Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Ras Ratnakar

Prasad,babu Jaganath · 2011/01

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रसरत्नाकर
जिसमें
श्रृंगारादि नवों रसों का सम्यक् वर्णन है
-
-रचयिता-
+
साहित्याचाय्य पावू जगन्नाथ प्रसाद मानु-कवि,
रिटायर्ड ई. ए. मी. बिलासपुर, मध्यप्रदेश ।
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जगन्नाथ प्रेस, बिलासपुर में मुद्रित ।
सन् १६१६ ई०
प्रधम धार।

PRATTO DI y Arbolra atasarre AT TAE
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I'U FLIMDF1) BP Air. B-JAQ1YVAIN PRASAD
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विज्ञप्ति ।
प्रिय पाठकहन्द
काव्य प्रवन्धमाला की तीन पुस्तके १ छद सारावली, २ कान्याल
और ३ अलंकारप्रश्नोत्तरी आपकी भेट कर चुका हू आज यह ची
पुस्तक "रसरनाकर" भी आपकी सेवा में सादर समर्पित है। इन
शृगारादि नयो रसो का सुगम बोध निरूपण है। रममयी काव्य मे अर
किक आनन्द प्राप्त होता है इसीलिये पूळचाय्योने कहा है चास्य रसात
आनन्द
कायम' अर्थात् रसही काय की आत्मा है, परन्तु वह रन कैने उत्पना है
-
है उसके लिये कोन कोनमी सामग्री चाहिये वन इसी का इस पुस्तक
सम्यक् वर्णन है यदि विद्यार्थीगर क्रमपूर्वक इसका पठन और मनन के
तो शीत्रही पूर्णरूप से लाभान्वित होंगे । इन्यलम्
मा
विनीत--
जगन्नाथ प्रसाद,
भानु कति

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विषयानुसार सूचीपत्र । नाम पृष्ठ Brio trattati in Fnalsh नाम पृष्ठ Puti tran-Intu 201n विभाव pude --- ~ ग्सोका सक्षिप्त Brief descrip, TIT 2017 Vision real चर्णन tion of senti मान १२. Prude ments लघुमान 10 Slight prid लक्षण Dehnution मध्यममान 50 Moderate. Cuuse 'nourtslumg the गुरमान * Higla pride 201811senti प्रवास १३] Foreign it 111ent dence प्राजवन Person 01 अभिलापर १३/ DEM0 thing with चिन्ता १8 Amvety reference to 53 Recollection Vluclisten गुण कथन Pratse sing tinient urines iny शगाररस ह Erottt cenu उद्धंग 34 Agitation menu Senti प्रलाप 94 Non sensi ment of lover 1 tal नभोगगार है Erotic senti उन्माद 2, Deliri mm (मयाग) meut in happy/ व्याधि Puuntul cim uviou of lorer edition of चेप्रलमगार १० Elotic sentinind (वियाग) ment Imm जडता 1.049 of fic ful epiration nity of losers 'मूर्श 16 Epileptic co त्रिविध वियोग 01 Sepnatio11 3 Julsions hinds मरगा 3Death पूर्वानुगग 10 Prestous tt-1 नायिका २७ Herotie, tachment cha 1101glad श्ररण दर्शन | Vision by बगानुसार is Acudug lienring Lurtis चित्र दर्शन Vision byu जात्यानुसार According pretue quality स्वप्न दर्शन 27 Vision in अन्य भेद re! Other vi ५७ १८ [४] सूचीपत्र । क्रिया चतुर OL.ramm स्वाधीनपतिका ३७ A woman अनभिज्ञ 22 Ignarunt (nf hasug unds sexual plein sionately deure) voted husband) उप पति 841 Apuliamon अभिसारिका ३७, A woman nilaet ) वचन चतुर ४५ Skilful m ed with inter erthoc speech repairtil to the house of ४५ Skilful in lovou so muhin. tictions ham rome to fiel ETF ४६ / A person who प्रवत्स्यत ३७. A woman Sociales पतिका whose livis. with luarlots bund is abont) हास्य Be Comic to go abrvadjकरण 85 Pathetic आगतपतिका ३८ A womines| रोड BE IV rathtal pecting the | वीर Her or return of her| युद्धवीर * Hero of war long ahent Juusband दानवीर Hero in ujun- नायिका भेदो30 Bct sunthcence का मक्षिप्त Italy ot दयावीर 0Hero वर्णन नायिका भेद merey धर्मवीर ५२/ Heronduts, नायक ४१) Hero a prn- भयानक ५३/ Terrible cipal persou वीभत्स ५४| Disgustful मानी ४२) Ploud अद्भुत ५५/ Alurvellons पोषित 8 A liusb ind शात ५६ Quietistic separated from वत्सल ५७ Aftecttonate lus wife ५७/ Friendship पति 83 Husband दास्य ५७. Sey stude अनुकूल ४३ A fulthfullhns भक्ति ५८ A. cense of band devoted devotion to luis site प्रयान् ५८/ Degrer दक्षिण ४४, Courteous, उद्दीपन $5 Erciter of feeling धृष्ट 83 Bold सखा ५६/Amale cont शठ ४४! Immodest, panion deceitful सखी ५१ A female conm panion 10 gillant 1 love in sey Us Cold ७४/ Slor पीठ मर्द १६ A clever com निरह ६७| Feeling of Pimmon m dis couree who t1on1 १५५1५ts one mप्रवोध É o Awaking securngm9| संघट्टन ६७. Encounter mistices स्वयदृतिका ६८ | Self messen- चिट * A cheut, a ger cunning chap! वसन ६८/ Sprng चेटक ५६ Any one rho होली | Holi festival diles set | ग्रीष्म ७१ | Summer tish chilfulls पावस Rany विदृषक ६० Jester, hitty, हिंडोरा ७२ A. swing humorous शरद Autumn हितकारिणी ६०/ Well nishing| हेमत ७३ Wnter feinale com- GATE 03 Cold seuson Pimon पान ७४/ An, wind, व्यग्यविदग्धा ६० Anoaan शातल shiltul m InIJ मद nu itious सुगध ७४/ Frigrant अतरगिणी ६० A trimate com- वन ७४/ Forest pinions in Recrery A| उपरन ve Garden confident चादनी 08 Moonlight वहिगिणी ६१ An orduury| पुप्प ७४/ Flower female frienti| पराग sd lower, polles मण्डन ६२Adornment अनुभाव sy Externuimar नखशिरव Charming desi festation 0 cription of internal feel cery limb of img body from ton सात्विकअनु-७४/ Natural eme भार tivus शिता & Advice sy inuuobility उपालभ y 'lnut ७६/ Perspiration परिहास ६५Joke रोमाच ७६/Horripninture दुनी ६५A female स्वरभग ७६] Indistinctmessenger ness of utter 1 नुति (स्तुति) Eulogy anco ७४/Moon to top सृापत्र। 1 a lover चेपथु w Tormor विम्रम 5 Putring of our वैचार्य vol Polonesa taments itt 5727 US! T79 Wring places प्रलय SS Ln4 of (on). hrunghi flu- SC10urners iry TEXT - Yanmng for Amorous agit- Forty- = Bolls hits stion 9t9ping HIT or unotion19 lmughing itu muciety of मानसिकानु (७८ Vents? ellic- भाव t10115 पुट्टमित 52 Aftetedrepul se of a lover's दाव UC Coquettich endearnuonts gesture in en or caiesses rite love facilisi 5 Aflectatiou of जीजा 50 Mutual amuauditler ence Bemont, din tending to erson,phi 114 excite love श्राहार्य ८१/ Single umure- मोटाइन 53 Co nplote perior star of unind by nient, Justine affectum ronaris विहत Reluor suco &n2 sbsent losor *10w fouling to her laser than slie ought to dis हेला 53 Insultug closa tuom sitour faceret ८१ Feminine gey/ बोधक Iudicating ture iudicat 777777779 58 A transient live of timorous feeling or sentiment emotion afara 58 Gincefirlness Feat 5 Disgust for of gait or am worldly plensorous gestis ures विच्छित्ति Carelessness or] रतानि =Lungour i regularits TET * Apprehensdraus or decor 101) ation through fanıt ntc, wluch SEST 5* Eury nevui theless adds ry 6 Wearineas lo lier kpanty 56 / lutoucation to 11 * सूत्रीपत्र। [७ धृति 23 Sleep 54 Repose of (निद्रा mind, detor mination ब्याधि १३) Pimful co. dition of und आलस ८७ Indolence निषाद ५७) Devputr मग्ण १३ Death मति 55 Prudence अपस्मार €8 Epileptico vulsions चिता 55) Pumtulreficca lion प्रावेग ६४ Agitation मोह SE Perplexity भास € Four स्वम '5€ Dieum उन्माद EX Deliriuni पियार GE Wahing जडता Ex Loss of far ulty स्मृति 10 Recollection चपलता ९६] Rashnees समर्प €0 Indignation वितर्क ९६! Descrunne गर्व * Pudc 1lon उत्सुक्का ? | Impatience |स्थायीभाव प्रवाहित्य E' Digsmulation EU A permane or lasting fceling टीनता ११/ Depression 65 Love हर्ष ६२. Joy हास EE Laugh 1 ब्रीडा १२| Bashfulness | शोक १०० Sonow [८] सूचीपत्र । loool उत्साह fpoo Energy रसामास भय २०२ Fear १०४/ The semblan ce or merenp pearance ofu sentiment ग्लानि १०२ Disgust - । भावाभास १०४ A fulse emo १०३/ A wonder tion आश्चर्य निवेद 70 Adjusted, finished . २०२Diaragurd of समाहित worldy pleas भाचोदय १०३/ Aflection tiles 1 स्नेह 204Mere are of sentiment ? रसवत् १०३/ Appearing like a senti- भावसधि 1१001 The unon ofi two biary Cmotious ment प्रेयस २०४ Dearer भावशवलता 100Coemstence of several emotions ऊर्जस्थित १०४ Speaking with tenapt CON- रसदोप PoEl Deiner its nt sentments भूल संशोधन । पृष्ठ २३ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध ६ शशि में शशि भे कहुँ कहें २३ डारी तो डारी ता मात्वि सात्विक औरहु याके दोष जे, लिखिहे सुजन विचारि । है कृतज्ञ देही तिनहिं, पुनरावृत्ति सुधारि ॥

अथ रसरत्नाकरः प्रारभ्यते। Locatend- जय जय जय राधा रमण, हरण मोह भव शूल । रसिक शिरोमणि सावरे, सदा रहहु अनुकूल ॥ रसों का संक्षिप्त वर्णन । जब हम लोग किसी उत्तम काव्य को पढने वा सुनते हैं या किसी उत्तम नाटक को देखते है तो यहुधा कहा करते हैं कि वाह क्याही रम- गीय वर्णन है, क्याही सुन्दर दृश्य है, यह निपय क्याटी सरस है, वम उससे जो विशेष प्रानन्द प्राप्त होता है वही रस है यह एक प्रकार का रिलक्षण श्रानन्द है जो अनिर्वचनीय है साहित्य शास्त्र में ऐसे लोकोत्तर अर्थात् अलोकिक आनन्द को ही रस कहते है। अलोक्कि प्रानन्द यह हे जो स्वार्थ मे रहित हो योर जिम प्रानन्द में स्वार्थ है वह लोकिक प्रानन्द है जैसे किसी मनुष्य ने गाकर किसी को प्रानन्द समाचार सुनाया कि आप के घर म पुन रन पेदा हुवा अथवा प्राप के वेतन की वृद्धि १००) पाच सा से ६००) में सो रपये मामिक की हुई। इस समाचार से उसी को विशेष आनन्द होगा जिसको लाभ पहुचा सर को नहीं क्योंकि इसमें स्वाथ है ऐसे प्रानन्द को लोकिक प्रानन्द कहते है और उसी से यदि यह कहा जाय कि अमुक मेव पसा दानी दै देखो कोई याचक उसके द्वार पर जाता है तो शीघही पोर के किंगार दे देता है घर मे सर को गालिया दिया करता हे, साधुओं को दोष देता है, यदि कहीं भिनुक से भेट हो गइ तो जगार दे देता है, यात कहते रो देता है, लेते देते भाजी गार देनाहै, पगडी क बद वाध देना है, वालो की गाठ दे देता है, गाती की काल देदेता है कहा तक कहें विचार को देने के [२] रसरताकर। मारे फुरसत ही नहीं मिलती कहिये क्या कोई इसमे बदकर ठानी हा सकता है ? तो इन वाक्यो के सुनने ही वह परमानदिन होकर अवश्यही हँस पड़ेगा और निकटवर्ती श्रोताओं को भी विशेष प्रानन्द होगा वस यही अलौकिक आनन्द है क्योकि यह स्वार्य से रहित है और इसी? कारण मनोहर भी है। यह आनन्द प्राय कवि के काव्य रचना की कुशलता तथा अनूठी उक्ति को जानकर उत्पन्न दुश्रा करता है। रस ही काव्य की प्ररत्मर है, कहा है "बास्य रसात्मक काव्य" जिस ग्म क विषय मे हम कह रहे है वह फिमरसामग्री के सयोग से उत्पन्न होता है अव उमी का वर्णन करते है । ग्स का प्रादुर्भाव (विकाश) तभी होता है, जव निभाव अनुभाव और सचारीभाव की सहायता से स्थायीभाव परिपक्व दशा पर पहुंचता है- विभावग्नु भावेश्च सालिफेयाभिचारिभिः । आनीयमान, स्वायत्व स्थायीभानारस स्मृतः ॥ इनमें विभाव (कारण) अनुभाव (कार्य) और सचारी भार (सहायक) है और जिसमे रस की स्थिति रहती है वह स्थायीभाव है। विभाव के दो भेद है एक पालवन और दूसरा उद्दीपन । अभी यह लक्षण सर्वसाधारण को सुगम बोध नहीं अतएव एक उदाहरण द्वारा इसका स्पष्टीकरण वाणासुर की कन्या उपा स्वप्न में अनिरुद्ध को देखकर प्रेमासक्तः होगई इस कथा प्रसग मे उपा ओर अनिरद्ध आलम्बन हुए, सखी, उद्यान, चन्द्रमा, चादनी, आदि ऐसे पदार्थ है जिनसे वह प्रेम भडक उठता है ये पदार्थ उद्दीपन हुए इन्ही पालम्बन और उहीपन कारणो से वह प्रेम उत्पन्न हुवा इन्हीं कारणो का नाम (निभाव) है, जो प्रेम उत्पन्न हुवा उसका नाम रति (अंत्यन्त प्रीति) यही रस का मूलरूप हे और यही (स्थायीभाव) है प्रेम के कारण उसके कार्य कटाक्ष अंग विक्षेपादि। दिखाई देने लेगे इन्हीं से उस प्रेम या रति की प्रतीति हुई इन कार्यो का नाम है (अनुभाव) अव उसरति की पुष्टता स्मृति, चिंता, उत्कठा आदि के द्वारा पूर्ण हुई इन पुष्ट कारक वस्तुओं का नाम है (सचागे व्यभिचारी या महकारी) इन्हीं कारणो कार्या ओर महायो मे रति (स्थायीभाव म्पप्रतया प्रतीत होने जगा पार रस कहलाने के योग्य हुआ, या शृगारग्म हे एमेही समन्न रसो के विभाव अनुभाव, सचारी श्रो स्थायीभाव अलग २ है जो आगे लिखे जागे । कान्य पोर नाटक में काई व कॉर्ड ग्म मानते हैं यथा- (८) श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्रं बार भयानकाः । वी मत्सागुन सा चेत्यष्टौ नाव्ये रसाः स्मृताः।। (e) शृगार वीर वीभत्स रो हास्य भयानका । करुणाद्भुत शातोश्च नवनाट्या रसास्मृताः ।। किमीने पक और वात्मत्य रस मानकर १० भेद कहे है- (१०) शृगौर वीरें करुणादभुत हास्य भयानका । वीभत्स रोद्री वात्सल्य शातधेति रसादश ।। रस यथार्थ में नवही है दृश्य काव्य मे शातरम् उपयुक्त नहीं माना गया अतपन ही भेट माने है । श्रव्य काव्य में शातरम उपयुक्त है अतव ६ भेद माने है । वात्सल्य तो प्रेम और दया की, प्रधानता के कारण गार और करुण का ही अग प्रतीत होता है । पुत्रादिको के प्रति जो मेहभाव है सो वत्सल कहाता है जैसे -पुत्रवत्सल, भक्तवत्सल, शरणागत चल्मल इत्यादि । काई भक्तिरस अलग मानते है परन्तु वह भी गांतरम के अन्तर्गत हे नाटकादि मे मख्य और टास और प्रेयान तीन ग्स और पाये जाते है परन्तु वे भी शातरसातर्गत प्रतीत होते है हा ग्रेयान् कभीर भावानुसार शृगार और करण रस में भी वर्णित होता है विचार पूर्वक देसने से ज्ञात होगा किशृगार रम से हास्य की, रौद्र से करुण की, चीर से अदभुत की और वीभत्स से भयानक रस की उत्पत्ति है शातरस पृथक हैं । इन पाचो रसो के मक्षिप्त उदाहरण शातरस के ImATH P [४] रसरताकर। अव यहा नवो प्रधान रसो का मक्षिप्त वर्णन स्थायीभाव सहित नीचे लिखा जाता है- नाम मक्षिप्त व्याख्या स्थायीभाव १ ८८.८LGAON शृगार स्त्री पुरुष का परस्पर प्रेम । इसके दो भेद है १ सयोग (सम्भोग), वियोग (विप्रलभ) हास्य | बिगड़े हुए आकार पचन चेटा आदि हास इष्ट नाश, जिसमे दृदय इवित हो वा दया उत्पन्न हो शोक- गेंद्र शत्रु पर क्रोध कोध वीर । सदोत्साह उत्साह ६ भयानक निससे डर पेदा हो भय वीगन्स दुर्गध पिर आदि घृणा उत्पन्न करने जुगुप्मा नाले पदार्थ (ग्लानि) ८ गदगुत निम्मय (आश्चर्य) उत्पन्न करने वाले पदार्थ विस्मय शांत शम, निर्वेद (वेराग्य) शम पहिले सह चुके है कि काव्य-रस में अलौकिक प्रानन्द है तो एममें यह प्रश्न हो सकता है कि शोक वीमत्स भयानक रसो से क्या आनन्द होता है तो इसका सम्यक् उत्तर यही हो सकता है कि इसमें सहृदय रामझने वालो का अनुभव देख लीजिये इन रसो में यदि दुख होता तो कोई उसके निकट जाने की इच्छा भी न करता यहा लौकिक दशोक, हर्ष का प्रमग ही नहीं, काव्य में तो अलौकिक भावो से सुख ही ६ उत्पन्न होता है करण रसके श्रवण मे तो अश्रुपात तक होता है क्योंकि इसके प्रभान मे चित्त पिपल उटता है जैसे हरिश्चन्द्र नाटकादि तथापि वारम्वार उसके देखने वा सुनने की इल्ला बनी रहती है यही इस टूवात का पूराप्रमाण है मागश यह कि काव्य रम में प्रानन्दही आनन्द है १इसलिये कहा है 'रस्यन्ते इति रमा'। अय नीचे लिखी सारिणी में इन समस्त रमों का सतिप्त विवरण दिया जाता है- । -- - विभाव (वारण) अनुभाव (कार्य) सचारभिाव (ब्यमिवारी) देवता वण M] स्थायाभाव आलम्बन उद्दीपन ३ ५ ६ रति नायक नायिका सग्यी, सखा, चन्द्र भू विक्षेप हान भार स्वप्न श्रौत्सुक्य शका, | विष्णु ज्याम चद्रिका, भ्रमर, वन | कटाक्ष श्रादि चिता,लजा, उन्मादि- वाग झकार भादि कादि कुरूप वेप जिसे हास्यजनक व्यक्ति पिलक्षण प्रकार से हर्ष बालस्य श्वेत देख हँसीपावे की चेष्टा आदि हॅसना मुस्कराना प्राख चपलतादि सिकोडनामदकना आदि शोक शोच्य वस्तु गांच्य की दाहादि| रोना देवनिदा दीर्य मोह, विषाद, जडता, वरण धवल क्रिया श्वास बेहाशी धादि आदि शत्रु की चेश शुभग, होठ चबाना, गर्व उग्रता मोह आक्षेप रुद्र नेत्रो का लाल होना, मुष्टिप्रहार आदि कप श्रादि उत्साह जिसके जीतने मनु की चेष्टा सहाय हृदना आदि । धैर्य, अगस्फुरण, को इन्धा हो नेत्री की लालिमा, मति गर्व, तर्क, रामाच श्रादि शत्रु लात

६
६ भयानक भय भयंकर दर्शन भयजनक वस्तु को बराहट, कप, वेहोशी) त्रास, दीनता, गद्द यम
चेष्टा
आदि
भाषा आदि
७धीभत्स जुगुप्सा
रक्त, माम, | दुर्गध यादि थूकना, मुँह नाक मूदना मोह, व्याधि, आवेग, महाकाल नील
ग्लिानि) अस्यि, मल,
गेमाच पादि प्रादि
मृत्रादि
अद्भुत विस्मय आश्चर्यकारी
वस्तु
वा फर्म
आश्चर्यकारी गुण स्तम्भ, पसीना, रोमांच तर्क, वितर्क, मोह, हर्ष गधर्व पीत
भ्रम, नेत्रविकाश आदि आदि
w
६ शांत
रोमाच आदि
म
परमात्माका
तीर्थ सेषा सत्सग
स्वरूप ससार आदि
की नि सारता
धृति, मति, निवेद, नारायण शुक्ल
हर्ष भूतदया आदि
पाहा भाग ममाप्त

१
रसरताकर।
रसादि के लक्षण।
(२) विभाव-कारण रस के आहिजे, ते विभाव अवदात ।
मालवन उद्दीपन दोय भेद विख्यात ॥
(आलवन) रस को हो रलव जह, आलवन है सोय ।
(उदीपन) उद्दीपनहि विलोकिकै, रस उद्दीपित होय ।।
(२) अनुभाव-कार्यस्प अनुभाव ते, रस को अनुभव होत ।
(३) संचारीभाव-सहकारी सब रसन् के, संचारिन के गोत ॥
१(४) स्थायीभाव-सकी थिरता जाहि में, थायिभाय उद्योत ।
सो विभाव अनुभार पुनि, संचारी मिलि होता
थायिभार रति हाम पुनि, शोक क्रोध उत्साह ।
भय ग्लानिहु विस्मय बहुरि, निर्वेदहि चित चाह।
(५) रस-रस कहिये नव भाति के प्रथम महत शृगार ।
'हास्य करुण पुनि रोद्र गनि, वीर सुचारि प्रकार ।।
बहुरि भयानक जानिये, पुनि वीभत्स बखान ।
अद्भुत अष्टम नवम पुनि, शांतरसहि उर आन ।
प्रत्येक रस के पालम्बन, उद्दीपनादि अलगर होते है जैसे
पहिले सारिणी में लिस पाये हैं।
१ मनमियारों के मूल कारणों को विभाव कहत है माहिन्य दपण में विभाव
का लक्षण यों है।
रत्यायुरोधका रोके विभावा काव्यनास्ययो
आलबादापारयो तस्य मेदावुभौ स्मृतौ ।।
विमार शब्द का अर्थ है विशफ्भाव, परिचय । -
।
H

Norwww Mer- । - है [८] रसरलाकर। आलंबन विभाव (कारण) जाको थायिभाव रति, सो श्रृंगार महोत । मिलि विभाष अनुभाव पुनि, संचारिन, के गोत ।। रति कहियतु जो मन लगनि, प्रीति अपर पर जाय । थायी भाव शृगार के, भल भापत कविराय ॥ परिपूरण विरभाव गति, सो शृंगार रस जान । रसिकन को प्यारो सदा, कविजन कियो बखान ।। आलंबन श्रृंगार के, तिय नायक निरधार । उद्दीपन सब सखि सखा, बन बागादि विहार ।। हाव भाव मुसक्यानि मृदु, 'इमि औरहु जु विनोद । अनुभाव श्रृंगार नव, कवि जन कहत समोद ।। उन्मादिक सञ्चरत त], संचाग है भाव । कृष्ण देवता श्याम रेंग, सो श्रृंगार रसराव ॥ सो शृंगार ई भाति को, दम्पति मिलन सॅयोग। - अटक जहां कछु मिलन की, सो श्रृंगार वियोग ।। भावार्थ स्पष्ट है । जैसे शरीर के सब अगों में सिर, ऋतुप्रो में चसन्त , तसेही सब रसो मे शृगाररस प्रधान हे जिसके देवता अलकार प्रिय श्री विष्णु भगवान अर्थात् रसिक शिरोमणि वृन्दावन विहारी श्रीकृष्णचन्द्र है इसी से गाररस की गणना सब से आदि में की है कविवर श्री पद्माकर भटकहते है- नव रस में शृगार रस, सिरे कहत सब कोय । सुरस नायिका नायकहि, बालवित है होय ॥ अंगाररस ही में नायिका भेद श्रोत प्रोत भरा हुचा है। कतिपय विद्वान नायिका भेद को गर पि से देखते हैं यह उनकी भूल है क्या सस्कृत और क्या प्रास्त काव्य ग्रन्थों में नायिका भेद ही का प्राधान्य । नायिका भेद केवल वाग्विलास है इससे मनुष्य सावधान होकर समाचतुर होता है यह वात अवश्य ध्यान रखने योग्य है कि जहां तक सरस वारण्यापार है यहीं तक नायिका भेद है। व्यभिचार में प्रवृत्त होने का नाम कदापि नायिका भेद नहीं है। नायिका भेद का ज्ञाता होकर मनुष्य अनेक बुराइयों से बचकर सावधान ओर कार्य पुशल हो जाता है हा कथन में कोई वात मयादा के वाहिर न होनी चाहिये, अश्लीलता से अवश्य बचना चाहिये क्योकि वह नीरस होने के प्रति- रिक्त सभ्य समाज में कभी ममाहत नहीं हो सकती है हमारे प्राचीन शास्त्रकार परम विद्वान और दृरदी थे हम लोगो के लिये वे जो एक में एक बढकर काव्यरत्न छोड गये है, उनसे हम को अवश्य लाभान्वित हाना चाहिये। (१) शृंगार रस। (सम्भोग) संयोग श्रृंगार पिय प्यारी को मिलन जह, मो संयोग शृंगार । सोहत ललना लाल मॅग, चक चर्कई अनुहार।। यथा- दाऊ जन दोऊ का अनुग रूप निरखत पावत कह न छविसागर को कोर हैं । चितामनि केलि के फलानि के विलासनि सो दाऊ जन दोउन के चित्तन के चोर है | दोऊ जने मद मुसकानि सुधा बरसति दाऊ जने छके मोद मद दुह पोर है । सीताजू के नैन रामचन्द्र के चकोर रामचन्द्र नैन सीता मुखचन्द्र के चकोर है ॥ छुट्यो गृह काज तोक लाज मामोहनी का भून्यो मन मोहन को मुरली बजावों । देवो दिन है में रस खान वात फेलि अहे सजनी कहा लौ चन्द हाथन दुराइयो । कालह, कालिन्दी तीर चितयो अचानकही दोउन को दोऊ मुरि मृदु मुसकाइयो । दोऊ परै पैया दोऊ लेत है वलैया उन्हें भूलि गई गया इन गागर उठाइयो । तिय पिय के पिय नीय के, नव गिग्य माजि सिंगार। करिवतो तन मनहु को, दम्पति करत विहार ॥ मिय मुख शशि में नया चकोग। एक बार चुनि कुसुम मुहाये, निज कर भूपण गम बनाये। 1 ।

