! हाय सूर्य अवध के कन्हैया । तुम हमारा शासन न फरते थे, तुम हमारी जाति के न थे तो भी, हमारा यावशाह कलकत्ते में बैठा है, यह स्मरण हमारे लिए सन्तोषजनक था। तुम्हारा अत करण हमसे ममता रखता था, इसमें कोई सन्देह नहीं। पर हाय ! दुष्ट देव से इतना भी न देखा गया, मूर्ख, सुशामदी और अपने दुर्गणों से भी पराए सद्गुण तक को तुच्छ समझनेपाले चाहे जो कुछ मस्र मारें, पर हम मली भांति जानते है कि तुम्हारे पोप भी मनुष्य जाति की अपूर्व शति से अधिक कुछ न थे। तुमने अपनी प्रभुता के समय हिन्दू मुसलमान दोनों को अपनी प्यारी प्रजा समझा है में यह तुम्हारा एक गुण ऐसा है कि यदि तुम सचमुच सहस्र दोष भी होते तो भस्म कर देता । जो मूर्ख और दुष्ट लोग अपने मतवालेपन से दूसरों के पूज्य पुरुषों की निन्दा
.
( ६४ )
और उनसे घृणा किया करते हैं उनसे तुम लाबी कोस दूर थे।
साइनों लोगों का रक रहेगा, सहस्रों ललनाओं का अहिकात
जाता रहेगा, इस भय से अपने तई प्रसन्नतापूर्वक दूसरों के
हाथ में सौंप दिया। यह गुण तुम्हारा हमारे हृदय को
प्रफुल्लित करता है। गुण-ग्राहकता, आश्रित पोपकता और
दुःख-सुख दोनों में एकरसता आदि के कारण तुम प्रेम
समाज के प्रातस्मरणीय हो। सितम्बर की २१ तारीख तुम्हारे
चियोग का दिन है, अतः सहदयों को दुःप्रदाई होगी। कहां
तक लिखें, शोफ के मारे तो अधिक विषय सूझते ही नहीं।
इस दशा में भी सहस्रों के पेट तुम्हारे अनुग्रह से पलते थे,
धाय आज उनके चिर की क्या दशा होगी !!
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7 द्वितीय परिच्छेद। सामयिक लेख। , स्वतंत्र। हमारे बाबू साहब ने यरसों स्कूल की खाक छानी है, पोसियों मास्टरों का दिमाग चाट डाला है, विलायतभर के अन्य चरे बैठे है, पर श्राज तक हिन्द्री, जियोग्रफी आदि रसाने में विद्या-विभाग के अधिकारीगण जितना समय नष्ट फराने हैं, उसका शताश भी स्वास्थ्य रक्षा और सदाचार शिक्षा लगाया जाता हो तो वतलाइए! यही कारण है कि जितने पो० ५०, एम० ए०, देखने में आते हैं उनका शरीर प्राय पेमा ही होता है कि चाधी आवै तो उड जाय। इसी कारण उनके पडे २ वयालात या तो देश पर कुछ प्रभाव हो नही डालने पाते या उलटा असर दिखाते हैं। क्योंकि तन और मन का इतना दृढ सम्बध है कि एक बेकाम हो तो दूमरा भी पूरा काम नहीं दे सकता, और यहां देह के निरोग रखने- पाने नियमों पर प्रारभ से याज तक कभी ध्यान ही नहीं पहचा । फिर फाया के निकम्मेपन में क्या सन्देह है, और ऐसी दशा में दिल और दिमाग निर्दोष न होतो मायर्य क्या है! ऊपर से आपको अपने देश के सल-वायु के मनुकुल माहार- N 5
।
।
विहार आदि नापसंद ठहरे। इससे और भी तन्दुरुस्ती में नेवर
का शाप लगा रहता है। इस पर भी जो कोई रोग उमड
आया तौ चौगुने दाम लगाके, अठगुना समय गयाके
विदेशी ही औषधि का व्यवहार करेंगे, जिसका फल प्रत्यक्ष
रूप ले चाहे अच्छा भी दिखाई दे, पर वास्तव में धन और
धर्म ही नहीं, घरच देशीय रहन सहन के विरुद्ध होने से
स्वास्थ्य को भी ठीक नहीं रखता, जन्म रोगीपने की कोई न
कोई डिग्नी अवश्य प्राप्त करा देता है।
यदि सौ जटिलमैन इकटे हों तो कदाचित् ऐसे दस
न निकलेंगे जो सचमुच किसी राजरोग की कुछ न कुछ
शिकायत न रखते हो। इस दशा में हम कह सकते हैं कि
के
आप रूप का शरीर तो स्वतन नहीं है,
हाथ का खितौना है। यदि भूख से अधिक डयल रोटी का
चौथाई भाग भी खा ले वा प्राडी देवी का चरणोदक आधा
आउस भी पी लें तो मरना जीना ईश्वर के आधीन है, पर
कुछ दिन वा घंटों के लिए जमपुरी के फाटक तक अवश्य
छो आवेगे, और वहा कुछ भेंट चढाए और 'हाहाका
गीत गाए बिना न लौटेंगे। फिर कौन कह सकता है कि
मिस्टर विदेशदास अपने शरीर से स्वतत्र हैं ?
ओर सुनिए, अब वह दिन तो रहे ही नहीं कि देशक
धन देश ही में रहता हो, और प्रत्येक व्यवसायीको निश्चय
कि जिस घर्प धधा चल गया उसी पर्प, वा जिस दिन वाम
प्रसन्न हो गया इसी दिन, सब दुख-दरिद्र 'टल जायगे।
तो वह समय लगा है कि तीन साओ तेरह की भूम सभी
बनी रहती है। रोज़गार-व्यवहार के द्वारा साकरण रीति
डाकर साइब
1
निर्याह होतारहे, यही यहुत है । विशेष कार्यों में व्यय करने के
अवसर पर आज कस सैकडा पीछे दश जने भी ऐसे नहीं
देख पहते जोचिंता से व्यस्त न हो जाते हो। इस पर भी
हमारे हिन्दुस्तानी साहय के पिता ने सपूतजी के पढाने में
मली चगी रोकड उठा दी है।
इधर आपो जर से स्कूल में पाव रक्खा है तभी से
पिलायती वस्तुओं के व्यवहार की लत डालके खर्च बढ़ा
रक्खा है । यो लेफचर देने में चाहे जसी सुन लीजिए, पर
बर्ताव देखिए तो पूरा सात समुद्र के पार ही का पाइएगा
इस पर मी ऐसे लोगों की सख्या इस देश में अब बहुत नहीं
है, जो धाए धूपे बिना अपना तथा कुटुम्य का पालन कर
सकते हो। इससे बाबू साहब को भी पेट के लिए कुछ करना
पसता है, सो और कुछ न कर सकते हैं, न करने में अपनी
रजत समझते हैं। अन हेर फेरफर नौकरी ही की शरण
धमत्ती है। यहा भी काले रंग के कारण इनकी विद्या बुद्धि
फा उचित आदर नहीं। ऊपर से भून के बिना भोजन करने
में सास्थ्य नाश हो, थाने के पीछे झपट के चलने से रोगों
की उत्पति हो, तो हो, पर डिउटी पर ठीक समय में न
पहुचें तो रहे कदा?
पाजे २ महकमों में अवसर पडने पर न दिन छुट्टी न
रात छुटी, पर छुट्टी का यत्त करें तो नौकरी ही से छुट्टी हो
जाने का डर है। इस पर भी जो कही मालिक फडे मिजाज
का युवा तो और भी कोद में साज है, पर उसकी मिडफो
आदि न पाएं तो रोटी ही कहां से साएँ ? यह छूते
न भी हो तो भी नौकरी की जड़ कितनी ? ऐसी २ पाते
"
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(६८)
घटुधा देखकर फोन न कहेगा कि काले रग के गोरे मिजाज
वाले साढ्य अपने निर्वाहोपयोगी कर्तव्य में भी स्वतत्र नहीं हैं।
अव घर की दशादेखिए तो यदि कोऊ औरयडा बूढाटुवा.
और इनका दयल न हुवा तौ तो जीभ से चिट्टी का लिफाफा
चाटने तक की खतत्रता नही। बाहर भले ही जाति, कुजाति,
अजाति के साथ मच्छ, कुभच्छ, अभच्छ भच्छन कर आय पर
देहली पर पाव धरते ही हिन्दू प्राचार का नाट्य न करें तो
किसी काम के न रवखे जायें। बहुत नहीं तो वाफ्य-बाणों ही
से छेदके छलनी कर दिए जाय । हयादार को इतना भी
घोडा नहीं है। हा यदि 'एक लज्जाम्परित्यज त्रैलोश्य विजयी
भवेत्' का सिद्धान्त रखते हो, औरयाने भर को फमा भी लेते
हा वा घर के फरता धरता आपही हों तो इतना कर सकते
है कि ययुआइन कोई सुशिक्षा दें तो उनको डांट लें, पर यह
मजाल नहीं है कि उन्हें अपनी राह पर ला सके, क्योकि
परमेश्वर की दया से अभी भारत की कुलांगनाओं पर कलि
युग का पूरा प्रभाय नहीं हुवा । इससे उनमें सनातनधम,
सत्कर्म, कुलावार, सुव्यवहार का निरा प्रभाव भी नहीं है।
आप-सम्रप भले ही तीर्थ, प्रत, देव, पितर आदि को
दुलन ममझिए पर वे नगे पाव माघ मास में कोसों की
थकाइट उठाकर गंगा-यमुनादि फा स्नान अवश्य करेंगी,
हरतालिका के दिन चाहे बरसों की रोगिणी क्यों न हो, पर
अन्न फी कणिका वा जल की वृंद कभी
गमनोमी, जन्माष्टमी, पितृविसर्जनी श्रादि माने पर, चाहे
जैसे हो, थोडा बहुत धर्मात्सम अवश्य करेंगी। सच पूछो तो.
मार्यत्व की स्थिरता में घदी भनेकाश श्रद्धा दिखाती हैं, नहाँ
में न धरेगी,
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(६६)
आपने तो छन्धीसाक्षरी मंत्र पढकर चुरुटाग्नि में सभी कुछ
स्वाहा कर रक्सा है।
यद्यपि गृहेश्वरी के यजन-भजन का उद्देश्य प्राय भाप
ही के मगलार्थ होता है, पर आप तो मन और वचन से इस
देश ही क न ठहरे। फिर यहावालां के प्रातरिक भार कैसे
समझे ? बन्दर की ओर घरफी लेकर हाथ उठाओ तो भी वह
देला ही समझ कर पी, खी, करता हुआ भागेगा ।
विचारी सीधी सादी अवला याला ने न कभी विधर्मी शिक्षा
पाई हे, न मुह सोलके कमी मरते २ भी अपने पराए लोगों
में नाना भाति की जटल्ले फहने सुनने का साहस रखती हैं।
फिर बाबू साहय को फैसे लेक्चरबाजी करके समझा दें कि
नोता मेना तफ मनुष्य की योली सीसके मनुष्य नहीं हो
जाते, फिर आपही राजभाषा सीख कर कैमे गजजातीय हो
जायगे १ देह का रग तो बदल ही नहीं सकत, माद सब बातें
पों पर यदल लीजिण्या ? हा, दूसरे की चाल चलकर
कृतकार्य तो कोई टुचा नहीं, अपनी हसी कराना होता हे यही
फरा लीजिए।
अब यहां पर विचारने का स्थल है कि जहा दो मनुष्य
न्यारे २ खभाव के हो, और एक की यातें दूसरे को घृणित
जात पडती हो यहा चित्त की प्रसन्नता किस प्रकार हो सकती
है । स्त्रीचाहे धर्म के अनुरोध से इनकी कुचाल फा सान भी
कर ले, पर लोक लज्जा के भय से गले में हाथ डाबके सैरतो
कभी न करेगी, और ऐमा न हुआ तो इनका जन्म सफल
होना असमव हे ' इससे मन ही मन कुढने वा पात २ पर खौ
गियाने के सिवा कुछ धन नहीं पडता, फिर कैसे कहिए कि
माप अपने घर में खतम
।
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कहिए, अपने निरके एक बाल को इच्छानुसार का करने में खतन नहीं, जिबर देगो परतन्त्रता ही दृष्टि पहनाई पर आप अपने को खतत्र ही नहीं, घरच सतनता का मला और प्रचारकर्ता माने बैठे है! क्या कोई यतला सकता है। हां, हमसे सुनो, आप वेद-शास्त्र पुराणादि पर राय देने वतन है, सस्कृत का काला अक्षर नहीं जानते, हिन्दी के साहित्य को खार धूल नहीं समझते, पर इसका पूरा सार्थियों को गढ़ी दुई भूठी कहानिया है, धर्मशास्त्र में प्रार का पक्षपात भरा हुआ है, ज्योतिष तथा मन्त्र-शास्त्रादि विद्या है। ऐसी २ चे सिर पैर की सत्यानाशी रागिनी पने में स्वतत्र है । यदि ऐसी बातें इन्हीं के पेट में बनी रहे आत्मिक रोगी भी देश में पड़े हैं, उनके लुढ़कते ही व जहानपाक' हो जायगा। पर यह खतत्रताके भुक्खड व्याय ओर तेत्रों के द्वारा भारत-सतानमात्र को अपना मी नहीं हो सकती, पर जो इन्दी के से फधी खोपड़ी (७२) में खनन नही, कोई प्रवल मनुष्य, पशु पा रोगका के जान यचाने में पता नहीं, मरने जीने में पता नहीं, कई यह माया-गुलाम साहव किस बात में स्वतन्त्र हूँ? रखते हैं कि वेद पुराने जगलियों के गीत हैं, या पुत्र भी अधिक भय नहीं है, समझनेवाले समझ यनाने में लयन रहते हैं, यदी थडी भारी खाध है। यद्यपि इनके मनोरयो की सफलता पूरी श.. m- कि थोडे - विलायती दिमागले हैं चायफवास सुनते ही गेली चाल में घट हो जाते हें, और 'याही ऊपर से भैया आगया फा .. रीति से ऐसों की सख्या बन बैठते बढ़
( ७३ )
म्भव है कि योही ढचरा चला जाय तो और भी बढकर
परतीयत्व के पक्ष में बुरा फल दिसावै।
वहीं विदेश के बुद्धिमान तनिक भी हमारे सद्विद्या-भडार
से परिचित होते हैं तो प्राचीनकाल के महपियों की बुद्धि पर
बलि २ जाते हैं, परंच बहुतेरे उनकी प्राज्ञा पर भी चलने
लगते हैं, और इसके पुरस्कार में परमात्मा उन्हें सुख सुयश
का भागी प्रत्यक्ष में बना देता है, तथा परोक्ष के लिए अनन्त
मनल का निश्चय उनकी आत्मा को श्राप हो जाता है। यह
खकर भी जिन हिदू फी आखे न मुले, और इतना न सूझे
कि जिन दिव्य रत्नों को दूर २ के परीक्षक भी गौरव से
देखते हैं, उन्हें फाच यतलाना अपनी ही मनोडष्टि का दोष
दिखलाना था अपने अग्रगन्ता की अतिमानुपी बुद्धि का
वैभव जतमाना है. और जो ऐसा साहस करने में संवत्र
बनता है उसके लिए विचारशीलमान कह सकते है कि यह
स्वतत्रता एक प्रकार का मालोमूलिया (उन्माद) है, जिसका
लक्षण है--किसी यात घा घस्तु को कुछ का कुछ समझ लेना,
वापिन जानीयात में अपने फोशाता एवशक्ति से बाहर काम
करने में समर्थ मान बैठना।
यह रोग यहुधा मस्तिष्क-शक्ति की हीनता से उत्पन्न होता
है और बहुत काल तफ एक ही प्रकार के विचार में मन
रहने से बद्धमूल हो जाता है। आश्चर्य नहीं फि स्वतम देश
के पतनाचारियों ही की बातें लड़फपन से मुनते २ और
अपनी रोति नीति का कुछ शान गौरव न होने पर दमरों के
मुग्न से उनकी निन्दा सहते २ ऐसा भ्रम हो जाता हो कि हम
स्वतत्र है, तथा इस स्पतत्रता का परिचय देने में और टीर
सुभीता न देखकर प्रायोख पुस्तकों ही के सिद्धान्तां पर मुह
3D
( ७४ )
मारना सहज समझकर ऐसा कर उठाते हो। इससे हमारी
समझ में तो और कोई स्वतत्रता न होने पर केवल इसीरीति
मी स्वतत्रता को दिमाग का खलल समझना चाहिए । फिर
मन्ना जिनके विषय में हम इतना यक गए यह बुद्धि विभ्रम के
रोगी है या स्वतत्र है?
