Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Shatpath Bramhan Hindivigyanbhashye
Front matter
परति तस्माद् एमाला
तस्वासावे
पुषा तया प्रस्सा सो
धूवाया एवं मुन्नों या प्रमावि
प्रयमेन मुलो योऽवं पूपर्ने ।
कानुनुपवते । तस्माड मुबमा
मएप स्वायमानः। रेपस्तव मालक
न्दोम्यो यद्धपिस्तीवाना मस्सोमो गंजा पत्तरोडावस्ता-
विश्य गगत्यमुष्मै वा ग्रामीत्येवमुतेपार ॥६॥
प्रष यान्याम्पानि गृपन्ते । ऋतुम्पप तानि न्यो-
भ्यश्च गृहमन्ते तत्तवनाविश्यान्यस्यैव स्पेश गगति
चन्मुडा गृहात्यष्टौ कृत उपभूति ॥७॥
स यच्चार्जुहा गृति । ऋषम्यस्तुदरगति प्रया
जेभ्यो हि तद् गृात्य॒तवो हि प्रयाजास्तचना विश्णम्प
स्यैव रूपेमा गृहत्यजामिताये जामि र्पाद् यदसन्ताय
त्वा ग्रीष्माय त्वेति गृगीयासम्माननाविश्याज्यस्पेट स्प्रेस
ग्रहाति ॥८॥
विज्ञानमाय शतपपमापी माम्यपणम् थ यदष्टौ कृत्व ऽउपभूति गृहाति । छन्दोम्यस्तद्ग- हात्यनुयाजम्यो हि तद् गृह्णाति छन्दासि बनुयाजास्त- चढ़नादिश्याज्यस्यैव रूपेण गृहात्यजामितायै जामि ह फर्याद्गायत्र्ये त्वा त्रिष्टुभे त्वेति गृहीयात्तस्मादनादिश्या ज्यस्यैव रूपेण गृहमति ।।६।। शृथ यचतुष्टुवायां गृहाति । मृर्वस्मै तद् यनाय गृहाति तत्तदनादिश्याज्यस्यैव रूपेण गृहाति कस्मा ! ह्यादिशेद्यत सर्वाभ्य एव देवताभ्यो ऽपद्यति तस्मादना दिश्याज्यस्येव रूपगा गृगति ॥१०॥ यजमान एव जुहूमन । योऽस्मा रातीयति स उप भतमन्वत्तव जुहमन्वाद्य ऽ उपभूतमन्वृत्तेव जुहूराध ऽउपभृत्स वे चतुजुड़ गृहात्सप्टो कृत्व उपपति ॥१९॥ स यजवर्जुदा गृहाति । अत्तारमवेतद् परिमिततर कुतीयास करोत्यय यदष्टो व 5 उपभूति गृहात्याद्यमे वैतदपरिमिततर भृयाण्स क्रोति तद्धि समृद्ध गुनाचा कनीयानायो भूयान् ॥१२॥ स वे वर्जुमा गृन् । भूय ऽमाज्यं गणत्यष्टौ पुत्व ऽउपति गृग्न कनीय ऽभाज्य गृति ॥१३॥ स यर्जु गृग्न् । भय ऽमाज्य गगत्पत्तारमेवेतत् परिमिततर कनीयास वस्तुस्मिन् वीर्य बल दधात्यय ३ भाम्बयपणम पपप्रामण: विज्ञानभाष्य यदष्टो कत्व ऽउपभूति गृग्न कनीय ऽभाज्य गणत्याधमुवैत- दुपरिमिततरं भूयासं कुस्तमवीर्यमवलीयासं करोति तस्मात राजापारां विश पावसायाप्येकवेश्मनैव जिनाति तथा लकामयते तया सवत ऽपतेनो हतद्धाण यज्जुहां भूय ऽाज्य गृगति स युज्जु गृगति क्षेत्र तज्जहोति यदुपति गृहति व तज्जुहोति ॥१४॥ तदाछु । कस्मा उ तुर्युपरति गृर्णयाद्यपदुपता न जुहोतीति स युद्धोपभुता जुहुयात पृथग्वेमाः मजा स्पन्नें- वात्ता स्यान्नाथ स्यावथ यत्तदेव समानीय जुहोति तस्मा विमा विश क्षत्रियाय बलिए हरन्त्यथ यदुपति गूगति तस्मादु क्षत्रियस्यैव व्वशे सति वैश्य पशव ऽम्पतिष्ठन्तेऽय यत्तन्यदेव समानीय जुहोति तस्मादात क्षत्रिय कामय- तेऽवाह वैश्यमपि यत्से परो निहितं तदाहरेति त जिनाति लाथा त्वकामयते तथा सचत एतेनो इ तबीर्येण॥१॥ तानि वाऽपतानि । छन्दोम्य भाज्यानि गृह्यन्ते स गृचार्जुमं गृगाति गायत्र्यै तद्गृणत्यय युदष्टो व उप ति गृभाति प्रिष्टुम् जगतीभ्यां तद्गृणत्यथ यश्चर्दवायां गृगत्यनुपमे तद् गृगति ब्वाग्वा ऽअनुभव वाचो वा ऽइव सर्व प्रभवति तस्माद धूवाया ऽएव सर्वो यज्ञ प्रभवतीयं ब्बा ४ विज्ञानमाय शवपथनापण भाग्यमामयम् ऽअनुष्यस्पे वा इद सर्प प्रभवति तस्मादु भूषाया ऽएव सों यन प्रभवति ॥१६॥ स गृगति । धाम नामासि प्रिय देवानामित्येतद्धे देवाना प्रियतमं ग्राम यदाज्यं तस्मादाह वाम नामासि प्रिय देवानामित्यनाथष्ट देवय जनमसीति बनो माज्य तस्मा- दाहानाधष्ट देवयनमसीति ॥१७॥ म एतेन यजुपा । साञ्जुर्मा गृपति विस्तृष्णीमते- नेव गुजुपा सापति गृति सप्ततस्तष्यामितेनैव यजुपा सन्द ध्रुवायां गृगति विस्तष्गी तदाहुअितिरेव यजुपा गृहीयात् त्रिवृद्धि यजति तनु सात्सकरवायो धेव विर्य हीत सम्पद्यते ॥१८||५|| इशि-निर्भुजपाठ (पारायगापाठः) इति-तृतीयाप्पाये दिवीप, दिनीपपपाठके पवम मामणम (1 फो। ०।५ ग्रा०/-( फो।००।५ मा०) ख-श्रथ निभुजपाट (अर्थाववोधानुगत)- (१-यज्ञप्रतिरूपरहस्पप्रकरणम् ) पुम्पो पा । गुम्पयन या -पान पुष्पमनु । एपनापपानो पापानेर पुषः वावान् विपीयते, तस्मात् पुरपो यमः। बाप-पसेर जह प-उपमन भास्मन घुगा । नहा मान्मन परेमानि सापयानि भाग्यमामणम् शवपथप्रामण विधानमा ममान्ति । तस्मादु घुगया एव सर्गे पा प्रमगति । प्राय एक मुषः सोऽय प्रायः सपिपलाम्पनुसबरवि । वस्मा सपा सर्वाऽभनु मुचा समरवि । वस्यामारेर पोर्नुस, मदमातरितमुपमून, इपमेष घुरा । वहा मस्या परेमे सरे मोकाः प्रमति । तसादु धापा पर सो पड़ा म पति । अयमेव मुग, योऽयं परते । सो ऽपपिमान सान मोकाननुपाते । तस्मा सुत्रः सर्वा मनु का सबरति ।। १, २, ३, ४, ५)। (२-प्राज्यग्रहणासंख्यानियमनप्रकरणम्) स एप पास्तायमानो देवेभ्यस्तापवे, हतुभ्या, धम्दोम्पा । पदषि, दरेवानाम्-यत् सोमो राना, यत् पुरोगा। बचदादिश्य प्रावि-म मुष्यै लाई राहयामि' इति । एवमु देतेपाम् । भय याम्याग्यानि गावे तुम्पन नानि, बम्दोम्परप गाम्ते । तदनादिश्य - पारपस्यैव स्पेय पाहणावि । सबै पम्हो परमाति, अष्टौ कस्ल सपपति । स पम्पा- झुंहा पाणाषितम्पस्न्दू राहाति, मयामेभ्यो हिन्दू सहाति । वववो हिमपामा। तपानादिश्य-माग्यम्पैव सपेरा ग्रहावि-प्रमामिठपि । मामि कवि-पव-'सन्ताय त्वा' इति शहीपात् । तस्मादनादिश्प- पाज्यस्यैव रूपेण पहाति । प्रम यदष्टौ रुस रपपसि सहादि-छन्दोम्प स्वद ग्रहाति, अनुपामेभ्यो । द ग्रहाति । य सि अनुपानाच्द नादिश्य-भाग्यपैर पेख रहाति-प्रभामिता । मामि ( कवि-पद यापै स्था, भिष्टुमे स्वा' इति इति पहीपात् । तस्मादनाविश्प-पाम्पत्यैप प ग्रहाति। अप गम्पर्धगया महावि, सर्वस्मै वद् पाप गावि । 11 नादिरय-प्रास्पस्पेन पेष प्रारि । स्मा उ पाशिव-यता सर्वाम्य पर देवयाम्पोऽपति । तस्माइनादिश्य-माम्पस्पैप स्पेस सहावि । (६,०,८६, १० फपिएका )। - विमानमाम्य शसपनाम: भाम्पासणम् (३-प्राज्यग्रहणोपपत्तिप्रकरणम् ) - यममान एर शुदमन, योजमा भरावीपति-स उपमृतमनु । पचर सुमन, माप उपमतमनु । मम जुहा, माप उपपत् । स रे पता माति, प्रष्टौ कत्त परति । स यवतमा समाति-प्रचारमेत परि- मितवर कनीपांस फरोति । प्रप यदी सस उपपति हानि-मामेपैतद परिमिततर मृपास फरोति । ददि सपद-यमाचा फनीयान, पापो भूपान् । म पै चतुर्जुदा रहन्-भूप भाग्य गृहावि, माटी हल उपपति गृहन्-नीप पाग्यं गृाति । स यपतुर्मुख कन् भूप भाग्य हाति, प्रचारमतव परिमिततर कनीस कान्, तस्पिन बीर्य पस दपाति । मप यदी कस उपमुनि ग्रहन फनीय पाप हाति-पापमपेवदपरि- मितवर भूयास कुनि, समीर्यमापीयसि फरोति । तस्मादुत रामाऽपारी सिंग मारसाय, भप्पेफोरमनेर मिनाति । स्वपपालकामयते, तया सपते। पतेन सरावदीपेण-पञ्जुहा भूय माश्य हाति । स यग्मुहां पहाति, मुहम तमुरोति, पद्पमति पछाति-मुहर बज्जरोति । सदा:-'स्मा न तपमति गृहीपाव, यदुपपता न पोति इति । म पदोपपता जुापात्- पृपम्पोपाः प्रमाः स्यु, नैनाचा स्यात् नाप स्पान्। मप यचग्जु बसमानीय जुहोनि मस्मादिमा विश मिपाय पनिारम्ति । प्रप यदुपपति पदानि, तस्माद सभिपापरयो मतिपय पर उपनियते। भय यजुरम समानीप मुरोति' मम्मापदो-तषिय फापपन-प्रयाय-अपि यचे परो निरित, तदार' नि। न निनादि । लण्या वनरामयते सपा ममने, एकन उरतदी पा। नानि का प्रनानि छोय माज्यानि पते । स पापमुक गृहमाति-पम्य नद सदाति । अप पण कस उपभूति गृहानि-प्रिष्टुम् जगतापी नदपदानि । प्रथ परमतुधवाया गृहानि-मनुष्टमे नद हानि।
भाग्यमामा "शतपथमा विज्ञानमात्र - पाग पा भनुष्टुप् । पाचो पाइदं सर्व प्रमयति । तस्मादु धुगावा एर सों याः भवति । (११, १२, १३, १४ १५, १६, कपिरका )। - (४-प्राज्यग्रहणपद्धतिप्रकरणाम ) स नति-पाम नामासि मियं देवानाम' (या स० १." में ) इति । एतदै देवानां पियतम पाम-पदाम्पम् । वस्मादा-पाम नामासि मियं देवाना' इति । 'मनाए दपपजनपमि' ) इति । पमो भाग्यम् । तस्मादार-'अनापृष्टं देषपजनमसि' इति । स पतेन यजुपा सफा ग्रहाति पिस्तूम्णीम् । एवनैव यनुपा सरुपपति गृहावि, सप्तकस्वस्तूष्णीम् । एवेनैप यजुषा सकृद ध्रुवायो ग्रहाति, प्रिस्तष्पीम् । वदा-'मिसिरेन यजुषा प्रहीपात्-मिहरि पना' इति । तदु नु सकर सहदेव । मम स प मिीिव सम्पपवे । (१७, १८, कपिरस्त्र)। इति प्रत्यापाठ (अधियोधानुगत) -ख- इति-तृतीयाध्याये द्वितीय, द्वितीय पाठके पचम भाग्यमापयनाम ग्राम समाप्तम् (१२-१५) ६ IRAनमान रापमापक भाम्पमाप्रणम् ग-मुलानुवाद- १-यज्ञप्रतिरूपरहस्यप्रकरणम् या पा (मनुष्पपरमानद्वारा किया गने बाबा वैध पह) निरपप रूप से पुरुष (मनुष्प की प्रतिकृति) है। (यह) पा इसलिए पुरुष (पुरुपतरूपस) कि, बो कि पुरुष (पाकचा समान, पिणाकीत मयु, होता, मद्ता प्रमा, मादि ऋतिक रोग, गे कि पुरुप सपा को वितत करता है (दि, कुम, मत्र, बि, बादि साधनों से विस्तारमाज में परिणत करता है)। (पुरुषाधरा 'पम्प सम्पन्न होता है, इस सिए पा को-पुरुषीन-भरपरी पुरुष कसा नासकता है । ( एक दूसरे कारण से मी पाको पुस्प कहा गसकता है, जो कि कारस पहिसे कारण की अपेक्षा-मुस्प है। पिरम का उपर पास्प उसी का सीकरण कर पा) पर (वैध पा) (प्रतिपादिपुरुषों द्वारा) वितापमान होता दुभा (पन्न, अग्णाग्नि, बावनीप, वेलि मादि रूप से पैता मा) निरपरूप मे जिवना (मितती सम्बाई गैहाई के परिमाणसे) पुरुष विनत रहता है, उतना ही ( उठने ही परिमाण से) सम्पग्म किया जाता (पुरुषपरिमाणसास विस्वारगर की समता से पाको पुरुप कामा भरप पन जाता है)१॥ (की प्रतिज्ञात पुषाकारता सिर काती ई ग्रुटि करती )-Jह इस पा की पही (दक्षिणमुजा-दाहिना हाप), उपपट (इस पाक) पही (बाम । मुग-माया गप), पुषा (इस पा कर) मामा (मध्य पा-पर)। (म प्रकार छ उपपत धुवा रूप मे दण बाम इस मापानमपति-सपण पुर पणाम-गति मे युक्तराने पाले पा को मायरी पुष-पुरुष की प्रतिनि पुरुपमा परा गासामा पहीतापर्य
भाम्यनामसम्
शतपथमाषण
विधानमा
।
पार पा अनुष्टुप् । पाचो पा इदं सर प्रमवति । यस्मादु धुवाया एर सों
यहा 'प्रभवति । (११, १२, १३, १४ १५, १६, कपिरका )।
(४-प्राज्यग्रहणपद्धतिप्रकरणम )
सरतवि-पाम नामासि मियं देवानाम' ( यजुः स० १०॥
में ) इति । एतदै देगाना पियवम पाम-पदाम्पम् । तस्मादाा-पाम
नामासि मियं देवाना' इति । 'मनापृष्ट देवयजनपमि' ११) इति ।
पनो पाम्पम् । वस्मादाइ-'भनाइष्ट देण्यमममसि' इति । स पवेन पजपा
सज्जुहा महावि विस्तूम्नीम् । एतनैव पनुपा सम्पपति गृहाति,
सप्तमस्तूष्णीम् । एवेनैष यजुपा सकद धुपायर्या गृहावि, मिस्तकीम् ।
बदार- मिसिरेप पशुपा गृहीपात्-पिटट्रि या' इति । तदु नु सरुव
सहदेप । म उ प मिशीव सम्पपसे । (१७, १८, कविरका)।
इति प्रतयणपाठ (अर्थावबोधानुगत)
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इति-सूतीपाप्याये द्वितीय, दिनीयमपाठके पक्षम
भाग्यमानयनाम वाम समाप्तम्
(२-२५)
मिसनमाप्प शवपयमायण भाम्पापणम् (इस वेप या में उपयुक्त होने वाला) 'सुप' मामा पापात्र प्राण । ।। सुपपात्र प्राण- स्थानीय क्यों माना गया ! परम का समाधान करती हुई शुति करती। (हम देखते हैं कि, पुरुषगरीर में केरा-लोम, एक मडाम मार्गों को छोर पर) पहचताप प्राण (पैमानरामिप्राण ) गरीर के सम्पूर्ण महों (को ज्य ममाकर ) में विपरता रष्टा है।(हम देखते है कि, इस पासस्पा में 'मुनामक पझपाय, इ-उपपत्-ग्रुप पारि इतर सभी वृक्-पानों के साप सम्बन्ध रखता है। इसी भाधार पर हम कर सकते हैं कि, भाभा-दक्षिण-वामहस्त-पादस्थानीय ध्रुबा-पुर-उपमत् भादि स्रुषों में सघरण मरने वाला मुब मारय ही प्रास स्थानीय है) इसीलिए (प्राणस्सामीप होने से ही) तो पह सव-पात्र सम सुषों (को लक्ष्य बनाकर सब ) में विपरक than (पा धपत पुरुप की प्रतिति किस भाभा पर माना गया ! इस प्रभ का समाध म अति ने पुरुषारमक माप्यास्मिकया द्वारा किया । पुरुषपर (पाम्पा मिया) का असा बाप , इस में पैसा मायरमेम्पान , पुरुषातृक, माधि- भौतिक, सगारि-प्रमीयसाधक इस वैपयन का खरप तपा संसान भी बेसा ही।मन 'समतुसमापाप' से बेघयज्ञ को पुरुष कहना ग्यापसान बन जाता है। पब म सम्पन्ध में दो प्रासनिक प्रश्न और उपरिपत होमे है । पदिसा प्रभम विस पुरुष के मार माघार पर बसपा का तपा- भूत यिनान क्रिया माता, उम पुरुष (माप्पाश्मिा पह) मगर ही एमविभ (पनामार) पे, मोर पों बना । जिस पाधिदैमा जगत् (प्राति) मे पुरण 4 (पाप्प मिया ४ मा नमे टोक में . से पारस पिपा गया। दमे (पाधि विपनगदको पर फिम पधार पर बहा गया ! रमा वा मी जा उपमत मार पामरपसापक परिमा विमान है। पी In मन में दमग मन प्रश्नों के मम धान मे ध्रुति का सरपए ।
भाग्यमायणम् रातपयमामण. -- - ८ ('गा' मामक पहपात्र मारमा (मप्पाङ्ग ) की प्रतिकति कसे है। इस विज्ञासा का समापाम करती हुई भागे पाकर पुति करती है कि यह प्रसव कि (ता), भारमा ( मप्यारूप पर से , पाई, मस्तकादि) सम मङ्ग ( शरीराक्या ) उत्पम होते है ( निकरते है, रसप्राप्ति बारा पर पोते सवे १)स (कैपया में माम्पपरिपूर्ण भुनापात्र भामस्पानीप है, एवं मात्मा से ही मगरूप इस्त-पादादि स्वर सम्पूर्ण वा उत्पन होते है, सिमरण करत ) मवरण (यहाँ भी इ, उपमृत् मादि के करा पा से ही पत वे से कर ) पा से ही सम्पूर्ण ..सालोपाल पया उत्तम होता है (पा की इविकर्षम्यता पूरी की जाती है। मता पायापसापकमूत्र मा को इस पापुस्प का भरप ही पारमा माना पास- कतापही तात्पर्य)२॥ (पुरुष के शरीर में स्त-पाद-भारमा' ये तीन पूर्व विमाग उरसम्म होते है। शिरोमाग से भारम्म कर मुसमन्पि पर्यन्त प्रदेश भारमा (प) माना जापगा, दिविणास्व, रविण पाद का एक मात्र विमाग, एष मामास्त, पामपाद का एक भवन निमाग माना गायगा । इस प्रकार पाबभौतिक स्यूड शरीर को भात्मा (पर) दक्षिणाव (वापसहित दक्षिणपाद), वामहस्त (दुप०धित मामपाद , इस ग्राम से हीन भागों में बिमल किया चापगा। निषिमाग्रमक इस शरीर में (प्रया २ सम्पूण हरपलों में ) वारपारीण सधार करने बाग तापमाण एक धीषा पलवल माना मायगा, जिसकी सजा से गा-मृत किपायस मनसे एबीप म से पुप्त रहते है । पुरुषसंस्था दी इन भार मारतर सरपामों में से पात्मा "विणहस्स (पाद) बामात (पाद), इनवीन भौतिक भवपकी { तो समय मुग, यह उपपर, हम बीन यापात्रों के सिद्ध करदी गइ । माशा चौया सभ्यप्राण रह जाता है। प्रतिरूपता बतमाती इति पदमी )- विजनमाप्य शिवपमप्रापण माम्पमामणम् (इस वैध पत्र में उपएक होने वाग) 'सुव' नामक पापात्र प्राण ही । सुवपात्र प्राण-त्यानीय क्यों माना गया ! परन का समाधान करती हुई मुति पती)- (इम देसते हैं कि, पुरुषशरीर में केरा-लोम, एवं मपास मार्गों को छोर कर ) यह चैतन्य प्राण (वानराग्निप्राण ) शरीर के सम्पूर्ण भागों (को लक्ष्य बनाकर ) में विघरता रहता है । (हम देखते है कि, इस यासस्पा में 'मुब' मामक पापात्र, पु-उपमत्-धुध पादि इतर समी या- -पात्रों के साप सम्बन्ध रखता है। इसी मापार पर हम कर सकते हैं कि, मामा-दक्षिण-वामहस्त-पादसानीप घुमा-गह-उपमत् भादि सुपों में सचरण करने वाला मुग भवरप ही प्रास स्थानीय है। इसीलिए (प्राणस्थानीय होने से ही) तो यह सुव-पात्र सय सुर्यों (को छचय बनाकर सब ) में विचरव ॥३॥ दी। प्रत (पा वैघया पुरुप की प्रतिति किस भाषा' पर मामा गपा ! इस प्रम का समाध न युति ने पुरुषात्मक भाप्पारिमस्या द्वारा किया । पुरुषपा (माया मिकया) का बसा सरप 1, इस में जैसा मायामम्पान , पुरुषाफ, जाकि भौतिक, स्वगादि-ममीएका साधक इस वैधया का स्वरूप, तपा संसान भी वैसा समतुहमग्याप' से वैपया को पुरुष करना 'पापसात बन जाता है। पर इस सम्बन्ध में दो प्रासङ्गिक प्रश्न और उपस्थित होते है । पदिमा प्रश्न वि विस पुरुष के भाकर के मापार पर पचपा का तपा- मृत पितान दिया गता, उम पुस्प (मायास्मिया) का बारी एवविध (यहाग्मक) ये मोर क्यों पना! । विस माधिदे या नगत् (माति) से पुरुष पा (माप्प मिकया उगम हा उसे टोक में bp राप्द पिपा गया है । उमे (पाधि विजगत को पा किम सभा पर कहा गया ! १ वहा मी मुह, उपपत मादि याम्पमपमापक परिमा विमान पी म माप में दम है। इन प्रश्नों के समाधान मे ध्रुति का द्वारपवउ से म्यान ।
माम्पमासयम् शपषमापण विधानमा यह बताना है कि, पाधिमौखिकपा (मनुप्पातपा) की प्रतिद्या भाप्पानिक- पा (पुरपाकारात्मकया), एप इस माप्यात्मिक यह की प्रतिष्ठा पापपूपिम्पारमक, सम्क्सवाषण, मापिदविकया है। मनुष्यात-पाका सरूप एपनिय क्यों । इस प्रभ की उपनिपत (उपपति-मौलिकरहस्प) भाप्पामिका। बाभ्यास्मिकया (पुरुष) का निध सहा क्यों ! इस प्रश्न की उपनिषत् भाभिदैविक, प्राकृतिक, निमया, बिस का कि-"यद देना अस्तित करपाणि"-"देवाननुविपा मनुष्या"-"सा या प्रमाः सहा पुरोगाप प्रमापति:"-"यझेन या. मपमन्त देवाः" मावि भौत-स्मार्च प्रमाणों से समर्पन मा है। जब मुवि मे भाभिमौतिक, भाम्पास्मिक यों का सरूप बता दिया, तो मकरणबरा श्रुति के लिए मर मी भापरपक होगया कि यह प्रसहोपाच तीसरे मापिदेनकया का सकप मी बवावे, साप साप उसकी मी इनके साप प्रति रूपता सिद्ध करे । इसी तोरप की पूर्ति के लिए 1-1 कपिरका पाठकों के सम्मुस उपस्थित हो रही हैं)- उस (माधिदैविकपड) की यह (बड़ी दूर दिसलाई देने पसी सौरमपातो- पसति३) पो ही युद्ध (दक्षिणास्त्रपारका प्रतिस्प) । एवं या वन्तरिक्ष (पापा पिपी के मध्य का प्रदेश) उपसत (वामहस्वपाद का प्रतिरूप)।। पर पृथिवी ग्रमा (मारमा का प्रतिरूप) । (पुरसपा की प्रतिरूपत्व सिद्ध करते हुए की मारमप्रतिरूपता का समर्पन मिपा गया पामतः पहा मी उसकी पुरि 'हए । बारमा यही मामा जापन, जिस से इस पादारि सब मा उत्पन्न on होगे । पृपियों को प्रबासपण भारमा तमी कहा जा सकेगा, जब कि पर मी मातारच पोकसप उपभत्, सपा छह, इन दो मगों की उत्पचि का कारण बन सकेगी। इसी प्रतिस्पता का स्पष्टीकरण करती हुई भूति करती 1)- विज्ञानमाय #शवपथनापण माभ्याम्पसणाम् पौर, भाप यह पपाप t () कि, इसी पपिपी से ये सब सोक ( पूपियी, मन्तरिक्ष बादि सोक) उत्पन्न हुए हैं। (स्योंकि पृपिणी से सब मोक उत्पन्न होते हैं, मतएव पृषिषी भरपही भारमरूप धुपा है। क्योंकि घुमा से ही यास्वरूप निपचि होती है) मतएव (माधिदैविक मपास में) पृपिनीरूप ध्रुषा से ही सम्पूर्मया (माधिदैविक सम्बत्सरपह) उत्पन्न हुमा uen (रगहभूत झा, उपपद, तपा का की प्रतिरूपता के सम्मान में समया पो, मन्तरद, पपिषी (मूपिण), इन तीन सोकों के द्वारा मारिषिक पा की प्रतिरूपता सिर की गई। मग या सर्वसधारी चैतम्प-प्राण रोष हा, जो कि माधिभौतिक पा में 'सुवपात्र' रूप से, एवं मापास्मिकपा में भागोमम्प , जामतापेम्प म्याप्त धामराम्निप्राण रूप से प्रतिष्ठित है। इसी चतन्य-प्राण की भाधिरपिकपा में प्रतिरूपता मातो गए, श्रुति करती ३). ((स माधिदैविकमा का) पही सुम (पैतन्यप्राण) है, जोकि पा (सोप में) पा रहा है। ( पुरुपया की प्रतिरूपता में प्राण, भौर सुपकी प्रतिकपता बत पाई गई थी। मत पा भी सस प्रतिसता का स्पीकरण होना चाहिए । भाषि देविक्या-सस्पा में प्राण ही माना जापाप, नो कि उह उपमत् ध्रुवोपतक्षित प्रथिषी, मातरिश, पुसोको को सक्ष्य बनाकर मिन में सचरण करता होगा। इसी प्रमितपता का दिर्शन कराती ई श्रुति करती है)- पर पायु (रेश मोमस्पानीप-वनस्पति-पौषधि-भातुर्ग, मादि पिणों के माम्पम्तर माग को मोरकर, ए नपामापानोप भूपिण के माम्यन्तर प्ररेश को • पाठर सरग कि प्रथम पृधियोस पम्तरिचारिमोगको उपच मानमा हो ममम। परि प्रामुपगममा म योदो रन मा मान मी लिया जाय तवमा धिपो म पपिपी को पत्ति मानना दोपमपि मुमत प्रोत मही रामासा का मापपत्ति समापान मागभान पासपचिपक पण में रिपा झापगा।
भाग्यमामयम् शतपथमायण मिभान माम्म छोरकर, पाकी पचे ए) इन सब सोकों में (सिस्थानीय पृषियीशोक, पश्चदरासामीय भरतरिक्षसोक, एष एकविंशस्थानीय पुसोक में, जो कि सीमों छोक माधिदैविकासमा के मास्वामीय, सत्य पना कर इन सब में) यह (मायु) बह रहा है (सचरण कर रहा ) । (पोंकि पायु सय लोकों में सघरण कर रहा है, उधर पाप्रक्रिया में सुमों में सधार करने बाग ही स्रुव माना गया है, इसी अमिप्राय को म्याक करती हुई सुसि करती है। प्रतएव निमपहप से यह सूप (प्रेमोक्पसारी बायम्पप्रारस ) इतर सुषों को ( गुह-उपपत्-धुवा-स्थानीय पृ-भातरिक्ष-पृथिवी को पाप पमा कर) इन में सचरण कर रहा ॥॥ A (१)-इति यन्त्रप्रतिरूपरहस्यप्रकरणम् A प्रकस प्रामण में प्रपामरूप स माम्पपदण की इतिकर्शम्पता (पति) का निरूपण भा है । यमराज में एक नियस म्पान पर भाग्य परिपूर्ण एक नियत पात्र रमया रहता। एक ही स्थान पर सदा सिसररूप से प्रविष्टिव रहमे बाधा परी माम्पपात्र 'भूषा ममाता है। शुषापात्र एक ही नाम पर स्थिर क्यों रहता। इस प्रा सहित प्रश्न समापि के लिए मुति को परवि-प्रदर्शन से पहिले पाप मौलिकस्वरूप पखामा भावश्यक प्रतीत मा ।। पारम्म की शिकमो में भूति न प्रविरूप पिपि स अपिमूव, पप्यात्म अधिदेवत, व तीन पम-समापो का सरूप बठलाया। इसी भाषार पर पपिचरमक प्रकरण को एक स्वतन्त्र प्रकरण मानते हप हमने इस 'याविरूपरास्यप्रकरय माम रे वासना उचित माम लिया है। माधिमौतिक वैपयन को मना बनाकर यमकर्ण परमार अपने पाप्पास्मिक पाका प्राविधिक पक्ष के साथ सम्पन्न करता है, एवं बही पन का मुम्प मरेश्म है। इस परेप की सफा के लिए अन्य या असु से बेष्टिव सम्बत्सरमणा- स्म प्रायदेवतामों का ही मन होता है, जैपा कि पाठक पपत्ति-प्रकरण में विस्तार में देखेगें । मासदेव माण रेषता है एवं इनका प्राविधिक से तुमना करते । प्राधिदैविक यम की प्रतिरूपता का परिवान मापश्यरूप से अपषित पा। पब पद्धति से पहिले प्रतिहारस का दिग्दर्शन करना पड़ा, भोरइस दिग्दर्शन मतकरय बना 'ध्रुवा मामण ने प्रमास पाम्यप्राण का विधान किया है। मेही भाग्य प्राय पो किया माय ? इस म्वामाविक, वसा पासनिक प्रम के । पान सिरी प्रमम यज्ञप्रतिरूप-रहस्य पवमाना भावश्यक समन गया या कि प्राधिमीतिक पन का माध्यामिका के साब जैसे पविलिम सम्पन्न है पवमेव प्राभ्यारिमकपाका माधिविक या साप भी पनिष्ठ सम्प। इस ममान-सम्बम्पष्टि में भी प्रसङ्गश भुति को अधिभूत, अध्यात्म की पमिर पत्ता के माय माय चभ्यात्म अधिपत की प्रतिरूपता भी पालानी पसे। - -विज्ञानभाग्य शिवपथमायण भाम्पापणम् - - २-प्राज्यग्रहणणसंख्याप्रकरणम् (बैसाकि टिप्पणी में रूपए कर दिया गया है, भारम्भ की - कपिरकामों में निरूपयोया पति का प्रथम कोई निरपण म होकर मामणप्रन्यों की सामाक्षिक- शेसी से सम्बन्ध रसने वाला पक्षप्रतिकारहस्य' ही प्रतिपारित मा।। मर ६ठी पिटको से ही परति प्रदर्शन का उपक्रम किण बाता)- (परहस्यवेषा मपयु, होता, उन्नाव्य, मा भारि मनाम् सिमों के IRI प्रास्मनुसार) तापमान यह यज्ञ (माधिभौतिकपा) देवतामों, अतु, तपा पदों के लिए 10 स्तित किया जाता है।(माइति दम्पो में से) नो पिम्प पर (प्रधान) देवताओं के लिए (नियत) 1, मोकि बातिदम्य सोम रामा, एवं पुरो गश । (तात्पर्य यही है कि सोमारसा का रस, तपा पुरोगरामण मार तिग्रम्प, ये दोनों हम्पि प्रभान (मानाप) देवतामों के लिए नियत है। हमें माम प्राण पूर्वक भाइति दी जाती है, इसी ममिमाप से आगे माकर श्रुति करती )- क्यों कि ४ 'चमपुरोगरा अमपुरोगयोपतक्षित 'पापुरोग,' एप सोम रस, ये तीन भारति-प्रम्प देवतामों के सिए नियत । एवं देषता (प्राणदेवता •पस में मिन बवामी का माइति दी जाती है, रेवता 'पावाप भनुपाम भेद तीन मेणिया में विमत है। पान माणदेवता 'भावाप देवता कासासार प्रारिमा मुफ्प सनासा की प्रतिमा मावि अतुएं 'प्रपात्र रखना फाइलानी । पप वानरूप गापायाविर 'अनुपामश्वना परसाती EIRArम पुगटागन पा पिम्प प्राप प ठोन प्राधि प्रम्प है। तीनो में मामरम तथा पुराणाशासम भारपसताना के लिए नियत एष अनुप मारप या अनुपालनामा का पापानिजामी। टि पशु माम माम यामधा मोर माग में निमत्त मामो गा। IR नाना मम मि सपुगेगग की भादनि हानी है, पगुणध में प्रधानाप म गुवपाकी भारनिदाता म प्रयागापापरिक सोमयाग में प्रधानाप म पाप अग्गिन म गाम भारिहातो। प्रयाज, ."