-
२०
रसरलाकर
वियोग (विप्रलम्भ) शृंगार ।
जहें विछुरत तिय पीय सों, है वियोग भृगार ।
हरि के बिछुरे राधिका, तजे सकल श्रृंगार ।। यथा-
शुभ शीतल मद सुगध समीर कछू छल छन्द से ध्ये गये है।
पदमाकर चांदनी चदह के कछु पोरहि डोरन च्चे गये है।
मन मोहन सो बिछुरे इतही वनि के न अवै दिन है गये है।
ससि वे हम चे तुम वेई बने पै कछु के कळू मन लै गये हे ॥
ऐसी न देखी सुनी सजनी धनी वाढत जात वियोग की वाधा ।
त्यो पदमाकर मोहन को नम त फल है न कह पल प्राधा ॥
लाल गुलाल घला घल मे दृग ठोफर दै गई रूप अगाधा ।
के गई के गई चेटकसी मन ले गई ले गई ले गई राधा ॥
अटकि रहे कित? कामरत, नागर नन्दकिशोर ।
करहु कहा पीकन लगे, पिक पापी चहुँ ओर ॥
त्रिविध वियोग।
त्रिविध वियोग शृगार वह, इक पूरव अनुराग ।
वरणत मान भवास पुनि, निरखि नेह की लाग॥
पूर्वानुराग।
हो आतुरता मिलन की, सो पूरव अनुराग ।
मनमोहन मिलिहैं जवहिं, अलि तवहीं बड भाग।।
मोहि तजि मोरनै मित्यो है मन मेरो दौरि मैनह मिले है देसि देखि
विरो शरीर । कहै पदमाकर त्यो मानमय कान भये हों तो रही कि
के भूली सी भ्रमी सी वीर ॥ ये तो निरदई दई इनको दया न दई ऐसी
ा भई मेरी कैसो वरो तन धीर। हो तो मनह के मन नैनन के नैन
मैं कानन के कान तोपें जान तो पराई पीर ॥
जैसी छवि श्याम की पगी है तेरी आसिन में ऐसी छवि तेरी
म आखिन पगी रहै । कहै पदमाकर ज्यो तान में पगी है त्योंही तेरी
कानि कान्ह प्राण मे पगी रहै ॥ धीर वर धीर धर कीरति किशोरी

. + नई लगन इतै उतै बरावर जगी रहै। जसी रट तोही लागी माधव की राधे एसी राधे राधे राधे रटमा लगी है। ज्यो ज्यो वरमत घोर पन, पन घमण्ड गरुवाइ । त्यो त्यो परति प्रचण्ड प्रति, नई लगन की जा तु० रा–सुमिरि मीय नाग्द वचन, उपजी प्रीति पुनीत । गोतम तिय गति सुरति कपि, नहि परसति पद पानि । मन विहॅसे रघुवंशमणि, प्रीति अलोकिक जानि ॥ (१) अवण दर्शन। दर्शन श्रवण जु मुनत नुति, उपजै चित अनुराग । अलि अस हरि सो पिलत ने, तिन तिय के बड़ भाग। राधिकासा कहिं पाई जुहू सखि सावरे की मृदु मूरति जेसी । तादिन ते पदमाकर ताहि सुहात कडू न विसूरति धैसी ॥ मानहु नीर भरी धन की घटा प्रोखिन म रही यानि उनैमी। पेसी भई सुनि कान्ह कथा तु निलोकहिगी तब होदी कसी ।। (०) चित्र दर्शन। दर्शन चित्र जु चित्र लग्वि, मन मैं होत निहाल । चित्र देवि जकि थकि रही, सन्मुख कौन हवाल।। यथा- चित्र के मदिर ते इक सुन्दरि यो निकसे जिन्हें नेह नसा है। त्यो पदमाकर सोलि रही हग वोले न बोल अडोल दमा है। 'भृगी प्रसगते भुगहि हात झुपै जग मे जड कोट महा है मोहन मीत को चित्र लग भई चित्रहिसी तो विचित्र कहा है ।। हरपि उठी फिर फिर परसि, फिर परमति चपलाय । मिन चित्र पट को तिया, उर सो लेत लगाय ।। (३) स्वम दर्शन। दर्शन स्वम जु स्वप्न में, लखि उपनति है पीति । सोवत हरि जात मन, यह कैसी अलि रीति ।। यथा- रन्दरि सपने में लख्यो, निशि में नदकिशोर । - । - , -- । रसन्ताकर।। m (४) प्रत्यक्षदशन। सो दरशन प्रत्यक्ष जय, लखिक उपजति प्रीति । पाय दरश नॅद नन्द को, हिय हुलसी रस रीति ।। यथा- ग्राई भलेही चली संखियोन में पाई गोविद के रूप की झाकी। त्यो पल्माकर हार दियो गृह काज कहा अझ लाज कहा की । है नरयने सिख लौ मृरमाधुरि बांकी ये भोह चिलोकनि वाकी । प्राजु की या छवि देखि भटू पर देखिये को न रह्यो कछुवाकी। हो लसि आई लखहुँगी, लखें न स्यो व्रज लोग । निलिदिन सांचहुँ सावरो, दुगुन देसिवे जाग ॥ मान। करिख पिय को अपगध कछु, प्रिया ठानती मान । पिय दृग लाली लखि तिया, तानति भौह कमान ।। इसके तीन भेद है लधुमान, जो प्रिय वचनही से शात हो ? मध्यममान, जा विनय व शपथादि से शात हो और गुस्मान जो स्तुति भूषण प्रदान द्वारा बडी कठिनाई से निवृत्त हो । लघुमान वाही के रेंगी है रग वाही के पगी है मग याही के, लगी है मग श्रानेट अगाधा को । कहै पदमाकर न चाहं तजें नेफ इंग तारन ते न्यारो कियो पक पल प्राधा को॥ ताइपै गोपाल कछु ऐसा ख्वाल खेलत है 'मान मोरिव को देखियेषी कर साधा को। काह पै चलाय चख प्रथम देखिमा फेरि बांसुरी बजाइके रिझाइ लेत राधा को ॥ मध्यममान मही की थोग पेन भोरी है किसोरी यह याकी चित चाह राह और की मॅझयो जिन । कई पदमाकर मुजान रसखान आगे पान बान प्रानफी सुभान के लगयो जिन ॥ जैसे अब तैसे साधि मोहनि मना लाई तुम एक मेरी, वात एती विमग्यो जिन । श्राजु की धरी ते असे भूलिष्ट भले हो श्याम ललिता को लेके नाम बासुरी वजेयो जिन। गुरुपान नीने के अनसी पुनि जैमी होइ तेसी तऊ योवन की मृरते न दृरि भागिय है । कहै पदमाकर उजागर गोविंद जॉप फिगे कह तो इती H रसरताकर। [१३] रागियतु है । प्रेमरस हाय लै जगाये ले हिये सो हित पाइने रि चलु प्रेम पागियतु है । परी मृगनैनी तेरी पाइ लगि बेनी पाइ पाइ गे तेरे फेर पाइ लागियतु है। निरसि नेय् नीको बनो, या कहि नदकुमार । सुभुज मेलि मेल्यो गरे, गज मोतिन को हार ॥ प्रवास । (भूत) सो प्रवाम दुख भोगनी, जिनके पिया विदेस । कहा कीजिये हे अली, हरि पठयो न सॅटेस ।। (भविष्य) समाचार तिहि समय सुनि, सीय उदी अकुलाय । जाय सासु पग कमरा जुग, बदि वैठि शिर नाय ॥ विरह की दशा। अभिलाषा चिंता बहुरि, सुमिरण गुण को गान | पुनि उद्वेग मलाप गनि, अरु उन्माद वखान । व्याधि और जडता मरण, विरह दसा दस आहि । कोउ कोउ मूर्खाहू कहत, ' सो संचारा माहि ॥ विरह की दस दशाए हैं १ अभिलाषा, २ चिता, ३ स्मरण, गुणधन, ५ उद्वेग, ६ प्रलाप, ७ उन्माद, ८ व्याधि, ६ जडता, • मरण । कोईर मृा भी मानते हैं, इनमे से चिना, म्मरण, उन्माद, सधि, जडता, मूळ और मरण की व्याख्या मचारी में वर्णिन ह तथापि मगानुसार यहा भी उनका सतिप्त वणन करते है- (१) अभिलापा । जहा परस्पर मिलन की, अभिलापा मन माहिं। मनमोहन के दरस को, ये नैना ललचाहिं । ऐसी मति होति प्रगतमी करोमानी मनमानी -- - । ८ MAMAL ~~rn. [१४] रसरलाका जहाज तजि डारवाई करिये ॥ धरी घरी पल पल लिन दिन रेन दिन नैनन की प्रारती उतारदोई करिये। इदुते अधिक अरविद त अधिक ऐसो आनन गोविद को निहारवाई करिये।- (0) चिंता चिंता कोनेहु भाति की, जब चित जाय समाय । है है कैसे विपिन में, सीय सहित दोउ भाय । ये विधि जो विरहागि के वान सो मारत हो तो यह वर मागो। जो पशु होउँ तऊ मरि कैसहु पावरि लै प्रभु क पग लागो । दास पवरुन में करो मोर जु नन्द किशोर प्रभा अनुगगो । भूपन कीजिय तौ वन मालहि जातें गोपालहि के हिय लागौ ॥ कबहु नयन मम शीतल ताता । होइहि निरखि श्याम मृदु गाता ॥ (३) स्मरण 'स्मृति) ज] वियोग में पीव को, सुमिरन हो मन माहि । मुरलीधर बिमरत नही, लखि बंसीवट छाहिं ।। यथा-' यो दुख दे व्रजवासिन को, ब्रज को तजि के मथुरा सुस है। वे रस केजि विलासनि को, वन कुजन की बतिया विसगैहै ।। जोग सिखावन को हम को, बहुया तुम से उठि धावन पहै। ऊधो नहीं हम जानतती, मन मोहन कुवरि हाथ यि है ॥ सघन युज छाया सुरवद, सीतल मद समीर। मन बै जात अजो यहै, वा 'जमुना के तीर ॥ तात शक्रसुत कथा सुनायड्ड । वाण प्रताप प्रभुहिं समझायहु ॥ (४) गुण कथन जहां विरह में कीजिये, पिय गुण गणनि वखान । मनमोहन के गुणनि पर, वारिय तन मन प्रान ।। संजन है मन रजन केगव रजन नैन किधौ मति जीकी। मोठी सुधा की सुधाधर को दुति दतन को किधौ दाडिमहीकी ।। चट भलो मुखचद किधौ सग्वि सूरति काम को कान्ह को नीकी। कोमल पकज के पद पकज प्रान पियारे को मूरति पीको ॥ -

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(५) उद्वेग
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उद्वेगहि में विरह तें, चित्त बहुत अलाय ।
मो तजि कुबरी साथ क्यों, नेह लगायो जाय ।।
बन होत हरीरी मही को लपे छन जोवति है छन जोति छटा ।
अवलोकति इद्र बन्न की पत्यारी विलोकति है खिन कारी घटा।
तकि डार कटवन की तरसे तऊ देसत नाचत मोर अटा।
अन ऊरधावत जात मया चित नागरिको नट कसोयटा ॥
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(६) प्रलाप
है प्रलाप अटपट बचन, विरह दशा के बीच ।
कहा करत यह विरह जो, होत मुठी में मीच ॥
श्राम को कहत मिली है अमिली को आम आफही अनारन
याकियों करति है। कहे पदमाकर तमालन को नाल कहै तालनि
लि कहि ताकिया करति है ॥ काहे कान्ह काई कहि कदली कढवनि
भट परि रभन मे शाकिबो करति है। सावरे सो रानरे यो विरह
कानी वाला वन वन वावगे लो ताकिनी करति है ।।
ना यह नद को मदिर है वृषभानु को भोन जहां जफती हो।
होही यहा तुमही कपि देव जु कौन को घृवट के तकती हो ॥
भेटत मोहिं भट्ट केहि कारन कौन कीधी छुरिमो कस्ती हो।
ऐसी भई हो कहाँ किहि कारन कान्ट कहा है कहा वकती हो।
(७) उन्माद
व्यर्थ वचन रोदन हॅसी, 'सो उन्माद बखान ।
छिन रोवत छिन सि उठत, छिन अनमिल बतरान।।
अरि के यह माज अकेली गई खरिक हरि के गुण रूप लुही ।
उनह अपनो पहिराय हरा मुमकाय के गाइ के गाय दुही ।।
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[१६]
रसरताकर
(८) व्याधि
व्याधि विग्ह तें होत जब, तन मॅह अति संताप ।
सुनत भारती की व्यथा, तुम्हें आइदै ताप ।।
विरह संतापन ते तपनि हेरानो चित कवि ऊबि सामै लेति नन)
नीर भरि भरि । करपूर धृरन ते चदन के चूरन ते तामरस मरनि,
उपाय थाी करि करि ॥ घेरि रहीं घर की नगर की डगर प्राई देखि
देखि भाखै सबै त्राहि त्राहि हरि हरि । अग अग सूके वेन मूके में वधू
के उर भभकि भभूके मैनजू के उठे परि वरि ॥
(६) जड़ता
जहॅ वियोग दुख तें तियहि, सुधि न रहत कछु देह ।
चित्र लिखी सी उगि रही; मनमोहन के नेह ।।
कौल से पानि कपोल धर डग द्वार लो नीर भरे हिय हारे ।
चित्र चरित्रमई सी भई गई लीन बै दीन टरै नहिं टारे ।।
रावर्गलागी 'ममारख' दीठि न जात कही हम जाति पुकारे ।
जागिहै जीहै तो जोहे सवै न तु पीह हलाहल नद के द्वारे ॥
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(१०) मरण
मग्ण विरह में सुजस हित, कविजन करत बखान।
रामचन्द्र विछुरत' तजे, नृप दशरय ने मान ||
सँगवारी सुनो सब कानन दै, विरहागि के हो तो मरी सुस
करि चेटक बदन वदन रीति, निहारियो भावते के रख में॥
सुधि लेहिंगे 'सेवक' जातहि मेरी पठाइ है बावन को दुख मे ।
तजि आगि सुधा गुनि पीतम को, धरि दोजियो पाती मेरे मुस मे।।
(११) मृछी
नही मूी में रहत, सुख दुग्व को कछु भान ।
चाल विरह.व्याकुल परी, वान चहत अब मान!
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रसरत्नाकर। नायिका। - 1 रम्य,नायिका पेखि, उपजे भाव सिंगार रस । रीझि रहे हरि देखि, विय तन छवि सुकुमारता ।। भा०-जिस सुदर स्त्री को देखतेही हृदय में शुगार रस का आविर्भाव हो उस रूपवती युवतीकोही नायिका कहते हैं। यथा- नायिका के तन की छवि और सुकुमारता देखकर हरि मोहित हा गये। यथा- सुतर सुग्ग नैन सोभित अनग रंग अंग अग फैलत तरग परिमल के । पारन के भार सुकुमार की लत लेक राजै परजक पर भीतर महल के । कहै । पदमाकर विलोकि जन रीमें जाहि अवर अमल के सकल जल थल के। कोमल कमल के गुलावन के, दल के सुजात गड़ि पायन पिछौना मखमल के । सवैया-जाहिरै जागतसी जमुना जब वूडै वहै उमहै वह बेनी । त्यों पदमाकर हीर के हारन गग तरगन को मुख देनी । पायन के रँग सो रंगि जातिसी भातिही भाति सरस्थति सेनी। पैरे नहाई जहा वह वाल तहा तहा ताल में होत त्रिवेनी॥ जासु फी दीपति दीपते सौगुनी दामिनी कुन्दन केसरि प्राइका । काम की खानि सदा मृदु वानि सनेह छकी चितिम छवि छाइका। अंग अनूपम को बरनै सव अगन प्रीतम को सुखदाइका । मानो रची छवि मूरति मोहनी श्रीधर पेसी वखानत नाइका ।। सहज सहेलिन सों तु तिय, विहंसि विहॅमि यतरात । सद चद् की चादनी, मद परत सी जात ॥ वर्णानुसार नायिका भेद । दिव्य दिव्य कई सुकवि, दिव्यादिव्य विचारि। . त्रिविध नायिका जगत में, ग्रन्थन बद्ध निहारि ॥ दिव्य देवतिय , वणिये, नारि अदिव्य बखान । . - .

Kan . I" - ANTER रसरताकर। मा०-वर्णानुसार नायिका तीन प्रकार की है १ दिव्य, २ प्रदिव्य और दिव्या दिव्य दिव्य-देवतिय, अदिव्य-नरनिय (सामारिक.), दिव्या दिव्य- ससार में जन्मी दुई देवतिय, यथा-सीता, पारती, राधिकादि । जात्यनुसार नायिका भेद । पशिनि चित्रिनि शखिनी, अरु इस्तिनी बखानि । विविध नायिका भेद में, चारि जाति तिय नानि । भा०-जीत्यनुसार इनके चार भेद है अर्थात् पद्मिनी, चित्रिनी, शखिनी और हस्तिनी, इनके उदाहरण नीचे दिये जाते है। पद्मिनी-अल्प रोप रति सुन्दरी, पमिनि, तन सुकुमार । तिय के बस में पिय भये, करि राख्यो हिय हार॥ यथा- सोनो और सुगन्ध है, बाल सलोने गात । जा पिय चख भारली, सदा रहत मॅडरात ॥" चित्रिनी-नृत्यगान,पिय चित्र रुचि, नाक चित्रिनि सोय । पिया,चित्र लखि तिय रही, चन्द्र चकोरी होय ॥ यथा- मित्र नाहि चितवते कहीं, चित्र रहो चितलाइ । पत्री हेरति है कोऊ, पत्री, सन्मुख पाइ ।। संखिनी-कृश तन लघु कुच निलज त्यों, संखिनि रहत सरोप । नन तनैन कर तिया, बोली-लरिख पिय दोष ॥ यथा- सतख हियो लखि लाल को, यह मन होत,संदेह । नखन खोदि चाहत फियो, लालन के हिय गेह ॥ हस्तिनी-देह लोम युत थूल वह, हस्तिनि की गज चाल । तिय,सन्मुख पिय रहत ज्यों, पन्यो पीजर लाल || अन्य, भेद । इन नायिकामों के प्रकृति के अनुसार नीन भेद है । उत्तमा, २मध्यमा ओर'३ अधमा तथा स्वभावानुसार भी तीन भेद है १ अन्य- ५ PUTAM . t रसरत्नाकर। [१९] सुरतदु.सिता, मानवती और.३ यकोक्तिगर्विता और धर्मानुसार भी तीन भेद हैं-१ स्वकीया,.२ परफीया और ३ मामान्या (गणिका)। स्वकीया के भी' अवस्था अर्थात् वयानुसार तीन भेद है । मुग्धा, २मध्या और ३ प्रौढा तथा दशा के अनुसार मुग्धा, मध्या, प्रौढा, परकीया और सामान्या इन प्रत्येक के दस दस भेद है- १ प्रोषितपतिका, २खडिता, ३ कलहातरिता, ४ विप्रलब्धा, ५ उत्कठिना, ६ यामफसजा, ७ स्वाधीनपतिका, ८ अभिसारिका, . प्रयत्स्यतपतिका और १० प्रागतपतिका । इन समस्त भेदों का क्रमा; नुसार वर्णन किया जाता है- , . 4 उत्तमा स्थापय दोप लखि उत्तमा, धर न मन में रोप । सुखी रहो किनहूं रहौ, पिया हमें सन्ताप ।। यथा भा०-निज्ञ पति के दोष देस और सुनफर भी जो नायिका मन म रोष (कोच)न लाये अर्थात् पिय के प्रहित करने पर भी सदा हित करनेवाली स्त्री को उत्तमा कहते हैं। जैसे-हे प्यारे श्राप जहा रहो तहा सुख मे रहो, आपके सुखी रहनेही मे हमे परम सतोष है। जो मथुरा हरि जाय बसे हमरे जिय प्रीति बनी रहि,सोज । ऊधो बडो सुख एहि हमे अति नीकी रह वर मुनि दोऊ ॥ मेरही नाम की छाप पडी अरु अन्तर चीच कह नहि फोऊ । राधिका रुपा म तो कह पर कृवरी राष्ण काहै नहिं कोऊ ॥ . . 1 मध्यमा पिया दोष लखि मध्यमा, करै मान सन्मान । । सन्मुख लखि नॅद नन्द कहुँ, बरजि मंद मुसकान || भा-पिय के गुनाह (टोप) देखकर मान सन्मान (हिताहित) करनेवाली श्री को मध्यमा कहते हैं। यथा-नन्द नन्दन का सामने देखकर पाने में मना किया और तत्पश्चात् मंट मद मुमकराने लगी। ----- [२०] रसरक्षाकर। - . अधमा पिय ज्यौं ज्यों कर नेह, अधमा त्यो त्यो रिस करें। तीय करति तउ तेह, पीय परत पायन जऊ ।। भा०-ज्योंही ज्यों पिय (स्नेहपूर्वक) हित करता है, त्याही त्यों अधिक रोप (कोध) अर्थात अहित करनेवाली सी को अधमा कहते है। दुष्पा पार कर्कशाभी इसी को कहते हैं । यथा-पिय ज्योर पाय पडता है। तिय त्या अधिकाधिक कुपित होती है।' हो उरझार रिझाये को रस राग कवितन की धुनि छाई। त्यो पदमाकर माहस के कयह न विषाद की बात सुनाई ।। स्थाह में न कियो अपराध सुमापने हाथन सेज विछाई । प्यो परि पाइ मनाइ उऊ तऊ पापिन को कछु पीर न पाई ।। अन्य सुरत दु:खिता अन्य सुरत दुखिता दुखित, लखि तिय तन रति अंक । मो हित तन बहु छत सहे, नाहिन तोहि कलंक । अन्य स्त्री के तन पर निज प्रीतम के रति चिन्ह देखकर स्त्री अपना दु ख प्रगट करे उसे अन्य सुरत दुखिता वा अन्य सम्भोग दुखिता कहते हैं। यद्यपि यह लक्षण प्रौदा में भी सम्भव है तथापि कविजन इसका कथन वहुधा परकीया में करते हैं। यों-हे सखी सूने मेरे लिये तन में बहुत घाव सहे हैं सो तुझ को कोई कलक नहीं है अभिप्राय यह है कि तू महा कलंकिनी है। यथा-- थोलति न काहे एरी पूछे बिन बोलों कहा, पूछलि हों कहा भई स्वेद अधिकाई है । कहें पदमाकर सुमारग के गये आये साची कह मोसों प्राज कहा गई भाई है ॥ गई श्राई हों तो पास साघरे के, कौन काज ? तेरे लिये ल्यावन सु तेरिये दुहाई है! काहे ते न लाई फिरि मोहन विहारी जू को, कैसे वाहि ल्याऊ? जैसे धाको मन ल्याई है ॥. दूती पर उपकारणी, को जग में सम तोर। अति सुकुमार शरीर में, सहेजु छत हित मोर।। Nineterinar MA - . . .मानवती। पिय सों करै जु मान तिय, वह माननी जान । पांच परत ह पीय तिय, तानति माह कमान ।। मा०-पिय के अपराध सूचनार्थ पिय प्रति मान करनेवाली स्त्री । मानवती कहते हैं। यथा-प्रीतम के पांच पडने पर भी नायिका हि कमान तानती है। त्यार तजै ओरहु तजे, भूपन अमल अमोल । तजन कलो न सुहाग में,'प्रजन तिलक तमोल ॥ वक्रोक्तिगर्विता। • वह वक्रोकति गर्षिता, त्रिविध कहत रसधाम ।, प्रेम रूप गुण गर्विता, क्रम ते इनके नाम । मा-प्रिय के प्रेम का वा निज स्वरूप का जो स्त्री अभिमान ब) करे उसे वफोक्तिगर्विता कहते हैं । इसके दो भेद है । प्रेमगर्विता रूपगर्विता। किसीर ने एक तीसरा भेद गुग्णगर्विता भी कहा है। प्रेमगर्विता। करे भैम को गर्व जो, प्रेमगर्विता मान ।। दुख इतनो सरिख मम पिया, देत न मइके जान।। भा०-पिय के प्रेम का जो स्त्री गर्व करै वही प्रेमगर्यिता है । यथा सम्बी मुझ को दुख केवल इतना है कि मेरे पिया मुझ को मइके नहीं जाने देते । पुनर्यथा- मो विन माइ न खाई क पदमाकर त्यों भई भाभी अचेत है। वीरन आये लिवायवे को तिनकी मृदु वानिह मानिन लेत है। प्रीतम को समुझायत क्यों नहिं हे सखि तू छुपे राखति हेत है। और तो मोहिं सवै मुखरी दुखरी यह माइके जान न देत है ॥ रूपगर्षिता। रूप गर्षिता होतंवर, रूप गर्व को धारि। मो मुख चदा सम कहत, अजब इहा की नारि ॥ भा०-निज स्वरूप का गर्व करनेवाली स्त्री रूपगर्विता कहलाती? h - - 1 [२२] रसरत्नाकर गुणगर्विता। ताहि कहत गुणगर्विता, होहि गर्व गुण जाहि । मो गूंथो गजरा सखी, पहिरत पिया सरहि ।। मा०-जिस नायिका को अपने गुण का गर्व हो, उमे गुणगर्थिता कहते हैं । यथा-हे सखी मेरे प्रीतम प्यारे मेरी गुही हुई फूलों की माला) की सराहना करके धारण करते है। स्वकीया। धन्य स्वकीया नायिका, निज पति ही मो प्रेम | पति परमेश्वर मानि के, तिय सेवति मह नेम ।। भा०-जो स्त्री मन बच काय (अर्थात् मनसा, वाचा, कर्मणा) से अपनेही पति के प्रेम में लीन हो और स्वभावही से लजा तथा शीलपती हो उसे स्वकीया वा स्वीया -नायिका' कहते है। यथा-नायिका अपने पति को परमेश्वर ही मानकर नियमपूर्वक उसकी सेवा करती है। इसके अवस्थानुसार मुग्धा, मध्या, प्रौढा तीन भेद है जो क्रमश प्रागे लिखेंगे। शोभित स्वकीयागनगुन गिनती में तहां तेरे नामही की एफ रेखा रेखियतु है। कहै पदमाकर पगी यो पति प्रेमही में पदुमिनि तोसी ? तिया तुही पेखियतु है । सुवरन रूप जैसो तैसो सील सोरम है, याही त तिहारो तन धन्य लेखियतु है। सोने में सुगन्ध न सुगन्ध मे सुन्योरी) सोनी, सोनो औ सुगन्ध तो दोनो देखियतु है। ।। तो हित सुन्दर देवन की तमवीर लिखी मणि मन्दिर माहीं। कौतुक हेत सहेत संयै सो करी निज पीतम तो चित चाहीं॥ जानि परी न कळू हमको मति पाई भट्ट तें कहा किहि पाहीं । देखी अनोखी नई नवला यह काहे ते चित्र पिलोकत नाहीं ॥ यथा- पति देवता सुतीय महे, मातु प्रथम तव रेख । खान पान पीछू करति, सोपति पिछले छोर! पान पियारे ते प्रथम, जगत भावती भोर ।' प्रीतम के प्रेमानुसार स्थकीया के दो भेद हैं १ जेष्ठा, र कनिष्ठा वरणत जेष्ठ कनिष्ठका, जहँ व्याही तिय दोय- पिय प्यारी जेठा कही, अनप्यारी लघु सोय || १ J - ३ Smitromine । यथा- रसरत्नाकर। [२३] भा०-जहा दो निया विवाहित हों उनमें से जो पिय की विशेष प्यारी हो यही जेष्ठा अर्थात् " जिसे पिया चाहे वही सुहागिन" और अनप्यारी को कनिष्टा कहते हैं । जहा अधिक स्निया विवाहित हो उनमें भी सब से अधिक प्यार वाली जेष्टा और शेष कनिष्ठा जानना चाहिये । जल विहारि पिय प्यारि को, देखति क्यों न सहेलि । लै डुबकी तजि एक तिय, करतः एक सो केलि।। अवस्था अर्थात् वयक्रमानुसार स्वकीया के तीन भेद हैं १ 'मभ्या, ३मोटा। एक स्वकीया की कही, कविन अवस्था तीन । मुग्धा इक मध्या बहुरि, पुनि प्रौदा परवीन ।। . - , ' 'मुन्धा के अंग अंग, झलकत आवे तरुणई । तन अनग रस रंग, नित नूतन प्रगटन लगे । भा०-जिसके शरीर के अंग प्रत्यग में नवयोवनाकुर निकलते प्रायें उसे मुग्धा कहते हैं इसे काम चेष्टा नहीं रहती। यथा नायिका के तन में नित नवीन अनग रसरग प्रगट होने लगे हैं । यथा- कछ गज गति के आहटनि, छिन छिन छीजत मेर। विधु विकास विकसत कमल, कछु दिनन के फेर । पल पल पर पलटन लगे, जाके अग अनूप । ऐसी एक व्रज बाल को, को कहि सकत सरूप ॥ यह अनुमान प्रमाणियत,तिय तन जोबनजाति। ज्यो मेंहदी के पात में, अस्तव ललाई होति ॥ मुग्धा के दो भेद है। मुग्धा द्विविधि खानही, प्रथम कही अज्ञात | जात योरना.दसरी, भापत मति अवदात ॥ Virit , .