परतत्रता के जो २ स्थान ऊपर गिना आए है उस ढंग के
स्थलों पर स्वतत्रता दिखावे तो शीघ्र ही धृष्टता का फल मिल
माना है। इससे स्वतंत्र नहीं बनते। यदि परमेश्वर हमारा कहा
माने तो इम भनुरोध करें कि देव, पितृ, धर्म-ग्रन्यादि की निन्दा
जिस समय कोई करे उसी समय उसके मुंह में और नहीं तो
एक ऐसी फुडिया ही उपजा दिया कीजिए, जिसकी पीड़ा से
दो चार दिन नींद भूख के लाले पडे रहें,अथवा पचों में हमारा
चलता हो तो उन्हीं से निवेदन करें कि निदकमात्र के लिए
जातीय कठिन दड ठहरा दीजिए, फिर देखें बाबू साहय फैसे
।
स्वतत्र है।
,
इनकमटैक्स।
यदि इस शब्द का यही अर्थ है कि "श्रामदनी पर महसूल"
दोन जाने हमारी सरकार ने हम लोगों को किस श्राय की
वृद्धि देखी है जा यह दुःखद् फर बाधा हे । पुराने लोगों से
सुनते हैं कि "उत्तम खेती मध्यम यान अधम चाफरो भीष
निदान", पर इस काल में यह कहावतपूर्ण रूपसेउलट गई है।
खेती की दशा पर हमें कुछ लिपने की आवश्यकता नहीं है।
जो चाहे दिहात में जाके देख ले, विचार कृषिकारों के यारहो
मास दिन रात के कठिन परिश्रम करले और 'नीद नारि
मोजन परिहरई' का ठीक नमूना बनने पर भी पेट भरना
कठिन हो रहा है। क्या जाने, किसी भविष्यत्-शानी कवि ने
माजकल की दशा पहिले मे सोवफे मद्य और विष पान
करने के परावर ही हल-ग्रहण को भी त्याज्य समझा हो, और
"हालाहल हलाहलम्" लिखा हो।
उससे उतरके व्यापार समझा जाता था, सो कुछ कहना
ही नहीं। हर शहर के प्रत्येक जगारी की दशा मरकार को
हम यों नही समझा सकते, जय तक न्याय दृष्टि से स्वयम्
कुछ दिन किसी बाजार का वह गुम रूप न देखें । हम जितनी
यडी २ दुकानें देखते हैं सभी भांय २ होती है। जिन्होंने हजारों
रुपया अटका दिया है उनको ब्याज भी कठिन हो रहा है।
दिवाले निकलना खेल सा हो गया है। अमीर फदाते हैं ये
की सैकडा दो तीर से अधिक न होंगे, जिन्हें रोजगार पेरे
कुछ मिल रहता है, नहीं तो फेषल पूर्न सश्चित द्रव्य ही से
पुरानी सान बाधे बैठे है। ऐसा कोई कार ही नहीं, जो
सरकार ने निज-इस्तगत न कर लिया हो। इस हालत में
( ७६ ) चि चारे छुटभइये लाइसेन्स और चुगी के दर से, पहिले तो कुछ करी नहीं सकते, यदि कुछ फरें तो तीन खाते है तेरह की भूरा पनी रहती है। हमारा कानपुर जो अब से दस वर्ष पहिले था, अब नहीं रहा । यह तो रोज सुन लीजिए कि बाज फलाने बिगड़ गये, पर यह सुनने को हम मुद्दत से तरसते है कि इस साल फलाने इस काम में वन वैठे । जय आमदनी के इन उत्तम और मध्यम मार्गों की यह दशा है तो सेवा वृत्तियों का कहना ही क्या, सैकडों पढे लिखे मारे २ फिरते ई, यिना सिफारिश कोई संत नहीं पूछता । कुछ मिडिल क्लास की पस, कुछ येकदरी के यायस से विचारे चावू लोग महगी कैसे मजदूर उतराते फिरते हैं । कहार ढूढो तो मुश्किल से मिलें, नाच वाच के लिए वेश्या बडे नखरे स आवे, पर हमारे 'इन्लाइटेन्ड' भाई से झूठ मूठ भी कहि देव कि फलानी जगह एक हेड की जरूरत है. बस, एक के बदले पचास, चुगा फलकारते, मुरैठा सम्हा. लते मौजूद हैं। अगले लोग जिस नौकरी फो निकृष्ट-वृत्ति और शूद्र का काम समझते थे उसकी लालसा यडे २ वाजपेयी ऐसी रखते हैं जैसी मतवाले भाई मुक्ति की न रखते होंगे। वह नौकरी जिनको महादेवजी की दया से मिल भी गई है, उन्हें घबुआई की उसफ मार डालती है । सुनते हैं. आगे चार रूपया महीने का नौकर अपने कुटुम्ब के सिधा यो सार और आश्रितों का भरण-पोषण कर लेता था, पर हमको इस का निश्चय क्यों फर हो, जय देखते हैं कि सौ२ दो दोसी के नौकर भी, राम झूठ न बुलाथै, सो पोछे पचहत्तर तो अवश्य ऐसे होंगे जिनको हज़रत गालिय फा यह पाश्य अनुभूत सिसान्त है:- । । 1 - 4 - - "यस कि लेता है हर महीने कर्ज, और रखती है सूद को तफरार, मेरी तनखाह में तिहाई का, हो गया है शरीफ साहकार"। तो भी धन्यवाद हे कि नितिहरों और लालों से फिर भी पाबूजी धावू तो कहाते हैं। हा, प्रोहत, पाधा, पडा और गया पात इत्यादि की दशा कुछ अच्छी कह सकते थे, क्योंकि उन्हें घेमेहनत घर बैठे लक्ष्मी भाती है, और हमारी उपर्युक्त लोकोक्ति भी यो ठीक होती है कि- "उत्तम मिक्षा वृत्ति है, फिरि धघुथाई जान, अधम बनिज वैपार है, पेती योटि निदान" । पर नहीं, जय यह विचार होता है कि कृषक, व्यापारी अथवा सेवकों की यही गति रही तो कहा से किसी को कुछ दे सकेंगे। घस, अब हमारा यह सिद्धान्त सत्य होने में किसी को कुछ सन्देर न होगा कि जितना दरिद्र मुसलमानों के मातसी वर्ष के प्रचण्ड शासन द्वारा न फैला था, उतना, घरच उससे अत्यधिक, इस नीतिमय राज्य में विस्तृत है । अब यतलायो, पाठकगण । इनकमटैक्स का फोपस्य अथं ठीक है या नहीं? नहीं, इसका अर्थ यो न - लगेगा। अग्रेजी व्याकरण सोलो, उसमें लिखा है कि "इन "न" और "डिसा किली शब्द के प्रथम जोड दो तो उलटा अर्थ हो जाता है | Direct साइकृ-पीघा, Indirect इनडाइरेक-जो सीधा न हो, Known नोनशात, Unknowa अननोन-अज्ञात, Mount माउन्ट-बदना, डिसमारन्ट-उतरना, इस रीति से in इन, अर्याद नहीं है, come कम-साना- " (७८ ) आमद, Tax (टैक्स) कर । भावार्थ यह हुमा कि जिस हालत में आमदनी न हो उसमें जो टैक्स लगै वह "इनकमटैक्स है! इस पर यदि हमारे अग्रेजी जाननेवाले पाठक यह कहै कि ऊट- पटांग अर्थ किया है, और केवल नागरी-नागर समझे कि धन्य भाषा का अर्थ असम्बद्ध है, हिन्दी पत्र में क्यों लिखा १ उनको यो समझना चाहिए कि हमारी सरकार को ब्रह्मदेश की आमदनी अनायास हाथ लगी है, इसकी मुशी में हम पर यह टैक्स (बहुत खुश हुए तो इंट फेंक मारी,) न्यायेन लगाया गया है। कुछ हो, हम समझे वा न समझे, पर सरकार की किसी यात में रोना चिल्लाना चा तर्क करना योग्य नहीं, केवल "इफिनेच्छा वलीयसी कहके सतोष करना चाहिए था, पर क्या करें, सम्पादक धर्म तो परम कठिन है। इसमें विना कुछ कहे उमग की हत्या होती है। इससे कोई सुने घान सुने, पर हम हाथ जोडके, पायं पडके, दाँत दियाके, पेट सखाके यही विनय करते हैं कि अस्तु, हुश्रा सो हुआ, हमें क्या, जहा और सय प्रकार के राज दह हैं वहा एक यह भी सही, घरव और हो (परमेश्वर न करें) तोवह भी सदी, पर इसकी तशखील (जाच) जरा न्यायशील पुरुषों को सौंपी जाय तो भी बडी दया हो। हमने कई विश्वस्त लोगों से सुना है कि देहात में विचारो की वार्षिक आय पांच सौ भी नहीं है, उनको केवल उजले कपड़ों के कारण पांच हजार का पुरुष तजवीज़ करते हैं। यदि यही दशा रही तो भारत के गारत होने में कोई सन्देह न होगा। हमारी सर्कार स्वय विचार देखे कि अब हम वह नहीं रहे। 1
( ७६)
।
देशी कपड़ा।
मानव जाति का, खाने के उपरात, कपडे के बिना भी
निर्वाह होना कठिन है। विशेषतः सभ्यदेश के भोजना,
छादन, रोटो कपडा, नानो नफफ इत्यादि शब्दों से ही सिम
है कि इन दोनों बातों में यद्यपि पाने पिना जीवन रक्षा ही
असम्भव है, पर कपड़े के बिना मी केवल प्रतिष्ठा ही नहीं,
परब भारोग्य, एवं असम्भव नहीं है कि प्राण पर भी याधा
भावे पर खेद का विषय है कि हम अपने मुख्य निर्वाह
की वस्तु के लिए भी परदेशियों ही का मुह देखा करें। हमारे
देश की कारीगरी लुप्त हुई जाती है, हमारा धन समुद्र पार
खिचा लाता है इत्यादि विषय बहुत सूक्ष्म है, उस पर जोर
देने से लोग कहेंगे कि एडीटरी को सनक है, कविता की
अत्युक्ति है, "जिमि टिटिभ खग सुतै उताना" की नकल
है, पर हमारे पाठक इतना देख लें कि जय हमको एक वस्तु
असम चिरस्थायिनी और अल्प मूल्य पर मिलती है तो बाहर
से हम पद वस्तु षयों लें।
गृहस्स का यह धर्म नहीं है कि जय एक रुपया से काम
निकलता है तय व्यर्थ देढ उठाये । विसायनी साधारण
कपडा नैनसुख मलमल इत्यादि तीन आने से पाच आने
नज मिलता है, उसके दो अंगरखे सालगर पडी मुश्किल
से रखते हैं, पर उसके मुकापिले देशी कपडा (मुरादाबादी
बारखाना, फासगजी गाढा इत्यादि) तीन पाने गज का।
पहा यद्यपि, अरज़ कम होने के कारण, कुछ अधिक लगता
है, पर उसके दो अंगरसे तीन घर्ष हिताये नहीं हिलते। बाबू
लोग यह न समझे कि मगरेगी फैशन का कपडा नहीं मिलता,
.
-
(८०)
नहीं, बहुत से अच्छे अंगरेज भी अय यही पहिनते हैं । शौकीन
लोग यह भी न पयाल करें कि देशी फपदे में नफालत नहीं
होती, नही, ढाके की मलमल, भागलपुरो टसर और मुर्शिदा
बाद की गई थव भी अंगरेजी कपडे को अपने मागे तुच्छ
समझती है। अब येसा कोई तरह का कपडा नहीं हे जो न
बनता हो, और कुछ ही दिन लोग उत्साह दिखलावेतो न बन
सके। प्रयागराज में केवल इसी की पफ कोठी मौजूद है। हमारे
कानपुर के सौभाग्य से धीयुक्त लाला छोटेलाल-ायाप्रसाद
महोदय ने भी देशी तिजारत कम्पनी खोली है। यदि अब भी
इम नगर और जिले के लोग देशी कपडे को स्वय पहिनने
ओर दूसरों को सलाह देने में फसर करें तो देश का अभाग्य
समझना चाहिये।
हम और हमारे सहयोगीगण सिखते २ हार गए कि
देशोन्नति करो, पर यहावालों का सिद्धान्त है कि "अपना
भला हो देश चाहे चूल्हे में जाय", यद्यपि जर देश चूल्हे में जायगा
तो हम पच न रहेगे। पर समझना तो मुश्किल काम है 'ना।
सो भाइयो, यह तो तुम्हारे ही मतत्व की बात है। माखिर
कण्डा पहिनोहोंगे, एक बेर छमारे कहने से एक २ जोडा देशी
कपडा धनवा डालो। यदि कुछ मुभीतादेख पडेतो मानना, दाम
कुछ दूने न लगेंगे, चलेगा तिगुने से अधिक समयादेशी लक्ष्मी
और देशी शिल्प के उद्धार का फा संतमेंत । यदि भय भी
न चेतो तो तुमसे ज्यादा मकुधा कौन नहीं २ हम सर
अधिक, जो ऐसों को हितोपदेश करने में व्यर्थ जीवन खोते है!
।
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कांग्रेस की जय। श्रीयुत भीमजी जिस समय प्रयागराज में आकर सुशो. मित हुप थे, इस धापर को प्रेमपूर्ण होके कई येर उच्चारण किया था। काग्रेस के मध्य में भी सैकडो सज्जनों के मुख से यही मत्र उच्चरित हुवा था, और अत में इलाहाबाद स्टेशन पर तो यह शब्द आफाश को भेद गए थे। अहाहा! आजतक हमारे कानों और मानों में यही ध्वनि गज रही है, और रहरह- के मुह से यही निकलता है कि 'काग्रेस की जय' । क्यों न हो, काम साक्षात् दुर्गाजी का रूप है, क्योंकि यह देशहितपी देवप्रकृति के लोगों को स्नेहशक्ति से आविर्भूत हुई है, "देवाना दिव्य गुण विशिष्टाना, तेजोगशिसमुद्भया है। फिर, हम नाहह्मण द्वोके इसकी जय क्यों न वोले । प्रत्यक्ष प्रभाव यही देख लीजिए कि इसके द्वेपियों ने अपनी सामर्थ्यभर झूठ प्रपंच, छल-कपट कोई पात उठा न रक्स्त्री थी, पर- जस जस सुरसा बदन बढावा, तासुदुगुण फपि रूप दिखाया। अत में 'मत्यमेव जयते' इस वेद-वाक्य के अनुसार कांग्रेस का अधिवेशन हुवा, और ऐसा हुवा जैसी श्राशा न थी। स्वयं कार्याध्य लोग कहते थे कि हमने समझा था बड़ी हद हजार डेलीगेट आचेंगे, उसके टौर पर डेढ हजार मौजूद हैं। धन्य है, लोग समझे थे कि मुसलमान उसमें फभी न शरीक होंगे, सो एक से एक प्रतिष्ठित विद्वान,धनिक मुसलमान, अनु- मान तीन सौ विराजमान थे। बरंच बाजे २ नगरों से हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमान ही अधिक आए थे! मला इन बातों को आँखों देखके पा विश्वासपात्रों से सुनके कौन न कह उठेगा कि "काग्रेस की जय। सच तो यह है फि तीर्थराज N.6 ८ (२ ८२ ) में ऐसा समागम शायद भारद्वाज वाया के समय में हुधा हो, चीच में तो सुनने में नहीं आया। यो कुम्भादि के मेलों में हजारों की भीड़ होती है, पर कहारेशम के लच्छे, कहाझौवा भर झोथर" कहा कुपढ़ उजड्ड वैरागियों के जमघट, कहा थी अयोध्यानाथ, श्री मदनमोहन, श्रीरामपाल, उमेश, सुरेन्द्र सरीयों का देवसमाज' आहा । इस अवसर पर जिसने प्रयाग की शोभा न देखी उसने कुछ न किया। लूथर साहब के हाते का नाम हमने प्रेमनगर रक्पा था। क्योंकि लडके, बूढे, हिन्दू, मुसलमान, जैन, किस्तान, पश्चिमोत्तरदेशी, बंगाली, महाराष्ट्र, गुजराती, सिंधी, मद्रासी, फारसी, इगलिस्तानी सय के सब प्रेम से भरे झुए दृष्टि पाते थे। किसी प्रकार की कोई वस्तु किसी समय आपको चाहनी हो, किसी कार्यकर्ता से कह दीजिए, बस, मानो कल की लाई धरी है।सब के एक से पटमन्दिर, (डेरे) सब का एक विचार (देशहित) आमोद प्रमोद, सलाप समागम के सिवा किसी को कुछ काम नहीं । व्यायानालय में पहुंचने के सिवा कोई चिन्ता नहीं, इजारों की वस्तु अकेले डेरे में उाल आइए, सुई तक खो जाने का डर नहीं नहाने स्त्राने, सोने, बैठने, सैर करने आदि की किसी सामग्री का प्रभाव नहीं। तनिक शिर भी दुखे, वैद्य, हकीम, डाकर सर्व उपस्थित हैं। पास ही काग्रेस के बाजार में दुनिया भर की चीजें ले लीजिए । पास ही तन्बू के तले दुनिया भर के समाचार (श्रयवार) जान लीजिए, पास ही डाक के यम्वे (लेटरबाक्स ) में लिस के डाल दीजिए, आपका सारा हाल आपके सवन्धियों को पहुच जायगा । उसके पास ही डेरे में चले जाहए, अपने घर तरका नतजातलीजिए। , (८३) जहाँ व्याख्यान होते थे वह स्थान ऐसा सुदृश्य और नाना वस्तु तथा एक रन रूप की कुर्सियों से सुसजित था कि देखते ही बनता था। विशेषत. महात्मा राम इत्यादि पुरुप रत्नों के आने पर तथा किसी के उत्तम व्याख्यान में कोई चीज की बात आ जाने पर करतल ध्वनि ओर आनन्द ध्वनि के एव नाना रग रूमाल-नर्तन को शोभा देसके यही ज्ञात होता था कि हम सुरराज के मदिर में देव-समूह के मध्य यंठे हुए आनन्द समुद्र की लहरें ले रहे हैं । २६ से २६ ता० तक काग्रेस का महाधिवेशन रहा । इस अवसर में प्रति. दिन प्रतिछिन आनन्द को वृद्धि रही। पर वह आनन्द केवल भारत-भक्तों के भाग्य में था । इतर लोग तो जो वहा जा भी पहुचे तो कोरे के कोरे ही श्राए । एक दिन एक मियां साहब किसी से टिकट मांगके हमारी प्रेम छावनी के भीतर पहुंच भी गए, पर इधर उधर अपनी अटीयाजी फैलाने से बाज न आए । अत दूध को मक्सी की भाति दूर फर दिए गए । २५ ता० को हमारे राजा शिव- प्रसाद साहब भी प्रयाग जी में आए, और टेलीगेट होने का दावा किया, परच फीस भी जमा कर दी, एय अपने पूर्व- शत्यो का अनुताप भी प्रकाशित किया। पर किसी को विश्वास ने हुना । विश्वास तो तब होता जर भाप कभी किसी देश- हित के काम में शरीक हुए होते। लोग नाना प्रकार के तर्फ वितर्फ करने लगे। किसी ने कहा-'राज पनि गति जानिन जाई', फिसी ने कहा चतुरतो हई , कौनजाने-'चीयेपन नृप कानन जाई' का उदाहरण दिखायें। किसी ने कहा, अभी यहीं वो कांग्रेसवालों को दखनीय ठहराते थे, एकबारगी पोकर ४ - बदल जायेंगे | जरूर कुछ दाल में काला है। इनका यहाँ, आना भेद से खाली नहीं है । अवश्य- "कोई माशूक है इस परदए जगारी में। अस्तु, बहुत कहने सुनने से मिला लिए गए। पर २६ तारीख को कुछ बोले चाले नहीं। इससे सब को निश्चय सा हो गया कि दिनभर का भूला साझ को घर आ गया होगा। पर २७ ता० को लीला दिखाना प्रारभ ही तो किया । आप जानते हैं शिवजी गरल-मठ तो हई है। उसकी भार हम मनुष्यों से कहा सही जाती है। आप बोलने जाते थे, लोग हिचकी ले लेके रद्द करते जाते थे । अत में जब श्रोतागण बिलकुल उकता गए तो 'गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ' वाला मत्र पढने लगे । भस्तु, आप विराजे, और हमारे परमाचार्य (सभापति) श्रीयुत जार्ज यूल तथा थी नवलविहारी वाजपेयीजी ने उस विपकी शान्ति के लिए मत्र पाठ किए। दूसरे दिन हमारे सी० एस० आई० महाशय अपनी काशी को पधार गए, और काग्रेस-रूपी कलानिधि का ग्रहण छूटा। सवको आनद हुवा । जिसका वर्णन करने को पड़ा सा प्रय चाहिए। जहां स्कूल के छात्रों तकाको देश-भक्ति का इतना जोश था कि रेल पर से डेलीगेटों को बड़ी प्रीति के माथ 'लाते थे, और डेरों पर सारा प्रबन्ध बडी उत्तमता से करते थे, तथा चपरास पहिन पहिन के व्याख्यान-मदिर का इतजाम करते थे, और प्रतिपल प्रेम प्रमत्त रहते थे, प्रतिनिधियों की सुश्रूरा 'में ही अपना गौरव समझते थे, (परमेश्वर करे कि हमारी गजराजेश्वरी इन वालटियरों को शीच चालटियर धनावें, और अपनी कीर्ति तथा हमारी 'राजभक्ति बढावें, वहां दूसरों के आनद का क्या कहना है !
