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2011/01

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अखिल भारत ग्राम उद्योग संघ
तेल घानी
,
लेखक
झवेरभाई पु. पटेल
कर्धा
म० भा० ग्रा.
उ० सप,
मगन वा डी

प्रयम सस्करण १९३९ द्वितीय सस्करण १९४१ तृतीय सस्करण १९४२ चतुर्थ सस्करण १९४७ यह किताप हाथके बने कागज पर छपी है । मूल्य-३० प्रकाशक- जे सो कुमारप्पा मत्रो, अ भा ग्रा उ सम, मगनबाड़ी वर्धा मुद्रक- . 'हिंदुस्तान टाइम्स प्रेस, नई दिल्ली ४-४८-१००.]

प्राक्कथन तेलपानी किताब का तीसरा सँस्करण निकालना नारश्यक हुन्मा यह एक सतोप को गात है। पहले सस्करण के बाद उसकी पूति प्रकाशित की गई थी जिसमें पानी की रचना के अधिक प्रयोग के परिणाम तथा उदइयों को धानी बनाने या उसकी मरम्मत करने के लिये मार्गदर्शन मिले इस तरीके से तपशीलवार सूचनाएँ दी गइ थी। दूसरे मस्करण में पानी की। रचना ज्यों की त्यो रसकर माम उद्योग पत्रिका में प्रकाशित हुए कुछ लेसों का समावेश किया गया था। इस तीसरे संस्करण में आज तक के पानी की रचना के प्रयोग के परिणाम तथा इस उद्योग के अर्थशास्त्र के अध्यमन का समावेश करके मूल किनार तथा उसकी पूर्ति को इकट्ठा कर दिया गया है। सीमेन्ट पानी की श्रोखली से सम्बंधित परिशिष्ट श्री भारतनद की सहायता से तैयार किया है। परिशिष्ट इ एच पी टेकनॉलॉजिकल इस्टीटयुट, कानपूर, के श्री डी व्हाय श्रायवले ने तैयार किया है। परिशिष्ट ६ श्री जे सी कुमारप्पा लिखित 'मगनदीप' नामक पुस्तिका से उदृत किया है। परिशिष्ट उ तथा किताब के शासरी प्रकरण का 'तेल को सड़ने से कैसे मचाना' वाला हिस्सा हमारे रसायनों की सहायता से लिसा है। और धानी के बैल की खुराक तथा देसभाल का हिस्सा थी व्हाय एम पारनेरकरने तैयार किया है। इस किताब की उपयुक्तता पढाने की दृष्टि से अपना हाय पटाने के लिये मैं इन महाशयों का कृतश हूँ। मगनवाडी, वर्धा ९अगस्त १९४६ झवेरभाई पटेल

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, तीसरे-संस्करण की प्रस्तावना चू कि प्रतिस्पर्धा और मुनाफा के तत्त्व पर अधिष्ठित अर्थशास्त्र चद -पूजीपतियों के ही हित के लिये रचा गया है न कि ग्राम जनता के हित के लिये, इसलिये, अपने तंत्र में विज्ञान की बहुतसी सहायता लेते रहने पर भी उसे अपनी हस्ती को कायम रखने के लिये तो बहुत कर प्रचार पर ही निर्भर रहना पड़ता है। उससे श्याम-जनता का भी फायदा होता है ऐसी मान्यता पैदा करने के लिये अर्थशास्त्र के गौरवयुक्त बुरसे के नीचे कई किस्मके अर्धसत्य उसे लोगोंने गले में उतारने पड़ते हैं। विद्यार्थी जर कच्ची उनके रहते हैं तब उनके भेले, निराक और नवीनताग्राहक दिमागों में ऐसा भूठा प्रचार भरा जाता है जो अक्सर अतिम सत्य के तौर पर मान लिया जाता है। उनके कच्चे दिमागों में इस तरह बने हुने पूर्वग्रहों को जब वे बडा उम्रने होते हैं तर निकाल भगाना बडी टेढी सीर बन बैठती है। हमको इस तरह की बहुतसी बातें कही जाती हैं कि वर्तमान युग यत्रयुग है, केवल यनों के बूते पर ही बहुत बडे पैमाने पर उत्पत्ति की जा सकती है, जिससे जीवनयात्रा सुस से हो सकती है, ऊँचे दर्जे की और उत्कृष्ट चीज केवल यत्रों से ही बन सकती है, कार्यक्षमता यत्रोत्पादन का ही उपमान है, इत्यादि इत्यादि। संक्षेप में उनके कहने का सार यह है कि यत्र और सभ्यता तथा विकास ये समानार्थी शब्द हैं । पश्चिम में कम से कम कुछ बडे पैमाने वाले व्यवसायीयोंने उपयुक्त प्रचार से अपनी पाँचों श्र गुलिया घी में कर ली हैं, पर हिंदुस्तान में इस किस्म के प्रचार से हीनता की भावना निर्माण हुइ है और यह विदेशी चीजों की सपत की सुरक्षित मडी बन गया है। परिणामत यहाँ बेकारी, दारिद्य और वष्ट का दौर दौरा है। अखिल भारत ग्राम उद्योग सँघ का मानरी बुद्धि की कार्यक्षमता में और तमाम मानी जरूरियातों को ठीक टीक सतोषपूर्वक पूरी करने की उसकी कुरत में अटल विश्वास है। इसलिये उसने पूर्वग्रहदूषित क्ल्पनाओं को निकाल भगाने में और तद्वारा सत्य और अहिंसा में अपनी निष्ठा सिद्ध पाँच करन मोर माजुदा मानवा जलाग्यात पूरी करन म गृह उद्योग पूरी कार्यक्षम और पर्यात नहीं इस भ्रमपूर्ण धारणा का सडन करने में कोई बात उठा नहीं रखी है। इस छोटीसी कितार में प्रयोग गौर सशोधन के बूते पर, माम उद्योगोंके विरुद्ध दिये जाने वाले झूठे प्रचार का जवाब दिया गया है। हमारे प्रयत्न बहुत अल्प हैं। हमारे पास पर्याप्त साधन नहीं है और हमारे औजार बिलकुल सीदे सादे रहे यह हमें मान्य है। फिर भी सात साल के छोटे असें में हमने कुछ उद्योगों की वास्तविक कार्यक्षमता को प्रकाश में लाकर उनम बडे पैमाने पर किये जाने वाले मिथ्यागौरवयुक्त व्यवसायों को बिना हिचकिचाहट के और खुलेयाम ललकारने की कुरत पैदा कर दी यह कुछ छोटी बात नही हुई। ग्राम और ग्रामीण उद्योगों की यह दुर्दशा हुइ है तो वह उनमे कोई मूलभूत दोष थे इसलिये नहीं बल्कि उचित सशोधन, मार्गदर्शन और संगठन के अभार म हुई है। यह सिद्ध करने के लिये श्री झरेरभाई पु पटेल ने इस पुस्तक में जो दलीलें दी हैं वे, ग्राम उद्योगों में का एक प्रधान उद्याग-तेलपेराई- के निस्वत की गई छान चीन के बाद दी हैं। इम सफल निर्णयात्मक प्रयोग का देसकर कई उत्साही और साहसी युरफ इस मोहक क्षेत्र में कूद पडेंगे और ग्राम जनता के हित का पीडा उठायेंगे ऐमी हमें ग्राशा है। उद्योगों के प्रति लोगों को विश्वास प्राप्त होने के लिये और उन्हें उठाने के लिये उन्हें प्रवृत्त करने के लिये काफी सशाधन की सख्त जरूरत है। राजकीय क्षेत्र में सब लोग प्रजातन पद्धति को प्रात करने पर तुले हुए हैं, पर वे नहीं समझते कि जातक श्राम जनता का दैनिक जीवन सच्चे प्रजातन में शरार नहीं होता तब तक यह कारी स्वाग बेकार ही है। केरल ग्राम उद्योगों को अपनाने से ही सच्चा अार्थिक प्रजातत्र सिद्ध होगा और फिर लोगों का, लोगों द्वारा और लोगों के हित का राज्य शुरू होगा। इस हेतु सिध्यर्थ हमें असत्य और झूठे प्रचार का सतत सशोधनों और प्रयोगों द्वारा पर्दाफाश करना होगा। हमें श्राशा है कि इस पुस्तक के बाद पूर्वप्रदूपित राय, अध विश्वास और मनराज्य आदि के लिये कोई गुजादश नहा रहेगी और ठोस कार्य के लिये रास्ता खुल जायगा। मगनयाडी वर्धा जे सी कुमारप्पा १५ नवबर १९४२ - दूसरे संस्करण की प्रस्तावना इस पुस्तक के प्रथम सस्करण के बाद तेलघानी के उद्योग ने काफी लोगों का ध्यान श्राष्ट किया है, इसलिये, और समय-समय पर ग्राम उद्धोग पत्रिका में दिये गये हमारे लेसों को एकत्र करने के लिये, यह दूसरा सस्करण निकालना नितान्त श्रावश्यक था। ग्राम उद्योग पनिता के इन लेसों पर टिपणी लिखते हुए गाधीजी ने "हरिजन" वर्ष ७ के ३० वें शक के २५३ 4 पृष्ठ पर इस प्रकार लिसा है-"श्री झवेरभाई ने इस बात की सोन की है कि धारिसर मिल का तेल घानी के तेल से सस्ता क्यों पड़ता है। इसके उन्होंने वीन प्रमुस कारण निश्चित किये हैं। जिनमें से मिलों की पूमी और अल्प समय में तिलहन की श्राखरी बूंद निचोड लेने की मिलोंकी कार्यक्षमता ये दो अनिवार्य है पर इनसे मिलनेवाला लाभ मिलमालिक को तेल की सपत के लिये जो कमीशन या दलाली देनी पड़ती है, उमम पूरा हो जाता है। तीसरा कारण है तेल की मिलावट । सो पानी का तेल भी मिलावट करके यदि बेचा जाय, तो वह मिल के भार में बेचना पूरा पड़ सकता है। स्वाभाविक तौर पर श्री भनेरभाई तो मिलारट के पक्षपाती नहीं हो सकते, इसलिये उनकी सूचना है कि मिलावट कानुन रद की जाय और मिलों को लाइसेंस लेने पर बाध्य किया जाय।" "श्री झोरभाई ने पुरानी देहाती घानियों यद पड़ने के कारण भी हूँद निकाले हैं। इनमें से प्रमुख कारण है तेली को तिलहन पूरे वर्ष तक असंड न मिलते रहना और मौसम के समय देहात की तमाम तिलहन दो ढोकर याहर चली जाना । तिलहन संग्रह करने के लिये या शहरों से तिलहन सरीदने के लिये तेली के पास पैसा नहीं होता, इसलिये वह पटी तेजी से नामशेष होता जा रहा है। देहातों में श्राज लासों पानियाँ बेकार पड़ी हुई है, जिससे देश की काफी हानि हो रही है । वास्तव में सरकार का यह कर्तव्य है कि वह तिलहन को उसी स्थान म रोक रखे और - उसे तेलियों की प्रारश्यकता के अनुसार योग्य भावों में देकर इन घानियों को पुनरुजीवित करे। इस प्रकार की सहायता मे सरकार को कोई नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा। श्री मोरभाई की मान्यता है कि को-ऑपरेटिव सोसायटिया या पचायतों द्वारा यह सहायता पहुँचाई जा सकती है । काफी समय के अनुभव और संशोधन के बाद श्री झवेरभाई इस निश्चय पर पहुँचे हैं कि तिलहन सग्रह का प्रश्न हल किया जाय तो घानी का तेल मिल के तेल से यी स्पर्धा कर सकता है और इस प्रकार देहातियों को श्राज मिलनेवाले मिलावटी तेल के उपयोग से रचाया जा सकता है। यह यात हमशा ध्यान में रखनी चाहिये कि देहातियों को जो कुछ स्निग्धता मयम्सर होती है, यह तेल द्वारा ही है। घी तो उसके भाग्य यदा ही नहीं है।" तेली के लिये साबुन बनाना या उनाला हुआ (बैल) तेल बनाना ये दो अच्छे सहयोगी उद्योग मानित होंगे, क्योंकि जो तेल साने के काम में नहीं श्रा सकता, उसका अथवा तेल का अत्यधिक संग्रह हो जाय तो उसका इन उद्योगों में उपयोग किया जा सकता है। इस दृष्टि से इन विषयों के लिए के में एक परिशिष्ट जोडा गया है। इस पुस्तक अत मगनवाडी, वर्धा ३१ मार्च १९४१ जे० सी० कुमारप्पा पहले सस्करण की प्रस्तावना श्राज जिस तरफ़ नी जाइये, सर्वत्र वेकारी को मिटाने की ही समस्या दिसाई पड़ती है। सरकारी और गैर सरकारी लोग तरह तरह की बातें सुझा रहे हैं। दरा ही से भोजन का काम नहीं चल सकता। सडकों और नहरों का बना बनाकर वेकारी दूर करने के प्रयल स्थिररूप से राष्ट्रीय सम्पत्ति की पृद्धि नहीं कर सकते। अगर हम इस बीमारी को जड़मूल से सांदकर देश को स्वस्थ करना चाहते हैं, तो हमें बीमारी के रास्तों को ही बन्द कर देना चाहिये। हमारी वेकारी पाने का सबसे बडा कारण तो यह है कि हम अपनी लरूरत की हर चीज पर विदेशी मुहर देसने के शौकीन हो गये हैं। अपने देश के कच्चे माल को, अपने ही हाथों जरूरी चीजें में बदलने के बजाय, विदेशों को भेजने का अर्थ तो रोजगार धन्धे को भेजने का होता है, और वहा की बनी चीजों को मगाने का श्रय है बेकारी को मंगाना। इस तरह हम दोनों ही तरह से बेकारी के पजे में फंसते जा रहे हैं। अगर यह बात हमारी समझ में या जाय, तो फिर इस समस्या को हल करने में दिक्कत ही नही रह जाती। विमार खलु परमार्थत अज्ञात्वा अनारम्भो प्रतिकारस्य हमें अपने कच्चे माल से खुद ही जरूरी चीजें बनानी चाहिये । हमें अपने आसपास की बनी हुई चीजै सरीदनी चाहिये । इन्हीं दो यातों से रोजगारघधे बढ सकते हैं। यही एक स्वाभाविक और सनातन परिहार है और अखिल भारत ग्राम उद्योग सर पे कार्यक्रम का यही मूलभूत सिद्धान्त है। विदेशी व्यागर के आँकडों को देखने से पता चलता है कि भारत वर्ष से हर साल करी १० लाख टन 'तिलहन विदेशों को भेजा जाता है। एक टन तिलहन के पेरने में करीब २८ रुपये की कमाई होती है। इसका नौ मतलब यह हुआ कि सिर्फ तेल के मामले मे ही हम करीब ३ करोड रुपये की सालाना कमाई के रोजगार को अपने हाथो से सो रहे हैं। केरल पेराई की बात ही नहीं, तेल पर तो पौर भी बहुतसे उद्योग निर्भर रहते हैं। और उन्हीं उद्योगों की बनी हुई चीज साउन, रग, पार्निश, मशीनों में लगाने के तेल तथा गन्य अनेक चीजें हम दूसरे देशों से सरीद रहे हैं। तिलहन को भेजकर हम इन उद्योगों को भी अपने हाथों से खो रहे हैं। बेकारी को करने का तो यही एकमान इलाज है कि हर जगह का कच्चा माल अपने पासपडोस मे ही जरूरी चीजों में बदल लिया जाय । इसीसे हमे रोजगार मिल सकता है, और यही हमे वेकारी के पजे से छुडा सकता है। यह पुस्तिका हमारी पानी की कार्यक्षमता बढाने और उसमें तरह तरह के सुधार करने की पिछले कुछ महीनों में की गई कोशिशों पर प्रकाश डालती है। इसी तरह योर कच्चे मालों का भी जरूरी चीजों में बदल कर उनसे मितनेवाले रोजगार से फायदा उठाया जाय, तो हमारे देश में कारोगर की कोई कमी नहीं रह सकती। इस हालत में हमे वेकारों को कुछ काम देने के लिये सडकें और नहरें बनाने की जरूरत नहीं रह जायगी। श्राशा की जाती है कि यह छोटीसी पुस्तिका अपने ढंग से हमारी सबसे वो समस्या को हल करने में सहायक हो सकेगी। मगनवाडी, वर्धा 1 जे. सी० कुमारप्पा ८ जनवरी १९३८ -- " .

घरेलू यत्रवाद क्या तेल की पानी पर भी पुस्तक लिखी जाती होगी ! और मेरे जैसा श्रामतौर पर धर्म, तत्तगन, शिक्षा और संस्कृति पर चर्चा करनेवाला शख्स ऐसी पुस्तक की प्रस्तारना लिखने के लिये तैयार हो जाता है यह भी कैसी अटपटीसी बात मालूम होती है ! क्या सचमुच यह विषय इतने महत्व का हे या ऐपल एक की देसासीसी दूसरा भी उसकी महत्ता प्रतिपादन करने पर तुला है ? ऐसे विचार चल विरोधियों के ही मन म उठत हो सो पात नहीं, पर राष्ट्रीय महासभा की दृष्टि मे विचार करने वाले कइ भाइयों के मा में भी ये जरूर जाते हैं। हमारे पास पडे बड़े कारखाने चलाने के लिये काफी पूजी नहीं है इसलिये छाटे छोटे गृह-गयोग चलाये यगैर हमें कोई चारा नहीं है। जब तक स्वराज्य नहीं मिलता और जबतक करोडो रुपयों की लूट हम बद नहीं कर सकते तरतक गृह उपयोग ही पनपाने में हमें सतोप मानना चाहिये। इसलिये ग्राम में जाकर हम लोगों को समझाने कि पानी का तेल ही वे पसद करें, और घानीवालों से हम कहेंगे "देगो भाई, निसालिश तेल यदि तुम दोगे तो ही लोग तुम्हारा रेल सरोदेंगे गौर तुम्गरा धधा पुनरुजीवित हो जावेगा। इतना कहने के बाद क्या और भी कुछ करने की जरूरत रहती है ? अधिक से अधिक हम इतना और कर सकते हैं कि कुछ पू जी की सहायता देकर इस काम के लिये स्वयसेवक तैयार करें कि वे देहाती घानियों का तेल शहरों में वेचें। ऐमा करने से शहरवासियों को सुविधा होगी और श्रम करने की तैयारी रखनेवाले स्वयमेरकों को श्राजीविका एक साधन मिल जायगा । पर पानी पर पुस्तक क्या लिसना ? यह तो हजारों वर्षों से चली पायी अनगढ पद्धति से तेल निकालकर श्रापको देती प्रारही है। इसमें विशेषता क्या है? ग्यारह । भारतीय संस्कृति के कहर अभिमानियों की भी साधारणत यही विचारप्राली होती है। धार्मिक मान्यताएँ और रोटी बेटी व्यवहार संबंधी नियम इतने ही को जो लोग सस्कृति मानते हैं उाको सस्कृति का असली मतलब मालूम ही नहीं हुआ है। किमी भी किस्म की चर्चा छेडे विना गाधीजी ने स्वराज्यप्राप्ति स भी पढकर ऐसा जो भारतीय सस्तकृति का पुन रुजीवन का महान कार्य है वह सादी और मामउद्योगो द्वारा करने की ठानी है। हमारी आज की राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक हालत को देसते हुए हमारे सामने दूसरा कोई रास्ता नहीं है। क्या चर्सा और क्या घागी सभी छोटे छोटे और सादे यत्र अनगढ चीजें नहीं है। हजारों बरसों का चितन, हजारों लोगों का प्रयोग और अनेक प्रातों का अनुभव इनके साथ लगा हुआ है। पिछले सौ पचास सालों से या इससे भी अधिक लये समय से हम हर तरहसे श्रालसी बन बैठे और नतीजा यह हुआ कि अपने तमाम उद्योगधों में काम थानेवाली यौनिक तथा व्यवहारिक बुद्धि और सूझको पीछे सींच लिया। जिस प्रकार भाफ के एजिन में से भाफ के निकल जाने से वह थोडी दूरतक दौडकर रुक जाता है, उसी तरह हमने अपने समाज की, और सासकर उद्योग धधों की भी, यही दशा होने दी। योरप से पाये हुई भाफ और पिजली के बड़े बड़े यनों को देखकर हम चौंधिया गये। हमने मान लिया कि अकेले योरप में ही यानिक बुद्धि सभव है । लेकिन वैसा समझने में हमने भूल की। हमारे यहाँ अाज भी हुनर, कारीगरी, क्लाकौशल और यारिक सूझ योरप से किसी कदर कम नहीं है। योरप जो धागे ढा, वह किसी और बातमें। कलाकारीगरी की मदद में भाफ, बिजली, तेल की गॅस, वगैरह को किस तरह काम मे लाया जा सस्ता है, इस हिक्मत को उसने सोन निकाला, और ज्यादा पूजी और पड़ेबडे कारखाने सोल के फिरा तरह अधिक से अधिक परिमाण में उत्साहन और बाजारों पर पूरा ना किया जाय, यह भी उसने सोज लिया। या यो कहें कि इसके लिये कोई उपमा देनी हो, तो कारीगरी और कलाबुद्धि J नोमी निक ता साना सेपद पाडा पाम न. लिया जा सकता। पदई उत्तम श्रीर महीन पाम बिना छोड़े के ही रसानी से करता है और इसीमें उसकी फला है। लेकिन बडे पाम करते समय उसाती सिरसर हपोहे मारे पिना उसफा पाम क्यिो तरह नहीं चलेगा। हमारे यहां मनुष्यो जैसे जैसे मोजारों को काम में लाने की शादत में उन्नति को, वैसे वैसे उस में छोटे बड़े सुधार भी किये। छाटे नौजारों में धेर बढे यनों में यही अंतर है। यह सच है कि बडे व यत्रों की खोज परमेनारो यशाली की कल्पना यही होती है, परन्तु ये यन मानी शक्ति से नहीं चलते। इनके चलानेमें मनुष्य की कुशलता या यात्रिक बुद्धि का कोई उपयोग नहीं होता, इससे इन यत्रों को चलानेवाला या सभालनेवाला खुद एक या अथवा यन का एक अंग न जाता है। नतीजा इसका यह होता है कि उसकी बुद्धि में अमुक प्रकार की नाति हाते हुए भी वृद्धि की तेजस्विता और कल्पनाशक्ति बिलकुत मुगिटत हो जाती है । सस्कृति की दृष्टिसे यह बहुत बड़ी हानि है। छोटे औजारों और यनों को हापसे चलाने के कारण मनुष्य की शक्ति का पूरापूग उपयोग तो होता ही है पर साथ ही मनुष्य को प्रतिक्षण अपनी बुद्धि, सूझ और निर्णयशक्ति का भी प्रयोग करना पड़ता है। इसलिये हायसे तैयार किये हुर मालमें मनुष्यका चैतन्य भरा रहता है और कारीगर का मन भी मिरसित होता है, और इसलिये हाथ की कारीगरी मनुष्य जाति की उन्नति के लिये प्राशीदरूप है। विशान मे हम पिदडे हुए हैं। हमारी पू जी हमारे हाथ में नहीं अथवा सार्वजनिक हितो लिये हम उसे इस्तेमाल कर सकें ऐसी हमें सतनता नहीं, इसलिये हमारे पास जो कारीगरी पड़ी है उसे हम भूल जायें और उसके विकास का विचार करना भी छोड दें यह कैसे हो सकता है ? घरबाद कर हम देखते हैं और पहते भी हैं कि यनराद ने योरप को हाला, लेकिन हम परसे हम यह नहीं मानतेना चाहिये कि कला और कारीगरी सराय चीज है। कारागरी तो बनी ही चाहिये। हमें हर तरह की योग्यता का विकास करना चाहिये । परतु हमारे सारे सामाजिक जीवन को ।

बिगाड़नेवाला पूजीवाद, और मनुष्यको बेकार बनाकर उसकी जगह प्राकृतिक शक्तियों का उपयोग कर उद्योग हुनर को पूजीपाले के हाथ में सांप देने वाली उद्योग व्यवस्था, ये दोनों ही चीजें खराब है। हमें इन्हीं का सामना करना है। छोटे छोटे श्रीजारों के जरिये अपनी योग्यता का विकास कर सुधरे हुए रूप में अपनी श्रावश्यकताएँ पूरी करना और इसी मार्ग से मनुष्य समाज का उद्धार हो सकता है, इसे मानकार ही तो हमने हाष्ट्रीय झडे के ऊपर कारीगरी का द्योतक 'चर्खा' रखा है। इसलिये यहाँ हमे 'यत्रवाद' शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिये, कोई दूसरा ही शब्द प्रयोग में लाना चाहिये। आर्थिक और सामाजिक शक्ति को एक हाथ में सौंपकर अनेकों को वश म रखना भारतीय संस्कृति के प्रादर्श के सर्तया विरुद्ध है। और इसी से "बहुतसी पू जी हाथमे पायी हो, तो भी मैं अमुक रकम से अधिक पूजी व्यापार में न लगाऊँगा" इस तरह का प्रत लेने की भावना हमारे उस कालने धर्मनिष्ठ व्यापारियों को सूझती थी। इस तरह का भी प्रत लिया जाता था कि 'हम इतने बैलोंसे ज्यादा काफिला अपने साते में न रक्सेंगे'। मनुष्य जाति की जरूरतों को पूरा करने वाला माल तैयार करने का मौका ज्यादा से ज्यादा लोगों को मिलना चाहिये। इनके यीच में महाजन द्वारा सहयोग का भाव भले ही फैले लेकिन ऐसी व्यवस्था थी कि हरएक फारीगर और हरएक व्यापारी स्वतत्रता का उपयोग कर सके और वह जहा है वहीं रहकर समाज की सेवा कर सके। हमारी संस्कृति की अर्थव्यवस्था का यह भी एक प्रधान लक्षण था कि माल तैयार करनेवाले और माल सरीद कर उपयोग करनेवाले , इन दोनों में जहाँतक हो सके, सीधा सबध बना रहे। ये लक्षण रूढि से इतनी अच्छी तरह सँभाल दिये गये थे कि समाज के अगुना इनमे समाये हुए तत्वज्ञान को समझने और उसे सँभालो का फर्ज भी भूल गये थे और पश्चिम का हमका होते ही पराजित लोग जिस तरह भयभीत होकर ठिठक जाते हैं, उसी तरह डरकर हमने अपना घर गभालना भी छोड दिया।

। को आशीर्वाद दे सकता है। लेकिन इसे वचन का वास्तविक अर्थ तो यही होता है कि ब्राह्मण को हर एक वर्ष की विद्या और क्ला सीसनी चाहिये। किसी भी सामाजिक उथल पुथल कोई वर्ग दवाया जाता हो, तो उस और तुरन्त ध्यान सोचने और उसका इलाज रतलाने की जिम्मेदारी बामणों की थी। अपनी ऐसी जावदेही समझकर श्राज जो चलेगा, वही नाहाण कहलाने का अधिकारी है। इसमें रोट बेटी का सवाल ही नहीं उठता। निस समाज में ऐसा ब्राह्मण वर्ग नहीं होता, वहाँ वर्ग क्लह चलना ही चाहिये । समद्धि से सलोकहित में लगे रहने वाला वर्ग जहाँ नहीं होता, वह समाज ही नहीं। यह तो सूक्ष्मतया बडने वाले गुट्टोका रणक्षेत्र ही कहा जायगा। हिन्दुस्तान म हजारों-लाखों वर्षों से उन्नत कारीगरी के ऊपर फिर से विश्वास जमाकर, जहाँ से हमने अपनी जिम्मेवारी का सूत्र छोडा था वहाँ से फिर उसे अपने हाथ में लेकर और कारीगरों के जीवन में अोतप्रात होरर उन के धधों और उनकी लोकयाना को सजीपन करने का जो प्रयत्न शुरू हुना है, उसके बयान के रूप में यह पुस्तक तैयार हुई है। स्व मगनलाल भाईने जम वणाट-शास्त्र' लिसा तभी इस काम का वास्तवमें प्रारभ हुआ। वास्तव में बुनाई शास्त्र सजीवन करने का काम किसी पेशेदार सुनकर का अथवा किसी ब्राझण का था। पर ये दोनों अपना धर्म भूल गये इसलिय एक को बुनकर तथा ब्राहण दोनों बनना पड़ा। हमारी सामाजिक जीवन व्यवस्था जैसी ग्राज है उसीको लेकर हमें प्रागे बढना होगा। इसके बदले, मुझे तो ऐसा मालूम होता है, मानों हम मुफ़लिसी की अदालत में पहुँचकर अपना दिवाला निकालने के लिये तैयार हो रहे थे, इवने ही में गाधीजी की प्रेरणा से राष्ट्रीय महासभा को सुनुद्धि सूझी और हमने कारागरों के जीवन में, उनके आर्थिक मामलों और उनकी दस्त- कारी में प्रवेश करना शुरू किया। इस पुस्तक को पडते समय सबसे पहली बात जो हमारा ध्यान खींचती है, वह यह है कि लेखक ने सरकारी रिपोर्टों और पाश्चात्य प्रथोंको पढकर उनके श्राधार इसे तैयार नहीं किया, बल्कि स्वय अनेक प्रातों में घूमकर यहा की घानियाँ किस तरह चलती हैं, उनमें क्या क्या सुविधाएँ प्रसुविधाएँ हैं, इन सब की उन्होंने जाच पडताल को। उन्होंने पुरानी नली आयी हुई धानी - पद्रह बिगाडनेवाला पू जीवाद, और मनुष्यको बेकार बनाकर उसकी जगह प्राकृतिक शक्तियों का उपयोग कर उद्योग हुन्नर को पूजीगले के हाथ में सौंप देने वाली उद्योग व्यरस्था, ये दोनों ही चीजें सराब है। हमें इन्हीं का सामना करना है। छोटे छोटे श्रीजारों के नरिये अपनी योग्यता का विकास कर सुधरे हुए रूप में अपनी पारश्यकताएँ पूरी करना और इसी मार्ग से मनुष्य समाज का उद्धार हो सकता है, इसे मानकार ही तो हमने हाष्ट्रीय झडे के ऊपर कारीगरी का द्योतक 'चा' रखा है। इमलिये यहाँ हमें 'याद' शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिये, कोई दूसरा ही शब्द प्रयोग में लाना चाहिये। आर्थिक और सामाजिक शक्ति को एक हाथ में सौपकर अनेकों का वश में रखना भारतीय संस्कृति के आदर्श के सर्वथा विरुद्ध है। और इसी से "बहुतसी पूजी हाथमें आयी हो, तो भी मैं अमुक रकम से अधिक पू जी व्यापार में न लगाऊँगा" इस तरह का प्रत लेने की भावना हमारे उस कालये धर्मनिष्ठ व्यापारियों को सूझती थी। इस तरह का भी व्रत लिया जाता था कि 'हम इतने बैलोसे ज्यादा काफिला अपने साते में न रखेंगे। मनुष्य जाति की जरूरतों को पूरा करने वाला माल तैयार करने का मौका ज्यादा से ज्यादा लोगों को मिलना चाहिये। इनके बीच में महाजन द्वारा सहयोग का भाव भले ही फैले लेकिन ऐमी व्यवस्था थी कि हरएक फारीगर और हरएक व्यापारी स्वतत्रता का उपयोग कर सके और वह जह है वहीं रहकर समाज की सेवा कर सके। हमारी संस्कृति की अर्थव्यवस्था का यह भी एक प्रधान लक्षण था कि माल तैयार करनेवाले और माल खरीद कर उपयोग करनेवाले , इन दोनों में जहाँतक हो सके, सीधा सबध बना रहे। ये लक्षण रूढि से इतनी अच्छी तरह संभाल दिये गये थे कि समाज के अगुश्मा इनमें समाये हुए तत्वज्ञान को समझने और उसे सँभालने का फल भी भूल गये थे और पश्चिम का मका होते ही पराजित लोग जिस तरह भयभीत होकर ठिठक जाते हैं, उसी तरह बरकर हमने अपना घर मभालना भी छोड दिया। "वर्णाना ब्राह्मणो गुरु का प्रर्थ पतित वाहाणों ने इतना ही लगाया कि ब्राह्मण सर घों के पास से दक्षिण ले सकता है और पैर छूनेवाले चौदह " हिन्दुस्तान में हजारों-लावा यषों से उमत कारीगरी के आर फिर से चाहिये । समबुद्धि से सर्वलोकहित में लगे रहने वाला से जदों नहीं होता, वह समाज ही नहीं। यह तो सूक्ष्मतया यडने वाले गुरुशरणक्षेत्र दीपा जायगा। विश्वास जमाकर, जहाँ से हमने अपनी जिम्मेवारी का मत्र छोडा पा यहाँ से फिर उसे अपने हाथ में लेकर और कारीगर के जीवन म श्रोतमोत्त होकर उन के धधों और उनकी लोकयाना का सजीपन करने का जो प्रयत्न शुरू हुआ है, उसके बयान के रूप में यह पुस्तक तयार हुइ है। स्व मगनलाल माईन जब 'वहार शास्त्र' लिसा तभी इस काम का वास्तरमप्रारभा। वालव में बुनाई शास्त्र सजानन करने का काम किसी पेशेदार सुनसर वा अथवा किसी नाक्षण का था। पर ये दोनों अपना धर्म भूल गये इसलिय एक को हमारी सामाजिक जीवन-व्यवस्था जैसी पार है. उसोको लेकर हमें प्रागे पढना होगा। इसके बदले, मुझे तो ऐसा मालूम होता है, मानों हम मुफलिसी की अदालत में पहुँचकर अपना दिवाला निकालने के लिये तैयार हो रहे थे, इतने ही में गाधीजी की प्रेरणा से राष्ट्रय महासमा कोसरे सूमों और हमने कारीगरों के जीवन में, उनके प्राणिक मामना और उनकी दस्त इश पुस्तक को पड़ते समय सबमे पानी पान जो हमारा ध्यान पींचती है, वह यह है निलेपक ने सरकारी रिपन पोर पारचात्य प्रयको पढकर उनये यापार से तयार नहीं किया, बल्कि इन सरपी उन्होने जाच पड़ताल की। उन्दाले पुनीता की धानियाँ फिरा तरह चलती ६, रामसा नपाएं असुविधाएँ है को आशीर्वाद दे सकता है। लेफ्नि इस वचन का वास्तविक अर्थ तो यही होता है कि ब्राह्मण को हर एक पर्ण की पिश और कला सोवनी चाहिये। किसी भी सामाजिक उथल पुथल से कोई वर्ग दनाया जाना हा, तो उस और तुरन्त ध्यान सांचने और उसका इलाज बतलाने की जिम्मेदारी ब्राक्षणा की थी। अपगी ऐसी जगावदेही समझकर श्रान जो चलेगा, यही प्राण कहलाने का अधिकारी है । इसम रोट बेटी का मान ही नहीं उन्ता । जिस समाज म ऐसा ब्राह्मण वर्ग नहीं हाना, वहाँ वर्ग वलाद चलना ही तथा ब्राह्मण दानों पनना पडा। फारी में प्रवेश करना शुरू किया। बुनकर . . स्वर अन पानी में घूमकर वहा . पर श्रन्दा रसकर उसका निरीक्षण परीक्षण किया है। उसके पीछे रही को पुद्धि की कद्र करके ही यह इन वस्तुओं की खोज करने बैठे हैं, श्र गणितशास्त्र की मदद से, हरएक नमूने के गुणदोषों को आँकड़ों के साथ प्रमाणित कर सके हैं। यदि शिक्षित मनुष्य (फिर नह पढ़ा-लिसा हो या न हो) अप बुद्धि का लाभ ऐसे धधों को पहुँचाय तो उसमे छोटे छोटे अनेक सुधार देगा और वह मनुष्यों के और पशुत्रों के हक में भी श्राशीर्वादरूप सा- होगा। जुदी जुदी लकडी के गुणदाप, धानी के जुदे गंदे नमूनों के गु दोष, घानी चलानेराले हरएक जाति के जानवर की सुविधा और घानी पेरे जानेवाले तिलहन की सासियत इन सारी प्रस्तुयों की नई - सोज करके इसका शास्त्र रचा जाना चाहिये । उसमें पाक्शा करणताशास्त्र, यत्रशास्त्र, पशुपिया, व्यवस्थाशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र, याहार शास इत्यादि अनक शास्त्रों में उपयोग होगा और उन उ शास्त्रों के विशारदों वीच सहयोग का मान बढेगा। गानों में जब उद्योगप्रधान शिक्षा शुरू जायगी, तर ऐसी पुस्तकें पाठ्य पुस्तक के रूप में उपयोग में लाइ जायेंगी। स्व मगनलाल भाइके 'यणाटशास्त्र' और 'तकली शिक्षक' लिस के बाद साबरमती में, बारदोली में, कलकत्ते के सादी प्रतिष्ठान में, नालगा में और सावली में कई प्रयोग हुए हैं और प्रगति भी काफ़ी हुई है, प अभीतक "वपाट शास्त्र" की सशोधित श्रावृत्ति नहीं निकली है। ऐसा । शास्त्र के निस्पत न हो। पानी के शास्त्र की सारे हिन्दुस्तान को जरूरत है किसान को ताल्लुक बुाने के साथ जितना है, उससे कहीं अधिक तेल धधे के साथ है। तेल और सली के बगैर किसान और उसके बैलों का एक दिन भी काम नहीं चल सकता। इसलिये हरएक फिसान को तेल के ध में होशियार तो होना ही चाहिये, फिर प्रत्यक्ष पानी चलाने का काम वह चा खुद करे या चाहे गार के तेली से करावे। ऐसे छोटे छोटे उद्योग धोका पुनरुद्धार भारतीय संस्कृति, भारतीय जीरनन्यरस्या और भारतीय अर्थनीति की दृष्टि से ही हो सकता है । श्रत हमें वह दृष्टि व्यापक पैमाने पर पैदा करनी होगी। वर्धा, अक्टूबर १९३७ दत्तात्रय बालकृष्ण कालेलकर सोजह .

