Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Isha Upnishad Atmagyan
Front matter
यजुर्वेद का स्वाध्याय ।
अध्याय ४०
आत्मज्ञान।
REDEEMENT
[पाजसनेयि-संहितोपनिषद् ]
ईशोपनिपद् ।
Sotifioमरस
मिरवडी
Saavui
SAT
लेखक और प्रकाशक
श्रीपाद दामोदर सातवळेकर
स्वाध्याय मंडल, औंध ( जि. सातारा )
प्रथमवार
संवत १९८६ शक १८५०, सन १९२९
RasECREE
LIPRARY
मुद्रक तथा प्रकाशक-श्री.दा. सातवळेकर
स्वाध्याय मंडल,
भारतमदणालया
औघ (जि. सातारा)
MULA
VIDYA
BHAR.
127188
N........
SHAYAR
ईशोपनिषद
यजुर्वेद अध्याय चालीस की
भूमिका ।
(१) यजुर्वेदकी संहितायें।
यजुर्वेदकी कई संहितायें इस समय उपलब्ध हैं । (१) काण्य
(२) माध्यदिन, पाजसनेयी, (३) मैत्रायणी, (४) काठक,
(५) तैत्तिरीय । इनमें कार और माध्यंदिन वाजसनेयी संहि-
ताके अंतिम अर्थात् ४० घे अध्यायम " आत्मशान " का विचार
किया है। यही घेदका अंतिम अध्याय होने से, घेदका अंतिम
भाग अर्थात् "घेदका अंत " होनेसे इस आत्मज्ञान विभाग को
घेदांत" (वेद+अंत ) कहते हैं ।
काण्व संहिताका जो अंतिम ४० वां अध्याय है, वही "ईशो-
निषद् " नामसे इस समय सुप्रसिद्ध है। माध्यंदिन शाखीय
वाजसनेयो संहिता के ४० वे अध्याय के मंत्र केवल १७ है, और
काय शाखाकी संहिताके १८ मंत्र है; इसके अतिरिक्त कुछ पाठ
भेद भी है। दोनों पाठ इस पुस्तक में दिये हैं, तुलना करने पर
पाठकों को पाठभेदादिशा का सर पता लग जायगा।
“
*
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ईशोपनिषद् । का वर्णन (२) अध्याय का नाम ! यजुर्पद के प्रत्येक अध्यायका उद्देश विशेप होता है, और तद. नुसार उसका नाम होता है। इस ६० वे अध्याय का माम "आत्म. मान"है। फोई इसको" आत्माऽध्याय, ब्रह्माऽध्याय,आत्मस्पत, ब्रह्मसूक्त, ईशसक्त " आदि कहते हैं । इन सब शब्दोंका भाष एक ही है। इसका नाम " शोपनिषद् " सुप्रसिद्ध ही है। इस नामका भाव भी यही आशय व्यक्त करता है, कि इसमें" की विद्या " अथवा "आत्माका शान कहा है। जिस सूफ्त में जो देवता हुआ करती है, उस देवताके अनुसार उस सूपतका नाम दुआ करता है। जैसा " अग्नि,इंद" आदि देवताओं के सूफ्तोका नाम " अग्निस्त, इंद्रस्मत " आदि होता है। इसी रीतिके अनुसार इस अध्यायमें " आस्मा अथवा ब्रह्म होने से इसका नाम " आत्मा-याय, आरमसूक्त किंवा ब्रह्मविद्या' होना स्वाभाविक हो है परंतु यहां कई विद्वान ऐसी शंका करते है कि, इस में "अग्नि " आदि भिन्न देवताओं के नाम आने के कारण य६ सय अध्याय एकही देवताका वर्णन नहीं करता है. अथवा ईशवर्णनसे मिन्न जो अग्नि आदि देवों का वर्णन इस अ- याय में है, यह प्रसिद्ध है। इसलिये इस आशंकाका यक्षा अधिक विचार करना आवश्यक है। इस अध्याय की देवताका विचार करने के पूर्व इस बात को कहना योग्य है कि जिस समय दशोपनीपद अश्या एकादशो- पनिपद का संग्रह इकटा हुआ, अथवा एकत्रित किया गया, उस समयसे अग्नि आदि देवताओके मंघ इसमें, सर्व संमतिले माने गये हैं। उपत उपनिषदोंका संग्रह आजकलका नहीं । सहन्नों घर्ष पूर्व उनका संग्रह हो चुका है कि जिस समय वैदिक विद्याको येत और जाप्रत थी। उस समय । ईशोपनिपद्" .
में - भूमिका। में उक्त मंत्र चले आये हैं, और ईशोपनिषद् का कोई ऐसा पाठ नहीं है कि जिसमें "अग्ने नय" आदि मंत्र नहीं है। इस परिपाठीके झमको विचार कोटी रसनेस पता लग जायगा कि, "अग्ने नय" आदि मंत्र प्रक्षिप्त नहीं है । तथापि देवता विचार फरके ही इस वातका निश्चय करेंगे। (३) हम सूक्त का देवता । जिस सूक्त अथवा मंत्रमें जिसका वर्णन होता है उस सूक्त किंवा मंत्रकी यह देवता समझी जाती है। किसी किसी सूक्त देवता एकही शब्द प्रारंभसे अंत तक प्रयुक्त हुआ होता है परंतु कई ऐसे सूफ्त हैं कि, जिनमें पकही देवताके वाचक अनेक नाम उम सफ्तके अनेक मंत्रोंमें प्रयुक्त होते हैं । जिसमें देवताका एक ही नाम प्रयुक्त होता है, उस मुफ्त की देवताके विषय में संदेह ही नहीं होता, परंतु जिस सक्तमें विभिन्न नामोंका उप- योग होता है, उस सूक्तकी देवताके निश्चय करने में शंका उत्पन्न होती है । इसी हेतुसे इस अध्याय की देवताके विषयमें कई वि. द्वानोंको संदेह हुआ है, इस लिये इसकी देवताका यहां विचार करेंगे। देखिए, देवता निश्चय की रीति यह है कि प्रथम प्रत्येक मंत्रका देवता-सूचक शब्द देखना चाहिये जैसा- मंत्र देवतासूचक परिशेष (चाजसनेयो संहिता १ईशा घास्यं २ कुर्च वह ३ असुर्या नाम ४ अनेजदेक ५ तदेजति . ० . . एक, एतत् तत् .
शोपनिषद् । आत्मा " ० ६ यस्तु संवाणि ७ यस्मिन्स ८ स पर्यगात् स,कविः, ९-१४ अंधं तमः १५ वायुरनिलं ओं १६ अग्ने नय अग्निः अग्निः १७ हिरपमयेन सत्य सत्यं परपः पुरुषः उख ब्रह्म (काण्य संहिता) १६ पूपक पूषा पूषा यम देवतावाचक जो शब्द है, उनमें सर्वनाम, विशेषण आदि छोड. कर जो मुख्य शब्द हैं, घे "ईश, आत्मा, ओम्, अग्नि, सत्या पुरुष, मह, पूषा, यम" ये हैं। वैदिक रीतिसे ये सब शब्द एक ही देषताके स्थक हैं । " ब्रह्म, आत्मा, ओ, पुरुष, सत्य, शब्दोंके विषय में किसी को शंका ही नहीं हो सकती। जो कोई शंका है, यह " पूषा, यम, अग्मि " इत्यादि शग्दोंके विषय में है। इस लिये इसका विशेष विचार करना चाहिये। (४) अनेक नामांसे एक तत्वका वर्णन | यदि यह सूक्त "आरम-ज्ञान " का प्रतिपादक है. तो एक की आत्मा के सब नाम है "यह अध्यात्मशास्त्र की कल्पना मान- मेसे विभिन्न देवताओंके नामों में एक ही "आमा" का प्रति- पादन होना संभव है. यह बात स्वयं ही सिद्ध होगी । वेदको भी यही कल्पना है.
भूमिका। इंद्र मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् ॥ एक सद्विमा बहुधा वदंत्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहुः ।। २।१६४।४६॥ "एकही सद्वस्तु का ज्ञानी जन बहुत प्रकार वर्णन करते हैं । उसी एक को इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि, सुपर्ण, यम, मातरिश्वा आदि कहते हैं।" इस मंत्र में "अग्नि, यम" आदि शब्द है जो कि ईशोपनिषद में तथा चा० य० अ०४० में आगये है। इस मंत्र से यह बात सिद्ध होती है कि, नामोंके भेदसे देवता भेद नहीं होता । यदि यह ऋग्पद का कथन माना जायगा, तो बहुतसे चि. वाद मिट पगे। परंतु शंका करने वाले युरोपीयन और उनके मतानुसार चलनेवाले पतद्देशीय विद्वानोंको यह मत माननीय नहीं है। इसका कारण इतना ही है, कि उन लोगोंने अबतक वह वैदिक दृष्टि प्राप्त नहीं की है, कि जिस की वेदाध्ययन के समय अत्यंत आवश्यकता है । तथापि यथा शक्ति उनकी शंका का निरसन करना आवश्यक ही है। उक्त ऋग्वेदफे कथन के साथ निम्न मंत्र भी देखिये- सदेवाग्निस्तदादित्यसाद्वायुस्तदु चंद्रमाः ॥ तदेय शुक्रं तद्ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः ॥ य,३२१२ "वही अग्नि, वही आदित्य, वही वायु, और निश्चयसे वही चंद्रमा है। यही शुक्र, यही ब्रह्म, और वही आप तथा प्रजा- पति भी यही है। इस मंत्र स्पष्ट कहा है कि अग्नि आदित्य आदि नामोसे उसीका वर्णन होता है, इतनाही नहीं परंतु अग्नि आदि की सब शक्ति उसीके कारण अग्निमें रहती है। वही एक आत्मा अग्नि आदि रूपोम कार्य कर रहा है, इस लिये अग्नि वर्णनसे उसीका वर्णन होता है। जैसा उपनिषदों में कहा है कि ।
८ ईशोपनिषद् । अथ.२०१३ यह आत्मा श्रीनका श्रोत्र, मनशमन, वाणीको वाणी, प्राणका माया और थोरका शोर है" (केन उ.११२) उसी प्रकार पाहा सृधिम " पद आरमा जाग्निका अग्नि, सूर्यका सूर्य, वायुका वायु। जलका जल," है। इस वर्णनमें "अग्नि" आदि शब्द जिस रीति- से आमाके वाचक होते है. उसी रीतिसे ईशोपनिषद् के "अग्नि, पूपा" ये शब्द भी आत्माके घाचक है । इसके अतिरिक्त- योन पिता जनिता यो विधाता धामानि चंद भुवनानि विश्वा । यो देघान मामघा एक एव तं संप्रश्नं भुवना त्पन्या ना.१०.८२/३.५.१७१२७ स नः पिता जनिता स उत संघर्धामानि वेद भवनानि विश्वा । यो देवानां नामध एक पय संप्रश्न भुवना यन्ति सा॥ "यह मारमा हम सयका पिता, जनक और बंधु है । यह सय भुवनों और स्थानोंको यथावत् जानता है। (य देवानां नामधः) यह सब देवों के नाम अपने लिये धारण करता है। और यह फेवल एकही है। उत्त प्रश्न करने योग्य आत्माके आधारसे सब अन्य भुवन अर्थात पदार्थ मान रहते हैं। इस वर्णनमें निम्न याक्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। य एक पप, देवानां नाम-धः । जोकही, देवोंके ना धारण करता है। "अग्नि " आदि देवताओं के नाम उसीका वर्णन करते हैं, इसलिये ये नाम उसके पावक होते है । यह मंत्र परम्वेद, यजः घेद और अथर्ववेद हैं । विशेषतः जिस यजुर्वेद के ४० ये आया- यका हम विचार कर रहे हैं, उसीके १७ अध्याय में यह मंत्र है। इसलिये इस अंतर्गत प्रमाणसे भी " अग्नि" आदि नाम उस - भूमिका। आमाके चायक सिद्ध होते हैं । आत्माध्यायमें संगृहित होने से अग्नि आदि पदोंका आत्मा अर्थ स्पष्ट ही था, परंतु इस अंतर्गत प्रमाणसे यही यात पुनः सिद्ध हो गई है। और देखिये- स्वमग्न इंद्रोध पमः सतामसि, व विष्णुरबगायो नमस्यः ॥ त्वं ब्रह्मा रयिविद्ब्रह्मणस्पते ॥३॥ त्वमग्न राजा वरुणो धृतवतस्त्वं मित्रो भवसि दस्म ईडयः त्वमयमा सत्पतिवा स्वमग्ने स्वष्टा० ॥५॥ त्वमग्ने रुद्रो असुरो महोदियः ॥ ६ ॥ ऋ.११ "हे अग्ने ! तूंही इंद्र है, सद्वस्तुओंमें बलवान् तू ही है, सूहो नमन के लिये योग्य विष्णु है, तूं ही ब्रह्मा है। हे आने ! तू वरुण राजा है और स्तुत्य मित्र तूही होता है, वही अर्थमा है ।। तू त्वष्टा है तू रुद्र है।" इत्यादि मंत्रों में अग्नि ही अन्य देव है, " यह बात स्पष्ट कही है । इसी प्रकार अन्य देवताओं के सूक्तों में भी चे अग्नि ही है ऐसाभी वर्णन है। इस सब वर्णन का तात्पर्य ही यह है कि सब देवताओके नाम एक ही " आत्मतत्व का वर्णन करते हैं। तथा- अग्नापग्निश्चरति प्रविष्टः ॥ य. ५।४); अथर्व ४।३९९ अग्नि प्रविष्ट है।" इस वर्णन का तात्पर्य एक (जीव) आत्मामै दूसरा (परम ) आस्मा प्रविष्ट है यही है। इस प्रकार विविध मंत्र भागोका वर्णन देखनेसे " अग्नि " शब्द आत्मावाचक है, ऐसा शान हो सकता है । जिस कारण से अग्नि शब्द आत्मावाचक सिद्ध होगा, उसी कारणसे “ यम, पूषा मादि शब्दभी आत्मावाचक ही सिद्ध होंगे । इसलिये उस विषयः में अब यहां अधिक लिखने की जरूरत नहीं है। इस विषयों हरएक देवताके संबंध आवश्यक प्रमाण दिये जा सकते हैं। एक अग्निमें ।
ईशोपनिषद्।
परंतु ऊपर जो पैदिक वर्णन की रोति का नमूना बताया गया है,
उससे वक्तव्य पात सिद होगई है। इस लिये अब इसके विषयम
अधिक प्रमाण देकर विषय लंबा करनेकी कोई आवश्यकता नहीं
है। तात्पर्य यह कि इस आयायमें जो " अग्नि, यम, पूषा " आदि
शब्द प्रयुक्त हुए हैं, वे " ब्रह्म, आत्मा, ईश " के हो गुणयोधक
पर्याय शन्द हैं । इसलिये यह संपूर्ण अध्याय एक ही आरमाका
घर्णन किंवा ब्रह्मका वर्णन कर रहा है । अर्थात् नामोकी भिन्नताले
एकही अभेद रूप सद्वस्तु का वर्णन इस अन्यायमे हुआ है। इस
का विचार करने के लिये अप ऋषिक नामका भी विचार करते हैं-
(५) इम अध्यायका ऋपि ।
किसी किसी समय पीका नाम भी देवताका निश्चय करने
फेलिये सहायक होता है । इसलिये इस अध्याय के ऋषिके नाम
का विचार करना चाहिये । अजमेर मुदित " यजुर्वेद संहिता
के ४०चे अध्यायका-
"ऋषिः दीर्घतमा ।"
पेसा छा है। परंतु यह अशुद्ध है। क्योंकि यजु सर्वानुपामणी में-
"शावास्यमयी। अंधतमौ नव । द्वे सप्तदश ।"
अनुवाक सूत्राध्याय
ईशावास्यमामदेवत्य आनुभोऽध्यायः । अनेजद्देफ पिए,
सपरि जगती । वायुगनिलं यजुषी ।
रा.सर्वानुक्रमणी.
फवं वाचं पंचाध्यायी दध्याथर्वणो ददर्श।
यजु. सर्वानुक्रमणी ४।५
यज अ. ३६ से ४० तक के पांच ही अयायोका " दायड्
अपर्णा "षि कहा है। यही भार शतपयमें भी है-
भूमिका। ११ दध्यङ् ह या आर्यण पतं शुक्रमेतं यज्ञं विदांचकार । श.ना.२४|११२१२० इस प्रकार यजुर्वेदके अंतिम पंचाध्यायीकाध्यङ् अथर्या ऋषि है । यही भाव अन्य भाष्यकार स्वीकार करते हैं- (आत्मदेवत्य अनुष्टुप्छंदस्कोऽध्यायो दधीचाचणेन दृष्टः। ( महीधरभाष्य) (२) ईशा वास्यं । तिस्रो ऽनष्टमः । दध्यङ् आथर्वण ऋषिः । (उपट भाष्य) " ईशावास्य आदि अध्यायका दध्यङ् अथर्या ऋषि है । " इस अथर्वा का ब्रह्मवर्णन के साथ वेदमें संबंध है । प्रत्यक्ष अथर्य वेद. का नाम ही "ब्रह्मवेद " है। देखिये- । " ब्रह्मवेद " श्रेष्ठो हि वेदस्तपसोऽधिजातो ब्रह्मभाना हदये संयभूव ।। (गो. मा. १।९) "एतद्वै भूयिष्ठं ब्रह्म यद् भृग्वंगिरसः । येऽगिरसः स रसः । ये ऽथर्याणस्तन्नैपजम्। यद् भेषजं तदमृतम्। यदमृतं तद्ब्रह्मा" (गो. मा. ३१४) "चत्वारो वा इमे वेदा ऋग्दो यजुर्वेदः सामवेदो ब्रह्मवेदः" (गो. ना.२-१६) चार वेद हैं ऋग्वेद, यजुर्धेद, सामवेद और ब्रह्मवेद " इस में अथर्य वेदका नाम " ब्रह्मवेद" आया है । अथर्य वेदमें अस्मा और ब्रह्मफे सूत यहुत ही है । इसलिये भी इसका नाम ब्रह्मवेद अन्यर्थक है। इसी ब्रह्मविवार के साथ संबंध रखनेवाला " अर्थवा " यह झपिनाम है, इसीलिये गोपथ इस नामकी यु. त्पत्ति निम्न प्रकार दी है- " ।
. ईशोपनिषद्। तधग्रयोदयापङिन...अन्धिच्छेति तदाऽभवत् । गो. ना.११४ ॥ इस को अथर्धा इस लिये कहा गया कि इसने (अथ अर्वाक् एनं अन्विच्छ) इसको यहां हो द ऐसा कहा। अप+अ- चांक ऐसा कहनेसे 'अधर्या' कहा गया। इसका तात्पर्य यह है कि, परमेश्वर को बाहिर कहां ढूंढते हो, यहां अपने अंदर इसको हूँढो, ऐसा जिसने कहा वह 'अथर्वा ' नामसे प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार 'अथर्वा शप्दका अर्थ सिद्ध कर रहा है कि, इसका आत्मविचार के साथ संबंध है। तथा- अथर्वाणः अधनवन्तः। थप तिश्चरतिकमा तत्प्रतिषेधः। निरु. न. ११००६ अधर्व" का अर्थ "स्थिर" है।"य" का अर्थ गति है, इस लिये "अ-धर्वा" का अर्थ गति-रहित होता है। योग साधन कर, नेके पश्चात् जो मनको स्थिरता, पकामता,अचंचलता सिद्ध होती है, उसका दर्शक यह शब्द है । स्थिरयुद्धि, स्थितप्रज्ञ, समाधिस्य, योगी यह इसका भाव है। इस प्रकारके योगीका ब्रह्मविचार के साथ संबंध होना स्पष्ट की है। इसलिये इस अध्याय का "अथा" शापिनाम यता रहा है कि, इस अध्यायमें ब्रह्मविचार किंवा आत्म. विचार हा है, तथा इसमें आये हुए " अग्नि, यम, पूपा, पुरुष" आदि शम्द इस प्रकरण में आत्मापाचक अथवा नाचाचा ही निथयसे हैं। देवताका विचार और ऋपिनाम का विचार करनेसे "अग्नि" आदि शब्दोंका माव आत्म विषयक ही इस अध्यायमें होना योग्य है, यह बात सिद्ध होगई। aye भूमिका। १३ (६) ईश उपनिषद्का महत्व । सब अन्य उपनिषद् ब्राह्मण और आरण्यक ग्रंथोंमें हैं। यह एक- ही उपनिषद् ऐसा है कि जो मंत्र संहिताम है । ग्राह्मणों और आर- ज्यकों की अपेक्षा मंत्र संहिता का मान और प्रामाण्य विशंप होने सेही इस ईशोपनिषद को पहिला स्थान प्राप्त हुआ है। यही एक "मंत्रोपनिषद्' है । और इसीके आधार पर अन्य उपनिषदों की रचना हुई है। जो शान अन्य उपनिषदोंमें है वह इसमें है, परंतु जितना उपदेश इसमें है उतना अन्य उपनिषदोंमें है ऐला नहीं कहा जा सकता । अन्य उपनिषदोंकी व्याख्या करने के प्रसंगमें इसका सप्रमाण विचार किया जायगा, और वहां ही किस उप- निषद् का इसके किस मंत्रसे कैसा संबंध है, यह बताया जायगा। उदाहरणके लिये यहां इतनाही कहना पर्याप्त होगा कि- (१) केन उपनिषद्- "नैनवा आप्नुवन्" इस ईशोपनिषद् के मंत्र भाग ( य० ४०४, ईश उ० ४) की व्यारया है। इसका विशेष स्पष्टीकरण "केन उपनिषद् ' की भूमिकामें किया गया है। (२) वृहदारण्यक उपनिषद् इशोपनिषद् की दौडती टीका ही है। संपूर्ण यजुर्वेदके ४० अध्यायोंपर " दौडती दौका' ही शतपथ ब्राह्मणके १४ कांड हैं। इससे स्पष्ट है कि, यजुर्वेदक अंतिम ४० वे अध्याय की टीका १४ ये कांडमें है । १४ वा कांड ही बृहदारण्यक है । जो पाठक दोनोंकी परस्पर तुलना करेंगे, उनको यह विषय स्वयं स्पष्ट हो जायगा। इस प्रकार इस य, अ. ४० का अर्थात् ईशोपनिषद् का संपूर्ण मात्मविद्या प्रथमंडारमें अत्यंत महत्व है। ऐसा समझोये कि यह अध्याय सब आत्मविद्या के ग्रंथों में शिरस्थानमें अथवा मुख्य स्थानमें विराजता है। इसी कारण सब उपनिषदोंमें भी इसको प्रथम स्थानपर गिनते हैं।
ईशोपनिषद् । इस प्रकार एक ही यातका विस्तार कमश इन अधिशा में हुआ है। प्रत्येक पद पद का परस्पर संबंध देखने से और सूक्ष्म विचार के साथ उनका आशय समझने से बडा ही आनंद प्राप्त हो सकता है, और अध्यात्म विद्याक गद सिद्धांत विशद हो सकते है। जैसा " एक ईयर के विषय में प्रथम अधिकार में वर्णित यातो का स्पष्टीकरण आगे के अधिकारों में हुआ है। इसी प्रकार अन्यान्य विषयों का भी है। इसलिये पाठक इस दृष्टिसे इस अध्याय का अभ्यास और मनन करें। १८) माप्यकारों का कथन । कई भाष्यकारोंने इस अध्याय के विषय में अवास्तविकता को प्रस्ट किया है, जैसा- (१) यो संकराचार्यजी कहते हैं कि"ईशावास्यमित्यादयो मशः फर्मरविनियुक्ता, तेषां अकर्मशेषस्यात्मनो याधात्म्यप्रकाश कत्वात् । यथाल्यं व आत्मनः शुद्धत्वापापविद्धत्य फत्यनित्य स्वाशरीरत्वसर्वगतत्वादिचक्ष्यमाणम् । तच्च कर्ममा विरुध्यते । इति युका परेश फर्मस्व विनियोगः ॥ ईश शाकर मार ॥ 'ईशावास्य. आदि मंत्र कों में चिनियुक्त नहीं हुए है, क्यों कि इन मंशशे में आत्मा का उत्तम वर्णन है। आत्मा २, अपार- घिद्ध, प, नित्य, अशरीरी, सर्वव्यापक आदि गुणोंसे युक्त है. ऐसा जो धर्णन इस उपनिपद में है, यह कर्म से विरोधी है, इस लिये इन मंत्रों का विनियोग को में न होना ही युक्त है।" थो० पूज्य शंकराचार्यजी को यह युक्ति वास्तविक प्रयल नहीं है, यही बात यहाधतानी है। यदि आत्मा का वर्णन होने से मंत्रों का विनियोग का में नहीं होना चाहिये, तो पजु १०३२ के मंत्रोमें पासी आमा वर्णन है, तथापि "सर्वमेधपक्ष" मक यभकर्म में उस चाय का विनियोग दिया गया है। आमा ना.
भूमिका के जो " शुद्ध, निष्पाप, एक " आदि गुण इस अध्याय में वर्णन किये गये हैं, वेही उसी अध्याय में हैं। देखिये- सर्पमेधप्रकरणं। ईशोपनिषद् । (यजु अ ३२) ( यजु अ ४०) शुक्र (मंत्र १) शुद्ध (मंत्र ८) अमृतं (मं १०) अपापविद्ध (") तत् (मं १) एक (मं ४) ऋतं (मं १२) (सत्यं) नित्यं (मं १५) न प्रतिमा (मं.३) असायं (मं ८) विभू (मं ८) पर्यगात् (") इस प्रकार जो गुण आत्मा के वर्णन रूपमें दिये गये है ये सब अध्याय ३२ में है, तथापि अध्याय ३२ फर्म में विनियुक्त है और अध्याय ४० नहीं है । इसलिये उक्त हेतु ठीक नहीं है । वास्तव. में देखा जायगा, तो यह बात सीन दिखाई देगी कि, मनों का विनियोग जो सर्वत्र कर्मकाड में इस समय प्रचलित है, यह सब का सब प्राय अर्थहीन है । अर्थात जो भाव मन में है, उसके अ नुरूप कर्ममें उसका विनियोग ही नहीं हुआ है । मनका भाव एक और उस से जो कर्म किया जाता है वह भिन्न ही है । जैसा "शर्माऽसि ।" यजु. अ ०१४ इस मंत्र का विनियोग ' चर्म" अर्थात् "कृष्णाजिन " उठाने के कर्म में हुआ है । परतु शर्म' फा" चर्म" के साथ क्या संबंध है ? वास्तव में कोई संबंध नहीं। इस मामें आत्मा के शर्म" अर्थात् “सुख गुण का वर्णन किया गया है, आत्मा स्वयं शर्म रूप है, सुखस्वरूप अथवा आनदरूप है । इस वर्णन के साथ "चर्म उठाने का फर्म" कोई संबंध नहीं रखता। इसी प्रकार बहुधा मत्रो क विनियोग गलत हैं । ऐसे विनियोगों को प्रमाण । - " ईशोपनिषद् । मानना, और अन्य वैदिक संहितायें यह फी में विनियुक्त होने से मान प्रतिपादक नहीं है, ऐसा करना सर्घया अयो- ग्य है। " . इस प्रकार के कथन से जो घृया दोषारोप वेदके संहिताओपर आताया, और जिस से अन्य मंत्रों में आत्मा का वर्णन नहीं है, ऐसा जो आशय व्यक्त होता था,उमीयातका खंडन यहां किया है। मंत्रों को जबरदस्ती किसी कर्म में विनियुक्त करनेसे ही केय. ल उनमें जी आरमविद्या है, वह दूर नहीं हो सकती। इसका उत्तम उदाहरण यजु अ० ३२ है। इसकी व्याख्या (एक ईश्वर उपासना नामसे ) स्वतंत्र रूपसे छपी है। हरएक पाठक इस म्यानपर उसको अवश्य देखें और अनुभव करें, कि उसमें मी कितनी आत्मविद्या है। अस्तु । यहां करना इतनाही है कि, घेद. की संहिनाका मुख्य श्यतस्य आत्मा का वर्णन " दी है। परंतु फर्मकांडियों में उनको जबरदस्ती अपने अभीष्ट कर्मों में विनियुक्त किया है। परंतु अध को दृष्टिसे देखा जाएगा, स्पर दिखाई देगा, कि जिन कोम मंत्रोषा विनियोग हुआ है, उन कर्मों के संबंध में मंत्र मुग्ध हो है । इस प्रकार भाष्यकारोने अपने पूर्व प्रहही स्थान स्थानपर यता- ये हैं। इसका और एक उदाहरण देखिये-- ९ वेदान्त के अध्ययन का काल । इस अध्याय के अध्ययन के काल के विषय में लिखते दिखते थी० उघट और महीधर ये दोनों आचार्य लिखते हैं- "समा कर्मकांडं. इदानीं शानकांदं प्रस्तूयते ॥ । घट्डाण प्रापिः स्थशिष्य एवं पा गर्भाधानादिभिः संस्कारैः संस्कृतशरीरं, अधीतवेद, तो यह ...