( ५ )
तीस तारीको सामाजिक व्यारवान हुए थे, और
उसी दिन यहुतसे लोग विदा भी हो गए थे। उस दिन
अवश्य सय सादयों को वैसा ही खेद हुवा होगा जैस
रामचन्द्रजी को चित्रकूट में छोडके श्री पादुका लिए हुप्प
भरतजी के माप भयोध्यावासियों को घर लौटती समय
दुवा था । पर हम उसका वर्णन करके अपने पाठकों को
वियोग-कया नहीं सुनाया चाहते । १८८६ में यम्बई की काग्रेस
के लिए सन्नद्ध होने का अनुरोध और दूसरे अङ्क
में प्रयाग
फी काग्रेस के कर्तव्य सुनाने का इकरार करके इस अध्याय
रो यही समाप्त करते हैं।योलो "काग्रेस की जै बोलेगा
सो निहाल होगा । पोतो, "महारानी विक्टोरिया की
तृतीय परिच्छेद। सामाजिक अंश। . बाल्य-विवाह विषयक एक चोज । आर्यावर्तीय जना को सर्वथा अनिष्टकारक होने के कारण, वेद, शास्त्र, पुराण तो क्या, बाल्य-विराह की विधि, माशा घा प्रमाण आल्हा तक में नहीं है। शीघ्रयोघ के जिन ग्लोको को प्रमाण मानके हिन्दू भाई इस घोर कुरीति पर फिदा हैं, जिनके लिए नई रोशनीवाले विचार काशीनाथ पर फटकेबाजी करते हैं, उनका ठीक २ अर्थ ही कोई नहीं विचारता, नहीं तो उनमें तो महा निषेध-बरच भयानक रीति से बाल्य विवाह का निषेधही है। देखिए साहब ! पुत्र का नाम आत्मा है , और लोक में भी प्रसिद्ध है कि "भाई तुमको देप लेते है तो मानों साक्षात् तुम्हारे पिता ही को देख लेते हैं।" अर्थात् वेद और खोक दोनों के अनुसार पिता और पुत्र की अभिन्नता है। शव शीघ्रबोध के वचनों पर ध्यान दीजिए-"अष्टवर्क भवेद्गौरी नव वर्षा च रोहिणी" इत्यादि। आठ वर्ष की लडकी गौरी है, और गौरीसाक्षात् भगवान् शिवजी की अधांगिनीजगत् की माता हैं, और नव वर्ष की लडकी रोहिणी है, जो साक्षात् । भगवान् श्रीकृष्णचद्रजी के घडे भाई थीदाऊजी (बलदेव) की माना है। इस नाते ससार की दादी हुई । भला फौन ऐसा तैसा दुष्ट नराधम राक्षस होगा जो श्रीमती पार्वती तथा (८७) रोहिणी देवी से विवाह अरे राम राम ! करना सा, फरने का नाम ले, उससी जीम में कोडे पडें । कहा रोहिणी, पार्वती, कहा क्षुद्र मानव तथा उसके सन्तान! और हाय रे कुजा (कहा)चैगहिक सम्बन्ध अरे भाई ऐसातो विचार करना महा चान्हालत्व है। और लीजिए.-"दशवर्या भवेत् कन्या" इस लेखे मनुष्यों की कन्या पव उनके बालको की भगिनी हुई। कहते रोप थर्राते हैं, कौन बेटी यहिन से व्याद कर लेगा। हो, "ततश्चौद्ध रजस्वला तिसके (दश वर्ष के ऊपर जब रजस्वला होय (बारहवें तेरहवें वर्ष ) तब व्याह के योग्य होगी। हां, इतना विचार रस्खो, रजस्वला का ना तक भार्य-रीति के विरुद्ध है। इस वाक्य के न मानने से यह होगा कि बीच ही में अर्थात् दश वर्ष के लगभग होने से रजखला धर्म, जो मृष्टि क्रमानुसार वारद तेरह वर्ष में होता है, सो घीचही में अर्थात् ग्यारहें हो साढ़े ग्यारहें चप कूद पड़ेगा। इससे विचारी कन्या की रजस्खला सा हो जायगी। इस खभाव विरुद्ध कर्मवालों के हक में भी काशीनाथजी ऊपर याले ग्लोक की पुष्टि करते है-"माता चैव पिता चैव ज्येष्ठ माना तथैव च ।" दयानन्द म्वामी (तथानुज ) और जोडते हे, सो भी ठीक है। व्याह के तमाशे छोटे लडके हीर देखते हैं। यरच हमारी राय लीजिप तो पुरोहितभी, क्योंकि पढ़ेनसमझो, अपने भ्रम में विचार यजमार से पाप परावे, और घर पन्या का जन्म नशावै ! "ते सर्वे नरक यान्ति दृष्ट्वा कन्या रजस्वला"। अय फहो श्री काशीनाथ भट्टाचार्य का दोष है कि गपू. नाप भट्टाचार्य हिन्दुस्तानियों का गदहापन है। - । पतिव्रता । इस नाम का हमारे यहां सदा से बडा गौरव है। हमारे वेद शास्त्र पुराणों में सहलो वचन पतिव्रताओं की महिमा के हैं। हमारी परमपूज्या जगदम्या श्री पार्वतीजी, श्री सीता- जी, श्री अनुसूयाजी इत्यादि का बड़ा महत्व विशेषतः इसी कारण है कि वे पतिव्रता थी । निश्चय हे कि स्त्री के लिए पति बत से बढ़के कोई धर्म नहीं है, न पति से बढके कोई देवता है। अद्यापि साधारण स्त्रियां कहा करती हैं कि "हमार पति परमेश्वर पाहीं । सच तो यों है कि जिस स्त्री ने मन-वचन- कर्म से सत्य और सरलता के साथ पति-प्रेम का निर्वाह किया वह महान् पूजनीया है । दक्ष प्रजापति की पुरी सतीदेवी का चरित्र परम प्रसिद्ध है कि उन्होंने अपने प्यारे प्राणनाथ भगः वान् भोलानाथ का अपमान देखके पिता फा, देवताओं का, ऋपियो का, अपने प्राण का भी कुछ शोच-सकोच न किया। फिर क्यों न हम लोग सतो शब्द को पतिव्रता का पर्याय समझे? भारत की पूनिति का एक घडा भारी फारण यह भी था कि स्त्रियां यदुधा पतिनता होती थीं । ससार रूपी रथ के दोनों पहिए स्त्री और पुरुष हैं, और व्यभिचार को तो व्यमि- चारी लोग भी शारीरिक, मानसिक, आत्मिक और सामाजिक अवनति का मूल मानते है । फिर,जिस देश में स्त्रिया विशेषत. पतिव्रता हो, और पुरुप एक स्त्रीप्रती हो उस देश को सन्नति में क्या वाधा हो सकती है। जिस गाड़ी के दोनों पहिए दृढ हो उसके चलने में भी कोई अडचन है । प्रेम में यह सामर्थ्य है कि प्रेमपात्र फैसा ही हो, परप्रेमिका की पद्धचित्तता से वह अवश्य प्रेमिका के रंगदग का हो जाता है। पुण्य कैसा ही फुफर्मी ओर कर्कश हो, पर स्त्री सच्ची पनि-देवता हो तो पुरुष निलज व्यभिचारी न रहेगा । ऐसे ही पुरुष सचमुच स्त्री से प्रीति र तो स्त्री का सुधर जाना असम्भव नहीं है। इसी से कहते हैं कि पतियता स्त्री दोनों कुल को सुशोभित करती है। जिस घर में पतियता हो यह घर, यह फुल, वह देश धन्य है। चित्तौर का राजवश भारत के इन गिर दिन में भी इतना प्रतिष्ठित है। इसका मुख्य कारण यही है कि इस घोर कलिकात में भी वहा सहस्सा शूर और सती थीं। इस जमाने मे हम देखते हैं कि शूरता का तो प्राय लोप ही सा हो गया है, पर सती मी यहुन कम रह गई है, परच नहाने के बराबर कह सकते हैं। सती से हमारा यह प्रयाजन ही है कि स्वाम वाह पनि के साथ जल जाना चाहिये । मुरय सनी यह है जो पति कविरहसपी अग्नि में ऐसा दु.स अनुभव करे कि जीते जी मर जान के समान । पर हाय । एक वह दिन थे कि हमारे यहा सतीत्व उस पराकाष्ठा का पहुचा हुआ था कि जीते जल जाना नक रिवाज हो गया , और एक वह दिन है कि पतिव्रता इ मिलना कठिन है ! हम यह तो नहीं कर सकते कि सारो सिया रायमाचाई की साथिनी हो रही हैं, पर श्म में भी सदेह नहीं है कि पति के दु म सुत्र में अपना सच सुन सुख दुससमझने वाली, पति की प्रतिष्ठा का पूरा ध्यान रपनेपाली, पति से सच्चा स्नेह निभानेपाली स्त्रियां भी हजारों दस ही पाच हों तो हों। इसके चई कारण है । एक तो यही किनी शिक्षा की चाल उठ सी गई है। यदि कोई कोई लोग पटाते भी है तो मेमो से (१०) या मेम दासियों से! मला घेईमा के गीत और लिवरटी लिखावेगी अथवा पतिव्रत ' दूसरे थोडा बहुत कुछ पढ़ भी गई तो घर का ठीक नियम नहीं है। बहुत सी दोदो चार चार पैसे की ऐसी पुस्तकें छप गई है जो पुरुषों के लिए तो खैर, जी यहलाने को अच्छी सही, पर स्त्रियों के लिए हानिकारक हैं। बावूसाहब बाजार स ले आए, घर में डाल दिया । बबुआइन, साहया ने खोलके पढा तो "जोवन का मांगे दान कान्ह कुजन में-भला कोन माशा करें! तीसरे मरदों को तो सभाए भी है, असबार भी है, पुस्तके भी हैं, पर स्त्रियों के लिए उपदेश की काई चाल ही नहीं है। हम आशा करते हैं कि श्रीमती, हेमन्तकुमारी देवी ( रतलामवासिनी) अपनी "सुगृहिणी" नामक पत्रिका में पतिवत पर अधिक जोर देंगी, जिसमें सर्वसाधारण स्त्रियों को वास्तविक लाभ हो । फोटोग्राफी आदि की अभी हमारी गृह-देवियों के लिए अधिक आवश्यकता नहीं है। नवीन ग्रन्थकारी को भी चाहिए कि जहां और बहुत सी बातें लिखते हैं, कभी २ इधर भी झुकते रहे । व्याख्यान दाता लोग कभी २ स्त्रियों को भी परदे के साथ स्त्री धर्म की क्षिशा दिया करें । यही सब पतिवत प्रचार की युक्तियां हैं। इधर हमारे गृहस्थ भाइयों को भी समझना चाहिए कि दोनों हाथ ताली बजती है । उन्हें पतिवता बनाने के लिए इन्हें भी स्त्री व्रत धारण करना होगा।एक यात और भी है कि स्त्रियां अभी विशेषत मूर्या हैं । अत साम, दाम, दड, भेद से काम लेना ठीक होगा। निरे न्याय और धर्म से वे राह पर न श्रावेगी । ऐसी युक्ति से वर्तना चाहिए कि वे प्रसन्न मी रहे, और कुछ डरती भी रहे। तभी प्रीति करेंगी।
"आई माघ फी पाचें घूढी डोफरिया नाचैं।
का उदाहरण बन जाते थे, पर जय इतनी सामर्थ्य न रदी
मय शिवरात्रि से होलिकोत्सव का आरंभ करने लगे। जय
सिका भी निर्याह पटिन हुआ तय फागुन सुदी अष्टमी से--
"होरी मध्ये भाउ दिन, व्याह माह दिन चार ।
शट पण्डित, वेश्या
घधू
सचे मए इसार"
का नमूना दिखलाने सगे । पर उन्हीं प्रानद्मय पुरुषों के
वश में होफर तुम ऐसे मुहर्रमी घने जाते हो कि आज
विवहार के दिन भी मानन्द वदन से होली का शब्द तक
सधारण नहीं करते । सच कहा, कही होली वायिल कीया
लगने से हिन्दूपन को सलीय पर तो नहीं चहा दिया ?
तुम्हें पास या सूझी है, जो अपने पगए सभी पर मुह
चला रहे हो? होली चाइयिल अन्य धर्म का प्रथ है, उसके
माननेगले विचार पहिले ही से तुम्हारे साथ का भीतरी-
शाहिरी सम्बन्ध छोड देते हे । पहिली उमग में कुछ दिन
तुम्हारे मत पर कुछ चोट चला भी दिया करते थे, पर अब
परसों से यह चर्चा मी न होने के घरायर हो गई है। फिर,
उन छुटे हुए गाइयों पर क्यों बौछार करते हो? ऐसी ही
नहास लगी हो तो उनसे जा मिडो जो अभी तुम्हारे ही
कहलाते हैं, तुम्हारे ही साथ रोटी बेटी का व्यौहार रसते हैं,
तुम्हारे ही दो चार मान्य अन्यों के माननेवाले धनते हैं, पर
तुम्हारे ही देवता पितर इत्यादि की निन्दा कर करके तुम्हें
चढाने ही में अपना धर्म और अपने दश की उन्नतिसमझते हैं।
अरे राम राम पर्व के दिन कौन बरचा चलाते हो
हम तो जाते थे तुम्ही मनहस हो, पर तुम्हारे पास बेठे सो
जी नसूढिया हो जाय ! अरे पाया दुनियाभर का योभा
-
M
.
.
(६२)
होली है।
तुम्हारा सिर है ! यहा दरिद्र की आग के मारे होला
(अथवा होरा भुना हुवा हरा चना) हो रहे हे इन्हें होली है,हे ।
अरे फेसे मनहस हो ? यरस २ का निवहार है, उसमें भी
वही रोनी सूरत ! एक बार तो प्रसन्न हो कर बालो, होरी है !
अरे भाई हम पुराने समय के वगाली भी तो नहीं हैं कि
तुम ऐसे मित्रों की जबरदस्ती से होरी (हरि) बोलके शांत
हो जाते। हम तो वीसवीं शताब्दी के अभागे हिन्दुस्तानी है।
जिन्हें कृषि, वाणिज्य, शिल्प सेवादि किसी में भी कुछ तत
नहीं है। खेतों की उपज अतिवृष्टि, अनावृष्टि, जगलों का
कट जाना, रेलो और नहरों की वृद्धि इत्यादि ने मट्टी करदी
है । जो कुछ उपजता भी है वह फटके सलियान में नहीं आने
पाता, ऊपर ही ऊपर लद जाता है ! रुजगार व्यौहार में कहीं
कुछ देखी नहीं पड़ता। जिन बाजारों में, अभी दस घर्प भी
नहीं हुए, कचन यरसता था वहा अब दूकानें भाय २ होती
हैं । देशी कारीगरी को देश ही वाले नहीं पूछते । विशेषत
जो छाती ठोंक २ ताली बजवा २ कागजों के तखते रग २ कर
देशहित के गीत गाते फिरते हैं वह पार भी देशी वस्तु का
व्यवहार करना अपनी शान से चईद समझते हैं। नौकरी
बी० ए०, एम० ए०, पास करनेवालों को भी उचित रूप में
मुशकिल से मिलती है। ऐसी दशा में हमें होली सूझती है
कि दिवाली!
यह ठीक है । पर यह भी तो सोचो कि हम तुम
वंशज किनके हैं। उन्हीं के न, जो किसी समय बसत.
पचमी ही से
.-
-
"आई माघ की पाचै बूढी डोकारिया नाचें।
का उदाहरण बन जाते थे, पर जब इतनी सामर्थ्य न रही
तब शिवरात्रि से होलिकोत्सव का आरंभ करने लगे। जय
इसका भी निर्वाह कठिन हुआ तव फागुन सुदी अष्टमी से-
"होरी मध्ये आठ दिन, व्याह माह दिन चार ।
श पण्डित, घेण्या
वधू
सबै भए इसारण
का नमूगा दिखलाने लगे पर उन्हीं शानदमय पुस्पों के
वंश में होफर तुम ऐसे मुहर्रमी बने जाते हो कि आज
निवहार के दिन भी आनन्द-बदन से होली का शब्द तक
रसारण नहीं करते। सच कहा, कहीं होली बाइबिल कीया
लगने से हिन्दूपन को सलीर पर तो नहीं चढा दिया ?
तुम्हें नाज क्या सूझी है, जो अपने पाप सभी पर मुंह
चला रहे हो ? होली वाइयिल अन्य धर्म का प्रथ है, उसके
माननेवाले पिचारे पहिले ही से तुम्हारे साथ का भीतरी-
वाहिरी सम्बन्ध छोड देते हैं । पहिली उमग में कुछ दिन
तुम्हारे मत पर कुछ चोट चला भी दिया करते थे, पर गर
परमां से वह चर्चा मी न होने के घरायर हो गई है। फिर,
उन दुरे हुए गाइयों पर क्यों बौछार करते हो? ऐमी ही
साहास लगी हो तो उनसे जा भिडो जो अमी तुम्हारे ही
कहलाते हैं, तुम्हारे हो साथ रोटी बेटी का ध्यौहार रगते ,
तुम्हारे ही दो चार मान्य अन्यों के माननेवाले धनते हैं, पर
तुम्हारे ही देवता पितर इत्यादि की निन्दा कर घरके तुम्हें
चिढाने ही में अपना धर्म और अपने दश की उन्नति समझते है।
अरे राम राम पर्व के दिन कौन चरचा चलाते हो
हम तो जाते थे तुम्ही मनास हो, पर तुम्हारे पास बैठे सो
भी नसूतिया हो जाय । अरे माया दुनियामर का योमा
(१४)
परमेश्वर ने तुम्ही को नहीं लदा दिया । यह कारखाने है, म
बुरे लाग और दुःस सुख की दशा होती ही हुघाती रहती है
पर मनुष्य को चाहिए कि जय जैसे पुरुष और समय
सामना ना पडे तब तैसा बन जाय । मन को किसी भग
में फसने न दे।
आज तुम सचमुच कहीं से भाग खाके आए हो
इसी से ऐसी बेसिर पेर की हाक रहे हो। अभी कल तक प्रेम
सिद्धान्त के अनुसार यह सिद्ध करतेथे किमन का किसी भी
लगा रहना ही फल्याण का कारण है, और इस समय कह
रहे हो कि 'मन को किसी झगड़े में फसने न देशवाह ! मला
तुम्हारी फिस बात को माने ?
हमारी बात मानने का मन करो तो कुछ होही न जाओ।
यही तो तुमसे नहीं होता।तुम तो जानते हो कि हम चोरी
चहारी लिखावेंगे।
नहीं यह तो नहीं जानते । और जानते भी हों तो पुरान
मानते। क्योंकि जिस काल में देश का अधिकांश निर्धन,
निर्वल, निरुपाय हो रहा है, उसमें यदि कुछ लोग "बुभुक्षित
किन करोति पाप" का उदाहरण बन जाय तो कोई आश्चर्य
नहीं है। पर हां यह तो कहेंगे कि तुम्हारी बातें कभीर समझ
में नहीं आतीं। इससे मानने को जी नहीं चाहता।
यह ठीक है,पर याद रक्सो कि हमारी वा मानने कामानस
करोगे तो समझ में भी थाने लगेंगी, और प्रत्यक्ष फल भीदेंगी।
अच्छा साहव मानते हैं, पर यह तो पतलाइए जब हम
मानने के योग्य ही नहीं हैं तो कैसे मान सकते हैं ?
छि क्या समझ हे । अरे बाधा ! हमारी बातें मानने में
योग्य होना और सफनामावश्यक नहीं है। जो बातें हमारे
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( ५ )
इसे निकलती हैं यह वास्तव में हमारी नहीं हैं, और उनके
बनने की योग्यता और शक्ति हमको तुमको क्या किसी को
तीन लाक और तीन काल में नहीं है। पर इसमें भी सन्देह
करना कि जो काई चुपचाप आने मीच के मान लेता है वह
बरमानन्द भागी हो जाता है।
हिहि ! ऐसी बात मानने तो कौन आता है, पर सुनफर पर
मानन्द तोनहा, हां, मसवरेगन फाछ मजा जरूर पा जाता है!
भता हमारी यातों में तुम्हारे मुह से हिदि तो निकली !
इस तोपडा से लटके हुए मुह के टाकों के समान दो तीन
दात तो निकले। और नहीं तो, मसखरेपन ही का सही,
मजा तो पाया। देखो, पाखें मट्टी के तेल की रोशनी और
कुल्हिया के ऐनक की चमक से चौधिया न गई हो तो देखो।
छत्तिसौ जात, यरच अजात के जूठे गिलास की मदिरा तथा
मच्छ अभच्छ की गध से अकिल भाग न गई हो तो समझो।
हमारी पाते सुनने में इतना फल पाया है तो मानने में न जाने
'क्या प्राप्त हो जायगा । इसी से कहते हैं, भैया मान जाय,राजा
मान जाव, मुन्ना मान जावो । आज मन मारके बैठे रहने का
- दिन नहीं है। पुरनों के प्राचीन सुख सम्पति को स्मरण करने
का दिन है। इससे हसो, योलो, गायो पजामो, त्योहार
मनाओ, और सय से कहते फिरो-होली है।
हो तो ली ही है। नहीं तो श्रय रही क्या गया है।
खर, जो कुछ रह गया है उसी के रराने का यत्न करो,
पर अपने ढंग से, नकि विदेशी ढग से। स्मरण रक्सो
कि जब तक उत्साह के साथ अपनी ही रीति-नीति का
अनुसरण न फरोगे तबतक कुछ न होगा। अपनी यातों को
युरो दृष्टि से देखना पागलपन है । रोना निस्साहसों का काम
।
है। अपनी भलाई अपने हाथ से हो सकती है। मांगने पर
कोई नित्य डवल रोटी का टुकडा भी न देगा। इससे अपनपना
मत छोडो। कहना मान जाव । आज होली है।
हां, हमारा हृदय तो दुर्दैव के वाणों से पूर्णतया होली
(होल अगरेजी में छेद को कहते हैं, उससे युक्त) है। हम
तुम्हारी सी जिंदादिली (सहृदयता) कहा से सूझे ?
तो सहृदयता के विना कुछ आप कर भी नहीं सकते, यदि
कुछ रोप पीटे दैवयोग से हो भी जायगा तो "नफटा जिया
चुरे हवाल" का लेखा होगा। इससे हृदय में होल (छेव)
तो उनपर साहस की पट्टी चढाभो । मृतक की,भाति पडे
काखने से कुछ न होगा। आज उछलने ही कूदने का दिन है
सामर्थ्य न हो तो चलो किसी हौली (मद्यालय) से थोई
सी पिला लाचे, जिसमें कुछ देर के लिए होली के काम के हं
जाओ, यह नेस्ती काम की नहीं।
वाह तो क्या मदिरा पिलाया चाहते हो?
यह कलजुग है । यडे २ वाजपेयी पीते हैं। पीछे से था
बुद्धि, धर्म, धन, मान प्रान सवा म्वाहा हो जाय तो घला से
पर थोडी देर जमकी तरग में "हाथी मच्छर, सूरज सुगन
दिखाई देता है। इससे, और मनोविनोद के प्रभाव ..
उसके सेवको के लिए कभी २ उसका सेवन कर लेना इत
बुरा नहीं है जितना मृतचित्त- यन बैठना । सुनिए । संगी
साहित्य, सुरा और सौंदर्य के साथ यदि निगम-विरुद्ध यत
न किया जाय तो मन की प्रसन्नता और एकाग्रता कुछ न
लाभ अवश्य होता है, और सहदयता की प्राप्ति के लिए
दो गुणों की आवश्यकता है, जिनके बिना जीवन की सा
-कता दुःसाध्य है।
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(७) बलिहारी है, महाराज इस क्षणिक बुद्धि की अभी तो कहते थे कि मन को किसी झगडे में फसने न देना चाहिए, और भी कहने लगे कि मन की एकाग्रता के विना सहृदयना तथा सहदयता के बिना जीवन की सार्थकता दुसाध्य है। धन्य है, यह सरगापत्ताली बातें भला हम श्रापको अनुरागी समझे या विरागी? गरे हम तो जो है वही हैं, तुम्हें जो समझना हो समझ लो। हमारी कुछ हानि नहीं है । पर यह सुन रस्सो, सीख रक्सो, समझा रस्त्रो फि अनुराग और विराग वास्तव में एक ही है। जब तक एक ओर अचल अनुराग न होगा तब तक जगत के खटराग में विराग नहीं हो सकता, और जब तक सब ओर से आंतरिक चिराग न हो जाय तय तक अनुराग का निर्वाह सहज नहीं है। इसी से कहते हैं कि हमारी याते चुप चाप मान ही लिया करो, बहुत अकिल को दौडा २ के धकाया न करो। इसी में आनन्द भी श्राता है, और हदय का फपाट भी खुल जाता है । साधारण बुद्धिवाले लोग भगवान् भूतनाप श्मसान विहारी, मंडमालाधारी को वैराग्य का अधि- प्ठाता समझते है, पर यह माठों पहर अपनी प्यारी पर्वत राजनदिनी को वामाग ही में धारण फिए रहते हैं, और प्रेम- शास्त्र के प्राचार्य हैं । इसी प्रकार भगवान कृष्णचन्द्र को लोग भङ्गार रस का देवता समझते हैं, पर उनकी निर्लिप्तता गीना में देखनी चाहिए। जिसे सुनाफे उन्होंने अर्जुन का माह- जाल छुडाके वर्तमान कर्तव्य के लिए ऐसा दृढ कर दिया था फि उन्होंने सरकी दयावा, मोह-ममता को तिलांजलि के - . . है। अपनी भनाई अपने हाथ से हो सकती है। मांगने पर कोई नित्य डबल रोटी का टुकडा भी न देगा। इससे अपनपना मत छोडो। कहना मान जाव । आज होली है। हां, हमारा हृदय तो दुर्दैव के वाणों से पूर्णतया होली (होल अगरेजी में छेद को कहते हैं, उससे युक्त) है। हमें तुम्हारी सी जिंदादिली (सहृदयता ) कहां से सूझे ? तो सहृदयता के विना कुछ आप फर भी नहीं सकते, यदि कुछ रोए पीटे देवयोग से हो भी जायगा तो 'नकटा जिया बुरे हवाल" का लेखा होगा। इससे हृदय में,होल (छेद) हैं तो उनपर साहस की पट्टी चढामो । मृतक की भांति पडे २ काखने से कुछ न होगा। आज उछलने ही कूदने का दिन है। सामर्थ्य न हो तो चलो किसी हौली (मद्यालय) से थोडी सी पिला लायें, जिसमें कुछ देर के लिए होली के काम के हो जाओ, यह नेस्ती काम की नहीं। वाह तो क्या मदिरा पिलाया चाहते हो? यह कलजुग है । बडे २ वाजपेयी, पीते हैं। पीछे से पल, धुद्धि, धर्म, वन, मान, प्रान सब स्वादा हो जाय तो धला से ! पर थोड़ी देर उसकी तरंग में "हाथी मच्छर, सूरज जुगनू दिवाई देता है। इससे, ,और मनोविनोद के अभाव में, उसके सेवकों के लिए कभी २ उसका सेवन कर लेना इतना चुरा नहीं है जिनना,मृतचित्त यन बैठना । सुनिए ! सगीत, साहित्य, सुरा और सौंदर्य के साथ यदि नियम विरुद्ध वर्ताव न किया जाय तो मन की प्रसशता और एकाग्रता कुछ न कुछ लामा अपश्य, होता है, और सहदयता की प्राप्ति के लिए इन दो गुणों की आवश्यकता है, जिनके बिना जीवन की सार्थ- कता दुःसाध्य है। - - - .