१ ३ . (६) पगाली घानी (डायमड हायर को पदति की) विषय-सूची १. तेल को मिल बनाम पानी १ पानी को मौजूदा हालत २ मा दारा ३ कार्यक्षमता की तुलना ४ पानी की पली पनाम मिल की खली ५. मिन २ इकाइयों की सली में का तेल का प्रमाण ६ पानी व्यवसाय को दिस्कतें (अ) तिलहन सग्रह करने के लिये पूनी का श्रमार (प्रा) खली का निकास (१) मौज्दा पानियों में कार्यक्षमता का प्रभार (६) पूरक व्यवसायों का अभाव (3) शुद्ध तेल की विक्री की सास का तेणी में प्रभाव (क) पानी का काम जानने वाले मिस्त्रियों की कमी २ प्रातीय घानिया १ पानी की किस्म और स्थानीय परिस्थिति २ कारीगरों का सगठन ३ अच्छी पानी के गुण ४ प्रातीय भानिया (अ) गुजराती पानी (प्रा) दक्षिण भारत की पानी () विदर्भ प्रातीय पानी १७ ૨૨ ૨૨ . (उ) पजावी घानी (क) मारवाडी धानी ५. प्रातीय धानियों की कार्यक्षमता ६ मगनवाडी धानी को कार्यक्षमता २५ દ २६ २६ ३० ३ पानी की रचना के सिद्धात १ भोसली (अ) तकडी की किस्म (श्रा) नाप (३) मुहरी २ कोठा (अ) लाट का मुकाव (आ) सली की मोटाई (इ) सली का कोठे में घूमना (ई) तली में ढलाव (3) फी धान का परिमाण (अ) कोठे का चित्र कैसे बनाना ३२ ३४ ३८ ४१ ४२ ४२ ४ समेटनी ५. बाकडी ६ नोझापाट (अ) उचालन और गति (आ) जुमा (इ) अोखली के साथ को रगड (६) बोझा खींचने की ताकत (उ) बैल का खाईदार दायरा ४ पानी कैसे बनाना १ साधनों की फेहरिस्त (श्रा) अन्य पारश्यक चीजें (१) बदई के औजार (१) बढई की मनदूर्ग ४६ अठारह (१) चोखली ५० (२) कोठा ५४ (अ) पहली पद्धति (प्रा) दूसरी परति (इ) तीसरी पद्धति (३ लाट (४) समेटनी (५) पाकडी (६) योझापाट ५ प्रतिष्ठापन और मरम्मत १ पानी का प्रतिष्ठान २ पानी की मरम्मत ५७ ६४ ६४ ६४ (१) लाट के दोष (२) फोठे में खली का असमान पनना (३) मुहरी का भर जाना (४) डके का टेढा हो जाना (५) पाकही का पीछे रह जाना (१) समेटनी का ठीक काम न देना (७) बोझापाट का ठीक तरह से न धूमना (८) लाट और फाचर पदलना ६ तेल पेराई १. पानी मिलाना ६५ ६६ ६७ ६० २ पूर्व तैयारी ३ तिलहन उनीस ७० ७२ । (१) तिल पेराई (२) मूगफली (३) नारियल (४) अलसी (५) राई (६) सरसों ७६ (७) महुग्रा (८) रेडी ७ बनास्पति घी और पानी का ताजा तेल ७६ ६२ ६४ ६५ पोषकता गन्ध असली तरक्की ८ सामान्य १ तेल को सड़ने से कैसे बचाना २ पानी की आम सफाई ३ धानी के बैल की खुराक और देसभाल ४ खली का श्राहार में स्थान ५ सलीका खाद परिशिष्ट अ सीमेन्ट पानी की गोखली बनामे का तरीका परिशिष्ट आ घानी का अन्दाजपत्र परिशिष्ट । मिल का अदाजपत्र परिशिष्ट ई मगनदीप परिशिष्ट उ उबला हुया तेल परिशिष्ट ऊ तेलपानी सम्बन्धी प्रश्नावली १०४ M प वीस

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FUARA NOLITAILUHALILLE
मगनबाडी पानी

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तेल की मिल बनाम पानी १ घानी की मौजूदा हालत "समें गुणा काचनमाश्रयन्ते" अथात् सारे गुण पैसे का श्राश्रय लेते है। बडी २ तेल की मिलें अपना उल्लू सीधा करनेवाले पूजीपतियों की बपौती हैं। वे इनम न केरल श्रमयाद पूजी ही लगाते हैं वरन् उनके प्रचार के लिये भी काफी पैसा बरबाद करते रहते हैं । परिणाम यह हुया है कि उनकी ओर जनता का ख्याल उनकी वास्तविक उपयुक्तता के उल्टे अनुपात मे सींचा गया है और सभी प्रकार के यनों की बडी इकाइयों की कार्यक्षमता में उनकी एक किस्म की अधभदासी पैदा होगई है । बडे यनों की इस अधिक कार्यक्षमता का श्रङ्गीकार करके उनके हामी जहा एक ओर रहन सहन का पैमाना ऊचा उठाने की गरज से इनका समर्थन करते हैं तहा जो इनके विरुद्ध हैं वे केवल अार्थिक दृष्टि से इस साल की चचा करने से हिचकिचाते हैं। इस एकागी प्रचार के कारण लोगों में एक यह भी धारणा फैल गई है कि तेल की मिलों ने घानियों को करीब-करीब स्थानभ्रष्ट कर ही दिया है नार अब उनका पुनश्च प्रचार होना कठिन है । यह मान्यता वस्तुस्थिति से बिल्कुल भिन्न है। तेल की मिलें अपना काम कर रही हैं और उनकी सरया भी कुछ वढ गई है यह बात सही है, पर उनमें जो तेल पेरा जाता है वह अधिकार देश की वर्धमान प्रायोगिक जरूरता को पूरा करनेवाला होता है, साने के काम में वह काम आता है । इस दृष्टि से मिलें धानियों की पूरक साबित हुई हैं न कि उनका स्थान लेनेपाली । दूसरी बात यह है कि मिलों के धाने से स्पर्धा निर्माण होगई है जिसके कारण पानी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। ऐसा होते हुए भी पानी का स्थान आज भी अभिमानास्पद है क्योकि साने के काम मानेगाले तेल का अधिकाश धानियोंमें ही पेरा जाता है । दुर्भाग्य से नौद्योगिक कामों में इस्तेमाल किये जाने वाले अलसी और मू गपली के तेलों के अलावा अन्य तेलों के धानो के और मिलों रे तुलनात्मक प्राकडे । (२) उपलब्ध नहीं हैं । छोटे पैमाने पर किये जाने वाले उद्योगों के प्रति सरकार की कितनी सहानुभूति है यह इस पर से जाहिर होता है। जिन दो किस्म के तेलो के याकडे उपलब्ध हैं उनके अनुसार हिंदुस्तान में पैदा होनेवाली कुल तिलहन का ११ प्रतिशत घानियों में और १७ प्रतिशत मिलों में पेरा जाता है। दिये हुए प्राकटो मे यह पात स्पष्ट होगी । नोचे कुल पेराइ(टना में) (टनो में) तिराहन पैदावार निर्यात के बाद कितना बचता है (टनों में) (पानियों में) (मिलों में) স্বাণী ४,८८,००० २,५५,००० ६०,००० १,३३,००० मृ गफली २,८८,२२,००० १७,१०,००० ३,८०,००० ७,२०,००० ५,४७,००० ८,५३,००० कुल पैदावार का प्रतिशत मू गफली, अलसी और श्रडी मिलाकर हिन्दुस्तान की कुल तिलहन की पैदावार का होता है । पर निर्यात और श्रन्य घरेलू कामों में इस्तेमाल होने के बाद इनका १७ प्रतिशत मिली मे और ११ प्रतिशत धानियों में इस प्रकार मुल २८ प्रनिशत ही पेरा जाता है । अन्य किस्म के तिलहनों की निर्यात बहुत कम होती है और उनकी भी पूरी पैदावार का इरीन २८ प्रतिशत पेरा जाता है। चूकि इनकी पेराई के याकडे उपलब्ध नहीं है इसलिये कितनी तिलहन मिलों में और क्तिगी घानी मे पेरी जाती है इसके तुलनात्मक श्राकड़े देना कठिन है, पर यदि हम युक्तपात और मद्रास प्रात के तेल के उत्पादन ये प्राप्य गारडे अाधारभूत मान तें तो इनका अनुपात १२ अर्थात् मोटे तौर पर पूरी पैदागर का २७ प्रतिशत और ११ प्रतिशत के ही करीर पडता है। इस तरह दोनों विभागों को मिलाने से कुल तिलहन पेराई पैदागर का ५६ प्रतिशत होती है जिसमें श्राधी मिलों में और अाधी घानियों में। भूठा दावा अपनी हस्ती का समर्थन करने के लिये हिंदुस्तान की तेल की मिलों के पक्ष में एक ऐसी गास दलील दी जाती है कि यदि अधिक नावेगी तो देश के देश में ही अधिक तिलहा पेरी जाकर । निर्यात करेंगे जिससे लहन की निर्यात को रोपने के साथ ही साथ हम सल्ली प रूपमे राष्ट्र या एक मुफीद चील दे सकेंगे। कार्यक्षमता में श्रभार के कारण घानियों द्वारा यह काम नहीं हो सफतार्यात समधी पापा का परिशीला करने से यह तो स्पष्ट होता है कि उत्तरोत्तर तिलहन नियात कम मम हाती जारही है, पर उससे सल्ली देश न ही रह पाती हो सो बात नहीं । मिला की इस्ती पायम रसने पे लिये जो दलील दी जाती थी उसी को मिल मालिक ने जह से उसाड दिया। क्यापि युद्धजन्य परिस्थिति पे कारण विवश होते तक सारी मिलों की सल्ली या अधिकाश माग विदेशों को ही भेजा जाता रहा। इस प्रकार मिन मालिक "जैसा चले बयार, पीठ पुनि तैसी दीने" वाली कहावत चरितार्थ परते रहे। ३ कार्यक्षमता की तुलना हमारा कुछ स्वभाव ही होगया है कि कार्यक्षमता हम बड़े याम और बड़े पैमाने की उत्पत्ति में ही मानते हैं। अगर कार्यक्षमता की कसौटी राष्ट्रीय सम्पत्ति की वृद्धि और जनता को अधिक यशक्ति ही मानी जाय, एस श्रेणी के लोगों की दूसरी श्रेणी के लोगों के मूल्य पर अधिक कमाने की शक्ति नहीं, तो हम लोगों में से अधिकाश के लिए यह जानना एस पाश्चर्यकारक विवरण होगा कि बड़े पैमाना की तेल की मिलों में एक अच्छी पानी से अधिक क्षमता नहीं होती । बहुतसी तेल की मिलें जो केवल तेल पेरने का ही काम करती हैं, श्रन्य सहायक उद्योग, जैसे साबुन बनाना, रग और वार्निश तैयार करना, नहा करती, ये लाभ पर नहीं चलती और इसनिए प्राय उनके मालिक बदलते रहते हैं। धनी व्यक्तियों के एक वर्ग में तेल की मिलें चलाने का कुछ उन्माद सा होता है। उसे अव्यावसायिक दग से चलाकर नुकसान उठाते हैं और फिर उहें बेच देते हैं । उदाहरणार्थ, विदर्भ और खानदेश में इतनी तेल की मिलें हैं कि उनके लिए बीज भी नहीं मिल पाता और इसलिए वे उतना काम नहीं कर पातीं, जितना कि कर सकती हैं। ये मिलें तो इसलिए चलता है कि उनके मालिका के पास नुकसान बर्दाश्त कर लेने के लिए पर्याप्त धन है। ये इसलिए नहा चल रही हैं कि उनमें कार्यक्षमता है। तेल के अधिक प्रतिशत से और कम पिराइ से मिलें जो कुछ बचाती हैं यह दलालों के कमीशन में चला जाता है । इस तरह घानियों से अधिक मिलों ४ को कोई लाभ नहीं है। लेकिन बड़े पैमाने पर उत्पत्ति परके पर्च और विकी की कीमत में न्यूनतक सीमान्त रस सकती हैं। यही बात धानियों के बारे में भी हो सकती है, यदि मालिए बहुतसी घानियो चलायें और उत्पत्ति बड़े पैमाने पर करें । लेकिन इसके विरुद्ध हमें रोक लगानी चाहिए, क्योंकि उसका नतीजा मम्पत्ति का केन्द्रीकरण और साथ ही जनता की क्रयशक्ति का हास होता है। इस प्रकार बड़े पैमाने की उत्पत्ति राष्ट्रीय सम्पत्ति में वृद्धि नहीं करती। वह स्वतत्र दस्तकारों को नौकर बना देती है, उनकी उचत दलालों को पहुँचती है, बहुतों को वह रक बना देती है, जिनके कारण केरल थोड़े ही लोग लाभ उठाते हैं। इसलिए, रिना इस बात का ध्याा रग्वे कि यह रही मशीनरी की सहायता से की जाती है या घानियों की सहायता से, बड़े पैमाने की केन्द्रीत उत्पत्ति को नहीं चलने देना चाहिए । नीचे के नक्शे में यह दिसाया गया है कि एक अन्धी घानी से अधिक क्षमता मिल में नहीं होती। इसमें पानी और मिल के एक टन तेल पेरने का युद्ध पूर्व के भानों से तुलनात्मक व्यय दिसाया गया है। . मूगफली तिल अलसी अडी रु आ पार आ पा रु आ पारुमा पा वबई की एक मिल में २१-१४-६ २४-२-९ ३५-१०-९ ३२-२-०, मगनवाटी घानी में ४७-०-० ४७-०-०८३-७-९४७-०-० पिराई में अतर २५-१-६ २२-१३-३ ४७-१३-०१४-१४-० घानी में तेल कम प्रतिशत में निकरने के कारण अतर १५-०-०१५-०-०२२-८-०१५-०-० अतर का योग ४०-१-६३७-१३-३७०-५-०२९-१४-० एक पौण्ड पर मतर ०-०-२ ०-०-३/ ०-०-३ ०-०-२ 2 . "वमीशन यह ध्यान में रखना चाहिए कि मिल वी पिराई का खर्च लगाने में चार लाख की लागत पूँजी का व्याज और मशीनरी की छीजन का खर्च नहीं लगाया गया। पानी के पिराइ के सच में पाठ याना प्रतिदिन के हिसाब से तेली की मजदूरी याजाती है। इसका अर्थ यह है कि वह मिल के फुटकर भाव पर तेल बेच सकता है और मिल के थोक भाव पर सल्ली । यदि वह सीधे ग्राहक को सल्ली वेचे तो उसे फुटकर बेचनेवाले ये कमीशन के बराबर पैसा भार मिल जायगा। यह भी है कि देश के विभिर भागों में स्थित तेल की सब मिलों की स्थिति एक समान नहीं है। दरगाहां की मिलो को अतर्भाग की मिला से अधिक सुविधाएँ होती है । रेल्वे की भाड़े की नीति से ऐसी मिलों को तेल के बीज सस्ते भाव में और वर्षभर मिलने म मदत मिलती है। इसलिए तमाम साल वे अपनी पूरी शक्ति से चलती हैं और इसलिए अन्तर्भाग में स्थित मिला की अपेक्षा उनकी पिराई क्म पडती है। कि मिलें अधिकाश सल्ली बाहर भेजती हैं, इसलिए अन्तर्गत की मिलों को पास के बन्दरगाह तक सल्ली भेजने का रेलभाडा और देना पड़ता है और उतना उह कम मिलता है । इस सत्र का अर्थ यह है कि अन्तर्भाग में स्थित मिलों को तेल बदरगाहों पर स्थित मिलों की अपेक्षा ऊँचे भाव पर बेचना पडता है। हमने ऊपर जो हिसाब दिया है वह एक पदरगाह की मिल का है। नक्शे में दी हुई मिल चूँ कि अलसी और अडी के तेल से पानिश और दवाइयों के तेल बनाती है, इसलिए कच्चे तेलों के ठीक कमीशन प्राप्य नहीं हैं । लेकिन दूसरी जगह वे घानी और मिल के तेल पेराई के दामों के अन्तर की पूर्ति निश्चित ही करते हैं । इस सबध मे यह स्मरण रसमा महत्व- पूर्ण है कि कमीशन की दर जो मिल की जगह पर क्म है, वही बहुत ज्यादा हो जाती है, जब तेल दूर के गारों मे पहुँचता है। इसी तरह जहाँतक उपभोक्ता का सबध है, वहाँ तक मिलद्वारा तेल की पिराई, जिसमें दलालों का लाजिमी कमीशन भी सम्मिलित है, उतनी ही पडती है जितनी कि देशी घानी की। दूसरे शब्दों म, ग्राहक को बडी तेल की मिलों की तथाकथित क्षमता से कोई लाभ नहीं होता है। अब हम देखेंगे कि तेल की मिलें कोई दूसरा उपयोगी काम पूरा करती हैं या नहीं। उदाहरण के लिए हम सरसों का तेल लेकर पावर से चलनेपाली धानियों और एक्सपैलरों वाली तेल की मिल की कार्यशीलता पर विचार करेंगे। एक मिल २४ घटे काम करके २०० मन सरसों एक दिन में पेरती है और महीने में २५ दिन काम करये प्रति मास १७५० मन तेल निकाल लेती है। नीचे दिये नक्शे में मिल और उतने ही उत्पादन के लिये श्रावश्यक मख्या की मगनगडी घानियाँ चलाने के युद्ध पूर्व के पर्व के विभिन्न मद दिये हैं। साथ म . ( ६ ) यह भी न रस्सा गया है कि मिल प्रतिदिन चौरीस घटे काम करती है जब कि धानी एक दिन में कैपल ८ घटे। एक पानी का दाम मय चैल के १२५ रुपया है । साधारणतया यथापि एक प्रादमी दो पानी चला सकता है, पर काम और विक्री की सुविधा के लिए नीचे दिया हिसार दो घानियों पर एक आदमी और एक लडके के हिसाब से लगाया गया है। पिराई के खच का विश्लेषण मजदूरी सामान के लिये पूजा रपय मजद्रो की मख्या पावर मरम्मत व्याज और छीजन योग मिल ३०,००० १९ । ५० |८००२५० ३५० १९०० मगनवाड़ी घानी २६५०० १४० २१००२१२०२६५ २३५ ४७२० १७५० मन तेल निकालने के लिए मिल को ५००० मन सरसों की आरश्यक्ता होती है। चूँकि धानी लगभग दो प्रतिशत कम तेल निकालती है, इसलिए मिलके परावर तेल निकालने के लिए उसे १३० मन सरसों की और अधिक सारश्यकता होती है जिसमे ६ रुपया प्रतिमन के हिसाब से ७८० रुपये और लगते हैं । तेल के इधर उधर पहुँचाने मे मिल की कमीशन १२६ प्रतिशत या २ रुपया प्रतिमन के हिसार से ३५००) देना होता है। यह तेल १६ रुपया प्रतिमन के हिसाब से विकता है। इसी याधार पर १७५० मन तेल का योगिक मूल्य इस प्रकार निकाला गया खर्च मय पिराई 'के स्वच के अतिरिक्त वीज का दाम कमीशन योग मिल ३१,९०० X २५०० ३५,००० मगनवाडी पानी ३४७२० ७८० । x ३५,५०० N । ७) इसके अतिरिक्त मिलों को बीज, तेल और खल्ली पर रेलभाडा और सर्चना पहता है और यह अतिरिक्त सर्च श्रासानी से कार के नक्शे मे दिये हुए मिल और पानी के तेल के बीच के प्रत्यक्ष मूल्य से कई गुना हो जाता है । चूँ कि तेली स्वय ही तेल वेचता है, इसलिए उसे कमीशन में कुछ भी नहीं देना पड़ता और चूँ कि वह स्थानीय बीज लेकर पेरता है, इसलिए उसका रेल- भाटा भी पच जाता है। इस प्रकार उपभोक्ता के दृष्टिकोण से, मिलें घानियों की अपेक्षा तेल सस्ता नहा दे पाती। मिल को घानी की अपेक्षा - सामान के लिए अधिक पूँजो की भी श्रावश्यकता होती है । मिल सातवें हिस्से भी कम श्रादपियों को काम देती है। वेतनरूप में यह चौथाइ से क्म सम्मत्ति का वितरण करती है। मिल पावर भी गलत करती है, क्योंकि बैल नादि जानवरा से वह काम नहीं लेती और न उन पढइयो को ही काम पर लगाती है जो अास. पास के गानों में मिलते हैं । उनकी जगह मिल राहर से आई मशीनें इस्तेमाल करती है और अाखिर ग्राहकों को सस्ता तेल नहीं दे पाती 1 सारा किस्सा यही, नहीं खत्म होता । मिल का कच्चा तेल साने योग्य नहीं माना जाता । उसम जो सडान पैदा होती है उसे दूर करना जरूरी होता है। इस प्रकार इस तेल को शुद्ध करने का खर्च वास्तर में तेल की लागत की कीमत म शुमार होना चाहिये । पानी के तेल की मिल के कच्चे तेल से तुलना करना बिल्कुल गलत है। उसकी तुलना वास्तव म शुद्ध क्येि तेल से या बनस्पति घी से करनी चाहिये । ऐसा करने से सीदी सादी दिखनेपाली पानी कीमती श्रोर पेचीदगी से भरी तेल की मिल-तेल शुद्ध करने के यनों और हायड्रोजनेटिंग यनों से युक्त- के बनिस्बत कई गुनी कार्यक्षम और उपयुक्त सारित होगी। सच बात तो यह है कि लोगों का यह महसूस करना चाहिये कि इसमें एक छोटे श्रीजार की बड़े अौजार से तुलना नहीं है-धानी एक छोटा अौजार है और तेल की मिल का यह एक बडा अौजार है इस मान्यता पर-पर इसमें दो किस्म की सघटनायां की तुलना है, एक विकेन्द्रित और दूसरी केन्द्रित । निकेन्द्रित सगठन हमेशा ठीक-ठीक कार्यक्षम नहीं होता और केन्द्रित पद्धति में कार्यक्षमता पराकोटि को पहुँच जाती है ऐसा माननेवालों का भ्रम दूर करने के लिये उपयूक्त विस्तार किया है। केन्द्रित रूपमें बडी माना का उसादन तो स्वयमेव एक बुराई है, क्योंकि (८) उससे शोपण को प्राधार मिलता है। शोषण प्रसार में हिंसा का मूल कारण है। अधिक माना में उत्पादन करने वाली नेल को मिलों की तरह यदि केन्द्रित उसादन क्षमतापूर्ण काम का दावा भी नहीं कर सरता तो बुराई और भी बढ़ जाती है। यात्रिक शक्ति का उपयोग करने से जो सपत्ति के अतिरिक्त उत्पादन और असमान विभाजन की समस्याएँ उपस्थित होती है उन्हें हल करने के लिये दो विकल्प सुझाये जाते हैं और वे दोनों इस मान्यता पर अधिधित हैं कि ये सालात यत्रों के उपयोग से नहीं बल्कि अन्य कोई गह्य कारणों से पैदा होते हैं और ये बाह्य कारण यदि हटा दिये जायें नो यानिकशक्ति का पूरा पूरा कार्यदा हमारे पल्ले पड जायगा । पहला है उत्पादन और विभाजन व्यक्तिगत न रसेकर सामाजिक बना देना और दूसरा विकल्प है केन्द्रित पद्धति पर सारे यार एक जगह इकठे न पर उन्हें पार से चलाने वाले छोटे-छोटे गृहयोग के स्वरूप में देश के कोने-कोने मे चलाया जाना। इन निकलों की युक्तायुक्तता पर विचार करने का यह स्थान नहीं है । यहा हम सिर्फ व्यावहारिक तौर पर यह दिखाना चाहते हैं कि जिन व्यवसायों की प्रक्रियाण विलकुल सामान और सादी है, जैसे तल पेराई, उनम यारिक शक्ति, फिर यह बड़े पैमाने पर हो या छोटे, देहाती उपकरए से अधिक कार्यक्षम नहीं सारित होती । और यदि शुद्ध श्रार्थिक दृष्टि से यम्र अधिक कार्यक्षम न हो तो वह केवल या है इस- लिए उसे कोइ इस्तेमाल करना नहीं चाहेगा। पानी और मिल की तुलनात्मक कार्यक्षमता मूतने के लिये प्रथम हमें दोनों में के उत्पादन सर्च की तुलना करनी चाहिये। भिन्न २ इकाइयां के युद्ध पूर्व के भावों से उत्तादन पर्च इस प्रकार है प्रतिमन तेल का इकाई की शक्ति उत्पत्ति पर्च ध्या पा० १ . . मन १ प्रतिदिन ८०० से १००० तेल तैयार करनेवाली मिल ५०० से ८०० १०० से ५०० ४० से १०० २ १ २ . " " " ३ " १ . " ४ १ . " ४० १ " " २ . " " २ २ ० ५से १० ७ बैल से चलनेवाली दो सशोधित धानियों की इकाई। इसमें प्रति घागी एक पार ८ सेर तिलहन पडता है और एक धान || घटे में सतम होता है। पटे के पूरे दिन में २ मन सरसों पेरी जाकर २६ सेर तेल मिलता है। प्रतिदिन का खर्च २०१७) होता है। इस पर से प्रतिमन तेल का उत्पादन सर्च- उपयुक्त तालिका से कुछ नाते निलकुल स्पष्ट होती हैं । पहली बात यह है कि यानिक शक्ति के कारण नहीं बल्कि कारखाने के बड़े मिकदार के कारण उत्पादन सर्च कम पाता है। यदि कारखाने और हस्तव्यबसार की तुलनात्मक उपयुक्तता के सिवाय विषय को अच्छी तरह से समझना हो तो यह मूलभूत बात ठीक तौर से समझ लेनी चाहिये । दूसरी बात यह है कि कारखाने में माल बनने में क्तिना सर्च हुआ इससे ग्राहकों को कोई ताल्लुक ही नहा। उन्हें तो विक्री कीमत से ताल्लुक है और इस बिजी कीमत में उत्पादन सर्च के अलावा उस माल के विभाजन सर्च की कई मदें शामिल रहती है । श्रर चूँ कि उत्पादन सर्च कारसाने के कद के व्यस्त प्रमाण में क्म होता जाता है इसलिये यह तो स्पष्ट है कि कारखाना जितना बड़ा उतना ही उत्पादन सर्च कम । पर जैसा हम ऊपर देख चुरे हैं कि जितने अधिक पैमाने पर केन्द्रित उत्पादन होगा उतना ही उसके विभाजन का खर्च भी पढेगा। इसलिए सिद्धान्त यह होगा कि जितना उत्पादन सर्च कम उतना ही विभाजन सर्व ज्यादा और जितना उत्सादन खर्च ज्यादा उतना ही विभाजन खर्च कम । अर्थात् कारसाने के कम उत्पादन सर्च से ग्राहक को कोई पायदा नहीं होता। यदि मिल रु० १) म एक मन तेल तैयार करती हैं तो उसे बेचने के लिये उसे पेकिंग, किराया, सीमा, इश्तहार, चिनी के लिये कमीशा, रास्ते का नुकसान इत्यादि कई खर्च भी करने पड़ते हैं, पर देहाती तेली अपना तेल अपने स्थान पर ही वेचता है इसलिये वह इन सब सचों से बरी रहता है। तालिका के न. ६ की यागिक इकाई में विभाजन सर्च सबसे कम ( १२ ) तेल ही बेकार न जायगा, बल्कि जानवर का हाजमा भी निगह जायगा। इससे यह बात स्पष्ट है कि उपरोक्त मर्यादा में १३ प्रतिशत तेल वाली सली से जो पौष्टिक भाग जानवर को मिलेगा यह ८ प्रतिशत तेलवाली सली की अपेक्षा कहीं अधिक होगा। २ दूध देनेवाले जानवरों की सूराक में यदि तेल की माना अत्यधिक हो जाय, तो उनके दूध का प्रमाण कम हो जाता है, ऐसा अनुभय किया गया है। कुछ सास-सास तेलों की निस्वत तो यह नियम पिलकुल ठीक पाया गया है । पर १,००० पौड वजनाले जानवरी को प्रतिदिन १ पीड तेल देनेवाली खुराक खिलाने पर भी कोई नुकसान नजर नहीं आया। यदि उनको खुराक द्वारा प्रत्यधिक माना मे तेल खिलाया जाय, तो वह जरूर उनके हाजमे में गड बड कर देगा, यह तो ऊपर लिप ही चुके हैं। ३ रिनौला और सोपरा इनके जैसे तेल सिलाने से जानवरों के दूध में चर्म का प्रमाण पट जाता है, पर वह कायम नहीं रहता। और जर किसी सास प्रकार की खुराक द्वारा दूध मे की ची वढाइ जाती है, तब उस ची का स्वाभानिक स्वरूप बदलकर वह उस सास खुराक में की चर्बी का रूप ले लेती है। दूसरे महाशय लिसते हैं- १ घानी की सली में जो अतिरिक्त तेल रहता है, वह बेकार नहीं जाता, उसे जानवर हजम कर जाते हैं । खुराक की दृष्टि से पानी की सली मिल की सली से श्रेष्ठ है। उनसे तुलनात्मक भारों पर उनकी उपयुक्तता निर्भर रहेगी। २ सली में का कितना तेल जानपर हजम कर सकते हैं, इसके लिये कोई मर्यादा नहा है । पीसा हुया समूचा तिलहन भी जानवर हजम कर जाते है । पर इसका यह मतलब नहीं कि खुराक में चाहे जितना तेल दिया जाय तो भी जानपर उसे हजम कर जायेंगे। तिलहन के तेल का ६५ प्रतिशत तेल जानवर हजम कर सकते हैं, बरातें कि वह योग्य प्रमाण में उन्हें दिया जाय । किस जानवर को कितने तेलवाली कितनी खुराक देनी चाहिये, यह उस जानवर की जात (breed) और उम्र पर अवलरित रहेगा। पर श्रामतौर से ऐसा कह सकते हैं कि १५ प्रतिशत तेलवाली सली जानवर वसूवी हजम कर सकते हैं । ।

३ खुराक के तेल का जानवर के दूध के घटकारययों पर कोई असर
नहीं होता।
४ सली के तेल से जानबर के दूध म की चर्बी का प्रमाण नहीं बदलता
पर उसके गुण यदल जाते हैं। चरी के प्रमाण की घटबढ तो स्तन की सावक
अथियों पर प्रवलरित रहती है, और इन पर सली की खुराक का कोई असर
नहीं होता । जानवर की मामूली तन्दुरुस्ती या बीमारी से ही इनपर अच्छा या
बुरा असर पड़ता है।
इन दोनों बडे तज्ञों की राय से जो सार्वत्रिक मान्यता है कि खुराक की
दृष्टि से पानी की सली मिल की खली से श्रेष्ठ है, उसे पुष्टि ही मिलती है।
इसलिये यदि पानी की खली कुछ महँगी भी मिले, तो भी वह नागपार नही
होनी चाहिए।
और फिर पानी की और मिल की खली के तेल के प्रमाण म इतना
ज्यादा फर्क नहीं है, जितना कि लोग समझते हैं । शाही कृषिसशोधन शाला के
रसायनशास्त्री द्वारा सूचित मर्यादा के मुतारिक घानी की सली में १५ प्रतिशत
से अधिक तेल शायद ही कभी रहता है और हिन्दुस्तान में प्रचलित घानियां
की सली में तो तेल का प्रमाण इससे कम ही रहता है।
५ भिन्न २ इकाइयों को सली मे का तेल का प्रमाण
हारकोर्ट स्टलर टेक्नॉलॉजिकल इन्स्टिटयूट कानपुर में अलग अलग
इकाइया की सली का पृथक्करण किया गया और उनमें नीचे दियेनुसार तेल
पाया गया
इकाई अलसी की सली सरसों की सली तिल की सली
१ मामूली कोल्हू बैलद्वारा
चलनेवाला १४ से १५% १५ से १६% १४ से १५%
२ सशोधित मगनवाडी पानी
बैलद्वारा चलोयाली *१२५८%
११२%
१२४५%*
३ बगामा घासी यानिक शक्ति
से चलनेवाली ११० १०५ से ११% ११ से १२%
(इनका पृथपरण कॉटन थोइल मिल, नवसारी, गुजरात ने किया है।)

(१६) कारीगर को उसको अपने व्यवसाय की गाड सम्हालने देना और उसकी श्राधिक जिम्मेवारी दूसरे किसी ने उठाना यह उपयुक्त ही है। इस प्रकार की कोई सुसगठित व्यवस्था के अभाव में वेचारे तेली को सपन मिल- मालिकों से टपर लेना पड़ता है । यह हाल केवल तिलहन समह करने के निस्वत ही नहीं बल्कि तेल की बिक्री में भी रहता है। देहात के लोग माल उधार सरीदने के आदि होते हैं। तेली की रोजी पर उसकी याजीविका अवलवित रहती है इसलिये वह उधार माल नहीं दे सकता। देहात का पनिया किसी तेल की मिल का एजेंट रहता है इसलिये वह उधार माल दे सकता है और सारे ग्राहक अपनी योर सींच सकता है। (आ) सली का निकास ग्राहकों ने अपनी आवश्यकता की तिलहन संग्रह करना छोड देने से धानियों के सामने एक और समस्या उपस्थित हुई है। जर लोग अपनी अपनी तिलहन सग्रह करते थे तर वह अपने जानवरों को खली सिलाते थे। पर श्रर यूँ कि वे तेल मोल लेते हैं इसलिये सली सरीदने की प्रवृत्ति उनकी कम रहती है। इसलिथे सली के ग्राहकों के अभाव में तेलियों को अपनी घानियों को चालू रपना कठिन हो गया। मिलें अपनी सली का अधिनाश भाग विदेशों को भेज कर यह समस्या हल कर लेती हैं। इस प्रकार अपनी जरूरत की तिलहन संग्रह करने की आदत नष्ट होने से तेल पेराई का ब्यवसाय घानियों के हाथ से मिलों के हाथ में जाने में सहायता हुई और साथ ही साथ हमारे जानवरों को उपयुक्त खुराक मिलने का एक जरिया भी हम ग्यो ठे।। कुछ किस्म की सलिया अधिक प्रचार में हैं और इसलिये वे जल्द विक जाती है, पर अन्य बड़ी मुश्किल से कटती हैं। दूसरी एक यह भी रात हे कि मलियों की निकी कीमतों का उनकी सायोपयोगिता के अनुसार सीधा अनुपात नहीं रहता। इसलिये पानी के लिये और भी अधिक उलझन पैदा होती है । जानवरों की खुराक की दृष्टि से कौनसी सली पसद करनी चाहिये यह जागो के लिये हम नीचे कुछ याकड़े दे रहे हैं - -- भोजन तुलना- (१७) मिल को भिन्न भिन्न सलियों सायोपयोगिता पार्यो सलीरो जाति पानी चरी प्रोटीन हायड्रेट्स रेषा रास की त्मक इसाई वीमत मूगफली ७९५ ९६० ४८२६ २३ ४९ ४१४ ५३५ १६८ १०० तिली ५१० १०७५४१३१२४२३ ४७० १३७० १५६ ९२८५ सरसो और राई३ १५ १०२०२४६१ ३६ ६४ ८३५ ७१५ १४८८८१० छोलेहुए पिनीले५२० ९५० ३४ ९४ ३४५१ ९५५ ८३० १४६ ८६९० करडी ७२५ ९२०३९ ६२ २०४३ १४३५ ९१५ १४३ ८५१० अलसी ९२० ३३ ३५ ३५७० ७५० ७४५ १४२ ८४५० जगनी ९३५ ७९५ ३४०६ १४९४ १३७५ ९८४१३० ७७७४ नारियल ४५५१४८५ २२९३ ३४३७ १६८० ६६० १२९ ७६८० किसी भी माय पदार्थ की कीमन उसपे रिभिर घटनाओं की उपयु क्तता और वे किस प्रमाण में मौजूद है इसपर श्रग्लवित रहती है । हजम होने वाली चरों और हजम होनेवाला प्रोटीन दोनों की उपयुक्तता एकसो ही मानी जाती है और वे दोनों अपने तई इजम होनेवाले कार्योहायड्रेट से २५ गुने अधिक उपयुक्त हैं । जब ये कीमतें जोड दी जाती हैं तर उनका योग उस खाद्य पदार्थ की याजार की तुलनात्मक कीमत कितनी होनी चाहिये यह दर्शाता है। यही बात स्वरूप में इस प्रकार लिस सकते हैं (चीx२५)+ (प्रोटीनx२५)+कार्बोहायड्रेट भोजन की इकाई। (३) मौजूदा धानियों में कार्यक्षमता का अभाव धानियों की गिरी दशा के लिये उनकी कार्यक्षमता का प्रभाव भी कुछ हद तक कारण हुश्रा है । हमने माना कि भिन्न भिन्न स्थान की तिलहन में तेल का प्रमाए अलग अलग होता है, भिन भिन्न स्थान के तेलियों की कुशलता और बैलों की ताक्त म फर्क होता है फिर भी एक पानी में एक दिन में १२ पॉड और दूसरी में५२६ पौड तेल निकलना, एक घानी में तेल की प्रति- शत २६ और दूसरी में ५० उतरना और एक टन तेल उ० तिली का पेरने के लिये रु० ७२) से २० ३८५) तक सर्च थाने का इसका एक मात्र कारण Some Cattle feeds of western India -by DL Sahasra buddhe से उधुत ।

, ( १८) घानियों में कार्यक्षमता का अभार ही हो सकता है। घानियों में काफी सुधार की गुजाईश है इसमें कोई शक नहीं, इतना ही नहीं बल्कि यदि देहातों का तेल तेराई का व्यवसाय पुनरुज्जीवित करना हो तो पानी में संशोधन कर उसे अधिक कार्यक्षम बनाना ही पड़ेगा। (ई) पूरक व्यवसायों का प्रभाव जैसा कि हम पहले देख चुके हैं जो मिलें केवल तल पेरने का ही काम करती हैं और अन्य कोई पूरक व्यवमाय नहीं करतीं वे मुनाफे में नहीं चलती। इस अनुभव से फायदा उठाकर मिलें बहुधा सानुनसाजी, पेंट और वार्निश बनाना, वनस्पति घी बनाना श्रादि पूरक व्ययसाय उठा लेती हैं । घानियों को भी ऐसे मागों का अवलयन करके जो पूरक व्यवसाय उठाना सभर हो वे उठा लेने चाहिये । दो ऐसे व्यवसायों का जिक परिशिष्ट (3) में किया गया है । (उ) शुद्ध तेल की बिक्री की सास का तेली मे अभाव ग्राहकों ने अपनी यावश्यकता का तिलहन संग्रह करना छोड दिया और साथ ही साथ तेल की मिलें भी घानियों से प्रतियोगिता करने लग गई, इसलिये तेलियों को तेल के व्याहार में मजबूरन अप्रामाणिकता का श्राश्रय लेना पड़ा। घानी का शुद्ध तेल मिल के तेल के भाव में वेच सकना उनके लिये असभर था इसलिये वे या तो पानी के तेल में मिल का तेल मिलाने लगे या धानी केवल बाह्य दिसाने के लिये रसकर निसालिस मिल का तेल ही पानी के तेल के नाम से बेचने लगे। इसका परिणाम यह हुया कि धानी के तेल की शुद्धता पर से ग्राहकों का विश्वास उड गया। धानी के तेल के नाम पर थोड़े अधिक दाम देकर मिल का ही तेल लेना ग्राहकों को नागवार हुया । दूसरी बात यह भी है कि तेली लोग गदे वर्तनोंमें गदे सराके से तेल रसते हैं जिससे वह जल्दी वास मारने लगता है। ये सब बातें अपने व्यवसाय मे उनति करने की ख्वाहिश रसनेनाले तेलिया के मार्ग में राड़े अटकाने का राम करती हैं । सचमुच मे शुद्ध तेल बेचने की इच्छा रचनेवाले तेलियों पर भी लोग विश्वास नहीं रसते इसलिये उनका माल जल्दी नहीं कटता । तेलियों में सशोधित घानियों का प्रवेश कराने के प्रयत्न के सिलसिले में हमें कई जगह यह प्रामर मिला। उनकी मुख्य शिकायत यह रही कि जब हम मौजूदा घानियों का ही मेल नहीं बेच पाते तब अधिक तेल निकालनेगली संशोधित धानी हम कैसे अपना ।