भूमिका। १९ उत्पादित पुत्रं......शिक्षयन्नाह ॥' उवाटभाष्य अ.४०।१ "एकोनचत्वारिंशताध्यायैः फर्मकांडं निरूपितं । इदानीं कर्माचरणशुद्धांतःकरणं प्रति ज्ञानकांडमे कैन अध्यायेन निरुप्यते । ईशावास्यमित्यादि मंत्राणां फर्मसु विनियोगो नास्ति । तेषां शुद्धत्वैकत्त्यापाप- विद्धत्वाशरीरत्वसर्वगतत्वाधात्मयाथात्म्यप्रतिपादनात् । तच्च फर्मणा विरुध्यते ।......ईशावास्यं .....अध्यायो दधीचाथर्वणेन दृष्टः। गर्भाधानादिसंस्कारसंस्कृतं, अधीत. घेदं, जनितसुतं,......शिष्यं पुत्रं या ऋषिरुपदिशन्नाह । महीधरभाष्य ४०।१ (१) यजु. अ.३९ तक कर्मकांड समाप्त हुमा. अय ज्ञान कांड का प्रारंभ होता है । ६० ॥" (२) दध्यङ् आथर्वण ऋपि अपने पुत्र अथवा शिष्य को इस अध्याय का उपदेश करता है जो शिष्य अथवा पुत्र गर्भाधा- नादि संस्कारों से सुसंस्कृत है, जिसने वेदका अध्ययन समाप्त किया है, और पुत्र उत्पन्न किये हैं ॥" ये दो कथन उक्त दोनों भाप्यों में समान ही है । पहिले कथन का संडन श्री शंकराचार्यजी के मतकी समालोचना करने के समय किया ही है । अब दूसरे कथन का विचार करना है। जिस. ने तो विरक्त वृत्ति से रहकर आजन्म ब्रह्मचर्य में रहना है, उस के लिये जिस समय चाहे ब्रह्म विद्या का अध्ययन करनेका अधिः कार होगा। पुत्र उत्पन्न करने के पूर्व वह ब्रह्मविद्या में प्रविष्ट हो सकता है, जैसे कि श्री शंकराचार्य स्वयं हुए थे। परंतु जो गृहस्थी होना चाहते हैं ऐसे माधारण जनों के लिये जो मार्ग उक्त दोनों आचार्योन अपने भाष्य में लिया है। उस से. ऐसा 6 २० . ईशोपनिषद् । प्रतीत होता है कि, पुष उत्पन्न करने के पश्चात् ही घह इस ईश उपनिषद् का अध्ययन कर सकता है। अर्थात् ब्रह्मविद्याके अध्ययन का प्रारंभ करने का समय पुत्र उत्पन्न होने के पश्चात् है। परंतु यही घडा भारी भ्रम है। अथर्व वेदमें ब्रह्म साक्षात्कार फा फल घर्णन किया है, वह यहां देखिये- यो वै तो ब्रह्मणो घेदामृतेनावृतां पुरम् ।। तस्मै ब्रह्म च ब्राह्माश्च चक्षुः माणं प्रजां ददु ॥ २९ ॥ न तं वाहाति न प्रायो जरसा पुरा । पुरं यो ब्रह्मणो येद यस्याः युरुष उच्यते ॥ ३०॥ अधर्य २०१२ - " जो अमृतमय ब्रह्मपुरी को जानता है, उसको ब्रह्म और अन्य देव चक्षु, माण और मजा देते हैं। जो इस ब्रह्मपुरी को जानता है. उसके चक्षु और प्राण वृद्धावस्था के पूर्व उसको नहीं छोड़ते।" इसका स्पष्ट तात्पर्य यह है कि ब्रह्मशान होनेसे उस प्री ज्ञानी को सुदृढ इंद्रिय, दीर्घ आयुष्य और सुप्रजानिर्माण की शक्ति प्रास होती है। यह ब्रहाशाम का फल है। वेदांतशास्त्र के अनेक लाभों में "सुप्रजानिर्माण शक्ति की प्राप्ति " यह भी एक लाभ है। यदि यह सत्य है तो गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होने के पूर्व ही ब्रह्मविद्याका अध्ययन होना चाहिये, पता लगना चाहिये । परंतु उक्त आवार्य इस वैदिक सिद्धांत के विरुद्ध ही कह रहे हैं, कि पुत्रोत्पत्ति के पश्चात् यह उपनिषद पढ़ें, इसलिये उनका मत चितनीय ही है। आत्मशानसे गृहस्थ के आवरण पर परिणाम होता है, इसलिये प्रक्ष विद्याका अध्ययन गृहरपाश्रमके पूर्वही होना आवश्यक है। और ग्रामपुरोका भूमिका। २१ पाठक भी इस अध्यायके मनन के पश्चात् जान सकते है कि, इसमें कोई ऐसी बात नहीं कही है, कि जो पूर्व आयुमै ज्ञात होने से हानिकारक सिद्ध हो प्रत्युत इस अध्यायके सबही उपदेश मायालवृद्धोंको अत्यंत लाभदायक है, ऐसा हरएक पाठक आय- यनके पश्चात् अनुभव कर सकता है । इस लिये इसका अध्ययन पूर्व आयुमें ही होना आवश्यक है । (१०) निष्काम कर्मयोग। श्री शंकराचार्यजी कहते हैं कि शान और कर्मका विरोध इस उपनिषद् में है और सर्वत्र है। परंतु इस उपनिषद्का विचार करनेसे पता लग जाता है, कि ज्ञान और कर्मका समुच्चय इस को अभोट है। यह उपनिषद् अथवा यह अध्याय कर्मयोगफा निषेधक नहीं है और कर्मत्याग का प्रवर्तक भी नहीं है। देखिये इसके मंत्रों में क्या क्या उपदेश कहा है। मंत्र १- "त्यक्तेन भुंजीथा" यह आशा यहां है। त्यागभावसे भोग करनेका उपदेश यहां मिलता है । " निष्काम कर्मयोग" का चीज इसमें है । श्रीमद्भगवद्गीतामें जिस निष्काम कर्मफी महती गायन की गई है, उसका मल चीज इस मंत्रके इन पदों में है। मंत्र २-" फर्म करते हुए सौ वर्ष जीनेफी इच्छा" करनेका उपदेश इस मंत्र है। प्रथम मंत्रमें कहे हुए निष्काम भावसे कर्म फरते हुए सौ वर्ष जीनेकी इच्छा धारण करनी चाहिये । यह दोनों मंत्रोंका इकठ्ठा तात्पर्य है। इस प्रकार प्रथम और द्वितीय मंत्रका वास्तविक कोई विरोध नहीं है, परंतु श्री० शंकराचार्यजी कहते हैं कि पहिला मंन शानीके लिये है और दूसरा मंत्र ज्ञानके अनधिकारी के लिये है। इस प्रकार दोनों का परस्पर विरोध है । स्पष्टीकरणमें इनकी परस्पर संगति जो देखेंगे उनको इनमें कोई विरोधही नहीं दिखाई देगा। "पर.
ईशोपनिषद् । मेश्वर सर्वन है, त्याग मापसे भोग करो, लालच न करो। निष्का म कर्म करते हुए सौ घर्ष जीने की इच्छा करो, यही पर मार्ग है, दूसरा कोई मार्ग नहीं, नरको फर्मका लेप नहीं लगता।' यह दोनों मंत्रों का तात्पर्य है । क्या इसमें परस्पर विरोध है ? घारत. पर्म दोनों मौका आशप मिलकर दो पूर्ण मानवधर्म बनता है । और इसी रिसे इन मंत्रोकी ओर देखना चाहिये। मन ३- आत्मघातक कर्म करनेवालोका अध पात होता है ऐसा तिसरे मंत्रमें कहा है । तात्पर्य यह है कि कोई इस प्रकारके आत्म- घातप कर्म न करें और सब आत्मोन्नतिकारक पुरुषार्थ करके ही अपना अभ्युदय और निधेयस् का साधन करें। मनः इस चतुर्थ मनमे "मातरि-श्या अप दधाति" यह वाक्य है। माताके बदरमे रहनेघाला गर्भस्थ जीव भी कोको धारण करता है, यह इसका तात्पर्य है । पहिले जन्म में किये हुए कर्म संस्कार रूपसे गर्भ में भी रहते हैं, यह इसका तात्पर्य है। कर्म छूटते नहीं है। निष्काम भावसे ही कर्मके पंधनको तोडना चाहिये। यह इस उपनिषद् का आशय है। मत्र ५-इस मंत्र " तद् एजति " ग्रह्म सपको गति देवा है। ऐसा कहने से उसके एक विशिष्ट कर्मा उल्लेख किया है। आत्मा ही सय जड जगत में हलचल करता है। इसका तात्पर्य यह है कि पिलकुल कर्महीन रहना असंभव है। भगवद्गीता में भी इसी हेतुसे कहा है कि 'कोई क्षणमात्र भी पर्म न धरता हुआ रहनदी सकता"(म गी ३१५)क्यो कि आत्माका स्थमापदी इल चल करना है। इसरिये यह मंत्रभी कर्म सूचक ही है। मत्र -समंध आत्माके जोगणगोधक शब्द है धेभी फर्म- योधप ही है। "कवि, मनीषी, परिमः " ये शब्द विशेष व्यापार केही पोधन है। तथा " अर्थान ध्यदधात् " यह पापप तो नि ' ।
भूमिका। २३ संदेह उसके कर्मका ही योधक है । " सब अोंकोचह ठीक प्रकार करता है।" यही उसका पुरुषार्थ है अथवा स्वभाव है। मंत्र ९.१२ - में “ विद्या और अविद्या " अर्थात् आत्मज्ञान और प्रकृतिविज्ञान की उपासना करनेका उपदेश है। यहां कई योके मतसे " विद्या अविद्या" ये शब्द ज्ञान और कर्म के बोधक है। इस दृष्टीसे भी ये मंत्र ज्ञान और कर्म के समुच्चय का उपदेश कर रहे हैं, न कि ज्ञान और कर्म के विरोध का। मंत्र १२-१४- इन मंत्रों में "संभूति और असंभूति " अर्थात् संघभाव और व्यक्ति भावक कर्तव्यों का उपदेश है। संघभाव और व्यक्तिभाव के कर्तव्योंका विरोध नहीं है, प्रत्युत दोनों कर्तव्यों का समुच्चय ही इस उपनिपद् को अभीष्ट है। मंत्र १५- में कहा है कि " सत्यके आचरण को दूर करो और सत्य का अवलोकन करो।" इसमें भी पुरुषार्थका ही उपदेश है । मंत्र १७- में जीवात्मा का नाम "ऋतु ' कहा है। यह पुरुषार्थ का ही सूचक है। मंत्र १८-में" सय कर्मोके जाननेवाले परमेश्वरकी प्रार्थना है कि वह दुष्टता रूप शत्रुके साथ हमारे द्वारा युद्ध करवाके हमको अच्छे मार्ग पर से ले जाये।" यह भी पुरुषार्थ ही है। इस प्रकार इस अध्याय का प्रत्येक मंत्र श्रेष्ठ पुरपार्थका द्योतक है। तथापि फई कह रहे है कि, यह उपनिषद् कर्मयोग का खंडन करता है। क्या इससे और अधिक कोई आश्चर्य है ? वास्तव में जैसा इसमें "फर्म और ज्ञानका समुच्चय " स्पष्ट शब्दोंसे कहा है वैसाही श्रीमद्भगवद्गीतामें भी कहा है। यदि गीता संपूर्ण उपनि- पदों का सत्व है, तो संपूर्ण उपनिषदोंका भी यही अभिप्राय होना चाहिये। और वैसा है भी। परंतु कई संप्रदायवाले अपने संप्रदाय के अहंकारसे इस ज्ञानकर्म समुच्चय का विरोध करते हैं। परंतु ॥
ईशोपनिषद् । वह मत इन मंत्रों में नहीं है। घद उनका निजमत है। इस शोपनि- पद् का तो स्पष्ट भाव " ज्ञान-कर्म-समुच्चय " ही है। (११) ज्ञान और कर्म के समुचय का मुख्य हेतु। आत्माकी चार अवस्थायें हैं। जापति, स्वप्न, सुपुप्ति और तुर्या । इन अवस्थाओमें आत्माकी सब शक्ति प्रकट हो रही है। उक्त अवस्थाओं के नाम परमात्माके साथ वैश्वानर, तेजस, प्राश और आत्मा ये चार है। अर्थात् आत्मापरमात्माके साथ उक्त चा. रो अवस्थायें लक्ष्म और वृहद्पाले हैं। चारो अवस्था आमाका वैभव व्यक्त करने के लिये आवश्यक ही हैं। सनातन कालसे इन चारों अवस्थाओं में आत्मा अपनी शक्ति का अनुभव देख रहा है। आरमा परमात्मा अवस्था तुर्या शद्धात्मा सुषुप्ति प्राक्ष नेइम अवस्था, (शान ) निवृत्ति स्वप्न... तेजस जागृति... पश्चानर Jफर्म अवस्था (कर्म) प्रधुनि. इनमें दो अवस्थायें कर्म की हैं और दो नैष्कर्म्य की है । चारों आवश्यक होने के कारण शान और धर्मका समुच्चय होनाही आ. वश्यक है। यह कोई नहीं कह सकता है कि इनमें से किसी अवस्था की बिलकुल आवश्यकता ही नहीं । जो अयस्था नष्ट होगी, उस अवस्थामे व्यक्त होनेवाली आत्माकी शक्ति गुप्त ही रहेगी, उस अवस्था विना यह प्रफट ही नहीं हो सकती। इसलिये जैसा आ- रमा सनातन है वैसी ये चारों अपरायें भी सनातन ही हैं। पर- मात्मा भी तेजस श्वानर आदि द्वारा फर्म करता ही है, जो सृ. शिरूपके अनादि प्रवाहसे दिखाई दे रहा है। परिच्छिन्न जीवको भी उत्त. कारणसे ही चारों अबस्थाये हैं । " चतुष्पाद् आत्म। " इसी 1 २५ है भूमिका। हेतुसे कहते हैं । उसके दो पांव तोडने नहीं हैं । इस कारण कर्म और शान का समुच्चय ही उन्नतिका साधा है। कई यहां ऐसा प्रश्न करेंगे कि मुक्त अवस्थामे जागृति मादि अवस्थाएं कहां है?इस शंकाके उत्तर निवेदन है कि शरीरके होने और न होनेसे मुक्ति और अमुक्तिफा कोई संबंध नहीं है। शरीरमें रहते हुए भी आत्मा मुक्तिका अनुभव कर सकता है औ- र शरीरत्याग होनेपर भी आत्मा पंधन की अवस्थामै रह सकता । मुक्तिका हेतु ही और है । "आत्माकी शक्तिका अनुभव करना और अपने आपको बंधनोंसे अलिप्त देखना मुक्ति है । " इसलिये यह शरीरमें कार्य करते हुए भी प्राप्त होती है। और इसकारण चारो अवस्थाओंका होना इसके लिये घातक नही है। प्रत्युत आ- स्माको विकसित शक्तिका अनुभव करने के लिये इसको जागृति की आवश्यकता होगी । यही मुख्य हेतु है कि ईशोपनिषद् तथा भगवद्गीता आदिमें ज्ञान और कर्मका समुच्चय कहा है। और कि- सी एक ही का स्वीकार नहीं किया। आशा है कि पाठक इस समु- च्चयका महत्व जानेंगे। (१२) इस अध्यायमें आये हुए यात्मा वाचक शब्दों का विचार । पहिले मंत्रम " ईश" शब्द है, वह "स्वामी, मालिक, राजा,, का भाव बताता है। इससे आत्माका स्वामित्व अथवा राज्यशासन किसी दूसरे " अनीश" पर है, यह बात सिद्ध होती है और इस लिये इस जगत् में राज्य शासन रूप फर्म यह आत्मा करता है यह सिद्ध है। जैसा सेवक का फर्म है वैसा स्वामीकामी कर्म है । स्वामी होनेपर कर्म छूटता नहीं है, परंतु बढता है।
२६ ईशोपनिषद्। द्वितीय मंत्रम " नर" शब्द है। यह "नायक, नेता, चलानेवाला" इस आशयको बता रहा है। जिनका नेतृत्व इसके पास है, उनको चलानेका, और योग्य दिशासे पलानेका कार्य करना समो आवश्यक हो है । इसलिये यह शब्द भी इसके फर्मका बोधक है। तीसरे मंत्रमें "जना." शन्द जननमात्र कर्म करने वाले सामा- न्य लोगोवा बोधक है। इस अवस्था में यह फेवल प्रजनन करनेका कर्म करता है, संतानकी उत्पत्ति करना ही इस अवस्थामें इसका पर्म है। 1 सातत्यगमन चतुर्थ मंत्रमें "अर्पत्" शब्द है । गत्यर्थक ऋ धातुसे यह शब्द बनता है, इसलिये इसका अर्थ गतिप्रधान ही है। गतिमी एक कमही है । ज्ञानार्थक भी यह शब्द है । तात्पर्य ज्ञान और कर्म का इस शब्दमें समुच्चय है। पष्ट और सप्तम मंगोम " आत्मा"शब्द है। कि सतत कर्म करने के अर्थयाला ' अत्' धातु इस शादमें है। इसलिये “ सतत कर्म करनेवाला " ऐसा इसका स्थयं अपना ही अर्थ है। इसीलिये आत्माके छः लक्षणों में "प्रयत्न " भी एक लक्षण संमिलित हुआ है। इच्छा, दुप, सुख, दुख, प्रयत्न, शान, आत्मा के छ. लक्षण है और उसका अत्' धातुके अर्थ के । साथ संबंध है। अहम मंत्रों में "फयो, मनीपी, परिभ." आदि शब्द आत्मा के विविध गुण बता रहे हैं। इस में यह विचारणीय है कि ये दो विशेषण " सनिघताफे भी हैं। देखिये- वमने प्रथमो अंगिरस्तमः कविधामा परिभूपसि प्रतम् ॥ १।३११२ "हे अग्ने ! तु (अंगि-रस-तमः) अंगोमें मुएए सस्वरूप (प्रथम बपि ) पहिला पपि है और (देयाना मनं ) इंदियोका २७ " भूमिका। चत, अथवा देवताओंका व्रत (परिभूपसि ) सुभूपित करता है।' शरीर में आत्मा सब अंगोका मुख्य सत्य है और वह इंद्रियोंके व्यापार चलावा है । तथा जगत् में परमात्मा मुख्य सत्वरूप है और सूर्यादिकोको चलाता है। इस मंत्रमें "अग्नि" शब्द आत्मा वाचक है और उसका"कचि" यह विशेष है, जो यज० अ० ४० के आठवे मंत्रमे शुद्ध आत्माका विशेषण आया है। अग्निका अर्थ वेदमें आस्मा है इसका यह एक प्रमाण है । इस विषयके अधिक प्रमाण यहां येने की आवश्यकता नहीं है। इससे पूर्व जो अग्नि देवता का विचार किया है, उस में यह मंत्रभी देखने योग्य है । अस्तु । पंध्रहवे मंत्रमें " सत्य" शब्द आरमाका बाचक है । " सत् "का यमन करता है अर्थात् 'सत् का नियामक" आत्मा है। यह निय. मनरूप कर्म बता रहा है। सोलहवे मंत्रमें उत अर्थकाही "यम" शब्द है । नियामक शा- ये इसके अर्थ हैं। "ईश" शब्दक अर्थ के साथ ही इसका मं. बंध है। "पूपा" शब्द पोपण करने का भाष, ऋषि " शब्द ग ति और ज्ञानका समुच्चय "सूर्य" शब्द प्रसव ऐश्वर्य वावक 'सु' धातुसे बनने के कारण सय जगत् की उत्पत्ति और सर जगत् का ऐश्चर्य बढानेवाला आत्मा है यह भाव बताता है। इसी मंत्रमें "प्र. जा-पति" शब्द है उसका भाव प्रजापालनरूप कर्म है । यही मा- व प्रथम मंत्रके 'ईश' शब्दने व्यक्त किया है । "पुरुष" शब्द पुरि. योमें रहनेका भाव बता रहा है। पूर्वोक्त चार अवस्थायें चार पुरियों में रहने सेही इसके अनुभव माती है । इसलिये पुरुषश- दसे पूर्वोक्त चार पुरियोंके साथ संबंध और यहां के कर्म व्यक्त होते। मंत्र १७ में "तु" शब्द फर्म का ही बोधक है। यह शब्द इसका स्वभाव धर्म ही बता रहा है। "शतकतु " शन्द जो इंद्र याचक है ।
०८ - ईशोपनिषद् । वह भी आत्माकाही वाचक है। सौ वर्पजीवित रहर यसकर- नका भाव उस शब्दमें है । इसीलिये रस अध्याय के द्वितीय मंत्र में "कर्म करते हुए यहा सौ घर्ष जीने की इच्छा फरो' ऐसा उप- देश किया है। उसका "शतकतु ' शन्दसे निकट सयध है। अठारह मत्रमें "अग्नि "शब्द गतियाचक ही है क्यों कि यह गत्यर्थक " अग्' धातुसे घनता है इस प्रकार आत्मावाचक सपही शब्द पुरुषार्थ के चाचा है, यह यहा अत्यत विचार करने योग्य बात है। इन शब्दोंसे जो जोआ- रमाके गुणधर्म व्यक्त हो रहे हैं उनका विचार करनेसे आत्माये घा- स्तविक स्वरूपका पता लग जायगा । और कर्म करना उसका स्वमानही है यह बात भी इस विचार से सिद्ध होगी। अब इन शन्दोका परस्पर सवध क्या है इसका विचार करना है- १३ इस अध्यायके विशेष नामाका परस्पर सबंध। इस अध्यायमें जो विशेष नाम हैं, वे आरमाफी शनिषा वर्णन कर रहे हैं। कई शब्द विशेषतया केवल जीवात्मा वर्णन करते है और कई विशेषतासे परमात्माका वर्णन कर रहे है । तथा को ऐसे हैं कि जो दोनोंका वर्णन समानतासे पर रहे हैं। साधारण अवस्थासे उच्च अवस्थातक उनका कैसा प्रमदे और उनसे हमें पया चोध मिलता है। इसका यहा विचार करना है। प्रथमत यहा इस बात को अवश्य स्मरण रखना चाहिये कि, जो परमात्माके घाचक शब्द घेदिक वाङ्मयमें है, ये परिच्छिन्न अर्थात् मर्यादित भाषफ साथ जीवात्मा भी वाचक है, और जो जीवात्माके पाचर शब्द हे चे अमर्यादित अर्थ के साथ परमात्मा भी वाचक है। प्राय सरशार दोनों परिये समानतासे ही प्रयुक्त होते हैं क्यों भूमिका। कि दानोंके गुणधर्म बहुत अंशमै समानही हैं और दोनोका पितापुत्र मंबंध सुप्रसिद्ध ही है। "अज, इद्ग,आत्मा" आदि शदोंके साथ सय पाठक परिचित ही है, और ये जानते है कि, ये शब्द दोनों के लिये प्रयुक्त होते है । इसी दृष्टिसे इन शब्दोका यहा विचार करना है और उस के द्वारा जीवात्माची उन्नतिका मार्ग देखना है। परमात्मा सदा पूर्णशानी है, परतु जीवात्मा किसी कारण मिथ्याशान अथना अशान से युक्त होता है, यह अशानरूप जो अयस्था जीवात्माको किसी कारण विशेषसे प्राप्त होती है, यह कदापि परमात्माको नहीं होती। इस अवस्थाके घाचक जितन शब्द जीवात्माके लिये प्रयुक्त होते हैं, वे कभी परमात्मा के लिये प्रयुक्त नहीं होते। यह विशेपेता लक्ष्य रखनी चाहिये। इन शब्दों में से एक "आत्म-हन्" शब्द तृतीय मत्रमें प्रयुक्त हुआ है। आत्मामा घात जो करता है यह आत्महन् हाता है । जिसपोजन्म और मरण नहीं है ऐसे अज और अमर "आत्माका घात "कैसा होता है? 'अपनी शक्तिका पता न होने से ही आत्मघात होता है। इस अध पातका कारण अशान है। यह "आत्म हन" शब्द उन जीवात्माओंका बोध करता हे कि, जो स्वकीय शक्तिसे अनभिज्ञ होने के कारण अपने आपको कमजोर समझते हुए हीन अवस्थामें गिरते जाते हैं। ये आत्मघातकी लाग अपनी शारीरिक शक्निमें ही मस्त रहते हैं, नहीं नहीं, अपनी शक्तिके घमंडसे उन्मत्त होकर बडेही अनर्थ करने के लिये सिद्ध होते है, और प्रत्येक प्रयत्नसे गिरते ही जाते हैं। असु " प्राणो कहते हैं। उन प्राणोको जो शक्ति है वह 'असुर्ग' नामसे प्रसिद्ध है। यह वस्तुत आत्मा को ही शक्ति है, परंतु यह स्थूल शरीरमें कार्य करती है । इस शक्तिमें ही मस्त रहनेक अथवा इस शक्तिस माथा भोग बढाने के कारण इस की ईशोपनिषद् । मेरी उत्पत्ति नहीं हुई, मैं स्वयं ही हूं, इसीलिये " स्वयं-भू" मुझे शानी कहते हैं। इस रीतिका विचार करके इस अवस्थामें यह अप. ने आपको स्वकीय शक्ति से अवस्थित अनुभव करता है और अपनी आत्मशक्तोसे यह शरीर चल रहा है ऐसा देखता है। आत्मा अपनी शक्ति से ही रहता है, परंतु शरीर के अस्तित्य के लिये आत्माका रस चाहिये, आत्माकी शक्ति चाहिये । इस रीति- के विचार से यह अपनी स्वतंत्रता का अनुभव प्राप्त करता है और अपने आधार पर शरीरका अस्तित्व है, अतएव वद, परतंत्र है ऐसा देखता है। मैं 'एक' है और मेरे पक के आधार से शरीरको अनेक शक्तियां हैं। उन अनेक शक्तियोंमे अपने 'एफ्स्य ' का यह अनु- भव करने लगता है । अनेक भिन्न पदार्थोंमें एकत्वका अनुमय करनेका अभ्यास इस रीतिसे उसको होता है। मैं कभी कंपायमान नहीं होता (अन्-एजत् ), पर्यो कि शरीर पननेके “पूर्व " ही में था, और शरीर नष्ट हो जानेपर भी मैं रहूं गा, और बीचकी अवस्था में शरीर को (अर्पत् ) गति दे रहा हूं। शरीर का अस्तित्व याचको अवस्था है, परंतु मेरा अस्तित्व शरीर से पूर्व और उत्तर कालमें भी एक जैसा ही है। इस शानसे यह निर्भय होता है और अपने गौरय का यह अनुभव क. रता है। मुझे कोई पाशवी शक्की नहीं दवा सकती क्यों कि पाशवी शक्तिसे कई गुणा पलवत्तर जी आरमशक्ति है वही मैं हूं. इस प्र. कारके मननसे वह आत्मिक पलसे परिपूर्ण होता है। यह तीनो कालो में उक्त प्रकार अपने आपको "सत्य" स्वरू- प समझता है। किसी काल में नहीं था पसा कोई काल नही हैं. परंतु सरीर एक काल में आता है और दूसरे कालमें चला जा ता है। उसके आने न आने से अपनी आत्मशक्ति कोई न्यूनाधिक । भूमिका। ३३ नहीं होता। यह अतींद्रियताका अनुभव इस समय वह करत है इसलिये उसको इस समय "कविः " कहते हैं । जो साधारण लोग नहीं देख सकते उस यातको अपनी असाधारण दृष्टिसे कवि लोग देखते हैं। यह असाधारण दृष्टि उसको इस समय होती है। इस दृष्टिके कारण ही वह अपने अंदर विलक्षण बलका अनु- भव करने लगता है। वह देखता है कि शरीर धारण करने के पूर्व उस को माताके उदरमें रहना पड़ा है। "मातरि-श्वा' मैं ही पेसा यह इस विचार से समहाता है । स्वेच्छासे देह धारण करने के समय अथवा कर्म के प्रवाहमें पड़ने के कारण द्वितीय जन्म धारण करनेके समय माताके उदर में जाना आवश्यक है । तथा एक शरीर छोडकर दूसरा लेनेके पूर्व जो गर्भस्थानीय अवस्था है उसमें भी, पूर्व शरीर द्वारा मेरी प्रेरणासे कियेहुए कर्म, संस्काररूप से रहते हैं। अर्थात् किया हुआ फर्म नष्ट नहीं होता। कर्म शरीरों के द्वारा किया जाता है, परंतु संस्कार रूपसे जन्मजन्मांतर तक वह रहता है। इस लिये आवश्यक है कि प्रशस्ततम कर्म ही किये जाय । और कमी पेसे कर्म न हो कि जो गिरानेवाले हो । मैं आत्मा ही. इस कर्मभूमि-वे हम-कर्मफर्ता हूं। मैं ही इस याशाला में-देहमें यशकर्ता हूँ। मेरी प्रेरणासे ही यहां के यज्ञ हो रहे हैं। इसी लिये मुझे "ऋतु" कहते हैं। इस देहमें रहता हुआ मैं सौवर्ष यज्ञ करता हूं इसलिये ही में 'शत ऋतु' हूं । इस शतसांवत्सरीफ यज्ञका बीच में ही विघ्नों के द्वारा घात होना उचित नहीं । कुविचार रूपी राक्षस सहस्त्रोंकी संख्या है जो कि इस यक्षका विध्वंस कर रहे हैं। परंतु मैं इसको अवश्य निर्विघ्नतासे समाप्त करूंगा। मैं 'प्पा " हूं, क्यों कि इस शरीर की पुष्टि मेरे से हो रही है। शरीर की पुष्टि मेरे विना नहीं हो सकती ! मैं ही इस शरीर का " प्रजा-पति॥ ईशोपनिषद् । और मन आदि संपूर्ण इंद्रियों का नियमन करनेवाला होनेसे यहां "यम और नियमों के पालन करने द्वारा सबक पया योग्य रीतिसे नियंमन अपश्यही करूंगा। संयम पूर्वक प्रल- वर्यादिका यथायोग्य रीतिसे पालन करता हुमा सु-प्रज्ञा उत्पन्न करके, उस सुप्रजा का उत्तम प्रकार से पालन करूंगा। क्यों कि मेरे विना मेरे संतानोका परिपालन कौन करेगा। का धर्म पालन करना मेरे लिये आवश्यक ही है। मैं"प्राजापत्यही । इसलिये सुप्रजा निर्माण करके उनका योग्य पालन करना मेरा योग्य और श्रेष्ठ कर्तव्य है । " सूर्य आरमा जगतस्तस्थुषश्च । " ( ११११११) स्थावर जंगमका आरमा ही सूर्य है । यहां शारीर में शरीरादि स्थाधर और मन आदि जंगम पदार्थों का में आरमा ई इस लिये यहां मैंही "सूर्य " हूं। ये मेरे सप्तरदमी सात किरण सप्त इंद्रियों में प्रकाश कर रहे हैं, ये ही मेरे (समाव) सात घोडे है। येही "सस ऋषी "हैं और ऋषियोंका "ऋषि आत्मारूपसे मैं यहां विराजमान हं। यहां मेरी.उपस्थिति होनेसे सप शरीर पवित्र रहता है और मेरे जानेसे यहां सय अमंगल हो जाता है, इसलिये यहाँ का सया कल्याण करनेवाला मैं हो" कल्याण-तम "हूं। इस देहरूपी पुरीका "ईश्वर" मैं ही 'परीश ' मेरा नाम है। पुरीम वसने के कारण मुझे "पुरुष " कहते हैं। इन चार पुरियों मैं रहता हुआ मैं जागृति, सज, सुपप्ति और तुर्या इन चार अब. स्थाओंका अनुभव करता हु । यही ओंकार के चार पाद क्रमश' अ, उ, म, अर्ध माना संज्ञासे सुप्रसिद्ध है । इस प्रकार "ओंकार" मेरे चारों अनुभवों का वर्णन कर रहा है । स्थूल सूक्ष्म, कारण और महाकारण ये इन चार पुरियों के नाम हैं और उनके चार सरत ओकार में है। चारों अस्थाओंका अनुभव करनेवाला इस भूमिका मैं किसी अवस्था के होने न होनेसे नष्ट नहीं होता, इसी लिये मैं अपने आपको अ-हं" अर्थात् म-हेय समझता हूं। यह मेरी सानतन सत्ता है। पूर्वोक्त सप्तऋपि जिसमें हवन कर रहे हैं वह आत्माग्नि में ही हूं। यही आत्माका “ अग्नि" है जो इस शतसांवत्सरीक " पुरुष- का अधिष्ठाता " देव " है । यही सय कर्मों को जानता हुआ, इस शरीर रूपी रथ में बैठकर अपने पूर्वोक्त पैमयका अनु. भव करता हुआ प्रगति करता है। अस्तु । में जो आत्मावाचक शब्द हैं उनका जीवात्माके विषयमें जो अर्थ लेना आवश्यक है, और जिस अर्थका चिंतन करता हुआ अथवा परमात्माके जिन गुणोंका चिंतन करता हुआ जीवात्मा, अपने अंदर उन सद्गुणों का विकास करके उन्नत हो सकता है, उनका वर्णन ऊपर किया है। इन शब्दोंका परमेश्वर विषयक वर्णन प्रसिद्ध ही है और वह आगे आ जायगा । इस लिये उसका यहां पुनः वर्णन करने की आवश्यकता नहीं है। १४ आत्मज्ञानकी आवश्यकता। जो ज्ञान प्रगतिके लिये अत्यंत आवश्यक है वह "आत्म-ज्ञान" हो है । साधारणतः बाह्य सृष्टिके शानसे लोग अपनी उन्नति करने का यत्न करते हैं, और प्रायः ऐसे लोग आत्मा की शक्तिके विषय में अनभिज्ञ ही रहते हैं। इनके प्रयत्नसे ही जगत् में अशांति फैलती है । येही आसुरी शक्तिसे काम करने वाले लोग हैं । जो दैवी शक्तिसे युक्त होते हैं वे आत्माकी शक्तिका शान संपादन करते हैं। और साथ साथ जगत् के पदार्थों का भी विधान प्राप्त करते हैं। और दोनों के संयोगसे ऐसी उन्नति करते हैं कि जो सब की भलाई के लिये कारणीभूत होती है।
। ईशोपनिषद् । शरीर का संचालक आत्मा है और जगत् का प्रवर्तक परमात्मा है। दोनों के गुणधर्माका शान प्राप्त करना आत्मविद्याके अध्ययन से होता है। पहिले कहाही है कि यहुत अंशमे दोनों गणधर्म एक जैसे ही हैं। एक का प्रमाण और कार्यक्षेत्र छोटा और दूसरेका प्रमाण और कार्यक्षेत्र अपरिमित है। इन क्षेत्रोके परिमित और अपरिमितता को अलग किया जायगा, तो यहुतसे गुणधर्म दोनों के एक जैसे ही हैं। इसी लिये दोनों के नाम एक जैसे ही होते है। इस आत्माके गुणधर्म जानने से, अपनी शक्ति क्या है और मैं क्या कर सकता हूं इसका ज्ञान होता है, और यही शान उन्नति का हेतु है । जो जगत् के गुणधर्मा को जानता है, परंतु अपने गुणधर्मों को नहीं जानता, उसकी अवनतिकी कोई पद नहीं है। इसी लिये आत्माके शान की अत्यंत आवश्यकता है। हरपक के आंख के सामने जगत् है, इसलिये हरएक मनुष्य जगत का कुछ न कुछ शान रखता ही है। परंतु आत्मा वस्तुतः जगत् से भी पास है, और जगत् से भी अधिक प्रत्यक्ष है; परंतु स्थूल इंद्रियों से उसका दर्शन न होने के कारण उसके विषयका शान प्राप्त करने में बहुत थोडे लोग प्रयास करते हैं। इसी लिये घेद में इसीका मुख्यतः वर्णन विविध रीतियों और अलंकारों के द्वारा किया हुआ है । आप किसी देवता मंत्र लीजिये, उसमें अंशत; अथवा पूर्णतः इसी आत्मा का वर्णन दिखाई देगा। परंतु चैदिक रीतिसे ही उसको देखना चाहिये । अन्य यातोंका वर्णन, गौण रीतिसे है, और हरएक प्रकरण में इसीका वर्णन मुख्य है, इसका हेतु यही है। आत्मा और जगत् इन दोनों के शानका समुच्चय उन्नति का साधक है, यह बताने के लिये ही इस अध्यायका "विद्या अविद्या" " भूमिका। प्रकरण है। इसलिये अब इसी विषयका विचार करेंगे- (१५) विद्या और अविद्या "विद्या और अविद्या" से किसका बोध लेता है इसका अब विचार करना है । प्रायः भाष्यकारों में इन शब्दों के अर्थ के विषय में मतको एकता नहीं है। देखिये- 'विद्या(श्री. शंकराचार्य.) देवता-शान। (श्री. रामानु- जशिष्य नारायण प्रकाशिका) ब्रह्मोपासना, परमात्मोपासना। (श्री. माध्य० जयतीर्थ विवरण) ईश्वरका यथार्थ शान. (थी. स्ना. दयानंद सरस्वती ) शब्दार्थ संबंधविज्ञानमात्र अवैदिक आचरण, आत्मशुद्धांतःकरणसंयोगधर्मजनित यधार्थ दर्शन । "अ-विद्या" (. शं०) कर्म । ( श्री. रा., ना. प्र.) कर्म । (श्री. मा. ज. वि.) अयथार्थ ज्ञानकी निंदा। (श्री. स्वा. द.) अनिस्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखास्मस्पातिरविद्या, इति ज्ञानादि गुणरहितवस्तु कार्यकारणात्मक जड परमेश्वरसे भिन्न । ये अर्थ इस समय तक किये गये हैं। इनमेंजोजगत्पूज्य आचार्य हैं उनके अर्थोपर हस्ताक्षेप करनेशा हमें अधिकारही नहीं है।तथापि उक्त अर्थों में से कई अर्थों की स्वीकृति करनेपर मंत्रों के अर्थोकी संगति लगती है वा नहीं, इसका विचार यहां करना चाहिये। इस अध्यायमें विद्या अविद्या प्रकरणमें तीन मंत्र हैं। उनका शब्दार्थ निम्न प्रकार है-"(१) जो केवल अविधा को उपासना करते हैं वे अंधेरेमें जाते हैं, और जो केवल विद्यामें रमते हैं ये भी उससे घोर अंधेरे में जाते हैं। (२) विद्या और अविद्या का फल भिन्न है ऐसा शानियों से हम सुनते आये हैं। (३) जो विद्या और अविद्याका समुच्चय करते हैं, वे अविद्यासे मृत्युको दूर कर के विद्यासे अमृत प्राप्त करते हैं।"
" देशोपनिषद्। थी शंकराचार्यजी विधा और भविधाका अर्थ क्रमशः देवता ज्ञान और कर्म करते हैं। परंतु ये अर्थ तीसरे मंत्रक भावके साथ संगत नहीं होते । कर्मसे स्वर्ग प्राप्त होकर जन्ममृत्यु होता है। परंतु तीसरे मंत्रमें "अविद्या से मृत्युको दूर करने का वर्णन " है, इसलिये कर्मसे मृत्युको दूर करनेकी संभावना न होने के कारण यह अर्थ ठीक नहीं । तथा देवता झानसे भी अमृत अर्थात् मोक्ष मिलना नहीं है। इसलिये ये अर्थ ठीक नहीं दीखते । अमृत शब्दका अर्थ बदलकर " देवतारममाव "ऐसा अर्थ इन्होंने किया है। यह भी ठोक नहीं। विधा अविद्या अर्थ उक्त प्रकार कृत्रिम माननेसे अमृत शब्दका अर्थ मी यदलना पडा है। विद्या शब्दक व्यापक अर्थका संकोच करके "देवताह पेसा संकुचित अर्थ करने, तथा " अ-विद्या "वादका कृत्रिम पनावटी अर्थ “फर्म' पेसा करने के कारण हो " अमृत " शब्दफे अर्थका संकोच करना पड़ा है। परंतु पेसा करने की कोई आवश्यकता नहीं। इस आपत्तिको हटाने के लिये करयोंने यह उपाय लिखा है कि " अविद्या " शब्दका अर्थ "सकाम कर्म " करना। परंतु यह अर्थ तीसरे मंत्रमें कर देता है क्योंकि वहां " निष्काम कर्म ।' ऐसा अर्थ उचित दीखता है। इसलिये ये अर्थ ठीक नहीं है। श्री मध्वाचार्यजीका अर्थ " अयथार्थ ज्ञान को निदा' यह बिल. क्षण ही है। यह अविद्या शब्दसे कैसा निकलता है यह भी सम- झना कठिन है। अन्य अर्थोका विचार करने के पूर्व हम अंतर्गत प्रमाणोसे इन शब्दों का अर्थ करने का यत्न करते हैं- इस अध्यायके प्रथम मंत्रक प्रयम पाद साध"विद्या अविद्या" का संबंध है, ऐसा पहिले कहा दी है। यह प्रथम चरण यह है। "ईशावास्य इदं सयो "ईश्वर इस संपूर्ण विश्व में व्याप्त है।" यह इसका भाव है। "श' शब्दको सापेक्षता से यह विश्व "अनीश"हैपेसा - । .
