Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Parikshamukham
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S16555
श्रीमाणिक्यनन्द्याचार्यविरचित
परीक्षामुखम् ।
1
श्रीमन्तवीर्याचार्यविरचित
प्रमेयरत्नमालासहित
सटिप्पणि च
श्रीमता पं० फूलचन्द्रशास्त्रिणा काशीहिन्दू
विश्वविद्यालयजैनधर्माध्यापकेन
संशोध्य संपादितम् ।
तथा
श्री वालचन्द्रजैनशास्त्रिणा
प्रकाशितम्
वीरसंवत्सरम्
२४५४
मुल्यम्
श-)
१९२८
GOVCOM
1
मुद्रक--
जयकृष्णदास गुप्ता-
विद्याविकास प्रेस, गोपालमंदिर, के उत्तर फाटक
बनारस सिटी।
,
.
Witual UUUUUUUUU । SUVE Anemaneman แนะนผยปบน FinamaAAR เนย ยยย समर्पणम् mmmmmin Limbuntunu mmmmmmun mmunith mmmmm เอก ใน EGORG 15000 श्रीमत्पूज्यपादानां विद्व- यन्यायाचार्यपण्डित Elwoooooooooooooooorvos 50000 गणेशप्रसादवाणः महोदयाना करकमलेषु ७०७pari GOESGio G050 MONGO सादरसमर्पितोऽयं ग्रन्थः । 90com ยผู้ยย ENTER AmAnnam thbhuminininy aurimmm uuuuuuubouth Minimmmmmm kinnrnwith Mmmmmmin Biduudhistir mmanmmunnat Emmmmmmm AAS
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प्रस्तावना।
-
उनके मन
ग्रन्थ के
यद्यपि प्रमेयरत्नमाला सहित परिक्षामुख कई दफे मुद्रित
हो चुकी है। परन्तु पाठकों के समक्ष यह नया रूप ही है जो
को
मुग्ध
करने वाला होगा। सूलग्रन्थ रहने से
प्रायः कर पठन पाठन शैली में बहुत कठनाई पडती थी। साथ
ही मूल प्रन्थ का जो भाव खुलना चाहिये था वह नहीं खुल
सकता था, इसलिये कठिन स्थलों के सरल करने को टिप्पणी
सहित यह ग्रन्थ प्रकाशित किया गया है । इस
प्रकाशित होने में पूरा श्रेय श्रीयुक्त भाई जगदीश चन्द्र जी
जैन वसेड़ा (मुजफ्फर नगर ) को है जिनकी असीम कृपा
से टिप्पणी सहित यह ग्रन्थ पठन पाठन शैली में उत्तम
रीति से आसका है। यद्यपि प्रमेयरत्नमाला की टिप्पणी
बहुत स्थलों पर पाई जाती थी, परन्तु अभी तक किसी
महाशय ने न तो स्वय प्रकाशित की है और न दूसरों
से ही प्रकाशित करवाई है। परन्तु आप को इस बात
से अरुचि है। आप का कहना है कि जब तक जैनसिद्धान्त
को प्रतिपादन करने वाले मौलिक ग्रन्थ संसार के सामने न
रक्खे जायेंगे तब तक जैन धर्म का संसार में प्रसार होना
मुश्किल है, इसी उद्देश्य को सामने रख कर आपने प्रमेयरत्न
माला की टिप्पणी को मुझे देकर मुद्रित करवाई, इसलिये
( २ ) आप अनेक हार्दिक धन्यवाद के पात्र है। तथा श्री युक्त पं० फूल चन्द्र जी शास्त्रो जैन धर्म अध्यापक हिन्दू विश्व- विद्यालय काशी ने कठिन परिश्रम से इस ग्रन्थ को संशोधित कर संपादित किया इसलिये वे भी अनेक धन्यवाद के पात्र हैं। विशेष कर श्रीमत्पूज्यवर गुरुवर्य न्यायाचार्य पं० गणेश प्रसाद जी वर्णी महोदय की असीम कृपा से हो मैं टिप्पणी सहित इस ग्रन्थ को आप लोगों के समक्ष रख सका हूं। आप ही की कृपा से सूल अन्य में जहां पर जो पाठ छूट गयेथे वे जोड़ दिये गये हैं। अन्त में पाटकों से मेरा नम्र निवेदन है कि मैं इस ग्रन्थ को वड़ो कठिनता से आप लोगों के समक्ष रख सका हूं। जहां तक मुझसे बना है ग्रन्थको सब तरह से सुन्दर बनाया है। फिर भी कहीं पर किसी प्रकार की त्रुटियां रह गई हों तो विद्वानों से मेरी यह नम्र प्रार्थना है कि वे मुझे उसके सूचित करने की कृपा करें ताकि आगे के संस्करण में वे त्रुटियां अलग की जासकें। সন্ধন্ধি -- सूत्रकार श्री प्राचार्य माणिक्यनन्दि का परिचय प्राचीन समय में एक प्रकार की पद्धती थी कि जो विद्वान् किसी भी ग्रन्थ को लिखते थे उस में वे अपना कुछ भी परिचय नही देते थे। बल्कि कई तो ऐसे ग्रन्थ हैं जिनके कर्ता का अभी तक पता नही चलता है कि इस के कर्ता कौन है ऐसी हालत में किसी भी ग्रन्थ कर्ता के सम्वन्ध इतिहास तैयार करना बहुत ही कठिन समस्या है। प्रस्तुत सूत्रकार श्री माणिक्यनन्दिस्वामी उन में से एक है जिनके सम्बन्ध में अभी बहुत कुछ खोज बाकी है। फिर भी अभी तक जो कुछ भी सामनी प्रस्तुत सूत्रकार या अन्य जैनाचार्यों के सम्बन्ध में उपलब्ध हुई है। उसका प्रेय श्रीमान् पं० नाथूरामजी प्रेमी मालिक हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय बम्बई को है। आपने अपने कठिन परिश्रम से जैनधर्मके स्तंभरूप पूज्य आचार्यों के सम्बन्ध में जो भी मौलिक सामाग्री इस जैन समाज को भेंट की है, उसके लिये यह जैन समाज सर्वदा आपकी ऋणी रहेगी। आचार्य श्रीमाणिक्यनन्दि स्वामी के पांडित्य का परिचय देना सूर्यको दीपक दिखा कर अपनी हंसी कराना है। जिन विद्वानों ने परीक्षामुख को अध्ययन किया होगा चे उनके
(४)
पांडित्य का अनुमान कर सकते हैं। जैन न्यायको सूत्रवद्ध
करने वाले. सवसे. प्रथम आपही हैं। यद्यपि इस कृति के
पहिले भगवान् समंत भद्र और भट्टाकलंक देव आदि अनेक
आचार्यों की मौलिक कृतियों ने दार्शनिकों के ऊपर अपना
सिक्का जमा लिया.था। परन्तु जैनधर्म के लिये न्यायशास्त्र
के लूत्रबद्ध न रहने से. जो त्रुटि रह जाती उसकी पूर्ति
आपने ही की है।
समय निर्णय
श्री पं० वंशीधरजो शास्त्री सोलापुरने प्रमेयकमल मार्तण्ड
की प्रस्तावना में विक्रम संवत् ५६९ से श्रीमाणिक्यनन्दि स्वामी
को परीक्षामुख का कर्ता लिखा है। साथ ही यह भी उल्लेख
किया है कि भाकलंकदेव उनसे पहिले अपने ज्ञान सूर्यका
प्रकाश लोक में कर चुके थे। जिससे पण्डितजी को
भट्टाकलंकदेव के बाद माणिक्यनन्दि स्वामीका होना इष्ट है
ऐसा प्रतीत होता है। परन्तु आपने यह समय निर्णय किस
आधार पर किया है इसके सम्बन्ध में आप सर्वथा मौन हैं।
भट्टाकलंकदेव का जीवन काल. विक्रम की आठवीं
शताब्दी का पूर्वभाग माना जाता है । अनेक विद्वानों ने
इसी बातकी पुष्टि की है। साथ ही प्रभाचन्द्र आचार्य ने
न्यायमुकुन्दचन्द्रोदय के प्रथम अध्याय में लिखा है कि मुझे
स्वामी अकलंकदेव के चारणों की सेवा से. वोधलाभ हुआ
लोक ये है।
$
( ) . बोधः कोप्यसमः समस्तविषयं प्राप्याकलंक पद जातस्तेन समस्तवस्तुविषयं व्याख्यायते तत्पदम् । किं न श्रीगणभृजिनेन्द्रपदतः प्राप्तप्रभावः स्वयं, व्याख्यात्यप्रतिमं वचो जिनपतेः सर्वात्मभाषामयम् । इससे निर्विवाद सिद्ध है कि प्रभाचन्द्राचार्य स्वामी भट्टाकलंकदेव के.समय में थे । इधर आपने प्रमेषकमल मातण्ड की समाप्ति मे श्रोमाणिक्य नन्दि स्वामी का गुरु रूप से स्मरण किया है यथा- गुरुः श्रोनन्दिमागिक्यो नंदिताशेषसज्जनः । नंदताद्दुरितकान्तरजो जैनसतार्णवः ॥ १ ॥ इससे भी विदित होता है कि भट्टाकलंकदेव स्वामी के समय में परीक्षामुख सूत्रकार मौजूद थे । भट्टाकलंकदेव का समय श्रीराजवार्तिक से विदित हो सकता है अतएव यहां पर उल्लेख नहीं किया है । इसलिये माणिक्यनन्दि स्वामी का जीवन कालभी भट्टाकलंकदेव के समान मानना चाहिये 'परन्तु इतना अवश्य है कि इन सव आचार्यों में प्रधान भट्टाकलंकदेव समझे जाते थे। जिसकी पुष्टि स्वामी अनन्त वीर्य ने भी की है। अकलंकवचोंभोधेरुद्दधे येन धीमता। न्यायविद्यामृतं तस्मै नमो माणिक्यनन्दिने ॥ २ ॥ स्वामी माणिक्यनन्दि ने किस संघ को सुशोभित किया इसके सम्बन्ध में हम कुछ भी नहीं लिख सकते हैं । .. -
(६ )
गार्हस्थ्य जीवन भी आपका कैसा व्यतीत हुआ किस कुलको
आपने सुशोभित किया इसका भी पता नहीं चलता है।
परन्तु अनुमान इतना अवश्य होता है कि इनको भी
तत्कालीन अन्य आचायों की तरह दक्षिणदेशीय होना
चाहिये।
प्रमेयरत्नमाला कर्ता
अभी तक आपके बाबत निश्चित कुछ भी नहीं हुओ
कि आपने कब अपने ज्ञान सूर्यसे संसार को प्रकाशित किया
इसलिये मैं पाठकों के समक्ष आपके बावत कुछ भी नहीं
लिख सकता हूं। परन्तु इतना निश्चित है कि प्रमेयरत्नमाला
प्रमेयकमलमार्तण्ड के पीछे उसी के आधार पर लिखी गई
। कई प्रमेयकमलमार्तण्ड और प्रमेयरत्नमाला के ऐसे
प्रकरण हैं जो बराबर मिलते जुलते हैं।
मार्तण्ड को संक्षेप कर जिस उत्तमता से प्रमेयरत्नमाला लिखी
गई है वह विद्वानों को मुग्ध कर लेने वाली है। अन्यकर्ता ने
स्वयं प्रमेयरनमाला की आदि में इस बातकोस्वीकार किया
है कि मैं श्री प्रभाचन्द्र आचार्य के उदार वचनों को जिस
प्रकार समुद्र का जल न्यूतन घट में भराजाता है इस
प्रकार इस ग्रन्थ में समाविष्ट करता हूं।
our
परन्तु प्रमेयकमल
संपादक
. - ॥ श्राः ॥ ग्रन्थपरिचय - श्री आचार्य माणिक्यनन्दि ने जैन न्याय को सूत्रबद्ध किया था, जिसका नाम परीक्षामुख है। सचमुच में यह ग्रन्थ परीक्षा का आदिस्थान है। जिस पुरुष की इस में प्रवृत्ति हो जायगी उस को संसार के संपूर्ण न्याय शास्त्र साध्य हो सकते हैं। साथ ही इसमें दूसरे दर्शनों का समावेश करके जिस उत्तमता के साथ उनका विचार किया गया है वह दार्शनिकों के मन को मुग्ध करने वालो है। इस के छह अधिकार हैं प्रमाणस्वरूपाधिकार, २ प्रत्यक्ष प्रमाणाधिकार, ३ परोक्षप्रमाणाधिकार ४ प्रमाणविषयाधिकार प्रमाणफलाधिकार प्रमाणामासाधिकार । इन अधिकारोंसे जिस विषय का वर्णन हैं वह अधिकारों के नाम से ही मालूम हो जाता है । परीक्षामुख के सूनों पर दो टोकायें लिखा गई हैं । एक प्रभाचन्द्र आचार्य कृत प्रभेयकमलमार्तड और दुसरी आचार्य श्मनन्तवीर्यकृत परीक्षामुख लघुसूत्रवृत्ति, इसका दूसरा नाम प्रमेयरत्नमाला भी है। इस समय मैं पाठकों के समक्ष दूसरी टीका को ही रख रहा हूं । यद्यपि यह ग्रन्थ कई दफे मुद्रित हो चुका है परन्तु जिस रूप में मैं इस को उपस्थित कर रहा हूं, यह पाठकों को एक नई वस्तु ही है। अभी तक यह मूल रूप में ही पाठकों के सामने आया था ( ८ ) - 1 परन्तु अब वह टिप्पणी सहित प्रकाशित किया गया है जिससे प्रसेयरत्नमाला के संपूर्ण कठिन स्थल उससे खुल जाते हैं। सूल ग्रन्थ में भी जहां जो पाठ छूटगये थे उस स्थल पर वे जोड़ दिये गये हैं। साथ ही जो परम्परा से अशुद्धियां आरहीं र्थी वे भी निकाल दी गई हैं । इस ग्रन्थ में योग, बौद्ध, पुरुषा- द्वैतवादी, चार्वाक, प्राभाकर और माह के शिद्धान्तों को पूर्वपक्ष में रखकर बड़ी उत्तम रीति से विचार किया गया है. ।। संपादक- 1 - ॥ श्रीः॥ . ॥ परीक्षामुखम् ॥ ॥ प्रमेयरत्नमालासहितम् ॥ - . 1 ॥ ॐ नमः सिद्धेभ्यः ॥ नतीमरशिरोरत्न-प्रभाप्रोतनखत्विषे ॥ नमो जिनाये दुर्वारमारवीरमदच्छिदे ॥१॥ १ प्रणतचतुर्णिकायदेवमानवपरिपृढचटुलमुकुटघटितमणिगणकिमीरितपद- नखमरीचये । मंगलं द्विविधं मुख्यममुख्यं चेति । मुख्यमंगल जिनेन्द्रगुण- स्तोत्रममुख्यमंगलं दध्यक्षतादि, तन मुख्यमगल द्वेधा निवद्धमनिवद्धं चेति.। तत्र निवद्धं स्वेन कृत मनिवद्धं परकृतम् । तदपि द्विविध परापरभेदात् । आ. तनमस्कारः परमंगल गुरुपरम्परानमस्कारो ऽपरमंगलम् । २ जिनाय समस्त- भगवदर्हत्परमेश्वराय नमो भूयात् । वहुविधं विषमगहनभ्रमणकारणं दुःकृत जयतीति जिनस्त्रिलोकगोचरपरमजिन इत्यर्थ स्तस्मै । ३ दुर्वारमारवीरमदच्छि- दे-मां लक्ष्मी राति ददातीति मारो लक्ष्मीदायको मोक्षमार्गस्य नेतेति यावत् । विशेषेण ईते सकलपदार्थजातं प्रत्यक्षीकरोतीति वीरः सर्वज्ञो विश्वतत्वानां ज्ञातेति यावत् । मारश्वासौ वीरश्व मारवीरः । मदं मानकषाय छिनत्ति विदा- रंयतीति मंदच्छित् , उपलक्षणपदमिदं कर्मभूमृतां भेत्तति यावत् । मारखीरश्वासौ परीक्षामुखम् । - अकलङ्कवचोऽम्भोधेरुद्दधे येन धीमतों ॥ न्यायविद्यामृतं तस्मै नमो माणिक्यनन्दिने ॥ २॥ प्रभेन्दुवचनोदारचन्द्रिकाप्रसरे सति ॥ मोदृशाः क्व नु मण्यन्ते ज्योतिरिङ्गणसन्निभाः ॥ ३ ॥ तथाऽपि तद्वचो ऽपूर्वरचनारुचिरं सताम् ॥ चेतोहरं भृतं यद्वन्नद्या नवघटे जलम् ॥ ४ ॥ वैजेयप्रियपुत्रस्य हीरपस्योपरोधतः ।। शान्तिषेणार्थमारब्धा परीक्षामुखपञ्चिका ॥ ५॥ मदच्छिच्च मारवीरमदच्छित् , दुर्वारो वादिभिरजय्योऽप्रतिहतशक्तिरिति यावत् दुर्वारश्चासौ मारवीरमदच्छिच्च दुर्वारमारवीरमदच्छित्तस्मै । अथवा मा प्रमेयपरि- च्छेदकं केवलज्ञानमेव रविरशेषपदार्थप्रकाशकत्वात् , इरा मृदुमधुरगंभारनिरुप- महितदिव्यध्वनिः । मारविश्च इरा च मारवीरे, दुर्वारे कुतुदृष्टान्तै निर्वारयि- तुमशक्ये मारवीरे यस्य स तथोक्तः। मदेनोपलक्षिता रागादयस्तेन मदच्छि. द्रागाद्यशेपदोषच्छिदिति निश्रीयते । उक्तस्यैव विवर्णनम् मदच्छिदे कर्मभूमृतां- भेत्रे, दुर्वारमारवये विश्वतत्वानां ज्ञात्रे, दुर्वारराय भोक्षमार्गस्य प्रणेत्रे । १ अकलंको भटाकलंकः स्वामी, अथवा न विद्यते ऽज्ञानादिकलंको यत्त्यासौ- ऽकलंको जिनदेवः, अथवाकलंकञ्च तहचश्चेत्यर्कलकवचो दिव्यध्वनिरित्यर्थः । २ प्रकटीकृतम् । ३ माणिक्यनंदिना की। ४ प्रशस्तविशालातिशयितज्ञानव. ता। ५ शान्तिपेणपठनार्थ । ६ लक्षितस्य लक्षणमुपपद्यते नवेति विचारः परी- क्षा । अथवा स्वरूपं तदाभासः, संख्या तदाभासः, विपयस्तदाभासः, फलं तदाभास एतेषां विचारः परीक्षा अथवा विरुद्धनानायुक्तिप्रावल्यदौर्बल्यावधार- णाय प्रवृतमानो विचारः परीक्षा। ७ कारिकास्वल्पवृत्तिस्तु, सूत्रं सूचनक ।
प्रमेयरत्नमालासहितम् । श्रीमन्यायोवारपारस्यामेयप्रमेयरत्नसारस्यावगाहनमव्यु- त्पन्नः कर्तुं न पार्यत इति तदवगाहनाय पोतप्रायमिदं प्रकरण- माचार्यः प्राह ॥ तत्प्रकरणस्य च सम्बन्धादित्रयापरिज्ञाने सति प्रेक्षावतां प्रवृत्तिनस्यादिति तत्रयानुर्वादपुरःसरं वस्तुनिर्देशपरं प्रतिज्ञोश्लोकमाह- स्मृतं। टीका निरन्तरं व्याख्या, पश्चिका पदभजिका 11 १ पूर्वापरविरोधरहि- तत्वलक्षणा श्रीः, निधिकत्वलक्षणा, श्रद्धानादिगुणोत्पन्नलक्षणा वा श्रीः । २ नयप्रमाणात्मको न्यायः। निपूर्वादिणगतावित्यस्माद्धातोः करणे घञ्प्रत्पये न्यायशब्दसिद्धिः । नितरां इयते ज्ञायते ऽर्थो ऽनेनेति न्यायः । प्रमाणशास्त्रक्षी- रसमुद्रस्य श्रीमदित्यादिनियमेन कथंचित्सावधारणत्वेन प्रमेयस्वरूपमियते ग- म्यते येन स न्यायः, नयप्रमाणयुक्तिस्तत्प्रतिपादकत्वादिति युक्तिशास्त्रमपि न्यायः। श्रीमांश्चासौ न्यायश्चेति श्रीमन्न्यायः। ३ अमेयानि कुदृष्टिभि बोद्ध- मशक्यानि विशेपतोऽनंतानतानि वा प्रमेयाणि परिच्छेद्यानि जीवादिवस्तूनि रत्नेषु साराणि, उत्कृष्टरत्नानि रत्नसाराणि पुनर्वहुव्रीहिरमेयप्रमेयरत्नैः सार उकृष्ट इति तत्पुरुषो वा । युक्तिशास्त्रसंस्काररहितैः पुरुषैः । ४ प्रायो भूमोपमार्तक्यप्रभृत्यन्ननिवृत्तिषु । ५ माणिक्यनन्दिदेवः । ६ परी क्षामुखप्रकरणस्य ७ आदिशब्देनाभिधेयशक्यानुष्ठानेष्टप्रयोजनम् । ८ विचारवतां। ९ उक्तस्य सार्थकं पुनर्वचनमनुवादः । णतदाभासलक्षणभिधेयकथनपरम् । ११ वर्तमानस्यांगीकारः प्रतिज्ञा । - १० प्रमा- 1 ४ परीक्षामुखम् । E प्रमाणादर्थसंसिद्धिस्तदाभासाद्विपर्ययः ॥ इति वक्ष्ये तयोर्लक्ष्म सिद्धमल्प लघीयसः ॥१॥ इत्यस्यार्थः-अहं वक्ष्ये प्रतिपादयिष्ये। कि तल्लक्ष्म, लक्षणम् । कि विशिष्टं लक्ष्म ? सिद्ध, पूर्वाचार्यप्रसिद्धत्वात् । पुनरपि कथंभूतं ? अल्पमल्पग्रन्थवाच्यत्वात् । ग्रन्थतोऽल्पम. र्थतस्तु महदित्यर्थः । कान् ? लघीयसो विनेयानुद्दिश्य। लघवं मतिकृतमिह गृह्यते न परिमाणकृतं नाऽपि कालकृतं तस्थ प्र. ? १ अत्र प्रमाणशब्दः कर्तृकरणभावसाधनः । तत्र प्रतिवन्धविगमविशेषव. शात्स्वपरप्रमेयस्वरूपं प्रमिनोति यथावज्ञानातीति प्रमाणमात्मा प्रतिवन्धापाये प्रादुर्भूतज्ञानपर्यायस्य प्राधान्येनाश्रयणात्प्रदीपादेः प्रभाभारात्मकप्रकाशवत् । साधकतमत्वादिविवक्षायां तु प्रमीयते येन तत्प्रमाणम् , प्रमितिमात्रं वा प्रमाणं २ अर्थः स्याद्विषये मोक्षे, शब्दवाच्ये प्रयोजने । व्यवहारे धने शास्त्रे, वस्तुहेतुनिवृत्तिषु । १ । अर्थते गम्यते ज्ञायते यः सोर्थः । ३ तन्न भवति तथापि तदिवभासते प्रतिभातीति तदाभासः । ४ स्वरूचिविरचितत्वदूपणपरिहारार्थ सिद्धमित्युच्यते । ५ पिष्टपेपणदूषणपरिहारार्थमल्लमित्युच्यते । ६ तीव्रमतीन्म- न्दमतीश्च शिप्यान् । ७ व्यतिकीर्णवस्तुव्यावृत्तिहेतुर्लक्षणम् । ८ शिष्यान् । ९ अनुलक्षाकृत्य । १० लाघवं त्रिविधं मतिकृतं कालकृतं कायपरिमाणकृतं चेति । तत्र नात्यद्वयमत्र ग्राह्यम् व्यभिचारात्तथाहि-विमतो व्युत्पाद्यः काल- कृतलाघवादित्युक्ते .गाष्टमवर्षजातज्ञानसपनसंयतेन व्यभिचारात् । विमतो व्युतायः कायकृतलाघवादित्युक्ते विदितशास्त्रेण कुब्जादिनानेकांतात्तयो व्युत्पा- प्रमेयरत्नमालासहितम् । तिपाद्यत्वव्यभिचारात् । कयोस्तल्लक्ष्म, तयोः प्रमाणतदाभास- योः। कुतः यतोऽर्थस्य परिच्छेद्यस्य संसिद्धिः संप्राप्ति प्तिर्वा भवति । कस्मात्प्रमाणात् । न केवलं प्रमाणादर्थसंसि- द्धिर्भवति । विपर्ययो भवति । अर्थसंसियभावो भवति । क- स्मात्तदाभासात् प्रमाणाभासात् । इतिशब्दो हेत्वर्थे, इति हेतोः । अयमत्र समुदायार्थः। यतः कारणात्प्रमाणोदर्थसंसिद्धि- र्भवति । यस्माञ्च तदाभासाद्विपर्ययो भवति । इति हेतोस्तयोः प्रमाणतदाभासयोर्लक्ष्म लक्षणमहं वक्ष्ये इति ॥ ननु सम्बन्धी- भिधेयशक्यानुष्ठानेष्टप्रयोजनवन्ति हि शास्त्राणि भवन्ति । त- त्रास्य प्रकरणस्य याचदभिधेयं सम्बन्धो वा नाभिधीयते न . Marat दकत्वात्। १ शिष्यत्व। २ साध्याभावे प्रवृर्तमानो हेतुर्व्यभिचारी भवति । ३ इति हेतुप्रकरणप्रकर्षादिसमाप्तिषु । ४ अवयवार्थमुक्त्वा - समुदायार्थः प्रतिपाद्यते ऽवयवार्थप्रतिपत्तिपूर्वका समुदायार्थप्रतिपत्तिरिति न्यायात् । ५ स- म्बन्धशब्दस्याल्पाच्वात्पूर्वनिपातो ऽन्यथाभिधेयपूर्वकत्वात्सम्बन्धशब्दस्य पूर्व- निपातत्व नोपपद्यते । प्रकृतस्यार्थस्यानुरोधेनोत्तरोत्तरस्य विधानं सम्बन्धः । सिद्धार्थ सिद्धसम्बन्धं श्रोतु श्रोता प्रर्वतते । शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः ॥ १॥ व्याख्याशुद्धिस्त्रिधा शास्त्रे, स्थानमार्गप्रमेयतः। स्थानं विधा द्विधा मार्गः प्रमेयं च त्रिधा विदुः ॥ २॥ तत्र पातनिकस्थानं, समर्थनस्थान विवरणस्थानं चेति त्रिधा स्थानम् । पातनिकस्थानं द्विविधं सूत्रपातनिका, ग्रन्थपातनिकेति । अन्वयमार्गो, व्यतिरेकमार्ग इति मार्गो द्विधा । प्रकृतप्रमेयं, प्रासंगिकप्रमेयमानुषंगिकप्रमेयमिति त्रिधा प्रमेयम् । '६ : एवं सति, त्रिषु । - ६ परीक्षामुखम् । ताबदस्योपादेयत्वं भवितुमर्हति । एष वन्ध्यासुतो यातीत्या. दिवोक्यवत् । दर्शदाडिमादिवाक्यवच्च ॥ तथा शक्यानुष्ठाने- टप्रयोजनमपि शास्त्रादाववश्यं वक्तव्यमेव । अशक्यानुष्ठाने. एप्रयोजनस्य सर्वज्वरहरतक्षकचूडारत्नालङ्कारोपदेशस्येव प्रे- क्षावद्भिरनादरणीयत्वात् । तथा शक्यानुष्ठानस्याप्यनिष्टप्रयो- जनस्य विद्वद्भिरधीरणान्मातृविवाहादिप्रदर्शकवाक्यवदिति । सत्यं, प्रमाणतदाभासपदोपादानादभिधेयमभिहितमेव,प्रमाण- तदाभासयोरनेन प्रकरणेनाभिधानात् । सम्बन्धश्चार्थायातः प्रकरणतदभिधेययोर्वाच्यवाचकभावलक्षणः प्रतीयत एव । तथा प्रयोजनं चोक्तलक्षणमादिश्लोकेनैव संलक्ष्यते, प्रयोजनं हि द्विधा भिद्यते : साक्षात्परम्परयेति । तत्र साक्षात्प्रयोजन वक्ष्ये इत्यनेनाभिधीयते । प्रथमं शास्त्रव्युत्पतेरेव विनेयैरन्वेषणा- त् ॥ पारम्पर्येण तु प्रयोजनमर्थसंसिद्धिरित्यनेनोच्यते शास्त्र- १ एप वन्ध्यामुतो याति, खपुष्पकृतशेखरः। मृगतृष्णांभसि स्नात्वा, शशशृङ्ग- धनुर्धरः।१। इत्यनेनाभिधेयो नाभिधीयते। अत्र सम्बन्धो वर्तते परन्त्यभिधेयत्वं २ दश दाडिमानि, षट् पूपाः, कुण्डक्रव्यमजाजिनं इत्यमुनासूचतो- ऽसंवन्धः। ३ शास्त्रादौ शक्यानुष्ठानं मास्त्विष्टप्रयोजनमस्त्विति शंकानिवार- थम् । ४ तक्षको नागभेद स्याद्वर्धकिट्ठमभेदयोरित्यनेकार्थस्तत्रपन्नगार्थोत्र गृह्यते । ५ अनादरणीयत्वात् । ६ यजुर्वेदप्रवृत्तिलक्षणे, मातरमपि वि. णीयात्पुत्रकाम इति श्रुतिः .! अर्धाजीकारे । ८ कथितमेव । ९ वाच्यमभिधेयम् । १० वाचकंप्रकरणम् । ११ शास्त्रव्युत्पत्तिः साक्षात्प्रयोजनम् । १२ मतेविशेषण संशयविपर्ययानध्यवसायव्यवच्छे. । । नास्ति । ७ 41 प्रमेयरत्नमालासहितम् । व्युत्पत्त्यनन्तरभावित्वादर्थसंसिद्धेरिति ॥ ननु निःशेषविघ्नो. पशमनायेष्टदेवतानमस्कारः शास्त्रकृता कथं न कृत इति न वाच्यम् । तस्य मनःकायाभ्यासपि सम्भवात् अथवा वाचनि- कोऽपि नमस्कारोऽनेनैवादिवाक्येनाभिहितो वेदितव्यः । के पाश्चिद्वाक्यानामुभयार्थप्रतिपादनपरत्वेनापि दृश्यमानत्वात् । यथा श्वेतो धावतीत्युक्ते श्वा इतो धावति श्वेतगुणयुक्तो धावति इत्यर्थद्वयप्रतीतिः ॥ तत्रादिवाक्यस्य नमस्कारपरता- भिधीयते ॥ अर्थस्थ हेयोपादेयलक्षणस्य संसिद्धिज्ञप्तिर्भवति । कस्मात् ? प्रमाणात् । अनन्तचतुष्टयस्वरूपान्तरङ्गलक्षणा, समव- सरणादिस्वभावा बहिरङ्गलक्षणा लक्ष्मीर्मा इत्युच्यते । अणन- माणः शब्दो मा च आणश्च माणौ प्रकृष्टौ माणौ यस्यासौ प्रमा. णः। हरिहरायसम्भविविभूतियुक्तो हृष्टेष्टाविरुद्धवाक्च भग- वानहन्नेवाभिधीयत इत्यसाधारणगुणोपदर्शनमेव भगवतः संस्तवनमभिधीयते । तस्मात्प्रमाणादवधिभूतादर्थसंसिद्धि. भवति तदाभासाच्च हरिहरादेरर्थसंसिद्धिर्न भवति । इति हेतोः सर्वज्ञतदाभासयोर्लक्ष्म लक्षणमहं वक्ष्ये-सामग्रीविशेषेत्यादि- ना ॥ अथेदानीमुपक्षिप्तप्रमाणतत्त्वे स्वरूपसंख्याविषयफललक्ष. देनोत्पत्ति र्युत्पत्तिः । १३ शोधनात् । १ माणिक्य नन्दिविभुना । २ नमस्कारस्य । ३ प्रमाणादर्थसंसिद्धिरित्यनेनैव । ४ अण्यते शब्द्यते येनासा- वाणो दिव्यध्वनिरित्यर्थः । ५ प्रत्यक्षपरोक्षाभ्यामविरुद्धवाग्यस्य सः। ६ स- वैज्ञात् । . ७ अर्थसंसिद्धःप्रथमकारणभूतात् । ८ स्वरूपविप्रतिपत्तियथा स्वापू- वर्थिव्यवसायात्मक ज्ञान-प्रमाणमित्यार्हतः। इन्द्रियवृत्तिः प्रमाणमिति कापिलाः + ८ परीक्षामुखम् । । णासु चतसृषु विप्रतिपत्तिषु मध्ये स्वरूपविप्रतिपत्तिनिराकर णार्थमाह- ||स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकं ज्ञानं प्रमाणमिति ॥५॥ प्रमातृव्यापारः प्रमाणमिति प्राभाकराः । अनधिगतार्थाधिगंतृ प्रमाणमिति भाटाः । अविसंवादिविज्ञान प्रमाणमिति सौगताः । प्रमाकरणं प्रमाणमिति यौगाः । कार- कसाकल्य प्रमाणमिति जरनैयायिकाः। संख्याविप्रतिपत्तियथा-प्रत्यक्षमेकं चार्वाकः कारणात्सौगताः पुनः । अनुमानं च तच्चैव सांख्याः शब्दं च ते अपि ॥१॥ न्यायैकदेशिनोऽप्येव मुपमानं च केन च । अर्थापत्या सहैतानि चत्वार्याहुः प्रभाकराः ॥ २ ॥ अभावपष्ठान्येतानि भाटा वेदान्तिनस्तथा। सम्भवैतिह्ययु- कानि तानि पौराणिका जगुः ॥ ३ ॥ प्रत्यक्षपरोक्षभेदाद्विविधं प्रमाणमिति जैनाः वदन्तिः । विषयविप्रतिपत्तियथा---प्रमाणतत्वस्य सामान्यमेव विषय इति कापिलाः पुरुपाद्वैतवादिनच, विशेषमेव विपय इति वौद्धाः । सामान्य वि. शेषश्च द्वयमपि स्वतन्त्रेण विषय इति योगाः, सामान्यं विशेपश्चाभेदेन विषय इति मीमांसकाः । उभावपि कथञ्चिद्भेदाभेदाभ्यां विषय इति जैनाः । फल- विप्रतिपत्तियथा-फलं प्रमाणाद्भिन्नमिति कापिलाः योगाश्च, प्रमाणादभिन्नमिति सौ- गताः प्रमाणात्कथाचित्फलमभिन्नभिन्नमिति जैनाः। १ सूत्रं द्विविधं तद्यथागमप्रमे णमनुमानप्रमाणञ्च तदुक्तं श्लोकवार्तिकालंकारे-प्रमाणमागमः सूत्रमाप्तमूलत्व- सिद्धितः । लैक्षिकं चाविनाभावि लिक्षात्साध्यस्य निर्णयात् ॥ १॥ तथेदं सूत्र. मनुमानप्रमाणं भवति, अल्पाक्षरत्वे सति वह्वयंसूचकत्वं सूत्रत्वम् , रमसन्दिग्धं न्यायवद्विश्वतोमुखम् । अस्तोममनवद्यश्च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥२॥ स्वस्थात्मनो ऽपूर्वार्थस्यानिश्रतस्य वाह्यस्य पदार्थस्येतिस्वापूर्थियो निश्चयस्वरूप कम् । २ मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानि ज्ञानमिति सभ्यरज्ञानानां सामान्यज्ञान- -- - अल्पाक्ष.
प्रमेयरत्नमालासहितम् । प्रकर्षेण संशयादिव्यवच्छेदेन मीयते परिच्छिद्यते वस्तुत- त्वं येन तत्प्रमाणम् ॥ तस्य च ज्ञानमिति विशेषणमज्ञानरूपस्य सन्निकर्षादेनयायिकादिपरिकल्पितस्य .. प्रमाणत्वव्यवच्छेदा- र्थमुक्तम् ॥ तथा ज्ञानस्यापि स्वसंवेदनेन्द्रियमनोयोगिप्रत्यक्ष- स्य निर्विकल्पकस्य प्रत्यक्षत्वस्य प्रामाण्यं सौगतः परिकल्पितं तन्निरासार्थ व्यवसायात्मकग्रहणम् ॥ तथा बहिरापह्नोंतॄणां - -- --.-. पदेन सङ्ग्रहात् , हेतुहेतुमद्भावज्ञापनार्थ ज्ञानमिति भिन्नपदकमिति, ज्ञानं प्रमाणं भवितुमर्हति स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकत्वात् । ज्ञानमिति विशेषणेनाव्याप्तिपरि- हारः , । व्यवसायात्मकमिति विशेषणेनातिव्याप्तिपरिहारः । स्व इति, वि- शेपणेनासंभवदोषनिराकरणम् । ३ प्रमेयप्रमितेराभिमुख्येन चेतना- त्मकः। यः प्रमातुः प्रयत्नः स्यात्तत्प्रमाणं जिनमतम् ॥ १॥ १ सामा- न्यप्रत्यक्षाद्विशेषस्मृतेश्च सशयः। आदिशब्देन विपर्ययानध्यवसायौ ग्राह्यौ । २ करणत्वप्रतिपन्नज्ञानस्य । ३ इन्द्रियार्थयोः सम्वन्धः सन्निकर्षः, कारकाणां 'समूहः कारकसाकल्यम् , लघुनैयायिकानां सन्निकर्षों जरनैयायिकानां कारकसा- कल्यं, कापिलानामिन्द्रियवृत्तिः, प्राभाकराणाम् ज्ञातृव्यापारोऽज्ञानरूपोऽपि । ४ सर्वचित्तचैत्तानामात्मसवेदनं स्वसंवेदनप्रत्यक्षम् , ५ इन्द्रियार्थसमनन्तरभव. मिन्द्रियप्रत्यक्षं, स्वविषयानन्तरविषयसहकारिकारणेन्द्रियज्ञानेन समनन्तरप्रत्य- येन जनितं मनःप्रत्यक्षम् ,क्षणिकभावनापरमप्रकर्षपर्यन्तजं योगिप्रत्यक्षम् । यो गाचारवेदान्तिकमाध्यमिकानां, सर्व माध्यामिकेशुन्यं योगाचारेऽवहिर्गतम् । सौत्रांतिकेऽनुमेयं स्यात् सर्व वैभासिके स्फुटम् ॥ १ ॥ ६ निश्चयात्मक । ७ अपलापिनाम् । r-mt4 १० परीक्षामुखम् । विज्ञानाद्वैतवादिनां पुरुषाद्वैतवादिनां पश्यतोहराणां शून्यैका- न्तबादिनां च विपर्यासन्युदासार्थसर्थग्रहणम् ॥ अस्य चापूर्व विशेषणं गृहीतग्राहिधारावाहिज्ञानस्य प्रमाणतापरिहारार्थमु. तम् । तथा परोक्षज्ञानवादिनां मीमांसकानामस्वसंवेदनज्ञान- चादिना सांख्यानां ज्ञानान्तरप्रत्यक्षज्ञानवादिना यौगांनां च मतमपाकर्तुं स्वपदोपादानमित्ययाप्त्यतिव्याप्त्यसम्भबंदोप- परिहारात् सुव्यवस्थितमेव प्रमाणलक्षणम्॥ अस्य च प्रमाणस्य यथोक्तलक्षणत्वे साध्ये प्रमाणत्वादिति हेतुरत्रैव द्रष्टव्यः। प्र- मथान्तस्यापि हेतुपरत्वेन निर्देशोपपत्तेः । प्रत्यक्षं विशदं ज्ञान- मित्यादिवत् ॥ तथाहि-प्रमाणं स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकं ज्ञानं भवति प्रमाणत्वात् ॥ यत्तु स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकं झानं न भवति न तत्प्रमाणम् । यथा संशयादिर्घटीदिश्च । प्रमाणं च विवादापन्नम् । तस्मात्स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकं ज्ञानमेव भ. १ पश्यन्तमनादृत्यहर्तृणाम् ।। २ परोक्षं जैमिनेनं, कृतः । ज्ञानं फले च भस्य शेषं प्रत्यक्षमिष्यते । १। ३ ज्ञानमस्वसविदितमचेत. नत्वात् , ज्ञानमचेतनं प्रधानपरिणामित्वादिति वादिनाम् । ४ एकात्मसमवे- तानन्तरज्ञानवेद्यमर्थज्ञानं न स्वसंवेदितमित्यर्थः ५ नैयायिकवेशीपकाणाम् । ६ लक्षणत्वेनाभिमते वस्तुनि क्वचित्प्रवर्तनं क्वचिच्चाप्रवर्तमव्याप्तिः । ७ तत्रान्यत्र च वर्तन मतिव्याप्तिः ८ यत्र लक्ष्ये क्वाप्यवर्त्तनमसंभवः । ९ पञ्चम्यन्तस्यैव हेतुत्वं प्रथमान्तस्य कथमित्याशंक्याह प्रथमान्तस्येति यथा गुरवोराजमापाः न- भक्षणीया इत्यत्र प्रथमांतोऽपि गुरुत्वादिति हेतुः । १० प्रत्यक्षं धर्मी विशदं जानं भवितुमर्हति प्रत्यक्षत्वात् । ११ बौद्धं प्रति दृष्टान्तः । १२ नयायिक प्रति ज्ञानमात्मा प्रभा- Virl - प्रमेयरलमालासहितम् अकादमी ११ वतीति ॥ न च प्रमाणत्वमसिद्धम् । सर्वप्रमाणस्वरूपवा दिनां प्रमाणसामान्य विप्रतिपत्त्यावीत् ॥ अन्यथा स्वेशानिष्टसाध- नदूषणायोगात् । अथ धर्मिण एव हेतुत्वे प्रतिज्ञार्थंकदेशांसिद्धो हेतुः स्यादिति चेन्न । विशेष-धर्मिणं कृत्वा सामान्य हेतु - वतां दोषाभावात् ॥ एतेनापक्षधर्मत्वमपि प्रत्युक्तम् । समान्य- स्याशेषविशेषनिष्ठत्वात् ॥ न च पक्षधर्मतावलेन हेतोर्गमकत्व- मपि त्वन्यथानुपपत्तिवलेनेति, सा चात्र नियमवती विपक्षे बा- धकप्रमाणवलान्निश्चितैव। एतेन विरुद्धत्वमनैकान्तिकत्वं च निरस्तं बोद्धव्यम् । विरुद्धस्य व्यभिचारिणश्चाविनाभावनिय. मनिश्चयलक्षणत्वायोगादतो भवत्येव साध्यसिद्धिरिति केवलं व्यतिरेकिणोऽपि हेतोर्गमकत्वात् । सात्मकं जीवच्छरीरं प्राणा- दिमस्वादितिवत् ॥ अथेदानी स्वोक्तप्रमाणलक्षणस्य ज्ञानमिति विशेषणं समर्थयमानःप्राह- Scा हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थं हि प्रमाणं, १ सर्वेषु प्रमाणेषु प्रमाणत्वसंभवात् विवादाभावात् सामान्येनैक- कथनात् । २ धर्मधार्मसमुदायः प्रतिज्ञा तदेकदेशो धर्मो धमी वा हेतुश्चेत् प्रमाणत्वस्य स्वरूपासिद्धत्वं माभूतत्प्रतिज्ञार्थंकदेशासिद्धत्वं स्यादित्याशंक्यते । ३ हेतोरन्यथानुपपत्तिनियमनिश्चयसमर्थनेन ।' ४ विवादाध्यासितं तथा चेदं प्रमाण न भवतीति। ५ अविनाभाववती। ६ प्रमाणत्वस्य हेतोः सन्निक- पादावप्रवर्तकत्वात् । ७ साध्यसाधनेन । ८ साध्यविपर्ययव्याप्तस्तु विरुद्धः । ९ हेतोरसिद्धविरुद्धानकान्तिकदोषत्रयाभावः समर्थितो यतः । १० यन्न सात्मकं तन्न प्राणादिमदृष्टं यथा मृतकशरीरम् ११ असाधारणप्रमाणस्वरूपकथनानन्तरं दृष्टान्तः।
. १२ परीक्षामुखम् । 3 ततो ज्ञानमेव तदिति ॥ २ ॥ हितं सुखं तत्कारणं च । अहितं दुःखं तत्कारणं च । हितं चाहितं च हिताहिते । तयोः प्राप्तिश्च परिहारश्च तत्र समर्थम् ।। हिशब्दोयस्मादथें । तेनार्यमर्थः सम्पादितो भवति । यस्माद्धिता हितप्राप्तिपरिहारलमर्थ प्रमाणं । ततस्तत्प्रमाणत्वेनाभ्युपंगतं वस्तु ज्ञानमेव भवितुमर्हति नाज्ञानरूपं सन्निकर्षादि ॥ तथा च प्रयोगः प्रमाणं ज्ञानमेव हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थत्वात् । यत्तुं न ज्ञानं तन्न हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थम् । यथा घटा- दिः । हिताहितग्राप्तिपरिहारसमर्थ च विवादापन्नम् तस्मात् ज्ञानमेव भवतीति ॥ नचैतेदेसिद्धं । हितप्राप्तयेऽहितपरिहाराय च प्रमाणमन्वेषयन्ति प्रेक्षापूर्वकारिणो न व्यसनितया सकल- प्रमाणवादिभिरभिमतत्वात् ॥ अत्राह सौगतः-भवतु नाम सन्निकर्षादिव्यवच्छेदेन ज्ञानस्यैव प्रामाण्यं न तदस्माभिनिषि- ध्यते । तत्तु व्यवसायात्मकमेवेत्यत्र न युक्तिमुत्पश्यामः । अनुमानस्यैव व्यवसायात्मनः प्रमाण्याभ्युपगमात् प्रत्यक्षस्य सूत्रसामान्यस्वरूपं प्रतिपाद्य । १ स्रग्वस्त्रादि २ सम्यग्दर्शनादि । ३ अहितं कण्टकादि । ४ मिय्यादर्शनादिकम् । ५ शक्तियुक्तम् । ७ अशोकृतम् । ८ प्रमाणम् । ९ उपनयस्तथा चेदम् । १० जानमज्ञानं चेति विप्रतिपनं प्रमाणं भवति । ११ हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थत्वात् । १२ निगमनम् १३ एतत्साध्यसाधनमसिद्धमित्युक्ते आह ५४ विचारयन्ति । १५ कार्य विना प्रवृत्तिर्व्यसनम् । १६ उपादेयभूतार्थकि- याप्रसाधकार्थप्रदर्शकत्वम् । १७ निश्चयात्मनः । १८ अंगीकारात् । १९ कल्प- ६ वक्ष्यमाणार्थः। ।
प्रमेयरत्नमालासहितम् । १३ - . - । - तु निर्विकल्पकत्त्वेऽप्यविसंवादकत्वेन . प्रामाण्योपपत्तेरिति तत्राह- तन्निश्चयात्मकं समारोपविरुद्धत्त्वादनुमानवदिति ॥ २॥ तत् प्रमाणत्वेनाभ्युपगतं वैस्त्विति धर्मिनिर्देशः । व्यव- सार्यात्मकमिति साध्यम् । समारोपविरुद्धत्वादिति हेतुः । अनुमानवदिति दृष्टान्त इति ॥ अयमभिप्रायः-संशयवि. -पर्यासानध्यवसायस्वभावसमारोपविरोधिग्रहणलक्षणव्यवसा- यात्मकत्वे सत्येवाविसंवादित्वमुपपद्यते । अविसंवादित्वे च प्रमाणत्वमिति चतुर्विधस्थापि समक्षस्य 'प्रमाणत्वम- भ्युपगच्छता समारोपविरोधिग्रहणलक्षणं निश्चयात्मकम- भ्युपगन्तव्यम् ॥ ननु तथापि समारोपविरोधिव्यवसाया. स्मकत्वयोः समानार्थकत्वात् कथं साध्यसाधनभाव इति न नापोटमभ्रान्तं प्रत्यक्षम् । १ अव्यवसायात्मकत्वेऽपि । २ प्रमाणभूतं ज्ञानम् । ३ निश्चयात्मकम् । ४ संशयविपयर्यानध्यवसायलक्षणसमारोपस्तत्प्रतिपक्षत्वात्। प्रत्यक्षस्य प्रामाण्यमविसंवादकत्वेन, तदपि-अर्थक्रियास्थितत्वेन, तदप्यर्थप्रा- पकत्वेन, तदपि प्रवर्तकत्वेन, तदपि, स्वविषयोपदर्शकत्वेन, तदपि निश्चयोत्पा- दकत्वेन तदपि गृहीतार्थाव्यभिचारत्वेन । ५ अधकार प्रकाशयो रहिनकुलयोः, रूपरसयोः · सहानवस्थानवध्यघातकपरस्परपरिहारास्थतिलक्षणेषु विरोधेष्वत्र सहानवस्थानलक्षणविरोधो प्राह्यः । ६ अनुभानप्रमाणवत् । ७ इदमपि व्यापक प्रमाणत्वस्य। ८ स्वसंवेदनेन्द्रियमनोयोगिप्रत्यक्षस्य । ९ प्रत्यक्षस्य । १० अङ्गीकुर्वता सौगतेन । ११ज्ञानम् । १२ बौद्ध आह । १३ साध्यसमोऽयं हेतुः ।
- परीक्षामुखम् । मन्तव्यम् । ज्ञानस्वभावतया तयोरभेदेऽपि व्याप्यव्यापकत्वध. मांधारयता भेदोपत्तेः। शिशपात्ववृक्षत्ववत् ॥ अथेदानां स- विशेषणमर्थग्रहणं समर्थयमानस्तदेव स्पष्टीकुर्वन्नाह- अनिश्चितोऽपूर्वार्थ इति ॥ ४ ॥ यः प्रमाणान्तरेण संशयादिव्यवच्छेदेनानध्यवसितः लोड पूर्वार्थः । तेनेहीदिज्ञानविषयस्यावग्रहादिगृहीतत्वेऽपि न पूर्वा- १ समारोपविरोधिव्यवसायात्मकत्वयोः । २ तदभाववदवृत्तित्वं व्याप्यत्वम् । ३ तत्सभानाधिकरणात्यन्ताभावाप्रतियोगित्वं व्यापकत्वम् । ४ अनुमान- पुरस्सरेण साधनान्तरेण भेदम् व्यवस्थापयति जैनः । निश्चयो ग्रहणं ह्यस्ति, तयसत्येऽपि सत्यवत् । ज्ञाने यत्तु समारोपविरुद्धं सत्यमेव तत् ॥ १ ॥ व्यापकं तदतनिष्टं, व्याप्यं तनिष्टमेव च । व्याप्यं गमकमादिष्टं, व्यापकं गम्यमिप्य- ते ॥ २ ॥ अत्र व्यवसायात्मकं तत्तु विपर्ययज्ञानेऽपि विद्यते, समारोपविरो- धित्वं व्याप्यं तत्तु व्यवसाय एव न तु विपर्यये तस्माद्भेदः। ५ व्यवसायात्मकं भवत्वर्थविशेषणमास्त्विति विज्ञानाद्वैतवादिनाम् , अपूर्व इति विशेषणेन सह वर्तमानम् । ६ प्रकृतात्प्रमाणादन्यत्प्रमाणान्तरं तेन येनकेनचित्प्रमाणान्तरेण । ७ त्यागेन । अनिश्चितः ८ अवग्रहो विशेषाकांक्षहावायो विनिश्चयः । धारणा स्मृतिहेतुः स्यान्मतिज्ञानं चतुर्विधम् ॥३॥ विषयविपयिसनिपाते सति दर्शनं भवति तत्पश्चादर्थरूपग्रहणमवग्रह उच्यते यथा चक्षुपाशुलं रूपमिति प्रह- ममवग्रह । ९ अवग्रहेण गृहीतार्थस्य विशेषपरिज्ञानाकांक्षणमीहा कथ्यते । यथा शुक्लं रूपं मया दृष्टं तद्वलाका आहोस्वित्पताका वेति विशेषाकांक्षणमीहा, तदन- न्तर मेपोत्पतति निपतति पक्षविशेषादिकं करोति तेन ज्ञायतेऽनया बलाकया प्रमेयरत्नमालासहितम् । १५ - । र्थत्वम् । अवग्रहादिनेहादिविषयभूतावान्तरविशेषनिश्चयाभावा- त् ॥ अथोक्तप्रकार एवापूर्वार्थः किमन्योऽप्यस्तीत्याह- दृष्टोऽपि समारोपात्ताहगिति ॥ ५ ॥ दृष्टोऽपि गृहीतोऽपि न केवलमनिश्चित एवेत्यपिशब्दार्थः। ताद्गपूर्वार्थो भवति । समारोपादिति हेतुः॥ एतदुक्तं भवति- गृहीतमपि ध्यामलिताकारतया यन्निर्णतुं न शक्यते तदपि वस्त्वपूर्वमिति व्यपदिश्यते प्रवृत्तसमारोपाव्यवच्छेदात् ॥ ननु भवतु नामापूर्वार्थव्यवसायात्मकत्वं विज्ञानस्य स्वव्यवसायं तु न विद्म इत्यत्राह- स्वोन्मुखतया प्रतिभासनं स्वस्य व्यवसाय इति ॥६॥ स्वस्योन्मुतखा स्वोन्मुखता तया स्वोन्मुखतया स्वानुभ- वतया प्रतिभासनं स्वस्य व्यवसाय: ।। अत्र दृष्टान्तमाह- अर्थस्येव तदुन्मुखतयेति ॥७॥ तच्छब्देनार्थोऽभिधीयते। यथाऽर्थोन्मुखतया प्रतिभास- नमर्थव्यवसायस्तथा स्वोन्मुखतया प्रतिमासनं स्वस्य व्यव- सायो भवति ॥ अत्रोल्लेखमाह- घटमहमात्मना वेनीति ॥ ८॥ ननु ज्ञानमर्थमेवाध्यवस्यति न स्वात्मानम् । आमात्नं भवतिव्यमेवं याथात्म्यावगमनं वस्तुरूपनिर्धारणमवाय इति । अवायस्य सम्य- परिज्ञानस्य यत्कालान्तराविस्मरणकारणं साधारणा.। १ विस्मृतपदार्थवत् । २ ज्ञानस्वरूपम् । ३ प्रत्यक्षीकरोति । ४ स्वरूपम् । ५ पुरुषं कर्तारं न -- - - परिक्षामुखम् । फैलं वेति केचित् । कर्तृकर्मणोरेव प्रतीतिरित्यपरे । कर्तृकर्म क्रियाणामेव प्रतीतिरित्यन्ये । तेषां मतमखिलमपि प्रतीति- वाधितमिति दर्शयन्नाह- कर्मवत्कर्तृकरणक्रियातीतेरिति ॥ ९ ॥ झानविषयभूतं वस्तु कर्माभिधीयते । तस्यैव ज्ञाप्तिक्रिया व्याप्यत्वात् । तस्येव तद्वत् । कर्ता आत्मा । करणं प्रमाणम् । क्रिया प्रमितिः। कर्ता च करणं च क्रिया च तासां प्रतीतिः तस्या इति हेतौ का प्रागुक्तानुभवोल्लेखे यथाक्रमं तत्प्रतीति- व्या ॥ ननु शब्दपरामर्शसचिवेयं प्रतीतिर्न वस्तुतत्ववलोप- जातेत्यत्राह- शब्दानुच्चारणेऽपि स्वस्यानुभवनमर्थवदिति ॥ १० ॥ १ प्रत्यक्षीकरोति अज्ञाननिवृतिहीनोपादानोपेक्षाश्च फलम् २ कर्मक्रिययोरेव प्रतीतिरिति वृत्तावनुक्तमुपलक्षणीयमिति प्राभाकराः । परोक्षं जैमने निं ज्ञानमात्मा प्रभाकृतः । ज्ञानं फलं च भस्य शेष प्रत्यक्ष- 'मिप्यते । १। ३ तस्येति सूत्रेणेवार्थे षष्ट्यन्ताकर्मशब्दाद्वत्प्रत्ययः प्रकर. णवलाज्ज्ञेयम् । प्रमातृप्रमाणप्रमितिक्रियाणां प्रतिभासनात् । । ४ हेती गुणोस्त्रि- यामितिनिधात्कथं पञ्चमीति नाशकनीयं "प्यखेकर्माधारे” इति सत्रणपञ्च- मी भवति, प्रतीतिमवलम्व्येत्यर्थः । ५ ज्ञान विषयभूतं कर्म कथं भवति "कि- याच्याप्य कर्मति" सूत्रसद्भाचादिति दूषणं न भवत्येकार्थत्वादिति । ६ प्रमाता ! प्रमाणम् । ८ प्रमितिः ।.९ :फलमानम् । १० पत्रमा । ११ शब्दशि- 12 - । प्रमेयरत्नमालासहितम् । १७ यथा घटादिशब्दानुच्चारणेऽपि घटाद्यनुभवस्तथाऽहम- हमिकया योऽयमन्तर्मुखाकारतयावभासः सशब्दानुच्चारणेऽपि स्वयमनुभूयत इत्यर्थः ॥ अमुमेवार्थमुपपत्तिपूर्वकं परं प्रति सोल्लुण्ठमाचष्टे- को वा तत्प्रतिभासिनमर्थमध्यक्षमिच्छंस्तदेव तथा नेच्छेत् ॥ ११ ॥ को वा लौकिकः परीक्षको वा। तेन ज्ञानेन प्रतिभासितुं शीलं यस्य स यथोक्तस्तं प्रत्यक्षविषयमिच्छन् विषयीधर्मस्य विषये उपचारात् तदेव ज्ञानमेव तथा प्रत्यक्षत्वेन नेच्छेत् । अपि विच्छेदेव । अन्यथा अप्रामाणिकत्वप्रसङ्ग स्यादित्यर्थः ॥ अत्रांदाहरणमाह प्रदीपवदिति ॥ १२ ॥ इदमत्र तात्पर्यम्-ज्ञानं स्वावीसने स्वातिरिक्तसजाती. . - - - । नम् ॥ ३ कल्पप्रधानानां तेषां कर्मादीनाम् । १ अन्तर्जल्पाकारतया । २ ज्ञा. ज्ञानस्य • ग्राहकशक्तिशीलत्वमर्थस्य ज्ञेयशक्तिशालत्वम् । ४ मुख्यतयार्थः प्रत्यक्षरूपो नास्ति किन्तूपचारात्प्रत्यक्षव्यवहारस्तन निमित्त विषयविषयिसनिपातः । ज्ञानधर्मः प्रत्यक्षत्व घटाद्यर्थ उपचारः, मुख्याभावे. सति प्रयोजने निमित्ते चोपचारः प्रवर्तत इति वचनात् । ५ यथैव हि प्रदी- पस्य प्रकाशतां प्रत्यक्षतां वा विना तत्प्रतिभासिनोऽर्थस्य प्रत्यक्षता न स्यात् ।' ६ अर्थान्तरानपेक्षे-इत्येतावति साध्ये घटादिभिः सिद्धसाध्यता स्यात् तदुक्तं N niran- २ परीक्षामुखम् । यार्थान्तरानपेक्षं प्रत्यक्षार्थगुणत्वे सति अदृष्टानुयायिकरणत्वाः . त्प्रदीपभासुराकारवत् ॥ अथ भवतु नामोक्तलक्षणलक्षित प्रमाणं, तथापि तत्प्रामाण्यं स्वतः परतो वा । न तावत्स्वतः अविप्रतिपत्तिप्रसङ्गात् । नापि परत:-अनवस्थासङ्गादितिः है सजातीयेति तस्मिन्नप्युच्यमाने पुरुषान्तरविज्ञानेन सिद्धासाध्यता स्यात्तन्निषे- धार्थ स्वातिरिक्तग्रहण, तथापि परार्थानुभवनेन सिद्धसाध्यता स्यादतस्तत्प. रिहारार्थ स्वाभासनग्रहणं साध्यं प्रति । १ करणत्वादित्येतावति साधने ऽदृष्टेन व्यभिचारोऽत उक्तमदृष्टानुयायीति, तथापि कुठारादिभिर्व्यभिचारोऽत उक्तं गुणले सतीति, तथापि सन्निकर्षण व्यभिचारोऽत उक्तं प्रत्यक्षार्थेति. पुनरपि प्रकारान्तरेण व्याभिचारवारणायोच्यते करणत्वादिति साधने सति कुठारादिभिर्व्यभिचारस्तत्परिहारार्थ प्रत्यक्षार्थगुणत्वे सतीत्युच्यते, तावत्यु- 'च्यमानेऽदृष्टेन शक्तिना व्यभिचारोऽतस्तत्परिहारार्थमदृष्टानुयायिकरणत्वा- दित्युच्यते, अस्मिन्नुच्यमानेऽपि चक्षुरादिना व्यभिचारो ऽतस्तत्परिहारार्थ प्रत्यक्षार्थगुणत्वे सतीत्युच्यते । २ प्रदीपवदित्युक्ते प्रदीपस्य द्रव्यत्वेनागु. णत्वात्साधन विकलोऽयं दृष्टान्तोऽत उक्तं भासुराकारवत् । ३ प्रामाण्यं स्वतोऽप्रामाण्यं परत इति मीमांसकाः, अप्रामाण्यं स्वतः प्रामाण्यं तु परत इति ताथागताः, उभयं स्वत इति सांख्याः. उभयमपि परत इति नैयायिकाः, उभयमपि कश्चित्स्वतः कथांचापरत इति स्याद्वादिनो जैनाः । इत्येवं वहुवा- दिविरतिषतः संशयः स्यात्तनिराकरणार्थ प्रामाण्य निरुपणामिति । ४ प्रा. माण्वं सर्वधा स्वतश्चेदविप्रीतपत्तिप्रसमोऽस्तु, तथा नास्ति । ५ जलज्ञानं प्रामाण्य लानरामियान्यथानुपपत्तेस्तावनुमानस्य प्रामाण्यं कुतोऽन्यस्मादेवमनवस्था; 4 प्रमेयरत्नमालासहितम् । १९. मतद्वयमाशंक्य तन्निराकरणेन स्वमतमवस्थापयन्नाह- तत्प्रामाण्यं स्वतः परतश्चेति ॥ १३ ॥ परतः " सोपस्काराणि हि वाक्यानि भवन्ति । तत इदं प्रतिप- त्तव्यं-अभ्यासदशायां स्वतोऽनभ्यासदशायां च परत इति । तेने प्रागुक्तकान्तद्वयनिरासः । नचानस्यासदशायां प्रामाण्येऽप्यनवस्था समाना, ज्ञानान्तरस्याभ्यस्तविषयस्य स्वतः प्रमाणभूतस्याङ्गीकरणात् ॥ अथवा प्रामाण्यमुत्पत्ती परत. एव, विशिष्टकारणप्रभवत्त्वाद्विशिष्टकार्यस्येति । विषय- परिच्छित्तिलक्षणे प्रवृत्तिलक्षणे वा स्वकार्ये अभ्यासेतरदशा. पेक्षया क्वचित्स्वतः परतश्चेति निश्चीयते । न त्यत्तौ विज्ञा- नकारणातिरिक्तकारणान्तरसव्यपेक्षत्वमसिद्धस् प्रमाण्यस्य तदितरस्यैवाभावात् । गुणाख्यमस्तीति वामात्रं, विधि- - चमूरिका परतः प्रामाण्यवाद चंचमीति । १ तस्य प्रमाणस्य (ज्ञानस्य ) प्रामाण्यामिति तत्प्रामाण्य प्रतिभातविषयाव्यभिचारित्वं सुनिश्चतासम्भववाधक: खमिति । उत्पत्तिज्ञप्तिश्चेति द्वेधा । २ शब्देन शब्दान्तरमेलनमुपस्कारस्तेन सहतानि सोपस्काराणि । ३ कारणेन । ४ जनानां समाना। ५ जलानान नितिलक्षणे। ६ स्वस्य ज्ञानस्य कार्य प्रामाण्यं तस्मिन् । ७ प्रामाण्यमुत्पत्तौ परत एव ज्ञानकारणातिरिक्तकारणान्तरसव्यपेक्षत्वा- प्रदीपवदित्युच्यमाने मीमांसकः प्राह 1; ८ चक्षुरादिनैर्मल्य ।। ९ यतो बाने- नैव पुरुषा अनभ्यस्तप्रमाणकार्येऽपि प्रवर्तन्ते ततः ज्ञानातिरिक्तकारणान्तरसव्य- प्रेक्षत्वमसिद्धमिति 4.१० : ज्ञानातिरिक्तकारणान्तरस्यैव । ११ नयने गुणाः ।
परीक्षामुखम् । 1 मुंखेन कार्यमुखेन वा गुणानामप्रतीते :॥ नाप्यप्रामाण्यं स्वत एव, प्रामाण्यं तु परत एवेति विपर्ययः शक्यते कल्प- यितुम् ॥ अन्वयव्यतिरेकाभ्यां हि त्रिपालिङ्गादेव केवलीत् प्रामाण्यमुत्पद्यमानं दृष्टम् । प्रत्यक्षादिष्वपि तथैव प्रतिपत्तव्यं नान्यथेति । तत एवाऽऽप्तोक्तत्वगुणसद्भावेऽपि न तत्कृतमागमस्य प्रामाण्यम् । तहि गुणेभ्यो दोषाणा- मभावस्तदभावाच्च संशयविपर्यासलक्षणाप्रामाण्यद्वयासत्त्वेऽपि प्रामाण्यमौलनिकमनपादितसांस्त एवेति । ततः स्थितं प्रामा- ण्यमुत्पत्तौ न सामयन्तरसापेक्षमिति ॥ नापि विषयपरिच्छि- २ अ- - सन्ति यथार्थोपलब्धेः प्रामाण्यान्यथानुपपत्तरिति । १ प्रत्यक्षेण । नुमानेन । ३ न खलु प्रत्यक्षं गुणान्प्रत्येतुं समर्थ तस्यातीन्द्रियार्थाप्रवृत्तेन गुणा- नां तेन प्रतीतिः, विरोधात् , नाप्यनुमानं तस्य प्रतिबन्धवलेनोत्पत्यभ्युपग- मात्, प्रतिवन्धश्चेन्द्रियगुणैः सह लिङ्गस्य, स च प्रत्यक्षेण गृह्यते- ऽनुमानेन वा न तावत्प्रत्यक्षेण तस्य तत्सम्बन्धग्रहणविरोधात् , नाप्यनुमानेन तस्यापि गृहीतसम्बन्धालङ्गप्रभवत्वात, तत्राप्यनुमानान्तरेण तत्सम्बन्धग्रहणे- ऽनवस्थाप्रसङ्गात् । ४ यतः प्रत्यक्षानुमानादौ स्वतः प्रामाण्यप्रतिपादनादिति । ५ पक्षधर्मत्वसपक्षसत्वविपक्षव्यावृत्तिरूपात् । ६ गुणनिरपेक्षात् । ७ इदै जलमिति प्रत्यक्षज्ञाने तत्कारणादेव प्रामाण्यमुत्पद्यते इति प्रतिपत्तव्यं न भिन्न कारणेन । ८ आगमे । ९ स्वाभाविकम् । धितमनिराकृतमिति । ११ विज्ञानकारणादेव प्रामाण्यमुत्पद्यमानं प्रतिभासते १२ विज्ञानातिरिक्तकारणान्तरापेक्षम् । १३ ज्ञप्तिपक्षोऽयम् । १० अवा- यतः।
प्रमेयरत्नमालासहितम् । २१ त्तिलक्षणे स्वकार्य स्वगृहणसापेक्षम् । अगृहीतप्रामाण्यादेव ज्ञानाविषयपरिच्छित्तिलक्षणकार्यदर्शनात् ॥ न न परिच्छि- त्तिमात्रं प्रमाणकार्य तस्य मिथ्याज्ञानेऽपि सद्भावात् । परि- च्छित्तिविशेषं तु नागृहीतप्रामाण्यं विज्ञानं जनयतीति ॥ तदपि बालविलसितम् । नहि प्रामाण्यग्रहणोत्तरकालमुत्पत्त्यवस्थात: परिच्छित्तेविशेषोऽवभासते ऽगृहीतप्रामाण्यादपि विज्ञाना- निर्विशेषविषयपरिच्छेदोपलब्धेः ॥ नर्नु परिच्छित्तिमात्रस्य, शुक्तिकायां रजतज्ञानेऽपि सद्भावात्तस्यापि प्रमाणकार्यत्वप्रसङ्ग इति चेत्-भवेदेवं, यद्यर्थान्यात्वप्रत्ययस्वहेतूत्थदोपज्ञाना- भ्यां तन्नापोद्येतं ॥ तस्माद्यत्र कारणदोषज्ञानं वाधकप्रत्ययो १ ज्ञानकार्ये । २ पूर्वमात्मनैव ज्ञानं ( कर्तृ) प्रामाण्य गृह्णातीत्ययम- भिप्रायोऽस्य । ३ मीमांसकं प्रति नैयायिकः प्राह, प्रमाणकार्य परिच्छि- त्तिमात्रं वा परिच्छित्तिविशेषो वेति पक्षद्वयमवलम्ब्य दूषयति । ४ पूर्व यज्जलादि वस्तु दृष्ट तद्विहायान्यत्सुवर्णादिकं न दृश्यते इति निर्विशेषविषय- परिच्छेदोपलब्धिः। ५ नैयायिकः प्राह । Hanuman ६ मीमांसकः प्राह । प्रथमं सर्वज्ञानं प्रमाणमेवोत्पद्यते तस्माच्छुक्तिकायाँ रजतज्ञानमपि प्रथम प्रमाण भवेत् । ७ अर्थस्य रजतलक्षणस्यान्यथात्वं नेदं रजत शुक्तिकेय नीलपृष्ठत्रिकोणदर्शनादित्यनेन ज्ञानेन । ८ चक्षुरादिगतकाचका- मलादिदोषज्ञानेन । ९ न निराक्रियेत । । १० वस्तुनि। ११ शुक्तिकेयमि- २२ परीक्षामुखम् । वा नोदेति, तत्र स्वत एव प्रामाण्यमिति ॥ नचैवमप्रामाण्ये- ऽप्यांशङ्कनीयं, तस्य विज्ञानकारणातिरिक्तदोषस्वभावसामग्री- सव्यपेक्षतयोत्पत्तेः निवृत्तिलक्षणे च स्वकार्ये स्वग्रहणसापेक्ष. स्वात् ॥ तद्धि यावन्न ज्ञातं न तावत्स्वविषयात्पुरुषं निवर्तय. तीत ॥ तदेतत्सर्वमनल्पतमोविलसितम् ॥ तथाहि-न ताव: प्रापाण्यस्योत्पत्ती सामग्रंयन्तरापेक्षत्रमसिद्धम् । आप्तप्रणीत त्वलक्षणगुणसन्निधाने सत्येवाप्तप्रणीतवचनेषु प्रामाण्यदर्शनात्। यद्भावाभावाभ्यां यस्योत्पत्यनुत्पत्ती तत् तत्कारणकमिति लोके- ऽपि सुप्रसिद्धत्वात् ॥ यदुक्तम्-"विधिमुखेन कार्यमुखेन वा गुणानामप्रतीतिरिति” तत्र तावदाप्तप्रणीतशब्दे न प्रतीतिणु- णानामित्ययुक्तमाप्तप्रणीतत्त्वहानिप्रसङ्गात् ॥ अथ चक्षुरादौ गुणानामप्रतीतिरित्युच्यते तदप्ययुक्तम् । नैर्मल्यादिगुणाना- त्यादि वाधकज्ञानम् । १ केवलं विज्ञानकारणचक्षुराद्यपेक्षयैव प्रामाण्यं परतः प्रतिपद्यते न तु गुणाद्यपेक्षया । उक्तञ्च-स्वतः सर्वप्रमाणानां प्रामाण्यमिति गम्यताम् । नहि स्वतोऽसती शक्तिः कर्तुमन्येन पार्यते । २ उत्पत्यवस्था- यामिति शेषः । ३ अप्रामाण्यं स्वत इति नाशंकनीयमिति । ४ यदि शुक्तिकायां रजतज्ञाने विज्ञानकारणातिरिक्तदोपाद्यपेक्ष्यस्तर्हि तनिवृतिलक्षणे स्वग्रहणं कथमिति तनिरूपयति । आत्मग्रहणमिति । यदा शुक्तिकायां रजतज्ञानं भवति तदा तन्निवृतिलक्षणेकार्ये न रजतं किन्तु शुक्तिकेयमिति ज्ञप्तिपक्षेऽप्रामाण्यं परत एवेति प्रदर्यते । ७ नैर्मल्यादि- गुण । ८ यत्सदसद्भ्यां । मीमांसकः प्राह । गुणानां ९ १० 5 प्रमेयरत्नमालासहितम् । २३ E ? भबलावालादिभिरप्युपलब्धेः ॥ अथ नैर्मल्यं स्वरूपमेव न गुणः तर्हि हेतोरविनाभाववैकल्यमपि स्वरूपविकलतैव न दोष इति समानम् ॥ अथ तवैकल्यमेव दोषः तर्हि लिङ्गस्य चक्षुरा. देर्वा तत्स्वरूपसाकल्यमेव गुणः कथं न भवेत् ? आप्तोक्ते. ऽपि शब्द मोहादिलक्षणस्य दोषस्याभावमेव यथार्थज्ञानादि- लक्षणगुणसद्भावमभ्युपगच्छन्नन्यंत्र तथा नेच्छतीति कथम- नुन्मत्तः ? अथोक्तमेव-शब्दे गुणाः सन्तोऽपि न प्रामाण्यो- स्पत्ती व्याप्रियन्ते किन्तु दोषाभाव एवेति । सत्यमुक्तं, किन्तु न युक्तमेतत् । प्रतिज्ञामात्रेण साध्यसिद्धरयोगात् । नहि गुणे- भ्यो दोषाणामभाव इत्यत्र किञ्चिन्निबन्धनमुत्पश्यामोऽन्यत्र महामोहात्। अथानुमानेऽपि विरूपलिङ्गमात्रजनितप्रामाण्यो- पलब्धिरेव तंत्र हेतुरिति चेन्न । उक्तोत्तरत्वात् । त हि प्रतीतिः सर्वथा नास्तीति वदति मीमांसकः । तस्मात्कुत्रचित्स्थले गुणाः सन्तीतिदर्शयित्वाग्रतन्मतं खण्डयति गुणगुणिनोरभेदात् । २ अतो दोषोऽपि न भिन्नः ३ यथा नैर्मल्यादिगुणाभावे स्वतः जैनानां समायाति तथा दोषाभावे स्वतोऽत्रामाण्यं मीमांसकानामपि स्यादिति समानम् । ५ न केवलमपौरुषेये वेद इत्यपि शब्दार्थः । ६ आगमे। दिशब्देन रागद्वेषौ गृह्यते । ८ आदिशब्देन वैराग्यक्षमे गृह्यते । गुणसद्भावं । ११ काकुः। १२ पूर्वापरविरोधरहितत्वादयः । १३ महामोहं वर्जयित्वा । १४ दोषाभावे । १५ कारणम् । १६ तर्हि लिङ्गस्य चक्षुरादेर्वा तत्स्वरूपसाकल्यमेव गुण इत्यादिप्रकारेण । १७ हेतौ । - १ प्रामाण्य ४ कारणस्य ७ आ- ९ नैर्म- ल्यादौ। .