भाममम्पम् रावस्त्रालय Rवमान मुबरूप से २३, १, १,पोते ए मी मपन महिमा पसे) समय में भी भगन्त ६ साथ ही में प्रत्यापिरोपों में तद् विशेष देता की प्रधान पते हैं, इसलिए मी) पर (हर्षिम्म उन उन देवताओं का ('मग्न ला जुए सहामि-'मग्नी पोमाम्पो वा जुर गृहामि'-'पगमणीवोऽसि पाम, इन्द्रगापुम्मा सा सई ग्रहामि मादि रूप से नाम सपूर्वक दी) 'प्रमुपै या जुष्ट ग्रहामि' (अमुक देवता के लिए विपूर्वक सेवन पोग्य उमाय-हर्थिय का प्रण करता , इस्मादिरूप से मामनिश करके ही (भाति इम्य का) प्राय करते है। (इस मामनिक वितरण का कारण यही है कि इस देवनामों के सम्बन्ध में (परम्परागत पहायति प्रज्यों में) पही प्रकार ( हरिणसापक मन्त्र पृष पूपा नाम निकदी पदे हर , यही बात-सम्मत प्रकार ) tuu (पेक मा में 'मान-पापा-सोमरस' दोनों में से किसी एक तो दिग्य की प्रधानता रहती है, इसप माइसिदम्य माम्य राता है। इस प्रकार रवि, एवं भाग्य मेद से प्रत्येक पा में रो भासिदाम से है। इस में से कि- ट्रम्प का समाप को प्रधान देता के सात मत दिन गण । भग मामक माइतिरम्प की परस्पा करवे )- (हर्दिम्प के अतिरिक) को (दूसरे ) भापों का प्राण किया जाता है, उन भाग्यों का प्राय (प्रथामदेववारूप ) अनु कसिए, तपा (मनुपान देव बसप) पदों के लिए, ' चरात् सरकर-पाग' के सिर ) किया जाता है। (यो कि त चन्द, निसर-देवम प्रधान-देसामों की अपेक्षा गौस। पदी ये सक्षण में भी पाप है, इसी साधारणों से मपप्पा (भाग्य) गाजानुपामादि गौर देखनाभों का)-नाम मकर मारपहर से दी ( समपि मेद) प्रहण करता ।। (तारा यही मा कि, प्रधान देवता के सिर जहा विप्राण मामनिपूर्वक हता, मां प्रणमानुग मादि सम्प्रधी पाप पाप्रा बिना मामनिर्देशक करना चाहिए । प्रणसमय में सिकम पता पामा म सम्बन्ध में विशेषता बताते हैं- म रिमानमाप्प Cशवपयमापस भाग्यताप्रामुम में सुप बह (मपy निपत सान पर स्पित माग्यपरिपूण वा दाग पूत ले ले कर) पार बार तो जुह में पृत-मरण करता है, र (उसो मुत्र से ) आठ चार करके उपमत में प्रत पास करता है | सो बो कि मप्पर्य पार पार करके (मुग से ) बुहू में (बना भाम निश के) भाग्प प्रण करता है (ससका कारस बरसाते )। तो पिए (कार) माम्यपास करता है। (शुतुबप प्रपामदेवमानों के उदरय से पतु त पा) माग्प प्रपाजदेरमानों के लिए ही इस मता। (योनि) अतुएं राप्रपान (देव) । उस भाग्य का (अनुरूप प्रयास मताभों के नाम निस के बिना ही) पनामिता के लिए भारासप से ही रहम करता है। ( पपपु ) + गाम करेगा, कि यदि 'वसन्ताप, ग्रीमार ता स्पादि रूप से (माम िश पूर्वक) माम्प प्राण करेगा । इस तिर (गामि नेपाल हो, म सिर) प्रपार देशों का नामनिर्दैशन कर भाम्प के सीकर मे (प्रपाबपनामों के सिए पर टू में भाम्प) ग्रहण करता है || सो नौ कि पापर्यु बार बार कर के (पुर से) उपमन् में (बिना नाम निर्देश के) बाग्प प्राण करता है, (हम का कारण बस ते । । * सर (णर मार कर के) भाम्प प्रहय करता है। (दोपरा अनुसार देशममों के उदय मे परी गृहीत पह) भाग्य अनुगा बनामें के सिर ही प्रास करता है। (म्पो कि) पम् । भनुपाम है । उस मप का (उन गए अनुपात्र । तामों के नाम निशव बिना बी) मनामिता के सिर मान्यरूप से ही प्रारम करता है। (मा मप) गमि दोर का प्रातक बन्गा, जो कि पनि गापासा, मिनम साम्पादि सप से (मामनिर्देशक ) भाग्यमाण करा म मर • मापता की रक्षा कमिप । + जामि-प्रसभ्यता मान्यमापसम् T "शपपमापणा शिनमाग + (नामिदोष न हो इस लिए ) अनुपानदेवतामों का नाम निर्देश न कर मान्य के ही रूप से (मनुमाज देवतामों के लिए पाठबार कर के अपर में भाग्य ) ग्रहण करण है॥॥ । -- - - - - (भाग्यप्राण के सम्बन्ध में अभी एक बात बाकी रह गई । जुह उपरत, धुषा, वीनों को 'सुम्' कहा जाता है। इन में पुद्र सपा उपत् माम की सुपों + सम्बन्ध में सो भाग्यमाण की परस्पा बसला दी गई। परन्तु ममी सक इस सम्बन्ध में कोई स्पष्टीकरण महमा कि तीसरी घुा माम की मुक में कहाँ से लेकर तो भाग्य मा भाग है, कितनी बार परके मरा जाता है, एष मामनिरेश पूर्वक मरा नाता है, भषमा शुल-परव, इन अप सुषों की तरह बिना नाम *निय माग्य प्राण होता है। क्योंकि तुला मी मुक् है, कत सर दोनों खुषों के भाग्यमाण की म्यवस्था के साथ समान प्रकरण के कारण ध्रुवा माम सुक् से सम्मन्ध रसने वाली भाग्यमास-म्पास्पा का भी स्पष्टीकरय होमा चाहिए । इसके अतिरिक्त भूषा के सम्बन्ध में एक सन्देश मोर उपस्थित होता है। पूर्व प्रतिपारित 'याप्रतिरूपरहरप' के अनुसार धुम मारमपानीय पमतमामा सम्पूर्ण पा की प्रतिष्ठा है । इस सर्वपासम्पमता की पि से घुवापात्र पर पुइ~ उपमृत् में क्रमश चतुबार-भएकर गृहीत भाग्य से सम्मान रसने, मासे प्रयाग- बनुपाम नामक गौण देवता की ही प्रतिष्ठा मही है, अपितु यसिप अन्य मापाप देवताओं की मी प्रतिष्य है । उपर पूर्व में यह म्पपया कि प्रधान देवता के हिए तो मामनिर्देश पूर्वक निमाण करना चाहिए, एव प्रयानामुमाम देवताओं के पण मिना माम निर्देश के भाग्यमाण करना चाहिए । घा वापा गौण तपा प मब दसों का प्रतिष्य है। सीमा में पदि बिना नामनिर्देश के भुग गल नायगा, तो प्रधान देवता का सम्पन्न म होगा, मोर पदि नाम , पूर्वक पुन 'डामा मागा, तो गौणवता का सम्मघम होगा। अपेक्षित हैदोनों का समयो किनी मम्पप से याकलाप नियम होता 1 विमानमाप्य शतपयमामण पाग्यमायणम् एवं धुवा सम्पूण्या की प्रतिया है। फसता छुप-समम्पी माग्पग्रहण के समय में उफ सन्देश एक मटित समस्या बन पाता है। इसी सब विप्रविपचियों का निराकरण करने के लिए युवा-सम्पापी माग्पप्राण भ्यषस्पा बताई जाती है। (पारम्म से यह समाप्तिपर्यन्त पशिप कम्म में वितमा माग्य अपेपित हत्य है, अपेक्षित नियत मात्रा से मम्य सामग्री-सम्मार के साप साप भाग्य का भी एकमा ही समह कर लिया जाता है। याकोपयोगी इस भाग्य के पहिले से ही निपत निस पश्यि पात्र में मियत स्थान पर कोगमप से मुापित रस दिमा माता है, मा पात्र 'माग्यस्थासी' नाम से प्रसिन है। वाहुति के लिए ध्रुव में मरे ए भाग्य का (सुर से) उपयोग होता है। चव चबत्रा में माम्प भपे शित होता है, तब तब कोशस्थानीय इस भाम्परपासी से इस एषापात्र में छिपा जाता है। जिस प्रकार ग्रुप-बारा भुगा में से गुइ, मोर उपपत् में बिना 1 मामनिश प्रमश घर्षर-भाटवार माग्पप्राण होता , वैसे भाग्पस्पासी में से धुवा में कितनी बार में काफे भाप भरा बाता है, एव प्रधान देवतागत् नामनिटंग पूर्ण भरा जाता है।, भपा गौणदेवतावर पिना नाम निर्देश का ये दो प्रश्न हमारे सामने भाते हैं। यही का कमरा समाधान करती ई श्रुति फाती )- मोकि (कार्प डहू-उपसद में भाम्पस्पाली में से ) पार पार करके धुमा में पापमाण करता :-(उस का कारण मतखाते हैं)। उस (भाग्य) को सम्पूण पा क लिए (पार पार करके अग्यस्यासी में से घुया में ) प्राण करता है। (तात्पप्प पर माफि, भूगा में भाग्यस्पासो से चार बार करके दो पापण किया जाता है इस माम्यमदण का समय न तो प्रामदेवता के साप दी, मर गोणदेवता के साथ दी । अपितु गोस, प्रधान, विवाद, मादि सम्पूर्ण दयतामों से युक्त समूणपा की सिदि । इम भाग्यमाण का मुभ्य देश्य है। क्योकि सम्पूणपान इस महण का उदरप । 'पतएप मा सर्प' इस - भास्यद्रामसम् शतपयमामण विज्ञानमाम - निगम के अनुसार सर्फच पार पों पर निमर है, मत पिना नाम निशके केयर चार बार करके ही माश्यायासी से ध्रुवा मैं भारपाय करना स्पायसव बना है। यही स्पष्ट करते हुए भागे माकर युति करती है) उस (म ज्य का देवनादि के नाम निर्देश के बिना, वाम्प के ही रूप से माण करता है। किस देना के लिए नाम निर्देश करे जब कि (इस छुपा में ) सभी (गौम्य, मुख्प, सिष्टा गदि। देवतामों के लिए प्रदान (पण निमा) करता है । (पर्यात ना भुग सब की प्रतिष्ठा है, तो मानना पड़ेगा कि, धुषा- स्पित भाग्प मी सब की प्रतिष्ठा है।इस में माम वाले, बिना नाम बाले, गौण- मुख्य सभी देवता संयुक्त है। ऐसी दशा में नाम नाम के समय में अधिक से मधिक 'साम्प सर्वस्मै कहना पम्याप्त है। जब 'सस्मि-साम्प' स्स्त सिड १, सो प्राण काम में इन प्रपोगों की मो कोई, भावरयकता नहीं य नावी। भतएम (सर्वप्रतिमाहप होने से ही किसी का नाम निर्दय किए बिना (मान स्थाती में से घुमा में) माप के रूप से ही (धार पर करके वाय) प्रह करवा ॥1॥ * २-इति-प्राज्यग्रहणासख्याप्रकरणम् --माम्यस्पाली में से एपयोगामुसार पूबा में चार पार र साम्प प्रास करना ही प्रदान है। ठोरिका से भारम्म कर१ वी सिम वापिसों का क खबरण मानना चाहिए । इस प्रकरण में प्रपानरूप से भाग्यमाण की मपापो का विचार हुमा है। इस से भागे उपपत्ति प्रकरण पजेगा, एवं साम्स म पद्धति प्रकरण भाएगा। पप्रशिकमक प्रस्तुव प्रकरण में चल सम्पामो का विचार मारे भय इसे 'भापमाण संस्थामारण' माम सेम्पपात भरमा पित मान लिया गया है।
विज्ञानमाप शतपपापणी भाग्पनामयम् ३-प्राज्यग्रहणोपपत्तिप्रकरणम् 7 (पूर्ण प्रकरण में यह स्पए किया नाचुका कि, प्रा में सुष के रा धुषा में से चार बार एक उपपर में भाठ बार माग्माण किपा माता है । 'मतुर्नुका पापी करव उपपति' इस पार-माठ संख्या की क्या उपनिपत ! पद्-(६)-क शिकारमक प्रात प्रकरण इसी प्ररम का समाधान कर रहा)- (पाकर्म में दीक्षित, फासमोला) ययमान ही मुइ को सप बनाता है, एक यो पममाम का श) इस पममान के प्रति (सम्पति बागमन कर द्वार पर कर करता आ के साप) शत्रुता करता है, ह (शत्रु) उपम को सत्य बनाता है। (पर्यात् गुर में प्रतिष्ठित भाग्प परमान का प्रतिरूप है, एवं सपरत् में प्रतिष्ठित भाग्य यबमान के गत्रु का प्रतिरूप है)। मचा ( मोक्षा) ही पुद को सपप बनाना ।, एवं बाप ( भोग्य) उपमर को सक्ष्प ममाता है । (पाव शुद्ध हिपत भाम्य मोका का प्रतिरूप है, एवं उपभूत् स्पित माग्प मोग्य का प्रतिरूप १)। दक्षिण बाकी प्रतिरूप) मा बघा, (मामबाहु व परिसप) उपपत् भाप६॥ - (उक्त यामाम-यममानराण, पत्ता-माप, इन दोनों से मुक्ति का भमिप्राप यही कि, पुह को पत्रमान तथा मोका समझ कर, उपपद के पमनानशत्रु, तथा भोप समम कर ही भाग्पप्राण-प्रमभनी सम्पामों के निपतमाप की उप पति पर रि गसनी पाहिर । पेफि परम्-मार ही सम्योपपति की मग प्रविष्टा । यह है-मौलिक परिस्पिति । इसे अपने भाप में एउता मा) या (मपयु) नियमितम्स से (२) पर बार उह में माम्पमाण करा, एक पट पार में करो उपमत में (भापमाण करता है) ०११॥
भाज्यमापणम् शतपत्रामण विधानमाण ir - , - * सो बो कि (मर्प) अह में धार बार प्राण करता है (इस की सपपति मतमा't) । ( में चार पार करके माम्प प्रहय करा हुवा वर्ष इस प्रहण कर्म से) मचा (यममाम) को ही अतिशय सीमित, और संख्या में मस (छोय ) करता है। (शु में माम्यग्रहण करने के अनम्तर जो कि अपर्प सपस्त् में पाठ पार करके (माम्य) हस करता है ( उसका कारण गर्ने हैं)। (सपरत् में पाठ बार करके माम्य प्राय करानमा संवयु इस प्राइस + - -- • मामणमयों की पर एक निपस शैली है कि, जब वे समों प्रापक्ष (भियान, मौलिरहस्य, पपपि) बदामे अपाम करते हैं, जो प्रारम्म में समापामोपामगर्मिर्व प्रभाषक वायो का प्रयोग करते हैं। जैसा कि-"तपाप उपपुराति" (२० १.११)-"भभावोऽरानानरानस्पैद' (श ११)-"अप पर उन्म. (श, १॥ २२) इत्यादि प्रश्नार्पक पाक्यो से स्पष्ट है। इन पाचष्मयों को सावि-मोबो कि पानी का उपस्पर्श करपे उम की उपपचि बत- लाभ पहा से प्रशम-अनशनरी-(मीमांसा की भावी)- अब जिस लिप विमा भाषी (पा कारण पटनाते t इस रूप से बायगी। मकव में भी इस स्वामाविशेबी के अनुसार हरी-पम पत्रदो गुणापित समाधानोपामगर्मित (उपपत्ति बिदासारूपा पर प्रश्नार्थक पान्य प्रमुखमा । मत इसका पर्व- अब जिस लिए कि मुई में चार बार प्राण परते । (पमे का कारण बतावे ) हरमा पोगा । अनम्तर धनुषार-मावि नर्सए पळ मायार्य के भागे जा में चार बार प्राण करतारमा भन्नायु इस पाप का सम्मम्म परस और बाबमा परेगा । प्रकव में इस राक्षसानोमामा विधीही म्मम्मावामी ने--सौ बोकडा मे चार मार मान्य प्राण रता है, पता को ही इस प्राय से परिभिवतर करता। यह मर्य किया है। न पसा मामन शैली से सपा पिलय, भवपष, उपापीय तरी माना स्वतन्त्र मामा बावगा, पद भाग के मर प्रकरण की समति लिये पायाव से भागे 'तदुपत्त चितारण मोर्मामा टियन शस्यापि मधीन पायो का समावेश करना पड़ेगा। । प्रस्पदशा म उपमनाप विमानमाध्य शतपपमामण আমায় 'कर्म से ) माप ( यजमानशत्रु ) को ही भविशय विस्वत, और संख्या में पा करता है। यहां मोका कम होंगे, एक मोत्यसामग्री प्रपुरमात्रा में होग, मारय ही यह (गृहसपरिवार, पाकर्म, मादि) समन है (समर मानें गायेंगे)। (वात्पम्य यही मा कि, पूर्वकपनानुसार शुई का भाग्य मोका है एक उपमत का माम्प मोग्य है । महां, विस सम्पा में मोक्ता की अपेक्षा मोग्यसामग्री अधिक होती है, मई सपदि मानी जाती है। इसी समृद्धि का पार्म में समावेश करने के लिए भोक्तास्मानीप पुहू का माम्पमाग संस्था में पनीपान् दिपा बाता है, एवं मोग्य स्थानीय उपम का भाम्पमाग भूपान् बनापा नावा) ॥१२॥ 3 है भाग्य यह (अपर्य) पुर में चार बार (भाग्य) पक्षण करता था (माठबार माले उपपत् की अपेक्षा) मात्रा में अधिक भाग्य माण करता(4) उपमा में भाठा पूरके (धाग्य। प्ररण करता हमा (पार बार बास पुडू की अपेक्षा) पोर्स भाग्य प्रहण करता है। (तात्पप्प परामा कि, पपपि वा में सुना सिया जता, चार ही पार, तथापि शुद्ध की माग्यमात्रा उपरत की भाग्यमाना से अधिक होती है, जबकि छह में उरत की अपेक्षा पार बार कम गठा नाता ।। एवमेव उपमत में परिभाम्य दिया जाता है, माठ मार, तथापि उपर की भाग्यमात्रा इ की माग्पमात्रा में भी कम रहती है, जबकि उपमत में शा की पक्षा पारबार मधिक गग माता ॥१॥ - सो नो कि (मापयु) गुद में पार बार ही (माम ) प्राण करत्व वा मी (उपमृत् की अपेना) मधिन माम्मपदण परता है, (उस का कारण पता है। (3 में पार बार में ही उपयत् की भपश अधिक माम्प प्राण परता मा मायु) इस भूपोमरण कम से मचा गे (पार सम्पा मे) मतिराप सीमिन, (ए) प्रस करता दमा ( भूपो ग्रहण से ) स (मता) में (माप की पपका) प्य, मार) बर का माधान पाता।। स पप्प पर निपनि चार सपा की १३ भाग्यमापणम् शवपथनाम विमानपान f तथा . प से माई भत्ता सम्पा की अपेक्षा कम है, वहां भाग्य की अधिकता से वh, सपा बस में माप की बपेचा-भधिक है)। सोयो कि (मप) उपमृत् में माठ बार (भाग्य) प्राय करता मा ( की भपेक्षा) थोडा माज्य महण करता है, (उस का कारण बताते है)। (उप सत् में बाठ बार में मी युद्ध की अपेषा पोषा भाम्पग्राण करता मा मयु) इस मत्सपाय कर्मसे वापको (माठ सम्या ) भतिशय विस्तृत, (एब ) बड़ा 'बनाता हुमा (झाप्राण से) इसे ( भाप को) वीर्य, तपा पा में (मत्ता की अपेषा) गून्य बनाता है । (पाल्पये, पाठ सध्या से मां भाप सहया, भापतन में पा , वहाँ मौसिक वीर्यसप माग्य की पल्पता से मना की अपेक्षा यह वीप्य, यस से गूप है, निर्धार्य है, निर्मछ) निष्कर्ष पही निकला कि, मचा सदा भाग्प परमपना प्रमुख प्रतिधित रक्से, माच सदा इसके सामने नतमस्तक रहे, इसी रूपसपदि के लिए बचा-स्पानीय युद्ध में अधिकमात्र से तमा भाष स्पानीय उपपद में पत्पमात्रा से माम्म प्राण करना प्राकृतिक। (एकाकी रहता भा मचा मषिक वीर्य बसके सम्बन्ध से बीममीर्म नक्स भनेको मापों पर कैसे वफ्ना प्रमुख प्रतिष्ठित रखता है, इस सम्बन्ध में प्राकृतिक-निमशानुगत 'रागा-प्रमा' का उदाहरण उस्त करती हुई सुरी करती)- इसीलिए तो (तस्माबुत-मार की अपेक्षा भत्ता विशप बरामीम्पकाम होने ही तो राषिपनि एक) राना मपार (समन-मगस्मित-अनगिनती ) प्रग को होकर मी सप एक घर से ( एका की ही उस मसल्य प्रमा को) अपने परा) लेता है। (यही नहीं, भापत राष्ट्र की भावरफ्कता के लिए यह राष्ट्रपति नम जब जैसी जैसी निस विस वस्तु की कामना करता है, तब तब सी जैसी उस उस ममिसपित वस्त की मी ( उस भाषास्मानीया प्रना से बस-पीर्य के प्रभार से ) प्राप्त करता रहता है। उसी पीर्य से (राजा यह सब कृष राम्परा ज वपकतापण. । मान्पामामयम् . . - मप माप्त करने में समर्थ होता है, जो कि पद मपनी छ (रूप दक्षिण बाहू ) में भाषिक माप (वीर्य ) ग्रहण करता है। विपने बाहुबम, वपा मारमवीर्य से राना एकाकी राता मा मी प्रसन्मात प्रमायुक्त राष्ट्र पर मपना प्रमुख मनाए रखता है, यही तात्पर्य )! पर भूपर्यु मिस माग्य को छुडू में आता है, उस भाग्य की (मो) भाइति जह से देता (101, (परस्तु) जिस पाम्प का उपरत् से प्राण करता है, (उस ही मी माइति उपमत से न देकर ) पद से ही भाति देता है। (aRRम्प पापुमा कि भाग्यमरण फर्म पृथक् पृषक पुढू उपसर में होता है, परन्तु माइति दोनों के भाग्य की सह से ही दी जाती tan१॥ ( यादति का यह एक साभाविक नियम देखा जाता है कि, मिस पात्र, किंवा पात्री में भादतिवन्य सिया जाता है, उसी पात्र, किंए पात्री से बाइति दी -१२पीपिका को टिप्पणी में ग्रामणमम्प की विस प्रतिपादन गरेको का स्पष्टीकरण किया गया है, पाठक देखेंगे कि १५- १४वी शिकामोरे मारम्भिक पापो से उस गैती का सरिममा समपन होगा। सतोपामग- मित प्रमापक पायो का सर्वत्र स पत-'भम पत'-'प्रभात' इस्पादि रूप से भारम्भ राणा है। एवं परवान्पो से सम्पर पूर्वापो का उपक्रम 'स-रिता पतम्' इत्यारिल्प से होता है। सा कि पीकरिता मागे प्रकरण से मम्मर मरेतुम् गानभूयाम्प एपाति" इस सामाम्प उपक्रम पाल्य में, प ४ शिका उत्तर प्रकरण से ममम्बित सवन्त्र भएब भन्यवासापर परोपामगर्मित, प्रश्नाक-"स पस्पत मुंह गुरुन् भुप माम्य गुमानि (सनप्राणमध्य-इति वाक्यप ) इस पाप से स्पर सिर दोरहा है। मामय प्रापो की इन परिमापामो म बामने से 'मविप स्थान मदिरा पाव म्हाप से म्पारणबसपर पर शमा अनुगमन से पारिफ भर्म-समय में बड़ी प्राति से जाती। मत पाटन से इस मम्मम्प में सामानिरहन रिया गायगा वि मर्षसमम्पप पाहुए परिमापामो समझीभांति स्पष्टीकरण परखे ।
बाबामण्यम् शिवपनाम: निशानाव 1 - (पाती है। परन्तु पूर्वमुन्ति ने मार्य बताया। उपपत् में, एवं भाति का विधान किया है से। इस पम्प का क्या कारण। इसी पम्प प्रल रूप से उपपादन कर, व में समाधान करती हई अति करती)- (सपमत में गृहीत भाम्प की उपमृत से भाति म देकर वा से ही माहुति देनी चाहिए, इस पूर्व सिदारत के सम्बन्ध में ) किसने एक विद्वान् करते है कि (* तदाा ), पदि ( उपमत् में पीत भाम की) उपमृत् से भाति नहीं देते, तो फिर क्यों (किस प्रयोजन के लिए ) उपरत् में (भाग्य) 'पार किया था। (प्रनका पिनों का ममिप्राय पी। कि, मावि देने के लिए ही ये बाप-पास का निपात मा है। यब उपरत् से भारति ही नही वी गाती, तो इस में बाम्प प्राण की मोर क्या भारपकता पाती है)। (अति उस देती। कि) पहिर(मर्प) उपपत् में गृहात मारप की) उपपव से माहुति देगा, तो ये भी प्रगाए । (मपना सामालिक संघठन तोरकर) स्तन बन बापी। न मचा रहेगा, म भाप (पुरषित) रोग्य । (उचर व तात्पर्प पीक, उपपत् में गृहीत भांप, एवं उपसर, दोनों भाषस्पानीय बनते हुए प्रजा स्यनीय है। रा में ग्रहीत माम्म, तमा मुहू दोनों मधास्थामीप बनने हुए 'एमा-त्पानीप' है । एसी परिस्थिति में पवि प्रचारपानीप सपपत् से ही प्रमास्थानीय भाग्य की मारति दी जापगी, तो उपपदाम्पस्पा- नीपा प्रजा स्तम्भ पन माफी, जो कि निकम, प्रमदित स्वातम्भ nat पारवत्र्य बनतामा प्रया-प्रया, दोनों के माण का कारण माना गया है। तुम उपमद्गृहीत माग्म की रानास्मानीय डा(के भाम्य) से माइति नाती है, तो उपपदाम्पहप प्रमावर्ग रूप मा की रक्षा में बाकर विषम •-हाँ कही मुति को किसी भम्प द्वारा प्रश्नामक, भाषपच पूर्व करना सा सवत्र भारम्भ में 'त' का सभिपेरा गया है। दूसरे शमो में तबाहु पाप सर्वत्र प्रामास्मक समझना चाहिए, पदम मामा मन्त्री को सामादिशैमी है। 1 1 1 निमाम्य शतपयमापण भाग्यम्पमयम् (सेयर माता । इसी राष्ट्रीम एकीकरण के लिए उपख-गृहीत भाग्य की भी से ही भाइति देना उचित है। इसी पमिप्राप को अपनी स्वाभाविक रेसी से प्यार करती हुई श्रुति करती 1)- (उपमत में माम्यमाण करने के सिर) मनम्तर निमुनिर कि । उपपत- गरी बाप को) में ही लेकर वालि दते है (इसका कारण बताते है)। (भोपपद-भाग्य को उडू में सेकर) माइते दने से ही ये प्रमाएं क्षप्रिय-राजा के लिए पति (कर) प्रदान करती है। (भयात् इसीलिए प्रया राग्प की भनु गामिनी बनी रहती)। (भब इस सम्बन्ध में एक परम भोर किया जासकता है। यही कि, पदि ऐसा है, फिर उपपत् में माम्पमाण की ही क्या भारपकता र माती।क्यों नहीं पहिले पर बार पुरा में लेकर मचामाव की प्राप्ति के लिए बाहुति देदो नाप, बनम्तर माप को मन के वाधीन बनाने के लिए डा में ही माठ मार सेकर (भापमाप की स्पा के लिए ) से ही पाति देदो गाय । पहिले उपरत में सेना, पुनः उपसत् से शा में सेकर माहुति देमा इस दहि-प्राणापान की अपेक्षा तो पहिले से ही शुर में ही लेकर क्यों न इतिकम्पिता पूर्व करतो पाप । इसी रिप्रतिपति का परनोवामपूर्वक निराकरण करती भुति करती)- (जह में चार बार प्राण करने के ) प्रमतर निसलिए पि उपपद में बाट पार भाग्य ) माण करते । (इसका कारण मतगते है)।(मापसपण प्रया से समाप मने माग उपपन-समाधी भाग्यमाणपुर में मोफर नपमत में ही तासलिए ही पत्रिप (मा) के परा में (पा में ) ते एक प(प्रजा प्रति-पशु ( सम्पनिबर्ग ) उपस्थित होते हैं । (सचर का तापम्प पी। कि जिस प्रकार राष्ट्रीय प्रबा कोरा के लिए मोता की सत्ता भपेधित ६उसी प्रवर मोरप की मग मी मापकग पदि प्रहार सम भरने सा में मातार बाप उसे मतवसकर (रिम्भपनो रक्षा) पनपने भाम्पाण्णम् शवपक्षमापण विहानमाण - को ममसर म दे, तो प्रणा कमी पा सम्पधि पन, लि, पशु मादि बहिर्विच) से युक्त न पर्ने । भोर इस दण में राजा का राजापना ही पुरवित न रहे। मत प्रवानिकास के लिए, प्रमासपदि के लिए प्रग एकांश से सन्त्र-समा मी भापश्पक । उपसत् ह पर पसी रहती है। र माघार , माप, उपपत भाषेय, भारित है। यही राम का प्रमा पर रक्षात्मक समुह है । इस रवा में प्रतिष्ठित वैश्यरूप प्रगार्ग स्वतन्त्ररूप से पासपदि करने में समर्थ बने, इसी प्रयोवन की सिद्धि के लिए छह पर रखे हुए उपमत में दो भाग्यास किया जाटा)। (इस प्रकार पहिले उपमत में भाग्यमाण कर, मनातर भोपपत्-मासको पर में लेकर ही माइति क्यों दी जाती है। इस प्रश्न का एक समाधान तो 4 पिरका के भारम्म में -'तस्मादिमा पिया पियार पनि हरम्ति' इस्मादि नप से दिया चुका है। इस उत्तर का ARपर्य यही है कि, प्रया राना को पनि (कर) प्रदान करती रहे, रागा इस बधिप्राप्ति से मोर मी बधिक यखान् बनता मा प्रमासन में पूर्ण सपर्य बने । भव इसी प्रश्न का एक दूसरा समाधान गरने लिए भूति पुन प्ररन रायकर समाधान करती है)- (8E पर रक्से हुए उपपद में भाठ बार भाग्यमाण करने के) मगन्ता ) निसलिए कि ( उस भोपपत्-माप को ) में लेकर इसे मात देते है (इसकी दूसरी पपछि मतमाते हैं)। पोंकि भोपपदाम्प की उपपद से बानि नहोकर पडू से माइति शेती) मतएप मिस समप भी क्षत्रियराना । गष्ट्र हित के सिर बिस सम्पधि की कामना करता है, कामना के प्रयासो- करन में दो बारम (प्रना) को सप्प बना पर मा देता है, वैश्य ! वारा जो भस्मस्प पुरवित (मुगुप्त) पर (परकोप पन), नसे (राष्ट्रहित के ए) शीघ से भाभो । ( माहानगवर रयारा प्राप्त धन को) मा पना अपन - भिकार में कर लेता है। इसी प्रकार रामा को (राष्ट्रसघाउन कर्म में ) म F । 1 विज्ञानमाम्म शिवपापण पाम्पमापपम् बसी मिन पस्मों की भारयकता परती रहती है, तो सपन पेश्यों के द्वारा पसी पे पाए प्राप्त होती रहती है (और इस स्वामारिक सम्पद प्राप्ति का एक मात्र कारण है) पीप्रमाण । (पर्य उत्तर का यही कि, पदि उपप से ही बाहुति दी पापी, सो इसका यह भर्प होगा कि, रामा ने प्रग को सञ्चित पन म्पप के लिए स्वतन्त्रता प्रदान करदी । प्रनाधन ही राजा के राष्ट्र का मुस्प पर है। यदि प्रमापन पर पापनि का नियन्त्रण म प, तो रामा के राष्ट्र की सापारिक ना दो नायगी। और उस परिस्पिति में राजा प्रणा से कामनानुसार राष्ट्रसपान के लिए सम्पति-समाह कर सकेगा। बैंक इसके विपरीत गए कि भोपदाम्प की छाया ही वाइति होती है, तो इस का यह भर्प होता कि, प्रनारा सचित पम राग की रक्षा में प्रागण | इसी लिए अब राणा जब मी बाहेगा, वही मंगा के सस गुप्स (परधित) धन के द्वारा राष्ट्रकामनाए पूरी करता रहेगा। इस दूसरे प्रयोगन की सिद्धि के लिए भी घोपमृदाम्प को पार +रेकर जह से ही भगति दी बाती ॥१॥ (हा और ठपभूव में क्रमश १-८ करके मो बाम्य प्राण होता है इस क सम्मान में शो का उपपत्ति बनसानी थी, बतला दी गई। पर सीसरा 'धुपा' नामी रोप राई, जिससे कि ब द्वारा शुरू-उपरत् में भाग्यग्रहण होता है। इस क्रमाऐ से यपपि म धुपा-समाधी माग्पमाण की उपपतिती मपे दित पी। तथापि बा-पाप बङ्गमूत तर दोनों घुषों (डा-उपपद) की प्रतिष्ठा बनमारमा पानिष्ठा मत पुरा के इस सत्रमाव को समुस बनाने ५ उदरप से प्रसाहात परित रतर दोनों सुपो का मी सिंहावलोकन कर किया जाता है। .. पपपि पन्दोरुप मनुष्य, पपा अतुलए प्रयास, दोनों के लिए क्रमश ठा पत्-नफा ना में मारपप्राण दोता, तथापि भुपा-सम्पप में पतसाद नान भाम्पमाध्यम् शिवपमापण . शिलमान 1 म , 2. पापी उपपति का अस्ति ने प्रधानरूप से पद सम्पत्ति के साथ ही समय माना ५पैसा कि निम्म खिसित मुसामुबाद से स्प होर।।) (माम्यस्यासी से चार मार करके युवा में, ध्रुव से सुनतारा चार बार कर के में, एव तुपा से सुवधारा पाठ बार करक उपमृत् में गृहीत होने वाले ) ये ये भाग्य चम्दों के लिए गृहीत होते है-(पदों के लिए हा भाग्यों का प्रमुख होता ) । सो बो कि मुह में चार बार करक (माज्य ) प्राण करता है, यह गायत्रीहन्द के लिए ही प्राय करता है। मो कि उपभूत में भाठ भार पर बाप) प्राण करता है, पत्रिप्' जगती पदों के लिए प्राय करता है। गो कि (बाम्पस्पाची से ) धुषा में पार' पार कर के (माग्य) प्राण करता है, पर अनुहुप्पाद के लिए ही प्राय करता है। मनुष्टुप् ही वाफ यह ( सय मौतिक प्रपत्र) उत्पम् रामा है। इसी लिए ( वाप्रतिरूप) घुषा से ही सम्पूर्ण पा उत्पम होता है । मनुष्टुप् ( वाक् ) हो या (पपिपी) है। इसी (पृथिवी ) से यह सब (स्तोम्पत्रिोकीरूप भूतप्रपञ्च ) उत्पम होता है। इसीलिए (पपिपीप्रतिकप ) हवा से ही या सम्पूर्ण या उत्पन्न आमा ॥१९॥ * ३-इति-प्राज्यग्रहणोपपचिप्रकरगाम् । बाक से ही • अमा फि मुलानपदपकरण कभारम्भ में पाया गया है ११ से १५ रिकामो में भाग्यपदम की उत्पत्ति हो प्रधानरूप से पाई गई सय एम पटकामा म प्रकरण को एक पतम्न प्रकरम मानत t" यमाणापपसिप्रकरण नाम म ग्यपात करना उचित मान लिया है।