भूमिका। स्वयं सिद्ध होता है । अनीशके ऊपर ही इंशका स्वामित्व है । जड के ऊपर ही चेतनका अधिकार है। ईश शब्दके घाचक अन्य शब्द इस अध्यायमें " आत्मा, ब्रह्म, सत्य, प्रजापति (प्राजापत्य), यम, पुरुप, एक" आदि हैं। इनको क्रमशः निम्न कोटक में रखा है- ईश अनीश. । आत्मा सनात्मा ब्रह्म सत्य अनेक जगत् असत्य यम यम्या नियंता नियस्य पुरुष प्रकृति एक प्रजापति प्रजा स्त्रष्टा सृष्टि (ईशा)......वास्य...... ( इदं सर्व) इससे 'ईश और इदं शब्दोंसे किस का बोध लेना है, इस यात का शान हो सकता है । दोही पदार्थ हैं, एक पुरुष और दूस- रीप्रकृति । दोनों का ज्ञान होना आवश्यक है। केवल किसी एक- का ज्ञान होनेसे कार्यभाग नहीं हो सकता। इसलिये उक्त शब्दों के साथ विद्या शब्दका प्रयोग करेंगे- ईश -विद्या अनीश-विद्या अनात्म-विद्या अब्रह्म-विद्या विद्या अ-१०-विद्या दोनों स्थानोंस समान शब्दोको हटानेसे " विद्या अविद्या" में दोही शन्द अयशिष्ट रहते हैं। पूर्वोक्त कोष्टकों के अनुसंधान से इन । - आत्म-विद्या ब्रह्म -विद्या ..
४० ईशोपनिषद्। ." साम्दोका अर्थ निम्न लिखित प्रकार होता है- (१) विद्या-आत्माका ज्ञान । (२) अविद्या-जगत् का विज्ञान । ये अर्थ प्रथम मंयक अनुसंधानसे होते हैं। सब बाह्य प्रमा- जौको अपेक्षा अंतर्गत प्रमाण अधिक बलवत्तर होता है, इसलिये ये अर्थ अंतर्गत प्रमापसे प्राप्त होने के कारण अधिक प्रामाणिक हैं। इस विद्या अविद्यारे विषयमें श्रुतिही क्या कह रही है देखिये- विद्याश्च चा अविद्याश्च यच्चाम्पदपदेश्यम् । शरीरं ग्रह प्रविशदचः सामायो यजः॥ अध. ११॥ ८॥२३ विद्या अविद्या तथा और जो कुछ उपदेश करने योग्य है। पद ऋक्, यजुः, सास और (ब्रह्म)शान रूपसे शरीर में प्रविष्ट इस मंत्री कहा ही है कि (विद्या) आरमशान जैसा उपदेशक- रने योग्य है, उसी प्रकार ( अ-विद्या) सृष्टिविज्ञान भी पढने योग्य द, तथा इससेमी भिन्न और (अन्यत् उपदेश्य ) अन्य छान उपदे. श करने योग्य है। पाठक पूछेगे कि यह नोसरा क्या है? विद्या अविद्या के "संघका ज्ञान " जो है वह तोसरा उपदेशसान है। (१) एक आत्माका ज्ञान: (२)दूसरा जगत् का विज्ञान और (३)तोसरा आरमा और जगत् के परस्पर संघका परि- शान है । फेवल आत्मज्ञान अथना केल जगद्विवान पैसा लाम- कारी नहीं हो सकता, जैसा दोनोका इकट्ठा ज्ञान हो सकता है। अर्थात् धोनों संबंधफे परिधान का भी पड़ा भारी मत्य है। यदी पात इस अध्यायमें कही है । देखिये घेही पूर्वोक्त तीनों मंथ. (१)फेवल प्रति विद्याकी हो जो भकि करते है धे गिर- ने ही है, परंतु जो केवल आत्मविद्यामें दो रमते हैं ये उससे मी हुआ है।
भूमिका। अधिक अवनत होते हैं। (२) आत्मज्ञान का औरजाद्विज्ञानका फल भिन्न भिन्न है ऐसा हम शानियोंके उपदेशमै सुनते आये हैं। (३)जो आत्मशान और जगद्विशान को साथ साथ लाभकारी समझते हैं वे जगद्विशानसे दुःखों को दूर करके, आत्मज्ञानप्त अमृतको प्राप्त करते हैं।" जगद्विद्याके शानसे पैहिक योगक्षेम ठीक चलता है और आत्म- ज्ञानसे आत्मिक शक्ति और शांति प्राप्त होती है । यदि फेवल जगत् के विज्ञानमें ही लोग मस्त रहेंगे और आत्मज्ञानके तरफ् जायगे ही नहीं; तो इस अवस्था ये जगत् के भोग बहुत पढा. येंगे, यह बात ठीक है। परंतु उनके प्रयत्नसे आत्मिक शति न होने के कारण लोग इनकी संगतिसे अधिकाधिक दुःखों में ही गिरते जायगे । तथा दूसरे पक्षमें जो लोग केवल आत्मशानमें ही रमेंगे और जगद्विज्ञानका विचार बिलकुल छोड़ देंगे, तो वे भी अवनत ही होंगे, क्यों कि ऐहिक तथा स्थूल देह विषयक स्वस्थता उनको विना सृष्टिविद्याके प्राप्त नहीं हो सकती । इस प्रकार ये दोनों केवल एक एक विद्याके उपासक होने के कारण अधोगतिको प्राप्त होते हैं। इस लिये दोनों विद्याओंका समुच्चय करनेको सूचना इस अध्यायमें कही है। दोनों विद्याओंको यथायोग्य प्रमाणमें जान- से भौतिक विद्यासे ऐहिक सुख प्राप्त होते हैं और आत्मिक विद्यासे अलौतिक आनंद मिलता है । इस प्रकार मनुश सीधा उन्नतिके मार्गपर चलनेका अधिकारी होता है। यह ४० वां अध्याय तत्वज्ञानका है, इसलिये इसमें जो यह सूचना दी गई है वह अत्यंत उपयोगी है। शिक्षा प्रणालीका विचार करनेवाले इससे अपनी शिक्षा प्रणाली ठीक कर सकते हैं । दूसरे लोक भी दोनों विद्याओं को जानने का यत्न करके अपना अभ्युदय ईशोपनिषद्। और निधेयस्का मार्ग सुगम कर सकते हैं। आधुनिक मतमतांतर के झगडों से यदि कुछ हानी होगई है,तो यही है कि इस सम वि. कास के तत्वकी ओर किसीने ध्यान नहीं दिया है। और हरपक मताभिमानी अपनी अपनी ही तार खींच रहा है। परंतु इन तीन मंत्रोका पुनः पुनः विचार करनेसे सब शंकाओंकी निवृत्ति होकर योग्य मार्ग दिखाई देता है । आशा है कि पाठक इन मंत्रोका और भी अधिक विचार करेंगे। (१७) संभूति और असंभृति । पूर्वोक्त विद्या-अविद्या प्रकरणके समानही यह संभूति और असंभूतिको प्रकरण अत्यंत विचार करने योग्य है । इन शब्दोंके अर्थ जो इस समयतक भाग्यकारोने किये हैं वे नीचे दिये है- 'संभूति " (श्री. शं०) सृष्टि, कार्यब्रह्म हिरण्यगर्भ आदि । (श्री. रा. ना०प्र०) समाधि । (धी०मा०) श्री हरिका जगत्पते । करव जो मानते हैं। (श्री० सा००) महदादि रूपसे परिणत सृष्टि। अ-संभूति"- (श्री. शं०) मूल प्रशति । (श्री रा० ना० प्र०) समाधिके अंगभूत निषिद्ध कर्मसे निवृत्ति । (धी० मा०) हरीका जगत्का संहार करनेका धर्म को मानते हैं।(धी०स्वा०६०) अनादि अनुत्पर मूलप्रकृतिरूप सत्वरजतमोगुणमय जड वस्तु । इन अ का विचार करने के पूर्य एक थात यहां कहना आव. श्यक है, यह यह है कि श्री शंकराचार्यजी संभूति असमति के अर्थ जो पहिले मंत्री मानते हैं घेही अर्श तीसरे मंत्रम मानते नहीं, परंतु उनके बिलकुल उलटे अर्थ मानते हैं। उन्होंने लिखा है कि- संभूति व विनाशं चेत्ययाऽवणलोपेन निशो द्रष्टव्यः । प्रानिलय फलधुत्यानुरोधात् ॥ (ईश० उ० शाकरमाप्य १४) भूमिका। क " संभूति च विनाश च इस १४ वे मंत्र में संभूति और वि- नाश के पूर्व अकारका लोप हुआ है ऐसा समझना उचित है। अर्थात् संभूति शम्दके स्थान पर " असंभूति" की और असंभूः तिके स्थानपर "संभूति "की कल्पना करनेको कहते हैं। इस कथन सेही स्वयं यह सिद्ध होता है कि इनके संमति असंभूतिके अर्थ तीनों मंत्रों में ठीक प्रकार नहीं लग सकते।जो अर्थ अपने प्रकरणमें ही सर्वत्र उपयोगी नहीं होते ये अर्थ किस प्रकार माने जा सकते हैं ? और जिन अर्थ के लिये 'अ'कारके लेोप की कल्पना करनी पड़ती है ये ठीक भी किस रोतिसे हो सकते हैं ? तथा अकारलोप की कल्पना किस व्याकरण के किस नियमसे मानी जा सकती है ? यह व्याकरणविरद्ध कल्पना है ऐसा श्री. जयतीर्थ जी ही कहते हैं- अकारलोपेन संभूतिरव्याकृत्तमित्यपूर्व व्याकरणकौशलम् ॥ (श्री० जयतीर्थ विवरण १४) अकार लोपकी कल्पना फर के संभूति का ही अर्थ अध्या- कृत किंया असंभूति करना यह अपूर्व व्याकरण का कौशल्य है !" यद्यपि यह भाषा उपहासात्मक है, और इसलिये हमें उसका स्वीकार नहीं करना चाहिये, तथापि मूल वक्तव्य यात असत्य नहीं है । तात्पर्य अकारलोप मानकर अर्थ करना श्रुतिप्रामाण्यकी दृष्टिसे भी उचित नहीं है। श्रुतिको प्रमाण मानते हुए उस के शब्दो के पूर्व अकार की कल्पना करनेसे शब्दों के विपरीत ही अर्थ हो सकते हैं । इसलिये ऐसी कल्पना करनी न पड़ेगी ऐसे ही अर्थ हम को ढूंढने चाहिये । इनका विचार करने के पूर्व सं. भूति असंभूति के तीनों मंत्रोका शब्दार्थ यहां देखिये- (१)जो असंभूति की उपासना करते हैं ये अंधेरे में जाते हैं परंतु उससे भी गहरे अंधेरे में ये जाते हैं जो कि समूति में ही शोपनिषद् । रमते हैं । (२) संभूति और असंभूतिका फल भिन्न है ऐस हम शानियों के उपदेश में सनते आये हैं। (३) संभूति और असंभूति को एक साथ उपयोगी जो समझते हैं, घे असंभूति के द्वारा मत्यु को दूर करके संमति के द्वारा अमृत को प्राप्त करते हैं।" (प. अ.४० में ९-१९॥ ईश. उ मं. १२-१४) अर पाठकही विचार करें कि पूर्वोक्त अयों में से कौन से अर्थ किस दहिसे उपयोगी हो सकते हैं। हमारी दृष्टिसे इन शब्दों पा संबंध प्रथम मंत्र के द्वितीय पाद से है और उस के विचार फरने से इन शब्दों का अर्थ स्वयही स्पट होना संभवनीय है और उस अवस्था में अकारलोप की कल्पना करने की कोई आवश्य फता भी नहीं देखिये प्रथम मंत्रका द्वितीय पाद- यत्किच जगत्यां जगत् ॥ यह द्वितीय पाद है। प्रथम पादमें कहा है कि "ईश्वर व्यापता है इस सब विश्व (ईशावास्थ इदं स ) इसके सर्व पदकी प्यारया इस द्वितीय पादमें की है। जो कुछ जगतीमें जगत् है उस सय में ईश्वर व्यापक है। यह इन दोनों पादोंका अर्थ है। हमारे इस प्रकृत प्रकरण का अर्थ निश्चय करने के लिये "जगत्यां जगत् " इन दो शब्दों का आशय देखना आवश्यक है। "जगत" के समुदाय का नाम है " जगतो"इसलिये "जगत्यां जगत् । सान्द में समुदाय और व्यक्तिकी कल्पना " समष्टि व्यष्टिरूप से जो है उस सब विश्वमें ईश्वर व्यापता है।" यह आशय उक्त मंघा का हुआ । अब और इसका अर्थ करने के लिये निम्न कोएक देखिये- जगत्यां जगत् जगती जगत् सृष्टि एक पदार्य . 1 " x भूमिका। १५ Aman एकमनप्य - सम्द व्यक्ति समष्टि व्यष्टि संघ, जाती एक व्यक्ति Vankind, People मानव जाती संभूति अ-संभूति "जगत्यां जगत् " इन पदों से जो गूढ भाव व्यक्त होता है यह उपत कोष्टक में दिया है। इनके कोश में दिये हुए अर्थ नीचे देता- (१)"संभ = मिलना, एक होना, संबंधित होना। (२)संभव-मेल, मिलाफ, एकता,सहकार,सहयोग । (३) संभूत-मिला हुआ। (४) संभति-संमेलन,मिलना, एक होना (५) संभूय-एक होकर, साय होकर, सहकार्य करके संघ बनाकर (६)संभूय समुत्थान-व्यापारी संघ, हिस्सेदार हो. कर व्यापार करना,मिलकर ऊपर उठ. नेका यत्न करना, मिलकर पक होकर शत्रुपर हमला करना. ये अर्थ देखने से पाठकों को पता लग जायगा कि "संभूति भादमें " संघ" का मार है । इसका अधिक विचार करने के लिये “ संभू" धातु से पने हुए शब्दों का प्रयोग ही देखिये- यणिकप्रभृतयो यत्र कर्म संभ्य कुर्वते ॥ तत्संभूय समुत्थानं व्यवहारपदं स्मृतम् ॥ नारद स्मृति ॥ " ४६ ईशोपनिषद् । "वैश्य आदि लोग मिलकर (संभूय ) सहकारिता के साथ ध्यवहार करते हैं, उस ध्यपहारको" संभूय समुत्थान " कहते . यह "संभूय समुत्थान " अर्थात् सहकारिताका व्यवहार ब्राह्मण, क्षत्रिय, पैदय, शूद्रों में अपने अपने कार्य के लिये हुमा करता है । (१) वाम्हण धर्मजागृतिके लिये, (२) क्षत्रिय शत्रुपर हमला करने के लिये, (३) वैश्यध्यापार व्यवहार करने के लिये और (४) शूद कारीगरी के संघ बनाकर अपना कार्य चलाने के लिये अपने अपने वों में संघ ( Unions ) पनाते हैं। यद्यपि पोंके धमाके अनुसार प्रत्येक वर्षका "संभूय-समु- स्थान " अर्थात् सहकारी संघ भिन्न भिन्न हेतु के लिये हुआ करता है तथापि संघकी कल्पना सर्वत्र एफसी ही है। तथा- संमय स्थानि कार्याणि कुर्वनिरिह मानधैः ।। अनेककर्मयोगेन कर्तःपांशप्रकल्पना हेमकारादयो पत्र शिल्प संभय कुर्वते ॥ कानुरूपं निवेश लमेरंस्ते यांशतः ॥ वृहस्पति स्मृति । "जो मनुष्य मिलकर,संघ यनाकर अपने अपने व्यवहार कर-- ते हैं उनके कर्मके अनुसार लाभमें उनको भाग देना चाहिये ।" लनार आदि शिल्पी जहां संघ बनाकर कार्य करेंगे, वहां उनके कार्य प्रवीणताके अनुसार उनको लाम मिलना चाहिये।" इत्यादि स्थानोमे "सं+" धातुसे बने हुए 'संभय ' शन्द का प्रयोग देखने योग्य है। यही कल्पना " संमति " मे है । तात्पर्य संभनि " शब्दमे संघमाय की कल्पना व्यक्त होती है। अर्थात् " -संमति "शन्दसे व्यक्तिभाव को भावना प्रकट होती है। संघधर्म और व्यक्ति धर्मका इस प्रकरण में वर्णन है यह याद - 1 . . भूमिका। उपस स्पोकरणसे मात हो सकती है। अब इस अयं को स्वी. कार करके उक्त घोंका भाव देखिये- (१)जो केवल व्यक्ति स्वातशय भक्त होते है ये गिरते है, परंतु जो फेयल मंघशक्ति में ही रमते मी उनसे अधिक गिरते है । (२) व्यक्तिमायका और संधमार वा फल भिन्न भिन्न पेसा हम शानियों के उपदेशप्ते मनो आये हैं। (३) जो व्यक्तिभाय और संघमाय को साथ साय उपयोगी ममझते है व्यक्तिमारसे दुष्यों को दूर करके मंघमायमं अमर होते हैं । " ध्यापिस धर्मका फल यह कि उसके पालन व्यक्तिको मता उत्तम प्रकारमं रहती है। स्नान, ध्यान, भोजन, व्यायाम आदिसं घ्यक्तिधर्म का पालन हनिक कारण व्यक्ति को सता रह सकती है। परंतु एक एक व्यक्ति सुरक्षित होनेपर मी संघमायक विना उनमें यल नहीं पा सकता । संघधर्मसे एक लाम है और व्यक्ति धर्म से दूसरा लाम है ! इसलिये उन्नति चादनेयाले मनुष्यों को चाहिये कि स्यक्ति धर्मके पालनसे प्रत्येक व्यक्तिको उत्तम अयस्था रहनेका अबसरदें, और संघ कपालगसे अपनी संघशक्कि पढाते हुर जातीयता के साय अमर पर्ने । घरपक मनुष्य यपि मरणधी समापि पर अपनी जानीय भायम अमरदी। संभूति असंभूति " के प्रकरणमें यह उपदेश है की संघभा. य और व्यक्तिभार का समविकास हो आरश्यक है. यक्तिक शाय और संघशक्ति से नियम बनाने चाहिये कि जिनसे किसी एक का घात न हो और दोनों का समविकास होकर मय की यथा योग्य उमति दो सके । तगान के अध्याय संघधर्म गौर व्यकिधर्म का अवश्य विचार होना ही चाहिये । व्यक्तिका जाता और गट साथ कैमा बार दोना चाहिये, तथा " ४८ " ३ शोपनिषद् । जातीका अधया राष्ट्रका व्यक्ति के साथ कैसा याय दोना योग्य है, इसका योग्य उत्तर इस प्रकरण पाठक देख सकेंगे। जिप्त प्रकार शान क्षेत्र में आमाका शान और जगत का ज्ञान साथ साथ आवश्यक है, उसी प्रकार कर्म क्षेत्रमै व्यक्ति के और समूहकै पोका और परस्पर संबंधोका विचार होना चाहिये । यही विचार इस प्रकरण में किया गया है। प्रथम मंधके साथ इन प्रकरणोंका विचार करनेसे यह भाय स्पष्ट हो जाता है। यह अर्थ अंतर्गत प्रमाणों के विचारसे होने के कारण अधिक सयुक्तिक है। इस अर्थ में भाष्यकारों अर्थ आजाते हैं। परमाणुसंघ का ना म सृष्टि है और विखारे हुए अलग अलग विभक्त परमाणु होनेसे यही मूल प्रकृति है। अर्थात् परमाणुओंका संघ " संभति शब्दसे भाग्यकारों ने लिया है, और परमाणुओंकी विभक्त स्थिति असंभूति ५७ से ली है। अर्थात् "संघभाव और असंघमाय " येही अर्थ भापयकारोंकोभी अभीष्ट है । यदि येही सामान्य मूल अर्थ लिये जायगे तोअर्थका गौरव अधिक होगा इसका पाठक भी अधिक विचार करें। (१८ द्वितवाद और अनवाद तत्वज्ञानका विचार करने के समय द्वैतवाद और अद्वैतवाद का विचार होना आवश्यक ही है, और उपनिषदोका विचार होने फे समय इस वादको दूर नहीं किया जा सकता। तथापि सांप्रदा. यिक झगड़ों से दूर रहना ही विचारी पाठकोको उचित है ऐसा हमारा विचार हो रहा है । इस धाद को सांप्रदायिकोंने इतना खेचा है कि उसपर अब और खेचनेसे कोई लाभ होना नहीं है। पास्तविक द्वैत है या अद्वैत है, इसका विचार करने समय अनुमव की हो अंतिम कसौटो मानी जायगी तो निम्न प्रकार " ।
भूमिका। मानना पड़ता है- आत्माकी चार अवस्था (१) तुर्या .. अज्ञेयस्थिति (म) सुपुस्ति...नियम अद्वैतका अनुभवा । (अ) स्वप्न... सविकल्पसमाधि (अ) जागति.. उपासनाको अवस्था, द्वैतका अनुभव आत्माकी चार अवस्थायें हैं, उनमें दो अवस्थाओमें द्वैत का अनुभव है और दूसरी दो अवस्थाओमें अद्वैतका अनुभव है। हर. एक मनुष्यको इन चारों अवस्थाओं का अनुभव है। यदि आत्माकी ये चारों अवस्थायें हैं तो द्वैतभी है और अद्वैत भी है। पाठको से यहां निघेदन है कि ये सांप्रदायिक इगडोंमें न जाय । उपनिषदों में और वेदमें भी ये आजकल के संप्रदाय नहीं है। येद कहता है कि आत्माको चतुर्विध शक्ति उक्त चार अवस्थाओं द्वारा अनुभव. में आती है । यही "चतुष्पाद आत्मा" है । वेदमें आत्मा के चारों यादों का वर्णन कई स्थानों में है । दो पादों में हम द्वैतका अनुभव कर रहे हैं और अन्य दो पादों में अद्वैत का अनुभव ले रहे हैं जापति और स्वप्नके अनुभवमें निश्चित द्वैतका ज्ञान है। " और " मैं- नहीं " ये दो पदार्थ इन दो अवस्थाओंमें हैं। " मैं, तू यह " श्यादिका अनुभव इनमें आता है। सुषुप्ति और तुर्या का अनुभव द्वैतका निश्चयसे नहीं है, का है। निश्चित एकत्वका है इस विषयमें किसीको शंका हो तो यह का अनुभव मान सकते हैं। उस अवस्थाम "द्वैत" का अनुभव निश्चयसे नहीं होता है, परंतु " एक "का अनुभव होता है या नहीं यह हरएक नहीं कह सकता जो कुछ अनुभव है वह शब्दों में प्रकट नहीं किया जा सकता, परंतु एकत्व " " अद्वैत ईशोपनिषद् । पादों की गति वहां नहीं है। यहां ऐसा अनुभव है कि जिसका वर्णन द्वैतषाचक शब्द नहीं कर सकते । पास्तविक द्वैत और अद्वैतका भाष यह है । जिस समय मसम- तांतर चल पडते है उस समय पहे झगडे खडे होते हैं। उनसे हमें कोई पास्ता नहीं है। आत्माकी चार अवस्थायें होने के कारण, द्वैत और अद्वैतका अनुभव होनेके हेतुसे, सर्वत्र द्वैतप्रतिपादक मी मंत्रों के साथ साथ देत मतिपादक भी मंत्र हैं। श्रीमद्भगवद्गीता देखिये कई श्लोक शुदद्वैत का प्रतिपादन कर रहे हैं, तो कई ऐसे हैं कि जो शुद्ध अद्वैत विचार हो बोल रहे हैं। यही बात उप. निषदों में है। घेदमंत्रोंमें भी यही प्रकार है। ऐसा होने का इंतु ऊपर दिया ही है। बहुत लोग इस मूल कारणको ज्यानमें नहीं धरते और कहते हैं कि, प्रयोंमें प्रक्षेप है। दूसरे कई समझते हैं कि एक प्रकार के मंत्र मुख्य है और दूसरे गोग हैं । कई लोग अन्य रीतिसे खेचातानी करके किसी न किसी प्रकार निर्वाह करनेको चेटा करते हैं और स्वमत की स्थापना करते हैं। परंतु ऐसा करनेसे मंथका सच्चा आशय च्यानमें नहीं आ सकता। उपत कारणसे हो अद्वैती लेग द्वैत प्रतिपादक मंत्रों को खींचते हैं और द्वैती लोग अद्वैत प्रतिपादक मंत्रोको खानते रहा ते हैं। परंतु उक रीतिसे यदि ये लोग वास्तविक यात कोसमझे- गे, तोखंचातानीका कारण ही नहीं रहेगा। इस यजु० अ०४० में यदि देखा जायगा पास्तविक रीतिसे सातये मंरके सिवाय सही अन्य मंत्र द्वैत प्रतिपादकही है। सातवे मंत्रका आशय निम्न प्रकार है " जिस अवस्थामै सप भूत मात्र आत्माही होगये, उस अवस्थामै एकत्वका मनमध करने पा. ले विज्ञानी को शोक और मोह कैसे हो सकते हैं? " (य.४०१७) यह एक अवस्थाका वर्णन है। इस अवस्थामें एकररका अनुभव भूमिका। होता है और उसी हेतुसे वहां शोक माह नहीं राधा करते । पूर्वो- त कोएकमें "सुषुप्ति, समाधि और जीवन्मुक्ति " की जो अवस्था पताई है, उस अवस्था का यह अनुभव है। यहां भेद दर्शन नहीं होता है। परंतु चार अवस्थाओंमें यह एक अवस्था है । सुषुप्ति, समाधि और मुक्तिमें ब्रह्मरूपता होती है ऐसा अन्य आस्तिक द- र्शनों में कहा है। यहां "ब्रह्म-रूप-ता" शब्द महत्व पूर्ण है। ब्रह्म के रूपके सदृश बनना है। इसी प्रकार सब भूत मात्र आत्मा ही हो जानेको अवस्था" है । आरमाके चार पादोंमें किस पादकी अवस्था में यह अनुभव हो सकता है, यह बात इस समयतक के वर्णन से स्पष्ट हो चुकी है। इस लिये इस विषयमै यहां और अधि. क लिखने की आवश्यकता नहीं है । चार पादों से किसी एक पादका अनुभव दूसरे पादोंके अनुभवोंको नष्ट नहीं कर सकता, इतनी ही यात यहां ध्यानमें धरनी चाहिये। इस मंत्र सिवाय सय अन्य मंत्र स्पष्ट ही द्वैत प्रतिपादक हैं। उनके विषय में किसी को कोई शंका नहीं हो सकती। सारांश। इस प्रकार ईशोपनिषद् अथवा यज.अ.४० के विषयों की समा- लोचना है। इस पुस्तक में दोनों संहिताओंके पाठ दिये हैं और स्पष्टीकरणमें वेदमंत्र, अन्य उपनियन के वचन तथा भगवद्गीताके श्लोकों की तुलना की है । इससे वैदिक धर्मके सदृश विचारों के साथ पाठक अच्छी प्रकार परिचित हो जायगे। आशा है कि इस प्रकार तुलनात्मक विचारसे वेदका वास्तविक अर्थ समझकर,आत्मज्ञान विषयक चैदिक सत्य सिद्धांत जानकर, पाठक अपनी उन्नतिका मार्ग आक्रमण करने के लिये सिद्ध होंगे। १ चैत्र सं. १९८६ श्रीपाद दामोदर सातवळेकर स्वाध्याय मंडल, औंध (जि.सातारा)
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ईश उपनिषद् ।
आत्म-ज्ञान।
小余
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小小
师,
दानसे भोग कर । लोभ मत
कर । प्रशस्त पुरुपार्थ करता हुआ
ही सौ वर्ष जीनकी इच्छा कर।
小小小小小小小小小小小小小矿山中中中中中中中中部地
出示尔小小
}
XXX
长长长长会会会治学
ॐ
वाजसनेयि माध्यदिन-शुक्ल
यजुर्वेद संहिता-पाठः।
0-
अथ चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
ईशावास्यमिदछसर्व यत्कि च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।। १ ।।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविपेच्छत समाः ।
एवं त्वयि नान्ययेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरै ॥ २॥
असुर्या नाम ते लोकाऽअन्धेन तमसावृताः ।
ताँस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्मनो जनाः ॥ ३॥
अनेजदेकं मनसो जीयो नै दे॒वाऽआंप्नुवन्यूर्वमर्शत् ।
वाचतोऽन्यानत्यति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरियां दधाति ॥४॥
तदेजति तन्नेजति तरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥५॥
५६
ईशोपनिषद् ।
यस्तु सीणि भूतान्यात्मन्नेगानुपश्यति ।
सर्वभूतेषं चात्मानं ततो न वि चिकित्सति ॥ ६ ॥
यस्मिन्सर्याणि भूतान्यात्मैपाभूद्विजानतः ।
तन को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्य॑वः ॥ ७ ॥
स पर्यंगाच्छुकर्मकायमगर्मस्नावर शुमपापविद्धम् ।
कृषिमनीपी परिभूः स्वयम्भूयीथातथ्यतोऽर्थान्व्यदधा-
छातीभ्यः समाभ्यः ॥८॥
अन्य तमः प्रविशन्ति येऽसभूतिमुपासते ।
ततो भूयेऽव ते तमो यऽऊ सम्भूत्याध रताः ॥ ९ ॥
अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदांडुरसम्भवात् ।
इति शुश्रुम धीरांणां ये नस्तचिचक्षिरे ॥१०॥
सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोमर्यछ सह ।
विनाशेनं मृत्युं ती. सम्भृत्यामृतमश्नुते ।। ११ ।।
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूपाइक, तमो यो विद्यायाध रताः ॥ १२ ॥
अन्यदेवाहीद्यायोऽअन्यदाँहुराविद्यायाः ।
इति शुश्रुम, धीराणा ये नुस्तद्विचचाक्षरे ॥ १३ ॥
-पाठ: ५७ माध्यन्दिन-प विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयछ सह । अविद्यया मृत्यु ती विद्ययामृतमश्नुते ॥ १४ ॥ चायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त, शरीरम् । ओ३म् ऋतौ सर । क्लिवे स्मर । कृत स्मर ॥ १५ ॥ अग्ने नय सुपा रायेऽअस्मान्विश्वानि देव युनानि विद्वान् । युयोध्युस्ममुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमऽउक्तिं विधेम ॥१६॥ हिरण्मयेन पात्रण सत्यस्यापिहित मुखम् । योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसायहम् । ओ३म् खं ब्रह्म ॥ १७ ॥ [इति चत्वारिंशोऽध्यायः।]
.