२४ परीक्षामुखम् । 1 -- + रूप्यमेव गुणो यथा तवैकल्यं दोष इति नासमतो हेतुः । अपि चाप्रामाण्येऽप्येवं वक्तुं शक्यत एवं । तत्र हि दोषेभ्यो गुणानामभावस्तभावाच्च प्रामाण्यासत्त्वे ऽप्रामाण्यमौत्सर्गि- कमास्त इत्यप्रामाण्यं स्वत एवेति तस्य भिन्नकारणप्रभवत्वव- र्णनमुन्मत्तभापितमेव स्यात् । किच गुणेभ्यो दोषाणाम-- भाव इत्यभिदधता ,गुणेभ्यो गुणा एवेत्यभिहितं स्यात् । भावान्तर स्वभावत्वादभावस्य । ततोऽप्रामाण्यासत्त्वं प्रामा. ण्यमेवेति नैतावता परपक्षप्रतिक्षेपः, अविरोधकत्त्वात् । तथा अनुमानतोऽपि गुणाः प्रतीयन्त एव, तथाहि-प्रामा. प्रयं विज्ञानकारणातिरिक्तकारणप्रभवं, विज्ञानान्यत्त्वे सति कार्यत्वादप्रामाण्यवत् । तथा प्रमाणप्रामाण्ये भिन्नकारण जन्ये, भिन्नकार्यत्वात्, घटवस्त्रवदिति च । ततः स्थितं प्रामा- १ अविनाभावित्वम् गुणस्तद्वैकल्यमेव दोषः । २ कथं न सम्मतो हेतुः। ३ एवं च सति प्रामाण्यं परत एव जायते गुणेभ्यो दोपाणामभाव इत्या- दिना । ४ प्रकारान्तरेण वदति । ५ त्वया मीमांसकेन । ६ भा- वान्तरस्वभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षया घटाभावस्य कपालस्वभाववत् । ७ प्रध्वंसाभावस्य ... ८. प्रत्यक्षप्रकारेणोक्तमनुमानतोऽपि गुणाः प्रतीयन्ते न केवलं प्रत्यक्षादित्यपि शब्दार्थः। ९ कार्यत्वादित्युक्ते विज्ञानेन व्यभि- चारो यतस्तकार्य परन्तु तत्र साध्यत्वं नास्ति ततो हेतोः साध्यविरुद्धव्याप्तत्वा- द्वयभिचारित्वमतो विज्ञानान्यत्वेसतीत्युक्तमेवं सति नित्यत्वादात्मना व्यभिचारो यतोऽसौ विज्ञानादन्यो भवति कारणप्रभवो न भवति ततः सर्व साधनमिति ।
प्रमेयरत्नमालासहितम् । -- ण्यमुत्पत्तौ परापेक्षमिति । तथा विषयपरिच्छित्तिलक्षणे वा स्वकार्ये स्वग्रहणं नापेक्षत इति नैकान्तः क्वचिभ्यस्तविषय एव परानपेक्षत्वव्यवस्थानात् । अनभ्यस्ते तु जलमरीचिका- साधारणप्रदेशे जलज्ञानं परापेक्षेमेव । सत्यमिदं जलं, विशिष्टा- कारधारित्वात् घटचेटिकापेटकदर्दुशरावसरोजगन्धवत्त्वाच्च, परिदृष्टजलवदित्यनुमानज्ञानादर्थक्रियाज्ञानाच्च, स्वतःसिद्ध- प्रामाण्यात्प्राचीनज्ञानस्य यथार्थत्वमाकल्पमवकल्प्यंत एवः ॥ यदप्यभिहितं प्रामाण्यग्रहणोत्तरकालमुत्पत्त्यवस्थातः परिच्छि. तेविशेषो नावभासत इति । तत्र यद्यभ्यस्तविषये नावभा- सत इत्युच्यते तदा तदिप्यत एव । तत्र प्रथममेव निःसंशयं विषयपरिच्छित्तिविशेषाभ्युपमात् । अनभ्यस्तविषये तु तद्ग्रंह- णोत्तरकालमस्त्येव विषयावधारणस्वभावपरिच्छित्तिविशेषः । पूर्व प्रमाणाप्रमाणसाधारण्या एव परिच्छित्तेरुत्पत्तेः। ननु १ अनुमानापेक्षम् । २ यथोत्पत्तावनुमानम्य परानपेक्षत्वं न घटते। ३ प्रमाणकार्थे। ४ समर्थनात् । ५ अनुमानादि। ६ स्नानपानादि । ७ पूर्वजलज्ञानस्य । ८ परमार्थत्वं । ९ कल्पपर्यन्तम् । १० निश्चीयते। ११ त्वया मीमांसकेन । १२ विकल्पद्वयं कृत्वोच्यते । १३ अनुमानसापेक्ष परिच्छित्तिविशेषः । १४ मयापि तदिष्यते यदतीतानागतवर्तमानेषु त्रिषु कालेषु दूषणं नास्तीत्यर्थः। १५ प्रमाणग्रहण । १६ सप्तम्यर्थेऽकर्मकधातुभिरित्यादिना द्वितीया । अन्धकूपवद्यथान्धकूपे जल नास्तीति निश्चितं वर्तते तदागत्य प्रतिपाद- यति यदन्धको जलं नास्तीति । १७ नियमेन सत्यमेव जलमित्यादिपरिच्छि- त्तिविशेपः । १८. अनभ्यस्तविषय एव । १९ मीमांसकः प्राहः।
२६ परीक्षामुखम् प्रामाण्यपरिच्छित्स्योरभेदात्कथं पौर्वापर्यमिति ? नैवम् । नहि सर्वाऽपि परिच्छित्तिःप्रामाण्यात्मिका, प्रामाण्यं तु परिच्छि. त्यात्मकमेवेति न दोषः । यदप्युक्तम्-वाधककारणदोषज्ञानाभ्यां प्रामाण्यमपोद्यत इति तदपि फल्गुभाषितमेव । अप्रामाण्येऽपि तथा वक्तुं शक्यत्वात् । तथाहि-प्रथममप्रमाणमेव ज्ञानमुत्पद्यते पश्चादबाधचोधगुणज्ञानोत्तरकालं तदपोद्यत इति। तस्मात्प्रा- माण्यमप्रामाण्यं वा स्वकार्ये क्वचिदभ्यासनभ्यासापेक्षया स्वतः परतश्चेति निर्णेतव्यमिति ॥ देवस्य सम्मतमपास्तसमस्तदोष वीक्ष्य प्रपञ्चरुचिरं रचितं समस्य । माणिक्यनन्दिविभुना शिशुबोधतो- निस्वरूपमर्मुना स्फुटमभ्यधायि ॥१॥ " इति परीक्षामुखलधुवृत्तौ प्रमाणस्य स्वरूपोद्देशः ॥ १ ॥ , - ४ निरा- १ इति न विरोधः। २ ज्ञानवरणादि वाधकं, काचकामलादिदोषः, बाधक च कारणदोषज्ञानञ्च ताभ्याम् । ३ परिच्छित्यात्मकम् । ५ स्वतो बुद्धो ऽन्यतो योगो ज्ञात्युत्पत्योद्वयं स्वतः । प्रामाण्यं परतोऽन्यच्च, जैमिनिः कपिलो यथा । ६ अदस्तु विप्रकृष्टं दूरतरं तेन, क्रियते ।
प्रमेयरत्नमालासहितम् । २७ - अथ प्रमाणस्वरूपविप्रतिपत्ति निरस्येदानी संख्याविप्रति- पत्ति प्रतिक्षिपन्सकलप्रमाणभेदसन्दर्भसंग्रहपरं प्रमाणेयत्ता- प्रतिपादकं वाक्यमाह- तद्वेधेति ॥ १ ॥ तच्छब्देन प्रमाणं परामृश्यते । तत्प्रमाणं स्वरूपेणावगतं द्वेधा द्विप्रकारमेव । सकलप्रमाणभेदानामंत्रैवान्तर्भावात् ॥ तद्वित्त्वमध्यक्षानुमानप्रकारेणापि सम्भवतीति तदाशङ्कानिरा- करणार्थ सकलप्रमाणभेदसंग्रहशालिनी संख्या प्रव्यक्तीकरोति- प्रत्यक्षतरभेदादिति ॥ २ ॥ प्रत्यक्षं वक्ष्यमाणलक्षणं, इतरत्परोक्ष, ताभ्यां भेदात्त्रमाण- 1 - अनन्तवीर्येण मया । १ परस्परापेक्षाणां पदानां निरपेक्षसमुदायो वाक्यम् । २ तच्छब्देन व्याप्तिप्रत्यासत्त्योः प्रत्यासत्तिः गरीयसीति न्यायमाश्रित्य प्रामाण्यं न परिगृह्यतेऽपि तु गौणमुख्ययोर्मुख्य कार्य सम्प्रत्यय इति प्रमाणमेव परा- मृश्यते, यतः प्रमाणस्य मुख्यत्वं प्रकृतप्रमेयत्वात् प्रामाण्यस्य गौणत्वमानुष- शिकप्रमेयत्वादिति। ३ सकलं निर्धारणमेवेति न्यायादेवकारः । ४ अनु- मानादीनाम् ।. ५ द्वित्वसंख्यायाम् ... ६, व्यक्तिभेदे लक्षणैकत्वमन्तर्भावः । ७ अक्षमात्मानं प्रत्याश्रितं प्रत्यक्षमिति मुख्यप्रत्यमक्षमक्षं, प्रति वर्तते । इति प्रत्यक्षं सांव्यवहारिकप्रत्यक्षम् । ८ अक्ष्णोति व्याप्नोति तान्तान् . गुणपर्यायानित्यक्ष आत्मा तस्मात्परावृत्तं परोक्षमथवा, परैरिन्द्रि- परीक्षामुखम् । ...- स्येति शेषः। न हि परपरिकल्पितद्वित्रिचतुःपञ्चषटप्रमाण- संख्यानियमे निखिलप्रमाणभेदानामन्तर्भावविभावना शक्या कर्तुम् । तथाहि-प्रत्यक्षेकप्रमाणवादिनचार्वाकस्य नाध्यक्ष लैङ्गिस्यान्तर्भावो युक्तः तस्य तद्विलक्षणत्वात् , सामग्रीस्वरू- पभेदात् ॥ अथ नाप्रत्यक्षं प्रमाणमस्ति विसंवादसम्भवात् । निश्चिताविनाभावाल्लिङ्गाल्लिङ्गिनि ज्ञानमनुमानमित्यानुमानिक- शासनं,तत्र च स्वभावलिङ्गस्य बहुलन्मयथाऽपि भावो दृश्यते। तथाहि कषायरसोपेतानामामलकानामेतद्देशकालसम्बधिनां द- शनेऽपि देशान्तरे कालान्तरे द्रव्यान्तरसम्बन्धे चान्यर्थोऽपि दर्शनात्स्वभावहेतुर्व्यभिचार्येव लताचुतवल्लताशिंशपाँदिस- याभिरुच्यते सिंच्यते ऽभिवर्द्धत इति परोक्षम् । १ मिनेः षटप्रमाणानि, चत्वारि..न्यायवादिनः । सांख्यस्य त्रीणि वाच्यानि द्वे वैशेषिकवौद्धयोः-११॥ २ चार्वाकसौगतवैशेषिकसांख्यनैयायिकप्राभाकरभाटाः ३ लिङ्गाज्जा- तस्यानुमानस्य । ४ प्रत्यक्षज्ञानविलक्षणत्वात् । ५ चार्वाकः प्राह । ६ इत्यत्र चार्वाकेन साध्यसाधनभावः स्वीकृतोऽनुमानेन तथापि नाङ्गी. करोति । ७ व्यभिचारसम्भवादकियाकारित्वासम्भवादिति । भावकार्यानुपलब्धिभेदात् । ९ सौगताभिमतस्य। १० साध्यं विनाऽपि। ११ सद्भावः । १२ स्वभावहेतोयभिचारित्वं दर्शयति । दिद्रव्यसिंचने । १४ मधुरसोपेतत्वेनाऽपि । १५ इदं फलं कषायरसो. पेतमामलकफलत्वात्परिदृष्टामलकफलवत् , इत्यत्र मधुरसोपेतामलकफलेन व्यभिचारः। १६ वृक्षोऽयं चूतत्वादित्यत्र देशान्तरे सम्भवलताचूतेन व्य- भिचारः । १७ वृक्षोऽयं शिंशपात्वादित्यत्र देशान्तरसम्भवशिंशपालतया ८ स्व- १३ दुग्धा- and- . P4 ।
प्रमेयरत्नमालासहितम् । म्भावनाच्च । तथा कार्यलिङ्गमपि गोपालघटिकादौ धूमस्य शक्रमूनि चान्यथाऽपि भावात्पावकव्यभिचार्येव । ततः प्रत्य- क्षमेवैकं प्रमाणमस्यैवाविसंवादकत्वादिति । तदेतद्वालविलसि. तमिवाभात्युपपत्तिशन्यत्त्वात् । तथाहि-किमप्रत्यक्षस्योत्पा- दककारणाभावादालम्वनाभावाद्वा प्रामाण्यं निषिध्यते ? तंत्र न तावत्प्राक्तनः पक्षः । तदुत्पादकस्य सुनिश्चितान्यथा पप- त्तिनियतनिश्चयलक्षणस्य साधनस्य सद्भावत् । नो खल्वप्यु- दीचीनः पक्षः । तदालम्बनस्य पावकादेः सकलविचारचतुर- चेतसि सर्वदा प्रतीयमानत्वात् ।' यदपि स्वभावतोयसि. चारसम्भावनमुक्तम् । तदप्यनुचितमेव--स्वभावमात्रस्याहे- तुत्वात् । व्याप्यरूपस्यैव स्वभावस्य व्यापकैम्प्रति गमकत्वा- भ्युपगमात् । न च व्याप्यस्य व्यापकव्यभिचारित्वं व्याप्यत्व.. विरोधप्रसङ्गात् ॥ किञ्चैव-वादिनो नाध्यक्षं प्रमाणं व्यव- तिष्ठते । तत्राप्यसंवादस्यागौ योगौणत्त्वस्य प्रामाण्याविना. व्याभिचारोऽतः स्वभावहेतुर्व्यभिचारी । १ कार्यहेतोयभिचारित्व दर्श- २ इन्द्रजालघटिकादौ । ३ वामलरशिरसि । ४ अग्नि- विनापि । ५ स्वभावकार्यहेत्वोरविनाभावित्वाभावात्तदुद्भूतानुमानस्य प्र माणत्व न घटते यतः। ६ उत्पादककारणत्वालम्बनयोर्मध्ये । ध्यमन्तरेण साधनानुपपत्तिः। ८ द्वितीयः पंक्षः । ९ अप्रत्यक्षा. लम्बनस्य । १० शिंशपात्वस्य । ११ वृक्षत्वं प्रति । १२ अनुमानंप्रमाण- वादिनस्तव स्वभावहेतुर्व्यभिचारीति वादिनः । १३ प्रत्यक्षेऽपि । १४ प्रत्यक्ष प्रमाणमविसम्बादकत्वादगौणत्वाच्चेत्यनुमानेन । १५ मुख्यत्वस्य । १६ प्रत्य- १२ १६ यति।
३० परीक्षामुखम् । भावित्वेन निश्चेतुमशकात्वात् । यञ्च कार्यहेतोरप्यन्यथापि सम्भावनं तदप्यशिक्षितलक्षितं सुविवेचितस्य कार्यस्य कारः णाव्यभिचारित्वात् । यादृशो हि धूमो ज्वलनकार्य भूधरनि- तम्बादावतिबहलधवलतया प्रसर्पन्नुपलभ्यते, न तादृशो गो- पालघटिकादाविति ॥ यदप्युक्तम् "शक्रमूर्द्धनि धूमस्यान्य- थापि भाव इति" तत्र किमयं शक्रमूर्द्धा अग्निस्वभावोऽन्यथा वा ? यद्यग्निस्वभावस्तदाग्निरेवेति कथं तदुइँतधूमस्यान्यथा- भावः शक्यते कल्पयितुम् ।अथानग्निस्वभावस्तदातदुद्भवो धूम एव न भवतीति कथं तस्य तद्यभिचारित्वमिति । तथाचो- क्तम्-अग्निस्वभावः शक्रस्य मूर्द्धा चेदग्निरेव सः । अथान- निस्वभावोऽसौ धूमस्तत्र कथं भवेदिति ॥ १॥ किञ्च प्रत्यक्ष प्रमाणमिति कमयं परं प्रतिपादयेत् । परस्य प्रत्येक्षण गृही- तुमशक्यत्वात् । ब्याहीरादिकार्यप्रदर्शनातं प्रतिपादयेदिति चे- दायातं तर्हि कार्यात्करणानुमानम् । अथ लोकव्यवहारापेक्षये- क्षप्रामाण्येऽप्रर्वतमानप्रत्यक्षेण निश्चेतुमशक्यस्य । १ अग्नि विनापि । २ सुनिश्तस्य ।। ३ अनग्निस्वभावो वा । ४ अग्निस्वभाववामलू- रोत्पन्नधूमस्य । ५ अग्निव्यभिचारित्वम् । ६ वामलरोत्पन्नः । ७ धूमस्य ! ८ अग्निव्यभिचारित्वम् । ९ चार्वाकः । १० शिप्यम् । ( शिष्यस्य ) १२ प्रत्यक्षेण शरीरस्यैव ग्रहणादात्मनः शरीरादभिन्नत्वात्श. रीरेणात्मनोऽपि ग्रहणमिति चेन्न शरीरप्रत्यक्षेऽपि वुद्धिविकल्पे संशयात्ततः शरीरमानं दृष्ट्वा पण्डितोऽयं मूरों वेति निश्चयो न भवत्यन्यथा परीक्षामन्तरे- णापि तस्य सन्मानावमानयोः प्रसज्ञात् । १३ वचनचातुर्यादि । १४ बुभुत्सुम्। ११ आत्मनः प्रमेयरत्नमालासहितम् । ३१ - प्यत, एवानुमानमपि, परलोकादावानभ्युपगमात्तदभावा- दिति । कथं तदभावोऽनुपलब्धेरिति चेत् तदाऽनुपलब्धि लिङ्गाजनितमनुमानमपरमापतितमिति । प्रत्यक्षप्रामाण्यमपि स्वभावहेतुजातानुमितिमन्तरेण नोपपत्तिमियर्तीति प्रागेवोक्त- मित्युपरम्यते ॥ यदेप्युक्तं धर्मकीर्तिना-प्रमाणेतरसामान्य स्थितेरत्यधियो गतः। प्रमाणान्तरसद्भावः प्रतिपेधाच्च कर्य चिदिति ॥ २ ॥ तंतः प्रत्यक्षमनुमानभिति प्रमाणद्वयमेवेति सौगतः । सोऽपि न युक्तवादी । स्मृतेरविसंवादिन्यास्तृनी- यायाः प्रमाणभूतायाः सद्भावात् । न च तस्या विसंवादाद- प्रामाण्यम् । दत्तग्रहादिविलोपापत्तेः । अथानुभूयमानस्य विष- १ तूष्णी स्थीयते । २' बौद्धन प्रमाणविनिश्चये । विसंवादित्वविसम्वादित्वस्वभावलिङ्गद्वयं विना सामान्यद्वय न व्यवतिष्ठते, व्याहारादिकार्यमन्तरेणान्यधियो गतिः (पटुबुद्धि- निश्चयो) न भवति तथानुपलब्धिलिङ्गमन्तरेण परलोकादेः प्रतिषेधो न घटत इत्यनुपपद्यमानप्रमाणेतरसामान्यस्थित्यन्यधीगतिपरलोकप्रतिषेधसाधकस्वभावा- दिलिङ्गत्रयं प्रमाणान्तरस्यानुमानस्य समीचीनभावं साधयतीति सर्वो- ऽपि कारिकार्थः । ५ शिष्य । ६ कार्यहेतो. ाहारादेः । ८ परलोकादेः : ९ चार्वाक प्रमा- णान्तरापादनं यतः । १० सौगतोऽपि न यथार्थवादी । ११ यस्य हस्ते, मया तद्धन दत्त सोऽमुक इति तन्मे स्वधनमियन्मात्रमित्यादिलक्षणस्मरणानु- त्पादस्तदभावाच स एवाय धनतत्येवमादिरूपप्रत्यभिज्ञानाभावादहमस्माच्च- धनमुपादेऽसौ वा मदीयधनहती भवतीति तत्र स्वधनं प्रार्थये । १२ ज्ञायमा.. ३ अ. प्रमाणसामान्याप्रमाण- ४ अप्रमाण । ७ज्ञानात् ।
३२ परिक्षामुखम् ।। यस्याभावात् स्मृतेरप्रामाण्यं, ने, तथापि अनुभूतेनार्थेन सावला- स्वनत्वोपपत्तेः । अन्यथा प्रत्यक्षस्याप्यनुभूतार्थविषयत्वादप्रा- माण्यमनिवार्य स्यात् । स्वविपयावभासनं स्मरणेऽप्यवशिष्ट- मिति । किञ्च स्मृतेरप्रामाण्येऽनुमानवापि दुर्लभा । तया. व्याप्तरविर्षयीकरणे तदुत्थानायोगादिति ॥ तत इदं वक्तव्यम्- "स्मृतिः प्रमाणम् , अनुमानप्रामाण्यान्यथानुपपत्तेरिति" सैव प्रत्यक्षानुमानस्वरूपतया प्रमाणस्य द्वित्वसंख्यानियमं विघट- यतीति किं नश्चिन्तया । तथा प्रत्यभिज्ञानमपि सौगतीयप्र- माणसंख्यां विघटयत्येव । तस्यापि प्रत्यक्षानुमानयोरनन्तर्भा- वात् । न तदिति स्मरणमिदमिति प्रत्यक्षमिति ज्ञानद्वयमेव, न ताभ्यां विभिन्न प्रत्यभिज्ञानाख्यं वयं प्रतिपद्यमानं प्रमाणा- न्तरमुपलभामहे । कथं तने प्रमाणसंख्याविघटनमिति तदप्य - .. r नस्य पदार्थस्य । १ वौद्धं प्रति जैनः प्राहेति चेन । २ अनुभूय. मानविषयाभावेऽपि । ३ उक्तविपर्ययार्थमन्यथा शब्दोऽनुभूतेनार्थेन स्मृतेः सावलम्बनत्वेऽपि तदप्रमाण्ये । · ४ भिन्नकालं कथं ग्राह्यमिति चेद्बाह्यतां विदुः । हेतुत्वमेव युक्तिज्ञास्तदाकारार्पणक्षमम् । १ । इत्यनेन सौगतानामपि प्रत्यक्षस्यातीतार्थविषयत्वात्तस्याप्यप्रामाण्यम् स्यादथवानुभूतार्थविषयमात्रेण स्मृतेरप्रामाण्येऽनुमानेनाधिगतेऽनौ यत्प्रत्यक्षं तदप्यप्रमाणं स्यादनुभूतार्थ- विषयत्वाविशेषादिति । ५स्मृत्या। ६ साध्यसाधनसम्वन्धस्य । स्मरणे । ८. अनुमानप्रमाण्याभावादिति । १ स्मृतिप्रकारेण । १० वौद्धः प्राह भो जैन । ११ स्मरणप्रत्यक्षाभ्याम् । १२ प्रत्यभिज्ञा. १३ जैनः प्राह भो बौद्ध । त्वदुक्तमयुक्तमेव ततः सख्यां विघ. ७अ. नेन ।
- प्रमेयरनमालासहितम् । . ६ घटितमेव, यतः स्मरणप्रत्यक्षाभ्यां प्रत्यभिज्ञानविपयस्यार्थस्थ गृहीतुमशक्यत्वात् । पूर्वोत्तरविवर्तवत्यैकद्रव्यं हि प्रत्यभिज्ञावि- पयः । न च तत्स्मरणेनोपलभ्य(क्ष्य)ते तस्यानुभूतविषयत्वात् । नापि प्रत्यक्षेण तस्य वर्तमानविवर्तवर्तित्वात् । यदप्युक्तम्- "ताभ्यां भिन्नमन्यत् ज्ञानं नास्तीति ।" तदप्ययुक्तमभेदपराम- शरूपतया भिन्तस्यैवावभासनात् । न तयोरन्यतरस्य वाऽभेद- परामर्शकत्वमस्ति विभिन्न विषयत्वात् । न चैतत्प्रत्यक्षेऽन्तर्भ- वत्यनुमाने वा तयोः, पुरोऽवस्थितार्थविषयत्वेनाविनाभूतलिङ्ग- सम्भावितार्थविषयत्वेन च पूर्वापरविकारव्याप्येकत्वाविषय- स्वात् । नापि स्मरणे, तेनापि तदेकत्वस्थाविपयीकरणात् ॥ अथ संस्कारस्मरणसहकृतमिन्द्रियमेव प्रत्यभिज्ञानं जनयती. न्द्रियजं चाध्यक्षमेवेति न-प्रमाणान्तरमित्यपरः । सोऽप्यति . । - 7 . . . , 7 टयत्येव । १.कोऽयं प्रत्यभिज्ञानस्य. विषयं इति. मनसि कृत्वा तमेवाह । २. पर्याय। ३ सम्वद्धं वर्तमानञ्च गृह्यते चक्षुरादिनामुना प्रमाणेन तस्य -वर्तमानविषयत्वसमर्थनादिति । ४ स्मरणप्रत्यक्षाभ्याम् । . ५. पूर्वोत्तरदि- वत्तरत्येकद्रव्यपरामर्शोऽभेदपरामर्शः । ६ स्मरणप्रत्यक्षयोः।, .७, प्र. त्यभिज्ञानम् । १८ प्रत्यक्षानुमानयोः । ९ प्रत्यक्षस्य विषयः प्रदर्शितः ।। १० अनुमानस्य विषयः प्रदर्शितः .. ११ पूर्वापरं विकारव्याप्येकत्वस्य । १२ योगः प्राह । १३ प्रत्यक्षविशेषो, धारणाज्ञानं संस्कारः। स्वाश्रयस्य प्रागुभृतावस्थासमानावस्थान्तरापादको , ऽतोन्द्रियो धर्मो वा संस्कारः । ३ परीक्षामुखम् ।.. - -- बालिश एवं । स्वविषयाभिमुख्येन प्रवत्तमानस्येन्द्रियस्य सह- कारिशतसमवधानेऽपि विषयान्तरप्रवृत्तिलक्षणातिशयायो- • गात् । विषयान्तरं : चातीतसाम्प्रतिकावस्थाव्याप्येकद्रव्यमि- न्द्रियाणां रूपादिगोचरचारित्वेन चरितार्थत्वाच ॥ नाप्यदृष्ट- सहकारिसव्यपेक्षमिन्द्रियमेकत्वविषयं । उक्तदोषादेव ॥ किञ्चा. दृष्टसंस्कारादिसव्यपेक्षादेवात्मनस्तद्विज्ञानमितिकिन्न कल्प्यते? दृश्यते हि स्वप्नसारस्वतचाण्डालिकादिविद्यासंस्कृतादा- त्मनो विशिष्टज्ञानोत्पत्तिरिति ॥ नन्वञ्जनादिसंस्कृतमपि चक्षुः सातिशयमुपलभ्यत इति चेन्न, तस्य स्वार्थानतिक्रमेणैवा- तिशयोपलब्धेर्न विषयान्तरग्रहणलक्षणातिशयस्य । तथाचो- क्तम्-यत्राऽप्यतिशयो दृष्टः स स्वार्थानतिलंघनात् । दूरसू- -- + - - १ भो यौग प्रत्यक्षविपयं ब्रूषे तदयुक्तं किंच विषयान्तरमप्यस्तीत्यनूद्य प्रति- पादयति । २ विषयवृत्तित्वेन । ३ संनिधानेऽपि । ४ प्रवृत्तर्थत्वात् । ५ पुण्यपापलक्षण । मतान्तरे विधिनिषेधजन्यत्वे सत्यतीद्रियत्वमित्युक्तम् । ६ एकत्वग्राहकत्वमात्मनः कल्पनीयं नत्विन्द्रियस्य । ७ त्वया योगेन। ८ अतीतानागतवर्तमानलाभालाभादिज्ञापिका स्वप्नविद्या । ९ असाधारणवादित्व- कवित्वादिविज्ञापनी सारस्वतविद्या । १० नष्टमुप्ठ्यादिसूचिका चाण्डालिका विद्या, मन्नविशेषः। ११ न केवलमात्मा। १२ चक्षुपो । १३ सनिहि- तवर्तमानरूपानतिक्रमेणैव । ' १४ रसादि । १५ उपलब्धि। मीमांसकश्लोकवार्तिके । १७ गृद्धवराहादिनेत्रादौ, यतो चक्षुःप्रावल्यं गृद्धस्य, श्रोतृप्रावल्यं वराहस्य १८ “स्वविषयानतिघड्वनादेवातिशयो १६ महेन । -- प्रमेयरत्नमालासहितम् । ३५. क्ष्मादिदृष्टौ स्यान्न रूपे 'श्रोत्रवृत्तित इति ॥३॥ नन्वस्य वार्तिकस्य सर्वज्ञप्रतिषेधपैरत्वाद्विषमो दृष्टान्त इतिचेन्न-इ- न्द्रियाणां विषयान्तरप्रवृत्तातिशयाभावमात्रे सादृश्यात्.. दृष्टान्तत्वोपपत्तेः । न हि सो दृष्टान्तधर्मो दार्शन्तिके भवि- तुमर्हति । अन्यथा दृष्टान्त एव न स्यादिति । ततः स्थित प्रत्यक्षानुमानाभ्यामर्थान्तरं प्रत्यभिज्ञानं सामग्रीस्वरूपभेदा. दिति । न चैतदंप्रमाणं ततोऽर्थ परिच्छिा प्रवर्तमानस्यार्थ.. क्रियायामविसम्वादात् प्रत्यक्षवदिति। नचैकत्वांपलापे बन्धमो- क्षादिव्यवस्थानुमानव्यवस्था वा । एकत्व भावे बद्धस्यैव मोक्षादेहीतसम्बन्धस्यैव लिङ्गस्यौदर्शनादनुमानस्य च व्य- - -- J दृष्टो. नाविषये । १ योगो जैन प्राह । २ उक्तानुक्तदुरुक्तव्यतिकारि वार्तिकम् । उक्तानुक्तदुरुक्तानी, चिन्ता यत्र प्रवर्तते । तं ग्रन्थं वार्तिकम् । प्राहुवार्तिकज्ञा मनीषणः । १। श्लोकवार्तिके वार्तिकस्येत्यनेन प्रकारेण लक्षण- मुक्तम्-सूत्राणामनुपपत्तिचोदना तत्परिहारो विशेषाभिधानञ्च । त्वत्र सर्वज्ञनिराकरणम् ४ पूर्वोत्तरविवर्तेकत्व प्रत्यक्षानुमानयोरवि षयो यतः. । . ५ प्रत्यभिज्ञानमप्रमाणं रजतज्ञानवदिति चेन्न । तिभिज्ञानात् । ८ पुरुपस्या ९ यो यत्रैव; स तत्रैव, यो यदैव स तदैव सः । न देशकालयोर्व्याप्ति र्भावानामिह दृश्यते । २ । इत्येकत्वापलापो, वौद्धानां पूर्वोत्तरविवर्तवृत्येकद्रव्यस्यापन्हवे सति क्षणिकत्वा- जीक्रियमाणे च सति!, १० गृहीतसम्वन्धस्यादर्शनं भवत्येकत्वापलापे सति । ११ महानसेऽग्निधूमयोगहीतसम्बन्धस्य धूमलक्षणस्य लिङ्गस्यादर्शनादिति. । ७ ज्ञात्वा । । 1 परीक्षामुखम् । वस्थायोगादिति '। मंचास्य विपये बाधकप्रमाणसद्भावाद प्रामाण्यं तद्विपये प्रत्यक्षस्य लैङ्गिकस्य चाप्रवृत्तेः। प्रवृत्ती वा प्रत्युत साधकत्वमेव न बाधकत्वमित्यलमतिप्रसंगेन । तथा सौगतस्य प्रमाणसङ्ख्याविरोधिविध्वस्तवाधं तख्यि- भूपढौकत एव । नचैतत्प्रत्यक्षेऽन्तर्भवति । साध्यसाधनयो- व्याप्यव्याकभावस्य साकल्येन प्रत्यक्षाविषयत्वात् । न हि तदिय॑तो व्यापारान्कर्तुं शक्नोति, अविवारकत्वात् सन्निहि- तविषयत्वाच । नाप्यनुमाने, तस्यापि देशादिविषयविशिष्ट- स्वेन व्याप्त्यविषयत्वात् । तद्विषयत्त्वे वा प्रकृतानुमानान्तर- विकल्पद्वयानतिक्रमात् तत्र प्रकृतानुमानेन व्याप्तिप्रतिपत्ता. वितरेतराश्रयत्वप्रसङ्गः । व्याप्तौ हि प्रतिपन्नायामनुमानमा- मानमासादयति, तदात्मलामे च व्याप्तिप्रतिपत्तिरिति, - १ प्रत्यभिज्ञानस्य । २ स्मृतिप्रत्यभिज्ञानप्रकारेण । २ स्मृतिप्रत्यभिज्ञानप्रकारेण ।। ३ तार्यते सशय- विपर्ययावनेनेति । ४ यावती शिशपा सा वृक्षस्वभावा वृक्षत्वाभावे तदभावा- दिति तकस्यैव विपयत्वात् । ५ देशान्तरकालान्तरसाकल्येन । ६ यावान् कश्चिधूमः सः सर्वोऽप्यमिजन्मानग्निजन्यो वा नं भवतीयतो व्यापारान् । ७ निर्विकल्पकत्वात् । ८ सम्बन्धविषयत्वात् । ९ नाप्यनुमानेऽन्तीव इति सम्बन्धः । १० प्रकृतानुमानानु- मानान्तरयोमध्ये । ११ अनियतदिग्देशकालादिविषया व्याप्तिः । -१२ गृहीतायां सत्यां । १३ अनुमानस्वरूपम् ।
प्रमेयरत्नमालासहितम् । अनुमानान्तरेणाविनाभावप्रतिपत्तावनवस्थाचैमूरी परपक्ष- चमू चञ्चमीतीति नानुमानगम्या व्याप्तिः । नापि सांख्यादि- परिकल्पितैरागमोपमानार्थापत्यभावैः साकल्येनाविनाभावाव- गतिः तेषा समयसंगृहीतसादृश्यानन्यथाभूताभावविषयत्त्वेन व्याप्त्यविषयत्वात् परैस्तथाऽनभ्युपगमाञ्च। अथ प्रत्यक्षपृष्ठ- भार्विविकल्पात् साककल्येन साध्यसाधनभावप्रतिपत्तेर्न प्रमा. णान्तरं तदर्थ मृग्यमित्यपरः, सोऽपि न युक्तवादी-विकल्प- स्याध्यक्षगृहीतविषयस्य तदगृहीतविषयस्य वा तद्यवस्थाप- कत्वम् ? • आये पक्षे दर्शनस्येव तदनन्तरभाविनिर्णयस्थापि ܝܝ - वस्था । । १ व्याप्तिरस्त्यनुमानान्यथानुपपत्तेरित्यनुमानान्तरात्प्रकृतानुमाने व्याप्तिसद्भावः स्यातमुत्रानुमानान्तरे व्याप्तिरस्तीत्यनुमानान्तरात्स्यात्तास्मिन्नप्यपरादित्यन- २.व्याप्तिप्रतिपत्तौ । ३ व्याघ्री। ४ सौगतपक्षसेनाम् । चमु अदनेऽतिशयेन भक्षयतीति चञ्चमीति, । ६ अक्षपादप्राभाकरजमनी- यैः। ७ प्रसिद्धसाधर्म्यात्साध्यसाधनमुपमानमुक्तञ्च, उपमानं प्रसिद्धार्थसाध- ात्साध्यसाधनमिति । ८ प्रमाणषटकविज्ञाता यत्रार्थों नान्यथा भवेत् । अदृष्ट कल्पयेदन्यत्सार्थापत्तिरुदाहृता । अथवा दृष्टः श्रुतो वाऽर्थोऽन्यथा- नुपपद्यत इत्यदृष्टार्थकल्पनार्थापत्तिः । अथवान्यथाभूतस्याथस्य दर्शनादर्थान्त. रप्रतिपत्तिः । ९ आगमादीनाम् । १०: देशान्तरकालान्तरसामस्त्येन । ११ व्याप्ति । १२. व्याप्तिग्रहणार्थम् । १३ वौद्धः । १४ अध्यक्षगृहीतमेव. विषयो यस्य..। १५. व्याप्तिव्यवस्थापकत्वम् । १६ प्रत्यक्षस्येव । १७ वि: । ।
३८ परीक्षामुखम् । - 4 नियतविपयत्वेन व्याप्त्यगोचरत्वात् । द्वितीयपक्षेऽपि विकल्प यमुपढौकत एव । तद्विकल्पज्ञानं प्रमाणमन्यथा वेति ? प्रथमपक्षे प्रमाणान्तरमनुमन्तव्यं, प्रमाणेद्वयेऽनन्तर्भावात् । उत्तरपक्षे तु न ततोऽनुमानव्यवस्था । न हि व्याप्तिज्ञानस्याप्रा- माण्ये तत्पूर्वकमनुमान प्रमाणमास्कन्दति सन्दिग्धादिलिंगा- दप्युत्पद्यमानस्य प्रामाण्यप्रसंगात् । ततो व्याप्तिज्ञानं सवि- कल्पमविसंवादकं च प्रमाणं प्रमाणद्वयादन्यदभ्युपगम्यमिति न सौगताभिमतप्रमाणसंख्यानियमः। एतेनानुपलम्भात्कार- गंव्यापकानुपलम्भाञ्च कार्यकारणव्याप्यव्यापकभावसम्वि- त्तिरितिवदन्नपि प्रत्युक्तः । अनुपलम्भस्य प्रत्यक्षविषयत्वेन कारणाद्यनुपलम्भस्य च लिंगत्वेन तजनितस्यानुमानत्वात् 7 २ विक- कल्पस्यापि । १ विशेषदेशकालतयावधृतविषयत्वेन । रूपस्य प्रत्यक्षानुमानयोरन्तर्भावः सम्भवतीति' नाशंकनीयं कल्पनापोडमभ्रा- न्तमिति-प्रत्यक्षलक्षणस्य तत्रासम्भवानिश्चिताविनाभाविनियमलक्षणलिङ्गाभावा. नानुमानेऽपि । ३ - अप्रमाणात्सविकल्पात् । ४ प्रत्यक्षपृष्ठभाविना विकल्पेन गृहीतुमशक्या व्याप्तिय॑तः । ५ बौद्धन प्रत्यक्षानुभानाभ्यां भिन्न प्रमाणमङ्गीकर्तव्यं तदेतत्संज्ञान्तरं सविकल्पकं तख्यिमेवेत्यभिप्रायः । प्रत्यक्षानुमानयोाप्तिग्रहणनिराकरणपरेण । ७ प्रत्यक्षण भूतले घटा- यभावस्तत्रानुमानं नास्ति । ८' नास्त्यत्र भूतले घटोऽनुपलब्धेरितस्वभावा नुपलम्भः । . ९ नास्त्यत्र धूमोऽनग्नेरितिकारणानुपलंभः । शिंशपा वृक्षानुपलब्धेरितिव्यापकानुपलम्भः । ११ निराकृतः । १२ के ६ १० नास्त्यत्र- -- १ प्रमेयरत्नमालासहितम् । M : - प्रत्यक्षानुमानाभ्यां व्याप्तिग्रहणपक्षोपक्षिप्तदोषानुपङ्गात्। एतेन प्रत्यक्षफैलेनोहापोहविकल्पज्ञानेन : व्याप्तिप्रतिपत्तिरित्यप्यपा स्तम् । प्रत्मक्षफैलस्यापि प्रत्यक्षानुमानयोरन्यतरत्वे व्याप्तेर- विषयीकरणात्, तदन्यत्वे च प्रमाणान्तरत्वमनिवार्यमिति । अथ व्याप्तिविकल्पस्य. फलत्वान्न प्रामाण्यमिति न युक्तम् । फलस्थाप्यनुमानलक्षणफलहेतुतया प्रमाणत्वाविरोधात् । तथा सन्निकर्षफलस्यापि विशेषणानस्य विशेष्यज्ञानलक्षणफला- पेक्षया प्रमाणत्वमिति न वैशेषिकाभ्युपगतोहापोहविकल्पः प्रमाणान्तरत्वमतिवर्तते । एतेनै त्रिचतुःपञ्चषप्रमाणवादिनो- - १ आरो- पित। वलं विधिप्रतिपत्तरेवान्यत्रप्रतिषेधरूपत्वादित्यष्टसहस्च्यामिति । २ सम्भवात् । ३ अनुपलम्भादिना व्याप्तिग्रहणे प्रत्यक्षानु- मानपक्षोपक्षिप्तदोषदर्शनेन । ४ पूर्वपूर्वप्रमाणत्वे फलं स्यादुत्तरोत्तरमिति । ५ बिज्ञातमर्थमवलम्ब्यान्येषु व्याप्त्या तथाविधतर्कणमूहः । ६ उक्तियुक्ति- भ्यां विरुद्धार्थात्प्रत्यवायसम्भावनमपोहः । ७ वैशेपिक्रमतम् । ८ नि- राकृतम् । ९ प्रत्यक्षफलज्ञानं प्रत्यक्षानुमानाभ्यां भिनं, ताभ्यां व्याप्तिग्रहणं-. नास्ति फलज्ञानेनास्तित्फलज्ञानं प्रमाणान्तरं स्यात् । १० प्रत्यक्षफलं, प्रत्य- क्षमनुमान वेति विकल्पद्वयं तयोर्मध्ये एकत्वे सति । ११ ताभ्यां प्रत्यक्षानुमा- नाभ्यामन्यत्वे भिन्नत्वे । १२ नैयायिकः। १३ व्याप्तिग्राहकस्य । १४.प्र. त्यक्षज्ञानफलं व्याप्तिविकल्पः । १५ नागृहीतविशेषणावुद्धिर्विशेष्य इति न्या- यात। १६दण्डज्ञानस्य । १७ । दण्डिज्ञान । १८ व्याप्तिज्ञानम् । १९ न निराकरोति । २० वौद्धस्य प्रमाणसंख्याप्रतिपादनतासामर्थ्यसमर्थनेन । + परीक्षामुखम् । ऽपि सांख्याशपादप्रमाकरजैमिनीयाः स्वप्रमाणसंख्यां न व्य: वस्थापयितुं क्षमा इति प्रतिपादितमवगन्तव्यम् । उक्तत्यायन स्मृतिप्रत्यभिज्ञानताणां तदभ्युपगतप्रमाणसंख्यापरिपंथि स्वादिति प्रत्यक्षेतरभेदात् द्वे एव प्रमाणे इति स्थितम् । अथे दानी प्रथमप्रमाणभेदस्य स्वरूपं निरूपयितुमाह- 1 विशदं प्रत्यक्षमिति ॥ ३ ॥ ज्ञानमित्यनुवर्तते । प्रत्यक्षमिति धेमिनिर्देशः । विशदशा- नात्मकं साध्यम् । प्रत्यक्षत्त्वादिति हेतुः । तथाहि-प्रत्यक्ष वि. शदज्ञानात्मकमेव प्रत्यक्षत्वात् । यन्न विशदज्ञानात्मकं तन्न- प्रत्यक्ष, यथा परोशम् । प्रत्यक्षं च विवादापन्नं, तस्माद्विः शदज्ञानात्मकमिति । प्रतिज्ञार्थंकदेशासिद्धो हेतुरिति चेत् का पुनः प्रतिज्ञा तदेकदेशो वा ? धर्मिधर्मसमुदायः प्रतिज्ञा । तदे. कंदेशो धर्मों धर्मी वा ? हेतुः प्रतिज्ञार्थंकदेशासिद्ध इति चेन्न- .धर्मिणो हेतुत्वे असिद्धत्वायोगात् । तस्य पक्षप्रयोगकालव. 7 येन च । १ व्याप्तिज्ञानस्य प्रमाणलव्यवस्थापनेन स्मृत्यादीनां प्रमाणताव्यवस्थापनेनोक्तन्या २. सांख्यादिना । ३.सांख्यादिस्वीकृतप्रमाणसंख्याविपक्षित्वात् । ४ विवक्षितं प्रत्यक्ष प्रमाणं धम्मी। । ५ साध्यधर्माधारो धर्मी पक्षः । ६ व्यतिरेकी। ८' वादिप्रतिवादिनोः प्रसिद्ध एव धर्मी भ. वति । ९ प्रत्रिज्ञा एवार्थः प्रतिज्ञार्थस्तस्यैकदेशः सो हतुरसिद्धः । १० पक्षः , ७ उपनयः। - प्रमेयरत्नमालासहितम् । ४१ हेतुप्रयोगेऽप्यसिद्धत्वायोगात् । धर्मिणो हेतुत्त्वे अनन्वयदोप इति चेन्न-विशेषस्य धर्मित्वात् । सामान्यस्य च हेतुत्वात्, तस्य च विशेषेवर्नुगमो विशेषनिष्ठत्वात्सामान्यस्यं । अथ सा. ध्यधर्मस्य हेतुत्वे प्रतिज्ञाथैकदेशासिद्धत्वमिति तदप्यसम्मतम्, साध्यस्य स्वरूपेणैवासिद्धत्वान्न प्रतिज्ञार्थंकदेशत्वेन तस्या. सिद्धत्वं, धर्मिणा व्यभिचारात् । संपक्षे वृत्यभावावेतोरेन- न्वय इत्यप्यसत्। सर्वभावानां . क्षणमङ्गसङ्गममेवाङ्गङ्गार -- - - - 1 ६ - प्रत्यक्षं तस्य प्रत्यक्षस्य प्रयोगकालः "प्रत्यक्ष विशदज्ञानात्मक प्रत्यक्षत्वा त्" यथा पक्षस्य प्रत्यक्षत्वं तथा हेतोः। १ वादिप्रतिवादिनोः प्रसिद्ध एव धनी भवतीत्यर्थः । २ पर्वतोऽयमग्निमान्पर्वतत्वादित्यादिवंदनन्वयदो- ३ प्रत्यक्षत्वस्य। ४ अन्वयो वर्तते । ५ निर्विशेष हि सामा. व्य भवेच्छशविषाणवत् । सामान्यरहितत्वाच्च विशेषस्तद्वदेव हि । १ । मी, योग तव मत वर्तते । ७ न मया साध्यधर्मस्य हेतुत्वं प्रतिपद्यते । ८ कथमप्रस्तावे साध्यधर्मस्य हेतुत्वं व्रपे, शब्दो नित्यो भवितुमहति नित्य- त्वादित्येवप्रकारेण प्रतिवादिना (जैनेन) साध्यधर्मस्यानझीकरणात् , किं च साध्यस्य हेतुत्वे स्वरूपासिद्धं च वक्तव्य न प्रतिज्ञार्थंकदेशासिद्धत्वमन्यथा यो यः प्रतिज्ञार्थैकदेशः सः सोऽसिद्ध इति व्याप्ती धर्मिणा व्यभिचारात् । अथवा यो य प्रतिज्ञार्थंकदेशः सः, सोऽसिद्ध इति व्याप्तौ धर्मिणोऽपि प्रतिज्ञा- थैकदेशत्वाद्वादिप्रतिप्रादिनोः साध्यवत्तस्याप्यसिद्धता स्यात् । , ९, साध्यसा- थनधी धर्मी सपक्षस्तस्मिन् । प्रत्यक्षत्वस्य हेतोः। ११ असपक्षधर्मत्वम् । १२ क्षणे क्षणे भंगः क्षणभङ्गः प्रतिसमयं नाश इत्यर्थः । - - । १० . परीक्षामुखम् मडीकुर्वतां ताथागतानां ‘सत्त्वादिहेतूनामदयप्रसङ्गात् । विपक्षे बाधकप्रमाणाभावात् पक्षव्यापकत्वाच्चान्वयवत्वं प्रकृ. तेऽपि समानम् । इदानी स्वोक्तमेव विशदत्वं व्याचष्टे- प्रतीत्यन्तराव्यवधानेन विशेषवत्तया वा प्रतिभासनं वैशद्यमिति ॥ ४ ॥ , .. एकस्याः प्रतीतेरन्या प्रतीतिः प्रतीत्यन्तरम् । तेनाव्यव. धानं तेन प्रतिभासन वैशद्यम् । यद्यप्यवायस्थावग्रहहाप्रती- तिभ्यां व्यवधानं, तथापि न परोक्षत्वं विषयविषयिणोर्भेदेना- प्रतिपत्तेः। यत्र विषयविषयिणो:दे सति व्यवधान तत्र . १ सर्व क्षणिक सत्वादित्यत्रापि हेतोः सपक्षे वृत्तिर्नास्ति सर्वस्य पक्षीकृतत्वेन. सपक्षस्यांभावात् । २ क्षणिकत्वे साध्ये नित्यत्वम् विपक्षः, नित्यो पदार्थो नास्ति कमयोगपद्याभ्यामक्रियाकारित्वाभावात् खरविषाणवदिति वौद्धमते - वाधक- प्रमाणम् । ३ अप्रत्यक्ष प्रत्यक्षत्वम् नास्ति परोक्षत्वात् शिंशपादिवदिति प्रकृतेऽपि प्रवृतानुमानेऽपि प्रत्यक्षेऽपि वाधकप्रमाणमस्ति । ४ प्रत्यक्षस्य- विशदज्ञानात्मकत्वसमर्थनानन्तरम् । ५ तवायस्य परोक्षत्वमस्त्ववग्रहा- दिप्रतीत्यन्तरेण व्यवधानादिति शक्षायामुत्तरं ददाति । ६ पूर्वज्ञानमुत्तरज्ञान व्यवधापयति, धारणायारपि व्यवधानमस्ति। ७ तर्हि प्रत्यक्षत्वं कुत इत्या- है । ८ विषयस्यार्थस्य विषयिणो ज्ञानस्य च भेदासम्भवात् , कथम् ! अवग्रहादिविषयभूतार्थस्यावायविषयभूतार्थस्य चावग्रहादिरूपेण परिणतस्यैकत्वा- दवग्रहादिरूपस्य प्रत्यक्षस्य चैकत्वात् । ९ अज्ञानात् । १० विषये प्रतीती वा।
प्रमेयरत्नमालासहितम् । ४३ . परोक्षत्वम्। तीनुमानाध्यक्षविषयस्यैकात्माद्यस्याग्नेभिन्न स्थोपलम्भादध्यक्षस्य परोक्षतेति तदप्ययुक्तम्, भिन्नविषयत्वा. भावात् । विसदृशसामग्रीजन्यभिन्नविषया प्रतीतिः प्रतीत्या न्तरमुच्यते नान्यदिति न दोषः । न केवलमेतदेवं, विशेष- वत्तया वा प्रतिभासनं सविशेषवर्णसंस्थानादिग्रहणं वैशद्यम् । "तञ्च प्रत्यक्षं द्वेधा मुख्यसंव्यवहारभेदादिति'' मनसिकृत्यप्रथम सांव्यवहारिकप्रत्यक्षस्योत्पादिकां सामी तभेदं च प्राह- है । इन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तं देशतः सांव्यवहारिकमिति ॥ ५ ॥ विशदं ज्ञानमिति चानुवर्तते । देशतो विशदं ज्ञानं सांव्यवहा- १ कश्चित्तटस्थः । २ प्रथममाग्निज्ञानं परोक्षं धूमज्ञानेन व्यवधानात्पुनः समीप गत्वाग्निं पश्यति तस्य प्रत्यक्षस्यापि परोक्षत्व स्यात्प्रतीत्यन्तरानुमानज्ञानेन व्यवधानात् , तथा प्रथमधूमदर्शनमन्यो विषयः पश्चादाग्निज्ञानं भिन्नः। ३ एक- स्मिन् विपये वहुप्रमाणप्रवृत्तौ दोषो नास्ति, दर्शनकाले प्रत्यक्षं प्रमाणान्तरेण व्यवहितं भवति चेद्दोपः । ४ एक्रपुरुषस्य। ५ लिङ्गानुमितस्याग्नेस्त- देशोपसर्पणे सति पदार्थग्राहकमध्यक्षं तस्य । ६ अनुमानस्य ज्ञातकरण- त्वात्प्रत्यक्षस्याज्ञातकरणत्वाद्भिन्नसामग्रीः, प्रत्यक्षेऽजातकरणं चक्षुरिन्द्रियं यत- स्तत्स्वं न पश्यति, ज्ञातकरणं परिशीलितधूमः । अवग्रहादिनेत्यर्थः, ७ वि- लक्षण। ८ केवलं प्रतीत्यन्तराव्यवधानमेव वैशयं नापि तु। २ "लघुध्वजा- येति" सूत्रेण मुख्यस्य प्राक्प्रयोगः ।। १० इंदति ,परमैश्वर्यमनुभवतीति तस्य लिङ्गमिन्द्रियम् । ११ ईपदिद्रियमनिन्द्रियम् । S आत्मा . - । परीक्षामुखम् । । । रिकमित्यर्थः । समीचीनः प्रवृत्तिनिवृत्तिरूपो व्यवहारः तत्र भवं सांव्यवहारिकम् । भूयः किंभूतमिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् । इन्द्रियं चक्षुरादि, अनिन्द्रियं मनः ते निमित्त कारणं यस्य । समस्तं व्यस्तं च कारणमभ्युपगन्तव्यम् । इन्द्रियप्राधान्याद- निन्द्रियवलाधानादुपजातमिन्द्रियप्रत्यक्षम् , अनिन्द्रियादेव विशुद्धिसव्यपेक्षादुपजायमानमनिन्द्रियप्रत्यक्षम् । तत्रेन्द्रिय त्यक्षमवग्रंहादिधारणापर्यन्ततया चतुर्विधमपि बह्वादिद्वादशभे- १ अवाधितः। २.सुहाय । ३ ज्ञानावरणवीर्यान्तरायक्षयोपशमलक्षणा विशुद्धिः । ४ द्वयोमध्ये । ५ अवगृह्यते सत्वसामान्यस्यावान्तरो जा- तिविशेपो येन सो विपयविषयिसन्निपाते सत्याद्यग्रहणमवग्रहः । ईयतेऽवग्रही- तार्थस्य विशेषमाकाक्ष्यते यया सेहा । अवयते निश्चीयतेऽर्थो ऽनेनासाववायः । धार्यते कालान्तरेऽपि न विस्मयतेऽनया सा धारणा। ६ वढेकव्यक्तिविज्ञानं, वहे च क्रमाद्यथा। वहवस्तरवः सूपो वहुश्चैको वनचत्रः 1१। वहेकजाति- विज्ञानं, स्यावहेकविध यथा। वर्णाः नृणां वहुविधाः गौर्जात्येकविधेति च ।२। आश्वर्थस्य ग्रहः क्षिप्रं, स्यादक्षिप्रं शनैर्मुहुः। मृत्पात्रं यद्वदादत्ते, नवं वाs नूतनं जलम् ।। वस्त्वेकदेशाद्वस्तुनो; वस्त्वंशाद्वस्तुनोऽथवा । तत्रासन्नि- हितान्यस्यानिसतं मननं यथा ।४। घटावाग्भागकन्यास्यगवयग्रहणे क्षणे । स्फुटं घटेन्दुगोज्ञानमभ्याससमयान्विते ।५। वस्त्वेकदेशमात्रस्य विज्ञानं निसृतं मतम् । घटाग्भागमात्रेऽपि क्वचिज्ज्ञानं हिं दृश्यते ।६। प्रत्यक्षे नियतत्वाद् दृग्गुणाथैकाक्षवोधनम् । अनुक्तमेकैकेनोक्तं प्रत्यक्षं नियेतग्रहः ।। ' चक्षुषा दीपरूपावलोकावसर एव तत् । तदुष्णस्पर्शविज्ञानं यथोक्तार्थः प्ररूयते ॥८॥ स्पर्शनं रसनं घ्राणं, चक्षुः श्रोत्रं मनश्च स्वम् । अर्थः स्पर्शे रसों गन्धों - प्रमेयरत्नमालासहितम् । ४५ दमष्टचत्वारिंशत्संख्यं प्रतीन्द्रियं प्रतिपत्तव्यम् । अनिन्द्रियप्र- त्यक्षस्य चोक्तप्रकारेणाष्टचत्वारिंशभेदेन मनोनयनरहितानां चतुर्णामपीन्द्रियाणां व्यञ्जनाचग्रहस्याष्टचत्वाारशभेदेन 'च समुदितस्येन्द्रियानिन्द्रियप्रत्यक्षस्य षट्त्रिंशदुत्तरा त्रिशती संख्या प्रतिपत्तव्या । ननु स्वसंवेदनभेदमन्यदपिप्रत्यक्षमस्ति, तत्कथं नोक्तमिति न वाच्यम् । तस्य सुखादिज्ञानस्वरूपसंवे. दनस्य मानसप्रत्यक्षत्वात् । इन्द्रियज्ञानस्वरूपसंवेदनस्य चे. न्द्रियर्समक्षत्वादन्यथा तस्य स्वव्यवसायायोगात्। स्मृत्यादि- स्वरूपसंवेदनं मानसमेवेति नापरं स्वसंवेदनं नामाध्यक्षम. . 1 रूपः शब्दः श्रुतादयः ।९। स्यानित्यत्वविशिष्टस्य, स्तम्भादेहणं ध्रुवः । विधुरादेरनित्यत्वेनान्वितस्याध्रुवो ग्रहः ।१०। तत्रार्थस्य द्वादशपदार्थैः सहा- वग्रहादीनामिन्द्रियाणां मनसश्च गुणने २८८ भेदाः भवन्ति, व्यञ्जनाव ग्रहस्य, द्वादशपदाथैः न चक्षुरनिन्द्रियाभ्यामितिनिषेधाच्चक्षुरनिन्द्रियव्यति- रिक्तचतुर्णामिन्द्रियाणां गुणने सति ४८ भेदाः भवन्ति । अर्थस्य व्यजनाव- ग्रहस्य च सर्वे समुदिताः३३६ भेदा मतिज्ञानस्य, सन्ति । मृव्यक्तं शब्दादिजातं तस्यावग्रह एव , भवतीति । .२ मिलितस्य । ३ बौद्धः प्राह । : ४ अह सुख्यहं . सुखीतीत्यादिना । ५ अनिन्द्रिय । ६ यथन्द्रियज्ञानं समक्षं तथेन्द्रियज्ञानस्वरूपसम्वेदनस्यापि, समक्षत्वमिति । ७ मनोक्षप्रभवज्ञानाभ्यामन्यत्वे । ८स्वसम्वेदनस्य । ९ तस्यानिन्द्रिय- निमित्तात् । १० भावप्रमेयापेक्षायां प्रमाणाभासनिवः । वहिःप्रमेयापेक्षायां १ व्यञ्जन- - - ४६ परीक्षामुखम् । स्ति ॥ ननु प्रत्यक्षस्योत्पादक कारण वदता ग्रन्थकारणेन्द्रिय- वदर्थालोकांवपि किन कारणत्वेनोक्तौ.१. तदेवचने कारणानां साकल्यस्यासंग्रहाद्विनेयव्यामोह एव स्यात् तदियत्ताऽनव- धारणात् । न च भगवतः परमकारुणिकस्य चेष्टों तद्यामोहाय. प्रभवतीत्याशङ्कायानुच्यते। /नार्थालोको कारणं परिच्छेद्यत्त्वात्तमोवत् ॥ ६ ॥ सुगममेतत् । ननु बाह्यालोकाभावं विहाय तमसोऽन्य- स्याभावात्साधनविकलो दृष्टान्त इति । नैवम् । एवं सति वा- ह्यालोकस्यापि 'तमोऽभावादन्यस्यासम्भवात्तेजोद्रव्यस्यास- म्भव इति विस्तरेणैतदलङ्कारे प्रतिपादितं बोद्धव्यम् । अत्रैव साध्ये हेत्वन्तरमाह- प्रमाणं तन्निभं च ते ।१.,१ नैयायिकः प्राह । २ कारणसाकल्यावचने. सति। ३ आचार्यस्य ग्रन्थकर्तुः । ४ प्रवृत्तिः -1 ५ तमोवत्परिच्छेद्यो । ६ सांव्यवहारिकप्रत्यक्षस्य कारणं नेति भावः प्रमेयत्वात्प्रत्यक्षगोच- रत्वादित्यर्थः । ८ वाह्यालोकामावस्य तमसः परिच्छेद्यत्वं नास्ति । वाह्यमिति विशेषणेनान्तरज्ञानत्वं प्रतिपादितं. भवति न तु तमस्त्वमिति । ९ वाह्यालोकस्याभावस्यैव . तमसः साधनात्तमसः परिच्छेद्यत्वं नास्त्यतः साधनविकलत्वं दृष्टान्तस्य । १० तमोऽभाव एव वाह्यालोकः । ११ प्रमे- -- प्रमेयरत्नमालासहितम् । तदन्वयव्यतिरेकानुविधानाभावाच्च केशोण्डुकंज्ञानवन्नक्तंचरज्ञानवच्च ॥ ७ ॥ - कयोः । - अत्र व्याप्तिः । यद्यस्यान्वयव्यतिरेको नानुविदधाति न त. तत्कारणकं, यथा केशोडुकज्ञानं, नानुविधत्ते च ज्ञानमर्थान्य. यव्यतिरेकाविति । तथाऽऽलोकेऽपि । एतावान् विणेपस्तत्र नक्तंचरदृष्टान्त इति । नक्तंचरा मार्जारादयः । ननु विज्ञानमर्थ. जनितमर्थाकार चार्थस्यग्राहकम् । तदुत्पत्तिमन्तरेण विषय- प्रति नियमायोगात् । तदुत्पत्तेरालोकोदावविशिष्टत्त्वात्ताद्रप्य- सहिताया एव तस्यास्तं प्रति नियमहेतुत्त्वात् भिन्नकालत्वेऽपि यंकमलमार्तण्डे । १ ज्ञान धर्म्यालोककारणकं न भवति तस्मादलो- २ अनुगमन । ३ अनेन दृष्टान्तेन ज्ञानामर्थकारणकमिति नि- रस्तम् । ४ अनेन ज्ञानमालोककारणकमिति, निरस्तम् । ५ ज्ञानं कार्यम् । ६ कारणस्यार्थस्य । ७ अर्थ सति ज्ञानमिति नियमो न यतोऽर्थाभावेऽपि ज्ञानसद्भावात् । ८ व्याप्तिः । ९ आदिशब्देनाञ्जन- संस्कृतमपि चक्षुः। १० योगाचारों वौद्धः प्राह।,११ तस्माद्विज्ञातवि. षयादिति । १२ प्रत्येकव्यापारम् । १३.सत्यालोके ज्ञानस्योत्पत्तिः कथं नालोकं गृह्णाति तदाकारत्वाभावात् । १४ अतस्ताद्रूप्यग्रहण, ताद्रूप्यतदु त्पत्ती नीलक्षणादौ । तस्य विषयस्य रूपं यस्य तत्तद्रूप तस्य भावस्ताद्रूप्यं । १५-तदुत्पत्तेः। १६ ज्ञानं नीलक्षणादुत्पन्न तदाकारधारि सत्तद्गृह्णातीति तदसत्यम्, तयोभिन्नकालत्वात् । नीलक्षणमतीतसमये नष्टं तदुत्पन्नं ज्ञानं वर्तमानसमये प्रवर्तते यतः, एक आत्मलाभक्षणो द्वितीयस्तस्य ज्ञानजननक्षणो ए परिक्षामुखम् । तत्प्रकाश ज्ञानज्ञेययोाग्राहकभावाविरोधात् । तथाचोक्तम्-भिन्नकालं 'कथं ग्राह्यमिति चेग्राह्यता विदुः। हेतुत्वमेव युक्तिशास्तदा- कारार्पणक्षमम् । इत्याशङ्कायामिदमाह- / अतज्जन्यमपि तत्प्रकाशकं प्रदीपवत् ॥ ८ ॥ अर्थाजन्यमप्यर्थप्रकाशकमित्यर्थः । अतजन्यत्वमुपलक्ष- णम् । तेनातदाकारमपीत्यर्थः । उभयत्रापि प्रदीपो दृष्टान्तः । यथा प्रदीपस्यातजन्यस्याऽतदाकारधारिणोऽपि कत्वं, तथा ज्ञानस्यापीत्यर्थः । ननु यार्थादजातस्यार्थरूपान. नुकारिणो ज्ञानस्यार्थसाक्षात्कॉरित्वं तदा नियतदिग्देशकाल- वर्तिपदार्थप्रकाशप्रतिनिर्यमे हेतोभावात्सर्व विज्ञानमप्रतिनि- 'यतविपयं स्यादिति शङ्कायामाह- स्वावरणक्षयोपशमलक्षणयोग्यतया हि प्रतिनियतमर्थ व्यवस्थापयति ॥ ९ ॥ यद्येवं ज्ञानस्य तदुत्पत्तिरभ्युपगम्यते प्रागभावत्वात्सर्वहेतूनामिति वचनान्तर्हि कारणभूतार्थस्य कार्यभूतज्ञानेऽभाव एव तथा च तस्य कथं प्राह्यत्वमित्या- शक्षायामाह । . १ तस्मै-आकारार्पणक्षमम् । २ न तज्जन्यमर्थाजन्यम् । ३ अर्थप्रकाशस्वभावादतदाकारधारित्वमुपलक्षणीयम् यथा काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामित्यत्र गृद्धेभ्योऽपि रक्षणीयं न केवलं काकेभ्यो तथातदाकारधारित्व- मप्युपलक्षणीयमिति । ४ वौद्धः प्राह । ५ भो जैन यद्येवं ब्रूषे । ७ तदुत्पत्तिताप्यहेतुमन्तरेण । '.८ अतीतानागतव्यवहितस्रान्त- रितानां प्रमाणस्य प्रकाशंकत्वं भववित्यनिष्टापादनं जैनानाम् । - ६ नि- श्वय। . ९ अर्थ- प्रमेयरत्नमालासहितम्। ताद्रप्यस्य स्वानि च तान्यावरणानि च स्वावरणानि तेषां क्षय उद. न्याभावः। तेषामेव सदवस्था उपशंमः 'तावेव लक्षणं यस्या योग्यतायास्तया हेतुभूतया प्रतिनियतमर्थ व्यवस्थापय- ति प्रत्यक्षमिति .शेषः । हि यस्मादर्थे । यस्मादेवं ततो नोक्तदोप इत्यर्थः । इदमत्र तात्पर्यम् , कल्पयित्त्वाऽपि तादूप्यं तदुत्पत्तिं तदध्यवसायं योग्यताऽवश्या ऽभ्युपगन्तव्या समानार्थस्तदुत्पत्तेरि- न्द्रियाँदिभिस्तद्वयंस्यापि समानार्थसमनन्तरप्रत्ययैस्तन्त्रि- ग्रहणशकिर्योग्यता । १ मतिज्ञानावरणवीर्यान्तरायकर्मसर्वघातिस्पर्द्धकानामुदया- -भावः क्षयः । २ अनुदयप्राप्तानां तेपामेव सदवस्थोपशमः ।.३ अस्य ज्ञानस्या- यमेवार्थ इति । ४ अर्थनिश्चयम् । ५ एतत्त्रयं सहकारि कारणं वर्तते तथापि कल्पनया किमुपकरण कल्पित यद्योगतावश्याभ्युपगन्तव्या । ६ यदि ताद्रूप्या- द्बोधोऽर्थस्यानियामकस्तर्हि निखिलसमानार्थेष्वेकवेदनापत्तिः स्यान्न च ताद्रूप्यात् बोधस्य समानार्थेषु नियामकत्वं घटतेऽतो नियामकाभावात्तैर्व्यभिचारः । अर्थादुत्पत्तिश्चेत् । ८ इन्द्रियादिभिर्व्यभिचारः स्याद्यतो ज्ञानमिन्द्रिया- दुत्पन्नं तनजानाति । ९ भो जैन त्वयैकैकस्य निराकरण ‘कृतं तन्न युक्तं यतस्तद्वयस्यापि प्रमाणत्वमिति शङ्कायां । तद्यमपि निराकरोति जैनः १० प्राक्तनज्ञानस्य य एव नीलाद्यर्थो विपयः स एवोत्तरज्ञानस्येत्येकसन्तानव- तित्वेन समानोऽर्थ एको. नीलः । ११ ईप्। १२ प्रथमक्षणे नीलमिति ज्ञानमुत्पन्नं तच द्वितीयस्य जनकं तत्र ताद्रूप्यमस्ति तदुत्पत्तिश्च, ज्ञानत्वेन समानमन्याव्यवहितत्वेन समनन्तरमिति । १३ तदुत्पत्तेस्ताद्रूप्याच्च यद्यर्थस्य बोधो. नियामकस्तदा प्राक्तनज्ञानेन, व्यभिचारः कथम् द्वितीयज्ञानस्य प्राक्त- W ४ ५० परीक्षामुखम्। J .. तयस्यापि शुक्ले शंखे पीताकारज्ञानेन व्यभिचाराद्यो- ग्यताश्रयणमेव श्रेय इति । एतेन यदुक्तं परेज-"अर्थेने धर्टयत्यनां नहि मुक्त्वार्थरूपताम् । तस्मात्प्रमेयाधिगतेः प्रमाणं मेयरूपतेति" तन्निरस्तम् । समानार्थाकारनानाज्ञानेषु मेयरूपतायाः सद्भाधात् । न च परेषां सारूप्यं नामास्ति व. स्तुभूतमिति योग्यतयैवार्थप्रतिनियम इति स्थितम् । इदानीं कारणत्वात्परिच्छेद्योऽर्थ इति मतं निराकरोति- कारणस्य च परिच्छेद्यत्त्वे करणादिना व्यभिचार इति ॥ १० ॥ नज्ञानात्तदुत्पत्तिताद्रूप्यसद्भावेऽपि द्वितीयज्ञानेन पूर्वान्तरज्ञानस्य नियामकत्वा.' योगात् । ज्ञानं हि न ज्ञानस्य नियामकं स्वप्रकाशकत्वात्तस्य । १ ननु. न, ताप्यतदुत्पत्तिभ्यां बोधोऽर्थस्य नियामकः किन्तु तदध्यवसायित्वसहिताभ्या- मेवेत्याशंकायां तनयमपि निराकरोति जैनः । २ काचकामलाङपहतच- शुषः शुक्ले शंखे पीताकारज्ञानादुत्पन्नस्य तद्रूपस्य तदध्यवसायिनो द्वितीयज्ञ- नस्य पीताकारेण प्राक्तनज्ञानेन व्यभिचारः । ३ ताद्रूप्यादीनां व्यभिचार- प्रतिपादनेन ४ वौद्धन । ५ सह ।.६ संवध्नाति निर्विकल्पप्रत्यक्षवुद्धिम् । अर्थरूपता . मुक्त्वान्यत् किंचिनिर्विकल्पप्रत्यक्षबुद्धि- मर्थन न घटयतीत्यर्थः ८ समानोऽर्थानामाकारो येषु । तानाम् । १० सारूप्यं सदृशपरिणामलक्षणं सामान्यं, तच्च वौद्धानां मते नास्ति वास्तवं तत्कथमर्थक्रियाकारि। , ११.साधकतमकरणं चक्षुरादि तेन । - । -- ९ सौग- L- प्रमेयरनमालासहितम् । . करणादिकारणं परिच्छेद्यमिति तेन व्यभिचारः। न ब्रमः कारणत्वात्परिच्छेद्यत्वमपि तु परिच्छेद्यत्वात्कारणत्वमिति चेन्न तथापि केशोडुकादिना व्यभिचारात् । इदानीमतीन्द्रियप्रत्यक्षं व्याचष्टे-- 7 - १ सामग्रीविशेषविश्लेषिताखिलावरणमती- न्द्रियमशेषतो मुख्यम् ।। ११ ।। सामग्री द्रव्यक्षेत्रकालभावलक्षणा, तस्या विशेषः समग्रता. लक्षणः। तेन विश्लेषितान्यखिलान्यावरणानि येन तत्तथो. तम् । किं विशिष्टं ? अतीन्द्रियमिन्द्रियाण्यतिक्रान्तम् । पुनरपि कीदृशमशेषतः सामस्त्येन विशदम् । अशेषतो वैशये किं का. रणमिति चेत्-प्रतिबन्धाभाव इति ब्रूमः। तत्रापि किं कारण- मिति चेदतीन्द्रियत्वमनावरणत्वं चेति ब्रमः । एतदपि कुत इत्याह- १ सावरणचे करणजन्यत्वे च प्रतिबन्धसम्भवात् ॥ १२ ।। नन्ववधिमनःपर्ययथोरनेनासंग्रहादव्यापकमेतलक्षणमिति कर्मक्षययोग्योत्तमसहननोत्तमप्रदेशोत्तमकालोत्तमसम्यग्दर्शनादिपरिणतस्व. रूपा । २ सामग्रीविशेषेण । । ३ विघटितानि । ४ ज्ञानेन । ५ इन्द्रियाण्य. तिक्रम्योल्लंध्य प्रवर्तत इत्यतीन्द्रियमिति । ६ उत्तरसूत्रपातनिका । ७ ज्ञानस्य प्रतिवन्धा आवरणानि । ८ प्रध्वंसाभावः। सावृतत्वेऽक्षजत्वे च, प्रतिवन्धो हि सम्भवेत् । मुख्यं चात्मनि सानिध्यमात्रापेक्षत्वतो मतम्। ११ ९ सूत्रेण.। - परीक्षामुखम् । - न वाच्यम् । तयोरपि स्वविषयेऽशेषतो विशदत्वादिधर्मसम्भ- वात् । नचैवं मतिश्रुतयोरित्यतिव्याप्तिपरिहारः ! तदेतदतीन्द्रि- यमवधिमनःपर्ययकेवलप्रभेदात्त्रिविधमपि मुख्य प्रत्यक्षमात्म- सन्निधिमात्रापेक्षत्त्वादिति । नन्वशेषविषयविशदावभासिज्ञा. नस्य तद्वतो वा प्रत्यक्षादिप्रमाणपञ्चकाविषयत्वेनाभावप्रमा- णविषमविपधरविध्वस्तसत्ताकत्वात् कस्य मुख्यत्वम् तथाहि-नाध्यक्षमशेषज्ञविपयं, तस्य रूपादिलियतगोचरचारि. त्वात् सम्बद्धवर्तमानविषयत्त्वाच्च । न चाशेषवेदी सम्वद्धो वर्तमानश्चेति। नाप्यमुमानात्तत्सिद्धिः । अनुमानं हि गृहीत. सम्बन्धस्यैकदेशदर्शनादसन्निकृष्टे वुद्धिः। न च सर्वज्ञसद्भावा. विनाभाविकार्यलिङ्गं स्वभावलिङ्ग वा सम्पश्यामः । तक्षप्तेः ? १ पंचभिरिन्द्रियमनसा च मननं मतिः । श्रुतावरणविश्लेपाच्छ्वर्ण- वा श्रुतम् । तदुक्तं श्लोकवार्तिके । १ । मत्यावरणविच्छेदविशेषान्मन्यते यथा । मननं मन्यते यावत्स्वार्थे मतिरसौ मता। १ । श्रुतावरणविश्लपविशेपाच्छ्रवणं श्रुतम् । शृणोति स्वार्थमिति वा श्रूयते स्मेति वागमः । २ । २ अत्यन्तवि- शदत्वाभावादिति दृष्टव्यम् । अविधमनः पर्ययवन्मतिश्रुते विशदे न भवतो यतो, ततस्तयोः करणजन्यत्व इत्यनेन निरासः कृतः । ३ भादः प्राह । ४ पुरुषस्य सर्वज्ञस्य। ५ उक्तार्थ विवृणोति ६ अशेपज्ञो विपयो यस्य। ७ प्रत्यक्षस्य ८ सवद्धं वर्तमानं च गृह्यते चक्षुरादिना । सुपा सवद्धः पुरुपो न । १० पुरुपस्य। ११ परोक्षे वहिलक्षणे । स एव चोभयात्माय, गम्यो गमक एव च । आसद्धेनैकदशेने गम्यः सिद्धन वो.
