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Karakprakaranm

2011/08

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सरण करते हुए पाणिनि ने लगभग २००० मूल शब्दांशों (Verbal root) यो उद्भावना की थी जो धातु कहलाती हैं । घातुपाठ मे इन्ही का संग्रह है जिन्हें भ्वादिगण प्रादि १० गणो मे विभक्त किया गया है । सक्षिप्त सूत्रों से काम चलाने के लिए गणपाठ की रचना की गई है। जब भनेक शब्दों के विषय में एक ही बात संज्ञा, प्रत्यय विघान मादि) कहनी हुई तो एक गण या समूह गएपाठ मे दे दिया गया तथा गण के प्रयम शब्द से मादि' जोड़कर सूत्र बना दिया गया; जैसे--सर्वादीनि सर्वनामानि ॥१॥२०, यहाँ 'सर्व' मादि शब्दों की सर्वनाम सज्ञा की गई है तथा गणपाठ में 'सर्व' से रोकर 'मि' तक सर्वादिगए प्रस्तुत किया गया है । (देखिये गणपाठ) उणादिमूत्र को भी पारिणनिवृत बतलाया जाता है। वस्तुतः यह पाणिनि की रचना नहीं है। हो, पाणिनि ने उणादयो बहलम् ॥३॥' मूत्र द्वारा उगादि सूत्रों की प्रामाणिकता प्रदश्य स्वीकार की है। इसी प्रकार पाणिनीय शक्षा तथा लिङ्गानुशासन नामक लघुग्रन्थों को भी पाणिनि की रचना मानता ववादास्पद ही है। इनके अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि पाणिनि ने जाताल-विजय या जाम्यवती विजय नामक एक महाकाव्य की रचना की थी, को मात्र उपलब्ध नहीं है। पस्तुत भगवान् पाणिनि ने शम्दानुशासन द्वारा मस्कृत भाषा को परिमाणित व परिकृत करने का प्रयास दिया है। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती यारणों के तोकी ममीक्षा करके एक ऐसे व्यवस्थित व्याकरण की रचना की है पिगमें मृत भाषा के समाली का विश्लेषण लिया गया है। पाणिनि ने भारत के सर्वसम्मत नियमों के साथ माप पूर्वी वैयाकरणों में विशिष्ट को भी उल्लेख किया है मे 'मोर मारस्यस्य व सोटा• नस्य ॥१२' इत्यादि। पाणिनि व्याकरण मंचन भाषा की प्रमूस्य लिम विचित्र रचना पा उदय होने पर प्राचीन भ्यान मुत्तत्राय -गये। पोई उमरवी भ्याकराण भी पारिरानि ध्या के समा टहर ,

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इस मत की पतम्नति (२००ई०पू० तथा प्रथम है. शमी के मध्य) पतजति ने महागाध्य नामक अन्य की रमना पी है पराये महामायार नाम से प्रसिर है। उनका समय भी विद्वानों के विवादा विषय रहा है। प विद्वानों के अनुगार उनका समय ईसा की प्रथम शती है। डा. वेलवेलकर -उनका समय १५०६०पू० माना है। इस मत का माधार यह है-महा- प्यकार ने एक सूत्र की प्याश्या में लिखा है 'इह पुष्यमित्र याजयामः' (यहाँ प्यमिन को यश कराते हैं)। इस प्रयोग से विदित होता है कि पतध्वनि ने व्यमित्र को यज्ञ कराया था। फलतः वे पुष्यमित्र के समकालिन थे । इतिहास- रो ने पुष्यमित्र का समय १५० ई० पू० माना है । मतः पतञनि का नमय भी यही है । इसके अतिरिक्त अन्य प्रमाणों से गई है । किन्तु युधिष्ठिर मोमासक इस मन को स्वीकार नहीं करते । नका विचार है कि भारतीय गणना के अनुसार पुष्यमित्र का समय १२०० • पू० के लगभग होना चाहिये । इसलिये पतञ्जलि का समय भी वही होगा। पतञ्जलि को शेषनाग का अवतार माना जाता है। अतः वहीं नहीं के लिये फरिणभृव, पहिपति इत्यादि शब्दों का भी प्रयोग किया गया है। होंने अपना मत प्रकट करते हुए गोनर्दीय शब्द का प्रयोग किया है-'गोनर्दी- त्वाह । इससे विदित होता है कि वे गोनदं प्रदेश के रहने वाले थे। व्याख्या. रों का मनुमान है कि जहाँ गाय बैल अधिक हृष्ट-पुष्ट होते - से नाद करते हैं (माधुनिक पञ्जाब तथा हरयाणा मादि), सम्भवतः यही श पतञ्जलि का निवास स्थान रहा होगा। पतञ्जलि ने पाणिनि के मुख्य मुख्य सूत्रों तथा कात्यापन के वात्तिकों की दाहरण व्याख्या की है। पाणिनि के प्रति उनकी प्रत्यधिक यद्धा प्रकट होती उन्होंने पाणिनि के कतिपय सूत्रों का प्रत्याख्यान भी किया है, किन्तु वहाँ चव.एवं तथ्य निरुपण की दृष्टि ही रही है। पतञ्जलि के मतानुसार जिस वान् पाणिनि का एक वर्ण भी निरर्थक नहीं हो सकता, मला उसके दोष न का दुःसाहस कैसे किया जा सकता है ? वातिककार के कार्तिकों की भी भाध्यकार ने व्याख्या की है उनकी उपयोगिता पर विचार भी किया है। मतः विशेष साथ ही मूत्रकार एवं वातिककार के वचनों की समीक्षा करते हुए अपना निर्णय भी दिया है। पाणिनीय व्याकरण में महाभाष्य के मन्तव्य सबसे अधिक प्रामाणिक माने जाते हैं। 'यथोत्तरं मुनिनां प्रामाण्यम्' इस न्याय के अनुसार पाणिनि के वचनो की पोशा कात्यायन के यचन अधिक प्रामाणिक हैं तथा कात्यायन के वचनो से भी पधिक पतञ्जलि के वचन प्रामाणिक है। वस्तुतः पाणिनीय व्याकरण के परिनिप्ठित रूल का निर्धारण करना पतञ्जलि काही कार्य है। व्याकरण शास्त्र की दृष्टि से ही पतजलि का कार्य महत्त्वपूर्ण नहीं है। प्रत्युत पाली की दृष्टि से भी उनका महत्व साररि है। उन्होंने रोचक अली तपा प्रवाहमयी भाषा मे व्याकरण के सूटम तत्त्वों का विश्लेषण किया है। व्याकरण जैसे नीरस माने गये विषय को इतनी सरस सरस शैली में स्पष्ट रूप से समभाना पतञ्जलि की पद्वितीय विशेषता है। इनकी मैली में नाटकीयता है, यत्र तत्र रोचक सवादो के दर्शन होते हैं। भोलचाल की मुहावरेदार भाषण का लालित्य उपलब्ध होता है। हो, शैली को सरसता एवं रोचकता में कभी. कभी यह निश्चय करना भी कठिन हो जाता है कि महाभाष्यकार का स्वमन्तव्य वस्तुतः गया है। पारण के प्रतिरिकत महाभाप्य में अन्य अनेक विषयों के सश्त भी उपलब्ध होते हैं । उससे भारतीय इतिहास के कितने ही विवादास्पद सन्दी पर नवीन प्रकाश पाता है, सतालीन भारतीय समाज को सांसतिक विशेषतामों का परिचय भी मिगता है। किच, यावरण-दर्शन के विशिष्ट मन्तव्यो कागज भी महाभाष्य में विद्यमान है। इसी के प्राधार पर मागे पलकर भर्तहरि ने म्याकरण-दर्शन दा विगः विवेचन स्यिा है। महाभाष्य व्याकरण पामार प्रन्प है। पह अन्य भत्यन्त विस्तृत है । यह सरल भाषा में सूक्ष्म एवं गहन पर्ष को प्ररर रिया गया है। पर चिपाल मे गुरमिप्य परम्परा द्वारा महारगप्प के ममं को समझने प्रयास रिया जाता रहा है। इसके अभिप्राय को सरप्ट करने के लिये अनेक रोकाएं भी लिसरी गई है। उनमे मे कतिपय टीकाएँ ॥ ८ ॥ अधिक प्रसिद्ध रही हैं । भर्तृहरि ने 'महाभाष्य दीपिका' नामक एक टोका लिखी थी जिसका कुछ अंश हो उपलब्ध हो सका है। अाज तो महाभाष्य के मर्म को समझने के लिये कयटकृत 'प्रदीप' तथा नागेशत 'प्रदीपोद्योत' नामक टीकाएं ही विशेष सहायक समझी जाती हैं। द्वितीय युग महाभप्य के साय २ पाणिनि व्याकरण का प्रथम युग समाप्त हो गया । ईसा की सातवीं शताब्दी में फिर अष्टाध्यायी तथा महाभाष्य पर कुछ सरलटीका-ग्रन्य लिखे जाने सगे । यहीं से द्वितीय युग का प्रारम्भ हुमा समझना चाहिए। इस युग में पाणिनि व्याकरण पर भनेक टीका अन्य लिमे गये । भतृहरि ने महाभाष्य पर टीग लिखी। वामन तया जयादिस्य (६६० ई.) ने प्रष्टाध्यायी पर 'काशिका' नामक वृत्ति लिखी । 'काशिका' पर जिनेन्द्र बुद्धि ने 'न्यास' नामक अन्य लिखा तथा हरदत्त ने 'पदमञ्जरी' नामक प्याख्या की। इस युग में ही पारिपनि ध्याकरण :बा दार्शनिक विवेचन भी प्रारम्भ हो गया। भर्तृहरि (६५. ई.) ने 'वाक्यपदीय' नाम का अन्य लिखकर इस विवेचना का श्रीगणेश किया। इस युग की अन्तिम रचना केयट पी प्रदीप नामक टोरा कही जा सकती है जो महाभाष्य पर लिखी गई सुन्दर टीका है। महरि-(सप्तम गताग्दी) भर्तृहरिना सस्कृत व्याकरण मे मत्यन्त उच्च स्थान है। प्यारण के मुनित्रय के पश्चात उनकी भोर ही दृष्टि जाती है। फिर भी उनके विषय में हमारी जानकारी वहन ही कम है । भर्तृहरि का समय भी मनिश्चित सा ही है । मनेक विमान इमिग नामक , चीनीयानी रे मेन मा अनुमरण करके भतृहरि का समय सप्तम गती १० का उत्तराई मानते हैं । भारतीय परमरा रे भनुमार भर्तृहरि महाराज विमा दिप रेभाई थे। दुधिष्टर मौमामा ने इत्मिा के मेन भी भूमी पोर मरेत परोए दुन्नि व प्रमानों के प्राधार पर यह मिद करने का प्रयास किया है हिरा समय ईशा में दाम्दी पूर्व होना चाहिये ।

। भर्तृहरि के जीवनवृत्त के विषय में कुछ किंवदन्तियां प्रचलित है। कुछ प्रामा• णिक विवरण भी मिलता है । वाक्यपदीय पर लिखी हुई पुण्यराज की टीका से विदित होता है कि भर्तृहरि के गुरु धसुरात पे । 'प्रणीतो गुरुणाऽस्माकमय- मागमसग्रहः' इस प्रलोक की प्रवतरणिका मे पुष्पराज ने लिखा है-'तत्र भगवता वमुरातगुणा ममायमागमः सज्ञाय यात्राल्यात् प्रणीतः इत्सिग के विवरण के अनुसार वाक्यपदीय का रचयिता भतृहरि बौद्ध था उसने मात बार प्रवज्या ग्रहण की थी। किन्तु पाक्यपदीय के अनुशीलन से यह स्पष्ट है कि भर्तृहरि वैदिकमतानुयायी थे। एक स्थान पर उन्होने लिखा है---'वेदशास्त्रा. विरोधी व तर्कश्चक्षुरपश्यताम्' । इसी प्रकार अन्य रान्दों में भी उनकी वेद के प्रति भास्था दिखलाई देती है। भर्तृहरि को रचनाएँ-संस्कृत वाङ्मय मे भर्तृहरि के नाम से मनेक ग्रन्थ मिलते हैं जैसे महाभाष्यदीपिका, वाक्यपदीय, नीतिशतक मादि शतकत्रय, भट्टि- काय तथा भागवृति नामक मप्टाध्यायी की एक प्राचीन वृत्ति । इनके अतिरिक्त 'वेदान्तसूत्रवृत्ति' पादि कतिपय अन्य ग्रन्थों का भी भर्तृहरि से सम्बन्ध जोडा जाता है। युधिष्ठर मीमांमक ने यह सिद दिया है कि वाक्यपदीय तथा महाभाष्य. पापिका का रचयिता एक ही भर्तृहरि है, भट्टिकाम्य तथा भागवृत्ति के पर्ता उससे भिन्न है, रिभ्य भट्टिवाय्य एवं भागवृत्ति के रचयिता भी परस्पर भिन्न ही हैं । इस प्रकार सीन भतृहरि हुए हैं, यह परिणाम निकलता है । जहाँ तक शतात्रय का प्रश्न है, उसके विषय मे यह निश्चित नहीं पिया जा सका है कि यह रिस भर्तृहरिकी रचना है । महाभाष्योपिका महाभाप्प पर लिसो गई एक विस्तृत व्याख्या थी । इसिंग के अनुसार इसका परिमाण २५०.. तोर के बराबर पा । यह माया अभी तक पूर्ण रूप में उपलब्ध नहीं हो सकी है। इसके उद्धरण भनेक भन्यो मे मिलते है । भर्तृहरि ने वास्यपदीय बहाराष्डको स्योपन टोरा में भी सरी भोर संरेत पिया है- 'सहितमूर-माप्यविवरण रहधा विधारितम् ।

माधुनिक युग में रा. कोलहान मे महामाप्यदीविका का प्रथमतः परिचय दिया है। जर्मनी में पलिन के पुस्तकालय में महाभाष्यदीपिका के एक अंश की हवा लपि विधमान है । इसकी फोटो कापी लाहौर तथा मद्रास के पुस्तकालयों में भी है। पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु ने इसका सम्पादन प्रारम्भ किया था। वाक्यपदीय---यह ध्याकरण दर्शन का प्रन्य है इसके तीन काण्ड है--ब्रह्मा- कापड, वाक्यकाण्ड, प्रकीर्णकाण्ड । इसमे समस्त विश्व को शब्दब्रह्म का विवर्त गना गया है, स्फोट रूप शब्द का विशद वर्णन किया गया है तथा व्याकरण के वविध विषयों का प्रक्रिया एव मयं की दृष्टि से विवेचन किया गया है वाक्यपदीय के ब्रह्मकाप्ड के कई संस्करण प्रकाशित हुए हैं, शेष वाक्यपदीय प्रकाशित हुमा है मभी कुछ समय पूर्व वाक्यपदीय का टिप्पणी सहित अंग्रेजी (नुबाद भी प्रकाशित हुया है। इस प्रकार भर्तृहरि केवल महाभाष्य के व्याख्याकार ही नहीं हैं। उनका वशिष्ट महत्त्व तो इसमे है कि उन्होंने व्याकरण दर्शन के स्वरूप को व्यवस्थित कया है । महाभाष्य मे जो व्याकरण दर्शन के मन्तव्य यत्र-तत्र कहीं संकेत रूप 'तया कही स्पष्ट रूप में विद्यमान थे, उनका क्रमबद्ध वैज्ञानिक विश्लेषण थमतः भर्तृहरि ने ही दिया है। अपने इस मौलिक कार्य के कारण भट्ठे हरि र सदा मादरपूर्वक स्मरण किया जाता रहेगा। तृतीय युग तृतीय युग में पाणिनि व्याकरण के अध्ययन की दृष्टि बदल गई। विषय- माग के अनुसार प्रष्टाध्यायी के सूत्रों की व्यवस्था की जाने लगी। वास्तव में न युग में शब्द-सिद्धि की प्रक्रिया पर अधिक बल दिया जाने लगा और भूत्रों विवेचन पर कम । इस दिशा में सर्व प्रथम प्रयास विमल सरस्वती (१३५० •) का था जिन्होंने 'रूपमाला' लिखी। इसी दृष्टि से रामचन्द्र (१५ शती'ने या-कौमुदी लिखी। १ प्रक्रिया-युग में सब से महत्त्वपूर्ण स्थान भट्टीजि क्षित का है। इस समय के व्याकरण के दार्शनिक विवेचन सम्बन्धी अन्यों में ।

'वैयाकरण भूपण' उल्लेखनीय है जिसे भट्टोजि दीक्षित के भतीजे को अभट्ट ने लिखा था। मट्टोनि रोक्षित-(१वी शताब्दी ई. के लगभग) भट्टोजिदीक्षित महाराष्ट्रीय ब्राह्मण थे। इनो पिता का नाम भीधर था। वैयाकरण भूपण के लेखक कोण्डभट्ट इनके छोटे भाई रङ्गोजि भट्ट के पुत्र थे। प्रौढ़मतोरमा की टीका 'शारदरत्न' के लेखक हरिदीक्षित इनके पौत्र थे। पण्डितराज जगन्नाथ कृत 'प्रौढ़मनोरमा खण्डन' नामक ग्रन्थ मे विदित होता है कि भट्टोजिदीक्षित ने नृसिंह के पुत्र शेवकृष्ण से व्याकरण शास्त्र का अध्ययन किपा पा । भट्टोजिदीक्षित ने 'चन्दकौस्तुभ' मे शेषकृष्ण के लिये गुरु गद का प्रयोग भी किया है । एक अन्य स्थल पर इन्होने मपय्य दीक्षित को भी नमस्कार किपा है । (प्पा. शा. का इतिहास पृ. ४०)। घेलवल्कर ने भट्टोजि दीक्षित का समय १६००-१६५०६० माना है। कुछ विद्वान् इनका समय १५८० ई० ११६३७ वि० सं०) के लगभग मानते हैं। प० युधिष्ठिर मीमासक ने कतिपय प्रमाणों के पाधार पर यह निर्धारित किया है कि इनका जन्म-काल वि.स. की सोलहवी शताब्दी का प्रथम दशक मानना पाहिये। भट्टोलि दीक्षित की कृतियो- भट्टोषि दीक्षित ने भनेक अन्य तिरो थे। इन्होंने प्रप्टाध्यायी पर 'शाद. कौस्तुभ' मामा एक वृत्ति विसो यो। मान इस दत्ति के प्रारम्भ के दाई मध्याय तथा चतुपे मध्याय हो उपसम्प है । यह अन्य किसी समय भन्यन्त महत्वपूर्ण समझा जाता रहा होगा। इसीलिये इस पर भनेक टीकाएं लिभो सी गई थी। सम्भवतः पतिराज जगन्नाथ मे स्नुभ- रागन' नामक सय भी लिसा पा। सिमान्तकौमुरी या पाकरण सिद्धान्तकोमुरो भट्टोरि दीक्षित कीतिका प्रसार करने वाला मुख्य मन्प है। यह शन्द पौस्तुभ' के पश्चात लिखा गया था। भट्टोषि दीक्षित ने स्वयं ही इस पर मनोरमा नम की टीका लिखी है। सिदान्तकौमुदी यो प्रक्रिया पनि रा सर्वोत्तम पन्य समझा जाता है। इससे पूर्व बोri raf उर परापापी भी मौत गमाग महो Sizifa ferni fनौकरी में पानी के गभी गो कोffry प्रारमपतिया है. गोमममस्त पातु माँ का रिसरातातिमा के प्यार का करके afrinा एकरहिया गोमाग में गया है। यही भदोषि दीक्षित मेगा. मागी मात्रामानुगामायापी तथा मरिया कोपुरी पोर उगी टीपापोंरे मतों की गोएशिया पनि के पनुगार पाणिनीय IIT मालिीग मा प्रा करने प्रयाग किया है। उन्होंने पावसतानुगार परिमलामो वातितो तया मायेटियों का भी उस्नेत रिपा है। उन्होंने मुनिप रे मनायों का सामन्त्रस्य रिगलाया है तथा महामाया मापार मेर पुप स्वीय मन भी रयाशित रिये है। साथ ही प्रसिद्ध विपी द्वारा पारु रिन्ही विशनपर प्रयोगो भी सापता पर भी पिचार रिया है। मामयुग में मिलीमुदी सना प्रभार एवं प्रमार हमा कि पाणिनि मारण को शापीन परति एष मुग्पोष पादि म्याकरण पद्धतियां विलीन होती चली गई । पलान्तर मे प्रतिपा-पद्धति सपा मिशन-कौमुदी के दोषी यो पोर भी विद्वानों को हरिट गई किन्नु वे इमे पोर न सके । इनरे पतिरिक्तः भट्टोज दीक्षित वा 'वेदमाध्यमार' मामा अन्य भी प्रकाशित हुमा है (भारतीय विद्याभवन, बम्बई)। यह ऋग्वेद सायणभाष्य का सार है। इसकी भूमिका मे भट्टोजि दीक्षित को ४ कृतियों का उल्लेख किया गया है। इनमे 'धातुपाठ-निर्णय' नामक ग्रन्थ भी है । हस्तलिपियों में इनकी 'ममरदोका' नामक कृति उपसन्ध हुई है। पाणिनीय व्याकरण में भट्टोजि दीक्षित का महत्त्वपूर्ण स्थान है। पाणिनि- ध्याकरण पर उनका ऐसा मनूठा प्रभाव पड़ा है कि महामाथ्य का महत्व भी भुला दिया गया है । यह समझा जाने लगा है कि सिद्धान्तकौमुदी महाभाष्य का द्वार ही नहीं है अपितु महाभाष्य का सक्षिप्त किन्तु विशद सार है। इसी हेतु यह उक्ति प्रचलित है :-- कौमुदी यदि कण्ठस्था वृथा भाध्ये परिथमः । कौमुदी पद्यकण्ठस्था वृथा भाष्ये परिश्रम ॥ प्रक्रिया के युग को शास्त्रर्य के क्षेत्र में प्रविष्ट कराने वालों में नागेश भट्ट का नाम अग्रगण्य है । इनकी प्रतिभा अनूठी थी। इनका विविध शास्त्रो पर समान अधिकार पास होने व्यारण के क्षेत्र मे गङ्गश उपाध्याय द्वारा प्रवर्तित नस्य-न्याय की शैली का प्रवेश किया तथा अनेक मौलिक एव भ्याग ग्रन्थो को रचना की। नागेश मह-(१७ वी तथा ८वीं शती ई.) नागेश भट्ट या नागोजि भट्ट के जीवन वृत्त के विषय में भी घट्नुत कम ज्ञात हो सका है । जनश्रुति के अनुसार ये महाराष्ट्र के एक ऋग्वेदी ब्राह्मण थे । शन्देन्दु शेखर के मङ्गल से विदित होता है कि उनके पिता का नाम शिवभट्ट तथा माता का नाम सती देवी या-'शिवभट्टमुतो धीमान मतीदेव्यास्तु ममंज नागेश भट्ट के पूर्वज उपाध्याय' रहलाते थे । मङ्गल श्लोक मे बनालाया गया है कि नागेश- भट्ट गवेरपुर के राजा राम के पाश्रित थे गवेरपुराधीशाद् रामतो सम्प• जीविकः । विद्वानोरा विधार है कि शङ्गवेरपुर से पानरम सिंगरौरा कहा भाता है, यह प्रयाग से मुख मीन पर स्थित है (परमलधुमपा वड़ोदा १९६१. भूमिस) । सगरदेन्दुसर के पन्तिम प्रयोग से पता चलता है कि उनके कोई सन्तान न पो, शादेन्दुशेखर को पुत्र पौर मञ्जूपा को पन्या मानकर उन्होंने शिव को पति पिया था- शम्देन्दुशेखरः पुणे मजपा व काया। स्वमतो सम्यगुन्गाध शिवयोरपितो मया ।। जाति है। वे पोरग वर्ष की भायु ता ममिति रहे । एर बार अपनी अगिष्टमा के गारण उन्हें पण्डितोंपी भन्संना सहन करनी पड़ी, जिमने उनके जीवन की दिशा बदल गई। तभी वे सरस्वती देश को भनि मे लग गरे पौर परस्पती के वरदान से विधन हो गये। उन्होंने हरितोशित (भट्टोषिके पौत्र) से माररए महाभाष्यामध्ययन नि HTimitr. । rrrrrrrrtolerate Triritrat -::Militate sant m rgentarit amiti str: RAJ Rem ant rrareere tena.marhtttare. fire terre.tirga Patrar h RARE ON whree RLE TREATi (पनुमा M. rem v; स . Health TTE SER RATE+REE TRAILER १.fan REE TITTrयां को मि बामरी माता पाय Firmir- Internात दापन माग भट्ट मोना.* नौ प्रारम्भ में है। ( Infer) | मामेश भट्ट कोरिया . रोपान महन्धी रचना है-महाभावाशेपोचो मा तन्दुशेखर, हम्मादेन्दुभिर, रिभानुशेशर, मधुमपुरा, परमप्रभुमा मोररोटासा माग [१५ डा वेलवलकर का विचार है कि प्रौड़मनोरमा को टीका शुद्धरन जो हरिदीक्षित के नाम से प्रसिद्ध है वह भी नागेश भट्ट की ही कृति है। इनके अतिरिक्त अन्य विषयों पर भी नागेश भट्ट के अन्य हैं, जैसे काव्यप्रकाश की प्रदीप टीका पर उद्योत नाम को टीका है, रसगङ्गाधर तथा योगसत्रो पर भी व्याख्यायें हैं। वस्तुत: संस्कृत वाङ्मय विशेषकर व्याकरण शास्त्र नागेश भट्ट के द्वारा गौरवान्वित हुमा है । नागेश भट्ट ने महाभाप्य के मर्म को स्पष्ट करन का प्रयास किया है। व्याकरण दर्शन के दोत्र में उनका अद्वितीय स्थान है उन्होने मपा अन्य में व्याकरण दर्शन का विशद विवेचन किया है । इस विवेचन में वेक्षन्त की हृदयग्राह्यता है और न्याय की तर्कप्रवणता । सिद्धान्त-कौमुदी पर पन्य भी अनेक टीकायें लिखी गई। उनमे परिव्राजका- चार्य ज्ञानेन्द्र सरस्वतीकृत 'तत्वबोधिनी' विशेष महत्त्वपूर्ण है। किन्तु छात्रो की दृष्टि से 'बालमनोरमा' नामक टीका अधिक उपयोगी है। पाणिनि-व्याकरण में बालको का प्रवेश करने के लिये भटोजिदीक्षित के शिष्य वरदराजाचार्य ने सघुकौमुदी तथा मध्यकौमुदी का निर्माण किया । लघुकौमुदी मे व्याकरण प्रक्रिया का सभी पेशगीय विवरण घरदराज ने दिया है यह सिद्धान्त कौमुदी का संक्षिप्त सस्करण होते हुए भी एक विलक्षण कृति है। ३-पाणिनि पाकरण के प्रध्यप्रलार्य ज्ञातव्य बातें- पाणिनि व्याकरण के सामान्य परिचय के साथ साथ यह भी जानना पावश्यक है कि सक्षेप की मोर पाणिनि का विशेष ध्यान रहा। इसके लिये उन्हें अनेक उपायों को काम में लाना पड़ा । जिनमे से कुछ का मक्षिप्त परिचय नीचे दिया जाता है- (१) प्रत्याहार-जर पादि के प्रक्षर का मन्त के इत्संशक के साथ ग्रहण किया जाता है और उसके द्वारा भादि तथा मध्य के समस्त मक्षरों का बोध होता है तो उसे प्रत्यहार कहते हैं। ये प्रत्याहार विशेषकर वर्णमाला के घरों से बोध कराने के लिये माहेश्वरगूत्रों के माधार पर बनाये गये हैं। जैसे- १. मादिरन्त्येन सहेता १११ । । इसी प्रकार अन्य १. उरदेशाजनुनामिक इन २, ६.घुट ३७, ७. प:प्रत्ययस्य | अइउण ।। ऋलक् ।। एप्रोङ् ।३। ऐनौच् ॥३॥ हयवरट ।vi लण, ६| अमटरएनम् ।७। झभत्र 1 घढधप ।।। जबगदश् ।१०। सफदव्यचटतव ॥१॥ कपम् ।१२। शपसर ।१३। हल ।१४|| ये १४ माहेश्वरसूत्र माने जाते हैं । इन भूत्रों के माघार पर अण, मादि। प्रत्याहार बनते हैं । इन सूत्रो में अन्तिम हल (व्यञ्जन) की इरसंज्ञा होती है। अादि प्रक्षर को इत्संज्ञक के साथ मिला कर प्रत्याहार बनता है। जैसे 'प्रइउण में प्रण प्रत्याहार बनता है जो म, इ, उ, का बोध कराता प्रत्याहारो के विषय मे भी जाना चाहिये। जैसे तिङ प्रत्याहार है, यहाँ मादि 'ति'२ को अन्तिम इत् संज्ञक हु के साथ मिला कर तिङ्' बनता है और क्रिया से लगने वाले १८ १९ परस्मैपद+९ प्रात्मनेपद) प्रत्ययों का बोध होता है । वर्णमाला के ४२ प्रत्याहार ये हैं-(प्रकारादि क्रम से) १५ ऐच २२ जश २६ भप् २९अच् १६ खय २३ भय ३ मट १० इच २४ झर ३१ यत्र ५पए १८ इम् २५ मल ३२ यण १२ उक १६ चय २६ अश ४.शा ६मम् २०चर २७ भप् । ३४ यस् २१ छन् २८ वश ३५ यर ४२ हश (२) इरसंज्ञा - अष्टाध्यायी में निम्न वर्णों को संज्ञा की गई है-- (a) पन्त का हल ३, (II) उपदेश में मनुनासिक अच्, वर)५ (III) प्रत्या वे प्रादि में पाने वाले चवर्ग, वर्ग तथा पकार (iv) तद्धितभिन्न प्रत्ययों १. हसरयम् १।३।३, २. तिप्तसझिसिस्थममियवम्मस्तातझिया- मापांवमिडवहिमाहिइ ३४७८, ३. हलन्यम् ।।३।३ ४. धानुसत्रगमोगादिवाक्यलिङ्गानुशासनम् । प्रागमनायादेगा उपदेगा प्रीतितिा:॥ ८ अश ३० मय ३७ दल ३८वश् . प्रल १० एच [ १७ ] -प्राने वाला लकार, शकार तथा क वर्ग । १ (V) धातु के प्रादि .२ इत्संज्ञक का लोप हो जाता है । ३ किन्तु लोप हो जाने पर भी लक्षण मानकर कुछ कार्य हो जाया करता है । जैसे 'गर्गादिभ्यो यत्र से यत्र प्रत्यय होता है जिसमें ज् इत संजक है अत: यञ् प्रत्यय सो विद होने से मादि को दृद्धि होती है और 'गार्य रूप बनता शक 'अनुबन्ध' कहलाते हैं और इनके कारण म्याकरण मे बडा लाघव अधिकार-युध सूत्र ऐसे बनाये गये हैं जो यह बतलाते हैं कि ममुक सूत्र तक यह प्रत्यय होगा या यह कार्य होगा। ये अधिकार जाते है । जैसे-कारके ३' अथवा 'प्राग्दिशो विभक्तिः ५२८' बनुत्ति-साघव के लिये पाणिनि ने ऐसा किया है कि एक (पूर्व) एक पद रस दिया, अग्रिम सूत्रों में जहाँ उस पद को मावश्यक्ता से लेकर अन्वर कर लिया गया। पूर्व सूत्रों से भग्रिम सूत्रो में पनुवर्तन को ही अनुवृत्ति कहते हैं । सामान्यत यह मनुवृत्ति एक र वाले मपिम सूत्र में जाती है मोर फिर जमश: पाये के सूत्रों में रिन्तु कभी २ बीच के सूत्रों में रिसी पद की भनुवृत्ति नहीं होती - भागे के. (यवटन) मूत्र में हो जाती है । उसे मण्डूकप्तुति या मनुषत्ति रहते है । (देखिये पृ० १८). परवा पाने के सूत्र से पूर्व मूत्र में किसी पद यो खींच का है पति मन्वित किया जाता है वहाँ पपकर्ष कहा जाता है उपपक गग-(i) एकादेश- दो वर्षों से मिपाकर जाता है वह एकादेशाता है से म+ए एकादंग होता पररूप- पूर्व तथा पर वार को मिलाकर परवणं हो हा पर हमला है. मे-प्र-एको प्रेजन, यहां म+ए- २ परियः | नपरोस समत. unt [ १८ ] ए होता है । (ii) पूर्वरूप-जहाँ पूर्व तथा पर वणं के मिलने पर पूर्ववरणं हो जाता है वह पूर्वरूप कहलाता है। जैसे-हरे+भव= हरेऽव, यहाँ ए+म =ए होता है । (iv) प्रकृतिभाव-जहाँ वणों को प्राप्त होने वाला कोई विकार नहीं होता, वह प्रकृतिभाव (जंसा का तैसा रहना) कहलाता है। जैसे गो+भयम् = गो भरमा यहाँ विकल्प से मो+=मो+म ही रहता है। पूर्वरूप प्रादि नहीं होता। (७) कुछ ज्ञातव्य संज्ञाएं-(i) प्रग-जिस धातु या प्रातिपदिक से प्रत्यय का विधान किया जाता है उसे अङ्ग कहते है। १ जैसे-कर्ता, यहाँ कृ (प्रकृति) से तृच् प्रत्यय कहा गया है । कृ अङ्ग है। (i) प्रातिपदिक-धातु और प्रत्यय (प्रत्ययान्त) को छोड़ कर सभी अर्थयुक्त शब्दों की प्रातिपदिक संज्ञा होती है। २ प्रत्ययान्तों में भी कृदन्त तद्धितान्त तथा समस्त पदो की प्रातिपादिक संज्ञा होती है। ३ प्रातिपादिक सज्ञक शब्द से सु प्रादि (सुप्) प्रत्यय लगते हैं । (ii) पद-(क) सुबन्त तथा तिडन्त की पद संज्ञा होती है; ४ जैसे-- राम+सुरामः यह सुबन्त है और पठ्+अ+ति-पठति यह तिङन्त पद है । सु से लेकर सुप् तक के सातों विभक्तियों के २१ प्रत्यय सूप् कहलाते हैं तथा ति से लेकर महिङ् तक धातु से लगने वाले १८ प्रत्यय तिङ्कहे जाते हैं । ये सुप् और तिड् प्रत्याहार हैं। (ख) सित (जिसमें स् की इत्संज्ञा हो) प्रत्यय परे होने पर पूर्व की पदसंज्ञा होती है । ५ (ग) सर्वनामस्थान ६ को छोड़कर सु से लेकर का तक के प्रत्यय परे होने पर पूर्व की पद संज्ञा होती है । ७ पद सक्षा हो जाने से राजत्वम् =(राजन +त्व) मे नलोप होता हैं । १ यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम् ॥४॥१३ २ अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिरादिकम् १।२।४५ ३ कृत्तद्धितामाश्च २०४६ ५ सिति च १६ के तीन प्रत्यय सु, मो, जस् तथा द्वितीया कहलाते हैं (सुडनपुसकस्य १।१।४३)।

(VI) म संज्ञा-(क) जिस प्रत्यय के प्रारम्भ में यकार या अच् (स्वर) है उसके परे होने पर पूर्व की म सज्ञा होती है, पद सज्ञा नहीं ।। (ख) न्ति और सकारान्त शब्द की मत्वयं प्रत्यय परे होने पर भ सज्ञा v) विभाषा-प्रतिषेध तथा विकल्प की विभाषा सना होती है (नवेति Tix) विभापा का है किसी कार्य का विकल्प से होना। था 'मन्यतरस्याम' शब्दों का भी विमापा शब्द के अर्थ मे प्रयोग किया है। वह विभाषा कई प्रकार की होती है, जैसे १. प्राप्त विभाषा- नयम से प्राप्त हुए कार्य का विकल्प, २. अप्राप्त विभापा- किसी नियम त कार्य का विकल्प से विधान, ३. उभयत्र विभाषा (प्राप्ताप्राप्त -कही प्राप्त तथा कहीं अप्राप्त विधि का विकल्प, ४, व्यवस्थित व्यवस्था से विकल्प अर्थात कही कार्य होना कही न होना (देखिये " 1) उपधा-अन्तिम वर्ण से पहले वाले वणं को उपधा संज्ञा होती रोऽन्त्यात पूर्व उपपा ११२६५) । जैसे-पठ् में पकार से अगले प्रकार T संज्ञा है। i) टि-किसी पाब्द का अन्तिम स्वर-सहित मागे वाला अंश टि है (मनोऽन्त्यादिटि १६४) जैसे पट मे भल् टि सज्ञक है । ii) सयोग-~-जब ध्यञ्जनी (हल) के बीच में स्वर नहीं होते तो यह का संयोग कहलाता है (हलोऽनन्तग: संयोग. १३१७)। जैसे अल्प का संयोग है। । सम्प्रसारण-य, व, र, के स्थान पर होने वाले इ, उ, ऋ । साम्प्रसारण संज्ञा होती है (इग्यणः सम्प्रसारणम् ॥१४५) पुरा --अ, ए तथा प्रो की गुण सजा होती है (प्रदेङ गुणः ११३१) । पृद्धिा, ऐ तथा श्री की वृद्धि संज्ञा होती है (द्धिरादेच २ तसो मत्व ११९ (xii) सोप-प्राप्त प्रत्यपादि या अपने स्थान पर दृष्टिगोचर न होना कहलाता है (प्रदर्शन सोपः ।।६०) । प्रत्यय के लोर की विविध स्थनों एक, म तपा सुपु संगा होती है (प्रत्ययस्य लुकाकुलुपः ॥१६)दि संज्ञा से प्रत्यय का लोप महा जाता है उसकी वही सजा होती है। (xit) मादेश-किसी वर्ण मादि के स्थान पर दूसरा पर्ण मादि होना कहलाता है, जैसे समास मे कन्या के स्थान पर स्या हो जाता है। xiv) भागम-किसी वर्ण यादि का प्रकृति या प्रत्यय के साथ मा 7 मागम कहलाता है। ये पागम प्रायः तीन प्रकार के होते हैं-टित्, तपा मित् । जो टित् मागम होता है, वह जिसे कहा जाता है उसके मादि है, कित् अन्त में होता है ।१ मित् मन्त्य के मच् से परे होता है। टेपणी -मादेश तथा पागम प्राचीन संज्ञाएँ हैं, पारिपनि ने इनके लिये दूर नहीं बनाया। (4) शब्द-सिद्धि में सहायक कुछ अन्य उपाय-(1) योग-विभाग- कभी बुध प्रयोगों में किसी प्रत्यय मादिका विधान स्पोपलब्ध नियमों होता ऐमी दशा में महाभाष्यकार भादि ने सूत्र के दो अंश (पोग 1) करके शब्दों की सिद्धि दिखलाई है यही योग-विभाग कहलाता है। ये मूत्र १८ प्रादि)। (i) नापक-कभी कभी किसी नियम के अनुसार कोई शब्द सिद्ध नहीं -- गादि प्राचार्यों के द्वारा किये हुए प्रयोग से उसकी साधुता । होती होते हैं। इसी प्रकार कुछ प्रत्य प्रकार कुछ सूत्रादि द्वारा प्रकट न होने वाली या इष्टि नाम से प्रसिद्ध है। में यत्र तत्र कुछ पारिभाषिक शब्दों : [पृ.५०) माकृतिगरण मादि। किया गया है। इन सब बातों सहायक हैं।

अध कारकमकरणाम १ । प्रातिपदिकालिगपरिमाणवचनमान्ने प्रथमा २२३४६। नियतोपस्थितिका प्रातिपदिकार्थः। मानशब्दस्य प्रत्येक योगाप्राति- पदिकार्थमात्रे लिङ्गमात्राद्याधिक्ये संख्यामात्रे च प्रथमा स्यात् । अथ करएकप्रकरणम-कारक' शब्द का अर्थ है क्रिया से सम्बन्ध रखने वाला'। किसी वाक्य मे जिस सज्ञा, सर्वनाम आदि का क्रिया से सम्बन्ध होता है, वही कारक कहलाता है। जिन माब्दों का क्रिया से सीधा सम्बन्ध नहीं, वे कारक नहीं कहलाते, जैसे-"देवदत्तः यज्ञदत्तस्य पुस्तकं पठनि" (देवदत्त यज्ञदत्त की पुस्तक पढ़ता है, यहाँ देवदत्त पठन क्रिया का करने वाला है और पुस्तक पढ़ी जाती है अत: ये दोनों कारक हुए, किन्तु 'यशदत्त' का पठन क्रिया से कोई सम्बन्ध नहीं, उसका सम्बाध है पुस्तक से, इसलिये 'यज्ञदत्त' यहाँ कारक नहीं । इस प्रकार सम्बन्ध को कारक नहीं कह सकते । संस्कृत व्याकरण के अनुसार केवल ६ कारक है--कर्ता, कर्म, फरण, सम्प्रदान, अपादान, अधिकरण; जैसा कि कहा भी है- कर्ता कर्म च करणं च सम्प्रदान तथैव च । उपादानाधिकरणे इत्याहुः कारकापि पद ।। वस्तुतः सिद्धान्तकौमुदी का यह प्रकरण विभक्ति प्रकरण है, जिसमें सातों, विभक्तियों का वर्णन किया गया है। प्रपमा विमति१. प्रातिपदिकेति-शब्द से जिस अथं की नियमपूर्वक उपस्थिति होती है वह प्रातिपदिकार्थ है। सूत्र में मात्र' शब्द का प्रत्येक के साथ सम्बन्ध है, यतः केवल प्रातिपदिकार्य लिङ्ग मात्र एवं परिमाण मात्र अधिक होने पर तथा संख्या मात्र को प्रकट करने के लिये प्रथमा विभक्ति होती है। इस प्ररार प्रथमा विमति निम्न चार अयों में होती है- (१) प्रातिपदिकार्य मात्र, (२) लिङ्ग मात्र से युक्त प्रातिपदिकार्य, (३) परिमाण मात्र से युक्त प्रातिपदिकार्य, (४) वचन मात्र । १. क्रियान्वमित्वं कारकत्वम् । .

। २० ] (xii) लोप-प्राप्त प्रत्ययादि पर अपने स्थान पर दृष्टिगोचर न होना सोप कहलाता है (पदरांनं सोपः ॥१०६०। प्रत्यय के लोर की विविध स्थलों पर लुट, स्नु तपा सुप् संशा होती है (प्रत्ययस्य सुशनुनुपः ११७६१)प्रर्यात जिस संज्ञा से प्रत्यय का लोप कहा जाता है उमको यही सना होती है। (xiii) प्रादेश-किसी वर्ण मादि के स्थान पर दूसरा वणं मादि होना मादेश कहलाता है, जैसे रामारा में कन्वा के स्थान पर ल्यप् हो जाता है। (xiv) मागम-किसी वणं यादि का प्रति या प्रत्यय के साथ मा मिलना मागम कहलाता है । ये पागम प्रायः तीन प्रकार के होते हैं-टित, हित् सपा मित् । जो टित् पागम होता है, वह जिसे कहा जाता है उसके भादि में होता है, कित् अन्त मे होता है । मित् पन्दय के पच से परे होता है। टिप्पणी-मादेश तथा प्रागम प्राचीन सजाएं हैं, पाणिनि ने इनके लिये कोई मूत्र नहीं बनाया। (८) शब्द-सिद्धि में सहायक कुछ अन्य उपाय--11) योग-विभाग- कभी-कभी कुछ प्रयोगो में किसी प्रत्यय मादि का विधान यथोपलम्प नियमों से नहीं होता ऐमी दशा में महामाप्यार मादि ने सूत्र के दो मश (योग विभाग) करके शब्दो की सिद्धि दिखलाई है यही योग-विभाग कहलाता है। (देखिये मूत्र ६८ प्रादि)। (i) शापक---कभी कभी किसी नियम के मनुसार कोई शब्द मिद्ध नहीं होता किन्तु पारिएनि मादि प्राचार्यों के द्वारा किये हुए प्रयोग से उसकी साधुता सिद्ध होती है यह शापक सिद्ध प्रयोग होते हैं । इसी प्रकार कुछ अन्य प्रकार के भी ज्ञापक होते हैं (देखिये पृ०५८)। (iii) इष्टि-महाभाष्यकार ने कुछ सूत्रादि द्वारा प्रकट न होने वाली बातो को अभीष्ट माना है वे भाप्येष्टि या इप्टि नाम से प्रसिद्ध हैं। (E) इसके अतिरिक्त विविध प्रकरणो में यत्र तत्र कुछ पारिभाषिक शब्दों का प्रसङ्ग भी पा गया है। जैसे - निपातन [पृ. २५० मातिगण मादि । उनकी व्याख्या यथास्थान करने का प्रयास किया गया है। इन सब बातों का ध्यान रखना सहित भ्याकरण के अध्ययन में विशेष सहायक हैं। १ माद्यन्तो विती ॥१॥४६ २ मिदचोऽन्यात्परः ११७ प्रकारकमकरगाम १। प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमाने प्रथमा २१३०५ नियतोपस्थितिका प्रातिपदिकार्थः। मानशब्दस्य प्रत्येक योगः। प्राति- पदिकार्थमा लिङ्गमात्राद्याधिक्ये संख्यामात्रे च प्रथमा स्यात् । अय कारकप्रकरणम्--'कारक' शब्द का अर्थ है क्रिया से सम्बन्ध रखने वाला'। किसी वाक्य में जिस संशा, सर्वनाम आदि का क्रिया से सम्बन्ध होता है, वही कारक कहलाता है । जिन शब्दों का क्रिया से सीधा सम्बन्ध नहीं, वे कारक नहीं पहलाते, जैसे-"देवदत्तः यज्ञदत्तस्य पुस्तकं पठति" (देवदत्त यज्ञदत्त की पुस्तक पढ़ता है) यहाँ देवदत्त पठन क्रिया का करने वाला है और पुस्तक पढ़ी जाती है अतः ये दोनों कारक हुए, किन्तु 'यशदत्त' का पठन क्रिया से कोई सम्बन्ध नहीं, उसका सम्बन्ध है पुस्तक से, इसलिये 'यज्ञदत्त' यहाँ कारक नहीं । इस प्रकार सम्बन्ध को कारक नहीं कह सकते । संस्कृत व्याकरण के अनुसार केवल ६ कारक है--कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, अधिकरण; जैसा कि कहा भी है- का कर्म च करणं च सम्प्रदानं सर्थव च। अपादानाधिकरणे इत्याहुः कारकाणि षट् ॥ वस्तुनः सिद्धान्तकौमुदी का यह प्रकरण विभक्ति-प्रकरण है, जिसमें सातो, विभक्तियों का वर्णन किया गया है।" प्रथमा विमति। १. प्रातिपदिकेति-शब्द से जिस अर्थ की नियमपूर्वक उपस्थिति होती है वह प्रातिपदिकार्थ है। सूत्र में 'मान' शब्द का प्रत्येक के साथ सम्बन्ध है, अतः केवल प्रातिपदिकार्य लिङ्ग मात्र एवं परिमाण मात्र अधिक होने पर तथा संख्या मात्र को प्रकट करने के लिये प्रथमा विभक्ति होती है। इस प्रकार प्रथमा विभक्ति निम्न चार वर्षों में होती है- (१) प्रातिपदिकार्य मात्र, (२) लिङ्ग मार से युक्त प्रातिपदिकाप, परिमाण मात्र से युक्त प्रातिपदिकार्य, () वचन मात्र । १. कियान्वयित्वं काररत्वम् ।

२ संस्कृतव्याकरणे । उच्च नीचः। कृपणः । श्री। ज्ञानम् । अलिङ्गा नियतलिङ्गाश्च प्रातिपदिकार्थमात्र इत्यस्योदाहरणम् अनियतलिङ्गास्तु लिङ्ग- मानाधिक्यस्य । तटः। तटी। तटम परिमाणमात्रे, द्रोपो व्रीहिः। प्रातिपरिकार्यमा-सार्थक शब्द को प्रातिपदिक कहते हैं। अंग्रेजी में जो शब्द की Crude form कहलाती है वही प्रातिपदिक समझना चाहिये। जिम गम के बोलने पर जो अयं नियम से उपस्थित हाता है, उसे प्रातिपदि- वार्थ रहते हैं । गम्द के इस नियत अयं को प्रकट करने के लिये भी विभक्ति लगानी पड़ती है, क्योंकि संस्कृत में पर का ही प्रयोग किया जाता है (नापर प्रयुशीत तथा न केवला प्रकृतिः प्रयोक्तव्या न केवलः प्रत्ययः) और मुरन्त या विन्त को ही पद कहते हैं (मुप्तिइन्तं परम्)। प्रातिपदिकार्य मे प्रथमा विभक्ति होती है । जो शरद अलिङ्ग है अर्थात किसी लिङ्गका बोध पो नियत लिङ्ग वाले हैं अर्थात् जिनके अयं के साथ-साथ लिगका बोध भी नियत का से हो जाता है, वे ही इसके उदाहरण है । जैरो-उग, नाग पे अलिज अपय पर हैं। इनसे प्रथमा विभक्ति होकर उचंग + गु-- सु सोप, 'सम्पयों में मुरमा लोप हो जाता है) और पद हो जाने से को विगर्ग होरर उच्चः आदि रूप होते हैं । शरद से गुलिन की, 'श्री' हम ये स्त्रीलिज भी पा 'शान' दरो नमक शिको नियम से प्रतीति होती है । बताये नियलिङ्ग के उदाहरण है। इनसे प्रपपा विमति होकर पण, पीतामानम् सहोते है। निमारातिपरिवार on जन विज मालकी प्रतीति दोस्ती मही यतः सित मात्र का अधिक शोध पराने के लिये प्रपमा होती। यह समझना चाहिये। अमित शिवाम मादाम के उगाहरण है। सेहरा, टी, टम र नारा, अर्थ वे माय-गाप मश: पुति आदि भी बोध कराते है. जो नानिएन अर्थ नहीं। तटस बियामा है, IT मिन मिजए नहीं। कभी पुलिस कभी मी नसारित हो जाता है । इस प्रकार 'त:.' या गाण्य अनुसार अपय मदों में भी प्रथमा अनी मोहोना है। विनि मगने पर ही मगर पद पर और प्रयोग के योर होते है।

३ द्रोणरूपं यत्परिमाणं तत्परिच्छिन्नी प्रीहिरित्यर्थः । प्रत्ययार्थे परिमाणे प्रत्यर्थोऽभेदेन संसर्गण विशेषणम, प्रत्ययार्थस्तु परिच्छेद्यपरिच्छेदकभावेन ग्रोही विशेषामिति विवेकः । वचनं संरया। एकः द्वौ बहवः इहोतार्थत्वाद्विभक्त रप्राप्ती वचनम ।। पानिपत अपं सरस्व मिलारा) है। उसमे अधिक पुंसव आदि ना ज्ञान भी पहा होता है । अत: ये लिमात्राधिकरके उदाहरण हैं। परिमाणमातापिपये--(उपर्युक्त रीति से परिमाण मात्र अधिक होने पर प्रथमा विक्ति होती है । जो जा बीहिः। 'हो' एक परिमाण (मrm) पानाम है। यदि यही 'द्रोणः' पम्प मे प्रातिपदिशा मे प्रथमा विमस्ति होतो तो 'प्रोण रूप जो परिमाण उमसे अभियवाहि यह मयं प्रतीत होता। पयो? यही जो परिमाण है वह नाम (प्रातिपदिक) का अर्थ होता; और नियम यह रिसमान विपक्तिबाले माम पदों के बर्रा बभेदान्यप प्रापरता है (नामापंयोरभेदान्वयः)। मनु यहाँ टोण परिमान माग दापोह यह अर्थ बमोष्ट है । त. परिमाणमाराधियर मे अषमा बिकि पा विधान रिया गया है। फला:-पहा द्रोण ग से होने वाली प्रथम सामान्य माण बर्ष को पार ली है। पम का अयं है-होण मामर परिमार-विशेष । मलिने होप (पार) अर्थ (परिमाण-विगंध प्रथा के अर्थ परिमाण मापान्य मे अभेद सम्बाप से मन्दिन हो जाना को "पहप परिमाण" अपं हो परिमाण प्रत्य है इस भारिपारिर-माव सम्पन्य बाहि मे बम्बर होट औरण परिमाप से मारा पीहि" वह अपं हो पाया है परमाणे-पनपते है संशोप सा दोर पर के लिये प्रपमा विमति होती है, से एकहोर। यहाँ एमा, दिर anो सेहो प्रादनिमा मिडिय बर.भी, या साधी महागात हो है। सानाभोयः (उक्त मोगा पुन: प्रयोग नही रोग)। १.रिसोई और भापोशांतीवालोग परिष्देर राग औरोराही परिदेस।

संस्कृतम्याकरणे २। संबोधने च ।२।३१४७॥ इह प्रथमा स्यात् । हे राम ।। इति प्रथमा । ३। कारके १।४।२३। इत्यधिकृत्य ॥ ४। फतुरीप्सिततमं फर्म ।१।४।४६। कतु:क्रियया प्राप्तु- मिष्टतमं कारकं कर्मसंज्ञस्यात् । कतु: किम् ? मापेप्वश्वं न्याय से प्रथमा विभक्ति नहीं होनी चाहिये थी, इसीलिये मूत्र में 'वचन' ग्रहण किया गया है। २ सम्बोधन इति-सम्बोधन में अर्थात् प्रातिपदिकार्य की अपेशा सम्बोधन मात्र अर्थ अधिक होने पर भी प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है । इस प्रकार संस्कृत भाषा में सम्बोधन के लिये पृथक् विमति नहीं है। जैसे-हे राम ! यहाँ राम शब्द से प्रथमा विभक्ति होकर (राम+सु), सम्बोधन मे सु का लोप हो जाता है । इति प्रथमा । द्वितीया विभक्ति ३ कारके-इस सूत्र से कारक का अधिकार करके कर्म आदि कारकों की संज्ञा की गई है । यह अधिकार सूत्र है। इसके आगे जो कर्म आदि संजाविधायक सूत्र हैं उन सब में 'कारक' पद का अन्वय होता है। ४कनुरिति-कत्ती अपनी प्रिया से जिस पदार्थ को प्राप्त करने की मधिक इच्छा रखता है वह कारक कर्मसंज्ञक होता है । क: फिमिति -जो कर्ता की क्रिया द्वारा उसे सबसे अधिक अभीष्ट होता है वही कर्मसंजक होता है। ऐसा क्यों कहा ? इसलिये कि यदि कोई पदार्थ कर्म आदि को अभीष्ट हो और कर्ता को अभीष्ट न हो तो उसकी कर्म सशा नहीं होगी, जैसे --'उड़दों (माप) में घोड़े को बांधना है।' यहाँ उहद कर्म (अश्व) को अभीष्ट है वही उन्हें खाना चाहता है । कर्ता के उड़द अमीष्ट नहीं, उसका अभीष्ट तो अश्य को बांधना ही है। इस हेतु अश्व को कर्म संशा होगी माप को नहीं । 'माए' बन्धन क्रिया का अधिकरण है अतः .. सप्तमी विभक्ति है।

कारकप्रकरणम् -- बध्नाति । कर्मण ईप्सिता मापा न तु कतुः । तमद्ग्रहणं किम् ? पयसा प्रोदनं भुक्त। कर्मेत्यनुवृत्तो पुनः कर्मग्रहणमाधार- निवृत्त्यर्थम् । अन्यथा गेहं प्रविशतीत्यत्रैव स्यात् । ५। अनमिहिते २।३।१॥ इत्यधिकृत्य ।। समय इति-ईप्सित शब्द में तमप् प्रत्यय क्यों लगाया ? इसलिये कि जो यस्तु कर्ता को अपनी क्रिया द्वारा सबसे अधिक अभीष्ट हो, उसकी कर्म संशा होनी चाहिये, अन्य को नहीं । जैसे -- 'पयसा ओदनं मुकते' (दूध से भात खाता है) यहाँ कर्ता को अपनी भोजन क्रिया से ओदन अभीष्टतम है। यद्यपि वह दूध भी प्राप्त करना चाहता है तपापि दूप भोजन क्रिया में साधन ही है, वह भोजन का उद्देश्य नहीं है । इससे योदन की कर्म संशा होती है पयः को नहीं। कर्म इति-यहाँ पाणिनि के सूत्रों का क्रम है-आषारोऽधिकरणम् ४४५, अधिशीस्थासां कर्म ११४१४६, अभिनिदिशश्च १९४४४७ उपाध्याइवसः १९४०४६ करीप्सिततमं कर्म १४४६। इस प्रकार 'अधिशी स्थासां कर्म' ११४१४६ सूत्र से 'कर्म' मा ही रहा पा (अनुवृत्ति हो रही पो) फिर 'कर्म' का ग्रहण आधार, निवृत्ति के लिये किया गया है। नहीं तो कर्म के साथ आधार भी चला आता तव 'येहं प्रविशति' आदि में अभीष्टतम आधार 'गेहूं की ही मं संज्ञा होती, 'हरि भजति आदि मे हरि की नहीं । कर्म ग्रहण करने पर तो यहाँ से किसी शब्द को भी अनुवृत्ति नहीं होती और हरि भजति आदि में भी कम संज्ञा होकर द्वितीया विमक्ति होती है। ५ अभिहितः इति-'अनभिहित अर्थ में इसका अधिकार करके। मनभिहित शद का अर्थ है~-अनुक्त । जिस अर्थ में कोई प्रत्यय आदि होता है यह अर्थ उक्त हो जाता है, जैसे--सिव्यते' में कर्म मे (ति) प्रत्यय हआ है, वही कर्म उक्त हो जाता है। उक्त अर्थ से भिन्न अयं अनुक्त या अनभिहित होता है । यह अधिकार सूप है। आगे के द्वितीया आदि विभक्ति के विधायक सभी सूचों में 'अनमिहिते' पद का अन्वय होता है । ।

. संगनवापरणे ६।कर्मणि द्वितीया २।३.२। अनुक्ते कर्मणि द्वितीया स्यात् । हरि भजति । अभिहिते तु कर्मणि प्रातिपदिकार्थ- मात्र इति प्रयमव । प्रभिधानं तु प्रायेण तितद्धितसमासैः। तिछ, हरिः सेव्यते । कृत, लक्षम्या सेवितः । तद्धितः, शतेन सिमभोनि-मनुक्त कर्म में शिया मिति होती है। हरि मानि-रिश भरता है) इस वापर में तो (भक्त) fr. स्तम हार है। हरि कीर. परिणतनम में पूर्व से कम मा हो पाती है। भनि शिबाग पो है यहा मार (11) मा में हुआ है मनि बम मुक्त है ममी प्रत्यय आदि में कहा नहीं गया । मनुल महोने हरिम' में लिया विमन्दि हैती है। ममिति-उत्तम मे तो प्राविधिं यामिनियम प्रमा मेर में न ममता बवाय के में तिीय विमान हनी। भ्य रे मर्म में होता है मम तक हो जाए। (c) शामिति मारो ने प्रथमा freी. -'हरि: मेब बाहरपमा frefra। बिमान २५-वाय: निति और सम में कर्म प्रार भार महो। १ अपने लिये TE है. हर्म में REP रेम rifontr: 'हरि:' , m मार में पिलो मल रन:-* ' Agar (rr) Pratiran" 'मन कामreti' में नहीं अnिterfert मा यस पी। है -- कारमप्रारणम् फ्रोतः शत्यः। समासः, प्राप्त प्रानन्दो यं स प्राप्तानन्दः । अवचिप्निपातेनाभिधानं यथा 'निपवृक्षोऽपि संवयं स्वयं छत्तम- साम्प्रतम् । साम्प्रतमित्यस्य हि युज्यत इत्यर्थः । ७. सापुरतं पानीप्सितम् १५४.५० ईप्सिततम- परिक्रयया युक्तमनीप्सितमपि कारक कर्मसंनं स्यात् । प्राम गच्छन् तुणं स्पृशति प्रोदनं भुज्जानो विपं भुङ्क्ते ।। शरय:-शतेन कीत: (सोसे खरीदा हश).यह इस शब्द से रम अर्थ A 'सत्' दिन परस्य ( सा टग्यतावश ५१५२११) होकर 'गरपमन्द बनता है दिन उक्त है मत. 'गरम' में दिखीया विभक्तिम होर प्रपमा ही होगी। माता-प्राप्तः मानन्दो वश (देवतादि) प्राप्ठानादः । प्राण और मामाद दोनो कम्मों पा द्वितीया में मीहि समारा हुआ है। अन्य पदार्प (देवता) हि ममाम से उक्त हो जाता है इसलिये 'प्राप्ताः' म समसा पदा पो भया। उसके पापा पर सोया नही होती पितु प्रातिपदिरा मार मे मा ही होती है प्राप्ता. जादोपदतनि. ' भिप्रायेण माद रखने का तात्पर्य दियमाते है परियितेनेति नहीही न भी पारित हो जाते है। पोलीनिकला'माप्रार' पर भी गित 'मामामा - । मामा-पि मही (R) frreisबाद में Frore बता देशम्पाय। साम्' framरानिय पौत हो गोमो से जी ति नही होती, होती है। पिfims mmहो गरे। ७. ITrt-बोकात होरीब पोए से पुरे १, उसी मोर होती है। १.nartml ६ संस्कृतव्याकरण . ". . - ८ अपितं च १४१५१ अपादानादिविशेषरविवक्षित कारक कर्मसंज्ञे स्यात्... में मनोपित पदार्थ दो प्रकार के होते हैं - उपेक्षा-जिमके प्रति का उदासीन रहता है और २.प-जिगके प्रति प रखना है। इन दोनों प्रकार के पदापों पर यदि किया का फन पहता है तो ये कर्मसंशक होने हैं और कर्म में द्वितीया होती है। प्रामं गस्तृणं स्पृशति -(पाम को जाता हुआ तिनके को ससा है) यहाँ जाने वाले के लिये 'तृण' उपेक्ष्य है किन्तु राना क्रिया के फल मे मुक्त होने के कारण 'तूण' की कर्म संज्ञा होकर द्वितीया विभक्ति होती है। विर्ष मरते-(विप खाता है) यहाँ विपदेष्य है किन्तु जिस प्रकार पोदन (मात) माने में ओदन का भोजन क्रिया से सम्बन्ध होता है उसो प्रकार यहाँ विष पर भी भोजन क्रिया का फल पड़ता है, इसी लिये विप की कर्म संज्ञा होकर डिवीपा होती है। टिप्पणी-यदि किसी को तृण का स्पर्श करना अथवा विष खाना ही अभीष्ट है तो वहाँ जो 'तृणं स्पृशति', विष भुवन प्रयोग होंगे उनमें पूर्वसूत्र (४) से ही कर्मसभा होगी। ८ अपितमिति-अपादान आदि विशेष रूपों से अविवक्षित कारक कर्मसंज्ञक होता है। अभिप्राय यह है कि जहाँ अपादान आदि का अर्थ प्रकट होता हो किन्तु वक्ता उसका प्रयोग नहीं करना चाहता । अकथित = अविवक्षित) तथा कर्म की विवक्षा रखता है वहाँ उस कारक को कर्म संज्ञा होती है । टिप्पणी--(१) अकषितं च मूत्र से जो कर्म होता है उसे गौण या “प्रधान कर्म कहते हैं और ' करीप्सिततम कम' से जो कर्म होता है वह प्रधान,कर्म कहा जाता है। (२) जिन धातुओं में दो कर्म होते हैं वे द्विकर्मक कहलाती हैं।

कारकप्रकरणम्
१
दुह्याच्पपदण्ड्रधिच्छिचिबूशामुजिमयमुपाम ।
कर्मयुक् म्यादथितं तया स्यानीहकप्वहार ।।
दुहादोनों द्वादशानां तथा नोप्रभृतीनां चतुर्णा कर्मणा
यद्युज्यते तदेवाकथितं कर्मति परिगणनं कर्तव्यमित्यर्थः ।
गां दौग्धि पयः। बलि याचते वसुधाम । प्रविनीतं विनयं याचते ।
तण्डुलानोदनं पचति । गर्गान शतं दण्डयति । प्रजमवरणदि गाम ।
ह, रति-दुह (दुहना), २-पा (मांगना), ३-१ (पमाना), ४-६
(दण्ड देना), ५.५५ (रोषना), प्रछ (पूछना), चि (पूना), न
(रहना), ६-शाम (हासन परला)१.fr (गोउना , ११-मन्थ (मपना),
१२-मुर गुगना, १५-नी (मे गाना), १४ह (हरना, से जाना), १५सर
(पीपना), १५.र, नि गाला, होना), इन दुह, आदि १२ तथा मी आदि ।
पुल मिलार १९ धातुओं के वर्म से रिसरा समय होता है (पुर) मोर
जिस बरार दिसा नहीं होती, रहीसथित रहा जाता
है।गार यह राशि में परिगपन दिया गया है।
१. परिच पय:-(पार से दूर होता है)। फार सामान्यतः
RAR मा है, हिमादान गराही, अपितु
पहर के निमित्त कर मे रिक्षerat ar: परिपथ (पादित
नाराबा होरपर्म में हिंसा रिलिहोगी।
अचं होगा-गोमम्मी पपास दोन । mstifier
होगी तो पासपीविलित होगी, सदा 'गोन्धि पनि हो।
पर और पासपोर।
१. साप-बरिसे अपीतातनिपाल
wafarmहोने राति की मार सही।
एपरिपोष है। Amazing
प्रमोष होगा।

सरातमारणे माणवतं पायानं पुच्छति । वृक्षमवचिनोति फलानि । माणवकं दिन बितिप्राय करा है) यही 'या' धातुरा अपं अनुनय या प्राना है । 'यविनीत' इसका मुख्य कर्म-अविनी दिनयाय अनुनयति' (अविनीत से विनय के लिये अनुनय करता है) मह अर्थ होता है। "विनय' में सम्प्रदान की विवधा न होने पर 'अकथितं च से कम संजा होती है तथा द्वितीया विभक्ति होती है । अन्यों का मत है कि "विनय' इसका मुख्य कम है। अविनीतकर्तृक विनय की प्रार्थना करता है अतएव 'अविनीत' पता है। उसमें वमत्व की विवक्षा में द्वितीया होती है । अन्य मत के अनुसार 'अश्निीत से विनय की प्रार्पना करता है' यह अर्थ है। अविनीत अपादान है। अपादानरव की अविवक्षा में इसको कर्मसज्ञा होती है। ३. सलान भोदनं पचति-(पावलो से भात पकाता है। यहाँ ओदन मुहर कर्म है । तण्डुल करण है । तण्डुल में भी कर्म की विवक्षा मे हितीया विमति होती है। तण्डुल गोण कर्म है। ४. गर्गान गातं दण्डपति-(गर्गों से सौ रुपया जुर्माना लेता है) यहाँ 'शतं मुख्य कर्म है । गर्गों से सौ रुपया दण्ड का लिया जाता है। गर्ग अपादान कारक है। गर्ग में कर्माद की विवक्षा होने से द्वितीया विमक्ति होती है। ५. प्रजमवरणद्धि गाम -(गाय को प्रज में रोकता है) यही 'माम्' भवरणति का मुख्य कम है ! 'बज' (गोशाला) जो आधार या अधिकरण है, उसकी अविवक्षा होने पर अपित कर्म में द्वितीया विक्ति होती है। ६. माणवकं पन्थानं पृति-(लड़के से मार्ग पूछता है)--यहाँ पप मुख्य ‘कर्म है । माणवक अपादान है। उसमें कर्म की विवशा होने पर हितोया विमति होती है । कुछ का मत है कि माणवक करण है। -७. वृक्षमचिनोति फलानि-(वृक्ष से फलों को घुनता है)- यहो फल

पाररप्रकरणे
पर्म यूते शारित था । शतं जयति देवदत्तम् । मुधो क्षीरनिधि
मध्नाति । देवचं शतं मुष्णाति । ग्राममो चयति हरवि
कति वहति वा ।
मुपवर्म है। पादान है। भगवान श्री विषक्षा में कम संझा होकर
हितीया होती है।
८.६.माणपकं धर्म ते शारिस था-(माणवक के लिये धर्म ।
चपदेश करता)-यह धर्म मुख्य में है। माणवक सम्प्रदान है । उसमे
बीविया होने पर रिली विक्ति होती है।
१०. शतं जयति वरतम (दवत से सौ पये जीता है)-- यहाँ
'ग' गुम है। देवदत्त महार है । उसमे र जीविषा होने पर
दिलीमा होगी।
११. मुया भारतिय ममाति-(सागर से भगा मपा)-या गुणा
पुरम है। सरनिधि' पान है । उसमें गर्म को पिर
लोरा होती है। परेमा धीरनिवियपरा भब है। 'गुषा
निनिमिता है हम है। गुण मान है। उसमे
रोग हो गो है।
१२. पुरणात (स्वत सेमी पारा-zi at'
न
परत मान है। सरेरोग विन्ति
११.१९. रिती-को
my-n'पुर पर है। इस पर
हातोही है।

मर्थनिवन्धनेयं संज्ञा । बलि भिक्षते वसुधाम । माणवकं धर्म भाषते मभिधत्ते वक्तीत्यादि । कारक किम् ? माणवकस्य पितरं पन्यानं पृच्छति । (या) अकर्मफधातुभियोग देशः कालो भावो गन्तव्योऽध्या च कर्मसंज्ञक इति वाच्यम् ॥ कुरुन् स्वपिति । मासमास्ते । गोदोहमास्ते । क्रोशमास्ते । अर्थनिबन्यतेति--'प्रकथितं च से जो कम संज्ञा होती है, वह अाश्रित है अर्थात् दृह आदि धातुओं के समान अर्थवाली अन्य धातुओं के योग में भी अपादान आदि की अविवक्षा होने पर कर्म संज्ञा हो जाती है। इसीलिये 'याच्' धातु के अर्थ वाती भिक्ष धातु के योग में भी 'बलि' की धर्म संज्ञा होकर द्वितीया होती है तथा 'बू' धातु के अर्थ वाली 'भाप' आदि धातु के पोग में 'माणवर' में द्वितीया हो जाती है। इसी प्रकार अन्य परिगणित धातुओं की समानार्थक धातुओ के योग मे भी यह मंसंज्ञा हुआ करती है। कारक किमिति-मूत्र के भर्य में 'कारक' शब्द रखने का बमा अभिप्राय है? यह कि अपादान आदि कारकों की अविवक्षा में उनकी ही यह कम संज्ञा होती है सम्बन्ध की नहीं, इसलिये 'माणवकस्य पितरं पन्यानं पृच्छति' यहाँ 'माणवक' में द्वितीया नहीं होती, अपितु सम्बन्ध में षष्ठी ही होती है। यहाँ मागवक कारक नहीं है, क्योकि इसका सम्बन्ध प्रिया से नहीं, अपितु केवल पिता से है। अकर्मक इति (वा)--अकर्मक धातुओं के योग में देश, काल, भाव तथा गन्तव्य मार्ग की कम संज्ञा होती है । जैसे- कुरन स्वपिति (कुरुदेश में सोता है)- यहाँ 'कुरु' देशवाची है । यहाँ देश का अर्थ है-ग्रामों का समूह कुरु पाञ्चाल आदि जनपद । कुरु आदि जनादवाचक शब्दों का बहुवचन में हो, प्रयोग होता है । 'स्वप्' धातु अरमंक है । यहाँ 'कुरु' की इस वात्तिक से कर्म संज्ञा होकर 'क्मणि द्वितीया' (६) से द्वितीया होती है। मासमारते (मास भर रहता है)--मास कालवाची है। यहां काल शब्द से दिन-रात के समूहवाचक मास' आदि का ग्रहण होता है। 'वास्' धातु अवमंक है। गोदोहमारते (गो दोहन वेला में है}---यहाँ 'गोदोह' शब्द का अर्थ है .

सरकारकम गतिबुदिप्रत्यवाना रदवाकर्मपाणामरिण पत्ता स शो १३४५२मत्याचना गन्दकर्मणामार्मा चासो यः वर्ता गणी कर्म स्यात् गहनगमपल्या येदा स्वानयेदयतापायाना. गोमतको दोहरा समय। मोरोपामारी कर भावानुमान। rमाने (कोमitalोग मा ufan मापारगहनामामागं । Emmert भारी पमा 'होगा। fort-1)ोपामोरे १०) Ratra RArthatma retriti): khaneferentीट ही हो पुरषु परित writगी। Trm. Ite) श्री का (Hramma)xtammiruntr gunmmen HTraininterritra Im-gurre mantr reframmtars पाकीntra cirrte fonnurn १ गोल :-) reenierentr) irr lim mahi...rrit Timrthermketruth- (Trrent-tet Intrtermarrrrror antarmart - संस्कृतम्याकरणे मतं देवान्वेदमध्यापयधिम् ।आरायत्सलिले पृथ्वीयःसमे श्रीहर्गितः।। जाने के लिये प्रेरित पिया पत: हरि प्रयोजक कर्ता है। 'अगमयद' यह णिजन्त दशा का प्रयोग है। इसीलिये अणिजन्त अवस्था पारतो 'पव:' मामपद (णिजम्न दशा) पा कम हो जाता है। गर्म में द्वितीया होती है (मन)। (२) पेदाप स्वान् मयेस्यात् (स्वजनों को ये का अर्थ समझाया)- यहाँ बुद्धि (शान) अयं वाली धातु 'विद्' है । 'स्वे वेदार्थम् अविदुः' यह साधारण दशा का रूप है। 'अवेदयद' णिजन्त वा प्रयोग है। उपयुक्त नियम से अश्यन्त दशा का 'वा' मिजन्त की अवस्था मे कम हो गया है सबा कर्म में द्वितीया विमक्ति होती है-स्वान्) । (३) माशयत् च अमृत वेयान् (देवताओं को अमृत खिलाया)- यहाँ 'श्' खाना अर्थ पाली धातु है । 'देवाः अमृतम् आश्नन (देवों ने अमृत खाया) यह साधारण दशा का रूप है । 'आगयत्' णिजम्त का प्रयोग है । उपर्युक्त नियम से अण्पन्त अवस्था वा कर्ता देवाः' णिजन्त दगा में कम हो गया है सपा कर्म में द्वितीया विमक्ति होती है-(देवान) । (४) वेदमध्यापय विधिम् (ब्रह्मा को वेद पढ़ाया)- यहाँ 'इङ्' पढ़ना अर्थ वाली धातु है । यह ऐसी धातु है, जिसका कर्म शब्द है (शब्दकर्मक) विधिः वेदम् अध्यंत (ब्रह्मा ने वेद पढ़ा), ब्रह्मा को हरि ने वेद पड़ाया- 'हरिः विधि वेदमध्यापयत्' । 'अध्यापयत्' णिजन्त का प्रयोग है । यहाँ साधारण दया के कर्ता, विधि की उपमुक नियम के कर्म संझा होकर- द्वितीया हो जाती है। (५) मासयत् मलिले पृथ्वीम् (पृथिवी को जल पर स्थित किया) यह अकर्मक या उदाहरण है । आस् (बैठना, घातु अकर्मक है। 'आस्त सलिले पृथिवीं (पृथिवी सलिल पर स्थित हुई)। 'ता हरिः आसयत्'-उसे हरि ने स्थित किया । इस प्रकार साधारण दशा का 'कर्ता' पृथिवी है । 'आसयत्' यह णिजन्त का प्रयोग है । उपर्युक्त नियम से साधारण दशा के कर्ता पृथिवी को धर्म संशा होकर द्वितीया हो जाती है। .. 'शब्द. कर्मकारकं येषां ते शब्दकर्मकाः-शब्द है कर्म वारक जिनका कहलाती हैं।

कारकप्रकरणम् गतीत्यादि किम् ? पाचयत्योदनं देवदतन । अण्यन्तानां किम् ? गमयति देवदत्तो यज्ञदत्त तमपरः प्रयुडक्त, गमयति देवदत्तन यज्ञदत्त विष्णुमित्रः॥* (वा) नोवोर्न ।। नाययति वायति वा भारं भृत्येन ॥ लोक का अर्थ यह है-जिम श्री हरि ने शत्रुओ को स्वर्ग भेजा, दिजनो को वेद का अर्थ समभाया, देवो को अमृन खिलाया, ब्रह्मा को वेद पढ़ाया और पृथिवी को जल पर स्थापित किया वह हरि मेरी गति है। (क) गतीत्यादि किमिति गति आ'द अयं वाली धातुओ के अण्यन्त अवस्था के कर्ता को ध्यन्त अवस्था में कर्म संज्ञा होती है यह क्यो कहा? इस लिये कि इनसे भिन्न धातुओ मे यह नियम नहीं लगता। अतएव 'पाचयति औदनं देवदत्तन' पहाँ देवदत्त की कम सज्ञा नहीं हाती, अपितु पातु साधारण दशा वार्ता 'देवदत्त' (देवदत्तः ओधन पचति) प्रेरणार्थक दशा में या हो (प्रयोज्य कर्ता) रहता है और उसमे "कर्ट करणयोस्तृतीया"२।३१८ से तृतीया विभक्ति होती है। (ख) अभ्यन्तानां किम् इति - (सूत्र मे) अणि अर्थात अणिजन्त अवस्था के बर्ता को कर्म हो, यह क्या कहा है ? इसलिये कि यदि णित्त अवस्था के कर्ता को कोई अन्य प्रेरित करे तो उसकी म सा नही होगी जसे :- (6) 'यज्ञदत्तः गच्छति'-यहाँ साधारण दशा मे 'यशदत्त' बर्ता है। (ii) 'गमयति देवदत्तो यज्ञदत्तम्'-यहाँ अण्यन्त के कर्ता 'यशदत्त' की प्रपन्त दशा में कर्म संशा हो गई है। (ii) परत्तम बारा (विष्णुमित्रः) मयुस्तदेववत को भी विम- भित्र प्रेरित करता है-'गमपति देवदत्तने यज्ञदत्त विष्णुमित्र-यहाँ देवदत्त' की कर्म संज्ञा नही होगी, क्योकि वह णिजन्त का बर्ता है, अणिजन्त का नहीं और, कार के सूत्र से अण्यन्त के कर्ता को ही कम सजा होती है। नीवह्योनं इति (वा)-नी' 'वह (ले जाना) णिजन्त धातुओं के प्रयोज्य बर्ता को कम संशा नहीं होती। जैसे- मृत्यो भारं नयति, बहात वा' यहां 'भृत्य' साधारण दशा का कर्ता है अर्थाद प्रयोज्य अर्ता है । 'नाययति, वाइयति वा भारं भृश्येन' यहाँ णिजन्त के प्रयोग मे भृत्य की वर्म संशा नही होती अपितु वह कर्ता ही रहता है और कर्ता में तृतीया होती है [नी-वह.. पातुओ का अर्थ है प्रापण (पहुँचाना=गति कराना) अत: यहाँ गत्यर्थक होने से ऊपर का नियम प्राप्त था] संस्कृतव्याकरण * (वा) नियतुं कर्तृ कस्य वहेरनिषेधः ॥ वाहयति रथं वाहान् सूतः। * (वा) आदिखाधोर्न ॥ पादयति खादयति वान्न वटुना । *(वा) भक्षेरहिंसार्थस्य न ॥ भक्षयत्यन्नं वटुना । अहिसार्थस्य किम् ? भक्षयति बलीवन सस्यम् । नियन्तृ इति-बा) "नीवह्मोन" इस वार्तिक से किया हुआ कर्म संशा या निषेप वहाँ नही होगा, जहाँ 'वह' पातु मा कर्ता नियन्तू' (हरिने पाला) होगा। जैसे- 'बाहाः (भवाः) स्पं वहन्ति तान नियन्ता (सारपि) प्रेरपति--- 'बाहपति र वाहान गूतः'-(सारपि भावों द्वारा रथ को से जाता है)--यही 'वाह' (प्रयोग्य पा) को कम संशा होकर उसमे द्वितीया विभक्ति हो ही जानी है। मादिनाधोनं (वा) - अन्यन्त अद् और पा घात के वर्ता को उनके व्यस्त प्रयोग में कम संशा नहीं होती अतएव प्रयोग्परा मे तृतीया होती है जरो :- मावपति, सारयति मा मन्नं पटना (माके को मन विलाता है)- पटुः भनम् इति (पादति वा) सम अम्यः प्रेरयनि-यह पद और धातु धातु के मामा हान के पारण मूत्र (गनियुधि.) से 'क्टु' की पर्म गंगा प्राप्त पी। उपयुंक्त वानिक के अनुसार यह पर्म संगा नही होती । मतएव "पटुता ही रहता है और उममे तृतीया विमति होती है । भोर मायाप.मा.जय मा पान का भाव हिमा.(पीड़ा देगा पानि पर पाना) नहीं होता तो उसके माधारण मार्गको गिरान्त के प्रयोग में समा मट्टी होती। जैसे- भात अनं वटुना -“वg: अनं मति" (बटु अन्न पाता है) उमेदसारित करता है -'मक्षपति ने पटना। यहां पर की गर्म मंशा नहीं होती हवा का में हनीया विमति ही हाती है। महिमायस्य शिमिति - वहाँ '' धान के भाव में हिमा प्रारती है वहां मरे प्रयोग्य बना कौम मंशा ही हो जाती है अतएर समाः क्षयनितान भन्दा पनि मानिनवनिमपम्' यही 'बीर होती है। पत्र को हरिहर गे पोहा पपाली को कारकप्रकरणम् *(वा) जल्पति प्रभृतीनामुपसंख्यानम् ॥ जल्पयति भापयति वा धर्म पुर्व देवदत्तः । * (वा) दृशेश्च ॥ दर्शयति हरि भक्तान् । सूत्रे ज्ञानसामान्यार्थानामेव ग्रहणं न तु तद्वि- शेपार्थानामित्यनेन ज्ञाप्यते । तेन स्मरतिजिघ्रतीत्यादीनां न । स्मारयत्ति ध्रापपति वा देवदत्तेन ।। जल्पतीति (या)---जाति आदि का अण्यन्त अवस्था मे जो वर्ता होता है उसकी णिजन्त दशा मे कम सजा हो जाती है, यह भी कहना चाहिये । जैसे -'पुत्रो धर्म जलति मापते बा । पुत्र को देवदत्त प्रेरणा देता है ता प्रयोग होगा--'जल्पपति भाषपत्ति का धर्म पुत्र देवदत्तः । यहाँ इस वातिक के अनुसार पुत्र की कम संज्ञा होकर द्वितीया विभक्ति हो जाती है । दृशेश्च (या)-दृश् (देखना। धातु का साधारण दशा का कर्ता प्रेरणार्थक के प्रयोग में भर्मसंज्ञक हो जाता है। जैसे-'भक्ताः हरि पश्यन्ति ।' गुरु प्रेरित करता है--'दर्शयति हरि भक्तान् ।' यहाँ इस नियम से 'भक्त' की कर्ष संज्ञा होती है तथा धर्म मे द्वितीया विभक्ति हो जाती है । नत्रे शानसामान्यार्थानाम इति (गतिबुद्धि, आदि) सूत्र मे बुद्धि शब्द से ज्ञानसामान्यवाची वुध्, जा आदि धातुओं का ही ग्रहण होता है ज्ञानविशेष की वाचक स्मरनि, जिघ्रति आदि का नहीं-यह 'दृशेश्च' वात्तिक से (अनेन) पता चलता है। यदि मान विशेष की वाचक धातु भी बुद्धि शब्द से ली जाती तो इस वार्तिक की आवश्यकता ही नही थी। इस ज्ञापन का फल यह होता है (तेन) रि-'स्मारयति धापयति या देवदत्तेन' यहाँ 'देवदत्त' की कर्म संशा नहीं होती। रामदायतेनं (था)-'शब्दाय' धातु के कर्ता की प्रेरणार्थक के प्रयोग में कर्म सशा नही होती । शब्दाय' यह नाम यातु है ! ५.न्दं करोति इस अयं में शक्यङ (शस्वैर ३. १. १७)= शब्दाय । इससे णिच् होकर शब्दारयति । शब्दापयति देवदतन--'शब्दायते देवदतः (देवदत्त प्राब्द करता है। उसको कोई प्रेरणा देता .

संस्कृतव्याकरणे * (वा) शब्दायतेन । शब्दायति देवदत्तेन । धात्वर्थसंगृहीत. -कर्मत्वेनाकर्मकत्वात्प्राप्तिः। येपो देशकालादिभिन्न कर्म न संभवति तेऽत्राकर्मकाः। न त्वविवक्षितकर्माणोऽपि । तेन मासमासयति देवदत्तमित्यादौ कर्मत्वं भवत्येव । देवदत्तेन पाचयतीत्यादौ तु न ।। ही शब्द रूपी फर्म संगृहीत हो गया है यतः यह धातु अकर्मक है और अकर्मक होने के कारण गति आदि मूत्र से प्रेरणार्थक के प्रयोग मे साधारण दशा के कर्ता को कर्म संज्ञा प्राप्त होती है । इस वातिक से उस कर्म संज्ञा का निषेध हो जाता है तथा 'देवदत्तन' में कर्त्ता मे तृतीया विभक्ति होती है । येषामिति- ( इस सूत्र में अकर्मक धातु वे मानी गई हैं, जिनका देश काल आदि से मिन्न कर्म सम्भव नहीं। (11) जो धातुएं कर्म की अविवक्षा होने के कारण अकर्मक हो जाती हैं, वे यहां अकर्मक नहीं गानो गई । इसका फल यह होता है- (i) मासमासयति देवदत्तम्- 'मासमास्ते देवदत्तः" उसको दूसरा कोई प्रेरणा देता है- 'मासमासयति देवदत्तम्'-यहाँ 'आस्' धातु का यद्यपि 'मास' (पाल) कर्म है तथापि वह अर्मक मानी गई है; क्योकि 'आस्' धातु का देश काल आदि से भिन्न कर्म नही हो सकता। इसलिये इसका साधार' दशा का कर्ता देवदत्त' प्रेरणार्थक के प्रयोग में कर्मसंज्ञक हो जाता है और उसमें द्वितीया । होती है। (11) देवदत्तेन पाचयति-'देवदत्तः पचति' यहाँ कर्म अविवक्षित है तथापि पच् धातु अकर्मक नहीं मानी जाती, अतएव 'देवदत्तेन पाचयति' में 'देवदत्त' की कम संशा नहीं होती और कर्ता में तृतीया हो जाती है। टिप्पणी-व्याकरण शास्त्र की दृष्टि से कियायें चार प्रकार से अकर्मक होती हैं-१. धातु का अन्य अषं में प्रयोग होने से, जैसे-वहति भारम् । यहाँ 'वहति सकर्मक है किन्तु 'नदी यहति', यहाँ अन्य अर्थ (स्यन्दन, बहना) अकर्मक हो जाती है। २. धातु के अर्थ में कम के संगृह त हो जाने से, द्रष्टय्य आपे (पृ. १८) टिप्पणी । .

कारकप्रकरणम् [ १९ होल्पतरस्याम ११॥४॥३॥ हकोरणी यः कर्ता सखो वा कर्म स्यात् । हारयति कारयति वा भृत्यं भृत्येन वा कटम ॥ *(वा) अमिवादिहशोरात्मनेपदे वेति धाच्यम् ॥ अभिवादयते दर्शयते देवं भक्तं भक्तेन वा । जैसे-'जीपति (प्राणधारण करता है) यहाँ प्राण' हामं धातु के अपं में ही संगृहीत हो गया है । ३. म के प्रमित होने से, जैसे-'मेधो वति' यहाँ भरसने का कर्म अल) प्रसिर ही है। ३. बर्म को न रहने की इच्छा (अविवक्षा) से-जैसे "हिताप्न संगण ते स कि प्रभु." यहाँ 'संगणुते. अपमक है क्योकि इसका कर्म विपक्षित है।कहा भी धातीपातरे रत्तस्विनीसंग्रह। प्रसिदविवक्षातःमगोजामिका किया। ग. पो. आरमनेपदाकिरा) १०.धोरन्यतरस्याम इति-हलि गाना), कृ (करना) धातु साधारण माओकता है यह शिजत (प्रेरणार्थक) के प्रयोग मे सिर से परांजक होता है। टिप्पणी सपा धातु का गति आदि अपं वाली धातुओं में अन्तर नहीं होता अतः यह अशाप्त विभाषा है।ह पातु जहाँ भोजन अप मे होती {-याति) तथा शतु अस्मा विरुने) वहाँ यह प्राप्त विमा है । इमार यह प्राप्ताप्राप्त उपयर विभाषा है। कारपति पृपं मायेन पा करम -(भृप से घाई बनाता है) "भूरुषः टं करोति' (मृरर चटाई बनाता है। उसे स्वामी प्रेरणा देता है- "भारयति भूष, भूत्वेन वा स्टम्" (हमार से पटाई धनवाता है)-पही जगनिम से भृत्य की शिल्प से समं समा होती है और खिोया हो पाती है । समर्म समा नहीं होती तो पता से हटाया विमति होती है। सो सार ही मार हत्येत वारम् (नौकर से पटाई हुनाता है)। ममिशिगोतिर (7)-अधिपूर्वक पर धातु का भानु साधारण.m, जिनके बापनेपर के प्रयोग में विशाल से होगा। अभिवाररते देवं मर्म र दा (पार से रेता पो प्रचाप पाया है। अश्विदेव पा. (दर मरमान पता है कोई २० ] संस्कृतव्याकरणे ११ । अधिशीस्यासां कर्म १।४।४६। अधिपूर्वाणामेपा- माधारः कर्म स्यात् । अधिशेते अधितिष्ठति अध्यास्ते वा वकुण्ठं हरिः॥ १२ । अभिनिविशश्च ।१।४।४७ अभिनीत्येतत्संघातपूर्वस्य विशतेराधारः कर्म स्यात् । अभिनिवियते सन्मार्गम् । 'परि- क्रपरणे संप्रदानम्-1१।४।४४ इति सूत्रादिह मण्डूकप्लुत्याज्य- प्ररित करता है- 'अमियादयते देव माग, भक्तेन या'- यहाधम राजा प्राप्त नहीं पी। उपर्युका नियम से 'म' की विराल मे कसजा होकर द्वितीय विमति होती है । पक्ष में काम तृतीय होती है । इमो प्रार-"पण्या देवं मामः" "दर्शयते देवं मत्रा भरतेन वा" । यहाँ 'शेरच' वातिक से निर पर्म संज्ञा प्राप्त थी। इस यासिर से विषम संज्ञा दिलाई गई। टिप्पणी-भिवादयने दर्शयते-मरणिचान ॥३७॥ से भारमनेर होता है। जब मात्मनेपद नहीं होता तर 'अभिवादति देव भक्तन'महा कर में तृतीया होती है तथा 'दर्भयनि देव मातम्' यही शेष' से कर्म सजा होक हिनीया होती है। ११. अभिगोदति-अघि उपसगंपूर्वक शोर (मोना), स्या (हरता) भाग विंटना धातुओं के आधार राम मंगहोती है। यहाँ 'Tirusly भरणम् ॥ से 'मायार' गम की अनुप्ति होती है। इसी प्रभा जागे के दो गुषों में भी। अधिोरे या हरि-यहाँ बहुष्ट थपियन का आधार है। सरी उपयुम निकम से कम संज्ञा हो जाती है या मं में द्वितीया ति होती है। मी प्रसार अधिनिष्टाल कुष्ट इfe', 'यार पास्ट हदि। १२. मिनिति-रिवा निगममं जा रोनी एक साप हमी कर (मपारा दिए पातुके पहले बात है नत्र पिम् धातुमार परवाला है। दभिर्विदशो सम्बागन - (गन्मार्ग में पता है) यही 'ममा छनिसले पर मंशा होकर इभ हिरोपा हो जाती है।

कारकप्रकरणम् रस्यांग्रहणमनुवर्त्य व्यवस्थितविभाषाश्रयणात्ववचिन्न । पापे. ऽभिनिवेशः॥ १३ । उपान्वध्यायसः १।४।४।८ उपादिपूर्वस्य वसतेराधारः कर्म स्यात् । उपपसति अनुवसति अधिवसति पावसति वा वैकुण्ठं हरिः ॥ * (वा) अभुक्त्यर्थ न ॥ वने उपवसति ॥ पापेऽमिनिवेश:-यहाँ 'पाप' अभि नि पूर्वक विश् धातु का याधार है अतः "अभिनिविशश्च" नियम के अनुसार 'पाप' की कर्म संज्ञा होकर द्वितीया होनी चाहिए, किन्तु 'परिक्रयणे सम्प्रदातमन्यतरस्याम् (१३५४४) सूत्र से मण्डू कालुनि (मेढक के समान कूदकर अर्थात् बीच के सूत्रों मे न जाकर) से 'अन्यतरस्या' (वा, विकल्प से) इस सूत्र में ले लिया जाता है और उस विकल्प (विभाषा) को व्यवस्थित विभाषा (अर्थात् कही होगा, वहीं नहीं) मानकर कहीं यह नियम (अभिनिदिशश्च) नही भी लगता । इसी से 'पापेऽभिनिवेशः" में पाप की कर्म संज्ञा तया द्वितीया नहीं होनी अपितु आधार मे सप्तमी होती है। १३ जपान्यष्पा वस:--उप, अनु, अषि, आ उपसर्ग पूर्वक वस् धातु का आधार कम हो जाता है। उपवसति कुष्ठं हरि:-(हरि वैकुण्ठ में बसते हैं) - यहाँ चैकुण्ठ उप- पूर्वक 'वस्' धातु का आधार है । उपर्युक्त नियम से 'दुष्ठ' को कर्म संज्ञा होकर द्वितीया विभक्ति हो जाती है । इसी प्रशर 'अनुवसति वैकुण्ठं हरिः', 'अधिवप्रति वैकुण्ठ हरिः', 'आवसति वैकुण्ठं हरिः'। ममुक्त्यर्थस्य न (वा)~-जब उप पूर्वक 'वस्' धातु का अर्थ 'उपवास फरना' (न खाना) होता है तो उसके आधार को कर्म संज्ञा नहीं होती। धने उपवसति (वन मे उपवास करता है)--यहाँ उपपूर्वक 'वस्' धातु का प्रयोग है। 'वन' उसका आधार है। 'उपान्वध्याङ् वस.' सूत्र के अनुसार यहाँ कमं संज्ञा होकर द्वितीया विभक्ति प्राप्त थी किन्तु इस वातिक के अनुसार उपवास अर्थ होने के कारण 'वन' की कर्म संज्ञा नहीं होती तथा अधिकरण में सप्तमी विभक्ति होती है ।, २२ संगतरणे * (वा) उभसर्वतसोः कार्या घिगुपर्यादिपु त्रिपु ॥ द्वितीयानेडितान्तेषु ततोऽन्यत्रापि दृश्यते ॥ उभयतः कृपणं गोपाः । सर्वतः कृष्णम । धिक् कृष्णाभवतम् । उपयुपरि लोकं हरिः। मध्यघि लोकम् । अधोऽयो'लोकम् ॥ * (41) अभितः परितः समयानिफपाहाप्रतियोगेऽपि ॥ अमितः कृष्णम् । परितः कृपयाम । ग्रामं समया। निकपा लडाम । हा कृष्णाभवतम् । तस्य शोच्यते इत्यर्थः । युसुक्षितं नप्रतिभाति किश्चित् ॥ उपेपर द्वितीया विभक्ति -आर जो द्वितीया विभक्ति दियनाई गई है, वहाँ 'वतुरीसिततम कर्म' आदि सूत्रों से कम संज्ञा होकर 'कर्मणि दिनीया' २३।२ से कम कारक में द्वितीया विभक्ति होती है। अतः वह 'कारक विभक्ति' है। कभी-कभी उपपद ( = पास में उच्चारण किय गये पद) के निमित्त से की द्वितीया आदि विक्तियां हुआ करती हैं । वे 'उपपद विभक्ति' कही जाती हैं । उपपद विभक्ति पष्ठी विभक्ति का अपवाद होती है। जैसे :--' उमसर्वतसोरिति (वा)- -इस यातिक में चार वायांश है। उनके अर्थ इस प्रकार हैं--18) उभसर्वतसोः द्वितीया कार्या-जब उभ और सर्व शब्द से परे 'तस्' प्रत्यय होता है तो उसके योग में द्वितीया विभक्ति करनी चाहिए । (२) धिक शब्दस्य प्रयोगे द्वितीया कार्या-धिक शब्द के योग में द्वितीया, (३) उपर्यादिषु त्रिषु आडितान्तेषु द्वितीया कार्या-'उपमध्यधसः सामीप्ये' ८।१७ में कहे हुए तीन शब्द उपरि, अधि तथा अधः है । जहाँ द्विक्ति होती है वहीं दूसरे को 'आप्रेडित' कहते हैं । उपाध्यत: सूत्र सामीप्य अर्थ में उपरि आदि के स्थान में 'उपरि-उपरि' आदि द्विरुक्त प्रयोग का विधान किया गया है। प्रस्तुत निपम से उनके साथ द्वितीया विमक्ति होनी चाहिये। ततोऽन्यत्रापि दृश्यते-इनसे अन्य स्थलो पर भी द्वितीया देखी जाती है । क्रमश: उदाहरण ये है- १) उभयतः कृष्ण गोपाः (कृष्ण के दोनों और गोपाल हैं। यहाँ उपयतः

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२४ संस्कृतव्यकरणे १५ । कर्मप्रवचनीयाः ॥११४।८३। इत्यधिकृत्य.॥ १६ । अनुलक्षणे ।१४।८।४। लक्षणे द्योत्येऽनुरुक्तसंज्ञः स्यात् । गत्युपसर्गसंज्ञापवादः। मन्तरेण" (देवी वसुमती के विषय में), (काले १०४), 'कोऽन्यस्त्वामन्तरेण शक्तः प्रतिकतुंम् । (तुम्हे छोड़कर दूसरा कोत प्रतिकार करने में समर्थ है।-- (आप्टे ३५., इन सभी प्रयोगों में 'अन्तरेण' के योग में 'हरिम्' आदि में द्वितीया विभक्ति होती है। १५ कर्मप्रश्चनीयाः इति-इसका अधिकार करके-कर्मप्रवचनीयाः, यह अधिकार गूत्र है । आगे 'विमापा लि IIE८ 1 के सूनों में इस पद का अम्वय होता है। पाणिनि पाकरण में कुछ उपसर्गों को विशेष स्थलों पर कर्मप्रवचनीय संजा की गई है। यह अन्वयं संजा है। जो पहिले किंग को पह चुके हैं 'म-त्रिया प्रोनयन' ये फर्मप्रवचनीय कहलाते हैं। उपसर्ग अवस्था में ये किग के अपं के घोतक होने थे • क्रिया के पहिने ही इनका प्रयोग होता था। किन्तु अव शि से पृथक् मात्र का में इनका प्रयोग हुषा करता है। ये किया के योतक नही होने, न मम्बन्ध के वाधक होते हैं, न किमी किा पहा आक्षा हो कराते हैं फिनु (वास्प पदों के) मन्दाय मे भेद कराने पाले होते हैं । अर्थात् विमषित-विधान के निमित्त होते है । १९. मनुलक्षणे-क्मिी लक्षण को घोनित करने में 'अनु' की कर्म- मानोर संता होती है । रिममे गोई बात मानी जाती है, उसे मक्षण (सुपर पहते है-'माने नायतेनेनेति महशम्' । यहाँ हेतु के 7 में होने वाला माण विवक्षित है। प्राचनीय मंशा गति और उसमर्ग मंशा का वाद अन सार अयं में बनु रो गति और उपम संजाम होर कमपनीर संतही होती है। सारा को नार, मामायस्य न वापरः। नाशि सिसी, मनन्याय तु । (रासस) कार प्रकरणम् २५ १७ । कर्मप्रवचनीययुक्त द्वितीया२१३१८} एतेन योगे द्वितीया स्यात् । पर्जन्यो जपमनु प्रावर्पत् । हतुभूतजपोपलक्षितं वर्पण- मित्यर्थः । परापि हेताविति तृतीयाऽनेन वाध्यते । 'लक्षणेत्थं- भूत-२१, इत्यादिना सिद्ध पुनः संज्ञाविधानसामर्थ्यात् । १८ । तृतीयार्थे । १।४1८1५ अस्मिन् द्योत्येऽनुरवतसज्ञः स्यात् । नदीमन्ववसिता सेना। नद्या सह संबद्धत्यर्थः ॥ पिन् बन्धने क्तः॥ १७. कर्मप्रवननीययुक्ते द्वितीया-वर्मप्रवचनीय के योग में द्वितीया विभक्ति होती है। पर्जन्यो जपमनुप्रावर्षत - इसका अर्थ है- हेतु रूप जप से उपलक्षित वर्षा, अर्थात् जप करने से उसके पश्चात वर्षा हुई । यहाँ हेतु और शापकता (लक्षण) दोनो द्वितीया के अर्थ हैं, ये दोनों 'अनु' द्वारा प्रकट होते हैं । उपयुक्त नियम से 'अनु' की वर्मप्रवचनीय संज्ञा होकर उसके योग मे 'जप' शब्द से द्वितीया विमक्ति होती है। परापि हेतौ तृतीयेति-गापि हेतो-३७' सूत्र से होने वाली तृतीया इसमे परे है और पाणिनि व्याकरण मे दो तुल्य कार्यों का विरोध होने पर परे वाला कार्य होता है । तथापि उसे बाध कर 'जपमनु' में, द्वितीया ही होती है, क्योकि २१ 'लक्षणेत्यं ० १४.६०। से अनु की कर्मप्रवचनीय संज्ञा हो ही जाती फिर १६ 'अनुलक्षणे 1 से लक्षण अर्थ में कर्मप्रवचनीय सज्ञा करने की क्या आवश्यकता थी। यह संज्ञा इसी लिये वी गई है कि लक्षण घोतित करने मे द्वितीया ही होनी चाहिये, तृतीया नहीं। १५. सृतीया-जब अनु' तृतीया के अर्थ अर्थात् सहभाग को प्रकट करता है तो उसकी कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है । नदीमन्वदसिता सेना- इसका अर्थ है-'सेना नदी के साथ सम्बद्ध है।" 'नदाम् अनु अवसिता' मे 'अवसित' शब्द अव उपसर्ग पूर्वक षिव वाधना धातु से 'क्त' प्रत्यय होकर बना है अत: 'सम्बद्ध' अर्थ होता है । यहाँ ऊपर के नियम 1 .........

. गंस्कृतव्याकरणे १६ । होने १।४।६। हीने द्योत्येनुः प्राग्वत् । अनु हरि सुराः । हरेहींना इत्यर्थः ।। २० । उपोऽधिके च १६४८७। अधिके हीने च द्योत्ये उपेत्य- व्ययं प्राक्मज्ञस्यात् । अधिके सप्तमी वक्ष्यते। हीने, उपहरि सुराः।। २१ । लमत्थंभूताख्यानभागवीप्सातु प्रतिपर्यनवः १।४।१०। एप्वर्थेषु विषयभूतेषु प्रत्यादय उक्तसंज्ञाः स्युः। लक्षणे, वृक्षं प्रति पर्यनु वा विद्योतते विद्युत् । इत्थंभूताख्याने, से 'अनु' को पर्मप्रवचनीय संज्ञा होकर उसके योग में 'नदीम' में द्वितीया विमक्ति हो जानी है। १६ होने -हीनता को धोतित करने में अनु की मप्रवचनीय. संज्ञा होती है। अनु हरि सुरा:- इसका अर्थ है देवलोग हरि से हीन हैं (घटकर हैं)। यहाँ अनु हीन अयं को धोतिन करता है अत: इसकी वर्मयवचनीय संज्ञा हो जाती है और इसके योग में (सूत्र १७ से) 'हरि' शब्द से द्वितीया विभक्ति होती है। जिस शब्द में द्वितीया होती है उससे भिन्न पदार्य की हीनता प्रकट हुआ करती है । यहाँ हरि की अपेक्षा देवों की हीनता प्रकट हो रही है । २०. उपोऽधिके च-अधिक या होन का अर्थ धोतित करने में 'उप' की कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है। जब वह 'अधिक' अयं को धोमित करता है तो सप्तमी होनी है, यह आगे कहा जाएगा। उप हरि सुरा:-(देवता हरि से घटकर हैं)- यहाँ होन अर्थ को द्योतित करने में 'उप' की पमं प्रवचनीय संज्ञा होती है तथा इसके योग में हरि' से द्वितीया विक्ति होती है । २१. लक्षणेत्यम् इति-लक्षण आदि अर्यों में प्रति, परि तथा अनु की कर्मप्रवचनीय सशा होती है। (१) वृक्ष प्रति विद्योतते विद्युत (वृक्ष की ओर बिजली चमरती है) यहाँ वृक्ष विजनी पकने को लक्षित करता है। यह लक्षण (शाएक) है। 'प्रति' मक्षण को प्रकट करता है अतः प्रति की उपयुक्त नियम से कर्म बंदचनीय संज्ञा सोती। इसी प्रकार पारस्पारणम २७ भक्तो विष्णु प्रति पर्यनु वा । भागे, लक्षमोहरि प्रति पर्यनु वा । हरेर्भाग इत्यर्थः । वीप्सायां वृक्षं वृक्षं प्रति पर्यनु वा सिञ्चति । अयोपसर्गवाभावान्न पत्वम् । एषु किम ? परिपिञ्चति ।। भक्तो विष्णु प्रति { विपणु के प्रति भक्त है }-यह इरय भूताश्यान का उदाहरण है। 'इत्थं' का अर्थ है-इस प्रकार । इत्यभून:-इस प्रकार का हुआ। जहाँ 'यह इस प्रकार का है' इसका प्रारून (कपन) किया जान है वही "प्रति' आदि की कर्मवचनीय संशा हो जाती है । इस प्रकार उपयुक्त नियम से प्रनि की कर्मप्रवचनीय संज्ञा होकर इसके योग में हरि' शब्द से द्वितीया विभक्ति होती है । इसी प्रकार भक्तो विष्णु परि', भक्तो विपणुम् अनु' । लक्ष्मीहरि प्रति- इसका अर्थ है-लक्ष्मी हरि वा भाग रहा । यहाँ लक्ष्मी के प्रति हरि का स्वामित्व 'प्रति' आदि से द्योतित होता है अत: 'भाग' अयं में उपर्युक्त नियम से प्रति को कर्मप्रवचनीय संशा हो जाती है योर उमके योग में हरि' पद से द्वितीया विभक्ति होती है। इसी प्रकार 'समी: हा परिलक्ष्मी: हरिम् अनु'। पक्ष वृक्ष प्रति सिञ्चति (प्रत्येक वृक्ष को सीता है। यह वीप्सा का उदाहरण है। वीप्मा का अर्थ है-'याप्तुमिच्छा' अपति किसी क्रिया या प्रत्येक वस्तु से सम्बन्ध करने की इच्छा । यहाँ वीप्सा अर्थ में 'पति' आदि की कर्मप्रवचनीय संज्ञा हो जाती है अतएव उपस संज्ञा नही रहती । उपसर्ग संशा का अभाव होने से प्रति मिति' यहाँ 'स' को 'प' नही होता । उपसर्ग से परे होने पर ही "उपसर्गात सुनीति० ८।३॥६५॥ सूत्र से पत्व होता है । यहाँ वृक्षं में द्वितीया विभक्ति कम मे ही होती है। इसी प्रकार 'परि-सिञ्चति' 'वृक्ष वृक्षम् अनुसिञ्चति । एकिमिति'लक्षण' यादि चार अथों के विषय में ही प्रनि आदि को कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है, ऐसा क्यों रहा ? इसलिए कि इनसे मित अर्थ में नहीं होती, अतएव 'परिषिञ्चति मे लक्षण आदि अर्थ न होने के कारण 'परि' को कर्मप्रवचनीय संज्ञा नहीं होती । उसको उपसमें संज्ञा हो जाने से 'स्' को '' हो जाता है।

ITH / २२ । समिरमागे II मागा ताणादावमि- Fireमारहरिभि गतः । मातो हरिममि । देवं देव- गभिनिगनि।पमा गिम ? मन ममाभिप्यातदीयताम ।। २३ । मधिरी प्रर्पो४६३उस्तसभी स्तः। युतीन- प्यागाति । गुतः पपांगाति । गतिगंशावापान 'गतिगतो 1१11 इति निपानोन॥ २४। गुः पूमाणम् १४१६४ मुसिम्तम् । मुस्तुतम् । अनुर- २२ मभिरमा माग का घोडार देर ऐप तीन मौके vिiraiप्रपनीय गोती है। (रिमरि यी (मान) (२ भारी हरिममि रयंभूनाम्यान ) 'मी मपनीय मर गयोग में द्वितीया होती है। (रेग्मभिपिश्यति (पी)।यही सको नहीं होता। भमागे रिमा-भान विषय में 'अभिबोरवयनीय समा मही होती। मा परिणाम यह होता है कि पत्र ममामिप्यात तर दीपनाम' (जो यह मेरा भाग हो वह जोगिए) यही अमि' की उपमगं संगा ही रहती है और 'स्वाद के म् को पहो जाता है (उपसर्गर दुर्मामस्तियं पर: ८.३1०७१) २३. मधिपरी मनपंको-अनक अधि, और परि कोपर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है। पुतोभ्यागमति (वह यहाँ से आता है ?)-यहाँ 'अधि' को कर्म प्रवचनीय संशा हो जाने से गति' संशा नहीं होती। गत संज्ञा के न होने से (गतिसंहायाघात) 'गनियंती १५०' इस सूत्र से अधि' को मा (अधि+ मा- गछति) परे होने पर सर्वानुदात्त (निधात) महीं होता। आगच्छति में 'आ'गतिसंशक है। टिप्पणी - "निघास' शब्द का अर्थ है-सर्वानुमत्त (अर्थात किसी शब्द के सभी का अनुदात्त स्वर हो जाना)। २४. सुः पूमायाम-पूजा अर्थ मे सु की कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है। सुसिक्तम्-'भली भांति सोचा है इसी हेतु पत्ता मे पूज्यता है । यहाँ

पप्रकरणम्
२६
सर्गत्त्वान्न पः । पूजायां किम् ? सुपिकतं किं तवाज। पोऽयम् ॥
२५१ अतिरतिक्रमणे च ।।४६५। अतिक्रमणे पूजायां चातिः
कर्मप्रवचनीयगंजः स्यात् । प्रति देवान कृष्णः ।।
२६ । अपिः पदार्यसंभावनाऽन्वयसर्गगर्दासमुच्चयेषु ११४६६
एषु द्योत्येप्वपिखतसंज्ञः स्यात् । सपिपोऽपि स्यात् । अनुपसर्ग-
'सु' की मंग्वचनीय सज्ञा हो जाने से इसकी उपमगं संशा नही रहती तथा
उपसर्ग संज्ञा के अभाव में स् को प नहीं होता। इसी प्रकार 'सुस्तृतम्'।
पूनायो किमिति -पूशा अर्थ मे ही सु की मंश्वचीय संज्ञा होती है।
ऐसा क्यों ? इसलिए कि "सुपितं कि स्यात तवात्र" यहाँ क्षेप निन्दा) का
भाव निकलता है अनः सु' को कर्म प्रवचनीय सजा नहीं होती तथा उ ।सर्ग
संशा ही हो जाती है । उस राशा हो जाने से 'मुपिकन' में 'स्' को प्' हो
जाता है।'
२१. यतिरकिकमरोंच-अतिक्रमण का अर्थ है-बढ़कर होना अथवा
सीमा को मापना । अरित्रमण तथा पूजा अर्ष मे 'अति की कर्मप्रवचनीय
संज्ञा होती है।
अति देवान कृष्ण:-(कृष्ण देवों से बढ़कर है या कृष्ण देवो के पूज्य
हैं) । उपयुं का नियम से 'अति' की कमप्रवचनीय सझा होकर, उसके योग में
'देवान' में द्वितीया विमक्ति हो जाती है ।
२६. अपि: पदार्य इति-पदार्थ, समावना, अविवसग, गहरे तथा समुन्वय
इन अपों का यातित करने मे 'अपि' की कमप्रवचनीय संज्ञा होती है।
सर्पिषोऽपि स्यात् (धृत का बिन्दु भी हो)- यह पदार्थ का उदाहरण
है। पदार्थ का तात्पर्य है-पद का अर्थ । यही '' अप्रयुक्त शब्द के अयं को
द्योनित करता है । 'सपिपोऽपि स्याद' का अर्थ है -सपिबिन्दुः स्याव" । अपि
बिन्दु का घोतक है । इसकी कर्मप्रवचनीय सजा हो जाने से उपसर्ग संज्ञा नहीं
होती तपा 'स्यात्' के स् को प् नही होता, क्योकि यह उपसर्ग से परे ही हो
सकता था।
१. उपसदि सुनोति ॥३॥६५॥

संस्कृतव्याकरणे . २२ । अभिरमागे १४६१ भागवतं लक्षणादावभि- रुक्तसंज्ञः स्यात् । हरिमभि वर्तते । भक्तो हरिमभि । देवं देव- मभिसिञ्चति । अभागे किम् ? यदत्र ममाभिप्यात्तद्दीयताम् ॥ २३ । अधिपरी अनर्थको।१४।६३। उक्तसंज्ञो स्तः। कुतोऽ- ध्यागच्छति । कुतः पर्यागच्छति । गतिसंज्ञाबाधात् 'गतिर्गतो ८।११७०। इति निघातो न । २४। सुः पूजायाम् ॥११४।६४। सुसिक्तम् । सुस्तुतम् । अनुप- २२ अभिरमागे-माग को छोडकर कार कहे हुए पोष तीन अर्थों के विषय में अभि की वर्मप्रवचनीय सज्ञा होती है। (१) हरिममि वर्तते (लक्षण) (२) मफ्तो हरिममि ( इत्थंभूताख्यान) यहाँ 'अभि' की कमप्रवचनीय सझा होकर उसके योग में द्वितीया होती है। (३॥ देवं देवममिपिञ्चति (वीप्सा) । यहाँ स् को नहीं होता। अभागे किमति-भाग अर्थ के विषय मे 'अभि' की वमेश्ववतीय संज्ञा नहीं होती। इसका परिणाम यह होता है कि 'यदा ममामिष्यात् तद् दीयताम्' (जो यहाँ मेरा भाग हो वह दीजिए) यहाँ 'अमि' की उपसर्ग संजा ही रहती है और 'स्यात्' के स् को प हो जाता है (उपसर्गप्रादुर्यामस्तिपंपरः ८1१७) २३. अधिपरो मनको-अनर्थक अधि, और परि की कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है। कुतोऽध्यागच्छति (वह कहाँ से आता है ?}-यहाँ 'अधि' की कर्म- प्रवचनीय संज्ञा हो जाने से गति' संज्ञा नहीं होती। गति संज्ञा के म होने से (गतिसंज्ञाबाघात) 'गतिगंती १०' इस सूत्र से 'अधि' को आ (अधि+ मा- गच्छति) परे होने पर सर्वानुदात्त (निघात) नही होता । आगच्छति में 'मा'गनिसंज्ञक है। टिप्पणी - "निपात' शब्द का अर्थ है-सर्वानुदात्त (अपाद किसी शब्द के सभी स्वरों का अनुदात्त स्वर हो जाना)। २४. मुः पुमायाम-पूजा अर्य में सु की पवनीय संशा होती है। सुरिश्तम् -'भसी भाति सींचा है इसी हेतु पा में पूग्यता है । यहाँ २६ करप्रकरणम् सर्गत्वान्न पः। पूजायां किम् ? सुपिक्तं किं तवाऽत्र । क्षेपोऽयम् ।। २५९ अतिरतिक्रमणे च ६१४६५ अतिक्रमणे पूजायां चातिः कर्मप्रवचनीयसंज्ञः स्यात् । प्रति देवान् कृष्णः ॥ २६ । अपिः पदार्य संभावनाऽन्ववसर्गगर्दासमुच्चयेषु १४६६ एषु द्योत्येप्वपिरक्तसंज्ञः स्यात् । सर्पिपोऽपि स्यात् । अनुपसर्ग- सुकी म स्वचनीय सज्ञा हो जाने से इसकी उपमर्ग सज्ञा नहीं रहनी तथा उपसर्ग संज्ञा के अभाव में स् को प नहीं होता। इसी प्रकार 'सृस्तृतम्'। पूजाय किमिति-पूजा अयं में ही सु की मंश्वच ीय सज्ञा होती है । ऐसा कों ? इसलिए कि “सुपितं किं स्यात् तात्र" यहाँ क्षेत्र निन्दा) का भाव निकलता है अतः मु' की कर्मप्रवचनीय संज्ञा नहीं होती तथा उसगं संज्ञा ही हो जाती है। गर्म सना हो जाने से 'मुपिन' में 'स्' को ' हो जाता है। २१. पतिरक्षित्रमरो च--अतिक्रमण का अर्थ है-बढ़कर होना अथवा सीमा को सांधना। अतिक्रमण तया पूजा अर्थ में “अनि की धर्मप्रवचनीय संशा होती है। अति देवान रण:-(कृप देवों से बढ़कर है या कृष्ण देवो के पूज्य है)। उपर्युका नियम से 'मी वर्मप्रवचनीय सझा होकर, उसके योग में 'देवान्' में हिसीरा विमति हो जाती है। २६. अवि पदार्थ इति-पदार्य, मभावना, बन्यवसग, गर्दा तपा समुन्वय इस अयों रो ढादित करने में 'विकी कमप्रवचनी। मना होती है। सररयोऽपि स्यात् (पृत का विन्द्र भी ह)-यह पनार्य का उदाहरण है । पदार्थ का वादन है पद का अर्थ यहा '' बप्रयुक्त कद के अयं को घोतित करता है । 'सरियपि स्यात्' । बमं है पिरिन्दुः स्यात्" । अपि विन्दु का द्योतक है । इसी मंश्वचनीय मंशा हो जाने से उसमगं गंगा नहीं होठी टपा 'स्यान्' के स्कोप नहीं होता, यो दह उपसर्ग से पर ही हो सापा, १. उपसर्गाद मुनानि ३६॥ है

territor मा एसपिभूत भवने
krtimrittenमियादित्यनेन संवध्यते
#यन गम्यमानस्य बिन्दोरवय.
TATA या मशिदस्य पदायद्योतावा
। रापिपो बिन्दुना योगी न
METRITIREmयामिष्णुम; संभावन शरत्युत्कपं.
Hemant E--सस्यिोर स्पाद'मेद बम धातु
Paritrim बिना अपं में निरपर। 'frमकी
Artist भम् धातु का बर्य हाना' (भवन या ससा)
REAT) शराभाना का विषय हो जाना है अपात होने
rvant हाना (भरन) केता (रिद को ''दोनित
औरोदुभता रग होना त्रिया को मनाकोपी
A. उस (भार) पायबर याद से हो जाता है। यह
'मा परिम् अकोहै और किदु असर ,सी
में दो विभति। यही अतिको पदा-पोतारा है।
नीय) के योग मे 'सपिम्' सम मदतीया विपक्ति नहीं
MA सहिस्' पा विन्दु से सम्बन्ध प्रति स नहीं, यह पहावा
अपि सुनिष्णम (क्या विष्णु की स्तुनि कर सकेगा ?)-
Pear का उदाहरण है। सम्भावना का अपहै-शक्तिके )
रमे के लिये भामुक्ति करना। म्हा भो कर्मप्रवननीय संशाहले
महीं रहती और स्तुपाद वे 'स् को ५ (उपसर्गात 100
अपि स्वहि अच्छा स्तुति करो अपवा नहीं)-यह अन्यायका
रामहै। शयवसका अर्थ है -पष्ट कार्य करने की अनुमति देना।
ANपमान है। सपिस (पर) से दिग्दु का " -
arrietin: ति स्तुहि, प्रन्यवगर्गः कामचारा-
।
पवनोप मंशा का फल है-उपसर्ग सज्ञा का दाध हो जाना तयार

कारकप्रकरणम् नुज्ञा । धिग्देवदत्तम, अपि स्तुयाद् धूपलम, गौँ । अपि सिञ्च, अपि स्तुहिः समुच्चये ॥ १७ । कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे ।२।३।५। इह द्वितीया स्यात् । मासं कल्याणी । मासमधीते । मासं गुडधानाः । क्रोशं कुटिला नदी। कोशमधीते । क्रोशं गिरिः । अत्यन्तसंयोगे किम ? घिग्देवदत्तम मपि रसुपाद पलम दिवस्त को धिक्कार है, वह शूद्र की स्तुति का है)-यहाँ गर्दा अर्थ 'अपि' द्वारा घोतित किया गया है । महो का अर्थ है.. || मप्रवचनीय संशा हो जाने से (उपसर्ग ८11८७) पत्व नहीं होता। अपि सिर, अपि स्तुहि (सीचो भी स्तुति भी रो)- यह अपि द्वारा समुच्चय घोतित किया गया है। कर्मप्रवचनीय संज्ञा के कारण 'स' को 'प्' (उपसर्गात ८।३।६५) नहीं होता। २७. कालावनारस्यन्तसंयोगे-अत्यन्त संयोग में समयवाची तथा मार्गवाची से हिलीया विभक्ति होती है । अत्यन्त संयोग का अर्थ है-निरन्तर सयोग । किसी गुण, क्रिया या द्रव्य का किसी काल या मार्ग में पूर्ण रूप से रहना। मास स्याणी (मास भर रल्याणकारिणी है। यहाँ रस्याण (गुण) माग भर मे लगातार रहता है-अत: उपयुक्त नियम से भास (कालवानक) मे द्वितीया विमति हती है। इसी प्रकार-- घोष कुटिला मदी (कोस गर तक मदो टेडी है) यहाँ मागंवाची 'को' गे भी द्वितीया होती है। मासमधीते (मास भर पड़ा है-यहाँ अध्ययन क्रिया मास भर सगातार चलती है त. मास मर से द्वितीया विभक्ति होती है। इसी प्रकार मावाधक कोश मद से भी पोशमपीते' में द्वितीया हूं तो है। मास गुयानाः (माग पर गुरुवान है)-यहाँ गुडधान (हम्म) मास भर मगातार चलते है अत: अस्पतमयोग में मास शम्द से हिलीया विभक्ति होती है। सीप्रसार में गिरिःमें भी। अत्यन्तरमोगे पिम्-यदि युभ किया और द्रश्या पालवाचक या मार्ग पार से लगातार सम्बन्ध (प्रत्यलसयोग) होता है तो कालराची पा मार्गगी से हिलीया विमति होती है, ऐमा यो रहा? इसलिये कि यदि साषापी या मार्गाची के एक बंश से- ३२ संस्कृतव्याकरणे : . मासस्य द्विरधीते । कोशस्यैकदेशे पर्वतः॥ इति द्वितीया। . २८ । स्वतन्त्रः कर्ता १।४।५४। क्रियायां स्वातन्त्र्येण विव क्षितोऽर्थः कर्ता स्यात् ॥ २६ । साधकतमं करणम् ।१।४।४२। क्रियासिद्धौ प्रकृष्टोप- कारकं करणसंज्ञं स्यात् । तमग्रहणं किम् ? गङ्गायां घोषः॥ द्वितीया विभक्ति न होगी। जैसे-मासस्य द्विरधीते (महीने मे दो बार पड़ता है) यहाँ अध्ययन क्रिया का मास से लगातार सम्बन्ध नहीं अतः मास से द्वितीया विभक्ति नही होतो अपितु सम्बन्ध में षष्ठी विभक्त ही होती है । इसी प्रकार 'कोशस्य कदेशे वंतः' में भी । ॥ इति द्वितीया । सृतीया विभक्ति। २८ स्वतन्त्रः कर्ता-क्रिया में स्वतन्त्रता से विवक्षित पदार्य कर्ता कहलाता है। कारक विवा के आधीन है, नियत नहीं-'विवसात का कामि भवन्ति', अतः क्रिया का जो प्राश्रय है । उसे ही कर्ता कहते हैं, चाहे वह गा हो या चेतन । जैसे-'देवदत्तस्तिष्ठति' 'वृक्षस्तिष्ठति । २६ साधकतम करणम्-क्रिया की मिति में जो कारक सबसे अधिक सहायक होता है उसकी करण संज्ञा होती है। साधकतम शब्द का अर्थ है-प्रकृष्ट उपकारक अर्थात् सबसे अधिक महायक । जिम पदार्थ के व्यापार के अननर क्रिण की सिद्धि हो जाती है। वही प्रकृष्ट उरकार है उसकी करण संशा होती है । तममण्हण किमिति –'साधक करणम्' ? ऐसा ही कह देते, कारसका प्रकरण है हो और धारक और साधक पर्याय है अत: पुन: ‘साधा प्रहण के प्राट मापक यह अयं समझ लिया जाता -फिर प्रकृष्ट अर्थ को पार करने के लिये तमप् प्रत्यय कगें सगाया ? इसलिये कि ताप् ग्रहण करने से गा विदित होता है कि इस कारक प्रकरण मे यन्वर्य संज्ञा के बल से प्राप्त हा विशेष अर्थ नहीं लिया II का यह होता है कि आधार धिकरणम्' से बाधार मात्र की प्रधिकरण समा हो जाती है । देवा लि आधार को ही नहीं । अतः महापा पोरगा के तट पर पामी रहो। का भी मिला होकर सप्तमी हो जाता है। अन्यथा डिवेषु पर मारि में जहाँ पुग्या व्यापक आधार है वही सप्तमी होती।

कारकप्रकरणम् ३० । कतुं करणयोस्तृतीया ।३।३।१८। अनभिहिते कर्तरि करणे च तृतीया स्यात् । रामेण वारणेन हतो बाली। * (वा) प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम् ॥ प्रकृत्या चारुः । प्राये। याज्ञिकः । गोत्रेण मायः । समेति । विपमेरगति । द्विद्रोणेन धान्यं क्रोणाति । सुखेन दुःखेन वा यातीत्यादि । ३० क्तृकरणयोरिति-अनुक्त कर्ता और करण में तृतीया विभक्ति होती है। जर्मवाच्य और भाववाच्य का प्रयोग होता है वहाँ वर्ता अनुक्त होता है जैसे - "लक्ष्म्या सेव्यते" । अतः यहाँ 'लक्ष्म्या' में शुतीया विभक्ति है। रामेण बाग हतो बालो-यहाँ 'हत. में कर्मवाच्य मे 'क्त' प्रत्यय हुआ है, 'राम' का कर्तापन अनुक्त है; अतः राम मे उपर्युक्त नियम से सृतीया हो जाती है। मारने का प्रकृष्ट साधन 'व' है इसकी 'साधरतमें करणम्' से .करण संज्ञा होकर इसमे भी तृतीया विभक्ति होती है। प्रकृत्यादिम्य इति (वा)-प्रकृति आदि शदो से तृतीया विक्ति होती है। प्रकृत्या पाय: (स्वभाव में सुन्दर)- यही प्रकृति शब्द से तृतीया विभक्ति हो जाती है। इसी प्रकार प्रायेण पाशिकः (प्रायः माशिक है), गोत्रेण गापः (गोग से गार्म है), समेति (समगति से चलता है), विषमेगति (विषम पमता है) आदि में भी तृतीया विक्ति होती है । ये शब्द प्राय. क्रियाविशेषण हैं। क्रियाविशेषण के योग में द्वितीया प्राप्त थी। कहीं-वही ये करण के अपं को भी प्रकट करते हैं । जहाँ ये करण होते हैं वहीं तो करण मे तृतीया हो जाता है। हिरोणेन धान्यं कोणाति (दो द्रोग सम्बन्धी बम परीदता है)-यहाँ "दो द्रोण सम्बधी धान्य" इस अयं में पप्टी प्राप्त पो, उपर्युक्त नियम से दृतीया विभक्ति होती है। मुन कुन दा पाति (मुष पूर्वक या दुचपूर्वक जाता है)--यहाँ 'सुख' वाधिद किाविशेषण । शिविशेषण में हिलोपा विभक्ति हुआ करती है उसके स्थान पर उापा (प्रायादिभ्यः) नियम से तृपीया विभक्ति हो जाती है। टिप्पणी-पार' आदि पर प्राकृति गर है मह म प्रकार की सूतीपा गाठ में अपनि मदों में भी देखो. जाती है इसलिये "नाम्ना शुतोषः" "चरितेन दात" यहाँ भी तोया होती है।

संस्कृतम्याकरणे ३१ । दियः फर्म च ।।४।४३ दिवः साधकतमं कारक कर्मसंशं स्याच्चात्करणसंजम् । अक्षरक्षान्वा दोव्यति । ३२ । अपवर्ग तृतीया ।२।३।६। अपवर्गः फलप्राप्तिस्तस्यां द्योत्यायां कालाध्वनोरत्यन्तसयोगेतृतीया स्यात् । प्रह्ना क्रोशेन वाऽनुवाकोऽधीतः । अपवर्ग किम् ? मासमधोतो नायातः ।। ३१ दिवः कर्म घ -दिव् (सेलना) धातु के सापातम कारकी कर्म संज्ञा होती है और करण सज्ञा भी। अभः समान वा दशैय्यति [पासों से असता है]-यहाँ अक्ष [पासे] जुवा खेलने के साधन है, अतः करण सशा होकर तृतीया ही होनी चाहिये थी। इस नियम से विकल्प से कर्म संज्ञा होकर द्वितीया भी होती है । ३२ मपवयं इति-अपवर्ग का अर्थ है -फल-प्राप्ति । फल-प्राप्ति य कार्यसिद्धि का बोध कराने के लिये कालवाची तपा मार्गाची शब्दो र अत्यन्त-संयोग में तृतीया विभक्ति होती है। - टिप्पणी - इस सूत्र के अर्थ में 'कालावनोरत्यन्तप्तयोगें' २३३॥ सूत्र का सम्बन्ध किया जाता है तभी यह अर्थ होता है । यह तृतीया विभक्ति द्वितीया की बाधक है। मह्ना कोशेन वा अनुवाकोऽधीत:- [दिन भर या कोस भर निरन्तर कार्य करके अनुवाक पढ़ लिया]-जितने समय या मार्ग में कार्य पूरा हो जाता है उस कालवाची या मागंवाची घाब्द से तृतीया विमति होती है । यदि दिन भर में अनुवाक नाम का वेद का अंश पूरा पढ़ लिया तो कासवाची अहन दिन] शब्द से तृतीग विभक्ति होगी तपा मार्गवाची 'क्रोश' शब्द से भी । इसी प्रकार 'दादशवर्षाकरणं भ्रूयते' आदि प्रयोग समझने चाहिये । - अपवर्ग किमिति- 'फल प्राप्ति होने पर ऐसा क्यों कहा? इसलिये कि यदि निरन्तर कार्य करते हुए भी कार्य की सिद्धि नहीं होती तो काभवाची या मार्गवाचो से तृतीया नहीं होती अपितु पहले नियम के अनुसार [कालाधनो- रत्यन्तसंयोगे] द्वितीया ही होती है । जैसे-मासम्पोतो नायातः - 'मास भर निरन्तर पढ़ा किन्तु आया नहीं।' यहाँ 'मास' में द्वितीया ही होती है। .

