Hindi Sahataya Samalayan

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१४
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सभाबिलास
अनेक कवियों के रचित नानाप्रकार
के छन्दों में सामयिक
विषय वर्णित हैं
दशक बहर
४८.ह
१.
मपन्दिर बाब मनोहरलाल भार्गव मी, ए.. के प्रबन्ध में
"
है

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११366
प्राप्त संख्या
69
वर्गसंख्या
८१.०६
२५.स
रखएक संख्या

११166 हिन्दी श्रीगणेशाय नमः॥ सभाबिलास॥ सोरठा॥ बिधनहरण गणराय, मूषकवाहन गजबदन । गणपतिचरण मनाय, तबैकाज कछु कीजिये ॥ १ ॥ दोहा॥ आनन भावत स्वाद इमि, परो गह्यो सु मलिन्द । कृष्ण चरण अरबिन्द को, पियत सदा मकरन्द २ ममता भ्रमता के मिटे, उपजे समता ज्ञान । रमे जो रमता राम सों, यमता गहै न मान ३ साधिसक्यो नतु साध सँग, लाय न सक्यो समाध | विषय विषाद उपाधि तज, हरि पल अाध अराध ४ निगमरु गीताने कह्यो, परमपुनीता नाम । बीत्यो जन्म जु जात है, भजले सीताराम ५ मन

३
सभाविलास।
की मिटै मलीनता, होय लीनता साथ । नीकी यही
प्रवीनता, भजिये दीनानाथ ६ जिन पायो हरि रस परम,
मिटे भरम भय दोय । गह्यो धर्म अपकर्म तजि, मान
परमगति होय ७ सुखकारण तारण तरण, वारण लयो
उबार । कंस पछारन मान हरि, निरधारण आधार ८
काम क्रोध लागी सुरत, वहै अभागी जान । हरि अनु-
रागी जासु मति, सो बड़भागी मान ६ सुखदायक भा.
यक भगत, उपजायक आनन्द । तीन लोकनायक जपौ,
अघघायक ब्रजचन्द १० पौरी पद निर्वाण की, यह
ज्ञान की गाथ । श्राज्ञा वेद पुराण की, जपो जानकी
नाथ ११ जपै गणेश सुरेश से, श्री महेश मुख आप ।
आनँद देश विदेश में, हृषीकेश के जाप १२ घने बाज
गजराज हैं, सुख के सने समाज । बने उने किहकाज
हैं, जो न हेत ब्रजराज १३ उपजावन आनन्द उर,
पतित सु पावन राम । आवन जावन जात मिट, जप
१

सभाबिलास। बावन को नाम १४ जौलौं घट में श्वास है, होयरहो हरिदास । पूरै आश निराश की, बासुदेव उर बास. १५ मान मुण्डमाली कह्यो, नरककुण्ड नहिं जाय । कोट झुण्ड पापी तरे, पुण्डरीक गुण गाय ॥ १६॥ अथ दृष्टान्त॥ भाव सरस समुझत सबै, भले लग यह भाय । जैसे औसर की कही, बानी सुनत सुहाय १७ नीकी पै फीकी लगै, बिन औसर की बात । जैसे वरणत युद्ध में, रस सिंगार न सुहात १८ फीकी पैनीकी लगै, कहिये समय बिचार । सबके मन हर्षित करै, ज्यों विवाह में गार १६ जाही ते कुछ पाइये, करिये ताकी आस । रीते सावरपै गये, कैसे बुझत पियास २० स्वाति बूंद है सघन में, चातक मरत पियास । जो जाही को खैरहै, सो तिह पूरै प्रास २१ भले बुरे सब एकसे, जोलौं बोलत नाहिं । जान परत हैं काक पिक, ऋतु वसन्त के माहिं २२

४
सभाविलास।
मधुर बचन ते जात मिट, उत्तम जन अभिमान । तनक
शीतजल सों मिटे, जैसे दूध उफान २३ सबै सहायक
सबलके, कोई न निबल सहाय । पवन जमावत भाग
को, दीपहि देत बुझाय २४ कछु बसाय नहिं सबल सों,
करै निबल सों जोर । चलै न अचल उखार तरु, डा.
रत पवन झकोर २५ जो जाही सों रचि रह्यो, तेहि
ताही सों काम । जैसे किरवा आक को, कहा करै बसि
आम २६ प्रकृति मिले मन मिलत है, अनमिलते न
मिलाय । दूध दही ते जमत है, कांजी ते फटजाय २७
परघर कबहुँ न जाइये, गये घटत है जोति । रवि-
मण्डल में जात शशि, छीन कला छवि होति २८
ब्रह्म बनाये बन रहे, ते फिर और बनैन । कान क.
हत नहिं बैन जों, जीभ सुनत नहिं बैन २६ मूरख गुण
समझै नहीं, तो न गुणी में चूक । कहाभयो दिन को
विभव, देखें जो न उलूक ३० मूढ़ तहांही मानिये, जहां

समाविलास।
न पण्डित होय । दीपककी रबिके उदय, बात न बूझै
कोय ३१ निपट अबुध समझे कहा, बुधजन वचन बि-
लास । कबहूं भेक न जानही, अमल कमल की बास ३२
सांच झूठ निर्णय करै, नीतिनिपुण जो होय । राजहंस
विन को करै, क्षीर नीर को दोय ३३ दोषहि को उमहै
गहै, गुण न गहै खल लोक । पियै रुधिर पय ना पियै,
लगी पयोधर जोंक ३४ कारज धीरे होत है, काहे होत
अधीर । समय पाय तस्वर फरें, केतिक सींचो नीर ३५
क्यों कीजे ऐसो यतन, जाते काज न होय । परवत पै
खोदै कुवाँ, कैसे निकसै तोय ३६ जो चाहै सोई करें, बड़े
अशङ्कित अङ्ग। सब के देखत नगन हर, धरत गौरि
अर्द्ध ३७ बड़े सहजही बात सों, रीझ देत बखशीश।
तुलसीदल तें विष्णु ज्यों, पाक धतूरे ईश ३८ सुधरी
बिगरै बेगही, विगरी फिर सुधरैन । दूध फटै कांजी परे,
सो फिर दूध बनै न ३६ छोटे नर ते रहत हैं, शोभायुत

६
समाविलास।
सिरताज । निरमल राखै चाँदनी, जैसे पायन्दाज.
सहज रसीलो होय सो, करैअहित पर हेत । जैसे पीड़ित
कीजिये, ईस तऊ रस देत ४१ कबहुँ कुसङ्ग न कीजिये,
किये प्रकृति की हानि गँगेको समझायबो, गँगेकी गति
श्रानि ४२ कहा करै कोऊ यतन, प्रकृति और की और।
विष मारै ज्यावै सुधा, उपजहिं एकहि ठौर ४३ डरै न काढू
दुष्टसों, जाहि प्रेमकी बान । भवर न छोड़े केतकी, तीखे
कण्टक जान ४४ धन बाहेमन बढ़गयो, नाहिंन मन घट
होय।ज्यों जल सँग बाढ़े जलज,जल घट घटै नसोय४५
सब ते लघुहै माँगबो, या में फेर न सार। बलि पै याचत ही
भये, बावन कर करतार ४६ सबै एक से होत नहि, होत
संबन में फेर। कपरा खादीवाफतो, लोह तवा शमशेर४७
जैसे की सेवा कर, तैसी आशापूर। रतनाकर सेवै रतन,
सर सेवै शालूर ४८ होत सुसङ्गत सहज सुख, दुख कुसङ्ग
के थान। गन्धी और लुहारकी, बैठे देख दुकान ४६ ठौर

समाविलास
छुटै ते मीत हू, है अमीत सतराता रवि जल उखरे कमल
को, गारत जारत जात ५० जातगुनी जात न तहां,
आडम्बरयुत सोय । पहुँचेचङ्ग अकाशलौं, जो गुन संयुत
होय ५९ गुनवारो सम्पति लहै, लहै न गुनबिन कोय ।
का नीर पतालते, जो गुनयुत घट होय ५२ अरिछोटो
गिनिये नहीं, जाते होत विगार। तृणसमूह को छिनक
में, जास्त तनक अँगार ५३ पण्डित जनको श्रम मरम,
जानत जे मतिधीर । कबहूँ बांझ न जानही, तन प्रसूत
की पीर ५४ वीर पराक्रम ना करे, तासों डरत न कोय ।
बालकहू के चित्रको, बाघ खिलौना होय ५५ नृप प्रताप
ते देश में, रहै दुष्ट नहिं कोय । प्रकटै तेज दिनेश को,
तहां तिमिर नहिं होय ५६ कारज ताहीको सरे, करै जो
समय निहार । कबहुँ न हारै खेल जो, खेलै दांव वि.
चार ५७ कोऊ दूर न करसकै, उलटे विधि के अङ्क ।
उदधि पिता तउ चन्द्र को, धोय न सक्यो कलङ्क ५८

सभाविलास।
माहक सबैसपूत के, सारै काज सपूत । सब को ढम्पन
होत है, जैसे बन को सूत ५६ करत करत अभ्यास के,
जड़मति होत सुजान । रसरी आवत जात ते, शिल
पर परत निशान ६० को सुख को दुख देत है,
देत कर्म भकझोर । उरझै सुरमै आपही, ध्वजा
पवन के जोर ६१ भली करत लागै बिलब, विलंब
न बुरे विचार । भवन बनावत दिन लगै, ढाहत लगे
न बार ६२ सोई अपनो आपनो, रहै निरन्तर साथ ।
होत परायो आपनो, शस्त्र पराये हाथ ६३ कह रस में
कह रोस में, अरिसों जिन पतियाय । जैसे शीतल तप्त
जल, डारत अग्नि बुझाय ६४ अन्तर अँगुरी चार
को, सांच पूंठ में होय । सब मानै देखी कही, सुनी
न मानै कोय ६५ होय भले के सुत बुरो, भलो बुरे के
होय । दीपक सों काजल प्रकट, कमल कीचमें जोय ६६
होय भले चाकरन ते, भलो धनी को काम |ज्यों अगद

द ६ सभाबिलास। हनुमान ते, सीता पाई राम ६७ सुख सजन के मिलन को, दुर्जन मिले जनाय । जानै ऊख मिठास को, जब मुख नींब चबाय ६८ जाहि मिले सुख होत है, तिह वि- हुरे दुख होय । सूर्य उदय फूलै कमल, ताबिन सकुचे सोय ६६ झूठे हुं करिये यतन, कारज बिगरे नाहिं । क- पट पुरुष धन खेत पर, देखत मृग फिर जाहिं ७० कारज सोई सधरि है, जो करिये समभाय।अतिबरसे बरसे बिना, ज्यों करपन कुम्हिलाय ७१ रहै प्रजा धन यत्न सों, जहँ बांकी तरवार । सो फल कोउ न लैसकै, जहां कटीली डार ७२ पण्डित अरु बनिता लता, शोभित आश्रय पाया है माणिक बहुमोल को, हेमजटित छवि छाय७३ अपनी प्रभुता को सबै, बोलत झूठ बनाय । वेश्या वरष घटावही, योगी वरष बढ़ाय ७४ कहूं कहूं गुण दोपते, उ- पजत दुःख शरीर । मधुरी बानी बोल के, परत पांजरा कीर ७५ भले बुरे निबहँ सबै महत पुरुष के सङ्ग। चन्द्र १० सभाबिलास। सर्प जल अग्नि ये, बसत शंभु के अङ्ग ७६ विना कहेहू सतपुरुष, परकी पूरै प्राश । कौन कहतहै सूर्य को, घर घर करत प्रकाश ७७ कछु कहि नीच न छेड़िये, भलो न वाको सङ्ग । पाथर डारे कीच में, उछलि बिगारे अङ्ग ७८ मीठी खाटी वस्तु नहि, मीठी जाकी चाह । अमली मिसरी छाँड़िके, आफू खात सराह ७६ खाय न खरचै शुद्ध मन, चोर सकल लैजाय । पीछे ज्यों मधुम- क्षिका, हाथ मलै पछताय ८० उत्तम विद्या लीजिये, य- दपि नीच पै होय । परो अपावन और में, कञ्चन तजत न कोय ८१ जानि बूझ अजुगत करे, तासों कहा वसाय । जागत ही सोवत रहै, ताको कहा जगाय ८२ सजन बचावै कष्ट सों, रहे निरन्तर साथ। नैन सहाई ज्यों पलक, देह सहाई हाथ ८३ अरिक कर में दीजिये, अवसर को अधिकार । ज्यों ज्यों द्रव्य लुटाइहै, त्यों त्यों यश वि: स्तार ८४ बुद्धिमान गंभीर को, संगत लागत नाहिं।

११
सभाबिलास।
ज्यों चन्दनढिग अहि रहत, विष न होय तिहमाहिं ८५
सजन को दुखहू दिये, दुरजन पूरै आस । जैसे चन्दन
को घिसे, सुन्दर देत सुवास ८६ सजन चित कबहुँन
धरत, दुर्जन जनके बोल | पाहन मारै आम को, तउ
फल देत अमोल ८७ विरले नर पण्डित गुनी, बिरले
बूमनहार। दुखखण्डन बिरले पुरुष, जे उत्तम संसार ८८
जे करतार बड़े किये, मग पग धरत बिचार । दुर्जनहू
सों मिल चलें, बोलें रोस निवार ८६ जाहि बड़ाई चा-
हिये, तजैन उत्तम साथ । ज्यों पलाश सँग पान के,
पहुँचै राजा हाथ ६० बचन पारखी होहि तू, पहिले प्राप
न भाखाअनपूछे नहिं भाषिये, यही सीख जिय राख ६१
मुखरु श्रवण दृग नासिका, सबही के इकठोर । कहबो
सुनिबो देखिबो, चतुरन को कळु और ६२ इक कामिनि
अरु कविबचन, दोऊ रस को और । बेधक को मन बेधई,
वे कामिनि कवि और ६३ जोतू चाहै अधिक रस, सीख