शुक्ल यजुरेंदीय
काण्व-संहिता-पाठः।
अथ चत्वारिंशोऽध्यायः॥४०॥
ईशा वास्यमिद सर्व यत्किन्ध जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुया मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥१॥
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविपेच्छुतरसमाः ।
एवं त्वयि नान्यथेवोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।। २ ।।
असुर्या नाम ते लोका अन्धन तमसाताः ।
तारस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्मनो जनाः ॥३॥
अनेजदेकं मनसो जीयो नै हेवा आप्नुवन्पूर्वमशेत् ।
तद्धायतोऽन्यानत्यति तिष्ठचस्मिन्नपो मातरियो दधाति ॥३॥
तदेजति तनजति तदुरे नन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य पाहतः ॥५॥
यस्तु सर्वाणि भूवान्यात्मनेघानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥
फाण्व-पाठ।
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यास्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥
स पर्यंगाच्छुक्रमकायमणमस्नावर शुद्धमापविद्धम् ।
कविमनीपी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधा-
च्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽवियामुपासते ।
ततो भूय॑ इव ते तमो य उ विद्यायाध रताः ॥९॥
अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तहिचचक्षिरे ॥ १० ॥
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह ।
अविद्यया मृत्यु ती. विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ ११॥
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।
ततो भूय इब ते तमो य उ सम्भूत्या रताः ॥ १२ ॥
अन्यवाहुः सम्भवादन्याहुरसम्भवात् ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नुस्तचिचक्षिरे ॥ १३ ॥
सम्भूति च विनाशं च यस्तद्वेदोभय सह ।
विनाशेनं मृत्यु ती| सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४ ॥
६० ईशोपनिषद्। हिरण्मयन पात्रेण सत्यस्यापिहित मुखम् ।। तत्त्वं पुनपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥ पूपन्नेक यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत् पश्यामि । योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमसि ॥ १६ ॥ वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तर शरीरम् । ०३ऋतो स्मरे कृतर स्मर तो स्मरं कृतरस्मर ॥१७॥ अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मञ्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नर्म उति विधेम॥१८॥ [इति चत्वारिंशोऽध्यायः ।]
शांतिमंत्र।
६१
ईशोपनिषद् का
शांति मंत्र
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णनादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।
ओम्
यह सत्य है, की
१ अदः पूर्णम्
यह पूर्ण है और
२ इदं पूर्णम्
यहभी पूर्ण है । क्योंकि,
३ पूर्णात् पूर्ण उदच्यते । पूर्णसे पूर्ण निकलता है।
४ पूर्णस्य पूर्ण आदाय पूर्णमेसे पूर्ण लिया तो भी
पूर्ण एव अवशिष्यते ।
पूर्ण ही अपशिष्ट रहता है।
(१) पूर्ण = परिपूर्ण, सम्पूर्ण, अनंत, जैसा चाहिए वैला, जिसमें
जराभी कमी नहीं है ऐसा, शक्तिमान् । (१,५) ओम् = है, ठीक,
निःसंदेह सत्य, सत्य । ( अवति इति ओम् ) रक्षक; सयका रक्षण
करनेवाला।
१ - अदः = वह (आदितत्व, ब्रह्म, परब्रह्म, आत्मा, परमात्मा, ईश)
२-इदं = यह ( जगत्, सृष्टि, विश्व, अनामा, अनीशा)
भावार्थ- ब्रह्म पूर्ण है और उस पूर्ण ब्रह्मसे प्रकट हुआ हुआ
यह जगत् भी पूर्ण है। क्योंकि पूर्णसे पूर्ण धनता है । पूर्ण ब्रह्ममेसे
यह इतना भारी जगत् प्रकट हुआ है, तो भी इससे उस ब्रह्ममें
किसी भी प्रकारको कोई भी कमी नहीं हुई है क्योंकि यह पूर्ण है।
पूर्णमसे पूर्ण निकाला जाए तो भूल पूर्णमें कोई भी कमी नहीं
आती।
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उपभोग करना, दान . = ६४ ईशानिषद् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥१॥ ३ तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः ||उसका त्यागसे उपभोग कर। ४ मा गृधः। लोभ मत कर। ५ कस्य स्वित् धनम् । किस एक व्यक्तिकाभलाधन है। ३ त्यक्त = त्यागा हुआ, दान किया हुभा, धर्म के लिए समर्पित किया हुभा । " भुञ्जीथा " =( भुज् )- भोगना, खाना, स्वथ अपने लिए उपयोग करना, अपने अधिकार में रखना, शासन करना, अपनासा कालेना । " त्यकेन भुजीया = दान करके भोग कर, देकर भवशिष्ट रहे हुए का उपभोग कर, उपकार के लिए सरपंण करना यही अपना वास्तविक उपभोग है ऐसा समज । (४)"मा गृध. अपने अधिकार में जो जगत् का भाग आया हुआ हो, उसकामी लोम मत कर, उसका उपभोग काना हो तो दानकरके का। दुसरेके पदार्थ का लोभ सो कभीभी मत कर । (५) "स्वित् "= शका, आश्चर्य, टोक है क्या भला ? " कस्य स्वित् धनम्? - भरा धन किस एक व्यक्ति का है' धन मेरे अकेलेका है ऐसा मानने वाले लोग मयु के समय धन छोडकर चले जाते है, भल. धन यह किसी एक व्यक्तिका नहीं है यह बिलकुल सत्य है । तो यह डिप्स का है। इसका उत्तर " फस्य धनं" (क) भजापति का धन है । प्रजापालन करने वाले का धन है, अथवा सर्व जन. सा का धन है, क्योंकि व्यक्ति के मरने परमी समाज अमर रहता है, सप धन सब जनताका है और जनता का है इसीलिए पनि उसे जनता के अग्युदय के लिए भर्ष कर भवशिष्ट रहे हुए में हो सनुष्ट होकर उसका भोग करें। सब धन सम्पूर्ण जनता का है। यह ग्यक्ति का नहीं है, अतएव पति को धनपरका लोभ छोड़ देना चाहिए और परोपकारा उसका व्यय करके जो कुछ शेष दचे, उससे अपनी जीवनयात्रा चलाने के लिए उपभोग करना चाहिये। । - अत ।
आरमोन्नतिका मार्ग। ६५ . । कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषच्छत५ समाः। ६ इह कर्माणि कुर्वन् एव, यहां प्रशस्त कर्म करता हुआ ही ७ शतं समाः जिजीविषेत् । सौ वर्ष जीने की इच्छा करे। (६) कर्म = प्रशस्ततम कर्म, श्रेष्ठ पुरपाथ, साकार संगति-दानात्मक कर्म, जनताकी उन्नति के कर्म, लोकसंग्रहकारक उपकारक कर्म। 'अकर्म = अकर्म दो प्रकारके है-(१)जो किये हुएभी न किए हुये के बराबर है, और वैयक्तिक अस्तित्व के लिये ही केवल जो कारणीभूत है ये । (२) नि- काम कर्म । “विकर्म"= विरद्ध कर्म, अयोग्यम, व्यक्ति और समाज की हानि करनेवाले कर्म । ये कर्म के तीन भेद है । इस मंत्रमें प्रथम अर्थ विवक्षित है। "ह"= यहां, इस जगत्म। (७) शतं समाः = 'सी वर्ष, इच्छा शक्ति उत्पन्न होने के बाद के सौ साल, अर्थात् यदि २०वर्ष की उमर में इच्छा शक्ति प्रकट होती है, ऐसा मान ले तो तबसे सौ साल जीनेकी इच्छा प्रयत्न पूर्वक करे, इस प्रकार निदान १२० साल की मानवी आयु होती है । अत एव ज्योतिप् गणितकारोंने यह मान स्वीकारा है। इतना पूर्ण आयुष्य प्राप्त करनेकी प्रयत्न पूर्वक इच्छा रखनी चाहिऐ, ऐसा उपदेश यहां पर है। 'श्रेष्ठोंका सत्कार, परावरवालों के साथ संगति और नीचेको पौडी पर स्थितोंको दान' ये तीन कर्म यज्ञम मुग्व्य है। इस कारण यज्ञद्वारा जनता का मेल तथा उन्नति होते है । सब यज्ञमी का यही ध्येय है। सब यज्ञ ऐसे लोकसंग्रहकारक होनेसे ऐसे रोकसंग्रह कारक प्रशस्त कर्म के लिए अपने पास का धन खर्चना सबके लिए उचित है। (१) अशानियोंको शानदान, (२) बडों का आदर, (३) अतिथियोंका सत्कार, (४) भूतमात्रपर दया, और (५) भूमि जल आदि दैवी शकियोंका आदर पूर्वक प्रयोग; ये पांच श्रेष्ठ (या) मं प्रत्येक मनुष्य के रिये करने आयश्यक है। ५ ईशोपनिषद् । एवं स्वयि नान्यथतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥२॥ ८ एवं त्वयि, यह (शान | तेरेमें (हो), ९ इतः अन्यथा न अस्ति । इससे दूसरा (मार्ग) नहीं। १. कर्म नरे न लिप्यते । कर्म नरको क्षित नहीं करते। (८)"पवं त्वयि " = यहां तक जो सात उपदेश क्हे, वे सरने साधकर्मे स्थिर होवे । (९)"इतः अन्यथा नास्ति " - उन्नति के लिये इसके सिवाय भिए मार्ग ही नहीं है। (१०) नर- (न रमते) जो भोगों में रमता नहीं वह । "कर्म नरेन लिप्यते"= जो भोगामें फंस कर अपने कर्मोसे च्युत नहीं होता, ऐसे मनुष्यको कोसे होनेवाला दोप नहीं लगता। सूचना- यहां तक जो आत्मोउतिका मार्ग कहा है पह यह है-- "(१) ईश्वरका सर्वत्र अस्तित्व मानते हुए, यह हमारे कर्मोको देखता है ऐसा मानना, (२) सम्पूर्ण जनताके सुखमें व्यक्ति का सुख है ऐसा मानना, (३) दानकरके घचेदुएफास्वतः मोग करना। (४) लोभ न करना, (५) सप धन मुझ अफेलेका नहीं है पर चह सय प्रजाफा है ऐसा मानना, (८) रसी पर आत्मोन्नति के मार्ग पर दृढ विश्वास रखना, (९) उसारका इसके सिवाय दुसरा मार्ग नहीं है ऐसा मानना, (१०) सत्कर्म कमी बन्धक नहीं है ऐसा मानना "स मार्गपर चलकर अपने जीवनको सार्थक करने वाले लोक " समर्थ " पनकर जगत् में आदर्शभूत धनते है और बंधनसे मुक्त हुए हुए अंतमें उस स्थानको जाते हैं, जहां कि आत्मोन्नति करने वाले लोक जाते हैं। परन्तु इस मार्ग को न स्वी. कारते हुए जो लोक आत्मघातके मार्ग से जाते हैं, उनकी क्या दशा होती है, इसको सीमो मंग्रम देखीए।] .
आत्मघातम मार्ग। २ आत्मघातका मार्ग। असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः । ११ असुर्याः नाम ते लोकाः बलकेलिए प्रसिद्ध ऐसे घे लोक, अन्धेन तमसा आवृताः गाढ अंधकारसे व्याप्त है । (११) असुर्य- 'असुर' = 'असु ' अर्थात् प्राण ! उस प्राण की शक्ति को जो (रा-देना ) देता है वह 'असु+र' है। यह ' असुर' शब्द वेदमें 'आत्मा, परमात्मा, ईश्वर,' इनका वाचक आया हुआ है। अत उनकी जो प्राण शक्ति है उसका नाम 'असुर्य ' है। माणि. योको प्राणशक्ति देनेवाले देवकी प्राणशक्ति " यह इसका अर्थ है । यह शक्ति जैसा टेवोंम वेपीही राक्षसाम, और जैसी सजनोंमें पैसाही दु. जनोंमें आई हुई है। प्रत्येक शरीरमै जो यल है, वह इसी शक्ति के कारण है । शरीरमें प्राणशक्ति के नीचे जो इन्द्रियशक्ति और शरीर शक्ति कार्य कर रही है ये इसी ही असुर्य शक्ति के कारण है। इससे पता चरेगा कि असुर्य' अर्थात् 'इन्द्रियों में और शरीरमें कार्य करनवारे यर ।। इनमे जो भिन है वे आरमाके दूसरे वर हैं, और वे माणसेभी अकृष्ट है, यह यात भवशिष्ट मानसिक, बौद्धिक और अध्यामिक शक्तिया द्वारा प्रकट होती है। बुद्धि और मन, इनमें जो चैतन्य सामथ्र्य प्रकट हुआ हुआ ह यह इस 'असुर्य' नामक बरसे भिन्न है। ‘असूया नाम ते लोकाः' - केवल जो शा. रीरिक बल के लिए प्रसिद्ध है ऐसे जो लोक हैं, वे शारीरिक बल दिसाना, दगा फिसाद करना, मारामारी करना, आदि गडबड सडरड के व्यवहारके लिए प्रसिद्ध है। सत्य न्याय, धर्म, मानवीय उच्च आदर्श भादि पाताके समझनेकी योग्यता इनम नहा है। यद्यपि इनक शारीरिक बर आरमासेही आए हुए यर ह तथापि ये अपने अज्ञान के कारण अपन्मार्ग मरगे होते है, अतण्य "आधेन तमसा आता ": ये रोक "अशानान्धकारसे यात हुप हुए है" = ऐमा समझा जाता है । ।
१८ ईशोपनिषद - ताँस्त प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३॥ ते प्रेत्य तान् अभिगच्छन्ति चे मृत्युके पाद उनमें जाते हैं ये के च आत्महनः जनाः । जो कोई आत्मघाती जन है। "ये के च आत्महनः जना ते तान् प्रेस्य अभि (अपि) गच्छ. न्ति" जो कोई आत्मघाती जन है, वे वैसे मूर्ख लोकों में मरने के पादभी जाते है, अर्थात् उनकी जीतेजी भी इन रोोंमें गणना होती है। 'जन' = जन अर्थात् केवल प्रजनन करके कैसीभी संतति उत्पन्न करनेमें ही जो समर्थ है, जिनसे इसकी अपेक्षा अन्य कोई प्रशसनीय मानवी क- सध्य होना संभव नहीं है। ये जन आत्मोन्नतिका पुरुषार्थ करने में असमर्थ है और इनके लट्टवाज होनेसे इनमे यदि कोई कार्य होभी गया, तो वह आत्मा की अवनति का ही कारणीभूत होता है, इस लिए इन्हें यहां भा. स्मघातकी ऐसा कहा गया है। पूर्वके दो मंत्रॉम जो मार्ग बताया है, उस भारमोसातके मार्ग का अवलम्बन न करते हुए उसके विरुद्ध आत्मघाती मार्गीकाही ये अवलायन करते है। आरमघातका मार्ग यह है- "(१)वरका सर्ष अस्तित्य न मानना, (२) सम्पूर्ण जनता के आधारसे व्यक्ति स्थित है ऐसा न मानकर, व्यक्तिका यथा सं. भय स्वार्थ यदाते हुए उससे संघके नाशके कारणीभूत कुकर्मों को करते रहना, (३) स्वार्थ पूर्धक भोग करना, (४) लोभ क. रना, (५) सब धन केवल मेराहो है ऐसा मानना, (६) सदा कुकर्म करना, (७) जिनसे आयु क्षीण हो ऐसे दोन कर्म करते जाना. (८) एक सम्मार्गपर मनको स्थिर न रखना, (९)विपरीत मागीपर विश्वास रखना, (१०)सार्म भी बंधक ये सामानमा!" ये दश प्रकारके मार्ग प्रारमघातके है । इन मागासे जो जाता है यह किस प्रकारसे अधोगति को प्राप्त करता है यह बात इस मंत्रने दिखाई है।
३ आत्मत्तत्वका वर्णन पूर्च, अर्पत, ३ आत्म-तत्वका वर्णन । अनेजदेकं मनसो जवीयो १२ एक, अन्-एजन्, यह एक चंचलता रहित, सबसे पूर्वका, स्फूर्ति देनेवाला, मनसः जवीयः। मनकी अपेक्षा वेगवान है। [प्रथम मंत्रमें ईश सर्वत्र वसता है, ऐसा कहा है, परन्तु वह एक है अथवा अनेकी और उसका क्या सामय है? इस विषयमें कुछ नहीं कहा है। यद्यपि यहां ईशा' ऐसा एक पचन का प्रयोग है, तथापि यह संदेह हो सकता है कि शायद वह जातिवाचा एक पचन हो; अतः उपरोक शंका को दूर करने के लिए इस मंत्रमें यह 'एक' ही है, ऐसा कहकर उसके गुणों का वर्णन किया हुआ है। वे गुण इस प्रकार है-] 'एक' = वह पूर्ण ब्रह्म एक है । 'अनेजत्' = वह हिलता नहीं अर्थात् वह स्थिर है। वह सर्वत्र व्याप्त होनेसे इधर उधर नहीं जाता, यह चंचल नहीं है। पूर्व' यह सबसे पूर्वका है । जगत् निर्माणके भी पूर्व वह था । 'अपत् (ऋगति) सवको गति देनेवाला है, स्फूर्ति देनेवाला है, वह चालक, प्रेरक और निरीक्षक है। 'मनसः जवीयः' = वह मनकी अपेक्षा वेग- वान् है । आत्मा, बुद्धि, मन, प्राण, इन्द्रियां और शरीर इस क्रमसे देख तो, प्रथम की अपेक्षा दूसरेमें गति कम और तीसरेमें उससे भी कम इस प्रकारसे गति कम होती जाती है। इस लिए यह मनसे ऊपर दो तीन सोदीयां आगे होनेसे मनसे भी अधिक वेगवान है। मन चंचल है सही, पर मन जिसका भी चिंतन करता है वहां वह ब्रह्म पूर्वसेही व्याप्त होनेसे, मन उससे पहिले कहीं भी जा नहीं समता क्यों कि मनसे पूर्व वही सर्वत्र फैला हुआ है । मनमे वह अत्यन्त वेगवान् होनेसे मन उसे प्राप्त नहीं कर सकता यह बात स्पष्ट ही है, परन्तु इतर 'देव' (इन्द्रियां) उसे %3D ७. ईशोपनिषद् । नैनवा आप्नुवन् पूर्णमर्पन् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत १३ देवाः एनत् न आप्नुवन् इन्द्रियों से पहुंचती नहीं। १४ तत् तिष्ठन धावतः वह स्थिर होता हुआ दौडते हुए अन्यान् अत्यति । दूसरोके आगे जाता है। माप्त कर सरते है या नहीं ? इस शंकामा उत्तर इस प्रकार है- (१३) देवाः पनत् न आप्नुवन्= देवोंके शान क्षेत्र है। व्यक्तिगत देव' य्यक्तिमे आस, कान आदि इन्द्रियां देव हैं। ये इन्द्रिया बहिर्मुख होनेसे इन्हें अन्तराधमाका दर्शन नहीं होता। मानव-समाजस्थ देव': शानी (शब्द शास्त्री), शूर, व्यापारी, कारगर, ये मनुष्य समाजमें देव है । ये ग्यवहार में जुटे रहते है अतः इन्हेंभी परमात्म साक्षात्कार नहीं होता। जगतमें स्थित देव " = सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वायु आदि देव जगतम हैं। वे भी ब्रह्म साक्षात्कारके अधिकारी नहीं है । इस प्रकार ये तीनो क्षे. मोके देव अन्तरारमाको पा नहीं सकते । व्यवहार न फंसते हुए जो वं धनसे छूटता है, व नि सग वृत्तिसे रहता हुआ उस परमारमाके लिए आ- स्मसर्वस्वका समर्पण करता है वही सन्त उसे प्राप्त कर सकता है । (१४) " तिष्ठत् "- वह ग्रह स्थिर है। ऐसा होते हुए भी अन्यान अत्येति" = दीदते हुए दूसरे पदार्थी के भी पहिले गया हुभा होता है। व्यक्मेिं इन्द्रिया दौड रही है, समाजमे मनुष्य भागदौड मचा रहे है, जगदमे सूर्य, चंदादि नक्षनभी दौर रहे है। परन्तु ये सव जहा दौड़कर जाते हैं, वहाँ पहिले से ही ब्रा पहुंचा हुआ होता है। चाहे कोई क्तिनाभी तेज दीदता हो पर वह इससे पूर्व पहोंचने के स्थान पर पहुंच नहीं सस्ता । [दूसरे मंत्रमें 'प्रशस्त में करते हुए सौ वर्ष तक जीने की प्रथान पूर्वक इच्छा करनी चाहिए, ' ऐसा कहा है। परन्तु धावता .