विधानमाष्य पपामण भाम्पत्रामणम् ४-पद्धतिप्रकरणम् किन में, क्ति से, किम के लिए, कितनी बार भाग्पग्राण होता है। पूर्व-प्र 'तिपादित ३ प्रकरणों में भी प्रश्नों का समाधान मा है। भव कैसे पाम्प प्रहण करना चाहिए 'पतिरूप यह प्रश्न माकी पर रहता है। भागे की क्रमप्राप्त १५-१८ कपिटकामों से इस मारपाहण-गति का निरूपण करता हुमा, पदय (१८) कणिकाम्पक प्रकरणचतुरपामफ, 'माम्पमाहा मामया' मामक, १ कापा-३ मप्पाप का मरा (२२), तपा दितीय प्रपाठक का पश्चम प्रामण (२१) समाप्त होता है। पर मापपु-'पाम नापासि मिप देवानामनापृट देवपमनमसि' (पनुः स. २ म.। ३१ म०) १६ मन्त्र बोसना (पा भाम्पमरण करता है।(मप- सरिया के लिए मन्त्र को दो भागों में विमाप्त कर पहिले प्रथम विभाग का अर्थ परती हुई श्रुति करती है यह देशनामों का पसन्त प्रिय स्याम (रमण साधन) 1, जो कि भाग्य है।मीसिर' 'पाम नामासि मिर्य देवानाम्' पह कहा गया है। (मत्र के रितीय माग का वर्ष करते हैं ) भाम्प वास्ता में बम है। देवपमन-मताभो की पवारा परस्पर समति कराने वासा)मी पमिप्राय से अनाज देवपननममि' यह कहा गया है |॥१७॥ यह पापयु इस ( उक्त ) या मे ( मप्र मे, मप्र बोउ तुमा । मुह में पपर भारपागा करता है तीन बार पर भाप ( प्राइस करता है।(सागरप पद है कि हमें चार बार पापमय का निवान |म में प्रारम्म में कार तो मन्त्र नमते हुए प्रारण करमा या प तीन पार बिना मन्त्र मोन अरबार माण करना प हि ) । उम्पर में एमबार (तो) सो पमु से ( मन्य पोजना मा) भाग्पप्राण परता! र सात बार पुरवार (बिना मय प्रयोग के) मारपण करत । षा में । मापापामी में से ) 4 बार मो मी यमु मे मायापपणम् शल्पबामण विमानमा १ - (मन्त्र घोषवा पुमा ) माग्यमहरा करता है, एवं तीन भार पुपचाप ( बिना मन्त्र प्रयोग के) भाग्यमाण करता है। इस समन्ध में कुछ निशान करत, कि, (भुषा, पुडू - वामद, तीनों में माम्पमाण करते गए प्रत्येक में ) तीन तीन बार पनु से ( मन्त्रपूर्वक ),माग्यप्राण करना चाहिए। क्योंकि प. विपत् ( मपाचारविरासम्पत्ति से युक्त) ।। (भापगर्मित प्रश्न-कचा का भमिप्राय पही है कि, गा पा शिस् है, और विवर सम्पत्ति बिना तीन तीन पार यषुः प्रयोग मन्त्रप्रयोग के सम्मन नही सो ऐसी दशा में श्रद्ध-उपरत्-कुना, तीनों की ?---१ इन प्राय सम्पामों में से क्रमश 1-1-1 रूप से तो मन्त्रप्रयोगपूर्वक माध्यमार करना चाहिए एप १-4- इस संख्यामों के अनुरूप तृप्ती वाग्यास करना चाहिए तमी प्रिात् सम्पत्ति प्राप्त होसकती है)। (उक्त पूर्वपच का तटस-रूप से लण्डन करती,ई, सार, सिद्धान्तपन बतबाठी श्री कहती 1)- इस भाग्यमाण कर्म में एक एक बार ही मन्त्रपूर्वक माम्फमाण करना चाहिए। स ( सात-साव परिपाण कर्म ) में मी माप का ( समकारकप ) तीन बार प्राण होगगता है। (इस प्रकार सहर पद में बिभर सम्पत्ति प्राप्त होगाती ॥१॥ ४-इति-प्राज्यग्रागा पद्धतिप्रकरणम् । 1-कापर-दिसीय प्रपाठक का पाषा प्राय समाप्त (२२) -कापर- -सृवीय प्रन्याय का दूसरा ब्रामण समास (शरा) मुलानुवाद समाप्त १२ पिशानमाप्य “शवपयमापस माम्पमापणम् - . - - ५-सूत्रानुगतपद्धतिसग्रह- (जुहू में मुव से चार वार प्राज्यग्रहण) प्राग्यावेवस कर्म मनम्तर 'माग्पप्राणकर्म होता है। भाग्य स्पासी में रहते हुए वाम्प को घुमा बारा गुर-उपमत में राउना ही भाग्यम- पण नर्म है । इसी कम्म की तिकम्यता बताते हुए सूप्रकार करते हैं- 'जुग्णापमाया पतुर्जुहा- 'पामनामति" सामा" इति । (का० मी० र २१)। उक्त सम्देशानुसार बमb-"मों पाम मामासि पिय देवानामनाएं देवपमनमसि" (इ बाम्प माप देवतामों के लिए रिप धाम' नाम पाछे हो, भाप किसी भी वासुरभाष से भपण करने योग्य नहीं होने पम्ने देवतामों के देवयनन (देवयनन मिस्थानीय ) हो' या ११३१) मह मप्र मोवामा भाग्यस्प सी में से चुना को पूर्ण भर कर चार बार युद्ध में भाम्प गमता है। इस मम्मान में पा स्मरण रखना चाहिए कि उक्त मन्त्र का प्रयोग प्रपमगार भाम्प प्रहण हो। रोष तीन बार बिना मन्त्रोचारण के वणी माग्यप पण होता है। तापप्य पापा कि, मप सुग को चार बार पूर्णरूप से धाग्यस्पती मरेगा इन में एक बार तो उत मन्त्र योजना मा जुह में गरेपा शेर तीन बार पुरष प गुडू में सामग्भ । (उपभृत् में मुव से श्राट वार श्राज्यग्रहण ) में खुप से पूणरूप से पार दार माग्पप्राण कान में ममता उसी मय से पाठ बार का के परिपूणरूप से माग्परपासी में से सुबाद्वारा पार बार उपपद में पाम्प प्राण पिया जाता है। इसी अभिप्राप से सूत्रावर बहन है- "पशपमत्पत्तीपोऽनुपामाप" (२० मी. p. २७)। - JE भाम्पमाण्यम् “शतपपासमण विधानमा पदि दरापूर्णम्पस में मनुपान का मग्नग्ध है, सो बाठ बार कर के उपर में मपूण माठ सुपों से भाम्य प्रण किया जाता है। प्रस्त ष्टि में पदोडप मनुपाचकम्म वैगिक, सी बात को स्पट करने के लिए 'चेत्' कहा गया है। यदि मनुयाजकर्म है, तब सो पर बार उपपत् में भाग्यमरण होगा, मापपा केरठ जुर में ही बार बार माप महण होग्य । स्वरूप प्रयामदेवतामों से -'यपष्टौ फस्म उपपति शाति, मपाजानुपामेभ्यस्तत-हाति" (•• I) इस कण-पमणानुसार उपपत में नो भाठ बार भाग्यम्- पण होता है, उस में चार बार गृहीत भाग्प का तो समाप , प धार बार गृहीत माप का न्योहप मनुपाव देवतामों से सम्बन्ध है।मनुयानों को पूर्वसूत्र ने बैंकरिपक बताया है। इस सम्बन्ध में एक संशप उपस्थित होता है। पदि प्रात इरि में बनुयाय-कम्म का प्रभाव । मभषा तो पुषदाग्पादि ब्रम्पान्तर से भनुपाबकर्म की इतिकतम्यता पूरी कर पी पाती है, वो एसी परिस्पिति में उपपत् में भाठ बार माग्य प्राण करना अपना चार बार!! इस सम्बन्ध में अपना निणय बलमा ए सूचकार काते:- "परम्यष मतिविभागाव" (का० श्री. सू. २१७११)। पदि प्राव शिरूर्म में मनुयामकम्म का ममान , वय तो पृषदाग्पादि मन्परम्प से मनु पापकर्म सम्पन्न करना ममीर, तो उस दशा में प्रतिविमाग मर्यादा से उपमत में चार पर ही वाम्पार करना चाहिए । उपपत् में प्रति वित प्रतएव भोपपत् नाम से प्रसिब माम्प १-१ क्रम में क्रमश प्रपाम, मनु- पाजनों के लिए विक्षित है। अब कि प्रौपमृत माम्प उमयाप , मोर मनु- (14+र्म अपेक्षित नही, तो ऐसी स्थिति में देगा प्रयामकर्म की सिद्धि के सिए चार बार री मारपमाण करमा नियमप्राप्त प्नता है। इसी सिखात सम्बन्ध में स्टान्तरूप से एक दूसरा हेतु बतलाते ए सूत्रकार करते है- विधाममाम्य शिवपपग्राम भाम्पसमयम् 1 "परशविप्यादराना" (मा. श्री० स० १२) पशुबन्ध में, तपा मातिप्पेष्टि में होने वाले मनुपान कम्म की सिसि के लिए उपमृव में चार बार भाग्य प्राण देखा जाता है। यदि मनुपान कर्म क- सिक होता है, तो प्रयास के लिए पार बार ही माग्पाय करना चाहिए, पही प्रतिषिमाग म्यास्पा म्यापत प्राप्त है। पशुबन्ध के सम्बन्ध में "हाँ पोपद्धति प पतुगीवं सहावित (माप० मी० १) इस्पादि रूप से स्पट ही प्रति- विभाग मप्यादा का समर्पन हुमा । एपमेव भातिप्पेशि के सम्बन्ध में भी "सपाययेव पतीवान्याम्पानि यानि, न प्रमानुपाजा मपन्ति" (शत. मा. शरा) स्पादि रूप से इसी पक्ष का समय मा मा इस सम्बरप में प्रामण युति के माधार पर एक मया पूर्वपप उद्यते पए सूत्रकया करते है- "न, रम्नोपगाद" (का. श्री० मू० २।७१३)। 'उपपत् में बाठ बार गत माम्पों में से चतुगृहीत माग्य तो प्रपार के हिए। पावतगीत माम्य पमुणा के लिए पूर्व में जो पा सिदान्त बत गया गया है, (श्रुतिविरेप मे) ठीक मही(म)। क्योंकि-"मय यदर्श कृत्व उपमति गृहाति, अनुयामेभ्यो हित प्रमादि" (शत०४० १॥३॥ २१)स श्रुति में उपपद में भाट बार कर के गृहीत सम्पूण माम्प का कार अनुगरकाम के लिए ही विधान हमा। एसी स्थिति में प्रतिषिभाग-मप्पाग का ममपन नही किया जासकमा । 'मरपा पनिरिभागान' से यह बनसापा गण पाकि, उपमत में पार गर गीत माप में से मापे का प्रचार में माघे का पनगा में उपयोग है।म का तात्एप्प यही मि, उपमर में मार पार प्रान तो अमुशम तिर हो। म उसे प्रपार के लिए गूगीत माम्प का सपन-माण में उत्तरापार में विप्नपेग दोगता, मेर पप भाग्यमायणम् शवपमयय: पहा भी प्रपान में उपयोग हो पाता है। दूसरा हे परवातिप्यादर्शनाम पर पा। इस सम्बन्ध में- "पचातिप्योर्ष पनात" (410 प्रो० सू. २७१५) या समाधान ही पप्याप्त होग्य । "अनुपाजेम्पो रित गृहावि" (गठ. मा० शिरा) इस श्रुतिवाश्य से सम्पूण भौमृत बाप पर कि अनुपात्र के लिए है, तब गहा पशुबघ में पृपदाग्याति दम्याम्सर से मनुपातिकसम्मता पूरी की बासी , एवं भासिम्पादि में अनुपान का ही भमान है तो उस दण में पा उपमय में अप्रहण प्राप्त होने पर बम से बतर्गहीतमाभ्प का ही निषान सम झना चाहिए । पहिले से प्राप्त का ही दर्शन सम्भव है । परादि में कि पहिले से प्राप्त नही पत पोपन ही मानना उचित है। प्रतिपक्षी का तात्पर्य पही कि जिस परवादि दराम क भार पर सिमान्ती प्रतिविमाग की मर्यादा स्थापित करता हमा भोरमद् भाम्पमाय के सम्बध में भवगृहीत धाग्याच स्थापित करना चाहता है, या ठीक नही । पमादि को इस सम्बन्ध में सपोद् पाक नहीं माना मासकता । भपित "यदष्टौकम उपपति शाति, अनुपा भेभ्यो कि तद् गृहावि" इस श्रुति से भोपसत् माम्प उभणार्म महो कर बतु- पानापही माममा स्पायसङ्गस है। प्रतिपपी को इस विप्रवित्ति का निराकरण करते हुए मायकार भपना या सियत स्भापित करता है कि 'यष्टौ करत उपमति गृहाति, ममामानुपा जेम्यता ग्रहाति' (ते, प्रा. ११८) इस शानान्तर पान के पापारपर भोपपत् भाम्प का विधान हभपाप की मानना पाहिए । 'भनुपानम्पो हिद गति ( श० प्रा० शरार) यह पायसनेप पन तो प्राप्त भर्य का मनु पादमात्र है, न कि विधान । ऐसी स्पिति में सिमान्त पही निकपता है कि मनु पानामान में, कि प्रत्यक्षम्पामुपानमुक्त कम मे उपमत् में चतुर्गहीत माम्पको निजाममाप्य शवपापण माग्पापणम् ही सिद्धान्त पप सममना पाहिए । छडू, तपा उपमत सम्मम में भाम्पमाण म्यवस्पा कर मब क्रमप्राप्त भुगनुगत बाम्य-प्यास्या करते हुए सूत्रकार 'ध्रुवापो ष जुहूरत" (का० श्री. पु. २७।१५)। घुषा में पकारात् उपपत् में सुई की तब एक बार मन्त्रायोग्यवक भाम्प प्राण होता है, एक तीन बार स्प्णी, मिना मात्र प्रयोग के भाग्य प्रारम होता . । इस प्रकार पनुयामपद में वो पह-उपपत-वा में तीनों में क्रमश १-८१ बार माम्य ग्रहण होता है एवं अनुपागामार पच में तीनों में कमरा मार भाग्पनास होता है। दोनों ही पक्षों में एक एक बार मात्र प्रयोगक माम्पमा रोता , शेष तीन बार तूपणी जाग्यमाय होता है, और भाग्य- मास से समय रसने बासे सूत्रानुगसपदति-कम का पही सापत सरी- १-१-१ इति-सूत्रानुगतपद्धतिसंग्रहः मिस्पप्राधणम् शवपासण --- I ३-वैज्ञानिकविवेचना- यातिकम्मता की सपनिषत् प्य ? इस प्रश्न के सम्प्रभान के र पदिण 'यममविरुपाप' मामक प्रकार प्रारम्भ होता है। इस उपपति-प्रक- रस में प्रपम मापास्मिक या का स्पीकरण पा, अनन्तर माधिदैविकपक्ष का विश्लेषण पाई। उपपत्ति-प्रकर स्मारम्भ से पहिले हम भाग एक बहुत बड़ी प्रितिपत्ति की मेरे पाठकों का पान माकर्षित करना चाहते हैं। मारा मेदशाम विज्ञान का महार है। इस सूक्ति के उम्पारण करते ही पचमान अगत् प्रश्न-परम्परा हमारे सम्मुख उपस्थित कर देता है। "पदि वेद में जिन 1, तो क्या उस रिक-विवान के भापार पर मारतीय भी पर्वमान नगर के से विनिम मौतिक भाषिकार कर सकते हैं?"! इस प्रश्न का महाप उस समप मौर भी का मार्ग, बब कि वेदापरेकी म्याम्या करते समप पदे पदे वान' एम्द का पुनरावर्तन होने सगता है। मारतवर्ष के सोहए देवयुगकार में विमानादि भौतिक भावकार उक्त प्ररन का मसीमाति समाधान कर सकते थे, इस मे को सन्देश महो। और पग्वेवीप कतिपय सात मात्र मी माविक रूप से अपना मसीत महमाम सुरक्षित रसने में पूर्ण समर्प है। साप होगमी मुग सलो कि, परि भारतीय विशनों में पूर्णराम्पायय मिले, तो वे भाज ही बिलुप्तप्राप वैदिक निधन-परम्परा के पुनस्सार राय भौतिक मानिष्कारों से अपना मतीत पचमाम कोटि में आ सकते है। इस प्रकार मोनिक विज्ञान के बापार पर प्रतिष्पित निमामादि मोतिक भाविकारों के सम्बन्ध में अपने विकासा मिदितरितम्य, कन्तुमातुमन्यवाकसमर्प, महा-- महर्षियों के परा सौरम को गणमात्र मी कम करते हुए इस समय में हमें मपमा पर मालम्य स्थए करना ही पडेगा कि, भारतीय मार्पियों हानिक जगर' की परिभाषा अपना कोई विशेष मास रमती है। सापती पर मी निर्षिगद है कि, अपियों की इस तालिकाना परिभाषा की तुलना में मौलिक मानिफारों से 15 शवपपमाप भाषामणम् । से सम्मन्य रसने पसी ग्रनिक परिभाषा कोई विशेष मालमही रसती । यदि इस समय में यह मी कर दिया गाय, तब भी कोई मवेशयोक्ति मोगी कि, प्रपियों फा विकनिशान प्रधानत लिम तीम अधिों में विभक्त है, उनके मतिरक किसी पौधे ( मौतक पाविष्कारामुगत ) शान पर उनकी रि सदा से महीने सपाम रही। यही कारण है कि बिस देवयुग में सिमानादि भौतिक पारिफार मिपमाम थे, उस पुग में भी ये माविष्फार सर्पयोक म्पपार में न मासके थे। भौतिक मालिकार माननीय पुदि में बता का समावेश करते हए उसमें मह) प्रसिदिसा सषण मासर-मार का समावेश करते हैं, या साप माप से इनके पवियय म्या घर से मानव समाग की प्रातिकालियां, सतः सिर पौरुप मा दासानुगत बनता रहता है। मारमनास्थ्य के पम्पतम गा पेही भौतिक भाषिष्कार है। पि इन की इस मौषमता से परिचित थे, पर इस मोर सदा से उगहों में उपेक्षावि को ही प्रशानवा दी। फसत इन मौसिक माविकारों के माधार पर न तो वैरिक- विज्ञान का माल कम ही मिपा वासकता, न इस सम्बन्ध में रिकविधान के सामने मापारमक कोई प्रल ही उपस्थित करने की एता की जासकती। - प्रपियों का बैदिक-मिशन प्रधानत मानिदैविक, प्राप्पारिमक, माधिमी तिक, न तीन श्रेणियों में विभक्त है। भापिमोतिकविधान की पाविहान' ., इसी के माधारपर सारा गारपाश्रमानुपी कर्मकाया प्रतिमित है। मातिरिक शिाम ही परमिशान', एमी के भापार पर पानप्रस्थाश्रमानुगधी 'उपास भावपर' प्रतिष्ठित है। पाप्यात्मिक ज्ञान ही 'जीविधाम', तपा इसी के माधार पर सम्पासायमानुबम्मी नफाण' प्रतिमित है। कम्म, उपासना, दान, ये तीम सी मानबसमान परमपुरुपाप है। इन सीनो का क्रमशः मनुप्प की पुरा, पोर, पसाबस्पार्मों से सम्बम्भ ।भपनी इन तीन भास्पायों में वामम बिम्ग की मानुसार क्रम तीनों पुरुषायों का बनुगमन करने वाले मनुष्प कारणेक, पासोक, गेफर्ममा, मादि सबपुष गताप होगावा । - माध्यमायणम् शम्पपत्रामण विज्ञानमाण 1 । यदि भोर मी सूक्ष्मष्टि से विधार किया जाता है, वो हमें इस निफर्ष पर पहुचना परवा है कि, उक्त तीनों विधानों का अन्ततोगत्वा 'पाक्षिान' पर ही पर्यवसान है। ईमर के साप सायुम्प-साहप्प-सामीप्य-सासोक्य रूप से अपने भारमा को मिटा देनाही पापिदैविक विद्वानानुगत उपासनाकाण का परम फर है | मारमप्रपतिपणा यह उपासना भारमा का ईश्वर के साप पजम कराती ई पमनरुपण पामोदा से ही पुत। एवमेव अपने विगुर अपहतपाप्मा, मीवारमा को उस निरुपाधिक, विगुर, प्यापक वामतत्व में सम्वरूप से बाइव कर देमा ही' माध्यामिक विद्यानानुगत जानकाण का चरम फर है। भारमसम- ग्दर्य पराम भी मास्मा का भारमा के साथ पान कराता मा यजन अषण फार्म्यादा से बाहिर मही मामा मासकता । इस प्रकार याविन गर्म में इतर दोनों विद्वानों का मी जन्तान होपा। इसी भापार पर योन पत्रमपगन्ध देवा"-'यझेन पापः परपीयमायन्' इत्यादि मन्त्रर्णन मम्बर्ष TH 1 - या तीनों विद्वानों का समथ्यात्मक एक ही नाम 1-'विपशिान'। क्योकि सम्पर्णविक बप्पारम, मषिदेव, अभिभूत भेद से वीन ही मागणे में विमल । विपर्धामक, विमवितामारमक इसी समधिपा के लिए 'सर्पव'-'सर्पमेपास' इस्पदि नाम प्रयुक्त हुए हैं मिस का पत्र का प्रकरण विशेषों में विस्तार से प्रति- .-पन पदमपबम्ब देवास्तानि पापि प्रममाम्पासम् । मामीमान' सपम्प पत्र पूरे साम्मा सन्ति रेषा॥ (पशुसं.३१॥१६)। परेम बाप परपीपमासम्तामम्पविन्दम्भूपिपु मपिष्टाम् । वामरस्मा म्परा पुरावा सप्रेमा भमिस मवन्ते ।। (सात) .
विज्ञानमार रापमापण: पादन मा. संपात पा के टळ तीनो पो का कमरा विच के 'सपम्म, मर्य, पृपिपी' इन तीन पदों के साप सम्बम्प माना गपा है। योगमायाम्पिम, सरसागारमक-मामायावपिन-ममत्वाप का पत्र पपीरमानापस्यास्यापक, मतएव पत्रपस्मिक, विस के मसिम पांचों पर्षों का "सपम्म, परमेष्ठी, मूर्य, पन्द्रमा, पयिती" से पताहों में कई बार उपग्रहण किया बापुका।।इन पांचो लिमपों का भागे गाकर 'सपम्म सप-पपिसी" इन तीन पर्षों में ही विमाम मान लिया जाता है । इस विभान्ति का कारण यही कि, पामरूप सम्पादक देवत्यमों का परस्पर पजन होता है। पनि के कमरा 'प्रमा, विष्ण, इन्द्र, सोम, मधि', पे पाप देवता है। इन में प्रमा सतन्त्र पते है । येही 'मास्म सर्पस्य प्रथमनम्' 'प्रम सर्वस्प प्रतिष्ठा' (शा. रा) के अनुसार सर्वप्रतिष्ठा है, प्रभमय है।निनन, -स्मापवान् सात पप समानि गहिरे। बम्बासि अधिरे दम्मापमुस्वस्मारबापत ।। वरमारा मनायव पेचोमपापव' । गायोपरि उस्माचस्मारडावा पाय । तपाईपनि मौरन पुरष भावमय । हेम रेखा पपरम्प साया अपबार । (या ३१054) "प पपम्मु पोऽपप्पत । रेषत मरे वपस्यामन्त्यमति, न्वाद भूर्व पारमान शानि, भूतानि पारमनि इति । वत् सर्वेषु भूतेमारमान हुत्वा मूतानि परमनि, सरेंगे भूतानो भएप, साराम्भ भाषिपत्य पप्पन । तपमान सो मधे सर्वान् मेपार हुस्वा सर्वाणि भूतानि ठप स्वायम्पमापिपस्यै पति। स पापप समिपणे रारात्रोमानुपति । एसपपरिण्ट, रिण स्नमम हसन स्पैगमापस्पावरपे । समिमम्मि पराय पिनोति । परमो पाएर पाना, पन् सबमेप । परमेरे परमतो गमपति"। (रा. ११.भ.१.१.)।
भान्जाभणम् रावस्यमापन ३ T T दोनों का एक पुग्म है, वैसा कि 'रिप्णोः कर्माणि पश्यत, 'यो प्रतानि पस्पथे। इन्द्रस्य पुज्या सखा' (युति ) इमादि। मन्नवर्णन से प्रमावित ।। एष इन्द्र-सोम (पद), ममि, तीनों का एक स्वतन्त्र दिमाग । इस प्रकार १-२-इस क्रम मे पापों का तीम ही संस्थानों के निर्माण में उपयोग दोहा है। प्रपमसंस्था के अधिपति ब्रह्मा है। इन सपा से सम्ध ।। द्विवीपसंस्था के अधिपति हामिव विष्णु हैं, इनका सूर्य से सम्बन्ध ।। एष तृतीयसंस्था के अधिपति इन्द्र-सोमगर्मित ममि है, तपाइनका बम्प पृपिथी सपा प्रमा में इन्धर्मितवियु निष्णु हैं, इन्द्र-सोम गति अनि महेरा है। इसी विश्वविमान के माघार पर 'पार्यसबब' (पुराण) ने रिकपनदेयतावाद के सान में मिद सामुद को प्रधानता दी है। पुस्परिधान के अनुसार मी सो लिपपं का समर्थन रहा है। भम्यम पुरुपानुगत 'मानन्द' भपरपुरुषानुगत । 'प्रामा' पपयानुगण 'मा', तीनों के समय में मानव-मा-प्राणमय बनन पावा सपम्म् भापकिया' की प्रतिष्ठा है। वायमानुगत विधानगर्मित 'मन', महर्रानुगः पिप्णुगमिन 'इन्द्र , परा नुगता मगर्भिता पम्' तीमों के से मन-दम्मम बनने वाला सम्म दी भाषिका की प्रसिम् ।। पपपानुगता प्राणगर्मिता पार , भवरानुगत इम्सोमर्भित 'ममि, परानुगत बग्नगाभत अन्नाद ,तालों के समन्ध से 'माक्- पनि-पग्मा मप बनने नामों पृथिवी ही माधिमीन या की प्रतिमा पिम्प नुगत कार्मा क, माविमौलिकपा म्याग की प्रतिष्ठयो। सम्पानुगन, उपाममामा, माचिदपिका परामुक्ति की प्रतिमा है । एवम्बम्मू-मन महापडा, मापामिर परामु सम प्रतिष्ठा है । इस प्रकार मि ससा यया के अनुसार मिनार का समर्थन पाने पाना हमारा सयातया घरी मन का प्रतिमा मनता TET 'एफामक नाम को कर रहा है। . -- न विमानमाप्य शतपयमापण चाम्पसमयम् १-मानन्द प्राण स्वयम्म] यम्मू- -विज्ञामम] विष्णु भाप परमेही - सम्मे --पन दाफ पूर्व ---सालपन सोम प्रभम् चममा -पिती पिबी प्रग्मि प्रभार । -म्याम् -अध्यात्मम् (पप्पास्मपत्रप्रतिष्ठा-जानकाएउम्) २-सप्प --मभिदनतम् (माधिदेवतपाप्रतिष्ठा-आसनापाणम् ), -सपावर ३-पपिपी-भभिभूतम् (मपिभूतपाप्रविध-कर्मकापाम् ) प्राकृतिक पविशन ही विविधाम है एवं इसी क मापार पर पुरुपार्पसा पक मेष-पात्रयी का (पान-उपास्ति-कम्मप्रयीपा ) मार्पियों के परा मारिन उमा। इस मौलिक स्थिति के माधार पर कहा जासकता है कि, हमारा दिकवि धान उस निपपविज्ञान से सम्बन्ध रसता है, जिस के परिशान से, एक तदनु पानुष्ठान से भामकरणण के साप साप सोककल्याण सरिमना पुष्पित, परलवित होता है। प्रतिसिम नियमों का अनुगमन करते हुए हम शाम्ति, तपा सोकसभाबक वीनियात्रा का निपार करते हुए परत्र सद्गति प्राप्त करें एक मात्र इसी टोरप की सिद्धि के लिए हमारा विशनशास्त्र प्रहमा है, जिसका मुलस्वाम पाविज्ञान ही माना जासकता है। याकम ह हमारे पिान का परम फट । ऐसी दशा में पारित मोतिक-मारिफरों को लेकर हमारे विण मशास्त्र पर किसी प्रकार का प्रतिप्रश्न नही किया जा सकता । जब रि देपर - तपमम्प्पन पाकर्म ही हमारी प्राप्तिक शक्षियों को सुरक्षित रखता मा हमारी सप मा रमकताएं पूरी कर सकता है तो फिर हमें हमारे विज्ञानशास्त्र से उम लिक, मास्तिर्यक, सहमतिविनाशक, मौतिक भाविकारों के सम्बन्ध में प्रश्न करने का कोई असर बब नही रहता । निवेदन करने का अभिप्राय पी।कि, 'मान' शब्द से भौतिक भानिहार प्रत निकायर में सर्वया मनमिप्रेत है। विधानसम की मादा पावन पर्यन्त ही सीमित सममन्ना चाहिए, बिस के कि गर्म में माघदेविक, गप्पामिक माधिभौतिक विज्ञान प्रतिष्ठित हैं। सत सकोस दो सप्प य रहते पए से हमें प्राव भाग्यमामा का समन्वय करना है। पाकर्म की सिदि के लिए सम्पप्राण किया जाता है। इस सम्बन्ध में प्रसङ्गार पद मी स्पा करना चाहिए कि वह पापी में से प्राव में प्रभाव लक्ष्य पूपिम्पनुगत भाषिभौतिक पाही।। उपासमा से सम्मम रसने वाला सानुगात भाषिदेवकर मारपपक मन्यों से सम्बन्ध रसा, एवं शाम से सम्बध रखने वाला सायम्भुव मा पारिमक पक्ष उपनिषत् मन्पों से सम्बन्ध रसal भाषणों में प्रधानरूप से कर्म से समय रसने वाले प्रपिम्पनुगत भाभि मौतिक काही निरसेपणाम। पिम्पमुगात भाभिमोतिक पा में मूपिण, पार्षिषम, भूमहिमा, मेद से तीनों यो का उपयोग होता है। सर्प भूपिण, तपा मोपभि बमसति मोहारि मवेतन वर्ग पूपिम्पनुगत माघमौविक पा से समाप रहते है। पामर-गम प्राशरमा सवार्षिनशरीर (बामदार घेतन) पिम्पनुगत साम्पास्मिक पा से सम्बन्ध रखते हैं। एक एकीयस्तोपारिखमा पापिषी (भूमरिमा) से समय नने मासे पार्पित रिम्पदेषन पिम्पनुगत माधिदैविक पा समान रखते हैं। 1म प्रकार केवल पार्पिसस्था से सम्मान रसने पाठे, कर्मप्रधान भाभिभौतिक पर में ही भूमिपई, पाविपतमा, रिप्पदे भेद से तीनों पक्षों का अपमोग सिरसा विधानमाप्प पपपपण भाम्पम्प्रमणम मात पोती भटपटी पी है। परन्तु इसका परीकरण करके ही मापण महान का समन्वय करना चाहिए। के तीन पदों के स्पीकरण के लिए वेद के पी. पेप प्रापण भाग रे 'पिपि, पारपयक, उपनिपत' भेद से तीन काप हमारे सम्मुख उपस्थित हुए। ये तीनों प्राप कम्य मार्ग का प्रदर्शन कर रहे है। र प्रम (मन्त्र) माग शावम्य माव से सम्बन्ध रखता है। इस प्रकार बातम्प, करम्य मेद से वेदगार 'प्रस-प्रमण' रूप से दो मागों में नमक होगा। शिवराम का क्या क्षरूप । इस प्रश्न का समाधान प्रमोद (संहिता) कर रहै। एक विश्वविद्वान के पापार पर हमें क्या करना चाहिए, कैसे करना चाहिए, इस परम का समाधान मामणवेद (घि, वारण्यक, उपनिषद वेद) कर रहा है। इस प्रकार मन्त्रसामणामक सगास वेदास बिल के प्रताप, कम्प की पूर्ति करता मा सर्वशय मन रहा है। प्रस्तुत माण्य कर्षम्य मेद भाग के कर्मया से सम्मान रखता है, जिसका कि पृषिम्यनुगत माधिमौसिक पा पर्व से सम्बध दिपरमक प्रामस पम्पों में पति नु अध्यात्मम्'-दति नु अपित परम्'-प्रयादिमनम्' मादिप से बिन ममरमादि का स्पीकरण होता है, उनका एकमात्र पिम्पनुगत भाघिमौखिक पर्व से ही सम्मान सममना चाहिए। निपEF पि, पदशा निझामप्रमान शाम से प्रभानत 'सिविधान' अभिप्रेत है। इस विज्ञान के भम्पाय पनि पपिमूत, तर प।। तीनों पी का कमरा: सपा -सूर्य-पृपिकी, से म। येही तीनों विधाम पर जानकाया उपासनाया वर्मा की प्रतिष्ठा मि। स हिनापी के ताप कसम्प, मे से दो रिवर्स है। जानकापी का परी करण संहितामा प्रदेश में इमा, कम्पपी का निरूपण प्रामणामक देश में पुमा । नपत्रविधान विधान, भोपप बनस्पतिविज्ञान, परिधान, मादि भारि बास्तर सग-मामानों को ही तीनो Funो में मातमार भाम्बामणम् शतपषमापा विधानमान १-अप्पारमपिधानम्-स्सायम्मुबम्-विधि (कम्पास्मक कर्म) २-मपिदैनधिानम्-सौरम्परयपक (कम्पारिमका-उपासना) १-मविभूतविधानम्-पार्थिवम-उपनिपर कम्पारमक शानम् ) - " इन तीनों में विशेषता यह है कि, सापम्मुव मध्यात्म का ईपरीपसस्पा सम्बप एवं इस के मापार पर सौर भाभिदैषिकविज्ञान प्रतिष्ठित ।। साप माधिदैविक माधिमौतिकविधान की प्रतिष्ठा बना हमारे। दूसरे शब्दों में इन रारमा कर पप्पारम स्वपम्मुमपात, भपिदैवत सौरपा, एवं मषिभूत पानि पा। इन तीनों में से हमारे रेषा का एकमात्र पिरीम, पार्षिकमाधिमा तिक पा से ही सम्बन्ध है। एवरीय भाषिभौतिक पूर्वकपनानुसार भूम हिमा, पार्पियशरीर, मनुष्यात पपा, मेद से तीन दिन होगाते हैं। यहां मूम रिमाणपण पा मारिदेविरुपा, एवं यही पापियरीमण्यम माध्यामिकपा की प्रविष्य है। जैसी स्पिति, यो मनपरसंस्थाम पापिर माधिदैविकया कर, मेसी रिपति, सीमावसंस्पाम पाविरारात्मक पाप्मामकपा का।। एवं मिस मिपम से भाप्पास्मिकपा (पुस्पसस्था) का निर्माण प्रभा , उसी निपम से अपियोपबाधिमौतिक पपण भैयद का विताम हमारीपसस्मा में | बापारिमक पषिदेक्त की प्रतिष्ठा पापा जीवसस्पा में अघिदेबत मप्पाम की प्रतिष्टा, बप्पाम अधिमूत की प्रतिष्ठा है। १-एकविंशम्तोमामहिमो भूमाहिमा मधिदै बिनयम (पार्थिवा) -पापियशपाय -----वायात्मक (पार्थिव ) सपा माषि ३-पुरुषप्रमग्नसाप्पा अपना -मामतपत्र (पार्पिक) ) भौतिस्पापी उक्त पतिको ठप में रम में प्रकलामण प्रतिरूप हप फा समय करना । 'पुरुषा मे यमा' 'पानि ति मनोरेरयेम पुस्प का पियानमाम्य शतपथमाण्य: मान्यपणम् विमान करती ईपी बता रही है कि, हम्परा यह पुरुषप्रयत्नसाप्प पत्र पुरुष की प्रतिकसि है। पुरुष इस पपा का विवान कर रहा, इसी लिए यह को पुरुप मामा नासकता है । 'पुरुष' राम्द स्वयं पास्वरूप का सूपक ।।, गोणित माग्नेप तप , एक सौम्य वामदामों के पमन का ही नाम पर है, एवं पही पाप्रक्रिया पुरुषोत्पति का प्रधान कारण है। प्रतएव पुरुप को वरपी या करा जासकता है। परमक पुरुप का पोम्पापार होग्य, यह भी पानी मामा पायन एवं इस पाम्यापार से विस कर्म का स्वरूप सम्पम होगा, या कर्म मी पिता-पुत्रवत् पारी का मायग्न । या इस मवियप का नाम यो प्रक्रिया विशेषों से उत्पन होकर पाकर्ण के भूतारमा की स्वर्गादि प्राप्ति का कारण बनवा है। अतएव इस मतिशप ( सस्कार ) को 'देवात्मा' करा माता। प्रदेश रमा की तुम या। इस का सपादान पबमाम का कर्म बना। चबकि उपादानस्पानीप पबमाम पिता पुरुष वो तत् पुरस्पानीय पतियपाषण देवारमरूप पा को भी पुरुष ही कहा जायगा । . इस के मतिरिक्ष इम पा भी देखते हैं, पुरुषपा (मानप) काबिस रंग से पिताम मा । उसी ढंग से इस पपा का पितान एमा।।पमा से पहिले पुरुषपड का विचार कीथिए। पापमोतिक शरीरपिया 'पनसस्पा' । भूमामा याता 'यममान'। भासोरम्प, मानसाप्रेम्प ग्णप्त शामराग्नि 'होता है। पासप्रशासRAक आयु 'मम' है। एमरप प्रज्ञान मन 'ममा' पळस्प ते गोगामी प्रतिष्ठित उशमप्राप्ठ उगा । मुगधारमण गारपरपकुपर' है। तत्र अपानामि गोपरपाग्नि'। टानमपरस दक्षिणाग्निकुपर' ।। तस्य मयाग्नि निगान' । शिरोम 'मा सनीयफुपर' । तप प्राणाग्नि प्रासनीपाग्नि' | देश-सोम पहिर । पसइ समिप बदम्प प्रगतीला, तपा मारणी है। मम 'माइतिरम्प'। दक्षिणापा 'गु' । वामभुगा-मपात - ४ मात्रामणम् शवपापण. 'उपस्द' ।। मध्याह्न 'भूषा' ।। सङ्गिशरीरसधारी चैतन्यप्राय 'भु। कसे प्रारम्भ कर मगपारपर्यत साए प्रदेश पदि ।।, इसप्रकार हमरी पुन मसस्या पालकप प्रतिरूप बन रही है। ऐसे खात्मक इस पुरुषकार के भाभारपर हो, 'वानुरूप ही कि इस पक्षध स्तिान होता है, मतप इस पिया को हम भरपही पुरुष का प्रतिरूप कासकते है। । 1 1. ) पुरुषया में दक्षिण मुया से मात दी चावी1, बाममुमा सहयोगिनी बनी पती , तापमाण! अमरस सर्वाङ्ग यस में पापाता रहता है, मापा से इवर सम्पूर्ण शरीरापपर रसमा रा रा है। ठीक यी काम इस पेना में समादि से लिया जाता है। प्रतएप मातिसापक हर को हम इस पया की पिम मुगा सकत है। उपरत पडू का सहयोगिनी , मवरण इसे समभुगा माना जाता है। धुन्ध से ही ( मास्पित माम्प से ही) सम्पू पा सम्पम होता है, पर इसे मामा (मप्पा ) मामा बासकता । मुभा का सप खुपों में सवार होता है मतएव इसे प्राण कहा मासकता है । इसप्रकार दपियभुगम, गाममुगा, मयाह सशरीमाण, बागो ममुहर अपना स्पान रस नेवासे १५, अपरत् मा, सुष, चारों मापात्र यादी पुरुषप्रतिदपता को बम बनाते हैं। निर्पत जैसा बितामक्रम बाप्यात्मिकया का 1, ठीक नही कम इस भापमोतिक यार। ऐसा क्या किया गया। किम नपार पर किया गया । इमादि परनों की उपनिपट परी भाभ्यामकमा (पुरुषस्वरूप) ।। या या भर प्राकृतिक पुरुपयन मी या पतिपदिकनि। कामगा पा पादेश। पतएक पार बसा ही कामा म्पायसनतास पर सामे यर (पुस्प) पान में कोई भापति महीको नामती । । पुरुष-(पममान )-प्रपन्नसाप्प होने मे, पापुरुपयशानुरूप क्लिायमान दोन से यह भारिमोतिषपाभी पुरुष माना जासका उत प्रतिरूपता काही निमाममाप्य शवपयामापण भाभ्यापमम् 1 निष्कप है। अब इस समय में यह प्रश्न पप रहता है कि पुरुषपड़ का सहप ही एपरिष कैसे प्रभा । पूसरे राम्दों में इस प्रश्न का यों मी विरलेपण किया पासकता है कि, माघिमौतिक या की उपनिषत् (प्रतिष्य-ममिति) हो पाप्यास्मिकपर, परम्त माध्यामिपया की उपनिपट क्या है। इस प्रश्न का उतर ही पूर्वप्रविप्रावित पार्षिष भाविदेविक पा समाधिदैविक पार्पिय दिम्पयन से इस माप्यात्मिक पुरुषपड़ की प्रविय है। भूपिण से मारम्भकर २१ स्तोम पर्यव मास महामहिम पार्पिगमरा यासस्या है। पार्पित सप्रमापति (पार्षि पमग्मि) पागि 'पममान' है। विश्वस्तोमावपिदम पार्पिण प्रदेश में म्याप्त शमर मरिन 'सेता' । पथदरास्तोमामहिम पार्षिक प्रदेश्यसहित मतरिक्ष में म्याप्त पायु 'भाप' है। पासोमारमा पानि मम यमा' ।। एकछिस्तोमा- बभिम पार्थिवप्रदेशोपसहित पुढोक म्याप्त मादिम 'उद्गावा' ।। भूपिया पर ण 'गापमकुपर'। तस्य विमान 'पुराणगापयाग्नि' ।। विश्व स्तोमात पापिनमविधा प्रदेश 'नूतनगारपपण', परम पार्पित पनाग्नि 'नत नगारपमाग्नि है। पञ्चदशातोगस्त पाविमहिमा-प्रदेश 'पिएपाग्निकुपट'। तत्रत्य मारविध मात्रिकाग्नि 'पिगपाग्नि' । एकषियस्तोमान्त पार्षिकमहिमा- प्रदेश प्रापानोपकुए , त्रस्प सौरसिपापिम मानीयाग्नि' है।गेका सोषमीमात वेन नामक बाप 'सी' है। अन्तरिक्ष में व्याप्त वरम सोम समिप' है। माग्रीप मीधि नामक बार रणीला', तपा प्राणी' । मोपभि सोम, पपा पादसेम 'माइतिरप्य' है। भूपिण 'इपिदि' है। भूमरिमा मारि । परिणतोवारिम पुछोर दक्षिणासापानीप 'जुई है। बा (पौ)का नाघारमन प्रसस्तोमावरियम मातरिपलोक यामास्वस्पानीप 'उपपन है। सप पिण मापारपानीप घुग है। मारपसवारी, पैतम्प प्राणु स्थानीय पापम्पारण 'पुत्र है। इस प्रकार पापिहिमायण हम भाभि दकिपा में पतिसम्पनामाषा सामग्री परिपा पपानुदा, पापान पत्र । ४ मम्पम्पमपम् शपथप्राण पिनमाम्य पित है। इस का कि ऐसा सहप है, अतएव इस से उत्पन बाप्यास्मिक या का भी बैसाही सरूप है। एवं वैसा मरूप पाप्यामिक या का, तदनुरूप दीपमाधिमौतिक पद का विवम किया जाता है। मुगनुबाद में यह सन्देह किया गया पा कि, प्रपम तो पिपी से गेक्स की सत्पति मामना 'पभगत , उसपर भी प्रपिकी से पूपिणी की उत्पपि मानना तो कपमपि सङ्गव नहीं बन सकता । इस सन्वर की निधि के लिए दो शब्दों में पार्षिसस्पा का सरूप मान लेना भारपक शेप । श्रुति ने मिस पृपिवी को मापागस्थानीय 'धुम' बताया है, यह बिमाग्निप्रधाम भूपिया, जिस पर भस्मदादि पार्षिक प्रमा सपरिमा प्रतिष्ठित ।। एवं मुति ने धास्पानीय निस इस भूपिपा से-'मस्या परेमे सबै मोकार प्रमान्ति' इष्मादिकार से निस खोप का प्रमष बसपा है, वा पिसेनिपेयाग्निप्रगान मरेमा है। मपि निमोकियों में से पृपिषी से समाप (सने बासी त्रिसोकी 'सौम्प प्रिलोकी' नाम से प्रसि। इस की उत्पत्ति पपाप में भुवारपानीय मूपिण से ही ।। "पयाग्निगमा पृथिती, क्या पौरिग गर्भिणी" इस मौत सिसारत के अनुसार भूपिण पग्निगर्म है। यह मौमाग्नि की ममि का भविष्याता प्रयापति' है । इस प्रापापस मौम पौन की मठ (विवेनिषेप), मर्प (विष्म) मद से दोबारा सहम सिम मानी गा है, वैसा कि- 'पदै मनापते- ग मनो पर्समासीददममवम्' (त. १०) मादि सपन से प्रमाणित । भूपिएर मयाग्निप्रधान , तम । इस पिपरम में प्रतिष्ठित ने । अस्ताग्निवी रसानिकी प्राणानि । यही दबानि नाम से भी म्पन ा है। सरि कामुक हम रसाग्मियण प्रजापति की कामना सयं इस नि-भाग गाई (म्म चारों योर ) प्रसार करती है। भूपिणन सपारो भोर विस होने वाचे इम रसारिन की धन-तरह-विर मे से तन मस्या होगाती है। माना परम शत हो, तापन्हिम प्रशदी - 1 विधानमाष्य रावपापम भाम्पमाषणम् 'पृपिडी' (महिमापूपिणी का पृपिपोक)। एष त्र प्रतिष्ठित धनाग्निरस ही 'अग्नि' है। महातक परब रस व्याप्त होता है, तदपरिकम प्रदेश की 'मन्व- रिध' (महिमापिथी का मन्तरिपोक) । एकत्र प्रतिष्ठित परवानी 'इस' नामक 'पायु। पहातक विरसरस म्याठ होता है, तदपस्थिम प्रदेश ही 'पी' (महिमापपिवी का पुठोक) एष वत्र प्रतिष्ठित विरगरिन । 'मादिस' है। इसप्रकार रसाग्नि के उप विमान से बही केयम्य परिम, 'बग्नि, वायु, मादिम अपने हल प्रथम-दितीय-तृतीपरूपों से डोक्य का निर्माण करता इमा 'अतिष्ठाय रूप से प्रेमोक्य में व्याप्त होता है। . इस प्रकार घुपस्पामीप भूपिया दी अपने हदयस्प (साग्नि के उर्ष बितान रा मार्गणामक स्तोमों के भाषार पर कमरा गित (१), पञ्चदरा (१५), एकविंश (२१) रूप से तीम संस्थाओं के रूप में पूपिणी, भगतरिय पौध पग्माता बनकर-'म पाऽएमे म मोका प्रभवन्ति' इस सिद्धान्त का समपन बरहा, और वह सम्दे का निर्दक बम रहा। इस सम्पूण बरपति अप' का फसिताप यही निकासा कि, पार्पिक माधिभौतिक पा से सम्बन्ध रखने बाले मरिमारमक मापिदैनिकपत्र, पापिपारीररमक भाप्यात्मिकया, एष पुरुपाय- साप्प पाधिमौतिक (और) पा, तीनों में पूर्ण पूर्व पाहता तर पाकीट- निपत् ।।( २,३,१)। • 'मापामा पापी शर पामोन तन् ममाम्पत। माथिम्म पवन तम्पा ममाम्पन्नम्प भारतस्य तबोरसा निवनानिमशरमान म्पत माविश्य नृतोय वायु तृतीयमा म पप प्राण' (प्राणाग्नि) पानि दिति (रा.प्रा ...।