. बलिहारी है, महाराज इस क्षणिक बुद्धि की। अभी तो कहते थे कि मन को किसी झगडे में फसने न देना चाहिए, और अभी कहने लगे कि मन की एकाग्रता के विना सहृदयता तथा सहृदयता के बिना जीवन की सार्थकता दु'साध्य है। धन्य है, यह सरगापचाली बातें । भला हम थापको अनुरागी समझ या चिरागी? अरे हम तो जो हैं यही हैं, तुम्हें जो समझना हो समझ लो। हमारी कुछ हानि नहीं है । पर यह सुन रक्खो, सीख रक्सो, समझ रक्खो फि अनुराग और चिराग वास्तव में एक ही हैं । जब तक एक ओर अचल भनुराग न होगा तब तक जगत के सटराग में विराग नहीं हो सकता, और जब तक सय ओर से आतरिक विराग न हो जाय तब तक अनुराग का निर्वाह सहज नहीं है । इसी से कहते हैं कि हमारी बाते चुप चाप मान ही लिया करो, बहुत अकिल को दौडा २ के थकाया न करो। इसी में आनन्द भी आता है, और हृदय का कपाट भी खुल जाता है । साधारण बुद्धिवाले लोग भगगन भूतनाथ श्मसान विहारी, मुंडमालाधारी को वैराग्य का अधि प्ठाता समझते हैं, पर यह आठों पहर अपनी प्यारी पर्वत राजन दिनी को वामाग ही में धारण किए रहते हैं, और प्रेम. शारत के प्राचार्य हैं। इसी प्रकार भगवान कृष्णचन्द्र को लोग शृङ्गार रस का देवता समझते हैं, पर उनकी निर्लिप्तता गीता में देखनी चाहिए । जिसे सुनाके उन्होंने अर्जुन का मोह- जाल छुडाके वर्तमान फर्तव्य के लिए ऐसा दृढ कर दिया था कि इन्होंने सयकी दया-मया, मोह-ममता को तिलांजलि देके मारकाट आरम कर दी थी। इन यातों से तत्व-प्राक्षिणी । समझ भली भाति समझ सकती है कि भगवान प्रेमदेव की N7.
अनत महिमा है। वहाअनुराग-विराग, सुप.दु.ख, मुक्ति साधन सय एक ही है। इसी से सच्चे समझदार ससार में रह कर सब कुछ देखते सुनते, करते धरते हुए भी ससारी नहीं होते। केवल अपनी मर्यादा में बने रहते हैं, और अपनी मर्यादा वही है जिसे सनातन से समस्त पूर्व पुरुष रक्षित रसते पाए हैं, और उनके सुपुत्र सदा मानते रहेंगे। काल, कर्म, ईश्वर अनु कूल हो चा प्रतिकूल, सारा ससार स्तुति करे षा निदा, बाह्य दृष्टि से लाम देख पडे घा हानि, पर वीर पुरुष वही है जो कभी कहीं किसी दशा में अपनेपन से स्वप्न में भी विमुख न हो। इस मूलमंत्र को भूल के भी न भूले कि जो हमारा है वही हमारा है। उसी से हमारी शोभा है, और उसी में हमारा वास्तविक कल्याण है। एतदनुसार आज हमारी होली है। चित्त शुद्ध करके वर्ष भर की कही-सुनी क्षमा करके हाथ जोड के पांच पड़ के, मित्रों को मना के, वाहें पसार के उनसे मिलने और यथा सामर्थ्य जी खोलके परस्पर की प्रसन्नता सम्पादन करने का दिन है। जो लोग प्रेम का तत्य तनिक भी नहीं समझते; केवल स्वार्थ-साधन ही को इतिकर्तव्य समझते हैं, पर हैं अपने ही देश जाति के, उनसे घृणा न करके ऊपरी आमोद- प्रमोट के समयतापिताले व -
।
।
समय का फेर।
अभी वह लोग बहुत से जीते हैं जो सन्५७ के घलवे के दस
पांच वर्ष पहिले का हाल अपनी आखों देखा बतलाते हैं, और
उनमें से अधिकांश लोग ऐसे हैं, जिनकी बातें विश्वास करने
के योग्य हैं। पर इस धर्तमान काल के लोगों को ये बातें
बाधा कहानी सी जान पडती है, क्योंकि उस जमाने से और
इस जमाने से इतना फर्क है कि घुढे लोग उसे 'सतयुग
कहते हैं, और इसे कलियुग मानते हैं । हमारे एक वृद्ध मित्र
१ का कथन है कि भैया तुम्हीं लोग कहो कि इन दिनों देश की
दशा सुधरने लगी, परहमारी समझ में सिवाय इसके कि तुम्हें
यातें बनाने का अधिक अभ्यास हो गया, और अठए दसए
दिन थोडे से नौसिखियों को इकट्ठा करके आपस की चकयास
निकाल डालते हो यह पाते तो बेशक हमारी जवानी में नथी,
पर जो आनन्द हमने भोगा है वह तुम्हें सपने में भी दुर्लभ है।
तुमो देखा होगा कि श्रोमर बनियों के यहा व्याह में बरातियों
को जो सोया (भोजन-सामग्री) दिया जाता है उसमें धेला
कौडी घी के लिए देते हैं । इस यात को तुम लालच अथवा
दरिद्धता समग के हसते होगे, पर हम सौगधबा के कहते हैं
कि हमारी जवानी में धेले का घी एक आदमी के लिए बहुन
होता था। यह प्रत्यक्ष देस लो कि हम में श्रय भी यह पल और
पौरुप है कि तुम्हें हम कुछ नहीं समझते। इसका कारण
यही है कि हमने १८ या २० रुपये मन धी और रुपये का २२
तथा २० सेर दूध ऐसा पाया है जैसा तुम्हें डेउढे दो दामों
पर मी मिराना कठिन है। भैया यह उसी पिलाई-पिलाई का
फल है कि हम साठा सो पाठा पने है।
. अनतमहिमा है। वहाअनुराग-विराग,सुप-दुःख, मुक्ति-साधन सब एक ही हैं। इसी से सच्चे समझदार ससार में रह कर सब कुछ देखते सुनते, करते धरते हुए भी ससारी नहीं होते। केवल अपनी मर्यादा में बने रहते हैं, और अपनी मर्यादा वही है जिसे सनातन से समस्त पूर्व पुरुष रक्षित रखते श्राप हैं, और उनके सुपुत्र सदा मानते रहेंगे । काल, कर्म, ईश्वर अनु कूल हो वा प्रतिकूल, सारा ससार स्तुति करे वा निदा, बाह्य दृष्टि से लाम देख पडे वा हानि, पर वीर पुरुष वही है जो कभी कहीं किसी दशा में अपनेपन से स्वप्न में भी विमुख न हो। इस मूलमत्र को भूल के भी न भूले कि जो हमारा है वही हमारा है। उसी से हमारी शोभा है, और उसी में हमारा वास्तविक कल्याण है। पतदनुसार आज हमारी होती है। चित्त शुद्ध करके वर्ष भर की कही-सुनी क्षमा करके हाथ जोड के, पांच पड के, मित्रों को मना के, वाहें पसार के उनसे मिलने और यथा. सामर्थ्य जी खोलके परस्पर की प्रसन्नता सम्पादन करने का दिन है। जो लोग प्रेम का तत्य तनिक भी नहीं समझते, केवल स्वार्थ-साधन ही को इतिकर्तव्य समझते है, पर हैं। अपने ही देश जाति के, उनसे घृणा न करके ऊपरी आमोद- प्रमोद में मिला के समयान्तर में मित्रता का अधिकारी बनाने की चेष्टा करने का त्यौहार है। जो निष्प्रयोजन हमारी यात २ पर भुकरते ही हों उन्हें उनके भाग्य के प्राधीन छोडके अपनी मोज में मस्त रहने का समय है । इसी से कहते ई, नई बहू की नाई घर में न घुसे रहो, पर्व के दिन मन मार के न पेठो, घर याहर, हेती व्यौहारी से मानसिक मानन्द के साथ कहते फिरो-हो भो भोली . -
समय का फेर ।
अभी यह लोग बहुत से जीते हेंजोसन्५७ के घलवे के दस
पाच वर्ष पहिले का हाल अपनी आखों देखा बतलाते हैं, और
उनमें से अधिकाश लोग ऐसे हैं, जिनकी वात विश्वास करने
के योग्य है । पर इस वर्तमान काल के लोगों को घे बाते
बहुधा कहानी सी जान पडती है, क्योंकि उस जमाने से और
इस जमाने से इतना फर्क है कि घुढे लोग उसे सतयुग
कहते है, और इसे फलियुग मानते हैं । हमारे एक वृद्ध मित्र
का कथन है कि भैया तुम्हीं लोग कहो कि इन दिनों देश की
दशा सुधरने लगी, पर हमारी समझ में सिवाय इसके कि तुम्हें
पातें बनाने का अधिक अभ्यास हो गया, और अठए दसए
दिन थोडे से नौसिखियों को इकट्ठा करके आपस की वकयास
निकाल डालते हो। यह पाते तो वेशक हमारी जवानी में नथी,
पर जो आनन्द हमने भोगा है वह तुम्हें सपने में भी दुर्लभ है।
तुमने देखा होगा कि अोमर पनियों के यहा व्याह में बरातियों
को जो सीधा (भोजन सामग्री) दिया जाता है उसमें घेला
कोडी घी के लिए देते हैं। इस बात को तुम लालच अथवा
दरिद्रता समझ के हसते होगे, पर हम सौगध स्त्रा के कहते हैं
कि हमारी जवानी में घेले का घी एक आदमी के लिए बहुन
होता था। यह प्रत्यक्ष देस लो कि हम में अब भी यह पल और
पौरुप है कि तुम्हें हम कुछ नहीं समझते। इसका कारण
यही है कि हमने १ या २० रुपये मन घी और रुपये का २२
तथा २० सेर दूध ऐसा साया है जैसा तुम्हें डेउढे दुने दामों
पर भी मिलाना कठिन है। भैया यह उसी पिलाई पिलाई का
फल है कि हम साठा सो पाठा यने हैं।
-- अनंत महिमा है। वहाअनुराग-विराग,सुख दुःख, मुक्ति साधन लब एक ही हैं। इसी से सच्चे समझदार ससार में रह कर सब कुछ देखते सुनते, करते धरते हुए भी सलारी नहीं होते। केवल अपनी मर्यादा में बने रहते हैं, और अपनी मर्यादा वही है जिसे सनातन से समस्त पूर्व पुरुष रक्षित रसते श्राप हैं, और उनके सुपुत्र सदा मानते रहेंगे। काल, कर्म, ईश्वर, अनु कूल हो पा प्रतिकूल, सारा ससार स्तुति फरे षा निदा, वाह्य दृष्टि से लाभ देख पडे चा हानि, पर वीर पुरुष वही है जो कभी कहीं किसी दशा में अपनेपन से स्वप्न में भी विमुख न हो। इस मूलमत्र को भूल के भी न भूले कि जो हमारा है वही हमारा है। उसो से हमारी शोभा है, और उसी में हमारा धास्तविक कल्याण है। परादनुसार आज हमारी होती है। विच शुद्ध करके वर्ष भर की कही-सुनी क्षमा करके हाथ जोड के पांच पड़ के, मित्रों को मना के, वाहें पसार के उनसे मिलने और यथा- सामर्थ्य जी खोलके परस्पर की प्रसन्नता सम्पादन करने का दिन है। जो लोग प्रेम का तत्य तनिक भी नहीं समझते, केवल स्वार्थ-साधन ही को इतिकर्तव्य समझते हैं, पर है. अपने ही देश जाति के, उनसे घृणा न करके ऊपरी आमोद- प्रमोद में मिला के समयान्तर में मित्रता का अधिकारी बनाने की चेष्टा करने का त्योहार है। जो निष्प्रयोजन हमारी थान २ पर भुकरते ही हो उन्हें उनके भाग्य के प्राधीन छोडके अपनी मोज में मस्त रहने का समय है। इसी से कहते है, नई बहू की नाई घर में न धुसे रहो, पर्व के दिन मन मार के न पैठो, घर बाहर, हेती व्योहारी से मानसिक मानन्द के साथ कहते फिरो-हो ओ ओली ईई है।
(१०१)
करे तो भो तुम में यह लक्षण नहीं है कि तुम्हारा घूता बना
बल की रक्षा के सिया धन का यह हाल था कि धागरम
की असी, लखनऊ की छोटे कनौज का गाढा, ढाके की मल
मन इत्यादि हमारे कपडे ऐसे थे कि कम से कम यरस दिन
तक तो टसकाए न सिझते थे। वरच गरीव गुरवा के कपडे
की यह दशा थी कि एक गाढ़े का थान ले लिया,दो वर्ष धोती
पहिनी, फिर रंगा के रजाई यनमा ली। तीन चार वर्ष को फिर
छुट्टी हुई। भला यह तो बताओ तुम्हारे लेकलाट और तंजेष
के मारने के महीने चलते हैं ? अभी यरतनों पर गुरच्या
फी दगा है। अधिकतर देशी ही है जो टूट फूट जाने पर भी
तारे पोतल के भाव विक ही जाते हैं । पर तुम्हारी कुबुद्धि ने
फाच के गिलास और लंप आदि की भक्ति उपजाय दी है।
जिनमें दाम तो दूने चौगुने लगते हैं, पर फूट जाने पर शायद
पाच रुपये की लप एक रुपये को भीनावि फहातक कहें सय
से तुच्छ जूना होता है, सो अमीर लोग तीन चार का पहिनते
थे और जाने पर नौकरों को उठा देते थे । वे पहन पहना-
फर रुपया बारह माने भर चादी उसमें से निकाल लेते थे।
पर तुम्हारे पाच रपये के बूट में बताभो तो फितनी जरी होगी'
रूजगार को यह गति धी कि हमारी देखी हुई यात हे कि
खननऊ, फरुखाबाद, मिरजापूर श्रादि में कचन यरसता था।
पर हाय आज धूल उडती है, और राम न करे, यही
दाल कुछ दिन और रहा तो यह शहर के नाम से पुकारे जाने
योग्य न रहेंगे । क्योंकि स्त्री का पति है पुरुष और पुरष फा
पति यज़गार है।
, 1 । (१००) जिन रोगो से तुम पारहों मास घिरे रहते हो उनका हमने कभी नाम भी नहीं सुना था। तुम अपनी सभाओं में वाल्य- विवाह बाल्य विवाद भीसा करते हो, पर हम लोगों के भी व्याह १२ हो १३ वर्ष की अवस्था में होते थे तो भी निर्व- सता क्या है, यह हम जानते भी नहीं। क्योकि लडकाई में व्या होता था तो क्या हुवा, गौना तो सात वर्ष, पाच वर्ष अथवा कम से कम तीन वर्ष ही में होता था। इसके सिवा हम अपने यडे बूढों की लाज से अपनी स्त्री के साथ खुल- क बात भी बहुत कम करते थे। इसके सिवा धर्म का डर और अपने जमाने की चाल के अनुसार अपने अडोस पडोस पार-देश की स्त्रियों को उनकी उमर देखके किसी को चाची, किसी को दीदी, किसी को विटिया कहते थे, और सचमुच घसा ही मानते थे। हम तो न भी मानते, पर यह डर था कि हम बुराई करेंगे तो कोई मूड काट संगा, या मारते२ अधमरा कर डालेगा! वेश्याओं के यहा लोकलाज के मारे न जाते थे। फोई देख लेगा या सुन पावैगा तो नौधरी होगी। यही मब याते थीं कि हमारा प्रख अर भी तुमसे अधिक है। यह बातें तुम में कहीं हुई नहीं। तुम चाहते कि हम अपनी यधुभाइन को लेके सैर करने पावें तो मानी बैकुण्ठ मिल जाय । नांव नगर की स्त्रिया तुम्हारे हिमात्र फक ही नहीं । यदि घर की सनातन रीति के मारे मुह से चाची पहिनी इत्यादि कहने भी हो तो जी में यह जरूर समझते होने किन हमारे चाचा की विवाहिता है न दमारे यापकी बेटी हैं। वेश्या के यहां जाना तुम अमीरी और जिन्दादिली समझते हो। धिकार है इस बुद्धि को! यदि परमेश्वर करे देश में यही चाल चल जाय कि व्याह २४-२६ वर्ष में हुया
( १०३)
~
-
"वजा फहे जिसे पालम उसे घजा समझो,
जबाने खल्फ को नकारए खुदा समझो।"
इत्यादि पचन पढ़े लिखों के हैं, और-पांच पंच के भाषा
अमिट होती है', 'पचन का पैर कै के को तिष्ठा है। इत्यादि
पाक्य साधारण लोगों के मुह से वात २ पर निकलते रहते
हैं। विचार के देखिए तो इसमें कोई सन्देह भी नहीं है कि-
'जब जेहि रघुपति करहिं जस, सो तस तेहि छिन होय'
की भांति पंच भी जिसको जैसा ठहरा देते हैं वह वैसा
ही पन जाना है। आप चाहे जैसे यसवान, धनवान, विद्वान
हो, पर यदि पच की मरज़ी के खिलाफ चलिएगा तो अपने
मन में चाहे जैसे बने बैठे रहिए, पर ससार से आपका धा
आपसे ससार का कोई काम निकलना असम्भव नहीं तो
दुष्कर अवश्य हो जायगा।हा, सय झगड़े छोडकर विरक्त
हो जाए तो और बात है। पर उस दशा में भी पचभूतमय
देह पर पचज्ञानेन्द्रिग, पचकर्मेन्द्रिय का मझट लगा ही
रहेगा। इसी से कहते हैं कि पच का पीछा पकडे पिना
किसी का निर्वाह नहीं। क्योंकि पच जो कुछ करते हैं, उसमें
परमेश्वर का ससर्ग अवश्य रहता है, और परमेश्वर जो
कुछ करता है वह पच ही के द्वारा सिद्ध होता है। यरच यह
कहना भी अनुचित नहीं है कि पव न होते तो परमेश्वर का
कोई नाम भी न जानता । पृथ्वी पर के नदी, पर्वत, वृक्ष पशु,
पक्षी और प्रकाश के सूर्य, चद्र, प्रह, उपग्रह नक्षत्रादि से पर
मेश्वर की महिमा विदित होती सदी, पर फिसफो विदित
होती ? अकेले परमेश्वर ही अपनी महिमा लिए यैठे रहते ।
पंच परमेश्वर। पंचत्व से परमेश्वर सृधि-रचना करते हैं। पंचसम्प्रदाय में परमेश्वर की उपासना होती है । पचामृत से परमेश्वर की प्रतिमा का स्नान होता है। पच वर्ष तक के वालो का पर- मेश्वर इतना ममत्व रखते हैं कि उनके कर्तव्याकर्तव्य की ओर ध्यान न देके सदा सब प्रकार रक्षण किया करते हैं। पचेन्द्रिय के स्वामी को वश कर लेने से परमेश्वर सहज में वश हो सकते हैं। काम के पंचवाण को जगत् जय करने की, पचगव्य को अनेक पाप हरने की, पचप्राण को समस्त जीव- धारियों के सर्वकार्य-सम्पादन की, पंचत्व (मृत्यु) को सारे झगडे मिटा देने की, पचरत को बडे बड़ो का जी ललचाने की सामर्थ्य परमेश्वर ने दे रक्खी है। धर्म में पचसस्कार, तीर्थों में पचगगा और पंचकोसी, मुसलमानों में पच पतित्रत आत्मा (पाक पेजतन) इत्यादि का गौरव देखके विश्वास होता है कि पच शब्द से परमेश्वर बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है। इसी मूल पर हमारे नीति विदाम्बर पूर्वजों ने उपर्युक्त कहावत प्रसिद्ध की है। जिसमें सर्वसाधारण संसारी-व्यवहारी लोग (यदि परमेश्वर को मानते हों तो ) पच अर्थात् अनेक जनसमुदाय को परमेश्वर का प्रतिनिधि समझे। क्योंकि परमेश्वर निराकार निर्विकार होने के कारण न किसी को पाह्य चक्षु के द्वारा दिखाई देता है न कभी किसी ने उसे कोई काम करते देखा, पर यह अनेक बुद्धिमानों का सिद्धान्त है कि जिस बात को पच कहते षा करते हैं यह भनेकांश में यथार्थ ही होती है। इसी से.. "पाच पंच मिल कीजै झाज, हारे जीते होय न खाम,"
--
(१०७)
विसर्जन तक का उदाहरण पनने को प्रस्तुत हैं। क्या तुम्हें
भी उसी पथ का अपलयन करना मंगलदायफ म होगा?