३ आत्मतत्वका वर्णन। तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥ १५ तस्मिन् मातरि-श्वा उसके आधारसे माताके (गर्भमें) रहनेवाला (जीव)काँको धार. अपः दधाति । ण करता है। इस पर ऐसी शमा उठती है कि एक्दम अन्तके जो धर्म होगे, उनका फल मृत्यु हो जानेसे उस व्यक्तिको नहीं मिलेगा और ऐसी दशामे वे उत्तम कर्म व्यर्थ जाएंगे' इसका उत्तर 'किए गए कर्म व्यर्थ नहीं जाते' ऐसा अग्रिम मत्र भागमें दिया हुआ है, उसे अब यहाँ देसिए-] (१५) मातरि-श्या' = माताके उदरमै रहनेवाला जीव, जिसका पूर्व का शरीर छूट गया है और जिसका दूसरा देह यन रहा है, वह माताके गर्भमे आया हुआ जीव, 'तस्मिन् अपः दधाति' 12 उस ब्रह्मके आ धारसे अपने कर्म धारण करता है । जिस प्रथम शरीरसे कर्म किय थे वह यद्यपि नष्ट हो गया ओर आगेका शरीर नहीं भी मिरा, तो भी इससे पूर्व कृत भच्चे बुरे कर्म नष्ट नहीं होते । परमेश्वरके त्रिकाल स्थिर नियमोसे वे कर्म सस्कार रूपसे आत्माके पास रहते हुए जीवको अच्छे उरे भोग देते ही है। [अथवा 'ब्रह्मपयाधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन०1" (भ गी ५१०) ब्रह्मको समर्पण करते हुए आसक्ति हित कर्म जो करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है। इस गीता पचनानुसार भी इस मत्र भाग का अर्थ हो सकता है। तस्मिन् अपः मातरिश्वा दधाति' = उस ब्रह्म को कर्म समर्पण करते हुए जो जांघ कर्म करता है, (वह पापसे बद्ध नहीं होता)। दूसरे मत्रमे 'मर कसे लिप्त होता नहीं' - ऐसा कहा है, वह किस प्रकारस' यह इस मन भागने दिखाया है, ऐमा यहा सन्बन्ध जानना चाहिऐ ] इस मश्रम कहे गए प्रकारसे आत्माका ध्यान करना चाहिए। इस मत्र भागसे पुन जन्मकी क्सना उत्तमतया दिखाई गई है।) - १२ ईशोपनिषद् । तदेजति तन्नेजति तरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्य तः ॥५॥ १६ तत् एजति (एजयति) यह हिलाता है, (परन्तु) १७ तत् न एजति । |घह (स्वयं) हिलता नहीं। १८ तत् दूरे वह दूर है, (और) १९ तत् उ अन्तिके। यह निश्चयसे समीप (भी है) २० तत् अस्य सर्वस्य अन्तः यह इस सबके अन्दर है। (और) यह निश्वयसे इस सब के याहिर २१ तत् उ अस सर्वस्य याह्यतः (भी है) (१६-२१) तत् = वह, ग्रह, आत्मा, परमारमा, पूर्ण ईश्वर । (१६) तत् एज(प)ति " = यह सयको प्रेरित करता है, चलाता है, फिरा ता है परन्तु (१७) 'तत् न पजति' = वह स्वय हिरता नहीं, चचर नहीं होता । वह सदा स्थिर व अचर रहता है । (१८-१९) तत् दूरे, तत् उ अन्तिके' - वह दूर है और निश्चयसे पास भी है, अर्थात् यह सर्वत्र समान रूपसे घ्याप्त है, अथवा यह अज्ञानी मनुष्यको अत्यन्त दूर और अप्राप्य प्रतीत होता है, इसके विरुद्ध ज्ञानी भक्तको यह अत्यन्त स- मीप है ऐसा अनुभव होता है। (२०-२१) "तत् अस्य सर्वस्य अन्तः बाह्यतःच" = यह इस सबके अन्दर और बाहर है, वह कहीं नहीं ऐसा नही । वह सबके अन्दर है इसका अर्थ वह मनुष्यके अन्दर भी है ही। अत वह वस्तुत अत्यन्त मजदिक है, पर भनिहीन मनुष्यको उसके समीप होते हुए भी अनुभव नहीं होता [प्रथम मयम श सर्वत्र पसता है। ऐसा कहा है। वहा उपदेश ५ और ५य मत्राने अधिव- स्पष्ट किया है।]
४ समबुद्धि। ४ समधुद्धि। यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥ २२ यः तु सर्वाणि भूतानि जो वास्तवमै सब भूतोको आत्मनि एव अनुपश्यति । आत्मामै अनुभवसे देखता है, २३ सर्वभूतेषु च आत्मानं (और) सब भूतों में अपनेको अनुपश्यति । अनुभवसे देखता है, (वह) २४ ततः न विजुगुप्सते। उनका तिरस्कार नहीं करता। [पूर्वके दो मनोमें जो ईशके गुणांका वर्णन किया है वह केवर शान्दिक बो धके लिए नहीं है, वे मनुष्य के स्वभाव और आचरणम आने चाहिए, मन उस जाने चाहिए और कार्यमें परिणत होने चाहिए। ये आचरणमें आ ने लगे कि मनुष्यमे कैसी समबुद्धि पैदा होती है वह इसम दिखाया गया है। (२२) 'यः भूतानि आत्मनि अनुपश्यति' = जो मनुष्य उत्प न हुए हुए सब पदार्थ, विशेषत सर्व प्राणिमान मात्माके अन्दर है अ र्थात् आत्मा उन सबको व्याप्त होकर स्थित है, ऐसा अनुभवसे विश्वास पूर्वक जानता है, और इसी प्रकार (२३) 'सर्वभूतेषु आत्मानं ' मर्च भूमि उस एक अद्वितीय आत्माको अनुभवपूर्वक देसत्ता है, यह सब भूतोके अन्दर बाहर आत्माका विश्वास पूर्वक अनुभव रेनेके कारण, (२४) 'ततः न विजुगुप्सते - उन भूतमात्रमा तिरस्कार नहीं घरता, उनसे दूर रहने का भाव उसके मनतमें नहीं आता, उनके विष. थम कोईभी सदेह मनमें नहीं राता। (वाजस० पाठ.) ततो न विधि- कित्सति'- उनके विषयमें सशय नहीं करता। सर्व भूतॉरे विषय में यर ७४ ईशोपनिषद् । ५ सर्वत्र आत्मवद्भाव । यास्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । २५ यस्मिन् विजानतः जहां विज्ञानीका आत्मा एव आत्मा ही सर्वाणि भूतानि अभूत्। सर्व भूत धनगया, वह समान आस्मभाव मनमें रखता है। उसी सर्वत्र समष्टि होती है। [पूर्धवे ५ और ५ धे मत्रमें कथित उपदेश आ मसात् होनेके पाद, उस उपदेशके निरन्त ध्यान करनेसे वृत्ति तप होजानेपर प्राप्त होनेवाली उच्च भूमिका इस सम्पूर्ण मत्रसे दिखाई है। पूर्वके मग्राम बहर अनुभध अधिक रब हुआ कि आगे 'सप भूत आत्मामें और आत्मा सय भूतोंमें है।' इतनेही अनुभव पर स्थिर न रहते हुए, ज्ञानीभक्त उससे अपरकी भूमिका पर जाकर सर्वन 'आत्मकत्व की महिमा' प्रत्यक्ष करता है। यह अनुभव इस मभने बताया है-1 (२५) वि+जानत् ' = विशेष रीतिसे जानने पाला, देखनेवाला, अनुभव विशेष ज्ञानी। " ऐसे ज्ञानी के लिए 'यस्मिन् ' - जब, जिस समय, जिस भव स्थाम, जिस भूमिकापर पहुच जाने के बाद, जो अनुभव मिरा, वह है, 'आत्मा एघ सर्वाणि भूतानि अभूत् ' - भरमाही सर्व भूत मात्र यन गई, आरमस्वरूपही सब विश्व भासने एगा, इतना नहीं तो सर्व विश्वभी भारमाकी महिमा है, सर्व जगत् इस जगदरमा का वाशरय है, सृष्टिमी उसके विरक्षण सायर्यको प्रस्पक्ष साक्षी है, ऐसा जानकर अन्तम यह प हिचाना कि मामयं समर्थका निज ऐश्वर्य है और वह उसमे भिल नही है। ऐसा जिसको पछा अनुभव हुआ, उममे सर्वात्मभाव स्थिर हुआ। - "विजा . नता ६ परमात्माके गुण वर्णन । तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः॥७॥ ६ परमात्माके गुण वर्णन। स पर्यगाच्छुक्रमकायमत्रणमस्त्राविर शुद्धमपापविद्धम् । २६ तत्र एकत्वं अनुपश्यतः वहां एकत्व अनुभव करनेवालेको का मोहः? मोह कैसा? और कः शोकः? शोकभी फैसा? २७ स पर्यगात्, वह सर्वत्र व्यापक है। अकार्य वह देह-रहित, अनाचिरं, अत्रणं स्नायु-रहित, घणरहित, शुद्ध, अपापविद्ध, शुक्र शुद्ध, निष्पाप, तेजस्वी (समर्थ), (२६) तत्र = वहां, उस अनुभवको अवस्थाम; 'एकत्वं अनुपश्यतः सर्वत्र एक आत्मतत्वका अनुभव लेनेवाले उस ज्ञानी मनुष्यको, 'कः मोहा, कःशोकः, ' - कौनमा मोह भ्रममे डालेगा और कौनसा शोक भला दुःरा उत्पन्न करनेमें समर्थ है ? ऐसे ज्ञानीको मोह और शोक जरामी कष्ट नहीं पहुंचा सकते, वे उसे भी नहीं सकते। ['ईश सर्वत्र है' ऐसा जो प्रथम मंगने कहा है, उसका पुनः अधिक स्पष्टीकरण इस आठवें मंत्र ने किया है, और वह 'शुद्ध, समर्थ, सर्वत्र, स्वयंम्, व्यवस्थापक है, ऐसा यह मंत्र यतला रहा है-] (२७)स पर्यगात् आत्मा सब स्थानमें पहुंची हुई है, सर्व व्यापक है, वह सब जानती है, सर्वत्र है। 'अ-काय, अस्ताविर, अवणं' - वह शरीर रहित है अत एव वह स्नायु और प्रणमे रहित है। 'अ-पाप विद्धं = वह पापों. में प्रस्त नहीं है। यह निष्पाप है। 'शुद्धं, शुक्र' = वह पवित्र होने - वह - ईशोपनिषद्। कविर्मनीपी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधा- च्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥८॥ २८ कविः, मनीपी, द्रष्टा, शाता (मनका स्वामी), परिभूः, स्वयंभूः। विजयो और स्वयंभू है। २९ यथातथ्यत: (उसने ) योग्य रीतिसे शाश्वतीम्यः : समाभ्यः अनादि कालसे सब अर्थान् व्यदधात् । 'अोंकी व्यवस्था की है। निष्पाप, तेजस्वी और समर्थ है। (२८) कवि ' = (कान्त दी) उसे अतीन्द्रिय ज्ञान है। भाखोंसे जो दीखता है उसे देखता हुआ उससे परेकाभी देखनेवारा वह कवि है। मनीपी' = मनको स्वाधीन रख ने वाला है। परिन्भः' - सबसे श्रेष्ठ, सबपर प्रभाव डालने वारा । 'स्वयंभू '= अपनी शक्तियांसही स्थित होनेवाला, जिसको दूसरेकी महायताची गरज नहीं है ऐसी वह आत्मा है । (२९) 'अर्थः' : विषय, प्रास करवाने के साधन । 'शाश्वतीभ्यः समाभ्यः याथातथ्यतः अर्थान् व्यधात् ' = अनादि कारसे इन्द्रिया और उनके विषयोंको योग्य रीतिसे तथा व्यवस्थासे उसने निश्चित कर रखा है। [पूर्वके सात मनोमें दिखाया गया ज्ञान अनुभवसे आत्मसात् कर लेनेपर उस ज्ञानी भातकी योग्यता इस मनम वर्णन किए हुए के अनुसार हो जाती है। जा- घात्मा परमेश्वरमा अमृत पुत्र होनेसे, पूर्वोक्त प्रकारोंसे आरमशक्तिका दि. कास करके अपने पिता के समान होता है । परमपिताके सर्व गुण पुनम विकसित हुए हुए दिखते है। इन गुणोंका मनुष्यमें आनाही उपासा पी मन्तिम सिद्धि है। है ७ ज्ञान क्षेत्र। ७७ ७ ज्ञानक्षेत्र । अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ३० ये अ-विद्यां उपासते जो अगारमशानको (ही केवल) उपासना करते हैं। ते अन्धं तमः प्रविशन्ति । ये गाढ अंधकारमें जाते हैं। [मनुष्यके लिए प्रपंच और परमार्थ उत्तमतया करनेके लिए जो ज्ञान आवश्यक है, वह कैसे प्राप्त किया जाए यह बात९-११ इन तीन मंत्रोम कही गई है । ] (३०-३१) 'विद्या' - ईश-विद्या, ब्रह्म-विद्या, आत्म-विद्या, विद्या, 'अघिद्या' = अनीश-विद्या, अनारम-विद्या, [प्रकृति-विद्या, सृष्टिविद्या, जगद्विद्या ] अविद्या । प्रथम मंग्रम ईशा वास्यं इदं सर्व जगत् - ' ईशसे वसने योग्य यह सब जगत् ' है ऐसा कहा है। यही ज्ञान अनुभव से जानना है । यही मनुष्यका 'ज्ञान- क्षेत्र है। इसे जानने के लिए 'ईश' कोन है ? और 'जगत् ' क्या है ? इन दो बातोंका ज्ञान माप्त करना आवश्यक है । ईश और अनीश (= जगत् ) ' इन दो पदार्थोके ज्ञान प्राप्त करनेके लिए ईशकी विद्या और अनीश की विद्या अर्थात् सृष्टिरी विद्या प्राप्त करनी चाहिए । आ. रमाका ज्ञान विद्या' और आत्मासे भिन्न अनात्माका ज्ञान 'अविद्या है अविद्या अर्थात् अज्ञान- ज्ञान हीनत्व-यह नहीं, क्योकि मनुप्यके परम- क्ल्याणार्थ जैसे आत्मा केसा है यह जानना चाहिए वैसे ही जगत् कैसा है यहभी जाननाही चाहिए। जगद्विद्यासे अभ्युदय-ऐहिक उत्कर्ष होता है और आत्मविद्यासे नि.श्रेयस अर्थात् आस्मिक शक्तिमा विकास होता है। इसलिए परम कल्याण साधने के लिए इन दोन विद्याओंको प्राप्त करना चाहिए। ये दोनों ही ज्ञान प्राप्त न करते हुए यदि कोई मनुष्य रिसी एकही विद्यामें रम कर दूसरीशी तरफ दुर्लक्ष्य करेगा तो उमझी कैसी अर - ७८ ईशोपनिषद् । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः ॥९॥ ३१ ये उ विद्यायां रताः जो केवल आरमज्ञानमै रमते है, घे तो उनसेमी मानो अधिक ते ततः भूयः इव तमः1 अंधकारमें जाते हैं। नति होती है वह इस मत्रमे उत्तमतया दर्शाया है। (३०) अधि. घोपासक' - सृषिविद्याके हो जो केवल उपासक है, अर्थात् जो आत्म विद्यासे पूर्णतया दुईक्ष्य करके केवर सृष्टिविद्या के पीछे लगे हुए है, वे इस मसारमें व्यवहारके उपयोगी सुखके विपुल और उत्तमोत्तम साधन निर्माण तो कर लेंगे, पर केवल भोगेच्छा बदा लेनेसे कारान्तरसे उनकी स्वार्थो भोगसृष्णा अत्यन्त बढ़ेगी और अत वे अपने सुसके लिए दूसरी की पलि रेनकी खदपट करेगे, जिससे इनके प्रयत्नोंसे जगम अशान्ति चढकर दुख पढेंगे, अतः वे 'अन्धं तमः प्रविशन्ति' गाट अध- कारमें प्रविष्ट होते है ऐसा रहा है। (३१) विद्यारतः' - आरम विम है। उसे रमले हैं अर्थात् माप विद्याकी और पूर्ण दुरंप का कैच लात्मविद्यामे ही रमते रहते हैं और उसके सिवाय और कुछ नहीं करते, घे मष्टि रिचाके उपासकोसे भी अधिक गाट अधकारमें जाते है। क्यों कि जीवनयात्रा चरानेके रिए अस्यन्त आवश्यक और उम्मीसे प्राप्त होने वारे व्यवहारके साधन इन्हें मिरने नहीं। इस प्रकार न प्रपच और न परमार्थ, प्रेमी इनकी स्थिति होजाती है। (केवर सृष्टिविद्योपासक प्रपर के माधन बढ़ाकर कुछ तो चन करते है, पर केवल भारमविद्याम रमने वारे और उसके सिवाय कुछ न करने वाले मनुष्य, यदि उनके लिए दमरोंने कुछ भी न दिया तो वे ऐहिक माधनों विना जीतेही न रह सकने के कारण, कुछ साध नहीं सकते। अत उनको अधिक खराब स्थिति होती है, ऐसा जो इस मंत्र द्वारा कहा गया है, यह सृष्टि विद्याकी गर मनुष्य को है ऐमा दिवाने के लिए ही है।
७ ज्ञान क्षेन। ७९ आहु, अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुरविद्यया । ३२ विद्यया अन्यत् एव आत्मज्ञानका (फल) और (है देसा) कहते हैं (और) ३३ अविद्यया अन्यत् आहुः। अनात्मशानका (फल) और (है ऐसा) कहते है। (३२) अविद्यया अन्यत् ' = आत्मज्ञानमे एक भिन्न ही फल मिलता है । इस आत्मविद्यायै आत्मशक्तिका विकास होता है, अमृतस्व प्राप्त होता है, यन्धन दूर होते है, अखण्ड भानन्द मिलता है, आस्मिक यल बढता है, मनुष्य निर्भय होता है और सची शान्तिका अनुभव मिल- ता है। (३३) अविद्यया अन्यत् ' = अनात्माकी अर्थात् जगत्की या सृष्टिकी विद्याकै फल भिन्न है । सृष्टिविद्यासे ऐहिक ऐश्वर्य, सासारिक सुव्यवस्था, इस जगत्मे सुसराभकी समृद्धि, उपभोगके साधनीकी विपु. रता प्राप्त होती है । जिसको अभ्युदय कहा जाता है वह सृष्टिविद्यासे प्राप्त होता है । इस जगत्मे सुखपूर्वक रहने के लिए जिन जिन साधनोंकी आव- श्यक्ता है वे सब इससे मिलते है । इस प्रकार ये दो भिन्न भिन्न फल इन दोनों विद्याओंके है। इनमेसे प्रत्येक विद्याके फोम बहुतभारी प्रोमन है । इससे साधारण मनुष्य उन प्ररोभनॉमें गोता लगाकर फस जाता है। जगत् विद्यासे ऐहिक भोगके साधन बढानेसे ऐहिक ऐश्वयं बढता है, इस हिए जो साधारण मनुष्य इस सृष्टिविद्याके पीछे लगता है, उसे अपने भो. गके साधन जितने बढे उतने बढाओ, तथा जगत्को जीतो, ऐसा प्रतीत होने रगता है। इस कारण इस प्रलोभनमें यह मनुष्य फसता जाता है और उसे सामनेका वास्तविक करयाणका मार्ग दीयता नहीं । इसी प्रकार जो आत्मज्ञानमे रीन हो जाता है, उसे उससे विशेष शाति मिरती है और यह और और उसमें रमता जाता है और ससारमै रहने के लिए अर्थात् जीवन व्यतीत रनेके रिये अत्यन्त आवश्यक साधनको जुटाने कामभी ८० ईशोपनिषद् । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥१०॥ ऐसा हम धीरोदात्त लोकोंसे सु. ३४ इति धीराणां शुश्रुम ये नः तव विचचक्षिरे । दिया। जिन्होंने हमें उस विषयमें उपदेश छोड देता है और अत एव धीमे धीमे उसकी इस शेक्की यात्रा भी पहनी कठिन होजाती है । यदि तो उसकी औरोंने सहायता की तो तो उसे कष्ट नहीं होता, पर न की तो इस लोककी यात्रा चलनी कठिन हो जाती है। दोनों तरफ ये ऐसे दो प्रलोभन है। उन प्रलोभनोंका मोह हो जानेसे दोनों ही तरफ ये दो भय है। भतः दोनों ओरके प्रलोभनामें न उलझते हुए समतोल वृत्ति रखते हुए दोनों ही विद्याओंसे लाम लेनेवाला जो ज्ञानी है, यही (३४) सच्चा ‘धीर' वृत्तिवाला मनुष्य है । लाभ होने पर जो उम्मत होकर किंकर्तव्य विमूढ नहीं होता और हानि होने पर भी धीरता विहीन न हुआ हुआ जो संन्यसे नहीं गिरता उसे 'धीर ' कहते हैं। मनुष्यके सामने सदा दोनों मार्ग भाते हैं। पहिला धेियमार्ग' से प्रथम कष्ट सहन करता है तो अन्तमें उसका वास्तविक कल्याण होता है और दूसरा प्रेयमार्ग' से प्रथम सुख अनुभव करता है तो अतमें भपकर आपत्ति भोगता है। इस विषयमें 'कठ उपनिषद्' में कहा है- "धेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्ती संपरीय विविनकि धीर । यो हिधीरोऽभिप्रेयसी घृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमावणीते ॥ कठ ३० १।२।२" अर्थात् श्रेय और प्रेय ये दो मार्ग मनुष्यके पास आते उनसे श्रेय मार्गका स्वीकार धीर रोक करते है और प्रेय मार्गको मन्दबुद्धिवाले पसद करते है और अन्तम फसने है। जो श्रेय मासे जाता है वह 'धोर' है, इस धौर वृत्तिके मनुष्यको ही इन दोनों विद्याओंसे अपना सच्चा कल्याण किस प्रकारसे प्राप्त करना आता है यह अगले मत्रमे देयो- 4 ७ ज्ञानक्षेत्र। " विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वदोभय सह । अविद्यया मृत्युं ती. विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ।। ३५ या विद्यां च अविद्यां च जो आत्मज्ञान तथा अनामज्ञान, इन दोनोंको एकत्र जानता है, वत् उभयं सह वेद । (वह) ३६ अविद्यया मृत्यु ती| अनात्मशानसे मुत्युको दूर करके, आत्मशानसे अमरत्व प्राप्त कर. ३७ विद्यया अमृतं अश्नुते । 'ता है। (३५)"विद्या और अविद्या %D आत्मा ज्ञान और सृष्टिका भान ये दोनों प्रकारकी विद्या मनुष्य की उन्नतिके रिए समान उपयोगी है। आत्मविद्यासे आत्मिक बर बढता है, शान्ति मिलती ह तथा मनका नित्य समाधान होता है। इसी प्रकार सृष्टिकी विद्यासे ऐहिक उत्कर्ष के सा. धन प्राप्त होते हैं। इस रीतिसे इन दोनी विद्याआसे मनुष्यकी वास्तविक उन्नति होती है । यह बात जिसकी समझमे आगई ह यह मनुष्य (३६) 'अविद्यया मृत्युं तीत्वा = प्रकृतिको विद्यास, पच महाभूतोंके ज्ञानसे, सृष्टिक शास्त्रकी सहायतासे मृ युको दूर करता है । मृत्यु अर्थात् अपमृत्य, दुःख, व्यवहारमे दनिक कार्योम होनेवाली रकावट।ये रकावटे यो ज्यों सृष्टि विद्यासे विविध साधन तैयार होते होगे, क्यों ज्यों अन्न तथा पेय वस्तु निर्माण होता जाएगा, इसी प्रकार ज्यो ज्यों उपभोगके पदार्थ निर्माण होते जाएगे त्या त्या उनकी महायतासे दूर होती जाएगी, और इन सायनाथ इस क्षेत्रमे दु.ख कम कर रेनेके बाद (३७) 'विद्यया अमृतं अश्नुते' आमविद्यामे अमरता, मोक्ष अथवा कैरत्य प्राप्त किया जा सकेगा। यह अन्तिम साध्य है। इसी अतिम साध्यको मनुष्यने प्राप्त करना है । परन्तु केरल इसना ही साधन रूगा और कुछ भी नहीं करगा ऐसा कहना योग्य नही ह । अतः मनुष्य सृष्टिविद्या सीयर जानी यहाको जीवनयाना ६ । - . इंशोपनिषद ८ कर्म क्षेत्र अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसंभृतिमुपासते । ३८ ये असंभृति उपासते जो असंघभावकी (ही केपल) उपासना करते हैं। (2) अन्धं तमः प्रविशन्ति । गाढ संधकारमें जाते है सुखमय करे और भात्मविद्यास अपने पारमार्थिक परम पायाणको सिद्ध करे [प्रधम मत्रमें 'जगत्यां जगत् ' जगतीम वर्तमान जगत्- ऐसा गान्द- प्रयोग है। 'जगत् ' के समुदायको ‘जगती' कहते है । 'जगत्' मधात् एक पदार्थ और 'जगती। उस ही का समुदाय है। व्यक्ति समुदाय' ऐसा जगत् है। एक पदार्थ और उसकी जाति ऐसी जगत् में स्थिति है । इसीको 'व्यष्टि और समटि' ऐसा साकैतिक दाब्दसे बाहन है। ऐसी स्थिति होनेसे व्यक्तिको समाजके रिये और समाजको पति के लिये कुछ कर्तव्य करने आवश्यक है । श्यों कि मनुष्य सामाजिक हिले उसे अपने साफ पतय करने होते हैं उसी प्रकार रिस समाजका वह घटक हे उसके लिये भी इसे कुछ कार्य करने पड़ते हैं। इस प्रकार व्यक्ति और समाज ' ये मनुष्य की क्षध' है ऐसा समझा जा सकता है । इसी मबन्धका उपदेश 'संभूति और असं- भूति " इस प्रकरणमे कहा गया है । इसका विचार अब देखिए---] (३८) संभूति और असंभूति ' - (स) एक होकर (भूति) होना, रहना, उत्कर्म के लिये प्रयत्न करना, ऐश्वर्य प्राप्त करना, (स-भूति) सघ दनाकर रहना, सहकार्य करके ऐश्वर्य वृद्धि के लिए प्रयास करना, 'सं. भूय समुत्थान' सहकारितासे व्यवहार करना, मिलकर हमरा करना, मय बनाकर समातिस करना, सहकारी सस्था स्थापन करके जाति शिप प्रयत्न करना ! 'सं+म' इस धातुरा अर्थ एक होकर रहमा, संघ नाना, एक्स वर भगे याना, रोया है । 'संभति' सघ, जमाव, ८ रनक्षत्र। - ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्या रताः ॥ १२ ॥ ३९ ते ततः भूयः इव तमः वे उनसे मानो अधिक अंधकार में जाते है, जो वस्तुतः (फेवल) ये उ संभूत्यां रताः । संघभावमें ही रमते हैं। समाज, सघठित समाज । विभक्ताकी विभिनता दूर करके उनका सघठन परमा, भिन्न भिन्न प्राकृतिक परमाणुओको एकत्रित करके उनसे सृष्टिरूप संघठित कार्य करना, भिन्न भिन्न व्यक्तिका सघटन करके उनका प्रवर सघ बनाना, जाति, राष्ट्र और राष्ट्रसंघ बनाना, सघसत्ता । 'अ+संभूति ' :: संघठित अवस्था । उपरोक्त प्रकारका सघटन न होनेपर जो स्थिति होती ६ वह । व्यक्ति की स्थिति, व्यक्तिक सत्ता, ये इस शब्दके मारिस अर्थ ह। (३८) असंभूतिके उपासक ' = जो अमघभावनाके व्यक्ति सत्ताके उपासक यानि वैयक्तिक स्वातयकाही क्चर आदर करने वाले है, वे अध कारमे जाते है । जो अपना मघठन जराभी न करते हुए कवर व्यक्ति की हो उनति ही हुई तो बस, ऐमा मानते है, उनम सघ शक्तिके न पढनसे लघवलसे होनेवारे कार्य करने लिए वे सर्वथा अयोग्य होते है और इस पारण वे दिवसानुदिवस अवमत होते जाते है, क्या कि मनुष्य सधर्मेही उनत होने वाला प्राणी है। (३९) 'संभूतिम रमण करनेवाले' = देवल सघभावके ही पूनम या केनर सघशक्ति बढाने के लिए व्यक्तिका स्वातन्य नष्ट करने वाले जो ह, “ केवल सपपत्तावादी भी अवनत होते है, क्यो कि इनके कार्यक्रममें व्यक्तिस्वात य को जराभी स्थान न मिलने से और प्रत्येक व्यक्ति सबके नियमोंसे जाडा हुआ होनसे धीरे धीरे उन्हें परतन्न होने की आदत पडनाती है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति में परतन सा की जड स्थिर होती गई कि व्यक्तिस्वातन्यसे होनेवारी सब उन्न तया बन्द होजाती है। और अन्ततो गत्वा उस राष्टाही लय होनाता है । अत्यधिक सघसत्तावादियों के बहुमत के कारण राटम मब लोकाशी ऐमी अपनति R इति शुश्रुम धीराणां ये नातद्विचचक्षिर ॥ १३ ॥ सम्भूतिं च विनाशं च यस्तहदोभय सह । ४२ इति धीराणां शुश्रुम ऐसा धीरोदात्तोसे सुनते हैं. यनः तन विचचक्षिरे। जिन्होंने हमें उस विषय उपपेश किया। ४३ यः संभूति च विनाशं च जो संघभाय और अमंघमायान तन उभयं सह वेद। दोनोंको एकत्र जानता है, (पद) यर्याग र गुण राय विरयिर होते , पर लोकों में मंगः न पढ़नेमे हम रधिगदानि होती अतः दोनों मारा ममता र विचार करके दोनाही ममि उत्तम पातको अपनायर अपना मार्ग में देखना है यह गधा 'धीर' है ] (५२) ऐसे 'धीर' पुरषों को इन दोनों मागों में कोई विलक्षण गुण दीगता है, जिसमे ये लोक दोनों ही मागॉममे गुण है। पसभा दोष सोरसे हुए अपने पुरपार्थमे अपने परम यल्याणको प्राप्त र मेरो। ये किस प्रकार अपना कल्याण माधने है यह पात आले मंत्रम दाई है उस मंत्रमा उत्तम विचार अस कामतापूक देखिए- (४३) संभति' संभशक्रिमे रहना, संघनिभी समाजनिष्ठा, रापूनिया, समाजमाबाद निष्टा, इन दान्दाम दिपाई जाती है। संघश- निये क्या काम है भार उसके पिना क्या क्या हानियों में यह भी पिउसी पिणीमें दिपाया गया है। हम मंग्रमें दोनोममे हानियों को दूर करके दोनोंसे लाभ में हेना चाहिये यह दिपाया है। "विनाश" यह शाद इम मंगम 'असमति' शब्दके लिए आया है। 'असंभूति' का भय संघसता' की विरोधी व्यक्तिसत्ता'। इस पैक मसाके लिए इस मंत्र पिनाश' यह गाद प्रयुग किया गया है। विनाश' पाक दो अर्थ है- (१) विगतः नाशः परमात्' % हिसका नाम - ८६ इंशोपनिषद् । विनाशेन मृत्युं तीली संभूत्यामृतमश्नुते ॥ १४ ॥ ४४ विनाशेन मृत्यु ती| असंघमावसे मृत्युको दूर करके, ४५ संभूत्या अमृतं अश्नुते। संघभावसे अमरत्व प्राप्तकरता है। नहीं होता ऐसा, अथवा (२) 'विशेषेण नाशः विशेषनाग दोनों परस्पर विरोधी अर्थ इस शब्दमे है । म्यतिके मरते रहने पर भी संघ अमर रहता है। यह नियम हम समारमें देख रहे है । प्रत्येक मनुष्य मरता है, पर सघ दृष्टिसे समाज सझा जीवित रहता है, इस लिए ( ४४-४५) सघभावसे रहते हुए "संभूत्या अमृतं अश्नुते । अमरत्व प्राप्त किया जा सकता है और यदि सघ टूट कर उसका प्रत्येर घटक भिन्न भिन्न होगया और उनकी सघ शक्ति नष्ट होगई तो एक एक व्यक्ति थोडेही समयमे नए हो जायगा । संघका विभाग करते करते अतम एक व्यक्ति पर आकर टहर जाना पड़ता है। इससे आगे विभाग नही हो सकता। इसका इससे आगे और विभाग नहीं हो सकता इस लिए व्याक्त को अविभज्य' अर्थात् 'उससे आगे विभाग करना असंभव' ऐसा कहा जाता है । इस व्यक्ति के लिए 'अहं' (अ+ई = अनन् = जिसका आगे हनन नहीं होता, जिसका इससे भागे नार नहीं होता, प्रेमा) यह शब्द प्रयुक्त किया जाता है । " अविभज्यता " ( Individuality) की रष्टिगे म्यनिका इससे भागे नाश होना सभव नहीं। इस प्रकार प्रथम अर्थ ही यहा सगत है। व्यतिको स्व सा स्थिर रखने के लिए वह अपम्युसे न मरे और अन्य कष्ट भी यह न भोग, इसलिए वैयक्तिक साम्प सरक्षगः कर्म व्यक्तिको करने पड़ते है । उन्हे करता हुआ व्यक्ति 'मृत्युं तो|' = अपमृत्युसे अपना बचाव कर सकता है, और 'संभूरया अमृतं अश्नुते ' = सघ सानिमे अमर होता है। इस प्रकार पक्तिनिष्टर और सनिष्टा इन दोनों के दिन होनेवा- . अहा%3 1 ९ सत्यधर्मका दर्शन। ८७ २ सत्यधर्मका दर्शन। हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुसम् । ४६ हिरण्मयेन पानेण सोने के पात्र से सत्यस्य मुसं अपिहितम्। सत्यका मुख ढका हुआ है। ही हानियोको दूर करके दोनोंसे मनुष्य लाभ उदा सस्ता ह यह इस मत्र ने दर्शया है। सघ पचमुसी परमेश्वरही है। इसके साह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र और निपाद ये पाच ग है । मघठित सपके विषयमे ऐसी निष्ठा रखते हुए उसकी आत्मशक्ति अभेद्य ऐक्यसे सुदृढ़ करनेपर प्रत्येक राष्टम पर, उसमे व्यक्तिके मरते रहने परभी, अमर होगा और प्रत्येक व्यक्ति भी मां लिए आत्मसमर्पणरूप सर्वमेध यज्ञ करके अपना जीवन सार्थक करती हुई अर्थात् स्वत सघरूम-विश्वात्मरूप-बनती हुई अमरत्व प्राप्त कर सकेगी। मनुप्योका 'कर्मक्षेत्र' इन तीन मनाने दर्शाया है । ( वाजसनेयी मा यदिन सहितामे ये तीन मन्त्र पहिरे तथा विद्या अविनाके यादमें है।) [सब आरमोन्नति अपरिग्रहवृत्तिसे होती है। अपरिग्रहका अर्थ है नि स्वार्थ भावसे व्यवहार करना । परिग्रहका अर्थ है अपना सुस रहानेके लिये सुरु साधनोंको अपने पास इकट्ठा करना । यही सुवर्णका प्ररोभन है। इसके नीचे सब धर्मनिमय दब जाते हैं, इसरिये इस प्रकारका स्वार्थी मनुष्य धर्मक जान नहीं सकता। इस प्रलोभनसे मुक्त होनेका उपाय अगरे म मे कहा है-(४६) 'हिरण्मयेन पात्रण सत्यस्य मुखं अपिहितम्'- सुर्वण के चमकीले बरतनसे सत्यका मुख ढका हुआ है। सोनेके नीचे सत्य छिपा पडा है। यह अनुभर हम व्यवहारमे भी मिलता है । अपराध करने परमी अ धिकारियोंको घूस देकर उसे छिपाया जा सकता है। घुस न लेते हुए नं. व्य भ्रष्ट न होनेवाले बहुत थोडे है । घुम लुच्चाई आदिमे मत्यमा मुख नद कर दिया जाता है इसका दैनदिनीय व्यवहारमै अनुभव हमे मिरता है। .