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.. ३१ । यिः कर्म घa दियः सापयतम कारक गर्गसंग स्पानातरणसंगम । प्ररिक्षावा दोय्यति । ३२ । अपारी तोका रा३३६) भगवर्गः फलप्राप्तिस्तस्या पारमाया मासायनोरत्यन्तरायोगेतृतीया स्यात् । पहा कोरोन यानुगोपीतः । अपवर्ग किम ? मारामयीतो नापातः ॥ fre: च-र (मा) पातुक सापायम कारक की कर्म एमाही औरण राहा भी। ni मान दारोम्पनि कामों से पता है}-पह! यस पारो] आरोपों के शापन है. मकरण संहा होकर सूतीया ही होनी चाहिये पी मनियम से पितरो कर्म संशा होकर हिनीया भी होती है। १२ बरगं पति-बावर्ग का अहै -फल-प्राप्ति। फल-प्राणि या सिडाबोध कराने के लिये गमवावी सपा मार्गशपी शम्दो से मत्पमनोयोम में तृतीया विभक्ति होती है। • टिप्पणी -इस च के अर्थ में 'कासाम्यनीरस्यन्तसंयोगे 10 सूत्र का सम्यग्य पिया पाता है तभी यह अर्थ होता है । यह तृतीया विभक्ति द्वितीया बापक है। महाकोशेन पा मनुवाकोऽधीत:- दिन भर या कोस भर निरन्तर नार्य करके अनुक पर लिग]-जितने समय या मार्ग में कार्य पूरा हो जाता है उस फालयाची या मार्गवाची शब्द से तृतीया विभरित होती है । यदि दिन भर में अनुवाक नाम का वेद का वंश पूरा पक्ष लिया तो कालवाची बहन [दिन] शब्द से तृतीय विमति होगी तथा मानवाची 'कोय' शब्द से भी । इसी प्रकार 'दादराव करणं धूयते' आदि प्रयोग समझने चाहिये। अपवर्ग किमिति--'फन प्राप्ति होने पर ऐसा क्यों कहा? इसलिये कि यदि निरन्तर कार्य करते हुए भी कार्य की सिद्धि नहीं होती तो कानवाची या मागंवाधी से तृतीया नहीं होती अपितु पहले नियम के अनुसार [कालावनो. पतसंयोगे] द्वितीया ही होती है । जैसे-मासम्धोतो नायातः - 'मास भार निरन्तर पदाकिन्तु आया नहीं। यहाँ 'मास' में द्वितीया ही होती है।

वारकप्रकरणम् ३३ । सहयुक्त प्रधाने ।२ ३॥१६॥ सहार्थेन युक्ते अप्रधाने तृतीया स्यात् । पुत्रेण सहागतः पिता। एवं साक-साध-सम- योगेऽपि विनापि तद्योगं तृतीया । 'वृद्धो यूना ।१।२।६५' । इत्यादिनिर्देशात् ॥ ३४ । येनाङ्गविकारः ।२।३।२० येनाङ्गन विकृतेनाङ्गिनो विकारो लक्ष्यते ततस्तृतीया स्यात् । अक्षणा कारणः । अक्षि बन्धिकाणत्वविशिष्ट इत्यर्थः । अङ्गविकारः किम ? प्रक्षिशणमस्य ।। २३ महतऽप्रपाने-साम [सह] के अर्थ के योग में अप्रधान (अर्थात् वाक्य के प्रधान वर्ग का साथ देने वाले] के वाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है। पुत्रेण सहागतः पिता (पुत्र के महित पिता आया)-यहाँ आगमन किया का मुख्य सम्बन्ध पिता से है अत: पिता प्रधान कर्ता है, पुत्र प्रधान है, इलिये पुत्र शब्द से तृतीया होती है। इसी प्रकार साकम, साधम, समम् के योग में भी तृतीया होती है। जैसे- पारस्व साकं मया सोधे (पट्टि 41७०), वनं मया साधमसि प्रानः (आधु० १४ १३), बाहो निवस्यति समं हरिणागनामिः (शाकु. १, २७) (देखिये, काले सेक्शन ६१८)। • • बिनापीति-यदि सह आदि शब्दों का प्रयोग न हो और इनका रूपं प्रद होता हो तो भी तृतीया विभक्ति होती है। स्वयं आचार्य पाणिनि ने "इटो यूना', (१३२६५) इत्यादि सूत्र में युवन शम्द में तृतीया । प्रयोग किया है इसी प्रयोग में यह बात पुष्ट होती है। १४ येनाशविकार :-जिम विकृत अङ्ग से अङ्गी का विकार सक्षित होता है उस बनवाची गम्म से हतीया विभक्ति होती है। अरुणा काण: (द का पाना या बांस से काना)- यहाँ आंख के विराव हेने से व्यक्ति (अङ्गी) पानानि सक्षित होता है, अत: आँसवाची 'अति' मद से तृतीया विभक्ति होती है । 'प्रीय सम्बन्धी कानेपन से युक्त है, यह बर्ष होता है। इसी प्रकार पादेन ' शिरसा सस्वाट: गणेन बषिरमादि। मनदिरारिमिति-सूत्र में अङ्गविधार सदा या तात्पर्य है? यहाँ बसम्म बङ्गी के अर्थ में है (अङ्गमस्सास्ति व बङ्गः- ३४ संस्कृतव्याककरणे ३१ । दिवः कर्म च ।।४।४३। दिवः साधकतमं कारक कर्मसंज्ञं स्याच्चात्करणसंज्ञम् । अक्षरक्षान्वा दीव्यति ॥ ३२ । अपवर्गे तृतीया ।२।३।६। अपवर्गः फलप्राप्तिस्तस्यां द्योत्यायां कालाध्वनोरत्यन्तसयोगेतृतीया स्यात् । अह्ना क्रोशेन वाऽनुवाकोऽधीतः । अपवर्गे किम् ? मासमधीतो नायातः ॥ ३१ दिवः कर्म च -दिव् (खेलना) धातु के साधकतम कारक की कर्म संज्ञा होती है और करण संज्ञा भी। अक्षः अक्षान का दीप्यति पासों से खेलता है-यहाँ अक्ष पासे] जुआ खेलने के साधन हैं, अत: करण संज्ञा होकर तृतीया ही होनी चाहिये पी। इस नियम से विकल से कर्म संज्ञा होकर द्वितीया भी होती है । ३२ मपवर्ग इति-अपवर्ग का अर्थ है -फल-प्राप्तिा फल-प्राप्ति या कार्यसिद्धि का बोध कराने के लिये कालवावी तथा मानवाची शब्दो से अत्यन्त-संयोग में सृतीया विभक्ति होती है। टिप्पणी-इस सूम के अर्थ में 'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे' ।।३।। मूत्र का सम्बन्ध किया जाता है तभी यह अर्थ होता है। यह तृतीया विभक्ति द्वितीया की बाधक है। 'महाकोशेन वा अनुवाकोऽधीत:- [दिन भर या कोस भर निरन्तर कार्य करके अनुवाक पढ़ लिया]-जितने समय या मार्ग में कार्य पूरा हो जाता है उस कालवाची या मागंवाची शब्द से तृतीया विभक्ति होती है। यदि दिन भर में अनुवाक नाम का वेद का अंश पूरा पढ़ लिया तो कालवावी अहन [दिन] शब्द से तृतीया विभक्ति होगी तपा मार्गवाची 'कोश' शब्द से भी । इसी प्रकार 'दादशवर्षाकरणं यूपते' आदि प्रयोग राममने me अपवर्ग किमिति- 'फल प्राप्ति होने पर ऐसा क्यों कहा?. यदि निरन्तर कार्य करते हुए भी कार्य को सिद्धि नहीं । मागंवाची से तृतीया नहीं होती अपितु पहले नियम के रत्यन्तसंयोगे] द्वितीयां ही होती है । चरे निरन्तर पड़ा कि भाया नहीं ।' यहाँ 'मास' में पारकप्रकरणम् ३३ । सयुक्त प्रधाने ।२ ३।१६। सहार्थेन युक्ते अपघाने तृतीया स्यात् । पुत्रेण सहागतः पिता। एवं साक-साघ-समं- योगेऽपि । विनापि तद्योगं तृतीया । 'वृद्धो यूना ।१।२।६५' । इत्यादिनिर्देशात् ।। ३४ । पेनाङ्गविकारः ॥२१३।२० येनाङ्गन विकृतेनाङ्गिनो विकारो लक्ष्यते ततस्तृतीपा स्यात् । प्रणा कारगः। अक्षि बन्धिकाणत्वविशिष्ट इत्यर्थः । अङ्गविकारः किम् ? अक्षि कारगमस्य । ३३ सहपुनधाने-साथ [सह] के अर्थ के योग में अप्रधान [अर्थात वावप के प्रधान कर्ता का साप देने वाले] के वाचक शब्द में हनीया विभक्ति होती है। पुषेण सहागतः पिता पुत्र के सहित पिता आया)-यहां आगमन क्रिया का मुख्य सम्बन्ध पिता से है अत: पिता प्रधान कर्ता है, पुत्र अप्रधान है, इसलिये पुत्र शब्द से तृतीया होती है। इसी प्रकार साकम, साधम्, समम् के योग में भी तृतीया होती है। जैसे- आस्व साकं मया साधे (मट्टि ८७.1, वनं मया साधमसि प्रपत्रः (रघु०१४ ६३), आहो निवरस्यहि समं हरिणागनाभिः शापु. १, २७) देिखिये, काने सेक्शन १८)। • विनापीतियदि सह आदि शब्दों का प्रयोग न हो और इसका वर्ष प्रकट होता हो तो भी तृतीपा विभक्ति होती है। स्वयं याचार्य पाणिनि ने "मो यूना', (११२२६५॥ हरयादि सूत्र मे युवन् शन्द में तृतीया का प्रयोग किया है इसी प्रयोग से यह बात पुष्ट होती है। ३४ येनाङ्गविकार:-जिम विकृम बङ्ग से अङ्गी का विकार लक्षित होता है उस अङ्गवाची शब्द से तृतीया विभक्ति होती है। भरणा काण: (अब 7 काना या आंद से जाना)- यहाँ आँख के पित हैने से व्यक्ति (अङ्गी) का पानानि सक्षित होता है, अत: आंधवापी 'दि से तृतीया विभक्ति होती है । 'आँख सम्बन्धी कानेपन से मुक्त है, पहब होता है। इसी प्रकार पादेन सः' घिरमा पस्वाट पणेने बषिरमादि। मङ्गविशाः सिमिति-सूत्र में बङ्गरिकार हदका क्या तात्पर्य है ? मही मर शम्द बनी के अधं में है (अङ्गमस्यास्ति इति अङ्ग:- संस्कृतध्याकरणे ३१ । दिवः कर्म च 1१।४।४३। दिवः साधकतम कारक कर्मसंज्ञं स्याच्चात्करणसंज्ञम् । अक्षरक्षान्वा दीव्यति ।। ३२ । अपवर्ग तृतीया ।२।३।६। अपवर्गः फलप्राप्तिस्तस्यां द्योत्यायां कालाध्वनोरत्यन्तसयोगेतृतीया स्यात् । प्रह्ला क्रोशेन वाऽनुवाकोऽधीतः । अपवर्गे किम् ? मासमधीतो नायातः॥ ३१ दियः कर्म च-दिद् (खेलना) धातु के साक्षवम कारक को कम संशा होती है और करण संशा भी। असं: अक्षान् या दोय्यति [पासों से खेलता है]-यहाँ अक्ष [पासे] जुभा सेलने के साधन हैं, अतः करण संज्ञा होकर तृतीया ही होनी चाहिये यो । इम नियम से विकल्प से कर्म संज्ञा होकर द्वितीया भी होती है। ३२ पवर्ग इति-अपवर्ग का अर्थ है-फल-प्राप्ति। फल-प्राप्ति या कार्यसिद्धि का बोध कराने के लिये कालवाची तथा मानवाची शब्दो से अत्यन्त-संयोग में तृतीया विभक्ति होती है। • टिप्पणी -इस सूत्र के अर्थ मे 'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगें' ।।३सूत्र का सम्बन्ध किया जाता है तभी यह अर्थ होता है । यह तृतीया विभक्ति द्वितीया की बांधक है। 'अह्ना क्रोशेन वा अनुवाकोऽधीत:- [दिन भर या कोस भर निरन्तर कार्य करके अनुवाक पढ़ लिया]-जितने समय या मार्ग में कार्य पूरा हो जाता है उस कालवांची या मार्गाची शब्द से तृतीया विमक्ति होती है । यदि दिन में अनुवाक नाम का वेद का वंश पूरा पढ़ लिया तो कालंबाची बहन दिन] शब्द से तृतीपा विभक्ति होगी तथा मार्गवाची 'कोश' शब्द से भी । इसी प्रकार 'द्वादशवर्षकिरणं यूपते आदि प्रयोग समझने चाहिये । अपवर्ग किमिति-'फल प्राप्ति होने पर ऐसा क्यों कहा? इसलिये कि यदि निरन्तर कार्य करते हुए भी कार्य की सिद्धि नहीं होती तो काभवाची या मागंवाची से सृवीया नहीं होती अपितु पहले नियम के अनुसार [कालाधनो. रस्यन्तसंयोगे] द्वितीया ही होती है । जैसे-मासम्मोतो नायातः निरन्तर पड़ा किन्नु ाया नहीं ।' यहाँ 'मास' में द्वितीया ही होती है। मर 'मास भर रिक-प्रकरणम् ३५ ३३ । सहयुक्त प्रधाने ।२ ३३१९सहार्थेन युवते अप्रधाने तृतीया स्यात् । पुत्रेण सहागतः पिता। एवं साक-साघ-समं- योगेऽपि'। विनापि तद्योगं तृतीया । 'वृद्धो यूना ।१।२६६५' । इत्यादिनिर्देशात् ॥ ३४ । नाङ्गविफारः १२१३१२० येनाङ्गन विकृतेनाङ्गिनो विकारो लक्ष्यते ततस्तृतीया स्यात् । अक्षणा कारणः। अक्षि बन्धिकारणत्वविशिष्ट इत्यर्थः । अङ्गविकारः किम् ? अक्षि शरणमस्य ॥ ३३ सहयुवप्रधाने-साथ [सह] के अर्थ के योग में अप्रधान [अर्थात वाक्य के प्रधान कर्ता का साथ देने वाले] के वाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है। पुत्रेण महागतः पिता (पुत्र के सहित पिता बाया)- यहाँ आगमन त्रिया का मुख्य सम्बन्ध पिता से है या पिता प्रधान कर्ता है, पुत्र प्रधान है, इसलिये पुत्र शब्द से तृतीया होती है । इसी प्रकार शाकम्, साधम्, समम् के योग में पो तृतीया होती है। जैसे- आस्व साकं मया सोधे (ट्टि ८७०), वनं मया साधमसि प्रानः (रघु. १४६३), आहो निवस्यति समं हरिणागनाभिः (शाकु. १, २७) (देखिये, काले सेक्शन २१८)। •विनापीति-यदि सह आदि शब्दोका प्रयोग न हो और ना धर्म प्रकट होता हो तो भी तृतीया विभक्ति होती है। स्वयं आचार्य पाणिनि ने "तो यूना', (१॥२॥६५॥ इत्यादि सूत्र में युवन शन्द में तृतीया का प्रयोग किया है इसी प्रयोग में यह बात पुष्ट होती है । ३४ पेनाङ्गवितर:-जिम विकृत बङ्ग से अङ्गी का विकार सक्षित होता है उस अङ्गवाची गद से तृतीया विभक्ति होती है। मागणः (ta काना या आंघ से माना)-पहा आँस के वित होने से व्यक्ति (अङ्गी) पानाम्न मसित होता है, अत: आंधवाची 'अशिम से तृतीया विभक्ति होती है । 'आँध सम्बन्धी कानेपन से युक्त है, यह बहोता है। इसी प्रकार पादेन ६ः शिरसा चत्वार वर्णन पिर: आदि। मनविकारः सिमिति-सूत्र में बङ्गरिकार इन्दका बया तात्पर्य है ? ए! बजङ्गी के अर्थ में है (प्रङ्गमस्पास्ति इति अङ्ग-प्रर्न संस्कृत व्याकरणे ३५ । इत्थंभूतलक्षणे।२।३।२१। कञ्चित्प्रकारं प्राप्तस्य लक्षणे तृतीया स्यात् । जटाभिस्तापसः। जटाज्ञाप्यतापसप्वविशिष्ट इत्यर्थः ।। ३६ । संजोऽन्यतरस्यां कर्मणि ।।३।२२। संपूर्वस्य जानातेः कीरा तृतीया वा स्यात् । पित्रा पितरं वा संजानीते ।। ३७ ॥ हेतो १२।३।२३॥ हेत्वर्थे तृतीया स्यात् । द्रव्यादिसाधारणं निव्यापारसाधारणं च हेतुत्वम् । करणत्वं तु क्रियामात्रविपर्य आधच्' अतएव जहाँ अङ्ग के विकार से अङ्गी का विकार लक्षित होता है वहीं अङ्गवाची से तृतीया होती है । 'अक्षि काणमस्य' मे आंख का कानापन ही कहा गया है। इससे किसी व्यक्ति का कानापन लक्षित नहीं होता अतः यहाँ प्रक्षि सब्द से तृतीया विनक्ति नहीं होती। ३५. इत्थंभूतलक्षणे - इत्थंभूत शब्द का अर्थ है-इस प्रकार हुआ, किसी विशेष दशा को प्राप्त हुआ। किसी विशेष दशा को प्राप्ति का बोध कराने वाले चिह्न में तृतीया विभक्ति होती है। जटामिस्तापसः (जटाओं से तपस्वी) - जिस व्यक्ति का तपस्वी होना जटाओं से लक्षिस होता है उसके लिये यह प्रयोग है। यहाँ जटा तपस्वीपन का शापक (लक्षण) है। इससे उपयुक्त नियमानुसार तृतीया विभक्ति होती है। जटाओं से लक्षित तपस्वीपन से युक्त है।' यह अर्थ होता है । ३६. संजोन्यतरस्यामिति- सम् उपसर्ग पूर्वक ज्ञा धातु के कर्म में विकल्प मे तृतीया विभक्ति होती है। पक्ष में द्वितीया होती है। पित्रा पितर वा सजानीते (पिता को सम्यक् जानता है)-यहाँ पितर' वि कम होने से द्वितीया प्राप्त थी। उपर्युक्त नियम से विकल्प से सृतीया होकर पित्रा' प्रयोग भी होता है। ३७. हेतो-कारण वानी शब्द से तृतीया विभक्ति होती है। करण और हेतु में भेद है। अत: इस मूत्र से हेतु में तृतीया कही गई है 'करणयोस्तृतीया' से करण में । हेतु और करण में भेद यह है कि हेतु ट्रम्प, गुग और किया सभी का जनक हो सकता है उसमें कोई , कारकप्रकरणम् । T.T व्यापारनियतं च । दण्टेन घटः । पुण्येन दृष्टो हरिः। फलमपोह हेतुः । अध्ययनेन वसति । गम्यमानापि क्रिया कारकविभक्तो प्रयोजिका । अलं श्रमेण श्रमेण साध्यं नास्तीत्यर्थः। साधनक्रियां प्रति श्रमः करणम | शतेन शतेन वत्सान्पाययति पयः । शतेन व्यापार हो या न हो। किन्तु वरण क्रिया का ही निमित्त होता है और उममें निमत रूप से क्रिया का साधक व्यापार रहता है। उदाहरण से यह बात स्पष्ट हो जायेगी। 'बाणेन हत. बाली हम उदाहरण में बाण' करण है। इसमे 'हनन' क्रि का साधक व्यापार विद्यमान है। दूसरी ओर- दण्डेन घटः (दण्ड से घड़ा) - यहाँ दण्ड में व्यापार तो है किन्तु यह घट (द्रव्य) का हेतु है क्रिया का जनक नहीं अत' करण नहीं । पुण्येन दृष्टो हरिः (पुज्य के कारण हरि का दर्शन हुपा.- यहां., पुण्य हरिदर्शन (क्रिया) का हेतु है किन्तु इममें व्यापार नही अतः यह करण नहीं, है। यहाँ हेतु में तृतीया विभक्ति होती है। फलमपोह पति -यहाँ फन या प्रयोजन का भी हेतु शब्द से ग्रहण किया जाता है। इसलिए 'अध्ययनेन सति' (अध्ययन करने के प्रयोजन से रहता है। पहा अध्ययन पद से हेतु में तृतीया विभक्ति होती है । गन्यमाना इति-यदि क्रिश का वाक्य में प्रयोग न हो और वह गम्य- मान हो अर्थात् उसका अर्थ निकलता हो तो भी वह धारक-विभक्ति में प्रयोजिका होती है। जैसे- अतं थमेण (धम से बस करो) इसका अर्थ है-'श्रमेण साध्यं नास्ति' । 'श्रम' यह साधन क्रिया के प्रति करण है। साधन क्रिया-वाक्य में प्रयुक्त नहीं अस्तुि अध्याहार से जानी जाती है अर्थात् गम्यमान है । अतः,'यम' से तृतीया विभक्ति होती है। टिप्पणी- यह भी कहा जा सकता है कि निषेधार्थक मलम, कृतम आदि के मोग मे तृतीया विरक्ति होती है-बलं कृतं वा थमेण । मातेन सतेन यत्सान पापयति- इसका अर्थ है-शतेन परिविद्य, सो सो करके बहरे को (दूध पिलाता है। यहाँ भी परिच्छिद्य क्रियो गा मान है। इसके प्रति 'शात' करण है । अत एव 'शतेन' में तृतीया विभक्ति होती है।

३८. संस्कृतम्याकरणे - परिच्छिद्येत्यर्थः ॥ * (वा) अशिष्टव्यवहारे दाणः प्रयोगे चतुर्थ्यर्थे तृतीया । दास्या संयच्छते कामुकः । धर्मे तु भार्याय संयच्छति ।। इति तृतीया ३.कर्मणा यसभिप्रेति स संप्रदानम्, १॥४॥३२॥ दानस्य कर्मणा यमभिप्रेति स संप्रदानसंज्ञः स्यात् । ३६॥ चतुर्थी संप्रदाने ।२।३।१३। विप्राय गां ददाति । अशिष्टय्यवहार इति (वा)-अशिष्ट व्यवहार में दाण (देना) धातु के प्रयोग में चतुर्थी के अर्थ मे तृतीया विभक्ति होती है । दास्या संयच्छते कामुकः (कामुक दासी को देता है)-यहाँ 'दास्या' में उपयुक्त नियम से तृतीया विभक्ति हो जाती हैं । चतुर्थी प्राप्त थी। कामुकता के भाव से दासी को कुछ देना अशिष्ट व्यवहार है। संयच्छते में दाण् पातु का यच्छ आदेश हुआ है। भार्याय संयच्छति- अशिष्ट व्यवहार में ही चतुर्थी के स्थान पर यह तृतीय होती है । जहाँ धर्म युक्त (घH) व्यवहार है वहाँ सम्प्रदान मे चतुर्थ विभक्ति ही होगी । अतएव 'भार्याय में चतुर्थी विभक्ति होती है। ॥ इति तृतीया ॥ चतुर्षी विक्ति । ३८, कर्मणा इति-दान के कमं द्वारा कर्ता बिसे उद्देश्य बनाता है उमकी सम्प्रदान संशा होती है । अन्वर्य संज्ञा है.-सम्प्रदीयते यस्म तत् सम्प्रदानम्--जिसे मुध है वह सम्प्रदान कहलाता है। चतुर्गा सम्मान-सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विमति होती है। गोरगति (साह्मण को गाय देता है) यहाँ विप्र के लिए गया जाता है अतः विप्र की सम्प्रदान संगा हो जाती है.और पवित्र' चतुवा विभक्ति होती है। ...

कारकप्रकरणम् भहित इत्येव । दानीयो विप्रः॥* (वा) क्रियया यमभिप्रति पे सम्प्रदानम् पत्ये शेते । * (वा) यजेः कर्मणः करणसंज्ञा दानस्य च कर्मसंज्ञा ॥ पसुना रुद्रं यजते । पशु रुद्राय ददा- पर्थः॥४० । रच्यानां प्रीयमाणः ११४।३३। रुच्यर्थानां नां प्रयोगे प्रीयमाणोऽर्थः संप्रदानं स्यात् । हरये रोचते भक्तिः मनमिहित इति यहाँ भी 'अनभिहिते' २१३१ सूत्र का प्रकरण है अतः जहा सम्प्रदान अनुक्त होगा वहीं चतुर्थी विक्ति होगी। दानीयो विप्रः' र योग्य विप्न है। यहाँ 'दा' धातु से सम्प्रदान में । (दीयतेऽस्म] अनीयर य होकर 'दानीयः' शब्द बनता है, अत एव सम्पदान उक्त हो गया, क्त नहीं रहा । इसी से यहाँ 'विप्र' में चतुर्षी विभक्ति नहीं होती, अग्तुि तपदिकामात्र प्रयमा होती है। क्रियया इति धा]--किसी क्रिया द्वारा कर्ता को जो अभिप्रेत होता है की भी सम्प्रदान संज्ञा होती है। पत्ये शेते--यहाँ पायन क्रिया का अभिप्रेत पति है। अतः उपयुक्त उम से पति को सम्प्रदान संज्ञा होकर चतुर्थी विभक्ति होती है । यजेः कर्मणः इति था] --[यदि वर्म और सम्प्रदान एक वाक्य में हो] ( धातु के कर्म को करप संज्ञा तथा मम्प्रदान की कर्म संज्ञा हो जाती है। पशुना र पमते- इसका थर्थ है-पशु रुद्राय ददाति । यहाँ 'पशु' है और 'रुद्र' सम्प्रदान है । उपयुक्त नियम से कर्म पिशु] को करण झा होकर उसमें तृतीया विभक्ति हो जाती है तथा सम्प्रदान [रुद्ध की कर्म सशा होकर उसमे द्वितीया विभक्ति होती है। ४०. हव्यर्यानो प्रीयमाण:-कवि अर्थ वाली पातुओं के योग में प्रसन्न होने वाला {प्रीयमाण] सम्प्रदान संशक होता है । 'रुच्' धातु के दो अर्थ है- दीप्ति और अभिपीति । यही प्रीयमाण शम के साहचर्य से अभिप्रीति अर्य लिया जाता है। हरये रोचते मतिः [हरि को भक्ति अन्धी लगती है!--यहाँ प्रसन्न होने वाला 'हरि' है। उपयुक्त नियम से 'हरि को सम्प्रदान संशा होकर उसमे चतुर्षी विभक्ति होती है ।

. मामाकरण प्रत्याभोऽमिलापो रमिः हरिनिष्टप्रोतभक्तिः पत्री। प्रोगमा: निम? देवदसाय रोचले मोदकः पयि ।। ४१ सापड इस्पा मोरयमानः १४॥३४॥ एषां प्रयोगे बोधयिागिप्टः रांप्रदानं स्यात् । गांगी स्मरायणाय साधते ह.ते भन्मक लिपि और अभिमापा कम में अमर है। अन्य के द्वारा उपहुई मिनालापि पहते है । उस उदाहरण में हरि में रहने वामी हमि [प्रीति को उन करले बासी भक्ति' है। रमि के इस वि अर्थ के कारण हरि: भक्तिमभिति' आदि में मप्रदान संशा नहीं होती। प्रीयमानः किलो प्रायमाप अति प्रसन्न होने वाला है उसी की सम्प्रदान संशा होती है, ऐसा यों कहा? इसलिये कि यही प्रीयमाण [प्रसष्ट होने वाग) को ही सम्प्रदान संजा होती है अन्य को नही, अएव 'देवदत्तार रोचते गोदकः पयि' [देवदत्त को मार्ग में मोदक अच्छा लगता है, यह पथिन गन्द की सम्प्रदान संशा नहीं होती, क्योंकि वह प्रीयमाण नहीं । ४१ नाति लाम् [स्तुति करना, ह. [छिपाना, दूर करना ठा [कहरना], शप [उलाहना देना] इन धातुओ के प्रयोग में, जिस पर वर्ता अपना भाव प्रकट करना चाहता है [शीप्यमान :- वोषयितुमिष्टः] उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। गोपी इमरान कृष्णाप इलाधते ह.ले तिष्ठते, शपते वा गोपी] वाम- से आत्मप्रशंसा द्वारा कृष्ण पर विरह वेदना प्रकट करती है {श्नाधते], म y कारकप्रकरणम् .. तिष्ठते शपते वा। ज्ञीप्यमानः किम् ? देवदत्ताय श्लाघते पथि । ४२ । धारेरुत्तमः ११४:३५॥ धारयतेः प्रयोगे उत्तम उक्तसंज्ञः स्यात् । भक्ताय धारयति मोक्षं हरिः । उत्तमाः किम् ? देव- दत्ताय शतं धारयति ग्रामे ॥ ४३ । स्मृहेरीप्सितः १४॥३६॥ स्मृहयतेः प्रयोगे इष्टः संप्रदान स्यात् । पुष्पेभ्यः स्पृह्यति । ईप्सित : किम् ? पुष्पेभ्यो वने सपत्नी को हटाकर अपना भाव कृष्ण पर प्रकट करतो है [ह्न ते], जाना चाहिये यह कहने पर भी ठहरते हुए अपना भाव कृष्ण पर प्रकट करती है [तिष्ठते], उपालमा द्वारा कृष्ण पर अपना भाव प्रकट करती है शपते)]१ यहाँ सर्वत्र 'कृष्ण' की उपयुक्त नियम से सम्प्रदान सज्ञा हो जाती है तथा उससे चतुर्षी विभक्ति होती है। जोपपमानः किमिति-सूत्र में 'शीपस्यान' शब्द का क्या प्रयोजन है ? यह कि जिस पर कर्ता अपना भाव प्रकट करना नही चाहत. उसकी सम्प्रदान संज्ञा नहीं होती । जैसे-'देवदताय श्लाघते पपि' यहाँ 'पथ' की सम्प्रदान संबर नही होती। ४२. पारेक्त्तमर्मः धारि णिजन्त धू-ऋणी होना] धातु के योग में ऋणदाता उत्तमम् को सम्प्रदान संशा होती है। भक्ताय धारयति मोक्ष हरिः [• गवान् भक्त के मोक्ष का ऋणी है]-- यहाँ 'हार' अधर्मण [ऋण लेने वाला है उस पर भक्त का भक्ति रूपी ऋण है जिसका निष्क्रय मोक्ष द्वारा सम्भव है । भक्त उत्तमर्ण है उपयुक्त नियम से भक्त की सम्प्रदान सज्ञा होकर चतुर्थी विभक्ति हो जाती है। उत्तमर्णः किमिति यह सम्प्रदान संज्ञा उत्तमर्ण [ऋणदाता] को ही "होती है अतः 'देवदत्ताप शतं धारपत्ति प्रामे' यहाँ देवदत की सम्प्रधान संज्ञा होती है 'ग्राम' को नही। ४३. स्पृहेरोसित :-गृह चाहना धातु के योग मे चाहा हुआ [इप्सित] १. बालमनोरमा ४२ संस्कृतम्याकरणे स्पृहयति । ईप्सितमात्रे इयं संज्ञा । प्रकर्षविवक्षायां तु परत्वात् कर्मसंज्ञा । पुष्पाणि स्पृहयति ॥ ४४। ऊधद्रुहेासूयार्थानां यं प्रति कोपः ११४॥३७॥ कधाद्यर्थानां प्रयोगे यं प्रति कोपः स उक्तसंज्ञः स्यात् । हरये ऋ.ध्यति, द्रुह्यति, ईयति, असूयति वा । यं प्रति कोपः किम् ? पदार्थ सम्प्रदान संशक होता है। पुष्पेभ्यः स्पृहयति [फूलों की चाह करता है] -यहाँ 'पुष्प' को उपयुक्त नियम से सम्प्रदान संज्ञा हो जाती है और उसमें चतुर्क विभक्ति होती है। प्सितः किमिति-ईसित शब्द का क्या प्रयोजन है ? यह कि- स्पृह धातु के योग में भी चाहे हुए पदार्य की हो सम्प्रदान संशा होती है, अतः "पुष्पम्प : बने स्पृहपति" मे बने की सम्प्रदान संशा नहीं होती। इप्सितमात्र इति- 'स्पृहेरीप्सितः ॥४॥३६ मूत्र रो रेवल चाहे हुए [इप्सितमात्र की सम्प्रदान संशा होती है। जहाँ चाह का आधिक्य विवक्षित होता है अर्थात् अस्यपिक पाहा हुआ [प्सिततम] रहना होता है वहाँ गरे होने से [पर वात्] वतुंरीप्सिततमं वर्म ४ सेप गंजा ही होती है। 'पुष्पाणि स्पृश्यति' में पुष्प में ईप्सिततम को विवश है। अतः इसकी कम संशा होकर द्वितीया होती है। ४. कृपाहेप्पति- ऋध [ोष करना], द्रह वर करता]. ईष्र्य [ईया करना), अमूय [गुणों में दोष देवना] -इन धातुओं तथा इनके समान अपं पाली धातुओं के प्रयोग में, जिसके कार क्रोध आदि रिया जाना ह उसी संप्रदान संमा हो जाती है। हर शनि, ति, यिंति, सम्पति वा [हरि पर कोष करता है, द्रोह करता है, ईगिरता है या उसके दोष निकालता है। यहाँ हरि की उपस नियम से संप्रदान संशा हो जाती है तथा उममे स्त्री विमला हो जाती है। प्रति शेर: रिमिनि- सिके प्रति लोग होता है उसी ही कारकयारणम भार्यामीप्यति मैनामन्योऽद्राक्षीदिति । क्रोधोऽमपः । द्रोहोप- कारः । ईप्यानमा । असूया गुणेषु दोषाविष्करणम । द्रुहा. दयोऽपि कोपप्रभवा एव गृह्यन्ते । प्रतो विशेषणं सामान्येन यं प्रति कोप इति । ४५ । ऋधहोरपसृष्टयोः कर्म ११४॥३॥ सोपसर्गयोरनयो- योगे यं प्रति कोपस्वत्कारक कर्मसंजू स्यात् । क्रूरमभिध्यति । अभिद्रुह्यति ॥ ४६ । राधोश्योर्यस्य विप्रश्नः ।१०४.३६ एतयोः कारकं सम्प्रदानं स्यात् । यदीयो विविधः प्रश्नः सम्पदान संशा होती है। मार्यामीति मनामन्योनासीदिति' अर्थात पत्नी को मरा देणे यह गहन नहीं करता। यहा मार्ग के प्रति गा नही, किन्तु उसा दूसरों के द्वारा देशा पाना असाह है, मत. यही भार्या की सम्प्रदान संशा नही होती .पितु धर्म राजा होकर त्रिीया विमान होती है। परि घोष, हरि म मिनर है. क्रोध का १-अमपं, हमा भय है-प्रसार करना, ई-सहन न रना तथा गुणों में रोष निकामना मगूगई तथापि प्रति दोर.' (जिसके प्रति कोप हो) यह सामान्य लसे सभी का विशेषण रोकिरपंदा होने पासे (ोपराभवा) द्रोह बाद ही पहा निरे जाते हैं। उन्हीं के योग से प्रदान मा होती है जगा कि भाभीय" मानिसहरण में पष्ट १.पारिति-उपसर्ग पूर्वक (जाट) पर सारे कोप मे, सिके प्रसार होता है उसी पर समाहोगे है। यह निश्म पहले निरम पार है। परममिति भिति (पुर रोष लापता - पूर्व सूप (M) से पूरी IA RET TO की. उमे गत गगनिम से पूरको मंग होरपीस तिहो जाती है। ४. पर AR:- ना है रे पं थे, लिपुतला Tv 1] ल VY संस्कवण्यापरणे क्रियते । कृष्णाय राध्यति ईक्षते वा । पृष्टो गर्गः शुभाशुभं पर्यालोचयतीत्यर्थः॥ ४७ । प्रत्याभ्यां च यः पूर्वस्य फर्ता ।१।४।४०॥ आभ्यां परस्य शृणोतेोंगे पूर्वस्य प्रवर्तनरूपव्यापारस्य कर्ता सम्प्रदान स्यात् । विप्राय गां प्रतिशृणोति पाशृणोति वा । विप्रेग मां देहीति प्रवर्तितः प्रतिजानीत इत्यर्थः ।। ४८ । अनुप्रतिगृणश्च ।१।४।४१ आभ्यां गृणातः कारक धातुओं के योग में निसका विविध प्रकार का प्रश्न होता है उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। कृष्णाय राप्यति क्षिते वा-इसका अर्थ है-पूछे जाने पर (गर्ग नाम का ज्योतिपी) कृष्ण के शुभाशुभ का विचार करता है। यहाँ कृष्ण की उपर्युक्त नियम से सम्प्रदान संज्ञा हो जाती है और उससे चतुर्षी विभक्ति होती है। ४७. प्रत्याहग्याम इति-प्रति और आ (गङ्) पूर्वक (सुनना) धातु के योग में पहले (प्रेरणा रूप) व्यापार के कर्ता अर्थात प्रवर्तित करने वाले की सम्प्रदान संज्ञा होती है । विप्राय गो प्रतिशृणोति (आशृणोति था)- इसका अर्थ है कि ब्राह्मण ने-"गुझे गाय दे दो" ऐसा कह कर किसी को प्रेरणा दी, तब उस व्यक्ति ने ब्राह्मण को गाय देने का वचन दिया (प्रति और आ पूर्वक त्रु धातु का अर्थ है-प्रतिज्ञा करना, वचन देना)। इस प्रकार यहाँ प्रेरणा रूप पूर्व व्यापार के वर्ता 'वित्र' को उपयुक्त नियम से सम्प्रदान संज्ञा हो गई तथा सम्प्रदान में चतुर्थी विमति हुई। ४८. अनुपनिगृणश्च-अनु और प्रति पूर्वक ग (शब्द) धातु के पूर्व ....र का कर्ता सम्प्रदान संशक होता है ।

रकप्रकरणम् पूर्वव्यापारस्य कर्तु भूतमु ज्ञं स्यात् । होत्रेऽनुगृणाति प्रति- गृणाति । होता प्रथमं शंसति तमध्वर्यु: प्रोत्साहयतीत्यर्थः । ४६ । परिक्रयणे सम्प्रदानमन्यतरस्याम् ।१।४।४४। नियत- कालं भृत्या स्वीकरणं परिक्रयणं तस्मिन् साधकतमं कारक सम्प्रदानसंज्ञं वा स्यात् । शतन शताय वा परिक्रोतः ।। * (वा) तादयें चतुर्थी याच्या ॥ मुक्तये हरि भजति । होनेऽनुगृणाति (प्रतिगृणाति वा)- इसका अर्थ है - होता (चार यज्ञकर्ता या ऋविजो मे से एक) पहले बोलता है उसे अध्ययु' (अन्य यशर्ता) प्रोत्साहन देता है । यहाँ 'हो' बोलना (शरुन) रूप पूर्व व्यापार का कर्ता है अतः उपयुक्त नियम से 'हो' की संप्रदान संज्ञा हाकर उसम चतुर्थी विभक्ति हो जाती है-(हो)। ४६. परिक्रपणे इति--परिक्ररण का अर्थ है-नियत काल के लिये पिसी को वेतन पर रखना परिकरण में साधकतम कारक अर्थात् करण की विकल्प से सम्प्रदान सज्ञा हो जाती है। शतेन शताय वा परिकोतः (मो रुपये 'वेतन' से रक्खा हुआ)-यहाँ 'शत' परिक्रयण का साधन है उसकी उपयुक्त नियम से विकल्प से सम्प्रदान सज्ञा हो जाती है तथा सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है। जब सम्प्रदान संशा नहीं होती तब,करण में तृतीया विभक्ति हो जाती है । तादर्य इति (वा)-तादर्ष का अभिप्राय है-उमके लिये अर्याद प्रयोजन । जिस (प्रयोजन) के लिए कोई कार्य या वस्तु होती है उस (प्रपोजन) से चतुर्थी विभक्ति होती है, जैसे- मुक्तये हरि भाति (मुक्ति के लिरे हरि को भजता है) यहाँ हरि के • भजन का प्रयोउन मुक्ति है अतः उपयुक्त नियम से 'मुनि' मद में चतुर्षी -विभरित हो जाती है। इसी प्रकार "कुण्डलार हिरणम्" (प्स बनाने के लिये सोना है) "कामं पासे" (गर पोति के रिय है) स्पादि में गुणस दया यशस् से नुको विभक्ति हो जाती है मंस्कृतव्याकरणे ज्ञापित च ॥ वाताय * (वा) क्लपि संपद्यमाने च ॥ भक्तिर्ज्ञानाय कल्पते सम्पद्यते जायते, इत्यादि ॥ * (ग) उत्पातेन कपिला विद्युत ॥ * (वा) हितयोगे च ॥ ब्राह्मणाय हितम् ।। ५० । क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्यानिनः ॥२॥३॥१४॥ रलपि इति वा)-बलप (समर्ष होना, पैदा होना) अयं पाली धातु के प्रयोग में जो होने वाला (परिणाम) है उसे चतुर्षी विभक्ति होती है । भरितीनाय कल्पते सम्पद्यते, जायते इत्यादि)-'भक्ति शान के लि होनी है', यहां शान सम्पधमान अति होने वासी वस्तु है। उपयुक्त निया से ज्ञान में धतुर्षी विभक्ति हो जाती है । उत्पातेन जापिते घ (वा)-उत्पात का अर्थ है-अशुभमूमन परस्मार होने वाला भौतिक विकार । उतात से मुक्ति अयं मे धतूषों विभाशित होती है। वाताय पिता विद्युत (पिस वर्ण की विजसी आंघी की सूचक होती है)-यही उपयुक्त नियम से 'याताय' में चतुर्षी विभक्ति होगा। हितयोगेध (पा)-हित के योग में धतुर्षी विभक्ति होती है। से "ब्राह्मणाय तिम्" ब्राह्मण के लिये हितकर। जी प्रभार 'बाह्मणाय मुखम' भादित ५०. स्मिार्ग नि-स्यायों पदस्य मम्द का अपं:--'क्रिपाकिला उपरक यस्य' freी किा केनिरे होने वाली दूसरी किता पाम में मुनी पाती है जिसके इस सम्म से 'तुपुर प्रत्यय मशित होता. सिया के साप होने पर तुमुन का विधान किया गया है-"तुमुन्गुली foat fKगम मानिनःपा अयं है विगमस्थान हो नि प्रोग मग या हो (प्रययुग्यमानस्य)। इस प्रभार भूत्र का अर्थ है- कमी घरमा पदम उपER, जोपर (पद) सपीर में मनाई देता उपपाता है।

Y७ कारकप्रकरणम् कियार्या क्रिया उपपदं यस्य तस्य स्थानिनोऽप्रयुज्यमानस्य तुमुनः कर्मणि चतुर्थी स्यात् । फलेभ्यो याति । फलान्यहाँ यातीत्यर्थः । 'नमस्युर्मो नृसिहाय । नृसिंहमनुकूलयितुमित्यर्थः । एवं स्वयं- भुवे नमस्कृत्येत्यादावपि । ५१ तुमर्याच्च मादवचनात् ।२।३।१५। 'भाववचनाश्च ३।३।११॥ इति सूत्रेण यो विहितस्तदन्ताच्चतुर्थी स्यात् । यागाय याति । यष्टुयातीत्यर्थः। यदि तुमुन् प्रत्ययान्त धातु का अर्थ प्राट हो, किन्तु उसका प्रयोग म पिया या हो तो उसके पर्म' में चतुर्षी विभक्ति होती है । फलेम्पो पारि-सवा अर्थ है 'फलानि भातु पाति' (फल लेने के लिये पाता है।- यहाँ प्रिपा दिया है-'काति' (पयोंकि जाना किया फान माने के लिये ) । बाहनु । मुमुन्प्रत्ययाना ) अर्थ प्रपर होता है। निम्नु उसका प्रयोग नहीं किया गया। उसरा पह-पास । उपर्युक्त नियम से कम से पतुरी विभक्ति हो जाती है। .....नमरो सिहाय-सा अर्थ है मसिहम् बालमितु नम. मुर्मः (मुसिह को माल परने के लिये हम नमवार ते १) । पर्दा उमर भरपयात 'अनु सपिदम् का भाव रहता है। अनामपिता पर्य भूमिह सलिये मसिंह द से उगरा निस्मानुमार पनुषी र होती है। इसी प्रकार स्वयम्भुरे नमस्कार (स्वार श्रीपरित मार को प्रगाने के लिये नमसार 'दि में भी पुति होती है। २१. गुमर-भाषनाम र हाल पम् बाहिर सुबई में की है। इन पण भाकाम गों से परिधि होती है। पाहायनि-सा है-' मस परमिरे net TR में मातम (+r) मार विश्य से पराजित होगा।

४ संम्पारणे ५२ नमःस्यस्तिस्याहास्ययायपायोगाच्च ।२।३.१६॥ एभिर्योगे चतुर्थी स्यात् । हरये नमः (प) उपपदविभक्तः कारविभक्तिर्वलोयसो ॥ नमस्करोति देवान् । प्रजाभ्यःस्वस्ति। अग्नये स्वाहा । पितृभ्यः स्वधा । .. ५२. ममः स्वस्ति इति-नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलं तथा बपट् शामों के योग में पती विमवित होती है । जैसे-हरये नमः हरि के लिये नमसार) यहाँ 'नमः' मन्द के येग में 'हरये' में चतुी विमक्ति है। उपपद विमरिति-उपद मिक्ति से पारक विमति बलवत्री होती है अर्थात उपपद विमक्ति को वायकर कारक विभक्ति हो जाती है। दो निमितो से विभक्ति का विधान किया गया है-एक तो क्रिया के सम्बन्ध रो, दिसे कारक विभरित रहते हैं। वह कम आदि संशा करके द्वितीया विभक्ति आदि के रूप में कही गई है। दूसरी है-उपपद विभक्ति : उपपर समीप में स्थित पद। शिया से भिम अन्य जद (पद) के निमित्त मे होने वाली विभक्ति उपपद विभक्ति कहलाती है। उपपद के सम्बन्ध से होने वाली विभक्ति की अपेक्षा क्रिया के सम्बन्ध से होने वाली विभक्ति बलवती होती है, जैसे-'न.स्करोति देवान' (देवों को नमस्कार करता है) यहाँ 'नमः' के योग में 'देव' शब्द से चतुर्षी विभक्ति प्राप्त होती है जिन 'नमस्करोति' यह क्रियापद हो जाने पर इसके सम्बन्ध से 'देव' कर्म हो जाता है और द्वितीया विभक्ति प्राप्त होती है। यहाँ द्वितीया कारक विमति है अतएव चुतुर्थी ( उपपद विमति) को बाप कर द्वितीया विभक्ति होती है-देवान)। प्रजाम्यः स्वस्ति (प्रजाओं का कल्याण हो)-'नमः स्वस्ति' यादि नियम से 'स्वस्ति' के योग में प्रा शब्द से चतुर्थी विभक्ति होती है। इसी प्रकार- अग्नये स्वाहा (अग्नि के लिये स्वाहा) । पितृम्यः स्वधा ( पितरों के लिये 'मनादि द्रव्य) में भी चतुर्थी विस्ति होती है। .

कारकप्रकरणम् चलमिति पर्यात्यर्थप्रहणम् । तेन दैत्येभ्यो हरिरलं प्रभुः समर्थः राक्त इत्यादि । प्रभ्वादियोगे पष्ठ्यपि साधुः। तस्मै प्रभवति ५०१०१०१। स एप ग्रामणी शरा७८' इति निर्देशात, । तेन प्रभुईभूषभुवनत्रयस्येति सिद्धम् । वडिन्द्राय । कारः पुन- विधानार्थः । तेनाशीविवक्षायां परामपि 'चतुर्थी चाशियोति २१३३७३ प ठी बाधित्वा चतुर्येव भवति ।। स्वस्तिगोभ्यो भूपात् ।। असमिति--सूत्र में 'मलम्' शब्द से पर्याप्त (समय) अर्थ वाले शब्दों का ग्रहण लिया जाता है । इसके दो फल होते हैं-(1) निषेध वर्ष में जो 'असम गद है, उसके योग में पतयों महीं होती, जैसे-'अले विवादेन' । (२) पर्याप्त ( समर्थ ) आर्य वाले 'प्रमु' आदि शब्दों के योग मे पती विभक्ति हो जाती है। जैसे-देस्यैम्पो हरिप्रभुः, समर्पः, पातः । रंपेम्यो हरिरलम-यहाँ पर्याप्ति अपं वाले 'अलम्' शब्द के योम मे 'वस्म्यः' में चतुर्क विक्ति होती है। प्रवादियोग रति--प्रभु आदि पदों के योग में पठी विभक्ति भी पुट है। पपिरिसी सूत्र या पातिक से पष्ठी का विधान नहीं विपापया पापि पापाय पाणिनि के 'तरमै प्रभवति ॥ प्रयोग से विदित होता है कि प्रभु आदि के योग में पती विमस्ति होती है। इसी प्रकार उनके 'सएपी प्रामणी' ॥२७॥ प्रयोग से मात होता है कि प्रभु भादि के योग में पप्टी भी होती है । अतएर-प्रसपु बनायस्य (१) माप कवि पोरस उक्ति में 'भुवनयस्य' में पष्ठी का प्रयोग भी पाकरण सम्मत ही है। बषट्+Trn (हल के लिए हरि दान)-पहाँ 'नमः स्वस्ति' मादि नियम से बप योग में 'पद में पतुर्थी विभक्ति होती है। पाति-पत्र (१२) में प (ोगात +) फिर से चर्चा करने के लिये है। वैसे- स्वस्ति योम्यो रात (पारी गराण हो)- यह नमः स्वस्ति. २१ मारि निरम से भी प्राप्त होती है। पूर्षी पाशिषि.

। संस्कृतय्याकरणे ५३ । मन्यकर्मण्यनादरे विभाषाप्राणिषु ।२।३३१७॥ प्राणि- वर्ने मन्यतेः कमरिण चतुर्थी वा स्यात्तिरस्कारे । 'नत्वा तृणं मन्ये तरीय वा । श्यना निर्देशात्तानादिकयोगे न । नत्वा तृणं मन्वे:- हम । अप्राणिवित्यपनीय 10 (या) नाकाकाप्नशुकभृगालयज्य- विति वाच्यम् ।। तेन न त्वां नावमन्नं वा मन्ये इत्यत्राप्राणि- "त्वेऽपि चतुर्थी न । न त्वां शुने मन्ये इत्यत्र प्रारिणत्वेऽपि भवत्येव । . २२३७३ इस नियम से चतुर्थी और पष्ठी दोनों विकला से प्राप्त होती है। अष्टाध्यायी में चतुर्थी शिविर' सूत्र नमः स्वस्ति० से परे (आगे) है और दो तुल्य नियमों के विरोध में परे वाला कार्य ही हुमा करता है (विप्रतिषेधे परे कार्यम्) अतः चतुर्थी और षष्ठी विकल्प से होनी मारिए। जिन्तु ऐसा नहीं होता 'स्वस्ति गोम्यो भूयात्' प्रयोग में नित्य चतुर्थी विमति ही होती है। इसका कारण यह है कि 'नमः स्वस्तिः' मूत्र में 'च' शब्द का ग्रहण किया गया है। यह बलपूर्वक पु-: चतुर्थी का विधान करता है इसलिये आशीर्वाद की विवक्षा मे 'चतुर्थी पाशिपि०' इस पष्ठी को बाधकर नमः' स्वस्ति से होने वाली चतुर्थी विभक्ति ही होती है। ४३. मन्यकर्मणि इति-अनादर प्रकट करने में मन (मानना, दिवादि) धातु केप में, यदि वह प्राणी न हो तो, विकल्प से चतुर्थी विमक्ति होती है, पक्षा में द्वितीया होती है। न त्योहणं मन्ये तृणाय था ( मैं तुम्हें तिनके के तुस्प भी नहीं समता) -यहा उपर्युक्त नियम से भृण मद से विकरूप से धतुर्षी विस्ति होती पक्ष में बम में द्वितीया ही होती है। गनेनि मन से निर्देश करने के पारण यहां दिवादि गण को मन "(भा) ग मी जाती है, बत: नादि गग की 'मन्' धातु के योग में यह परी नहीं होती, 'न वा महम्' । भरपु. निवा)-बानिसकार का कपन है कि भूत्र में से सम को हटाकर उसके स्थान मे-नो (नाव), कार (कोमा) कारकप्रकरणम् ५४ । गत्यर्थकमरिग द्वितीयाचतुर्यों चेष्टायामनध्वनि ।२।३।१२। अध्वभिन्ने गत्यर्थानां कर्मरिण एते स्तश्चेष्टायाम । ग्रमं ग्रामाय वा गच्छति । चेष्टायो किम् ? मनसा हरि व्रजति । अनध्वनीति किम् ? पन्थानं गच्छति : अन्न, शुक तोता) शगाल (सिपार) को छोड़कर ऐसा कहना चाहिये । इसका फल यह होता है कि- (१) न वा नाव मत्ये (तुझे नाव नहीं समझता(-यहाँ अप्राणि नाव) होने के कारण मूत्र के अनुसार 'नौ' से चतुर्थी प्राप्त होती है किन्तु इष्ट नहीं । वासिक में 'भी' को वर्जित करने से नहीं होती। (२) न वा शुने मन्ये (तुझे कुत्ता भी नहीं समझता)--यहाँ स्मन (कुचा) प्राणी है अतएव सूत्र के अनुसार चतुर्थी प्राप्त नही (अप्राणिषु); किन्तु चतुर्षी इष्ट है। वार्तिक मे 'वर' को वजित नही किया गया यतः वातिक के अनु- सार 'शुने' में प्राणी होते हुए भी चतुर्थी विभक्ति हो जाती है। ५४. पत्यर्थकर्मचा इति- यदि वह (कम) मार्ग न हो और शरीर की गति (चेप्टा) कही गई हो, तो मते अर्थ वाली धातुओं के कर्म में द्वितीया और चतुर्थी विभक्ति होती है। प्रामं प्रामाय वा गच्छति (गदि को जाता है) यहाँ 'भाम' मार्ग नही है और गांव जाने मे शरीर की चेष्टा करनी पड़ती है अतः उपयुक्त नियम से 'ग्राम' या 'मामाय' मे विकल्प से द्वितीया अथवा चतुर्थी विभक्ति । चेष्टायो किमिति-चेष्टा' मे यह क्यों कहा ? इसलिये कि जहां शारीरिक खातार नहीं करना पड़ता वहाँ केवल द्वितीमा विभक्ति ही होती है जैसे- 'मनसा हरि प्रजति' (मन से हरि के पास जाता है ।) इसी दकार नरपतिहित- कर्ता दें ध्यता यानि लोके' इत्यादि (आप्टे ७१)। अनघनीति -यदि गति अयं वाली धातु का मं अध्यन (मार्ग) होता है तो कर्म मे केवल द्वितीया हो होती है, चतुर्थी नहीं । जैसे -पन्यानं गच्छति' (मार्ग को जाता है।

संरानमाारणे गवाधिष्ठिम्यन्येवायं निषेधः । यदा तूत्पयात्पन्या एवाग्रामितुमिप्यते तदा चतुर्थी भवत्येन । उत्पपेन पये गच्छति ॥ इति चतुर्थी। ५५ । ध्र पमपायेऽपादानम् ।१।४।२४। अपायो विश्लेषस्त- स्मिन्साध्ये ध्रुवमवधिभूतं कारकमपादानं स्यात् ।। ५६ । अपादाने पञ्चमी ।२।३।२८। ग्रामादायाति । गन्नाधिष्ठित इति-यदि जाने वाले (गन्द्र) के द्वारा मार्ग अधिष्ठित (प्राप्त) होता है अर्थात वह इष्ट मार्ग पर स्थित होता है तभी यह चतुर्थी विमक्ति नहीं होती; किन्तु जब उसय (अनिष्ट मार्ग) से जाने में असमर्थ होकर वह उसे छोड़कर इष्ट मार्ग को और जाता है तब मागवानी में भी चतुर्षी विक्ति होती ही है। जैसे-उत्पपेन पये गच्चति" (उत्पप से पय को जाता है) भाव यह है कि-यदि कोई देहली के लिये चला; किन्तु प्रम से देहली का मार्ग छोड़कर अन्य मार्ग पर हो लिग, वही अन्य मार्ग उदाय कहलायेगा। उस मार्ग से जब अपने इष्ट देहली के मार्ग को प्राप्त करने के लिपे चलेगा तो 'उसपेत पये गच्यान' यह प्रयोग होगा। यहाँ 'पर्थे' में चतुर्थी विभक्ति होती ही है ।। इति चतुर्थी । पञ्चमी विभक्ति । ५५. प्रयमपायेजादानम् -- अपाय का अर्थ है विश्लेष, अलग होना। किसी वस्तु या व्यक्ति के अलग होने में जो कारक घव अर्थात् अवधि (सीमा) रूप है वह अपादान कहलाता है। ५३. अपावाने पञ्चमी-अपादान कारक में पचमी विभक्ति होती है । प्रामाद मायाति (पाम से आता है)-कहाँ से आता है ? ग्राम से । यहाँ ग्राम अवधिरूप अतः इसको अपादान संज्ञा होकर इससे पञ्चमी विभक्ति हो जाती है।

कारकप्रकरणम् धावतोऽश्वात्पतति । कारकं किम् ? वृक्षस्य पण पतति ॥ (बा) जुगुप्साविरामप्रमादार्याना पसंख्यानम् ।। पापाज्जुगुप्सते । विरमति । धर्मात्प्रमाद्यति ॥ ५७ । भोवार्थानां भयहेतुः १११४१२५१ भयार्थानां वारणा- र्थानां च प्रयोगे भयहेतुरसादानं स्यात् । चौराद् बिभेति । धावतोशवास्पतति दिौड़ते हुए घोड़े से गिरता है}--यहाँ यद्यपि घोड़ा स्थिर नहीं,ौड़ता हुआ है तथापि वह पतन क्रिया के प्रति अवधि है ही अतएव 'प' को अपादान संज्ञा होकर, इससे पञ्चमी विभक्ति होती है। टिप्पणी-'पावतोप्रवाद पतति' आदि प्रयोगों मे अश्व आदि की अपादान सजा होनी चाहिये इसलिये मूत्र के 'घव' पाब्द का अर्थ 'स्थिर' नहीं अपितु 'अवधिभूत' माना जाता है। कारक किमितिकारक अपादान संशक होता है ऐसा क्यों कहा गया। इसलिये कि जो कारक नहीं होता, अर्थात् जिसका क्रिया से सम्बन्ध नहीं होता, उसकी अपादान संज्ञा नही होती, जैसे 'वृक्षस्य पर्ण पतति' में 'वृक्ष' का पतन किया से सम्बन्ध विवक्षित नहीं, अपितु 'पर्ण' से सम्बन्ध है । अतएव यहाँ दहा को अपादान संज्ञा नहीं होती। पुगप्सेति (प)-जुगुप्सा ,पणा) विराम (हना, अलग होना) प्रमाद (मसावधानी करना) अर्थ वाली धातुओं के योग में जुगुप्सा आदि के विषय को अपादान संज्ञा होती है। पापात् शुगुप्सति (पाप से घृणा करता है)--यहाँ पाप जुगुप्सा का विषय है अतः उपयुक्त नियम से इनकी पादान सज्ञा हो जाती है और अपादान मे पञ्चमी विभक्ति होती है । इसी प्रकार (पापार विरमति) (पाप से बचता है) धर्मात प्रमाद्ययति (धर्म से प्रमाद करता है) धादि । टिप्पणी-प्रमादार्थक के साथ सप्तमी भी आती है । जैसे-'न प्रभावन्ति प्रमदातु विपश्चितः' (आप्टे ७६ टि)। ५७. भीत्रार्थाना भयहेतुः~मय' अर्थ वाली ठपा 'रक्षा' (ण) अर्थ बाली धातुओं के प्रयोग में भय का हेतु अपादान कहलाता है । घोराद विमति (चोर से डरता है । यहाँ पोर मय का हेतु है । उसको संस्कृतव्याकरण - चौरात् त्रायते । भयहेतुः किम् ? अरण्ये बिभेति त्रायते इति वा। ५८ । पराजेरसोढः 1१।४।२६॥ पराजेः प्रयोगेऽसहोर्यो. ऽपादानं स्यात् । अध्ययनात्पराजयते । ग्लायतीत्यर्थः । असोढः -किम् ? शत्रून्पराजयते । अभिभवतीत्यर्थः॥ ५६ । वारणानामीप्सितः 1१।४।२७। प्रवृत्तिविघातो वारणम् । वारणार्थानां धातूनां प्रयोगे ईप्सितोऽपादानं स्यात् । उग्युस नियम से आदान सजा होकर अगादान मे पञ्चमी विभक्ति हो जाती है। इसी प्रकार पौरांद त्रायते' (चोर से रक्षा करता है। मयरेतुः किमिति-अप के कारण की ही आदान संशा होती है यह कयों महा? इमलिये कि 'अरण्ये विभेति' मे अर, वन) को अपादान संशा नहीं होगी, क्योकि मरण्य भय का हेतु नही। यदि समय को भय का हेतु माना जाये तो बरण्य से 1 पचमी विमति हो ही गलती है। ५८ पराजेरसोर :-परा (उपसर्ग पूर्वर धातु के योग में मगर वस्तु को भगदान संशा होती है। मारपना परामयते (अध्ययन से हार मान रहा है)-जा किसी के लिय अध्ययन अमहा या मटकर हो गया है तो उपयुक्त नियम से पराजपने के योग में अध्यापन की अपादान का होती है और उनमे पवमी वित हो नती है। 1 है प्ययन से एक गरा है। ममोकिमिति अमल वस्तु पी ही अपादान राजा होती है ऐसी मयं मा इमानो रचून परतणे कोहराता है (अभिभात- पराधित करना है , पहाँ त्रु की अपादान संज्ञा नहीं होती, कोहि मई ममा नहीं । 'ग' में मंदिनी हुई है। पारमयनामोसित:-. वारण अर्थ है- ime finani in mrriarपी पाओं . . नर्स संस्कृत कारकप्रकरणम् रवेभ्यो गां वारयति । ईप्सितः किम् ? यवेभ्यो गां वारयति क्षेत्रे ।। ६० । अन्तों येनादर्शन मिति । १।४।२८ व्यवधाने, पति यत्कर्तृ कस्यात्मनो दर्शनस्याभावभिच्छति तेदपादानं स्यात् । मातुनिलीयते कृष्णः । अन्तर्षी किम् ? चोरान्न दिदृक्षते इच्छतिग्रहणं किम् । प्रदर्शनेच्छायां सत्यां सत्यपि दर्शने यथा '- - स्यात् ॥ पवेम्यो गो वारयति (पवों में गाय को हटाना है -'यव' से गाय को हटाना चाहता है त उपयुक्त नियम से 'यद' की अपादान सज्ञा होती है और पादान मे पञ्चमी विभक्ति होती है । प्सितः किम - जिससे किसी को दूर करन अौर होता है। पही अगदान होता है ऐसा क्यो कहा? इसलिये कि थवेभ्यो गो धारयति' क्षेत्र में दौत्र' अभीष्ट नही बल्कि यव है । अत. क्षेत्र की अपादान संज्ञा नहीं. होती। ... अन्त' इति-अन्तधि का अर्थ है, प्रवपान (बोट)। म्यवधान होने पर जि से माना अदर्शन चाहता है अर्थात् जिससे अपने आपको छिना पाहता है। उसकी उपादान सज्ञा होतो है ।। मानितीमतें रणः रिण माता से द्विाता है --कृष्ण दीवार मादिरावधान करके माता से दिखना चाहता है अतः उपर्युका निपम से 'माता'की अपादान सज्ञा हो पाती है बोर अपादान में पदमी विमति होती है। अन्ता रिमिति-अन्तधि भद रखने का प्रयोजन है। यह कि यहाँ जवान होने पर कोई अपने बार दो किराना चाहता है वहीं यह बा- दान संभा होती है अतएव "चौरान न दिसते" (भोर मुझे ने देख इस चार से भोपगोदेवा महीं पाहता) यही 'चोर' को अपादान संभा नहीं होती; सोरि यहाँ पपान निमित्त दिने का भाव नहीं है । तिपहर्ष सिमिरिसर में पति हता है। कारण मरों प '..

. ५६ सवण्याकरणे ६१ । आख्यातोपयोगे ॥१॥४॥२६नियमपूर्वकविद्या- स्वीकारे वक्ता प्राक्संज्ञः स्यात् । उपाध्यायादधीते । उपयोगे किम् ? नटस्य गायां शृणोति ।। ६२ । जनिक प्रकृतिः ।१।४।३०। जायमानस्य हेतुर- पादानं स्यात, ब्रह्मणः प्रजाः प्रजायन्ते । किया? इसलिये कि यदि किसी के दिपने की इन्छा है तो उसे देख लिया जाने पर भी अपादान संशा हो ही जाती है । जैसे 'देवदतात् यज्ञदत्तो निली. यते।' -देवदत्त से यज्ञदत्त छिपता है। ६१. आख्यातोपयोगे-यहां उपयोग शब्द का (८) अर्थ है--नियम- पूर्वक विद्याग्रहण करना। नियमपूर्वक विद्या ग्रहण करने में अध्यापक या शिक्षक (आष्याता, वक्ता) की अपादान संशा होती है । उपाध्यायाद् अधीते (उपाध्याय से पढ़ता है)---उपयुक्त नियम से उपा- म्याय की अपादान संज्ञा होकर उसमें पञ्चमी विभक्ति हो जाती है।। उपयोगे किमिति-जहाँ नियमपूर्वक शिक्षा ग्रहण की जाती है वहीं पता की अपादान संज्ञा होती है, यह क्यों ? इसलिये कि 'नटस्य गायां शृणोति' मट की गाथा सुनता है। यहाँ 'नटस्य' में पञ्चमी विभक्ति नही होती, क्योंकि यहां नियमपूर्वक शिक्षा प्राप्ति नही है । ६१. जनितुः प्रकृतिः-अनि का अर्थ है-जन्म उत्पत्ति । अनिकर्ता- उत्पन्न होने वाले (जायमान) का हेतु अपादान संशक होता है । ब्रह्मणः प्रमाः प्रजायन्ते [ब्रह्मा से प्रजाएं उत्पन्न होती है]--यहाँ र उत्पन्न होने वाला] प्रजा है। इसका हेतु 'ब्रह्म है। अत: से 'ब्रह्म' की अपादान संज्ञा होकर उससे पञ्चमी विभक्ति हो कारकप्रकरणम् ६३ । भुवः प्रभवः।१।४।३११ भवनं भूः। भूकतुः प्रभवस्तथा । हिमवतो गङ्गाप्रभवति । तत्र प्रकाशत इत्यर्थः । (या) ल्यग्लोपे कर्मण्यधिकरणे च ॥ प्रासादात् प्रेक्षते । आसनात्प्रेक्षते । प्रोसाद- मारुह्य प्रासने उपविश्य प्रेक्षत इत्यर्थः। श्वशुराज्जिहति श्वशुरं वीक्ष्येत्यर्थः । गम्यमानापि क्रिया कारकविभक्तीनां निमित्तम् । कस्मात्त्वं नद्याः ॥ ६६. भूवः प्रभवः-(भू) शब्द का अर्थ है होना (मू का पष्ठी (एक. भुव.) 'प्रभव' का अर्थ है - प्रथम प्रकाश स्थान । यहाँ पूर्व सूत्र से 'क्तुः' पर की अनुप्ति होती है। भू के पके उतात्तिस्थान की अपादान संज्ञा होती है । हिमवतो गङ्गा प्रभवति- इसका अर्थ है-हिमालय से गङ्गा निकलती है अथवा यहाँ प्रथम दिपलाई देती है । यहाँ उपयुक्त नियम से हिमवर' को अपादान संशा हो जाती है और अपादान में पञ्चमी विभक्ति होती है । स्पग्लोप इति (1)-रूपम् या पत्वा प्रत्ययान्त के घिरे रहने पर (उसका अ प्रकट होने पर उसके कर्म तथा आधार में पञ्चमी विभक्ति प्रासादात प्रेक्षते-इसरा अर्थ है-'प्रासादमारा प्रेक्षते' (महल पर कर देखता है। यहाँ 'बाई' स्थप प्रत्ययान्त का प्रयोग मही, उसका कर्म है-'प्रासाद' । उपयुक्त नियम से 'प्रासाद' में पञ्चमी विभक्ति होती है। इसी प्रकार बासनात प्रेमते अर्थात 'आसने उपविषय प्रेक्षते' (भासन पर बैठकर देवता है) यही बासन 'उपविश्यबाधार है। इसम पञ्चमी विभक्ति होती है। बराग्निहति (पशु से सरवापरतो है) अर्थात् विमुर को देखकर भरिणत होती है यहाँ शुर' स्प् प्रत्ययान्त (बोय) राम है। गम्यमानाति-विसयिाशवार में प्रयोग नहीं होता पितु प्रकरण आदिसे जान सी जाती है, उसे 'पम्पमानामाहा परा है। ऐमो किग भी पार विमति निमित्त होती है। वैसे-'स्मात् स्वम् ?' (तुम ही से माये !) 'नया' (नदी से) यहोरण मादि से बाता (भाग- * (या) यतश्चाध्वकालनिर्माणं तत्र पञ्चमी ।। तद्युक्ताद , ध्वनः प्रथमासप्तम्यौ ॥ * कालात्सप्तमी च वक्तव्या ।। वनाद् ग्रामो योजनं योजने वा। कार्तिक्या आग्रहायणी मासे ।।.. ६४ । अन्यारादितत दिक्शब्दाञ्चुत्तरपदाजाहियुक्त ।२।३।२।६ एतैर्योगे-पञ्चमी स्यात् । अन्य इत्यर्थग्रहणम् । मन) क्रिया का बोध होता है। उसके निमित्त से 'कस्मातू' और 'नद्याः' में पञ्चमी विभक्ति होती है। यतश्चेति 'वा- जिससे (आरम्भ करके) मार्ग या समय की गणना (माप) की जाती है उस स्थान या समय-वाची से पञ्चमी विभक्ति होती है। यहाँ निर्माण का अर्थ है-निमान, माप । सघ क्तादिति (घा) -उस पञ्चम्यन्त से अन्वित दूरी या मार्गवाची शब्द में प्रथमा अथवा सप्तमी विभक्ति होती है । कासादिति (वा)- )-उस पञ्चम्यन्त से अन्वित कालवाची शब्द में सप्तमी विभक्ति होती है। धनाद ग्रामो योजनं योजने वा (वन से प्राम एक योजन है)- यहाँ 'वन' से ग्राम की दूरी दिखाई गई है। यतश्चः' इत्यादि नियम के अनुसार 'वन' पञ्चमी विभक्ति में है। पञ्चम्यन्त से अन्वित मागंवाची शब्द 'योजन' में प्रथमा या सप्तमी विभक्ति है । कार्तिक्या आग्रहायणी मासे-(कार्तिक की पूर्णिमा से अगहन की पूर्णिमा एक महीने में होती है)-यहाँ 'कातिकी' से 'आग्रहायणी' का अन्तर दिखाया गया है अतः कातिकी में पञ्चमी विभक्ति है और मास भर का अन्तर दिखलाया है अतः 'मास' से सप्तमी विभक्ति होती है । ६४. 'मन्यारत्' इति अन्य पाराद (दूर या समीप), इतर (अन्य), कृते (दिना , दिशावाची पाब्द, अञ्चु धातु से बना हुआ है उत्तरपद जिनमें से प्राक् प्राक, आदि शब्द, आच् (तरित) प्रत्ययान्त 'दक्षिणा' आदि शम्द बापा 'आहि (तदित) प्रत्ययान्त 'दक्षिणाहि' आदि शब्द-इनके योग में पञ्चमी होती है। " T कारकप्रकरणम् , अन्यो भिन्न स. या २॥ew 11 1 पारादनात् । ऋते कृष्णात् । पूर्वो ग्रामात् । दिशि दृष्टः शब्दो दिक्शब्दः। तेन सम्प्रति देशकालवृत्तिना योगेऽपि भवति । चत्रात्पूर्वः फाल्गुनः । अवयववाचि योगे तु न । तस्य परमानोडितम् ।।१।२। इति निर्देशात् । पूर्व कायस्य । अचूत्तरपदस्य तु दिक्शब्दत्वेऽपि 'पाठ्यतसर्थ रा३।३० इति पष्ठीं बाधितु पृथग्ग्रहरणम् । अन्येति - मूत्र में 'अन्य' शम्द से "मिन्न' अर्घ वाले सभी शब्दों (मिन्न, पर इतर आदि) का ग्रहण होता है । इतर' शब्द भी यायाधक है, इसका पृथक प्रण दिग्दर्शन मात्र के लिये दिया गया है। (अथवा अनावश्यक है । अन्पो किस इतरो या कृष्णात (कृष्ण से भिन्न यही उपयुक्त नियम के अनुसार 'कृष्ण' शब्द से पञ्चमी विभक्ति होती है। मी प्रकार 'आराद धनाद(वन के समी अथवा वन से दूर) "ऋते कृष्णात' कृष्ण के बिना), पूर्वो ग्रामात् (ग्राम से पूर्व)। (१) विशिष्ट पति-मूत्र में दिक गद का अपं है-दिशा में देखा गया शब्द, इसलिये जो मम्द दिशा के लिये प्रयुक्त होता है किन्तु इस समय देश या काल में उसका प्रयोग किया गया है उनके साथ भी पञ्चमी विमति हो पति है। जैसे- मंचात् पूर्वः फाल्गुनः-में पूर्व शम्द का अर्थ है-पहले, अतः यह पाल पावापा,पर यह दिशा में देखा गया गन्द है इसलिये इसके साप भी मात' में पञ्चमी विभक्ति होती है। (२) भवपवेति-अवयवाची पूर्व, पर बादि शब्दों के योग में पञ्चमी नहीं होती । आपां पाणिनि पा सस्प परमानहितम् ॥१॥ प्रयोग ही इसमें प्रमाण है । यह! 'तस्य परम्' में 'पर' के योग मे पञ्चपी नहीं । फलतः पूरंगायस्य' शरीरमा पूर्व भाग मे परमी विभक्ति नहीं होती अपितु सम्बन्ध में पठी विभक्ति होती है। (१) मसूतरपरस्येति- पत्तरपद 'प्रार'पलर' आदिम femदही है, अतः दिए गम से सम्भूत्तरपद भी हम हो गया है 1

संस्कृतभाकरणे'
प्राक् प्रत्यग्वा ग्रामात् । प्राच, दक्षिणा प्रामात् । भाहि,
दक्षिणाहि ग्रामात् । 'अपादाने पत्रमी रा३।२। इति सूत्र
कार्तिक्या प्रभृतीति भाष्यप्रयोगात् प्रभृत्यर्थयोगे पञ्चमी ।
भवात्प्रभृति प्रारभ्यः वा सेव्यो हरिः। 'अपपरिबहिः-२६१३१२,
इति समासविधानाशापका बहियोंगे पञ्चमी । मामाद बहिः।।
तयारि भूत्र में उनका पह पहण पश्यतमपंप्रत्ययेन २०० (७८) से
प्राप्त होने वाली पथ्टो का बाघ करने के लिये किया गश है। इसका कम
यह होता है कि भार परपक् मादिक योग में पञ्चमी विमति ही होती है
पछी नहीं.से-प्राइ, प्रत्याभ प्रामाद ।
टिप्पणी-यहाँ प्राण प्रारक आदिगदों से हवा में बस्तात प्रत्यप
(प. ५॥३॥२३) होता है और उसका मुआ (मध्यमुर 0.) हो जाता
है। मरतामि' प्रत्यय मत सर्प हे (दहिये मू.७८) ।
दक्षिणा प्रामार (प्राम पे दक्षिण दिशा में)- यह भाषु प्रत्यप मामाहरण
है। एगद से आप प्रत्यय होकर रशिया-दक्षिणा मम्पर गम
बनता है। योग में मार में पञ्चमी विपत्ति होती है।
दक्षिणाहि पामात (पाम से दूर दक्षिण दिशा में यह 'भारपर
का उदाहरण है। निगमे 'बाहि' दिइरे) प्रत्यय होरर
'नागिरता है। इस योग में प्रामान में ममी रिमाल
मायनि-पासने पचमी ॥२मपामाथि प्रहार
इस पारी रोग से प्रति अपंरा सदों योग में पञ्षयी मिति
मा प्रति मारण्य का सेयो हरि (म्म है मेहर (मरल) हार
कौमनिरपी वाहिय-यहाँ प्रकृति के योग में समीति होता है।
किमी किन है यह रही नहीं कई मिने' पपी
साल में किया प्रतिकर पोय पिपरा समे
सहकाभिम होती पहनों गांव में पामी दी है।
परी-fr.११. शारादिका मान
साम frey in the

कारकप्रकरणम् ६५। अपपरी वजने २१४।८। एतौ वर्जने कर्मप्रवचनीयौ ६६ । आङ मर्यादायचने ।१।४।८६। मर्यादायामुक्तसंजः स्यात् । वपनग्रहणादभिविघावपि । ६७। पञ्चम्यपापरिभिः ।।३।१०॥ एतैः कर्मप्रवचनीय- योगे पञ्चमी स्यात् । पर हरेः, परि हरेः संसारः। परिरत्र वर्जने । पोग मे पञ्चमी होती है। प्रामाव बहिः (पाम के बाहर)--यहाँ 'वहिः' मन्द के योग में 'ग्राम' शब्द से पञ्चमी विभक्ति हो जाती है । यद्यपि किसी भूत्र आदि से 'वहिः शय के साथ पवमो विभक्ति का विधान नहीं किया गया तथापि अपपरिवहिरचयः पञ्चम्या २०१।१२ इस सूत्र में 'बहिः' शब्द का पचम्यन्त के साथ समास विधान किया गया है । उससे ज्ञात होता है कि महिः' के योग मै पञ्चम विभक्ति होती है। यदि इसके साथ पञ्चमी विभक्ति न होगी तो पचम्यन्त से समाम कैसे होगा? ६५. अपरिपनेवर्जन अर्थ को पोतित करने में 'अप'और परि कोपर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है। ११. माइमर्यादावचने-पर्यादा अर्थ में 'बाई की कर्मप्रवचनी जा होती है। प्राइमर्यादामाम" ऐसा कहने से ही पर लिखा निगल बाडारिन'मधिक दिन है। इसका प्राय यह है कि 'अतिविधि' में 'भाईरी रमप्रवचनीय मंडार है। पदिा या र है-उमरे दिना ( तेन दिनेति मर्यादा)। विधि का अर्थ है उमर सहित (उन सहेत्वमितिभिः) ९.. पगारपारिभिः-अप, भाइ, परि इन कर्मप्रवचनीय को योग मे परमो विक्रि होती है। अपहरे, परि हरे साप-भिपगार कर उन्म मरण र संसार का है। यहां 'अप' वा 'परिन मैं है : निरी - मंस्कृतव्याकरणे लक्षणादी तु-हरि परि । मामुक्तेः संसारः पा सकलां ब्रह्म । ६८ । प्रतिः प्रतिनिधिप्रतिदानयोः १४।१२। एतयौरर्थयोः प्रतिरुक्तसंज्ञः स्यात् । - ६६ । प्रतिनिधिप्रतिदाने च यस्मात् ।२।३।११। अत्र कर्म- प्रवचनायोगे पञ्चमी, स्यात, । प्रद्युम्नः कृष्णात् प्रति । तिलेभ्यः प्रतियच्छति माषान् । प्रवचनीय संज्ञा होती है तथा उपयुक्त नियम से नके योग में 'हरेः' में पञ्चमी विभक्ति होती है। सक्षणादाविति--जहाँ "परि' शब्द लक्षण इत्थंभूताहयान आदि अयं में होगा वहाँ तो इसकी 'लक्षणेत्य मूताय्यान० (२१) आदि सूत्र से कर्म- प्रवचनीय संज्ञा होकर इसके योग में 'कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया (१७ इससे द्वितीया ही होगी। जैसे-हरि परि। आमुक्तेः संसारः (मुक्ति तक अथवा मुक्ति से पहले संसार है) यहाँ 'आ' मर्यादा अर्थ में है । मुक्ति होने पर जन्ममरण रूपी संसरण नही रहता अतः मुक्ति मर्यादा है । इस 'आड की कर्मप्रवचनीय संज्ञा होकर . इसके योग में 'मुक्ति' शब्द से पञ्चमी विभक्ति हो जाती है । मा सालाद् ब्रह्म (सकल पर्यन्त या सवको व्याप्त करके ब्रह्म है)- यहाँ 'आइ' मिविधि अर्थ में है क्योंकि मवलवस्तु में ही ब्रह्म है । इस 'आज की वर्मप्रवचनीय संज्ञा होकर इसके योग मे उपयुक्त नियम से 'सकलाद' में पञ्चमी विभक्ति होती है।' ६९प्रतिरिति-प्रतिनिधि तथा प्रतिदान अर्थ में प्रति' की कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है। ६६. प्रतिनिधीति-जिसकी ओर से कोई प्रतिनिधि होता है अथवा जिससे कोई वस्तु बदली जाती है उससे कर्मप्रवनीय ( उपर्युक्त प्रति') के योग में पवनी विभक्ति होती है। A १ कारकप्रकरणम् . . । :" ७० । अफर्तयणे पञ्चमी २॥३॥२४॥ कर्तृवजित यहणं हेतु- भूतंततःपञ्चमी स्यात् । शताबद्धः प्रकर्तरि किम्? शतेन बन्धित्तः।। प्रद्युम्नः कृष्णात् प्रति ( प्रद्युम्न कृष्ण के प्रतिनिधि हैं)~यहाँ 'प्रति' प्रतिनिधित्व को प्रकट करता है अतः इसी कर्मप्रवचनीय सज्ञा हो जाता है कोर प्रतिनिधि० ६ ' आदि नियम से इसके योग में पञ्चभी विभक्ति होती है। तिलेम्यः प्रतियच्छति माषान् (तिलों से 'उड़दो को बदलता है- यहाँ तिलों से उड़द बदले जाते हैं इस प्रतिदान को प्रति शब्द घोतित करता हैं अतः प्रति की कर्मप्रवचनीय संज्ञा हो जाती है और इसके योग में 'तिलेगः' शम मे पञ्चमी विभक्ति होती है। ७०. मकर्तपणे, इतिकर्ता से भिन्न जो ऋण (किसी का ) हेतु हो, उससे पञ्चमी विभक्ति होती है। राताद यक्ष:-इसका अर्थ है-सौ ( सये आदि । का ऋण न लोटाने के कारण बन्ध गया । यहाँ 'शत' ( ऋण ) बन्धन का हेतु है अतः उपयुक्त - नियम से इससे पञ्चमी विभक्ति हो जाती है। अकर्तरि किमिति अकर्तरि शब्द का क्या प्रपोजन है ? यह कि ऋण अयं मे विद्यमान जिस शब्द को 'कता' संज्ञा हो जाती है चाहे वह हेतु भी हो तो भी उसके योग मे पञ्चमी विभक्ति नहीं होती । जैसे-~~शते र बन्धितः'; - इसका अर्थ है--"सौ का नै ऋणदाता से कर्जदार को वश्या दिया" शतेन सन्धि: अघमर्णः उत्तमन इत्यर्थः। बघित. शब्द पिन (प्रेरणार्थक) बन्धु पातु से कर्म में 'क्त' प्रत्यय होकर बना है 'अघ..ण उत्तमर्णन बन "कर्जदार कोहणदाता ने संघा". यह साधारण दहा अणिजन्त) का रूप होगा। 'शत' बोघने को प्रेरणा देता है । यह प्रयोजक कर्ता है और हेतु भी (तत्प्रयोजको हेरच )। यहाँ शव की कर्तृसंज्ञा हो जाने के कारण इससे पञ्चमी विक्ति नहीं होती।

संस्कृतव्याकरणे ७१ । विभाषा गुगेऽस्त्रियाम् ।।३।२५।गुणे हेतावस्त्रीलिङ्ग पञ्चमी वा स्यात् ।। जाड्याज्जाड्यनवाबद्धः । गुणे किम् ? धनेन कुलम् । अस्त्रियां किम् ? बुद्धया मुक्तः। विभाषेति योगविभागा- दगुणे स्त्रियां च क्वचित् ।धूमादग्निमान ।नास्ति घटोऽनुपलब्धेः।। ७१ विमाति-जो गुणवाचक शब्द हेतु को प्रकट करता है और स्त्रीलिङ्ग नहीं है उसी दिकस से पञ्चमी विभक्ति होती है । पक्ष में तृतीया विभक्ति होती है। जात्यात जाव्यन वा बः (जड़ता के कारण बंध गया)-यहाँ 'जाध्य बन्धन का हेतु है । यह गुणवायक शम्द है और स्त्रीलिङ्ग में भी नहीं। अतएव इसमे पञ्चमी तपा तृतीया विभक्ति होती है। पुणे किमिति-गुणवाचक गम्द से पञ्चमी होती है, ऐसा क्यों पहा ? इसलिये हिजो शाद गुणवाचक नहीं उससे पञ्चमी विभक्ति नहीं होती; रितु हेतु में तृतीया विभक्ति ही होती है, जैसे-धनेन कुलम् (पन के कारण कुल)। मस्त्रिया लिमिति-मूत्र में अस्तिो गम का पा प्रपोग्न है। यह किबोगद गुगामा हो रितु स्त्रीलिङ्ग हो उससे पञ्चमी विपरित न होगी; पितु हेतु में तृतीया विमति होगी; जैसे-ध्या मुक्तः (दि कारन मुक्त हो गया)। यही 'बुद्धि' में तृतीया विमति होती है। विपापा इति योगपिभागाइ इति-"विमाता गुगेऽस्त्रियाम्" इम में विभाग के. "विमापा' एक मूत्र मान मरे है। उममें कार से तो और पञ्चमी' जमी बनुमति हो जाती है तथा उमा बर्ष होता है- हेतु मे बिल मे पश्चमी तिमि होती है । इमा कर यह होता है- (१) मगवारा हाद होने पर भी पश्चमी विnिt -हमा विमान (qtोने मे अग्नि सामा भी दारिपञ्चमी रिक्ति होती है। .

पासपर ७२ । पृथग्विनानानामिस्तृतीयाइन्यतरस्याम् ।।३ ।। रभिर्योगे तृतीया स्यात्पश्चमोद्वितीय च । प्रन्याम्या ग्रहा नमुपपार्थम । पश्यमौद्वितीय चानुवर्तते। पृथग् गमग गमान सामं था। एवं विना नाना। ७३ करणे च स्तोकाल्पफतिपयायासनग्य (२)ही मिजमा भीम पथमा बिन है. है-'पारित पटोनुरागा.' (पपि ॥ at Trafe* दीलिप इस मी 'uefante 10. ५१. पूरि-थर . किमा. नाना के पाय far R -fraftruth (Ram I taet...' Tr अमराषि-- यार ! farm अच भात) - riter fesfer . मम। पनि मोवीgrat ... पापभीर म और नया का पप मेष, राबाद राधा Then uml inm. प. प. famirst mtattatorrentimrnt are Ermatrnturn turant (मोmar.m संस्कृरण्याकरणे ।२।३।३३। एभ्योऽद्रव्यवचनेभ्यः करणे तृतीयापञ्चम्यो स्तः । स्तोकेन स्तोकाद्वा मुक्तः। द्रव्ये तु-स्तोकेन विषेण हतः। ७४। दूरान्तिकार्येम्मो दिखीया च १२६३३० एम्पो द्वितीपास्याच्चात्पञ्चमोतृतीये। प्रातिपदिकार्थमाने विधिरयम् । ग्रामस्य दूर-दूरात-दूरेण वा अन्तिकम-अन्तिकात अन्तिकेन्वा। करण में तृतीया अथवा पञ्चमी विभक्ति ( विकला से ) होती है। असत्व- वचनस्य का अर्थ है-'अद्रावाची का' अर्थात् जब इनका प्रयोग द्रव्य के समानाधिकरण रूप में नहीं होता। स्तोकेन स्तोकादा मुक्तः-इसका अर्थ है-घोड़े से (प्रयास ही मुक्त हो गया । यहाँ 'स्तोक' शब्द किसी द्रव्य का विशेषण महींप्रत : उपयुका नियम में इसमें तृतीया तथा पञ्चमी विमक्ति किल से हो जा है । इसी प्रकार-'अल्पेन अमाद वा मुक्तः', 'कृच्छ्रेण कृत पद वा मुक्त 'कतिपयन कतिरयाद वा मुक्तः आदि प्रयोग होते हैं । द्रव्ये रियति--जहाँ 'सोक' आदि शब्दो का द्रव्य के लिए प्रयोग कि जाता है अर्थात् ये किसी द्रव्यवाची शब्द के विशेषण के रूप में प्रयुक्त हैं वहाँ इनमें केवन तृतीया विभक्ति ही होती है, पञ्चमी नहीं, जैसे-'स्तो विषेग हनः' ( थोड़े से विष से मारा गया ) यहाँ 'स्तोक' पध्द 'विपन 'विशेषण है । "विय' वैशेषिक को परिभाषा के अनुसार,द्रव्य है। ७४. दूरान्तिकेति-दूर तथा सीप ( अन्तिक ) अर्थ वाले शब्दों द्वितीया होती है और पञ्चमी तथा तृतीया विभक्ति भी। मै विभक्तिय केवल प्रातिपदिकार्य में होती है इनका अन्य कोई अपं नहीं होता। निराम प्रथमा विभक्ति का अपवाद है। पामस्य रम, दूरात, दूरेण षा (पाम से दर)-यही उपयुक्त निया के अनुसार 'दूर' शाम से दिया, पयो तपा तृतीया विभक्ति होती है अमरावनस्पेश्यनुानेनेह । पदरः पन्थाः ॥ इति पञ्चमी ।। ७५.। पाटी पे १२॥५०॥ पारस प्रातिपदिशा- प्पतिरिवार स्यागामिभावादिगम्बायः परमत्र पठी स्थान- रामा पुगः । पर्मादीनामपि मम्पमात्रविक्षाय पट्येय, मो-लिम, सिनियnि) पर-पाय [Or] मे भी माना गया भारीMurari विजओर और सिगरे र re frhीमरामि सासरा "re पाया:"PrRA TERI feleोहोरी futm net Trmernator.net. frintीरे-rrent1ोmn पुग! RAMERITririt.. . mmaleneratiniantarrereी Runnel.Nkm.mami refeaturettery .tr rrrrrrnmmtartm Tr{nugr)-rnimammetry mritenintentinemaram thortlinkee keenette rrittent her. * ) . संस्कृतय्याररणे सतां गतम् । सपिपो जानीते । मातुः स्मरति । एवो दकर योपस्कुरुते । भजे शम्भोश्चरणयोः । फलानां तृप्तः । ७६ । षष्ठी हेतुप्रयोगे ।२।३।२६५ हेतु शब्दप्रयोगे हेतो. द्योत्ये पप्ठो स्यात् । अन्नस्य हेतोर्वसति । षष्ठी विभक्ति ही होती है । जैसे - 'मतां गतम्--यहाँ भाव मे त प्रत्यय है । "सत्पुरुषों का गमन" यह मथं होता है अतः सम्बन्ध मात्र की विवक्षा में कर्ना, सद शब्द से पष्ठी विभक्ति होकर 'ससाम्' शब्द बनता है। इसी प्रकार-- सपिषो जानीते - इसका अर्थ है-“सपिपा उपायेन प्रवर्तते" अर्थात 'घृत के धारा प्रवृत्त होता है। यहाँ 'सपिस्' (घृत) प्रवृत्ति का वरण है। जसमें सम्बन्ध मात्र को विवक्षा होने पर षष्ठी विभक्ति हो जाती है । भातुः स्मरति (माता को स्मरण करता है। यहाँ 'माता' स्मरण का कर्म है। कर्म मे सम्बन्ध मात्र को विवक्षा होने पर पष्ठी विभक्ति हो जाती है। एषोदकस्य उपस्फुरते (काष्ठ जन को परिष्कृत करता है अथवा काष्ठ और जल को परिष्कृत करत. है) - एध" शब्द अकारान्त पु. है । अथ 'एषस्' सकारान्त नपुं. इसका अर्थ है काष्ठ । पहिले अर्थ मे 'एघः' पृथक प्राब्द है । यह कर्ता है । दक शब्द का अर्थ है -जल (उदक), यह कर्म है। कर्म में सम्बन्ध मात्र की विवक्षा होने से पष्ठी विभक्ति जाती है। दूगरे अर्थ में 'एधारण उदक पां समाहार एधोदकम्' यहाँ एध मन अकारान्त है। 'एधोदक' समस्त पद कम है। उसमे सम्बन्ध की विक्षा होने से पप्टी विभक्ति होती है। मो शम्मोचरणयो (शम्भु के चरणों का मान करता हूँ। यहाँ 'चरण: कर्म है । इसमे सम्बन्ध मात्र की विवक्षा होने से पष्ठी विभक्ति हो जाती है। फलाना तृप्तः (फलों से तृप्त हुआ)-यहाँ 'फल' करण है । इसमें सम्बन्ध मात्र की विवक्षा होने से पष्ठं विभक्ति हो जाती है। ०६. पाटो हेनुप्रयोगे इति-यदि हेतु शम्द का प्रयोग हो तथा कारणना कट करनी हो तो (हेतु शब्द तथा कारणवोधक शब्द दोनों में) पष्ठी विभक्ति ती है। बी- काराप्रकरणम् ७७ । सर्वनाम्नस्तृतीया घ । २।३।२७। सर्वनम्नो हेतुशब्द- स्य च प्रयोगे हेतौ द्योत्ये तृतीया स्यात् पष्ठी च । केन हेतुना यसति । कस्य हेतोः। * (वा) निमित्तपर्यायप्रयोगे सर्वासां प्रायदर्शनम । सिंनिमित्त वसति। केन निमित्तेन । कस्मै निमित्तायेत्यादि । एवं किं कारणाम, को हेतुः, कि प्रयोजन- मित्यादि । प्रायग्रहणादसर्वनाम्नः प्रथमाद्वितीये न स्तः । अभस्य हेतोसति (अप्र के लिये बमता है-यही रहने का प्रपोजन पर है । हेतु सम्म वा प्रयोग भी किया गया है । इलिये 'अन' गम्द तथा हेत शब्द दोनों से पष्ठी विक्ति हो जाती है। ७७ सानाम्नस्तृतीया ति सर्वनाम के साथ है भन्द का प्रयोग होने पर हेतु प्रबट ररने के लिये (सर्वनाम और हेत शब्द दोनो मे) हनीया तपा पठी विक्ति होती है। केन हेतुना बसनि सिम नि रहना है !)- यही हेतु सदा सर्वनाम के प्रयोग रिया गया है तथा हेतु प्राट करना है, अतएव उपर्युक्त नियम मे पन तथा हेतुना' दोनों मे हनीया विक्ति होती है । पक्षा में पप्टो यिमित होती है 'रस्य हेतोः। निमितति (1)-निमित्त पद के पर्यायवावो (गरण, प्रपोजन ant) Rो । प्रयोग होने पर प्रायः सभी विभक्तियाँ देवी गाती है। - कमिमिस पति (किम तिये रहता है)-दहा मा पा दिनीया विभक्ति। पेन निमित्तैन (या) करमै निमित्तार बनी मी प्रसार- परमाद निमित इ. सनिमित्तम्मास्मिन् निमित्त प्रमादितचा निमित्त दे पायोग में रणम्" वाद होते है। प्रायपहनार ति-बालित में पार हाराहग सियाहै। सालापर्व है जहाँ मनाम राग मी होवा (पमानाम.) वो अपपा दश जी विक्ति महीं होमो, मर र विपिन होतो- गरातमाकरण ज्ञानेन निमित्तेन हरिः सेव्यः । ज्ञानाय निमित्तायेत्यादि ।। ७८ । पठ्यतसर्यप्रत्ययन।२।३।३०। एतद्योगे पष्ठी स्यात 'दिक्शब्द-६४' इति पञ्चम्या अपवादः । ग्रामस्य दक्षिणतः पुरः पुरस्तान्, । उपरि उपरिप्टात् । मानेन निमित्तेन हरि सेम्यः [शान के लिये हरि की सेवा कर पाहिए]- यहाँ 'ज्ञान' सपा निमित्त दोनों शब्दों से उपयुक्त नियम अनुसार तृतीया विभक्ति होती है । इसी प्रकार मानाय निमित्ताय आदि धतुर्थी इत्यादि हो जाती है । किन्तु 'शान' शब्द सर्वनाम नहीं है अतः मर प्रयमा एवं द्वितीया विमक्ति नहीं होती। ७५. षष्ठ्यतसर्थ, इति-अतस् (अनसुच्) प्रत्यय तथा उसके मा वाले प्रत्यय लगाकर बने हुए (दक्षिणतः, पुरः, पुरस्तात् इत्यादि) शब्दों योग मे षष्ठी विभक्ति होती है। 'अन्यारात्० ६४' ।२।३।२६। सूत्र में दिक् शब्द का ग्रहण करने दक्षिणत: आदि के योग में पञ्चमी प्राप्त थी उसका यह सूत्र अपवाद अर्थात उस पञ्चमी को बापकर षष्ठी का विधान करता है । प्रामस्य दक्षिणतः (माम के दक्षिण और)- यहाँ दक्षिणतः में अतसुच (दक्षिणोत्तराभ्यामतसुच) ॥२८प्रत्यय है । यह प्रत्यम दिग्देशकानवाची शब्दों से स्वार्य मे कहा गया है । उपयुक्त नियम के अनुसार दक्षिणतः के योग में 'ग्राम' शब्द से पाठी विभक्ति होती है । इसी प्रकार-प्रामस्य पुरः, यहाँ पुरः शब्द पूर्व शब्द से 'असि' प्रत्यय होकर बना है। पूर्व को पुर् आदेश होकर पुर+अस्-पुरः हो जाता है । पूर्वाधरावराणामसि पुरधवश्चषाम् ५।३॥३६॥ असि प्रत्यय भी अतसुच् अयं में ही है । पुरस्तात--पूर्व प्रस्ताति • पुर+अस्ताउ--पुरस्ताद । उपरि तथा उपरिष्टाद दोनों शब्द मतसर्थ प्रत्यय के प्रकरण में कार्य शन से दिवछन्देभ्य: सप्तमीपञ्चमीप्रपमाभ्यो दिग्देशकालैण्वस्ताविः शश कारकप्रकरणम् ७९ । एनपा द्वितीया २।३।३१। एनबन्तेन योगे द्वितीया स्यात् । एनपेति योगविभागात्पष्ठ्यपि । दक्षिरणेन ग्रामं ग्रामस्य वा। एवमुत्तरेण । ८० । दूरान्तिकार्य: षष्ठ्यन्यतरस्याम ॥२॥३॥३४॥ एतयोगे पष्ठी स्थात्पञ्चमी च । दूरं निकटं ग्रामस्य ग्रामाद्वा ॥ ८१ । ज्ञोऽविदर्थस्थ करणे ।।३॥५१॥ जानातेरज्ञानार्थस्य करणे शेपत्वेन विवक्षिते पष्ठी स्यात् । सपिपो ज्ञानम् ॥ [रिल तथा रिष्टाति प्रत्यय और ऊध्व को 'उप' आदेश] निपातन द्वारा बनाये गये हैं। इनके योग में पष्ठी विभक्ति होती है-"प्रामस्य उरि", "प्रामस्य उपरिष्टाद" इत्यादि। ७१. एनपैति--एनप् प्रत्ययान्त पन्दो के योग में द्वितीया विभक्ति होती हैं। यहाँ “एनगा' इतना मूत्र अलग मानकर उसमें पध्यमर्थ० २१३॥३०॥ से षष्ठी की अनुत्ति लाते हैं इस प्रकार 'एनए' प्रत्ययान्त शब्दों के योग में षष्ठी विशक्ति की होती है। दक्षिणेन प्रामं ग्रामस्य वा [प्राम के दक्षिण-दक्षिणेन शब्द दक्षिण एल्द से एनप प्रत्यय {एनबन्यतरस्यामदूरेपश्वस्या ] ५३॥ ५॥ होकर बना है। इसके योग में उपयुक्त नियम के अनुसार 'प्राम' या 'प्रामस्य' में द्वितीया मोपळी विभक्ति होती है। ८०. दूरान्तिकारिति-दूर और सीप [अन्तिक] अयं वाले शब्दों के योग मे षष्ठी तथा पञ्चमी विभक्ति होती है । जैसे-दूरं निकद ग्रामस्य, प्रामाद श पाम से दूर या समीप] । ११. शोऽविदर्यस्पति अविदर्यस्य का अर्थ है-शान से भिन्न भपं वाली । शान से भिन्न अर्थ वाली जानाति [शा) के करण में सम्बन्ध मात्र की विषक्षा होने पर पाठी विभक्ति होती है। कारको ज्ञानम्-इसका अर्थ है-धृत सम्बन्धी [7 द्वारा होने वाली] प्रवृत्ति । यहाँ जा धातु मानपूर्वक प्रवृत्ति अयं में है । 'सपिस्' [त] उपर्युपरिष्टात् ५५३३३१० संस्कृतव्याकरणे ज्ञानेन निमित्तेन हरिः सेव्यः । ज्ञानाय निमित्तायेत्यादि ।। ७५। षष्ठ्यतसर्यप्रत्ययन।२।३।३०। एतद्योगे पष्ठी स्यात् । 'दिक्शब्द-६४' इति पञ्चम्या अपवादः । ग्रामस्य दक्षिणतः। पुरः पुरस्तान । उपरि उपरिप्टात् । गानेन निमित्तेन हरिः सेम्यः [जान के लिये हरि की सेवा करनी चाहिए] - यहाँ 'जान' तथा निमित्त दोनों गमों से उपयुस नियम के अनुगार हनीया विभक्ति होती है। इसी प्रकार मानाय निमित्ताय' आदि में चतुर्थी इत्यादि हो जाती है। किन्तु 'शान' शम्द सर्वनाम नहीं है अतः यही प्रपमा एवं दिनी विभक्ति नहीं होती। ७१. पाठ्यतसर्थ, ति-अतम् (अनमुच्) प्रत्यय तथा उसके अर्ष माले प्रत्यय लगाकर बने हुए (दक्षिणतः, पुरः, पुरस्तान इत्यादि) गम्मों के योग में पध्ठी विभक्ति होती है। 'अग्यारात. १४ राश२॥ मूत्र में दिक गहरा पहन करने के दक्षिणतः आदि के योग में पञ्चमी प्राप्त थी उसका यह सूत्र अपवाद अर्थात उम पञ्चमी को बाधकर पष्ठी का विधान करता है। पामाप भियतः (ग्राम के दक्षिण और)- यही दक्षिण में अगर (आणिोतरामामामुष) ॥२॥ प्रत्यय है। यह प्रत्यम दियकालापी गमों मे इस मे करा गया है । गका नियम के अनुगार दक्षिणा के योग में 'साम' मद में षष्टी विभक्ति होती है। सो प्रार-प्रामस्य पुरः, यहा पुर: सम्म पूर्व बस में 'मि' प्रत्यय होकर बना है। पूर्व दो पुरमादेश होकर पूर+सम्पुर: हो जाता है। पुधिराधराणामि पुग्धवारंपाम् ॥1अमि प्रत्यय की अगुवाई में ही है ।पुरमा सात पुरता-पुरमा तथा सरकार दोनों हा मनमथं प्रम्पप , प्रहरम में जा रहे . गरि .......

कारकप्रकरणम्
।
७६ । एनपा द्वितीया २१३१३१३ एनबन्तेन योगे द्वितीया
स्यात् । एनपेति योगविभागात्पष्ठयपि । दक्षिणेन ग्राम ग्रामस्य
वा । एवमुत्तरेण ।
८० । दूरान्तिकार्यः षष्ठ्यन्यतरस्याम् ॥२॥३॥३४॥ एतयोंगे
पठी स्यात्पञ्चमी च । दूरं निकटं ग्रामस्य ग्रामाता ॥
८१ । ज्ञोऽविदर्थस्य करणे १२१३१५१॥ जानातरज्ञानार्थस्य
करणे शेपत्वेन विवक्षिते पष्ठी स्यात् । सपिपी ज्ञानम् ।।
[रिल सथा रिष्टाति प्रत्यय और ऊय को 'उप' आदेग] निपातन द्वारा बनाये
गये हैं। इनके योग में पष्ठी विभक्ति होती है-"प्रामस्य उ.रि", "मासस्य
उपरिष्टात्" इत्यादि।
७६. एनपेतिएनयू प्रत्ययान्त शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति होनी
हैं। यहाँ एन' ना मूत्र अलग मानकर उसमें पटानम० २०११
से राष्ठी की अनुत्ति माते है इस प्रकार 'एनए' प्रत्ययान्त शब्दों के योग में
षष्ठीविभक्तिभी होती है।
क्षिणेन प्रामं प्रामस्य रा [ग्राम के दक्षिण-दक्षिणेन शद दक्षिण
गम एना प्रत्यय [एनयन्यतारामपञ्चम्या ] || होकर बना
पारसके योग में उरवा नियम के अनुसार 'ग्राम' या 'ग्रामप' में दिखाया
भारण्टी विर्भात होतो।।
... दुरान्तिकारिति-दूर और समीप [अनिा अपाते शन्दों
मोग से परठी सपा पमी विभक्ति होती है। जो-दूर निर प्रामस्य,
प्रामार या[बाम से दूर या समीप] ।
११. प्रोऽपिरतिमविदर्थस्य अपं है--ज्ञान से भित्र र
माली ।मान से नि अपं पाली गानानि कारण मे सम्बन्ध मार को
रिसा होने पर पाट रिमाल होती है।
को मानम्-दमका है- सम्बन्धी होने
लो] प्रति । दहीमा पातु मानपूर्वक प्रति अपं में है । रिम् []
परिवाद |

संस्थापकरणे ८२ । अधोगर्यदयेशा फरिस (२१३५२॥ एषां कर्मणि शेपे पप्ठो स्यात, । मात । स्मरणम् । सपिपो दयनम ईशनं वा । • ८३ । कृमः तियाने १२१३१५३। कृमः कर्मणि शेपे पष्ठी स्याद् गुरणाघाने । एघोदकस्योपस्करणम् ॥ ८४ । जार्थानां भाववचनानामज्वरः।२।२१५४। भावकतुं - करण है । इसमें सम्बन्ध मात्र को विवक्षा मे पष्ठी विभक्त होती है। टिप्पणी-मोऽविदर्थस्य करणे ॥३॥५१॥ से लेकर व्यवहगीः समर्थयोः २॥३॥१७॥ तक के सूत्रो मे तथा कृत्वोऽयंप्रयोगे० २।३।६। इस सूत्र में शेषे' की अनुवृत्ति आती है अतः 'पष्ठीशेषे' सूत्र से ही इसके विषय में षष्ठी विभक्ति मिद है । इन सूत्रों से फिर पष्ठी का विधान इसलिये किया गया है कि "सपिपी ज्ञानम्" आदि मे १ष्ठो समास न हो, जैसा कि कहा है- "प्रतिपदविधाना षष्ठी न समस्यते"। ५२. अघोगर्ष इति -[अधि पूर्वक धातु (इक् स्मरणे)= अधोक्, अघीगर्थ का अर्थ है- स्मरणार्यक] । स्मरणार्थक धातुएं तथा दय् (दान- गतिरक्षणेषु, ईश [ऐश्वर्य] इनके फर्म में सम्बन्ध मात्र की विवक्षा होने पर षष्ठी विक्ति होती है। मातुः स्मरणम् [माता को याद करना], सपियो दयनम् ( का दान देना], सपियो ईशनं [त का यथेष्ट प्रयोग) इनमें 'मातुः' तथा सरिपः में षष्ठी विभक्ति हो जाती है तथा यहाँ पठी समास नहीं होता [देखिये कार टिप्पणी] ५३. कृत्रः प्रतियत्न इति- [प्रतियल का अर्थ है- गुगाधान अर्थात में अन्य गुणों की स्थापना करना, जैसे-जल में उष्णता पैदा करना] । कृ धातु के कर्म मे सम्बन्ध मात्र की विवक्षा होने पर गुणाधान अर्थ में पष्ठी विभक्ति होती है । जैसे-"एपदिक्स्य उपस्करणम्" [देखिये कपर पष्ठी शेषे शीध्याच्या । ४. जापानाम् इति-ज्वर धातु को छोड़ कर अन्य रोगार्थक किसी वस्तु कारकप्रकरणम् काणां वरिवर्जितानां नार्थीनी कर्मणि शेपे षष्ठी स्यात् । चौरस्य रोगस्य रुजा ॥ (वा) अज्दरिसंताप्योरिति वाच्यम् ॥ रोगस्य चौरज्वरः चौरसन्तापो वा राँगत के चौरसम्बन्धि ज्वरादिकमित्यर्थः।। ८५ । आशिषि नाथः २१३१५५। पाशीरर्थस्य नाथतेः शेपे कर्मणि पष्ठी स्यात् । सपिपो नाथनम् । आशिपीति किम् ? माणवकनाथनम् । तत्सम्बन्धिनो यात्रेत्यर्थः ।। धातुओं के कम मे सम्बन्ध मात्र की विवक्षा होने पर षष्ठी विक्ति होती है जबकि उनका की भाववाचक शब्द हो। चौरस्य रोगस्य एजा (रोग द्वारा की हुई चौर की पीड़ा) यहाँ भाववा- चक 'रोग' प्राब्द रुजा अर्थाद पीडा का कर्ता है, चोर पीड़ा का कर्म है । उससे सम्ब-घ मात्र की विवक्षा मे पाठी विभक्ति हो जाती है। मज्वरि-इति (दा)-सूत्र में 'अज्वरे:' के स्थान पर "अज्वरिसन्ताप्योः" यह कहना चाहिये अर्थात् चरि और सत्तापि धातु को छोडकर । इसलिये- 'रोगस्य चौरज्वरः' अथवा 'धोरसम्ताप:' यहाँ चौरस्य ज्वरः (चौरज्वरः) मे इस नियम से षष्ठी नही हुई, अपितु 'षष्ठी दो' से षष्ठी विमति हुई सया 'चौरज्वरः' में षष्ठी समास हो गया । इस सूत्र से पष्ठी होने पर तो समास न होता । (देखिये पृष्ठ ७२, टिप्पण) । यहाँ मी अयं उसी प्रकार होता है-'रोग द्वारा किया हुआ चौर सम्बन्धी ज्वर आदि। ८५. माशियोति--आशी: आथं वाली नाथु धातु के के कर्म में सम्बन्ध मात्र की विवक्षा होने पर पष्ठी वित्ति होती है। अमी:' का अर्थ अभिलाषा। पिषो नापनम् (कमरूप पा सम्बन्धी अभिलाषा)--यहो 'मेरे धृत हो।' यह अच्छा है । 'सगिस्' नाय धातु का कर्म है । इसमें सम्बन्ध मात्र की विवक्षा में षष्ठी विभक्ति होती है। यहाँ भी समास नहीं होता । माधिषि किमिति-सूत्र मे 'आशिषि' शब्द का क्या प्रयोजन है ? - यह कि जब नाथ् पातु "आशोः" अर्थ में होती है तमी उपयुक्त नियम पे षष्ठी

संस्कृतम्गकरणे
८६ । जासिनिमहणनाटकापियां हिंसायाम् २१३३५६।
हिंसा नामेपां शेपे कमीण पष्ठो स्यात् । चौरस्योज्जासनम् ।
निप्रो संहतो विपर्यस्तो व्यस्तो वा । चौरस्य निप्रणनम् ।
प्रणिहननम् । निहननम् । प्रहणनं वा । नट अवस्कन्दने
चुरादिः । चौरस्योन्नाटनम् । चौरस्य क्रायनम् । वृपलस्य
पेपणम् । हिंसायां किम् ? धानापेपणम् ॥
होती है।
होती है, अन्यथा नहीं। जी-माणवकनापम यहाँ पर यह पष्ठी नहीं होती।
इसका अर्थ है - माणवक सम्बग्पो याचना । यहाँ माणयक से कम में सम्पण
मात्र की विवक्षा में (पष्ठी शेपे) पप्टो विमवित होती है और षष्टी समाग
हो ही जाता है।
८. बासोति-हिमायक गाशि (गिवन 'जगु ताइने' तथा 'अमु
हिमायाम') नि तथा पूर्वक हन, माद (मिजत नट्) आप जिबन्त ऋष)
शिम इन धातुओं के गम में सम्पन्ध मात्र की विदा होने पर यष्टी विमति
चौरस्य समासनम् (और मम्बपी हिसा)-यहाँ चोर उपासन
का गर्म है। हममें सम्पत्यमार की दिवसा होने पर उपर्युक्त नियमानुमार
बष्टी विमति होती है।
नित्री - नि और प्र उमगं मी म से मिले हुए हनिप्र)
सिरीत क्रम में मिले हर (विजयस्ती-प्रनि इति) तपा पृपा-२ का में
(पानी) निरे जाते है। अगएर “धोरस्य निम्हणतम्", "चौरस्य प्रणिहुनतम",
'पोरस निननम्", "कोय प्रहलनम्" सर्वत्र षष्टी विभक्ति होती है।
गौरव सम्मानम्-वही " सादने" आरिगण की
मो जाती है गन्दना जादप है कि मगं नमने है रमका
महक हो जाता है। मोर राय अपमान, गुगनाय गरम
में भी पटौती है।
मा दिन-हिमा वर्ष में ही पर पष्टौ होती मार्गा

कारकप्रकरणम् ८७ । व्यपहपणोः समर्थयोः १२॥३१५७। शेपे कमणि पछी स्यात् । द्यूते क्रयविक्रयव्यवहारे चानयोस्तुल्यार्थता । शतस्य व्यवहरणं पणनं वा । समर्थयोः किम ? शलाकाव्यव- हारः । गणनेत्यर्थः ब्राह्मणपणनं स्तुतिरित्यार्थः । ५५ । दिवस्तदर्थस्य ।२।४।५८। द्यूतार्थस्य क्रयविक्रयरूपव्य- कहा। इसलिये कि- 'धानापेषणम्' (धानाना पेषणम्) यहाँ कृदन्त के योग में हो (ककर्मणोः कृति १२ अपवा पष्ठी पे ७५ से) पप्ठो होती है तथा यहाँ पप्ठो समास हो जाता है। जासि.८६, इत्यादि भूत्र से जह पप्ठी होती है वहाँ पष्ठी समास नहीं होता यह कहा जा चुत है (देखिये कार टिपणी)। ८७. व्यवह इति-समान अयं वाली दि+अव पूर्वक ह हरणे) तथा पण पहारे स्तुली ) धातु के गर्म में सम्बन्ध मात्रको विवक्षा होने पर पष्ठी विक्ति होती है। पूत रति-श सेलना और कर विकर करना इन दो अर्थों में पबह तभा पण पतु समान अयं वाली है। गतस्य पहरणं पणनं वा [सोमा क्रय विक्रय या आ]-यहाँ 'शतस्प भवहरसिमर्थ में गत' है इसमें सम्बन्ध मात्र मी विवक्षा होने पर पाठी विमति होती है। समर्पयोः निमिति-सूत्र में समान अ वाली [ममर्पयोः] क्यों रहा? इसलिये किया र विक्रमबहार से भिन्न अर्थ में इन पातुओं के कर्म में, इस नियम से, पप्टी नहीं होती। जैसे- शलाकाम्यवहार यहाँ 'महारबर्ष पणना है। यहाँ 'पप्टो पे' से पटी विभरित होकर षष्टी समास हो जाता है। इसी मार दाह्मणपणनम्' अर्थात् बाह्मण को स्तुति' यहां भी ८.मिर- विमर्शदपूत और पवित्र पहार बर्ष में दिधातुकर्म में पटो मिति होती है।

संस्कृतम्याकरणे वहारार्थस्य दिवः कर्मणि पाठी स्यात । शतस्य दीव्यति । तदर्थस्य किम् ? ब्राह्मणं दीव्यति । स्तोतीत्यर्थः ८६ । विभाषोपसर्गे ।२।४।५६ पूर्वयोगापवादः । शतस्य शतं वा प्रतिदोव्यति ।। + ६० प्रेष्यब वोहंविषो देवतासंप्रदाने ।२।३।६१॥ देवता- संप्रदानेऽर्थे वर्तमानयोः प्रेष्यब्रुवोः कर्मणोः हविविशेषस्य वाच. काच्छब्दात्पष्ठी स्यात् । अग्नये छागस्य हविपो वपाया मेदसः प्रेष्य अनुहि वा ।। शतस्य दो यति [सी को दाव पर या व्यवहार मे लगाता है] यहां 'शत' दीव्यति का कम है। इसमे उपयुक्त नियम से षष्ठी विभक्ति हो जाती है। टिप्पणी-इस सूत्र में 'शेर्षे' को अनुवृत्ति नही आती, अतः यह षष्ठी- विधान मास की निवृत्ति के लिये नहीं है, इसी से 'दीव्यति' यह तिङन्त का प्रयोग दिया है , पहले सूत्रों के समान कृदन्त का नहीं । तदर्थस्य किम इति-धूत तथा करविक्रय ध्यवहार इन अर्थों में प्रयुक्त 'दिव्' धातु के कर्भ में पष्ठी होती है जहाँ इन दोनो अर्थो से भिन्न अर्थ में दिव धातु का प्रयोग होता है वहाँ कर्म में पष्ठी नही होती, अतएव 'ब्राह्मणं दीपति' मे कर्म में द्वितीया ही होती है । यहाँ दीव्यति का अर्थ है- स्तुति फरता है। ५६. विभाति - उपसर्ग पूर्वक दिव घातु के कर्म मे विक्ला से षष्ठी विभक्ति होती है। यह पहिले नियम का अपवाद है। जैसे-शतस्य शतं या प्रतिदीव्यनि-यहाँ पष्ठी तथा द्वितीया विभक्ति विकल्प से होती है। २० प्रेष्यन बोरिति-[देवनासम्प्रदाने शब्द का अर्थ है-'देवता सम्प्रदान यस्य तस्मिन' अर्थात् जहाँ देवता को उद्देश्य करके कुछ दिया जाता है। प्रेध्य शरद पूर्वक इष् धातु (दिवादि) का लोट् लकार मध्यम पुरुष का एकवचन है । इसके साहचर्य से 'बूम' घातु का भी सोट् मध्यमपुरुप का एक "वचन ही लिया जाता है]-देवतासम्प्रदान अर्थ में विद्यमान प्रेष्य तथा व पुहि) के कर्म हविः वाधक शम्द से षष्ठी विभक्ति होती है। -

७७
वारकप्रकरणम्
११ । कृत्वोर्थप्रयोगे कालेऽधिकरणे ॥३॥६४। कृत्वोर्थानां
प्रयोगे कालवाचिन्पधिकरणे शेषे षष्ठी स्यात् । पञ्चकृत्वो हो
भोजनम् । द्विरह्रो भोजनम् । शेपे किम् ? द्विरहन्यव्ययनम् ।।
६२ । कर्तृ कर्मयोः कृति २।३।६५॥ कृद्योगे कर्तरि कर्मणि
च पप्ठो स्यात् । कृष्णस्य कृतिः। जगतः कर्ता कृष्णः ।।
आनये छागस्य हविषो पाया मेदसः प्रेप्य अनुबू हि वा - यह!
हविः विशेषवाचक वया तथा मेदर शब्द से पप्ठी विक्ति होती है और
हविस् शब्द मे भी।
६१. कृत्वोऽयति - कृत्व अर्थ वाले प्रत्ययों के प्रयोग मे कालवाचक
अधिकरण मे सम्बन्ध मात्र को विवक्षा होने पर षष्ठी विभक्ति होती है।
श्यिा की आरति को प्रकट करने के लिए सख्या से कृत्वमुच् [करच ]
प्रत्यय होता है - 'संख्याया. क्रियाम्यावृत्तिगणनै कृत्वसुच' 1॥४॥१॥
पकृत्योह्नो भोजनम् [दिन मे पाच बार भोजन]- यहाँ कालवाचक
'अहन' शब्द वास्तव में अधिकरण है । उपर्युक्त नियम से कृत्वप्रत्ययान्त
नरव:' पारद के योग में 'बहन' शब्द से पप्ठी विभक्ति [अह्नः] हो गई है।
द्विरह्रो भोजनम् [दिन में दो बार भोजन] - यहाँ दि शब्द से कृत्वसुच्
प्रत्यय के अर्थ मे मुन् प्रत्यय हुआ है । इसके योग मे 'अहन्' शब्द से पप्ठी
विभक्ति होती है।
शेषे किम् इति-सम्बन्ध मात्र को विवक्षा में ही पष्ठो विपरित
होती है अतएव 'हिः अहनि अध्ययनम्' यहाँ अहनि मे सप्तमी विभक्ति हुई
भयोकि यह अधिकरण को विवक्षा है।
१२. हुं कर्मणोः इति कृदन्त के योग में कर्ता तथा कर्म मे षष्ठी
विभक्ति होती है।
कृष्णस्य हतिः कृष्ण का काय] - यहाँ पर 'कृति' पाद कृदन है।
यह कृ धातु से सिन प्रत्यय जोडने से बना है। इसग कर्ता कृष्ण है।
१.दित्रिचतुर्पः सुच् ॥४॥

• (वा) गुमरमणि येत्यते ॥ नेवारयस्य मनस्य अनं या । कृति किम् ? तद्धिते मा भूत् । कृतपूर्वी कटम् ॥ ६३ । उभयप्राप्तो फरिण।२।३।६६। उभयोः प्राप्तियस्मिन् मनः MRR {rti] के योग कम से पछी मिति मग कर्ता : [गा का कर्ता --यही पर कmi R पदारपान मे न प्रार होकर मना है । हम कर्म 'जगत् है। उसका नियम के अनुसार नमन गा से हारसगल [F] के योग में पष्ठी विमति होती है। गुगरगोति [ग] नामापपान्त हि धातु के योग में गोग पर्म में सिर से पष्ठी वियक्ति होती है। मुख्य कर्म में निरस पम्टी होती मेता भावस्प शनाप सून या [सन नामक स्थान को पोला ले पाने वाला]--नो पातु फिर्मक है । इसका मुख पर्म 'भाव' है और गौण कर्म [अापितं ध' के अनुमार न न है । उपर्युक्त वार्तिक के अनुसार सन मम्द से निरसा से पष्ठी विति हो जाती है पक्ष में द्वितीया ही होती है- सनस्य स.नं वा। कति किम् इति- मूत्र में कृति' गन्द का पहण क्यों किया? इसलिए कि कृदन्त के प्रयोग में ही कर्ता और कर्म में पाठी हो तस्तिान के प्रयोग में नहीं । इसका फल यह होता है कि "कृतपूर्वी कटम्" यहाँ कट शब्द से षष्ठी विभक्ति नहीं होती। 'पूर्व कृतमने।' इस अर्थ में 'कृत+पूर्व' शम से तरित इनि [पूर्वादिनि: ५।२६ सपूर्वाञ्च शराजप्रत्यय होकर कृतपूर्वी चन्द बनता है । फिर कम की अपेक्षा होने पर 'कट' शब्द का कर्म रूप में अन्वय होता है । 'कट' शब्द कृदन्त 'कृत' शब्द का कर्म है अतः षष्ठी प्राप्त होती है, किन्तु 'कृति' प्रहण से तहतमाय भी अधिक हो जाने पर पष्ठी विभक्ति नहीं हो पाती। ३. उमयेति-जहाँ कृदन्त के योग में कर्ता और कर्म दोनों में पष्ठी- है वहाँ कर्म में ही पष्ठी होती है या में नही।

७६ कृति तत्र कर्मण्येव पष्ठी स्यात् । पाश्चर्यो गवां दोहोऽगोपेन ।। *(वा) स्त्रीप्रत्यययोरकाकारयोयिं नियमः ॥ भेदिका वि. मित्सा वा रुद्रस्य जगतः ।। (वा) शेपे विभाषा ।। स्त्रीप्रत्यय इत्येके । विचित्रा जगतः कृतिहरेहरिणा वा । केचिदविशेपेरण विभाषामिच्छन्ति । शब्दानामनुशासनमाचार्यणाचार्यस्य वा।। माधयों गवा दोहोम्योपेन (गोपाल से मिन्न व्यक्ति के द्वारा गोदोहन भाार्य की बात है। यहाँ दोह' करता है (दुइ +4) रसके योग में भगोए कर्ता में तथा गोकर्म में षष्ठो प्राप्त है । उग्युत नियम से कर्म में हो षष्ठी होती है का (अयोपेन) मे नहीं । स्त्रीप्रत्ययोरिति (पा)-स्त्रीलिङ्ग में होने वाले कृत् प्रत्यय 'क' (बुल् मादि) सपा 'म' में यह नियम (उभयप्राप्ती कर्मणि) नहीं लगता माद वहां का में भी पष्ठी विक्ति हो जाती है और साप होम में भी। मेरिका घिमिसा पा र बE- 'यहाँ भेदिका' शद मिद पातु से गुस् प्रत्यय होकर (धुन् •-अक) सपा स्त्रीलिङ्ग में टाप् प्रत्यय होकर पला।' विभिरसा सभसा मिद धातु (वि+पिद+स) से 'अ' प्रत्यय या प्रत्यय होकर बना है। इन दोनों के योग में उपयुक्त वाहिक के अनुसार कर्ता (स्प) या कर्म (गत.) दोनों में हो पप्ठी विभक्ति हो जाती है। पे बिमाति (0) -प्रत्यय से भिन्न स्वोमिङ्ग र भरपयों प्ररोग में कर्म में नित्य षष्ठीमाकर्ता में विल से षष्ठी विभक्ति होतो है ऐसा कुछ भाचार्यों का मत है, जैसे विपित्रा गतिहरे (हरिणा) यहां हरिकता है। हमसे कर्ता में विराल से षष्ठी विति होती है तथा पक्ष में नीरा होती है। केदिति- आचार्यों का मत है कि वर्ष विभाषा' यह कि स, सेत्रितीयों के प्रयोग में ही नहीं होता अपितु सामाम्य कर से (विशेष) सभी प्रत्यमों के प्रयोग में होता है मतएर १. पारपंनिये भुन बसतमः (11. २१०१) २.प्राद.१..