प्रमेयरत्नमालासहितम् । ५३. 3 . पूर्व तत्स्वभावस्य तत्कार्यस्य वा ..तत्सद्भावाविनाभाविनो निश्चेतुमशक्तः। नाप्यागमात्तत्सद्भावः । स हि नित्योऽनि- त्यो वा तत्सद्भावं भावयेत् । न तावन्नित्यः-तस्यार्थवाद- रूपस्य कर्मविशेषसंस्तवनपरत्वेन पुरुषविशेषाववोधकत्वा. योगात् । अनादेरागमस्यादिमत्पुरुषवाचकत्त्वाघटनाच । ना. प्यनित्यं आगमः सर्वज्ञं साधयति । तस्यापि तत्प्रणीतस्य तन्निश्चयमन्तरेण प्रामाण्यानिश्चयादितरेतराश्रयत्वाच्च। इतर- प्रणीतस्य त्वनासौदितप्रमाणभावस्थाशेषज्ञप्ररूपणपरत्वं नित- रामसम्भाव्यमिति । सर्वज्ञसशस्यापरस्य ग्रहणासम्भवाञ्च नोपमानम् । अनन्यथाभूतस्यार्थस्याभावान्नापत्तिरपि सर्व- ज्ञावबोधिकेति धर्माद्युपदेशस्य · व्यामोहादपि सम्भवात् । द्विविधो ह्युपदेशः सम्यमिथ्योपदेशभेदात्; तत्र मन्वादीनां सम्यगुपदेशो यथार्थज्ञानोदयवेदमूलत्वात् । बुद्धादीनां तु १लिंगस्य । नित्यो वेदोऽनिया स्मृतिः तत्पूर्वकत्वात् ४ ज्ञापयेत् । ५ अपौरुषेयवेदस्य । स्तुतिनिन्दार्थवादरूपस्य । ७ यज्ञादिः । १८ अनित्यः साधयति चेत्स. तु सर्वज्ञप्रणीत इतरप्रणीतो वेति विकल्पद्वय मनसि कृत्वा दूषयति । वज्ञप्रणीतत्वादागमप्राभाण्यासिद्धि निश्चितप्रामाण्यादागमात्सर्वज्ञासीद्धीरतीतरेत- राश्रयत्वम् । १० असर्वज्ञप्रणीतस्य । ११ अप्राप्त । १२ सर्वज्ञसदृशं किंचि. बाद दृश्येत संप्रति । उपमानेन सर्वज्ञ जानीयामस्ततो वयम् । १ । १३ प्रमाणपङ्घविज्ञातो यत्रार्थो नान्यथा भवेत् । अदृष्ट कल्पयेदन्यत्सार्थापत्तिरुदाहृता२। १४ धर्माद्युपदशस्त्वस्ति परन्त्वसावन्यथापि सम्भवतीत्यनूद्य दूपयति । १५ सर्वज्ञो. धकः । १ । २ आगमः । ३ १स- L 4 परीक्षामुखम् । - - व्यामोहपूर्वकः तदमूलत्वात् तेषामवेदार्थज्ञत्वात् । ततः प्रमा- णपञ्चकाविषयत्वादभावप्रमाणस्यैव प्रवृत्तिस्तेन चाभाव एवं ज्ञायते । भावांशे प्रत्यक्षादिप्रमाणपञ्चकस्य व्यापारादिति । अत्र प्रतिविधीयते। यत्तावदुक्तम्-प्रत्यक्षादिप्रमाणाविषयत्व. मशेषज्ञस्येति तदयुक्तं, तद्ग्राहकस्यानुमानस्य सम्भवात् । तथाहि-कश्चित्पुरुषः सकलंपदार्थसाक्षात्कारी। तदुग्रहणस्वभा. वत्वे सति प्रक्षीणप्रतिवन्धप्रत्ययत्वात् । यद्यग्रहणस्वभावत्वे ऽस्ति धर्माद्युपदेशान्यशनुपपत्ते रिति शंकायां । १ वेद । २ वुद्धादी. नाम् । ३ गृहीत्वा वस्तुसद्भाव स्मृत्वा च प्रतियोगिनं । मानस नास्ति- ताज्ञानं जायतेऽक्षानपेक्षया । १। प्रमाणपञ्चकं यत्र वस्तुरूपेन जायते । वस्तुसत्ताववोधार्थ, तत्राभावप्रभाणता । २ । न तावदिन्द्रियेणैषा नास्तीत्यु- त्पाद्यते मतिः । भावांशेनैव सम्बन्धो योग्यत्वादिन्द्रियस्य हि । ३ । प्रत्यक्षादे- रनुत्पत्तिः प्रमाणाभाव उच्यते । सात्मनोऽपरिणामो वा विज्ञानं वान्यवस्तुनि । ४ । न च स्याव्यवहारोऽयं, कारणादिविभागतः । प्रागभावादिभेदेनः नाभावो यदि भिद्यते । ५ । यद्वानुवृत्तिव्यावृत्तिवुद्धिनाह्यो यतस्त्वयम् । तस्माद्गवादिव- द्वस्तु प्रमेयत्वाच्च गृह्यताम् । ६ । प्रत्यक्षाद्यवतारश्च भावांशो गृह्यते 'यदा.। व्यापारस्तदनुत्पत्तेरभावांशे जिक्षिते । ७ । ४ इतो भाइमतस्य जैनेन प्रतिविधानं क्रियते । ५ अशेषज्ञ। ६ अनिर्दिष्टनामा । रूपादिमत्प्रतिनियतवर्तमानसूक्ष्मांतरितदूरार्थाः सकलपदार्थास्तेपाम् । योगपरिकल्पितमुक्तजीवस्य प्रक्षीणप्रतिबन्धप्रत्ययत्वमस्ति यदर्थग्रहणस्वभावो नास्त्यतस्तव्यवच्छेदार्थ तद्हणस्वभावत्वे सतीत्युक्तम् । प्रक्षीणप्रतिवन्धप्रत्य- नस्वादियुक्त प्रतिवन्धविवर्जिते वही व्यभिचारोऽतस्तव्यवच्छेदार्थ तद्ब्रहणस्व- ८ HARurnament- प्रमेयरत्नमालासहितम् । ५५ सति प्रक्षीणप्रतिबन्धप्रत्ययं तत्तत्साक्षात्कारि। यथाऽपगत- तिमिरं लोचनं रूपसाक्षात्कारि। तद्ग्रहणस्वभावत्वे सात प्रक्षीणप्रतिबन्धप्रत्ययश्च विवादापनः कश्चिदिति संकलपदार्थ- ग्रहणस्वभावत्वं नात्मनोऽसिद्ध चोदनातः सकलैंपदार्थपरि. ज्ञानस्यान्यथायोदधस्येवादशंदूपप्रतिपत्तेरिति । व्याप्ति- ज्ञानोत्पत्तिबलाञ्चाशेपविषयज्ञानसम्भवः केवलं वैशये विवादः। तत्र चावरणापगम एव कारणं रजोनीहाराद्यावृतार्थज्ञानस्येव तदपगम इति । प्रक्षीणप्रतिबन्धात्ययत्वः कथमिति चेदुच्यते- दोषांवरणे क्वचिन्निर्मूलं प्रलयमुपव्रजतः प्रकृप्यमाणहानि . ३ वेदात् भावत्वे सतीत्युच्यते, तद्ग्रहणस्वभावत्वादेतावन्मात्रस्योच्यमाने काचकाम- लादिदुष्टे चक्षुपि तद्ग्रहणस्वभावोऽस्ति ग्रहणं नास्त्यतः सर्व साधनमिति । १ पञ्चावयवान्यौगश्चतुरोमीमांसक्स्त्रीन् साख्यो द्वौ. जैनो वौद्धस्त्वेकमेव हेतुं "प्रलपतीत्युक्तत्वात्मीमांसक प्रति चत्वार एवावयवाः प्रयुक्ताः ।, २ असि- द्धोऽयं हेतुरिति शकां निराकरोति । ४ चोदना हि भूतं भवन्तं भविष्यन्तं विप्रकृष्टमित्येवं जातीयकमर्थमवगमायतुमल" पुरुषविशेषा- नितिवदन्नपि मीमांसकः स्वयं सकलार्थज्ञानस्वभावत्वमात्मनोन प्रत्येतति कथ स्वस्थः ५ आत्मन सकलपदार्थज्ञानस्वभावत्वं विना । नातः सकलार्थज्ञत्व न युज्यते । ७ यत्सत्स्वरूपं तत्सर्वमने. कान्तात्मकमित्यादिव्याप्तिज्ञानाच्च सकलार्थज्ञत्व युज्यतेऽन्यथाऽनियतदि- रदेशादिस्थितानेः परिज्ञानं कथमुत्पद्यते । ८ रजोनीहारादि भावद्रव्यकर्मणी । १० आत्मनि ११ वर्धमानहानिदर्शनात् , । ६ चोद- , 1 ५६ परीक्षामुखम् । कत्वात् । यस्य प्रकृप्यमाणहानिः । स क्वचिन्निर्मूलं प्रलय- मुपव्रजति । यथाऽग्निपुटपाकापसारितकिट्टकालिकाद्यन्तरङ्ग बहिरङ्गमलद्वयात्मनि हेस्नि मलमिति, निर्हासातिशयवती च दोषावरणे इति । कथं पुनर्विवादाध्यासितस्य ज्ञानस्या वरणं सिद्ध ? प्रतिषेधस्य विधिपूर्वकत्वादिति । अत्रोच्यते-- विवादापन्नं ज्ञानं , सावरणं, विशदतया स्वविषयानववोध. कत्वाद्रजोनीहाराद्यन्तरितार्थज्ञानवदिति । न चात्मनोऽसूर्त- त्वादावारकावृत्त्ययोगः । अमूर्ताया अपि चेतनाशतर्मदिरा- मदनकोद्रवादिभिरावरणोपपत्तो । न चेन्द्रियस्य तेरावरणं, इन्द्रियाणामचेतलानामप्यनावृतप्रयत्वात् स्मृत्योंदिप्रतिवन्धा- योगात् । नापि मनसस्तैरावरणमात्मव्यतिरेकेणापरस्य मनसो निषेत्स्यमानत्वात् । ततो नासूर्तस्यावरणाभावः । अतो ना- सिद्धं तद्ग्रहणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्रतिवन्धप्रत्ययत्वम् । नापि विरुद्ध विपरीतनिश्चितीविनाभावाभावात् । नाप्यनैका- 4 ~ १ बौद्धः प्राह । २ अपि तु न कुतः । ३ प्राप्तिपूर्वको हि निपेधः । ४ स्पष्टाकारतया ५ आवरण । ६ भो भाइ, यद्येवं बूपे यदिन्द्रियाणामावरणमि- ति तदेवानूद्य दूपयति । ७ समानत्वात् ।, ८ अन्यथन्द्रियाणामावरणं चेत् । ९ आदिशब्देन प्रत्याभिज्ञानतर्कादयः । १० आत्मन आवरणाभावे मदोन्मत्तस्य स्मरणं भवतु, नास्ति च स्मरणं तस्मादात्मन एवावरणं सिद्धम् । ११ भाव- रूपस्य मनसः। १२ अग्रे निपेत्स्यते । १३ सकलपदार्थग्रहण । १४ स्व- प्रमेयरत्नमालासहितम् । - १७ न्तिकं देशतः सोमस्त्येन वा विपक्षे वृत्त्यभावात् विपरीतार्थों पस्थापकप्रत्यक्षागमासम्भवान्न कालात्ययापदिष्टत्वम् । नापि सत्प्रतिपक्षं प्रतिपक्षसाधनस्य हेतोरभावात् । अथेदमस्त्येव विवादापन्नः पुरुषो नाशेषज्ञो. वक्तृत्वात्पुरुषत्वात्पाण्यादिमः त्वाच्च । रथ्यापुरुपवदिति, नैतच्चारु, वक्तृत्वादेरसम्यग्धे- तुत्वात् । वक्तृत्वं हि गुण्टेटविरुद्धार्थवक्तृत्वं तदविरुद्धव- क्तृत्वं वक्तृत्वसामान्यं वा गत्यन्तराभावात्। न तावत् प्रथमः पक्षः सिद्धसाध्यतानुषङ्गात् । नापि द्वितीयः पक्षः विरुद्धत्वात्। तदविरुद्धवक्तृत्वं हि ज्ञानातिशयमन्तरेण नोपपद्यत इति । व. क्तृत्वसामान्यमपि विपक्षाविरुद्धत्वान्न प्रकृतसाध्यसाधनायाले ज्ञानप्रकर्षे वक्तृत्वापर्षादर्शनात्प्रत्युत ज्ञानातिशयवतो वचः नातिशयस्यैव सम्भवात् । एतेन पुरुषत्वमपि निरस्तं-पुरुषत्वं ५ साध्याभावेन सह सम्वन्धस्याभावात् । १ सकलपदार्थसाक्षात्कारिणि पुरुपे । २ अग्निरनुष्ण इत्यादिवत् । ३ प्रत्यक्षागमवाधितकालानन्तर प्रयुक्तत्वात्कालात्ययापदिष्टः । ४ सन्प्रतिपक्षो यस्य हेतुरूपस्य तत्तभोक्तम् । न प्रकरणसमः । ६ मीमासकः प्राह । प्रत्यक्षानुमाना- स्याम् ८ दृष्टेष्टाविरुद्धवक्तृत्वम् । ९ विकल्पान्तराभावात् । १० संपात् । ११ प्रत्यक्षानुमानाभ्यामविरुद्धवक्तृत्वम् । । ५२ सर्वज्ञेन सहा- विरुद्धत्वात् । १३ असर्वज्ञत्वसाध्यसाधनाय न समर्थ वक्तृत्वं हेतुः । १४ ज्ञानातिशये सति वचनस्य हानित्वं न दृश्यते । १५ वक्तृत्वस्यासर्वज्ञसाधना वानराकरणेन । १६ द्वितीयसाधनम्। १७ पुरुषत्वं हि रागादिदोपदू- - ४ .
परीक्षामुखम् हि रागादिदोषदूषितं, तदा सिद्धसाध्यता, तददूषितं तु विरुद्ध वैराग्यज्ञानादिगुणयुक्तपुरुषत्वस्याशेषज्ञत्वमन्तरेणायोगात् । पुरुषत्वसामान्यं तु सन्दिग्धविपक्षब्यावृत्तिकमिति सिद्ध सकलपदार्थसाक्षात्कारित्वं. कस्यचित्पुरुषस्यातोऽनुमानादिति न प्रमाणपञ्चकाविषयत्वमशेषज्ञस्य ॥ अथास्मिन्ननुमानेऽहंतः 'सर्ववित्त्वमनहतो वा ? अनर्हतश्चेदहद्वाक्यमप्रमाणं स्यात् । अर्हतश्चेत्सोऽपि न श्रुत्या सामर्थ्येन वाऽवगन्तुं पार्यते । स्वशक्त्या दृष्टान्तानुग्रहेण वा हेतोः पक्षान्तरेऽपि तुल्य. वृत्तित्वादिति । तदेतत्परेषा स्ववधाय कृत्योत्थापनं, " एवं विधविशेषप्रश्नस्य सर्वसामान्यांभ्युपगमपूर्वकत्वात् १३ पितं तददूषितं पुरुषत्वसामान्यं वा । १ रागदोषमोहेर्दूषितं संयुक्तम् । २ रागाभावे वीतराग, द्वेपाभावेशान्तं, मोहाभाव सर्वज्ञ साधयति तस्माद्वि- ३ विरागत्व ४ संदिग्धा विपक्षाद्यावृतिर्यस्य तत्तथोक्तम् । ५५ कश्चित्पुरुषः सकलपदार्थसाक्षात्कारी तद्हणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्रति. वन्धप्रत्ययत्वात् ६ प्रत्यक्षानुमानागमोपमानार्थापत्तिप्रमाणपञ्चकम् । ७. सर्वज्ञत्वम् । ८ वुद्धादः। ९ आगमेन १० वाचकत्वेन व्यञ्ज- कत्वेनाविनाभावित्वेन.वा । ११ हेतोरविनाभावशक्त्या, सामर्थ्येन नावगन्तुं पार्यत इत्येतद्विवृणोति । १२ यथापगततिमिरं लोचनं रूपसाक्षात्कारीति दृष्टान्तस्तस्य क्लेन । १३ तद्ब्रहणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्रतिवन्धप्रत्यय- १४ हरिहरहिरण्यगर्भादौ। १५ भाहानामसर्वज्ञवादिनाम् । ३६ कर्णाटकभाषायां मारि । १७ कुतः स्वपक्षाच्छादनं वाच्छाम्यहमिति- -- त्वस्य ।
प्रमेयरत्नमालासहितम् । ५९ .. अन्यथा न कस्याप्यशेषज्ञत्वमित्येवं वक्तव्यम् । प्रसिद्धा- नुमानेऽप्यस्य दोषस्य सम्भवेन, जात्युत्तरत्वाच्च । त. थाहि नित्यः शब्दः प्रत्यभिज्ञायमानत्वादियुक्त व्यापकः शब्दो नित्यः प्रसाध्यते अव्यापको वा । यद्यव्यापकः तदा व्यापक- स्वेनोपकल्प्यमानो न कश्चिदर्थं पुष्णाति । अथ व्यापकः सो. ऽपि न श्रुत्या सामर्थन वाऽवगम्यते । स्वशक्त्या दृष्टान्ता नुग्रहेण वा पक्षान्तरेऽपि तुल्यवृत्तित्वादिति सिद्धमतो निर्दो- 'पासाधनादशेषज्ञत्वमिति । यच्चाभावप्रमाणकवलितसत्ता- कत्वमशेषज्ञस्येति तदयुक्तमेवानुमानस्य तद्ग्राहकस्य सद्भावे सति प्रमाणपञ्चकाभावमूलस्याभावप्रमाणस्योपस्थापनायोगात् "गृहीत्वा वस्तुसैद्भावं.स्मृत्वा च प्रतियोगितम् । मानसं ना- . T पृच्छसि चेदाह । १ सर्वज्ञसामान्यानभ्युपगमे । २ मीमांसकेन त्वया । ३ तव मते प्रसिद्धानुमानेऽपि । ४ अर्हतोऽनहतो - वेत्येवं प्रकारस्य । ५ दोपसम्भवात्प्रयुक्त स्थापनाहेतौ दूषणाशक्तमुत्तर जातिमाहुरथान्ये तु स्वव्याघातकमुत्तरमसदुत्तरं वा संदर्भणदूषणासमर्थ वा छलादिभिन्नदूषणसमर्थ. मुत्तरं वा जात्युत्तरमाहुः । ६ प्रसिद्धानुमानेऽप्ययं दोषः कथं सम्भवति तदेव विवृणोति । ७ स एवायमिति प्रत्यभिज्ञानात् । ८ मीमांसकमते व्यापकः शब्दः सर्वगतश्च । ९ कल्प्यमानः शब्दः । १० अवगन्तुं न पार्यते । ११ अव्यापके नित्ये शब्दे जात्युत्तरम् । १२ तहणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्रतिबन्धप्रत्यत्वात् । १३ घटव्यतिरिक्त भूतल गृहीत्वा । १४ घट . ।
६० परीक्षामुखम् । स्तिताज्ञानं जायतेऽक्षानपेक्षयेति" च भांवत्कं दर्शनम् । तथा च कालत्रयत्रिलोकलक्षणवस्तुसद्भावग्रहणेऽन्यत्रान्यर्दा गृहीत- स्मरणे च सर्वज्ञनास्तिताज्ञानमभावप्रमाणं युक्तम् । नापरथा। न च कस्यचिदग्दिर्शिनस्त्रिजगत्रिकालज्ञानमुपपद्यते सर्वज्ञ. स्थांतीन्द्रियस्य वा । सर्वज्ञत्त्वं हि चेतोधर्मतयाऽतीन्द्रिय तेदपि न प्रकृतपुरुषविषयमिति कथमभावप्रमाणमुदयमासा- दयेत् । असर्वज्ञस्य तदुत्पादसामग्या असम्भवात् । सम्भवे वा तथाज्ञातुरेव सर्वज्ञत्वमिति । अत्रांधुना तदभावसाधनमित्यपि न युक्तं सिद्धसाध्यतानुषगात् । ततः सिद्धं मुख्यमतीन्द्रियः ज्ञानमशेपतो विशदम् ।, सर्वज्ञज्ञानस्यातीन्द्रियत्त्वादशुच्यादिद- दर्शनं तद्रसास्वादनदोषोऽपि परिहत एव ।' कथमतीन्द्रियज्ञा- नस्य वैशद्यमिति चेत् । यथा सत्यस्वप्नज्ञानस्य भावनाज्ञान- स्थ चेति । दृश्यते हि भावनावलादतद्देशवस्तुनोऽपि विशद- १ वाह्येन्द्रियानपेक्षया । २ भवदीयम् । ३ मतम् । ४ एवं सति ५ क्षेत्रान्तरे । ६ कालान्तरे । वप्रमाणं भवितुं नाहति । ८ केनचित्प्रकारेण । ९ असर्वज्ञः जनस्य तद्विपयं न किञ्चिदपि ज्ञानमुत्पद्यते । १० उत्पत्तिं प्रापयेत् । अभाचप्रमाण । १२ असर्वज्ञाभावोत्पादकसामग्रीसम्भवे वा सर्वज्ञाभावसा. मग्रीज्ञातुः । १३ अस्मिन् क्षेत्रे काले च सर्वज्ञाभावसाधनम् । अस्मिन् क्षेत्रे काले च सर्वज्ञोऽस्तीति केन वोच्यत इति सिद्धसाध्यता । प्रत्यक्षम् । १६ इन्द्रियज्ञानस्य वाशुच्यादिरसास्वादनदोपो नातीन्द्रियज्ञान- स्थेति शेषः। १७ मानसिकज्ञानस्य । १८ भावनाज्ञानाधिकरणपुरुषभिन्न- । स्मृत्वा ७ अन्यथाभा. ។ ។ १४ १५.
प्रमेयरतमालासहितम् । ६१ 1 । दर्शनमिति । "पिहिते कारागारे तमसि चः सूचीमुखाग्रदु- भैये । मयि च निमीलितनयने तथापि कान्ताननं व्यक्तमिति" बहुलमुंपलम्भात् । ननु च नावरणविश्लेषादशेषज्ञत्वमपि तु 'तनुकरणभुवनादिनिमित्तत्वेन । न चात्र तन्वादीनां वुद्धिमद्ध- तुकत्वमलिद्धमनुमानादेस्तस्य सुप्रसिद्धत्वात् । तथाहि-विम- त्यधिकरणभावापन्नं उर्वीपर्वततस्तन्वादिकं वुद्धिम तुकं का- र्थत्वादचेतनोपादानत्वात्सन्निवेशविशिष्टत्वाद्वा वस्त्रादिवदिति । आगमोऽपि तदावेदकः श्रूयते-"विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमु- खो विश्वतोवाहुरुत विश्वतः पीत् । सम्बाहुभ्यां धर्मतिसम्प- तत्रैवाभूमी जनयन्दे एकः” तथा । व्यासवचनं च "अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः । ईश्वरप्रेरितो गच्छे- स्वर्ग वा श्वभ्रमेव वा ॥ १ ॥" न चाचेतनरेव परमाण्वादि. कारणैः पर्याप्तत्त्वावुद्धिमतः कारणस्यानर्थक्यम् । अचेतनानां . धोक्तौ । देशवर्तिवस्तुनोऽपि। १ इन्द्रियार्थयोः सम्बन्धाभावेऽपि विशदत्वोपपत्तेः । २ योगः प्राह । प्रश्नावधारणाऽनुज्ञानुनयामन्त्रणे ननु । ननु च स्याद्विरो. ३ विवादापन्नम्, विविधा मतयो विमतयो विमतीनामधिकरण तस्य भावसापन्न प्राप्तं । ४ रचनाविशेप । ५ बुद्धिमत्प्रतिपादक. । ६ विश्वमधिकृत्य प्रवर्तते । ७.चक्षुः कार्यज्ञानं विवादाध्यासितम् । विश्वव्यापि वचनम् । ९ व्यापारः । १० विश्वव्यापित्वम् । पापाभ्याम् । १२ संयोजयति । १३ परमाणुभिः १४ ईश्वरः । ८ > ११ पुण्य.. ।
२ २ २ . !: परीक्षामुखम् । स्वयं कार्योत्पत्तौ व्यापारायोगातुर्यादिवत् । न चैवं चेतनस्या- पि चेतनान्तरपूर्वकत्वादनवस्था । तस्य सकलपुरुषज्येष्ठत्वा- निरतिशयत्वात्सर्वज्ञबीजस्य "क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृ- प्रत्वादनादिभूतानश्वरज्ञानसम्भवाच्च । यदाह पतञ्जलिः- क्लेशकर्मविपांकाशयरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः। तत्र नि- १ यथा तुरीततुवेमशलाकादीनामचेतनानां स्वयं कार्योत्पत्ती व्यापारायोगाचेतन- कुविंदाधिष्ठितेनैव कार्यकर्तृत्वं तथा प्रकृतेऽपि । २ यथा चेतनस्य कुविन्दा. दवालकाले गुरूपदेशमन्तरेणाकर्तृत्वाञ्चेतनान्तरेण भाव्यं तथा चेतनान्तरेऽपर- चेतनान्तरेणैवं परापरचेतनप्रयुज्यकर्तृत्वादनवस्था । ३ ईश्वरस्य ४ अतिशयांतिकान्तत्वात् ।। ५ सर्वज्ञस्य यद्वीजं सर्वस्य मूलत्वाद्वाजमिव वीजम् । ६ पातंजलयोगसूत्रे । ७ क्लेशा अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनि. वंशाः । अनित्यताशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या नित्यादिचतुष्टयेऽनित्यादिचतुष्टयवुद्धिः, पापादौ पुण्यादिवुद्धिरपि विवक्षिता, तासामपि संसारहेत्वविद्यात्वात् । दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतवास्मिता । सुखा- नुशयी रागः । सुखतत्साधनमात्रविषयकः क्लेशो राग इत्यर्थः । दुःखानुशया द्वेषः । स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः । स्वस्य रसेन संस्कारेणैव वहतीति स्वरसवाही । अपिशव्दादविद्वानपि परिगृह्यते। रूढः प्रसिद्धः । तथा च यथाऽविदुषस्तथा विदुपोऽपि स्वरसवाहित्वहेतुना यज्जातीयो यत्क्लेशो भयाख्यः प्रसिद्धोऽस्ति सोऽभिनिवेश इत्यर्थः । ८ कर्म धर्माधौं । ९.विपाकाः कर्मफलानि . जन्मायुर्भागाः । १० आशयो ज्ञानादिवासना । एतैः कालत्रयेऽप्यपरामृष्टः पुरुषविशेष : ईश्वरः । ११ सर्वज्ञत्वानुमापक यज्ज्ञानस्य सातिशयत्वं तत्तत्रेश्वरे निरतिशयं विश्रान्तमित्यर्थः । तथा च' - -- प्रमेयरत्नमालासहितम् । sine-- रतिशयं सर्वज्ञवीजम् । स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानविच्छेदा- दिति" च 'ऐश्वर्यमप्रतिहतं सहजो विरागस्तृप्तिनिसर्गजनिता वशितेन्द्रियेषु । आत्यन्तिकं सुखमनावरणा च शक्तिर्ज्ञानं च सर्वविषयं भगवंस्तवैव” इत्यवधूतवचनाच्च । न चात्र कार्य- त्वमसिद्धम् । साँवयवत्वेन कार्यत्वसिद्धः, नापि विरुद्धं विपक्ष एव वृत्त्यभावात् । नाप्यनैकान्तिकं, विपक्षे. परमाण्वादावप्रवृ- तेः। प्रतिपक्षसिद्धिनिबन्धनस्य साधनान्तरस्याभावान्न प्रकर- णसमम् । अथ तन्वादिक बुद्धिमद्धेतुकं न भवति दृष्टकर्तृक- प्रासादादिविलक्षणत्वादाकाशवदित्यस्त्येव प्रतिपक्षसाधन- मिति । नैतद्युक्तं, हेतोरसिद्धत्वात् । संनिवेशविशिष्टत्वेन प्रासा- निरतिशयज्ञान ईश्वर इति लक्षणम् । तस्मिन्भगवति सर्वज्ञत्वस्य यद्वीज सर्वस्य मूलत्वाद्वाजमिव वीजम् , तन्निरतिशयं काष्ठां प्राप्तम् । ईश्वरः पूर्वेपां हिरण्यगर्भादीनामपि गुरुरन्तर्यामिविधया ज्ञानचक्षु प्रदः । कालानवच्छिनत्वान्नित्यो भवति । तथा च श्रुतिः "जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्य" मिति २ विनाशरहितम् । ३ क्षित्यादिक समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणत्रयप्रभव कार्यत्वाद्वस्त्रादिवत्तत्र समवायिकारणं चतुर्धा परमाणवः, असमवायिकारणं परमाणुसंयोगः, निमि-' त्तकारणमीश्वराकाशकालारित्यनुमाने तन्वादौ कार्यत्वमसिद्धं न भवति ।' ४ तथाहि-क्षित्यादिकं कार्य सावयवत्वाद्यत्सावयवं तत्कार्य यथा प्रासादादि सावयव चेदं तस्मात्कार्य भवति । ५ अवुद्धिमद्धेतुके नित्ये परमाण्वादौ ।' ६ अबुद्धिमद्धेतुके इदमेव प्रतिपक्षसाधनमस्ति ७ यथां प्रासादादीनां कर्ता दृश्यते तथा तन्वादीनामिति ८ रचनाविशेष १स एक . . - न , । परिक्षामुखम् । । दादिसमानजातीयत्वेन तन्वादीनामुपलम्भात् । अथ यादृशः प्रासादादौ सन्निवेशविशेषो दृष्टो न तादृशस्तन्वादाविति चेन्न सर्वात्मना सदृशंस्य कस्यचिदप्यभावात् । सातिशयसन्निवेशो हि सातिशयं कर्तारं गमयति प्रासादादिवत् । न च दृष्टकर्तृक- स्वादृष्टकर्तृकत्वाभ्यां बुद्धिमन्निमित्ततरत्वसिद्धिः कृत्रिमैर्मणि- मुक्ताफलादिभिर्व्यभिचारात् । एतेनाचेतनोपादानत्वादिकमपि समर्थितमिति सूक्तं बुद्धिमद्धेतुकत्वं तंतश्च सर्ववेदित्वमिति ॥ तदेतत्सर्वमनुमानमुद्रागविणदरिद्रवचनमेव कार्यत्वादेरसम्य. ग्धेतुत्वेन तजनितज्ञानस्य मिथ्यारूपत्वात् । तथाहि-कार्यत्वं स्वकारणसत्तासमवायः स्यादभूत्वाभावित्वमक्रियादशिनो- ऽपि कृतवुद्ध्युत्पादकत्वं कारणव्यापारानुविधायित्वं वा स्या- द्गत्यन्तराभावात् । अथाद्यः पक्षस्तदा योगिनामशेषकर्मक्षये प- १ सर्व रूपेण । २ सर्वो दृष्टान्तधर्मो दार्टान्तिके प्रवर्तते चेदृष्टान्त एव न स्यात् । ३ यदृष्टकर्तृकं -तद्बुद्धिमनिमित्तं यददृष्टकर्तृकं तदबुद्धिमन्निमित्तं । ४ अवुद्धिमनिमित्तत्व । : ५ अन्यथा ६ अत्रापि चतुरस्वर्णकारादयो निमित्तम् । कार्यत्वहेतुसमर्थनपरेण न्यायेन । ८ परमाण्वादि । ९ सर्वतन्वादिकार्याणां बुद्धिमद्धेतुकत्वतः । १० निमित्तकारणत्वात् । ११ कार्यत्वाद्यसद्धेतु । १२ विकल्पचतुष्कं कृत्वा वदति । १३ स्वस्य निष्पाद्यवस्तुनः कारणानि तेपां सत्ता तया समवायो मिलनमिह मृत्तिकायां घट इति मृत्तिकासत्तया घटो व्याप्यत इत्यर्थः । १४ स्वकारणसत्ता स्वका- रणसयवायो वा । १५ अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानामिहेदंप्रत्ययलिगो यः सम्वन्धः स समवायः। १६ कारणानि परमाण्वादीनि । १७ चेत् । "Are . " - १४ प्रमेयरत्नमालासहितम्। शान्तःपातिनि हेतोः कार्यत्वलक्षणस्याप्रवृत्तेर्भागासिद्धत्वम् । न च तेत्र सत्तासमवायः स्वकारणसमवायो वा समस्ति, त- प्रक्षयस्य प्रध्वंसरूपत्वेन सत्तासमवाययोरभावात् सत्ताया द्रव्यगुणक्रियाधारत्वाभ्यनुज्ञानात् समवायस्य च परैव्यादि- पञ्चपदार्थवृत्तित्वाभ्युपगमात् । अथाभावपरित्यागेन भावस्यैव विवादोध्यासितस्य पक्षीकरणान्नायं दोषः प्रवेशभागिति चे- सहिमुक्त्यर्थिनां तदर्थमीश्वराराधनमनर्थकमेव स्यात्। तत्र तस्याकिञ्चित्करत्वात् सत्तासमवायस्य विचारमधिरोहतः श- तधा विशीर्थमाणत्वात् स्वरूँपासिद्धः च .. कार्यत्वम् । स हि १ योगिनामशेषकर्मक्षयस्य प्रध्वसाभावरूपत्वान्नहि तत्र स्वकारणसत्तासमवाय- लक्षणस्य कार्यत्वस्य हेतोः प्रवृत्तियुज्यते । २, पक्षान्तःपातिनि भूधरादा स्व- कारणसत्तासमवायस्य प्रवृत्तेरशेषकर्मक्षये चाप्रवृत्तेः स्वकारणसत्तासमवायलक्षण- स्य हेतोः पक्षैकदेशासिद्धत्वमिति । ३कर्मक्षये कार्य । ५ स्वस्य कार्यस्य कर्मक्षयलक्षणस्य कारणे यमनियमादिलक्षणे ' समवायसम्ब- न्धः । ६ पृथिव्यप्तेजोवावाकाशकालदिगात्ममनांसि नवैव द्रव्याणि । ७ वु. द्धिसुखदुःखच्छाद्वेषप्रयत्नसंस्कारधर्माधर्मरूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापरिमाणपृथक्त्व. संयोगविभागपरत्वापरत्वगुरुत्वद्रव्यत्वस्नेहशब्दाश्चेति चतुर्विशतिगुणाः ८ प्रसारणाकुञ्चनोत्क्षेपणावक्षेपणगमनानि पंच कर्माणि ।' ९ योगैः । १० द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेष । ११ अङ्गीकारात् । १२ योगैः प्राह । १३ त. न्वादिकस्याभावव्यतिरिक्तभावस्यैव । १४ भावस्यैव पक्षीकरणाद्बुद्धिमद्धेतुक- त्वसाध्ये, १५ मुक्त्यर्थिनि । १६ ईश्वराराधानस्य । १७ महीभूधरादौ सत्ता- समवायस्यासम्भवात्स्वरूपासिद्धं कार्यत्वमिति ४ सत्तायाः सम्बन्धः। १८ सत्तासमवायः॥ ५ ६६ परीक्षामुखम् । समुत्पन्नानां भवेदुत्पद्यमानानां वा ? यद्युत्पन्नानां, सतामस-- तां ? न तावदसंतां खरविषाणादेरपि तत्प्रसङ्गात् । संता चेत् सत्तासमवायात्स्वतो. वा. ? न तावत्सत्तासमवायादव- स्थाप्रसङ्गात् प्रागुक्तविकल्पद्वयाऽनतिवृत्तेः। स्वतः सतां तु सत्तासमवायानर्थक्यम् । अथोत्पद्यमानानां सत्तासम्बन्धो निष्टासम्बन्धयोरेककालत्वाभ्युपगमादिति मतम् । तदा सत्ता. सम्बन्ध उत्पादाद्भिन्नः किं वा अभिन्न इति । यदि भिन्नस्त- दोत्पत्तरसत्त्वाविशेषादुत्पत्त्यभावयोः किंरतो भेदः । अथोत्प- त्तिसमानान्तवस्तुसत्त्वेनोत्पत्तिरपि तैथाव्यपदिश्यते इति म. तम् , तदपि अतिजोड्यवलिगतमेव । उत्पत्तिसत्त्वप्रतिविवादे वस्तुसत्त्वस्यातिदुर्घटत्त्वादितरेतरीश्रयदोषश्च । इत्युत्पत्ति- , १ यदि समुत्पन्नानामसतां सत्तासमवायस्तदा खरविषाणादीनामपि सः स्यादसत्वावि शेषात् ।२ सतां सत्तासमवायश्चेत्सत्तासमवायात्सतां सत्तासमवायः, स्वतो वा सतां सत्तासमवायः। ३ सत्तासमवायात्सतां सत्तासम्बन्धस्तर्हि सोऽन्यः सत्तासम्ब-: न्धः सतामसतां वासतां चेत्खरविषाणादीनामपि तत्प्रसंगात , सतां चेत्सत्ता- सम्वन्धात्सतां स्वतो वा सतां, सत्तासम्बन्धात्सतां चेत्तर्हि सोऽप्यपरः सत्तास-- म्बन्धः सतामसतां वेति विकल्पानामनवस्थानादनवस्था स्यात् । ४ सतामस; तां वेति.. ५ स्वरूपेण । ६ उत्पत्तिसत्तासमवाययोः । ७ योगस्य, ८ जैनाः पृच्छन्ति । -९ उत्पत्ती सत्तासमवायो नास्त्यभावेऽपि नास्ति तर्हि, तयोः को भेदः । १० सत्वरूपेण । ११ उत्पतिश्चः सत्वं चेति तयोर्विवादे । 33 यथाकथंचिद्भवतु तथापीतरेतराश्रयपणमापतितमिति। १३ उत्पत्ती स, २.
प्रमेयरत्नमालासहितम् । ६७. संत्त्वे वस्तुनि तदेककालीनसत्तासम्बन्धावगमस्तदवंगमे च 'तत्रत्यसत्त्वेनोत्पत्तिसत्त्वनिश्चय इति । अथैत होषपरिजिहीर्षया तयोरैक्यमभ्यनुज्ञायते, तहिं तत्सम्बन्ध एव कार्यत्वमिति । ततो बुद्धिमद्धतुर्कत्वे गंगनादिभिरनेकान्तः। एतेन स्वकारण- सम्वन्धोऽपि चिन्तितः । अथोभयसम्बन्धः कार्यत्वमिति मतिः सापि न युक्ता । तत्सम्बन्धस्यापि कॉदाचित्कत्त्वे समवाय- स्यानित्यत्वसङ्गात् घटादिचदकादाचित्कत्त्वे सर्वदोल म्भप्रसङ्गः। अथ वस्तूत्पादककारणानां सन्निधानामावान्न सर्वदोपलम्भप्रसङ्गः । ननु वस्तूत्पत्त्यर्थं कारणानाम् व्यापारः । । । । त्वमुत्पत्तिसत्व तस्मिन् सति १ वस्त्वेककालीनसम्वन्धावगमे । २ वस्तुस्थसत्वेन ३ उक्तदोप ४ उत्पत्तिसत्तासम्बन्धयोः । ५ अभिन्न इति द्वितीयभेदमंगीकृत्य दूषयति ६ सत्तासम्बन्ध. । ७ सत्तासम्बन्धरूपात्कार्यात् । ८ साध्ये सति १ गगनादौ सत्ता. सम्बन्धरूपसाधनत्वमस्ति बुद्धिमद्धेतुकत्वं नास्ति ततो साध्याभावे हेतुसद्धावाद- नेकान्तः । १० सत्तासमवायसम्बन्धनिराकरणेन । ११ स्वकारणसम्बन्ध- उत्पन्नानां स्यादुत्यद्यमानानां वा, यद्युत्पन्नानां तर्हि सतामसतांवा, नतावदसतां खरविषाणादानामपि तत्प्रसंगादित्यादिना निरस्तः । १२ स्वकारणसमवाथः सत्तासमवायश्चेत्युभयसम्बन्धः । १३ तनुकरणादीनामुभयसम्बन्धस्यापि ।१४ - तत्सम्बन्धोऽकादाचित्कः कादाचित्को वेति विकल्पद्वयं मनसि कृत्वा दूपयति । १५ कदाचित्कार्योत्पत्तिरस्ति कदाचिन्नास्तीति समवायोऽनित्यो भवितुमर्हति कादाचिकत्वाद्धटवदिति समायाति । १६ कार्यस्य । १७ नैयायिकः प्राह । ---- i परीक्षामुखम् । उत्पादश्च स्वकारणसत्तासमवायः स च सर्वदाप्यस्ति, इति तदर्थ कारणोपादानमनर्थकमेव स्यात् । अभिव्यक्त्यर्थं तदु. पादानमित्यपि वात्तै वस्तूत्पादापेक्षया अभिव्यक्तरर्घटनात् । वस्त्वपेक्षयाऽभिव्यक्ती कारणसम्पातात्प्रागपि कार्यवस्तुस. द्भावप्रसङ्गात् । उत्पादस्याप्यभिव्यक्तिरसम्भाव्या, स्वकारण- सत्तासम्बन्धलक्षणस्योत्पादस्यापि कारणव्यापारात्प्राक्सद्भावे - "वस्तुसद्भावप्रसंगात् । तल्लक्षणत्वाद्वस्तुसत्त्वस्य प्राक् सत एव हि केनचित् तिरोहितस्याभिव्यञ्जकेनाभिव्यक्तिस्तमस्तिरोहि- तस्य घटस्येव प्रदीपादिनेति । तन्नाभिव्यक्त्यर्थं कारणोपादानं युक्तं, तन्न स्वकारणसत्तासम्वन्धः कार्यत्वम् ॥ नाप्यभूत्वाभा. वित्वम् । तस्यापि विचारासहत्वात् । अभूत्वाभावित्वं हि भिन्नकालक्रियाद्वयाधिकरणभूते कर्तरि सिद्ध सिद्धिमध्यास्ते क्त्वान्तपदविशेषितवाक्यार्थत्वाद्भुक्त्वा ब्रजतोत्यादिवाक्या- र्थवत् । न चात्रभवनाभधनयोराधारभूतस्थ कर्तुरनुभवोऽस्ति । अभवनाधारस्याविद्यमानत्वेन भवनाधारस्य च विद्यमानतया भावाभावयोरेकाश्रयविरोधात् । अविराधे च तयोः पर्यायमा- - .१ वस्तू पत्यर्थ ।। २ कारण। ३ उभयसम्बन्धरूपस्य वस्तूत्यादस्य नित्यत्वान्न तदेपक्षयाभिक्तिः सम्भवति । ४ द्वितीयविकल्प दूषयति । ५ नैयायिका ह्यसत्कार्यवादिनस्तेषां मते परमाण्वादिषु कारणेषु सर्वथाऽस- ..न्त्येव द्यणुकादीनि कार्याणि, समुत्पद्युत्ते। ६ यथात्र भिनकालाधिकरणभूते कतार देवदत्ते सत्येव भुक्त्वा व्रजाति युज्यते न तथाभवनभवनक्रियाद्वया.
प्रमेयरत्नमालासहितम् । ६२... श्रेणैव भेदो न वास्तव इति । अस्तु वा यथाकथंचिदभूत्वाभा-- वित्वं, तथापि तन्वादौ सर्वज्ञानभ्युपगमाद्भागासिद्धम् । न हि महीमहीधराकूपारारामादयः प्रागभूत्वा भवन्तोऽभ्युपगम्यन्ते परैः। तेषां तैः सर्वदावस्थानाभ्युपगमात्। अथ सावयवत्त्वेन तेषामपि सादित्वं प्रसाध्यतेः तदप्यशिक्षितलक्षितम् । अवय.. वेषु वृत्तेरवयवैरोरभ्यत्वेन च सावयवत्वानुपपत्तेः । प्रथमपक्षे सावयवसामान्येनानेकान्तात् । द्वितीयपक्षे साध्याविशिष्टत्वात्। अथ सन्निवेश एव सावयवत्वं तच्च घटादिवत् पृथिव्यादावुपलभ्य. त इत्यभूत्वाभावित्वमभिधीयते तदप्ययेशलम्। सन्निवेशस्थापि विचारासहत्वात् । स हवयवलम्बन्धो भवेद्रचनाविशेषो-वा। यद्यवयवसम्वन्धस्तदा गगनादिनानेकान्तः सकलंमूर्तिमद्- व्यसंयोगनिबन्धनप्रदेशनानात्वस्य सद्भावात् । अथोपचरिता । धिकरणभूतस्य कर्तुरनुभवोऽस्ति । १ जैनैः । २ कालः सर्वज्ञना- । थश्च जीवो लोकस्तथागमः । अनादिनिधनाः ह्येते. द्रव्यरूपेण संस्थिताः ।.१.। ३ महीधरादीनाम् । ४ न तु सर्वदानवस्थारूपतया सादित्वं साध्यते कादाचित्कत्वादपि न साध्यते किन्तु मावयवत्वेन साध्यते ।। ५ अवय- वेषु वृत्तित्वं सावयवत्वं तैरारभ्यत्व वा। ६ महीधरादयः सादयोऽवय- वेषु वृत्तेरित्युच्यमाने सामान्येन व्यभिचारः स्यात्सामान्यं 'ह्यवयवेषु वर्तते परन्तु तन सादित्वं नास्ति । अवयवैरारभ्यत्वकार्यत्वयोः समानार्थ. त्वात्साध्यसमोऽयं हेतुः । ८ अवयवैः सह सम्बन्धी यस्य स तथोक्तः । ९ इयत्तावद्र्व्यपरिणामयोगित्वं मूर्तिमत्वं । सकलसूर्तिमद्रव्यसंयोग एव नि-- MA - ७० .. परीक्षामुखम् । एव तंत्र प्रदेशा इति चेत्तहिं सकलमूर्तिमद्व्यसैम्बन्धस्था- प्युपचरितत्वात्सर्वगतत्वमप्युपचरितं स्यात् । श्रोत्रस्यार्थक्रि. याकारित्वं च न स्यादुपचरितप्रदेशरूपत्वात् । धर्मादिना सं- स्कारात्ततः सेत्ययुक्तम् । 'उपचरितस्यासद्रूपस्य तेनीपकारा योगात् , खरविषाणस्येव ततो न किञ्चिदेतत् । अथ रचनाविशे- “पस्तदा परम्प्रतिभोगासिद्धत्वं तदवस्थमेवेति नाभूत्वाभावित्वं विचारं सहते । नाप्यक्रियादर्शिनोऽपि कृतवुद्ध्युत्पादकत्वम् । तद्धिः कृतसमयस्याकृतसमयस्य वा भवेत् । कृतसमयस्य चेद् गगनादेरपि बुद्धिमद्ध तुकत्वं स्यात् । तत्रापि खननोत्सेचनात् ++ 10 . वन्धनं येषां तेषां प्रदेशानां नानात्वं तस्य सद्भावात् । १ आकाशादौ। २ आकाशस्य मूर्तिद्रव्येण सह संयोग एकदेशेन सर्वात्मना वैकदेशेन चेत्साव- - यवत्वं सर्वात्मना चेदव्यापकत्वं । ३ व्यापकत्वम् । ४ शब्दग्राहकत्वम् । ..५पुण्यादिना । सुखदुःखानुभवप्रापकधर्माधर्मविशिष्टस्यैव नभोदेशस्य • श्रोत्रस्याभ्युपगमाददृष्टबलादक्रियाकारित्वात् । ६ श्रोत्रात् । अर्थक्रिया। ८. धर्मादिना । ९ अवयवसम्बन्धलक्षणं सनिवेशविशि- टत्वमिति । १० महीमहीधरादयः सादयः सावयवत्वाद्घटवादित्यत्र सुखादिव द्रचनाविशेषो नास्ति ततो भागासिद्धत्वमिति, नहि परैर्महीधरादयो रचनाविशि टारभ्युपगम्यते । ११ भागासिद्धस्वं पूर्वत्तदवस्थमेव । १२ न क्रियां पश्यतीत्यक्रियादर्शिनोऽपि कृतवुद्धयुत्पादकत्वलक्षणकार्यत्वमपि क्षित्यादीनां वु. द्विमद्धेतुकत्वे साध्ये साधयितुनालमिस्यर्थः । १३ गृहीतसंकेतस्य । कारण- मिदं कार्यमिदमिति गृहीतसंकेतपुरुषस्य । १४ तत्कथमितिचेत् । १५ मृत्तिका. . .