- Enter [२४] अज्ञात यौवना। सो अजान जोवन तिया, जोवन जिहि न जनाय । दीलि परति क्यों घांघरी, आङ्गी तन न समाय ॥ भा०-जिसे अपना योवनागमन न आन पडे उसे प्रक्षात यौवना कहते हैं । यथा-हे सखी दिन दिन घांघरी क्यो ढीली पड़ती जाती है? और अगिया क्यो कडी होने लगी? लाल तिहारे मंग में, खेलो खेल वलाय । मूर्वत मेरे नैन हो, करन कपूर लगाय॥ .. ज्ञात यौवना। ज्ञात यौवना जानही, यौवन आगम अङ्ग। दिना दूंकतें बाल क्यों. लखन लगी निज अङ्ग । भा०-जिसे गौवन का आगमन स्वय जान पडे सो ज्ञात योवना है। यथा-नायिका दो एक दिन से अपने अंग को बार बार क्यो देखने लगी है? ये वृषभान किशोरी भई इत हां वह नन्द किशोर कहावै । त्यो पदमाफर 'दोउन पै नवरग तरंग अनग की छावै॥ दोरै दुइ दुरि देखिये को दुति देह दुह की दुहन कोभावै। छां इनके रस भीने बड़े हग हा उनके मसि भीजत श्रावै॥ । इतै उते सकुचत चित, चलत डुलावति वाह । दीठ वचाय संखीन की, छिनक निहारति छांह। झात यौवना के दो भेद है १ नघोढा, २ विश्रग्ध नवोड़ा। नवोढा। नहिं नवोढा रति चहै, अति लज्जा भय पाय । निरखतही सखि सिर मुचुट, लगी धाय गरजाय।। भी-अधिक भय तथा अधिक लाजवश जो नायिका रतिन चाहे उस मुग्धा को नवोदा कहते हैं। यथा-सखी के सिर पर मुकुट देखतेही हरि समझकर नायिका धाय के गलेमे जाकर लिपट गई यथा- HAN 1 Aer . है रसरत्नाकर। [२५] राजि रही उलही छवि सो दुलही दुरि खतही फुलवारी । त्यो पदमाकर बोले हॅस एलस ग्लिस मुग्मचन्द उज्यारी ।। ऐसे समै कहु चातक की धुनि कान परी उरपी वह प्यारी। चौकि चली चमको चितमे चुप द्वै रही चचल अंचलवारी ॥ विश्रब्ध नवाहा। सो विश्रब्ध नवोद जिहिं, हो कछु रति परतीत । दूर गये पिय लालसा, निकट भये भय गीति ।। 'भा०-थोड़ामी विश्वास तथा अनुराग पति पर होनेवाली मुग्धा को विश्रब्ध नवोढा कहते है । यथा-प्रीतम के दूर होने पर तो नायिका के मन मे निकट जाने की लालसा बलवती होती है पर समीप जाने पर भयभीत होती है। मध्या। म-या तन में गजहीं, लज्जा मदन समान । कहन चहति काहि नहिं सकति, लगति सखी के कान ।। भा०-लजा भोर मान जिस म्री में समान होता है उसे मध्या कहते हैं । यथा-नायिका कुछ कहना चाहती है परन्तु ससी के कान में लगतेही कुछ नहीं कह सकती । पुनर्यथा- देखे धनै न देसवो, अनदेग्ने अपुलारि । इन दुखिया अखियान को, सुप सिरज्योही नारि॥ मदन लाज बस तिय नयन, देखत बनताकत । ईचे खिचे इत उत फिरत, जिमि दुनारि के फत ॥ मान के समय मध्या के तीन भेद । मान समय मध्याहि के, तीन भेद पुनि जान | धीरा और अधीर गनि, धीराधीरा मान ।। मा०-मान के समय में मध्या तीन प्रकार की होती है १ धीरा, २अधीग और ३ धीराऽधीरा । 1 Apan คงจะ [२६]. रसरताकर। मध्याधीस। मध्यावीरा व्यंग्य रिस, तजे न पति सनमान । स्वारय परमारथ फरत, हो पिय नीति निधान ।। मा०-अन्य रविसूचफ चिन्ह देख धैर्य तथा मानपूर्वक सादर व्यंग्य वचनों से मोध जनानेवाली स्त्री को मध्या धीरा कहते हैं । यथा-हे पिय तुम यथार्थ मे नीतिनिधान हो क्योकि स्वार्थ परमार्थ दोनो साधते हो।। स्वारथं में रत हैं सबही परमारथ साधत नाहि न कोऊ । हैं परमारथ में रत लोग गुलाय कहै विरले जस जोऊ ॥ जो परमारथ स्वारथ हीन सुयालस लोभित कीरति पोऊ। हो तुम नीति निधान लला परमारथ स्थारथ साबत दोऊ ॥ भाल पै लाल गुलाल गुलाल सो गरि गरे गजरा अल घेलौ । यो बनि बानिक सो पदमाकर पाये जु खलन फाग तो खेलो ॥ पै इफ या छवि देखिवे के लिये मो विनती के न झोरिन मेलो। राघरे रग रेंगी अखियान मै ए पलधार प्रवीर न मेलो॥ मध्या अधीरा। मध्य अधीरा रोस करि, करति अनादर कत । जाव पिया जहॅ निधि जगे, कस भूले ही अत ॥ भा०-अन्य रति सूचक चिन्ह देसकर अधीरता सहित प्रत्यक्ष, कोप तथा प्रीतम का अनादर करने वाली स्त्री को मध्या धीरा (मध्या अधीरा) कहते हैं । यथा--हे पिया वही जाबो जहा रात भर जगे हो।। यहां दूसरी जगह कहां भूल पड़े हो। भूले से भ्रमे से काहे सोचत श्रमे से अबुलाने से पिकाने में ठगे से ठीक ठाये हो । कहें पदमाकर सुगोरे रग वारे दृग, थोर थारे अजव कुसुम्भी करि लाये हो ॥ पागे को धरत पर पीछे को परत पग, भोरही ते आज क्छु ओर छवि छाये हो। कहा पाये ? तेरे धाम कौन काम ? घर जानि सहां जाउ कहां जहा मन धरि थाये हो । मध्या धीराऽधीरा ।। मध्या धीरा धीर मृद, भापि रोय सह रोप। भाग लिख्यो हम भोगती, पिया तुम्हें नहिं दोप॥ भा०-अन्य रति सूचक चिन्ह देस गुप्त तथा प्रमट (अथात् उभयत ) रोदन मरित गेप प्रकाश करनेयाली मृदुभापिणी स्त्री को Receness 17 , रसरलाकर। [२७ मध्या धीरा अधीरा कहते हैं । यथा-हे पिया तुम्हारा कुछ दोष नहीं हम अपने भाग्य का लिखा हुआ दुख भोग रही है । पुनर्यथा-' - बलि कहाँ हो फिन का फहतः पन्त अर्ग रोम मजरोस कियों में का प्रचाहे को । काहे पदमाफर यह तो दुख सुरिफरो दोस का है तुम्हें नेह निरवाहे को ॥ नौ इत रोवति वाहा हो कहाँ फोन या मेरे जागे दिये ग्रांसुन उमाह को । फोहो मैं तिहारी तो मे प्रानप्यारी अजू होती जो पियारी तब रोती फहो फाहे फो॥ भानु कहा नजि बैठी हो ? भूषण, ऐमेहि अग अल्लू अरसीले । चोलति मोल रखाई लिये मति राम सनेह सुनेते सुसीले । क्यो न कटौ दुग्य प्रान प्रिया । प्रसुवानि गहे भरिमैन लजीले । कौन तिन्हें दुग्य है, जिनमे, तुम में मन भावन छैन छबीले ॥ वरि मादर तिय पीय को, देखि गन अलसानि। सुमुख और घरमा जगी, लै उराम सुवानि ।। पादा। मौदा लज्जा ललित कछु, मकल केलि की खानि । तिय इकन्त में फन्त कहें, अब भी मनमानि ।। भा०-किंचित लान तथा मदन पूरित और सम्पूर्ण काम कला प्रवीया स्त्री को प्रोदा प्रगल्भा पोर समस्ते रस कोविदा कहते हैं यथा--नायिका कन्त का एकान्न गे पाकर इण्यापूर्यफ अफ में भरत है । पुनर्यथा- तुम नाम लिवायति हो हम पे हम नाम काही कह जीजिये। 'अव नाव चले सिगरे जल में थल में न चले कह कीजिये ॥ कवि मचित औसर जो श्रफी रायती नहिं छापर कीजिये । हम तो अपनो वर पूजती है सपनेह न पीपर पूजियेजू ।। तिय तन लाज मनोज फी, यो प्राय दशा दिखाति । ज्यो हिमत मृतु मे सदा, घटत बदत दिन राति ॥ सौदा विभेद कथन। प्रौदा द्विविधि बखानही, रति पीता इक वाम ! .

। [३०] रसरताकर 1 सुचितै सुचित है के गनित निकारो तो ।। ठाकुर कहत यह प्रेम की परिच्या छान इच्छा को प्रमान भलीभांति निरधागेती । मेरो मन माहन ते लागत है वार बार मोहन को मोते मन लागि है विचाग तो॥ गोप सुता कहै गोरि गुसाइनि, पांव परी विनती सुनि लीजे ! दीन दयानिधि दासी के ऊपर, नेसुरु चित्त दया रस भीजै ।। देहि जौ व्याहि उछाह सो मोहने, मात पिताह के सो मन कीले । सुन्दर सांवरो नन्दकुमार, बस उर जो वर सो वर दीजे ॥ सू०-ऊढा और अनूढा के दो दो भेद प्रोर माने गये हैं जो स्वेच्छा पूर्वफ उपपति से प्रेम करे उस परकीया को उबुद्धा योग जो उपपति की चतुराई में लगकर प्रीति करे उस परकीया को उद्योधिता कहते हैं ।। परकीया विभेद । पुनि परकीया के कहैं, पट विध भेद खान । प्रथमहि गुप्ता जानिये, बहुरि विदग्धा मान । ललित लक्षिता तीसरी, चौथी कुलग होइ । पञ्चई मुदिता पठई, है अनुशयना सोइ ॥ परकीया के छ भेद है अर्थात् १ गुप्ता, २ विदग्धा, ३ लक्षिता, ४ कुलटा, ५ मुदिता और ६ अनुशयना । " । गुप्ता। . - गुप्ता रति गोपन करै, त्रिविध कहत समुझाय ।। भा०-पर पुरुषानुराग सम्बन्धी क्रिया को छिपाने वाली स्त्री को गुप्ता" कहते है इमके तीन अवान्तर भेद है १ भूतसुरतसगोपना, २.वर्तमानरति गोपना, ३ भविष्यरति गोपना । भूतसुरत संगोपना। भूतसुरत-संगोपना, प्रथम भेद यह आइ । फटिगो चीर करीर फॅसि, लगे कंट तन घाइ । भा० बीती हुई रति को छिपाने वाली नायिका भूत सुरति सगोपना कहाती है। यथा-देखो सखी करल में उलझकर मेरे चीर फट गये है और शरीर में कांटों के घाव लग गये हैं। यथा- Parmantic COM

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रसरताकर।
[३१]
छुटंत कम्प नहि रैन दिन, विदित विदारनि काय ।
अति शीतल हेमत की, परी जरी यह वाय ॥
वर्तमान मुरत सगोपना।
वर्तमान रति गोपना, भेद दूसरो जान ।
पाहि जाती मैं सरित में, गा न गहत हरि आन ।।
भा०-वर्तमान रति छिपाने वाली नायिका को धर्तमान सुरति.
मगोपना कहते हैं। यथा-यदि हरि आकर मुझे न पकडते तो मै
निश्चय इस नदी में बह जाती। पुनर्यथा--
जोर जगी जमुना जल धार में धाय धसी जल केलि की माती ।
त्यों पदमाकर पंग चलै उछल जल तुग तरंग विधाती ॥
इंटे हग छरा छुटे सवै सरवार भई अंगिया रॅगराती।
को कह तो यह मेरी दशा गहता न,गुविंद तौ मै यहि जाती ॥
चढत बाट बिचल्या सुपग, भरी पान इन अक ।
ताहि कहा तुम तकि रही, यामे कोन कलक ॥
भविष्य मुरति सगोपना।
है भविष्य रति गोपना, लक्षण नाम प्रमान ।
'पुष्प लेन को जाय बन, शुरु चोंयत अधरान ।
भा०-भावी सुरति गोपन करने वाली नायिका को भविष्य
सुरत गोपना कहते हैं । यथा-पुप्प लेने के लिये धन को कौन जाये
यहा तो शुक मेरे अधरो मे छत कर देता है अर्थान् अधर चोध खाता
है । पुनर्यथा---
कोऊ कछु अव काहुवै, मत लगाइयो दोष ।
होन लगी ब्रज गलिन मे हुरि हारन को घोष ॥
विदग्धा वर्णन।
द्विविध विदग्धा जानिये, वचन विदग्धा एक ।
क्रिया विदग्धा दूसरी, भनत सुकवि सविवेक !!
भा०-पर पुरुषानुराग सम्बन्धी कार्य को चतुराईपूर्वक साधन

, " [३२] रसरत्नाकर। वचन विदग्धा । वचन विदग्धा साधती, वचन रचन सो काज | रैन अधेरी सून घर, दई सहायक' आज ।। मा०-वचन चातुरी से परपुरुषानुराग सम्बन्धी कार्य,को साधन करनेबाली नायिका को वचन विदग्धा कहते है। यथा-रात अंधेरी है, और घर सूना है आज हमारा रामही रक्षक है । यथा- कल करील की कुज मे, रहो अरुझि मो चीर । ये बलबीर अहीर के, हरत क्यो न यह पीर ॥ क्रिया विदग्धा। क्रिया विदग्धा साधती, चतुर क्रिया करि काज । केंश मांग ब्वै सैन किय, अर्ध निशा मिलु आज || भा०-परपुरुषानुराग (प्रीति) सम्बन्धी कार्य किया चातुरी द्वारा साधन करनेवाली नायिका को क्रिया विदग्धा कहते हैं। यथा-नायिका ने केश और माग छूकर यह सकेत किया कि प्यारे आज आधीरात को मिलना । इसी को बाधक क्रिया भी कहते है। लक्षिता। निरखि लक्षिता पान रत, करै प्रगट तिय आन । कहा छिपावति री लग्यो, अजन हरि अधरान ।। भा०-जिम नायिका का परपुरुष सम्बन्धी प्रेम कुछ चिन्हों से दूसरी स्त्री जानकर प्रगट कर देवे उस नायिका को लक्षिता कहते है। -अरी सखी हमसे क्या छिपाती है तेरी प्रीति प्रगट करने के लिये तो स्वय हरि के अधरो में अंजन लगा है। १ यथा--- - कुलटा। . कुलटा कुल बोरनि करे, बहु लोगन सों प्रेम । फरै सरस'जन दुमन ते, हे विधि कर अस नेम ॥ भा०-जार (व्यभिचारी) पुरुषो के विलासादिक से भी प्रस- न्तुष्टा स्त्री को बुलटा कहते है (अर्थात् अनेक पुरुषों से रति चाहने । + रसरत्नाकर। [३३] वाली स्त्री ही कुलटा है ) यथा-हे विधना ऐसा नियम फरिये कि वृत्तो मे रसीले जन फरने लगै जिससे हमारी मनोकामना पूर्ण होवे ४पुनर्यथा-- जानि सुजान में प्रीति करी महिके वटु भातिन लोग हँसाई । त्यो हरिचन्दजू जो जो कहो मो कन्यो चुप ह्वे करि कोटि उपाई। मोई नहीं निरही उनसों उन तोरत वार कडू न लगाई । साची भई कहनापतिया अरी ऊची दुकान,की फीकी मिठाई । अनुशयाना। अनुशयनहिं सङ्केत के, विघटन ते सुम्व हानि । वर्तमान भावी बहार, भूत तीन विधि जानि ॥ भा०-सकेत नष्ट होने के कारण दुखित स्त्री को अनुशयाना कहते हैं इनके तीन भेद है। धर्तमान (मकेत विघट्टना)२ भावी (मकेत नष्टा) ३ भूत (रमण गमना) -1 प्रथम अनुशयाना सकेत विघटना । पहिली अनुशयना दुखित, लखत नष्ट सकेन । ननही लगत वसंत के भइ द्वरि किहिं हेत ॥ भा०-वर्तमान समेत स्थल को नष्ट होते हुए देस दुखित होने- ली नायिका को प्रथम अनुशयाना हते है। यथा वसत के लगतेही ननॅद क्यो दुवली पडती जाती है । यहा वसन्त में पतझट होकर सकेत स्थान नष्ट होना व्यजित होता है पुनर्यथा- मौति संजोग न रोग कछ, नहिं रियोग बलवन्त । ननॅट होत क्यों दूवरी, लागत ललित वसन्त ॥ (२) अनुशयाना भावी संकेत नष्टा । दूनी अनुशयना विकल, भाषि सहेट अभार । ससुर बहु वाटिका, दुलहिन जनि पतिताव ।। - F १३ A~ । J , । 7 bencansavenna sexee [३४] रसरत्ताकर। मस्त्री की उक्ति है दुलहिन तुम किसी बात का शोच न करो तुम्हारे मसुर में भी बहुतसी फुलवारिया हैं।' निघटन फूल गुलाब के, धरति क्यों न धनधीर । श्रमल कमल फूलन लगे, विमल सरोवर नीर ॥ (३) अनुशयामा रमण गमना । व्याकुल अनुशयना तृतिय, रमन गमन अनुमान । चौकि, चकी, उझकी, झकी, सुनि बंशी धुनि कान 11, भा-ति सकेत में प्रीतम का गमन अनुमानकर वहा न पहुँच सकने के कारण व्याकुल (दुसित) होनेवाली स्त्री को तीसरी अनुशयाना तथा रमण गमना कहते है । यथा-वशी की ध्वनि मुनकर नायिका चकित हो चमक उठी और कपित होकर इधर उधर देखने लगी। यहा वन्शी ध्वनि से नायक का पहिले पहुँच जाना व्यजित हुवा । मुदिता। मुदिता मुदित जु होय प्रिय, वात बात मुनि देखि । कन्त गमन हरि आगमन, देखि प्रसन्न विशेखि ॥ भा० -स्वेच्छापूर्वक सानुकूल वार्ता वा समय देख सुनकर जो स्त्री मुदित ('प्रसन्न) हा उसे मुदिता कहते हैं। यथा-फन्त की अन्यत्र जाते हुए और हरि को निज गृह आते हुए देखकर नायिका अत्यन्त प्रसन्न हुई । यथा- परखि प्रेम बस पर पुरुष, हरपि रही मनि मन । तव लगि झुकि आई घटा, अधिक अंधेरी रेन ॥ सामान्या (गणिका) सामान्या धन लोभत, करें जनन सों प्रेम । आज हार प्रिय देहु कल, लैयो विदिया हेम ॥ मा०-केवल धनार्थही प्रेम करनेवाली स्त्री को गणिका कहते है। यथा--हे प्यारे प्राज तो यह हार दे दीजिये और कल सोने की विदिया लेते श्राना। तन सुबग्न सुवरन वमन, सुवरन उति उठाह । धनि सुवरन में ह रही, सुवरन ही की चाह ॥

RAMANAGAR - 1 - - रसरत्नाकर। सू०-परकीया और गणिका की प्रोढ अवस्था काही कविजन वर्णन करते है। नायिका के दश भेद। मोपित पतिका, खडिता, कलहान्तरिता होड । विपलब्ध उत्कठिता, वामा सज्मा जोइ ।। स्वाधिन पनिकाहू कहत, अभिसारिका बखानि । प्रगट प्रवत्स्यत् प्रेयसी. आमत पतिका जानि ।। मुग्धा, मध्या, प्रौढा, परकीया पार सामान्या में ये दसों भेद, पद्यातर्गत भागानुमार निश्चित कर लिये जाते हैं । यथा-मुग्धा, प्रोपित पतिका, मध्या प्रोपिनपतिका, प्रोढा प्रोषितपतिका, परकीया प्रोषित पतिका, सामान्या प्रोपितपतिका इत्यादि । " रसकुसुमाकर" में सामान्या मे ये टस भेद नहीं कहे है परन्तु अन्य कवियों ने इनका वर्णन किया है। । (१) मोपितपतिका । प्रोपिनपतिका सोइ, पिय विदेश सों दुखित जो। निशिदिन काटत रोइ, पिय अबली बहुरे नहीं । भा०-प्रीतम के विदेश गमन से विरह सतापित स्त्रीको प्राषित पतिका कहते है । यथा-पिय अव तक परदेश से नहीं आये ऐसा साच कर नायिका रातदिन रोया करती है । यथा- निसिहि ससिहि निटहि वहुभाती। जुग मम भई सिरात न राती ॥ (२) खडिता। दुखित खडिता पीय'तन, लखि पर तिय रति अङ्क । को बड भागिनि पिय रॅगी, लाली नैननि बङ्क ।। भार-अन्य स्त्री सम्भोग सूचक साधारण चिन्ह सहित नायक के प्रभात आगमन से क्रोधित होनेवाली स्त्री को खडिता कहते है। यथा--प्रान ममय घर में नायक को आया दुवा देखकर नायिका कहती है है प्रिय किस बड़भागिनी ने तुम्हारे वाके नेत्रो को लाल रंग मे Trendeream रसरताकर। कुछ आश्चर्य (३) कलहांतरिता। कलहांतरिता कलह करि, पिय सों पुनि पछिताय । रसन नयन अजगुत नहीं, कर हटक्यो पिय हाय ।। भा०-प्रीतम का स्वय अपमान कर पीछे मे पश्चात्ताप (पछताने) वाली स्त्री को कलहांतरिता कहते हैं। यथा-नायिका कहती है हे रसना अोर नयना तुम दोनोने पिया से कलह कराया सो. नहीं है क्योकि तुम्हारा नामही है रसना अर्थात् रस नहीं और नयना, अर्थात् नीति नहीं। परन्तु कर अर्थात् प्रीति करानेवालाजो हाथ है उसने पिय को हटक दिया। हाय यह वडा अनुचित हुश्रा। रसना, मति इन नयना निज गुण लीन । कर ते पिय झिझिकारे अजगुति कीन ।। (४) विमलब्धा । विपलब्ध अकुलाय, पिय विहीन संकेत लखि । कहां गयो पिय हाय, सेज फूल अब शूल सम ।। भा०-रति सकेत मे पीतम को न देखकर व्याकुल होनेवाली स्त्री को विप्रलब्धा कहते है । यथासमेत स्थान में नायक को न पाकर नायिका कहती है हा प्रागानाथ तुम कहा चले गये यह सेज के फूल मुझे शूल के सदृश लगते है। (५) उत्कंठिता। उत्का सोच सोट में, क्यों आयो नहिं त । रात जात सिय रात सब, पिय विलमे कह अत ॥ भा०-जो स्त्री रतिस्थल में जाकर प्रीतम के गाने में विलम्ब देख चिंतित होती है उमे उत्कठिता अथवा उत्का कहते है। यथा-मर रात वीती जाती है न जाने पिया दूसरी जगह कहा विलम रहे है (६) वामकसज्जा। वासकसज्जा सेज सज, पीय मिलन के काज । सजी सेज पिय मिलन हित, सांझहिते तिय पान ।। . - - ।

रसरताकर। [३७ ] भा-निश्चयाही प्रीतम का मिलाप जानकर सभोग सामग्री सजित (अर्थात् तेयार) करनेवाली सो को वासझमजा कहते हैं। यधा-पिय मिलाप के लिये नायिका ने आज सामही से सेज सजा रक्खी है। " (७) स्वाधानपातका। , , 1 + L . . स्वाधिनपतिका के रहत, पिया सदा 'आधीन । पिय आपुहि अन्दवाय तिय, सकल सिंगारहु कीन ॥ भा०-जिस स्त्री का पति सदाही उसके वशीभूत रहे उसे स्वा- धोनपतिका कहते हैं । यथा-नायिका को नायक ने स्वय अपने हाथो से खान कगया ओर सोलहो शृगार भी किये अर्थात् नायक नायिका के सब प्रकार प्राधीन है। (८) अभिसारिका। अभिसारिक घुल पियहि, के यापुहि चलि जाय । करि सिंगार भूपण पहिरि, तिया चली हरपाय || भा०-पिय सभोगार्थ सकेत रतिस्थानमे स्वय जानेवाली अथवा प्रीतम को युलानेवाली स्त्री को अभिसारिका कहते हैं । यथा-नायक मे मिलने के लिये नायिका श्रृंगार कर भोर प्राभूषण पहिन हर्षित होती हुई चली जा रही है। इसके तीन भेद है। दिन म जानेवाली दिवाभि- मारिका, अंधेरी रात में जाने वाली कृष्णाभिसारिका और चादनी रात में जानेवाली शुहाभिसारिका । (६) प्रवत्स्यत्पतिका। प्रवसित पतिका सोड, चलन चहत परदेश पिय । रही विफल हिय होइ, भोरहिं तें पिय गमन, लखि ।। भा०प्रीतम का विदेश जाना निश्चय हाने से व्याकुल होनेवाली स्त्री को प्रवत्स्यत्पतिका कहते हैं । यथा-याज पिय विदेश जायेंगे इस कारण प्रात कालही से नायिका शिकल हो रही है। यथा--

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[३८]
रसरत्नाकर।
(१०) आगतपतिका।
आगतपतिका मुदित बहु, बहुरत पिय परदेस ।
मुनि आगम पिय तरकिंगे, बन्द : कंचुकी बेम ॥
भा०-प्रीतम के विदेशागमन से प्रानदित होनेवाली नायिका को
प्रागनपतिका कहते हैं । यथा-पिय का आगमन सुनकर हिय में इतनी
प्रसन्न हुई कि मारे उमग के कचुकी के वद तडक गये।
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रसरताकर। N 7 अथ नायिका नायकवयस वर्णन । अमुक वर्ष तक अमुक नायिका होती है इस बात का निर्धारगा करना महा कठिन है कोई वार्षिक नियम स्थिर करना प्रकृति देवी के प्रतिकूल चलना है अगो के चिन्ह तथा स्वभावानुमार तो अवस्था पलटतीही जाती है यही प्राकृतिक नियम अचल है देशभेद तथा प्रकृत्य- नुमार कवियों के अनेक मतभेद है इनमे से काई मर्गनुकूल नहीं तथापि स्थूलमान से पूर्व कथित कुछ भेद इस अभिप्राय से लिखे जाते है कि जिसमे काव्य में व्यवहत अनेक शन्दो का भाव विदित होजावे । शृगार प्रकरण म केवल युवती अोर युवक का ही वर्णन होता है नायिका कव तक युवती कहाती है इस विषय में एक प्रमाण यह है- विशाखातागतामेघा, प्रसूतांतंच यौवनम् । प्रणामातः सताकोपो, याचनातहि गौरवम् ।। अर्थात् प्रसूत तक ही नायिका का यौचन है । अन्य स्थान मे वयस का प्रमाण यो है- अष्ट वर्षा भवेत् गौरी नव वर्षातु रोहिणी । दशमें कन्यका मोक्ता, अत. ऊर्दै रजस्वला ।। दूमर कवि यो लिखते हैं- सात बरस लौ जानिये, कन्या को परमान । तेरह ली गौरी बहुरि, बालाबैस निदान । तरुणी है तेईस लो, मोढ़ा पुनि चालीस । इह विधि तिय वय को कहत, जे कहात कवि ईश ।। अन्य कवि का कथन यो है- साढ़े दसय वर्ष लौं, गौरी वयस पमान । पुनि साढे चौबीस को, लक्ष्मी वयस मुजान ।। बहुरि वर्ष पैतीस लो, चैस सरस्वति जान । . . .