पदि बहकानेघाले रोचक और भयानक पातों से लाख घार
करोद प्रकार समझा तो भी ध्यान न देना चाहिए। इस यात
को यथार्थ समझना चाहिए कि पच ही का अनुकरण परम
कतर्य है। क्योंकि पच और परमेश्वर का बडा गहिरा सम्बन्ध
है। बस इसी मुख्य यात पर अचल विश्वास रखके पव के
अनुकूल मार्ग पर चले जाइये तो दो ही चार मास में देख
लीजियेगा कि यड़े लोग भापके साथ बडे सह से सहानुभूति
करने लगेंगे, और बडे २ विरोधी बड़े साम, दाम, दड, भेद से
भी आपका कुछ न कर सकेंगे। क्योंकि सय से यडे परमेश्वर
हैं, और उन्होंने अपनी पढ़ाई के बड़े २ अधिकार पच महोदय
कोरेरक्ले है। अतः उनके आश्रित, उनके हितैपी, उनके कृपा.
पात्र का कमी कहीं किसी के द्वारा धास्तविक अनिष्ट नहीं हो
सकता । इससे चाहिए कि इसी क्षण भगवान् पचवकू का
स्मरण करके पच परमेश्वर के हो रहिए तो सदा सर्वदा पंच.
पाहव की भाति निश्चित रहिएगा।
( १०६ ) "जियत हंसी जो जगत में, मरे मुक्ति केहि काज" क्या फोई सफल सद्गुणालकृत व्यक्ति समस्त सुख सामग्री सयुक्त, सुवर्ण केमदिर में भी एकाकी रहके मुख से कुछ काल रह सकता है ? ऐसी २ वातो को देख सुन, सोच समझके भी जो लोग किसी डर या लालच या दवाव में फॅसके पच के विरुद्ध हो धैठते हैं, अथवा द्वेपियों का पक्ष समर्थन करने लगते हैं वे हम नहीजानते कि परमेश्वर, (प्रकृति) दीन, ईमान, धर्म, फर्म, विद्या, बुद्धि, सहृदयता और मनुष्यत्व को क्या मुंह दिखाते होंगे? हमने माना कि थोडे से हठी, दुराग्रही लोगों के द्वारा उन्हें मन का धन, कोरा पद, झूठी प्रशसा, मिलनी सम्भव है, पर इसके साथ अपनी अतरात्मा (फानशेन्स) के गले पर छूरी चलाने का पाप तथा पचों का श्राप भी ऐसा लग जाता है कि जीवन को नर्कमय कर देता है, और एक न एक दिन अवश्य भडा फूट के सारी शेखी मिटा देता है। यदि ईश्वर की किसी हिकमत से जीते जी ऐसा न भी हो तो मरने के पीछे आत्मा की दुर्गति, दुर्नाम, अपकीर्ति एव सतान के लिए सजा तो कहीं गई ही नहीं। क्योंकि पच का बैरी परमेश्वर का बैरी है, और परमेश्वर के बैरी के लिए कही शरण नहीं है- राखि को सकै रामकर द्रोही । पाठक! तुम्हें परमेश्वर की दया और बों वूदों के उद्योग से विद्या का अभाव नहीं है। अत. आंखें पसार के देखो कि तुम्हारे जीवनकाल में पढ़ी लिखी सृष्टिवाले पच किस ओर मुक रहे हैं, और अपने ग्रहण किये हुए मार्ग पर किस दृढता, वीरता और अकृत्रिमता से जा रहे हैं कि थोडे से विरोधियों की गाली धमकी तो क्या, परच साठी तक खाके हतोत्साह नहीं होते, और स्त्री पुत्र, धन जन क्या, घरच प्रात्म
,
( १०६ )
पूजा में यगाली मासा पेट भर २ मास खाते और तो फुलाते
है। कार्तिक में यों तो सभी को सुख मिलता है, पर हमारे
मटीवाजो को पौवारह रहती है। 'न हाकिम का मटका न
रैयत का गम सरे बाजार मतलर गांउना विशेषत दिवाली
में तो देश का देश ही उनकी स्वार्थसाधिनी समा फा मेम्बर
हो जाता है। पीछे से "आफयत की खबर खुदा जाने," भाज
तो राजा, यावू, नमाय, सर (अगरेजी प्रतिष्ठावाचक शब्द)
हजरत, श्रीमान् सब पापही तो हैं।
मगहन और पूल हिन्दुओं के हक में मनहूस महीने हैं ।
इनमें शायद कोई त्योहार होताहो। परवडा दिन पहुधा इन्हीं
में होता है। इससे भेजाफरोशों तथा हमारे गौराग देवताओं
का मुह मीठा होता है।
माघ में स्नानादि श्रखरते हैं, इससे धर्मकार्य ही कम होते
हैं, पर कहां से हो रहा, यसतपचमी के दिन घोविनों
को महिमा बढ जाती है। घर २ श्री पार्वती देवी की स्थाना-
धिकारिणी पनी पुजाती फिरती है। हम नहीं जानते कि यह
चाल कय से चली है, और फोन उचमता सोच के चलाई
फागुन के तो क्या २ गुन गाइएगा, होली है। ऐसा कौन
है जो खुशी के मारे पागल न हो जाता हो । जब जट वृक्ष
श्राम भी वोराते हैं तब आम खास सभी वीराने की या
यान है। पर सबसे अधिक मडुओं का महत्व बढ जाता है।
पडे २ दरवारों में उसकी पूछ पैठार होती है, बडे बडे लोगों
को उनकी पदवी मिलनी है। 'भाधा आए होली के मा'
पस सिर से पाच तक तर हो गए !
-
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.
.
( १०८ )
किस पर्व में किस की बन आती है।
थी रामनीमी में भक्तों की वन आती है। व्रत केवल दुपहर
तक का है, सो यों भी सब लोग दुपहर के इधर उधर खाते
है । इससे फष्ट कुछ नहीं, और थानन्द का कहना ही क्या है,
भगवान का जन्मदिन है । अनुभवी को अकथनीय आनन्द है।
मतलवी को भी थाडे से शुभ फर्म में बहुत यड़ो आशा है।
वैशाष में कोई बडा पर्व नहीं होता, तो भी प्रात मान
फरनेवालो को मज़ा रहता है । भोर की ठडी हवा, सो भी
वसत ऋतु की। रास्ते में यदि नीम का वृक्ष भी मिल गया तो
मुगध से मस्त हो गए।
जेठ में दशहरा को गगापुत्रों की चादी है। गरमी के
दिन ठहरे, बडा पर्व ठहरा; नहाने कौन न आवैगा, और कहा
तक न पसीजेगा। आषाढी को चेला मूडनेवाले गोसाइयों के
दिन फिरते हैं । गरीव से गरीव कुछ तो भेट धरेईगा । नाग
पचमी में लडकियों का, (परमेश्वर उनके माता पिता को
बनाए रक्खे) भादों में हलपप्टी को भुजरियों के भाग जगते हैं,
जिसे देखो वही बठुरी २ कर रहा है।
हमारे पाठक कहते होंगे कि जन्माष्टमी भूल गए । पर
हम जर आधी रात तक निर्जल रहने की याद दिला देंगे तब
यकीन है कि वे भी सव आमोद-प्रमोद भूल जायगे । पर्याकि
'भूने भगति न होय गुपाला ।'
कुआर का कहना ही क्या है । मोहित जी पित्रपक्षों भर
सर के पिता पितामहादि के रिप्रिजेन्टेटिव (प्रतिनिधि) वने
हुए नित्य शकुली खाते और गुलछरें उड़ाते हैं । फिर दुर्गा
।
( १११)
माघ फा मदीना कनौजियों का काल है। पानी छूते हाथ
पांच गवते है। पर हमें विना स्नान किये फलहारी पाना भी
धर्मनाशक है । जलसूर के माने चाहे जो हो, पर हमारी समझ
में यही माना है कि सूर अर्थात अधे बनके, आखें भूदके लोटा
भर पानी पीठ पर डाल लेनेवाला जलसूर है !
फागुन में होलीपडा भारी पर्व है। सय को सुख देती
है । पर उप भी कइयों को देती है। एक माडवारी, दिनभर
माना है न पीना, डफ पीटते २ हाथ रह जाता है। होकते २
गला फटता है। कहीं अकेले दुकेले शैतान-चौकडी (लडकों
के समूह) में निफल गए तो कोई पाग उतारै छ, फोई धाप
मारे है, कोई फीचड उछारै छ । क्या करें विचारे एक तो
विन्दु, दुसरे कमजोर, तीसरे परदेशी सभी तरह आफ़त है।
दूमरे नई रोशनीवाले देशमाइयों की बैलच्छ देख देख जले
जाते हैं । यह चाहते हैं सब ज्युटिलमैन बन जायें, यहां आदमी
वनना भी नापसद है।
मुह रगे हनुमान जी की बिरादरी
में मिले जाते हैं। तीसरे दाढ़ीवाले हिन्दू दिनभर रग अवीर
पर खलाई कहा जाती है। जो किसी ने गंधा पिरोजा
लगा दिया तो और भी आफत है । तो, इतने हमने घता दिए,
ऋछ तुम भी सोचो।
प्रोमो,
( ११० )
किस पर्व में किस पर आफत आती है।
नौरात्र, चैत्र और कुवार दोनों में बकरों पर। हमारे कनौ
जिया भाई एव वगाली भाई उन विचारे अनमोल जीवों का
गला काटने ही में धर्म समझते हैं।
बैशाख, जेठ, असाढ़ वरी हैं, तो भी छोटी मछलियों को
श्रासन पीडा है। जिसे देखो वही गगा जी को मय रहा है।
सावन में विशेषत रक्षा-वधन के दिन फजूस महाजनों का
मरन होता है, इनका कौडी कोडी पर जी निकलता है, पर
ब्राह्मण-देवता मुसके बाधने की रस्सी की भाति राखी लिए
छाती पर चढ़े, घर में घुसे आते हैं।
भादों में त्रियों की मरही होती है। हरतालिफा पानी
पीने में भी पाप चढ़ाती है ! बहुत सी बुढ़ियां तमाखू की थैली
गाले पर धर के पड रहती हैं। सभी तो पतियता हई नहीं,
दिनभर पति से साव २ करती है। कहीं पा तो उस भूपि
की दाढ़ी जलाद, जिसने यह व्रत निकाला है।
पित्रपक्ष में आर्यसमाजी कुढते २ सूख जाते होंगे । 'हाय
हम सभा फरते, लेक्चर देते मरते हैं, पर पोपजी देशभर का
धन खाए जाते हैं।"
कार्तिक में, खासकर दिवाली में, आलसी लोगों का अरिए
पाता है । यहा मुंह में घुसे हुए मुच्छों के बाल हटाना मुशफिल
है, यहा यह उठाव वह धर, यहा पुताय, पहा लिपाध, कहां
की आफत
अगहन पूस तो मनहूस हुई है, विशेषतः घोवियों के
कुदिन आते हैं। शायद ही कभी कोई एक आध हुपट्टा उपट्टा
धुलवाता हो।
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-
, हमको मी राजा, सद -- (११३ ), सिट पिट करो हट जायगे । आप अगरेजी में फिट पिट कारके, इमें शांत करना चाहोगे, पर हमें यही "सुनटा नहीं क्ष्य चला जायमा टुम बाडमा" सूझेगा। लास खुशामद करोगे दम एक न सुनेगे। हम जो कुछ लिखेंगे, आप यदि हिन्दू ६ तो वेदवाक्य समझेंगे, यदि मुसलमान हैं तो थायाते कुरान से भी अधिक मानेंगे, अगर नेटिव मिश्चियन है तो गपने मोचिङ्गाज में नीम के नीचे पडे होफर के हमारे लेप को भी, सच मानिए, अपनी चाइपिल के प्रमाणों में मिलाने लगेंगे ऐसे समय पर कहीं हम विलायत याना-निषेध पर कुछ लिखें तो विद्युत् समाचार की नाई समस्त भूमडल पर फैल जाय। श्री ईसाई (CS.I)ी पदवी मिल जाय । पर भेय्या! हम तुम्हें यह समझाते है। कि साहिय लोगों के ही क्या रकमला (सुर्खाय) का पर लगा है जो उनके लेफचर और, आर्टिलों को बिना मीमांसा प्राण कर लेने हो, इममें तुम्हारा पाल्याण नहीं है। "यथा राजा तथा मजा" का अर्थ यह नहीं है कि साहिच लोगों की नाई आपकी लटकी भी मिलें हो जाय । पापफी रहन सहन में खडे होके पयाप त्यागे फरना सभ्य समझा जाय । आप जो इतने ममाण श्री महाभारतादि वृददितिक्षासों और शीमागवतादि महापुराणों से छारते हैं कि हमारे पूर्वज विलायत जाते थे। रूपने माना, किन्तु यह तो समझिप फि उन महापुरुषों ने जाके क्या किया था। किसीने जाके अपनी व्यवहार विद्या मलाई थी। आप उराटे यही कीरीति नीति सील आते हैं। उन लोगों ने वहा जाके अपने सनातन धर्म को विस्तृत किया था, आप यहां से ईसाई होके लौटते हैं। आपके पूर्व- गुरुप झट से अन्य देशस्थ मनुष्यों को विशालाक्ष, कालयवन, N.
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विलायत-याता।
नवाने पया दुर्दशा शाई है कि लोगों को सब विलायती
पदार्थ प्रीशाच्छे लगते हैं। कदाचित् इसका कारण पश्चिमीय
शिक्षा हो । लोग बाल्यावस्था में ही उन स्कूलों में भेज दिने
जाते हैं जहा वही अगरेजी गिटपिट से काम पडे। चाहे
कश्मीरी, खत्री आदि की भी सतति हो, पर अपने को ब्लैक
कहने में आदर समझे। चाहे महाराष्ट्र वीरों को पुत्र भी हो,
पर घही कि इम में अगरेजों की सी फुर्ती कहां से आई,
इत्यादि । यह सब बातें लिखें तो लेख बहुत बढ़ जायगा। हमें
तो केवल यह दिखाना है कि काल के परिवर्तन से जो लोग
विलायत गमन के लिए कहो वेद से लेकर पुराण, कुरान
धादि के श्लोक घा आपत छांट छाँट के छपा दें,,कहो सहस्त्र
युक्तिया निकालके यह सिद्ध कर दें कि वहां की सी जल
वायु काहीं नहीं है. वडा की रहन सहन, बोल चाल,
शिष्टता
मिष्टता कहीं नहीं । वहा हमारे पूर्वज तो सब जाते थे। बिना
चहा के साधाच्छादन किये हमारी ब्लैकनेम ( श्यामना)
जा सकती है, न गौरा देवों को भी पूजा, मिल सकती है।
अरे भाई एक ब्राहाण चाहे सो यके, पर तुम्हारी समझ में
नहीं आएगा।
पर यदि हमी श्वेत खेप कागा लें, और अपना नाम भी
रेवरेन्ड मिस्टर P Narovegem Messur ए० बी०सी० डी०
ोड रस लें तो तुरत श्राप हमारे बगले पर माके हममे
साक्षात् करके फर-स्पर्श करने को उत्सुफ होंगे। आप अपनी
पाफेट से रूमाल निकालके मुकेंगे कि हमारा वूट पोछ ।
पर हम कहेंगे "मो हट जाओ सूपर फाला। झट से आप
.
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बर्विस में हजारों रुपए व्यय करके जब लौटोगे तो मिलेगी यही नौकरी। धमारा अभिप्राय यह नहीं कि नौकरी करो ही मत, न करोगे ता जियोगे फैले ? किन्तु यह अभीष्ट है कि ऐमा उद्योग करो कि जिससे देश का धन देश ही में रहे। गज्य दूमरों का है, कुछ न कुछ धन तो अवश्य ही विदेश जायगा। यह बात तो पत्थर की लकीर ही है। पर ऐसा उद्यम करो, जिससे यथोचित द्रव्य के अतिरिक्त एक फोडी भी निदेश को न जाय । यदि सैर ही के प्रयोजन में विलायत जाते हो तो तनिक चैन करके देखिए तो हमार वैसे दिन नहीं रहे। यदि ऐसी ही इच्छा हे तो श्रीवृन्दारनादि तीर्थों को रमणीय करने की चेष्टा कीजिए । नहीं तो यह पवित्र स्थान एक तो वैसे ही पूर्वापेक्षा कुछ न्यूनतर रमणीय हो गए हैं, टूमरे तुम और कर दोगे। मुसलमानों के अत्याचार से तोमदिर भग्न हुए, आय तुम्हारे विलायत आदि जाने के व्यय में अकेले तीर्थ हो पा सुन्धारे सब प्रहादि प्राणरहित देह के समान हो जायगे। जिस दिन नुम पिलायत में जाकर अपने प्राचार-व्यवहार फैलायोगे, और जैसे अन्य देशियों की रीति नीति तुम सोण्ठे हो येस दूसरों को भी अपनी नीति सिम्बायोगे, उस दिन तुम्हें कोई चुरा न पहेगा, और कोई जातिभ्रष्ट न देगा। बोल श्री नन्दन- दन की जै- " ( ११४ ) (१) मयदानव (२) नामधर लेते थे। आप ब्लैक, डैमडफूल बन फे फूल से खिल जाते है कि इन अधरों से भला इतना तो भी सुना । अभी तो श्राप हल बात पर हंसते होगे कि हम भी किम मुल्क में उत्पन्न हुए, जहा लोग जहाज पर नहीं बढते, जहा राडे होके नहीं मुतते जहां लोग हाइड्मपार्क (३) की सैर नहीं करते, जद्दा खो स्वच्छन्द नहीं विचरती, जहा कागज का एक काम तो तोगों को विदित ही नहीं, देवल लिखने, छपने, टोपी बनने भादि के ही काम में आग है इत्यादि । पर यह न समझते होंगे कि हमारे देश की एक २रीति पर चाहे और देश के प्रादमी असभ्यता का दोष गरोपण करें, किन्तु कुछ नहीं, कहीं धूलि के उडने से भानु' प्रतापहीन होने है। हा इतना तो हो जाता है कि भानु दिखाई न दें। पर ज्योंही धूलि हटी त्योही भगवान धैसे के वैसे ही। सिविलसनिस है तो सर्विस ही न, हिर यौँ। उसके लिए बिना घुलाए अपनी लक्ष्मी को समुद्र- प्रातों में भेजे । एक सिविलसर्विस के लिए जितना रुपया व्यय किया जाता है, और एक माल जिसने मनुष्य परीक्षा देने विलायत जाते हैं उतने रुपयों के यदि हमारे देश में कोई सदव्यय होने लगे तो क्या ही शानन्द का विषय हो । लिवि. (१) अरव का रहनेवाला था। हर समय कार तथाला, काल. हुजैद कहा करता था | झट महर्षियों ने "कालयवन नाम पर दिया । (२) फारस का रहनेवाला था। जय कोई वस्तु चाहता था तो विदुर' जा से कहता--"रंगे जदै म नाह" मट से मै (मय) नाम पड़ गया। । (३) हाइड्सपार्क-जहा से बना योजाभर दर रहती । बदन का . - , एक बारा
( १७ )
मक्षा क्षत्रियत्व का देप नहीं पातापिर हमारे टाकुर साहस
के नामों में, चेहरे मोहरे में एफै प्रकार की वीरता प्राज भी
झलकती है। इससे हम क्या एक विदेशी भी कह देगी' कि
यह बहादुर फौम है। पर बिनार के देखो तो स्वजातिहिता
न्क्षेपण के मैदान में जितना मुंशीजी को और मंत्री साहय
'का कदम मांगे यदी दुआ है उतने ही राजपून महाशय पीछे
पड़े हममें जांतिहितपियों की संख्या कदाचित् उंगुलि-
यो पर मिना लाय । इसीसे इनके देखें चे समुपत हैं।
वैश्ण में हमारे ओमर दोसर जो ईम कान्यकुन्जों ही की
जिंहा से नहीं, घरेच जगत् के मुख से बनिया ही के नाम से
लपित है, ये फूट का मूलारीपण और फलावादन में हमारे
मुरूप शिष्य है । पर अग्रवाल महोदय जो समय के फैरफार
तथा पश्चिमीय जल वायु के संस्कार से कुछ २ मिया भाइयों
की लटक पर आ गये ६, घे अपने चार भाइयों की दया
सम्पादन करके ऐक्य के मधुर फल को पूर्ण रीति से नहीं
ता भी कुछ नो पा ही रहे हैं । मारवाडी भाई यधपि विधा से
वचित और दोनों प्रकार के धेश्यों से अलग है, पर एका
मैं ऐसी है कि ओमरे दोसर और अगरवाले मदेसरी तो
क्या, हम मनाते हैं, परमेश्वर हमारे ठाकुर साहय और और
में भी सिखाये धन्य है, देश से आते देर नहीं और सेठ
जो बन जाते देर नहीं ! चाहे नित्य' दिवाला निकले, पर
"मपणा मायांग कोडीने सांगा। मतो इस घुद्धि को
देवताओं ही की बुद्धि काहेंगे।
रहे शूद्र, जो सर की दृष्टि में नीच है, पर पाच पच फा
सहायता, स्नेह की पूर्ण सुख भोगते हैं। इसीसे कहते हैं
कि "जब निवास नीच करतूती, हिते लगी पडेन में कृती' !