जा नेलियों का उपयुक्त अनुभर हुश्रा यहा दूसरी ओर जिन्होंने अपनी निदगी में पहली बार ही पानी का काम उठाया उनको ठीक उल्टा अनुभर प्राया। कुछ अधिक कीमत देकर भी लोग खुशी से उनका तेल गरीदते थे। इसका कारर यह था कि उनके तेल के गरे में लोग पूर्वग्रहदूषित नहीं ये इस 'नये इस तेल की शुद्धता के बारे में उ हे जल्द यकीन होगया। पर यदि यह पसाय पूर्णरूर से पुनरुजीरित करना हा भार उसकी बुनियाद पछी करनी हो जो यह पेशेदार तेलिया के हाथ से ही हो सकता है यह सष्ट है। इसलिये तेलिया को यह समझाने की सख्त जरूरत है कि उनको ग्राहकों में अपनी पठ इस कदर जमानी चाहिये कि उनके तेल की शुद्धता के बारे म कभी कोड सशक्ति न हो। (ऊ) पानी का काम जाननेवाले मिस्त्रियों की कमी तिलहन समह, विकी का इन्तजाम, मिलों से स्पर्धा श्रादि के कारण पानी की समस्या तो वैसे ही जटिल होगई है। प्रामाणिकता से पानी चलाकर ही निजी चरितार्थ निबाहने वाले तेली बहुत कम है पर एक घानी चालू रसकर उसकी नोट में मिल का तेल पेचने वाले तेलियों का प्रमाण अत्यधिक है। इस परिस्थिति के कारण पानी का काम करनेवाले मिस्त्रियों की रोजी छिन गई, क्योंकि जब कभी चलने वाली धानी म मरम्मत करने के मौके ही क्यों बार- चार थाने लगे ? फिर नई पानी बनाना तो दरकिनार रहा। इसलिये धानी का काम करनेवाले मिस्त्रियां की श्रामद गिर गई और वह काम सीखने का नई पीढी के लिये कोई प्रलोभन न रहा । इसलिये पुराने मिस्त्रियों की मौत के साथ ही साथ उनकी क्ला भी दपना दी गई। परिणामत अाज जो घानिया रची खुची हैं उन्हें मरम्मत करने वाले मिस्त्री नहीं मिलते हैं इसलिये देश के कई स्थानों के तेलियों को योग्य समय में अपनी घानियों की मरम्मत करवाना सभव नहीं होता । इस प्रकार योग्य मिस्त्रियों का प्रभाव आज की पानी की अवनति का एक प्रधान कारण बन गया है। यदि घानियों को पुनरुजीवित करना हो तो मिस्त्रियों की शिक्षा इस कार्यक्रम का प्रधान श्रग रहेगा। योग्य समय पर मिस्त्रियों की सहायता न मिलने के अलाना तेलियों को घानी के छुट्टे भाग, योग्य भार में और जरूरत पड़ने पर नहीं मिल सकते। कई स्थान ऐसे होते हैं नहा घानीके भागों के योग्य लकडी नहीं मिलती और रेड (२०) जीन और प्रेस महगे दाम देकर सारी लकडी जलाने के लिये सरीद लेते हैं यौर उस लकडी में पानी पौर उसके भाग रन सकने योग्य लकडिया होती हैं। इसलिये यह जरूरी है कि यावश्यक स्थानों पर पानी के भाग सग्रह किये जायें ताकि जरूरत पटने पर तेलियों को ने योग्य दामों में मिल सके। इस व्यवस्था से तेलियों को प्रापश्यम्ता की पूर्ति के साथ ही साथ पुरानी और अक्षम घानियों की जगह सुधरी हुई अधिक कार्यक्षम घानी बैठाने में भी काफी सहायता मिला करेगी । इस प्रकार घानिया और उनके भाग बनाने तथा उन्हें वितरित करने वाले केन्द्र ही नये पानी के मिस्त्री तैयार करने के उचित स्थान होंगे । ये और ऐसी ही अन्य अटचर्ने दूर करने का काम एक अखिल भारत तेली सघ द्वारा ही ठीक तौर से हो सकेगा। सघ सारे देश की धानियों के प्रश्नों का विचार करेगा और उनकी नित्यप्रति की अडचनी से वाकिफ रहा करेगा। पर्तमान युग सगठन का है न कि यत्रों का, जैसा कि श्रामतौर से कहा जाता है। संगठन द्वारा कोई भी काम सफल और सुचारुरूप में किया जा सकता है । तेल को मिले सगठित हैं इसलिये वे बाजी मार ले जाती हुई दीपती है । घानिया सगठित नहीं हैं इसीलिये उनकी दुर्दशा है ।

२. प्रातीय घानियों १ पानी की किस्म और स्थानीय परिस्थिति धानो की बनावट और उसे चलाने का तरीका इन दाना को हमारे कारीगरों ने स्थानीय परिस्थिति के अनुकूल बनाया है। जहा वर्षा चूर होती है यहा घानिया मकान के अन्दर लगानी पड़ती है और यह तभी सभर होता है जबकि वे छोटेसे दायरे में चलाई जा सके। इसलिये पूर्व और उत्तर के भागो म एक बैलगाली घानिया प्रचलित हैं । मद्रास और उत्क्ल के कुछ भागों मे जहा वर्षा कम होती है घानिया खुले मैदान में और दो चैलों द्वारा चलाई जाती है और बैल काफी बड़े चकर में धूमते हैं । इनमें से कुछ धानिया बहुत बडी है थौर घान में बहुत नडे प्रमाण में तिलहन पेर सक्ती हैं । पानिया छोटी या बडी बनाने का दूसरा एक कारण रैलो की किस्म भी है। सिंध और उत्कल को छोड कर करीर सब जगह पानी खींचने का काम बैल ही करते हैं और वे जैसे कम या ज्यादह ताक्तवाले हो वैसी घानिया छोटी या बडी बनानी पड़ती है। सिंध मे अँट और उत्कल में कभी-कभी मैसे भी जोते जाते हैं । वैल और ऊँट फुर्तीले होते हैं, पर भैंसे तो बहुत सुस्त होते हैं । पजार, बबइ और मद्रास के बैल तगड़े होते हैं इसलिये वहा की घानिया भी बड़ी होती हैं । पर युक्तपात, बिहार, आसाम, बगाल, उत्कल और मध्यप्रात के बैल कद में छोटे गौर ताकत में कमहोते हैं इसलिये वहा की घानिया तुलनात्मक दृष्टि से छोटी हैं । २ कारीगरों का सगठन घानी बनानेगाले कारीगरों का जो सगठन होता है वह बडे मारे का है। धानी बनाना एक खास कला है और पुश्तैनी तौर पर वह किया जाता है । हरएक कारीगर अपने अपने दायरे में काम करता है और एक नियत कीमत म धानी बना देता है। इस क्षेत्र में दूसरा कोई कभी हस्तक्षेप न करेगा। ये बढइ इस व्यवसाय की परपरा और उसके विभिन पहलुओं और समस्यायों से परिचित रहते हैं इसलिये भिन्न भिन्न स्थानों के तेलियों में सबंध प्रस्थापित करना इनके लिये बहुत आसान रहता है । वे अपना शान और अपनी अद्यावत् जानकारी का पायदा तेलियों को देते रहते हैं। इस समय यद्यपि वे फेवल स्थानीय पानिया बनाना ही जानते हैं और यद्यपि उनकी संख्या बहुत कम हो ( २२ ) गई है फिर भी सशोधित घानियों का प्रचार करने में उनका उपयोग कर लेना और उनकी परपरा और सगठन कायम रसना ही ठीक होगा। यू तो यह सगठन अच्छा था, पर विमिन्न प्रान्तों का समन्वय करने का काम उसकी स्वाभाविक घटना में ही नहीं था। यदि ऐमी कोई सस्था होती तो विभिन प्रातों की घानियों में जो फर्क अोर कमिया है वे न रह कर एक निश्चित तर्ज की धानी ईजाद होती जो अपने-अपने प्रात में आवश्यकतानुसार हेर फेर कर इस्तेमाल की जाती होती । उदाहरणार्थ, कई घानियों में सिनेवाले भाग अलग से बैठाये जाते हैं पर अन्यों में ऐमी कोई योजना नहीं । उनम तो गोखली ग्ने कुद्ध को ही कोठे की तरह इस्तेमाल किया जाता है जिसका नतीजा यह होता है कि योग्नली घिस जाने पर उसे निकाल कर फेंक देना पडता है। कोई-कोई घानियों में तेल निकालने के लिये मुहरी रहती है और अन्यों में कपडे के टुकड़ों को डुगा डराकर और उसे किसी बर्तन मे निचोडकर तेल निकालना पटता है । कुछ घानियां में कोठे की सली निकालने के लिये लाट उठानी पडती है और कुछ में नहीं। इन सब फौं के अलापा घानियों की रचना के तफसील में भी फर्क रहता है । यह फर्क एक ही प्रात में पास ही पास दिसाई देता है इसलिये वह स्थानीय परिस्थिति के कारण नहीं हो सकता। ३ अच्छी घानी के गुण अब हम प्रचलित घानियों का एक अच्छी घानी के नीचे लिये हुए गुण की क्सौटी पर निरीक्षण करेंगे। १ निलहन से निकलनेवाले तेल का प्रतिशत अधिक से अधिक होता चाहिये। २ हर घान का परिमाण अधिक से अधिक होना चाहिये । ३ हरएक धान के पेरने में कम से कम समय लगना चाहिये । ४ यादमी और बैल की कम से कम शक्ति लगनी चाहिये । ५ लागत और मरम्मत खर्च कम से कम होना चाहिये । ४ प्रातीय घानिया (अ) गुजराती पानी गुण २. दोर ,

प्रान्तीय घानियों की फाचरें
दौवामिर
tee

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( २३) . ४ इसमें समेटनी के लिये कोई इतजाम नहीं है इसलिये हायसे तिलहन कोठे में बार-बार सरकाना पड़ता है। परिणाम यह होता है कि एक आदमी एक समय में एक ही पानी सम्हाल सकता है। ५. धानी चलानेवाले तेली को बैठने के लिये जो चबूतरा बनाया जाता है उसम व्यर्थ सर्च करना पड़ता है। (अ) दक्षिण भारत की पानी २, दोष ४, ५ ४ बैलों के चलने का घेरा बहुत बड़ा होता है-करीब १२ से १८ पीट की निज्या का-इसलिये एक तिलहन सरकाने के लिये और एस बैल हाकने के लिये ऐसे दो श्रादमियों की जरूरत पड़ती है। वाझापाट काफी लरा होने से योखली के ऊपर उठता है। वह ऐसा न उठे इसलिये उसको घूमने के लिये भोसली में एक साचा बनाया जाता है । इस खाचे में घूमते हुए बोझापाट कापी अावाज करता है जिम पर से यह मिद्ध होता है कि उसमे काफी रगह पैदा होती है और रगड पैदा होने का मतलब है बैलों को अधिक श्रम पडना । इसमें तेल निकालने के लिये कोई मुहरी नहीं होती। ५. भोसली के कोठे का बदले जासकने वाले हिस्से का नहीं बनाया जाता, बल्कि खुद नासली में रने कुड को दी काठे की इस्तेमाल किया जाता है। नतीजा यह होता है कि इस हर चौथे, पाचवे साल निकालकर पेंक देना पड़ता है और ना जान पर श्राता है इसलिये उसको कार्य- क्षमा कम होजाने पर भी कुछ समय तक और उससे काम लेने की प्रवृत्ति रहती है। विदर्भ प्रातीय पानी गुण दोप १, पाचवा गुण है पर पहले चार प न होने से उसका स्वतत्ररूप से कोई महत्व नहीं है। इसका योठा तल पेरो ये किमी भी सिद्धात ये आधार पर नहीं बनाया ( २४) गया इसलिये तिलहन पर पर्याप्त दबार नहीं पड़ता। कपड़े के टुकडो को डुबा डुमाकर तेल निकाला जाता है । वैल के लिये नडी कष्टप्रद है। (ई) बगाली घानी (डायमड हावर की पद्धति की) गुण एक यादमी एक साथ दो घानियों को देसरेप कर सकता है। दोप सरसो और सोपरे के सिवा अन्य तिलहनों की पेराई के अनुकूल नहीं है। २० सेर सरसों की एक घान पूरी होने के लिये ५ से ६ घटे तक समय लगता है । एक ही घानी में पाली-याली से दो बैल जोतने पड़ते हैं, अर्थात् एक धानी के लिये दो बैलों की जरूरत पड़ती है। यदि धान का प्रमाण पूर कम कर दिया जाय तो एक बैल से काम चल जाय । इसकी बनावट का मुख्य दोष यह है कि इसका कोठा बहुत ही छोटा रहता है जिससे पेराई के लिये अवकाश कम रहता है । लाट केवल ७• का कोण बनाती हुई घूमती रहती है इसलिये जो दवाव पड़ता है वह तली पर पड़ता है। वहा पेगई का कार्य नहीं होता इस लिये वह दवार करीप-करीन व्यर्थ सा जाता है। यही कारण है कि धान पूरी होने के लिये इतना अधिक समय लगता है। इसकी भोरवली में बदले जा सपने पाले भाग नहीं लगाये जाते । कोठा घिसने पर पोसली का उतना हिस्सा काट डालते हैं और नया कोठा बनाकर काम चालू करते हैं । (उ) पजाबी पानी गुणा दोष इसमें सली की मोटी तह बनती है इसलिये तिलहन पर पर्याप्त दरान नहीं पड़ता। यदि समेटनी की बनावट में थोडा फर्क किया जाय तो एक समय एक श्रादमी दो घानिया सम्हाल सकेगा। (क) मारवाडी घानी गुण करीब सर (समेटनी तथा बोझापाट की बनावट को छोड़कर) इसके और गुजराती घानी से आधार पर मगनगडी में शनी के प्रयोग चिये गये। -- . ३ ६ १६ ३२ २ ४ ३७६ २ ८ ३८ ४ ( २५ ) ५ प्रान्तीय घानियों की कार्यक्षमता श्रर हम हमारे पास श्राये हुए विवरणों पर से प्रान्तीय घानियों की क्षमता को एक सूचि देते हैं। मुकाविले के लिये हमने तिल को लिया है क्या कि यही एक ऐसी तिलहन है जो श्रामतौर से सब जगह पेरी जाती है। स्थान प्रात तिल तेल प्रतिशत घान यदे पौड में (पौड में पतरपूर महाराष्ट्र દ૨ भद्रक उत्कल ४२ ३११ बडदगल बंगाल छपरा बिहार ३६ १२ ३३१ १२ कुमिला गाल ५० १७ १२ चितूर श्रान १०८ पिजनौर युक्तपात १२ तिरुपमामलाई तामिलनाट १५१ ५२१ ३७३ जालघर पजान २ भुमावल सानदेश ३६५ साबरमती गुनरात ४२ राजकोट पाठियावाड ११२ ६ बबई ন ૦૨ ३२ कडप्पा श्राम ६० ४२ ११ कालीकट मलबार ६२ E पीयापुरम श्राम ५० यह सूचि पताती है कि एक दिन में २२ से लेबर ५२ पौर तक तेल निकाला जा सकता है और तेल का पडता २६ से लेकर ५० प्रतिशत तर पदवा है। इस पर से सारे देश में एक्सी पदिया पानी चलाने की कितनी पारश्यक्ता है यह सिद्ध होता है। अगर हमें विभिन्न धानियों को योवा की तुलना, तेन के एक निश्चित परिमाप निसलो में पडनेगाले पर पे रूप में करनी हो तो हमें पय और गहराई में पाने को जरूरत है। इसो लिये सहरहान मजदूरी की गम, नो के १० ७ १० १०० ८ ८ ३ ४ २ ( २६) ८ घटे में पिलाने का खर्च श्रादि सर घानियों के लिये एकसा ही है ऐसा हम मान लेंगे। इसी मान्यता के बूते पर नीचे एक सूचि दी जाती है, जो पिछली सूचि से हिसार लगाकर तैयार की गई है। एक टन तेल के लिये प्रतिदिन स्थान जरूरी तिलहन पेराई सर्च पेरने के लिये निमलनेवालातेल (पौड में) (रुपयों में) लगनेवाले दिन (पाड में) पढरपुर ८५८७ १२७-१४-० भद्रक ७१६८ २७६-२-० २०३ पडदगल ७००० १६२-८-० १४० छपरा ६७२० ३८५-०-० कुमिल्ला ६५८८ २७२-४-० १६८ चितूर ६४५१ १०५-०-० ३७५ बिजनौर ६०८० ३३०-०-० १४० तिरुवन्नामलाई ६०१६ ४२ ५१५ जालधर ५६७४ १८१-८-० १३२ १७१ भुसावल ५६८८ २२०-०-० १६० १३८ साबरमती ५२७० ७२-१४-० ५२ ४२५ राजकोट ५१२० १०३-२-० वबई ५०४० ६६-४-० ३२ घडप्पा १४४-०-० कालीकट ४६३० १६८-०-० २६६ पीथापुरम् २१११२.० १५४ ऊपर की सूची में युद्ध-पूर्व पेराई का खर्च इस तरह लगाया गया है तेली की तनरमाह २०१५ माहसार रु०१० घानी और बैल की छीजन मकान किराया न्याज इत्यादि ८४-०-० ३० ४४८० १४४ बैल की खुराक २०४ रु०२ " + (२७) हर महीने के काम के दिन यदि २५ माने जाय तो रोजाना पेराई का पर्च २०१-६-० होगा। दाक्षण में यह करीर रु०२ पटता है क्योंकि वहाँ एक पानी के लिये दो यादमी और दो बैल लगते हैं। चूंकि वहाँ की घानियों में काफ़ी तिलहन भरा जाता है, इसलिये उनमें रोजाना तेल भी काफी निकलता है। राजकोट जैसे कुछ स्थानों में एक ही घानी दो बैल पाली पाली से सींचते हैं और इम प्रभार १३ से १४ घटे काम कर रोजाना अधिक तेल पैदा करते हैं। तेल के प्रतिशत की दृष्टि से कडापा कालीकट और पीथापुरम् की धानिया श्रेष्ठ मालूम पडती हैं। इतना अधिक प्रतिशत दो कारणों से सभरनीय है, एक तो वहा की तिलहन में तेल का अश सूत्र होना और दूसरा हमें भेजे गये श्राकडॉ मे कुछ गल्ती होना । तेल के नीचे जमनेवाली गाद का यदि विचार न किया गया हो तो ऐसी गल्ती होना असभर नहीं। मातीय घानियों का अभ्यास और कुछ प्रयोगों के बाद अखिल भारत ग्राम उद्योग संघ के प्रधान कार्यालय में मगनवाडी घानी बनाई गई है जिसकी कार्यक्षमता नीचे दियेनुसार है ६ मगनवाडी घानी की कार्यक्षमता प्रतिघान में तिलहन कितनी तिलहन तेल का प्रतिपान में लगनेगाला पडती है (पौड में) प्रतिशत समय (घटों में) तिली १७ १ खोपरा २० ५५ से ६० प्रलसी १२ ३२ से ३५ राइ ३० सरसो ३५ से ४० ११ से १३ महुधा १६ ३५ श्ररटी पीछे दी हुइ न० २ को सचि के मुताविक दो मगनबाडी घानियों की इकाइ पर एक टन तिली का तेल पेरने का सर्च रु० ५३-०-० के करीब पाता है। यह हिसान करते समय प्रतिदिन का सर्च २०१-१२-० ता गया है। क्योंकि मूगफली १६ । १

गाना FATHER 1-1-
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artifima (ci) nitrinarnirmir
ग्राममनो

३. पानी की रचना के सिद्धात धानी के प्रमुख भागा रे नाम तथा उनका वर्णन नीचे दिया जा १ अोरमली (कुर और मुहरी क माथ) २ कोटा ४ समेटनी ५ फड़ी ६ बोझापाट १ ओखली (अ) एकडी की विस्म श्रोसली की लकही मजबूत, भारी, ठास थोर तेल का न रगनेवाली होनी चाहिये । वह मिलने में श्यासान तथा पानी साइ हुई होनी चाहिये । श्रगर लकडी मना न हो तो लाट के भारी दबार से टूट जायगी। अगर वह भारी न हो तो लाट के वजन से उलट जायगी, अगर यह ठोस न हो तो तेल रस जायगा और अगर तेल को रग देती है, तो तेल खराब हो जायगा। इसलिये पिसी भी तरह की लकटी घानी की ग्रोखली के लिये काम नहीं दे सकती। इसके अतिरिक्त पानी बनाने के लिये जितने चौड़े तने के पेड की जरूरत होती है, वे बहुत थोड़े और कही कहीं पाये जाने हैं। अाजकल पानी की ग्रोसली बनाने के लिये आमतौर पर इमली, नीम, कटहल, मेरा और शिरीप की लकडी काम में लाते हैं। कभी कभी रायन, मा, श्राजन और बबूल भी काम में लाते हैं, पर ये चटक जाने का डर रहता है। इमली की लफडी भारतवर्ष के बहुत हिस्सों में इस्तेमाल होती है। नीम सानदेश, गुजरात और बिहार में और शिरीष की लक्डी मध्यमात में इस्तेमाल होती है। इसके अलारा इस काम के निये शायद कुछ और लकडिया भी मिल सस्ती हैं, जो इस काम के लिये अच्छी साबित हो, पर बढई लोग तो यह मान बैठे मालूम पड़ते हैं कि इनके सिवा और कोई लकडी हो ही नहीं सक्ती । पर अच्छा हो कि किसी नई लकडी ( ३० ) का पता लगाने के पहले वेकार पड़ी मौजूदा धानिस का ही उपयोग किया जाय, क्योंकि वे अच्छी तरह तेल पी चुकी हैं और उनसे काफी पैसे और मजदूरी की रचत हो जायगी शर्त कि वे इष्ट ग्राार की और चटकी हुड न हाँ। (आ) नाप पासली जमीन के अपर इतनी ऊँची चाहिए कि उस पर काम करनेवाले को ज्यादह न झुकना पडे । साथ ही कोठे की दलुया मुहरी के लिये भी काफी ऊँचाइ की जरूरत है। इस प्रकार यह जमीन से कोइ २ फीट ऊँची होनी चाहिये और ताकि यह लाट के घूमने से पडनेवाला वजन और उनके विभिन दायरे में घूमनेवाले गोझापाट का नजन परदास्त करमके इसलिये कोई 3 फीट जमीन के अन्दर भी गडी हुई होनी चाहिये । इस प्रकार कुल लाइ ५. पीट हुइ । पर जहाँ की जमीन रेतीली हो रहा इससे भी अधिक लगाइ चाहिये । जहा तक हो सके लकटी दिलकुल सीधी हो। कभी कभी ५ पीट लबाई की मिलना मुश्किल होता है । ऐसी हालत मे नीचे की ओर कुछ बढी सूटियां या गुणाकार गद्दी जोडी जा सकती है । श्रोसली का पेग इतना होना चाहिये कि कोठे का कुड बनाने के बाद भी दीपारें मजबूती के ख्याल से काफी मोटी रह जायँ । तिलहन भरने के लिये भी जगह होनी चाहिये । चटक जाने की समाना न रहे इसलिय भी घेरा एक विशेष हद का अपश्य चाहिये । इमलिये वह करीर २१ फीट तो अवश्य ही चाहिये । अगर लकडी का भेर इससे कम हो तो और लकडी जोडकर इतनी जगह बना लेनी चाहिये । ऐसी लकडी जोडने के बाद पेरे बाहरी तरफ लोहे का पहिया लगा लेना अच्छा होगा, जिससे काफी मजबूती भाजायगी। (इ) मुहरी यह कुड की तली म एक तरफ खोदी जाती है और दूसरी तरफ जमीन के पास या निकलती है। अगर लकडी अच्छी न हो तो जस्त का एक नल लगा देने हैं जिमसे तेल न रसने के लिये काफी इन्तजाम हो जाता है । मुहरी जमीन की सतह के बहुत नीचे जाकर नहीं निकलनी चाहिये, क्योकि उस हालत मे तेल का वर्तन रसने का गड्ढा बहुत गहरा बनाना पडेगा। अगर यह गड्हा गहरा रसा जाय तो तेल भरे वर्तन को निकालने में दिक्त पड़ेगी और मुहरी को .

साफ करने के लिये डके का डालना भी मुश्किल होगा। यह मुहरी कोठे का कुड न जाने के बाद अदर से बनाई जाती है ताकि वह ठीर जगह पर बनाई जा सके। मुहरी को वद करने के लिये जो लोहे का डका डाला जाता है उसका मुँह ऐमा हाना चाहिये कि वह मुहरी में बिलकुल ठीक बैठे २ कोठा कोठा, पानी का वह हिस्सा है, जहा लाट तिलहन पेरती है । यह मानी का वडा महत्वपूर्ण भाग है। तेल निकलने का प्रतिशत, रोजाना निक्लनेवाले तेल का परिमाण, हर घान में लगोवाला समय श्रादि सभी बातें सासकर इस काठे की बनारट पर ही निभर करती हैं। विभिन पानियों से निकलनेवाले के परिमाण का अन्तर उनकी बाहरी बनावट के कारण इतना नहीं होता, जितना काठों को बनावट की विभिन्नता के कारण होता है । यह बदले जा सकनेवाले तख्तों का बनाया जाता है। जिसे कोठे की बनावट का कुछ भी शान नहीं है उसे तो पजावी और मारवाडी घानियाँ एक्सी ही मालूम पड़ेंगी। (अ) लाटका युवाव कोठे की नापट म सरसे बडी बात यह है कि काठा और लाट को इस हिसाब से बनाया जाना चाहिये कि तिलग्न ठीक तौर पर पेरा जाय और तेल शासानी से बाहर निस्ल सके । इसरे लिये पहली शत यह है कि लाट कोठे में अधिक झुकाव से धूमे, क्योंकि जितना ही अधिक मुकार होगा, कोठे की गानुनो पर फा दबाव भी उतना ही अधिक पड़ेगा। लाट द्वारा कोठे की तली पर जो दवाव पड़ता है उसके कारण कोठे म उष्णता पैदा होती है जो तेल पेराई में सहायक होती है और कोठे की बानुश्री पर का दबार तिलहन को पीसकर निचोडता है । ये दोना दबार लाट के मुकाव के अनुसार क्म ज्यादा होते हैं, अथात् यदि झुकार ज्यादा हुआ तो कोठे की तली पर का दवार कम होगा और बानुनों पर का दाव बढ जायगा, पर यदि मुकार कम हुश्रा ता कोठे की तली पर का दाव बढ़ जायेगा और आजुधों पर का दवाव कम हो जायगा। जितना हम लाट का झुकार अधिक रखेंगे उतनी ही कोठे की गहराई कम और चौटाइ ज्यादा रखनी होगी। पर यह भी हम अमुफ एक हद तक ही ( ३२ ) र सस्ते हैं क्योंकि कोटा चौडा बनाने में एक तो उसका मिकदार घट जायया यौर पानी के लिये अधिक चौड़े तने की लकड़ी की श्रावश्यकता होगी जो आमतौर से करीब करीन अप्राप्य होती है। लाट का योग्य मुकार निश्चित करने के लिये हम यह भी देखना चाहिये कि लाट का पाटा दवार इतना नहीं पढ जाना चाहिये कि यह कोठे मे की खली को काठे की दीवार के सहारे पूर्ण रीति से पेरी गये निना ही नाहर फेंक दे । हमारा अनुभव यह है कि मुकार २२° पर पहुँचते ही उपयुक्त नगर होने लगता है। इसलिये ऐसा मालूम पड़ता है फि २०° और २२° के श्रदर तक का मुकार फायदेमद है। (आ) सली की मोटाई हमने ऊपर देखा कि दवाव को अमकारक पनाने के लिये लाट का झुका रहना जरूरी है, पर इतना ही काफी नहीं । झुकने के सिवा उसे कोठे की दीवार पर कम से कम जगह छोड कर धूमना चाहिये । यदि इनके बीच मे अनावश्यक जगह रहने लगे तो दवार कम हो जायगा । सली इसी साली जगह के अनुसार बनती है और अगर यह मोटी बनी है तो उसकी पेराई में काफी ममय लगेगा और तेल का प्रतिशत भी कम रहेगा । इसलिये अधिक से अधिक तेत प्राप्त करने के लिये कोठे की दीवार ऐसी चाहिये जो विना अधिक पाली जगह छोड़े लाट के मुकाव के साथ मिल जाय । अगर हम लाट और दीवार के बीच में अधिक जगह नहीं छोड़ना चाहते, तो दीवार ऊपर से लेकर कुछ गहराइ तक सिमिटती सी होनी चाहिये और फिर कोठे के निचले हिस्से तक निसरती सी होनी चाहिये । अर्थात् कोठे की दीवार का ढलाव लाट के ढलान के अनुसार होना चाहिये। दीवार का कुछ दूरी तक सिमटना और बाद में पिसरना इसलिये जरूरी है कि उस खास स्थान से लाट कोठे की सामनेवाली दीवार को छूती है। इस तरह कोठा दो हिस्सों में बँट जाता है, जिसके विपरीत ढलार ऐसे विंदु पर मिलते हैं, जिससे एस तग गोल गरदन सी बन जाती है। इस प्रकार कोठे की दीवार को सिमटती सी नाते समय यह ध्या। रखना चाहिये कि कहीं यह गर्दन यादह तग न हो जाय । यह इतनी चौडी होनी चाहिये कि जरूरी मोटी लाट नीचे जा सके। यदि लाट या वह हिस्सा - - ( ३३ ) बहुत पतली होगा तो वह तली म और गरदन के नीचे की दीवार पर खाली जगह छोड़ देगी। नतीजा यह होगा कि उस दीवार पर मोटी सली बनेगी, और अगर तिलहन नीचे बैठ गया तो कभी कभी लाट बाहर भी निकल पावेगी। गरदन के नीचे की दीवार इतनी ऊची भी नहीं होनी चाहिये कि उनके और लाट के बीच में बहुत जगह खाली रहे। ऐमा होने से उसके पास मोटी गमली जमती जावेगी। और उसे निकालने के लिये लाट को बाहर निकालना पड़ेगा। यह दीवार छोटी रसने से खली को कोठे में नीचे से ऊपर की ओर घुमने में भी सहायता होगी। लेकिन चूंकि यह भाग ऐसा है जिसमें अधिक से अधिक दवाव पड़ता है इसलिये उपयुक्त मयादात्रों को सम्झलकर वह ययासभव अचा रखना अभीष्ट है। लाट का निचला सिरा कुछ फूला हुया रचने से उपयुक्त मकसद अच्छी तरह पूरा हो जाता है। इस श्राकार के कारण कोठे के निचले भाग म बहुत पतली पली जमती है। इस गली को हरएक घान 'के पाद निकालने की जरूरत नहीं रहती क्योंकि नया तिलहन डालने पर यह श्राप ही श्राप ऊपर उट श्राती है और तिलहन में मिल जाती है। चूंकि इसका प्रमाण बहुत छोरा होता है इसलिये नये घान की मिकदार पर इसका कोई असर नहीं होता। हर पान के पाद' लाट पाहर निकालने या झझट बचने से वास्तव म हर घाा के बाद बैल खोलने की भी जरूरत नहीं रही। लेकिन दोधान के बीच में यैल को थोडा श्राराम देना और उसकी गरदन पर से जुश्रा उतारना अच्छा है। जुया साध पर लगातार रहने मे गरदन ताती है और सूजती है। हम प्रकार मिहनत का काम हट जाने से अब पानी चलाना याने उसके ऊपर काल निगरानी रखना है। यह काम हलका होने से घर की स्त्रिया या निहें कड़ी मिहनत का काम करने की ग्रादत नग ऐसे लोग भी अब पानी चला सकेंगे। () खली का काठे में घूमना कोठे के नीचे, मध्य और ऊपर के हिस्से की गली का परीक्षण करी से पता चलता है कि लाट का दवार कोठे की दीवारों पर असमान रूप से घट जाता है। इससे मिंद होता है कि पली कोठे ने अन्दर घूमनी चाहिये । अगर ।

( ३४ ) तल के पेरने म समय की बचत करनी हो तो कोठे में सली को अधिक से अधिक तेजी से घूमना नाहिये। अगर उसकी घूमने की रफ्तार कम रही ता वह एक ही जगह रहकर पिरेगी और धान के सत्म होने में बहुत समय लग जायगा। क्योंदिसली का यह हिस्सा जहाँ दयाव अधिक से अधिक है, जल्दी पिर जायगा और जहा दबाव कम है, वह देर म। इसलिये यदि सली जल्दी 'जल्दी धूमती रहे तो उसका हरएक हिस्सा अधिक से अधिक दवा की जगह 'आता है और खली भी उलट जाती है, यानी दीवार से लगा हिस्सा उलटते उलटने लाट' की तरफ या जाता है ।' सली वे घूमने की रफ्तार कोठे की बनावट पर निर्भर करती है। उसकी दिशा नीचे से ऊपर की तरफ होती है इसलिये इमम अगर कोई चीन पाधा डाल सकती है तो वह गर्दन है। अगर गर्दन के नीचे की दीवार मे ढलान ज्यादा हो तो सली श्रासानी से ऊपर नहीं श्राती। इसलिए कोठे की तली का व्यास उसकी गर्दन के व्याम से २" से अधिक नहो।' माथ ही तली का पेरा इतना पटा होना चाहिये कि लाट यासानी से झुर सरे। अर्थात् कोठे की तली का पेरा और गर्दन ये दाना एक निश्चित् प्रमाण मे बडे होने चाहिये। गर्दा को वहत तेज धार नहीं रखनी चाहिये। दोगों बाजुमा र ढाल में गोलाई देकर मिला देना चाहिये। (ई) तली में ढलाय यदि कोठे मी तली सपाट रसी जाय तो कि लाट कुछ भुलार म घूमती रहती है इमलिये उसके और तली के बीच में कुछ जगह छूट नाया परेगी और इसमें तिलदन भरा रहीं करेगा। इस प्रकार यदि तिलहन भरा रहे तो मुहरी का मुंह बन्द हो जायगा और लाट बाहर निकला करेगी जिमसे लाट हटाकर गाली जगह पर जमी हुई तिलहन टाना लानिरीगे जावेगा। इसलिये कोटे और लाट की तलिया में क्तइ जगह न छूटने देनितात श्रावश्यक है और दमके लिये दोनों का दलार ममान परिधि का रखना चाहिये। रेनाचित्र न. २ कालम ८ में दशाये मुताबिक दोना के लिये एक ही वृनपद सोचने से यह यामानी से हो सकता है। (3) पी पाा का परिमाण घाा ये परिमाण का घगने बढाने के लिये कोटे की गहराई और - --

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पथ, भेजा जाता है।

-- चौडाइ कम ज्यादा करनी चाहिये। पर ऐसा करते समय बैल की शक्ति का भी खयाल रखना चाहिये । एक मामूली बैल के लिये १८ पौड तिली का धान ठीक होता है। दूसरी बात यह भी है कि धान बहुत बड़ा होने से गज का तेल का उत्पादन हमेशा बढता ही है सो बात नहा है। यह तो पी धान को लगने वाले समय पर निर्भर रहता है। कोठे का चित्र कैसे बनाना (रेसाचिन न० २) इस रोपचिन में दो भिन मिक्दारों के कोठा के चित्र दिये गये हैं। मगनवाडी में किये गये प्रयोग इनकी बुनियाद है और मगननाढी घानियो म इसी नाप के कोठे मनाये जाते हैं । बडा कोटा 'घ' मामूली मजबूत बैल के लिये है और कोटा 'ब' कमजोर रेल के लिये है। दोनों में प्रतिघान स्तिनी निलहन पडेगी यह जानने के लिये छठा प्रकरण देखिये। इस रेखाचिन म दिये नार और गोलाइयो कैल अनुभवसिद्ध हैं, गणित के हिसार का उन्हें कोई आधार नहीं है । नीचे दिये हुए वर्णन में उप- स्थान कोठे का वह ऊपरी हिस्सा है जिसपर लाट धूमो समय टिकती है, गर्दन कोठे की सिकुडन का हिस्सा है और खाचा (socket ) काठे का निचला हिस्सा है। यह रेसाचिन पूरे नाम का दिपाया गया है ताकि चौथे प्रकरण म गित पाचर और लाट के फ्में बनाने में बदइया को आसानी हो । १ 'क' म से कोठे का लरश्रक्ष खोचिये। १ इस पद पर गर्दन और ग्वाचे की गहराई दहिये । ३ र गन, गर्दन और साचे के स्थानों में से उस उस स्थान पर की फोठे की तिनी प्राडी लकीरें खींचिये। 'भार 'ईड' को जोड दीजिये। इसी प्रकार दूसरे छोर भी मिलाइये। । अब उसस्थान का केंद्र मानकर उस स्थान पर जितनान्यास हो उसकी नाधी त्रिज्या से एक वृत्तपड खींचिये। इसो प्रार 'ड' को केंद्र मानकर नीचे की ओर लाट का जितना व्यास होता है उसकी नापी त्रिज्या से एक दूसरा वृत्तसड साचिये। ४ ६ अप इन दाना वृत्ताडों के सामान्य ऐमी मरेगा लांचिये। या स्पर्श या लाट की धुरी होगी। ७ कोठे की और लाट की धुरा या ऐदन पिंदु दर्शाहो । ८ इस देदन यिदु का केंद्र मानमर गाचे के छोर तक पी पिज्या लेकर गाच रे दोनों छोरों का जोडपाला एक वृत्तसद योचिये। गि तह वृत्तपा पोटा और ताट की धुरा को मामा य ऐसे केंद्र से पीचा गया है, इमलिये " कोठा और लाटो मामान्य तनी दर्शाता है। ६ मा 'द' को केंद्र मार भोर लाट के निचले सिर में व्यास गर निग्या लेकर उपयुक्त वृत्तपड यो 'ग' में छेदिये। १० ''और 'ग' मे लाट की धुरी का सामानातर रेवाण सीचिये । गर्दन और पाच (sochct line) के बीच में कोठे की धुरी जितनी पडती रे उससे " कम प्रतर तकदा रेवानों को उठाइये। उपयुक्त सामानान्तर मेमानों के दोना छोर मिला दीजिये। ११ दायोरा को जोडनेयारा। रेसा को सामानान्तर और १३" के पासले पर एक दूसरी रेग्या मीचिये । इस रेखा की चौडाई उपस्थान में लाट का जितना व्यास राना है उतनी ही रहे और लाट के धुरे के दोनों ओर एक रहे । इन दोनों रेगानों ने छोर जोड दीजिये । १२ उपयुक्त रेगा के एक छोर का उपस्थान मे जाड दीजिये । दूसरे छोर म से लटकी धुरी के सामानान्तर एक रेखा पीचिये । १३ लाट और कोठे की याजुनों में प्रावश्यक जगह छोडकर गोलाइयों बना लीजिये। मा तर 3 का लक्डी की तरह ऐसी होनी ऐसी लकडी हमलो, लाट की ला, चाहिये जिसफा रेशान लकडियों है, पर शामतौर की लफडी भी ५ लगी हो तो के मामले में 11 या ५ पर ।अगर श्रदला पर ~ dि । (३७) तेल की पेराइ में बाट राइ का पानी हाय होता है, स्यापि लपाई से उचालन का लाभ मिलता है। तगन की डडी की तरह लाट भी दो हिस्सा में पट जाती है और कोठे या उपरी किनारा इसका उपस्थान होता है । यह इतनी लबी न होनी चाहिये कि जर काठे से दर निकाली जाय तब निकालने वाले श्रादमी से मादल ही 7 सके। साथ ही जिस मकान में पानी चल रही हो, उसकी छत को ऊचाइ पा भी भान होना चाहिये । पर जा रही है। मफे और पानी खुली जगह में चलाई जाये, जैसा कि दक्षिण और उत्क्ल में होता है, यहा उचाला कायदे से लाभ उठाया जा सकता है। इस रन्यान से लाट १० पीट लयो पनी चाहिये। पर यह बहुत भारी न हा नाय इसलिये जहा तक हो सके इसे उपस्थान भाग के अपर पतली ही, याने करीवरच व्यास की, रसनी चाहिये । घृगते समय लाट रिना धचकों के चलनी चाहिये, नहा तो बोकडी ये उलट जाने का प्रदेशा रहता है। इसलिये लाट ये दाना सिरे और उपस्थान भाग एक सीधी रेगा में होने चाहिये और लार का उपस्थान पर * का भेग भी एरसा याने एक से अर्ध व्याम का होना चाहिये। खराद पर लाट तैयार करने से ये सारी बातें श्राप ही प्राप हो जाती है। लाठ के ऊपरी सिरे के लिये नुकीली होने के सिमा विमी साम आकार या शक्ल की जरूरत नहीं। यह नोक परीर १६" व्यास की रहती है लाट के उपस्याा भाग घे नीचे ही उसमें कुछ नाकार और नार करना पडता है। पहली बात तो यह है मि लाट में उरस्थान के र बनाया जाने वाला खांचा उपस्थान से करीब चार इच ऊपर होना चाहिये। अगर यह फोठे से छू जाता है तो यह कोठे के बाहर लगो हुइ सली को दया देगा और हर पार उसे यहा से निकालना पडेगा। अगर यह साँचा कोठे के ऊपरी हिस्से पर ठहरता है, तो लाट दीवार पर न धूमकर फिसल जाया करेगी। लाट का खाँचा उसे जरूरत के समय बाहर निकालन में महायता देता है। इसके अर एक छोटी सूटी जड देना चाहिये जिस से लाट निकालने में और भी श्रासानी होगी। अगर लाट को यापी बडे कोण पर मुकाना है तो या तो लाट उसंस्थान भाग पर पतली बनानी चाहिये या कोठे का ऊपरी पेरा चौडा करना चाहिये।