भानपणम् तपयमाव - पुरुषप्रपत्नसाप्प इस वैपपा में उपयुक्त होने वाले सुप-मुक् पात्र इव पाद-मम्पाङ्गादि स्थानीय बनते हुए यह प्रमाणित कर रहे कि, यह वैपया पुर पविष माप्यारिमकपद का ही प्रतिस्प। 'माग्य-पृष्ठ' विधान के मसार प्रत्येक मौतिक पदार्प में पृष्ठ, माम्प मेर से दो पर्व रहते हैं। मृत मयपिण पृष्ठ करवाता ए एस मिस बीननीय प्राणशति से परसपात (परकूट ) प मौखिक परमाण एकसूत्र में बन रह गए नियत समय तक सर प्रतिमा सुरक्षित रखने में समर्प होवे है, पर प्रासाक्तिही 'माम्प' नाम से म्यवान ई। बबतक पृष्ठ (पिपर ) में मारप (प्राणशक्ति) प्रतिष्ठित रहता , तमीतक पृष्ठ की सरप सचा। पाखभौतिक खगादादि शरीरावा पिपारपामीप बमते ए पृष्ठ है। इनमें प्रतिष्ठित माग्नेयप्राण (मानराग्निप्राण)ीन की प्राणशक्ति है। बर बरुण से (जमीयतप से) प्रतिक्षित अग्मितस काही नाम भाम्प (त), सी भाधार पर "मो प्राग्यम्" (al. • ११०१०) "मग्न एवझप, यदाम्यम्" (ते. प्रा. १४१२)-मामो मामा ज्य"ते. हा. १८१२), मादि निगम प्रतिष्ठित है । लोम्पहार में मी सुप्रसिदशि पूत ही बाप पैरों में जीमीप शक्ति प्रदान करता है। या पाम से पुरुषविध देगारमा साम किया जाता है। यतिकतरफ्ता में सहीत घुत् चुप तो पृष्ट स्पामीप है, एवं हम में गृहीत भाग्य प्राण प्रतिरपा ११। इस प्रकार इस भार प्राण-कर्म से भी पुरुषप्रयत्नमाय इस वैषपा पुरुषप्रतिरूपता भसीमाप्ति मिस होरही है। डामा सहित स.न, पाममयी मुदः श्रापकी उपपम पेत्री भवा सपी रूपम" (04) म पन क अनुमार बम्पपिर (11) की मसीका गुर पेरणमपी पकाश (पोसा), प्रा पिन 1 जान पारप (पाप)ीका बनाया मावा है। १२ विधाममाम्प शपथग्रमण भाग्यम्पपणम् माम्पस क्या देवरमा के सरूप निर्माण में उपयुक्त होता है। यह प्रश्न है । इसके समाधान के लिए ही वगहा प्रकरण भारम्म इमा। पदिले माप्मास्मिकसंस्था का विचार कीनिए । प्राप्पा स्मिकसंस्पा में प्रधानत 'प्रास्मा, गरीर' पे दो पर्न । गरीर पुर , भारमा इस गरीरपुर में सुरक्षित रहने पाछा 'पुरि शेव' निर्वचन से 'पुरुप है। इस गरीरपुर के 'भाकार, पम्तुत क्स' मेर से दो पर्व है। भापतनहप बाप वाकार हो भाकार, निसे कि विधान मापा में 'पयोनाप' कहा माता यह पोनाम ही + चन्द' है। प्रत्येक महापया का कोई न कोई नाम पावर पपरप पता है, एक इस बार भाकार से ही मा पारित वस्तुतरा सीमित रहता हुमा सरपित वमा सता है। पदोपण पपो माप (माकार ) से सुरक्षित बस्तुतरा ( भूतपिण)य है। मिस प्रकार उदरसीमा से सीमित बम 'पप है एवमेव एम्द सामा रूप उदर में प्रतिष्ठित एने से ही इस बात रख को वप (मम ) मान लिया गया है। वय सदा वयोमा से युक्त रहता है। प-योनाष के समन्विरूप काही माम 'पपुमम् ।। स मिद पपुनम्' इस सिद्धान्त के अनुसार पच पावत् मौतिक पदार्प वप (परतुतरर), पोनाप (पाकार ) से युक्त पते हुए युग है। बपुन ही पप्यामिक सस्थाका शरीर नामा पहिण पर्व। गरीर के मप माग का । मतमाग का ) निर्माण एक-गोणित से गुण है। भनुस्नाता में प्रजमकर्मसाप प्रतिप्राण प्रतिष्ठित राता है। इस अनुप्राण के समय से ही रा को ऋतुमती' का वास है। पग्नि-सोम की सम्म, प्रस, मेद से दो दो मस्पा म नी गई है। सापतम मि साप , सापतन साम सरप है । ए निरानन बार प्रि-सोम है। इन नापि-सोमों के प सपरिक प्रमाभ-निमाम सम्म से शुगबग्म ता। इसका +-बमामिपानापा (शन | ८)। •पमामिदद म र पुन मम (गा IPE ) | गोपनाम भी लि प्रपात माग पुगोपावरप mrti का नाम -प्रेमिका और प्रकार न्यानमारस() ।इसपनिमार सोनी पनि मद्यपार साग तपस्यों वदनुरूपही धरा अपलोमा। आत, पर समय से मालकिपर ब्यपुर पन्नास तु-पनोमप राम-रोपित सम्पत्वमा सम्पपलिया प्रतिक्षित होगा। इस प्रकार भारमा, शरीर, इन दो पो बाल(Maan (पोमाघ ), मेद से तीन पर्व होगाते है। तीनों में पाया, ही पापरिमाषा में 'पारापदेवता' मा बा |om (1) परे हैं, बापाकार पदो देवता । दोनों नौकरबपक्रम हो। उपसंहार पद पर होता है। स्तुप उपक्रममनीष सत्र में सम्पन्न है, इसी उपक्रमसपस प्राचम्म के कारण मनुस्मकबारे परिमाण में 'प्रयामरना' कहा गया है। बाबा नामाकरी बक्साम भूमि सका हम से सम्बम्प। इसी उपसंहासन मन्तमाय करता कारमक हद को अनुपामशता कहा गण। इस प्रकार - ता, तपा एमोरूप अनुपान दाता दोनों के समय से शरीर मामा- मिपुर का निर्माण है। दसरा मानपदेशसापानाप बसम्मेलन निर्माण के लिए भम्प ब्रम्प की पा रant| पृष्ठ हाम- •शन समिar प्रशाध प्रसनयम्ति पापभी पति" NET inm) २४ विज्ञानभाम्प शवपपग्रामण भाग्यमापणम् इसी से सम्पय है । इपर पृष्ठम्नरूपनिमापक बत, एवं दोदेता है। फसत सिब होगाया है कि, या भाम्पमाण कर्म त, तपा एम्दोदेक्तामों की दप्ति के लिए विठ।पैसा भधारम में है, वैसा ही पाई होना चाहिए, होता। - . मप्पामपत् मषिमूतफा से सत्पम होने बाची देवात्मसंस्पा में 'पात्मा-पुर' मेर से दोनों पमपेपित है। मुस्पदेवता देवरमसंस्था के मामसह का नि माण रेगे, एन एम्दोमपण गौणदेवता बामपुर का निर्माण करेंगे । मतः वितापमानपा का पही तात्पर्य म्यममा पड़ेगा कि, भनेक इति पतामों से तायमान पर या देवता ऋतु, बन्द, हन धीम देवतामों की सम्पद-प्राप्ति के लिए ही मम्मम्प रसता है। मुत्यदेवता का एक स्वतन्त्र बिमागइस के लिए नियत मातिदम्य भी सतन्त्र , एष पा रवि' नाम से प्रसिग है, जोकि इति दृश्य 'हरि, पशु, सोम,' पा मेद से अमपुरोग, पशुपापुरोगरा पहलीसोमरस, मेद से प्रभावित है। अनुपन्दोरुप दो प्रयाबामुपागदेवतामों का (जिम से कि पुर का निम्माण होण) एक स्वतम्य विमाग है, इनके लिए पाइतिहम्प मी स्वतन्त्र है, एवं बही भाग्य' नाम से प्रसिद।। , भारमा-गरीर, पापि दोनों की समष्टि कच' । अपात् देवदच' माम समपि से समय रम्पत , तपापि मानना पप कि, पद नाम मुस्पतः भारम माग से सम्मान रखता है, म कि शरीर से । यही कारण है कि, पब भूतारमा प्राप्त समय पर नहका परित्याग परदेना। तो उस समप देवच मार नदी रहा है मोकप्पपदार रोतामशेर राग शरीर का नाम नही पता। रसरी रि मे विचार कीजिए । एक पना मरने परिकर (सपा) के साप ही मानिस रन जता है। यादी माम मुफ्प रहता है, रामा के माममाण सम्पहार मोर सिम।। सेवामा के नाम मेराबन्तमारक परी स्थिति पहा सममिए ।
71 मात्मारूप-सम्पारण मुल रोजwin होना चाथिए, एवं परिभत्ती बनवेरेसा से मन प्रारही पनि मौ पाय )। मर- . 'बाम एकमाणेच बाम बारगर 'मान' रोष । सम्मको हिल जिस सम्मान र पाल, उसे वही स्थान पर, समदाब, मन ही इस सम्मान | t. प्राणिमात्र समान है परन्तु म्हारक्षेत्र में मिल पारा के पास। कारबील, समर्श का साग बिमाम से सम्बोडियापा- (-मिरमन कीटयदि पप सब में, एकरस बप से प्रविहिन विमान कार प्रतिशरीर में मिम प्राधानिकसम्म भूमा। दानों के क्षेत्र साम विभिम।। इसलिए यह बात भारविर में मामलोष (मादा -अस्मघायल म्याग्दोव मसम्पा) से बबने ए को मिल योग्य हो, उसे उसी सम्मान | परिकारी सममा बाप । यो डा उपमा, ध्या में गो कम्य . - बार करके भाग्यमाय किया जाना है, पापा तपा पदों के सिर नियत है। मुम्प मा मदेवता को बना मैं ये रेसा अपना निम्न स्म,म रसने है । मुख्य देवतामों को तराइन परिकरवानाय देवतामो. लिए मा यदि नाम मणक वाग्यमाण किया जायगा तो-विमा TAR नक्षण पानिदोष होगा। क्त इनपिए बिना नाम प्रापीबाग्माण करना चाहिए। अन्तरिक्षमारना रेपण ( बा ॥२॥१मनुसार १० प्रयका बन्रक से सम्पर उपर दासि पसरण हलवाण पत-मन्द पास्थानीय है। 'म लरिक्षस (रा Pानमाम #शहपगडापण प्राध्याम्पम सार माग्यप्राण का अन्तरिक्ष से सम्बाप । भवन भाग्दरिदप मनु-पदों के सभापम्प का प्रदरण ही सम्पप बनता है। 1 खर में जो पार बार भाग्यग्रहण रोता है, उसका प्रयासषण अतुदेवता से सम्बन्ध , एवं उपमत में बो भाठ बार करके भाम्पपास किया जाना है, उस का अनुयार पण एग्दोदेवता से सम्मान है। दोनों मुस्थ्य देवनापेक्षया भवरणि ५ प्रतिमव होते र मामप्रहण की मय्यादा से बहित हैं। अब यप पता है- पुषा । पूव में हो घार बार माग्पनास किया माता। उसका उपयोग सम्म ण पानी सिमि से मम्दाप रसता है। थाम्पसमरिपनी सारी इविकम्यता दिवा स्थित माग्य से ही प्री की जाती है । जब यह सब का मन्तमाव है, तो पहा मी मापप्रण को अवसर नही मिससकता । यो बस सबके लिए 1, उस में विशेष व्यक्ति का नामप्राण भसङ्गत है। इसप्रकार मारमा के पुर निर्माण करने भाले मत-मन्दों के लिए गीत प्राम्य में नाममाणामात्र ही ममामिमार का रक्षक बम रहा।।(4,५,८,९,१.)। भाग्यप्राण प्रक्रिया में कुछ विशेषता रवी गई। मौर पर विशेषता यही १कि, हमें पास होता है चार बार ही, परत वाम्पमात्रा भोपपद माम्प की अपेक्षा अधिक होती है। पर उपस में सम्मा कीर से उह की पपेक्षा प्रहण तो होता है हिगुणित (माठपार, परस्त भाग्यमात्रा जुहू के पाप की पपेक्षा मोतीस बिपना का पया कमण । प्रहत प्रकरण इसी प्ररन का सोपपतिक स्माशन कर रहा है। शिक-दान से समय एपने पासी सुप्रसिम् 'निदानविधा इस तर परिमार, विस रिपाका गीताविधानमाप्पाल मतियोगीता मामक भूमिका पयपाउया पहिपानिपायाराम्प नाम प्रकरण में विस्तारसे भान्पमापपम् *शतपषमापण विनमान निरूपण मा । एक सादरयों के माधार पर मम में पाप वस्तु का मारोप करना निदाम' कहलाता है। यहाँ कम्पबहार में पारकर्म सचान के थिए पदे पदे निदाम का मानय लिया गया , वहां शास्त्रीय पवार में, विरो- पवा वेदगर के माध्यमाग में फार्मसिदि के लिए अनेक स्पों में इसका भाभय सिमा गया है। परि एक सौफिक उदाहरण हो बीमिए । 'गक्टर नागप्रसाद प्रेविड मोतीबाड गौर का दहिमा हाप पाकिक निदान पर सवारण है। बस्तुगाया मजाप्रसाद कमी मोतीसाव का दहिना हाप नही, परन्तु वारोप किया चाता है। इस मिदामारोप का मा यही है कि, दविना हाप ही कम्म सिर का मूहद्वार ।। चूकि आगाप्रसाद मोतीबास के पर्म का मम्म तम सहायक है ।बस इसी फर्मसारश्यक मापार पर से निदानतिमि से दाहिना एप माम लिया गया है। अब एक शास्त्रीय उदाहरण भी सीमिए । पोकम्पबहारसबारिणी जगामाता दमी की प्रतिमा केप में कमी का पुष्प ।।पर कमा भूपिम का सूचक है । पिएर का'प्रारम्मिक उपादाम 'पापो पै पुफरपर्णम' (शत० ६।४।२।२ ) इस मौत सिमान्तक भनुमार पुकारपत्र । कालाखीव (पनमाययुक्त) मप्-परख ही पुपारपर्ण ।।वही सत्रोचर तेगा- स्नेह के कमिक ममन से माप -फेनादि माठ म्पातियों में परिक्षित होवा रामा करणान्तर में भूपिरारूप में परिणत होगाता है । कमलपुष भी उसी भपतत्व से सम्बन्ध रसता है। इसी सारय के भधार पर कमर में भूपिण का मारोप करते पर इसे मूपिण का नियम मान लिया गया है। 'स्रष्टा पमापवि पपा मन रनिगामान रहते हुए पपम: नाम से मसिदा सम्पबहार का भी गै ममिदान से सम्माप। । इम निदानविषा को हम में रखते हुए ही इसे 3 सपपत् के भाग्य का +ना है। को दहिना हाप, नपा उपमव का नाम आप बताया है। शकुनगाण क भनुसार दक्षिण माग गुम है, पाममाग बाम । दक्षिणायक- विधानमाम्य शतपयनाम: भाम्पमापणम् एक गुम सूचना का प्रक, मामानहरण माम सूधमा का सूपफ है। कारण यही है कि पुरुष अग्निपीर्यप्रधान है। पुरुष के दक्षिणा इसी पन्निवीर्य का प्राधान्य रहसा , एक पामाङ्ग में निर्यि सोम का प्राधान्य रहता है, मोकि सोम सीपीH माना गया है। बाममाग सापीर्यप्रणाम है, इसका फरण पुरुषतस्व का विरोधी बतए इसे माम मामा गण । विधि का बाम (टेढा-प्रतिकूल ) दोगामा पाममाग से समतुलित है। इसी सारय भाषार पर हम कर सकते है कि दक्षिणहस्त स्पामीय र पुरुषवीप का प्रति- निषि बमता एमा पप्रमामस्थामीप है। एष पामास्तस्पानीप उपसव सीपीपे का प्रतिनिधि बनता था, मगुमसूचक बनता वा यममानराचस्पानोय है। इस पार्यसूचना के अतिरिक्त भादान-विरोध मर्यादा से भी यह मारोप समन्धित दोरहा है। दक्षिणास्त्र कर्म द्वारा यहाँ सम्पत्ति के मागमन का कारण बना हुभा है, पापामहस्त नकर्म का प्रतिनिधि बनता इभा निरोकर बग्नु बन रहा। शत्रु का यो काम ( सम्पति निरोप ) 1, वही स्पान मामह का। इसीलिए भी ६०. स्थानीय जुहू को परमान, तपा मा० १० स्थानीय उपपत् को परमानयत्रु कहा जासकता है। दक्षियात पमिवीप्यप्रधान एवं वामहस्त सोमवीर्यप्रधान बताया गया है। ममि बमा ( मला ) । सोम भाप ( मोग्य ) इस एशि से द०१० सा नीय वग्निप्रधान पुर को 'पमाद' माना नासपता , एका • सानीप सोम प्रधान उपमत् को 'पाप' कहा गसकता है । इस प्रकार निदानमिधि से छह उपपत को कमरा पजमान-यममानराष्ट्र तत्रा प्रमाद-माप, मानते हुए पार मण्यार, एक मदास-पनीस का समग्यप कानिए । सपरिकारपण ही कि, मेला पाम, एवं मोप सामग्री मेकपा में मारक हो । इसी सपदिमाव की प्राप्ति के लिए मोका म्पानीप जुइ में चार मार दी माग्यमाण किया जाता है, एक मग्यमानी उरमर में मार बार माग्म ।
मानमाणम् शल्प । प्रय किया, पाती। यदि मोका को अमेषा मोत्याचार्ग पिकवावीर्य पुरू, तो पर मिरमानुगता समधि निरक। पास्तविक समृद्धि तो उसे का बापा, बिस में मोका सम्पा में दो कम हो, पान्न मठ -श्रीप्य में मोम्प की प्रपेचा भूपान् हों। भोला में इसी पर बीम्प समृद्धि के लिए मोहतास्मानीय ह य मापार बार प्राण करते हुए मात्रापदि की जाती है वहां माप को निव-निर्धार्य बनाने के लिए भोग्यस्मानीय तमृत् में पाठ बार माण करते हुए मी मात्राास किया जाता है। शारीरिक बस , वारस मीठ है। मूतबस पाठो, पाणा । मोग्य प्रजा पर शासन यति सुरक्षित रखनए दोनों शपयाँ अपेक्षित है। हम देखते है कि एक पम्प में समा एक होता प्रमा पसन्म होती है । परस्त राजा अपने कोशवा से, तपा बागीर्य से एक पर का सामी हतामा मी भनेक घरों पर अपना प्रमुत्त प्रतिष्ठित रसता । अपनी इच्छानुसार यपासमप इन मे भपने गोरप सापन प्रस्तुत विपा करता है।सी मबीर्य-प्राप्ति के लिए यो मो कनीयाम, भूपसि मयारा रक्सी गई है। पुह में गृहीत माग्प की तो खा से भाइति होती ही, परत उपमत में गृहीत माम्प की मी पूरा से ही माहुति होती है। इसका कारण -बान-समाद की मारूप रपा' । उपयत प्रमा-स्मानीय । प्रमा का बह राजा का पी। पदि प्रमा को ससपवि-म्यय में सतन्त्र कर दिया गायगा तो प्रमा इस अमप्पादा में अपना स्वरूप मोठेगी एक प्रवासायोग से बधित मामी सम्पनी से हाप या बटगा । राष्ट्रसमरि के लिए दोनों का स्वरूप रपा अपेक्षित है। धर्मदण पहा को सुरक्षित, मम्पारित रमता है, यहाँ धानुगत रामदण्ड प्रग को मध्यारित नए सम्बना है। इस रसारिक महयोग में दोनों का सहप परांपत रहता है। शिप्रभारित पर अपना अधिकार जमाना ही राजा का एकमात्र याता, नाको प्रमासानीय उपपद ३ भारपण मापन भी पर उस । - मायाम्प शतपथमायण भाग्यम्पपणम् । पण में मी पही परिणाम होता, नो ममर्यादा में बताया गया है। प्रयासरतक स्वतन्त्र रूप से सम्पत्ति समाह में प्रास नहीं होती, वक प्रयासपदि मसम्मर है। राष्ट्र का विषय, परावर मादि प्रमाखावमय पर ही निर्भर है। क्या एकाफी रागा ये सब कार्य कर सकता है। बसम्भव । मनुपित नियन्त्रण प्रगसद्धि के मायकेही कारण मानें गर है। ना पा पाहिए कि, प्रमाको सम्पत्ति सम्र के सम्बाप में पूर्ण सतम्बादी बाय, साप ही पयसमन्ध में निपश्रय गाया गाय। पत्र, भौर विट् के इस पारस्परिक सहयोग से ही प्रतिसिस पर वाममम्यवस्था सरचित रह सकती है, वो रासमृद्धि का मम्पतम सूत्र है। एक स्पान पर प्रतिष्ठित का 'प्रभात', जुह 'वाम' , उसपर गिर पम' , पयसम्पत्ति 'शद्रमाग' ।। प्रत्येक राष्ट्र को राष्ट्राम्पुदय के लिए शानसा मीप सबस, सियाम्पानीय पत्रबस, मस्सामीय विवस, प्रग्यस्थानीय सर, चारों बस अपेक्षित है। मी सम्भव है, जबकि चारों में परस्पर सहयोग बना रहे। सहयोग तमी सम्मप, मब कि चारों मपादा सूत्र समालित हैं। इसी समदिरा के लिए उपयव से गीत बाम्प की मीशा से ही माति दी जाती है। इस प्रकार रारकर्मसपधिपूर्वक ससपदि के लिए पर भाग्यमाण कर्म समय गापत्री, विएप् जगती, मनुष्टुप् छन्दों से सम्बन्ध रसता है । 'सपर्णकार देपास्यामशिनर के अनुसार मूठत सभी हद चतुरपर माने गए है। सोमापहरण करने के लिए सर्वप्रपम पतुरपर नवीन्द का तृतीय पुछोक में गमन होता है। तीन चरण खोकर एक चरण से बात भूतठ पर चोट भाती है। मनम्ता पारपण त्रिपुर सोपापारण लिए उपहन करती है। पापना एक पाण होकर तीन बरसों से वापस चैट भाती है। सबान्त में सामिनी बस से पुरु परपण गपत्री सुपर्ण-रूप धारण कर माटा मारती है। मत सोमा पारण के साप साप वास जगती के तीनों परण, एपिएर का एक परण सेती ईमपने मापने चारों चरणों से मुक्षित और माती ।भारम में रखर
मामलापणम्
रावस्यमापण
बापने पापी पी अगली त्रिप के पार्यों के समय म
त्रिप एस. मयारा पत्री में सामसूमर्पण कर एकाद्याच्या मन, पती, पत्र का
सरा मगती त्रिपका पत्री में भारमसमर्पण कर वारणा बन जातीस
प्रकार सबपि राव गायपालि कुन्द :-R15.Fसारि पदरों में पुरमीत
गहे परतवनका मौशिक साप चतरघर से मानालामा मनसा कि सर्ना
मि.मि-पतरदापि मानि निगम से प्रमाणितE.
बुद्ध-स्पत चतुगिह भी पतुरदर गायत्री इन्दसे सम्बन्ध रखता
सपमत् पित भागार प्रशस भाप महबरपर त्रिष्टुं पश्चन्द, एक बार
Emat we सम्म स्सा है। एक सपस्थितीत भाग्मा मनुष्टुप् पर
मे धमाध-पत्य सपिय, मितपपिसी समय तरिका एकविंशोक,
सकेमयमापविन्ममि, मस्स्यमिन्दगर्भिताय माविमा कर विधामा
दोहताना एक वारों को प्रमश मनुष्ठम् (गामी भिम्दुमा मातीपेन्वार इन्द
पिएँ कर पासी भीम सारुमप-मनुसुमुहारमा नुनुपू, मपिस कर मादी,
भूपिमा नावाचा भास इसी बात-पितान से पटकावणास
सामी का जन्म होगी जिस के पार पर ममहिमामा,सम्पूपा प्रतिष्ठित
। तर स्थानीय भुड़ा से ही सम्पूर्ण युवकर्म सन्म होता है। (३१.३३
५.३.१.१.५.१०
+
- FrN
41 4
.
भ
rr .
-पमहणपति के - सम्मान में विशेष सम्मानही विशिष्ठ
भूमिपा) वाम्य (मम्मक) परिपूर्णपापा से प्रतिष्ठित वात्मउस
त्या में प्राणदेवता समी प्रकाराममप कर अपने भाग्परिक माकी इति
पचापा निरापद सम्मानित करो , मेसे कि सपा-से धित मनुष्प. अपने
कर्म में लिपट गए या भार अन्य को समय प्राप्त tam
विधाममाप्य शवपापपाण: भाम्पमामयम् बास्तबमें देवपसममूमि । मापसामग्री-सम्भार उस समय तक निरपक है, परतक भाग्प (प्राणतिषण कर्मसाधक पत्र) का प्राण भी कर सिया माता- पाम का पाप, अभिमृतपा का मापदम्य दोनों ही पास्वरूप सिद्धि के मुस्प द्वार पर्ने गए है। 'मिः सयादेगा।के अनुसार या त्रि-मादा से युक्त है। कितने एक पाक्षिकों का कहना था कि इस यासम्पत्ति-समा सिर शुर-उपरव- धुवा' हीमों में तीन तीन बार मन्त्रमयोग होना पहिए । परत परमधानिक भग मान् यातप ऐसा करना इसलिए समझते हैं कि, सोनों पापकर्म एक ही यासिमि से सम्बन्ध रस्ते। यदि तीन स्थान पर सिर सम्पचिका समर किया जाप, तो पारस्मता न होनापारी । इसलिए (पास्नता सुरक्षित रसने के लिए) एक-एक बारही मन्त्रप्रयोग होना चाहिए। ऐसा करने से योकक- पता मी परपित रहेगी, एष तीनों स्थानों की सम्मा के समन्वय से निव-सम्पति मी प्राप्त होगापगी ( १५, १७ १८), इति-विवेचनाप्रकरणम् । समाप्त पदवीपाप्पापे दिवीय, द्वितीयमपाठ पथम प्रामणम् । इति-श्राज्यवाझणम् ।
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• तिवस प्रमणे नमः प्रप शतपथब्राह्मण-हिन्दीविज्ञानमाष्ये दर्शपूर्णमासनिरूपणात्मके प्रथमकायडे दवीयाप्पापे स्वीय पतुर्य, दिवीपमपाठके पठ-नृवीयमपाटफेष मयम मामणम् इमग्रामण परिधिमामण - 1 - फ-निर्मुजपाठ (पारायणपाठः)- प्रोक्षणीरपर्युगदत्ते । म इममेवाने प्रोक्षति कृष्णो ऽस्याखठोऽग्नये ला जुष्टं प्रोक्षामीति तन्मभ्यमेवैतदमये करोति ॥१॥ पृथ बेदिं प्रोक्षति । ब्वेदिरसि चर्हिपे त्वा जुष्टी प्रोक्षामीति तन्मेन्यामेतद् वहिपे करोति ॥ २॥ शृथास्मै पहि प्रयच्छति । तत् पुरस्तादू ग्रन्या सादयति तत् प्रोक्षति वर्हिरसि मुग्म्यस्त्वा जुष्टं प्रोक्षामीति त मध्यमेतत् सुग्म्य क्रोति ॥ ३ ॥ ग्रंथ या मोक्षगय परिशिप्यन्ते । तामिरोपधीनां मूलान्युपनिनयत्यदित्यै व्युन्दनममीतीयं वे पृथिव्यदिति स्तुदस्या ऽषेतटोपवीना मू नान्युपोनत्ति ताम। श्राई ६४
इप्मनामयम्
शवपामय
मला ऽशोषधग्रस्तस्माद्यपि शुष्काण्यग्रामिण भमन्या
रायेव मूलानि भवन्ति ॥ ४॥
अध विसास्य अन्यिम् । पुरस्तात् 'प्रस्तर गृहमति
विष्णोस्पोऽसीति यज्ञो वै विष्णुस्तस्पेयमेष शिला स्तुप
एतामेवास्मिन्नेतद्दधाति पुररस्ताद गृहाति । पुरस्तात्यय
स्तुपस्तस्मात् पुरस्ताद् गृहाति ॥ ५ ॥
अथ सन्नहन विस्र सयति। प्रत हेवास्य स्त्री विजायत
प्रति तस्मात् सनहन विसधेसयति ताक्षिणाया श्रीखो
निदधाति नीविवास्येपा दत्तिमात जल हीय नीनिस्तस्मा-
एक्षिणाया श्रोगों निरधाति तत्पुनराभिन्छाश्यत्यभिन्छने व
हीये 'नीविस्तम्मातनरभिच्छादयति ॥ ६ ॥
अथ र्हि स्तृगणानि । अयं वै स्तुप प्रस्तरोऽप यान्य-
वावि लोमानि तान्दैवास्य पढित्तर वर्दिस्तान्येवास्मिन्नेतर
धाति तस्माद् वर्हि स्तृगाति ॥ ७ ॥
योपावे ज्वेदि । तामेतदेवाश्च पर्यासते ये चेमे वा
मगा शुश्रुवाजसोऽनूवानास्तेष्ववेनामत पर्यासीनेष्व
नां करोत्यनाणताया ऽएव तस्मादाई स्तृणाति ॥८॥
विधानमा रातपयमापण इमायणम् यावती वै ब्वैदि । तावती पृथिव्योपधयो पहिस्तृद- स्यामरेतत् पृथिव्यामोपधीर्दधाति ता जमा अस्या प्रथि- व्यामोषधय प्रतिपितास्तस्मादर्हि स्तृणाति ॥६॥ तद्धे बहुला स्तृणीयादित्याहु । यत्र वा ऽस्यै बहुलतमा भोषियस्तरस्या ऽउपजीवनीयतम तस्माद वड्डल स्तृणी- याविति तदे तदाहर्तर्येवाधि त्रिवृत् स्तृणाति त्रिवृद्धि यन्नो- ऽयो ऽपि प्रवर्ह स्तृणीयात् स्तृणन्ति नहिरानुपगिति दृषिणाम्यनूतमधरमलेछ स्तृणात्यधरमूला ऽइव हीमा ऽधस्यां पृथिव्यामोपचंय प्रतिष्ठितास्तस्मादधरमल स्तृणाति ॥ १० ॥ म स्तृगाति कर्णप्रश्स त्वा स्तृणामि स्वासस्यं देवे- म्य ऽति साठी देपेभ्य ऽप्युवेताह यदाहोगमदस वेति स्वासस्या देवेम्य प्रति स्वासदा देवेभ्य ऽप्त्येतदाह ॥११॥ प्रयाणि कल्पयति । शिरोवे यास्याहवनीय पूर्वार्दो वे शिर पूर्वार्द्धमेवेतद्यास्य कल्पयत्युपर्युपरि प्रस्तरं धार- यन् कल्पयत्यय स्तुप प्रस्तर ऽएतमेवास्मिन्नेतलनिदधाति तस्मादपर्युपरि प्रस्तर धारयन् कल्पयति ॥ १२ ॥ भय परिधीन् परिदधाति । तदयत् परिधीन परिद- धाति युनो देना ऽभग्रेडमि होगाय मावणत तदोवाच इम्मासपम् शपबमालय :- -- न वा अहमिदमुत्सहे युदो होता स्यां यद्धो हव्य हेय- न्त्री पूर्वान मावृद्व ते प्राधन्विषुस्तान्नु मेऽवकल्पयतापा ऽअामेतात्साक्ष्ये यद्धो होता स्यां यद्रो इन्यं हेयमति तथेति तानस्मा एतानवाकल्पयंस्त :एते परिधय ॥१३॥ म होवाच । वज़ो वे तान् षषट्कार प्रावृणम् वजारे वपद् कागद विभेमि यन्मा बजो अपट्कारो न प्रवृद्ध्यादे- तेखे मा परिधत्तं तथा मा ब्वज़ो वषट्कारो न मवर्यतीति तथेति तमेते पर्यवधुस्तन व्वजो वषट्कारः प्रमाक् तद- मतदग्नये नयति यदेते परिदधाति ॥१४॥ त ऽउ हेतु चु । इदमु चेदम्मान यन्ने युक्यास्त्वे वास्माकमपि यो भाग ऽति ॥ १५ ॥ तथेति देवा ऽअब्रुवन् । यमद्दिष्परिध स्कन्त्स्यति तयुष्मामु ठुतमथ यद्र उपर्युपरि होष्यन्ति तद्धोऽविष्यत्यय यदना होष्यन्ति तद्रोऽविष्यतीनि स गुदग्नो युवति तदे नानवत्यप यदेनानुपर्युपरि ग्रहति तदेनानवत्यथ यमहिष्प रिधि स्वदति त तेषु हुन तस्मादु । नाग इव स्कन स्यादिमां वे ते पृथिवी माविशन् यदा इदे किव स्कन्दत्य म्यामेव तत्मर्ष प्रतितिष्ठति ॥ १६ ॥ म स्कनमा मृशति । भवपतये स्वाहा मुत्रनपतये स्वाहा भूताना पतये स्वाहेत्येतानि वै तेपाम लीनां नामानि विमानमाण शवपासयम इमानामसम् - . यद् मुत्रपतिर्मुवनपतिर्भूतानां प्रतिस्तद् यथा पट्कृतम् हुतमेवमस्यतेष्वग्निषु भवति ॥ १७॥ तद्धे के । इमस्येवतान परिधानपरिदधति । तदु तथा ... न कुर्य दनवफ्लप्ताह तस्यैते भवन्ति यानिध्मस्य परिधा- त्ययाधानाय वेम क्रियते तस्यो हवेते ऽवक्लप्ता भवन्ति म्येन नन्यान हरीत परिधय इति तस्मादन्यनिगाह रेयु ॥ १८ ॥ ते घे पालाशा स्यु । ब्रह्म वे पलाशो ब्रह्मानिनयो हि तस्मात्पालाशा स्यु ॥ १६ ॥ यदि पालाशान न पिन्देत् । भयो ऽपि वैकसत्ता स्युर्य दि वैककतान् न निन्दथो ऽपि कार्मर्यया स्युर्यदि कामयान न विन्देदृयो ऽपि वैल्या स्युरपो सादिरा भयो ऽमोदुम्बरा एते हि वृत्ता याभ्यास्तस्मादेतेषां वृक्षाणां, भवन्ति ।। २० ॥ ६ ॥ (समाप्त चेदमिमवाहणम्) इति दितीयपाठके पष्ठं व झण, तृतीयाध्याये च तृतीय वाझगाम् दितीयप्रपाठकश्च समाप्त । ए
परिमिलापसम्
रावपयमापन
विकासम्मम
(अष-परिधिनाझपम् )
ते वा ऽपार्दा स्यु । एतद्धयेषो जीवमेतेन सतेजस ए-
तेन वार्यवन्तस्तस्मादाः स्यु ॥१॥
स मध्यममेवाने परिधि परिदधाति । गन्धर्वस्त्वा
विश्वावर परिदधातु विश्वस्यारिष्ट्य यजमानस्य परिधि
रस्यागीरड ईडित ऽति ॥२॥
अथ दक्षिण परिदधाति । द्रस्य बाहुरसि दक्षिणो
विश्वस्यारिष्टचै यजमानस्य परिधिास्यनिरिड ईडित
इति ॥ ३॥
अयोचर परिदधाति । मित्रावरुणो तोचरत परिधर्वा
ध्रुवेण धर्मणा विश्वस्यारिष्ट्यै गजमानस्य परिधिरस्पमि-
रिद्ध ईडित ऽत्यम्मयो हि तस्मादाहानिरिए ईडित
ऽति ॥ ४॥
प्रय समिधम यादधाति । स मध्यममेवाने परिधिमुप-
स्पृशति तेनैतानने सुमिन्ऽथामावभ्यादधाति तेनो ]ि
मत्यत समिन्धे ॥ ५ ॥
सोऽम्याद राति । नीतिहोत्रं त्वा को युमन्त मुमि
महि । श्रमे वह तमनर येतया गायच्या गायटीमवे
नत्ममन्धेि मा गायत्री समिद्धान्यानि हुन्दाधेसि ममिन्धे
छन्दांसि मुमिडानि देवेभ्यो या बहन्ति ॥६॥
“तपयमापन परिपिम्पमणम् प्रथ या द्वितीया समिधमभ्यायाति । असन्तमेव तुपा समिन्धे स बसन्न समिद्धोऽन्यान्वन्त्ममिन्ध ऋ. तर समिद्धा प्रजाश्च प्रजनयन्त्योपधीश्च पचन्ति सोड भाववाति समिदसीति समिद्धि असन्तः ॥ ७ ॥ अपाम्पाधाय जपति । सूर्यस्त्वा पुरस्तात् पातु कस्या- श्चिदमिशस्त्या प्रति गुप्य वा अभितः परिधयो भवन्त्यये तत् सूर्यमेव पुरस्ताद गोप्तारं करोति नत् प्रस्ताभादा रत्तायस्यम्यारानिति सूर्यो हि नायाणा रक्षसा- मपहन्ता ॥८॥ श्रथ यात्रामु तृतीया समिचमम्यादधाति । अनु याजेषु ब्राझगामेव तया समिन्धे स बाह्मण समिद्धो देवे- म्यो यो वहति ॥६॥ अथ स्ती ब्वेदिमुपावते । स दे तणे ऽधावाय तिरश्ची निदधाति सवितुर्याहू स्थ प्त्यर्य वे स्तुपः प्रस्तरोऽ- यास्येचे सुवावेव तिची निस्वाति तस्मादिमे तिरश्न्यो मुषो क्षत्रने प्रस्तरो विश ऽतरं वर्हि तत्रस्य थे जि- शुश्च बिघृत्यै तस्माचिरची निश्वाति तस्मादेव नि घृती नाम ॥ १०॥ तत् प्रस्तर स्तृग्याति । साम्ररस वा स्तृगणामि स्वासस्य देवेभ्प ने साधु देवेभ्य इत्येवेतवाद-पदाहो
परिषिप्रपसम्
शपथमायम
--
।
-
दस वेति स्वासस्थं देवेम्य ति स्वासद देवेभ्यं प्रत्ये-
घेतदाह ॥ ११ ॥
तमभिनिदधाति । मा त्वा सो रुटा पारित्या'-
सन्वित्येते वे प्रण देवा यदसवा रा ऽश्रादित्यो 'एते.