1 ॥ । . [४] 'रसरताकर। साढे दशयें दर्प तें, मुग्धापन दरसाय । पुनि सोलहवें वर्ष ला, रहे सुनौ कविराय ॥ बहुरि सोरहें वर्ष ते, मध्यापन लगि जाय । रहे बीसये वर्ष लो, कहैं सकल कविराय । फेर वीसय वर्ष ते, प्रौदा होय सुजान । साढे चौविस ला रहै, कह चिरजीव महान (इन महाशय की जांच परताल चमत्कारिक है) पक श्रोर कवि महाशय ने निम्नाकित 'नाम कहे है रजो दर्शन से तीन महीने तक अकुरित योयना, ६ महीने तक नवलवधू, १४ वर्ष में नवयोवना, १५ मे नवल अनगा, मे सलजा वा घ्यामा, १६ मे प्रगल्भा, २० में सुरत विचित्रा, '२१ में प्रोदा, २२ में रतिकोविदा, २३ मे वल्लमा, भोर २४॥ मे लुभर्मा (गृहिणी) साराश यह है कि स्थूलमान से ११ से १५ तक मुग्धा, २३ तक मध्या और २४ से ४० तक प्रोढा कहाती है। नायकों के वर्णन मे भी युवक का ही वर्णन होता है इनके वय- भेट शृगार रस के ग्रन्थो में नहीं दिये गये न इनकी आवश्यक्ता है हां पुरुष के चयभेद मन्थो में इस प्रकार मिलते है वर्ष अरस्था घर्ष शिशु '१७-४० तरुण कुमार '४०-७० वृद्ध किशार १०-१०० वान नायिका भेदों का संक्षिप्त विवरण । - से । अवस्था मध्य ५-१० पागह ७०-६० जरा २६ वर्णानुसार ३-दिव्य (देवतिय), अदिव्य (नरतिय), दिव्यादिव्य (ससार में जन्मी हुई देवतिय) जात्यनुमार ४-पदमिनी, चित्रिनी, सिनी, हम्तिनी। प्रत्यनुसार ३-उत्तमा, मध्यमा, अधमा, Ca - , " रसरताकर। [४१] प्रेमानुसार २-जेष्ठा, कनिष्टा । वर्मानुसार ३-सकीया, परकीया, सामान्या । स्वभावानुमार ३-अन्य सुरत दु विता, मानवती, गर्विता । गर्विता 3 प्रकार-प्रेमगर्विता, रूपगर्विता, गुणगर्विता। स्वकीयाफी अवस्था अर्थात् वयक्रमानुसार भेन-मुग्धा, मध्या, प्रोढ़ा। मुग्धा के २ भे:-अशात योगना, शात यावना। मच्या और प्राढा के मानानुसार ३ भेद-पीरा, अधीरा, धीराऽधीग। प्रौढा के क्रियानुसार भेद-रतिप्पीना, यानन्द राम्मोहिता । । परकीया (ऊढा', अनूढा) इनके छै छ भेर-गुमा, विदग्धा, लतिना, कुलटा, अनुशयाना, मुदिता। 'सामान्या-गणिका जिसे श्या, वारवध, चागगना, रामजनी, रडी इत्यादि कहते है इसके भेदापभेद सारहीन जानकर छोड दिये गये। दशानुसार नायिका भेद १०-मुग्धा, मध्या, गढा पोर सामान्या इन प्रत्येक के दस दस भेद है-प्रोषितपतिका १, खडिता - लिहातरिता ३, विप्रलब्धा ४, उत्कठिना, चामक- सज्जा, स्वाधीनपतिका७, अभिमारिका, प्रसन्न्यत- पतिका , और पागतपतिका १० - । । -- r नायक -नायक गुण मंदिर युवा, युपती रीझहिं देर । ललकि रही ब्रजनायिका, निरखि श्याम को 'भेव।। भा० सुन्दर गुण रूप योचन मम्पन्न युना जिराका धिया अंगार राष्टि ने देखें और जो'कान्य गग, रस का येत्ता (ता) हो उने नायक कहते दि। पथा-धीटपाचन्द्र के न्यरूप को देखकर मज की नायिकाएँ ललचाय ही प्रथात् माहित होगई। पुनर्यथा-- दौरे कोन पिलादिन, रसिकम्प प्रभिराम । -- 1 + 1 . [४] रसरताकर। द्विविध नायक । द्वै चित्र के नायक कहे. कविजन सहित विचार । मानी होत स्वभाव साँ, मोषित दशानुसार ॥ भा० नायक के स्वभाव (प्रकृति) अनुसार तथा दशानुसार द्रा भेद है, अर्थात् प्रकृति अनुमार (मानी) और दशानुसार (प्रोपित) पानी। करै जुतिय पै मान पिय, मानी कहिये सोय । रूस रहे पिय पूम में, करत न ऐसो कोय । भा०-प्रिया प्रति । मान करनेवाले पुरप को मानी नायक कटते, है । यथा हे पिय प्रस में क्यों रूस रहे हो पेसा ता कोई भी नहीं करता। पुनर्यथा-, जगत जुराफा द्वै जियत, नज्यो तेज निज भान । रूस रहे तुम पूस में, यह था कोन सयान ।। पापितपति 1. सो पति मोपित जानिये, विकल विरह तें होय । कबधौ कंठ लगाइवी, -प्यारी को, मुख जोय ॥ भा०-प्रिया के नियोग होने से मतापित नायक को प्राषितपति कहते है । यथा-हा यह सुन्दर अवसर न जाने कव प्राप्त होगा जब अपनी प्राणप्यारी का मुख देसकर उसको कठ से लगाऊगा । पुनर्यथा--- लोकन मबारो तो मवारी ना विगारो कट्ट लोकन' सवारि नर, नारिना संचारो तो! कीन्हो,नग नारितो ना प्रेम को प्रचार देतो प्रेम को प्रचागे तो ना मन को प्रचार तो ॥ मैन को, प्रचारो तो प्रचारोना संयोग देतो कीन्हो जो मयोग तो वियोगना विचार तो। नन्दराम कीन्हो जो वियोग विधना तो भूलि बोरे चन वागन वसन्त ना वगार तो ।। प करतार गिन सुनौ दास की लोकनि को अवतार फगे जनि । लोफन को अबतार करो तो मनुप्यन को तो सैनार कगे जनि ।। मानुषाको सनार करो तो तिन्हें विच प्रेम प्रचार कगै जनि। प्रेम प्रचार करो तो दयानिधि केहु पियोग विचार करौं अनि ॥ - - - - - रसरताकर। [४] नायक भेद। धर्मानुसार नायम के तीन भेंट है अर्थात् नायक तीन प्रकार है पति, उपपति, शिर । पति। । जो विपि सो व्यायो तियहि, सोई पति मब और । जर ते पर भाई प्रिया, लाल लपत नहिं और ॥ भा०-जी नायक रीत्यानुसार 'नायिका' के साथ पाणि ग्रहण करता है, उसे पनि कहते है । यथा--जब से लाल प्रिया को विवाह कर घर लाये है, तव में अन्य की प्रार देसने भी नहीं है। पति के पांच उपभट। अनुकूलरु दक्षिण बहुरि, बेष्टरु गठ अनभिज्ञ । पाच भाति के पति कहे, जे कवि काव्य अभिज्ञ'। मा०-पति पांच प्रकार के होत है (२) अनुक्ल, (२) दक्षिण, (२) ए, (४) गट और () अनभिज्ञ, अनुकूल। निज पतनी में रत सदा, सो अनुकल बखान । धन्य राम जिन जग सदा, एक तिया व्रत ठान।। भाग-जो पुरुप निज विवाहिना एकही सी से प्रेम रसकर पर सी मे निमुख रहता है उसे अनुक्कत कहते है। यथा--श्रीरामचन्द्रजी, को धन्य है जिन्हो ने संसार में मर एक तिय ग्रन का , पालन किया । यथा- टालत हक सग खरे इस मग ही वोलत है मन भायक। दूसरी बात न जानत ये निशि वानर मग रहै सुखदाया । कौन करे समता इनकी गनिये इनह का सदा खग नायक। देखि परे खग राजन में इक मारम साचे सिपारत लायन 44 . . 11 ४.] **หมวล रसग्ताकर। བཀབང་ནས་ག दक्षिण। । . पहु नारिन को मुसह सम, मो दक्षिण पनि जान मन मोहन बग निगन प, राग्वत प्रेम समान ॥ मा०-अनेक पियो पर समान प्रीति करनेवाले पुरुष को दक्षिण कहते है । यथा-मनमोहन मज नाग्यिो पर एक समान ग्रेग रखते हैं। निज निज मन के चुनि सवे, फल लेहु एक बार। यह कहि कान्ह कदम की, हप हिलार्ड डार ॥ धृष्ट। धृष्ट कलंकी निलज पुनि, करै दोप निरशक । ज्या ज्यो बरजत ताहि तिय, त्यों त्यों लागन अंक ।। मा०-अत्यन्त अपमानित होने पर भी नम्र लज्जाहीन, अधम, निश्शक अपराध करनेवाले पुरुष को धृष्ट कहते है । यथा तिय ज्यो) ज्यो वर्जती है त्यो त्यो नायक अक में लगता जाता है, अर्थात रिकारने 24मी नही मानना। शठ। शठ सावत निज काज, मुख मीठो हिय कपट मय । प्यारी गारी आज, मिसरी ते मीठी लगै ॥" मा० बलपूर्वक अपराध छिपाने में चटर तथा अपना काज माधने के निमित्त मधुर-भाषी पुरुष को शठ नायक कहते है । 'यथा- प्यारी आज की तुम्हारी गाली हमको तो मिश्री से भी अधिक मीठी लगती हैं। यहा छल से प्रापना कार्य साधने के लिये ही नायक ने गालियो कमीटी बताया है। अनभिज्ञ । नदि चूमत अनभिज्ञ है, नारि विलास अनेक ! करि हारी सत्र जनन तज, वलमान समुझै नेक, - मा०-गारादि रसानुकुल रिण का योचित काना न होने पाले पुरुष को अनभिज्ञ फहने है । यथा नायिका सब प्रयत करके थक गई परन्तु बलमजी कुछ भी नहीं समझे। 1 -- । . + रसरताकर। ! - -- उपपति। उपपति ताहि बखानही, जो परतिय के मीत । व्याह प्रथा जिन निग्मई, करी बड़ी अनर्गत ।। मा०-अन्य की स्त्रियो पर अनुरक्त रहनेवाले पुस्प का उपपति कहते हैं। यथा-जिन्हो ने व्याह की गति चलाई है, उन्हो ने बड़ी अनरीत की है। प्रभिप्राय यह है कि अन्यत्र (वाहर) जाना यथेच्छ नहीं बन पडता । अर्थात् निज स्त्री के कारण पर स्त्री रमण करने का अवसर नहीं मिलता। उपभेट । याम दोय प्रसार के. उपपति भेट बग्वान । वचन चतुर दक हे ,तहा, क्रिया चतुर रिय जान ।। भा०-डरा (उगपति) के दो भेद है । वचन चतुर नोर २ किया चतुर । (विच दुसरा) है वचन चतुर।। वचन चतुर साधत सदा, चतुर रक्ति सौ काज । तुब घर पैट्यो चोर इत, प्रिया फिरत कहें आज । मा०-वचन चातुरी से अपना कार्य माधने वाले पुरुष को वचन चतुर रहते हैं । यथा--प्यारी आज तु या कहा फिरती हे तर घर में! नो चोर घुमा है । अभिप्राय यह है कि नायिका शीन अपने सूने घर में वापिन जाये और सहायतार्थ नायक को भी साथ लेती जावे इग्नी बहाने से नायक अपना अभीष्ट संपादित करता है। क्रिया चतुर । किया चतुर रचि छल क्रिया, साधत अपनो काज । मैन मंदि सूनित कियो, प्रिया माझ मिलु आज ॥ भा०-छल दिया करके अपना कार्य साधने वाले पुरुष को क्रिया करने। मकर नायक ने यह मचित किया + . Mara -- . १ [४६] रसरताकर। वैशिक। वार वधुन को गसिक स्वइ, वैमिक अलज अभीत। बहुत फीनहू भये, तजत न गणिका प्रीत ।। मा०-वेश्यानुगगी नधा निर्लज और निडर पुरष को रेशिक कहते हैं। यथा - अत्यन्त फजीहत होने पर भी गणिका में प्रीति नहीं छोड़ता। नायक भेदों का संक्षिप्त विवरण । स्वभावानुसार-मानी। दशानुसार-प्रोपित। । धमानुसार ३-पति, उपपति, वंशिक । पति के ५ उपभेद-अनुकूल, दक्षिण, पृष्ट, गाउ, अनभिना उपपति २ उपभेद वचन चतुर, बिया चतुर । वैशिक के उपभेद नहीं है। नायिका के सदश नायक के भी उतनेही भेटोपभेद हा सके। परन्तु उनमे सार न जानकर प्राचार्या ने मुख्य मुख्य भेद ही वर्णन करना उचित समझा बुधजन इतनेही से विचार कर लेग! इति भृगार रस। (२) हास्यरंस। थाई जाको होस्य है, वहै हास्य रस जानि तह कुरूप ऋदव कहब, कछु विभाव ते मानि । भेद मध्य अरु ऊच स्वर, हँसिवोई अनुभाव! हरप चपलता औरहू, त संचारी भाव 1; 7 स्वेत रंग रस हास्य को देव प्रमथ पति जाम ! ताको कहत उदाहरण, सुनतहि आवे हास ॥ भा०-जिस रस का स्थायीभाव हाम हो उसे हास्यरस कहते है, कुरूपता मटक और अनुचित कहना उद्दीपन और इसके पात्र - - 1 ~~ .

४७ रसरक्षाकर। विभाव इसी प्रकार मध्योच स्वर मिना अनुभाव तथा हर्ष चपलता (चलता ) आदि सचार्गभाव माने है, इसका रग येत और प्रमथ देवता है । यथा-- अरबी तेरे यार में है है रिभचार जाय जानती विचार तो सूधौ होन जारशे । कती विचार भाति भाति के सुभाय भाय केती बड़ी वात हुती वाकी अटकायवा || ग्वाल कवि पीठन पै एक एक हाटी वापि नीके मनमोहन को करती रिझायबी। यातो कट्ट काई बहुरापिरा बलास कर सीख लेती हम सब घर बनायो । कप में कसर नाहा गग में कसर नाही लाग मे कसर नाहि लाज की घेरी हैं। रग म कसर न कसर है उमगा में प्रण के प्रसगह म परम घनेरी है ॥ गाल कति हाव में न भार में कमर यहा चाव में कमर ना चलाफ बनेगे है। तीन है कसर ऊधो काह के न कृव इहा नाग्न न जाति श्रर का की न चेरी है । प्राज को कह तो पाठ मास लों न लागे ठीक काल्ह जो कहे तो मास सोरह चलानहीं। पाच दिन कहे पाच वरस पिताय देंहि पाख जो कहै तो ले पचास पहुँचावहीं । मनत प्रधान जॉपै तान त्याग द्वार पापना लजान फेर वाट्ट को लजानहीं। ऐसे मत्यवादी मरदार हैं देया जहा काहे को परेया तहा जीनत ला पावहीं॥ । सम पतनी मो कहै मुन सरने-की वात अकथ कहानी रात वरवस हागे तो चानी में खगे ती जिमी गाड़ के धरो तो ताहि मन में विचार खोदि हाथ के निझागेनो। इतने में प्रायो कविराज एक ताहि समें पढौ ता फपित्त हो तो दीवा अनुसारो ता| हो तो कुल दाग पडे जिटन के भाग प्ररी जाग न परो तो में रपेया देइ डारी तो ॥ दानी कोउ नाहि ना गुलावदानी गोददानी पीकदानी घनी शोभा इनहीं में लहे है। मानत गुणो को गुणही में प्रगटत देख्यो यातें गुणी जन मन सावधानी गहे हैं ॥ यदान हेमदान गजदान भूमिदान मुकवि मुनाये ो पुरानन म कहे हे । अवतौ कलमदान जुजदान जामदान सान। डान पानदान कहिवे को रहे है । पौर के किनार देत घरै सवै गारि देत साधुन को दोष दत प्रीति ना चहत हैं । मांगने को ज्वाब देत बात कहे। रोय देत देत देत भाज देत ऐमें निवहत हैं ॥ पागहू के पद देत बारन की गाट देत पर्दनि की काद देत देतई रहत हैं। एते पै सर्वेई कहें दाऊ - LAGALAN रसरताकर। - - TAI.ne [४] वैशिक। वार वधुन को गसिक स्वड, वैसिक अलज अभीत । बहुत फजीहतह भये, तजत न गणिका प्रीत ।। भा०-वेश्यानुगगी तथा निर्लज्ज पोर निटर पुरुष को वैशिक कहते है। यथा- अत्यन्त फजीहत होने पर भी गणिका में प्रीति नहीं छोड़ता। नायक भेदों का संक्षिप्त विवरण । स्वभावानुसार-मानी। दशानुसार-प्रोपित धमानुसार :--पति, उपपति, वैशिक । पति के ५ उपभेद-अनुकूल, दक्षिण, पृष्टं, गट, अनभिज्ञ ! उपपति र उपभेद-वचन चतुर, क्रिया चनुर । चशिक के उपभेद नहीं है। नायिका के सदृश नायक के भी उतनेही भेदोपभेद हो सके हैं। परन्तु उनमे मार न जानकर प्राचार्यों ने मुख्य मुख्य भेद ही वर्णन करना उचित समझा बुधजन इतनेही से विचार कर लेगे। । - - इति शृंगार रस । 5 -- '(२) हास्यरस। थाई जाको हास्य है, वहै हास्य रस जानि । तह कुरूप कंदव कहब, छु विभाव ते मानि ।। भेद मध्य अरु ऊंच स्वर, हँसिबोई अनुभाव । । हरप चपलता-औरह, तहे। सचारी भाव 1, स्खेत रग रस हास्य को, देव प्रमथ, पति जाम । ताको कहत उदाहरण, सुनतहि - आय हास ।। -जिस रस का स्थायीभाव हाम हो उसे हास्यरस कहने है, कुरुपता मटक और अनुचित कहना उद्दीपन और इमके पान श्रालम्पन? भा०- में , विभाव है इसी प्रकार मध्योच स्वर हॅमना अनुभाव तथा हर्ष चपलत (चचलता) आदि सचारीभाव माने है, इसका रग श्वेत और प्रम देवता है । यथा- ऊनो तेरे यार प्रेम है है रिझवार जाय जानती विचार तों रुयो हो न जायवों । करती विचार भाति भाति के सुभाय भाय केत बडी वात दुती वाको घटकायरा ॥ बाल कवि पीठन पै एक एक हार्ड वाति नीके मनमाहन को करती रिझायवा। यातो कह काई बहुरापिय दलास करि सीरा लेती हम मर कृवर बनायवो ॥ रूप में कसर नाही गग में कसर नाही लाग में कसर नाहि लाज की घेरी है। ग म कसर न कसर है. उमगढ़ में प्रण के प्रसगह- में परम धनेरी है ॥ बाल करि हाव में न भाव में कमर यहा चाव कमर ना चलाक बहुनेगे है। तीन है कसर ऊधो काट के न कृव इह- नाइन न जाति अरु काह को न चेरी है । प्राजु को कह'तो पाठ मास लौ न लागे ठीक काल्ह जो कहें तो मास सोरह चलायहीं । पाच दिन कहे पाच बरस विताय देंहि पाख जो करे तो रो पचास पहुँचानहीं ॥ भनत प्रधान जो ताह पे न त्यागे द्वार आपना लजात फेर वाह को लजारहीं । ऐसे सत्यवादी सरदार है देया जहा काहे को पंपैया तहा जीत लो पावहीं । सृम पतनी सो रहै सुन सपने की वात अकथ कहानी रात बग्वस हारो तोचानी में खग ता जिमी गाड के धरो तो ताहि मन में विचार खोदि हाथ के निकारा नो ॥ इतने में श्रायो कविराज एक ताहि समे पढो ता कवित्त हो तो दीवी अनुमारो तो। हो तो कुल दाग बड़े जिठन के भाग भरी जाग न परो तो मे रपेया देइ डारी तो॥ दानी कोउ नाहि ना गुलावदानी गोददानी पीकदानी घनी शोभा इनहीं में लहे है । मानत गुणी को गुणही में प्रगटत देख्यो यातै गुणी जन मन सावधानी गहे हैं । हयदान हेमदान गजदान भूमिदान मुकति सुनाये पो पुगनन में कहे हे । अवनो कलमदान जुजदान जामदान सान दान पानदान कहिवे को रहे है ॥ पोर के किवार देत घरै सबै गारि देत साधुन को दोष देत प्रीति ना चहत हैं । मागने को ज्यान देत बात कहे रोय देत लेत देत भाज देत ऐसे निवहत हैं। पागह के बद देत वारन की गार देत पनि की काल देन देतई रहत है। प्ते 4 सर्वेई कहूँ दाऊ नानाग देतात । - + [४] रसरत्ताकर। पान ते ज्ञान की गान सुन विन पान खुसी नहि हात है वानी । चाहत हैं सव जोगी जी पर देवन में महादेपष्ट झानी ॥ याकी ममान न पान कळू मुहि दीखत है जग मुक्ति निसानी ।' नगत ऊची तरग जब अग में श्रावति भग भवानी ॥ शम्भु को पाहन वेल वली वनिताह को वाहन सिंहहि पेखिके। मृसे को वाहन है सुत एक सो दुजो मयूर के पक्ष विशेखिके ॥ भूपण है करि चन फनिन्द के पैर परे सब तें सब लेखिके। : तीनहुँ लोक के ईश गिरीश जो योगी भये घर की गति देखिके॥ जल पीये तो पीनै न सावै कड़ जिहिं चित्त नहीं अभिलासिवै है। वर वित्त की बात कछु न करें मनहते फछू नहि भासिये है ॥ नित नित्त कवित्त कर जसरे जिहि प्रेम सुधारस चासिब है। कहुँ कोउ जो ऐसा मिले कवि एक सुतो हमह को रासिब है। हसि हॅमि भजे देखि दुलह दिगवर को पाहुने जे आवें हिमाचल के विवाह में । कहै पदमाफर सुकाह सो कहै को कहा जोई जहा देखें। सो हँसेई तहा राह में ॥ मगन भयेई हैनै नगन महेश ठाढे श्रीरउ सेउ हॅसें हसी के उमाह मे । सीस पर गगा हँसे भुजनि भुजगा हॅले हासही को दगा भयो नगा के विवाह में ॥ बर प्रानुहार वगत न भाई । हॅसी कहहु पर पुर जाई ॥ विष्णु वचन सुनि शिव मुसकाने । निज निज सेन सहित विलगान।। नाना जिनिस देसिकर कीसा। पुनि पुनि हॅसत कोशला पीसा ॥ 1 इति हास्यरमा (३) करुण रस। यालम्बन-प्रिय को मरण, उद्दीपन दाहादि । थाई जाको शोक जहें, बडै करुण रस यादि ।। रोदन महिपतनादि जह, वरणत कवि अनुभाव । निर्वेदादिक जानिये, 'त: संचारी भाव || चित्र कबूतर के वरण, वरुण देवता जान। या विधि को या करुण रस, वरणत कवि कवितान।। , answer Marwwmore -A रसरत्नाकर। [४] भाव-प्रिय वधु आदि की अपार हानि व मरण पालम्बन, तथा उनकी दुखित दशा वा मृतक का दाह कर्म, उनकी प्रिय वस्तुओ का दर्शन गुण श्रवण आदि उद्दीपन, रोना, पृथ्वी पर गिर पड़ना आदि अनुभाव भाग्य को निन्दा पश्चात्तापादि सचारी भाव और शोक जिसका स्थायीभाव है, उस रस को करुण रस कहते हैं। रग इसका कवरा कबूतरसा और देवता इसका घरुण है। यथा- पुर ते निकसी रघुवीर वधू धरि धीर दये मग मे डग है। मलकी भरि भालकनी जल की पट सूख गये मधुराधरवै॥ फिरि चूझति हैं चजनोऽव कितो पिय पर्ण कुटी करिहो कित है। । तिय की लसि प्रातुरतापिय की अखिया अति चारु चली जल च्॥ इति करुण रस । - + -- । । (४) रौद्ररस । थाई जाको क्रोध अति, वहै. रौद्ररस नाम । बालम्बन रिपु रिपु उमॅड़, उद्दीपन तिहि ठाम || भृकुटि भंग अति अरुणई, अधर दसन अनुभाव । गरव चपलता औरहू, तह सचारी भाव ।। रक्त रंग रस रौद्र फो, रुद्र देवता जान। ताको कहत उदाहरण, सुनहु सुमति दे कान ।। भा०-क्रोध को पुष्टता (स्थिरता) को रोदरस कहते है रिपुती इसका पालम्पन है और रिपु की उलग उद्दीपन है, इसी प्रकार भूभगता तथा नेत्रों की परणाई, अधर दशनादि अगों का स्फुरणादि (फरकना) अनुभान हैं और गर्व (अभिमान) तथा चपलतादि संचारी भाव है इसका रक (लाज) वर्ण,और रद देवता है । यथा- वारि टारि डारों कुभकर्णहि विदारि डारों मारो मेघनादे प्राज यो वल प्रमन्त हो । कहै पदमाकर निकटहीं को ढादि डारो डारत करै यातुधानन को अत हो ॥ अन्धहि निरच्छ कपि ग्च्छ है उचारौं इमि जाति नाति .

[५] रसरत्नाकर जैसा ते न मोसो कह नेकह उगत दुतो पेसो अव हो ह तोसों हनेकह न दरिहीं। कहै पदमाकर प्रचड जो परंगी तो उमड करि? तोसो भुजदड ठोकि लरिहौ ॥ चलो चलु चलो चलु विचलु न बीचहीन, कोच वीच नीच तो कुटुम्ब को कचरिहो... एरे दगादार मेरे पातक/ अपार तोहि गग की कछार मे पछार बार करिहों ।। वोरो सवै रघुवस कुठार की धार में, वाग्न वाजि सरथ्यहि । वान के वायु उडाय के लच्छन,लब्धी करो अग्हिा समरथ्थति। रामहि वाम समेत पठे वन सोक के भार मे भूजी भग्थ्यहि । जो धनु हाथ लियो रघुनाथ तो प्राजु अनाथ करो दशरहि ॥ तु. रा०-जो शत शकर करहिं सहाई । तदपि हतौ रण राम दुहाई ॥ -- " इति रौद्ररम। (५) वीररस - जा रस को उत्साह शुभ, है इक थाई भाव । सुरस वीर है चार विधि, कहत सबै कविराव ।। युद्ध वीर इक नाम है, दयावीर विय नाम । दानवीर तीजो सुपुनि, 'धर्मवीर अभिराम || . युद्ध वीर को जानिये, पालम्बन रिपु जोर । उद्दीपन ताको तहिं. पुनि सेना को सोर ।। अॅग फरकत दृग अरुणई, इत्यादिक अनुभाव । - गरव असूया उग्रता, तह सचारी भाव ॥ चन्द्र देवता वीर को, कुन्दन वरण विशाल । ताको कहत उदाहरण, सुनि जन होत खुशाल ।। 'भा-जिस रस का सुन्दर उत्साह पूर्ण स्थिर (स्थायीभाव) हो उसे वीररस कहते है इसके चार भेद है, २ युद्धवीर, २ दयावीर, दानवीर, ४ धर्मवीर । रिपु का विभवही युद्धवीर का आलम्बन है ओर सैन्य के मार वाद्यादि तथा (करखागानादि) कोलाहल उद्दीपन है इसी ?