प्रमेयरत्नमालासहितम्। ७१ कृतमितिगृहोतसङ्कतस्य कृतवुद्धिसम्भवात् । सो मिथ्येति चे. द्भवदीयापि किं न स्यात् । वाधासद्भावस्य प्रतिप्रमाणविरोधस्य चान्यत्रापि समानत्वात्, प्रत्यक्षेणोभयत्रापि कर्तुरग्रहणोत्।क्षित्या. 'दिकं वुद्धिमद्ध तुकं न भवत्यस्मंदाद्यनर्वग्राह्यपरिमाणाधारस्वात् गगनादिवदिति प्रमाणस्य साधारणत्वात् । तन्न कृतसमयस्य कृतबुद्ध्युत्पादकत्वम् । नाप्यकृतसमयस्याऽसिद्धत्वादविप्र- तिपत्तिप्रसङ्गाच्च । कारणव्यापारानुविधायित्वं च कारणमा- त्रापेक्षया यदीप्यते तदा विरुद्ध सार्धनम् । कारणविशेषापे । - दिनिष्काशन . १ गतॊऽयमिति २ गगनादौ या कृतवुद्धिः । ३ तन्वादौ या कृतवुद्धिः ४ नित्यमाकाशं सदकारणत्वात्समवायवदि. ति । ५ तन्वादौ । त्वमेवं कथयिष्यसि यद्गगनादौ कृतयुद्धयुत्पाद- कत्वस्य प्रतिवाधक प्रमाणमस्ति तर्हयन्यत्र तन्वादावपि वाधकप्रमाणमस्त्येव । ६ अपरिछेद्य परिमाणाधारित्वादित्युक्ते घटगतपरिमाणादौ व्यभि- चारस्तस्मादस्मदाद्यवग्राह्येतिपदोपादानं कृतम् । ८ भूम्याकाशयोः । ९ समवलवत्वात् । १० अक्रियादर्शिनोऽपि कृतवुद्धयुत्पादकत्वादिति हेतोर. सिद्धत्वादित्यर्थः । ११ अयं घटो न पट इति विप्रतिपत्तिरास्त परन्तग्रहीत- समयस्य तथा नास्ति। १२ निःसंदेहप्रसङ्गात् , यदि कृतसंकेतस्य कृतः बुद्धिसम्भगस्तथाकृतसकेतस्यापि यदि कृतबुद्धिसम्भवश्वेत्तदा मास्तु विप्रतिप- त्तिरस्ति च ततो विपत्तिपत्तिप्रसङ्गो दूषणमिति भानः । १३ कारणमात्र- व्यापारनुविधायित्नं कारणविशेषव्यापारानुविधायित्वं वा । १४ निपक्षी- भूतेऽवुद्धिमद्धेतुके वस्तुनि वर्तमानत्वात् । ईश्वरकारणावशेषस्येष्टस्यासिद्धेनि- ७२ । परीक्षामुखम् । . . । ४ - an ५ अं- क्षया चेदितरेतराश्रयत्वम् । सिद्ध हि कारणविशेषे बुद्धिमति तदपेक्षया कारणव्यापारानुविधायित्वं कार्यत्वम् । ततस्तद्वि- शेषैसिद्धिरिति सन्निवेशविशिष्टत्वमचेतनोपादानत्वं चोक्तदो. पदुष्टत्वान्न पृथक् चिन्त्यते । स्वरूपभांगासिद्धस्वादेस्तत्रापि सुलभत्वात् । विरुद्धाश्चामी हेतवो दृष्टन्तानुग्रहेण सशरीरास- र्वज्ञपूर्वकत्वसाधनात् । न धूमात्पाबकानुमानेऽध्ययं दोष रुद्धत्वम् । १ .कारणविशपापेक्षया । , २ कारणव्यापारानुविधायित्वतः । ३ ....कारणविशेपवुद्धिमद्धेतुकत्यासिद्धिः सुखादिना भागासिद्धत्वां यतः सुखादौ.. रचनाविशेपत्वं नास्ति कार्यत्वमस्ति । कुरादिकं सकर्तृकमचेतनोपादानवादित्यनचेतनोपादाने ज्ञानकार्थेऽप्रवर्तमानत्वा- दचेतनोपादानवास्य हेतो गासिद्धत्तम् । ६ तन्नादिकं बुद्धिमद्धेतुकं का- यत्वात्घटवादित्यत्र यथा घटो वुद्धिमत्कुंभकारेण कृतः सोऽपि सशरीर्यस-- नज्ञस्तथादृष्टान्तसामर्थ्यात्तन्वादिकार्यमपि सशरीरासर्वज्ञबुद्धिमनिमित्तं स्यादिती-- टनिरुद्धसाधनाद्विरुद्धसाधनमिति कार्यवासनिकेश- निशिष्टत्वाचेतनोपादानत्वरूपास्त्रयो हेतनः दृष्टान्तसामयिदी. स्वारस्य सशरीरासर्वज्ञत्वं साध्यते तथा- सति सर्वानुमानोच्छेदः स्यात्तथाहि- समिरय पर्वतो धूमनत्वान्महानसवदित्यत्रापि पर्वतादौ महानसपरिदृष्टस्यैन खादिरपलाशाद्यग्नेः सिद्धरिष्टनिरुद्धसधिनाविरुद्ध साधनमिति नैयायिकशंकां. परिहरति ।, ९ अत्र, नैयायकेनाशंक्यते यद्भवतोक्तं तन्न युक्तमुत्कर्पसमजाति. रूपासढुत्तरत्वात्तथाहि दृष्टान्तधर्म साध्ये समासंजयतो मतोत्कर्पसमा जातिरिति. प्रकृतेऽप्येवं दृष्टान्तधर्मयोरर्सवज्ञसशरीरत्वयोः साध्यधर्मिणि बुद्धिमति. समारोपणादुत्कर्पसमाजातिः स्यादेवेति शंका परिहरति । १० विरुद्धरूपो A - प्रमेयरत्नमालासहितम् । ७३ तंत्र तोपर्णपार्णादिविशेषाधाराग्निमात्रव्याप्तधूमस्य दर्शनात् । नैवमत्र सर्वज्ञासर्वज्ञकर्तृविशेषाधिकरणतत्सामान्येन कार्यत्व- स्य व्याप्तिः सर्वस्य कर्तुरतोऽनुमानात्प्रागसिद्धत्वात् । व्यभि- चारिणश्चामी हेतवा बुद्धिमत्कारणमन्तरेणापि विद्युदादीनां प्रादुर्भावसम्भवात्। सुप्ताद्यवस्थायोमबुद्धिपूर्वकस्यापि कार्यस्य दर्शनात् । तदवा तंत्रापि भाख्यं कारणमित्यतिमुग्धविल. सितं, तद्यापारस्याप्यसम्भवादशरीरत्वात् । ज्ञानमात्रेण कार्य- कारत्वाधटनादिच्छाप्रयत्नयोः शरीराभावेऽसम्भवात्तदसम्भ. दोषः । १ धूमात्पावकानुमाने । २ महानसे सामान्येन घूमग्निसम्बन्धं :. दृष्ट्वा पर्वतेऽपि सामान्याग्निमनुमिनोति तथा 'सति महोपो न । ३ क्षित्यकुरादिकं कर्तृजन्यं कार्यत्वादित्यत्र ४ यथा धूमात्पावकानुमाने तार्णादीनां विशेषानीनामनिमात्राधारग्रहणम. स्ति न तथा तव मतेसर्वज्ञासर्वज्ञयोर्विशेषभूतयोस्तदाधारभूतस्य पुरुषस्य ग्रह- . णमस्ति येन कार्यत्वस्य व्याप्तिः स्यात् । यतस्तवमते सर्वज्ञ एव बुद्धिमानतु ५ भवतां मते हि सर्वज्ञसाधकं तन्वादयो बुद्धिमनिभित्तकाः कार्यत्वादिदमेवानुमानं तच्च सांप्रत विवादापन्नमेवातो न तेन सर्वज्ञसिद्धिरिति सर्वज्ञासर्वज्ञविशेषाधिकरणतत्सामान्येन न कार्यत्वस्य हेतोर्व्याप्तिरिति । वन्हि- मान्धूमादित्यत्र तु ताणपार्णादिविशेषाधारवहिसामान्येन धूमस्य व्याप्तिरस्त्ये. वेति नान दोपः। ६ यथा घटपटकर्तारौ कुलालकुविंदौ न तथा विद्युत्कर्ता कश्चिदस्त्यतो विद्युति बुद्धिमत्कर्तुरभावात्कार्यत्वसद्भावाद्यभिचारत्वम् । हस्तपादादिसञ्चालनस्य कार्यस्य । ८ सुप्ताद्यवस्थायां समुत्पन्न कार्ये । ९ सदाशिव । १० सदाशिव । ११ ईश्वरस्य । १२ चिकीर्षाक्रिययोः । PN -- सामन्यः । -- : - परीक्षामुखम् + चश्व पुरातनैविस्तरेणाभिहित आप्तपरीक्षादौ, अतः पुनरत्र नोच्यते । यच्च महेश्वरस्य क्लेशादिभिरपरामृष्टत्वं निरतिशयत्व- मैश्वर्याद्युपेतत्वं तत्सर्वमपि गगनाजसौरभव्यावर्णनमिव निाव- षयत्वादुपेक्षामहति । ततो न महेश्वरस्याशेषज्ञत्वम् । नापि' ब्रह्मणः । तस्यापि सद्भावावेदकप्रमाणाभावात्। न तावत्प्रत्यक्ष तदावेदकमविप्रतिपत्तिप्रसङ्गात् । न चानुमानमविनाभाविलि- ङ्गाभावात्। ननु प्रत्यक्षं तद्ग्राहकमस्त्येव, अक्षिविस्फालनानन्तरं निर्विकल्कस्य सन्मात्रविधिविषयतयोत्पत्तः। सत्तायाश्च परमन्त्र- ह्मरूपत्वात्। तथा चोक्तम्-अस्ति ह्यलोचनाज्ञानं प्रथमं निर्विक- रूपकम् । वालमूकादिविज्ञानसदृशं शुद्धवस्तुजम् ॥ १॥ न च विधिवत् परस्परंव्यावृत्तिरप्यध्यक्षतःप्रतीयत इति द्वैतसिद्धिः। तस्य निषेधाविषयत्वात् । तथा चोक्तम् । आहुविधातृप्रत्यक्षं न ३ १७ । ४ अ- स्तिव । ब्रह्म १ ईश्वराभावात् । २ अनादरणीयताम् । ३ सर्वज्ञत्वम् ५ सर्वेषामपि ब्रह्मदर्शनं स्यात् ६ यदि प्रत्यक्षं तदावेदकं तर्हि सर्वेषामविप्रतिपत्तिरस्त्वस्ति च विप्रतिपत्तिः । ७ वेदान्तिनो वदन्ति । ९ विकल्पज्ञानशून्यस्य । १० वसः । ११ सत्ता सा महानात्मा यामाहुस्त्वतलादयः । १२ प्रथमालोकनं विशिष्टव्यवहारानड्ग- भूतं ज्ञानमालोचनाज्ञानम् । १३ परमार्थभूतेश्वरविधिजन्यं प्रत्यक्षम् । १४ यथा विधिः प्रत्यक्षस्य विपयः तथा व्यावृत्तिरपि विषय इति जैनशङ्कां निरा- १५ सत्तावत् ।- १६ प्रत्यक्षस्य विपया व्यावृत्ति नेति भावः । १७ प्रत्यक्षस्य । 1, १८.घटे पटो नास्तीति । ५९ विधिविषयम् । - - करोति ।
- प्रमेयरनमालासहितम् । ७५ निषेधृविपश्चितः । नैकत्वे. आगमस्तेने प्रत्यक्षेग प्रवाध्यते ॥१॥ अनुमानादपि तत्सद्भावो विभाव्यत एव । तथाहि-ग्रामारा. मादयः पदार्थाः प्रतिभासान्तःप्रविष्टाः प्रतिभासमानत्वात् । यत्प्रतिभासते तत्प्रतिमासान्तःप्रविष्टम् , यथा प्रतिभासँस्वरूपं प्रतिभासन्ते च विवापिन्ना इति । तदागमानामपि पुरुष एवेदं यद्भूतं यच्च भाव्यमिति बहुलमुपलम्भात् । सर्व चै" खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन । आरामं तस्य पश्यन्ति न तं पश्यतिः कश्चन । इति श्रुतेश्च ॥ १ ॥ ननुः परमब्रह्मण एंव . परमार्थसत्त्वे कथं घटादिभेदोऽवमासत 'इति न चोद्यम् । सर्वस्यापि तद्विवर्ततयावभासनात् । न चाशेपभेदस्य तद्विवर्तत्वमसिद्धं प्रमाणप्रसिद्धत्वात् । तथाहि-विवादा- ध्यासितं विश्वमेककारणपूर्वकमेकरूपान्वितत्वात् । घटघटी- . - १ निषेधविषयं न । २ एकत्वे सन्माने योऽसावागमः । सर्व खल्विद ब्रह्मेत्याद्यागमस्य वाधकं प्रत्यक्षं न' ३ कारणेन। ४ प्र. त्यक्ष साधकं न वाधकम् । ५ उक्तार्थमेव विवृणोति । ६ व्यवहारे ऽनुमानांगीकाराद्भदृमताश्रयः । ७ ब्रह्मस्वरूपम् । ८ ग्रामारामादयः । ९ ब्रह्मवाचकानां तदावेदकश्रुतीनाम् । १० सर्व ब्रह्मेति प्रतिपादनार्थ बै ग्रहणम् । ११ विवर्तम् ।। १२ ब्रह्मणः १४ एकस्यातात्विकानेकप्रतिपत्तिर्विवतः । पूर्वरूपापरित्यागेनासत्यनानाकार- प्रतिभासः पूर्वावस्थाऽपरित्यागेनावस्थान्तरापत्तिा विवतः उपादान- विषमसत्ताकत्वे .सत्यन्यथाभावो वा । १५ सत्स्वरूपानुवृत्तिरूपत्वात् । १३ जैनाः प्राहुः। में , ७६ परीक्षामुखम् । -N वा ? सरावोदञ्चनादीनां मृद्रूपान्वितानां यथा मृदेककारणपूर्वकत्वं, सद्रूपेणान्वितं च निखिलं चस्त्विति । तथाऽऽगमोऽप्यस्ति- "ऊर्णनाभ इवांशूनां चन्द्रकान्त इवाम्भसाम् । प्ररोहाणामिव प्लक्षः स हेतुः सर्वजन्मिनामिति ॥१॥" तदेतन्मदिरारसा- स्वादगद्गदोदितमिव मदनकोद्रवाद्युपयोगजनितव्यामोहमुग्ध- विलसितमिव निखिलमवभासते विचारासहत्वात् । तथा हि- यत्प्रत्यक्षसत्ताविपयत्वमभिहितं तत्र कि निविशेष लत्ताविष. यत्वं सविशेषसत्तावबोधकत्वम् न तावत्पौरस्त्यः पक्षः सत्तायाः सामान्यरूपत्वात् । विशेषनिरपेक्षतयाऽनव. भासनात् , शावलेयादिविशेषानवमासने गोत्त्वाऽनवभासन- वत् । 'निर्विशेषं हि सामान्यं भवेच्छशविषाणवदित्यभिधा- नात्, सामान्यरूपत्वं च सत्तायाः सत्सदित्यन्वयवुद्धिविषयत्वेन सुप्रसिद्ध मेव । अथ पाश्चात्यः पक्षः कक्षीक्रियते, तदा न पर मपुरुषसिद्धिः । परस्परव्यावृत्ताकारविशेषाणामध्यक्षतोऽव- भासनात् । यदपि साधनमभ्यधायि प्रतिभासमानत्वं तदपि न साधु, विचारासहत्वात् । तथाहि प्रतिभासमानत्वं स्वतः 3 -em- P4 -- १ तंतुवायः । २ तंतुनाम् । ३ न्यग्रोधः । ४ सामान्यसत्ताविपयत्वम् । ५ विशेषसहितसत्तायाः परिच्छेदकत्वम् । ६ प्रथमपक्षः । ७ सति सद्भावोऽन्वयः। ८ सविशेषसत्ताववोधकत्वमिति द्वितीयः पक्षः। ९ परब्रह्मणो। यमस्माद्भिन्नोऽयं श्यामः शवलो वेत्यादिपरस्परभिन्नाकारघटपटादिनदार्थानाम् । १० अ. -- प्रमेयरत्नमालासहितम् । ७७ । पुरतो.वा ? न तावत्स्वतोऽसिद्धत्वात् । परतश्चेद्विरुद्धम् । परतः प्रतिभासमानत्वं हि परं विना नोपपद्यते, प्रतिभास- नमात्रमपि न सिद्धिमधिवसति तस्य तद्विशेषानान्तरीयकत्वा. त्तद्विशेषाभ्युपगमे च द्वैतप्रसक्तिः । किञ्च धर्मिहेतुदृष्टान्ता अनुमानोपायभूताः प्रतिभासन्ते न चेति । प्रथमपक्षे प्रतिभा सान्तःप्रविष्टाः प्रतिभासबहिर्भूता वा । यद्याद्यः पक्षस्तदा साध्यान्तःपातित्वान्न ततोऽनुमानम् । तदहि ये तैरेवं हेतो याभिचारः। अप्रतिभासमानत्वेऽपि तावस्थाभावात्तनो नानुमानमिति। अथानाद्यविद्याविजृम्भितत्वात्सर्वमेतदसम्बद्ध- मित्यनल्पतमोविलसितम् , अविद्यायामप्युक्तदोषानुषङ्गात् । - - १ घटादीनां स्वतः प्रतिभासमानत्वाभावात् २ पदार्थानां स्वय- मेव प्रतिभासन चेन्नेत्रोन्मीलने प्रकाशाभावेऽपि स्वतः प्रतिभासन भवतु परन्तु तथा नास्ति तस्माद्धेतुरसिद्धमेव । ३ एकत्वविरोधिद्वैतप्रसाधकत्वाद्विरुद्ध. मिति ४ विशेषाविनाभावित्वात् । ५ प्रतिभासमानविशेषाभ्युपगमे । ६ सम्बन्ध ७ प्रतिभासान्तः प्रविष्टत्वाद्धेतोः सिद्धसाध्यता समागता । ८ द्वितीयः पक्षः । ९ सह । १० न प्रतिभासन्त इति द्वितीयः पक्षः। ११ तेषां धर्मादीनाम् । १२ भाटः प्राह । १३ अविद्या स्वा- श्रयव्यामोहकरी । १४ विडंवितत्वात् । १६ पूर्वोक्तं धर्मिहेतुदृष्टान्तादिकं सर्वम् । १६ अविद्या प्रतिभासते न वा, प्रतिमासते चेत्प्रतिभासान्तः प्रवि. टा तद्वहिर्भूना वा, प्रतिभासान्तः प्रविष्टा चेद्विद्येव स्यात् तद्वहिर्भूता चेत्तयैव हेतोय॑भिचारो द्वैतापत्तिश्च, न प्रतिभासते चेत्तदाविद्यति व्यवस्था न स्यात् । M-KA- . ७८ - MA परीक्षामुखम् । सकलविकल्पविकलत्वात्तस्या नैष दोष इत्यप्यतिमुग्धभाषि- तम् । केनापि रूपेण तस्याः प्रतिभासाभावे तत्स्वरूपानवधा- रणात् । अपरमप्यत्र विस्तरेण देवागमालङ्कारे चिन्तितमिति नेह प्रतन्यते । यच्च परमब्रह्मविवर्त्तत्त्वमखिलभेदानामित्युक्तं । तत्राप्येकरूपेणान्वितत्वं हेतुरन्वेन्वीयमानद्वयाविनाभावित्वेन पुरुषाद्वैतं प्रतिवध्नातीति स्वेष्टविघातकारित्वाद्विरुद्धः । अन्वि- तत्वमेकहेतुके घाँदावनेकहेतुके स्तम्भकुम्माम्भोरुहादावप्यु. पलभ्यत इत्यनेकॉन्तिकश्च । किमर्थ चेदं कार्यमसौ विदधाति? अन्येन प्रयुक्तत्वात्, कृपावशात् क्रीडावशात्, स्वभावाद्वा ? अन्येन प्रयुक्तत्वे स्वातन्त्र्यहानिद्वैतप्रसङ्गश्च । कृपावशादिति नोत्तरम् । कृपायो दुःखिनामकरणप्रसङ्गात् । परोपकारकरण- निष्ठत्वात्तस्याः सृष्टेः प्रागनुकम्पाविषयप्राणिनामभावाच्च न सा युज्यते । कृपापरस्य प्रलयविधानायोगाच्च । अदृष्टवशा- त्तद्विधाने स्वातन्त्र्यहानिः कृपापरस्य पीडाकारणाष्टव्यपेक्षा- Prak । १. शून्यत्वात् । २ आवद्यायाः । ३ उक्तलक्षणः । ४ अवि. चा। ५ यथा - काचकामलादिदोपसद्भावे मिथ्याज्ञानसद्भावस्तदभावे तद- मावस्तथाविकल्पाभावेऽविद्यास्वरूपाभावः । ६ आवद्यमा प्रयोगे। अष्टसहस्त्र्याम् । ८ न विस्तार्यते। ९ अन्वेता पुमान् । १० अन्वीयमानाः पदार्थाः । ११ निषेधयति । १२ एकरूपेणान्वितत्वादिति साधनं विचार्यते । १३ मृदैककारणके । १४ घटघटीसरावोदंचनादौ । १५ सव्यभिचारोऽनैकां- तिकः । १६ विश्वरूपम् । १७ अनुकम्पा । १८ जगद्विधाने । १९पापलक्षण । ६ प्रमेयरनमालासहितम् । योगाच्च । क्रीडावशात्प्रवृत्तौ न प्रभुत्वं क्रीडोपायव्यपपेक्षणा. द्वालकवत् । क्रीडोपायस्य. तत्साध्यस्य च युगपदुत्पत्तिप्रसा ङ्गश्च । सति समर्थे कारणे कार्यस्यावश्यम्भावात् । अन्यथा क्रमेणापि सा ततो न स्यात् । अथ स्वभावाईसौ जगन्निमि: नोति यथाग्निर्दहति वायुतीति मतं, तदपि वालभाषितमेवः पूर्वोक्तदोषानिवृत्तः । तथाहि-क्रमवर्तिविवर्तजातमखिलमपि युगपदुत्पद्येत । अपेक्षणीयस्य सहकारिणोऽपि तत्साध्यत्वेन योगपद्यसम्भवात् उदाहरणवैषम्य च | वन्ह्यादेः कादाचि- कैस्वहेतुजनितस्य नियतक्त्यात्मकत्वोपपत्तेरन्यत्र नित्य- व्यापिसमर्थकस्वभावकारणजन्यत्वेन देशकालप्रतिनियमस्य कार्ये दुरुपादात् । तदेवं ब्रह्मणोंऽसिद्धौ वेदानां तत्सुप्तप्र. बुद्धावस्थात्वप्रतिपादन परमपुरुषाख्यमहाभूतनिःश्वसिता. १ - कंदुकादि २ क्रीडासाध्यसुखस्य ३ समर्थ- कारणाभावे । ४ उत्पत्तिः । ५ ब्रह्मणः ६ ब्रह्म । गतो युगपदुत्पत्त्यादि । ८ दोषं समुद्भावयति । ९ परब्रह्मणि मु. ख्यकारणे सति किमर्थं कारणानां युगपदुत्पत्तिर्नास्ति, यदि तत्र तनियतकार- णस्य संयोगाभावानोत्पद्यत इति चेत्तर्हि तनियतकारणस्य संयोगस्यापि कर- णीयत्वेन सम्भवोऽस्तु । . १० ब्रह्मकरणीयत्वेन । ११ आनिर्दहतीत्यादि। १२ काष्ठादि । १३ दहन । १४ मर्यादाभूतशक्तिस्वरूपोपपत्तेः । १५ ब्रह्मणि। १६ अघटनात् । १७ सुप्तिप्रलयः प्रवुद्धावस्थासृष्टेरेतस्य महतो निःश्वसितमे वेति ऋग्वेदो यजुर्वेदश्च । निःस्वसितं तस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्च भूतानि । 1 - - .
परिक्षामुखम् । भिधानं च गगनारविन्दमकरन्दव्यावर्णनवदनवधेयार्थविषय- स्वादुपेक्षामर्हति । यच्चागमः प्रमाणं "सर्व वै खल्विदं ब्रह्मेत्यादि। "ऊर्णनाभ इत्यादि, च तत्सर्वमुक्तविधिनाऽद्वै- तविरोधीति नांवकाशं लभते । न चापौरूषेय आगमोऽस्ती- त्यग्रेप्रपञ्चयिष्यते । तस्मान्न पुरुषोत्तमोऽपि विचारणा प्राञ्चति ॥ प्रत्यक्षतरभेदभिन्नममलं मानं द्विधैवोदितम् । देवैर्दीतगुणैर्विचार्य विधिवत्संख्याततेः संग्रहात् ।। मानानामिति तद्दिगप्यभिहितं श्रीरत्ननन्द्यायै । स्तयाण्यानमदो विशुद्धधिषणोद्धव्यमव्याहतम् ॥१॥ मुख्यसंव्यवहाराभ्यां प्रत्मक्षमुपदर्शितम् । देवोक्तमुपैजीवद्भिः सूरिभिििपतं मया ॥२॥ इति परीक्षामुखस्य लधुवृत्तौ द्वितीयः समुद्देशः ॥२॥ .. च 1 A स्मितमेतस्य चरमचरमस्य सुप्त महाप्रलयः । १ । 'इति भामती, १ प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावेन ।। २ मतस्थापने 1 ३ अकलंकदेवैः ।। ४. दर्शनविशुद्धादिगुणैः । ५ यथोक्तप्रकारण । ६ संक्षेपात्संग्रहमाश्रित्येत्यर्थः । ७ हेतोः । ८ तेषां मानानां दिक् ताद्दिक् । ९ एतत् 1.१० निर्दोषम् । ११ अभ्युपगच्छद्भिः । १२ मयानन्तवीर्यण। 1 प्रमेयरत्नमालासहितम्। ८१ अथेदानीमुद्दिष्टे प्रत्यक्षेतरभेदेन प्रमाणद्वित्त्वे प्रथमभेदं व्याख्याय, इतरद्याचष्टे- - परोक्षमितरदिति ॥१॥ - उक्तप्रतिपक्षमितरच्छब्दो ब्रूते । ततः प्रत्यक्षादितरदिति लभ्यते, तच्च परोक्षमिति । तस्य च सामग्रीस्वरूपे निरूपयन्नाह- प्रत्यक्षादिनिमित्तं स्मृतिप्रत्याभिज्ञान तर्कानुमानागमभेदमिति ॥ २॥ प्रत्यक्षादिनिमित्तमित्यत्रादिशब्देन परोक्षमपि गृह्यते । तर्च यथावसरं निरूपयिप्यते । प्रत्यक्षादिनिमत्तं यस्येति विग्रहः । स्मृत्यादिषु द्वंद्वः । ते भेदा यस्य इति विग्रहः । तत्र स्मृति क्रमप्राप्तां दर्शयन्नाह- 'संस्काराद्वोधनिबन्धना तदित्याकारा स्मृतिरिति ॥ ३ ॥ संस्कारस्योब्दोधः प्राकट्यं स निवन्धनं यस्याः सा तथोक्ता । तदित्याकारा तदित्युल्लेखिनी, एवम्भूता स्मृतिभव- " . १ नाममात्रेणार्थानामभिधानमुद्देशः ।। २ परोक्षप्रमाणम् । ३ उत्पत्ति- कारणम् । ४ अविशदस्वरूपम् । ५ स्मृतिः प्रत्यक्षपूर्विका प्रत्यभिज्ञानं प्रत्यक्षस्मरणपूर्वकं प्रत्यक्षस्मरणप्रत्यभिज्ञानपूवकस्तोऽनुमानं प्रत्यक्षस्मरणप्रत्य- भिज्ञानतर्कपूर्वकमागमः श्रावणाध्यक्षस्मृतिसकेतपूर्वकमिति । ६ परोक्षरूपनि- ६ ८२ परीक्षामुखम्। तीति शेषः उदाहरणमाह- D स देवदत्तो यथेति ॥ ४ ॥ . प्रत्यभिज्ञानं प्राप्तकालसाह- Lutive दर्शनस्मरणकारणकं सङ्कलनं प्रत्याभिज्ञानं । तदेवेदं तत्सदृशं तद्विलक्षणं तत्प्रतियोगीत्यादि ॥ ५ ॥ अत्र दर्शनस्मरणकारणकत्वात् सादृश्यादिविषयस्यापि प्रत्यभिज्ञानत्त्वमुक्तम् । येषां तु सादृश्यविषयमुप॑मानाख्यं १ ur मित्तम् । निमित्तकम् । २ अनुभूतार्थस्य विवक्षितधर्मसम्ब- धित्वेऽनुसन्धानं संकलनमेकत्वसादृश्यादिधर्मयुक्तत्वेन पुनग्रहणमिति वा । ३ यनिरूपणाधीनं निरूपणं यस्य तत्तत्प्रतियोगी ४ संकलन- स्येति शेषः । ५ नैयायिकादीनाम् । दृश्यमानाद्यदन्यत्र विज्ञानमुपजायते । सादृश्योपाधिवत्तज्ज्ञरुपमानमिति स्मृतम् । १ । तस्माद्य. ययते तत्स्यात्सादृश्येन विशेषितम् । प्रमेयमुपमानस्य सादृश्यं वा तदन्वि- तम् ।। २ । प्रत्यक्षेणावबुद्धेऽपि, सादृश्ये गवि च स्मृते । विशिष्टस्यान्यतोऽस. द्ध रुपमानप्रमाणता । ३ । प्रत्यक्षेऽपि यथादेशे स्मर्यमाणे च पावके । वि. शिष्टविपयत्वेन नानुमानप्रमाणता । ४ । न चैतस्यानुमानत्वं, पक्षधर्माद्यसं- भवात् । प्राक्प्रमेयस्य सादृश्यधर्मत्वेन न गृह्यते । ५। गवये गृह्यमाण च न गवार्थानुमापकम् । प्रतिज्ञार्थंकदशत्वाद्गोगतस्य न लिंगता। ६ । गवयश्चापि सम्बन्धान गोलैिंगत्वमृच्छति । सादृश्यं न च सर्वेण, पूर्वदृष्टं . तदन्वयि । ७ । 1 प्रमेयरत्नमालासहितम् । ८३. प्रमाणान्तरं तेषां वैलक्षण्यादिविषयं प्रमाणान्तरमनुषज्येत । तथा चोक्तम्-'उपमानं प्रसिद्धार्थसाधात्साध्यसाधनम् । तधात्प्रमाणं किं स्यात्सज्ञिप्रतिपादनम् ॥ १ ॥ इदमल्पं महद्दूरमासन्नं प्रांशु नैति वा । व्यपेक्षातः समक्षेऽर्थे विकल्पः साधनान्तरमिति ॥ २॥" एष क्रमेणोदाहरणं दर्शयन्नाह- यथा स एवायं देवदत्तः ॥ ६ ॥ गोसशो गवयः ॥ ७ ॥ गोविलक्षणो महिषः ॥ ८ ॥ इदमस्मादरम् ।।९।। वृक्षोऽयमित्यादि ॥ १० ॥ आदिशब्देन-“पयोम्वुभेदी हंसः स्यात् पट्पादैर्धमरः स्मृतः । सप्तपर्णैस्तु तत्त्वज्ञैर्विज्ञेयो विषमच्छदः ॥ १॥ पञ्चवर्ण .. एकस्मिन्नपि दृष्टेऽर्थे द्वितीयं पश्यतो बने । सादृश्येन सहैवास्मिन्तदैवोत्पद्यते मतिः । ८ । प्रामाण्यवच्च सादृश्यमेकैक हि समाप्यते । प्रतियोग्यन्यदृष्टेऽपि तत्तस्मादुपलभ्यते । ९ । १ गेविलक्षणो महिष इत्यत्रः प्रमाणान्तरण भवितव्यम् । २ संपद्येत । ३ गवादि । . ४ प्रश्ने ५ सज्ञिनो वाचस्य प्रतिपादनं, विवक्षितसंज्ञाविषयत्वेन च सङ्कलनं यथा वृक्षोऽयमित्या- दि । ६ उन्नतम् । ७ अथवेदमस्मान्न महत । । · ८ परस्परापेक्षया। ९ तदा प्रमाणसंख्याविघटनम् । १० प्रत्यभिज्ञानभेदानाम् । ११ ए. कत्वप्रत्यभिज्ञानम् । १२ सादृश्यप्रत्यभिज्ञानम् । १३ वैलक्षण्यप्रत्यभिज्ञानम् । १४ तत्प्रतियोगीप्रत्यभिज्ञानम्। १५ वृक्षसामान्यस्मृतिप्रत्यभिज्ञानम् । १६ हंसो भवतिपयोम्बुभेदकृत् । १७ भीमसेनकपूरोत्पादकेलिः 1.
परीक्षामुखम् । भवेद्रत्न मेचकास्यं पृथुस्तनी । युवतिश्चैकशृङ्गोऽपि गण्डका परिकीर्तितः ॥ २ ॥ शरभोऽप्यष्टभिः पादः सिंहश्चारुसटा. न्वितः' इत्येवमादिशब्दश्रवणात्तथाविधानेव संरालदीनव. लोक्य तथा सत्यापयति यदा तदा तत्सङ्कलनमपि प्रत्यभि- ज्ञानमुक्तं, दर्शनस्मरणकारणत्वाविशेषात् । परेषां तु तत्प्रमा- णन्तरमेवोपपद्यत उपमानादौ तस्यान्तर्भावाभावात् । अथोहो- ऽवसरप्राप्त इत्याह- - उपलम्भानुपलम्भनिमित्तं व्याप्तिज्ञानमूहः ॥ ११ ॥ इंदमास्मिन्सत्येव भवत्यसति न भवत्यवेति च ॥ १२ ॥ उपलम्भः प्रमाणमात्रमत्र गृह्यते । यदि प्रत्यक्षमेवोपलम्भ- शब्देनोच्यते तदा साधनेष्वनुमेयेषु व्याप्तिज्ञानं न स्यात् । अथ व्याप्तिः सर्वोपसंहारेण प्रतीयते, सा कथमतीन्द्रि 1 १ हंसादीन् । २ सत्यंकरोति । । ३ स एवायं हंसः पयोम्बुभेदीति यज्ज्ञानं तत्संकलनम् । ४ सङ्कलनज्ञानम् । ५ साधनत्वेनाभिप्रेतं वस्तु । ६ अन्वये । ७ व्यतिरेके । ८ नैयायिकानामभिप्रायमनूच दूषयति, ते. पामभिप्रायस्तु, व्याप्तिः प्रत्यक्षगोचरेति । ९ आदित्यो गमनश- क्तियुक्तो गतिमत्वाद्यो यो गतिमान् स स गमनशक्तियुक्तो दृष्टो यथा वाणो गतिमांश्चायं तस्माद्मनशक्तियुक्तः । आदित्यो गतिमान् पूर्वदिशात्यागेन - देशान्तरसमुपलभ्यमानत्वाद्देवदत्तवत् । इत्यत्र सूर्यगतिमत्वादिषु धर्मादिषु • गृत्यादिष्वनुमेयेवत्यन्तपरोक्षेपु। १० सर्वदेशे सर्वकाले सर्वात्मना गृह्यते ।
प्रमेयरत्नमालासहितम् । -- - यस्य साधनस्यातीन्द्रियेण साध्येन भवेदिति । नैवं प्रत्यक्ष- विपयेग्विवानुमानविषयेष्वपि व्याप्तेरविरोधात् । तज्ज्ञान- स्याप्रत्यक्षत्त्वाभ्युपगमात् । उदाहरणमाह- यथाग्नावेव धूमस्तदभाव न भवत्येवेति च ॥ १५ ॥ इदोनीमनुमानं क्रमायातमिति तल्लक्षणमाह- साधनात्साध्यविज्ञानमनुमानम् ।। १४ ॥ साधनस्य लक्षणमाह- साध्याविनाभावित्वेन निश्चितो हेतुः ॥ १५ ॥ नेनु त्रैरूयमेव हेतोर्लक्षणं, तस्मिन्सत्येव हेतोरसिद्धादिदोष परिहारोपपत्तः । तथाहि-पक्षधर्मत्वमसिद्धत्वव्यवच्छेदार्थम-- भिधीयते । सपक्षे सत्त्वं तु विरुद्धत्वापनोदार्थम् । विपक्षे अनियतदिग्देशव्याप्तिज्ञानस्य ३ व्याप्तिज्ञानस्योदाहरणमाह ४ प्रमाणाद्विज्ञानमनुमानमेतावन्मा ने लक्षणेऽनुमेयागमादिभिर्व्यभिचारोऽतस्तद्वारणाय साध्यविज्ञानमनुमानमित्युक्तं तथापि प्रत्यक्षेण व्यभिचारोऽतस्तद्वारणाय साधनात्साध्यविज्ञानमनुमानमिन्यु. ५ वौद्धः प्राहः । ६ पक्षधर्मत्वसपक्षसत्वविपक्षाद्यावृतित्रयमिति । ७ रूप्ये। ८ आदिपदेन विरुद्धानकान्तिकदोपौ । १ शब्दोऽनित्यः चाक्षुषत्वादित्यत्रापक्षधर्मत्वमस्ति चाक्षुषत्वादिति हेतोः पक्षभूते शब्द तमानत्वात्तस्मादसिद्धोऽयं हेतुरतस्तद्वारणाय पक्ष सत्वमिति । १० नित्यः शब्दः कृतचत्वादित्यत्रसपक्षेऽसत्वमस्ति कृतकत्वस्य हि १ पराक्षस्य २ तर्कस्य । कम् ।
..८६. परीक्षामुखम् । चासत्त्वमेवानै कान्तिकम्युदासार्थमिति । तदुक्तम् 'हेतोस्त्रि. स्वपि रूपेषु निर्णयस्तेन वर्णितः । असिद्धविपरीतार्थव्यभि. चारिविपक्षतः" इति ॥ १ ॥ तदयुक्तं-अविनाभावनियमनि. श्चयादेव दोषत्रयपरिहारोपपत्तेः । अविनाभावो मन्यथानु. पपन्नत्वं, तंञ्चासिद्धस्य न सम्भवत्येव, अन्यथानुपपन्नत्वम- सिद्धस्य न सिद्ध्यतीत्यभिधानात् । नापि विरुद्धस्य तल्लक्षण- वोपपत्तिविपरीतनिश्चिताविनाभाविनि यथोक्तसाध्याविनाभा. वनियमलक्षणस्यानुपपत्तेविरोधात् , व्यभिचारिण्यपि न प्रक- तलक्षणावकाशः तत एव । ततोऽन्यथाऽनुपपत्तिरेव श्रेयसी, न त्रिरूपता। तस्यां सत्यामपि यथोक्तलक्षणाभावे हेतोनमक- त्वादर्शनात् । तथाहि–स श्यामस्तत्पुत्रत्वादितरतत्पुत्रवदित्यत्र । - ' नित्यत्वविरोधिनाऽनित्यत्वेन व्याप्तत्वात्तस्माद्धेतोः साध्याभावबद्वृत्तित्वाद्वि- रुद्धत्वमिति, अतो विरुद्धदोपपरिहारार्थ सपक्षे सत्वम् १ शब्दो नित्यः प्रमेयत्वादित्यत्र विपक्षादव्यावृत्तिरस्ति प्रमेयत्वस्य हेतोः पक्ष- भूते शब्दे तथासपक्षरूपाकाशादा वर्तमानेऽपि नित्यत्वविरोधिनो घटादेरव्या. तित्वात्तस्माद्धेतोः पक्षसत्वसपक्षमत्वविपक्षादव्यावृत्तित्वादनैकान्तिकत्वमिति, अतस्तत्परिहारार्थ विपक्षाद्यावृत्तिरिति । २ दिग्नागाचार्येण । ३ एत -एव विपक्षास्तेभ्यः । ४.असिद्धादिदोषपरिहारार्थ हेतोस्रूप्यवर्णनम् । ५ अन्यथानुपपनत्वम् । ६ अन्यथानुपपनत्व । ७ साधने । तसाध्याविनाभावनियमलक्षणस्यानुपपत्तेरेव । ९ अन्यथानुपपत्तिवलेनैवा- सिद्धादिदोपपरिहारो भवति यतः । १०. त्रिरूपतायाम्। ११ साध्याविना- - + ८ यथो. Prer प्रमेयरत्नमालासहितम् । ६७ त्रैरूप्यसम्भवेऽप्यर्गमकत्वमुपलक्ष्यते अंथ विपक्षाद्यावृत्ति नियमवती तंत्र न दृश्यते, ततो न गमत्वमिति । तदपि मुग्धविलसितमेव । तस्यों एवाविनाभावरूपत्वात् । इतररूप- सद्भावेऽपि तदभावे हेतोः स्वसाध्यसिद्धिम्प्रति गमकत्वानिष्टौ सैवं प्रधानं लक्षणमणमुपलक्षणीयमिति। तत्सद्भावे चेतर. रूपद्वयनिरपेक्षतया गमत्वोपपत्तश्च । यथा सन्त्यद्वैतवादि. नोऽपि प्रमाणानीष्टानिष्टसाधनदूषणाऽन्यथाऽनुपपत्तेः । नचा १४ भावित्वेन निश्चितो हेतुरिति । १ गर्भस्थो मैत्रतनयः श्यामस्तत्पुत्रत्वादि- तरतत्पुत्रवदित्यत्र तत्पुत्रत्वस्य हेतोः पक्षभूनगर्भस्थे सपक्षभूतेतरतत्पुत्रे च वर्त- मानस्य साध्याभाववद्गौरादिना व्यावृत्तौ सत्यामपि गर्भस्थमैत्रतनयस्य गौरत्वे. नापि सन्देहसम्भवात्सदिग्धानकान्तिकत्वं स्यादिति । २ बौद्धः प्राह । ३ स श्यामस्तत्पुत्रत्वादित्यनुमाने । ४ साध्यज्ञापनशक्तिकत्वम् । ५ विपक्षाद्यावृत्तेरेव । ६ पक्षसत्वसपक्षसत्वद्वयसद्भावेऽपि ७ विपक्षा- यावृत्यभावे । ८ सत्याम् । ९ साध्याविनाभाववती विपक्षाध्यावृत्ति- रेव । १० निर्दोषम् । ११ प्रतिपादनीयम् । १२ पित्रोश्च ब्राह्मणत्वेन, पुत्र- ब्राह्यणतानुमा । सर्वलोकप्रसिद्धा न पक्ष धर्ममपेक्षते ॥ १ ॥ नदीपूरोऽप्यधो देशे, दृष्टः सन्नुपरिस्थिताम् । नियम्यो गमकत्वैव वृत्तां वृष्टिं नियामिकाम् ॥२॥ इत्यत्र पक्षसपक्षसत्वद्वयाभावेऽपि विपक्षाध्यावृत्तिवलादेव पित्रोः ब्राह्मणत्वाधो- देशस्थनदीपूरौ पुत्रव्राह्मणतोपरिसञ्जातवृष्ट्योगमकाविति। १३ तेपां प्रमाणानि प्राग न:सन्तीदानीमापद्यन्ते तस्य प्रमाणवत्वधर्मस्याङ्गीकाराभावात्पक्षधर्मत्वं नास्ति तथापि गम्यगभकभावोऽस्ति अनुमाने । १४ ८८. परीक्षामुखम् । पक्षधर्मत्वसपक्षान्वयो चाऽस्ति केवलमविनाभावमात्रेण गम- कत्वातीतेः। यदप्यपरमुक्तं परैः पक्षधर्मताभावेऽपि काकस्य कार्पोद्धबलः प्रासाद इत्यस्यापि गमकत्वापत्तिरिति तद- प्यनेन निरस्तम् । अन्यथानुपपत्तिवलेनैवापक्षधर्मस्यापि साधु. वाभ्युपगमात् । न चेहँ साऽस्ति । ततोऽविनाभाव एव हेतोः प्रधानं लक्षणमभ्युपगन्तव्यम् । तस्मिन्नत्यति त्रिल- क्षणत्त्वेऽपि हेतोर्गमकत्त्वदर्शनादिति न त्रैरूप्यं हेतुलक्षणमव्या. पकत्वात् । सर्वेषी क्षणिकत्त्वे साध्ये सत्त्वादेः साधनस्य सपक्षेऽसतोऽपि स्वयं सौगतैर्गमकत्वाभ्युपगमात् । एतेने पञ्चलक्षणत्वमपि योगपरिकल्पितं न हेतोरुपपत्तिमियीत्य- भिहितं बोद्धव्यम्। पक्षधर्मत्वे संत्यन्वयेव्यतिरेकॉववाधित- विषयत्त्वमसत्प्रतिपक्षत्वं चेति पञ्चलक्षणानि, तेषामप्यविना- भावप्रपञ्चतैव बाधितविषयस्याविनाभवायोगात् सत्यति. १वौद्धादिभिः। २ पक्षधर्मतां विना गम्यगमकभावो नास्त्यस्ति चेदत्र गमकत्वमस्तु, ३ भवतु । ४ अन्यथानुपपत्येकलक्षणद्वारेण । ५ इष्टानिष्टसाधनदूपणान्यथानुन पत्तरिति हेतोः पक्षधर्मता नास्ति तथाप्यस्यान्यथानुपपत्तिवलात्साधुत्वस्वीकारा. तू । ६ काकस्य कार्णयाद्धवलः प्रासाद इत्यत्र । ७ अन्यथानुपपत्तिः । ८ अन्वयव्यतिरेकसमधिगम्यो हि कार्यकारणभाव इति समायातम् । अविनाभावनियमे सति । १० असति त्रिरूपे । ११ पदार्थानाम् । १२ रूप्यनिराकरणद्वारेण । १३ सपक्षे सत्वं । १४ विपक्षाध्यावृत्ति । १५ अविनाभावस्य.पर्यायनाम । - १६ अबाधितविपयस्याविनाभावयोगो ९ , प्रमेयरनमालासहितम् । ८९ - पक्षस्येवेति, साध्याभासविषयत्त्वेनासम्यग्घेतुत्वाच्च, यथोक्त- पक्षविषयत्वाभावात्तदोषेणैव दुष्टत्वात् । अतः स्थितं साध्या- विनाभावित्वेन निश्चितो हेतुरिति । इदानीमविनाभावभेदं दर्शयन्नाह- सहक्रममावनियमोऽविनाभावः ॥ १६ ॥ तत्र सहभावनियमस्य विषयं दर्शयन्नाह- सहचारिणोाप्यव्यापकयोश्च सहभावः ।। १७ ।। सहचारिणो रूपरसंयोाप्यव्यापकयोश्च वृक्षवशिशपा- त्वयोरिति । सप्तम्या विषयो निर्दिष्टः । क्रमभावनियमस्य विषयं दर्शयन्नाह-- पूर्वोत्तरचारिणोः कार्यकारणयोश्च क्रमभावः ।। १८ ॥ पूर्वोत्तरचारिणोः कृत्तिकोदयशकटोदययोः कार्यकारणयोश्च धूमधूमध्वजयोः क्रमभावः । नन्वेवम्भूतस्याविनाभावस्य न प्रत्यणक्षेण ग्रहणं, तस्य सन्निहितविषयत्वात्। नाप्यनुमामेन, प्रकृतापरानुमानकल्पनायामितरेतश्रियत्वानवस्थावतारात् । वर्तते बाधितविषये नास्ति । १ कुतः २ अग्निरनुष्णः कृतकत्वात् । ३ पक्षदोषेणैव । ४ अव्यभिचारित्वम् । ५ रूप रसं विहाय न ति. छति रसो रूप विहाय न तिष्ठति सहैव स्थितिः । ६ रोहिणी । ७ त्यक्षस्य । ८ अनुमानेनाविनाभावग्रहणं चेत्तर्हि प्रकृतानुमानेनानुमानान्तरेण प्र.
परीक्षामुखम् - - आगमादेरपि भिन्न विषयत्वेन. सुप्रसिद्धत्वान्न ततोऽपि तत्त तिपत्तिरित्यारेकायामाह- तर्कातन्निर्णयः॥ १३ ॥ तर्काद्यथोक्तलक्षणादूहातन्निर्णय इति । अथेदानी साध्य- लक्षणमाह- इष्टमबाधितमसिद्धं साध्येम् ।। २० ।। अत्रापरे दूषणमाचक्षते-आसनशयनभोजनयाननिर्धवना- देरपीटत्वात्तदपि साध्यमनुषज्यत इति । तेऽप्यतिबालिशा अप्रस्तुतप्रलापित्वात् । अत्र हि साधनमधिक्रियते । तेन साधनविषयत्वेनेप्सितमिष्टमुच्यते । इदानी स्वाभिहितसाध्यल क्षणस्य विशेषणानि सफलयन्नसिद्धविशेषणं समर्थयितुमाह- संदिग्धविपर्यस्ताव्युत्पन्नानां साध्यत्वं यथा वा, प्रकृतानुमानेन चेदितरेतराश्रयस्तथाहि-सत्यामविनाभावप्रतिपत्तावनु- मानस्यात्मलाभस्तदात्मलाभे चाविनाभावप्रतिपत्तिरिति । अनुमानान्तरेणावि. नाभावप्रतिपत्तिश्चत्तस्याप्यनुमानान्तरेणाविनाभावप्रतिपत्तावनस्था स्यात् । १ एकस्मिन्वस्तुनि प्रमाणसंप्लवोऽस्ति तथापि मुख्यवृत्त्या तत्तनियतस्य प्रमा- णस्य स एव विषयः। २ आवेनाभाव। ३ अविनाभावनिर्णयः । ४ हेतु- लक्षणकथनानन्तरम् ।, ५ साध्यं लक्ष्यमिष्टमवाधितमसिद्ध लक्षणं यदासिद्ध साध्यं तदेष्टावाधितविशेषणसहितमेवेति । ६ साध्यलक्षणे । ७ नैयायिकाः। ८ मैथुन । ९. सन्मुखीक्रियते। १० साधनाधिकारेण । - . ११ अनध्यव- .
. प्रमेयरत्नमालासहितम् । स्यादित्यसिद्धपर्दस् ।। २१ ॥ तत्र सन्दिग्धं स्थाणुर्वापुरुषो वेत्यनवधारणेनोभयकोटि- परामशिसंशयाकलितं वस्तु उच्यते । विपर्यस्तं तु विपरीता. वमासिविपर्ययज्ञानविषयभूतं रजतादि । अव्युत्पन्नं तु नाम- जातिसंख्यादिविशेषापरिज्ञानेनानिर्णीतविषयानध्यवसायग्राह्यम् । एषां साध्यत्वप्रतिपादनार्थमसिद्धपदोपादानमित्यर्थः । अधु- नेटावाधितविशेषणद्वयस्यं साफल्यं दर्शयन्नाह- अनिष्टाध्यक्षादिवाधितयोः साध्यत्वं माभूदिती- टावाधितवचनम् ।। २२॥ -- अनिष्टो मीमांसकस्यानित्यः शब्दः प्रत्यक्षादिवाधितश्चा. श्रावणत्वादिः । श्रादिशब्देनानुमानागर्मलोकस्ववचनवाधि. तानां ग्रहणम् । तदुदाहरणं चाकिञ्चित्करस्य हेत्वाभासस्य निरूपणावसरे स्वयमेव ग्रन्थकारः प्रपञ्चयिष्यतीत्युपरम्यते । सित । ३ . १ प्रतिपादितम् । २ अनध्यवसितं तु गच्छत्तृणस्पर्शः । यथा, मार्गे गच्छतः पुरुषस्य तृणस्पर्शनं जातं तदा स चिन्तयति यत्किचिद्ध- विष्यतीत्यादि। ४ सन्दिग्धादीनाम् । ५ अपरिणामी शब्दः कृतक- त्वात् घटवत् । ६ प्रेत्यासुखप्रदो धर्मः पुरुषाश्रित्वादधर्मवत् । ७शु- चि नरशिरःकपालं प्राण्यङ्गत्वाच्छवशुक्तिवत् । ८ माता मे वन्ध्या पुरुष- संयोगेऽप्यगर्भत्वात्प्रसिद्धवन्ध्यावत् । ९ सूत्रकारो . माणिक्यनन्दिदेवः ।
९२ परीक्षामुखम् । । तंत्रासिद्धपदं प्रतिवाद्यपेक्षयैव, इष्टपदं तु वाद्यपेक्षयेति विशे- अमुपदर्शयितुमाह- नैचासिद्धवदिष्टं प्रतिवादिनः ।। २३ ॥ अयमर्थः-न हि सर्व सर्वापेक्षया विशेषणमपि तु कि- श्चित्कमप्युदिस्य भवतीति । असिद्धवदिति व्यतिरेकमुखेनोदा- हरणम् । यथा असिद्धं प्रतिवाद्यपेक्षया न तथेष्टमित्यर्थः । कुत एतदित्याह-- -- प्रत्यायनाय हाच्छों वक्तुरेव ।। २४ ॥ इच्छायाः खलु विषयीकृतमिष्टमुच्यते । प्रत्यायनाय हीच्छा वक्तुरेवेति । तच्च साध्यं धर्मः किं वा तद्विशिष्टो धर्मोति प्रश्ने तभेदं दर्शयन्नाह- साध्यं धर्मः क्वचित्तद्विशिष्टो वा धर्मीति ॥ २५ ।। सोपस्काराणि वाक्यानि भवन्ति । ततोऽयमों लभ्यते- १ त्रयाणां मध्ये । २ वादिनः साध्यं प्रसिद्ध प्रतिवादिनस्त्वसिद्धमिति । ३ यथा प्रतिवादिनोऽसिद्धं तद्वदिष्टं न प्रतिवादिन इति व्यतिरेकेण ज्ञापितम् । ४ । इष्टपदग्रहण तु वाद्यपेक्षयैव यथा प्रतिवाद्यपे.. क्षयासिद्धपदमिति । ५ विशेषणम् । ६ वादिनं प्रतिवादिनं वा यथैकस्य जनस्य पुत्रापेक्षया पितृव्यपदेशः पित्रपेक्षया पुत्रव्यपदेश इति। ७ परप्रतिपाद- नाय शब्दप्रयोगः । ८ परप्रतिवोधनाय । .९ इत्यमेवेष्टमित्यर्थः । १० प्रयो- -- प्रमेयरत्नमालासहितम् । ९३ व्याप्तिकालापेक्षया तु साध्यं धर्मः । क्वचित्प्रयोगकालापेक्षया तु तद्विशिष्टो धर्मी साध्यः । अस्यैव धर्मिणो नामान्तरमाह- पक्ष इति यावत् ॥ २६॥ ननु धर्मर्मिसमुदायः पक्ष इति पक्षस्वरूपस्य पुरातनैनि- रूपितत्वाद्धर्मिणस्तद्वचने कथं न राधान्तविरोध इति । नैवं- साध्यधर्माधारतया विशेषितस्य धर्मिणः पक्षत्ववचनेऽपि दो- पानवकाशात् । रचनावैचिंध्यमात्रेण तात्पर्यस्यानिराकृतत्वा- सिद्धान्ताविरोधात् । अत्राह सौगतः भवतु नाम धर्मी पक्षव्य. पदेशभाक् तथापि सविकल्पबुद्धौ परिवर्तमान एव न वास्तवः। सर्व एवानुमानानुमेयव्यवहारो वुद्ध्यारूढेन धर्मर्मिन्यायेन न वहिःसदसत्वमतेक्षत इत्यभिधानादिति तन्निरासार्थमाह-- - प्रसिद्धो धर्मीति ॥ २७ ॥ - गकाले । १ यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्निः । २ पर्वतोऽयं वह्निमान् । अत्र वहिविशिष्टः पर्वतः साध्यः । ३ ज्ञातव्ये पक्षधर्मत्वे पक्षो धर्म्यभिधीयते । व्याप्तिकाले भवेद्धर्मः साध्यसिद्धौ पुनर्द्वयम् ।। ४ साध्यधर्मविशिष्टो धर्मी पक्षः। ५ अकलकदेवादिभिः । ६ सिद्धान्त । ७ धर्मधर्मसमुदायः पक्ष इति रचनावैचित्र्यम् । ८ अर्थस्य । ९ यथा केशोंडुकज्ञानमिति । १० विकल्पबुद्धिगृहीतेन । अपरामृष्टभेदा सन्तानिन एव सन्तानो जलप्रवाहवद्यथा गतो जलप्रवाहो गत एव पुनरन्य एवागमिष्यति तथापि सन्तानरूपेण एक एवं व्यपदिश्यते । ११ वाह्य वस्तु वर्तते तथापि क्षणिकं, निर्विकल्पक- - ९४ परीक्षामुखम् । अयमर्थः-नेयं विकल्पबुद्धिर्वहिरन्तर्वाऽनसादितालम्बन- भावा धर्मिणं व्यवस्थापयति । तदेवास्तवत्वेन तदाधारसाध्य- साधनयोरपि वास्तवत्वानुपपत्तेस्तहुँद्धेः पारंपर्येर्णापि वस्तु- व्यवस्थानिवन्धनत्त्वायोगात् । ततो विकल्पेनान्येन वा व्यवं. स्थापितः पर्वतादिविषयभावं भजन्नेव धर्मितां प्रतिपद्यत इति स्थित प्रसिद्धो धर्मीति । तत्प्रसिद्धिश्च क्वचिद्विकल्पतः क्वचि- प्रमाणतः क्वचिच्चोभयत इति नैकान्तेन विकल्पाधिरूढस्य प्रमाणप्रसिद्धस्य वा मित्वम्। ननु धर्मिणो विकल्पात्प्रतिपत्तौ किं तत्र साध्यमित्याशङ्कायामाह- विकल्प सिद्धे तस्मिन्सत्तेतरे साध्ये ।। २८ ।। - ४ तस्मिन्धर्मिणि विकल्पसिद्ध सत्ता च तदपेक्षयेतराऽसत्ता ज्ञानविपयास्थिरस्थूलतया सदसत्वं नास्ति । १ अवलम्वनेति पाठान्तरम् । २ अप्राप्तविषयभावा । ३ धर्मिणोऽवास्तवत्वेन पक्ष आ. धारौ ययोस्तो साध्यसाधनौ तयोः । ५ अनुमानबुद्धः । ६ दहन- स्वलक्षणाद्भूमस्वलक्षणं तस्मात्तदनुभवस्तस्माद्भूमविकल्पस्तस्माणिविकल्प इति पारंपर्यण । तर्हि बौद्धानामनुमानं नष्टं ततो निर्विकल्पप्रत्यक्षप्रामाण्यमनुमानेन मास्तु । ७ विकल्पवुद्ध्या । ८ प्रमाणान्तरेण । ९ निर्णीतः ।। १० विषयभावोऽस्तिचेद्धर्मी भवति अन्यथा धर्मी न भवति धर्मी नास्तीति वक्तुं न पार्यतेऽनुमानभनो भवति यतः । ११ अनिश्चितसंवादविसंवादो विकल्पः । १२ प्रत्यक्षादेः। १३ विकल्पप्रमाणाभ्याम् । १४ नियमेन । १५ भाद्रः प्राह । १६ प्रमाणाप्रमाणसाधारणी शाब्दी प्रतीतिर्विकल्पः । १७ पक्षे, मानसप्रत्यक्षसिद्ध ।
प्रमेयरत्नमालासहितम् । ९५ च ते द्वे ऽपि साध्ये, सुनिर्णीतासम्भवद्वाधकप्रमाणवलेन योग्यानुपलब्धिबलेन चेति शेषः । अत्रोदाहरणमाह- 'अस्ति सर्वज्ञो नास्ति खरविषाणमिति ।। २१ ।। सुगमम् । नर्नु धर्मिण्यसिद्धसत्ताके, भावाभावो धधर्मा- णीमसिद्धविरुद्धानेकान्तिकत्त्वादनुमानविषयत्वायोगाँत् कथं सत्तेतरयोः साध्यत्त्वम् ? तदुक्तम्-असिद्धो भावधर्मश्चेद्य -भिचार्युभयोंश्रितः । विरुद्धो धर्मोऽभावस्य सा सत्ता. साध्यते कथम् । इति तदयुक्तम्-मानसप्रत्यक्षे भावरूपस्यैव धर्मिण: प्रतिपन्नत्वात् । न च तत्सिद्धौ तत्सत्त्वस्यापि प्रतिपन्नत्वाद्य- ? १ योग्यानुपलब्धिवलेन । अस्ति सर्वज्ञः सुनिणीतसम्भवद्वाधकप्रमाणत्वाप्रसि- द्धवेदार्थज्ञानिवत् , नास्ति खरविषाणं दृश्यत्वे सत्यनुपलब्धः । २ मीमांसकः प्राह । ३ अविद्यमाने ४ आस्तित्व । ५ भावाभाव । ६ हेतूनाम् ७ आक्षेपः । ८ सुनिश्चितासम्भवद्वाधप्रमाणत्वादिति हेतुर्यदि सर्वज्ञभावधर्मश्चत्तदा सर्वज्ञवद्धतुरप्यसिद्धः, को हि नाम सर्वज्ञभा- वधर्ममिच्छन्सर्वज्ञमेव नेच्छेत् । ९ हेतुर्यदि सर्वज्ञभावधर्मश्चत् । १० हेतुर्यदि सर्वज्ञभावाभावधर्मश्चत्तदा व्यभिचारी सपक्षविपक्षयोवृत्ते । ११ हेतुर्याद सर्वज्ञभावाभावधर्माश्रितश्चेत् ।- १२ हेतुयदि सर्वज्ञाभावधर्मश्चेत्तदा विरुद्धो यतः सर्वज्ञाभावधर्मात्सर्वज्ञनास्तित्वस्यैव साधनात् । १३ सर्वज्ञाभाव- स्य। १४ स सत्तां साधयेत्कथमिति पाठान्तरम् । १५ सर्वज्ञस्य । १६ स. वज्ञ । १७ यथा धर्मिणो मानसप्रत्यक्षेभावरूपेण. प्रत्यक्षत्वं, तथा धर्मस्यापि ९६ परिक्षामुखम् । र्थमनुमानम् । तदभ्युपेतमपि वैय्यात्याद्यदा पैरो न प्रतिपद्यते तदाऽनुमानस्थ साफल्यात् । न च मानसज्ञानाद्गगनकुसुमादे. रपि सद्भावसम्भावनाऽतोऽतिप्रैसङ्गः । तज्ज्ञानस्य बाँधकप्रत्य- यव्यपाकृतसत्ताकवस्तुविषयतया मानसप्रत्यक्षाभासत्त्वात् । कथं तर्हि तुरगशृङ्गादेर्धर्मित्त्वमिति न चोद्यम्-धर्मिप्रयोग- काले बाधेकप्रत्ययानुदयात्सत्त्वसम्भावनोपपत्तेः। न च सर्व- ज्ञादौ साधकप्रमाणासत्त्वेन सत्त्वंप्रति सेशीतिः सुनिश्चितास- म्भवद्वाधकंप्रमाणत्वेन सुखादाविव सत्त्वनिश्चयात्तत्र संशया- योगात् । इदानीं प्रमाणोभयसिद्ध धर्मिणि किं साध्यमित्या- शङ्कायामाह ग्रमाणोभयसिद्धे तु साध्यधर्मविशिष्टता ॥ ३० ॥ । ३ H4 r ४ प्रसिद्धित्वं वर्तते किमत्रानुमानेनेति मीमांसकशकां परिहरति । -१ धाप्ट्यात् । २ सर्वज्ञाभाववादी । ३ यथा धर्मिणो मानसप्रत्यक्षेण भावरूपग्रहणं तथा गगनकुसुमादेरपि भवत्विति मीमांसकप्रयुक्तातिप्रसंगरूपदूषणं परिहरति । गगनकुसुमादिकं नास्ति दृश्यत्वे सत्यनुपलव्धेरिति गगनकुसुमादिसद्भावकानु. मानाभावात्तत्र संजातमानसप्रत्यक्षस्य मानसप्रत्यक्षाभासत्वात् । ५ तुरंगवि. पाणामित्व मास्त्विति शंकां परिहरति । ६ खरविषाणादिकं धर्मी । ७ खरविषाणादिकं नास्ति दृश्यत्वे सत्यनुपलब्वेरिति वाधकप्रत्ययानुदयात् । .८ खरविषाणादिकमुररीक्रियते । ९ सर्वज्ञसाधकं प्रमाणमस्ति ततः सर्वज्ञास्ति. से संशयो नः। सर्वज्ञास्तित्वे । ११.प्रमाणसिद्धे प्रमाणविकल्पसिद्धे च - प्रमेयरत्नमालासहितम्। । १३ साध्ये इति शब्दः प्रोक द्विवचनान्तोऽप्यर्थवंशादेकवच. नान्ततया, सम्बध्यते । प्रमाणं चोभयं च विकल्पप्रमाणद्वयं ताभ्यां सिद्ध धर्मिणि साध्यधर्मविशिष्टता साध्या । अयमर्थः- प्रमाणप्रतिपन्नमपि वस्तु विशिष्टधर्माधारतया विर्वादपदमा- रोहतीति साध्यतां नातिवर्त्तत इति । एवमुभयसिद्धेऽपि यो. ज्यम् । प्रमाणोभयसिद्धं धर्मिद्वयं क्रमेण दर्शयन्नाह- अग्निमानयं देशः परिणामी शब्द इति यथा ॥ ३ ॥ देशो हि प्रत्यक्षेण सिद्धः शब्दस्तूभयसिद्धः ! नहि प्रत्यक्षे- णाग्दिर्शिभिरनियतदिग्देशकालावच्छिन्नाः सर्वेशव्दा निश्चेतुं पार्यन्ते । सर्वदर्शिनस्तु तन्निश्चयेऽपितं प्रत्यनुमानानर्थक्या- त्। प्रयोगकालापेक्षया धर्मविशिष्टधर्मिणः साध्यत्वमभिधाय व्याप्तिकालापेक्षया साध्यनियमं दर्शयन्ताह- व्याप्तौ तु साध्यं धर्म एवेति ॥ ३२ ।। धर्मिणि । १ पूर्वसूत्रे । २ अर्थवशाद्विभक्तीपरिणामः । ३ विकल्पप्रमाण- योर्द्वयम् । ४ पर्वतादि। ५ अग्न्यादि । ६ आग्निमत्वानग्निमत्वरूप। ७ हेतोः । ८ तदा धमविशिष्टता साध्या। ९ पर्वतादिदेशो हि प्रत्यक्षप्रमाणसिद्धोऽग्निरूपवि- शिष्टधर्माधारतया तु साध्यो जातः। १० यथा नियतदिग्देशवर्तमानकालावच्छिन्न : शब्दाः श्रावणप्रत्यक्षसिद्धा, नहि तथानियतदिग्देशातीतानागतकालावच्छिन्नाः शब्दारस्माभिर्निश्चेतु शक्यन्ते तस्मात्श्रावणप्रत्यक्षसिद्धा वर्तमानशब्दाः प्रमा- णसिद्धारन्ये तु विकल्पसिद्धाः।। ११ किञ्चिज्ञैः पुरुषैः । १२ अनियतदि- रदेशाद्यवच्छिन्नशब्दनिश्चयेऽपि । १३ सर्वज्ञ प्रति। १४ अनुमानप्रयोग। १५ यत्र यत्रं घूमस्तत्र तत्र वहिरिति व्याप्तौ । - १६ अग्निरेव, नहि वहिवि. ७ al . परीक्षामुखम् । सुगमम् । धर्मिणोऽपि साध्यत्वे को दोष इत्यत्राह .......अन्यथा तदर्घटनादिति ॥ ३३ ।। उक्तविपर्ययेऽन्यथाशब्दः । धर्मिणः साध्यत्वे तदघटनात् व्याप्त्यघटनादिति हेतुः । न हि धूमदर्शनात्सर्वत्र पर्वतोऽग्निमा- निति व्याप्तिः शक्या कर्तुं प्रमाणविरोधात् । नन्वनुमाने पक्षप्र. योगस्यासम्भवात् प्रसिद्धो धर्मीत्यादिवचनमयुक्तम् । तस्य सौ. मर्थ्यलव्धवात् । तथापि तद्वचने पुनरुक्तताप्रसङ्गात्। अर्थादा- पन्नस्थापिपुनर्वचनं पुनरुक्तमित्यभिधानादिति सौगतस्तत्राह- साध्यधर्माधारसन्देहापनोदाय गम्यमान स्यापि पक्षस्य वचनम् ।। ३४ ॥ साध्यमेव धर्मस्तस्याधारस्तत्र सन्देहो महानसादिः पर्व- तादिति । तस्यापनोदो व्यवच्छेदस्तदर्थ गम्यमानस्यापि सा- शिष्टपर्वतः । १ व्याप्तौ धर्मिणः साध्यत्वे । २ व्यायघटनानहि यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्निमान्पर्वत इति व्याप्तिः शक्या कर्तुं प्रत्यक्षादिना विरोधादनुमानासंभवादिति व्याप्तौ साध्यविशिष्टधर्मिणः साध्यकरणेन हेतोरन्वयासिद्धेः । ३ साध्यसाधनभावासंभवात् । ४ वौद्धः प्राह । ५. पक्षस्य हेतुसामर्थ्यलब्धत्वात्तद्वचनमयुक्तं । ततः केवलहेतुरेव • हि वाच्य. स्तथा चोक्तम् , तद्भावहेतुभावौ हि दृष्टान्ते तदवेदिनः । ख्याप्यते विदुपां वाच्यो हेतुरेव हि केवलः । १। ६ पक्षस्य । ७ साधनसामर्थ्य । , ८ त्रैरू- प्यालिंगदर्शनेनार्थीपातत्वात् । ९ पक्षस्य सामर्थ्यलव्यत्वेऽपि । मिवचने। ११.पक्षः। १२ साध्यधर्माधारसंदेहस्य । १३.साध्यसाधन- १०. धु- M प्रमेयरत्नमालासहितम् । १२ म ध्यसाधनयोाप्यव्यापकभावप्रदर्शनान्यथानुपपत्तेस्तदाधार- स्य गम्यमानस्यापि पक्षस्य वचनं प्रयोगः । अत्रोदाहरणमाह-- साध्यधर्मिणि साधनधर्मावबोधनाय पक्षधमोपसंहारवत् ॥ ३५ ॥ साध्येन विशिष्टो धर्मी पर्वतादिस्तत्र साधनधर्माववोधनाय पक्षधर्मोपसंहारवत् पक्षधर्मस्य हेतोरुपसंहार उपनयस्तद्वदिति अयमर्थः-साध्यव्याप्तसोधनप्रदर्शनेन तदाधारावगतावपि नि-- यतधर्मिसम्बन्धिताप्रदर्शनार्थ यथोपनयस्तथा साध्यस्य विशि. टर्मिसम्बन्धिताववोधनाय पक्षवचनमपीति। किञ्च हेतुप्रयोगेश पि समर्थनमवश्यं वक्तव्यम् , असमर्थितस्य" हेतुत्वायोगात् । तथा च समर्थनोपन्यासादेव हेतोः सामर्थ्यसिद्धत्वाद्धेतुप्रयो- गोऽनकः स्यात् । हेतुप्रयोगाभावे कस्य समर्थनमिति चेत्- पक्षप्रयोगाभावे व हेतुर्वर्ततामिति समानमेतत् । तस्मात्कार्य- स्वभावार्नुपलम्भभेदेन पक्षधर्मत्वादिभेदेन च त्रिधा हेतुमुक्त्वा समर्थयमानेन पक्षप्रयोगोऽप्यभ्युपगन्तव्य. एवेति अमुमे- . - mm सामर्थ्याज्ज्ञायमानस्यापि । १ धूमवांश्चायमिति । २ प्रतिपादनाय । ४ हेतोरुपसहार उपनयः। साधनरूपस्य न तु साध्यरूपस्य । ५ साध्या- धारपक्षावगतेऽपि । ६ समर्थनं हि हेतोरतरंग- भवति । ७ असिद्धत्वा. दिपरिहारलक्षणं समर्थनम् । ८ तथापि हेतुप्रयोगवचने पुनरुक्तता स्या दादापन्नस्यापि पुर्नवचनं पुनरुक्तमिति । ९, वौद्धमते हेतुस्त्रिधा। १० पक्षसपक्षसत्वविपक्षाव्यावृत्तिरूपानयो हेतवो द्वितीयप्रकारेण । ११ वौद्धेन ।
7 १०० । “परीक्षामुखम् । वार्थमाह- को वा त्रिधा हेतुमुक्त्वा समर्थयमानो न पक्षयति ॥३६॥ को वा वादी प्रतिवादी चेत्यर्थः । किलाथै वो शब्द ।युक्त्या पक्षप्रयोगस्यावश्यंभावे का किल न पक्षयति? पक्षन करोत्यपि तुकरोत्येव । किं कृत्वा हेतुमुक्त्वैव । न पुनरनुक्त्वेत्यर्थः । सम- र्थनं हि हेतोरसिद्धत्वादिदोषपरिहारेण स्वसाध्यसाधनसाम. र्थ्यप्ररूपणप्रवणं वचनम् । तच्च हेतुप्रयोगोत्तरकालं परेणाङ्गी कृतमित्युक्त्वेति वचनम् । ननु भवतु पक्षप्रयोगस्तथापि पक्षहे- तुदृष्टान्तभेदेन व्यवयवमनुमानमिति साख्यः । प्रतिज्ञाहेतूदाहर णोपनयभेदेन चतुरवयवमिति मीमांसकः । प्रतिज्ञाहेतूदाहरणो पनयनिगमनभेदात्पञ्चावयवमिति यौगः । तन्मतमपाकुर्वन्स्वम- तसिद्धमवयवयमेवोपदर्शयन्नाह- एतद्वयमेवानुमानाङ्गं नोदाहरणमिति ॥ ३७ ॥ एतयोः पक्षहेत्वोयमेव नातिरिक्तमित्यर्थः । एवकारेणै- वोदाहरणादिव्यवच्छेदे सिद्धेऽपि परमतनिरासार्थ पुनोंदा. १ लौकिकः परीक्षको वा। २ निश्चयार्थे । ३ वौद्धः खलु हेतोः समर्थ नमंगीक्रियते तत्तु पक्षप्रयोगाभावे न संभवति तस्यासिद्धादिदोषपरिहाररूपत्वाद. सिद्धादिदोषपरिहारस्तु पक्षप्रयोगे सत्येव सभंवति नासतीत्युक्त्या । ४ स्वे. न हेतुना साध्यं तस्य साधनं कारणं तस्य सामर्थ्य समर्थनापन्याससामर्थ्य तस्य प्ररुपणं तत्र प्रवणवचनम् । ५ एकद्वित्रिचतुःपचावयवं लैझिकं विदुः । सौगतार्हतद्विसौख्यभाट्योगाः यथाक्रमम् ६ पक्षहेतुद्वयमेव । । १ ।।
प्रमेयरत्नमालासहितम् । १०१ - - हरणमित्युक्तम् । तद्धि किं साध्यप्रतिपत्त्यर्थमुतस्वैिधेतोरवि- नाभावनियमार्थमाहोस्विद्याप्तिस्मरणार्थमिति विकल्पान् क्र- मेण दूषयन्नाह- न हि तत्साध्यपतिपत्यङ्गं तत्र यथोक्तहेतोरेव व्यापारात् ॥ ३८॥ तदुदाहरणं साध्यप्रतिपत्तेरङ्गं कारण नेति सम्बन्धः । तत्र साध्यप्रतिपत्तौ यथोक्तस्थ साध्याविनाभावित्वेन निश्चितस्य 'हेतोापारादिति । द्वितीयविकल्पं शोधयन्नाह- तेदविनाभावनिश्चयार्थ विपक्षे बाधैकादेव तसिद्धेः ॥ ३९ ॥ तदिति वर्तते । नेति च । तेनायमर्थः तदुदाहरणं तेन सा- ध्येनाविनाभावनिश्चयार्थ वा न भवतीति । विपक्षे वाधकादेव तत्सिदुधेरविनाभावनिश्चयसिद्धः। किञ्च व्यक्तिरूपं निर्देशन तत्कथं साकल्येन व्याप्तिं गमयेत् । व्यक्त्यन्तरेषु व्याप्त्यर्थ पु- नरुदाहरणान्तरं मृग्यम् । तस्यापि व्यक्तिरूपत्वेन सामान्येन १ तदुदाहरणमागत्य किं करोति । २ परिज्ञानार्थम् । ३ अथवा । त्यन्तराभावात्। ५ उदाहरणम् । ६ साध्यपरिज्ञाने ।७ साध्याविनाभा. वित्वेन निश्चितस्य। ८ हेतोरावनाभावनियमार्थ वेति । ९ 'साध्याविनाभाव । १० एतदर्थं वा नेति, वाशब्दः ' ११ वहयभाववति । महाहदे धूमत्वस्य हेतोवधिकसद्भावादेव । १२ दूपणानन्तरम् । १३. विशेपरूपम् । १४. उदाहरणम् । १५ सर्वदेशकालोपसंहारेण । १६ सामान्यरूपाम् । 4 १०२ ४. परीक्षामुखम् । व्याप्तेरवधारयितुमशक्यत्त्वादपरापरतदन्तरापेक्षायामनवस्था स्यात् । एतदेवाह-- व्यक्तिरूपं च निदर्शनं सामान्येन तु व्याप्तिम्तत्रापि- तद्विप्रतिपत्तावनवस्थानं स्यात् दृष्टान्तान्तरापेक्षणात् ४०॥ तत्रापि उदाहरणेऽपि तद्विप्रतिपत्तौ सामान्यव्याप्ति- विप्रतिपत्तावित्यर्थः । शेषं व्याख्यातम् । तृतीयविकल्पे दूषणमाह-- नापि व्याप्तिस्मरणार्थ तथाविधहेतुप्रयोगादेव तत्स्मृतेः४१॥ गृहीतसम्वन्धस्य हेतुप्रदर्शनेनैव व्याप्तिसिद्धिरगृहीतसम्ब- न्धस्य दृष्टान्तशतेनापि न तस्मरणमनुभूतविषयत्त्वात्स्मरण- स्येति भावः। तदेवमुदाहरणप्रयोगस्य साध्याथं प्रति नोपयो- गित्वं प्रत्युत संशयहेतुत्वमेवेति दर्शयति-- तत्परमभिधीयमानं साध्यधर्मिणिसाध्यसाधने. सन्देहयति४२ तदुदाहरणं पर केवलमभिधीयमानं साध्यधर्मिणि साध्य- . . - त्वेन । १ व्याप्तिसंदेहापनोदाय यादाहरणं मृग्यं तदा तत्रापि सामान्येन व्याप्तिसंदे- हापनोदायोदाहरणान्तरेण भवितव्यमित्येवमनवस्था स्यात् । २ विशेषाधार- ३ उदाहरणेऽपि ।- ४ व्याप्ति । ५ साध्याविनाभवित्वेन । ६ व्याप्ति । ७ पुरुपस्य। .८ दृष्टान्तस्तु व्याप्तिं स्मरतीति सांख्या- सिमतं दूपयति । ९ महानसे केवलं धूमाग्निसम्बन्धं जानाति परन्त्वनिय. तल्या या व्याप्तिर्यत्र धूमस्तत्र वहिरिति न जानाति तस्य । १० व्याप्ति.