वासीदन्वित्यवेतदाहामिनिहित एव संध्यन पाशिना
भवति ।। १२ ॥
प्रय दक्षिगान जुहूं प्रतिगृह्णाति । नदिह पूग नामा
रक्षास्याविशानिति बाझगो हि रक्षसामपहन्ता तस्माद-
मिनिहित, एव सत्येन पाणिना भवति ॥ १३ ।।
मथ जुहूँ प्रतिगृमति ।। घृतान्यसि, जुहूर्नाम्नेति
घृताची हि जुर्हि नाम्ना सेवे प्रियेण धाम्ना प्रियर्थ सद
मासीदेति घृताच्यस्युपमृन्नाम्नेत्युपभृतं घृताची घुपमृद्धि
नान्ना सेट पियेण-धाम्ना प्रिय मद मासीदेति वृता ।
च्यसि वा नाम्नेति ध्रुवा घृताची हि वा हि नाम्ना
सेदं प्रियेग धाम्ना प्रिय सदासीदेति यदन्यद्धवि १४
स वा ऽउपरि जुह 'सायति । अंघ ऽतरा संच
तत्र वे जहर्बिश इतरा मव तुन्नमवतत् विश उत्तर
करोनि तम्मादपर्यासीन क्षत्रियमस्तादिमा प्रजा पासते
तुम्माटुपरि जुए मादयत्सब प्तगं सच ॥१५॥
पिनमाप्प शवपणनाम मापसम् सोऽभिमृशति । ध्रुवा ऽअसदनिति ध्रुवा मसवन्नृतस्य योनाविति यज्ञो वा ऽमृतस्य योनिर्यज्ञे सदस्ता विष्णो पाहि पाहि यह पाहि यम्पतिमिति तजमानमाह पाहि मो यान्यमिति तप्यात्मान यगन्नान्तरेति यज्ञो वे विष्णु- स्तधगयेवेतत्सर्व परिददाति गुप्त्यै तस्मागहता विष्णो पाहीति ॥ १६॥ १॥ [३, ४] (समाप्त चेद परिधिवाझणम् ) इति तृतीयप्रपाठके प्रयम माझगा, तृतीयाध्याये च चतुर्थ ब्राह्मणम् इति-निर्भुजपाठ - - - . स-मरणपाठः (पर्यायसोपानुगतः )- (१-मनोदि-हिपो मोवर्ग, क्या प्रोपणीपेण परिममोपमेयनम् ) मोक्षणीरपर्युरादधे । स इममेषाने मोदति-"हप्णोऽध्यायरेष्ठोऽ- ग्नपे सा जष्ठ प्रोपामि (पशुः स. २) इति । वन्यप्पमेरवदग्नये फरोति । प्रय देहिं मोक्षति-रिदिरसि वरिपे हा मुष्टी पोशामि' (२) इति । सम्मेष्पाविद् पे फरोति । प्रपाम परिर पपरहति । सन् पुरनादू ग्रन्यासावपति । तत् प्रोदति-बारमि मुग्म्याला अष्ट मोक्षावि" (२) इति । बन्येपमेरवत सुग्म्प रोति । पय याः मोसपः परिशिप्पन्ने, वाभिरोपनीनो मान्युपनिनपति- मदिर म्पन्द्र नपसि" (१२) इदि । इप: पृपियो- प्रदितिः । बदस्या परोपपीना .शापमान मचान्पोनपि । वा इमा प्राईममा मोषधयः । वस्माषपपि एमाण्पमाथि मरम्ति, मादाएपेन' मसानि भवन्ति । - 1 '(२-पमित्रे प्रणीतापु निपाप परिपः पुरस्तात मस्तरप्रायम् ) प्रप सिम्स प्रन्यि पुरस्ताद प्रस्तर माति-विप्मोस्तुपोऽसि" (२२) इति । यो विष्णु नस्पयमेर शिम्मा स्तुपः । पतामास्मिये सहपाति । पुरस्ताद याति । पुरस्तादपप म्नुग, तस्मात पुरम्हाद ग्रहाति। भक समान पिसमयति । प्रक्लप्स वास्प स्री विणायवे, इति । तस्मात समान विस्रसपति । परविणार्या असो' निमावि । नीलिमास्पैषा । दक्षिणव इसीप नीरि । वस्माक्षिणापो प्रोणो निपाति । तव पुन रमिरवावपति । प्रमियम हीप मीविः । वस्मात पुनरमिम्हारपति । (३-ण वहिपा मित् स्वरसम् ) अप परिम्समाति । प्रपत्र पर प्रस्ताः। प्रथ याम्पनाधि सोमानि, वाग्वाम्म-पदिवर बहिरे, नाम्येपास्मिमवापाति । तस्माद मस्तृिणाति । पोपा दिः । वामेवोपारप पासवे, ये मे ब्रामणा गभूषांसोऽन पानाः । सेनापतत् पप्पासीनेजना करोवि-मनापा पर । तस्माद परिसणाति । पाती व दिः, वारसी पृथिती। प्रोपरयो परिवर स्पामेव पूपिम्पामोपपीईपादि । तामा प्रस्ण पूपिम्पोपरा मति हिवार । तस्माद गाति । तदै बास मृग्रीपान' इस्पा । या या मम्यै बहुमनमा भोपरया, सदस्पा उपगीवनीयवपम् । तस्माद बस ख पापात्' इति । सई नदारतापि। प्रिन् तृग्णाति, मिहदि यहा। प्रपो पपि मगर मगोपात् । नृपनि परिरानुपम्' इति हिषि पाम्पनुरूप । मरम्स सग्याति । ममरम्मा इस मा मस्या प्रपिम्या -
पिवानमाम्य
रायपषस:
हिमायणम्
मोपपपा मतिष्ठिता। तस्मादपरमून स्तृणाति । स स्मृणाति-"कम्रदस
स्था तृणामि स्वासस्या दम्प (२२) इति सादिरेम्प स्पेवदार, प
दार-उपप्रइस सा' इति । 'स्मासस्यां देवेम्प इवि-स्वासदा देरेम्पा-
इस्पांतदाद।
1
। ४-मापनीयाप्रेरिमकाठेन पापीकरणम् )
प्रपालि कस्पपति । शिरोरे पापपनीय । पूमाहों गिरा,
पादपेशवपाप फरपपति । उपयुपरि प्रस्नो पारपन करपपदि। पप
स्तुपा प्रत । एतमेगाम्मिमवत प्रतिवपाति। तस्मादुपयुपरि प्रस्तर
पारपन् सम्पयति।
(५-पावनीस्प पधिमे दक्षिण रचरे च क्रमेण परिपिपरिनिपानम )
प्रय परिपीन परिदमाति । तद् यद परिपीन परिदपापि पारे
देश प्रऽमि रोकाय माहणत, सदोषाच- 'नपा भामिदमुत्सरे, पदो
होणा स्पाम् । यदो एम्प पोयम्, प्रीन् पनि मारा, वे पापनिपुर, वान्नु
मेऽपपत । पप पा भामेतदुस्साहपे-पदो रोता स्याम, पदो एप परे
पम् । इति । येति । वानस्मा एतानराफरपपन्, त एवे परिपयः। स
होपाप-पो वान पपरकार मारण। पादै पपदकाराद् रिममि
पपा पोपपदकारो न पशापात् । एतो मा परिपच, तथा या बनो
पगारो न माचर्यतीति । तपेनि । ती पर्पदधुः । तम नमो वपर.
कार' प्रणः । तदनदग्नये नपति-यता पारदपाति । १ कपुर
१५म पेदम्मान पत्रे पु क्य, प्रस्वास्माकमपि यो
इति। पांव
देश प्रमुगन्- 'पारिपरि कमप्पति-नयमा सम् । मप यह उप
परि होटपसि-दोऽपिपनि । मप यामी पन्धि-वोऽरिप्पवित
माग,
परिचित्रणम् शतपयमाण: -- इति । स यदग्नौ बुद्धवि-देनानपति, अप पदेनानुपर्युपरि जुहति-देना नपवि, अप पद परिप्परिषि सम्दति-उदेशेषु इतम्।। तस्माद् । नाग इस कम स्यात् । इमां ते पृषिी मारियन् । यदा इदकिप, सन्दति- अम्पामेव नवम मनितिष्ठति । - स फमममिपति-"मुवपतपे सारा, मुग्नपतये पारा, मनाना पवये स्वाहा" (२२२ ) इति । एतानि नेपामग्नीनो नामानि-पद मुर- पतिः, मुगनपवित, मूनानापतिः । तद् पपा पदात हुन-एवमस्पते प्वपिपु भवति । तदैके नाम परवान् परिपीन परिदपति । तदु तथा न फुर्यात् । प्रनाम्लप्यार तस्मते मरन्ति-पानिध्मात्य परिरमाति। अभ्पाषानाय गोवेमा निपत । सम्यो वेऽपक्लप्या मन्ति-पस्यैवानम्यानाहरस्ति-परि- पपः, इति । वस्मादन्यानेशारयुः । तेरे पासायाः स्युः । बम पमाया, प्रमाधिः । ममयो हि । तस्मात् पाप्ताशार पुः । यदि पासागान् म पिन्देव- भयो अपि पैकलाः स्युः । परिकावान् न विम्वेव-प्रपो पपि फार्म यमपाः स्युरापदि कामयामपिन्देव-प्रयो पपिसास्युा, भयो सादिरा" अपो प्रौदमाराः । एते शिक्षा पलिया । तस्मादेसा रक्षा मन्ति । (अत्र-मवाझणं समाप्तम् ) , ते पा पार्टाः स्यु । एतदपेपी जीप, एतेन समसः, एनेन वीरपयन्ता। नम्मादार्ग स्पुस पम्पममा पीपिं पारदपाति-"गम्पस्सा मिला वम् परिपातु सिधास्यारिएप पममानस्प परिपिास्यपिरिर ईरिता । ३) इति । अथ दविण परिसनाति-न्दप मारसि दक्षिणो विसम्पारिएप पनपानस्प परिसिम्पग्निरिवहितः" (ग) इति । भयोचर परिदपानि-"मिमासम्गो लोवरत परिपचा पुरेण पर्मणा पिसावमाम्प मशवपपतामण* परिपियपणम् पिनस्पारि पनमानस्य परिपिरस्पग्निरिसारिता" इति। अग्नपो दि। तस्मादा-'मम्मिरि ईरिसप्रति । (६-भाषमीय समिपापानम ) - अप समिपम यादमाति । स मध्यममेषाने परिधिमुपस्पृशति देनंतानने समिभ्ये । भयाग्नारम्पावपावि, सेनो पग्नि पसद समिन्थे । सोऽभ्याद पाति-"बीतिहोप सा फो घुपन्त समिधीमहि । अग्ने साम्तमपरे"१२।४) श्रोतया गायध्या। गायमीमेपेतत् समिन् । सागायत्री समिदाग्यन्पानि छन्दा सि समि पे । छन्दांसि समिदानि देवेभ्यो या पान्ति । अय यो द्वितीया समिपमम्पादनावि-पसरतमेत्र तया समिपे । स पसन्तः समिझोज्न्यान्वन सपिन्ने । ऋतमा समिदाः प्रनारच प्रमनयन्ति, प्रोपपीरप पपन्ति । सोऽम्पादपानि-'समिसि { २१५ ) इति । सपिद्धि पसन्ता । मयाम्या पाप भपति-"मर्पस्या पुरस्तात् पातु कस्याश्चिदमिरास्सै । (२५) इति । गुप्मै वा प्रमिता परिपपो माम्ति । प्रवद मूर्यमेर पुरसाद गोप्पार करोनि-'नेत् पुरस्साभाष्ट्रा रक्षासम्पपपरान्' इति । मुग्यो। नाष्टाणा रसमामपाता । प्रप यामेवाम् हनीपो समिपमम्यादावि-मनु पामेषु मानणमेव तया समि। स माममा समियो सेम्पो यमै पानि - (७-खगग्रयोविएरपोपा निपानम् ) पप स्वीणों दिमुपारर्चत । सदेहणे प्रादाप विरापी निपानि- "सवितु इस्पा" (२५) इति । अयं व स्तुपा प्रत्सर । प्रपारपते भुरा निररपी निवपाति । तस्मादिम तिरापो भयो । तर, पिग 'T यसमयम् रातपपताण्ण विधानमा . ग-मूलानुवाद- + 1 F . प्रोदय करना नाम, दि तया पाका मोक्षण, वया पोचणीशेप से परिमृप्तोपसिवन अh ( भामर प्रशिक् क्रमश एम घेदि- िक पोषण के लिए) पोषणो (प्रोषण कर्म के लिए निफ्त, अतएव 'प्रोषणी' नाम से प्रसिद्ध पर्यो । प्रमाण परवा ।। (इसे इन प्रोपणी बों से इमोदि बहि, तीमों का है। इन में से ) पर भर्यु सत्र से पहिले "कृष्णोश्यास्तरेष्ठो ऽपये वा झुए मोक्षामि । ( यजुः सं० २१ हे बग्ने ! बाप कृष्ण पपग-k, भारतीय मामक सर में प्रतिष्ठित रहने के कारण वाप 'मासरेष्ठ है, ऐसे माप घ पपानुरूप-मिठपित प्रोक्षण करता इ) पर मात्र बोसता मा रम (पा प्रमान के लिए भाए हुए नकदी के षे हुए मारों ) का पोषण करता है। इस प्रोपण कर्म से इन इम सम्मारों को अपर्यु भग्मिदेवता के लिए सामनीय ही करता है॥१॥ इम्प्रोषणामम्तर- दिसि परित्या जुष्टं प्रोक्षामि" (पा सं० २।१-माप सापत्रसमृद्धि प्राप्ति के कारण वेदि' नाम से प्रमिय है, बहिस्त- रख के सिए भाप का में अमिलपित प्रोक्षण करसह) यह मन्त्र योजता पा बेदि का पोषण करता है । इस प्रोक्षणकर्म से यह पप इस मेदिको बरिस्त पण कर्महिए ही सहममीय करता ॥२॥ पेरिप्रेक्षणानन्तर (व के प्रोषण के विए) भाग्नीध मामक अधिक कार्य के उप में off (कुशमुशि ) सोपना है। सामान से समर्पित गीको गप मे सेकर ) अप्वयु उस बरि को दिपर उत्तराम इस प्रकार रखता है, जिससे लिबर की गोठ पूर्व की भोर रहे । (इस प्रकार वेदि पर पुरम -मग्यि रूप के प्रतिष्ठित कर ) र वायु-परिसि सुगपतरा मुए मोसामि" (१३ सं. २१-माप बस्मिरण कर्म में समप हनने ए 'बी' मा में प्रसिद्ध 1 विधानमाम्मे शपथप इमाणम् है, ऐसे भाप का में मुषों के लिए भमिषित शोषण करता है) प मात्र बोबसा हुमा वेदिपर प्रतिष्ठित बहिं का पोषण करता है। इस प्रोषणकर्म से पर मपर्य सुषों के लिए ही इस पारी को सङ्गमनीय करता है ॥in. धीनों प्रोषण-कमों के मनम्तर (प्रोदणी पात्र में ) षो प्रोपती बसपा पाते है, उम से "भदिस म्युन्दनमसि" (पः सं० २।२- प्रोषणी पर माप पुषिनी के सिश्चक से) पा.मात्र योमता इभा भोषधिय (परि) मा का सिपन करता (पे पानी को भोषधियों को बड़ों में गा देता है)। निश्पपेन पृथिवी वविवि है। इस सिशन कर्म से भप इस पपिपी के मोष चिम्सों को हो माई करता है। (इसी सिधन कर्म से ) पे भोपधिपा मुबमाम से भाई ( उपसम्घ होती। इसी सिनम कर्म का प्रमान है कि पापि मेपधिर्मों का भप्रमाग एकता , परन्तु मूठभाग पार्ट ही होवे ? nu , " •म (फाएसम्मार) मपयोग पाहबनोयाम्नि में होता है, वेदिका पपयोग बस्तिषण कर्म में होता है, पव परिभ पयोग घुम्मापन सम्म में होता है। दूसरे रामो में इध्म भादपनीय भम्नि में गले माते ६, परिषदि पर पिलाई जाती है, पर मुल्पात्र पर्हि पर वे बाते है । इम्म कामाग्नि से, मेरिका पनि से, एवं परिजमुम्पा से संगमनीय-यज्ञ सम्मम्प होगाप, एक मात्र इमी प्रयोजन के लिए इम पेरि बस्किमिक मोपण होता है। पर- मएस में ग्रहोव धोनो ही पवित्र पवरप है, परन्तु ममी इन में मेप्पपर्म का प्रमाव। पानो में मम्पगुण है। इसी मम्पमापकी निप्पति के लिए प्रास प्रापासम्म विदिव। मप्पा पपित्रमा भिन्न भिम पर हस। ऐसीरण में मम्प 'एस (पवित्र ) अपमानना निताम्स पसल, असा कियाभ्या- त्य की रूपमर रिमा । म रिपपातिषि मशवम 1-1-माय मरसार किसानपुत। मामान प्रमाणम् रापमाण विधानमाप्य २-परीक्षा में पवित्र स्थापित फर पी के माग से प्रस्चर प्राण- प्रोपण कर्मामम्तर पह मपर्यु (अपने आप से प्रपीतापान में दो कुश सर ) वेदि पर पुरखात् गोठ छगे पाए काले बाई (कुण्मुगि) की गांठ सोध २-'विष्णो स्तुपोऽसि" ( पसु स० २।२१ प्रस्तर ! माप विष्णु-पके रस्थानीय केबसातहप शिला स्थानीय-11) पामत्र मोखत्य सभा उस मई में से पूर्व की भोर से (कुरासमा सपण) प्रस्तर । प्राण करता है। निम्म निरपयेन या है, इस पर पुरुष की शिखा या सुप (कुरासात आपण मनर)। (प्रखर प्राण करता इमा ) इस पर पुरुष में इस शिका की प्रतिष्ठित करता है। यह स्तुप (शिमा-माध्यामिक यारूप पुरुष के ) पूर्णमग ( शिरोम ग) में ही रे, मतएव ( तत्प्रतिरूप इस वैप माधिमौतिकपा शप के शिखास्पामीप स्वप का मी ) पुरस्तात् ।। प्राण करता ॥ (बताया गया है कि, वेदि पर रक्से हुए भी समाव की रम्म् की गट बोल कर भापर्यु-उम में से प्रस्तर प्राण करता है। इस प्राण कर्म के मनन्तर प्रस्तर तो मा को सौंप देता है एवं प्रो) समहन (बहिरे घारों मोर हिरटी हई बन्धन र ) । वसे ( वर्ष से सबपा ) पृथक् कर देता है। (समहम को पृषक क्यों किया गाना है ! इस की उपपत्ति बनाते हैंपर निश्चित कि, बग्धन के खुब माने पर ही इस यमान की सी दशममास में सम्पूर्णायपर सम्तान सत्पन्न करती। (तापर्ण पीक मधमाधम सोबरन से ही गर्भिपा मुखक प्रसत्र कर्म करने में समय होती है। पर वेदि योपायका' मलती ई निदानेम स्पी है, एष या बहि-गण इस का मीमी-धन है। पा देवण्यरूप सन्तान उपम करने पसी है। उत्पति-कर्म में बन्धन विलसन भार सकसी लिए समान मोबा। उस समान ए को मेदि के दरिने ओपी मग पा रस देव।। कारण यही है कि, पहरा (निदानेन ) इस पवमान पत्नी का मीनी बनती है। एवं होम्पाहार में निमीषापन बियों के वसायमाम सर्वपापपत्रण दक्षिण अणिमाग पर ही रहता है। मतएव (तत्प्रतिरूप दिपिय श्रेणिमाग में ही नानी-मापनस्थानीया रमु प्रतिष्ठित करता है। दक्षिणमेदिमाग पर रस्सी ई मीमी को बरिये माश्यादित कादेता है। कारण पही। कि, बोकम्पबहार में वियों का नीती पन बस से भाधादित रहता है। भतएष (वत्प्रतिरूप देवि के ) इस नीवी ,बन्धम स्थानीय एम को भावादित कर देता॥ - १ । क . । विपर पस्तृित से। प्रित्-रुप से पायदन- (प्रस्तरमहण-कर्म *"सम्बन्ध में पायथाया गया है कि, मिदानमिति से प्रस्तर शिक्षा-स्थानीय है। कि इस मेष पा में पुरुष की प्रतिरूपता के भनुरूप प्रस्तररूप शिसा र सपा मारपक मामा गया है हो शिमाधि- रिक शिखा से नीचे के गेमों का मी उसी निदानविधि से समा रोना चालिए । इसी उपपति कक्ष्य में रमती ई श्रुति करती 1-समहमा विज्ञसनकम्म के मनम्तर परमायु (बेरि पर पन भाव से मपा शिवमाया से) करा विवादा है। (वेदि पर प्रतिष्ठित ) यह प्रस्तर (करामुधि । निश्मन (निरान विधि से ) सर (रासबात साप शिखा) (रके मतिरिक को सम्र्य पेदि पर पुशा विपाई जाती है) मह यह इतापहि (प्रस्तर से मिग विमानाने पासी कुरा) (निरामविधि से) शिक्षा के मघ प्रदेशों में ( सोम शरीर में) प्रतिष्ठित सोम (मोम का प्रतिरूप) । (वेदि पर फुण निदाता मा भर्यु प्रतिक्षप मर्यादा से ) मन मा स्पित कोमा कोही या पुरुष पर लगाता है। इस लिए कुण विधाता ॥७॥ (फुशास्तरण को पूर्ण सपपत्ति पा-पुरुष के होम से समाप रसती है। मम स्स्य वेरेकी रवि से दूसरी उपपति पतलानो हुई युति कहती पर मेदि (प्रतिरूप मर्यादा से ) पोषा (बी) |इससी (रूपा मेदि) चार प - सम् रापमापक विहानमाप , (मिस के लिए भारा प्राणामक) देवता प्रविष्ठित इसे , एमओये प्रकोपारस्पा तथा अनुग्रम करने वाले विद्वान् बामणे येदि के समीप प्रतिष्ठित ।। (सोकादा में एक स्त्री मन राम से पुपमठी में महा बैठ पसी, अपितु' मपमा सोहा गरम स से बेटित कर सम्ममा से भासीन पती र दि म पोषा-स्थानीय। इसे भी यही ठक बोरिक-प्रामदेव अों, एससौकिक तिल के समीप रहमा पदता है। इसलिए मनमा के लिए भय ही इस पर क्या विधानी चाहिए। इसी अभिप्राय से शुसि करती)-न ठे हुए देवताओं, तयां इथिों की मसी में ( प्रतिष्ठित रिपर उन्म निता हा ) भापर्यु ईस वेदि को मनान वगता है। मनमत्य के लिए। ('स चरण मारयको)। इसलिए ( मी ) कुणोता है l ( मेदि को प्रतिस्प-मादा से पृथिवी मानते हए इसी रष्टि से झण स्मय की तीसरी उपाधि बताई जाती- चिक्नी बड़ी यदि उतनी बड़ी पूपिक (वर्षात् पा वेदि प्राकृतिक पातितारिमा-पपिपी का प्रतिरूप)। प्रोपधिया ( प्रतिरूपविधि से यहां ) (चा कि-वेदिहा पपिपी का यहां समय तो मोवधिों का मी प्रतिर इस पर मारप ही प्रतिष्ठित कामा चाहिए।पी धर्म बरिस्वरण से पूर्ण होगा। इसी अभिप्राय से युति करती है )-(पहिस्सरण करा मा) कार्यु हम प्रविधी पर ( पृथिरिपानीका वेदिपर ) मोपनिया ही प्रतिष्ठित करता है। से बोपनियों इस प्रपिपी में प्रArent | तात्पर्य इस बाप का कि, पपिपी का अपना पूर्ण सम्प यही कहलाता जिसपर मोपधियों रहती है। भोरधियुक्ता पुषिकी की सपदा पृथिवी मानी गई है। पर येदि का निर्माण एव मी से दुमा है । मोर को उस पाग से रेदि बनाई गई है। भोषधियों की प्रतिष्ठा का रसा माना पिवी का निवार्य (सर ) बन जाना ।। स निष्पिता को पूर करने के लिए, भोपधिप्रतिष्ठा प्रतिधित करने के लिए से यहाँ इशास्तरण मारपस लिए वर्ष कुणातरण करता है | इमात्रामसम् शतपमानाम: - (फुशास्वरम मतिराय धन होना चाहिए, गिस से वेदिरेश मणमात्र मीन दीस सके-रस विशेषता को उपग्यस्त करती हुई श्रुति करती है) पारस्प मेला विद्वानों का मास्तरण के समय में यह कहना है कि वा मर्प बनरूप से बरि बिहावे । भमिनाप उन भमियों का ( इस कपर में ) पाकि, पूपिणी के मिस माग में मोरथियों प्रचुर मात्रा में रोही, पृपिकी कार माग पतिराम बीवनप्रद माना गग है। इस माई का माहचा जो पजमान है, वही इस पार वरणानुबन्धी मीनप्रदमाग का मन बना । ।सा कि-"शास्त्रफल - करि, वरनवणवात" इत्यादि मिनि सूत्र से प्रमाणित है। (पदि परमान यही माने या में भूमिमानीया बेदि का भोधि-स्थानीय बात से पार-मारक दन करेगा वो इस के भागधेप का भूपरेश प्रभुर भोपनियों से युक्त बलवामा) इसके लिए उपभीवनीपतम ( मोग्यतम ) बन पापगम, यही वरपर्य है)। 1 पहिस्तरण त्रिविका से करता है ( तीन दर्ममुशियों से तीन बार विधाता कारस रही है कि (विस माखदेताओं के सम्मान से ) या विसत् ।। (इस विश्व-छपण पासम्पति की प्राप्ति के सिर तीन बार कुणस्तास दोना उपा। (विएतातरण का अभिप्राय पो कि, तीन ममुष्टियों से , इस प्रकार स्तरण करमा पारिए मिस से तीनों दममुष्टियों के तीनों स्वर एक्सर-ए से प्रत त परिक्षे एक दर्भमुष्टि सेपर उसे कि पूर्व माग में दक्षिण भस से घरमर स्तda पम्पम्त म प्रकार पेदि पर विहाना चाहिए जिस से पुशो का पप्रमग तो पूष की भोर रहे तपा मूठ माग परियम की मोर । मनगर इमरी दममुएि बहर (पहिसे की भमुटि मे सम्म) दिमाप में प्रप मुरि मे पपिपम प्रदेश में इस प्रकार विहार, मिस से पूषमुष्टि के +प माग रितीपमुष्ट र अप्रमागों के मीये दर जाएँ। पर ती दुशमुरे सार (सरी दर्भमुटि से समान) बलि के परिष मान भाग में इस प्रकार विचारे, रिस से मापमुनि के परिपमरप मुबमागास - शिवपनाम: इमध्यपणम् दीमुटि के पूर्वस्पित मप्रमागों से मान्छादित होगा। इस प्रकार येदि के पूर्व माग से स्तरय भारग्म होगा । एवं तीनों स्वाणों में कुरा के भप्रमाग पूर्व की मोर रहेंगे, मूलमाग पश्चिम की मोर रहेग्य । साप ही प्रपममुष्टि के समग मण्यमुद्धि के पप्रमागों से मार्यादित रोगे एवं मापमुनि के मधमाग तृतीयमुधि के अममार्गों से पानादिन गंगे । इसीको विशवम्बरण कहा जागा । इस स्तर पर्म का पारम्भ पूर्व से होन, बरसान पश्चिम में होगा । इसी को 'परमार- सर्म' पर माना बापगा। । - (सरा है-'पागपवर्ग' प पिहिले प्रपम इमरि को येदि के पश्चिममाग में पूर्व को मोर मप्रमाग रस्ते गए, तण पश्चिम की भोर मुखमाग रसते हुए विधापा वामनम्तर दूसरी वर्ममुष्ठि विकाते हुए प्रपममुनि के भरमार्गों को उपर उखा कर इसके नीचे दूसरी मुन्ट के मुडमाग दवा दिए गाते हैं। इतीय मुसि पूर्व में विलाई माती है। इसके मुखभाग मी मप्यमुनि के भामार्गों के नीचे दय दिए जाते हैं इस प्रकार या मास्तरण पश्चिम से भारम्भ होकर पूर्व में समाप्त होता। इस पत्र में शामों का परस्पर मोतप्रोतमात्र सा होगाता है। बिस्प्रकार कल्याहार में वृणादि के सप्पर बनाते हुए वण-पाकों को परस्पर दाप कर फैलाया जाता है, वैसे ही पह मास्तरण काम है । सप राषि ने ( वेद मन्त्रने ) मो इसी पद का समर्थन किया है। इसी द्वितीय पक्ष को नदत करती - श्रुति कहती)- वा प्री मादा से ( एक मुरि के भममार्गों के नीच इमरी के मस दारते हुए) मास्तरण करना चाहिए । (पयोकि 'स्मृणीव परिरानुपर" हा सं. १०१२सू.५म. परस्पर सम्पद पर भाप सोग रिहाने पहमन्त्र इसी पद को पतला (दोनों पक्षों में मूसमाग मा प्रदेश पुत्र इसी प्रकार से फला।। (भवादमी के मूबमाग मप्रमार्गों पे मीचे दबाना उमप पर में प्रय)। इस प्रपिवीर चौपनियों भरारूप से ही प्रतिष्ठित है। C.