१० उपासना।
८९
१० उपासना।
पूपन्नेक यम सूर्य प्राजापत्य ब्यूह रश्मीन्समूह ।
तेजो यत्ते रूप कल्याणतम तचे पश्यामि ।
यम, सूर्य
४८ पूपन्, एक ऋपे,
हे पोषक ! एक दृष्टा!
नियामक ! तेजमदाता!
प्राजापत्य !
प्रजापालक!
४९ रबमीन् व्यूह, (तेरी) किरणे एकत्र करके,
समूह ।
एक ओर कर।
५० यत् ते कल्याणतमं जो तेरा अत्यंत कल्याणकारी
(४८) परमामा 'पूगन् ' = सबका पोपक है । वह 'एक' है और
वह 'नापि ' - ज्ञाता, ज्ञानी, सर्वज्ञ आर अतान्द्रियार्थदी है। वहीं
'- सबका नियामक, सबको अपने नियमामें रखनेवाला, 'सूर्य'
तेन देनेगला, प्रकाशित करनेवाला, आर 'प्राजापत्य' जो प्रजाओका
पालन करनेवाला है वह प्रजापति । प्रजापतिसे उतत होनेवाले प्राजापत्य
अर्थात् उसके सामर्थ्य । इन सब सामोंसे युक्त वह देव है। इस देवको
भक्तियुक्त अन्त:करणसे इस मनम पुकारा ह । 'हे पोपक, नियामक,
तेजस्वी, सामर्थ्यशाली, सर्वशदेव ! मेरी सहायता कर। (४९)
'रक्ष्मीन् व्यूह समूह ' = रिरणाको इकट्ठा करके एक ओर । हे देव'
इस जगत्की इस चचाहटके कारण मुझे तेरा स्पदिसता नहीं, जहा
देखता हू वहीं इस प्रकृतिकी चरुवाहद नजर आती है। उससे परे वर्त
मान तेरा रूप दिखता नहीं । इसमाम्ते ये तेरी विरण एक ओर कर, और
यम
इंसोपनिषद् । - याऽसाबसा पुरुषः सोऽहमसि ॥१६॥ तेजोरूपं, तेजोमय रूप है, तत् ते पश्यामि । यह तेरा रूप में देखता हूं। ५१ या असा असौ पुरुषः जो यह प्ररणो में पुरुष है सः अहं असि । मुझे तेरा स दीखे, उसके लिये तूही मेरे पर दया करके मेरी ओधोंको चक चौध करनेवाले ये तेरे तेज दूर कर, तूने ऐसा किया कि (५०) ते कल्याणा तमं तेजोरूपं पश्यामि' = तेरे अत्यन्त कल्याणमय तेजस्वी स्वरूपको में देखता हूं। हे देव 'तू ही करा कर और अपना रूप दिखा । तेरी कृपा के विना ते मङ्गलमय और कल्याणमय रूप मुझे दीख नहीं सकता। (५१)' या असौ असौ पुरुषः = को यह सरे ( असो-असुम) माण शत्ति के आधारमे रहनेवाला और (पुरुषः = पुरि+यसति ) इस शारीररूपी नगरी में रहनेवाला, देह धारण कर अभ्युदय और निःश्रेयसी प्राप्तिको इच्छा करनेवाला, शरीर धारणार परम पुरुषार्थ करनेकी इच्छा वाला जो तेरा भक्त है। आई अस्मि' = वही में हूँ। मै तेरा एक- निष्ट भक्त हू, मुझे भक्त मानता हुभा तू 'अपना ' मान । ( इस मन्त्रके पहिले दो भाग वाजसनेयी साध्यदिन साहिता नहीं हैं। मत्रका अन्तिम भाग इस प्रकार है- " योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम् । ओखं ग्रह ) १७ ॥ " यह भग्न भाग वहाँ 1 वां है और हिरण्मयेन । इस मप्रका उत्तरार्ध है। इसका अर्थ- " (यः असो)जो यह (आ. दिये पुरुषः) आदिरथम पुरस है , (सः असो अहम् ) वह यह में हू, (भो खं ब्रह्म) वह आकाशकी तरह भापक ओंकार द्वारा दिखाया जाना है"] हम मनमें कह गए अनुसार भक्तको परमेश्वरकी उपासन कानी चाहिए। स' .
12 आत्मपरीक्षा ११ आत्म-परीक्षण वायुरनिलममृतमथेदं भन्मान्तर शरीरम् । ५२ वायुः अन्-इलं अमृतम् । प्राण अपाधिन अमृत है । और यह शरीर अन्तमें भस्म ५३ अथ इदं शरीरं भन्मान्तम्। होनेवाला है। ५४ क्रतो! ओं पर। हे धर्मकर्ता पुरुष सर्व रक्षक आरमा का ध्यान कर। । (५२) हे मनु य । यदि तुम उन्नत होना है तो तू यह रक्ष्यमे रख कि- (वायुः) यह हमारा माण (अन्+इल अ+मृतं) अपार्थिव अमृत रूप प्रचण्ड शाक्ति है । (५३) और (इदं शरीरं भस्म+अन्तं) येर रीर मान आम भस्म होनेवारा है । आ मर जानेवारे शरीरकी अपेक्ष" अमर प्राणशक्तिकी विशेष आराधना करनी उचित है । मरनेवाले शरीरम अमर प्राणशक्ति है और उम प्राणाति के अन्दर तू (असो पुरुष:जीय आरमा ) है । तेरी उमति के रिए ये याहिरके सरं साधन है । इन साध नोकी सहायतासे तुझे अपने अमरपनेका अनुभव रेना है। " त्य साधना के योगसे तुझे वह नित्य स्थान प्राप्त करना है।" इसवान ५५) हे "तो" = कर्म कानेवाले पुरप' कर्म करना जिसका म भाव है ऐसे हे मनुष्य के स्मर' = (अपति इति ओम् ) उस सर्व रक्षा परमारमाका पान कर। उसके गुणोंका चिन्तन कर । उसके क्ल्या मय गुणोंको निदिध्यासनसे अपने आरमधुद्विमन में नित्यमति यहा। कृतं स्मर' रोज प्रातः साय तूने जो कई कर्म किए हुए हों उनका स्मरण कर । भान पूर्वक विचार करके देखा कि तूने तो कोई कर्म किए है चे आरमाको उत्सति करनेवारे है अथवा अपनति । दिनभर किएलए करें इन अनि ९२ ईशोपनिषः । कृतं स्मर कतो! स्मर कृतं स्मर ओ३म् क्रतो सर कृतस्मर कतो स्मर कृतर स्मर ।। १७ ।। किए हुए फोका स्मरण कर। हे कर्म करनेघाले पुरुष स्मरण कर 'किप हुप कमौका स्मरण कर। का निरीक्षण सायकारको तथा रातको किए हुए काँका निरीक्षण सबेरे कर । इस प्रकार अपने आचरणाकी परीक्षा तू स्वय कर और अपना तू स्वय निरीक्षा पन निससे कि तेरी कहा भूर है भार वहाँ तुझे वास्तवमै क्या करना चाहिए या यह अपने आप तेरेयानमें आएगा हमें अपने आप अपना उद्धार करना चहिए। जिनसे भरनी अवनति होती हो ऐसे बाधरण हमें कभी भी करने नहीं चाहिए।" [वाजसनेयी माध्यदिन महिताम यह मत्र १५ वा है । और इसके द्वितीयाधम “पिलवे स्मर" पमा अधिक पाठ है । क्लिय, क्लिप, फ्लुप् ' इनका अब ‘समर्थ होना, योग्य होना एया है । भन ‘क्लियं स्मर' = अर्थात् 'अपने सामध्यकी वृद्धि के लिए यह स्मरण कर ।' अपने भार समर्थ होने के लिए अपर कहे गए अनुमार । ईश स्मरण कर और स्वय कृत फमका स्मरण पर | ' अपने उद्वारके लिए इस धेट मार्गवा अवलम्बन कर । ] रोनहम क्या करते हैं इस यातका निरीक्षण करना, यह भा मपरीक्षण आमोग्नति के लिए अन्यत सहायक है । इसके बिना किसी भी प्रकार की उन्नति होनी, सभव नहीं । साधकका शरीर पोषण तक इस परीक्षण के विना नहीं होगा। अत हमारी माध्यास्मिक उन्नति आरमपरीक्षणके विना नहीं होगी, इम प्रकार पृथक् रहनेकी आवश्यक्ता ही नहीं । इस वास्ते यह आमनिरीक्षण करना चाहिए ऐसा नो यहा सास करके कहा गया है उसका अभिप्राय कि उसकी और साधक कदापि दुलक्ष्य न करे। .
१२ प्रार्थना
३
१२ प्रार्थना।
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मञ्जुहुराणमेनो
६५ अग्ने! अस्मान् सुपथा हे प्रकाशक ! हमें उत्तम मार्गसे
राये नय।
अभ्युदयको प्राप्त करा।
५६ देव! विश्वानि घयुनानि हे देव! तूं सय कर्म
विद्वान् ।
जानता है।
५७ अस्मद जुहुराणं एनः हमारे पाससे सब कुटिल पाप
युयोधि ।
(५५) हे 'अग्ने' = प्रकाश देनेगले ईश्वर ' ' अस्मान् सुपथा राये
नय'- हमें अच्छे मार्गसे अभ्युदयको प्राप्त करा । हमारेमें कुमार्गसे जा.
नेकी बुद्धि कभी भी न हो। धन मिले, चाहे न मिले, पर हमारे आचरणका
मार्ग शुद्धही हो। हे देय! तू (५६) "विश्वानि वयुनानि विद्वान्' हमारे
म कर्म जानता है । तुझे पता न चले इस प्रकार छिपकरके भी कर्म करने
असंभव है । क्यो कि तू सर्व साक्षी, सर्वज्ञ होता हुआ सर्वत्र है। इस
कारण हम जो कुछ करते है चाहे वह किननाभी चुपकेसे छिपकर किया
गया हो, तो भी वह तुझे उसी समय पता लग जाता है। इतना ही नहीं,
मनमें आया हुआ संकल्पभी तुझे मालूम हो जाता है। ऐसी दशामें हम
सेरेमे छिपाकर कुछभी नहीं कर सकते। हमारे सब अच्छे बुरे कमाया
मुझे पता होने जिस मार्गमे जानेये हमारा उद्धार हो, उस श्रेष्ठ और शुद्ध
दूर कर।
ईशोपनिषद् ।
भूयिष्ठां ते नम उक्ति विधेम ।। १८ ॥
५८ ते भूयिष्ठां नम उक्तिं वरी विशेष नमन पूर्वक स्तुति
विधम ।
हम करते हैं।
-
मार्गमे तूं हमें ले चल | हमारेमें कटिलता और पापभाव भरे हुए है। वे,
(५७) जहुराणं पनः अस्मत् युयोधि' : कुटिरता और पाप,
हमारेसे सर्वदाके लिए दूर कर। इन पापोंके साध युद्ध करके उन्हें दूर
करने के लिये हमें शक्ति दे! (५८) इस तेरी कृपाय लिए. हम तुझे 'नमः
विधेम' = नमस्कार करते है। मुझे देनके रिए हमारे पाप नमस्कार
नर सिवाय दूसरा उ नहीं है । हे देव ' यह हमारा नमस्कार स्वीकार,
और हमारा उद्धार कर।
"जा। पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेशावशिष्यते ॥
ओं। शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
परमेश्वरका नामसंकीर्तन । ९५ परमेश्वरका नाम संकीर्तन । हमारे धार्मिक ग्रन्थों में ईश्वर के नामोंका संकीर्तन विशेष रूपसे किया हुआ सर्वत्र मिलता है। वेदों में अनेक नामोसे एकही सद्वस्तु के वर्णन किए हुए हैं ।। (ऋ. १ । १४६ १४६)। उपनिष. दोमें भी यही प्रतिपादित है । इतिहास और पुराणों में भी यह सं. कीर्तन मिन रीतिसे आया हुआ है। इस छोटीसी इशोपनिषदमै भी पुनः पुनः "परमात्म-गुणवर्णन" ही आया है। ऐसाजहां तहां पर- मात्माके गुणोंका संकीर्तन क्यों किया हुआ है? इस प्रश्नका विचार करना उपयुक्त है। इस संयन्धका मूल सिद्धान्त क्या है, उसे समझे विना इस नाम संकीर्तनका महत्व समझमें माना कठिन है, लिए इस विषयमै संक्षेपसे दो शब्द यहां कहने हैं। सबसे पहिले बहुतसी प्रास्ताविक ऊहापोह न करते हुए वैदिक धर्मकी एक मूल भूत घात यहां कहनी चाहिए और वह यह है कि " परमेश्वर सयका पिता है और हम सब उसके पुत्र हैं।" यह कल्पना इस नाम संकीर्तनका मूलाधार है। मैं परमेश्वर का पुत्र हूं और परमेश्वर मेरा पिता है, यह कल्पना मनमें उस जानेके दूसरे ही क्षणमें दूसरी कल्पना मनमें आती है, और वह यह कि 'पुष उन्नत होते होते कभी न कभी अपने पिताके सदृश हो जाए. गा, 'इस नियमानुसार परमेश्वरके भी पुत्र उन्नत होनेके मार्गमें है और ये कभी न कभी परमेश्वर के सदश ' स्वतंत्र (मुक्त) होगे । इस विचार द्वारा आगेका सिद्धान्त हमारे ध्यान में आस- - . केगा ईशोपनिषद्। . . (१)परमेश्वर सपका परम पिता है। (२) हम सर उसके अमृत पुत्र हैं, (३)पिताके गुणधर्म अंशरूपले जन्मतः पुत्रोंमें होते ही है। (४) पुत्रक गुण धर्म पूर्ण विकसित हुए कि वह अपने पिता के समान होता है, (५) पुत्रके पढ़ने की भी परम सीमा है, और कभी न कर्मातो यह उतिको परम सीमा हर पकको प्राप्त होगीहो। जिन अर्थों में पिता पुषके गुणधर्म पितामें पूर्णत्यको पहुंचे हुपर्दै और पुत्र अंशरूप से है, तो ये समान ही हैं. उन अधोमें जो गुण- योधक नाम होंगे थे पिता पुत्रके कसे ही होने चादिप,इसमें संदेश नहीं। जैसे 'द (देखनेवाला), धोता (सुननेवाला) स्पादि माम फेवल गुण पोधक होनेसे, घे जैसे पिताके लिए प्रयुक्त हो सकते हैं वैसे ही पत्र के लिए भी प्रयुक्त दोसकते हैं। यह सोप्यायचारिक अनुभव है पद वैसा ही इस परमार्थमें भी एकदम सत्य है और इसी लिए पेद, उपनिपर तथा इतर धर्म प्रधा में पर. मेश्वर के जो गुण संकीर्तन किए हुए है ये यदि परमेश्यरका पूर्ण तपा वर्णन कर रहे है तोपदी कभी कभी इस जोपारमालिप भी लागू होगा । जैसे परमेसर हाता' है यह जैसे आज परमे- सरका सत्य घर्णन है तो जप यह जीव 'शाता होगा, तप उत्त फामी यही घर्णन होगा और इस समय भी थोडी दर लिप परमेदारकी विशाल ब्रह्माण्ड पाप्ति'को तथा जीयको शरीग्में छोटेसे पिपरमें प्यानिको मनमें यदि न लाथा आप, तो शातत्य शक्ति दोनों में ही होनेसे जैसे 'शाना बाद पूर्णतया परमेश्वरके लिए लगता है येसेही पद अंश का जोपर्क लिए भी रयप दी लागू होता है। इससे पता चलता है कि हमारे धर्म प्रयोमे पर.
परमेश्वरका नामसंकीर्तन । १७ मेश्वरके नामसंकीर्तनों में किए गए गुण वर्णन जीवात्माको उन उन गुणों के बढानेको सूचना दे रहे हैं, और इसी लिप वे साधकको अत्यन्त सरल उन्नतिका मार्ग दर्शानेवाले हैं, यह निसंदेह है। तेरा पिता शर, वीर और धीर था, उसने इतिहास में ये ये महत्वके कार्य किए ' इत्यादि प्रकारके बडोके वर्णन लडकोंके सुन. नेपर उनके अन्तःकरणोम' हम भी उनके सदृश बने 'ऐसा भाय. उठना एकदम स्वाभाविक है। यह हमारे में उन्नति करलेनेकी स्फूर्ति-उत्तेजना नामसंकीर्तनसे होती है और वह जिस प्रफारसे वैसी होती रहे उसी प्रकारसे इन नामोका स्मरण करते रहना चाहिए। घेदोंमें जिन देवताओंका वर्णन है और उनमें जो परमेश्वरके वर्णन हैं, वे सय उपरोक्त कथनानुसार मनुष्यमें उन्नतिकी स्फूर्ति उत्पन्न करने तथा उसे उन्नतिके मार्गमें लगानेके लिए है । जैसे परमात्माका अंश यहाँपर जीवरूपसे आया हुआ है वैसे ही अग्नि वायु, सूर्य, आदि तेतीस देवता अंशरूपसे इस जीवात्माके साथ साथ शरीरमें लाकर इन्द्रियों और अवयवों में बसे हुए हैं। इस. लिए चाहे किसीभी देवताका वर्णन हो तोमी यह हमारे शरीरमें स्थित अंशभूतकामी यह सूक्ष्म रूपसे वर्णन है ही। धन जलाने घाले दावानलका वर्णन छोटीसी चिनगारीकाभी अंशरूपसे है ही। इसी प्रकार यहांमी समझना चाहिए। इससे यह बात ध्यानमें आती है कि हमारे घेदादि धर्म ग्रंथों में परमेश्वरका तथा इन देवताओंका वर्णनभी ब्रह्माण्ड व्यापी शक्तिका वर्णन होता हुआ वही पिण्ड- व्यापक अल्पशक्तिकामी है, और यह पिण्ड में उन उन अविकसित शक्तियोंको बढाकर पूर्ण करने के लिए हमें आदेश दे रहा है । इस प्रत्येक वर्णनले मनुष्यको धोध लेते हुए यथा संभव अपने आचरण में उसे घटाना है। इस योधका कैसे पताचले इस यातकों बताने के ७
इंगोपनिषद् ।
।
लिप आगे कोष्ठोमें उसको डालकर दर्शयागया है, जिससे पाठक
सुगमतासे जान सकें। मूल वाक्य दर्शानेके लिए ऊपर मंत्राक
दिया है । अर्थात् उस उस अङ्कवाले मंत्रका यह मूल वाफ्य
परमेश्वरके वर्णनसे मनुष्यके ग्रहण
करने योग्य बोध ।
परमात्माके वर्णन।
मनुष्यके ग्रहण करने योग्य पोध ।
(शाम्ति मंत्र)
१ अदः पूर्णम् ।
१ मनुष्य पूर्ण पनने के लिए पुरु-
पार्थ करे। (इस जन्म में कुछ
(घह ब्रह्म पूर्ण है )
नहीं तो किसी एक अच्छी बातमें
पूर्णत्व संपादन करे।)
२ ओम् ।
२ आत्मसंरक्षण की शक्ति शरीर
(यह रक्षक है) में लाकर पीडा देने वाले प्राणि.
योसे पीडितोका संरक्षण करे।
(मंत्र०१)
३ इंशा इदं सर्व चास्य।
३ अपनी शक्तिपर स्वामित्व
(घर से यह सप घसने योग्य संपादन करके जगत् में व्यवहार
है। ईश्वर देश होकर सर्वत्र पसा करे । गुलाम वृत्तिमे रहते हुए
हुआ)
अपने दिवस म विताए ।
बांध। २९ दूर करे। (मंत्र०४) ४ अन्-एजत् । किसीसे डरकर उसके सामने (यह कांपता नहीं, यह चंचल कांप नहीं अर्थात् कभी किसीसे नहीं) न डरे, चंचलपना छोड दे। ५ एकम् । ५ जगत में अद्वितीय बने, (किसी (यह एक, अद्वितीय है 1) भी एक विद्यामे तो अवश्य अद्विः तीय बने।) ६ मनसः जवीयः। ६ अपना वेग बढावे, आलस्य (यह मनसे घेगवान है। ७ देवाः एनत् न आप्नुवन् ।। ७ अपनी साधनायें दूसरे सहसा (देव उसे प्राप्त नहीं कर सकते। समझलें ऐसी थोथी न करे। वह देवोके चलते हुप भी उनसे (अथवा स्वयं दूसरोंका संचा- अप्राप्य है) लक बने, पर उनसे स्वयं न घेरा जावे ऐसे सुरक्षित स्थान पर रहे।) ८ पूर्वम् । ८सयसे प्रथम स्वयं कार्य आरं- (यह सबसे प्रथम, पूर्वसे है) है ऐसा कहावे ।) |भ करे । (इस काममें यह प्रथम ९ ज्ञान प्राप्त करे और जनतामें (वह शानी अथवा स्फूर्ति देने स्फूर्ति बढाये। , ९ अर्पद चाला है) १० तिष्ठन् । (घह स्थिर है) १० अपना पाया मजबूत करे। अपने स्थानपर स्थिर रहे । (युद्धमें अपना स्थान न छोडे) 2
ईशोपनिषद् ।
अत्येति ।
११ तत् धावतः अन्यान् । ११ सव स्पर्धा करनेवाले पीछे
रह जायें और स्वयं उमसे आगे
(पह दौडनेवाले दूसरोके आगे निकल जाए ऐसी अपनी तैयारी
जाता है)
करे।
१२ तसिन मातरिश्वा अपः १२ अपने आप स्वयं कर्म करे
दधाति ।
और दूसरोंसे कर्म करावे।
(इसके आधारसे जीव कर्म
धारण करता है)
(मंत्र५)
१३ वत् एजति तत् नएजति।। १३ स्वयं अपने स्थान पर स्थिर
(यह दूसरोको चलाता है, पर
रहे और दूसरोको अपनी ओर
स्वयं हिलता नहीं)
आकर्षित करके उन्हें सन्को में
'प्रवृत्त कराये।
१४ तत् दूरे तत् उ अन्तिके। १४ दुर्जमोसे दूर रहे और सदा
(यह अशानी के लिए दूर तथा सज्जनों के पास रहे।
शानीफे लिए समीप है)
१५ तत् सर्वस अन्तः बाह्य-१५ अपनो अन्दरकी तथा पाहि-
रकी अवस्थाओका निरीक्षण
(पद सबके अन्दर और बाहर है) करे।
बोध। मंत्र १६ सर्वाणि भूतानि आत्मनि, १६ सयके सुखमें अपना सुख है आत्माच सर्व भूतेषु । ऐसा माने और अपनी शकिसे (सय भूत आत्मा और आत्मा सयको सुखी करना अपना कर्त- सय भूतोंमें है) व्य है ऐसा समझे (मंत्र) १७ आत्मा एव सर्वाणि १७ मैं सर्प जनता के लिए हूं ऐसा भूतानि । समझता हुआ व्यवहार करे। (आत्माही सर्वभूत है) (मंत्र८) १८ सः परि-अगात् । ११८ स्वयं अपने सय कार्यक्षेत्रों (वह सर्वत्र गया हुआ है) का निरीक्षण करे। १९ अकायं, अस्लाविरम् । (१९शरीरकी स्थूल शक्तिको च. (वह देह रहित, स्नायु रहित है) लानेवाली आत्मिक शक्ति बढाये । २० अत्रणम् । २० वण, घाव आदि न हो (वह प्रणरहित है) ऐसा आरोग्य प्राप्त करें। २१ शुद्धं, शुक्रम् । ३१ पवित्र और वीर्यवान् यो। (यह पवित्र और वीर्यवान है) 1971 ईशोपनिषद् । २२ अपापविद्धम् । २२ पापसे विद्ध मत हो।(पाप (वाह पापसे विद्ध हुआ हुआ मत कर) नहीं है) २३ कविः। २३ मनुष्य केवल स्थलदर्शी न (वह अतीन्द्रियार्थदशी है) होता हुआ सक्ष्मशरियोका भी ज्ञान प्राप्त करे। २४ मनीपी। २४ हमें मनका संयम करना (बह ममका स्वामी है, विचार चाहिए तथा विचार पूर्वक शील है) कर्तव्य करने चाहिए। २५ परिभूः। | २५ अपनेको शत्रुके आधीन न (वह सबसे श्रेष्ठ अथवा विज करते हुए, विजय प्राप्त जिससे धी) होसके ऐसी अपनी शक्ति पढानी चाहिए। २६ स्वयंभूः। २६ अपनी शक्तिसे रहे, परावल (वह अपनी शक्तिसे स्थित है) म्धी न बने । २७ याथातथ्यतः अर्थान् २७ कर्तव्य जैसे करने चाहिए। वैसे पिना भूल चूष के करता व्यदधात् । (करने योग्य कार्य यह करता रहे। रहता है) (मंत्र १६) २८ गरीय असमौका पाटन पोषण करना चाहिए । २८ पूषा । (यह पोपक है) बोध १०३ २९ एक ऋषिः। २९ विशेष शान संपादन करे । (वह पक, शानी है) ३० यमः। ३० हम अपनी शक्तिपर प्रभुत्व (वह नियामक है) प्राप्त कर, नियामक बनें। ३१ सूर्यः। ३१ दूसरोको प्रकाशका सन्मार्ग (वह प्रकाशक है) दिखा। ३२ प्राजापत्यः । ३२ आश्रितों का उत्तम रीतिसे (वह पालक शकिसे युक्त है) पालन करे। ३३ कल्याणतम रूपम् । ३३ नित्य प्रसन्न चित्तसे व्यवहार (उसका रूप अत्यंत कल्याणमय करे है) (मंत्र १८) ३४ सुपथा राये नय(ति)। ३४ स्वतः उत्तम मार्गसे ऐश्वर्य (घह उत्तम मार्गसे ऐश्वर्य के प्राप्त करे और दूसरोंको उत्तम पास ले जाता है) मार्गसे उन्नतिको पहुंचाए । ३५ विश्वानि वयुनानि विद्वान। ३५ सय कर्तव्याकर्तव्य कर्मीका (वह सर्व कर्म जानता है) योग्य ज्ञान प्राप्त करे। ३६ जुहुराणं एनः युध्यते । ।३६ कुटिलता और पापसे (स. (वह दुटिलता और पापसे त्यका पक्ष लेते हुए) युद्ध करके उनका पराभव करे। युद्ध करता है) ईशोपनिषद्। सूचना यहां पर जो ईशोपनिषद् के मंत्रोंसे लेने लायक भोध दिया गया है, वह उस सूचक मंत्रसे उतनाही मिलता है ऐसा किसीकोमी यहां समझना नहीं चाहिए। मंत्रका अर्थ मनमें समझकर उसका थोडा थोडा मनन करनेसे परमेश्वरके गुणोका ज्ञान धीरे धीरे स्वयं होने लगेगा। परमेभ्यर इस विश्वव्यापकसंसारमै जैसे प्रच. ण्ड कार्य अतुल स्व शक्तिसे कर रहा है पैसे थोडेसे कर्म हमें, मारे छोटेसे क्षेत्रमें करते दुप अपने पिता समान बनने का प्रयत्न करना चाहिए। येही कर्म मनुष्यको जन्मसे मृत्युपर्यन्त करने हैं और इसी फर्म मार्गसे अपनी उन्नति साधनी है। परमेश्वरके गुणोंका शांत चि. तसे जितना अधिक मनन होगा, उतना अधिक स्वकर्तव्यों का स्फुरण साधकको होगा; और रस मार्गसे जाते जाते साधकका स्वभावभी वैसा बन जाएगा। और ज्यों ही साधकका स्वभाव पैसा पनगया अर्थात् वह स्वाभाविकतया अकृत्रिमतासे पैसे कर्म करने लग गया कि यह साम्यके समीप समीप पहुंचने लगा ऐसा मानने कोई दोष नहीं है। परमेश्वर के नाम तराते हैं यह कैसे, यह इस विवेचनसे समझा जा सकता है। वेदमंत्रोंमें ईश वर्णनका यह ऐसा उपयोग साधकके लिए है। इस प्रकार घेदमंत्रोका अर्थ ज्ञान पूर्वक विचार करके पोध माप्त करनेसे 'वेदका एकाध सूक्त अथवा एक मंत्र या आधामंत्र किंवा परमेभ्यरका एक नामदी मन- प्यको परम उत्कर्षके लिए पर्याप्त है, ऐसा जो समझा जाता है। यह कितना यथार्थ है, यह पाठको ध्यान में आएगा। अब हम ईशोपनिषद् का थोडीसी मिन्न रीतिले मनन करते हैं.