- 7 रसरत्नाकर। [५१] प्रकार तथा प्रग स्फुरण नेत्री की परणाई अनुभाव है और गळ असूया (अर्थात् शत्रु को पराजित करने की अभिलाषा) उग्रतादि सचारी इसका देवता चन्द्र सुन्दर सुवर्ण वर्ण है। युद्धवीर । सोह अस्त्र ओढे जे न छोड़ें सीस सगर की लगर लगुर उच्च प्रोज के अंतका में । कहै पदमाकर त्यौं हुकरत फुकरत फैलत फलात फाल वाधत फलका में || आगे रघुवीर के समीर के तने के सग तारीदे 'तडाक तडा तडके तमका मे । सका दे दसानन को हका दै सुवका वीर डका दै विजे को कपि कृट पन्यो लका में |. भोगते साझलौं सूर चलें अर शूर चले है कबन्ध परे लो । ये सिरताज गनी मन को प्रण तो न टरे दुहु लोक टरे लो। पेसी वही अरवी गरवी शिव शकरह यमलोक डरे लो। सो सिर काटि गनी मन के तरवार वही तरघा के तरे लो॥ धनुष चढारत भै तवहि, लसि रिपुकृत उतपात । हुलनिगात रधुनाथ को, वखनर में न समात ॥ इतना कहत नीति रस भूला। रण रस विटप पुलक मिस फूला दानवीर। दान समय को ज्ञान पुनि, याचक तीरथ गौन । दानवीर के कहत है, ये विभाव मति भौन ॥ तण समान लेखत सुधन, इत्यादिक अनुभाव । ब्रीडा हरपादिक गनी, तह सचारीभाव ॥ भा०-दान उत्साह को पुटता को दानवीर कहते हैं याचक और तीर्थ गमनादि इसम आलम्बन है और दान समय का ज्ञानोत्साह उद्दीपन है तथा अरुपणता ओर सर्पम्न देने की उदारता अनुभाव है और नीडा हर्षाटि सचारी है । यथा- सम्पति सुमेर की कुर की जु पान ताहि तुरत लुटारन विलय उर पारे ना । है पदमाकर सो हम य हाथिन के हलके हजारन के? रितर विचार ना ॥ गज गज बकस महीप रघुनायगर गजही के धोपे। कह पाह दे डार ना । याही डर गिरिजा गजानन को गोह रही गिरि ते 3र A - [१२] रमरताकर। वकसि वितुद दये मुडन के झुड रिपु मुडन की 'मालिका दई ज्यो त्रिपुरारी को। कहै पदमाकर करोरन को कोप दये पोटपह दीन्ह महादान अधिकारी को । ग्राम दये वाम दये अमित पाराम दये अन्न जल दीने जगती के जीवधारी की । टाता जयसिंह दोय याते तो न दीनी कहू बैरिन को पीठि और दीठि पर नारी को। तु०रा०-जो सपति शिव रावणहिं, दीन्ह दिये दंश माथ। सो सपदा विभीषणहि, सकुचि दीन्ह रघुनाथ ॥ दयावीर। दयावीर में दीन दुख, वरणत आदि विभाव | दूरि करव दुख मृदु कहब, इत्यादिक अनुभाव ।। सुधृति चपलता औरहूं, तहें सचारी भाव । दयावीर वरणत सबै, याही विधि विराव ॥ भा०-दीनता देसफर जो चित्त मे दया की स्थिरता होती है। वही दयावीर है इसमे टीनताही पालम्बन है मधुर वास्यो द्वारा दुस दूर करने की चेष्टा करना अनुभाव है, दीन टुस वर्णन उद्दीपन, धृति और चपलता सचारी है । यथा- पापी अजामिल पार कियो जेहि नाम लियो सुतही को नरायन । त्यौं पदमाकर लात लगे पर विप्र के पग चौगुने चायन ॥ को प्रस दीन दयाल भयो दशरथ्य के लाल से भूने सुभायन । दौरे गयद उवारिबे को प्रभु वाहन छोड़ि उपाहने पायन ॥ तु० रा०-मुनि सेवक दुख दीनदयाला । फरकि उठी है भुजा विशाला धर्मवीर । धर्मवीर के कवि कहत, ये विभाव उर आन । वेद सुमृति शीलन मदा, पुनि पुनि मुनव पुरान ॥ वेद विहित क्रम वचन वपु, औरहु है अनुभाव । धृति आदिक बरणत सुकवि, तह संचारीभाव ॥ o-वेद स्मृति के वाक्यो में मान्यशीलता आलम्बन तथा पुगणादि श्रवण उद्दीपन विभाव है वेदविहित कर्म अनुभाव और वृति तमा दयादि धर्म के टश लक्षण सचारी है। यथा- 1 भा है . -- रसरनाकर। [५३ तृण की समाग बन धाम राज त्याग करि पाल्यो पितु वचन जे जानत जनेया है। कहै पदमापर विकही को वानो वीच मानो मत Kची धीर नीरज वरैया है ॥ सम्मृति पुगण वेद आगम कयो जो पर श्राचरत लाई शुद्ध करम कया है। मोहमति मदर पुरन्दर मही कं अन्य धरम धुरन्धर हमारो रघुरेया है। तु० रा०-शिनि दधीत्र बलि जो कछु भाषा । । तन धन तयउ वचन प्रगा रारा ।। प्रमवीर के अन्तर्गत ही एक भेद त्यागवीर' भी है। यथा- राजियजोचन राम चले तजि वाप को राज वटाउ की नाई । इति वीररम। । - - - (६) सयानक रस। जाको थायी भार भय, वहै भयानक जान ।. दृश्य भयकर गनर कछु, ने विभाव उर धान ॥ कम्पादिक अनुभाव तह, सचारी पोहादि । काल देव कोयलां वरण, सुभयानक रसयादि । भा०-भय की स्थिरता (पूर्ण पुष्टता) को भयानक रस ।। कहते १० ६ है । भरकर दश्य निभाव हे और कम्प-इसका अनुभाव है। इसी प्रकार हिमोहादि सचारी है । इसका काल देवता और कृष्ण वर्ण है। वमन वटोरियारि वोरि तेल तमीचर खोरि खोरि धार पाड वापत तगर है । तैसो कवि कोतुको डेगत ढीलो गात के के लात के अधात सहे जीमे कहे कृर है । वाल किनकारी केके तार्ग देटे गागे देत पाडे लागे वाजत निसान ढोल तर है। वालधि बढ़न लागी टार ठौर दीन्ही भागी विध्य की वारि वेधा काटि शत सूर है ।। - तु०रा०-डरपे गीध पचन सुनि झाना । हाहाकार करत सुर भाग।।

R - - काली महाकाल के समान है विशाल हेरि पकरि निशाचरन ५४] रसरताकर। (७) वीभत्स रस। थायी जासु गलानि है, सो वीभत्स जनाव । पीच भेद मज्जा रुधिर, दुर्गधादि विभाव ।। नाक दिवो कंप तन, गेम उठव अनुभाव । मोह अम्या मूरछा, ये संचारी भाव ।। महाकाल सुर नील रंग, सो विभत्स रस जानि । ताको कहत उदाहरण, रस ग्रथनि उर आनि ।। भा०-ग्लानि की स्थिरता (पूर्ण पुष्टता) को बीभत्स रस कहते है । पीव भेद, मजा (हड़ियों के भीतर का मेद) रक्तादिको की दुर्गंध विभाव है और तन कम्प रोमांच प्रादि अनुभाव है। इसी प्रकार मोह मूळ सचारी है इसका महाकाल देव और नील वर्ण है । यथा- वैठिये की उठवे की चलिये की बोलिवे की जानत न एकौ चाल आये जग बंचे मे । देखिये मै मानुप की प्राकृनि दिखाई परै पर नर पशू औ परिन्द हैं सुजाचे में ॥ ग्वाल कवि जानी है विरचि तुन्छ जतुन को डार और ठौर लगि ख्यालन के खांचे में । कुकर ते शूकर ते रासन तें उल्लुन त बैंचि खेंचि जीव डारे मानुप के साचे में । पट्ट पट्ट पटकत । नैन विकराल लाल रसना दशन दोउ भरि भरि खग मास गट्ट गट्ट गटकत है ॥ लोथनि पै लोथ रड मुन्ड ते विहीन के उरि उछरि भूम चट्ट चट्ट चटकत । जोगिनी सवीस के हयीस खू पूरे होत खप्पर में खून भरि घट्ट घट्ट घटकत ॥ पढत मत्र अरु यत्र अत्र लीलत इमि जुग्गिनि । मनहु गिलत मद मत्त गरुड तिय अरुण उरग्गिनि ॥ हरवरात हरपात प्रथम परसत पल पगत । जहैं प्रताप जिति जग रग अग अग उमगत ॥ जह पदमाकर उतपत्ति अति रन रकतन नदिय बहत।' चस चकित चित्त चरधीन चुभि चकचकाइ चडी रहत॥ तु० रा०-मजहिं भूत पिशाच वेताला । श्रोणित सर कादर भय कारी ॥ " ३ 44 इति दीभत्स रस 1 4 , । (6) अद्भुत रस। जाको थायी आचरज, सो अद्भुत रस गाव । असथवित जेते चरित, तिनको लखत विभाव ।। वचन विचल चोलनि कॅपनि, रोप उठनि अनुभाव । वितरक शका मोह ये, तह संचारी भाव ।। जासु देवता चतुर मुख, रंग वखानत पीत । सो अद्भुत रस जानिये, सफल रसन को मीत ।। भाव-प्राश्चर्य की पूर्ण स्थिरता को अद्भुत रस कहते हैं असंभ- रित वस्तु, चरित्र तथा वार्ता पालम्बन है गुणों की विचित्रता व महिमा उद्दीपन, इसी प्रकार चास्यो की विचलता फपना तथा रोम उठना अनुभाव और वितर्क सदेहादि सचारी है। ब्रह्मा इसके देवता है और गत वर्ण है । यथा- सात दिन सात राति करि उतपात महा मारत भको, तर र दीह दुख में कहें पदमाकर करी त्यो धूम धारनपते पैन कान्ह म प्रायो रोप रस में ॥ छारि छिगुनी के उन ऐसो गिरि छाइ राख्यो के तरे गाय गोप गोपी खरे सुख मे । देखि देखि मेधन की सेन अकु- तानी रहो सिन्धु में न पानी पर पानी इन्द्रमुख में । मुरली बजाइ तान गाइ मुसक्याइ मद लटकि लरकि माई नृत्य निरत है । कहै पदमाकर गोविद के उछाह अहि विष को प्रवाह प्रति सुख द्वे झिरत है । ऐसी फैल परत फुसफरतही में मनों तारन को गुन्दु कतकारन गिरत है। कोप करि जौलों एक फन फुफकारे काली तौलों नमानी सोऊफान पे फिरत है। तु० रा०-दिखरायां मातहि निज, अद्भुत रूप अखट । रोम रोम प्रति राजहीं, कोटि कोटि ब्रह्मण्ड ॥ सती दीख कौतुफ मगु जाता।

. -- काली महाकाल के समान है विशाल हेरि पफरि निशाचरन पट्ट पट्ट पटकत । नैन विकराल लाल रसना दशन दोउ भरि भरिखमा Varut [४] रसरताफर। (७) वीभत्स रस। यायी जासु गलानि है, सो घीभत्स जनाव । पीच भेद मज्जा रुधिर, दुर्गधादि विभाव ॥ नाक मूदिवो कंप तन, गेम उठव अनुभाव । मोह अमया मूरछा, ये संचारी भाव ।। महाकाल सुर नील रंग, सो विभत्स रस जानि । ताको कहत उदाहरण, ग्स ग्रंथनि उर आनि ॥ भा०-ग्लानि की स्थिरता (पूर्ण पुष्टता) को धीभत्स रस कहत है। पीव भेट, मजा (हड़ियों के भीतर का भेद) रक्तादिको की दुर्गंध विभाव है और तन कम्प रोमांच श्रादि अनुभाव है , इसी प्रकार मोह मूळ सचारी है इसका महाकाल देव और नील वर्ण हे । यथा- वैठिवे की उठवे की चलिये की योलिने की जानत न एको चाल आये जग हमचे मे। देखिये मै मानुप की प्रारुति दिखाई पर पर बर। पशू औ परिन्द है सुजाचे मे ॥ ग्वाल कवि जानी है विरचि तुन्छ अतुन को डार और ठौर लगि ख्यालन के खांचे मे । कुकर ते शूकर ते रासभ ते उल्लुन ते बैंचि चि जीव डारे मानुष के साचे में ॥ मास गट्ट गट्ट गटकत है ॥ लोथनि पै लोथ रड मुन्ड ते विहीन केते उछरि उचरि भूम चट्ट चट्ट चटकत । जोगिनी खवीस के हदीस खूब पूरे होत खप्पर में खून भरि घट्ट घट्ट घटकत ॥ पढत मत्र अरु यत्र अत्र लीलत इमि जुग्गिनि । मनहु गिलत मद मत्त गरुड तिय अरुण उरग्गिनि । हरवरात हरपात प्रथम परसत पल पगत । जहँ प्रताप जिति जग रग अग अग उमगत॥ जह पदमाकर उतपत्ति अति रन रकतन नदिय बहत । चख चकित चित्त चरबीन चुभि चकचकाइ चंडी रहत ।। तु० राकमजहिं भूत पिशाच वैताला। श्रोणित सर फादर भय कारी॥ - 3 । - 1 . - ! - इति बामत्म रस !

। (८) अद्भुत रस । जाको थायी आचरज, सो अद्भुत रस गाव । असभवित जेते चरित, तिनको लखत विभाव || बचन विचल बोलनि पनि, रोम उठनि अनुभाव । पितरक शका मोह ये, तह संचारी भाव ॥ जासु देवता चतुर मुख, रग खानत पीत । सो अद्भुत रस जानिये, सकल रसन को मीत ।। भा०-प्राधर्य की पूर्ण स्थिरता को अद्भुत रस कहते हैं असंभ- नित वस्तु, चरित्र तथा वार्ता पालम्वन है गुणों को विचित्रता व महिमा उद्दीपन, इसी प्रकार पाक्यो की विचलता कपना तथा रोम उठना अनुभाव और नितर्फ सदेहादि सचारी है। ब्रह्मा इसके देवता है और पीत वर्ण है । यथा- सात दिन सात राति करि उतपात महा मारत भाकोरे त तो दीह दुरा में । कहै पदमाकर करी त्यो धम धारन ह पते पैन कार फट्ट आयो रोप रस मे ॥ छोरि विगुनी के इन पेसो गिरि छाइ राख्यं ताके तरे गाय गोप गोपी खरे मुख मे । देसि देसि मेघन को सेन अकु लानी रहो मिन्धु मे न पानी अरु पानी इन्द्रमुस में ॥ मुरली बजाइ तान गाइ मुसक्याइ मद सकि लटकि माई नृत में निरत है। कहै पदमाफर गोविट के उछाह अहि विष को प्रवाह प्रति मुख कै भिरत है । ऐसो फैल परत फुसकरतही में मनो तारन को वृन्द नकारन गिरत है। कोप करि जौलो एक फन फुफकाचे काली तौलो धनमाली मोऊ फन पारित है। तु०रा०-दिखगयो मातहिं निज, अद्भुत रूप अग्वा । रोम रोम प्रति राजहीं, कोटि कोटि ब्रह्मण्ड ॥ सती दीख कौतुक मगु जाता। .

[६] रसरताकर। (8) शांतरस। सुरस शांन निर्वेद है, जाको थाची भाव.। सत संगति गुरु तपोवन,' मृतक समान विभाव ।। प्रथम रुमांचादिक तहां, भापत कवि अनुभाव । धृति मति हरपादिक कहे, शुभ संचारीभाव ।। शुद्ध शुक्ल रेंग देवता, नागयण है जान | ताको 'कहत उदाहरण, सुनहु सुपति दै कान !! भा०-निवेद (वैराग्य) की स्थिरता को शानरस कहते है। सत्सगति और गुरु इसके पालम्बन तथा तपावन और मृतक आदि उद्दीपन विभाव है। इसी प्रकार रोमाच अनुभाव धृति (बैर्य) पार मति (बुद्धि) प्रादि सघारीभाप है। इसका देवता नारायण और रग, श्रेत है । यथा- मानुप हो तो वही रसखान बसौ व्रज गोकुल गोप गुवारन । जो पशु हो तो कहा बस मेरो चरो नित नद की धेनु मॅझारन ॥ पाहन हों तो वहीं गिरि को जो कियो हरि छन पुरढर कारग । जो खग हो तो वसेरो करौ दहि कालिन्दी कृल कदव की डारन ॥ प्रभु सत्य करी प्रहलाद गिरा प्रगटे नर केहरि खम्भ महा । भारराज प्रस्यो गजराज कृपा ततकाल विलम्ब किये न तहां।। सुर साखी दै गती है पाडु वधृ पट लुटत कोटिक भूप जहा । तुलसी भनु सोच विमोचन को जन को प्रण राम न राख्यो कहाँ!! जड पर मिले जेहि देह करी करनी लधु या धरणीधर की। जनकी कहु क्यो करिहै न सम्हार जो सार करे सचराचर की॥ तुलसी कह राम समान को पान है सेवाझि जासु ग्माघर की। जग में गति जाहि जगत्पति की परवाहि है ताहि कहा नर की ॥ सो जननी सो पिता मोइ भ्रात मो भामिनि सो सुन सौ हित मेरो। सोइ सगो सो सरा सोए सेवक नों गुर सो सुर साहब चेगे। मी तुलसी प्रिय प्राण समान कहा लो बनाइ कहाँ बहुतेरो। जो तजि देह को गेह को नेह सनेह मो गम को होइ सवेरो॥ MA - .

रमरताकर ।' [१५७] तिन तें सर शूकर स्वान भले जडता वश ते न कहै कछुवै। तुलसी जेहि राम सोने नहीं सो सही पशु पुछ पिसानन ॥ जननी कत भार मुई दश मास मई किन वारू गई किनच्चे। जरि जाउ सो जीवन जानकि नाथ रहै जग में तुम्हंगे विन वै ॥ श्रागम वेद पुराण वरानत मारग'कोटिन जाहि न जाने । जे मुनि ते पुनि पापुहि आप को ईश कहावत सिद्ध सयाने । 'धर्म सवै कलिकाल से जप जोग विराग ले जीन पराने। को करि शोच मरै तुलमी रम जानकि नाथ के हाथ विकाने ॥ वन पितान रवि शशि दिया, 'फल भख सलिल प्रवाह । अवनि सेज पखा पवन, अप न कछू परवाह ॥ तुका रा-परिहरि सकाल भरोस, राम भजहिं ते चतुर नर । । - इन प्रधान नवरसो के अतिरिक्त नाटकादि में पाच रस और पाये जाते हैं जिनके लक्षण नाम्ही से ज्ञात होते हैं, इनको उपरस भी । कह सक्ते है, उनके मक्षिप्त उदाहरण नीचे लिखते हैं। (१) वत्सल। १ मेरे प्राण नाथ सुत दोउ । • भया कहहु कुशल हउ बारे । ३ वार बार मुस चुम्वति माता । (२) संख्या 'कम्हि विधि मोसन ये प्रीप्ती। ' ससा नीति तुम नीक बिचागे। । सुनत सुदामा मीत, टाढे है निज पर प्रय।। दौरे श्याम सप्रीत, दादि राज के फाज मव ॥ (२) दास्य । हम सेवक स्वामी मियनाह। २ चरा फमल चापन निधि नाना। macarmanneacturas r - 7 are [-६०] रसरताकर। "विदूपका सोड 'विदूषक' रचि क्रिया, दम्पति करे निहाल । 'चित्रं कोक दिय लाल कहें, त्यों सारस कर बाल। यथा- कटि हलाय रलकाय कछु, अद्भुत ख्याल बनाय । अस को जाहि न फाग मे, परगट दियो हँसाय ॥', सखी वर्णन। सो सखि राग्वहिं जासु सों, दम्पति कछु न दुराय । मिलो लाल सों जो लली, तो हो देहुँ सजाय.॥ सखी उन स्त्रियों को कहते है, जिनसे नायिका नायक कुछ भेद नहीं छिपाते। सखी भेद। बचन चातुरी सों करें, जे सखिया निज काज । तिन कहें चार प्रकार की, वरणत है 'कविराज ।। प्रथम कही हितकारिनी, दुतिय सुव्यंग्य विदग्ध । 'अन्तरंग' बहिरंगिनी, वृतिय चतुर्थ सुलब्ध । (१) हितकारिणी। 'हितकारिनि' स्वइ जो करत; छल तजि तिय के काम । निय आनन मैं स्वेदै करिख, कियो विजन अभिराम ।। यथा, छनिक न छोडत सुन्दरी, सखी हितू को सग । 'सखी वढावत रहत त्यो सुन्दरि हिये उमंग ॥ (२) व्यंग्य विदग्धा। वचन व्यंग्य युत कहत, जो, 'सो सखि 'वचन' विदग्ध । विन गुन मुकता माल अलि, कहां भई तुहि लब्ध । (३) अन्तरगिणी सखी। अन्तरंगिनी की फिया, आन सकत, नहिं जानि । ल्याइ,कान्ह की चांमुग,"धरी सुन्दरी, नि । marti १ मे, २'चतुर, ३ पमाना, ४ पन्या ५ सुखद, ६ प्राप्त, ७ हाथ । . ज , M , .

.PLS - , (४) बहिरंगिणी। कर सखी वहिरंगिनी, खुले खजाने काम। जे मन नाहिं निवाहती, अलि वे पापिनि बाम ॥ सखी कर्म। मंडन-शिक्षा सहित ये, उपालम्भ परिहास । चार कर्म सखियान के, कविजन किये प्रकास। मथम कर्म मंडन मंडन तियहि सिंगारिबो, घरनहिं घुदि अनूप । दीन्हों मुन्दरि को बना, अली मोहिनी रूप ॥ यथा- सखी बिया की देह में, सजे सिंगार अनेक । कजरारी अंखियान में, भूलो काजर एक ॥ कहा करों जो प्रागुरिन, अनी घनी चुभि जाय । अनियारे चख लखि सखी, फजरा देत डराय ॥ मडनान्तर्गत नख शिख वर्णन । नखते शिख लो वरणिये, देवी दीपति देखि । शिख तें-नख लो मानुपी, केशवदास विशेखि ।। “भा०-देची और देवता की दीप्ति नख से शिख तक वर्णन की जाती है और नर व नारियों की शोभा शिख से नख पर्यन्त वर्णन की जाती है। विस्तार भय से नख शिख के कुछ थोडेही उदाहरण नीचे लिये जाते हैं- ' पगतल-तुव पदतल मृदुता वितै कवि वर्णन सघुचाहि ।' • मनते आवत जीभ लो, मति बाले परि जाहि ॥ पदलालिमा-लिसन चहो मामि योरि जब, अम्गाई तुव पाय। तब लेखनि के शीश का, ईगुर रँग हं जाय ॥ पार-तुच पद मम तन पदम को, फायो कोन विधि जाय। जिन गयो निज शीश पर, नुव पद को पढलाय ।। गुल्फ-गोरे गोल अमोल मुठि, सुन्दर सहज सुदारु । - . -- - - 1 . - - . ६.[६२ ] रसरताकर। पिडुरी-प्यारी पिडुरी की दिपति, अम्बर मे न समाय । दीप शिखा फानूस लौ, न्यारी झलकत प्राय अघा-शीश जरा धरि मौन गहि, खडे रहे इक पाय । • येतो तप कदली किया, लयोन जघ सुभाय ॥ काटि-सुनियत कटि सक्षम निपट, निकट न देसत नैन । देह मध्य यो.जानिये, ज्यो रसना में वैन । नाभी-उदर बीच मन जाय कै, बूढ्यो नाभी माहि । कूप सरोवर के परे, कोऊ निकसत नाहिं ।। रोमराजी-लसति उदर रोमावली, अति विचित्र बारीक । खिची कनक की भूमि पर, मृग मद की जनु लीक ..त्रिवली-मो मन मजन को गयो, उदर रूप सर धाम । पन्यो सु त्रिवली मेंबर ते, नाभि भंवर मे आय ॥ यौवन-निरखि निरखि वा कुचन गति, चकित होत को नाहि । नारी उर ते निकसि के, पैठत नर उर माहि॥ भाजि गई-लरकाई मनो लरिके करिके दुहु दुदुभि ओंधे।। भुज-गोरे गोरे दुति भरे, प्यारी के भुज मूल । दरसत मुख सरसत महां, वरसत मोद अतल ॥ करतल-बडे फावत'आपु हो, गम्ने गोपीनाथ । "तो वदि हो जो रालिहों, हाथन लसि मन हाथ ॥ -हथेजीकी लालिमा-दीप इथेरिन की दिगति, यो मिहदी के सग। लाली सायन सामंत, ज्यो सुरज को रग ॥ .आगुरी वर्णन-चम्पकली करगहि कुवरि, हुती 'सखी को देति ।। वह पौरी धोखे परी, अंगुरी गहि गरि लेति ॥ पीठ-जोरि रूप सुवरन रची, विधि रचि पचि तुच पीठ । कीन्हीं रखवागतहां, व्याली वेणी दीठ ॥ अधर-लिखन चहत रस लीन अव, तुव अधरन' की बात । लेखनि की विधि जीह वैधि, मधुगई ते जात ।' दन्त- मोल लेन को जगत जिय, विधि जौहरी प्रवीन । राखे विट्टम के। उवा, ले.द्विज मुकुत नवीन ॥ रसना-नाव सत स्वर सिधु की, वचन मुक्त की सीप । के रसना सव रसन की, पोथी गिरा समीप ॥ CATE - । .. UAwener - " 2 F १ मुखवास-अगर अतर की नगर में, कह रही नहि चाह ॥ बगर यगर सन डंगर मे, तुव मुख वास प्रवाह ॥ हँसी-सहस महेलिन सो जु तिय, विहसि विहसि वतराति । शरदचन्द की चादनी, मन्द परति सी जाति ॥ कपोलतिल-गोरे मुख पर श्याम तिल, ताहि करा पर नाम । मानी चन्द विचाय के, धैठे शालिगराम ॥ बेसरिमोती-धेसरि मोती धन्य तुहि, को बूझे कुल जाति । पियत रहत तिय अधर को, रमे निधरक दिनराति॥ लोचन-अमी हलाहल मर्द भरे, सेत श्याम रतनार । ।' जियत मरत झुकि झुकि परत, जिहि चितवत इक बार ॥ भृष्टी-भृकुटो कुटिल दिलोकि यो, होत हिये अंनुमान । विनरोदा की है बरी, मानहे मेन कमान ॥ भालविदु-लाल सुवेदी भाल तकि, जग जानी यह रीति । । तेरे शीश प्रतीत के, वसीमीत की प्रीति ।। नीको लसत ललाट पर, टोको जटित जगाय। विहिबढावत रवि मनो, शशि मडल में प्राय ॥ मुसमहत-लर्जत चन्द प्रानन निरखि, विजत सदा अरविंद । मुप सुसमा किहि निधि कहो, हिय जानत गोविद ॥ केश-सटकारे कार सुभग, घुघुनारे सुकुमार। मतवारे रसिफन करत, नेही तिय तुव वार ॥ घेणी-है निय वेणी रावरी, कारी नागिनि कए। भेट इतो वाक टसे, यहि लसि लहर अनूर ।। छप्पय । सरांग-रतन मयी नर नारि रमा सम सुन्दर कहिये। घृघट ह्य धनुष अमिय विप मद चस पश्ये ॥ मुख शशि प्रीया कम्बु सदा सुखदा सुरतस्सी। रम्भासी मुकुमारि चतुर अति धन्वन्तरसी ॥ गज गामिनि धनि लेपिये सुरभी सम शुबि जीता। 'विपण वृथा वारिधि मथ्यो तिय तन मे चौदह रतन ॥ Amसातहत. नासा वाम तरग। . , है . + N - BREAKERGREasa EAR [४] रसरताकर अगदीप्ति-देह दर्भिप्ति छवि गेह की, किहि विधि वरणी जाय । जा लसि चपला गगन तें, छिति पटकत सिर प्राय ॥ गति-चित चाह अवूझ कहें कितने छवि छीनी गयन्दन की टटकी। कवि केते कहे निज बुद्धि, उटै यह लीनी मरालन की मटकी ॥ द्विज देवजू पेसे कुतर्कन में सव की मति योनि फिरे भटकी । वह मन्द चले किन भोरी, भटू पग' लाग्खन की अखिया अटकी॥ सोरह शृगार-प्रथम सकल शुचि मजन अमलबास जावक सुदेस केशपास को सुधारियों । अंग राग भूपण विविध मुख वास राग कजल कलित कलित लोल लोचन निहारिबो ॥ वोलनि हॅसनि चित चातुरी चलनि चारु-पल पल प्रति पतिव्रत प्रति पारियो । केशोदास सविलास कहत प्रवीनराय यहि विधि सोगह सिगारह सिंगारियो । शुचिता शील सनेह गति, चितवन वोलनि हॉसि। कच गूथन श्रीवन्त शुभ, भाल तिलक सुख रासि ॥ भाल तिलक सुसरास हगन अजन अति सोहै। वीरी बदन सुदेस चिबुक ममान मन मोहै । या विधि मिहदी अग राग भगवत मन रुचिता । ये सोरह 'सिगार मुख्य तामें वर शुचिता ॥ वारह भूपण-नूपुर विछिया किंकिणी, नीची वन्धन सोय । कर मुंदरी ककण वलय, बाजूवद भुज दोय ॥ वाजूवद भुज दोय कठ श्री दुलरी राजे। नासा बेसर सुभग श्रवण ताटक विराजे ॥ भगवत बेंदा भाल माग मोती गुह ऊपर । द्वादश भूपण अग नित्य प्यारी पग नूपुर ॥ द्वितीय कर्म शिक्षा। सखि बिलास सिख देन को, शिक्षा कह कवि मोर । मुख जनि खोले तू सखी, लेहै घेर चकोर ॥ यथा- वहत लाज बुडत सुमन, भ्रमत नैन तिहि ठाव । नेह नदी की धार मे, तृन दीजियो पाच-॥ रे + + t