विधानमा शवपक इसलिए ( मोपषिस्यावीप ) बर्षि को ( पनि स्वामी विपर) भघरममसर से ही फेगम ॥१०॥ - - -- - (.15,.,इम पार रिकामों से मार-खाकी उपपक्षिय एं । मेरमो को ११ वी करोडका से पाए-पदति बताते हैं) या गाणयु: कई ब्रास रगणामिलासम्मदिवेम्पा पक्ष से रार-मसूत्र गन से बनेर कोमास कम्पको समम सगसी बनाने के लिए विदेक्ते माप पा + कासारामाप देक्तामों के सर एमपूर्वक बैठने क साधन ) यह मन्त्र बोरतामा बर्दिवरपकाता है। देवताभों के लिए माप शोभना बनाई गयी है। सीमागण जोकि 'उमदस पापा गया है। स्वावस्या देवम् । स म प्रभाग से भाप देवताओं के लिए प्रारिका प्रतिष्य भूमि मनाई गरही है की करा -- - ४-पारमाणमि का इप-कास प्रमीकर- मेवातारणानम्तर का वपर्य मानीयाग्नि को + क्लुप्त विहनसमर्थ) करता है (पान को बह से निताता)। परभानीयामि इस ( पुरुषप्र- सिकप ) या का मस्क (स्व.जीय) है। साहायर में गिरेमग पूष () है। इस कर्म से समय पूर्वमाम (नामनिपारिताप शिरोभाग ) को ही प्रस + इस सम्बम्प में रोविलाप है। तिमोह मतामुमार पो भारत भोपाम्नि में प्रतिक्षित मरी की मस्म मगर पति को प्रबल बनाना प्राय विधमे एक पानिक और कार रक्षर पनि प्रममित पर है। मोना में प्रयापत्ति पनि मनवम हो फलाश में भमित वस्तुवस्तु भगले मामय मे इस कम्मश्री इतिचेम्मवा समाज भट हो कागरिमे भस्मापाकरण ही अमिव समममा पाहिए। प परिपिपपसम् शतपपप्रपण पिशाममाम्प बनाता है। (शिरोमाग से उपधित मुख मन ही माति का माइक है । है ही उस कर्म से प्रदीप्त किया जाता है, यही निष्कर्ष )। माननीयाग्नि के उपर कार पातर बाप में रसता पाही बन को सृप्त (प्रम ) बनाता है। पा प्रस्तर स्तर सहावसषण शिक्षा ) । इसी को इस कर्म से इस प्रसी करस में समागिर करता ।। (शिला मी-शिसापित मारिन मी-स धर्म | प्राह बन माय म लिए प्रस्तर को ऊपर उपर धारण करता [मा भम्मि प्रास बाता।।.॥१२॥ 1 -- 1 ५-मारनीय कुपा के पश्चिम-उत्तर-दक्षिण मास मागों में परिपियों का स्पापन--- बीनापछीकरणामस्तर पर समर्प ( भाइखनीय पुल के पश्चिम, उप या दक्षिण के प्रास्त भागों में क्रमश तीन ) परिधिों स्थापित करता है। सो बिस सिर कि, परिपियों स्थापित करता है-(उस की उपपत्ति मतगई गाती है)। (मिस समय ) देतों में (प्राणविध पानि मानेपदेवनामों में ) मिस (अपने मासिक भूमिण सममी पा) में इस मरिन का होत्र-कर्म के लिए बाए किया-(मण करने की या भग्नि से प्रकट की ), उस समय भरिम ( प्रापु घर में पह ) बोजे कि में इप्त फर्म के लिए अपना सासाह नही सिमा सकता, यो कि (4। भाप का होता अन् एष जो कि भाप के हिर ( पृथियो से पुतोक पप्पस सेगाने के लिए ) हरिव्य का ( मार ) पान कर (पग्नि मे होत्र कर्म में क्यों भमुखाइ प्रकार किया। इसका कारण मतसाती हुई मागे गाकर •इसी सिसम्म प्रापार पर तोर में भोजन-प्यार . समय का मावा कि अमुक मूरण पाटो पर हाप फेरत गए, और मामन परत गए । पाप ए मोचन बला में शिक्षा पर सप फेरत रहन से तिरोभान रोप्त हावा गला, भानाम्प का प्रारूपय स्थिर पना रहता है।
नम्म्म रासपासवान परिषिवरम् मुति करती है कि) बनि ने बरसाद का कारण बताते हुए देवताभों से पही करा कि) रे देवताभो ! मापने मेरे ही तीन पुरुषों ( मत्सबातीप तीन भरिनपों ) को (होत्र कर्म के लिए) पर किया पा (वरण करना चाध पा) और इसी विभीपिच से ये तीनों पनि पापित होगए थे (मपना सरूप सो T ठे थे.)। - - -- (प्रपरम कर्म की विभीविका से पापित, वा सरूपता किस उम) दीनों ममियों को पदि भाप (पुन:) पपस (इस च में मेरी माता के रूप में भक्ति बना कर ) सोटा सकते है, तो में (किर मी पपापविद-माप के) इस बोत्र कर्म क लिए उत्साह दिसमा सकता , जोकि (म) भाप का होता बन बाठ, तपा माप के हम्य काम करने बगगाल। (भमि की इस सम्मा- रात को स्वीकार करते हुए देवतामों में कर दिया कि ) ऐसा,की रोग । (वन कार देवताओं में ) उम ( पापित भणियों) को इस पनि के थिए (पा में पुन पविकत बनाकर ) पौटा दिया । वे ही ये तीन परिनिया है। (बर्षात पायित तीनों ममियों के द्वारा पनामि को सपस मम ने के लिए ही मिदान विधि से परिधिपा स्थापित की जाती है ) १२॥ (तीयों पूर्णपुरमों के पक्ष में सोट मानेपर होच कर्म में नियुक्त) ममि पर पोते कि, पक्कार (रुप बन मे ही उन तीनों को पापित किया पा। मैं (सप भी) इस पदकार (सप ) बर से गहरा पा पदकारक मुझे मी ( उन तीनों की वह इस पा से ) पान करदे । ( मेरी रति में इस • ये ही पनावित भमि तिरूप से 'एकता, हिना बिता' मामी से तमा समणिरूप से 'पापा' मामो से प्रसिद। मिन प्रवियर शानिक विषपर पूर्व 'भायात्रामय में -चना विहिवा. अमेऽनिरास १९१।।) इस्पादि रूप से किया बायुमापने के माम- सहपमान की ष्टि मे 'भापया विमान अपना एक विशेष स्थान रमवा है।
पीपिम्पमतम् शवपयाम्प विहाममात्र मन मप से अपने का सब यही उपाप है कि आप लोग) इन तीनों (पुमः गोटे इए अमियों) से ही (तीनों भोर से ) पेर दीथिए । (इन के बरपक नगने पर ) मपट्कार पर मुझे (पा से )पर न घाट सफेछ । ( देवताओं में कसा ) ऐसा ही लेगा। (सहकार) देवतामों में इन तीनों से इसे सीमित कर दिया । ( परिणामस्वरूप , वषट्कार बबू ( स सीमित, पुरधित ) अपि को (प) प्रवक् न हार सका । (पा इस वैपया में यो वपर्यु दोष फर्म में निपक भास्नीमामि के तीनों मोर पगापित प्रमिपों के प्रतिरूप में तीन पार पियां स्थापित करता है) इस कम्म से यह ममि के लिए (पाप) वर्म (काप ) ही पित्य है, जो कि इन मीनों से परिधान करता है। (रोत्र फर्म में नियुक्त माइक्नीयानि की सहप का एक परिधियों स्थापित की जाती है। दीपये ॥१॥ (त्र कर्म में नियुत भमि करने से पछापित सम तीनों ममियों को मारमा बनाने के लिए देवता मा पापपास में से भार, को) ने तीनों करने पगे कि, पदि भाप हमें इस पार्म में मपुक्त करना चाहते है, वो इस का में (प्रपामादि भम्प गौण देखतामों की तर) हमारा माग (म गपेय मी निपत) होना चाहिए ॥५॥ (देवताओं ने कहा )-ऐसा ही हो। ( प्रतिसार तीमों के लिए भाग- पेय की पापा करते हुए । देवता करने सगे कि, (भारमीप में माइति देते समप) यो मानिदम्प परिधियों के बाहिर मागिरेगा, यह तुम में शेष। (प्रति परिवि से बाहिर स्कम दम्प मारा प्रालिसि-मसाधारण मागम समम्म बापग ) । इस पतिक्फि बो भारतिप्प भविम् सोग तुम्हारे।( पर गियों के ) अर अप रामदेंगे, या तुम्हारी (सहप ) रक्षाका बारण बनेग्य। सापरी प्रतियोग मो द्रम्प (सापा) ममि में इव करेंगे, ग ( मीदेव. वाओं के साप साप ) तुम्हरी रश करेगा ।
बिहानमाम्य शतपथनाम: परिधिमपहम् - 1 - 1 होता है। (परिधि-स्थानीय पतापित भमियों क मागभैय के सम्मान में भारम्म में उक्त म्पपस्या हुई पी। एवं 'यद मेरा भकुरस्वत् करलि पा मादेश है। इस लिए धान मी पों में इन कमियों के लिए यही प्यारा भली भारही। इसी पवस्या को सबूत करती हई थुति का है कि) 1 ( सो नो कि) मायु पाक्नीयाग्नि में माइति देता है, यह ( दम्य ) हम, परिधिस्प मीय भग्मियों की रक्षा करता है, को इम्प इन परिधिों के जार उर गनता ।, १६ (मी) इन की रा करता , जो दम्प परिधियों से यहि प्रदेश में या गिरबा (हम का प्रातिस्मिक भाग बनता हुभा ) इन में [ स्कम मातिदम्म पचयिता भपियों के लिए प्रातिसिक मातम सम्बर में एक यातिप्रविधि उपस्थित होती है कि कामामुमार जोर दम्प उपयोग क्षेत्र से बाहिर होगा मा पानी पपमान के शत्रु का माग बनवा रामा फसमान के शिए पनि का कारण बनता है घर ममाप्ति के लिए पोमा गत माइतबम्म बहि.प्रदेश में भर गिराया भामगा । इस कप-दोम का या उत्तरं । इसी प्रपति का निराकरण करती हुई युवे कहती है कि ] [कि देवतामों में स्कम बग्य वमियों का मागधेप नियत कर दिया, मत स्कम मही माना गसम्ता --सीशिए पनि बातिदम्य माहिर गिर माप, इस में कोई माप [ ग ] ही [ माना माग्य ) [ पणपित तीमो ] पनि इसी पृथिवी में प्रतिभाए है। [ फसतः कम दम्प पृथिवी प्रवेश पर गिरता उपा इनकी वृति का कारण बनेगा न कि पा प्रम्य शत्रु का भागधेय बनेगा ) । जो का पशिप इम्प गिरता है, वह सब कुछ इसी पृथिपी में तो प्रतिद्वित होता है। [मत स्कमहोप फा प्रात में कोई मकसर नही1] ॥ १६ ॥ पा मापयु- भुवपतये मास, भुवनपवये साग, मनानापापे स्मा" ( 47 में• २१२-'मुपरति के लिए साहा मुक्नपति के लिए मा, मूलपति के लिए मा - } यह मात्र बोलता मा [ उस ] स्कम [ निकाय करते समय - 1 १२ विधानमाम्प शतपपत्रास परिधिमामयम् परिषि के बहिःप्रदेश में गिरे र वातिपय का पर करवा ।। 'मुबपति' । पारि ही उन [ पायित 'पिम्रातर' माम से प्रसिम् ] तीनों मनियों के नाम हैं। सो से प्रभान देवताओं के लिए वषट्कार से पुक्त हविद्रव्य पुत होता है, इसी प्रकार [ सलमत्रप्रयोग पूर्वक स्फमाप के स्पर्श से मन पग्निपों में 'इत मन बावा । [ तरपर्य यही है कि-हाकार च वपदकार पदेशा उपमोति' इस बुधि के अनुसार 'बारा-चौपट्' पूर्विका माहुति का सम्बन्ध देवतामों के साप माना गया है। तीनों ममियों के लिए साहा प्रयोग पूर्वक कमनग्य काश करना में देखायों की तरह ही माइति देसे ए देवकाटि में स्थापित करता है ॥१॥ [ परधियाँ किस सकसी की बनाई जाये । इस प्रश्न की मीमांसा की जाती 1 ] कितने एक याधिक [ वमि-समिधन के लिए या स्पा में गृहीत ] {म की [परियों से ही इन परिधियों का परिधान करते है। [ भात् जो काठसम्मान प्यापनीयाग्निसमिधन के लिए पाया है, इन के मतानुसार इसी में से परिभियों में दिए सही लेनी चाहिए । (इस पक्ष वा मण्डन करते हुए यासातप करते हैं कि ] सो ऐसा भीम करे। माद रममारकाट से परिधिया न बनाई जा ] 1 उस यममाम के लिए ये परिपिया [ परिभानमय कर्म के लिए ] असमर्थ होता है, निरम कार की बनाया मारा। काठ [ अग्निसमिपमा, माहसमीप में स्थापना का प्रण किया जाता है। [ Tag केषठ मिस मेघनोरप से पासंस्था में संगत , तो इस से दूसरा समलिय गस।। पनि म काष्ठ की परिधियों बनाई जाएँगी, तो हम से कभी परिवानपण वर्म सिद न होप ] । उसी सम्मान के सिर ये परिचया मालिान कर्म में सपप होती है जिस पपमान के लिए प्रति स ग पम्प राठ का 'पे परिधिया है। रस रूप से (सनम्न रूप से प्राम करते हैं। इसरिर (परिधियों के लिर) रसरी ही परिधियों सेनी पाहिए ॥१८॥ पाव " परेपिसामणम् शपपनापण विधाममाप्य -- - ये परिधियां + पसाय की परियों की होना चाहिए । पठाश मिरपन प्रम (पषीप्पप्रधाम ।।(घर) बनि [ मो] बम [ प्रमवीप्पप्रधाम] || ये परिधियों [ प्रतिरूपमर्यादा से ] अग्मियों दी है। इस सबातीय सम्बन्ध से ये पचाय की ही होनी चाहिए ॥ १२ ॥ यदि बलाश की म मिलें, तो विकर काट की होमी पाहिए। यदि बैंक इत सम्भव न हो, सो कार्मर्ममप होनी चाहिए। यदि का मिले, तो किस का को होमी पारि। [ये भी न मिळे तो ] स्वदिर काष्ठ की होनी पारिए। [ यदि सादिर मी उपम्प न हो, वो] सम्पर काष्ठ की परिधिमा [ोनी पाहिए ] । ये [ परिगणित ] ) पप पक्षिय है। इसलिए इन वषों में से किसी एक ] की ही परिधियाँ होती ॥२०॥ । (प्रम तृतीयाच्यापे तृतीय, द्वितीयमपाठके प प मामयम् । द्वितीयमपाठपश्य समाप्तः) - । इन मक्षिय को पिरोप विवरण विषमा में किया जायगा । • पपि प्रापणाम को मांश अनुसार यही प्रामण समाव हो जाता पापि प्रकरण माग का ष्टि में हमने इस से भगो प्रापण कामी इसी मामा के साथ समावेश कर लिया है। प्रत प्रापणी परिसका से मिस पारेषि परिपान' प्रकरण का भारम्म दुपारपर ववीय प्रपाठक पपम मापण को ४ मो परिशका पर समान हुआ है। इस भागे यो कर्म मी परिशित स्थानीय पनवे हुए इसो से सम्पर है। प्रारोमा मामपो को पक साथ मामा करना चिट मान शिया गया।
मानमाप्प शवपपनाम परिचितानाम् - - (तृतीयप्रपाठके प्रथमं ब्राह्मणम्) व परिधिों भाई [ गीले काष्ठ की होनी चाहिए । माईमाव ही इन [ष्ठों ५] जीवन [ जीवमलिङ्ग-जीवितरूप। इसी मामाब से ये काष्ठ [साम. पों से ] कासित गर्ने रहते हैं। इसी मामाब से य काष्ठ [ गुप्फकाष्ट की अपेक्षा ] पीयुक्त [विशेषप्राणशक्तियुक्त ] पर्ने रहते है। इस लिए परिधियों मी पाहिए | कुछ विशेष ऋतलामा पा ( परिधियाय के सम्बन्ध में उपपति, नाति, स्वरूप, पपातर, भादि नो बता दिया गया। अप पद्धति मतठाते है -मह मायु सक से पहिले - "गरपसा विचारयः परिदमा विश्वस्यारिएप, पममानस्प परिघिरसि, प्रपिरिद ति" [ पशु से. २६१-विध रक्षा के सिए विश्वास नाम का धर्म माप को स्थापित करे। बार पजमाम को परिधि है, अमि है, अतएप स्तुत्य है, दोजादिशारा ईरित-स्तुत ] यह मन्त्र मोडता मा मप्प की परिधि को प्रतिष्ठित करता है। [माइमनीय का पश्चिममाग इस परिधि से मुक्त होता है ] ॥२॥ पश्चिम परिधि पापमानम्तर- नस्य पारसि दक्षिणो विश्वस्यारिप, पभमानास्प परिपिरस्पपिरिड ईडिवा" [Lषु सं० २।३-विश्वरता के लिए माप एम की दाहिनी बाहे.] पा मग्न बोलता मा भारतीय की दक्षिण ऐसा पर नसरी परिधि पापित करता है || हिण परिधि-स्पापमानम्तर-पिप्रारणी खोचरता परिषमा धुरण पम्पंणा विपस्पारिएच यमपानम्प परिपिरस्पपिरित दिन" [पयुः स. २११ चपरे । वि की रक्षा के सिपे अपने रियरधम्म रो निवारण • पधमान कम्प परेश सभारम्म र पाइपप्यम्स इन का सम्माई में परिमाण वा मार में मोटी रामी र पप गीती नी ।
परिधिमाभणम् शवपषमापण विधानमा देषताओं ने मापको सत्तरदिशा में प्रतिष्ठित किया t० , या मन्त्र पोछता आमा पाहनीय की उत्तर लेखा पर वीमरी परिधि स्थापित करता है | - - ६-पाइपनीपाप्ति में समिध स्थापन- [ पूर्वमण की-"प्रयानि पररपति०" इस्मादि १२ पीक पाका में पर स्पष्ट किया गण । कि, माहवनीयामि को हरिदम समर्थ बनाने के लिए यासस्पा में गृहीत इम-सम्भार में से काष्ठ लेकर उस से बाहनीपाजारों का भस्म पृषक कर इसे प्रवर बना दिया जाता है। इस प्रकर ममार से गृहीत मिस समिप-रतनमक काठ-से परिधिस्थापन से पूर्व ममिप्रयसीकरण कम्म किया जाता है, उसी समिध का वर-परिधिस्थापनानम्तर-बाहपमीप में प्रक्षेप करना ही-समिधापान कम्म कासाया है। प्रकत प्रकरण सी पिप का स्पाठी- करण कर सा]। [ इस समिप का पूर्वापार से सम्बध है, भतएव इसे- 'पूर्वाधारसमियो- पापानकर्म' भी कहा जासकता है। माननीय कुणण की पापम्य दिशा से भारम्म कर माग्नेय दिशा पम्यन्त प्रविधिम पारा से नो होष होता , वही 'पूर्वाधार' कहलाया है। पर वापार काम निव माग्नेपरिक-समाप्ति पर समाप्त होता है, वहीं इस समिघ का माधान होता है। इस परिस्थिति को सामने रखने दए ही प्रकार प्रकरण का समन करना चाहिए। - परिधिापापनानम्तर या भायु [ माहवनीयारिन ये पूगधार समाप्ति प्रदेश ] समिध गसता । [भाहनीयाग्नि में समिध सबने से परिने] पासपर्यु पममागपिन माप की परिधि पर [दतगत समिध से ] स्पर्श कर है। इस स्पशा से भषयु 'अग्निभातरः स्थानीय परिभिलप मग्मियों काही दिन समिम्धन करता है। मनम्तर उस समिघको बारमनीय भग्निगनना 11 विधानमाप्प मराठपपाषण परिधिप्रामणम् है। इस सचर कम्म से या अपर्य अग्नि को साक्षात् रूप से समिट करता (भव परस्त बतलाते हैं)- वयु (परिधिस्पर्शकर्मानम्वर ) "नीति दो सा करे चुपन्त समिधीमी प्रग्ने वान्तमप्परे" ( पड स० २।१-या- सपरिप्रवधिक, तपा सपा मोराशियुक्त, तपा महान् ऐसे हे भने । इस पह कम्म में में माप को-स समेधाधान से-प्रदीप्त कर रहा हु ) इस गायत्री मन्त्र से मापनोयाग्नि में समिम गाता है। इस समिधन कर्म से भरपर्यु गायत्री एन्द को ही प्रतीस कर रहा है। या गायत्री । इस कर्म पे ) प्रदीप्त बन कर दूसरे ( सहयोगी त्रिष्टुप् जगती, मनुष्टुप् ) पदों को प्रदीप्त करता है । (परम्परया) पदीत सन्द देवतामों के लिए पा (माप्तिद्रम्प ) का (पुसोक में ) गहन dk६॥ - प्रपमसमिधाधानास्तर निस दूसरी समिश्र को पपयु (भाहनीयाग्नि में ) गसता है, उस से पसन्त ऋतु कोही प्रदीप्त करता है। ( समिन्धनकर्म से) पापसात प्रदीप्त होकर बाप मीमादि प्रमों को प्रदीप्त करता है । ( परम्परया) पदीम अनुए प्रणा उत्पम बरसी है भोर भोपधियों का परिपाक करती है। (रितीप सपिपाधान की पही उपपछि । मा पदस बतखाने में - पापयु 'सपिदसि ( या स० २।५-हे पपुम्ल ! मार-अमि को प्रमसित करने कारण-समित् है) पर मप्र वोचता मा समिभाधान करता है। (सम्त से शी भनि समिधन पारम्भ होता है) मा निरचपेन यत समित है |॥७॥ इस प्रकार भाधारसमिरम्पाधान कर के अपयु (माहवनीय बी मोर देखता 1-"मीरपा पुरस्तात् पातु स्पारिपाभिवस्य" ( पशु स० २१५-६ माहानीयाग्ने ! मुप्पोमा पूरिया को प्रोर से (होने पाले ) किसी भी (मा पर)मा कर्म मे मार रक्षा कर) मन्त्र का वा (सरमधानकर एमाणापयम शतपथप्रामण विज्ञामपाय उचारण) करता है। मारपनीयामि की रक्षा के लिए ही (क्रमशः इसके पश्चिम-दक्षिण-उत्तर प्रान्तों में ) परिधियाँ प्रतिष्ठित रहती है। इन तीम परि धियों से तीनों दिशाए तो इस अग्नि के लिए सुरक्षित हो जाती है। पूर्वदिशा रोष रहती है)। पूर्व की भोर से ( समृदिमाशक ) माट्रा छोग, तपा समधि- भवरोधक यसोग इस पमि को हानि म पहुचा सके, इसलिए (इस मन्त्र पपकर्म से ) पूर्व की भोर से ही सप्प को ( इस भमि का ) एक बनाता है। सूर्प मिरचपेन नाष्टा, वपा राइसों का मारा है | (भनुपामकर्म से पहिले पनि समिधन के लिए एक समिष माहबमोय मे भोर गवी गाती है। कि समिधाधामप्रकरण पस हारे, मत समान- प्रसङ्ग से सस भम्पापान का मी पहा विधान बतगतो ई श्रुति सम की सपपति बतखा देती)- निस सीसरी समिप का मपर्यु भनुपाजकर्म में भाषान करता है इस तीसरी समिध से ( पाकर्मेतिकतन्यतासमानक ) अलिक प्राइस को ही प्रदीस करता है। यह प्रामण इस काम से प्रदीप्त होकर देववाभों के लिए या पान करता है (समर्प बनसा है)|| ७-उपरानो पवित्रों का रेवि पर स्थापन- इस प्रकार परिधिपरिपान-समिधापामादि भारमनीयामुगल कर्म करने के भनम्तर पर मपर्यु (भाषनीय की भोर से ) कुणखरणयुक्त दि की मार सौर भाव। (यह भार बर्षि में से ) दो पवित्र (दर्भ तण ) सेकर हमें । यदि के ऊपर विच्छे हुए पश्चिम मागस्प पुनासा पर उत्तर को मप्रमाग करते र)- 'सपितुबास्पा" या स. २१५-रेवसे । माप समता के मार ० परपमतृण 'विभूती नाम से प्रसिद। 15 इप्मनाभणाम रोनो बरि-रूप लिद, दोनों की प्रतिध के लिए ही (दमों की सम्परता के लिए, निशानमान शवपपामा १) पह मन्त्र बोलता हुआ तिर्यग् रूप से रसठा है ।(इनें रखने का प्रयोजन पवमानती हई युति करती है। (वेदि पर रक्ला हुमा कुण्मुशिलपम) प्रखर स्वप (शिसा-पानीय ) , पम्प यहि मोम स्पानीय है, भम केस दोनों भुषों- मोहों का प्रतिरूप मच रहता) है। इस विवति स्पापनमर्म से भाप इसके मगदी तिम्पक रूप से प्रतिष्ठित करता है। (अपात् ये दोनों दर्मतम मों के दो प्रतिरूप है । कि ये तिर्यग्रूप से प्रतिष्टित किए माते हैं ) पतएम ये दोनों भुत्र ( माध्याम्भिकी पुरुषसत्या में ) तिर्पक हो । ( चूकि ये तृष्ण भुग के प्रतिरूप है इधर बाप्पामिक या में ध्रुव तिव्यग् रूप से प्रतिष्ठित पते है, इसलिए मी इ स वैध पा में निर्यगरूप से प्रतिष्ठित किया पाता है। इस मतिरिक सिप्पाइप से प्रतिष्ठित करने का एक सय पह मी कारण है कि) दि पर प्रतिक्षित प्रस्तुर (निदानेन ) क्षत्र (शास्ता राजा ) , एच मिट्टी हुई इवर बहिं (निशनेन ) पिट ( पासित प्रजा ) ।। इस प्रस्तररूप पा, तपा पारस्परिक सम्मान के लिए ही सिप्प पापन उचित ) । इस लिए इसमें विप्पग् र से ही प्रतिष्टित करता है। इस ( विवरण कर्म के सम्मथ) से होमतों को ( पाविज्ञाम परिमापा में ) 'विभूती' नाम से पबहन किया गया है ||१०|| ( पिपनी के ऊपर प्रम्तर को पंपाना- (हिपत परिसर के ऊपर पश्चिम माग में प्रतिम्ति किए गए वन रेनो ती नामक दर्मयों पर ) या भापर्यु-अर्गदस सा मणापि सासम्य देशप" ( यहः मु. २११-देवनामों के लिए समापूर्वक पैठने योग्य उससूत्र नि मत कम्पबत् मदुरपण, ऐसे माप को-प्रसर फो-विहान्य ) P3 बोजारमा ( उस दभमुशिलक्षण ) प्रनाले पाता है। 'मार व परिधिनापणम् 8 शसपथनाम विज्ञानमाय सामों के सिर साधु-मृदुस्पश-दो' यही कहा गया है, जोकि 'ऊर्णपदसं स्वा' पर कहा गया है । 'स्वासस्प देवेम्प' इस मन्त्रमाग से 'आप देवतामों के लिए मच्छी बैठक हो' यही कहा गया है ॥१॥ ६-दोनों दापों से प्रस्तर का स्पश करना- मन्त्रपूर्वक प्रस्तर-स्वरणानन्तर बर मापर्यु- 'मासा पसपो रुद्रा मादिया: सदन्तु" ( पषुः स० २।५-सवनप्रयाधिष्ठाता वसु-सन-पादिन देवता बापको- प्रस्तर को-देवप्रतिष्ठा के लिए-सब मोर पैसा ) या मन्ध बोलता हुमा स्तीर्ण प्रस्तर पर अपने दोनों हाप रखता है। JA- १०-प्रस्वर का पाप राय से स्पर्ण किए हुए सुपों का दरिने हाय से ग्रहण, तया मस्वर पर स्थापन-- यह मार्य प्रस्तर के साथ अपने वाम हस्त का समध बनाए हुए ही रखता । (हुमा) ॥१२॥ दहिने हापसे युद्ध का ग्रहण काता है। नाट्य-राक्षस मोग (दोनों के मप्य में) पहिसे (मामयशरीर के नाष्ट्र-राक्षस नाशक रिम्पप्राण के सम्बन्ध होने से पदि ) प्रति म हो जाये ( इस वरेश्य से प्रस्सर के साप रस्त सम्बन्ध पनाए रसते हुए ही पुत् प्राण करता है)।मण निश्चयेन रापों का नाशक है। इसीलिए ( करस्पर्श द्वारा प्रविछिन्नरूप से रिग्यशक्ति का प्रवेश परक्षित रपने के लिए ) सम्प हाप से स्पर्श बनाए रखता है ॥१३ अनन्तर ही-"घृताश्यसि मुहूनाम्ना" ( पजु। सं• २०६।-हेडडू माप ( सम्प से सो ) पत से परिपूर्ण हो (एष माम से छह माहुति देने बासी) हो, या मात्र बोचता हुमा दक्षिस हाप में (भानीघ्र शरा समर्पित ) शुइ ग्रहण करता विमानमाम्य सतपपत्रापण परिपिापणम् । निश्चयेन शुद्ध ( पृतप्राप्ति के कारण) प्रताची है, साथ ही यह नाम से निम पेन धा (वाहुति देने घाली) है। (प्रासानन्तर पर भपयु)-"सेद प्रिपेण पाम्ना पिपं सदमासीर' -पतु स० २।६।-एसी माप मपने प्रिप पामरूप माम्प के साप इस प्रस्तर पर निरामिए, यह मात्र पोसता मा इस पुर को मेदि रिपत्र प्रस्तर पर रस देता है)। इसके अनन्तर वह अवयु 'घृतास्पस्युप पाम्ना (पडः स० २।६-हे उपपद वाप प्रताची हो, माम से-जुहू के उप- समाप- कर भाग्य लेने से-उपरत् हो) मन्त्र बोसता मा उप पद का माण करता है। पा सपमुव प्राधी है एक सचमुच माम से ठपपत् बनम्तर "सेर मियेण पाम्ना पिप सद मासीद" ( यमु स० २) का मन्त्र बोसता मा इसे प्रस्तर पर रस देता है। ठामवमहण-पापनानम्तर समपर्यु-"घृतापसि धुरा नाम्ना' ( यमु 'स. २०६ने धुय मार भूटानी हो, एष मारमरूप से एक स्थान पर प्रतिष्टित रहने के कारण शोक में पता 'घुस माम से प्रसिद्ध हो) मा मात्र मोक्ता मा मुमा मास करता १। बनातर-सेद मियण पाम्ना प्रिय सद मासीद' ( प3 स० २६) पए बोहना मा इमे प्रस्तर पर रस्ता है। ( इस प्रकार बाम-हाप से प्रम्बर से सम्म बनाए रस्ता हुमा भषयु कमरा भाग्नीध्र से अपने दहिने हाथ में जा- आमद-मुग सेता माता है, और दि-पश्चिममाग में विधे पुर प्रखरासन पर पपई एम्प जाता है)। इन तीनों से मतिरक जो पुरोडागादि हरिग्य है, न मी "सेद मियेण माना पिय सद मासीद" यही मन मोजता हमा प्रसर पर एसमा १-( पद पदधिः) | १०n (सुमों के सादन कम्म में पिरोग्ता पतसाठी हई प्रति कासी पर्यु प्रस्वर क उपर सो रह रसता है, एव भग्य (उपपत्-ग) मुत्रों को मस्तर से मापे पर्सि पर रहतास पहाकि (निदानेम) पत्र, विट् । (जह रूप पत्र को उपा, तथा उपसर-घुगमप पिट को अन्य सुरु परिमियमणम् शापमानाम: विज्ञानमाण को प्रस्ता के ऊपर मीचे रखता हुमा ) मषय पत्र को ही बिट से श्रेष्ठ-उपा बटने वाला बनाता है। मतएव उंचे भासन पर विद्यमान पाय रामा की नीचे से सोखो प्रमा उपासना फिया काठी है। इसी प्राकृतिक नियमानुसार उस् रखता है, मन्य मुषों को नीचे (रकता है) ॥१५॥ २१-स्पशफर्म- (मनातर यह भारयु-'धुवा प्रसदनृतस्य योनी मा सिप्लो पारि, पाहि पई पाहियापतिम्" ( या स. २६-पत्र की योमिरूप, कर्मसमाप्ति पर्पत निरम रूप से प्रतिष्ठित पने मासे मोहम्यादि यहाँ प्रतिष्ठित हुए है, हे विष्णो ! भार उन की रक्षा करें या की रक्षा करें, एक पाति ययाम की रथा करे, र मन्त्र बोसता हवा माग्पस्पाशीस्प माप, हामिस्थत भाग्य एम पुरो- गश भादि का उपयोग कम से स्पश करता है। इसी कम्म का मन्त्र-सपारूप से प्रतिपादन करती ई श्रुति कइसी 1)- मह म 'भूना प्रसदन' या मात्र बोसता मा (नाम्पादिकार्य करता है। ये प्रम्प कर्मसमामिपर्यन्त निघसरूप से ही प्रतिष्ठित है ।(मन्त्र का भगला भाग 1)-"मनस्य योनी" पा । पाभूत की योनि ।।पा पर की ये जुहारि प्रतिष्ठित हैं । ( मन्त्र का मगछ। माग!)-"हिप्पोपाल, पारिया, पात पापविम" पा । इस से ( पारमा साप ही ) परमामाचा के लिए प्रार्थना की गई। मनन्तर- 'पादिमा याम" ( यह सं. २०६॥ पाकर्म को मामी बनाने वाले मुम-अस्मिन् की मी का करें ) पा मात्र मोजता मा भर्यु कप माग्ने शरीर का स्परा करता है। इस कर्म से यह अपने माप को भी पा से बाहिर मही करता है। विष्णु को दीख करते है। यह की रक्षा में ही पार्म (इस सर्य कर्म से ) सब को प्रतिष्ठित करता है। इसी प्रमिप्राप से-म्यो। भाप पा करें 11 पर कहा गया है॥१६॥ रवि दीयाप्याप पार्ष, सतीपमपाके प पषम मामणम् इति-मुलानुवादः -- -- विग्रनमाम्म शवपयाम इमपरिपितामणे घ-पत्रपतिपद्धातसग्रह- १-दम-पेदि-रिपा मोषणम् - भारपाय के बनम्तर वेरिमध्य से भाग्यस्प ही पर उसे किसी सापित सान में रस दिपा जाता है। वनस्तर अमितमिग्धन के लिए पसंस्था में गृहीत रग से बसे हुए इममार (काष्ठमार ) की प्रपि खोसता है। प्रन्पि स्रोटने के पनन्तर प्रोदयकर्म के लिए ब्रह्मा से-"प्रमन् ! म मोसिप्पामि" इन शब्दों में माझा मांगता है। ब्रह्मा-"पों मोरया गर्षयत नाकस्प पृष्ठे यममानो- ऽस्तु । सप्त भूपीणो Bf यप्र लोफरतप्रेम यम यममानं पहि" (का. मो० २।२।८) या अपनाप बोगमा इमा-"नामोच" इन गम्दों में प्रोवसकर्म की मात्रा देता है। इसी मपयुक्त प्रोषणकर्म की इतिकर्मपता बताते हुए मप्रकार करते है- "म्म मोति सिम्रप, बंदि च, पहिं प्रविशा पेपा करमा पुरस्तादप्रश्यि- "हप्पोऽसि" इति प्रतिम भम् ' (फा० मौ• ए 1७६) ससान पर प्रतिष्ठित इम को प्रपि सोलकर --" झप्कोस्पालग्यो पेसा मुए मोहामि । पह मन्त्र योजनामा माधयु इप्प का ( प्रणीता-पानीप प्रतीक्षा पास से कुणा द्वारा ) प्रोक्षण करता है। इमोदणामम्तर-"मोदि- रप्ति परिपसा जुप्त मोक्षामि" या मम्प्र मोहता इमा येदि का प्रोपण करता ।। वि प्रोदपनार यानी मापक अस्विक् से सोपे गए गाई' मामक कुगों को सेका वेदि के उपा(मरिय को पूर्व की प्रोर रसमा पुमा ) रखार प्रोपण कर्म के लिए प्रमा से-"प्रसन् ! बहिः प्राक्षिप्यापि" इन पदों में पारा माि है। ममा- प्रोक्ष यस देवता पर्षयता" इस्पारि मन्प्रपाटानग्तर "भो मोहन पदों में बाजा देता है। इस सत्र से मनुकात मर्य-"alant सुम्पसा जुएं मोक्षामि" यह मन्त्र मोसता मा पेरिरप गरि का प्रेषण रसि इमपरिपितापणे शपथन विज्ञानमाम्य करता है। ममि के ममात्र में भरमपेरिमें, या परिमित कर्म मेम का पोषण नही होता । एवं गृहमेधोपकर्म में (का० श्रोसू० ५।६।६।२५ ) कि बर्षि एवरण नहीं होता, मत यहाँ मेदि का प्रोक्षण नहीं होता । प्रोपयकर्म के समय या प्रामहिक विरोषप्ता समझनी चाहिए । २-मोक्षपी-शेपेस परिमृमोपसे धनम् प्रोदणकर्म के अनन्तर वह वायु प्रोषयीपात्र में बाकी बचे हुए नर को "भों प्रतिस्पै प्युपनमसि" यह मन्त्र मोजता हा कृष्ण के मुग माग में गळ देता ।पही बतावे पुए सूत्रकार कहते हैं- 'शेप मूसेप्पसिथवि-"प्रदिस्पै म्पुम्दन' मिति" (पा औ००२।७१७) ३-पवित्र मणीवाम निषाय परिपः पुरस्तात् प्रस्तरवाणम् मुसोपसिघन कर्म के मनन्तर अपने हाथ से प्रणीता-पात्रस्प बसों में दो दमता रखता है। मनन्तर घेरि पर स्थित बाई की गांठ प्रपन करता है। मनम्तर गाई के पूर्वमाग से कुछमुष्टि का प्राय करता है, जो कि कुमुधि 'प्रस्तर' माम से कृपयात गरिबक से प्रस्तरनामक कुण्मुष्टि के पास के लिए ही कि- "मों विष्णो स्तुपोऽसि । यह मत्र पिडित , मतएर वहां पित्या में प्रस्तर का Aff से पृपा-करण नहीं होता, 1-प्रसार उपसमदः" (का० श्री०५।२।२७) इस सिदान्त मनुसार पहिले सेक्स प्रस्तर काही प्राण होजाता है। फम्ता पितृपक्ष में प्रस्तरप्रायकास में मत्रप्रयोग नहीं होता । प्रस्तरमाण की सो इतिकर्षम्यता का स्पीकरण करते गए पत्रकार करते हैं- 'पवित्रे निपाय मशीवाद, हिपिसाप, पुरस्वाद-प्रस्वरमाण- "पिप्णो' रिवि" (का० प्रौ० ० २७.८)। २.४ विधानमाम्य शतपपत्रायण इप्मपरिधिप्राम ५-पेय परिपा मिसव सरणम् प्रस्तरमाण के मनम्तर या मफ्यु सास्त में गृहीत प्रस्तर प्रथा को सौंप देता है । विस्थित वरिपूरक की बाधन रस को वेदि की दाहिनी भोपि पर उसे रखकर माय बहि-तणों से डॉक वेठा है। मनन्तर- र-"मो ऊणम्रद्रस ता सपामि स्वासरप दभ्याया मन्त्र वोलठा मा बेदि पर तीन वार करके प्राम्य इस बिहाता है। पही त्रि-स्तरणर्म पासावा , जैसा कि सूधकार + - "ममा बदाय समान निस्रस्य, दक्षिणत्या पेदियोगी निपाप, प्रन्येरवछाप पेवि तृणावि- 'ऊणम्रदस” मिति भित'" (का• प्रो० ० 1978) मप विकृत स्तरयन कर नितने हों से वेदि इस प्रकार क माय, गिस से बेरि का मुख्मप प्रदेश न तिचाई परे, ऐसे मनरूप से स्तरय कर्म करना चाहिए। सी पक्षातर को उस्त करते हुए स्त्रकार कहते है- 'उपपया पानापम" का० श्री. म. 0102. स्वरण के सम्बन्ध में यह विशेषता है पि, परि के भूगमाग मध एने चाहिए। पा गया है कि सीम कुरामुपियाँ विधा गाती । पहिले जो मुरि बिदाई गाती ।, उसके मुत्रमा को इसरी मुष्टि के समभागों से, तपा दूसरी , मुसमागों को तीसरी मुशि के भप्रभागों से मापदादित करमा चाहिए । इस प्रकार अपरमत- परत से स्मरण कर्म करना चाहिए । इस विशेषता के रिक्त पमादपर्श रूप दूसरी विशेषता भौर होती है। देदि के पूर्वमाग से तो सरणकर्म का पारम्म होना चाहिए, एव पशिम माग में अवसान करना चाहिए । यही पवादपान्तर सामक एक पक्ष है। अपना प्रागपबग-रूप से मी मापदादन किया गसकता है। इस पर में पूर्व-पूर्व स्तृत बाई के अप्रमानों से पथात् तीर्घमाय बलि के से मपरिधिमागणे शवपवनाथप विधानाम मुतमार्गों का भाष्वादन करना चाहिए । खरणकर्मानुगत इन्ही सीमा विशेषमाओं का परीकरण करते हुए सूत्रकार कहते है-- "प्रपरम्मम्" 'पमादपरर्गम्" महापा (फा० भीम २।७। १,१०,२०) ५-मारपनीयफस्पनात् पूर्व परिपामुद्रामनम् पी.परिपाक के सम्बन्ध में दो पक्ष माने गए हैं। गाहपस्माधि में हवि परिपाक करना एक पक्ष है, एक माहबमीपानि में परिगक करना एक पक्ष । जो मार कमीप-परिपाक का अनुमी । ठम यजमान के पत्र में इस स्तरमकर्म के नमस्तर 'हविलासन' कर्म होना चाहिए । स्तरण कर्म के अनसामादि से ममि को प्रति माया गाने वाला है। यदि इस काम के पीछे सदासन पग्म किया बायगा तो हम्प के बसने का मप रहेगा । अा भनि-प्रमृप्ति (म बन ) से पूर्व ही वासन कर सना उचित है। जो गापपपप का मनुगामी ।, पाठवासन कय करे। इसका निणप भाग (का, २०१५) होने वाग। माहनीयमापी परमान : या में इसी उवासम कम्म का सम्म बताते हुए सूत्रकार कहते हैं- 'मनोदासनपासनीयप्रापिणः (का० पी० म. ६-समिदमसेपेसापनीपाय ममारगाम् इपिसासन-वाम रे मनम्तर पर भापर्यु ममार में से एक समिप सकर, गप्रया से प्रस्सर र माइक्नीयाग्निकुण्ड + उपार मीप मे प्रसार मान हाप समता एमा उस ममिध के मापान से मारपीय पुराण में प्रति छत काट्यारिका मसा पर प्रतिको प्रयास बनाता है।इम से होने वाण यह समपन कम्म भी सम्मान रमता न शि भम् से, सपा परिमिद से। मतएक
शतपपापण
इमपरिपिनाम
बम् में, मोर परिमितों में या कर्म मी दोATHसी समर्पम-फम्म का परी
करय करते हुए सूत्रकार कहते हैं-
"एमा समिघमादायारमनीय कम्पपति,
उपर्युपरि प्रस्तर धारयन्" { का० औ म्० २७२३)।
७-अनुयामार्पमुमुक.योगारनीयाभिप्कानम्
पग्निसमर्थी करस के भमम्ता प्रमालिन पनि ६ में दो उत्सुक लिए जाते हैं।
पो-देवता से समान रखने वाला अनुयाय कर्म करियक माना गया है। यदि
अनुगमकर्म संग्रहीत है तो इसी दशा में अनुयार लिए दो उत्सुक भाइरमीप
पपक निकाल लिए पाते हैं। अनुपा बाम का समय माता, तर
उन उन (मम्पत्र सपिन ) सत्सकों को मापनी में रासार अनुपाचकर्म
किन बाता है । वि भातिप्येष्टि में ( का श्री० ८ १॥' के अनुसार ), तपा
गामेवीयादि में (1. श्री० ५६२५ । अनुसर ) अनुपापकर्म का ममार
1, मतएव या उस्मुक मिसाशन मी नही हो।।
से
-
,
इति-दिप्तीपाप्यारे सतपी पांगरता समाप्ता
गा
८-प्रारमनीयम्य पश्चिम दचिया उत्तरे व झमए परिपिपरिपानप
यमुनाफाशन-मर्म जमातर या मत्यु प्रमश 'मे-गम्पपस्मा गि
भाबमा०' -'प्रो ट्रम्प पारसि ददिगो
1- 'प्रो मित्रापरणीताम
सीनो मन्त्रों का बारण करता हुग,(मामणप्रायों में परिगणित पमाणादि किसी)रक
परिप के काष्ठ से निमित, परिमाण में बाहुमान, नरूप में पली बाश्रितः
इमपरिधिमापणे ग्रवपापपाय. विधानमा भवना पारा -वैकहत-कार्मर्य-बैल में से पूर्व पूर्व की म मखने पर उत्तर के, सादिर-मौदुमार की तीन परिषियों बाहनीयकुम के मध्यम ( पश्चिम , दक्षिण, उर प्रान्तमागों में क्रमश प्रतिष्ठित करता है। इसी प्रमिक परषानकर्म का स्पष्टीकरण करते हुए सूत्रकार करते हैं- "परिपीन परिदपाति-पार्दान एफवृक्षीयान् बाहुमामान पानागवेकडूत- फार्मर्प-स्वान्, पूजाप्ताम पूर्णताम उचरान, सादिरौदुम्परान्वा, मध्यम दक्षिणो चरान्- 'मन्धर्ष ' इति प्रतिमम्प्रम्" (का.औसा)। - र-मापनीयायौ समिपापानम् परिधि--परिभानकम्म के वनस्तर वा वर्ग भग्निकल्यार्प परिने से गृहीत समिधा का पहिले रक्सी ई मध्यम परिपि के साप स्पर्श कराके, सा होकर- 'बीवियोमम्" या मन्त्र योजना वा उस समिधा को माइग्मीपामि में गता है। दूसरी समिधा को परिधि से विमा स्पर्श कराए ही 'समिदास' यह मन्त्र मोमता इमा मानीय में गवता है। इसी दनों प्रक्षेप-कर्मों का स्पीकरण करते ए सूत्रकार करते है- "मपर्म परिषि समिपोपस्पश्य "याविहोम' मिसादपाति" | अनुपस्पृश्य द्विवीयो 'समिदसी" वि" (का०मो सू० २।१।२)। १०-मासनीयेषणपूर्वक मनस्मरणम् समिबापाम-र्म के मनन्तर यह अयप्प भारमनीय भग्नि की मोर देखता रमा "पो मर्पस्ता पुरस्तात् पातु कापारिषदभिशस्म' इस मन्त्र का सहि नापठिठस्परसंधान पूर्वक उपारण करता है। इसी कर्म का दिग्दशन कराते इए सूत्रकार करते है- मेधाममाप्य भरावपयमापण इमपरिधिनापे "मुर्यस्थे" ति अपठि, माहवनीयमीक्षपागसपना"। (का. श्री. सू० २) "-उदगायोपियोपा निपानम् मन्त्रस्मरण-कर्म के अन्तर या अपयु पुनः घेदि की भोर सौट पाता। या भाकर बेदि पर विछ हुए गारिक उपर दो पवित्र (दर्मवण ) मधगम विग- रूप से-"भो सरितु हस्या" या मन्त्र बोसता भा रहता है। ये दर्मवण ही "विधती नाम से प्रसिद्ध है। निम्न लिखित सूत्र से इसी कर्म का स्पष्टीकरण या- 'भाटयदि पितृपे तिरपी निदपाति-"सपितु" रिति" (का. मो. ०२८)। इम दमतों के सम्बन्ध में एक विज्ञासा ऐप हाती है । वर कि, बिन दो तशों के निशान का विभाम हुआ है, इस पेदि र विष्टे गरि में से ही किए गये, मपपा मम्प दमण विए माइस गिामा का समाधाम करते र सूधपार का है- "मन्ये पाऽपुकस्मार" (का• धौ० सू० २९) । इस निपाम कर्म के लिए दूसरे ही इस लेने चाहिए। क्योंकि वेदिक पाली बस्तियों में से हम दोनों का प्राय विहित नहीं है । वेदि-वों का देवता स्टस कर्म में विनियोग विहित मतामय वण ही रसने पारि। पम्पत्र मी पवित्र-पगुणकरण-प्रोपापरान-मम्निमग्पनादि में यहाँ पूणनिधान पिडित १, सपा भग्प पण ही सेने पाहिए । पही प्रासनिक म्पपापा बनसाठे हुए सूत्रकार इमपारामापस शपथप्रापमा "मन्यप्रापि सुखार्ये' (फा० श्रो० स० २१८७)। भूमि वनिधाम-प्रसङ्ग से भय सों की वर्षा परी । मतपत्र इसी प्रसङ्गारि से भाग्यसम्बन्ध में भी विनियोग-मर्यादा का स्पष्टीकरख कर दिया बाता है। माम्प से एक 'यूपानम' म होता है। पक्षिय यूप के चारों भोर पृत का सम्बन्ध कराना ही पालन कर्म ।। प्रश्न होता है कि, विस माप स्यासी में प्रयामानुपामादि के लिए माम्प लिया बाता है, इस यूपाचन-कर्म के हिए मी इसी में से म्यिा बाता माय इसके लिए मन्य माग्य का माण होता सूत्रकार सचर देते है- "यूपामने घ सपि" (का० यो २० २१८८) । मूगमन सापक पूत भम्प (बौकिक) ही सेना चाहिए। भाग्यमानी का भाग्य इस मर्म में विनियुक्त नहीं है। ज्योतियोम यज्ञ में पुरोगरा का इन्द्र-नायू के लिए, पयस्पा का मित्रा-मरण के लिए, तपा धान का भविनीकुमारों के सिर परेप होता है। इस प्रकार प्रक्षेप कर्म के लिए अपेक्षित पुरोगणदि प्रास्त लिए गएँ ! मपमा गैडिक! इस सम्बन्ध में ऐचिक प्यवस्था मतमाते हुए सूत्रकार पाते है- "पुरोगश-पपस्या-पानाम छन्" (का०प्रो.सू. २२१) १२-सिएसोपरि प्रस्वरस्वरण, पाणिदपेन तदमिमीनम पेदिके ऊपर विपती-पापन कर्म के अनातर बह भापर्यु उन विग्रहप से उदगम प्रतिष्ठित दम-तमों के उपर-"मो-ऊणमदस स्पा स्मृणामि सासस्प वेभ्यः पर मन्त्र बोजता हुभा प्रस्तर (एतमामक दममुरि) विधाता है। सर बिहाने के मनन्तर पर कार्य-"मो-माता पसको रुद्रा मादिसा। मदन्तु" पर मप्र बोउता एमा माने दोनों हापों से वेदिपर फैलाए गए उस पयाप्प रामपथमायण इप्मपरिपिपरखे पावर को दबाता है। इन्ही स्तरम-ममिमर्शम-कम्मो का स्पीकरण करसे ए सूत्रमार करते है- "वयोः प्रस्वर स्तृणा-"पूर्णप्रस" मिति (का०मी०सू० २।८।१०)। "ममिनिया-"मा वा सव" इति (काः भौ-सू० रामा)। -प्रस्तरस्पद्वारा दक्षिणेन मुचा प्राण, प्रस्तरे स्थानिय प्रस्तरणस्तरय-स्पर्श-कार्मामन्तर वा पार्यु भपने दोनों हापों में से बाम शाप को प्रस्तर पर रक्खे रहता है, एक दहिने हाप में भाग्नीध्र नामक ऋषिक् से कमत सोपे गए हुए-उपरत्-धूप मामक मुक्पात्रों को-"घृताची." स्मादि सारियो धोनों मम्मों का उच्चारण करता एमा प्रस्तर पर पूर्वाण स्थापित करता इस स्पापन कर्म में विशेषठा पा । कि, यह को तो प्रस्तर के ऊपर एक्सा या है, एवं उपमृत, तपा घ्य को प्रस्तर से नीचे वाई पर रपसा बाता है। माण, स्थापन-वैशिष्ठय की इसी इतिकर्यम्यता का स्पष्टीकरण परते ए सरकार का है- जुह पविराम निवपावि "पापो' इति (का० प्रौ० स्. रा१२)। "एसमिवरे ग्राा प्रविपन्न परिप्युपपत, ध्रुपा पारकरेऽनम्" (का०मी०सू० २१)। "सम्पाश-पे 1-पुरोडायस्य धोनामन, कामानाथ प्रतेनपदचनम् सपापन-फम्म के माता यह भपर्य वेदिस्पाम से गाईपक्ष्य समीर पाता है। हमाकर पुरोगदम्प पर पृष्ठ रासकर उसे कर पहिले से सम्पम पुरोगरापानी में मरण कर-"यस्वे माणः परापु विटो देखना १९५ इमपरिचितामणे शपयापण: विहानमाण -विधामनु यो वितस्थे । भारमन्नान् सोम घृतवान् हि मूरगाऽग्नि गाछ सर्प ममानाप पिद" यह मन्त्र खतरामा पुरोगारापापी में प्रतिष्ठित पुरोगणपी को भाम्प से चुपड़ा। वहां मग्निदेवता का सम्मघ ।, यो 'अग्नि गाछ पर्यममानाप' इमादि रूप से मन्त्र प्रयोग होगा । एक वहाँ मम्प देवतामों का समय हो "प्रग्नीपोमो गाव स.'-"पदाग्नी गप पर्यनमानाप' इस्मादि रूप से ठा किया मायगा। पुरोगावन के ममम्तर निस क्रम से कपास से गए थे, उसी क्रम से उन उन कपाों का वह मर्म्यु- 'णनि धर्मे कपालाम्पुप विवन्ति पसः। पूप्मस्वाम्पपि प्रत इन्द्रपार विमुञ्चसाम्" यह मन्त्र बोसता मा पृत से पोका पोला उपरता है। किसी याविकों के मत में कपाराखन कर्म तप्त (बिना मान- प्रपोग के) होता है। दोनों वैकल्पिकपप ऐधिक है। जितने कपास इस कर्म में गृहीत है, उनका निधानक्रम से सम्पापूर्वक- प्रयममुहासयामि, विर्त पं०, वतीय, इस्मादिरूप से ही सदासन बरना चाहिए। मी कम्मों की इतिकरम्पठा बताते हुए सूत्रकार करते है- "पुरोगयो-प्रनिघार्य, बदायऽउपस्वीणें निपायाऽनकि “यस्ते माण: पशुपु परिष्टो देखाना पिटामनु यो पिवस्पे। पास्मन्यान् सोम घृतमान हि मूस्लामि गछ स्वर्यजमानाप बिन्दे ' नि" ( का.मौ० सू०२११४)। पपा देववमन्पत्" (R• भौ• स्. २२) 'अस्पनक्ति कपातानि-'यानि पम्में फपासान्पुप पिनन्ति पसः । प्रष्णस्तान्पपि मत इग्दरा रिमुषवा" मिति ' (० मी. सू०२।१५)। "तूष्णीं पा' (का श्रो० सू० २।८।१७)। संरूपपोदासपवि", का० मी. सू० २।१८) । । ११२
विधानमाप्प
शिवपपत्रापप
इमपरिपितामणम्
५-सप्तम्मनम्
सक्त कर्मानम्तर वह पम्मयु-"मो-मियण धाम्ना पिर्य सद पासीद"
यह मत्र बोसतामा पाम्प पुरोगशादि हविद्रयों को पेदिस्पित धूपपात्र के पचर
प्रदेश में बेदि पर रसकर-"-ध्रुमा प्रसदन्नृतस्य योनी वा रिप्णो पाहि.