प्रमेयरतमालासहितम्। १०३ विशिष्टे धर्मिणि साध्यसाधने सन्देहयति सन्देहवती करोति । दृष्टान्तधर्मिणि साध्यव्याप्तसाधनोपदर्शनेऽपिसाध्यधर्मिणि तन्निर्णयस्य कर्तुमशक्यत्वादिति शेषः। अमुमेवार्थ व्यतिरेक- मुखेन समर्थयमानः प्राह- -- ... कुतोऽन्यथोपनयनिगमने ॥ ४३ ॥ . अन्यथा संशयहेतुत्वाभावे कस्माद्धेतोरुपनयनिगमने प्र. युज्यते । अपरः प्राह-उपनयनिगमनपोरप्यनुमानाङ्गत्वमेव, त- दप्रयोगे निरवकरसाध्यसंवित्तरयोगादिति । तनिषेधार्थमाह-- न च ते तदङ्गे । साध्यधर्मिणि हेतुसाध्य- योर्वचनादेवासंशयात् ॥ ४४ ॥ ते उपनयनिगमने ऽपि वक्ष्यमाणलक्षणे तस्यानुमानस्याङ्के न भवतः ।. साध्यधर्मिणि हेतुसाध्ययोर्वचनादेवेत्येवकारेण दृष्टान्तादिकमन्तरेणेत्यर्थः । किञ्चाभिधायापि “ दृष्टान्तादिकं समर्थनमवश्यं वक्तव्यमसमर्थितस्याहेतुत्वादिति तदेव वरं १० स्मरण । १ हेतुप्रयोगादेव यदि साध्यसाधने संदेहो न भवेत्तर्हि तथा चाय तस्मात्तयेत्युपनयनिगमने किमर्थे... २ महानसादौ.!, ३ पर्वतादौ । साध्यव्याप्तसाधननिर्णयस्य । ५ उदाहरणं हि यदि साध्यविशिष्टधर्मिणि साध्यसाधने न सन्देहयति चेत् । ६ उदाहरणस्य । ७ कारणात् । प्राह । ९ नि:संशय। १० संशयो न भविष्यति । ११ आदिपदेनोप- नयनिगमने। १२ विपक्षे वाधकप्रमाणदर्शनमेव समर्थनमिति । १३ स- ८ चौगः F , १०४ '. 'परीक्षामुखम् । 1 - हेतुरूपमनुमानावयवो वाऽस्तु. साध्यसिद्धौ तस्यैवोपयोगा- नोदाहरणादिकमेतदेवाह- समर्थनं वा वरं हेतुरूपमैनुमानावयचो वाऽस्तु साध्ये तदुपयोगात् ॥ ४५ ॥ प्रथमो वाशब्द एवंकारार्थे । द्वितीयस्तु पक्षान्तरसूचने। शेषं सुगमम् । ननु दृष्टान्तादिकमन्तरेण मन्दधियामवयोध यितुमशक्यत्वात्कथं पक्षहेतुप्रयोगमात्रेण तेषां साध्यप्रतिपत्ति- रिति तत्राहा--' ; . बालव्युत्पत्यर्थं तत्रयोपगमे शास्त्र एवासौ न वादेऽनुपयोगादिति ॥ ४६ ॥ बालानामल्पप्रज्ञानां . व्युत्पत्यर्थः । तेषामुदाहरणादीनां त्रयोपगमे शास्त्र एवासौ-तत्रयोपगमो न वादे, नहि वादकाले शिष्या व्युत्पाद्याः, व्युत्पन्नानामेव तंत्राधिकारादिति । बाल- व्युत्पत्त्यर्थः तत्रयोपगम इत्यादिना शास्त्रेऽभ्युपंगतमेवोदाह- रणादित्रयमुपदर्शयति- दृष्टान्तो द्वेधा । अन्वयव्यतिरेकभेदादिति ।। ४७ ।। मर्थनमेव । १ समर्थनस्य हेतुरूपस्य वा । २ समर्थनमेव न पक्षध- मत्वादि। ३ हेतुलक्षण कीदृशं ? दृष्टान्तोपनयनिगमनलक्षणत्रिरूपत्वप्रदर्श- नस्वरूपम् । ४ आदिपदेनोपनयनिगमनग्रहणम् । ५ दृष्टान्तोपनयनि- गमनाभावे मात्रग्रहणम् । ६ दृष्टान्तोपनयनिगमनत्रयाभ्युपगमे। , ७ वादे ।
प्रमेयरतमालासहितम् । १०६ दृष्टावन्तौ साध्यसाधनलक्षणी धर्मावन्वयमुखेन व्यतिरेक- द्वारेण वा यत्र स दृष्टान्त इत्यन्वर्थसज्ञाकरणात् । स द्वेधैर वोपपद्यते । तत्रान्वयदृष्टान्तं दर्शयन्नाह- साध्यव्याप्तं साधनं यत्र प्रदर्यते सोऽन्वयदृष्टान्तः॥४८॥ साध्येनं व्याप्त नियंत साधनं हेतुर्यत्र दर्श्यते व्याप्तिपूर्वक. तयेति भावः द्वितीयभेदमुपदर्शयति-- साध्याभावे साधनाभावो यत्र कथ्यते सव्यतिरेकदृष्टान्तः४९ असत्यसद्भावो व्यतिरेकः। तत्प्रधानो दृष्टान्तो व्यतिरे. कदृष्टान्तः। साध्याभावे साधनस्याभाव एवेति सावधारणं द्रष्टव्यम् । क्रमप्राप्तमुपनयस्वरूपं निरूपयति- हेतोरुपसंहार उपनयनः ॥ ५० ॥ पक्षे इत्यध्याहारः तेनायमर्थः-हेतोः पक्षधर्मतयोपसंहार १ अन्तःपदार्थसामर्थ्यधर्मसत्यव्यतीतिष्विति. धनञ्जयः । २ वस्तुनि । ३ सामान्यतः स्वरूपं दृष्टान्तेनोक्तं विशेषतस्तु तत्स्वरूपं साध्यव्याप्तिमित्या- दिना दर्शयति । ४ यथाग्नौ साध्ये महानसादिः । ५ जन्यजनकादिभावे- ६ अविनाभावित्वेन निश्चितम् । ७ धूमजलयोाप्तिः ‘स्यादिति शङ्कां परिहरति, न धूमजलयोव्याप्तिस्तत्र जन्यजनकत्वाभावाद्यो यज्जन्यस्तेन तस्य व्याप्तिरिति नियमात् । ८ भावः - पदार्थचेष्टात्मसत्ताभिप्रायजन्मसु । ९ यथाग्नी साध्ये महाहदादिः। १० साध्याभावे। १२ मध्यमपदलोपी समासः। १३ सामान्यनियमं सावधारणम् । ध्याविनाभावत्वेन विशिष्टे साध्यधर्मिण्युपनीयते पुनरुच्चार्यते हेतुर्येन स उप. ११ साधनाभावः। १४. सा- '-, " परीक्षामुखम् : " . उपनय इति । निगमनस्वरूपमुपदर्शयति-- प्रतिज्ञायास्तु निगमनमितिः॥ ५१ ॥ उपसंहार इति वर्त्तते । प्रतिज्ञाया उपसंहारः साध्यधर्म- विशिष्टत्वेन प्रदर्शनं निगमनमित्यर्थः । ननु शास्त्रे दृष्टान्तादयो वक्तव्या एवेति. नियमानभ्युपगमात्कथं तत्रयमिह. सूरिभिः प्रपञ्चितमिति न.चोद्यम् । स्वयमनभ्युपगमेऽपि प्रतिपाद्यानु रोधेन जिनमतानुसारिभिः प्रयोगपरिपाट्याः प्रतिपन्नत्वात् । सा. चाज्ञांततत्स्वरूपैः कर्तुं न शक्यत इति तस्वरूपमपि शास्त्रेऽभिधातव्यमेवेति । तदेवं मतभेदेन द्वित्रिचतुःपञ्चावयव. रूपमनुमानं द्विप्रकारमेवेति दर्शयन्नाह--.. तदनुमानं द्वेधा ॥ ५२॥ .. तद्वैविध्यमेवाह- स्वार्थपरार्थभेदादिति ॥ ५३ ।। . स्वपरविप्रतिपत्तिनिरासफ़लत्वाद्विविधमेवेति भावः । १ प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयाः साध्यलक्षणेकार्थतया निगम्यन्ते सम्बन्ध्यन्ते येन तन्निगमनमिति । २ सांख्यादयः प्राहुः । ३ यदा शिष्यो व्युत्पन्नो भवति तदा दृष्टान्तादिभिः प्रयोजनाभावाद्यदात्वव्युत्पन्नो भवति तदा शास्त्रे । तेभ्य उपेदशादिति । ४ दृष्टान्तोपनयनिगमन- त्रयमिति । ५ शिष्यानुरोधेन । ६ अन्यथानुपपत्त्येकलक्षणं लिङ्गमभ्य- प्रयोगपरिपाटी तु प्रतिपाद्यानुरोधतः ॥ १ ॥ ७ अङ्गीका- ८'प्रयोगपरिपाटी। ९ पुरुषः । १० अनुमानस्वरूपमपि । 4 नयः । - पत्। रत्वात् ।
प्रमेयरत्नमालासहितम् । १०७ - स्वार्थानुमानभेदं दर्शयन्नाह-- स्वार्थमुक्तलक्षणम् ।। ५४ ॥ 3 साधनात्साध्यविज्ञानमनुमानमिति प्रागुक्तं लक्षणं यस्य तत्तथोक्तमित्यर्थः। द्वितीयमनुमानभेदं दर्शयन्नाह- परार्थ तु तदर्थपरामर्शिवचनाज्जातमिति ॥ ५५ ॥ तस्य स्वार्थानुमानस्यार्थः साध्यसाधनलक्षणः । तं परामृ- शशीत्येवं शीलं तदर्थपरामर्शि। तच्च तद्वचनं च तस्माजी तमुत्पन्न विज्ञानं परार्थानुमानमिति । ननु वचनात्मकं परा- र्थानुमान प्रसिद्धं, तत्कथं तदर्थप्रतिपादकवचनजनितविज्ञा. नस्य परार्थानुमानत्वमभिदधता न संग्रहीतमिति न वाच्यम् । अचेतनस्य साक्षात्प्रेमितिहेतुत्वाभावेन निरुपचंरितप्रमाणभा- वाभावात् । मुख्यानुमानहेतुत्वेन तस्योपचरितानुमानव्यप- A १ साधनात्साध्यविज्ञानमनुमानमित्यनुमानसामान्यलक्षणस्य परार्थानुमानेऽपि सद्भावात्स्वार्थपरार्थानुमानयोः को भेद इति शङ्कायामाह । २ धूमावह्निविज्ञान- मनुमानमित्यर्थपरामर्शि यद्ववचनं तस्माद्वचनरूपसाधनात् । (परोपदेशात् ) यद्भूमावहिविज्ञानं जायते तत्परार्थानुमानं; वचनमन्तरेण यद्भूमादिसाधनादग्न्या- विसाध्यविज्ञान भवति तत्स्वार्थानुमानमित्यनयोर्भेदः। ३ द्योतयति विषयीकरोति। ४ पर्वतोऽयं वह्निमान्धूमवत्वादिति वचनश्रवणादेव पूर्व धूमज्ञानं पश्चात्ततो वह्नि विज्ञानमित्याभप्रायः। ५ नैयायिकः प्राह ।। ६ पञ्चावयवरूपम् । ७ जै- ९ अज्ञाननिवृत्ति । १० मुख्या पानुमानस्य । . १२ वचनस्य । १३ यथा विपयोधर्मस्य विषय उपचारात्प. नेन। ८वचनस्य। ११ज्ञानरू- - १०८ परीक्षामुखम् । - देशो न वार्यत एव । तदेवोपचरितं परार्थानुमानत्वं तद्वचन: स्याचार्यः प्राह तद्वचनमपि तद्धेतुत्वादिति ॥ ५६ ॥ उपचारो हि मुख्याभावे लति प्रयोजने निमित्ते च प्रवर्तते। तत्र'वचनस्य परार्थानुमानत्वे निमित्तं तद्धेतुत्वम् । तस्य प्रतिपाद्यानुमानस्य हेतुस्तद्धेतुस्तर तस्य भावस्तत्त्वम् । तस्मा. निमित्तात्तद्वचनमपि परार्थानुमानप्रतिपादकवचनमपि परा. नुमानमिति सम्बन्धः। कारणे कार्यस्योपचारात् । अथवा तत्प्रतिपादकानुमानं हेतुर्यस्य तत्तद्धतुस्तस्य भावस्तत्वं तत- स्तद्वचनमपि तथेति सम्बन्धः । अस्मिन्पक्षे कार्य कारणस्यो. पकवचनस्य । दार्थस्यापि प्रत्यक्षता, कार्यस्य कारण उपचारादिन्द्रियस्यापि प्रत्यक्षता, यद्वा इन्द्रियार्थसम्बन्धस्यापि प्रत्यक्ष उपचारित्वं तथा वचनस्याप्युपचारनिमित्तं प्र. तिपादकप्रतिपायापेक्षयानुमानकार्यकरणत्वमिति । १ परार्थनुमानप्रतिपा- २ विज्ञानलक्षणपरार्थानुमानवचनमपि पदार्थानुमानं त- हेतुत्वात् । ३ वचने ,ज्ञानलक्षणमुख्यानुमानस्याभाव इति मुख्यार्थवाधः। ४ वचनस्यानुमानत्वे प्रयोजनमनुमानावयवाः प्रतिज्ञादय इति शास्त्रे व्यवहार एव । ५. वचनं ज्ञानस्य. निमित्तमिति । ६ परार्थानुमानस्य । ७ प्रति- पादकत्वाद्वचनं हेतुः । ८ वचनात्मके कारणे कार्यस्य विज्ञानलक्षणस्यो. पचारात् ।। .९ प्रकारान्तरेणाह। १०.स्वार्थानुमानम् ।। ११ वचनस्य। १२स्वार्थानुमानज्ञानस्यार्थपरामर्शि वचनमपि। १३.स्वार्थानुमानमिति सम्बन्धः, कार्य कारणस्योपचारात् । १४ स्वार्थानुमानवचनलक्षणे कार्य । १५ स्वार्थी- ४ -- .
प्रमेयरत्नमालासहितम् । '१०९ पचार इति शेषः। वचनस्यानुमानत्वे च प्रयोजनमनुमाना• वयवाः प्रतिज्ञादय इति शास्त्रे व्यवहार एव । ज्ञानात्मन्ये नशे तद्वयवहारस्थाशक्यकल्पनत्वात् । तदेवं साधनात् सा ध्यविज्ञानमनुमानमित्यनुमानसामान्यलक्षणम् । तदनुमान द्वेधेत्यादिना तत्प्रकारं च सप्रपञ्चमभिधाय साधनमुक्तलक्षणा- येक्षयैकमप्यतिसंक्षेपेण भिद्यमानं द्विविमित्युपदर्शयति-- सं हेतुधोपलब्ध्यनुपलब्धिभेदांदिति ॥ ५७ ॥ . सुगममेतत् । तत्रोपलब्धिर्विधिसाधिकैव । अनुपलब्धिः प्रतिषेधसाधिकैवेति परस्य नियमं विघटयन्नुपलब्धेरनुपल. ब्धेश्चाविशेषण विधिप्रतिषेधसाधनस्वमाह--, उपलब्धिर्विधिप्रतिषेधयोरनुपलब्धिश्चेति ॥ ५८ ।। गतार्थमेतत् । इदानीमुपलब्धेरपि संक्षेपेण विरुद्धाविरुद्ध- नुमानविज्ञानलक्षणस्य कारणस्योपचारः । १ ज्ञानस्य प्रतिज्ञाद्यवयवा भवन्विति शङ्कायामाह । २ अनुमाने । '३ निरवयवे। ४ प्रतिज्ञादि. व्यवहारस्य। ५ अनुमानभेदम् । ६ अन्यथानुपपन्नत्वलक्षणापेक्षया.। ७ योऽविनाभावलक्षणलक्षितः प्राक्प्रतिपादितः सः। ८ प्राप्तिः। १० निषेधः। ११ उपलब्धिर्विधिं साधयति प्रतिषेध च, तथानु पलब्धिनिपेध साधयति विधि च तस्मादुभयोरपि विधिप्रतिषेधत्वं वर्तत इति । १२ अविनाभावनिमित्तो हि साध्यसाधनयोर्गम्यगमकभावः । यथा चोपलव्धेर्विधौ साध्येऽविनाभावाद्गमकत्वं तथोपलव्धेः प्रतिषेधेऽपि साध्येऽवि. नाभावाद्गमकत्वम् । अनुपलब्धेश्च यथा प्रतिषेधे साध्येऽविनाभावादमकत्वं V ९ सत्वं । दर्शयति ।
- ११० परीक्षामुखम् । १ भेदाद्वैविध्यमुपदर्शयन्नविरुद्धोपलल्धेर्विधौः. साध्ये विस्तरतो भेदमाह- अविरुद्धोपलब्धिविधौ पोढा व्याप्यकार्यकारण. पूर्वोत्तरसहचरभेदादिति ॥ ५९ ॥ पूर्व च उत्तरं च सह चेति द्वन्द्वः । पूर्वोत्तरसह इत्येते. भ्यश्चर इत्यनुकरणनिर्देशः, द्वन्द्वात् श्रूयमाणश्चरशब्दः प्रत्येकम- मिसम्बध्यते । तेनायमर्थः पूर्वचरोत्तरचरसहचरा इति । पश्चा. याप्यादिभिः सह द्वन्द्वः । अत्राह सौगतः-विधिलाधनं द्विवि- धमेव । स्वभावकार्यभेदात् । कारणस्य तु कार्याविनाभावा. भावादलिङ्गत्त्वम् । नावश्यं कारणानि कोर्यवन्ति भवन्तीति व. चनात् । अप्रतिवद्धसामर्थ्यस्य कार्यम्प्रति गमकत्वमित्यपि नोत्तरम् । सामर्थ्यस्यातीन्द्रियतया विद्यमानस्यापि निश्चेतु. मशक्यत्त्वादिति । तदैसमीक्षिताभिधानमिति दर्शयितुमाह-- रसादेकसामग्यनुमानेन रूपानुमानमिच्छद्भिरिष्टमेव in साध्ये । तथानुपलब्धेर्विधावपि साध्येऽविनाभावाद्गमकत्वमिति । १ अस्तित्वे । २ पश्चानिर्देशः । ३ विधिसाधनहेतुः । ४ वृक्षत्वाशिं. शपात्वयोः । ५ धूमाग्न्योः। ६ असाधनत्वम् । ७ दण्डादीनि । ८ मणिमन्त्रादिनाऽप्रतिहतसामर्थ्यस्य । ९ अप्रत्यक्षतया । १० पूर्वोक्तम् । ११ अन्धकारावगुहिते प्रदेशे आस्वाद्यमानो रस: स्वसमानसमयकारणकार्यो भवत्येवंविधरसत्वात्सम्प्रतिपन्नरसवदिति । आस्वाद्यमानो रसः स्वसमान- कालीनपूर्वरूपक्षणसहवान् 'समनन्तरक्षणजन्यकार्यक्षणत्वादनुभूयमानरस.
प्रमेयरनमालासहितम् । १९१ १ किञ्चित्कारणं हेतुर्यत्रं 'सामर्थ्याप्रतिवन्धकारणान्तरा-- कल्ये ।। ६० ॥ आस्वाद्यमानाद्धि रसात्तनिको सामग्न्यमीयते । ततो रूपानुमानं भवति । प्राक्तनो हि रूपक्षणः सजातीयं रूपक्षणा. न्तरलक्षणं कार्य कूर्वन्नेव विजातीयं रसलक्षणं कार्य करोतीति रूपानुमानमिच्छद्भिरिष्टमेव किञ्चित्कारणं हेतुः, प्राक्तनस्य रूपक्षणस्य सजातीयरूपक्षणान्तराव्यभिचारात् । अन्यथा रससमानकालरूपप्रतिपत्तेरयोगात् । नह्यनुकूलमात्रमन्त्यक्षण- प्राप्त वा कारणं लिङ्गमिष्यते । येन मणिमन्त्रादिना सामर्थ्य- क्षणवदिति । १२ मातुलिङ्गे रससमानकालीन रूपमस्त्येकसामग्र्यधीनत्वा- सम्प्रतिपन्नरसवदिति। १३ सौगतैः ।। १ विशिष्ट, नानुकूलादिरूपम् । २ कारणे । ३ मन्त्रौषधादिना प्रतिबन्धः । ४ पूर्वक्षणं उत्तरक्षणस्य कारणमन्त्यक्षणो यदान्यक्षणोत्पादको न भवति तदा वैकल्य पूर्वक्षणापेक्ष. यान्त्यक्षणः कारणान्तरं तदेव' यदा विकलमिति । सहकारिणां क्षित्यादीनां वैकल्यमित्यर्थः । ५ पूर्वरूपक्षणः सजातीयोत्तररूपक्षणं : जनयन्नेव विजा- तीयोत्तररसक्षणं जनयति कारणक्षणत्वादनुभूतरसक्षणवदिति । रति चेत् । ७.रूपरसयो , समानकालीनप्रतिपत्तेरयोगात् । मतमनूद्य जैनः कथयति । :-९ - दण्डादि । :, १० मात्रग्रहणेन कार्येण सह .कारणस्याविनाभावनिराकरणत्वमिति ।, ११. कार्याव्यवहितपूर्वक्षणप्राप्त तन्तुसंयोगरूपमिति । १२ यथा- प्रदीपे ..क्षणाः वहवो जायन्ते विनश्यन्ति च..तथापि प्रदीपस्य... विनाशकाले योऽसावन्त्यक्षण इति । ६ व्यभिच- ८ बौद्ध F- ११२ परिक्षामुखम् । प्रतिबन्धात्कारणांन्तरवैकल्येन वा कार्यव्यभिचारित्त्वं स्यात् द्वितीयक्षणे कार्यप्रत्यक्षीकरणेनाऽनुमानानर्थक्यं वा । कार्या- विनाभावितया निश्चितस्य विशिष्टकारणस्य छत्रादेलिङ्गत्वे. नाङ्गीकरणात् , यत्र सामर्थ्याप्रतिबन्धः कारणान्तरावैकल्यं निश्चीयते तस्यैव लिङ्गत्वं नान्यस्येति नोक्तदोषप्रसङ्गः । इदानीं पूर्वोत्तरचरयोः स्वभावकार्यकारणेवनन्तर्भावाभेदान्तरत्त्व- मेवेति दर्शय त- न च पूर्वोत्तरचारिणोस्तादात्म्यं तदुत्पत्तिा कालव्यवधाने तदनुपलब्धेरिति ॥ ६१ ॥ तादात्म्यसम्बन्धे साध्यसाधनयोः स्वभावहेतावन्तर्भावः, १ यथा वाजं कारणान्तरक्षितिपवनसलिलातपयोगरहितमंकुर न प्ररोहति । २ तदेव नाङ्गीक्रियतेऽत उक्तदूषणं न ३ वौद्धमतमनूद्य दूषयति, बौद्धेन त्वयानुमानभङ्गात्कारणस्य लिङ्गत्वं नाझीक्रियतेऽस्ति चाङ्गीकारस्त्व- न्मतेऽनुमानस्य च नास्ति वैयर्थ्यमिति । ४ आदिपदेन चन्द्रवृद्धः । ५ साध्यसाधनयोः । पूर्वोत्तरकालवर्तिनोरिति पाठान्तरमिति । त्साधनमात्मा यस्य साध्यस्यासौ तदात्मा तस्य भावस्तादात्म्यमिति । ७ तस्मात्कारणादुत्पत्तिर्यस्य कार्यस्यासौ तदुत्पत्तिः । ८ तादात्म्यत. दुत्पत्योः । ९ तादात्म्यतदुत्पत्ती कृत्तिकोदयशकटोदययोर्न शकटोदयकालेऽनन्तरं वा कृत्तिकोदयानुपलब्धेर्यद्यत्कालेऽनन्तरं वा नास्ति न तस्य तेन तादात्म्यं तदुत्पत्तिा, यथा भविष्यच्छट्सचक्रवर्तिकाले रावणा- देस्तादात्म्यतदुत्यसतः। नास्ति च शकटोदयकालेऽनन्तरं वा कृतिकोदया- भवतः प्रमेयरनमालासहितम्। ११३ तदुत्पत्तिसम्बन्धे. च कार्ये कारणे. वान्तर्भाधो, विभाव्यते । न च तदुभयसम्भवः कालव्यवधाने तदनुपलब्धेः । सहभा- विनोरेव तादात्म्यसम्भवादनन्तरयोरेव पूर्वोत्तरक्षणयोर्हेतु- फलभावस्य दृष्टत्त्वात् , व्यवहितयोस्तैदघटनात् ननु कालव्यवधानेऽपि कार्यकारणभावो दृश्यत एव । यथा जाग्रत्प्रेवुद्धदीभाविप्रबोधयोर्मरणारिष्टयोर्वेति । तत्परिहा रार्थमाह-- भाव्यतीतयोमरणजाग्रद्धोधयोरपि नारि- ष्टोद्बोधौ प्रति हेतुत्वम् ।। ६२ ॥ सुगममेतत् । अत्रैवोपपत्तिमाह-: तयापाराश्रितं हि तद्भावभावित्वम् ।। ६३ ॥ दिकं तस्मात्तयोस्तादात्म्यतदुत्पत्ती न स्तः- । १ अव्यवहितयोः । २ कारणकार्यभावस्य । तादात्म्यकारणकार्यभावयोरघटनात् । ४ वौद्धः प्राह । ५ निशि जायदवस्थायां . किमपि कार्य विचरितं तत्कारणं, पश्चात्प्रभाते प्रबुद्धावस्थायां तत्कार्य करोतीति कालव्यवधानेऽपि कारणकार्यभावः दृश्यते । पूर्व जानदवस्थायां ज्ञानं तदेव प्रबुद्धावस्थानन्तर- ज्ञानस्य कारणमिति भावः । स्वप्नात्पूर्वावस्था जाग्रदवस्था, स्वप्नात्पश्चादवस्था प्रबुद्धावस्था । ७ मरणात्पूर्वमरिष्टं भवति तत्र मरेणं कारणं तस्मादरिष्टकार्यमत्रापि तथा । ८ व्यवहितयोः कार्यकारणभाव- दर्शनस्य । . ९ भावीमरणस्यातीतजाग्रदवस्थाबोधस्य च । प्रवुद्धावस्थाज्ञान, च प्रति ..न . कारणत्वम्, । , ११ कारण + سر . । ६अवस्था। + - परीक्षामुखम् । -- ; . हिशब्दो परमादर्थे । यस्मात्तस्य कारणस्य भावे कार्यस्य भावित्वं तद्भावभावित्वं तच्च तद्यापाराश्रितं तस्मान प्रकृतयोः कार्यकारणभाव इत्यर्थः । अयमर्थः--अन्वयव्यति- रेकसमधिगम्यो हि सर्वत्र कार्यकारणभावः । तौ च कार्यम्प्रति कारणव्यापारसव्यपेक्षावेवोपपद्यते कुलालस्येच कलशम्प्रति । न चातिव्यवहितेषु तयापाराश्रितत्त्वमिति । सहचरस्याप्यु- क्तहेतुप्वनन्तर्भावं दर्शयति-- सहचारिणोरपि परस्परपरिहारेणा- वस्थानात्सहोत्पादाच ॥ ६४ ।। हेत्वन्तरत्त्वमिति शेषः । अयमभिप्रायः परस्परपरिहारेणो- पलम्भात्तादात्म्यासम्भवात्स्वभावहेतावनन्तर्भावः । सहो- जायते । १ निश्चयेन । २.चीजागुरादौ। ३ घटेते । ४ यथा कुलालस्य कलशं प्रत्यन्व- यव्यतिरेकत्वं वर्तते यतः सति कुलाले कलशस्योत्पतिर्जायतेऽन्यथा न ५ पदार्थेषु । ६ स्वभावकार्यकारणेपु। सह युगपदेक. स्मिन्काले चरतः प्रवर्तेत इत्येवं शीलौ प्रकरणाद्रूपरसौ तयोः । ८ सहभाविनोरेव तादात्म्यमिति नियमाद्रूपरसयोरपि तादात्म्यं ततश्च स्वभावहेतावन्तर्भावः स्यादिति शङ्कापरिहारार्थ परस्परपरिहारेणावस्था. नादित्युक्तं, रूपरसयोर्हि .स्वरूपभेदपरस्परपरिहारेणावस्थानान तादात्म्यं तदभावे न स्वभावहेतावन्तर्भावः । ९ अनन्तरपूर्वोत्तरक्षणभाविकारणकार्ययो- धूमधूमध्वजयोरनन्तर्भावार्थ सहोत्पादादिति पदोपादानमिति । शपावृक्षत्वयोरेककालीनत्वाद्यथा तादात्म्यं न तथा. रूपरसयोर्यतो वृक्षत्वपरिहा- १.शि.. * प्रमेयरत्नमालासहितम् । २१५ त्पादाच्च ने कार्य कारणे वेति । न च समानसमयवर्तिनोः- कार्यकारणभावः सव्येतरगोविषाणवत् । कार्यकारणयोः. प्रतिनियमाभावप्रसङ्गाच्च । तस्माद्धत्वन्तरत्वमेवेति । इदानी. व्याप्यहेतु क्रमप्राप्तमुदाहरन्नुक्तान्वयव्यतिरेकपुरस्सरं प्रति.. पाद्याशयवशात्प्रतिपादितप्रतिज्ञाद्यवयवपञ्चकं प्रदर्शयति-- परिणामी शब्दः कृतत्वात् । ये एवं स एवं दृष्टो यथा घटः, कृतकश्चार्य, तस्मात्परिणामीति, यस्तु न परिणामी स न.. कृतको दृष्टो यथा बन्ध्यास्तनन्धयः, कृतकश्चायं, तस्मात्परिणामीति ।। ६५ ।। स्वोत्पत्तावपेक्षितव्यापारो हि भावः कृतक उच्यते । तच्च कृतकत्वं न कूटस्थनित्यपक्षे नापि क्षणिकपक्षे किन्तु रेण यथा शिंशपात्वस्यानुपलब्धिन तथा रूपरसयोरुपलब्धिर्मिनेन्द्रियग्राह्यत्वा- त्तयोः । रसनेन्द्रियग्राह्यो हि रसो रूप तु चक्षुरिन्द्रियग्राह्यमिति । १ ए- ककालोत्पादात् । २ रूपरसयोः। ३ समसमयभाविनोः सव्येतरगो- विपाणयोनहि कार्यकारणभावत्व विद्यते तथा, रूपरसयोरपि न सम्भवति । ४. सहचारिणोः कारणान्तरत्वमिति । ५ शिष्याभिप्रायवशात् । पूर्वोत्तराकारपरिहारावाप्तिस्थितिलक्षणः परिणामःसोऽस्यास्तीति स परिणामी । पूर्वावस्थामप्यजहन्संस्पृशन्धर्ममुत्तरम् । स्वस्मादप्रच्युतो धर्मी परिणामी स उच्यते ॥१॥ ८ हेतुः। ९ अन्वयव्याप्तिः । १० अन्वय. १२ निगमनम् । १३ व्यतिरेकव्याप्तिः । १४. व्यतिरकदृष्टान्तः। १५ कालव्यापी स कूटस्थ इत्यमरः । एक- ६ ७ पक्षः। दृष्टान्तः। ११ उपनयः। .
परीक्षामुखम् । परिणामित्वे सत्येवेत्यग्रे वध्यते । कार्यहेतमाह-- अस्त्यत्र देहिनि बुद्धिाहारीदेः ।। ६६ ।। कारणहेतुमाह- अस्त्यत्रच्छाँया छत्रात् ।। ६७ ।। अथ पूर्वचरहेतुमाह- उदेष्यति शर्केट कृत्तिकोदयात् ॥ ६८ ॥ मुहूर्तान्ते इति सम्बन्धः । अथोत्तरचर:- उदगारणिः प्राक्तत एव ॥ ६९॥ अत्रापि मुहूर्तात्प्रागिति सम्बन्धनीयं, तत एव कृत्तिकोद- यादेवेत्यर्थः । सहचरलिङ्गमाह- अस्त्यत्र मातुलिङ्गे रूपं रसात् ॥ ७० ॥ स्वभावरूपतया यः कालव्यापी स कूटस्थ इति भावः । १६ प्रतिक्षणविनाशि क्षणिकमिति । २ वचनमादिशब्देन व्यापाराकारविशेपा- दिपरिग्रहः । ३ कारणकारणादेरत्रवान्तर्भावस्तथाहि-महोऽत्रत्यानां कण्ठ- क्षेपविक्षेपकारी धूमवदग्निमत्वात् , कण्ठादिविक्षेपस्य कारणं धूमस्तस्य का- रण वहिरिति । ४ रोहिणी। ५ पूर्वपूर्वचराद्यनेनैव संगृहीतं तथाहि उदेष्याते कृत्तिकाऽश्विन्युदयात् , कृत्तिकायाः पूर्वचरो भरण्युदयस्तत्पूर्वचरोऽ- दिवन्युदय इति । ६ उत्तरोत्तरचराद्यनेनैव संगृहीतं तथाहि-उदगाद्भरणिः शकटोदयात् ,' भरण्युत्तरचरः कृत्तिकोदयस्तदुत्तरचरः शकटोदय इति । ७.साध्यसमकालस्य संयोगिन एकार्थसमवायिनश्चात्रैवान्तभावो भवति ।' संयो गि लिङ्गं यथात्मनोनास्तित्वं विशिष्टशरीरात् , आत्मनः संयुक्तं शरीरं तदात्म' . १आत्मा । है । - . - .
प्रमेयरत्नमालासहितम् । ११७ विरुद्धोपलब्धिमाह- विरुद्धतदुपलब्धिः प्रतिषेधे तथेति ॥ ७१ ॥ प्रतिषेधे साध्ये प्रतिध्येन विरुद्धानां सम्वन्धिनस्ते व्या- प्यादयस्तेषामुपलब्धय इत्यर्थः । तथेति षोढेति भावः । तत्र साध्यविरुद्धव्याप्योपलब्धिमाह- नास्त्यत्र शीतस्पर्श औष्ण्यात् ।। ७२ ।। शीतस्पर्शप्रतिषेध्येन हि विरुद्धोऽग्निस्तद्याप्यमौषण्यमिति।। विरुद्धकार्योपलम्भमाह - नास्त्यत्र शीतस्पर्शो धूमात् ।। ७३ ॥ अत्रापि प्रतिषेध्यस्य साध्यस्य शीतस्पर्शस्य विरुद्धोऽग्नि-- स्तस्यकार्य धूम इति । विरुद्धकारणोपलब्धिमाह- नास्मिन् शरीरािणि सुखमस्ति हृदयशल्यात् ॥ ७४ ॥ सुखविरोधि दुःखं, तस्य कारणं हृदयशल्यमिति । विरुद्ध- पूर्वचरमाह- नोदेष्यति मुहूर्तान्ते शकटं रेवत्युदयात् ।। ७५ ।। शकटोदयविरुद्धो ह्यश्विन्युदयस्तत्पूर्वचरो रेवत्युदय इति। । - नोऽस्तित्वं ज्ञापयति । संयोगिलिङ्गस्य नैयायिकमतानुसरणे तु कार्यहेतावन्तीवं इति । १ प्रतिषेध्येन साध्येन यद्विरुद्धं तत्सम्बन्धिनां तेषां व्याप्यादीनामुप. लब्धिरिति । २ अविरुद्धोपलब्धिवत् पटप्रकारा । ३ आदिशब्देन कार्य- कारणपूर्वोत्तरसहचराः परिगृह्यते । ४ सहभावात्कारणे , हेतौ कार्ये वानन्त- 1 ११८ परीक्षामुखम् । h विरुद्धोत्तरचरं लिङ्गमाह- नोदगाद्भणिर्मुहूर्तात्पूर्व पुष्योदयात् ।। ७६ ।। भरण्युदयविरुद्धो हि पुनर्वसूदयस्तदुत्तरचरः पुप्योदय इति । विरुद्धसहचरमाह- नारत्यत्र भित्तौ परभागाभावोऽर्वाग्भागदर्शनादिति ॥७७।। परभागाभावस्य विरुद्धस्तद्भावस्तत्सहवरोऽर्वाग्माग इति। अविरुद्धांनुपलब्धिभेदमाह- अविरुद्धानुपलब्धिः प्रतिपेधे सप्तधा स्वभावव्यापक- कार्यकारणपूर्वोत्तरसहचरानुपलम्भभेदादिति ॥ ७८ ॥ स्वभावादिपदानां द्वन्द्वः तेपामनुपलम्भ इति पश्चाच्छष्टी. तत्पुरुषसमासः । स्वभावानुलम्भोदाहरणमाह- नास्त्यत्र भूतले घंटोऽनुपलब्धेः ॥ ७९ ॥ अत्र पिशाचपरमावादिभिर्व्यभिचारपरिहारार्थमुपलब्धि- र्भावाव्यतिरिक्तो व्याप्यहेतुरिति । १ अभावस्तु निषेध्यस्तविरुद्धो भावः । २ परभागसंद्धावः। ३ प्रतिपेध्यन साध्येनाविरुद्धस्यानुपलब्धिरिति । पश्चात्तास इति पाठान्तरमिति । ता-इति पष्ठीविभक्तेः सज्ञा जैनेन्द्रे स इति ५ केवलं घटरहितस्वभावभूतलं दृष्ट्वानुमिनोतीति स्वाभावानु- 'पलब्धिः। ६ प्रतिषेध्यस्य घटस्याविरुद्धस्तत्स्वभावस्तस्यानुपलम्भात् । ७ - श्यस्वभावत्वे सत्यनुपलब्धरिति । ८ य उपलब्धिलक्षणप्राप्तत्वे सति नोपलभ्यन्ते त एव निषेध्या न पुनः पिशाचादयस्तेषामुपलब्धिलक्षणप्राप्तित्वायो- गात्तथा सति प्रभाववता योगिना पिशाचादिना वा प्रतिवन्धात् घटादेरनुप- - समासस्य च ।
प्रमेयरत्नमालासंहितम् । लक्षणप्राप्तत्त्वे सतीति विशेषणमुन्नेयम् । व्यापकानुपल ब्धिमाह- नास्त्यत्र शिंशपा वृक्षानुपलब्धेः ।। ८० ।। शिशपात्वं हि वृक्षत्वेन व्याप्तम् । तदभावे तद्याप्यशिंश- पाया अप्यभावः । कार्यानुपलब्धिमाह- नास्त्यत्राप्रतिवद्धसामथ्र्योऽग्निधूमानुपलब्धेः ॥८॥ अप्रतिबद्धसामथ्र्थ हि कार्य प्रत्यनुपहतशक्तिकत्वमुच्यते। तदभावश्च कार्यानुफ्लम्भादिति कारणानुपलब्धिमाह- नास्त्यत्र धूमोऽननेः ॥ ८२ ॥ पूर्वचरानुपलब्धिमाह- न भविष्यति मूहूर्तान्ते शकटं कृत्तिकोदयानु. पलब्धेः ॥ ८३ ॥ उत्तरचरानुपलब्धिमाह- नोदगाद्भरणिर्मुहुर्तात्प्राक्तत एव ॥ ८४ ।। तत एव कृत्तिकोदयानुपलब्धेरेवेत्यर्थः । सहचरानुपलब्धिः प्राप्तकालत्याह- नास्त्यत्र समतुलायामुन्नामो नामानुपलब्धेः ।। ८५ ॥ . -- " लब्धिन विरुध्यते । १ निश्चेतव्यम् । २ आईन्धनसंयोगे सति । ३ अत्र धूमरूपकार्यकारित्वमेव सामर्थ्यम् । ४ अदर्शनात् । पणम् । ६ धूमम् । ७ नोदेष्यतीति वा पाठः । ८ उच्चत्वम् । ९ नम्रता, • ५ यद्विशे- J १२० परीक्षामुखम् । है - विरुद्धकार्याद्यनुपलब्धिर्विधौ सम्भवतीत्याचक्षाणस्तभे दास्त्रय एवेति तानेव प्रदर्शयितुमाह- विरुद्धानुपलब्धिर्विधौ त्रेधा । विरुद्धकार्यकारणस्वभावानुपलब्धिमेदात् ॥८६॥ विरुद्धकार्याद्यनुपलब्धिर्विधौ सम्भवतीति विरुद्धकार्य- कारणस्वभावानुपलब्धिरिति । तत्र विरुद्धकार्यानुपलब्धिमाह- यथाऽस्मिन्माणिनि व्याधिविशेपोऽस्ति निरामयचेष्टानुपलब्धेरिति ॥ ८७ ।। व्याधिविशेपस्य हि विरुद्धस्तदभावस्तस्य कायं निराम- यचेष्टा तस्या अनुपलब्धिरिति । विरुद्धकारणानुपलब्धिमाह- अस्त्यत्र देहिनि दुःखमिष्टसंयोगाभावात् ।। ८८ ॥ दुःखविरोधि सुखं, तस्य करणमिष्टसंयोगस्तदनुपलब्धि रिति । विरुद्धस्वभावानुपलब्धिमाह- अनेकान्तात्मकं वस्त्वेकान्तस्वरूपानुपलब्धेः ॥ ८९ ।। अनेकान्तात्मकविरोधी नित्यायेकान्तो न पुनस्तद्विषय- क- - यदोन्नामस्तदा नामेति सहचारित्वमिति । १ विधेयेन साध्येन विरुद्धस्य कार्यादेरनुपलब्धिः । २ साध्ये। ३ विरुद्धशब्दः प्रत्येकमभिः सम्बध्यते । ४ अनुपलब्धिरूपो हेतुरुपलब्धि साधयति । वानित्यमेवेति वस्तुन एकान्तरूपस्यानुपधेः । ६ एकान्तपदार्थविषयविज्ञा. ५ वस्तु नित्यमे- -- .
प्रमेयरतमालासहितम् । १२१ विज्ञानम् तस्य मिथ्याज्ञानरूपतयोपलम्भसम्भवात् । तस्य स्वरूपमवास्तवाकारस्तस्यानुपलब्धिः, ननु च व्यापविरुद्ध कार्यादीनां परम्परया विरोधिकार्यादिलिङ्गानां च बहुलमु. पलम्भसम्भवात्तान्यपि किमिति नाचार्यैरुदाहतानोत्याश- कायामाह- परम्परया सम्भवत्साधनमत्रैवान्तर्भावनीयम् ॥ ९० ।। अत्रैवैतेषु कार्यादिष्वित्यर्थः । तस्यैव साधनस्योपलक्ष- णार्थमुदाहरणद्वयं प्रदर्शयति- अभूदत्र चक्रे शिवकः स्थासात् ॥ ९१ ॥ नम् । १ यदि नित्यायेकान्तस्वरूपपदार्थो नास्ति तर्हि तद्विषय विज्ञानं कथं सन्भवतीति शङ्कां परिहरति । २ एकान्तपदार्थविपयविज्ञानस्य । नित्यायेकान्तवस्तुनोऽनुपलब्धिर्वर्तते न पुनस्तविपयविज्ञान तस्य विपरीतादिमि- थ्याज्ञानरूपतया सम्भवाद्यथा शुक्तिकायां रजतज्ञानमिति । तत्र शुक्तिका शुक्तिकैव न रजतं परन्तु तत्र रजतज्ञानं भवति तथा पदार्थोऽनेकान्त- स्वरूपः परन्तु तत्र नित्यायेकान्तरूपमिथ्याज्ञान जायते इति । ४ नित्यै- ५ कारणविरुद्धकार्यादीनाम् । ६ नास्त्यत्र शीतस्पर्श. सामान्यव्याप्तः शीतस्पर्शविशेपो धूमात् , निषेध्यस्य शीतस्पर्शविशेषस्य हि व्यापकं शीतस्पर्शसामान्यं तद्विरुद्धोऽग्निस्तस्य कार्य धूममिति । ७ नास्त्यौ- एण्यं रोमाञ्चात् । व्यापकोऽग्निस्तदविरुद्ध कार्यमौष्ण्य तस्य विरुद्ध कार्य शैत्यं तस्य परम्परया कार्य रोमाञ्च इति । ८स्वस्य स्वसहशस्य च ग्रा हकमुपलक्षणम् । स्वप्रतिपादकत्वे सति स्वेतरप्रतिपादकत्वं वा, स्त्रार्थवोधकत्वे कान्तरूपस्य ।
१२२ परीक्षामुखम् । J पतच्च किं साशक क्वान्तर्भवतीत्यारेकायामाह--- कार्यकार्यमविरुद्धकार्योपलब्धौ ।। ९२ ॥ अन्तर्भावनीयमिति सम्बन्धः। शिवकस्य हि कार्य छत्रक, तस्य कार्य स्थास इति । दृष्टान्तद्वारेण द्वितीयहेतुमुदाहरति- नास्त्यत्र गुहायां मृगक्रीडनं मृगारिसंशब्दनात् । कारणविरुद्धकार्य विरुद्धकार्योपलब्धौ यथेति ॥ ९३ ॥ मृगक्रीडनस्ये हि कारणं मृगस्तस्य विरोधी मृगारिस्तस्य कार्य तच्छन्दनमिति । इदं यथा विरुद्धकार्यापलब्धावन्तर्भवति तथा प्रतिमपीत्यर्थः । वालव्युत्पत्त्यर्थं पञ्चावयवप्रयोग इत्युक्त व्युत्पन्नम्प्रति कथं प्रयोगनियम इति शङ्कायामाह- व्युत्पन्नपयोगस्तु तथोपपत्त्याऽन्यथानुपपत्त्यैव वा ९४ ।। व्युत्पन्नस्य व्युत्पन्नाय वा प्रयोगः क्रियते इति शेपः। तथोपपत्त्या तथा साध्ये सत्येवोपपत्तिस्तया ऽन्यथानुपपत्यैव वा ऽन्यथा साध्याभावेऽनुपपत्तिस्तथा । तामेवानुमानमुद्रामु. न्मुंद्रयति- अग्निमानयं देशस्तथैव धूममत्वोप- पत्तेमवत्त्वान्यथानुपपत्तेति ॥ ९५ ॥ सतीतरार्थबोधकत्वं वा । अन्तर्भावनीयार्थमिति । १ इदं लिङ्ग कार्यकार्यस- ज्ञमिति । २ अन्तर्भावः ।३ तथा कार्यकार्य कार्याविरुद्धोपलब्धावन्तर्भाव- नीयमिति सम्बन्धः । ४ कार्यकार्यलिङ्गमपि । ६ अग्निमानयं देशो धूमवत्वान्यथानुपपत्तेरिति । ७ प्रकटयति । 1 ५ अन्वयव्याया। ८ अग्नि- प्रमेयरत्नमालासहितम् । १२३ 1 . ननु तदतिरिक्तदृशान्तादेरपि च्याप्तिप्रतिपत्तावुपयोगित्त्वात् । व्युत्पन्नापेक्षया कथं तदप्रयोग इत्याह- हेतुप्रयोगो हि यथाव्याप्तिग्रहणं विधीयते सा च तावन्मात्रेण व्युत्पन्नैरवधार्यते इति ॥ ९६ ॥ हिशब्दो यस्मादर्थे, यस्माद्यथाव्याप्तिग्रहणं व्याप्तिग्रहणान. तिक्रमेणैव हेतुप्रयोगो विधीयते । सा च तावन्मात्रेण व्युत्पन्न- स्तथोपपत्त्याऽन्यथानुपपत्त्या वाऽवधार्यते दृष्टान्तादिकमन्त- रेणैवेत्यर्थः । यथा दृष्टान्तादेव्याप्तिप्रतिपत्तिम्प्रत्यनत्वं तथा प्रॉक प्रपञ्चितमिति नेह पुनः प्रतन्यते । नापि दृष्टान्तादिप्रयोगः साध्यसिद्ध्यर्थ फलवानित्याह- तावता च साध्यसिद्धिः ॥ १७ ॥ चकार एवकारार्थे । निश्चितविपक्षासम्भवहेतुप्रयोगमात्रे- गैव साध्यसिद्धिरित्यर्थः । तेन पक्षप्रयोगोऽपि सफल इति दर्शयन्नाह-- तेन पक्षस्तदाँधारसूचनायोक्तः ॥ ९८ ।। यतस्तथोपपत्त्यन्यथानुपपत्तिप्रयोगमात्रेण व्याप्तिप्रतिपत्ति- स्तेन हेतुना पक्षस्तदाधारसूचनाय साध्यव्याप्तसाधनाधारसू- 'मत्वे सत्येव । १ साध्यसाधनातिरिक्तादृष्टान्तादेः । २ यत्र यत्र धूमस्तत्र वहिरिति यथाव्याप्तिमहणं तथा । ३ हसः (अव्ययीभावसमासः) व्याप्ति- अहणमनतिक्रम्य वर्तत इति यथाव्याप्तिग्रहणमिति । ४ अहेतुत्वम् । ५ एतद्व- यमेवानुमानङ्गं नोदाहरणमित्यत्र । ६ यथोकसाधनेन साध्यसिद्धिर्येन । ७ सा- .
परीक्षामुखम् । ३ x . चनायोक्तः । ततो. यदुक्तं परंण-तद्भावहेतुभावौ हि दृष्टान्ते तदवेदिनः । ख्याप्येते विदुपां वाच्यो हेतुरेव हि केवलः ॥ १ ॥ इति तन्निरस्तम् । व्युत्पन्नं प्रति यथोक्तहेतुप्रयोगोऽपि पक्ष- प्रयोगाभावे साधनस्य नियताधारतानवधारणात् । अथानुमा. नस्वरूपं प्रतिपाद्येदानी क्रमप्राप्तमागमस्वरूपं निरूपयितुमाह- आप्तवचनादिनिवन्धनमर्थज्ञानमार्गमः ॥ ९९ ।। यो यत्रावञ्चकः स तत्राप्तः । आप्तस्य वचनम् । आदिशः ब्देनागुल्यादिसंज्ञापरिग्रहः । आप्तवचनमादिर्यस्य तत्तथोक्तं ww नसादौ । धनव्याप्तसाध्याधार । १ चौद्धेन । २ साध्यसाधनमावी । ३ महा- ४ साध्यव्याप्तसाधनावेदिनः । ५ विद्वभिः कथ्यते। ६प र्वतो वा महानसो वेति । ७ अर्थज्ञानमागम एतावत्युच्यभाने प्रत्यक्षादाव- तिव्याप्तिरतस्तत्परिहारार्थ वाक्यनिवन्धनमिति । वाक्यनिवन्धनमर्थज्ञानमागम इत्युच्यमानेऽपि यादृच्छिकसम्वादिषु विप्रलम्भवाक्यजन्येषु सुप्तोन्मत्तादिवा- क्यजन्येषु वा नदीतीरफलससंर्गादिज्ञानेष्वतिव्याप्तिः स्यादत उक्तमाप्तति । आ- प्तवाक्यनिवन्धनज्ञानमागम इत्युच्यमानेप्याप्तवाक्यकर्मके श्रावणप्रत्यक्षेऽतिव्या- तिरतस्तत्परिहारार्थमुक्तमथेति । अर्थस्तात्पर्यरूढः प्रयोजनरूढ इति यावत् । तात्पर्यमेव वचसीत्यभियुक्तवचनाद्वचसां प्रयोजनस्य प्रतिपादकत्वात् । आप्त- वाक्यनिवन्धमर्थज्ञ नमागम इत्युच्यमाने परार्थानुमानेऽतिव्याप्तिरतस्तत्परिहा- . -रार्थमादिपदमिति । ८ आदिशब्देन शिरोनयनपादादयः । सामीप्येऽर्थव्य- वस्थायां प्रकारेऽवयवे तथा । आदिशब्दं तु मेधावी चतुर्वर्थेषु लक्षयेत् ॥१॥ ९ शब्दादुदेति यज्ज्ञानमप्रत्यक्षेऽपि वस्तुनि । शाव्दं तदिति मन्यन्ते प्रमा. --- - प्रमेयरत्नमालासहितम् । १२५, - . 1 . - नन्निबन्धनं यस्यार्थज्ञानस्येति । आप्तशब्दोपादानादपौरुषेयत्व' व्यवच्छेदः । अर्थज्ञानमित्यनेनान्यापोहंज्ञानस्याभिप्रायसूचॅनस्य च निरासः । नन्वसम्भवीदं लक्षणं, शब्दस्यं नित्यत्वेनापौरुपे- • यत्वादाप्तणीतत्वायोगात् ।। लित्यत्वं च तदवयवानों वर्णानां व्यापकत्वान्नित्यत्वाच्च । न च'तध्यापकत्वमसिद्धम् , एकंत्र प्रयुक्तस्य गकारादेः प्रत्यभिज्ञया देशान्तरेऽपि ग्रहणोत् । स एवायं गकार इति नित्यत्वमपि. तयैवावसीयते । काला- न्तरेऽपि तस्यैव गकारादेनिश्चयात् । इतो वा नित्यत्वं शब्दस्य सङ्केतान्यथानुपपत्तेरिति । तथाहि गृहीतसङ्केतस्य शब्दस्य . णान्तरवादिनः ॥ २॥ १ मीमांसकमतनिरास । आगमस्त्वाप्तपुरुषप्र- तिपादितो भवतीति निष्कर्ष २ अन्यस्मात्पदार्थादन्यस्य . पदार्थस्यापो- हो निराकरण तस्य व्यावृत्तिरूपापोहविषय एव शब्दो न त्वर्थविषय इति बौद्धः। ३ अगोः व्यावृत्तिर्गौः, व्यावृत्तिस्तुच्छाऽर्थरूपा न भवति । न्दर्भस्य, यथा केनचिदुक्तं घटमानय तदा जलानयनाभिप्रायं मनसि कृत्वा । ऽऽनयति तदा तदभिप्रायस्यार्थत्व नास्ति । ५ मीमांसकः प्राह। वर्णात्मकास्तु ये शब्दाः नित्याः सर्वगतास्तथा। प्रथगद्रव्यतया ते तुं न गुणाः कस्यचिन्मताः॥१॥ ७ रागद्वेषादिकालुष्यं पुरुषेष्वुपलभ्यते । अतो, प्रामाण्यशक्षा हि निकलके प्रसज्यते ॥ २ ॥ १८ शब्दनित्यत्वं । कस्मिन्देशे। १० यस्तत्र मया श्रुतो गारः स एव मयात्र श्रूयते । इति ११ ज्ञायते । • , १२ प्रकारान्तरेण नित्यत्व व्यवस्था- पयति । १३ खुरककुदलाशूलसास्नादिमत्यर्थे गोशब्दस्य सङ्केतोऽन्यथा न भवति तस्मानित्यत्वं ' शब्दस्य १४ एतदेव विवृणोति । --- ture- ४ शब्दस. . Aau RH भावः। 1 - - , १२६ . परीक्षामुखम् । 1 - प्रध्वंसे सत्यगृहीतसंकेतः शब्द इदानीमन्य एवोपलभ्यते इति तत्कथमर्थप्रत्ययः स्यात् ? न चौसी न भवतीति स एवार्य शब्द इति प्रत्यभिज्ञानस्यात्रापि सुलभत्वाच्च । न च वर्णानां शब्दस्य वा नित्यत्वे सधैः सर्वदा श्रवणप्रसङ्गः । सर्वदा तदभिव्यक्तरसम्भवात् । दसम्भवश्चभिव्यञ्जकवायूनां प्रतिनि- यतवात् । नच तेषामनुपपनत्वम् , प्रमाणप्रतिपन्नत्वात्-तथा- हि-वक्तृमुखनिकटदेशवतिभिः स्पार्शनेनाध्यक्षेण व्यञ्जको वायवो गृह्यन्ते । दूरदेशस्थितेने मुखसमीपस्थिततूलैंचलनाइ- नुमीयन्ते । श्रोतृश्रोत्रदेशे शब्दश्रवणान्यानुपपत्तेरापत्त्यापि निश्चीयन्ते । किश्चोत्पत्तिपक्षेऽपि समानोऽयं दोपः । तथाहि- १. अगृहीतसङ्केतशब्दात् । २ किन्वर्थप्रत्ययो भवतीत्यर्थः । नि- त्यत्वात्शब्दस्य । ३ वर्णेविव, शब्देऽपि । ४ यथा प्रत्यभि- ज्ञानस्य वर्णानां नित्यत्वे सुलभत्वं तथा शब्दनित्येऽपि सुलभत्व- ५ नैयायिकशङ्कामनूद्य दूपयति । ६ पुरुषैः । ७ वर्णानां श- ८ वर्णानां शब्दस्य वाभिव्यक्त्यसम्भवश्च । ९ प्रतिवर्णता- ल्वोठपुटादिसम्वन्धिवायोभिन्नत्वात् । १० यदा वायुवर्तते तदा तदभिव्य. क्तिर्भवत्यन्यथा न, ताल्वोष्टपुटादिव्यापारे सत्येव वायूनामुत्पत्तिरिति भावः । ११ तदभिव्यंजकवायूनाम् । १२ प्रत्यक्षादिप्रमाणप्रसिद्धत्वात् । १३ पुस्पैः । १४ स्पर्शनेन्द्रियजन्यप्रत्यक्षेण । १५ पुरुषेण । १६ वस्त्र । १७ वर्णाभिव्यंजकवायुं विना शब्दश्रवणं न घटते । १८ तदभिव्यंजकवायवः । १९ भो नैयायिक त्वयाभिव्यक्तिपक्षे वर्णशब्दानां नित्यत्वे सर्वदा सर्वषां श्रवणं भवत्विति दूपणमुद्भावितं तर्युत्पत्तिपक्षेऽपि मया तथैवोद्भाव्यते । मिति । व्दस्य वा। २० अनि.