१२ सभाबिलास। ईख की लेय । जो तोसों अनरस करै, ताहि अधिक रस देय ६४ नरकी अरु नलनीर की, गति एकै करिजोय । ज्यों ज्यों नीचो के चलै, त्यों त्यों ऊंचो होय ॥६५॥ अथ पखानो॥ कैसे निबहै निबल जन, करि सबलन सों गैर । जैसे वस सागर विषे, करत मगर सों बैर ६६ अपनी पहुँच विचारके करतब करिये दौर । ते ते पांव पसारिये,जेती लांबी सौर ६७ पिशुन छल्यो नर सुजन सों, करत वि- श्वास न चूक | जैसे दाह्यो दूध को, पीवत छांछहि फूक १८ फेर न हैहै कपटसों, जो कीजे व्योपार । जैसे हांडी काठकी, चढेन दूजी बार ६६ करिये सुख को होत दुख, यह कहु कौन सयान । वा सोने को जारिये, जासों फाटै कान १०० भले बुरे जहँ एक से, तहां न बसिये जायज्यों अन्याय पुरमें बिकै, खर गुड़ एकै भाय १०१ भाव भाव की सिद्धिहै, भाव भाव में भेव । जो माने तो

सभाबिलास।
१३
देवहै, नहीं भीतको लेव १०२ अति अनीति लहियेन
धन, जो प्यारो मन होय । पाये सोने की छुरी, पेट न
मारै कोय १०३ मूरख को पोथीदई, बांचन का गुणगाथ।
जैसे निरमल पारसी, दई आँघरे हाथ १०४ अति हठ
मत कर हठ बढ़े, बात न करि है कोय । ज्यों ज्यों भी
कामरी, त्यों त्यों भारी होय १०५ लालचहू ऐसो भलो,
जासों पूजै श्रास । चाटतहू कहुँ श्रोसके, बुझत काहु की
प्यास १०६ जैसो गुण दीनो दई, तैसो रूप निवन्ध ।
ये दोऊ कहँ पाइये, सोनो और सुगन्ध १०७ प्रेम निवा-
हन कठिन है, समुझ कीजियो कोय । भङ्ग भखन है सु-
गम पै, लहर कठिन की होय १०८ एक बस्तु गुणहोत
है, भिन्न प्रकृति के भाय । भँटा एक को पित कर, करत
एक को बाय १०६ बिन स्वास्थ कैसे सहे, कोऊ करुवे
बैन । लात खाय चुपकारिये, जु हो दुधारू धेन ११०
करै बुराई सुख चहै, कैसे पावै कोय । रोपै पेड़ बबूल को,

१४
सभाबिलास।
आम कहां ते होय १११ होय बुराई ते बुरो, यह कीन्हों
निरधार। खाड़ खनेगो और को, ताको कूप तयार ११२
एक भेष के आसरे, जाति वरण छिप जात । ज्यों हाथी
के पांव में, सबको पांव समात ११३कन कन जोरे मन
जुरे, खाते निबरे सोय। बूंद बूंद सों घट भरे, टपकत बीते
तोय ११४ श्रमही सों सब मिलत है, बिन श्रम मिले न
काहिं। सीधी अँगुरी घी जम्यो, क्योंहू निकर नाहिं११५
होत न कारज मो बिना, यह कहै सो अयान । जहां न
कुक्कुट शब्द तहँ होत न कही विहान ११६ यही बात
सबही कहें, राजा करै सो न्याव । ज्यों चौपर के खेल में,
पांसा परै सो दांव ११७ पर को अवगुण देखिये, अपनो
दृष्ट न होय। करै उजेरो दीप पै, तरे अँधेरो जोय ११८
अपनी अपनी गैरपर, सबको लागै दाव । जल में गाड़ी
नाव पर, थल गाड़ी पर नाव ११६ सुख दिखाय दुख.
दीजिये, खल सों लरिये काहि । जो गुर दीन्हे ही म.
१

सभाबिलास।
१५
रत, क्यों विष दोजे ताहि १२० अनपूछे ही जानिये,
मूढ़ देख मनमाहिं । छलकै ओछे नीरवट, पूरे छलकै
नाहिं १२१ बिनशत बार न लागही, अोछे जन की
प्रीति । अम्बर डम्बर सांझ के, ज्यों बालू की भीति १२२
कुल सुपूत जान्यो परै, लखि सब लक्षण गाता होनहार
विखान के, होत चीकने पात १२३ जो धनवन्त सुदेय
कछु, देय कहा धनहीन । कहा निचोरेनग्न जल, न्हान
सरोवर कीन १२४ होत निवाह न पापनो, लीन्हे फिरे
समाज | चूहा बिल न समातहै, पूछ बाँधिये छाज १२५
बिना प्रयोजन भूलहू, उटिये नाही गट । जानो नहिं
जा नगर को, ताकी पूछ न बाट १२६ इंगित औ
प्राकार तें, जानलेत जो भेट | तासों बात दुरै नहीं, ज्यों
दाई सों पेट १२७ आप कहै नाहिंन कर, दाता को है
हेत । आप न जावै सासरे, औरन को सिख देत १२८
जो कहिये सो कीजिये, पहिले कर निरधार । पानी पी

.
१६
सभाबिलास ।
घर पूछनो, नाहीं भलो बिचार १२६ पाछे कारज की.
जिये, पहिले यतन विचार। बड़े कहत हैं बांधि ये, पानी
पहलेपार १३० ठीक किये बिन और की, बात सांच
मतथएँ । हाथ अँधेरी रैन में, परी जेवरी सर्प १३१ झूठ
बिना फीकी लगे, अधिक झूठ दुख भौन । झूठ तितोही
बोलिये, ज्यों आटे में लोन १३२ ठौर देखके इजिये,
कुटिल सरल गति आप।बाहरटेढो फिरत है, बांबी सूधो
सांप १३३ दोऊ चाह मिलन को, तौमिलाप निरधारि।
कबहूँ नाहिंन बाजि है, एक हाथ ते तारि १३४ आप
प्रकारज आपनो करत कुसङ्गतिसाथ। पाय कुल्हाड़ी देत
है, मूरख अपने हाथ १३५ ताहीको करिये यतन, रहिये
जाकी आर। कौन बैठके डार पर, काटै सोई डार १३६
परतछ नीके देखिये, कह बरनै कोउ ताहि । कर कङ्कन
को आरसी, को देखतहै चाहि १३७ आये आदर ना करें,
जात रहे पछताय । अायो नाग न पूजिये, बांबी पूजन

सभाबिलास। जाय१३८निबल सबल के पक्षते, सबलन सों अनखात। देत हिमायत की गधी, एराकी के लात १३६ बहुत द्रव्य संचय जहां, चोर राज भय होय। कांसे ऊपर बीजुली, परत कहत सब कोय १४० अोछे नरके पेट में, रहै न मोटी बात । आध सेरके पात्र में, कैसे सेर समात १४१ तरसेहू परसै नहीं, नौढ़ा रहत उदास । जो सर सूखा भादवें, किसी उन्हाले आस १४२ हिलन मिलन चित- वन मिटी, वय बीते करतूत । योगी था सो उठगया, अासन रही भभूत १४३ मिलन चले आये बहुरि, तउ न रही तिय चिन्त । कांधे डाली कामली, योगी काके मिन्त १४४ तज के सुन्दर चतुर पिय, विरझे अनत बसाय । कूकर चौक चढ़ाइये, चाकी चाटन जाय १४५ निरखि प्रात पिय सौति सब, रही प्रीति हित हार । लेय परोसन झोंपड़ी, नित उठ करती रार १४६ वय रति मति गति चाह बिन, पिय रिझवन की वाक । धोबी २ -

सभाबिलास।
बेटा चांदसा, सीटी और पटाक १४७ रूट्यो पिय सौतिन
मिल्यो, सखिहि खिजत करभान।ना बस चलत कुम्हार
सों, खर के मेंठति कान १४८ पिय चितवन पठई सखी,
रही बैठ सुख लेय । चारौं कुतिया मिलगईं, पहरो काको
देय १४६ सब सुखन्द पिय हित करे, तऊ न रहतिय
नीति । भस ऊपर को लीपनो, अरु बाल की भीति १५०
पिय और चितवन चलन, घरतिय सों नहिं लेश जैसे
कन्ता घर रहे, तैसे गये विदेश १५१ बय बीते पाये
रमन, अब न लहत चित चाय। बीत्यो व्याह कुम्हारको,
भांडा लै लै जाय १५२ पीव परोसिन सों रहत, तियन
कहत डर काज । अपनी जाँघ उघारिये, आपहि मरिये
लाज १५३ सौतिन कोउ बय में गनी, पिय ते भयो
बियोग । जिह घर जितो बधावनो, तिहि घर तितनो
सोग १५४ तिय बैठी मन सकुच के, पिय आये नहि
माय । सने घर को पाहनो, ज्यों आवै त्यों जाय १५५

सभाबिलास।
सुख बिलसै योवन समय, फिर पछतावत बाल । गई बास
बोदार की, रही खाल की खाल १५६ सौति लरी पिय पै
गई, वहै रह्यो रिस पाग । घर की दागी बन गई, बन
में लागी आग १५७ पाय पलोटत दै तिया, दै तिय
सोवन साथ । इक दै दै अरु चीकनी, पुनि लाजू दोउ
हाथ १५८ पिय आये योबन वितै, बहुरो चले विदेश ।
दोनों खोई जांगना, मुद्रा अरु आवेश १५६ अद्भुत हित
प्रीतम प्रिया, सौतिन जानत सार।काजर सब कोउ देत
है, चितवन माहि बिचार १६० नौदा प्रौढ़ा सों कहत,
हों जानत रस घात । कूला में की मेंढकी, कहै समुद्र
की बात १६१ सौति आज योना कियो, हाँ न कहोंगी
सोय । हम तो दुरयो प्यार में, को कहि बैरी होय १६२
सौति बात मीठी कहत,तऊ सौति सतराय। सौगाहासूत्रो
पढ़े, अन्न बिलाई खाय १६३ आलि लई सँगटहल को,
करन लगी रस रास । गाड़र आनी ऊनको, बैठी चरै

२०. सभाबलास। कपाल १६४ सौतिप्रीति जोरत रहै, दुलहिन देत उठाय। आधौ बादै जेवरी, पाछे बकरीखाय १६५ जीवन लौंतिय रस स्मी, बीते भयो वियोग। कोल्हू सों खलि ऊतरी, भई पलीता योग १६६ मान मनाये विन कहत, आव खेल हँसबोल । बनिक दार बैठन न दे, कह झुक कोसो तोल १६७ नौढ़ासों अति रतिकरी, सो न कहत रत चाव।गोजामें के घावको, का जाने कैराव१६८ अधिक मानते तिय तजी, पियन मिले हित जोड़ । बनजारेकी आग ज्यों, गयो बलंती छोड़ १६६ सुच नायक सुच तिय स्मै, असुच न हिये समाय। कै हंसा मोती चुगै, कैलंघन रह जाय १७० कबहुँ न रस कै कुच गहे, रिसकै गहेन केश । जैसे कन्ता घर रहै, तैसे गये विदेश॥ १७१॥ अथ प्रेम॥ भूतलगे मदिरा पिये, सब काहू सुध होय। प्रेम सुधा रस जिन पियो, तिन न रहे सुध कोय १७२ अद्भुत

२१
सभाबिलास।
पैंडो प्रेमको, न्याय कहत सब कोय । नयननसों नयना
मिले, घाव करेजे होय १७३ जे घट बिरह वा अगिन,
परपक भये सुनाय । तिनही घटमें नन्दभनि, प्रेम अमी
ठहराय १७४ जब बिछुरत तब होत दुख, मिलिके हियो
सिराय । याही में रस है भये, प्रेम कह्यो क्यों जाय १७५
जबलग मनके बीच कछु, स्वास्थ को रस होय । शुद्ध
सुवा कैसे कहै, परै बीच में नोय १७६ मन मतङ्ग मद
रस मत्यो, धस्यो प्रेम रन धाय । लोक वेद कुलकान
की, दई सैन बिचलाय १७७नीको विरह समीप तें,
जामें मिलनकि पास। कहिये भलो संयोग क्या, जाने
बिछुरनवास १७८ प्रीति न टूटै अनमिले, उत्तम मनकी
लागी सौयुग पानीमेंरहै, मिटै न चकमक आग|| १७६ ॥
अथ नेत्र॥
अमी हलाहल मद भरे, श्वेत श्याम रतनार । जि-
यत मरत झुक झुक परत, जेहि चितवत यक बार १८०

२२ सभाविलास। दौरत काहू और के, थके न कोऊ और । मेरे दृग पै धक रहैं, देखत पिय दृग दौर १८१ प्यारो दृग अञ्जन दिये, यहै लूक जन होय । श्राय हिये मन ले गई, देख सक्यो नहिं कोय १८२ नयन सलोने अधर मधु, कह रहीम घट कौन । मीठो भावै लोनपर, मीठेहू पर लौन १८३ मन राखौं हौं बरजिकै, जिय राखौं सम- भाय । नयना बरजे ना रहें, मिलैं अगाऊ जाय १८४ जब बरजत तब ना रहे, गये प्रेम रस लैन । अपबस तें परबस भये, ये विश्वासी नैन १८५ पल न लगत है एक पल, छिन न घटत घट साँस । साहस मन जब ते चुभी, नैन सैनकी फाँस १८६ समझाये समुझत नहीं, पलक देत नहिं चैन।नीर भरे प्यासे रहें, निपट अनोखे नैन १८७ पिय मूरति चितलायके, अब रोवें यह नैन । बैरी अाग लगायके, दोरे पानी लेन १८८ प्यारे नयनन की कथन, कैसे कहीं कवित्त । खिनक