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-
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ऊंच निवास नीच करतूती।
बगाली ब्राह्मण अपने को कान्यकुब्जों का वश बताते हैं।
इससे स्वय सिद्ध है कि जो लोग बाज़ भी कान्यकुब्ज देश
ही के इधर उधर रहते हैं, और कान्यकुब्ज ही कहलाते है
वे अधिक श्रेष्ठ हैं। क्योंकि देश, मेप, भाषा, भाचार,
व्यवहार सभी कुछ बना है । भला यह श्रेष्ठत होतो तो क्या वे
होंगे जिनका नाम भी और हो गया। पर जब हम देखते हे
कि वगाली माशा (महाशय ) पक शूद, निर्धन, अविद्य और
उदासीन (न मित्र न. शत्रु) वगाली के हितार्थ पतद्देशीय
अत्युच ब्राह्मण पड़े, भारी, अमीर, महापड़ित एवं परम मित्र
को कुछ माल नहीं गिनते, घरसों की मित्रता छोड़ नए परि-
चयी की भोर हो जाते हैं, यहा तक कि 'हिन्दुस्तानी' शब्द ही
को वे अन्त करा से तुच्छ, समझते हैं। पर हमारे रौरे जी
(कनौजिया भाई) की अकित पर ऐसे पाथर पड़े हैं कि
दुनिया भर की चाहै लातें खाय प्रात्रे, पर अपने को अपना
नमझे तो शायद पाप हो । सनौजियाय में पट्टा लग जाय।
धाकर तो धाफर ही है। अच्छे झमझौधा पटकुरत का भी
पक्ष करना नही सीखे । यही कारण है कि विद्या में, बुद्धि में,
राजद्वार में, प्रतिष्ठा में यगाली भद्रो पुरुप है, (यदि आज न
हो नो कुछ दिन में अवश्य याबू लोग बनाय लेगा) और यह
फुलीन दादा फुली नहीं तो मजदूर अवश्य ही हैं।
इधर क्षत्रियों में देखिए तो हम यह नहीं कह सकते कि
खत्री और फायस क्षत्री नहीं हैं, पर डीन डौल, माम काम,
पहिरावे उदावे में मगायत आ जाने से और यज्ञोपवीत
तथा सामयिक राज भापा यो अभ्यास के अतिरिक और कोई
-
१
-
( १२१ )
के समय शिर के ऊपर से धाग यहती है, यह शिव जी
का अग है। बाहर निकलते ही मुख में वेद का कोई मत्र
वा घेदवद्य परमेश्वर का कोई नाम होता है, जो ब्रह्म का रूप
है। क्यो, तीनों हो गये ? हमारे मित्र मुशी कालीचरण साहय
'सेयका कति की एक सवैया इसी पतलय में है, यथा
सेवक तौर पे ठाढो भयो पद है यहि विष्णुना गंग दई है,
नदीत समय सिरते कढ़ी ताछन शफर ली शुभ शोभा भई है।
बाहर आय पढ़े श्रुति मत्र त विधि को पद साची हुई है,
माय त्रिगामिनि तीर त्रितापिटु होत सदेह त्रिदेवमयी है।
घरच हमारे रसिकों को इन्द्र पदयी अधिक प्राप्त होती है,
क्योंकि हजार अखे मिलती है, इसका
अर्थ समझना मुश्किल
महीं है। अहा हा
नजर आता है हरसू गट परीयोहरो गिलमा का।
मिने हैराहे गगा में में रुतया सुलेमा का।
-
.
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.
-
-
प्रेमाधार है। धन्य गगे। सर्वदेवमयी गगा जिन्होंने कहा है,
निहायत ठीक कहा है, पयोंकि-
शिव शिर मालति माल भगीरथ नृपनि पुण्य फल,
ऐरावत, गज गिरिवर' पविनव कठमालकल ।
श्री हरिपद नख चद्रकांतमणि द्रवित सुधारस,
ब्रह्म कमडल मडन भवखंडन
सुर सरवस ।।
-इत्यादि वाक्यों का स्मरण होते ही नधियत को ताजगी
होत, है । फिर तुम्हें अमृतमयी क्यों न माने ?
'बहुतों का विश्वास है, यहुत पोथियों में लिखा है कि
गगा मातक मरणानन्तर शिवत्व अथवा 'विष्णुव को प्राप्त
होता है। श्रीमान् कविवर श्रब्दुल रहीम खां खानखाना, जो
अकार के समय में संस्कृत और भाषा के बड़े अच्छे वेत्ता थे,
उनका एक श्लोक बहुत प्रसिद्ध है-
अच्चुत चरण तरंगिनि शशिशेपर मौलि मालतीमाले।
मम तन वितरण समये ,हरता देया न मे, हरिता।
अर्थान् विष्णु वनाभोगी नो मुझे कृतघ्नता का दोष होगा,
क्योंकि तुम उनके चरण से निकली कहाती हो। अतएव शिव
यनाना, जिसमें तुम्हें शिर पर धारण करूं । अन्य मतवाले देख
ले कि अच्छे मुसलमान भी हमारी गगा को क्या कहते हैं ।
फिर उन हिन्दुओ कोम या कहें जो गगा की प्रीति नहीं
करते।
हमारी समझ में मरने पर क्या होता है, यह नहीं आता।
पर जीते जी ब्रह्मा, विष्णु, महेश बना देती है, यस्तो हम
प्रत्यक्ष दिखा देगें। किसारे नहाने को खडे हो तो पावके नीचे
गगा बहती हैं, यह विष्णु भगवान का चिढ़ है । डुबकी लगाने
.
( १२३ ) नशा छोगी? यही विचार फर कई नगरों में चंदा, गोशाला, समा, लेख, लेकचर इत्यादि हो भी चो, परच वाजे २ गाग्य शाली शहरों में धर्मिष्ठ मुसलमान भी शरीक हैं। परमेश्वर उनका सहायक हो। पर बडे खेद और लज्मा का विषय है कि इस कानपुर में, जहां हिन्दू ही अधिक हैं, विशेषतः ग्राह्मण ही क्षत्री धन, विद्या, प्रतिष्ठा आदि सामर्थ्य विशिष्ट हैं, परन्तु इस यात में यदि दूसरे चौथे वर्ष किसी के हुलियाए २ कुछ मन भी करते हैं तो बस कुछ दिन टाय २ पीछे से फिस्त । जहां कोई झूठ मूठ का वेसिर पर का यहाना मिल गया वहीं वैर रहे ! यदि किया चाहे तो केवल दो चार लोग मिल के सब कुछ कर सकते हैं, पर हौसिला नहीं है । हजारों रुपया व्यर्थ उठाते हैं, पर इस विषय में मुह चुराते हैं। इन शहरवालो से तो हम अपने सुहृद अकबरपुरवासियों को धर्मनिष्ठता, ऐफ्यता, द्योग, उत्साह और साहस की सराहना करेंगे, जहा श्रीयुत पण्डितवर बद्रीदीन जी सुकुल, श्रीयुत थाधू तुल- सीरामजी अग्रवाल और श्रीयुत लाला टेकचन्द्र महोदमादिक योडे से सजनों के आन्दोलन से दोही महीना के भीतर अनुमान छ• सौ के रुपया भी एकत्र होगया, समा भी चिर- स्थायिनी स्थापित हुई है, व्याख्यान भी प्रति सप्ताह मनोहर होते हैं, और सब ने कमर भी मजबूती से वाध रक्सी है। क्यों भाई नगरनिवासियो । अधिक न करो तो अपने जिले के लोगों को कुछ,तो सहाय दोगे ? जहां सैकड़ों की आतशवाजी फूक देते हो. हजार्गे,दिवालियों को दे बैठते हो, अदालत में उडाते हो, वहा गऊ माता के नाम पर कुछ भी न निकलेगा ? धर्म, नामवरी, खोक परलोक का सुख सब है, पर हौसिता चाहिए।
( १२२ ) गोरक्षा। । -- - , गौमाता की महिमा इससे अधिक क्या वर्णन की जाय फि देवता, पितर, मनुष्य, स्त्री,लडके, बूढ़े, सभी उनके अमृत समान दूध से तृप्त होते हैं। माननीया ऐसी हैं कि देश भर माता कहता है, जगत्पज्य ब्राह्मण नाम के भी पहले स्मरण की जाती हैं, 'गऊ ब्राह्मण' । भगवान का नाम भी उन्हीं के नाते गोपाल कहाता है। पवित्रता यह है कि उनका मलमूत्र तलक खाया जाता है। उपकार उनके अनत है । वयं तथा मतान द्वारा मरते जीते, लोक परलोक सव में हित ही करती हैं। ऐसी बातें एक लडका मी जानता है। फिर हम भी कई चार लिख ही चुके हैं, घार पार पिष्टपेपणमात्र है। यह बात भी पूर्णतया विदित है कि बीस वर्ष भी नहीं भप, घी कैसा सस्ता था, और उसके खाने से अब भी जो लोग पचास वर्ष के कुछ इधर उधर है कैसे बली शीररोगरहित हैं। वे अपनी जवानी की कथा कैसे अहंकार से कहते हैं कि आजकल के लड़के एव नाजुक बदन गेगसदन जवान लोग सपने में भी उस प्रकार के मुख भोग के योग्य नहीं होसफते! जहा स्वादिष्ट और बलकारक भोजन तक खेच्छापूर्वक न मिलें वहां और सुखों की क्या कथा है। यह भी अच्छी तरह सब जानते हैं कि 'प्रजावत्सल सर्कार इस विषय में अपनी ओर से क्या, हमारी विनय सुम के भी सहाय फरती नहीं दीसती । याजे २ छठी मुसलमान कुरान और हदीस के वचन सुने अनसुने करके अपनी जिव का नियाद करेंगे, इस मामले में हमारा साथ न देंगे। फिर यदि हम भी कुछ न करें तो दशही पाच वर्ष में हमारी क्ष्य
( १२५ )
ईश्वर की इच्छा, फाल की गति, वर्तमान गजा की नीति, चाहे
जो कह लीधिए, पर इसमें भी कोई सन्देध नहीं है कि हमारे
नाश का मुख्य कारण हमारी ही मूर्पता है । नहीं तो कुत्ते भी
जहा पैठते हैं, पहा पूछ हिता के बैठते हैं । पर इमने अपनी
घास उनसे भी पुरी कर रक्खी है कि जिस पृथ्वी पर रहते
है उसी के पगने बिगडने का ध्यान नहीं रखते। हमारे वे पूर्वा
मूर्ख नाथे जिन्होंने धरती को माता पव शिवजी की बार
मूर्तियों में से एक मूर्ति कहा है, तथा उसके पूजने की साक्षा
दी है। वे भली ति जानते थे कि ससार में जितने पदार्थ
है सबकी उतान्ति मोर लय इसी में और इसी से होनी है।
हम सारे भ्रम धस इली- पर फरते हैं, हमारे सुख भोग
की सारी सामग्री हमें इसी से प्राप्त होती है। फिर इसके माता
होने में क्या सादे हे। यदि इस.माता के प्रसन्न रखने में
उद्योग न करते रहेंगे तो हमारी'फ्या दशा होगी' पर इस
समय के अनेक विदेशी विद्वानों को भी निश्चय हो गया है
कि यदि कोई पुरुप नित्य शरीर पर लाफ चिकनी मिट्टी
लपाया करे वा प्रतिदिन कुछ काल उसमें लोटा करे तो शरीर,
मस्तिष्क पर हदय को बडालाम पदुचता है। हमारे यहा के
अपठित लोग भी जानने है कि मट्टी देही को पालती है पर
दि हम मट्टी को शुद्ध न रपये, उसके अशुद्ध करनेवालों को
गरोफ, शुद्धमट्टी प्राप्त करने में आलस्य अथवा लोम पर नो.
हमारा ही अपराध है कि नहीं? और इस अपराध मे, मही
लगाने तथा उसके लाम जवाने से हम वचित रहेंगे कि मनी!
पेसे हो मट्टी को तथा यायत् वस्तुओं की गानि प्रभारी
धरती माता- यदि निर्वीजा होती रहेंगी, जैसी भाजात
हमारी पेपरवाई से होती जाती है तो इसमें भी कोई माधयं
-
(१२४ )
धरतीमाता।
श्राजका हमारे देश में गौमाता के गुण तथा उनकी
रक्षा के उपाय एवं जनित लोभ की चर्चा 'चारों और
सुनाई देती है। पद्यपि दुष्ट प्रकृति के लोग उसमें बाधा करने
से नहीं चूकते, और बहुत से फटी रक्षक बन के भी
भक्षक का काम करते हैं, अथवा कमेर मजबूत बोधके तन
मन धन से इस विषय-का उद्योग करनेवाले भी श्री स्वामी
पालाराम, श्रीमान् स्वामी श्रीर पंडित जगतनारायण' के
सिवा देख नहीं पड़ते। नामधरी की लालच, आपस की
वैमनस्य, सकार की स्वार्थपरता यो चेपरवाई इत्यादि कई
अडचने बडी भारी है। पर लोगों के दिलों पर इस बात की
यीज़ पड गया है तो निश्चय है कि कभी न कभी कुछ न कुछ
हो ही रहेगा। पर खेद का विषय है कि हमारी धरती माता
की और अभी हमारे राजा प्रजर्जा किसी का भी ध्यान नही
है। हम अपने दिहाती माईयो को देखते हैं तो सर्दा पच्छे
वायु में रहते और परिश्रम करते एव अनेक बलेनाशक
दुर्यसनों से घचंते हुए भी अधिकांश निर्यल ही पाते हैं। यह
धुद्धिमानों का महानुभूत सिद्धान्त है कि उत्तम खेती मध्यम
यान, निषिद्ध चाकरी भीख निदाना, पर श्रीज कल कॅपिजीवी
ही लोग अधिक दरिद्री पाए जाते हैं। कितने शोक की बात
है कि जिनके घर से हमारें नगरवासी भाईयों को अन्न-वस्त्र
मिलता है उन्हीं को रोटी-लंगोटी के लाले पड़ें रहते हैं।
" हमारे बुद्धिमान डाकर और हकीम जिन बातों का स्वास्थ्य
रक्षा का मूल बताते हैं उन्हीं कामों को दिन रात करनेवाले
यथोचित रीति से दृष्ट पुष्ट न हो, इसका कारण क्या है ?
Y ( १२६ ) हमारे देश में वृक्षों का नाश होने लगा,तमी से हमारी धरती- माता जीर्ण हो गई। वर्षा की न्यूनता और रोगों की वृद्धि हो गई। यदि पर भी हमारे देशहितपी भाई धरती का भला चाहते है तो वृक्ष और घास का नाश होना रोकें। नोगों को उपदेश देना, अपनी जमीन पर के पेडो को न काटना-सदा की सख्या घटाते रहना-सरकार से भी इस विषय में भार्थना करते रहना इत्यादि हो उपाय है। पीपल का वृक्ष पोसा होता है, घाइ औरों से अधिक जल श्रींचता है। इससे उसका काटमा धर्जित है। जहां तक हो सके उसको तो काटने अवश्य हो यचाप! परगद, यांवला इत्यादि दूधवाले वृक्षों (जिगर्म दूध निकलता है) से और भी अधिक पसार है। आप जानते हैं, पानी की अपेक्षा दूध अधिक गुणकारी होता है, सो भी वृक्षों का दूध ! जिसका प्रत्यक्ष फल यह है कि परगद का दूध, गूलर के फल निर्वतों के लिए पड़ी भारी पवा है।मला पनसे सूर्यनारायण कितनी सहायता पाते है, तथा उनके काटने से फिसना धरती माता को दुख होता है, इसको हम थोडे से पत्र में कहां तक लिख सकते हैं। हमारे रिखियों ने जेठ में वरपूजन एवं अन्यान्य मासों में दूसरे वृक्षों का पूजन पाहा है, इसका हेतु यह था कि पूरज की प्रपर किरणों उनका दूध सुखा देती है यह घाटा उनकी जड में दूध बालके तथा मला और अष्टगंध की मुगध से पूरा करना चाहिये। पर शोक है नये मतावलम्बियों की बुद्धि पर फि उन्होंने मुखता से ऐसी हिकमतों को जड वस्तु की उपासना समझा है। अरे भाई अपना मला चाहो तो मतवाले न बनो । प्रत्येक वृक्ष की रक्षा, वृद्धि और सनातन रीति से नल दुग्धादि धारा उनको सींचना खीकार करो। 1
( १३०)
दवी हुई आग।
यदि किसी ठौर पर आग लगे, धधक उटे, तो हम अनेक
उपाय से तुरन्त उसे धुझा मझते हैं। पर जो आग किसी
वस्तु ने दयी दुई मुलग रही हो, मोर कोई उसे पतलानेवाला
न हो तो उस अग्नि से अधिक भय है। आज कल परमेश्वर
की दया से हमारे धर्मरूपी भवन के अग्निपत् ईसाई मत का
प्रत्यक्ष प्रायल्य तो शांत होने के लगभग है, पर अभी ईसाइयों
की एक कार्रवाई ऐसी फैली हुई है कि यदि उसका उपाय
सभी से कमर पाधा न किया जायगा तो एक दिन दी। मुई
श्राग की भांति वह महा अनिष्ट करेंगी। अभी पचास वर्ष भी
नहीं हुए कि हमारे प्रमाग से भारत में ईसाईपन यो भाग पूरे
जोर शोर के साथ धधक रही थी। माईकेत मधुसूदन दत्त,
निष्टोमोहन धनी नोलक इत्यादि विद्यावानों का स्मरण
करके हमको शाजनक सेद होता है कि हाय यह तोग यदि
हमारे समाज से बहिष्कृत न हो जाते तो कितना उपसार न
करते । पर हाय वह समय ही ऐमा दुस्समय था कि लोग
पढ़ने लिसने के साथ ही पादरियों के जाज्वल्यमान अग्नि
समूह में खाहा हो जाते थे । परमेश्वर ने बड़ी दया की कि
स्वामी दयानन्द, बाबू केशवचन्द्र मुशी कन्हैयालाल आदि
पुरुपरनों को उत्पन्न कर दिया, जिनके वचनरुपी वरुणारत्रों
से क्रिस्तानी की भयानक अभि बहुत कुछ शात हो गई।
अब विकत यह सभव नहीं है कि पढ़े लिखे, प्रतिष्ठित,
कुलीन
में शामिल होके दुर्देव साहब के दस्तरखान
में धर दिए जाय । म एक चार अनेक विद्वानों के मता
उक्त लिरा चुके हैं कि हजरत ईसा पर पूजनीय पुरुष ,
.