( ३८ ) १ समेटनी निलहन मा काठ में समंटने रहने के लिय ममंटनी एक युक्ति है। इसमे तिलहन म्पय ही समेटने की योजना होने के कारण श्रादमी एक साथ सरलता ने दा धानियों की और एक बच्चे की सा से तो तीन घानियों की देखरेख कर सकता है। समेटनी कोठे पर लाट के ग्रागे घूमती है । सम्भ, द्वारा यह लटकाई जाती है । यहाँ वह गम्भ से चाप दी जा और तिलहन को दलने के लिये काफी जोर देने की गरज से इ गरी २० सेर वा शेझ लटका दिया जाता है। इसका वह सिरा जो प्रोसली की दीवार पर घूमता है दीवार तरह का कदार होना चाहिये, ताकि वह बिना रगड़ के धूम अर्थात् समेटनी क शहर के बाजू की गोलाई समेटनी के साचे की वी गोलाई जैसी ही चाहिये । समेटनी का एक सिग तो राम्भ से नधा रहता: है और साच की दीवार पर से गुजरकर साँचे में धूमता रहता है। अर्थात् वह थाहा नहीं धूमना है पर एक कोरा बनाता हुश्रा घूमता है। इसका परि यह होता है कि समेटगी की समूची याद्य गोलाइ स्वाचे की दीपाल- स्पर्श नहीं करती, उमका सिर्फ ऊपरी योण ही स्पर्श करता है जि समेटनी को गोलाई में और साँचे यी दीवार में कुछ जगह छूट जाती खाचे में समेटनी एक कोण पर धूमने के कारण साचे की तली ममेटनी सी तली म भी सामने की थोड़ी सी नोक को छोडकर,

Stirrer Templets
समेटनी के फर्मे
Sketch no. 3
रेखा चित्र नं. ३
रेनार का यह रेखाचिन फितार के साथ मेजा जाता है।

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बनने वाला कोणा मिल सकते हैं । उदाहरणाय, यदि हम इन कोणों को १ T ३६०० होते हैं। इन चार्ग म मे तीमरा समकाण पश्चित है और चाया छूट जाती हैं। ये साली जगह तिलदा से भरी रह जाती हैं और यमेटना का कोई उपयोग नहीं होता। इम लिये समेटनी और साने की दीवार म तथा समेटनी और सोचे की तली म तरा भी साली जगह न छूटे इसकी केक करना निहायत लरूरी है । श्रथात् समेटनी की गोलाइ सोचे की गोलाइ म और उसकी तली गोचे का तली म बिलकुल मिल जानो चाहिये। इसके लिये समेटनी की गोलाइ को कार से लोटना चाहिये। दूसरे शब्दो म रह पात्र उपर से नीचे की ओर ढाल मे छाटना चाहिये पार पर का सिरा शरीर " कम चौडा कर देगा चाहिये। श्रयात् इमस निश्चित प्रमाण तो समेटनी मम्भ पर गिनी ऊची गोधी गई है रलपित रहेगा। तली म की साली जगह का गलने के लिये इसे भा सामने से फेन्द्र की और करीव ३" दलुना बनानी चाहिये । गोलाई को नीचे और ऊपर की चौडाई तथा समेटनी की ततो म ढाल याचिर न० ३ में अनुनम से पमा न० , २ और ३ म दिपाया गया है । ५ बारडी लाट पर दवार दालनेवाले झापाट का रोझ एक वाकडी पर लटकाया जाता है। यह चाकडी लाट में महारे घूमती है । यह पापी मावृत होनी चाहिये, क्योंकि इसमे शराफी भारी पोझ तटकारा जाता है। इस लिये कोई भी मामूली मांटी लाही याम दे सकती है पर अगर वह जल्दी ही खरान दोनेवाली हो तो बार पार पदली पटेगी। इसलिये बबूल की लकी इसमा लाट २ मा पानेराला कोण यह स्वयम् किम काण मे झुकी दुर है इस पर ग्रालमित रहेगा। क्योंकि ये दोनों योग, तीमरा सभा का जमीन से उननेवाला समोश और लाट या मोठे से बननेपाला चौथा योग ये चार मिलकर चौकोन तैयार होता है और चारा काण मिलकर ४ ही टीर दाती है। - भी निश्चित सा ही है क्योंकि वह लाट प्रौर काठे की धुगा से यनो ले कोण या पूरक है ( देखिये रेशाभिमान..)। बचे हुए दो कोणा म हेर फर हो सकता है । यदि गाँकडी का कोण मालूम हा तो हम उसका लाट से

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- (४) '' कोए का पूरफ कोए 'b'- लाट की धुरा और कोठे की धुरा के बीचका कोण = कोण 'b-२१ जहा तक हो सके, जरूरी पोकपाली एक ही लकडी काम में लागी चाहिये जिस से मनायूती कामी हो जाती है। अगर इतनी लबी और याँकचाली लकडी न मिले, तो एक छोटी सी कदार लकडी को दूसरे टुकड़े में जोटकर लगई पूरी कर लेनी चाहिये । जाड लगाकर चौंक भी बनाया जा सकता है। अगर लार लवी रखी जाय तो कभी कभी ऐसे जोद लगाने पटते हैं। चौंकटी पर लटकनेवाला बोझ काफी होता है, इसलिये लाटकी नोम श्नौर पोकही पे गड्ढे में काफी गड होती है । इसे कम करो के लिये इस गद्ढे म थोडा सा सामुन रख दे। चाहियो ६ घोमापाद चैल पर पडनेशाला पोझ खासकर पोझापाट को बनावट पर ही निर्भर होता है। इसकी लम्बाइ, जुए की योजना, श्रोसली के साथ होने वाली रगड श्रादि वात बैल पर पड़नेवाले रोझ घटाने या यदाने का काम करती हैं। अगर हा सर दृष्टि से योझपाट सन्तापजनक अनता है, तो बैल के लिये तिलहन रीर ४ मन का जरूरी दवार दालनेवाले भारी बोझ का , पाचना अामान हो जाता है। पामागाट दो काम करता है। (१) लाट के कारी सिरे पर दबार डालने के लिये के लिये श्रावश्यक बोझ सहना। (२) यह उचालन का काम करता है। इसका एक सिरा एक रस्सिया से चैल के साथ वधा रहता है। यह चैल ही इसकी सीचने की शक्ति है। इसका भोसली के सहारे घूमता रहता भाग उपस्थान बन जाता है, और दूसरे पर जुत्रा लगायाजाता है। इसमें लगा हुआ खम जो लाट के ऊपरी सिरे जोडा जाता है और लो लाट को थारश्यक गति देता है वही लाट की तमाम प्रतिरोध शक्ति सहन करता है।

(अ) उचालन और गति सोझापाट जितना ही अधिक लम्या होगा, बैल को उसके सींचने में उतनी ही सहलियत होगी, क्योंकि लम्बाई से उन्चालन लाम मिल जाता है। पर साथ ही इसे वैत के धूमने का दायरा भी बढ़ जाता है । इसका मतलब यह हुआ कि उचालन लाभ के लिये हम गति सो बैठते हैं जिससे फी धान का समय यद जाता है। इसलिये बैल में घूमने के मेरे और उञ्चालन लाभ का ठीक से समन्वय करना पडेगा। इसके अलारा पानी जिम मकान में चलाई जानेगली हो उसकी चौडाई का भी ख्याल करना होगा। इस तरह यह पता चलता है कि वोझापाट को इतना लगा रखना चाहिये कि उसे बैल श्रासानी से पांच सौ और उसको एक और अत्यधिक न झुकना पड़े। यदि वैल के दायरे का व्यास १६ फट ग्मा जाय तो उपयुक्त सारी शतें पूरी हो सकती हैं। (या) गुआ (१) गुराव की पद्धति का गुजरात और विदर्भ की घानियों को छोडकर त्रैल की गर्दन के सिना जुए को अन्य कोई श्राधार ही नहीं रहता। इमलिये गोलाई म घूमते समय थैल को किसी भी चीन से टिकने की गुजाइश नहा रहती और उसे बिना प्राधार ही एक और अत्यधिक झुरना पडता है। यह जुन्या बोझापाट से वधी और बैल की दोनों गायों से गुनरने वाली दो रस्सियों के सहारे बैल की गर्दन पर टिका रहता है । इसलिये रैल को इन दो रसियों के बीच में घूमना लालिमी होता है । च कि बैल को इस अस्वाभाविक हालत में घूमना पडता है इसलिये उसे अपनी गति और सुकार में का तोल सम्हालने की कला हासिल करनी पड़ती है। नये बैल तोल सम्हाला जल्दी नहीं सीखते और इसके लिये उन्हें करीब १ महीना लग जाता है। इतना करने पर सभी बैल यह खोग्य पाते हों सो भी नही। गुजरात पद्धति का जुश्रा बोझापाट से जुडा होने के कारण पानी चलाने वाले के लिये तकलीफदेह होता है, क्योंकि उसके कारण तेली को पानी के अासपास घूमने के लिये बहुत कम जगह रह जाती है, पर वह बैल के लिये दीर । ( ४३ ) यारामदेह मालूम होता है । इसपद्धति मे जुए के कारण बैल को वाजू मे टिकने के लिये श्राधार मिल जाता है जिससे उसे अपना तोल सम्हालना श्रासान हो जाता है। साथ ही साथ बाहर की रस्सी न रहने से वह थोडा इधर उधर मी हो सकता है। यदि जुए को केवल बैल की गर्दन के ही आधार पर न रखकर सोझा- पाट का भी प्राधार देना हो तो यह जरूरी है कि जुना बैल की गर्दन की ऊचाई पर हो । इसके लिये जुए को श्राधार देनेवाले रोझापाट का सिरा गोखली पर यथासभर अधिक ऊचाई पर घूमना चाहिये । फिर भी यदि कुछ अचाइ कम पडे तो उस छोर पर एक फूट अची यूटी ढीली बैठानी चाहिये । इस सूटी को एक श्राडे नट-बोल्ट से या एक ढीली सूटी से जुड़ा दिया जाता है। गोझापाट की यूटी और उस ग्वू टी से जुना को जडनेवाली सूटी ढीली रखने का सास कारण यह है कि बैल की चाल से इनको मिलनेवाले झटकों का उसके कधे पर कोई असर न हो। (२) मामूली पद्धति का यह करीब सारे देश में प्रचलित है। इसमें एक लम्बी पट्टी रहती है और कुछ रस्सियों और सूटियों के सहारे उससे बैल जोता जाता है। रस्सिया बैल की दोनों बादुनों पर रहती है और उनका एक सिरा जुए से पधा रहता है और दूसरा सिरा बोझापाट से। दोनों रस्सियों को जोड़ने के लियै त्रैल के पेट के नीचे से एक रस्सी लगाई जाती है। बैल की गदन पर जस्म न हो इसलिये जुश्रा यथासभव चौडा रसा जाता है और उसरे और बैल की गर्दन के बीच या तो एक नरम गद्दी या चमड़े की पट्टी रस दी जाती है। इस प्रकार का बोझाघाट यदि बैल की भोर झुका हुआ रसा जाय तो नासानी से चलता है। खम को विरुद्ध दिशा में मुसा हुना रखने से यह बात सधती है। इसका जो सिरा श्रोग्वली से रगडता रहता है उसपर अोवलीपी गोलाई का एक लकड़ी का पाशर बैठा दिया जाता है। विम जाने पर यह बदल दिया जा सकता है। (६) ओरली के साप की रगत पोझागट के एक छोर पर वजन रखने से योगासाट का श्रोसती घे जर बैल का दायरा नमीन की सतह पर होता है तब उसक बनन सोचने की रस्सी पैर से गरदन तक तिरछी रहती है। इस से बैल के बुर पर जो साचार पटता है वह उसकी रीढ मे समानान्तर न होने के कारण बढ़ जाता है। वैल को लगी हुई रस्सी दो बलो का फल है जिसमें से एक पैर से रीट तक और दूसरा रीढ से गरदन तक रहता है। इन में से हम केवल रीढ से गरदन तक का समानान्तर यल ही उपयुक्त पाते हैं। होकिन पैर से रोढ तक का बल न येवल बैल पर अधिक जोर डालता है वरन् वह मोझापाट के एक सिरे पर के योग को ऊचा उठाकर उसकी कार्यक्षमता भी कम कर देता है। पाईदार दायरे से हम पैर से रीढ तक के बल को निकान देते हैं और केवल रीढ से गरदन तक के समानान्तर पत को उपयोग में लाते हैं जो कि बोझ खींचने की रस्सी की दिशा में काम करता है। रमाई के अलावा, पाकडी और खम के पोच की रस्सी की लबाई को कम करने से भी समानान्तर बल को चैल के रीढ के करीब लाने में सहायता मिलती है। इस तरह समानान्तर ल को रीढ ये करीब ऊचा उठाने पर रस्सी वे बीच में स्मिन्ग बैलेन्स लगा कर देखा तो कुल करीम ६० से ८० पौड के खिंचार में से कम से कम १० पौड का खिंचाव घट जाता है।

कमाफ उपयोग बबूल, कुसुम, मेग ४. पानी कैसे बनाना साधनों की फेहरिस्त [अ] लकड़ी जात विशेपता नाप १ ओखली इमली, शिरीष, नीम पानी साईहुई, ठोस लबाई ५' से ५३" मटहल, आजन, मेरा और सीधी व्यास २३"४२३ बबूल २ पाचर बबल या कुसुम काफी सीवी और ल्बाई १८" बिना गाठवाली ध्यास १७" ३ लाट पानी साई हुई, सीधी स्वाई ९ से १० और विना गाठवाली ध्यास ८" ४ समेटनी बबूल, कुसुम १३'४५"x४' कोई भी लकड़ी ४६४३"x ३ ५ समेटनी काई भी लक्ती परीब १० मेर का वजन ६ बावडी बबूल या अन्य कोई बृहत कोण में लवा भाग ४' कडी रक्डी झुकी हुई छोटा भाग १ ७ बोझापाट (अ) गुजराती पतिका बबूल या अन्य कोई लनडी ४६ से९' रची १ से १३चौड और २३"मोटी उचालन दड पोई भी लकड़ी मामूली गोर लकडी १२४५°४५" ६x६"x६" ५'४४"x४" जुआ गोडपट्टी ३४३"३" खभ दड " भर ( ४८ ) (भा) मामूली पद्धति का घासर सागोन या अम कोई लकडामेर २' लबी,४ चौडा जो मोसली की लकडी से नरम हो और ३" मोटी जुआ सागोन-पुराना और ९" मोटा ८ मोहरी कोई भी लकडो १०"x४"४४" सूटी वोई भी लबाडी छोटी बाशीके समान लबा छोर। छोटा ३" से ४" क्रमाक १ । २ [अ] अन्य आवश्यक चीजें नाम प्रयोजन वर्णी डका मुहरी साफ रखने के लिये लयाई १६ परिधि१" खरी खोदने के लिये ल्याई२३ अष्टकोनी" तराजू और बाट पीपे तया वाल्टिया सेल और मली रराने के लिये हरएक की एक एक फापडा गोपर हटाने के लिये जोड़ी घमेले बल कोखली सिललो के लिये छन्नी तेल छानने के लिये रस्मे खमको बाकडीसे बाधने के लिये लबाई १२' मोटाई१" पानी वा नाप तिलहनमें पानी डालने के लिये ३० तोले मिकदार का ५ - 1 धातु का वर्तन आख पटा बैल की आखोपर बावके लिये छोटी टोकनियोपर टाट मढकर बनाई जाती है ११ दो टीन की तश्तरिया , (१) तेल के यतन के नीचे गड्ढे गड्ढे के नाप वा में रखने के लिये (२) बाहर के तेल के वर्तनो के नीचे रखने के लिए ओपली पर बैठाने के लिए ओखली ये ९x४ १२ रोहे की रिंग गा, टाट पषिट सामान ३ पौंड,२ १ ३ वस्ले (४९ ) [१] बढई के औजार १ झुका हुआ और गोल १ सपाट और गोल १ मपाट १३" व्यासवाला, मूठ को करीब ११' का जोड दिया हुआ १." व्यासवाली, चाभी को कसते समय मुहरीमें रखने के लिये, जिसमे फापर अपने स्थान में रहे। २ वरमा ३ सलाख ४ रुखानिया ५' दो आरिया १ बडी, १ छोटी गोनिया ८ खराद ९ सतपस परकाल, साबुल रेखाचिन न० २ ने आधार पर बनाए हुए [ई] बढई की मजदूरी आवश्यक दिन धामीका हिस्सा पढईके लिये मजदूरके लिये वर्धामें कुल मजदूरी (युद्धपूर्व के दर से) मेमाक क० आ. पा. १ २० . . सपूण बानी २ अोखली १० १४ . . ३ फाचर १ ९ . . १ ३ . . - . . लाट बोझापाट समेटनी बाकडी आदि फिटिंग और फुटपर ०१२ . ७, ०१२ . ८ ३ २

1
( ५०)
०. बनावट
[ देखो रेखाचित्र न १]
१. ओसली
(१) लकड़ी के दो सिरे प्रारी से सीवे काट डालो।
(२) अधिक चौह सिरे के एन फुट नीचे - कुरीत्र . पृट नीचे तक
बाहर का पृष्ट माग चिका और कुछ उतरता हुयां ऐसा बनाये । यह उतार
बिलकुल गोल और चिकना होना चाहिये क्योंकि इसी के श्रासपास बोभावार
घूमेगा और यदि वह गोल और चिकना न होगा तो उसका बोझापाट के साथ
का घर्षण बढ़ेगा और लाट को भटके मिराते रहेंगे।
(३) जमीन में गाडे जाने वाले निचले सिरे पर डामर और रेत लगा
देनी चाहिये । जमीन में गाटने समय यह बिलकुल सीधा गाडना चाहिये और
इसका ऊपरी पृष्ठभाग बिलकुल सपाट होना चाहिये। जमीन के कार इसका
क्रीन २ फट का भाग रहना चाहिये।
(४) उपरी पृष्ठभाग का केंद्र निकाल र उम पर " frज्या का
एर वृत्त स्वीचिये।
(५) इस पूरे वृत्त को वेलने के आकार में २१" तक सोद लिये।
इसका व्यास १६" रहे । इसकी जाँच करने के लिये साहुल को ऊपरी भाग
पर इस प्रकार जमाइये ताकि उसका केंद्र गइहे के केंद्र पर ग्रावे। अर उसकी
रम्सी में गइहे की त्रिज्या प्रितनी याने ८" लबी लकडी बाधकर उमको चारों
ओर घुमाकर देखिये । गहे की दीवालें और पेंदी गोनिया में है या नहीं यह
भी देख लीनिये।
(६) अब पतरस से इस गइहे के
गोलाइ में पांच दीजिये । श्रर इसका पृष्ठभाग
ग्बोद देना चाहिये तानि ऊपर १६. ऊँची श्र
गोदने समय यह, रयाल रखना चाहिये
दुलार म हो।

UGERA
रेखा चित्र नं SRETCH No1
16-
48"
TRON
BAND
नोहे पीमिग
*
REPLACEABLE
PART
फार
प्रमाण
SCALE IN=1"
.
DRAIN
CHANNEL
मुहरीकी नाली
मोखली कुड, मुहरी
-

२. बनावट [ देसा रेग्पाचित्र न १] १ पोसली (१) लाडी के दो सिरे यारी से मीचे पाटालो। (२) अधिक चौटे सिरे के एक पुट नीचे करीब ६ पट नाचे ता बाहर का पृष्ट भाग चिका और कुछ उतरता हुयां ऐमा बनाइये । यह उतार शितल गोल और चिकना होना चाहिये क्योकि इसी के ग्रामपास नोभापार घूमेगा और यदि यह गाल और चिकना न होगा तो उमझा बोझापाट के साथ का धर्षण बढेगा और लाटको माटो मिलते रहेंगे। (३) अमीन म गाहे जाने वाले निचले मिरे पर डामर और रेत लगा देनी चाहिये । नमीन में गाउने समय यह बिलकुल सीधा गाडना चाहिये शौर इसका ऊपरी पृष्ठभाग पिलाल सपाट होना चाहिये। नमीन के कार इसका करीब २, पृट का भाग रहना चाहिये। (४) उपरी पृष्ठभाग 1 पेंद्र निकाल कर उस पर " निच्या या एम वृत्त पीचिये। (५) इस पूरे वृत्त का बेलो के श्राकार म २११" तक सोद बालिये । इसका व्याम १६" रहे । हमकी जाँच करने के लिये साहुल को ऊपरी भाग पर इस प्रकार जमाइये तागि उसका केंद्र गड्ढे के केंद्र पर साव । अर उसकी गम्मी मे गड्हे की तिच्या नितनी याने " लेवी लकडी बाधकर उसको चारों श्रोर घुमाकर देखिये । गट्टे की दीवालें और पेंदी गोनिया में है या नहीं पर भी देग लीजिये। (६) अब सतम्स से इस गहे के नेस से २" नीचे एक लकीर गोलाई म सींच दीजिये । श्रर इसका पृष्ठभाग, जो इस समय सपाट है, कुछ चोद देना चाहिये ताकि पर." ऊँची और १६" चौडी किनार रह जाय । चोदते ममय यह रज्याल रखना चाहिये कि वह केन्द्र के तरफ {" दलार में हो।

(७) शर ग्रेपली पे फार नाहर पीनार से एक लादे की रिंग जद्द देनी चाहिये और लकडी पोर रिंगरे पानी जगा हा तो उमन परचिया ठो देनी चाहिये। सूचना --यह रिंग जदने के पहले प्रोग्गली का बाहरी पृष्ठभाग जितना अधिक से अधिर गोल और चिकना गाते ने उनना बनाना चाहिये, पर ऐगा परने के लिये यहुत पारीकी TEL कसी चाहिये क्योंकि यदि साली जगहेर जायें तो वे पपच्चियां से भर दी जासक्ती हैं। लकड़ी का चुनार करते समय यह ग्पाल म रगना चाहिये कि पेमे गइहे २" से अधिर चौडे न हाँ। • फोट) [देग्विये खा चिर्ष २] (1) पहली पनि (१) १७" व्यास या १८" ला एक पका सीधा और गाठहीन लकडे का टुण्डा लीजिये । उसो सामान्य गोल कर लीमिये और खराद पर 'लगाार १६" व्यास रस कर गोल बना दीजिये। (२) टीक कुड सी गहराई कितनी लगाई अथात् १७" रसकर दोना सिरा से काट लीजिये। (३) एक की ऊपरी सतह पर मध्यबिन्दु से ७" विज्या का एक वृत्त साचिये । और उसका एक व्यास साचिये । व्यास के एक सिरे पर दोनों ओर परिधि पर १" दूरी पर दो रिन्दु, लीजिये। ये और इन दो पिदुओं से दो त्रिज्याग्रा की रेखा सीचिये। लकडे को व्यारा यी रेखा के अनुसार सीधा पडा काट लाजिये और बाद म दोनों भागों में से त्रिज्या को रेगा के अनुसार काट लीजिये। इस प्रकार दो। पाचरों में से ३" लकडी फाटकर चाभी के लिये जगह की जाती है। (४) दो पाचरो के सपाट पृष्ठभागा पर बिल्कुल पांच में लगाकृति रेसाएँ खाचिये। श्ररथ पकडई पर्मा मपाट पृष्ठभाग पर इस किस्म से रसिये कि पमें की सीधी रेसा लर पर श्रारे। पम को लर की दोनों बाजुत्रों पर गिराकर अक्स कीजिये तो रेसाचित्र न २ बन जायगा।

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- (७) मगर गली में ऊपर बाहर सी भार से एक लाहे की ग्गि जड देनी चाहिये और लाडी पोर रिंग के कनीमानी जगह हा तो उममें पपच्चिया ठोक देनी चाहिये। सूचना--यह रिंग जदने र पहले योगली का बाहरी पृष्ठभाग नितना अधिक से अधिर गोल और चिक्ना बनाते बने उतना बनाना चाहिये, पर ऐमा करने के लिये बहुत गरीकी नही करनी चाहिये क्योकि यदि कही साली उगहे रद जाय तो वे गपच्चियां से भर दी जासक्ती हैं। लकडी का चुनार करते समर यह ज्यान में रपा चाहिये कि ऐसे गहे २" से अधिर चौडे न । २ कोठ) [दग्विये खा चिर्प२ (१) पहली पद्धति (१) १७" व्यास का १८" लग एक पक्का सीधा और गाठहीन लकडे का टुक्डा लीजिये । उसको सामान्य गोल कर लीमिये और खराद पर लगार १६" व्यास रस कर गोल बना दोनिये। (२) टीक कुइ की गहराइ नितनी लगाइ अर्थात् १७" स्पकर ना सिरी से काट लीजिये। (३) एक की ऊपरी सतह पर मध्यबिंदु से ७" विज्या गा एक पाचिये। और उसका एक व्यास सीचिये । व्यास के एक सिरे पर गांधार परिधि पर १" दूरी पर दो मिदु लीजिये। ये और इन दा पिन्दुओं से दो त्रिज्याग्रा की रेसा नीचिये। लफडे को व्यास की गेगा अनुसार सीधा खड़ा काट लाजिये और बाद में दोनों भागों म मे पिया को रेखा के अनुसार काट लीजिये । इस प्रकार दोनों पाचर में मे ." की काटकर चाभी के लिये जगह की जाती है। (४) दो पाचरों के सपाट पृष्ठमार्गों पर पिल्लन याच म लगानि रेसाएँ खाचिये। अब भ प फ डई' पर्मा सपाट पृष्ठमाग पर इस किस्म से रखिये कि पमें की सीधी रेसा लब पर श्रावे। पमें काला की टाना बानुनी पर गिरार अक्स कीजिये तो रेखाचित्र न २ यन जारगा।

। ( ५२ ) (५) ऊपर बताये मुतारिक खींचा पाचर पर का कोठे यात्राकार और उसकी सतह पर सीचे वृत्त का अन्दाज लगाकर प्रथम छाती का भाग तैयार कीजिये। (६) गरदन की रेसा पर फर्भा 'ई फ' (रेसाचिन न २) की मदद से गरदन के अर्धन्यास के समान गहरा गड्डा करना । फाचर पर ग्वींचे गरदन के दोनों ओर के बिन्दुओं को जब कि यह फर्मा एक साय छूये तब रसोदा हुअा गड्हा ठीक समझा जायगा। (७)उसी तरह छूट के रेसा पर छूट के अर्धव्यास के समान गहा करना। यह गडहा करने में पेट की दीवाल छोलते जाना और गड्हा गहरा करते जाना। (८) फर्मा 'ड क ग' की मदद से दोनों फाचरों में तली का ढलार कर देना। (६) नाखीर में पर्मा 'अ ब क ड ई' की मदद से दोनों फानरों को पूरी चौडाई पर मिला लेना। (१०) तीसरी छोटी फाचर को हम चाभी कहेंगे। चाभी का मत्या रसना यानी दोनों पाचरों से करीब २" लम्बी और सिरे पर करीर २" मोती रखना । चाभी कस देने के बाद नाप से ज्यादा लकडी काट डालना। इम चाभी को दोनों पाचरों के बीच में जितनी साली जगह है उतनी ही चौडी करना। चामी इस तरह से तैयार की जाती है। दानो फाचरों के समान परिधि लेकर उसके पिछले भाग को तैयार कीजिये। फिर दोनों पाचरी म से कटे हुने डेढ २ इच के दो टुकड़ों को एक साथ मिला कर के इस ने सिरे पर रखिये और दोनों पगलो के दलाव के निशान कीजिये। इस दलाव की दिशा में चाभी के दोनों बगलों के दलान कीजिये । मत्या रख कर बाकी के हिस्से में दो कारों के समान श्राकार कर दीजिये । (११) अर फाचर को कुड में रसकर रेखाचिन न० १ में बताये मुताविक मुहरी सोदिये। 'अ' बिन्दु फाचर की ऊपरी सतह, जो कुट की ऊपरी सतह से ४॥" के बराबर एपना चाहिये। परमे को ४५. के कोए पर रस्पकर चलाना चाहिये । 'ब' रिदु जिसे पाचर मे छेद गिराते समय नीचे रहती

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मगनबाडी पानी का कोटा कैसे बनाना ( ५३ ) घरमे की नोक रखनी चाटिने, पाचर के काणे से ३" की दूरी पर है। रमे की नोक ठीक उसी पिन्दु पर रखने में रुकावट पाती हो तो 'अ' हिन्दु रे पाम नाली में याडी जगह कर लनी चाहिये जिससे कि रुकावट मिट जाये। सूचना पाचर म छेद गिराते समय यह इधर-उधर घूम न जाय इस लिये उसके और कुड के बीच में ऊपर नीचे दो मकडी पी पियों को राग्न क्स देना चाहिये। नीचे की पट्टी करीन ८" लबी तथा ऊपर की पट्टी करीन १६" लवी रहेगी। (१२) मुहरी के छेद के बिल्कुल नीचे रे भाग में स्वाचा करक एक लकड़ी का टुकड़ा जिस की पूरी लगइ मे अर्धचम के आकार की एक नाली मोदी गई हो, लगा देना चाहिये। (१३) कुड की दीवाल में भीगा चूना पोतना और गुणटाट लगाना। छेद का स्थान देसर दोनों पाचर कुड म रसना । दोनों फाचगें के बीच में दुपट गुणटाट रखना । चाभी के दोनों उगल थोडा तेरा लगाकर क्स देना। सुचना - चाभी क्सने समय छेदवाली पाचर इधर-उधर घूमन जाय इसलिये १६" वाली सताय नीचेकी शोर से पाचर ये छेद में से पसार हो इस तरह से मुहरी मे तग रख दीजिये। (२४) तली की पाली जगह म छोटी २ पाचरें भरकर तली साफ कर लेना । कोठे की दीराल पर बाहर रहनेवाले टाट को तथा चाभी रे मत्ये को काट कर कोठे को साफ कर लेना। (१५) रेपाचित न० १म बताये मुताबिक कु ड २३" गहरा बनाया गया है। याले की दिनार तथा ढाल के बाद कु ड १६ गहरा रहता है। इसमे १७" लबाई की पाचर विठाने के बाद २१" ऊचा और १" चौडा साचा रह जाता है। इस खाँचे को १" अधिक चौडा बनाइये ताकि उसका व्यास १८" का हो जाय। इस तरह १' चौडा तथा २" ऊचा समेटनी का साचा बन जाता है। (१६) तेल के बरतन के जमीन के अंदर गड्ढे में रखे जाने के कारण नोखली का वह भाग खुला रहता है । इसलिये गड्ढे को तीन तरफ की -- मगनवाडी घानी का कोठा कैसे बनाना परमे की नोक रमनी चाहिय, पाचर के काणे से ३" की दूरी पर है। परमे की नोक ठीक उसी पिन्दु पर रपने में रुकावट आती हो तो 'अ' रितुरे पास नाली में पाडी जगह कर लनी चाहिये जिससे कि रुकावट मिट जाये। मूचना पाचर में छेद गिराते समय यह इधर-उधर पृम न जाग इस लिये उसके प्रौर कुड के बीच म ऊपर नीचे दोलकडी पी पियों को सख्त क्स देना चाहिये। नीचे की पट्टी करीव ८" लबी तया ऊपर की पट्टी वरीप १६" लयी रहेगी। (१२) मुहरी के छेद के बिल्कुल नीचे के भाग में खाचा करपे एक लकड़ी का टुकडा जिस की पूरी लगाई म अर्धचा ने श्राकार की एक नाली सोदी गई हो, लगा देना चाहिये। (३) कुड की दीवाल में भीगा चूना पोतना और गुण्टाट लगा।। छेद का स्थान देसफर दोनों पाचर कुड में रसना । दोनों फाचगे के बीच में दुपट गुण्टाट रखना । चाभी के दोनों अगल थोडा तेल लगाकर कस देना। सूचना -चाभी क्सते ममय छदवाली पाचर इधर-उधर घूमन जाय इसलिये १" वानी सलाग नीचेरी श्रोर से पाचर के छेद में से पसार हो इस तरह से मुहरी में तग रख दीजिये। (१४) तली फी साली जगह म छोटी २ पाचरें भरकर तली साप कर लेना । कोठे की दीगल पर बाहर रहनेवाले टाट को तथा चाभी के मत्ये को मट पर फाठे को साफ कर लेना। (१५) रेणाचिन न. १ म बताये मुताविक कुड २६ गहरा बनाया गया है। याले की किनार तथा दाल फे राद कुट १६ गहरा रहता है। इसमें १७" लगाइ की पाचर मिठाने के याद २१" ऊचा और १" चौडा साचा रह जाता है। इस साँचे को १" अधिक चौडा बनाइये ताकि उसका व्यास १८" का हो जाय। इस तरह चौडा तथा २" ऊचा समेटनी का खाचा बन जाता है। (१६) तेल पे परतन के जमीन के अंदर गड्ढे में रखे जाने पे कारण भोसली का वह भाग खुला रहता है । इसलिये गदे की तीन तरस की " मगनपाडी घानी का कोठा कैसे बनाना

(७) चाभी करा देने के बाद देर का स्यान देनफर तली कम देता।
पदली पद्धति रे झम १४ ये अनुसार कोटा नैयार करना और प्रम १५ २
श्रनुमार समेटनी कानारामा
(६) तीसरी पनि
यदि थड की लकडी ठोस हो तो पहली बार बिना पाचर का कोटा
रनार र दा साल चलाने में पाद घिम जाने पर उसको मुटु ये नाप से योद
कर उसम पहली या दूसरी पद्धति पे अनुसार पाचर चैटा र काठा तयार किया
जा सस्ता है। इससे उड तैयार उरने की मेहनत म गोठा तैयार हो जाता है
और शुरू में पाचरों पे नैयार करने का पनं च नाता है।
(१) थाले पर मध्यनिदु मे गरदन, काठ का जारी किनारा पार
सभेटनी के रसाचे थे उस्म से ७१', " और " व्यास न वृत्त ग्वीचो ।
पहले ७३" का गरदा ा वृत्त १४३" मीधा गहरा गादना। रेग्पाचित न० १
के क्रम ६ में पाने श्रनुसार माला तैयार करना ।
(२) १४" ने न का अन्दाज लगाकर काठ की छाती तयार करना
निममे गरदन के नीचे या पेट का भाग पाटने म ग्रासानी होगी।
(३) काठे के नाप रे अनुमार पट की दीपाल श्रार तली या दलार
कर लेना। श्राग्नीर म पमा अबकडई को लेकर तली का ढलार, पेट और
छाती की दीपाल रे माथ मिलाार तीनों की कमान देन लेना कि ठीक है
या नहीं।
(४) नाचित्र न. १३ नम १५ मे पापे अनुमार छाती को दीवाल
में मुहरी खोदना।
(५) समेटनी का याचा ना लेना।
.
३ लाट
रचनाक्रम
(१) लकडी म जा बेढगापन हो उसमे रावर करके उसके
पर उसे वरीप" व्यास की रसद ।
(२) लकडी के दोनों सिरे श्रारी से सीधे
सूचना दोना सिरो में से उस मिरे को