Co संस्कृतप्रकरणम् ६४ । क्तस्य च वर्तमाने २।३।६७। वर्तमानार्थस्य क्तस्य योगे पष्ठी स्यात् । न लोक-२१३१६६। इति निषेधास्यापवादः । राज्ञां मतो बुद्धः पूजितो वा ।। ९५ । अधिकरणवाचिनश्च ।२।३१६८। क्तस्य योगे पष्ठी स्यात् । इदमेपामासितं शयितं गतं भुक्तं वा ।। "शब्दानामनुशासनमाचार्येण आचार्यस्य वा' यह अनुशासन (ल्युट् प्रत्यय, नपुं०) के योग मे भी आचार्य शब्द से विकल्प से षष्ठी विभक्ति हो जाती है । 'अनुशासन' शब्द नपुंसक लिङ्ग है। • ६४. क्तस्प घेति-वर्तमान अर्थ में कहे हुए 'क्त' प्रत्यय के योग में पष्ठी विभक्ति होती है। मतिबुद्धिपूजार्थम्यश्च ३।२।१-८॥ से वर्तमान अयं में 'क्त' प्रत्यय कहा गया है, उमी का यहाँ ग्रहण है । 'न लोक-इनि ।२।३६ मूत्र (E) में कत (निष्ठा) प्रत्यय के योग में षष्ठी का निपंथ किया जायेगा। उमका यह अपवाद है। राश मनो पुरः पूजितो वा (राजाओं द्वारा माना जाता है, जाना जाता है और पूजा जाता है) यहाँ मनः (मन +) बुधः (बुध् +क्त) और पूत्रित ( ज+न) तीनो पद वर्तमान में बन प्रत्यय होकर बने हैं। इनके योग में उपयुक्त निप में राज्ञाम्' में पष्ठी में विभक्ति होती है। ६५. मधिकरणेति-अधिकरणवाची क्त प्रत्यय के योग में पष्टी महोत है। 'बोधिकरणे च नौगतिप्रत्यवमानान्यः' समूत्र से अधिकरण मेस प्रत्यय का विधान किया गया है, उसी । यहाँ पहण है। यह भी 'न मोक' हम निरोधमा बावाद है। परमेषामासिन गयितं गतं भुतं या-यहाँ 'वामित' इत्यादि में का प्रत्यय अधिकरण में हुआ है प्रापस्न अस्मिन इति मागितम. शेने मस्मिन् पनि गपितम् । इनके योग में 'एपाम् में पष्टी विमति होती है । यह कर्मा मे पटरी है।

कारप्रकरणम् ६६ । न लोकाव्यनिष्ठाखलतनाम् १२१३१६६। एषां प्रयोगे पष्ठी न स्यात् । लादेशः--कुर्वन् कुर्वाणो वा सृष्टि हरिः । -हरि दिक्षुः । प्रालंकरिष्णुर्वा । उक-दैत्यान धातुको हरिः ॥ * कमरनिषेधः १६. न लोकेति --ल+3+उक यह पदच्छेद है । ल (ल के आदेश 'शत शानच् श्रादि), उ, उक कृदन्त अपय (क्त्या आदि), निष्ठा [क्त, क्तवतु], खल प्रत्यय के अर्थ वाले प्रत्यय तथा तृन इनके प्रयोग में पष्ठी विमति नहीं होती। यह नियम 'क्त क्मणोः कृति' से प्राप्त षष्ठी का निषेध करता है। दुर्गन् कुर्वाणो वा सृष्टि हरि[सृष्टि करता हुआ हरि]-~-यहाँ कुर्वन् शब्द शत् प्रत्ययान्त है [+शत - कुत्र] 1 तथा कुर्वाणः' शानच् प्रत्ययान्त है {+शानन् - कुर्वाण । शतृ और शानन् नट् लकार ल] के आदेश हैं ।' ये कृत्सशक भी है । इनके योग मे 'क्लै कर्मणोः कृति ६२ से पष्ठी विभक्ति प्राप्त होती है । उपर्युक्त नियम से षष्ठी का निषेध हो जाता है और कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है। हार दिक्षः हरि के दर्शन का इछुक रहाँ दिदृशु समन्त दृ धातु से 'उ' प्रत्यय होकर बना है। दि+दृश् + स+उ], इमके योग मे हरि में पष्ठी विमक्ति नही होती अपितु द्वितीया ही होती है। हरिम भत्तद्धरिणा-यहाँ अन पूर्वक कृञ् धतु से इपगुच प्रत्यय {3॥२१. ३६ हुभा है [अल +इप्णु] । सूत्र में 'उ' से उकारान्त वृदन्त लिया जाता है इसलिये यहाँ भी पष्ठी विभक्ति का निषेध होता है। वैरपान पातुको हरिः बित्यों के घातक ही]--'भातुक' शब्द 'हा' धातु से “उमञ्' प्रत्यय होकर बना है। यह कृत्यत्यय है। इसके योग मे पष्ठी प्रलपी। इस नियम से पप्टी का निषेध हो जाता है और कर्म में द्वितीया करिति [वा]--'उक' प्रत्ययान्त 'कम' धातु के योग में पष्ठी का निषेध नही होता अतएव 'लक्ष्म्या: काभुको हरिः' यहाँ 'कामुक' (कृरत के २. लटः शतृशान चावप्रथमासमानाधिकरणे ३१२।१२४॥ २. सनाशंममिक्ष उ: ३१२।१६: ३. लपतिपदस्थाभूपहनकम गमशभ्य उप ३३२११५४ ८२ मंगरामाकरणे लक्षम्याः कामुको हरिः। अव्ययम्-जगत् सृष्ट्वा । मुचं कर्तुम् । निष्ठा-विष्णुना हता दैत्याः। दैत्यान हतवान विष्णुः । खलयः-ईपकरः प्रपञ्चो हरिणा । मिति प्रत्या हारः गतृशानयाविति तृगन्दादारभ्यानुनो नागरात् । योग में दम पछी वितही जाती है। अग गृदा (नगत को रार] यहाँ मुददा कम गुर धातु पर हार ना है और मामा मगरहने है न मोकामा मूत्र १.मेरमों के योग में वितिका franam यही पनि होकर कर्म में दिलीग किही है। प्रार 'मुगम-T+तुम और तुमन' प्रयास भी होते freyाहाया: [famारा देय मारे ग र नास्पान हलगन for teejने को मारा ] -- यह! ६१. पान धागेक[इन रहकरना है और न थामे तातु [ar+mar] | PRIMENT Eaar Tarf निन्दा रेपो में Niu featen Er: art मे | nी नही होती थी। featurinar Iय करता है । उस ME) पदी महोतीपा for for smitmriti ARRAHamr11- trati ममम. मोर यो लोभी 340; न मोड। - LEATHA FinatantriJi afranाहै। 41 mrntrast २१॥ Ramail पर 140 म भ Eriti irat - ।

वारकप्रकरणम् ८३ शानन्-सोमं पवमानः । चानश्यात्मानं मण्डयमानः । शत-वेदमधीयन् । तृन्--कर्ता लोकान् । अद्विषः पातुर्वा । मुरस्य मुरं वा द्विषन् ।। सर्वोऽयं कारकपप्ठ्याः प्रतिषेधः ॥ शेषे पष्ठी तु स्यादेव । ब्राह्मणस्य कुर्वन् । नरकस्य जिष्णुः ।। पष्ठी विभक्ति नहीं होती, जैसे-सोम पवमानः सोम को पवित्र करता हुआ, (पवमानः-पू+शानन्), यात्मानं मण्डयमानः-अपने आप को भूषित करता हुआ (महि+ पानस्), वेदमधीयन्-वेद को पढ़ता हुआ (अधि+इ+४), कर्ता लोकान्-संसार को बनाने वाला (कृ+तृन) यहाँ सोमम्', 'आत्मानम्', 'वेदम्' तथा 'लोकान' सर्वत्र षष्ठी न होकर कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है। टिप्पणी-तून प्रत्याहार के अन्तर्गत 'लट् के स्थान में होने वाले शत शानच् नहीं लिये जाते 'अधीयन्' मे दूसरा हो 'श'' प्रत्यय है। द्विषः इति (व)~गत प्रत्ययान्त द्विप् धातु के योग में षष्ठी विमक्ति का निषेध विकल्प से होता है, अतएव मुरस्य मुरं वा दिन (मुर नामक राक्षस का पात्रु)-यहो द्विपन शब्द शतृ प्रत्ययान्त है । 'मुर' शब्द से विकल्प से षष्ठी तथा द्वितीया विभक्ति होती है । सर्वोऽयम इति - न सोकाव्यय -६६। इस सूत्र से कारक पष्ठी (कर्तृ- 'कर्मणोः कृति १०' आदि से प्राप्त) का ही निषेध होता है । शेषे पष्ठी (अर्थात् किसी कारक मे, सम्बन्ध मात्र की विवक्षा हो जाने पर) तो हो ही जाती है, अतएव 'ब्राह्मणस्य कुर्वन' 'नरकस जिष्णु' में षष्ठी विभक्ति हो जाती है । टिप्पणी-यह प्राचीनों का मत है उनके मन में यहाँ 'कारक पष्ठी' न होने और शेपे पष्ठी हो जाने में शाब्द-दोष का अन्तर है। नवीनों (नागेश भट्ट आदि) के मत में तो यहाँ शेपे पष्ठी भी नहीं होती। (सि० को. टिप्पणी), १. पार्यो. शकृच्छिणि ।३।२।१०। २. द्विषोऽमित्र ।३३३३१३१॥

८४
संस्कृतव्याकरणे
६७ अफेनोभविग्यदायमग्यंयोः ।२।३७०१ भविष्यत्यक
भविष्यदायमार्थनश्च योगे पष्ठी न स्यात् । सतः पालक
ऽवंतरति । वजं गामी । शतं दायी ।।
६८ कृत्यानां कर्तरि वा ।२।३।७१। पष्ठो वा स्यात्
मया मम वा सेव्यो हरिः।
१८. अकेनोरिति - भविष्यत् अर्थ में कहे हुए 'अक' प्रत्यय तया भविष्य
और आघमण्यं [अघमणं (कर्जदार) का भाव आधमपं] अर्थ मे, उन 'इ.
प्रत्यय के योग में षष्ठी विकिन नहीं होती। कमणोः कृति ६२ .
अपवाद है।
सतः पातकोतरति (जो सज्जनों का पालन करेगा वह अवतरित हो
है)-यहां पालक शब्द भविष्यत् अर्थ मे घुल (अक प्रत्यय होकर बना है।
इमके योग में सत् शब्द से थप्छो न होकर द्वितीया (सत.) ही होती है।
धनं गामी (भविष्य में व्रज को जाने वाला)-- गामी" शब्द गम् धा
से भविष्यत् काल में णिनि प्रत्यय (गम् +इन) होकर बना है । इनके योग
षष्ठी विभक्ति न होकर 'ज' से द्वितीया विक्ति ही होती है।
शर्त वापी (सौ-हाय-का देनार)--'दापी प्राब्द 'दा' धातु से आपर:
अर्थ में णिनि' प्रत्यय होकर बना है (दा+इन्)।' इसके योग में 'शत' शरा
से षष्ठी विमति न होकर कम में द्वितीया विमविन होती है।
६८. कृ.यानाम् इति--कृस प्रत्ययों के योग में कत्ता में विकता से पर
विभक्ति होती है।
कृन् प्रत्ययों के अन्तर्गत कुछ प्रत्ययों की 'कृत्प' मंज्ञा है। उनके योग
में कर्तृकर्म गो. कृति २' से नित्य पष्ठी प्राप्त थी । यह मूत्र विपक्ष से पठ
मेरा मम या सेम्पो हरिः (मेरे द्वारा हरि मेनीर है। यहाँ 'सेंटर शाम
सेब (पेश सेवायाम् धातु से कम में पत (कृत्य) प्रत्यय होकर बना है।
का अनुमा है। कत्ता में उपयुका नियम से विकला में पष्ठी (मम
१. तुमुन्युनो क्रिमाया क्विापायाम ३३१०४.देखि कमन्न प्रकरण।
२. भविष्यति गम्यादयः ।३॥३३॥
३. आवश्यमयोगनि: ३॥३॥१७॥

कारप्रकरणम् ६५ रीति किम् ? गेयो मारणवफः साम्नाम् । भव्य गेय-३।४।६८' 1 कर्तरि यद्विधानादनभिहितं कर्म । अत्र योगो विभज्यते ।। यानाम् ।। उभयप्राप्तावित्ति नेति चानुवर्तते । तेन नेतन्या गायः कृपनि । ततः । कर्तरि वा ।। उक्तोऽर्थः ।। EE I तुल्मारतुलोपमाभ्यां तृतीयाऽन्यतरस्यान ।२।३१७२। पि मेहनीया विभशि होती है। बतं गरिम् इति सूत्र में दरि' (ग्र्ता में) शद वा जन है? यह रिकर्ता में प्राप्त होने वाली पाठीशही विरास होता है एवजह! स्य' के पोग मे वर्म में षष्ठी प्राप है वहाँ इग नियम से विकल्प क्या यो माणवक: सानाम्' (माणवक साम का गायक है) पशम 'गा' धातु से गेय. आदि गूप से पर्ता मे 'मनु' प्रत्यय (हत्य) कर बना है। (मापन) अनभिहित है यत: 'मानाम्' (सामन ५० १.) नित्य ही पछी मिति होती है।' पति-नो तरि वा मूत्र में योग-विभाग पिया जाता है पति रयानाम' यह एक सूत्र माना जाता है जिसमे "उभयानो' और को अनुपति पाती है तथा यह अर्थ होता है-त्यों के योग में पर्ता र दोनों में प्राप्त होने वाली पछी नहीं होती। बसे- 'नेसम्मा व गावपणेन' (गि दो गाय १ मे से जानी १)-यहाँ पार:' प्रधान गर्म है । 'तम्म प्रत्यय प्रधान कर्म में होता है (प्रधाने नीहात. म. ''मोगरम ताण है। दोनो अनुक्त है। मनः नों में प्राय नियम से 'A' (1) Bषा रणन' (पती) में मनहीं होगी रितु कतिसमोर तो विपनिला होती है। मरिया हमरा मानना चाहिए इसमें 'लाको अनुति पारा (२) बरं होता। स्वारिति-तुना और 'उपमा' से होंगे दोर ऐप र अपंगते मोरे योप में गिर से औरत होती है में पोहोनी है। १.hu

तुल्यायोगे तृतीया वा स्यात्पने पष्ठी । तुल्यः सहगः समोर
कृष्णस्य कृष्णेन वा । अतुलोपमाभ्यां किम् ? तुला उपमा
कृष्णस्य नास्ति।
१००। चतुर्थी घाशिघ्यायुष्यमद्रभद्रपुमालगुणार्य हित
।२।३।७३। एतदोंगे चतुर्थी वा स्यात्परे पष्ठी माशिपि
मायुष्यं चिरंजीवितं कृष्णाय कृष्णस्य वा भूयारा । एवं मद्र
भद्रं कुशलं निरामयं सुख शं भयंः प्रपोजनं हितां पथ्यं या भूयात.
हुपरस्परपोत पा (ण + ममान) महा 'ग' के सार
Tण' मम्मे पष्ठी अपाता विमति होती है। इगी प्रकार सरग
कान वा' मम प्पिस्य कृष्णन पा'।
मनुमोरमाम्या मिति
-तुना और उसमा के योग में केवल पाटी
forही होती है, मे 'तुमा उगमा वायस्प मास्ति।'
प्पणी मागत असोटि के कवियों ने तुसा और नाम नाप
भीतीपा का प्रयोग fruit, मे - GARHI तुला ममाहरोह (रपु. ५.१५),
रोम भनिमिन गामा (निशु. 1.4) । (माटे ११७)
...पुर-गोद में- आयुरा, मा, भा, पुल, मुग, म,
बोलिन याने दो माप nिanी मि िहोती है,
पदी होती है।
भाष्य रणाय समय या भूवन (लकी यायु)-4हाँ
'बार' योग पदम पर पदी fatrint
इनोसर - चितित्रार TET का भुगना "Art at
পামর
मुश सम्म प्रोजन पधबा रकम्प, roman
rfrfafeमर-भीम पनी अपका भावी fry
गरपोरम नदी frg
। 'मन (radi):
पापा-यर मारल में बाहर

पामिपि पिम् ।देसम्यायमस्तिापायानार गम् । माभन्योः पापनादल्यतरोन पटनोय। १०१ माघारोधिकरण ४ घमर्मसार प्रियाया मापारा पापमधिकरणमा १०२फाधिपरमेघ ६ मिमी पापागलान नदिको सिभि. पितmrinarina refirreltrent (Inter) नारा मेला) marathi from सीder- 1.1 mrtmetan returiramin (et-fare furrrrrrrr hem mmentertrimmitra संस्कृतमाकरणे व्यापकश्चेत्याधारस्त्रिधा । कटे प्रास्ते । स्थाल्यां पचति मोने इच्छास्ति । सर्वस्मिन्नात्मास्ति । वनस्य दूरे अन्तिके वा 'दूरान्तिकार्थेभ्यः ७४, इति विभक्तित्रयेण सह चतस्रोऽत्र विभक्तयः फलिताः ।। * (बा) क्तस्येन्दिपयस्य कर्मण्युप. आधार (कट) के साथ सयोग सम्बन्ध है। 'कट' बोनेपिक आधार है। इसकी अधिकरण संज्ञा होकर इसमें सप्तमी विभक्ति होती है। स्थायां पति (देगची में पकाता है) यहाँ 'स्थाली' पाकक्रिया के कर्म (तण्डुल आदि) का संयोग सम्बन्ध से आधार है। इसकी अधिकरण संज्ञा होकर इनमें सप्तमी विभक्ति होती है। (१) बेपयिक आधार- विषयता सम्बन्ध से होने वाला आधार वैषयिक आधार कहलाता है अर्यात उसके साप कर्ता का बौद्धिक सम्बन्ध होता है। जैसे- मोसे इच्छास्ति (मोक्ष में इच्छा है)- यहाँ पर्ता को मोक्ष के विषय में इच्छा है ! मोक्ष इच्छा का विषय है अतः यह वैपयिक आधार है । इसकी अधिकरण सज्ञा होकर इसमें सप्तमी विभक्ति होती है। (३) अभिव्यापक-वह आधार है, जिसमें कोई वस्तु समस्त अवयवों में व्याप्त होकर रहती हो; जैसे- सर्वस्मिन् आत्माऽस्ति (सद में आत्मा है)-आत्मा सब में व्यापक 'सर्व' अभिव्यापक आधार है। इसकी अधिकरण संज्ञा होकर इसमें सप्तमी विक्ति होती है। इसी प्रकार "निलैपु तलम्" इत्यादि । वनस्य दूरे प्रन्तिके वा (वन से दूर या निक्ट)- यहाँ दूर और अन्तिक में सप्तमी विभक्ति होती है । इस प्रकार दूरान्तिकाम्य: ७४, इम सूत्र से होने वाली तीन विभक्तियों (द्वितीया, पञ्चमी तया सृतीया) सहित दूर और समोर अपं वाले शब्दों में चार विभक्तियां (द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी तया सप्तमी होती हैं। सस्पेति ()- प्रत्ययान्त शब्दों के इन प्रत्यय होकर बने हुए पदों के कर्म में सप्तमी विभक्ति रहनी चाहिए। अत:

- बारकप्रकरणम् संख्यानम् || अघीती व्याकरणे अधीतमनेनेति वि इष्टादिभ्यश्च ५।२१८८ इति कर्तरीनिः ॥ * (वा) साध्व- साधुप्रयोगे च ।। सायुः कृष्णो मातरि । प्रसाधुर्मातुले । * (वा) निमित्ताकर्मयोग। निमितमिह फलम् । योगः संयोगसमवायात्मकः ॥ चर्मणि द्वोपिनं हन्ति दन्तयोर्हन्ति कुञ्जरम् । केशेषु चमरी हन्ति सोम्नि पुष्कलको हतः ॥१॥ (इति भाध्यम) प्रधौती व्याकरणे (धाकरण पढ़ा हुआ)-यहाँ 'अघीतो' शब्द 'अधीत (अधि+इड्+क्त) से कर्ता मे 'इनि' प्रत्यय' होकर बना है (अोइन- अधीतिर =अधीती प्र• एक.) । 'व्याकरणम् यभीतवान्' यह अर्थ होता है यहाँ व्याकरण कम है और उपयुक्त वार्तिक के अनुसार कर्म में सप्तमी विमति हो जाती है। साधु इति (वा)-सापु योर असाघु शब्द के प्रयोग में सप्तमी विवि होती है। साधुः कृष्णो मातरि (कृष्ण माता के प्रति अच्छा है। यहाँ साधु । योग में 'मातृ' शब्द से सप्तमी विभक्ति होती है । इसी प्रकार 'असाधुः मातु (वह भामा के प्रति दुरा है!--यहाँ 'मातुले' में भी सप्तमी है । टिप्पणी - 'सायुनिपुणाभ्याम् अर्चायाम्' २१३४३ से पूजाम में ही सा शब्द के साथ सप्तमी होती है, अत: श्रेष्ठ, हितकारी आदि अयो में हम सू- से सती कही गई है। निमित्ताद इति (वा)--इस वार्तिक में निमित्त का अर्थ -फल । यो कहते हैं सम्बन्ध को, वह यहाँ संयोग या समवाय लिया जाता है। निमि- अर्थात् फलकाचक शब्द से सप्तमी विभक्ति होती है यदि उस फलवाचक श= का कर्म के साथ संयोग या समवाय सम्बन्ध हो । धर्मणि दीपिनं हन्ति (धर्म के लिये व्याघ्र को मारता है)--यः १. इष्टादिभ्यश्व शरा९८॥

संशतमाकरणे हेतो तृतीयाऽत्र प्राप्ता तन्निवारणार्थमिदम् । सीमाण्डकोशः। पुष्कलको गन्धमृगः। योगविशेषे किम् ? वेतनेन धान्यं लुनाति । १०३ । पस्य च भान मावलक्षणम् ।।३॥३७॥ यस्य क्रिय- या क्रिपान्तरं सक्ष्यते ततः सप्तमी स्यात् । गोषु दह्यमानासु गतः।। 'मम' [पम] के नियमानी हत्या की जाती है। भर्म बीपी [मान काम में ममवेत है अर्थात समवाय सामग्य से रहता है। अतः उरा नियम के अनुसार 'बमणि' में सप्तमा विभक्ति होती है। इसी प्रसार--'गन्तयो हन्ति पुनरम्' [मों के लिये हाथी को मारता है]- यहाँ दलगे.' में, घरी हन्ति' (केगों के लिये ची माग मृगविशेष को माला-पहा गे' में नपा सीनि पुलको हा[गी अा. पोगरी रोपही है । पुष्करा मा एक रोग है जिसे गर पृग भी रही है। यहाँ मौग्नि में मनी मिति होती है । मह भी मा, कैश सपा मीप का कर्म हमी, पपरी, पुशला के गाय माय मय है। नापिति-यह सभी प्रयोगों में है। इस मूत्र सं हेतु में जीया मिति प्राणायो। उप स्पान में मनमी कही गई है। वोपरि हिमति- "पाप माप मेगोग या समार मावरही गम निगम में फरामों में कमी शिका होगी। ऐमा गोंगा किनेर वाम्य मुना के लिये धारामा।हो बान' मदरापान में मंयोग अशा गमवाय मार नहीं था. यह ममी नहीं होती, तु है। में नौया पित ...यमिगि मे गरी मिति int रममें मामिल होतिमीमायाम में रिम में मिमि मा में इमरी NिT मश्रित है पानी होगी है। रिपोममें होते माली मनपी को मनपी' या ' Locaomantitalो।

कारक प्रकरणम् ११ * (वा) अर्हाणां कर्तृत्वेऽनर्हाणामकर्तृत्वे तद्वं परीत्ये च ॥ सत्सु सरत्सु असन्त आसते । असत्सु तिष्ठत्सु सन्तस्तरन्ति । सत्सु तिष्ठत्सु असन्तस्तरन्ति । असत्सु तरत्सु सन्तस्तिष्ठन्ति ।। गोषु दह्यमानासु गतः ( जब गाएं दुही जा रही थी तब वह गया ) यहाँ 'गायो' की दोहन क्रिया से किसी को गमन क्रिया लक्षित होती है अतः उपयुंक्त नियम के अनुसार 'गोपु' मे सप्तमी विभक्ति होती है और विशेष्य के अनुसार ही 'दुह्यमानासु' में सप्तमी विभक्ति हो जाती है। यहाँ क्रिया मस्थ है । कर्तृस्य क्रिया का उदाहरण है -ब्राह्मणेषु अधीयानेषु गतः । बहाणाम् इति-जिस कार्य के लिये जो योग्य या उपयुक्त हैं, वे 'अहं' प हे जाते हैं तथा जो अयोग्य या अनुपयुक्त हैं वे अनह' । योग्यो का कर्तृत्व प्रकट करने में तथा अयोग्पो का अकर्तृत्व प्रकट करने में और इसकी विपरीतता में सप्तमी विभक्ति होती है । इस गार्तिक के चार भाग हैं । (१) महोणाम पर्तृत्वे-क्रिया में उचित व्यक्तियो के कर्तृत्व की विवक्षा होने पर उनमे सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे-'सस्तु तरत्सु प्रसन्त पास्ते सज्जन तरते हैं और असज्जन बैठे हैं ) यहाँ सत्पुरुपों का तरना उचित है, वे तरण किया के कर्ता हैं अत: 'सत्सु' में उपर्युक्त नियम के अनुसार सप्तमी विक्ति होती है तथा सत्सु' के समान इसके विशेषण 'तरस्सु' में सप्तमी हो जाती है। (२) मनहर्हाणाम् प्रकट त्वे-जिस क्रिया मे जिनका कर्तृत्व अनुचित है उनके अकर्तृत्व को बतलाने के लिये उनसे सप्तमी विभक्ति होती है, जैसे-'मसत्सु तिष्ठत्सु सन्तस्तरन्ति' असजनों का तरना अनुचित है तथा 'तिष्ठत्सु से तरण त्रिया में अकर्तृत्व का बोष होता है अतः 'असत्सु मे सप्तमी विभक्ति हो जाती है और उसके विशेषण निष्ठत्सु मे मी: सवपरीत्येप-और उसकी विपरीत दशा मे; जैसे- १३) विना करना उचित है उनके अवतत्व को प्रस्ट करने में उनसे सप्तमी विभक्ति होती है; जपे --'सत्सु तिष्ठत्म असन्तस्तरन्ति-सज्जनों का तरण उचित है किन्तु उनका न तरना ( अवस्व ) 'तिप्ट मुसे प्रकट हो रहा है अतः 'सत्सु तिष्ठत्सु यहाँ सप्तमी विमति होती है। (४) जिनका करना उचित नहीं उनका करना ( कव) बतलाने में ६२ संसतम्याकरणे १०४ । पष्ठी चानादरे २।३।३८। अनादराधिवये भाव- लक्षणे पष्ठीसप्तग्यो स्तः । रुदति रदतो वा प्राब्राजीत् । रदन्तं पुत्रादिकमनाहत्य संन्यस्तवानित्यर्थः ।। ०५ । स्वामीश्वराधिपतिदायादसाक्षिप्रतिभूप्रसूतश्च १२॥३॥३६॥ एतैः सप्तभिर्योगे पष्ठोसप्तग्यौ स्तः । पाठ्यामेव प्राप्तायां पाक्षिकसप्तम्यथं वचनम् । गा गोषु वा स्वामी । गवां गोपु वा प्रसूतः ।गा एवानुभवितुं जात इत्यर्थः । उनसे सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे - असत्सु तरत्सु सन्तस् तिति' यहाँ असज्जनों का तरना अनुचित है किन्तु उनका तरना 'तरत्सु' से प्रकट हो रहा है । अतः असत्सु तथा उसके विशेषण तरत्सु मे सप्तमी विभक्ति होती है । टिप्पणी-कुछ आचार्यों का मत है कि इस वातिक के उदाहरणों मे 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' से ही सप्तमी सिद्ध हो जाती है अतएव इसकी आवश्यकता नहीं। किन्तु दूसरों का कथन है कि यहाँ एक की क्रिया से दूसरी क्रिया लक्षित नहीं होती; “यदा सन्तस्तरन्ति तदा असन्त आसते' इस प्रकार का अर्थ उपयुक्त उदाहरणों का नहीं होता अपितु 'गन्तस्तरन्ति, असन्त आसते' इत्यादि अप ही होता है (दे० शारदारञ्जन, मित. १०३) १०४. षष्ठीति-यदि अनादर भी प्रकट हो तो जिमकी क्रिया से अन्य क्रिया लक्षित होती है उसमे षष्ठी या सप्तमी विभक्ति हो जाती है। रवति रदतो वर प्रसाजीत - इसका अर्थ है-'रोते हुए पुत्र आदि की उपेक्षा करके सन्यास ग्रहण कर लिया। यही 'रुदन' प्रिया से प्राजन क्रिया लक्षित होती है। साथ ही 'स्दन' का तिरस्कार या उपेक्षा भी प्रकट हो रही है, अतएव रुदति' या 'रुदत.' मै सप्तमी तया पष्टी विभक्ति होती है। १.५. स्वामीति-स्वामी, ईशार, अधिपति, दायाद, साक्षिन, प्रतिभू तथा प्रसूत इन शब्दों के योग में षष्ठी तथा सप्तमी विभक्ति होती है । संबन्ध मे केवल षष्ठी प्राप्त थी, पक्ष में सप्तमी के लिये यह मूत्र कहा गया है। गर्वा गोप वा स्वामी ( गापों का स्वामी) यहाँ उपमुंबन नियम से 'स्वामी' शब्द के योग में 'गवाम्' तथा 'गोधु' मे विकल्प से पष्ठी या सप्तमी विभक्ति होती है। १. सि.को तस्वबोधिनी।

कारप्रकरणम् । ६३ ! १०६ । आयु सकुशलाभ्यां चासेवायाम् ।२।३।४०। प्राभ्यां योगे पठीसप्तम्यो स्तस्तात्पर्यऽर्थे । आयुक्तो व्यापारितः।आयुक्तः कुशलौ वा हरिपूजने हरिपूजनस्य वा । प्रासेवायां किम् ? आयुक्तो गौः शकटे । ईपयुक्तः इत्यर्थः ।। १०७ । यतश्च निर्धारणम् ।२१३१४१३ जातिगुणक्रियासंज्ञा- भिः समुदायादेकदेशस्य पृथक्करणं निर्धारण यतस्ततः पप्ठी- सप्तम्यो स्त; । नृणां नृषु वा ब्राह्मण; श्रेष्ठः । गवां गोपु वा कृष्णा वहुमीरा। गर्वा गोत्र का प्रसू: (गायो मे उत्पन्न हुआ है। इसका भाव है- गायों को प्राप्त करने के लिये ही उत्पन्न हुआ है । यहाँ भी पष्ठी तथा सप्तमी विभक्ति होती है। इसी प्रकार पृथिव्याः पृयिथ्यां दा ईश्वरः, 'प्रामाणा सामेषु वामधिपतिः' 'पिरंशस्य पियो वा दायाद.' 'व्यवहारस्य व्यवहारे वा साक्षी' 'दर्शनस्य दर्शने वा प्रतिभू.। १० मायुक्तेति-तत्परता अर्थ में आयुक्त और कुशल शब्द के योग में षष्ठी तथा सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे-'आयुक्त. हरिपूजन हरि- पूजनस्य या' आयुक्त का अर्थ है-लगाया हुआ । इसी प्रकार 'कुशलो हरि जने हरिपूजनस्य था। मासेवायाम् पिम् इति--जहाँ ततारता अर्थ होता है वही आयुक्त, नशर के योग मे पष्टी, सप्तपी होती है, यह को कहा ? इसलिये कि अन्य अयं में केवल सप्तमी ह तो है ; जैसे - 'आयुक्तो गो: शरटे इसका अर्थ है- बैल गाड़ी में जोड़ा गया। यहाँ तारता का बोर नहीं होता। १.७. पताचेति-निर्धारण का अर्थ है-जानि, गुण किया तथा संजा आदि को विशेषता के कारण किसी वस्तु को अपने समुदाय से पृथक करना । जिसमे से निर्धारण किया जाता है उससे पष्ठी या सप्तमी विभक्ति होती है। नगो, नए वा बाह्मणः श्रेष्ठः (मनुष्यों में ब्राह्मण थेट है)- यहाँ मनुर-समुदाय से जाति की विशेषता के कारण नाह्मण को विरिष्ट दिखाया . -- संस्कृतव्याकरणे गच्छतां गच्छत्सु वा धावन शीघ्र; । छायाणां छात्रेषु वा मंत्रः पटुः।। १०८ । पञ्चमो विभक्ते ।।३।४२। विभागो विभक्तम् । निर्घार्यमाणस्य यत्र भेद एव तय पञ्चमी स्यात् । मायुरा; पाटलिपुत्रकेभ्य प्रायतराः॥ Koe साधुनिपुरणाम्यामार्या सप्तम्पप्रतेः ।२।३॥४३॥ प्राभ्यां योगे सप्तमी स्यादर्चायां न तु प्रतःप्रयोगे।मातरि साघुनिपु. गया है, यह मनुष्य गमुदाय का ही एक अङ्ग है। यही निर्धारण है, अतः समुदाय का ''गम से पटी अपवा सप्तमी विभक्ति होती है। इसी प्रकार-'t गोषवाटणा' गभीरा (पापों में रणा बहुत दूध वामी होनी है)-यहाँ गुण के द्वारा पृपकारण है। 'गता गरा पा पारन भीम:' (जाने वालों में दौडता हा भीम आता है) यहाँ कि के द्वारा कारण है 'er टापु पामर पर (धात्रों में मैत्र चतुर है)--यहाँ सशा (मंत्र) के द्वारा पृयकारण है। इन सभी उदाहरणों में अपने समुदाय में एक भाग को विशिष्ट दिचनाया गया है। १.८. पञ्चायति-विधान का अर्थ है-frभाग भेद। जहाँ दिगिट रूप में दिशमाई हुई वस्तु ( नियमान) वस्तुनः भिन्न होती है वहाँ (बिसने भेर दिखाया जाता है उसमें) १७मी रिमति हवी है। मापुरा: पाणिपुरम्यः मातरः (मपुरा-निवासी पारिष के मोगों से सम्मा)- महा मापुर (मदुरा के रहने पामे) पावित्री (पटना एने सनो) मे भिन है । माकुरों में दूसरों से ओशा माता पिताई गई है। पाइलिप' में पत्रकी विभक्ति होती है। ... मानिमा और निपुग योग में मनी होती है | बई में, रिमाप्रसंग में नहीं होती।

कारकप्रकरणम् । पुणो वा । अर्चायां किम ? निपुणो राज्ञो भृत्यः । इह तत्त्वकथने तात्पर्यम् । ॐ (ग) अप्रत्यादिभिरिति वक्तव्यम् ॥ साधुनिपुणो वा मातरं प्रति पर्यनु वा ॥ ११० । प्रसितोत्सुकाभ्यां तृतीया च ।२।३।४४। प्राभ्यां योगे तृतीया स्याच्चात्सप्तमी प्रसित उत्सुको वा हरिणा हरौ वा॥ १११ । नक्षत्रे च लुपि ।२।३।४५॥ नक्षत्रे प्रकृत्यर्थे यो लुप्सं- मातरि साधुनिपुणो वा-यहां 'साधु' और निपुण शब्द के योग में 'मातरि' में सप्तमी विभक्ति होती है। प्रया किम् इति--जहाँ पूजा या आदर का भाव नही होता वहाँ सम्बन्ध में पष्ठी विभक्ति ही होती है, जैसे-~'निपुणो राज्ञो मृत्यः' ( राजा का सेवक कुशल है)। यहाँ तथ्यकथन मे तात्पर्य है, पूजा का भाव नहीं । टिप्पणी-अर्चा से मिस अर्थ मे भी साधु शब्द के साथ 'साहधमाधु- प्रयोगे च' (ar) से सप्तमी विवित हो ही जाती है । ' हाँ 'सायु' प्राद के ग्रहण का फल यह है कि 'यर्चा अर्थ मे प्रति आदि के योग में साघु शब्द के साप सप्तमी विक्ति नहीं होती । अप्रत्यादौति (घा)-मूत्र में 'अप्रते.' के स्थान पर 'अप्रत्यादिभिः कहना चाहिए अतः 'प्रतिपरि' 'अनु' के प्रयोग में साधु और निपुण शन्द के साथ अर्चा अर्थ में भी सप्तमी विभक्ति नहीं होती अपितु द्वितीया होती है ( वर्मप्रवचनीययुक्त द्वितीया ); जैसे 'साधुनिपुणो वा मातरं प्रति परि बनु वा। ११०. प्रतितेति-प्रसित और उत्सुक शब्द के पोग मे तृतीया विभक्ति होती है और सप्तमी मो। सितो हरिणा हो या (हरि मे लवलीन)- यहाँ 'प्रस्ति' शब्द के योर में 'हरिणा में दृतीया तया 'हरी' में सप्तमी विक्ति होती है । इमी प्रमा "उत्सुको हरिणा होया।" १११. म चेति- उहाँ नक्षत्रवाची शब्द सुप् संज्ञा से लुप्त प्रत्य संस्कृतयारणे ज्ञया लुप्यमानस्य प्रत्ययस्यार्थस्तम वर्तमानातृतीयासप्तम्यौ रतो. ऽधिकरणे । मूलेनावाहयेद्देवी श्रवणेन विसर्जयेत् । मूने श्रवणे इति वा । लुपि किम् ? पुप्ये शनिः॥ ११२ । सप्तमीपञ्चम्यौ कारकमध्ये ।२।३१७ शक्तिद्वयमध्ये यो कालाध्वानी ताभ्यामेते स्तः। अद्य भुक्त्वाऽयं द्वघहे द्वयहाद्वा भोक्ता कर्तृ शवत्योर्मध्येऽयं कालः। इहस्थोऽयं क्रोशे क्रोशाद्वा लक्ष्यं - के अर्थ में वर्तमान होता है। अर्थात् जहाँ नक्षत्र वावी शब्द काल विशेष को प्रकट करता है वहाँ उससे अधिकरण मे तृतीया तथा सप्तमी विमवियाँ होती हैं। 'मूलेन मायाहये देवी अणेर विसर्जयेत् (मूले श्रवणे इति वा ) यहाँ 'मूल' पाद मूलनक्षत्र से युक्त काल वा बोधक है । नयात्रवाची मूल शब्द से 'नक्षत्रेण युक्तः कालः' ४१२१३ इससे 'अ' प्रत्यय हुआ और 'लुवविशेषे ४।२।४' से उसका लुप् हो गया है । इसी प्रकार 'श्रवण' शब्द है। ऊपर के नियम (१११) से इन दोनो में तृतीया और सप्तमी विभक्ति हुई है। लुपि किम इति–जहाँ अण् प्रत्यर होकर उसका लुए नहीं होता अर्थात् नक्षत्रवाची शब्द कालविशेष के लिये नहीं आना, अपने ( नक्षत्र) अर्थ में ही रहता है वहाँ अधिकरण में सप्तमी विभक्ति ही होती है तृतीया नहीं, जने 'पुष्य शनिः' (पुष्यनक्षत्र मे शनि है । ११२. सप्तमीति-दो कारक शक्तियों के बीच में जो काल और मार्ग हों उनके वावरु शम्शे से सप्तमी या पश्वमी विभक्ति होती है। प्रय भुक्त्वाऽयं द्वघहे उपहाइ वा मोक्ता- (आज खाकर यह दो दिन मे खाएगा)--यहाँ कान (यह) को क शक्यिों के बीच मे है एकक शक्ति का आज (अद्य) के भोजन से सम्बन्ध है और दूसरी का दो दिन पश्चात् के भोजन से। इसलिये कालवाची शब्द 'पह से सप्तमी या पञ्चमी विभक्ति होती है। इहापोऽयं को क्रोशा वा सक्ष्यं विध्वेत् (यहाँ रिथन होकर यह , कोश पर स्थित लप को वैध देगा)-यहां वर्ता और वर्म कारक + कारकप्रकरणम् विध्येत् । कर्तृकर्मशक्त्योर्मध्येऽयं देशः। अधिकशब्देन योगे सप्तमीपञ्चम्याविष्यते । तदस्मिन्नधिकम् ५।२।४५' इति 'यस्मादधिकम् २।३।९। इति च सूत्रनिर्देशात् । लोके लोका- द्वाधिको हरिः ॥ ११३ । अधिरीश्वरे ।१।४।६७। स्वस्वामिभावसम्बन्धेऽधिः कर्मप्रवचनीयसंज्ञः स्यात् ॥ ११४ । यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचनं तत्र सप्तमी २।३।। अत्र कर्मप्रवचनीययुक्ते सप्तमी स्यात् । उप परार्धे हरेर्गुणाः । को दो शक्तियों ('अयम् तथा लक्ष्य') के बीच मे मार्ग (क्रोश) है अत. कोश शब्द से सप्तमी या पञ्चमी विभक्ति होती है । अधिकशम्देनेति--आचार्य पाणिनि ने “तदस्मिन् अधिकम् । शरा४५ 'इस मूत्र में अधिक के साथ सप्तमी विभक्ति का प्रयोग किया है और “यस्माद् अधिकम् ०" २३६ इस मूत्र में 'अधिक' के साथ पञ्चमी का प्रयोग किया है। इस निर्देश से ज्ञात होता है कि अधिक शब्द के योग में सप्तमी और पञ्चमी दोनों विभक्तियाँ इष्ट हैं । अतएव 'लोके लोकाद् वा अघिको हरिः' (हरि लोक को अपेक्षा श्रेष्ठ है)- यहाँ 'लोके' 'लोकाद' में सप्तमी और पञ्चमी विभक्ति है। ११३. अधिरोश्वर इति-स्व और स्वामी के सम्बन्ध को प्रकट करने मे 'अधि' की कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है । ११४. यस्माद् इति-जिससे अधिक हो और जिसका स्वामित्व कहा पाये उसमे कर्मप्रवचनीय के योग में सप्तमी विभक्ति होती है । उप परार्धे हरेर्गुणा:- इसका अर्थ है-पराधं से अधिक अर्थान संख्यातीत (असंख्य) । पराधं सबसे बड़ी संख्या को कहते हैं। यहाँ 'उप कर्मप्रवचनीय संज्ञक है (उपोऽधिके २४.८७)। 'परार्ध' से अधिक हरिक गुणों का चयन किया गया है अतः 'उप' के योग मे 'परार्धे' में सप्तमी विभक्ति होती है। ऐश्वर्य विति-स्वामिल को प्रकट करने के लिये तो स्व और स्वामी मन्दों में पर्याय से सप्तमी होती है । जैसे- संपतम्याकाणे परार्धादधिका इत्यर्थः। ऐश्वर्य तु स्वस्वामिभ्यां पर्याय सप्तमी । अधि भुवि रामः । अघि रामे भूः । सप्तमी शोर रिति समासपते तु रामाधीना। 'अपडक्ष-५१४१७' इत्यादिनार ११५ । विभाषा कृषि १।४।६। अधिः करोती प्रावसंजी स्यादीश्वरेऽर्थे । यदन मामधिकरिष्यति । विनियोक्ष्यत इत्यर्थः इह विनियोक्तुरीश्वरत्वं गम्यते । अगतित्वात् 'तिडि चोदार वति-८१७१' इति निघातो न ।। इति सप्तमी । ॥ इति कारकप्रकरणम् ॥ अघि भुवि रामः (राम भूमि के स्वामी है)--यहाँ 'स्व' वाची भू शब्द से अधि कर्मप्रवचनीय के योग में सप्तमी विभक्ति होती है। अघि रामे मः (भूमि राम को स्व है)-यहाँ स्वामी वाचक 'राम'श मे कर्मप्रवचनीय अघि' के योग में सप्तमी विभक्ति होती है। सप्तमोति-'अधि राम' इस विग्रह में "सप्तमी शौण्डः” २०१४ इस सूत्र से समास' होकर राम + अपि-रामाघि से 'a' ' प्रत्यय हो जार है 'द' को 'ईन' होकर गमाधि+ ईनरामाधीन स्त्रीलिङ्ग में 'टाप' होक "रामधीना भूः" यह प्रयोग होता है। ११५. विभाति--कृत धातु परे होने, पर 'अधि' की स्व-स्वामिभा सम्बन्ध मे विकल्प से प्रवचनीय सज्ञा होती है। यदा मामधिकरिष्यति (जो यहाँ मुझे नियुक्त करेगा)—यह 'अधिकरिष्यति' का अर्थ है--विनियोक्ष्यते (नियुक्त करेगा)। यहाँ विनिपोक्त का स्वामित्व प्रकट होता है। इसी से 'अघि' की शर्मप्रवचनीय संज्ञा हो जात है और गति' संज्ञा का बाध हो जाता है। गति संज्ञा न होने से "र्ताि घोदात्तवति" ३१७१ इस सूत्र से 'अधि' को निधात (सर्वानुदात) नई -होता । 'माम्' में द्वितीया तो कर्म होने से ही सिद्ध है। यह सूत्र अपि के निधात-निषेध के लिये है। इसका प्रयोजन स्वर प्रक्रिया में है, कारक मे नही । ॥ इति कारकप्रकरणम् ॥ १ अघि शब्द शोमादिगण में पढ़ा गया है। २ अपडक्षाशितग्वलंकमलिंपुरुषाध्युत्तरपदारखः ।।१७ . -- ML

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संस्कृतम्याकरणे द्वितीयः। प्रायेणोत्तरपदार्थप्रधानस्तत्पुरुषातृतीय । तत्पुरुषभेदः कर्म घारयः । कर्मधारयभेदो द्विगुः । प्रायेणान्यपदार्यप्रधानो बहुमीहिश्च. यही प्रायेण इसलिये कहा है कि कहीं-कहीं मव्ययीभाव समास में पूर्वपद प्रधान नहीं भी होता, जैसे-'उन्मत्तगङ्गम् (उन्मत्ता गङ्गा पत्र-जहाँ गङ्गा उन्मत्त है) यहाँ अन्य पदार्थ प्रधान है। (सि० को०) (३) प्रायेणोत्तरेति-जिसमें प्राय: उत्तरपद का प्रथं प्रधान होता है वह तत्पुरुष समास कहलाता है. यह समास का तीसरा प्रकार है, जैसे-'राजपुरपम् भानय' (राजा के पुरुष को सानो) यहाँ प्रानयन (साना) त्रिया से 'पुरुष' का पन्वय होता है, प्रतः यहाँ पुरुष (उत्तरपद) का अर्थ ही प्रधान है। यहां प्रायेण इसलिये कहा है कि कहीं-कहीं तत्पुरुष में उत्तरपद का अर्थ प्रधान नहीं होता जसे "अतिमालः" (मालाम् प्रतिक्रान्तः) यहाँ पूर्वपद 'पति' का मषं प्रधान है। (सि. को०) तत्पुरुष भेद इति-तत्पुरुष का ही एक भेद कर्मधारय समास है। "तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः, १२२४२।। कर्मधारय मै भी उत्तरपद काम प्रधान होता है, भेद इतना है कि वहाँ विशेष्य और विशेषण का समास होता है, जैसे-'नीलम् उत्पलम्'-मोलोत्पलम् । कर्मधारय भेद इति--कर्मधारय का एक भेद द्विगु समास कहलाता है। जिस फर्मपारय (विशेष्य विरोपण का समाम) समास में पहला पद संख्यावाचक विदोषण होता है, उसे द्विगु कहते हैं (संस्थापृधों दिगुः २॥१॥५२॥) जैसे- पञ्चमवम् । यहाँ विशेपण है-पञ्च जो संख्यावाचक है। (४) प्रणायेति-जिसमें प्रायः अन्य पद का भर्ष प्रधान होता है यह बहुव्रीहि समास कहलाता है, यह समास का चतुर्थ प्रकार है, जैसे- "लम्बकर्णम् मानय" (लम्बे कान वाले को लामो) यहाँ अन्य पदार्थ प्रधान है। वह अन्य पदार्थ है, सब्बे कान वाला व्यक्ति विशेष । उसी का मानयन रिया से मन्वय होता है। यहाँ प्रायेण इसलिये कहा गया है कि कहीं-कहीं बहुव्रीहि समास में " सभासप्रकरणम् १०१ तुर्थः । प्रायेणोभयपदार्यप्रधानो द्वन्द्वः पन्चमः। ११६ । समर्थः पदविधिः २०११ पदसम्बन्धी यो विधिः स समर्थाश्रितो वोध्यः। ११७ । प्राक्कडारात्समासः २०१३ कडाराः कर्मधारये इत्यतः प्राक् समास इत्यधिक्रियते । ११८ । सह सुपा २।१।४ सुप् सुपा सह वा समस्यते । समा. पन्य पदार्थ प्रधान नहीं भी होता, जैसे-हित्रा: (सि• को०) दो, तीन यहाँ दोनों पदों का अर्थ ही प्रधान है। (२) प्रायेणोभयेति-जहाँ समास में प्रायः दोनों पदों का मयं प्रधान होता है, यह द्वन्द समास कहलाता है। यह समास का पोववो प्रकार है । से-'मातापितरी सेवस्व, (माता-पिता की सेवा करो), यहाँ दोनों पदों (माता, पिता) का पर्व प्रधान है, दोनों का ही 'सेवस्व, किपा से मन्वय होता है । यही प्रायेण इसलिये कहा है कि 'दन्तोष्ठम्, (सि. को०) धादि समाहार द्वन्द में 'समाहार, (समुदाय) मयं प्रधान होता है जो कि अन्य पर्थ है । टिप्पणी-इन्द्र मोर बोदि समास में दो या दो से अधिक पर होते हैं, रोष समासो में प्राय: दो हो पर होते हैं। तत्पुरुष में भी एक दो पल पर को से अधिक पद होते हैं। ११६. समय इति-पद सम्बन्धो (पद को उद्देश्य करते कही हुई) जो विधि है वह समयं पदों में जाननी चाहिये । संरत में 'पद' शम्द पारिभाषिक है । सुवन्त पौर विद्वन्त को पद कहते हैं समासविधि सुबन्तों को कही गई है..मा: यह परवियि है। समास समयं पदों का ही होता है । समर्थ पद वे कहलाते हैं, जो परस्पर पन्वित होते हैं अर्थात् परस्पर मिलकर पर्य-बोध कराने का सामर्म रखते हैं। जहाँ पदो में यह सामर्थ्य नहीं होता वहाँ समास प्रादि नहीं होने, जैसे- "मार्या राश, पुरुषो देवदतस्य" (नधिका) यहो राशः और पुरुषः परसर समन्वित नहीं है । अतः इन समास नहीं होता। ११७. प्राकाराद इति-कहाराः वर्मधारये ।२।२०३८ सूत्र से पहले समास पा भषिकार है मपति समास का प्रकारा है। ११८. सहेति-सुबम्त का मुरन्त के साथ विकास से समास होता है ।

--- संस्कृतम्पाकरणे सत्वात्मातिपदिकत्वेन सुपो लुक् । परार्थाभिधानं वृत्तिः। कृत्तद्धिर समासैकशेषसनाद्यन्तघातुरूपाः पञ्च वृत्तयः । वृत्त्यर्थावधोधकं वाक विप्रहः स च लौकिकोऽलौकिकश्चेति द्विघा। तत्र पूर्व भूतो भूतपू! इति लौकिकः । पूर्व श्रम भूत सु इत्यनौकिकः। भूतपूर्व घरहिति नि शाद् भूतशब्दस्य पूर्व निपातः। (वा) इवेन,समासो विभक्त्यलोपश्च वागयों इव वागर्याविय । इति केवलसमासः ॥१॥ समासत्वाद् इति-समास हो जाने से प्रातिपादिक संज्ञा हो जाती है (कृत्तद्धितसमासाश्च ११२।४६।) मोर प्रातिपदिक संज्ञा हो जाने से 'सुप्' (स प्रादि विभक्ति)का लोप हो जाता है (मुपो धातुप्रातिपदिकयोः २।४१७१३) पराति-अन्य मयं (परार्थ) को प्रतीति कराना वृत्ति कहलाता है । प्रत्यय अथवा अन्य पद के अर्थ सहित जो विशिष्ट मर्य हो जाता है, वह परापं ये वृत्तियां पांच हैं -कृत्, तद्धित, समास एकशेष मोर सनाद्यन्त धातु । (इनमें कृत्, तद्धित मोर सनाद्यन्त घातु में प्रत्यय के भयं सहित विशिष्ट अर्थ की प्रतीति होती है तथा समास और एकशेप मे अन्य पद के प्रथं सहित विशिष्ट प्रयं की प्रतीति होती है प्रत्ययति-वृत्ति के अयं का बोध कराने वाले वाक्य को विग्रह कहते हैं। वह लोकिक (विग्रह) मोर मलौकिक (विग्रह) भेद से दो प्रकार का है। लोक में जिसका प्रयोग होता है उसे लौकिक विग्रह कहते हैं, जैसे-'भूत- पूर्वः, समस्त पद का लौकिक विग्रह है-"पूर्व भूतः, (पहले हुमा)। इस धाग्य का लोक में प्रयोग किया जा सकता है । मलौकिक विग्रह का अर्थ है- ऐसा विग्रह जिसका लोक में प्रयोग नहीं किया जाता केवल वैयाकरण जिसका प्रयोग करते हैं, जैसे-'पूर्व मम् भूत मु' यह भूतपूर्व का प्रलौकिक विग्रह है। भूतपूर्वः (पहले हुमा)-'पूर्व भूतः, इस लोकिक विग्रह में सथा 'पूर्व भम् भूत मु, इस पलौकिक विग्रह में सह सुमा' सूत्र से पुर्वम् मोर भूत: आम्द का विकल्प से समाज होता है । समास हो जाने पर "कृत्तरितसमासारच" अथाऽव्ययीभावसमासः ॥२॥ ११६ । अव्ययीभावः २१११५॥ अधिकारोऽयं प्राक तापुरुषात् । १२० । अव्ययं विभक्तिसमीपसमृद्धिन्द्धधर्थाभावात्यया- सम्प्रतिशब्दप्रादुर्भावपश्चाद्यथानुपूर्व्ययोगपद्यसादृश्यसम्पत्तिसा- कल्पान्तवचनेषु २।१६। विभक्त्यर्थादिषु वर्तमानमव्ययं सुबन्तेन सह से प्रतिपदिक संशा होकर 'मुपो धातु पतिपदिकयोः' से 'मम्' और 'सु' विभक्ति का लोप हो जाता है। यहाँ 'भूतपूर्वे चरद' इस पाणिनिमूत्र के निर्देश से भूत शब्द को पहले रखा जाता है (पूर्वनिपात')। अब भूतपूर्व- सद की प्रातिपरिक संज्ञा होने से सु विभक्ति (प्रथम एकवचन) भाकर उसे विसर्ग होकर 'भूतपूर्वः' शब्द बनता है। इवेनेति (बा)इव' के साथ सुबन्त का समास होता है और विभक्ति का लोप नहीं होता। वागर्याविव-वागयो इव' इस लोकिक विग्रह में तथा 'वागर्थ मो इक' इस प्रलौकिक विग्रह में 'दागयों का 'इव' के साथ समाप्त होता है। पही 'भो विभक्ति का लोप नहीं होता। यही समास होने का फल है:-(१) एक १८ होना (२) समास का स्वर हो जाना । इति केवल समास ॥१॥ प्रपाम्ययीभावः । ११६. मध्यपोभाव पति-तत्पुरुष से पहले प्रत्ययीभाय इस पद का अधिकार है अर्थात् 'तत्पुरुषः' २१॥२२ से पहिले के सूत्रों से जो समास होंगे उनको व्ययीभाव संभा होगी। १२०. प्रम्मयम् इति-(1) विमक्ति, (२) समीर, (३) समृद्धि, (४) पृदि (दि का प्रभाव), (५) मपं (पस्तु) का प्रभाव, (1) भत्यय (ध्वंस), (७) पसंप्रति (मनुचित), (0) धन्द को पमिष्यक्ति, (इ) पश्चात्, (१०) यथा, (११) अनुगम, (१२) योगपच (एक साप होना), (१३) सादृश्य, (१४) समत्ति, (१५) साकल्य सम्पूएंदा) तथा (१६) पन्त, इन भर्यों में १. समास में किसी सन्द को पहले रखना 'पूर्वनिपात' पहलाता है।

संस्कृतव्याकरणे
नित्यं समस्यते सोऽव्ययीभावः। प्रायेणाविप्रहो नित्यसमासः प्रायेणा-
स्वपदविग्रहो वा। विभक्तौ । हरि डि अघि इति स्थिते ।
१२१ । प्रथमानिदिष्टं समास उपसर्जनम्
श२४३॥ समास शास्त्रे प्रयमानिर्दिष्टमुपसर्जनसंझं स्यात् ।
१२२ । उपसर्जनं पूर्वम्
२।२।३०। समासे उपसर्जन प्राक प्रयोज्यम् । इत्यधेः प्राक प्रयोगः
मुपो लुक ।
वतंमान प्रन्यय का सुबन्त के साथ नित्य समास होता है और यह प्रम्ययीमार
समारा कहलाता है।
प्रायेणेति-निस्य समाम वह कहलाता है जिसका प्रायः विग्रह नहीं होता
(मविग्रहःन दिग्रहो यस्य सोऽविग्रहः), अथवा प्राय: अपने पदों में विग्रह
मही होता, (न स्वेन पदेन विग्रहो यस्य सोऽस्वाविप्रहः)।
टिप्पणी-नित्य समास का अपने सभी पदों में मौकिक विग्रह नहीं
होता, पलोरिक विग्ह को होता ही है, जैसा कि नीये के उदाहरणों से
पष्ट है।
विमताविति-विमस्य में, यहाँ मप्तमी के प्रषं में प्रपि' प्रव्यय
है। "हरि तिमधि"इम स्पिति में-
१२१. प्रपति- समाचार में (अर्थात ममाम-विधायक भूत्रों में)
प्रथमा से निर्दिष्ट पर उपमन संग होता है।
भाष बर है किषमाम पद से बिमका बोय होता है उसकी अमन
ना होती है। जैसे 'मयं विमति.' म मूत्र में प्रथमान्त पर है-
"सम्परम् । मध्यम पद से 'प्रषि' पारि पम्पों का शेष होता. पर:
"षि' मासिकी रासन संशा होगी।
१२२. सपति-समास में समर का पहलं प्रयोग करना
चाहिये।
"रिमा पूर्व प्रधान (ifra) पा

समाचप्रकरण AR एकदेशविकृतस्यानन्यत्वात्, प्रातिपदिकस भावश्चेत्यव्ययत्वात्सुपो लुक् । अविहार १२३ । अव्ययीभावश्च २४१८ अयं नपुंसकं स्यात् । १२४ । नाव्ययीभावादतोऽम त्वपञ्चम्या: २।४।८३। सुपो सुर-इति--प्रधि का पूर्वनिपात होने पर 'अघि हरि हि' यहाँ "सुपो धातु प्रातिपदिकयोः" से डि' (सुप} का लोप हो गया । एकदेशेति--एक देश का अर्थ है भवयक (प्रश) । यदि किसी वस्तु का एकदेश (मवयव) विकृत हो जाये तो वह मन्य नहीं हो जाती; जैसे- हाप कट जाने पर भी देवदत्त नामक व्यक्ति देवदत्त ही कहलाता है। इसी न्याय से ' का लोप हो जाने पर भी 'मधि हरि' को प्रातिपदिक १ सज्ञा होती है मौर उससे 'सु' भादि प्रस्थय होते हैं। मध्ययीभावश्चेति -'मविहरि-+सु पहाँ "मव्ययीभावश्च" १३१९४१। इस सूत्र से 'भषिहरि' की अव्यय सजा हो जाती है तथा अव्यय से मागे वाले 'सुप्' का भव्ययादाप्सुपः' रा से लोप हो जाता है। इस प्रकार 'मधि हरि' रूप हो जाता है। (१) भघि हरि-हरों' इस सोकिक विग्रह मे 'हरि हिमधि इस मलौकिक विग्रह मे 'मध्यय विभक्ति०' मादि सूत्र से विभवत्यर्थ में मध्ययीभाव समास हो जाता है। पि' का पूर्वनिपात और हि' का लोप होकर 'मधि हार' समस्त पद से पाने वाले 'सु'का (मव्यय संज्ञा हो जाने के कारण) लोप हो जाता है। १२३. मध्ययीभाव इति-यह मर्यात् सम्पयीभाव समास नपुंसकलिङ्ग मे हो जाता है। १२४. नाष्पपीमावारिति--प्रदन्त का अर्थ है-मत् मर्यात् 'म' (भकार) है पन्त मे घिसके । कारान्त प्रश्पयोभाव मे परे 'सुपू' का सोप नहीं होता सपा पञ्चमी विभक्ति को छोड़कर उसे 'मम' रूप हो जाता है। १. कृतद्धितसमासाश्व । १६ ममतामाकरण “अवतापव्ययोमावारमुपो न लुक तस्य तु पम्पमी विना भमादेशश्च स्यात । गाः पातीति गोपास्तरिमनिरयधिगोपम् । १२५ । तृतीयासप्तम्योपंहुलम RIEN अदन्ताव्ययोमावा- सतीयासप्तम्योयंदुलमम्मावः स्यात् । अघिगोपम, अधिगोपेन, अधि. गोपे था। कष्णस्य समीपम उपकृष्णम् । उपकृष्णेन । मद्राणां समृद्धिः- । भपिगोपम्-'गोपाः' का ममं है 'गा: पाति इति गार्यों का पालन करने वाला। गोपा में (गोषि-गोत. वि० एक.) म लोकिक विप्रह में तथा 'गोरा पिपिइस पौकिक विग्रह में 'मम्प विक्ति०' मादि एर के अनुसार विभारपर्ष में पधि (रामी भर्ष में पप) का 'गोपा' के साप मव्ययीभाव समास होता है । 'मधि' का पूर्व निपात और हि' का लोर होकर अधिगो बनता है। अव्ययीभाव समास के नपुसक लिङ्ग में हो जाने से गोपा के मा को हस्व' (म) हो जाता है। 'मधिगोप' पद से 'सु' प्रत्यय भाकर 'सु' को उपयुक्त नियम के अनुसार प्रम् होकर अधिगोषम् रूप बनता है। १२५. तृतोपेति-प्रकारान्त अव्ययीभाव से परे तृतीया पौर सप्तमी विभक्ति को प्रायेण मम् होता है। इस प्रकार प्रकारान्त प्रध्ययीभाव से पञ्चमी विभक्ति में नित्य मधि. गोपात्' इत्यादि, तृतीया में 'मधिगोपेन मघवा 'मधिगोपम् भादि सप्तमी में 'अधिगोपे' भषवा 'मधिगौपम्' प्रादि रूप होते हैं। 'भव्ययं' मूत्र के शेप उदाहरण निम्न प्रकार हैं। (२) उपकृष्णम्-कृष्णस्य समीपम् (कृष्ण के समीप)-इस विग्रह में (कृष्ण छस् उपपलौकिक विग्रह) समीपापक 'उप' भव्यय का कृष्ण के साप 'मध्ययीभाव समास हो जाता है। शेष पहले धर्म के समान है। (३) सुमदम्-मद्राणां समुद्धिः (मद्रदेश के राजामों की समृद्धि)-स १. ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य ।।२४ समासप्रकरणम् सुमद्रम । यवनानां व्यद्धिदुर्यवनम् । भत्तिकाणामभावो निर्मक्षिकम् । हिमस्यात्ययोऽतिहिमम् । निद्रा सम्प्रति न युज्यत इत्यतिनिद्म । हरि- शब्दस्य प्रकाशः-इतिहरि । विष्णोः पश्चाअनुविष्णु । योग्यतावीप्सा. पदार्थानत्तिवृत्तिसारश्यानि यथार्थाः। विग्रह में समृद्धि मथं में 'सु' मन्यय का 'म' शब्द के साप 'मद्रमाम् सु इति' प्रन्ययीभाव समास होता है। (४) दुर्यदनम् ---यवनानां व्यदिः (भवनों की दुर्दशा)-इस विग्रह में यदि मयं मे 'दुर' प्रव्यय का 'यवन शन्द के साथ (भवन माम् दुर् इवि) मव्ययीभाव समास होता है। (५) मिमंक्षिकम् --मक्षिकाणाम् प्रभावः (मविक्षयों का भी मभाव भर्षांत बिल्कुल एकान्त)--इस विग्रह में प्रभावार्थक निर' मभ्यय का मक्षिका (सुबन्त) के साथ (मक्षिका माम् निर् इति) अव्ययीभाव समास होता है। निमक्षिका ऐसा हो जाने पर नपुसक लिङ्ग होने के कारण ह्रस्व होकर निमंतिक रूप बनता है। (६) पतिहिमम् - हिमस्य प्रत्यय: (बर्फ की समाप्ति)-इस विग्रह में प्रत्यय अर्थात् विनाश मर्य मे 'मति' पव्यय का 'हिम' के साप (हिम इस मति इति) भव्ययीभाव समास होता है । (७) प्रतिनिद्रम् --निहा सम्प्रति न युज्यते (निदा इस समय उचित नहीं) इस विग्रह मे प्रसम्प्रति (पनौचित्य) मयं मे 'मति' प्रव्यय का निदा' के साथ (निदा इस प्रति) मध्ययीभार समास होता है। (0) इतिहरि-हरिशम्दस्य प्रकाशः (हरि पद का उन्चारण)-इस । विषह में प्रादुर्भाव (प्रकट करना) मई में 'इति' पम्पय का हरि शम्द के साप (हरि इस इति) मध्ययीभाव समास होता है। (९) मनविष्ण-विष्णोः परमात् (विष्ण के बाद)-इस विषह में, पपात् अयं मे वर्तमान 'मनु' प्रध्यप का विष्ण पक्ष के साप (विष्ण इस पनु) समास होता है। (10) पोपतेति-पपा बाद के पार अर्थ है (5) योग्यता, (ख) बोप्या, .

संस्कृतव्याकरणे रूपस्य योग्यमनुरूपम् । अर्थमर्थ प्रति प्रत्यर्थम् । शक्तिमनतिक्रम्य यथा- शक्ति। । १२६ । अव्ययीभावे चाकाले ६२१ सहाय सः स्यादव्य. व्यीभावे न तु काले। हरेः सादृश्य सहरि । ज्येष्ठस्यानुपूज्येणेत्यनुज्ये- प्ठम् । चक्रेण युगपत्सचक्रम् । सदृशः सख्या ससखि । तत्राणां सम्प- (ए) पदार्थानति वृत्ति, (घ) सादृश्य । इन चारों पयों में विद्यमान मव्यय का सुबन्त के साथ समास होता है, जैसे- (क) अनुपम्-रूपस्य योग्यम् (रूप के योru)- यहाँ योग्यता प्रथं में 'मनु' भव्यय का रूप के साप (रूप हम मनु) मध्ययीभाव समास होता है। (स) प्रत्यर्षम् -मर्थम् मपं प्रति (प्रत्येक प्रपं मे)- यहाँ बोप्या (धार पार होना) भर्य में प्रति' पम्पय का 'म' (गुबन्त) के साप (मपं प्रम प्रति) अव्ययीभाव समास होता है। (1) पपाशक्ति-शक्तिम् मनतिषम्य (यक्ति का मतिरमण म करके अर्थात् शक्ति के अनुसार) यहाँ पदार्थाननिवृत्ति (वस्तु का प्रतिक्रमण न करना) पर्ष में यथा' मस्यय का शक्ति' [मुदत) के साथ (पतिमा यपा) पम्पपीभाष समास होता है। १२९. प्रथ्यपीमाव इति-'सह पदको स' हो जाता है अध्ययीभाव समास में, किन्तु मामाची उत्तरसर होने पर नहीं । (4) सहरि-हरे. सादृश्यम् (हरि का सादृश्य) -यहाँ साहएप में 'सह' मध्यप का 'हरि' (मुगन्त) के साथ (हार टासह) अध्ययीभाव समास होता है । महको '' हो जाता है। (११) भनुम्पेटम-ज्येष्ठाय प्रानुपयेण (मेट के ऋम से)--यह मानार्थ (म) अर्थ में 'मनु' मम्मा ज्येष्ठ' (मुन्न) माप (मेछ मनु) पपीभाव समार होता है। (१२) सम्-पत्रण युगपत (पा के साथ)-मविर में. योगाय (एक हार) मई में बयान छह प्रपय काप' (मुबल) रे हाय (११ समासप्रकरणम् त्तिः सक्षत्रम् । तृणमप्यपरित्यज्य सतृणमत्ति । अग्निप्रन्यपर्यनमधीते साग्नि १२७ । नदीभिश्च २।१।२०। नदीभिः सह संख्या समस्यते । (वा) समाहारे चाय- मिप्यते । पञ्चगङ्गम । द्वियमुनम् । टा सह) अव्ययीभाव समास होता है । 'सह' को 'स' हो जाता है। ससखि-सदृशः सख्या (सखा के समान)-इस विग्रह में, सादृश्य भयं में 'सह' पव्यय का 'सति' (सुबन्त) के साथ (सखि टा सह) मव्ययीभाव समास होता है । 'सह' को 'स' हो जाता है। (१४) सक्षत्रम्-क्षत्राणां सम्पत्तिः (अत्रियो की सम्पत्ति)--इस विग्रह में, सम्पत्ति पर्थ में 'सह' मव्यय का 'क्षत्र' (सुबन्त) के साथ (क्षत्र भिस् सह) मन्ययीभाव समास होता है । 'सह' को 'स' हो जाता है । (१५) सतृणम् - तृणमपि मपरित्यज्य (तिनके को भी न छोड़कर मात सब कुछ)-इस विग्रह मे, साकल्प (सम्पूर्णता) पर्थ में 'सह' भव्यय का 'तृण (सुबन्त) शम के साप (टा सह) मव्ययीभाव समास होता है । 'मह' को 'स' हो जाता है। (१६) साग्नि-पग्निग्रन्थपर्यन्तम् प्रधी (अग्निसम्बन्धी अन्य तक पढ़ता है)-इस विग्रह में 'अन्त' (पर्यन्त} मयं मे 'सह' भव्यय का 'मग्नि' (सुबन्त) के साप भव्ययीभाव समास होता है । 'सह' को 'स' हो जाता है। टिप्पणी-इन सभी प्रयोगों मे भव्यय का पूर्व प्रयोग, सुप् कालोप तथा समस्तपद से होने वाले सु को 'मम्' मा उसका लोप भादि होते हैं। १२७. नदीभिश्च इति-नदीविरोषवाची पदों के साप संख्यावापी पदों का समास होता है और वह प्रध्ययीभाव समास पहलाता है। समाहारे इति(वा)-यह समास समाहार IAggregate) में इष्ट है मति समस्त पद समाहार का बोधक होता है। पञ्चगङ्गम-पञ्चानो गङ्गानां समाहारः (पाँच गङ्गामों का समाहार)- इस लोकिक विग्रह में सपा 'पञ्चन् जस् गङ्गा वस्' इस प्रलोकिक विरह में, संस्कृतव्याफरणे १२८ । तद्धिता: ।४।१७६। आपञ्चमसमाप्तेरधिकारोऽयम् । १२६ । अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः ।।४।१०७) शरदादिभ्यः ष्टच स्यात्समासान्तोऽव्ययीभावे । शरदः समीपमुपशरदम् । प्रति- विपाशम् । नदी, विशेष वाचक गङ्गा शब्द के साप संख्यावाचक 'पञ्च' छन्द का समास होता है । (यही संस्था माद प्रथमान्त है प्रत: संख्यावाची 'पञ्चन्' दाद को उपसर्जन संशा हो जाती है। पञ्चन् पाद का पूर्व प्रयोग होकर सुप् कालोप हो जाता है । पश्चन् का न लोप (नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य) से हो जाता है ।पश्य- योमाव होने के कारण नपुसकलिङ्ग होने से गङ्गा को ह्रस्व होकर 'पञ्चगङ्ग' पद बनता है। पञ्चगा+सु-सम्पञ्चगङ्गम् । इसी प्रकार- मियमुनम्-त्यो: यमुनयोः समाहारः, (दो यमुनामों का समाहार)। १२८. तद्धितः इति-इस मूत्र से मेकर मष्टाध्यायी के पश्चम मध्याय की समाप्ति तक यह मधिकार है अर्थात् वहाँ तक तसित प्रत्यय कहे गये हैं। १२६. मध्ययीभाव इति-घर मादि वादों से पव्ययीभाव समास में समासान्त 'टप' प्रत्यय होता है । (टप में सेट् पौर का लोप हो पाता है केवम 'म' बचा है) हिप्पणी-समारा के अन्त में होने वाले प्रत्यय समासान्त प्रत्यय कहलाते हैं। सदित प्रकरण में है। अतः जिन पदों के अन्त में से प्रत्यय होते है। उनकी "स्तिसमासार" से प्रातिपदिक संजा हो जाती है भोर 'गु' पालि विभक्ति होती है। परम्परा समीरम् (घर के समीप)-इस विग्रह में, प्राय विति' मादि मूत्र से समीप अयं में 'उप' प्रयय का पद (गुबन्त) के माय र म उ०] समास होता है । 'उपयर' से गुमासान दर (4) प्रत्यय बना है। Tare+मु उपचल+प्रम- दम् ।

समामप्रकरणम्
-
(जराया जरश्च) । उपजरसमित्यादि।
१२६ (क) मनश्च ॥११०८) अन्नन्तादयीभावाच स्यात् ।
१३०। नस्तद्धिते ६।४।१४।। नान्तस्य भस्य टेलोप: स्यात्
तद्धिते । पराजम् । अध्यात्मम् ।
प्रतिविपाशम्-विपाशायाः मभिमुषम् (विपाशा नदी को भोर)-इस
विग्रह में 'लदाणेनाभिप्रती माभिमुख्ये २०११ से प्रति, मध्यय का विपास
(व्यास नदी) के साथ समास होकर, समासान्त 'टच' प्रत्यय होता है सु-मम्
होकर 'प्रतिविपासम्' रूप बनता है।
जरापान-गणमूत्र)-जरा सम्म को बरस हो जाता है तथा अध्ययी.
भाव में समासान्त रन् प्रत्यय होता है ।
उपसरसम्-अरायाः समीपम् (बुढ़ापे के समीप)-म विग्रह में 'प्रश्पर्य
विभक्त मादि से समीप पर्थ में 'उप, पम्पय रा 'जरा, (सुबन्त) के साप समास
होता है। इस मणसूत्र के अनुसार 'अरा, को परस् होकर तया र समासान्त
परयय होकर उपबरस+म+उपयरस+मु (म्)-उपवरसम् ।
१२६(८) पनवेसि-सस पायीभाव समास के पन्त में 'पन्' होता है यह
अनन्त पायीभाव है (पन मन्ते यस्य); उससे समासान्त एच् प्रत्यय होता है।
११.सद्धिताति-साराम्त भनक रोटि का मोर होता है.रित
परे होने पर।
टिपली-यही 'भ, घोर पालिनि मारणारापिट संहावें
(यषि, भ[nts'मूत्र के अनुमार यारादिपरमादिमुमादि प्रत्यय
परे होने परहले की काही ३ (३) पोन मित्र
के अनुसार पिसी म पनि सर(प) सहित भारे पापा समस्त माग it
SET है।बसे 'उमरान-पहा का
(41) है पाक्षि में

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ममाराप्रकरणम् मथ तत्पुरुषममास: ॥३॥ १३३ । तत्पुरुषः ११॥२२ अधिकारोऽय भाग्यनीहे । १३४ । द्विगुश्च २॥१॥२३ द्विगुरपि तत्पुरुपसंज्ञकया। प्रत्यय होता है। टिप्पणी-(भय प्रत्याहार है इसमें गर्गा चौथे, भीमरे, दूसरे तपा पहले अक्षर पाते है। १भा प्रत्याहार वाले अक्षरों में से किसी भन्न में हो उसे मायन कहा जायेगा । सामिष-उपसमिन् - 'समिप ममोपम' (मगिधा मोर)-ग विपद में समीप अर्थ में 'उ' पाय गमि' के माप पम्पमीभाव समास होना है। पर समामान्त 'टच् प्रत्यय हो आमा है तो 'उपसमिषम् नहीं तो 'उपमित होता है। यमयीभाव ॥२॥ पापुष्पm.art-पहने न.प. पपिसार पर्यात तत्तुल २।१।२२' से 'शेपो गोहिः ॥२२॥ में पूर्व गूगों में जिम ममाम विधान निमारा वह ताररमार होता है। १५.fryाति-णि ममाग भी तमा माग OR REP गिपि मारे १ कोई)। पिलो-तररममा भार सहना है-11) पिसाप (३)सिया (1) समानाधिकरण सरप में परंपरा उत्तरपरी मान (या कि होती है। पर्मबारय और समानाधिका साताप है। (२) आणि पुर में पूजा मेरा मनमी Frefrrer में होता है और उE Tufeति में। सिनि में रोता है उसी नाम से साप हा १. fre FREE:-पाnिferent fr पा पूर्वपापम्' रहो। १. पा. पास, परर.

HAT
संस्कृतव्याकरणे
१३५। द्वितीया श्रितातीतपतिलगतात्यस्तप्राप्तापन्नः ।।२४'
द्वितीयान्तं श्रितादिप्रकृतिकैः सुबन्तैः सह वा समस्यते, स च तत्पुरुषः ।
कृष्णं श्रितः कृष्णनितः इत्यादि।
१३६ । तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन २०११३० सृतीयान्तं
एतीयान्तार्यकृतगुणवचनेनार्यशब्देन च सह वा प्राग्वत् । शहकुलया
खण्डःशकुनाखण्डः।
१३५. द्वितीयेति-द्वितीयान्त का पित (पाधित), पतीत (पार पा)
पतित (गिरा), गन (गया), परयस्त (फैका हमा), प्राप्त, प्रापत (पाया
हमा)-नामों से बने सुबन्त के साथ विकला से समास होता है तथा
वह तत्पुरुष समास रहलाता है।
छापित:-कृष्ण, पित' (म पर पाश्रित)-per पम् श्रित
मुग पिह में हनीपान्त 'कृष्ण' मका पितः' मुयन्त के साप समास
होता है। राम का पूर्व निगम और गृप का मोष होकर 'पथित'
यह समस्त पर होता है। इससे प्रथमा के एकयनन में 'गु' प्रत्यय हो।
प्राषितः' होगा।
हमी प्रसर दुमाती (दुसा भनीतः). तित: (पति)
: (पाम.ग.), हिमात्यातः (सुहिनम् परमानः), समगज (मुगं
प्राप्तः) दुमन पासिय होते है।
ferenी-लिया. मात्र में द्वितीया प्रथमा विभक्ति में
है। यह विग्रह में स्थित कृष्णम' प्रालिका बोध, प्रतः प्रथमानिर्दिष्ट
समास उसमरस'गे 'वृष्ण'माको मन मंशा हार 'उसमर्थन
पूर्वम्' मे उमानित (प्रपोग) होता है। इसी प्रकार तासभाम
पारिमें भी
१३. जोति-तीयान बारम भर्ष में यह मुगाची
छापामार मार समान होता है और समान
मामा-मालदा समः' मंगो मे रिका RT Am) !
१. पहल्दिनवारक (रापोरया)

समासप्रकरणम्
धान्यनाथों धान्यार्थः । ततेति किम | अक्षणा कारणः ।
१३७ । पतूंपारणे कृता बहुलग २०१३। तरि करणे च
तृतीया करतेत पहुल प्राग्वर । हरिणा वातो हरित्रातः । नरोभिन्नो
मा'
पुरावा है और यह तृतीया के अपं पसा से किया हुया है. पर.
प्रा प्रत्र से समान होता है। साबुला रा स इस सीरिक हि में
इमा' या पूर्व निपात, मुर लोप होकरयला समन पर बनना
है । इससे प्रपमा एकवचन में दामासः'।
पाया:-धान्येन पर्थ: (धान्य से पन)-स सौनिक वियह में सपा
'पाय टापुस पोलिविण्ह मे तापुरुष समास होता है।
सहरिमिनि-मूत्र में 'तात' 'रम तृतीयान्न यि हुमा) पर
पर्यो रहा ? मरिये तिनही तृतीयान (4) गया (पा गुणामक नहीं
वह समास नहीं होता।
इस प्रकार 'पणापाणः' में ममाग नहीं होता, पणकि समाग्न मा
पामा महीं।
१७.लिस्ता पोरस मे को तृतीया उम दृरोपान
mngam के साप पा समाप होता है और वह तुष ममाम
परमाता है।
हरितारणा Ir: RR A tea-मोnिe.frrr में सपा
हनिमुरम पोrain मे पुल समान हो गया है। (यहाँ
हरिणा' होसमा 'मा' पात्रोका' समे
भएर होना IRATE पाई त्।
मनभितर्ग:शिलः (बलों में पारामा)-म सौe for मे
NAPATI'm alie fier हर घाम राई।
{cat .. परत शो और नियन'
परमा)।

माकृतव्याकरणे नसभितः। "कृद्महणे गतिकारकपूर्वस्याऽपि प्रहणम" नखनिर्भिन्नः। १३८ । चतुर्थी तदर्थार्थवलिहितसुखरक्षित: ।२।१।३६। चतुध्यन्ताग यत् तद्वाचिना अर्यादिभिश्च चतुर्यन्तं वा प्राग्वत् । यूपाय दारु यूपदारु । तदर्थेन प्रकृतिविकृतिभाव एवेष्टः तेनेह न-रन्धनाय स्थानी। कृप्रहरत इति (५०) - कृदन्त के ग्रहण में गति और कारक पूर्वक (कृदन्न) का भी ग्रहण होता है, अर्थात् जो कार्य कृदन्त को कहा जाता है वह गति (अ, परामादि) मोर कारक (कम मादि) जिसके पहले हो ऐसे कृदन्त को भी होता है । इसका फल यह होता है कि तृतीयान्त 'नख' का निर्मिन्न शब्द के साथ भी समान हो जाता है। यहां निभिन्न' शब्द में निर गति संज्ञक है और रूपयुक्त परिभाषा से कृदन्त के ग्रहण से इसका भी ग्रहण हो जाता है । इस प्रकार ननिभिन्नः' यह समस्त पद बनता है । १८. चतुर्थीति- चतुर्यन्त का अर्थ है- चतुर्थी है अन्त में जिसके । चतुभ्यंन्त के मयं के लिए जो वस्तु हो उसके वाचक शब्द तथा प्रथं, बलि, हित, सुख पोर रक्षित इन शब्दों के साथ चतुर्यन्त का विकल्प से समास होता है और वह तत्पुरुष समास कहलाता है । यूपदार-यूपाय दारु (यज्ञस्तम्भ के लिये काष्ठ)-इस लौकिक विग्रह में तथा 'यूप है, दारु सु मलौकिक विग्रह मे यूप सन्द का दारु शब्द से तत्पुरुष समास होता है । यहाँ 'दारु' (काष्ठ) चतुर्यन्त (यूपाय) के मथं यूर [यशस्तम्भ के लिये है। - तवयनेति-सूत्र में 'तदर्थ' से प्रकृतिविकृतिभाव इष्ट है। प्रकृति का प्रथं है-उपादान कारण और विकृति का भयं है-कार्य। भाव यह है कि 'जहाँ चतुर्यन्त का अर्थ [पदापं] कार्य हो मोर उतरपद का मर्य उसका उपादान कारण प्रकृति हो वहाँ यह समास होता है, जैसे उपयुक्त उदाहरण में 'दार' (लकड़ी) प्रकृति है उससे यूप बनता है और विकृति है। इसी प्रकार 'घटभृत्तिका' 'पट-तन्हद; माद में । किन्तु - 'यूप' उसकी समासप्रकरणम ११७ 2 (41) अर्थेन नित्यसमामो विशेष्यलिङ्गता चेति वक्तव्यम् ।। द्विजाः सूपः । द्विजार्या यवागू। द्विजार्थ पयः भूतवलिः । मोहितम। गोसुखपा गोरक्षितम। १३६. पञ्चमी भयेन ।।१।३७ चोराद् भयं चोरभयम् । 'रचनाय स्याली' (रोपन के लिये देगची) यहाँ स्थाली धन का उपादान कारण नही, मतः यहाँ यह समास नहीं होता। माय मेति 'वा)-मर्थ शब्द के माय नित्य समास होता है। तथा समस्तपद का विशेष्य के समान लिङ्ग होता है। रिजायं तपः--दिजाय प्रथम इति द्विवार्थः (ह दिन के लिये है)यहाँ निस्य समास होने से अपने पदों में मौकिक विग्रह नहीं होता (मस्वपविग्रहः) । दिन पर्थ मु यह पलौकिक विग्रह है। तत्पुरुष समास होकर द्विआर्य' समस्त पर होता है । इसका विशेष्य के सणन रिङ्ग हो जाने से डिजापः सूपः द्विज के लिये दाल (पद पुल्लिङ्ग है) यह प्रयोग होता है- इसी प्रकार दिसाय पम्' दिलार्धा पागू:' (बाहरण के लिये लप्सी) (स्त्रीलिङ्ग), दिमाय इदम् विजार्थ पयः' (बाहाण के लिये दूष) (नसक तिक) होता है। इसी प्रकार मृतबलिः-~-भूनेम्य,बलिः (भूतों के लिये बलि), गोहितम गोम्यः हिलम (गायों के लिये हितकर, सुझम-गोम्ब गुरुम् (गायों के पिये मुखार), गोरहिरम् - योग्य रहितम् (भायों के लिये रासाहुप्रा), प्रादि में चतुर्क तत्प ममाम होता है। १३६. पोति-पसम्पन्त का भयानक गुरुन्त के साथ विकल्प से समास होता है और यह सत्तर सालाना है। धोरम-बोरा भयम् (पौर से भा)-18 मौकिन हि में मा "पोरसि भप पुस मलौकिक विग्रह में पोरान (पचापात) 'भपम् साप पास हो जाता है।

११८ संस्कृतम्याकररो १४०-1 स्तोकान्तिकदरार्थकृच्छाणि क्तेन ।२।१॥३६॥ १४१ । पञ्चम्पा: स्तोकादिभ्यः ।६।३।२६ बलुगुप्सरप स्तरेकान्मुक्तः । अन्तिकादागतः। अभ्याशादागतः। दूरावागतः। कृष्ण दागतः। १४२ | पष्ठी ।।२।। सुबन्तेन प्राग्वत् । राजपुरुषः । । । १४३ । पूर्वापरायरोत्तरमेकदेशिनकाधिकरणे २२२॥१॥ १४.. स्तोति-स्तोक (पोका मन्तिक समीप) और दूरस्न पर्षो । [सम्म तपाइन पञ्चम्यन्त पदों का प्रत्ययान्त गुबन्त के साथ मा होता है और वह ताप ममास कहलाता है। ११. पडसम्माति-शोर मारिपादों गे उसपर परे रहो पञ्च विभक्ति का मुरु [A] नहीं होता। मोहामुत-स्तोमात् पुरक [पोई से मुक्त हुपा]. पEिET:-प्रन्तिादात् पात: (पास से प्रापा हमा), पम्यार-म्यागात् मागतः (पास से पाया हपा), राम:-रान मागतः (दररो माया हमा), anगत: दात पागत. [कष्ट से प्राण मा}-1न गोगो गपूत्र मे परमीतत्यु सराम होता है सपा पयमा विमान । अनुसनोजभाष होता है। १४२. पष्टोनि-पष्टपात मुबम के साथ समाम होता है और। पिष्टी हार करताना सम्पुरष--रामपुरः राजा का पुल-दम मौद्धिक विग्रह में रात ४ पुष्प मुहम किषि में पटीप ममाण होगा। Fध होर' मोर होता है दक्षा पा समान पाला प्रति-सच में एकदेशीरा पर्व है-प्रती एयmalfar शहरको एकाधिकरण राई- म [lin Int-धारे 1), अपर परत समासप्रकरणम् अवयविना सह पूर्वादयः समस्यन्ते एकत्वसइख्याविशिष्टरचेद्वयवी। पष्ठीसमासापवादः। पूर्व कायस्य पूर्वकायः । श्रपरकायः । एका घिकरणे किम् ? पूर्वश्छात्राणाम् । १४४ । अधं नपुंसकम् ।।२। समांशवाच्यर्धशब्दो नित्यं क्लीधे प्राग्वत् । अर्घ पिप्पल्या अपिप्पली। (ऊपर का)-इन पदों का प्रवयवी वाचक शो के साथ समास होता है यदि प्रदयवी एकत्व सरूयायुक्त हो, अर्थात् एक' हो । षष्ठी समाति--यह षष्ठी समास का अपवाद है। इस सूत्र से समास विधान करने के कारण शब्दो के 'पूर्वप्रमोग' (पूर्वनिपात) में भेद हो जाता है, जैसे-पूर्व कायस्य' यहाँ 'पष्ठी' समास होता तो 'काय' का पूर्वनिपात होता किन्तु प्रस्तुत सूत्र से समास होने पर पूर्व' पद का पूर्वनिपात होता है क्योकि समास शास्त्र में 'पूर्व' इत्यादि प्रथमा निर्दिष्ट है । पूर्वकाय! पूर्व कायस्य (शरीर का अग्रभाग)-इस लोकिक विग्रह मैं तथा 'पूर्व भम् काय ङस्' इस प्रलोकिक विग्रह मै उपयुक्त सूत्र से तत्पुरुष समास होता है । यहाँ 'काय' एकत्व सस्यायुक्त अवयवी है और पूर्व उसका अवयव है। इसी प्रकार पपरकाया--'अपरं कायस्' (शरीर का पिछला भाग) । एकाधिकरणे किम् इति-सूर मे एकाधिकरणे कहने का क्या अभिप्राय है ? यह कि जहाँ मवयवी बहुख सस्यायुक्त होगा वहाँ समास नहीं होगा.. जैसे 'पूर्वछात्राणाम् (धात्रों का पूर्व भाग) यह समास नहीं होगा, क्योंकि पात्र एक नहीं मनेक है। १४.अभंम् ति–'समान भाग इस पर्व का वाचक 'म' शब्द है, मो नित्य नपुसक लिङ्ग में होता है। उसका एकत्व संस्थायुक्त प्रत्यको के साप समास होता है और वह तत्पुरुष समास कहलाता है। प्रपिपली-म पिप्पल्याः (पीपली कामघं भाग)-इस सौकिक विग्रह में सपा पर्ष पम् पिप्पली इस्, इस मलौकिक विरह में उपयुक्त सूत्र से समास - १२० संस्कृतम्याकरणे १४५। सप्तमी शोण्ड: २।१।४। सप्तम्यन्तं शौरडादिभिः प्राग्वात् । अक्षेपु शोएहः अक्षशोएड. इत्यादि । द्वितीयाहतीयेत्यादियोग- विभागादन्यत्रापि सृतीयादिविभत्तीनां प्रयोगवशासमासो झंयः। १४६ । दिकमध्ये संज्ञायाम् ।२।१।५०। सज्ञायामेवेति निय. होता है । मधं पद का पूर्व निपात होकर 'प्रपंपिप्पली' दाम बनता है (यहाँ सत्पुरुप में पूर्व पद प्रधान है)। १४५.सप्तमीति- सप्तम्यन्त का कोड प्रादि राम्दों के साथ ससास होता है और वह तत्पुरुष समास कहलाता है माशोड:-प्रक्षेपु शौण्डः (पासे फेंकने में पतुर)-इस लौकिक विग्रह मे तपा 'भक्ष गुप् शौण्ड मु' इस भलौकिक विग्रह मे तत्पुरुष समाप्त होता है । यहाँ सप्तम्यन्त का पूर्वप्रयोग होता है। द्वितीयेति - ('द्वितीया श्रितातीत.' मादि समासविधायक सूत्रों में) द्वितीया तृतीया इत्यादि योग-विभाग करने से प्रयोग के मनुसार अन्यत्र (उक्त स्थलों से भिन्न स्थानों में भी तृतीया प्रादि विभक्तियों का समास जानना चाहिये, पति जिन शब्दों मे द्वितीया मादि समास कहा गया है, उनसे भिन्न शन्दों में भी कहीं कही शिष्ट प्रपोग के अनुसार समास समझना चाहिये । १४६.दिवसंहपे इति-संशा के विषय में दिशावाचक शम्दों का समाना- धिकरण मुवन्त के साथ समास होता है मौर यह तत्पुरुष समास कहलाता है। टिप्पणी-सप्तमी शोण्डः । ४५ तक व्यषिकरण सत्पुरुष दिखाया गया है जैसा कि उदाहरणों से स्पष्ट है इसमें पूर्वपद पर उतर पद भिन्न भिन्न विभक्ति में हैं । मूत्र १४६ से लेकर "उपमानानि सामान्यवचनः" तक समानाधि करण तत्पुरुष समास दिखलाया जा रहा है। इसमे पूर्वपद तथा उत्तरपद समान विभक्ति में होता है।

समासप्रकरणम् मार्थ सूत्रम् । पूर्वेपुकामशमी । सप्तर्षयः । तेनेह न । उत्तरा वृताः । पञ्चाक्षण: १४७ । तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च तद्धिताथै विषये उत्तरपदे च परतः समाहारे च वाच्ये दिक्सइख्ये प्राग्वत् । पूर्वस्यां शालायां भवः पूर्वा शाला इति समासे जाते । पूर्वेषुकामशमी--पूर्वा इषकामशमी इस लौकिक विग्रह में तथा 'पूर्वा सुपुकामशमी सु' इस पलौकिक विग्रह में प्रकृत सूत्र से तत्पुरुष समास होता है । 'पूर्वपुकामशमी' प्राचीनकाल के किसी ग्राम का नाम है । सप्तर्षप.-'सप्त च ते ऋषप.' इस बलौकिक विग्रह में तथा 'सप्त जस् ऋपि जस्' इस मलौकिक वियह मे तत्पुरुष समास होता है । संख्यावाचक का पूर्वनिपात, सुप लक् होकर सप्तर्षि से प्रथमा के बहुवचन में 'सप्तर्षमः' रूप होता है। संज्ञायाम् इति-संगा में ही दिशावाची मोर सरूपावाची का समास होता है । इस प्रकार के नियम के लिये यह सूत्र है, अन्यथा समास तो विशेषणं' विशेष्येण बहुलम् २११०५७। से सिन हो पा । इस नियम के कारण यहाँ समास नहीं होता; जैसे-'उत्तरा वृक्षाः' 'पञ्च ब्राह्मणा:' भयोंकि यहां संज्ञा १४७ तद्धितेति--तदितार्य के विषय मे, उत्तरपद परे होने पर और यदि समाहार काव्य हो सो दिशावाचक भोर संख्यावाचक शब्दों का समानाधिकरण सुबन्त के साथ समाप्त होता है और यह सत्पुरुष समास कहलाता है। पूर्वस्याम् इति-यह सचिवार्य के विषय में उदाहरण है । 'पूर्वस्यो शालाय भवः' (पूर्व पाला में होने वाला) यहाँ 'म:' ने वाला यह दिसाप है। इस विषय में 'प'- होकर, सूप का लोप समाव ॥॥२७ 23 (41) सर्वनाम्नो वृत्तिमाये यायः । १४८ । दिर्वपदादसंज्ञायां नः ।४।२।१०॥ अस्माद् भवार्य पः स्यादसंज्ञायाम। १४६ । तदितेप्वचामादे: २११७मिति णिति च तद्धिनेष्व- चामादेरचो वृद्धिः स्यात् । यम्येति च । पौर्वशालः । मनाम्न इति (वा)- सर्वनाम को वृत्ति मात्र में पुंदभाव हो जाता है। पीधे कहा गया है कि कृतदित समास पादि पांच वृत्तियां रहनाती है । उनमें इस नियम से सर्वनाम स्त्रीलित शन्दों का पुल्लिङ्ग के समान रूप हो जाता है (बदभावः) । यहाँ समास पत्ति है भएप 'पूर्वाशाला' में पूर्वा' को पुरमाय होकर उसमें स्त्रीत्वबोधक 'टा' प्रत्यय नहीं रहता और 'पुवंशाला' बन जाता है। १४. दिक् पूर्वेति-जिसमें दिशावाचक पूर्वपद होता है ऐसे शम्म से भय (होने वाता) मर्ष में 'य' प्रत्यय होता है यदि संज्ञा न हो। 'ब' में 'स' की इत् संझा होकर उसका लोप हो जाता है पोर 'म' शेप रहता है। इस प्रकार 'पूर्व घाला ' इस स्थिति में- १४६. सद्धितेविति-मित पौर णित् तदित परे होने पर प्रों में भादि मथ को वृद्धि होती है। नित् का पर्व है-'' है इत् संज्ञक जिसमें | यही 'ब' प्रत्यव जित् तद्धित है मतः पूर्व शाला 'प्र' में 'पू' के ऊ (मादि मन्) को वृद्धि होकर 'मो' हो जाता है । 'पौवंशाला+' में 'यस्येति प १४ से 'सा' के मा का लोग हो जाता है मौर पौवंशाल राम से प्रयमा विभक्ति के एक वचन मैं 'पौवंशालः' पोशाल:--'पूर्वस्यां शालायो भवः' (पूर्व शाला में उसष्ट हुमा)- इस सौकिक विग्रह में सपा 'पूर्वा हि शाला डि' इस प्रलोकिक विषह में (तद्धिसार्थोत्तरपदसमाहारे च) तदितार्य में तत्पुरुष समास होता है। सुप् का भोप होकर 'पुर्वाशामा शब्द में पूर्वा को पदभाव तथा पुवंशाला शन्द के ------- समासप्रकरणम् १२३ पञ्च गावो धनं यस्येति त्रिपदे बहुव्रीहौ (वा) द्वन्द्वत्तत्पुरुषयोत्तरपदे नित्यसमासवचनम्। १५० । गोरतद्धितलुकि ५।४।१२। गोऽन्तात्तत्पुरुषाच स्यात् समासान्तो न तु तद्धितलुकि । पञ्चगवधनः । (दिकपूर्वपदासज्ञायां नः) 'अ' तद्धित प्रत्यय हो जाता है। पूर्व शाला+म (ब) इस दशा में प्रादि वृद्धि ऊ को प्रो तथा 'यस्येति च' से लकार के पागे वाले प्राकार का लोप होकर 'पौवंशाल' शब्द बनता है उससे प्र• एक. में पौवंशालः। पञ्च गावो षनं यस्य (पांच गायें हैं धन जिसका)-इस तीन पदों के बहुवोहि समास मे-उत्तरपर (धनम्) परे रहते 'पञ्चन्' मोर 'गो' शब्दों का विकल्प से तत्पुरुष समास प्राप्त होता है- इन्टेति (वा)-द्वन्द्र भोर तत्पुरुष समास मे उत्तरपद परे रहने पर नित्य समास कहना चाहिये। इस वात्तिक से यहाँ तरपुरुष समास निस्प होता है। सुप् का लोप होकर तथा न् का लोप होकर पञ्च पो धन' इस स्थिति में- १५. गोरिति-जिसके अन्त मे गो शम्द हो, ऐसे तत्पुरुष से टच समासान्त प्रत्यय होता है किन्तु तदित का लुक (लोप) जाने पर नहीं होता। 'टच्' में से 'ट्' और 'च्' चले जाते हैं म' रहता है। इससे 'ट' प्रत्ग्य होकर 'पञ्चगो++धन' इस स्थिति में 'मो' को 'भद' होकर 'पञ्चगवधन, सम्म बनता है। पञ्चगवपन:-'पञ्च गावो घनं यस्य' (पोव गायें है धन जिसका)-इस मलौकिक विग्रह में तया 'पञ्चन् जस् गो जस पर मुं' इस प्रलोकिक विग्रह में बहुबीहि समाप्त होने पर उत्तरपद परे रहने पञ्च भौर गो पद का निरव तत्पुरुष समास होता है । सुप का लोप होकर तमा न लोप होकर 'पञ्चगोषन १.न लोप. प्रातिपदिकान्तस्पा मारा " . .* १२४ संस्कृतव्याकरणे १५१ । तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः १।२।४२। १५२ । सत्यापूर्वो द्विगुः । २।१३५२१ तद्धितार्थे त्यत्रोक्तरित्रविधः सख्यापूर्वी द्विगुसंज्ञः स्यात् । १५३ । द्विगुरेकवचनम् २।४।१॥ द्विग्वर्थः समाहार एकवत् स्यात् । १५४ । स नपुंसकम् ।२।४।१७) समाहारे द्विगुद्वन्द्वश्च नपुसकं स्यात् पञ्चानां गवां समाहारः पञ्चगवम् । इस अवस्था में 'पञ्चगो' से समासान टच् प्रत्यय होकर मो को प्रव हो जाता मोर पञ्चगवषन धन्द से प्रथमा के एकवचन में 'पञ्चमवधना' रूप नता है। १५१. तत्पुरुष इति-समानाधिकरण तत्पुरुष की कर्मधारय समा ती है। समानाधिकरण का पर्व है-समान है प्रधिकरण (माचार अथवा भिधेय) जिनका । जहाँ पूर्वपद तथा उत्तरार दोनों समान प्रर्यात एक वस्तु लिये हो पाते हैं. वह ससुरुष समानाधिकरण कहलाता है जैसे - 'नीलमु. लम्'-नील च तद उसमम् (नीला है जो उसल)- यहाँ 'नीलम्' तपा सपम' एक ही वस्तु को प्रकट करते हैं तथा पूर्वपर मोर उतरपद विप्रह रामान विभक्ति वाले ही होते हैं। १५२. संख्यापूर्व इति-तद्धिताप' मूत्र में उक्त तीन प्रकार के बस में यदि पूर्वपद सस्यावाची होता है तो वह द्विगु समास कहलाता है। १५३.द्विगुरिति -दिगु समास का मपं समाहार (समुराय) एकवमन में, १५४. म पनि ममाहार में हिगु मोर न ममाम नगुमानित पञ्चपरम्-'पञ्चाना गर्दा समाहार:' (परि माप का समुदाय)- नोकि विग्रह में दपा ‘पयन पाम गौ माम् ण प्रसोक में समासप्रकरणम् १५५ । विशेषरणं विशेष्येण बहुलम् २।१६५७ भेदकं भेयेन समानाधिकरणेन बहुल प्राग्वत् । नीलमुत्पल नीलोत्पलम् । बहुलप्रह- 'तद्धितापं०' से समाहार अयं मे समास होता है। सुप् का लुक् होकर 'पञ्चन गो' इस अवस्था में 'न्' लोप तथा समासान्त टच् प्रत्यय (मोरहितकि) हो कर- पञ्च गो-+- (रच्) प्रोकार का पद मादेश होकर पञ्चाय बन जाता है। दिगु संशा होने से एकवचन तथा नपुंसकलिङ्ग होकर प्रथमा विभक्ति के एकवचन मे 'पञ्चगवम्' रूप होता है । १५५. विशेषणम् इति-विशेषण का विशेष्य के साथ बहुलता से समास होता है मोर वह कर्मधारय समास कहलाता है। विशेषण का मर्थ है--भेदका जो समान वस्तुओं मे भेद करता है। जैसे- "कृष्णा गौः' यहाँ कृष्ण' शब्द 'गो' को अन्य श्वेतादि) गायो से भिन्न रूप में बतलाता है। जिसकी विशेषता (भेद) बतलाई जाती है यह विशेष्य या भेट कहा जाता है। जैसे ऊपर के उदाहरण में 'गो' विशेध्य है । नीलोत्पलम् -- नीलम् उत्पलम्' (नीला कमल)-इस तौरिक विग्रह में तथा 'नील सु उत्पल स्' इस पलौकिक विग्रह मे । विशेषण (नीलम्) और विशेष्य (स्पलम्) का समास होता है। इसमे विशेषणाची L का पूर्व निपात होता है वहीं समास-शास्त्र में प्रथमानिर्दिष्ट है--विशेषणम्' इति ।) शोष पूर्ववत् । बहलपहरणाद् इति--सूत्र में 'बहुल' शब्द के ग्रहण से कही कहीं यह समास नित्य भी हो जाता है । बहुल' दाद का प्रपं है मन् पर्याद साति' (जो बहुत से पयों को प्राप्त कराता है)। इसके प्रयोग से चार प्रकार के प्रपा जाते हैं. (१) कही कोई नियम (नित्य) संग जाता है । १२ वहीं बिस्कुस नहीं लगता। (३) कहीं विकल्प से लगता है। (१) कहीं कुछ अन्य (मूत्र से प्रमानु) कार्य भी कर देता है। *याचित् प्रवृत्तिः काचिद वृत्तिःवचिद विभाषा क्वचिदन्यदेव । विधेविषानं बहुषा समीर चतुर्विषं बाहुलकं वदन्ति ।। .

संस्कृतमाकरणे णात क्वचिनियम फष्णसर्पः । क्वचिन्न-रामो जामदग्यः । १५६ | उपमानानि सामान्यवचनः ।।५॥ धन इव श्यामो घनश्यामः । (वा) शाकपार्थिवादीनां सिद्धये उत्तरपदलोपस्योपसह- ख्यानम् ॥ शाकप्रियः पार्थिवः शाकपार्थिवः । देवपूजको प्रामणो देवनाझणः। कृष्णसर्प:-(काला साप) 'कृष्ण सु सर्प स' इस मलौकिक विग्रह में विशेषण विशेष्य का समाम (कर्मधारय) होता है। यहा (बाहुलकात्) यह समास निस्य ही होता है । 'कृष्णसर्प' नाम को सांपों की जातिविशेष है उसके लिए 'कृष्णः सर्प:' ऐसा विग्रह वाक्य प्रयुक्त नहीं होता। रामो जाममन्यः-बहुल ग्रहण करने से ही यहाँ उपयुक्त नियम से समास नही होता (२ काचिद् मप्रवृत्तिः)। १५६. उपमानानि-उपमानवाचक सुबन्तों का समानधर्मवाचक शब्दों के साप समास होता है और वह कर्मधारय (तत्पुरुष) समास कहलाता है। जिससे किसी की समता दिखलाई जाती है वह उपमान कहलाता है मौर जिस धर्म के कारण समानता दिखलाई जाती है वह सामान्यवचन या समान. धर्म कहलाता है। घनश्यामः-घन इव क्ष्यामः {घन के समान श्याम)-इस लौकिक विग्रह मे तथा 'धन सु श्याम सु' इस मलौकिक विग्रह में प्रस्तुत सूत्र से उरमान- पाचक 'धन' शब्द का समानधर्मवाचक 'श्याम' शब्द के साथ समास होता है। यहाँ लोकिक विग्रह मैं 'इव' द्वारा यह प्रकट होता है कि 'इन' शब्द लक्षणा द्वारा धनसहश को कहता है। इसलिये 'घन' धन्द का पयाम' शब्द के साय सामानाधिकरण्य है। शाकेति (था)-घाकपापिय मादि समासों की सिद्धि के लिए उतरपद का सोप भी हो जाता है। भाकपार्थिवः--शकप्रियः पार्षिक: (पाक में चि रखने वाला समाप्तप्रकरणम् १५७ । नञ् ।।२।६। नत्र सुपा सह समस्यते । १५८ । नलोपो नत्र: ।।३।७२। नबो नस्य लोपः स्यादुत्तरपदे । न ब्राह्मणः अन्नामणः । १५६ । तस्मान्नुडचि। ६।३७४ लुप्तनकारान्नम उत्तरपदस्या- जादे डागमः स्यात् । अनश्चः । राजा)---स लौकिक विग्रह मे तपा 'शाकप्रिय सु पार्थिव सु' इस मलौकिक विग्रह मे विशेषण विशेष्य का समास होकर उपयुक्त वातिक से याकप्रिय' के उत्तरपद 'प्रिय' का लोप हो जाता है। इसी प्रकार 'देवपूजको ब्राह्मणः' में 'पूजक शब्द का लोप होकर देवब्राह्मण.' शब्द बनता है । १५७. ना-नाका सुबन्त के साथ समास होता है और वह तत्पूरुप (न तत्पुरुष समास कहलाता है । १५८. नलोप इति-ना के न का लोप हो जाता है उत्तरपद परे होने पर। मनाहारा:~न ब्राह्मरणः (ऐसा व्यक्ति जो ब्राह्मण नही है अर्थात् ब्राह्मण से भिन्न मोर ब्राह्मण सदृश)-इस लौकिक विग्रह में तथा 'न ब्राह्मण सु' इस अलोकिक विग्रह में 'नत्र' का 'ब्राह्मण' के साथ समास होता है। न्' का लोप होकर म+बाह्मण+मब्राह्मण. रूप होता है। १५९. तस्मादति-जिस नन के नकार का लोप हुमा हो उससे परे मजाति उत्तरपर हो तो समे नुट का मागम हो जाता है । 'जुट' मे टु को इसंशा होकर बोर हो जाता है | उकार उच्चारण के लिये है। अत: पोप रहता है और वह उत्तरपद के मादि में रखा जाता पनव:-न अश्वः (ऐसा पारी जो अपवन हो)-इस मोकिम विह में तपान भश्व सु'इम मलौकिक विग्रह में ना समास होकर न् कालोप हो जाता है । 'म+मश्व' इस अवस्था मे उपयुस नियम के अनुसार नुद का भागम होकर म+++नव समस्त पद होता है । इस प्र. एक. में मनश्वः।

नेकधेत्यादौ तु नशब्देन सह 'सुप सुपेति समासः।
१६० । कुगतिप्रादयः । २।२।१८)
एते समर्थेन नित्यं समस्यन्ते । कुत्सितः पुरुषः कुपुरुषः ।
१६१ । ऊर्यादिविडाचश्च ॥६॥ ऊर्योदयः कल्यन
नया-न एग्धा इस विग्रह मे 'न' शब्द के साथ 'एकषा' कामका
'सुप सुपा' से समास होता है। यह केवस समाम' के अन्तर्गत होगा, ममतत्पुरुर
समाम के नहीं । 'नाएका' के साथ ना. तत्पुरुष समास होकर ते
न पोर, नुट का प्रागम होकर 'प्रनेकपा' रूप बनेगा। इस प्रकार न तथा मत्र
दो भिन्न २ प्रम्पप है, यह भी ध्यान देने योग्य है।
१६०.कुगनीति-कु, गतिसंजका थापादिका समय के साप
निरय ममाम होता है और वह तत्पुरुष समास कहलाता है।
पुका-मिस परः ।वुरा मनुष्य) इगलौकिक विग्रह में सपा
पुरप मु' इम पीरिक विग्रह में 'कृ'सम्पया पूरपः' मुबन्त के साथ समाम
होता है।
१६१. कशिनि- ऊरी पासिम,जिप्रत्ययान तथा प्रत्ययान्त
सम्पया के योग में गमिगत होते है।
टिपासी-(१) करी, रोमाशिम गणपाठ में परे गये है।
(२) यो वामी पहले ही उसके कमी होने के पर्थ में (पना
भावे) 'सम्मियोगे मग्मरि नि' इस गुत्र मे fr' प्रय
होता है।सयान प्रिपाटीमार हो जाता है और पहले 'म'
होकर 'मुस्ली' या मुक्ती पति पाक्षिम होते हैं।
(6) RT परिण मे पातु योग में 'ग'
उपर दाताह में रोपटर' ऐसी न करतातो -'पात
दिय में पाया होने पर Te: +ne+' मा

२ समासप्रकरणय १२६ डाजन्ताश्च कियायोगे गतिसंज्ञाः स्युः । उरीकृत्य । शुरलीकृत्य । पटपटाकत्य । सुपुरुषः । * (वा) प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया पटत् को दिव (हाचि बहुले द्वे भवतः) होकर 'पटत पटत् +मा+करोति' तथा दूसरे 'पटत्' के 'पत्' का लोप होकर और पहले पटत् के 'त' को पररूप (मर्थात् +१-५) होकर पटपटाकरोति' रूप होता है । करीकृश्य-बोकृश्य (स्वीकार करके)- यहाँ 'कृ' के योग में 'ऊरी' शब्द की गति संज्ञा होकर, 'कुपतिप्रादय ' से समाम हो जाता है | समास होने से 'परवा' प्रत्यय' को 'त्यप' (ममाऽनत्र पूर्व क्त्वो ल्यप्) हो जाता है । करी+ कृ+य रूपप) इस भवस्था में 'कृ' से परे तुक (त) का पागम होकर ऊरीकृत्य. मव्यय ाग्द होता है शुरलीकृत्य-प्रशुक्ल शुक्लं कृत्वा (जो श्वेत नही उसे श्वेत करके)-स में विप्राययाल 'शुक्ली' शब्द को 'हत्या' के योग गति संज्ञा होकर समास होता है तथा क्त्वा को ल्यप् होकर पूर्ववत् "शुक्लीकृत्य' रूप बन जाता पटपटारय-पटत् इति कृत्वा (पटपट करके)-इस मयं में हाच प्रत्ययान्त 'पटपटा' पद की 'कृत्वा' के योग मे गति संज्ञा होकर रामास हो जाता है सपा परवा को 'पप' प्रादेश होकर 'पटपटाकृत्य रूप होता है । यही सर्वत्र गति संगाका फल समास होना है तथा समास होने से 'बत्वा' को 'ल्यप' मादेश होता है। सुपुरुष-पोमनः परयः (पच्छा मनुष्य)-इस विग्रह में 'सु' (मादि) का 'पुरुषः' मृजन्त के साप निस्य 'कुमतिप्राय: से समास होकर रूप बनता टिपपणी-'' परा'पादि धादि) की पिया के योग में ही गति संज्ञा होती है सुपुरुष' में 'सु' का किया से योग नहीं पतः इसकी गति संज्ञा नहीं होती। ऐसे उदाहरणों के लिये ही गूत्र में गति से पृथक् प्रादिका ग्रहण किया है। प्रमादिका समास प्रादि समास करलाना है। किम प्रमादि का किस विभवरमन्त के साथ किस प्रपं में समान होता है। इसके स्पष्टीकरण के लि 'प्रायोगडापत्यादि पांच वात्तिा पड़े गये हैं।

संस्कृतम्याकरणे प्रगत आचार्यः प्राचार्यः। (ग) प्रत्यादयः कान्तार्थे द्वितीय या अतिक्रान्तो मालामिति विग्रहे। १६२ । एकविभक्ति चापूर्वनिपाते । १॥२॥४४॥ विप्रहे यनिया विभक्तिक तदुपमर्जसंझं म्यान्न तु तस्य पूर्वनिपातः ॥ १६३ | गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य १।२६४८॥ उपसर्जन योगोशब्द स्त्रीत्ययान्तं च तदन्तस्य प्रातिपदिकस्य द्वस्वः स्यात् । यतिमालः प्रादय इति (वा)-'प्र' प्रादि का 'गत' मादि मयं में प्रथमान्त के सार समास होता है। प्राचार्य:-'प्रगत पाचार्य:' (कृष्ट पाचार्य)-इस विग्रह में 'प्र' का 'प्राचार्य ' के साथ समास होता है । यह समास प्रादि-तारुष समास कहलाता है। भत्यादय इति 'ग)-प्रति' मादि का 'क्रान्त' मादि भर्य में द्वितीयान्त के साथ समारा होता है। पतित्रान्तो मालाम् इस रिग्रह में- १६२.एक विभक्तीति-विग्रह में जिम पद की एक अर्थात् नियत विभक्ति रहती है, उसफी उपसर्जन संज्ञा होती है। किन्तु उसका पूर्व निपात नहीं होता। टिप्पणी-'प्रथमानिर्दिष्ट समाम उपसर्जनम् से मो उपसर्जन संज्ञा की गई थी, वह ममास में पूर्वनिपात के लिये की गई थी; किन्तु यहाँ अन्य कार्य के लिये अमर्जन सज्ञा की गई है। जिसका निर्देश प्रामे किया जा रहा है। १९३.गोस्वियोरिति-उपसजनसंजा जो गो पाम अपवा स्त्री प्रत्ययान्त शः वह जिनके पन्त में हो (तदन्त) उस प्रतिपदिक को हव हो पता है। यहा मतिकान्तो मालाम, मतित्रान्त मालाम्, 'मतिकावन मासाम' - समासप्रकरणम् (वा) अयादयः कटाद्यर्थे तृतीयया । अवक.प्टः कोकिल या अवको- किलः । (वा) पर्यादयो ग्लानाद्यर्थे चतुथ्यो । परिग्लानोऽध्ययनाय पर्यध्ययनः ।। (ग) निरादयः कान्ताद्यर्थे पञ्चम्या ॥ निकान्तः इत्यादि विभिन्न विभक्तियों के विग्रह मे 'मालाम्' शब्द नियव विभक्ति वाला भान् द्वितीया विभक्ति वाला ही रहता है, अतएव यह निपत विभक्ति वाला है। इसकी उपसर्जन सजा हो जाती है और इसे ह्रस्व होता है। पतिमाल:-'पतित्रान्तो मालाम्' (अतिक्रमण कर गया माला को)- इस लोकिक विग्रह में सपा "मति माला अम्' इस अलौकिक विग्रह में 'प्रति' सन्द की प्रथमानिर्दिष्ट' पादि से उपसर्जन संक्षा होती है तथा उसका पूर्व- प्रयोग होता है । सप् का लोप होकर फिर 'प्रतिमाला' इस दशा मे 'माला' पाद की 'एकविभक्ति चापूर्वनिपाते' से उपसर्जन संभा होकर 'मा' को ह्रस्य (4) हो जाता है। इस प्रकार प्रतिमाल' समस्त पद से प्रपणा के एक प्रतिमाल: रूर होता है। भवादय इति (वा)-सव प्रादि का इष्ट प्रादि मर्थ में तृतीयान्त के साथ समास होता है। प्रयको किस:--प्रवकृष्टः कोकिलया (कोकिन द्वारा कूजित-इस विग्रह में 'प्रव' का 'कोकिलया' के साथ समास होता है। मन का पूर्व प्रयोग पौर सप का तुरू हो जाता है । 'कोकिला' को उपसजन संशा होकर हुस्स हो जाता है मोर 'प्रोफिलः' रुप बनता है। पदिय इति (1)-परिभादि का ग्लान मादिभ में चतुप्यन्त के साथ समास होता है। पर्यध्ययन:-परिरलानोऽध्यपनाय' (पड़ने से पका हुआ)-इस विग्रह में परि' का तुप्पंन्न पध्ययनाय' के साप समान होता है। निरायः इति (वा)-निर्मादिका निधान्त मालिके पर्थ में पञ्चम न्त के साए समास होता है।

११२ मंसम्मा कौगाया: निकोगाम्बिः । १६४। तत्रोपदं मप्तमीस्वम | सप्तम्यन्ते पदे कमणीत्यादी वाच्यतेन सियत दुम्मादि तद्वापक पदगुपपदसा स्याग। १६५ । उपपदतिष्ठ २।२।१६) सपपदं अपन्तं समयन नित्यं समस्यते, अतिघन्ताचायं समासः । कुम्म करोतीति कुम्भकारः । निय-निष्पान्त: कोबाया. (कोशानी से निकला हुमा)-- इस विग्रह में निर' मा नि पर्ष में पञ्चम्यन्त कौशाम्या' के साथ समाग होता है तथा गोगाम्बी' को पूर्ववव सारसंशक सशा होकर हस्व हो जाता है। १६४. सरि--सप्तम्पात पद 'कमणि' इत्यादि में वाध्यम में स्थित जो कुम्भ (घड़ा) पादि है उसरा वाधक पान उपसंशक होता है। जैसे- 'कर्मण्यण' कर्मणि+पण) मादि मूत्र में सप्तम्यन्त पद है--'कर्मणि'। उसके पास रूप में स्थित है-कृम्भ मादि वातुः क्योंकि 'कुम्भं करोति (षई को बनाता है) इत्यादि में 'कुम्भ' को कम संशा होती है। इस प्रकार घड़े के वाचक 'कुम्भम्' शब्द की उपपद सजा होगी। १६५. उपसमिति-सुबन्त उपद का समर्प के साथ निरय समास होता है और यह समास विन्त नहीं होता। भाव यह है कि तिङन्त के साथ समास नहीं होता। मुम्भकार - 'कुम्भं करोति' इस सौकिक विग्रह में सपा 'कुम्भ डम् कार' इस प्रतीकिक विग्रह में 'गतिकारकोपपदामाम्' इत्यादि परिभाषा के अनुसार उतरपद में सुप् के पाने से पहिले ही "उपपदमतिङ" से समास होकर 'कुम्भ कार' शब्द होता है। उससे प्रथमा एक० मे कुम्भकारः। टिपणी-कुम्भ करोति इस मर्थ में 'कुम्भ' रूप कर्म के माद होने पर 'कृ' धातु से मए (कर्मण्यण) प्रत्यय होकर कुम्भ++मए के के को 'प्रचोऽणिति से वृद्धि 'मार' होकर नुम्भ+कर+म-कुम्भकार शम बनना है उसी की प्रक्रिया के अन्तर्गत यह उपपद समास होता है। 'उपपद' समान प्रति किम १ मा भवार भून् । गाडि लुहिति सप्तमोनिर्देशान्माइप- पक्षमा "गतिकारकोपपदान र मह ममासवचनं पाक सुयुत्पत्तेः"। यामी पश्चक्रीती: पीत्यादि। लिश्य समारा होता है । भाव यह है कि दिना के 'प्रए' पादि पर ही महीं होते कार पारिपागे प्रयोग नहीं होता। पति- उपसमय निहन्त से नहीं होता, अतएव "मा मवान भर" में 'T' का भूत के साथ समारा नहीं मा। यहाँ 'मा' शम सा है योकि मास्तु' हम सूत्र में 'माहि' यह सप्तम्यान है । 'भूर' (मुड) पर ferent सीमेह समास नही हमा। परिवार पनि र पौर पद के पाप मुस् के भाने से पहले समास हो जाता है। राम्रोमाजिनि विशेष रूप से चारों प्रोर गूपती है)- इस विग्रह गरपाद पूर्वक 'मा' ग क य (भास्योपसर्ग) होता है। पा+मा+r () यहाँ 'मा' पार होकर मा+घ्र इस दवा में "' से परे मर भान ये पहल होगनिसमाम जाता है। प्रधान शरद मासिलिये जास्त्रीविषयाश्योपपात मूत्र से प्रापर होर Musी' बनना है। पर यही गुप होने के पास समास होता तो पाने से पहिले 'मिसीएम य होना पाया था, Neife नियोपर प्राय पाहोमाभिक्ति (मुर) होनेवल 'प्र' राति वापरहीरो' नहीं होता. पापा' श होता, म HAIRECTहोला St- पग सरोटी १६)-म सिह freeमारला बाम मर से र numat मुर्रे पर ही समास हो बार an art से होहोर erati' पर - र मन हो रे प्रार amaretr for tra 4 होने से नारा नहीं होगा ।