पाहि या पाहि यसपाविस मन्त्र की भाति पूर्वक मापापासीरिपत माम्प
का मुहू-उगमत् ग्रुषा-पित भाग्य का, पुरोगरा पापी में स्थित पुरोगरायी
का उपयोग क्रम से स्पश करता है। मनम्तर-"नो-पादिपा पमन्यम्' या
मन्त्र बोसता एमा यह अपर्यु भरने दप का स्पर्श करता है। पही सीसम्मन
कर्म बताते ए सूत्रकार करते हैं-
'मिपण पाम्न" ति बीपि पेपो कस्वा "धुरा प्रसद' भिति-
सापानमन (का. मो. सू.MR)
'पाीमा' पित्पारमानम् ' (का• श्री० सू० २।२०)।
मतोपापन कर्म के सम्बाध में दो बार-पक्ष माने गए हैं। रितीपाप का
भासर का है। इसका समाधान करते गए सूत्रकार करते हैं-
मम पानोपापनपत्र वा प्रतापायनम् । का• श्री. स्० २०२१)।
इति कामापनप्रीतम् द्वितीपोध्याप
इति-सुत्रप्रदर्शितपदातिसग्रह
रम्मपरिधिमपणे Fपयनप्रिय IPT TrictT 2 HERPPHIEF । - . FFB 6 1 ड-वैज्ञानिकविवेचना अथ-पोक्षणकोपपत्ति । "पपिE, मामा-मध्पा माला (ATER.१ ११) इन बाबर भाषा नसार पानी में मेम और अवित्र मामक दो, धर्म प्रतिष्ठित रहते जिनकी दिशानिक, माया उसी मामय में को माउस या कर्म में उपयुत बार, वेदि, तपाइम, दीनों यासस्या में गृहीत होने से पवित्र तो बन । परम्व भभी इन में उस मेध्य गुण का अमात्र है, जिस के सम्बन्ध से ये पत्र के साप अन्तमसम्बन्ध करने में समर्प दोसकती है। उस समनीमगुण का (स्नेगुण का) इनमें भाषान करने के लिए हील का पोषण किया जाता 1,प्रहरी प्रोपण कर्म यही एकमात्र विसका "तम्मे पमे- वदग्नये रोवि" इन शब्दों में अभिनय कि" पानि (मोहम्मीयान) समय काठमार पासस्पा में सगृहीत होता है, उसे 'हिमा मयुरग्निम् इस निधिन मे १म' कहा मामा मात्र यानि का प्रतिरूप है। मोमि याग्नि का छापा, अतएव काष्ठप्रसप्त सिग्नि को 'मग मी' कहा जाता। सौगनिम यास मकतिक निम पहपय कालनिरमायास्निगणव है। इस में प्रतिष्ठित सोर सावित्राग्नि (प्राणाग्नि) मम्मीपोमामक सम्बसर पा का समर समर्थक बनाइमा यात्मक है। इस सौर यममि के प्रमोदम, प्रपर्य भेद से दो दिमाग रोगाते है । मो सौर अग्नि सर्पसस्पा की सरपरक्षा लिए सदा सौरमास में पताम सम्बध से प्रतिष्ठित रहता है, उसे ब्रह्मौदन अग्नि करा पाता। पबह सूर्य का मीतसिनिमांगी-बों और मान प्रमापति की काममा से सोरसस्था से पृषक होकर मगम में प्रपिए होता मा पृषियी की भोपाप बनस्पतियों में (इन के सरूप निर्माण के लिए) प्रविए रहता , मा प्रकाग्नि पाता है। इसी सौर-प्रबार्यन्यज्ञामि से पार्षिपसापा की साप निष्पपि ई - 21, 16U विमानमाम्प रावपापण रमपरिपिप्रामणे पही पाविमति, जो कि सौरम्पग्नि का प्रकाश , गापम नाम से पर- स्त होने सगता है F1 6 - - , 17 1 11 स्व-सौरसस्या में प्रतिष्ठित नारी सावित्र मामि मामेष्टम, साथअसति मामक सोमाहति से गुमस (म्पेनिस) मारता से लि-हम दस का वाप्रवरूप कासकते हैं। यही शुस्ख तथा प्रसाद स सौर पथमि-एस सम्बन्ध से जब पार्थिवसरपा में प्रविण हो गता है, तो इस का शुस्वरूप उतारत दोगता है। पारमेष्ठष सोम समय के उदकान्त होगाने से अपना शुक्लरूप छोड़ना ना मा पहारुप में (पप्रमवरूप में ) परिणत हो जाता है। हो इसका समरूप है।' पापिय पदापों में, विशेषतः वादि ये मानका यही पप्त सहप प्रतिष्ठित । स भवामि-सम्मान से जगाया जाता है, सो माग पता है, काष्ठ प्रमसित हो जाता है। तर यह अपने गुस्वरूप में माता हमा स्वापानम्। धुलोकोदित सौर-देवमयास में पछा गता । । पाधि भनि का इसी सप्त-जात अवस्पाइयी का स्पष्टीकरण करती हुई मन्त्रशुति करती है- 'पे पनेपु पास सामनासावे। प्रतन्द्रोम्पा पासि रविका मादिदेवेमु रामसि" || . (प्रासं• COR) सौर यायित् कि यह माम प्रसाद ममी परितु मम्पमाल (मोग्ने पोप) , मास इसे पप REEF ममप ममतावामि नाम मे प्रमामारत में आपका से विचरण करन-से रुप्पग (काठे बरस) में मोप हस्पति को मानतातरसर काम में शामि 'सपदि के सिर म्याग बम-परको क्षति पेपसादिकम्मोता, सापि पूर्ण प"मय कृप्यागिममाद (एव. भर रसादि रूप से पप्पामिमा पण में विस्तार से बताया नगनुका है। सर महामि की प्रकर्ष समय से .-"तस्प (भग्न) पप सोलोरयापन्निम्" (TRONI)। - - इमपरिधिमामणे शपापण विशम्ममाम्म +पार्षिक पदापों में प्रविष्ट होता हुमा कृष्णमृग माम से म्यमात होने ARTI, इसी रास्प का निम्नसिस्ति बामग्ण-धुति से स्पष्टीकरण मा - "यहोर देवेम्पोऽप पफ्राम । स कृप्मो मृत्वा पचार । वाय देगा अनुपिप स्वपमेगावखायामपु' (शत० ११११)। "मृगपमा यम" (पलायनशीमा (ता. १७१.)। नही मायाग्नि प्रतिरूपमप्यादा से पहा तो भारवनी मर में प्रतिष्ठित ।, एक ठस प्राकृतिक या में पानीपचरस्थानीय सौर मपरम में प्रतिष्ठित है। बतएव 'मापनीये स्वरे विष्ठति' इस मिषन से इसे 'भालरेष्ठ' नाम से मी म्पबढ़त किया मासकता है। इसके अतिरिक काठरधि से भी इस माR का सम मप किया जासकता है । 'पा-समन्तात् सरे-करिने हो-काठे-तिप्रति इस नियधम से (महीधरमाम्य ) इस इमकाष्ठाप कपणाग्मि को भी मासरठ' कहना मन्नई ममता है । इम में मूत-देव मेदसे ने भाग प्रतिष्ठित है। भूतमाग काट- का से प्रस्मर, सापही इसका दिम्यातिएपयुक्त पड़ से कोई सम्बन्ध भी नही । समय अपेक्षित उस दिम्याग्नि (प्राणानि ) का, से (प्रामवरूप से) प्रतिष्ठित रहवामा मासरेठ: ममताही सरमनीय है। भूतमाग प्राणसम्बाध का निरोधक माना गण। इसके समय से देवप्राण में भमेप्प (मसगममीप) धर्म र समावेश हो जाता है। कारिपत हप्काग्नि के भूतसंगमनित इसी ममेयमार को हटाने के लिए 'हष्णोऽस्पाखरेष्ठ पर मात्र बोलते हुए एप्प का प्रोपण किया जाता है। बता पर पोषण कर्म नही कर सिया माता, दस्तक इस मस्पित रणाग्नि का उस दिग्पाग्नि प्रतिरूप माहानीपपान के प्राप पम्सप्पाम सपा मही होसकता | पाक पनि मगि का दिम्याग्नि के साप समय नहीं होगाग, तपतक 'पोन-पायिर य (पपि)प्पामिनम् (सत. " 'यहोणाधिनम् (राव) विधानमा शतपचम्पपण इमपरिधिनापये - 1 पोन-पक्षमपनन्त-दिम्याग्निमयमन्त' परिमापा से सम्बन्ध रखने वाण पार्थिव (माधिमौतिक), दिम्प ( भाधिदैविक), यसमानाग्नि (माप्यास्मिकामि) के सम. ग्गय पर स्वरूपसम्पति निर्मर रसने बाग पहातिरापाषण देवारमा उत्पम नही होसकता । इसके लिए प्रपम पार्षिक-कारस्प कृष्णामि का दिम्य बाइपनी पनि के साप सम्बन्ध कराना मावश्यक है। पर तमी सम्मब है, सब इमराठा मि को मेप्प बना सिपा भाप । यस इसे प्रोषण आप भूतानुगत ममेप्पधर्म से प्पा कर दिया जाता है, तो मावनीपरिपत देवतामों के लिए यह तुर (सम्म योग्य) बन जाता है। इसी मेप्प फर का-"प्रग्नये त्या जुर मोचापि' इस मन्त्रोतरमाग से स्पीकरण होरहा ॥१॥ वेदि पर परि का भाखरण होता है ।बरि (दम) म नामक उस पानी से उत्पमामा , जो सौरमपास की मन्तिम सीमा में म्योतिर्मयरूप से प्रतिष्ठित - पारमेष्ठप पानी का जो माग सौर-रश्मियों में प्रविय होकर अपने स्मामाविक मामुरमार को नया म्योतिर्मय बनता मा पधिप बन पात्य, सी वेन नामक पविप मप्तत्त से दर्भ की सत्यप्ति , जैसाकि पके परिप्रे करोति' (पत १ ) इस्मादि पवित्र माण में 'दोत्पतिविज्ञान' बननावे र विस्तार से स्पर किया बानुका tx। दिप प्राणात्मक दर्भ के दिम्पातिएप का पेदिके साप तमी सम्बन्ध सकता है, सब कि पिकात प्रपीप्रति विरूपा वेदि पार्षिक भग्नि को भूतसमपनित भमेप्प धर्म से पक कर ठिपा भाप । इसी प्रयोजन के लिए (बहरिपत दिग्प प्राणके साप रेपित प्यामि •-"पय मेनरपोर परिनगर्मा म्पोसिमरा रसमा विमान । बममा मङ्गम सर्पस मा म मतिमोतिमा (प.) सतपपर्य समुद्रातस्मादुरे पापा बोमरमादिर। जापपयेति पारिरे । इस रमा' ।हाता प्रमापविना पार (रान " x- इम्मपरिधिमापणे रावपापपत्रण विधानमा . के समय के लिए) ही इमप्रोदयानम्तर वेदिका मोक्षण किया जाता है। प्रोपस मन्त्र है-पदिरसि, परिप स्वाशुष्ट मोक्षामि' यह | 'पा वेदि । इस बास्य से श्रुति का तापप्प ही है-किामही याप्राप्ति का साधन + सी में तो प्रकार्य पनि प्रतिष्ठित है। इसे मेष्य बनाना ही प्रोपणकम्मोदरप है ॥२॥ दिगोषमान तर माह का प्रोपण दिया पाता है। यदि में भी मूत-प्रारण मेद से दो विभाग है। फलत इम-वेदिवत्-इसका दिम्प प्राप्प ममि मी भूतससर्ग ननित भमेप्पधर्म से युक्त है। पवित्र-मेष्य सुपात्र इस पर तमी रक्से जासकते हैं, जबकि इस का भगेय धर्म हटा दिया माप । तदप ही परिसि युग भ्परत्वा जुऐ मोक्षामि' मन्त्र से बर्हि का प्रोषण भी भापक बन जाता है। यह दम उस वेन पानी का प्रतिरूप है, जिस वेन पानी के वेष्टन से सम्पूण पापिष श्रेचोप पारों भोर से बेधित होरहा है। पृथिवीरूपा वेदि का रामकर्म (वेटम फर्म ) वेनहर दम पर भगवम्बित ।। इसी परमपर्म के कारण मेनप्रति- हस्पनीय दर्म को बारपी-पीए कहा वासाता।। पा में गरी भौतिक पदार्यों में भूत-प्राण में से दो दो बस्तर हैं। दोनों मे मूतमाग धमाध, प्रासमाग माम है। भूत भमेप्पी, तत्सम से प्राण भी ममेप बना रहता है । इस भमेप्यमापनिपति के लिए ही प्रोषणकर्म किसा नाता। पोर यही एकमात्र सब प्रोपसम्माकी उपपत्ति । प्रोषणकाम होता है- दमतों बाग मोधणीपात्र में रक्से हुए मन्त्रमूत मेप्प पामियों से । दर्मवण पूर्वकप नानुसार सय पवित्र है। पतएष इन से प्रोदस करना माय बनता है || पमायदेवता हि के अधिष्ठाता है। पमम्प राग माकारा से मरुत-गम से भनय की मोर मासा मा पानी पोड़ी देरतक तो मूलस पर दिखाई देता है। रतु पुष ही समय में यह सिन गाता है। इसका मिसयन मूनसस्पित '४ (47) पामम्मपिनम् । पर यामम्पपिन्वन् तारित्वम् (00मा.३९) - विधानमाष्य ठपयाम इम्मपरिधिमापणे प्रोपषि-वनस्पतियों के । मुले में ही होता है। इसीलिए तो मोपनि-वनस्पतियाँ यहाँ अपने तूममागों से गुफ- प्रतीत होती है, गौ इनके समाग गीझ रहते हैं। यह मसाद्रता ही इनके जीवन पा फारण है । पदी कारण है कि, एक पर को उत्साय कर पदि पन्यत्र लगाने की कामना होती । सो उस घर की में को उम्पाटक सोग (ब) मिट्टी सहित उस तरह उसापते है मि से उन क्य मागमाग गुप्फ म होमाय । इस प्रकार प्रागतिक पड़ में सिधक पर्नम्प देवता द्वारा सीचा हुमा पानी भोषषियों के मूल में प्रतिष्ठित रहता है। यह पेपका उसी पा प्रतिरूप है । मन - पंद्र देशा प्रकुस्तिवकरमाणि' इस निगम से पहा मी पोषणीगत्र में बचे पस कोपरि के मों में दी गममा म्यप्राप्त है। पह पिरपस करने योय पातपकि, यहर्म में जो गो भतिशय उपम होते हैं, उन सबका फलमोक्ता यजमान ही बनता है। सा कि- 'सदैवदारपेरापि" इस्मादि रूप से मनुादमें ही स्पष्ट होनेमास पहा उससे जो सिधन कर्म होवा है, उस का फस यह होता है कि, पार्ण पबमान के उभोग में वाने वाली भोपवि-वनस्पतिया स । उपजीपनीय बनी रहती है। इसतिर कमी थो.. सम्पतिको कमी न । राती । . मोरपिमलों को माद बनामा ही इस सिधन पर्म का मुरुप ठारय है। बम देखते है यि, यदि वेगस मोपधिों पर पानी डासा गता, तो इस से ये मर्दम्य तब तक नहीं बनती बम तक कि उनकी मिट्टी में पानी म गला साप । भूप्रदेश की मातीमोधि मुताईवा का भार । फलतः सिघनकर्म कर मधामसप भूमशही बनता है। सारा परम्परपा ही पारम्पद प्राप्त होती। मवएप पहा मी पानी राण तो जाता है-रिश्तों में । परम्त मारना की जाती है 'प्रदिप शुमनमसि' पा! हे रोग मा! ना पिण के लिए लेदनाद्रम्प से मप्रभाग पही बता रहा ।मि गोडी मी हो म मग सम्पति-प्रति का कारण है। यही कारण है कि, अपना 7पात हरि नीलो, इमपरिधिनापणे सरावपाण्याम विकासमन . 1 के सम्बपके सिए) ही इमप्रोषणामतर वेदिका मोक्षण किया जाता है। प्रोषण मन्त्र है-पेदिरसि, परिप स्वा जुष्ट मोक्षामि' या I यह पेदि है। इस बाप से श्रुति का सात्पप्य ही है-कि दही याप्राप्ति का साधन +। इसी में तो प्रबर्ग यशनि प्रतिष्ठित है। इसे मेग्य बनाना ही पोषणकम्मोरेश्य है ॥२॥ पेदिप्रोक्षणामातर मर्दि का प्रोक्षण दिया माता है। पार्ट में भी भूत-प्राय मेद से दो विभाग है । फसत इम-वेशियत्-इसका दिप्प भाप्प अग्नि मी भूतससर्ग ननित ममेष्यधर्म से युक्त है। पवित्र-मेष्य सुपात्र इस पर तमी स्पले मासको है, ना कि इस का अमेय धर्म हटा दिया माप । तदप ही परिसि युग भ्परता सृष्टं मोक्षामि' मन्त्र से गरि का प्रोपण मी भापक मन जाता है। यह दम उस वेन पानी का प्रतिरूप है, निस वेन पानी के मेष्टम से सम्पूर्ण पार्षिक खोक्य चारों भोर से घेपित हरहा है । पृथिवीरूपा वेदि का पुरणकर्म (बेरन कर्म ) मेनरूर दम पर ही मवम्बित है। इसी मृणधर्म के कारण पेनप्रति हास्पानीप दर्भ को बारपी-पी का बास कता है। पा में ग्रीन भौतिक पदापों में भूत-प्राण मे से दो दो वस्तुए है। दोनों में भूतभाग मप्राप, प्राएमाग ग्राम है। भूत ममेय है, वत्स से पास भी अमेप बना रहता है। इस बमेप्पमापनिति के लिए ही प्रोषणकर्म किया जाता है भीर ही एकमात्र सव प्रोषणकोंकी उपपछि ।। पोषणकम होता है- दमदयों द्वारा प्रोपणीपात्र में रस्से हुए मन्त्रभूत मेप पानियों से । वर्मत कप- मानुसार स्थप पवित्र है। मतएव इन से प्रोक्षण करमा मम्व बनता है ॥२॥ पषम्यदेवता शिधिष्ठाता है। पम्य पारा भाकारा से मरुत-गर्म से भूता की मोर मामामा पानी पोदी देरतक तो सूतक पर दिखाई देता है। परत कुछ ही समय में यह विधीन बोभावा है। इसका विमपम भूतस्पित - 'd (या) यामम्पपिगन् । पचामम्वविमम् वदेववित्वम् (प.प्रा.) 1 द: 1-"भय पाएप सागर पर पर समस्सरवम पान पुरा दिपुरत पप्पासानुपपन्नि, साऽन्यवर पदर पानापरिकार सोन्यवर, मात्मा विपुपान्" (रत१२॥२॥३॥७) । २-"मामा समारस्य विपुपान, मलानि मासा (ग्रत. १२॥२॥१९॥ {-"प्रारवारे सम्बस्तरस्परिशुरान, महानि पौ" (ले० प्रा० ० )। ४-"समरसरो यस प्रजापति । वास्पद हारे पद्मावास्पापरमा पर दारपिपान" (राव० ११११११)। ५-"पुपो पार समरसर" (व० १२२२१)। - 'सासगी पुरुष: मासाचा सासपात । स मर्मि सर्वदा स्वासविहरणस्गुमम्" ( पा सं• ११११.)। उछ सम्भसरणापुरुष के मस्तकोापान में प्रतिBिT यूपमा पूर्ण स-पिता' । रिय केशामकणागुफारमक होतीरा-गोमत • साल सम्म प्रणमामारमा पर्नुम पूच का एपक पोजिम होता १. से पारो और पहारसापारिक मेमोकमा मासिक प्रचिव न होता है। सम्मत्सरपुरुप निगर, मतएव : PATARTE रविन्द पनता हुभा दीपाच (भाव) माना गया है। 'म ति भिप्रेत है। विधान से मापसाप गम पORam परिस्थिरता र विज्ञान मध्य पमितमामात पोको मशः पार मर-मन-विनिता तो भूमि पर है। एवं पो मारमा में पसारमner परेश में प्रतिदिन है। इस भाप्यारिमा रोमानिया - 1 - गावा। ११ इमपरिपिापणे शतपथब्रापण मिमा - उत्पत्ति भोषपिनस्पतियों से मानी गई है, साकि-"भोपपीओपानि, बनस्प- वीन देणा" (पृ० मा उप० ) हमादि श्रुति से स्पर। पार मेष्ठप सोम ही मोषपि-वासति के स्वरूप का धमक । मन्त्र पही। कि, पही सोम पन्द्ररूप से (ममिगर्मित सोमरूप से ) मोपधियों का नमक ममता , एम 4ही सोम सूर्परूप से (सोमगमित xमिकप से) वनस्पतियों का तासादक बनता है। या सम +यूप सोमामक है, सोम ही परम्परया केशरमात्मक ६ ये हम मारप ही सूर्य को इस यापुरुष की शिक्षा कासकते हैं। सी शिक्षा मक सोममात्र के भागमन से तस्य सौरदिम्मेद्प्राण स्वरवरूप से सुरक्षित है। पदि शिवात्मकसोम का ( सोमाहुति का) समग्ध नसे तो सस्कास सौरसस्था सरियम बाय । इसी उस रूपाण माविदेविक पापुरुष के अनुरूप मापारिमा पा- पुरुप का पहप निग्माण [मा है। सम्रसर फायधिस पार्य से इस के मेरुदण से भारग्म कर दिय रेसापर्यन्त दक्षिणपार्थ का, मामगार से मेहमास से भRम्म कर हदपरेशापर्यन्त प्रमपार्स का, तपा मध्याहस्पानीय विपुत्रप्राण से मेम्दग का निर्माणमा है। स्तोमविधामानुसार विवर-सम्बसरमाग-से पाद माग का, पथदरामाग से मापानका एशिभाग से शिरोमग का निर्माण धमा ।इसी में सौर-म्पप्राण प्रतिष्ठित , वो शिसान्तस्पान से निकसर मिरो- + +- त्वाममा भोषपी' मोम विश्वाससमपो भयवस्व गम। स्वमा पोवोम्वरित त्वं मोतिषा दिनमा पाये। (मरस १६१२२)। x-"अभिवमरपति" (.मा.१.६)। - +-“मसोपा मस्प भारियो यूप" (ऐ००८)। 'भारिला भूप" (दै० मा २२)।
विधानमाम्प शिवपयाम - इम्मपरिपितामण मिड से भारम्मका सूप्पोन्द्र तक बितत महापप के मार्ग से सूहन्द्रपMम्त एक निमेषमात्र मन बार मासा है। यही प्राणगमनागमन शतायु का प्रवर्मक माना गण है । सूप्परिपत मन प्राण वामप ४३६०० , सम्पारमक पापु मामक मनोता का मागमन ही मायु-रक्षा का कारण है। 'वृष्य प्राण' नाम से प्रसिर इस परया मप्र भायु प्राण का भगमन इसो माणसम्बालनामिपा पर निर्भर सपण भाप्पा मकप्राण, तपा उस सूर्य केन्द्रस्प बाधिदैविक प्राण के माप में बसानपम्मा याम्पप्राण का भागमम होजाता है, तत्काल मायुसूत्र पिहिम होगाता , प्राण को सत्पादक दिपायका बीवन सोत मिसमा बन्द दोमाता , निधन सेगा है। इस निघन का भरोधक प्राणगमनागमनवपण पी दैनग्निण रिसे या परिभाषा में 'पहरापन कहा गण। -मणु पाया वितत पुराना मा स्टोऽनुपित्तो मयैः । वेन धीरा पियम्ति प्रति वर्ग लोकमित कर्म वियुपा ।। तस्मिनुक्समुत नीममा पिस हरित सारिख च । ५५ पम्या प्रमाणा हशमुरिचलेनति प्रापित-पुण्यकम् मैजसरप ।। (प.भा. ३) x--"anामानमवैमा वत्तपोऽनप्यात, तत् प्रामुरडून तत् परनिरा सा स्राएपपरपदाग्मनो नोमान् मनामयाम् , प्राणमपान बामपम् (शव०१४प्र.प्रा. -"मिम् उवाच-सपे। मिय मे पामीपागाः। बरं ते परामि-निस बाव बामेरमाम यो इदिनपमिम स प प्राणो वा भामस्मि आप प्राण प्राण सर्वाणि भूतानि प्राणो पपपपप पति 18 पवन सपण सर्ग दियो विद्याऽतिम तस्य मनं मित्र रपिण। वरवामित्रेण तपम्नास्मि इति दोषाच । वासो- सम्पमम् । सम्पदा पवरप परतो सारस्प सम्पमस्प पधिरावमापण सामाणि (३....) मान kिa TTERRHOET-सामाणि भवन्ति । परसा प्रामपा Kwar. मपा ममममप सम्भूपता पति । वो मोडमा पासा-मोजमा (ए.मा २१४)। " माय मरठाया, भारद सम्मिान, मादाम मगम्य मोरप गस्त्यै पुरळे भाराननन स्वर्ग कोई गमति ( राव. ४ ५.१ ५) - इम्मपरिपियम शवपयापथ विधानमा " + बताया गया है कि 'ती' गमक, माधु सरूपसमर्पक प्रदिप्य सौरमा शिखान्तस्पानस्पित मार्ग से निकलकर महारपद्वारा प्रमय सम्म से सब करत राही पणतस्पात 'अमर' माम से प्रसिद्ध है। विद्या माषा में इसे ही *'विरविदा' (धार) 'नानन्दनदा' (दार) इस्मावि मामा से म्पपाव किया जाता ।। मस्तकस्प फेशों का सर्व प्रदेश में भ्रमरूप से एक स्पान पर भासान होता है। वहां पर वसाम मिदु, बही एक मसूक्ष्म शर होता है। पीर उस भापुरप्राण के समार का माग है। सक दिम्य प्राण सौर-दिम्पप्राण का प्रभाया है। पवएम सूर्पविरोधी ठमो- मप मामुरप्राण का इस दिम्य सौरमास के साप स्वामाविक विरोष है। गैरपात में मारपास की प्रमानता रहती है। घर ER कर्म में सौह-दुमिका का सप योग होता है। इस में बने पाछे मामरमाण के स्पर्श से उस दिम्पप्राण को बचाने के लिए ही परमपेवामिक मार्पियों ने कमातमाग पर शिक्षा बार मापरयक मामा है, जोकि शिसापारण माधर्म के भनुगामी मारतीयों की माला, तपा विधामा- नुगामिता प्रकट कर रहा है। या दो शिसाधारण का एक प्रासङ्गिक प्रयोबन मतवाया गया। बसरा प्रपो- बन-प्रतिरूप माग से देवमादानुगमन । प्राकृतिक मापुरुष मम रूप शिण से पुरू, यामार्ग का मनुगमन करने बाजी, तपा पापुरुप से उदा- कारेण उत्पम हाने बानी पार्षप्रया को भी अपनी मध्यात्मसेस्पा का वैसा ही बाप बाकार रमना चाहिए । 'देवो भूस्या देव माषपेत् । का मी यही रहस्य है।माधिदैविक पापुरम के मोर और पब तो भाम्यारिमका पुरुष में पर है। परत यूपस्थानीय पिसा वस्पर । मतः यूपातिात् शम्त माग में इस का प्रतिरूप मर्यादा से भय ही समावेश होना चाहिए। •'स पम्मेष सीमान विराम एवया आग प्रापपव। सैपा विरविनाम। वस्वमायनम्" [ए भा. I] | १६४ *शतपयमास इमपरिधिमपणे शिसाधारण से वहाँ वार्षवर्मानुबन्धिनी पदमादा की रक्षा पती, पादिम्पप्राण-पापूर्वक लिहान मी सुरक्षित, तपा पुष्पित-पतरित होता है। शिामराद हमारी परिभाषा में पारमानुगत उस निस विज्ञान का सूपक, विस के परिणाम, एक अनुयन से दहन-भमुभ पम्पुदय-निश्रेयस् सम्पशि प्राप्त होता है। मतएव गे गानियाँ शिखा नही रसती, पपना को भारतीय सम्माने ।स 'स्मरम्मनकर्म का महत्व न समझती हुई कसित, विभीपिकामय मग्न सौन्दम्य का मोहकर शिसाधारस को पप भारमा समझती है, उन का विज्ञान (मुखि) मने ही मौतिक, माशलीलाप्रबतक भापुरमावारमक विद्वान में निपुणता प्राप्त करसे, परस्त में "निस विज्ञानमानन्द प्रा' की परिमापा से सो सर्मपा अभिव ही रहते है। निमें यह पमा स्वीकृत है वे भले ही शिखा को शर्म (या) का कारण सममें, परन्तु को पस्तव में शर्म (सस) का मर्म समझने पासे। वे भारतीय तो भरमी शिवानवा को गातीयता, धर्म, विनाति,मादि का उपोद्घसक की मानेंगे। वेदशास्त्र पर मनम्प निष्ठा रसने चारों के लिए तो उस समप उपपत्ति-विनसा का कोई महत्व ही नही व माता, बकि- 'तस्ये पमेश शिना स्तुपः" स्यादि रूप से यह शिणधारस को भापश्यक कर्म मामने का मादेश देसा। प्रस्तुत मासहिक पर्या को हम इसलिए विशेष महल दोहे है कि मान मगिपितों की परिपाल पुनि कत्र में शिया-सूत्रादि रिकों को लेकर का बोगरत मच रहा है।तिरोषत शिम्पा के निफाराम का वो पासस्या में ममुगमन हम समम है ऐसी दुपाति मापसी के भय पतन की सूचना देनेवासी। इसलिए हम उन सम्पात पुरुषों से निवेदन करेंगे कि वे अपने इस Bामाद, तपा गौरवपूण सिकी रक्षा करने में अपना गम ता और सममें । माधिदैविक पाप से भाप्पास्मिक पा की सरूपनिषति हुई, एवं पाप्यात्मिक पास माश्मिीतिक पापुरप (पापप्रफ्नसाप्प प ) उम्मपरिधिप्रामणे शपथप्रामण BI 'विज्ञानमान विवान वरा। अब दोनों यापुरुष शिक्षा से युक्त है, तो प्रतिपद समी की अनुरूपता से सम्बन्ध रखने वाले इस वैष पप मी शिक्षा-स्पापम होना चाहिए। इस या से बो शातिरापहप देवपुरुष (रेयात्मा ) उत्पन्न होने बाग, शिसाराम्प रहवामा दिम्पप्राय विकास से बाधम म रह गाय, मतएम यहाँ प्रख- रमाण किया भावा है । प्रस्तर दर्भमुशि दर्म म पर सोन्य मापोमय है। सोम ही शिक्षा, साकि पूर्व में बताण वायुका है। इसी सस्य से दमम- रिरुप प्रस्तर को मारय ही शिणा का निदान मामा चासकता है। किप्यो स्पोऽसि' यह प्रस्तर प्राण का मन्त्र । विष्णु पापुरुष है। इसके पूर्वमाग में (शिरोभाग) में ही प्रकाया में स्तुप (भिण) प्रतिक्षित ।। भवः प्रताप पारण मी पुरस्तात् ही होता है इदि-मस्तरमायोपपतिः - अथ-सन्नहन विस्रसन-स्यापोपपत्तिः बोबी वेदि पर बिहाने के लिए संगीत है, 'समहम' मामक रम्पु से कधी सती है। गांठ सोस कर परिसे तो इस बहि-सपात से प्रस्तर (ख) लेसिया जाता है। मनप्तर इस समान (कपर रख ) को पहिसान से पृषक् कर लिया गाता है। यह स्मरण रणने की बात है कि, जिस मेदिर परिका मास्तरण होने माग पारपानी देवतामों की (पापुरुष की) योपा (पानी) सी के दाम्पापमान से देशमाक्षस पपरम उत्सम होने वाला है। प्रगमन निमावीमन प्रतिपकधर समान एग्ज इस पोग (नि) को मामिपानीपा ।। पूति र प्रजनन कर्म होने बाग , मतः इस बामन को पारना ही मा BARत है। मगधन को पा कर इसे कि दक्षिण बोणिप्रदेश पर ससा जाता है। 7 पर सपा प्रतिहपमप्यादा से नीति, उपर मीनापन मापार में विशनमाम्य सरावपपत्रापण इम्मपरिमित्रापण दपिण प्रोणि पर रहता है सापही यह पोन बत्र से ₹का गी रहता है। फस्पा सन्धान की अपेक्षा पुत्रसन्धान का (पिवश्वस-मोचन की ररि से) विशेष महत्व माना गया है। दक्षिण माग पपिप्रधान ममता मा पुरुषप्रधान , वाममाग सोमप्रधाम बनतामा स्त्रीप्रधान है । अतएव महर्षि चरकादि ने गर्माधान संस्कार कार में पति के रविण पैर से ही शप्पाहर होना भारयक माना है। इस पा से मी देवाहमासदण पुरुपविष सन्तान का प्रपनन अपेक्षित है।मता ममि- प्रधान दक्षिण प्रोण पर ही समान रखना उचित नीवोपम शिष्टमर्यादा के अनुसार का रहता है। प्रतः परं मी उसी मप्पादा का प्रमुगमन रिसा श्रथ पईिस्तरगोपपति कहा गया है कि, इस या पम्म में गृहीत प्रस्तर शिक्षा-स्थानीय है। सर शरीरामपों का प्रतिक्षा मप्पदा से समाहोगया, शिसपारण प्रस्तर से गताप बन गया । मम ये देश सोम पर रहते ,गे शिसा के मभोमाग में प्रतिष्टित रहते है। इसी गेमसम्पसिस के लिए यहां प्रतिरूप मप्पदा से बहि रमाई गाही पही स्तरण की एक सपपलिuou दि को पोग (स्त्री) स्पानीय बताया गया है। शिर का पर मामा कि, क्योम स्त्री पर किसी मारक कार्य से मापुरुप-मासी ठे, तो अपने सङ्गीर कोहरो विनय, तपा जग्गा मात्र से पुरु रो। पहा मंदिरूपा स्त्री-पातिक प्राणदेलामो, तपा पासधाक लियो की माली में प्रतिष्ठित है।बत मारक है कि इसे मा (निस) मएने किया गया इससए भी देदिपर गरि निडामा मारक है। वरिए की वही इस उपपा मपरिषिपणे शिवपचत्रामण वेरि असे निदानेन योपा (स्त्री) 1, वैसे निदानेन या पृथिवी मौ।। प्रथिषी के तर, उसर मेद से दो लिमाग रहते है। निर्मल' मामक -दरिदेक्सा (मसमी, प्मावती, ममरोहियी, मेष्ट्य,)ो अनुमा से सस्पादिप्रबनम भयोगम,पत- विपत भूप्रदेश सर है । एवं रोधिसी मामक भाग्यदेवता (समी, कमन) बनुमा से सत्यादिबाए सम मदेश सर पर-मोपधियुक्त प्रवेश ही मोम्यतम मामा गया है। दो पपिवी का प्रदेश यहाँ मेदिरूप से गृहीत, यह इस पापी परमाम के लिए पाप मोपवि-नस्पतियों से युक्त बनता इमा बीपनीयतम बने माप से इस पर मोपधि कनस्पति के प्रतिरूप बह निहाए बावे ।। कर्म मिमित्त निदाननिषि से अधिक सेग विस सम्पचि कासमा करते ६ भरपमेव “यापदि तापदात्मा। इस मौत सिमान्त के अनुसार परमान की प्रारिमिक सम्पचिक्न गावी । यही बरिस्वरण की तीसरी उपपत्ति॥॥ । में पबमाम प्रपिवी के किस माग में नितमी भषिक भोपषियों प्रतिष्ठित राती , माग सतमा पिषिक उपचार करतानाही उपमीक्नीपतम ( मोग्यतम ) प्रदेश माना गया है।इस सम्पत्ति के लिए मह उस मात्रा से मिलाई जाती है, जिससे बेदि का प्रदेश मप्रमक होगाय । योपरिम्स भूगर्म में प्रति है। इसी प्राक- सिक स्पिति के समापन के लिए बचप्रमागों से दितीय-पतीप दभमुधि के मुबमा को दवा रिया बाता त्रिसम देवता विषादी ससप निम्पत्ति के लिए ही स्वरण कर्म मिति है। उसी निभानुगता पासम्पति के लिए तीन बार सागोता॥१॥ उम्रदस सवा मृणामि सासस्पा दरम्पा' या स्वरणकर्मसापक मन्त्र । मन्त्र का माल पकि, यपपि दर्मदल का मास्तरणant,तपापि पना ऐसी रसमी पाहिए, मानों म मेरि पर बैठने वाले प्रासरेमकामों के लिए विज्ञानमाम्य शतपयमायण इमपरिचितामणे कोमबापरा भासन बिदा रहे हैं। 