। दीपाला को मनन्त नाने के लिये (एF तरफ तो योग्गली ही की दीगल रमती है) उनमे पडे बटे पत्थर से चौके जोड देने चाहिये या लकडी लगा देनी चाहिये । (आ) दूसरी पद्धति यदि १७" व्यास का लकटा मिलना ममा न हो तो ५ या ६ पाचरा का कोटा तैयार किया जा सकता है। (१) नब्ल या कुसुम के चार पक्के राकडे लीजिये जिनकी लबाड १६" और व्याम करीन १२" हो। प्रत्येक लण्डे को उसकी व्यास रेना पर मे सीधा काट दीरिये। उसने चोडे माग को कु की दीवाल ने भाथ पिठाने के लिये तैयार कीजिये। (२) पहले पाचर को कुड में स्थिर रखने के लिये उसकी गल म एक छोटा कीला लगाना। (३) पहले पाचर को कुर म रक्को और कुड ने व्यास के दाना सिरों पर दो याचे (१" लम्बा १" चौडा और ४३" गहरा) काटकर उस पर महाल पट्टी रक्यो । सहारल पट्टी के मध्यविन्दु से कुड की दीराल को छूते पाचर के शना उपरी सिरों के साथ जोड़नेवाले 'अर्धन्यास के दुलार में फाचर की दो गलों को काट लेना और रन्दा से साफ कर लेना। मध्यविन्दु से फाचर के सिरे पर ७" अर्धव्यास का हत्त पींचा। (४) पहली पद्धति के प्रम ४ से ६ तक मे बताने के अनुसार फाचर तैयार करना । फर्क फेवल इतना है कि फाचर को तली ने भाग म गरदन की अपेक्षा एक सून अधिप मोटी रमना । रचना --एक पाचर इस तरह तैयार होने के बाद उसकी गल दुमरी रखना और उसको कुड की दीगल और तैयार पाचर की दीपाल से मिलाकर उम पर तैयार पाचर सींच लेना पार उम ग्राकार के अनुसार उसे ना लेना। (५) पद्दलीपनि के क्रम १० अनुमार चाभी तैयार करना । (६) चाभी कसने से पहले फमा 'डकग' को मदद से ७" व्यास की तली तैयार करना और पहली पद्धति के प्रम ११ के अनुसार उसमें मुहरी का छेद गिरा और कम १२ और १३ के अनुसार चाभी कस देना। में ( ५५ ) (७) चाभी क्स देने के बाद छेद का स्यान देसकर तली कस देना। पहलो पद्धति के प्रम १४ के अनुमार कोठा तैयार करना और कम १५ के अनुमार समेटनी कामाचा बनाना। (इ) तीमरी पद्धनि यदि थड की लकडी ठोम हो तो पहली बार पिना पाचर का कोठा पनार एक दो साल चलाने के बाद घिम जाने पर उनको कुड के नाप से सोद कर उसमें पहली या दूमरी पद्धति के अनुसार पाचर पेंटा र कोठा तैयार किया जा सक्ता है। इससे कुट तैयार करने की मेहनत म कोठा तैयार हो जाता है और शुरू में पाचरों से तैयार करने का पर्न रच नाता है। (१) थाले पर मध्यबिन्दु से गरदन, काठे मा जारी किनारा प्रार समेटनी के साचे के अनुनम से ७३", १४" पार १८' व्याम 7 वृत्त खीचो। पहले ७३" का गरदन या वृत्त १४६" मीधा गहरा योना। रेयाचित्र न० ५ के मम ६ मे बताने के अनुमार शाला तैयार करना । (२) १४" के हत्त का अन्दाज लगाकर साठे की छाती तैयार करना जिसमे गरदन के नीचे का पेट का भाग सोने में अासानी होगी। (३) काठे के नाप के अनुसार पेट का दीपाल और तली का ढलान कर लेना । पासीर म पमा अनकाई को लेकर तली का ढलार, पेट और छाती की दीपाल के साथ मिलाकर तीनों की कमान देख लेना कि ठीक है या नहीं। (४) रेखाचित्र न. १ के क्रम १५ मे बताये अनुमार छाती की दीवाल म मुहरी खादना। (५) समेटनी का ग्नाचा ना लेना। + लाट रचनाक्रम (१) लकडी म जा वेदगापन हो उमन परार करते उसरे एक मिरे पर उसे करीब ८" के व्याम की रपद । (२) लकडी के दोना सिरे श्रारी से साधे काट दानिये । रचना दोन सिरों में से उस मिरे को, जा गि गाटा या लकडी की दूसरी बुराईयों की वजह से कुछ कमजोर हो, ऊपर का नोकीला सिरा बनाने के लिथे छोड दीजिये। (३) नीचे के मिरे की तली पर मध्यविन्दु निश्चित करने कोइ भी एक व्यास सीचिये। (४) इस व्यास परसे पसार होती हुई एक रस्मी को इस तरह पसार होने दीजिये जिससे कि रस्सी की दोनों बाजुओं पर श्रापश्यक मोटाई का लकडा बच जाय । यह मोटाई तली से ६" तक ७१" की तथा उसके बाद उपस्थान भाग तक ५६" की रहती है। (५) रस्सी को तग सीचकर दूसरे सिरे की तली पर उसे पसार होने दीजिये । और उसकी दिशा म पेन्सील से लकीर खींच लीजिये। (६) पहले सिरे की तली पर प्रथम व्यास मे काटकोण बनाता हुआ दूसरा व्यास नीचिये। (७) ऊपर बताये मुतानिक लाट के उपस्थानभाग तक की मोटाई को देखते हुए रस्मी को इस दूसरे व्यास पर रखकर लाट की गोलाई पर से पसार होने दीजिये और उसे तग सीच कर दूसरे सिरे की तली पर रम्सी की दिशा में लकीर खींचिये। (८) दूसरे सिरे की तली पर भी इन दोनों लकीरों का मिलनबिन्दु लाट के उपरी सिरे का मध्यविन्दु ग्नेगा। (६) दोनो सिरों की तलीग्रों में निश्चित किये बिन्दुगा से लाट । को खराद पर लगाइये। (१०) नीचे के सिरे पर ४" तक ७१" व्यास की मोटाई बनाइये । इस रिदु से १३" की दूरी पर ५६" व्यास की मोटाई बनाईये और इन दोनों मोटाईयों को एक सीधे ढाल में जोड दीजिये। (११) ५३" का यह व्यास १२" तक चालू रसिये और उसे ३" तक और बढाईये जहा मूल लकडी के साथ एक सीचे साचे से उसे जोह दीजिये । (१२) फर्म ड क ग (रेखाचित्र न. २) की सहायता से लाट की खली का दलार बनाइये। (१३) योठे की छाती मे पेट में तेल जाने के लिये लाट के उम भाग में ( ५७ ) जो कि कोठे की गरदा पर घूमता है एक बाजु पर दालू गड्डा-सा यना लीजिये जो कि करौष ४" लम्बा, १" चौडा और " गहरा हो। (१४) लाट को उठाने में सहायक हो इसलिये उपस्थान भाग से करीय " कार की तरफ लाट में एक यूटी लगा दीजिये। (१५) ऊपर का सिरा करीरह" नीचे से लेकर इस तरह दालू बनाइये ताकि नोक करीव १६" व्यास की रह जाय । इस नोक का मध्यबिन्दु खराद पर लगाया हुआ बिन्दु ही रहे। ४ समेटनी (देखिये रेखाचित्र न. ३) १ १३' लम्बा, " चौडा तया ४" मोटा बबूल या दूसरी मजबूत लकडी का टुकड़ा लीजिये। लक्डी की चौडाई पर तली में फर्मा न. १ की घहायता से अन्दर तथा याहर की गोलाईयों का याकार सांचिये और लकडी का गोलाई के मुताबिक तैयार कीजिये। २ फर्मा न. ३ को लकडी की अन्दर की गोलाइ की दीशल के साथ रखकर पर्मे का श्राकार खींचिये और दीवाल को उसके मुतारिक तैयार कीजिये । ३ फर्मा न० २ को लकडी की ऊपरी सतह पर इस तरह रखिये ताकि फर्मा तथा लकही दोनों की श्रदर की गोलाईयां मिल जॉय । लकडी पर में की बाहर की गोलाई सोंच लीजिए और उस गोलाइ को तली की बाहर की गोलाइ सीधे दाल में मिला दीजिये। ४ इस तरह तैयार हुये समेटनी के मुखभाग को लम्चे दडे के साथ नोड दीनिये। - ५ बाकडी प्रकरण चौये में दी हुई श्रापश्यक साधनो की फेहरिस्त के मुताविक बाकडी की लकड़ी पसन्द करके उसमें प्रकरण तीसरे में प्राकृति सहित बताये मुताबिक लाट के कारी नोक के लिए छेद कीनिए । ६ चोमापाट साथ में दिये हुए रेखाचित्र न० ४ और न० ५परसे बढई को गुजराती तथा मामूली पद्धतिका पोझापाट पनाने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन मिल जायगा ।

गुजगती पद्धतित
योझापाट
रेसाचित्र न.४
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MALINE
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रेखाचित्र न. ५
मामूली पद्धतिका बोझापाट
।

५, प्रतिष्ठापन और मरम्मत १. पानी का प्रतिष्ठापन (१) अोखली को उसकी कमर में एक खाचा किया है वहा तक याने करीब २ जमीन के ऊपर रसकर मजबूती से सीधी गाडना चाहिए। यह सीधी गडी है या नहीं यह देखने के लिये मुहरी को कपड़ा ठूसकर वन्द कर लिया जाय और भोसली में पानी भर दिया जाय । यदि फाचरों की सतह के परापर पानी की सतह श्रा जाय तो समझ लेना चाहिए कि श्रोसली सीधी गडी है। (२) मुहरी के नीचे तेल के यरतन का गड्दा करना चाहिए । इस गड्ढे से श्रोखली का नाधार ढीला न हो जाय इस तरह गड्हे को मजबूत पनाना चाहिए। याने मुहरी के नजदीक दो वाजुनों पर श्रोसली में किये गये दो खाचों में दो पटिये रसकर दोनों को सहारा देनेवाला एक तीसरा पटिया रखनी चाहिए। (३) बोझापाट का पोसली के सहारे घूमनेवाला सिरा अोखली पर ऊँचा उठकर श्रासानी से रिना घर्षणा के घूमना चाहिए । सभ के साथ लगाई गई फाचर को तग या दीली करने से यह हो सकता है। (४) सभ के बाहर बोझापाट पर करीव ४ मा का बोझ रखा जाता है। सरसों या राई की पेराई में यदि सली न जमती हो तो कुछ समय के लिये पोझा थोटा कम कर सकते हैं। (५) पान सतम होने पर वोझापाट को एक स्टल पर रख देना चाहिये । दो धान के बीच में बैल को थोडा आराम देना चाहिए। (६) जुश्रा और नोझापाट के बीच में की रस्सी करीन ७ फुट लम्बी रहनी चाहिए। (७) समेटनी का गोलासाला सिरा कुड के हाशिये पर रसकर उसका दूसरा सिरा पाट के सभ में सीला ठोक कर उस पर टाग देना चाहिए । और उस सिरे पर करीब दस सेर का वजन घटका देना चाहिए । (८) मोहरी की नाली में एक सटकर बैठने वाला लोहे का डा डालना। - । 7 +

चाहिए जो कोठे की तली से एक सूत नीचे तक रहे । डका कोठे के अंदर
कभी न घुसना चाहिए । जा उसे ठोककर बाहर निकालना हो तब चैल को
ऐसे स्थान पर खडा रखना चाहिए जिससे लाट मुहरी के छेद की दूसरी ओर
रहे और मुहरी का मुंह खुला रहे । काठे का तेल साफ हो जाने पर डके को
दो तीन बार जोर से अन्दर ठोकना चाहिए जिसमे मुहरी के ऊपर जमी हुई
सली फूट जायगी और तेल उतर आयेगा।
(६) श्रोसली के श्रासनास ३ फुट की जगह छोडकर चैल को धूमने
के लिए करीब १३ फूट गहरी और २६ फुट चौडी खाई बनानी चाहिए ।
(१०) तेल के यरतन को धूल ग्रादि से बचाने के लिए उस पर एक
पटिया दाम र रसिये ।
२ घानी की मरम्मत
सूचना-नीचे जो ग्यन दिया जाता है उसमें छाती से मतलब है,
कोठे का ऊपरी हिस्सा, गरदन से मतलब है मध्य का तग हिस्सा, और पेट से
मतलब है कोठे का निचला हिस्सा।
(१) लाट के दोष।
(अ) लाट का कोठे के उपस्थान पर विना आश्रय लिए घूमना ।
(श्रा) लाट का बाहर उठ पाना ।
(इ) कोठे की छाती पर पूरा दवार न पडना ।
(ई) कोठे की छाती से पेट में जानेवाले तेल के रास्ते का बन्द
.
(उ) लाट का टूटना।
(२) कोठे में सली का असमान बनना ।
(३) मुहरी का भर जाना।
(४) डके का टेढा हो जाना।
(५) वाकडी का पीछे रह जाना।
(६) समेटनी का ठीक काम न देना ।
(७) योझापाट का ठीक तरह से न घूमना ।
मलना।

५. प्रतिष्ठापन और मरम्मत १. पानी का प्रतिष्ठापन (१) ओसली को उसकी कमर में एक खाचा किया है वहा तक याने करीव २F' जमीन के ऊपर रखकर मजबूती से सीधी गाडना चाहिए। वह सीधी गडी है या नहीं यह देसने के लिये मुहरी को कपडा तूसकर वन्द कर लिया जाय और नोसली में पानी भर दिया जाय । यदि पाचरों की सतह के बराबर पानी की सतह श्रा जाय तो समझ लेना चाहिए कि श्रोसली सीधी गडी है। (२) मुहरी के नीचे तेल के बरतन का गड्ढा करना चाहिए । इस गड्ढे से श्रोखली का श्राधार ढीला न हो जाय इस तरह गड्हे को मजबूत बनाना चाहिए। याने मुहरी के नजदीक दो वाजुनों पर बोसली में किये गये दो खाचों में दो पटिये रसकर दोनों को सहारा देनेवाला एक तीसरा पटिया रखनी चाहिए। (३) बोझापाट का अोखली के सहारे घूमनेवाला सिरा अोखली पर ऊँचा उठकर श्रासानी से पिना घर्षणा के घूमना चाहिए । सभ के साथ लगाई गई फाचर को तग या दीली करने से यह हो सकता है। (४) सभ के बाहर बोझापाट पर करीव ४ मा का बोझ रखा जाता है। सरसों या राई की पेराई में यदि खली न जमती हो तो कुछ समय के लिये मोझा योटा कम कर सकते हैं। (५) पान खतम होने पर वोझापाट को एक स्टूल पर रख देना चाहिये। दो धान के बीच में पैल को थोडा श्राराम देना चाहिए । (६) जुश्रा और बोझापाट के बीच में की रस्सी करीव ७ फुट लम्बी रहनी चाहिए। (७) समेटनी का गोलाईवाला सिरा कुड के हाशिये पर रसकर उसका दूसरा सिरा पाट के सभ मे सीला ठोक कर उस पर टाग देना चाहिए । और उस सिरे पर करीब दस सेर का वजन अटका देना चाहिए । (८) मोहरी की नाली में एक सटकर बैठने वाला लोहे का डका डालना । y

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--- ( ६२ ) (१) लाट के दोष (अ) लाट का कोठे के उपस्थान पर बिना ग्राश्रय लिए घूमना । (१) अगर लाट तली पर अधिक चौडी है तो वह इतना काफी नहीं । मुकेगी कि कोठे के उपस्थान को छूकर घूमें इसलिये उसका पूरा दवाव नहीं पड़ेगा। ऐसी स्थिति में नीचे के सिरे को इतना छील देना चाहिए कि लाट उपस्थान को छूकर घूमें। (२) यदि उपस्थान पर का भाग घूमने की वजह से घिस कर पतला हो जाय यो बनाने में पतला रह जाय तो उपस्थान को गिना छुए हुए घूमेगा। ऐसी हालत में या तो लाट को बदल देना चाहिए या उसी लाट को उलट कर तैयार करके चलाना चाहिए । (३) अगर कोठे की गरदन पर या छाती की दीवाल पर सली बैठने के लिये पर्याप्त जगह न होगी तो पलो लाट को कोठे के मध्य की और उठा देगी। ऐसा तब होता है जर कि छाती के भाग की लाट अधिक मोटी हो या दीवाल की गोलाई बारश्यकता से कम हो । साधारण' तया छाती की दीपाल और लाट के बीच में उगली जाने भर का त्यान होना चाहिये। (स) लाट का बाहर उठ पाना। (१) कुछ समय तक प्रयोग में लाये जाने के बाद कोठे का पेट चौडा हो जाता है और उस भाग की लाट पतली हो जाती है। इसलिये तली में बहुत जगह छूट जाती है जिसमें तिलहन बैठ जाता है और लाट को ऊपर की ओर उठा देता है। ऐसी अवस्था में या तो लाट को बदल देना चाहिये या उलट कर तैयार करके चलाना चाहिये । (२) अगर लाट की तली और उसके नीचे की कोठे की तली एक दूसरे से मिलती न होगी तो उन दोनों बीच में जगह छूट जायगी जहा तिलहन बैठ जायगा और लाट को ऊपर उठा देगा। ऐसा प्राय तय होता है जब कि कोठे की तली का दाल कम होता है या लाट का तला अधिक दालू और असमान होता है। जायगा तब भी लाट रोरागी। यह फालतू पानी खली (३) यदि श्रावश्यकता से अधिक मात्रा में पानी पेट में छोड़ दिया । । । - चिपचिपी बना देता है जिसकी वजह से खली कोठे की तली मचिपक पर लाट को ऊपर उठा देती है। (क) कोठे की छाती पर पूरा दवार पहना। सदि लाट कोठे के उपस्थान पर मोटी होगी तो लाट और छाती के बीच में कापी श्रन्तर रह जायगा। ऐसा तय भी हो सकता है यदि दीवाल में दाल ज्यादा होगा। हर हालत में सली मोटी पनेगी और दवार कम पडेगा । (१) कोठे की छाती से पेट में जाने वाले तेल के रास्ते का चन्द हो जाना। कमी २ वह तेल जो कि कोठे की छाती में जमा होता है नीचे बहुत देर में जाता है। ऐसा प्राय तय होता है जब कि लाट का गरदन की पास का गदा हलका होता है या कोठे की तली और लाट दोनों के पिस जाने के कारण वह गदा गरदन के नीचे चला जाता है। अगर ऐसा हो तो गड्ढे को कुछ और गहरा बना देना चाहिये और ऊपर की श्रोर इतना बदा देना चाहिये जिससे कि वह गरदा से परीव १" ऊपर श्रा जाय। (च) लाट का टूटना। अगर लाट समरूप में नहीं घूमती है और उसमे झटके लगते हैं तो यह जहा भी गाठ होगी वहा से टूट जायगी। इसलिये लाट के लिये बिना गाठ की लकही अधिक अच्छी है। झटपे लगने के ये निम्न कारण हैं (१) घानी प्रारम्भ करने पर जब कि बोझापाट तिपाई के ऊपर से हटता है तो लाट को पहुत जोर से धक्का देता है। इसलिये लाट और खम्भ दोनों को हाथ से सम्हाल कर धीरे से चलने देना चाहिये। इस प्रकार भटका कम लगेगा। (२) जव कि करीब २ सब तेल पेर लिया जाया है तर वह पहा जिससे कि तेल पोछा जाता है लाट के नीचे रख दिया जाता है जिससे कि उस का भी तेल निकल पाये। इस समय की खली पहुत सख्त होती है। इसलिये इस कपड़े को पराबर फैलाकर रसना चाहिये क्योंकि अगर यह कपडा बरावर पैलावर न रस्त्या जायगा तो लाट इस कपड़े के ऊपर श्रानेपर उठ नायगी और पाद को नीचे गिरेगी । (३) नगर लाट सीधी नहीं है अर्थात् उसका नीचे का सिरा, उपस्थान और चोटी तीनों एक सिधान में नहीं हैं तो उसमें बहुत गटके लगेंगे और वह बहुत जल्द टूट जायगी। (४) अगर १६ साँचा जो कि लाट के उपस्थान के ऊपर बनाया जाता है काफी दूरी पर नहीं है तो वह कोठे की सतह पर टिका रहेगा और उसकी वजह से लाट कोठे को न छू सकेगी। इसलिये घूमते वक्त वह फिसलेगा और फिसलने की वजह से उसमें झटके लगेंगे। वह पिसे हुए तिलदा को कोठे की ऊपरी सतह पर दबावेगा नहा से इस दनी हुई तिलहन को बराबर हथते रहना पडेगा। यदि यह सांचा कोठे के मुख से करीव ४" ऊपर बना दिया जाय तो यह सब बातें दूर हो जाये । जा कभी लाट का सिरा और कोठे की तली विस जाय तो इस खाँचे को फिर से ऊचा उठा देना चाहिये । (५) यदि पानी जो कि थोडी २ देर बाद कोठे म छोडा जाता है काफी नहीं है और सली कोठे में सूनी ही घूमती है तो लाट पिसलेगी श्रीर उसमे झटके लगेंगे। 1 (२) कोठे मे सली का असमान धनना श्रगर पोसली समरूप में नहीं बैठी है या बाद में यह किसी तरफ झुक गई है तो उस तरफ सली मोटी बनेगी और दूसरी तरफ पतली । यह त्रुटि ओसली को सीधा किये बिना दूर नहीं हो सकती है । (३) मुहरी का भर जाना (१) नगर पानी सली में अधिक पड जाय तो सली तली में चिपक जायगी और मुहरी के मुह को बन्द कर देगी। (२) अगर डका मुहरी में आवश्यकता से छोटा है तो मुहरी खली से भर जायगी। (४) डके का टेढा हो जाना डका मली के पतले पर्त को, जो फि मुहरी के मुख पर रहता है तोडने के लिये घुसेडा जाता है। इस उफे यो तर चलाना चाहिये जर की लार मुहरी के सामने की तरफ हो और मुहरी गुली हो। डका चलाते समर चैन का भी रोक देना चाहिये। अगर लाट डके के ऊपर से चली गई तो डका अरश्य ही टेढा पड जायगा और तर मुहरी को पिना कुछ नुक्सान पहुँचाये इपे का निकालना मुशिल हो जायगा। (५) पाकड़ी का पीछे रह जाना "अगर पारडी का छेद, जिसमे लाट रहती है किसी अनुपयुक्त स्थान या कोए पर बनता है अथवा जर तक यह छेद खुग्दरा रहता है और प्रयोग से चिम्ना नहा होता है, तर तर याकडी स्वतंत्रता से लाट के साथ नहीं घूमती है और पीछे रह जाती है। ऐसी हालत में एक लकडी सम्भ और याकडी की मूटियों पे बीच में तिरछी लगा देना चाहिये। इस तरह से सम्म अपना जोर लकडी पे जरिये से पहुँचाता है और याकडी को लाट के साथ चलाता है। (६) समेटनी का ठीक काम न देना १ समेटनी की बाहर की दीगल की गोलाइ ठीक हाशिये के रिधि को न पनाई गइ हो तो वह हाशिये के माथ रगड साती हुई चलेगी २ समेटनी की याहर की दीवाल में तथा तलीमें उचित ढलार न रहा ो हाशिये में साली जगह छूट जायगी और उसमें तिलहन भरे रहेंगे। ३ समेटनी को सभ के ऊपर अधिक ऊँची या अधिक नीची पाधी नायगी तो भी हाशिये में साली जगह छूट जायगी। साधारणतया समेटनी हाशिये की दीवाल से क्राप १" ऊँची रहती है । (७) बोझापाट का ठीक तरह से न घूमना (१) सभ का स्थान लाट के ऊपरी सिरे से योभागट पर सीचे हुए लम्ब के स्थान के निकट ( क्योंकि इस म पाट पर के वजन के लिये गुजाइश छोटना पडता है ) रहता है। अगर सभ गलत स्थान पर लगाया गया है तो बोझापाट की समतुलता चली जाती है। पाट में सभ के स्थान को या सभ के पाट पर के कोण को बदल देने से यह ठीक हो सकता है। मॅम को पाट के उस सिरे की भोर जो की कुछ जमीन की तरफ चला जाता , है, हटा देना चाहिये या मुसा देना चाहिये। दूसरे, संभ के साथ लगाई जानेगाती फाचर का पाट के उस मिरे की योर लगाना चाहिये, जोकि ऊँचा उठता है । इस तरह मुके हुने सभ को गाकडी की रस्सी सीध में सोंच लेगी और उसके साथ ही चोझापाट का झुका हुया मिरा भी उठ पायेगा (२) नोझापाट को जुने के साथ जोडनेवाली रस्सी यथाशक्य बैल के पैर के करीर ही वाधनी चाहिये। (८) लाट और फाचर वदलना घानी की कार्यक्षमता में फर्क पड़े, जैसे कि तेल का प्रतिशत कम हो या लाट ऊपर की ओर उठ यावे तो पाचर तथा लाट बदल देना चाहिये । साधारणतया अभी जो लाट और पाचर बनाये है वे करीब एक साल तक टिकने हैं। काठे को निकालने के लिये पहले उसकी चाभीको तोड देना चाहिये | . - . , ६. तेल पेराई तिलहन में तेल छोटे-छोटे कणों के रूप में होता है और उनके पर एक सख्त मिल्ली का श्रावरए रहता है। तिलहन में पानी मिलाने मे श्रार पेरते समय लकडी और तिलहन के बीच की रगड से जो गरमी पैदा होती है, उसमे पकाने के समान एक प्रक्रिया हो जाती है। इस प्रक्रिया मे । तेल रे कणों के चारों तरफ की सख्त मिली फूलकर मुलायम हो जाती है और नल के कण फूलार इस मुलायम मिली यो पाट डालते हैं इस तरह तेल पेरने में पानी, गरमी और रगड तीनों चीते अपना अपना काम करता है। पानी मिलाना तेल की पेराई में पानी की,मिलाएट एक महत्वपूर्ण - कार्य करती है। तेली के लिये इसका जान लेना जरूरी है कि कर और किन्ना पानी मिलना चाहिये। इस जानकारी के निा पेराई दोपयुक्त होगी। अगर कम या अधिक पानी डाला जागा, तो नेल कम निकलेगा और समय भी बहुत लग जायगा । इस क्ला का जन लेना कोई मासान चीज पहीं, क्योंकि पानी कितना भार कर डाला जाय, इसके लिये कोई नपे-तुले कायदे नहीं रनाये जा सरने। यह कह पातों पर निर्भर रहता है। पानी कम-ज्यादा या टीक है, इस जानने के लिये सरसे अच्छा तरीका यह है कि खली को निकालकर देप लि आय, जैते भोगा बनानेगला एक दाना चावल निसानार यह देख लेता है कि चारल पका है या नहीं। यह कापी दिपमाल और भानुभा याद ही हो सकती है। पर सबसे पहले तो मनुष्य की बुद्धि ही है। झलोंकि इस रात फा सौरना एक कठिन चीज़ है, पर यह जितना कठिन है, उतनादी मजेदार और फायदेमंद भी है। यही तो दलकारी को मिला है कि जहा पदी-बड़ी मशीनों के मामले में मयीन श्रादुमी पर मत करती है और श्रादमी को अपनी बुद्धि के प्रयोग २ प - (- रह जायगी और सारा तेल नहीं निकल सकेगा। दूसरी तरफ अगर जरूरत पहले ही काफी पानी डाल दिया गया, तो चूरा चिपकने लगता है औ है। ऐसी हालत में भी धान के सतम होने में काफी ममय लग जागा वृछ पानी कोठे के निचले हिस्से में डाल देना चाहिये, ताकि सली वन ( ६८ ) का मौका ही नहीं मिलता, वहाँ दलकारी के मामले में श्रादमी मशान पर हुक्मत करता है और अपनी बुद्धि के विकास के लिये बेहद मोठे पाता है। इस पानी का परिमाण, तिलहन की किस्म, मौसम, जनरे पक्कान और गीले और सूरयेपन पर निर्भर रहता है । वरसात में तिलहन में नगी होता है, इसलिये सर्दियों की बनिस्पत कम पानी डालना पडता है और गर्मियों में इससे भी अधिक। यह ग्रन्तर करीव ५, ७ तोले प्रतिधान होता है। प्रगर तिराहन को दिशा पानी डाले ही पेरा जाता है, तो थोडा-बहुत तेल तो जरूर निकल पाता है, पर काफी तेल सली में ही रह जाता है। पानी सली से अतिम शक्य बूंद को निकालने का काम करता है। इसलिय, अगर तिलहा में करूरत के मुताबिक पानी नहीं पड़ा है, तो सली सचा से ज्यादा पानी पड़ गया है, तो गली चिपकने लगेगी और तब भी परा तेल नहीं निकलेगा । इसलिये बहुत ही जरूरी है कि पानी ठीक परिम में ही डाला जाय । मोटे तौर पर एक पौंड तिल या सरसों के लिये क ३ तोले उनलता पानी चाहिये । पाती ठीक-ठीक पडा है या नहीं, जानने की एक मोटी सी पहचान तो यह है कि थाडे से कुचले ! तिलहन को निकालकर उसकी गोली बना ली जाय । अगर गोली बार तो पानी काफी समझना चाहिये और अगर रिसर जाय, तो नहीं। पी के परिमाण के सिवा उसके डालने के समय का जानना भी क्षरूरी है चूँ कि पानी तेरा के निकालने में सहायक होने के साथ ही तिलहन कुचलने को भी श्रामान बना देता इसलिए इसे प्रारभ से ही डालना शु करना चाहिये । ज्यों-ज्यों चुरा गारीफ और खुश्व होता जाय, यो थोडा कर परार डालते रहना चाहिये। अगर चूरे के बारीक हो। चारीक होने में काफी समय लेता है। साथ ही, अगर पानी ठीक सन पर नहीं डाला जाता, तो चूरा गिना खली को ही कोठे में घूमता रहता जाय, क्योंकि जबतक पहले यह सली नहीं बन जाती, तरतक ऊपर का बूग पिना खली पने ही घूमता रहता है। पूर्व तयारी जल्दी न सहनेवाले और अच्छे मीठे तेल को निकालने के लिये निम्र सूचनायों पर अमल करना बहुत लाभकर होगा १ पेरा जानेवाला तिलहन अच्छी तरह पका होना चाहिये । उसमे अधपका तिलहन न होना चाहिये। जर तिलहन अथरा अन्न का थी। उगना शुरू होता है, तर पहले मधु शारा श्रया फ्ल-शर्करा पनती है, उसके बाद कारपोज प्रथा और पिष्टमय तत्व बनने हैं और उसके बाद स्निग्ध श्राम्ल तथा ग्लिसरीन । यही स्निग्ध पाम्ल तथा ग्लिसरीन जीपन-साधन निया से तेल और चरवी में परिणत हो जाते हैं। इस तरह तिलहन के प्रारम्भ काल में काफी स्निग्ध श्राम्ल रहता है। ज्यों-ज्यों बीज बढता आता है, त्यो त्यों यह श्राम्ल कम होता जाता है और चीज के श्रछी तरह पक जाने पर करीर-करीव नहीं सा ही रह जाता है। तब अधिकाँश में तेरा ही होता है। तिलहन से तेल निकालने से पहले इस बात का समझ लेना बहुत जरूरी है। अधपके तिलहन मे तेल में स्निध्य श्रास्ल पा जायगा। साथ ही यह तिलहन हवा में पाये जानेगले नाशक जन्तुयों का बहुत जल्द शिकार हो जाता है। नतीजा यह होता है कि तेल में बदबू श्राने लगती है और स्वाद भी सराब हो जाता है। इसलिये पूरी तरह पके हुए तिलहन को हो पेरना चाहिये । २ तिलहन को ठडी, खुश्क और हवादार जगह में समद करना चाहिये, नमी से यचाना चाहिये। ३ पेरने के पहले रेत और कचरा वगैरह साफ कर लेना चाहिये । ४ परते समय तिलहन में से तेल निकलवे ही उसे बाहर इकट्ठा नहीं होने देना चाहिये, क्योंकि उस समय इसमें गाद और पानी मिला रहता है। इस तरह से निवाला तेल फन्चा ही रहेगा और जल्दी सड़ेगा। ५ जहाँ तक हो सके, नेल को मिट्टी के बरतनों में नहीं रखना चाहिये, क्योंकि वे तेल को पीकर बुरी तरह चिक्ने हो जाते हैं। उसके अन्दर का (७०) तेल किसी भी तरह साफ नहीं हो पाता। वह जल्दी ही सह जाता और यर्तन के सारे तेल को खराब कर देता है। रेखाचिन न० २ में छोटे और बड़े धानके दा परिमाण के कोठे दि गये हैं। सामान्य दुबले बैल से छोटा कोठा और सामान्य मजबूत पैलसे यह कोठा चलाया जा सकता है। यहा बडे काठे के चलाने काही विवरण दिया गया है। इस में ६ सेर और छोटे में ६ सेर तिलो समाती है। इस हिसार से छाटे कोठे के लिये दूसरे तिलहनों के परिमाण का अन्दाज लगेगा। घान का परिमाण तिलहन से तेल निकल जाने के बाद कोठे में यची हुई खली पर गिभर करता है। अगर तिलहन म से अधिक तेल निकल जायगा तो कोठेमें कम सली रहेगी और पान वडा सामायेगा। इसके विपरीत यदि तिलहन में से कम तेल निक्लेगा और सली कोठे में ज्यादा बचेगी तो घान छोटा समायेगा । कोठे में डाला गया तिलहन यदि श्रावश्यक्ता से कम होगा तो याठे ही छाती में और सास कर उपस्थान के समीप खली बहुत पतली बैठेगी और पारश्यकता से अधिक होने पर इन जगहों पर सली बहुत मोटी बैठेगी। यहा पानी का जो नाप दिया गया है वह गरम पानी का है। इसको निश्चित रूप में न समझकर लगभग का ही समझना चाहिये। कारण यह है कि उसमें तिलहन की जात, कोटा और लाट के लकडे के गीलेपन, छाती और पेट में बैठने वाली सली के परिमाण प्रादि यातों के अनुसार घोडा बहुत परिवर्तन करना होगा। वी अधिक होने पर तिलहन में और धिक नमी या जाती है, इससे उस समय में जो परिमाण हा दिया गया है, उससे भी कम करना पडता तिलहन (१) तिल (२) मुगफली (३) न सरसों (७) महुग्रा () रेडी। . . न का परिमाण समय १ तिल (५) राई " ६ । ७१ ) तेल का निकलना ४५ प्रतिशत पानी की मात्रा जाडे ग्रऔर गरमी मे ६० तोला बरसात में ४० से ५० ताला प्रथम पानी तिलहन को कोठे में छोड़ने के ५ मिनिट बाद १५ तोला पानी छाती में और १० तोला पेट में डालना चाहिये। दूसरा पानी प्रथम पानी के ५ मिनिट पाद ३५ तोला पानी छाती मे छोडना चाहिये। विवरण जिसमे कि लाट के कोठे में घूमने में जगह दी कमी की वजह से झुरने में कठिनाइ न हो, पूरे तिलहन के } हिस्से को ही पहले पेरो के लिय डालना चाहिये और बाकी : भाग को नोपली के थाले पर पैता देना चाहिये। पाच मिनिट के बाद जब कि काठे के अन्दर का तिलहन ऊर या जाय तब जैसे कि ऊपर बतलाया गया है प्रथम पानी देना चाहिये । बरसात में तिलहन चिपचिपा हो जाता है। उस समय वह प्रासानी से ऊपर नहीं पाता। इसलिये पानी देने के पहले ही एक दो गर उसे साद देना चाहिये । इस रात में निश्चय होने के लिये के पानी छाती में ही न रुक जाय और पेट में पहुँच जाय कोठे में गरदन के पास हाथ-समेटनी से जगह पनाकर पानी छोडना चाहिये । अगर पेट मे काफी पानी नहीं पहुचता है तो छाती को सली चिपचिपी बन जाती है और महीन होने के पहले हो तेल निकलने लगता है। पेट के निलहन का चूरा भी सलीका रूप नहीं धारण करता और घूमते २ जब कि यह छाती तक पहुँच जाता है तो यह तेल को काफी देर तक स्वच्छ नहीं बनने देता है। और जरकि साली सोली जाती है तो गाद से मिला हुना तेल निक्लो लगता है। इस प्रकार यदि छाती में अधिक पानी है तो श्रावश्यक तेल ठीक समय से पहले ही निकलने लगता है और यदि यह समरूल में छोड़ा गया है तो चूरा सूसी ही हालत मे पिर जाता है।

। ( २ ) बरसात ऋतु में प्रथम पानी में सिर्फ ५ तोला पेट मे छोडना चाहिये, अगर ज्यादा टाला तो लाट कार की भोर उठ पायगी । पहला पानी देने के बाद समेटनी का प्रयोग मे लाना चाहिये और करीर पाच मिनिट के बाद दूसरा पानी, ३५ तोला और यदि वरसात हो तो १५ से २० तोला तक, काठे की छाती में छोडना चाहिये । दूसरा पानी देते वख्त प्रगर पेट में काफी पानी न होने के चिन्द दिसते हा तो दूसरे पानी में से करीव ५ तोला पानी लेकर जगह बनाकर पेट में छोड देना चाहिये। दूसरे पानी के पाद थाले पर के बाकी तिलहन को भी धीरे २ कोठे में डाल देना चाहिये क्योंकि पहले तिलहन के पिसने की वजह से कोठे में लाट के लिये झुक कर घूमने की जगह हो जाती है। इस तरह से पानी की पूरी माना'१५ मिनिट में दे दी जाती है। दूसरे पानी के करीर १० मिनिट बाद जब कि तेल कुछ २ दिखाई पडने लगता है तर पोटासा चूरा लेकर उसकी गोली बनाना चाहिये । अगर वह गोली बनाने में फूट जाय तो मालूम होता है कि पानी काफी नहीं है। इसको ठीक करने के लिये करीव ५ तोला पानी छाती मे छोडना चाहिये। इस हालत में सली को सपन से पाच या छ यार सोदकर उलट देना चाहिये। इस उपाय से चूरा खली के माथ मिल जाता है और शुद्ध तेल निकल पाता है। इसके बाद समेटनी को हटा देना चाहिये और सती को ऊपर की तरफ़ इकट्ठी होने देना चाहिये। इसके करीर ५ मिनिट बाद , नाली को सोल देना चाहिये जिससे कि तेल नीचे वह कर आ जाय। एकत्रित तेल को छान लेना चाहिये और गाद को फिर कोठे में छोड़ देना चाहिये। चीच २ मे नाली को डके से साफ करते रहना चाहिये । इस प्रकार से करीब सवा घटे में सन तेल पिर जाता है। श्रासीर में दो या तीन तोला पानी सली को ढीला बनाने के लिये उसपर छोड देना चाहिये। इसके बाद बैल को चार या पाच चकर घुमाकर सली निकाल लेना चाहिये। इस प्रकार घान समाप्त हो जाता है । । २ मूगफली पतिघान का परिमाण १५ घटा ६ सेर " " समय तेल का निग्लना पानी की मात्रा । । ७३ ) ४५ से ४६ प्रतिशत ६० तोला गरमी और जाडे में ३०से ३५ तोलातक परमात में विवरण मू गाली को पेरने के पहले उसे एक घमेलेलें गरम कर लेना अच्छा है। बिना गरम किये मुगानी पेरने से उसमें से दूध के समान सफेद और गाद के साथ तेल निकलता है। गरम करने से साफ तेल निकलता है। मुगाला के पेरने की रीति करीव २ तिल दी के समान है। श्रन्तर फेवल इतना है कि उसने पेरने में करीव ५ ताला कम पानी पेट में छाडा जाता है परसात में नमी की वजह से तिलहन मुलायम होते हैं। इसलिये पानी की मात्रा कम कर ३५ तोला डाला जाता है जिसमें से सिर्फ५ तोला कोठे के पेट में छोड़ना चाहिये। यह अनुभव किया गया है कि सभूची मुगफली पेरना उसके दाने परने के निस्मत कहीं अासान है। उसमें एक तो समय की बचत होती है और तेल में गाद नहीं उत्तरती। एकस्पेनरवाली मिलों में भी दानों के साथ कुछ समूची मुगफली रेखना सुविधाजनक पाया गया है। इसकी सली जानवर साते हैं और सानदेश में वही इस्तेमाल की जाती है । पर इसम एक बात खासकार ख्यालम रखनी चाहिये कि यदि समूची मुगाला पेरनी हो तो उसे पेरने के पहले खूब साफ था लेना चाहिये ताकि उसकी सारी मिट्टी धुल जाय। ऐसा करने से तेल का पूरा अश निक्ल । सस्ता है और जानवरों को साफ सली मिल सकेगी। समूची वही मुगफली परनी चाहिये जिस का छिलका पतला दाना छोटा पर अधिक तेल याला हावा है। यदि बड़े दाने की मुगाली पेरनी हो तो उसका कुच ही हिस्सा समूचा रखना चाहिये। समूची मूगफली पेरने से तेल के प्रमाण में कोई फाई नहीं पडता, पर पेराई पोसान होती है। और मूगफली छीलने की मिहनत वा पचती ही है।

१० सेर (७४) पर यदि सली मनुष्यों के खाने के काम आती हो तप तो दाने निकाल कर ही पेरना चाहिये। ३. नारियल प्रतिधान का परिमाण से १ घटा तेल का निकलना ५५ से ६० प्रतिशत पानी की मात्रा ३० से ३५ तोला गरमी और जाडेमें १५ से २० तोला परसात में प्रथम पानी पहले ५ तोला छाती में " समय १ . दूसरा पानी - दस मिनिट के बाद १० तोला छाती म और ५ तोला पेट में तीसरा पानी दूसरे पानी के दस मिनिट बाद ५ से १० तोला तक छाती में विवरण पहले पानी के गद जब कि गरी के बडे २ टुकडों का चूरा हो जाय तो उनको एक या दो बार सोद कर उलट देना चाहिये। जब कि वह कुछ सूसने लगे तो ऊपर बतलाये अनुमार दूसरा पानी देना चाहिये । इसके दस मिनिट बाद यदि चूरा तेल के साथ घूम रहा है तो तीसरा पानी देना चाहिये। इस प्रकार से बाकी सली के साथ दरने से चुग का सब तेल शुद्ध निकल पाता है। इस अवस्था म खली को एक या दो बार खोद कर उलट देना चाहिये। . ४ अलसी ६ सेर प्रतिघान का परिमाण समय तेल या निक्लना पानी की मात्रा ११ घटा ३२ से ३५ प्रतिशत ६५ तोला, वर्षा में प्रथम पानी प्रारम्भ में १० तोला छाती में दूसरा पानी पहले पानी से २५ मिनिट बाद १५ तोला छाती में और १० तोला पेट में तीसरा पानी दूसरे पानी के १५ मिनिट बाद २५ से ३० तोला तफ छाती में विवरण सब तिलहन जो कि एक पान में छोड़ा जाता है, यह प्रारम्भ से ही सिने दिया जाता है। पहले लगभग १० तोला पानी छाती डिडका जाता है। इस जल से चिकनी और कही अलसी मुलायम हो जाती है और इस प्रकार उसका फिसलना भी मन्द हो जाता है। पहले पानी से करीब २५ मिनिट याद जय कि तिलहन प्राधा पीस बाय ता ऊपर बतलाई हुई रीति से दूसरा पानी देना चाहिये। यह पानी चूरा को अधिक मुलायम और चिपचिपा बना देता है जिसकी वजह से वह जल्दी पिर जाता है और जल्दी घूमता है। इस अवस्था में समेटनी को प्रयोग में लाना चाहिये। दूसरे पानी के दस मिनिट याद जब कि चूरा सख जाता है तो तेल निकलने लगता है और धुमार धीमा पड जाता है। तब तीसरा पानी देना चाहिये। इससे चूरा फिर से मुलायम और चिपचिपा पन जाता है और उस के घुमाव में तेजी आ जाती है। इस पार चूरा पहुत बारीक हो जाता है और तेल लगभग दस मिनिट में निकल श्राता है। अलसी से कम मात्रा में तेल निकलने कारण जो तेल कोठे में निकलता है यह, .. यदि फाठे के पेट में ठीक मात्रा में पानी पहुंच जाता है तो यहा चला जाता है इसलिये कोठे में कुछ तेल हुआ है या नहीं इस पर सन्देह होने लगता है। अगर पैरा हुआ तेल छाती में रहता है तो उसका यह मतलप है कि पेट में काफी पानी नहीं पहुंचा है। और शुद्ध तेल के बजाय पह फेवल गाद है जो कि उपर घूम रहा है। .