१३४ संस्कृतव्या करणे १६६। तत्पुरुषस्याङ्गुले: सङ्ख्याध्ययादेः ५।४१८६। ख्याव्ययादेरड्गुल्यन्तस्य समासान्तोऽच् स्यात् । द्वे श्रङ्ग ली प्रमाण- मस्य द्वपङ्गलम । निर्गतमङ्ग लिभ्यो निरङ्गलम् । कच्छपी-'कच्छेन पिरति' (कच्छ से पीती है, कबी)-इस विग्रह में सुबन्त'कच्छ पान्द उपपद होने पर 'पा' धातु से 'क' प्रत्यय होकर 'कम्य पा+म (क) इस दशा मे 'पा' के प्रा का लोर हो जाता है । फिर उतरपद में सुप् के माने से पहले ही कच्छ शब्द का 'प' के साप समाप्त हो जाता है। इस प्रकार 'कन्छप' सम्म जातिवाचक है, मत: जातिवाची शम्मों से होने वाला डीप प्रत्यय होता है। यदि यहाँ सुप माने के पश्चात् समास होता तो सुप् से पहले 'टा' हो जाता फिर डीप नहीं होता। १६. तरपुरुषस्येति-जिस सत्पुरुष के घादि में संस्थावाचक या प्राय आम हो भौर अन्त में प्रालि राम हो उसे समासान्त पम् प्रत्यय होता है। उपासम्- मङ्गुली प्रमाणम् मस्य (दो घंगुली है मार गिमा) इस विग्रह में (मदिनापर्योत्तरपदसमाहारे प) तदितार्य में तत्पुरुष ममाप्त ! है । यहां प्रमाण पयं में मात्र प्रत्यय होता है, जिसका लोप हो जाता इस प्रकार मालि' पास से समामात पय प्रत्यय होकर लि. के . भोर (पश्यति ब) हो जाता है। तब पहगुम राम सेना प्रपमा के एका में 'पागुनम' स बनता है। निरगलम-निर्गतम् महमुसिम्य.' (गुनियों से निकाला हुपा)- पापमि' के साथ रास्यः कानाचर्य पञ्चम्या' प्रादि समान होता है या समासात प्रच प्रत्यय होकर पूर्ववत निरहन विग्रह में समासप्रकरणम् । १६७ { अहः सर्वेकदेशसंख्यातपुण्याच्च रात्रैः ५४१८० एभ्यो रानेरच स्याच्चात्संख्याध्ययादेः । श्रमहणं द्वन्द्वार्यम् । १६८ । रानाहाहा: पुसिः ॥४॥२१॥ एतदन्ती द्वन्द्वतःपुरुषो भुस्येव । अहश्च राख्रिश्चाहोरात्रः । सर्वरातः । सख्यातराः। १६७. घरिति-बहन, सर्द, एकदेश (एक अंश अपात्), संख्यात, पुष्प तथा सरूपावाची और अव्यय से पने रात्रि पाद से समासान्त प्रच् प्रत्यय होता है। महप्रहरणम् इति --उपयुक्त मूत्र में 'महन्' शब्द का ग्रहण द्वन्द्व समास के लिये मर्षात् भहन घोर रात्रि के द्वन्द समाप्त भै भनू प्रत्यप होता है, इन दोनों का सत्पुरुष समाप्त नहीं होता। १३६. रातिरात्र, प्रह्न और यहा-मै शब्द जित दन्द्र और तत्पुरुष के अन्त में हों ये पुल्लिङ्ग में ही होते हैं । महोरात्र:-'महश्च रात्रिश्च प्रनयो: समाहारः' (दिन और रात का समु. दाय)-इस लोकिक विग्रह में तथा 'महन सु रात्रि सु' इस अलौकिक विग्रह में दन्द समास होता है। सुप् लोर होकर न कोह तथा उत्त' होकर 'महोराषि मौर समासान्त मच प्रत्पप इ का लो तथा उपयुक्त मूत्र के भनुमार पुल्लिङ्ग होकर 'महोरात्रः' रूप बनता है। सरान:-सी रात्रि' मधवा 'सर्या चासो रात्रिश्च' (सारी रात)-- इस विग्रह में सर्वा शद का रात्रि' शब्द के साथ तत्पुरुप समास होता है। "सर्वा' शब्द को युबद्भाव (लिङ्ग के समान रूप) होकर सपा अपराविशन से समासान्त मच प्रत्यय होकर पूर्ववत् 'सबंरा रूप बनता है। संख्याता:- संस्पाता रात्रिः प्रपया संपाता चासो रात्रिश्च (गिनी हुई रात) इस विग्रह में सर्द रात्रः' के समान तापुरुष समास होता है। हिपणी--एकदेश का उदाहरण पूर्वराषः (पूर्व रात्र अर्थात् रात्रि का पूर्व भाग) है । वहाँ भी सवरात्र के समान कार्य होता है। १.पहन ८.२।६३ २. हशि च Item संस्कृतव्याकरणे (वा) संख्यापूर्व रात्रं क्लीवम् । द्विरात्रम । त्रिरात्रम् । १६६ । राजाहःसखिभ्यष्टच ५॥४६॥ एतदन्तात्तत्पुरुषात् टच स्यात् । परमराजः। १७०) । पान्महत: समानाधिकरणजातीययोः ६१३४६ संत्येति (वा)--संख्या पूर्वक रात्र सन्द नपुंसकलिङ्ग होता है । द्विरावम-द्वयोः रापोः समाहारः (दो रात्रियों का समुदाय)-इस विग्रह में दि शब्द का रानि शब्द के साथ (तद्धिताोतरपदसमाहारे घ) समाहार अर्थ में द्विगु समास होता है । समासान्त अप प्रत्यय होकर तथा उपयुक्त वार्तिक के भनुगार नपुंसक सिङ्ग होकर 'दिरात्रम्' पान्द यनता है। निराधम्-तिसृणा रात्रीणां समाहारः (तीन रात्रियों का समुदाय), द्विरानम्' के समान । १६६. राजेति-जिस तत्पुरुप के मन्त में राजा, पहन मा सतिशय होता है उससे समामान्त टच् प्ररपय होता है । परमरा-परमश्चासो राजा क (बड़ा रामा या प्रदा रारा)-रा विग्रह में परम शममा राजन् शाम के साप (विशेषण विशेष्य का) कर्मधारय तत्पुरुष समास होता है। उपयुक्त नियम के अनुसार समासान्त टम् प्रत्यय होकर परम राजन+4 (ट) इस दशा में प्रत्र का लोप हो जाता है। परमरार दान रो० एक. में परमराजः । टिप्पणी-समामान्त टच् प्रत्यय होकर ही धर्मराम, मोगराम: माद राजसदान्त, परमाहः, सप्ताहः (धेष्ठ दिन) प्रादि पहन पम्मान तथा राजसख:, ब्राह्मणसमः प्रादि समिम्मान्त समस्त पर बनते हैं। मामहः इनि-महद पद के मन्त अर्थात् ' को प्रापर पादेय हो पाता है समानापिकरण रतसर सपा वातीय (भतीपर) प्राय परे होने पर। महारा.-महान् प पसौ गमा प, दम पोषिक हि में ता १. भातदिन mtml समासप्रकरणम् भइत आकारोऽन्तादेशः स्यात्समानधिकरणे उत्तरपदे जातीये च परे। महाराज. । प्रकारवचने जातीयर । महाप्रकारो महाजातीयः। १७१ । यष्टनः सङ्ख्यायामबहुव्रोह्यशोत्योः ६३१४७ आत्स्यात् । द्वौ च दश च द्वादश । अध्दाविंशतिः । 'महत सु राजन् सु' इस मलौकिक विग्रह मे महत् को समानाधिकरण 'राजन शब्द परे होने पर प्राकार मन्तादेश होता है। शेष 'परमराज' के समान । इसी प्रकार महादेवः, महावीरः, महापुरुषः, महायुद्धम् इत्यादि । महती सेना महासेना, महादेची, महानदी मादि शब्दों में भी महती' का पुल्लिङ्ग के समान (पु वदभाव) होकर महत् शब्द हो जाता है और त को भा होकर 'महा'। महाजातीयः- महाप्रकार: (बड़े ढङ्ग का)-इस प्रर्ष में 'प्रकारवचने जातीयर' सूत्र से महत् शब्द से 'जातीयर' प्रत्यय होता है। उपयुक्त नियम से 'महत' के पन्त को माकार होकर 'महाजातीयः' रूप बनता है। दिप्पणी-(१) 'महाजातीय.' तदितान्त शब्द है समस्त पद नही। यहाँ ऊपर के सूत्र में महत्त के तू को मा होता है इसी से यहा उदाहरण दिपा गपा है। (२) समानाधिकरण उत्तरपट परे होने पर ही यह 'मास्व' होता है । पत: महतः सेवा=महत्सेवा इस षष्ठी समास मे मावन हीं होता। महान्तो वाहू यस्य स महाबाहुः इस समानाधिकरण बहुव्रीहि में भाव होता ही है। १७१. पष्टन इति-दि मौर मण्टन शब्द के मन्त को पाकार (मादेश) होता है सख्यावाची उत्तरपद परे होने पर, किन्तु बहुव्रीहि समास में तथा 'प्रशीति' शन्द परे रहते नहीं होता। दादरी व दशप (हो और दश अर्थात् बारह)- इस विग्रह मेरि शब्द का दशन शब्द के साप द्वन्द समास होता है । उपयुक्त नियम के अनुसार द्विको भाकार मन्तादेश होकर 'द्वादशन् समस्त शन्न बनता है। इससे प्रथमा के एकवचन में 'सु' उसका लोप तथा 'न' का लोप होकर 'दादश' रूप बनता मष्टाविशति:--मष्टो च विशतिश्च (पाठ मोर बीस भर्थात् भट्टाइस)- संपतम्याकरणे १७२ । तेस्त्रयः ६३॥ त्रयोदश। त्रयोविंशतिः। प्रयस्त्रिया! १७३ । परवल्लिङ्ग द्वन्द्वतत्पुरुषयोः ।४।२६॥ एतयोः परपद- स्येव लिङ्ग स्यात् । कुक्कुटमयूर्याविमे । मयूरोकुक्कुटाविमौ । अर्ध- यही 'मटन शब्द पा विशति के साथ द्वन्द सगास होता है तपा अष्टन मन्त को भाकार हो जाता है। १७२. रिति-विशद को 'श्रयम्' (प्रादेश) सो जाता है सस्थावाची उत्तरपद परे रहते किन्तु बद्रोहि में तथा मशीति शब्द परे रहते नहीं होता। प्रयोदश-त्रयश्च दश च (तीन भौर दा मर्यात् तेरह)-इस विग्रह में fत्र' शब्द का 'दशन्' शब्द के साथ द्वन्द्व समास होकर निको 'त्रयस्' हो जाता ई । 'प्रयत+दशन' यहाँ 'स' को रु तथा उ होकर प्रयोदश रूप होता है। इसी प्रकार 'पश्च विशतिश्च'--'अयोविंशतिः' भोर तपश्च विशत् च- 'त्रयस्त्रिात' रूप होते हैं। १७२. परवद् प्रतिद्वन्द्व पोर तरपुरुष समास में परपद के समान लिङ्ग होता है। फुक्कुटमयूयो इमे-कुनकुटरच मयूरी घ (मुर्गा भोर मोरनी)-इस विग्रह में द्वन्द्व समाम होता है। इसका परपद 'मयूरी' स्त्रीलिङ्ग है तथा द्वन्द्व भौर तत्पुरुष समास में परपद के समान लिङ्ग होता है, मतएव समस्त पद उपयुक्त नियम के अनुसार स्त्रीलिङ्ग में है। इसी स्त्रीलिङ्ग को 'इमे' स्त्रीलिङ्ग का प्रयोग स्पष्ट करता है। मयूरोकुक्कुटो इमो-मयूरी च कुक्कुटरच (मपूरी पौर मुर्गा)- -इस विग्रह में द्वन्द्व समास होता है। यहाँ परपद 'कुक्कुट' पुल्लिङ्ग है प्रतएव समस्त पद पुल्लिङ्ग में होता है । 'इमो' इसी पुल्लिाको प्रकट करता है। पपिप्पली-म पिपल्या: (पिप्पली का मधं भाग)-यही सत्पुरुप समास है । पराद पिपली स्त्रीतिङ्ग है प्रतएव समाप्त पद स्त्रीलिङ्ग होता है । -" समासप्रकरणम् १३६ पिप्पलो। (वा) द्विगुप्राप्तापन्नानम्पूर्वगतिसमामेपु प्रतिषेधो वाच्यः॥ पञ्चसु कपालेषु संहित. पच्चकपाल पुरोहाश. । १७४ । प्राप्तापन्ने च द्वितीयया : १२१४५ एती समस्येते अका. रचारयोरन्तादेश प्राप्नो जीविको प्राप्तजीविक । श्रापम्नजीविकः । दिशाति (वा)-दिगु रामास घोर निस समास मे प्राप्त, मापन या मलम शम्द पूर्व में पूर्वपद) है एवं गति समात, इनमै परपद के समान लिज नहीं होता। पञ्चापालः पुरोग:-पञ्चसु कपालेषु संहतः (पषि कपापों में संत)-इस विग्रह मे दिनाथ मे दिगु समाम . होता है। यह परपर सपास' नसक लिक है किन्तु उसके अनुसार समस्त पद नपुंसक लिङ्ग मे मही होता पितु विशेष्य के अनुसार लिन होता है । पहा पुरोहा (विशेष) लिग है मतएव समस्त पद पुल्लिा मे है। १७४. प्रासापले परितोषि-प्राप्त और पात्र माहितीयान्त के साथ हमारा होता है और इनके पन्त को मार' (मादेश) हो जाता है। प्रासमोदिक:-प्राप्तो कीविताम् (जीविया को प्राप्त हुमा)-स विषह में 'मोनिका हितोगत के साथ उत्पुरुष समास होता है।विरामी मन१ संशा होकर 'मा'रोहन हो गया है.२ पहा परपद मोवि वीनिङ्ग है किन्तु इसके समान समस्त पर मोलिन में नहीं होगाभविष्य के अनुसार निज होता है। रिपी-rasीरितम्'ली इस हि में प्राप्तवा' पह समरत पर होता है। यह मूत्र के पर्ष (इति) मे रहा पा प्राप्ता को पर तास होता है। पानीति-मो पौविरार (शविरा रो माया)-म बिह में 'राप्र्शविर' के सशन समस्त बार होता है। १. एविभक्ति नि ॥२४॥ २. बोरिशेखर Ruret

संरकृतव्याकरणे
अलङकुमार्य अलकुमारिः। अत एव ज्ञापकात्समासः निष्कौशाम्बः ।
७४ अर्चा: पुसि च ।२।४।३१अर्धर्चादयः शब्दा
पुसि जीवे च स्युः अर्घः । अर्घचम्। एवं ध्वजतीर्थशरीरमण्ड.
टिप्पणी:-यहाँ पक्ष में द्वितीयाथिता • १३५ इससे समास होता है तथा
जीविकाप्राप्तः' मोर 'जोविकापन्नः' पद भी होते हैं।
मलाकुमारि:-'मल कुमार्य' (कुमारी के लिये योग्य)-इस विग्रह में
सस्पृश्य समास होता है । कुमारी को उपमर्जन सजा होकर ई को हस्व हो
जाता है । यहाँ परपद 'कुमारी' स्त्रीलिज है, किन्तु उसके समान समस्त पद
का मिङ्ग नहीं होता परितु विशेष्य के अनुगार होता है । पतः 'मलकुमारिः'
पुल्लिङ्ग है।
पतएवेति-उपर्युक्त वात्तिक में मलम् पूर्वक समास में परपर के समान
सिङ्ग होने का निषेध किया गया है । इससे यह पता चलता है कि मनम्'
का मुबन्त के साथ समास होता है।
माविकामार के मत में तो पदियो म्लानावर्षे घा' इग वाकि के
मनुमार यह समास होता है।
निमावि-यहाँ परपर कौगाम्बी स्त्रीलिङ्ग है किन्तु उसके समान
समस्त पर स्त्रीलिङ्ग में नहीं होता मपितु विशेष्य के भनुमार लिङ्ग होता है।
(देमिये पृष्ठ १२)
पिलो-निकासाम्बि: में प्रादि समारा है। दिपावापन' यादि
वाधिक में गरिमपाम के मार-माव प्रादि समास का भी ग्रहण है। इसी से
यह पदाहरण दिया गया है।
१७१. चंदा इति-'प्रधष गरि पालिङ्ग तथा नपुसकषित
(ोनों) में होते है।
:-अपंचम्-'ऋनो' .ऋषा पर्षभाग)-परिषद में
मरम् मे ममाग होता है। सामान्त ' पर होकर
:- हमाल पाना है। यहां परपर पनि
समांमार ममत रास्ति नहीं होता तिमित्र और

समासप्रकरणम् पीयूषदेहांकुशपात्रसूत्रादयः । सामान्ये नपुसकम् । मृदु पचति । प्रातः कमनीयम् । इति तत्पुरुषः ॥३॥ अथ बहुव्रीहिसमासः ॥४॥ १७६ । शेपो बहुब्रोहिः २।२।२३॥ अविकारोऽयं प्रागद्वन्द्वात् । १७७ । अनेकमन्यपदार्थे १२०२४५ अनेक प्रयमान्तमन्यस्य पदस्याथै वर्तमानं वा समस्यते स बहुप्रीहिः । १७८ । सप्तमीविशेषणे बहुव्रीहो २।२।३५॥ ससम्यन्तं नपसक लिङ्ग दोनों होते हैं। एवमिनि-इसी प्रकार ध्वज, तीर्थ, पारीर, भण्ड, पीयूप, देह, मकुश, पान, सूत्र. मादि शम्द दोनों लिङ्गों में होते हैं । टिप्पणी - यहाँ समस्त पदों के लिङ्ग निर्देश के प्रकरण में प्रवादि गण के कुछ शब्दों का लिङ्ग निर्देश कर दिया गया है। इनका समास प्रकरण में स्पान नहीं है। सामान्म ति--जहाँ निङ्ग विशेष का भान नहीं होता, वह सामान्य है। सामान्य पर्थ मे नपुंसक लिङ्ग होता है, जैसे 'मृदु पति' में 'म' दाद नपुंसकलिङ्ग है । इसी प्रकार प्रात कमनीयम्, यहाँ कमनीयम्' में सामान्य मर्थ मे नपुसक लिङ्ग है। इति तत्पुरुषः । अथ बहुम्रीहिः१७ रोष इति-न्द्र से पूर्व तक यह (बहुवोहि का) अधिकार है । दोष समास को बहुब्रोहि यशा होती है। शेष का प्रपं है कहे हुए है बचा हुपा-'उक्तादन्यः शेषः'। १७७. अनेकम् इति--पन्यपद के अपं में विद्यमान भनेक प्रथमान्त पर्यो का विकल से समास होता है पर वह बहवोहि समाप्त कहलाता है। १७८, सप्तमोति-सप्तम्यन पौर विशेषण का बहुप्रीदि समास में पूर्व प्रयोग होता है।

- संस्कृतव्याकरणे विशेषणं च यदवीधौ पूर्व स्यात् । अत एव ज्ञापकायधिकरणपदो बहुव्रीहिः । १७६ । हलदन्तात्सप्तम्याः संज्ञायाम ६३ हलन्ताद् अद न्ताच्च सप्तम्या अलक् । कण्ठेकालः । पतएवेति-उपर्युक्त सूत्र में सप्तम्यन्त का बबीहि समास में पूर्वप्रयोग कहा गया है । इसरो ज्ञात होता है कि भिन्न विभक्ति वाले पदों का भी बहुव्रीहि समाप्त होता है। इसी को व्यधिकरण बहुप्रीहि समास कहते हैं । जहा सभी प्रथमान्त पदो का समास होता है, वह समानाधिकरण बहुव्रीहि कहलाता है। इस प्रकार बहुव्रीहि समास दो प्रकार का होता है-(१) समानाधिकरण बहुव्रीहि (२) अधिकरण बहुव्रीहि । (१) विग्रह दाक्य में समानाधिकरण बनी हि के पद प्रथमा विभक्ति मे रहते हैं जैसे प्राप्तम् उदकं यं सः प्राप्तोदकः यहाँ 'प्राप्तम' तपा 'उदकम' दोनो प्रथमान्त हैं। यहाँ बहुमोहि द्वितीयायं में हुपा है, (द्विनीमार्थ बहुव्रीहिः) जिसे 'यम्' शब्द द्वारा विग्रह में प्रकट किया जाता है । इसी प्रकार प्रथमा को छोड़कर अन्य सभी विभक्तियों के अर्थ मे बहुव्रीहि समास होता है । (२) व्यधिकरण बहुवरीहि कर विग्रह में एक पर प्रथमारत होता है और दूसरा पष्ठी या सप्तमी विभक्ति मे, कण्ठे कालः यस्य' (कण्ठे काल.) धादि। १७६. हलन्ताद् इति हलन्त तथा प्रकारान्त शाद से परे वाली सप्तमी का लुक (लोप) नहीं होता, संज्ञा के विषय में कण्टकाला-कण्ठे काल. यस्य सः (कण्ठ मे है काल-काला चिन्ह या विप-जिसके ऐसा, नीलकण्ठ महादेव) इस विग्रह में उपयुक्त ज्ञापन से ध्यधिकरण बहुव्रीहि समास होता है। सप्तमी विशेषणे बहुव्रीही' से कण्ठे (सप्तम्मन्त) का पूर्व प्रयोग हो जाता है तथा उपयुक्त नियम के अनुसार सप्तमी का सुक नहीं होता। इस प्रकार प्रथमा के एक वचन में कण्ठे कालः' रूप होता है। कण्ठे काल:-- व्यधिकरण बहुधीहि का शहरण है । समानाधिकरण बहतीहि के द्वितीयाएं से लेकर सप्तम्यर्थ तक के उदाहरण क्रमसः नीचे दिये समासप्रकरणम् - प्राप्तमुदकं यं स प्राप्तोदको प्रामः। ऊढरयोऽनडवान् । उपहृतपशुरुद्रः । उद्धृतौदना स्थाली । पीताम्वरो हरिः । वीरपुरुपको ग्राम । (बा) . प्राप्तोदको ग्राम.-'प्राप्तम् उदक यं स.' (प्राप्त हुग्रा है अर्थात पहुच गया है जल जिसको ऐसा ग्राम)- इस विग्रह में द्वितीया विभक्ति के प्रथं में प्राप्त तथा उदक इन दो प्रथमान्त यादों वा बहुव्रीहि १ समास होता है मिष्ठान्त 'प्राप्त२ शब्द का पूर्व प्रयोग होकर प्राप्तोदक शकर बनता है। उससे ग्रम' (विदोष्य) के अनुसार पुल्लिङ्ग प्रथमा एकवचन में प्राप्तोदकः प होता है । टिप्पणी -बहुव्रीहि समाप्त प्रायः विशेषण होता है और उसमे लिङ्ग वचन भादि विशेष्य के अनुसार होते हैं। कढरपोऽनपान-ऊदी रयो धनसः' (चलाया है रथ जिसने, ऐसा वैन)-इस विग्रह में तृतीया विभक्ति के अर्थ में ऊढ तथा रय इन प्रथमान्त पदों का बहुदीहि समास होता है । उपहृतपशुः रुद्रः-'अपहृतः पश: यस्मै मः' (उपहार किया गया है पशु जिसके लिये, ऐसा रुद्र)- इस विपद में चतुर्थी विभक्ति के पर्थ मे उपहृत तथा पशु इन प्रथमान्त पदों का बहुव्रीहि समास होता है। उद्धृतोदना स्यालो- उदधृतम् भोदनं यस्याः सा' (निकाल लिया है भात जिससे ऐमी पाली या देगची)-इन विग्रह में पञ्चमी विभक्ति के पर्थ मे बहुव्रीहि समास होता है। पीताम्बो हरि:-'पीतम मम्दरं यस्य सः' (पोला है वस्त्र जिसका, ऐसा हरिः)-इस विग्रह में पष्ठी विभक्ति के अर्थ में बहुव्रीहि समास होता है । घोरपुरुषको ग्राम:--'दीराः पुरुषाः यस्मिन् सः' (वीर पुरुष हैं जिसमे, ऐसा ग्राम)-इस विग्रह में सप्तमी विभक्ति के मयं मे बहुव्रीहि समास होता है । यहाँ 'क' (क) समासान्त प्रत्यय है। १. 'भनेकमन्यपदार्थ. २१२।२४॥ २. 'निष्ठा' २२२३३॥ इस सूम से क्त-प्रत्ययान्त का पूर्व प्रयोग होता है।

संस्कृतम्याकरणे प्रादिभ्यो धातुजन्य वान्यो वा चोत्तरपदलोपः। प्रपतितपर्णः, प्रपर्णः। (11) नमोऽस्त्यर्थानां वाच्यो वा चोत्तरपदलोपः॥ अविद्यमानपुत्रः, अपुत्रः। १८० । स्त्रिया: पुवद्भाषितपुस्कादलूङ समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणोप्रियादिपु ६।३३।४। प्रादिभ्य इति (वा)-प्रादि से परे जो घातु से बना हुमा शम्द है, तदन्त का दूसरे पद के माप बहुदीहि समास होता है और पूर्व भाग में जो उत्तरपद (प्रति धातुज शन) होता है उसका विकल्प से लोप होता है। प्रपतितपणं, प्रपर्ण:-प्रपतितानि पनि यस्मात' सः (गिरगये हैं पत्ते जिससे ऐसा) । यह विग्रह है-यही '' से परे पातुज शब्द 'पतित' है। तदरत 'प्रपतितं शब्द है । इमका "पर्ण' शन्द के साथ ममास होता है। जब पतित शब्द (मो प्रातित में उत्तरपद है। कालोर हो जाता है तो 'प्रपर्णः' पन्यथा प्रपतितरण:' इस प्रकार दो रूप हो जाते हैं। ना इति (वा)-नम से परे जो विद्यमानता (मस्ति) अर्थ वाला पद, तदन्त का पन्य पद के माप नहुव्रीहि ममास होता है और विद्यमानता प्र- वाचक का विकल्प से लोप हो जाता है। प्रविद्यालनपुरः, अपुत्र -मविद्यमानः पुत्रो यस्य म:' (नही है पुत्र जिसके ऐसा)---यह विग्रह है । या ना मे परे प्रत्ययंदानक विधमान' शब्द है। विद्यमान सन्द का पुत्र के साथ बहुमोहि ममास होता है । 'जब विद्यमान पान का लोप हो जाता है तो 'मपुत्र.' प्रन्यपा 'मविद्यमानपुत्र' इस प्रकार दो रूप बनते हैं। ५०. स्त्रिया नि-सूत्र में स्थित 'भापितपुरस्कार' एक समस्त पर है। जिसका अर्थ है-भाषितपक शम से परे अहो अङ्ग प्रत्यय महीं है। यही 'मापितकात्' शब्द में पञ्चमी विभक्ति का निपातन गे मोप (लुरु) नहीं हुमा भिन्तु 'मनूशद में पष्टी विभक्ति होनी चाहिये पो उमका नि. तन से ही सोप हो गया है । (पद समस्त पद स्त्रिया:' का विशेषण है)।

समाराप्रकरणम् सतपुकादन्छ । ऊोऽभावोऽस्यामिति बहुमोहिनिपातनात्पञ्चम्या अलुरू पट्यारच लक। तुल्ये प्रतिनिमित्त यदुक्तपुरक तस्मात् पर ऊोऽभावो यत्र नगाभूतस्य स्त्रीवानादस्य पु वाचकस्येव रप म्यान समानाधिकरणे पोलिने उत्तरपदे न तु पाएमां प्रियादौ च परतः । गोस्त्रियोरिति स्वः । चित्रगुः । रूपबद्भार्य । "भापिनसम नाम का अर्घ है-'उनकम् प्रथया नुस् प्रनिनिमित्त पर उतपुरम्। भापितक दे रहा है जिनका प्रपोग पुल्लिङ्ग तथा अन्य लिम (लिङ्ग या नपुसकलित) में भी होता है और प्रनिनिमित्त भी दोनों मिलों में गमान होता है। प्रवृत्तिनिमित्त का म है-प्रयोग सारा पनि जोपर गमान रिमिस से पुस्मिता पम्य लिङ्ग में प्रयुक्त किया जाता है यह 'भातिक' वहनाता है, जैसे featre है। यह चित्राव के कारण पुस्लिम स्त्रीलिज सपा नसरिन मे अपुन होता है। सूत्रा-प्रतिनिमित्त समान होने पर मोर उकाम है और उमगे परे का प्रत्यय नही है, ऐसे स्त्रीगरक पर पुलिस जवाधाममान कर हो जाता है, समानाधिकारासीमिङ्ग उसपर परे होने पानि पूरणी संकपा (प्रथमा पाहि) पौर nिt परे होने पर मही। चित्र-त्रिी गो दाय' (वित्रा पार रिमो)-म विह मे पप्टी ति पर्ष में सीहि समास होता है। दिगो, मा.पा- मपिरोलिन दो पर परे होने पर पूर से किराको पृत भार होगरपिहो सातामोके पोरो वोरिपोरसा में हार (3) होगरपि'ममता। पामा:-कसी भार्ग य (म पामो है वो रिम)-म रिह में गोहि FAIR हारे। 'समो' मा भागिरी मातापिरतीवित मा नरहै . साह १.स.स +

अनूह किम ? वामोरुमार्यः । पूरण्यां तु-
१८१ , अणूरणीप्रमाण्योः ॥ १६॥ पूरणार्यप्रत्ययान्त यात्री
मिज तदन्तात्म्म एयालाच बहुप्रीहेरस्यात् । कल्याणी पञ्चमी
यासा रात्री ताः कल्याणीपञ्चमा रात्रयः । स्त्री प्रमाणी यस्य सः
स्त्रीप्रमाण । अप्रियादिपु किम कल्याणीप्रिय इत्यादि।
रूपात' हा जागापा भार्या के मानो गोस्सियोहरसम' से हस हो।
है। इस प्रकार कादमा' बनता है।
निमिति - गूत्र में मनुष्यों कहा ? गलिये मिसे
परे 'अ' श्यप होता है उसे पुकदमाव नहीं होता. मन. यामोमय.' में
"कामोरे पान पर नहीं होता। यह बामोर पास में (वाम
++क) जावानीस
पूरणी परे होने परतो-
५१. पति-पताक प्रत्ययान यो पीमित तपा
भमाणी शासन दरो समाम मा पप होता है।
स्यानोपमा -याली पञ्चमी पामो intar [rwar
एजी (गरिति वियों में]- fang में पला मेरि
गामा, ञ्चमी पूराली महपापा:
पुरदर में प्राणी' faint पाभाव नहीं होता। आयुक्त गुप
से समानार में मं (and) है।
arma' हो यामागीमा।
माल,-सोनी (६ मा बिमा)-मरि
परिमार है। पानमा ममामाल RT
महोला है वापमा प्रमा:'
..Terr

समामप्रकरणम् १८२। बहुग्रीही सक्थ्यक्षणोः स्वाङ्गात्पच ५४११३॥ चापाचिसध्ययन्ताद बहुमोहेः पच स्यात् । दीर्घसस्थः। जल जाती। स्याङ्गारिकम ? दीर्घसक्यि शकटम् । स्थूलाचा वेणुयष्टिः । 'पदणोऽदर्शनाद्' ५।४.७६॥ इति वक्ष्यमाणोऽन् । पग्यिालिस्विति--'स्त्रिया: पुनमापित.' मादि भूत्र मे 'मप्रियादिप' मर्थात 'प्रिया' पादि पद परे होने पर पूर्वपद को पुचद्माव नहीं होता, यह पर्यो महा? इमलिये कि 'कल्याणीप्रिय ' (कल्याणी प्रिया यस्य स.)-यहाँ प्रिया दाम्म परे होने पर कल्याणी' पाद को पृबदभाव नहीं होता। १४२. नीहाविति-जिसके अन्त में स्वागवामी मक्यि मोर पक्षिाद हों ऐसे बहुमोहि से समासान्त पच प्रत्यय होता है। (बर में 'म' दोष रहता है, कार और पकार इरसंशक वित्' होने से स्त्रीलिज मे पिगौरादि. भ्यश्च १४१ से होप् प्रत्यय हो जाता है।) पोषणय.-दो सपियनी यस्य सः, ऊ जिसके)-से विग्रह में पाठप में बबीहि समास होता है। उपर्युक्त सूत्र से समासान्त पत्र (4) प्रत्यय होकर वीर्ष+रिप+' इस पवाया में 'यस्येति प' से ..' पोप होकर दीर्घमाया रूप होता है। सा- शिणी यथासा (कमल के समान निस)-म विभा में पास में मोहिममाल होता है । ममासान्त पषु प्रश्रय तथा लोप होर 'मला' बना। हमसे स्गलिङ्ग में डीप' प्रत्यय होकर 'जलसा'ने जाता है। रानात मितिचे शरीर पर मिला है। पत्तएर दीर्घसपियर (मम्मी सपिए दामो माड़ी) महो 'सविरोर रामही रितु माहोनीमायो पालो विशेष सती पानाम है : मासान्त नहीं होगा की प्रसार- मा बेगम (ो पासो गली स की नाटी)-पहा भी माशा' में सामान नहीं होगा पार' २.५ से संस्कृतम्याकरण १८३ । द्वित्रिभ्यो प: मूनं: ०४११५ श्राभ्यां मूर्ध्नः पः स्याद् बहुव्रीहो । द्विमूर्धः । त्रिमूर्घः । १८४ । अन्तबंहिD च लोम्नः ४११७। आम्यां लोग्नोऽप स्याद् बहुब्रीहो । अन्तर्लोम :। बहिर्लोमः । १८५। पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्य: ५।४।१३। हत्यादि -इस वियह में 'म' समासान होता है । इसी से 'स्थूलाला' बनता है 'स्थूसाक्षी' नहीं। टिप्पणी - जहाँ पप समासान्त होता है वहाँ 'डी' स्त्री प्रत्यय होत है पिन्तु जहाँ 'पच' समासान्त होता है वहाँ 'टाप' स्त्रीप्रत्यय होता है। १८३. द्वित्रिम्याम् इति-दिौर दि शब्दों से परे मूर्धन् पाब्द को, समा सान्त 'प्रयप होता है, बहुव्रीहि समास में । 'य' में 'म' 'शेप रहता है। शिमूर्ष-दो मुर्थानो यस्य सः (दो सिर है जिसके)- बहुनीहि समास होता है। उपयुक्त सूत्र से समासान्त 'प' प्रत्यय होकर +मन+'म' इस दशा में 'मन्' का लोर (नस्तहिते) होकर विमू:' पाद बनता । इसी प्रकार 'विमूर्घः' (यो मानो यस्यम्-तीन हैं सिर रिमो.) १८४. पन्तरिति-न्तर प्रौर बहिर पाद से परे मोमन शाम को समामात 'प्र' प्रत्यय होता है. यहीहि समास में। पन्ताम:-अन्तर मोमानि याय (भीतर है सोम मिके)-स विषह में बहुधीहि समाम होता है नया उपयुक्त मूत्र से समाप्ताम्त 'म' प्रत्यय होकर "मन्तर+लोमन+प इसमें 'अन्' का मोप (नस्तदि) हो पाता 'मन्तोम' से . एक. में पन्तलोकप बनता है। इसी प्रकार बहिर्मोमः बहिर सोमानि यस्य (बाहर है मोम जिसके), १८. पारस्येति-बहोहि समाग में हस्ति' मादि मे भिल सामान मे परे बामे पार चम्म के अन्त का मोर (गमासान्त) हो जाता है। टिपलो-यह नोट समाधान्त विधि के अन्तर्गत है मन: BRAIL "राषिों के समान मा माता है और उसके होने पर समा.

समासप्रकरणम वर्जितादुपमानात्परस्य पादशब्दस्य लोप. स्याद् घहुव्रीहौ । ध्याघ्रस्येव पादावस्य व्याघ्रगत् । अहत्यादिभ्यः किम् ? हरितपादः । कुसूलपादः। १८६ । सङ्ख्यासुपूर्वस्य ५।४।१४०। पादस्य लोपः स्यात् समासान्तो बहुव्रीहौ । द्विपात् । सुपात् । १८७ । उद्विभ्या काकुदस्य १५४१४८॥ लोप: स्यात् । उन्कात् । विकाकुत्। सान्त 'कप' प्रत्यय नहीं होता। याघ्रपात - व्याघ्रस्येव पादौ यस्य (वाघ के समान हैं पर जिसके)-. इस विग्रह में बहुवीहि समास हेता है भौर उपर्युक्त सूत्र से पाद के अन्त्य प्रकार का लोप (ममासान्त) होने पर व्याघ्रपाद्+ व्याघ्रपात् शब्द बनता है। पहस्याविम्य इति-हस्ती मादि से भिन्न उपमान से परे क्यों कहा? इसलिये कि हस्तिपाद हस्तिन इव पादौ यस्य' (हाथी के समान हैं पर जिसके) तथा कुसूलपादः, 'कुसूलस्येव पादौ यस्य' (कुसूल के समान है पर जिसके) इत्यादि में अन्त का लोप नहीं होता। १८६. संख्येति-जिसके पहले संख्यावाचा या सुदाब्द हों, ऐसे पाद शब्द के पन्त का लोप (समासान्त) होता है, बबीहि समास में । हिपात--टी पानी यस्य (दो पर हैं जिसके इस विग्रह में बहुव्रीहि समास होता है । संख्या पूर्व होने के कारण पाद के अन्त्य प्रकार का लोप (समासान्त) हो जाता है तथा द्विपाद, द्विपात् रूप बनता है। इसी प्रकार सुपात् शोभनो पादौ यस्य (सुन्दर पैर हैं जिसके) । १७. सदिम्या नकुदस्य-उद् पौर वि से मागे वाले काकुद शाद के मन्त का (समासान्त) तोप होता है, बहुबीहि में। उरकाकुत्-उद्गत काकुदं गम्य (उठ गया है तालु जिसका)-इस विग्रह में बहुधीहि समास होकर उत्+ काद इस दशा में उपयुक्त सूत्र से 'प्रकार' का लोप समासान्त' हो जाता है - संसतारणे १८८ | पूर्णाद्विभाषा ||४१४६॥ पूर्णकाकुन् । पूर्णकाइदः । १८६ । सुहृदुह'दो मिनामित्रयोः ।।१०। सुदुर्या दृदयस्य प्रभावो निपात्यते । मुहम्मित्रम। दुईदमित्रः। १६० । उरः प्रभृतिभ्यः कप् ||१| १६१ । सोऽपदादीमा पाशकल्पककाम्येषु विसर्गस्य सः। तथा उकाकद- उसाबुत राद बनता है। इसी प्रकार विकाकुत्, (विगत) कादं यरुप, विगत हुपा है सालु जिसका)। १८८, पूलविति-पूर्ण शब्द से परे काबुद शन्द का समामान्त लोप विकल्प से होता है. बहुव्रीहि समाम में । पूर्णकाकुत, पूर्णकाकुद:--पूर्ण काकुदं यस्य (पूर्ण है तालु जिसका)-इस विग्रह में बहुप्रीहि समाम होता है । जब उपयुक्त मूत्र से पन्त का लोप होता है तो पूर्णकाकुत्, जब लोप नहीं होता तो पूर्णकाकुदः रूप बनते हैं। १०६. सुहृद इति-बहुव्रीहि समास में सुपौर दुर से परे हृदय पाम्द का निपातन द्वारा (समासान्त) 'हृद' हो जाता है क्रमशः मित्र पौर शत्र प्रयं में। सुहृद-शोभनं हृदयं यस्य सः (पच्छा है हृदय जिसका बस, मित्र)=इस विग्रह में 'सु' का हृदय के साथ बहुचीहि समास होता है तथा उपयुक्त सूत्र में निपातन से हृदय को 'हृद' मादेश हो जाता है। इसी प्रकार "दुष्टं हृदयं यस्य"-दुष्ट है हृदय जिसका, दात्र (ममित्र) इस मपं 'दुहद' शम्म बनता है। १६०. उर इति-उरस् प्रादि शनों से समासान्त पप् प्रत्यय होता है, बहुधीहि में । कप में पु का लोप हो पाता है क शेष रहता है। १६१. सति-पाश, कल्प, मोर काम्य परे होने पर विसर्ग को स् हो जाता है।

समासप्रकरणम् १६२ री कस्कादिषु च । ३८ एविण उत्तरस्य विसर्ग पः स्यादन्यत्र तु सः । इति सः, व्यूढोररकः । इः प; ८१२१३६५ इण उत्तरस्य विसर्गस्य । पाशकल्पककाम्येषु परेप । प्रियसर्पिकः । १६४ । निष्ठा २।२।३६ः निष्ठान्तं बहुप्रीही पूर्व स्यात १९२. कस्कादिष्विति-कस्क इत्यादि (गण पठित) शब्दों में : (मर्थात इ. १, ए, ऐ, मो मादि) से परे वाले विसर्ग को ए (पकार) हो है, मन्य को स् (सकार)। यूदोरकः-व्यूढम् उरो यस्य (विशाल है वक्षस्थल जिसका)-इस वि में (प्यूट+उर) बहुव्रीहि समास होता है । पूर्व सूत्र से समासान्त रुप प्रर हो जाता है। 'व्यूढ + उरस्'+क' इस दशा में स् को विसर्ग' हो जाते फिर विसर्ग को स्' होता है। १८३. इण इति-इण से परे वाले विसर्ग को ए होता है-पाश, क क और काम्प पर होने पर- प्रियापिक-प्रियं सपिः यस्य (घृत है प्रिय जिसको)-इस विग्रह घ्यूढोरस्क: के समान समस्त कार्य होता है। किन्तु यहा विसर्ग इकार से है मतः विसर्ग को प्' होता है। १६४. निष्ठति-बहुव्रीहि समास मैं निष्ठा प्रत्ययान्त पद का प प्रयोग होता है। टिप्पणी-क्त मोर क्तवतु प्रत्ययों की निष्ठा अंशा है (तक्तवतू निए मतः पठितः, पटितवान शादि शन्द निष्ठान्त हैं। १.खरवसानयोविसनीयः १८३१५॥ २. सोसवादी ३८॥ से स होता है (तत्वोधिनी) फिर 'कस्का च'का यहाँ क्या प्रयोजन है? यह विचारणीय है। ३. इण: षः ६३२३६॥

संस्कृतव्याकरणे युक्तयोगः । १६५ | शेषाद्विभाषा ।।४।१५४। अनुक्तसमासान्ताद बहुबोहे: कप वा स्यात् । महायशरकः । महायशाः । इति बहुव्रीहिः॥४॥ अथ द्वन्द्वसमासः ॥५|| १६६ । चाय द्वन्द्वः २।२।२९। अनेक सुयन्तं चायें वर्तमान वा समस्यते सद्वन्द्वः । युग्मयोगः--युक्तो योगो येन सः (सगाया है योग जिसने)- इस विग्रह में युक्त तथा योग एम का बहुव्रीहि समास होता है। उपयुक्त सूत्र के अनुसार निष्ठान्त 'युक्त' आम्द का पूर्व प्रयोग हो जाता है । पोपार इति-जिस बहुव्रीहि समास से (कोई) समासान्त में कहा गया हो उससे समासान्त प प्रापय विकल्प से होता है। टिप्पणी-शेष का मय है कहने से बचा हुमा। यहाँ बही ऐप है जिस बहुबोहि से कोई समासान्त नहीं कहा गया है। महाया:, महायता:-महार यो यस्य (महान् पर है जिसका)- विग्रह में महत् पाप का यार के साथ बहुमीहि समाप्त होता है । महान यशस्' इस दगा में 'महत्' शब्द के 'त्'को 'मा' हो पाता है तथा उक्त गूग के पनुमार विकल से समासान्त पिक 'क' होकर 'महायशस्-महा. ययस्क कप प्रत्यय न होने पर महायस् +गु (प्र. एयान में) yमोप उपाय से परे वाले को दोर्ष होकर सको पिसा हो जाते है और महायशाः होता है। संघ :-१५१. पार्थ पति-प (पौर) के वर्ष में वर्षमान भनेर मुखम्तों का (विwer ) समान होता है और उसकी दर समा होती है। १. पारमहरः समानाधिकररावादीयोr समासप्रकरणम् समुच्चयावाचयेतरेतरयोगसमाहाराश्चार्थाः। तत्र 'ईश्वरं गुरुच भजस्व' इति परस्परनिरपेक्षस्थानेकस्यैकरिमन्नन्वयः समुच्चयः । 'भिक्षामट गां चानय' इति अन्यतरस्यानुषङ्गिकत्वेना वयोज्वाचयः । श्रनयोरसामात्समासो न। समुच्चयैति-समुच्चय, मन्वाचय, इतरेतरयोग भौर समाहार--ये चार 'च' के मथं हैं। इनमें-(प्रत्येक का लक्षण यह है) समुच्चय-परस्पर-निरपेक्ष भनेक पदार्थो का एक मे मन्वय होना समुच्चय कहलाता है, जैसे-ईश्वर और गुरु की सेवा करो। यहाँ ईश्वर और गुरु पदार्थों का भजस्व (भजन क्रिया) मे स्वतन्त्र रूप से मन्वय होता है। ईश्वर भजस्व', 'गुरु भजस्व' इस प्रकार मलग अलग दोनों का किया मे मन्वय होता है। ये दोनों पदार्थ मन्वय में एक दूसरे की अपेक्षा नहीं रखते । इसी हेतु दोनों परस्पर निरपेक्ष है। भन्याचय--जब (च के पर्थ द्वारा जुड़ने वाले पदार्थों में से) एक का गौण रूप से (मानुपङ्गिकत्वेन) मन्वय होता है, तो उसे मन्वाचय कहते हैं, जैसे भिक्षामट गां चानय-भिक्षा को जामो और गाय भी लामो। यहाँ च से दो कार्य जुड़े हैं-एक भिक्षा के लिये घूमना दूसरा गाय लाना। इनमे भिना के लिए घूमना (भिक्षाटन) प्रधान कार्य है। यदि भिक्षाटन करते हुए माप मिल जाये तो उसे भी लेते पाना' इस तात्पपं से 'पाप लाना' भानुपङ्गिक पा गौण कार्य है, पतः महाँ च 'भावाचप' मयं को प्रकट करता है। प्रनयोरिति- इन दोनों (समुच्चय मोर मन्वाचय) में सामर्या न होने के कारण समास नहीं होता। विशेष-जहाँ मनेक पदार्थों का एक दूसरे के प्रति माकांक्षा होने से परस्पर सम्बन्ध होता है उसे सामर्थ्य ( ) कहते हैं'. वहीं समास होता १. देखिये सिद्धान्त कौमुदो, तत्त्वबोषिती टीका, समर्थः पदविधिः ।

संतम्याकरण धवसदिरौ छिन्धि इति मिलितानामन्दय इतरेतरयोगः । 'संज्ञापरि- भापम' इति, समूहः समाहारः। . है (समर्थः पविपिः' २१)। समुच्चय में दोनों पापं निरपेक्ष है इरासिये उनमें सामर्दी नहीं। मम्वाचय में एक पाय गौण होता है इसलिये थे परस्पर माकांक्षा नहीं रखते भतएव यहां भी सामथ्र्य नहीं । इसीलिये इन दोनो मयों में समास नहीं होता। दातार योग-मापरा में मिले हुए (इतर का इतर से योग) पदार्थों का एक में प्रथम होना इतरेतर योग कहलाता है, जसे पवमादिरी दिन्धि-घर भौर खदिर को काटो। यहा पर पोर खदिर का एक साथ मिलकर काटना' (घेदन) क्रिया में मन्वय होता है । किन्तु दोनों का अपना अलग-अलग 'व्यक्तित्व' रहता है यही दिवचन से प्रकट होता है। समाहार-ममाहार का मयं है समूह । जैसे; संशापरिभाषम्-संज्ञा मौर परिभाषा का समूह। पहा संज्ञा और परिभाषा को समुदाय रूप में एक मान लिया जाता है, इनका निजी व्यक्तित्व समुदाय में तिरोहित हो जाता है भोर समुदाय का ही अन्य पर्थ के साथ भन्वय होता है। विशेष-इतरेतरयोग मौर समाहार इन दोनों (च के मों) में सामध्ये होने के कारण इन्द्र समास होता है । इसी हेतु नन्द समास दो प्रकार का माना जाता है - १. इतरेतर द्वन्द । २. समाहार इन्द्र । इनके विग्रहादि निम्न प्रकार होते है- घरमादिरी-धयश्च खदिरश्च (घव मोर खदिर)-इस विग्रह में घर पौर सदिर शब्दों का इतरेतर योग में द्वन्द्व समास हो जाता है। 'पप सु +खदिर मु' यहा दिमक्ति का लोप हो जाने पर मलाचुतरम् २०२।१४ से 'घर' का पूर्वनिपात होकर 'घवखदिर' समासपद बनता है। घर और सदिर दो हैं मतः प्रपमा दिवचन को 'मो विभक्ति पाने पर धवखदिरी शम्भ बनता है।

समासप्रकरणम् १५५ १९७१ राजदन्तादिषु परम् ॥२॥२॥३१॥ एषु पूर्वप्रयोगाई पर स्यात् । दन्तानां राजा राजदन्तः। (वा) धर्मादिध्वनियमः। अर्थधौ धर्माधोवित्यादि। टिप्पणी-इतरेतरयोग इन्द्व में यदि पदार्थ दो हों तो समास मे द्विवचन होता है यदि दो से अधिक हों तो समास मे बहुवचन, जैसे-घवश्च खदिरश्च पलाशश्च-धवखदिरपलाशाः । सज्ञापरिमाणम् -सज्ञा च परिभाषा च तयोः समाहारः (सज्ञा और परिभाषा का समाहार)- इस विग्रह में समाहार पर्थ में द्वन्द्व समास हो जाता है । समाहार इन्द्र सदा नपुंसक' लिङ्ग और एकवचन ही होता है। नमक लिङ्ग हो जाने से 'सज्ञा परिभाषा' इस समस्त पद के पन्त को हस्व (माको म हो जाता है । सब प्रपमा एकवचन (नपुं०) की मम्' विभक्ति पाकर 'सज्ञापरिभाषम्' रूप होता है। १९७, राजदन्नेति-राजदन्त मादि शब्दों में जिस शब्द का पूर्व प्रयोग प्राप्त हो, उसका परे (मागे) प्रयोग किया जाता है। राजदन्तः-दन्तानो गजा (दांतों का राजा)-इस विग्रह में 'षष्ठी' सूत्र से (पष्ठी) तत्पुरुष समास होता है। यहाँ 'दन्त' शब्द का पूर्व प्रयोग प्राप्त है।' इस सूत्र के अनुसार 'दत्त' का प्रयोग भागे हो जाता है । धर्माधि (वा) - धर्म (मर्य) भादि शब्दों मे किसको पहले रखा जाय, इसका नियम नही अर्थात् किसी को भी पहले रक्खा जा सरता है। टिप्पणी-धर्मादि इत्यादि "राजदन्तादि' गणपाठ के मन्तर्गत है। द्वन्द्व समास के प्रकरण में 'धर्मावों' मादि प्रयोगों को दिखलानो मभीष्ट पा, १. स नपुंसकम् २।४।२७ २. ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य १२४७ ३. प्रथमानिदिष्टं समास उपसर्जनम् ॥२॥४३॥ उपसर्जनं पूर्वम् ।।३०

संस्कृतव्याकरण
(१९८॥ द्वन्द्वे घि ।२।२।३२॥ द्वन्द्व घिसंज्ञपूर्व स्यात् । हरिदष
हरश्च हरिहरौ।
(१६६) अजाद्यदन्तम् ॥१२॥३३॥ इदं द्वन्द्वे पूर्व। स्यात् ।
ईशकृष्णी।
इसीलिए 'राजदन्तादिए परम्' यह मूत्र यही दिया गया है । 'राजदम्त' पब मैं
पष्ठी
'तत्पुरुष है यह ध्यान देने योग्य है ।
अर्थषमा, धर्मापी-भयंश्च धर्मश्च (भयं भौर धर्म)-इस विग्रह में
इतरेतरयोग में दन्द समास होता है। पूर्व प्रयोग का नियम न होने के कारण
दोस्प बनते हैं।
११८. नाति-द्वन्द समास में यि संज्ञक पद का पूर्व प्रयोग होता है।
यहाँ उपवर्जनं पूर्वम् २।२।३० से पूर्व सद को पनुवृत्ति होती है ।
टिप्पणी-पाणिनि ने पि' एक सजा की है । प्रायः हस्य प्रकारात हरि
मारि पौर उकारान्त गुरु मादि म (सति पद को छोड़कर) पिसमक
होते है।
हरिहरी-हरिश्म हरच (हरि पौर हर)-इस विग्रह में इतरेतर न
ममास होता है। हरि (कारात) को पि' संगा होने
होता है।
१६१. पत्रावति (स्वर) है मादि में मिले वह पाहिलाता
है और प्रत (कार) सिम पन्त में होता है यह मस्त बहमाता है। ये
दोनों एकही विशेषण है। र्थात जिसके मादि में स्वर हो, अन्त में ''
हो ऐमा पा र समास में प्रशादि पोर मत पराप्रपोग
होता है।
Karot-tan II ( धौरहया) Natर
इसमास होता है। यह मशाह (पद है पारि मैं सिर)
इसका पूर्व प्रयोग
--
१.सोपसहि ॥

समासप्रकरणम् २०० । अल्पान्तरम् २.२।३। शिवकेशवौ। RO १।२।७० मात्रा सहोक्तौ पिता वा शिष्यते । माता च पिता च पितरौ, मातापितरौ वा। पिता मात्रा मोर प्रकारान्त है मत एवं इसका पूर्व प्रयोग होता है । २००. अल्पाच् इति प्रल्पाच' का अर्थ है--प्रल (पोडे) मधु । स्वर) जिसमे । जिस शब्द में पोड़े स्वर होते हैं, उसका इन्द्र समास में पूर्व प्रयोग होता है। २०१० शिवकेशवो-शिवश्व केशवश्च (शिव भोर केशव)-इस विग्रह में (इतरेतर) द्वन्द्व समास होता है । यहाँ शिव भल्पान्तर है अतः शिव का पूर्व प्रयोग हो जाता है। टिप्पणी-'केशव' में तीन (ए, म, म) स्वर है तथा 'शिव' मे (इ, म) दो स्वर है इसलिय 'शिव' पल्पान्तर है। पितेति--'मातृ' शब्द के साथ कथन होने पर 'पितृ' शब्द विकल्प से शेष रहता है। पितरो मा मातापितरो-माता च पिता च (माता और पिता-इस विग्रह में मातृ मौर पितृ शब्द का इतरेतर द्वन्द समास होता है । उपयुक्त मूत्र के अनुसार पितृ' पद पोप रह जाता है, किन्तु यहाँ पितृ शब्द 'माता भौर पिता' दोनों के पर्थ को कहता है इसलिये द्विवचन में प्रयोग होता है और "पितरौ' बनता है। जब एक प नहीं होता तब अधिक पूज्य होने के कारण 'मातृ' का पूर्व प्रयोग होता है-(प्रयहितं च, पातिक)। मातृ+पितृ इस दशा में पूर्वपद 'मातृ' के ऋ को पानङ होकर (माना ऋतो द्वन्द्वे ६३१२५) माता पितृ→ प्रपमा द्विवचन में-मातापितगे। विशेष--जहाँ एक पद शेष रह जाता है उन समासो को एकशेष कहते हैं । वास्तव में एक शेष कोई पृषक् समास नही, भपि तु 'एकपति' नाम की भिन्न प्रकार की विधि है। एकशेष विधि में शेप रहने वाला पद चले 40 मार २०२ | बन्दरन प्रारिणतूर्यसेनाङ्गानाम् ॥ एषां इन्द्र एवम् । पाणिपादम । मादंशिकरण विकम । रथिकादारोहम। २०३ । द्वन्द्वादपहान्साह समाहारे ॥४॥१.६ वर्गान्ता- पहाताप दाट स्यात्समाहारे । बाद चखा च पापाय पम् । पाने गाने पर के मर्म को भी कहता है-य: शिष्यते, सुप्यमानार्याभिषायो भा - २०२० श्चेति--यह मजद का अन्वय प्राणि, सूर्य पार सेना तीनों के साथ होता है। प्राली. नूयं (चाय) तया सेना के मङ्गो के वारक पामों का एक वपन में होता है। यह सूत्र नियमार्य है। पभिप्राय यह है किनका समाहार पर्व में ही इन्द्र समाप्त होता है. इतरेतर मोग में नहीं। समाहार एकवचन तथा नलिज में होता ही है। पाणिरायम्-पाणी च पादोष (हाय मोर पैर)-इस विग्रह में, प्राणी के मङ्गवाची होने से पाणि तपा पार शम्द का, उपयुक्त नियम के अनुसार, समाहार न्द्र ही होता है, नपुसकलिङ्ग एकवचन में पाणिपादम्' रूप होता है। मादगिर्वणविकम् --मादङ्गिकश्च वैविकश्च (मृदङ्ग बजाने वाला मोर वीणा बजाने वाला)- -इस विग्रह में 'दुङ्गि' (वाध के मङ्ग) होने के कारण समाहार द्वन्द्व ही होता है सपा नयु, एकवचन होता है। रायकारवरोहम-रपिकाश्च प्रश्वारोहाच (रशिक मौर मुहसकार)- इस विग्रह में सेना के मङ्ग होने के कारण समाहार द्वन्द्व ही होता है क्या नपुं, एकवचन होता है। २०३ इन्दाद् इति-जिस द्वन्द्व समास के पन्त में प्रवर्ग (च) ८, पमा ह होते हैं, उससे समासान्न टच् प्रत्यय होता है. समाहार में । टच में से भोर चु चले जाते हैं केवल 'म' शेष रहता है। वापरवचम्-वाक् प वक् च तयोः समाहार; (वाणी मोर खना का समाहार)-इस विग्रह में वाच् मौर स्वच् का समाहार-मर्थ में दन्द

समासपकरणम्
१५६
स्वासजम । शमीटपदम् । वाविषम । छत्रोपानहम । समाहारे
किम् ? प्रावृदशरदौ । इति द्वन्द्वः ॥
समास होता है । पूर्वपद (वा) के च को क् हो जाता है (पोः कः) । 'वाक्
स्वच्' यह पवर्गान्त है, मत एव समासान्त टच प्रत्यय होकर 'याक्त्वच म'
→ वास्त्वच, न एकवचन मै 'वावरवचम् ।
सापजम्-स्वक च स्रक च तयोः समाहार: त्वचा और माला का
समाहार)-इस विग्रह मे त्वच् और सज शब्दों का समाहार द्वन्द समास
होता है । रोष कार्य वाकवचम् के पमान ।
समीपवम्-शमी च पद च तयोः समाहारः (शमी भोर पापारण का
समाहार)--इस विग्रह मे शमी मोर दषद् का समाहार द्वन्द्व समास होता है।
पन्त में होने से समासान्त 'टच' प्रत्यय होकर पहले के समान रूप
बनता है।
पारिवषम-वाक् प स्विट् च तयोः समाहारः (वाणी पौर प्रभा का
समाहार)- इस विग्रह मे 'वाच् पौर विप' शब्दों का समाहार पर्थ में
बन्द समास होता है । मन्त मे 'ए' होने से समासास्त टच् प्रत्यय होकर रूप
बनता है।
वोपानहम् - चोपानही च तेषां समाहारः (छाता भौर जूतो का
समाहार)-इस विग्रह में छत्र पौर उपानह, पादों का समाहार प्रथं मे द्वन्द्र
समाप्त होता है। अन्त में 'इ' होने के कारण उपयुक्त सूत्र से समासान्त घु
प्रत्यय होकर रूप बनता है।
समाहारे किमिति--'हमाहार में ऐसा क्यों कहा ? इसलिये कि इतरेतर
द्वन्द्व मे सपासान्त च प्रत्यय नहीं होता । जैसे--
प्रावदशरदो-प्रावृट् च शरश्च (वर्षा और शरद)--इस विग्रह में प्राव
भौर पद धब्दों का इतरेतरयोग मे द्वन्द्व समास होता है, म:महा समासान्त
'टेच प्रत्यय नही होता।
॥५॥

१५० संस्कृत व्याकरणे अथ समासान्ताः। २०४ । ऋक् पूरब्धःपथामानक्षे ५४७४ अ अन इति च्छेदः । ऋगाद्यन्ताम्य समासस्य अप्रत्ययोऽन्तावयवः, अक्ष या धूरत- दन्ताय तु न । अधर्च । विष्णपुरम । विमलाप सरः। राजधुरा। अक्षे तु अवधूः । दृढधूरक्षः सखिपथः । रम्यपयो देशः । श्रथ समासान्ताः : २०४. ऋषिति- यहां समासान्ता: से समासान्त पाम की अनुवृत्ति होती है । मूत्र में स्थित 'मानो' इस पर का भ+प्रक्षे यह छ है। जिस समास के अन्त में प्रक, पुर, मप, धुर या पधिन् शब्द होता है उस समास से समासान्त 'म' प्रत्यय हो जाता है किन्तु पक्ष रयम का मध्य भाग) में को 'पुर' धुरी) तदन्त को नहीं होता। पर्ध-मर्धम् शन: (ऋषा का माषा)-इस विग्रह में सत्पुरष समारा होता है । उपयुक्त मूत्र से समासात 'म' प्रत्यय हो जाता है। (पूर्ण मिति पहले दी जा चुकी है। विष्णपुरम-विष्णोः प (विष्ण की नगरी)-म विग्रह में पष्टी तापुरण ममास होता है । उपमुक्त गूत्र मे समासान्त '' प्रत्यय होकर wिण +पर-+--नए साल के प्रपमा एकापन में विष्णपुरम । मिसाप मर:-दिममा पापो मत्र (निर्मम है जल जिसमें)-- विग्रह में बहीहि सयाम होता है। उपयुस मूत्र से समासान्त परपर होगर विमल+पाप+प-विमलाप राम बनता है। गरम् (ना पाविशेषण होने से "मिमापं नमामिन एयवन में होता है। पुरा-राश घु: (राश्य का भार)--हम विप्र में पष्ठी artv सभाम होता है । पत्र ममासा '' प्ररप होर रामन् + धुर + मोर होकर "राप्रपुर"। लोमिन मेटार (मा) भयप (भमापन. स्टार) होहर रामधुग शाम बनता है। शुति-पकीधुरी विषय मान्त 'प्राय नहीं होता माएर 'प्रसस्य घमा पहीमला है। स:-दरा धूपाय (१४ धुरी है विमौ) -इस गि में ghe प्रयुक धुर धमसे वोममा. मीबार ------ ही बापरी मप्यार ..- समासप्रकरणम् २०५ । प्रक्ष्णोऽदर्शनात! | अतःपर्यायादव स्यात्समासान्तः। गवामक्षीव गातः। २०६ । उपसर्गादध्वन: शी गोवाना : समास होने पर समामान्त 'म' प्रत्यय नहीं होता। यहाँ 'पुर' शब्द मक्ष के विषय मे है। मविपयः-सस्युः पन्थाः (सखा का मार्ग) इस विग्रह में पष्ठी तत्पुरुप समाम होता है। अन्त ये 'पयिन्' शब्द होने से समासान्त 'x' प्रत्यय हो जाता है। 'सखि+पथिन म' इस भवस्था में पथिन के 'इन्' (डि) का (नस्तद्धिते) लोप होकर सखिपथ-→ सखिपथ. रूप बनता है। सम्पपयो देश:--रम्या: पन्धानो यस्मिन् (रमणीप है मार्ग जिसमें)- इस विग्रह में बहुप्रीहि समास होता है । समासान्त 'म' प्रत्यय होकर पहले के समान रूप बनता है। २०५. अक्षण इति-वक्षवानी से भिन्न क्षि शम्म से समासान्त प्रचं प्रत्यय होता है। गवाक्ष-~-गवाम भक्षि इव (गो की अति जैसी-खिडकी)-इम विग्रह में षष्ठी तत्पुरुष समास होता है । यहाँ प्रक्षि शब्द चक्षु का पर्याय नही, इस लिये उपयुक्त सूत्र से समासान्त यच प्रत्यय हो जाता है। 'गो+मक्षि+' इस दशा में कार का लोप (यस्येति च) होकर गत् +मन+म+गवाक्ष रूप बनता है। टिप्पणी गवाक्ष वाद के विग्रह-पर्ष में कुछ मतभेद है। मिटान्त कौमुदी की तत्वबोधिनी टीका के अनुसार अक्षि का अर्थ है-छिद्र (गाव: गिरणा:, पक्षि शब्दो राप्रवाची) इसलिये यहाँ यह चक्ष का पर्याय नहीं। बालमनोरमा के अनुसार हा क्षि पद पक्षिसदृश मे लरक्षणिक है प्रतः यह पक्ष का पाचक नहीं तथा भच प्रत्यय हो जाता है। २०६. उपसदिति-उपसर्ग से परे प्रध्वन शब्द को समासान्त 'मध्' प्रत्यय होता है। प्राध्य: . मार्ग पर गया हुमा)--इस विग्रह में 3 २०७ । न पूजनात् ६पुजनार्यात् परेभ्यः समासान्ता न स्युः 8 (वा) पतिभ्यामेव । सुराजा । अतिराजा। इति समामान्ताः॥ 'प्रत्यादयः त्रामा रितीयया' डम (पातिक) से प्रादि समास (तत्तुरूप) होता है । उपयुक्त मूत्र के अनुसार समासान्त 'मम्' प्रत्यय होकर + मध्यन् +म' इस दशा में 'पन्' (टि) का मोप हो जाता है मोर प्रायः पन्न बनता है। २०७.म पूमनाद इति-प्रसार्थक शम्दों से परे वाले शाम से समा. सान्त प्रत्यय नहीं होते । (सुमार मति पान्दो मे परे वाले परों से ही यह समासान्त प्र का निषेप होता है ।) सुराजा--शोभनो राजा (मच्या राजा)-इस विग्रह में 'कुगतिप्रादयः' से प्रादि (तत्पुष्प) समास होता है । यहाँ 'राजाहःसखिम्यष्टन्' से समासान्त 'टच' प्रत्यय प्राप्त हुपा उसका उपयुक्त सूत्र से निप हो जाने पर सुराजन्- (प्र०, एक.) 'सुराजा' रूप बनता है। भतिराजा-पूज्यो गजा (पूज्य राजा) इस विग्रह में प्रादि (तत्पुरुष) समास होता है । यहाँ भी समासान्त टच प्रत्यय का निषेप हो जाता है। इति समासप्रकरणम्

यूथ कृदन्तप्रकरणम्
मथ कृदन्तकृत्यप्रक्रियाप्रकरणम् ||१||
२०८ धातोः
प्रातृतीयाध्यायसमाप्यन्तं ये प्रत्यायास्ते धातोः परे स्युः । कृत्ति
डिति कृत्संज्ञा।
२०६ । बासरूपोऽस्यियाम ३६१६४
अस्मिन्धात्यधिकारेऽसरूपोऽश्वापदप्रत्यय सर्गस्य बाघको वा
यात स्त्र्यधिकारोक्त बिना।
अथ कृदन्त कृत्यप्रकया। २०० पातो.-पह अधिकार मूत्र है । पहा
(१९९१) से प्रप्टाध्यायी के तृतीय अध्याय की समाप्ति पर्यन्त जो प्रत्यय कहे
गये है, वे पातु से परे होते हैं।
हर्शित कृतिह३।१०६. इस मूत्र से (दिङ्ग भिन्न) इन प्रत्ययों को
कृत संज्ञा होती है।
२०६. वामपति-इस पातु के अधिकार में भतरूप अपपाद प्रत्यय
उत्सर्ग श्यय का विकल्प मे बाधक होता है, स्त्रिया तिन्' ३३. इस
अधिकार में प्रस्पयों को छोड़कर ।
रसगं बस पर है--सामान्य (General) और प्रकार का पथ है--
निरोप या वापक (Exception) : नियम यह है कि मपाद प्ररथप उत्सगं प्रत्यय
का बाधक होता है। इस सूत्र से धातु के पवितार में उक्त प्रारूप
प्रत्ययों के विपर में यह दाप दिवस होता है। जैसे-पए ३१२॥
इस मूत्र द्वारा अपद होने पर भी पानुषों से परा. प्रत्यय का विधान
frया गया है। यह पण सामान्य प्रत्यय है। सोनुपमर्ग सूत्र
दारा धान्न पातु से 'क' प्ररर का विधान किया गया है। यह 'क'एप
पए प्रत्यय ा प है। महरा अपं है--समान समासा से परा
और को सप स्य है कि दोनों में रहा है। जो सET
महों में समा प्रस्थर है। ये समत्' प्ररर का यह प्रत्पर पसरूप है।
मसाप मम प्रकरण में विकास से
फमठः पास
म मर सम्म को हमेशा
पवादब

२१० । कृत्याः ३१६५ एकुलतृचावित्यतः प्राक् कृत्यसंज्ञाः स्युः । २११ । कर्तरि कृत् ३।४६॥ कृत्यप्रत्ययः कर्तरि स्यात् । इति प्राप्ते। २१२ । तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः ३।४७०। एने भावकर्मणोरेव स्युः। २१३ | तव्यत्तव्यानीयर: ३१६६६। घातोरेते प्रत्ययाः स्युः । एधितव्यम, एघनीयं त्वया। भी; जैसे दातव्यम, देयम् दोनों रूप बनते हैं। किन्तु वासरूप परिभाषा स्त्री- पधिपारोक्त प्रत्ययों में नहीं लगती। पत: स्त्रियां विनन्' इप्त सामान्य नियम का 'प' प्रत्ययात् ३३३१०२। नित्य बाधक होता है मोर विकीर्वा रूप ही यनता है। २१०.रया इति-स तृषौ ३१११॥ इससे पहले के प्रत्ययों की कृय संज्ञा होती है। २१. पतंरीति-पत्यय पर्ता पर्य में होते हैं। इसके प्राप्त होने पर- २१२.सपोरेवेति-वृत्प. वन, पौर चल मयं वाले प्रत्यय भाव मौर कर्म (तपो.) में ही होते है। २१३. ताति-धातु से तथ्य, तथ्य और मनीपर प्रपय हो । सम्पद में 'तम्मा मेष रहता है तथा इराको पातु से जोड़ने पर भी तम के समान ही बनते हैं। रेवण बरा है. तम्मत स्वरित होता है (निवरितम्)। पनीयर में मनीय शेष रहता है। एभिनयम, एपनीयम सया (बना गाहिये)-एप (दि होना, पार्मर) पातु मे मार में तय (तम्यत भी) या पनीयर प्रायय होते है। १. पाचागुम्मेदवलाः १२३५५ के अनुसार दुघ (At) कानुषों में 'मम' प्रार होने पर पर और यानुरे बोर में राजाद 11) र रहता है। ..

कृत्यप्रकरणम् भावे औत्सर्गिकमेकवचनं क्लीवत्वम् । चेतव्यश्चयनीयो वा धर्मरत्वया। (भ) केलिमर उपसंख्यानम् ॥ पवेलिमा माषाः । पक्तव्याः । भिदेलिमाः सरलाः । भेनच्या दत्यर्थः । कर्मणि प्रत्ययाः। एष्+तव्य---तव्य से पूर्व इट' (इ) का यागम होकर एवितव्य, कृदन्त होने मे प्रातिपदिक संज्ञा होकर सु आदि एघितच्यम् । एप+भनीय-एघनीयम् । टिप्पणी-कृतद्धित समासाश्च ११२४६। से कृदन्त, तद्धितान्त तथा समाप्त की प्रातिपदिक संज्ञा होती है। पाणिनि ध्याकरण में प्रातिपदिक संज्ञा वाले शाद से ही 'सु' मादि (विभक्ति) प्रत्यय होते हैं । भाष इति-भाव सामान्य एकवचन तया नपुंसकलिङ्ग होता है । कृत्य प्रत्यय प्रामक पातुमों से मात्र में होते हैं, तथा सकर्मक धातुमो से कर्म में (तयोरेव कृत्यक्तनली.) । एष धातु भकर्मक है, इससे 'सच्यत्' पादि भाव में होते हैं । इसलिये एघितव्यम' मादि में भाव मे एकवचन तथा नपुसकलिङ्ग होता है । इनके साथ क्र्ता में तृतीया विभक्ति होती है (कत करणयोस्तृनीया) इसी से त्वया' यहा तृतीया विभक्ति है। चेतव्यः, चयनीवः वा धर्मस्त्वया - तुझे धर्म पजित करना चाहिये)- यही चि (चुनना, सकर्मक) यातु से कर्म मे तम्य मोर मनीयर प्रत्यय होते हैं। चि+तव्य' को गुण(ए) होकर चेतब्यः । चि+पनीय-६' को गुण 'ए' तथा 'ए' को 'प्रय' होकर भयनीयः । चि धातु सकर्मक है । पर के उदाहरण मे कम में प्रत्यय हुमा है, इसी से 'चेतव्यः' प्राधि में कर्म (धर्म) के अनुसार पुल्लिङ्ग पोर एकवचन होता है । यहाँ (अनुक्त) कर्ता में तृतीया होती है - (त्वया)। सिमरति केलिमर प्रत्यय भी तव्यत् प्रादि के साथ कहना चाहिये। केलिभर मे 'एलिम' शेष रहता है। पचेलिमा भाषा:-पक्तव्या (पकाने योग्य)-पच् (पकाना, सकर्मक + केलिमर---पलिमाः। कम में प्रत्यय होने से कर्म (माषा:) के अनुसार १. इस प्रकरण में इगन्त (इक् प्रत्याहार है अन्त मे जिसके) भङ्ग को 'सार्वधातुकापातु यो: ३३४ से गुण होता है तथा उपधा के लघु इक को 'पुगन्तलघुपयस्य च ७३श से।

संपतमाकररो २१४ । परपल्युटो बहुलम ४११ मचिमिति: क्वचितप्रवृत्तिः वचिद्विमापा क्वचिदन्यदेव । विधेर्विधान बहुधा ममोश्य पतुर्विध बाहुलकं वदन्ति ॥१॥ स्नात्यनेनेति स्मानीय चूगांम् । दीयतेऽरम दानीयो विप्रः । २१५ । प्रचो यत् ॥१ अजन्तादातोयंत् । धेयम्। पुलिसथा वहन होता है। भिवेतिमा: सरसा:--मेतया इस्पर्म: (काटने योग्य सरल वक्ष)-मिद (भेदना, तोना)+लिमर-मिटेलिमाः । पूर्ववत् । कर्मयोति -पतिमाः, भिदेतिमाः में कर्म में प्रत्यय हुण है, पच मोर भिद धातु सकमंश है। २१४. करयेति--कृत्य संजक प्रत्यय और ल्युट् बहुलता से होते हैं । यहाँ कहे हैं उससे भिन्न स्थलों में भी होते हैं। टिप्पणी- बहुल धन का पं है 'बहुत ढंगसे' (बहूनान सातीति) पगली कारिका में बहुल के प्रकार बत्तामे हैं। पवधिरिति-कहीं (नित्य) प्रवृत्ति होना, कहीं प्रवृत्ति न होना, कहीं विकल्प से होना, कहीं कुछ और ही होना इस प्रकार विधि का बहुत प्रकार का विधान देखकर (विद्वान) चार प्रकार की (बहुलता) बतलाते हैं । स्मानीयम् -नाति भनेन (जिससे स्नान किया जाता है वह पूर्ण स्नानीय कहलाता है जहाँ ना' पातु से करण अपं में मनीयर प्रत्यय बाहुलकात हो गया है-स्ना+मनीय स्नानीयम् । शानीय: दीयतेऽस्म (जिसे दिया जाता है, वह दानीय विप्र है- 'दा' धातु से सम्प्रदान मे मनीपर प्रत्यय हो जाता है । टिप्पणी-कृत्य प्रत्यय भाव और कर्म में होते हैं, 'बहुल' कहने से ये कार के उदाहरणों में करण और सम्प्रदान में भी हो गये हैं। २१५. पच इति-प्रजन्त (जिसके अन्त में स्वर हो) धातु से यत् प्रत्यय होता है। धेयम् (चुनने योग्य)--अनन्त चित्र, (चुनना) धातु से यत् प्रत्यय होकर कृत्यप्रकरणम् १६७ २१६ । ईद्यति ॥४६५७ यति परे श्रात ईस्यात् । देयम् । २१७ १ पोरदुपधात् ३१९६८ वर्गान्ताददुपवायत् स्यात् । यतोऽपवादः शयम, लभ्यम् । २१८ । एतिस्तुशास्वपः क्यप् ३१.१०॥ भ्यः चप्पयात् २१६ । ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् ॥१७॥ 'को गुण (ए) पेय । प्रातिपदिक एशा होकर न सिन में सुखमम मिति-यत् प्रत्यय परे होने पर मा कोई हो जाता है। म् (देने योग्य या देना चाहिये)-दा (देना) थातु से यत् प्रापय + यर के से पा कोई होकर दो+2+६ को गुण ए पम्। ७. पोरिद्धि-जिस धातु के अन्त में पवर्गकोई रर्ण हो हथा उपमा उससे मत् प्रत्यय होता है। पति-यह या प्रत्यय 'हलोपत १२४ से प्राप्त व्यत् का । H-1 के योग्य- (शाप देना या पथ माना) धातु के पिगं) है पौ. उपमा में है इसलिये इससे यत् प्रत्यय होकर 1.--(पाने योग्य)ल र पाना ) पातु से पर प्रत्यय होर लम्पम्। गो-सम् पातु के अन्त मे पर्ग का रं भरेमपात के वन से (उपमा) पकार है। एति हति-रण (ए). पातु से र है। मे उनमोर संस्कृतव्याकरणे इत्यः । स्तुत्यः । शासु अनुशिष्टौ। २२० । शाम इदङ्लो: ६४॥३४॥ शास उपघाया इत्स्यादङि इलादी विडति च । शिष्यः । मृत्यः । पाहत्यः । जुष्यः। २२१ । मृजेविभाषा ३।१११३॥ मृजेः क्यवा स्यात् । मृज्यः । होने पर ह्रस्व को तक का मागम होता है । (क्यप् पित् है)। इत्य, (जाने योग्य।-इण (जाना) धातु से क्यप् प्रत्यय होकर इ+य- 'इ' से परे तुक (व) का पागम इ+६+य इत्यः । इसी प्रकार स्तु (स्तु करना, धातु से-स्तुतियप्+स्तुत्य: (स्तुति करने मोग्य)। शामु इति-मास् पातु अनुशासन प्रथं में है। २२०. शास इति-शास् धातु की उपधा को इकार हो जाता है पड्य हलादिति हि प्रत्यय परे होने पर । (क्यप् ति है) शिष्य - बास् (पनुशासन करना)-धातु से क्यप् प्रत्यय होक पास् +यरप्शाम के पा (उपधा) को इकार होकर शिस्+7-1 पशिष्यः। वत्यः-(वरण करने योग्य)-4 (वरण करना) धातु ये कापू, + →तुक होकर-वृत्यः। पात्यः-(मादर--योग्य, मादरणीय)-माइ (उपसर्ग) पूर्वक (पार करना) धातु ये पप होकर भाद+म+तुक-मादयः । -(सेवनीय)-जुप (प्रीति तथा सेवा करना) पातु से गया होता •२१. मवेरिति-मृत धातु से या प्रस्थप होता है विकला है। भार (पट करने योग्य)-गज (शुद्ध करना) धातु से सपा दोहर मुर+य-मयः । १.शानिमिघमीमां व inton २. सत्यम परे होने पर दिमिक ११ गुण दिशापि हो कृश्यप्रकरणम् २२२ । ऋहलोय॑त् ६१॥१२ ऋवणान्ताद्वलन्ताच्च धातोर्ण्यत् स्यात् । कार्यम् हार्यम धार्यम । २२३ । चजोः कुधिष्ण्यतोः ॥३॥५२॥ चजी: कुत्वं स्यात् घिति एयति च परे। २२४ । मजेर्वृद्धि: ५ २०११॥ मृजेरिको वृद्धिः स्यात् सार्वघातुकार्घधातुकयोः । मायः। २२२. ऋहलोरिति-जिस धातु के मन्त में ऋकार अथवा व्यजन हो उससे पयत् प्रत्यय होता है। कार्यम्- (करने योग्य, करना चाहिये)-कृ (करना) धातु से प्पत प्रत्यय होकर कृ+य-णित् प्रत्यय परे होने से ऋको वृद्धि भार होकर कार+4+-कार्यम् । इसी प्रकार ह ( हरण करना) से हु+ ण्यत् +हायम् (हरने योग्य)। ५ ( धारण करना) से धु+यत्→ धार्यम् (धारण करने योग्य)। ३२३. बजोरिति- भोर व को 'कुरव ( कवणं ) हो जाता है पित (जिसमें प इत् हो) भोर ण्यत् प्रत्यय परे होने पर । २२४. मरिति-मृज् धातु के ऋ (इक ) को वृद्धि हो जाती है सार्व- घातुकमोर मार्धधातुक प्रत्यय परे होने पर । टिप्पणी- पातु से होने वाले तिज (तिप्, तर, झि प्रादि) पौर शित (जिराभै श् इत् हो) प्रत्यय सार्वधातुक' कहलाते हैं तथा इनसे मिल मा. धातुक (तिसित्सार्वधातुकम् ३।४।११३ तथा माघधातु शेषः ॥११)। माग्यः (शुद्ध करने योग्य)-मज् धातु से क्यप् के विकल्प मे ण्यत् प्रत्यय होकर भुज+यप्→ऊपर के सूत्रों से जकार को गकार (कुत्य) तथा ऋ को पार (दि) मार+ग+य--माग्यः । १. प्रपोटिति २१११५॥

२२५ | भोज्यं भक्ष्ये ॥३॥६॥ भोग्यमन्यात् । इति परमप्रक्रिया utu अथ पूर्वकृदन्तम् ॥२॥ २२६ । वुल्तृची ३.१॥१३॥ घातोरेतौ स्तः । कर्तरि दिति कर्ये। २२७ । युनोरनाको ५११११ यु बु एतयोरनाको स्तः । कारकः । कर्ता । २२५. भोज्पमिति-भक्ष्य प्रर्थ में भोज्य शब्द बनता है। भोज्यम् (खाने योग्य, भक्ष्य)-गुज् (पालन तया भोजन करना) धातु से 'न्त होने के कारण ण्यत् प्रत्यय होता है । भुज+य इस दशा में ज को कुरव ) प्राप्त होता है किन्तु आर के सूत्र से भक्ष्य भ में कुष्य का प्रभाव निपातन ने से वह नहीं होता, 'उ' को गुण (मो) होकर भोज्यम् । अन्य पर्यात गने योग्य अर्थ में कुत्व होकर भोग्यम् । इति कृत्य प्रक्रिया ॥११॥ २२६. अय पूर्वकृदन्तम् । लिति-धातु से ज्वल पोर तृचु प्रत्यय होते प्रयल में तथा तृच् मैं तु शेष रहता है। टिप्पणी-वल्तृचौ से भारम्भ करके 'करणे यजः २४९' से के प्रत्यय मान काल में होते हैं। कतरीति- 'कर्तरि कृत् २११', इस सूत्रानुसार ये प्रत्यय कर्ता पर्थ में २२५. युवोरिति-यु मोर व इन दोनों को क्रमशः मन मोर मक मादेश जाते हैं। हारक:- करोति इति (करने वाला)- (करना) धातु से फर्सा पर्य दल प्रत्यय होकर कृ+ण्वस्→ को मक तथा ऋ को बुद्धि (पार) र कार+भक-कारकः । स्त्रीलिङ्ग में कारिका, नपुंसकलिङ्ग में कता-करोति इति (करने वाला)--+-+ऋ को गुण १.प्रचोणिति ७२।११५॥ २. सार्वधातुकाधधातुकयोः | मक ।

पूर्वकृतम २२८ । नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युरिगन्यवः ।।११३४ नन्यादेव्यु, प्रयादेणिनि । पचादरच यानन्दयतीति नन्दनः । जनमर्दयतीति जनार्दनः । लवणः । माही स्थायो । मन्त्री पनादि- राहतगणः । पर-कर +7+गर्नु । पु. प्रथमा एक० में पा । (स्त्री.) कर्बो. (नपु.) पर्नु । २२८. मादीहिनदि पारि धातुमों से क्यु प्रत्यय, पह, पादि से गियान तथा एप यादि से पच होता है। स्थ में युदोष रहता है, गिनि मै इन् और मच् में तीनों प्रत्यय कमि में ही होते है। मायन:--नन्दति इति (मानक्षित करने वाला) --णि प्रत्ययान्त (और. साधक) नदि धातु मैच प्रत्यय होकर नन्दि+यु-» को धन (युयोरनाको) मदि+मन--णि) पोर होकर नन्द+मन-नन्दनः । मनाम-जनमदयति इति (जन को गति देने वाला, विष्ण)-जन उस पर-युक्त णिजन्त मद' (गति और याचना) पातु से स्पु प्रत्यय होता है। बन +++--पुको मन तथा {णि) लोर बनाईनः । सपस:-सुनाति इति (काटने वाला, नमक)-सत्र (टना। पातु से प्रत्यय होर +- ++न-5ो गुण (मापापातुख्योः) भोतमा पोको पद होकर म+पन । नन्दादिगण में विरान सेनकोग होवा:-:. सही-पहा ति ( पाने वाला)-1 (हण करना) धातु से लिनि रपय होग+ इस में उसको दिमा) होर पाह+न-पाहिन् । प्रा एकान में प्राटी।। १.रनिट १४१५११ २.पा उपाया: २११ सारेको होती है। शिविर मरस परे होने पर . .

कृतव्याकरण २२६ । इगुपधज्ञाप्रीकिरः क: ३।१।१३५१ एभ्यः कः स्यात् । युधः। शः सः । प्रियः । किरः । स्थायी-तिष्ठति इति (स्थिर)-प्टा (ठहरना) पातु से णिनि प्रय होकर स्था+इन् इस दरा में पिरयय पर होने से स्था धातु को युक का मागम होता है । पा+-+इन्+स्थायिनपु. एक० में स्थायी। मन्त्री - मन्वति इति (मन्त्रणा देने वाला}--णिच् प्रत्ययान्त मनि (चुरादि, गुप्त वार्तालाप करना) धातु से गिनि प्रत्यय होता है । मन्त्र + {णिच् }+गिनि→मन्त्र+इ+इन्-+६ (णि) का लोप होकर मन्त्र+इन+ मन्निन् →मन्त्री। पचाविरिति-पच् मादि प्राकृतिगण है । पचति इति पचः-पर- मन्च (पकाने वाला) इत्यादि शब्द पच् प्रत्ययान्त है। २२६. इपयेति-जिन धातुप्रो की उपधा में इ, उ, ऋ, ताइक) में से कोई हो (इगुपष) इनसे तथा झा, प्री मोर धातु से क प्रत्यय होता है। क प्रत्यय में प्रशेप रहता है। यह प्रत्यप किन है अतः इसके परे रहते 'पिद्धति ।' से गुण-निषेप हो जाता है। धुष-(जानने वाला, विद्वान् } बुघ (जानना) घातु की उपधा में उ (st.) है । अतः इप्तये क प्रत्यय होकर वुध+प्रदुषः । प्रत्यय के किद होने से । को गुण (मो) नहीं होता (विडति च)। कृश:-कृश्यति इति (दुबला, सोण)-कर (दुबसा होता) पातु सेक प्रत्यय होकर कृतः । (ऋ को गुण नही होता)। श:-जानाति इति (जानने वाला)-शा (जानना) धातु से क प्रत्यय होकर शा+म+प्रत्यय के किन हाने से पा का लोग (मातो लोप इटिप १४६१) होकर श++शः। १. मातो युक विणकृतोः ७३३३३३॥ माकारात को युक का भागम होता तपाणित कृत प्रत्यय परे होने पर। -१

२२० ।
प्रज्ञः । सुग्नः ।
२३१ । गेहे क: Aut
गेहे कर्तरि प्रदेः क स्यात् । गृहम, ।
foय:-श्रीगाति इति (सृप्त करने वासा)-प्रा (तृप्त करना, क्यादि)
पान से क प्रत्यय होकर प्री+को+4 इस दशा ईकार को इप
(इयू) मादेश होकर प्रिय +मप्रियः ।
किर:-किरति इति (बिखेरने वाला)-क (दिखेरना) धातु से प्रत्यय
होकर काम को हर-किर+म-किरः ।
२३.. भातश्वेति-उपसर्ग पूर्वक माकान्त धातु से क प्रत्यय
होता है।
प्रम-प्रजानाति इति (प्रकृष्टता से जानने वाला)- उपसर्ग सहित ज्ञा
(जानना) यातु से कमरपय होकर प्रशा+म+प्राकार का लोप प्र+:+
प्रशः।
सुग्ल:-मुग्लायति इति (मलो माति ग्लानि करने वाला)-सुपूर्वक ग्ल
(प्लानि) धातु के ऐ को मा (देच उपदेशेऽशिति ६१४५) होकर क प्रत्यय
होता है । सुग्ला-+क+पा का लोप सुग्ल+प्र-→सुग्लः ।
गेहे इति-यदि गेह (घर) कर्ता हो मर्यात् गेह पथं को प्रकट करने
में प्रह, पातु से क प्रत्यय होता है ।
गृहम्गृह्णाति घान्यादिकम् इति (जो मन भादि को रखता है. पर)-
इस विग्रह में ग्रह, (ग्रहण करना) धातु से क प्रत्यय होकर पह+क इस दशा
में धातु के र फोह (सम्प्रसारण) होता है, गह+गृहम् । गृह शब्द
१. मचि अनुपातुभ्र वां बोरियङ्वको ६।४15
२. ऋत इद् धातो: ७१।१०० इस सूत्र से ऋ को इ। इमर है मतः यह
र के साथ (दरण रपरः) होती है तथा ऋदर हो जाती है।
३. पहिल्यावयिम्पपिस्टिविचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां डिति च
'.

संस्कृतबारणे २३२ । कर्मण्यरए ३२०१६ फमण्युपपदे धातोरण प्रत्ययः स्यात् । कुम्भ करोतीति कुम्मकारः। २३३ । पातोऽनुपसर्गे कः ॥२३॥ श्रादन्ताद्धातोरनुपसर्गातकर्मण्ययुपपदे क' स्यात् । श्रणोऽपवादः । श्रातो लोपः। गोदः। धनदः । कम्बलदः । अनुपसर्ग किम, ? गोसन्दायः - - पुल्लिङ्ग में सदर बहुवचनान्त होता है, जैसे-गृहा: दाराः । २३२. कमणीति-कम उपपद होने पर पातु से अण प्रत्यय होता है। कुम्मसार:-कुम्भ करोति इति (पड़ा बनाने वाला-कुम्हार)--इस विग्रह में कुम्भ+क+अणक के ऋकार को वृद्धि' पार होकर कुम्भ-+कार- कुम्भ को कार राब्द के साथ उपपद समास (उपपदमतिङ्। होकर कुम्भकारः । टिप्पणी-इस धातु अधिकार में सप्तम्यन्त पदों से समझा जाने वाला (बोध्य) पद उपपद कहलाता है और उसका मगले पद से समास होता है (उप- दितिङ्) । (विशेप द्रष्टव्य 'उपपदमतिङ् १५५) २३३. पातहति-जिससे पहले उपसर्ग न हो ऐसी मादल पातु से कर्म उपपद होने पर 'क' प्रत्यय होता है । यह प्रण का बाधक है। गोवा-गां ददाति इति (गाय देने वाला)-गो+द+क-गोदा+ +पा का पोर होकर गो+द+-+गोदा। इसी प्रकार धनं ददाति इति निदः (घन+या+क) कम्बलं ददाति इति कम्बलर (कावल++क)' अनुपसर्ग किमिति-उपसर्ग रहित माहारान्त धातु से क होता है यह क्यों है इसलिये कि गोसन्दायः में 'सम्' उपसर्ग सहित दा पातु है मत: महांक भयोजित Utt|| २.भातो लोप इरि६४४६४१॥

पूर्वदत्तप्रकरणम् * (41) मूलविभुजादिभ्यः कः । मूलानि विभुजनीति मूलविभुजो रयः प्राकृतिगयोऽयम, महीपः । कुधः । २३४ । चरेष्ट: ३।१६ अधिकरणे उपपदे । कुरुचरः। २३५ । भिक्षासेनादायेषु च ३।२।१७॥ भिक्षाचरः । सेनाचरः । श्रादायेति स्यबन्तम । श्रादायबर । नहीं होता मरतु प्रा प्रत्यय होता है गो+सम् + दा+प्रणा से परे युक का भाग' गो++--- गोसायः । मलेति (41)-मूविज भादि शम्दो मे क प्रत्यय होता है । मलविमुको रफा-भूतानि विभुजति (वों को कुचलने वाला स्थ)--- मूल+विभुज+क-- मूल+विभुज, उपपद समास होकर मूरधिभुजः । मातोति यह (भूलविभा पादि) प्राकृति गण है । भतएव मही धति इति-मही+५+--प्रत्यय के वित होने से पुरानी होता भपितु ऋको र (पण होकर मही+घ+र+म - महीना। इसी प्रकार क् पृथिवी परति कुमः । महीम और कुछ द पर्वत के पर्याय है। २३४.परेरिति-पिकरण उपपद होने पर चरभात सेट प्रत्यय होता है। 2 में प शेष रहता है। टित होने से स्त्री से हो । पुर:-पुरुषु परति इति गुरुपदेश में पूमने पाकुरु+are+ ४-+पर+Rउपर समास दुरुपरः। स्त्रीलिङ्ग में टित होने से डीप एकरी। २३५.भिति-भिशा सेना पर माय शम उपद होने पर पर धातु से ट प्रत्यय होना है। भिक्षा:-भिदा परति (भिशारण करने वाला)-भि+पर +3. सेनाघर:-सना यति सेना में प्रविष्ट होता है-सेना+पर+2 १. माता मुकरिणत: १३॥३॥ २.टि. ११॥ ३. सेना परति प्ररितील. (वायोपिनी} !

areण्याकरण २३२ । कर्मण्यरण ३२॥१॥ कमण्युपपदे घातोरण प्रत्ययः स्यात् । कुम्भं करोतीति कुम्भकारः। २३३ । पातोऽनुपसर्गे कः ३२॥३॥ पादन्ताद्वातोरनुपसर्गात्कर्मण्ययुपपदे क स्यात् । अणोऽपवादः । प्रातो लोपः । गोदः । धनदः । कम्बलदः । अनुपसर्गे किम ? गोसन्दायः पृस्मिा मे गदा बढ्य पनान्त होता है, मे-गृहाः दाराः । २३२. कमलाद-कम उपपद होने पर पातु से पण प्रत्यय होता है। कुम्मार:-शुम्भ करोति इति (पहा बनाने वाला-मुम्हार)-इस पिह में भ++पण -- के पार को टि' पार होकर कुम्म+सार- पुम्भ रोगर के साथ उपपद समास (३पदमनिइ होकर गुम्भकारः। पिली-म धातु अधिकार में हप्तम्यन्त पर्यो मे गममा जाने वाला (बोय) कहलाता है मौर उमका अगी पर से समास होता है (31. पनि) । ( पिस्टप 'उपपदनि १५५) २३. पात-जिममे पहले पास न हो ऐसी मान्नु पातु मे गर्म होने एक प्रत्यय होता है । यह पए का बाधक है। मोर:-माहानिति (गाय देने वाला)-गो+द++गो++ --भासमोर होकर मो++म-गोरा इमी प्रकार मनं दशादिति नाः (पन++)। कम्पन राति इति काबर:: (+at+r नाम रिति-टाइम हित पारात बार होता है यह E ! इसलिये कि गोमनाया में 'मम्' उपमर्ग महित साचातु। यहाँ 1.मोनिया २.भादो मौत intel मृलदिभुजा - मिहीध.घ्रः। २३४ । चरेप्टः ॥२१॥ अधिकरणे उपपदे । पुरुषरः । २३५ । भिक्षासेनादायेषु च ॥२॥१४॥ भिक्षाचरः । सेनाचरः । प्रादायेति स्यबन्तम । श्रादायनर । होता अपितु पण प्रत्यय होता है गो+सम् +दा+प्रणा से परे एक गम' पो+दा+य--प-गोसदायः । लेख (1)--मूमरिमा प्रादि सम्मों में क प्रस्म्य होता है। सविमुमो रए:-- भूमानि विमति (बों को कुचलने वाला ग्यो-- बिभु-+विभुज, पद रामास होर विभत्र । तति यह (मूविभु आदि) प्रालि गए है। एक मही ति-मही+++--प्रत्यय के रित होने से गुण मही होता परितु १ (पए) होकर मही+++4 महीना। इसी प्रार वाति दुमः । महीन मोर म 'पत' पर है। ५. रेरिति-पधिकरण उपर होने पर पर पातु मेट पर होता पऐप मा।रित होने में की हो । -गुरपु परनिति (पुर में पूमने वाना)-पुरु+पर+ +पर+4-- उपस मास परवीमिङ्ग में टि होने ..fir-पिता सेना पोर पादार व उपसर होने पर पर भरपयोग। r-भिमा पति भारत ने वामा,-भिसार -गो (ना में sire'होता है)-ना+र+। ran Trimum fears. In नागपं. (रोपिनी)।

माITIA २३६ । फूलो हेतुमच्योल्यानुलोम्ये ३०॥२०॥ पपु गोत्यपु करोष्टः रणन। २३७ : कृरुगिसकुम्भपामकुमाकर्णीवनव्ययस्य ८३४६। पादुत्तरम्यानम्ययाय विमर्गस्य समासे नित्यं मादेशः स्यान् करो- त्यादिपु परेषु यशस्करी यिया ' भाद्धकरः । बननकर। २३८ । एजे: खर ॥२॥२ । एयन्तादेजेः सश ग्यान पावायेति-'प्रादाय' यह स्पा प्रत्ययान्त दाद है। पावायचर-प्रादाय (गृहीरवा) परति (लेकर घरने वाला)-मादार +पर+ट। २६६. कल इतिहेतु, ताच्छील्य (वंसा म्वभाव होना) तथा पानुनीर (गुकलता) प्रस्ट हो तो (कर्म उपपद होने पर) कृ धातु से ट प्रत्यः होता है। २३७. प्रत इति-प्रकार से परे उस विसर्ग को, जो अव्यय का न हो, समास मे नित्य सकार भादेश हो जाता है , कम् पातु तथा कुम्भ, पात्र। कुशा मोर की सब्द परे होने पर । मशस्करी विद्या-यशः करोति, ती तुः (यशदा हेतु विद्या)-पृशो हेतु सूम से हेतु प्रथं में ट प्रत्यय होकर यशः+कृ=+:+++ को गुण धर् यशः+कर, उपपद समाम तथा ऊपर के मूत्र से विसर्ग कोस होकर यस्कर (स्त्री०) डोप प्रत्यय यास्की। पद्धकर:-श्राद्ध करोति, मच्छीलः भयवा याद कतुचीलमस्य (स्वभाव से थाद करने वाला)-प्राद++ट+था++म+ऋ को गुण पर श्राद्ध कर उपपद समास पाटकर। वचनकर:-वचनं करोति, तदनुलोमः । (वचनानुकूल कार्य करने वाला)- वचन+क+2+वचनकरः। २३८. एजेरिति-णिच् प्रत्ययान्त (प्रेरणार्थक) एज् (कांपना) पातु

पूर्वकृदन्त प्रकरणम
२३९ । प्रद्विपदजन्तस्य मुम ६४३६६७।
अस्पो द्विपतोऽजन्तस्य मुमागमः स्यात् खिदग्ने परे नाव काय ।
शिवाच्छवादिः । जनमेजयतीति जनमेजयः ।
२४० । प्रियवशे वद; खच् ३३२॥३८)
प्रियवदः। वशवदः।
२४१। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते ३१२१७५॥
मशिन पनि विच एने प्रत्यया घातोः स्युः ।
सेवा प्रत्यय होता है।
सश् प्रत्यय में शेष रहता है। शित होने से इसकी साधातुक (तिइ.
वित् सार्वधातुकम्) संशा होती है । पत: बीच में शप (4) प्रादि पा जाता
है। वित्' करने का फल मागे बतलाया जाता है-
२३६. महरिति-भष्प् द्विपत् पौर अजन्त (स्वरान्त) मन को मुम् का
मागम होता है । सिदन्त पद परे होने पर किन्तु पव्यय को नहीं ।
शिरवादिति--राश प्रत्यय के गित होने से शप घादि होते हैं।
जनमेमप:---जनमेजयक्ति (जनता को कपाने वाला, मजा है-
गिअन्त एज धातु (एजि) से सा प्रत्यय होता है। जन सम्+पजिन पश्-
या के बीच में पप्' (4) होकर उन पम+एशि++4 (}
-r'को मुख एतथा पय् होकर जन +एजय +4+प पहले को
पर होता है तथा भम का सुक (मुमो घात) होकर सिदन्त एप्रय र
परे रहने पर पजस्त जन को मुम (म}~उन ++एजप-जनमेजपः ।
प्रियवश इति-प्रिय भौर (म) उपपद होने पर दद् पातु से सब
प्रत्यया होता है। सच में रोष रहता है।
प्रियंव:-प्रियं वदति (प्रिय बोलने वाला)-धिय+व+खच.
प्रिय+व+प्र-पिर से परे मुम (म) सभापम होकर प्रिप+म+दद
मनुस्वार प्रिया
ववर:-ववति (पौन)-4+द+सर ।
१.परिपुरा २. प्रो मुणे ६११०१७
एप्रियो

सस्कृतव्याकरण - २४२ । नेड्वशि कृति ७।२।। पशादेः कृत इण न स्यात् । श हिंसायाम । सुशर्मा । प्रातरित्वा। २४३ । विड्वनोरनुसिकस्यात् ॥४॥४॥ अनुनासिकस्याऽऽस्यात् विजायत इति विजावा। ओए अपनयने। अवावा । विच । रुप रिप हिंसायाम् । रोट । रेट । सुगुण । २४१. प्रन्येय इति-मनिन्, वनिप, वनिए और विच ये प्रत्यय पात मे देखे जाते हैं। इम सूत्र में 'मन्येभ्यः' का अर्थ है-हले सूत्र-मातो मनिन् कानिए वनिपश्न १२७४। में कही गई (प्राकारान्त) धातुपों से भिन्न धातुओं से परे, इसलिये प्रयोग का अनुसरण करके धातु मात्र मे ये प्रत्यय होते हैं । मनिन् में मन यवनिर पौर वनिए मे दन् शेष रहता है । विच् का लोप (सरिहार हो जाता है। मेनि- के पादि में व, र, म तथा वर्गों के पाय चौथे, तीगरे प्रक्षर (या। होते है (वशादि) उसे इट् का मागम नही होता [पद 'माघातस्यैह वलादे.' का बाधक है] । मुशर्मा- मुटु भयाति (पच्छी तरह हिंसा करता है)-सुगम पूर्वक एहिमा करना) धातु से मनिन् प्रत्यय होकर मुग मन्- गुण पर होकर मुशर+मन् - कार के गूत्र से हट का निषेध होकर सुगमन प्र. एक मुशर्मा। safrai-प्रातः एति (प्रातः जाने वाला)- प्रातर पूर्वक इए (ज्ञान, पात से वानिय प्रश्यप देकर प्रान++यन्-प्रत्यय के पित होने पूर्व हम' का तुक' का भागम होकर प्रातर+++बन्-शान रिदन, प्र. एक. प्रारिया। २४२. विनि-विद और वनिए, कनिर (बन्। पप पर होने पर पनुमा रोकोमा हो जाता है। १. हामार मिति दिन २४२. जिस कत पूर्वकृदन्तप्रकरणम् २४४ । विवप् च ३२७६॥ अयमपि दृश्यते । उखासत् । पर्णध्वत् । वाइभ्रद । विजावा-विजायने (विविध प्रकार से होने वाला)-वि पूर्वक जन् । उत्पत्ति, प्राविर्भाव) धातु से वनिप प्रत्यय होकर विजन + वन् -→न् (मनु- नामिक) को मा विज+मा+व+विजावन ५० एकमे विजावा । प्रयावा-प्रोणति अपनयति इत्यर्थः (हटाने वाला )-प्रोण (हटाना) धातु से वनिप् प्रत्यय होता है। भोए + वन --ए को मा होकर मो+भा + →यो को अव-प्रवावन् । प्र० एक० में प्रवावा । रोट--(हिंसा करने वाला ---रुष (हिमा करना) धातु से विच् प्रत्यय होता है । हप् + विच-विच का लोप (सपिहार) तथा 'उ' को गुण मो होकर गेप । रोष से प्रथमा एकवचन में को ड (जश्त्व) तथा द (चत्वं) होकर रोट । इसी प्रकार रिए' (हिंसा करता) पातु से रेद। सुगरण --सुष्ठ गणयति (मच्छी तरह गिनने वाला) सु पूर्वक गंण धातु से विम् प्रत्यय होता है । सुगण+विच-विच का लोप सुगण । २४४. विवर चेति-पातुनो से क्विम् प्रत्यय भी देखा जाता है । टिप्परली-विप का सर्वापहार हो जाता है। यह प्रत्यय क्ति पौर उखासत्-उपायाः१ (पात्रात्। स सते [पतीली से गिरने वाला] - उखापूर्वक वस धातु से कियप् प्रत्यय होकर उला भस् + स स + क्विा --वित्रए का लोप तथा प्रत्यय के रिक्त होने से धातु के न मनुस्वार) का लोप२ उपपद समास तपा मुर (मस्) लोप होकर उखास्रम् प्र० एक. मे पन्त के स्कोर मौर ३ को विकल्प त् (वावसाने से चत्वं) होकर रखासत् । पर्णध्वत -पर्णाद वसते [पत्ते से गिरने वाला]-पर्ण+घ्वस् + किंवा रोष उखासत् के समान है। १. पिठरः स्पाली उखाकुण्डय-ममरकोप । २. निदितां हल उपाधाया: बिडति ॥२४॥ ३. बसू सुध्वंस्वनइहां दः २०७२ 1

गस्तम्पारणे
३४५ । सुप्यजातो रिणनिस्ताच्छील्ये ३१२७८
अजात्य मुपि घातोणिनिः स्यात् तान्छील्ये द्योत्ये । सध्यामोजी।
२४६ । मनः ।।२।८२
मुपि मन्यतेणिनिः स्यात् । दर्शनीयमानी।
२४७ । प्रात्ममाने स्वश्च ।।२।३।
स्वकर्मके मनने वर्तमानान् मन्यते: मुपि खश स्यात् चारिणनिः।
थाहघट्-वाहात् [परवान] प्रपाते । पश्य से गिरने वाला ]-पाह
++सिर, विवप् का लोर, न् का लोप होकर वाहनम् । ३० एक-
वचन में मु' प्रत्यय, मुनरोप तयार को वश्च०' इत्यादि सूत्र से ए मौर
इ [जश्व] ८ (चर] होकर याहट । ..
२४५. मुपाति--जातिवाचक [गौ प्रादि] से भिन्न कोई सुबन्त उपपद
होने पर धातु से लिनि प्रत्यय होता है यदि तान्छोल्प (पादत) प्रकट करना
हो । 'रिणनि' में इन दोष रहता है।
उपभोगी-व्या मूड्वते तच्छोलः प्रथवा भोक्तु परिसमात्य (गर्म गर्म
खाने की मादत वाला)--यहाँ उघा सुबन्त उपपद है, जो जातिवाचक नहीं
प्रत्युत गुणवाचक है । उष्ण पूर्वक भुज् (खाना) पातु से णिनि प्रत्यय होकर
उष्ण मम् +मुज+इन् → 'उ' को गुरण भो तथा उपपद समास भोर सुप्
(पस्) लोप होकर उष्णमोजिन् प्र० एक० में उष्णभोजी।
२४६. मन इति-सुबन्त उपपद होने पर मन् पातु से णिनि
होता है।
पर्शनीयमानी-दर्शनीयं मन्यते ( दर्शनीय मानने वाला )-- 'दर्शनीयम्'
सबन्त उपपद होने पर मन् (जानना. दिवादि) यातु से णिनि प्रत्यय होता है ।
दर्शनीय प्रम् +मन् +इन् + मन् के म को बुद्धि' (मा) तया उपपद समास मोर
सप (पम) लोप होकर दर्शनीय+मा+
(+दर्शनीयमानिन्ः प्र. एक० में
दर्शनीयमानी।
२४७. पारममान इति-अपने पापको ( स्वकर्मक) कुछ मानने के
१.भत उपधायाः ॥११६॥

१ , पूर्वकृदन्तप्रकरणम् पण्डितमात्मानं मन्यते पण्डितम्मन्यः। पण्डितमानो। २४८ 1 खित्यनव्ययस्य ६.३॥६६॥ खिदन्ते परे पूर्वपदस्य द्वस्वः स्यात् । ततो मुम । कालिग्मन्या। २४६ करणे यजः ३।२।१५॥ करणे उपपदे भूतार्थयजेणिनि. स्यात, कर्तरि । सोमेनेष्टवान् प्रय में विद्यमान मन् पातु से सुबन्त उपर होने पर ख प्रत्यय होता है और णिनि भी। पतिंमन्य-पण्डितमात्मानं मन्यते (पपने पापको पण्डित मानता है)-- इस विग्रह में पण्डितम् मुबन्त उपपद होने पर मन् धातु से खश् प्रत्यय होता है। पण्डित मम् + मन् + साशित होने से पा की सार्वधातु १ सशा होती है पौर धातु से २ श्यन् (य) हो जाता है । उपपद समास सपा सुपु (पम्। का लोप होकर-पण्डित+मन+य (श्यन्)+म-खिदन्त शब्द से पूर्व भजन्त (पपिन) को मुम् (म्) का मागम होकर पण्डित+म+म+म→म को पररुप होकर पण्डितम्मन्यः । पण्डितमानी--पस में णिनि प्रत्यय होकर पण्डित प्रम+मन+णिनि- दांनीयमानी के समान कार्य होकर बनता है। २४० सितोति-खित परे होने पर प्रध्यय-भिन्न पूर्वपदको हस्प होता है। कालिममा--काली मान मन्यते (अपने पाप को माली समझती है)-काली सुवात उपग्द होने पर मन धातु मे ला प्रत्यय होता है । धातु श्यन् होकर काली+मन्य+:--आर के मूत्र से ईको हाम्प होकर मुम् पापागम होता है तथा स्त्रीगोषक टाप प्रत्यय होकर कानिम्मन्या । २१. परब इनि-रण कारक उपर होने पर भूतराल में यज १. तिधित् सावधानुकम्। २. दिवादिम्यः ३. भवो गुणे १t.

-- । धातु १८२ संस्कृतव्याकरणे सोमयाजी। अग्निप्टोमयाजी। २५० । दृशे: क्वनिप् ॥२६ कर्मणि भूते । पारं दृष्टवान् पारदश्वा । २५१ । राजनि युधि कृनः ।। क्वनिपस्यात् । युधिरतर्भावितण्यर्थः। राजाने योधितवान् गज- के रिपनि प्रत्यय होता है, कर्ता में। टिप्पणी-करणे यजः २४९' से सुश्च २७१ तक के प्रत्यय भूतकाल में कभयं में होते हैं। सोमपानी - सोमेन इष्टवान् (जिसने सोमयाग किया, यह)- सोम वरपर होने पर यज़ (देवपूजा करना पादि) पातु से भूतकालिक कभषं में गिन प्रत्यय होता है। उपपद समास तथा सुप (य) मोप होकर मोम यज् + इन-- के पको वृद्धिमा सोमयाजिन्; प्र० एकवचन में इ (उपधा) को दी सथान का मोर होकर सोमयाजी । इसी प्रकार 'मग्निष्टोमेनेन इष्टवान् इति' भग्निष्टोमयाजी। २५०. शेरिति-कर्म उपद होने पर भूतार्य में पातु रो पनि प्ररपय होना है। पारावा-पार दृष्टवान् । जिसने पार को देख मिया)-'पारम्' उपपद होने पर दूर (देखना) पातु से भूतकासि कर्नु पर्थ में पानि' प्रत्यय, उपद ममाम तपा मुर् मोर होकर पार+द+पन - पारदरबन्।. एकवचन में पारदश्वा। शिपसी--पारदश्चन सम्द घोजि प धाप यान को र • होर पारदुपदरी' प होता है। २१.सनिति-राजन् कम टापर होने पर युय मोर पर धातु से पनि प्रत्यय होता है। १.पाषायाः ॥२१ २. बनो पूर्वदन्तप्रकरणम् १८ युष्यााराजकृत्वा । २५२ । सहे च ॥२६) कर्मणीति निवृत्तम् । सह योधितवान् सहयुवा । सहकृत्वा। युधोति-पुषु धातु प्रकर्मक है । इससे पूर्व कर्म उपपद कैसे हो सकता है ? इस शका का समाधान करते हुए कहते हैं-यहाँ युध पातु भन्तर्भावित- ध्ययं ली गई है अर्थात् "युध्' धातु योषि (युध+णिच) प्रेरणार्थक को प्रकट करती है। राजयुध्वा-राजानं योषितवान् (जिसने राजा को लड़ाया)- राजन (कर्म) उपषद होने पर युष (युद्ध करना) धातु से भनिए प्रत्यम होता है उपपद समास नया सुप् लोप होकर राजन के मकार का लोप हो जाता है राज युध+वन् →राज युध्यन् →. एक० में राजयुध्वा । राजकृत्वा~-राजानं कृतवान् (जिसने राजा बनाया)-राजन् (कर्म) उपपद होने पर क पातु से क्वनिप् प्रत्यय होता है। उपपद समास सुप लोप सपा न सोप होकर राजक+वन इस दशा म पनि के पित होने से 'क' को सुरु का भागम हो जाता है। राजक+त+बन-राजकत्वन, प्र० एक राजकृत्वा । २५२. सहे रेसि-'सह' उपपद होने पर युध् और क धातु से अवनिए प्रत्यय होता है। कर्मणीति-इस सूत्र में कर्मणि निवृत्त हो गया, यहाँ उसकी पनवृत्ति नही माती, क्योकि 'सह' अभ्यय है । इसका विशेषण कर्म नहीं हो सकता। सयुवा-सह योषितवान् (साथ पड़ामा जिसने}-सह उपपद हो पर युध् धातु से क्वनिप् प्रत्यय होकर प्र० एक० में सहयुध्वा । इसी प्रकार 'सह कृतवान् इति' सहकृत्वा । १.न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य २१७ २. हस्वस्य पिति कुति तुक् ६३११७१३

१८४
सस्कृतव्याकरणे
२५३ । सप्तम्यां जनेड: ३३२१६७।
२५४ । तत्पुरुपे कृति बहुलम ६१३१४॥
केरलुक स्यात् । सरसिजम् । सरोजम् ।
२५५ । उपमर्गे च संज्ञायाम JIRIEE)
"प्रजा स्यात्सन्ततो जने"।
२५३. सप्तम्याम् इति-सतम्यन्त उपपद होने पर जन धातु से भूतार्थ में
उप्रत्यय होता है [ड मे म शेष रहता है । यह डित है]
२५४. तत्पुरुष इति--तत्पुरुष समास मै कान्त उत्तरपद होने पर टि
(सप्तमी एक०) का बहुत करके लोप नही होता।
सरसिमम् सरोजम--सरसि जातम् (मरोवर में उत्पन्न हुमा)-सप्तम्यन्त
'सरस्' शब्द उपपद होने पर जन् (उत्पन्न होना) धातु से ड प्रत्यय होता है।
सरस्+Eि-+-जन + म (ड)+प्रत्यय के हित होने से प्रन् (टि) का लोप'
होकर सरस्+हि++म+सरस् + डि+ज यहाँ उपपद समास होने पर
ढि (सुप्) का लोप प्राप्त हुप्रा' पर के सूत्र के अनुसार सप्तमी का विकल्प
'लुक हुप्रा । जब लुक नहीं हुमा तो सरसिज रूप बना । लुक हो जाने पर
सन्धि नियम से सरस् के स् को रु, रु को उ तथा म+3=ो होकर 'सरोज'
नपु०प्र० एक० मैं सर्गसजम्, सरोजम् ।
२५५. उपसर्ग इति--उपसर्ग उपपद होने पर जन धातु से प्रत्यम
होता है, संशा मे।
.

102
पूनप्रकरणम्
२५६ 1 तक्तवतू निष्ठा ।।१९२६४
एमी निष्ठासंज्ञा स्तः ।
२५७ । निष्ठा ३१२।१.२३
भूतार्थ तोनिष्ठा स्यात् तत्र 'तयोरेव-इति मावकर्मणोः
। 'कसरि पद इति कर्तरि तपतु । उकारितोनातं मया।
हिप-वहाँ से उपपद रहित पातु से होने वाले पदन्त परयय रहे
२५१. बोषि-पौर तवतु प्रत्ययों की निष्ठा का होती है।
२५५.निडा-भूत-पर्ष में मार पातु मे निष्ठा-मंजर प्रयय
fr-इन दोनों में सेनयोरेव पायावसः २१२'मनुसार
त प्रत्यय भार और रम में होता है। तपतु प्रत्यर गरि २४
पई में होता है।
anाति-उपौर है। वायत मे 'उ' की संशा होती
है और बाल दोनों को इत् समा होती है। तुका मो
हो जाता है। दोनोपय पित है।
मानं मया--(4ने माग )-भूपाये रिमान मा (an
को भार में प्रत्यय होकर स्ना+aj• R• एक.में
रनामम् ।
रिप-10 साधारदा मामा पापों से पार से मोnt,
पना
प्रभार सा है। भार में (सामाग्र) THE
लिङ्गराएपन होता है। भामाश ऐसा
१.सोश' हा पाई।
(२) पाक पर सलिए, टी (मोना). (माला).
पसमा (m). वर (उपमा... (सरना)
होगा)- पादुओ प (Pre) नोटा
सेन, रेत माहितोप परपस में

१८६ संस्कृतव्याकरणे स्तुतस्त्वया विष्णुः । विश्यं कृतवान् विष्णुः । २५८ । रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः ८।२।४२। मागे मिलेंगे। स्तुतारवया विष्ण: (तुमने बिष्ण की स्तुति को)-भूतायं में स्तु (स्तुति करना) घातु से कर्म में क्त प्रत्यय होकर स्तु+त+प्रत्यय के क्ति होने से 'उ' को गुण नहीं होता स्तुत पु० प्रथमा एक० मे स्तुत. । विशेष-सकर्मक पातु से कम में यत प्रत्यय होता है, स्तु पात सकर्मक है। मतः इससे कम में 'क्त' हुमा है । कर्म के अनुसार ही उसके लिङ्ग पवन पौर विभक्ति होते हैं, यह दिखलाने के लिये स्तुत. विष्णः' (पु. प्रथमा एक०) दिया गया है. कर्म का प्रत्यय द्वारा 'उक्त' है, मतः विष्ण (कम) में प्रयमा है । कर्म में प्रत्यय होने से कर्ता मनुक्त है। अतः कर्ता तृतीया विभक्ति में है । इसी से 'क्या' मे तृतीया विभक्ति है । विश्वं कृतवान् विष्णः (ससार को विष्णु ने बनाया)-'क' पात कर्ता मे क्तवतु प्रत्यय होता है, कृ+तबद-किव होने से गुण का ममार कृतवत् । पु. प्रपमा एकवचन मे क्रतवान् । विशेषातिपदिक से मुदत पद कैसे बनते हैं, यह कौमुदी के सुरन्त प्रकरण में दिया गया है। यहाँ मक्षेतपुल्लिङ्ग में कृतवत् + सु-सवा के सगित होने से नुम्' का मागम कृतवन्त+सु-सुलोप, तु लोप तथा मान्न की उपधा (म) को दोध होकर कृतवान् बनता है। स्त्रीलिङ्ग मे डो (ई) होकर कृतवत् + ई कृतश्ती प्र० एक० में सुनो। होकर कृतवती (नदी के स्थान । नपुसकरिङ्ग में शुभोप होकर क्तवत् । २५८. रदाम्यामिति- पोर द से परे निष्ठा के त् को न हो जाता है मौर निष्ठा से पूर्व पात के द को भी न हो जाता है। १. गत्यामकारलपगोस्पासवतानाहजीविम्याच ॥४२॥ २. विति च ११॥ ३. उगिदवा सर्वनामस्थानेऽधातो: strust ४. सर्वनामस्पाने दासबुद्धौ - पूर्वकृदन्तप्रकरणम् १८७ रदाभ्यां परस्य निष्ठातस्य नः स्यात् । निष्ठापेक्षया पूर्वम्य घातोश्य च।” हिंसायाम । ऋन इत् । रपरः । त्वम । शारण भिन्न । छिन । २५६ । संयोगादेरातो धातोर्यण्वत: ८।२।४३। निष्ठातस्य नः स्यात । द्राणः । ग्लान । २६० । त्वादिभ्यः ८.२४ ।। एकविशतेलू धादिभ्य प्राग्वत् । लूगः । ज्या धातुः । महिन्यात पोण -- मष्ट टुमो) -2, हिंसा करना) घातु स कर्म में एक प्रत्यय होता है । ऋको रेफ सहित इकार होकर इ' तथा ६ को दोष' (ई होकर शी+त इस भवस्था मेर से परे निष्ठा के त् को न हो जाता है, म् को ए होकर शीर+ए+शीणं, पु.. एक. में शोएं। भिन्नः (फाड़ा हुमा)-भिद् (फाड़ना) घातु में कर्म मे क्त प्रत्यय होता है। मिद+त यहादसे पर निष्ठा के त् को न तथा पहले द को भी न होकर भिन्+न भिन्न-भिन्नः । इसी प्रकार घिद (काटना) बिन्न: (काटा हुमा)। २५६. सयोगावेरिति-जिस धातु के भादि मे व्यञ्जनों या सगोग हो, मन्त मे भाकार हो तथा उसमें यरल, क (यण ) मे से कोई मदार हो, उस पातु से परे निष्ठा के तमोन होता है। हाल:- (कुरिसत गति) धातु से क्त प्रत्यय होता है । +8 यहाँ के मादि में (द और रका) सयोग और भन्त में प्राकार है तथा इसमें र (पए) भी है मत: निष्ठा के त् को न होकर द्रा+न-न को - +ए+हाणः । गतान:--(दु.ली)-ग्ले (हर्पक्षय) धातु से त प्रत्यय होता है। धातु के ऐ को पा होकर' ला+8 इस दशा मे ऊपर के सूत्र सेतु को न होकर दापातु ग्लानः। २६.. सारिप रहि-इसकीस पादि पातुओं से परे बारा॥

सस्कृतथ्याकरणे संप्रसारणम् । २६१ । हल: ६ अहारयवादलः परं यरसम्प्रसारणं तदन्तस्य दीपः स्याताजीनः । २६२ ! मोदितश्च ॥२४॥ भुजो-भुग्नः। टुप्रोदिन, उन्नः । निष्ठा को न होता है। ये पातुएँ पातु पाठ में पादिगण में स्थित है। पूनः-पाटा हमा)--सूत्र (काटना) या मे रु प्रया कर पू+त- होम--सूनः । २६१. हल इति-पाके मवयव पश्चन ( हम ). से परे को गाप्रमाण हो तपन को दी हो जाता है। फोनः-(ो मागु पासा) ज्या (जीगं होना) धातु से प्रायर दोरर ग+1 इस दशा में रुके रित होने के करण ५ को । (गमगारा') हो जाता है।++तम दगा में मारा पूरकर (r+पा-६) fr+कामे होने से निपान तथा "हम" मे गोटीर्य (६) जो+जीमः । १२. पोरिताचे-जिन पापों में 'पो' गीतमा होती है, उनमें परे पिठात कोन होता है। भूष-21)-मुशे कोटि) पातु में 'क' की पोर मोर होकर भुरच माद। मुत्र-पुत्र +7 कार के को -भूर +रोन'ऐतर भुग+7-मुगमः । pr: -- (गापा, मुगा )- पूर्वक पोलिस प) पादसे पर होnt+fr+trपोनित होने से रित होम traRKET में रोमाग उ(31++7+11 REMiष्टिविनिमामि ste Umपुर कि पापों को निति दोहोरमा मम्माना। . ५ पूर्वकृदन्त प्रकरणम् २६३ । शुप: क: २५ निष्ठातस्य कः स्यान् । शुष्कः। २६४ | पधो ध: स५२। पश्यः । तेहपतये। २६५। क्षायो मः ८२३॥ शामः। २६६ । मिष्ठायो सेटि ६४१२ गोपः । भावित. । भावितवान् । १ दियायाम । +--को पूर्वरूप' (8+1=3) उत्+7+3+न+3 को चोरेर उत्++:--मग्धि कार्य होकर उगः । २५. पुषतिगए पातु रो परे मिष्टा रोका। पुर: {मूषा)-गुर् +त-तोर होकर गुनगुष । २६. पच पति-पद पातु से परे निष्ठाकोर हो जाता है। ए: (परा हुमा)-५५ (पाना पाय होरप:-- पोक..पर+पोर परः । २५ इति (३) पातु मे पो निष्ठा व कोम् होता है। सामः (सीरा)-संप से तय होरा के एगो हो जाता है, यातया में महारधाम-दाम पक्ष मेन प्रापय पा). २६. निnair- मति (वेद) निष्ठा र परेने पर लिलिप)ोष होता है। मारित मागिन्-Ratfom (रता है mat मरो। वि. रा... और का रेपलाने महा+:+Enternet १.हम्ममारणाय ..10: 1.Rit.l ४. भावानुमान .