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हताय कम उपालम्भ ।
उपालम्भ दम्पति विषय, सखि जु उरहनो देय ।
अबला-पै चल करत हो, हैकर पुरुप अजेय ॥ यथा-
कौन भांति श्राये निरखि, तुम तिहिं नन्दकिशोर ।
भरभराति भामिनि परी, घनघराति घन घोर ॥
चतुर्थ कर्म परिहास।
सोइ कृत्य परिहास लिय, जासों होय निहाल ।
पिय पगरी सखि सिर धरै, आइ सामुहे बाल ॥ यथा-
को तेरो यह सावरो, यों भयो मषि प्राय ।
मुख तें कही न पात कछु, रही सुमुखि मुख नाय ॥
दूती।
जतन करहि सुविचार, जो तिय पिय संयोग हित ।
नाम कियो निरधार, तिहि को दूती सुकवि जन ।।
इक मृदु कछु मृदु दूसरी, कुपित तीमरी बैन ।
बोलहि यासों तीन विधि, फिय दृती पति ऐन ।।
एक उत्तपा दूसरी, दुती मध्यम होत ।
अधमा तीजी काज सों, वरणत कधि के गीत ।।
* उत्तमा दूती।
दृती बरहित वचन कहि, दम्पति देय मिलाय ।
दामिनि धन सों मिलत अलि, तपिय सों मिल जाया यथा
काहि कलिन्द्री के निकट, निरखि प्राय हो जाहि ।
आई खेलन फाग पह, तुमही मो चित चाहि ॥
मध्यमा दूती।
मध्यम दूती हित अहित, कहत मिखाई पात ।
रूप चांदनी चार दिन, फेर अधेरी रात । यथा-
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[६६ ] rwww nenterimenternam रंसरत्नाकर। अधमा दुती ।। अधपा दूती साधती, 'कुपित वचन कह काज] री चकोर मरिहै कहाँ? जोन उये 'द्विजराज ।। दूती को। - बिनती नुति निंदा विरह, अरु प्रबोध संयोग। इक इक दूती के कहे, -पट कारज कवि लोग | उत्तमा, विनय-विनय सोइ जहें विनय किय, है दुती को काज ।। मन जिनको तुम हर चुकी, सो आये ब्रजराज ॥ मध्यमा विनय-जाहि वचायो मेह ते, कारि गिरवर की छोहि.। ताहि श्याम जिन जारियो, विरहानल झरि मांहि ॥ अधमा विनय-जो न मानहो लाल तो, फिर काा परी वलाय । स्वइ भोजन रूखे करहि, जिहि गोरस ढरकाय ॥ नुति (स्तुति) अस्तुति सौ अस्तुति किये, करै दूतिका कोम । तो.तन छवि अलि दामिनी, हरि तन सम घनश्याम ॥ उत्तमा स्तुति-तिनके रूप अनूप की, किहि विधि कहिये वात । जिन मोहन छवि मन धरे, मन मोह्यो सो जात ॥ मध्यमा स्तुति-निज तेन जल शायी कहनि, करि समुद्र प्रागार । तिन को मन पावत नहीं, तुव तन पानिप पार ॥ , अधमा स्तुति-कसकि कमकि पूछत कहा, चसकि ममकि अनुमान । खसकि जायगो ठेसकि यह, नेक ससकि सुन कान ॥ 2 निन्दा।। निन्दा सों दूती करत, सोई निन्दा काम । गोरी भोरी याल कह, क चलांक तुम श्याम।। । निन्दा-आउ डरहु जनि देखिक, फाग रची व्रजवाल । को कमरी पै डारिहै । केसर रंग नंदलाल ॥ กะกะ . -

मिलन चहत यह रूपसी, राधाजू के साथ ॥
अधमा निन्दा-कहा आपने रूप की, करत बडाई हाल ।
तोह ते अति प्रागरी, नगर नागरी बाल ॥
विरह निवेदन।-
विरह कथन तिय पिय विरह, दूती कह समुझाय ।
नेह नीर विन बाम वह, क्यों जीवे यदुराय ॥
पापुस मे हमको तुमको लखि जो मन पावत सो करती है।
वाते चवाव भरी सुनिकै रिस लागत पे चुप द्वै 'रहती है ।
ये घरहाई लुगाइ सवै निसि घोस नेघाज स्मै दहती है।
प्रान पियारे तिहारे लिये सिगरे व्रज को हँसियो सहती है।
उत्तमा-जव ते आई तडितलों, नीलाम्बर में कोधि ।
तव ते हरि चकित भये, लगी चसनि चकचौधि ।
मध्यमा-कहा कहो चाकी दशा, जब खग वोलत राति ।
पीय सुनतिही जियति है, कहा सुनति मरि जाति ॥
अधमा-मोहि कहो कहिये उतै, बनमाली को पाय ।
नवल पोलिसी वाल चा, टिन प्रति सूसी जाय ॥
प्रयोग।
वह प्रवोध किय वोध हो, दूती कृत निरधार ।
हे हरि हरे नवाइयो, बाल चम्प की डार ॥
उत्तमा प्रवोध-प्रव कीजे अनयास यह, चन्यो न्योत अनयास ।
तेरे मीतर कन्त के, दोऊ अटा सुपास।
मध्यमा प्रबोध-हरि चिंता नहिं कीजिये, अपने मन में ल्याइ ।
या होरी के खेल में, गोरी मिलि है प्राय ॥
अधमा प्रयोध-के गुमान गुण रूप के, ते न ठान गुन मान ।
मनमोहन चित चढि रही, तोसी किती न पान ॥
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- - , Area 6 [६८] रसरताकर। उत्तमा सघट्टन-गोरी और गुपाल कों, होरी के मिस ल्याय। विजन सांकरी खोरि मे, दोऊ दिये मिलाय ॥ मध्यमा संघट्टन-रमनी रमन मिलाय यो, दूती रहति वराय । घन दामिनि को जोरिकै, ज्यौ समीर.रहि आय: अधमा संघट्टन-छल सो वल सो रावरे, किहु विधि ल्याइ मनाय । मिलो बेगि चलि नतरु फिर, जाने मोरि वलाय ॥ स्वयं दूतिका। स्वयं दूतिका दूतपन, करहि जु अपने काज । मग 'दुर्गम कारी निशा, पथिक वसहु इत आज । यथा- मोही सो किन भेट ले, जौलौं मिते न वाम । शीत भीत तेरो हियो, मेरो हियो हमाम || . -- - अथ उद्दीपन विभावांतर्गत षट् ऋतु वर्णन । गर्मी वर्षा और शीत के क्रमानुसार प्रत्येक वर्ष के के-विभाग होते है जिन्हें ऋतु कहते है । यथा वारा महीने और पड्ऋतु- चैत विशाख वसतहि जानो, जेठ असाढ जु ग्रीषम मानी। सावन भादो वरपा होई, क्वार कारतिक, शरदउँ सोई ॥ अगहन पूस हिमन्त कहीजे, माघ फाल्गुन शिशिर गनीजे। गर्मी वा जाडो होर्ड, चौ चो,मास केर पुनि माई ॥ (१) बसन्त (ऋतुराज) मास चैत्र और वैशाख (२) ग्रीपम (गर्मी) जेठ और अपाढ (३) वर्षा (पावस) श्रावण और भाद्रपद (४) शरद श्राश्विन और कारतिक (४) हेमन्त मार्गशीर्ष और पौष (६) शिशिर माघ ओर फाल्गुन ए " वसंत ऋतु। कि उठीं कोकिलाने गुजि उठी और मीर डोलि उठे सौरभ सरसायने । फुलि उठीं लतिकाह लौंगन को लोनी सोनी भूमि Miss - । उठा डालिया कदम्ब सरसाचने ॥ चहकि चकोर उठे कीर करि सोर उठे ररि उठी सारिका विनोद उपजायने । चटकि गुलाब उठे लटकि सरोज पुर्ज खटाकि मराल रितुराज सुनि भाग्ने । अनि ते अम्बर ते गुमनि दिगम्बर ते अपर अडम्मर ते सखि सरसो परै। काफिला की कूकन ते हियन की हकन ते अतन भभूकन ते तन तरसो परै । कहत किशोर कज पुजन ते कुजून ते मंजु अलि पुजन ते देखो दरसो परे । वसन त वासन ते सुमन सुगासन ते वैहर ते 'वन ते वसन्त वरसा परें कुलन में केलि में कछाग्न में कुजन में क्यारिन में कलित कलीन किलकल है। कई पदमाकर परागह में पोन में पातिन मे पोकुन पलासन पगन्त है । द्वार में दिसान में दुनी में देस देसन मे देखो दीप दीपन में दीपति दिगन्त है ।-वीथिन में व्रज में नलिन में बलिन में बनन में यागन में गोवसन्त है। मिलि माधवी आदिक फूल के व्याज विनोदलवा बरसायो करें। 'रचि नाच लतागन तानि वितान सवै विधि चित्त चुरायो करें। द्विज देव जु देखि अनोसी प्रभा अलि चारन फीरति गायो करें। 'चिरजीवी बसन्त सदा द्विज देव प्रसूनन की झरि लायो करें । मंदमाती रसाल की डारन पै चढि आनंद मो यो विराजति है कुल जानकी कान करें न कडू मन राय परायहि पारति है । फोऊ फेसी करै द्विज तुहि कई नहि नेकौ दया उर धारति है। अरि फेलिया कूक करे जन की किरच किरचें किये डारति है। इहि मधु ऋतु मे कौन के, 'यढत न मोद अनन्त ।। । - 1 Ah . . Erwardresear [ ७०] रसरताकर। डरो ना अहीरन सो मंतर अवीरन सो चार जनी चार बार पोरन ते धावोरी। एक हाथ प्रोडो पिचकारी की अपार मार एक हाथ, नोट चोट आखिन बचावारी । कवि सरदार पायो बडो खेलवार ताहि खेल को सयाद ग्रेग अंगन बंतावारी । कीरति कुमारी कहै हेरि के। कुमारि कोऊ हौरी गुनवारी वनवारी वांधि लावोरी॥ । एकै सग हाल नॅटलाल औ' गुलाब दोऊ गर्न गये ते भरि आनद मढ़े नहीं । धोय पोय हारी पदमाकर तिहारी मौह अवतो उपाय एको चित्त में चहै नहीं ॥ कैसी करौं कहा जाऊ कासो कहौ कौन सुने कोऊ तो निकासों जासों दरद वटै नहीं। ऐरी मेरी वीर जैसे तैसे इन प्राखिन ते कदिगो अबीर पै अहीर'को कदै नहीं ॥ उतते कन्हाई लरिकाई सखा लीन्हें संग करि चतुराई केलि होगे, की मचाई है । इत वृपभान की कुमारी सुकुमारी प्यारी प्रालीगर्न पाली में रसाली सी सुहाई है.॥ लालन गुलालन की लालन पै. डारें मडि चले पिचकारी.सुसकारी दुहुँ घाई है। केसर सुरगसाने नेह सरसाने डारै मानो वरसाने वरसाने झरि लाई है ॥ मेला झेल झोरिन की मूठिन की मेला मेल रेला रेल व की उमग सरसत है । कहै पदमाकर गवैयन की पेल परी गैल गैल फैल फैल फाग परसत है। धृम धधकोयनकी धधकी वजत तामें ऐसो अति ऊधम अनोखो दरसत है । ग्वाल पर ग्वाल तेहि ग्वाल पर नन्दलाल लान, नन्दलाल पै गुलाल वरसत है ॥ ऐसी न देखी सुनी सजनीधिनि वाढति जाति वियोग की बाधा। त्यो पदमाकर मोहन को तव ते कलहै न कछु पल प्राधा ॥ लाल गुलाल घलाधलि में हग ठोकर दे गई रूप अगाधा । कैगई कैगई चेटक सी मन गई लैंगई लैंगई राधा ॥ भाल पै लाल गुलाम गुलाल सो गरि गरे गजरी अलबेलो। यो पनि बानिक सो पदमाकर आये जुनेलन फाग तो खेलो पै इक या छवि देसिने के लिये मो विनती,कै न झोरिन मेलो ।। रावरे,रग रँगी अतिमान में ए वलवीर अवीर म मेलो ॥ रस मिजये दोऊ दुहुँन, तांटिक रहे नरैन । रवि सों हिरकत प्रेम रंग, भरि पिचकारी नैन । F . . LJ , ग्रीष्म ऋतु। जीवन को पास कर वाला को प्रकास कर मोरही ते भास फर प्राममान आयो है । धमक धमक धूप सूखत तलाय कूप पौन को न गोन भान प्रागि म तचायो है ॥ तकि थफि रहे अकि सकल विहाल हाल प्रीपम अचर चरपचर सतायो है। मेरे ज्ञान काहू वृषभान जग मोचन का तीसरे त्रिलोचन को लोचन खुलायो है H , वेठि रही अति सघन वन, पैदि सदन मन मांह । निरखि दुपहरी जेठ फी काही चाहत शाह ।। पावस (वर्षा) भातु। चातक चिहुक मत मुरवा कुहुक मत भिंगुर झिहुक मत भेकी मन नाय मत | चकया चिकार मते पपिहा पुकार मत घुन्द झर धार मत धार धहराय मत ॥ कृष्णलाल गाय मत पीर उपजाय मत यालम विदेस पाय मैन तन ताय मते । पौन फहराय मत चपला चवाय मत धाय मत धुरवा औ धन घहराय मत ॥ पाई ऋतु पावम न प्राय प्राण प्यारे यात मेघन वरज पाली गरजन लावना । दादुर हटाकि बकि पकिक न फोरै कान पिकन पटकि मोहि सवट सुनावैना ॥ विरह विथाते हो तो ध्याकुल भई हो देव चपला चमाफि चित चिनगी उड़ायैना । चातक न गानें मोर सोर न मचावै धन धुमदिन छावे जोलो लाल,घर आना । कंधो वही देश जहुँ प्रीतम पियारे धर्मं घोर घटा नहि मि मि धहराव है। कौं चमफत नहिं चपला च₹ धा. तहा कधौना सुरेश कयौं युन्द झर लाये है ॥ फैधौं काम कुटिल न न्यौपत करैजे कधो कोऊ नहीं मेध औ मेलार राग गायें है । कैयौं लाल पायस की रात में पपीहा पापी बार बार पीपी कर कूकना सुना है ॥ कर कागद लेकै दियोगिनि नारि लिखे मि प्रीतम को पतिया। - यहि पानस मे परदेम छये वलिहारि तुम्हारी सिजा छतियां ॥ सनिया पिय'मग हिंडोरे चढी कहें गीत मेगर्व भरी बतिया । प्रतिकारी डरावनी सापिनसी माहि साजत सावन की रतिया ।। । .

reme INTree [७२] रसरलाकर। ता समैं मोहन के ग दुरित आतुर रूप की भीख यो पावै । पौन मया करि घूघट टार दया करि दामिनी दीप दिखावै ॥ पावसाचन अधियार मे, रहो भेद नहिं मान । राति घांस जान्यो परे, लखि चकई चकवान ।।- J है - - . अथ पावस तु अन्तर्गत हिंडोरा। भौरन को गुजियो विहार बन कुजन में मजुल मलारन का गावनो लगत है । कहै पदमाकर गुमानह मे मानह में प्राणहत प्यारो मन भावनो लगत है ॥ मोरन को सौर घनघोर चहुँ पोरन हिडोग्न को, वृन्द छथि, छारनो लगत है। नेह सरसावन में 'मेह वरसावन मे सायन मे भूलियो सुहावन लगता है । सावन तीज सुहावन को सजि सोहें दुकुल सबै सुख साधा।। त्यो पदमाकर देखे वनै कहते न वनै अनुराग अगाधा-II, । प्रेम के हेम हिंडोरन मे सरस बरसें रम ग्ग अगाधा। - राधिका के हिय भूलत साबरो सावरे के हिय मुलत राधा.., हेरि हिंडारे गगन त, परी परीसो टूटि। घरी धाय प्रिय वीचही, करी खरी,ग्स बूटि ॥ : ( " ! शरद ऋतु। भूएयो गति मति चन्चलत न एक पैड प्यारे मुरलीधर मधुर कल गाम की । फली कुसुमावलि- विविध नव कुजन में सोरभ सुगधताई। जात ना वखान की | बाजत मृदग ताल झाझ मुरचगावीन, उठत संगीत जहा अति गति तान की । प्राज रस रास में अनूप रूप दोऊ न. नन्द- लाल लाडिलो किशोरी वृषभान की। । खनकाचुर्गन की त्यो ठनक मृदगन की रनुक मुनुक सुर नूपुर के जाल को। कह पदमकार, त्यो वासुरी की धुनि मिलि रहो बंधि सास सनाको एक साल को ॥ देखत बनत पे न कहत धनैरी कछू विविध त्यो हुलास यह ख्याल को । चन्द रवि रास चांदनी को परगास को मन्द हास रासमडल गोपाल को। 4 17" 1.

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तालन पे ताल पैतमालन पै मालन पै वृन्दावन वीथिन बहार
सी वटपै । कह पदमाकर असण्ड रास मण्डल पै मरिडत उमण्डि महा
लिन्दी के तटपै । हितिपर छानपर छाजत छतानपर ललित लतानपर
डिली के लट पै। आई भले छाई यह शरद जुन्हाई जिहि पाई छवि
जुही कन्हाई के मुकुट पै॥
पोडस हजार पाल पोडश श्गार साजि पोड़श वरस वैस मुदिर
हार है । वाहुन सों वाहु जोरि मोरि मोरि भगन सो कीन्हों महा मडल
खडल अपार है । कहै नदाम तैसे तार औसितार मिलि चुरी खनकार
र पञ्चम उचार है। झूलत दिशान विदिशान आसमान ह लौ छम छम
ई घुघरू फी झनकार है।
सीत समै परदेस को पीया पयान सुन्यों घट रोवन लोगी।
या रितु मे हरि क्योह रहै घर देवता प्रजि मनावन लागी॥
और उपाय तस्यो न कछू तव माजि के चीन वजावन लागी ।
प्यारी प्रवीण भरे स्वर मेघ मलरि अलापि के गावन लागी ।
'हेमन्त ऋतु।
परसें तुसार यह सीतल समीर नीर कम्पमान उर क्योंटू धी
। धरत है। राति न सिराति सरंसाति व्यथा विरह की मदन राति
र जीवन करत है । सेनापति स्याम हौ अधीन हो तिहारी सोह मिले
बेन मिले सीत पार न सरत है । और की कहा है सविताह सीत रित
पनि सीत को सतायो धन रासि मे रहत है ।
सुन्दर मदिर अन्दर में वहु वन्दनवार वितान अडोले ।
है परदा मखतूलन के तिहि मूल विछी गिलमे गुल गोले ॥
बलभ दीपत दीपत है मनि त्यों सुक सारिका के गन वाले।
परी हिमन्त में राधिका श्याम करै बहु रग उमग कलोले ।
आवत जात न जानियत, तेजहि तजि सियरान ।
घरहि जमाई लोधस्यो, खम्यो प्रेस दिनमान,।'
।
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1 - [७४] रसरत्नाकर। कसाला तिन्हें जिनके अधीन ऐते उदित मसाला है। ताक तुक ताल हैं विनोद के रसाला है सुवाला है दुशालाहे विशाला चित्रसाला है । लगत सुभग शीतल किरण, निशि सुख दिन अवगाह। माघ शशी भ्रम सूर त्यों, रहति चकोरी चाहि ॥ पवन। पवन तीन विधि जानिये, शीतल मंद सुगंध । पवन तीन प्रकार की होती हैं, अर्थात् (१) शीतल, (२) मद (३) सुगन्ध । शीतल। अम्बु परसिकर वहति जो, सोई शीतक पौन । जल स्पर्श करती हुई जो पवन चलती है उसे शीतल पवन कहते हैं। मन्द । बहै रुकै पुनि बहि चकै, सो है मन्द समीर । ठहर ठहर कर धीमी गति से चलने वाली पवन को मन्द पवन कहते हैं। सुगन्ध। कुसुप परसिकै चळति जो, तौन सुगन्धित पौन । वन । स्वाभाविक बहु वृतयुत, वन भाषत कवि वृन्द । उपवन। कृत्रिम वन उपवन अहै, जाहि कहत आराम । चन्द्रा शशि उपमा जउ तिय बदन, तउ विरहिनि दुख देत । चांदनी, पुष्प, पराग । चांदनि पुष्प पराग में, उद्दीपन परतच्छ । । (1 2303VAve - इति उद्दीपा विभाव चौथा भाग समाप्त ।।

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-
रसरताकर।
[७]
अनुभाव (कार्य)।
जिनही ते रति भाव को, चित में अनुभव होत ।
ते अनुभाव सिंगार के, वरणत है कवि गोत ।।
सात्विकभाव स्वभाव धृत, आनंद अंग विकास ।
इनहीं तें रतिभाव फो, परकट होत विलास ।।
भा-जिन क्रियाओं से रसास्वाद का अनुभव अर्थात् अनुमान
हो उनको अनुमान कहते हैं। इसके तीन भेद है, १ सात्विक, कायिक
३ मानसिक।
१ सात्विमनुभाव ।
सहहिं अंग विकार कह, सात्विक भाव बखान ।
ताके पुनि नव भेद गुनि, चरणत है मतिमान ।।
भा०-शरीर के सहज अग विकार को सात्विक भाव कहते है,
सके ६ भेद ये हैं।
स्तम्भ स्खेद रोमांच कहि, बहुरि कहत स्वर भंग ।
कम्प बरणि वैवये पुनि, आंम प्रलय मसंग॥
अन्तरगत अनुभाव में, आठहु सात्विक भाव ।
जुम्भा नवम चखानहीं, कोऊ कवि सतभाव ।।
भा०-१ स्तम्भ २ स्वेद ३ रोमाच ४ स्वरभंग ५ कम्प६ विवर्ण
७ अश्रु ८ प्रलय और जृम्भा।.
(स्तम्भ)
हरप लाज भय आदि तें, 'अग यकित अस्तम्भ ।
पियहिं निरखि तिय धकि रही, भूलि पान अरु दम्भ।
भा०-हर्प, लाज, भय, श्रम और व्याधि इत्यादि कारणों से
मम्पूर्ण अवयनों (अगो) की गति के अयरोध (थकित) हो जाने को स्तम
कहते हैं। यथा-
तीन सर्च गई मिटी कलकानि कैसो

. + -- 11 [७६ ] रसरत्नाकर पेसी नेह को उपरिवोचित कैसे लिसि-दोउ ठाढे रहे " काशीराम नाहीं परवाह लोग लाख करो'लरिवो। वसी को बडवो नद्र नागर। विसरि गयो नागरी विसरि गई गागरी को भरिवों। तु० राक-गहि जनु कुंवरि चित्र प्रवरेसी । भये विलोचन चार अचचल ॥! th,' (स्वेद) : रोप लाज हादि तें, अंग सलिल स्वइ स्वेद। श्रम. सीकर मुख कमल में, लाज हर्प संभेद ॥ भा०-रोप अर्थात् क्रोध, लाज,भय, हर्षादि से अग प्रत्यग में जल (पसीना) प्रकाशित (झलक) होने को स्वेद कहते है। (बोझ उठाने वा लादने से जो पसीना निकले उससे सम्बन्ध नहीं) तु० रा०-श्रम विदु मुरा राजीव लोचन अरुण तन श्रोनित, कनी । (रोमांच) शीत भीति हर्षादि तें, रोमाचित है.जात । उठे अंकुरे प्रेम के, पुलकित गात अन्हात ॥ भा०-शीत, भय और हर्षादि के कारण शरीर मे रोम उठ पाने को रोमाचं कहते है । यथा-- कैधौ डरी तू खरी जल जन्तु ते के अंग भार सिंवार भयो है । के नख ते सिख लो पदमाकर जाहिरै झार गार भयो, है ।। कैधो कछु तोहिं शीत विकार है ताहि को या उदगार'भया है। कैधौ सुवारि विहारहि मे तनु तेरो कदम्ब को हार भयो है ॥ “पुलकितगात अन्हात यो, अरी खरी छवि देता। उठे अकुरे प्रेम के, मनहुँ हेम के खेत ॥ तु० रा--श्यामलगात रोम भये ठाढे (स्वरभंग) हरप भीति मद क्रोध ते, जहां होत स्वर भंग । सूधे बचन न, कहि सके, कामिनि पुलफित, अंग ।। - - - - 1 . । T - -- -- - " - - मा० हप, भय, मद ओर प्राधादि से स्वाभाविक वाक्य ध्वनिका पर्यय होमा (बदल जाना) सरभग कहलाता है। यथा- तु० रा०-पुलकित तउ मुस भाव न बचना । कप (वेपथु) हरप कोप भ्रम, भय सहित, जहँ कंपित सब गात । अव वहि किमि प्राण ये, विरह अनल ते तात ।। भा०-हर्ष, क्रोध, भ्रम, भय आदि के कारण अकस्मात् शरीरा- चलायमान (थरथराने) को कप कहने है । यथा- तु० रा०-थर थर कपहिं पुर नर नारी। (वैवर्ण्य) भय क्रोधादिक तें जहा, हो पिवर्ण्य गत्ति चैन । श्रीहत भूपति भे सवै, धनुप भग लखि नैन । मा० मोह, क्रोध और भय प्रादि से शरीर की काति के परि रको धैवर्य कहते है । यया कहिन,सफत कछु,लाज ,तें, अकथ श्रापनी यात । ज्यों ज्यों निशि नियरात है, त्यो त्यो तिय पिय रात jj तु०रा०-श्रीहत भये भूप वनु टूटे। (अ) हर्प शोफ भय श्रादि ते, अनु चलत ठहरैन ) : तासु दशा देसी सखिन, पुलकगात जल नैन । o-हर्ष, क्रोध, शोक, भयादि के कारण नेत्रो से जल प्रचार ट भा. अथ कहते है। (प्रलय), तन मन की न संभार जह, सोई मलय कहात । फैकेई के वचन सुनि, शिथिल भूप के गात ।। भा-किनी विषय या रिसी वस्तु में तन्मय होकर तन मन फो .