उन्नतिका मार्ग। ईशोपनिषदमें वर्णित मनुष्यकी उन्नतिका मार्ग। (१) मनुष्यका साध्य । - मनुष्यका साध्य 'तीन शांति' स्थापना करना और उन तीन शान्तियोंका अनुभव लेना है। (१) वैयक्तिक शान्ति-शरीर, इन्द्रियां, मन, बुद्धि और आत्मामें किसीभी प्रकारकी अशान्ति न रहे और यहां पूर्ण शान्ति स्थिर रहे, उसेही "आध्यात्मिक शांति" कहते हैं । योगादि साधन इसी अनुभवके लिपही हैं । (२)सामा. जिक शान्ति-समाजमें विभिन्न मनोवृत्तिवाले लोगों में शान्ति स्थोपनी, यह दूसरा साध्य मनुष्यको साधना होता है। सर्व प्राणि योंके विषय में प्रेम और दया भावको तथा विचार और आचारको घढानेसेभी यह शान्ति स्थापित हो सकती है। इसेही आधिभौति- क शान्ति कहते हैं । (३) जागतिक शांति-सब चलाचल जगत्में शान्ति और समताका स्थापन फरना यह अन्तिम साध्य है। इसे 'आधिदैविक शान्ति ' कहते हैं। प्रत्येक मनुष्यको ये विविध साध्य साधने हैं। इन कर्तव्योंका स्मरण प्रत्येकको कराने के लिए "शान्तिः शान्तिः शान्तिः" इस प्रकार तीनयार उच्चारण किया जाता है। (देखो शान्ति मंत्र) (२) साधन । उपरोक्त तीन लायोको साधने के लिए. 'ज्ञान और कर्म ये दो साधन हैं । इन साधनोंको प्रयोगमें लाने के लिए प्रत्येक मनुष्य के शरीरमै ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को स्थापित किया गया है। शानेन्द्रियोंसे शान प्राप्त किया जाता है और कर्मेन्द्रियोंसे कम किए जाने हैं।
दंगोपनिषद्। , A - . । शानेन्द्रियों के लिए 'ज्ञान क्षेत्र और कौन्द्रियों के लिए 'कर्म- क्षेत्र है। जगत् में जानने योग्य वस्तुका यथार्य ज्ञान प्राप्त करना। शानक्षेत्रको व्याप्तिके अन्तर्गत है । पुरुप और प्रकृति, ईश्वर और सृधि, आत्मा और अनामा, ये दोही प्रकारफे पदार्य संसारमें हैं। अतः इन दोनौका यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेना यह ज्ञान क्षेत्रका सा. ध्य है । पञ्च ज्ञानेन्द्रियोंसे तथा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार इस अन्तःकरण चतुष्टयसे यह शान प्राप्त करना है। ईशावास्यं इदं' (०१)श प्यास करता है इस सृष्टिको ' ऐसा जो प्रथम मंत्र में कहा है, उससे हमारा शान क्षेत्र व्यक्त हो रहा है। 'ईश'श. ग्दसे 'आत्मा या परमात्मा ' और 'इदं ' शन्दसे 'सटि, जगत्- अधया संसार' इनका बोध होता है। मनुष्यको जो शान प्राप्त करना है यह इसी सम्बन्धमें है । अभ्युदय और नियत प्राप्त करनेको इच्छा हो तो इन दोनों प्रकार के शानोको प्राप्त करले ना जरूरी है। सृष्टि विज्ञानसे 'अभ्युदय ' और आत्मज्ञानले 'निः पस'माप्त हो सकता है। और इन दोनोंको साध लिया कि मनुष्य कृतार्थ हुआ ऐसा मामनेमें किसीभी प्रकार की आपत्ति नहीं दीख- ती। मनुष्य इनमे से कोईसा पफ सुगमतासे साध सकता है। दि. शेषतपेदिक उन्नति प्रत्यक्ष होनेसे उसे प्रत्येक प्राप्त करनेकी की. शिश करता है। ईशोपनिषद्म 'क्षारक्षेत्र' सबन्धी तीन (९-११) मंत्रोंने दोनों विद्यार्य प्राप्त करके ऐहिक और पारमार्थिक उन्नति विना विरोध किस प्रकार साधनी चाहिए, यह उत्तमतया दिखाया है। (३) कर्म-मार्ग। शान प्राप्त कर लेनेके पाद यह शान फर्म द्वारा प्रकट होनाचा. हिए । इसके बिना मानका उचित उपयोग होना संभव नहीं।
आध्यात्मिक कार्यक्षेत्र। 4 . खाना अर्थात् पेट भरना, 'ऐसा ज्ञान होनेपर खाने के कर्म करने ही पड़ते हैं। ठीक ऐसा यहां परमी समझना चाहिए। परमेश्वर पूर्ण और सर्वश होने से इस जगत्में उसके श्रेष्ठ कर्म सर्वत्र जारी है। उसी प्रकार मनुष्यको जितना जितना ज्ञान प्राप्त होता जाएगा, उतना उतना उसका कर्मक्षेत्र बढता जाएगा, यह सुस्पष्ट ही है। दोनोंके सम्बन्धसे फर्म उत्पन्न होते हैं। इस जगत् में 'जगत्यां ज- गन् । (०१) जगतीके आधारसे जगत् है, अर्थात् संघ आ. धारसे व्यक्ति है, अथवा समटिके आधारसे व्यष्टि है। अतः इस सम्बन्धके होनेके कारण व्यक्तिको समाजके लिए कर्म करनेही चाहिए। इसके सिवाय गत्यन्तर नहीं । व्यक्ति भी आत्मा और शरीरका सम्बन्ध होनेसे शरीरको आरमाके लिए और आत्माको शरीर के लिए कुछ एक कर्म करने आवश्यक हैं। परमात्मा सर्व जगत्म होनेसे यह सर्व जगतको यथायोग्य गति देनेके पवित्र कर्म सर्वदा कर रहा है ही। अतः मनुष्यकोभी उसके लिए अपने फ- तव्य कर्म करने अत्यावश्यक है। इस प्रकार दोनोंका जहां संबन्ध पड़ता है वहां एकका दूसरेसे जो सम्बन्ध बनता है, उस संबन्धसे परस्परके कुछ विशेष कर्तव्य उत्पन्न होते हैं। इन्हें करनेपर उन्नति और न करनेपर अवनति होती है । सारांश रूपसे मनुष्य के कर्म- क्षेत्रका यह स्वरूप है। (४) आध्यात्मिक कार्यक्षेत्र । मनुष्यका प्रथम कर्तव्य अपने शरीर में सम विकास करना है। शरीरमें स्थूल और सूक्ष्म, इस प्रकारकी अनेक शक्तियां हैं । स्थूल शक्ति अधिक बढानेले सूक्ष्म शक्तियों की प्रगति रुक जाती है और सूक्ष्म शक्तियों के बढानेका प्रयत्न किया तो स्थूल शक्तियां क्षीण होती है। इसलिए इन दोनों शक्तियोंका समविकास करना मनुः 104 ईशोपनिषद् । ज्यका प्रथम कर्तव्य है । मनुष्यके अंदरकी स्थूल और सूक्ष्म श. कियोका नामही "अध्यात्म शक्ति"है ऐसा कहते हैं और इन शक्तियोंका विकास करनाही आध्यात्मिक शकि-विकास' ऐसा कहा जाता है। 'वा'प्राण'चक्षुः धो" इत्ययात्मम् । (छां० उ० ३।१८०२) वाणी, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, इत्यादि शक्तियां आध्यात्मिक शक्तियां हैं। इनका विकास आध्यात्मिक शक्तिका विकास है। स्थल शक्तियां बढकर सूक्ष्म शक्तियोंकी सहायक पर्ने और सूक्ष्म शकियां पढकर स्थूल शक्तियोंकी योग्य मददगार पर्ने, इसका नाम है समविकास । 'आग्यात्मिक कार्यक्षेत्रका मतलय वैयक्तिक शक्तियों के पढानेका कार्यक्षेत्र है। (५) आधिभौतिक कार्यक्षेत्र । व्यक्तिकी यह शक्ति जैसे जैसे पढ़ती जाएगी, रयो त्यो उसके पाह्य कार्यक्षेत्र विस्तृत होते जाएंगे। उसके क्रमशः कुटुम्ब, परिवार, संथा जाति, राष्ट्र . मानवजनता, प्राणी समष्टि इत्यादि कार्यक्षेत्र एकसे एक इसको अन्तःशक्तिके विकासानुसार विस्तृित होते जा. पंगे। मनुष्य व्यक्ति यदि सम्पूर्ण लमटिके आधारसे स्थित है तो व्यक्तिकी शक्तिका उतना पूर्ण विकास होनेसे पूर्व यह समरिक कार्यके लिए योग्य नहीं हो सकती। अतःजितनी शक्ति बढाई जाए- गी और तदनुसार कार्यक्षेत्रकी मर्यादामें अपने कर्तव्यका भाग मनः ज्यमे किया कि उसके कर्तव्य कर्म उसकी उन्नतिमें सहायक होते हैं। यह मनुष्यका "आधिभौतिक कर्तव्य क्षेत्र भूत अर्थात् प्राणी। इन प्राणियोंके संबन्ध जो कर्वस्य है आधिभौतिक क. संध्य हैं। अपने आयात्मिक कर्तव्य करते हुए अपनी पैयक्तिक उन्नति जिस प्रकार मनुष्य कर सकता है, उसी प्रकार उससे जनताके अर्थात् संघके हित साधने के पवित्र कार्य योग्य रीतिसे होने संभव है, यह इससे विशद होता है, इस ओर पाठक उचित ध्यान दें। 7 यज्ञ और अयज्ञ । (६) आधिदैविक कार्यक्षेत्र । इससे अगला कार्य विश्वके सम्बन्ध जो कुछ मनुष्यके करने लायक है वह है। इस जगत में जो फोई विश्वशक्ति है, उस शकिसे यति और संघकी सहायता करवालेगा, अग्नि, जल, वायु, वि. धुत् इत्यादि सर्व दैवी प्रचण्ड शक्तियां हैं उन्हें अनुकूल करके उनसे जनता और व्यकिके हितके कार्य करालेना, इसे 'आधिदैवि. क कार्यक्षेत्र' कहते हैं। (७) यज्ञ और अयज्ञ। मनुष्यको इन त्रिविध कार्यक्षेत्रोंमें अनेक कर्तव्य करने हैं। और सनद्वारा वैयक्तिक तथा सामुदायिक सुख और शान्ति प्राप्त करने है। यह मनुष्य के कार्यक्षेत्रकी व्याप्ति है । वैयक्तिक और सामुदायिक कर्तव्य करते हुए व्यक्ति के हित के लिए समाजके हितका अर्थात् व्यष्टिके हित के लिए समरिक हितकानाश होना नहीं चाहिए। इस ओर विशेष लक्ष्य देना चाहिए । व्यकिको समष्टिके लिए मात्मा समर्पण करना यह 'यज्ञ' और व्यक्तिका स्वतःके लिए समष्टिक हितका नाश करना यह 'अयश ' है। यज्ञसे मनुष्यकी उन्नति और अयक्षसे अवनति होती है। अपर जो 'जगत्यां जगत् ' (म०१) समष्टिके आधारसे व्यक्ति है, पेसा कहा है उसका उद्देश यही है। जिस आधारसे व्यक्ति स्थित है,उस आधारको अपने सुखके लिए उसी व्यक्तिको सर्वदाफे लिए नष्ट नहीं कर देना चाहिए, क्यों कि उस आधारका नाश हुआ तो फिर वह व्यक्ति कहां रहेगी? अतः अपने आधारको अपने आप नष्ट करनेका मतलब अपने आप अपना नाश करना है। अयशसे जो नाश होता है वह इस प्रकार है। ।
ईशोपनिषद् । - , (८) कर्म, अकर्म और विकर्म । व्यति और संघफे कर्तव्योंका कार्यक्रम परस्पर विरोध होते हुए किस प्रकार होना चाहिए, इसका स्पष्टीकरण 'कर्मक्षेत्र के तीन मंत्रोमें किया है। उसके अनुसार प्रत्येकको अपने कर्तव्य करने चाहिए । केपल अस्तित्व के लिए ही जी कर्तव्य करने है उनका नाम 'अकर्म' है। क्यों कि उनका परिणाम व्यक्ति तक सीमित है। अकर्म' शब्दका निष्काम कर्मऐसा दूसरा अर्थ भी है।] जो कर्तव्य व्यक्ति और समाज के हित करने वाले है और जो परो. पकार युद्धिसे किए हुए हैं, उनका नाम 'कर्म' है। इसेही 'यक्ष कहते हैं । यह पाचक सप शब्द इसी फर्मक पर्याय शब्द है और व्यक्ति तथा समाजका घात करने वाले सो फर्म है, उन्हें विफर्म' अर्थात विरुद्ध फर्म या जो नहीं करने चाहिए ऐसे कर्म, कहते हैं। अकर्म तथा कर्म ये दोनों अविरोध पूर्वक करनेहीचाहिए। केवल विकर्म न करने चाहिए। कर्म क्षेत्रोंमें यह कर्मको व्याति इतनी ध्यापक है, और अकर्म कर्म-विकर्म किसीको भी समझना इत. ना कठिन है कि कभी कभी विद्वान् लोक भी चक्कर खा जाते हैं, अत' 'कर्मकी गति गहन है ' (भ. गी० ४।१७) ऐसा कहा गया है। तथापि ज्ञान द्वारा अपने कर्तव्य कर्म पहिचान कर उन्हे योग्य रीतिसे करना यह मनुष्य की उन्नति के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इसी लिए 'कुर्वनेवेह कर्माणि ' (मं०२) 'कर्म करने चाहिए,' ऐसा उपदेश किया गया है । इस मंत्र कर्म करने चाहिए ऐसा जो कदा है, ये कर्म कौनसे यह ऊपर दिखाया गया है। व्यक्ति और संघकी उन्नति करने वाले जो यारूप कर्म है, घेदी करने चाहिए और इन फर्मों को करते हुए 'जिजीविच्छतं समा." (मं०२)= सौ वर्ष जोप'। यह उपदेश मनन करने लायक है।
अमरत्व प्राप्तिका मार्ग। . . मकर्म लिप्यते नरे।(म०२) = फर्मोंका लेप मनुष्यको नहीं लगता' ऐसा जो कहा है, वे ये ही यशरूप कर्म हैं। ये मनुः पएको पवित्र करते हैं, उच्च पदको प्राप्त कराते हैं और पूज्य बनाते हैं। इस प्रकार 'शान और कर्म 'इन दो साधनोंका साधकको कैसे उपदेश करना चाहिए और उन द्वारा आत्मोद्धार कैसे कर लेना चाहिए यह यहां दिखाया गया है। ये दो, एकहीकी दाई और पाई पाजू हैं, अथवा एकही उन्नतिके रथके ये दोनों पहिये हैं। इनके द्वा. रा उन्नतिक मार्गपर समीपतया आक्रमण होता गया कि मनुष्यका विकास होकर, उसे अंतमें जो पद प्राप्त करना है वहां यह पहुंच जाता है। (९) अमरत्व प्राप्तिका मार्ग। कर्मक्षेत्र ' का वर्णन करने वाले जो (१२-१४) मंत्र हैं उनमें 'वैयक्तिक कर्मों द्वारा अपना विनाश दूर करके, संघनिष्ठा द्वारा समुदाय के लिए कर्म करते हुए अमृतत्वको प्राप्त करे" (मं०१४) ऐसा कहा हुआ है । इसका थोडासा यहां मनन करना चाहिए । संघनिष्ठाका क्या अर्थ है और उससे अमरत्व कैसे प्राप्त होता है। यह यहां विचार करने योग्य प्रश्न है। संघनिष्ठ पुरुप यदि वास्तव में अमर होता है तो क्या चोर डाकु कहीं किसीसे कम संघनिष्ठ नहीं है? ऐसो अवस्थामें यहां संघनिष्टा' शन्दसे क्या दिखाया गया है इसका विशेष विचार करना चाहिए । इन (१२-१४) मंत्रों के अर्थमें "संघभाव और असंघभाष" ऐसा शब्द प्रयोग किया गया है। यहां भाष' शब्दका अभिप्राय भक्ति ऐसा समझना चाहिए। - +- १२ इंशोपनिषद्। । भाव अथवा भकि केवल ईश्वर परही रखनी चाहिए। ईश्वर हमारा पूज्य पिता है और उसके हम अमृत पुत्र' है । अथर्य घे. दमे “अनुमतः पितुः पुषः" (अथर्व०३६३०२) पिताके कार्य आगे चलाने वाला पुन होवे' ऐसा कहा है। इस नियमानुसार इम सय यदि परमेश्वरके पुत्र हैं, तो उसके चलाय. हुए कार्योको आगे चलाना या उसके कार्योका माग हमें अपने ऊपर लेकर उसे योग्य रीतिसे पूर्ण करना यह हमारा कर्तव्य ठहरता है। ईश्वरके कौनसे कार्य जगत में चले हुए है? ईश्वरके तीन प्रकार के कार्य यहां प्रचलित हैं। 'सज्जनोका संरक्षण, दुशका दमन और धर्मका संस्थापन।' (भ० गी०४८) ये तीन प्रकारके कार्य परमेश्वर कर रहा है ऐसा सय आर्यशास्त्र कह रहे हैं। येही कार्य हमने किए, या इन कार्यों में भाग लिया तो हम परमेश्वरक कार्य आगे चला रहे हैं ऐसा होगा। यही उसकी भक्ति या सेवा है। परमेश्यकी भक्ति अथवा सेवा करनी चाहिए ऐसा जो माना जाता है, वह सेवा यही है । भक्ति, भजन, 'इन शब्दोंका अर्थ 'सेवा और सेवन ' यही है। (भज-सेवाया। भज् धातुका अर्थ सेवा फरना है) पिताको सेवा पुत्रको करनी चाहिए का अर्थदी यह है कि पिताद्वारा चलाए गए कार्यों में अपना माग पटाना चाहिए। सेवक यही कार्य मालिकके लिए करता है । ईश्वर सेवकको भी यही कर्य परमेश्वरार्पण बुद्धिसे नित्य करने चाहिए। 'सज्जनोका परिपालन, दुर्जनोंका शासन और मानवधर्मको स्थापना' ये ईश्वरके कार्य हमें करने चाहिए, यही मति है। और इन कामोंका फरना यह सच्चा 'मक्ति मार्ग' है। अपनी शक्तिक जोरपर अनेक प्रकारके दुख दुर्जन अशकोंको देते हैं। उन दुखों से अशकोंका संरक्षण करके उन्हें सुखी करना यह 'जनताम जनार्दनकी उपासना करना है। विद्यासे, शक्तिसे, अधिकार अमरत्व प्राप्ति मार्ग। सेवा धनस सम्पनोंकी सेवा करने की जरूरत नहीं है, क्यो कि उनके गुणोंसे उनकी सेवा करने वाले उन्हें चाहिए इतने मिल सकते हैं। परन्तु जो विधान नहीं है, बलाढय नहीं है, अधिकारी नहीं है, या धनवान नहीं है, उसे कोई सहायक नहीं मिलता। अतः ऐसे दीन जनकी सेवा करना, उसकी स्थिति सुधारना, उसकी उ. प्रतिके लिए अपने आपको समर्पित कर देना, यह 'ईश्यरफी सेवा है। दोनोंकी दया यह संतोंका मूल धन है, (तुकाराम)। इसी मू- ल धनसे यह भक्तिका व्यापार करना है। जोसंघभावना, संघनिष्ठा या संघोपासना अथवा संभूतिकी उपासना इस ईशोपनिषद कही है वह यही है। ईश्वर 'दीनोद्धारक' है। इसी दीन जनोद्धार णके कार्यका करना जन संघकी उपासना है। 'गुरुकी सेवा करनी चाहिए ' अर्थात गुरुको किसीभी यातकी कमी पडने नहीं देनी चाहिए । इसी प्रकार दीनोंकी सेवा करनी चाहिए अर्थात् उनका दीनपना हटाकर, उन्हें अदीन बनाकर उनके उद्धारार्थ जो कुछ करना आवश्यक हो वह करना चाहिए । यही दोनोद्धारका काम परमेश्वरकी भक्ति है । दुःखितोके दुःख देखकर अन्तःकरण खिन्न होना चाहिए यह इसीलिए ही है। इस विषयमें अथर्व वेदका मंत्र देखिए- 'ये वध्यमानमनु दीभ्याना अन्वक्षन्त मनसा चक्षपा च । अग्निष्टानने प्रमुमोक्तु देवो विश्वकर्मा प्रजया संरराणः ॥ अथर्व०२॥३४॥३॥ "जो तेजस्वी लोक बद्ध मनुष्यको अपने मन और चक्षुसे अ. नुकम्पापूर्ण दृष्टि से देखते हैं, उन्हेही मजाजनके साथ रमण करने बाला विश्वकर्ता तेजस्वी देव प्रथमतः विशेषरीतिसे मुक्त करता है। इस मंत्रमभी यही कहा है कि दीन, दुःखी, घद्ध और परतंत्र लोकोपर जो लोफ दया करते हैं, उनकी दीनता दूर करने के लिए ८ ईशोपनिषद् । काध अविधात परिश्रम करते हैं, उन्हें ही सबसे प्रथम (प्रमुमोर ) यह मुक्त करता है, क्योंकि विश्य निर्माता देय (प्रजया सरराण.) जनतामें रहता हुआ उसरे आनन्दसे आनन्दित होनेवाला है। इसीलिए वह जनताको दुष्टोसे दुखी देखकर खिा होता है और उन दुष्टों दल्नके लिए प्रेरणा करता है। 'संघमति ' क्या है. कैसे करनी चाहिए, और उसे करनेसे (अमृतत्वं ) अमरपना कैसे प्राप्त होता है. यह इस विवेचनसे ध्यान में आया होगा। वद प्रतिपादित 'भक्तिमार्ग' यह है । जिस मनुष्यकी जितनी योग्यता होगी, उतने अधिकारक्षेत्रमें वह कार्य कर सकेगा। ५. वैद्य निर्धन रोगीका योग्य औषधोपचार परफे अच्छा करके मेने ईश्वर सेवा की पेसा एमझ सकता है। दूसरा कोई तृपितको थोड़ा जल देकर वेसोहीश्वर सेवा कर सकता है। कोई चीर परतंत्र देशको पीडित करने वाले शको दूर करके जनताको स्वतत्र करफ परमेश्वरकी सेवा को ऐसा समझ सकता है। 'स्वकर्मपा तमभ्यर्य सिद्धि विन्दति मानव ' (म०पी०१८४६) स्वकास ईश्वरकी उपासना करके सिद्धि प्राप्त करने का यह मार्ग है। ये कर्तव्य क्षेत्र विविध हैं और कर्ताकी पुरुषार्थ शक्तिके अनुसार उसके कर्तव्य भी अनेक हैं, परन्तु उन सबका तत्व 'जनता जनार्दनकी सेवा' यही एक है। यही 'भक्तिमार्ग' है और पूर्वोक्त 'भानमार्ग और कर्ममार्ग' ये दोनों मार्ग इसके अन्तर्हित होते हैं। इस मार्गसे जानेयाला माही सरल और जल्दी मुक्त होता है, यह उपरोक्त अथर्व पचनसे स्पष्ट प्रतिपादित है। आजक्ल प्रचलित भक्तिमार्गमे इस समसंघोपासनासे ईश्वर भक्ति होती है. ऐसा कोईमी नहीं मानता, और यल “नाम-स्म रण" ही तारक है ऐसा माना जाता है । यह यद्यपि अन्त शुद्धि मानके लिए टोय हो। तथापि ईश्वरकी पहिरग उपासना वे नहीं - अमरत्व प्रालिका सार्ग। फरते अतः उनके कार्य आधे होते हैं । (तत् उ अन्तः वाह्यतः च। मं०५) ईश्वर अन्दर है और वाहिरभी है, नाम स्मरणसे यदि उसको अन्तःकरणमें पूजा हुई तो उस 'नाम' से दिखाए गए क. तव्य बहिस्थ जनता जनार्दन के लिए उसे करनेही चाहिए । और तभी कर्तव्योंकी आन्तरिक और थाहा पूर्णता होनी संभव है। एक अन्तर्यामीक कर्तव्य किए तो साप्रा कार्य हुआ। दूसरे बहिस्थफे फर्तव्य होनेतक कार्य पूर्णही न होनेसे चाहे कुछभी हो, उन बाह्य कर्तव्यों के न कर लेनेतक यह मनुष्य मुक्त होनेवाला नहीं। अब यहां एकही प्रश्नका विचार करना है और वह यह कि जन संघ भक्ति ' अथवा संभूतिकी भक्ति या पृथिवीपर संपूर्ण जनताको सेवा एक मनुष्यसे फैसे हो सकती है? वस्तुतः संभूति में सर्व प्राणियोंकी समष्टिकी कल्पना है। किसीभी एक मनुष्य के लिए सब मनुप्योतक अपनी सेवा पहुंचाना संभव नहीं। इस लिए अप. ना दया भाव और प्रेमभाव जितना संभव हो, उतना विस्तृत कर. नेसे, उससे जितनी जन संघ सेवा होगी, उतनी यह जनार्दनके अर्पण होगी और उतनी उसकी उन्नतिम सहायक होगी। यच्च यावत् प्राणियों तक उसकी सेवा पहुंचनी कोई जरूरी नहीं है। . केवल उसकी संघ भक्तिसे अधर्म बढना नहीं चाहिए। इतनी सावधानी उसे रखनी चाहिए । इतना करनेपर सघ सिद्धी है। राक्षसभी संघोपासफ थे, परन्तु वे अपने संघवलसे दूसरोंका नाश करके अपने भोगको बढाने का प्रयत्न करने के कारण उनके प्रयत्न जनताके दुःख बढाने के कारणीभूत होते थे। इसलिए ऐसे प्रयत्नोंसे अधोगति होती है। 'दुष्ट सय दूर हो, अथवा दृष्टोकी वृत्ति यदल जाए, सज्जनोंका संरक्षण हो और धर्मका उत्कर्ष हो। इस दिशामें जो संघकी भक्ति होती है वही उद्धारक है। इसमें दूस. रोके रक्तसे सने हुप भोग हमें मिले ऐसा उद्देश नहीं है, अपितु ।
ईशोपनिषद्। सर्वत्र शांति प्रसरे,मानव धर्मका उत्कर्ष हो और सप लोकसुखी हो, इस दृष्टि से प्रयत्न करना है। इसी कर्तव्यको दिशा इस उपनिषद्ने संभति प्रकरणद्वारा दर्शायी है। अंहिसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मच. र्य, अपरिग्रह, शुद्धता, संतोय, तप, स्वाध्याय, और ईश्वरमति, यह जो शुद्ध सनातन धर्म है, उसका प्रारंभ अहिंसासे अर्थात् भूत- दयासे होकर अंत 'सर्वस्व समर्पण' में होता है। इससे राक्षसी स्वार्थको इस धर्ममें जराभी स्थान नहीं है यह जरा समझने ला. यक थात है। सत्यनिष्ठा । जगत्में शान्तिकी स्थापना करना यह मनुष्यकासाध्य है। और इस साध्यको साधने के लिए शान, कर्म और भक्ति ये तीन साध- न है । इन तीनों साधनोंका दुरुपयोग न हो इसलिए 'सत्य' की कसौटी मनुष्यको सदा अपने पास रखनी चाहिए ऐसा पंद्र मंधने सूचित किया है। 'सुवर्णका मोह छोड, एकदम सत्य दि- संगा'१और सत्य पकडतेही तेरा पोषण होगा इत्यादि मायार्थ इस मंत्र हैं। 'लोम छोडना चाहिए येसा कहने के कारण संघ- भक्तिमसे सप राक्षसी स्वार्थसे उत्पन्न होनेवाले अनर्थ दोगए है, ऐसा समझने में कोई रुकायर प्रतीत नहीं होती। ऐसी इस निर्लोम सत्यनिष्ठासे पवित्र हुए हुए शान, कर्म और भकिसे सर्वत्र शांति स्थापित करना मनुष्यका परम कर्तव्य है। सिंहावलोकन । 'हमने जो कुछ किया उसका क्या परिणाम दुआ.वह हमारे उद्धारफे लिए सहायक हुआ है या नहीं, कौनस प्रतियन्ध आप है, सकासिंहावलोकन करते हुए उपरोक मार्गका अनुसरण करना चाहिए 'पेसा पुनः १७ वे मंत्रमें बताया है। हतं स्मर'= सिहावलोकन । ११७ 'हमने पया किया है वह देखो और फिर आगे जो कुछ करना है यह करो'। यह उपदेश सयकोही सदा कर्तव्य करते हुए ध्यान. में रखनेसे लाभदायक है। इस प्रकार ईशोपनिषद के मुख्य उपदेशोंका मनन पूरा हुआ। इसका इस रीतिसे अधिक विचार करके साधक अपनी उन्नति करते रहे। शेष उपदेश यद्यपि विशेष योधप्रद हैं पर यह संगम. ताले समझने योग्य होने से उसका यहां अधिक स्पष्टीकरण नहीं किया है। वेदका आदेश। कितने लोक ऐसा समझते हैं कि वेदके मंत्रमागोंमें 'आशा' (विधि) नहीं है । ' मनुष्य! त् अमूक कर और अमूक मत कर' ऐसी स्पष्ट माशा नहीं है, ऐसा जो समझते हैं, उसका अर्थ इतना ही है कि सब संहिताओं में सभी आझार्थक वायय नहीं हैं। परन्तु बेदोंमें पुष्कल आशायें हैं- (१)मा गधा - लोभ मत कर । (२) त्यक्तेन भुञ्जीथाः = दानसे भोग कर। (३) कृतं स्मर = किए हुए कृत्योंका स्मरण कर। इत्यादि आशा इस ईशोपनिषदमें (अर्थात यजुः अ० ४०मही) हैं। उन्हें देखने पर बेदमें आशायें नहीं है पेसा फिसीकोभी सम. झना नहीं चाहिए। परन्तु जो लोक, आशार्य नहीं हैं ऐसा मानते है, उसका अर्थ यह है कि उन्हें चाहिए उतनी आशायें वेदमें नहीं हैं। आमा होने पर ही काम करना नहीं तो नहीं' यह वृत्ति गुलाम (दास) मनुष्यों की है। स्वतंत्र मनुष्य आन्तरिक स्फूर्तिसे काम करता है। लोकोंको गुलाम बनाने की चेदकी इच्छा नहीं है, अतः वह किसीको यष्टुतसी आशा नहीं करता, परन्तु वह ऐसी शब्द योजना करके वर्णन .