71
संस्कृतम्याकरण
२६७ । दृढ़ः स्थूलबलयोः ॥२।२०।
स्थूले बलवति च निपात्यते।
२६८ । दधातेहिः ७ २०४२।
तादौ किति । हितम् ।
२६६ ।दो दद्धो: ४।४६॥
घुसक्षम्य दा इत्यस्य दद् स्यात् तादौ किति । चर्वम् । दत्तः ।
इ+तवत् इस दशा में, णि का लोर होकर भाव++त+भावितः,
भावितवान् ।
-fam
२६७. दृढ इतिः स्यूल मौर बलवान् मयं मे 'दुट' गन्द का निनातन
किया जाता है।
वृद्ध-(स्थूल, बलवान)-दह, (हिसायंक) धातु से क्त प्रत्यय होकर
निपातन से इट् का प्रभाव, निष्ठा त को द तथा ह, का लोप होकर बुद्ध शाद
बनता है । (द्र सिद्धान्त कौमुदी)
टिप्पणी-सिद्धान्त कौमुदी के अनुसार दह, दहि, वृदो, से यह शन
धनता है। यही उचित भी है 'दह, हिसायाम् से नहीं।
२६८, धातेरिति-या घातु को हि मादेश हो जाता है तकारादि कित
प्रत्यय परे होने पर।
हितम्-धा (धारण तथा पोषण करना) धातु से क्त प्रत्यय होकर
घा+क्त+या+त इस दशा में क्त के कित होने से 'धा को हि भादेश हो
जाता है। हि+त→नपु. प्रपमा एक० में हितम् ।
२९६. दो दिति-धर्ममकदा धात को दद्यादेग हो जाता है तकारादि
कित् प्रत्यय परे होने पर।
दत्त: (दिया हुमा दा (देना) घात से क्त प्रत्यय होकर दा को दद
हो जाता है। दद्+त-द को त् (चरर्व) होकर दत्++सः ।
टिप्पणी--पहाँ दा को रद या दय् मादेश होता है, ये दो मत है।
-

पूर्वकदन्तप्रकरणम् २७० लिट: कानज्वा ॥२।१०६। २७१ । क्वसुश्च ३१२११०॥ लिटः कानच क्वसुश्च वा स्तः । तहानावात्मनेपदम् । चक्राणः । २७२ । म्वोश्च दा॥६॥ मान्तस्य धातोनत्वं स्यात् म्वोः परतः । जगन्वान । २७०.लिए इति -लिट् (लकार) को कानच मादेश होता है विकल्प कान में मान ऐप रहता है। २७१. क्वसुरिति-लिट् को क्वसु मादेश भी होता है विकल से। वसु से । में वस् रोष ताति-तड. (त से लेकर महिष तक घातु से लगने वाले प्रत्यय) सपा पान (कान शान मादि) की पात्मनेपद सक्षा होती है। ये मारमने- पदी धातुमों से होते हैं यह भाव है। घकाण:-(भूतकाल मे करता हुमा)- कृ (करना) घातु से परे लिट के स्थान में कानच होता है । क+पान-कानच् (लिट) परे होने पर धातु को द्वित्व कृ++मान + प्रयासकाय' होकर च++मान-ऋ को र (यण), न कोण होकर चकाराः। २२७. वोचेति-मकारान्त घात (के अन्त्यदरणं) को नकार मादेश हो जाता है मकारपोर वकार परे रहने पर। अगन्वान -गम (जाना। धातु से परे लिट् के स्थान में क्वस हो जाता है। गम्+व+धातु को दित्व भादि कार्य होकर उगम्+वस इस दगा में कार के म को न होकर जगत्वस्' पु. प्रथमा एकवचन मे जगवान् । टिप्परली-जगम्बस् पाद के रूप विस्' के समान घलते है। . उसके 'कृ' को मर (उरत. १. पहले की मम्यातजा: उरण रपरः), र लोप १८२ संस्कृतव्याकरणे २७३ । लट. शतृशानचावप्रघमासमाधिकरणे ३।२।१२।। अप्रथमान्तेन समानाधिकरणे लट एतौ स्तः । शवादि । पचन्तं चैन पश्य। २७४ । प्राने मुक् ७।२ ।। अदन्ताङ्गस्य मुगागम. स्यादाने परे। पचमान चैत्रं पश्य । २७३, सटति-प्रथमान्त से भिन्न पद के साथ समानाधिकरण में लट् के स्थान में पतृ धौर पानच् होते हैं। गतृ में 'प्रत्' तथा शानच् में 'मान' शेष रहता है। ये दोनों प्रत्यय वर्तमान काल में होते हैं । शतृ परस्मैपदी धातुपों से होता है तथा शानच मात्मनेपदी धातुमों से। शबादीति-बात भोर शामच् प्रत्यय परे होने पर शप् मादि प्रत्यय (विकरण) होते हैं । इन दोनों में दा की इसना होने से ये शित् हैं । शित होने से इनकी सावधातुक संज्ञा है अतः भू+शप् +ति-भवति मादि के समान इनके परे रहने पर भी शप मादि होते हैं । शप में प्र शेष रहता है। पचन्तंशव पश्य-पकाते हुए चत्र को देखो)-पच धातु से परे लट् के स्थान में बात होता है। पच+प्रत्→घात से भागे थप होकर पच+ म+मत्-रूप के प्रकोपतो गुणे से पररूप (म+मप) होकर पचत् । यह द्वितीयान्त 'चत्र" का समानाधिकरण है इसलिये पुलिङ्ग द्वितीया एक- पचन्नम्। टिपणी-दातृ प्रत्ययान्त शब्द तीनो लिङ्गों में होते हैं :-पु. निज में 'पचत्' पाटि, पुलिङ्ग मे पचन्, पचन्ती, पचन्तः इत्यादि तथा स्त्रीलिङ्ग में डीप' और नुम् (न) का मागम होकर पचन्ती इत्यादि नदी के समान का होते हैं। २७४. पान इति-प्रकारान्त मन को मुझ (म) का भागम होता है, मान परे हाने पर। उगिसश्च १६॥ शतृ प्रत्यय में ऋकार को न संशा होती है मतः दातृ प्रत्ययान्त शब्द गित् हैं । २. छपश्यनोनित्यम् १०१ चवन ३ . 1 लहित्यनुवर्तमाने पुनर्लइप्रहणास्थमासामानादिकरण्येऽपि पनि सन् द्विजः। २७५ । विदेः शतुर्वमुः ७.१॥३६॥ वेत्तः परस्य शतुवसुरादेशो का यान । विदन । विद्वान । पचमान संच पश्य (पकाने हुए चंत्र का दवा)- च पान में पर के स्थान पर 'शान' होता है । पच् - पान -गर (ए। दार पच · 4 पान-4+प्रान इस अवस्था प्रान्त पल 'पच' ! 'मन मुक् सम्)का मागम हो जाता है -पच+म+मान, प. दिनोबा क. परमानम्। टिप्पणी-शानच प्रत्ययान्त पद भी तीनो लिहीम रन + - 10 तथा पु० में परारान्त पदों के मान तथा स्त्रीलिङ्ग म ' र परमान+मा-पचमाना मादि रक्षा के ममान करते है। सरित-इस मूत्र में वर्तमाने सर २२१२ । सेट को पति हो ही माती, फिर भी यहां लट ग्रहण पिया है. इसमें प्रथम त ने कार .. करण्य होने पर भी नही लट को रात, पानच हो जाने । रान मिः (विद्यमान साह्मण) --'परित दिन 'म अर्थ में प्रथम --- । समानाधिकरण पस घान से मद क ग्थान मे पान हा जान । इस दशा में धातु के पका लोप होकर म- प्रत - मत प्राति बनना हम प्रयमा एक वचन मे सन । नपु० सत् ' या मनी । टिणी-सूत्र के अनुसार प्रत पोर मानच प्रत्यया का ६५५म - प्रयोग को प्राप्त है। इस मापक से अपमान्त प्रयोग भी होता है या दार ,111 बार में प्रपमान्त प्रयोग प्रचुरला से मिलते है उनम य ही मन ब.' पम.पन २१. विरिति-रिद (भाने पदा० से परे रात को बनु हो जाता है कि रो। हम में दस घेर रहता है । १. नसोल्लोप: ११

चौ सत्सझो सः।
लट: सद्वा ३३॥१॥
व्यवस्था विभाषेयम । तेनाप्रथमासामानाधिकरण्ये प्रत्ययोतर.
पदगो सम्बोधने लक्षणहेत्वोच्च नित्यम् । करिष्यन्त करिष्यमाएं
पाय।
पिन्. बिहान -विद (जानना) धातु से परे सट के स्थान में पान होता
के म्यान मरिका मेवमु होकर दिवस --fri--पु.प्र.
एक. मे किन् । श्री. विशे। पक्षा में विद+ (गन्। दिन-
विदन् ।
२७३. मति-रेशन मोर जान सत्मक होते है।
२७७. मति- सूट के स्थान में सर नाक (गत शानम्) प्रत्यय होने
है बिर।
व्यवस्थितनि- यह म्यपित विभाषा है पर्थात् सत् संजर प्रणयों का
विकलाप में होता है, वही ये नित्य हो शोकहीमही होने
गम प्रश्पमा-मामानाधिकरग्य मे. प्रत्यय तथा उत्तर पर परे होने पर
भोपन में नया मोर हेतुप में निप (सूट को) पान
.
इनमे मे पहा (मपीमुशी में) अप्रपमा मामासाधिकार में मा
। उसहरण पहने दिया गया है न्यों (यय पा) नहीं । यो
म मरमानाधिकार का उदाहरण नीचे देते है।
eferrereमा पर (पिं करने वाले कोमो)---
पातु मे परे नट के चार में राम और मान होते हैं। यान में
रहीने पर क्या है। FAT+सरा
*+मारोह होगुण पर होरर +:+m+
'तार++य मानत ोपना होगा afrie.
7). मांशपरत में परिमाध्यमाणम् ।
१.काही नसोः ॥१३॥

१६५ पूर्वकृदन्तप्रकरणम् २७८ । माक्वेस्तच्छोलतद्धर्मतत्साधुकारिषु ॥२।१३४॥ क्विपमभिव्याप्य वक्ष्यमाणाः प्रत्ययात्तच्छीलादिपु कर्तुपु षोभ्याः । २७९ । तृन ३।२।१३। कर्ता कटान् । २८० । जल्पभिक्षकुट्टलुण्टवृङः पाकन् ३।२।१५५। २८१ । पः प्रत्ययस्य ॥३॥' प्रत्ययस्यादि. पः इसक्षः स्यात् । जल्पाकः । भिक्षाकः । कुट्टाकः । लुएटाकः । वराकः, वराकी। २५८ मा वेरिति--सागे कहे जाने वाले क्विप् पर्यन्त प्रस्थय तच्छील, तद्धर्म तथा तत्साधुकारी कर्ता के अर्थ में होते हैं, यह जानना चाहिये। "भाज.."मामधुविद्युतोजिजुप्रावस्तवः विवप ३।२।१७७ मन्येभ्योऽपि-- दृश्यते ३।२।१७८ में विहित विवप प्रत्यय पर्यन्त यहाँ से भागे कहे गये प्रत्यय इन तीन वर्षों में होते हैं :-- उस सील (मादत) वाला, २- उसे धर्म या कतंव्य मान कर करने वाला, ३, उसे भली प्रकार करने वाला। २७६. शुन् इति-धातु से हुन् प्रत्यय होना है तन्छील मादि कर्ता के प्र में स्तकिटान (चटाई बनाने की भारत याला, धर्म मानकर पटाई बनाने पासा या मच्छी प्रकार घटाई बनाने वाला)-कृ (करना) पात से करा शील- भस्य (करना जिगरा स्वभाव है) इस मर्थ में हन् प्रत्यय होकर म+तृ→ ऋको गुण कर+तुकतुं-पु. एक में कर्ता। यही कटान' में कर्म में द्वितीया होती है। 'पतृकर्मणोः कृति से जो षष्ठी प्राप्त होती है उसका नसोक' निपेष हो जाता है। २८०. अल्पेलि-अल्प, भिम कुट्ट लुण्ड मोर द धातुओं ये वच्छील मादि कक अपं में पान् प्रत्यय होता है। २६१. पति-प्रत्यर के मादिएको इन संज्ञा होती है। संभक का लोर हो जाता है तथा वान् मे पाक बचता है। बाकस्थित शौसमरप (बोलना है स्वभाव विसरा)-स्पू

संस्कृतव्याकरण
२८२ । सनाशंसभिक्ष उ: ३।२।१६८॥ चिकीपुः। श्राशंसुः
भिः।
२८३ । भ्राजभासधुविद्य तोजिजुग्रावस्तुवः क्विम् । ३।२।१०-
धातु से पाकन् प्रत्यय होकर उत्स+माक-जल्याकः।
इसी प्रकार भिक्ष+पाकन-मिनाक: ( मांगने के स्वभाव वाता)।
ह+पाकन • कुट्टाकः (कूटने के स्वभाव वाला)। लुण्ट +पाकन् + नुण्टाक:
(लूटने के स्वभाव वाला) । (चाहना)+पाकन्+वर+मा+पराक:
(पाह के स्वभाव वाला, बेचारा)।
वराती-पाकन् प्रत्यय के पित होने के कारण इमसे बने हुए सम्मों ये
स्त्रीलिङ्ग में डोष प्रत्यय हो जाता है-दराक+६(छोप)-वराकी।
२८२. मनेति-सन् प्रत्ययान्त घात से तथा मन पूर्वक शंस् पौर भिदा
धातु से उ प्ररपय होता है. तच्छोल मादि कर्ता के पर्व में ।
विडीय-करने की इच्छा वाला)-कृ धातु से मिति (करना
पाहता है) इरा मयं में 'मन' प्रत्यय होकर चिकीर्ष' मन्नन्त पातु बननी है।
विकीर्य धातु से उ प्रत्यय होकर विकोपं +3. से परे वाले पार,
चिकीर्ष +3-चिकी।narian Traf
भानुः (भाशा काने वामा)-माङ (उपसर्ग) सहित दाम् पातु से उ
प्रत्यय होटर पाय+र--प्राममुः।
मिला (भिसा करने वाला)-मिक्ष पात र प्रत्यय होकर भि+
उ-भिः ।
२८. प्राति-मान, मासु, पुषि, पत, कर, पृ. दुसरा पार पूर्वक
स्तपात से विप प्रत्यय होता है तमधील मादि के अर्थ हैं।
१. पिराम्पिार MILI
“२. तो मोर: Mrs

१६७ - पूर्णम् शिधादाम २८४ | गल्लोप: ५४॥२९॥ रेफार मोलॉप' स्याग को मलायौ विनि विएन । । । विधा रीणि यामा)- भार माना ) पार से रिप होता है। मरिहार) मोर होकर विभाग बना है।.ए. में 'T' पार मानोर हो जाता है। कोप और प तारो रस होररमार । पा (प्ति. म)-भाम+farm-fun Rोर ाम । प्रचा ST. Inोहर भाग के स्कोरम होकर माः । Sr. mart-2 परे और १ मोर हो लिए और wife (बिसर पाद में लोक पं. हलीम, पि, प्रथम सरनामस्म हो पर परे होने पर। (भुग) पुरं हमार) पातु सर हर मोर होशाला मोहोर पुरस है। मासअत्ता inो हो :) पागला" Frey fernan aftega (मरमा बामे fore पर मामा होHिRE (ron Twो हो। र' (RTML-Arm fire nan Ra.r. २रा रहर Tiwar)-1 (सम, tem) ... fre, forn 1. सोyoutuRetreate

मा
रशिपणापापकांग्जमते दीपः । प्रामामा स्यारिमा ।
पापमानामधील पोशागार ॥ यतोनिया ।
२८५ । ट्योः मूहनुनामिके घ ६४१६॥
मतुरस्य दस्य
चाय च ममाम् श उठ इत्यादेशो तोऽनुनासिके वो मजादौन
एसोनि-पोरिदृश्यते ११२६१७८१ गूर से 'दशने' का परकर्ष
होने से (पौर उमरा समन्य कार्य भी हो जाते हैं यह मानने पर) Im
प्रत्यय परे होने पर जु पात को दोपं हो जाता है।
टिप्पणी-यही मार पाप हे मागे के मूत्र से पहले मूत्र में किसी
परासीपना । (विप देगिरे विषय-प्रदेश)।
जू: (पेग वासा)-जु (गति) भान ये सिप, स्विप सोर, उ को दीर्घ
काजूपन्त राम से प्र० एक० में जूः ।
पायातुत (पेल या पाषाण के गुण गाने वाला)-ग्राग्न उपद पूर्वक
स्त (स्तति करना, गुण बचानना) धातु से पिया प्रत्यय होकर उसका सोप
हो जाता है । पातु से भागे तुक' (त) का प्रागम होकर 'प्रावस्तुत्' कृदन्त
शाम बनता है। प्र० एक.
में
ग्रावस्तुत्
शिवयिति (वा)-वच्, प्रच्छ्, मायत पूर्वक स्त, कट पूर्वक पू. जु,
मोर थि धातु से विवप् प्रत्यय होता है. इन्हे दीर्घ होता है पोर सम्प्रसारण
नहीं होता।
वाफ-पक्ति, (इति जो बोलती है, वाणी)-वच् (बोलना) पातु से विवर
प्रत्यय, उसका लोप भोर म' को दीपं होकर 'वाच् कृदन्त शब्द बनता है।
प्र० एक० मे वाक्-यह स्त्रीलिङ्ग है)।
२८५. छ पोरिति-तुरु सहित छ (छ) को तथा को क्रमशः ए
मोर ऊ (क) मादेश होते हैं मनुनासिक, विवप् मोर झलादि कित् डित् परे
होने पर।
१. हस्वस्य पिति कृति तुक १७१॥

पूर्वकृदन्तप्रकरणम् १६६ विति । पृच्छतीति प्राट्। श्रायतं स्तोतीति आयतरतूः। कटं प्रवते । जुरुक्तः । श्रयति हरि श्री । २८६ । दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिचमिहपतदशनहः करणे १२०१८२१ दावादेः 'ट्रन् स्यात्करणेऽ। प्रार-पृच्छति, इति (पूछने वाला)-प्रच्छ धातु से विवप् प्रत्यय, उसका लोप, दीर्घ तपा सम्प्रसारण का प्रभाव होने पर प्राच्य -- ऊपर के मूत्र से च्छ भादेश होकर प्राश् कृदन्त से प्र० एक० मेंश को प, इ तपाद होकर प्राट् (विनाद के समान)। पायतस्तू:-भायतं स्तोति, इति (विस्तार से गुण गाने वाला)-पायत पूर्वक स्तु धातु से विप, उसका लोप, दीर्घ होकर भायतस्तू बनता है। 3. एक में पायतस्तूः । काटा:-कटं प्रवते (चटाई बलाने वाला) कट पूर्वक पातु से विव सपा दोषं होकर 'कट'। प्र० एक० कटपूः। जूपत ति-'जूः' पर कहा जा चुका है। थो:-(लक्ष्मी, सम्पति)-'यति हरिम् (हरि ा पाश्रय लेने वासी) यह एक प दिखलाया गया है गया में तो "थति, इति श्री:" यही व्युत्पत्ति है । पि (सेवा करना) पातु मे विवप् त्या दोघ होकर श्री । यह स्त्रीलिज है। यह 'जी' प्रत्ययान्त नही मतः मु का सोप नहीं होता पितुर को विसर्ग होकर 'श्री'। २८६. सनीति-दाप् (काटना), नी (ते पाता), घस् (हिंसा करना; पु{मिलाना), युर (युक्त करना), स्तु (eafत करना), ९ (पोता देना), सि (पना), सिप (सोचना), मिह, (सींचना, मूत्र त्याग करना), पर (गिरना), पर (पाटा). नह, (बापना), इन पापों से एन प्रलय होता है करराव मे। एन् में से ए पोर न पला जाता है। के पते पाने पर अपने रूप में पापाता है और प्ररयर काम रहता है।

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पूर्वकान्तप्रकरणम् २०१ २८८ । प्रतिसूसूखनसहचर इत्रः ॥२॥१८॥ अरित्रम् लवित्रम् । धुवित्रम। सवित्रम । साहित्रम। चरित्रम् । मेठम् (मून्द्रिय)---मिह, धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय गुण मेह.+7 इस दशा मैं ह, को,त् को धू' तया और पहले ६ का लोप होकर मे+र- मेढम् । परत्रम् (सवारी,, पत्ता, पंस प्रादि)-~-पत् +-होकर पत्रम् । राष्ट्रा (दाद-वंश +3 को होकर दंप+- कोद (ष्टस्य) दंष्ट्र स्त्री बोषक टाप' प्रत्यय होकर इष्ट्रा। नामी (हल मादि मैं बाँधने की रस्सी, नाही)-नह धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय होकर ह, कोषु नहो षः) तयात को घ होकर न+भ-पहले ५ को ६-- नध-पित होने से डीप प्ररपम होकर नधी । २८८. पति-~ऋ (जाना), लू (काटना), ५ (कांपना), सू (प्रेरणा देना), सन् (खोदना), सह, (सहन करला), पर (जाना खाना) इन पात्रो प्रत्यय होता है। परित्रम् (नाप पलाने का डंडा)-पात से इस प्रत्पप होकर ऋ+ - को गुण (पर) होकर पर+7-प्ररित्र, नपुं० प्रथमा एक में परितम् । टिप्पणी--हर प्रस्थयात दाद प्रायेण नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। सवित्रम् (पाक, छुरा)-- पात से इन प्रत्यय होकर लू+7 को गुण पो तथा मो को पद सवित्रम् । थुवित्रम् (पंखा)-५ घात से हा प्रत्यय होकर धू+1 इस १.हो२१३॥ २. झपस्तपोर्षोऽषः श. प्टनाष्टः 51100 से दस। ४.को लोर ५. प्रजापताटाप् १r प्रत्यय के विद होने पर भी सवादि गए में होने के कारण साप होता है। ६. 'धूवित्र मजनं तद् पदचितं मगनमता' भमरकोप ।

संस्कृतव्याकरणे *- যুগ २८६ । पुव: संज्ञायाम् ॥२१॥ पवित्रम् । इति पूर्वकदन्तम् ॥३॥ अथोरणादयः ॥३॥ कृवापाजिमिस्वदिसाध्यगृभ्य उरए १॥ दशा में घु धातु के कुटादि में होने के कारण 'इत्र' को हित के समान मान लिया जाता है तथा गुण नहीं होता । उ को उव (उवङ्) होकर धु+उ+ इत्र-धुवित्रम् । वित्रम् (प्रेरणा का साधन)-सू घाग से इत्र प्रत्यय, उ को तमा भो को अप होकर सवित्रम् । इसी प्रकार खन्+इत्र-→सनित्रम् (कुदाल)-राह+इन+सहित्रम (सहन करने का साधन), चर्-+-इत्र-चरित्रम् । २८६. पूर्व इति-पूपात से संज्ञा में इत्र प्रत्यय होना है। पवित्रम् (पवित्र करने का साधन)-पू+इत्र-3 को गुण प्रो तथा अव प्रादेश होकर पवित्रम् । यह उस दर्भ को संज्ञा है जो यज्ञादि के अवसर पर मनामिका अंगुलि में अगूठी के समान धारण किया जाता है । 'मस्त्री कुछ कुथो दर्भः पवित्रम्' अमरकोष ॥ इति पूर्वकदन्तम् ॥२॥ प्रयोगादय:-जिन प्रत्ययों के मादि में उण् प्रत्यय है वे उणादि प्रत्या कहलाते हैं । ये प्ररपय फत प्रस्पप के अन्तर्गत हैं, किन्तु भष्टाध्यायी से पृयर ५ पाद जिनमें ७५६ सूत्र हैं उणादि कोप या 'उणादि प्रकरण' भाम से प्रसिद्ध है। कृवेति-क (करना), वा (गति, गन्ध), पा (पीना, रक्षा करना), fa (जीतना), मि (फैकना), स्वद् (पखना), साध (सिद्ध करना), मश (ध्यान होना) इन धातुमों से उरए प्रत्यय होता है। कांह(शिल्पी)-करोति इति इप्त भयं में कृपात से उए प्रत्यय २. गापुटादिभ्योऽञ्यिन्डित् ११२१ १.निति च .

पूर्वकृदन्तप्रकरणम् करोतीति कारः। वातीति वायुः । पायु दम । जायुरोधषम् । मायुः पित्तम । स्वादुः । सानोति परकामिति साधु. । श्राशु शीघ्रम । २६०। उरणादयो बहुलम ३।३.१॥ एते वर्तमाने सज्ञायां च बहुले स्युः । केचिदविहिता अप्यूद्याः । होकर कृ + उ--ऋ को वृद्धि भार कार+3-→ कार; प्र एक० मे कारः । कापु-वाति इति (जो बहती है, निरन्तर चलती है)- इस पर्थ मे चा+ उप-- युक्' (य) का पागम होकर वा++3+वायु । इसी प्रकार पा+ ५ (युक)+उण पायुः (गुदा) । जायु:-(भौषध) जयति रोगान् इति (रोगों को जीतने वाली) fr+उण -णित होने से 'इ' को दि(ऐ) तथा ऐ को प्राय होकर जाय+उ+जायुः, इसी प्रकार मि+उण+मायुः (पित्त)। स्वादुः (स्वादिष्ट)-- स्वद् धातु से उण प्रत्यय, म को वृद्धि' स्वाद+त+ स्वादुः). साधु: (श्रेष्ठ, उत्तम) साप्नोति परकार्यमिति दूसरों के कार्य सिद्ध करने वाला) इस पुपत्ति में साप् धातु से उए प्रत्यय होकर साघुः । भाशु (भीम)-प्रश्नुते इति (जो पापक सा हो जाता है)-प्र+ए →मको वृद्धि (1) मा+3+भा। माशु दाम्द शीघ्रता अर्थ में प्रय है। शीघ्रमा युक्त द्रव्य के प्रथं मे सोनों लिङ्गों में, विशेषण रूप में, इसका प्रयोग होता है। २९.. उणारय इति-उए प्रादि प्रत्यय दर्तमानकाल मैं तया संशा में बहुत करके होते हैं। केचिदिति-दुछ प्रविहित (किसी सूत्र द्वारा निरा विधान नहीं किया गया) भी कल्पित कर लेने पाहिये। उणाति प्रापयों की किस प्राधार पर १. मातो युक् चिए तो ७॥३॥३.. २.प्रचोमिएति ॥२॥११५ भत उपधायाः ७२।११६॥

"सज्ञासु धातुरूपाणि प्रत्ययाश्च ततः परे। कार्याद्विद्यादनूबन्धमेतच्छास्त्रमुणादिपु" इरयुगादयः ॥३॥ प्रयोतरकृदन्तप्रकरणम ॥४॥ २६१ । तुमुन्ण्वुलो क्रियायो क्रिर्यायाम ॥३ क्रियार्यायां कियायामुपपदे भविष्यत्यय घातोरेती रत. मान्तत्वादरूप कल्पना की जाती है यह पप्रिग इलोक में बतलाया है :- संगास्थिति-मंशा गमों में (पहले) घातु के रूप की कल्पना करके तर उममें परे प्रापयों की कल्पना करनी चाहिये । प्रत्ययों में कार्य (गुण, बुद्धि तपा इनका प्रभाव पारि) के अनुसार मनुवन्य (किरव, हिरव या मारि) सम. मने चाहिये । उणादि में यही पास्त्र है। जैसे- "पाइकुम" यह प्रयोग देखा जाता है। इसकी दाट धातु मोर उतर प्रत्यय गनर म्पत्ति की जाती है। उस में ए मनुदग्ध स्वरादि की दृष्टि से भोग हिणी-पूत्रकार के बहुम ग्रहण से तथा इस भाष्यस्य नोक के पापा र (प्रयुक्त) गमा-मामों में धानु तपा प्रत्ययों को माधयाना करणे नसी प्युलिपी जाती है। कृपाति' इत्यादि शास्टापन प्राणी जणा पपी का प्रान मात्र है प्रति इमको विस्तृत व्याख्या है। पुणा- T: भयोत्तरात तुमुन इनि-एक त्रिया के लिये की जाने वाली पणे यिा समोर रहने पर (उपद) पातु मे भविष्यत् अपं में न ये दोनों प्रपप हो । 'तुमुन् में से "तुम्न रहता है मोर पस में से कोमा हो alt रिसो-बम रियाक निरे दुम जिया को जो है उनमें २ पोर मन प्रसर हो है। सुस्त प्रत्यपाल श्री Garuratial

पूर्वान्तप्रकरणम्
यत्वन कृष्णं इष्टु याति। कृष्ण दर्शको याति ।
infinitiven काम करता है, मे कृष्णए पाहि- Hegort to see
Krishnt. यही 'युम्'-देखने के लिये -tore प्र में पाया है।
(२में भविष्यत् पर्व में बहने नारा पह है कि तुमन'
भीषिया दुपरी निकी पेशा भविष्य में होती है। इसतिर 'Mrg.
मगार पद प्रयोग भी होता है. यहाँ भी दान किया गम किया उपरान
(मणि) होती है।
(1) मुन् प्रत्ययावास के माप भी मोप में
प्रयोग होता है, जैसे-'रायो पाम मारभे, रामेरा पार पामारेभे। रितु
पर धम्म तपा पुरनिया ही होता है सोनाम में पर
कर्म प्रपमा में समा जाता है -सपन्य टिमिन्दात, हेम प्रब y.
मिच्यो, विप्राप्टे १७t).
माहि-मात होने मे तुमुन् मायाम गरहो। मे.
UURE राधा पालिनिने रात को एलो
पात्री
पारित किये गा)-
देखना औरपामा। 'मामा'
गिरिजारा।
पोरन ARRER का एक सोपा मुरोग
m+w पोरोर (+++
सुपर सर -+++++7+एको
१.R..बसेस सं. ८.१.११२.
......भी..१३.
.fa pititi-मर और मार
writeratोरम nturQuote
मलतः २ को

२०६
संस्कृतव्याकरणे
२६२ । कालसमयवेलासु तुमुन् ३।३।१६७। कालापूपप
तुमुन स्यात् । कालः समयो वेला वा भोक्तुम् ।
२६३ । भावे ३१८ सिद्धावस्यापन्ने घोरवय वाच्ये पार
पत्र स्यात् । पाकः ।
'यया त को ट् (प्टुत्व) होकर द्रप+टुम्-- द्रष्टुम् ।
यहाँ 'कृष्णम्' में 'न लोकाव्यय०' से षष्ठी का निषेध होकर कर्म
द्वितीया विभक्ति होती है।
कृपणं दर्शको याति (कृष्ण को देखने वाला जाता है)--यहाँ भी कियार्थ
क्रिया 'याति' उपपर है इसलिये दर धातु से प्रवल प्रत्यय होकर दूर---
को मक पादेश दृश+प्रक→ऋ को गुण पर्+द+7+पक=दर्शक, पु
प्र० एक० मैं दर्शकः ।
प्रवल प्रत्ययान्त शब्द तीनों लिङ्गों में होते हैं। यह प्रत्यय कर्ता में हो
है। 'कृष्णम्' में कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है। यहाँ कृदन्त के योग में पर
नहीं होती क्योंकि 'अकेनोभरिप्पापमप्पंयो:' से पप्टी का विषय हो पाता है
२६२. कालेति-कालार्थक शब्द उपपद होने पर धातु से तुमुन् प्रत्य
होता है।
कालः समयो येसा वा भोक्तुम् (साने का समय है)-कालवाची श.
उपपद होने पर भुज् धातु से तुमुन् प्रत्मय हुमा है। भु+तुम् -- 3 को पुर
मो तथा को ग एवं क होकर 'मोस्तुम् ।
२६३. भावे--सिट परस्पा को प्राप्त धातु के मयं को कहने में पातु के
पत्र, प्रत्यय होता है । पन में 'म' चुप रहता है।
१.प्रावधान कारा३६
२. चो: कृ: ।।३

उतशतधारम
२८४ । मकरि च कारके संमायाम iter
कारफे पण या
२६५ परिच भावकरगयोः ६।४।२। रजननोप:यान् ।
रागः।
'भार' अभिमाय है-पासामर्ष । यो प्रातरा होता है-
१. सापापासम्म, २. मिचाएन । पासपोसाता निपटने
मार की जाती है, जैसे-'पति' (TRAIEि नही पाय
है।
धामिनात से प्राट होगे. बंसे पार । न के
बारा पानापर्ष भादप प्रारहो त्रि
बएन प्रादिका गय होता है।
पार: (पाने पा)-परा में भाव पेस प्रापर होता है।
+-++प्रन्यय केजर होने से प (घर)को २ पा
होर पा+पोहोर पार+..पा. पृ• या एस. में
farmeri-TRI RETIR में हो।
२१४. पकन-Eि, A find से
पाम पर mti
२१. पोर-मारी मेबो पर, उसके परे होने पर
m-मुना (रना . मिगे रहर
प)-(en) ega (or) m.
1) जय होकर आरमार
मोम)
१. भा(TR).
२.mmistan
Twो. सरररररर

सम्कृतव्या करणे
२६६ । डिवत: वित्रः ३।३
।।
३०० । क्यमंम नित्यम् ॥४॥२०॥ त्रिप्रत्ययान्ताद् मप निय
अऽयं । पाफेन निवृत्त पवित्रमम। डुक्प-उपनिमम् ।
गोन का नाम] प्रतिष्ठन्तेऽस्मिन् बनाः इति प्रस्थः [पर्वत शिखर]-प्र पूर्व
था धातु से अधिक रकरण मे क प्रत्यय होकर प्र+स्था--प्रत्यय के कि
ने से माकार का लोप प्र+स्थ्+प्र-प्रस्थः ।
विघ्नः (विघ्न, अन्तराय)-'विघ्नन्ति मनासि पम्मिन्' (जिसमें मन में
आते हैं। इस विग्रह में विपूर्वक हन घातु से क
प्रत्यय होता है। वि+
न्-→म (क) इस दशा में हन् के प्र (उपघा) का लोपर होकर ह. को भर
कुत्व) होकर विघ्+++विघ्न, ।
२६६, डियत इति-जिस धातु का डु इत्संज्ञक होता है (ड्वित्) उपरे
रेवित्र प्रत्यय होता है । (वित्र में वि दोष रहता है)।
३००. परिति-वित्र प्रत्ययान्त से नित्य मप् प्रत्यय होता
नष्पन्न मा सिद्ध होना) मधं में
टिप्पणी- मूत्र में निन्यम्' कहने से यह वित्र प्रत्यय मप् के विषय में
निवृत्त अर्थ में) हो होता है।
पवित्रमम४-पाकेन नितम् (1क से निरन्न, पका हुमा)-उपचः
कि यह पातुपाठ मे पटित घात का रूप है। यहाँ 'ड' इरसंशक है (तपार
1) मतः पच् धात हिवत् है। इससे वित्र प्रत्यय होकर पच +विच को
१५ परिष-कार के सूत्र से मप् प्रत्यय होकर पवित्र+म+पत्रिमम् ।
१. भातो लोप इटिच ६४
२. गमहनजनखनयसा सोपः विनत्यनदि ४९
३. हो हन्ते ठिणग्नेषु ३५४
४. Ripened, Matured काले से०-७७७ ।
५. घोः कुः पा२॥३०॥

उत्तरकृदन्तप्रकरणम्
३०१ । टिवतोऽथुच ३३१८६१ टुवेष कम्पने । वेपथुः ।
'३०२ । यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नङ् ३।३।६। यहः ।
याचा! यत्नः। विश्नः। प्रश्नः।
उत्रिम-वापेन निवृत्तम् (बोने से निष्पन्न}~हद बोजसन्ताने (बीज
मोना) धातु से किन पत्यय तथा भग् प्रत्यय होकर व+त्रि+म यहाँ प्रत्यय
के कित होने से व को उ (सम्प्रमारण') हो जाता है । उप-त्रि+म+
उधिमम्।'
टिप्पणी-सी प्रकार 'कृत्रिम' सम्म भी बनता है- +कि+
मप) । पत्रिम मादि शब्दों के विशेष्य के अनुसार लिङ्ग पचन होते हैं।
३.१. दिवत इति-जिस धातु का 'ट' इत्सशक होता है उससे मधुच
प्रत्यय होता है (भाष भे) । (मधुच् में मधु शेष रहता है)।
वेषप (कम्पन)-रवेप कम्पने (कॉपा) पानु से पपच् प्रमय होकर
वेप-+ पथु --वेपयु--पु. प्रथमा एकवचन मे वेपथुः ।।प्रय प्रत्ययान्त पु. मे
होते हैं।
--
३०२, पति-यज, याच, यत्, विन्द, प्रच्छ धौर र पातु से मा
प्रत्यय होता है, भाव में । नामेन शेष रहता है।
4: (पश, हवा)-- देवपूजा भादि) पातु से मड़ प्रत्यय होकर
यजन-न से (श्वस्व'! यज+-++ यक्ष, पु.. .
ए.. 4:1
टिप्पणी :--नङ्ग प्रत्ययान्त धम्म पुल्लिङ्ग में होते हैं वेवल माया शब्द
स्त्रीलिङ्ग है।
पामा (पादना-चाप (मोगना) धातु से नङ् प्रत्यय होकर पाच +
मन को मात्र स्कीबोधक प्रत्यय टा' होकर यात्रा-पाया।
१. वरिपपियादीनां विति AIR द धातु पनदिमे है।
२.तोः इचुना चुः ४४.
३.पवारप्टार |
..

२१२ संस्कृतव्याकरणे ३०३ । स्वपो नन शशस्वप्नः। ३०४ । उपसर्गे घो: कि: ३३ प्रधिः । उपधिः । यत्नः [प्रयन]-यत् [प्रयल करना) घातु से नइ प्रत्यय होकर यत् +न-यत्नः। विश्नः [गति, कान्ति-विच्छ (जाना) धातु से नङ् प्रत्यय होकर विच्छ +न इस दशा में न्छ को श होकर विस्+न-विश्नः । प्रश्न:-प्रच्छ [पूछना] धातु से नङ् प्रत्यय तथा च्छ को श् । रवणः-रिक्षा] रक्ष् पातु से नङ् प्रत्यय तथा न कोण' होकर रदणः । ३०३. स्वपः इति-स्वप् धातु से नन् प्रत्यय होता है, भाव में । नन में न शेष रहता है। स्वप्न: [सोना, स्वप्न]-स्वप् [सोना] धातु से नन् प्रत्यय होकर स्वप +न+स्वप्नः। ३०४. उपसर्ग इति-उपसर्ग पूर्वक घु संज्ञक धातुपों से कि प्रत्यय होता है, भाव में तथा फ भिन्न कारक में । हुदा (देना), दाण (देना), दो (तोड़ना), देङ् रक्षा करना)-इन दा-रूप को प्राप्त होने वाली तमा धान (धारण करना) धेट् (पीना) इन या-रूप को प्राप्त होने वाली धातुमो की घु' संज्ञा होती है। कि प्रत्यय मे इ शेष रहता है कि प्रत्ययान्त राम्द लिङ्ग होते हैं। प्रधिः (चक्र की परिधि, पहिये का घेरा)-प्रपूर्वक पा धातु से कि प्रत्यय होकर प्रधा+r-इस दशा में प्राकार का लोप प्र +-प्रधि पुं० प्रयमा एकवचन में प्रधिः । उपषि: (कपट, दम्भ)-उपपूर्वक धा धातु से कि प्रत्यय होकर उपपा++माकार का सोप उपधिः। :. न्योः यूनुनासिके घ ६४४.१९ २. रयाम्या नोगः समानदे | दापाध्यदा १०१।२01 ४. पातो लोप इटि घure उत्तरकृदन्तप्रकरणम् ३०५ । स्त्रियां क्तिन ३.३।१४। स्त्रीलिङ्ग भावे क्तिन् स्यात् । पभोऽपवादः। कृतिः । स्तुतिः (वा) स्वादिभ्यः क्तिनिष्ठाव. द्वाच्यः । तेन नत्वम् । कीणिः । लनि । धूनिः । पूनिः । टिप्पणी--(१) प्रधिकरण अर्थ में भी कि प्रत्यय होता है, जैसे- जलानि धीयतेऽस्मन्निति जलधिः, नीरघि , उदघि प्रादि । (.) उपाधि, व्याधि, प्राधि, सन्धि, अभिसन्धि (अभिप्राय) निधि (कोष) विधि (ब्रह्मा, विधान) तपा समाधि भादि शब्द भी कि प्रत्ययान्त है। (२) "कि' प्रत्ययान्त शब्द संस्कृत में पुल्लिङ्ग होते । ३०५. स्त्रियापिति--स्त्रीलिङ्ग में भाव में तिन् प्रत्यय होता है। (क्तिन में ति शेष रहता है)। यह घञ् प्रत्यय का बाधक है अर्थात् स्त्रीलिङ्ग मे भाव में क्तिन होता है धन नही। कृतिः (कार्य)-कृ धातु से तिन प्रत्यय होकर कृ+तित्रीलिङ्ग प्रथमा एक० मे कृतिः । इसी प्रकार स्तु+क्तिन् -स्तुतिः । शुल्वादिभ्य इति (11-कारान्त पार लू मादि धातुपो से परे वितन् प्रत्यय निष्ठा (क्त, कवतु) के समान होता है, यह महना चाहिये। तेनेति-निष्ठा के समान होने से वितन् के त को भी न हो जाता है। काल: (विक्षेप, बिखेरना)-क (विक्षेरला) धातु से क्तिन् प्रत्यय होकर म+ति+ऋकार को हर किर+ति→ को दी कीर+ति-निष्ठा के समान होने से र से परे त को न्' तथा न् को ण होकर कोणि-कोणिः । इसी प्रकार ग+क्तिन-गोलिः । सूनि: (काटना)~ल (गरना) पातु से क्तिन् प्रत्यय होकर ति को १. ऋत धातो: ०।१११०॥ २. हलि च १२७७ ३. रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च ६: ८।२।४२१ २१४ संस्कृतव्याकरणे 8 (41) सम्पदादिम्यः क्वि ।। सम्पत् । विपत् । आपत। 8 (. क्तिमपीध्यते ।। सम्पत्तिः । विपत्तिः । श्रापतिः । ३०६ । कतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च ॥३७॥ निपात्यन्ते। । a निष्ठावत् हो जाने से त् का न होता है इसी प्रकार धू+लिन् । (कम्पन) पू+क्तिन् -→पनि: (पवित्रता)। सम्पविति-(वा) सम् भादि उपसर्ग पूर्वक पद् पातु से विप् प्रत्यय हो है, भाव में (स्त्रीलिङ्ग में)। सम्पत् (सम्पत्ति) 'सम्' पूर्वक पद धातु से विवप् प्रत्यय, विवप् का सं (सर्वानहार) सम्पद, स्वी० प्र० एक० में सम्पत् । इसी प्रकार वि- पद+विवर-विपत् । पा+पद+विवप् + मापत् । तिमिति-सम् मादि उपसर्ग पूर्वक पद धातु से भाव में (स्त्रीलिङ्ग में वितन् भी इष्ट है। सम्पत्तिः-सम+पद+ क्लिन-→ सम्पद+ति-+दकार को तकार' (चत्वं होकर सम्पतिः । इसी प्रकार विपत्तिः, प्रापत्तिः। ३०६ गतीति-ति, यूति, जूति, साति, हेति मौर कीति इन पित प्रत्ययान्त दादों का निपातन किया गया है। इनमे जो कार्य किसी नियम (सूत्र) से प्राप्त नही, वे सब निरातन । सिद्ध हो जाते हैं। अति (रक्षा)-प्रद (रक्षा करना) पातु से विवन् प्रत्यय होकर मन ति+प्रकार तया वकार के स्थान में (ज्यर० भप्रिम मूत्र से) 5 (ऊ) होकर +ति-अतिः। उदात्त स्वर के लिये सूत्र में निपातन रिया गया है। १. स्वादिभ्यः ८/२॥४॥ २. सरि पाश उसरकृदन्तप्रकरणम् ३०७ । ज्वरस्वरतिव्यविमवामुपधायाश्च ६।४।२० एपा. मुपधावकारयोरूठ स्यादनुनासिके क्वौ मलादी विडति । अतः विवप् । जू । तूः । सः। ऊ । मूः । पूतिः-यु (मिश्रण करना) पातु से क्तिन् होकर निपानन से दीर्घ होता है। इसी प्रकार जु+क्तिन्'-जूति: (वेग) में भी निपातन से दो होता है। साति: (अन्त, अवसान)--तो ( अन्तक ) धातु से क्तिन् होकर सोनति इस अवस्था मे मो को प्राप्त' मा निपातन से उसका प्रभाव हो आता है तथा मो को भा होकर सातिः । हैति:--हपियार)-हन् पातु से क्तिन होकर निपातन मे न् को इ-- होकर ह++ति-गुण (म+इ=ए) हेतिः । कोतिः (ख्याति)-स्वार्थ पिजन्त (चुरादि) त् (संशब्दने' ) धातु से यु' प्रत्यय प्राप्त पा किन्तु कहाँ निपातन से क्तिन होता है। कृत्+ति- को हर कि+ति-+६ को दीर्घई कीतिः । ३०७. उपरेति-वर, पर, निन्, मद, मद-इन धातुपों के उपधा (अन्त्य वर्ण से पूर्व वर्ण) तथा २ को क होता है मनुनासिक, क्वि तथा फलादि कित् हित प्रत्यय परे रहने पर । मतः विवपति-इसलिये (इन धातुभों से) विवप भी होता है अर्थात् इस सूत्र से निप् प्रत्यय परे होने पर ज्वर मादि को क विधान किया गया है प्रतः इनसे विवर होता है। १. जवन जूतिः (ममरकोष)। २. सातिस्त्ववसाने स्यात् (ममरकोष)। ३. पतिस्पतिमास्थामिति किति ७२४१४॥ ५. मादेच उपदेशेशिवि ६u ५. To name, toglorify-काले। १. पयासत्रयो युच् ३१३१०७१ ७. उपधायाश्च ॥१॥१०॥ ६. उपधायाध || संस्कृतश्यावरणे ३०८ । इच्छा ३॥३॥१०॥ पनिपातोऽयम् । ३०६ । म प्रत्ययात्॥३॥१०३। प्रत्ययान्तेभ्यो धातुभ्यः स्त्रिया- जू (रोग)-ज्वर (रोगे) धातु से वियर प्रत्यय. उसका नौर, वकार तथा प्रकार (उपया) को ऊ (क) होकर जूर राम बनता है । बूर से प्रथमा में पूः, जूरी, जूरः । इसी प्रकार सर+विवा-तूर-तुः (शोघ्रारी)। पू:- (शोषक या जाने वाला,-ग्निव (गति तथा शोपरा)-पात । क्विप् प्रत्यय, उसका लोप, इकार पोर वकार को ऊ होकर 'कागन सन्द बनता है । उसमे स स वो, स: मादि । ऊः (पक्षक)-भव (रक्षा करना)+विप+भाकार तथा वकार को ऊ होकर 'क' शब्द बनता है। उसमे ऊः, उदी, उद: भादि। म् (बाँधने वाला)-मद (बोधना)+विप+प्राकार मौर वकार को कट होकर 'मू' उससे मूः, मुयो, मुवः प्रादि । टिप्पणी-वर मादि गूत्र के प्रसङ्ग से यही विवप् प्रत्यय के '' मादि रूप दे दिये गये हैं, इन शब्दों में विवप् प्रत्यय कर्ता में होता है, भाव में नहीं तथा इस क्विप् का स्त्रीलिङ्ग से भी सम्बन्ध नहीं। ३०८. इच्छेति - इषु (इच्छा करना) धातु से इच्छा शन्द का निगवन कया गया है। इन्दा-३५ धातु के निपातन द्वारा भाव में श (म) प्रत्ययं होता है हा त्यय के शित् होने से सार्वधातुक हो जाने के कारण या प्राप्त य पाठन द्वारा उसका प्रभाव हो जाता है। इस प्रकार इप+7+ . होकर इच्छ+म+छ. से पूर्व त् (तुक'), त को च होकर इन्च →स्त्रीत्वबोधक टाप् प्रत्यय होकर इच्छा। अलाkaisode ३०६. प्रत्ययादिति-प्रत्ययान्त घातु से स्त्रीलिङ्ग में 'म' प्रत्यर ता है, भाव में तथा कर्ता भित्र कारक में। सार्वधातुके यक् ॥१६॥ २. इपुगनियमांध ७३७ ६१७३३

उत्तरकृदन्तप्रकरणम्
मकार प्रत्ययः स्यात् । चिकीर्पा । पुत्रकाम्या ।
३१० । गुरोश्च हलः २१३१.३। गुरुमतो हलन्तास्त्रियाम.
:: प्रत्ययः स्यात् । ईहा।
३११ । ण्यासभन्यो युच् ३३६१०७५ अकारस्यापदादः ।
एणहारा।
प्रत्ययान्त धातुए वे कहलाती हैं जो पातु या सुबन्त से कोई प्रत्यय लगाने
नती हैं, जैसे-+सन्-रिकी (विकीपति,, पु+काम्य-पुत्रकाम्य
काम्यति) मादि।
विकी - (करने की इच्छा)- पातु से इन्धायक मन् (स) प्रत्यय
फिर 'चिकीर्ष' पातु बनती है । चिकीर्ष से भाववाचक प्र' प्रत्यय होकर
+4+का लोप'चिको+भचिकीर्ष स्त्रीलिङ्ग में टाप् प्रत्यय
र चिकी+पा-विकी।
पुत्रकामा (पुत्र को दा)-'पुत्रमारमन इम्पति, (मपना पुष चाहता
इस अर्थ मे पुत्र से काम्यम् प्रत्यय होकर 'पुत्रकाम्य' यातु बनती है।
से स्त्रीलिङ्ग भाव में प्र प्रत्यय होकर पुत्रकाम्या ।
१.1. गुरोरवेति-डिस म्यजनान्त (हमन्त) पातु मैं कोई गुरु पयर
युक्त पचन तथा दोर वर) हो उससे स्त्रीलिन मे (माग में) म प्रत्यय
हाष्टिा)-ह. (पेप्टा करना) पातु व्यवनात है और इसका
६१ पतः इससे रपय होता है।+वीलिङ्ग में चार प्रत्यय
करह+RT-हा।
Re-विषयास्त, पार तथा पप पातु से तुप प्रत्यय
Pan, सोलिङ्गभार मैं।
पारस्पति-पुर प्रय'' पप ााा है। हर पन्त से
स्यपान्त पातु होने के कारण प्रवरा-३०६ या मान और यन्यू से
१.प्रोमोर mms

AIMERO
३१२ । नगमे माये त ३११४१
३१३ । स्मुद
गतिमानमः।
३१४। पुनि ममाप: प्रामेणा |
३१५। पादेशप पमर्गस्य :१६षमगझनाय
पाहमा भानु होने के गुर ६. ... RR
का (ना)- पातु मे लिए प्रेरणा ४) प्रत्यय होर
गरण पाको हैरो) भा में मुष प्राप हार
कार+यु- पु सो पत्रकारि+पन.लि (v) का मोर' कार+न.
मको मतवावीषयोधा राप्रपा होकर कारण । मो मार पन्त
ह (हारि)+II-मामा । प्राय+यु--प्रामना (मान, पिडि)।
धा+पुष+पना।
२१२. मगर इति-नित्र मात्र में पातु से प्रत्यर
२१. युरिहि-मममिन भाव में पातु से युद् प्रत्यय भी होता है।
हसितम् हमनम् (हमना)- हम् हसना) लातु से मधुसरनिङ्ग भाव में
कि सपा स्पट् प्रत्यय होते हैं । हस+त+कापागम होकर हस्+rt
तहसितम् । हस+-+यु का मन मादेच होकर हस्+मन --हमनम् ।
३१४. गुसोति-करण तथा मधिकरण प्रयं में पुल्लिङ्ग मैं प्राय: ५
प्रायय होता है, ससा दाद बनाने के लिये।
३१५. छारेरिति-दो या दो से अधिक (दो मावि) उपसर्ग रहित धादि
धातु धादि को हम्ब हो जाता है, घ प्रत्यय परे होने पर।
१. कारण तु यातना तीवदना (ममर कोष)।
२. युवोरनाको 10
1. गैरनिटि १५॥

उत्तरकृपत्तप्रकरणम् २१६ छादेव यः स्यात् घे परे। दन्तारछाधन्तेऽनेनेति दन्तच्छदः। श्राकुर्व- मयस्मिन्नित्वाकरः। ३१६ । पवे तृस्त्रोघम ३१२६१२०॥ अवतार कूपादेः । अव- स्तारो जवनिका। ३१७ । हलश्च ३।२।१२१६ हलन्ताभ स्यात् । धापवादः । इगतपदः (मोष्ठ)-दत्ताश्छाधन्ते भनेन (दीत ढके जाते है जिससे):-- यहाँ यन्त छादि धातु से करण पर्य में घ प्रत्यय होता है। दन्त+छादि+ म-णि का लोप तथा मा को हस्व (R) होकर दन्त +2+4+ दन्तच्चरः। मकर: (खान, सनि)--माकुर्वन्ति पस्मिन् (पारों भोर से मार काम करते है जिस-यहाँ पधिकरण पर्थ में पाइपूर्वक धातु से च प्रत्यय होता है । मा+2 (घ)को गुण भर पाकरः । are - स्पसर्ग पूर्वक र पौर स्तु धातु से संगा मे धम. प्रत्यय होता है करण तथा प्रधिकरण में। पता: ( आदि का पान, पाट)-भपतरम्ति पत्र जिसमें उतरते है) यहाँ पर पूर्वकत (सरना) पातु मे पा प्रत्यय होकर भव++ -प्रित् प्रत्यय परे होने पर को वृद्धि भार म+ता+प अवतारः। हिप्पणी-भाव प्रत्यपान्तों में क्त.स्युट् प्रत्ययान्त मभक लिङ्ग में,तिन् माहि प्रत्ययात्रीलिङ्ग में तथा ऐप पर अप, भए पनि प्रत्यय बाले पर पुस्ति होते है। ममता (अनिका पा)--पाणाति भनेन (जिससे Tv arat U-4हास्तु (पाच्छादन करना) रातु से पम् प्रत्यय होकर an+kt+ परोधि भार होहर पस्तारस होता है। हलापति सन्त (निसके मन में इस पर्थात् मात होता है) -- . remail २२० सस्कृतव्याकरणे रमन्ते योगिनोऽस्मिन्निति रामः। अपमृज्यतेऽनेन व्याभ्यादिरित्यपा- मार्गः। ३१८ । ईषदुस्सुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल ३।३।१२२॥ करणाधिकरणयोरिति निवृत्तम् । एषु दुःखसुखायपूपपदेषु सत् । तयोरेवेति भावे कर्मणि च । कृच्छ -दुष्करः कटो भवता । घातु घन, प्रत्यय होता है। घापनाद इति-- यह घर प्रत्यय घ का बाधक है। "सि संज्ञापाम् ३१४, सेध प्राप्त था। राम.-रमन्ते योगिनोऽस्मिन् (जिसमें योगी रमते हैं)-यहाँ प्रधिकरण पर्थ मे रम् धातु से पत्र प्रत्यय होता है। रम् + (पत्र)-म (उपा) फो वृद्धि' (पा) होकर राम्+म+रामः । भपामार्ग:-अपमृग्यतेऽनेन व्याघ्यादिः (जिससे रोग मादि का सोधन होता है, एक पौषधि जिसे हिन्दी में चिरचिटा' कहते है। यहाँ मा पूर्वक मृज (शुट करना) धातु से धन प्रत्यय होता है । म++पञ्जको पुद्धि पार तथा ज् को म्' होकर अप-+मा+म- घर, प्रत्यपात परे होने पर उपसर्ग 'मप' के पन्त को दीर्घ होकर'मामार्गः । २१८. ईवरिति कठिनता (दुस) और सरलता (सुख) भोपक दुस् पौर मु उपसर्ग उपाद होने पर धातुपों से तस् प्रत्यय होता है। सर में 'म' शेष रहता है. स् पौर स् को इत् मंशा होती है । कावंति-'करण पोर प्रधिकरण मयं में इसकी निवृति होगा भर्चा! खस् प्ररपय इन मयों में नहीं होता। फिर पिसम में होता है ? योरे। मूत्र के अनुमार तम् प्रत्यय भाव और कर्म में होता है । यहा कृष्छा (मठिनता) दुम् का विशेषण है मोर माछाप १६an १.प्रत पाया: ७२१६॥ २. मृशिरा ३. चाकु, पिण्यता: ॥३॥५२॥ ४. उपसर्गस्य पश्यमनुष्य रहलम १२२ ।

उत्तरकृदन्तप्रकरणम् २२१ अकृच्छ - ईपत्करः । सुकरः। ३१६ । प्रातो युच् ॥३।१२८। खलोऽपवादः। ईपत्पानः सोमो भवतार दुष्पानः। सपान:। सुका क्योंकि ऐसा ही सम्भव है। दुका: पटो भवता-(भापको चटाई बनाना कठिन है}-दु पेन कतु योग्यः, इस पर्थ मैं दुस् पूर्वक कृ धातु से कर्म में खत् प्रत्यय होता है। दुस++भ (सल)-- को गुण पर-दुस+कर+4-सका मोरया Frm या प- दुर यात्मयों से पूर्व से विस्कर: (सहज में ही करने योग्य)-इषदक+खल्→ईषत+कर+ म-ईपरकरः। सुकर. (सुख से करने योग्य )-सु++ खल+सु+कर+4 ३१९ मात इति-कठिनता और सरलताबोधक ईपन, दुस् तथा सु उपपद होने पर माकागात धातु से युच प्रत्यय होता है। पल इति-~-यह मुच् प्रत्यय खल प्रत्यय का बाधक है। युच मे मु शेष रहता है । यु को मन' हो जाता है। ईषत्पानः सोमो भवता (पापको मोम पीना सरल है)-महाँ सरलता- योधक (पदार्थक) ईद उपपद होने पर पाकारान्त पातु पा (ना) से (खल् प्रत्यय को बाधकर) पुच् होता है । ईषद+पा+यु+यु को मन+ ईपरपानः । इसी प्रकार दुस्+पा+ युद्--दुष्पानः (कठिनता से पिया जाने योग्य) सु+पा+युच-पानः [सुख से पिया जाने योग्य) | Tri टिप्पणी-पत्कर, ईपपान: इस्मादि में कर्म मे सत् प्रत्यय हुमा है, प्रत्यय द्वारा कर्म के उक्त हो जाने के कारण क्टः, सोमः प्रादि में अपमा विभक्ति होती है तथा कर्ता के अनुक्त होने से 'भदता' में तृतीया होती है। यहाँ कता से पष्ठी नहीं होती, क्योंकि खलपक' प्रत्ययान्तों के योग में १. कर्तृकर्मणोः कृति ॥२.न लोकाम्यनिष्ठाखलर्थतनाम् ।

रवर २२२ सम्वृतम्याकरणे ३२० । प्रलंखल्वोः प्रतिषेधयोः प्राची कवा ३१ प्रतिपेघार्ययोरलंसल्वोरुपपदयोः पत्वा स्यात् । प्राचां महणं पूजार्थम । अमैवाव्ययेनति नियमान्नोपपदसमासः दो यो । अन्नं दत्वा । उसका निषेध हो जाता है। यही से मागे इस प्रकरण की ममानि पर्यन्त परवा तथा रामुल प्रत्यय का विधान किया गया है। ३२०. मसमिति-निषेपार्थक प्रलं मौर हलु शम्द उपपद होने पर धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है। 'क्त्वा' में स्वा शेष रहता है। क्ति करने का प्रयोजन है- १. गुणवृद्धिनिपेय, २. सम्प्रमारण मादि। प्राचामिति--'प्राचाम् यह कहना मादर प्रक्ट करने के लिये है। मभिप्राय यह है कि कुछ सूत्रों में प्राचार्य-विशेष (शाकल्यस्य मादि) का नाम या 'प्राचाम्' (प्राचीनों के मत में) इत्यादि ग्रहण करने से कार्य (विधि) का विकल्प प्रभीष्ट होता है किन्तु यह तो 'वासस्प' परिभाषा के अनुसार ही पक्ष में ल्युट मादि प्रत्यय हो जाते हैं । प्रतः विकल्प के लिये 'प्राचाम्' पहरा की मावश्यकता नहीं, केवल मादर-प्रदर्शन के लिये इसका ग्रहण किया गया है । प्रमैवेति- 'प्रध्यय से साथ यदि उपपद का समास होता है तो मम् साथ ही इस नियम से यत्वा प्रत्ययान्त के साय उपपद समास नहीं होता। भलं दत्त्वा (मत दो)-प्रतिषेधार्थक 'मलम्' शन्द उपपर होने पर दा (देना) धातु से बस्वा प्रत्यय होता है। दानवादा को दावा मादेश होकर तु (चर्य) होकर दत् +या+दत्वा । टिप्पणी-वत्दा प्रत्ययान्त शम्द मध्यय' होते हैं इनके रूप नहीं चलते। १. करवातोसुन-सुनः ११०४.

उत्तरकृदन्तप्रकरणम् २२३ धुमाश्येतीत्वम। पीत्वा खलु । अलखल्वोः किम १ मा कार्षीत् । प्रतिषेधयोः किम् अलङ्कारः । ३२१ । समानक कयो: पूर्वकाले ॥४॥२१॥ समानक क. योधात्वर्थयो: पूर्वकाले विद्यमानामातोः कस्वा स्यात् । भुक्त्वा ब्रजति । द्वित्वमतन्त्रम् । भुक्त्वा पोत्वा ब्रजति । को खसु (मत पीजिये) - प्रतिबंधार्यक 'स्वलु' राम उसपर होने पर पा (पीना) मातु से बस्वा प्रत्यय होकर पा+वा-कित प्रत्यय (वस्वा) परे होने से 'पा' के मा को 'ई' होकर पीत्वा । भलस्को: किमिति--पल और सतु के पूर्ण होने पर, ऐसा क्या कहा ? इसलिए कि 'मा कात्'ि (मस कीजिय) यहा प्रतिषेधायक 'मा' (माइ) उपपद होने पर धातु से 'परवा' नहीं होता। प्रतिषषयोः रिमिति- यदि प्रतिषार्थक मल खलु हों, ऐसा क्यो कहा ? इसलिए कि भनवारः' मादि में या नहीं होता। हो भलम्' धनिय अपं में नहीं अपितु 'भूषण' प्रधं में है। २१. समानेरि-हो (या पषिक) पारदर्थो का एक (समान) होमहा पूर्वकास में वर्तमान धातु से स्वा प्रत्यय होता है। पूर्वकाल में पहुंभान पातु से पस्था होने के कारण त्या प्रत्ययात को पूर्वजनिक किंग कहा जाता है। हिन्दी मे 'कर' या 'करके' लगाकर सा अप्रस्ट किया जाता है। भरमा यति (खाकर बाता है) - यही दो दिया है साना (भुर) पौर पाना (परान दोनों का एक है। इनमें 'साना पिा पूर्वाल में होती है, पतएव साना' पर्प पालो मुन् पातु से बत्वा प्रत्यय होगर मुरा-जोग तयार होकर +++भारा। मिति-मूत्र में 'समायो' पद में रिवन भतिशत है ( सरासी) पद वहां से नियारे हो उनमे से पहली से बना होता है, १. घुमायापारहाविमा हलि sitti L- ३२२ । न क्त्वा सेट् १।२।१८। सेट क्या किन्न स्यात् ३२३ । रलो व्युपधाद्धलादेः संश्च ॥२॥२६॥ इववियों घालादेः रलन्तात्पगै क्त्वासनो सेटौ वा किती स्तः। युतिता यह अभिप्राय नही मपितु यदि दो से अधिक क्रियायें हों तो उनम से जो पूर प्रियायें होती हैं, उन सबसे क्या हो जाता है, जैसे भुक्त्वा पोरका प्रति यहाँ तीन क्रियायें हैं, इनमे पूर्वकाल में वर्तमान भज पोर पा दोनों धातु से करवा हो जाता है। ३०२. म पवेनि-सेट (इट सहित) करवा कित नहीं होता। टिपलो-कुछ धातुओं से परे करवा प्रत्यय को इदका मागम हो माग है. यही कहा सेट पर्यात् इट महित है । परवा मे करत है पत: यह fra है fr.तु ऊपर के मूत्र के अनुसार 'सेट करया' रित् नहीं पर्थात् उसके परे होने पर गुणवृद्धि नियमादि (क्ति के) कार्य नहीं होते। मयिया (सोम)~ो (सोना) पामु से पला प्रयप होकर शो+ ग्या-त्या को इट (३) का प्रागम होकर धी+r+वा-- सेट पर रिव न रहने मे गुण का निधनहीं होता तयाको गुण (ए) होर E+:+खाए को 'प्रय' पादेश पा+:+cा=विता । मेह निरिति-मूत्र मे मेट क्यो कहा। इसलिये कि परिद का रित होता ही है. जैसे-'या' यही इद नही होता पर: वका से नहीं नपा यह क्ति ही है इमनिये यहाको गुण नही होता। १२३ रल रनि-त्रिम धानको उपा में दणं और गो नपा बाद में हस (म्पयन) हो मोर पन्त मे रस (कोई का र.. म. ५. ६) हो उमसे परे मेद गया पोर मन वि fre। रिपती- मूत्र में यात्रा पर्व है उन पर की डाय धार-उब और अचा में निमकी ऐमी पात। मा दोनिमा (कर)-पा (मा) 43 १. दि. मे

उत्ताकृदन्तपकरणम्
२२५
-
घोतित्वा। लिखित्वा, लेखित्वा। ध्युपधाकिम ? वर्तित्वा । रलः
किम ! सेवित्वा इलादेः किम ! रुपिया। सेट किम भुक्त्वा ।
३२४ । उदितो वा २५६॥
उदितः परस्य व इड् वा स्यात् । शमित्वा, शान्त्वा ।
का प्रत्यय होता है तथा त्वा कोट । द्युत धातु की उपचा (अन्य वर्ण से
पहला वर्ष) में उवणं है प्रादि में हल (द) है भोर पन्त मे रत (त) है । पत.
कार के मूत्रानुसार त्या प्रत्यय विकास से रित होता है। जब कित होता है
सो गुण नहीं होता 'दुनिस्वा' । क्ति न होने पर गुण होकर घोतित्वा । इसी
प्रकार लिहिरवा लेस्बिरमा (तिखकर) ।
प्युपधात् किमिलि-अदि सरधा में इ. उ हों, ऐसा क्यों कहा? लिये
कि सिस्वा' में पत्या कित नहीं होता । पहाँ 'क्त' धातु है उसको उपमा
स: किमिति-मूत्र में रसन्त घात हो ऐमापों पहा ? इसलिये कि
"मेविरवा' में परवा रित नहीं होता, पत: पुरण हो जाता है । 'पिर' पातु
के
मत्त में '' है जो 'रल' में नहीं पाता।
हसाः किमिति-हसाद पातु हो, यह मयों कहा? इसलिये कि
'एपिरषा' में कस्वा पित नहीं होता तथा गुण होता है। भातु के पार
में मप (स्वर) हल नहीं।
सेट किमिति- इस पूत्र के पर्थ में सेट क्यों कहा ? इसलिये कि 'भुरका
मादि में 'पारित ही होता है तथा यही गुरा-निध हो जाना है। महा
परमा पनिट है।
२२४.परितो वेति--जिन पामों में उकार का है,नमे परेका
को फिर से होता है।
अमिरा, माया (साल होहर)-व्हा पमु उपगमे (दिगरि पात
है।हवि है परस्या परे होने पर विकता से इद होता है। म+
+साधयित्वा । र द नहीं होगा भी एम+रवा-कोष'
१. पनुनासिरप विझलोः बिदति ॥१॥

संस्कृतम्याकरणे देविस्वा. घुत्वा । दधातेहि:-हित्वा । ३२५ । जहातेश्च क्वि ७४|४३॥ हित्वा, हाडस्तु हात्दा ३२६ । समासेऽनपूर्वे क्वो ल्यप् ७॥१॥३७॥ अव्ययपूर्वपदे- ऽनसमासे क्त्वो ल्यवादेशः स्यात् । तुक । प्रकृत्य । अनन् किम ! श्रकृत्वा। शाम +त्वा→म को अनुस्वार तथा परसवणं होकर शान्त्वा । दैवित्वा, धूत्वा (खेलकर)-यहाँ दिव (कोडा मादि) उदित् घात से क्त्वा प्रत्यय होकर विकल्प से इट् होता है। दिव++tar+इ को गुण (ए) देवित्या । इट् के प्रभाव मे दिव+त्वा→व को ऊ' (8) दि++ स्वा→इ को य् (यण) द्यूत्वा । हित्वा (धारण करके)--धा+क्त्वा प्रत्यय के कित् होने से घा को 'हि" प्रादेश होकर हि+रवा→हित्वा । ३२५. जहातेश्चेति-मोहाक् त्यागे (जहाति) धातु को भी हि मादेश होता है, क्त्वा परे होने पर। हित्या (त्यागकर,--हा (मोहाक्। धातु से करवा प्रत्यय-कला परे होने पर ऊपर के सूत्र से 'हा' को हिमादेश होकर हि+वा-हिरवा । हाइ इति-(मोहाङ् गतो, हाइ) का 'हात्वा' रूम होता है । हारवा (जाकर)-प्रोहाङ (जाना) घात से क्त्वा प्रत्यय होकर हा+रा -हावा । यहाँ घात को हि' पादेश नहीं होता । इमीलिये मूत्र में 'अहाति' रहा है जो 'मोहाक स्यागे' का रूप है । मोहन गो' का 'जिही' म होता है। ३२६. समाप्त इति-जिस ममास में अव्यय पूर्वपद हो उसमें कसा को ल्या पादेश हो जाता है. किन्तु नन, समास में नहीं । त्यप् में य शेष रहता है प्रकरण (प्रकरण बनाकर।-प्र+वा म्हाँ प्र का करवा में समाम १. छोमूडनुनासिके च MEI २. दमातेहि: ४२ (२९८). .

उत्तरकृदन्त प्रकरणम् २२७ ३२७ । प्राभीक्ष्ण्ये रणमुल् च ३४२२४ श्राभीक्ष्ण्ये द्योत्ये विषये णमुल स्यात् पत्वा च । ३२८ नित्यवोप्सयो: साभीक्ष्ण्ये वीप्सायां च द्योत्ये स्य वित्वं स्यात् । श्राभीक्ष्ण्यं तिडलेश्वव्ययसंक्षकेषु कृदन्तेषु च । 1 है (कुति प्रादयः) । समास होने से ऊपर के सूत्र के अनुसार करवा के न से ख्यप पादेश हो जाता है । प्रकृ+ इस दशा मे वित् कृत् (ल्य) होने से तुक्का मागम होता है, प्रक++य-प्रकरय । पजिति--सूत्र में माना कहने का क्या प्रयोजन है। यह कि नत्र, स में क्त्वा को व्यप नहीं होता, जैसे--प्रकृत्वा (न करके)। यहा नव कृत्वा के साप नत्र समास होता है। ३२७. भाभीक्षण्य इति-यदि बार बार करना या लगातार करना पोप्य पौनः पुन्य:- पुनः पुन' होना) बतलाना हो तो क्या प्रत्यय के में णमुल प्रत्यय होता है और करवा भी। ३२८. नित्येति--रच बार बार होना (निस्य) मोर प्रत्येक वस्तु (वीप्सा) प्राट करना हो तो पद को द्वित्व दो बार प्रयोग) हो में प्राभीयमिति --तिङन्तौ । त्रियापों) में तथा भव्ययसंजा कृदन्तों में का कार ार होना या लगातार होता (भाभीय) प्रकट होता है । पणी-यहाँ निय' और 'भाभीषण्य' समानाक है। जिस क्यिा को भार सर या लगातार करता है वह नित्य कहलाती' (काशिका)। स्या की नित्यता तिइन्तों पौर अभ्यपगंजक कृदन्त रसात पादि से की जाती है। जैसे--मुक्त्वा भुवा प्रजाठि । वीप्सा' का अर्थ है-बनेक का एक साथ किया और गुण के साथ सम्बन्ध दिलाने की इच्छा, प्रामो पापो रमणीयः। • हस्वस्य पिति कृति तक्रा॥

२२८ ५.४५ रमारं स्मारं नमति शिवम । स्मृत्वा स्मृत्वा । पायं पायम ।। भोजम् । श्राव श्राव। ३२६ । अन्यथवंकथमित्थंसु सिद्धाप्रयोगश्चेत् ३४ एषु कृयो णमुल स्यात् । सिद्धोऽप्रयोगोऽस्य एवंभूनश्चेत कृम् ।। स्मा स्मारं नमति शिवम (याद कर करके शिवजी को नमस्कार है)-यही स्मरण क्रिया का बार बार होना (पामीय) प्रकट कर लिए स्मृ+ (स्मरण करना) घातु से णमुल प्रत्यय होता है । स्मृ+णमुर स्मृ+मम् + ऋ को वृद्धि मार् स्मार्+प्रम् →स्मारम-निरप पर द्वित्व (नित्यवीप्सयोः) होकर स्मारं स्मारम् । पक्ष में क्त्वा प्रत्यय स्मृ: +स्मृत्वा स्मृत्वा। पाय-पायम (बार बार पीकर था रक्षा करके)-यहाँ पा धार पाभीक्ष्ण्य अयं में णमुल प्रत्यय होकर पा+प्रम्-णित् कृत् परे होने युक का भागमा पा++मम् -→ पायम् -दिप्रयोग (द्विस्व) होकर पायम् । पक्ष में पीत्वा पीत्वा । Rai भोज भोजम् (बार बार खाकर)-क्रिया के बार बार होने को । करने के लिये मज् धातु से णमुल् प्रत्यय होकर भुज+मम्+3 को मो→भोजम् --द्वित्व होकर भोज भोजम् । पक्ष में-भुक्त्वा भुक्त्वा । यावं यावम् (बार बार सुनकर)-प्रामीण्य पर्थ में धू धातु प्रत्यय होकर धु+मुल् →ध्रु+म+उ को वृद्धि' मी तथा । प्रादेश होकर था+मम् +थावम-द्वित्व होफर धार्य थावम् । पक्ष थत्वा धुस्वा । ३२६. प्रत्ययेति-पन्यषा, एवम्, कया और इस्थमा उपपद होने पर कृन धातु से णमुल प्रत्यय होता है यदि पुत्र काम १. मचौञ्जिति रा११॥ २. भातो युक चिरण कृतो: ७७३॥३३॥ ३. भवोणिति ११५ उत्तरकृदन्तप्रकरणम् २२६ स्वान्प्रयोगानई इत्यर्थः। अन्यथाकारम, एचईकोरम, कथहकारम, इत्यहकारं भुइफ्ते । सिति किम ? शिरोऽन्यथा कृत्वा भुकते। इत्युत्तरकृदन्तप्रकरणम ॥४॥ (प्रयोग न करना) मिड हो। ध्यराविति-सिदाप्रयोग का अर्थ है-मयं होने के कारण इम् धातु का प्रयोग भापक न हो' अर्थात् कृत्र घातु का प्रयोग तो होता है, किन्तु उसका कोई अर्थ नहीं प्रकट होता। भन्यथाकार मुरते-(मन्य प्रकार से खाता है)-यह 'मन्या रक' का जो पथं होता वही 'अत्यपाहारं मुड़ने का पर्व है, इसलिये है" धातु का प्रयोग म्पर्य है, उसका प्रयोग सिख है। ऐसी 'पन्यथा पूर्वक धातु से एमुल् प्रत्यय होता है। अन्यथा++मुस-+ ऋ को वृद्धि गरपन्यथा+कार सम् + प्रग्यधाकारम् । इसी प्रकार एव+1+ णमुल. बहकारम् (स प्रकार है), काकारम्, पडकारम् । Feaतिकिम रति-मूष में सिवाप्रयोग (कदा प्रयोग म्यथं हो) शरद में किया? इसलिए कि जहा 'क' का प्रयोग मावश्यक होता है, वह पायथा दि पूर्वक '' पातु से णमुस् प्रत्यय नदी हतास-विरोध्य पाया इप । शिको भन्यया करके पता 8), यहाँ कपात के प्रयोग के बिना AirdrTHIRIRAM यथ तद्धितप्रकरणम् अथ साधारणप्रत्ययाः ॥१॥ ३३० । समर्थानां प्रथमावा ॥१॥२॥ इदं पदन्नयमधिक्रियते प्राग्दिश इति यावत् । ३३१ । अश्वपत्यादिभ्यश्च ४१४ एभ्योऽण स्यात् प्राग्दी. व्यतीयेष्वर्थेषु । अश्वपतेरपत्यादि-श्राश्वपतम् । गणपतम्। १५ तद्धितेति-'तद्धित' शब्द अन्वर्थ संज्ञा है, 'तेम्यः (प्रयोगेम्यः) हिताः तद्धिता:' जो उन उन प्रयोगों के लिये हितकर हैं, इसलिये प्रयोग के मनुसार ही तद्धित प्रत्ययो का व्यवहार होना चाहिये । (सि० तस्वबोधिनी)। ३३०. समर्थानामिति-समर्यानाम्, प्रपमात्, वा इन तीन पर्यो का प्राग्दिशो विमक्तिः (५॥३॥१) तक अधिकार है । प्राग्दिशो विभक्तिः सूत्र से मागे वार्षिक प्रत्यय चलते हैं, उनमें इम अधिकार का प्रयोजन नही। अभिप्राय यह है-तद्धित विधायक सूत्रों में पहले उच्चारित पद द्वारा जिसका बोध हो, सामर्थ (पर्थ क्यन योग्यता) होने पर उसठे (विकल्प से) प्रत्यय होता है । जैसे–'तस्यापत्यम्' इस सदित विधायक सूत्र में 'तस्म' और 'अपत्यम्' को पारद हैं । इनमें प्रथम उच्चारित 'तस्य' है, इससे (षष्ठपन्छ) 'उपगु' इत्यादि का बोध होता है । प्रत: 'उपगोः अपत्यम्' इस भर्य में 'उपगु' दाद से विकल्प से प्रत्यय होता है। २३१. प्रश्वेति-प्रश्वाति मादि शम्दों से भए प्रत्यय होता है। भाग्दोव्यतीय (प्रपत्य मादि) वर्षों में । यहाँ प्राग्दीम्यतोऽए ४।१९८३ से भए को मनुत्ति माती है। टिप्पणो-तेन दीव्यति ४४२ मूत्र कहा गया है, वहाँ तक प्रग्बोम्पतीर मथं है । प्रादीभ्यतीय मो मैं-मपरया, रक्तावर्ष, चतुर, शेप तया . विकारार्थ सम्मिमित हैं।

सहित साधारणप्रत्ययाः - ३३२ दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदापय: ४४११८५६ दिभ्यःपत्युत्तरपदारच प्रारदीव्यतीयेप्वर्थेप ण्यः स्यात् । अणोऽय दितेरपत्यं दैत्यः । अदितेरादित्यस्य वा-- भावपतम्-प्रश्वपतेः अपत्यादि (अश्वपति की प्रपत्य इत्यादि विग्रह मै तद्धित विधायक सूत्र में प्रथम उच्चारित समर्थ पद मश्वपति प्रत्यय होता है । 'प्रश्पति +मरण' इसकी कृत्तद्वितसमासाश्च' से पदिक सना होकर डस् का लोप हो जाता है। प्रश्वपति+म इस पादि के 'प्र' को वृद्धि' (मा) होकर तथा पन्त के 'इ' का लोप' भाश्वपत् +4→माश्वपत शब्द बनता है। फिर अर्थ के अनुसार नपुंसर प्रथमा के एक वचन मैं 'माश्वपतम्' रूप बनता है । टिप्पणी 1) जिन तद्धित प्रत्ययों मे न.. ए इत्संगक होता है । खित कहलाते हैं । उनके परे होने पर शब्द के प्रथम स्वर को वृद्धि है है (तद्धितेष्वचामादे: ७१२०१९७) इसी प्रकार कित् प्रत्यय परे होने । किति ५ ७२.११८)। (i) यकारादि तथा प्रजादि प्रत्यय परे होने पर पूर्व की भ संज्ञा पोर भ सशक के इवणे तपासवणं का ईकार तथा सदित परे होने प हो जाता है (यस्येति च)। गाणपतम् -- गणपतेरपश्यम् (गणपति को सन्तान पादि)-प प्रश्वाति धादि (गण) में पढ़ा है इससे पण प्रत्यय होकर 'माश्यपर समान रूप होता है। ३३२.दिस्येति-दिति, प्रदिति, प्रादिस्य तथा जिसम पति उत्तरपद हो-ऐसे शब्दों से प्रारदीव्यतीय मों में व्य प्रत्यय होता है । दोष रहता है । यह पए का बाधक है। देस्य -दितेरपरयम् (दिति को सन्तान)-दिति शम्द से अपत्य १. मुपो धातुप्रातिपदिकयोः ॥१ २. तहितेष्वचामादेः ११७॥ ३. यस्येति प ६१४॥१४॥ .

२१२ संगतमाकरण ३३३ । हलो यमा यमि लोरः ६४.हलः पराय यम लोप: स्यावा यमिति यनोपः। आदित्यः। प्राजापत्यः। (वा; देवापसमी। देव्यमा देशमा उपशगूर रोय' प्रत्यय होता है दिक्षि+ य ग दशा में मालि' को वृधि (ऐ। सपा प्रत्य'का मोर होकर दंत+य--देश्यानता है। परितरिति-पक्षिति तपा मारिप दोनों से प प्रत्यय होहर पादिश्य रूप होता है। ३३. हम इति पञ्जन (हन) से गरे यम् (प, रस, व तथा वर्गों के पञ्चम प्रक्षर, का मोर हो जाता है. यम् परे होने पर। पादिश्य:-प्रस्तेि पारयम् (मादात को सन्तान,-इम विग्रह में अदिति पाम से ग्य प्रत्यय होकर प्रादि को वृद्धि (पा) तपा ' मोर हो जाता है भौर प्रादिश्य रूप बनता है। माविश्याय अपत्यम् (मादित्य को सन्तान - इस विग्रह में ज्य प्रत्यय होकर 'मादिरय +4' इस दशा में य से मागे वाले 4 का लोप होकर मादित्य + य इस दशा में ऊरर के मूत्र से 'यू' (यम् लोप हो जाता है तथा मादित्य रूप बनता है। प्राजापरप -प्रजापतेः अपत्यम् पुमान् (प्रजापति की पुरुष सन्तान)-- इस विग्रह में पति उत्तरपद होने से प्रजापति शमसे प्य प्रत्यय होता है । प्रजापति + य--प्रादि वृद्धि, इ' का लोप प्राजापत्+य प्राजापत्यः । देवाद इति (वा) देव शम से अपत्यादि प्रों मे पत्र, और मन परयर होते हैं । यज, में (य) मोर पत्र 'मे भरोप रहना है । वैग्यम् देवम् - देवस्य अपत्यम् (देव को सन्तान)-इस विरह में 'देव' से पत्र तया मत्र, प्रत्यय होते हैं । देव+य तथा देवम इस दशा में प्रादि एको वृद्धि' (ऐ) वपा द् से मागे वाले (म) का लोप' होकर देव्यम् तथा देवम् रूप होते हैं। १. यस्येति च ६।४।१४८ २..तद्विवचामादे: १५ ३.यस्येति च ILIY-.

२ उदिडे साधारणप्रत्ययाः (R) हिपष्टिलोपो याच ॥ बायः । वा) ईकरू च । ३३४ । किति च २१ किति तद्धिते चाचामादेरको वृद्धि स्याम । वाहीकः । बागोरजादिप्रसङ्ग यत् ॥गोरपत्यादि गायम । ३३५ । उत्सादिभ्योऽन ॥१.६६ पौत्स। इति साधारण प्रत्ययाः ॥१॥ बहिष रति (ar)-महिम दाद से मपश्यादि प्रों में यम् प्रत्यय हाता पौर टिम पति 'ग्' का लोप होता है। राहः - बहिवः (बाहर होने वाला) |-सविहमें हम राम से म प्रायर होकर 'इस्' (टिमशक) लोप हो जाता है । म टिमको स होकर वाह+प-बाल बनता है। कि पति-दिस इन पा में कप होना है और देशकासोर भी। २१. fruilt-REति परे होने पर करों में पारि को म होती है। पिव का है जिसमें कही इसमा होकर उसका मोर हो प्रया हो । रहरपय में सो रसमा होकर मोर हो जाता है. यह होक.हिप (हर होने मामा)-1 हि मे बहिरा पान १ कर हिम् +6 इस कामे हम् ) 1 मोर तरा frie से पारियो (पा) होगर बाहीक रूप बनवाए। गोजाबोनि (en)पर है l बिन (Int) citण दिस्य न होने पर गोबर से प म होता है। परभु-पो.स्मोको सम्मान दि)-इस ाि में को सस Patin है। यम र कोको ५५ समोर मारकर+t-m है। ११. Rance हिरो वा मैं २३२ संस्कृतम्याकरणे मथ अपत्याधिकारः ॥२॥ ४१७ । स्त्रीपुंसाभ्यो नस्ननो भवनात् धान्यानों भवन इत्यतः प्रागर्थेयु स्त्रीपु साभ्यां क्रमानअनमो स्तः स्त्रैणः पौंस्नः । मन प्रत्यय होता है। मौत्सः- उत्सस्य अपत्यम् पुमान (उत्स की पुरुष सन्तान)-- इस विग्रह में उत्त शब्द से उपयुक्त सूत्र के अनुसार अञ् प्रत्यय होता है । उत्स+4 इस अवस्था मै मादि स्वर उ को बुद्धिमौ) तथा अन्त्य प्रकार का लोप' होकर मौत्स+प्र-पौत्सः रूप बनता है। इति साधारण प्रत्ययाः॥१॥ अथ अपत्यप्रत्ययाः । स्त्री साम्यामिति-धान्यानो भवने' ५२१०१। इस मूत्र से पूर्व के मयों में स्त्री और पुस्-झाब्द से क्रम से म मोर स्नञ् प्रत्यय होते हैं । नन में न तथा स्नम् में स्न शेष रहता है। स्प्रेरणः स्त्रियाः मपत्यम्, स्त्रषु भवः, स्त्रीणां ममूहः मादि (स्त्री को सन्तान. स्त्रियों मे होने वाना, स्त्रियों का समुदाय मानि)-इन विग्रहों मे स्त्री शम से (मपत्यादि प्रों में) उपर्युक्त सूत्र से नञ् प्रत्यय होता है । +न इम अवस्था में मादि वृद्धि (ई को ऐ) तथा को ण होकर स्वणः प बनता है। पोस्न:-पुस. प्रपत्यादि (पुरुष का प्रपत्यादि)-पुस् पाद से स्तन प्रत्यय होकर पृस्+स्न इस दशा में पुस् के सकार का मोप' हो पाता है । माहिउ को वृद्धि (पो) पोस्नः । १. तदितेवचामादेः ॥२।११७॥ २. यस्येति च १४८) ३. संयोगान्तस्य लोपः चारा तद्धिमत्याधिकार ३३७ । तस्यापत्यम् ४ १७६२ षष्ठ्यन्तास्कृतसन्धे समर्थाद- पत्येऽर्थे उक्ता वयमाणाश्च प्रत्यय वा स्युः । ३३८ । पोर्गुण: ६४१४६॥ सवर्णान्तस्य भस्य गुणः स्यात् तद्धिते । उपगोरपस्यमोपगवः । पाश्वपत. । दैत्यः । श्रौत्सः । स्त्रैणः । दीनः । ३३६ । अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम् | अपत्यत्वेन विवक्षित पौत्रादि गोत्रसज्ञ स्यात् । ३४० । एको गोत्रे ४११६६३॥ गोत्रे एक एवापत्यप्रत्यय स्यात् । पगोर्गोत्रापत्यमोपगमः। २३७. तस्येति-पष्ठपन्त कृतसम्म समर्थ पद से अपत्य पर्थ में पहले कहे हए तथा मागे कहे जाने गले प्रत्यय विकल्प से होते है। २३८. बोरिति-जिसके अन्त में 'उ' वर्ण है ऐसे भसशक को गुण होता है, तदित प्रत्यय परे होने पर । पोरगव:--उपग: अपर पुमान् (उपग की पुरुष सन्तान)--यहाँ 'उपरा' पद से अपत्य मय में पए प्रत्यय होता है । उपगु+8 इस दशा मे मादि स्वर को वृद्धि (उको मौ) सपा अन्तिम '3' को ऊपर के मूत्रानुसार गुरु (उको परे) होकर पौरपो+इस दशा में को पद हो जाता है सपा पोरगवः सबनता है। 'प्रारपत:' इत्यादि कार पा चुके हैं। १३६. परत्यमिति-भय रूप में विवक्षित पौष मादिकी गोर संसा होती है। ३४.. एकाति-गोत्र पर्थ मे एक ही (मास्यवारक) प्रत्यय होता है। भोगा:- उपयोः गोशायम् (उपग को गोत्रापरय)- यह उपगु र से पण प्रत्यय होकर पूर्वमत मोरगवः सहोता है। 'एकोगोत्र" नियम . । संस्कृतभ्यारणे ३४१ । गर्गादिभ्यो यन ४११॥ गोत्रापत्ये । गर्गस्य गोत्रापत्यं गार्यः । वात्स्यः । ३४२ । योश्च २४६४. गोत्रे यद्यअन्तमअन्तं च तदुवा यवयोरेतयोलुक स्यात्तत्कृते बहुत्वे न तु स्त्रियाम् । गर्गाः । वरसाः । ३४३ । जीवति तु वंश्ये युवा ४.११६३॥ वंश्ये पित्रादौ जीवति पौवादेर्यदपत्य चतुर्थादि तय वसझमेव स्यान् । के कारण उपग की पाचवी, दसवी या सोवी मादि गोत्रापत्य को कहने के लिये भी 'मोपग' शम्द ही पर्याप्त होगा अन्य कोई प्रत्यय करने की मावस्या कता न होगी। ३४१. गर्गादिम्य इति-गर्ग प्रादि वादों से गोवापत्य वर्ष में यत्र प्रत्यय होता है। गाय:-गर्गस्य गोत्रापत्यम् (गर्ग के पौत्र मादि)- इस पर्व में गर्ग शाद से पत्र, प्रत्यय होता है । गगं+प' इस दशा में पादि भ को वृद्धि (मा) तथा मन्त्य प्रकार का लोप होकर 'गाग्मः, रूप बनता है। इसी प्रकार वत्सस्य गोत्रापत्यम् वात्स्यः । योरिति--गोत्र अयं में जो यत्र प्रत्यास्त मौर मञ् शग्द हों उनके अवयव या अन, का लोप हो जाता है उन भषों के बहुत्व मे, किन्तु स्त्रीलिङ्ग मे लोप नहीं होता। Of:- गार्य शब्द के बहुवनन में गर्गाः होता है। यहाँ उपयुक्त सूत्रानुसार गर्ग+यन (गाय) मे यत्र का लोप होता है। इस प्रकार गार्यः, गाग्यो', गर्माः रूप होंगे । इसी प्रकार वसाः । टिप्पणी--द्वितीय.दि विभक्तियों के पहुवचन में भी गोत्र प्रत्यय यत्र और मन्त्र का लोप हो जाता है तथा गर्गान इत्यादि रूप बनते हैं । ३४३. भोवतीति वंश्य अर्थात पिता इत्यादि के जीवित रहते पौर की जो प्रपत्य (प्रपौत्र) उसकी युवासंशा ही होती है । प्रत्ययान्त .

तद्विवेत्याधिकार:
३४४ । गोत्रा न्यस्त्रियाम१४ा यून्यपत्ये गोत्रप्रत्यया.
तादेव प्रत्यय: स्यात् । स्त्रियां तु न युवसझा।
३४५। यजियोश्च ४११०॥ गोत्रे यो यजिनौ तदन्तात्फक
स्यात् ।
३४६ । प्रायनेयोनीयिय: फढख छयां प्रत्ययादोनाम
।१।२। प्रत्ययादेः फस्य श्रायन्, दस्य एय, सत्य
छरप ईय,
घस्य इय् स्यु. । गर्गस्य युवापत्य गायिण । दातायणः ।
-
टिप्पणी-वश्य का अर्थ है वश मे हुरा. पूर्वज, पिता पितामह प्रादि।
पदि इनमे से कोई जीवित हो तो पौत्र (प्रथम गोवापस्य) की सन्तान को
वापरप कहा जाता है।
३४. गोधाविति-युवापत्य मर्थ में गोत्रप्रत्ययान्त से ही प्रत्यप होता है,
स्त्रीलिङ्ग मै तो युवा संशा होती नहीं।
२६५, अप्रिोडर-गोत्र मयं मे जो यम और हज प्रत्यय होते हैं, तदन्त
से (युवापत्य अयं मे) फक् प्रत्यय होता है। फल में 'क' का लोप होकर
फ पोप रहता है।
३४. अग्निति-प्रत्यय के मादि फकार को धामन, दार को एय
सार को ईन, कार को पार को इय हो जाता है ।
गाग्र्यापण.~गर्गस्य युवापत्यम् (गर्ग को युवापत्य)-- प्र में ऊपर के
नियम के अनुमार गोत्रप्रत्ययान्त 'गाय' सम्म से जिनोश्ष) फक् प्रत्यय
होता है। गाय + इस दशा में कार को भान होकर तथा गाय के
परय कर सोप होकर गाय + पाय+प--(न को ए) पर्यायणः ।
बिपी-यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि मपय या सन्न तीन प्रकार
की है -१-अनन्त रापत्य (१५), २-गोवापरय (ौत्रादि) -युवापरय
(बद प्रपोतमादिजिसके farm, पितामह मादि मे से कोई जीवित हो) ।
इनमें से पनन्तरापश्य में-गर्गस्य पनन्तराश्य गागिः (एन). गोत्रापश्य में-
१. यस्येति ॥ ६॥१४॥

२३८ চুলায় ३४७ । प्रत इन् HITEN अदन्तं यत्मातिपदिकं तस्मादिर स्थात् अपत्येऽय दाक्षिः। ३४८ । बाह्वादिभ्यम्च बाहरिः। औडुलोमिः। - गर्गस्य गोत्रापायं गायः (गर्गादिम्यो यब) सपा मुवापरय में गर्गस्य पुवापत्यम् गायर्यायण: (यरियोश्चेति फा)। बामायण:-क्षस्य युवापत्यम् (दक्ष की युवापत्य) यही दम से गोर प्रत्मय इन होकर 'दाक्षि' बनता है। दाक्षि से युवापत्य अर्थ में 'यनियोश्च' सत्र से फक् प्रत्यय होता है । दाक्षि+फ+दाक्षि+प्रायन+म-मन्स्य इकार का लोप, म कोण-दाक्षायणः । ३४७. मत इति-प्रदन्त शब्द से पपस्य अर्थ में इन प्रत्यय होता है। दाक्षि-दक्षस्यापत्यम् (दक्ष को सन्तान)--इस मषं में 'दक्ष' शब्द से इज. प्रत्यय हुभा । दक्ष +5-→मादि वृद्धि (प्र को मा), मन्त्य प्रकार का लोप-दाक्षिः। ३४८. वाह वादिभ्य इति-बाहु प्रादि शब्दों से मपत्य मर्ष में इन प्रत्यय होता है। थाहवि-बाहोरपत्यम् (बाहु की सन्तान)-इस मप में बाहु पम्प से उपयुक्त सूत्र के अनुमार इत्र,' प्रत्यय होता है। बाह+5 इस दशा में उ को गुण भो) तथा भव होकर 'बाहु+भव +इ-वाहविः' रूप होता है । पौडलोमिः- उडूनि (=नक्षत्राणि) इन सोमानि यस्य स बहलोमा (तारों के समान लोम वाला एक ऋषि) तस्य अपत्यम् (उडलोम की सन्तान)-इस भर्ष में 'बाई' प्रादि गण में होने के कारण 'उडलोमन् बाद 'इन' प्रत्यय होता है । उडुलोमन् +5 इस भाषा में प्रादि वृद्धि उ को मौ तथा अन् (टि) का लोप होकर "मोडलोमि" शब्द बनता है। १. मोगुणः ६।४।१४॥ २. नस्तद्धिते ६011

सदितेयाधिश
२५६
* () लोग्नोऽपत्ययेषु बहुवकारो वक्तव्यः । सानोमा (पाति-
गणोऽम।
३४६ । मनुष्यानन्तये विदादिभ्योऽन् ।।१६१.४॥ एभ्यो.
ऽभ । ये स्वत्रानुष यस्तभ्योऽपश्येऽन्यत्र तु गोत्र । विदस्य गोत्र येवः।
धैदौ । बिदाः । पुत्रस्यापत्य पोर, पौत्रीः पौ। एक दौहित्रादयः।
सोम इति माया पचन में मोमन १ सय
कहना चाहिए।
गलोमा-लोग्नः पपरयानि (अलोम को मात्रा)-~म पर्ष
में
आयुक्त मातिा के प्रतुमार वालोमन से रस होता है। मोमन्
+परस परषा अन् मोर होकर प्रपया हमर मे उपायः प
भारतियह ( मानि) पतिपरा है। जिन दो मे
म. (तदिन) प्रत्स्य दिखाई देता है कि प्रत्वरने वाला कोई मूत्र
(मियम) नहीं मिलता, उन्हें सहपादि गरल ये समझ पाए ।
vt.eीति - वि भादों से बोर वर्ष में पत्र प्राप
होगा विनुस को ऋषि नहीं है उनम (पनमार) पाप पर में
होता है।
:- मोरयम (
सिपि की पोश)--fer teen
पोपपत्र पर होगरnि+मपाल पारि
परिसपा कास्य पोरहोता है और मनता।
Cam-मोरया .ex nyu में मोर'"
र पारम् (पको नाम षि महो।
ताप मेंnt t+C-10. कर
१. सगे Pantn (४२)

में संस्कृतव्याकरणे ३५० । शिवादिभ्योऽण् ४१।११२। अपत्ये । शैकः । गाङ्गः । ३५१ । ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यम् Mr. ऋषिभ्य:- वासिष्ठः । वैश्व मित्रः । अन्यकेभ्य:-श्वाफरकः । वृष्णिभ्यः- वासुदेवः । कुरुभ्य:-नाकुलः। साहदेवः । पौत्रा:-यहाँ गोत्रापत्य मयं में पत्र प्रत्यय नहीं मतएव बहुमत पा का लोप नहीं होता। एवमिति-इसी प्रकार दुहितुः प्रास्यम् (पुत्री को सन्तान-दुहिर +ए+ ऋ को र (यम्) होकर दोहित् +7+-दोहितः इस्पादि। शिवाजीति-शिव भादि (गण) से भपरप भयं भए होता है। ३५० शब-शिवस्यापरयम् (शिव को सन्तान , ---इस पर्व में शि' से पण प्रत्यप होर 'शिर+म' इस दशा गं मादिवृद्धि को ऐ सपा प्रत्य '' का लोर हो जाता है। गाजाया. पपत्यम् (गजाको सम्तान)-राम में पता सरो 'म' प्रत्यय पन्य प्रापार का सोप (यस्येति प) होकर गाजः। ३५१, ऋष्यम्पति ऋषि प्रसिद्ध मिठ माहित अन्य पणि और गुरु येवगों के नाम है--नम मात्य अर्थ में पण प्रत्यय होता है। ऋषिष्यनि-ऋषिकेमामों है, जैसे-- सामिष्ठ - वमिष्टाय पायम (यमिष्ठ को मनान)--शविर यमिठ से प्रण प्रत्यय होकर भादिवशि (म को पा) तथा भार (ET) मोर होता है । सो प्रकार गिमिसापरयम्-मानित प्रापयनि-पाधक पानों में- मास्क:- वाकस्य पश्यम, सफल प्रयामा हम पम् प्रापर होर पापा:" बना है। अपि दक्षिणिक वालों से, मे--- बार-"मुदायापय" . ,

तद्धितेऽस्याधिकार
४१
(३५२ मातुरुत्संख्यासंभद्रपूर्वाया: ४५११११५॥ सहयादि.
पूर्वस्य मातृशब्दस्या उदादेशः स्यादण प्रत्ययश्च । द्वैमातुः । पाएमा
तुरः। सामातुर । भाद्रमातुरः।
३५३ । स्त्रीभ्यो ढक् ४११२01 स्त्रीप्रत्ययान्तेभ्यो ढक
स्यात् । वैनतेयः।
इससे भण् प्रत्यय होता है।
कुकम्प इति-कुरु वंशियों से, जैसे-
नाकुल:- नकुलस्यापत्यम्, दुश्वश मे होने से नकुल से प्रण प्रत्यय
होता है । इसी प्रकार साहदेवः ।
३५२. मातुरिति-(अपत्य भय मे)-संख्या, सम् मोर भद्र पूर्वक मात
द को उत् मादेश होता है मोर पण प्रत्यय ।
टिप-मातृ शब्द के अन्य स्वर अर्थात् ऋ को '' (उत्) होता
'मौर वह 'र' सहित होकर 'उर' होता है।'
द्वमातरः-द्वयोर्मावोरपत्ये पुमान् (दो मातायो की पुरुष सन्तान)-
पर्थ में दिपूर्वक मातृ वाद से प्रण प्रत्यय तथा ऋ को उर हो जाता है ।
+मात्+उ+7 इस दशा में प्रादि इ को बुद्धि (ऐ) होकर देमातुरः
प बनता है। इसी प्रकार 'पण्णा मातुणामपत्य पुमान्" पाएमातुरः ।
संमातुरपत्य पुमान्' सामांतुरः । मदमातुरपस्य पुमान् (पच्छी माता की
रूप सन्तान) भाद्रमातुरः।
३५३. स्त्रीम्य इडि-त्री प्रापपान्त शब्दों से अपत्य अर्थ में ढक
यय होता है।
ढक में क का (इ.सशा) लोप हो जाता है तथा ८ को एय' हो
जाता है।
१. प्रलोऽन्त्यस्य १३१॥श
२. उरण सर: ११११५१५
३. गणेशः।
४. कातिकेयः।
५. पायनेयोनीषियः फ्डमको प्ररपयादीनाम् ७१३२ (३४६)

२४२
संस्कृतव्याकरण
३५४ । कन्यायाः कनीन च ॥१॥१९६० चादण। कानीनो
व्यासः कर्णश्च।
३५५ । राजश्वशुराद्यत् ४ ११३15 (1) राज्ञो जातावे.
वेति वाच्यम।
३५६ । ये चाभावकमंगोः ४१६८ यादी तद्धिते परेऽन्
प्रकृत्या स्यान्न तु भावकर्मणोः । राजन्यः ।
वननेय:-विननाया: प्रपत्यं पुमान विनता की पुरुष सन्तान)-
इस पर्थ में स्त्रीप्रत्ययान्त (विनत +टाप) विनता शब्द से ढक प्रत्यय होता
है। द को एय तथा पाटि इ को वृद्धि' (ऐ) मोर मन्रय पा का लो'
होकर बनतेयः रूप होता है।
३५४. कन्याया इति-काया शब्द से अपत्य मषं में मण प्रत्यय
होता है और कन्या को कनीन प्रादेश हो जाता हैं।
कानोमः-कन्यायाः प्रपत्यं पुमान् (कम्या को पुरुष सन्तान)-
मर्थ में कन्या शब्द से पण प्रत्यय तया कनीन मादेश होकर कमा+म+
फनीन + (प्रादि वृद्धि) कानीन: रूप होता है।
३५५. राजेति-राजन् मोर श्वशुर शब्द से यत् प्रत्यय होता है,
प्रपस्य प्रथं में।
राम इति (वा)-राजन शब्द से जाति में ही (यत्) होता है. यह
कहना चाहिये । अर्थात् यत् प्रत्यय से बने हुए सन्द की वाय 'जाति'
होती है।
१५६. ये घेति -यकारादि तद्धित परे होने पर 'मन्' ज्यों का पों
(प्रकृया) रहता है किन्तु भाव मौर कर्म' में नहीं।
रामन्यः-राशोमस्पं जातिः (राजा को सन्तान क्षत्रिय जाति)-१७
म में राजन राम्द से यत् प्रत्यय होता है । राजन+य-राजन्यःक्षत्रिय
१. किति प ७२।११
२. यायेतिter
.

सदितेरयाधिकारः
२४३
तावेवेति किम् ?
३५७ । अन ६।४।१६॥ अन प्रकृत्या स्यादणि परे । राजनः ।
वर्यः।
३५८ । क्षत्राद्धः १११११३८ चलियः । जाताविस्येव ।
त्रिरत्यत्रा
टिप्पणी-राजन+य इस दहा में 'नस्तद्धिते' सूत्र से मन् (टि) का लोप
प्ति हा "ये पाभावकमणोः" से निषेध हुमा मोर मन् ज्यों का त्यों (प्रकरया)
रह गया।
माताविति-जाति में ही हो ऐसा क्यों कहा गया ? इसलिये कि जाति.
म अर्थ में यत् प्रत्यय नहीं होता। जैसे-रामनः ।
११७. मत् इति-पए प्रत्यय परे होने पर मन् ज्यों का स्यों रहता है।
राजनः-जोसत्यम् (राजा की सन्तान)-इस पर्थ में राजन् से
ए प्रत्यय होता है। रान+इस दशा में 'नस्तदिते' से मन् (दि)
Iोप प्राप्त होता है, किन्तु, 'पन् ३५७ के अनुसार धन का प्रति भाव
कर गन्+:--राजनः प होता है ।
श्वर्य:-गुरस्कारप पुमान् (वसुर को पुरुष सन्तान)--इस पर्व में
मुर से मत् प्रत्यय होता है । क्शुर+य-पत्य प्रकार का लोप पवमुर
-य--पशुपः।
१८. महादति- एम से प प्रत्यय होता है। (जाति मपं
MANE:-टामायापार्य जाति: (पत्र को मतान, बाति)-इस पर्ष में सत्र
मसे प प्रत्यय होरोस हो जाता है" .+मरयमा
पm+प-सधियः।
विति-दार
होता है पाए
के भनुमार
सोरा+r

२४४ संस्कृतम्याकरणे ३५६ । रेवत्यादिभ्यष्ठक् ॥१६ ३६० । ठस्येक: ७.३३५० अङ्गारपरस्य ठस्येकादेशः स्या रेवतिकः । ३६१ । जनपदशब्दात् क्षत्रियादन १३१६८। जनपद स्त्रियवाचकान्छब्दादा स्यादपत्ये। पान्चालः। (वा) क्षत्रियसमा ३५६. रेवत्यादिभ्यः इति-रेवती पादिशब्दों से प्रपत्य अपं में ठ- प्रत्यय होता है। ३६०. ठस्येति-पङ्ग संज्ञक से परे ट् को इक मादेश होता है। रेवतिक:-रेवत्याः अपत्यम पुमान् (रेवती को पुरुष सन्तान)-इम मथ में 'रेवती' शब्द से ठक् प्रत्यय होता है। ४ को इक् होकर रेवनी-+5 इस दशा मे मादि ए को वृद्धि'ऐ तथा अन्त्य ई का लोप होकर रैवत् +इक- रेवतिकः रूप बनता है। ३६१. जनपदेति-बो जनपदवाचक शब्द क्षत्रिय का भी वाचक हो उससे भत्र प्रत्यय होता है. अपत्य पर्थ में । पाञ्चाल:- पञ्चालानामपत्यं पुमान् (पञ्चालों को पुरुष सन्तान)-इस मयं में जनपदवाचक तथा क्षत्रियवाचक पञ्चाल सम्म से प्रत्र प्रत्यय होता है। पञ्चाल+7 इस दशा मे मादिवृद्धि (म को पा) तपा मन्त्य भ कामोप होकर पाञ्चालः रूप होता है। टिप्पणी-जनपद प्रदेश को कहते हैं। पन्नाल पारद एक पनपन का नाम है और उसकी निवासी एक क्षत्रिय जाति का भी। क्षत्रिय इति (वा)-जो जनपदवाचक शब्द समान रूप से क्षत्रिय वाचक भी हैं उनसे तस्य राजा (उसका राजा) इस पर्थ में अपत्य पर्थ के समान प्रत्यय होते हैं। पाञ्चाल:-पञ्चालान राजा (पञ्चामों का राजा)-इस पर्ष में भी.. १.किति प ७११ २. यस्येतिष Eli २४५ तांदतात्याधिकार शब्दाज्जनपदात्तस्य राजन्यपत्यवत् ।। पच्चालानां राजा पाञ्चालः *(वा) पूोरण वक्तव्यः ।। पौरवः । *(वा) पाण्डोड्यंए । पाएव्यः। ३६२ । कुरुनादिभ्यो ग्य: ।।११।१७२। कौरव्यः । नैवष्यः । अपस्य भ के समान भत्र प्रत्यय होकर पाञ्चाल: रूप बनता है। पूरोरिति (बा)--पूरु शब्द से राजा पर्व में प्रण प्रत्यय होता है यह कहना चाहिये। पौरप:--पूरूणां राजा (पूरु नामक जनपद का राजा)-इस अर्थ में 'पूरु' शम्द से पण प्रत्यय होता है। पूरु+म+मादिवृद्धि के को मो तपा पन्त के त को गुण' (२ को परे) होकर पौरो+प्र-पौरव+--पारयः रूप होता पाण्डोरिति (ar)-समान रूप से जनपद तथा क्षत्रियवाचक पाण्ड चन्द से राजा भर्ष में जमण प्रत्यय होता है। उधए' में इभौर एए का मोप हो जाता है। य शेष रहता है। हित होने के कारण इस प्रत्यय के परे होने पर टिका लोप होता है। पाया-पाहुना राजा (पाण्ड जनपद का राजा)-इस अर्थ में पाण्ड द से स्पण प्रत्यय होता है। पाम+उ (टि) का लोप होकर पाण्ड +म+पापा रूप बनता है। १२. पुनानिय इति समान रूप से बनाद तथा पश्यियापक कुछ शब्द और नकारादि शम्मों से प्य प्रस्थय होता है। औरायः-कुरूणाम अपत्यं पुमान् अथवा कुरुणा रात्रा (कुरणों की पुरुष सन्तान या कुस्मों का राजा)-इस पर्व में कुरु धम्म से व्य प्रत्यय होता है। कुरु+म+मारिद्धिव को पो तथा मन्तिम उ को गुणे (पो) कौरो+य +कौरव-प--कोरम्पः । १. प्रो. In २.१४॥ ३.दिवेष्वधामादेः॥११॥ .मोगुणः Mu

२४६
संस्कृतम्पारणे
३६३ ते तद्राजा: ।।१।१७। अमादयस्तद्राजसंज्ञाः स्युः
३६४ । तमाजस्य बहुपु तेनैवाऽस्त्रियाम् ।।४ २६ बहुवर्य
तद्राजस्य लुक स्यात् तदर्शकृते बहुरवे न तु स्त्रियाम्। रिकवः
पन्चालाः । इत्यादि।
३६५ । कम्बोजाल्लुक् ।।१७। अस्मासद्राजस्म लुक
मंपप्य:-निषघानाम् प्रपर पुमान् पपया निधाना राजा (निपुर
परय या निपप का राजा)-मकादि निषष राम जमपर शानियों का नाम
है। इससे प प्रत्यय होकर निषष+य-मारिधि नेप+ पर प्रकार का
मोरनापः का होता है।
Har-परमादि प्रश्पयों को ताज गंजा होती है।
१६४. साति-बहुवचन में तमाम प्रयय का लोप हो जाता है पर
बमार प्रत्यय के भयं का सत्य हो किन्तु स्त्रीला में नहीं ।
पवार:गणा रामानः (माओं के रामा)-'एका
(मारणा रागा) पागल के बयान में य:' होता है-g+.
(ऐसार) में गापन की विधा में प्रन का लोप हो जाता है।
पमाना:--पञ्चामानां रामानः (पचालों के रामा) पास्मान (पञ्या.
माना राणा) मापन में वास्यप (पर) का मुरू हो जाता है।
सम्बोमारिति-भागोब म से मशयय का मांस (म) हो जाता
:
freeी-पान और रिन में प्रत्यय । सुन करने के पी
पद
परिधिम दानों से सर होता है।
मोबागान रा (ोगों का रा)-ht:
नारदात् १ . प्रायर होता । मूत्र में 10
"है। पररा मोहोबा पर भी हो (ग)
रेर सम्बोधों पर।

कटिने रक्तामा स्यात् । कम्बोजः । कम्बोजी (1) कम्बोजादिभ्य इति वक्तव्यमा घोलः । शक फेरलः । यवनः । इत्यपत्याधिकारः ॥२॥ प्रय रक्ताद्ययंकाः ॥३॥ ३६६ तिन रतौं रागाव २१ अए स्यात् । रयतेऽने. मेति रागः पायेण रक्त पत्र कापायम। म्दोमारियन (41 पूत्र मे सम्बोज के स्थान पर) योगादिसे वानरयम का लुक होना है यह पहना पाहिमे । बोल:-पोलान राश (सोनों पा राणा)-इस भर्ष में पोल पद से राका पर्ष मे उपर कोहराता) होने मे राम पर अपम मा । उसका कार के वाकिसोर हो गया। इसी प्रकार पानी राम पमः। केरला-केरलाना राजा'-म अर्थ में भम् प्रत्यय हमा। उसका उपयुक्त वातिक से सोप हो गया। इसी प्रकार यनाना गया यवनः' पश्याधिशास॥२॥ पर रहामा:-तेन तिम् मादिर्य के प्रत्यय यहाँ से प्रारम्भ होते २६.ति-रिशेषापीर से (पाव) 'उमसे पाहुपा हम में पाए प्रत्यय होता है। यति-ससे रमा माता, परम को सपहा पाई। ति मूत्र में पाप है. गाने कोमा मोमा पोला मादि। पा-पायेग मात्रम् (गरपाय से रमा पा)-स प में चार से पत. दूर से वापस होता है।+R में पारिधि' ( पारा प्रत्यासोर होस्राय+4 -पि। १..पर माविमरयमाए १tun २. बारा (३) १.अमिषामा ११५ ४.पाnिtra T.८ संस्कृतम्याकरणे ३६७ । नक्षत्रेण युक्तः कालः ॥२३॥ अण स्यात • (वा) तिष्यपुष्ययोर्नक्षत्राणि यलोप इति वाच्यम् ॥ पुष्येण र पौपमहः । ३६८ । लुबविशेषे ।४ २।४। पूर्वेण विहितस्य लुप् स्यात् पनि दण्डात्मकस्य कालस्यावान्तरविशेपश्चेन्न गम्यते । अद्य पुष्यः । ३६६ । दृष्टं साम ।४।२७॥ तेनेत्येव । वसिष्ठेन दृष्टं वासिम साम। पुष्य पाद से भए ३६७. नक्षत्रणेति-नक्षत्र-विशेषवाचक शब्द से 'नक्षत्र से सम्बद्ध काला इस मयं में भए प्रत्यय होता है। तिष्येति (वा)-नक्षत्र-सम्बन्धी पण प्रत्यय परे होने पर (नश+पणि, तिष्य मोर पुष्य के य का लोप हो जाता है, यह कहना चाहिये । पौषम् (महः)-पुष्येण युक्तम् (पुष्यनक्षत्र सम्बन्धी दिन मर्याद पुष्यनक्षत्र में स्थित चन्द्रमा से युक्त)-इस विग्रह में उपयुक्त सूत्र से प्रत्यय होता है। पुष्य+म इस दशा में मादि वृद्धि (को भो) सपा मन्स प्रकार का लोप होकर 'पोष्य+म' इस भवस्था में ऊपर के वार्तिक से एका लोप होकर पोष'+पौषम् रूप बनता है। ३६८. सुविति-पूर्व सूत्र से कहे हुए (पण प्रत्यय) का लोप हो जाता है। यदि साठ दण्ड रूप काल के भवान्तर भेद (रात या दिन) का ज्ञान न हो। मा पृथ्यः-मच पुष्येण युक्तः कालः (माज पुष्यनक्षत्र से सम्बर पन्द्रमा मुक्त कास है)- यहाँ पुष्य नाम से पूर्व सूत्र से पण इमा। इस भूत्र से प्रण का सोर हो जाता है क्योंकि यहाँ रात या दिन पारि विशेष कास का पता नहीं - पसता! २६. दृष्टमिति-~*उसके द्वारा (तेन) देखा गया (ट) साम' इस पर्ष में हतीयान्त समपं से मन प्रत्यय होता है।

सदिते रक्ताद्यर्थकाः २४६ ३७० । वामदेवाड्यड्ड्यो ARIE वामदेवेन दृष्टं साम घामदेव्यमा ३७१। परिवृतो रथः ४४२११०१ अस्मिन्नर्थेऽ प्राययो भवति । वस्त्रेण परितो धास्त्रो रथः । - वासिष्ट शाम-वसिष्ठेन पृष्ट साम (वशिष्ठ द्वारा हष्ट साम)--इस विग्रह में वसिष्ठ शम्द से पण प्रत्यय होता है। पसिष्ठ+4 इस दशा में पादि दिमको मा तथा अन्त्य R का लोप होकर वासिष्ठ +4-वासिष्ठ- कासिष्ठम्। ३७०. वामदेवादिति--'उससे देखा गया साम' मयं में वामदेव राम से पत् तपास प्रत्यय होते हैं। उपतु और प दोनों में 'य' शेष रहता है। सफार (हित्) स्वर' के लिये लगाया गया है। वामदेश्यम् --वामदेवेन दृष्टं साम (पामदेव द्वारा देखा गया साम)-स विग्रह में वामदेव शाद से उपत् भोर उप प्रत्यय होकर वामदेव+मस दया में म (टि) का लोप हो आता है तथा वामदेय रूप बनता है। टिप्पणी-माम मात्र विशेष हैं, जिन ऋषियों ने मन्य दर्शन किया पर्याद जिन्हें मन्त्रों का गान हमारे मन्त्र उसके द्वारा देखे गये (हप्ट) कहलाते हैं। ३७१. परिवत इति-'उससे देका हुमा रस भर्ष में तृतीयान्व से भए प्रत्यप होता है। रास्त्रो रप:-वरण परिवृतः रथः (वस्त्र से दस हुमा रप]-RE १. तिपतिम् ॥१८इस रपत् काभ' स्वरित होता है, किन प काम मायुदात्तव ॥१३॥से उदात्त होता है। २.१.६४१४॥

२५. রমান্তে ३७२ तमोघृतममत्रेभ्यः ।।२।११ शरावे दतः शारा प्रोदनः। ३७३ । संस्कृतं भक्षा: ११॥ सप्तम्यन्तादम् स्यात्संकृतऽ= यत्संरकृतं भक्षाश्चेत्त ज्युः । भ्राष्ट्र पु संस्कृता भ्राष्ट्राः याः । ३७४ | साऽस्य देवता ४.२.२४॥ इन्द्रो देवता अरयेति ऐन्द्र विग्रह में वस्त्र शब्द से भण् प्रत्यय होता है । वस्त्र+म+वास्+म+वास्त्रों रपः। ३७२. तति-अमत्र का अर्थ है पात्र । 'तसमें उठाकर रक्खा हुमा' इस पर्थ में पारवाचक शब्द से भए प्रत्यय होता है । शाराव भोवन:-शरावे उद्धृतः (सराई में उठाया हुमा)- इस भर्ष में पाराव (सराई) धन्द से उपयुक्त सूत्र से पए प्रत्यय होता है । रा++ धारावः। ३७३. संस्कृतमिति–'समें संस्कृत' इस मयं में सप्तम्यन्त से मण प्रत्यय होता है, यदि वह संस्कृत पदार्थ भक्ष्य (साने की वस्तु) हो। भ्राष्ट्राः यथा:- भ्राष्ट्रपु संस्कृताः । (माड़ में संस्कार किये हुए या मने हुए)- इस पर्व में भ्राष्ट्र शब्द से उपयुक्त सूत्र से पण प्रत्यय होता है । भ्राष्ट्र +7 इस दशा में मादि वृद्धि'भा को पा मन्त्य म का सोप होकर 'प्राष्ट्र धन्द बनता है। ३७४. सास्पति-'वह इसका देवता है। इस पर्थ में प्रथमान्त देवतावाची शब्द से पण प्रत्यय होता है। १. मद्यपि भ्राष्ट्र के मादि में प्रा है, यहाँ वृद्धि की मावश्यकता नहीं पारि पन्यपल्लक्षणप्रवृत्तिः' अर्थात् मेघ के समान लक्षण प्रवृत्त होते हैं, इस न्यान से वृद्धि होती है। भाव यह है कि जैसे मेप कृषि योग्य भूमि पर बरसता है, ही पावश्यकता न होते हुए भी तरङ्गित सागर पर, इसी प्रकार नियम भी लक्ष्यानुसार मावश्यकता न होने पर भी सगते है । .