। । " " अलसी को खली को खोद कर उलटना बहुत बारश्यक नहीं है परन्तु यदि तेल के जये में से पचा गाद एक पान में मिलाया जाय तो खली को चार या पाच या खोद कर उलट देना चाहिये। सब कि तेल में जरा भी चूरा न हो तय समेटनी को हटा देना चाहिये। अगर कोठे की छाती का एकत्रित तेल पेट में नहीं जाता है तो नाली खोल देना चाहिये और जो गाद बचे उसे फिर सली में मिला देना चाहिये। इस खली को कोठे से छुडाने के लिये पानी छिडकने की कोई आवश्यकता नहीं है। शेष के लिये तिल के सम्बन्ध में नो वर्णन दिया गया है उसे देखिये। ५. राई प्रतिपान फा परिमाण ७३ सेर समय ११ घटा तेल निकलना ३० प्रतिशत पानी की मात्रा ७० तोला, वर्षा में ६० तोला विवरण राई पेरने की रीति अलसी के ही सहश है। ६ सरसों प्रतिधान का परिमाण समय ११ से १६ पटा तेल का निकलना ३५ से ४० प्रतिशत पानी ६० से ६५ तोला विवरण इसके पेरने की रीति राई के समान है। नों-सरसों और राई को पानी इस तरह से भी दिया जाता है। पामी में डालने के पहले १५ तोला पानी काफी 'रगड फर मिलाया जाता है। पानी का बाकी हिस्सा पेरने के समय मिनाया जाता है। " " ७. महुआ प्रतिपान का परिमाण -- . " २० से २६ तोला ( ७७ ) पौन घटा समय तेल निका ३५. प्रतिशित पानी प्रथम पानी श्ररम्भ में ५ तोला छाती में पसरा पानी यास मिनिट के याद १० तोला छाती में और ५ पाच तोला पेट में तीसरा पानी दूसरे पानी के दस मिनिट बाद ५ तोला छाती में विवरण अगर तिलहम यचा और तर है तो पानी की कोई श्रावश्यक्ता नहीं। ऐसे तिलहन से यहुत कम प्रतिशत में तेल निकलता है । यदि तिलहन पक्षा, सूसा और लाल तीनों हैं तो पानी की श्यावश्य पता होती है । साधारणतया ताजा तिलहन फेयल वर्षा ऋतु में मिलता है श्रत उसके तर होने के कारण पानी देने की कम प्रापश्यकता पडती है। फेवल ताजे तिलहन अच्छे प्रकार से पिरते हैं। पुराने तिलहन में यदि मना के फूल न मिलाये जाय तो तेल निकला कठिन हैं। प्रथम पानी तिलहन के फेवल सूखे होने पर देना चाहिये। दूसरा और तीसरा पानी ऊपर बताये हुए कायदे से देना चाहिये। सली को दो या तीन बार सोद कर उलट देना चाहिये। " प्रतिपान का परिमाण समय तेल निकलना पानी की मात्रा । विवरण ६ सेर (छिलका सहित) १ घटा ४० प्रतिशत बिलकुल नहीं तिलहन को गरम पानी में उबालने के बाद सत्र पानी छानकर कोठे में डालना चाहिये । इस क्रिया से मिलइन मुलायम पट जाती (७८) है। दस या पद्रह मिनिट के बाद जब कि तेल दिसाई पडने लगे तो सली दो या तीन बार सोद कर उलट देना चाहिये और बाद में नाली को सोल देना चाहिये। तिलहन फो कोठे में छोदते समय यदि उसमें जरा भी पानी रह गया है तो सली बहुत चिपचिपी हो जाती है और लाट ऊपर की ओर उठ भाती है और गर्मी बिलकुल नहीं उसन्न होती। इस अवस्था में एक जलती हुई मशाल लेकर कोठे में घुमा कर चूरे को गरम कर लेना चाहिये । यह मशाल जब कि पानी को मार बनाकर उहा देती है तो कोठे में गर्मी उतन्न हो जाती है और तेल पिरना प्रारम्भ हो जाता है। - - . ७. वनस्पति घी और पानी का ताजा तेल वनस्पतिम य तेलों को साफ करने और हाइड्रोजनेटेड वनस्पति घी बनाने का पधा भारत में इतना जोर पकड रहा है कि तेल पेरने के साथ का धधा न रह कर, इसने तेल पेरने के घधे को ही अपना एक छोटा धधा बना लिया है। बहुत सी तेल-मिलें अपना सारा तेल केवल वनस्पति घी बनाने वाली मिलों के लिये बनाती है, और ऐसी मिलों की संख्या धीरे धारे बढ ही रही है, और उम्मीद तो ऐसी है कि श्रानेवाली प्रातिक युद्धोचर पुर्नरचना की योजनाओं के अनुसार वह कहीं अधिक हो जायगी। जैसा सभी ऐसे भादोलनों के साथ होता है जो स्थापित हितों द्वारा चलाये जाते हैं इस घधे ने भी विशापा और पैसे से सरीदे हुऐ वैशानिका के प्रचारात्मक संदेशों द्वारा जोर पकड लिया है। यह सब प्रोपेगडा अधं सत्यात्मक है और इसलिये सतरनाक है। ये लोग जनता में जानबूझ कर गलत यातें फैलाते हैं और उनको विश्वास दिलाते हैं कि वनस्पति घी सपूर्ण और स्वास्थ्यकर साद्यपदार्य है। वैज्ञानिक दृष्टि से वे इस वस्तु को तेल की अपेक्षा अधिक पौष्टिक यह हो नहीं सकते। केवल एक गुण शुद्ध वनस्पति घी में तेल की बनिस्बत यही कहा जा सकता है कि यनस्पति घी सादे तेल' की अपेक्षा अधिक दिनों नक रसा जा सकता है। यहाँ इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि जर वैज्ञानिक 'सादा तेल' कहते हैं तो उनका मतलन मिलसे निकले तेल से होता है, पानी से निकले वाने तेल से उसका कई सम्बध नहीं होता। असल में देखा जाय तो इन दोनों तेलों में यडा फर्क है। मिल पा तेल तो खाने वाले के पास पहुंचने तक अवश्य ही खराब हो जायगा । क्यों कि पहले तो मिल का तेल यू ही हतनी अधिक मात्रा में रोज पेरा जाता है कि तिलइन में से गन्दगी और सड़े वीज प्रादि पार कर डालना सम्भर नहीं होता। और फिर मिलों में छिलका उतरा हुश्री तिलहन गोदामों में रस्सा नाता जो वैसे भी पूरे बीज की अपेक्षा दल्दी सह जाने की प्रवृत्ति रखता है। मिलों में दिलदार पूरे तिलान इक्ट्ठा रसना और रज की रेज दहें दिला तर पर पेरना मिलों के लिये सम्भव नहीं - . J - । ८० ) । इन तिलहनों को रमने का इन्तजाम भी एक दम सतोष जनक नहीं कहा जा सकता। इसलिए वीनों को सडने के लिये श्यपूर्व अरसर मिल जाता है। । इस तरह यह तेल मिलों के एजटी, दलालों और दुकानदारों के पास होता हुना उपभोक्ता के पास तक पहचता पहुचता और भी सड़ जाता है। गुण इमलिए ऐमे 'साद तेरा' की अपेना कनसति घी साने की जो वैज्ञानिक राय देते हैं, उससे हम भी सहमत हैं । साफ किया हुआ तेल सडे तेलसे सदैव नन्छा है। परन्तु मड़ान तेलका कोई स्वाभारिक गुण ता है नहीं, यह तो मिल की लगी योर गलत व्यास्था के काररा तेलमे उत्पन्न हो जाता है। 'सडान' श्ररश्न ही एक ऐसी समस्या है जो मिल-नके सामने याती है, इसलिये साफ दिये हुए हायोजनेटेड वेल उसी मिन-समस्या समाधात की तौर पर शक्य है। वैज्ञानिकों के पास ऐसी कोई दलील नहीं जिसके द्वारा वे वनस्पति घी को ताजे पानीसे निकले तेतसे अच्छा ठहरा सके। माम घानियों द्वारा ताना पौर साफ तेल निकाला जा सकता है। दोनोमा मुकारला यहीं नहीं खत्म हो जाता । मिल का पच्चा या मादा तेल साने योग्य नहीं समझा जाता है । इसकी भडान दूर करने लिये इसको साफ करना यावश्यक हो जाता है । इसनिये तेल साफ करने में जो सर्च बैठता है वद सर मिल-लके पेरने की कीमतमें जोडा जा चाहिये । इसलिये असल में तो पानी ताजे तेल और मिनके कच्चे तेल की कीमतकी तुलना करना ही गलत है। कायदे की बात तो यह है कि मिल के साफ किये तेल या वासनि घी और धानीसे निकले ताजे तेल की तुलना की जानी चाहिये । यदि इस प्रकार देखा जाय तो पता चलेगा कि पैंचीदा तेल-मिल और कीमती सफाई और हाइड्रोजनेट करने की मशीनों से हमारा सादा कारहू कहीं अच्छा ठसा है। यहाँ तुमना सादगीवाली पानी और पेंचीदगीमाली मिल में नहीं है परिक मूल मिना वा दानाका व्यवस्था में है। एक सिन्द्रित उतार्दन पर टिको है तो दूमरी का ध्येय हो केन्द्रकरण है। उयांगों के अंगों को लेकर येद्रित उपागों में विकेन्द्रित उद्योगों से अधिक कार्यक्षमता देखना कितना मामा है इसका यहाँ हमें एक अच्छा उदाहरण मिल जाता है।

पोपकता वैज्ञानिक किस प्रकार कटु सत्यको पचा ले जाते हैं और जाता के सामने श्राने ही नहीं देते यह एक दृष्टान्त से साफ हो जाता है। वनस्पति घी में विटामिन डालने की क्रियाही को लीजिये । विदेशों में राजाज्ञा के अनुसार कोई बनस्पति घी बिना रिटामिन डाले बना नहीं सकता, पर अपने देश में ऐसे किसी नियम का सर्वथा अभार होने से कैसे कहा जा सकता है कि सभी पनस्पति घी बनाने वाले उसमें विटामिन डालते ही होंगे ? कहने को कहते जरूर हैं पर गत सदेदात्मक है । परन्तु यदि डालते हैं तो क्या कभी जनता फो मालूम होने देते हैं कि किन द्रव्यों का उपयोग किया जाता है ? यदि जनता को पता चल जाय कि विटामिन मछलोकी तिल्ली का तेल डालकर दिया जाता है, तो उनमेंसे अधिक तर ऐसे घी को छुएँ भी नही, साने की बात तो दूर रही। परतु प्रश्नके इस पहलू पर जनताको कठिनता से कोई जानकारी हो पाती है। और फिर हाइट्रोजनेटेड तेल, घानीके ताजे 'तेलकी अपेक्षा विटामिन डालनेके लिये कोई अधिक उपयुक्त भी तो नहीं है। इस तरह हम देसते हैं कि पानी के ताजे तेलसे मिलतेल की तुलना ही क्या, तुलना तो वनस्पति घी से की जानी चाहिये । वनस्पति घी में केवल एक नकारात्मक गुण दिसाया जा सकता है और वह है कि 'सडान से रोकना।' इससे यह पानीके ताजे तेलसे किसी भी रात में उत्तम नहीं ठहराया जा सकता। यह मानी हुई बात है कि गाय भैंस के घी से तो बनस्पति घी का कोई मुकारला । ही नहीं है। सिद्धान्तत निस्पति घी तेल मिन के पन्चे तेल से अच्छा ठहराया जाता है और ऐसे तेल की जगह इस्तेमाल करने को बताया जाता है। पर वास्तव में यह असली घी की जगह रोने का प्रयत्न कर रहा है। कारण विशुद्ध घी मिलना ही कठिन हो गया है। और इस बात से वनस्पति घी फैक्ट्रिया का और उतना मिली है और उनकी विक्री वदी है। पदा पाता है 'जर मिना हुआ पो ही लेना है तो असली घी के दाम हो क्यों दिये नॉय, सीवे सीधे पास्पति घी ही क्यों न सरोदो।' यह चाल सूर रही ! पहले ता मिनावट की जा सके ऐसी म्पपस्या उत्पन्न कर दो, अस महते हैं मिलाट क्यों खरीदते हो . । -- ( ८२ ) सीधे रनावटी ही न सायो । इतना ही नहीं ये लोग इसके भी विरुद्ध हैं कि वनस्पति घी किसी ऐसे रग का बनाया जाय जो असली घी से आसानी से पहिचाना जा सके । क्योंकि उस हालत में तो उनके बहुत से ग्राहक छूट जाय गे । इसीसे वह घी की शक्ल छोडने को किसी तरह तैयार नहीं है । यदि वे असली घी को वनस्पति घी से अच्छा मानते हैं, और कोई वजह नहीं कि न माने, तो उ हे असली घी ये ग्राहक के राह में रोड़ा नहीं अटकाना चाहिये । मिलावट रोकने का यह सबसे ठीक रास्ता होगा । सरकार को इस मामले में सख्ती करने की जरूरत है। गन्ध । तेल के साफ करने में जैसे सडान दूर होती है वैसे ही गन्ध भी उड जाती है। यह दूमग काम निर्गन्धीकरण कहलाता है और यह दम भरा जाता है कि इसके द्वारा कैसी भी तेज और नजीर गध मिटाई जा सकती है। पर किसी तेल की विशेष गध को उड़ा देना कोई अच्छी बात नहीं कही जा सती है । श्रासिर अपनी विशेष महर के विना गुलाब गुलाब ही कहाँ रहा ! खाने की चीजों को ही लीजिये, क्या हमें विशेष गध ये पदार्थों से निर्गध पदार्थ अधिक पसन्द हैं । चामल खरीदते समय लोग सुगधित चावल को अच्छा समझर खरीदते हैं। तेल के बारे में भी वही पात है। लोग तेल को बिना सू घे नहीं खरीदते । तेल लोगों को उसकी गध के कारण ही विशेष पसन्द नाता है, यदि वह गध न हो तो उन्हें मजा ही न आये। अलसी के तेल में एक तेज महक होती है और सरसों के तेल में तो उससे भी अधिक तीसी गध प्राती है। जो लोग श्रादी नही है उन्हें इन तेला से नफरत होगी। पर जा इन्ही या उपयोग करते हैं उनका इनके पिना काम नहीं चल सकता। जब यह बात है तो तेलों को निर्गध करना बेकार है और इस पर गर्ग करना मूर्खता है। पर रोजगारी अपनी कमजोरियों को तारी के रूपमें कर दिखाने की कला भली भाति जानते हैं। श्रय बहुत तारीफ किये गये वनस्पति घी की पोषकता पर भी जरा गौर कीजिये । इस विषय की जो भी जानकारी प्राप्त है उसके अनुसार धानी का ताला तेल बनस्पति घी के मुकारले में कहीं अधिक पाचक है और इसलिए स्वभारत वनस्पति घी की पोपकता कम ही है। यह एक बनावटी पदार्य है - ।

धानिक प्रारिम्कारों का पूरा पूरा उपयोग पर लाभ उठाना चाहिये। है। यदि उनसे होने वाली सामाजिक शानियों के कारण हम जो मानव शरीर के अनुपयुक्त है, इसलिये इसका बहुत सा अश ज्या का त्या बाहर निकल जाता है। हाइड्रोजनेशन में होने वाली प्रक्रियाओं को समझने पर भली भाँति यह बात साफ हो जाती है। । १ स्टीयरिक ग्लिसराइड (Stearnc glyceride) की मात्रा क्ट जाती है और नालेइक ग्लिसराइड कम हो जाते हैं। २ श्रोलेइक एसिड का काफी भाग श्राइसो श्रोलेइक एसिड म परिवर्तित हो जाता है, जिसका द्रवण विदु (४५° से ) श्रोलेइक एसिड के द्रविण पिदु (१४° से ) से कहीं ऊ चा है इन दोनों बातो का तेल की पाचस्ता पर निम असर पड़ता है। मानव पाचन-यन्त्र को स्टीयरिक एसिड ऐसे सैचुरेटेड ग्लिसराइड पचाने में अोलेइक एसिड ऐसे अनसचुरेटड ग्लिसराइड्स से अधिक मेहनत पडतों है। इस तरह श्रोलेइक एसिड ग्लिसराइड से स्टीयारेक एसिड ग्लिसाराइड बन जाने पर तेल की पोषक्ता पम हो जाती है। यह बदला स्वरूप शरीर को बहुत भारी पडता है और काफी अश में शरीर से ज्यों का त्यों बेचा ही निकल जाता है। श्राइसौ श्रोलेइक एसिड का पचाना तो श्रोलेइक एसिड से और भी मुश्किल होता है क्योंकि उसका द्रवण मिन्दु ऊचा होता है । इससे हाइड्रोजने शन में होने वाले परिवर्तन से साने वाले को नुक्सान ही होता है। इसलिये यदि वनस्पति घी बनाने से पोषरता बढने के बजाय कम हो जाती है, कम से कम अधिक तो होती ही नहीं, तो इतनी सय पूजी, मेहनत और समय जो इस पर लगाया जाता है समाज को घाटे में ही डालता है। पर सा कि बताया जा चुका है, तेल मिल और वनस्पति घी फैक्टरी यह दोनों से मिले जुले हैं और एक दूसरे से अलग नहीं किये जा सकते । मिल में. पेरना तो श्राधी क्रिया हुई, क्योंकि यह नेल ता जल्दी हो सह जाता है, जो की व्यवस्था के कारण होकर ही रहेगा। असली तरक्की मेशा यह दलील दी जाती है कि नीवन का पैमाना ऊना करने के लिये । , कल और श्रम की चित करने के सापन, उत्ति बढ़ाने के लिये सर्वोतम - उनका उपयोग छोड़ दें तो उसके अर्थ होंगे हगने विशान की देनको ठुक्रा दिया। लेकिन जरा सोचिये तो कि श्रासिर विज्ञान करते किसे हैं ? वैज्ञानिक उन्नति के इतिहास में यत्र दिशा का रियास श्राहार विधान से प्रथम हुना है। बहुत समय तक यापिकता ने निशान के ऊपर एकछत्र राज किया, और उसके पगम्मो को मानव मस्तिष्क की नीनका नाम दिया गया । वाद को विज्ञान की अन्य शाखायें बनी जैसे-ग्राहार विशाल, शरीर विज्ञान, प्राणि विशान इत्यादि, जिन्होंने यत्र विज्ञान के कई एक पराक्रमों को मनुष्य सुस के घातक ठहराया। यंत्र विशान ने चागल पालिश करने को मिल सडी कर दी, परन्तु याहार निशान बताता है कि यह हानिकारक साबित होती है। इमी प्रकार अनेक दृष्टान्त दिये जा सकते हैं । परन्तु यहा तो हम केवल तेल को ही लेते हैं। तेल मिल सचमुच यानिक ज्ञान की जबरदस्त उत्पत्ति है परन्तु इससे बनी चीज तेल-योषक तत्वमें 'फम ठहरता है । और अपने दुगुणों को छिपाने के लिये इसे तेल साफ करने की दूसरी यडी मिल सही करनी पड़ी । मगर नो पदार्थ पना वह ताजे पानीके तेलका मुकाबला ही नही कर पाया। अब पताइये श्राप कौन से विज्ञान को मानेगे ? यस विज्ञान को या श्राहार विज्ञान को ? नगर हम श्राहार विज्ञान को अधिक मूल्य देते हैं तो क्या यह कहना ठीक है कि हम विज्ञान की उन्नति में बाधक होते हैं ? सिर्फ इस वास्ते कि यन विज्ञान द्वारा कुछ कलें बना दी गई है क्या हमें उनका उपयोग श्रावश्यक ही है, चाहे उनसे हमे नुकसान ही क्यों न होता हो? और क्या तभी हम वैज्ञानिक मनो भूमिकापाले कहला सकेगें। जरा ठहर कर सोचिये तो, नौरक्षीरविवेक बुद्धि से काम लीजिये।

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सली के चुरे
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मिना साफ किए पानी र तेल के बारे में निम्न दो शिकायतें हमारे
'८, सामान्य
१ तेल फो सडने से कैसे बचाना
तिलहन में जो पानी मिलाया जाता है वह तेल के साथ न मिलकर
खली में रहता है। यदि तेल में खली का चूरा रह जाता है तो उस चूरे के
साथ साथ पानी का भी कुछ अंश तेल में श्रा जाता है। यह पानी तथा
तेल कुछ समय के बाद सड़ने लगता है। यदि तिलहन कच्चे
पूरे साफ न किये तथा नमी लगे हुने हो तो भी तेल सड़ता है।
ताने निक्ले घानी के तेल में नीचे लिसी याहरी चार्जे मौजूद
१ नमी (पानी)
२ गाद
३ मैल जैसे खली के टुकडे नादि
४ एजीमैटिक पदार्य
५ ची की सटास
६ रंगदार पदार्य
६ और नम्बर की चीजें नहो तफ तेल की साद्याता पा समय
है, पुरी नहीं हैं। नारियल को सी सुगध हो ( जोकि सास तौर से पानी के
तेल में ही पाई जाती है ) शायद एक चीज है जो पानी के तेल को मिल
१ से लेकर ५ नम्बर तक की चीजों से तेल को सुरक्षित रखने या
मुरक्षित रसने के उसपे गुणों में बड़ी गडबडी पैदा होती है।
७ सुगध
के तेल से अच्छा बनाती है।
रामने है

, - (अ) तेल को अधिक दिा रराने से यह सह जाता है और उसम ऐसी पदयू पाने लगती है कि वह साने के काम का नहीं रहता। (श्रा) जर तेल बहुत गरम होता है और उसमें तलने के लिए कोई चीज डाली जाती है तो उसमे झाग बहुत उठते हैं। स्पष्ट तौर से इन दोनों दोषों का इलाज यही है कि तेल में से मी (पानी), सटास, गाद गौर एजीमेटिक पदार्थों को तेल में नीचे जमाकर निकाल देना चाहिये। इाको सफाई कर देने के बाद तेल छ महीने से अधिक तक रक्सा जा सकता है यह बिगड़ेगा नहीं। तेल में जितनी सरानी नाती , उसका कारण यह है कि कच्चे माल में, जिसमें से कि तेत निकाला जाता है, सहे या टूटे या सरार बीज श्रा जाते हैं। यदि इन चीजों को ध्यानपूर्वक साफ करा दिया जाय, तो तेल में जल्दी सराबी थाने का खतर शायद बहुत कम रह जायगा। यह भी ध्यान रक्सा जाना चाहि कि तेल साफ़ वर्तन में सफाई के साथ रखा जाय । उसमें हवा या नमी बिल्कुल नहीं पहुँचनी चाहिये । तेल को खराब करनेवाली चीजों को दूर करने के लिए हमारी प्रयोग शाला में जो जाँच हुई, उससे जो परिमाण किले, वे सक्षेप मे नीचे दिये जाते है। (१) तिल का तेल प्रयोगशाला में अच्छी तरह से छान लिया गया और हवा और नमी से सुरक्षित रक्सा गया। उसमें छ महीने के बाद भी दुर्गन्ध नही पाई। लेकिन वे छना तेल एक सप्ताह के बाद ही खगन हो गया। और तीन सप्ताह बाद उसमें दुर्गन्ध श्राने लगी। यह छना तेल, जो कि दवा और नमी से सुरक्षित नहीं रक्सा गया, दो महीने तक ही अच्छा रह सका। तिल के तेल के बारे में जो कुछ कहा गया है, यह योरे बहुत उराट फेर के साथ दूसरे तेलों पर भी लाग होता है। (२) वजन फे अनुसार तेल में एक प्रतिशत तक पिसा नमक डालने से गाद नीचे बैठ जाती है और तेल को छ से नौ हफ्ते तक रक्सा जा सकता है। लेकिन यह ध्यान रक्सा जाना चाहिए कि तेल में नमक बाकी न रहे। लगभग २४ घटे बाद उस नमफ पर गाद जम जाने पर ऊपर फा साफ तेल अलग कर लेना चाहिए।

माती। हो, तलने के लिए अगर चीज को तेल के अच्छी तरह गरमाने । ८७ ) (३) चर्चा की खटास को दूर करने के लिए तेल में ४ से ८ प्रतिशत - पोटाश वाली लकडी की रास मिलाई गई । सामान्यत इसमें पोटाश के नाए ५.० से ७५ प्रतिशत तक रहता है। इस प्रकार साफ क्यिा गया नछ सप्ताह से अधिक रक्सा जा सका। इस साफ करने की क्रिया में अच्छा हो यदि तेल को रास के विलेय से और सूत्र गरम करके साफ कया जाय) तेल को छाना या साफ किया गया, जिससे तेल का चिकना चार जमा मैल दूर हो जाय । तिल के तेल में चूंकी अधिक सटास नहीं होती होती, इसलिए उसमें राख का अनुपात जो अपर बताया गया है, वहीं रहता है। लेकिन कुछ तेल ऐसे होते हैं जिनमें २० प्रतिशत तक सटास होती है। उनके लिए उसी अनुपात में सटास को दूर करने के लिए अधिक मात्रा में रास की आवश्यकता होती है । (४) नमक और रास द्वारा तेल साफ करने के तरीकों को मिलाकर तेल साफ करने से बहुत अच्छा परिमाण निकला और तीन महीने से ऊपर (५) यह जाँच करने लिए कि श्राया सफाई की क्रिया में तेल को गरम करपे डालने के प्रयोग से (जिससे कि तेल की माना यद जार) वेल की सरावी पर कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं, गरम तेल की जाँच की गई। उससे पता चला कि इस क्रिया से तेल के सुरक्षित रहो के गुण पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है। (६) नमी को दूर करने के लिए अर प्लास्टरपेरिस इस्तेमाल किया है। दूसरे प्रकार की इनफ्यूसोरियत मिट्टियाँ अधिक उपयोगी नही पाई गई। ग्रादि नमक और राख के प्रयोग नमी दूर करने के लिए अरेले किए जाते हैं, तो हमने देखा है कि तेल की दुर्गन्ध को दूर करने में वे यधिक सहायता नहीं देते। (७) माग धानेके बारे म हमने देखा है कि ये चीजें जो कि रेल में दुगप लातो हैं, वही भाग भी लाती है। साफ किए तेल में झाग नहीं से पहले ही गल दिया जायगा, तब तो भाग उठेंगे ही। तेल की ताजगी बनी रही। तक हमने पेवल ( ८८ ) २. घानी श्राम सफाई श्राम तौर पर घानियों के चलने की जगह के चारों तरफ पर्डी गदगी रहती है, और हम भी इस गदगी के शादी-से होगये हैं। पर हमें यह मनोदशा छोड कर गदगी को बरदाश्त न कर सकने की आदत डालन चाहिये । 'प्रगर ग्राहक सफ़ाई पर जोर दें, तो तेली लोगों को सफाई रसनी ही पड़ेगी। , कि तेल साने की चील है, इसलिये इसकी सफाई पर जोर देना और भी जरूरी है। १ बैल के चलने से धूल उडती है और इसका कुछ हिस्सा कोठे में भी पहुँचता है। इसे दूर करने के लिये बैत के चलने के दायरे को करीब १६ फीट गहरा रसना चाहिये और रोज पानी छिडकना चाहिये । इस दायरे के गहरा होने से तैल को बोझा सीचने में भी प्रासानी हो जायगी। २ तेल भरने वाले वरतन को धूल और पेशाब से बचाने के लिये एक लकड़ी के तरते से ढक देना चाहिये। यह ऐमा होना चाहिये, जो गड्डे पर ठीक बैठता हो। ३ बैल चलते समय कभी ही पेशान करता होगा, मगर चलकर रुकने के बाद तो जरूर करता है। इस समय उसे तेले के परतन से दूर महा करना चाहिये, ताकि तेल में पेशाब के छोटे न जा सके। अाजकल तेली गोरर को उठाने के बाद बैल या धानी से हाथ पोछकर ही तिलहन चलाने लगते हैं। इस तरह हाथ पूरी तरह साफ नहीं होने पता । इस रिवाज को एकदम बद करके गोबर को एक छोटे से सुरपे से उठाने का तरीका काम लाना चाहिये । ५. तेली लोग काम करते करते तम्बाकू पीते रहते हैं और उन्हीं हायों से तिलहन को चलाते रहते हैं। या तो काम करते करते तम्बाकू पीने के रिवाज को पद करना चाहिये या पीने के बाद हाथ धो लेना चाहिये ६ तेली के कपड़े जल्दी ही गदे हो जाते हैं इसलि उसे दो जोड़े कपड़े रसने चाहिये जो अदल बदलकर रोज घोये जा सकें। श्राम तौर पर पानी और तेल के परता बहुत ही गदे होते हैं। उन्हें धूल से दूर रपना चाहिये और अक्सर धाते रहना चाहिये।

८. तिलहन में डाला जानेवाला पानी पीने पे पानी की ही तरह साफ होना चाहिये। ६ तिलान को अच्छी तरह साफ़ कर लेना चाहिये । बरसात में तिलहन में बहुत से पीड़े पैदा हो जाते हैं, इसनिये ययाराक्य पैरो से पहले तिलहन को धूप में रखकर साफ कर लेना चाहिये । यहुत सी जगहों में तो इसी वजह से बरसात में घानियाँ पद रस्त्यी जाती है। १० बैल को हर हफ्ते नहलाना चाहिये। इसमे यह साफ रहेगा और उसकी थकारट भी दम हो जायगी। पैल की यकावट को दूर करने के लिये पानी में तैराना रहुत ही उत्तम है। ४ घानी के बैल की खुराक और देखभाल चुनाव पानी की आर्थिक व्यवस्था में पानी का बैल एक महत्तवपूर्ण अंग है क्योंकि थानी चालने में सारी शक्ति बैल ही से प्राप्त होती है। घाना को अच्छी तरह से चलाने के लिये हमें एक ऐसे प्राणी की जरूरत होती है, जो तेज चाल से गोल घेरे में घूमता रहे और भारी बोझा परावर सींचता रहे। ये सब बातें उस प्राणी में हमें मिल जाती है, जो कद में मध्यम हो, शरीर उसका गठा हुआ हो और टौंगै लम्बी हो । इन जुतनेवाले प्रारियों की जाच करने के दो तरीके हैं। पहले तो उसके शरीर से ही पता लग जाता है, दूसरे उसकी यात्रायदा जाँच करफे। अच्छे बैल में जो गुण होने चाहिए, वे नीचे दिये जाते हैं जबड़े मजबूत और चौडे होने चाहिए, होंठ पतले और मजबूत, नथने चौडे और खुले, मुह चौडा, माया यडा, आँसें पडी, चमकीली, लुभावनी और स्पष्ट, गर्दन लम्बी और मुगठित, कन्धे मजबूत, मारी और सुगठित, पैर मजबूत और सीधे, जोड जिनरे भारी हाँ और हड्डियाँ साफ, खुर न बहुत बढे हो, न बहुत छोटे, अधिक खुले न हो। शक्ल म गोल, सीना चौडा होना चाहिए और पसलियो मजबूत और बडी, कूल्हे और पसलियों के बीच का भाग चौटा और पंछ अच्छी और पतली, बैल पर अधिक चीन हो, मोटा चल नहीं लेना चाहिये, हड्डियाँ उसकी मजबूत, यदी और पूर्ण विकसित हो। - ८ १ खुराक पानी में जुतने वाले १००० पौण्ड यजनगाले बैल के लिये नीचे दिये नक्शे के अनुसार खुराक चाहिये सूखा पदाथ प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट चर्बी * पौष्टिकताका अनुपात (पौण्ड) (पौण्ड) पौण्ड (पौण्ड) (पौण्ड) भाराम में १८ १ भारी काम में २८ २८ साधारणतया ढोरों का चारा दो भागों में बाँटा जाता है (१) चारा (२) दाना चारे में साधारणतया सब तरह की घासें ज्वार और मक्के की कडन, गेहूँ और चावल के डठल, सिलेज और भूसा ये सत्र पाते हैं । खुश्क चारे के रूप मे वे बहुत उपयोगी होते हैं। कच्चे रेशे के कारण भी उनकी उप योगिता होती है। सब व्यवहारिक अथों में उचित यही है कि बैल जितना चारा साना चाहे, उतना उसे खाने दिया जाय । १२ से २० पौण्ड तक खुश्क चारा दो तीन बार में दिया जाय, तो अच्छा होता है। दाने को तीन मुख्य उप विभागों में नौंटा जा सकता है (१) अनाज और उनसे तैयार की गई चीजें, जिनमें कार्बोहाइड्रेट अधिक हो, जैसे नाजरा ज्वार, मक्का, रागी, गेहूँ का चाकर, चावल का चोकर, इत्यादि । (२) दालें और उनसे तैयार की गई चीते जिनमें प्रोटीन और कार्यों हाइड्रेट अधिक हों, जैसे चना, अरहर, मु ग उडिद, सेम इत्यादि । (३) तेल के बीज और खली जिनम, प्रोटिन और चर्बी बहुत होती है जैसे बिनौले, सली-मूंगफली की सली, तिल की सली, करडी की सली, राई और सरसा की सली, प्रलमी की खली, नारियल की सली। यह सब जानते हैं कि प्रोटीन एक दूसरे से बहुतसी बातों म भिन्न होते हैं और पैलो के शरीर पुष्ट करने के लिये बहुत सी किस्म के प्रोटीना की श्रावश्यकता होती है । श्रत' अावश्यक है कि प्रोटीन पर्याप्त माना ही में न हो, चल्पि भिन्न भिन्न प्रकार के गुणों वाले भी हों। * प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट+(चवोंx२ २५) .