( १३१)
और उनके उपदेश भी मानवजाति के महाहितकारत । पर
ईमाई हो जाना, या यों कहो कि पादरियों के मायाजाल में
फस जाना, ऐमा अनिष्टकारक है कि मनुष्य, देश हित, और
जातिदित से सर्वथा चनिन हो जाता है। हमारे ईसाई भाई
जिस ज्ञाति पोर शिस देश के भए उपजे हैं, उससे न उन्हें कुछ
ममना रहती हे न प्रेम, फिर उनसे क्या आशा की आय । इस
पात को ही नही समझते, ईश्वर के अनुग्रह ले सहनों लोग
समझने लगे है। यह बात पर समझदारों की समझ में आना
दुर्लभ हे कि महात्मा मसीह ने मुक्ति का टेका ते लिया है,
विश्वास की महिमा मे तो ईसा क्या हम चोराहे की ईद पूजन
यामां को भी प्रतिष्ठा करते हैं, पर मताद में हिन्दुओं से श्रय
पादरी साहयों का जीतना उयल रोटी का गस्सा नहीं है।
ऊपर से पादरी लोग हमारे ईसाई भाइयों का पक्ष नहीं लेते।
पहनने मसीही दाो२ को महताज हैं, इससे घोर भी सर्व
साधारण की अश्रद्धा हो गई है। पर छोटे २ कोमल प्रहनि-
चाले नासमझ यालकों को रवाना हम हिन्दू मुसलमानों का
परम कर्तव्य है। उन्हें परमेश्वर न फरे पादाग्यिो ती चिकनी-
चुपड़ी बातें असर कर जाय तो हमारी नई पौध निकम्मी
हो जायगो । यही दूरदर्शिता सोच अनेक सजन मिशन-स्टल
में अपने लडकों को नहीं पढ़ाते । पयोंकि वहा और पुस्तकों के
साय इजील भी अवश्य पढ़नी परती है। हम इजाल को पुरा
कदापि नहीं कहते, घद भी धर्म का एक अन्य ऐ, पर उसके
पढनेवाले यदि अन्य धर्म के ट्रेपो न हो। पर हम खेद के
साथ प्रकाश करते है, मी मिशन फूलों में चदन लगाना
योर गगा नहाना, निमोनिजाता है।
अभी हाल ही में शास फेगिरी साक्ष्य ने अपना जूता
- ( १३२ ) दिखाके विचार आर्य बालकों से कहा था-'यह तुम्हारे देवता है। भला ऐसे २ अनर्थ देख सुनके किसको मिशन- स्कूलों की शिक्षा से घृणा न होगी १ महा अभागी वह नगर है जहा मिशन स्कूलों के सिवा दूसरा स्कूल न हो। हम अपने कानपुर की इस विषय में प्रशसा करते है कि जहां चालकों की शिक्षा मिशन ही पर निर्भर नहीं है। लोग गवर्नमेन्ट स्कूल और जुविती स्कूल के आछत अपने सन्तान को हिन्दु धर्म का अश्रद्धालु बनावें तो दूसरी बात है, पर सुभीता परमेश्वर ने दे रक्सा है कि धर्म में भी पाधा न डालो, और राजभाषा भी पढ़ा लो। हमारी समझ में हर शहर के लोगों को चाहिए कि अपने २ यहा कमसे कम एक पाठशाला ऐसी अवश्य स्थापित फरें जिसमें केवल हिन्दू-मुसलमानों का अधिकार रहे, और अन्य शिक्षा के साथ धर्म तथा नीति भी सिसाई जाय। इससे क्रिश्चियानिटी की प्रत्यक्ष माग का रहा सहा प्राबल्य भी जाता • हेगा। पर एक दयी हुई माग अभी ऐसी पडी है जिस पर कोई ध्यान नहीं देता । अभी उसका धुझाना सहन है, नहीं तो पीछे बडी भारी हानि फरेगी । स्कुलो में धनुधा स्याने लडके भेजे जाते हैं और यहां की आग भी धधकती हुई है। इससे इतना उर नहीं है, पर महाजनी पढानेवाले भैया जी के यहां सदा बहुत ही छोटे लडके पढते हे घहा ईसाइयों फा घुसना फिसो सरह ठीक नहीं। लड़के तो लउके हो रहे, बहुधा गुरुजी स्वय नहीं जानते कि इन महापुरुषों से पया हानि संभव है। ईसाई साक्ष्प वहा बिन रोक टोक कह सकते हैं कि 'खडका तो लडका मास्टरन के उडाई ला' खां उन्होंने यह लीला फैलग रक्खी है कि प्रायः सय - साहय ने ( १३ ) महाजनी शिक्षकों को दो घार रुपया महीना देते हैं, और पटुत सी मीठी २ यातों में उन्हें फुसलाके प्रति सप्ताह में दो या एक दिन हिन्दू चालकों को पादरिहाई शिक्षा देने जाया करते हैं। कभीर छोटीर तसबीर, मी किता, कमी मिठाई आदि भी वांटते हैं। जिससे नादान यो और भी मोहित होके लालच के मारे थोर भी ध्यान देके उनकी यातें सीखें, ओर अपनी रीति, नीति धर्म-कर्म, देव-पित्रादि को तुच्छ समझने लगे। मैंने स्वय देखा है कि जिन बालको के माता पितादिक नीच जाति के हिन्दू को छू के न्हावे हे उन यालको को गोद में विठा मुह चूमा ।लउके बिचारे को तो यह नालीम दी गई है कि सब एफ मा पाप से पैदा हुए हैं, जात पात मानना पाप है। और तालीम भी किसी यूरोप- वासी ने नहीं दी कि यह हमारे आचार से प्रहात हो, घरच उन साहय ने शिक्षा दी है जिनके माता पिता भगी चमारादि नीच मला शिक्षा देनेवाले या और शिक्षा यह कि- "माला लकड, ठाकुर पत्थर गगा निरवक पानी, रामकृष्ण सर झूठे भैया चारो वेद कहानी" तो बतलाए, इसका असर हमारे दुधमुहे पश्यों के जी पर केसार अनर्थ न मचावेगा! लडफपन की सीखी बातों का सरकार जन्म भर बना रहता है, यह बात सय जानते हैं। क्या यह उपदेश, यह ईसा के गीत, यह ईसाइयों का मिथ्या प्रेम, हमारे नई पौध के हक में छिपी हुई नाग नहीं है ? इमारी समझ में सय पातों से पहिले इसके बुझाने का यत्न होना चाहिए। हम अपने देशहितेपी भाइयों से आशा करते है कि जहां मेलों और याजारों में ईसाइयों का मुकायिला करते फिरते है वैसे महाजनी पढ़ानेवालों को भी समझा -
( १३४ )
कि दो चार रुपये के लालच से यह अनर्थ न करें। कभी
कभी लड़कों के सामने भी उनको शास्त्रार्थ में निरुत्तर
करते रहे, जिसमें लडकों को उनकी पोल पाल मालूम होतो
रहे। लड़कों के माता पितादि को भी समझा कि जहा चार
आने पाठ श्राने महीना देते हैं यहां दो चार पैसे भैया जी को
और दे दिया फरें, जिसमें उन्हें मिस्तानी धन का घाटा
भी न पडे, और प्रसन्नताचर्चक उन्हें अपने यहा न आने दें
यदि इतने पर भी उन्हें लोभदेव न छोडें तो लडकों को वहां
भेजना बद कर दें। बस यही उपाय है, जिससे यह अनर्थ
कारिणी दबी हुई आग बुझ जायगी। नहीं तो याद रहे कि
खजूर की इंटे ऊपर ऊपर नहीं जाती। एक दिन वह अवश्य
श्रावैगा कि जिस नई पौध के लिए हम अनेक पत्र, अनेक
पुस्तके, अनेक सभा, अनेक लेक्चर, अनेक प्रीच करने है, जिस
नई पौध से हमें बढी २ आशा है; वह नई पौध इस दवी आग
में झुलस के रह जायगी, और हमारा इस काल का सारा
परिश्रम व्यर्थ होगा स्वर्ग में भी हमारी आत्मा पछताएगी कि
'समय चूक फिर का पछिताने ।'
-
.
( १३५ )
चाले पर विश्वास।
इस यात का विश्वास मसीही धर्म का मूल है कि ईसा
मारे पापों के लिए चलि हो गये हैं । अर्थात् हमें पापजनित
दुख से छुडाने के निमित्त अपने प्राण दे दिये हैं। सथे ईसाई
इस कारण से उनकी कृतज्ञता प्रकाशनार्थ श्रपना तन, मन,
धन, जाति, कुटुम्ब, घरच प्राण तक निछावर कर देने में
ईश्वर को प्रसन्न करना मानते हैं, और अपने, अशात दशा में
किए हुए, पापों के फलभोग से निश्चिन्त रहते हैं। यदि विचार
के देखो तो प्रत्येक स्थान पर कोई २ ईश्वर के प्यारे होते हैं
जो लोकोपकारार्थ बलि हो जाते हैं, और कृतज्ञ-समुदाय
को योग्य है कि ऐसे उपकारियों का गुण मानके उनके लिए
एवं उनके नाम पर जहा तक हो,कुछ प्रत्युपकार करें। यदि
प्रणपूर्वक उनकी किसी बात का कुछ लोग अनुसरण करें तो
ससार का महोपकार सम्मर है। खीष्टीय धर्मप्रचार के
आरभ में बहुत से लोग महा २ विपत्ति झेल चुके हैं, यहा तफ
कि जीते जला दिए गए है। पर यह कहने से नहीं रुके कि
ईसा ने हमारे लिए प्राण दिए हैं, हम उसका उपकार क्यों
नमान।
उन्हीं की दृढता का फल है जो पृथ्वी के प्रत्येक भाग:
इंसा का मत गौरव के साथ फेल रहा है। बडे २ बादशा
घडे २ विद्वान वपतिसमा लिए पैठे हैं। परच हम यह
कह सकते हैं, उन्दी के धर्मदाय का फल है, (प्रत्यक्ष
या परपरा द्वारा) कि फई असभ्य देश सभ्य हो गए। हम
तात्पर्य इस फई, लित समाज जेता हो गप, हलेस से यह
है फि हमारे प्रिय पाठक भी सत्य सनातनधर्म छोड निज
ले मुह मोड पादरियों के पक्षलगुआ वन पैठे। पर अच्छी बातें
जिसके यहां से मिले, लेना श्रेयस्कार हैं। क्या हमारे धर्म में
उपकारी की कृतता वर्जित है ? जबकि कुत्ता भी अपने
इफडा देने और चुमकारनेवाले के साथ प्रीति निभाता है तो
मनुष्य या उससे भी गए बीते है कि अपने हितैपियों के
अनुगृहीत न हो, जिनको हम विधर्मी और निद्य कहते हैं
उनमें इतनी कृतज्ञता है तो क्या हमको कृतन होना चाहिये ?
अन्य सम्प्रदायी जिन बातों को करते हो उनके ठीक विरुद्ध
चलना हमारे यहां कहीं नहीं लिया।
फिर हम इतरों की भली बातों को क्यों छोड़ दें। यदि
विचार के देखिए तो मसीद कोई धनी और विद्वान् न ये कि
कोई बडा उपकार कर सकते। उपदेश भी केवल अपने शिष्यों
ही को देते थे। जिन विचारों ने ईसा के नाम पर अनेक दुख
सहे उनका कमी ईसा ने नाम भी नहीं लिया। हमारे यहां तो
पुरुपरतों ने अपना तन, मन, धन, विद्या, प्रतिष्ठा सब कुछ
संपल हमारी उन्नत्यर्थ लगा दिवा, और हमारे लिए हाव २
करते २ दुष्ट कार का कौर हो गए। पर हम उनको मानों
मूल गए।
दयानन्द स्वामी घर को तहसीलदारी छोड के फकीर
भए थे, विद्या भी साधारण न थी, रूप भी दर्शनीय था,
बु में भी चमत्कार था। क्या यह चाहते तो दस वीस
रानाओं को भी न मूडते, दो चार गाव भी अपने मुट्ठी में म
कर लेते, दो चार वारांगना भी नित्य सेवा में न रखते, अथवा
विशुद्ध विराग धारण करके देवता न बन जाते ?
फेशव थाबू पया कहीं के जन या बडे यारिस्टर वन के
लाखों का प्रव्य और लाखों सुख न भोग डालते ? हमारे भार'
-
1
( १३७ )
तेन्दु पया दस पांच कोठियों के स्वामी न घन सकते थे,
सार के यहां से 'सी० एस० आई० अथवा अनार्यरी
मजिस्ट्रेट न हो सकते पर उन्हें तो यह धुन थी कि
पार्यवश हमारे होते दूधने न पाये । इसी लिए अपना बहुत
साधन, यहुत सा समय, बहुत सा सुख त्याग दिया, पटुतेरों
फी गालिया सही, और हमारी ही चिन्ता की चिन्ता पर सो
गए । मा न्याय यह नहीं कहता कि यह लोग हिन्दुओं के
लिए शिर मुडा के घर फूक तमाशा देख केोधलि हो गए।
बहुतेरों का स्वभाव होता है फि फैसी ही बात कहो,
फाई पस्न जरूर निकालते हैं। ऐसे जन कहते हैं कि
स्वामी जी एवं बाबू जी अपना नाम चाहते थे। इसका सहज
सा उत्तर पों है कि नाम तो विषयासकि और अपव्यय से
भी लोग पा सकते हैं, देश की फिकर क्यों करते । यदि
माम ही लो कि नाम ही चाहते थे तो विचारों ने खोया अपना
सर्वस्व, से भी परार्थ, और चाहा केवल नाम । श्रापको इसमें
भी ईपी है तो नाम भी न लीजिए गालिया दिया कीजिए।
पर विचारशीलता यदि कोई वस्तु है तो वह अत करण से
यही कहेगी कि-
पर हित लापि तजे जो देही,
सन्तत सन्त प्रशसहि तेही।
यदि कृतज्ञता कोई पदार्थ है तो वह अवश्य कहेगी कि
ऐमों का गुण माना, ऐसों की प्रतिष्ठा तन मन-धन से
फरना धर्म है, और अपने तथा देश के लिए श्रेयम्फर है।
भारत सन्तान-मात्र इनके ऋणी है इनके नाम पर अपना ओ
कुल पार दे, वह थोडा है। कृतघ्नता के पाप से तभी गम मुना
होंगे, जब इनकी महिमा दृढ रसने का प्रयत फरें। गदी शाय
-
( १३८) के अनुसार जिसका धन लिया है उससे बिना दिए उद्धार नहीं हाता । जिसका सब जीवन ही हमारे हेत लग गया है, उममे कैसे उऋण होगे, जब तक जन्म भर उसके लिए अपना सरसन लगाते रहें। ऐसा करने से ही भारत का गोरय है। नहीं तो स्मरण रहे हिपृथ्वी है भगवती का रूप, और भग चती बलिप्रदान से सतुष्ट होती है. हमारे ऐसा कहने का यह श्रथ नहीं है कि विचारे अनबोल बकरे की हत्या करने से भगवती प्रसन्न होती हैं। यों होता तो उनका नाम जगदम्यान होता, वरच जगदक्षिणी होता। सच यो है कि ईश्वर की तीन महाशक्ति है-श्रीशक्ति, भूशक्ति, लीलाशक्ति । इन तीनों के दो २ रूप हैं, दैवी पोर आसुरी, तिसमें भूशक्ति के आसुरी सम्प्रदायवाले कुछ लोग तो पराए मांस स तुष्ट होते है, पर थाशक्ति का देवी श्रश उन दुश्चरित्रों तथा तद्गुण विशिष्ट जीयो के रक्तसावन से सतुष्ट होता है जो ससार के लिए अनिष्ट कारक हो । अधचा सत्यपुरुषों के उस रक्त मांस से सतुष्ट होती है जो जगहितैपिता की चिन्तानि में धीरे धीरे वा कमी २ एकबारगी स्वाहा होता है। सेो भगवती भारतधरित्री ने हाल में उपर्युक्त तीन चलि ली हैं । निश्चय है कि यह विशुद्ध रक्त उनको साधारणतया न पच जायंगा। अवश्यमेव कुछ अच्छा रग दिसावेगी । पर भारत-सन्तान को भी योग्य है कि इस वलि पर विश्वास लायें कि इन पुरुषरतों ने हमारे लिए प्राण दिए है, हम भी यदि कृतज्ञता के पाप से पचा चाहें, और अपना एव अपने वश का भला चाहे तो मत करण से इनके महान् उपकार के कृतम होके यथासामर्थ्य इनका अनुक- रणरें। जिसमें इनके नाम की महिमा हो, लोग और भी प्रात्मपलि के लिए प्रस्तुत हों। और कुल ( १३६ ) भारत पर भगवान की अधिक ममता है। यद्यपि उनका नाम जगदीश्वर है। वे अकेले पक देश या एक जाति के ही ईश्वर नहीं हैं। सकल सृष्टि पर उनकी कृपा- दृष्टि आवश्यक है । एका घार चे सभी को पूर्णमिति न देतो पक्षपाती कहावें । इतिहासवेत्ताओं को यह रात प्रत्यक्ष हे कि एक दिन भूमउल भरे में आया की जयध्वजा उढती थी। एक समय यननों की फतह का नधारा बजा। आज अगरेजों की तूनी बोलती है । ससार की यही रीति हे कि एफ की माज उन्नति है, कल अवनति, परसों और की पढ़ती है। इसी से यर सिद्धान्त हो गया है कि ईश्वर सब की सुध लेता है। पर हमारे प्रेमशास्त्र और प्रत्यक्ष प्रमाण के अनुकूल इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि कोई कैमा ही क्यों न हो, यदि हम उससे सच्चो प्रीति करेंगे तो वह भी हमारा हो जायगा। इस न्याय से विचार देखिए ता हमारे देश को जितना परमात्मा के साथ सम्बन्ध सदा से है, और को कभी म रहा है, न है, न होने की आशा है। 'सवं खरिचर्द ब्रह्मा 'सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो प्रजा- धिप। "सब तज हरि भज" इत्यादि वाक्यों का तत्व सम- अना.तो दुर रहा, ऐसे महामान्य वचन ही अन्य देशीय धर्म- अथ में कठिनता से मिलेंगे। इसी भरोसे पर हम यह दावा कर सकते हैं कि हम ईश्वर से अधिक मेल रखते हैं, और इसीसे ईश्वर भी हमसे अधिक ममत्व रखता है। इसका प्रमाण भी हमें लेने नहीं जाना, हम मिद्ध पर देंगे कि जितने काल जितनी श्रेणी तक सर्वमात्र से आर्य देश की उन्नति रह चुकी है, वैसी अभी तक किसी ने सुनी भी - - 1 ( १४० न होगी। आजकल अवनति है सही, पर ऐसी अवनति भी नहीं है, जैसी इत्तरी को किसी समय थी। और पर मेश्वर ने चाहा, एवं धीरे ऐसे ही उद्योग होते रहे जैसे गत यास पचीस वर्ष से देखने सुनने में आते हैं तो आशा होती है कि इन दिनों की सी दुर्दशा भी हजार दो हजार वर्ष तक न रहेगी। सबसे अधिक राम की दया का चिह्न यह है कि इन गिरे दिनों में, जवकि हमारे गुण भी प्राय. दुर्गुण से हो रहे हैं, अब भी सहनशीलता, सरलता, धर्मदृढता, स्वच्छता, यश प्रियता, सूक्ष्म विचार आदि कई एक बातें, जो विचारशीलों ने माननीय मानी हैं, उनमें हम अनेक देशों से चढे बढ़े हैं। अभाव हमारे यहां आत भी किसी घास का नहीं है। जो यात अच्छी तरह समझा दी जाती है उसके माननेवाले मिली रहते हैं। हां, अपनी ओर से लाभकारक यात सर्व- साधारण को सूझती नहीं है। पर सुझाने के साथ ही बस विषय में हम औरों से बढ़ नहीं जाते तो वरावर 'ती भी हो आते हैं। क्या यह लक्षण भले नहीं है । इसे जाने दो, यहां और पृथ्वी भी ऐसी है कि सब हालत में गुजारा चल सकता है। हां, संसारचक के "पतनात समुन्य. के नियमानुसार यह बात अवश्य होमी है कि रहंद का ऊपरवाला पटोला जय तक नीचे न हो जाय तबतक ऊपर फिर नहीं चढ़ना । इप न्याय से कुछ दिन अधःपतन योग्य था। पर प्यारा लडफा कोई अपराध करे तो भी दयालु पिता अधिक काल तक उसे फष्ट में न देख सकेगा। वह दिन श्रय यहुन दूर नहीं है कि हमारी दुरवस्था पूर्ण रीति से दूर हो जाय । विश्वास के साथ देशहित में लगे रहना हमारा काम है। सय यात जाती सी रही हैं, तो भी यदि हम अपनी की जलवायु
(१४१ )
निजता फोन जाने ६ तो हमारे दिन फिरने में शकामही है
क्योंकि संसार का नियामक्ष जो है उसके साथ हमारा अधिक
अपनपी है। यदि ईश्वर कोई जाग्रत एव चैतन्य गुणवाले का
नाम है तो हमारे पूर्वज पियों का नाता सर्वथा भुला दे, यह
सभव नहीं, और यह भी असभव है कि हमारे साढे तीन
हाथ के पुतले में उनका कुछ भी अश न हो । हा, हम
अपने ही को भूल जाय तो औरयात हे।नहीं तोयह यात अधिक
प्रमाणीभूत है कि हमारी उमति औरों की उन्नति से अधिक
थी, और अधिक काल तक रही है। हमारी अवनति औरों
की अमनति से न्यून है और उतने दिन रहना विचार से दूर
है, जितने दिन औरों की रही है। क्योंकि इस बात में सन्देह
नहीं है कि ईश्वर से हमको और हमसे ईश्वर को औरों से
अधिक अपनायत है। यदि यह यात युक्ति और प्रमाणों से
न भी सिद्ध हो सके ( यह फेवला अनुमान कर लो) तो भी
यदि हम प्रास्तिक है तो हमें विश्वास कर्तव्य है कि-
मोपर करहिं सनेह विशेपी, मैं फरि प्रीति परीक्षा देगी।
( १४२)
उर्दू बीबी की पूंजी।
यदि आप किसी साधारण वेश्या के घर पर कभी गए
होंगे अथवा किसी जानेवाले से यातचीत को होगी तो
छापको भली भाति ज्ञात होगा कि यद्यपि कभी कमा विद्वान्,
धनवान, और प्रतिष्ठावान् लोग भी उसके यहां जा रहते हैं,
और जो जाता है वह कुछ देही के आता है। एवं उन्हें बाहर
से देखिये नो तेल, फुलेल, हार, पान, टुक्का, पीकदान, मच्चा,
घा झूठा गहना, एव देखने में सुन्दर कपडे से सुमजित है,
कमरा भी दो एक चित्र तथा गही-तकिया आदि से सजा
हुआ है, उनकी चोली-वानी, हाव-भाव भी एक प्रकार की
चित्तोल्लासिनी सभ्यता से भरी है, दस पाच गीत गजल भी
जानती है । पर उनको प्रसलो पूजी देखिये तो दो चार रंगीन
गाटे पढे ले कपडे तथा दोही चार सच्चे भूठे गहने अधच
एक या दो पलग और पीतल, टोन, महो आदि की गुडगुडी
उडगुडो समेत दस पाच वरतन के सिवा और कुछ नहीं
है। रुपया शायद सब असयाव मिला के सौ के घर धाट
निजले, चाहे न भी निकलें । गुण उनमें केवल हाय मटका-
के कुछ गानामात्र, विद्या अशुद्ध फशुद्ध दसही बारह हिन्दी उपटू
के गीतमात्र पच मिष्टभाषण केवल इतना जिससे आपकुछ
दे आवें । यस, इसके सिवा और बलानियां का नामही है।
उनके प्रेमी, या यो कहिए, अपनी धुरी शादत के गुलाम,
उनको चाहे जैसा लक्ष्नी,मरवती, रमा तिलोत्तमा,लेली, शीरी,
समझते हों, पर वास्तव में उनके पास पूरी उमा जथा उतनी
ही मान होगी जितनी हम फह चुके, वरच उससे भी न्यून
ही होगी। कमी २ वे कह देती है कि हम फ़कोर है, या इम
-
( १४३ ) आपके भिन्दुक है, यह बात उनकी शिष्टता से नदी, यग्च सच दी है। क्योकि सर से लेता है तो भी कुछ उड नहीं सत्ता। यदि पदह चीस दिन गोई न जाय तो उन्हें वह नगर छोडदेना पड़े, जता वे कई वर्ष रही है। प्रिय पाठक ! ठीक वही हात उरदूजान का भी है। यद्यपि र २ सस्कृत, अरेजी, अरबी को भी सहाय हे, और उसके चाहनेवाले उसे सारे जगत् की भाषाओं से उत्तम माने बेटे हैं, पर उगको वास्तविक पूजी यटि विचार- के देखिए तो आशिर अर्थात् किमी का चाहोवाला, माशूफ अर्थात् फोई रूपवान् व्यक्ति जिसे माशिम चाहता हो, चार अर्थात् वाटिका, गुरु अर्थात् फल, पुलगुल अर्थात् एक अच्छी घोली घोलनेवाला और फूलों में प्रसन्न रहने घाला पक्षी, यागवान अर्थात् माली, सैयाद अर्थात् चिडीमार, खिलवत अर्थात् एकान्त स्थान, जिलवत या मजलिस कई एक सुन्दर व्यक्तियों का लमाज, शराव अर्थात् मदिरा, कवाय गथात मास, साकी अर्थात् मध पिलानेवाला, मुतरित अर्थात् गयेया, रकीय-दुशमन गर अर्थात् जिसे तुम चाहते हो उसका दूसग गहनेवाला, नासिह अर्थात् भव और वेश्यादिको ससर्ग से रोकनेवाला, वायज अर्थात् उपदेशक, पानमान अर्थात भाग्यवा, इतनी ही पाते है जिन्हें उलट फर के वर्णन किया करो, भाप बढे अच्छे उरदूदा हो जायगे। माशूक्ष के रूप, मुस, नेर, केशादि की प्रशसा, अपनी सर्च शता का घमड, उसे गुल श्रीराम अर्यात् मोमबत्ती एय अपने को पुणबुस शोर पर्वाना अर्थात् पतग से उपमा . .