नद्धिते रक्ताधर्थकाः २५३ इविः । पाशुपतम् वाहपत्यम् । ३७५ । शुक्राद् धन् ४१२।२६। शुक्रियम. । ३७६ । सोमायण ४।२०सौम्यम् । ३७७ । वाय्वृतुपित्रुषसो यत् ४१२॥३१॥ ऐन्द्रं हवि.-इन्द्रो देवताऽस्य (इन्द्र है देवता इसका वह हवि)--इस पर्य मे इन्द्र पाद से उपयुक्त सूत्रानुसार प्रण प्रत्यय होता है । इन्द्र+म इस पशा में प्रादिवृद्धि इ को ऐ तथा मन्त्य 'म' का लोप होकर ऐन्द्र शन्द बनता है। हविः का विशेषण होने से नपुं० प्रथमैकवचन मे 'ऐन्द्रम् । टिप्पणी-देवता अर्थ में सभी प्रयोगो को हविस (नपु) का विशेषण करके नपु में दिया गया है। पाशुपतम्-पशपति, देवताऽस्य (पशुपति है देवता इसका)-इस अर्थ में (प्रश्वपत्यादिम्यश्च ४.१८४) अण् प्रत्यय, मादि वृद्धि, मन्स्य (क) का लोप होकर रूप बनता है। इसी प्रकार "बृहस्पतिः देवताऽस्य" वाहस्पत्यम् । (दिरादित्यादिस्यपत्युत्तरपदाण्यः १११८५) ३७५. शुवादिति-शुक्र शब्द से वह इसका देवता है' इस पर्थ में धन् प्रत्यय होता है। शुक्रियम्-शुक्रो देवताऽस्य (शुक्र है देवता इसका)-इस अर्थ में उपर्युक्त सूत्र से शुक्र से पन् प्रत्यय होता है। शुक्र+प यहाँ ५ को ' होकर शुक+ इ + म (क के भ का लोप)--शुक्रिय-शुक्रियम् । ३७६. सोमादिति-सोम शब्द से 'साश्य देवता' अर्थ में व्यण प्रत्यय होता है । ट्यण मे य शेष रहता है। सौम्यम्---सोमो देवताऽस्य (सोम है देवता इसका)-इस अयं में सोम पान से व्यए प्रपप होता है। सोम+य-मादि वृदि, अन्त्य मोप- सौम्यम् । ३७७. वाग्विति-वायु, ऋतु, पितृ, उपस् शब्दों से, साश्य देवता, अर्थ मे, यत् प्रत्यय होता है। १.भायनेयोनीषिप: १२० (२४६) २. यस्येति च II

संस्कृतव्याकरण
ऋतव्यम् ।
। रीङ ऋत:४२॥ अद्यकारे असावधातुके यका
च्वौ च परे ऋदन्ताङ्गस्य रीडादेशः स्यात् । 'यस्येति च'। पिश्यम्
उपस्यम् ।
३७८ (क)। पितृव्यमातुलमातामहपितामहाः ॥२॥१६
एते निपात्यन्ते । पितुर्धाता पितृव्यः । मातुर्धाता मातुलः ।
वायव्यम् -वायुदेवताऽस्य (वायु है देवता इसका)-इस अर्थ में 'वायु'
पाद से यत् प्रत्यय होता है। वायु+य' यहाँ उ को गुण' (मो) तपा मो
को मय मादेश' होकर वायव+य+यायध्यम स होता है।
० तप्यम्-ऋतृदेवताऽस्य (ऋतु है देवता इसका)- इस में भए
प्रत्यय होकर वायव्य के समान रूप होता है।
13. रोड इति-पद तथा सार्वधातुक से भिन्न पकार मार गिव प्रत्यय
परे रहने पर ऋदन्त मम कोरोन मादेवा होता है। (श को रोड़)।
विज्यम्-पितगे देवताऽग्य (पितर , देवता जिम यह हjि-ग
पर्थ में पितृ राम मे 'वारवतु० ३७७' मूत्र से पत् परयय होता है । ति+
इस दशा में "गोड ऋत." मे कोश होकर पित् रो+य तपा 'पस्येति 'ब'
से ईमासोर होकर ति+र+य-पिघ्य-विश्यम् रूप बनता है।
उपापम्-उपा: देववाश्य हविषः (उया है देवता इस हरि की)-इस
पपं मे यत् प्रत्यय होकर उप +य-उपाय- उपरपम् रूप होता है।
मिष्यति-पितृम्प, मानम, मातामह शिवामहइन पदों का निपातन
पिया जाता है।
হিসেব-নিরা” বাহিনীর প্রায় বিগপিছ ।
वही पदों के मिरर मूत्र में पा दिवाने है टममें पायामामार
अरपर दमा मादेश पारि बाते माते है यह निपावन' (निराप) का
पोल: unt
२.वामी विपाप IROLI
---

सहित रक्ताधर्थकाः . मातुः पिता मातामहः । पितुः पिता पितामहः । ३७६ । तस्य समूहः ।।२।३७काकानां समूहः काकम् । ३८० । भिक्षादिभ्योऽण ४।२।३८। भिक्षाणां समूहो भैक्षम् । गर्भिणीनां समूहो गाभिणम । इह वा) भस्याढे तद्धिते इति पुवद्भावे कृते- पितृभ्यः - पितोता (पिता का भाई, चाचा ताऊ)- इस प्रर्य मे पितृ राम्द से व्यत् प्रत्यय का निपातन किया गया है। पितृ+व्य-पितृष्यः । मातुल'-मातर्धाता (माता का भाई, मामा)- इस भर्थ में मातृ शन्द से निपालन द्वारा हलच प्रत्यय होता है। डलच मे से उल शेष रहता है- भात+उल इस दशा में ऋ (टि) का लोप'+मात् + उल+मातलः । मातामहः-मातुः पिता (माता का पिता, नाना)-इस अर्थ मे मातृ पर से डामहच प्रत्यप का निपातन किया गया है। मातृ+प्रामह--ऋ र) लोप-- मरत नामह-मातामहः । इसी प्रकार पितुः पिता (पिता का पता, बाबा) पितृ+डामहच् + पितामहः । ३७६. सस्पेति-षष्ठ्यन्त पद से (उसका) समूह अर्थ में प्रण प्रत्यय ता है। काका-काकानां समूहः (कौमों का समूह)-इस प्रथं में काक शब्द में ए प्रत्यय होता है काक+म+प्रादि वृद्धि मा को प्रा तथा अन्य म का प काम-काक-काका ३०. भिक्षादिभ्य इति-भिक्षा मादि शब्दो से, समूह मयं में, मण यय होता है। दिपणी-भिक्षा मादि शम्दों से. समूह अर्थ में, भवितहस्तिनोष्ठक २०४७ पादि सूत्रों से ठक् प्रादि प्रत्यय प्राप्त हुए, उन्हें बाधने के लिये १.टेः ६१४३॥

२५४ संस्कृतथ्याकरण ३८१। इनण्यनपत्ये ६४१६४/ अनपत्यार्थेऽणि परे इन्प्रकर- स्यात् । तेन 'नस्तद्धिते' इति दिलोपो न । युवतीनां समूहो यौवनम् प्रकृत सूत्र द्वारा 'पण' का विधान किया गया है। भक्षम्-भिक्षाणां समूहः (भिक्षा का समूह)-इस मपं में भिक्षा शब्द उपर्युक्त सूत्र द्वारा मण प्रत्यय होता है। भिक्षा+म-मादि वृद्धि ई' को तथा अन्त्य 'मा' का लोप होकर "भक्षम्' रूप बनता है। गाभिणम्-गभिगीनां समूहः (भिणियों का समूह)-इम मपं = गभिरणी शब्द से (भिक्षादिगण में होने के कारण) भए प्रत्यय होता है। गभिणी+म इस दशा में गर्मिणी को पुल्लिङ्ग के समान रूप (पुषदभाव) होकर तथा प्रादि वृद्धि होकर गाभिन्+म→माभिणम रूप होता है । इह." टिलोपो नेति-यहाँ गर्भिणी+मण इस अवस्था में "मस्याटे तद्धिते' (वा) (ढ भिन्न तक्षिप्त परे होने पर भसज्ञक को पुवाव होता है) इस यातिक से पुवभाव होकर 'गभिन्+म' इस सा में मस्तद्धिते से 'टि' का लोप प्राप्त हुमा किन्त- ३८१. इन् इति-पत्य अयं से भिन्न भरण परे होने पर 'इन्' प्रकृतिभाव रहता है। इस कारण नस्तद्धिते से टि का लाप नहीं होता। (क्योंकि यहाँ अपत्यार्थ से भिन्न अर्थात् समूह अर्थ मे प्रण है)। यौवनम् - युवतीनां समूहः (युवतियों का समूह) इस पर्व में युवति शब्द से (मिक्षादिभ्योऽण्) मण् प्रत्यय होने पर युवति+मण पदभार युवन+भ→मादि वृद्धि उ को मो तथा भन् को प्रकृतिभाव- पोवन - यौवनम् रूप होता है। टिप्पणी-युवति=युवन् +ति (यूनस्ति: ११७७) प्रक्ष: पदभार से युवति को युवन् हो जाता है। भाषा में 'योवतम्' शब्द का भी प्रयोग मिलता है वह यह प्रत्ययान्त युवत् सन्द से होप (स्त्री प्रत्यय) होकर बने हुए युक्ती शब्द से (पनुदात्तादेर ४) मा प्रत्यय होकर पुपदभार से . १. पन् १४१५८ (२५७) सदिते रक्तावर्षकाः २५५ ३८२ । ग्रामजनवाघुम्यस्तल ४५१४१॥ हलन्त त्रियाम । मामता । जनता । बन्धुत।। (वा) गजसहायाभ्यां चेति वक्तव्यम् । गजता। सहायता । ॐ (वा) प्रणः स. कतौ ।। अहोनः । होकर बनता है (सि. को० र २४५।। ३८२. पामेति -प्राम, जन भोर बन्धु पद से समूह पर्थ में तल प्रत्यय होता है। सलातमिति (लि.) हल प्ररथयान्त दाम्द स्त्रीसिन में होता है। इससे स्त्रीत्यय टाए जोड़ा जाता है। पामता-पामारणो समूहः (यामों का समूह)-इस पर्व में ग्राम पाम से तल प्ररपय होता है। ग्राम+त स्त्रीलिङ्ग होने के कारण टाए प्रस्थप होकर प्राम+त+मा+पामता शन्द बनता है। इसी प्रकार जनानां समूहः (जनों का समुदाय) बनता, मधूनां समूह. (बन्यमों का समूह) बन्धुता। पति (वा)-गज और सहाय यादों से भी समूह पर्थ में तल प्रत्यय करना चाहिए। गजानो ममूह (हाथियों का समूह)-गजता, सहायानां समूहः (सहायकों का समूह) सहायता पहाति-महन् राम से समूह पपं में प्रत्यय होता है यदि अतु (1) वाध्य हो। महीना पहा समूहेन साम्यः ऋः (दिनों के समूह में किया पाने वाला प:--सप में पहन दामसेस प्रत्यप होता है। पहन+समा में सोमादेश होकर पहन+न-पन् ।टि) सोप' प+ ईन- महीन-हीनः । १. पारनेयोनदि पासपी पसरादीनाम् ॥१॥२ (02t) २, नस्वnिtm९३०) सस्कृतव्याकर ३८३ । अचित्तहस्तिधेनोष्ठक् ४०२॥४॥ ३८४ | इसुसुक्तान्ताक: I इस उस उक्नान्तात्परय ठस्य कः स्यात् । सातु कम । हास्तिकम् । धेनुकम् । • ३८५ ! तदधोते तद्वेद || - २८. प्रचित्तेति-प्रचेतनवापी से तथा हस्ति प्रार घेनु पाम से समूह पर्ष में टक प्रत्यय होता है। १४. इसिति-जन ानों के मम्त में इम. उस्, उफ या तकार हो उनसे परे को क हो जाता है। टिपणी-- यहा तक प्रत्याहार है. जिसरी उ, ऋ.न का पहरा होता है। साकम+सनूनो समूः (गतों का समूह)-इस भर्ष में भारत- पानी मातुरो समूत्र पर्ष में ठक प्रत्यय होना है। साग के पास में उक (1) है पनः को क हो जाता है। गातु+:--प्राबिधिको मा सामरम्। हास्त्रिय-हस्तिना ममूहः हाथियों का समूह)-इस पर्व में हति से प्रत्यय होता है । हस्तिन्+ठा पहा टक्येक: 1.रोहको हो जाता है। हस्तिन +r-ri (दि) म' तथा माfrien ५को पाहा--माहारिनाम। दिलो-सिनीना ममम मप्र में भी भागने रोटर स्लिाम का होता है। भैर-धना ममा (तुषों का समूह)- सिद में पार कम में एक प्राय होता है। मं+-- म में होने के को नु+पारिदिए ऐ - पैनु+5-नुहम् । १८. सरीने रवि-हिचान से उमे पदमा1'उमे जाना १.तर २.१५(३१) तद्धिते रक्ताचर्यका: २५७ ३८६।न प्वाभ्या पदान्ताभ्यां पूर्वी तु ताभ्यामैच ७३३३ पदान्ताभ्यां यकारवकाराभ्यां परस्य न वृद्धिः किं तु ताभ्यां पूर्वी क्रमादैचावागमौ स्त । व्याकरणमधीते वेद वा वैयाकरणः । ३७ । क्रमादिभ्यो वुन् ४१२६६१९ क्रमकः । पदकः । शिक्षकः । मीमांसकः । इति रक्ताद्यर्यकाः ||३|| है' इस भयं मैं पण मादि प्रत्यय होते हैं । १५६.न ग्वाम्यामिति-पदान्त के यकार तथा वकार से भागे काले (पर) स्वर को वृद्धि नहीं होती, किन्तु उनसे पूर्व कमशः ऐच का मागम होता है भर्यात् य से पूर्व ऐ तथा व से पूर्व मौ का मागम होता है। याकरणः-व्याकरणमधीते वेद वा (व्याकरण को पढ़ता है। या जानता है)-इस विग्रह में व्याकरण शब्द से भरा प्रत्यय होता है। व्याकरण+मण यहाँ पादि वृद्धि प्राप्त होती है उसे वाधकर 'न स्वाभ्याम्' इत्यादि सूत्रानुसार य से पूर्व ऐ का मागम हो जाता है। व् +ऐ+या करण+ अन्य प्रकार कालोप-वैयाकरण→वैयाकरणः । टिप्पणी-व्याकरण-वि+माकरण, यहाँ वि उपमर्ग (पद) है, को म्हमा है. अतः य पदान्त माना जाता है तथा 'न खाम्याम्' से वृद्धिनिध मौर ऐच का पागम होता है ३६७. क्रमादिम्य इति-मपादिब्दों से 'उमे पडता है' या 'जानता है' मर्थ में वन प्रत्यय होता है। क्रमम:-ममधीते वेद छा (कम पाठ को पढ़ता है या जानता है)-इप्स विग्रह में कम शद से उपयुक्त सूत्रानुसार वन् प्रत्यय होता है। म+व+ को प्रक' होकर कम प्रक-अन्त्य प्रकार का लो' म+क कमक→ भकः। इसी प्रकार पदं, पक्षपाठमधीते वेद वा (पद पाठ को पढ़ता है या जानता है) पदक: शिक्ष:-शिक्षामधीते वेद गाशिक्षा को पदसा है या जानता है)-इस १. युवोरनाको १॥ २.यस्येति च ६४१४८।

मामाकरण मप नासुरमिता ॥४॥ ३८८ । तस्मिन्नस्तीति देशे माग्नि १.२०१७॥ उदुम्ब सपासमारो बोगरीराः। ३८६ । तेन निर्वतमा २६ पुसावन निघा नग कौशनी। पर्व में गिा+नु --fral+मक यभार का मोfor+क- शिक: मी प्रचारमीमामामापीने या मोमासरः । इतिहापाः॥३॥ अप पातुरधिका:- पानुषिक प्राय प्रारम्भ किए बाउ हैं। इस मारण मे पार मयों में प्ररपप रहे गये है मो से इसका नाम चातुरधिक है। ये पार पपं है-१.बह बातु इसमें है. २. उसके द्वारा बनाया गया .. उसका निवाम. ४. नसे दूर न होने वाला । प्रत्यगन्न सम्म देश-विसर पर्यात किमी स्थान का नाम होता है। ३८८. तामिनिति-'यह वस्तु इसमें है' इस पर्ष में अपमान्त पद से यथोक्त (पहे हुए तया मागे कहे जाने वामे) प्रत्यय होते है, यदि प्रत्ययान्त धम्म देश का नाम हो। प्रोग्यरो देश:-उदुम्बरा: सन्त्यस्मिन् देशे (गूलर हैं इस देश में)-इस विग्रह में उदुम्बर सम्म से मरण प्रत्यय होता है। उदुम्बर+मण प्रादि वृदिउ को पौ तथा अन्य प्रकार का नोर-मौदुगर+म+मोदुम्बरः । देशविशेष । नाम है। ३६. सेनेति-- उसने बसाया (नासा)' इस प्रथं में तृतीयान्त बाद से यपोक्त प्रत्यय होते हैं। कौशाम्बी-कुशाग्वेन निवत्ता नगरी (कुशाम्ब के द्वारा बसाई हुई १. यस्येति च ६४१४८॥

- २११ तो वापिस ३६० | तस्य निवासः ४२२६६॥ शिवीनां निवासी शेरः । ३६१। मदूरभवश्च ॥२।७०। विदिशाया अदूरभवं नगर परिराम। ३६२ । जनपद लुप् ४।२।०१। जनपद पाये पारपिंकाय सुप ग्यात् । २६३ । सुपि युक्तवद्वपक्रिय चने १॥२॥५१॥ लपि मति नियस्लिावगने मः। पप्पालानां नियामो जन- 1) -म वियहसाब सेभए प्रत्यय होता है। पुण+0- रय पारस सोपा सराफोरर बोपार (6) पसरपारी। ति-उमा निगम' समर्ष में पहन पोन पाहिजे है। -दिमा निमो देसः (लिकि मोपदों निरास -महि aft पर प्रारम होता है। fer+mufere. भर लोर होकर पं+:। १.पुती-सारमा रमहा माल मे पोत (पर aft) प्रायो। सिप-मिरियागपूरमगरम् (विाि नाम पानामाग पCिE से पत्प्रापर होलिका -efereो ऐतदापमा सरर होife+ सम्। १२. AN-मारतीय महामतिर ARTr-INरा गुर (मर) होने ). मिन) NR हो।

संस्कृतम्याकरणे पदः पन्चालाः । कुरवः । अङ्गाः। वङ्गाः। कलिङ्गाः । ३६४ । वरणादिभ्यश्च ४।०२। अगलपदार्थ प्रारम्भः । वरणानामदूरभवं नगरं वरणाः । टिप्पणी-सूत्र में युक्त शब्द का अर्थ है-प्रकृति (जिससे . प्रत्यय जाता है) और 'व्यक्ति' का पर्य है-लिङ्ग (पुलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग मादि) पञ्चाता:-पञ्चालानां निवासो जनपदः (पञ्चाल लोगों का नि जनपद)--इस अर्थ में पञ्चाल शब्द से तस्य निवामः' मयं में ए - होता है। उनका निवास एक जनपद है भतः 'जनपदे लुप्' से प्रण का हो जाता है। अब 'पञ्चाल' शब्द एक जनपद का नाम है इसलिए उससे । वचन प्राप्त होता है। किन्तु 'लुपि युक्तवद् व्यक्तिवचने' के अनुसार म प्रकृति क्षत्रियवाचक पञ्चाल शब्द (जो पुल्लिङ्ग तथा बहुवचन है) के स- पुल्लिङ्ग तथा बहुवचन में होता है । इसी प्रकार-कुरूणां निवासो जनपदः (कुरु लोगों का निवास जना कुरवः । पङ्गानां निवासो जनपद: मङ्गाः । वङ्गानां निवासो जनपदः पना कलिङ्गानां निवासो जनपदः कलिङ्गाः । टिप्पणी-पञ्चाल मादि जनपदों के नाम सदा पुस्लिङ्ग मोर बहुवर में ही प्रयुक्त होते हैं। ३६४, परणादिम्य इति-वरणा मादि शमों से परे चातुरपिक प्ररर का लोग होता है। भजनेति-जनपद से भिन्न भयं में लोप करने के लिए वह मूत्र बनाय गया है (जनपद में तो पहले सूत्र से ही लोप हो जाता है)। घणा:-वरणानामदूरभवं नगरम् (वरणा से दूर न होने वाला नार- इरा विग्रह में 'मदूरमव' मयं में मण् प्ररपर होता है वरणाम यह उपमुक्त सूत्र मे भए का लोप हो जाता है तथा प्रकृति के समान सिंजर होकर वरणा: स्प बनता है। mind-

तहिते चतुरपिकाः
३६५ । कुमुदन डवेतसेभ्यो ड्मतुप् ४।२।८
३६६ | झयः ८।२।१०॥
भयन्तामतोमस्य वः । कुमुद्वान् । नडवान् ।
३६७ । मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः सारा
मवर्णावान्तान्मवर्णवर्णोधाच्च यवादिवजितापरण्य मतो.
नायवः ।
१६५. कुमुति-मुद, ना, वेतस सब्दों से हमतुप प्रत्यय होता है।
चातुरपिक।
टिप्पणी-मतुप में मत् चुप रहता है, द्वित् होने से इसके परे होने पर
टिका लोप हो जाता है।
३६६. भया-झयम्त से परे 'मतु'के म को पहो जाता है।
टिप्पणी-भय प्रत्याहार है, जिसके पातपंत वर्गों के प्रथम-दितीय, तृतीय
सपा चतुप वणं पाते हैं। 'झम्' का कोई वर्ण जिसके मात में होता है यह
पाम्म झरस्त कहलाता है जैसे कुमुद।
पुमुवान्-कुमुदाः सन्ति मस्मिन् देये (मुद होते हैं इस देश में)-स
अपं में बुमूद पद से इमतृप प्रत्यय होता है। मुमुद+हमतुप (fe) का
लोप होकर कुमुद् शम्द भयन्त (एकान्त) हो जाता है । तर "मय." से
मा के म को होकर 'मुददत् शन्द बनाता है। इससे प्रथमा, एकवचन मे
मृत्वान् ।
मान-रान्ति पस्मिन् देशे [ना (नापुल का नासत) होते हैं
इस देश मे]-इस प्रषं में नर+रमतु++मत+नवत्+नावान
(पूर्व)।
* *१९७. पादाति--सि शहरे मन में मार या प्रकार हो तथा
जिसमे मम्तिमय से पूर्व महार या प्रकार हो (मवारमात्'। उससे परे
१.टे: १४१४३
३. मलोया पूर्व उपधा रा॥
२. मूत्र के 'मात्' धावणं हा पदम्यहमर्थ है। मारा
मापनकोसमाहार: तमा मात्' ।

२६२ संस्कृतम्याकरणे वेतवान् । ६३८ । नडशादाइड्वलच ४ाशा नड़वनः। शाद्वनः। ३६६ । शिखाया वलच् ४।२।८९ शिखावनः। इति चातुरोथकाः ॥ मतु के म को हो जाता है। बेतस्थान-वैतसाः सन्ति मस्मिन् देशे (वेत होते हैं इस देश में)- विण्ह में वेतस शाम से मनुर प्रत्यय होता है। येता+इमर--( मोर वेतन+मत् प प्रापा में मन्तिम पणं से पूर्व प्रकार होने के का (मरणोप) मतु के स्कोव हो जाता है येतस्मत-वेतवान् । २९८. मोति-ना और शाद शद रो चातुरपिक बस पर सवान में बन पोर रहता है। रित होने से इसके परे रहने पर हित भारम-ना: सन्ति पस्मिन् देतो-ना+दवस टि (4) am +बत-मारम.. पापन- सति पस्मिन् देशे (ही पाम है इस देश में)-1 सिह में पा+सलर (म)ोर--पासनः । पूर्वषन् । ५.शिवान-शिवा राम भाषिक बल प्रत्यय होगा। Faren-पिमाः सनि पस्मिन् देने (गिमा सयान में}-- पि में शिक्षा एम वम प्राय होकर बनता है। इनिबारपिका --- - HOM- तद्धिते शैषिका: अथ शपिका: ॥ ४०० । शेषे ४ारा अपत्यादिचतुरयन्तादन्योऽर्थः शेषरतत्राणादयः स्युः । धनुषा गृह्यते चापं रूपम् श्रावणः शब्दः। औपनिषदः पुरुषः । पदि पिष्टा दार्पदाः सक्तकः । चतुभिरहते चातुरं शकटम । चतुर्दश्यां दृश्यते चातुर्दशं रतः। तस्य विकारः' इत्यत प्राक शेषाधिकारः । प्रष पौषिका:-यहाँ से शषिक प्रत्यय भारम्भ होते हैं। शेष भयों में होने वाले प्र पय शैषिक कहलाते हैं । ४०० शेरे इति-अपत्य अयं से लेकर चातुरर्षिक तक के अपों से मन्य मर्ष शेष है, उस शेष भयं) में प्राणु भादि प्रत्यय होते हैं। चाक्षप रूपम-चक्षुपा गृह्यते (चक्षु से जिसका ग्रहण किया जाता है)- इस विग्रह में चक्षुः शब्द से मण प्रत्यय होता है। चक्षप्+भण् मादि वृद्धि (पको पा) चाक्षुप्+म+चाक्षुषम् । यावरण: शब्द:--अवर्णन गृह्यते (श्रवण (कान) से जिसका ग्रहण किया जाता है।-थवरण+पण्यावरण----श्रावणः। मोपनिषतः पुरुषः-उपनिषदभिः प्रतिपादित: (उपनिषदों के द्वारा जिसका प्रतिपादन किया गया है)-इस भयं में उपनिषद् छन्द से पए प्रत्यय होता है। उपनिषद+पए मादि वृद्धि उ को भी मोपनिपदः । बाबा सक्तवा-ददि पिष्टाः (पत्पर पर पिसे हुए सत्त):-इस मय प्रण प्रत्यय होता है। दृपद्+भए भादि बुद्धि को भार दापद+प-दाद, प्रयमा बहु० मे दादाः । चातुरंपाकटम-चतुभिः उहते (जो पार से ले जाया जाता है)- इस पर्थ में चतुर् शन से पए प्रत्यय होकर चतुर+म पादि वृद्धिः चातुरम् । धातुईया-चतुर्दश्यां दृश्यते (जो चतुर्दशो में दिखलाई देता है)-- इस पर्व में चतुर्दशी शब्द से भए प्रत्यय होकर चतुर्दशी+पए--मादि दिपा भन्त्य ईका लोप होकर पातुर्दश+प्रपातुर्दश। रसः का विशेषण होने ये नपुं. एकवदन में चातुर्दशम् । -- दुपद शब्द से - संस्कृतम्याकरण ४०१ । राष्ट्रावारपाराद्घखो ४।२।३। पाभ्यां क्रमाद् घखो स्तः शेपे । राष्ट्रजातादिः राष्ट्रियः, रपारीणः। (वा) अवारपाराद्विगृहीतादपि विपरीताच्चेति व्यम् ।। प्रवारीण: पारीणः । पारावारोए.। इह प्रकृतिविशेषात् धार युट्युलन्ताः प्रत्यया उड्यन्ते, तेषां बातादयोऽयविशेषाः समयविभात वापरते। सस्येति-तस्य विकारः' ४१३१३४। इस मूत्र से पहले शेफ भधिकार है। ४०१. राष्ट्रीति-राष्ट्र मोर मवारपार शब्द से नमः भोर प्रत्यय होते हैं। राष्ट्रियः-राष्ट्र जातः, राष्ट्र भवः मादि (राष्ट्र में पैदा मादि) जात मादि पर्यों में राष्ट्र शम्द से घ प्रत्यय होता है। राष्ट्र++ इय् तथा राष्ट्र के मन्तिम 'म' का लोप होकर राष्ट्र-- इयराष्ट्रियः । मवारपारीण:-अवारपारं गतः (धार पार गया हुभा)-इस प मवारपार शब्द से 'ख' प्रत्यय होता है। भवारपार+स→ख को ईन मा तथा मन्त्य प्रकार का लोप होकर प्रवारपार + ईन--(न को ) भवः पारीणः । प्रबारेति (वा)-प्रवारपार शन से, पृषक किये जाने पर (भवार में पार) तथा उलट देने पर (पार+मवारपारावार) भी स प्रत्यय होता। यह कहना चाहिये। प्रवारीण:-पवारे जातः (वार में हुमा)-प्रवार शाम से स प्रत्य होकर मवार+स-प्रवार+ईन-मवारीणः । इसी प्रकार पारे जात:- पारीणः (पार+ख), पारावारे जातः'-पारावारीणः पारवार+स)। इहेति-यहाँ प्रकृति विशेष (राष्ट्र मादि) से 'ध' प्रादि (राष्ट्रादा पारा घसौ) से लेकर व्य व्य न (सायं विर० ४।३।२३) पर्यन्त प्ररथया गये हैं, उनके जात (तत्र जात: १३२५) इत्यादि मयं तथा समर्थ विभक्तिया

तहिते पिकाः
२६५
४०२। मामाद् यखनी ४.२६४
प्राम्य.प्रामीण।
•४०३ । नद्यादिभ्यो ढक ४।२।६७/
नादेयम् । माहेयम । वाराणसेयम ।
(सप्तम्यन्त मादि) मागे कही जायेंगी। इस प्रकार प्रत्यय-विधायक सपा
मर्यादिविधायक सूत्रों की एकवाक्यता से सूत्रों का प्रपं किया जाता है, यह
भाव है।
४०२. पामा पति-पाम शब्द से दोपिक प्रों में य, खजु प्रयप
प्राम्यः-ग्राम जातः ग्रामे भवः मादि (ग्राम में पैदा हुमा इत्यादि)-
इन पी में ग्राम शुदसे म प्रत्यय होता है। प्राम+य-अन्त्य प्रकार का
लोप-याम्यः ।
प्रामीण:-प्रामे जात: मादिप्रयं मे ग्राम शब्द से खन। प्राम+
खस को ईन तथा ग्राम के अन्त्य प्रकार का लोप होकर प्राम+ ईन,
(१ कोण) ग्रामीण।
४.३. नद्याविन्य इति-मदी मादि शब्दों से जातादि प्रों में ढक
प्रत्यय होता है।
नादेयम् --नयां जातम् मादि (नदी में हुमा प्रादि)-~इन पर्थो में
नदी शब्द से उपयुक्त सूत्र से ढक् प्रत्यय होता है। नदी+ढक-८ को एय
भादेश होकर नदी+एय इस भवस्था में ढक् प्रत्यय के कित होने से मादि
दिर (म को मा) । तब अन्त्य ई का लोपर होकर 'नादेयम्' रूप बनता है।
इसी प्रकार-मह्यां जातम् भादि (पृथ्वी पर हुमा इत्यादि) माहेयम, मही
+टक→मही+एय-माहेयम् । वाराणस्या जातम् प्रादि (वाराणसी में
हुमा इत्यादि) वाराणसेयम, वाराणसी-ढक-वाराणसी+एप-वाराणस्
+एम-वाराणसेयम् ।
१. किति च |
२. यस्येति च ॥१४॥

संस्कृतम्माकरणे
४०४ । दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यक् ४।२।६८!
दाक्षिणात्यः । पाश्चात्यः। पौरस्त्यः ।
४०५ । थुप्रागपागुदप्रतीचो यत् ४।२।१०१॥
दिव्यम्। प्राध्यम । अपाच्यम् । दोच्यम् । प्रतीच्यम् ।
.
४.४. दक्षिणेति-दक्षिणा पश्चात् और पुरा इन पदों से
प्रत्यय होता है (शैषिक)।
दाक्षिणात्य:-दक्षिणा जात: मादि (दक्षिण में उत्पन हुमायादि).
इस विग्रह में दक्षिणा दाम से उपयुक्त सूत्रानुसार त्या प्रत्यय होता है
दक्षिणा+पक --कित परे होने के कारण प्रादि वृद्धि 'म' को मामा
खात्यः।
टिप्पणी-पह! 'दक्षिणादा। इस सूत्र के अनुसार बन
दक्षिण+माक्षिणा पद लिया जाता है, तो पम्पय. (म.क.,
माएर दक्षिा अत:, दक्षिणा मयः यह वियह होगामी प्रकार पापा
भषः (पीछे या पश्चिम में हमा) पाश्मात्य: । पुरो भा: पहले या पूर्व में
पा)-पुरण+स्वापौरम्त्यः ।
४.१. प्रागति-रिव, प्रा. मात्र वा मौरीप मोरे
भावादि पर्षी म यत् प्रत्यय होता है।
रिपम्-बिगानम् मादि (स्वर्ग में हमा प्रा)-यहाँ frror
से गत मूत्रानुसार प्रसर होता है। दिव+t-fruम् ।
इसी प्रकार प्रारयम-माया भरं प्राग भर पा (पूर्व में होने वाला)
आन्।
पाय-राध्या ग भईया (yि for में हमा) itt

तद्धिते शेषिकाः २६० ४०६ । मव्ययात्यप् ४.२०१४। (वा) अमेहक्वतसिनेभ्य एव ।।अमात्यः।हत्यः। क्वत्यः। ततस्त्यः। तत्रत्यः। . (वा) स्यन्नेभुव इति वक्तव्यम् ॥ नित्यः । ४०७ । वृद्धियस्याचामादिस्तवृद्धम् ॥१॥७३॥ यस्य समु- दायस्याचा मध्ये श्रादि द्धिस्तद् वृद्धसज्ञ स्यात् । चवीष्यम् - उदीच्या जात, भव वा (उत्तर दिशा मे हुमा), उदीच +यत् । प्रतीप-प्रतीच्या जात भवं वा (पश्चिम दिशा में हुमा)-प्रतीच् +यत्-प्रतीच्यम् । ४०६. पव्ययाद इति-व्यय से दोषिक स्यप् प्रत्यय होता है । त्यप में स्प वेष रहता है। पमेहेति (41)-प्रमा (सह, साथ) इह (यहाँ), रव (कहाँ) सस् प्रत्ययान्त (ततः, यतः मादि) और प्रत्ययान्त (सन मादि) मध्ययों से ही स्यप् प्रत्यय होता है। ममात्य:-प्रमा (मह) भवः (साथ रहने वाला, भन्धी)-इस विग्रह मे भमा शब्द से त्यप् प्रत्यय होता है। प्रमा+त्यप् +मा+त्य+अमात्यः । इसी प्रकार यह भवः (यहाँ होने वाला)-इहरयः, का भवः (कहाँ होने पाला प्रावि) वायः, तत्र भवः (वा होने वाला) तत्रयः और ततः भागतः (वहाँ से पाया हमा) ततात्यः । त्यनेरिति (at)-नि उपसर्ग से घर पर्थ में स्यप् प्रत्यय होता है यह पहना चाहिये। नित्यः (स्थिर)--यहाँ नि उपसर्ग से प्रव अर्थ में त्यप् प्रत्यय होकर नि +स्यप-नित्सनिस्यः । ४०७. तिरितिजिस समुदाय के स्वरों मची) में मादि स्वर वृद्धि संशा (मा, ऐ, भौ) होता है उस समुदाय (धन्द) को संका होती है।

२६८ संस्कृतम्याकरण ४०८ सत्यदादीनि च १३१७४. युद्धसंशानि स्युः। ४०६ । वृद्धाच्छ: ४।२।११४१ शालीय. । मालीयः । तदीयः । - (वा) वा नामधेयस्य वृद्धसंज्ञा वक्तन्या । देवदत्तीयः । देवदत्तः ४१० । गहादिभ्यश्च ११२।१३८। गहीयः । ४०८. यद् इति-त्य मादि को भी वृद्धसंज्ञा होती है । ४०६. वृताविति-वृद्धसंज्ञक (शन्नों) से छ प्रत्यय होता है, पोषिक प्रों मे । शालीय:-शालायां जाता, भवो वा (शाला में हुमा इत्यादि)--यहाँ 'शाला' शब्द वृद्धसंशक है, क्योंकि इसका मादि मन् 'मा' है जिसकी वृद्धि संज्ञा, की गई है। इसी हेतु शाला शब्द से छ प्रत्यय हो जाता है । शाला+ छ-छ को ईप तथा अन्त्य प्रा' का लोप शाल+ईय-पालीयः। इसी प्रकार-मालायां जातः मादि मालीयः। तोपः-तस्य मयम् (उसका यह)-इस मयं में तद् राम से 'एदान्धः' से छ प्रत्यय होता है ।त्यदादि में होने से उद् शन्द की वृद्ध संशा है)। +छ+त+ईय-तदीयः। वा नामधेयस्येति (at)-किसी व्यक्ति के नाम को विकल्प से वृद्धसंशा कहनी चाहिये। परतोपः, वदतः-देवदत्तस्य मयम् (देवदत्त का)--यह देवदत्त भक्ति का नाम है इसलिये जब इसकी वृद्ध संज्ञा हो जाती है तो छ प्रत्यय होकर देवदत+छ–देवदत्त + ईय माकार लोप --देवदत्तीयः रूप होता है। जब वृदसला नहीं होती तो पण प्रत्यय होकर देवदत्त+मण - प्रादि वृद्धिए को ऐ देवदत्तः। ४१०. गहारिम्य इति-यह प्रादि सम्मों से भी छ प्रत्यय होता है, पावितों में । गहोय:-गहः देशविशेषः, तत्र जातः पादि (गह नाम के देश में १. वृदिगदंच ११ २. मायनेयोनीयिप: - तदिते षिकाः २६६ ४११ । युष्मदस्मदोरन्यतरस्या बन च ॥३१॥ चाच्छः । पोऽण। युवयोयुप्माकं वाऽयं युष्मदीयः । अस्मदीयः । ४१२ । तस्मिन्नरिण च युस्माकास्माको १२।२। युष्मदस्म- पोरेतारादेशी स्तः खभि अणि च । योप्माकोणः । प्रारमाफीनः । गौमाः । पारमाकः। उत्तम मा धादि-इस विग्रह मे बह शाम से घ प्रत्यय होता है। गह+ --गह+प प्रकारसोप गह,+ ईय%-गहीयः । ४५१. पुष्माति-युष्मद् भस्मद् राम से विकल्प रो खन्न प्रत्यप हाता पारिक प में। पारिति-५ (पोर) गहने से ५ प्रत्यय भी होता है । तथा (विकल्प से होने के कारण) पक्ष मे पए प्रत्यय होता है। रिपती-पृष्मद, परम पद की यदादीनि च से पट संज्ञा होकर '' प्राप्त पा गयुक्त पूत्र से विरल से सा सपा पभ में पए हुमा । इस प्रभार नसे छ. सबसपा भए ये तोन प्रत्यय (तपिक पर्षों में) होते हैं । पुरमय: - युषयो. युष्माक वायम् (तुम दोनों का या तुम सब का यह) -इस रिपह में पाम राम से परस्य होता है। युष्मद् +1+युप्मद +-मशेयः । सो प्रार-पादयोः पस्माकंा प्रयम् (हम दोनों पापामसरा पामतीयः। २. निपप्प और परमो युप्मा मोर पस्मारु मादेश होगसम.प्रत्यय और पए प्रत्यर के परे रहने पर। पौरमाल-पुण्योः दुष्माचा परम्-युम+मत्र, गुस्मद् का पुष्मा मारा कोन होकर दुपार+to+पादिवृष्टि ३ को पो, Enमोर-पोमा+नो एगोमागीणः । मोर+स-पाामाकोनः। मा:-दुप्प+पए-पुष्पाको दुप्मा पारेर होपर युमा+ वारिधिमार मोर दोप्पासो र माम+ए- २७० संस्कृतव्याकरणे ४१३ । तवकममकावेकवचने ४३३३३॥ एकार्यवाचिनोयुष्मद- स्मदोस्तवकममको स्तः खनि अणि च । तावकीनः, तावकः । मामकीनः, मामकः । छे तु- ४१४ । प्रत्ययोत्तरपदयोश्च २८ मपर्यन्तयोरेकार्यवा. चिनोस्त्वमौ स्तः प्रत्यये उत्तरपदे च परतः । त्वदीयः । मदीयः । त्वत्पुत्रः । मरपुत्रः । ४१३. तवकेति-एकार्यवाचक युष्मद् भौर भस्मद् को तवक और ममक मादेश होते हैं खा और अरा प्रत्यय परे रहने पर। सावकीन., तावक---- तव अयम् (तेरा)-युष्मद् शब्द से खन तथा भए । एकार्थवाचक होने से युष्मद् को 'तवक' मादेश होकर तवक+खन-मादि- पृद्धि भ को मा तथा अन्त्य भ का लोप होकर तावक् +ईन-तावकीनः । तपा तवक+प्रण- तावकः । इसी प्रकार मम भयम् (मेरा)-प्रस्मद् + सत्र ममक+ईन: मामकीनः । अस्मद्+मण्-ममक+मणमामः । थे तु=छ प्रत्यय परे होने पर तो (एकवचन में, मागे कहे हुए कार्य ४१५. प्रत्ययोत्तरपदयोरिति- एकार्थवाचक युष्मद् भस्मद् के म पर्यन्त (भाग) को स्व मौर म भादेश होते हैं, प्रत्यय मौर उत्तरपद परे रहने पर। सदीय:-तव प्रयम् (तेरा)-एकवाची युष्मद् शब्द से छ प्रत्यय होकर युष्मद्+घ इस दशा मे ऊपर के सूत्रानुसार म पर्यन्त भाग (युष्म् ) को व तथा छ को ईप हो जाता है । स्वद+ ईय-विदीयः । इसी प्रकार मम ममम् (मेरा) अस्मद+छ-मद् + ईय-मदीयः । वापुत्र:-तद पुत्र. (तेरा पुत्र) इस विग्रह में षष्ठी तत्पुरुष समान होता हसि+पुत्र सु-यहाँ विक्ति लोप होकर 'प्रत्ययोत्तरपदसोप' हे राम (उत्तरपद) परे रहते युष्मद के म पर्यन्त को स्व होकर स्वापुर.'

४१५ । मध्मान्म: ४।३।। मध्यमः। ४१६ । कालान् ४।३।११। कालवाचिभ्यष्ठम स्यात् । कालिकम् । मासिकम । सांवत्सरि कम्। (वा) अव्ययानां भभात्रे दिलोपः ॥ सायंप्रतिकः पौन पुनिकः। ४१७ । प्रावृप एण्यः ४१३॥१७॥ प्रावृपेण्यः। बनता है। इसी प्रकार मम पुषः। 'मत्पुनः'। (ये दोनों समास-विषि उक्षाहरण है क्योंकि उत्तरपद समास मे ही सम्भव है)। ४१५. मध्यारिति-मध्य शब्द से शैषिक प्रयों में 'म' प्रत्यय होता है मध्यम-मध्ये भवः (मध्य में होने वाला)-मप+म-मध्यमः । ४१६. कालादिति-कालावाची से शंषिक मयों में ठञ् प्रत्यय होता। कालिकमकाले जातम् पादि (काल में हुमा प्रादि}-काल शरद ठा प्रत्यय होकर, 3 को इक प्रादेश' हो जाता है। काल+इक-+मा वृद्धि, मध्य प्रकार का लोप होकर कालिकः । इसी प्रकार मासे बात भवं या मासिकम्, संवत्सरे (वर्ष में) भवमू-स इसरिकम् । प्रव्यमानामिति (वा)-- संशा होने पर सर्वत्र, मव्यय को टि (म मद सहित अग्रिम भाग) का लोप होता है। सामंप्रातिक.-- सायंप्रातः भवः (साय प्रौर प्रातः होने वाला) प्रातर+→सायात +हा→मादिदिः, ऊपर के वार्तिक से पर (टि) सोर सायंप्रातिकः । इसी प्रकार पुनः पुनर्भवः (बार बार होने या पुनः पुनर+ उपादिवृद्धि तथा टिलोप होकर धौनः धुनिकः । १७. प्रायुध इति-प्रावृष राम से बॉपिक पयों मे एण्य प्र होता है। १.ठस्थेक: जरा २. दिवध्वपापादे: रासस

२७२
सस्कृतम्याहरणे
४१८ । सायंचिरंप्राल्लेप्रगेऽश्ययेभ्यष्टय, उन लो तु च
४॥३।२३। सायमित्यादिभ्यश्चतुर्थोऽव्ययेभ्यश्च कालवाचिम्यष्ट्यु
ट्य लो सस्तयोस्तुट च । सायन्तनम् । चिरन्तनम् । प्रागेऽनयोरे-
दन्तस्वं निपात्यते । प्राह तनम् । दोषातनम् ।
प्रावृषेण्य -प्रापि भवः (वर्षा ऋतु में होने वाला)-प्राव + एण्य-
प्रावृषेण्यः ।
४१८ सायमिति -- सायम् चिरम्, प्राहे, प्रगे तथा कालवाची मव्ययों से
व्य और ट्य ल प्रत्यय होते हैं और उनको तुट का मागम होता है ।
टिप्पणी-ट्य पौर व्यल प्रत्ययों में यु रोप रहता है। इन दोनों के
स्वर में भेद है। यु को 'युवोरनाको' से 'अन्' होकर, 'मन् के मादि' में तुट
का मागम होता है । तुट में त् शेष रहता है मतः प्रत्यय का रूप 'तन' हो
जाता है।
सायन्तनम्-साये भवम् । (सायंकाल को होने वाला) साय शाम पत्र
प्रत्ययान्त है । उससे ट्य तथा ट्य ल् प्रत्यय होकर तथा प्रत्ययों के साथ उसका
निपातनात् मकारान्त रूप होकर सायम् +ट्य →यु को मन सायम+मन+
तुद का मागम-सायम् +त्+मन+सायन्तनम् इसी प्रकार चिरे भवम'
(देर में होने वाला) विरन्तनम् ।
टिप्पणी-सायम् मोर चिरम् शन्द भव्यय भी हैं उनसे तो मध्यय होने
के कारण ही ट्य ट्य ल प्रत्यय हो जाते हैं ।
माह सनम्-प्राह जातम् पादि । (पूर्वाह्न काल में उत्पन्न हुमा)-प्राह
सद से ट्य, य ल प्रत्यय तथा निपातन से एकारान्तता होकर प्राई +च्य.
(ट्य स)+को मन तथा तुट मागम-प्राहे+त+मन+प्रातनम् ।
प्रगेतनम्-प्रगे जातम् (प्रातःकाल उत्पन्न हुमा)-प्रगे+य. (व्यल)--
प्रगे+त+पन-प्रगेतनम् ।
शोषासनम्-दोषा भवम् (रात को होने वाला)-कासवाची. भम्पय
१. प्रायन्तौ स्तिो ॥४॥

है
४१६ । तत्र जातः ।४३१२५
सप्तमीसमर्थाजात इत्यर्थे ऽणादयो घादयश्च स्युः। उ.प्ने
जातः सौनः । उसे जात श्रौत्सः । राष्ट्र जातो राष्ट्रियः । अचार-
पारे जातः अवारपारीणः । इत्यादि।
४२० ।प्रावृपष्ठप ४१३॥२६॥
एण्यापवादः । प्रावृषिकः।
दोका (रात्रि। से ट्यु, टयुल प्रत्यय होकर दोषा+यु-→ यु को पन तथा तुर
का पागम--दोषा+त मन→दोषातनम् ।
४१६.ति-सप्तम्यरत समर्प से 'उत्पन्न हुपा' या 'हमा' इस मर्च
में पए मादि पोर प मादि प्रापय होते हैं ।
पिणी-जैसा कि ऊपर (राष्ट्रावार०" सूत्र के नीचे) कहा गया
है शषिक प्रों में से एक मर्थ का तथा समर्प विभक्ति का निर्देशक यह सूत्र
• एक मथं निर्देशक सूत्र से दूसरे प्रथं निर्देशक सूत्र तक जो प्रत्यय कहे
जायेगे वे पर वाले विशेष मयं मे ही होते हैं । जैसे 'वत्र जात:' से मागे
प्रायभवः ४२१. 'वक के प्रत्यय तत्र जातः' मधे में होते है।
फोन:-सूने जातः (सन नामक देश में पैदा हुमा) स.न+
पण-मादि वृद्धि उ को भो, अन्त्य प का सोप सोनम, सीनः ।
प्रोत्सः-उसे जातः (म्रोत मे उत्पन्न हुमा, - यहाँ उत्पादिम्पो
१८६ से भञ् प्रत्यय होता है । उत्स+म→मौत्तः, पूर्ववत् ।
राष्ट्रियः, भवारपारोण की सिद्धि पहले भा धुकी है।
४२०. शब इति-प्राव राम से हुमा जात) पर्थ में टप् प्रत्यय
होता है । टप में ठष रहता है।
यह ४ प्ररपय ('प्रावृष एण्यः, से है (ए) एप प्रत्यय का (बात पर्षे
में) बाषक है।
प्रावृषिक:-प्रावृषि बाठः (वर्षा तु मै उपस हा)-प्रा+
उप-प्राद+8→ठ को कर होकर शर्षिक:।
१.रस्येकः ॥१०॥

सस्कृतव्याकरण ४२१ । प्रायभव:४४ तत्येव । मध्ने प्रायेण बाहुल्येन भवति स्रोप्नः । ४२२ । सम्भूते। H सघ्ने सम्भवति सौधनः। ४२३ । कोशाड्ढन ॥३२॥ कौशेयं वखना ४२४ । तत्र भवः ॥३॥५३॥ स्रघ्ने भवः सोध्नः । श्रौत्सः । राष्ट्रियः । ४२१. सायमन इति-सप्तम्यन्त समय से प्रायभावः (मषिकतर होने बाला) मथं में मण् प्रादि तथा प पादि प्रत्यय होते हैं । यौनः-सघ्ने प्रायेण (बाहुल्येन) भवति (स.प्न देश में अधिकता से होता है)-सन प्रण। ४२२. सम्भूते इति-सप्तम्यन्त समर्थ शब्द से सम्भूत (होना सम्भव है प्रर्य में प्रणमादि तथा घ मादि प्रत्यय होते हैं । सोऽन - सध्ने सम्भवति (सम देश में जिसको सम्भावना है)-- सध्ने+पए। ४.३. कोशाद इति - सम्भूत अर्थ में कोश शब्द से ढन् प्रत्यय होता है। कौशेय पात्रम्-कोशे सम्भूतम् 'कोश में सम्भव प्रर्थात् कृमिकोश में होने वाला, रेशम या रेशमी)-इस विग्रह में कोश द से इन प्रत्यय होकर को+द+ह को एप तथा मन्त्य प्रकार का लोप होकर भादि वृद्धि कौशेय-कौशेयम् । टिप्पणी-वस्तुतः (कोशस्य विकारः इति) विकार में ढन होना उचित है जैसा कि वातिक है--विकारे कोशाइडन सम्भूले हानुपपत्तिः । ४३४. तत्र भव इति-सप्तम्यन्त से भव (विद्यमान, होने वासा) 'मयं में प्रण प्रादि तपाप मादिप्रस्मय होते हैं। सप्नेः भवः सोध्नः (स.प्न तद्धिते शंपिका: २७५ ४२५ । दिगादिभ्यो यत् ११३५४ दिश्यम । वग्यम। ४२६ । शरीरावयवाच्च ४१३॥५५॥ दन्त्यम् । कण्ठ्यम् । बा) अध्यात्मादेष्ठबिध्यते । अध्यात्म भवमाध्यात्मिकम् । ४२७ । अनुशतिकादीनां च ७३.५०। एषामुभयपदवृद्धिः . देश मे होने वाला)-सघ्न+पए । इसी प्रकार उत्से भव: प्रोत्सः । राष्ट्र भवः राष्ट्रियः । ४२५. विगादिम्य इति-दिश् मादि शब्दों से 'तत्र भवः' अर्थ मे यत् प्रत्यय होता है। विश्यम्-दिशि भवम् (दिशा में होने वाला)-यत्-दिश्यम् । इसी प्रकार वर्ग भवम् (वर्ग या समूह में होने वाला) पय॑म् (वर्ग शब्द दिगादि गण में है। ४२६. शरीरेति-शारीर के अवयववाची शब्दों से भी 'तत्र भवः' इम पर्य में यत् प्रत्यय होता है। दन्त्यम-दन्तेषु भवम् (दांतों में होने वाला)-इस अर्थ में गरीरा- वयवाची दन्त शब्द से यत् प्रत्यय होकर दन्त+यत्→अन्त्य प्रकार का लोग-दन्त्यम् । इसी प्रकार 'कण्ठे भवम्' (कण्ठ में होने वाला) कण्ठ+ यत् + कण्ठयम्। अध्यात्मादेरिति (वा)-मध्यात्म प्रादि शब्दो से तत्र भव:' प्रषं मे ठञ् प्रत्यय इष्ट है। भाप्यात्मिकम-अध्यात्म भवम् (पात्मा में होने वाला)-इस विग्रह में अध्यात्म शब्द से ठञ् प्रत्यय होता है। मध्यात्म+ठन्→ठकार को +इक,-माध्यास्किम् । १२७. मनुशतिकेति-मनुशतिक प्रादि समस्त पदों के पूर्वपद तथा उत्तरपद दोनों (उभयपद) को पादि वृद्धि होती है जित, पित् पौर वित् २७, संस्कृतम्याकरणे स्यात् मिति णिति किति च । श्राधिदैविकम् । श्राविभौतिकम । लौकिकम् । पारलौकिकम । प्राकृतिगणोऽयम्। ४२८ । जिह्वामूलागुलेश्छः ४१३६६२। जिह्वामूनीयम अङ्ग लोयम् । । तद्धित प्रत्यय परे होने पर। प्राधिर्वविकम् -भषिदेवं भवम् (देवों में होने वाला)-अघिदेव+द- -→ढकार को इक पाघिदेव+इक→मनुशतिक मादि में पाठ होने उभयपद वृद्धि (मधि के म को मा तथा देव के ए को ऐ) प्राषिदेव+ अन्त्य प्रकार का लोप-माधिदैविकम् । इसी प्रकार- प्राधिभौतिकम् -मधिभूतं भवम् (पृथिवी मादि भूतों में होने वाला पधिभूत+ठञ् । टिप्पणी-पात्मनि इति मध्यारमम, देवे इति भषिदेवम्, भूते इति मधिभूतम्-ये शब्द विभक्त्यर्थ में अध्ययीभाव समास होकर बने हैं । ऐहलौकिकम्-इह लोके भवम् (इस लोक में होने वाला)-४६ लोक+ठन । पारलौकिकम् -परलोके भवम् (परलोक में होने वाला)--परलोक +ठञ्। प्राकृतिगण इति- यह मनुशतिक मादि गण माकृति गण है । भाव यह है कि जिन प्रयोगों में उभयपद वृद्धि देखी जाती है किन्तु किमी नियम (सूत्र) से नहीं की गई. उनको भनुशतिकादि गण मैं समझना चाहिए। ४२८. मिहामूलैति-जिह्वामूल तथा मङ्ग.लि शब्द से 'तत्र भवः' अर्थ में छ प्रत्यय होता है। मिहामूलीयम्-जिह्वामूले भवम् (जिह्वामूल में होने वासा)- यहाँ जिह्वामूस पाब्द से छ प्रत्यय होकर जितामूल+छ→छ को ई जिह्वामून +ईय+परयम का मोप-जिह्वामूलीयः । मग लोयम्-मङ्गल्या भवम् (मङ्ग.लि में रहने वाली, मंगूठी)- तद्धितेश षिका: २७७ - ४२६ । वर्गान्ताच्च ४१३१६३। कवर्गीयम् । ४३० । तत मागतः ४.३१७४१ नादागतः सोमः । ४३१ । ठगायस्थानेभ्यः ११३७५। शुल्कशालाया आगतः शोकशालिकः । ४३२ । विद्यायोनिसम्बन्धेभ्यो वुन् ४।३१७७। औपाध्यायकः । पैतामहकः। पङ्ग लि+छ+भङ्गलि +ई+भन्स्य इकार का लोप मङ्गलोयम् । ४२६. साविति-जिस शब्द के अन्त में वर्ग शब्द हो उससे भी 'तत्र भवः'पर्य मे छ प्रत्यय होता है। कवर्गीयम-कवर्गे भवम् (कवर्ग में होने वाला)-कवर्ग+छ+कवर्ग +य-कवर्गीयम्। ४३..तत इतिपञ्चम्यन्त समर्ष से पागतः (पापा हुमा)स अपं मे मरण पादितथा घ मादि प्रत्यर होते हैं। जैसे--सना मागतः (सन देश से माया हमा) सन+मए-सोनः । ४३१. निति-मायस्थानवाची शब्दों से 'तत प्रागतः' (वहाँ से माया हुमा) इस अर्थ में उक् प्रत्यय होता है। कोकशालिक:-शुलाशालाया मागत: (कर ग्रहण के स्थान से माया हमा)-इस विग्रह में शुल्कशाला शद से ठक प्रत्यय होता है। शुलासाला+ ठक-ठकार को इक, प्राविधि तथा पन्त्य पाकार का सोर होकर शोल- पालिकः। ४३२. विति-विधा तथा रक्त (योनि) के सम्बन्धवाची पानों से 'त पागतः' इस पर्व में प्रपप होता है। भोपाध्यायक:-पाध्यायाद मागतः (उपाध्याय से भाया हुधा)- वियत सम्बन्धकाचा पायाय शब्द से वा प्रत्यय होता है। कोप मादि (3) को वृद्धि (भौ) या अन्य प्रकार का सोर होकर मौपाध्यायकः । १. युदोरनाको १ २७ संस्कृतम्याकरणे ४३३ । हेतुमनुष्येभ्योऽन्यतरस्यां रूप्य: ४।३।८। समान गतं समरूप्यम पक्षे गहादित्वाच्छः, समीयम् । विषमीयम् । देवद रूप्यम । देवदत्तम। ४३४ । मयट् च ४।३।२। मममयम । देवदत्तमयम् । ४३५ । प्रभवति ॥३॥८३। हिमवतः प्रभवति हेमवती गङ्ग . पैतामहक:-पितामहाद मागतः (पितामह से माया हमा)-' सम्बन्धवाची पितामह शब्द से व प्रत्यय होता । पितामह+वत्र- पैतामहकः । ४३३. हेतुमनुष्येम्य इति-हेतर्मों से तथा मनुष्यों (के नामों) से र मागतः मर्य में विका से रूप्य प्रत्यय होता है। समहप्यम-समाद् भागतम् (सम हेतु से प्राया हुमा)-सम+रूप्य- समरूप्यम् । इसी प्रकार विषमरूप्यम् । समीयम्-रूप्य प्रत्यय विकल्प से होता है, जहां यह नहीं होता वह '(पक्ष में) 'गहादिभ्यश्च ४२१३८॥ से छ प्रत्यय होता है । सम+छ-सम- ईय-समीयम् । इसी प्रकार विषमीयम् । देवदत्तहप्यम्-देवदत्ताद मागतम् (देवदत्त से भाया हुमा)-मनु के नामवाची देवदत्त शब्द से रूप्य प्रत्यय होकर बनता है। पक्ष में देवदत्त + मण-दैवत्तम् । ४३४. मयट चेति-हेतु तथा मनुष्यों के नामों) से सत भागत मण मयट प्रत्यय भी होता है । (मयट में मय शेष रहता है) सममयम्-सम+मय-सममयम् । इसी प्रकार देवदत्तमयम् । ४३५. प्रभवति-प्रभवति का अर्थ है प्रकट होता है, निकलता है। पञ्चम्यन्त से वत: प्रभवति' वहाँ प्रकट होता है अर्थ में पण मादि पोरन मादि प्रत्यय होते हैं। हेमवती गङ्गा-हिमवतः प्रभवति (हिमालय से निकलती है। इस । विग्रह में हिमवद शम्द से भम् प्रत्यय होता है । हिमपद -कम- --

तद्धिते शषिकाः
२०६
४३६ । तद्गच्छति पथिदूतयो: ४।३।०६। स.नं गच्छति
सोध्नः पन्या दूतो वा।
४३७ । अभिनिष्कामति द्वारम ४१३८६॥ मनमभिगच्छति
सौधन काम्यकुब्जद्वारमा
४३८ । अधिकृत्य कृते ग्रन्थे १३७ शारीरकमधिकृत्य कृतो
मन्थः शारीरकीयः।
पादिवृद्धिको ऐ, हेमवर-+-+हैमवत-स्पी प्रत्यय ही होकर मन्त्य भ
का लोप हैमवत् +६-हैमवती।
६. सद गायोति-'उसको जाता है' (सद् गच्छति)-इस अर्थ में
द्वितीयान्त से मए मादि प्रत्यय होते हैं. यदि जाने वाला मार्ग या दूत
होता है।
लोग्नः-सगच्छति, पथा: दूसो वा (अ.प्न देश को जाने वाला मार्ग
या दूत मन+प्रण।
४३७. अभिनिष्कामतीति--'उसकी भोर निकलता है' (सद् अभिनिष्क्षा.
मति)-इस मर्य में द्वितीयान्त से भए मादि प्रत्यय होते हैं, यदि निकलने
पाला द्वार होता है।
सोनम् - सध्नम् अभिनिष्कामसि, काग्यकुम्बद्वारम् (सन देश की
पोर निकलने वाला कन्नौज का द्वार-सौन कहलाता है) रूपसिदि पहले के
समान है।
४३.षिकापेति-'उप्त विषय को लेकर अन्य बनाया' इस मयं में
द्वितीयान्त से पण मादि प्रत्यय होते हैं।
पारोरकीयः- शारीरकम् मधिकृत्य तो प्रन्यः (जीवात्मा को विषय
करके रचा मा पन्ध)-इस विषह में शारीरक पाम से 'वृद्धाभ्यः सेय
प्रत्यय होता है । शारीरक+छ+शारोफ+ईय-धारोकीयः ।
टिप्पणी-पारोरमेव शरीरकम् (स्वार्थ मे क) तत्र भष:-धारीत:
जीवारमा । अथवा शरीरपा : 'तस्पेरम्पए प्रत्यप होकर वार्ष
मैं 'क' होता है।
,

२८० संस्कृतम्याकरणे ४४६ । सोऽस्य निवास: ४.३८ स.नो निवासोऽस्य सौन- ४४० । तेन प्रोक्तम् ११.१३पाणिनिना पोर पाणिनीय ४४१ । तस्येदम् ॥३॥१२॥ सपगोरिदम् औपगवम् । इति शैषिकाः ॥शा प्रथ विकारार्थकाः ॥६॥ ४४२ । तस्य विकार: ४।३।१३* (वा) मरमनो विका ४३६. सोस्येति-"वह इसका निवास स्थान है।" इस पर्व में प्रथमा से पण मादि प्रत्यय होते है। खोप्न:-सनो निवासोश्य (म.प्न देश है निवास इसका)-मनन पण. ४..तेति-"उसके द्वारा प्रोत" इस प्रर्ष में तृतीयात से परामा प्रत्यय होते हैं। पालिनीयम-पाणिनिना प्रोक्तम् (पाणिनि द्वारा प्रमाफिया इमा)- विष्ह में पाणिनि दाम्म में वृक्षाच्छः' से ध प्रत्यय होता है। पाणिनि+ पालिन+ti-मनय रहार का लोप पाणि+ई-पाणिनीय व्याकरणम्। १.तस्पैति-'म का यह इस प्रर्य में पायात से पए मालिसा मौषमम्-उपमोः इस (ग्गमु का यह है-इस विशद में बम अप्रत्यय होगा। सिटि पहले के समान है। felm अपरिहारायंका:-यही में रिसारायं प्रयय पार हो। m.वनि-रसम्म समर्थ पद में शिकारपर्थ में ---- तदिवे विकारार्थकाः २८१ हिलोपो वक्तव्यः । अश्मनो विकारः श्राश्मः । भास्मन मार्तिकः । ४४३ | अवयवे च प्राण्योपधिवक्षेभ्यः १३१३५॥ चाद्वि. कारे। मयूरस्यावयवो विकारो वा मायूरः । मौर्व काण्ड मरम था। पैप्पलम। टिप्पणी-विकार का अर्थ है- प्रकृति (कारण) का दूसरी भवस्था को प्राप्त हो जाना; जैसे मिट्टी घट के रूप में परिणत होती है तो घट मिट्टी का प्रश्मन इति (पा)--विकारार्थक प्रत्यय परे होने पर प्रश्मन् शब्द को "टि' का लोप होता है यह कहना चाहिये । माश्म:-पश्मनो विकार: (पाषाण का विकार या पत्थर का बना हुपा)- इस विग्रह भे भपमन् शब्द हे विकारायं मे का प्रत्यय होता है। भश्मन + पर--मादिबुद्धि को मा तथा ऊपर के वार्तिक से पन (टि, का सोप होकर माश्म् +म+पाश्मः । भास्मन:-मस्मनो विकारः (राख का विकार)--मस्मन् +पण यही "नस्तमिते' से हि लोप प्राप्त होता है किन्तु 'भन्' से प्रकृतिभाव हो जाता है। पादिवृद्धि को भा होकर-मास्ममः । मतिक.-मृत्तिकायाः विकारः (मिट्टी का विकार, मिट्टी का बना हुमा'- मृत्तिका+भरा+गादिवृद्धि ऋो भार तपा मनम भा का लोप मात्तिक (घटः)। ४४३. अवयवे पेति-प्राणी, पोपषि तथा वृक्षवाचक पदों से भचपण मर्थ में पए मादि प्रत्यय होते हैं। वादिति-धकार कहने से विकार प्रर्ष में भी। भापुर:-मयूरस्य अषयको विकारो वा (मोर का पङ्ग या विकार)- मोर दाद प्राणिवाचक है। इससे पण प्रत्यय होकर मयूर+पण-पादिद्धि, पन्य परामोप-मायूर+म-मायूर। मौर्वम्-पूर्वायाः अवयवः (काम) विकारो (माम) वा (मूर्वा नाम की भोपषि का छाना मा भाम)-पूर्वा+प्रण+मामिद्धि को प्रो तथा भमय मा का सोर-मो-14+मौर्यम् । ..

१८२ संस्कृतम्याकरणे ४४४ । मयड्वतयो पायामभक्ष्याच्छादनयोः ४१ प्रकृतिमात्राग्मयड़ वा स्यात विकारावयवयोः । अश्ममयम। पाश्मन अमत्येत्यादि किम् ? मौद्ग: सूपः कापसमाच्छादनम् । पंपातम्-पिप्पलस्य अवयवः विकारोवा (पीपत का मन या विकार)- पिप्पल+मण-प्रादिवृद्धि, मन्त्य प्रकार का लोप पंप्पलम् । ४४. महिति-प्रकृति मात्र से विकार और प्रवयव मर्थ मैं विकल्प .मयट प्रत्यय होता है, भाषा में, यदि वह अवयव या विकार भक्य (साय अथवा मान्छादन (वस्त्र न हो। टिप्पणी-प्रकृति उसे कहते है जिसका अवयव या विकार होता है । मूत्र में 'भाषायाम्' (भाषा में) कहरे से वेद में मयट नहीं होता। यहां संस्कृत के भाषा कहा गया है, इससे विदित होता है कि पाणिनि के काल में संस्कृत बोलचाल की भाषा या लोक भाषा थी। अश्मययम, माश्मनम्-मश्मनः अवयवो विकारोवा, इस प्रर्य में भश्मन् शम्द से मपट् प्रत्यय होकर प्रश्मन् +मय-1 लोप' प्रश्ममयम् । पक्ष में भश्मन+मण-मादिवृद्धि पाश्मनम् । दिप्पणी-काशिकाकार के मतानुसार प्रश्मन् का विकार पर्थ में टि लोप विकल्प से होता है (टिलोप: पाक्षिकः, काशिका ४४१३४)-प्रतः भए प्रत्यय होने पर विकार में प्राश्मम, माश्मनम्, अवयव मयं में भाश्मनम् का होगा। ममध्येति-मरुप पौर माच्छादन से भिन्न होना चाहिये । यह क्यों कहा गया ? इसलिये कि मौद्गः सूपः' कार्पासमाच्छादनम्' में मयट प्रत्यप नहीं होता। मौदग: सूपः-मुद्गाना विकारः सूपः (मूग की दाल)-यहाँ सूप (दाल) भक्ष्य है। अत: मयट प्रत्यय नहीं होता है अपितु मुद्ग शम्म से पण प्रत्यय होता है । मुद्ग+पण→ मौद्ग+क→मौद्गः । १. सोप:प्रातिपदिकान्तस्य दाराव । २. बिल्वादिम्पोऽण VIRAL ४४५ । नित्यं वृद्धशरादिभ्य: ४।३।१४। आम्रमयम । शरमयम् । ४४६ । गोश्च पुरोषे ४॥३॥४॥ गोः पुरीप गोमयम् । ४४७ । गोपयसोयंत् ।।३।१६ गठयम । पयस्यम् । इति विकारार्थाः ॥६॥ (प्राग्दीव्यतीया)। . . कार्यासमाच्छादनम् --कर्षासस्य कार्पासम्म कर्पास्याः ग विकास (कपास का विकार या कपास का बना हुमा वस्त्र)-यहाँ मयट प्रत्यय नहीं होता मपितु पण प्रत्यय होकर कार्पास+मण कार्पासम् रूप बनता है। ४५ नित्यमिति-सजक तथा शर मादि पाग्दों से विकार तथा अवयव पर्थ में नित्य ही मयट् प्रत्यय होता है। मानमयम्-मासस्य विकारः अवयवो वा (पाम का विकार या पङ्ग- पहा पाच शब्द परसंशक है मत. मान-मयट→मानमयम् । शरमयम्--शराणा विकार: मवयवो वा सरकों का विकार या अवयव)-शर शाद से उपयुक्त मूत्रानुसार मपद प्रत्यय होता है। शर+ मयट्शरमयम्। ४. मोरधि गो शब्द से पुरोष (गोवर) भर्थ में मपट् प्रत्यय होता है। गोभयम्-गो: पुरोपम (गाय का गोबर)-जो+मयट् गोमयम् । ४७. गोपयसोः इति~गो और पपस् शम्द से विकार मौर अवयव प्रपं मै यत् प्रत्यय होता है। गथ्यम्-गो: विकारः पवययो वा (गाय का विकार या अवयव)- इस प्रपं में जोश से अपुंक्त मुशनुमार यत् प्रत्यय होता है। गो+यत-- गो+यस दशा में बान्तो वि प्रत्यये II से मो को प्रद हो वाता है+य-गव्यम् । १. कर्पासी राम से विम्यादिभ्योत्रण तथा अर्याम मे मामाग्य मण होता है। T --

२८४
संस्कृतव्याकरण
.
अथ ठगधिकारी
४४८ । प्राग्वहतेष्ठक् तद्वहतीत्यतः प्राक् ठगधि.
कियते।
.
४४६ । तेन दीव्यति खनतिजयति जितम ४२ मते.
र्दीष्यति सनति जयति जितं वा आत्तिकः।
४५० । संस्कृतम् ॥४. दग्ना सस्कृतं याधिकम् । मारीनि.
कम्।
पयायम्-पयसो विकार: दिप की बनी वस्तु)--इस प्र मे पयर का
रो यत् प्रत्यय होकर पयस+यत् पयस्यम् ।
टिप्पणी-पपम् शम्द मे विकार अपं में हो यत्' होता है।
पतिविकारायंकाः ॥५॥ (प्राग्दीमतीय समाप्त)।
अय ठगधिकारः--यह स ठा प्रत्यय प्रारम्भ होता है।
४४. प्रावरिति-सहति ४४७६। इससे पहले ठक् प्रपया
प्रधिकार
wt.ति-तृतीयास्त से दीभ्यति (सेनता है). समति (सोना है),
पति (सीनता है) और रितम् (जीत लिया)ों में टक् प्रत्यय होता है।
पाक्षिक-मसं. टीयति समति, अति. रिवो पापामों से प्रेममा
है. खोसा है जीतता है या जीत मिया गया)- मर्ष में प्रशद
टक प्रगर होगा है। प्रक्ष+८ टकार को इस मा+-प्रालि बुद्धि
दोमाया अन्य प्रकारातोप-प्रादिक-प्राधिकः ।
हिप्पणी - कातिक पा मि. को. मादि में 'ध्रपा (राम)
सननि प्राधिक. यह वहाहाल दिया गया है। मपुकौमुदीर ने ममी को
एसाहारिया है।
... म FR-तीन से सम (मात रियामा) ५
: टायर होता है।
शरिरम-दमा ममम (पी में मन मा पास

तदिते ठगधिकारः २५५ ४५१ । तरति ४१४१५ तेनेत्येव । उहुपेन तरति औडुपिकः । ४५२ । चरति ४८ सृतीयान्ताद् गच्छति भक्षयतीत्यर्थ- योष्ठक् स्यात् । हस्तिना चरति हास्तिकः । दध्ना चरति दाधिकः । ४५३ । संसृष्टे ४१४,२२॥ दना ससृष्टं दाधिकम् । अर्थ में दघि शम्द से ठक प्रत्यय होकर दषि+ठक-दधि+इक-मादि पद्धि तथा भन्स्य इकार का लोप दाघ +इक-दाधिकम् । इसी प्रकार मरी- चिकाभिः संस्कृतम् (मिरचों से बघारा गया) मरीचिका+म+मारी- चिकम् । ४५.. तरति इति-तृतीयान्स पद से 'तैरता है' (तरति} इस मषं में ठक् प्रत्यय होता है। मोडपिक:-उडपेन तरति (डोंगो) से पार होने वाला)- इस पर्व में उडा शरद से ठक् प्रत्यय होता है। उडुप-+ठक • उडुप+इक-पादि- पदि उ को भी तथा मन्त्य प्रकार का लोप-मोड +इक-भौपिकः । ४५२. पाति इति-तृतीयान्त शब्द से 'जाता है' खाता है" (चरति, पर गतिमाएयो:) इन प्रों मे ठक् प्रत्यय होता है। हास्तिक होस्तना परति (हाथो से जाने वाला)-इस मई से हस्तिन सम्द से ठक् प्रत्यय होकर हस्तिन् +3+हस्तिन् +क-इन (दि) का लोप' तया मादिवृद्धि हास्त्+क+हास्तिकः। दाधिक:-दना चरति (दही से खाने वासा)-६ विक । म सिद्धि कपरमा चुकी है। ४५३. ससृष्टे इति-तृतीयान से समृष्ट (मिला हुमा) अपं में ठक प्रत्यय होता है। राषिकम-दना ससृष्टम् (दही से मिला हमा) वि+ठक । १. नस्वदिते ॥

२८६
संस्कृतम्याकरणे
४५४ । उञ्छति ॥३२॥ बदराण्युन्छति पादरिकः ।
•४५५ । रक्षति ४४॥३३॥ समाज रक्षति सामाजिकः ।
४५६ । शन्ददद्रं करोति ३४ शब्दं करोति शाब्दिकः ।
दईरं करोति पार्दु रिकः ।
४५४. सम्पति-रितीयान्त पद से 'चुनता है (उम्छति) इस पथं मैं
ठक प्रत्यय होता है
टिप्पणी-भूमि पर पहुए मनान मादि के एक एक दाने का पुनना
सम्ध कहलाता है।
पारित:-बदराणि उधति (मेरों को चुनने वाला) इस वर्ष में
बहर स से ठक् प्रत्यय होकर बदर+ठक-बदर + --पारिधि
समय का लोप-वारिकः।
४५५. रक्षति इति-हितीयान्त से रक्षति रक्षा करता है)-इस भर्य
में टक प्रापय होता है।
मामाजिक:-माज मति (समाम की रक्षा करता है. रक्षा करने
पाना)-~ममा+टक-४ को हक, मादिवृधि तथा प्राय 'मा
होकर समा+मामाजिकः ।
समिनि-हिनीयान्त '' तथा राम्रो कति
(करता) प्र मे टक प्रत्यय होता है।
शाति--पर करोति, प्रकृतिपविभागेन म्युगात (को
करता है अर्थात प्रकृति और प्रत्यय के विभाग से सरयुक्ति करता है।
पैसाकरण) हम विराह में पार+r-nw+n-- मास्ति, भय मार
कामोर-दाम-शादिर।
गरिक-सुंर गति (सुंर मामा भाग हो बनाता है)-
पिठारिक
१.पहार पापं है. दापविशेष या wrmire
मामा रिकामाता महार प्रालि

तद्धिते गधिकार
२८७
४५७ । धर्म चरति ४४१४१ धार्मिकः । (वा) अधर्माचेति-
वक्तव्यम् ॥आधर्मिकः।
४५८ । शिल्पम् ११४५५ मृदङ्गवादन शिल्पमस्य माद्रिकः ।
४५६ । प्रहरणम् ॥१॥५७ तदस्येत्येव । असिः प्रहरणमस्य
.
श्रासिकः । घानुष्कः ।
४५७ धर्ममिति--द्वितीयान्त धर्म शब्द से चरति (माचरण करता है)
इस अर्थ मे ठक् प्रत्यय होता है।
घमिक-धर्म चलि (धर्म का सदा पाचरण करने वाला-धर्म
+क+धमं+क+यामिकः ।
प्रथमोदिति (वा)-द्वितीयान्त अधर्म शब्द से भो 'नति' प्र में के
प्रत्यय होता है. यह कहना चाहिये।
पाथमिक:-अधर्म परति (पधर्म का पावरण करने वाला)-अधर्म
+क-अधर्म+इक-मादि वृद्धि मार्मिकः ।
टिप्पणी-(१) 'घरति' शब्द यहाँ तत्पर होना' या 'सदा भाचरण
करना' पर्थ मे है इसलिये यदि कोई दुईत व्यक्ति कहीं धर्म में प्रवृत्त हो जाये
तो वह पामिक नहीं कहा जायेगा । (तत्वबोधिनी)
(२) मार्मिकः शम का भी प्रयोग देखा जाता है, वहाँ धार्मिक के साथ
नन समास है।न पामिकः, पषामिकः ।
४५८. शिल्पमिति-प्रथमान्त शब्द मे "इसका वह शिल (कौशल,
व्यवसाय) है" इस प्रर्य में ठक् प्रत्यय होता है।
मारंङ्गिक:--मृदङ्गवादनं शिल्पमस्य (मङ्ग बजाता है कौशल इसका,
वह-इस विग्रह में पूष्ण शन्द से हक प्रत्यय होता है। मृदङ्ग
मुदण+क, मादिवृद्धि को पार मध्य प्रकार ा मोप माई
+in+माजिकः ।
४५६. प्रहाणामिति-प्रथमान्त शब्द से 'इसका यह पस्त्र है इस भयं में
ठर प्रत्यय होता है।

२६. संस्कृतम्बाकरणे न स्थान् धुर्यः, धौरेयः। ४६६ । नौवयोधर्मविषमूल मूलसोतातुलाभ्यस्तार्यतुल्य- प्राप्यवध्यानाम्यसमसमितसम्मितेषु VIEनावा तायं नार जलम् । चयमा तुम्यो वयस्यः। धर्मेण प्राप्यं धर्यम् । विषेण वध्य धुर्य.--धुरं वहति (धुरा को धारण करता है)-पर+त+इस दशा में 'उ' को दीयं प्राप्त होता है तथा प्रातुत सूत्र से निषेध हो पाता है. घर+4=धर्यः । धोरेयः-धुरं बहति इति (धुरा को बहन करने वाला)--पुर+दक ढक-घुर+एप →मादिवृद्धि उ को प्रो-पौर+एय-धोरेयः। टिप्पणी-रथ मादि के अग्रभाग को धुर् कहा जाता है' धुर करने वाला घोड़ा मादि धौरेयः' कहलाता है। इसी माधार पर कोई अग्रगामी या उत्तरदायित्व को संभालने वाला व्यक्ति भी घोरेय: मारि कहा जाता है। ६६६. नौवय इति –नो, वयस्, धर्म, विष, मूल, मूल सीता मोर तुला- इन (पाठ) तृतीयान्त शब्दों मे श्रमशः तार्य, (तरने योग्य) तुल्य (समान) प्राप्य (प्राप्त करने योग्य) वध्य (मारने योग्य). भानाम्य (लाम नामक मंग)। सम, समित (समीकृत इकसार किया हुमा) संमित (समान, मापा हुआ)- इन भाठ मर्गों में यत् प्रत्यय होता है। माय्यम जलम-नावा तायम् (नाव से तरने योग्य)-इस विग्रह में 'नो' शब्द से यत् प्रत्यय होता है । नी+यत् →यकारादि प्रत्यय परे होने से मौ मौ को माव' होकर ना+य-नाध्यम क्यस्य-वयमा तुल्यः (मायु में समान, मित्र)-वयस्+यत् । धर्मम्-धर्मेण प्राप्यम् (धर्म से प्राप्त होने वाला)--धर्म+यत्- १. किति च ॥११॥ २. 'धूः स्त्री क्लीवे मानमुखम्' (भमरकोष)। वान्तो यि प्रत्यये ६१९१७१॥

तद्धितेपदधिकारः २६१ विध्यः । मूलेन श्रानाम्यं मूल्यम । मूलेन समो मूल्यः । सीतया समित सीत्य क्षेत्र । तुलया समितं तुरुयम । ४६७ । तत्र साधु: ४८ अमे साधुः अपधः। सामसु साधुः सामन्यः । ये चाभावकर्मणोरिति प्रकृतिभावः । कर्मण्यः। शरण्यः॥ भन्स्य प्रकार का लोप-ययम। विष्यः-विर्षण वध्यः (विष से मारा जाने योग्य)-विष + यत्-विष् +म-विष्यः। भल्यम्-मूलेन भानाम्यम् (मूल, 'लागत' के द्वारा बचने वाला पन)- भूल+यत मूल+य-मूल्यम् । टिप्पणी-मूल शब्द का अर्थ है-मूलघन (लागत) पोर मूल्प' का अर्थ है-से प्राप्त किया जाने वाला धन अर्थात् लाम', किन्तु जितने धन में वस्तु मिलती है। उसके लिये 'मूल्य' बन्द रूढ हो गया है । मूरुप-मूलेन समः (मूल के बराबर)-मूल+यत् + मूल्यः । टिप्पणी-वान भादि के उत्पत्ति के कारण (मृत भादि को भी मूल कहते है। मूल (सूत) के बराबर जो पर होगा वह 'मूस्य: पर:' कहलायेगा । उपादानेन समानफलः इस्पर्षः (उपादान के समान-यह भाव है।-काशिका । सोत्यम्-सीतया समितम् सीता का अर्थ है-हल द्वारा खोदी हुई रेखा (सूड) उससे समीकृत भयवा कृष्ट-मोता+सत्-सीत् +य-सीत्यम् । सुरूवम-तुलपा सम्मितम् (तराजू से तोला गया)-तुला+यत-तुल्यम् । तुल्य शबद सदा का पर्याय है। *६७, सति-सप्तम्यन्त से "उसमे प्रवीण या योग्य है" (माधु) इस प्रषं में यत् प्रत्यय होता है। भप्रधः-म साधुः (पागे रहने में योग्य)-प्रम+पमन्य प्रकार का लोप-प्रपा सामन्यः-सामसु साघुः (साम-गान मैं वोग)--सामन +4 इस दशा में 'नस्' itm से 'अन्' का नौप प्राप्त होता है किन्तु "ये पाऽमा.

२९२ संस्कृतम्पाकरणे ४६८ । सभाया य:४१सभ्यः। इति यतोऽविधिः । (प्राग्वितीयाः) |८|| अथ छयतोरधिकारः || ४६६ । प्राक् क्रीताच्छः ॥१॥ तेन क्रीतमित्यतः । छोऽधिक्रियते। ४७० । उगवादिभ्यो यत् ५.१.२५ प्राक् क्रीतादित्येव । एवम न्ताद् गवादिभ्यश्च यत् स्यात् । छस्यापवादः । शङ्कवे हित शव वकर्मणोः ६।४।१६८" से प्रकृतिभाव होकर सामन+य+सामान्यः इसी प्रक "कर्मणि सापुः" कर्मग्य , कर्मन् +यद । पारग्य:-शरणे साधुः (शरण देने में प्रवीण)-शरण+पत्+म प्रकार लोप शरए+यारण्यः । ४६८. सभाया इति-सप्तम्यन्त सभा दाम्द से 'तत्र साघु: मयं में य प्रत्या होता है । (य और यत के स्वर में भेद है)। सम्यः-सभाया साधुः (सभा में प्रवीण या योग्य)-समा+य-पर- भाकार का लोर सम्+य→सम्पः । इति यत् प्रत्यय ॥८॥ अथ छयतोरधिकार:-यहाँ से घ मोर यत् प्रत्यय का अधिकार है। ४५६. प्राक् कोजाविति -तेन क्रीतम् ॥१॥३७॥ से पहले तक '' प्रधिकार है। ४७०. गवादिम्य इति-जिनके अन्त में उकार है, उनसे तथा गो मादि शब्दों से यत् प्रत्यय होता है 'तेन क्रौतम्' से पहले पाने वाले मयों में यह 'यद' प्रत्यय 'छ' का अपवाद है। शव्यम्-शमुवे हितम् (पास के लिये उपयोगी, काष्ठ)-इस विग्रह में श+यत्+3 को गुण' पो तथा मो को पद होकर घर+म १. मोगुण: 01 २. वान्तो पि प्रत्यये ६।१७ -~- २६३ तस्वेिच्यतोरधिकार गध्यम । ॐ (ग. सू०) नाभि नभ च ।। नभ्योऽतः । नभ्यमन्जनम् । ४७१ । तस्मै हितम् ॥१॥ वत्सेभ्यो हितो बत्सीयो गोधुक । →पापम्पम् दाह। टिपणी- पाका प्रर्य बाराका प्रप्रभाग या कोला (सू टप) होता गम्यम-गोम्यो हितम् (गायों के लिये हितकारी)-गो+पत्र-पोको मग घाम मादि नाभीति-17.पू.)-नाभि पद से हिल पर्ष में पर प्रत्यय होता है पौर मे समादेश हो जाता है। भन्योल-मामी हितः (नाभि प nि)-मालि+पन- नाभि को मम होर म+4-पनप र मोर नम् +1-नभ्य- नयोधाः। पके पहिये के मात्र माग को नाभि कहवे है उसके लिए हितकर पक्ष मारपाठविशेष पद पर। मी प्रकार मपम पम्' (१ माधि के लिए हिरापन मामालना), -पहा रथ को नामि' काहो पहा है मनुष्य की मालिका कही। रममे तो 'नाये माग्य सम-रामया' होता है। उमण के पो एनारि गम्' पास महीं होता। १२. सामं निमनुष्यन्त कम से 'उसके लिए हित (लिम्) इम पर्व में पर होता है। परीयो पोपुर-पत्रोत: (लिएरी. कार रोहने R-+0.00 +ft-GAT SIEn-मीर मकोयो दोपुर।

२६४
संस्कृतम्याकरणे
४७२ । शरीरावयदाद्यत् ॥१६॥
दन्त्यम । कण्ठयम निश्यम ।
• ४७३ । प्रात्मन्विश्वजनभोगोत्तरपदात ख: ॥१॥
४७४ । आत्माध्वानो खे ६४११६६॥ एतौ खे प्रकृत्या स्त
भारमने हितम । आत्मनीनम् । विश्वजनीनम । मातृभोगीण ।
इति छयतोः पूर्णोऽवधिः (प्राककीतीयाः) |
४७२. शरीरेति-शरीर के अवयववाची चतुप्यन्त शम्द से 'हित' मपं
यत् प्रत्यय होता है।
दन्त्यम्-इन्तेम्यो हितम् (दाटी के लिये हितकारी)-दन्त+ यत् + दन्त्यम्
इसी प्रकार 'कण्ठाय हितम्' कण्ठ्यम् ।
मस्यम्-नासिकायं हितम् (नासिका के लिए हितकारी)- नासिका+यत
→नासिका को नस् मादेश' होकर नस्+य→नस्यम् ।
४७३. प्रारमन् इति - चतुभ्यंन्त प्रात्मन, विश्वजन पौर ऐसे शब्दों से
जिनमें 'भोग' उत्तरपद हो ख प्रत्यय होता है हित' पर्थ में ।
४०४. धात्मेति-मात्मन् पौर मध्वन् शन्द को 'ख' प्रत्यय परे होने पर
प्रकृति भाव होता है । प्रकृत्यकाच् ॥१६॥ से 'प्रकृत्यया' शब्द की प्रवृत्ति
होती है।
भास्मनीनम्-भारमने हितम् (अपने लिये हितकारी)-भारमन्++
को ईन पादेश होकर मात्मन् +ईन (यहां नस्तद्धिते ६१४ से (टि),मन्
का लोर प्राप्त या उसका ऊपर के सूत्र से बाघ हो जाता है) प्रात्मनीनम् ।
विश्वजनीनम् -विश्वजनाय हितम् (सब जनों के लिये हितकर)-विश्वजन
+--विश्वजन+ईन→अन्त्य प्रकार का सोप विश्वजन्+ईन विश्व
जनीनम् ।
मातृभोगीण:-मातृभोगाय हितः (माता के शरीर के लिए हितकर)-
मातृभोग+स→मातृभोग+ईन→मातृभोग+ ईन--नकार को एकार' मा
भोगी।
इति छयतोरवधिः ।
१. पहलोमास. ११.३॥ २. कुमति च ॥१३॥

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संस्कृतम्याकरण सर्वभूमेरीश्वरः सार्वभौमः । पार्थिवः । ४७६ | पक्तिविंशतित्रिशच्चत्वारिंशत्पञ्चाशत्पष्टिसप शीतिनवतिशतम् ॥ ३॥ ४७३. अनुशतिकामोनामिति-णित, मित पौर शित् प्रत्यय परे होने मनुगतिक मामि (गणपठित) रामो के उभयपद को मार लि होती (20 कार मू. ४२०) मार्वभौम:-सर्वभूमे ईश्वरः (ममस्त भूमि का स्वामी)-सभूमि +उभयपद को प्रादिति, पाय का लोप होकर मात्र भोम् +पए। भौमः। पापित-वृषिभ्या: ईश्वर: {पिवी का स्वामी-विधी+मम | बुद्धिको मार तथा भरपरका मोर, पाथिवः। ४७६. पावित ति-पक्ति, विशति, निशा परवारिंशद, पाथ पष्टि, सप्तति, प्रीति मति तपा गतम्-इन कामों का निराक गया है। टिप्पणी-येराब की है। सर्वर ही इनके प्रश्यवाही संगी मही बैठती। हिमी प्रति प्रत्यय तथा अन्य कार्यों का पुत्र में निपात किया गया है। काशिका वृत्ति के अनुमार मिनिम्न प्रकार से होती है- ति:-पञ्च परिमाणमाय (पाच परिमाए इसके)-पन्न fr+मनु (टि) मोn-in+f-कोक या धकार को मनुवा परमबर्न होकर पतिः पन्त (पाक्ति मामा घाय)| पतिमान पारियों में है। ofult:-दो दो परिमाण माय मचाय (श रिमाल संध का प्रति बीम)-metrit-mar font एनिजको घरवार विसतिः । ..हिषपामा | .

तद्धिते स्वतलोरधिकारः २१७ एते दिशब्दा निपात्यन्ते। ४५० । तदहति ।१।६३ लन्यु योग्यो भवतीत्यर्ये द्वितीया. टिप्पणी-ददास्पद का अर्थ है दस का समूह (वर्ग) 'पञ्चद् दशती धर्ग वा १०६.' शित-प्रो दशल: परिमाणम प्रस्प (सीन दशक हैं परिणाम इसका तीस-त्रिदशत + शत--विवशत् को निन् पादेश होकर निशत् । चत्वारिंशत्-वस्वारो दशनः परिमाणम प्रस्य (धार दगक है परिमाण इसका)-चतुरंशत् + शत-प्रकृति को चस्वारिन् भादेश होकर पवारिंशत् । पञ्चाशत-पञ्च परिमाणम् पस्य (पचास)-पञ्चदशत् शत्- प्रकृति को पञ्चा मादेश होकर पञ्चाशत् । पष्टि:-पर शत: परिमाणमय (साउ)-पदशत् +ति-प्रकृति को पा मादेष प+तिषष्टिः । । प्ततिः-सप्त दरात: परिमाणम् पस्य (सत्तर)-सप्तदशत् +ति प्रकृति को सप्त पादेश होकर सप्त+ति-सप्ततिः । मशीति:--प्रष्टो दशतः परिमारणम् अस्प (मसी)-प्रष्टदात+ति- प्रकृति को पशी मादेश-प्रशी+ति-पशीतिः। भवति.---नवदातः परिमाणम् अस्य (मम्बे)-मपदध +ठि-प्रति को नव भादेश-नर+ति-नवतिः । श:--दम शत; परिमाणम अस्य (सौ)-दशदात++प्रकृति को '' भादेश कर+त+तम । विशेष--विशति से लेकर नवति सक के राष्ट्र नित्य एक्वपन पोर स्त्रीलिंग में होते हैं। धन' पद मसक निङ्ग से होता है। ये सख्या मोर मरूपेष दो के लिये पाते है तथा इस प्रकार प्रयोग होता है-"मनुष्याण विशति:" (संरुपा प्रषं मे)-"विशतिः मनुध्या:" (घस्येप पर्ष में)। ४०. ताईतीति-उसको शाप्त करने पोय' अपं में द्वितीयान्त २१८ संस्कृतम्याकरणे न्ताहमादयः स्युः वंतव्यत्तमईनि श्वेतन्यत्तिकः । ४८१ । दण्डादिभ्यो यत् २०१०६६। एस्तो यत् स्यात् । महति दण्ड्यः । अर्पः । वभ्यः । ४६२ । तेन निवृत्तम् ॥१७॥ श्रद्धा नियंतिम पाहि इति ठमोऽवविः । (गग्वतीयाः) ॥१॥ अथ त्वतलोरधिकारः ॥११॥ ४६३ । तेन तुल्यं किया चेद्वतिः ॥११॥ प्राणेन पाद से ठन् मादि प्रत्यय होते हैं । श्वतधनिकः- स्वतच्छरम महंति (श्वेता को प्राप्त करने : है-श्वेतच्छत्रम् + +6 को इक→मादिवृद्धि ए को ऐ मन्त्य प्रकार लोप-वतछ +इक-श्वतम्धनिकः । दारिम्य इति-द्वितीयान्त दण्डपादि दरम्दों से 'महंति' म मे प्रत्यय होता है। दण्ड्यः-दण्डम महंति (दण्ड प्राप्त करने योग्य)-दण्ड+यत्न म का लोप दण्ड्यः । इसी प्रकार मधमहति मूल्य या पूजा विधि के यो मर्ष+यत् मयः । बषमर्हति (वष के योग्य) वध+यत+वष्यः । ४८२ तेनेति-तृतीयान्त से सिद्ध हुमा' (निवृत्तम् =निष्पन्थम्) मयं में ठम् पत्यय होता है। माह्निकम-भह्वा निर्वतम् (एक दिन में सिद्ध होने वाला)- +उ+मन+इक-मन के प्र का लोप (पल्लोपोनः) मादिवृदिया +हक प्राह्निकम् । इति ठोऽवधिः ॥१०॥ प्रय स्वतलोरपिकार:-अब व भोर तस् का अधिकार है। ४८३. तेन मुस्थमिति-~-तृतीयास से तुरुप मयं में पति प्रत्यय होता। जो सुल्य है यदि वह क्रिया हो। वति में कार इरसंशक है । 'वतु' शेष रहता है।

तद्धिते त्वतलोरधिकार २६६ - प्राहाणवत अधीते । क्रिया चेदिति किम ' गुणतुल्ये मा भूत् । पुत्रेण तुल्यः स्थूल । ४८४ । तत्र तस्येव ॥१११६. मथुरायामिव मथुरावत् स्वप्ने प्राकारः। चैत्रस्येव चैत्रवीत्रस्य गावः । ४८५। तस्य भावस्त्वतलो १।१।११६। प्रकृतिजन्यबोधे प्रकारो भावः । गौ-वो गोत्वम् । गोता । स्वात क्लोचम् । ब्राह्मणवद् प्रवीतं ब्राह्मणेन तुल्यम (दाह्मण क तुल्य)- यही प्रध्ययन किया समान है मतः वाह्मण' पाद से वति प्रत्यय होकर ब्राह्मण पति - ब्राह्मण+वत् ब्राह्मणवत् । वत् प्रत्ययान्त शब्द मभ्यय होता है और इसका प्रयोग क्रिया विशेषण के रूप में होता है। क्रिया दिप्ति-ऐसा क्यों कहा कि यदि तुल्य विधा हो' ? इसलिए कि गुण को समानता होने पर पति प्रत्यय नहीं होता. जैसे- "पुत्रेण तुल्य: स्थलः" यहाँ स्थूलता रूप गुण की समानता है, प्रतएव वति प्रत्यय नहीं होता। ४८. सति-सप्तम्यन्त पौर षष्यन्त से समानता मर्य (इव मर्ड) में वति प्रत्यय होता है । यहाँ क्रिया चेत्' की अनुवृत्ति नहीं होती अतः द्रव्य मादि की समानता में यह विति' प्रत्यय होता है । मथरावत् सध्ने प्राकार:- मथुरायाम् इव (मथुरा के समान)- मथुरा+पति+मथुरावत् । सन पोर मथुरा के 'प्राकार' समान है। अंत्रवत मंत्रस्य नाव:-चत्रस्य इव (पत्र के जमान)-4+वति- चैत्र+वत् । चंक तथा मैर की गायें समान हैं। ४६५. तव्य भाव ति-पाठ्यन्त से भाव अषं में स्व भौर दल प्रत्यय प्रति इति-प्रति बारा उत्पन्न होने वाले गान में को विशेषण होता है बद्द भाव कहलाता है। पभिप्राय यह है कि जिससे प्रत्यय का विधान किया जाता हैबह प्रकृति कहलाती है, जैसे गो मादि शब्द । गो आम्द से गो व्यक्ति का बोध होता है जिसे दूसरे एब्दों में कह सकते है-''गोत्व-विषिष्ट गो व्यक्ति" हा गो संस्कृतभ्याकरण तलन्तं त्रियात्म। ४८६ मा च त्वात् ५॥१॥१२॥ प्रणय इत्पतः स्वतलावषिक्रियते । अपवादैः सहसमावेशामिदम् । षकारोना मुभ्यामपि समाशार्थः । स्त्रियाः भावः स्प्रेसम, स्त्रीत्वम, स्त्री पोस्नम्, पुसवम्, पुस्ता। ४८७ । पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा ॥१॥२२॥ व्यक्ति विशेष है और गोरव' धर्म विशे पण या प्रकार है। यही कहलाता है, जो प्रकृति से उत्पन्न होने वाले ज्ञान में विशेषण है। गोश्वम्, गोता-गोवः (गो का भाव)ो+व+पुन एकवचन मे गोस्वम् । गो+तल-गो+त-स्त्रीलिङ्ग होने से गोता गीतमा-पोता। स्वास्तमिति-(लि.) प्रत्ययात पर नपुंसकशिल होते है। तसन्तमिति-(लि.) तलन्त मीलिजही है। पाति-ब्रह्मएरव शURE" से पहले तक प पोर। भरपरका अधिकार प्रति-नियाशिय इरिग इस्पात प्रयाओं के साप घोर तपस्या समावेश करने के लिये यह पधिकार किया । इमरा फन पर होता है मनिष' मा प्रत्यय समोर वा नही होने तमाम पृथता, पुत्व पाप भी सन माते है। पार नि-मुत्र में च' (ोर, श्री) मन और मा (त्रीमा मारो भमान १७) माय भी स्व और तर काममावेश करने गिरे है। विकी में मार में रा (म), व (नीलमी थी (en) श्यप हो तथा धुम् गानम, (दम धोरम (सा vt. नासाय-पदन प भारि पों से माप म १.पETrum

तद्धिते स्वतलोरधिकारः
पावचनमणादिसमावेशार्थम ।
४८८ । र ऋतो हलादेलंघोः ११६॥ इलादेलेघो कार.
स्य र स्यात् इप्ठे मेयस्सु परतः।
४.६ टेः ६४१५५॥ भस्य टेर्लोप स्यात् इष्ठे मेयस्सु । (का)
पृपमभृशकपरिवृद्धानामेवाएवम् । पृयोर्भावः प्रथिमा ।
४८६ । (क) इगन्ताच्च लघुपूर्वात् ५।१।११। इगतारल.
-
-
में विकल्प स 'इमनि' प्रत्यय होता है । इमनिष मे इमन शेष रहता है।
चावचमिति-प्रण भादि प्रत्यय के समावेश के लिये 'का' (विकल्प से)
'कहा गया है।
४८. र ऋत इति-जिसकै मादि मे हल (यजन) हो, ऐसे लघु प्रकार
को रमादेश होता है, इष्ठन्, इमानद मोर ईयसुन प्रत्यय परे होने पर।
४६६. टेरिति-मसनक की टि का लोप हो जाता है। इष्ठन, इमनिच
ईयसुन प्रत्यय परे होने पर।
पृप इति (वा)-पृथु, मृदु, भृश, पश, समोर परियड धम्दों के यूको
ही यह र होता है, (अन्य को नहीं); जैसे-
प्रथिमा-योनिः (पृथु का भाव-विस्तीवंता:-इस विग्रह में पृथ शाब्द
है मनिन् प्रत्यय होकर पृष+मन्-ऋको र सफा fr(s) का लोप प्रप
+मन+प्रथिमम्-० एक० में प्रधिमा ।
हिप्पणी -मनि प्रत्ययात शाम पुसिङ्ग होडे है।
४८६ (क) नाति'-इगम (जिसके अन्त में इक भर्थात् उ, ऋ
) लपूर्वक (जिस पर से पहले सधु स्वर है) प्रातिपरिक से भए प्रत्यय
होता है।
पार्षवम्-पृयो यः-पृथ् धद के भन्त में उ (हरु) है और उसे पहला
१. यह मूष बोसामा पापकरणों मे नही है। पोडा प्रेस सं. में है।

संस्कृतव्याकरणे
पुपूर्वात् प्रातिपदिकाद् भावेऽण प्रत्ययः । पार्यवम नदिमा। मार्द
४६० । वहढादिम्य: व्यञ्च २११११२३॥ धादिमनि
शौक्ल्यम्. शुक्लिमा । दादयम् द्रढिमा ।
४६१ । गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च ५१
चाद्भावे जडस्य भावः कर्म
जाड़यम
.
धा
स्वर लघु है। इसलिए इमनिच के विकल्प में पृथु शम्द से पण प्रत्यय ई
है । पृथ+पण→प्रादिवृद्धिको मार् तपास को गुण भी होकर पा
+म+पो को प्रव पापं+म+पाधवम् ।
इसी प्रकार मृदोर्मावः (मृदु का भाव, कोमलता) मृदु+मनिध-प्रदिर
मृदु+मण→मार्दवम् ।
४६०. वर्ण इति-पष्ठपन्त वर्णविशेषवाची शब्द से तथा हत भारि शरद
से भाव वर्ष में व्यत्र, प्रत्यय होता है।
चादिति--च कहने से इमनिच भी।
शोवल्यम्, सुश्लिमा-शुक्लस्य भावः (शुक्ल का भाव. शुक्लता)--वर्ण
विशेषवाची शुक्ल शब्द से ध्यत्र प्रत्यय होकर शुक्ल+या+मुफ्ल+य:
मादिवृद्धि 7 को प्रो तथा अन्त्य भकार का लोप, शौक्ल +4+कल्यम् ।
पक्ष मै शुभल+ इमनिच-+शुक्ल + इमन्→शुक्जिमा ।
पादयम्, दिमा-हतस्य भावः (द का भाव, दृढता)-दमध्यम
भादिकृष्टि को मार तथा भन्स्य म का लोप भारद+पदाइयम् । पक्ष में
दृढ़+इमनिच--ऋको र दिया।
४६१. गुणवचति-यष्यन्त गुणवाची शम्म भौर हाह्मण मावि सम्यो
से भाव तथा कर्म प्र में प्यन् प्रत्यय होता है।
चारिति- कहने से भाव में भी होता है।
मारप-बम भावः क्रमं वा । मूर्ख का भाय या फर्म, मूसंता)-मा
१. तद्धिवेयचामादेः २०११
२. मोगुणःtt

तद्धिते खलोरघिकार:
-
मूदस्य भावः कर्म वा मौव्यम् । ब्राह्मण्यम, । प्राकृतिगोऽ
४६२ । सख्युर्यः ।।१।१२६॥ सख्युर्भावः कर्म वा संस्थान ।
४६३ । कपिज्ञात्योढंक ५११२७॥ कायम । ज्ञातेयम् ।
४६४ । पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक
श११२८
+ध्य →पादिवृद्धि (म को पा) तथा अन्त्य प्रकार का लोप होकर जाह+
घाख्यम् । इसी प्रकार-
भोड्यम् - मूढस्य भावः कर्ष वा (मूढ का भाव या कर्म)-मूह+य-
मोदधम् ।
ब्राह्मण्यम् -दाहाणस्य भावः कर्म वा (बाह्मण का भाव या कम)-ब्राह्मण
+व्यञ्जाह्मण्यम्।
भाकृतीति--यह ब्राह्मण मादि प्राकृति गण है ।
४१२. सल्युरिति-षष्ठ्यन्त सखि शब्द से भाव भोर कर्म, में 4 प्रत्यय
होता है।
सत्यम्-सस्युः कर्म या (सखा का भाव या कर्म, मित्रता) ममि +
2+परय इकार का लोप' सत् + यमरूपम् ।
४६३. कपिलारपोरिति-षष्ठ्यन्त कपि और जाति पद से भाव तथा
कम में डफ प्रत्यय होता है।
कापेयम्-कविः कर्म वा (कपि का भाव या कर्म)-पि+:--
को एय-कपि+एप=पादिदिपा पन्त्य र कालोप होकर काप +एय-
कापयम् । इसी प्रकार मातेर्भावः कर्म वा (सम्बन्धी का भाव पा कर्म) माdि+
दर-शातेयम्।
४६४ परयन्तेति-जिनके अन्त में पति पद है ऐसे सम्से ठया
"पुरोमित' मादि से भाव पार कर्म में या प्रत्यय होता है।
१. यस्येति च ॥१४॥

१०४ संस्कृतम्याकरणे सैनापत्यम, । पौरोहितम, । इति त्वतलोरधिकारः ॥११॥ प्रथ भवनायंका. ॥१२॥ ४६५ । धान्यानां भवने क्षेत्र खञ् ५५२०१६ भवन्त्यस्मिग्नि भवनम, । मुद्गानां भवन क्षत्रं मौद्गीनमः। ४६६ । द्वाहिशाल्योढंक १०२।। हेयम : शालेयमः। सनारयम - सेनापते: भावः कर्म वा (सेनापति का भाव पा कर्म)- सेनापनि+यक्→पादिवृद्धि' ए को ऐ नया पन्त्य का मोप सेनापत+य. सनापस्यम । रोहितम् - पुरोहितम्य भावः म वा {पुरोहिन का भाव या कार्य). पुरोहित+यक्+पोगेहितम् । इति स्वतसोरधिकारः ॥१॥ अथ भवनाद्यर्थका-मब मवन (होने का स्थान)-प्रयं वाले प्रत्य भारम्भ होते हैं। ४६५. धान्यानामिति-पष्ठ्यन्त धाग्यविशेषवाची शब्दों से 'भवनं क्षेत्रम (होने का स्थान, सेन)--पर्य मे सम् प्रत्यय होता है। भवतीति - जिसमें होता है उसे भवन कहते हैं (होने का स्थान)। मौदगीमम् - मुद्गानां भवन क्षेत्रम (जिसमें मूग होती है ऐसा खेत)-- मुद्ग+ खन-स को ईन-मुद्ग-+-ईन→पादिवृद्धि' 3 को पो तथा मन्त म का लोप होकर मौदग+ ईन+मौद्गीनं क्षेत्रम । ४६. ग्रोहीति-षष्ठ्यन्त व्रीहि पौर सालि शब्दों से 'भवन क्षेत्रम्' म में ढक् प्रत्यय होता है। बहेयम् - ग्रोहीणा भवनं क्षेत्रम् (जिसमें बीहि होती हैं ऐसा खेत)-प्रीहि +ढक्ढ को एप होकर धोहि+एय= प्रादिवृद्धि ई को ऐ तथा मन्स्य हकार का लोय-यह + एयवहेयम् । इसी प्रकार 'शालीनां भवन क्षेत्रम्' शाली+ रक्शालेयम्। १. किति च ॥११॥ २. तद्धितेष्वचामादेः ७२।११७॥

वद्धिते भवनाद्ययंकाः ४६७ । हैयङ्गवीनं संज्ञायाम् ।२।२३॥ ह्योगोदोहशब्दस्य हियगुरादेशः विकागर्थे खन्न निपात्यते । दुह्यत इति दोहः तीरम् । ह्योगोदोहस्य विकारः हेयङ्गवीनं नवनीतम् । ४६८ ! तदस्य सज्जातं तारकादिभ्य इतच् ५५२३६॥ तारका सब्जाता अस्य तारक्ति नभः । पण्डितः । श्राकृतिगणोऽयम । ४६७. हैवीनम् इति-ह्यो पोदोहः (पहले दिन का दहा हुमा दूध)- शब्द को हियड्ग' प्रादेश और विकार अर्थ में खञ् प्रत्यय का निपातन किया गया है, संज्ञा में। दुहत इति जिसको दुहा बाता है (दुहते-कर्मवाच्य)- यह दोह' कहलाता है पति दूध। हैपङ्गीतम्-होगीयोहस्य विकार: {कल के दुहे दूध से बना हुमा या निला हमा, नवनी घृत)-योगोद+ख-प्रकृति को हियइगु पादेश सपास को न होकर हिपा+ईन→माविष्ट को ऐ तथा भन्स्य उको गुण (मोगुणः) हैपङ्गो+ईन-मो को भम् होकर हैपङ्गीन नवनीतम् । ४६. तदस्यति-प्रथमात सारका मादि सम्मो से "ये इसके हो गये" (मस्य सजातम्) इस अर्थ मे इतच् प्रत्यय होता है। तारहितं ममः-तारकाः संजाता प्रस्य (इसके तारे हो गये या निकल -rrr- .y mr- सस्कृतव्याकरणे ४६६ । प्रमाणे द्वयसज्दघ्नमात्रच: ५॥२॥३५॥ वर्तते । उरू प्रमाणमस्य उइद्वयसम् । ऊरुघ्नम् । अरुमा ५०० । यत्तदेतेभ्यः परिमाणे वतुम् ।।३। य णमस्य यावान । तावान। एतावान । ५० किमिदंभ्यां वो घः ५१२४०। श्राभ्यां वह बकारस्य घश्च। ५०२ । इदंकिमोरोश की ६॥३॥ । दृग्दशचतुप ४६६. प्रमाण इति-प्रमाण विशेष के मयं में विद्यमान पथमान्त "यह इसका प्रमाण है" इस अर्थ में द्वय सच्. दन पौर मात्र प्रत्यय (सोनों प्रत्ययों में से ५ का लोर हो जाता है।) अरुयसम्, अवघ्नम्, अमावम् उरु प्रमाणस्य (जसा है इस पर्थात् बा तक जम पादि)-क+या+यसम्. दान- ऊम करु+मात्रच-ऊरूमात्रम् । ५... पातदिति-प्रथमान्त यत्. तत, एतत् दामों में 'यह इसका पा है" इस पथ में वतुप प्रत्यय होता है। बतुप में 'वत्' शेष रहना है। यापान-यसरिमाणम् मस्प (जो है परिमाण इमका, जितना यत+बना+त+व+यन के त को मा (पा सर्वनाम: AL होर पा+वत्-यावत् लिङ्ग प्रथमा एकापन में यावान् । प्रभार तरिमाणमाय (वह है परिमाण इसका, उतना) nt+ar वातान एतत् परिमाणमार-(पह है परिमाण इगा, इसना)-पर- एवावा.एमावान्। ...निमियामिनि--प्रथमारत मि' और 'म्' गम परिमार अयं में प्रत्पर होता है समाबरोप हो पाता है। १०२. समितिदार और पप पर होने पर कोई

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५०५ । उभादुदात्तो नित्यम् ॥२४४ उभशब्दार
स्यात् स चायुदात्तः उभयम।
५०६ । तस्य पूरणे डट् ५।२।४८/ एकादशानां पूरणः
५०७ । नान्तादसङ्ख्यादेमंट ५१२४६। डटो म
पन्चानां पूरणः पन्चमः । नान्तारिकम ?
५०५. उभादिति-उमदाब्द से परे सयप् को नित्य प्रयच हो
वह माधुदात्त होता है।
उभयम् - उभी अवयवो प्रस्य (ो अवयन है इसके पथद
समुदाय)-उम+मयच्+मन्त्य प्रकार का लोर उभ+प्रय--उमर
५०६. सस्येति-पष्ठपन्त संस्थाविशेषवाची शब्द से पूरण ।
प्रत्यय होता है । इट में शेष रहता है।
टिप्पणी-पूरणार्थ प्रयपान्त शब्दों को सस्कृत में पूर
कहते हैं। हिन्दी में ये अमवाचक मपादोधक विशेषण (
कहलाते हैं।
एकादश:-एकादशानां पूरणः (ग्यारह संख्या को पूरा कर
ग्यारहवा)-एकादशन् +डट → एकादशन् म-इट प्रत्यय के हित हो
(टि) का लोप होकर एकादश+4-(रामवत्) एकादशः ।
५०७. नास्ताविति--जिसके प्रादि में कोई संख्या न हो ऐसे
संख्यावाचक शब्द से परे डेट का मद का भागम्
जाता है। मट्
रहता है । टित होने मे मिट्' (मागम) डट् के मादि में प्राता है पर
+प्रत्यय-म्+म (हद-म।
पञ्चमः-पञ्चानां पूरणः (पाच संख्या को पूरा करने वाला,
पञ्चन्-+हट+मट का मागम होकर पञ्वन् +म+4--न का सोप'
पञ्व+म+पञ्चमः।
नान्तादिति-नकारान्त से परे हट को मट का पागम हो ।
१.नलोपःप्रातिपदिकान्तस्प ८11

.०६
सद्धिते भवनायकाः
५०८ । ति विशतेडिति ६४१४२ विंशतेर्भस्य तिशब्दस्य
प: स्यात् डिति परे । विंशः । असख्यादेः किम एकादशः ।
५०६ पटकतिकतिपयचतुर्रा थुक्
५।२।५॥ एषां धुगागमः
इदि। पण्णां पूरण. षष्ठः । कतियः । कतिएयशब्दस्यासख्यात्वे.
? इसलिये कि विंशति मादि (मनकारान्त) से परे मट् का भागम नहीं
-
१०३. ति विशतेरिति--भसशक विशति के ति शम्म का लोप होता है,
परे होने पर ।
विश:-विशतेः पूरणः (सीप्त संख्या को पूरा करने वाला, वीसवाँ)-विशति
स्ट-कपर के सूत्र से ति लोप होकर विश+ इस दशा मे से भागे
ते मकार को पररूप (मतो गुणे) हो जाता है-विश+म+म-विश+
+विशः।
असहयादेः किमिति-जिसके मादि मे संख्या न हो' ऐसा क्यों कहा?
लिए कि 'एकादश.' मे मट् का मागम नही होता। यहाँ दशन् शन्द से पूर्व
क' संख्यावाची शब्द है।
५.६. पर पति-पद कति, कतिपय भोर चतुर शम्दों को थुक का मागम
ता है, इट् प्रत्यय परे होने पर ।
एक में यु पोष रहता है यह पित्' होने से षट् मादि शम्दों के अन्त में
ता है।
पष्ठ:--पण्णा पूरणः (धः संख्या को पूरा करने वाला, घटा)-१+
+रु का पागम होकर प+++य को (स्व) पर+3+
छः। इसी प्रकार 'कसोना पूरणः' कति+पु+र+कतिपः (क्तिने
कतिपयेति-पचाप कतिपए राम्द सस्यावारक हो (उससे स्ट् प्रत्यय
१.मापन्तो किती ॥४॥

सम्पारणे
यतए पापकाइद । कतिपययः । गतुषः ।
५१०।देस्सीयः ॥२४॥ हटोऽपदः । यो
द्वितीयः।
५११ । नेः सम्प्रसारणं च ५।२५। सृतीयः।
५१२ । श्रोत्रियंदछन्दोऽधीते ARRET मोत्रियः ।
प्राय नहीं होता) तयारि पो होने पर कतिपय को बुक का मानम क
है. इस मापक से इससे प्रत्यय होता है।
कतिपयप:-कतिपयानो पूरण: (रिसों का पूरा करने वासा)-कतिर
++टु-कतिपयपः।
पतुप:--सतुष्णा पूरणः (धार संस्था पूरा करने वाला, चौपा)-पतु
+युक-चतुर्पः।
५१..म्तीय इति-हिम से पूरण मर्ष में तीय प्रत्यय होता है। यह
उट् प्रत्यय का बाधक है।
द्वितीयः-दयोः पूरणः (दो सपा को
पूरा करने वाला, दूसरा)
तीय-द्वितीयः।
५११. रिति-त्रिशद से पूर्ण पर्व में तीय प्रत्यय होता है मौर निको
सम्प्रसारण भी हो जाता है।
तृतीयः-त्रयाणां पूरणः (तीन संख्या को पूरा करने वाला, तीसरा)
+तीय-२ को ऋ (संप्रसारण) होकर (t+ऋ+t)+तीय इस दशा में इ.
को पूर्व रूप (ऋ+5-ऋ) होकर तृ+तोप-तृतीयः ।
५१२. श्रोत्रियन् इति-'वेद (पाद) पढ़ता है' इस प्रर्ष में घोत्रिय छन्द
का निपातन किया गया है।
भोत्रियः-छन्दोऽधीते (वेद पढ़ने वाला, वेदपाठी) इस विग्रह में छन्दम्
घम्द से निपातन दारा घन् प्रत्यय मोर सन्दस् को श्रोत्र मादेश होता है । योत्र
+थन्धोत्र+इय-अन्त्य मका सोर थोत्रियः।
१. सम्प्रसारणाच्च ६५११०८|

तद्धिते भवनादर्घका: त्यनुवृत्ते श्वान्दसः । ५१३ । पूर्वादिनि: ५।२।८६। पूर्व कृतमनेन पूर्वी । ५१४ । सपूर्वाच्च ५।२।८७। कृतपूर्वी । ५१५ । इष्टादिभ्यश्च ५।२८८ इष्टमनेन इष्टी। अधोती। इति भवनाद्यर्थका ॥१२॥ वेति-तावतिथ ग्रहणमिति सुग्वा ५.२१७७ इम मूत्र मे वा' को अनुत्ति होती है इसलिये पक्ष मे छन्दस् आम्द से मरण प्रत्यय होकर छन्दम् + ग . पादिवृष्टि धान्दसः। टिप्पणी-धन् प्रत्यय मे (थोत्रियन ) मकार स्वर के लिये है । प म शादो. पीते 'पान्दसः' यह रूप होता है। भाषा-विज्ञान को शाप क अनुमार ना थोत्रियः भिन्न आम है, इसको बन्दस्' गम्द से पुत्पत्ति नही होती, पथ की समानता प्रवास है। ५१३. पूर्वाद ति-दितीयान्त पूर्व दाम में 'मनेन सनम' (मन किया) माहिम मे इनि प्रत्यय होता है। पूर्ण-पूरं कृतम मनेन (पहले क्यिा है इसने)-इस विग्रह में पूर्व म नि प्रत्यय होता है। पूर्व +शनि--पूर्व +इन+पस्य प माना पूविन् । प्रषमा एक्वचन मे पूरीं। १४. सपूर्वारिति-बिससे पहने दूसरा स हो (मपूर्ण पूर्व महिम) एमे पूर्व पद से भी मनेन तम्' इस मपं में हनि प्रत्यय होता है । तपूर्ण- पूर्वम् पनेन दिया है पहले इसन)-इस विषह में पनपूर पप से पनि प्रत्यय होकर पूर्वात ल बनता है। .२११. पाश्म्यि इति-पादियों से पनेन एम वार्षिक पनि प्रत्यय होता है। प्टो-प्टम् मनेन (इसने पत्र दिया है-म सिंह मे re+rik . इष्टिन (. ए.) परी

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.११.टारम्पति-इष्ट मादि पदों से 'भनेन इण्टम'मादि मर्ष में पटो-प्टम् धनेन (इसने यश किया है)-इस विग्रह में इष्ट इनि, तद्धिते भवनायक पेरयनुवृत्चे श्वान्दसः । ५१३ । पूर्वादिनि: ५।२१८६। पूर्व कृतमनेन पूर्वी । ५१४ । सपूर्वाच्च ।।८ कृतपूर्वी। .५१५-1 इष्टादिभ्यश्च ।२।१८। इष्टमनेन इष्टी। अधीती। इति भवनाधर्थकाः ॥१२॥ ति--तावतिथं ग्रहणमिति सुग्वा ५।२७७ इम सूत्र से 'वा' को मनुवृत्ति होती है इसलिये पक्ष में छन्दस् शब्द से पण प्रत्यय होकर छन्दस्+पण- भादिवृद्धि छान्दस। टिप्पणी-धन् प्रत्यय में (थोत्रियन्) मकार स्वर के लिये है । पक्ष में छन्दो. ऽधीते 'धान्दसः' यह रूप होता है। भाषा-विज्ञान को शोध के अनुसार तो थोषिय: भिन्न मान्द है, इसकी छन्दस्' शम्द से व्युत्पत्ति नहीं होती, प्रथं की समानता अवश्य है। ११३- पूर्वाद् इति-रतीयान्त पूर्व शाद से 'भनेन कृतम्' (इसने किया) मादि पर्व में इनि प्रत्यय होता है। पूर्ण-पूर्व कृतम् मनेन (पहले किया है इसने}-इस विग्रह में पूर्व इनि प्रश्यय होता है। पूर्व इनि--पूर्व+इन+अन्त्य भ का लोप 'पूविन्', अपमा एयरन में पूर्वी। १५. सपूर्वादिति-जिससे पहले दूसरा शब्द हो (सपूर्व पूर्व सहित) ऐसे पूर्व दाद से भो भनेन पृतम्' इस भर्ष में इनि प्रत्यय होता है । इनपूर्ण- पूर्वम् धनेन किया है पहले इसने)-इस विग्रह में कृतपूर्व पप से नि प्रत्यय होकर पूर्वग्नु स बनता है । शब्द से पनि प्रस्थर होता है। टिन (१.ए.) पी।

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५१८.प्रारिणस्थाद इति-प्राणी में स्थित मङ्गवाचक प्राकाराम्त बाम्ब से तद्धिते मत्वर्षीया: ५१७ तसो ममर्थ ११ तान्तसान्तौ भसज्ञौस्तो मत्वर्थे प्रत्यये परे। गरुत्मान् । वसोः सम्प्रसारणम विदुष्मान । *(वा) गुणवचनेभ्यो मतुपो लुगिष्टः । शुक्लो गुणोऽस्यारतीति शुक्लः पटः । कृष्णः । ५१८ । प्राणिस्थादाती लजन्मरस्याम ५५२०६६। । ५१७ तसौ. इति-तकारान्त और सकारान्त साम्द भसंज्ञक होते हैं मत्वर्षक प्रत्यय परे होने पर। गरमान्-गरतः प्रस्प सन्ति (पंख जिसके हैं, पक्षी गस्त + मतु+गत् +मत् (यहाँ गरुत् की भसंज्ञा हो जाने से पद संज्ञा का बाघ हो जाता है तथा त् को 'प्रत्यये भाषायां नित्यम्' से मनुनासिक (न) नही होता । पहत्मत्-प्र० एक० में गरुत्मान् । विदुष्मान्-विद्वांसः अस्य सन्ति (विद्वान् जिसके हैं)-विद्वस + मतुप --मसंभा होने से सम्प्रसारण' अर्थात् व् को उ होकर विद्+उ++ स्+मत्→ को पूर्व रूप विद्+उ+स+मत् + विदुष्मत प्र० ए० विदुष्पान् । गुणवचनेम्य इति धा-गुणवाचक शब्दों से परे मतुप् का लोप होना प्रभीष्ट है। टिप्पणी-जो शब्द गुण और गुणवान् दोनों के लिये भाते हैं वे हो यहाँ गुणवचन कहे गये हैं, जैसे- शुक्लो वर्णः, शुक्लो वस्त्रः । इस लिये रूप' मादि शब्दों से परे मतुम् का लोप नहीं होता जैसे-रूपवान् । शुक्लः पट:-शुक्लो गुणोऽस्यास्ति (श्वेत गुण वाला वस्त्र)- शुक्ल +मतुप्→मतुप लोप होकर शुक्ल पटः । इसी प्रकार कृष्णो गुणोऽस्या- स्तीति कृष्णः। भरवयं मे विकल्प से लच् प्रत्यय होता है। 1.पसोः सम्प्रसारणम् ॥३१॥ २.सरप्रसारणाप ११..

संस्कृतव्याकरणे चूडालः। चूडावान । प्राणिस्थाकिम ? शिखावान् दीपः। प्रायजादेष नेह-मेघावान् । ५१६ । लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः पनेलचः ॥२१॥ लोमादिभ्य शः । लोमशः । लोमवान् । रोमशः । रोमयान् । पामादि भ्यो नः पामनः । (ग० सू.) अङ्गारकल्याणे | अना। पूडाम:. पूगवान् पूरा प्रम्य पस्ति (पोटी जिसके है)--पू+म- पगमः । पक्ष मे-चूरा+मतुप→यू+मत् मतुप के म को बाहोकर- पूवत् प्रएक. मे धूतावान् । लिम्पात् हिप्रिति-'प्राणी में स्थित हो' ऐसा क्यों कहा? इसलिये fr"शिपायाम् दोर." यहा माग हो। यही शिक्षा दीप में है. प्राणिस्प मही, पर मनु प्रत्यय ही होता है मधु महीं। प्रायजादेव-प्राणी के मङ्गाची से ही मच् प्रायप होता है, इसलिये "मेघास्तीति मेधावान" यह! मेया शाम से 'म' नहीं होता पितु मा प्रत्यय होता है। मेघा (दुझि) प्राणी का पजनी. मूर्त हाथ, पैर मार हीपाली जहमाते है। १८.मोमfa-माव में मोमारियों से पामागों से 'मा रियास्मिों में इस पय, किस्सरी होते है। मोमश..मोमवार-मोमानि माय नि मोम रिसर है, मोम बापा) मोमन् + होकर मोमगः । पक्ष में मनु-गोमन् + मनुप-मोवान् मी पर मालिस सन्नि'-रोमयः, रोमान। पामरः-पास गति (असमी इसके ) पाम +4+पामा मोहोर पामत: स -पासवान् । १.मारवासारसम्पति २.रासाभस्य ८१२१

तद्धिते मत्वर्थीयाः
३१५
.
* (ग० सू०) लक्ष्म्या अच्च ॥ लक्ष्मणः। पिच्छादिभ्य इलय ।
पिच्छिलः, पिच्छवान् ।
५२० १ दन्त उन्नत उरन् ।२।१०६। उन्नता दन्ताः सन्त्यस्य
दन्तुर
५२१ । केशाद्वोऽन्यतरस्याम् ॥२॥१०॥ केशवः, फेशी,
पङ्गादिति (ग० ०) शोभनाज विक भङ्ग शब्द से मत्वर्थ में न प्रत्यय
होता है।
मङ्गना-कल्याणानि (शोभनानि) मङ्गानि सन्ति मस्या: (सुन्दर
मङ्ग हैं जिसके }--म+न+त्रिीत्वबोधक टा (मा) प्रत्यय होकर भङ्गना
(स्त्री)
सम्या-1० पू०)-लक्ष्मी शब्द से मस्वयं मे न प्रत्यय होता है और
इसके पन्त को भकार हो जाता है।
लक्ष्मण:--लामी: मास्यास्ति (लक्ष्मी इसके है. लक्ष्मी वाला)-लक्ष्मी+
न-मनप (ईकार) को प्रकार होकर लक्ष्य+न+न को ए लक्ष्मणः । पक्ष
में -- लक्ष्मी+मतपु-लक्ष्मी+मतुप्→ लक्ष्मीवान ।
पिपिछल:-पिन्छ स्यास्ति (मोरपंख इसके हैं।-पिच्छ+इलच्-अन्त्य
मकार का लोप होकर पिछ+इल पिच्छिलः । पक्ष में पिच्छ+मता--
पिछवान् ।
५२०. दात इति-उन्नतदन्तार्थक दन्त शब्द से मत्वर्य में उरच प्रत्यय
देता है।
दन्तुर:--- उन्नता दन्ताः अस्य सन्ति (ऊचे दाँत इसके हैं. दाता-दन्त +
उरच-पन्त्य भ का लोप दातु+हरदन्तुरः ।
५२१, केशादिति-केश शम से मत्वर्ष में विकल्प से व प्रत्यय
होता है।
टिप्परली-तद्धित प्रकरण मे 'वा' का अधिकार घस ही रहा है।
१. समर्थाना प्रथमाद वा १२१ (१३०)

संस्कृतव्याकरणे फेशिकः, केशवान् । *(वा) अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते ॥ मणि *(वा) अणंसो लोपश्च ।। अर्णवः । ५२२ । प्रत इनिठनी ।२।११५ । दण्डी। दृष्टिकः । इस मूत्र में फिर से 'अन्यतरस्पाम्' (विकल्प से) कहने के कारण केश या इनि तया उन्' प्रत्यय भी होते हैं। इस प्रकार व, इनि, ठन् पौर म चार प्रत्यय केश शम्द से मत्व में हो जाते हैं। जैसे- केशवः, केशो, केशिका, केशिवान-शा मस्य सन्ति (केश : केश+व-केशवः । पक्ष में वेश+इनि→अन्त्य प्रकार का लोप के इन् - केशिन्, केशी । केश+-ठन्- को इक् केश+इक्, अन्त्य म का केशिकः । केश+मतुपकेगवान् । पश्येम्य इति (वा)-'केश' से भिन्न शब्दों से भी मत्वर्ष में व देखा जाता है। मारिणतः :-मणिरस्यास्ति (मरिण वाला, विशेष प्रकार का नाग)-मन व-मरिंगवः। पएंस इति (वा)--प्रणंस् शब्द से मत्वर्थ में व प्रत्यय होता है प्रो का लोप हो जाता है। अर्णव-पर्णासि सन्ति मस्मिन् (जल वाला, सागर)-प्रणं + स् लोप+म+व+मर्णवः । ५२२० मत इति-प्रकारान्त शब्द से मस्वयं में इन भोर ठन् होते हैं, विकल्प से। दण्डी, दधिक:-दण्डोस्यास्ति (दण्ड जिसके है, दण्ड वाला दण्ड+इनि-दण्ड+इन् → अन्य प्रकार का सोप होकर दण्डिन् प्र. में दडी । दण्ड +ठन्→ को इक्-दण्डिकः । पक्ष में दण्ड+ १. प्रत इनिठनो ५२१॥ (१२२)

तद्धिते मत्वर्थीयाः
५२३ । प्रोह्यादिभ्यश्च ११२।१९६१ ग्रोही, प्रीहिकः ।
५२४ । प्रस्मायामेघास्रजो विनिः ॥२१॥ यशाची,
यशस्वान । मायावी । ग्रोधादिपाठादिनिठनो। मायो । मायिकः ।
मायावान् । मेधावी । सम्वी।
५२५ । वाचो रिमनि: श२।१२४१ वाग्म्मी।
५२३. नौशादिय इति-प्रोहि मादि शमों से भी मरवयं में इनि मोर
ठन प्रत्यय होते हैं और मतुप भी।
श्रीही, बीहिक:-द्रोहयः मस्य सन्ति [धान इसके है, पान वाला -प्रीहि
+इन+भनय का लोप - प्रोह +इन् -प्रीहिन् (ही) Bा नीहि +
इन्दको रक तथा अन्य कामोष होकर वोह +इक-दोहिकः । पक्ष
में बोहिमान।
५२४. पसमायेलिममन्त (जिन राम्दों के पन्त में प्रस् हो) तथा माया,
मेया पौर सजशप से मरवयं में विनि प्रत्यय होता है।
यस्वी-पोऽस्यास्ति (जिसके यश है, पश वाला)-प्रमन्त यशस परद
से यह +विनि-यशस्+दिन - यशस्विन प्र. एक० मे यशस्वी । पक्ष में
परात+मतुपयवान् ।
इसी प्रकार मायाप्रयास्ति, माया+विनि-मायावी, यायावान् । मेधा-
ऽस्याहित, मेघा+विनि-मेधावी, मेषावान् । मग मस्यास्ति (माला जिसके है,
माला यामा) समिनिज् को ग (षोः कु.), मग+विन्यपी,
सम्वान्
५२५. पाच इति--वाच शब्द से मत्वर्ष में ग्मिनि प्रत्यय होता है।
armमो'-याचोऽन्य सन्ति (वाणी इसके है, प्रशस्त पाणी वाला)- वान्
+मिन्+घ को क (चौ: कुः) तथा ग् (जस्व) होकर वार+मिन+
१.वामी मैं को गकार है।

-
संस्कृतव्याकरणे
फेशिकः, फेशवान् । *(वा) अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते ।। मणि
*(वा) अगसो लोपश्च ।। अर्णवः ।
५२२ । प्रत इनिठनी शरा११५ । दण्डी। दण्डिकः ।
इस सूत्र में फिर से 'मन्यतरस्याम्' (विकल्प से) कहने के कारण केशर
हनि तथा ठन्' प्रत्यय भी होते हैं। इस प्रकार य, इनि, ठन् पोर मन
पार प्रत्यय केश शद से मत्व में हो जाते है। जैसे-
देशपः, केशो के शिक्ष:, शिवान-केशा मस्य सन्ति (केशा
देश+4--केशवः । पक्ष में-देश+पनि+मश्य प्रकार का सोने
इन्केशिन्, केशी । केश+ठन्- को इक केश+क, भरपका
केशिकः । केश+मनु - वेगवान् ।
मापेम्य इति (ग)-'केश' से भिन्न शो से भी मवर्ष में '
देखा जाता है।
मलियः - मरिणरस्पास्ति (मरिण वाला, विशेष प्रकार का नाग)-
प-मग्गिया।
पर्यत इति (41)--पर्णम् गम् मे मरवर्ष व प्ररपर होता
का मोरहो जाता है।
प्रव-प्रमि मनि पश्मिन् (जन वामा, गार)-प्रणम् ।
म् मोर-मरणं+4+शंकः।
५२२. प्राग-प्रकारान्त गम से मल में न और न
होते है, विवश है।
बो, दलितगोव्याति ( शिम है, ण वाप
दा+नि-m+-+य प्रहार का मोर होकर दरिनु प्र.
में । प+न्-४ हो -णि पक्ष में +
१.पिनो URL (१९३)

सदिते मरीयर:
* (ग० सू०) लक्षम्या अच्च । लक्ष्मणः । पिच्छादिभ्य इलच ।
पिच्छिलः, पिच्छवान् ।
५२० । दन्त उन्नत उरच् ५५२५१०६। उन्नता दन्ताः सन्त्यस्य
दन्तुरः।
५२१ । केशाद्वोऽन्यतरस्याम् २१०) फैशवः, फेशी,
प्रङ्गादिति (म० सू०) शोभनाङ्ग विषयक मङ्ग शब्द से मत्वयं में न प्रत्यय
होता है।
प्रया-कल्याणानि (शोभनानि) अङ्गानि सन्ति प्रस्थाः सुन्दर
मङ्ग हैं जिसके)--मङ्ग+न-चीत्वकोषक (प्रा) प्रयप होकर भगना
(स्त्री)।
सम्या--(० मू०)-लक्ष्मी बाबद से मत्वयं में न प्रत्यय होता है और
इसके भन्त को प्रकार हो जाता है।
लक्ष्मण:-लक्ष्मी: अस्पास्ति (लक्ष्मी इसके है. लक्ष्मी वाला)ी+
न-प्रनय (ईकार) को प्रकार होकर लक्ष्य+न+न् को ए लक्ष्मणः । पक्ष
में -- लक्ष्मी+मत+लक्ष्मी+पतुप्-, लक्ष्मीवान ।
पिजिल:-पिछःस्थास्ति (मोग्पप इसके हैं)-पिछ+इलच्~अन्त्य
भकार का लोप होकर पिछ+इल पिच्छिलः । पक्ष में पिन्छ+ मतपू--
पिएशन्।
५२०. गत इति - उन्नतदन्तार्थक दन्त शाद से मत्वर्ष में उरच प्रत्यय
हवा है।
दन्तुर:-उन्नता दन्ताः अस्य सन्ति {चे और इसके हैं, तू)-दन्त+
उप-अस्प भ का लोप दन्त +2र-दन्तुरः।
५२१.शादिति-केश पद से मत्वषं में विशल्प से प्रत्यय
होता है।
रिपणी-सदित प्रकरण मे 'वा' का अधिकार चल ही रहा है।'
१. समाती प्रपमाद वा १३२६ (३३.)

संस्कृतव्याकाणे
फेशिकः, केशवान् । *(वा) अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते ॥ म
*(वा) अरणंसो लोपश्च ।। अर्णवः ।
५२२ । अत इनिठनी २२।११५ । दण्डी। दण्डिकः
इस सूत्र में फिर से 'अन्यतरस्याम्' (विकल्प से) कहने के कारण केश
इनि तथा ठन्' प्रत्यय भी होते हैं। इस प्रकार व, इनि, ठन् मौर
चार प्रत्यय केश शन्द से मत्वर्थ में हो जाते हैं । जैसे-
केशवः, केशो, केशिका, केशिवान--केशा भस्य सन्ति ।केशां
केश+व-केशवः । पक्ष मे-केश+दनि→अन्त्य प्रकार का सोप
इन् - केशिन्, केशी । केश-+-ठन् → को इक् केश+इक्, अन्त्य म'
केशिकः । केश-+ मतप → केशवान् ।
मम्येभ्य इति (वा)-'केश' से भिन्न शब्दों से भी मरवर्थ में व
देखा जाता है।
मणिक:- मणिरस्यास्ति (मरिण वाला, विशेष प्रकार का नाग)--मा
4-मरिणवः।
पणंस इति (या)--प्रर्णस् शब्द से मत्वर्थ में व प्रत्यय होता है -
का लोप हो जाता है।
पर्णव-प्रासि सन्ति प्रस्मिन् (जल वाला, सागर)-प्रणंम् +
लोप-पणं+व+अर्णवः ।
५२२. प्रत इति-प्रकारान्त शब्द से मस्वर्ष में इनि भोर ठन् :
होते हैं, विकल्प से।
दण्डी, दकि:-दण्डोस्यास्ति (दण्ड जिसके है, दण्ड वाला)
दण्ड-+-इनि-दण्ड+इन् →मस्य प्रकार का लोप होकर दण्डिन् प्र•
में दण्डी । दण्ड+ठन्→ को इक-दण्डिकः । पक्ष में हम
दण्डवान।
१. पद इनिठनो ॥२॥१॥ (५२२)

वदिते मत्वर्षीया: ५२३ । ब्रोह्यादिभ्यश्च १२१११६ श्रोही, प्रीहिकः । ५२४ । अस्मायामेघास्रजो विनिः शरा१२१॥ पशाची, यशस्वान । मायावी। बीह्यादिपाठादिनिठनो। मायी। मायिकः । मायावान । मेधावी । स्रग्बी। ५२५ । वाचो रिमनि: ५२११२४। वाग्मी । ५२३.बोहादिभ्य इति-प्रोहि मादि शादों से भी मत्वर्थ में इनि पोर ठन् प्रत्यय होते हैं और मतुप भी। घोही, बाहिक:-प्रीयः सस्य सन्ति धिान इसके है, धान वाला कोहि +इन+भन्स्य का लोप - ग्रोह +इन+प्रीहिन् (ग्रोही) तथा नीहि+ उनको एक तथा अन्त्य ह का सोप होकर बाह+इक-वाहिक: । पक्ष में बोहिमान् । ५२४. असमावेति-प्रमन्त (जिन शन्दों के पन्त में प्रस् हो) सपा माया, मेषा मोर सज पद से मत्वर्थ में विनि प्रत्यय होता है। प्रशस्वोल्योऽस्यास्ति (जिसके या है, पश वाला)-प्रमन्त यशस् शब्द से यशस् + शिनि-- यशस्+दिन+यशस्विन ० एक० मे यशस्वी । एक्ष में यशस+म+मशस्वान् । इसी प्रकार मायास्यास्ति, माया+विनि-मायावी, मायावान् । घा- ऽस्यास्ति, मेधा-+-विनि- मेधावी, मेधावान् । सग प्रस्यास्ति (माला जिसके है, माला यामा) स विनि-जु को ग (चोः कु.), सग+विन्+सग्यो, अग्यान् । ५२५. पाच इति--वाच् शब्द से मत्वयं में ग्मिनि प्रत्यय होता है। वागमो'--वाचोऽस्य सन्ति (वाणी इसके है, प्रशस्त वाणी वाला)--वाच् +मिन्→व को क (चोः कः) तथा ग (अस्त्व) होकर वाग+मित- - -- १. वाम्मी में हो गकार है।

। संस्कृतम्याकरणे ५२६ । मशं मादिभ्योऽच् ५।२।१२१ पर्थोऽस्य प्रशंसः । प्राकृतिगणोऽयम्। ५२७ । महशुभमोयुस् ५।२।१०। अहंयुः अहकारव शुभंयुस्तु गुमान्वितः । इति मरवर्षीयाः ॥१३॥ मथ प्राग्दिशीयाः ॥१४॥ ५२८ । प्राग्दिशो विभक्तिः ॥१॥ दिकरानेभ्य --- पामिन -भागमी। १२६. पान-मसम्मास्मिोक मरवर्ष में प्रच प्रत्यय होता प्रम:-wnlfम मन्ति प्राय (धामी सके है, बोर का मम्++मः। मातfr-- प्राविधानि गण है। ५२७. बहमिनि-पहम् मार गुभम् बरगे भाव में पुग श्यप 'पहार में पाप है और 'गुमम्' शुभ प्र में wr पुत्र में और हमारे हा-परम् (पहार:) पम्याग्नि (पहार पामा--हमन बह+8-0ो अनुसार मु । मी प्रकार 'शुभमस्यानि गुभम् । मिग-मसरोमिन होने से पूर्वी पासा (TAIT) मानबर को अनुमार प्राता(मोनुवार) 0 परिमयी वा ॥१॥ curit: fire II रान है। १२.rritrim in

तद्धित ग्दिशीया
त्यमाणा: प्रत्यया विभक्तिसज्ञा स्युः ।
५२६ । किसर्वनामबहुभ्योऽद्वयादिभ्य: ५।३।२। किमः सर्व-
बहुशब्दाच्चेति प्राग्दिशोऽधिक्रियते ।
२३० । पञ्चम्यास्तसिल ५॥३॥७॥ पञ्चम्यन्तेभ्यः किमादिभ्यः
वा स्यात्।
२३१॥ कु तिहोः ७२।१०४। किमः कु स्यात्तादो हादौ च
परतः । कुनः। कस्मात् ।
-३२ । इदम इश् ५॥३॥३॥ प्राग्दिशीये परे इतः ।
पहले जो प्रत्यय कहे जायेंगे, उनको विक्ति मंज्ञा होती है ।
..फिसर्वनामेति-द्विमादि से भिन्न सर्वनाम, किम् तथा बह शन्द
अप होते हैं) यह "दिकशम्देम्य" से पहले तक अधिकार है।
'पारद भी सर्वनाम है किन्तु यह हि पाहि मे माता है अतः प्रदया-
हने के कारण इससे तसिल् मादि प्रत्यय न हो सकते थे। इसीलिये
या ग्रहण किया है।
पञ्चम्या इति-पञ्चम्यन्त किम् मादि से तसित् प्रत्यय होता है
तमिल मे तस् शेष रहता है।
कुति-किम् को कु हो जाता है तकारादि मोर हकारादि विभक्ति
।
-कस्मात् (किस से) -इस विग्रह मै पञ्चम्यन्त किम् शम्द से तमिन्
है। किम् +इस+तस् इस दशा मे प्रातिपदिक सज्ञा (कृतदित.
होकर सुर (इसि) का लोप (सूपो षातुप्रातिपदिक्यो.) हो जाता
-सिल्-+किम् को कु भादेश होकर कु+तस्-स् को विसर्ग-
कस्मार।
-(1) प्राग्दिशीय प्रत्ययों से बने अध्यय' होते हैं ।
त् मादि प्रत्यय पञ्चम्यन्त मादि मुरन्त शरदो स जैसा होते हैं,
बवासर्वविमति ॥३॥

३२०
सस्कृतव्याकरणं
५३३ । (एतद:) अन् ५॥३५॥ एतदः प्राग्दिशीये।।
लत्वात्सर्वादेशः । श्रतः। अमुतः। यसः । ततः । यहुसः द्वप।
द्वाभ्यामा
कि दिखलाया गया है (किम् +ऽसि+तस्)। सुप् का लुक् हो जाता है ।
प्रयोगों में भी यह प्रकिया समझनी चाहिये ।
५३२. इवमिति -प्राग्दिशीय प्रत्यय परे होने पर इदम् को इस मा
जाता है । इश् में इ शेष रहता है । शित होने से यह समस्त इदम् के र
होता है।
इत:-प्रस्मात् (इमसे) सर्वनाम 'इदम्' शब्द से तसिल प्रत्यय होकर
+तस्+इदम को इश् होकर + तस्- इतः ।
५३३. पम् इति--प्राग्दिशीय प्रत्यय परे होने पर 'एतर' को मन् ।
हो जाता है।
भनेकाल्वादिति-अनेक वर्णों (पल) वाला होने से 'मन' प्रादेश स
"एतद' के स्थान में होता है। (मन में 'म' तथा न पो पर्याद पनेक वर्ण
जो प्रादेश भनेक वर्णों वाला या शित् (जिसमें श् को इत्संगा हो जैसे '
घर') होता है, वह सम्पूर्ण स्थानी के स्थान पर हुमा करता है (मनेकाहिं
पंत्य ११।१५)।
प्रत:-एतस्मात् (इससे)-एतद् + तसिल-एतरको 'मन्' प्रादेश
+सस-२ का लोप-प्रतस्-प्रतः ।
प्रमुतः-ममुष्मात् (उससे)-प्रदस+तसिल-मस+त+म को
तथा पूर्व प्रकार का पररूप' होकर प्रद+तस इस दशा मै दकार से।
पाले प्रकार को उकार तथा दकार को मकार' होकर प्रमु+तस्→ प्रमुगः।
पतः-यस्मात् (जिससे)-यद्+तसिल-यद् +तस+को मक
तथा पूर्व प्रकार का पररूप' य+ठम् +यतः । इसी प्रकार तस्मात्
-तनः। यहो.. बहन-तसिल-बहुतः ।
१.मोपः प्रातिपदिकान्तस्य राम - २. स्पानामः ॥१.२
३. पो गुणे II
४.परसोऽमदिरोमः सारा

वदित प्रान्शिीयाः १२१ ॥ ५३४ । पर्यमिभ्यां च ५॥३६ आभ्यां तसिल स्यात् ! सर्वो- यार्थान्यामेच, परितः, सर्वत इत्यर्थः । अमितः, उभयत इत्यर्थः । ५३५ । सप्तम्यास्त्रल् ॥१०॥ कुत्रा यत्र तत्र । बहुन । ५३६ । इदमोहः ॥११॥ त्रलोऽपवादः । इह । दूपादेरिति-हिमादि सर्वनाम शब्दोस प्राधियीय प्रत्यय नही हाते तएव शिन से पश्चमी में 'दाभ्याम्' ही बनता है, दूसरा तसिस रूप ५३९. पर्यभिम्पामिति--परि और पनि से ससिल् प्रत्यय होता है । परित-सवंतः (सद पोर से) परि+सिलारितः इसी प्रकार निव-वनयतः (दोनों पोर से) अभि+तसिल । ५६, सप्तम्या इति--सप्तभ्यन्त कम मादि से वर प्रत्यप होता है। कुत्र-मिन (किसमें, कह!)-भि शब्द से बल् प्रत्यय होकर किम् +२.रिम को कुपादेश (तिहो: ४२११०४) कुत्र। इसी प्रकार यस्मिन् जिसमें, बही), यदल-पत्र, पस्मिन (उसमे, वहाँ) त+प्रल तक, बहु बहुतों में) बह ++बहन। टिप्पणी-यत्र, सत्र मे यद, त के को प्रकार तथा पररूप' मठः, के समान होता है। १६. सम इति-सप्तम्यन्त इदम् बन्द से है प्रत्यय होता है। यह पशायर का नाम है। ह-अस्मिन् (इसमें यहाँ)-दम् शद से ह परयय होकर इदम् । म् का हर पादेश (हम् II) होकर+हह । टिणी तरह से बत् प्रत्यय होडर एउद को मन् सर्वादेश होता है दबनता है। १.वरनाम:.1111०२. २. पठा गुणं ६

३२२ ]
संस्कृतम्याकरण
५३७ । किमोतु ॥३॥१॥ पाइणमपकृप्यते । सप्तम्या
किमोऽद्वा स्यात् । पने प्रल ।
५३८ । क्वाति १.५॥ विमा क्यादेशः स्यादति । य
५३६ । इतराभ्योऽपि दृश्यन्ते ।।३।१४६ पयगोसप्तमी
विभक्त्यन्तादपि तमिलादयो रश्यन्ते । इशिग्रहणाद्भषदादियोग
म मवान् । सतां भवान् । तत्र भयान्तं भवन्तम् सतो भवन्तम।
रिमति-मातम्पन्न मन से प्रापय होता है कि
में, पक्ष में होता है।
घामहलमिति-पत्रिम गुर वाहपमि' से 'का'
पाच यिा मार्गात का' को कार की भोर सीप रियाना
(मी में ful हाना है)।
५.६. स्वातीति- कोका' पाश होता है प्रयर
होने पर
भ
-frमम् (गि, 4t-f+at+
मिका
होरस-4 पोर्ण मे परमा होकर पल में किम+91-
(प).
सराम्य इति-पगो और मातमी से भिन्न full
श्रीमपाशाने।
हरिप्रसादति-चिनु मायने) प्राण में 'ना' प्रालि
र में हीमोभिप्राय पर frant
frarxaagat मा ही प्रय
भाषा बरेना समाया पार
भान, हर मवानाम(
ment बो-
पर।
पानमा भबनम (m.)..