सभाविलास।
२३
साह खिन चोरटा, खिन बैरी खिन वित्त १८६ अनि-
यारे तीखे कुटिल, अंकुश से दृग बान । लागत सीधे
प्राय के, पाछे खींचें पान १६० प्रीतम नैनन में गिरी,
जिन नैनन की सैन । फिर काढ़न को चाहिये, वेई
तीखे नैन १६१ लटपट पग धरती धरै, अटपट बोलत
वैन । कछु पिय सों खटपट भई, सु टप टप टपकत
नैन १६२ पात झरते इमि कहैं, मुन तरुवर बनराय ।
अबके बिछुरे कब मिलें, दूर परेंगे जाय १६३ बालम
ऐसी प्रीति कर, ज्यों बारिज हित बार । वह सूखे बह ना
रहे, मिटै मूल दलडार १६४ प्रीति जो सीखो ईख सों,
जहां जो रस की खान । जहां गांठ तहँ रस नहीं, यही
प्रीतिकी बान १६५ बल्लरियां कुलवंतियां, नेहा नाचू
कन्त । जित्थे कण्ठ बिलग्गियां, तित्थेही सूखन्त १६६
प्रीति जो ऐसी कीजिये, ज्यों निशि चन्दा हेत । शशि
बिन निशि है सांवरी, निशि विन चन्दा श्वेत १६७

२४
समाविलास।
बिपति बराबर सुख नहीं, जो थोरे दिन होय । इष्ट मित्र
बन्धू जिते, जान पर सबकोय १६८ नेह निबाहन है
कठिन, फिखो जगत सब जोय । विमल प्रीति नहिं दे-
खिये, स्वास्थ लग सबकोय १६६ प्रीति प्रीति सब कोउ
कहै, कठिन तासु की रीति । श्रादि अन्त निब है नहीं,
वारू कीसी भीति २०० सहसबार डुबकीलई, मुक्ता करहि
न लाग । सागर को कह दोषहै, बुरे हमारे भाग २०१
बाला निकसी तीर जव, नीर चुवन वरवीर । मानौ अँ-
सुवन रोवती, तन बिछुरन की पीर २०२ अलकावलि
मंदोषये, गोरे मुख की लोय । ज्यों रूखनमों चाँदनी,
झिलमिल झिलमिल होय २०३ मुक्ता तियके कान में
कागुन सदा कँपाय । तिरछी चितवन ते डरै, मत फिर
बेध्यो जाय २०४ रोमावलि हियरे सखी, नाहिन एरी
नाहिं।श्याम ध्यान हिरदय बसै, ताकीहै परछाहिं २०५
चुम्बन समय जु नासिका, बेसर मुनिय इलाय । अधर

सभाबिलास।
चुरावन पीय पै, मानों हाहा खाय २०६ तिलचारा मा-
निय सलिल,अलक फन्द बलचारभन पक्षी गहि गहि
किते, डारै श्रवण पिटार २०७ गुञ्जा ऐसी हो रहे, मुक्ता
बेसर बाल । नयन ओर के श्याम सब, अधर ओर के
लाल २०८ जबते मो ऊपर पड़ी, श्याम सलोनी जोति ।
लौनी लागै भीति ज्यों, देह दूवरी होति २०६ गोरे मुख
पर श्याम तिल, ऐंच लियो जिय मोर। नही कैसे बच
रहै, पड़े चांदनी चोर २१० फेंटा चले छुड़ायके, निवल
जानि पिय मोहिं । मन की लगन छुड़ायहो, तो बल
बदिहाँ तोहि २११ गवन समय फेंटा गयो, सुन्दर हित
जियजान । छूटत ही दोऊ छुटे, उत फेंटा इतमान २१२
गौन समय फेंटा गह्यो, छोड़ जु कह्यो सुजान । पीउ
पियारे कहो तुम, फेंटा तजूं कि पान २१३ आज सखी
हम इम सुन्यो, पहु फाटत पिय गौन । पहु अरु हियरे
दोय हैं, पहिले फाटै कौन २१४ बाला प्रथम वियोगिनी,

२६
सभाबिलास।
घर ही घर पूर्वत । बलम पयाने ए सखी, बल याह बा.
दंत २१५ बिरह घटा कौंधा सुरत, क्षण क्षण कौंधत आहि।
नयन नीर बरपालगी, गरजन आहि कराहि २१६
सूनो भवन विदेश पिय, उससि साँस तिय लेत । मूरति
आवै ध्यान में, उठ उठ आदर देत २१७ अाज दीज
विदेश पिय, शशि निकस्यो इहि ओर। मम नयना अरु
पीयके, आय भये इकठौर २१८ उन विन सब ऋतु फिर
गई, देख दिनन के फेर । जेठ भिजोई प्रांसुवन, सावन
जारी घेर २१६ प्रीतम तुम्हरे दर्श को, रह्यो अधर जिय
आयाअवकह आज्ञा होति है, रहै कि फिर घट जाय २२०
मो मन मनसा इम हुती, जन्म न छाडौं पाय । बिछुरन
अंक जो विधि लिखे, तासों कहा बसाय २२१ मुख श्री.
षम पावस नयन, जिय महिया जड़ काल।पिय बिनतन
ते तीन ऋतु, कबहुँ न मिटत जमाल २२२ जबलग हिय
में घर सकी, तबलग धरोजु धीर। मीरन अब कैसी बनी,

२७
समाविलास।
जु अधिक पिरानी पीर २२३ मन बहलावत दिनगये,
महाकठिन है रैन । कहा करों कैसे मरौं, बिन देखे नहि
चैन २२४ खिन बैठे खिन उठचलै,खिनखिन ठाढ़ी होय।
घायलसी घमति फिरै, मरम न जाने कोय २२५ साहस
तन मन ज्ञान गुण, सबै गये पिय सङ्ग। चितवन दामिनि
सी गिरी, मरम कियो जिन अङ्ग २२६ बिरही लोगन में
रहत, तिय विन नीर गंभीर। मीन रहत सब नीर में, इन
मीनन में नीर २२७ तेरे बिरह समुद्र में, हौं जहाज भइ
कन्त।तन मन योवन डूबियो, प्रेम ध्वजा फहरन्त २२८
रोम रोम बूंदै चुपैं, लोग प्रस्वेद कहन्त । सजनी सजन
वियोग ते, सब तन रुदन करन्त २२६ पिय बिछुरत वि-
छुरे सबै, तनमन के सुख चैन । घर बाहर न सुहात कछु,
तलफ कटें दिन रैनै २३० सम्मन इक दिनवै हुते, बिच
न सुहाते हार । वायु जो कोऊ फिर गई, अब विच परे
पहार २३१ कालकुट ते कठिन है, जो ब्यापै उह लाल ।

सभाबिलास।
यम नेरे पावै नहीं, विरह काल को काल २३२ तन
दुख मन दुख नयन दुख, हियेभई दुख खान । मानौ
कवहूँ ना हुती, या सुखप्तों पहिचान २३३ रूप सयानप
चातुरी, सबै गई पिय साथ । देखौ सखी जु रहगई, एक
बौरई हाथ २३४ हौं सजनीजानत नहीं, पिय बिछुरन
की सार । जिय विठुरन ते कठिन है, पिय विठुरन की
बार २३५ हौं सजनी जानत नहीं, पिछी भूले भाय ।
बकी बेर जु फिर मिलौं, जन्म न छोड़ौं पाय २३६
अहमद गति अवतारकी, कहत सबै संसार। बिछुरे मानुष
फिर मिलें, यही जान अवतार २३७ विरह तपन अति
ही कठिन, जानत है सब कोय। देखि सखी या आगको,
जरिके शीतल होय २३८ बिरह दही पनघट गई, तपन
न तऊसिराय। भरै धरै शिरगागरी रीती लै लैजाय२३६
मीरन बिछुरतही पिया, उलटगयो संसार । चन्दन
चन्दा चांदनी, भये जरावनहार २४० तुम बिन एतो

सभाविलास।
२६
को करै, छुपाजु मेरेनाथ । मोहिं अकेली जानि के, दुख
राख्यो है साथ २४१ मीरन प्यारे अस कह्यो, सपने देखो
मोहिं । तुम बिन नींद नावही कैसे देखों तोहिं २४२
प्यारे मेरे नींद की, बात तिहारे हाथ । पावत है तुम
साथही, गई तिहारे साथ २४३ एकौ दुख निवखो नहीं,
दूजो पहुँच्यो श्राय । हियो कहाँ के पुल कहाँ, दुख की
किधौं सराय २४४ कहा करौं परगट नहीं, लागत तोसों
घात | प्यारे सपने मांझ में, मेरी तेरी बात २४५ प्रीतम
प्यारे के विरह, नागिनसी यह रैन । लम्बीकारी विषभरी,
देख भज्यो है चैन २४६ घरी पहरसी पहर दिन, दिन
भा पहरसमान । छिन २ बरि विन मिले, मोहिं तिहारी
धान २४७ लालपिया के बिछरतै, बिछुर गये सब चैन ।
भूख प्यास नींदौ गई, ऊर्द्ध वायु भये नैन २४८ जबलग
चल मारग पिया, आवन की प्रोसेर । तब लग हिय में
हे सखी, हाँसनि के भये ढेर २४६ प्रीतम तुम गुन बे;
१

समाविलास।
लरी, पसरीमों उर माहिं । नेह नीरसों नित बरै, क्यों
सूखत नाहिं २५० प्रीतमको संदेशरा, कहत हियो रुधि-
याय । सधे बात न श्रावही, योंही कहियो जाय २५१
प्रीतम को पतिया लिखी, लिखत लिखी भरताव । वामें
और कछू नहीं, कैहाहाकै आव २५२ करकाँपत पतिया
लिखत, जल भरि श्रावत नैन । कोरो कागद हाथ दै,
मुखही कहिये बैन २५३ कागद भीजत नयन जल,कर
काँपत मसिलेत । पापी बिरहा मन बसत, बिथा लिखन
नहिं देत २५४ तुम बिछुरत छिन में मरौं, कहा जियों
बिन तोहिं । तुम मूरति मो मन बसैं, वही जियावत
मोहिं २५५ लिखन पढ़नकी है नहीं, कही सुनी नहिं
जात । अपने जिय ते जानियो, मेरे मनकी बात २५६
इह गुन पतिया ना लिखौं, धरे रहो मन मौन । तुम
प्रीतम जिय में बसौ, पाती बाँचै कौन २५७ पतिया
ताहि पठाइये, जो साजन परदेश । निशि दिन हिरदे

सभाबिलास।
३१
में बसै, ताको कहा संदेश २५८ बायस राहु भुजङ्ग हर.
लिखत तिया ततकाल । लिखि लिखि पोंछत फिरिलि-
खत, कारन कौन जमाल २५६ प्रीतम तुम मति जा.
नियो, भयो दूरको बास । देह खेह कितहूँ रहै, प्राण ति.
हारे पास २६० मनमाला तुव नाम की, जपत रहौं दिन
रैन । नयन पियासे दरश के, नेक न पावें चैन २६१
बासर भूख न नींद निशि, चित चिन्ता पिय तोरि।लो-
यन गङ्ग तरङ्ग गति, उठत हिलोरि हिलोरि २६२ पाती
लिखन सँदेश तहँ, जहाँ न पहुँचै अाप । प्रीति लुकअन
आंजिके, करिये मीत मिलाप २६३ मन चाहत है मि
लन को, मुख देखन को नैन।श्रवण जो चाहतहैं सुनन,
पिय प्यारेके बैन २६४ करकमलन पाती लिखों, प्यारी
चतुर सुजान । इक इक अक्षर पै सखी, वारों तन मन
प्रान २६५ मेरो मन तो रह्यो, तेरो मन मो माहि।
दोऊ व्याकुल बिन मिले, चैन शरीरहि नाहिं २६६तेरो

सभाबिलास। मेरो एक मन, दिखियत दोय शरीरबान जो मारै काम इक, होत दुहुन को पीर २६७ मसि लेखन कागद नहीं, समाचार है मौन । अब हम तुम एकै भये, लिखै कौन को कौन २६८ नाद शब्दमें बश कियो, मांस बेच धन लेहु । मृगछाला पर गाइयो, यह माँगौं मुहि देहु २६६ मृगई चितई मृगा तन, लगे अहेरी घात । मिल नरसोई रावरे, चला न इन के गात २७० दधिसुत अबला अ- धरपर, शोभा ते लटकन्त ।मानोभुजा सिकन्दरी, पन्थी मने करन्त २७१ तन समुद्र मन लहर है, रूप कहर दरि- यावामानो भुजा सिकन्दरी, पन्थी यहांनाव ॥२७२॥ सो० बुध विद्या गुण ज्ञान,नेम चाव अरु हर्ष वल । ये तजि होहिं अयान,जिहघटबिरहासंचरै॥२७३॥ अथ तुलसी कृत॥ अपने अपने कर थपे, लिख पूजत तियभीत । सुफल फले मन कामना, तुलसी प्रेम प्रतीत २७४ तुलसी जहां

सभाबिलास।
३३
विवेक नहि, तहां न कीजै बास । श्वेत श्वेत सब एक
से, करर कपूर कपास २७५ राम नाम आराधबो, तु.
लसी बृथा न जाय । लरकाई को पैरवो, आगे होत स.
हाय २७६ जिमि पनिहारी जेवरी, बँचत कटै पषान ।
तुलसी रसना राम कहु, पाप कितक अनुमान २७७
तुलसी रसनातौ भली, जो तू सुमिरै राम । ना तो काढ़
निकासिये, मुख में भलो न चाम २७८ तुलसी विलंब
न कीजिये, भजलीजे रघुवीर । तन तरकस ते जात है,
श्वांस सरीखे तीर २७६ एकै साधे सब सधै, सब साधे
सब जाय। जोगहि सेवै मूलको, फूलै फलै अघाय २८०
स्वास्थ सीताराम है, परमारथ सियराम । तुलसी तेरो दू-
सरे, द्वार कहा है काम २८१ स्वास्थ परमारथ सुलभ,
सकल एकही ओर। द्वार दूसरे दीनता, उचित न तुलसी
तोर २८२ तुलसी सोई चतुरता, राम चरण लौलीन ।
परधन परमन हरन को, बेश्या बड़ी प्रवीन २८३ चतुराई
३