धानी के बैल की खुराक में चारा सूब हो और ४-५ पौएड दाना हो, जिसमें २-३ भाग सली हो, एक भाग दाल, कोई एक अनाज और २ श्रास नमक । बिलकुल सली ही देना या अधिक सली खिलाना श्रत में बैल के स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। खुराक की तैयारी पाचन में सहायता देने के लिये चारे को कई प्रकार से तैयार करके बैलों को दिया जाता है। लम्बी घास और क्डय की कुट्टी की जाती है। खली, चोकर और दली दाल को पानी में भिगोया जाता है और सख्त अनाज, जैसे धार, को कभी-कभी उगला भी जाता है। निगरानी और डावस्था । बैल के पाचन को ठीक रसने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की श्रावश्यक्ता होती है। इसलिए आवश्यक है कि बैल को अधिक माना में साफ पानी देना चाहिये। साधारणतया बलों को मौसम के अनुसार प्रति दिन ३ से ५ यार पानी पिलाना आरश्यक है। चूँ कि चैल को तमाम दिन घर के भीतर काम करना पड़ता है, इसलिये श्रावश्यक है कि बैलों का पाडा खुश्क रहे और हवादार हो। उपयुक्त नाँद अगर बना दी जाय, तो उससे खुराक के सर्च मे कमी हो जाती है। बैल जुगाली करनेवाला जाापर है और जुगाली करने में उसे काफ़ी समय लगता है । इसलिये उसके काम की व्यवस्था इस प्रकार होनी चाहिए कि येल को पाने के बाद कम से कम एक घण्टे का समय अपने खाये हुए चारे को चबाने को मिल जाय । इसलिये काम के समय चैल को सली देना उचित नहीं है। दिन भर के कठिन परिश्रम के बाद यैल को मसलने या कभी-कभी गरम पानी से नहलाने से वह स्वस्थ रहता है। तैरना भी उसके लिए लाभदायक है । मक्खियों, विग्गू और जोक श्रादि के अाक्रमण से पूर्णतया रक्षा होनी चाहिये। यदि मैले अस्वस्थ हो, तो उचित यह है कि एक पौंड तेल और एक मुठ्ठी न देकर SARASHTer चाहिए और ( ९२ ) उसे पूरी तरह से आराम मिलना चाहिये । साथ ही जानवर्ग का इलाम करने वाले पास के क्सिी डॉक्टर से सलाह मशविरा करना चाहिए। ४ सली का आहार में स्थान मूंगफली, तिली और शायद अलसी श्रादि चन्द किस्म की खलिया साद्य पदार्थ के तौर पर पपूरी इस्तेमाल की जा सकती हैं। अन्य सलियों में कडे रेपों का प्रमाण बहुत ज्यादह रहता है इसलिए उनका साद्य पदार्य के तौर पर उपयोग नहीं किया जा सकता। हमारे भो17 को उपयुक्तता बढाने की दृष्टि से खली उपयुक्त है। हमारे भोजन में प्रोटीन की कमी रहती है ऐसा कहा जाता है इसलिए यह कमी जिस मार्ग से हो पूरी करनी चाहिये । सली यह प्रोटीन मिलने का पहुत अच्छा साधा है, क्यों कि मूगफली की सली में ४८६/-, तिली की खली में ४१ ३१/० और असली की सली में ३५.५००). प्रोटीन रहता है । उनमे चर्ती भी काफी प्रमाण में मौजूद रहती है इसलिये वे एक मुफीद खाद्य पदार्थ बन सकती है। खलियों से जो प्रोटीन मिलता है उसकी किस्म भी अच्छी होती है । सर रॉबर्ट मॅप रिसन की राय में एक दल अनाजों से मिलने वाले प्रोटीन की बनिस्बत द्विदल अनाजों से मिलने वाले प्रोटीन अच्छे हैं और उनसे भी बढिया वे प्रोटीन हैं जो बीजों से प्राप्त होते हैं। सली याने ऐसे बीजों का तेल निकालने के बाद बचा हुआ अवशेष ही है। डॉ डी एल सहस्रबुद्धे के अनुसार मूगफली की सली, दूध, सोयागीन और चने से प्राप्त प्रोटीन का तुलनात्मक तख्ता इस प्रकार है अॅमिनो अॅसिड्स मूगफली की बली सोयाबीन अजिनाईन १३ २६ हिस्टिहाईन लिसाईन सिस्टाइन टायरोसी। ट्रिनोफेन । ०५६ ५.१५ १५८ - १४२ में सपूर्ण रीति से सानी चाहिये हो तो तिलहन घर पर साफ कर अपने डॉ. सहस्सनुढे यह भी कहते हैं कि मूगफली को सली टायरोसीन और श्राजिनाईन में विशेष समृद्ध है यह एक माऊँ की बात है। ये दो श्रावश्यक और महत्तय पे अँमिनो ग्रॅमिड है। दूध के प्रेटीन सपूर्ण माने जाते हैं और ऐसा मालूम होता है कि सोयाबीन के बनिस्बत मूगफली की सली दूध से अधिक मिलती जुलती है। लोग कभी कभी मूगफली के दाने और तिली साते हैं, पर उनमें चरी अत्यधिक होने से वे श्रासानी से हजम नहीं होते इसलिये वे किसी बड़े प्रमाण में नही साये जा सकते । खलिया उाको तुलना में हजम होने मे श्रासान है इसलिये वे श्रासानी से हमारे नित्य के भोज्न का घटक मन सकती हैं। उनम जो प्रोटीन और चर्चा का प्रमाण है उसकी दृष्टि से वे दाला की अपेक्षा यहुत सस्ते दामों में मिलती हैं और इसलिये गरीब श्रादमी भी उन्हें इस्तेमाल कर सकते हैं। चली साने की नये सिरे से हम सिफारिश करते हो मो भी नहीं। अाभ देश में इसकी प्रथा है। वहाँ निली को कपडे में या टोक्नी में रखकर पानी से भिगोकर रगडते हैं जिससे तिलीका वाला हिलका तथा मैल निकल जाता है। इस प्रकार सफाइ से तिली तैयार करने से जो सली बनती है वह दिसने मे सफेद रहती है। लेलगू में उसे 'तेलग पिंडा' कहते हैं और यह सरे आम सालन के तौर पर साई जाती है। अमरावती के पास हमें ऐसा एक देहात मिला जहाँ का तेती नियमपूर्वक लोगों को सली चेचता है और लोग उसे शाकभाजी के साथ पकाकर साते हैं । इस प्रकार यदि सली खाने के काम में लानी हो तो तिलहन मे से रेत और धूल सपूर्ण रीति से साफ करने की समस्या खडी होती है। मूगफली पे दाने बड़े होते हैं इसलिये वे आसानी से साफ होते हैं, पर तिली और अलसी के दाने उसीके श्राकार की रेत से अलग करना मुष्किल होता है। इसलिये खूर पानी में उन्हें धोना चाहिये ताकि धूल धुनकर निकल जावेगी और रेत नीचे जम जावेगी। यदि सली की ताजगी और सपानी के बारे सामने पेला लेना सब से पन्छा है।

( ९४ ) राली की कौनसी चीजें बनाना यह सानेवाले की रुचि के अनुसार तय किया जा सकता है। उसके अच्छे निस्किट बनाये जा सकते हैं, कई किस्म की मिठाई बनाई जा सकती है, या उसे शाक और दाल के साथ पकाकर भी खाई जा सकती है। ५ सली का खाद खली का साद भी पढिया होता है। गोचर प्रादि के साद की अपेक्षा इसमें जमीन को ग्रासानी से मिल सानेवाले साद का अश केन्द्रित रूपमें रहता है। साद की किमत उसमें के नाइट्रोजन के अनुपात में गिनी जाती है। * भिन्न भिन्न सली में का खादतत्त्व खलीका नाम नाईट्रोजन प्रतिशत मुगफली की सली ७६६ २ तिली की सली ६६० करडी की सली बिनौले (छिलके सहित) की सली ५.५६ ५ राई, सरसों की सली ६ जगनी की सली ५.४५ अलसी की खली ५.३० नीम की सती रंडी की सली ४५० खोरे की खली बिनौले (निना छिलके) की सली ३३८ महुवे की खली २७२ * डॉ डी एल सहस्रबुद्धे द्वारा विश्लेपित । कम ४ ५५४ ६ ३६७ १२

दीजिये। ताकि उस छेद से पाईर बाहर आ सके।
परिशिष्ट अ
सीमेट घानी की योखली
बनाने का तरीका
पानी की ओखली के लिए पर्याप्त नापकी लकडी मिलाना मुश्किल
हो तो वह सीमेंट कान्कीट की बनाई जा सकती है। बाकी के हिस्से कही
को मोखली में बिठाये जाते है वसे ही रहो,
१ निम्न चीजे नीचे बताये मुताबिक तैयार कराईये।
साचा
पिंजरा
पाईप समेत कोठा
समेटनी चक
(अ) साचा
१ २३ पुट लगी । मोटी और एक सिरे से २५ चौड़ी तथा दूसरे
सिरेसे २३" चौडी ऐसी ३८ लक्डी की पट्टियाँ तयार करिये।
२ १ मा मोटी और १" चौडी लाहे को पट्टी के चार टुक्ढे लीजिये
जिसमे दो टुकडे समाचार चार फुट लपे हो और दूसरे दो टुकड़े
समातीन तीन फूट लवे हो। इन पट्टियों के सहारे लकडी की पट्टियों में
दो ऐसे गोलार्ध तैयार कीजिये जिसका कि एक सिरेवा अदरका न्याय
२१ फूट हो और दूसरे सिरेका अदरका न्यास २ पुट हो।
३ इन दो गोलायों को लोहे की पट्टी पर नटबोलट से क्सने से पूरा साचा
चनना है। नटबोल्ट निकाल लेनेसे साचा खुल जाता है।
। साचे की कोई भी एक ही को नीचे से करीब ५" कर तक कार
क

( ९८ ) २ निम्न औजारों और साधनों को इकठ्ठा कीजिये। (१) ३ घमेले (२) १ पावडा (३) सम्बल (४) १ एक राज का फौचा (५) १ लेहल ग्लास (६) ३ थैली सीमेन्ट (७) ७ थैल रेती (८) १२ थैली १" मोटी गिट्टी () २ पानी डालने टम्लर (१०) ३ साली थैली (११) ३ तेल लगाये हुए थैले के टुकडे जो कोठे को फाचरों के बीच में रखे जाते हैं। (१२) डका (१३) करीब ५० ईट, चूना, १ फुट x ५ फुट की दो लादी (१४) ५ फुट ४ ५ फुट की चद्दर या लादी जिसके ऊपर सीमेंट कान्नीट तैयार किया जा सके। ३ जमीन का गड्ढा ओसली तैयार करने के स्थान मे ३ फुट गहरा और २ फुट व्यास का एक गड्ढा सोदिये । उसमे एक फुट तक टोल भर कर धुम्मस से पाया मजबूत कीजिये। ४ पहले दरजे का कान्क्रीट सीमेन्ट, रेती और गिट्टी १३५ के अनुपात में मिलाकर पहले दरजे का कान्क्रीट तैयार कीजिये। जमीन के गड्ढे के बीच में पिजरा रखिये और पिजरे के अन्दर और बाहर यह कान्क्रीट सबल से ठोंक ठोंक कर जमीन के तल तक भरिये। सूचना-काक्रीट भरते समय पिजरा एक वाजु झुक न जाय इसकी सावधानी रखिय। ५ दूसरे दरजे का कान्क्रीट सीमेन्ट, रेती और गिट्टी १ २ ३ के अनुपात में मिलाकर दूसरे दरजे का कान्क्रीट तैयार कीजिये। सूचना-काँक्रीट लोहे की चद्दर या लादी पर ही तैयार करना चाहिए ताकि उसमें मिट्टी या दूसरा कचरा न मिल जाय । रेती और गिट्टी को काफी पानी में खूब धोकर साफ कसा चाहिए ताकि उसमें कुछ धूल आदि न रह जाय। ६ साचा रसना श्रर पिजरे के बाहर साचे के दो गोलाधों को नट बोल्ट से पसिये और उसका मध्य विन्दु पिजरा फेमध्य हिन्दु से बराबर मिलाइये । साचे को ठीक सीधा , - ७ कोठा रसना गोले पोते से दारु कर नोसली को तीन सप्ताह तक सख्त होने दीजिये। । ९९ ) रखिये । माचा और मिनरे के च में तथा रिजरे के अंदर जमीन से यार इच ऊपर तक दूसरे दरजे का कॉन्क्रीट भरियें। श्रम सिंजरे के अन्दर कॉन्क्रीट पर पाईप ममेत और पानरों के बीच में रखे हुए तेल वाले थैले के टुक्डे समेत योठा रखिये। पाईप की बगल में डके की रस्सी भराने लिये गैर पाच इच लगा एक पीला रस देगा। इस बात को सास सावधानी रसिये कि कोटा ठी मध्य में और ठीक सीधा हो। लेहन ग्लास से इसको परीक्षा कर लीजिये । कोठे बाहर उसकी ऊपरी सतह से १" नीचे तक कॉन्क्रीट भरिये। इस समय पाइप और कोठा अपने स्थान म रहे इसकी सावधानी रसिये। १२ये अनुपात में सीमेन्ट और बारीक रेती लेकर पानी से ताही बनाइये और इस लाही से कोठे की अासपाम की जगह चिकनी करिये। पिंजरे के अन्दर ममेटनी चक्र इस तरह रसिये कि उसका साचा काठे की ऊपरी सतह से परापर मिल जाय । साचे के अन्दर समेटनी चक्र की ऊचाई के बराबर कॉफीट भरिये । माचे की दीवाल के साथ साथ २" चौडी और १३" ऊची एक दीवान बनाइये । इस दीवाल से समेटनी चक्र तक एच इंच का दाल बनाइये । साचे के अन्दर कॉन्क्रीट को २४ घन्टे तक सख्त होने दीजिये । उसये माद साचे को हटा लीजिये। कॉन्क्रीट की असमान सतह को १ भाग सीमेंट और २ भाग वारीक रेती की लाही से समान कर दीजिए और उसे चार पाच पण्टे तक सूसने दीजिये और ऊपर साली पोते रख दीजिये। ६ समेटनी चक्र रसना १ साचा हटाना । पाने हमेशा गीले रसने चाहिये १० तेल के बर्तन का गड्ढा पाइस के नीचे बनन रखने के लिए पर्यात और डया बाहर निकल सके

(१००)
उतना लम्बाह" ऊची दीपल का ईंट और चूने का एक गड्ढा
तैयार
कीजिये । गड्ढे में जमीन पर या नो लादी रखिये या ईट ।
११ मिट्टी का चबूतरा
भोसली के आसपास ६५ ऊचा और २ फुट चौडा एक चबूतरा बना
इये । उसको परिधि पर रास या लकडी की सूटियाँ लगाने से चबूतरा मजबूत
बनेगा।
-
L
1
-

परिशिष्ट श्रा घानी का अदाज पत्र थों में एक तेली एक समय में दो पानी चला सकता है, इस श्रापार पर एक महीने में यह तिली (लाल) कितनी पेर सकेगी, उसके लिये कितनी जी लगेगी, श्रादि बातों का मासिक श्रन्दाज नीचे दिया हुश्रा है। तेल की कीमत पेचघर पे तेल की फुटकर रिझी की दर पर और खली की कीमत पेचघर की सली की थोक चिकी की दर पर पूती गयी है। इसी मकार दूसरे प्रकरण में मगायाडी पानी की कार्यक्षमता के नीचे दिये गये तरते की मदद से अन्य तिलहन के लिये भी स्थानिक भार खयाल में रसपर श्रदाजपन बनाया जा सकता है। लगनेवाली पूजी (क) पैल तथा अन्य सामान के लिये दो पानी दो बैल अन्य सामान या. पा० रु. . . २०० . ४०० . . ७५० (स) तिलहन एक साल के लिये १२००० (ग) जगह का क्षेत्रफल दो पानी मे लिये ३६' x १६' x १०' तिराहन रसो के लिये २०' x १६' x १०' तेल और खली रखने पे लिये १०' x १६' x १०' दूकान पे लिये १.'x १६' x १.' रेलो के लिये (समय) २.४ १.'x.' सूचना हर महीने के काम के दिन २५ माने गये हैं। रोज .

" म काम के घटे ८ रहेंगे, दोनों घानियों में मिलाकर कुछ १० घान प्रतिदिन निकलेगे, ऐसा माना गया है। आमदनी खर्च ४४% के हिसाब से हर रु आ पा हर महीने में १२६ खडी र आ. पा महीने १९६० पौड तेल (३६६ पौड) तिल लगेंगे। होगा। इसमें २५ पौंड उनके ८५-०-० खडी नुकसान हो जायगा, के हिसार से (हरएक ऐसा माना है प्रति पडी में कूडा कचरा आदि पौड के ११ श्राने के पौड घट जाने की के हिसार से गुजाईश रसकर) ११६२-८-० कुल दाम १३४७-८-० तिल साफ कराने की मजदूरी ०-८-० खडी के हिसार से सहायक का वेतन ३०-०-० दो बैलों की खुराक १०-०-०- १५-०-० कुल सलो २५२० पौड सामान दुरुस्ती, छोजन १ मन (८० पौंड) मकान किराया के ३.०२.० देहिसारसे ६७-१०-६ ६% के हिसाब से पूँजी का ब्याज ५-०-० अन्य खर्च १३३८-१२-० १०६-६-६ १४४५-२-६ वापस की जा पछा मुनाफा १४५-२-६ सूचना हर महीने की विकीना सकेगी, इसलिये न्याज की रकम, याद जायगी। ऊपर जो न्याज दिसाया गया है सभर है कि मौसम के दिनों में म्याज पर रहम न मिले। ऐसी हालत में कम होती औसत है।

(१०३) भार से तिलहन सरीदना पड़ेगा। तिलहन का मौसम करीब २ महीने = होता है। साल के अन्य दिना म तिलहन का भाव सी पीछे करीब ७ बढ जाता है, अर्थात् तिली की कीमत ६०) से बढ जायगी और पूरे सा की, औसत निकाली जाय, तो वह ८० से बडेगी। इसमें से बचने न्याज के ५०) घटा देने से मुनाफे में से औसत ३०) कम हो जायेंगे परिशिष्ट इ २४ घटे में २०० मन सरसों पेरनेवाली पारसे चलनेवाली रोटरी घाने तथा एक्सपेलम पाली मिलकी योजना । (युद्ध पूर्व भावो के आधार पर) ३६००) ५०० । यंत्र तथा अन्य सामान कानपूर वर्स में बने वगाल पद्धति के पापर से चलने वाले ३० धानों का प्रतिघान र १२०/ के हिसार से। २ कानपूर वर्क्स में बनी रोटरी पद्धति की तिलहन सफाई की मशीन ३ एक्सपेलर एक-किसी भी प्रसिद्ध कपनी का स्टैंडर्ड टाईप का ४ खली तोडने का यत्र-डिसइटीग्रेटर न० ११ ५. फिल्टर प्रेस २'४२-१२ प्लेट्स के साथ ६ तेल की टकी-१००० मन के मिकदार वाली टोटी श्रादि सहित ७ तराजू दो-२० मत तक वजन करनेवाले ८ भाफ, निजली या गैस से चलने वाला अश्वशक्ति का एजिन बिजली और गैस से चलनेवाले एजिनों के साथ एक छोरा वायलर जरूरी है ६ पपुली, खमे शेफ्टिंग आदि १० इमारत तथा अन्य फुटकर अनाहूत खर्च ६००० ३५० १२०० १३५० ५०० १४००० १००० १००० ३०,००० चालू खर्च ६० नोकर ७५ १२० ६६ " 8 शप्रतिशत यदि ३५ माना जाय तो कुल तेल १७५० मन होगाारसलिए ( १०५ ) १. एक रमायनशास्त्री २ एक हेडमिस्त्रा ३ एक, स्टोर कनक दो मे निरु दर रु ३०३ हिसार से ५. छह लाइनमेन, दर रु २० ६ चूली ८, दर रु १२ के ७ फुट कर सर्च कोयला और स्टोर १ कोयला या उसकी ऐरज में लगनेमा तेल या रिजली २ कर गेर सामाा और मरम्मत (मासिक) - माज तथा पसारा र ३०,००० पर ब्याज ६./ और घसारा ७°/ हिसाब से प्रतिमाह पडनेपाली रकम एक मन तेल का पेपर करीब इ १.२० हुई कमाई २५० के कुल मिजान या रोष १८६० १६०० इसमें जमीन और मकान की कीमत नहीं ली गई है। यह लेने पर उसकी कीमत पर का ब्याज और घमारा भी शुमार कर लेना चाहिये । पैदावार मिल में प्रतिदिन २०० मन तिलहन पेरी जावेगी। एक महीने में १५ दिन काम होगा इस हिसय से कुल ५०.. मन तिलहन पेरी जा सकेगी। वेल पे अपसाप की आमदनी के दो विभाग होते हैं - ( १०८ ) रहती थी, खुली रहती थी, उसकी ज्वलन क्रिया पूर्ण नहीं होती थी इसलिये धुनो कापी होता था और उसे क्म अधिक करना समा नहीं था। यदि लालटेनों में वनस्पतिजन्य लो काही उपयोग करना हो तो उनमें तेल की टक्यिों लालटेन के सिर पर रखनी चाहिए ताकि गुरुत्वाकर्षण के मिद्धात के अनुमार तेल स्वयम् नीचे उतर कर पत्ती तक पहुँचता रहे या फिर इन तेलो को रासायनिक तरीकों से काफी पतला कर देना चाहिये । इसमें का दूमरा मार्ग देवातियों की पहुँच के शहर है । गुरुवारपण के सिद्धात पर चलना तय करने पर भी हमारे सामने कई सवाल श्राकर सड़े होते हैं। पहला सवाल है, पर्नर में से तेल चूने का, इसलिये हमको ऐमी कोई तरसी करनी चाहिये ताकि उसकी सतह ज्योत के कुछ ही नीचे हमेशा एक सी उनी रहे। मगनदीप में यह बात हमने "नीरो के चश्म" के गिद्धात का अमल कर रत्ती तेल की टकी के बाहर रसार साधी है । पर्नर में हवा का कापी अावागमन रहे ताकि जलन-क्रिया पूर्ण हो, इसकी भी व्यवस्था अयश्य चाहिये। मिट्टी के तेल की लालटेन की बत्ती की सुनारट,गफ़ रहती है। वनस्पतिजन्य तेल छीदी चुनी रत्ती द्वारा अधिक तेजी से कार उठ सकता है या नहीं इसके प्रयोग हमें करके देराने हैं । उपर्युक्त समस्याओं को हल करने में श्री सत्यन गत चार वर्षों से लगे हुए हैं। इन लालटेनों की माग पूरी करने योग्य टीन की चहरे तथा अन्य सामान हमें मयस्सर नहीं हो रहा है इसलिये मौजूदा मिट्टी के तेल की लालटेनों को ही मगनदीप के तत्वानुसार वनस्पतिजन्य तेल जलाने लायक बना देने की नीति को अख्तियार करना पड़ा। इससे लोगों को नयी लालटे की मीमत की पचर होगी। मौजूदा लालटेनों को नयी पद्धति के बनाने के प्रति लालटेन बारह माना मजदूरी और चार पाने का माल मसाला इतना ही सच पावेगा पर यह रूपातर-करने का काम भी सारे देश के लिये एक जगह पर करना सभर नहीं होगा। इस लिये हम यह जानकार! प्रसिद्ध करा रहे हैं, और हमें माशा है कि सेवावृत्ति वाले लोग इस से लाभ उठा कर स्थानिक कारीगरों को यह पाम सिलाकर अपनी अपनी जगह की मौजूदा लालटेनों को रूपातरित करने में तथा टूटी फूटी और फेंक दी गयों लालटेनें भी जोड-जोड कर काम में लाने में सहायक होगे। जो लोग इस काम को उठाना चाहें वे सभा मा उ सध से मान्यता प्राप्त करलें। यदि उ हैं रूपान्तरित लालटेन और मगनदीप के हिस्से कीमतें इस प्रकार है ३४-०-० चले जाते हैं। तेल के माषिक इन लालटेनों के कारण भी लोगों को कोई रोजगार नहीं मिलता। जब येई देशी चीज इस्तेमाल की जाती है तो उसका निर्माण और वितरण दानो साथ साथ चलते हैं। पर जब कई विदेशी वस्तु ।२६ सम्पत्ति बाहर जाने कीही फारशीमत होती दूसरे स्तर ने उाफा आयोग फरा ऐसी शालत में मी परिणामहरीपरीर चाहिये हो तो उनको चाहिये कि वे उनकी कीमत, पैकिंग श्रादि के दाम मंत्री, अ भा मा उ सघ, मगनबाडी, वर्धा को पेशगी भेज दें। इनकी मौजूदा रूपातरित मगनदीप (सपूर्ण) मगनदीप के छुटे भाग दिवालगिरी पुरानी लालटेनों में कौन से हेर फेर परने से नई किस्म की लालटेन बन जाती हैं इसकी तफतील मगनदीप नामक किताब में दी गई है। यह विताय मा उ संघ, वर्धा से प्राप्य है। २ मगनदीप का अर्थशास्त्र मिटी का तेल भूगर्भ में से निकला हुअा सनिज तेल है। इसे मनुष्य निर्माण नहा करता पर केवल कुदरती भण्डार में से बाइर निम्लता है। इस लिये उसका श्रर्यशाल याने लूट का प्रार्यशास्त्र है। उसका व्यापार सानगी व्यक्तियों के हाथ में होने से उसके भार बुरी स्पर्धा, विनाशक और शक्तिशाली गुष्ट या सगजों द्वारा तय किये जाते हैं । हिन्दुस्तान में हरसाल करीब २० फर ड रुपये का ६० करोड सेर मिट्टी का तेल सपता है। उसके बूते पर लोगों को शायद ही कोई रोजगार मिलता हो पर वह लोगों की आमदनी में से २० करोड रुपया तो सींच ही ले जाता है। गरीब से गरीब और सुदूर देहातों लाग भी इसकी चु गल से नहीं बच पाने । यह किस्सा यहाँ सत्म होता हो सा बात नहीं। यह तेल जलाने के लिये हमें लालटेने खरीदनी पडती हैं जो राय सभी विदेशी होती हैं और उनमें भी हमारे करय उतने ही रुपये बाहर इस्तेमान की जाती है तब है। एक ही स्थान के समाज पे एक स्तर के लोगों ने उत्पादन करना और ऊपर वैसा ही होता है। इसलिये यदि समतास्थापन का कोई उल्टा प्रवाह जारी न रहा तो उपयुक्तालत में गरीरी अधिकाधिक यदती दी जावेगी। इस यनाम से यदि हमको यचना हो तो हम ऐसा रास्ताद ढना पडेगा जिससे लोग खुद की मूलभूत जरूरियातें स्वयम् पूरी परने लग जायें। रोशनी एक जरूरी चीक है और उसके लिये दूसरों के मुसातिय रहना हमारे लिये अनुचित होगा। सारी दुनिया में तिलहन पैदा करने वाला हिन्दुस्तान ही प्रमुस देश है। यहा से प्रतिवर्ष फेल डी, मूगफली और अलसी ही १० लाख टन पाहर भेजी जाती है। इन तिलहनों का तेल रोशनी के काम वसूची लाया जा सकता है, पर इन तेलों के अन्य उपयोग हो सकते हैं, इसलिये रोशनी के लिये वे शायद मगे मालूम होंगे। पर नीम, मश्रा, परजिया, रायन, नगर, पोलग, पाजू श्रादि का भी तेल निकलता है जो श्राज भी देतो में रोशनी के काम लाया जाता है और जो व्यापारिक दृष्टि से भी मिट्टी के तेल से सस्ता पड सक्ता है। मनुष्य ये तेल प्रतिवर्ष निर्माण करता है और यदि हम इनका उपयोग करने लग जाये तो हम एक कायम वा अार्थिक ढाँचा चना लेंगे, निससे लोगों को हमेशा के लिये व्यवसाय मिल जायगा, तिलहन का अटूट - ग्रह दोने से हमारे दाचे में कोई सलपली 7 मच सकेगी और उत्ता दन और विभाजन दोनों करने वाले लोग मालदार बन जावेंगे। एक ही श्राफार प्रसार की बत्ती द्वारा उतो ही समय में मिट्टी के तेल की पनिस्बत वनस्पतिजन्य तेल २००/- म जलता है। इस हिसाब से मौजूदा मिट्टी के तेल की खपत की पूर्ति के लिये हमें ७२ करोड सेर वास्पति जन्य तेल की जरूरत होगी। तिलहनों के अय उपयोग कायम रसकर यदि हम उाकी केवल निर्यात रोक दें तो उन्हें १,५०,००० घानियों में पेर कर हम , ४५ करोट सेर तेल पा सकेंगे। ऐसा करने से १,५०,००० तेलियों को रोज गार देकर और उसके द्वारा उ हे ४|| करोड रुपयों की कमाई करा देने के अलार हम ४ करोड रुपयो को खली मिलेगी, जिसके द्वारा हमारे जानवर पुष्ट होंगे और हमारी जमीन क्सदार मन सकेगी। पानी के १,५०,००० बैलों को भी समुचित खुराक मिलेगी और पूरा काम मिलता रहगा। इन से जो तेल निकलेगा पह परीब १७ करोड सयों का होगा। इस प्रकार निर्यात रोक कर यदि ते की कीमत ६ धाना सेरौरवाने काम में नचानेगाले वेलादीमत कम चालामाही होते हैं इमलिये उनके उपयोग से नाकस्मिक श्राग लगने की हानटेन की यनिस्मत मगादीप की रोशनी करीष १५०/- कम होती है, पर सगातार ७ घरटरों में मगनदीप में ७॥ पाईफा मंगपली, माधा, फरजिया या नोम पा और ६पाई का तिली, अल्सी, या अगे या तेल चाहिये सर कि उतने ही समय के लिये उसी धागर पीलालटेन के लिये ७ पाइ का मिही का रेल चाहिये (इस हिमार में मिट्टी के रेल पीपे की कीमत १०६॥ari लिलइन अपनी अपनी जगह पेरा जाय तो देश की सम्पत्ति २०४|| रोड पढेगी। शेष २७ करोड सेर तेल के लिये साने के काम न अाने वाले तेलों को इस्ते- माल कर सकेंगे। इसमें और १,००,००० धानियों, तेलियों और बैलों का काम मिल जायगा, और इन कामों में सलग्न कुटुम्बों को करीब ३ करोड रुपयों की श्रामदनी होने लगेगी। इस प्रसर किसानों और तेलियों के पायदे के और जानवरों की खुराक और जमीन के लिये अच्छी साद मिलने के अलाश मगनदीप के कारण कई टीन का जुडाई करने वालों को भोर काच के ग्लोन बनाने वालों को भी रोज- गार मिल नायगा। इससे प्रतिवर्ष करीब २० करोड़ रुपया और मिल गया करेगा, जमीन पर बोझस्वरूप बने हुए कई लोग इस श्रोर लग जाने से खेती परका कुछ पोझ हलका हो जायेगा और लोगों की औसत श्रामदनी भी बढ जायगा । मिन व्यवसायों का तुल्यबल यनाने में इसका सासा असर होगा, शल कारीगर निमाण होगे और लोगों का मानसिक विकास होगा । शुद्ध भौतिक दृष्टि से भी मिट्टी के तेल की एवज में वनस्पतिजन्य टेलों के व्यवहार से लोगों को करीब २० २७॥ करोड के व्यवसाय मिल जायेंगे। राष्ट्रीय अर्थशास्त्र के अलावा मगादीप इस्तेमाल करने वालों के भक्तिगत अर्थशास्त्र पर भी सरसरी नजर दौडाना अनुचित न होगा। सर्वप्रथम महा यह यता देना ठीक होगा कि वनस्पतिजन्य तेल मिट्टी के तेल की अपेक्षा समारना अत्यन्त कम रहेगी। फिलहाल उसी श्रापार ये मिट्टी के तेल की बैसा कि हम कार लिस के २०० ते (जन में) फम जलता है। + ५ भाना सेर ये दिखाय से मानी गा)। पदि खाने हार न मानपाले -- । ११२ ) तेल इस्तेमाल किये जायें तो दोनों का सर्च एम्मा ही श्राता है। पर राष्ट्रीय नर्यशास्त्र की दृष्टि से मगनदीप इस्तेमाल करने में कितने रडे पायदे है यह हमने कपर देस ही लिया है, इमलिये जिन को देश के हित का रगाल है उनका तर्क है कि वह याने पडामियों को मिली के तेल के बजार नतिजन्य तेल इस्तेमाल करने के लिये समझाने की भरसक काशिश करें। (उपरोक कीमतें युद्ध पूर्व के भारसे गिनी गई है।)

ननेपाली और श्रासानी से सरनेाली चीजें बनाने के उद्याग भी इस देश फेवारीगरो के लिये कापी उत्रादक साबित होगी। इस दृष्टि से तेल पराई को सबसे प्रथम स्थान मिलता है। देहाती उद्योगों का बुनियाद खेती होने से यहाँ चलने वाला पधा क्तिनाही याक्यों नहा, सेती कीहालत के साथ उसका मी विस्तार और सकाच होता रहता है। इसलिये यह जरूरी है कि जय इस प्रकार रोजगार मदा पह जाता है, तर उस समय के लिये हम कोई सहयोगी " घघा सुभाए। यह यात मद्देनजर रसर पैल तल और देशी चीजों से साबुन पनाने की रीति यहाँ दी गई है और इसलिये मगनवाडी म तेलपानी की जो शिक्षा दी जाती है, उसकी पूर्ति के रूप में ही यह सास उपयोगो होगी। सतत्र का से जो लोग इस विषय का अभ्यास परना चाहें, उनके लिये यह बहुत है। कुछ प्रकार के वार्निश, ताडपत्रो, लिनोलियम और सानुन बनाने म भी अलसी का तेल रग ( Paint) बनाने में काफी इस्तेमाल किया जाता यह को प्रमाण म इस्तेमान दिया जाता है। अलसी का तेल जल्द सूखने बाना तेल है, क्योंकि यह हमाम से प्राएवायु (यॉक्साजन) जल्द सोच ताऔर उसकी एक कही तह बन जाता है। रंग और यानिश पनाने के लिये ४ किस्म का अलसी का देल परहार १ ताना पेरा श्रा, २ पुख्ता यना ड्या, ३ शुददिया हुया और परिशिष्ट उ उबाला हुआ तेल (घेल तेल) चु कि दुनिया के तमाम देशों में हिन्दुस्तान या, तिलहन की पैदागर की दृष्टि से, पडे महत्व का स्थान है इसलिये यह बात स्पष्ट है कि उनसे सदित मालूम होगा। जागा जाता है। आला हुआ।

ताजा तेल बहुत शाहिस्ते सूसना है, और उसकी झिल्ली नि नहीं होती। पुख्ता तेल ताजे तेल से अच्छा है, क्योंकि उसम काई भी कचरा तैरत हुया रहने नहीं पाता, और वह एकदम साफ रहता है। ताजा पेरा हुआ तेव निति डिब्वे में एक साल तक पद रमने से माफ पुरता तेल हो जाता है बैल तेल बनाने के लिये यह सीधा काम में लाया जा सकता है। यदि पुख्ता तेल न मिल सके, तो ताजा तेल गरम करके शुद्ध कर रोन चाहिये। इसके लिए तेल जल्दी से २६०° सेंटीग्रेड तक गरम क्यिा जात है और फिर ठडा होने दिया जाता है। उसे एक सप्ताह तक योदी रस दिय जाता है और उसमे, की सारी अशुद्ध चीजें नीचे जम जाने पर कार का साफ तेल बैल-तेल बनाने के लिये लिया जाता है। उपयुक्त तीनों तेल कुछ पाहिस्ता ही सूरसते हैं। इसलिये कुछ रसाय निक शोषक द्रव्य डालकर तेल २००° सेंटीग्रेड तक गरम कर लिया जाता है और ६ से ८ घटे तक उसी हालत में रखा जाता है। इस प्रकार से जो तेल बनता है, उसीको “उगाता हुना" या पैल तेल कहते हैं। यह बहुत ही जल्द सूरसता है। शोषक द्रव्य बनाना कोबॉल्ट, सीसा और मैगेनीज के रोजिनेट्स ये प्रमुग्म शोषक द्रव्य हैं। इनके अॉक्मादड्स भी शोषक द्रव्यों के तौर पर इस्तेमाल किये जा सकते हैं, पर वे रोजिनेटम जैसे गुणकारी नहीं होते। प्रोक्साइड्स की अपेक्षा रोजि नेट्स तेल में ज्यादा पैल जाते हैं और तेल के सूसने की गति भी दाते हैं। नीचे दिये हुए तरीके से राजन में कोबोल्ट, सीसा और मैंगेनीज रे. श्रॉक्साइडम मिलाने से रोगिनेट्स तैयार होते हैं। एनमल या पोज में राजन डालकर वह नोच पर रस कर पिघलाया जाता है। पिघल जाता है, तब उसमें उपयुक्त तीन 'श्रॉक्साइड्स' में नीचे दिये हुए प्रमाण में मिलाया जाता है और उसे राजन पोटा जाता है। राजन और प्रोक्साइड्स का जो मिभए

रोनिनेः कहते हैं। हरएक प्रॉक्सादड् का स्वतन्त्र रूप से रोजिनेट बनाना
चाहिये।
राजन और प्रॉक्साइड्स के प्रमाण ये हैं
राजन कोबाल्ट ऑक्साइड लेडनॉक्साइड या लिया मैंगेनीज प्रॉक्साइड
६
७
तेल मे रोजिनेट्स मिलाने का प्रमाण
कोनॉल्ट रोजिनेट लेड रोजिनेट मंगेनीज रोजिनेट
तेल
७
तेल उबालने की रीति
निसा भी खन के प्रमाए का से अधिक रोल उसमें न भरकर
तेल उबाला जाता है। नेल को पालने समय इस बर्तन का मुंह ढकना
न चाहिये । १००° सटामेड उधएता हाते ता उसे पाँच दी जानी है,
और बाद में रोजिनेटम मिलाये जाते हैं और लरडी की डडी मे रद मिश्रगा
हिलाया जाता है। इस तरह करीब ७ घटे नक २००° सेंटीमेड की
उम्यता प्रारम ररनी पहती है। इसके बाद उसे कुछ ठदा होने दिया
जाता है और गरम रहते ही क्यडे द्वारा छानकर एक निर्वात डिच्चे में भर
दिया जाता है। यही "उता हुना" या "बैल" तेल है।
इसकी परस एस प्रसार होती है। लन्डी के तरने पर इसका एक
दाय मारा जाता है और उसे सूरमने में कितनी देर लगती है, यह देग्या
जाता है। यदि तेत निदीप हुआ, ता १२ से २४ घटा में सूख जाता
है। सूमो पर पद चमाना चाहिये और हाथ म चिपका TIचाहिये,
आगरा उमारनी अंगुली साचो मे उसका निशा हीं बनना चाहिये ।
मार दिये हुए प्रमाण म शोस द्रन्स मिलाने में प्रार २००° टीमेह
ताउता देते यानानापागलपासादाम याता
हापाता और १२ | पदर ही अली तर मे सूप
जाता है।
उष्णामान बारम रोकी गारari Mना बहुत जरूरी
है। इसम पम उमा सिमारे पर इसका रंग असा माना है। और