'मम्प को मम्य भावना से देसना' पायो निदाम है। एम भावमारमक निदान ही हमारे कम्मों की श्रेष्ठता का मूणपार ॥११॥ इति-परिस्वरयोपपति " प्रथ-श्रमिकल्पोपपत्ति:- 40 गया है कि, सम्पसर यापुरुष का एकविंश स्त्रोमारमक पुप्रदेश शिरो माग है। प माहरमीयकुण्ड निदानेन इस वैषपा का शिरोमाग । शिरोभागस्प मुग माग में बातिमा समानामि प्रतिष्ठित पता है। तव स्यान में यहां बार बनीपणा में प्रतिक्षित भाहलमीयामि है। पदि ममि प्रबस राता है, तो बात मम की माकरण, दान पवमादि क्रिया ठीक ठीक होती है। मनिपान्प में ये किपार निप रहती है। परिणामत पुषि, तपि, तृप्ति, या, वीप्यादि का भभाष रहता है। ऐसी मबापा में यह मारपक है कि शिरोमागोपदिक, मुष्ठस्पित, गतिमाहक वाहनोपामिको माइतिदम्परेसाकर्षणादि के लिए इम्मका से मस्मादि बटा कर प्रपन मना Rपा जाय । पापुर का पूर्णसहा शिमा पप्परत माना गया है। हर कुरमुरिसरण प्रस्तर इस पापुरष को शिला है। मनः मस्तररूप विधा का भाहसमीप के कर सपाप नावे ए पूर्णपणही या प्रास्तीकरण किया जाता॥१०॥ इनि-प्रमियरपोपपत्तिः प्रथ-परिधिरिधानोपपात जिन ती परिधियों का मापनप पुपा के पहिषम-निव-नवप्राप्त मागों में बस स्पाम ता, सन का रियर शानिमिषन के मामा प्मपरिपितामणे शक्षपमापण विशाममाम विज्ञान में (शत० मा प. दि.०० स०७० से ११० पपन्त) लिया जानुका है। वनिरहस्क्वेता विद्वानों में बनेकपा विमा पनि के चार रूपों का प्रस्पद किया । एष इसी भापार पर "पतुः पिहिमोरमा भने प्रपिरास" पाभनुगमन वपन प्रतिष्ठित है। उन सब ममिविका उलथाप्या मागण में दिग्दर्शन करापा माधुका है। प्रात प्रकरण के समय के लिए यह मा स्पक शेगा कि, पाठक एक मर बह प्रकरण अपरप अपने पक्ष्य में से भायें । यहाँ प्रारणसङ्गति के लिए दो शब्दों में उसका सिंहासोप.म पर दिया जाता है। "पुरुपाधि, मातापि, निराम्म, सम्बत्सराप्ति' इन पर ममियों में से पौधा सम्बसपनि ही इस कथानक का मुबाधार है। इस सम्बत्सरामि को हो 'मूताना पवि' कहा गया । इस भूतामापति ' सम्मसराम की मागे माकर घार परस्पा होगाती है, दिम क बिए-'मतदा वित्तिोरपा भग्रेड मिरास यह कहा गया है। सम्बसरमा सौर पार्थिग, में से दो मग में बिमल ।।पनि सरसर चक गायत्रामिप्रधान । एष सौर सम्बरसरचक्र सावित्रामिनमान है। प्राव में पा पाकिमिसम्बन्धी पार्थिनसम्परसर चक्र से ही मिकी मास्था तुस्थी से सम्बघ समझना चाहिए । भूमिया के गर्म में प्रतिष्ठित प्राणाप्ति ममदामि माम से प्रसिद्ध है। इसी पमादामि को म' का गता है। इसी स्यानि की मार्गणविधान से मागे माकर पार मारणा होती है। इस बार पार्पित सम्पसरमियों में एक तो पानि या होता बनते हैं रोष सीम ममि 'मामा' रूप परिणत होकर इस पनि .-"मस्त प्रसिष्ठ यो मूधानि च भूटाना पनि समारसगपादोषम्त । भूताना पनिग हपविरासीद्, म पस्नो। दयानि नानि मूवानि भगवते । भव व स भूनाना पति समास्सरस (राव ६१ म मा...)। २३ विहानमाम्य -पावपथप्रामण इम्मपरिषिप्रमसे . की परिधियां बने रहते हैं। पार्थिव प्रमापतिममि की गृहपति, समासर, मेद से दो भवस्पा हो गाती है | गृहपति भग्नि भूपिण में प्रमादरूप से प्रतिष्ठित राय है, सम्पत्सराग्नि पार्पिक सम्बसर में प्रतिष्ठित रहता है। मुपिपास पार्थिव पति की सप-अर्क मेद से दो मबस्पा रहती है। केन्द्र में प्रतिष्ठित, 'मनिररूपमापति माम से प्रसिर उप ममि सप्रमय बनता हुमा 'उप' माम से प्रसिद्ध है। पही इस पा का प्रमापति (पनमान), पार्पिक उपा इसकी पत्नी । गी दोनों के दाम्पसमा से पार्पिकप्रमा की उत्पति । इक्य से भर्फ-(परिमयों) निकला करते है। मूम्रप उम्यामि की प्राणास्मिारविमर्षों उप से निकट कर कही दूर तक ग्याप्त रहती है। यहां तक पह बरमक प्राणामि प्याप्त बता है, वहांतक पार्पिबमास की-सीमा मानी जाती है, जोकि सीमा सामपरि भाषा में 'रपस्तर साम नाम से प्रसिद।। बेग्दस्प, उम्पम म प, गृहपति, प्रभापति ममि से पारूप में परत गेने वाले इस प्राणाग्नि की भागे जाकर पापित्र भति समासराप्नि मेद से दो पापा होमाप्ती है। भूपिपरामिडम बसी प्राणानि (बाग्नि ) पार्षिक भनि , एष इसे ही भूपनि कहा जाता है। एष भूमहिमापछिम बही भामि सम्म रसरामि है एक-इसे ही पूर्ण रुपमानुसर 'मूनानापति: करा नाता है। महिमा का बपट्कारमण से सम्बन्ध है। एक ममिसम्बन्ध से इस बपदकार के २१ बागों में से २१ मार्गण संग्रहीत है। मपया से परम्मर २१ मार्ग पर्यन्त बो भूमरिमा प्रदेश १, वही सापासापक है। इस पार्षिा मागसर चक में ही पर पार्षिक प्रणामिविध सम्पपि प्रतिष्ठित है। 'मनामापति' नामक, सम्पूर्ण सम्पसरव में एक रूप से प्रतिनि, मत 'समासरप्रयापति' माम से प्रसिद इस महिमालि रे माग गार कम पारि पित (', पथदरा (१६', एकींग (२१) स्तोम मे से तीन में होगाते हैं। एपशिलोपामहिम पुरस में प्रतिष्ठित ही भूनाना पवि माताति । नाम से इमपरिपिताम्ये रापनाम: विनमान प्रसिद्ध है। यही देवविधामानुसार मादिम' कराया है। पादश-स्तोमावण्डिम मन्तरिय प्रदेश में प्रतिष्ठित वही भूतानां पति 'मुवनपतिः' माम से प्रसिद।। पही देवपरिभाषा में-मायु' कामापा है। एव त्रिपूतस्तोमावम्मिम पृपिषी प्रदेश में प्रतिष्ठित पही भूतानां पति: मुगपति' नाम से प्रसिद्ध है।पही दवपरिमापा में 'पति' पइसापा। इस प्रकार स्वोममे से पावि सम्मरिचक में तीन सानो में विमाप्त होता मा एक ही सम्बसिरामि तीम रूप धारण कर लेता है। निफर्ष या मिकता कि, भूपियारे दस्म'गृहपति अग्नि के उम्परूप के भाषारंप भूपिया, मित्-पञ्चदश-एकविंयस्तोम इस बार प्रदेशों में बिभात भामि के स्पति, मुक- पति मुसमपति, भूतामा पति' ये चार रुप होगते हैं । इहो पारों को सपप में रसर पारा विहितोमा मोऽस' यह का गंपा। - मौमामि [१-भूपति:- मूपिरहादिम -मरिष - ममि ।२-मुवपति-पूपिम्पपिम - -भनि। सम्परसरामिा-11-मुपनपतिा-मातराभिमा-, -वायुः ४-मूतानां पति - पुसोकामणिमा भादिमः ज्येष्ठमाता पिता-प्रगपाताप गृहपति-उत्पा भग्निम्रातरः - प्रश्न या कि, पविष उतबारों ममियों में से पपिंक गृहपति पवमान के पावि हविर्मक-फर्म में होता कौम सा मनि बनता प्रामाविज्ञान में एक मात्र इसी प्रम का समापन मा ।। पार्मिक स्वौम्पप्रैलोक्य में म्यात विविध सम्बसरामियी इस कर्म में पमपर्य है। क्योंकि इसका भूपिणा से-मताम सुबाष परचम मसीएने पाता । करण इस का यही है कि-'समुद्रममितः पिनमानम्' इम मन्त्राणन के अनुसार भूपिया चारों मोर से मणच 'समुद्र से व एत ।। इस प्रप्तान के सम्बन्ध से तस्प सम्बसराप्नित्रयी का मौमपापान म भन्तपाम समय नहीं होन पाता । पारम्भ में एकरूप से प्रतिष्ठित तीनों साफ- मरिक प्राथामि इस माममुद्र के गर्भ में पले प्रावे ।। म का भूपिया से विधानमा शवपपापण इम्मपरिधिनाये मन्ताम सम्बन्ध नही पा । सम्बन्ध ग्रा-उम्र मौम प्राणामि कर, परममि मी करा पाता है। यही वपने 'एति-पति पावा बट से तृतीय पु से सोमापारण में मी समर्प होता, ९५ पाविरदेवामा के यह कम्मी का भी सचान करता है साम्रसारिक मामिश्रपी ने क्यों नही इस कर्म को अपनाया ! इस का उत्तर है-पपदकार । मूपिया की मपमी माइमपी सीमा है। पहीपक्सीमा 'पपट- पार' नाम से प्रसिद्ध है। इस मौम-अपटूकारसीमा में रही ममि भत्ताम सम्पन्न से प्रतिष्ठित ए सकता है, मो मृमि की प्रा तस्विक वस्तु बना रहता है। समाप्त रामि का इस पट्कार-सीमा से सम्बन्ध, पारप रहता है, परन्तु पर सस में प्रति शिवदीदोसकसा सी प्राकृतिक स्पिति का मास्पानरूप से निरूपण करते हए ध्रुति ने कहा है कि, तान पनि माग कर पानी (वयममु ) गायुपे, एक रिम (गापत्र ) ने गैत्र-कर्म करमा स्वीकार किया । क्षेत्रकाम में निपुप्त पानि इस मसामिरे सहयोग से सर्वपा मधित पता है, तपा सम्सराग्नित्रयी को पापपा का कोई पर मी नही मिला, पा पार नहीं है। बाग पनाग्नि पुरोकरप देवताभों के पास इषि सार पहुचने k-+- तो पण समुर में 4 मप्य भामरमाण के पाकम से पही सा सममित्रयी इस की रवा पाती है। पश्चिम दक्षिण-उत्तर-प्रान्तरप स० मानवपी सीमाना सेहत तीनों भोर से गनपत्राग्नि की रक्षा करती, पीस पनित्रयी का पार्थिव में उपयोग है। साप हीमो मापांश प्रसपाप से सम्मानित्रपी के गम में सनसन के सिर माहुनियन भाता है। सीमाहप से होता मणि की सहपरपा तथा प्रतिक में उमिदम्प पर प्राण काना हो इसका धामापा ने सम्मुकशेना । +- पर रम्य पहमि गिरिपु पनि ।
मपरिपिनाम शतपथब्रायण - । इस सम्बन्ध में एक यह विशेषता यान में रखनी चाहिए कि, इस पगापित मामाग्मियों की शुद्ध-मसिन मेद से दो मास्या होगाती है, जैसाकि बाप्ला- विज्ञान में विस्तार से परमाया नाचुका है। सम्सराग्नित्रयी का अर्णवसमुर से समय बताण गपा है । इस भर्ण समुदा के पापभाग में सम्मासराग्मिप्रपी का पो प्रमर्पमाग प्रविष्ट पता है, वह मचिन पाप्मा है एक प्रमोदनात्मक सम्वत्स रामित्रयी शुद्ध मामा । ये ही भग्निरक्षक बमते हुए सीमा है। मसिन भाप्स्पायुक्त भप्तस्व ही मूपिम का उत्पादक है। इस परम्परा से प्रबर्यम्स मास्माभित्रयी भूपिणण में प्रतिष्ठित राती है। जो हविर्द्रम्प भूपिण्ड पर प्रवर्य सम्पाप से रह माता, वह इस मसिन-प्रवर्य-माप्मामि की भूमिका कारण बनता है। एष पुसोक में होता-अग्नि के द्वारा से गया मगामा गो हर्थिम्प प्रकार्यरूप से सम्बत्सर मयार में जाता है, यह तत्रस्प सीमाकप, गुर वाप्माभित्रयी की राप्ति का कारण बनता है। पाप कि उक्त प्राकृतिक-पार्पियावियों का प्रतिहप है। मतः असे वहा सीमारूप से पापित ममित्रयी का सम्बन्ध हो रहातपेय का भी प्रतिस्प विधि से वम का समाता है। यहाँ की ताह पहा भी प्रबार्प दम्पका समय होना चाहिए । की तरह भूगर्मस्प मसिन भाप्माभित्रयी की प्ति का भो । समावेश होना चाहिए | इसी उदरप से 'देगननुविपारे मनुप्यार यद देना प्रस्तस करमाणि" इस भावेश के मनुगमन के लिए प्राकृतिक मानिसम्पत्तिसम्रा के लिए पापित वाग्मित्रपी के प्रतिरूप में तीन परिधियों का परिधान किया जाता है। इन की दृष्टि के लिए इन पर प्रकार्यरूप से भाग्पादि बागता है। एष वो भाविदम्प पष्ठ पर मिनाता है पाकिम भाप्सामि तृप्ति का फरण बनता है । एक परिधिपरिपामकर्म की यही मलित उगपति ।। १३, १४, १५, १६, १७, १८॥ 7 परिधिया विस फाठ की बनाई जायें ! इसका उचर यक्षिप सप । मनमरिक माप्मानित्रयी सम्पासरपासीमा के गम में प्रतिष्ठित है। बता इन का . १४
विद्यममा
शपथप्रापण .
एम्मपरिपितामणे
प्रतिरूप काठ वही बन सकता मिम में पनातिशप विकसित ऐT पठारा,
विकहित, का मर्य, मिस, सदिर, उदुम्बर, इम पदों में यातिपय मिकसित रहता
है, पतएप पे पहिप वक्ष माने गए हैं । इम में से प्रधामपप तो 'पल' प्राण
का ही है। क्योंकि पापप में प्रसवीर्यसम्पादक भग्नितत्व प्रधानरूप से प्रति
टित रहता है। एष अमिसम्पतिसमाह के लिए ही इम परिधि का प्राण शेता
है। पारा के समपपर न मिसने से ही विकदादि मम्प काष्ठों का प्राण करना
चाहिए । पाठकों की सुविधा के लिए इन पधिप परों के मापान्तर समृत कर
दिए जाते है ।। १९ २.॥
-पसारा:-
पचाश, सिंगुक, करकपर्णी, पातपोत, ये सब सद समानार्पक माने गए
हैं। गुण से इसी पधारा के निम्न लिखित नाम प्रसिद-तिक, प्रशाप,
अमपादर, ममोपनेता, पूर, समिर, काष्ठा पण त्रिपर्ण, विपत्रक, काग,
रखपुण्य, दीपस्नेह तमिप्न, पारश्रेष्ठ इस्मादि । मिम्न लिक्षित सपहरलोक पसारा
इम्ही गुणों का स्पए करण करा-
कपायसिक्ताः स्मिग्पोप्णो दीपना सर ।
मयसम्पानकर हप्प पप्नाणे गुणो मा In
मियोपात फपिम्नोऽप पसागो पमपादप ।।
ग्रामपणे गुरमगु रोगप्पीरामणे हित ॥२॥
एक पीत सिवनी। पुप्पोप पतसिंध' ।।
सर समगुणा उस सिवात दानादन ||
पुण दिपालमपुर
मारियोतममुपणम् ॥
पापातिककटक पावन पोष्णपिप्पते ॥
एतत् पुष कर्फ पिच कुष्ठ दाई पापपि ।
वातरक रकोप मपहाई प मारपेन ॥५॥
इमपरिषिपाये
शवपयनापण
विधानमा
-
पर विपाका सरम रघमिष्यवे ॥
यसष्टममेहाः कृमियुरपोदर हरेत् ॥४॥
पामगरविवस्वग्दोष न वृक्षरीयकम् ॥
फसवीन पद्वस्निग्पोप्या कमिम्न कफापहम् ||७|
वम्ममसरसो हन्ति मेलापायपुप्पकम् ।।
नूतना परतपश्चास्य कमि पावच नागपेव ॥प्पा..
प्रारी तस्य निग्यासोहरद सेदातिर्मिर्गपम् ।।
मुखरोगारप कासारव प्रामी प पिनाशयेत ॥६॥ इनादि ।
ससस
रिपी
गया महाराष्ट्री गुजरातो कार्याटको हो वानिया उसन
पक्षारा
पलाश
पमास
पछस समिरो गजल मार
परम्परा
१
r
हाम्टेम
कम्धारा
परिपा
२-
विन
विकास, इत, गगण, मधुपी, गोपमोण्टा, पिणार, किंकरी, पूतर्कि-
निमा हिमन हलादि शर सममार्पक।। गुमाल से पी निम्न मार्गों में
प्रसिसी-परिय पाप, अमपादप, मशरु सुबगुम मुमाबप, पारप पृषु
बोज, फर, पदमस परिपर दरवकाष्ठ पादरोहिण म्यानपात् विकर,
पाक कपटकारी, टपाद, करपात्र, स्पदुमपटक इस्मादि । निम्म सिसित
संपारसोरु विकास के ही गुखों का दिग्दर्शन करा हे-
पायोऽम्नम मपुर: पाकेऽति मधुरो सपुः ।।
विकसोडपं नारपुष्पगीतो दीपनपारना ॥२॥
विधानमाम्य
शवपयमामण
इम्मपरिपितापणे
फफ पिच रक्तदोपान् नेप्रपुष्प प फामप्ताम् ||
शोप शोक वर्ष दाह वामर्शप इन्दि सा॥
पिकासफस पर मधुर सरहोपात् ॥२॥
स०
२०
40
म०
a
.
को र राई पाररामी निमको पसी कामि मोपे रामो
शमी विवर
हर सपुरामो न मही
सफेर बाम्ला
कीर
-
३-काष्मठ:--
कामl, कार्मरी, गम्मारी, श्रीपर्णी, भद्रपी, स्निग्धपर्णी, मधुपर्णी,
कुमुटा मोदिनी, गरि मदा, समता, सर्वतोमदा, स्वरूपमा, पमया, मधुमदा,
महामा, सदाममा, रोहिणी, पीवरोहिणी, ही, इस्मा िशद समानायक है। इन
में 'काम' राष्द का बिगुट एन्दोम्पा' नामक पदिको मारा से ही समाप
। गुणशि से पही निम्न नामों से पता-पीरिणी, विदारिणी, मधु
रसा, मघुमाती, एकता, पीतकसा, कटुका, प्णका, प्णता, पण
परवेता, बारहा, स्यूसायचा, समचा, इमा। निम्न लिखित संमह-रसोगों से
विकारत के इसी गुणों का समर्पन होण-
गम्भारी मपुरा निता फपापा कटुन गुरुः ।।
दीपनी पापनी मेप्पाप्पीपा मेदनी तया |
हुण मर दाा गोप गो रुपा विपम्।।
पामराप्त महानिदो र भ्रम रुमिम् ।। ।।
गीतम मधुर मिक गुरस्तिाप प सदफमम् ॥
पाणं प्रारि मेरप प हप्प हा रसापनम ॥२॥
इप्मपरिधिम्यपणे शवपक्षप्रापण विहालमान हन्ति मुभविषपष पात पिच हपो चयम् ।। दाच रकदोष साविकमपुर फमम् ॥४॥ फत्तमम्मपाप तु गुरुस्निग्ध विशुदिछत ॥ मूत्रदं बुदिद म्ति पातपिचं वयं नृपाम ॥५ रतक्षत रक्तपित्त रकदोप च न्ति वत् ।। पामयात मृत्यू दार घ प्रदर रेत् ॥६॥ कपायतितमधुरा फसमाऽसमोरजम् ॥ ग्राहिणी पासता पस्या कृष्णा पिचकारता ७॥ फपायतिकमपुर पुष्पं तस्ास्तु शीतसम् ॥ विपाकमपुर- ग्रादि पातम रक्तदोपात ||) गम्भारीमूसमस्युमा मानुपेषु रित तत् ॥ - म. 4. म० गु० - गम्मारी गौमारी । शवम्य सीपनी मामागुपुटी बम्मारी गांमार गमारो क्लि श्रीफा, शलभ मालूर, शापिरस्प, शस्त्य, सोमारीवकि, गोहरीतकि, कपीतन शगटु महाकपिप नीसमरिक फकट, पुनीक, इमादि शम्द समा- नार्षक है । गुरु रधि से यही निम्न नामों से म्यवान हुमा --शिवेट, शिक्नुम, मात्य, प्रतिमहर समरिसार, पूतियात पीतफळ महापा, मोफल, सदाफला गायफल, समफस समपर्म, पप गपपत्र, सपत्र, मिशागपत्र, निशिश, प्रिदस, पत्रमेष्ठ, कष्टकाम, सियमन, अपराम, इमादि । निम्म रोक मिसके मी गुखों का समर्पन कर है- १५८ विज्ञानमाय शपियनाराण इप्मपरिमित्रापणे कफानितारं वीण स्निग्प सग्राहि दीपनम् ।। कवितापायोष्ण पान पिसमुदाइतम् ।। वदेश विपात् सपर्म मधुरानुरसं गुरु ॥ विदारि रिम्पफर दोपहर पूनिमारुतम २॥ सं. म० गु० वा बेस बस देख विक्षाबिलु बम मारेीप रिस्परामाय चित्य ५-मदिर मदिर, सपपत्री प्रब, कर्कटी, गापणी इस्मादि शम्द समानापक हैं। गुणगि से या निम्न मामों से भी प्रसिद-पारिक, पान, मेप्य, यूपम दप्तधामन पपिम, सतसार, तिकसार, गसार, विनियम, बसपत्र, पासपुर, बासतमप, पाटक, कण्टकी बहुमत्प, सुरम्प, मिरास्स गिहारात्य, फुयारि, कुपात्, इस्पादि । निम्न लिखित रसोक मदिर गुणों का ही योग्मन पर रहे गीतोपा मदिरो रन्मा कपाटुनिता ॥ मरिमदो विम्बदिरे पर सदिरे मि ॥२॥ करोन कपनि कुष्ट भूतमा मरप ॥ मुम्बरोग पागारोग ग्कोप कमि हमम ॥२॥ सिर्ष ग्रोप पापपिल पमा परिर्प नपा ।। मेदोरोग पासम्फ नागपन मदिरा सिता सारो प्रगपो रकदोप मुम्मरोग कर्फ परे । निपासो मधुरो परप' सादिरा सदन ॥1 इमपरिषियामणे वपनामय विधानमाया स० म० • है. और सदिर पत्या पपडिया परम्पेला वेसपए सपर कोरिया मेपिन और गरिर पिलीवत्रि गावपररा सयर ६-उदुम्बर सम्पर, उदमार, प्रविष्टित मुबल अन्तुमर, इस्मादि शम्द समानार्थक माने गए है। गुण से यही निम्न नाम से म्यपाल मा -पजिप पायोग्य, पवाह, पासार, पवार, पवित्रक, समाच, सौम्प, कासकाम, पेतस्कर, सीत श्रीवास, बमफश, सफर अम्मा, अपुप्पफर, पुष्पाय, पुपतीन, पासिमुख, पीरहर, हेमदुग्ध, हेमदुग्धी, कृमिकप्टक, प्रमादि। निम्न लिसिन रोक सहमर के गुणी मात्र कर रहे है- कपापपपुरः शीतो यो मा उदुम्मरः ॥ प्रणापोऽम्यिसपनगमस पानाद्गुरुः यफपिचमतीसार पोनियोग पन्धि सा॥ कपापशीतप्त पर गम्य दुष्प प्रणापाम् ॥२॥ भाप फम पापाम्म मसिष्टदिकर नरम् ॥ दोपर्म रहतारि दीपन रुपपिच्यते ॥३॥ प्रतिशोर्ट फछ पक रूपापमपुर मरम् ॥ कमित कफहद यान्ति पिन प्रमोफम् || रकगेग सुर्मा मूछी दार गोप प्रम इपाम्।। फोपम पवनृपो रक्तदोपं पिच कफ रेत || पिशाममाप्य रावपपत्रामण उम्मपरिधियो किषितु फोमर्स सादु पाप शीवच फलम् ।। इन्ति प्रारम पमेश गान्ति पिचमसम्मुतिम् ।।६।। स० म गु० क० सुदुम्बर गूलर पाहमुर पभर सम्परो प्रचि बाह प्रत्र-प्रामण समाप्तम् क यधिपादों में से किसी समपप्रम्त एक पछिपाप की जो परिधियों की गती है, वे गीली होती है। माइमात्र होइन का बननीय रस। यही इनकी प्रातिस्विक सम्पति।। इस मम्पति सपा शि से यहां वाईमार वर्मिपत। पहा मालाग्नि के मगर्भ-मरूप की ए मे भी मगर मानसी भपेपित है। तीमो परियों उस बाप्मानित्रयी की प्रतिरूप । मो मामय प्रणवसमुद्र में प्ररिट २। मत सत्साश्यन परिपियाँ भाद्री मी राती है। रिस प्रवर माक्रमण कण माक्रपण को पीर पm पाने हार्यों की परिधि से रोक देता । एवमेव ये परिधिया माझमणारा मी it। मतएकमाई में ये बारिमाणी बमा गती है। 'गपरस्सा. (म मात्र मे पश्चिम मगम परिधि मणी माता। प्रतिकार में तीन पुस्सानीय गोम की (पारमेष्टप आपप्रमुगमन मे ) या विश्वासप्रमुम, एतमाम पम्पमपाए से हो हो। पE मी पण ही रा पम्म अमित । मत परिभिरपापनापण रणम्प में उसी प्रागतिक स्पक की भावना की जाती है। मतगद् धि' अनुमार सम्पूण विस जिस में कि पर जीवनपश्य का संचाइन पर 1, माणि इमपरिपिताम्मे शतपय प्रय है। इस की शास्ति में ही यजमाम की रणन्ति ।। इस रपाकर्म से इसी के लिए इसी के मोग्य विभय को सुरक्षित रहने की मावना पत करने के भमिनाम से-'विसस्यारिएपैमादि कहा गया है ॥२॥ दक्षिणविशा की भोर से प्राकृतिक हर्मिक पर मो मासुर माक्रमण होते रहते है, ये भमिसयुक पास से रोके पाते । एव भौमदेवम्यवस्था के अनुसार परियविश्व की भोर से होने वाले मनु पवित्र भामरों के भाक्रमण मनुम्पविध प्रश्न से रोके मावे मे+। प्रतएव यहो मो दक्षिण परिषिस्थापम व कब की माना से उसी इन्द्ररपक की प्राप्ति की जाती है । 'न्द्रिस्य पाहरगि० इस्मादि मन्त्र का यही तत्पर्याच॥३॥ उचरादिव्ई की भोर से होने वाले भारमण सत्रस्म मित्रावरुण देवतामों से पेके जाते हैं जैसा कि नदीची दिद मिप्रापरयो देववा" (३०० ११) मावि कम्पति से प्रमाणित ।। 8ो रसको की मारमा सिए-"पिपापली त्वोचरता मावि मन्त्र बोरसे हुए उत्तर की भोर सासरी परिषि का मापन होता है। ॥१॥ अथ-समिधाम्यापानोपपत्ति अधिकत्सा पूर्व में गृहीत समिष को माहनीप में सबमा की समिधाम्पा भाम कर्म ।। समिवाम्पाधाम पद, हमापदेवता के समिम्पन से सम्बन्ध रमतारामांव-पार समिन्धन पद तथा श्रमों का पी किया बाता। माम बि मापनीय मनि में भारत अप का इसी नाम से पुलोकस्य देव- - 'वधिया विमोवता" (0 मा ।।११)। 'मक्षा होमस्थिम् पिणको नाष्टा रस्पपाहन ( Atu)। १४२ विज्ञानमाण शिवपपत्रामण B इध्मपरिपिनापणे . समों में गमन होने पला । मनि माइति नेनाने पाठे है। इधर ममि की प्रतिया पद, तपा भातुए है । पदि पद-इतु समिद है, तो सम्पबाट ममि भी समि है। एक समिद पनि ही हम्यपान कर्म में समप है। मत भातिकम्म से पहिले पन्द-ऋतु का समिन्धन मामक हो जाता है। समिभन होता है- मामि के उद्देश्य से परन्तु उप-प्रतु भौर पद । मपिता सम्बसरामि प्रमी, गर्षिय गायनाशिम भेद से चार भागों में पिमत बताया गया है। तीनों परिपि-निदानेन सम्मसराप्नित्रयी के प्रतिरूप, माननीयामि पपप्राप्ति का प्रतिरूप है। दोनों के समिम्पन के लिए पहिले समिप का परिधि से पर्ण करापा पाता । स से तो परिधिषणा पग्नित्रयी परोक्षकप से समिन होगाती, मन ग्सर समिप मापनीय में डाली जाती , स से इस का प्रस्परम्प से समिधन हो पाय॥ 'पीविहोप स्माइस्मादि गायत्री मन्त्र से ही प्रथम ममिव रामो जाती।। इस प्रपम समिघ से पदों का समिधन करना है। उधर घाट पत्री-प्रमुम है। गापपीहद ही सबपन्दों का मूम माना गया है। इस एक के समिपम मे इवर सब हम्दो का समिन्धन हो गया। प्रत मटर -ममिन्धमोरेश्य से गायत्री माग गपग्रीहन्द का समिपम | पाता है। समिद गती तर पोप का समिधन कर देती है। एक पे समिद छन्द देववाभों के लिए समान माने में समर्थ हो पाते। तात्पम्प इस समिम्बन का एकमात्र १-पाधिप वप्नि में रिम्य मोयुक्त मानि पा मम मेरा । सवयफ पापित बग्नि में पिटना पापान मही से गाय, तब तक यह पनि यो निकम्म में ही पूर्ण समर्थ गमता, एष म ऐसे विसर पारित भमिगत गि का Pम्पमापानिप्रधान प्राणनामों के साप दी समय होता गैस कि मागे सामिरेमी-मरों में विस्तार से बता पाने पा। प्रातिक पासोर सारिवानिए पापित पति पर समिपम इमपरिपितामणे सपनाम: धारमाम गायत्रीछन्द से ही होता है। सगोसीय उत्तरस्य ककीच से मरम्मर दरियल मारपणन्त क्रमशः बगती, त्रिगुप्, पछि, पुराती समुधुप, सब्धिक, गायत्री, पे सम्व देवन्द प्रतिष्ठित है। चगती सचर भाग की प्रतिमा सीमापर, पत्री दक्षिण भाग की मतिम सीमा पर है। उत्तरादिक सानुग्रता मानी गई है। मत एवं तदतिरूप उद्गाता की नदीची ही दिक् मनी वाती है, जैसाकि नदीषु दूगातु' (शत. १२) से स्पष्ट है। कर्करचमक उत्तर प्रदेशोपन पित सत्तरदिशा में प्रतिष्ठित सौर व दवियत्य गायत्रीहाव से सम्बाय करता जा सम्पूर्ण पदों को समिट करता है। । भपिच गायत्री भग्न का है। उपर 'प्रमिः सर्ग देवता के अनु- सार सम्पूण देवता ममि की ही भवस्पा शेप है। फलत मम्मि के गम पनी पद का सर्वपम्दोमूसा मसीमति सिन होमाता है। गायत्री समिधन से तपादक पाथिप परिम दिमभाव समावेश से दिम्पदेवरों के लिए मि-पहल में समर्प को चाता है । मपत्री पद काशिम्मि पो दिम्यामिारा समिद करने भाग माध्यम है। बतएव यह पद -समिपिनमर्म रक को जाता है। 'पीविरोम वा इस्पा मध्यपक पर समिक्षा गर्म होता गमाग होने वाले इस समि धन से भनि काम में सफल हो तो दिव्य तेजसमा धे से पुतिमान् बन at पिती स्पान से हर सेकर पुठोपर्यत गाता एमा पृहत् पन जाता है। इसका ममाने समिधान काममा पतिपणा हस्पिटीवरम दियाnl दूसरा समय से पमम्त का समिम्धन किया जाता है। कर्म में पित विनि विस का पुरेसायों के माप मmy कराने लगा है, जो कि म्य देशमा को उत्पन करने का है। पर अपना का माम में मावेश नही ले जाता, सतक प्रजनन मसामय है। समरसराद मना रेतो भनयम पीतपिपन के मनुमार प्रहरी प्रममा कर्म की मग्यित्री विधानमा शतपथमपण इमपरिपितामणे है। भाप्पारिमक पा में भी परामती-त्रीही गर्मापान पोम्पा मामी गफलत हम्पबहन के लिए महा इन्द समिपम मामपक 1,4/ प्रसन के लिए पात- समिन्धन मी भाषरपक बन पाता है। इस दितीय समिधाम्यापाम से पसन्त मत का ही समिन्धम शेता है। गायत्री मन्दोवत् बसम्मत इतर प्रीष्मादि पाचों ऋतुओं का महाधार है । फरतः बसन्त समिन्धम से स्वर अनुमों का समिधन होमाता रे समिधामों से भग्नि में अतुषम्म का समावेश होगाता है। एक वारिकम पग्नि देवात्मप्रबनन में समर्थ हो जाता है। इसी समिपमोपपति को बप में सार-"भूतका समिटा प्रमाइप प्रमनयन्ति" इमादि करा गया है, एक समिधाम्याधामकर्म की ही सक्षिप्त उपपति || प्रथ-मन्त्रजपोपपति परिधिस्थापन आरा तीनों भोर से तो माटानों का मात्रमण रोक दिया गया। पूर्व की बच रहती है। पूर्व PM मगवान् सर्प का साम्राप है। सीवेज से बहार माष्ट्रा-पों का माशक दूसरा नही। माहनीय के पूर्व माग में इस पक-दिप-प्राण क पापम की भावना से इस मोर मुम करके- 'मस्सा पुरस्ताव पातु फरपाश्पिमिगस्थ." इमादि मन्त्र का पप किया बावासा श्रय-विघृती-स्थापनोपपतिः "रिपती' उन दो दम घों की पाक्षिक संहा , निवेदि पर स्पापित किय नगा। महमेषा पुररिप बताया गण। प्रस्तररुप गिमा का स्थापन गया, भारमनीपादिरूप से शिरोमदिर पपरोस पापन होगया । मा मोरे । इन स्पारन मोर मपेपिसी दरप से इम्मपरिमियम मशपयार विपती स्थापन शेवा।पुरुपयासस्या में मोहे राती 1, बता निशान तहप विभूती मी तिर्यक् ही एसी चाती है। यही सिर्पगाधान की एक उपपलि है। उसी निदानमावा के भनुसार प्रस्न पत्र का प्रतिरूप है, तो एकमाई पिट का प्रतिस्प है। सहपरचा के ए दोमों का नियन्त्रण अति है। निस त्रा करमा मप्पोदा सूत्र का पाप ।। मर्यादा सूत्र भारत को देता। उस में पता नही मामा करना नहीं मानता । निदानेम मिती माया पत्र का प्रतिरूप है। पतएम इसे विर्य रूप से । स्थापित किया था। इसी पत्र-विद् विचरण कर्म से इसे 'विभूसी कहना मन बनता है। विती- स्पापम कर्म के अनन्तर यो प्रस्तर मिलाया जाता है, उस की उपपति स्पर||०, ११॥ प्रथ-मुक्स्थापनकम्मोपपत्तिः विभूती के ऊपर प्रस्तर स्थापन के मनन्तर यह मपर्य प्रस्ता के साथ अपने पामहस्त का सम्बन्ध बनाए ए बाम्नीध्र नामक लिहाव से क्रमश पुर, उपरत्, ग नाम के सुक्पात्रों को घृत पमि० लादि मप्र मोसा पुमा सेलेकर सेद प्रियेण पाम्नामादि मात्र बोमतामा हे देविपर सता माता है। यही मुक्माण-स्थापन कर्म है । पनन्तर 'घुग प्रसदन इमादि मन योग्ता मा स्थापन क्रमानुसार इन सब का सर्ग करता है। इस प्राण- स्पापन-पश-कम्म की कोई विशेष उत्पति नहीं। मप्रशणपके समय में मोबुद्ध विशेष काम्य पा, यह मूसानुगाद से ही गवार्थ ॥१९११,१४,१५,१५॥ इनि-शतपय विमानमाप्ये तीपापापे पती, मृतीयप्रपाउके ध प्रपम ग्राम समासम्।
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