सभाबिलास।
चूल्हे पर, ज्ञानी जमके घाय । तुलसी राम सों प्रेम
नहिं सो जर मूल नशाय २८४ मोर २ सब कोउ कहत,
तूको कह निज नाम । कै चुप साधै सुनि समुझि, के
तुलसी भज राम२८५ तुलसी अपने रामको, रीझ भजौ
कै खीज । खेत परे ते जामिहै, उलटे सीधे बीज २८६
सी कहते सुख उपजिहै, ता कहते तम नास । तुलसी
सीता जो कहत, राम न छोड़तपास २८७ तुलसी अघ
सब दूरगे, रा अक्षर के लेत । फिर नेरे आवें नहीं, मा
अक्षर पढ़ देत २८८ आप आपने को अधिक, जिहि
विधि सीताराम । तुलसी ताके पग तरे, मेरे तन को
चाम २८६ तुलसी जोपै राम सों, नाहिंन सहज सनेह।
मूड़ मुड़ायो सो बृथा, भाँड़ भये तजि गेह २६० मूड़
उघारन किन कह्यो, बरज रहे प्रियलोग । घरही सती
कहावती, जरती नाहिं वियोग २६१ यथालाभ संतोष
सुख, रघुपति चरण सनेह । तुलसी जो मन हाथ है,
-

सभाबिलास। ३५ जस कानन तस गेह २६२ प्रीति राम भजनीति पथ, चले राग रस जीति । तुलसी सन्तन के मते, यही भक्ति की रीति २६३ तुलसी खोटे दास को, रघुपति राखत मान |ज्यों मूरख उपरोहितहि, देय दान यज- मान २६४ काहू के धनधाम है, काहू के परिवार। तुलसी ऐसे दीन के, सीताराम अधार २६५ नहिं सेवा नहिं बुद्धिबल, नहिं विद्या नहिं दाम । तुलसी पतित पतङ्ग की, तू पति राखै राम २६६ एक भरोसे राम के, किये पाप भर मोट । जैसे नारि कुनारि को, बड़ी खसम की प्रोट २६७ तुलसी छलबल छांडिके, करिये राम सनेह । अन्तर कह भरतार सों, जिन देखी सब देह २६८ सब देखे परखे लखे, बहुत कहे कह होय । तुलसी सीताराम विन, अपनो नाही कोय २६६ कै अधीन यांचे नहीं, शीश नाय नहिं लेय । तुलसी मानो याचकहि, विन रघुवर को देय ३०० गङ्गा यमुना सरस्वती, सात समुद्र

३६
सभाबिलास।
भरपूर । तुलसी चातक के मते, बिन स्वाती सब धूर ३०
एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास । स्वातिवून
रघुनाथ हैं, चातक तुलसी दास ३०२ ज्यों कामी
चित्त में, चढ़ी रहत नित बाम । ऐसे हो कब लागि हो
तुलसी के मन राम ३०३ ज्यों गरीब की देह में, मात्र
पूस को घाम । ऐसे हो कब लागिहौ, तुलसी के मन
राम ३०४ तीन टूक कोपीन के अरु भाजी विन लौन
तुलसी रघुबर उर बसैं, इन्द्र बापुरो कौन ३०५ गुण स्व
रूप बल द्रव्य को, प्रीति करै सबकोय । तुलसी प्रीति
सराहि जो, इन ते बाहिर होय ३०६ मीन काट जर
घोइये, खाये अधिक पियास । तुलसी प्रीति सराहिये,
मुये मीतकी आस ३०७ कहा कहाँ छबि प्राजकी, भरे
बने हो नाथः। तुलसी मस्तक तब नवै, धनुष बान ले
हाथ ३०८ मुरली मुकुट दुराय के, नाथ भये रघुनाथ
तुलसी रुचि लखि दासकी, धनुष बान लियो हाथ ३०६

समाविलास।
३७
पशू गढन्ते नर भयो, भूले सींगरु पूंछ । तुलसी हरिकी
भक्तिबिन, धृक दाढ़ी अरु मूंछ ३१० प्रभुताको सबकोउ
चहै, प्रभुको चहै न कोय। जोतुलसी प्रभुको चहै, आ.
पुहि प्रभुता होय ३११ तुलसी घरके घेरमें, घरी घरी तन
छीन । कबहूं ना बन बन फिरै, कर करवा कोपीन ३१२
घरके घमर घेर में, रामचरण लौलीन । तुलसी ऐसे सन्त
को, । कह करवा कोपीन ३१३ काम क्रोध मद लोभकी,
जब लग मन में खान । तबलग पाण्डत मूरखौ, तुलसी
एक समान ३१४ तुलसी या जग आय के, कौन भयो
समरस्थ । इक कञ्चन अरु कुचन को किन न पसारे
हत्थ ३१५ मन राखत बैराग में, घर में राखत रांड़ ।
तुलसी किरवा नीमको, चाख्यो चाहत खांड़ ३१६ जब
लग अंकुश शीश पर, तबलग निर्मल देह । तुलसी
अंकुश बाहिरे, शिरपर डारत खेह ३१७ तुलसी काया
खेत है, मनसा भयो किसान । पाप पुण्य दोउ बीज हैं,

N ३८ सभाविलास। बवै सुलुनै निदान ३१८ एकघड़ी आधी घड़ी, आधी हू में अाध । तुलसी संगति साधु की, हरै कोटि अप- राध ३१६ स्वामी ते सेवक बड़ो, जो निजधर्म समान। राम बाँधि उतरे जलधि, कूदि गये हनुमान ३२० स्वामी को सेवक घने, सेवक को प्रभु एक । तुलसी दो में सो बड़ो, जाके मन में टेक ३२१ तुलसी मन को मुकुर है, लखै सुलक्षण कोय । जैसो जाको भाव है, तैसो देखें सोय ३२२ होत भले के अनमलो, होत दानि के सूम । होत कुपूत सुपूत के, ज्यों पावक महँ धूम ३२३ नीच निचाई नातजै, साधुनहू के संग । तुलसी चन्दनविटप बस, विन विष भौन भुवंग ३२४ आसनदृढ़ आहारहढ़, सुमति ज्ञान दृढ़होय । तुलसी बिना उपासना, विनदूलह की जोय ३२५ तन सुखाय पिंजर करै, धरै रैनि दिन ध्यान । तुलसी मिट न बासना, बिना बिचारे ज्ञान ३२६ आवतही हरषै नहीं, नयनन नहीं सनेह । तुलसी तहां

सभाबिलास।
३६
न जाइये, कञ्चन वर्षे मेह ३२७ हरष उठे श्रादर कर, आ.
वत जान अतीत । तुलसी तबहीं जानिये, परमेश्वर सों
प्रीत ३२८ तुलसी या संसार में, भांति भांति जे लोग।
हिलिये मिलिये प्रेमसों, नदी नाव संयोग ३२६ तुलसी
बिलंब न कीजिये, मिलिये सब सों धाय । को जाने
किहि भेष में, नारायण मिलिजाय ३३० तुलसी कहत
पुकार के, सुनो सकल दै कान । हेमदान गजदानते,
बड़ो दान सनमान ३३१ परसुखसम्पति देखि सुनि,
जरहिं ते जड़ बिन आग । तुलसी तिनके भागते, चलै
भलाई भाग ३३२ तुलसी कबहुँ न त्यागिये, अपने कुल
की रीति लायकहीसों कीजिये,ब्याह र अरु प्रीति३३३
ज्ञान गरीबी हरिभजन, कोमल वचन अदोष । तुलसी
काहुँ न छोड़िये, क्षमा शील संतोष ३३ ४ तुलसी सु.
पुरुष सेइये जब तब आवै काम। लङ्क विभीषणको दई, बड़े
दुचित में राम ३३५ तुलसी निज कीरति चहै, पर की

सभाबिलास। कीरति खोय । तिनके मुख मसि लागिहै, मिटैन मरि है धोय ३३६ बहुत गई आनन्द सों, रही नेकसी प्राय । तुलसी चिन्ता मतकरी, श्रीरघुनाथ सहाय ३३७ तुलसी जगमें आयके, करलीजे दो काम। देवेको टुकड़ा भलो, लेबे को हरिनाम ३३८ तुलसी या संसार में, पंच रत्न हैं सार। साधुमिलन अरु हरिभजन, दयादान उपकार ३३६ बैर सनेह सयानको तुलसी नो नहिं जान । सो किमि प्रेम मग पगधरै, पशु बिन पूंछ बिखान ३४० तुलसी तृण जल कूपको, निर्धन निपट निकाज । कैराखै कै सँग चले, बांह गहेकी लाज ३४१ लिख लिख लिख सब जग लिख्यो, पढ़ि पढि पढ़ि कह कीन । बढ़ि बढ़ि बढ़ि घट घट गये, तुलसी राम न चीन ॥ ३४२ ॥ अथ श्लेष ॥ पीव कचौरी है सखी, पूरी परती नाहिं। मन लडुबा करती फिरी, बिरह दही मनमाहिं ३४३ कचौरी पिय ए

सभाबिलास।
सखी, पकौरी पिय नाहिं । बराबरी कैसे करों, पूरी परै कि
नाहिं ३४४ अमिली बरले हो रही पीपर पास न जाउँ
जामुनि भेद न पावहीं, तासों में अठिलाउँ ३४५ करना
फूल्यो ए सखी, सोपी बिन क्या करना । जो प्रीतम कर
ना गहैं, तो जीले क्या करना ३४६ नारंगी हों पीव
सों, यह अनारपन मोहि ।जो मैं पीवे सेवती, सदा सदा
फल होहि ३४७ तो ताकति निशि दिन रहै, तूती निपट
अजानालाल कहै सो कीजिये, तज मैना की बान ३४८
सूख छुहारा तन भया,गिरी परै सब देह । किसमिस लिखें
संदेशरा, नौज लगौ यह नेह ३४६ करछूही बरटाइ नहिं,
तवा टाकनी नाहिं । चौके गर वोघारियां, रसन रसोई
माहि ३५० पालक लेने हाँ गई, पिय सोया पाया। मैं
थी निपट अजान, लाल में चूक जगाया ॥ ३५१ ॥
सो० कीकर पाकर तार, जामन फलसा आमिला।
सेव कदम कचनार, पीपल रत्ती तू न तज॥३५२॥

सभाबिलास। अथ प्रश्नोत्तर ॥ कहा नवला करिसकै,कहा न सिन्धु समाय। कहा न पावक में जरै, काल काहि नहिं खाय ३५३ सुत नहि अवला करिसकै, मन नहिं सिन्धु समाय । धर्म न पावक में जरै, नाम काल नहिं खाय ३५४ प्रीतम या कलि- काल में, कह ऐसे को प्राहि । एक बस्तु जिहि सौंपिये, दे दश गुण करि ताहि ३५५ सुनो अर्थ मन मोहनी, है यह धरा सुभाइ । बोये एकै बीजके, दे दश गुण करि ताहि ३५६ ऐसो बहुभख कौन है, खात जो नाहिं अ- घायाखात खात भोजन घटे, तवापहि मरिजाय ३५७ बहु भख ज्वाला जानिये, तृण लकड़ी बहु खाय । जब भोजन घट जातहै, तब सीरी है जाय ३५८ हग मंदे सब देखिये, कौन मुकुर सो ईठ । जो चख खोल निहा- रिये, कळू न आवै दीठ ३५६ वह स्वप्ने को मुकुर है, सोवत सब दिखराय । जागे कछु सूझै नहीं, जब गदै

सभाबिलास।
४३
खुल जाय ३६० रहत भाकसी में सदा, चिन्ता कळु न
जनाय । रुदन करै छूटै जबै, वाको नाम बताय ३६१
चालक वाको नाम है, गर्भ भाकसी जान । जब निकसै
तब रोय है, वाको यही बखान ३६२ तिय बिगार नर
शिरपरै, नर बिगार शिर तीय । ए चारोंही पूछिये, कहाँ
सोच के जीय३६३ भूमि बिगारतश्वानिनी, नाम श्वान
को लेइ । हानिकर मंजार सो, दोष मँजारी देइ ३६४
न्यारे न्यारे पुरुष हैं, सकल होहिं इक ठाम । तब सब
कोऊ कहत हैं, नारी उन को नाम ३६५ मनके तबलों
पुरुषहैं, न्यारे न्यारे आहि । धागे माहिं परोइये, माला
कहिये ताहि ३६६ न्यारी न्यारी नारि है, मिले सो
पुरुषन माहि। तब सब कोउ नर भाखिये, नारी क-
हियत नाहिं ३६७ अश्व अश्विनि इकसंग हैं, जबहि
कहत दल होय । कहत सबै घोड़ा जुरे, घोड़ी कहत
न कोय ॥ ३६८॥

सभाबिलास।
अथ कुण्डलिया॥
बैरी बँधुवा बानिया, ज्वारी चोर लवार | व्याभिचारी
रोगी ऋणी, नगरनारिकोयार। नगर नारिको यार, भूलि
परतीति न कीजै। नौ सौ सौहें खाय, चित एको नहि
दीजै । कहि गिरिधर कविराय, घरै आवै अनगैरी। हित
की कहै बनाय, जानिये पूरो बैरी ३६६ विना विचारे जो
करै,सो पाछे पछिताय काम बिगारे यापनो, जगमें होय
हँसाय । जग में होय हँसाय, चित्तमें चैन न पावै । खान
पान सनमान, रागरंग मनहिं न आवै । कह दुःखकछु
टरत न टारे । खटकतहै जिय माहिं, कियो जो विना
विचारे ३७० बीती ताहि बिसारदे, आगे की सुधिलेय ।
जोबनि आवै सहजमें, ताही में चितदेय । ताही में चित
देय, बात जोही बनिगावै । दुर्जन हँसे न कोय, चित्तमें
खेद न पावै । कह० यही कर मन परतीती | आगे को
मुखहोय, समुझ बीती सो बीती ३७१ साई ये न बिरु-