- - ( १४४ ) दे दिया करो, रफीच इत्यादि पर जल २ के गानी दिया करो, यस उरदू का सर्चख आपको मिष नायगा । चाहे गद्य हो, चाहे पद्य हो, चाहे कविता हो, चाहे नाटक हो, चाहे अखबार हो, चाहे उपदेश हो,सबमेंयही यातभरी हैं। यदि चौर कोई विद्या का विषय लिखना होतोसस्कृत,पंगता, नागरी, अरबी, फारसी,अगरेजी की शरण लीजिए। इनवीवी के यहा अधिक गुजायश नहीं है । और लिखना तो दरकिनार मुख्य २ शब्द ही लिखके किसी मौलवी से पढ़ा लीलिए, अरे म्या मजा ही न मावेगा! हमारे एक मित्र का यह वाक्य फितना सशा है कि और सव विद्या हैं यह अविद्या है। जन्म भर पता कीजिए, तेली के वेल की तरह एक ही जगह घूमते रहोगे सत्य विद्या के यतलाइए तो कै ग्रन्थ हैं ? हाय न जाने देश का दुर्भाग्य कब मिटेगा कि राजा प्रजा दोनों इस मुलम्मे को फेंक के सधे सोने को पहिचानेंगे जानते सब हैं कि पूजी इतनी मात्र है, पर प्रजा का प्रमाग्य, राजा की रीझ- बूझ । और क्या कहा जाय।
(१४५ ) ~ . कलिकोष। कचहरी-कच माने वाल और हरी मानी हरण करनेयाती, अर्थात् मुडन (उल्टे छूरे से मूडनेवाली) जहा गये मुडाये सिद्ध। दार-दर्य इव्य का अपभ्रश और अरि अर्थात शत्रु, जैसे सुरारि मुरारि इत्यादि । भाषा में अन्तवाली हवा की माना यहुधा लोप हो जाती है। अदालत-श्रदा अर्थात् छवि, उसकी लत । पोशाकें चमका २ के जा बैठनेवालों का स्थान । अथवा होगा तो वही जो भाग में है, पर अपनी दौडने धूपने को लत अदा कर लो। अथवा अदा घना के जायो, लातें मा के थानो इत्यादि । हाकिम-दुखी कहता है हा ! (हाय) तो हुजूर कहते है किम् अर्थात् क्या है ये ? अथवा क्यों चकना है। वकील- –य कील, जो सदा कलेजे में खटके, अथवा धग भाषा में 'चो की क्या है, अर्थात् वह तुम्हारे पास क्या हैं, लावो। मुखतार-जिसके मुख से तार निकले, अर्थात् मकडी (जाल फैलानेवाला) अथवा मुस्त्यारि (मुक्तिका परि जो फदै में आ से छूटने न पाये।) मुमफिल-मुथा अर्थात् भरा फित इति निश्चयेन (जरूर - मरो।) मुद्दई -ग्राम्य भाषा में शत्रु को कहते हैं, (हमार मुई आहिड लरिका थोरे माहित) मुद्दालेह-मुद (आनन्द)' !!श्रा ! ले दोत । अर्थात् भाव प्राय मजा ले अपने कर्मों का। N. 10. +
इजलास-अगरेजी शब्द है, इज 15 (है) Lass (हानि) अर्थात्
जहां जाने से अवश्य हानि है,अर्थवाई माने यह, जलासा
अर्थात् कोयला सा काला मादमी । अथवा फारसी तो
शब्द ही है, जेर के बदले जवर अर्थात् अजन (मौत) की
आस (आशा) अथवा विना जल (पानी) के पास लगाप
खडे रहो।
चपरासी-लेने के लिए चपरा के समान चिपकती हुई बात
करनेवालान देनेवालों से चप (चप): रासी का अर्थ
फारसी में हुया, 'नेवला है तू-अर्थात् 'चुप रह, नेवला
की तरह तू क्या ताकता है ।' कहनेवाला । बथवा
फारसी में चप के माने याया अर्थात् अरिष्ट के हैं (विधि
घाम इत्यादि रामायण में कई ठौर आया है, अर्थात् तू
वाम नेवला है, क्योंकि कोल डालता है।
सरदली-अरिवत् दलतोति भावः ।
जी-(शुद्ध शब्द इसस्तरी) अग्नितप्त लोद के समान गुण
जिसमें । (धोबी का एक औजार)
मेहरिया-जिसकी आग्यो में मेह (यात २पर रोना) और
हवय में रिया (फारसी में कपट को रिया कहते है) का
।
3
चास हो।
लोगाई जिसमें नौ गौओं की सी पशुता हो। बंगाली लोग
बहुधा नकार, के बदले लकार और लकार के बदले
नकार योलते हैं, जैसे नुकसान को लोक्शान, निलंज।
को निरनज।
बोल-गो रूठना खूब जानती हो।
पुरुष-पुरु कहत हैं जेह में नेतु, सींचा जाथै, और 'म'
आकाश (सस्कृत में ।) अर्थात् शून्य । भावार्थ यह मा
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फिएफ पानी भरी साल, ग्रिसके भीतर अर्थात् हृदय में
फुछ न हो । 'मूर्यस्य हदय शून्य' लिखा भी है।
मनसवा--मन अर्थात् दिल ओर शव श्रर्थात् मुरदा (माका-
रान्त होने से स्त्रीलिंग हो गया) भाव यह कि स्त्री के
समान अकर्मण्य, मुर्दा दिल, हिम्मत।
मर्द मरदन किया हुआ, जैसे लतमर्द ।
खसम-परबी में सिस्म शत्रु को कहते हैं।
सन्तान-जो सन्त अर्थात् याया लम्पटदास की शान से जन्मे ।
पालक-या सरयूपारी भाषा में 'है' को कहते हैं। जैसे
ऐसन या अर्थात् ऐसा ही है, और लक निरर्थक शब्द है।
मात्र यह कि होना न होना बराबर है।
लडका-जो पिता से तो सदा कहे लड, अर्थात् लड ले और
स्त्री से कहे, का (पया माशा है।)
छोरा-कुलधर्म छोड देनेवाला (रकार डकार का बदला)
पुत्र-पुमाने नक (संस्कृत) और त माने तुझे, (फारसी,
जैसे
जवाबत् चिदिहम-तुझे उत्तर क्या दू ।) और रादाने धातु
है, अर्थात् तुझे नर्क देनेवाला ।
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( १४८)
ककाराष्टक।
ज्योतिष शाननेवाले जानते हैं कि घोडाचक यो अनुसा
एक अक्षर पर जितने नाम होंगे उनका जन्म एक नक्षत्र के प
ही चरण का होगा, और लक्षण भी एक ही ला होगा। यद
हार-सम्बन्धी विचार में ऐसे नामों के लिए ज्योतिपियों के
बहुत नहीं विचारना पडता । विना विचारे कह सकते हैं
एकाशि, एक नक्षत्र, पक चरण के लोग मिल के जो कार
फरंगे वह मिद्ध होगा। लोक में भी नाम राशी का अधिव
सम्बन्ध प्रसिद्ध है। इसी विचार पर सतयुग
नता, सद्धर्मादि का वडा गौरव था। हमारे पाठक जानते हो
कि श्री महाराजाधिराज कलियुग जी देव (फारसी में भी तो
घडे छटे बडे नीतिनिपुण हैं । वे काहे को चूकते हैं । अर
छापर अत में इस देश की ओर आने लगे तो अपना भार
राशी नगर समझ के इस कानपुर को अपनी राजधानी यनाय
और बहुत से फकार ही नाम वाले मुसाहप बनाए । जिन
से छ सभामद हम पर बड़ी कृपा करते हैं। श्रता हमा
सोचा कि अपने रत दयालु जजमानों की स्तुति न करत
छत्तनता है। छ मुसाहब, एक महाराज, एक उनकी राजधा
की स्तुति में एक चना डाले तो ममारी जीव धर्म कर्मा
से शीघ मुक्ति पा सकेंगे। हमारे छ. देवता या कलिरा
के मुख्य सहायक यह ई, एक कनोजिया यद्यपि कान्यकुन्न
मडली इत्यादि कार्रवाइया उन्हों ने महाराज की मरजी
बिलाफ की है, पर महाराज तो बडे गभीर है, ये बहुत
मागज हुए हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि इनकी पैदाइश पिरा
भगवान के मुख से है, और शुख ऐसा लान है जहाथ
(१४) भरा रहता है। फिर जो थूक के ठौर से जन्मेंगा वह कहां तक, धुफैलपना न करेगा। दूसरे कायस्य हैं, इन पर भी कायस्थ- सभा, कायस्थ पाठशाला का इलजाम लग सकता है, और ने लोग बेष्णव हो जाते हैं, इस ने कलिगुग जो नापुश हो जाय तो अजय नहीं । पर कि कलियुगराज की माशूका बी उरदूजान की सिफारिश है, इसमे कोई डर नहीं रहा । बोसरे मुमाहिय कलगार है, इनमें वेशक वही लोग हुजूर के पापाप है, जो कलवरिया के कार्याध्यक्ष हैं। चोथे फहार, पाचवे फसाई, छठे कसपी यह वेशा वेण्य है। इन छहाँ मुमा ।हियों में इतना मेल है कि एक दूसरे के मानो मग प्रत्यग हैं। एक के विना दूसरा निर्वल हे, और उन्हीं के एका का फल कि कलिदेव राज करते हैं। यह परिचयस्तोत्रपाठकों को श्रद्ध बढाने मात्र को दिया है। क
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( १५०)
पड़ें पत्थर समझ पर आपकी समझे
तो क्या समझे।
अक्तूबर में जो हमने "फतेहगद पंच को शिक्षा दी थी,
हमने समझा था कि कुछ आसैं खुल जायंगी। नागरी देवी
और उग्दू बीवी का भेद कुछ तो समझ जायंगे, पर तब से दो
मास तक आप मुंह छिपाने पीछे आज पहिली जनवरी को
"उपदेशोहि मूर्याणा प्रकोपाय न शांतये' का उदाहरण दन के
आये हैं, तो कहते क्या हैं कि "कोई उरदू को क्या समझेगा
जैसा हम समझते हैं। क्यों नहीं माहय, तभी तो रसोईपज
का शब्द गढा है ! हजरत रसोई हिन्दी का शब्द है, उसके
साथ पकाने वाला कहते तो युक्त था, नहीं तो 'तुम्नामपज'
कहना योग्य है। रसाईपज' यह दोगली भाषा है। इसी से
तो आपकी उरदू में खलल मालूम होता है। पर हमने आपकी
खातिर से मान लिया कि आप उरद जानते हैं फिर इससे
क्या, उरदू स्वय कोई भापा नहीं । अन्य भापाओं का, विशेषत
हमारी हिन्दी का, करकट है। विचारे उसके जाननेवाले हम
गरी रसिकों का सामना क्या खाके करेंगे । हां, जीम
हिलाना यह और बात है। यद्यपि विजातीय मससरों के मुह
लगना अखिलार्य नरेन्द्र-पूजित पादपीठ महात्मा 'ब्राह्मण' को
शोमा नहीं देता, पर व्यर्थवादियों का दर्पदलन न करें तो भी
सो अच्छा नहीं । अत. जब तक योग्य समझेगे, लेपनी चलाये
जायगे।
पंचजी ! हिन्दी का गौरव समझना और उसके मतों से
शास्त्रार्थ करना आपही की सी बुद्धिवातों का काम नहीं है।
पहिले पर ही भली भाति सीपिये, फिर फिसी मागरी मागर की सेवा कीजिये,तय देखा जायगा। अभीतो जान पडता है कि आप इस देश ही में नए आये हैं । अथवा दिल्ली में रहे, परमार झोंकते रहे । नहीं तो जिस 'बालण' को यहा मूर्ख से मूर्ख भौर विद्वान् से विद्वान् सात-गुरु देवता और महा. माज इत्यादि कहता और पूजता है उसे आपने फेवल रसाई- पर समझा है। फिर उसके गुण और उसका पचन-लालित्य क्या धूल समझेंगे, और पिना समझे किसी बात में फान. पूंर हिलाना निरा भख मारना है। ऐसी समन पर तरुज फामाइगा तो अपने मन में ही मम में चाहे जो फूल उठिये, पर बुद्धिमाम लोग जान जायगे कि कौन कितना है, यस मुर्तजा का शब्द नागरी में लिसाजा सकता है, परन्तु गणित, बाहाण और मत्रादि शन्द लिखने में सरदू वाले ऐसे अक्षम है जैसे सन्तानोत्पत्ति में और आत्म विद्या में यवन । इस विषय को हम यथोचित रीति से सिद्ध कर चुके हैं, पर 'पाय यदा करीर विटपे दोपो वसन्तस्य किं ? मिया न समझे तो हम कहां तक 'अन्धे के आगे रोवे अपने दीदे खोवे । चेहयाई हो तो इतनी हो कि उत्तरदाता की बात न समझने पर भी अपनी ही जीत मान लें। ऊपर से दूसरी चुद्धिमत्ता यह दिखाई है कि 'नागरी में सनत तजनी नहीं होती', अर्थात् मतीजा में नैचा, चूना में जूता, मालूबुखारा में उल्लू विचारा, इत्यादि का धोखा नहीं होता। हजरत ! यह उरदू का दोष हे, आपही इसे सनमत समझिये। फिकिया की चंदरियों ने श्रीसीताजी के सौन्दर्य में इतना दोप निकाला था कि उनके दुम नहीं हे ! यही लेखा पडिटर करता है। हम लोग इसीलिए सरकार से प्रार्थी हैं कि यह फरेषी . .
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( १५२ )
गक्षर कचहरी से उठ जाय तो प्रजा का अरिष्ट दूर हो। ऐसे
बुद्धि शत्रुओं से शास्त्रार्थ करना व्यर्थ है जो कल को कहेंगे,
नागरी-कविता में उरदू की भांति : स्वाभाषिक दुष्कर्मों का
वर्णन नहीं होता। आगे से हमारे पाठक क्षमा करें। हम ऐसे
प्रमादियों का उत्तर यदि कोई विचारणीय विषय न होगा तो
बहुत कम देंगे। जो मूर्ख उरद को प्रशंसा और वेद से
सेकेवाल्हा तक को आधार सर्वगुणागरों नागरी देवी की
निन्दा को केवल निज का विषय समझता हो, और अनर्थक
हाहा ठीठी में देश सेवा गिनता हो, उसकी बकवाद पर ध्यान
देनां निष्फल है।
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( १५३
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मुक्ति के भागी।
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एक सोच. घर के कनवजिये, क्योंकि पैराग्य इनमें
परले सिरे का होता है। सब जानते हैं किसी फानाम अर्धाङ्गी
है। पढे लिग्वे लोग तक धागस में पछते हैं "कही घर का
क्या हाल है ?" इससे सिद्ध हुआ कि घर स्त्री ही का नामा.
सर' है। उस स्त्री को यह महातुच्छ समझते हैं। यहा तक
कि 'हे मेहरिया तो प्राय पायें के पनहीं', यरच पनहीं के
खो जाने से तो रुपया धेली का सोच भी होता है, परन्तु स्त्री
का यदुतेरे मरना मनाते हैं। अप कहिये, जिमने अपने आधे
शरीर एव ग्रह देवता को भी तृणवत् समझा उस परम
स्यागी वैराणी की मुक्ति क्यो न होगी?
दूसरे अदनिए, क्योंकि प्रेतत्य जीते ही जी भुगत लेते है।
म माना कानपुर आके देख लो, बाजे याजो को आधी रात
तक दतून फरने की नौबत नहीं पहुचती। विन रात चैपारियों
को हार २ में यह भी नहीं जानते कि सूरज का निकलता
है। मला जिसे जगत् गति व्यापतो ही नहीं, जिसे नुधा
तृषा लगती ही नहीं है, उस जितेंद्री महापुरुष को मुकि न
होगी, तो किसे होगी?
तीसरे उपदश रोगवाले, क्योंकि बडे २ वैद्यों ने सिद्ध
किया है कि इस रोग से हडियों तक में छिद्र हो जाते हैं तो
कपाल में भी हड़ी ही है, शरीर को भीतर ही भीतर फॅक
देती है। अब समझने की बात है कि जिसके प्राण प्रमाण्ड
(शिर) फोड के निधन तथा पचाग्नि की परदादी प्रति
बोमाग्नि का सेवन करे यह परम योगी शरमग पिके
समान तपस्खी क्यों न मोक्ष पायेगा?
A
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(५४)
हमारे पाठक कहते होंगे, कहां की खुराफात यफते हैं ।
खैर, तो अय सांची २ सुना चले।
वर्ग, नर्क, मुक्ति कहीं कुछ चीज नहीं है। युधिमानों में
पुराई से बचने के लिए एक हौवा बना दिया है, उसीका
माम नर्क है, और स्वर्ग वा मुक्ति मलाई की तरफ़ झुकाने के
लिए एक तरह की चाट है। अथवा जो यह मान लो कि
जिसमें महादु.ख की सामग्री हो वह नर्क और परम सुख
स्वर्ग है तो सुनिए, नी जीव हम गिना चुके, उन्हीं के भाई वर
और भी है। रहे स्वर्ग के सच्चे पान, वह यह हैं किसी
हिन्यी-समाचारपत्र के सहायक, बशर्तेकि धार्पिक मूल्य
धुर पुकुर न करते हो, और पढ़ भी लेते हों, उनको जीते ही
जी स्वर्ग न हो तो हम जिम्मेदार । दूसरे देशोपकारी कामों में
एक पैसा तथा एक मिनट भी लगावेंगे वे निस्सन्देह वैकुंठ
पावेंगे, इसमें पाव रत्ती का फरक न पडेगा। हममे तथा बडे २
विद्वानों से ताये के पत्र पर लिस्ना लीजिए। तीसरे गोरक्षा
के लिए तन, मन, धन से उद्योग करनेवाले । अन्न, धन, दूध,
पूत सय कुछ न पावें, तथा शरीर मोक्ष का मजा न उठाधे
तो वेद, शास्त्र, पुराण और हम सबको झूठा समझ लेना
चौथे परमेश्वर के प्रेमानन्द में मस्त रहने वाले तथा,
भूमि को सच्चे चित्त से प्यार करनेवाले एक ऐसा अली
किफ अपरिमित एव अकथ श्रानन्द लूटेंगे कि उसके मागे
मुक्ति और मुचि तृण से भी तुच्छ हैं। हमारे इस धवन को
'प्रहावाश्य सदा सत्यम् न समझेगा यह सब नास्तिकों का
गुरु है।
,
भारत
,
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