कहते हैं। यथा---ग्रीदा करते समय धीरामाने नायिका , [ wwservUAR पेर metene क्षण में बदन उभारने को जृम्भी कहते है । यथा-- दरदर दौरति सदन दुति, सम सुगन्ध सरनानि । लखत क्यो न प्रालस-भरी, परी तिया मुरझाति !, तन की कृत्रिम, चेष्टा, सो कायिक अनुभाव। पिय को केश बताय तिय, इंगित किय निसि आर भा०-याख, भौह, हाथ प्रादि अगों द्वारा जो चेष्टा की। (मे बैठी हुई नायिका ने अपने काले केश दिखलाकर यह शिरा है, उन्हें कायिक अनुभाव कहते हैं। यथा-नायक को देखकर . कि रात को आव-इसी को वोधक क्रिया कहते है। यथा- श्याम सैन तिय नेन तकि, निसरि भार ते प्राय) अधर शांगुरी धरि चली, चित की चाह विताय मन संभव मोदादि कहँ, काहिय मानसिक भाई। छळा छोनि तोयो इरा, तक मिलन को चाप भा०-मन एन प्रमोदादिक अनुमाव का मामगि iierenERS [७] रसरत्नाकर। किसी भई है 'दसा हुनकी ? तुमहू तो कहौ सत्र में महती हो। मोहन तौ मथुरा को गये भट्ट कोन उपाय करे गहती हौ । गोकुल ध्यान धुनी में धसो,अब ताहि कहाँ किन क्या लहा राधे कहे कछु ऊतरु देति न कान्ह कहे कहै का कहनी हो ।' तु० रा० केहरि कटि पट पीतधर, सुखमा शील निधान । । देखि भानुकुल भूपणह, विसरा सखिन अपान । 'व्याकुल राउ शिथिल सब गाता ! ... (नृम्भा) पिय वियोग सम्मोह में, आलस (जुम्भा) आय! .. लरिका श्रमित उनींदबस, शयन कराबहु जाय ॥ भा०-पिय विछोह (वियोग) वा मोह श्रालस्य के कारण २ कायिकानुभाव। अस कहि पुनि चितये तिहि मारा। ३ मानसिकानुभाव । WWagerssNNAGAR srcheme L " J im A 1 . रसरत्नाकर [७]8 ल्ला छीन लिया ओर-मोतियों का हार भी तोड़ डाला तोभी उसके दय मे मिलने की उत्कठा वनी ही है । गोरस को लूटिवो न छोरिवो, छरा को गनै दुटिवो गनै न कह रोतिन के माल'को । कहै पदमाकर गुवालिनि गुनीली हेरि हरखे हॅसेयो रें झूठे मुंठे ख्याल को हां करति ना करति नेह की निशा करति जाकरी गली में रग राखति रसाल को। दीवो दधि दान को मुकैसे ताहि भावत है जाहि मन भायो झार झगरो गुपाल को॥ शरद पूर्णिमा यमुन तट, राम रच्यो नन्दलाल । मोद अलोकिक की छटा, इक जानत ब्रजवाल ॥ देखि सिया शोमा सुस पावा ॥ कायिक तथा मासिक अनुभावान्तर्गत । द्वादशहाव ।- अनुभारहिं में जानिये, लीलादिक जे हाव । ते संयोग शृगार में, वरणहिं सब कवि राय ॥ मगट स्वभाव तियान के, निज सिंगार के काज । हाव जानिये ते सर्व, यो भापत कविराज ।। लीला विहन विलास पुनि, ललित विच्छिती जान । विभ्रम किल किंचित वहुरि, हाव कुदृमित मान ।। विन्बोकर मोटाइनई, है दस हाच प्रसिद्ध । हेला वोधक हावहू, फहत जु हैं रस सिद्ध ।। भाषाभूपण में दस हाच वर्णन किये है, अन्य प्रन्यों में दो हार मोर मिलते हैं । यथा-भाषाभूपण प्रिय प्यारी रति सुख फरै लीलाहाव सुजानि । बोलि सकै नहिं लाजत, विहृत डाव वग्वानि ॥ चितवनि बोलनि चलनि में, रस की रीति रिलीस । । . - - w 7 [८०] रसरताकर। .6 विच्छिति काहू बेर में, भूपण अलप सुदाय । रस सों भूपण भूलिक, पहिरे विभ्रम हाय ॥ क्रोध हर्प अभिकाप भय, किल किंचित्र में होय । प्रगट करै दुख सुख समै, हाव कुंट्टमित सोय ॥ प्रगट करै रिस पीय सों, बात न भावै कान । आये आदर ना करै, धरि विव्योक गुमान ॥ पिय की वातन मैं चले, तिय अँगराइ ज॑भाय । मोइत सो जानिये, कहैं महा कविराय ।। • हेलोहू सभोग में, जहें हो विविध विलास । वोधक इंगित कोउ कहै, सो कायिक में भास ।। अब इनके लक्षण और उदाहरण पृथक पृथक लिखते हैं- (१) लीलाहाव। लीला भूपण बसन.सजि, इक के एक विसाल । कृष्ण वने श्री राधिका, राधे श्री नंदलाल ।। यथा- ये इत घृघट घालि चलें उत वाजत वासुरी की धुनि खोलें। त्यो पदमाकर ये इतै गोरस लै निकसे थो चुकायत मोलें ॥ प्रेम के पथ सु प्रीति की पैठ में पैठत ही है , दशा यह जोलें। राधामई भई श्याम की सुरति श्याम मई भई राधिका डोलै ॥ तिय बैठी पिय को पहिरि, भूपण वसन विशाल । समुझि परत नहिं संखिन को, को तिय को नंदलाल ॥ सूचना-लीलाहाव और आहार्य मे थोडाही अन्तर है, जहां प्रिया और प्रीतम दोनो एक साथही रूप पलटते हैं वहा लीलाहाव जानिये और जहां उनमे से केवल एकही रूप पलटे वहा आहार्य हान जानिये कतिपय कवियो ने आहार्य को अनुभाव का एक उपमेद माना है। यथा- गुच्छा विच विच कुसुम कली के। , ." Here Bre

आहार्य का उदाहरण ।
श्याम रग धारि पुनि वांसुरी'सुधारि कर पीत पट पारि वाणी
सुनावेगी । जरकसी पाग नुराग भरे शीश वाधि कुडेल किरीटा
निदरसावेगी। याही हेत सरी प्ररी हेरति रौ वाट पाकी केयो
पह को श्रीधर भुरावेगी। सफल समाज पहिचानेगी न केह भाति
वह बाल ब्रजराज पनि आवेगी ।।-
-
(२) विहृतहाय।
विहृत पिया के मिलतहू, बालति नहि बस लाज ।'
लाज वसहिं चुप है रही, मिलत आज व्रजगज ।। यथा-
सीस कहै परि पाय रहौं, भुज यो कह अक तें जानन दीजै ।
जीह कई वतियांहि फियो करों, धौन कह उनही की सुनी।
नैन कह छवि सिधु सुधारम हो, निसि वासर पान करीजे ।
पायहु प्रीतम,चित्तन चेन, यौँ भारतो एक कहा कहा - कीजै॥
(३) गिलास।
रिमारती पिच भावती, करि करि विरिष विलास.।
मनमोहन मनहरण को, मंद मंद किय' हास ।। यथा-
समुझि श्याम को मामुहै, करत वार वगार।
मनमोहन मन हरण को, लगी करन शृगार ॥
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Annier - - - [२] रसरताकर। (५) विच्छिति। विच्छिनि थोरइ वनक में तरुणि महाँ छवि देत ।' एकहि मृग मद बिंदु सों, मन हरि को हरि लेता। यथा- बंदी भाल तमोल मुख, सीस सिलसिलेवार । दृग प्रांजे राजेश्वरी, साजे सहन सिंगार ।। (६) विभ्रमहाव। विभ्रम भूपण भूलि कै, उलट पलट कहुँ धार । पहिरि कंठ विच किंकिणी, कस्यो कमर विच हार। दूवाह श्री रघुनाथ बचे दुलही सिय मुन्दर मदिर माहीं। गावति गीत सवै मिलि सुन्दर वेद युवा जुरि विप्र पदाहीं ॥ राम को रूप निहारत जानकी ककण के नग की परवाहीं। याते सबै सुधि भूलि गई कर टेकि रही पल टारति नाहीं ॥ (७) किलकिंचित । रोप हास भय रस इकत, सो किलकिंचित रीति । चड़त भौह धरकत हियो, इसति जनावति प्रीति ।। (८) कुट्टमितहाव । मिथ्या रोंप जनावती, सो कुट्टमित कहात ।' करि करि नाहीं थक रही, पिया न मानी बात ॥ कर ऐंचत आवत इची, तिय आपुहि पिय ओर । भूठिहुं रूसि रहै छिनक, छुवत छरा को छोर ।। (8) विव्चोकहाव। विव्योकहि निज पीय को, करै निरादर वाल । मैं चेटी वृषभानु की, तुम अहीर, के लाल ) यथा:- ए अहीर वारे बोसो जोरि कर कोरि कोरि विनय सुनायो बलि वासुरी बजावे जनि । बासुरी बजावै तौ धजाव मो बलाय जाने बड़ी बडी श्रांखिन ते एकटक लावे जनि ॥ लावे है तो लाब टक तोप मोसों कहा काम वेर वेर ठोरि दौरि मेरी पोर आवे जनि। आवे है तो भाव वो कचूल्यो पर मोरे गोरे गात मे तू फारोगात यावे जनि । -- .

01 रसरक्षाकर। [८] दानी भये नये मागत दान हो जानि है कस तो पधन जैहो । होछरा बछगदिक गोधन जो यन है मो सवे धन देही ।। रोफत हो यन में "रसवानि" चलायत हाथ धनो दुन पैहो । जैहै जो भूषण काइ तिया को, तो मोल छला को लला न विकहो।। न्हातई न्हात तिहारई स्याम फलिंगियो स्याम भई वहते है । घोपेटु धोयहो या कह तो यहै रंग सारिन में सरस है ॥ मावरे अंग को रग फडू यह मेरे सु अगन में लगि जैहै । घेत छवीले छुयोगे जो मोहिं तो गातन मेरे गुराई न रहै ।। (१०) मोहायिवहाव । मोटाइत मुनि पिय कथा, मज्जवि अति अनुराग । गनि मूदि मोहित, तिया, भूरि सराहत भाग ।। रूप दुह को दुहन सुन्यो सु रहे तव ते मनो सग सदाहीं। ध्यान में दोऊ दुहन लस हर अंग अग अनग उकाहीं॥ मोहि रहे कवके यों छह पदमाफर और कछु सुधि नाही। मोहन को मन मोहनी में यस्यो मोहनी को मन मोहन माहीं।। चसी करन जय ते सुन्यो, श्याम तिहारो नाम । सुगन मूदि मोहित भई, पुलकि पसीजत वाम ॥ (११) इलाहाव। करत ढिठाई पीय सों, हेला धाव सुधार । पारन विधि हरिहर लहै, तिन सो [यवत बार ॥ के भीर अहीरन त्यो गहि गोविद लै नई भीतर गोरी। भाई करी मनको "पदमाकर" ऊपर नाय प्रवीर की झोरी ॥ छीन पितम्बर कम्मर ते मु विदा दई मीडि कपालन रोरी। नैन नचाइ कही मुसुक्याय लला फिर आइयो खेलन होरी। (१२) बोधकहात्र । बोधकहार फायिकानुभाव ओर किया विदग्या के अन्तर्गत त होता है। इसका वर्णन पहिले हो चुका - ละผม न H - Remierence [४] रसरताकर संचारीभाव। थाई भावन को जिते, अभि मुख रहै सिताब । जे नव रस में संचरै, ते संचारी भाव ॥; थाई भावन में रहस, या विधि प्रगट विलात । ज्यों तरंग दरियाव में, उठि उठि तितहि समात ॥ थिर है थाई भाव तब, परिपूरण रस होत । भिर न रहत रस राज लौं, संचारिन के गोत ॥ थाई संचारीन को, है. इतनोई भेद । ते संचारिन के कहत, तैतिस नाम निवेदः ।। ! भा०-स्थाईभाव मे जो विद्यमान रहते हैं और सम्पूर्ण , नवरसो, में जल की तरग (लहर ) की भाति उत्पन्न हो होकर फिर बिलात अर्थात् उमी में विलीन हो जाते हैं तथा समस्त भावो में जिनका सचार है वेही सचारीमाव कहलाते हैं मोचे लिखे अनुसार वे तेतिस। प्रकार के हैं । ये भाव स्थिर नहीं रहते चचल होते, है (रसराज-पारा) कहि निरवेद, ग्लानि, शका, त्यो प्रसूया, श्रम, मद, धृति, आलस, विपाद, मति, मानिये । चिन्ता, मोह, सुपन, वियोध, स्मृति, अमरख, गर्व, उत्सुकता, सु अवाहित्य, ठानिये ॥ दीनता, हरप, ब्रीडा, उग्रता, सु निद्रा, व्याधि, मरण अपस्मार, आंवेगहु, प्रानिये। श्राम, उन्माद। पुनि जडता, चपलताई तेतिसों वितर्क, नाम याही विधि जानिये ॥ (१) निर्वेद। तिरस्कार संसार सों, सो निर्वेद कहात ! सब तजि अब तौ सेइये, माधव पद जल जात ।। भा०-विपत्ति, ईर्ण अथवा किसी नेद के कारण ज्ञान पैद होने से निज शरीर तथा सासारिक सम्पूर्ण अनित्य पदार्थों का तिर स्कार करना निवेद भाव है। यथा- या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिह पुर को तजि डारों। पाठह सिद्धि नवो निधि को सुख नन्द की गाय चाय विसारौं। - . । - - -

रसरनाकर।
[५]
नैनन सो रस खानि को ग्रज के धन वाग तड़ाग निहारौं ।
फोटिन फलधौत के घाम करील के कुजन ऊपर घारौं ।
भयोन को होइगो, मो समान मति मन्द ।
तजे न अवलों विपय विप, भजे न दशरथ नन्द ॥
तु० रा०-सव परिहरि रघुवीरहि, भजो महिं जेहि सन्त ।
श्व प्रभु रुपा करटु हि भांती।
सर तजि भजन करों दिन राती।
(२) ग्लानि।
आधि व्याधि के दुःख सों, उपज ग्लानि मन माहिं ।
धिक जीवन या जगत में, जहँ एकहु सुत नाहि ।।
भा-प्राधि व्याधि जैसे सुधा, तृपा, अधया रतिश्रमादि के
कारण अग शिथिल होने को ग्लानि कहते हैं, इसकी शिथिलता
विहलता) में स्वरमग तथा कपादिक भी होता है । यथा-
-भई गलानि मोरे सुत नाही।
(३) शंका।
इष्ट हानि दुर्नीति ते, हो मन में अति शक ।
चौय चांद भादों लखे, लगिहै कहू फलक ॥
भा०-निज दुर्नीति तथा मरता अथवा औरही किसी कारण से
इष्ट हानि के शोच को शफा कहते हैं । यथा-
तु० राoशिवाई विलोकि सकेउ मारू।
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"

- - - - ३ , anordvarer [८६ ] रसरत्नाकर। 9 तैसी चेटकनि चेरी.ताके चित्त को चहा कियो। राधिका की कहवत कहि दीजो मोहन सों रसिक शिरोमणि कहायधों कहा कियो। जैसे को,तैसो मिले, तवहीं जुरत सनेह । ज्यों जिभग तन श्याम को, कुटिल कूवरी देह ॥ तु० रा०-तव सिय देखि भूप अभिलाखे, कर कपूत मुद मन माखे । (५) श्रम । अति गति ते जब काहु के, "होवै 'श्रमं गंभौर । द्वन्द युद्ध देखहु संकल, श्रमित भये अति बीर ।। । भा०-मार्ग क्रमणादि परिश्रम जन्य थकावट से स्वेदादि निकल पुनः तत्कार्य की अनिच्छा को श्रम कहते हैं । यथा, पुर तें निकसी रघुवीर पधू धरि धीर दिये मग मे डग है। झलकी भरि भालकनी जल की पटु सूखि गये अधराधरवै ॥ फिर वूझति है चलनोऽव कितो पिय पर्ण कुटी करिहौ कित है। तिय की लखि पातुरता पियकी अखिया अति, चारुचली जलच्वै॥ श्रमित भूप निद्रा प्रति आई। थके नयन रघुपति छवि देखी। (६) मद। मद उपजै धन रूप ते; के यौवन मंद पान । नहीं भाजु ससार में, योधा मोहि समान ॥ भा०-धन, यौवन, स्वरूप तथा मदिरादि सेवन मे मद उत्पन होकर असगत'वाक्यो का कहना तथा अनुचित वर्ताव करना मद कहलाता है । यथा- धन मद यौवन मद महा, प्रभुता को मद पाय । तापर मद को मद जिन्हें, को त्यहि सके सिखाय ।। जग जोधा को मोहि समाना। रए मद मत्त निशाचर उर्पा । (७) धृति। धृति साहस अरु ज्ञान ते, उपजत हिय महँ आय । एक दिना नहिं एक दिन, दिन, फेरहिं रघुगय ।। Punene - - तु० रा-

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रसरत्नाकर। उपाय एको चिचचदै नहीं। कैसी करौं कहां जाऊं कासों कहीं कौन सुन कोऊ तो निकासौ आसो दरद बढ़े नहीं। येरी मेरी बीर जैसे तैसे इन प्रांखिनतें कदिगो प्रवीर पे अहीर को कढ़े नहीं। तु० रा राम राम रट विकल भुवालू अति विषाद वस लोग लुगाई। . - (१०) मति। नीति निगम आगमन ते, उपजत सुमति सुचारु । रसना जो भव तरण नहु, राम नाम उच्चार ।। भा०-मिथ्या श्रम होने पर भी सुनीति ज्ञान का होना मति सचारी है। यथा- बादही बाद बदी के वकै मति बोर दै _ज विर विपी को। मानिले या पदमाकर की कही जो हित चाहत पापने जीको । शम्भु के जीव को जीवन भूरि सदा सुखदायक है सबही को।। रामही राम कहै रसना फसना? तू भजे रस नाम सही को तु०रा०-भयो ज्ञान उपजो नवनेहा । (११) चिन्ता। चिंता चित हो फित जब, धिरता दिन प्रति भोर । चिंता कौनहु भांति की, सात करिय जनि मोर ।। भा०-जहां किसी बात की मन में चिंता होती है उसे ही चिंता कहते हैं ।यथा- भोगदि भुखात हैहैं कदमूल खात है दुति कुभिलात है। मुख जल जात हो । प्यादे प्रम जात हैहे मग, मुरझान है थकि जैहै घाम लागै श्याम कृष्ण मत को ॥ पडित प्रवीण कहै धर्म के धुरीन पेसे मन में न राज्यो पीन प्रन राख्यो तात को। मातु कहै कोमल कुमार सुकुमार भोर छोना है मोक्त विछौना करि पात को। तु० स० सितवत चकित चाह दिशि सीता। १ सुमिरि-पिता पन मन प्रति कोभा। कह गये नृप फिशोर मन चीता। - -- भा०-विरक्षा (१२) मा। मोह, आपने देह को, ज्ञान रहत जब नाहि । 'नियोंही की मोति में, गोपी अनि बिलखाहि ॥ दुस, तिकी ने जब बोरी फल रहे उसे मोह सचागे कही है। यथा- मोहन मोहि रह्यो कद को यकी पर मोहिनी मोहि रखी है। तु० री-मुनि प्रति सिका मोह मसि नाही लीन्ह लाय उर जनक मानकी। (१३) स्वभ। स्वम स्वम को देखियो, वरणत है कवि लोग। सपने में देरि मिलि गये, जागे बदयो पिरोग ।। - भा०-निद्रावस्था में किसी पदार्थ के शान को स्था मेधारी कहते हैं । यथा- सोरत प्राजु ससी सपने द्विज देव जू पानि मिले पनमाणी। जोली उठी मिलिये कह धाय सुहाय मुजान गुजान दे घागी ॥ वालि उठे ये पपोगन तो लगि पीय कहाँ कहि फर फुचाली । सम्पति सी साने की भई मिलियो ग्रजगज को प्राव को प्रार क्यो कलि मुठी मानिये, मसि सपने की बात । जु हरि न्यौ मोचत हियो, सोन पायत मारा। तु० रा दिन प्रति बहु रानि पुसपने ।। सपने घागरलका जारी ।। -(१४) वियोध 1ोध है जागियो, वरणत मति अवदान । अनुरागी लागी हिये, जागी बड़े प्रभात ॥ -निद्रा की विपरीत श्रवस्था को विवोध सचारी कर लखन निमि विगत सुनि, अरण जिसा धी कान । त परिले जगत, पति, जागे राम सुझान ।। विगत निशा रघुगायफ जाने। 1 10- . - आनन्द [२] रमरक्षाकर। के गिनती सी इती गिनती दिन तीनकली वा धार सुनाई। त्यो पदमाफर मोह मया फरि सोहि दया न दुखीन की प्राई ॥ मेरो हरा हर हार भयो प्रयनाहि उतारि उन्हें न दिखाई। स्पाई न तु कयहूं बनमाल गोपाल की या पहिरी परिगई। मुख मलीन तन छीन छवि, परी सेज पर दीन । लेत क्यो न सुधि सांबरे, नेही निपट नवीन ॥ सुकरा---प्रापनि दारण दीनता, कई सहि शिर नाइ । पादि नाथ कहि पाहि गुमाई। (२१) मर्ष मिलतही इष्ट के, हियो जात है फल । सिय हिय दर्प न जाय कहि, जान गौरि अनुकूल ॥' भा०-जमा किसी कारण से ग्ति को आनन्द प्राप्त हो, सूचक पुलफायली नधा प्रस्वेद का होना हर्ष सचारी कहलाता है । गृह गृह वाज वधाव शुभ, प्रगटे प्रमु सुखकर । हर्षवत सय जहि तह, नगर नारि नर वृन् । तु०रा०-हरपि राम भेटेउ हनुमाना। हर्षे अनु निज निधि पहिचाने ॥ (२२) ब्रीड़ा (लॉज) पीटा यौनाह हेतु तें, रहत लाज उर छाय । गुख नवाय सकुचाय तिय, रही सु-धूंघट नाय ।। भा-क्सिी कारण यश लाज (लखा) उत्पन्न होने को ब्रीड़ा सयारी कहते हैं । यथा- ० रा०-गुरजन लाज समाज बडि, देखि मीय सकुचानि । बहुरि यदन विधु अचल ढोकी । पिय तन चितै भौह फरियांकी। खजन मंजु तिरी नयननि । निज पति कहेउ तिनहि सिय सयननि। -(२३), उग्रता। निरदैपन है उग्रता, नहीं दया को ठांउः। शिव धनु भजनहार कहूँ, यमपुर अबहि पठाउँ।। Ex Here -- L 15 -- 44 ܪ܃ - १ 1 4 भाव-निटेयपन अर्थात् हदय में दया का संचार न हानाही ? उनता सचारी कहलाता है। यधा एक बार कात किन हो। (२४ निद्रा। शयन कहावंत सोइयो, व सुनिद्रा होय । पिया बाट जोहत तिया, रही पलंग पर सोय।। भा०-मायन,करना (सोना) निद्रा सचारी कहलाता है । यथा- • तु०रा०-ते मिय राम मार्ग मोये। (२५) व्याधि। व्याधि विरह कामादि ते, तन मतापिन छाम । सुत विझुरत व्याकुल भये, दशरथ ले के नाम । भाचिरहवश वा कामादि या किसी अन्य व्याधि के फार रोगादि सचार को व्याधि सचारी करते है । यथा- दरही ते देखत में विथा वा वियोगिनि की प्राई भले भाजिह इलाज मदि आगी। कई पदमाकर सुनो हो धनश्याम जाहि चेत का जो एक प्राहि कदि आवैगी ॥ सर सरितान को न सूखत लगेर देर पती कछु जुलमिन ज्वाल बदि प्रादेगी। ताके तन तापको कहो कहाँ बात मेरे गातहिं छुची तो तुम्हें चाप चदि भावैगी। फव की अजद जार में, परी वाम तन छाम । तित को मत लीजियो, चन्दोदय.को नाम ॥ तु० राम-देसी व्याधि असाधि नृप, पन्यो धरथि धुनि माय।। *करत परम प्रारत वचन, राम राम रघुनाथ ॥ यह कुरोग फर औषधि नाहीं । अति परिताप सीय मन मा (२६) मरण। मरनो मूर सतीन फो, कहते सुजस के हेत। सती सुलोचन हो गई, रही कीर्ति प्रति सेत ॥ . भा० शरीर से प्राण वायु के निफल जाने को मरण कहते हैं जानकी को सुनि भारत नाद सुजानि दशानन की छलहाई। . MH - 1 [१४] रसरत्नाकर। रावण पेसे महा रिपु सों प्रति युद्ध कियो अपने बनताई। सोहत श्री रघुराज के काज पै जीव तजै तो जटायु की नाई ।। तु० रा-राम राम कहि राम कहि, राम राम कहि राम । तन त्यागो दशरथ नृपति, गवने सुरपति धाम ॥ (२७) अपस्मार (मृर्जा) अपस्मार दुःखादि तें, होत कम्प भूपात । हरि वियोग तें राधिका, धरणि पछारे खात ॥ मा०-दु खादि'सहन करने तथा अन्य किसी कारण से कम्पादि होकर पृथ्वी पर गिरने, मुख से फेन और अधिक स्वासादि निकलने अर्थात् अपस्मार (मृगी) रोग की सदृश अवस्था हो जाने को अपस्मार सचारी कहते हैं । यथा- लखि बिहाल एकै कहत, भई कहू भयभीत। इकै कहत मिरगी लगी, लगीन,जानत प्रीत ॥ तु० रा०-अस कहि मूर्छि परेउ महिराऊ। (२८) आवेग । आवेगहि चलि परत झट, भय तें वा अति नेह । सुनि आहट पिय पगनि तिय, भभरि भगी बिच गेह।। भा०-अत्यन्त भय वा अधिक स्नेह से आतुरता के साथ र चलनाही आवेग सवारी कहलाता है, इसी को सम्रम भी कहन है। यथा- लछमन दीख उमाकृत वेषा । चकित हृदय भ्रम भयउ विशेषा॥ पितु प्रण समुझि वहुरिमन छोभा। सुनत श्रवण वारिधि वधाना । दशमुख बोलि उठा अकुलाना ॥ बाधेउ वननिधि नीरनिधि, जलधि सिंधु पारीश । सत्य तोय निधि पकनिधि, उदधि पयोधि नदीश ॥ (२६) त्रास । यास कौनटू अहित ते, उपजत हिय भय आय । सुनस तिहारी वात तृप, त्रसित शत्रु समुदाय ।। - . . 7 म T । .. L. ..

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ए ब्रजचन्द गोविद गोपाल सुनी न क्यो केते कलाम किये में
त्यो पदमाकर पानंद के नॅट हो नॅद नन्दन जानि लिये मै ||
माखन चोरी के खोरिन हे चले भाजि कछू भव मानि जिये में।
दुरिह दोरि दुन्यो जी चहीं तो दुरी फिन मेरे अँधेरे हिये मे ॥
तु० रा०~~भा निरास उपजी मन भासा ।
भयउ विलम्ब मातु भय मानी ।
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(३०) उन्माद।
अविचारी आचरण जो, सो उन्माद वखान ।
छिन बोलति छिन रोवती, छिन छिन में मुस्कान।।
मा०-विना विचारही आचरण करने को उन्माद कहते हैं।
व्यर्थ बरुवाद करना, रोना, हॅसना आदि उन्माद के स्वाभाविक लक्षण
है। यधा
श्रापहि आप पै रूसि रही कवह पुनि श्रापुहि पाप मना।
त्यो पदमाकर ताकि तमालनि भेटि को कवह उठि धावै ॥
जो हरि रावगे चित्र लखै तो कह कवह हँसि हरि पुलाये।
व्याकुल वाल सु प्रालिन मो कहो चाहै का तो कछु कहि भाषे॥
छिन रोवति दिन हॅसि उठति, छिन बोलति दिन मौन ।
छिन छिन पर छीनी परति, भई दशा धौं कौन' ॥
तु० रा०-अहहे तात दारुण प्रण ठाना ।
तुम सम पुरुष नमो सम नारी । यह संजोग विधि रवा विद्यारी॥
लदिमन ममुकाये या भाती । पृछत चले लता सर पाती।

, है। यथा रिमग्ताकर। . तु०रा०-लोचन मगु रामहि उर पानी । दीने पलक कपाट सयार यारि विलोचन वाचत पाती। पुलकगात आई भरि छाती राम लखन उर करवर चोठी । रहिगे कहत न साटी मी मुनि मग माझ प्रचल होइ पैसा ॥ (३२) चपलता। होत चपलता प्रेम ते, थिरता नहिं उहगत । चरीसी सकरी गलिन. छिन आवत छिन जात भा०-अधिक अनुरागादि के कारण स्थिरता का न चपलता संचारी है इच्छानुसार प्राचरण करना इसका मुख्य कौतुक एक लयो हरिछां पढमाकर यो तुम्हें जाहिर की मैं। को बड़े घर की ठकुराइनि ठाढी न घात रहै किनकी मै ॥ *". झाकति है कवई भगन झरोखनि त्यो सिरकी सिरकी में झांकतिही खिरकी में फिर थिरकी थिरकी खिरफी खिरकी में तु०रा०-देरयन नगर भूप सुत आये। समाचार पुरवानिन पाये। . (धाये धाम काम सव त्यागी । मनहुँ रक निधि लूटन लागी करत मनोरथ आतुर धावा । प्रभुहि चितय पुनि चितय महि ।। (३३) वितर्क। उर उपजत सन्देह जब, सो वितर्क हिय मास । i. लंका निशिचर की पुरी, इत्त कत सज्जन वास ।। 'भा०-किसी प्रकार का विचार करतही चित्त में तर्क (सन उत्पन्न होना वितर्क कहलाता है । यथा- घोस गुण गौरिकै सु गिरिजा गुसांरन को श्रावत यहाही प्रानन्द इतै रहै । कह पदमाफर 'प्रतापसिंह महाराज देखों देखि दिव्य देवता तिने रहै। गेन्त तजि वेल तजि फैल तजि गैलन में हेग्त उमापति हिते रहै। गौरिन में कोनाधों हमागे गुण गौरि घरी चारफ लौ चकत चित रहे। A - tasvA

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[८] 'रसरताकर। ७ वीभत्स अद्भुत शात १० वत्सल ग्लानि आश्चर्य शम (निवेद) , स्थायीभावो के लक्षणो, का.सारांश उदाहरण सहित नीचे लिखा जाता है- (१) रति । होत अपूरय प्रीति जाँ, सोई रति सह नेम । जनकनंदिनी को अचल, रघुपति पद नित प्रेम ॥ गूढ और अपूर्व प्रीति को रति कहते है रति देवता गुरु मुनि और राजा विषयफ भी होती है, कोहर पुत्र विषयक भी कहते हैं सो तो वत्सल के अन्तर्गत है, रति के तीन भेद माने गये है। एकागी (उत्तम) परस्पर (मध्यम) और स्वार्थवश (अधम)। उत्तम-मीन काटि जल धोइये, खाये अधिक पियास । तुलसी प्रीति सराहिये, मुये मीत की प्रास ॥ मध्यम-राधिका के हिय झूलत साबरो सावरे के हिय मूलति राधा अधम-सुर नर मुनि सब की यह रीती। स्वारथ लागि करै सब प्रीती ।। गुरुविषयक-चदौं गुरु पद पन परागा । सुरुचि सुबास सरस अनुरागा ॥ राजाविषयक-चंदौ अवध भुवाल, सत्य प्रेम जिहिं राम पद् । विछुरत दीनदयाल, प्रिय तन तृण इव परि हरेउ ॥ हम सेवक स्वामी सियनाए । देवता विषयक-हरि हर पद रति मतिन फुती। तिन कहें सुखद कथा रघुवर की ॥ मुनि-वंदो मुनि पद कज, रामायण जिन निमयो । सखरस कोमल मंजु, दोष रहित दूषण सहित ।।

रूप वचन वेढग कछु, लखि सुनि आवत हास। चारि पदारथ पाइये, एक भंग की आस ॥ भा०-कौतुकार्थ वचन वा रूप रचना से भलादयुक्त मनो विकार को हास कहते हैं । यथा- चन्द्रकला चुनि चूनरी चारु दई पहिराय सुनाय सुहारी। बंदी विशाखा रची पदमाकर अंजन आजि समाजिकै रोरी। लागी जबै ललिता पहिरावन कान्ह को कचुकी केसर बोरी। हरि हरे मुसकाइ रही मॅचरा मुख दै वृषभानु किशोरी ॥ अति उदार करतृतिदार सव अवधपुरी की यामा। खीर खाय पैदा सुल करतो पति कर कछु नहि फामा । सखी बचन सुनते रघुनन्दन वोले मृदु मुसकाते । प्रापन चलन सिसाबहु प्यारी कहहु धान की बातें ॥ कोउ नहिं जन्मे मातु पिता विन बँधी घेद की नीती। तुम्हरे तो महित सव उपर्जे अस हमरे नदि रीती। सूचना-हास के भी तीन भेद है । उत्सम, २ मध्यम, ३ अधम राम के २ भेद है १ स्मितहसित । १ स्मित-विना दात देख पडते हुप विकसित कपोलो से युक मंद मुसकान को स्मित हास कहते हैं। २ हसित-कुछ दांत देख पड़ते हुए प्रफुल्लित कपोलो से युक्त हास का हसित कहते हैं। मध्यम के दो भेद १ विहसित २ उपहसिता १विहमित-प्रवमर पर मनोहर शब्द निकलने से योंही कुछ मुँह सिकोड़ने और यदनराग दीखते हुए हास का विकसित कहते हैं। २ उपहसित-नाक के फुलाने एवं कुटिल दृष्टि से देखने तथा प्रीय सिकोडे हुए शब्द भरे हास को उपहसित कहते हैं। अध्रम के दो भेद १ अपहसित २ प्रतिदसित। १ अपहसित-सिर हिलते और प्रासू निकलते हुए उद्धत हास के । . .