४५ सभाबिलास। द्धिये, गुरु पण्डित कवि यार।बेटा बनिता पौरिया, यज्ञक- रावनहार । यज्ञकरावनहार, राज मन्त्री जो होई । विन परोसी वैद्य,आपको तपै रसोई। कह यहै कैसी समझाई। इन तेरह तें तरह दिये, बनि आवै सांई ३७२ साईं अपने चित्तकी, भूल न कहिये कोय । तवलग मनमें राखिये, जबलग कारज होय । जबलग कारज होय, भूल कवहूं नहिं कहिये । दुर्जन तातो होय, आप सीरे द्वै रहिये । कह० बात चतुरन के ताई। करतूती कहि देत, आप क- हिये नहिं साई ३७३ चिन्ता ज्वाल शरीर बन, दावा लगि लगि जाय । प्रकट धुत्रां नहिं देखिये, उर अन्तर धुंधुवाय । उर अन्तर धुंधुवाय, जरै ज्यों कांचकी भट्टी। जरगो लोहू मांस, रहगई हाड़ की उट्टी। कह० सुनो हो मेरे मिन्ता। वे नर कैसे जियें, जाहि तन व्यापत चिन्ता ३७४ राजाके दरबारमें, जैये समयो पाय । साई तहां न बैठिये ,जहँ कोउ देय उठाय।जह कोउ देय उठाय,

४६
सभाविलास ।
बोल अनबोले रहिये । हँसिये ना हहराय, बात पूछे ते
कहिये। कह समय सों कीजे काजा । अतिआतुर नहिं
होय,बहुरिअनखैहै राजा३७५ कृतघन कबहुँ न मानहीं,
कोटिन करोजोकोय । सरबस आगेराखिये, तऊनअपनो
होय । तऊन अपनो होय, भले की भलीन माने । काम
काढ़ि चुप रहै, फेरि तिहिं नाहिं पिछाने । कह० रहत
नितही निर्भय मन। मित्र शत्रु सब एक दाम के लालच
कृतघन ३७६ जाकी धन धरती लई, ताहि न लीजे
सङ्ग।जो सँग राखेही बने, तो करि राख अपङ्ग। तो करि
राख अपङ्ग, फेरि फरकै सो न कीजे। कपट रूप बतराय,
ताहि को मन हरिलीजे । कह० वटक जैहै नहिं ताकी।
कोटि दिलासा देउ, लई धन धरती जाकी ३७७ साई
अपने भ्रात को, कबहुँ न दीजे त्रास । पलक दूर नहि
कीजिये, सदा राखिये पास । सदा राखिये पास, त्रास
कबहूं नहिं दीजे त्रास दियो लङ्केश तासु की गति सुनि
,

समाबिलास। लीजे । कह० राम सों मिलियो आई । पाय विभीषण राज, लङ्कपति बाज्यो साई ३७८ साई बेटा वाप के विगरे भयो अकाज । हरनाकुश अरु कंस को, गयो दुहुनको राज । गयो दुहुनको राज, बाप बेटा के बिगरे। दुशमन दावादार, भये महि मण्डल सगरे । कह० उन्हें काहू न बताई । पिता पुत्र की रारि, लाभ एकौ नहि साई ३७६ साईं नदी समुद्र को, मिली बड़पनो जानि । जाति नाश भइ मिलतही, मान महत की हानि । मान महत की हानि, कहो अब कैसी कीजे । जल खारी है गयो, ताहि कहु कैसे पीजे । कह० कच्छ मच्छ न स- कुचाई। बड़ो फजीहतचार, भयो नदियनको साई३८० साई सन अरु दुष्टजन, इनको यही स्वभाव । खाल खिं- चावें आपनी, परबन्धन के दाव । परबन्धन केदाव, खाल अपनी खिंचवावें । मुण्ड काटिके कुटिय, तऊ पर बाज न आवें। कहजरे अपनी कुटिलाई । जल में गिरि सड़

सभाबिलास।
गये, तऊ छोड़ी न खुटाई ३८१ साई समय न चूकिये,
यथाशक्ति अनुमान । को जाने को आय है, तेरी पौरि
प्रमान । तेरी पौरि प्रमान, समय असमय तकि आवै।
ताको तू मन खोलि, अङ्कभरि कण्ठलगावै । कह० सबै
यामें सधि आई । शीतल जल फल फूल, समय जिन
चूको सांई ३८२ साईं हरि ऐसी करी, बलिके द्वारे जाय।
पहिले हाथ पसारिक, बहुरि पसारे पाय। बहुरि पसारेपाय,
मतो राजा ने बतायो। भूमि सबै हरिलई, बांधि पाताल
पठायो । कह० राव राजन के ताईं। छल बल करि पर
भूमि, लेतको तृपत्यो साई ३८३ साईं पुर पाला पखो,
आसमान ते प्राय । पंगुहि अन्धे छोड़ि के. पुरजन चले
पराय । पुरजन चले पराय, अन्ध इक मतो बिचायो ।
पंगु कन्ध पैलियो, दृष्टि वाकी पग धाखो। कह० मते
है चलिये साईं। बिना मते को राज, गयो रावण की
नाई ३८४ सोना लेने पी गये, सूनो करि गये देश ।

सभाबिलास। सोना मिला न पी फिरे, रूपा होगये केश। रूपा होगये केश, रूप सब रोय गँवायो । घर बैठी पछिताय, कन्त अ- जहूं नहिं आयो । कह० लोन बिन सबै अलोना । जब यौवन ढलि जाय, कहाले करिये सोना ३८५ मोती लेने पीगये, खार समुन्दर तीर । मोती मिले न पी मिले,न- यनन टपकत नीर। नयनन टपकत नीर, पीर अब कासों कहिये। बीते बारह मास, पिया बिन घरही रहिये। कहा सांझ डारत सगुनौती।जर जावै वह सिन्धु,जहां उपजत हैं मोती ३८६ हीरा अपनी खान को, मनहीं मन प- छताय । गुन कीमत जानी नहीं, तहां विकानो आय। तहां बिकानो आय, छेद करहासों बांध्यो । मीगे लगै न मांस, लोन विन फूहर रांध्यो।कह० धरों कैसे कै धीरा। गुन कीमत घट गई, यही कहि रोयो हीरा ३८७ साई अगर उजार में, जरत महा पछताय । गुनगाहक कोई नहीं, जाहि सुवास सुहाय । जाहि सुबास सुहाय, सभाबिलास। सुतौ बन में कोउ नाहीं। कै गीदर कै हिरन, सुतौ सम- झत कल्लु नाहीं । कह० बड़ो दुख यहै गुसाईं । अगर पाककी राख, भई एकै मिलि साई ३८८ साईं हंस न श्रावहीं, विन सखर जलपास । निरफल तस्वर ते डरें, पंछी पथिक उदास । पंछी पथिक उदास, छांह विश्राम न पावें। जहां प्रफुल्लित कमल, भ्रमर तहँ भूल न आवे । कह० जहां यह बूझ बड़ाई। तहां न करिये सांझ, प्रात ही चलिये सांई ३८६ हंसा उड़ि दिश को चले, सरवर मीत जुहार । हम तुम कबहूँ भेटिह, संदेशन ब्योहार। संदेशन ब्योहार, भखोपूरो जलरहियो। जीव जन्तु चिर जियो सदा उत्तम फल लहियो । कह केल की रही नमंसा दे अशीष उड़ि चले, देश अपने को हंसा ३६० हंमा यहँ रहिये नहीं, सरवर गयो सुखाय। जो रहिये तो शीश पर, बगुला देहें पांय । बगुला देहें पांय, कीच कारे है जैहो। लोक हंसाई होय, कहा कछु ईजत पैहो । कहा

५
सभाबिलास।
मोहिं इक येही संसा । याहू ते कछु घाट, औरही है है
हंसा ३६ १ सांई एकै गिरिधखो, गिरिधर गिरिधर होय।
हनूमान बहु गिरिधस्यो, गिरिधर कहै न कोय | गिरि-
धर कहै न कोय, हनू धौलागिरि लायो । ताको किनका
टूटि, पखो सो कृष्ण उठायो । कह० बड़नकी बड़ी ब.
ड़ाई। थोरेही यश होय, यशी पुरुषनको सांई ३६२ न.
यना जब परवश परै, उत्तम गुण सब जायँ । वे फिर २
सीरी करें, ये फिर फिर लपटायें । ये फिर फिर लपटाय:
नेत्र बहुरो भरि आवै । खान पान सुख त्याग, रात
दिनहीं दुख पावें । कह० सुनौ तुम श्रवणन बैना। लोग
जु देय कलङ्क, परें जब परवश नैना ३६३ साई सुमन
पलाश पर, सुश्रा रह्यो जो प्राय । लाल कलीसी चोंच
पर, मधुकर बैठयो जाय । मधुकरबैव्यो जाय, सुपा तत.
काल बचायो। कोटिकष्ट दुख पाय, मरूंकर छूएन पायो।
कह बेग घर बजै बधाई। दीजै विदा एलाश, जियत घर

५२
सभाबिलास।
जैये साँई ३६४ साँई तेली तिलन सों,कियो नेह निर्वाहि।
छोटि फटक उज्ज्वलकर,दई बड़ाई ताहि।दई बड़ाई ताहि,
पञ्च यह सिगरे जानी। दे कोल्हू में पेरि, करी है इकतर
घानी। कह० मया की यही बड़ाई।अमया सबते भली,
मान मति मेरी साई ३६५ साई सुश्रा प्रवीन अति, बानी
बदत विचित्र । रूपवन्त गुण आगरो, रामनाम सों चित्त।
रामनाम सों चित्त और देव न अनुराग्यो । जहां जहां तू
गयो, तहाँ तू नीको लाग्यो । कह० सुआ चूक्यो चतुराई ।
सेमल सेयो बृथा, विश्वास करि भूल्यो साई ३६६ धोखे
दाडिम के सुश्रा, गयो नारियल खान | खम खाई पाई
सजा, फिर लाग्यो पछतान | फिर लाग्यो पछतान,बुद्धि
अपनीको रोयो । निर्गुणियनके पास, बैठ गुण अपनो
खोयो। कह कहूं जैयेनहिंोखे। चोंच खटक्कै टूटि, सुश्रा
दाडिमके धोखे ३६७ गदहा थोरे दिनन में, खूद खाय
इतरात । अफरान्यो मारन कहै, एराकी के लात। एराकी

सभाविलास।
५३
के लात, देत शङ्का नहिं आनै। एराकी सहि रहत, ताहि
कोऊ नहिं जाने । कह रहेगी कौलौ दुवहा । एराकी
की लात, फेर कैसे सहै गदहा ३६८ महुआ नित उठ
दाख सों, करत मसलहत आय । हम तुम सूखे एकसे,
हूजत हैं रसराय । हूजत हैं रसराय, बिलग जनि याका
मानौ । मधुर मिष्ट हम अधिक, कछू जिन जियमें जानौ ।
कह कहत साहब सो रहुआ। तुम नीची कुल बेल, वृक्ष
हम ऊंचे महुअा ३६६ गुलतुर्रा सों जायके बाद करै जो
करील । हम तुम सूखे एकसे, पूँछ देखिये भील । पूँछ
देखिये भील, भेद जो जानै मेरो। तुहूँ पूछ बुलवाय, भेद
जो जान तेरो । कह० नतरहौं करिहों हुर्रा । अब जिन
भूल गुमान, करै फिर हौ गुलतुर्रा ४०० बगुला झपटत
बाज पै, बाज रहै शिर नाय । कुलहा दीने पगबँधे, खोटे
दे फहराय । खोटे दे फहराय, कहे जो जो मन आवै ।
कुलहालै पग छोरि, धनी बिन कौन छुड़ावै । कह

५४
सभाबिलास।
अरे तू सुन खग बगुला । समयो पलट्यो जान, बाजपे
झपटै बगुला ४०१ कौश्रा कहत मराल सों, कौन जाति
को गोत । तोसों बदरूपी महा, कोउ न जगमें होत ।
कोउ न जगमें होत, कुटिल मैले मल खाने । ऊसर बैठ
मर्याद,भ्रष्ट आचार न जाने। कह कहांते पायो होगा।
धन्य हमारो देश, जहां सजन जन कौत्रा ४०२ साई
घोड़न के अछत, गदहन आयो राज। कौआ लीजै हाथ
में, दूरि कीजिये बाज । दूरि कीजिये बाज, राज ऐसोही
आयो । सिंह कैद में कियो, स्यार गजराज चढ़ायो ।
कह जहां यह बूझ बड़ाई । तहां न कीजे सांझ, सबेरेहि
चलिये सांई ४०३ भौंरा ये दिन कठिन हैं, दुख सुख
सही शरीर । जब लग फूलै केतकी, तब लग बिरम
करीर । तब लग विरम करीर, हर्ष मन में नहिं
कीजे । जैसी बहै बयार, पीठ तब तैसी दीजे । कह०
होय जिन जिय में करा । सहै दुःख अरु सुःख, एक

सभाबिलास।
सजन अरु भौंरा ४०४ हिरना बिरझेउ सिंह सों.
औझर खुरी चलाय । झारखण्ड झीनो पस्यो, सिंहागयो
वराय । सिंहा गयो बराय, समौ सामर्थ्य बिचायो । कुलहि
कालिमा लाय, हँस्यो हँसके कहि हास्यो । कह मोहि
याही बन फिरना । आज गैर कर जाउँ, कालि मैं हाँ के
हिरना ४०५ पानी बाढ्यो नाव में, घरमें बाढ़यो दाम।
दोऊ हाथ उलीचिये, यही सयानो काम । यही सयानो
काम, नाम ईश्वर को लीजे । परस्वास्थ के काम, शीश
आगे धरि दीजे । कह० बड़न की याही बानी। चलिये
चाल मुचाल, राखिये अपनो पानी ४०६ मैंना जानौं
जीवकी, तोता की दिन रैन। बक बकरी केता कहूं मोर
कहां ते चैन । मोर कहां ते चैन, दुनियमें तीतर जानो।
गलिगलि आई बाज, मौन ताही ते ठानो । कह सुने
कुरङ्ग के बैना । पिय गल डारी बाह, हंस मुख देखौ
नैना ४०७ हुक्का बाँध्यो फेंटमें, गहि लीनी नै हाथ ।