प्रमेयरत्नमालासहितम् । १२७ वाय्वाकाशसंयोगोदसमवायिकारणादाकाशाच्च " समवायिः कारणादिग्देशाद्यविभागेनोत्पद्यमानोऽयं शब्दो न सर्वैरनुभू- यते । अपि तु नियतदिग्देशस्थैरेव तथाऽभिव्यज्यमानोऽपि। नाप्यभिव्यक्तिसांकर्यमुभयत्रापि समानत्वादेव । तथाहि-- अन्यैस्ताल्वदिसंयोगैर्यथान्यो वर्णो न क्रियते तथा ध्वन्यन्तर सारिभिस्ताल्वादिभिरन्यो ध्वनिरिभ्यते इत्युत्पत्त्यभिव्य क्त्योः समानत्वे नैकत्रैव-पर्यनुयोगाँवसर इति सर्व सुस्थम् । मांभूर्णानां तदात्मकस्य वा शब्दस्य कौटस्थ्यनित्यत्वम् । तथाप्यनादिपरम्परायातत्वेन वेदस्य नित्यत्वात्प्रागुतलक्षण- स्याव्यापकत्वम् । न च. प्रवाहनित्यत्वमप्रमाणकमेवास्येति 33 - त्यपक्षेऽपि । १ सहकारिकारणात् । २ उपादानकारणात् । ३ यथोत्पद्यमानः शब्दो न सर्वेरनुभूयते तथाभिव्यज्यमानोऽपि न सर्वैरपि तु नियतदिग्देशस्थैरेव । ४ , यदि नित्यशब्दोऽभि- व्यक्त्या व्यक्तो भवति तर्हि युगपत्सर्वे शब्दाः व्यक्ता भवन्विति दोपा- पादनमुत्पत्तिपक्षेऽपि समानमिति भावः । ५ करणान्तरसारिभिस्ताल्वोष्ट- पुटादिसम्बन्धिवायुभिरुच्चार्यमाण एव वर्ण आरभ्यते नान्यो ध्वनिरिति । ६ अन्यस्मिन् ज्ञानसम्बन्धे न, चान्यो वाचको भवेत् । गोशब्दे ज्ञानसम्वन्धे नाइवशब्दो हि वाचकः ।। ७ यत्रोभयः समो दोषः परिहारोऽपि तादृशः । नैकः पयुनुयोक्तव्यस्तादगर्थनिरूपणे ॥२॥ प्रश्नावसरः । ९ अधीझीकारेण मीमांसको ब्रूते । एकस्वभावनित्यत्वम् । ११ अपौरुषेयत्वात् । १२ परम्परायातत्त्वम् । १३ आगमस्य। - १० + 1 - परिक्षामुखम् । r युक्तं वक्नुम । अधुना तत्कर्तुरनुपलम्मादतीतानागतयोरपि कालयोस्तदनुमापकस्य लिङ्गस्याभावासंदभावोऽपि सर्वदाप्य तीन्द्रियसाध्य माधनसम्बन्धस्येन्द्रियग्राह्य वायोगात् । प्रत्यक्ष प्रतिपन्नमेव हि लिङ्गम् । अनुमानं हि गृहीतसम्बन्धस्यैकदेश- सन्दर्शनादसन्निप्टेऽर्थे वुद्धिरित्यभिधानात् । नाप्यर्थापत्तेत. सिद्धिः, अनन्यथाभूतस्यार्थस्याभावादुपमानोपमेययोरप्रत्य. क्षत्वाच्चनाप्युपमानं साधकम् । कंवलमभाप्रमाणमेवाव- शिप्यते तबै तदभावसाधकमिति । च पुरुपसद्धा. बवदस्यापि दुःसाध्यत्वात्संशयापत्तिस्तदभावसाधकप्रमाणानां सुलभत्वात्। अधुना हि तदभावः प्रत्यक्षमेवातीतानागतयोः कालयोरनुमानं तदभावसाधकमिति । तथा च-"अतीता- नागतौ कालौ चेदकारविवर्जितौ । कालशब्दाभिधेयत्वादि- दानीन्तनकालवत् ॥ १॥ वेदस्याध्ययनं सर्व तर्दध्ययनपूर्व १. वर्तमानकाले । . २ वेदकर्तुः । ३ कतुरनुमापकस्य । ४ लिङ्गभावः। ५ अतीतानागतवेदकती साध्यः .. स स्वतीन्द्रियस्तस्य साधनमप्यतीन्द्रिय. मिति । ६ पुरुषस्य । ७ परोक्ष । कर्तुः ।. मीश्वरस्तच्छब्द उपमेयः । १० प्रमाणपञ्चकं यत्र वस्तुरूपेण जायते। वस्तुसत्तावबोधार्थ तत्राभानप्रमाणता ॥२॥ ११ अभागप्रमाणम् । कंतुरभाव । १३ कतुरभावस्यापि । १४ यथा वेदस्य कतुः पुरुषस्य सा. धकमेकमपि प्रमाणं नास्ति तथा तदभावसाधकानि प्रमाणानि न सन्तीति चेन्न” तदभावसाधकानां वहूनां प्रमाणानां सद्भावादेतदेव विवृणोति । . १५ वर्तमानकाले । १६ वेदतुरभावः । १७ वर्तमानकालवत् । १८ वेदाध्य- - - ९ उपमान १२ 1 1 . + .. ] प्रमेयरतमालासहितम् । १२९ T कम् । वेदाध्ययनवाच्यत्वादधुनाध्ययनं यथेति ॥ २॥” तथा अपौरुषेयो, वेदः अनवच्छिन्नसम्प्रदायत्वे, सत्यस्मर्यमाणकर्तृ. कत्वा काशवत् । अर्थापत्तिरपि प्रामाण्यलक्षणस्यार्थस्यान- न्यथाभूतस्य दर्शनात्तदभावे निश्चीयते । धर्माद्यतीन्द्रियार्थवि- षयस्य वेदस्यार्वान्दर्शिभिः कर्तुमशक्यत्वात् । अतीन्द्रियार्थद- शिनश्चाभावात्प्रामाण्यमपौरुषेयतामेव कल्पयतीति । अत्र प्रति. विधीयते यत्तावदुक्तं वर्णानां व्यापित्वे नित्यत्वे च प्रत्यभिज्ञा प्रमाणमिति, तदसत् । प्रत्यभिज्ञायास्तत्र प्रमाणत्वायोगात् । देशान्तरेऽपि तस्यैव वर्णस्य सत्वे खण्डशा प्रतिपत्तिः स्यात् । नहि सर्वत्र व्याप्त्या वर्तमानस्यैकस्मिन्प्रदेशे सामस्त्येन ग्रह- जमुपपत्तियुक्तम् , अव्यापकत्वप्रसङ्गात् । घंटादेरपि व्यापक- रवप्रसङ्गः । शक्यं हि वक्तुमेवं, घटः सवंगतश्चक्षुरादिसनिधा- यनपूर्वकम् ।। १ अस्मृर्यमाणकर्तृत्वादित्युक्ते जीर्णकूपप्रासादादीमयभिचार रतो व्यभिचारनिर्वृत्यर्थमनवच्छिन्नसंप्रदायत्वे सतीत्युक्तम् । २ अपौरूपेयो- वेदः प्रामाण्यान्यथानुपपत्तरित्यर्थापत्यापि वेदकर्तुरभावो निश्चीयते । ३ वेद. कतुरभावे । । ४ किञ्चिज्ञैः पुरुषैः । ५ सर्वज्ञस्य । ६ साधयति । ७ उत्तर दीयते । ८ वर्णानां व्यापित्वे नित्यत्वे च । ९ यदि प्रतिभिज्ञायास्तत्र व्यापित्वे नित्वत्वे च प्रमाणत्वं, तर्हि । १० पूर्व व्या- पित्वपक्षमवलम्व्य दूषयति । ११ नास्ति च खण्डशः प्रतिपत्तिः । १३ युक्तियुक्तम् ।, १४ अन्यथा । १५ वर्णस्य व्यापकत्वे. ऽप्येकस्मिन्प्रदेशे सर्वात्मना वर्तते चेत् । १६ यथा शब्दस्य एकस्मिन्प्रदेशे वर्णस्य । ९ परीक्षामुखम्। 4 । नादनेकन देशे प्रतीयत इति । ननु घटोत्पादकस्य मृत्पिण्डादे. रनेकस्योपलम्मोदनेकत्वमेव । तथा सहदणुपरिमाणसम्भवा. च्चेति । तच्च वर्णेष्वपि समानम् । तत्रापि प्रतिनियतताः ल्वादिकारणकलापस्य तीनदिधर्मभेदस्य च सम्मवाचिरो- धात् । ताल्वादीनां व्यञ्जकत्वमत्रैव नित्स्यत इत्यास्तां तावदे- तत् । अँथ व्यापित्वेऽपि सर्वत्र सर्वात्मना वृत्तिमत्त्वान्न दोपो- ऽयमिति चेन्न । तथा सति सर्वथै त्वविरोधात् । नहि देश भेदेन युगपत्सर्वात्मना प्रतीयमानस्यैकत्वमुपपन्न प्रमाणविरो- धात् । तथा च प्रयोगः-प्रत्येकं गकारादिवर्णोऽनेक एव युगप. द्भिनदेशतया तथैव सर्वात्मनोपलभ्यमानत्वात् घटादिवत् । श्रूयमाणेऽपि व्यापकत्वं तथा घटस्यापि स्यादिति समः समाधिः ।.१ मीमांसकः प्राह, घटोदाहरणं न घटते यतो घटोत्पादककारणभेदेन घटस्यानेकत्व वर्णस्यैः कत्वमिति । २ चक्रचीवरकुलालादेः । ३ यत्त्वनेकं तदव्यापकमिति । . ४ कारणभेदत्वं । ५ अकारादिवणेष्वपि । ६ उदात्तानुदात्तस्वरित ह्रस्वदाप्लुतरूप । ७ मीमासकः प्राह । ८ साकल्येन । ण्डशः प्रतिपत्तिलक्षण । किन्तु नैयायिकाभिमतसामान्ये खण्डशः प्रतिपत्तिलक्ष. शामिदं दूषणं भवतु तन्मते तस्यैकत्वे सत्यनेकसमवायित्वात् । मित्वेऽपि सर्वत्र सर्वात्मना वृत्तिमत्वे । . ११ यदि व्यापकं सदैकस्मिन्प्रदेशे- सर्वात्मना वर्तते पुनरन्यत्र प्रदेशेऽपि सर्वात्मना वर्तते तानेकत्वमागतमिति । १२वर्णस्य । १३ एक.एव..घटः प्रत्यक्षेणैकस्मिन्देश उपलभ्यमाने नहि स एव तदैवान्यत्रोपलभ्यते . तथा :वर्णोऽपीति प्रत्यक्षादिप्रमाणविरोधः।' १४ एक- स्यैव. घटस्य सर्वत्रानुक्रमेण प्रवृत्तिः सर्वत्मिनाास्त तथापि युगपत्प्रवृत्तिनी- . ९.ख- १० व्या- .
प्रमेयरत्नमालासहितम् । १३१ न सामान्येन व्यभिचारः, तस्यापि सदृशपरिणामात्मकस्या- नेकत्वात् । नापि पर्वताद्यनेकप्रदेशस्थतया युगपदनेकदेशस्थि- तपुरुषपरिदृश्यमानेन चन्द्रार्कादिना ब्यभिचारः, तस्याति- दैविष्ठतयैकदेशस्थितस्यापि भ्रान्तिवशादनेकदेशस्थित्वेन प्र. तीतेः । न चोभ्रान्तस्य भ्रान्तेन व्यभिचरकल्पना युक्तति । नापि जलपात्रप्रतिविम्वेन, तस्यापि चन्द्रार्कादिसन्निधिमपेक्ष्य तथापरिणममानस्यानेकत्वात् तस्मादनेकप्रदेशे युगपत्सर्वा- त्मनोपलभ्यमानविषयस्यैकस्यासम्भाव्यमानत्वात्तत्र प्रवर्त्तमानं प्रत्यभिज्ञानं न प्रमाणमिति स्थितम् । तथा नित्यत्वमपि न प्रत्यभिज्ञानेन निश्चीयत इति। नित्यत्वं हि एकस्यानेकक्षणव्या- पित्वं । तच्चान्तरीले सत्तानुपर्लम्भेन न शक्यते निश्चेतुम् । न च प्रत्यभिज्ञानबलेनैवान्तराले सत्तासम्भवः । तस्य सादृश्यादपि । स्तीति व्यभिचारनिर्वृत्यर्थ युगपद्हणमिति । १ सामान्यस्यापि प्रति- व्यक्तिभेदात् । २ सामान्यस्यापि । ३ खण्डमुण्डादिषु सदृशपरिणाम- लक्षण सामान्य प्रतिव्याक्ति भिन्नमेव । ४ चन्द्राकीदेः । ५ अतिदूर- तया । ६ गकारादिवर्णस्य युगपद्भिनदेशत्वेन सर्वात्मनोपलभ्यमानत्वम. भ्रान्तं सूर्यस्य तु दविष्टतया नानात्वेनोपलभ्यमानत्वं भ्रातमतो न तस्य तेन व्यभिचार इति । ७ चन्द्राद्याकारेण । ८ प्रतिविम्वस्यापि । ९ प्रतिवि- म्वरूपेण । १० शब्दादेवस्तुनः । ११ व्यापित्वे । १२ गकारादेः । उच्चार्यमाणगकारादीनामन्तराले । १४ गकारादीनां सद्भावानुपलम्भेन । १५ सत्तोपलम्भस्य । १६ प्रत्यभिज्ञानस्य । १७ गोसदृशोऽयं गवय 4 १३२ परीक्षामुखम् । सम्भवाविरोधात् । न च घटादायप्येवं प्रसङ्गः । तस्यो. त्पत्तावपरोपरमृत्पिण्डान्तरलक्षणस्य कारणस्यासम्भाव्यमा- नत्वेनान्तराले सत्तायाः साधयितुं शक्यत्वात् । अत्र तु कारणानामपूर्वाणां व्यापारे सम्भावनाऽतो नान्तराले सत्ता- सम्भव इति । यच्चान्यदुक्तं संकेतान्यथानुपपत्तेः शब्दस्य नि- त्यत्वमिति, इदमप्यनात्मज्ञभापितमेव । अनित्येऽपि योजयितुं शम्यत्वात् । तथा हि गृहीतसंकेतस्य दण्डस्य प्रध्वन्से सत्य. गृहीतलंकेत इदानीमन्य एव दण्डः समुपलभ्यत इति दण्डोति न स्यात् । तथा धूमस्यापि गृहीतव्याप्तिकस्य नाशे अन्यधूम- दर्शनाद्वन्हिविज्ञानाभावश्च । अथ सादृश्यात्तधाप्रतीतेन दोष इति चेदापि सादृश्यवशादर्थप्रत्यये को दोपः? येन नित्यत्वे- ऽत्रै दुरभिनिवेश आश्रीयते । तथाकल्पनायामन्तराले सत्त्वम- इत्यादिवत्सादृश्येऽपि सम्भवति प्रत्यभिज्ञानं यतः । १ एकं दृष्ट्वान्तः राले तमेव पश्यतो जनस्य सादृश्यप्रत्यभिज्ञानवलादेवं सम्भवे तस्यापि ना. न्तराले सत्तासम्भव इति शंकायामाह । ২ ঘনানন্ধান্ত यो घटो दृष्टस्तमेव मध्यान्हकाले पश्यति जन इत्यन्तराले घटसत्तासम्भवः । ४ शन्दे। ५ प्रभातकाले शब्दः श्रुतः पुनो मध्यान्हकाले कारणान्तरे. गोत्यद्यमानोऽन्य एव शब्दः श्रूयत इति न घटवदन्तराले शब्दसत्ताप्रसगः । .६ दण्डादावपि । ७ एतदेव विवृणोति । ८ नास्ति च दण्डीति व्यपदेशः । ९ अस्ति च वहिज्ञानमिति । १० मीमांसकः प्राह । पूर्वदण्डदृष्टेऽपि तत्सदृशान्यदण्डनिमित्ताद्दण्डीति प्रतीतिर्भवति । ब्देऽपि ।'- १३ शब्दे । १४ सादृश्यवशादर्थकल्पनायाम् । २ घटस्य । १२ श- १५ वर्ण प्रमेयरत्नमालासहितम् । १३३ प्यदृष्टं न कल्पितं स्यादिति। यच्चान्यदभिहितं व्यक्षकानां प्रतिनियतत्वान्न युगपत् श्रुतिरिति तदप्यशिक्षितलक्षितम् । समानेन्द्रियग्राह्येषु समानधर्मसु. समानदेशेषु विषयिविषयेषु नियमायोगात् । तथाहि-श्रोत्रं समानदेशसमानेन्द्रियग्राहास- मानधर्मापन्नानामनां ग्रहणाय प्रतिनियतसंस्कारकसंस्कार्य न भवति, इन्द्रियत्वात् चक्षुर्वत्। शब्दा वा प्रतिनियतसंस्कार- कसंस्कार्या न भवन्ति, समानदेशसमानेन्द्रियग्राह्यसमानध. पिनत्वे सति युगपदिन्द्रियसम्बद्धत्वात् घटादिवत् । उत्पत्तिपक्षेऽप्ययं दोषः समान इति न वाच्यं मृत्पिण्डदीपट्ट- शान्ताभ्यां कारकव्यञ्जकपक्षयोविशेषसिद्धरित्यलमतिजल्पिते. सत्वम् । .१ इन्द्रियागोचरम् । २ येनापि प्रकारेण सत्ता कल्पिता स्यान्न तु स्वभावतो वर्तते तेनापि न कल्पितं स्यात् । ३ प्रतिवर्णनि श्चितत्वात् । ४ श्रोनेन्द्रिय। ५ उदात्तादिसमानधर्मयुक्तेषु । काशलक्षणैकप्रदेशाभिव्यक्तपु। ७ विषयीन्द्रियं । ८ विषयाः शब्दाः । ९ प्रतिनियतकारणादभिव्यक्तेर्नियमायोगात् । १० गकारादीनां शब्दा-- नाम् । ११ प्रथक् प्रथक् वायुलक्षण । १२ पूर्वानुमाने श्रोत्रमिन्द्रियं पक्षोऽत्र तु शब्दाः पक्षः । १३ वर्ण वर्ण प्रति नियतो निश्चितोऽभि. व्यंजको वायुः स एव संस्कारस्तेन । १४ एकेनैव संस्कारेण संस्कृत सदर्थानां ग्राहकं भवतीति नियमः । १५ यथा युगपत्सर्ववर्णश्रवणभापादित तथा युगपदुत्पत्तिः' स्यादिति दूषणं कारकव्यंजकपक्षयोः समानं न भवति । १६ एको हि मृत्पिण्डः कतरिच्छावशेन घटाद्यन्यतममेव कार्यमारभते व्यंजकस्तु. प्रदीपः घटप्रकाशापेक्षया प्रेरितः स्वसयुक्त सर्वघटादिकं प्रकटयत्येव । १७ मृत्पि- ६ आ.
परीक्षामुग्वम् । न। यच्चान्यत्वाइनित्यत्वेन वेदस्यापौरुषेयत्वमिति तय कि शब्दमात्रस्यानादिनित्यत्वमुत विशिष्टानामिति ? आद्यपक्षे य एव शब्दा लौकिकास्त एव वैदिका इत्यल्पमिदमभिधीयते वेद एवापौरुषेय इति । किन्तु सर्वेपामपि शास्त्राणामपौरुषेयतेति । अर्थ विशिष्टानुपूर्विी एव शब्दा अनादित्वेनाभिधीयन्ते तेषा- मवगतार्थानामनवगतार्थानां वा अनादिता स्यात् ? यदि ता. बदुत्तरः पक्षस्तदाऽज्ञानलक्षणमप्रामाण्यमनुपज्यते । श्रथ आयः पक्ष आश्रीयते तद्याख्यातारः किञ्चिज्ञा भवेयुः सर्वज्ञा वा ? प्रथम पक्षे दुरधिगमसम्बन्धानामन्याप्यर्थस्य कल्पयितुं श. क्यत्वात् मिथ्यात्वलक्षणमप्रामाण्यं स्यात् । तदुक्तम्--अयम. थों नायमर्थ इति शब्दा वदन्ति न । कल्प्योऽयमर्थः पुरुषैस्ते च रोगादिबिप्लुताः ॥ १॥ किञ्च किञ्चिज्जव्याख्यातार्थाविशे- पादग्निहोनं जुहुयात् स्वर्गकाम इत्यस्य खादेच्छ्वमांसमिः ४ एडस्तु युगपत् घटाद्यन्यतमवस्तुकारकः प्रदीपस्तु विद्यमानसर्वस्याभिव्यजक इत्युत्पत्त्यभिव्यंजकयोः कुतः समानत्वं किन्तु विशेप एव । १ अ. भिहितं मीमांसकेन । २ वेदस्यापौरुषेयत्वे । ३ विशेषशब्दानाम् । द्वितीयपक्षः। ५ विशिष्टानुक्रमायाताः। ६ वैदिका इति भावः । सूचीकराहन्यायेनोत्तरपक्षस्य प्रथमतः प्रतिपादनम् । ८ विशिष्टानुपूवि- का ये शब्दास्तेषामवगतानामेवानादिता स्यात् । ९ वेदवाक्यानाम् । विपरीतत्वेनापि । ११ रागद्वेपमोहैः । १२ अग्नि हंतीति आग्निहः इवा तस्योत्रं मास जुहुयात्खादेदथवाऽगति गच्छतीत्याग्निः इवा हूयतेऽद्यते यत्तत् १० रत्नप्रमेयमालासहितम् । १३५ । . त्यपि वाक्यार्थः किं न स्यात् संशयलक्षणमप्रामाण्यं वा । अंथ सर्वविद्विदितार्थ एव वेदोऽनादिपरम्पराऽयात इति चेत् । हन्त धर्मे चोदनैव प्रमाणमिति हतमेतत् । अतीन्द्रियार्थप्रत्यक्षी. करणसमर्थस्य पुरुषस्य सद्भावे च तद्वचनस्यापि चोदनावत्तंद- वबोधकत्वेन प्रामाण्याद्वेदस्य पुरुषाभावसिद्धस्तत्प्रतिबन्धक स्यात् । अथ तयाख्यातॄणां किञ्चिज्ञत्वेऽपि यथार्थव्याख्यान परम्पराया अनवच्छिन्नसन्तानत्वेन सत्यार्थ एव वेदोऽवसीयत इति चेन्न, किचिज्ञानामतीन्द्रियार्थेषु निःसंशयव्याख्यानायोगा. दन्धेनाकृष्यमागस्यान्धस्यानिष्टदेशपरिहारेणासिमतपथप्रापणा- नुपत्तेः । किञ्चानादिव्याख्यानपरम्परागतत्वेऽपि वेदार्थस्य गृहीतविस्मृतसम्बन्धवचनाकौशलदुणाभिप्रायतया व्याख्यान- स्यान्यथैः करणादविसम्वादीयोगादप्रामाण्यमेव स्यात् । द्रु श्यन्ते ह्यधुनातना अपि ज्योतिःशास्त्रोदिषु रहस्यं यथार्थमवे. यन्तोऽपि दुरभिसन्धेरन्यथा व्याचक्षाणाः । केचिज्जानन्तोऽपि होत्र मांसमन्नर्होत्रमित्यग्निहोत्रं श्वमांसं तज्जुहुयात्खादेत्स्वर्गकामः पुमान् द्विजः । १ द्वितीयःपक्षः । २ सर्वज्ञज्ञातार्थ एव । ३ खेदे । ४ यज्ञादौ । ५ वेदवाक्यमेव । ६ अतीन्द्रियार्थप्रत्यक्षीकरणसमर्थ- पुरुषवचनस्यापि ७ अतीन्द्रियार्थधर्मावबोधकत्वेन । प्रमाणभूतसर्वज्ञवचनम् । १० दूषणान्तरं दायते । ११ गृहीतविस्मृत- सम्म्बन्धतया वचनाकौशलतया दुष्टाभिप्राय॑तया.। १२.विपरीतत्वेनैव । १३ आविप्रतिपत्त्ययोगात् ।। १४ एतत्कालसम्वान्धनः। १५ जानन्तोऽपि । १६ दुष्टा~ ८ ततश्च । ९ १३६ परीक्षामुखम् । वचनाकौशलादन्यथोपदिशन्तः। केचिद्विस्मृतसम्बन्धा अया- थातथ्यमभिदधाना इति । कथमन्यथा भावनाविधिनियोगॅवा- क्यार्थविप्रतिपत्तिर्वेदे स्यान्मनुयाज्ञवल्क्यादीनां श्रुत्यर्थानुसारि- स्मृतिनिरूपणायां वा ? तस्मादनादिप्रवाहपतितत्वेऽपि वेद- स्यायथार्थत्वमेव स्यादिति स्थितम् । यच्चोक्तमतीतानागता- वित्यादि तदपि स्वमतनिर्मूलनहेतुत्त्वेन विपरीतसाधनात्तीभा- समेवेति । तथाहि--"अतीतानागतौ कालौ वेदार्थज्ञविवजितौ । कालशब्दाभिधेयत्वादधुनातनकालवदिति ॥१॥" किञ्च कालश- ब्दाभिधेयत्वमतीतानागतयोःकालयोहणे सति भवति। तहणं भिप्रायत्वात् । १ अन्यथा प्रतिपादन नास्ति चेत्कथं विवादः परस्परं । २ भवितुर्भवनानुकूलो भावकव्यापारविशेपो भावना । तेन ( वाक्येन ) भूत. पु ( यागक्रियासु ) कतृत्वं प्रतिपन्नस्य वस्तुनः (द्रष्टव्यादेः) । प्रयोजकक्रियामा- हुर्भावनां भावनाविदः १ । सा द्विविधा शब्दभावनार्थभावना च-शब्दात्म भावनामाहुरन्यामेव लिडादयः । इयं त्वन्यैव सर्वार्था साख्यातेषु विद्यते ३ परमपुरुष एव विधिः । परमपुरुषव्यतिरिक्तमन्यद्वस्तु नास्ति विधिनादिनो मते । ४ नियुक्तोऽहमनेनाग्निष्टोमादिवाक्येनेति निरवशेषो योगो हि नियोगः । ५ पूनाचार्यो. हि धात्वर्थ वेदे भट्टस्तु भावनाम् । प्रा- ... भाकरो नियोग तु शंकरो विधिमब्रवीत् । ६ तत्किमर्थ भाद्वानां भावनेन वाक्यार्थः प्रभाकराणां नियोग एक नक्यार्थो ब्रह्माद्वैतवादिनां निधिरेन ना- ७ वेदार्थ । ८ विप्रतिपत्तिः कथं. स्यात् । १० अनुमानाभासमिति । ११ अतीतानागतकालग्रहणम् । क्यार्थः । ९ मीमां- सकमत ।
. प्रमेयरत्नमालासहितम्। १३७ 1 . .+ । च नाध्यक्षतस्तयोरतीन्द्रियत्वात् । अनुमानतस्तद्रहणेऽपि न साध्येन सम्बन्धस्तयोनिश्चेतुं पार्यते । प्रत्यक्षगृही. तस्यैव तत्सम्बन्धाभ्युपगमात् । न च कालख्यं द्रव्यं मीमांस- कस्यास्ति । प्रसङ्गसाधनाददोष इति चेन्न । परम्प्रतिसाध्यसा- धनयोाप्यव्यापकभावाभावादिदानीमपि देशान्तरे वेदकार- स्याष्टींकादेः सौगतादिभिरभ्युपगमात् । यदप्यपरं वेदाध्ययन. मित्यादि तदपि विपक्षेऽपि समानम्-"भारताध्ययनं सर्व गुर्व. १ भवतीति शेषः । २ अतीतानागतकालयोः । ३' अथ अनुमान- तस्तयोग्रहणं भवति, तथाहि-अतीतानागतकालौ स्तः कालवाद्वर्तमानकाल- नत् । ४ कालशब्दाभिधेयमस्त्यतीतानागतकालत्वाद्वर्तमानकालगादित्यनु- माने साध्येन कालशब्दाभिधेयनातातानागतकालत्वस्य सम्बन्धो निश्चेतुं न शक्यते । ५ अतीतानागतकालयोः । ६ साध्यसाधनसम्बन्धस्य । ७ मीमांसकमते कालद्रव्यस्यास्वीकारादतीतानागतकालौ वेदकारनिर्जितो. कालशब्दाभिधेयत्वादित्यनुमाने कालशब्दाभिधेयस्य स्वरूपणेनासत्वात्स्व- रूपासिद्धोऽयं हेतुरिति भावः । १८ साध्यसाधनयोः' व्याप्यव्यापकभावसि- धौ व्याप्याभ्युपगमो व्यापकाभ्युपनांतरीयको यत्र कथ्यते तत्प्रसङ्गसाधनमि. ति । परेप्ट्यानिष्टापादनं प्रसंगसाधनमिति । ९ वेदस्य कास्तीति वादिनं प्रति । १० वेदकारनिर्जितत्वकालशब्दाभिधेयत्वयोः । ११ इदा- नातनकालनलेन साध्यसाधनयोयाप्यव्यापकभावो भनत्यनेत्यत आह । कारणवादिनस्तत्कतीरं चतुराननं जैनाः कालामुरं वौद्धाश्चाष्टक तत्कर्तारं स्म- १३ इदानातनकालगदिति दृष्टान्तः प्रतिवाद्यसिद्धः सौ- गैतरधुनापि तत्कर्तुः स्वीकारादिति भावः । १४ पौरुषेयेऽपि । । . १२ रत्येव ।
१३८ परीक्षामुखम् - + AP ध्ययनपूर्वकं । तदध्ययनवाच्यत्त्वादधुनाध्ययनं यथेति ॥२॥" यच्चान्यदुक्तम्--अनवच्छिन्नसम्प्रदायत्वे सत्यस्मर्यमाणकर्तृ- त्वादिति । तत्र ‘जीर्णकृपारामादिाभिचारनिवृत्त्यर्थमनवच्छि- सम्प्रदायत्वविशेषणेपि विशेप्यस्यास्मर्यमाणकर्तृकत्वस्य वि- चार्यमाणस्यायोगादसाधनत्वम् । कतुरस्मरणं हि वादिनः प्रतिवादिनः सर्वस्य वा ? वादिनश्चेदनुपलब्धेरभावाद्वा ? - आधे पक्षे पिटकत्रयेऽपि स्याँदनुएलब्धेरविशेषात् । तत्र परेः तत्कर्तुरङ्गीकारान्नों चेत् । अत एवात्रापि न तदस्तु । अभावा- दिति चेदस्मात्तदवसिद्धावितरेतराऽऽश्रयत्वम्। सिद्धे हि तद- भावे तन्निबन्धनं तदस्मरणमस्माच्च तदभाव इति । प्रा. माण्यान्यथानुपपत्तेस्तदभावान्नेतरेतराश्रयत्वमिति चेन्न । ९ १ हेतो। २ यतः जीर्णकूपादौ विच्छिन्नसंप्रदायत्वं वर्तते । ३ वाशब्दः प्रत्येकमभिसम्वन्ध्यते तेनायमर्थः सम्पादितो भवति यदभावाद्वा वादिनः कर्तुरस्मरणमनुपलब्धेर्वा कर्तुरस्मरणमिति । ४ ज्ञानपिटकवन्दनापिटकचैत्य- पिटकानां त्रयमिति पिटकत्रयम् । वौद्धमतविशेषग्रन्थाः । ५ अपौरुषेयत्वम् । ६ पिटकत्रये । ७ वौद्ध. । ८ पिटकत्रयस्य कर्तास्ति परन्तु स्मरणं न भवतीति वौद्धः स्वीकारात् । ९ पिटकत्रयेऽपौरुषेयेत्वं नो चेत् । १० वेदेऽपि । ११ अनुपलब्ध्यविशेषापिटकत्रयवद्वेदेप्यपौरुषेयत्वं मास्तु । १२ अभावात् । १३ कर्तुरभावसिद्धौ । १४ वेदकर्तुरभावे । १५ अभावकारण- कम्। १६ वेदतुरस्मरणम् । १७ वेदकर्तुरस्मरणाच्च । १८ वेदकर्तुरभाव १९ कर्बभावसिद्ध हि वेदस्य प्रामाण्यसिद्धिरिति। २० वेदकर्तुरभा- - -- 1 प्रमेयरत्नमालासहितम् । १३९ + - प्रामाण्येनाप्रामाण्यकारणस्यैव पुरुषविशेषस्य निराकरणात् पुरुषमात्रस्थानिराकृतेः। अथातीन्द्रियार्थदर्शिनोऽभावादन्यस्य च प्रामाण्यकारणत्वानुपपत्तेः सिद्ध एच सर्वथा पुरुषाभाव इति चेत् कुतः सर्वज्ञाभावो विभावितः ? प्रामाण्यान्यथानुपपत्तेरिति , चेदितरेतराश्रयत्वम् । कर्तुरस्मरणादिति चेच्चक्रप्रसङ्गः । अभावप्रमाणादिति चेन्न, तसाधकस्यानुमानस्य प्रांप्रतिपा- दितत्वादभावप्रमाणोत्थानायोगात् प्रमाणपञ्चकाभावेऽभावप्र- माणप्रवृत्तेः--'प्रमाणपञ्चकं यत्र वस्तुरूपे न जायते । वस्त्वल- तीववोधार्थ तत्राभावप्रमाणतेति' परैरभिधानात्। ततो न वादिनः कर्तुरस्मरणमुपपन्नम् । नापि प्रतिवादिनोऽसिद्धः । तंत्र हि प्रतिवादी स्मरत्येव कर्तारमिति । नापि सर्वस्य, वादिनो अपौरुषेयत्वम् । १ प्रामाण्यान्यथानुपपत्तरित्यननाप्रामाणिकनि. रासः कृतो भवति न तु सामान्यपुरुषनिराकरणम् । २ सर्वज्ञस्य । ३ अ. सर्वज्ञस्य । ४ हेतोः। ५ सिद्धे सर्वज्ञाभावे प्रामाण्यान्यथानुपपत्तिस्त- सिद्धौ च सर्वज्ञाभाव इति । ६ त्रितयादिसिद्धावव्यवधानेन त्रितयाद्यपेक्षा चक्रकत्वमथवा पूर्वस्य पूर्वापेक्षितमध्यमापेक्षितोत्तरापक्षितत्वमथवा स्वपिक्षणी- यापेक्षितसापेक्षत्वनिवन्धनप्रसङ्गत्वमिति । वेदकर्तुरस्मरणात्सर्वज्ञाभावः सि. येत्सवज्ञाभावसिद्धितो वेदप्रामाण्यान्यथानुपपत्तिः सिद्ध्येत्तस्यां च सिद्धायां कर्तुरभावः सिद्ध्येदिति पुनः पुनः प्रसझान्नैकस्यापि सिद्धिरिति' त्वक्रकप्रसंगः । ७ सर्वज्ञाभावः। ८ सर्वज्ञसाधकस्य । ९ सावरणत्वे करणजन्यत्वे चेत्यादिस्थले सर्वज्ञसद्भावज्ञापकमनुमानं ! प्रयुक्तं तत्सम्भवादभावस्याप्रवृत्तिरि- १० केवलभूतलसत्तावबोधार्थम् । १३. मीमांसकैः।। । १२ . वेदे । वात ति ।
परीक्षामुखम् । A वेदकर्तुरस्मरणेऽपि प्रतिवादिनः स्मरणात् । ननु प्रतिवादिना वेदेऽएकादयो वहवः कर्तारः स्मर्यन्तेऽतस्तस्मरणस्य विवा- दविषयस्याप्रामाण्याद्भवेदेव सर्वस्य कर्तुरस्मरणमिति चेन्न । कर्तृविशेषविपय एवासौ विवादो न कर्तृसामान्ये । अतः सर्व. स्य कर्तुरस्मरणमप्यसिद्धम् । सर्वात्मज्ञानविज्ञानरहितो वा कथं सर्वस्य कर्तुरस्मरणमवैति । तस्मादपौरुषेयत्वस्य वेदे ध्य- वस्थापयितुमशक्यत्वान्न तल्लक्षणस्याव्यापकत्वमसम्भवितत्वं वा सम्भवति । पौरुषेयत्त्वे पुनः प्रमाणानि वहनि सन्त्येव । सज. न्ममरणापिंगोत्रचरणादिनामथुतेरनेकपर्दसंहितप्रतिनियमसंद- र्शनात् । फलार्थिपुरुषवृत्तिनिवृतिहेत्वात्मनां श्रुतेश्च मनुसूत्र- वत् पुरुषकर्तृकैव श्रुतिः॥१॥ इति वचनात् । अपौरुषेयत्त्वेऽ. पि वा न प्रामाण्यं वेदस्योपपद्यते तद्धेतूनां गुणानामभावात् । मैनु न गुणकृतमे प्रामाण्यं किन्तु दोषाभावप्रकारेणापि, से च दोषाश्रयपुरुषाभावेऽपि निश्चीयते न गुणसद्भाव एवेति । ६५. १ मीमांसकः प्राह । २ कर्तृस्मरणस्य सर्वज्ञवादिनां नैयायिकसौगतजै. नानां परस्परविवादादप्रामण्यं तस्मात । ३ सर्वात्मप्राणिनां ज्ञानं तस्य विज्ञानं तेन रहितः । ४ मीमांसकः । ५ आगमलक्षणस्य । ६ जन्मसहितमरण । ७ स्वर्गादि । ८ श्रवणात् । ९ छन्दोरूपे- णवाक्यरचनादर्शनात् 1.. १० स्वर्गादिफलाार्थपुरुष । ११ अग्निष्टोमेन यजेत्स्वर्गकाम इत्यादिप्रवृत्तिवाक्यानि । न सुरां पिवेगौन पदात्स्पृष्टव्येत्यादिनि. वृत्तिवाक्यानि । १२ वेदः । १३ मीमांसकः प्राह। १४ वेदे । १५ दोपा- प्रमेयरतमालासहितम् । १४१ तथाचोक्तम्--शब्दे दोषोद्भवस्तावद्वक्त्रधीन इति स्थितम् । त- दभावः क्वचित्तावद्गुणवद्वक्तृकत्वतः ॥ १॥ तद्गुणैरपक्रष्टा- नां शब्दे संक्रान्त्यसम्भवात् । यद्वा वक्तुरभावेन न स्युर्दोषा निराश्रयाः ॥ २॥ इति तदप्ययुक्तम् । पराभिप्रायापरिज्ञानात् । नास्माभिर्वक्तुरभावे वेदस्य प्रामाण्याभावः समुद्भाव्यते । किंतु तेंड्याख्यातॄणामतीन्द्रियार्थदर्शनादिगुणाभावे। ततो दो- षाणामनपोदितत्वान्न प्रामाण्यनिश्चय इति । ततोऽपौरुषेयत्वे- ऽपि वेदस्य प्रामाण्यनिश्चयायोगान्नानेन लक्षणस्याव्यापित्व- मसम्भवित्वं वेत्यलमतिजल्पितेन । ननु शब्दार्थयोः सम्बन्धा- भावादन्यापोहमात्राभिधायित्वादाप्तप्रणीतादपि शब्दात् कथं वस्तुभूतार्थावगम इत्यत्राह- सहजयोग्यतासङ्केतवशाद्धि शब्दादयो वस्तु- प्रतिपत्तिहेतवः ।। १०० ॥ सहजा स्वभावभूता योग्यतो शब्दार्थयोर्वाच्यवाचकशक्तिः १० भावः । २ दोषा- भावः। १ वृहत्पञ्चनमस्काराख्यस्तोत्रैः पात्रकेशरिणोक्तम् । ३ जैनैः । ४ वेद । ५ अनिराकृतत्वात् । ६ तस्मात्का- रणात् । ७ अपौरुषेयवेदेन । ८ आगमलक्षणस्य ।। ९ बौद्धः प्राह । १. नामजल्पादियोजनात्मकः शब्दो नास्ति । ११ वाच्यवाचकरूप । पारतन्त्र्य हि सम्बन्धः सिद्ध का परतंत्रता । तस्मात्सर्वस्य भावस्थ सम्बन्धो नास्ति तत्वतः। १। १२ अस्मिन्धटादावन्यस्य घटस्यापोहो व्यावृत्तिर .
૪૨ परीक्षामुखम् । तस्यां सततस्तद्वशादि स्फुट शब्दादयः प्रागुक्ताः वस्तुप्र- तिपत्तिहेतव इति । उदाहरणमाह- / यथा मेादयः सन्ति ॥ १०१ ।। ननु य एव शब्दाः सत्यर्थे दृष्टास्त एवार्थार्भावेऽपि दृश्य- न्ते तत्कथमर्थभिधायकत्वमिति । तदप्ययुक्तम्--अनर्थकेभ्यः शब्देभ्योऽर्थवतामन्यत्वात् । न चान्यस्य व्यभिचारेऽन्यस्यासौ. युक्तोऽतिप्रसङ्गात् । अन्यथा गोपालघटिकान्तर्गतस्य धूमस्य पावकस्य व्यभिचारे पर्वतादिधूमस्यापि तसङ्गात् । “यत्नतः परीक्षितं कार्य कारणं नातिवर्तते" इत्यन्यत्रापि समानम् । सुपरीक्षितो हि शब्दोऽर्थ न व्यभिचरतीति । तथा चान्या- पोहस्य शब्दार्थत्वकल्पनं प्रयासमात्रमेव । न चान्यापोहः श. ब्दार्थों व्यवतिष्ठते प्रेतीतिविरोधात् । न हि गवादिशब्दश्रव- भावः सत्यार्थभूतः । १ तस्या इति पाठान्तरम् । सम्बन्धः संकेतो यथा पृथुवुधोदराकारे मृत्पिडे घट इति संकेतः । आदिशब्दनाद्भुलिसज्ञादयः । ४ आप्तनिवन्धनेन समर्थिताः वौद्धः वदति । ६ गगनारविन्दादौ । ७ रामादयो न सन्ति तथापि तद्वाचकाः शब्दाः वर्तन्त इति कथमर्थाभिधायिकत्वं शब्दानामिति चेन्न, नहि तैः तेषामस्तित्वं साध्यते किन्तु स्वरूपं प्रतिपाद्यत इति न दोषः शब्दानाम् ।। अनर्थकशब्दस्य १० अर्थवतः । ११. व्यभिचारः । . १२ अन्यस्य व्यभिचारेऽप्यन्यत्र परिकल्पनायाम् । १४ शब्देऽपि १५' व्यभिचाराभावे .१६ अन्योऽपोह्यते व्यावयतेऽनेनाभावेनेति ।। १७' यत्र हि प्रतीति- २ वाच्यवाचक- ३ ९. " १३ व्यभिचारः च । Enhan- प्रमेयरतमालासहितम् । १४३ ? Hair णादगवादिव्यावृत्तिः प्रतोयते । ततः सास्नादिमत्यर्थे प्रवृत्तिद- र्शनादगवादिबुद्धिजनकं तत्रै शब्दान्तरं मृग्यम् । अथैकस्मादेव गोशब्दादर्थद्वयस्यापि सम्भावनान्नार्थः शब्दान्तरेणेति चेन्नै. वम् । एकस्य परस्परविरुद्धार्थद्वय प्रतिपादनविरोधात् । किञ्च गोशब्दस्योगोव्यावृत्तिविपयत्वे प्रथममगौरिति तीयेत न चैवमेतो नान्यापोहः शब्दार्थः । किञ्च अपोहाख्यं सामान्य वाच्यत्वेन प्रतीयमानं पर्युदासरूपं प्रसज्यरूपं वा ? प्रथमपक्षे गोत्वमेव नामान्तरेणोक्तं स्यात् । अभावाभावस्य भावान्तर स्वभावेन व्यवस्थितत्वात् ।. कश्चायमश्वादिनिवृत्तिलक्षणो प्रवृत्तिप्राप्तयः समधिगम्यन्ते सः शब्दार्थो नान्यः । १ व्यावृत्ती तु कोऽपि न प्रवर्तते यतो व्यावृत्तिः तुच्छाभावरूपा २ गवादिशब्दश्रवणात् । ३ गवादी ४ गोशब्दाद्भिन्नः ५ विधिनिषेधरूप। ७ गवाद्यस्तित्वगवा- दिव्यावृत्तिरूपार्थद्वयस्य । ८ एकान्तवादिन न स्याद्वादिनम् । ९ गोशब्दस्य भावार्थे विषयो नास्ति चेत् । १० अश्वादि। ११ अगोनिवृत्तः पूर्वम् । १२ भवदभिप्रायेण । १३ अगौरिति प्रतीत्यभावात् । १४ गोशब्दस्यार्थत्वेन । १५ बौद्धमते । १६ पयुदासः प्रसज्यश्च द्वौ नौ गदिताविह पर्युदासः सदृग्ग्राही प्रसज्यस्तु निषेधकृत् । १ । १७ सिद्धसाध्यता, यतो यदेवागो- निवृत्तिलक्षण सामान्यं गोशब्देन भवतोच्यते तदेवास्माभिर्गोत्वाख्यं भावलक्षणं सामान्यं गोशब्दवाच्यमित्यभिधीयते । १८ अगौरित्युक्ते महिषादयस्तेषा- मभावो व्यावृत्तिोपदार्थरूपो भवति . नद्वयस्य प्रकृतार्थसद्भावरूपत्वा- दिति । १९ अगोनिवृत्तिलक्षणोऽभागो भावान्तरेण गोत्वेन व्यवतिष्ठते । सामान्या. च। न शब्दः। ६ शब्दस्य।
१८४ परिक्षामुखम् । . ५ अन्यथा ६ सामान्य- भावोऽभिधीयते ? न तावत्स्वलक्षणरूपस्तस्य सकलविकल्प- वाग्गोचरातिकान्तत्वात् । नापि शावलेयादिव्यक्तिरूपस्तस्या- सामान्यत्वप्रसङ्गात् । तस्मात् सकलगोव्यक्तिप्वनुवृनप्रत्य यजनक तौव प्रत्येक परिसमाप्त्या वर्तमान सामान्यमेव गोशब्दैवाच्यम् । तस्यापोह इति नामकरणे नाममात्रं भिद्येत नोर्थत इति, अतो नाद्यः पक्षः श्रेयान् । नापि द्वितीयो, गोशदधिः क्वचिद्वाद्येऽर्थ प्रवृत्त्ययोगात् । तुच्छाभावाभ्यु पगमे परमतप्रवेशानुपंगाच्च । किञ्च गवादयो ये सामा- न्य शब्दा ये च शावलेयादयस्तेषां भवेदभिप्रायेण पर्या- १ अपितु न कोऽप्यभावः किन्तु भाव एव । २ क्षणिकनिरशनिरन्वायरूपः । ३ स्वलक्षणस्य । ४ अपोहस्य। स्यापोहस्याभावोऽसामान्य तस्य प्रसङ्गात् । परन्नपोहः सामान्यस्वरूपस्त- दुक्तम्- अगोनिवृत्तिः सामान्य वाच्यं यः परिकल्पितम् । गोत्वं वस्त्वेन तैरुक्तमगोपोहगिरा स्फुटम् । ७ गौरयं गौरयमित्यादि । सास्नादिमत्वाम् । ९ सर्वात्मना । १० पृथग्विशेषणेन नैयायिका- भिमतसामान्यनिरासस्तन्मते सामान्यमेकं नित्यमनेकसमवायि, जैनमते तु विशेष विशेपं प्रति सामान्यं पृथगेन । ११ गोत्वम् । १२ किन्तु नाम जात्यादियोजनारूपपदार्थो भवतीत्यायातमिति । १३ प्रसज्यपक्षः । गोशब्दादेः किञ्चिद्वस्तु नाच्यं न स्यादित्यतः प्रवृत्तिनिवृत्यभावप्रसङ्ग इति १६ नैयायिकमत । भिधायिकाः। १८ निशेषशब्दाः। १९ द्रव्यगुणक्रियारूपाणां भेदोऽस्ति, शावलेयत्वं नाम गुणस्तस्माद्भेदो भवतीति लोकव्यवहारः परन्तु भवता- ११॥ ८ १४ भावः। १५ अत्यन्ताभावः । १७ सामान्यस्या- प्रमेयरनमालासहितम् । १४५ यता स्यादर्थभेदाभावावृक्षपादपादिशब्दवत् । न खलु तुच्छौं: भावम्य भेदो युक्तो वस्तुंन्येव संसृष्टत्वैकत्वनानात्वादिविकल्पा- नी प्रतीतेः । भेदे वा अभावस्य वस्तुतापत्तिः तल्लक्षणत्वावस्तु- त्वस्य । न चापोहालक्षणसम्बन्धिभेदाभैदैः । प्रमेयाभिधेया- दिशब्दानामप्रवृत्तिप्रसङ्गात् । व्यवच्छेद्यस्यातदूपेणाप्यप्रमेयादि रूपत्वे तंतो व्यवच्छेदायोगात्कथं तंत्र सम्बन्धिभेदाभेदः ? किञ्च शावलेयादिप्वेकोऽपोहो न प्रसज्यंत किन्तु प्रतिव्यक्ति 1 मभिप्रायेण तुच्छाभावरूपेण भेदो नष्ट -एन। . १ एकार्थता स्यात् । २ सर्वपदार्थानां तुच्छस्वरूपत्वं यतः ३ वृक्षपादपादिशब्दानामर्थ- भदाभाने यथा पर्यायता । ४ निःस्वभाग । ५ अपोहस्य । ६ तथा भवतां मते बस्तु नास्ति प्रसज्यप्रतिषेधस्यांगीकारात् । ७ न तुच्छाभावरूपे । ८ अन्येन सम्बन्धत्वा । .९. आदिना प्रमेयत्वादि । १० भेदानाम् । ११ अपोहस्य । १२ भेद । १३ व्यानर्तनीयपदार्था.अश्नादयः । १४ , गौरित्यत्रागोव्यावृत्तिरश्नादिस्त- दादभागभेद इत्यनूद्य दूपयति । १५ अभागे ।। १६ अन्यथा अपोह्यलक्षणसम्बन्धिभेदाढ़ेदे , सतीति । १७ अप्रमेयायावृत्त प्रमेयमनभिधेयायावृतमभिधेयमित्यनाप्रमेयानभिधेयादिरूपापोह्यानामसत्वात्कथं सम्बन्धिभेदाढ़ेदस्तदभाने कथ प्रमेयादिशब्दानां प्रवृत्तिरिति । १८ अप्रमेयत्वस्य । १९ यतोऽप्रमेय स्वरूपेण नास्ति । २० अप्रमेयादित्वतः। २१ अभिधेयादिशब्दानाम् । २२ प्रमेशाभिधेयशब्दवाच्येऽपोहे । २३ गौरित्य. नागोरहनादेव्यावृत्तिस्तया शागलेयादागापि कथमन्यव्यावृत्तिःभवतुः। १४. अनेने भागः च परीक्षामुखम्। . भिन्न एव स्यात् । अथ शाबलेयादयस्तन्न भिन्द्रन्ति तश्चिा- दयोऽपि भेदका माभूवन् । यस्यान्तरङ्गाः शावलेयादयो न भेद कास्तस्याश्वदयो भेदका इत्यतिसाहसम् । वस्तुनोऽपि सम्ब- न्धिभेदाभेदो नोपलभ्यते किमुतावस्तुनि । तथाोक एच देवदत्तादिः कटककुण्डलादिभिरभिसस्वध्यमानो न नानात्व मास्ति नुवानः समुपलभ्यत इति । भवतु वा सम्बन्धिमेदाभे दस्तथापि न वस्तुभूतसामान्य॑मन्तरेणान्यापोहाश्रयः सम्वन्धी भतां भवतुमर्हति । तथाहि यदि शावलेयादिषु वस्तुभूतसा- रुध्याभावोऽश्वादिपरिहारेण तत्रैव विशिष्टाभिधानप्रत्ययौ कथं स्याताम् । ततः सम्बन्धिभेदाभेदमिच्छतापि सामान्य वा- स्तवमङ्गीकर्तव्यमिति । किञ्चापोहशब्दार्थपक्षे संकेत एवानु- पन्नस्तद्ग्रहणोपायासम्भवात् । न प्रत्यक्षं तद्ग्रहणसमर्थ तस्य वस्तुविपयत्वात् । अन्यापोहस्य चावस्तुत्त्वात् । अनुमानमपि न तसद्भावमववोधयति तस्य कार्यस्वभावलिङ्गसम्पाद्यत्वात्। भगन्तु परन्तु तथा नास्ति । १ अपोहम् । २. अव्यभिचारि प्रति- नियतमन्तरङ्गम् ।। ३ किं पुतरवस्तुनीत्यपि पाठः ४ अपोहे । ५ आस्कंदमानः । १६ अपोहस्य । ७ परमार्थसत्य । ८ गो- त्वादि । ९ शावलेयादिः। १० वौद्धानाम् । १२ व्यावृत्या । १३ गव्येव ।। १४ अयं सास्नादिमान् गौरिति विशिष्टशब्दज्ञाने । १५ सामान्यानभ्युपगमे विवक्षितोऽपोहाश्रयः सम्बन्धी न सिध्यति यतः।। , १६ सौगतेन । १७ शब्दापोहयोर्वाच्यवाचकसम्बन्धः १८ अपोहः। १९ प्रत्यक्षस्य । २० अपोह। २१ अनुमानस्य । २२ ज. 1 ११ सामान्याभावः । .
प्रमेयरत्नमालासहितम् । 1 अपोहस्य निरुपाख्येयत्वेनानर्थक्रियाकारित्वेन च स्वभावकार्य- योरसम्भवात् । किञ्च गोशब्दस्यागोपोहाभिधायित्त्वेऽगौरि-- त्यत्र गोशब्दस्य किमभिधेयं स्यादज्ञातस्य विधिनिषेधयोर.. नधिकारात् । अगोव्यावृत्तिरिति चोदतरेतराश्रयत्वमगोव्यव- च्छेदो हि गोनिश्चये भवति स चागौगौनिवृत्त्यात्मा गौश्चागो- व्यवच्छेदरूप इति । अगौरित्यत्रोत्तरपदार्थोऽप्यनयैव दिशा चिन्तनीयः। नन्वगौरित्यत्रान्य एवं विधिरूंपो गोशब्दाभिधे- यस्तदाऽपोहः शब्दार्थ इति विघटेत । तस्मादपोहस्योक्तयु. क्त्या विचार्यमाणस्यायोगान्नान्यापोहः शब्दार्थ इति, स्थितं. सहजयोग्यता संकेतवशाच्छन्ददायो वस्तुप्रतिपत्तिहेतव इति । स्मृतिरनुपहतेयं प्रत्यभिज्ञानशा । प्रमितिनिरतचिन्ता लैंगिक संगतीर्थम् । प्रवचनमनवचं निश्चितं देवाचा। रचितमुचितवाग्भिस्तथ्यमेतेन गोतम् ॥ १ ॥ इति परीक्षामुखस्य लघुवृत्तौ परोक्षप्रपञ्चस्तृतीयःसमुदेशः॥३॥ १ निःस्वभावत्वेन स्वभावलिशाभावः ।। २. जल ' धारणाद्यर्थक्रियाकारित्वाभावेन कार्यलिङ्गाभावः । ३ अगोव्यावृत्यभिधायित्वे । ४ गोशब्दो वर्ततेऽतस्तस्य किं वाच्यं स्यादिति । ५ प्राप्तिपूर्वको हि अगौरित्यत्र गौरित्यास्य परिज्ञानम् नास्ति कथमगौरित वदति । ६ दूषणान्तरमाह। ७.गोशब्दार्थः। ८ नागोनिवृत्यात्मा । नागोनिवृत्यात्मा । ९ निर्दोषाः । १० उपादेया । ११ तर्कः । १२ याथातथ्यम् । १३ आगमः । १४ निर्दो पम् । १५ अकलंकदेववाचा । १६ मणिक्यनन्दिदेवेन। . - न्यत्वात् । -- निषेधः; । १७'अनन्त- परीक्षामुखम् । . - अथ स्वरूपसङ्ख्याविप्रतिपत्ति निराकृत्त्य विषयविप्रतिप- त्तिनिरासार्थमाह- । सामान्यविशेपात्मा तदर्थो विपयः ॥ १ ॥ तस्य प्रमाणस्य ग्राह्योऽर्थो विषय इति यावत् । स एव चि. शिष्यते सामान्यविशेषात्मा । सामान्य विशेषौ वक्ष्यमाणल- क्षणी तावात्मानौ यस्येति विग्रहः । तदुभयग्रहणमात्मग्रहण च केवलस्य सामान्यस्य विशेषस्य तदुभयस्य धा स्वतन्त्रस्य प्रमाणविपयत्वप्रतिषेधार्थम् । तत्र सन्मात्रदेहस्य परमब्रह्मणो निरस्तत्त्वात्तदितरद्विचार्यते। तत्र सांख्यैः प्रधान सामान्यमुक्त "त्रिगुणमविवेकि वियः, सामान्यमचेतनं प्रसवैधमि । व्यक्त वीण। मध्ये । नावसरे । A १, विशेषरूपेण क्रियते । २ इतरानरपेक्षस्य । ३ त्रिषु ४ सामान्यस्वलपस्य ५ सावरणमित्यादिसूत्रव्याख्या- ६ सन्मात्रस्वरूपपरमपुरुषातिरिक्तम् । ७ सत्वरजस्तमसा साम्यावस्था प्रकृतिः । ८ सुखदुःखमोहात्रयो गुणा अस्येति त्रिगु. णमेतेन सुखादिकानामात्मगुणत्वं गिराकृतम् । ९ यथा प्रधानं न स्वतो विविच्यते, एवं महदादयोऽपि न प्रधानाद्विविच्यन्त, तदात्मकत्वात् । अथवा सम्भूयकारिताऽनाविवेकिता नहि किञ्चिदेकं. पर्याप्तं स्वकार्थे, अपि तु सम्भूय, तत्र नैकस्माद्य स्यकस्यचित् केनचित्सम्भवः । १० विषयः-ग्राह्यः, विज्ञानाहिरिति यावदेतेन विज्ञानाद्वैतवादिनां योगाचारणां मतं निराकृतम् । ११ साधारणं घटादिवदनेकैः पुरुषैगृहीतमित्यर्थः । १२. सर्व, एव प्रधान- बुद्ध्यादयोऽयेतनाः, न तु विज्ञानवादिवच्यैतन्यं युद्धरित्यर्थः । १३ प्रसव प्रमेयरत्नमालासहितम् । ९४९- Far - तथा प्रधान, तद्विपरीतस्तथा च पुमानिति ॥ १ ॥" वचनात् । तञ्च केवलं प्रधान महदादिकार्यनिष्पादनाय प्रवर्तमानं किम- प्यपेक्ष्य प्रवर्तते निरपेक्ष्य वा? प्रथमपक्षे तन्निमित्तं वाच्यं यद. पेध्य प्रवर्तते । ननु पुरुषार्थ एव तंत्र कारणं, पुरुपार्थेन हेतुना प्रधान प्रवर्तते। पुरुषार्थश्च द्वेधा, शब्दाद्युपलब्धिर्गुणपुरुषी- न्तरविवेकदर्शनं वेत्यभिधानादिति चेत् सत्यम् । तथा प्रवर्त- मानमपि बहुँधानकं पुरुषकृतं कञ्चिदुपकारं समासादयत्प्रवर्ते तानासादयद्वा ? प्रथमपक्षे स उपकारस्तस्माद्भिन्नोऽभिन्नो वा ? यदि भिन्नस्तदा तस्येति व्यपदेशाभावः, सम्बन्धाभावा- ? रूपो धर्मों य. सोऽस्यास्तीति प्रसवधर्मि प्रसवधर्सेति वक्तव्ये मत्वर्थीयः प्रत्ययः प्रसवधर्मस्य नित्ययोगमाख्यातुम् । सरूपविरूपपरिणामाभ्यां न कदाचिदपि वियुज्यते इत्यर्थः । तत्वान्तरेण परिणामो विरूपरिणामः सत्वः रजस्तमोरूपेण परिणामः सरूपरिणामः । १ व्यक्तवृत्तमव्यक्तेऽतिदिशति "तथा प्रधानम्" इति । यथा व्यक्तं तथाऽव्यक्तमित्यर्थः । २ चैगुण्या- दिरहितः पुरुषः । ३ यद्यप्यत्रैगुण्यादि वैधर्म्यमस्ति तथाप्यहेतुमत्वनि- त्यत्वादि प्रधानसाधयं पुरुषस्यास्तीति द्योतनार्थ तथा चेति पाठः । - ४ जैनः प्राह ५ यत्किञ्चिदपेक्ष्य प्रवर्तते तनिमित्तं प्रतिपाद- नीयम् । ६ सांख्यः प्राह। ७ प्रवृत्तौ। ८ कारणेन । महदादिकार्यनिप्पादनाय । १० आदिशब्देन रूपरसगन्धस्पर्शाः । -प्रकृतिपुरुषभेदविज्ञानम् । १२ . पुरुषार्थद्वयमपेक्ष्य । १३ प्रकृतिः । १४ बहुधानकात् । : १५ तदोपकारो वहुधानकस्येति व्यपदेशस्य - ९ - २५० . परीक्षामुखम् । --- - संदभावश्च समवायादेरनभ्युपगमात् । तादात्म्यं च भेदविरोधी. ति। अथाभिन्न उपकार इति पक्ष आधीयते नदा प्रधानमेव तेने कृतं स्यात् । अथोपकारनिरपेक्षमेव प्रधान प्रवर्तते तर्हि मुक्ता- स्मानम्प्रत्यपि प्रवर्त्तताविशेषात् । एतेन निरपेक्षप्रवृत्तिपक्षोऽपि प्रत्युक्तस्तत एव । किञ्च सिद्धे प्रधाने सर्वमेतदुपपन्नं स्यात् न च तत्सिद्धिः कुतश्चिन्निश्चीयत इति । न कार्याणामेकान्य. दर्शनादेककारणप्रभवत्त्वं भेदानां परिमाणदर्शनाचेति। तदप्यचा. रुचर्वितं सुखदुःखमोहरूपतया घटादेरन्वयाभावादन्तस्तत्वस्व . ७ - '-कथनस्याभावः प्रधानस्योपकार इति वक्तुं न शक्यत इति भावः । .१ उपकाराभावश्च । २ 'आदिपदेन संयोगादयः । ३ सांख्यः । ४ अंयमुपकार इदं प्रधानमिति भेदो न स्यात् । ५ पुरुषेण । ६ तदा नित्यत्वहानिरिति । पुरुपकृतोपकारनिरपेक्षमेव । महदादिकार्यनिष्पादनाय । ९ उपकारनिरपेक्षत्वस्याविशेषात् । • पुरुपकृतोपकारनिरपेक्षमेव प्रधानं वर्तत इत्यस्य निराकरणेन । ११ मह- दादिकार्यनिष्पादनाय निरपेक्ष्य वा प्रधान प्रवर्तत इति द्वितीयविकल्प 'दूपयति । १२ अविशेषादेव । १३ प्रमाणात् । १४ सांख्यः प्राह । १५. महदादीनाम् । १६ भेदानां परिमाणात्समन्वयाच्छक्तितः प्रवृत्तेश्व कारणकार्यविभागादविभागाद्वैश्वरूपस्य ।। महदादिव्यक्तमेककारणसम्भूत- मेकान्वदर्शनात् 'घटघटीसरावोदंचनादिवत् । १७ महदादिव्यक्तमेककारण- पूर्वक ' परिमाणदर्शनात् घटादिवत् ।। १८ सत्वरजस्तमसामुदयाज्जा- यमानाः परिणामाः सुखादयः प्रधानस्य १९ चित्तस्यांतरात्म. 4 है। - - रत्नप्रमेयमालासहितम् । १५१ तथोपलम्भात्। अथान्तस्तत्वस्य न सुखादिपरिणामः किन्तु तथापरिणममानप्रधानसंसर्गादात्मनोऽपि तथा प्रतिभास इति तदप्यनुपपन्नम् । अप्रतिभासमानस्यापि संसर्गकल्पनायां तत्त्वे. यत्ताया निश्चेतुमशक्तेः तदुक्तम्-संसर्गादविभागश्चेदयोगो- लकवहिवत् । भेदाभेदव्यवस्थैवमुच्छिन्ना. सर्ववस्तुपु. ॥ १ ॥ इति यदपि परिमाणाख्यं साधनं, तदप्येप्रकृतिकेषु घटघटीश- रावोदञ्जनादिप्यनेक|कृतिकेषु पटकुटमकुटशकटादिषु चोपल म्भादनकान्तिकमिति न ततः प्रकृतिसिद्धिः। तदेवं प्रधानग्रह णोपायासम्भवात्सम्भवे वा ततः कार्योदयायोगाच्च । यदुक्तं परण-प्रकृतेर्महान् ततोऽहंकास्तस्माद्गणश्च षोडेशकः । तस्मो- न एवं । १ सुखदुःखमोहरूपतयोपलम्भात् । २ चेतनस्य । ३ सुखदुःखादिरूपतया । ४ आत्मनो सह संसर्गकल्पनायामविभागो जात एवेति चेत् । ५ नष्टा । ६ एककारणकेषु । अनेक- कारणकेषु । ८ परिमाणोपलम्भात् । ९ महदादिव्यक्तमेककारणकं , परि. माणोपलम्भादित्यनुमाने परिमाणोपलम्भस्य हेतोरेककारणकेषु घटादिषु भिन्नभिन्न कारणेषु पटकुंडलादिषूपलभायभिचारित्वम् । १०.परिमाणोपल म्भसाधनात् । ११ प्रधान । १२ प्रकृतेः । १३ घटादि । १४ सांख्येन । १५ प्रकृतिरव्यक्तम् ततो महतत्वमुत्पद्यते । १६ अध्यवसायो वुद्धिर्धर्मों ज्ञान विराग ऐश्वर्यम् । सात्विकमेतद्रूपं - तामसमस्माद्विपर्यस्तम् . ॥१॥ सर्वो व्यवहता "अहमत्राधिकृतः" इत्यभिमत्य "कर्तव्यमेतन्मया"; इत्यध्य- वस्यति, ततश्च प्रवर्तत इति लोकसिद्धम् , योयं कर्तव्यमिति विनिश्चयश्चि- -तिसंनिधानादापन्नचैतन्याया बुद्धेः, सोध्यवसाय:-बुद्धरसाधारणो व्यापारस्त- - - १५२ परीक्षामुखम् । दपि पोडशकात्पञ्चभ्यः पञ्च भूतानीति ॥ १ ॥ सृष्टिक्रमे, मूलन कृतिरविडतिर्महदाद्याःप्रकृतिविकृतयः सप्त। पोडशकस्तु विकारो दभेद। बुद्धिः, स च बुद्धेर्लक्षणं समानासमानजातीयव्यवच्छेदकत्वात् । १७ वुद्धः । १८ अभिमानोऽहकारस्तस्माद्विविधः प्रवर्तत सर्गः । एका. दशकश्च गणस्तन्मात्रपञ्चकश्चैव ।। १९ अहकारात एकादशेन्द्रियाणि तन्मात्राणि च पञ्च, सोयं पोडशसंख्यापरिमितो गणः पोडशकः । २० बुद्धीन्दि- याणि चक्षुःश्रोत्रन्नाणरसनत्वगाख्यानि वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रिया. •ण्याहुः ।२। मनश्चेत्येकादशेन्द्रियाणि शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः पञ्च तन्मात्राणि । '२१ तस्मादपि षोडशकादपपकृष्टेभ्य. पञ्चभ्यस्तन्मात्रेभ्यः पञ्च भूतानि तत्र शब्दतन्मात्रादाकाशं शव्दगुणम् , शब्दतन्मात्रसहितात्स्पर्शतन्मात्राद्वायुः गब्द- स्पर्शगुणः, शब्दस्पर्शसहिताद्रूपतन्मात्रात्तेजः शब्दास्पर्शरूपगुणम् , शब्दस्पशरू- पतन्मात्रसहिताद्रसतन्मात्रादापः शब्दस्पर्शरूपरसगुगाः, शब्दस्पर्शरूपरसत. न्मात्रसहिताद्गन्धतन्मात्राच्छब्दस्पर्शरूपरसगन्धगुणा पृथिवी जायते, रूपात्तेजो रसादापो गन्धाभूमिः स्वरानभः । स्पर्शाद्वायुस्तथैवं च पञ्चभ्यः पञ्चभूतकम् 1३1 १ मूलञ्चासौ प्रकृतिश्चेति मूलप्रकृतिः विश्वस्य कार्यसङ्घातस्य सा मूलम् , न त्वस्या'. मूलान्तरमस्ति-अनवस्थाप्रसङ्गात् .. २ . प्रकृतिरेवेत्यर्थः। ३ प्रकृतिश्च विकृतयश्चेति प्रकृतिविकृतयः सप्त, महत्तत्वमहङ्कारस्य प्रकृतिः, विकृतिश्च मूलप्रकृतेः । अहंकारतत्वं तन्मात्राणामिन्द्रियाणां च प्रकृतिः,. 'विकृतिश्च महतः । एवं पञ्च तन्मात्राणि तत्वानि भूतानामाकाशादीनां प्रकृतयो विकृतयश्चाहंकारस्येति । ४ एकादशेन्द्रियाणि पञ्च महा-- "भूतानि चेति षोडशको विकारो विकार · एव । , ५ . तु शब्दोऽवधारणे ..