Va . । [.१००1 रसरताकर। २ अतिहसित-शरीर के कॅपने, अधिक प्रांसुओ के वहने और नानी दे ऊचे स्वर से उटाकर हंसने को अतिहसित कहते हैं। (३) शोक । अहित भये दुख होय जो, वहै शोक परकास । सब के प्यारे राम को. क्यों दीनों बनवास ।। भा०-अहित के लाभ अथवा हित की हानि से हृदय में जा दु.ख उत्पन्न होता है उसे शोक कहते हैं । यथा- मातं को मोह न द्रोह दुमात को सोच न तात के गात दहे को। प्राण को छोभ न वधु विछोभ न राज को लोभ न मोद रहे को । पते पै नेक न मानत श्रीपति एते में सीय वियोग'सहे को। ता रनभूमि में राम कहो मोहि सोच विभीषण भूप कहे को । तापस वेष विशेष उदासी । चौदह वर्ष राम वनवासी। सुनि तिय वर्चनभूप उरशोक । शशि कर छुचत विफल जिमि कोक ॥ काम वाम की ससम की, भसम लगावत अंग। 'बिनयन के नैनन जम्यो, कछु करणा को रग॥ (2) क्रोध। अपमानादिकते जहां. क्रोध हिये मजबूत'। बक्ष अक्ष को फारिहौ, तौ अंजनि को पूत || . भा० शत्रु के किये हुए अपमानादि से उत्पन्न हुए मनोविकार को क्रोध कहते है। (५) उत्साह । अपर वीर को देखिकै, चाव चदै चित आर्य । -, मेघनाद को लखि, लखन, हरपे धनुप चढाय ॥ भा०-उद्भट योद्धाओ को देख चित्त में जो सहर्ष चाव जगजगा उठता है उसे उत्साह कहते है । यथा- इत कपि रीछ उत राक्षसनहीं की चमू डका देत' वो गढ ते कदै लगी । कहै पदमाकर उमड जग ही के हित चित्त में कछुके " + १ । . १ - वाप चावका चढ लगी। बानन के वाहिरे को कर मे कमान कसि धाई र धान आसमान में मढे लगी। देखते बनी है दुह दलकी चढा चढी मे पम ग ह प नेक लाली जो चढे लगी। मेघनाद को लखि लखन, रग्पे वनुप चाय । दुखित विमापण दवि रहो, कछु फूले रघुगय । . (६) भय। - भय रिकृत छु रूप लखि, रक्षा कीन मतात । लखि चाढत वामन तनहि, बाढ़ी बलि हिय भीति ।। भाग-ढव भयकर रूप का देखकर चित्त में जो व्याकुलता पैदा होती है अथवा शरीर सगकित होता है उसे भय कहते हैं। तीन पैग पहुमी दई, प्रथमहिं परम पुनीत । वहुरि वढत जखि चामनहिं, भे वलि कछुक सभीत ॥ तु०रा० -~सीतहि समय देखि रघुराई । कहा अनुज सन सेन बुझाई । (७) ग्लानि ।। ग्लानि घृणित लखि वस्तु को, जहें चित जाय धिनाय । सुपनसाहि विरूप लखि, सिय मुख लीन छिपाय । भा०-किसी वस्तु के देखने, एव स्मरण करने अथवा छुने चेत्त में जो धृणा उत्पन्न होती है उसे ग्लानि वा घरांसा फह । यथा- "स्पनसाहिं विरूप लपि, रधिर चरवि युचुवात । सिय हिय मे घिन की लता, भई सुवै द्वै पात ॥ (E) आश्चर्य। विस्मय युत लखि सुन कछू, अचरज रह उर छाय । मृदुलगात क्यों साबरो, गिरिवर लीन उठाय !! भा०-देसने से छने से स्मरण करने मे अथवा कानों से कोई चरित्र सुनने पर दृदय में जो विस्मय उत्पन्न होता है उसे आश्चर्य -- पद्भुत --.mom.

। . . [१००] रसरताकर। २ प्रनिहासित-शरीर के कॅपने, अधिक श्रांसुओ के बने ओर ताली दे ऊचे स्वर से ठटाकर हमने को प्रतिहसित कहते हैं। (३) शोक । अहित भये दुख होय जो, वहै शोक परकास । सब के प्यारे राम को क्यों 'दीनों बनवास ॥ भा०-अहित के लाभ अथवा हित की हानि से हृदय में जो दु ख उत्पन्न होता है उसे शोक कहते है । यथा। मातं को मोह न दोह दुमात को सोच न तात के गात दहे को। प्राण को छोभ न वधु विछोम न राज को लोभ न मोट रहे का ॥ एते पै नेक न मानत श्रीपति एते में सीय वियोग सहे को। ता रनभूमि में राम कह्यो मोहि सोच विभीषण भूप कहे को । तापस वेप विशेष उदासी । चौदह वर्ष राम वनवासी सुनि तिय वचनभूप'उरशोकू । शशि करेंछुचत निकल जिमि कोफू ॥ काम वाम,की खसम की, भसम लगावत अग। त्रिनयन के नैनन जम्यो, कछु करणा को रग॥ (2) क्रोध । अपैमानादिक तें जहां, क्रोच हिये मजबूत'। वक्ष अक्ष को फ़ारिहौ, तो अंजनि को पूत ।।. भा० शत्रु के किये हुए अपमानादि से उत्पन्न हुए मनोविकार . . 12 को क्रोध कहते हैं । - -- - । (५) उत्साह । अपर वीर को देखिकै, चाव चदै चित आय । मेघनाद को लखि लखन, हरपे धनुप चढाय ।। 'भा०-उद्भट योद्धात्रो को देख चित्त मे जो सहर्ष चाव जगजगा उठता उटता है उसे उत्साह कहते है। यथा- इतु कपि रीछु उत राक्षसनहीं की चमू डका देत' बैंका गढ ते कढे लगी। कहै पदमाकर उमड जग ही के हित चित्त में कछुके - - + - ~ * धुर धान आसमान में मदं लगी । देसते वनी हे दुह दलकी चढा चढी म म ग प नेक लाली जो चढे लगी। मेघनाद को लखि लसन, हरपे अनुप चढाय । दुखित विभोपण दवि रधो, कछु फूले रघुगय ॥ (६) भय। भयविकृत कछु रूप लखि, ग्वा कीन मतीत । लखि चाढत चामन तनदि, वाढी बलि हिय भीति ।। भा०-वेढव भयकर रूप का देखकर चित्त मे जो व्याकुलता पैदा ती है अथवा शरीर सशक्ति होता है उसे भय रहते हैं। तीन पैग पहुमी दई, प्रथमाहि परम पुनीत । वहरि वढत लखि वामनहि, भै वलि कछुक सभीत ॥ तु० रा०-सीतहि समय देखि रघुगई। , ग्लानि घृणित लखि वस्तु को, ज चित जाय धिनाय । सूपनखादि विरूप लखि, सिय मुख लीन छिपाय ॥ भा०-किसी वस्तु के देखने, एवं स्मरण 'करने अथवा छूने चित्त में जो घृणा उत्पन्न होती है उसे ग्लानि धा गप्सा कह हैं। यथा- सूपनग्माहि विरुप लखि, रुधिर रवि युचुवात । सिय हिय में घिन की लता, भई सुवै पात ॥ , (s) आश्चर्य। विस्मय लखि सुन फछू, अचरज रह उर मृदुलगात क्यों सावरो, गिरिवर लीन उठाय ॥ . भाल-देखने से छने से स्मरण करने से अथवा कानों से कोई भत चरित्र सुनने पर एदय में जो विस्मय उत्पन होता है उसे आश्चर्य . . युत ... - benduare [ १०२] रसरताकर। सेस महेस गनेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरतर गाई । जाहि अनादि अनन्त अराड अरोद अभेद सुवेद बतावै ॥ नारद से सुक व्याम र पचि हारे तऊ पुनि पार न पाये। ताहि अहीर की छोरियां छलियां भरि छांच पे नाच नचारै ॥ वधु घिरोध करी सिगरो झगरो निन होत सुधारस चाटत । मित्र करे करनी रिपुकी धरनी धर देखिन न्याउ निपाटत ॥ राम कहें विष होत सुधा घर नारि सती पति सोंचित फाटत । भा विधना प्रतिकूल जवै तव ऊंट चढे पर कूकर काटत ॥ देखत क्यो न अपूरव इदु मे है अरविंद रहे गहि लाली।। त्यो पदमाकर कीर बधृ इक मोती चुगै मनो है मतवाली ।। ऊपर ते तमछाय रहयो रवि की दयते न दवै सुलि ख्याली । यों सुनि वैन सखी के विविध भये चित चकित से बनमाली ॥ (६) निर्वेद । हो विरक्त संसार सों, सो निर्वेद विचार । यह असार संसार में, राम नाम है सार । भा०-परिश्रमादि के निष्फल होने पर सद्गति हित हृदय में जो पश्चात्ताप होकर वैराग्य उत्पन्न होता है उसे निवेद कहते हैं । यथा- है थिर मदिर में न रहो गिरिकन्दर में न तप्यो तप जाई। राज रिझाये न के कविता रघुराज कथा न यथामति गाई ।। यो पछितात कळू पदमाकर कासो कहौ निज मूरखताई।। स्वारथहन कियो परमारथ योही अकारथ वैस विताई ॥ मोग में रोग वियोग सयोग में योग मे काय कलेश कमायो । त्यों पदमाकर वेद पुराण पढ्यो पढिकै बहु बाद वढायो । दौयो दुरास में दास भयो पै कह विसराम को धाम न पायो । खायो गमायो सु पेसेही जीवन हाय मै राम को नाम न गायो । या लकुटी कर कामरिया पर राजति पुर को तजि डारौं। पाठहु सिद्धि नौ निधि को सुख नन्द की गाय चराय बिसाएँ । नैनन सो रस खानि जवै व्रज के वनवाग तड़ाग निहारौं । कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौ।। ८८

माप हा ता वहा रसखान वसा माल गाकुल गाव क ग्वारन ।
जो पशु हो तो कहा बस मेगे चरो नित नद के धेनु मॅझारन ।
पाहन हो तो वही गिरि को जो कियो हरि छत्र पुरदर कारन ।
जो खग हो तो वसेरो करो वहि कालिदि तीर कदव की डारन ॥
(१०) स्नेह।
पुत्रादिक की प्रीति जो, सोई नेह कहात ।
गोद लिये अति प्रेम सों, हरि मुख चुम्बत मात ॥
इति स्थायीभाव सातवा भाग समाप्त
रसवत् अलंकार।
अमवान ज] रस अरु भावा । सह अलकृत रसवत गावा ॥
रसवत् यस ऊर्जस्वित, और समाहित जान ।
भावोदय पुनि सधि अरु, शवलताहि पहिचान ।
ये अलकार भूषण चन्द्रकादि प्रन्यो के आधार से लिखे गये
हैं। इनको अपराग भी करते हैं।
१ रसवत् ।
रसवत रस के अंग ते, मगट और रसभाव ।
जयति जयति योगिन्द्र मुनि, कुमज महा अनूप।
देखे जाके चुलुक में, कच्छप मल्य स्वरूप ।
यहा अद्भुत रम का अग मुनि विषयक रतिभाव है।
तु० राम कृपा वारिधर राम सरारी! पाहि पाहि प्रण तारति हारी
यहा चीररस का अग करुण रस है।
श्री रघुवीर प्रताप ते, सिंधु तरे पापान ।
ते मतिमन्द जे राम तजि, भजहि जाय प्रभु पान ।।
।

- -- - - - [.१०४] रसरलाकर। सियहि विलोकि तक्या धनु कैसे। चितय गरुड़ लघु व्यालहि जेसे ॥ यहां गार का अग वीररस है। अति सुकुमार युगुल मम वारे । निशिचर सुमट महा बल भारे॥ यहां वात्सल्य का अंग भयानक है। नाग पाश वस भये खरारी । अविगत अलख एक अविकारी ॥ यहां अद्भुत का अग शात है। २ प्रेयस् (प्रियतरं प्रेयः) प्रेयस है अंग भाव को, के कछु रस को भाव । भावालंकारहु कहै, याही को कवि राव ॥ यथा- कव वसि मधि वाराणसी, धरि कोपीनहि चीर । हे हर शिव शकर जपत, फिरिही गगा तीर ॥ यहां चिता सचारीभाव का अग शम स्थायीभाव है। सोह मवल तन सुन्दर सारी । जगत जननि अतुलित छवि भारी ।। यहा, टगार का अंग देवरति भाव है। भयउ कुलाहल नगर मझारी । पावा कपि लका जिहि जारी || यहां भय से चिता और वढी। प्रेयस का पुंल्लिगे रूप मेयान् और स्त्रीलिंग रूप प्रेयसी होता है; प्रेयान्-अति प्रिय पुरप, प्रेयसी-प्रति प्रिय स्त्री अर्थात् सीता प्रेयसी और राम प्रेयान् हुए। ३ उर्जस्वित (ऊर्जः वळे) रसाभास वा.भावाभास, अर्जस अलंकार परकास । (अनौचित्य प्रवृत्तत्वे आभासो रस भावयोः) अनुचित रस को रसाभास और अनुचित भाव को भावाभास कहते हैं। इनमे से एक वा दोनो रहे, सोई ऊर्जस्वित अलकार है। आभास झलक को कहते है। रसाभासी रसाभास अनुचित कथन, सीमा सो नहिं काम | चराचरहुं मर्याट तजि, भये सकल बस काम || rement - --- । -

शृगार रताभास-१ मय के हृदय मदन अभिलाषा ।
लता विलोकि नवहि तरु शाखा ॥
२प्रभु लछमन पहें बहुरि पठाई।
३ देसि रूप मुनि विरति विसारी।
वडी बार लग रहे निहारी ।।
हास्य रसाभास, सुनत घचन विहॅसे ऋपय, गिरि सभव तव देह ।
नारद कर उपदेशं सुनि, कहहु बसे को गेह ॥
'करुण रसाभास मुनि सुत वचन सनेहमय, कपट नीर भर नैन
मरत हदय जनु शूल सम, पापिनि वोली वेन ॥
रौद्र रसाभास अति रिस वोले वचन कठोरा।
कहु जड जनके धनुप फिहि तोरा ।।
बेगि दिसाउ मूढ न तु आजू ।
उलयो माहि जहँ लगि तुव राजू ॥
चीर रसाभास-१ वीर वृत्ति तुम धीर प्रलोभा ।
'गारी देत न पावहु शोभा ॥
२ फपि वल विपुल सराहन लागा।
भयानक रसाभास-फर कुठार मै अकरण कोही।
आगे अपराधी गुरुद्रोही ॥
उतर देत छाडो बिन मारे।
केवल कौशिक शील तुम्हारे ॥
बीभत्स रसाभास-भेष श्रमगल मगल राशी ।
अद्भुत रसाभाम-रोम गेम हरि के रहत, किमि कोटिक ब्रह्मट ।
भारतसामासउनु सतिभान हौ.महिपाता।
यहा वसत बीते घटु काला॥
तातें गुप्त रहौं जग माहीं।
हरि तजि क्मिपि प्रयाजन नाहीं।।
,
।

- , . - १[ १०४ ] रसरताफर। सियहि बिलोकि तक्यो धनु कैसे । चितय गरडु लघु व्यालहि जैसे ॥ यहां शृगार का अग वीररस है। अति सुकुमार युगुल मम वारे । निशिचर मुभट महा बल भार॥ यहां वात्सल्य का अग भयानक है। नाग पाश वस भये खरारी । अविगत अलख एक अरिकारी ॥ यहां अद्भुत का अंग शांत है। २ प्रेयस् (मियतरं मेयः) प्रेयस है अॅग भाव को, के कछु रस को भाव।। भावालंकारहु कहै, याही को कवि राव ।। यथा--- कब बसि मधि चाराणसी, धरि कोपीनहिं चीर । है हर शिव शकर जपत, फिरिही गगा तीर ।। यहां चिता सचारीभाव का अग शमस्थायीभाव है। सोह मवल तन सुन्दर सारी । जगत जननि अतुलित छवि भारी॥ यहां शृगार का अंग देवरति भाव है। भयउ कुलाहल नगर मझारी । अावा कपि लका जिहिं जारी ।। यहां भय से चिंता और वढी । प्रेयर का पुल्लिंग रूप प्रेयान् और स्त्रीलिंग रूप प्रेयसी होता है, प्रेयान् अति प्रिय पुस्प, प्रेयसी-अति प्रिय स्त्री अर्थात् सीता प्रेयसी और राम प्रेयान् हुए। ३ ऊर्जस्वित (ऊर्ज बले) रसाभास वा भावाभास, ऊर्जस अळंकार परकास । (अनौचित्य प्रवृत्तत्वे आभासो रस भावयोः) अनुचित रस को रसाभास और अनुचित भाव को भावाभास कहते हैं। इनमे से एक वा दोनो रहें सोई ऊर्जस्वित अलकार है। आभास झलक को कहते है। रसांभास। रसाभास अनुचित कथन, सीमा सो नहिं काम । चराचरहुं मर्याद तजि, भये सकल ,वस काम || - - ।

A रसाभास-१ मव के हृदय मदन प्रामलापा। लता विलोकि नवहिं तरु शाखा ॥ २प्रभु लछमन पहँ बहुरि पठाई। ३ देखि रूप मुनि विरति विसारी। वदीवार लग रहे निहारी ।। हास्य रसाभास-सुनत बचन विहॅसे ऋषय, गिरि सभव तव देह । नारद कर उपदेश सुनि, कहहु वसे को गेह ॥ करुण रसाभास-सुनि सुत वचन सनेहमय, कपट नीर भर नैन । मरत हृदय जनु शूल सम, पापिनि बोली वेन ॥ रौद्र रसाभास-अति.रिस वोले वचन कठोरा । कहु ज जनक धर्नुप फिहि तोरा ।।। बेगि दिसाट मूढ न तु आजू । उलटो महि जहें लगि तुव राजू ॥ वीर रसाभास-१ वीर वृत्ति तुम धीर अलोमा । 'गारी देत न पावड शोभा ॥ २ कपि वल विपुल सराहन लागा। भयानक रसाभास-कर कुठार मैं प्रकरण कोही। भागे अपराधी गुमद्रोही। उतर देत छाडो विन मारे । केवल कौशिफ शील तुम्हारे ॥ दीमत्स रसाभाम-भेप श्रमगल मगल राशी। अद्भुत ग्मामास-रोम रोम हरि के रहत, किमि कोटिक ब्राह्मट । त रसामान मुसु सतिमात्य कहीं महिपाला यहा यसन बीते बटु, काला॥ ताते गुप्त रहौं जग माहीं। हरि तजि रिमपि प्रयोजन नाहीं ॥ . . . . .

-- - . F+ ४ chanee रसरताकर। २ गुरु सन कहा करिय प्रभु सोई । रामहिं भरतहि भेट न होई ।। ३ भागे भालु बली मुख यूथा। ४ भभु विलोकि सर सकहि न डारी। थकित भये रजनीचर झारी । रसाभास भावाभास । वन वन भीलन सँग रगत, तुव वैरिन की बाम । अरु अरि तुव गुण गणत, नित प्रबल भतापी राम ।। यहां भीलन सग रमत रसाभास, अरि गुण गणत भावाभास है, यही ऊर्जस्थित अलकार है। (१) समाहित (समाधाने) रस अरु भावहिं शाति कर, 'सोइ समाहित जान । जहा कोई रस वा भाव उत्पन होकर वढने नहीं पाता दुसरा भाव उत्पन्न होकर प्रवल हो जाता है उसे शाति वा समाहित अलकार जानो। यथा-- पिय ठाढे भे मान लखि, तिय इत रही विजोय ।। देखत हेसि दीन्हो ललन, तिय तव दीनी रोय ॥ यहां शृगार रस का अंग कोप शाति है। देत चाप प्रापुहिं चदि गयऊ । परशुराम मन विस्मय भयऊ । यहां गर्व की शाति है। अटादुरी मे निरखि हरि, फौधा कीसी बांह । चकित हो समुझे बहुरि, लखि राधे की चाह ॥ यहां विस्मन को मति संचारी ने शात किया । पुनि संभार उठी सो लका । जोरि पानि कर विनय ससका ॥ यहा वीररस का अंग प्रोध की शांति है। (५) भावोदय । भावोदय रसभाव जव, उदय होय रद्दि जाय । जहा अन्य सामग्री प्रवल होने के कारण रस या भाव अपरित रह जाता है मो भावोदय है। यथा- का

P
चहत विचारि विचारि उर, कव मिलिहँ घनश्याम ॥
'यहां गार रस का अग औत्सुक्य सवारी का उदय है।
वेंदी पिय पट सो लगी, लीनी अली उतारि।
वूड गई अवलोकि उन, सकुच सिंधु सुकुमारि ॥
यहा ब्रीडा सचारीभाव का उदय है।
रावण पावत सुन्यो सकोहा । देवन तके मेरु गिरि खोहा॥
यहा त्रास संचारीभाव का उदय है।
(६) भावसंधि।
रस अरु भावहिं सघि जो, भाव सधि सोइ जान ।
जव एक रस वा भाव मन को एक ओर और दुसरा दुसरं
रखींचता है तव भाव सधि कहते हैं । यथा-
चलत वीर सग्राम को, लखि विलसी निज वाल।
अरुण वरण तन में उठे, विपुल-पुलक ततकाल ।
यहा रतिभान और औत्सुक्य की सधि है।
नीके निरसि नैन भरि शोभा। पितु प्रण सुमिरि बहुरि मन छोभा ।।
यहा हर्प और स्मृति की सधि है।
दुहु समाज हिय हर्ष विपाद्दुः ।
यहा हर्ष और विषाद की सरि है।
सकुचत कहि न सकत गुरु पाही। पितु दरशन लालच मन माहीं॥
यहा लाज और हर्ष की सधि है।
(७) भाव शवलता।
मिलत बहुत रसभाव जह, भाव शवलता जान ।
जहां अनेक रस तथा मावों को एक साथही उत्पति हो सो
शिवलता है।
वशीधर बनमाज धर, हरि उर माहि रहाय ।
कित में कित यह फित मिजन, सजनी ध्यात वताय ||
.
-
Immon

areer Mus [ १०८ ] रसरताकर। मिय शोमा हिय वरगिा प्रभु, भापनि दशा विचारि । धोले शुचि मन अनुज मन, बचन समय अनुहारि ॥ तात जनुकतनया यह सोई । धनुष यश जिहि कारण होई ।। पूजन गौरि मखी ले आई । करति प्रकाश फिरत फुलवाई ॥ जासु विलोकि अलौकिक शोभा। सहज पुनीत मोर मन छोभा ॥ सो सय कारण जान विधाता । सुभग अंग फरफ़हि सुनु भ्राता॥ रघुबसिन कर सहज सुभाऊ । मन 'फुपथ पग धरहि न काऊ ॥ मुहि अतिशय प्रतीत जिय केरी | जिहिं सपनेहु पर नारि नहेरी॥ जिनकी लहहि न रिपुरण पीठी । नहि लावहि पर तिय मन डीठी। मंगल लहर्हि न जिनके नाहीं । ते नरवर थोरे जग माहीं ॥ करत बतकही अनुज सन, मन लिय रूप लुभाने !" , मुख सरोज मकरद.रवि, करत मधुप इच पान ॥- इसमे मोह, वितर्क, हर्ष, मति, धृति इत्यादि अनेक भाव हैं।' हरि संगति मुखमूल सखि, पे परपची गाउँ। तू कहु तौ तजि शक उत, हेग बचाय द्रुत जाउँ ॥ यहा हरि से मिलने की उत्कंठा, गाव के प्रपची लोगो को शका, दीनता, धृति, आवेग, प्रवाहित्या अनेक भार है। - क . - - सूचना-इन सात भेदो के अतिरिक्त किसी ने सकर नामक एक भेद और माना है। मेरी सम्मति में वह भाव शबलता के ही अन्तर्गत है । सकर का अर्थ है मिश्रण । यथा- महि परत उठि भट लरत मरत न करत मायो अति धनी। सुर डरत चौदा सहम निशिवर एक श्रीरघुकुल मनी ।। सुर मुनि सभय अवलोकि माया नाथ प्रति कौतुक करे । देखत परस्पर राम करि सग्राम' रिपुदल लर मरे ॥ यहा वीर, भयानक और अद्भुत रसो का मिश्रण अर्थात् सकर है। मि रस वक्षादि अल्कार आठवा भाग ममाप्त ।। จะงงมะมะมะ PRAM RAATDADA PILLI सगरनद भैरॉज्ञान मेठिया

रस दोष वर्णन ।
+
"
"
जिस रस के जो रम विरोगी हैं उनका उल्लेस नीचे करते है-
गार के विगंधी-करुण, धीभत्स, रोद्र, वीर भयानक
हास्य
करुण, वीभत्स, भयानर,
करगा
हास्य, गार
गेंद्र
हास्य, गार, अद्भुत, शात
वीर
गात, गार, भयानक
भयानक
गात, गार, हास्य
बीभत्स
शृगार
अद्भुत
रोद्र
शात
रोद्र, शृगार, वीर, हास्य, भयानक
ये विरोधी रस जहा देशभेद कालभेट रममकर भोर अगागिभाव
द्वारा वर्णित किये जाते है वहा वे दृषित नहीं समझ जाते है।
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Ras Ratnakar

Author
Prasad,babu Jaganath
Title
Ras Ratnakar
File name
Ras Ratnakar
Text
OCR done
Citation
1916
Published
2011/01
Publisher
Jaganath Press Bilaspur Madhay Pradesh
Language
Sanskrit
Pages
124
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546456
Barcode
4990010024929.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
0oJb9WFMacZ
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