५६ सभाबिलास। चले राह में जात हैं, बाँधि तमाकू साथ । बाँधि तमाकू साथ, गैलको धंधा भूल्यो । गइ सब चिन्ता दूरि, आग देखत मन फूल्यो ।कह जु यमको आयो रुका। जीव ले गयो काल, हाथ में रह गयो हुक्का ॥ ४०८ ॥ अथ बरवा॥ हरिपद रुचिर तरनियां चढ़ मन मोर । तर भवसागर अबहीं रहे दिन थोर १ मोहन के मुख सौहन जौहन जोग । रूप अशन अखियनको भस्मक रोग २ ऊंच जाति ब्राह्मणियां बरणि न जाय । दौरि दौरि पालागी शीश छुआय ३ बड़ि २ आंख बरिनियां हिय हरि लेय! पतरी के अस डोब करेजवा देय ४ घाट बांट लै बानिनि हाट बईठ । कहत काह नहिं जानी बतियन मीठ ५ नीक जाति कुरमी की खुरपी हाथ । आपन खेत निवारै पीके साथ ६ अहिरिनि मनकी गहिरी उतरन देय। नैना करें मथनियां मनमथलेय ७ हलुआ अस हलवनियां गलवा सभाबिलास। लाल । लाल २ है जुबनानेन रसाल टेढ़ मांगनाइन की नहरन हाथ। फिर पाछे जो हेरै महतौ साथ ६ चीकन गात तेलिनियां बरनि न जाय । चितवत रूप अनूप दृष्टि लपटाय १० मैली एक धोबिनियां ऊजर गांव । भूली कन्त बिन कलपति लै लै नांव ११ झमक चली कसइ. नियां दै दै सैन । धरै करेजवा छुरियां करि करि पैन १२ नीक जाति तुरकिनकी बहुतै लाज। जानै पियकी सेवा औरन काज १३ सुन्दरि तरुणि तमोलिनि तरवन कान। हेरै हँसै हरै मन फेरै पान १४ भरभूजिन कन भूजहि बैठि दुकान । फुटका करत विहंसिके विरही प्रान १५ कलवारी मदमाती काम कलोल । भरि भरि देत पिय- लवा महा ठठोल १६ परदवार तन नाजुक कैथिनि नारि शङ्क धरै घुघुट दृग चली निहारि १७ अचरज करत लुहरिया पिय के पास । जाहि छुवत विन जियके लेय उसास १८ खेल फाग धन बहुरी धूरि उड़ान ।

५६
सभापिलास।
दिखहुं न कोय २६ बोली आनि कोयलिया मधुरी बान।
महुआ रोवै ठगढ़ आम बौरान ३० प्रेम प्रीति को बिखा
चलेछु लगाय। सींचनकी सुधि लीजो विसरिनजाय ३१
अस मन होय बलम अब कबहुँ न जाय । रखिये रातहु
दिवस हिरदवा लाय ३२ पात पात कर लूटिस बिपन
समाज । राजनीति यह कसि कसि कस ऋतुराज ३३
चलत न शोच करसि सखि सगुन सभाग। है ससुरार
तुम्हारिहु घन बन बाग ३४ करिबरन कैलिया कुहकति
आन । अम्बा चढि डरपावति पिय बिन जान ३५ भले
भेट बालमसन भटकिहु प्राय । धाय धाय बन खाय बेष
नहिं जाय । बालम चलत न भेटे छतियाँ लाय । सोइ
कसक करेजवा कसकति आय ३६ बदरन धरी धनुहियाँ
करत अचेत । बुंदियन के करि बान करेजवा देत ३७
नैनाभीतर मितवा रहत जो ठाढ़ । निकसन कबहुँ न भे-
टिस अस मन गाढ़ ३८ हरद बरन मोरी देही पियहि

६० सभाबिलास। वियोग । कौन विथा मोहिं बूझहु बाउर लोग ॥ ३९ । अथ अरल॥ भज सया हरिनाम कि बैठा ताक में | दिना चार का रङ्ग मिलैगा खाक में । साहिब बेग सँभार काल सों रार है । यम के हाथ गुलेल फटका पार है ? यह दुनियाँ बाजीद पलक का पेखना । यामें बहुत विकार कहो क्या देखना। सब जीवन का जीव जगत आधार है। पर हां बाजीदा जो न भजै भगवन्त छठी में छार है २ दो दो दीपक बार महल में सोचते । नारी से करि नेह जगतमहँ जीवते । सोंधा तेल लगाय पान मुख खांयगे । बिना भ- जन भगवान के मिथ्या जायगे ३ रामनाम की लूट फवै है जीवको । निशि वासर कर ध्यान सुमिर तू पीवको। यह बात फिर सिद्ध कहत सब गांवरे । पर हां बाजीदा अधम अजामिल तरे नारायण नांवरे ४ गाफिल हुये जीव, कहौ न यों बनत है । या मानुष के सांस जु कोऊ

समाविलास।
६१
गिनत है। जाग लेय हरिनाम, कहांलौ सोय है। पर
हां बाजीदा चाकी के मुख पलो सु मैदा होय है ५ आज
सुनै के काल कहत हों तुझ को। भावे बैरी जान जीव
तू मुझ को । देखत अपनी दृष्टि खता क्यों खात है । यहाँ
बाजीदा लोहे कैसो ताव जन्म यह जात है ६ केते अर्जुन
भीम जरा जसवन्त से । केते गिने अशङ्कबली हनुमन्त
से । जिनकी सुन सुन हांक महागिरि फाटते । परहां
बाजीदा तिन घर खायो काल जो इन्द्रहि डाटते ७
जानौं कछु मीठ अन्त कह तीत है । देख्यो हृदय बि-
चार देह यह अनीत है । पान फूल रस भोग अन्त कह
रोग है । परहां बाजीदा प्रीतम प्रभु के नाम विना सब
सोग है ८ देख तमाशा अजब जो लगी पठाननू ।
होया खड़ा निहङ्ग पकड़ सूजाननू। लगा लुटावन आप
आपना सर्वजर । परहां बाजीदा कौन साहिब नू अक्खे
यों नहिं यों कर : नबियादा सरताज खंभदर गाहदा।
--

।
६२
सभाबिलास।
सब नादा मखवूल रसूल खुदाहदा। उम्मत देयुत जी-
वन उसदी जानमर । परहां बाजीदा कौन साहिब नू
अक्खे यों नहिं यों कर १० बिना बास का फूल न ताहि
सराहिये । बहुत मित्र की नारि सों प्रीति न चाहिये।
शठ साहिब की सेव कबहुं नहिं कीजिये । परहां बाजीदा
विद्याविद अरु जिन्द अकाज न दीजिये ११ एक राम
कहत कलमा न डूबा कोइरे । अर्द्ध नाम पाषान भरा
निरलोइरे । कर्म कि केतिक बात बिलग है जांइगे।
परहां बाजीदा हाथी के असवार कुत्ते क्यों खांइगे १२
कुञ्जरमन में मत्त मरै तो मारिये । कामिनि कनक कलेश
टरै तोटारिये । हरिभक्तन सों नेह पलै तौ पालिये। परहां
वाजीदा रामभजन में देह गले तो गालिये १३ जेती
बोली बानी से तो बहरही । हृदय कपट की बात तो मुख
सों का कही । बोले बोली बोल बुलाई पीउ की। परहां
बाजीदा ऊपर की सब झूठ फलैगी जीव की १४ घड़ी

सभाबिलास। घड़ी घड़ियाल पुकारै कही है । बहुत गई है अवधि अल्प ही रही है । सोवे कहा अचेत जाग जग पीउरे। परहां बाजीदा चली है अाज कि काल्ह बटाऊ जीवरे १५ जो जिय में कछु ज्ञान पकरहू मन को । लिपटहि हरि को हेत सुजावत जन्न को । प्रीति सहित दिन रैन राम मुख बोलई । परहां बाजीदा रोटी लिये हाथ नाथ सँग डोलई १६ पानौ सगैन ताहि तहां लौ गोयरे । रीते हाथन जाय जगत सब जोयरे । यह माया बाजीद चलै क्या साथरे । बहते पानी बीर परवाली हाथरे १७ पाहन कोरारहै बरसते मेह में । घाल धरी बाजीद दुएता देहमें। उसै औचका प्राय झूठ गहिरोइथे। परहां बाजीदा सर्प- हि दूध पिलाय वृथा ही खोइये १८ बदन बिलोकित मयन भई हो बावरी । धारे दण्ड विभूत पगन द्वैपावरी। कर जोगिनको भेष सकल जग डोलिहों। परहां बाजीदा ऐसो मेरे नेम पीव पिउ बोलिहौँ १६ एकै नाम अनना समाविलास। कहूं के लीजिये। जन्म २ के पाप चुनौती दीजिये। लेकर चिनगी आग धरै तू अब्बरे । परहां बाजीदा कोठी भरी कपास जाय जल सब्बरे ॥ २०॥ अथ छप्पय॥ तिलक भाल बनमाल अधिक राजत रसाल छबि । मोरमुकुट की लटक चटक बस्नत अटकत कवि । पी. ताम्बर फहराय मधुर मुसुकाय कपोलन | रच्यो रुचिर मुख पान तान गावत मृदु बोलन । रति कोटि काम अभिराम अति दुष्ट निकन्दन गिरिधरन । आनन्द कन्दब्रज चन्द प्रभु सुजय जय जय अशरण शरण ? मोर मुकुट नग जटित करण कुण्डल हेम झलक । मृग मद तिलक ललाट कमल लोचन दल पलकें । घुघरवारी अलक कौस्तुभ कण्ठ.बिराजै। पीत बसन बनमाल मधुर मुरली धुनि बाजै। करत कोटि आमा बरन सुचन्द सूर्य देखत लजत । ब्रह्मदेव देभक्त जन सुश्याम रूप प्रीतम सभाबिलास। ६५. सजत २ चतुरानन सम बुद्धि विदित जो होय कोटि घर । एक एक घर प्रतिनिशीश जो होय कोटि धर। तीस सीस प्रति बदन कोटि करतार बनावै । एक एक मुख माहिं रसन फिर कोटि लगावै । रसन रसन प्रति शारदा कोटि बैठि बानी कहहिं । महिजन अनाथ के नाथ की महिमा तबहुँ न कहि सकहिं ३ भूमि परत अवतरत क- स्त बालक बिनोद रस। पुनि यौबन मद मत्त तत्व इन्द्री अनङ्ग बस । विषय हेतु जड़ फिरत बहुरि पहुँच्यो वृद्धा- पन गयो जन्म गुन गनत अन्त कछु भयो नापन। थिररहत न कोउ नरपति नवल रहत एक चहुँ युग सुयश । सोइ अजर अमर नरहरि निरख जोइ पियत भ- गवन्त रस ४ बिमल चित्त करि मित्र शत्रु छल बल वश किजिय। प्रभु सेवा वशकरिय लोभवन्तहि धन रजिय। युवति प्रेम वश करिय साधु आदर वश आनिय । महा- राज गुन कथन बन्ध समरस मन मानिय । गुरु नमत

सभाबिलास।
शीश रस सो रसिक विद्या बल बुधि मन हरिय । मूरख
बिनोद सु कथा बलन शुभ सुभाव जगवश करिय ५
याचक लघु पद लहै कामतुर जो कलङ्क पद । लोभी
दुर्यश लहै अशन लालची लहै गद। मूरख औगुन लहै
लहै पढ़ पढ़ गुन पण्डित । सूर सुरन यश लहै रहै रनमें
महिमण्डित। निर्वान सुपद योगी लहै जो न गहै ममता
सुमति। सुख भगत यतन जनलहै करे जु नौ विधि भक्ति
अति ६ धिक मंगन विन गुनहि गुनहि धिक सुनत न
रीमा रीझकाधिक बिन मौज मौज धिक देत जोखीम।
देवोधिक बिन सांच सांच धिक धर्म न भावै। धर्म सुधिक
बिन दया दयाधिक अरि कहँ श्रावै । अरि धिक चित्त न
सालई चित धिक जहँ न उदार मति । मति धिक केशव
ज्ञान बिन ज्ञान सुधिक विन हरि भगति ७ न कछु क्रिया
बिन बिन न कछु कायर जिय क्षत्री। न कछु नीति बिन
नृपति न कछु अक्षर विन मन्त्री । न कछु बाण विन धाम

सभाबिलास।
न कछु गृह बिन गरुवाई । न कछु कपटको हेत न कछु
मुख आप बड़ाई। न कछु दान सनमान बिन न कछु
सुभोजन जासु दिन । नर सुनौ सकल नरहरि कहत न
कछु जन्म हरि भक्ति विन ८ यदपि कुसँग सँग लाभ
तदपि वह संग न किजिय । यदपि धनिक होय निधन
तदपि घट प्रकृति न लजिय । यदपि दान नहिं शक्ति
तदपि मन मान नर खुट्टिय। यदपि प्रीति उर घटै तदपि
सुख उघरन टुट्टिय । सुन सुयश दुवार किवाड़ दे कुयश
जमाल न मुकिये । जिय जाय यदपि भलपन करत तऊ
न भलपन चुकिये ह तजहु जगत बिन भवन भवन तज
त्रिय बिन कीनौ । त्रिय तजहु न सुख देव सुखहि तज
सम्पति हीनौ । सम्पति तज बिन दान दान तज जहँ न
विप्रमति । विप्र तजहि बिन धर्म धर्म तजियेबिन भूपति।
तज भूप भूमि विन भूमि दज दीह दुर्ग बिन जो बसे ।
तज दुर्ग सुकेशवदास कवि जहां न पूरन जल लसै १०