तन्तेि प्राग्दिशीयाः
[ ३२३
भवन्तम् । एवं दीर्घायुः । देवानां प्रियः । आयुष्मान् ।
५४० । सर्वकायकियत्तदः काले दा ५॥३॥१सप्तम्यन्तेभ्य
कालार्थेभ्यः स्वार्थे दा स्यात् ।
५४१ । सर्वस्य सोन्यतरस्यां दि ५३१६। दादी प्राग्दिशी
सर्वस्य सो वा स्यात् । सर्वस्मिन् काले सदा । एकदा अन्यदा। कदा
या। तदा। काले किम् ? सर्वत्र देशे।
के योग मे द्वितीयान्त तद् शन्द से तमिल और प्रल् प्रत्यय होकर ततः, तत्र
बनते हैं।
एवमिति - इसी प्रकार दीर्घायुः, देवानाप्रिय तथा पायामान शब्दो के
मोग में भी; जैसे-~स दीर्घायुः, इस प्रथं मै ततो दीर्घायुः, तत्र दीर्घायुः प्रादि
का प्रयोग होता है।
५४०. सर्वकेति-सप्तम्यन्त कालबोधक मर्व, एक, प्रन्य, किम्, यद् पौर
तद् शन्नो से स्वायं मे दा प्रत्यय हावा है।
५४१. सर्वस्येति - सर्व शब्द को शिकल्प से समादेश होता है । प्राग्दिशीय
दकारादि प्रत्यय परे होने पर।
सदा सर्वदा-सर्वस्मिन् काले (सब समय में)- इस विग्रह में सर्व शब्द
से दा प्रत्यय होता है-सर्व+दा-सवं को विकल्प से सपादेश होकर सदा,
पा में सर्वदा। इसी प्रकार एकस्मिन् काले (एक समय) एकदा। पन्यस्मिन्
पाले (अन्य सम्प) अन्य।
कदा-कस्मिन् काले (किप्त समय, कर)-म्+िदा-पिम् को
कमादेश'क+दा-कदा।
यदायस्मिन् काले (जिस समय, बब)-~यद्+दा 'त्यादीनाम:' से
दको पौर 'पतो गुरणे' से +4 को पररुप होकर या। इसी प्रकार
तस्मिन् काले (उस समय, सर) तद+दातदा।
१. किमः कः ॥१०॥

३२४ ] संस्कृतमकरणे ५४२ ॥ इदमोहिल श३।१६। सप्तम्यन्तात् । काले प्रत्येक ५४३ । एतेतो रथोः ५.३।४। इदम् शब्दस्य एत् इत् इत्या स्तो रेफादो यकारादौ च प्राग्दिशीये परे। अस्मिन्काले रतहि । किम ! इह देशे। ५४४ । अनद्यतने हिलन्यतरस्याम् ५।३।२१ कर्हि, कर यईि, यदा । तर्हि, तदा। काले किमिति-काल अर्थ मैं दा प्रत्यय होता है यह मयों का इसलिये कि सर्वस्मिन् देवो+सर्वत्र । यहाँ देश अर्थ है इसी से दा नहीं । मपितु 'बल' प्रत्यय होता है। ५४२. इदम इति-काल-पर्थ में विद्यमान सप्तम्यन्त इदम् शरद 'से" प्रत्यय होता है । हिल में हि शेष रहता है। ५४३. एतेतौ इति-इदम् शब्द को एत तथा इ देश हो जाते क्रमशः रेफादि (जिसके मादि मे र= रेफ हो) तया यकारादिप्रागिरीय पर परे होने पर। एतईि-पस्मिन् काले (इस समय, मब)-इदम् + हिल रेफादि पर परे होने से इदम् को एत प्रादेश होकर एत+हि→ एतहि । टिप्पणी-इदम् शरद इस मयं मे 'धुना' और 'इदानीम्' शब्द निते हैं। धाले किमिति-इदम् सन्द से राल में हिल प्रत्यय होता है पहब हा? इमलिये कि मस्मिन् देशे (इह देशे) यहाँ हिल नहीं होता अपितु । त्यप ५४४. अनियतन इति-पनपतन (जो माज का न हो) काल-विषय 'मादि सम्पन्न शब्दों से विकल से हिल प्रत्यय होता है। कईि, कदा-कस्मिन् काले (किस समय, कंद)-+ मिक स्थान पर'क' होकर कहि । पक्ष में किम+दा-कदा । . होता है। ....

तद्धिते प्राग्दिशीयाः ५४५ । एतदः ॥३॥५॥ एत इत् एतौ स्तो रेफादौ थादौ प्राग्दिशीये । एतस्मिन्काले एतर्हि । ५४६ । प्रकारवचने थात् ५५३१२३॥ प्रकारवृत्तिभ्यः किमादि स्थान् स्यात् स्वार्थे । तेन प्रकारेण तथा । यथा । ५४७ । इदमस्थमः ५५३।२४। थानोऽपवादः । -इसी प्रकार य+हिल-+यहि । तद+हिल-ताहि । पक्ष में ५४५. एतद इति-एतद् शब्द को एत, इद ये दो आदेश होते हैं, क्र- रेफादिौर कारादिप्राग्दिशीय प्रत्यय परे होने पर। टिप्पणीमन् (५३३) तथा एतदः (५४५) ये दोनों सूत्र पष्टाध्यायी एक सूत्र के ही रूप में (एतदोऽन् ५।३६५) हैं । काशिकाकार तथा भट्टो दीक्षित (मि को०) इस मूत्र में योग विभाग करके ही दोनों अर्थ निकालते किन्तु लघुकीमुदोकार दरदराज ने इन्हें दो सूत्रों के रूप में ही रख दिया। एतर्हि-एतस्मिन् काले (इस समय, प्रब)--एतद् +हिल-एतद् को पादेश एत+हिएकहि । ५४६. प्रकारचचन इति-प्रकार प्रर्ष में किम् मादि शब्दों के प्रत्यप होता है, स्वार्थ में। टिप्पणी-सामान्य के भेदक (विशेषक) को प्रकार कहते हैं। देवदत किस दशा (विशेष) मैं है । इस जिज्ञासा में क्पं देवदत्तः? यह होता है। तथा-तेन प्रकारे (इस प्रकार से, बंता)~ -शम्द से पाल्प होकर पूर्वोक्त प्रकार से नद केदको प्रतपा पहले म को पररूप होकर इमी प्रकार येन प्रकार (जिस प्रकार से, वैसा) यद+पाल+या। ५४७. इदम इति-प्रकार प्रयं में इदम् -शब्द से थमु प्रत्यय होत (स्वार्य मे)। यह पान प्रत्यय का गाएक है । यमु में 'एम्' घेष रहता है। ।

प्टनरपयहाई.मरमें सम्पाय - संस्कृतध्याकरण (वा) एतदोऽपि वाच्यः । अनेन एतेन वा प्रकारेण इत्यम् ५४८ । किमश्च ॥३२५. केन प्रकारेण कथम् । इति प्राग्दिशीयाः ॥१४॥ . प्रय प्रागिवीयाः ॥१५॥ ५४६ । अतिशायने तमविण्ठनो ५३।५५ अतिशयविशिष्टा वृत्तः स्वार्थे एतौ रतः । अयमेषामतिशयेनादयः-पाहयतमः । पतद् इति (वा)-प्रकार पर्थ मे एतद् शम्द से भी यमु प्रत्यय होता है । त्यम्-प्रनेन प्रकारेण (इम प्रकार से, ऐ)-इदम् +थमु+ थम् -- या प्रत्यय परे होने मे इदम् को इत' होकर + पम् -- इरयम् । मी प्रार एनेन प्रसरण एतद+पमु-एतद् को तइत्यम् । ४४८ फिमश्चति-प्रागर्थ में किम् गम से भी चमु प्रत्यय कथम-रेन प्रकारेण (किम प्रार, कमे)-किम् +थमु-कम को ' पनि प्राग्दिशीयाः ॥१४॥ भयपीया:~या में मेहर इवे प्रतिकृती 110 में पहले त प्राप्तिरीय (आर.+ra+ti) रहमाने हैं। पर उनका पाल - ২. সিযন সি-রশিদহ ই বিমান দেই । हो. fameraनों में सर्व सिमाना होता है तो . N २. एer. tu (m) वदिते शमिवीया: लघुतमः । लघिष्ठः। ५५० । तिङश्च २३३५६ तिहन्तादतिशये द्योत्ये तमप् स्यात् । ५५१ । तरपतमपी घः १११२२। एतौ घसंज्ञा स्तः । ५५२ । किमेतिडव्ययधादाम्बद्रव्यप्रकर्षे ५। ४ ११ । किम एदन्तात्तिहोऽव्ययाच्च यो घरतदन्तादामु. स्यान्न तु द्रव्यप्रकर्षे । किन्तमाम् । प्रातमाम् । पतितमाम् । उच्चैरतमाम् । ग्यप्रकर्षे श्राढ्यतमः-भयमेषाम् अतिशयेन माढ्यः (यह इसमै पषिक पनी है)- इस विग्रह मे पादप गम से तमा प्रत्यय होकर भाड्य+तम पादपतमः। लघुतमः लघिष्ठः-मयमेषाम् अतिशयेन लघु (यह इनमे सबसे छोटा है)-लघु- तमपलघुतमः । लघु + इष्ठन् -+टि प्रदि उ का लो।' लम्- इष्ठ-लपिष्ठः। ५५०. तिडश्चेति--तिहन्त शब्द से भी मतिशय प्रकट करने के लिये समए प्रत्यय होता है। ५५१. तरप इति--तरप और तमप, प्रत्ययों की प संज्ञा होती है। ५५२. किमेद् इति-किम्, एकारान्त, सिडन्त और भव्यम से परे लोग (तरप, तम) तदन्त से मामु प्रत्यय होता है, किन्तु द्रव्यप्रकर्ष मे नहीं। किन्तमाम्--निम्+तमप भाम् प्रत्यय होकर किम् + तम+पा+ तम के अन्य प्रकार का लोप (पस्येति १) होकर किन्तमाम् । प्राइतमाम् (बहुत मध्याह्न) एतन्द प्राहे शब्द से समप, प्रत्यय होकर उससे परे 'माम्' प्रत्यय, प्राहृतमाम् । पचतितमाम्-प्रतिशत पचति (बहुच भन्या पकाता है)-पति+मा +माम् →पचतितमाम् । १. टेः ६१५५) इष्ठन, इमनि मोर ईयसुन् प्रत्यय परे होने पर भसंज्ञक की टिका लोप होता है।

प्रयदक्षि-परभराप्रा दियागामो
4.14...+xeffounा
उपमनगारतिशगेन लगुर्लनर, लघीयान् । उदीच्याः प्रायो
संस्कृतम्याकरणे
५५३ । द्विवचयिभन्योपपो तरयीयसुनो ५२:५३॥ इय
रेकग्यातिशय विभपव्ये पोपपदे मुप्तिान्तादेतो स्तः। पूर्वयोरपार
३२८ ]
सुच्चीतगरतरु ।
परमाम--पनि गरेन उन्धः (गा पेपर) उत्पैम -: 47, 1
.. मा।
दि-RRIAL पय होते है।
HTTARAMETHI) Antr (or)
artime.TATTERetrorani
h
-
..
r" mm..

सद्धि प्रागिनीयाः [ २६ पटुतरा, पटीयांस। ५५४ । प्रशस्यस्य श्रः५३६० अग्य मादेश ग्याद नायो परतः। ५५५ । प्रकृत्येकाच् ६ ४११६३। इठादिग्वेकाच प्रत्या म्यान ६ श्रेष्ठः, श्रेयान् । ५५६ । ज्य च ५२०६१। पशम्यम्य व्यादेश ग्यान इठेयसो । ज्येष्ठः। पटुतराः, पटीयांस.-नीच्या प्राच्येय अनिशयन पटव. (उन्नर 4 निवासी पूर्वी लोगो से अधिक चतुर है। यहाँ प्राच्य' मे विभाग (भः दिखाना है, अतः पटु गब्द मे नरप पोर ईयसुन् प्रत्यय हान है- पद का . पटुतरा । पटु+ईयसुन् --पटीयन पृ० प्र० बह० मे पीस | टिप्पणी-तमप मादि प्रत्यय विशेषरण शमा गे होते हैं प्रन Rife प्रत्यय वाले शब्दो के रूप तीतो लिङ्गो मे बनने है जैम (पु) घनम , (मपु०) लघुतमम् स्त्री०) मधुनमा। (पु.) लोयान, 'न :) नघीय (स्त्री. सधीयमी। ५४४ प्रशग्यम्येति--प्रशम्य को ' माग होना , मगर (प्टन, ईयमुन् प्रत्यय परे होने पर । ५५५. प्रकृत्येति-टन् प्रादि प्रत्यय पर हाने पर एकाच जिममे 15 पत्र या स्वर हो) को प्रकृतिभाव होता है पर्थात् टि लोप नहीं होता। भेष्ठः-पय एषाम् भतिशयेन प्रशस्य (यह इन मधिन प्रशमनीय है)-प्रास्य +प्टन -प्रशस्य को ५ मादेश होकर नए+टि लोरमन होने पर प्रकृति भाव होकर ध+ इष्ट-थोष्ठ । भयान्-अयम् प्रनयो पतिशयेन प्रशस्य (यह इन दोनो में अधिक प्रबंधनीय है।-प्रशस्य + ईयसुन् --+ ईयस् • श्रेयस् , पु. चमा र. १५. म पेति-प्रशासन देत होता. छिन् को मुन जपान् ।

३३० ]
सस्तव्याकरणे
५५७ । ज्यादादीयसः ६१६। (ज्यादुत्तरस्येयम्
रादेशः) आदेः परस्य । ज्यायान् ।
५५८ । बहोर्लोपो मूच वहोः ६४४१५८ बहोः ५
लोप: स्यात् वदोश्च भूरादेशः । भूमा । भूयान् ।
प्रत्यय परे होने पर।
ज्येष्ठः-प्रणम् एषाम् भतिशयेन प्रशम्यः (यह इनमें मधिः
है) प्रशस्य+इष्ठन् →ज्य + इष्ठ→ प्रकृ'तभाव तथा गुण ।
ज्येष्ठः।
५५७. ज्याद् इति-ज्य से परे ईयस् को प्राकार मादेश होत
श्रादेरिति-मादेः परस्य १।२०५१। सूत्र के अनुसार आर वह
ईपस् के यादि (ईकार) का होता है ।
ज्यायान्-प्रथम् मनयोः अतिशयेन प्रशस्यः (यह इन दोनो
प्रशसनीय है)-प्रशस्य+ ईयसुन् प्रशस्य को ज्या भादेश होक
ईयस्- ईयस के पादि (६) को मा होकर ज्या+मायस-- ज्या
प्र. एक० मे ज्यायान् ।
५५८. बहोरिति-रह से परे इमनिच पोर ईयसुन् प्रत्यय (फे
का मोर होता है और बहु को भूपादेश हो जाता है।
भूमा-बहोर्भाव: (बहुत्व, बहुतायत)-वह शद मे
इमनिच प्रत्यय होकर बह+इमन-इमन के ह का लोप तथा
पादेश होकर भू+मन-(०) प्रथमा एक० में-भूमा।
भूयान-प्रयमनयोः पतिशयेन बहः (दो में अधिक)-
ई-सुनह+ईयस-+यस् के पारि (ई) का सोप या बह
....।' परिमापा सूत्र के अनुसार मादि।
भा
इमनिग्या ११२

तदिते प्रागिवीया:
३३१ ]
५५६ । इष्ठस्य यिट् च ६४१५६) यहोः परस्य इष्ठस्य लोप
येडागमश्च । भूयिष्ठः।
५६० । विन्मतोलुक् ५।३।६५ निनो मतुपश्च तुक् स्यादिप्ठे.
। अतिशयेन स्रग्वी सजिष्ठः, सजीयान् । अतिशयेन तवान्
, त्वचीयान् ।
५६१ । ईपदसमाप्तो फल्पब्देश्यदेशीयरः ॥ ३॥६६॥ ईपदूनी
: विद्वरकल्पः । विद्वद्देश्यः । विद्वद्देशीयः । पचतिकल्पम् ।
होकर भू+यम-भूयस् पु. प्रथमा एकवचन मे भूगन् ।
(RE. इष्ठस्येति-बह से परे इप्टन (के मादि) का साप होता है तथा
पंट ना पागम होता है। (भूपादेश भी होता है) पिट् में यि शेष रहता
53 के मादि में माता है।
भूयिष्ठः-प्रयम् एतेषाम् पतिणयेन बर: (यह इनमें सबसे अपिल)-
प्ठिन्मलोर तथा बहनोभूपदेश होकर भू+8--यि (पिट्)
मागम होकर भू+दि+8-भूविष्ठः ।
५६०. चिन्मतोरिति-चिन और मतुप् प्रत्यय का भोप (मुर) हो जाता
प्ठन और यमुन प्रत्यय परे होने पर।
सजिठः-पतिशयन सम्यो (अत्यधिक माला बाला) अग्पिन्'+
न-विनामोप होकर सतष्ठि-सजियः।
सजीयान्-प्रयमनपोः भविमरेन अग्यो (यह इन दोनों में पक्षिक मामा
सा है) सरिर+यसुन-दिन का मोर नमीयस्-प्रमोशन् ।
त्वचिठः-पतिशयेन तसा (पषिक स्वरा पाना)-सम्पार
पष+म+रष्टन-मदु का सोर होकर स्वषिष्ठः सोप्रार दान
+पमुन्-स्वकीयस्-सीमान् ।
११. ईषदिति-दुध पूरी (दिसमाप्तिहर)- में दिमाग
पन्त और विनों के कारण, देर और देवी प्रत्यय होते है।
१.मायापासोनि. २१

२३२ ] संस्कृतम्याकरणे ५६२ । विमापा सुपो बहुच पुरस्तालु ३५८ ईपदस माप्तिविशिष्टेऽर्थे सुबन्ताद्वहुचा स्यात्स च प्रागव न तु परतः ईपदूनः पटुर्वहुपटुः । पटुकल्पः । सुपः किम् ? यजतिकल्पम् । .५६३ । प्रागिवात्कः ५३७०। इवे प्रतिकृतापित्यतः प्रा. काधिकारः (इनमें क्रमशः कल्प, देश्य मोर देशीय प रहता है) ईपद् प्रथमालि शब्द व मर्थ-है घोड़ी सी अपूर्णता, कुछ कमी । विद्वत्कल्पः-ईपटूनः विद्वान्, (कुछ कम विद्वान्, विद्वान् सा)-विद +अल्पप्स् काद' तथा 'होकर विद्वत्वा । इसी प्रकार विद्वस् + देश्य विदद्दे पयः । विद्वर + देशायर्-विद्वद्द शोयः । पचतिकल्पम्- ईषत् पचति ।कुछ कम पाता है, पकाता सा है तिहात पचति शब्द से कल्पप् प्रत्यय होकर रूप बाता है। ५६. विभापति-ईपदसमाप्ति विशिष्ट मषं में विद्यमान सुबन्त शाम प्रत्यय विकल से होता है और वह शन से पहले होता है परे नहीं (बहुच में बहु शेष रहता है)। धडपटुः-पटूनः पटुः (कुछ कम चतुर, चतुर सा}-यहुच + पटु- +पटु→वपटुः । पक्ष में कल्पप् मादि होकर पटुाल्प: मादि । मुपःकिम-मूत्र में सुरः क्यों कहा। इसलिये कि बहुप प्रत्यय बन्द में ही होता है विहन्त से मही, इसी से 'यति', से यहुप, प्रत्यय नही होता क्योकि यह विन्त है । पराप मादि प्रत्यय होकर यजतिरम् गा कर होते है। .५६३. प्रागिति-इवे प्रतिकृती १६ रा (पूर) मे पहले तक धिर है। - शक्ति प्रागिकीयाः ५६४ । अध्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक् टे: ५।३७१। कापवादः श्चेत्यनुवर्तते। ५६५ 1 अज्ञाते ५३.७३॥ कस्यायमश्वोऽश्वकः। उच्चकैः । कैः । सर्वके । (श) श्रीकारसकारभकारादी सुपि मर्चनाम्नष्टेः का अन्यत्र सुधातस्य । युष्मकाभिः । युवकयोः स्वयका । ५६४. अव्ययेति-प्रब्यय पोर मर्वनाम से प्रकच प्रत्यय होता है। पवीय पयों में और वह टि मे पूर्व होता है । (प्रकच मे पक शेष रहता यह क प्रत्यय का अपवार है । यहाँ "तिका' को अनुवृति पाती है अर्थात निम्न में भी होता है। ५६५. अज्ञाते इति~ज्ञात मधं में यपोक्त कनपा चकच प्रत्यय टिप्पणी-'मज्ञाते' पादि सूरी में केवल पर्ष निवेश किया गया है । इसके यपिछले दो सूत्रों को एकवाक्यता होकर पूर्ण अर्थ होता है। प्रत. मात्र यह ~पमान पथ में प्रयम, सर्वनाम तथा तिदन्त को १८ से पूर्व प्रक' प्रत्यय 'ता है तथा प्रोष मतों से 'क' प्रत्यय । 'अश्वक:-मातोश्य प्रति कस्यायमानः इति न मन: (प्रभास घोडा ति यह किसहा घोड़ा है इसका पता नहीं-इस पर्व में प्रसाद से क त्यय होकर पव+क+: सरच--तम उच्च: (मनात म दिग्रह में उन शन्न । अषय होने के कारण टि (एस) से पूर्व पञ्च प्रत्यय होता है। उन्+ +ऐस-उरकः । इसी प्रकार मातं नौवः (प्रजात नीचा) भी+भा इस+मीच। सर्वके-प्रजाता: सर्वे (प्रजात सब)--सर्वनाम 'स' मन्द है Eि (4) से पर प्रत्यय हाकर सर्व +पा+ए+सर्वके रूप होता है। ओकारेति-रिस सुप, (विरक्ति प्रत्यय) के प्रादि में प्रो, का हो, सिके परे होने पर सर्वनाम कोटि में पूर्व एक होता है, पम्पत्र हुन्छ की Eि । पहले।

१४ ]
संस्कृतम्याकरणे
५६६ । कुत्सिते ५।३।७४. दुत्सितोऽश्योऽश्वक
५६७ । किंयतदोनिर्धारणे द्वयोरेकस्य :
अनयोः फतरी वैष्णवः । यतरः। ततः ।
युप्मकाभिः-मनातः युष्माभिः (तुम पज्ञातों ने)- इस
सर्वनाम मे मकारादि (भिस्) प्रत्यय परे है इसलिये युष्मद् के
पहले मकच हो जाता है। युष्म++पद+भिस्+युष्य
को मा' तया सवर्ण दीर्घ होकर युष्मकाभिः ।
टिप्पणी-यदि युष्माभिः (सुबन्त) में टि (इस्) से पूर्व "
मनिष्ट रूप होने लगता।
युवकयोः-प्रज्ञातयोः युघयोः (मज्ञात तुम दोनों का)-
भोकारादि (पोस्) प्रत्यय परे होने पर सर्वनाम की दि से पूर्व मन
'युव+प्रक+म+मोस्→ युवकद+प्रोस् --द'- क्य
त्वयका-मज्ञातेन त्वया (प्रज्ञात तूने)-या भोकार,
भारादि प्रत्यय परे नहीं प्रतएव सुवन्त त्वया कोटि (प्रा) से पूर्व
है। त्वय+म+मा+श्यका।
५६६. कुत्सित इति-कुत्सा-विशिष्ट मर्थ में विद्यमान पार
(क तथा प्रकच्) प्रत्यय हाते हैं।
अश्यकः कुरिसतोऽश्व: (निन्दित घोड़ा)-प्रव+-+
५६७. किंयत्तदोरिति-दो में से एक का निर्धारण करने में
मोर सद् से इतर प्रायय होता है । हतरच में पतर शेर रहता है।
कतर:-प्रनयो:: sms: ? (इन दोनों मे कौन है
हद रो तरच प्रत्यय होकर निम+मगर-म् (दि) का मो
सर-तरः । इसी प्रकार समयोयः (इन दोनों में से जो) मा

तद्धिते प्रायिवीयाः [ ३३५ ५६८ । वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने डतमच ५७३।६३। वहूनां कस्य निर्धारणे इतमज्या स्यात् । जातिपरिप्रश्न इति प्रत्याख्यात- । कतमो भवतां कठः। यतमः । ततमः। वाग्रहणमकजर्थम् । इति प्रागिवीया: ॥१॥ नियोः सः (इन दोनों में से वह) तत+डतर --ततर। ८. वा बहूनामिति-बहुतों में से एक का निर्धारण करने में किम्, सद् मे उतमच् प्रत्यय होता है। इतम का प्रतम शेष रहता है। नीति-जातिपरिप्रश्ने' इस शर का साकर (भाष्य) मैं प्रत्याख्यान किया गया है अर्थात सूत्र में इस पद की कोई प्रावश्यकता नहीं। R:-कः भवतां कठः ? (कोन माप में +8 शाखा का है)- नमच +कतम । इसी प्रकार यो भवत'म्, यतमः । स भवताम्, हमिति-सूत्र में 'वा' या ग्रहण प्रकच के लिये किया गया है। कल्प से पबच प्रत्यय होता है। --यः भवताम् (माप मे से जो) सहारादि (पद्+मु) प्रत्यय पर होने सर्वनाम की टि (भद) से पूर्व प्रकच् प्रत्यय होता है। म+म+ •यकद + सुद को 'म तथा पहले को पररूप होकर यक+ । -स भवताम् (पाप में से वह) त+सुकद्+सु+तक+ स' होकर+सक+स्-सकः । इति प्रागिनीयाः ॥१५॥ स सावनन्ययोः ४२११०६ संशय्याकरणे प्रय स्वायिकाः ॥१६॥ ५६६ । इवे प्रतिकृती ५२३६६ कन् स्यात् । प्रतिकृतिः अश्वकः । *(वा) सर्वप्रातिपदिकेभ्यः स्वाथै कन् । ५७० । तत्प्रकृतवचने मयट् ५.४।२१। प्राचुर्येण प्रस्तु तस्य पचनं प्रतिपादनम् । भावे अधिकरणे वा ल्युट् । आद्य - अथ स्वार्थिकाः-मब स्वापिक प्रत्यय मारम्भ होते हैं। ५६६, इव इति-सदृश इवा) मर्य में विद्यमान (मर्याद वाची) प्रातिपदिक से कन प्रत्यय होता है । यदि प्रतिति (मूर्ति मादि होता है। यहाँ उपमानवाची शब्द से प्रत्यय होता है और प्रत्ययान्त शर लिये माता है किन्तु वह उपमेय मिट्टी, काष्ठ यादि से निर्मिन प्रति पाहिये। अश्वकः-मश्य इव प्रतिकृतिः (मात्र समान मूति)-प्रय भश्यकः। सर्पति (वा)-सब प्रातिपदिकों से स्वार्थ में गन् प्रत्यय होता है अश्वकः-प्रश्व एव (पोड़ा ही) भव+--प्रश्वक स्वार्थ में होने पर अयं में कोई प्रन्तर नहीं होता। पावः मोर मानक.का पर्य है। ५७०. तत्मातवचन इति-पपमान्त सम से प्रभुरता-गोपन प्रत्यय होता है। प्राचुर्येणेति-मूत्र में प्रा अर्थ है--प्रता से प्रार गया । उमापन-कपन या शेष राना। मन न (प. माय में या प्रधिकरण में स्यूट प्रत्यय होकरता है। पापा को भार मानते हैं तो मयट या उमी वायुको प्रतिमा कोर कसा परमे मय होता है। पर मे परिणी मात्र) द्रविते स्वारिकाः अन्नमयम् । अपूपमयम् । द्वितीये तु-अन्नमयो यज्ञः, अपूपमयं पर्व। ५७१। प्रज्ञादिभ्यश्च १४१३८ अए, स्यात् । प्रज्ञ एव प्रासः। प्राशीस्त्री।देवतः। बान्धवः । ५७२ । बह्वल्पाच्छस्फारकादन्यतरस्पाम् ।।४।४२।। तो जिस मे किसी वस्तु को घिरता है उसे प्रकट करता है । जैसे-पहले मधे में (भाव स्पुट मानने पर)- मन्नमयम्-प्रकृतमम् (पन्न की भविस्ता)--पन्न + मयट +पन्न- मयम् । इसी प्रकार प्रतोपूपः-(पूड़ों को मधिरता) अपूप+ मयट मधूप- मयम्। दूसरे मे (पधिकरण ल्युट मानने पर)- भन्नमयो यज्ञ:-प्रवृतभन्न यस्मिन् (जिसमे पन की अधुरता हो ऐसा बस)-मन+मयटरमय:, यह यज का विशेषण है। इसी प्रकार प्रता: अपूपाः यस्मिन् (जिसमें पूड़ो को प्रचुरता है ऐसा स्यौहार) पपूपमय पर्व । ५७१. प्रोति-प्रङ्ग भादि शादी से स्वायं मै भए प्रमय होता है। प्राज्ञ:-प्रज एव (पण्डित)-प्रग+ प्रणमादिदृष्टि को पा प्रायः। प्रान+सीप १६)+पर लोप प्राश +-+प्राशी स्त्री। मग प्रत्ययान्त से स्त्रीलिङ्ग मे रोप प्रत्यय होता है।' देवतः-देवता एवं (देव)-देवता+पण -पादिवृदिएको ऐ तथा पन्य पार का सोपवतः। बान्धवः-बाधुरेव (शु हो वाधव है)-ग+पण,-मादिति शेमा तपाइको गुरु' पो होहर पो को भव हो पाता है- बाप. ४७२. बहल्पार्थादिति-गिनका भयं बहु या भर है। ऐसे कारक जमों से कार्य में स. प्रत्यय होता है, दिया। t. रिराष.11॥ २. मोगुण: Aru

.....
बहूनि ददाति बहुशः । अल्पशः । ॐ (वा) घायादिभ्यर
ख्यानम् ॥ आदौ आदितः। मभ्यतः। अन्ततः पृष्ठतः
श्राकृतिगणोऽयम् । स्वरेण, स्वरतः । पर्णतः ।
५७३ । कृन्वस्तियोगे सम्पद्यकर्तरि विः ॥४॥५
(वा) अभूततद्भाव इति वक्तव्यम् ॥ विकारात्मतां प्राप्नुन
यहुश:-- बहूनि याति (बहुत देता है)-at बहभागमा
पमं कारक है इससे शास प्रत्यय होकर बह+शमशः।
प्रत्यानि दानि, पप+शस भागः ।
आयादिभ्य इति (या)-'मामि' प्रभृति शम्दो गि
पाहिये । यह तसि सर विभक्तियों के प्रपं में होता है । (मानविहिन
पादितः-मारी (प्रापि मे)-पाr+ai →ाति: । इम
मानामादि।
पानीति-या (HEET) मा म वाम Part
म वालिम प्रयवहाना
परत:'-रेण (at)नीवार्थ में हम gif सी
पग-47
रिप-मम और तमि RA
(Infrarमम् ) MITRA पास।
१३. दलियांगन-hen on कामी
(reeta Kara h (4) Anar में
tu.५, बाम
गि (1,Yaminat:- TANTAN (ter

तद्धित याषिकाः वर्तमानाद्विकारशब्दात स्वार्थे विर्वा स्यात् करोत्यादिमियोंगे। ५७४ । अस्य च्यौ ०४:३२अवर्णस्य ईत्यात् च्वो। वेर्लोगः। ध्वयन्तत्वादव्ययत्वम् । अहणः कृष्णः सम्पद्यते तं करोति कृष्णी- करोति । भलीभवति । गगीस्यात् । * (वा) अव्ययस्य च्वावीत्वं इस वातिक को मिलाकर ही ऊपर अयं किया गया है, भाव यह है कि जो पर नहीं है उसके बसा होने के मय में होने वाले के वायक शम (सम्पचकतरि) से क, भू मस्ति के योग में चि पश्य होता है। ५७४. यस्येति-प्रवणं को ई हो जाता है कि प्रत्यय परे होने पर। चलोप इति-नि प्रत्यय में कार की इत्संगा होकर लोर हो जाता है, इ उच्चारण के लिये है द का लोप विरक्तस्य ।।१०७) से होता है, इस प्रकार समस्त प्रत्यय का लोर (जिसे वैयाकरण सपिहार कहते है) हो जाता है। ज्यन्तादिति-वि प्रत्यय अन्त में होने से भव्यय सभा होती है। स्वरादिनिपातमध्ययम् से वि प्रत्ययान्त मव्यय सशक हैं । कृपणीकरोति-भायः यः सम्म त करोति (जो पाला नहीं वह काला होता है, उसे करता है) कृष्ण शम से पभूततद्भाव में कृ धातु के योग में जिप्रत्यय होता है। कृष्ण+चि+करोति+नि का सरिहार भकोईणीकरोति । मशीभवति-माल ब्रह्म भवति (कोना नही यह ब्रह्म होता है)- रान् +fo+अति-चिलोप, म' लोप, म को ईह्मोमबति । गडीग्या-माना गङ्गा प्यार (ो गङ्गा नहीं वह गङ्गा हो बा)- महाधि+स्यार-यि लोरमा को । होरर गहोरयार । अध्ययस्येति--(का) दि प्रत्यय परे होने पर पपप के अपएं कोई नहीं होता, यह रहना पाहिये। १. मसोमः प्रातिपदिय Itisa ३४. ] संस्कृतम्याकरणे नेति वाच्यम् ॥ दोपाभूतमहः दिवामूता रात्रिः । ५७५ । विमाषा साति कास्न्ये ।।५२। विविध स्यात्सांकल्ये। ५७६ । सात्पदाद्योः १३१११॥ पदाद्योः साय पत्वं = कृत्स्नं शस्त्रमग्निः सम्पद्यतेऽग्निसाद्भवति । दधि सिञ्चति । ५७७ । च्ची च ७४२६१ च्ची च परे पूर्वस्य दीय दोषाभूतमहः-मदोष: दोवा भभूत (जो रात नहीं पा यह गया, ऐसा दिन जो अन्धकार के कारण रात सा हो गया)-दोषा- भूतम् दोषाभूतम् । 'दोषा' प्रव्यय शब्द है मतः मा को ई नहीं होता प्रकार मंदिवा दिवा प्रभूव (जो दिन नहीं थी दिन हो गई, दिन जैसे रात) दिवाभूता रात्रिः। ५७५. विभापेति-चि प्रत्यय के विषय में विकल्प से साति प्रत्य- 'है, सांकल्प (सम्पूर्णता) अर्थ में। ५७६. सादिति-सात् प्रत्यय के स् तथा पद के पादिम के हर को होता। अग्निसोद्भवति-कस्नं शस्त्रम् मग्निः एप्पचते [सम्पूर्ण शस्त्र (Ke ग्नि हो रहा है]-भग्नि+साति+पति+सकार को पाव' प्राप्त 'पयुक्त सूत्र ने उसका निषेब कर दिया। अग्निमा भवति । (साताप 'य्यय होते है। टिप्पणी---.-.

भग्नीभवति । ५७८ । अध्यक्तानुकरणाद् द्वयजवरार्धादनिती डाय ५.४।१७॥ यजेवावरं यजवरं न्यून न तु ततो न्यूनमनेकाजिति याव- सादृशम यस्य तामाइडाच् स्यात् कम्वस्तिभिर्योगे। (वा) हाधि विचतिने द्वधानम् ॥ इति हाचि विवक्षिते द्विस्वम । * (1) नित्य- माहिते डाचीति वक्तव्यम् ॥ हाच परं यदानोडितं तरिमपरे पूर्व- परयाणेयोः पररूपं स्यात् । इति तकारपकारयोः पकारः। अग्नीभवति-नारिणः अग्निः भवति (ो अग्नि नहीं पह पनि हो पाता है)--अग्नि+वि+भवति-चि प्रत्ययाखोर तथा पूर्व शरीष (७)हाकर पानीभवति । ५८. अध्यक्तेति--जिसमा मधमाग भनेक स्वर बाना (अनेका) होता जिसमे परे इति शब्द न हो ऐसे मम्यात नि के भनकरण शब्द से भू मोर प्रस्ति के योग में गच् प्रश्रय होता है। पर मे पायो (सूत्रस्थ शब्दों की व्याख्या)-ऐसी पनि जिसमें प्रभारादि पर नही पद होते सम्यक ध्वनि कहपाती है। जैसे हाथ से किदार पादि पीटने का बदायरात्रि पर्य है, दयन् (दो स्वर वाला शन्द) होम्यून उममे कम नरी पद पनेका (पनेरु दर शा)। ऐसा (नेश र पाषा विमा, उपसे हार होता है , पस्ति धातु के योग में। डाचीति (ज)-- प्राय की पिता में वाहन दिला होता है। नित्यमिति (पा)-पाच प्रत्यय है परे जिससे उस पारित के परे होने पर पौरपर परो परम (एकादेश) हो गाडा है। मे पटर+पर+गर, यहाँ पर होता है। पटपटाकरोति-पदरोड(पटव ऐसा Re art- ४२ । सम्पारंग पटपटाकरोति । अम्यादानुकरणारिकम् १ ईपत्करोति । दूर रिफम । भतारोति । अवरेति किम् ? सरटरटाकरोति । अनि पटितिकरोति । इति स्वार्थिकाः ॥१६॥ इति तद्धितप्रकरणम् । मा प्रत्यय करने को इग्या होते हो पटन का निर होकर 'पटव पट यह पवस्था हो जाती है। हा प्राधा भाग पटव दो बर बाना प्रातः उपर के मूत्र से हाच प्रत्यय होता है। पटन पटव + डाच क- दशा में प्रगसे 'पट' को मानहित संझा होकर पूर्वतकार और अपने को पररूप पति पकार हो जाता है तथा पगने पटद के प्रत (E) होकर पटपट+मा+करोति+पटपटाकरोति । असतानुकरणादिति- -प्रवक्त ध्वनि के अनुकरण मे डाच होत क्यों बहा ? इसनिए कि ईपत्करोति मे दाच प्रत्यय नहीं होता, कोंकि पम्पका ध्वनि का अनुकरण नहीं। द्वपजदरार्धादिति-दय ही न्यून हो ऐसा क्यों कहा ? इन श्रत्करोति मे च नही होता, त् में द्वित्व होने पर प्रधभ ग एF+ अवरेति- -प्रवर (न्यून) शब्द क्यों दिया गया ? इमलिए Fिare कंगति में भी हा होता है । यहाँ पर्भ भाग खाटत 'दो पच् वाल पनेक प्रच वाया है । 'प्रबर' म के ग्रहणं से यह अर्थ होता है कि माग कम से कम (पवर) दो मच् कामा हो पषिक पन् वाला हो तो को अनितो किमिति - इति गरे रहने पर डान् नहीं होता यह गायों सलिये कि पटव इति करोति-पातिकति यहाँ सच नहीं होता है। इति वार्षिः ॥१॥ ॥ इति तद्धित प्रकरणम् । १. तस्य परमारितम् ८ १.राबहाद को मिय होता है वहाँ शम्मको म.नंति संत्रा होती है।

अथ स्त्रीप्रत्ययाः ५७६ । स्त्रियाम् ४१११३॥ अधिकारोऽयम् समर्थानामिति यावत् । ५८० । प्रजायत्तष्टाप् ४॥१॥४॥ अजादीनामकारान्तस्य च वाच्यं यत् स्त्रोत्वं तत्र धोत्ये टाप् स्यात् । अजा। एडका । अश्वा । घटका । मूपिका पाला। वत्सा। अथ स्त्रीप्रत्ययाः-पद स्त्रीत्वबोधक प्रत्ययों का निरूपण किया जाता है। ५७६. स्त्रियाम् इति-'स्त्रीयाम्' यह मषिकार समर्थानां प्रयमाद्वा' VI१०२सक है । 'च्याप् प्रातिपदिकात' ४११ से प्रातिपदिकात शब्द को मनुवति होती है । अत: मूत्र का पर्व है-प्रातिपदिक से स्थीलिङ्ग मै मागे के प्रत्यय होते हैं। टिप्पणी-भाव यह है कि स्त्रियाम्' यह भधिकार सूत्र है। 'ममर्यानां माद वा' ४१८२ से पूर्व प्रत्येक सूत्र में यह १६ उपस्थित होता है मत तक के सूत्रों से स्त्रीत्वबोधक प्रत्यय होते हैं । ५८. अजायत इति-मज' मादि तथा प्रकारान्त शब्दों का वाध्य हो स्वीरव' उसको प्रकट करने के लिये इन प्रातिपादिकों से टाप् प्रत्यय होता है। टापू में 'मा' शेष रहता है। कार तपा पकार का लोप हो जाता है टिप्पणी-लिङ्ग' किसका अर्थ है ? इस विषय में दो मत हैं-प्रथम मत है कि लिङ्ग प्रातिपादिका ही मर्प है। सामादि प्रत्यय केवल उसके द्योतक हैं । इसी मत के अनुसार प्रस्तुत सूत्र का मर्य किया गया है। द्वितीय पक्ष के अनुसार प्रभादि प्रत्यय स्त्रीत्व भादि लिङ्ग के वाचक होते हैं । द्वितीय पक्ष में अनेक दोषों को उभावना करके व्याख्याकारों ने प्रथम मन का ही समर्थन किया है। अजा (बकरी)-प्रशन्न प्रजादिगण का प्रथम शन है, इससे प्रजाद्य- तष्टापू से सीत्व खोतक टाप् प्रत्यय होकर पज+प्राइस अवस्था में सवदीर्घ (म+पापा) होकर 'पना' शब्द बनता है। प्रजा से प्रथमा विभक्ति का एकवचन 'मुहाकर उसका सोप हो जावा है-मजा। % 'हल्यायो दोर्षात् मुतिस्यपृक्त इल' ९९९ ३४२ ॥ संस्कृतम्याकरण पटपटाकरोति । अम्यानुकरणास्किम् । ईपरकरोति । द्वयजव रिकम् । भतरोति । भवरेति किम् । खरटरसरटाकरोति । भनितो। पटितिकरोति । इति स्वार्थिकाः ॥१६॥ इति सद्वितप्रकरणम् । सामने को होते ही पटत काय होकर 'पटव पक्ष । यह परस्था हो जाती है । यह पाथा भाग परत दो पर पाला (. प्रतः पर के गुर से हरा प्राय होता है। पटक पटत +1 को दगा में अगले 'पीपा होकर पूर्वकार पोर पाने पो परत पार हो जाता है तथा पगमे पटत के पत (2) होकर पटपट +4+करोति- पादाकात। असतानुकरणादिति '-भारत ध्वनि प्रकरण मे होता हानिरहिरोनि में आप प्राय मही होता, यो निमानुकरण मही। द्वपजपराधादिति-पन ही न्यून हो ऐमा यों कहा है की रात मे नही होता, श्रत में शिव होने पर गएप अवरेति r-ITE (यू) को दिशा? मल anrel गोद में भी होता है । यह धं भाग बटन को पान प्रनर पर वाया है । 'वा' म के ग्रहणं यह पर्व होता है। भागम में कम (पर) पद बाबा हो पनि म बाबा हो तो को अनितोकिमिति-रिए पर हार नहीं होगा पर अथ स्त्रीप्रत्ययाः ५७६ । स्त्रियाम् ॥१॥३॥ अधिकारोऽयम् समर्थानामिति यावत् । ५८० । प्रजाधतष्टाप् ४॥२४॥ अजादीनामकारान्तस्य च वाच्यं यत् स्त्रीत्वं तत्र द्योत्ये टापू स्यात् । श्रजा। एडका । अश्वा । चटका । मूषिका । पाला । वत्सा। अथ स्त्रीप्रत्यया:-प्रब स्त्रीत्वबोधक प्रत्ययों का निरूपण किया जाता है। ५७६. स्त्रियाम् इति-स्त्रीयाम्' यह पधिकार 'समर्थानां प्रपमाद वा' १८२क है । 'व्याप् प्रातिपदिका' ४१t से प्रातिपदिकात् द को अनुवृत्ति होती है । मतः सूत्र का मर्ष है-प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में मागे के प्रत्यय होते हैं। टिप्पणी-भाव यह है कि स्त्रियाम्' यह अधिकार सूत्र है । 'ममर्थानां माद वा १२ से पूर्व प्रत्येक सूत्र में यह पर उपस्थित होता है अर्थात तक के सूत्रों से स्त्रीत्वबोधक प्रत्यय होते हैं। ५८० अजायत इति–'मज' पादि तया प्रकारान्त शब्दों का धाय को स्त्रीत्व' उसको प्रकट करने के लिये इन प्रातिपादिको से टाप् प्रत्यय होता है। टाप में 'मा' शेष रहता है । टकार तथा पंकार का लोप हो जाता है] टिप्पणी-लिङ्ग' किसका अर्थ है ? इस विषय में दो मत है-प्रथम मत है कि लिङ्ग प्रातिपादिक पाहो अर्थ है । 'टा'मादि प्रत्यय केवल उसके द्योतक है । इसी मत के अनुसार प्रस्तुत सूत्र का मयं किया गया है । द्वितीय पक्ष के अनुसार टापू मादि प्रत्यय स्त्रीत्व मादि लिङ्क के दायक होते हैं । द्वितीय पक्ष में अनेक दोषों की उभावना करके व्याख्याकारों ने प्रथम मन का ही समर्थन किया है। अजा (बकरी)-'प्रज' शब्द प्रजादिगण का प्रथम शब्द है, इससे प्रजाद्य- दष्टाप् से स्त्रीत्व द्योतक शाप प्रत्यय होकर प्रज+मा इस अवस्था में सवर्णदीर्घ (+मा-मा) होकर 'मजा' शब्द बनता है। प्रजा से प्रथमा विमक्ति का एकवचन 'सुहाकर इसका लोप हो जाता है-प्रजा। क 'हल्झ्याम्पो दोर्षात् सुतिस्यपृक्त हल्' ५१०६८ ३४२ ] संस्कृतम्यांकरणे पटपटाकरोति । अध्यक्षानुकरणात्किम् । ईपत्करोति । द्वय रिकम् । प्रत्करोति । प्रवरेति किम् ? खरटसंरटाकरोति । भनिती पटितिकरोति । इति स्वार्थिकाः ॥१६॥ इति तद्धितप्रकरणम् । कच् प्रत्यय करने को महोते ही पटत कादिर होकर 'परत पटव यह अवस्था हो जाती है। यहाँ भाषा भाग पदो पर पाला (E मरा: पर के मूत्र से प्रत्यय होता है। पटक पटव+म् । दशा में अगले 'परको भाग्नेटिस' संशा होकर पूर्वतकार और प्रगये को परस्प पति पकार हो जाता है तथा पगमे पटव के प (2) होकर परपद+पा+करोति+पाटाकरोति । मनतानुकरणादिति-प्रगत पनि के भनगर मे पर्चाबहा? इसलिए कियकोन में हा प्राय नहीं होता, पति साध्वनि कानुकरण नहीं । दुपजयरादिति-पद हो ग्यून हो ऐसा क्यों ना ? मसि बारात मे नही होता, श्रनु विश्व होने पर प्रभाग ए+प अवरेति -प्रस (युन) भयको दिशगा? for free मन में भी होगा। यह धं भाग को मा म. वारा है ' 'म पहाण मेयर प होता प्रगम से (1) परवाना हो सिप गामा हो तो कोई अनितोचिमिति- पररा नही हार को कर बपिfistiferatीवा। ॥ इति नाम OR, Unitianimaterptst अथ स्त्रीप्रत्ययाः ५७६ । स्त्रियाम् ॥१३॥ अधिकारोऽयम् समर्थानामिति यावत् । ५८० । अजायतष्टाप् ४॥१४॥ अजादीनामकारान्तस्य ष षाच्यं यत् स्त्रीत्व तत्र घोत्ये दापू स्यात् । अजा । एडका । श्रश्वा । पटका । मूपिया। बाला । वत्सा । अथ स्त्रीप्रत्ययाः-पब स्त्रीत्वदोघक प्रस्थयों का निरूपण किया जाता है। ५७६. स्त्रियाम् इति-स्त्रीयाम्' यह अधिकार 'समर्थाना प्रथमाद् वा' १०२ तक है । 'इया प्रातिपदिकाद' ११ से प्रातिपदिकात्र को पनुत्ति होती है । प्रतः मूत्र का अर्थ है-प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में मागे के प्रत्यय होते हैं। टिप्पणी-भाव यह है कि स्त्रियाम्' यह पषिकार सूत्र है। 'ममर्थाना माद वा १५२ मे पूर्व प्रत्येक सूत्र में यह पर उपस्थित होता है अर्थात् तक के सूत्रों से स्त्रीत्वरोधक प्रत्यय होते हैं। ५८० अजायत इति-पज' मादि सथा प्रकारान्त शन्नों का वाध्य को सौरव' उप्तको प्रकट करने के लिये इन प्रातिपादिको से टाप् प्रत्यय होता है। टाप में "मर शेष रहता है । टकार तथा परार का लोप हो जाता है। टिप्पणी-'लिङ्ग' किसका अर्थ है ? इस विषय में दो मत है-प्रथम प्रव है कि लिङ्ग प्रातिपादिक नही पर्थ है। 'टप'मादि प्रत्यय केवल उसके दोतक है। इसी मत के अनुसार प्रस्तुत सूत्र का भय किया गया है। द्वितीय पक्ष के मनुसार धादि प्रत्यर स्पीय मामिलिट्र के दायक होते हैं। द्वितीय पक्ष में अनेक दोषों को उद्भावना करके पाख्याकारों ने प्रथम मनु का ही समर्थन पिया। अजा (बकरी)-'परमपजागिरण का प्रपम गम है, इससे पाप- तष्टा से सीलपोतका प्रत्यय होकर जाम मवस्था में सवरणदीयं (4+पापा) होकर 'परासद बनता है। अगा है प्रपमा विपक्ति का एकवचन मुकार उसा सोप हो जाता है-परा। ' हयाम्यो दोर्षाव मुखिस्यपृक्त हल' tite

सशकरण
होहा । मन्दा । दिलाता इत्यादि: अजादिगणः । सवा ।
पुमाउगितरच ४१६
उनिदातान् प्रातिपदिकात् स्त्रियां डीपू स्यात्
भवन्ती। पचती। दीयन्ती।
इसी प्रकार पारिगण म पाठन एका (भा), अम्बा 144
(विडिया), मूर्षिका (पुहिया) इन शादों से रस्त्रीवित
१०:३ मूत्र से टी' प्रदय प्राप्त पा, तथा गना, वत्सा है।
दिलाता ये पर प्रथम पायु (पोवन से पूर्वाधाया के बाचा है. इ.
प्रथम १२० के पनुमार स्त्रीलायक और प्राप्त था। अज
इना ग होने के कारण डोष तथा हेपको वापर टार हो
इनमें अतिरिक्त मजादिगण में अन्य मी जद हैं।
सर्वा-प्रचारात 'सर्व' श में 'मजायतष्टाप' मूत्र के प्र.
प्रय होकर म+-मववीध तस ते पा लो मर्वा ।
५-२ उगितश्चेति-गिद (उक है इसंज्ञक जिसका प्रत्यय
जिनके ऐसे प्रातिपदिक से त्रीविज मे होप प्रत्यय होता है।
टिप्पणी-(१) डोप प्रताय में हार गैरप्रकार की इस
हो जाता है केवल 'ई' मेष रहता है । (२) उक प्रत्याहार है। जिम
स्तु वएं लाते हैं । ये वणं जिस प्रत्या मे इसजक होते है वह उमिद
भवती (आप)--मा घातु से दवतु प्रत्यय सार भवत् शब्द न
डानु प्रत्यय में कार को इसजा है, अत: यह उतित है तथा भवद :
प्रत्ययान्त है मन इससे होर कर भदत + ई-+भवती इसे 'सु' ।
सोर हार भवती स्प बनता है।
भवन्ती (होती हुई)-भू धातु से शतृ प्रत्यय, उकार को नुण ।
प्रादेशबार भवत शन्द बनता है। ४६ अपिदन्त है, अत: उससे डोप
भात+ई इस प्रवस्पा सपना निरयम्' ११ से तुम का मागम
भवन (नृम्) +!--भवानी मुसी।

स्त्रीप्रत्ययाः [ ३४५ ५८२ । टिड्ढाणन द्वयसदना मात्रचतय ठकठन कर स्वरपः ४।१५॥ अनुपसर्जनं यदिदादि तदन्तं यददन्तं प्रातिपदिकं ततः स्त्रियां डी स्यात् । कुरुचरी। नदट-नदी। देव देवी। सौपर्णेयी। ऐन्द्री इसी प्रकार पबन्ती-१ + शतृ→पचत् + डोप+१च न ३+ई। दीव्यन्ती-दीव + शतृ दोव्यत् + कैप-दीव्य न तु + ई । ५८२ टिड्ढेति-रित (वार है इत् जिसका ऐया प्रत्यय ) और । घरा, भज देयम, दानच, मात्र, तय, टक उज, वन, क्वरप् प्रत्यय मन्त में जिसके ऐसे प्रकारान्त प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में डोप प्रत्यय होता है यदि वह गौरा (उपसर्जन) न हो। कुरुचरी-(कुरु प्रदेश मे विचरण करने वाली) करघु पति (स्त्री) पर्य में कुरु (वन्त) उपपद होने पर चर् धात में घरेष्ट' ३१२१६॥ मनुसार 'ट' प्रयिय होकर 'कुरुवर' शब्द बनता है। यह टिदस्त है। इस बिहारण ' सूत्रानुसार डोप होकर कुरुचर + ई-- यायेति प २४॥१४॥ प्रकार का लोप होकर कुरुचरी रूप बनता है। नदी देवी-दट और देश्ट शद पचादि मे पढे ये हैं। इनके टि होने की प्रत्यय होकर 3+ ई, देव+ई समका यति ध' प्रकार का लोहोकर नटी, देवी येस्प बनते हैं। सौपर्णेयी (सुपणी की पुत्री)~सुपणी शम्भ से मपत्य मयं मे वो ढक से हा प्रत्यय होकर 'ई' को एय्' प्रादेश, सु के उकार की वृद्धि (मा वृद्धि) मोकार, ईकार का लोप होकर 'सौपर्णय यह ह प्रत्ययान्त श बनता है। इससे डीप होकर सोरणेय+ई→मकार लोप सोपणेयो। ऐन्द्री (इन्द्र है देवता जिसका या इन्द्र सम्हघिी)-इन्द्रो देवताय (asrय देवता) ४२१२४॥ अथवा इन्द्रस्य इदम् (तस्ये ४.३।१२.) इस अ- १. प्रायनेयोनीषियः फदसधा प्रत्ययादीनाम् । २. यस्येति च ६४.१४८

औत्सी। ऊरुद्वयसी। ऊरुदनी। ऊरुमात्री। पञ्चतयी।
लावणिकी। यारशी। इश्वरी।
मे इन्द्र शम्द से प्रए प्रत्यय होकर प्रादि वृद्धि प्रकार लोप होकर 'ऐ
मए प्रत्ययान्त शब्द बनता है। इससे डीप होकर ऐन्द्र+8-ऐन्द्री।
औत्सी 1-उरस सम्बन्धिनी (उत्स-जल-स्रोत या ऋषि विगे
:उत्सस्येदम्' इस प्रर्ष में उत्स शब्द से 'उत्सादिभ्योऽम' सूत्र से
प्रत्यय होकर मादि वृद्धि तथा प्रकार मोर होने पर मज, प्रत्ययान्त कौरस
बनता है। उससे होप होकर मौत्सी।
करुद्वयतो रुदनी-नस्मात्री-(घुटने तक गहरी) का प्रमा
(उच है माप निसको) इम मप में ऊर शाम से दपसच, दन भोर ।
प्रत्यय' होकर उरुम्पस, ऊन, करमात्र शब्द बनते हैं। उनसे भोप
होकर प्रकार का लोप होने पर ऊरयसी मबन है।
पश्यतयी-(परि पक्या वासी) अवयका पस्या:-इस मा
पसन् गर से 'संशया प्रवपये तय' १२३४२ से तयप् प्रत्यय ।
पश्चतप' बनता है । इमसे होकर पञ्चायो।
तिकी (पामों से खेलने वाली)-प्रदायति इस विग्रह में :
IPE में तेन दौय्यति सति जति तिम्' ४.२ टक प्रत्यय
पदा+पादि वृद्धि तथा प्रकार मोप होकर पाक्षिक-त्रीय
कोप होकर माक्षिक+t-- मोप
पाना है।
माणिकी (नमक वैचने वाली)-मवरणं पश्यम् माया-म nि
मव me मे टर. (मलान) होरर सालिगम बनता है।
त्रिमित में ग्यप होकर माणिक-प्रसार सोप माणिती।
पारसी (मी)-'या' गम्प पर होने पर हा पातु मे काप
सोनामोचने पत्र ३.२० वापर होरमा माग्न
(पमर) को प्राकार होहर या' गाना है, मगर हरया!
+1-पार मोर पाहयो ।
1.प्रमाणे परनमार; १२
A TA

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३४. ]
सस्कृतथ्याकरणे
-
५८३ । यज्ञश्च ४।१।१६।।
यमन्तात स्त्रियां डीप स्यात् अंकारलोपे कृते-
५८४ । हलस्तद्धितस्य ६।४।१५०॥
हल: परस्य तद्वितयकारस्योपधाभूतस्य लोप ईति परे । गार्ग
५८५। प्राचां एफ तद्धित. ४।१।१७॥
यमन्तात् प्फो वा स्यात् , स च तद्धितः ।
५८३ यनश्चेति-या है अन्त में जिसके ऐसे प्रातिपदिक से स्त्री
में डोर प्रत्यय होता है।
अकारेति-(गार्य + डोर -- गाग्यं +ई इस अवस्था मे 'यस्पेति च'
अन्त्य भकार का लौर करने पर।
५८४. हल इति-हेल से परे जो तदिन का यकार उपधारूप में है
है उसका लोप हो जाता है ईकार परे होने पर ।
टिप्पणी-प्रलोत्यात पूर्व उपधा १॥१॥६५ अर्थात किसी शब्द के पन
वर्ण से पूर्व वर्ण को उपधा संज्ञा होती है, जैसे-'गाय' शब्द मे अन्त्य व
मार है उससे पूर्व वणं यकार को उपधा संज्ञा होती है ।
गार्गी (गर्ग गोत्र की स्त्री)-'गर्ग' शब्द से 'गर्गस्य अपत्य स्त्री' इस विर
मे यन्त्र (गर्गादिभ्यो या ) प्रत्यय होकर मादि वृद्धि तथा प्रकार लोप होने ५
'गाय' यह या प्रत्ययान्त शब्द बनता है । इससे 'यशश्च' सूत्र से होप प्रत्य
होकर गाये + ई-प्रकार लोप तथा 'हसस्तद्धितस्य' से यथार लोप होक
गार्गी।
५८५, प्राचामिति-या प्रत्ययान्त से विकहर से स्त्रीलिङ्ग में एक प्रत्यर
होता है और वह तद्धित संशक होता है।
टिप्पणी-(1)फ प्रत्यय के पार की इसंज्ञा होकर सोप हो जाता है
र फकार को प्रायन पादेश हो जाता है । (२) 'एफ' को तदित संशा के
योजन है-(4) 'यस्येति च' से प्रकार लोप मौर (पा) सदितात होने से
िितपदिक संज्ञा हो जाना।
-

चोप्राथापाः
[ ४६
(५८६) पिगौरादिभ्यश्च ४३११४१॥
पिट्यो गोरादिभ्यश्च स्त्रियां सीप स्यात् । गाायणी। नतंको ।
.
सामनडुहः स्त्रियां वा ॥
धनबुही, अनदवाही । प्राकृतिगरपोऽयम् ।
५८६. पिगौरादिभ्यश्चेति-पिन (पकार है इत् मिसा) शतिपादक
सपा गौर मादि शन्दों से स्त्रीलिङ्ग मे डोप प्रत्यय होता है।
टिप्पणी-वीप में भी 'द शेष रहत है। तथा डोद दोनों में स्वर
का पन्तर है।
गायिणी-(गर्ग की सन्तान स्त्री)-यजन्त 'गाय' पाद से क प्रत्यार
भाषा फसदित.) होकर माग्य+पायन (फ)+गार्यापण शम्द बनता है।
सेफ में पकार को इत्संज्ञा होने के कारण यह चिद है। मतः 'पिगौरादि-
भार' से मेष प्रत्यय होकर पार्याय+t-मार्यापरणो रूर बनता है।
मतको-नव पातु से धन (शिल्पिनि दुन्) प्रत्यय होकर यु को प्रक
शहाने पर नकद बनता है। पित होने के कारण गेप प्रत्यय होकर
in+t-अन्य प्रकारकासोर मतको।
गौरी-गौरमादि (40) के प्रथम हम 'पौर' से 'पिपोय.' से
बप्रयय होकर गौर+ई-कार मोर गौरी।
भामिति (प)-भाइ, पाद से गोनिमें पाम् पागम होता?
अनडुहो-अनदाही (गो)-मना मन्द गौरादिपए में है। इससे लो-
में और प्रत्यय होने पर अतुत पसिनुमार दिल पाम् ।
म हो जाता है-पन+++t-नगाहो । पामाम् 1 पायम
होता तर मनाइ+t+नीलनता है।
माइतिगरा इति-हौरदिप भागिल में पटिन हाहों
'रिहर पर मोरोपटपंड हमने पाहि।

१५. ] . संस्कृतम्याकरणे ५८७)। चर्यास प्रयमे ४।०२०॥ प्रयमवयोवानिनोऽदन्तात् स्त्रियां सोप् स्यात् । कुन ५८८ । द्विगोः ४.११२१॥ अदन्ताद् द्विगोडौँप् स्यात् । त्रिलोकी । प्रजाति त्रिफला । त्र्यनीका (सेना)। ५८७. वयसीति-प्रथम प्रवस्या के वाचक मकारान्त प्रातिपदि स्त्रीलिङ्ग मे डोर प्रत्यय होता है। कुमारी-प्रथम मवस्था के वाचक कुमार शन से और प्रत्यय कुमार+ई-प्रकार लोर (यस्येति च) कुमारी। टिप्पणी-तीन अवस्थायें मानी जाती हैं-कौमार, योरन मोर वृद्ध प्रथम क्य: (अवस्था)का मभिप्राय है-यौवन से पूर्वावस्था 'वमि पाणिनीय सूत्र के अनुसार प्रथम प्रवस्था के वाचक शब्द से ही स्त्रीति होप प्रत्यय होता है, किन्तु दघूट प्रादि शम, जो यौवनावस्या के व हैं उनसे भी जो प्रत्यय देखा जाता है अर्थात 'वपूटो' पादि प्रयोग उप होते हैं मतः वातिककार के भनुमार-'वयस्पचरम इति वाच्यम्' वर-भक को छोड़कर पन्य अवस्थावाचक शब्दों मे डोप प्रत्यय होता है। इस वधूटी, चिरण्टी प्रादि शन्द बन जाते हैं। ५८८. द्विगोरिति -प्रकारान्त द्विगु (समास) से दीर, प्रत्या होता त्रिलोकी-(तीन लोकों का ममुदाय)-त्रयाणां लोकानां समाहार- इस विग्रह में द्विगु समास होकर 'त्रिलोक' रूप बनता है। "जिमका उत्तर -प्रकारान्त होता है ऐमा दिगु स्त्रीलिङ्ग में होना चाहिये" (प्रकारान्तोत्तर 'दिगुः स्त्रियामिष्यः) इसके अनुसार स्त्रीलिङ्ग होने पर हिंगो.' मूत्र से प्रत्यय होकर विनोक+ई-भकार लोप-विलोड़ी। त्रिफला-त्रयाणां पलानां समाहार:-इस विग्रह में फिर मकारान्त दिगु बनता है किन्तु यह प्रमादिगण के अन्तर्गत है। 'मजावंतष्टार' से टाप प्रत्यय होकर निफसाना है। .

स्पोप्रत्यया: ५८८ । वर्णादनुदात्तात् तोपधाव तो नः ४।१॥३६॥ वर्णवाची योऽनुदात्तान्तस्तोपधस्तदन्तादनुपसर्जनान प्रातिपदिकाद् डीप्तकारस्य नकारादेशश्च । एनी, एता । रोहिणी, रोहिता। ५६० । बोतो गुणवचनात् ४१११४४॥ उदन्तात् गुणवाचिनो वा डीप स्यात् । मत्री, मृदुः । ज्यनीका (सेना)याणाम् मनोकाना समाहार:-इस विग्रह मे द्विगु गस होकर नीक' शन बनता है। यहां भी भजादिगण में होने के कारण प् प्रत्यय होता है। ५१. वर्णादिति-वर्णवाची जो अनुदानान्त तथा तोप (तकार है घा में जिप्सको) तदन्त अनुपपर्जन प्रातिपरिक से विकल्प से ही प्रत्यय ता है और तकार को नकार हो जाता है। एनी-Tar-(कबरी) 'एत' शब्द अनुदात्तान्त' है। इसकी अधा में कार है । यह किसी के प्रति गौण भी नहीं है। (मनुपसर्जन है), पत. यहां पद् इत्यादि मूत्र से विकल से झोप प्रत्यय तथा तकार को नकार कर 'एनी' का बन जाता है । पक्ष में मजायतष्टाप् से टाप् प्रत्यय होकर एता' रूर बनता है। रोहिणी-रोहिता-लाल रङ्ग पाली), रोहित' शब्द से उपयंका गति से प्रकल्प से डीए प्रत्यप होने पर तथा तकार को नकार होकर रोहिणी, पक्ष 'टाप होकर रोहिता रूप बनता है। ५०. वीत इति-उकारान्त गुणवाचक शब्द से स्त्रीलिङ्क में ही स्पय होता है विकल से। मृद्वी मृदुः (कोमला)-मृदु श सरारान्त दया गुणवाचक है। इससे ी प्रत्यय होने पर मृदु+ई, उार को एण (६) मुनी। जब रोष पत्थय नहीं होता तो मृदुः। १. 'वर्णाना तानिनितान्तानाम' इस फिट् सूत्र से 'ए' का ए (मादितएं) उदात्त है और 'भनुमत पदकपए के अनुधार शेप पर मनुवार है, प३ः यह पनुशतान है। - ३५२ ] संस्कृतम्याकरण ५६१ । बह्वादिभ्यश्च ४१॥४५॥ एभ्यो वा डीय स्यात् । यदी, पहुः । (ग) यदिफारादहिनः । रात्री, रानिः । है (ग) सर्वतोऽक्तिन्नादित्येके । शक्टी, शयाटिः । ५६२१ पुयोगादाख्यायाम् ४।११४८॥ ५५१. यदादिभ्य इति-पतु माद शम्दों से स्व.सिज मे विस्प प्रत्यय होता है। मही-बहुः (बहत)- यह गन्द मे स्त्रीलिज मे जो प्रत्यय 'बह+ ई-दी। डीप प्रत्यय के प्रभाव में बनस्प बनता है। पृदिति (ग)-(यह बवादिगण मागूत्र है) इत् प्रत्ययाको यह है अन्त मे गिर ऐगे प्रतिक्षिक मे दीप प्रयम होता है कि किन्तु तिन् प्रत्ययान्त से नहीं होता। रानी रात्रि:-'n' धातु से निर. प्रत्यय (राशदिश्यां विपु. होरा समबनता है । उपप गए गूत्र के अनुसार प्राम होपर रात्रि+ई-कार मोप यायेनिन) रात्री । १ मे गरिः)। मवेत इति (ग)-(4ह भी बदल गणका गूर है) गि भ वाले प्रत्यय है पल में शिकाऐगे शम्दों को पोरकर भी मिन इगतामों में और होता है, ऐगा दुध पाषाय मानते।। राष्टी राटि:-(मा) शाEि.पर है। गमे , होने पर माटी, पक्ष में मर- दो गमका होते है। शिपली-गट गम पात्र प्रातिपnिt, यारा है पन: पान र प्रायर कार मो : सपा firrina (1) 07 नही हता, 'म मरे 9 रोमामा-मामे-रात्र मे १२. योगादिनि- TMERE (पागामा, सेवा र दुप fra) m gm का उस पुरुष स्त्रीप्रत्ययाः [ ३५३ या पुमाख्या योगात् स्त्रियां वर्तते ततो डीप । गोपस्य स्त्री गोपी। * पालकान्तान्न। ५६३ । प्रत्ययस्थात् कात् पूर्वस्यात इदाप्यसुपः ७१३॥४४॥ प्रत्ययस्थात् कात् पूर्वस्याकारस्येकारः स्यादापि, स आप सुपः परो न चेत् । गोपालिका । अश्वपालिका । सर्विका । कारिका । अतः स्त्री के लिये प्रयुक्त होता है । उससे डीप, प्रत्यय हो जाता है । गोपी गोपाल की स्त्री)-'गा: पाति' (गायो का पालन करता है)- इति गाः । तस्य स्त्री गोप+ डोष →कार का लोप (यस्येति च) गोयो । टिप्पणी-यहाँ गापालन के कारण 'गोप' शब्द पुरुष के लिये आया है। के साथ पति-पत्नी भाव सम्बन्ध होने से स्त्री के लिये भी जब इस शब्द का व्यवहार होता है तो 'गोपी' शब्द बनता है, किन्तु कोई स्री यदि स्वयं गोपालन करती है, गोप को स्त्री नहीं है तो गोप:' शब्द बनता है। पालकान्तादिति-पालक शब्द है मन्त में जिसके ऐसे शब्द से पुयोग मे डोष प्रत्यय नहीं होता। ५६३. प्रत्ययस्थादिति-प्रत्यय में स्थित कार से पूर्व के प्रकार को इकार हो जाता है भाष, परे होने पर, यदि वह भाप सुर से परे न हो। गोपालिका (गोपाल की स्पी)--यहाँ पुयोग होने से दीप प्राप्त था, किन्तु पालकान्त होने से 'पालकान्तान' वार्षिक से होष का निषेध हो जाता है और प्रकारान्त होने से टाप, प्रत्यय होकर पूर्व के प्रकार को इकार होने पर गोपालिका रूप बनता है। इसी प्रकार 'मश्वपालिका। • सर्विका-स' शब्द से 'मव्ययसर्वनाम्नामकच प्राक् टे.' ३३७१ से मकथ प्रत्यय होकर सर्वक' शब्द बनता है। उससे स्त्रीलिङ्ग में टाप (पजाद्यतष्टाप) प्रत्यय होकर सर्दक+मा+सर्वका इस अवस्था में प्रत्यय स्थित रार से पूर्व के प्रकार को इकार होता है तथा सविका रूप बनता है। कारिका- धातु से 'वुल्तृवो ३।१।१३३ से पवुल प्रत्यय होता है। चु को भक, ऋकार से लि (पार) होकर कारक गम बनता है। उससे प ३५४ ] संस्कृतव्यकरणे किम् ? नौका । प्रत्ययस्थात् किम् ? शक्नोतीति शका । असु बहुपरिव्राजका नगरी। * सूर्यादेवतायां चाब्वाच्यः । सूर्यस्य स्त्री देवता सूर्या । देवनायां किम् ? स्त्रीलिङ्ग में टार प्रत्यय होकर, पूर्व के प्रकार को इकार होने पर रूप बनता है। श्रतः किमिति-ककार से पूर्व वे प्रकार को इकार होता है- कहा गया है ? इसलिये कि 'नौका' में मौकार को कार नही हो- प्रत्यय के ककार से पूर्व प्रौकार है प्रकार नहीं, मौक (स्वाधि- (टाप-नौका प्रत्ययस्थात किमिति-प्रत्यय का कार हो ऐसा क्यों रहा इसलिये कि 'या' में प्रकार को इकार नहीं होता । 'शक' धातु से पच प्रत्यय होकर शा उससे टाप प्रत्यय होकर शंका शम्द बनता ककार प्रत्यय का नहीं अपितु धातु का है। असुपः किमिति-यदि पाप सुर से परे न हो-ऐमा यों कहा ग इसलिये क 'बहुद्वाजका यह प्रकार को इकार नहीं होता। प आज धातु से एल. प्रत्यय होकर परिव्राजक गद बनता है। फिर परिवारकाः' यस्यां (सा नगगे)-इस विछह में समास होकर मुर होकर बहुरिवारक' शब्द से टाप प्रत्यय होकर बहुपरिणाजा' पर है । यस पार (सुप्त) सुा से परे है, प्रतः मार को इकार नहीं होता। सूर्यादिति-(1) पुयोग से देवता स्पस्त्री के मयं में वर्तमान गाद से पाप प्रत्यय रहना चाहिये। यह 'पुयोगासाक्ष्यायाम् मे प्राप्त जीप का अपवाद है । पाप में , हंगा है। चार मोर पहार की इरमंशा होकर मोर हो जाता है। सूर्या -मका पं है - मयं की सी देवता । यहाँ सूर्य बन्द पुंगोन देवठा कमी नि प्रयुक्त होता है। 1. मुयं मम से पापय । मूर्य+मा+मूर्या ।

स्त्रौप्रत्ययाः २५५ ] सूर्यागस्त्ययोश्छे घ ङ्यां च ॥ यलोपः । सूरी-कुन्ती, मानुषीयम । ५६४ । इन्द्रवरुणभवशवरुद्रमृडहिमारण्यवयवनमातुलाचा- रिणामानुक् ४।१।४६॥ एषामानुगागमः स्यात् डीप च। इन्द्रस्य देवतायां किमिति-देवता अर्थ मे चाप होता है- यह क्यों कहा गया है ? इसलिये कि यदि सूर्य को स्त्री देवता न हो तो दीप प्रत्यय हो होता है । जैसे सूर्यस्य स्त्री.-सूरी (कुन्ती), यह मानुपी अर्थात् मनुष्य जाति की है । यहाँ सूर्य + ई (होष्) इस दशा मे भकार का लोर होने पर- सूर्यागस्त्ययोरिति (वा)-सूर्य और भगस्त्य शब्द के पकार का लोप होता है छ और डी प्रत्यय परे होने पर। यलोपः-इससे यकार का लोप होता है। सूरी-(सूर्य की स्त्रो मानुषी-मूरो-कुन्ती) पुयोग से स्त्री पर्थ मे वर्तमान 'सूर्य' गन्द से 'पु योगादाख्यायाम्' १८ के अनुसार ही प्रत्यय होकर सूर्य + ई-→ प्रकार लोप (यस्येति च) तथा ऊपर के दार्तिक से यकार का लोप होने पर सूरी। ५६४. इन्द्रति--इन्द्र, वरुण, भव, शवं, रुद्र, मृड, हिम, परण्य, पब, पवन, मातुन पर प्राचार्य-इन शन्दों से स्त्रीलिङ्ग में डोप. प्रत्यय होता है मोर मानुक का प्रागम भी। टिप्पणी-(१) इस सूत्र में भी 'योगांद' को अनुवृत्ति माती है। इन्द्र पादि ६ शब्दो और मातुल तथा भाचार्य शन्दो से ''योगाव' का सम्बन्ध होता है न्यों से नहीं, क्योंकि समव नहीं है। इस प्रकार इन्द्र मादि शब्दों से डीप, पुयोग' में सिद्ध हो है, भानुक् का विधान करने के लिये यहाँ इनका ग्रहण किया गया है । धेष 'हिम' मादि चार शम्मों से होष तथा भानुन दोनो का विधान रिया गया है । (२) मानुक मे ककार की इसशा होती है, उकार उच्चारण मात्र के लिये है प्रतः 'मानू' शेष रहता है जो किद' होने मे 'इन्द्र' प्रादि के अन्त में होता है। १. प्रान्तो कितो १४६

संस्कृतम्याकरणे
स्त्री इन्द्राणी। वरुणानी । भवानी । शर्वाणी । रुद्राणी
* हिमारण्ययोमहत्त्वे । महद् हिम-हिमानी ।
अरण्यानी।
* यवादोये ॥ दुष्टो यचो यवानी।
* यवनाल्लिप्यार ॥ यवनानां लिपि:- ययना
* मातुलोपाध्याययोरानुग्दा । मातुलानी, मार
यानी, उपाध्यायी।
इन्द्राणी (इन्द्र की स्त्री)-इन्द्र शE मे पुयोग मे डीपत
मागम होकर इन्द्र+मा++न+F-महार कोण
मी प्रकार वर की स्त्री 'बरुणानी', शर्व, ह मूर
नाम है-इनसे 'भवानी', 'गणी'. 'रुद्राणी', 'मुबानी' ।
हिमारण्ययोरिति (वा)--हिम पोर परण्य से महर
मई मैं डीय गोर मातु
हिमानी (महद हिमम् परिह बर)-हिम+पान-+
अरण्यानी-(महापरण्यम् या वन-arm+wit
यवादिति-दोपयुक्त पत्र के.१६ मे वर्तमान . प से
या पानक होते हैं।
पवानी-(दोशयुन )-'दुष्ट यः स पर्व में पर।
प्रस्यय या प्रानुक्रमागम होकर an+sin+t-ययाती ।
यदनादिति-पपन समेत मैं और मनु
परनानी (पीमि)--समाना निर:-- पर्ष
मे ही प्रत्यप पोर भानुकका पागम होकर न+पान +tat
मातुति--मानुस at ILAR TRA प्रानु nि
भानुलानी मातुलो (मामा)-मामायामामाको -
में 'मानुष' मा (पुग मे) र प्रमय होना है और fer

-- स्त्रीप्रत्यया प्राचार्यादयत्वं च ॥ आचार्यस्य स्त्रो प्राचार्गानी। * अर्यक्षत्रियाभ्यां दा स्पायें ॥ अर्याणी, प्रर्या । क्षत्रियाणी, क्षत्रिया। माभागम होता है+मातुन+मान् +t-मातुलानी। पानुक न होने पर मातुम+सीप,+मातुल + ई-कार लोप (यायेति १) मातुली। इसी प्रकार उपाध्याय की स्त्री-'उपाध्यायानी, उगण्यामी' टिप्पणी-जो स्वयं ही प्रकारका होती है। उसके लिये तो उपाययो' या उपाध्याया शब्द प्रयोग होता है, क्योंकि शातिक है-'या हु स्वपमेका- यारिका का डीप वाष्य। आचार्येति -प्रत्यय और पानुका मागम होने पर पाचार्य सन से परे मार का रार (त्व) नहीं होता। प्राचार्यानी-पापाय स्त्री (पाचार्य की स्त्री)-इस विरह मे पाचार्य शब्द से योग में ही प्रत्यय तथा पातुक का मागम होकर प्राचार्य +पान +-पानी-इस अवस्था ये नकार पर होना प्राप्त होता है उसरा प्रस्तुत पातिक से निकष हो जाता है तथा प्राचार्यानी स बनता है। योती स्वप हो पापाय हो उसको 'मापा' हा पाता है। अति- मोर पिर शय से स्वार्य में रोप प्रत्यय तथा भानुभका पागम होता है सिप से । बर्याणी प्रर्या (वैप पर नारी-भय (वैश्य) से सोनिन में FAIR मेरो प्रत्यय तथा भानका भागम होने पर +पान+t- मारमा पर्याणीपा में शायर (HISTार) होकर + भा-रूपबनता है। मोरार त्रिपाणी-सरिय-पशि पर की स्त्री) दाम में वो (पक्ष स्ली) हरा (पिरो) किसी सका है। .

. ३० संस्कृतम्याकरणे ५६५ । क्रीतात् करणपूर्वात ४।११५०॥ कीतान्त करणादेः स्त्रियां डीपू स्यात् । वस्त्रक्रीती। क्वचिन्न-धनक्रीता ५६६ । स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपघात् ४॥१॥ ५६५. क्रीतादिति--'क्रीत' शब्द है अन्त मे जिसके तपा करण मादि में जिसके ऐसे मारान्त प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में की होता है। वस्त्रक्रीती (वस्त्र से खरीदी हुई)-'वस्त्रंण कोसा' इस विग्रह कारकोपपदानां कृद्भिः सह समासवचन प्राक् सुबुस्पतः, .इस पनि अनुसार 'कोर' से परे सुप् पाने से पहले ही समास' हो जाता। 'वस्त्रक्रीत' शब्द से 'क्रीतात् करणपूर्वाद सूत्र से डीप प्रत्यय होकर । +ई-प्रकार लोप वस्त्राीती शन्न बनता है। क्वचिदिति-कही यह डीप नहीं होता, जैसे-धनकीता धनेन धनकीता-~-'कर्तृकरणे कृता बहुलम्' में बहुल शब्द के ग्रहण से कह 'गतिकारक०' इत्यादि परिभाषा की प्रवृत्ति नहीं होती, तएव कीत श पहले सुप होकर सब सुबन्त के साथ समास होता है और सुप से पूर्व बोधक प्रत्यय टाप हो जाता है। ५६६. स्वानाच्चेति-संयोग नहीं है उपपा मे जिसकी ऐमा, उ (गौण) जो स्वाङ्गवाची शम्म, वह जिसके अन्त में हो उस प्रकारात पदिक से ही प्रत्यय होता है विकल से। टिप्पणी-शाङ्ग सम का योगिक प्रर्य 'भपना मङ्ग' (गर मवयद) होता है किन्तु यहाँ इस पारिभाषिक अर्थ है जया कि काशिर इतलाया गया है-(१) मायं मूर्तिमत स्थान प्राणिस्थमविकारयम् । (२) प्रत्तत्स्थं तत्र दृष्टं च । (३) तेन घेत्तसपा पुनम् । १. कर्ट करणे वा बहनम् ।।१.३२ । -- स्त्रीप्रत्ययाः [ ३५६ असंयोगोधमुपसर्जन यत् स्वाङ्ग तदन्ताददन्तात् डीप चा स्यात् । केशान् अतिक्रान्ता अतिकेशी, अतिकेशा। चन्द्रमुखी, चन्द्रमुखा । असंयोगोपचात् किम् ? सुगुल्फा । उपसर्जनात् किम् १ शिखा। मर्यात स्वाङ्ग तीन प्रकार का होता है--(१) जो द्रव (तरल) रूप न हो साकार (मूर्तिमान) हो, प्राणपारी में विद्यमान हो और किसी रोग मादि (विकार) के उत्पन्न न हुपा हो, (२) जो इस समय प्राणी में स्थित न हो किन्तु प्राणो में देखा गया हो, जैसे यदि प्राणी के सुन्दर देश किसी गली में पढ़े हों तो वहा भी उपयुक्त सूत्र से होप होकर 'सुकेशी मुकेशा का ध्या' पह प्रयोग हो जायेगा । (३) यदि कोई यप्राणी भी प्राणी में स्थित किसी प्रङ्ग (स्तन प्रादि) से उसी प्रकार पुक्त हो जैसे पाणी होता है तो वह पप्राणी भी स्वाङ्ग पहलायेगा । अतः सुस्तनो सुस्तना वा प्रतिमा~-यहाँ भी उपयुक्त मूत्र के अनुसार विकल से डीप होता है। अतिकेशी अतिकेशा-केशान् प्रतिक्रान्ता (केशो का प्रतिक्रमण करते वाली) यहाँ प्रतिके भा' पाद से 'स्वानाच्योपसर्जनाद् असयोगोपधाद सूत्र से विकल से डोष होकर प्रतिकेश+ई→मकारलोप प्रतिकेशी । शेष न होने पर (प्रजाटतष्टापू ) टाप प्रत्यय होकर प्रतिकेशा शब्द बनता है। विशेष-'केशान् प्रतिक्रान्ता' इस विग्रह में 'मत्यादयः कान्ताधर्षे द्वितीयया' इस दार्तिक से समास होता है । यतिकेश शब्द में केश शब्द प्रथम प्रकार का स्वागावाची है यह भद्रव है, मूतिमत् है तथा प्राणो मे स्थित है। यह उपसर्जन भी है, क्योंकि 'भतिकेश' शब्द में पूर्वपद का वर्ष प्रधान है तथा उसरपद का गौए । इस प्रकार मन्मत्र भी समझना चाहिये। चन्द्रमुखी-चन्द्रमुखाबाद इव मुखं यस्याः (चन्द्र के समान है मुख जिसका)-इस विग्रह में बहुव्रीहि सपास होकर चन्द्रमुख गन बनता है। उससे 'स्वाङ्गाच्च' इत्यादि सूत्र से विकल्प से होष, होकर चन्द्रमुखी । पक्ष में सार (प्रजायतप्या) प्रत्यय होकर चन्द्रभुता शब्द बनता है। असंयोगोपधात् किमिति-जिसकी उपपा मे संयोग न हो ऐसा क्यों कहा गया है ? इसलिये कि सुगुल्फा (गोमनी गुल्फो यस्याः) यहाँ हो नहीं होता

३६.]
संस्कृतध्याकरण
५६७ । न क्रोडाविह्वः ४।११५६। क्रीडादेः
स्याङ्गान डीप । कल्याणकोडा । श्रारतिगणोऽयम् । सुजघना ।
। नसमुखांत संज्ञायाम् । ४.१५८ न ही
५६९)। पूर्वपदात्संज्ञायामगः ८४३॥ पूर्वपदस्थाति
परस्य नस्य णः स्यात् संज्ञायां न तु गकारव्यवधाने। शू
गौरमुथा।
क्योकि यहाँ उपधा मे (फकार के साथ लगार का) सयोग है।
उपसर्जनात् किमिति-उपसर्जन जो स्वाङ्गवाची-ऐसा क्यो क
है ? इसलिये कि 'शिखा' शब्द में डीप नहीं होता। यतिखा पार
के प्रति उपसर्जन नहीं है।
५६. न कोडादीति-प्रोड मादिगण के तथा बच् (जिसमे
अच् अर्थात् स्वर हो) स्वाङ्गवाची प्रातिपदिक से ही प्रत्यय नही होता
कल्याणक्रोडा-कल्याणी क्रोडा यस्याः (कल्याणकारी है क्रोड'
वक्षस्थल जिसका ऐसी घोड़ी-इस विग्रह मे बहुव्रीहि समास होकर
'कल्याण क्रोड' शब्द से 'स्वागच्च.' से प्राप्त डीप नहीं होता मपि
(भजायता) होकर :कल्याणक्रोडा' शब्द बनता है।
आतिगण इति-यह (कोडादि) माकृतिगण है अर्थात गणपटिर
के अतिरिक्त अन्य भी ऐसे शब्द हो सकते हैं।
सुजघना-शोभनं घनं यस्याः (सुन्दर है जघन जिसके ~स विन
'सुजघन' बहुप्रीहि समास बनता है । यहाँ 'स्वानाच्च०' से टोप प्राप्त
है किन्तु 'जघन' शब्द में बहुत से प्रच हैं अतः न कोडादियतयः से ही
निषेप हो जाता है और टाप प्रत्यय होकर सुजघना शब्द बनता है।
VEE. नखेति-नस और मुस-इन स्वागवावकं पन्नो से से
होप प्रत्यय नही होता।
५. पूर्वपदादिति-पूर्वपद में स्थित निमित्त से पर वाले मका
रएकार हो जाता है संज्ञा में, विन्तु पदि गकार बीच में हो तो नहीं होता।
शुर्पणखो-शूर्गणि इव नखानि यस्याः (छाज के समान है नम 'वि
१. मवानामुरःोडा-सिद्धान्तकौमुदी।

स्त्रीरत्यया:
३११
'यो किम् । तात्रमुरबी कन्या।
६०० । जातेरस्त्रीविषयादयोपचात् ४११६३॥ जातिचापि
प स्त्रियां नियतमयोपधं ततः स्त्रियां हीर क्यान् । तटी। पृपली ।
कमी का नाम (संज्ञा) है : बागाय.' से ओहोद प्राप्त होता
का मखमुखात समायाम्' इम सूत्र से निषेध हो जाता है और प्रत्यय
तथा पूर्वपदारसंशायामग.' के अनुसार नकार कोणार होर 'भूगएमा
."
..
औरमुपागोर मुसं परया: (गौर है मुख बिमराह स्वाहा
प्राप्त होता है.frm यह किसी का नाम है मत होप.पा उपयुंक्त मूत्र
हो पाता है और टार प्रत्यय होकर गौरमुसा रूप बनता है।
मायाँ किमिति-सना में ही नही होता ऐसा कशे कहा गया है।
। कि वाममुखी या' यहाँ (स्वाहा') दोष, होरा ही है क्योकि
मुख यस्या: साइम विग्रह मे बना मा 'ताप्रमुखो गा यौगिक है,
संडामही
२०. लातेरिति-~ो जातिय कम्म, त्रीनिक में नियत न हो हा
उषा में यार हो: ऐमें काराव घर से निप.प्रत्यय
-
प्पणी-हो कति पारिमारिकसा किरहा है-
पातिपहला जाति: (२) मिजमा वन समार।
सामानिgr (१) गोर पर: सह ।।
हो जामीनप्रसार है-®ो पारविनिमेष से परत
है. मेजर पाहिरिनयुक्त जलसमीप प्रदेश पहनाना
कोपरनिलों में महोवदा कति में बता देने पर पार्षों में
एका से हरा हो जाने से पल 0 गोत्र मय
तरराररावासा पाने वाले
'' के हर मोरेरिरे बारे-
-smar पनि निराश नहीं है.

१२ ] संगमारी कठी। पहशुभो। जानेः किम् ? मुण्डा। भरत्रीविषयान्, महारा! अयोपचान् किम् ? जत्रिया। योगपतिघे हयगययमुख्यमनुध्यमल्यानामपतिपः इयो । गयी । मुफयी। दलातदिनस्येति यज्ञोपः। मनुषी । हमको उसपा में महार भी ना पतः इसमे डायुंफ मूत्र प्ररपर होर+f--प्रकार सोरटी बनता है। पती-पम तिमी)-म+प -qri+f- कठी-(पारो पड़ने वानी)-ठेन ओक्तमधीयाना कद जिसका प्रपन किया गया है (ठेन प्रोतम्) वह ठगामा है । उमा पाने भी सहसाते हैं । ठगः को गालिगचा मानकर उसमे 'ज विपायोग्यात' मूत्र मे और प्रत्यय हो जाता है। सो प्रहार 'बह.पी-बहवासामधीयाना-बहारगाखा . बामी । यशपयारत का उसहरण है-टागोरपापं स्त्री 'पोरगी पौगय गल मे औप, प्रायय होता है। (मिक्षान्ता मुी) जातेः शिमिति-जातिवारी मे हो, ऐमा यों कहा गया है ? इस 'मुण्डा (भुडी हुई) यहां सीप, नहीं होता क्योंकि इसमें उक्त बा सटाण परित नही होता। पात्रीनिन्यान् किमिति--जो स्त्रीलिङ्ग में नियत न हो ऐसा क्यों गया है ? इसलिये कि 'बाबा' यही होष नहीं होता; क्योंकि बलाका स्त्रीलिङ्ग में निवत है। अयोपधात् किमिति-जिसकी उपधा में यकार न हो-ऐसा क्यों गया है ? इमलिये कि 'क्षत्रिया-यहाँ होष नहीं होता। योपधेति (वा)-योरघ के निषेध में हय, गवय, मुरुय, मनुष्य रस्य-इन शब्दो का प्रतिषेध नहीं होता पर्याद इनसे डोष होता ही है । इयी (घोड़ी)-'हय' गन को उपधा में कार है मत: 'बाते स्पयाइयोपधाद' से स्त्रीलिङ्ग मे डीप राप्त नहीं था । इस कार्तिक के म रोष हो जाता है तथा य+डोष →हय+ई--मकारसोप यी शब्द स्त्रीरत्ययाः [ ३६३ * मत्स्यस्य ड्याम् ।। यलोपः। मत्सी। ६०१ । इतो मनुष्यजातेः ४।११६५॥ सीर । दाक्षी । ६०२ । ऊतः ॥१॥६६॥ दन्तादयोपधान्मनुष्यजातिवा- है। इसी प्रकार गवय (गाय जैसा एक पशु) से 'गवी' मोर मुक्य (पशुविशेष) से "मुकी' । मनुपी (नारी)-मनुष्य शब्द की उषा में पकार है फिर भी उपयुक्त वार्तिक के द्वारा ही प्र-यय होता है । मनुष्य + ई-+इस अवस्था में मकार लोर (यस्येनि तथा हलस्तदितस्य' से यकार का लोप हाकर 'मनुषी' शब्द बनता है। मत्यस्येति-'मस्य' से यकार का लोप होता है डोपरे होने पर। मत्सी (मछली)-'मत्स्य' शब्द की उपधा मे यकार है तथापि उपयुक्त पातिक के अनुसार डीप प्रत्यय हो जाता है। मत्स्य + ई-+इस अवस्था मे पकार सोप (यस्येति १) तया मत्स्यप झ्याम्' इस वानिक से पार का लोप होकर मत्म+ई-मत्पी रूप बनता है। ६०१. इत इति-मनुष्य जातिवाधी इकारान्त शब्द से डोष प्रत्यय होता है। टिप्पणी-जाते रस्त्रीविषयास्योपघाद सूत्र के अनुमार प्रकारान्त प्राति- पदिक से रोष होता पतः प्रस्तुत सूत्र द्वारा इकारान्त सम्म से की का विषान किया गया है। दाक्षी-दशस्यारत्यं त्री-दस की सन्तान धी-इस विग्रह में दस शब्द से 'मत्त ' से इस प्रत्यय होकर दाक्षि' शब्द बनता है जो अपत्य प्रत्ययान्त होने से जातिवाचक है । इससे (स्तो मनुष्यजाते.) ही प्रत्यप होकर दालि+ ई-कारलोप (यस्येति ) राक्षी स्प बनता है। ६०२. जात इति-सकार है मन्त में सिके तथा यकार नहीं है सपा में जिसके ऐसे मनुष्य जातिवाचक प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में 3ा, प्रत्यर होता है।

संस्कृतव्याकरण चिनः स्त्रियामूछ स्यात् । कुरूः। अयोपधात् किम् ? अध ६०३ । पङ्गोश्च ४।१।६। पङ गूः । * श्वशुरस्योकाराकारलोपश्च ॥ श्वश्रः। कुरु-कुरो. मपाप स्त्री-कुरुत्रदेश का राजा कुरु उसकी यहाँ कुरु' शब्द से प्रपत्यय अर्थ मे प्य' प्रत्य होकर उसका लुक प्रत्यप्रत्ययान्त हाने से यह मनुष्यजातिवाचक है प्रताप इससे उ प्रत्यय होकर कुरु+3+ सवर्णदीर्घ कुरू रूप बनता है। 'दुरूर अयोपधान् किमिति-जिमकी उपधा में यकार न हो-ऐ। गया है । इसलिये कि अवयु ग्रह्मणो यहाँ प्रध्वयु शब्द मे उड होता; क्योकि इसकी उपधा मे यकार है । 'मध्वयु' शब्द 'गोत्रं च के अनुसार जातिवाचक है। ६०३. पगोश्चेति- 'पड गुशन से स्त्रीलिङ्ग में ऊड टिप्पणी-पड गु शब्द जातिवाचक नहीं, मन हतः से पा। इसलिये इस मूत्र द्वारा कङ, प्रत्यय कहा गया है । पङ्ग : (लंगड़ी)-4 गु शाम से 'पङ्गोश्च' मूत्र के अनुमार । उ प्रत्यय होकर पह ++पङ्ग रूप बनता है। श्वसुरस्येति-- शुर' शब्द से स्त्रीलिङ्ग मे 3, प्रत्यय होर १. कुस्मादम्पो मः ॥१ १७२१ २. अर्यवस्पातुर.त्यय. प्रतिक्षिम् ॥४५॥ मूत्र रो धातु तर को छोड़कर अयंयुक्त शन्दगी प्रातिपदिक संशा होती है पर हन्त शद की प्रातिपदिक मंशान होगी फिर मारि-मुर) : होगे ? क्योकि वे (स. गार प्रातिपदिकाय) डी, मार, प्रत्ययान्त तपा मंझक से ही होते है। तयारि 'प्रातिपदिशग्रहणे. विविशिष्टाया (कातिपदिक ग्रहण में लियोधकप्रत्ययविशिष्ट का भी प्रहण होट परिभाषा के अनुसार इ. प्रत्ययान्त मे मी 'सु' पार हो जाते हैं भी -कुमारि सानते हैं। प्रत्यर स्त्रीप्रत्ययाः [ ३६५ ६०४ । ऊस्तरपदादौपम्ये ४११६६।। टपमानवाचि पूर्वपद- मूत्तरपदं यत्प्रातिपदिफ तस्माद, स्यात् । करमोरुः । ६०) । संहितशफलक्षणवामादेश्च ॥७॥ अनौपम्यार्थ सूत्रम् । संहितोरूः । शोरू' । लक्षणोः । वामोरुः। पापार मे परे वाले मार का मोर रेफ (१) से परे वाले प्रकार का लार रवा : (सास)-'श्वशुर' न से स्वीमिङ्ग में अा. प्रत्यय होकर वशुर+3-इस अवस्था में कार से पर उगर का तथा रेफ से परमार सोर हो जाता है. शुर+ऊ→श्वश्र + गुपय: । ६०४. ऊरूत्तरेति--उपमानवाची हो पूर्वपद जिमका पौर 'ऊद' शरम हो सरप जिमका ऐमे प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग मे कर प्रत्यय होता है। करभोरू:-करमी व अरु यस्याः (परम के समान है अरू जिसके)- पूर्वपद 'करम' पद है जो उपमानवानी है तथा उत्तापः 'कर' म है पतः प्रस्तुत सूत्र मे ऊड प्रत्यय होकर रमो++ सवरध होर भोक बनता है। टिप्पणी-हाथ की कलाई (मणिबन्ध) से मेकर कमिटिका सरे पेमी के निचले भाग को करते है की भाति इम (म) के सरस है वही दोनों में समानता है अपवा स्निग्या या कोमसता दोनो । समान धर्म ६.. महिनेति-संहित. १, सक्षण और दाम कम हो पूर्वपर (प) जिला और अPो उत्तरपद रिसा ऐसे प्रतिपदिक से भी नितम प्रयय होता है। भनौपम्यार्थमिति-यह सूत्र नौपम्य के लिये है पनि वहाँ पूर्वपर समानयासी मही है यहाँ प्रत्यय के विधान के लिये है। मंहितोर-साहिता सहिलाटो दाया:-मिले हुए हैं और मित्रो १.परिवार निरपरमोबदमरोग।

-- Int . ३६६ संस्तव्याकरण ६०६ 7 शाङ्गरवाद्यत्रो डोन ४१।७३|| शा योऽकारस्तदन्ताच्च जातिवाचिनो डीन् स्यात् । शार माहाणी। नृतरयादिश्च । नारी। इस विग्रह मे निष्पन 'संहितोह शम्द से स्त्रीलिङ्ग में कर संहितो+3-- सवर्णदीपं सहितोकः । इसी प्रकार 'फो करू याया:' (सपिलष्ट' है अरु जिप्स सारणी करू यस्याः (शुभ सभणयुक्त है 36 जिमके) 'लभरणों करू यस्याः (सुन्दर है करू जिसके.) 'वामोरू' शन्द बनते ६०६. शाहरवेति-मारव मादि शब्दों से तथा पत्र । यह है पन्त मे जिसके ऐसे जातिवाचक शब्दों से दोन प्रत्यय होता है टिप्पणी-शारद तथा बंद' शब्द अपत्य प्रत्ययान्त हैं । सक्षण डीप प्राप्त होने पर डीन प्रत्यय का विधान किया गया है। डीन में स्वर का भेद है । डीन प्रत्ययान्त शब्द मा दात्त होता है । शाहरवी-शृङ्गरोः अपत्यं स्त्री (शृङ्गरु को सन्तान स्त्री) से पण प्रत्यय होकर शाङ्गरव शम बनता है। उससे प्रस्तुत सूत्र हान् प्रत्यय होकर शारव+t-भकार लोप (यस्येति च) शा वैदी-बिदस्य प्रपत्यं स्त्री वेदी । (बिद को सन्तान स्त्री) बिर बंद । प्रान्त बंद शन से डीन् प्रत्यय होकर बैद+ई+प्रकार लोप ब्राझणी-ब्राह्मण शब्द शाङ्गरव मादि गण में है। लक्षण ही प्राप्त था। उसे बाप कर प्रस्तुत सूत्र से डोन होता है +ई-ब्राह्मणी। नृनरयोरिति (गणसूत्र)-न मोर नर शब्द से स्त्रीलिङ्ग में १. शफ शब्द का प्रथं सुर होता है, किन्तु यहाँ शफ शन से सदृश संलिष्ट' यह अर्थ लक्षणा द्वारा प्रकट होता है। २. 'लक्षण' शब्द प्रधिच प्रत्ययान्त है जो लक्षणयुक्त के प्रथं ३. नित्यादिनित्यम् ।६।१।१६७ ४. मनुष्यानन्त विदादिम्योऽन्न ११॥

.
स्त्रीप्रत्ययाः
३६७ ]
(६०७) यूनस्तिः ४.१७७॥ युधन शब्दात् स्त्रियां ति प्रत्ययः
स्यात् । युवतिः।
इति स्त्रीप्रत्यया ॥
होता है और इन शब्दों को वृद्धि भी होती है।
टिप्पणी-(१) न के ऋकार को वृद्धि (भार) होती है तथा नर प्राब्द मे
नकार से पर प्रकार को वृद्धि (41) होती है । (२) न शब्द से 'ऋन्नेभ्यो दीप'
से डीप् प्रत्यय प्राप्त था और 'नर' शब्द से जाति लक्षण डीए प्राप्त था।
उनको बावार इससे होन् प्रत्यय होता है।
नारी-'न' शब्द से डीन् होकर ऋकार को वृद्धि (पार्) होकर नार+
'+नारी तथा 'नर' शब्द से डीन होकर र+ई→अन्त्य प्रकार
पा पूर्व प्रकार को दृद्धि होकर नारी शब्द बनता है।
६०७. यून इति-'युवन्' शब्द से स्त्रीलिङ्ग मे ति प्रत्यय होता है।
युवती-युवन् शब्द से यूनम्तिः' सूत्र के अनुसार ति प्रत्यय होकर
पन+ति-नकार' लोप होकर युवतिः शब्द बनता है ।
टिप्पणी-यह ति प्रत्यय तद्धितसंजक है, मतः 'कृत्तद्धितसमासाश्च से
पति' शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होकर सु मादि प्रत्यय होते हैं ।
र इति स्त्रीप्रत्यय
का लोप
१.नलोपःप्रातिपदिकान्तस्य बारा॥

अथ तिङन्तप्रक्रिया तिङन्तेति-धातुपों के क्रिया पर बनाने के लिये जो 'ति'. जोड़े जाते हैं, उन्हें तिङ्ग कहते हैं । तिन प्रत्यय जिनके अन्त में हो किया पड़ों को तिडन्त रहते हैं। धातु-धातु पाठ में पठिन जो 'म्' माहिए तथा 'सन्' धादि कर जो चिकीर्ष' इत्यादि बनती हैं, वे धातु कहलाती है। धातुओं में दो प्रकार के प्रत्यय जोड़े जाते हैं--(1) अपय तिह, प्रापय । इनमें से कृत प्रत्ययों को प्रक्रिया कार दिसलाई जा लिङ्ग प्रत्यय 'लकार' के स्थान में होते हैं। हाल धादि (Tent movis) को प्रकट करने वाली मया की प्रवस्या को भ्याकरण में कहा जाता है । साार दम है-लट, लिट लुइ, सूट, लेट, मोट् म लुइ, २८ रन मै मेट मार का प्रयोग रेकर वेट में ही होता है मार के दो भेद होते है-'. विधिनिल पोर , पागनिज इन सब विस्तृत विवेचन सकारार्थ प्रक्रिया में किया जायेगा। तिध-मार के स्पान में होने वाले ' लिपा १ प्रपों में मा प्रत्यय पपमैप सनक होने है तथा अन्त के मा प्रत्यय भारमनेर होते हैं । परमपदी धातुणे में परस्मैपद के प्रत्यय, मारमनेपदी में प्रारपने प्रत्यय लगाये जाते हैं धातुमों के बाद पारि । पाये पिया जायेगा।) परम्मट पोर पात्मनेपद के लिए प्राययों के जो तीन नि (तीन का समूह) होते हैं उनको मा प्रथम, मध्यम मार १. भूवादया पानवः ॥१.१॥ २. मनापन्ना धारयः ॥१.३२ ३. सस्य ३४१७॥ तिमभिमिप्यम्पमिगमगात मायामापनि महिम यहाँ नि' से लेटर.नि. प्रवाशार पर ४.मः परम्मैपदम् Pritu १. नानाम्यहम् int.or বিপণিমা पुरुष संशा होती है। पौर प्रत्येक किक के तीन प्रत्ययों का क्रमशः एकवचन, द्विरत और बहरवन में प्रयोग होता है। संक्षेप में विपरपयों का मूलस्वरूप तम् प भवय: भवप पम्मेव मात्मनपर बचाएक. बहुवचन प्रथम पुरुष तिप् भाताम् मध्यम पृथप मि यस् पासू प्राचाम् पम् उत्तम पुरुष मि वस मस् वाह महि इन प्रत्ययों । विविध समारों में बुध स-परिवर्तन हो पाता है। लद (वलं मान) में यह रूप परिवर्तन बहुत ही कम होता है। निहन्त प्रक्रिया को समझने के लिये परमग्दी तथा प्राश्मनेपदी पातुर्षों के लिदु सकार में) सामान्य रूपों का विवेचन उपयोगी होगा । 'भू' सत्तायाम् (होना) घातु परस्मै. पदो हमके लट् लकार में मे रूप एज्वचन द्विवचन बहुवचन प्रमपुरष माति भवतः भवन्ति मध्यमपुरुष भमि उसमपुरुष भवामि भरामः इन मों की सक्षिप्त प्ररिया इस प्रकार है- भवति-भूषा से पवार' के ('यह होता है इस भयं में) भद लकार प्रथमपुरुष के एरवहन मे-'भू+ति" इस दशा मे तिको माय. धातासंगा (तिमिरमा पातुरम ) होने के कारण भानु पौर fre १.निम्नगि वीणि प्रथममध्यमोममाः १int. २. साम्ये कारनविपनरहरपलाययः ॥११.२॥ ३. मा तीन होते हैं-बाप वापर, भावराष नापिरोप बरन भावरमरिया में किया येया। 1.नि परामर (हमयम्' से समझा उमा 'वस्य मोर:' से मोर)ो जाता है। १.भानु से होने वाले दोनों प्रकार के प्रत्ययों ( ता निज) को दो बयों मे सदा परा है-(१) साधातु मोड Eि वजन (सिरा NETर मंडरा र दिशित भाईचाराम Intty; (२) मा. माम प्रति पातु से होने वाले पर प्रत (INITE: १४), लिद (fe Re R११११) या अनि मिलिपि 11).

गरातम्या
के मध्य में गर (ररिस tite) हरा हो जाता है।
रहता है) तपा 'म+प्र+fa' यह पति हो जाती है। यहाँ
गुण' (प) होकर भो++ति म मा में 'मों को 'अव पः
है तपा म++f-मनि यहा बनता है।
भरत:-+तम' (प्रथम पु० मिन} इस दशा में मात्र
ही सब कार्य होगर '' को र (३) तपार' को विसर्ग होकर
भति-'भूमि' हा (प्रथम पुष्प बहुवचन में)
भादेश (मोऽन्तः ७.१॥ होकर तपा प्, गुण और पद
प्रकार को पररूप'(+-) हो जाता है।
इसी प्रकार मधम पुप के तीनों रूप-भू++सि-
w+धम् → को र तथा विसग होकर 'मवषः' मोर+.
सिद्ध होते हैं।
उत्तम पुरुष के एकवचन में भू+म+गि-+भव ++
इस अवस्था में 'भव' के मसिम प्रकार को दीप' होकर
होता है।
इसी प्रकार द्विवचन में-भू+म+वस='भवाव:'. बहुवच
म+मस्-'मवाम:'।
।
१. धात मोर ति के बीच में जो 'श' मादि पम्दांश जोड़े
'विकरण' कहलाते हैं । ये विकरण केवल सार्वधातुक ।
लोट, ना पौर वियिल) सकारों में ही होते हैं।
२. सार्वधातुकाधंधातकयोः (11८४) सार्वधातुक तथा माध
परे होने पर इगन्त मङ्ग को गुण होता है।
३. मतो गुरणे |
४. मतो दीर्घा यषि ७।३.१०१ यम् है मादि में जिसके ऐसा ।
प्रत्यय परे होने पर मकारान्त प्रङ्ग को दीघं होता है।

तिइन्तप्रक्रिया एघे मात्मनेपदी धातुओं को सामान्य प्रक्रिया एप पद्धौ (बदना) धातु मात्मनेपदी है। इसके रूप लट लकार मे इस र होते है:- एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमपुरुष एघते एधेते एधन्ते मध्यमपुरुष एघसे एघेथे एषध्वे उत्तमपुरुष एपबहे एषामहे इन रूपों की संक्षिप्त प्रक्रिया निम्नलिखित है :- एषते-'ए' इस दशा में 'त' की सार्वधातुक सजा होने पर धातु :प्रत्यय के मध्य मे दाए होकर 'एघ+म+त यह "त' के म को ए" हो है तथा एप+म+तेभएघते रुप होता है। एघेते - 'ए +म+प्राताम्' इस दशा मे 'माताम' के पा को इय्' मादेश र 'ए+म+इय+ताम् इस दशा मे 'म+ए (गुण) तथा 'य' लोप' होकर ए+ए+ताम् यहाँ पर ताम् के 'माम्' (ट) को एकार जाता है तथा एघेते रूप बनता है। एषन्ते-ए+4 (पए)+झ (म को 'भन्त' मादेश होकर) एघ-+- - पन्त' पन्त के प्रतिम 'म' (टि) को एकार तथा शप के का मन्ते के पर के साथ पररूप होकर एष++-एधन्ते रूप होता है। एधसे-~-ए-14+यास्' इस अवस्था मे पास् के स्थान में 'से' मादेश सः मे ३४८०) होकर एघ++से-एषसे । एघेथे-'एय+म+माथाम्' इस भवस्था मे (पा को इय् म+:+ए ॥ प्राथाम्' के पाम को 'ए' मादि) सब कार्य 'एयेते' के समान होते हैं । एघो-ए-+म+वम' यहाँ ध्वम के मम् (दि) को ए हो जाता है - १.टित मारमनेपदानां टेरे ६४७६) २.प्रातो डितः ।। लोपो ब्योलि १९

यथ ण्यन्तप्रक्रिया
६०८१ स्वतन्त्रः कर्ता ११४१५४॥ क्रियायां
विवक्षितोऽर्थः कर्ता स्यात् ।
६०६ । तत्प्रयोजको हेतुश्च १५॥ कतु
हेतुसंज्ञः कर्तृ संज्ञश्च स्यात् ।
एधे-ए++5 (इद) इस दशा में 'इ' को एकार !
+ए यही म+एए (मतो गुणे से पररूप) हो पाता है।
एगाहे - एध++ यहि (इकोए होकर) '
एम-
दीर्घ होकर एप मा+वहे - एघावहै । इसी प्रकार एप++
महे' यह रूप बनता है।
प्यन्तप्रक्रिया मादि में धातुपों के रूप बनाने के लिये उपयु
ध्यान में रखना चाहिए। पन्य लकारों में जो विशेष कार्य है
यथास्थान निरूपण किया जायगा।
पथपतति-णि णिच या गिङ) प्रत्यय है पन्त में जि
(गि+मन्त) कहलाता है। ज्यन्त धातुओं को पसिसके !
प्रकरण में विवेचन किया जा रहा है।
१०८. सतन्त्र इति-रिया में जिनको स्वतन्त्र रूप से कहन
(विवक्षितपत म इष्टः) वह वस्तु मा व्यक्ति (पं) पबिहम
पमित्राय यह है कि 'पर्ता होना' विवक्षा के प्रधीन है।
व्यक्ति जिसे पियामिति में स्वत्र लाना चाहता है यहीका
'देवदत्तः पचति' 'पग्निः पचति तथा काठानि पवि'-को-
इच्छा के अनुमार तीनों ही प्रयोग हो सकते है ।
. तरम्पोजक इति- उम (ii) के प्रयोग की है
मन मंशा (दोनों) होती है।
1.मोटोपों पनि ॥१.१॥

ण्यन्तप्रक्रिया ३०१ ६१० । हेतुमति च ॥२६॥ प्रयोजकव्यापार प्रेषणादौ वाच्ये घातोणिच् स्यात् । भवन्त प्रेरयति भावयति । टिप्पणी- का दो प्रकार का होता है-एक किसी कार्य को करने वाला और दूसरा किसी कार्य को कराने वाला अर्थात् करने की प्रेरणा देने वाला। जो व्यक्ति कार्य करने वाले को प्रेरणा देता है वह प्रेरक कहलाता है वही ग्योजक कता है तथा उसकी हेतु' सज्ञा भी होती है। जिसे प्रेरणा दी जाती है वह 'प्रयोज्य' कर्ता कहलाता है। जैसे प्राचार्य जी देवदत्त को पढ़ाते हैं। पहा 'भाचार्य जी' प्रयोजक फत्ता है और देवदत्त प्रयोउप का है। यहाँ प्रेरणा' देना ही प्रयोजक कार्य हैं । यही प्रयोजक का व्यापार कहा जाता है। ६१०. हेतुमति चेति-~प्रपोजक का व्यापार प्रेषण इत्यादि (प्रेरणा) कहना हो तो धातु से णिच् प्रत्यय हो जाता है। [चि मे शकार मोर पकार का लोप हो जाता है केवल 'इ' शेष रहती है। भावयति-'भवन्तं प्रेरपति' (होने वाले को प्रेरित करता है)-इस विग्रह में 'भू' धातु से हेतुमति प' सूत्र के अनुसार णिच्' प्रत्यय होता है। 'भू+इ-मही पिन् प्रत्यय के णित् (ए है इसजक जिसका) होने से अकार को (भचो क्रियाति ७.२२११५) वृद्धि (पौ) होकर 'पो' को पाव हो माता है+भी+भात+भावि---इस गिजन्त रूप को पातु' सजा होती है तथा लट् लकार में 'भावि+ति' इस दशा में पातु तथा प्रत्यय के मध्य मे पप्' (प) हो जाता है। भावि++ति इस अवस्था मे को गुण (ए) तथा 'ए' को 'पम्' मादेश होकर भाव+प्रम् +म+ति+भावयति रूप सिद्ध होता है। टिप्पणी-(१) यह णिच् प्रत्यय प्रेरणा भर्य में होता पतः भावयति इत्यादि प्रेरणार्थक क्रियायें कहलाती है। चोरयति (चर् + णिच) पादि मे जो शिप प्रत्यय होता है. वह स्वार्थ मे होता है, वहां प्रेरणा अर्थ नहीं होता। कितु रूप दोनों के समान ही होते हैं। (२) भावयति' के 'भवति' के १.सनानन्ता पातयः ३११।३२१ २. कतरि प ३ प ६११ । प्रोः पुषणज्यपरे ॥७II सनि याभ्यासोकारस्य पुस्यात् पवगंयणमकारेश्ववर्णपरेषुप समान समस्त सकारों में सा बनते है उदाहरण प्रत्येक स्प इस प्रकार है-सद-माश्यति । निद-भावयामा भावयासकार। मुद-भावयिता । मुट-भावयिध्यति । समभावयत् । विपिलिङ्ग-भावत् । पाशिपि लिइ- मनोमवत् ।जिसको सिटि मागे की जा रही है)। लु (३) जिन्त धातुओं के रूप परस्मैपद सपा मारमनेपद दोन मत: 'भावपते मादि भी हम होंगे। ६११. बोरिति-[यहाँ मृनामित्' IMEI से तथा से 'सनि-इन पदों को अनुवृत्ति होती है] सन् प्रत्यय परे । उसके अवयव अभ्यास के उकार को इकार हो जाता है । जिनके ऐसे पवर्ग, मए (य, व, र, ल) तथा बकार परे हों। प्रबोमवत्-भू+णिच् + लुङ प्रिपम पुरुष एकवचन). मद' का मागम, तुड़ के स्थान में तिप् होकर 'ति' का इक सपा म भू++त+इस दशा मे लुङ, परे होने से नि स्थान में चा' (प) होकर प्रभू इम' इस अवस्था । द्वित्व होकर 'म भू भूमत' यहाँ पर पहले 'भू' को भर ससे मम्यासकार्य-भिकार को बकार' (जर) तथा '' को ह 'मधु भू भत्' इस अवस्था में परे वाले 'भू' के ऊ को व पाद भादेश होकर 'म बु भा मत'--णिच् का लो। के प्राकार को हस्व हो जाता है । म दु मद म में सम्बद्भाव (सन् प्रत्यय के समान कार्य) होकर 'मोः १. लुङलङलइक्ष्वडुदात्त: ॥६॥ २.लि लु ३. शिधिस म्यः कर्तरि घड १ ४. च ५. अशी चर्च ८१४१५४|| ७. जो घायुपधायाः हाद: HIMA • सन्वालपनि घसरेनाली Nisa रनि ६.