प्रमेयरनमालासहितम्। न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥ २ ॥ इति स्वरूपाख्यानं च बन्ध्या सुतसौरूपवर्णनमिवासद्विपयत्त्वादुपेक्षामहति । अमूर्तस्याका' शस्य मूर्तस्य पृथिव्यादेश्चैकैकारणकत्त्वायोगाच्च । अन्यथा अचेतनादपि पञ्चभूतकदम्बकाच्चैतन्यसिद्धेश्चार्वाकमतसिद्धिप्र- सङ्गात् सांख्यगन्ध एव न भवेत् । सत्कार्यवादप्रतिपेधश्चान्यत्र विस्तरेणोक्त इति नेहोच्यते संक्षेपस्वरूपादस्येति । तथा विशे- पाँ..एव-तत्वं तेषांमसमानेतरविशेपेभ्योऽशेषात्मना विश्लेषामें कत्वात्सामान्यस्यैकस्यानेका व्याप्त्या वर्तमानस्य सम्भवामा वाचतस्यैकव्यक्तिनिष्ठस्य सामस्त्येनोपलव्धस्य तथैव व्य. क्त्यन्तरेऽनुपलम्भप्रसङ्गात् । उँपलम्भे वा तन्नानात्वापत्तेयुः १ प्रधान । . शकस्य . मिन्नक्रमश्च । २ अमूर्तस्याकाशस्य मूर्तस्य पृथिव्या- देवककारणकल्पनायां तु । ३, असदकरणादुपादानग्रहणात्सर्वसंभवाभा- वात् । शक्तस्य शक्यकरणात्कारणभावाञ्च सत्कार्यम् (१। संदकरणादुपादानग्रहणासर्वसम्भवाभावात् । शक्यकरणात्कारण- भावाच सत्कार्यम् ।।२। इत्यादिना सत्कार्यवादस्य प्रतिषेधादिति । ५ प्रमेयकमलमतिण्डे । ६ बौद्धः प्राह I · ७ प्रतिक्षणं विसर।- वोऽनित्याः परस्परासम्बधिनः परमाणवः ।। ८ वस्तुनः स्वरूपम् । ९ विशेषाणाम् । .. १० विजातीयसजातीयविशेषेभ्यो, यथा घटे घटान्तरं सजातीयं पटान्तरं - विजातीयम् 1 ११ सामस्त्येन । १२ भिन्नात्मक- त्वात् 1: १३ शावलेयादिव्यक्तिषु । १४ परिसमाप्त्या । १५सामा- न्यस्य । १६. दृष्टस्य । १७ सामस्त्येन। १८ एकस्मिन्क्षणे सामान्य- -- . - परोक्षामुखम् १३ गपत् भिन्नदेशतयां सामस्त्येनापलब्धेस्तयक्तिवत्, अन्यथा व्यक्तयोऽपि भिन्ना माभूवन्निति ततो बुधे भेद एव सामान्यम् । तदुक्तम्-एकत्र दृष्टो भावो हि क्वचिन्नान्यत्र दृश्यते । तस्मा. क्न भिन्नमस्त्यन्यत्सामान्यं वुद्ध्यभेदतः ॥ १ ॥ इति । तेच विशेषा परस्परालम्बद्धा एच, तत्सम्वन्धस्य विचार्यमाणस्या. योगात् । एकदेशेन सम्बन्धे अणुपटकेन युगपद्योगादणोः पड़ शतापत्तेः । सर्वात्मनाभिसम्बन्धे पिण्डस्याणुमात्रकत्वापत्तेः । अवयविनिषेधाच्चासम्बद्धत्वमेपामुपपद्यत एव । तनिषेधश्च बृत्तिविकल्पादिवाधनात् । तथाहि-अवयवा अवयविनि वर्तन्त इति नाभ्युपगतम् । अचयी चावयवेपु वर्तमानः किमेकदेशेन वर्तते सर्वात्मना वा ? एकदेशेन वृत्तावयवान्तरप्रसङ्गः । तंत्राप्येकदेशान्रेणावयविनो वृत्तानवस्था । सर्वात्मना वर्त- स्य व्यक्तयन्तरे । १९ सामान्यस्य । १ सामान्यं नाना युगपाद्भन्न. देशतंयोपलव्धेस्तयक्तिवदिति । ३ शावलेयादि- व्यक्तिवदिति । ४ युगपद्भिन्नदेशतयोपलव्धेऽपि तस्यैकत्वे । त्र गोव्यक्तिषु वुद्ध्यभेद एव सामान्यं न वस्तुभूतम् ! ६ एकस्थाने । ७ द्वितीयस्थाने । ८ एकत्र दृष्टस्य भावस्य. तदैव द्वितीयस्थानेऽद. शनात् । 3. स्वतन्त्रम् ।। -१० अभेदे हेतुरयम् ।। ११ विशेषाणां परस्परसम्बन्धस्य 1 १२ सम्बन्धश्चेदेकदेशेन सर्वात्मना वेति शङ्यायामाह । “१३ परस्परानुप्रवेशात् । १४ विशेषाणाम् । १५ अवयविनिषेधश्च । १६ वृत्तिविकल्पादिवाधनम् विवृणोति ।। १७ नैयायिकैः । न्तरेषु । १९ अवयवेष्ववियविन एकदेशेन वृत्ताववयवान्तरप्रसङ्गोऽवयवा- २ सामान्यस्य ५ सर्व. १८ अवया + प्रमेयरत्नमालासहितम् । “१५५ - मानोऽपि प्रत्यवयवं स्वभावभेदेन वर्तत, आहोस्विदेकरूपेणेति : प्रथमपक्षे अवयविवहुत्वापत्तिः। द्वितीपक्षे तु अवयवानामेक- रूपत्वापत्तिरिति । प्रत्येक पॅरिसमाप्त्या वृत्तावप्यवयविवहु- स्वमिति । तथा यत् दृश्यं सन्नोलभ्यते तन्नास्त्येव यथा गगने. न्दोवरं. नोपलभ्यते चावयवेष्ववयवीति । तथा यद्गहे यबुद्ध्य- भावस्तत्ततो नार्थान्तरम् , यथा वृक्षाग्रहे वनमिति । ततश्च निरंशा एवान्योन्यासंस्पशिणो रूपादिपरमाणवस्ते च एकक्ष. णस्थायिनो न नित्या, विनाशं प्रत्यन्यानपेक्षणात् । प्रयोगश्च यो यद्भावं प्रत्यन्यानपेक्षः स तत्स्वभावनियतो यथान्त्या कारण- सामग्री स्वकार्य । नाशो हि मुद्रादिना क्रियमाणस्ततो भिन्नो. तध्वकदेशेन वृत्ताववयवान्तरप्रसङ्गस्तत्राप्येकदेशेन वृत्ताववयान्तरप्रसङ्ग इत्यनवस्था । १ प्रत्यवयवमवयविनो हि स्वभावभेदान्नानात्व स्यादेवेति । '२ सर्वेष्वायवयवेष्वेकरूपेण वर्तनादवयवानामेकत्वं स्यादेव स्वभावभेदा- भावात्। ३ अवयवमवयवं प्रति । । ४-साकल्येन । ५ अवयवेव- वयवी नास्त्येव दृश्यत्वे सत्यनुपलभ्यमानत्वात् । ६ अवयवेभ्योऽवयवी नार्थान्तरमवयवानामनहेऽवयविवुद्ध्यभावात् । ७ पूर्वानुमानेनावयवेष्ववयवी नास्तीत्यस्य सिद्धिरनेन त्ववयवेभ्योऽवियविनो भेदोऽपि नास्तीति साधित इति । ८ कारणनिरपेक्षात् । ९ सर्वे भावाः क्षणिकास्तत्स्वभाव . प्रत्यन्यान- १० विनाशभावम्॥ • ११ कारणनिरपेक्षः । । १२स विनाशस्वभावनियतः । १३ अन्त्यतन्तुसंयोगलक्षणाऽन्त्या कारणसामग्री। १४ पटोत्पत्तौ ... १५ घटादिनाशे मुद्राद्यपेक्षाऽस्त्येवेत्याशंक्य , वौद्धो . पेक्षणात् । - परीक्षामुखम् । ऽभिन्नो वा क्रियते ? भिन्नस्य करणे घटस्य स्थितिरेवं स्यात् । अथ-विनाशसम्बन्धान्नष्ट इति व्यपदेश इति चेत्, भावाभा. वयोः कः सम्बन्धः ? न तावत्तादात्म्यं तयोर्भदात् । नापि तदुपैत्तिरभावस्य कार्याधारत्वाघटनात् । अभिन्नय करणे घटादिरेव कृतः स्यात् । तस् च प्रागेव निप्पन्नत्वाद्यर्थ कर- णमित्यन्यानपेक्षत्वं सिद्धमिति विनाशस्वभावनियतत्वं साधय- त्येव । सिद्ध चानित्यानां तत्स्वभावनियतत्वे तदितरेपामात्मा. दीनां बिमत्यधिकरणभावापन्नानां सत्त्वादिना साधनेन त - टान्ताद्भवत्येव क्षणस्थितिस्वभावत्वम् । तथाहि यत्सत्तत्सन- मेकक्षणस्थितिस्वभावं यथा घटः सन्तश्चामी भावी इति । विकल्पद्वयं कृत्वा दूपयति नैयायिकम् , अथवा नैयायिकोक्ततुच्छाभावम. झीकृत्य दूषयति । १६ घटादिकार्यात् । १ नाशो भिन्नो भवति तथापि तेन सह घटस्य सम्बन्धात् घटोऽपि नष्ट इति व्यपदेशः । -२ घटविनाशयोः ।३ भावाभाषयोः । ४ नाप्यभानस्य घटादुत्पत्तिर्यन कार्यकारणभानसम्बन्धः स्यात् । ५ यथा भावरूपस्य घटस्य मृपिंडादुत्त. त्तिरस्ति तदा तस्य कार्याधारित्वं तथाऽभावस्ववस्तुरूपस्तस्मात्तत्र कार्याधारित्वा- घटनात् ।' ६ मुद्रादिना घटादभिन्नस्याभावस्य करणे। घटस्य। ८ साधनम् । · ९ तदन्यानपेक्षत्वं साधनम् । १० विशेषाणाम् । ११:विनाश । '२ विवादापन्नानाम् । १३ घंटादिविशेषदृष्टान्तात् । १४ सर्वे भावाः क्षाणकाः सत्वात् । १५ परमार्थरूपेण घटः क्षणिक एवं, पृथुवुनोदराकारेण दृश्यमानो घटः कियत्कालस्थायी, नरवाशु' विनाशीति ७ प प्रमेयरतमालासहितम् । १५७ । अधर्वा सत्त्वमेव विपक्षे बाधकप्रमाणवलेन दृष्टान्तनिरपेक्षम-' शेषस्य वस्तुनः क्षणिकत्वमनुमापयति । ताहि सत्त्वमर्थक्रियया व्याप्तं, अर्थक्रिया च क्रमयोगपद्याभ्यां, ते च नित्यान्निवर्तमाने स्वव्याप्यामर्थक्रियामादाय निवर्तते । सापि स्वव्याप्यं सत्व: मिति, नित्यस्य क्रमयोगपद्याभ्यामर्थक्रियाविरोधात्सत्त्वासम्भा वनं विपक्षे बाधकप्रमाणमिति । नहि नित्यस्य क्रमेण युगपट्टा सो संम्भवति । नित्यस्यकेनैव स्वभावेन पूर्वापरकालभावि- कार्यद्वयं कुर्वतः कार्यभेदकत्वात्तस्यैकस्वभावत्वात् । तथापि कार्यनानात्वे ऽन्यत्र कार्यभेदात् कारणभेदकल्पना विफलैव स्यात् । तादृशमेकमेव किञ्चित्कारणं कल्पनीयं ये कस्वभावे. - खेन । अन्तिरेवाविद्यावशादिति । १६ तस्मारक्षाणकाः । १ वहिर्व्यापिमु- २ नित्ये। ३ नित्यः पदार्थ नास्ति क्रमयोगपद्याभ्याम- र्थक्रियाकारित्वाभावादिति विपक्षे वाधकप्रमाणाबलेन । ४ अन्ता- पिमुखेनानुमान दर्शयति । ५ यदेवार्थक्रियाकारी तदेव परमार्थसत् , नित्यं नार्थक्रियाकारी तन्न तत् परमार्थसत् ११ ६ क्रमयोगपद्ये । ७ व्युत्पन्नं प्रतीदमनुमानम् ।। ८ नित्यः पदार्थो नास्ति क्रमयोगप. द्याभ्यामर्थक्रियाकारित्वाभावात्खरविषाणवदिति। । ९ नित्यसर्थक्रियाकारी न भवति क्रमयोगपद्यरहितत्वात् । १० अर्थक्रिया । ११ एकस्वभा- वेनानेकस्वभावेन वेति विकल्पद्वयं मनसि कृत्वा क्रमेण दूप- यति । १२.नित्यस्य। १३ नित्यस्ौकस्बभागले सति । १४ अनित्ये । ।
परीक्षामुखम् । च नेकेनैव चराचरमुत्पद्यत इति । अथ स्वभावनानात्वमेव तस्य कार्यभेदादिष्यंत इति चेहि, ते स्वभावाम्तस्य सर्वदा सम्भ- विनस्तदा कार्यसायम् । नो चेत्तदुत्पत्तिकारणं वाच्यम् । तस्मादेवतदुत्पत्ती तत्स्वभावाना सदा सम्भवात्सै- कार्याणां युगपत्प्राप्तिः । सहकारिक्रमापेक्षया तत्स्व- भावानां क्रमेण भावान्नोक्तदोष इति चेत्तदपि न साधुसंगतम् ।। समर्थस्य नित्यस्य परीपेक्षायोगात् । तैः सामर्थ्यकरणे नित्यता- हानिः । तस्माद्भिन्नमेव सामथ्र्य "तैविधीयत इति न नित्यता- हानिरिति । चेतहि नित्यमकिंचित्करमेव स्यात् । सहकारिज़ नितसामर्थ्यस्यैव कार्यकारित्त्वात्तत्सम्बन्धात्तस्यापि कार्यका. रित्वे तत्सम्बन्धस्यैकस्वभावत्वे सामर्थ्यनानात्वाभावान्न कार्य भेदः । अनेकस्वभावत्वेऽक्रमवत्त्वे च कार्यवत्तस्यापि सार्यm ५ सर्वेपां युगप- N Anal । न तु कारणभेदः । २ नित्यस्य । ३ यदि । ४ जीवद्रव्या. दुत्पद्यमाननरनारकादिकार्याणां युगपदुत्पत्तिप्रसङ्गः । प्राप्तिः सङ्करः। ६ ते स्वभावाः सर्वदा सम्भविनो नो चेत् । ७ स्व. भावोत्पत्ति। ८ नित्यादेव। ९ स्वभावनामुत्पत्तौ। १० निमित्तकारण। ११ निमित्तकारणापेक्षा । । १२ सहकारिभिः । 1 १२ सहकारिभिः। १३ नित्यस्य । १४ नि। त्यात् । १५ सहकारिभिः । १६ सहकारिजनितसामर्थ्यसम्बन्धात् । १७ नित्यस्यापि ।' १८ तेन सामर्थ्येन सह सम्बन्धो यस्य नित्यस्य स तथा १९ संहकारिभिः कृतं सामर्थ्य तन्नित्येनैकरूपेण सम्बन्ध्यतेऽनेक. रूपेण वा, यद्येकरूपेण सम्बन्धस्तदा सामर्थ्यनानात्वाभावात्कार्यभेदो न स्याद्य. तस्य ।।
प्रमेयरत्नमालासहितम् । १५९ मिति सर्वमावर्तत इति चक्रकप्रसङ्गः । तस्मान्न सेण कार्य- कारित्वं नित्यस्य । नापि युगपत् अशेपकार्याण युगपटुत्पत्ती द्वितीयक्षणे कार्याकरणादनर्थक्रियाकारित्वेनावस्तुत्वप्रसंगा- दिति नित्यस्य क्रमयोगपद्याभावः सिद्ध एवेति सौगताः प्रति- पेदिरे । तेऽपि न युक्तवादिनः-सजातीयेतरव्यावृत्तात्मनां वि- शेपाणामनंशानां ग्राहकस्य प्रमाणस्याभावात् । प्रत्यक्षस्य स्थिरस्थूलसाधारणाकारवस्तुग्राहकत्वैन निरंशवस्तुग्रहणायो- गात् । न हि परमाणवः परस्परासंबद्धाश्चक्षुरादिबुद्धौ प्रति- भान्ति तां सत्यविवादप्रसंगात् । अँथानुभूयन्त एव प्रथम तथाभूताः क्षणीः पश्चात्तु विकल्पवासनावलादान्तरादन्तराला- नुपलम्भलक्षणाद्वाह्याच्चाविद्यमानोऽपि स्थूलाद्याकारो विक ल्पवुद्धौ चकास्ति । स च तदाकारणानुरयमानः स्वव्यापार दि नानास्वभावेन संवन्ध्यते तदा युगपत्क्रमेण वा यदि युगपत्तदा घटादिवत्सा- मर्थ्यस्यापि सांकय॑म् । १ तस्मात्सम्बन्धस्य क्रमवत्त्वं स्वीकर्तव्यं क्रम वत्वे च तदुत्पत्तौ कारणं वाच्यमिति सम्बन्धः । २ मिनस्वरूपणाम् । ३ परमाणूनाम् । ४ क्षणिकत्वव्यवच्छेदार्थ स्थिरपदं परमाणुत्वनिरासार्थ स्थूलपदं विशेपनिरासार्थ साधारणपदमाकारपदं तु प्रत्येकं परिसाप्यते । प्रत्यक्षज्ञाने। ६ प्रतिभासन्ते चेत् । ७ वौद्धः प्राह । ८ निर्विकल्पप्रत्यक्षत्रु- द्धाविन्द्रियार्थसम्वन्धानन्तरं प्रतिभासन्त एव । ९ निरंशाः। १० परमाणवः । ११ आभ्यन्तरात् । १२ मध्ये स्थिरस्थूलसाधारणाकारग्रहणमस्ति। १३ पर- माणूनां स्फुटं परस्परं व्यवधानानुपलम्भलक्षणात् । १४ शोभते । विकल्पः।१६ निर्विकल्पप्रत्यक्षाकारेण । १७ आरोप्यमाणः । १८ आल. ५. १५ । परिक्षामुखम् । तिरस्कृत्य, प्रत्यक्षव्यापारपुरःसरत्वेन प्रवृत्तत्त्वात्प्रत्यक्षायत इति, तदप्यतिबालविलसितम् । निर्विकल्पकवोधस्यानुपलक्ष- णात् । गृहीते हि निर्विकल्प के तरयोर्भदे . अन्याकारानुराग- स्थान्यत्र कल्पना युक्ता स्फटिकजपाकुसुमयोरिव नान्यथेति । एतेन तयोर्युगैपवृत्तेलघुवृत्तवा तदेकत्त्वाध्यवसाय इति निर- स्तं तस्यापि कोशपानप्रत्येयत्त्वादिति । केन वा तयोरेकत्त्वा- ध्यवसायः ? न तावद्विकल्पेन, तस्याँविकल्पवार्तानभिज्ञत्त्वात् । नाप्यनुभवेन, तस्य विकल्पागोचरत्त्वात् । न.च तदुर्भयावि. पयं तदेकत्वाध्यवसाये समर्थमतिप्रसङ्गात् । ततो न प्रत्यक्ष. १ . त्मव्यापारमविशदमव्यक्तमस्पष्टम् । इति बौद्धसिद्धान्तः । २ ज्ञानस्य ३ अनुपलम्भात् ४ निर्विकल्पसविकल्पयोः । "५ प्रत्यक्षानुरागस्य । ६ विकल्पे । ७ निर्विकल्पसविकल्पयोर्भदेऽग्रहीते निर्विकल्पाकारस्य सविकल्पेऽनुरागता न युक्ता ! ८ सविकल्पे निर्विकल्प. स्थाकारनिराकरणेनें । ९ निर्विकल्पसविकल्पयोः । १० युगपद्वृत्तस्तयोरेकत्वा- ध्यवसाय इति चेत्तर्हि दीर्घशप्कुलीभक्षणादी रूपादिज्ञानपञ्चकस्याप्यभेदाध्यव- सायः स्यात् । ११ कमवत्वेऽपि । १२ लघुवृत्तेश्वाभेदाध्यवसाये खररटितमि. त्यादावप्यभेदाध्यवसायः . स्यादिति : . -- १३ निर्विकल्पसविकल्पयोः । १४ युगपद्वृत्तेलधुवृत्तेवा तदेकत्वाध्यवसायस्यापि । १५ ज्ञानेन । कल्पसविकल्पयोः । १७ निश्चयः । . १८ विकल्पज्ञानस्य । १९ निर्विक- रुपज्ञानेन । २० तदुभयमविपयो यस्य, ज्ञानान्तरस्य । २१ निर्विकल्पस- विकल्प :। २२ केनचिदपि प्रमाणेन तदेकत्वाध्यवसायस्य ग्रहणं न भवति. . : । १६ निर्वि- न - + प्रमेयरत्नमालासहितम् । १६१ बुद्धौ तथा विधविशेषावभासः । नाप्यनुमानबुद्धौ संदवि- नाभूतस्वभावकार्यलिङ्गाभावात् । अनुपलँम्भोऽसिद्ध एव अनुवृत्ताकारस्य स्थूलाकारस्य चोपले धेरुक्तत्वात् । यदपि परमाणूनामेकदेशेन सर्वात्मना वा सम्बन्धो नोपपद्यत इति तत्रानभ्युपगर्म एव परिहारः । स्निग्धरूक्षाणां सजातीयानां च यधिकगुणानां कथञ्चित्स्कन्धाकारपरिणामात्मकस्य सम्ब- स्याभ्युपगमात् । यच्चावयविनि बृत्तिविकल्पादि बाधक- मुक्तं तत्रावयविनो वृत्तिरेव यदि नोपपद्यते तदा न वर्तत इत्यभिधातव्यम् । नैकदेशादिविकल्पस्तस्य विशेषनान्तरीय- कत्वात् । तथा हि नैकदेशेन वर्तते नापि सर्वात्मनेत्युक्ते प्रकान्तरेण वृत्तिरित्यभिहितं स्यात् । अन्यथा न वर्तत यतः। वभासः। ५ यद्यनु - - ८ जैनै- १ परसरामवद्धपरमाणूनाम् । २ परस्परासंवद्धपरमाणूनाम- ३ परस्परासवद्धपरमाण्वविनाभूत । ४ हेतुः । वृत्ताकारस्य स्थूलाकारस्यानुपलम्भवलेनानुपलब्धिः स्यातदा निरंशपरमाणना सिद्धिः स्यानान्यथा प्रत्यक्षेण हि स्थूलाद्याकारस्य प्रतीते. । ६ उक्तम् । एकदेशेन सर्वात्मना वा परमाणनां सम्वन्धानुपपद्यमाने । रपि तथा स्वीकियते। ९ णिद्धस्स णि ण दुराहियेण लुक्खस्स लुक्खेण दुराहियेण णिद्धस्स लुक्खेण दुराहियेण जहण्णवज्जो विसमे समे वा । १० अवयवेषु । ११ एकदेशादिविकल्पस्य । १२ वृत्तिविशेषाविनाभाव- रूपत्वात्। १३ एतदेव विवृणोति । १४ तादात्म्येन । १५ अवयवे. अवयवी वर्तते । १६ यद्यवयवेष्ववयविनां सर्वथा वृत्तिर्नास्ति । ह hd परीक्षामुखम् । 1 इत्यत्र बक्तव्यमिति विशेषप्रतिषेधश्य शेषाभ्यनुज्ञानरूपत्वात कथञ्चित्तादात्म्यरूपेग वृत्तिरित्यवसीते । तंत्र याक्तदोपा. णामनवकाशाद्विरोधादिदोषश्चाग्रे प्रतिपेत्स्यत इति नेह प्रत- न्यते । पञ्चकक्षणस्थायित्त्वे साधनं 'यो यद्भाचं प्रतीत्यायुक्तं, तदप्यसाधनमसिद्धादिदोषदुष्टत्वात् । तत्रान्यानपेक्षन ताव- सिद्धं घटाद्यभावस्य मुद्गरादिव्यापारान्धयन्यतिरेकानुवि थायित्वात् तत्कारणत्वोयपत्तेः । कपालादिपर्यायान्तरभावो हि. घटादेरभावस्तुच्छाभावस्य लकलप्रमाणगोचरातिकान्त. स्यात् । किर्च अभावो यदि स्वतन्त्रो भवेत्तदाऽन्यानपेक्षत्वं विशेषणं युक्तम् । न च सौगतसते तोऽस्तीति हेतुप्रयोगानव. तार एव, अनेकानिक चेदं शालिबीजस्य कोद्रवांकुरजनल- M १ यदवयवेनवयविनां सर्वात्मनेकदशेन वा वृत्तिप्रतिषेधो विधीयते तेन तदति रिक्ततादात्म्यरूपा वृत्तिः सिद्धा भवति । २ तादात्म्यरूपेण वृत्तौ । ३ साध्ये ४ विनाशभावित्वं प्रत्यन्यानपेक्षणादिति साधनम् । ५ घटविनाशो हि मुद्गरादिना भवत्यतो घटविनाशे मुद्राद्यपेक्षासम्भवाद्विनाश प्रत्यन्यानपेक्ष- .णादिति साधन स्वरूपासिद्धं स्वरूपेणैवास्य हेतोघंटविनाशेऽनुपलम्भादिति ।। १६ मुद्गर । ५ सर्वधाऽभावस्य । ८ प्रकारान्तरेण दूषयति । ९ हेतो। १० अभावः । . ११, विनाशस्वभावत्वाभावेऽन्यानपेक्षत्व- -मपि नोपपद्यते . ततो विनाशस्वभावत्वं प्रत्यन्यानपेक्षत्वादिति हेतुरेव नः स्यात्तदभावे च कथं साध्यसिद्धिरिति भावः। : १२ शालिवीजं हि कोद्रवाछु: रजननं प्रत्यन्यानपेक्षं परन्तु शालिवीजे कोद्रवाकुरजननसामर्थ्य नास्त्यतः सा-- ... - प्रमेयरत्नमालासहितम् । :१६३ : प्रति अन्यानपेक्षत्वेऽपि तजननस्वभावानियतत्वात् । तत्स्व. भावत्वे सतीति विणेषणान्न दोष इति चेन्न। सर्वथा पदा. र्थानां विनाशस्वभावासिद्धः । पर्यायरूपेणैव हि भावानामु- त्पादविनाशावङ्गीक्रियेते, न द्रव्यरूपेण-समुदेति विलयमृ. छति भावो नियमेन पर्ययनयस्थ । नोदेति नो विनश्यति /भावनैयालिङ्गितो नित्यम् ॥ १ ॥ इति वचनात् । नहि निर- न्वयविनाशे पूर्वक्षणस्य ततो मृताच्छिखिनः केकायितस्येवो. त्तरक्षणस्योत्पत्तिर्घटते। द्रव्यरूपेण कथञ्चिदत्यक्तरूपस्यापि सम्भवात् न. सर्वथा भावानां विनाशस्वभावत्व युक्तम् । न च द्रव्यरूपस्य गृहीतुमशक्यत्वादभावस्तहणोपायस्य प्रत्य- मिॉनस्य बहुलमुपलम्भालत्प्रमाण्यस्य च प्रांगेवोक्तत्वादुत्त- ध्याभावेऽपि साधनसद्भवादनैकान्तिकोऽय हेतुः । १ नहि शालिवीज को- द्रवारजननं प्रत्यन्यमपेक्षते तस्य तज्जननसामर्थ्याभावात् । २ कोवा- ३ बौद्धः प्राह सर्वे भावाः विनाशस्वभावनियताः तत्स्वभावत्वे सति तद्भाव प्रत्यन्यानपेक्षत्वादित्यनुमाने कृते नोक्तदोष इति । ४ नहि पदार्थानां सर्वथा विनाशस्वभाव सम्भवति तदसम्भवे च पूर्वोक्तदोष. तद. वस्थ एवेति भावः। ५ पर्यायार्थकनयेन, पर्यायो विशेपोऽस्तीति मतिर स्यासौ पर्यायार्थकनयस्तेन । ६ पदार्थानाम् '1. ७ द्रव्यार्थकनयेन, द्रव्यं सामान्यमस्तीति मतिरस्यासौ द्रव्यार्थकनयस्तेन । ८ विनश्यति । ९ पर्याः यार्थकनयस्य । १० द्रव्यार्थकनयेन । ११ पूर्वक्षण त् । १२ पदार्थस्य । १३ द्रव्यरूपग्रहणोपायस्य । १४ स एवायं घष्टो यं पूर्वमयंश्यमित्यादिप्रत्यः- भिज्ञानस्य। १५ प्रत्यभिज्ञान । १६ तृतीयाध्याये दर्शनस्मरणकारणक a - परीक्षामुखम् । र कार्यात्पत्यन्यथानुपपत्तेश्च सिद्धत्वात्। यच्चान्यसाधनं सत्त्वा- रयं तदपि विपक्षवत्स्वरक्षऽपि समानत्वान्नं सध्यसिद्धिनि. वन्धनम् । तथा हि सत्त्वमर्थक्रियया व्याप्तमर्थक्रिया च क्रम- योगपद्याभ्यां ते च क्षणिकान्निवर्तमाने स्वव्याप्यसर्थक्रिया- मादाय निवर्तते । सो च निवर्तमाना स्वव्याप्य सत्वमिति नित्यस्येव क्षणिकस्यापि खरविपाणवदसत्वमिति न त सत्वव्यवस्था । न च क्षणिकस्य वस्तुनः क्रमयोगपद्या. भ्यामर्थक्रियाविरोधोऽसिद्धस्तस्यै देशकृतस्य कालकृतस्य वा क्रमस्यासम्भवात् । अवस्थितस्यैकस्य हि नानादेशकालकला. व्यापित्वं देशैक्रमः कालक्रमश्चाभिधीयते । न च क्षणिके लोऽस्ति, "यो यत्रैव स तत्रैव यो यदेव तदैव सः। न : . मित्यादिस्थले। १ यदि वस्तु द्रव्यरूपेणान्वितं न स्यात्तदोत्तरकार्योत्पत्ति रपि न स्यादित्यन्यथानुपपद्यमानोत्तरकार्योत्पत्तेः द्रव्यरूपस्य सिद्धिः । २ सर्वे भावाः क्षणिकाः सत्वादित्यत्र । ३ साधनम् । ४ नित्यवत् । अनित्यपक्षेऽपि यथा । ६ नित्ये क्रमयोगपद्याभ्यामर्थक्रिया न सम्भवति, क्रमयोगपद्याभ्यामर्थक्रियाकारित्वासावाच तत्सत्त्वाभावस्तत्सत्वाभावे च तदभाव. स्तथाऽनित्येऽपाति समानम् । ७ एतदेव विवृणोति । ८ मयोगपये च । ९ अर्थक्रिया । १० क्षणिके । ११ क्रमस्येति सम्वन्धः । १२ अवस्थितस्यैकस्य नानादेशव्यापित्वं देशक्रमः । १३ अवस्थितस्यैवस्म -कालकलाव्यापित्वं कालक्रमः । १४ देशक्रमः कालक्रमो वा भावो यस्मिन्क्षेत्र उत्पद्यते स तत्रैव विनश्यति, यो यस्मिन्काले समुत्पद्यत स १५ यो १ प्रमेयरत्नमालासहितम् । १६५: देशकालयोव्याप्तिर्भावानामिह विद्यत" इति "स्वयमेवामि- धानात् । न च पूवोत्तरक्षणानामेकसन्तानापेक्षया क्रमः सम्भ-. वति, सन्तानस्य वास्तवत्वे तस्यापि क्षणिकत्वेन क्रमायोगा- दक्षणिकत्वेऽपि वास्तवत्वे तेनै सत्त्यादिसाधनमनै कान्ति. कम् । अवास्तवत्वे न तदपेक्षः क्रमो युक्त इति । नापि योग- पद्येन तत्रार्थक्रिया सम्भवति, युगपदेकेन स्वभावेन नाना. कार्यकरणे तत्कायकत्वं स्यात् । नानास्वभावकल्पनायां ते स्वभावास्तन व्यापनीयाः। तत्रैकेन स्वभावेन तद्याज्ञो तेषा- मेकरूपता, नानास्वभावेन चेनस्था । अथैक चौकस्योपादान- भाव एवान्यंत्र सहकारिभाव इति न स्वभावभेद इय्यते, ताहि नित्यस्यैकस्यापि वस्तुनः क्रमेण नानाकायकारिणः तस्मिन्नेव काले विनाशं याति तस्माद्भावानामिह देशकालक्रमापेक्षया देशका- लयोव्याप्तिास्ति । १ बौद्धः । २ सन्तानस्यापि । ३ सन्तानस्य । ४ नित्यत्वेऽपि । ५ सन्तानेनैव । ६ सत्वादित्यस्य हेतोः पक्ष सत्वेऽपि साध्यविरुद्धविपक्षनित्यसन्ताने वर्तमानत्वात्तेन सन्तानेन व्यभिचारः। ७ सन्तानस्य । ८ सन्तानापेक्षः। ९ क्षणिके । १० क्षणिकेन । ११ नानास्वभावानाम् । १२ क्षणिकेन । १३ नानास्वभावानाम् । १४ नानास्वभावेन नानास्वभावानां व्याप्तिश्चत्तेऽपि नानास्वभावाः केन व्याप- नीया अपरनानास्वभावेन चेदनवस्थाऽपरापरनानास्वभावपरिकल्पनात् । १५ बौद्धः प्राह। १६,रूपक्षणादौ । १७ रूपक्षणादेः । १८ रसक्षणादौ । १९ क्षणिकवस्तुनि । २० एकस्य क्षणस्यैकत्रोपादानभावेऽन्यत्र सहकारिभावे. । , परीक्षामुखम् । - M तथा स्वभावभेदः कार्यसाय वा माभृत् । अक्रमात् क्रमिणाम- नुत्पत्तेनैमिति चेदेकानंशकारणाधुगपदनेक कारणसाध्याने. ककायविरोधादकमिणोऽपि न क्षणिकस्य कार्यकारित्वमिति । किञ्च भवत्पक्षे सतोऽसतो वा कार्यकारित्वम् ? सतः कार्यक- हुंकत्वे , सकलकालकलाव्यापिक्षणानामेकक्षणवृत्तिप्रसङ्गः । द्वितीयपक्षे खरविषाणादेरपि कार्यकारित्वमसत्त्वाविशेषात् सत्वलक्षणस्य व्यभिचारश्च, तस्मान्न तस्मान्न विशेषैकान्तपक्षः / श्रेयान् || नापि सामान्यविशेषौ परस्परांनपेक्षाविति योगमत- मपि युक्तियुक्तमवभाति तयोरभ्योन्यभेदे. द्वयोरन्यतरस्या- पि व्यवस्थापयितुमशक हि-विशेपास्तावत् द्रव्यगुणकर्मात्मनः सामान्यं तु पपरभेदाद्विविधं, सत्यपि स्वभावभदाभावात । . ३ युगपदेनककायाणा सम्प्राप्तः कार्यसायम् । २ नित्यात् । ३ कार्याणाम् । ४ न दोपाभावोऽपि तु दोप एवति ५ क्षणिकात् । ६ बौद्धपक्षेः। ७ सत्वस्य यदर्थक्रिया- कारित्वं लक्षणं तस्यासत्वेऽपि सम्भवात्सत्वलक्षणं व्यभिचारीति भावः । ८ अनित्यनिरंशपरस्परासम्बद्धपरमाणूनां कार्यकारित्वाभावात् । . स्परनिरपेक्षौ । १० सामान्यविशेषयोः । ११ परस्पर । । १२ केवलं सामा- न्यस्य विशेषस्य वा । : १३ द्रव्यं गुणः कर्म चात्मा स्वरूपं येषां ते द्रव्यगु- णकर्मात्मानः । १४ नित्यत्वे सत्येकसमवेतत्वं सामान्यत्वम् । अनेकसम- वेतत्वं संयोगादीनामप्यत्यत उक्तं नित्यत्वे सतीति । नित्यत्वे सति समववेत्व गगनपरमाणादीनामप्यस्त्यत उक्त मनेकेति । नित्यत्वे सती-अनेकवृत्तित्वमत्य- -न्ताभावेऽप्यस्त्यतो वृत्तित्वसामान्यं विहाय समवेतत्वमित्युक्तम् ।. १५.सामान्य भावः। ९ पर- प्रमेयरत्नमालासहितम् । १६७ तंत्र परसामान्यात्सत्तालक्षणाद्विशेषाणां भेदेऽसत्वापत्तिरिति । तथाच प्रयोगः । द्रव्यगुणकर्माण्यसदूपाणि सत्त्वादत्यन्तं भिन्न- स्वात्यागसावादिवदिति ।न सामान्यविशेषसमवायभिचारः। नत्र स्वरूपसत्वस्याभिन्नस्य परैरभ्युपगमात् । नर्नु द्रव्यादीनां प्रमाणोपपन्नत्ने धर्मिग्राहकप्रमाणवाधितो हेतुर्येन हि प्रमाणेन द्रव्यादयो निश्चीयन्ते तेने तत्सत्वमपीति । अथ 'न प्रमाण- प्रतिपन्ना द्रव्यादयस्तहि हेतोराश्रयासिद्धिरिति' तदयुक्तम् । प्रसङ्गसाधनात्प्रांगभावादौ हि सत्त्वाभेदोऽसत्त्वेन व्याप्त उपलभ्यते ततश्च व्याप्यस्य द्रव्यांदावभ्युपगमो व्यापकाभ्युः द्विविधं प्रोक्तं परं चापरमेव च द्रव्यादित्रिकवृत्तिस्तु सत्ता परतयोच्यते ।। 'परभिन्ना च या जातिः सेवापरतयोच्यते । द्रव्यत्वादिकजातिस्तु परापरतयोच्य ते ।२। व्यापकत्वात्परापि स्याद्व्याप्यत्वादपरापि च । महद्देशव्यापित्व परत्व- मल्पदेशव्यापित्वमपरत्वमिति । १.व्योर्मध्ये । २ द्रव्यगुणकर्मात्मनाम् । ३ सत्व,दत्यन्तं भिन्नत्वादिति हेतोः ।। . ४ सामान्यविशेषसमवायेषु । १५ यौगैः । ६ योगः प्राह । ७ द्रव्यादयः प्रमाणोपपन्नाः प्रमाणानु पपन्नाः वेति विकल्पद्वयमाश्रित्य दूपयति । ८ सत्वादत्यन्तं भिनत्वादिति हेतुः कालात्ययापदिष्ट इति भावो यतो येन प्रमाणेन-द्रव्यादगो गृह्यन्ते तेनैव 'प्रमाणेन द्रव्यादिसत्वमपि गृह्यतामिति प्रमाणवाधितपक्षानन्तरं प्रयुक्तत्वाद्धेतोः कालत्ययापदिष्टत्वमिति । ९ प्रमाणेनः । १० द्रव्यादि । ११ निश्ची- यतामिति शेषः । १२ द्रव्यादीनां प्रमाणाप्रतिपन्नत्वात् .
१६८ .' परीक्षामुखम् । पगमनान्तीयक इति प्रसङ्गसाधने-अस्य दोपस्याभावात् । पैतेन द्रव्यादीनामप्यद्रव्यादित्त्वं व्यत्वादेर्भद चिन्तित बोद्ध- व्यम् । कथं वा पपणां पदर्थानां परस्पर भेदे प्रतिनियतस्व रुव्यवस्था ? द्रव्यस्य दि द्रव्यमिति व्यपदेशस्य इयत्यासिसम्बन्धाद्विधाने तनः पूर्व द्रव्यस्वरूपं किञ्चिद्वाच्यं, यन सह द्रव्यत्त्वाभिसम्बन्धः स्यात् । द्रव्यमेव स्वरूपमिति चेन्न, तहापदेशस्य द्रव्यत्त्वाभिसम्बन्धनिबन्धनतया स्वरूपत्या. योगात् । सत्त्वं निज संपमिति चेन्त, तस्थापि सत्तासस्व. न्धादेव तब्धपदेशकरणात् । एवं गुणादिप्यपि वाच्यम् ।। केरलं सामान्यविशेपसमवायानामेव स्वरूपसत्त्वेन तथाध्य. पदेशोपपत्तेस्तत्वयव्यवस्थैव स्यात् । ननु जीयोदिपदार्थानां सामान्य विशेषात्मकत्वं स्याद्वादिभिरभिधीयते तैयोश्च वस्तु १२. १ 3 असत्वं व्यापकः सत्वाद्भेदो व्याप्यः, स च सत्वाद्धेदः प्रागभावादासत्वेन व्याप्त उपलब्धः सन् द्रव्यादावसत्वं साधयत्येव व्याप्याभ्युपगमो व्यापकाभ्यु. पगमनान्तरीयकमिति नियमात् । २ पूर्वोक्तदोपस्य । ३ न्यादीनां सत्वादत्यन्तं भेदसाधनेन । ४ द्रव्येभ्यो द्रव्यत्वं भिन्नं गुणाश्च भिन्नास्तथा सति द्व्यत्वस्य द्रव्य एव सम्बन्ध न गुणादिष्वति प्रतिनियमाभावात्प्रतिनि- यतपदार्थव्यवस्था कथं स्यादिति भावः । ५ द्रव्यत्वाभिसम्बन्धात् । ६.द्रव्यस्वरूपेण । ७ द्रव्यव्यपदेशस्य । ८ द्रव्यस्य सत्वमेव द्रव्यस्व-- रूपम् । ९ सत्वस्यापि । १० द्रव्ये । ११ सत्वव्यपदेश । १२ द्रव्यवत् ।। १३ सत्वव्यपदेशोपपत्तेः । १४ सामान्यविशेषसमवाय । १५ सामान्यविशे- .
प्रमेयरत्नमालासहितम्। १६९ -- -- - नोर्भेदाभेदाविति । तोच विरोधादिदोषोपनिपातान्नैकत्र सम्भ- विलाविति । तथाहि-भेदाभेद्योविधिनिषेधयोरेकत्राभिन्ने वस्तुन्यसम्भवः शीतोष्णस्पर्शयोवेति ॥ १ ॥ भेदस्यान्यदधि करणमभेदस्य चान्यदिति वैयधिकरण्यम् ॥ २ ॥ यमात्मानं पुरोधाय भेदो यं च समाश्रित्याभेदः तावात्मनो भिन्नौ चाभिन्नौ च तत्रापि ती परिकल्पनादनवस्था ॥ ३ ॥ येन रूपेण भेदस्तेन भेदश्चाभेदश्चेति सङ्करः ॥ ४॥ येन भेदस्ते - नाभेदो येनाभेदस्तेन भेद इति व्यतिकरः ॥ ५॥ भेदाभेदा. मकत्ये च वस्तुनोऽसाधारणीकारेण निश्चेतुमशक्तः संशयः ॥१॥ ततश्चाप्रतिपत्तिस्ततोऽभावः ॥ ७-८॥ इत्यनेकान्तात्म- कमपि न सोस्थ्यमाभजतीति केचित् । तेऽपि न प्रातीतिकवा. -- षयोः। १ भेदाभदौ । २ एकस्मिन्वस्तुनि । ३ तदेवाष्टदोषोपनि. पातित्व दर्शयति । ४ यथा शीतोष्णयोरेकनाभिन्नवस्तुन्यसम्भवस्तथा भिन्नाभिन्नयोस्तस्माद्भिन्नाभिन्नयोरेकत्र विरोधः । एकावच्छेदनकाधिकरणकत्वा- भावो विरोधः । ५ इवार्थ वाशब्दः । ६ स्वरूपम् । ७ पुर- स्कृत्य । - ८ द्वयोरात्मनोरपित ९ भिन्नाभिन्नपरिकल्पनात् । १० अपार माणिकानन्तप्रवाहमूलकप्रसास्वमिति । ११ स्वरूपेण । । १२ परस्परा. त्यन्ताभावसमानाधिकरणयोधर्मयोरेकत्र समावेशः शङ्करः । १३ असाधार णस्वरूपेण । · १४,शुक्तिकेयं रजतं वेति चलितप्रतिपत्तिः सशयः । १५ शंस- १६ प्रतिपत्यभावात् । १७ योगादयः। १८ यथार्थवादिनः । - - याच्च।
१७० परीक्षामुखम् ४ दिनः' ! विरोधस्य प्रतीयमानयोरसम्मवादनु लम्भसाध्यो हिं विरोधः, तत्रोपलभ्यमानयोः को विरोधः ? यच्च शीतो. पणस्पर्शयोति दृष्टान्ततयोक्तं तच धूपदहनाद्यकावयविनः शीतोष्णस्पर्शस्वभावत्योपलब्धेरयुक्तमेव । एकस्य चलाचल- रक्तारक्तावृतानावृतादिविरुद्धधर्माणां युगपदुपलब्धेश्व प्रकृतयोरपि न विरोध इति । एतेने वैयधिकरण्यमप्यपा स्तम् । तयोरेकाधिकरणत्त्वेन प्रतीतेः । अत्रापि प्रागुक्तनि- देर्शनान्येव चोद्धव्यानि । यञ्चानवस्थानं दूषणं तदपि स्याहा. दिमतानभिरेवापादितम् । तन्मतं हि सामान्यविशेषात्मके वस्नुनि सामान्यविशेषावेव भेदः । भेदध्वनिनो तयोरेवामि- धानात् । द्रव्यरूपेणाभेद इति द्रव्यमेवाभेद, एकानेकात्मक- त्वाद्वस्तुनः । यदि वा भेदनयप्राधान्येन वस्तुधर्माणामान- न्यान्नानवस्था । ती हि-यत्सामान्यं यश्च विशेषस्त- 1 १ भेदाभेदयोः । २ एकस्मिन्वस्तुनि . । ३ भेदाभेदयोः । ४ इवार्थे वा शब्दः । ५ शीतस्पर्शयोदृष्टान्ततया कथनम् । ६ वस्तुनः । ७ भेदाभेदयोरपि । ८ एकत्रोपलब्धौ । ९ एकत्र वस्तुनि भेदा- भेदयोर्विरोधनिराकरणेन । १० भेदाभेदयोः । ११ वैयधिकरण्यनिराक- रणप्रकरणेऽपि । १२ एकस्य चलाचलादिनिदर्शनानि योज्यानि १३ स्याद्वादिनां मतम् । १४ सामान्यविशेषयोरेव । १५ द्रव्यार्थिकन- थप्राधान्येन । १६ द्रव्यदृष्ट्या वस्त्वेकरूपं पर्यायदृष्ट्याउनेकरूपमिति भावः । . १७'अथवा । ८ वस्तुधानन्त्यप्रकारमेव प्रदर्शयति । १९ सामान्य- - प्रमेयरत्नमालासहितम् । १७१ योरनुवृत्तव्यावृत्ताकारण भेदस्तयोश्चार्थक्रियावेदाभेश्व शक्तिभेदात् , सोऽपि सहकारिभेदादित्यनन्तधर्माणामङ्गीक रगात् कुतोऽनवस्था। तथा चोक्तम् । मूलक्षतिकरोमाहुरन वस्थां हि. दूषणम् । वस्त्वानन्त्येप्यर्शकौ च नानवस्था..जिचा. यते.॥ १ ॥ इति । यो च सङ्कव्यतिकरी तावपि भेजकज्ञा. ननिदर्शनेन सामान्यविशेषदष्टान्तेन च परिहतौ । अथ नेत्र तथा प्रतिभासनं परत्यापि वस्तुनि तथैव प्रतिभासोऽस्तुं तस्यै पक्षपाताभावान्निगीते संशयोऽपि न युक्तः तस्य चलि- तप्रतिपत्तिरूपत्वादचलितप्रतिभासे दुर्घटत्त्वात् । प्रतिपन्ने - १ . विशेषयोः। १ गौगौरत्यनुवृत्ताकारः। २ श्यामः शवलो न भवतीति व्यावृत्ताकारः। ३ अनुवृत्ताकारव्यावृत्ताकारयोः । ४ अर्थक्रियायां च शक्तिभे- दाढ़ेदः । ५ शक्तिभेदोऽपि । ६ वस्तुविकल्पपरिसमाप्तौ । ७ सङ्करो मेचकज्ञान- निर्देशनेन, व्यतिकरः सामान्यविशेष्यदृष्टान्तेन परिहृतः । ८ यथा मेचके नी- लाधनेकप्रतिभासे सति नहि शक्यं वक्तु यद्येन रूपेण पातप्रतिभासस्तेन रूपेण पातप्रतिभासश्च नालप्रतिभासश्च, भिन्नाकारेण प्रतिभासधास्ति तथैकस्मिन्वन्तुनि भेदाभेदव्यवस्था सुघटा। नहि येन रूपेण विशेषस्तेन रूपेण सामान्यं, “येनरूपेण सामान्यं तेन रूपेण विशेषः पर्याय- दृष्ट्या । सामान्यं तथैव तथैव भेदाभदयोरपि योज्यमिति : नं व्य- तिकरदोषावकाशः। १० मेचकज्ञाने सामान्यविशेषयावी । ११ चित्रा- कारण सामान्यविशेषरूपेण च । १२ जैनस्यापि । १३ भेदाभेदरूपेण । १४ प्रतिभासस्य । । “१५ प्रतिमासबलेन । १६. संशयस्य । ९ वा .
परीक्षामुखम् । वस्तुन्यप्रतिपत्तिरित्यतिसाहसम् । उपलब्ध्यमिधानादनु पल- म्भोऽपि न सिद्धस्तनो नाभाव इति दृष्टाविरुद्धमनेकान्त- शासनं सिद्धम् । एतेनावयवावयविनोर्गुणगुणिनोः कर्म- तनोश्च कथंचिदुभेदाभेदी प्रतिपादितौ चौद्धव्यौ । अथ समझायवशान्दिन्नेप्वप्यभेदप्रतीतिरनुपपन्नब्रह्म तुलाण्यवानस्प्रे- ति चेन्न, तस्यापि तती भिन्नस्य व्यवस्थापयितुमशक्तः । तथा हि-समवायवृत्तिः स्वसमायिपु वृत्तिमती स्यादवृत्तिम- ती वा ? वृत्तिवे स्वेनैव वृत्त्यन्तरेण वा ? न तावदाद्यः पक्षः समवाये समवायानस्युपगमात् । पञ्चानां समवायित्त्वमिति ब- चनात् । वृत्त्यन्तरकल्पनायां तदपि स्वसम्बन्धिषु वर्तते न वेति .. १ अनुपलम्भाभावात् । २ विरोधादिदोपपरिहारेण । ३ कपालघटयोः । ४ ज्ञानात्मनोः । ५ क्रियाक्रियावतोः। ६ घटादीनां कपालादी द्रव्येषु गुणकर्मणोः । तेषु. जातेश्च सम्बन्धः समवायः प्रकीर्ततः 191 अवयवावय व- नोर्जातिव्यक्त्योर्गुणगुणिनोः क्रियाक्रियावतोनित्यद्रव्यविशेषयोश्च यः सम्बन्धः स समवाय इति समवायवशात् । ७ अनुत्पन्नं ब्रह्मतुल्याख्यं ब्रह्मसदृशं ज्ञानं यस्य तस्य किंचितस्येति भावः । ८ समवायस्यापि । ९ पदा र्थभ्यः १० वृत्तिमत्व स्वेनैव स्वसमायिषु वृत्तिमती वृन्यन्तरेण वा स्वसम वायिषु वृत्तिमती । ११ समवायेन समवायः समवायिषु वर्तते चेद्रव्या- दयः पञ्च भावा अनेके समवायिन . इति ' ग्रन्थविरोधः स्यात् , नहि परैः समवाये समवायः स्वीकृतः । १२ द्वितीयपक्षमवलम्व्य' दूषयति । १३ विशे- पणविशेष्यभावेन समवायः समवायियु-वर्तते च । १४ वृत्यन्तरमपि A । . 1 प्रमेयरत्नमालासहितम् । १७३ । सम कल्पनायां वृत्त्यन्तरपरम्पराप्राप्तेरनवस्था । वृत्त्यन्तरस्य स्व. सन्धिषु वृत्त्यन्तरानभ्युपगमन्नानवस्थेति चेत्तर्हि वायेऽपि वृत्त्यन्तरं माभूत् । अथ समवायो न स्वाश्रयवृत्ति. रङ्गीक्रियते, तहि षण्णामाश्रितत्वमिति ग्रन्थो विरुध्यते । अथ समवायिषु सत्स्वेव समघायप्रतीतेस्तस्याश्रितत्वमुपके ल्प्यते तहि मूर्तद्रव्येषु सत्स्वेध दिग्लिङ्गस्येदमतः पूर्वेण इत्यादिज्ञानस्य काललिङ्गस्य च परापरादिप्रत्यस्य सद्भावा सँयोरपि तदाश्रितत्वं स्यात् । तथा चायुक्तमेतदन्यत्र नित्य. द्रव्येभ्य इति । किञ्च समवायस्थानाश्रितत्त्वे सम्बन्धरूपतैय न घटते। तथा च प्रयोगः-समवायो न सम्बन्धः । अना- श्रितत्त्वाद्दिगादिवदिति । अंत्र समवायस्य धर्मिणः कथंचि तादात्म्यरूपस्यानेकस्य प्रतिपन्नत्वार्मिग्राहक १ व्यत्यन्तरं स्वसम्वन्धिषु वर्तते नवा बनते चेत्स्वेनैव नृत्यन्तरेण वा, स्वेनैव स्वसम्बन्धिषु वर्तते चेत्समवायेऽपि कृत्यन्तरं माभूत् । वृत्यन्तरण वर्तते चेत्तदपि घृत्यन्तरं स्वेनैव वृत्यन्तरेण वा स्वसमवायिषु वर्तते प्रथमपक्ष समवायेऽपि वृत्यन्तरं माभूत् द्वितीयपक्षे परापरबृत्यन्तरपरिकल्पनायामन- २ विशेपणविशेष्यभावस्य । ३ दण्डदण्डिषु। ४ समवायस्य । ५ उपचर्यत । ६ दिककालयोपि । मूर्निद्रव्याश्रित्वं स्यादिति । यदि समवायः स्वाश्रयवृत्तिर्न स्यात्तदा, सम्बन्ध एव ९ समवायः प्रमाणप्रतिपन्नोऽप्रतिपनो वा, प्रथमपक्षे धर्मिग्राहकप्रमाणान. न्तर हेतोः प्रयोगात्कालात्ययापदिष्टत्वमनाश्रितत्वादिति हेतोः, द्वितीयपक्षे हेनो- राश्रयासिद्धिरिति योगशङ्कां मनसि कृत्वा परिहरति जैनः । १० च परैः बस्था । न स्यात् । १० जनैः १७३ परीक्षामुखम् । प्रमागवाध श्राश्रयासिद्धिश्च न वाच्येति, तस्याधितत्त्वे-- ऽप्येतदभिधीयते न समवाय एकः सम्बन्धात्मकत्ये सत्या- थितत्वात् संयोगवत् । सत्तयाऽनेकान्त इति सम्बन्ध विशेषणम् । अथ संयोगे निविडशियिलादिप्रत्ययनाना- त्वान्नानात्वं नान्यत्र विययादिति चेन्न, समवायेऽप्युत्प त्तिमत्वनश्वरत्वप्रत्ययनानात्वस्य सुलभत्वात् । सम्बन्धिभेदा भेदोऽन्यत्रापि समान इति नै त्रीव पर्यनुयोगो युक्तः । तस्मा. समवायस्य पंरपरिकल्पितस्य विचारासहत्वान्न तहशाद्गु- जगुण्यादिवभेदप्रतीतिः। अंध भिन्नप्रतिभासावयवावय- व्यादीनां भेद एवेति चेन्न, भेदप्रतिभासस्याभेदीविरोधात् । घटपटादीनामपि कथञ्चिदभेदोपपत्तेः । सर्वथा प्रतिमालमे. स्यासिद्धेश्च । इदमित्याद्यभेदप्रतिभासस्यापि भावात्ततः १ समवायस्य । भावात । ८सम- वाय । २ सत्ताऽप्याश्रिताऽनेका च तस्मात्तद्वारणाय सम्बन्ध पे सतीति विशेषणम् । ३ समवाये । ४ निविड़शिथिलादिप्रत्ययनानात्वः-- ५ समवायेऽपि । ६ संयोग एव । ७ योग । ९ योगः प्राह । १० द्रव्यार्थिकं गुणं कृत्वा पर्यायार्थिकप्राधा- न्येनान्यो गुणोऽन्यद्रव्यमन्यो पर्याय इति । पर्यायार्थिक गुणं कृत्वा द्रव्यार्थि- कप्राधान्येन एकमेव सन्मानं तत्वं यतोऽनादिपारिणामिकद्रव्यस्यैव घटाद्यनेके पर्यायाः प्रतीयन्तै नहि तव्यतिरिक्तं घटादिपर्यायाः गुणाः वा सन्ति । ११ नहि रूपादिगुणा पुद्गलद्रव्यात्सर्वथा भिन्ना प्रतीयन्ते रूपादिगुणानां प्रती- तिस्वस्ति तस्मात्कथञ्चिद्भेदोऽवसेयः सर्वथाभेदेऽभेदे च प्रमाणविरोधात् ।।
प्रमेयरत्नमालासहितम्। १७५ कथंचिदुभेदाभेदात्मक द्रव्यपर्यायात्मकं सामान्यविशेषात्मक च तत्वं तीरादर्शिशकुनिन्यायेनायातमित्यलमतिप्रसंगेन । इदा. नीमनेकान्तात्मकवस्तुसमर्थनार्थमेव हेतुद्वयमाह- अनुवृत्तव्योवृत्तप्रत्ययगोचरत्वात्पूर्वोत्तराकारपरिहारावाप्ति- स्थितिलक्षणपरिणामेनार्थक्रियोपपत्तेश्चेति ॥२॥ अनुवृत्ताकारो हि गौौरित्यादिप्रत्ययः । व्यावृत्ताकारः श्यामः शवल इत्यादिप्रत्ययः । तयोर्गोचरस्तस्य भावस्तवां तस्मात् । एतेन तिर्यकलामान्यव्यतिरेकलक्षणविशेषद्वयात्मक वस्तु साधितम् । पूर्वोत्तराकारयोर्थथासंख्येन परिहारावाप्ती तारवां स्थितिः, सैव लक्षणं यस्थ, स चालो परिणामश्च तेनार्थक्रियोपपत्तेश्चेत्यनेन तू तासामान्यपर्यायाण्यविशेषद्ध- यरूपं वस्तु समर्थितं भवति । अथ प्रथमोद्दिष्टसामान्यभेदं -- - शेषः । १ अनुवृत्ताकारप्रत्ययेन तिर्यक्सामान्यं साधितम् । २ व्यावृनाकार- प्रत्ययेन व्यतिरेकविशेषः साधितः । ३ पूर्वोत्तराकारौ पर्यायौ, पर्यायवि- ४ स्थितिलक्षणं द्रव्यमूर्ध्वतासामान्यम् । ५ प्रमाणविपयः सामान्यविशेषात्मा अनुवृत्तव्यावृत्तप्रत्ययगोचरत्वात् यो यदाकरोल्लेखिप्रत्यय- गोवरः स तदात्मको दृष्टो यथा नीलाकारोल्लेखिप्रत्ययगोचरो नीलस्वभावोर्थः सामान्य विशेपाकरोल्लेख्यनुवृत्तव्यावृतप्रत्ययगोचरश्चाखिलो .वाह्याध्यात्मिकप्र- मेयोऽर्थः । तस्मात्सामान्यविशेषात्मेति : तथा पूर्वोत्तराकारपरिहारावाप्ति- स्थितिलक्षणपरिणामेनाकियोपपत्तेश्च प्रमाणविषयः सामान्यविशेपारमा सिद्धय- परिक्षामुखम् । दर्शयन्नाह- सामान्यं दे॒धा तिर्यगूलताभेदात् ॥ ३ ॥ प्रथमसेदं सोदाहरणमाह-- सदृशपरिणापस्तिर्यक् , खण्डमुण्डादिषु गोत्ववत् ।। ४ ।। नित्यैकरूपस्य गोत्वादेः कायौगपद्याभ्यासर्थक्रियाविरो. चात् । प्रत्येक परिसमाप्त्या व्यक्तिषु वृत्त्ययोगाच्चाने में- दृशपरिणामात्मकमेवेति तिर्यक्सामान्यमुक्तम् । द्वितीयभेद- मपि सदृष्टान्तमुपदर्शयति- परापरविर्तव्यापि द्रव्ययूचंता मृदिव स्थाँसा- दिदिति ॥ ५॥ सामान्यमिति वर्तते तेनायमर्थः-ऊर्ध्वतासामान्यं भव- ति। कितत् ? द्रव्यम् , तदेव विशिष्यते परापरविवर्तव्या- पीति पूर्वापरफोलवर्ति त्रिकालानुयायीत्यर्थः । चित्रज्ञानस्यै- कस्य युगपद्भाव्यनेकस्वगतनीलाद्याकारज्याप्तिवदेकंस्य क्रम- भाविपरिणामव्यापित्त्वमित्यर्थः । विशेषस्यापि द्वैविध्यमुप ." । तीति भावः । १. सास्नादिमत्वेन । २ साकल्येन । ३ प्रत्येक गोव्यकिषु ।' नित्यकरूपस्य गोत्वादेः । "५ प्रत्येकगोव्यक्तिभिन्नं सदृश- 'परिणामात्मकं गोत्वाचनकेमिति । ६ पर्यायरूपविशेषव्यापित्वाद्व्यक्तिनिष्ट. स्वमूर्खतासामान्य सिद्धम्। पायेषु। ८ तदेव जैनैरुपादानकरणं श्रोत नैयायिकादिभिश्च समवायिकारणमुफमित्यर्थः ९ व्यस्य । AN प्रमेयरतमालासहितम्। १७७ दर्शयति-- विशेषश्चेति ॥६॥ . -- द्वेधेत्यधिक्रियमाणेनाभिसम्बन्धः । तदेव प्रतिपादयति-- पर्यायव्यतिरेकभेदादिति ॥ ७ ॥ प्रथमविशेषभेदमाह / एकस्मिन्द्रव्ये क्रमभाविनः परिणामाः पर्यायाँ आत्मनि हर्पविषादादिवदिति ॥ ८॥ अत्रात्मद्रव्यं स्वदेहप्रमितिमात्रमेव न व्यापकम् । नापि वटकणिकामात्रम् । न च कायाकारपरिणतर्भूतकदम्बक- मिति, तंत्र व्यापकत्त्वे 'परेषामनुमानमात्मा व्यापक द्रव्यत्त्वे व्दार्थे । पर- १ यथा द्वेधा सामान्य तथा विशेषश्चेत्याभिसम्बन्धः । २ चकारोऽपिश- ३ द्वैविध्यमेव । ४ ज्ञानसुखवीर्यादयः । ५ ज्ञानसुखवीर्य- दर्शनादय आत्मनः सहभावित्वाद्गुणाः स्युः, क्रमभावित्वाच्च ते पर्यायाश्च भवन्ति कुता-वस्तुनोऽनेकधर्मात्मकत्वात् । ६ सुख्यहं दुःख्यह घटादिक- मह वेद्मोत्यहमहमिकया स्वदेह एव सुखादिस्वभावतयाऽत्मा प्रतीयते, सम्बन्धिनि देहान्तरेऽन्तराले वा न प्रतीयते । तथापि व्यापकत्वपरिकल्पनायां तस्य सर्वदर्शित्वं भोजनादिव्यवहारसङ्करश्व स्यात्तस्य सर्वैरात्मभिः सम्बन्धा- दिति । ७ सर्वशरीरे सुखादिप्रतीतेविरोधानापि वटकणिकामात्रमिति । ८ पृथिव्यप्तेजोवायुरूाभूतकदम्बकमिति ९ अचेतनभूतकदम्ब- यश्चनात्मन उत्पत्तिविरोधात् । १० त्रिषु मध्ये । ११ यौगानाम् । - - . - १७८ परीक्षामुखम् । - सत्यमूर्तत्त्वादाकाशवदिति तंत्र यदि रूपादिलक्षणं मृर्तत्वं तत्प्रतिषेधेोऽमूर्तत्वं तदा मनसाउनेकान्तः। अथासर्वगतद्र- व्यपरिमाणं मूर्तत्वं तन्निपेधस्तथा चेत्परंप्रेति साध्यसमेो हेतुः । यच्चापरमनुमानं-यात्मा व्यापकः अणुपरिमाणान: धिकरणत्वे सति नित्यद्रव्यत्त्वादाकाशवदिति। तदपि न साधु- साधनम् । अणुपरिमाणानधिकरणत्त्वमित्यात्र किमयं नर्थः पयुदासः प्रसंज्यो वा भवेत् ? तत्राद्युपक्षे अणुपरिमाणप्रति. पेधेन महापरिमाणमवान्तरपरिमाणं परिमाणमात्रं चा? महा- परिमाणं चेत् साध्यसमो हेतुः । अवान्तरपरिमाणं चेत् विरुद्धो १ द्रव्यत्वे सत्यमूतत्वादति साधने । २ रूपादिलक्षणप्रतिषेधोऽमूर्तत्वम् । ३ मनसि · द्रव्यत्वे सति रूपादिलक्षणप्रतिषेधरूपामूर्तत्वं वर्तते परन्तु व्यापकत्वं नास्ति तस्माद्व्यत्वे सत्यमूर्तत्वादिति हेतोः पक्षसपक्षावपक्ष- वृत्तित्वादनकान्तिकत्वमिति । अमूर्तत्वम् । ५ नं प्रति । यासर्वगतद्रव्यपरिमाणनिपेधोऽमूर्तत्वं तर्हि व्यापकत्वामूर्तत्वयोर्न कश्चिविशेषः स्योदेवं सत्यात्मा व्यापको व्यापकत्वादित्यायातमिति साध्यसमोऽयं हेतु. यथा साध्ये विवादस्तथा हेतावपीत्यर्थः । ७ परमाणुभिरनकान्तपरि- हारार्थमणुपरिमाणानधिकरणत्वे सतीति विशेषणं यतः परमाणुपु नित्यत्व- मस्ति व्यापकत्वं नास्ति । ९ भावान्तरस्वभावः । तुच्छाभावरूपो वा। ११ पर्युदासपक्षे । १२ महापरिमाणस्याओं हि व्यापकत्वं, तथा सत्यात्मा व्यापको व्यापकत्वादित्यायातमिति यथाऽनि. त्यः शब्दोऽनित्यत्वे 'सति वाह्येन्द्रियप्रत्यक्षत्वादित्यत्र हेतोः साध्यसमल तथी प्रकृतेऽपीति भावः । १.१३ व्यापकत्वविरुक्षाव्यापकत्वेनावान्तरपरिणा- ur ८ साधने १० प्रमेयरत्नमालासंहितम् । १७९. हेतुरवान्तरपरिमाणाधिकरणतां ह्यव्यापंकत्वमेव साधयतीति। परिमाणमात्रं चेत्-तत्परिमाणसामान्यमङ्गीकर्तव्यम् । तथा चा: 'णुपरिमाणप्रतिषेधेन परिमाणेसामान्याधिकरणत्वमारमन इत्यु क्तम् । तच्चानुपपन्नं, व्यधिकरणासिद्धिप्रसंगात् । न हि परिमाणसामान्यमात्मनि व्यवस्थितं किन्तु परिमाणव्यक्ति. वेवेति । न चावान्तरमहापरिमाणद्वयाधारतयाऽऽमन्यप्रति. पन्ने परिमाणमात्राधिकरणता तंत्र निश्चेतुं शक्या । दृष्टा- न्तश्च साधनविकलः । आकाशस्य महापरिमाणाधिकरणतयाँ परिमाणमात्राधिकरणत्वायोगात् । नित्यद्रव्यत्वं च सर्वथाः ऽसिद्धम् । नित्यस्य क्रमामाभ्यामर्थक्रियाविरोधादिति । प्रस: ज्यपक्षेऽपि तुच्छाभावस्य ग्रहणोपायासम्भवात् न विशेषण - मस्य हेतोाप्तत्वाविरुद्धत्वमणुपरिमाणानधिकरणत्वे सति नित्यद्रव्यत्वादिति हेतोः। १ भवतीति शेपः। २ परिमाणसामान्याधिकरणम् । ३.आ-: त्मनः । ४. यथा द्रव्यत्वस्य द्रव्य एव समवायो, गुणत्वस्य गुण एक तथा परिमाणसामान्यस्य ( परिमाणत्वस्य ) परिमाण ऍव समवाय नात्म- . नति व्यधिकरणासिद्धिरिति । ५ दूषणान्तरं । दीयतें। ६ आत्मनिः ।। ७ आत्मनि परिमाणविशेषाधिकरणाऽसिद्ध 'नहि परिमाणसामान्याधिकरणकला- ना युज्यते,सामान्यस्याशेषविशेषनिष्ठत्वात् । ८ प्रतिपन्नत्वात् । ९ हेतो- विशेष्यासिद्धिमुद्भभावयति । १० युगपत् । ११ सर्वथाऽभावस्य प्राहक प्रमाण नास्तीति भावः। १२ अणुपरिमाणाधिकरणत्वे सतीति हेतोर्वि- शेषणं यदि तुच्छाभावरूपं । तर्हि तहणोपायाभावाद्धेतीविशेषणासिद्धि गृही. , -- . परीक्षामुखम् । त्वम् । न चागृहीतविशेषणं नाम, न चागृहीविशेषणा विशेप्यो वुद्धिरितिवचनान्न प्रत्यक्षं तद्रहणोपायः सम्बन्धाभावादि. न्द्रियार्थसन्निकर्पज हि प्रत्यक्षं तन्मते प्रसिद्धम् । विशेषण- विशेष्यभावकल्पनायामभावस्य नागृहीतस्य विशेषणत्वमिति तदेव दूपणम् । तस्मान्न व्यापकमात्मद्रव्यम् । नापि वटक- णिकामा कमनीयकान्ताकुचजघनसंस्पर्शकाले प्रतिलोमकु- पमाल्हादनकारस्य सुखस्यानुभवनात् । अन्यथा सर्वाङ्गीण रोमाञ्चादिकार्योदयायोगात् । आ वृत्त्यालातचक्रवत् क्रमे गैव तत्सुखमित्यनुपपन्नम् । परापरान्तःकरणसम्वन्धस्य सत्कारणस्य परिकल्पनायां व्यवधानप्रसङ्गात् । अन्यथा सुखस्य मानसप्रत्यक्षत्वायोगादिति । नापि पृथिव्यादिच तुष्ट्यात्मकत्वमात्मनः सम्भाव्यते । अचेतनेभ्यश्चैतन्योत्प. योगाद्रारणेरणद्रवीणतालक्षणान्वयाभावाच्च । तदेहात तविशेषणं नामेति नियमात्तदासद्धौ च नित्यद्रव्यत्वादिति विशेष्यासद्धिश्च ना गृहीतविशेषणा विशेष्ये वुद्धिरिति नियमात् । नहि दडाग्रहणे दंडिनि बुद्ध- युज्यते । १ अगृहीतं विशेषणं न भवतीति भावः २ अगृहीतं वि. शेषणं यया सा। ३ दण्डिनि । ४ तुच्छाभाव । ५ योगमते । ६ पूर्वोक्तमेव । ७ आत्मनो व्यापककल्पनायामनेकदोषसंभवात् । ८ सर्वाङ्गीणम् । ९ यदि कमनीयकान्ताकुचजघनसंस्पर्शकाले प्रतिलोम. कूपमाल्हादनाकारं सुखं न भवति चेत् । १० शीघ्रवृत्या। कारणस्य। १२ तत्सुखं मानसं नेति शंकायामाह तत्सुखस्य मानसत्वा- कल्पेन । १३ धारणलक्षणा पृथिवी । १४ ईरणलक्षणो वायुः । १५ द्र- - ११ सुख- . . J प्रमेयरत्नमालासहितम् । १८१ Tiwa वालकस्य स्तनामावभिलाषाभावप्रसङ्गाच्च । अभिलाषा हि प्रत्यभिज्ञाने भवति, तच्चे स्मरणे. स्मरणं चानुमाचे भवतीति पूर्वानुभवः सिद्धः। मध्यदशायां तथैव व्याप्तेः । मृतानां रक्षो यक्षादिकुलेषु स्वयमुत्पन्नत्वेन कथयता दर्शनात् , केषाञ्चित् भवस्मृतेरुपलम्भाच्चानादिश्चेतनः सिद्ध एव । तथा चोक्तम्- तदहर्जस्तनेहातो रक्षोडष्टर्भवस्मृतेः । भूतानन्वयनात्सिद्धः प्रकृतिज्ञः सनातनः ॥ १॥ इति । न च स्वदेहप्रमितिरात्मेत्य. त्यत्रापि प्रमाणाभावात् सर्वत्र संशय इति वक्तव्यं तत्रानु- मानस्य सद्भावात् । तथाहि देवदत्तात्मा तद्देह पत्र तत्र सर्वत्रैव च विद्यते तत्रैव तत्र सर्वत्रौव च स्वासाधारणगुणाधा. रतयोपलम्भात् । यो यौव यत्र सर्वत्रैव च स्वासाधारण- गुणाधारतयोपलभ्यते स तत्रैव तत्र सर्वत्रैव च विद्यते यथा देवदत्तगृहे एव तत्र सर्वत्रैव चोपलभ्यमानः स्वासाधा. रणभासुरत्वादिगुणः प्रदीपः तथाचायं तस्मात्तथेति । वलक्षणं जलम् । १६ उष्णतालक्षणोऽग्निः । १७ तत्कालीनसमुत्पन्न । १ प्रत्यभिज्ञानं च । २ युवावस्थायाम् । ३ अभिलाषायाः कारण प्रत्य. भिक्षानं तच्च सति स्मरणे, स्मरण च सति पूर्वानुभवे इति व्याप्तेः। ४ भू तसंघातस्यान्वयाभावात् । ५ स्वदेहप्रमितौ व्यापके वटकणिकामात्र च । ६ आत्मा स्वदेहप्रमितिरित्यत्र । ७ अस्मिन्ननुमाने साध्यसाधनयोरात्मनो वटकणिकापरिमाणप्रतिषेधार्थ तत्र सर्वत्रैवेति पद दत्तं, · व्यापकत्वनिरासार्थ तदेह एवेति पदं दत्तमिति । ८ देहे। ९ तत्रैव तत्र सर्वत्रैव च स्वासा. धारणगुणाधारवांश्च देवदत्तत्मा'। १० तम्मात्तदेह एव तत्र सर्वत्रय च. वि. त - - २६२ परीक्षामुखम् ।.. देसाधारणगुणा ज्ञानदर्शनसुग्ववीर्यलक्षणास्ते च सर्वागीणा. स्तत्रैव चोपलभ्यन्ते ॥ सुखमाल्हादनाकारं विज्ञानं मेयवोध- नम् । शक्तिः क्रियानुमेया स्पाधूनः कान्तासनागमे ॥१॥ इति वचनात् । तस्मादात्मा देहप्रमितिरेव स्थितः । द्वितीय चिशेपभेदमाह- अर्थान्तरंगतो विसर्शपरिणामो व्यतिरेको गोमहिपादिवत् ॥ ८॥ वैसादृश्यं हि प्रतियोगिग्रहणे सत्येव भवति । न चापेक्षि. कत्त्वादस्यांवस्तुत्वमवस्तुन्यापेक्षिकत्त्वायोगात् । अपेक्षाया वस्तुनिष्ठत्वात् ।। स्यात्कारलाच्छितमवाध्यमनन्तधर्म संदोहमितमशेषमपि प्रमेयम् ॥ देवैः प्रमाणवलतो निरचायि यम्। ५ १२ द्यमानः। १ आत्मासाधारणगुणाः। २ गुणाश्च । ३ आत्मन्येव । ४ अनुमानसामर्थ्यात् । ५ एकस्मादर्थात्सजातीयो विजातीयो वार्थोऽधी- न्तरम् , ततोऽयान्तरगतः। ६ खण्डलक्षणादोः सजातीयो मुण्डलक्षणो गौः, विजातीयो महिपः , खण्डापेक्षया मुण्डो विशदृशाकारो माहयापक्षया च नविशदशाकार इत्यर्थः । ७ विशेप इति सम्बन्धः । ८ यथा गोपु खण्डमु ण्डादिलक्षणा, महपेषु विशालविसंकटत्वलक्षणी, गोमहषेषु च परस्परमसाधार- णस्वरूपलक्षणो विसदृशपरिणामोऽस्ति ।:: ९ वैसादृश्यस्य । र्थाऽभावे । ११. संयुतम् । १२ अकलंकदेवैः । १३ विरचितम् ॥ १.१४ प्रमे १०सवः " प्रमेयरत्नमालासहितम् । १३ संक्षिप्तमेव मुनिभिर्विवृतं मयैतत् ॥ १॥ इति परीक्षामुखस्य लघुवृत्तौं विषयसमुद्देशश्चतुर्थः ॥ ४ ॥ ॥ अथेदानी फलविप्रतिपत्तिनिरासार्थमाह- अज्ञाननिवृत्तिहानोपादानोपेक्षाश्च फलम् ॥ १॥ द्विविधं हि फलं साक्षात्पारम्पर्येणेति । साक्षादज्ञाननि-. वृत्तिः पराम्पर्येण हानादिकमिति, प्रमेयनिश्चयोत्तरकालभाषि- 'त्वात्तस्येति । तद्विविधमपि फलं प्रमाणाद्भिन्नमेवेति यौगाः। अभिन्नमेवेति सागताः। तन्मतद्वयनिरासेन स्वमतं व्यवस्था. पयितुमाह--- प्रमाणादभिन्न भिन्न च ॥ २ ॥ कथंचिदभेदसमर्थनार्थ हेतुमाह-- यः प्रमिमीते स एव निवृत्तज्ञानो जहाँत्यादत्त यम् । ३ अज्ञानम- रे १' माणिक्यनन्दिदेवैः । २ अनन्तवीर्येण ज्ञप्तिः स्वपररूपव्योमोहस्तस्य निवृत्तियथावत्तद्रूपयोप्तिः । ४ अज्ञान निवृत्तिः प्रमाणस्याभिन्नं फलमत्र कथंचिदभेदो दृष्टव्यः ‘कारणकार्यभे- दादिति । ५ हानोपादानोपेक्षाश्च प्रमाणस्य भिनं फलमत्रापि कथाचिद्भदौ दृष्टव्यौ, सर्वथा भेदे प्रमाणफलव्यवहारविरोधादिति । ६ यः प्रतिपत्ता । ७ स्वार्थप्रहणपरिणामेन परिणमते । ८ स्वविषये व्यामोहरहितः । अभिप्रेतप्रयोजनाप्रसाधकमर्थं जहाति १०.अभिप्रेतप्रयोजनप्रसा- .