सभाबिलास।
मूढ़ तपीसम कृती दुष्ट मानी गृहस्थ नर। नरनायक अति
आलसी विपुल धनवन्त कृपण कर । धर्मी दुष्ट सुभाव
बेदपाठी अधर्मरत । पराधीन गुनवन्त भूमिपालक विदेह
सत । रोगी दरिद्र पीड़ित पुरुष बृद्ध नारिनर गृद्ध चित ।
एते बिडम्ब संसारमें इन सबको धिक्कार नित ११ तिय बल
यौवन समय साधु बल शिव पद सब्बर । नृप बल तेज
प्रताप दुष्ट बल बचन अडम्बर । निर्द्धन बल सुमिलाप
दान सेवा याचक बल । वानिज बल ब्योपार ज्ञान बल
बर विवेक दल । इमि विद्या विनय उदार बल गुन समूह
प्रभु बल दरख । परिवार सुबल सविचार कर होहिं एक
सम्मत सरब १२ नरपति मण्डन नीति पुरुष मण्डन
मन धीरज । पण्डित मण्डन बिनय ताल रस मण्डन
नीरज कुल तिय मण्डन लाज बचन मण्डन प्रसन्न मुख ।
मति मण्डन कवि कर्म साथ मगहन समाध सुख । भुज
बल मण्डन क्षमा गृहपति मण्डन बिपुल धन | मण्डन

सभाविजास। ६६ सिधरुव सन्त कहि काया मण्डन बल न धन १३ ज्ञान- वन्त हठ गहै निधन परिवार बढ़ावै । बँधुआ करै गुमान धनी सेवक है धावै । पण्डित किरिया हीन गड दुर्बुद्धि प्रवान । बृद्ध न समझेव धर्म नारि भर्तहि रिपु मान । कुलवन्त पुरुष कुल विधि तर्जे बन्धु न मानै बन्धुहित। संन्यास धार धन संग्रहै ये जग में मूरख विदित १४ गई भूमि फिर मिले बेलि फिर जमै जरे तें । फल फूलन तें फलें फूल फूलन्त झरे तें। केशव विद्या निकट बिकट वि- सरी फिर आवै । बहुरि होय धन धर्म गई सम्पति फिर पावै । होय जो शील सुशील मति जगत हेत इमि गा. इये । प्राण गये फिर मिलै पै पति न गई फिर पाइये १५ सर सर हंस न होत बाजि गजराज न दर दर । तर तरु सुफल न होत नारि पतिव्रता न घर घर । तन तन सु. मति न होत मोति जल बूंद न घन घन । फन फन मनि नहिं होत सर्व मलया नहिं बन बन । कहुँ नर होहिं न सभाबिलास। शूर सब नर नर होत न भक्त हर | नरहरि सुकवि कवित किय सर्व होहिं नहिं एक सर ॥ १६ ॥ अथ पहेली॥ इक नारी अरु पुरुष हैं ढेर। सबसे मिले एकही बेर । दिना चारका अन्तर होय । लिपटे पुरुष छुड़ावै सोय१॥ कंघी॥ पानी में निशि दिन रहै, जाके हाड़ न मास । काम करै तरवार को, फिर पानी में बास २ ॥ कुम्हार का डोरा ॥ जल में रहै झूठ नहिं भाषै बसे सु नगर मँझार । कच्छ मच्छ दादुर नहीं पण्डित करो विचार ३॥ घड़ी॥ सोने की वह नारि कहावै । दाल चावल के मोल बिकावै ४॥ कंचनी॥ श्याम बरन पर हरि नहीं जटा धरे नहिं ईश । ना जाने पिय कौन है पंख लगाये शीश ५॥ कसेरू ॥ बूझ तरुवर अरु अाधो नाम । अर्थ करौ के छाँडो ग्राम ६ ॥ नीम ॥ जल कर उपजै जल में रहै। आंखों देखा खुसरो कहै७॥ काजल शीश सभाबिलास। जटा पोथी गहै श्वेत बसन गल माहि। योगी जंगम है नहीं ब्राह्मण पण्डित नाहिं ८ || लहसुन ॥ श्यामबरन पीताम्बर कांधे मुरलीधर नहिं होय । बिन मुरली वह नाद करत है विरला बझै कोयह ॥ भौश ॥ कर बोले करही सुनै, श्रवण सुनहि नहिं ताह । कहै पहेली बीर- बल, सुनिये अकबरशाह १० ॥ नाड़ी ।। बांबी वाकी जल भरी ऊपर जारी आग । जबै बजाई बांसुरी निकस्यो कारो नाग ११ ॥ हुक्का ।। जाके रातन कोंप फल पेड़हि देयजलाय।सो तरुवर बहू फल्लियां देखौलोगोआय १२॥ भौचम्पा ॥ शीश केश बिन चुटिया तीन । औगुन लेत पराये छीन । जोइ जाय उनके दरबार । ताके मूड़ न राखै बार १३ ॥ त्रिवेणी ॥ रात पड़े तब पड़नेलागी। दिनको मरी रातको जागी॥ उसका मोती नाम बताया। बूझो तुम मैं कूक सुनाया १४ ॥ोस । नरनारी हम एकै दीठे । ज्यों ज्यों बोलें त्यों त्यों मीठे । एक न्हाय

७२
समाविलास।
इक सैकन हारा । कह खुसरो नहिं कीचन गारा १५ ॥
नगारा ॥ श्याम बरण अरु सोहनी फूलन छाई पीठ।
सब पुरुषन के गल परत ऐसी लङ्गर ढीठ १६ ॥
दाल || शिर पर सोहै गङ्ग जल मुण्डमाल गलमाहिं ।
बाहन वाको बृषभहै शिव कहिये के नाहिं १७ ॥रहे।
रङ्ग रङ्ग इक पक्षी बना । छोटी चोंच अरु काटै घना।
तीस तीस मिलि बिल में बसे । जीव नहीं अरु उड़िके
डसें १८॥ तीर ॥ देखी एक अनोखी नारि । गुण
उसमें इक सब से भारि । पढ़ी नहीं अरु अचरज आवै ।
मरना जीना तुरत बतावै १६ ॥ नाड़ी ॥ फाट्यो पेट
दरिद्री नाम ॥ उत्तम घर में वाको ठाम । श्री को
अनुज विष्णु को सारो । पण्डित होय सो अर्थ वि-
चारो २०॥शंख ॥ नरके पेट जो नारी बसै । पकड़
हिलावै खिल खिल हँसे । पेट फाड़ जब नारी गिरी।
मोको लागी प्यारी खरी २१॥ गिरी ॥ बारे से वह सब

सभाबिलास।
को भावै । बड़ा हुआ कछु काम न आवै । मैं कह दिया
है उसका नाम । अर्थ करौ कै छोड़ो ग्राम २२॥दिया।
चहूं ओर फिरि आई। जिन देखा तिन खाई २३ ॥खाई।।
आधी बू सारी रानी । अर्थ करौ कोउ पण्डित ज्ञानी २४
बूरानी ॥ नारी एक शहर में सोई । सभी वस्तु वाके
घर होई । खाय कळू नहिं पीवै पानी । लोग कहें यह
खरी दिवानी २५ ॥ खारी ॥ बावरी ॥ बिना बुलाई
खरचे दाम । तन गोरी श्री अभरन श्याम । आवतही
परदेश सिधारी । पहुँची जहां भई अति प्यारी । भरी
गई रीती है आई । तब वह नारी पुरुष कहाई २६
हुण्डी ।। अरबी कहौं तो पाईना । फारसी कहाँ तो आ.
ईना । हिन्दी कहत आरसी पावै । कहाँ पहेली कौन
बतावै २७॥ दर्पण ॥ आदि कटेते सब को पाले । मध्य
कटे ते सब को पारे । अन्त कटे ते सब को मीठा । सो
खुसरो में आंखों दीठा २८ ॥ काजल । पक्षी एक श्वेत

सभाबिलास।
औ हस्यो । निशि दिन रहै वाग में पस्यो । ना कछु
पीवै ना कछु खाय । अश्व बराबर दौखो जाय २६
बकसुना ॥ एक नारि भौंरासी काली। कान नहीं औ
पहिरै बाली । नाक नहीं अरु संधै फूल । जितना अर्ज
उतनाही तूल ३० ॥ ढाल ॥ एक नारि वह है वह
रङ्गी । घरसे बाहर निकसै नङ्गी । उस नारी का यही
शिंगार । शिरपर नथुनी मुहँ पर बार ३१ ॥ तलवार ॥
डाल दीजे । देखा कीजे ३२ ॥ चिक ।। हाथ में लीजे।
देखा कीजे ३३ ॥दर्पण ॥ एक नारि करतार बनाई।
नां वह वारी ना वह व्याही । सूहे रङ्ग सदासी रहै ।
भाबी भाबी सब जग कहै ३४ ॥ बीरबहूटी ॥ आधा
भक्तन मुख बसै आधा गुनियन साथ । वाहि पसारी
देत हैं पुड़ी बांध के हाथ ३५ ॥ हरताल || खेत में
उपजै सब कोउ खाय । घर में होय तो घर बहि
जाय ३६ ॥ फूट ॥ लाग कहूं लागू नहीं बरजत

७५
सभाबिलास।
लागै धाय। कही पहेली एक मैं दीजे चतुर बताय३७॥
होंठ ॥ लक्ष्मीपति के कर बसै, पांच अक्षर के माहिं ।
पहिलो अक्षर छोड़के, सो दीजै तुम नाहि ३८ ॥
दर्शन ॥ एक अचम्भा देखो चल । सूखी लकड़ी लागे
फल । जो कोई उस फलको खाय । पेड़ छोड़ वह अन्त
न जाय ३६ ॥बरछी ॥ योगी एक मढी में सोवै । मद
पीवै अरु मस्त न होवे । जब बालका कान में लागा।
योगी छोड़ मढ़ी को भागा ४०॥ गोला।
अथ मुकरी।
अर्द्ध निशा वह आयो भौन । सुन्दरता वरणे कहि
कौन । निरखतही मन भयो अनन्द । क्यों सखि सजन
ना सखि चन्द १ घुल गई गांठ न खोले खुलै । जहां
तहां मेरे सँग डुलै । हिये विराजत होय न भार | क्यों
सखि सजन नहिं सखि हार २ दासी ते में मोल मैं-
गायो । अङ्ग अङ्ग सब खोल दिखायो । वासों मेरो भयो

समाविलास।
जु मेल । क्यों सखि सज्जन ना सखि तेल ३ मैं अपनो
मन दीन्हों ऐन । सुन्दर रूप सुहावै वैन । ढिग तें
कबहुँ न करिहौं जूया । क्यों सखि सजन ना सखि
सूया ४ वा बिन चित्त चहूं दिशि डोले । चातक ज्यों
पुनि पुनि पिय बोलै । परलय हो अावै नहिं गेह।
क्यों सखि सज्जन ना सखि मेह ५ शोभा सदा बढ़ा-
वनहारा । अाँखन तें छिन होत न न्यारा । पाठ
पहर मेरो मन रञ्जन । क्यों सखि सजन ना सखि अ.
अन ६ रात दिना जाको है गौन । खले द्वार आवे मेरे
भौन । वाको हरष बताऊं कौन । क्यों सखि सजन ना
सखि पौन ७ बाट चलत मेरो अँचरागहै। मेरी सुनैन
अपनी कहै । ना कछु मोसों झगरा झांटा। क्यों सखि
सजन ना सखि कांटा ८ बाट चलतमें पड़ा जो पाया।
खोटा खरा नहीं परखाया। हाथ लगै तब होवै कैसा।
क्यों सखि सजन ना सखि पैसाह देखन में वह गांठ
-

सभाबिलास। गठीला । चाखन में वह अधिक रसीला। मुख चमौ तो रसका भाँड़ा । क्यों सखि सजन ना सखि गाँड़ा १० सगरी रैन मेरे सँग जाग्यो । भोर भये ते बिछुरन लाग्यो। वाके बिछुरत फाटै हिया । क्यों सखि सज्जन ना सखि दिया ११ छठे छमासे मो घर आवै । आप हिले अरु मोहिं हिलावै । नाम लेत आवै मोहिं शङ्का । क्यों सखि सज्जन ना सखि पङ्खा १२ निशि दिन मेरे ऊपर रहै । दोऊ कुच लै गाढ़े गहै । उतरत चढ़त करत झक- भोली । क्यों सखि सज्जन ना सखि चोली १३ मोको तो हाथीको भावै । घट बढ़ हो तो नाहिं सुहावै । ढूँढ़ ढूँढके ल्याई पूरा । क्यों सखि सजन ना सखि चूरा १४ सगरी रैन छाती पर राखा। उसका रस कस मैंने चाखा। भोर भया तब दिया उतार । क्यों सखि सजन ना सखि हार १५ हरित रङ्ग मोहिं लागत नीको । वा बिन सब जग लागत फीको । उतरत चढ़त मरोरत अङ्ग।

सभाबिलास।
क्यों सखि सजन ना सखि भङ्ग १६ लम्बी लम्बी डगों
जु आवै । सारे दिनकी हौस बुझावै । उठके चला तो
पकड़ा छूट । क्यों सखि सज्जन ना सखि ऊँट १७ दुर
दुर करूं तो दौड़ा आवै। खन प्रांगन खन बाहर जावै।
देहरी दौड़ कहीं नहिं सुत्ता। क्यों सखि सजन ना सखि
कुत्ता १८ छोटा मोटा अधिक सुहाना।जो देखै सो होय
देवाना। कबहूँ बाहर कबहूँ अन्दर। क्यों सखि सजन ना
सखि बन्दर १६ अति सुरङ्ग है रङ्ग रँगीलो। है गुणवन्त
बहुत चटकीलो। रामभजन बिन कभी न सोता। क्यों
सखि सजन ना सखि तोता २० आठपहर मेरे दिग
रहै। मीठी प्यारी बातें कहै । श्यामवरण अरु राते नैना।
क्यों सखि सज्जन ना सखि मैना २१ जब श्रावै तब
जल भरिलावै । तन मनकी सब तपन बुझावे । मनका
भारी तनका छोटा । क्यों सखि सजन ना सखि
लोटा २२ धमक चट्टै सुध बुध बिसरावै । दावत जांघ