प्यन्तप्रक्रिया ३०५ प्ठा गतिनिवती- ६१२ । मति होटलोरीक्तूयीक्ष्माय्यातो पुङ् रणौ ॥३॥३६॥ क्यापयति। ६१३ । तिष्ठतेरित 111५11 उपापाया इमादेशः पाचपरे णो। प्रतिष्ठिपत् । उकार को इकार होता है तथा उसे 'दीपों मघो:' UMer से दोष होकर "सोमवत्' हासिल होता है। टेति-या पातु हाना या खड़ा होना मथं में है। प्ठा के पकार को सकार'होकर स्था' रूप हो जाता है उससे णिच् प्रत्यय होने पर श+6 सपस्या मे- ६१२ मताति-हो, सी, रो, क्यो, दमायो १४ पसरात पातुपों को पुर मागम होता है.fण' परे होने पर। (स्था धातु सकारात है पत: इस सूत्र से स्पा के पागे पुत्र हो जाता है। पुर मे उपर सपा कार का Rोप हो जाता है पोर पेष रहना है।) स्थापयति-पा+णि गा+t' इस भाषा में पुरका भागम होकर स्थाrkife imत पातु होती है। उसने सट सकार. पु. एक. मे स्थापि++ति-गुण पोर पर पादेश होकर स्थापयति । इसी प्रकार-यति पयति यति, रेपयति सोम साप. पति पत्यादि। १३. तिरिति-स्था धातु को उपधा को रार पास होता है पद पाये जिसके ऐमा ति परै हाने पर। पतिप्टिपत्-था+ लिन (प्रथम पुर एरपन) भीमा के समान 'पस्या 'हवा हो पाने पर पा'को हिप होकर मम्याम मे 'प' मात्र पर रहता है तथा 'पप स्थापत्' इस पापा मे १. पारकादे::स: Auth २.ए मोर मायके रासोर हो जाता है। १. स्पू: पर: से सर पर्वा स र एमापोर 'या' को हाम: ४६ पे हव होरर मार देर रात

पपया
स
घट चेष्टायाम्-
६१४ । मिता ह्रस्व: ६॥२॥ घटादीनां ज्ञपार
हस्व: स्याएको घटयति ।
ज्ञप ज्ञाने ज्ञापने च । ज्ञ पयति । अजिज्ञपस् ।
॥ इति एयन्तप्रक्रिया ॥
'तिष्टतेरिस्' से स्थाप' के माकार (उपथा) को कार
स्थिप् इ मत् यहाँ पर सन्वद्भाव होकर '' के प्रकार को इका
पकार को कार' (चत्त) होकर 'म ति स्पपपत' यही र
स्पि के स् को पनौर को ह (ष्ट्रव) होकर मतिष्ठिात् रूप
६१४. मितामिति-घट मादि मोर ग भादि धातु
हस्व हो जाता है कि परे होने पर । (पटु मादि मोर गप्पा
संझक है)
घटयति-घट + णिच्=पादि-इस मयस्या में भाग
हस्व होकर 'घटि' णिजम्त धातु होती है। पटि' पेश
भय भादि होकर पति रूप बनता है।
(लुचलकार में 'मजीपदत्' का बनता है)
जप्दति- धातु जानना और शान कराना में
यह धादिगण की यातु है इससे प्रेरणार्थक णि कर
पिच का ऐरनिटि ५१ से लोप हो जाता है]
मपति--स+णिपशापि-इस मारपा में माकार
हस्य होकर 'nfr' गिअन्त धातु होती है। उससे पति का
प्रमिमपत-ग+णि+मुह (प्रथम पुष्प, एकवचन)
+मत् इस दशा में यि, अम्यासहाय',far होकर प्रति
१. सम्यतः ७४४१७. यह पोमर के समान दोषों
नहीं होगा, क्योंकि 'हयोग गुरु के अनुसार ४ गुरु है मप नही
२.पभ्यासे वर्ष 2011
1. सम्वत: MInst से प्रधा कोशारोगा।

श्रथ सन्नन्तप्रक्रिया ६१५ । धातोः कर्मणः समानर्तृ कादिच्छायो वा ३॥१३॥ इपिकर्मण इपिणेककरी काद्धातोः सन प्रत्ययो वा स्यादिन्छायाम पढ़ व्यक्तायां-वाचि ६१६ । सन्यडोः ६९|| सन्नन्तस्य यड-तस्य च घालोर टिप्पणी- इसी प्रकार अन्य धातुपो से भी जिन्न (प्रेरणाथक) रूप नाये पा सकते हैं । कुछ प्रसिद्ध धातुमो के रिणजम्त रूप निम्न प्रकार के हात गम्-गमपति । दा-दापयति । हम शयति । पा (पीना)-पापति (पालना)-पालयति-लम-लम्भयति । मस् (होना -भावयति ग्रह- हियति । नम्-नमयति, नामयति । हन्-धातयति । भी नाययति । भी-भाषति- पियते। प. (मुनगा)-श्रावयति । चावति । मृ-मारयति । - रयति । र रजयति । रह-गेहयति-गपति । सिष्-माधान, मेघ. त्यादि। ॥ इति प्यरतप्रक्रिया। सानाति-सन् प्रत्यय है अन्त मे जिसके वह सन्+मन्त= मनम पातु माती है । सम्नन्त पातु की प्रक्रिया - सम्नम्त प्रक्रिया । १५. पातोरिति-[गृप्ति विदम्य. सन ||१५ से मन को अनुपस्ति vt है] पो इच्छा का कर्म हो तपाइन्छा त्रिया को समाना (पति इन्धा किया का ही है या जिसका ऐसी) हो उस पान सइया म्यं में विकल्प से सन् प्रत्यय होता है। पद-पातु व्यक्तगरणी (स्पष्ट उच्चारत पा पाना) पर्थ में है। इससे सन् अप्प होता है. 'सत्' में स शंष रहता है। ५. सन्यहोरिति-[एकापो के प्रथमस्य २ को पति हो रही है। जिसका दिप , हमा हो (पवमासस्य) को सन् प्रत्ययान्त और मा प्रत्ययात पातु के प्रथम पार को दिवा ६.११ प्रजातीय

नभ्यासस्य प्रयमस्येकाचो द्वे स्तोऽजादेतु द्वितीयस्य । मन
मिछति पिपठिपति । कमण: किम ? गमनेनेच्छति। स
है, जिस धातु के मार में प्रव (स्वर) हो उगके तो दिलीप प्र
होता है।
टिप्पणी-एका का अर्थ है एक पम् है जिममें, बैठे
पहा पर 'पट एकाध है, क्योंकि इसमें 'म' ही एक ष है।
होकर पठ्+पठ् + समयासकार्य प+पद+स इस भवस्या
सम्पतः इति-अभ्यास के प्रकार को इकार हो जाता है ।
होने पर इसमे मम्मास के 'प' के स्थान पर पि' हो जाता है
पिपठिषति-पठितुमिच्छति' (पढने की इदा करता है)
में 'पातो; कमणः' इत्यादि सूत्र से पढ़ पातु से मन् प्रत्यय हो
सूत्र के अनुसार पठ् पाद को द्विस्व होने पर पूर्व पट् (मम्यास)
रहता है तथा 'सन्यतः' से उस 'ए' के प्रकार को इकार हो जात
'स' इस अवस्था में स (सन्) को इट' (इ) का मागम होकर
षकार होता है । इस प्रकार 'पिपठिप' यह सन्नन्त घातु' बनन
लट् लकार के एकवचन में तिप, शप होकर पिपठिप+म+ति
+मम) पिपठिषति ।
कर्मण पति-इण्या की कम र धातु से सन् प्रत्यय होता
कहा गया है ? इसलिए कि 'गमनेन इच्छति'-यहाँ गमन क्रिय
कर्म नही अपितु करण है। प्रतः 'गम्' धातु से सन् प्रत्यय नहीं
१. यहाँ 'इच्छति' क्रिया का कर्ता जो देवदत्त पादि है वही
का कर्ता है । मतः पद धातु इण्या, क्रिया की एककक है तथा
इच्छा का कर्म भी है इसलिए पर धातु से सन् प्रत्यय होता है।
२. पढ़ पढ़ स~यहाँ 'इलादिः पेष: 1.1 के अनुसार "
रहता है।
३. प्राधातुकररोडवलादेः ७.२१३५
४. सनायता: पाता:॥१॥३२॥

सन्नन्तप्रक्रिया -- किम ? शिष्याः पठन्वितीच्छति गुरुः। वामहणाद वाक्यमा लड्सनोपल । समानेति-जो इच्छा का कर्ता है वहीं उस (जिससे सन् करना है) का भी कर्ता होना चाहिये, यह क्यों कहा गया है ? इसलिये कि 'शि परन्तु' इति इन्दति गुरु:-यही पर पउन क्रिया हरुधा का कम है, । दोनों क्रियामों के कर्ता भिन्न भिन्न है-'पठन्तु' का फर्ता शिष्या: है इच्छति का कर्ता 'गुरुः' है। इसलिये दोनो क्रियायें समानक'क नहीं यहाँ पढ़ पातु से मन् प्रत्यय नहीं होता। पाग्रहणादिति-'यातोः कर्मण.'-इत्यादि सूत्र मे 'या' विकल्प पद का ग्रहण किया गया है इसलिए (पक्ष मे) पठितुम् इच्छति' इस व का भी प्रयोग होता है। वक्ता की इच्छा के अधीन है कि वह 'प पाहता है-इस प्रथं को प्रकट करने के लिए पढ़ पातु से 'सन्' जोड़कर पिपठिषति' धम्द का प्रभोग करे अथवा 'पठितुम् इच्छति' इस व का प्रयोग करे। टिप्पणी-(१) धातुए दो प्रकार की है-सेप्ट भौर अनिट् । पातुमों से परे पलादि (प को छोड़कर कोई व्यञ्जन जिसके भादि में। हैपाषातुक प्रत्यय होने पर उस प्रत्यय से पहते । (इ) मा जाता छैट (स+द) हैं। जिनसे इद नहीं भाता वे भनिष्ट (+) हैं। धातु सैटू है, उससे परे 'सन्' प्रत्यय को इद हो जाता है, जैसा कि 'पिपठित में हुमा है। किन्तु जो धातु मनिद है वहाँ इट नहीं होता जैसे 'चिकीर्वति (२) जो पातु सन् प्रत्यय न होने पर परस्मैपदी था पारमनेपदी बंसी सन् प्रत्ययान्त होने पर भी उमी पर में रहती है प्रतः पिपठित' में पर होता है तथा 'चिकीर्वनि-चिकीर्ष'--यह! उभयपद होते हैं । इपिटिक -इस सम्नन्त पातु के भी पति के समान सभी लकारों में निम्न प्रका रूप होते हैं :- लट्-'पिाठिपति' । लिद-पिठिपाञ्चकार' पठियाम्दभूष', पि पामास', सुद-पष्ठिपिता'। सह-पिडिपिष्यति' । सोद-शिठिा खड़-पपिपटियत् । विधिलिड्-'पिटिपेत् । पाशिषि लि-एटिप्यार मुङ्--'अपिटिषत्' । नापिटिपिप्यत् । सुहाति-मद पातु के सन् प्रत्यय करने पर 'मुनौपस्तु' २४11 ६८० संस्कृतम्याकरणे ६१७ । सः स्यार्धधातुके ७४४६॥ सरर पार्घधातुके । अत्त मिच्छति जिघत्सति । एकाच इति ६१८ । अज्झनगमो सनि | देशगमेश्च दीर्षों मजादौ सान। इस सूत्र से मद के स्थान में पर घिस्ल) मादेश हो 'इस भवस्था मैं- ६१७. सति-स:+सि+प्राधासुके} सकारक है 'स" है मादि में जिसके (सादी) ऐगा पाषंघातुक प 'पम्' के म् को होता है) पिरति-भत्तुमिश्चति (खाना चाहता है. इस से सन् प्रत्यय होने पर पद को पसू पादेश हो जाता है 'एम # 'म: स्यार्षपातु से सकार को तकार होकर परस- मम्मामको सम्यतः'रोकारको कार सग्नन्त पातु बनती है। उससे लट् लकार में तिप. ल होता है। एका-एकाच गोनुभसात ७.२॥१॥ इस पूत्र के अनुमार 'पम् पातु मे परे (सन् माथि) । नहीं होना चातुसे सन् प्रत्यय होने पर- १८.amin-(पर) मत में मिमके ऐगी पौर मागमा (प्रति ए मारि बातु के स्थान में पा)- डोना है ममादि मन परे होने पर। पिलो-(भूत्र में ओपन है बह गम् का भी कि हैन: भागमा ४ वर्षका गया है। इसे पास्या में श्री गम भाग होताना पण होता पए मेrtna मे मियनेमा प्रतिमे) १.राम में समय पर मनु को दोबार नहीं विनमा हाशिपिनि अधिमिमिका - सन्नन्तत्रिया ३१ . ६१९ / इको झल् १२६॥ इगन्ताज्मलादिः सन् कित् स्यात् । कत इद्घातो । कर्तुमिच्छनि चिकीर्षति । ६२० । सनि ग्रहगुहोश्च २|१२प्रहे हेरुगन्ताच्च सन् इण न स्यात्त चुभूपत्ति। इति सम्मतिक्रिया तपाइइ के कर्तृवाच्य रूप 'मििजगामते' में भी। (२) जब सन् प्रत्यय की इट नहीं होता तब ३६ झलादि (झल् है मादि में जिसके) होता है । इट होने पर तो उसके मादि मैं 'इ' (मच्) होता है, अतः वह झलादि नहीं रहता । ६१६.कति-इमन्त के भागे झलादि सन् कि हो जाता है। (सन् के कित हो जाने से कृ को गुण नहीं होता) कृ+सन् यहाँ कृ को दोध होकर +सन् इस दशा में- ऋत इति-- कृत इदधातोः ७१४१००। इस सूत्र के द्वारा उरण रपरः ११५ के सहकार से ऋकार के स्थान में इर् होता है। चिकीर्षति - तुमिच्छति (करना चाहता है, इस विग्रह में क पातु से मन् प्रत्यय होकर कृ+स इस दशा में इट् न होने पर' 'मग्झनगमो समि' से कृ को दीघे होकर गुरु के प्रभाव में 'ऋत इदधातो:' से का इर होकर कि +7 इस अवस्था में 'हलि च' से इकार को दोधं होकर कोर्स+ ऐसी दशा में द्विस्व अभ्यासकार्य तथा सकार को पकार चिकी' सन्नन्त धातु बनती है उससे 'चिकीर्षति' रूप बनता है। ६२०. मनोति - ग्रहगुह. और जगन्त (उक् प्रर्थात उपौर ऋ हैं मन्त में जिसके) पातु मे परेसन' प्रत्यय को इट नहीं होता। बुमूषति- भवितुमिच्छति (होना चाहता है। इस विग्रह में भू धातु से सन् प्रत्यय होकर, सनिग्रहगृहोपच' से हट का निषेष होता है। इको झल' से सन् कित् हो जाता है तथा गुण नहीं होता भू+' इस अवस्था मे दित्व, १.एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् ६॥२॥१०॥ २. 'इको झल' से सन किन हो जाता है तथा डिति ' सूत्र के गुण का निषेध हो जाता है।

.
प्रय यहन्त प्रक्रिया
६२१ । पातोरेकाची हलादेः क्रियासमभिहारे य
पौन:पुन्ये भृशार्थे च धोत्ये घातोरेकाचो हनादेयंड म्यार
६२२ । गुणो पहलुको: ४४८२॥ प्रयासस्य
प्रभ्यासकामपा सकार को पकार होकर भूष सलन्त धातु
लद प्रयमपुरुष एकवचन में बुभूपति ।
टिप्पणी-कुद प्रमिस पातुर्यो के सन्नन्द प इस प्रकार है
पाप-ईसति । गम-जिगमिपति । प्रा-जिघ्रासति वि-विचीवाद
जि-जिगीपति । शा-जिजासते । दा-दिस्सति । श्-दिसते ।
पा-पिपासति : मुघ-मुरसते । -विवाति है । भुज-बुमुभते । म
यज-विपक्षनि-ते । लम्-लिप्सते । वस्-विवासति ।
पुस पते । स्तु-सुष्ट्रपति । स्म-सुस्पते । स्वप्-मुष्प्सति । हन्-
हा (स्पागना)-बिहासति ।
॥इति सन्नन्तप्रकिया ।
पइन्तेति-यङ् प्रत्यय है अन्त में जिमके वह यन्त भातु है ।
प्रक्रिया-यहन्तप्रक्रिया।
६२१. पातोरिति-क्या का बार बार होना या अधिक है
पुन्ये + मुशायें =क्रिया सममिहरे) इस मथं को प्रकट करने के ।
धातु से, जिसमें एक ही स्वर हो तया जिसके मादि में व्यञ्जन हो
होता है । यिङ्' प्रत्यय मे 'य' शेष रहता है. भू धातु जो एक
हलादि है उपसे क्रियासमभिहार मैं यङ् प्रत्यय होकर 'सन्यको.' ६।
द्वित्व हो जाता है मौर भू भूय' इस मवस्था में-
६२२. गण इति-पभ्यास को गुण हो जाता है। यह प्रत्यय
पर था गइ का लुक हो जाने पर।
१. 'भू' को नित्व होकर पूर्व भाग (प्रभ्यास) के ऊकार को सकार
सपा मकार को वकार (अश्य) हो जाता है।
२. पोनः पुन्यं भशापंच क्रियासमभिहारः । सिमान्तकौमुदी ।

यङन्त प्रक्रिया
या लुकिं च परतः। हिदन्तस्वादात्मनेपदम् । पुन: पुनरतिशयेन वा
भवति घोभूयते । योभूयाचक्रे । अयोभूयिष्ट ।
{इससे अभ्यास को
गुण होकर 'भोभूय' यहाँ भपात के अब' होकर
'चोभूप' मह पन्त धातु धनती है 1}
डिन्तस्यादिति-पङ् प्रत्यय के हित (इकार है इससक जिसमें होने से
यन्त धातु से पारमनेपद' होता है ।
बोभूयते-पुन: पुन: पतिशयेन या भवति (गर दार या अधिक होता है)-
इस विषह में भू धातु से यह प्रत्यय होने पर विश्व होकर भू भूव समस्या
मे ममास को गुण (कार) तथा भकार को मार (जश्स्य) होकर 'बोभूष'
यह रूप होता है। इसको सनायता: धातवः' से धातु सजा होकर तथा हित
होने से पात्मनेपद होने के कारण सट् लकार में बोभूय+ते माप होकर--
बोभूय+++य के प्रकार का राप के प्रकार से पररूप होकर धोभूपते
रूप बनता है।
हिप्पणी-(.) क्यिासमभिहार पर्य मैं मन प्रत्मय शिला से होता है
छत्त: पक्ष में पाप भी होता है जैसे-पुन: पुन: भजति पपा पतिशयेन
भवति (बोभूपते), (२) पन्त पातु के सभी सकारों से होते हैं जैसे-
षट् -बोभूयते । लिटोभूयाचतुदोभूषिता । रोमियते
भोट-बोयताम् । लापशेमूरत । विधिलिङ्गोमूत। भाक्षिति
FRE-नोभूपिपोष्ट । लु-भदोभूयिष्ट। मा--पोभूयिष्यत । इनमे से
অমুক এ মৰীমূযিgী মি ি মাথায় শিলা না
-
पोभूगाम++लिट्)-बोभूय+लिट इस पदस्था में प्रत्य.
धान्त पातु होने से पा' प्ररयम और होमग+मा+टि-हाँ निट
१.पपासे १८१४
२. मनामना: धाव:1111
१. अनुदाधि भारयनेय ११२
४.काम्प्रत्ययादारम लिद ११

६२३ । नित्यं कौटिल्ये गतौ ३१॥२३ गत्यथ'
यह स्यान्न तु कियासममिहारे।
६२४ । दीर्घोऽकित: ७.४.८३॥ अकितोऽभ्यासर
यहलुकोः । कुटिलं व्रति वायज्यते।
का सुक'को जाने पर तथा कुन का अनुप्रयोग होने पर क
सकार में जो पात्मनेपदा का रूप होता है (चक्र प्रादि) वह जोड़ा
वोभूयाम+चके-बोभूयाञ्चके मादि रूप बनते हैं ।
भयोभूषिष्ट-भ+यह+लुङ) गोभूय+लु+योमुप+
त के मध्य मे 'लि' होकर उसको सिच हो जाता है-योभूप+र
को इट (इ) पायम होकर बोमय+:+म+सया के प्रका
तथा स को परस होने पर धोभूपिष्ट' रूप बनता है।
१२३. नियमिति-गरपपंक पातु से कौटिल्य पर्थ में ही यह
है वार पार करने या प्रषिक भर्ष में नहीं।
६२४.ति-प्रकिंतु अभ्यास को दीर्घ होता है यह
तथा यइका लुक् होने पर)
टिप्पणी-निसका ककार रसशरू होता है वह हित कहपात
मास को नीक (फ्त सनीपरयते) तथा नुक (गम-अजम्म) मादि
हो जाता है वहाँ नीक तपा नुक के कित् होने के कारण प्रमा
पहलाता है। जो कि नहीं है वह पकित हमारा है।
पानापते-टिस प्रजाति (देवा पमता)-म बिह में गर'
धातु से यह प्रत्यय होता है। ज+पा, हिरहोसर या सम्याग
रह जाने पर 'प+am+य इम मवम्या में प्रयास के पहार
(कार) होकर बाप' यम पातु बनती है। इमरी मप्र
१.ग्रामः २४८"
२.श्यानुस्युरो सिदि
३. मानसोपोगाय blth
४.मोर: Irell
-

पडन्तप्रकिया
६२५ । यस्य हल: ६।४।४६ यस्येति संघातग्रहणम् । हल:
परस्य यशब्दस्य लोम प्राधातुके । मादेः परस्य । मतो लोपः।
बाबजाञ्चके । वाजिता।
एकवचन में पारज्यते रूप बनता है।
वावग्य+लिट्-वावय+मा+चों इस दशा मे-
६२५. यति-व्यञ्जन (हल्) से परे 'य' शब्द का लोप हो जाता है
राधंधातुक परे होने पर।
(सूत्र में) 'यस्य' यह यकार (प्) तपा प्रकार (+मप) के समुदाप
1 ग्रहण किया गया है।
प्रादेरिति-प्रादेः परस्प १५१८५४ के अनुसार 'य' समुदाय के प्रादि भाम
वल यकार) का लोप होता है।
पत्र इति-प्रती लोप: ६।४.४८ अर्थात प्राधातुक के उपदेश काल)
जो मदन्त मह उसके प्रकार का लोप होता है मार्धधातुक परे होने पर)
प्रकार का लोप हो जाता है।
धाननाञ्चक-(ब+यह+लिद)-वावज्य+लिट, लिट् परे होने
मा प्रत्यय होता है तथा लिट् का लोप होकर कृ धातु के लिट् लकार के
पर्क का अनुप्रयोग होकर वावग्य+माम् + चक्र--यहाँ पर 'मादेः परस्य'
सहायता से 'यस्प हल.' सूत्र के द्वारा प्रकार का लोप तथा 'मतो लोप:' से
र का लोप होकर वानजाञ्चके रूप बनता है।
चावजिता-(प्रज्+पड+नुद)- वावग्य+ता+' इस दशा में
को इट् का प्रागम होता है तथा उपयुक्त रीति से यकार मोर प्रकार का
होकर वान+s+a+प्रा यहाँ 'मास (टिसंज्ञक) का लोप हो
१. लुटः प्रथमस्थ डारोरसः' २०४१८५३॥ सूत्र के अनुसार सुट् के प्रथमपुरुष
एकवयन के लिए के स्थान मे 'डा' हो जाता है तथा 'स्पतासी मुलुटोः
१३॥ से पातु पौर प्रत्यय के बीन 'तास' पा जाता है।
.'डा' मे या शेष रहता है और इसके 'डित्' होने से तास के पास भाप
(रि) का लोप हो जाता है।

मंतिधारणे
६२६ । रोगृदुपयस्य च ७४६०॥ दुपयस्य
रोगागमो यझ्यश्लुकोः । वरीयत्यते । वरीयताम्य
६२७ । क्षुम्नादिषु च ८४३६॥ सत्य न
जरीगृह्यते।
॥ इति पन्तिप्रक्रिया
-
जाने पर वावज+++मा+यागजिता रूप बनता है।
६२६. रोगिति-ऋकार है उसया में जिगके ऐमी धातु
रीक का मागम होता है यह, परे होने पर तथा यह, मुक होने
परीवृत्यते-पुन: पुनः भतिशयेन वा वतंते (बार वार या
होता है)-इम विग्रह मे वृत धातु से या प्रत्यय होकर द्वित्व हो
+य-इस अवस्था में मायाम को री का प्रागम होता है
कोप रहता है) तथा 'वरीदत्य' यह यहन्त धातु बन जाती है। इस
में 'वरीयत्यते रूप बनता है।
वरीयताञ्चक्र--(वृत् + यड +लिद) वरीवृत्याम+
और मकार या (उपर्युक्त रीति से) सोप होकर वरीवृताञ्चक्र ।
परीकृतिता-(वृत+यह+लुटु) वरीवृत्म+ता+हा-व
समान वरीवृतिता रूप बन जाता है।
६२७. क्षुम्नादिग्विति-शुभ्न प्रादि शब्दों में णत्व माट
रणकार नहीं होता।
- टिप्पणी-'शुम्न प्रादि शब्द गण पाठ में दिये गये हैं । उनमें
नियम के अनुसार नकार को प्रकार प्राप्त होता है उसका इस सूत्र
किया गया है।
मरोनृत्यते-पुनः पुनः प्रतिथयेन वा नृत्यति (बार-बार या अधिक
है)-इस विग्रह मे नृत् धातु से यड, प्रत्यय होता है। द्वित्व तथा पर
शक का मागम होकर 'वरीवृत्य' के समान ही 'नरीनृत्य' यहन्त धान
हैं । यहाँ रेफ से भागे होने के कारण 'नृत्य' के नकार को एकार होन

अथ यङलुक्प्रक्रिया ६२८ । योऽचि च २१४१७811 योऽचि प्रत्यये लुक् स्यात् पकारात्तं विनामि क्वचित् । अनैमित्तिकोऽयम् अन्तरङ्गरवादादो भवति । होता है किन्तु सुम्नादिषु च से उसका निषेध हो जाता है। मरीनृत्य से लट सकार के प्रथम पुरष एकवचन मे नरीनृत्यते । जरीगृशते-पुनः पुनः मतिशयेन वा गृहाति (बार बार या मषिक प्रहरा करता है) इस विग्रह में ग्रह, धातु से यड, प्रत्यय होकर द्वित्व तथा पम्यास-- कार्य होकर जरीगृह्य' यडन्त धातु बनती है उससे जरीगृह्यते । टिप्पणी-बुछ अन्य प्रसिद्ध धातुपो के यहन्त रूप इस प्रकार होते हैं- भट-भटाट्यते । कृ-चेनीयते । गम्-अङ्गम्यते । गा-जेगीयते। प्रा-जेधीयते । चि-पेचीयते । वर-वधूयते । जि-जेजीयते । जन-जाजायते । दा-देदीयते । धा-देधीयते। पत-पनीपत्यते। पठ-पापथ्यते । प्रच्छ-परीपच्यते । यस्- वावस्यते । शी-शरशय्यते। स्मृ-सास्मयते । ह-जेहीयते। हा-जेहीयते । इत्यादि। ॥ इति यहन्तरिया ।। यह सुक् इति - यह प्रत्यय का लुक हो जाने पर भी प्रामय लारा से सनाद्यन्त मानकर जिसरी धातु सज्ञा होती है वही यड्लुक् धातु है । यह लुक की प्रक्रिया को पड्नु प्रतिया कहा जाता है। ९२८. यह इति-अन् प्रत्यय परे होने पर यह कालोप हो जाता है। पकारादिति--सूत्र में 'च' (भी) रहने से उस (पन् प्रत्यय) के बिना भी कहीं पड का लोर हो जाता है। १. अप्पाइ नुम्व्यवायफ्री | २.मन्यान में गार को जगार (होन्चु | भी हो जाता है। ३. यहाँ 'पहिग्यावविधिष्टिवितिदृश्चनिन्दनियतीना द्विति च ६१६ समूत्र से रेफ ने धान पेशार (प्रभारए) हो जाता है।

३८० संस्कृतव्याकरण ततः प्रत्ययलक्षणेन यङन्तत्वादद्वित्वम् । अभ्यासकार्यम्। दयः । शेपात् कर्तरीति परस्मैपदम्। चर्करीतं चेत्यदादी पा ६२६ । यडो वा ७।३।६४॥ यलुगन्तात्पर सार्वधातुकस्येड् वा स्यात् । भूसुवोरिति गुणनिषेधो यङ्ल अनमित्तिक इति- यह यङ् का लुक् (लोप) बिना किसी है प्रतएव यह अन्तरङ्ग है तथा अन्तरङ्ग होने से (किसी भन्य प्र से) पहले ही हो जाता है। सत इति - तब यिङ्ग का लोप होने पर) प्रत्ययलोपे १।११६२३) अर्थात प्रत्यय का लोप हो जाने पर उस प्रत्यय पर : जाता है। इस मूत्र के अनुसार द्वित्व हो जाता है । फिर मम्यारा तपा घातुमंज्ञा होने पर लट् मादि होते हैं। शेषादिति-शेषाव कर्तरि परस्मैपदम् ११३॥७॥ इसके (यङ्लुक मे) परमपद होता है । चरोतमिति -प्रदादि गण में 'चरीतं च' यह पड़ा 'चरीत' या लुरु को रहते हैं) अतएव यह सुर में शपु' का लो- जाता है। ६२९. यहोवेतिया लुगन्त से मागे ऐमे सार्वधातुक' प्रत्यय मादि में हल हो तथा जितका पकार इत्यनको विशाल से दक जाता है। ["निप्' ऐमा ही सावधातुक है) भमुरिति- भूगुवास्तिति ७३३३८८ (प्रति भू मौर गतुक तिट परे होने पर गुण नहीं होता। इससे मनुगार या लुए एक निषेध नहीं होता, क्योकि 'बोभूतु तेतित' इन्गादि के द्वारा में १.सनादन्ताः धानवः ॥१॥३२॥ २.रि ॥ १. अधिभूतिय: गा ४. मिगिन्माधानुरम् ॥११॥ १. दापतिरनिनिमितदिन 10॥

। या सुप्रक्रिया 1 ३१ बोभूतुतिक्ते इति छन्दसिनिपातनात् । बोभवीति, बोभोति । बोभूतः ।, मदभ्यस्तात् । बोभुवति योभवाञ्चकार-वोभवामास । बोभविता वोभ- लिपेप का निपातन किया गया है । [यदि 'भुसुवोस्तिहि' मूत्र से यह लुक में गुण-निषेध हो जाता तो इस निपातन की आवश्यकता नहीं पी । यह गुण- निषेध वेद में ही दिखलाया गया है । अतः इससे सूचित होता है कि भाषा मैं गुण हो ही जाता है। धोमवीति-योमोति - पुन. पुनः अतिशयेन वा भवति (बार बार था मधिक होता है। इस विग्रह मे 'भू' धातु से यह होकर उसका 'यो दि ' से लुक हो जाता है । तब लुप्त प्रत्यय के निमित्त से इसे पहन्त मानकर 'भू शब्द का द्वित्व और भन्यास कार्य होकर 'वोभू' यह यह लुगन्त धातु बनती है । इससे परस्मैपद के लट् लकार में 'बोभू +ति' यह अवस्था हो जाती है । यहाँ जो शप् प्राप्त होता है उसका लुक् हो जाता है तथा बडो वा' से विक्त्प से ईद, उत्तर भाग को गुण' (उ को मो) तथा 'मद' पादेश होकर 'बोभवीति' रूप बनता है ईट्' न होने पर 'मोमोति' रूप होता है। बोमूतः-धोभू+वर (ईट् तथा गुण के अभाव में) बोमूतः । टिप्पणी--पितु सार्वधातु को ही ईट का पागम होता है किन्तु तस् पिंड नहीं है मतः ईद नहीं होता। पिद न होने से हो उस डित के समान हो जाता है। मौर उसके परे होने पर गुरए नहीं होता। भवम्यतादिति-प्रदभ्यरतात अभ्यस्त से मागेको मद मादेश होता है। थोमवति-पइसुगन्त 'योभू' धातु से प्रथम पुरुष के वचन में 'वोभू +मि' इस भवस्था मे । को पत् प्रादेश होकर 'धोभू+मदि' यह स्थिति १. अभ्यास को मुरगो यड्लुको:' २ से गुण हो जाता है। २. सार्वधातुकाधातुक्यो: GARH ३. सार्वधातुकमपित् । ४.विति t] संस्कृतव्याकरण यिष्यति । चोभवीतु-चौमोतु-चोमूतात् । बोभूताम् । वोभव r - है। यहाँ बोभूतः के समान ही ईट तपा गुण नहीं होते और का (उ) होकर बोमुव+प्रति + बोभुवति रूप बनता है। धोमवाञ्चकार-बोमवामास-पड लुगन्त बोभू प्रत्ययान्त ५ लिट् में 'माम्' हो जाता है तपा कृ के परस्मैपदी रूप 'चकार' । होकर वोभवाञ्चकार रूप बनता है । प्रस् धातु वा अनुप्रयोग होने मास रूप होता है। बोमविता-भू+यङलुक+लुट् -- योभू + ताम् +7। इट तथा धातु के ऊकार को गुण (मो) यौर मवादेग होकर व बनता है। सोमविष्यति-भू यङ्लुक + लुट् + वोभू + स्य+ति मवादेश होकर वोभव्++स्य+ति तथा सकार को पकार बो बोमवीतु-योमोतु+ (भू+यडलुक् + लोट्) बोभवोति-बोभोति तब कार्य होता है ति प्रत्यय के को (एकः ४१८६ से) उ पोभवीतु-बोभोतु रूप बनते हैं। बोमूतात्--भ+ यङ्लु+ लोट् (माशिपि)-बोम+तु-इस तु को माणिपि मर्थ मे तात् प्रादेश होकर बोभूतात रूप बनता है बोभूताम्-यलुगन्त बोभू से लोट प्रथम पुरुप के द्विवचन स् इस अवस्था मे तस् को ताम्' प्रादेश होकर बोभूताम् रूप बनता। योभवतु - (योभू + लोट प्रथम पुरुष बहुवचन)-बोभू+कि तात्' से झ् को प्रत् तया 'एरु:' से इकार को उबार होकर बोभू+ वस्था में ऊकार को उवङ्ग होकर बोभुव+अतु- वोमुवतु रूप होता है १. प्रचिश्नुपातुघ्र वां स्वोरियाबड़ो ६।४७७॥ २. तुह, योस्तातङ् डाशिष्यन्यतरस्याम् ७:१॥३५॥ ३.स्वस्वामिषा जास्तम्लप: 00 पडलुकप्रक्रिया घोभवानि । प्रबोभवीत् अवोभोत् । अवोभूताम् । अवोभव. वोभूया 'मोभूयाताम्, बोभूयुः । बोभूयात्, वोभूयास्ताम्, बोभूयासुः । गतिस् बोमूहि--(कोभून लोट् मध्यमपुरप बहुवचन)-बोभू+सिसि को । मादेश होकर वोभूहि रूप बनता है . भोमपानि--(बोभू + लोट् उत्तमपुरुष एकवचन)-चोभू + मि-→मि को (मेनि: AIEE) मादेश होकर बोभू+नि~ यहाँ पर नि को (आइत्तमस्य पिन ३४६२) से भाट् वा भागम होता है । माट् पित है अतः यह द्विद्वत् न होता तया ऊकार को गुण और अद् प्रादेश होकर योभन्+मा+नि- बोभवानि रूप धनता है। प्रबोमवीत-अवोमोत्-(बोभ लड. ० ० एक०) अ+वोभू+ विकल्प से ईट का मागम होकर गुण तथा प्रवादेश होते है और मोव रूप बनता है। ईट् न होने पर प्रयोभोत रूप होता है । भयोभूताम्- (दोभू+लड ३० पु० दि०)-- यो भू+तम् -- अयो ताम् (यहाँ तस पपित् सार्वधातु है अत' उसे डिद हो जाने से ऊ को गू नहीं होता। पदोमवाः-(शेभू+ला, प्र० पु. बहु.)-- बोभू+झि इस भवर में झि को सिजम्यस्तविदिभ्यश्च ६४११०६ इस मूत्र के अनुसार जुस् पार हो जाता है तथा जुसि च ३०१ से गुण होकर भकादेश हो जाता है पर्याभवः रूप बनता है। मोभूयात् -(बोभू+विधिलिई प्र० पु० एक.)-दोभू+यास (पासु +तु इस अवस्था में लिडः सलोपोऽनन्त्यस्य २७। इससे 'यास' के स् लोप होकर बोभयात् रूप बनता है। योभयाताम्- (कोभ + विधितिह, प्र. पु० दि०)-बोम् +या+d सलोर होकर बोभूयाताम् रूप बनना है । १. ईपिन्च १६७ हि के भरित होने से दित हो जाने के का गुरा नहीं होता। २. यहाँ 'मरोभूयः रूप शुद्ध नहीं । 'भवोमवः' यही प्रामादिक पाट है।

३६२
संस्कृतव्यकिरणे
सिचो लुक । यो वैतीद पक्षे गुणं वाधित्वा नित्यत्व
वीव-अदोभोत्, प्रबोभूताम्, प्रबोभूवः । अयोभविष्यत् ।
॥ इति यलुकप्रक्रिया।
बोभूयुः--(बोभू+विधिलिड प्र. पु. बहु०)-बोभू+
मवस्या में झि को मोर्जुस् ३४११०८ से जुस् मादेश हो
सकार का लोप होकर बोभू+या+उस इस अवस्था ।
१६ से पा' के भाकार को पररूप होकर बोभूयुः रूप बना
योभूयात्-(बोभू + माशिपि लिङ्ग प्र० पु० एक.)
इस अवस्था में (स्कोः संयोगाद्योरन्ते प' ८०२।२६) सकार
बोभूयात् ।
बोभूयास्ताम-(पोभू+मा० लिङ्ग प्र. पु. शि.) योभू
यहाँ सकार का लोप नहीं होता। (मलहरालोपोनन्यस्य'
हो मोष होता है पोर 'पाशिषि लिङ्गमार्यघातक' है) तपा
बनता है।
मोमयामः-(पो+मा० लि. पु. यह.) बोभू-
बोम+यास + उस +योभूयासुः ।
गातिस्येति-(योभ+सिच +-इस अवस्था में) गा
मियः परस्मैपदेषु २।७७ इम मूत्र में गिम्' । क (गो)
पाति--यहो वा ३ १४ से ईट होने के पमें (मार्य
कयोः में प्राप्त) गुणको बाप कर निस्पं होने के पास हो
पोमचोर-पोमोत- (होम सुर . पु• एक.)-
मिष+ इम भवापा से मिषु सुर होकर पिता से
१.निरामिपि ॥१९॥मी पायान सा होती है।
२. भूयो हो निग्यवान, यह महामाप्यायधन मार्ग
रिपरे होने पर गुण करने या न करने पर दोनों
प्राणु होता . वह पियामि
।

श्रथ नामधातवः होता है प्रबोभू+ ई+त यही गुण को वाधार वृक् हो जाता है तथा प्रवीभू + ईत्-- प्रबोभूवीत रूप बनता है । ई६ न होने पर गुण होकर भवोभोव रूप होता है। भवोमूताम्-(बोभू+सुड, प्र० पु० दि०)-भवोभू + सिच् +ता+ सिंघ का लोप होकर प्रबोभूताम् रूप बनता है। पोभूवु'-(बोमू + लुइ प्र० पृ० बहु०) प्रबोभू+सिच्+मि.- सिन् का लोप होकर झि को (सिजम्यस्तविदिष्यश्व से) जुम् होकर म बोभू + उस इस अवस्था मे बुक का पागम होकर प्रबोभूवुः रूप बनता है। प्रयोयिष्यत् -(बोभू + पु० एक०) म+बोभू + इ +स्य +7 इस अवस्था में कार को गुण, मद् भादेश होकर प्रबोभद्++स्प +-+स कोष प्रबोभविष्यत् रूप धनता है। टिप्पणी- इसी प्रकार कुछ अन्य धातुप्रो के यड लुगन्त रूप इस प्रकार - दा-दादाति, दादेति । मुद्-मोमुदीति, मोमोत्ति । कूद-चोकूर्दीति, चोति । गम्-जङ्गमीति, जङ्गन्ति । हन्-जा धनीति, जङ पन्ति । घर--- चञ्चुरीति, प्रकृति । हा~जाहेति, जाहाति । रवपू-सास्वपीति, सास्वप्ति । है-केरोति, परिकरीति, परीकरीति, चति, परिकति, परीकति । श्यादि। ॥ इति यङ्लुक प्रक्रिया ॥ नामघातक इति-गाम अर्थात् प्रातिपदिक या सुबन्त से प्रत्यय जोड़कर जो धातु बनाई जाती हैं वे नामधातु कहलाती है। इन पातुमो के विविध मर्थ होते हैं क्योकि प्रातिपदिक या सुबन्त से अनेक प्रयों में प्रत्यय किये जाते T १. भुवो वलि लिटोः M८अर्थात् मजादि सुइ, और लिट् परे होने पर भू होता है । बुक में व शेष रतहा है।

संस्कृतव्याकरणे ६३० । सुप् प्रात्मनः क्यच ३।१११॥ सम्बन्धिन. सुवन्तादिच्छायाम क्यच् प्रत्ययो वा स्यात। ६३१ । सुपो धातुप्रातिपदिकयो: २।४७१॥र सुपो लुक । ६३२ । क्यचि च ७/४॥३३॥ मवर्णस्य ईः।। मिच्छति पुत्रीयति ६३० सुप इति-इच्छा का कर्म तथा इच्छा के कर्ता से धाला जो सुबन्त उससे इच्छा प्रर्थ मे विकल्प से क्यच् होता है। टिप्पणी-'मात्मनः पुत्रम् इच्छति'-~अपना (अपने लिये, है यहाँ इच्छा का कर्म है-पुत्र तथा वह चाहने वाले से सम्ब क्योंकि चाहने वाला अपना पुत्र चाहता है, इसलिमै 'पुत्र' श प्रत्यय होता है। यदि कोई दूसरे का पुत्र चाहता है तो वहाँ । क्यच् प्रत्यय नहीं होता । क्यच में 'य' शेप रहता है । क्यच प्रर परस्मैपदी होती हैं । पुत्र+मम्+य (क्यच्) इस अवस्था मे। ६३१ सुपो धात्विति-धातु और प्रातिपदिक के अवयव सु हो जाता है । [पुत्र+मम् +य' की सनारन्ता: घातक: ३३१०३ संज्ञा होती है मतः यहाँ अम् का लुक् हो जाता है मोर पुत्र+ जाता है ] ६३२ कपचीति-क्यच् प्रत्यय परे होने पर भवर्ण का ई हो इससे पुत्र के प्रकार को ईकार होकर 'पुत्रीय' नामपातु बनती है । लट् लकार में तिप, शप् होकर पुत्रीयति ।। पुत्रीयति-पुत्रमात्मनः इच्छति (अपना पुत्र चाहता है)-दरा । ब्द से क्यच् प्रत्यय होकर पुत्र +य इस भवस्था में प्रकार को ईका और 'पुत्रीप' नामधातु बन जाती है। उससे लट् प्रथमपुरुष के एक त्रीय+म (शप)+-ति--प्र+म= ('मतो गुणे', से पररूप) प बनता है। टिप्पणी नामघातु के स सब लकारों में इस प्रकार होते हैं- 1 - नांमधोतवैः ६३३ नः क्ये १॥४॥१५॥ क्यचि क्याड च नान्तमेष पद नान्यत् । नलोपः। राजीयति। नान्तमेवेति किम् । वाच्यति । हाल पागीयत्ति । पूर्वति धात्तोरिरयेव नेह-दिवमिच्छति दिव्यति । लट-पुत्रीयति । लिट्-पुत्रीयाञ्चकार इत्यादि । तुट्-पुत्रौपिता। सूद-पुत्री- यिष्यति । लोट-पुत्रीयतु । लह-मपुत्रीयत् । विधिलिइ-पुत्रीयेत् । पाशिपि निइ.-पुत्रीय्यात् । लुङ्ग, अपुत्रीयोन । ना-मपुत्रीयिष्यत् । ६३३. पति-पच् पोर वण्ड प्रत्यय परे होने पर मारान्त शब्द ही पद संज्ञक होता है मन्य नहीं । न लोप इति-'राजन+ दयन्' इस अवस्था में ऊपर के सूत्र से 'राजन्' की पद सज्ञा होने से 'नः लोपः प्रातिपदिकान्तस्प' ८१२७ से नकार का लोप हो जाता है राजोयति-राजानमारमनः इच्यति (पपना राजा चाहता है) इस अर्थ मे राउन् + मम्+4 (पच्) इसको 'सनाद्यन्ता धातव.' से धातुसमा होकर मम् का लोप होता है तथा न. क्ये' से राजन् की पदसंज्ञा होकर नकार का लोप हो जाता है 'यजम' इरा दशा में 'क्यवि च' से प्रकार को ईकार हो- कर 'राजीय' नामधातु बनती है। उसरी लट् लकार प्रथमपुरष के एकवचन मे राजीयति' रूप बनता है। नान्तमेवेति-नान्त को ही पदसजा होती है, ऐसा बयो बहा गया है। इसलिये कि वाध्यति, यहाँ पर 'श' शब्दको पदसशा मही होती। पाचमात्मनः इस्पति इस वर्ष में 'वाच्+य (क्यच्} इस दशा में (वा) को पदमा न होने से पसार को 'पौ: '१३. से दुत्व (वार) नहीं होता भनां वशोन्ते' पारा से बाल भी नही होता मौर 'वायति' रूप rarहै। हरि घेति-गि+य, पुर+य-दस अवस्था में हाल ५ ६१२७७ जिस पानु रे मन्त में रेफ का भार होता है उसको उपभा को दो हो है) सूत्र से गिर के इकार दीर्घ होता है। ) पर्ष में ३६६1 संतव्योकरणे ६३४ । क्यस्य विभाषा ६।४।५०। हलः पर लोणे घार्धधातुके । प्रादेः परस्य । अतो लोपः । तस्य र धूपधगुणो न । समिधिता । समिध्यिता। गिर+मम् +य (क्यच्) यहाँ मम् का लोप होकर 'हलि दीर्घ [ईकार) हो जाता है तथा 'गीय' नामपातु बनती है रूप होता है। पूति - पुरमात्मनः इच्छति, (अपना नगर चाहता है) पुर धातोरिति-'हलि च' इस सूत्र से धातु की उपधा को । गिर' और 'पुर्' शब्द 'ग निगरण' तथा पालनपूरणयोः' प्रत्यय होकर बने हैं तथा यह सिद्धान्त है कि विवप् प्रत्ययान का त्याग नहीं करते (विवग्विजन्ता न घातुत्वं जहाँत) अतः गो दीर्घ हो जाता है। किन्तु 'दिवमात्मनः इच्छति'-'दिव्यति': होता, क्योकि यहाँ 'दिव्' विवबन्त या विजन्त नहीं हो सकत ही प्रातिपदिक है । इसलिये यहाँ 'दिव्' धातु नही कहला सकती। ६३४. क्यस्येति -हल् (व्यञ्जन) से परे क्यच मोर क्यई से लोप हो जाता है, माधंघातुक परे होने पर । मादेरिति-प्रादेः परस्य ५४|| के अनुसार यह लोप के मादि मर्याद यकार का होता है। प्रत इति-मतो लोप: ६४४८ से शेष प्रकार का लोप हो। तस्येति--उस प्रकार के लोप को स्थानिवद् भाव होने से नहीं होता मर्याद समिध् +5+ता' इस अवस्था में समिथ् के एए प्राप्त है। समिघ्य+5+ता, इस दशा मे पकार से मागे लोप हुमा है उसको लोप न हुमा सा मान लिया जाता है ब्दि नहीं रहता (क्योंकि उपघा में धकार दिखाई देता है और गुरए समिमिता-समिध्यिता-सभिषमात्मनः इच्छति (समिधा म -इस भयं मे 'समिप से क्यच् प्रत्यय होकर समिध्य' ना। सकार के प्रथम पुरुष । इससे के एकवचन में समिः नामधातवः [ ३६७ ६३५ । काम्यन्न ३११। उक्तविषय काम्यच् स्यात् ।पुत्र- मात्मन इच्छति पुत्रकाम्यति । पुत्रकाम्पिता। ६३६ । उपमानादाचारे ३३१०१०॥ उपमानात. कर्मणः हा-समिध्य+ता+इट होकर समिध्य ++ता इस अवस्था में 'क्यस्य विभापा से विकल्प से कार का लोप मोर 'मतो लोप.' से प्रकार का लोप होकर समिपिता प बनता है। पकार का लोप न होने पर प्रकार का लोप होकर समिध्यिता' रूप होता है। १३५. काम्याचेति- क्यच के अर्थ में ही काम्यच प्रत्यय होता है। ['काम्यच्' मे पकार का लोप हो जाता है और काम्य शेष रहता है काम्यच् प्रत्ययान्त पातु परस्मैपद मे होती है। पुत्रकाम्यति-पुरमात्मनः इन्चति, इस प्रथं में काम्यच प्रत्यय होता है, पुष+सम् +काम्य' इसको 'सनाद्यन्ताः घात:' से धातु संशा होकर 'अम्' का लोप होता है और 'पुवाम्म' यह नामधातु बन जाती है। इससे लट् के प्रथमपुरल एववचन में पुत्रकाम्यति । पुरकास्थिता-पुत्रराय + लुट प्रथम पुरुष एकवचन । पुत्रकाम्य+६ (द)+ता --काम्य के अन्तिम प्रकार का लोप (अतो लोपः) होकर पुत्र- काम्पिता। विशेष-~इच्छार्य वपद् और काम्यच् प्रत्यय करके अन्य शब्दों के रूप भी इसी प्रकार बन जाते हैं, जैसे-~-मालामात्मनः इच्छति मालीयति तथा मुनीयति, सापूयति, कवीयति । मामात्मनः इन्छति---गव्यति । अश्वीयति । वृषीयति इत्यादि । काम्य-~धनमात्मन. इच्छति-~धनकायति । इसी कार यशस्वाम्यति, सपिष्काम्यति, स्वः काम्यति इत्यादि। ६३६. उपमानादिति-उपमान रूप कर्म सुबन्त से भाचार पर्थ में यच् प्रत्यय होता है। टिप्पणी-प्राचार का अर्थ है व्यवहार करदा। जो सुबन्त उपमान होता तथा प्रावार वा कर्म होता है उससे यह क्यच होता है। यह प्राचार-क्यच इलाता है, 'सुप मात्मनः पञ्' से बतलाया गया क्यच् इच्छा-क्य है। नो के अर्घ में ही भेद होता है, रूप तो समान ही होते है ।

३१८]
संस्कृतश्याकरणे
सुवन्तादाचारेऽये क्यच् । पुत्रमिवाचरति पुत्रीमति छा!
द्विजम् ।
* सर्वप्रातिपदिकेभ्यः विवब्वा वक्तव्यः ।।
कृष्ण इवाचरति कृष्णति । स्व इवाचरति स्वति । सस्य
पुत्रीपति छात्र-छात्रं पुत्रमियाघरति (यात्र से ।
करता है)-इस प्रथं में 'उपमानादाचारे' से पच् प्रत्यय हो
क्यन्- 'पुत्रीय' नामधातु बनती है। उससे पुत्रीयन रूपय
पिएपनि निजम-दिन विष्णु गियापति (ग्राह्मण से
व्यवहार करता है-इम मय मे प्राचार मर्ष में क्या परपय ।
'इग प्रयम्या मे 'मावमापातामोदीर्घः ७।४।२५ इस यू'
दीर्घ होर विषय' नामधातु बनती है । उगसे विष्णपति का
सर्वेति-या) राब प्रातिपदिकों रो मायार प्रर्ष मे वि
प्रत्यय हो जाता है, यह कहना माहिये ।
टिप्पणी-(१)गि प्रयय में ककार की सातदि
कार की 'उपदेशनागिरवार से और पसार की
मे दरगना होकर सोर हो जाता है। रोग बचे हुए चार
१९७ र सोहोना है। मार गमात दिवा सो
भी गर्वापदार परमाता है (२) उमानादानारे' गज के 4-
वाची दम सुबल से एच् पर होता है किन्तु 'गगानिला
वातिसके पगार उपमानवाची कर्मा प्रातिपदिय form
यह दोनों ा पनर है।
निवारित (पारे समान पापण.
प में प्रामाशिक में लिए हर nि का मग
पाया है। करण की 'नाद: या,' मे पातु ममा हो।
Farm)+frम पारा में 'मी ' मै
पर रामा मेयर गिता
पवन
पाने समान प्रान्तमा

नामधातवः [ ३६ ६३७ । अनुनासिकस्य विवझलो: विइति ६१४॥१५॥ अनुनासिकान्तस्पोपधाया दीर्घ स्यात्, वो भलादी च विति। इदमिवाचरति इदामति । राजव राजानति । पन्या इव पथौनति । में 'स्व' प्रातिपदिक से विवप् प्रत्यय होकर उसका लोप हो जाता है तब 'स्व' नामंपातु बनती है और इससे लट् प्रथम पुरुष एकवचन मे 'स्वति' रूप मनता है। संस्वो-विवप् प्रत्ययान्त नामधातु 'स्व' से लिट् लकार प्रथम पुरुष एकवचन में स्व+गाल (प) 'स्व' के पवार को वृद्धि' (भावार) होकर "स्वा+'इम अवस्था में एल के स्थान मे 'श्री'२ हो जm है। स्वा+मी -~~यहाँ दित्व, अभ्यास कार्य होकर स+स्वा+मो-(भा+मोनो) स+ स्वी-सी' मह रूप धनता है। ६३७. अनुनासिकस्यरि-मनुनामिक है पन्त पे जिसके ऐसे (मङ्गोको अपपा को दीर्घ होता है वि तथा मलादि वित हित प्रत्यय परे होने पर । हामतिमिव भाचरति (इसके समान पाचारण करता है)-इस पर्थ में 'इटम् प्रातिपदिक से विरप् प्रत्यय होकर इदम् +विव, पहाँ मनुना- सिरस्यः' इस मंत्र से इदम् से उपचा पर्याद दाार से पर प्रकार) को दी हो जाता है तथा कि लोग हो जाने पर 'इदा, यह नामधातु बनती है। हममे सद्गार में इदाम् ---- (गर)+-नि-इशामति रूप बनता है । राजानति--रार पाचारनि (राजा दुग पाचारण करता है) इम प में राजन् कवि-दीर्घ होर 'गवान्' नामपातु बनती है। इससे राजाननिसबन जाता है। पधीनतो-या पानरति (मार्ग के समान भाचरण पता है)-- समर्थ मे पनि शिप्रा से दोघं होपर पधोन' यह नामपातु नठी है। विशेष-यदी पाचारार्य में दो प्रवर संसारे गये है-११)प को ए । न प्रत्यारों में पन्य पदों ये 7 इमार होते है- १.पोथिोलि १११॥ २. पासपोराम:

४०. 1
संगम्याकरणे
६३८ । कष्टाय क्रमणे ३३१०१४॥ चत र्य
दुत्साहेऽयं क्यङ् स्यात् । कष्टाय क्रमते कष्टायते।
इयर्थः ।
६३८ । शब्दवरकलहाभ्रकण्वमेघेभ्य: कर
षयच्-(प्रधिकरण में)-कुट्या प्रासादे वाचरति-प्रा
मिक्षुः । इसी प्रकार कुटीयति प्रासादे राजा। विवपू
मालाति । पितेव प्राचरति पितरनि इत्यादि। इनके अतिरित
मपङ्ग प्रत्यय भी होता है, जैसे-कृष्ण इद पाचरति कृर
पाचरति कुमारीयते इत्यादि ।
६३८. कष्टायेति - चतुय्यंन्त कप्ट श से उल्माह मपं
होता है।
टिप्पणी--(१) क्यड् प्रत्यय मे कवार और डकार के
लोप हो जाता है और 'य' शेष रहता है । (२) डित (ड
जिसका) होने से 'क्यङ्' प्रत्ययान्त नाम धातु प्रात्मनेपदी होती
कष्टायते-कष्टाय जमते (पाप करने को उत्साह करता
में चतुर्दान्त कष्ट शब्द से क्यद् प्रत्यय होकर कष्ट+डे+क्य
मैं धातु संज्ञा होकर 'हे' का लोर होता है तथा 'कष्ट' शब्द
को दीर्घ' होकर कप्टाय नाम धातु बननी है इससे लट् लका
रूप बनता है।
पाप मिति--कष्टायते वा अर्थ है-पाप करने को उत्सा
यह है कि यहां कष्ट शब्द से उसके साधन पा' का ग्रहण ।
पर्थ होता है उत्साह (ब्रमणमुत्साहः-तत्वबोधिनी)। मत
उपर्युक्त मयं हो जाता है ।।
६३६. शन्देति- शब्द, वर, कलह, अघ्र, कण्व, मेघ
स्थित इन शब्दों से 'करोति' (करता है) इरा अर्थ में कर
१. भकृदसाबंधातुक्यो: दीर्घः ॥२॥

नामधातवः - . एभ्यः कर्मभ्यः करोत्यर्थ क्यङ् स्यात् । शब्दं करोति-शब्दायते। 'तत्करोति तदाचप्टे' इति णिच् प्रातिपदिकाद् धात्वर्थे बहुलमिष्ठवच्च । प्रातिपदिकाद घाटव णिच् स्यात्, इप्ठे यथा प्रातिपदिकस्यपु षद् भावरमाव. टिलोप-विन्मत्तुब्लोप-यणादिलोप-प्रस्थस्फाद्यादेश-भसशास् तद्वदगावपि स्युः । इत्यल्लोपः घट करोत्याचप्टे वा घटयति । ॥ इति नाम धातवः राम्दायते-- शन्दं करोति (शब्द करता है)-इस पर्थ मे 'शब्द+म+ अयड्रा पवस्था मे पम् का लोप होकर शब्द+य-शब्द' के मन्तिम परार को दीर्घ होकर 'शब्दाप', यह नाभप तु बनती है । इससे शन्दाप+4 ()+ तेशदायते प बनता है। सरकरोतीति-'उपे करता है या उसे रहता है' इस भयं में प्रातिपदिक से णिच् प्रत्यय होता है। टिप्पणी-'तलरोति' इत्यादि धातु पाठ में पटित गणमूत्र है। इससे 'करने' भौर पहने' के अर्थ में कर्मचारी शम्द से णिच् प्रत्यय होता है। प्रातिपरिकारिति-प्रातिपदिक से धातु के पर्थ मै बहुधा लिन् प्रत्यय होता है और वह (पिच्) इप्टन् प्रत्यय के समान होता है वर्षाद पटन् प्रत्यय परे होने पर जैसे प्रातिपदिक को पदभाव, रभाव पर होना.) टिसंगामा खोप, भोर मतुप प्रत्यय का लोग, पए है माह में जिस अंश के उसका लोग, स्थ तपा रफ पादेश सपा ममंशा होती है, उसी प्रकार पिपरमय परे होने पर भी रेरायें होते हैं। त्यस्लोप: रति-इस प्रकार टन प्रत्यय के समान होने से 'पट+पिच' हो पर पटकी मसंशा हो जाती है उपा 'पापेलि MEE मे अन्तिम मोर हो जाता है। ति-पदंति, पावटेवा (पद को बताता है या पटोरहवा | रा प में पट र से गि प्रापप होकर पर+लिर-इम पाया में मन्तिम प्रारमोर हो जाता है मौर पर+t- परि' म्ह नाम- मरहनम्याकरण प्रय कण्डवादयः ६४० । कण्ड्वादिभ्यो या ॥१॥२७॥ एम यक् स्यात् स्थायें। कण्डूर गाविपर्पणे। कण्डूर इत्यादि। ॥ इति कण्डवादयः॥ पातु बन जाती है । इगमे लट् लकार प्रथमपुरुष एकवच बनता है। टिप्पणी-(१) इष्टवन होने से पुंवद्राव यादि के उदा है। पुंवद्भाव-पट्वीमाचष्टे पटयति [,भस्याई तद्धिने' (E रभाव-दृढं करोति द्वयति (र ऋती हलादेलंघोः ६४४१६५ टिलोप-पटुमाचष्टे पटयति (टे ६।१५।।)। दिल्लुक जपति । मतुप-नुक-श्रीमन्तं करोति थापयति (विन्मते यणादिलोप-स्थूलमाचष्टे स्थवयति, दूर करोति दवपत्ति शिप्रसुदाणा यणादिपरं पूर्वस्य च गुणः ६.४१५६) । प्र- प्रापयति, स्थ-यादेश-स्थिरं करोति स्थापयति; स्फ-मादे स्फापयति (प्रियस्थिरस्फिर० ६४१५७)। भसंज्ञा का उदाह गया है। ॥ इति नामधातु ॥ कण्ड्वादय-कण्डू' मादि गणपाठ में पड़े गये शब्द हैं। उनसे बनने वाली क्रियानों का उल्लेस किया गया है। ६४०. कण्डवादिभ्य इति-कण्डू भादि यातुपों से नित्य है, स्वार्थ में। टिप्पणी-यहाँ 'घातुभ्यः' (घातु से) इम विशेषण का प्रय कण्डमादि प्रातिपदिकों से यक् प्रत्यय नहीं होता। कण्डू' मावि हैं--पातु तथा प्रातिपदिक । इनमे पातुपों से ही या प्रत्यय यथात्मनेपदप्रक्रिया कम-धातु खुजलाना' अर्थ में है। कण्डपति-कण्डूयते-कण्ट्र धातु से 'यक्' होकर 'कण्डूय' ऐसा रूप बनता । इसको धातु' संज्ञा होकर लट् लकार के परस्मैपद' में कण्डूयति तथा मात्मनेपद में कण्डूयते रूप बनते हैं। टिप्पणी-(१) 'कण्डूम' प्रादि धातुओं के सब लकारो में इस प्रकार रूप होते हैं-लट् कण्डूयति-कण्डूयते । लिद--कण्डूयाचकार-कण्ड्या-चक । लुट- कण्डूपिता । लुट्-~-कण्डूयिष्यति-ते । लोट-कण्डूयतु-ताम् । लङ्-प्रकण्यद -~-त । विधिलिड्कण्डूयेतु-त । प्राशिपि लिङ्कण्डम्याद-~कण्डयिपीष्ट । लुमकदूषोत् -- प्रकण्डूयिष्ट । लुइ--प्रकण्डूयिष्यत-त । (२) कण्ड्वादि के कुछ व्यवहारोपयोगी स्मिारूप इस प्रकार हैं- सपर-सपर्यति । भिपज-भिपज्यति । इपुष्-इषुध्यति । केला, खेला- केलापति, खेलायति । मही-महीयते । पपस्-पपस्पति । सुख-मुख्यति । कण्ड्दादि माकृतिगए है। ॥ इति कण्डवादि। मात्मनेपदेति--जैसा कि तिङन्त प्रक्रिया के प्रारम्भ मे बतलाया गया है तकार के स्थान में होने वाले प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं- १. परस्मैपद पौर २. प्रात्मनेपद । किन धातुरो से परस्मैपद प्रत्यय लगाये जाते हैं और किनसे मात्मनेपद, यह बतलाने वाले तीन सामान्यसूत्र हैं। उनके अपवाद रूप ही अन्य सूत्र परस्मैपद या पात्मनेपद का विधान करते हैं। वे सामान्य सूत्र ये हैं- अनुदातडित मात्मनेपदम् १९३६१२४-निसका अनुदात्त प्रचु (स्वर) व हो (पनुदात्तेत अथवा डकार इत्संज्ञक (डित) हो ऐसी धातु से भात्मनेपर १. सनाद्यन्ता धातवः ॥१॥३२॥ २. 'कण्ड' धातु त्रि' (प्रकार है इसंवा निमका) है अतः उभयपदी है । (देखिये भारमनेपद प्रक्रिया)

४०४
संस्कृतव्याकरणे
होता है । जैसे-एघ वृद्धो, इसका धकार से मागे वाला अनुदान
है मतः इससे पात्मनेपद (एधते) होता है। इसी प्रकार 'शोई
इत्संजक है अतः इसमै प्रात्मनेपद (ोते) होता है । कौन धातु
कौन 'डित' है-इसका ज्ञान धातुपाठ से होता है।
२. स्वरितशितः कत्रभिप्राये कियाफले ११३७२।।-जिस
इव हो (स्वरितेत्) अथवा जिसका अकार इत हो (नि:) उस
पर होता है यदि प्रिया का फन कर्ता को प्राप्त होता है (कतुंग
'पच' घातु का धकार से मागे वाला स्वरित प्रकार इत्मंश
स्वरितेत है । यदि कहना है कि 'देवदत्त अपने लिए भोजन पका
'पति' प्रिया का फल कर्ता को प्राप्त होगा (क्तुंगामी) मतः
पचते यह (मात्मने।६) प्रयोग होना चाहिये पौर यदि कहन
(दूगगे के लिये) भोजन पराता है तो यहाँ पचति' प्रिया का
अन्य को प्राप्त होता है (परगामी) मत पाचक: भोजन
(परस्मैपद) प्रयोग होना चाहिये । इसी प्रकार 'कूल' पातु
जो
गामी प्रियाफल में मान्मनेपद तथा परगामी पापला
टिप्पणी-परमपद मोर प्रारमनेपद के प्रयोग का पह
हम पिया जाता है। उच्चकोटि के संस्कृत कवियों ने भ
सामान्य से प्रयोग दिया है किन्तु दशकुमारचरित तथा कार
एवं स्थल है जहा दोनो पदों का नियमित प्रयोग मिलता है।'
३ शेशासरि परामंपग १॥1960-गि धातु में
नमित्त नहीं होता वह गेप कही गई गे, उममे पर्नु वाध्य में पर
इन सूरी से नवाच्य मे ही ग्रामनेपद पाक्षिकी वाचा
या वर्म मे तो मारमंगो'११३ रे अनुमार माग्मनेप:
प्रसार मो में मामान्य नियम पर है-
१. मिपाइरे-M. R. Kele. A ligher Sanskrit
पाटियागो मेकान १६१.

के मात्मनेपदक्रिया [ ४०५ ६४१ । कर्तरि कर्मव्यतिहारे १३ १४॥ क्रियाविनिमये द्योत्ये कर्तर्यात्मनेपदम् । व्यतिलुनीते। अन्यस्य योग्यं लवनं करोतीत्यर्थः । ६४२ । न गतिहिसार्थेभ्यः ११३॥१५॥ व्यतिगच्छन्ति व्यतिघ्नन्ति । ६४३ । नेविंशः १।३.१७॥ निविशते । मात्मनेपद-(क) अनुदात्तेत, डिव धातुप्रो से (ख) स्वरितेत्, जित घातुप्रो से कर्तृगामी क्रियाफल मे (ग) कर्मवाच्य तथा भाववाच्य मे होता है। परस्मैपद-शेषधातुओं से केवल कर्तृवाच्य मे परस्मैपद होता है इस नियम कुछ अपवादो का मागे निरूपण किया जा रहा है । ६४१ करोति-क्रिया का विनिमय अर्थात् कार्यों की अदला-बदली को प्रकट करने के लिए कर्तृवाच्य मे प्रात्मनेपद होता है । टिप्पणी-जब एक के नियत कर्तव्य को दूसरा करता है तो वह कर्म- व्यतिहार (क्रियाविनिमय) कहलाता है । यह कर्मव्यतिहार वि+अति उपसर्गों द्वारा प्रकट होता है। व्यतिलुनीते-दूसरे के योग्य काटने के कार्य को करता है, यह, अर्थ है। यहाँ वि, प्रति उपसर्ग पूर्वक सून (काटना) धातु से कमव्यतिहार को प्रकट करने के लिये प्रात्मनेपद होता है । वि अति ++ना (श्ना)+ते+व्यतिलु नीते।' ६४२ नोति-मति और हिंसा है अर्थ जिनका ऐसी धातुनो से किया विनिमय अर्थ में प्रात्मनेपद नहीं होता पूर्व सूत्र १ ३३१४ का अपवाद)। ध्यतिगच्छन्ति-(एक दूसरे के गन्तव्य स्थानों को जाते हैं) वि+अति+ गम् +श मन्ति । यहाँ क्रियाविनिमय अर्थ प्रकट होता है तथापि गत्यर्थक घात होने के कारण मात्मनेपद नही होता है । इसी प्रकार- प्यतिघ्नन्ति-वि-+पति+हन्+प्रन्ति । यहाँ हिंसाधक धातु होने से क्रियाविनिमय अर्थ में भी भात्मनेपद नहीं होता है।" ६४३ विशइति-नि पूर्वक विश् घातु से प्रात्मनेपद होता है १. यहाँ ई हत्यघोः ६१९१३ श्ना के प्राकार को ईवार होता है। सया प्यादिना ह्रस्व: से लू के उकार को ह्रस्व (कार) हो जाता है।

संस्कृतम्याकरण ६४४ । परिव्यवेभ्यः क्रियः ११३॥१८॥ विक्रीणीते । अवक्रीणीते। ६४५ । विपराभ्या जे: । १॥३॥१६॥ विजयते । ६४६ । समवप्रविभ्य: स्थ: ११३||२२ सन्ति प्रतिष्ठते । वितिष्ठते । निविशते-सामान्यत. विश् परस्मैपदी है। अनुसार नि उपसर्ग पूर्वक विश् धातु से प्रात्मनेपद हो जाता म (r)+ते। ६४४. परीति-परि, वि और अव उपमर्ग पूर्वक 'श्री होता है । 'दुकोन द्रव्यविनिमये' ब्यादिगण की धातु है कर्तृगामी क्रियाफल में मात्मनेपद सिद्ध ही है। इन उप क्रियाफल में भी पात्मनेपद का विधान करने के लिये यह र परिक्रोणते-(वेतन द्वारा नियत काल के लिए रखत पूर्वक क्रो धातु से प्रात्मनेपद होकर परि+की+ना (श्ना इसी प्रकार विक्री गीते' (वेचता है) प्रवीणोते । ६४५. विपराम्यामिति-वि, परापूर्वक 'जि' धातु से । विजयते-विजय प्राप्त करता है) वि पूर्वक जि | धातु से उपयुक्त मूत्र के अनुसार पात्मनेपद होकर वि- 'जि' के इ को गुण (ए) तथा भय होकर विजयते । इस हारता है |भकर्मक) हाता है (सकर्मक)। ६४६. समवेति-(मम्, अव प्र, वि उपसर्ग पूर्वक स्या होता है। मन्तिप्टते-माछी तरह ठहरता है, साथ रहता पूर्वक स्या (व्हरना) धातु से समवविम्यः स्पः मूत्र से । १ यह तुदादिगण की पातु है मत: 'तुदादिभ्यः : । होता है।

प्रात्मनेपदप्रक्रिया [ ४०७ ६४७ । अपह्नवे ज्ञः ११३६४४॥ शतमपजानीते। अपलपतीत्यर्थः । ६४८ अकर्मकाच्च ३.४५॥ सपिपो जानीते । सपिपोपायेन प्रवर्तत इत्यर्थः। ६४६ | उदश्चरः सकर्मकात् ११३॥५३॥ धर्ममुच्चरते । उल्लङ्घय गातीत्यर्थः। है तथा सम्+था+अ (शप्)+ते-→रथा को तिष्ठ मादेश होकर सन्तिप्टते। इसी प्रकार प्रवतिष्ठते (रहता है) प्रतिप्ठते (प्रस्थान करता है), वितिष्ठते (विशेष प्रकार से स्थित रहता है) इत्यादि । ६४७ अपह्नवे इति-शा धातु से छिपाना अथं मे पात्मनेपद होता है । (गा अवबोधने 'ब्यादिगण की उभयपदी पात है। प्रस्तुत मूत्र से परगामी बियाफल में भी भपह्नव' अयं में मात्मनेपद ही होता है । शतमपजानीते-सो (रूपये) को विपाता (नटता) है यह अर्थ है यहाँ उपयुक्त सूत्र से प्रात्मनेपद हो जाता है-माशा-+ना (ना)+ते.ा के स्थान में 'जा" होकर प्रपजानीते। ६४८ प्रकर्मवाच्चेति-प्रामक शा धार से मारमनेपद होता है। [इस सूत्र में भी परगामी प्रियापन में प्रारमनेपद पहा गया है। मर्पियो जानीते-पूत के द्वारा प्रवृत्त होता है, यह पपं है । ग पर्ष मे भी शा धातु प्रकर्मक है । प्राः 'पार्मरान्च' से प्रारमनेपद होकर मा+ना+ से-जानी। V८ उपाधर इति-31 उपसर्ग पूर्वक सम्म घर धान से मात्मनेर होता है। चिर गतिमायो.' म्यादिगरा को परमपदी धातु है। उसमे पात्मनेपद का विधान रिया गया है। धर्ममुग्गरते-उलपन से पता है. यह प है। यही काम पूर्वक पर बात है जो समर है पत: उपर्युक्त सूत्र से प्रारम्भनेर होकर + पर+म(+-उपरते। १.नारनो l

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६५० | रामस्तृतीयायुक्तात ११॥५४॥ रपै.
६५१ १ दश्य र रेन्दतुम् ॥२५
यान्तेन मुक्तात स्थान तृतीया प्रेग्नतुयय । दार
६५२ । पूर्ववररानः ॥६२॥ सनः पूों में
सनन्तादप्पारमनेपद ग्यात् । एदिपिपते ।
११. सम
हिसक हनीमाविमापन
पातु रो मारमनपर होता है।
रथेन समपरने-(प में प्रमण करता है। यह मम्
तृतीयान्त रिपन में उसरा मोम भी है पत: प्रस्तुत गूत्र
सम्+घर+मश)+है+सचरते।
६५१ चेति -सम् पूर्वर दारण पातु पदि तृती
वह तृतीया विभक्ति चतुर्यो के प्रपं में हो तो उससे मात्मनेर
टिप्पणी- प्रविष्ट व्यवहार में दारा पान के प्रयोग में
पर्य मे तृतीया हो जाया करती है (प्रशिष्ट व्यवहारे द
तृतीया-कारक प्रफरण) । दाए दाने म्वादिगण को परस्मैप
दारया सयच्छते कामो-(कामी दासो के लिए कुछ
पूर्वक दाण, धातु दास्या' इस तृतीयान्त शब्द से युक्त है तय
निविष्ट वार्तिक के अनुसार चतुर्थी के मयं मे तृतीया वि
दाणश्चेति० सूत्र
के. अनुसार भात्मनेपद हो जाता है। सम्
+ते-दारण को यच्छ मादेश होकर सपन्यते रूप बनता
६५२ पूर्ववरिति-सन् प्रत्यय से पूर्व जो धातु (म
रमान सन् प्रत्ययान्त धातु से भी मात्मनेपद होता है।
एविषिषते-(बड़ना चाहता है)-'ए५ वृद्धौ पदम
१. पानामास्थाम्नादाए दृश्यति सतिशदपदा । पिजिE
--
७.३१७८

मात्मनेपदप्रक्रिया ४०१ ६५३ । हलन्ताच्च १।२।१०॥ इसमीपाद हल परो झलादि: सन् कित् । निविविक्षते। इससे 'एधितुमिच्छति' इस मर्थ मे सन् प्रत्यय होकर 'एम् + स' इस अवस्था मे सन को इट् का मागम होकर तथा सकार को पकार होकर 'एधिष' यहाँ 'घि' को द्वित्व 'होकर एघि धि प→अभ्यास के धकार को दकार होता है तथा 'एदिषिष' यह सन्नन्त घातु बन जाती है । इससे पूर्ववत् सनः' सूत्र अनुसार मात्मनेपद होकर एदिधिपते रूप बनता है ।" ६५३. हलन्ताच्चेति-इक् (इ, उ, ऋ. ल) के समीप जो हल् (ध्यजन) उससे परे झलादि (झल प्रत्याहार का वणं है प्रादि में जिसके) सन् कित हो जाता है। टिप्पणी-सन् प्रत्यय को जहाँ इट् नही होता वहाँ यह झलादि है, क्योकि सकार भल प्रत्याहार मे है । इट् हो जाने पर तो 'इ+स'-यह सन् का रूप होता है मतः यह भलादि नहीं रहता। निविरिक्षते-(निवेश करना चाहता है) 'निवेष्टुम् इच्छति' इस अयं मे निपूर्वक विश् पातु से सन् प्रत्यय होता है। 'नि + विश् + स', यहाँ सन् को इट्का मागम नही होता मतः सन् भलादि है और वह कित हो जाता है। कित हो जाने से 'विश्' के 'इ' को गुण नही होता । द्वित्व होकर निविविश्+ स इस अवस्था मे विश के शकार को पकार' तथा उसे ककार' हो जाता है पौर सन् के सकार को पकार होकर 'निविविक्ष' यह सन्नन्त धातु बनती है मब; क्योकि 'नेविंशः' के अनुसार निपूर्वक विश् धातु से मात्मनेपर होता है इसलिये सन् प्रत्ययान्त से भी 'पूर्ववत्सनः' के अनुसार प्रात्मनेपद होकर निविविक्षते' रूप बनता है। १. एथ् धातु के मादि में भच् (स्वर) है प्रत. 'मबादेद्वितीयस्य' ६॥२॥ के एकाच धि को ('सन्यडो.' IIE) द्वित्व होता है। २. प्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजमारच्छा पः ।।२।३।। , ३. पदोः कः सि २४१ अनुसार द्वितीय

संस्कृतव्याकरण
६५४ । गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक
पयोगेषु कृमः १।३।३२! गन्धनं सूचनम् ! उत्कु
अवक्षेपणं भर्सनम् । श्येनो वर्तिकामुदाकुरुते-भत्र
कुरुते-सेवते इत्यर्थः । परदारान् अकुरुते तेपु.सा
कस्योपस्कुरुते-गुणमाघत्ते । कथा: प्रकुरुते-प्रक
प्रकुरुत-धर्मार्थ विनियुक्ते । एप किम ? टं कर
६५५ । भुजोऽनवने ११३१६६ मोदन भुङ्क्ते
महीं भुनक्ति।
इत्यात्मनेपदप्रक्रिया
६५४. गन्धनेति-गन्धन (मूचन, शिकायत
(= भर्त्सन, फटकारना), सेवन (रोवा वरना), साहा
प्रतियत्ल (गुणों का प्राधान), प्रकथन (विशेष ढग से
मादि में लगाना)-इन प्रर्षों में कृञ् भातु से मात्मनेपद
टिप्पणी-डा करणे धातु नित है प्रत कर्तृगामी
प्रात्मनेपद होता ही है। इस मूत्र से गायन मादि प्रों में
में मात्मनेपद का विधान किया गया
उरकुरते--इसका मर्थ है सूचित करता है अर्थात् शिव
उत्पूर्वक कृत् धातु से गन्धन (सूचन) मध में पात्मनेपद हो
स्येनो पतिकामुदापुरते-इसका अर्थ है-याज वटेर ।
उद+मा उपसर्ग पूर्वक कृ धातु भत्र्सना (मवशेषणा
गन्धनेत्यादि से प्रात्मनेपद होता है । इसी प्रकार---
हरिमुपगुप्ते-इसका मयं है हरि की सेवा करता है।
धातु सेवन मर्य मे है।
परदारान् प्रदते-इमा मर्य है परस्त्रियों में साहन
है । यहाँ एक पातु 'साहमियर' अर्थ में है।
एपोरकरय उपमुस्त-दराका म है-काष्ठ प

प्रथ परस्मैपदप्रक्रिया ६५६१ अनुपराभ्यां कृतः ११३१७९, कढगे च फले गन्ध- नादौ च परस्मैपदं स्यात् । अनुकरोति । पराकरोति । गुण उत्पन्न करता है । यहाँ उपपूर्वक कृ धातु प्रतियन (गुणाधान) अर्थ में है। कथा प्रकुरत-इसका पथं है रथा वहता है। यहाँ प्र पूर्वक कृ धातु प्रकथन अर्थ में है। सतं प्रकुरुते - इसका अर्थ है धर्म के लिये सैकसरी लगाता है । यहा प्र पूर्वक कृ धातु उपयोग (धर्म ग्राहि मे लगाना) पर्थ मे है । मत: पहा सर्वत्र गाधनेत्यादि' सूत्र से प्रात्मनेपः हो जाता है। एषु किमिति--इन (गन्धन मादि पर्यो) में कृ धातु से भारमनेपर होता है. ऐमा यो कहा गया है ? इमलिये कि 'बट करोति' मादि में पात्मनेपद महो होता। यहाँ 'चटाई बनाता है' यह भर्ष है को मोक्त पों में भिन्न है। ५५५, मन इति-भुर् धातु से पालन (=प्रयन) से भिन्न प्रपं में मात्मनेपद होता है। टिपलो-भुपालनाम्पहारपोः (मन तपा भोजन) मह रुपादिगण की पातु है। इससे पालन भिन्न मर्यात भोजन करना' तथा 'भोपना'प में मामने. पद होता है. पोदन भक्त । पालन में परमपद होता है मही भुक्ति । पोरन पु-(भार साता है-यह भुज पानुसासन से भिन्न पं में है मन: भुगोनपने नुसार भारमरद होता है। पनपने नि-पालन में भिन्न पर्ष मे पागभनेर हो यह क्यों कहा गया है ? इसलिये किमो भुति' (पोका पातन Int) पहा पर दुन्ि मे परमपर होता है पारमनेपद नही। मारमनेsfree मयनि--पर पद प्रारम्भ दिलाई। पति-पतु पोर m उपसर ग में मामी INR मेरा दान में भी पटाti-

.
সার্টে
१५७ । अभिप्रत्यतिभ्यः क्षिपः ११३८०॥
स्वरितन । मभिक्षिपति।
६५८ 1 प्रावहः ॥२१॥प्रवहति ।
६५६ । परेम॒षः ११३८२४ परिमृष्यति ।
६६० । व्याङ परिभ्यो रमः ११३८३ ॥
विरमति ।
६६१ । उपाच्च ११३५८४॥ यज्ञदत्तमुपरमति
त्यः। मन्तीवितण्यर्थोऽयम् ।
।। इति परस्मैपदाधिमा ।
अनुकरोति-यहाँ भनु पूर्वक कृत्र धातु से सर्वत्र परस्मैपद
कहीं भी पात्मनेपद नहीं । इसी प्रकार पराकरोति ।
६५७. ममोति-अभि, प्रति मोर पति उपसर्ग पूर्वक
रस्मैपद होता है।
क्षिप्-भिप् (फेंकना) पातु (तुदादि) स्वरितद है. मतः
स सूत्र से भर्तृगामी क्रियाफल मे भी परम्मैपद का विधान ।
ममिक्षिपति-अभि पूर्वक क्षिप् पातु से परस्मैपद ही होता
आत्मनेपद मही। इसी प्रकार प्रतिक्षिपति, प्रतिक्षिपति ।
६५७.प्रादिति-'प्र' उपसर्ग पूर्वक 'वह' धातु से परस्मैपद होत
टिप्पणी-वह धातु (म्यादि) स्वरितेत है मतः उभयपदी है
कर्तृगामी क्रियाफल में भी परस्मैपद का विधान किया गया है ।
प्रवहति- पूर्वक पह, धातु से परस्मैपद ही होता है, भारम
६५९. परेमप इति-परि उपसर्ग पूर्वक मृष धातु से परस्मैपद
टिप्पणो-'मृप् तितिक्षायाम्' (दिवादि) स्वरितेत धातु है । इ
ढगामी क्रियाफल में भी परस्मैपद का विधान किया गया है।
परिमृपति-~-परि पूर्वक मृष् धातु से परस्मैपद ही होता है, माल

अथ भावकर्मप्रक्रिया ६६०. व्याङ् इति-वि, माड्, परि उपसर्ग पूर्वक रम् धातु से परस्मैपद होता है। रमु-'रभु कोडायाम्' (भ्वादि) प्रतुदात्तत् है, पत: प्रात्मनेपदी है। इस सूत्र से वि, पाङ्, परि पूर्वक रम् से परस्मैपद का विधान किया गया है। विरमति-(रुकता है। वि पूर्वक रम् धातु से उपयुक्त सूत्र के अनुसार परस्मैपद होता है । इसी प्रकार भारमति, परिरमति । ६६१ उपाच्चेति-- उप उपसर्ग पूर्वक रम् धातु के परस्मैपद होता है । यज्ञदत्तमुपरमति-इसका अर्थ है-प्रज्ञदत को रोकता है। यहाँ उप पूर्वक रम् धातु से परस्मैपद होता है। मन्तरिति-(यज्ञदतमुपरमति मे उपरमति का अर्थ 'उपरमयति' किया गया है) यह (पातु) अन्तर्भावित है रिण का मयं जिसमे ऐसी हैं भाव इस रम् धातु मैं गि प्रत्यय का मर्थ प्रेरणा अन्तनिहित है। टिप्पणी-'उपाच' ५॥ इस सूत्र द्वारा वहाँ परम्भपद होता है जहाँ उप पूर्वक रम् पातु सकर्मक होती है। जहाँ यह प्रकर्मक होती है वहाँ तो 'विभाषाऽकर्मकात्' १५३१८५॥ इस सूत्र से विकल्प से परस्मैपद होता है । ति परस्मैपदप्रतिया ॥ मय मावकर्मति-अब भाववाच्य भोर कर्मवाच्य क्रियानो का प्रकरण भारम्भ किया जाता है। विरोप-धातु दो प्रकार को हैं-सकर्मक भौर प्रक्रमक । सम्भक धातुपों से पर्ता तथा कम में सकार होते हैं मोर प्रवर्मक धातुभों से दर्ता तथा भाव में। (१) सकर्मक मौर प्रकर्मक को समझने के लिये यह ध्यान रखना मावश्यक है कि धातु के घर्ष मे दो अंश होते हैं-फल और व्यापार । जिस उद्देश्य से सिद्धि के लिये जिया को जाती है वह फल है मौर उस फल की सिद्धि के लिये लिया के लिये जो कार्य किया जाता है वह व्यापार पहलाता है। यह (पातु-वाच्य) फल १.स.. चालोपIn सतम्यारिस ६६२ भावकर्मणेः १३:१३ लस्यात्मनेपद जिसमें रहता है, वह कम है और व्यापार जिसमें रहता है 'देवदत्तः मोदनं पचति'-यहाँ पर चावलों को पकाने के। की जाती है मत: पकना-गलना (=विक्लित्ति) 'पति' इसका माश्रय 'मोदन' कर्म है । इस पाक के लिए पतीली कर चूल्हे पर चढ़ाना से लेकर उतारने तक के जो काम क्रिया के व्यापार कहलाते हैं, उनका प्राथप 'देवदत्त' कर प्रकार- सकर्मक धातु-वे धातु कही जाती हैं जिनके फल प्रो पृथक पृथक् होता है । जैसे पचति' इत्यादि। अकर्मक' पतु-वे धातु कही जाती हैं जिनके फल में एक ही होता है, जैसे 'गच्छति' यहाँ अग्रिम प्रदेश में पहुंचने की जाती है अतः 'उत्तरदेशसंयोग' गमन क्रिया का फ व्यापार है। ये दोनों एक ही कर्ता में रहते हैं प्रतः यह पर (२) संस्कृत मे तीन वाच्य होते हैं-कर्तृवार भाववाच्य, कर्तृवाच्य मे ऊपर के विवरण के अनुसार और प्रात्मनेपद होते हैं । विन्तु कर्मवाच्य तथा भाववाच्य ही होता है । कर्मवाच्य तथा भाववाच्य के रूपों की प्रक्रिया रही है। ६६२. मावेति--भाव और कर्म में लकार के स्थान में होते हैं। १. संक्षेप में प्रकर्मक धातु ये कही गई है-- लज्जासत्तास्थितिजागरणं वृद्धिक्षपभयजीवितमरणम् शयनक्रीडारचिदीप्य धातुगरणान्तमकर्मकगाहः ।। २. फलयापारयोः सामानाधिकरण्याद् भवत्यादिरकमकः प्यात् करोत्यादिः सम्मका भावकम प्रक्रिया ६६५ । सार्वधातुके या ३३१॥६७ धातोर्यक् भावकर्मवाचिनि सार्वधातुके । भावः क्रिया । सा च भावार्थकलकारेणाद्यनूते । युष्म- दस्मद्भ्यां सामानाधिकरण्याभावात् प्रथमः पुरुपः। तिड्वाच्यक्रियाया प्रद्रव्यरूपत्वेन द्वित्वाद्यप्रतीतनं द्विवचनादि कि वेकवचनमेवोत्सर्गतः। ६६३. सार्वधातुक इति-~धातु मे यक् प्रत्यय होता है भाववाचक तथा कर्मवाचक सार्वधातुक परे होने पर । टिपणी-पातु से विधान किये गये तिङ् तथा शिव प्रत्यय सार्वधातुक कहलाते हैं तथा पातु से विहित शेप प्रत्यय प्रार्धधातक कहे जाते हैं । माव इति - (भावकर्मणो. प्रादि मे) भाव का अर्थ है क्रिया भौर उस क्रिया का भावार्थक लकार से अनुवाद किया जाता है। अभिप्राय यह है कि (भाववाच्य) मे लकार भाव मे पाता है अर्थात् वह वियामात्र को प्रकट करता है। किन्तु किया तो प्रत्येक धातु का वाच्यार्थ है अतः उस धात्वर्थ प्रिया का लकार द्वारा अनुवाद किया जाता है अर्थात् धातु के वाच्या क्रिया को ही भावाक लकार प्राट करता है। पुष्मदिति युष्मद् (तुम) मोर प्रस्मद् (हम) से (भाव का) सामानाधिकरण्य न होने से भाववाच्य की क्रिया में केवल प्रथमपुरुप ही होता है, मध्यमपुरुष या उत्तमपुरुष नहीं। भाव यह है कि जहाँ लकार कर्ता और कर्म में होता है वहाँ लकार का अर्थ (कर्तृत्व और कर्मत्व) युष्मद् तथा अस्मद् के साथ एक अर्थ में स्थित रहता है अर्थात् उमका युष्मद् और प्रस्मद् के साथ सामानाधिकरण्य होता है। किन्तु भाववाच्य मै तो लकार कियामात्र को प्रकट करता है और भाव का युष्मद् तथा अस्मद् के साथ सामानाधिकरण्य नहीं हो सस्ता अर्थात् शिया (भाव) न 'तुम' हो सकती है, न 'हम' हो सकती है। लिइ वाच्येति-तिड की वाच्च जो दिया है वह द्रव्य रूप नहीं है अत: १. तिइ शित् सर्वधातुकम् ३११११३॥, माघधातुकं शेषः ॥११४ २. मनुवाद का अर्थ है-ज्ञात (प्राप्त भयं का पुन: कथन ।

संगवारणे
पमा मान्न भूले। पवे।
६६४ ! स्यसिसीयुटतासि भावकमर
ग्रहशा या चिमदिट् च ६४ ६२॥ उपदेंगे
जग शिव पाहि (गया) की प्रतीनि नही होती। म
हिमपन पाटि नही होने, किन्तु मागान्यतः पिहित एरवचन
टिपरलो-'पद
बरवनम् १४॥२१॥ हा
१४१२२॥ अष्टाध्मायी में इस प्रकार दो गर है । इनमः
सपा गिनने के प्रयोग या मालिके. वामा में
प्राप्त होता, पतः महाभाप्यार में मनुमार ये मूर इमा
'एश्वननम्' द्विपदोषियनवमने-ऐगा होने पर एक
पहा गया है वह frमो राम्या पो पेशा नहीं रमा मनए
में भी एकवचन हो जाता है । जैसे-
स्वया मया प्रत्यरच भूयते-तुममे, मुझमे और अन्य
है)-'भूधात मनमक है प्रतः 'ल: कर्मणि.' इत्यादि के ।
मे सकार (लट हुमा है । भावकमणो से प्रात्म
5+ते' इस मवस्था में 'सावधातुके यक से या होकर भू
यह रूप बनता है।
टिपणी-उपर्युक्त विवरण के अनुसार भाववाच्य में
सकार में केवल प्रथमपुरुष के एकवचन का ही रूप बनता है,
भाव में सकार हुमा है अतः कर्ता अनुक्त है तया कर्ता (स्वय
तृतीया विभक्ति होती है।
बभूवे-भू+लिट् (भाववाच्य) प्रथमपुरुष एकवचन । भू
लिट् होकर मात्मनेपद होने से भू+ए द्वित्व और प्रयास
ए-वक् का भागम' होकर व+भू+व (वुक +ए→वभूत्रे
६६४. स्यसिज इति-उपदेश में जो अच वह है अन्न
धातुनों और हन् ग्रादि घानुग्रो को घिरा के समान मङ्ग कार्य
१, भुवो धग सुइ लिटोः ६०८८||

-
भावकर्मप्रक्रिया
हनादीनां च चिणीवाङ्गकार्य वा स्यात्स्यादिषु भावकर्मणोर्गम्यमानयोः
स्यादीनामिडागमश्च । चिण्वद्भावपक्षेऽयमिट् । चिण्वभावाद् वृद्धिः ।
भाविता, भविता । भाविष्यते, भविष्यते । भूयताम् । प्रभूयत । भूयेत ।
से स्य' मादि (स्य' मिच् सीयुट् भोर तासि) परे होने पर, जबकि भाव और
कर्म गम्यमान होते हैं (मर्यात भाव और कर्म मे लकार होता है) तथा 'स्य'
प्रादि को इट् का मागम भी हो जाता है।
टिप्पणी-'चिण' का विवरण प्रागे दिया जा रहा है । चिए परे रहते
जसे मङ्ग को वृद्धि प्रादि हो जाती है इसी प्रकार यहाँ विण वदभाव होने से
भी हो जाती है।
दिवदिति--विण्वद्भाव (पर्याद चिण के समान कार्य) होने के पक्ष में
ही यह इट् होता है (जब विप्वभाव नही होता तो इट् भी नहीं होता)। चिए
के समान कार्य होने से वृद्धि हो जाती है। जैसे-
माविता-मविता-भू+लुटु (भाववाच्य) प्रथमपुरुष एवचन । भू+
तास्+हा' इस भवस्था मे चिप्वद्भाव होने से तास् को इट् पा पागम तथा
ऊकार को वृद्धि (मो) होकर धो को प्राव हो जाता है 'मावि तास् हा' यह
मास् (दि) का लोप होकर 'भाविता रूप बनता है।
पक्ष में चिण्वभाव न होने पर 'माघातकस्येडवलादे. २१७३५ मे इद्
होकर मार को गुण (पो) तथा प्रद पादेश होर 'भविता' रूप होता है।
माविष्यते भविष्यते-भू+लट् (भाववाच्य) प्रपमपुरष साचन । भू+
स्य+ते-चिण्वदभाव होने से स्य को इट का मागम तथा उकार को वृद्धि
(मो) और प्रो को पात् होकर भाविष्यते । चिश्वद्भाव न होने पर भविष्यते
भूपताम्-भू+लोट (भाववाच्य) प्र.पु. एक भू+4 (4) + ताम् ।
पम्पत-भू + लह, (भाववाच्य).पु. एक.++य (प)+।
भूपेत-भ+विधिलिइ (भाववाच्य) प्र.पु. एक + (प) #t
(सीपुर' +
१.लिड. सोयुट ॥१०॥

संस्कृतम्याकरगे
भाविपीप्ट, भविषीप्ट।
६६५ । चिण भावकर्मणोः ३।११६६|| च्ले
भावकर्मवाचिनि तशब्दे परे । अभावि । प्रभाविष्यत
प्रकर्म कोऽप्युपसर्गवशात् सकर्मकः । अनुभूयते प्रानन्दश्च
माविपोष्ट भरिपीट -भू+माशिपि लिड (भाववाच्य) प्र
भू+सोयुट् + सुट्+त→ भू+सी+स्+त-महाँ चिण्वभा
सोयुट को इट् का पागम तथा वृद्धि होकर भाविपीष्ट तथा चि-
पर भाविपीष्ट रूप होता है।
६६५ चिण इति -जि के स्थान में चिण होता है भा
शब्द परे होने पर ।
दिपणी-लड़ नकार मे घात तथा 'त' मादि प्रत्यय के
लुटिं' ३३११४३॥ सत्र के अनुमार 'चि' हो जाता है उसो स्थान
'चिण' मादेश होता है।
ममादि-भृ+लुङ् (भाववाच्य) प्र० पु० एक० । 'म
इस दशा में चिण भावकमणोः मे नि के स्थान में चिए,
'पिण' मे इ शेष रहता है नया 'चिणो लुक्' ६४१०४॥ मूत्र
सोप हो जाता है । 'म भनाइ' इस अवस्था में कार को पनि
माद होकर प्रभावि।
प्रमाविष्या-ममदिष्यत-भू+सर (भाववाच्य) प्र. पु.
+स्पत-निद्भाव होने पर प्रभामिप्यत । न होने पर अभय
पामा इति-भू धातु) प्रामक होते हुए भी (मनु) उपगणं
सार्मक हो जाती है।
टिप्पणी-(१) उपमर्ग के द्वारा धात के अर्थ में परिवान हो
पतः यक भूधातु का अर्थ होता है 'अनुभव करना और रा
पामा हाती है । मामक हो मे कर्म मे भी लिया के पवन
२) कम में लकार होने पर कर्म उस होता है, गतः वर्म में प्रथम
और कता अनुग है अत: उग नृतीया होती है । (३) कर्मवाथ्य
१. गु नियो: अगर

भावकमंप्रक्रिया च । अनुभूयेते । अनुभूयन्ते । त्वमनुभूयसे । महमनुभूये। अन्वभावि अन्वभाविपाताम्, अन्वभविपाताम् । णिलोपः । भाव्यते भावयाञ्च का अर्थ कर्म होता है । उस कर्म का युष्मद् अस्मद् से सामानाधिकरण्य होत है तथा उसमे द्वित्व ग्रादि सध्या को भी प्रतीति होती है इसलिये कर्मवार- को क्रिया तीनो पुरुषो तथा तीनों बचनों में होती है । जैसा कि उदाहरणो : भ अनुभूयते--प्रानन्दश्चत्रेण त्वया मया च (चत्र के द्वारा, तुझ से पौर मुझ से प्रानन्द का अनुभव किया जाता है)-अनुपूर्वक भू धातु 'अनुभव करना' भयं में सकर्मक है । इससे कर्म में लकार होकर अनुभू+ य (यक्) + ते. अनुभूयते । टिप्पणी-कर्मवाच्य की क्रिया के पुरुष और वचन कर्म के अनुसार होते । यहाँ कम 'मानन्द' है जो प्रथमपुरुष तथा एकवचन है पतः 'भनुभूयते' में प्रथमपुरुष का एकवचन होता है । इसी प्रकार- अनुभूयेते 1-मनु भू+लट् (कर्मवाच्य) प्र. पु० द्वि० । अनु भू++ माताम्। अनुभूयन्ते--मनु भू + लट् (कर्मवाच्य) प्र० पु० बहु० । अनु भू+य+ (मन्त)। स्वमनुभूयसे-मनु भू लट् (कर्म०) म. पु. एकः । अनु भू+ य+से। यहाँ कर्म 'त्वम्' है प्रतः कर्मवाच्य की क्रिया में मध्यम पुरुष का एकवचन होता है। इसी प्रकार द्विवचन मे युवाम् अनुभूयेथे, वह० में यूयम् अनुभूयध्वे । पहमनुभूये-मनु भू+लट् (कर्म०) ३० पु० एक० । अनु भू+य+। कम 'महम्' है अतः कर्मवाच्य को दिया मे उत्तमपुरष का एक्वचन होता है। इसी प्रकार द्वि० में 'प्रावाम् अनुभूयावहे (हम दोनो को अनुभव किया जाता है), षयम् अनुभूयामहे । अन्धमावि-मन म' प्रभावि के समान रूप सिद्धि होती है (मं०) प्र. पु० दि. .

पमा
भाषयाम्पमूये, माययामागे। मिष्यन्दि भाविता, भाभी
मनु भद्- भू+गिम्+पानाम-निभाने पर दर
माप पाडेग होर मनमाविणानाम् । विराधा न होने पर
मो) सपा पर पाग होकर भारताताम् ।
रिसोर-tar धान (भा) में नवाथ्य में
भाषि++दम गा में 'मेरनिति
पाता है।
माम्पते-भू+लि + सट् (कर्मवाच्य) प्र. पु. एफ.
से इस पापा में गि (इ) का मोर होकर भाइ++ते
बनता है।
भागमाञ्चके भावि+लिद (मवाच्य) प्र. पु. एक। मा
पर गिरे सार को गुण (ग) तथा मा प्रादेश होकर भावपाशा
इसी प्रकार 'भू' का अनुप्रयोग होने पर भाययाम्बभूवे तयाम
प्रयोग होने पर 'भाषयामासे' स्प होता है।
माविता-मातपिता--भावि+सुट (कम) प्र. पु. एक.
सास्++भावि + ता इस अवस्था में विवाद भाव से इद होता
इ+ता' यहाँ 'ममियदाभा' २२॥ इम मूत्र के अनुमा
हुए के समान (अप्तिदवत) हो जाता है । इसलिये इस इट् के आगे
'गरनिटि' से रिण का सोग हो आरा है तथा 'माविता रूप बनता है
जब चिण्वद्भाव से इद नहीं होना तय 'माघपातुकस्मेड् क्ल
होता है वह 'इट्' प्रसिद्ध के समान नहीं है अतः णि का लोप नहीं
इकार (णि) को गुण भय मादेश होकर भावयिता' रूप बनता है।
टिप्पणी-'ग्रसिद्धवदाभात' ६॥२२मूत्र से लेकर 'मस्य'
सूत्र तक जिनका विधान किया गया है वे भाभीय (भ पर्यन्त होने व
१. ग्ले: सिच् ३१॥४४॥ इससे लि के स्थान में सिच हो जाता
२. जिसके प्रादि में इन न हो ऐसा आघंघातक प्रत्यय परे रह
लोप हो जाता है।

भांवकर्मप्रक्रिया णिलोपः । भावयिता । भाविष्यते, भावयिप्यते । मभाव्यत । भाव्ये भाविपीप्ट, भावयिपीप्ट । प्रभावि । प्रभाविषाताम्, अभावयिपाता कहलाते हैं । यदि किसी निमित्त से एक भाभीय कार्य किया जा चुरा हो । उसी निमित्त से दूसरा भाभीय कार्य प्राप्त हो तो पहला किया कार्य मसिद्ध (न हुए के समान) हो जाता है । जैसे 'भावि++ता' यहाँ तास् के निमि से 'स्यसिच्.' ६।४।६२ इस मूत्र से चिवदिन होता है जो भाभीय है। फिन पार्घधातुक प्रत्यय तास् के निमित्त से ही ऐरनिर्टि' ६४.५१ से गिलो- प्राप्त होता है वह भी भाभीय है। इसीलिये प्रसिद्ध वदनामार के अनुसार इस प्रसिद्ध सा हो जाता है। किन्तु 'भावयिता मे जो 'माधंधातुपस्येवलादेः ७॥२॥३५' से इट् होता है वह 'भाभीय' प्रकरण का नहीं है। मतः यह इट् मसिद्ध नहीं होता पौर माघधातुक के मादि मे इट् होने के कारण 'गरनिटि' से मिलोप नहीं होता। इसी प्रकार अन्य स्थलो मे भी जब विवदिट होता है तो गिलोर होता है, अन्यथा नहीं। भावविष्यते-मावयिष्यते-भावि+सट् (कभं०) प्र. पु. एक० । भावि +द+स्य+ते चिवदित होकर गिलोप हो जाता है भाविष्यते । मन्यत्र भावयिष्यते। प्रमाव्यत-भावि+सह (कम०) प्र. पु. एव । भ+भावि+यर +बिलोप। भाध्येत-मावि+विधिलि (मं०) प्र. पु. १२० । भावि+य (प.) +६ (सीयु)+3 हिलोर मा++t+त मावेत । भाविपोष्ट-मावपिषीष्ट-मावि+माशिपि लिइ (०) प्र. पु.ए.। पिग्मदिन के पक्ष मे सिलोप होता है । ऐप भादिषीष्ट (भाव.) के समान । प्रमावि-मावि नुर (म.) प्र. एक । प्रभाविनर चिर) + तपासोर होर पारिए के परे रहते 'पिन्' सोर होरर प्रभावि स्प बनता है। ममादिपाताम-प्रमादिमाता -मावि सुः (धर्म) • पु. दि.

महतध्यारणे युभूप्यते । युभूपान्चक । भूपिता भूमिप्यते । वं प्रयत्सार्वधातुकयोपः स्तूयते विष्णुः स्ताविता, स्तं ममाथि-+-मिच्+प्राताम् --चिवद्भाव से इट होने पर णि भन्यत्र णि (६) को गुण ए) पय मादेश होकर पभावविप धुमप्यते-बुभूप+ लट् (मात्र०) प्र. पु. एक० । (युभूप) से भाववाच्य में लट् होकर वुभूप+ते+यक होका यहाँ पकार से मागे वाले प्रकार का सोप' होकर वुमप्यते । युभूपाञ्चक-वुमूष+लिट् (भाव०) प्र. पु. एक० । वु अमपिता-युभूप+ लुट् (भाव०) प्र. पु० एक० । बु इट् का प्रागम तथा सन् के भकार का लोप होकर बुभूषिता सुमपिप्यते-~-युभूप+ लृट् (माव०) प्र. पु. एक । स्य को इट् फा मागम तथा सन् केन कार का लोप होक बनता है। टिप्पणो-अकर्मक पातु सन्नन्त होकर भी अकर्मक ही भाव में लकार होता है। मोभूय्यते - भू-+-य+लट् (भाववाच्य) प्र. पु० एव भू (वोभूय) धातु से भाववाच्य, लट् लकार प्रथम पुरु बोभूय + ते इस अवस्था में यक् होकर बोभूय+यते-~पह का लोप हो जाता है तथा बोभूय्यते रूप बनता है। भोभूयते-भू-+यलुक्+ लट् (भाववाच्य) प्र. पु. भू+ (बोभू) धातु से भाववाच्य के लट् लकार प्रथमपुरप +य (यक्) ते+बोभूयते रूप बनता है। प्रकृरिति-प्रकृतसावधातुकयोदर्घः ७४१२५॥ कृत म यकारादि प्रत्यय परे रहते प्रजन्त प्रङ्ग को दी (स्तु+ य+वे' यहाँ 'स्तु' के उकार को दीर्घ होता है १.भतो लोप: ६॥४॥४६॥ २. मतो लोप: ril के

भावकमप्रक्रिया
स्योप्यते । प्रस्तावि । प्रस्ताविपाताम, प्रस्तोपाताम् ।
मिति गुण. । अर्यते । स्मृ स्मरणे । स्मर्यते। सस्मरे । ३
स्तूपते विष्णु-~(विष्णु को स्तुति की जाती है) 'स्तु' ५
ध्य, लट् लकार प्रथम पुरुष एकवचन में प्रात्मनेपद होकर
ए होकर स्तु+म+ते इस अवस्था मे 'अकृत्सार्वधातुक्योर्षि
। दीप (उकार) होकर स्तूयते रूप बनता है।
स्ताविता-स्तोता- स्तु+लोट् (कर्मवाच्य) १० पु. एव०
-हास्तु+ता इस अवस्था में 'स्यसिध्० इत्यादि से विकल्प
व तथा इट् होकर स्तु+इ+ता वृद्धि स्तो+s+ता-
विता । चिण्वभाव न होने पर उकार को गुण (ओ) होकर
नता है (स्तु धातु अनिट् है अत. यहाँ इट् नहीं होता।
स्ताविष्यते स्तोप्यते--स्तु + लुट् (कर्मवाच्य) प्र० पु. एक
ते+चिण्वभाव इट वृद्धि प्राव भादेश होकर स्ताविध्यते
गोप्यते।
मातावि--स्तु+तुद (कर्मवाच्य) प्र० पु. एक० । मद्-
ति-स्तु को वृद्धि भाव परदेश तथा 'त' लोप होकर मस्तावि।
मस्ताविपाताम्-मस्तोपाताम्-तु+लुङ् (कर्म) प्र. पु.
स्त+सिच्+भाताम् विश्वभाव इद वृद्धि, प्राव होकर ।
8 में-उकार को गुण (यो) होकर भरतीपाताम् रूप बनता है
मयंते-गत्यर्थक ऋ धातु से कर्मवाच्य लट् लकार अषम
'चन मे "ऋ+य (यक्)+ते, इस अवस्था में गुणे
१४४२६॥ इस सूत्र से ऋो गुरु (पर) होकर भ+4+
निता है।
स्मते-स्मृ+लट (क्मवाच्य) प्र. पु. एकर ।
योगादि धातु होने से 'गुरगोतिसंयोगायो.' से गुण होकर पर्यते
सस्मरे+लिट् (कर्मवाच्य) प्र. पु. ए. + :
प्रन्यासकार्य स+स्मृ+ए+स्मर+ए+सस्मरे रूप बनता है।

संस्कृतव्याकरणे
चिप्वदिट् आरिता, अर्ता । स्मारिता, स्मता । म
लोपः-सस्यते । इदितस्तु नन्द्यते । सम्प्रसारणम् इज्य
उपदेदेशेति-(स्पसिच्० इत्यादि मूत्र में) उपदेश शन
चिण्वभाव तथा इट् हो जाता है। [ भाव यह है कि
मैं पर तथा नित्य होने से पहले गुण हो जाता है और मर+त
में भर अजन्त नहीं है फिर भी चिण्वभाव तया इट होत
"स्यसिन्' इत्यादि सूत्र में 'उपदेश' शब्द का ग्रहण किया गर
मर्थ है-'उपदेश में जो मच् तदन्त धातु को चिवदिट होता ।
उपदेश अवस्था में प्रजन्त ही है।
मारिता-प्रा-→सुट (कर्मवाच्य प्र. पु. एक० ।
+-+ता→गुरा (ऋ को मर् ) होकर मर+ता चिण्वभाव
वृद्धि (प को मा') होकर पार +8+ar-मारिता । विवाभ
न होने पर मा।
मारिता-स्मता-रम- सुट (कम०) प्र. पु. एक० । मारित
प्रनिरितामिति-भनिदितो हम उपाधाया: विमति ।
नसार का मोर होता है।
यस्यते-यम (गिरना) लट (भाववाच्य) प्र. पु. एक ।
(यक)+8+इम अवस्था में 'मनिदितामः' इत्यादि से मार (
स्वार के स में है। का लोप होकर सम् +ते+सस्यते ।
हरिताति-विम धातु का ात (इकार) सशक होता है
सार इस मंशरः यस्य हरय) नाररा मोर नहीं होता
मूत्र में 'प्रनिरिताम' हा गया है)। इसलिये टुर्ना गमृदी' या
वाष्य मप्र.पु. एक में नन्दने' बनना है। यही नमो नहीं
1. मापातुधातो. lion
२. उपधावा: ११॥

भावकमाया १२ . - ६६६ । तनोतेयक ॥४४ प्रकारोऽन्तादेशी वा स्यात, तायत, तन्यते। ६६७ तपोऽनुतापे च ३३१॥६५॥ तपरच्लेश्चिण न स्यात. कर्मकर्रर्यनुतापे च । अन्वतप्त पापेन । धुमास्थेतीत्वम् । दीयते । धीयते। नद+य+ते+नन (नम+य+ते नन्यते । सम्प्रसारणम् ~~-'यज्+यक्ते यहाँ यञ् धातु के यकार को 'चिस्व- पियजादीनां किति' ६।१५१५॥ से सम्प्रसारण (इकार) हो जाता है। ग्यते-'य+धातु मे कर्मवाच्य लट् प्रथम पुरुष के वचन मे पम् + यते -सम्प्रसारण (यकार को कार) इज् य ते इज्यते । ६६६ सनोरिति-सम् धातु के पन्त (नकार)को प्रकार धादेश होता है विरल से, यक परे होने पर। सामते-तम्यते -तन् विस्तार करना)+लट् (काव्य) प्र. पु. एक 1 तन्+यक-न-ते--मन्त को विकल्प से भार होकर a++d-मायते । पदा मे लन+4+ते+तन्यते । ६९७१ इति-तप पातु से परे लि को रिण नहीं होता कर्मकर्ता भोर भनुताप पर्थ मे । भनुपात का अर्थ है पश्चात्ताप । अन्वतप्त पान--(पाप से दुसी दिया गया) पनु++मु कर्म- पाय। पथका पापेन पुसा भन्वतप्त' {पारी पुरुष के द्वारा पश्चात्ताल रिया गया) इस प्रकार पारदरा पापी होता है तथा पर होने से भाव में नुन, होता है। मन्याप्त-मनु+त+सि+7+मिन के स्थान में भिए होने १. दिनो मुम् पातोः ११ जिस पातु सहस्व पर सहर होता है उसे नम पा पायम होता है। २. पामरसास्तीति पार: सादियो १३२६१२७ से पर महा मत्वरप्ताम पागातार करता है। ..सिमावरमो. १९६९ से निरोपित प्राप्त होता है।

संगनश्याम
.
६६८ । प्रातो युक् चिणकृतीः ७३३३
युगागमः स्याच्चिणि पिति कृति च। दायिता, दाता
दासीप्ट । पदायि । पदायिपाताम् । भग्यत ।
निषेध हो जाने से निको सिच् होकर मनु+म+त+सिच
झति दारा२॥ से मिच् का लोप होकर पन्वतप्त बनता है
पुमास्येति-धुमास्थागापाजहातिसा हनि ६।१६६॥ (इन
कोई होता है हलादिमित् नि प्रार्थधातुक परे रहने) इस मू
+ते' यहाँ '' के प्रकार को ईशार होता है । दा धातु
(दाधाध्वदाप ॥१॥२.)।
वीपते-दा+सट्(कर्मवाच्य) प्रथम पुरुष एकवचन । दा
"धुमास्थागापाजहातिसा हलि' से प्रशर को ईकार होकर
बनता है।
पोयते--धा (धारण, पोपण करना}+सट् (क्मवाच्य) प्र०
घा+म+ते।
ददे-दा+लिट् (कर्मवान्य) प्र. पु. एक । दा+ए (ए
प्रभ्यासकार्य ८ दा+ए+प्रकार' का लोप होकर द +ए.
बनता है।
६६८. भात इति-प्राकारान्त घातुमो को युक् का मागम हो
छया निद गित् कृत्पत्यय परे होने पर।
दापिता-दाता-दा+ लुट् (कर्मवाच्य) प्र. पु. एक. 1 दा+
→दा+ता यहाँ 'स्यसिच०' इत्यादि से चिण्वभाव तथा इट् होने ।
युर चिकृतो.' से युक् का मागम हो जाता है दा+युक+इट
दायिता। पक्ष में दाता' रूप बनता है।
दायिषीष्ट-दासौष्ट-दा+माशिपि लिङ (कर्मवाच्य) प्र. पु.
चिण्वदिट होने पर 'मुक' का माम दाथिपोष्ट पक्ष में दासोप्ट ।
१. मातो सोप इटि च ६४१६४१

- भावामक्रिया I४२. ६६६ । भजैश्च चिणि ६४.३३॥ नलोपो वा स्यात् । पमाजि, प्रजि । लभ्यते। ६७० । विभाषाविष्णमुलो ॥६६॥ सभेनु मागमो वा स्यात् । पलम्भि मलामि। ॥ इति भावकमप्रक्रिया। मायि-दा+लुइ (म०) प्र. पु. एक० । मदा+लि + त--दिल के स्थान में विण (विभावकमगो) और चिण परे होने पर युक् का भागम होकर पदा+++त-→त का लुक होकर प्रदायि । प्रदापिघाताम्--दा+तु (पमं०) प्र. पु. दि. मदा+म् (सिंच) +पाताम् ।विण्वभाव, इट् होकर युद्ध का मागम हो जाता है म दाम् माताम् पदायिपाताम् । विण्वभाव न होने पर 'स्याम्बोरिश्च' से पवार को झार होकर पदिपाताम् (सिदान कौमुदी) । भज्यते--मज (तोड़ना) धातु से धर्मवाच्य सट् सकार प्रथमपुरप के एरवचन में भज+म+ते+नलो होर भग्यते रूप बनता है। १९९० माचेति-मज पात के नारासोर होता है दिए परे होने पर विकल से। पानि प्रतिमा (का). पु. एक मज +रिण+द-विल से नमार का लोप होर म भ +8+उपधा' (भन के भगार) को वृद्धि तथा 'त' मा लोप होर पार++माजि। जर नगार का नोप नहीं होता तब 'प्रश्चि' यह रूप बनता है। सम्पते-सम+नट (म.) प्र. पृ. एषः । लम+या+d- मापते यह रूप बनता है। ६७०. विभापतिसमकत कोशिस मे सामान होता है, दिउ और न होने पर। १. प्रतिदिन हल पाषायाः शिविगा २. उपपारा ११९॥

भय कमक्त प्रक्रिया यदा कम मतॄत्येन विवक्षित तदा मकर्मकाणाम पतरि भाव घसकारः। मुल का उदाहरण है--साभ लाम, लम्म सम्मम् । प्रम्भि-मलामि + मुह वर्म०) प्र. पु. एक० ।। +ह । निभाषा विष्णमुली.' के मनुनार गुम का प्रागम होकर भू+पिy+R-- 'T' का लोप होकर मल न भ+६-नकार तथा परसवर्ण (मवार) होकर प्राम्भ प बनता है। जब तव उपधा (प्रकार) से वृद्धि होकर अनाभि रूप बनता है। टिप्पणी-मसत साहित्य में कर्मवाच्य का प्रचुर प्रयोग हEि है। कुछ अन्य धातुषों के कर्मवाच्य के रूप निम्न प्रकार से होते है इ-क्रियते । -गोपते । ग्रह-गृह्यते । प्रा-प्रायते । चि- चोर्यते । जि-जीयते । नी-नीयते । पा-पीना)-पोयते । पा-(र पायते । पू-पूयते । पृच्छ-पृच्छयते । मा-मीयते । वर--उप्पते । वह.-उह्यते । वस-उध्यते । वद्-उद्यते । बच्-उन्यते । शी-शय्य शिष्यते । हन्-हन्यते । इत्यादि । ॥ इति भावकमप्रक्रिया। यदेति --जब कर्म को ही कर्ता के रूप में कहना मभीष्ट हो सकर्मक धातुओं के भी अकर्मक हो जाने से (उनसे) कर्ता तथा भाव होते हैं। भाव यह है कि जब क्रिया अत्यन्त सरलता से हो जाती है म सोकर्यातिशय होता है तो इस भाव को प्रकट करने के लिये कर्ता के कथन नही किया जाता, अपितु अन्य कारकों को ही कर्ता के रूप किया जाता है, क्योकि वे अपने कार्य में स्वतन्त्र है, प्रतः वे ही कर्ता । जैसे-'प्रशिः दिनत्ति' अर्थात तरावार से योदा क्या काट रहा है स्वयं काट रही है। यहाँ 'मसि' करण है यह कर्ता बन गया है और न वर्मक्त प्रक्रिया ४२६ ६७१ । कर्मवत् कर्मणा तुल्यक्रियः ३.१८७'। कर्मस्थया क्रियया तुल्यक्रियः कर्ता कर्मवत स्यात् । कार्यातिदेशोऽयम् । तेन यगात्मनेपदचिण्वदिट स्यु । पच्यने फलम् । भिद्यते वाप्ठम् । प्रपाचि । प्रभेदि। भावे भिद्यते काप्ठेन। ॥ इति वर्म व प्रक्रिया ॥ में लकार होता है । इस प्रकार जब कर्म को छोडकर अन्य कारको को कर्ता के प में प्रकट किया जाता है तो कर्ता मे लकार होता है । किन्तु कर्म में विशेषता है । जब कर्म को वार्ता के रूप मे कहना अभीष्ट ता है सकर्मक धातु भी अकर्मक हो जाती है और उससे कर्ता तथा भाव मे कार होते हैं । क्र्ता मे लकार होने पर भी कुछ धातुप्रो के रूप कर्मवाच्य के मान हो जाते हैं । यह धागे दिखलाया जा रहा है। ६७१. फर्मवविति-कर्म में स्थित (कर्मस्थ) पिया के समान है, क्रिया जिमको ऐसा कर्ता कमवत् (कर्म के ममान) हो जाता है-- टिप्पणी-कर्मस्य क्रिया नहीं मानी जाती है जहाँ पर्म मे क्रिया के द्वारा की गई कोई विशेषता दिखलाई देती है, जैसे पके हुए चावलों मे या फटी हुई लकड़ियो में कुछ विशेषता हो जाती है ! जहां क्रिया कर्मस्थ है तथा जब कर्म को कर्ता बना दिया जाता है, तर मी उसमे वही प्रिया रहती है जो कर्मदशा मे थी। अतः एव वह या वर्म के तुल्य क्रिया पाला होता है घोर उसे कर्मवद्- भाव हो जाता है। किन्नु गमन त्रिया से तो ग्राम प्रादि मे कोई विशेषता उत्पन्न होती नहीं । अत ऐमी क्रियानो के इर्ता को दर्मवद्भाव नहीं होता। कार्यातिदेश इति यह कार्यातिदेश है । इसलिये कर्मवाच के समान यक्, पात्मनेपद मोर चिवदिट (ये कार्य। यहाँ भी होते हैं । यह उसके समान होवे, इस प्रकार बतलाना अतिदेश कहलाता है । 'कर्म के तुल्य क्रिया वाना कर्ता कर्मवत हो' यह बहना पतिदेश है । इसके दो अर्थ हो सकते हैं-(१) कर्मवाच्य मे क्रिया का रूप बनाने में जो मूत्र (शास्त्र) लगते हैं वे ही इमका कर्मवत . प्रिया रूप बनाने में लगाये जाते है-यह शास्त्रानिदेश होगा । (२) का जिया स्प बनाने मे जो जो वायं होते हैं वे ही इमा प्रिया बनाने

अथ लकारार्थप्रक्रिया
फल कर्म
होते हैं--यह कार्यातिदेश होगा । यद्यपि शास्पातिदेश से भी
सिद्धि हो सकती है तथापि मुख्य होने से कार्यातिदेश ही माना
पच्यते फलम्-(फल स्वयं ही पक रहा है। -कालः
किन्तु पाकक्रिया के सोकर्यातिशय को प्रस्ट करने
पाल क्या पका रहा है फल तो स्वयं पक रहा है, यह बतताने
को कर्ता बना दिया जाता । तब कर्ता में लकार होने पर
तुल्यकियः' के अनुसार कर्मवद्भाव होता है और कर्मवाच्य
मात्मनेपद होकर पच्यते रूप बनता है।
यहाँ कढे वाच्य होने से कर्ता उक्त है, प्रत 'फलम्' में (भ
मे) प्रयमा विभक्ति होती है । इसी प्रकार भिधते काष्ठम् ।
प्राधि--पच् धातु से कमंतूं में लुभ लकार प्रथमपुरुष ।
'ग्रा+लि-1 इम अवस्था में कर्मवद्भाव रोने से किल को।
है नया 'त' का लोप और पप के प्रकार (उपपा) को वृद्धि (म
मावि रूप बनता है। इसी प्रकार प्रभेदि ।
भावे स्थिति से पढे रूप में रहने पर जर पात से ।
होता है तर तो 'भिाने काप्ठेन' म प्रकार का में हनीपा विभ
कोकि यहाँ कर्ता अमृत है।
॥ इनि कमर प्ररिया।
सशरार्थप्रश्येिति-जमा कि आर रल्लेस पिया गया।
व्याकरण में दस सवारों का विवेचन किया जाता है । उगो पथं
दुध मावश्यक वा प्रस्नुन प्रकरण में यतलाई जा रही है-
मट्-वर्तमान कार में (वर्तमाने सन २०१२३॥) अंगे पः
पनि।
निट जो पात्र को न हो (मनवान) तथा बहने बारे को
(परस गो रिया को पार करने के यि; (परोको लिए।
अंग-मुहिप पुरा पाठ

लकारार्थप्रक्रिया सुट-अनद्यतन भविष्यत् काल मे (पनद्यने लुट् ३६३१५ एवः पठिता--वह कल पड़ेगा। लह-सामान्य भविष्यत् काल मे (लूट शेषे च ३३३३१३।। प्रद्य पठिष्यति, सः पठिष्यति । लेट-केवल वेद मे ही (इसका विविध प्रों मे) प्रयोग होता लोट--विधि, आज्ञा मादि मयों मे (लोट् र १॥३॥१६२॥ पटतु । पाशीर्वाद अर्थ में भी {ग्राशिपि लिह लोटौ ३४३५१७ पटतात् । लड्---मनद्यतन भूतकाल मे (मनद्यतने लड् ३२११११), जै मपटत-उसने कल पढा। लिङ्--(1) विधिलिड्' विधि प्रेरणा प्रादि भयों में। इसवे माणे दिये जा रहे हैं। (२) माशिषि लिङ्--इसका आशीर्वाद प्रर्थ में प्रयोग वि (माणिगि लिङ् लोटौ ३१३३१७३) प्राशी: का अर्थ है भप्राप्त र इच्छा। जैसे-~-चिरजीव्यात् भवान् । तत्किमायदाशारमहे वेवर भूयाः । उत्तम पुस्प मे वता की अभिलाषा को प्रकट करने के प्रयोग किया जाता है। जैसे-वृत्तार्था भूयासम् । सुड.---सामान्य भूतकाल मे (लुङ् ३।१।११० (जैसे---सोग (प्रत्यय) के साथ सब सारो के विषय मे तु का ही प्रयोग होता सुङ ३६३६९७५) जैसे-भतु विपकृतानि रोपणतया मा स्म प्रतीप, ला-क्रिया की निष्पत्ति (मसिद्धि होने पर हेतुहेतुमद्भाव (C. मादि को प्रकट करने के लिये भविश्यत् काल में लड़ लवार का प्र है । (लिङ्ग-निमिते सह-निमातिपत्तो ३३४१३६), जगे--मभीर

मन्तवाारणे
अभिशावनने लट ३३।११२॥
भूतानइतने पालोनद सडोमगादः । वम निय
गोकुले यस्यामः । एव बुध्यमे, चतयरी इत्यादि प्र.
६७२
घृतेन यदि भत्समीपमामिप्यत् काशिया)। गुदृष्टिर
गुभिशम् भविष्यत् (यदि अच्छी वर्षा होगी तो सुपात है
संक्षेप में सव लशारों या मर्य निम्न कारिता में दिया
सट् वर्तम सेट
भूने तुङ सङ लिटस्तया।
विध्याशियोस्तु लिइलोटो लुट लूट लड़ च भविष्यति
सवारों के अर्थ में विषय के कुछ मन्य बात यही बता
६७२. अभिजेति-मरणोधक उपपद होने पर अना
से लट् लकार होता है।
टिप्पणी-(१) यहाँ उपपद का मर्थ है समीप में स्थि
माणं पदमुपपदम)। (२) सनातन-जो मान का कान
सड़ इति-पनद्यतन भूत प्रथं में सामान्यतः ला ला
इस विशेष स्थल मे
लट् का विधान किया गया है अतः यह
का मपवाद बाधक) है।
स्मरति कृष्ण, गोकुले वत्स्यामः-हे कृष्ण, तुम्हे
गोकुल में निवास करते थे। यहां स्मरणयोधक 'स्मा
मननन भूत अर्थ में धस धातु में लूट लसर हो जाता ।
.. +मस) यह लुटु तकार के उत्तम पुरुप बहुवचन का
एवं युध्यसे इति-इसी प्रकार वुध्यसे, चेतयसे इद
.,६ रूप मे) प्रयोग होने पर भी (अनद्यतन भूत
में
लुद
।

अथ संस्कृतव्याकरणस्थ-सूत्राणाम् अकारादिवर्णानुक्रमः सूनाः सूत्राणि अकथितं प २६४ अरिप. ७० अवतंयुणे. ६४८ असमंकाच १७ अकेनो. २.५ पदणोऽर्शात १८३ अचित्तहस्ति २१५ अघोपत् ५६. धजाधतष्टा १६मजाचदन्तम् ११८अग्मनगमा सनि ५६५ मनाते अध्यायपाद- अध्यायद सूबादः सूत्रागि मृवाधा १।४।११ ५३३ अन् ५१३१५ ५ अनभिहिते २॥३॥२४ w अनबननेहिल. १३१२१ ||१२६ (क) अनाच ५॥४१.८ २१३७० ६३७ अनुनासिक्स्स. ५४७६ अनुपराम्पांजः १३७९ ४॥२॥४७ ४८ अनुपतिगृणश्च १४१ ३११७ १६ अनुलक्षणे १४४४ nee} अनुशतिका २।२१३३ ७२. ११३७३ ३४९ अनुष्यान. १.७ अनेसमन्या ६.डा. २।२।२४ १४१२८ ५२२ बल इनिठनो २५ अतिरतित्रमणे १४ मनिशायने ९१रमवार १५मधिकरण ४३५अपिाप.. २१ पिपरो. ११॥अधिरोप ११ अधिोर पर बायोग २२१११ १५४ अन्तहिन्याम् १५ १४ अन्तरान्तरेण. १२६ भन्यवाद १२।७. ६४ अम्पादित २ २४१ सम्मेम्पोपित ४१३ २२९पर पौर १३ १५ बरोबर १२ रोमा ४० मारे २३१२ २१बपि सारा पानी २०६२१ श। AMER १vie Rite १७ .

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सूत्रातः सूत्राणि ५३२ इदम इथ ५४७ इदस्थमुः ५४२ ६दमोहिल ५३६ इदमोहः ५०२ इदक्मिोरीकी ३८१ इनण्यनपत्ये ५६४ इन्द्रवरुणभव ५६६ इवे प्रतिकृती ४१५ इष्टादिम्पश्च ५५६ इष्ठस्य यिट् घ ३५४ इसुसुक्तान्तात्क: ४३६ अध्यायपाद- मूत्राद्वाः श६२ ३।२। २।२।३० ११३८४ १४४८ ११४७ २॥३॥६६ ५॥२१४४ ५।४।१५१ २१६ ईति ५६१ ईपदसमाप्ती ३१८ ईषाः सुषु. अकारादिवर्णानुक्रमः अध्यायपाद- सूत्र कः सूत्राणि सूत्राद्राः ५१३३ ३०४ उपसर्ग घो: कि: ३२४, २५५ उपसर्गेच ५। १६ / १२२ उपसर्जनं पूर्वम् ६६१ उपाच्च ६३. १३ उपान्वध्याइ. ६४१६४ २० उपोऽधिकेप ४११०४६ १३ उभयप्राप्ती. १९६ ५०५ उभादुदात्तो. ५।२।८८ १९. उरः प्रभृति. ६।४११५६ ६०२ ऊडुतः ७.३१५१ ३०६ अतियूति. ६४.६५ ६०४ उत्तरपदा० ५॥३॥६७ १६१ ऊय दिनि ३।३।१२६ [[ २०४ ऋकपूरन्पू: ५॥११२ ३५१ ऋष्यन्धक ४६ २२२ ऋहलोभ्यंद ४१४३२ २६८ ऋदोरम् ४१६ ११३३५३ १६२ एकवित्तिा ७.२०५६ ६४. एको गोरे ५१४१४६ २३८ एचे पण २९] ५४५ एतदः २१८ एतिस्तुशास. २।१।११ ५४३ एतेती रपोः ५१४८५ ७६ एना दिसोश ४११६६ ३१३७ ४१६१६६ १२४६१ ५४७४ ४११४ ३३११२४ ३।३३५७ ४७. उगवादिम्यो यत् 1८१ उगिताच ४५४ उयति २६. उणादयो ३३५ उत्सादिम्योःण ६४६ उदश्चर:सक. २२४ उदितोवा १८७ उद्विभ्यां काकु. १६५ उपपदमति ६२६ उपमानादाचारे १२६ उपमानानि २.६ उपसर्गाश्वनः १२४ ४१३ ३।२।२८ ३.११०१ १३४ ॥२३१ ४३८ सस्कृतध्याकरणस्थमूनाणाम् अध्यायपाद- मूत्राणि मूत्राद्वा মুগ মুখালি १८१ अप्पूरणी० ५।४।११६ १६७ अहः सर्वक. ३०६ अप्रत्ययात् ३।१०२ [भा ६७२ अभिझावचने ३।२।११२ २७८ आश्वस्तही १२ अभिनिदिपश्च १४१४७ ६१ आख्यातोश्योरें ४३७ अभिनिष्कामति ४१३८६ ६६ आङ्मर्यादावत ६५७ अभिप्रत्यतिभ्यः श३०८० ४८६ आ च स्वात् २२ अभिरमागे १।४।११ | २३० मातश्योपसर्ग २.६ अरद्विपदज. ६।३०६७ २३३ बातोऽनुपसर्गे। २८८ अतिलघूसू १८४६६८ आतो युक. ६१२ अतिही०ली. ७.३।३६ ३१६ आतो युच १७५ अर्धचा: २२४३१ ४७३ यात्मविश्व १४ अचं नपुंसकम् ।२।२ २४७ आत्ममाने.. ५२६ अर्श आदिभ्योऽच् ।२।१२७ ४७४ आत्मावानो ३२० अलंखल्वोः० १०१ आधारोऽपि २०० अल्लातरम् २।२।३४ २७४ आने मुक् । ४४३ अवयवे च. ४१३।१३५ १७. आत्महतः ३१६ अवे तृस्त्रो:० ३।३।१२० ३२७ मामीक्षा ५७८ अव्यक्तानुकर० ५॥४१५७ ३४६ आयनेयो ५६४ अव्ययसवं. श३३७१ १०६ आयुक्त०. ४०६ अव्ययाश्यप ४।२।१०४ १२३ अव्ययीभावश्च २१४११८ १२३ अव्ययीभावे च० ६।३०१ ६१६ इको फल १२६ अध्ययीभावे शरत ५४१०७ 1८६ (क) इगन्तान ११६ अव्ययीभावः २२११५! २२६ .१२० अव्ययं विभक्तिः २०१६ ३३१ अश्वपत्यादिम्यश्च ४११०४ ५२४ अस्मायामेधा. ५५२।१२१. ५७४ यस्य च्ची ५२७ अहं गुभमोस् ८५ आशिपि.

अकारादिवर्णानुक्रमः अध्यायपाद- सूत्रादा. ४१२६४ ६.८१२० सूबाइः मूत्राणि ५० कियाप ५६५ त्रीतात् wधदुहे. ४५ क्रुपद्हो० २७१ क्यमुश्व ५३८ वाति २४ क्विप्प ३५८ क्षत्राद्धः २६५ क्षायो मः ६२७ शुम्नादिषु च २४८ खित्यनव्ययस्य ६ गतिबुद्धि ५४ गत्यकर्मणि. ६५४ गग्धनावपण. ४५ गर्गादिम्यो यत्र ४१० गहादिम्यश्व ४६१ गुणवचन. ६२२ गुग्भे यइलुः ३१. गुरोपच हलः अध्यायपदि- मूत्राधाः सूत्राङ्कः मूत्राणि २।३।१४ | ४०२ प्रामाद्यसतो ४१११५० १४१३७ २९५ पनि च १४१३८ ३।२।१०७ २२३ घजोः कुपि. ७२।१०५ १०० चतुर्थी चाशि ३२२७६ १३८ चतुर्थी तदर्था० ४१११३८ ३६ चतुर्थी सम्प्रदाने ४५२ चरति ८।२।५३ २३४ चरेष्टः साग३६ २९६ पायें दन्द्र ६३५ चिण्मावकर्मणोः २८५ वो. शूड. १४५२ ५७७ चोप २१३०१२ ११३३३२ ३१५ छादे० ५।३.५२ २।३.७३ २।१।३६ २।३।१३ ४१४८ ३।२।१६ २।२।२६ ६.४१६ ७१२६ ४११ ४१।१३८ ३६१ जनपदशदात् ।१।१२४३६२ जनपदे लुप ७.४१८२ ६२ जनिगर्नु ३३३१०३ २८. सत्पमिक्षा ३।११४ ३२५ जहावेश्व रित्व १४ ६०. जावेरस्त्रीविषया. ४१।१६० ८६ आमिनिग्रहण ४२४२८ विनामूला. ३४३ जीरति तु. १२।४८ १मोऽविस्था १२।३ mगोत्राद पून्य. ७ गोरसार्य १५.गौरतरित. w६ गोष पुगेपे १६५पोस्त्रियो ३९२ सामनरन्धु. ७.४५४३ M६२ Mille

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Karakprakaranm

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Karakprakaranm
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Karakprakaranm
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OCR done
Citation
1952
Published
2011/08
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
476
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
DLI number
310977
Barcode
99999990314412.00
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