. ( ११४ ) ताजा तेल बहुत शाहिस्ते हसता है, और उसकी झिल्ली निदोष नहीं होती। पुख्ता तेल ताजे तेल से अच्छा है, क्योंकि उसमें कोई भी कचरा तैरता हुना रहने नही पाता, और वह एक्दम साफ रहता है। ताजा पेरा हुआ तेल निर्यात डिब्बे में एक साल तक वद रसने से साफ पुरना तेल हो जाता है। बैल तेल बनाने के लिये यह सीधा काम में लाया जा सकता है। यदि पुरना तेल न मिल सके, तो ताजा तेल गरम करके शुद्ध पर लेना चाहिये। इसके लिए तेल जल्दी से २६०° सेंटीग्रेड तक गरम किया गता है और फिर ठडा होने दिया जाता है। उसे एक सप्ताह तक योंही रस दिया जाता है और उसमें की सारी अशुद्ध चीजें नीचे जम जाने पर ऊपर का साफ़ तेल चैल-तल बनाने के लिये लिया जाता है । उपयुक्त तीनों तेल उछ अाहिस्ता ही सूसते हैं । इमलिये कुछ रसाय निक शोषक द्रव्य डालकर तेल २००० सेंटीग्रेड तक गरम कर लिया जाता है और ६ से ८ घटे तक उसी हालत में रसा जाता है। इस प्रकार से जो तेल बनता है, उसीको “उनाला हुआ" या बैल तेल वहते हैं। यह बहुत ही जल्द सूरसता है। शोषक द्रव्य बनाना कोपॉल्ट, सीसा और मैंगेनीज के रोजिनेट्स ये प्रमुख शोषक द्रव्य हैं। इनके ऑक्साइड्स भी शोषक द्रव्यों के तौर पर इस्तेमाल किये जा सकते हैं, पर वे रोजिनेटम जैसे गुणकारी नहीं होते । श्रोक्साइड्स की अपेक्षा रोजि नेटम तेल मे ज्यादा फैल जाते हैं और तेल के सूसने की गति भी बढाते हैं। नीचे दिये हुए तरीके से राजन में कोबॉल्ट, सीसा और मैंगेनीज रे श्रॉक्साइड्म मिलाने से रोनिने स तैयार होते हैं। एनमल या पीतल के बर्तन में राजन डालकर यह ाँच पर रस कर पिघलाया जाता है। अब सब राजन पिघल जाता है, तब उसमे उपयुक्त तीन 'नॉक्साइड्स' में से कोई भी एक नीचे दिये हुए प्रमाण में मिलाया जाता है गौर उसे राजन के साथ अच्छी तर मोटा जाता है। राजन और श्रॉक्साइड्स का जो मिश्रण तैयार होता है, उसे - काफी प्रबादी रहता है ग्रार १२ घटा पधदर ही अच्छी तरद ( ११५ ) रोजिनेट कहते हैं। हरएक पोक्साइड् का स्वतन्त्र रूप से रोजिनेट बनाना चाहिये। रामन और प्रोक्साइड्म के प्रमाण ये हैं राजन कोबाल्ट श्रॉक्साइड लेडॉक्साइड या लिया मैंगनीज प्रॉक्साइट ७ १ ७ तेल में रोमिनेटम मिलाने का प्रमाण : गोल्ल रोजिनेट लेड रोजिनेट मंगेनीज राजिनेट १०० तेल उपालने की रीति किसी भी रतन के प्रमाण कार से अधिक तेल उसमें न भरकर तेल उगला जाता है। नेल को डालने समय इस बर्तन का मुंह दाना न चाहिये । १००° सेंटामेट उमाता दोले ता उसे पाँच दी जानी है, और बाद में रोमिनेट्स मिलाये जाते हैं और लण्डी की डडी से वह मिश्रणा दिलाया जाता है। इस तरह करीर ७ घटे तक २००° सेंटीग्रेड की उभ्यता कायम रानी परती है। इसके बाद उसे कुछ उदा होने दिया जाता है और गरम रहते ही कपड़े द्वारा छानकर एक निर्वात दिन्बे में भर दिया जाता है। यही "उबाला हुअा" या "वैल" तेल है। इसकी परम इस प्रसार होती है। लन्डी के तख्ने पर इसका एक हाय मारा जाता है और उसे सुपने में स्तिनी देर लगती है, यह देना जाता है। यदि तेल निर्दोष हुया, ता १२ से २४ घटो म घूस जाता है। सपने पर वह चमकना चाहिये और हाथ में चिपकना ना चाहिये, प्रथा उसपर से अँगुली साचने से उसका निशान नहीं बनना चाहिये । कार दिये हुए प्रमाण में शोषक द्रव्य मिलाने से प्रार २००° सेंटीग्रेड तक उपरता देने से यानानेवाले तेल पा रग हलका वादाम शाता है। पर यूव उपमान डायम रखने की साधानी रखना बहुत जरूरी है। इससे कम उम्यता दिखाने पर समाहा पाता है। और - सूसता भी बहुत जल्दी है , पर काफी लवे असे तक वही उष्णता सिथर रसनी पड़ती है , जो कि बहुत कष्टप्रद है। उष्णता २००° सेंटीम इ पर कायम रखने के लिये ३५०° सेंटीमेड वाले थर्मामीटर का नार-बार उपयोग करते रहना श्रावश्यक है। १०° तक उष्णतामार कभी कम हो जाय, तो हर्ज नहीं, पर उसे २००० से अधिक कमी नही होने देना चाहिये। ३००° तक उपएता पाने पर तेल पार ही धार जल उठता है, जिससे जान और मात दोनों को खतरा पाँचना मुमकिन है। इसलिये ४००० तक उष्णता किसी भी हालत में ही पढो देना चाहिये। इसके अलावा इननी उपता पाने पर तेल में से नेज दुर्गध छूटती है, जिससे जी घरा जाता है। आम तौर से यह ध्यान रसना चाहिये कि तेरा उबालने की जगह की दीवारें मिट्टा को मोर उनके जार टान छाया हो ताकि वह जगह आग से सपूर्णतया सुरक्षित रहे। २ देशी चीजो से बना साबुन यद्यपि देहातों में साबुन यार तौर से इस्तेमाल नहीं किया जाता, पिर भी शहगे के हरएक घर में तो यह रोजमर्रा इस्तेमाल करने की चीज हो गई है। फिलहाल या तो वह विदेशों में आता है, या वहीं पर तेल या चर्चा और मॉस्टिक सोडा द्वारा बड़े बड़े कारखानों में बनाया जाता है। देहातों में मिलने वाली चीजों से भी यह मनाया जा सस्ता है। पानसनेक तेल अपने यहाँ यामी प्रमाण में होता है और मामूली साडे में चूना मिलाकर कॉस्टिक बनाया जा सकता है। सनीमिट्टी, रुजीसार और पापहामार के रूप में अपने यहाँ मामूली सोडा बहुत मिल सकता है। इन सबमें साडियम या पाटेशियम कारनोंनेट कम अधिक प्रमाण में मौजूद रहता है। ऊमर जमीनों पर मृतु ने बाद सर्ज मिट्टी की तह पार जाती है। उसमें सामान्यत ५ से २० प्रतिशत तक सोडा रहता है। पाज वक्त और चद जगहों पर इसका प्रमाण ६० प्रतिशत भी पाया जाता है। कुछ याप तियों को रास को सर्बसार कहते हैं। इसम १५ से २५ प्रतिशत तक सोडियम या पटॅशियम कारबोनेट रहने हैं। यह अक्सर पजाब और सिंध में होता है।' नीची जगहों पे तालार तथा झीलें गमी म सूसने पर उनपर पापडसार जमा एक बारहे। पिसी भी क्षार की तेजी जानने के लिये उसे किसी निर्धारित निर्धारित तेनार है। क्षार या गुण नष्ट करने प लिये कितना तेजाव मिलाना पड़ेगा, यह जाननेरे लिये एक निदर्शक (Indicator) भी तय करना पड़ेगा। । ११७ ) मिलता है। यह परार और सिंघ म बहुतायत से पाया जाता है। इसमें सोडे का प्रमाण ४० से १० प्रतिशत तक रहता है। कार दी हुइ तीनों चाजों में चूना मिलाने से साबुन बनाने के लिये शार श्यक कॉस्टिक सोडा या पाटेंशियम प्राप्त हो तरता है। थोड़े पैमाने पर और सस्ता कपड़े धोने का साम्रा बनाना हो, तो मामूली मिटाने तेल के साली हिल्वे, करछुल और मामूली चूल्हे की सहायता से बनाया जा सकता है। रॅडो, नारियन, मूगफली, महुश्रा और तिली के तेल से साउन श्रागनी से बन सकता है । एरडी के तेल से सामुन बहुत जल्दी ग्नता है, पर वह अकेला अन्छा नहीं होता। अन्य चार तलों का साबुत बनता तो ठीक है, पर उन्हें लेरे समय तक उबालना पड़ता है, तब उनका साधुन में रूपातर होता है। इनमें से भी नारियल, तिली और मूगफली के तेल के अन्य उपयोग होने से वे मरेंगे विरते हैं, इसलिये साबुन बनाने के लिये पूरे नही पडते । नेपल नारियल के तेल का माबुन हुत जल्द घिस जाता है । ये तेल स्वतत्र रूप से या किसी भी प्रमाT से मिलावट करके साबुन बनाने के काम या सरते हैं। मिन भिन स्थानों की सनीमिट्टी, सजीसार और पापडसार के सोडे या पोटॅश का प्रमाण भिन्न भिन्न रहता है, इसलिये इसमें से कॉस्टिक मोडा या पाटॅश बनाने के निये किस नमूने में कितना सोडा है, यह जान लेना जरूरी है। इसका आसान तरीका यह है। सजामिट्टी या उसमें का णनी घुलनेवाला रासायनिक घटक सोडा कारयोनेट तेजान से मारना पड़ता है और मामूली काम के लिये नीबू का रस एक सुन्नम नासोन पे फूल का रस एक सुलभ निदर्शक है। (अ) एक नीबू का रस निकाल लीजिये। यह हमारा निर्धारित तेजार हो गया।

( ११८ ) (या) एक बोतल में तोला सीमिट्टी तीजिये और उसमें २५ तोला पौलता हुश्रा पानी मिलाकर बोतल को कोर से गिलाकर मिट्टी को सूब पोल लीजिये। इसे सजीमिट्टी का दारण कहेंगे। (४) चीनी मिट्टी के प्याले में एक प्रौस द्रारण ले लीजिये। 15) सफेद स्याहीसोस पर जासोन का फूल मसलकर अच्छी तरह से रगडिये ताकि स्यादीसोप पर फूल के रस का रंग चढ जाय । इस रस से स्यादीसास का रंग गनी हो जाता है। यह हमारा टेस्ट कागन है। इस त्याहीसोस पर पर यदि पार द्वारण की एकजूद डालेंगे, तो उसका रग हरा हो जायगा। पर जब द्रारण का क्षारधर्म नीबू का रस मिलाते मिलाते नष्ट हो जायगा, तर उमकी बूंद से स्याहीसोस के रग पर कोई असर नहीं पडेगा। पर इसके बाद भी अधिक नीबू का रस मिलाकर द्रावण यदि ग्राम्ल बना दिया गया, तो उसकी वूद मे स्याहीसोस का रंग गुलानी हो जायगा । मिनिम ग्लाम में नीबू का रस लेकर सजीमिट्टी के द्वारण में एक एक बूंद मिलाते जाइये और द्रापण को लकडी से हिलाते रहिये । समय समय पर उस लकडी को निदर्शक पर छुआते जाइये । जस्तक निदर्शक का रग हरा होना बद न हो जाय, तबतक नीबू का रस मिलाते जाइये। जब ऐसी हालत श्या जाय, तब समझ लीजिये कि द्रावण का क्षारगुण नष्ट हो गया है। पिर भी नि सशय होने के लिये और थाड़े बूंद नीबू का रस मिलाइये, ताकि द्वारा हिलाने की लपली की चूद के स्पर्श से निदर्शक कागज का रंग गुलाबी हो जाय । द्वारण का क्षारगुण नष्ट होने के लिये कितने मिनिम रस रागा, यह मिनिम ग्लास में से देष लेना चाहिये। अत मे जो अधिक रस मिलाया था, "उसे शुमार नहीं करना चाहिये । द्रापण का क्षारधर्म नष्ट करने के लिये जितने मिनिम लगेंगे, उगमे ऐमा सिद्ध होगा कि उतना प्रतिशत सोडा फारगोनेट उम मजीमिट्टी म है, अर्थात् यदि ३० मिमि लगे होंगे, तो ३० प्रतिशत सोडा कारसोनेट होगा। इसमें एक गात गात में रपती चाहिये कि मिनिम का मतला एक यूँ द नहीं होता, क्योंकि मूंद वही रहती है और छोटी भी । इसातये मिनिम जानने के लिये पाजार में मिलनेवाला मितिम ग्लास दी काम में लाना चाहिये । । . - M (E) इस प्रसर सजीमिट्टी में सोहा कारखानेट का प्रमाण निश्चित हो जाने पर साइन बनाने में उसका क्या प्रमाण होना चाहिये, यह तय करना नावान हो जाता है। सोडा ३ भाग ( या उतना सोडा मिल सक्ने लायक सजीमिट्टी ), पली का चूना २ भाग और पानी ६ भाग इतने सामान से पॉस्टिक मिश्रा मनाया जाता है। पहले पानी में सजीमिट्टी डालकर उसे उवाला जाता है। जब वह सोलने लगता है, तब उसम थोडा चूना मिलाया जाता है और उस के बाद करीब १ घटे तक वह सारा मिश्रण उपलने दिया जाता है। इसके बाद वह उतार दिया जाता है, ताकि उसमें की मिट्टी नीचे जम जाय । फिर ऊपर का मिश्रण फपडे से छान लिया जाता है और मिट्ट में पिर एक पार गर्म पानी मिलाकर मिश्रण डान लिया जाता है। इस प्रकार दोनों बार के छने हुए मिश्रण मिला दिये जाते हैं और सामुन बनाने के काम में लाये जाते हैं। यही कॉस्टिक मिश्रण है। सानुन रनाने का आसान तरीका यह है। यारश्यक सामग्री ६ पोह तेल, ३ पौड सोडा और २ पौड कली के चने से बना हुश्रा कॉस्टिक मिश्रण। क्रिया कॉस्टिक मिश्रण कामी पडे गर्तन में रखकर उबाला जाता है। फिर उसमें तेल ( यह तिली, महुअा, एरडी और मूंगफली के तेल का मिश्रण भी हो सकता है ) धीरे धीरे लोहा जाता है और साग मिश्रण पछी से या लाही से हिलाते रहना पडता है। जब वह सारा पिंड ठडा होने पर ठोस जमने की प्रवृत्ति धारण करे, तब उबालना और लफडी से दिलाना बन्द करना चाहिये। और उसे लकड़ी के या पातु के सोचों में उठेलना चाहिये । एक दो दिनों में साबुन साँचों में जम जाता है। यदि साचे धातु के बने हो और साधुन उसको गाना गया हो, तो यात्रुओं पर रेज चाकू फेरफर उसे छुडा लेते हैं मोर साँचा उल्ट देते हैं जिससे साउन ये डले नीचे गिर जाते हैं। फिर इन्हें इच्छित प्रमाण में काटकर रख लिया जाता है ।

परिशिष्ट ऊ तेलघानी सम्बन्धी प्रभारली इम विषय के अधिक संशोधन के लिये इस समय बहुत ही कम जानकारी हासिल है। जानकारी विस ढग की होनी चाहिये इसकी रूप- रेया नीचे दिये हुए प्रश्नों पर से श्रामयती है। सपूर्ण विगतदार और विचार- पूर्वक जानकारी हामिल की जाय तो वेल अर्थशास के विद्यार्थियों को ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण में दिलचस्पी लेनेवालों को भी वह उपयुक्त सावित होगी। इस दृष्टि से जो महाश्य निम प्रमों में से सभी या कुच के बारे में प्रत्यक्ष और विश्वसनीय जानकारी हासिल कर सकते हैं वे उस नानकारी को व्यरत्यारक, घानी विभाग, प्रभा मा उ सघ, वर्धा (मध्यमान्त) को भेजने की कृपा करें। १ पानी को कायक्षमता (१) प्रतिघान मे कितने सेर तिलहन डाले जाते हैं ? (२) प्रतिघान को कितना समय लगता है ? (३) कितना प्रतिशत बिना गाद का शुद्ध तेल निकलता है ? (४) तेल और सली की प्रतिदिन की औसत मात्रा क्या है ? सूचना भिन्न भिन तिलहनों के लिये अलग २ जानकारी दीजिये। (५) जुश्रा और बोझापाट के बीच की रस्सी म लिग बॅलेन्स लगाने से कितने पौड का सिंचार होता है? (६) धानी में बनी हुइ सली की मोटाई कितनी है ? (७) घानो का काठा और लाट का रेसाचित्र न. २ के अनुसार नारसहित नरुसा दोजिये। (८) लाट पर दवान डालने के लिये योभाराट पर कितना वजन रस्सा माता है? --

( १२१ )
(e) तेल को नीचे से निकलने के लिये क्या मुहरी होती
है या कार से निकाला जाता है ? यदि कार से निकाला जाता है तो किस
उपाय से?
२ पानी को रफडी
(१) प्रातोमें किस लकडी की पानिया बनाई जाती हैं ?
(२) इनमें से कौन लकडिया कम मिलती हैं और कौन यहुतायत में
और वे कहाँ पायी जाती हैं ?
(५) कौनसी लकही सर से ज्यादा अच्छी है ? किस किस्म की
लको जल्दी पटती या पिंसती है ? कौनसी लकडियों तेल ज्यादा पीकर
पोची पड़ती है और सडती है ? किस लकडो में दीमक तथा अन्य की
नहीं लगते ?
(v) भिन्न भिन्न लकडियों की रनी हुई पानियों में से प्रत्येक औसतन
स्तिने समय तक टिकती है। प्रत्येक लकड़ी के पानी की ओखली की श्रीमत
कीमत बताइये।
(५) पानी की लाट और कोठे की फायर किन प्रकार की लकडियों
से मनाई जाती है ?
सूचना ऊपर के प्रश्नों में जो बातें पूछी गई हैं उनमे उक्त दोनों कामों
की लकडियों के बारे में सही जानकारी दीजिये।
(६) लाट और श्रोखली की लम्बाई और चौडाई यताइये।
सूचना पोसली की लमयई निश्चित करने में जमीन का क्या
भाग रहा है पतलाइये, क्योंकि जमीन में बालू का भाग अधिक होने पर
तपा दरारें पहने का गुण होने पर श्रोखली की लकडी अधिक लम्बी रखनी
पडती है।
(७) पानी के लिये प्रापश्यक कुछ लकडी का पूरा मूल्य यतलाइये।
पानो बनाने म मजदूरी को लागत
(१) पानी के मुख्य अगा जैसे प्रोखली, कुट, कोठा, लाट, बोभापाट
इत्यादि के बनाने में लग क्या मसदूरी लगती है!

- । १२२ ) (२) एक सम्पूर्ण और नई पानी बनाने में क्या मजदूरी लगती है ? इस मे कारीगर को यदि साना दिया जाता हो तो उस को भी सम्मिलित कर लेना चाहिये । मजदूरी रोज के हिसाब से दी जाती है या ठेके पर ? (३) एक वढई को पूरी धानी बनाने में कितने दिन लगते हैं १ धानी के प्रधान अगों के लिये अलग २ कितने दिन लगते हैं ? (४) घानी के काम के विशेष नढई जिले में कितने हैं १ क्या उनकी सख्या इतनी पर्यात है कि वे मरम्मत के लिये समय पर मिल सकें ? क्या स्थानीय बढई धानो की मरम्मत का कुछ काम करते हैं ? (५) पानी के लिये प्रोसत वार्षिक मरम्मत खर्च क्या प्राता है ? सूचना इसमें लकडी की घिसाई और पदई का सर्च इन दोनों का भी हिसाव करना होगा। ४ घानी का बैल (१) स्थानीय बैल कमजोर होते हैं या मजबूत ? (३) एक मिनिट में बैल घानी के आसपास औसतन कितने चक्कर लगाता है ? (३) घानी एक बैल से चलाई जाती है या दो ल से ? साधारण बैल की कीमत क्या होती है ? यह पानी का काम कितने वर्ष कर सकता है? (५) बैल पर प्रतिदिन क्या खर्चा पडता है ? (६) योझापाट को लम्पाई कितनी है १ घानी में चलते समय चैल की रोद वगल को कितनी झुकती है ? जुने को बोझा पाट से बाँधने याली रस्सी क्या बैल के बगल से रगर साती है? (७)बैल के अलारा और कौन जानवर घानी में जोते जाते हैं ? कीमत खुराको खर्च और कार्यशक्ति के यारे में इनकी और बैलों की तुलना करो। ५ तेली की कायकुशलता (१) एक पानी चलाने में कितने तेली की आवश्यकता पड़ती है ? (२)तेली कितने प्रकार के तिलहों को पेर सकता है ?

उनमें से कितने मोये नाते हैं और कितने प्राकतिक वनस्पति से कह किये
कौन से हैं ?
पथप्रदर्शन कर सकने वाला होता है ? यदि धानी ठीक काम न देती हो तो
(६) क्या तेली को पैल तेल या साबुन बनाने जौसा काई हायक
(२) मान्त में किन तिलरनों की उपज होती है? कितनी तादाद में !
१२३ )
(३) भिन्न भिन्न तिलहनों के पेरने के उसके तरीके पतलाश्रो। वह
कर और कितना पानी डालता है ? ठडा या गर्म ? क्या बैल के चलते हुए
रहने परमो सली खोदी नाती है ? यदि हो तो कितने बार ? यदि तेल मुहरी
से निकाला जाता है तो मुहरी कब खोली जाती है ?
(४) तेली निम्नलिसित चीजों के बारे में क्या जानकारी रखता है,
बतलाइये।
(अ) तेल के पिरने में गर्मी का महत्व ।
धानी में जो अपने श्राप गर्मी उत्सन होती है उसके अलावा यदि
गर्मी पैदा करने के कोई दूसरे साधन व्यवहार में लाये जाते हैं तो वे
(ब)पेरते समय में सनी के अभिसरण से समय का बचना ।
(क) सली की मोटाई का लाट के दवाव तथा लाट और कोठे की
दीवाल के बीच की जगह पर निर्भर होता है। सली की तुलनात्मक
मोगा के आधार पर खली पर के दवार का अन्दागा लग सकता
है । तेली इस विषय पर क्या प्रकाश डाल सकता है ?
(ड) मिन भिन्न तिलहना के लिए भिन्न भिन्न ऋतुओं में पानी डालने
(५) क्या तेली धानी मरम्मत के लिए पदई को विस्तृत और श्रावश्यक
क्या यह पता लगा सकता है कि कहाँ गडबड है ?
६ तिन्हत
की मात्रा
पेशा श्राता है ?

(२) प्रत्येक तिलहन के पैदागार में से कितना उसी प्रदेश में पेरा जाता है और कितना पाहर मेज दिया जाता है ? क्या पेरने के लिए बाहर से कोई तिलहन श्राता है ? यदि हाँ तो कौन कौन से और कितने ? (३) कोन कोन निलहन शिरा पेरे हुए व्यर्थ जाते हैं ? उनकी तादाद भी पतलाइये (४) कौन से तिलहन साने के काम में लाये जाते हैं और कौन दूसरे व्यवसाय के काम में पाते हैं व्यवसाय में उनके क्या उपयाग होते हैं ? (५)अपनी तेल की जरूरत के बारे में क्या प्रान्त स्वाग्लवी है ? अथवा तेल का यायात बाहर से होता है ? यदि होता है तो कहीं से और कितनी तादाद में? (६) भिन्न भिन्न स्थानीय तिलहनों का तेल प्रतिशत बतलायो । (७) प्रत्येक तिलहन की सली किस राम श्राती है ? क्या उसका निर्यात होता है ? यदि हाँ तो कहाँ भेजी जाती है और कितनी माना में ? ७ बल घानी, पावर घाना और मिलें (१)भिन्न भिन्न तिलहनों के लिए एक टन तेल की पेराई (परने की कीमत) वतलाश्रो, यदि वह (१) बैल धानी में पेरा जाय, 1.(२) पावर धाना में पेरा जाय, और (३) पावर मिन म पेरा जाय । (२) भिन्न भिन्न तिलहनों का क्रमश, उक्त तीनों प्रकार की पेराई से निम्लने वाले तेल प्रतिशत यतलायो । तीनों प्रकार की पेराई में सली के अन्दर कितना प्रतिरात तेल रह जाता है ? सूचना विश्लेषण पेलिए उपरोक्त प्रत्येक प्रकार की और प्रत्येक तिलहन की करीब पौन सेर सली अच्छी तरह टीन में रखकर व्यवस्थापक, घानी विभाग, अ भा मा उ सघ, वर्धा, को भेजना चाहिये। पौन सेर सली में से काठे के सत्र से नीचे के हिस्से (पेट) में से एक पाव, बीच म से एक पार और ऊपर के भाग में से एक पार होनी चाहिये । और इन तीनों भागों की सली के नाम अलग अलग लिस कर भेजना चाहिए। साथ माय इन तीनों भागों में बैठने वाली सली का प्रमाण भी बतला कर भेजी हुई खली उसका कौन सा भाग है बताना चाहिये । , स्या तेली अपने तिलहन पेरते हैं या पिगई पर ? यदि पिराई पर घेरने हो एक शान पे लिये क्या मिलता है से मिलते हैं या खली (३) उक्त तीन प्रकार से निकले तेल और खलियों के बाजार भाव , की तुलना करी। (1) प्रान्त में स्तिनी बैल पानी, पावर घाना और पावर मिलें चलती हैं। उनका तल तथा खली का वार्षिक उत्सादन क्या है। (५) प्रान्त की इस समय चलने वाली धानियों में जितने श्रादमियों अर्थात् तेली, चढई, और मजदूर तथा बैलों को रोजी मिलती है ? पावर घाना में कितने प्रादमी काम करते हैं ? पार मोल में कितने १ पापर घाना और पर मिल के मानिक के मुनाफे और कुल कर्मचारियों की तनख्वाह और मजदूरी की रकम में क्या अनुपात है? (६) तेली के अाय व्यय का ब्यौरा दीजिए | और उसमें शुरू का तिल- *हन का समह, नई खरीद, बैल श्रादि का पर्चा, पानी की घिसाई और मरम्मत का सच तथा तेल और सली की बिक्री और बचा हुआ तिलहन का हिसाब बत्तलाइये। ८साशय (१)चनापट तथा चलाने की पदति के अन्तर के अनुसार प्रान्त में क्तिने प्रकार की घानियाँ है? (२)क्या हाय पानी भी कही इस्तेमाल में है ? उससे निकले हुए तेल प्रतिशत की बैल पानी के तेल प्रतिशत से तुलना करो। (३) पेरने पे स्थान की सफाई की दृष्टि से क्या क्या उपाय किये जाते ११ ? (४)तेल में की गाद कैसे दूर की जाती है। सेल फच तक विगहता नहीं। इसको टिकाने के लिए क्या उपाय काम में लाये जाते है । (५) गत दस पयो में मैल पानी को सख्या में कितनी कमी है? और स्यो? रख लेते हैं। कितना तेल निकाल देने का रिसान है। - १२६ ) (७) बैल पानी में सुधार करने के लिये तथा उसके पुनरुद्धार करने के लिये श्राप क्या उराय पतला सकते हैं ? ८ बड़े पैमाने पर चलनेगली तेल की मिलों की स्पर्धा के कारण बैलानियों की संख्या घट गई है। इस स्पर्धा के होते हुए भी कई ऐसी बातें हैं जो इन घानियों के अस्तक जिंदा रहने में मददगार हुई है नीचे लिसी ऐमी बातों में आपकी राय में कौन २ मददगार हुई हैं और घानियों के पुनर्जीवन में उनसे किस तरह फायदा उठाया जा सकता है ? १ मिल के तेल से पढकर पौष्टिक और स्वादिष्ट होने के कारण लोग पानी तेल को पसद करते हो, २ फ्म से कम फायदे में अपना गुजर करने के लिये तेली तैयार हो, ३ मिल के तेल का अभी तक सभी जगहों पर गुजर'न हो पाया हो, ५, लोग तिलहन का संग्रह करके जरूरत पढने पर मजदूरी पर तेल पेरवा लेने हों, ६ दूमरे पायदेमद धधे का न होना और अपने धधे के प्रति प्रेम, ७ ज्यादा परिमाण में न मिलने के या और कई कारणों से मिल में कई तिलहन न पेरे जाते हो, पर वे स्थानीय उपयोग के लिये घानियों में पेरे नाते हों, ८ काश्तकारी या दूसरे मुख्य उद्योग की फुरसत में सहायक धधे के तौर पर तेली तेलघानी चलाते हों, ६ लोग और तेलियों के सहकार से मिल के तेल का बहिष्कार किया गया हो। ६ नीचे लिखी बातों में कौन २ सो घानियों की संख्या घटाने में मददगार हुई है? १ घानी की कार्यक्षमता का अभार याने तेल का प्रतिशत पम निकलना, कम तिलहन लगना, ज्यादह समय लगना, मरम्मत सर्च ज्यादह होना श्रादि २ शुद्ध पानी तेल न वेचो मे तेलियों की अदूरदृष्टि, ३ फसल के समय मे तेली के तिलहन संग्रह करने के लिये पूंजी का ४ जलाने के काम में वनस्पति तेल की जगह मिट्टी के तेल का उपयोग। १० गाँव के क्तिने प्रतिशत लोग सुद निलहन 'समह करके मजदूरी पर तेल पेरवा लेते हैं ? यह तेल मिल के तेल से सस्ता पडता है या श्रभाव 1 १५ पूग काम करने वाली एक घानी के तल से गांर के कितने ( १२७ ) महँगा ? क्या, तेली मजदूरी पर पेरे जानेवाले तिलहन से भी उतना ही तेल निकालता है जितना खुद के तिलहन में से निकालता है ? ११ फसल के समय में और दूसरे मौसा में तिलहन के मार में स्या पर्फ रहता हैं ? इसका उस तेली पर क्या परिणाम होता है जो फसल के समय में न खरीद सकने की वजह से दूसरे मौसमों में गाजार भाव से तिलहन खरीदता है ? इस हालत को सुधारने के लिये श्राप क्या उपाय बताते हैं। १२ सालभर में कितने महीने और महीनेभर में कितने दिन तेली पानी चलाता है ? पाकी दिनों में क्यों नहीं चलाता ? रोजाना क्तिना तेल निकालता है और फितना वेचता है ? गाँव में सर्च होनेवाले तेल में से मिल तेल और पानी तेल का क्या प्रमाण हैं ? १३ साधारएतया खाने के काम श्राने गले तेल कौन २ से है उनमें कौन से पानी के हैं ? उनके भार में क्या पक रहता है? यह मार साल में किस तरह बदलताता है ? १४ क्या पानी में मूंगफली पेरते हैं ? इसमं पानी मिल के तेल या मुकापना कर सकती है १ दूमरे महँगे तेल की जगह इस तेल को हमेशा के लिये इस्तेमाल करने के लिये लोग तैयार हैं ? कुनयों की मांग पूरी हो सकती है?

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तीन आना अधिक भेजें।
गाधीजी कहते ह-ग्राम आदोलनकी आवश्यक्ता और व्यवहारिताने सवधर्म
अखिल भारत ग्राम उद्योग संघ
मगनवाडी, वर्धा (मध्यप्रात)
प्राप्य पुस्तकों की मूल्य सूची
शत
निम्न लिखित पुस्तकें हमारे यहा मिलती है । जो सज्जन स्तिाव मगाना चाहें
उन्हें चाहिय कि वे उनकी कीमत तथा डाक खचकी रकम टिक्टोंके रूपमें या मनि-
आडर द्वारा परागी भेज दें। पुस्तकें अग्रेजी, हिंदी, मराठी और गुजराती इन
मापाआमें ह । इसलिए आहर देते समय अग्रजीके लिए (अ) हिन्दी के लिए (हिं)
मगठीके लिये (म), और गुजरातीके लिये (ग), ऐसा लिख देना चाहिये । पता,
पाकखाना, मिला, स्टेशन प्रादि साफ लिखें। रजिस्टर पोस्टसे किताब चाहिये हो तो
कोई भी बुकसेलर एक साथ कम मे-कम रु० २५/- के हमारे प्रकाशन मगावें
तो उह १५०/- कमोशन दिया जावेगा। पेकिंग, रेल्वे खच तथा दीगर खच जिम्मे
खरीददार । पुस्तकें मगाते समय १० १०/- पेशगी भेजने चाहिये और शेष रकम
रही पो द्वारा वसूल की जावेगी।
जिनके पीछे तारेका चिह () है वे हमारे प्रकाशन नहीं है। इसलिये उनपर
कोई कमीशन नही दिया जावेगा।
रातकी क्सिीभी विस्मकी नुकसानीचे हम जिम्मेवार न होगे।
माम प्रान्दोलनकी आवश्यकता-
ले जे सी कुमारप्पा [ गाधीजीकी प्रस्तावना सहित]
जितन कुछ आक्षप उठाये गये हैं उस सवा श्री जे सी कुमारप्पाने इस पुल
जवाब दिया है। ग्रामोसे प्रेम रखनेवाले हरएर व्यक्तियो इसे अपने पास
पाहिये । शक्तिोषीशकाए इसे पढ़ने पर निमल हुए बिना
तो ऐसा लगता है कि नराश्यका मादोलन शुरू होनेके
बादोलन की आवश्यक्ता प्रकाशित हुई है।
जवाव देनेकी बोगिय परती
१ सामान्य
३

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। अखिल भारत ग्राम उद्योग संघ मगनवाडी, वर्षा (मध्यप्रात) प्राप्य पुस्तकों की मूल्य सूची श निम्न लिखित पुस्त- हमारे यहा मिलती है । जो सज्जन किताब मगाना चाहें उ हैं चाहिय कि वे उनकी कीमत तथा हाक सचकी रकम टिफटोके रूपमें या मनि- बार द्वारा पेशगी दें। पुग्न अग्रेजी, हिंदी, मराठी और गुजराती भापायोंमें है। इसलिए बाहर देते समय यग्रेजी के लिए (अ) हिन्दी के रिए (हिं) पगाके रिय (म), और गुजराती रिये (ग), ऐसा लिख देना चाहिये । पता, दाकशाना, जिल्ला, स्टेशन प्रादि साफ लिसें । रजिस्टर पोस्टसे किताब चाहिये हो तो तीन आना अधिक भेजें। कोई भी बुक्सलर एक माय कम-से-कम रु. २५/- के हमारे प्रयासन मगाय तो उन्हें १५. कमीशन दिया जावेगा । पैकिंग, रेल्वे सच तथा दीगर पत्र जिम्म घरीददार । पुस्तकें मगाते समय १० १०/- पेशगी भेजने चाहिये और शेष रकम म्ही पो द्वारा वमूल को जावगी। जिनके पीछे तारेवा चिट () है वे हमारे प्रकाशन नहीं है। इसरिये उनार कोई कमीशन नहीं दिया जायेगा। रातेकी रिसीमा रिम्मको नुक्सानी हम जिम्मेवार न होगे। १ सामान्य माम आदोलनकी आवश्यक्ता- ले जे मा कुमारपा [ गाधीजीको प्रस्तावना सहित] गयाजी कहत हग्राम आदानकी आवश्यकता और व्यवहारिता धर्म नितन कुछ बाक्षा ठाये गय ह उन सबका यी जे सी बुमारपाने इस पुरनकम जवाब दिया है । प्रामासे प्रेम रखनेवाले हर व्यक्तिको इसे अपने पास रखमा चाहिय । परिवादी शकाए इस पद पर निमल हुए बिना नहीं रह सकतामन्ने का एमा Praा कि नरामा मादोरन शुरू होनेये पूर्व ठीक भावान की भावपशा प्रकाशित हुई है। यह विवाय इस अवार की शामली।

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शकहता है-धाम बान्दोनन्द
रहार्मोस न रखनेवार
हाईन
Frमारनोंफो नारसपान र निरTM
ratो बारपाता प्रकाहिहै। हम
अखिल भारत ग्राम उद्योग संघ
मगनवाडी, वा (च्याट)
प्राप्य पुस्तकों की मृन्य र
निम्न लिखित पुस्तकें हमारे यदा मिला है।
उन्हें पदिय कि वे उनको कामत तथा हार
मार द्वारा पेशगी भज दें। पुस्तक बाबी, दिी :
भावावाम है। इसलिए बाहर देव समय पनि)
पग्रठाके रिय (म), और गुजरातीके चि (१), सलिद
एनना, निला, स्टेशन मादि साफ
दिन्ट
वान आना अधिक भो।
कोई मा बुक्सर एक साप कमला :.
वो उन्हें १५०१, मासन दिया
जाम, नन्द भन द
घरासार । पुस्तकें मगाते समय १० १०/ पार कर
म्हापा द्वारा वसूल को बाद
जिनक पाठ नारेका चिह (क) है वे होमन दाइक
मोइ कमान नहा दिया जावमा !
पदरी रिसीमा विस्मको नुक्साना हरिनले।
मान मानोसनको आवश्यकता
से व सा कुमारप्पा माओतावना)
रिन बागा उठाये गय हैन मुदायमा
है कि नरासा मादन
मा पिरती है।

. ८ . । . . ० गाधीजी लिखते है--दूसरे परिच्छेदमें जो सर्व साधारण इसकी मौलिकता स्पष्ट होती है और वह यह भी बताती है कि यह रि अमलमें आनी चाहिए, फाइलमें केवल पड़ी न रहने देनी चाहिए। उद्योगोके निस्मत व्यवहाय सूचनाएं की है। जिज्ञासुओको रिपोर्ट पढनी चाहिये। खएड १भाग १ (पृष्ठ ५० ६०६ देहातोकी पैमाइशके बाद सरकारको की हुई सर्व सामान्य सूचनाएं सएड १ भाग २ (पृष्ठ १३२) चुने हुए दो जिलोंकी पैमाइश और २४ ग्राम उद्योगोपर टिप्पणिया पण्ड - भाग १ (पृष्ठ ४०) (अ) जगल, खनिज और यात्रिक शक्ति उत्पादन के साधनोंके निस्वत सूचनाएँ राएड २भाग२ ० १२ ० ० खनिज उत्पत्ति, जगलकी उत्पत्ति और यानिक शक्ति उत्पादन माधनोंके चुने हुए भागोका तथा बाजार, ढुलाईके साधन और कर निश्चित आदिके सबध में चर्चा + वायव्य सरहद प्रातके लिये एक आर्थिक योजना (पृष्ठ ३८) ले जे सी कुमारप्पा (पूर्ति सहित) सर मिओ उस्माईल लिखते हैं--प्रानकी औद्योगिक उनतिरे। सवालोपर चर्चा करना जरूरी या उापर आपने बहुत ही साफ तौरमे घर इसके लिये में आपका अभिनन्दा करता हूँ। आपने यह सवाल व्यावहारि यास्तविर ढग से कसे हल हो सकता है यह बताया है। तालुकाकी पैमाइश-ले जे सी कुमारप्पा (अ) २ काका साहब कालेलकर लिखते हैं-गुजरातके सच्चे प्रतिनिधिक त आपिम हालतका अधिकृत क्यान इसमें देखने को मिलता है। पाठोंके यार ति आ जायगी कि उपर्युक्त कोष्टक बनायर दिये गये अक रिपोटके सारे वि . . । ० . ० - -

Tell Ghani

Author
Not Available
Title
Tell Ghani
File name
Tell Ghani
Text
OCR done
Citation
1943
Published
2011/01
Publisher
Hindusthan Times Press Delhi
Language
Sanskrit
Pages
169
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546743
Barcode
4990010025188.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
12SdzYMkTJc
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