७६ सभाबिलास। बहुत सुख पावै । अतिबलवन्त दिनन को थोड़ा। क्यों सखि सजन ना सखि घोड़ा २३ अतिसुन्दर जग चाहत जाको । मैं भी देख भुलानी वाको । देखत रूप भयो जो टोना । क्यों सखि सज्जन ना सखि सोना २४ निशि दिन आंगन उभो रहै । छांह धूप सब ऊपर सहै । वाको देखे लगै न भूख । क्यों सखि सज्जन ना सखि रूख ॥ २५॥ अथ हियहुलास॥ प्रथमै ताको सुमिरिये, जिन दीन्हों गुरु ज्ञान । ज्ञानी गुण गावै सदा, ध्यानी धरै जु ध्यान १ अम्बर थांभ्यो थम्भ विन, धरती अधर धराव । मनुषरूप है अवतखो, देखत कतिको भाव २ भावित तीनों लोक में, नाहीं दूजो कोय । मन में निश्चय जानिये, होनी होय सो होय ३ अब कछु बरणों तीन रस, रसही जगको जीय। रसना रसकी जस कहै, सुनि सुख पावै हीय ४ हिय सभाबिलास। हुलास या ग्रन्थ को, राख्यो नाम विचार । यामें सिगरे राग के, रचे रूप शृङ्गार ५ आदि नाद अनहद भयो, तातें उपज्यो बेद । पुनि पायो वा बेद में, सकल सृष्टिको भेद ६ प्राण पक्यो षटराग सुनि, तब उपज्यो बैराग। बारे तरु में बृद्ध को, ताते भावै राग ७ जग को धीरज राग है, राग रूपकी खान । तन मजन सो राग है, राग प्रेम को प्रान ८ सुख को दाता राग है, राग रूप को भेग। याही ते सब कहत हैं, राग रङ्ग से योग : राग हरै सब रोग को, राग चहै रस भोग । बिरही झुरे जु संग को, उपजै महाबियोग ॥ १० ॥ अथ रागरागिनी नाम॥ भैरों की धुनि भैरवी, बंगाली बैसरि । मधु माध्वी अरु सिन्धवी, पांचौ बिरहिन नारि ११ टोड़ी गौरी गुन. कली, स्वम्बावति को कब्ब | मालकोसकी रागिनी गावत अति दुर्लब्ब १२ रामकली पटमञ्जरी, और कहाँ सभाबिलास। देसाख । ये नारी हिंडोल की, ललित बिलावल राग १३ देशी नट अरु कान्हड़ा, केदारा कामोद । दीपक की यारी सबै, महा प्रेम परमोद १४ धनासिरी आसावरी, मारू बहुरि बसन्त । सिरी रागकी रागिनी, मालसिरी है अन्त १५ भोपाली अरु गूजरी, देशी कार मलार । जनक बियोगिन कामिनी, मेघराग की नार ॥ १६ अथ रागगुनवर्णन॥ भैरों सुर सुरता कहै, कोल्हू चलै जुधाय । मालकोस तब जानिये, पाहन पघिलब जाय १७ चलै हिंडोलो आप ते, सुनत राग हिंडोल । बर्षे जब घन धार अति, मेघराग के बोल १८ सिरी राग के सुर सुने, सूखो वृक्ष इराय । दीपक दीपक बर उठे, कोऊ जानै गाय ॥ १६ ॥ अथ राग अलाप समय। पिछले पहरे निशि समय, भैरों राग बखान । माल- ६ ८२ सभाबिलास। कोस तब गाइये, जब लग निकसै भान २० एक पहर दिन चढ़ेतक, कह्यो राग हिंडोल । ठीक दुपहरी के समय, दीपक के सुर बोल २१ सिरी राग चौथे पहर, जब लौं दिन अधियाय । मेघराग जवहीं भलो, जब मेघ बर- साय २२ फागुन में ये राग सब, जागत' पाठोयाम । अष्टयाम में निशि समय, एक याम विश्राम ॥ २३ ॥ अथ राग की ऋतुवर्णन ॥ भैरों शरद कौशिक शिशिर, और हिंडोल बसन्त । दीपक ग्रीषम हेम श्री, मेघ सुपावस अन्त ॥ २४ ॥ अथ बाजे वर्णन॥ जग में सब सुरता कहैं, बाजे साढ़े तीन । खालतार अरु फॅक पुनि, अर्द्ध ताल सुरहीन २५ खाल नगारो ढोल डफ, और पखावज जान । तार तँबूरा बीन है, बहुरि खाव बखान २६ फूंक नफीरी बाँसुरी, सरनाई सभाविलास। ८३ करनायो ताल खंजरी झांझ सब,बाजे दिये बताय॥२७॥ अथ गान आसन॥ बैठे आसन ऊंट को, तब हो शुद्ध अलाप । चलते लेटे सुर भरै, मानो महा कलाप ॥ २८ ॥ अथ भैरों स्वरूपवर्णन॥ भैरों शिव छवि शिरजा, श्वेत बसन तिरनैन । मुण्डन की माला गले, सिद्धरूप सुख दैन २६॥ सवैया॥ शिव मूरति भैरों को भाव बन्यो, तिरनेतर मुण्ड की माल गरे । पट श्वेत सबै तनमें पहरे, हृदये भगवान को ध्यान धरे ॥ तिरशूल विराजत है कर में, सब भा. मिनि को मन लेत हरे । तन छार लगे द्युति दूनि भई, चित चाहन में जियजात छरे ।। ३०॥ अथ रागिनीस्वरूपवर्णन॥ शिव पूजत कैलासपर, दोऊ कर में ताल । श्वेत सभाबिलास। चीर अँगिया अरुण, रूप भैरवीबाल ३१ भस्म पिटारी करगहे, हाथलिये तिरशूल । बंगाली व्याकुल भई, गई सबै सुध भूल ३२ कर्णफूल दुपहरिया, कर कङ्कण शृङ्गार । शीश केश सोहत छुटे, श्वेत बसन बैरार ३३ कङ्कण तव लोचन कमल, नागरि महा अनूप । पियपै बैठी हँसत है, मधु माध्वी यह रूप ३४ पुहुप बदन का- नन धरे, पहिरे बस्तर लाल । क्रोधवन्त तिरशूल कर, लिये सिन्धवी बाल ॥ ३५ ॥ अथ मालकोसस्वरूपवर्णन ॥ मालकोस नीले वसन, श्वेत छरी है हाथ । मोतिन की माला गले, सगरी सखियां साथ ३६ ॥ सवैया ॥ कौसिक की उपमा है भली, तन गोरे विराजत है पट नीलो । माल गले कर श्वेत छरी, रस प्रेम छक्यो जिय छैल छबीलो । नागरि रूप उजागरि लै, सँग डोलतहै सभाबिलास। ८५ , सुखसों गरबीलो । कामिनि को मन मोहत है, मन भावन रूप अनङ्ग रसीलो ॥ ३७॥ अथ रागिनीस्वरूपवर्णन॥ दो० टोड़ी कर बीणागहे, गावत पियके हेत । चञ्चल छवि मृगलोचनी, पहिरे बस्तर श्वेत ३८ गोरी छवि अति साँवरी, अम्ब पुहुप धर कान। तिरषा तन तप काम की, गावत मीठी तान ३६ छुटे केश तन गुनकली, बैठी पिय के पास । नीची ग्रीवा करिरही, अतिही चित्त उदास ४० खम्बावति गोरे बदन, गावत कोकिल बैन अति आतुर चातुर खड़ी, कामवन्त दिनरैन ४१ कोक व कामिनि निशा में, जागै पियके.सङ्ग। रति माने के छीन तन, अङ्ग अङ्ग में रङ्गः ॥ ४२ ॥ अथ हिंडोलस्वरूपवर्णन। दो० पीत बसन हिंडोल के, है जो हिंडोरे माहि ।

८६ सभाबिलास। सखी झुलावत चाव सों, गाय गाय मुसकाहिं ४३ ॥ सवैया ॥ कीन्ह बनाव महा छवि सुन्दर भावत बैठ्यो हिंडोलहि डोले । भूक झुलावत और दुहूं सब गावति हैं सखियां मुख खोले॥गोरे सो गात दिखात खरे मनो दामिनिसी युति देखत सोले । बस्तर पीत लिये रस रीति अनङ्गमों सोहैं हँसे मृदु बोले ॥ ४४ ॥ अथ रागिनीस्वरूपवर्णन ॥ दो० रामकली नीले बसन, कञ्चन सी सब देह । पिक बानी गावत खड़ी, पिय के प्रेम सनेह ४५ बिरह भरी पटमंजरी, मन मलीन तन छीन। सखी सीख अति देतहै, भई प्रेम आधीन ४६ पियके करपर कर धरे, अति व्यापै तन काम । तन दुर्बल दे साख है, महा विरहिनी वाम ४७ पुलकित गर माला पुहुप, सुन्दर तरुणीजान। गोरी छबि बस्तर अरुण, नयन काम के बान ४८ काम- ८७ समाविलास। देव को ध्यान धरि, गावत गीत सँगीत । करति शिंगार बिलावलो, ले ले बस्तर पीत ॥४॥ अथ दीपकरागस्वरूपवर्णन। दो० दीपक गज की पीठ पर, बैठ्यो बागो लाल | मुक्तमाल शोभित गरे, चहुँ दिशि सिगरी बाल ५०॥ सवैया ॥ दीपक को परताप बड़ो, चढ़ि बैव्यो गयन्द की पीठ विराजै। अम्बर राते शरीर सबै, मुक्तान की माल गले छबि छाजै ॥ संग सखी सब सोहत हैं, तिन माहिं जो आप गयन्द सो गाजै । साँवरो रूप स्वरूप बन्यो, युति देखत दुःख सबै तन भाजै ॥ ५१ ॥ अथ रागिनीस्वरूपवर्णन॥ दो देशी अति बिस्तरहरै, काम सताई नारा पति को ठेल जगावती, सिसकी बारम्बार ५२ अरुण वरन सिगरे बसन, नटवासी नट नारि । दोऊ कांधे करधरे

सभाबिलास।
पिय तन रही निहारि ५३ शीश पत्र गज दन्त को,
कर बांकी तरवारि । मोरकण्ठ के बरणहै, रूप कान्हरा
नारि ५४ शीश जटा सब तन लटा, गरे जनेऊ नाग ।
केदारो यह रूप है, धरे मान वैराग ५५ कामवन्त का-
मोद है, पीत बसन तन तास । अम्बातरु बैठी हँसत,
पिकरी पिय को पास ।। ५६ ॥
अथ सिरीरागस्वरूपवर्णन॥
दो सिरीराग के कर कमल, भूप रूप पट लाल । वर्ष
अठारह के बरण, गावत कण्ठ रसाल ५७॥ सवैया ॥
वर्ष अठारहको बरण्यो, मुख देखत ही सब के मन भावै ।
बाम सबै वशकै अपने, गुण गायके भावते भेद बतावै॥
रातो जो बागो विराजत है, कर बारिज फूल लिये मुस-
कावै । भूप के रूप स्वरूप बन्यो, सबही में भलो सिरि
राग कहावै ॥ ५८॥

८ समाविलास। अथ रागिनीस्वरूपवर्णन ॥ दो० धनासिरी बिरहिनबड़ी, हृदय बिहार अपार । सब तन पियरो है रह्यो, निपट क्षीण तन बार ५६ चन्दन टीको भालपर, गरे नाग को हार ! छबि अति सुन्दरि साँवरी, आसावरी कुमारि ६० मारू के माला गरे, पिये प्रेम मदमात । तरुणी सुन्दरि साँवरी, बैठी अति अल- सात ६१ मोरपक्ष शिर पर धरे, बस्तर पीत बसन्त । कानफूल जो अम्ब को, चहुँ दिशि भ्रमर भ्रमन्त ६२ मालसिरी दुर्बल बदन, सखी हाथ पर हाथ । चन्द्र ओर पतिको तकत, चहै मदन को माथ ।। ६३ ॥ अथ मेघरागस्वरूपवर्णन॥ दो० श्यामबरण जो मेघ है, गहे हाथ तस्वार अति आतुर चातुर खरो, गावत सुरत विचार ६४ ॥ सवैया॥ मेघमलार महा अति सुन्दर, इन्दर की छवि आप बन्यो है । पहरे पट श्याम गहे तरवार, जो माल गरे इह भांति सभारिलास। ठन्यो है ।। जैसो जहां चहिये जोइ अङ्ग, सो तैसिय भांति में आप धन्यों है ॥ काम को आतुर है अति ही, तिय की रति को चित चाब बन्यो है ॥ ६५ ॥ अथ रागिनीस्वरूपवर्णन॥ दो० भूपाली विरहिन खरी, केसर बोरे चीर । भयो विरह की ज्याल तें, पीरो सबै शरीर ६६ विरह जरा तन गूजरी, रोवत छूटे केश । कामदेव कानन लगे, तिनहि दियो उपदेश ६७ देसकार कञ्चन बरन, खेलत पिय के सङ्ग। हिय हुलासहै कामको, चढ़यो जो जोबन अङ्ग ६८ बीन गहे गावत बहुत, रोवति है जल ढार । तन दुर्बल बिरहा दहै, बिरहिन नारि मलार ६९ सेज बिछाई कमल दल, लेट रही मन मारि ।लेत उसास उसी परी, तनक बियोगिनि नारि ॥७॥ इति समाविलासः समाप्तिमगादिति शम् ॥ --

Sabha Vilas

Title
Sabha Vilas
File name
Sabha Vilas
Text
OCR done
Citation
1913
Publisher
Lucknow
Language
Sanskrit
Pages
91
Library
Hindi Sahataya Samalayan
Classification
Literature
DLI number
486462
Barcode
5990010113739.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
VMLT id
0xn17AkqsDo
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