१८४ परीक्षामुखम् । उपेक्षते चति प्रतीतेः॥ ३ ॥ अयमर्थः-यस्येवात्मनः 'प्रमाणाकारेण परिणतिस्तस्यैव फलरूपतया परिणाम इत्येकप्रमाप्रपेक्षया प्रमाणफलयोरभेदः । करणक्रियापरिणामभेदाभेद इत्यस्य सामर्थ्यसिद्धत्त्वा-- नोक्तम् ॥ पराम्पर्येण साक्षाच्च फलं द्वधाऽभिधायि यत् । देवैभिन्नमभिच प्रमाणात्तदिहोदिनम् ॥ १ ॥ इति परीक्षामुखलघुवृत्ती फलसमुद्देशः पञ्चमः ॥ ५ ॥ अथेदानीमुक्तप्रमाणस्वरूपादिचतुष्टयाभासमाह- ततोऽन्यत्तदाभासमिति ॥ १ ॥ तत उक्तात् प्रमाणस्वरूपसंख्याविषयफलभेदादन्यद्विप- रीतं तदाभासमिति । तत्र क्रमप्राप्त स्वरूपाभासं दर्शयति- अस्वसविदितगृहीतार्थदर्शनसंशयादयः । ३ भे. धकमर्थमादत्ते । १ उभयप्रयोजनाऽप्रसाधकं तूपेक्षणीयमुपेक्षते । माणफलयोः कथञ्चिद्भेदाभेदव्यवस्था प्रतिपत्तव्येति सम्बन्धः दस्य ।' ४ भेदरूपफलं सूत्ररूपेण न निवद्धम् । ५ अकलंकवर्माणिक्यनन्दि. 'देवश्च ।। ६. अनन्तवीर्येण । ७ . अस्वसंविदितस्य स्वग्राहकत्वाभावे. नार्थप्रतिपत्ययोगात्प्रवृत्तिविपयोपदर्शकत्वाभावः । ८ निर्विकल्पकं दर्शनं तस्य प्रवृतिविषयोपदर्शयत्वाभावस्तजनितविकल्पस्यैव तदुपदर्शकत्वात् । ९ आ- ५ प्रमेयरनमालासहितम् । १८५ प्रमाणाभासाः॥२॥ अस्वसंविदितञ्च गृहीतार्थञ्च दर्शनञ्च संशय आदिर्येषां ते संशयादयश्चेति सर्वेषां द्वन्द्वः । आदिशब्देन विपर्ययान- ध्यवसाययोरपि ग्रहणम् । तत्रास्वसंविदितं ज्ञान ज्ञानान्तर- प्रत्यक्षत्वादिति नैयायिकाः । तथाहि ज्ञानं स्वव्यतिरिक्तवेदन. वेद्यं वेद्यत्वात् घटवदिति तदसङ्गतम्-धर्मिज्ञानस्य ज्ञानान्तरवेद्यत्वे साध्यान्तःपातित्वेन धर्मित्वायोगात् । स्थ- संविदितत्वे तेनैव हेतोरनेकान्तात् । महेश्वरज्ञानेन च व्यभि. चाराद्याप्तिज्ञानेनाप्यनेकान्तादर्थप्रतिपत्त्ययोगाच्च । नहि ज्ञाप- E - दिना विपर्ययानध्यवसायौ ग्राह्यो । १ ज्ञानान्तरवेद्यमित्यर्थः २ प्रमेयत्वात् । ३ प्रत्यक्षादिप्रमाणप्रसिद्धो हि धर्मी भवति, न चात्रानु- माने धर्मिज्ञान प्रमाणप्रसिद्धमस्ति ततस्तस्य साध्यान्तःपातित्वेन धर्मित्वा- योगात् , धर्मिणो ज्ञानस्यासिद्धेश्च वेद्यत्वादिति हेतुराश्रयासिद्ध इति भावः । ४ धर्मिज्ञान स्वसविदितं ततो न यथोक्तदोषानुषन इति शंकायामाह । ५ धर्मिज्ञानेनैव । ६ वेद्यत्वादिति हेतोः । ७ धर्मिज्ञाने हि वेद्यत्वमस्ति. परन्तु स्वव्यतिरिक्तवेदनवेद्यत्व नास्ति ततः साध्याभाववति विपक्षेऽपि हेतोः सद्भावाध्यभिचारित्वमिति । ८ महेश्वरज्ञाने ज्ञानान्तरवेद्यत्वं नास्ति वेद्यत्वम. स्ति ततस्तेन व्यभिचारः । ९ ज्ञानान्तरेण व्याप्तिज्ञाने व्यवधानाभावात् । १०ज्ञानं स्वपरप्रकाशकं ज्ञानत्वान्महेश्वरज्ञानवदव्यवधानेनार्थप्रकाशकत्वाद्वाऽर्थ ग्रहणात्मकत्वाद्वा, महेश्वरज्ञानवत्' यत्पुनः स्वपरप्रकाशकं न भवति न तज्ज्ञान. पळवधाननार्थप्रकाशकमधग्रहणात्मकं वा यथा चक्षुरादि । ११ ज्ञानम् ।
१८६ परीक्षामुखम् कमप्रत्यक्षं झाप्यं गमयति शब्दलिङ्गादीनामपि तथैव ग. मकरवप्रसङ्गात् । अनन्तरभाविज्ञानग्राहात्ये तस्यायं गृहीतस्य पराज्ञापकत्वात्तदनन्तरं फल्पनीयम् । तत्रापि तदनन्तरमित्य नवस्था तस्मानाय पक्षः श्रेयान् । एतेने करणज्ञानस्य परोक्ष. त्वेनास्वसंविदितत्वं ब्रुवन्नपि सीमांसकः प्रत्युक्तः । तस्यापि नतोऽर्थप्रत्यक्षत्वायोगात् । अथ कर्मत्वेनाप्रतीयमानत्वादप्रत्यः क्षत्वे तर्हि फलशानस्याप्रत्यक्षता तते एव स्यात् । अथ फल- त्वेन प्रतिभासनं नो चेत् करणज्ञानस्यापि करणत्वेनावभास. नात् प्रत्यक्षत्वमस्तु । तम्मादर्थप्रतिपत्त्यन्यथाऽनुपपत्तेः करण- ज्ञानकल्पनावदर्थप्रत्यक्षत्वान्यथाऽनुपपत्तेानस्थापि प्रत्यक्षा मस्तु । अथ करणस्य चक्षुरादेरप्रत्यक्षत्वेऽपि रूपमाफट्याय h ४ १ ज्ञेयम्। २ अन्यथा । ३ अप्रत्यत्यक्षत्वेनैव । प्रधमज्ञानस्य । ५ अनन्तरंभाविज्ञानस्यापि । ६ अपरज्ञानेनागृहातस्य । ७ प्रथमना- नस्य । ८ ज्ञानम् । ९ तदनन्तरमानेऽपि । १० ज्ञानं ज्ञानान्तरवां प्रमेयत्वादिति पक्षः। ११ ज्ञानान्तरवेद्यज्ञाननिराकरणेन । १२ भाट्टः प्रभाकरस्य । भामते मात्मा प्रत्यक्ष प्रभाकरमते तु फरमानं प्रत्यक्षम् । १३ मीमांसकस्यापि । १४ करणज्ञानतः । १५ प्रभाकर आह। १६ करणज्ञानस्य । १७ यदि कर्मत्वेनाप्रतीयमानत्वात्करणज्ञानस्य परोक्ष- ता तहि। १८ प्रमितिक्रियायोः । १९ कर्मत्वेनाप्रतीयमानत्वादेव । २० भारस्य तु कर्मत्वेनाप्रतीयमानत्वादात्मनोऽप्यप्रत्यक्षता त्यादिति । २१ फ- लज्ञानस्य । २२ अतः परोक्षता नो चेदिति सम्बन्धः । २३ तर्हि । २४ करण- प्रमेयरनमालासहितम् । -- भिचार इति चेन्न, भिन्नकर्तृककरणस्यैव तद्यभिचारात् । अभिन्नकर्तृके करणे सति कर्तृप्रत्यक्षतायां तदभिन्नस्यापि करणस्य कथञ्चित्प्रत्यक्षत्वेनाप्रत्यक्षतैकान्तविरोधात्प्रकाशा- त्मनोऽप्रत्यक्षत्वे प्रदीपप्रत्यक्षत्वविरोधवदिति । गृहीतग्राहिज्ञानं गृहीतार्थ, दर्शनं सौगताभिमतं निर्विकल्पकं, तञ्च स्वविष- यानुपदर्शकत्वादप्रमाणं व्यवसायस्यैव तज्जनितस्य तदुपदर्श कत्त्वात् । अथ व्यवसायस्य प्रत्यक्षाकारणानुरक्तत्वात्ततः प्रत्यः क्षस्यैव प्रामाण्यं व्यवसायस्तु गृहीतंग्राहित्वादप्रमाणमिति तन्न सुभाषितं-दर्शनस्थाविकल्पकस्यानुपलक्षणात्तत्सद्भावा. योगात् सद्भावे वा नीलादाविध क्षणक्षयादावपि तदुपदर्शक- त्वप्रसङ्गात् । तेत्र विपरीतसमारोपान्नेति चेत्तर्हि सिद्ध, नी- -- ज्ञानमन्त्यर्यप्रतिपत्यन्यथानुपपत्तरिति चेत् करणज्ञान प्रत्यक्षमर्थप्रत्यक्ष- त्वान्यथानुपपत्तेरित्यपि भवत्विति भावः १ करणभूते चक्षुरादौ रूपा- दिप्राकट्यमस्ति प्रत्यक्षत्वं नास्ति ततः साध्याभाषति हेतोः सद्भावाध्यभि- चार इति। २' करणं द्वेघा विभक्काविभक्तकर्तृकभेदात् , क्तुरन्यद्विभक्तक- र्तृकंकरणं यूथा, परशुना. छिनत्ति देवदत्तः। कर्तुरनन्यदविभक्तकं यथाऽग्निर्दहत्यौष्णेनेति, इह त्वविभक्तकर्तृककरणं विवक्षितं तस्माद्विभक्तकर्तृ. ककरणेन व्यभिचारोऽपि न दोषायति भावः । ३ हेतोः । ४. कर्तृ । ५ दर्शनम् । ६ दर्शन । ७ प्रत्यक्षविषयोपदर्शकत्वात् । सविकल्पज्ञानस्य । ९ प्रत्यक्षगृहातविषयस्यैव प्राहकत्वाअवसायस्येति , भा- वः । १० दर्शन। ११ दर्शन।, १२. क्षणक्षमायौ। १३ न. क्षणिक ८ - परीक्षामुखम् । लादी समारोपविरोधिग्रहणलक्षणों निश्चय इति तदात्मकमेव प्रमाणमितरत्तदाभासमिति । संशयादयश्च प्रसिद्धा एव । तत्र संशय उभयकोटिसंस्पर्शी स्थाणुर्वा पुरुषो वेति परामर्शः। वि. पर्ययः पुनरतस्भिस्तदिति विकल्पः । विशेपानवधारणमनध्यव- सायः । कथमेपामस्वसंविदितादीनां तदाभासतेत्यत्राह- स्वैविषयोपदर्शकत्वाभावात् ।। ३ ।। गतार्थमेतत् । अत्र द्वमान्तं यथाक्रममाह- पुरुपान्तरपूर्वार्थगच्छत्तॄणस्पर्शस्थाणुपुरुषादिज्ञानवत् ॥४॥ पुरुषान्तरं च पूर्वार्थश्व गच्छत्तृणस्पर्शश्च स्थाणुपुरुषादिश्च तेषां ज्ञानं तद्वत् । अपरं च सन्निकर्षवादिनं प्रति दृष्टान्नभाह- चर्रसयोर्द्रव्ये संयुक्तसमवायवच्च ॥ ५ ॥ अयमों यथा चदरसयोः संयुक्तसयवायः सन्नपि न प्र- माणं तथा चक्षुरूपयोरपि । तस्मादयमपि प्रमाणाभास एवेति । उपलक्षणमेतत् अतिव्याप्तिकथनमव्याप्तिश्च सन्निकर्पप्रत्यक्ष- वादिना त्रक्षुषि सन्निकर्षस्याभावात् । यथा चक्षुः प्राप्तार्थपरि. १ २ नित्यमिति विपरीतसमारोपात् । निश्रयात्मकमेव । निर्विर- ल्पात्मकम् । ३ प्रवृत्तिविषयोपदर्शकत्वाभावात् । ४ सनिकर्षः प्रमाण- मिति लक्षणे सति चक्षुरसयोः संयुक्तसमवायसनिकपोऽस्ति परन्तु तत्र चक्षुषा रसप्रतिपत्तिर्नास्ति तस्मात्प्रभित्यभावेऽपि लक्षणसद्भावादतिव्याप्ति- रिति । ५ चक्षुर्मनसोः प्रमित्युत्पादकत्वमस्ति सग्निकपत्वं नास्ति तस्माल्ल- क्ष्यम.व.व्याप्तत्वाल्लक्षणस्याव्याप्तिरिति । ६ अप्राप्यकारि चक्षुः स्पृष्टानव- द प्रमेयरत्नमालासहितम् । १८९ च्छेदकं व्यवहितार्थाप्रकाशकत्वात् प्रदीपवदिति तंत्सिद्धिरिति मतं तदपि न साधीयः । काचाभ्रपटलादिव्यवहितार्थानामपि चक्षुषा प्रतिभासनाद्धेतोरसिद्धः । शाखाचन्द्रमसोरेककालद. र्शनानुपपत्तिप्रसक्तेश्च । न च तंत्र क्रमेऽपि योगपद्याभिमान इति वक्तव्यम् । कालव्यवधानानुपलब्धेः । किञ्च क्रमप्रतिपत्तिः प्राप्तिनिश्चये सति भवति । न च क्रमप्राप्तौ प्रमाणान्तरमस्ति । तैजसत्वमस्तीति चेन्न तस्यासिधैः । अथ चक्षुस्तैजसं रूपा. दोनों मध्ये रूपस्यैव प्रकाशकत्त्वात् प्रदीपवदिति । तदप्यप. - ग्रहात् । यदि प्राप्यकारि चक्षुः त्वगिन्द्रियवस्पृष्टमंजनं गृह्णीयात् , न च गृह्णात्यतो मनोवदप्राप्यकारीत्यवसेयम् । १ प्राप्ताथंपरिच्छेदकत्वसिद्धिरिति । २ शाखाचन्द्रमसोरेककालाहणे ।. ३ शाखाचन्द्रमसोरेककालग्रहणे कालव्य - वधानो नोपलभ्यत इति भावः । ४ क्रमप्राप्तिनिश्चये। ५ क्रमप्राप्तिान- श्चये तेजसत्वं प्रमाणमस्ति, चक्षुषः तजोद्रव्यत्वात्क्रमणैव शाखाचन्द्रमो. प्राप्तिरिति भावः ६ अतैजस चक्षुर्भासुरत्वानुपलब्धेरित्यनेन च- क्षुषः तैजसत्वमसिद्धमिति । आदिपदेन रसगन्धस्पश्चि गृह्यन्ते । ८ चक्षुस्तैजसं रूपस्यैव प्रकाशकत्वादित्युच्यमाने येनेन्द्रियेण यद्ग- ह्यते तेनैव तज्जातिस्तदभावश्च गृह्यत इति नियमाद्धेतुः स्वरूपा- सिद्धः स्यादतस्तद्वारणाय रूपादीनां मध्ये-इति विशेषणं दत्तमिति प्रदीपस्य स्वीयस्पर्शव्यञ्जकत्वादन दृष्टान्तेऽतिव्याप्तिवारणाय परकीयर- साद्यव्यजकत्व इति विशेषणम्, तथा घटादेः स्वीयरूपव्यजकत्वायभिचा- रवारणाय परकीयरूपव्यजकत्वादिति विशेष्यम् चक्षुः सनिक व्य- .
१९० परीक्षामुखम् । सात लोचिताभिधानं मण्यञ्जनादेः पार्थिवत्त्वेऽपि रूपप्रकाशक- त्वदर्शनात् । पृथिव्यादिरूपप्रकाशकत्त्वे पृथिव्याधारब्धत्व- प्रसङ्गाच्च । तस्मात्सन्निकर्षस्थाव्यापकत्वान्नाप्रमाणत्वं कर जज्ञानेन व्यवधानाच्चेति । प्रत्यक्षाभासमाह- अवैशये प्रत्यक्षं तदोभासं बौद्धस्याकस्माद्धम- दर्शनाद्वद्रिविज्ञानवदिति ॥ ६ ॥ परोक्षाभासमाह- वैशोऽपि परोक्षं तदाभासं मीमांसकस्य करणज्ञानवत् ॥ ७॥ भिचारवारणाय द्रव्यत्वं देयम् तथा चक्षुस्तजस द्रव्यत्वे सति परकीररसाद्यव्यजकत्वे सति च परकीयरूपव्यंजकत्वात्प्रदीपव- दित्यनुमानं भवति । १ मण्यंजनादौ तेजसत्वं नास्ति प्रकाशकत्वमस्ति तस्मात्साध्याभावेवति मण्यंजनादी हेतोः सद्धावा. यभिचारित्वं तस्येति भावः । २ चक्षुपस्तेजोल्पाभिव्यंजकत्वात्तेजः कार्य- स्ववत्पृथिव्यप्कार्यत्वप्रसङ्ग इति भावः । ३ यतश्चक्षुर्भनश्चाप्राप्तमर्थमुपल- ४ प्रमाणोत्पत्ती सनिकर्षस्य करणज्ञानेन व्यवधानमस्ति, साधकतमं करणमिति" नियमात्तत्र साधकतमं करणं ज्ञानमेव न स निकर्ष इति भावः । ५ यथा धूमवाप्पादिविवेकनिश्चयाभावाद्याप्ति ग्रहणाभावादकरमालूमाज्ज त यहिविज्ञानं तत्तदाभासं भवति कस्माद- निश्चयात् । “तथा · बौद्धपरिकल्पितं यन्निविकल्पकप्रत्यक्षं तत्प्रयं- क्षाभासं कस्मादनिश्चयात ६ परोक्षाभासम् ।। ७. मीमांसकमते रूपस्य भने । । - , प्रमेयरत्नमालासहितम् । १९१ - प्राक् प्रपञ्चितमेतत् । परोक्षभेदाभासमुपदर्शयन् प्रथम क्रमप्राप्त स्मरणामोसमाह--- अतस्मिस्तदिति ज्ञानं स्मरणाभासं जिनदत्ते स 'देवदत्तो यथेति ॥ ८॥ अतस्मिन्नननुभूत इत्यर्थः शेषं सुगमम् । प्रत्यभिज्ञाना. भासमाह- सदृशे तदेवेदं तस्मिन्नेव तेन सदृशं यमलकव- दित्यादि प्रत्यभिज्ञानाभासम् ॥ ९॥ द्विविधं प्रत्यभिज्ञानाभासमुपदर्शितं, एकत्वनिबन्धनं सा- सादृश्यनिवन्धनं चेति । तत्रैकत्त्वे सादृश्यावभासः साढस्ये चैकत्वावभासस्तदाभासमिति । तर्कामासमाह- असम्बद्ध तज्ज्ञानं तर्कामासम् ॥ १० ॥ यावांस्तत्पुत्रः स श्याम इति यथा । तज्ज्ञानमिति व्याप्ति- लक्षणसम्बन्धज्ञानमित्यर्थः इदानीमनुमानाभासमाह- इदमनुमानाभासम् ॥ ११ ॥ इद वक्ष्यमाणमिति भावः तत्र तदवयवाभासोपदर्शनेन 1 - . . करणज्ञानं ज्ञानान्तरवेद्यमिति परन्तु नहि करणज्ञानऽव्यवधानेन' प्रतिभासलक्षणं वैशद्यमसिद्ध स्वार्थयोः प्रतीत्यन्तरनिरपेक्षतया · तत्र प्रतिभा. सनादिति । १ एकत्वप्रत्यभिज्ञानाभासम् । २ सादृश्यप्रत्यभिज्ञानाभासम्, स्वय स्वेन सदृशमित्यर्थः। युगल । ४ प्रत्यभिज्ञानाभासम् । ५ अ- ३ २५२ परिक्षामुखम् । समुदायरूपाजुमानाभासमुपदर्शयितुकामः प्रथमास्यवाभा- समाह. -- तत्रानिष्टादिः पक्षाभासः ।। १२ ।। इष्टमवाधितमित्यादि नल्लक्षणमुक्तमिदानीं तद्विपरीतं त- दामासमिति कथयति- अनिष्टो मीमांसकस्यानित्यः शब्दः ॥ १३ ॥ असिद्धाद्विपरीतं तदाभासमाह- सिद्धः श्रावणः शब्दः इति ॥ १३ ।। अवाधितमविपरीतं तदाभासमावेदयन् स च प्रत्यक्षादि- बाधित एवेति दर्शयन्नाह-- वाधितः प्रत्यक्षानुमानागमलोकस्ववचनैः ।। १५ ।। एतेषां क्रमेणोदाहरणमाह-- तत्र प्रत्यक्षवाधितो यथा अनुष्णोऽग्निद्रव्यत्वा. ज्जलवत् ॥१६॥ स्पार्शनप्रत्यक्षेण धुणस्पर्शात्मकोऽग्निरनुभूयते। अनुमान- । २ विनाभावाभावे ऽव्याप्तौ। ६ व्याप्तिज्ञानम् । १ अनुमानाभासे । वादिनोऽनभिप्रेतादिः । ३ स हि प्रतिवादिसभ्यसभापतिदर्शनात्कदाचिदा- कुलितवुद्धिः स्वाभिप्रेतं नित्यः शब्द इति पक्षं विस्मरत्ननभिप्रेतमपि पक्षं ४ पक्षाभासः । ५ वादिप्रतिवादिनोः सिद्धेऽर्थऽविप्रतिपत्तेः । ६ वाधितपक्षाभासः प्रत्यक्षादिवाधेितपक्षाभासानाम् । करोति । 1 - प्रमेयरत्नमालासहितम्। १९३ बाधितमाह-- अपरिणामी शन्दः कृतकत्वात् घटवत् ॥ १७ ॥ अत्र पक्षोऽपरिणामी शब्दः कृतकत्वादित्यनेन वाध्यते । आगमवाधितमाह-- प्रेत्यासुखप्रदो धर्मः पुरुषाश्रितत्वादधर्मवत् ॥ १८ ॥ आगमे हि पुरुषाश्रितत्वाविशेषेऽपि परलोके धर्मस्य सुख- हेतुत्वमुक्तम् । लोकवाधितमाह-- शुचि नरशिर कपालं प्राण्यंगत्वाच्छंखशुक्तिवत् ॥ १९ ॥ लोके हि प्राण्यंगत्वेऽपि कस्यचिच्छुचित्त्वमशुचित्वं च तत्र नरकपालादीनामशुचित्वमेवेति लोकवाधितत्वम् । स्ववचन- बाधितमाह-- माता मे वन्ध्या पुरुषसंयोगेऽप्यगर्भत्वात्मसि- द्धवन्ध्यावत् ।। २० ॥ इदानी हेत्वाभासान् क्रमापन्नानाह-- हेत्वाभासा असिद्धविरुद्धानकान्तिकाकिञ्चित्कराः ॥२१॥ एषां यथाक्रमं लक्षणं सोदाहरणमाह-- असत्सत्तानिश्चयोऽसिद्धः ॥ २२ ॥ १ परिणामी शब्दोऽर्थक्रियाकारित्वात्कृतकत्वाद् घटवदित्यनेनानुमानेनापरिणामी शब्द इति पक्षो वाध्यते । २ यथा गोपिण्डत्वाविशेषेऽपि किश्चिद् दुग्धादि शुद्ध न गोमांसमिति तथा प्राण्यंगत्वाविशेपेऽपि नरशिरःकपालस्याशुचित्वं शंख. १३ + १९४ परिक्षामुखाम् । सत्ता च निश्चयश्च सत्तानिश्चयौ, असन्तौ सत्तानिश्चयो यस्य स भवत्यसत्सत्तानिश्चयः । तत्र प्रथमभेदमाह-- अविद्यमानसत्ताकः परिणामी शब्दश्चाक्षुपत्वात् ।।२३।। कथमस्यासिद्धत्वमित्याह-- स्वरूपेणीसत्त्वात् ॥ २४ ॥ -- , शुवत्यादेः शुचित्वमिति । १ अविद्यमाना साध्यनासाध्येन ( दृष्टान्तेन ) उ. भयेन चाऽविनाभाविनी सत्ता यस्यासावसिद्धः । २ चक्षुज्ञानग्राह्यत्वं हि चाक्षुपत्वं, तच शब्द स्वरूपेणैवासत्वारस्वरूपासिद्धम् । ये च विशेप्यासिद्धा- दयोऽसिद्धप्रकाराः परेनैयाथिकादिभिरिटास्तऽसत्सत्ताकत्वलक्षणामिप्रकारान्ना- थान्तरं तल्लक्षणभेदाभावात् तत्र विशेष्यासिद्धो यथा-अनित्यः शब्दः सामा- न्यवत्वे सति चाक्षुपत्वात् । विशेषणासिद्धो यथा-अनित्यः शब्दश्चाक्षुपत्वे सति सामान्यवत्वात् । आश्रयासिदो यथाऽस्ति प्रधानं विश्वपरिणामित्वात् वस्तुतः प्रधानं नास्तीति भावः । आश्रयैकदेशासिद्धो 'यथानित्याः परमाणुप्रधानात्मेश्व- रा अकृतकत्वात् । व्यर्थविशेष्यासिद्धो यथाऽनित्याः परमाणवः कृतकत्वे सति सामान्यवत्वात् । व्यर्थविशेषणासिद्धो यथाऽनित्याः परमाणवः सामान्यवत्वे सति कृतकत्वात् । व्यधिकरणासिद्धो यथाऽनित्यः शब्दः परस्य कृतकत्वात् । भागासिद्धो यथा नित्यः शब्दः प्रयत्नानंतरीयकत्वात् । व्यधिकरणासिद्धत्वं च परप्रक्रियाप्रदर्शनमात्रं न वस्तुतो हेतुदोषो व्यधिकरणास्याप्युपदेष्यति शकटं कृतकोदयादित्यादर्गमकत्वप्रतीतेः । भागासिद्धस्याप्यविनाभावसद्भावाद्गम- कत्वमेव न खलु प्रयत्नानन्तरीयकत्वमनित्यत्वमन्तरेण , कापि दृश्यते यावति, शब्द.तत्प्रवर्तते तावतः शब्दस्यानित्यत्वं ततः सिध्यति अन्यस्यत्वन्यतः कृत- १ -- प्रमेयरत्नमालासहितम् । द्वितीयासिद्धभेदमुपदर्शयति-- अविद्यमाननिश्चयो मुग्धबुद्धिं प्रत्याग्निरत्रधूमादिति ॥२५॥ अस्याप्यसिद्धता कथमित्त्यारेकायामाह-- तस्य बाष्पादिभावेन भूतसङ्घाते संदेहात ॥ २६ ॥ तस्येति मुग्धबुद्धिं प्रतीत्यर्थः । अपरमसिद्धभेदमाह-- सांख्यम्प्रति परिणामी शब्दः कृतकत्त्वादिति॥ २७ ॥ अस्यासिद्धतायां कारणमाह- तेनाज्ञातत्वादिति ॥ २८॥ विरुद्ध हेत्वाभासमुपदर्शयन्नाह-- विपरीतनिश्चिताविनाभावो विरुद्धोऽपरिणामी शब्दः कृतकत्वात् ॥ २६ ॥ तेन सांख्येनाज्ञातत्वात्, तन्मते ह्याविर्भावतिरोभावावंव प्रसिद्धौ नोत्पत्त्यादिरिति । अस्याप्यानिश्चयादसिद्धत्वमित्यर्थः। - कत्वादेः । १ पृथिव्यादिलक्षणानां भूतानां सङ्घातो धूमस्तस्मिन् धूमे । २ विद्यमानधूमेऽपि । ३ सन्दिग्धविशेष्यादयोऽप्यविद्यमाननिश्चयतालक्षणा. तिक्रमाभावान्नार्थान्तरम् तत्र संदिग्धविशेष्यासिद्धो यथाऽद्यापि रागादियुक्तः कपिलमुनिः पुरुषत्वे सत्यप्यस्यानुत्पन्नतत्वज्ञानत्वात् । सन्दिग्धविशेषणासि- द्धो यथाऽद्यापि रागादियुक्तः कपिलमुनिः, सर्वदा तत्वज्ञानरहितत्वे सति पुरुषत्वात् । ४ साध्यस्वरूपाद्विपरतिन निश्चितोऽविनाभावो यस्यासौ विरुद्धः । ५ एकस्वभाव्यक्षणिकलक्षणो नित्यैकलक्षणः। ६ ये चाष्टौ विरुद्धभेदाः परैरिटास्ते-- - परिक्षामुखम् । कृतकत्वं छपरिणामविरोधिना परिणामेन व्याप्तमिति । अनेकान्तिकं हेत्वाभासमाह-- विपक्षेऽप्यविरुद्धवृत्तिरनैकान्तिकः ॥ ३० ॥ प्येततल्लक्षणलक्षितत्वाविशेषतोऽत्रवान्तभवति, सति सपक्षे चत्वारो विस्ताः पक्षविपक्षव्यापकः सपक्षावृत्तियथानित्यः शब्द उत्पत्तिधर्मकत्वात् । विपक्षक- देशवृत्तिः पक्षच्यापकः सपक्षावृत्तिश्च यथा नित्यः शब्दः सामान्यवत्वे सत्य. स्मदादिवायेन्द्रियप्रत्यक्षत्वात् । पक्षविपक्षकदेशवृत्तिः सपक्षावृत्तिश्च यथा सामा- न्यविशेषवती-अस्मदादिवायकरणप्रत्यक्ष वाग्मनसे नित्यत्वात् । पक्षकदेश. वृत्तिः सपक्षावृत्तिविपक्षव्यापको यथा नित्ये वाग्मनसे उत्पत्तिधर्मकत्वात् । तथा ऽसति सपक्षे चत्वारो विरुद्धाः पक्षविपक्षव्यापकोऽविद्यमानसपक्षो यथाऽऽका- .शविशेषगुणः शब्दः प्रमेयत्वात् । पक्षविपक्षकदेशवृत्तिरविद्यमानसपक्षो यथा सत्तासम्बन्धिनः पटपदार्था उत्पत्तिमत्वात् । पक्षव्यापको विपक्षकदेशवृत्तिरवि- -द्यमानसपक्षो यथा ऽऽकाशविशेषगुणः शब्दो वाह्येन्द्रियग्राह्यत्वात् । पक्षकदे- शवृत्तिर्विपक्षव्यापकोऽविद्यमानसपो यथा नित्ये वाडमनसे कार्यत्वात् । १ एकस्मिन्नते नियतो ऐकान्तिकस्तद्विपरितोऽनैकान्तिकः । २ पराभ्यु- पगतश्च पक्षत्रयव्यापकाद्यनैकान्तिकप्रपंच एतल्लक्षणलक्षितत्वाविशेपानातोऽर्था- न्तरम् । पक्षत्रयव्यापको यथा अनित्यः शब्दः प्रमेयत्वात् । सपक्षविपक्ष- कदेशवृतियथा नित्यः शब्दोऽमूर्तत्वात् । पक्षसपक्षव्यापको विपक्षकदेशवृत्तिः यथा गौरय विषाणित्वात् पक्षविपक्षव्यापकः सपक्षैकदेशानिर्यथाऽ गौरयं विषाणित्वात् । पक्षत्रयैकदेशवृत्तियथाऽनित्ये वाग्मनसेऽमूर्तत्वात् । पक्षसपः- कदेशतिर्विपक्षव्यापको यथा ,द्रव्याणि दिक्कालमनांस्यमूर्तत्वात । पक्षवि. 1 प्रमेयरत्नमालासहितम्। १९७ अपिशब्दान्न केवलं पक्षसपंक्षयोरिति द्रष्टव्यम् । स च द्विविधो विपक्षे निश्चितवृत्तिः शङ्कितवृत्तिश्चेति । तत्राद्यं दर्श- यन्नाह निश्चितत्तिरनित्यः शब्दः प्रमेयत्त्वात् घटवदिति ॥३१॥ कथमस्य विपक्षे निश्चिता वृत्तिरित्याशङ्कयाह-- आकाशे नित्येऽप्यस्य निश्चयात् ।। ३२ ।। शङ्कितवृत्तिमुदाहरति-- शङ्कितवृत्तिस्तु नास्ति सर्वज्ञो वक्तृत्वादिति ॥ ३३ ॥ अस्यापि कथं विवक्षे वृत्तिराशंक्यत इत्यत्राह- सर्वज्ञत्वेन वक्तृत्वाविरोधादिति ॥ ३४ ॥ अविरोधश्च ज्ञानोत्कर्षे वचनानामपकर्षादर्शनादिति निरू- पितप्रायम् । अकिञ्चित्करस्वरूपं निरूपति- सिद्धे प्रत्यक्षादिवाधिते च साध्ये हेतुरकिञ्चित्करः ॥३५॥ तत्र सिद्ध साध्ये हेतुरकिञ्चित्कर इत्युदाहरति- सिद्धः श्रावणः शब्दः शब्दत्वात् ॥ ३६ ।। कथमस्याकिञ्चित्करत्वमित्याह- किञ्चिदकरणात् ॥ ३७॥ ។ - - पक्षकदेशवृत्तिः सपक्षव्यापको यथाऽद्रव्याणि दिक्कालमनांस्यमूर्तत्वात् । सप. क्षविपक्षव्यापकः पक्षकदेशवृत्तिर्यथा पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशान्यऽनित्यान्यगंधव- स्वात् । १ प्रमणान्तरात्साध्ये निणीते । २ न क्रिश्चित्करोतीत्यकिश्चित्करः। ३न- परिक्षामुखम् । - अपरं च भेदं प्रथमस्य दृष्टान्तीकरणद्वारेणोदाहरति- यथाऽनुष्णोऽग्निद्रव्यत्वादित्यादौ किञ्चित्कर्तुम- श्यक्यत्वात् ॥ ३८॥ अकिञ्चित्करत्त्वमिति शेषः । अयं च दोपो हेतुलक्षणविचा. रावसर एव, न वादकाल इति व्यक्तीकुर्वनाह- लक्षण एवासी दोपो व्युत्पन्नप्रयोगस्य पक्षदोपेणैव दुष्टत्वात् ॥ ३९॥ हटान्तोऽन्वयव्यतिरेकभेदाद्विविध इत्युक्तं तत्रान्वयदृष्टा न्ताभासमाह- दृष्टान्ताभासा अन्वयेऽसिद्धसाध्यसाधनोभयाः ॥ ४० ॥ साध्यं च साधनं च उभयं च साध्यसाधनोभयानि अ- सिद्धानि तानि येप्विति विग्रहः । एतानेकत्रैवानुमाने द. शयति- अपौरुषेयः शब्दोऽमूर्तत्त्वादिन्द्रियसुखपरमाणुघर्टवत् ।।४।। इन्द्रियसुखमसिद्धसाध्यं तस्य पौरुषेयत्त्वात् । परमाणुर सिद्धसाधनं तस्य मूर्तत्वात् । घटश्चासिद्धोभयः पौरुषेयत्वा- - ह्यसौ स्वसाध्यं साधयति तस्याध्यक्षादेव सिद्धः । १ लक्षणव्युत्पादनशाने। २.अकिश्चित्करलक्षणो दोपः । ३ पक्षाभासलक्षणेनैव । ४ इन्द्रियसुखे साधनत्वमस्ति. साध्यत्वं नास्ति ।, ५ परमाणुषु साध्यत्वमस्ति साधनत्वं ना- स्ति तस्मात्साधनविकलोऽयं दृष्टान्तः । ..६ घटे तूभयमपि नास्ति तस्मादुभ- प्रमेयरत्नमालासहितम्। १६६ मूर्तत्वाच्च । साध्यव्याप्तं साधनं दर्शनीयमिति दृष्टान्तावसरे प्रतिपादितं तद्विपरीतदर्शनमपि तदाभासमित्याह- विपरीतान्वयश्च यदपौरुषेयं तदमृतम् ॥ ४२ ॥ कुतोऽस्य तदाभासतेत्याह- विद्युदादिनाऽतिप्रसङ्गात् ।। ४३ ॥ तस्याप्यमूर्तताप्राप्तेरित्यर्थः । व्यतिरेकोदाहरणाभासमाह- व्यतिरेकेऽसिद्धयतिरेकाः परमाण्विन्द्रियसुखाका- - शवत् । ४४ ॥ अपौरुषेयः शब्दोऽमूर्तत्वादित्यत्रैवासिद्धाः साध्यसाधनो- भयव्यतिरेका यत्रेति विग्रहः । तत्रासिद्धसाध्यव्यतिरेकः पर माणुस्तस्यापौरुषेयत्वात् इन्द्रियसुखमसिद्धसाधनव्यतिरेकम् । आकाशं त्वसिद्धोभयव्यतिरेकमिति । साध्याभावे साधनव्या- वृत्तिरिति व्यतिरेकोदाहरणप्रघट्टके स्थापितं तत्र तद्विपरीतमपि तदामासमित्युपदर्शयति- विपरीतव्यतिरेकश्च यन्नौमूर्त तन्नापौरुषेयम् ।। ४५ ॥ चालव्युत्पत्यर्थं तत्रयोपगम इत्युक्तमिदानी तान्प्रत्येव कि- यविकलोय, दृष्टान्तः । १ विपरीतान्वयो व्याप्तिप्रदर्शनं यस्मिन्निति यथा योऽग्निमान्स धूमवानिति यथा । २ विद्युद्वनकुसुमादौ ह्यपौरुषेयत्वेप्यमूर्त- स्वं नास्ति । ३.असिद्धस्तेषां साभ्यसाधनोभयानां व्यतिरेको येषु ते ।, ४ यन २०० परिक्षामुखम्। -- यद्धीनतायां प्रयोगाभासमाह-~- बालप्रयोगाभासः पञ्चावयवेषु कियद्धीनता ॥ ४६ ॥ तदेवोदाहरति- अग्निमानयं देशो धूमवत्वात् यदित्थं तदित्यं यथा महानस इति । इत्यवयवनयप्रयोगे सतीत्यर्थः । चतुरवयवप्रयोगे तदाभा- सत्वमाह- धूपवांश्चायमिति वा ।। ४८ ।। अवयवविपर्ययेऽपि तत्वमाह- तस्मादग्निमान् धूमवांश्चायमिति ।। ४९ ।। कथमवयवविपर्यये प्रयोगामास इत्यारेकायामाह- स्पष्टतया प्रकृतप्रतिपत्तेरयोगात् ।। ५० ॥ इदानीमागमाभासमाह- रागद्वेषमोहाक्रान्तपुरुषवचनाज्जातमागमाभासम् ॥ ५१ ।। -- २न धूमवान् तन्नाग्निवानितिवत् । १ यो ह्यव्युत्पन्नप्रज्ञोऽनुमानप्रयोगे पञ्चा. वयवे गृहीतसङ्केतः स' उपनयनिगमनरहितस्य निगमनरहितस्य वानुमा. नप्रयोगस्य तदाभासतां मन्यते । सूत्रव्येन क्रमेण तदेव दर्शयति । केवलं कियद्धीनतैव बालप्रयोगाभासः किन्तु तद्विपर्ययश्चेति प्रदश्यते । लप्रयोगाभासत्वम् । ४ केवलं बालव्युत्पत्यर्थमयं प्रयोगाभासो न पुनो च्यु सनप्रज्ञ प्रति, सर्वप्रकारेणं वाक्प्रयोगे व्युत्पन्न प्रज्ञस्य केनापि प्रकारेणाऽनुमान- - ३ वा. .
प्रमेयरत्नमालासहितम। , - उदाहरणमाह- यथा नद्यास्तीरे मोदकराशयः सन्ति, धावध्वं माणवकाः ॥ ५२ ॥ कश्चिन्माणवकैराकुलीकृतचेतास्तत्सङ्गपरिजिहीर्षया प्रता- रणवाक्येन नद्या देशं तान् प्रस्थापयतीत्याप्तोक्तरन्यत्वादागमा- भासत्वम् । प्रथमोदाहरणमात्रेणातुष्यन्नुदाहरणान्तरमाह- अङ्गुल्यग्रे हस्तियूथशतमास्त इति च ।। ५३ ।। अत्रापि सांख्यास्वदुरागमजनितवासनाहितचेता दृष्टे- एविरुद्धं सर्व सर्वत्र विद्यत इति मन्यमानस्तथोपदिशतीत्यना. सवचनत्वादिदमपि तथेत्यर्थः । कथमनन्तरयोर्वाक्मयोस्तदाभा सत्वमित्यारेकायामाह- विसंवादात् ।। ५४ ॥ अविसंवादरूपप्रमाणलक्षणाभावान्न तद्विशेषरूपमपीत्यर्थ । इदानीं संख्याभासमाह-- प्रत्यक्षमेवैकं प्रमाणमित्यादि संख्याभासम् ॥ ५५ ।। प्रत्यक्षपरोक्षभेदात् द्वैविध्यमुक्तं तवैपरीत्येन प्रत्यक्षमेव, प्रत्यक्षानुमाने एवेत्याधवधारणं संख्याभासम् । प्रत्यक्षमेवैक- मिति कथं संख्याभासमित्याह-- लोकायतिकस्य प्रत्यक्षतः परलोकादिनिषेधस्य प्रयोगस्य प्रणसम्भवात् । प्रतिपन्नार्थविचलनं हि विसंवादो विपरीता- २०२ परिक्षामुखम् । . . परबुद्ध्यादेश्चासिद्धेरैतद्विषयत्वात् ।। ५६ ॥ अतद्विषयत्वदत्यक्षविषयत्वादित्यर्थः । शेषं । सुगमम् । प्रपञ्चितमेवैतत्सङ्ख्याविप्रतिपत्तिनिराकरण इति नेह पुनरुच्य- ते । इतरवादिप्रमाणेयत्तावधारणमपि विघटत इति लोकायति- कदृष्टान्तद्वारेण तन्मतेऽपि सङ्ख्याभासमिति दर्शयति-- सौगतसांख्ययोगप्रामाकरजैमिनीयानों प्रत्यक्षानुमानाग- भोपमानार्थपत्त्यभावैरेकैकाधिकैयाप्तिवत् ॥ ५७ ॥ यथा प्रत्यक्षादिभिरेकैकाधिकैाप्तिः प्रतिपत्तु न शक्यते सौगतादिभिस्तथा प्रत्यक्षेण लोकायतिकैः परबुद्ध्यादिरपी. त्यर्थः । अथ परवुड्यादिप्रतिपत्तिः प्रत्यक्षेण माभूदस्माद्भवि. प्यतीत्याशङ्कयाह-- अनुमानादेस्तद्विषयत्वे प्रमाणान्तरत्वम् ॥ ५८ ॥ तच्छब्देन परवुद्ध्यादिरमिधीयते । अनुमानादेः परवुद्ध्या- दिविषयत्वे प्रत्यक्षकप्रमाणवादो हीयत इत्यर्थः । अत्रोदाहर णमाह-- तर्कस्येव व्याप्तिगोचरत्ने प्रमाणान्तरत्वमप्रमाण- स्याव्यवस्थापकत्वात् ॥ ५९॥ सौगतादीनामिति शेषः किञ्च प्रत्यक्षकप्रमाणवादिना प्रत्यं. -- - पस्थापकप्रमाणावसेयः । १ लौकायतिकस्य प्रत्यक्षतः परलोकादिनिपेध. स्थ परवुद्धयादेश्च • कुतोऽसिद्धिरित्याह । २ मते । ३ व्याप्तिनं सिद्धयति - प्रमेयरत्नमालासहितम्। २०३ - क्षायेकैकाधिकप्रमाणवादिभिश्च स्वसंवेनेन्द्रियप्रत्यक्षभेदोऽनु- मानादिभेदश्च प्रतिभासभेदेनैव वक्तव्यो गत्यन्तराभावात् । स च तेझेदो लोकायतिकं प्रति प्रत्यक्षानुमानयोरितरेषां व्या- तिज्ञानप्रत्यक्षादिप्रमाणेविति सर्वेपां प्रमाणसंख्या विघटते । तदेव दर्शयति- प्रतिभासभेदस्य च भेदकत्वात् ॥ ६० ॥ इदानीं विषयाभासमुपदर्शयितुमाह-. विषयाभासः सामान्य विशेषो द्वयं वा स्वतंत्रम् ॥ ६ ॥ कथमेषां तदाभासतेत्याह- तथाप्रतिभासनात्कार्याकरणाच ॥ ६२ ।। किञ्च तदेकान्तात्मकं तत्त्वं स्वयं समर्थमसमर्थ वा कार्य- कारि स्यात् ? प्रथमपक्षे दूषणमाह- समर्थस्य करणे सर्वदोत्पत्तिरपेक्षत्वात् ॥ ६३ ।। सहकारिसान्निध्यात् तत्करणान्नेति चेदत्राह- परापेक्षणे परिणामित्वमन्यथा तदभावात् ॥ ६४ ।। वियुक्तावस्थायामकुर्वतः सहकारिसमवधानवेलायां कार्य- पूर्वोक्तप्रत्यक्षादिप्रमाणाविषयत्वात्तथा प्रकृतमपि । १ प्रतिभासभेदश्च । २ अस्तु प्रामाण्यमनुमानस्य किन्तु तत्प्रत्यक्षे एवान्तर्भविष्यतीत्युक्ते सत्याह । ३ ततः प्रत्यक्षेऽनुमानस्यान्तीवाभावः । ४ अन्योन्यनिरपेक्षम् । वलसामान्यतया. केवलविशेषतया · द्वग्रस्य । स्वतत्रतया वा। ७ अनपेक्षाकारपरित्यागेनापेक्षाकारेण । परिणमनात् । ८ परानपेक्षे । + ५ के. ६ परस्य। + m ܝܳܟ २०४ परिक्षामुखम् । - कारिणः पूर्वोत्तराकारंपरिहारावाप्तिस्थितिलक्षणपरिणामो- पपत्तेरित्यर्थः। अन्यथा कार्यकारणाभावात् । प्रागभावाव- स्थायामेवेत्यर्थः । अथ द्वितीयपक्षदोषमाह- स्वयं समर्थस्य अकारकत्वात्पूर्ववत् ॥ ६५ ॥ अथ फलाभासं प्रकाशयन्नाह - फलाभासं प्रमाणादभिन्न भिन्नमेव वा ।। ६६ ।। कुतः पक्षद्वयेऽपि तदासतेत्याशङ्कायामापद्यक्षे तदाभासस्वे हेतुमाह- अभेदे तयवहारानुपपत्तेः ॥ ६७ ।। फलमेव प्रमाणमेव वा भवेदिति भावः। व्यावृत्या संवृत्य- परनामधेयया तत्कल्पनाऽस्त्वित्याह- व्यावृत्यापि न तत्कल्पना फान्तराद्यावृत्त्या. ऽफैलत्वप्रसङ्गात् ।। ६८ ॥ अयमर्थः-यथा फलाद्विजातीयात् फलस्य व्यावृत्त्या फल- व्यवहारस्तथा फलान्तरादपि सजातीयायावृत्तिरप्यस्तोत्यफ त्वम् । अत्रैवाभेदपक्षे दृष्टान्तमाह- प्रमाणाद्यावृत्त्येवाप्रमाणत्वस्येति ॥ ६९ ॥ १ कार्योत्पत्यभावात्सर्व वस्तुजातं प्रागभावावस्थायामेव विद्यमानं स्यात् । २ सर्वथा। ३ तयोः प्रमाणफलयोः । ४ अफलाद्व्यावृत्तिः कथं यथा तथा फलान्तराद्व्यावृत्त्या भाव्यम् । तथा सति फलान्तराद्व्यावृत्तिः फलविशेषा. व्यावृत्तिरित्यर्थः। ५ अफलत्वप्रसंगोगोावृत्याऽगोत्वं भवति यथा . - - प्रमेयरत्नमालासहितम् । २०५ - अत्रापि प्राक्तन्येव प्रक्रिया योजनीया। अभेदपक्षं निरा. कृत्य आचार्य उपसंहरति- तस्माद्वास्तवो भेद इति ॥७॥ भेदपक्षं दूषयन्नाह - भेदे त्वात्मान्तरवत्तदनुपपत्तेः ।। ७१ ।। अथ यत्रैवात्मनि प्रमाणं समवेतं फलमपि तत्रैव समवेत- मिति समवायलक्षणप्रत्यासत्या प्रमाणफलव्यवस्थितिरिति, नात्मान्तरे तत्प्रसङ्ग इति चेत्तदपि न सूक्तमित्याह- समवायेऽतिप्रसङ्ग इति ॥ ७२ ॥ समवायस्य नित्यत्वाद्यापकत्वाच सर्वात्मनामपि समवाय. समानधर्मिकत्वान्न ततः प्रतिनियम इत्यर्थः। इदानीं स्वपरप. क्षसाधनदूषणव्यवस्थामुपदर्शयति- प्रमाणतदाभासी दुष्टतयोद्भावितौ परिहृतापरि- हृतदोषौ वादिनः साधनतदाभासौ प्रति- वादिनों दृषणभूषणे च ।। ७३ ।। वादिना प्रमाणमुपन्यस्तं तच्च प्रतिवादिना दुष्टतयोद्भावितं 'पुनर्वादिना परिहृतं तदेव तस्य साधनं भवति प्रतिवादिनश्च - १वास्तवभेदाभाचे प्रमाणफलव्यवहारानुपपत्तेरिति । २तर्हि सर्वथा भेदोऽस्त्विति शङ्कापनोदार्थमाह । ३ इदं फलमस्येति व्यवहाराभावात् फलानुत्पत्तः ४ फलप्रसङ्गः । ५ इदं फलमस्यैव नान्यस्येति प्रतिनियमाभावः ।
२०६, । परिक्षामुखम् । दूषणमिति । यंदा तु वादिना प्रमागाभासंमुक्तं प्रतिवादिनों तथैवोद्भावितं वादिना चापरिहतं तदा तद्वादिनः साधना-- भासो भवति प्रतिवादिनश्च भूषणमिति । अथोक्तप्रकारेणाशेष विप्रतिपत्तिनिराकरणद्वारेण प्रमाणत्वं स्वप्रतिज्ञातं परीक्ष्या नयादितत्वमन्यत्राक्तमिति दर्शयन्नाह सम्भवदन्यद्विचारणीयमिति ।। ७४ ।। सम्भवद्विद्यमानमन्यत्प्रमाणत्वान्नयस्वरूपं शास्त्रान्तरप्र. सिद्धं विचारणीयमिह युस्त्या प्रपिपत्तव्यम् । तत्र सूलनयो द्वौ द्रव्याथिकपर्यायाथिकभेदात् । तत्र द्रव्यार्थिकस्त्रेधा नैगमसं- ग्रहव्यवहारभेदात् । पर्यायार्थिकश्चतुर्धा ऋजुसूत्रशब्दसमभिरू वम्भूतभेदात् । अन्योऽन्यगुणग्रंधानभूतभेदाभेदप्ररूपणो नै. गमः । नैकं गमो नैगम इति निरुक्तः। सर्वथाऽभेदवाद- - १ नयचक्रादौ । २ कथितात्प्रमाणतदाभासलक्षणादन्यन्नयनयाभासयोलक्षणं । ३ नयनिष्ठैः। ४ अनिराकृतप्रतिपक्षो वस्त्वंशग्राही ज्ञातुरभिप्रायो नय इति नयसामान्यलक्षणम् ।, ५ अस्मिन् शास्त्रे । ६ द्रव्यमेवार्थो विषयो यस्यास्ति स द्रव्यार्थिकः । ७ पर्याय एवार्थो यस्यास्त्यसौ पर्यायार्थिकः । ८ धर्मिणोः । ९ गौणमुख्यभावेन । १० यथा-जीवगुणः सुखमि- त्यत्र हि जीवस्याप्राधान्यं विशेषणत्वात्सुखस्य प्राधान्यं विशेष्यत्वात् । सुखी- जीव इत्यत्र तु जीवस्य प्राधान्ये विशेष्यत्वात्सुखस्याप्राधान्यं विशेषणत्वात् ।। अथवाऽनिष्पन्नार्थसङ्कल्पमात्रग्राही नैगमः । निगमो हि सङ्कल्पस्तत्र भवस्त-- प्रयोजनो वा नैगमः । यथा कश्चित्पुरुपो गृहीतकुठारो गच्छन् किमर्थं भवः- ३ .
प्रमेयरत्नमालासहितम् । २०७ स्तदाभासः। प्रतिपक्षव्यपेक्षः सन्मात्रग्राही संग्रहः । ब्रह्मवाद: स्तैदाभासः । सङ्ग्रहगृहीतभेदको व्यवहारः । काल्पनिको, भेद- स्तदाभासः । शुद्धपर्यायग्राही प्रतिपक्षसापेक्ष ऋजुसूत्रः । क्षणिकैकान्तनयस्तदाभासः। कालकारकलिङ्गानां भेदाच्छब्दस्य कथञ्चिदर्थभेदकथनं शब्दनयः। अर्थभेदं विना शब्दानामेव नानात्वैकान्तस्तदाभासः। पर्यायभेदात्पदार्थनानात्त्वनिरूपकः समभिरूढः । पर्यायनानात्वमन्तरेणापीन्द्रादिभेदकथनं तदा- भासः । क्रियाश्रयेण भेदप्ररूपणमित्थम्भावः । क्रियानिरपेक्षत्वेन क्रियावाचकेषु काल्पनिको व्यवहारस्तदाभास इति । इति । २ ४ द्रव्य न् गच्छत्तीति पृष्टः सन्नाह प्रस्थमानेतुमिति। न चासौ प्रस्थपर्यायसनिहितः कि- न्तु तनिष्पत्तये सङ्कल्पमात्रे प्रस्थव्यवहारात् । १ प्रतिपक्षसापेक्षः । सर्व वै खल्विदं ब्रह्म नेह- नानास्ति किश्चनेत्यादिः सङ्ग्रहाभासः । ३ सन. हनयग्रहीतानां विधिपूर्वको भेदकः यथा सद्व्यं पर्यायो वेत्यादि । पर्यायप्रविभागः । ५ वर्तमानमात्र । ६ भूतंभविष्यतपर्याय । ऋजु प्राजलं वर्तमानक्षणमात्रं सूत्रयतीत्य॒जुसूत्रमिति निरुक्ते । यथा सुख- पर्यायः सम्प्रत्यस्ति । ८ बौद्धाभिमतसर्वथाक्षणिकवादस्तदाभासः । शब्दनयो हि पर्यायशब्दभेदानार्थभेदमभिप्रेति , कालादिभेदत एवार्थभेदाभि- प्रायादिति । अत्र तु भेदः पर्यायभेदादिति यथा शक इन्द्रः पुरन्दरः । १०, यथा शकनक्रियायां सत्यासेव शक्रः, समभिरूढनये तु तस्यां सत्यामसत्यां वा तत्शव्दव्यवहारात्तथा रुढेः सद्भावात् । एतेषु ऋजुसूत्रान्ताश्चत्वारोऽर्थ-.. प्रधानाः शेषास्तु त्रयः शब्दप्रधानाः । ११. शकादिशब्देषु । एतेषु सर्वन- परिक्षामुखम् । नयंतदाभासलक्षणं संक्षेपेणोक्तं विस्तरेण नयचक्रात्प्रतिपत्त- व्यम् । अथवा सम्भवद्विद्यमानमन्यद्वादलक्षणं पत्रलक्षणं वा. ऽन्यत्रोक्तमिह द्रष्टव्यं तथाचाह, समर्थचनं वाद इति, प्रसि. द्धावयवं वाक्यं स्वेष्टस्यार्थस्य साधकम् । साधुगूढपदप्राय पत्रमाहुरनाकुलम् ॥ १ ॥ इति ॥ परीक्षामुखमादर्श हेयोपादेयतत्त्वयोः । संविदे माशो वालः परीक्षादक्षवद्यधाम् ।। १ ।। + येषु पूर्वः पूर्वो बहुविषयः कारणभूतश्च परः परोऽल्पविषयः कार्यभूतश्चेति । सङ्ग्रहनयानगमो बहुविषयो भावाभावविषयत्वात् । यथैव हि सति सङ्कल्प- स्तथाऽसत्यपि । सङ्ग्रहनयस्तु ततोल्पविषय सन्मात्रगोचरत्वात् , नैगमपूर्व- कत्वाच्च तत्कार्यः । सङ्ग्रहाव्यवहारोऽपि तत्पूर्वकः सद्विशेषाववोधकत्वाद- ल्पविषय एव । कालत्रितयवृत्त्यर्थगोचराद्व्यवहाराजसूत्रोऽपि तत्पूर्वको वर्त- मानार्थगोचरतयाऽल्पविषय एव । कारकादिभेदनऽभिन्नमर्थ प्रतिपाद्यमाना- दृजुसूत्रतस्तत्पूर्वकः शब्दनयोप्पल्यविषय एव तद्विपरीतार्थगोचरत्वात् । शब्दनयात्पर्यायभेदेनार्थाभेदं प्रतिपाद्यमानात्तद्विपर्ययात्तत्पूर्वकः समाभिरूढो. प्यल्पविषय एव । समभिरूढतश्च क्रियाभेदेन भिन्नमर्थं प्रकटयतस्तद्विपर्यया. तत्पूर्वक एवम्भूतोप्यल्पविषय एव । यत्रोत्तरोत्तरो नयोऽर्थाशे प्रवर्तते तत्र पूर्वः पूर्वो नयो वर्तत एव, यथा सहले सप्तशती तस्यां वा पञ्चशती। १ वादस्य चत्वार्यशानि सभ्यसभापत्तिवादिप्रतिवादिनः । २ पदानि त्रायन्ते गोप्यन्ते रक्ष्यन्ते परेभ्यः ( प्रतिवादिभ्यः) स्वयं विजिगीषुणा यस्मिन्वाक्ये पत्रमिति पत्रस्य व्युत्पत्यर्थः । ३. पत्रपरीक्षादौ । ४ अवाधितम् । , - " प्रमेयरत्नमालासहितम् । २०६ 8 व्यधाम् कृतवानस्मि । किमर्थं ? संविदे। कस्य ? अहं च कथंभूत इत्याह बालो 'मन्दमतिः। अनौद्धत्यसूचकं वचनमे- तत् । तत्त्वज्ञत्वञ्च प्रारब्धनिर्वहणादेवावसीयते । किं तत् ? परीक्षामुखम् । तदेव निरूपयति आदर्शमिति । कयोः ? हेयो. पादेयतत्वयोः । यथैवादर्श आत्मनोऽलङ्कारमण्डितस्य सौरूप्यं वैरूप्यं वा प्रतिबिम्बोषदर्शनद्वारंण सूचयति तथेदमपि हेयोण. देयतत्त्वं साधनदूषणोपदर्शनद्वारेण निश्चायतीत्यादर्शत्वेन निरू- प्यते । क इव ? परीक्षादक्षवत् परीक्षादक्ष इच, यथा परीक्षादक्षः स्वप्रारब्धशालं निरूढवांस्तथाऽहमपीर्थः ।। अकलङ्कशशाङ्गैर्यत्प्रकटीकृतमखिलमाननिभनिकरम् । तत्संक्षिप्तं सूरिभिरुरुमतिभिर्व्यक्तमेतेन ॥ १ ॥ इति परीक्षामुखलघुवृत्तौ प्रमाणाधाभाससमुद्देशः पाठः ॥ ६ ॥ - । ३ श्रीमान् वैजेयनामाभूदग्रणीर्गुणशालिनाम् । बदरीपालवंशालिव्योमधुमणिजितः ॥ १॥ तदीयपत्नी भुविविश्रुतासी- नाणाम्बनाना गुणशीलसीसा । यां रेवतीति प्रथितास्विकेति प्रमावतीति प्रवदन्ति सन्तः ॥ २ ॥ १ सज्ञानाय ।
२१० परिक्षामुखम् । - । । तस्यामभूद्विश्वजनीनवृत्तिर्दानाम्बुवाहो भुवि हीरपाख्यः । स्वगोत्र विस्तारनसांऽशुमाली सम्यस्त्वरताभरणार्चिताङ्गः ॥३॥ तस्योपरोधवशतो विशदोरुकोर्ते- आणिक्यनन्दिकृतशास्त्रमगाधबोधम् । स्पष्टीकृतं कतिपयैर्वचनेरुदार- लियोधकरमेतदनन्तवीयः॥४॥ इति प्रमेयरत्नमालापरनामधेया परीक्षामुखलधुवृत्तिः समाप्ता ।
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