१८ ईशोपनिषद । करता है कि उससे मनुष्यके अन्तःकरण में स्वयं स्कूति होवे और यह अपनी अन्तःस्फूर्तिले स्वतंत्रतासे अपने फतव्य करे तथा अपनी उन्नति करले। इससे पाठकों को पता चलेगा कि घेदमंत्रमें आसार्थक प्रयोग बहुतसे नहों हैं, यह उलटो वैदिक धर्मके महत्व को बढानेवाली घात है । इन्द्र अपने बलसे शत्रुका नाश करता है ' ऐसा कहते ही, 'हमें अपना पल बढाकर शनुका नाश करना चाहिए' ऐसी स्फूर्ति मनमे उत्पन्न होती है । इसी प्रकार वेदों में जिस देवताकी स्तुति है वह उपासकके अन्त करणमें वैसी स्फूर्ति उत्पन्न करने के लिए ही है। अत यह आज्ञा नभी हुई तोभी आशाकाही काम करती है। इतनाही नहीं बल्कि उसका परिणाम उससे भी अधिक यडा होता है, यह विचारनेस स्पष्ट प्रतीत होगा। इस रिसे वेद- के प्रशंसापरक मंत्र अत्यन्त महत्व हैं। इस हमारी ईशोपनिष- में बहुत से मंन 'आत्मा' देवताकी प्रशंसा परक है। फेयल तु तीय मत्र 'आत्मघातक' लोकोको निन्दा परक है। इस प्रकारसे निन्दा फरजेवाले जो मंत्र है, वे अपनतिकारक कर्म न करने का उपदेश करते हैं। अमुक मत करो' ऐसी निषेधक आशान कर ते हुए ऐसे आत्मघातक फर्म करने से ऐसी अधोगति होती है। ऐसा घेदमंत्रों में कहा हुआ है। यह निन्दा सुनकर ऐसे अधोगति कारक कर्म न करने चाहिए ऐसी स्वाभाविक इच्छा मनमें उत्पन्न होती है। स्तुति के मंत्रोंसे मनुष्योकी सत्कौकी ओर प्रेरणा तथा निन्दाके मंत्रोंसे होन कोको ओरसे निवृत्ति होती है। मनुष्यको दुरकोसे निवृत्त करते हुए सस्को में प्रवत्त कराना यह धर्मका उद्देश इस प्रकारसे वैदिक धर्मने साधा है। आग करके मनुष्यों में गुलामीका भाव डालनेकी अपेक्षा इस प्रकारसे मनुष्यको अन्त:- प्रवृतिको ही पदलना यह सर्वथा श्रेयस्करही है, ऐसा सुगमतया ।
वेदका आदेश। ११२ - समझा जा सकता है। अब बंदके सम्बन्धमें दूसरी एक बात यहां ध्यान रखने जैसी है। और वह यह कि वेदमें 'प्रशंसा' रूप मंत्रों की संरया बहुत अधिक होती हुई 'निन्दा' रूप मंत्रोंको संरया बहुत थोडी है । हमारी इस छोटीसी उपनिषद्म अठारद मंत्री से केवल एकही मंत्र निन्दापरक है, शेष सब मंत्र प्रशंसात्मक है। इसका कारण यह है कि मनुष्यका मन जिस वातका अधिक मनन करता है तदनुसार यह बनता है।' मनका यह धर्म है। इसलिए मनके सामने कौनसी यात लानी चाहिए और कौनसी नहीं, इस विषय में अत्यधिक विचार करना चाहिए । निषेध रूपमें भी यदि बुरी कल्पना मनके सामने आवे तो भी उनका बुरा परिणाम मनपर होता है। बुरी बुरी कल्पनायें निषेधरूपमें चार बार मनके सामने आनेसे उनका प्रभाव धीरे धीरे मनपर पडताजाता है और अन्त में यह स्थिर रूपसे मनपर जम जाता है। इसवास्ते निषेधकी आशायेंभी यहुत थोडी होनी चाहिए और वे ऐसी भाषामें होनी चाहिए कि उनका यथा संभव कम प्रभाव पड़े। 'चुरी बात मत करो' ऐसा कहने में प्रथम बुरी यातकी कल्पना मनुष्यको दीगई और फिर उसका निषेध किया गया। इसलिए ऐसे ऐसे निषेध वारंवार मनके सामने आने लगे कि उनका अच्छा परिणाम होने के बदले अनिष्ट परिणाम आधिक्यसे होगा। इसीलिए मनके इस धर्मका विचार करते हुए वेदमें बुरी बातोंके निषेधोफेभी मंत्र बहुत थोडे हैं और प्रशंसा मंत्र प्रकाशके धर्मकी स्फूर्ति देनेवाले होने. से अधिक है । हमारी ईशोपनिषद में अथवा यजुर्यदके ४० वे अ. ध्याय २७ मंत्र प्रशंसापरक है और सिर्फ एक मंत्र निन्दापरक है। उपदेशभी केवल 'सत्यधर्मकी दृष्टि' (मं०१५) मनुष्य के मन में उत्पन्न करने के लिए ही करना चाहिए और यह सत्यको प्रशंसा - १२० ईशोपनिषद् । करके किया जाना चाहिए न कि असत्यका निषेध करते हुए। बेदके उपदेशमें यह विवेक अवश्य विचारणीय है। इस चातको अधिक स्पष्ट करने के लिए ईशोपनिषद् का उपदेश सर्वथा सरल शब्दों में नीचे दिया जाता है। भावार्थ स्पष्टतया यानमें आनेके लिए उसमें कुछ शाद अधिक प्रयुक्त किये गए हैं और कहीं फही क्रियापदों में थोडासा परिवर्तन भी किया है। कहां क्या परि- वर्तन किया गया है यह पीछे दीए गप उपनिषद् वचनोंसे पाठ- कोंके ध्यान में आसकता है। यह परिवर्तन इसवास्ते किया गया है ताकि किस मंत्रसे किस भावनाकी जाग्रति मन में उत्पन्न होती है। यह पाठकों के ध्यान में जल्दी आ सके। उपनिषद्का भावार्थ । शान्ति मंत्र । यह आत्मा पूर्ण है और उससे उत्पन्न हुआ हुआ यह जगत् मी पूर्ण है। पूर्णसे पूर्ण उत्पन्न होता है। यद्यपि उस पूर्णसे यहभी पूर्ण पैदा होता है तो भी वह जैसाका तैसाही परिपूर्ण रहता है, उसमें कुछभी न्यूनता नहीं आती। आत्मज्ञान । (१) वह आत्मा ईश पनकर इस सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त है। इस जगत् में संघके आधारसे व्यक्ति स्थित है। अतः व्यक्तिको अपने स्वार्थका त्याग (यश)संघके लिए करना चाहिए और त्याग करके जो कुछ अवशिष्ट रहे उसका अपने लिए भोग करे। लोम म करे। धन किसी एक व्यक्तिका नहीं, यह सय जनसंघका है। (२) इस जगतमै सर्पदा प्रशस्त कर्मही करता रहे, और सौ वर्ष तक जीने का प्रयत्न करे । यह इतनाही मनुष्यका धर्म है। इसे ध्या- नमें रखना चाहिए । इसके सिवाय दूसरा उन्नतिका मार्ग नहीं। - आत्मज्ञान । सत्कर्म करनेसे मनुष्यको दोष नहीं लगता। (३) केवल शारीरिक शकिके लिए ही प्रसिद्ध कुछ लोक हैं, परन्तु उनमें आत्मिक ज्ञान जरामी नहीं है। जो आत्मघातकी लोक है वे मरने के बाद और जीतेजीमी, पेसेही लोकोमें गिन जाते हैं। (४) वह आत्मा अद्वितीय, स्थिर, सबसे प्रथम, द्रष्टा, और मनकामी प्रेरक है । वह इन्द्रियोंको नहीं दीखता। सब घेगवान् पदार्थीकी अपेक्षाभी उसका वेग अधिक है। उसके आधारसेही मनुष्य अपअपने कर्म धारण करता रहता है (५) वह स्वयं नहीं हिलता तोमी सयको चलाता है। यह दूर होता हुआभी सबके एकदम पास है। यह सबके अन्दर और बाहिर भी है। (६) जो सर्व प्राणियोको आत्मामे और आत्माको सब प्राणि यो में देखता है वह किसीका भी तिरस्कार करता नहीं है। (७) जिस समय आत्माही सब भूत धनगया ऐसा अनुभव आया कि उस समय सर्वत्र पकत्वका अनुभव प्रतीत होनेसे उसे किसीभी कारणसे शोक अथवा मोह नहीं होता। (८)वह सर्व व्यापक है। यह देह रहित, स्नायु और व्रणसे रहित है। उसी प्रकार वह शुद्ध, निष्पाप, तेजस्वी, अतीन्द्रियार्थ- दर्शी, मनका स्वामी, विजयी और स्वयंम् है, और वह सदा सब कर्तव्य योग्य रीतिले करता रहता है। (९) जो केवल जगत्की विद्याकेही पीछे लग जाते हैं वे अध. नत होते हैं । इसी प्रकार जो केवल आत्माको विद्याके पोछे लग जाते हैं भी अवनत होते हैं (१०) जगत्की विद्याका फल और आत्माकी विद्याका फल और है, ऐसा विचारशील उपदेशकों का कहना है।
१२२ ईशोपनिषद् । (११) जगत्की विद्या और आत्माकी विद्या ये दोनीही उप- बोगी हैं। जगत्को विद्यास प्रापंचिक (सांसारिक) दुःख दूर करे और आत्माकी विद्यास अमर होवे । (१२)जिनकी दृष्टि केवल व्यक्तितकही सीमित है ये अधोग- तिको प्राप्त करते हैं और जिनकी दृष्टि केवल संघतक सीमित है घे भी अधोगतिको पाते हैं। (१३) व्यक्तिक दृष्टिको सीमित रखने से और लाम होता है और मंघतक सीमित रखनेसे और ऐसा विचारशील उपदेशक कहते हैं। १४) व्यक्तिका हित और संघका हित इन दोनोंको साधना चाहिए। व्यक्तिको उपासनासे वैयक्तिक कष्ट दूर करके संघसेवनसे अमर होचे। (१५) सत्यका मुख सुवर्णके ढक्कनसे चन्द हुआ हुआ है। अत: यदि सत्य देखना हो तो वह सुवर्णका ढक्कन दूर करना चाहिए। (१६) हे पोषक! सर्व और नियामक प्रजापति देव! तेरी किरणे एक ओर कर और अपना मंगलमय रूप मुझे दिखा, यह मुझे देखना है। शरीरधारण किया हुआ मैं प्राणशकिसे उन्नति होनेवाला तेरा उपासक हूं। (१७) प्राण अपार्थिव अमृत है और यह स्थूल शरीर नाशवान् है । अतः हे जीव ! ओंकारका जप कर और अपने किए हुए कोपर विचार कर। (१८) हे देव ! हमें उत्तम मार्गसे अभ्युदयके पास लेजा। तू हमारं सप कर्मोको जानताही है। हमारे से कुटिल पापोको दूर कर। इसके लिए हम तुझे नमस्कार करते हैं।
आत्मज्ञान। १२३ यह ईशोपनिषद् का सरल रूपान्तर है। भाषान्तर पूर्व दिया हुआ है ही। यह यहां पुनः देकर द्विशक्तिका दोष यद्यपि हुआ है तथापि किन्हीं मंत्रोका आशय केवल भापान्तरसे पदम ध्यानमें नहीं आसकता, अतः यह दौडते हुए शन्दोंसे यहां केवल रूपान्तर दिया है। इस आत्म सूक्तमें मुख्यतः आत्माके गणवर्णन है तथापि प्रार्थना, उपासना, निन्दा, स्तुति, प्रशंसा, आशा, याचना, आदेश आदि सब प्रकारके मंत्र इसमें हैं, इस दृष्टिले विचार करनेवालेको यह सरल रूपान्तर सहायक होगा यह निःसंदेह है। आशा और निन्दा कितनी थोडी है और प्रशंसा कितनी अधिक है, इनकी तुलना यहां देखने लायक है । बुराईको निन्दातक अधिक नहीं करनी चाहिए, और की भी तो एकदम थोडी। युरेशब्दोंस जीभको जरासामी सराय करना नहीं चाहिए । सुविचार के शब्ददी उच्चा रने चाहिए । यही वेदका आशय है । देखिए--- भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः }० १२८९/८॥ "अच्छी बातें कानोंसे सुने और अच्छीही आंखोंसे देखें।" किसीभी तरहसे, निषेध करने के लिएभी बुराईका स्मरणतक न करें । वेदमें स्तुति और प्रशंसापरफ मंत्र अधिक तथा निन्दा और आशापरक एकदम कम हैं, इसका यही कारण है। मनका स्वभावधर्म 'मननसे तद्प होनेका' होनेसे वेदोंने प्रशंसनीय दिशा ही लोकों के सामने रखी है। सत्यकी पहिचान करवानेका यह उद्देश्य है । सत्यके सिवाय शेप जो कुछ है वह असत्यही है। उ- सका वर्णन करके मनको कलुषित करनेसे क्या लाभ ? इसके अतिरिक्त 'सत्य एक' होनेसे उसको कहा जा सकता है पर अस. स्योकी गणना करके कहना असंभव है। उदाहरणार्थ एक और एक कितने होते हैं? इस प्रकार उबर एकमात्र प्तत्य दो है। इसके ।
१२४ ईशोपनिषद्। सिवाय शेप सय संख्याएं असत्य उत्सर हैं। ऐसी दशाम उन सब असत्य उत्तरोका कहना कठिन है पर इस प्रश्नका एक मात्र सत्य उत्तर 'दो अति सुगमतासे प्रकट किया जा सकता है। यही घात सब विपयों के सत्यासत्यके कपनमें समझनी चाहिए। उपरोक्त मंघोंम जोस्तुतिविषयक मंत्र है,वे परमात्माके गुणोंकी प्रशंसा कर रहे हैं। परन्तु कभी न कभी इस उपासकको आत्मा उन गुणों से युक्त होनेवाली है अतः 'हमारे अन्दर विद्यमान आ- स्माके भायी स्वरूपका वर्षम' यह है अथवा 'सोऽहं' (मं०१६) पह मैं हूं, ऐसा समझते हुए वह वर्णन पढनेसे हमारी उन्नति कितनी हुई है और कितनी होनी है यह उससे ठीक ठीक पता चलेगी। इसके अतिरिक्त आरमाका वर्णन पढकर, वह क्या करती है यह देख और हमसे तत्सदश क्या हो सकेगा, यह पता करे। इस प्रकार करनेस अपना फर्ममार्ग पर किस प्रकार आक्रमण करना चाहिए इसका ज्ञान हर एकको हो सकता है। तीन मार्ग। ज्ञानमार्ग, कर्ममार्ग और भक्तिमार्ग ये तीन मार्ग हैं। इन्हें एक- ही स्तुति विषयक मंत्रमें अथया सूक्तमें कैसे समजा जा सकता है यह अघ देखिए। उपरोक्त सूक्तम (१) जो परमात्मापरक स्तुतिका वर्णन है, वह हमारी आत्माकी, उसके पूर्णत्वको प्राप्त कर लेनेके बादकी अवस्था का है क्यों कि सोऽह(मं०१६) = 'यह मैं होनेसे यह वर्णन जैसा उसका है पैसाही मेराभी है, ऐसा समझते हुए यह आत्माका ज्ञान में कितना प्राप्त हुआ है, यह देखते जाना और आगे अनुभव प्राप्त करने का प्रयत्न करते जाना यह, 'शान मार्ग' है। (२) परमात्मा क्या करता है यह उसके वर्णनसे या स्तुतिसे समझकर तत्सदृश पर्म'स (च) अहं' = 'उसके सश में, विरोधमा परिहार। होऊंगा ऐसी भावनासे अपने कर्तव्य क्षेत्रानुसार यथा संभव नि- दोषपूर्ण करते रहना यह 'कर्ममार्ग' है । इसविषयम, क्या क्या घोध लेना चाहिए यह मंप्रखण्डोसे कोष्टक द्वारा पूर्व दिया गया है। (३) इन दोनों मामि कुछ समानताका नाता दिखाया जाता है। जगत्मे परमेश्वरके जो महानसे महान कार्य चल रहे हैं उनमें से यथा संभव भाग परमेश्वरार्पण बुद्धिसे घटाना, उससे जनता जनार्दनकी यथाशक्ति सेवा करनी और फलेच्छा की ज. राभी इच्छा न रखते हुए '(तस्य दासोऽहं ) - 'उसका मै अनुचर हूं' ऐसी भावनाले केवल ईश्वरार्पण बुद्धिसभी की गई सेवाको परमेश्वरकोही अर्पण करना, यह 'भक्तिमार्ग' है । एकही स्तुति विषयक सूकसे ये तीन मार्ग इस रीतिसे विचार और मनन करने वालेको सुगमतया समझमे आ सकते है। आधुनिक समयमें ये मार्ग प्रचलित हुए हैं यह बात नहीं है। अपितु वेदम पूर्वसही इस प्रकारसे हैं। इस हमारी ईशोपनिषद के मंत्रोसे ये तीन मार्ग पाठक समझ सकेंगे।भक्तिमार्गका उत्तम उदाहरण हनुमानजी का है। रामनामके जपसे अंतरंगउपासना करनी और श्रीरामकेज- মাদ্ধ জামাকা যথা কি বল ভ ম ঈসান্ধী पहिरंग उपासना करनी, ये भकिमार्गके द्विविध कार्य श्री हनुमान- जीको जीवनोके देखने से स्पष्ट प्रतीत होते हैं। ऐसे और भी बहुत भक्त हैं। उनके चरित्रों में भी यह यात दिखाई देगी। विरोधका परिहार। ईशोपनिषद्म विद्या प्रकरण' और 'संभूति प्रकरण' है। इनमें विद्या अविद्या' और 'संभूति असंभूति' इन शब्दोंके अनेक भाष्यकारोंने अत्यन्त विविध अर्थ किप है। इसीलिए इनके अर्थ अन्तर्गत प्रमाणोसे क्या होते है यह यहां दिखाना आवश्यक है। इनका स्पष्टीकरण इस प्रकार है- .
ईशोपनिषद् ! . आत्मा आत्म विद्या ... प्रथम मंत्रमें ईशावास्यमिदं सर्व ऐसा वापय है। इसमें देश और इदं ये दो पदार्थ एक दूसरेसे भिन्न वर्णन किए गए हैं। इनका ज्ञान हो शानक्षेत्र है। शि इदं जगत् ईश अनीश अनात्मा अनात्मविद्या विद्या अ"विद्या इस प्रकार ये शम्द प्रथम मंत्रके अनुरोधसे धनते हैं। यही दाद विद्या अविद्या प्रकरणमें क्रमशः 'आत्मज्ञान और जगत्का शान' इस अर्थमें आए हुए हैं। पहिले मंत्रके पदोके विषय में विचार करनेपर अगले मंगोका स्पष्टीकरण सुगमतासे होजाता है। और किसीभी प्रकारको शंका नहीं रहती। इसी मंत्र भागके अगले 'जगत्यां जगत् ' ये माग्द जगतका स्वरूप वर्णन करने वाले हैं। जगत् कैसे स्थित है ? इसका उत्तर है कि यह 'जगतीके आधारसे जगत् ' स्थित है। जगतोंके स- मह का नामही जगती है। संघके आधारमे व्यक्ति इस जगत्में रहता है' यह जगतका नियम है । 'एक और उसकी जाति', यह - जगत् का रूप है। जगती जगत् सं+भूति असंभूति संघ व्यक्ति 'सं+' धातु का अर्थ 'एक होकर रहना' है। एक होकर न रहनेके भाषको 'अ+संभू' धातु दर्शा रही है। एक होकर जम करके रहने की एक कल्पना और एकके अकेले रहनेकी दूस- गा विरोधमा परिहार। . री कापना, ऐसी दो कल्पनाये 'संभूति और असंभूति' इन दो शब्दोले दिसाई गई है। इन दोनोंकी अंजीर बनाकर उससे मनुप्यकी उन्नति किस प्रकार साधी जा सकती है। यह इस प्रफरणमें दर्शाया गया है। परस्पर विरुद्ध दीसनेवाली बातोंको इस योजना तथाकल्पनासे यदि हम उन्नतिकी ओर ले जा सके, तो उनसे एक दूसरेका पोषक परिणाम कैसे निकाला जासकता है यह वात इन दोनों प्रकरणों के मननसे पाठकगण समझ सकेंगे। विरुद्ध दिशाले जानेवाले एकदम अन्तिम सिरे किस प्रकार एफ स्थानपर आकर मिलते है। और उन परस्पर विरोधी शक्तियोंसे एक दूसरे के लिए सहायता केले लेनी चाहिए, यह यात पाठक यहां अवश्य ध्यान पूर्वक देखें, क्यों कि जगत में सर्वदा परस्पर विरोधी विचारकों की यदी कहीं भेटभी होगई तो एक दुसरेके विचारोंकी एकता करना न आनेसे प्राय झगडे होते है और उनके यढ जानेसे दोनोफा नाश होता है । परन्तु यदि दोनों विरुद्ध शक्तियोंको एक केन्द्रमै एक रूप य- नाना आया, तो दोनोंके अनेक प्रकारके कल्याण हो सकते हैं। विरोधी प्रतीत होनेवाली शक्तियोंको एक कैसे बनाना चाहिए, यह इस प्रकरण पर विचार करनेवाला सुगमताले समझ सकता है। असुर्य लोक । 'असुर्य लोक ' गाढ अंधकारसे व्याप्त है ऐसा तृतीय मंत्रमें कहा है। ये असुर्य लोक कौनसे हैं, इस विषय में बहुतीने यदुतसे तर्क किप है । कितनोने सूर्य जहां नहीं है ऐसे देश' ऐसा अर्थ किया है। परन्तु यहांपर असुर्य' शब्द है ' असूर्य ' नहीं। दूसरे कुछ मानते हैं कि 'असुर' का अर्थ राक्षस है, और उनके देशका नाम 'असुर्यलोक' है। परन्तु ये मव अर्थ ठीक प्रतीत नहीं होते। वेदमें 'अमर' यह शब्द 'माणशक्ति (अस+र) देनेवाला' । , - १२८ ईशोपनिषद् । इस अर्थमें परमेश्वर के लिए आया है। वेदमें बहुत से देवताओं के लिए 'असुर' शब्द इसी अर्थम विशेषण रूपसे आया है। 'असु रत्व' शब्द (ऋग्वेदमे २८ यार, वाज० यजुर्वेदमे ३ वार, और अधर्व में २ बार) उपरोक्त अर्थमें प्रयुक्त हुआ हुआ है। 'असुर्य' शब्द वेदमें अन्य दूसरे किसी अर्थमभी नहीं आया है और केयल्ट 'परमेश्वरसे मिलने वाले (असु-र्य)प्राणोंके यल' इसी एक अर्थम आया है। प्राणके ऊपरक यौद्धिक, मानसिक आदि बल इससे भिन्न है। इस अर्धको ठीक ठीक समझनेके लिए यहां थोडासा भिन्न री- विसे विचार करना आवश्यक है। शरीरमें (असु) प्राणोंकी शक्तिको गति देनेयाला आत्मा है। उसके रहते हुए शरीरमें प्राण शक्ति कार्य करती रहती है और पद गया कि प्राणोका कार्य बन्द हुआ। इस दशाम शरीरमें (अस+र) प्राणशक्ति देने वाला आत्मा हो है इसमें शंका नहीं। इस आत्मा जो पल शरीरमें दीखते हैं 'असुर्य' पल है । आत्मासे प्राप्त जो प्राणों के यल है वे यही हैं। ये प्राणों के बल इन्द्रियों में और शरीरमें संचार करते है, इसीलिए प्राणोफे बल इस स्थल शरीरमें नजर आते हैं। रायणके शरीरमें जैसे ये असुर्य घल थे पैसेही रामकेभी शरीरमें थे। सिर्फ दोनों में भेद ताकि रावण अपनी शक्तिसे दूसरों को परतंत्र करके अपने शारीरिक भोग पढाता था और इसलिए राक्षस गिना जाता था और श्रीरामचंद्र समर्थ होते हुए भी स्वयं कष्ट उठाकर दुःखितोके दुखको दूर करने के लिए आजन्म प्रयत्न करते रहे। और अतः उनको गणना देवोमें है। असुर्य यल दोनों में होता हुआमी एक देव और दूसरा राक्षस बन सकता है। इसका कारण उत्कृष्ट आत्मिकशक्तिकी प्रवृत्तिमें भेद होना है। इसीलिए ही-- असुर्य लोक। १२९ असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः । * असुर्य बलसे प्रसिद्धी पाए हुए वे लोक है जो गाढ संधकारसे याप्त हैं। इस मंत्रमे 'असुर्यलोको' का 'गाढ अन्धकारसे व्याप्त' ऐसा विशेषण दिया है। यह इसीलिए कि प्रकाशसे प्रकाशित हो- नेवाले दूसरे असुर्य लोक भी हैं, उनका बोध इस मंत्रसे न हो। -उनका वर्णन हम इस प्रकार कर सकते हैं- असर्या नाम ते लोका आत्ममासा प्रकाशिताः । तांस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्मविदो नराः॥ 'असुर्य बलसे प्रसिद्ध पे लोक हैं कि जो आत्माके तेजसे प्रका- शित है। उनमें मरने के उनकी गना होती हैं जो कोई आत्मज्ञानी नर हैं।' ऐसा अर्थायत्तिसे और विशेषणके अनुसंधानसे श्लोकका हम निर्माण कर सकते हैं, और इससे पता चलेगा कि असुर्यलोक जैसे राक्षसों में हो सकते हैं, ठीक वैसेही देवोंमें भी हो सकते हैं। रावण और राम दोनोंही असुर्य शक्तिस युक्त थे, पर प्रथम अंध- तमसे व्याप्त था और दूसरा आत्म प्रकाशसे पूर्ण था क्यों कि प्रथमकी अन्तःकरण प्रवृत्ति स्वार्थी भोग तृष्णासे अन्ध हुई हुई थी और इसके विरुद्ध दूसरेको शुद्धाचरण और जगदुद्धारकी प्रेरणासे प्रकाशित हुई हुई थी। अन्तः शक्तिभी पेंजिनकी तरह है। वह केवल गति देती है। जिनकी शक्तिसे काटने के यंत्र जैसे फिरते है पैसेही जोडनेके यंत्रभी फिरते हैं । इसी प्रकार यहांमी समझना चाहिए। । लोक। 'लोक' शब्द देशबाधकमी है और अनवाचकभी है । अमुक मनुष्यको स्वर्गलोक मिला, इसका अर्थ स्वर्गस्थानमै देवजनों में ९ ईशोपनिषद् । जाकर घसनेको योग्यता उसे प्राप्त हुई ऐसा है। स्वर्ग में निर्जन भूमि उसे मिली पेसा अर्थ नहीं । स्वर्ग, मृत्यु और नरक वे यदि स्थान विशेष है, तो वह उस उस योग्यता जन है, और कम अधिक मात्मिक योग्यता होनेसे उन उन लोकों में जाकर रहना होगा और योग्यता समाप्त होनेपर पापिस आना पड़ेगा। इससे यह पता लग सकेगो, कि पिसीमी 'रोक की प्राप्ति का अभि- प्राय है कि वहाकी जनतामें जाकर घसनेको योग्यता । अधतम सायत असुर्य लोक ' और 'प्रकाश पूर्ण असुर्य लोक ' इनमें कौन जात है और वहाके लोकों में उनकी गणना कैसे होती है यह बात ऊपरके विवेचनसे स्पष्ट ध्यानमै सुगमतासे आ सकेगी। लोक शब्दको देशवाचक, स्थानवाचन और जातिवाचर में में कोई भी यदि मान लिया जाये तो भी उन सरका मुख्य आशय एषही है। यह हम उपरोक विचार करनेसे समझ सकते हैं। धनका अपहार। प्रथम मत्रमें 'मा गृध कस्यस्विद् धनं' (म०१)पेसा एक घरण है। उसका, '(१) रोम मतकर, (२) धन भला क्सि एक व्यक्किा है?' ऐसा अर्थ हम पहिले कर आए है। बुछ रोक इस मत्रखण्डके ऐसे दो भाग न मानते हुए 'स्य स्विद् धनं मा गध ।' विसीके भी धनका लगेम मत रख, ऐसा अर्थ करते हैं। यद्यपि यह अर्थ बरा नहीं है तथापि इस मंत्र जो 'स्वित्' शब्द है यह प्रथाधक है। 'फ्या, भला' ऐसाही उसका अर्थ होता है। कस्य स्वित्' इसका क्स्य चित् ' ऐसा अर्थ नहीं होता। इसके सिवाय कुछ और जो दूसरा अर्थ करते हैं वह इस मन भागका अर्थ सीधे तौरपर नहीं होता। और खेंचातानीकरये उस प्रकार से अर्ध कियाभी तो उसका अर्थ 'दूसरे किमीकमी धनपर होम - धनका अपहार। . दृष्टि मतकर' ऐसा होगा। दूसरेके धनका अपहार मतकर, दूसरे को लूट करके अपने उपभोग मत बढा । यह एक उत्तमही उपदेश है पर इससे अर्थापत्तिद्वारा एफ ऐसी ध्वनि निकलती है कि 'स्वयं कष्ट उठाकर प्राप्त की हुई जो धन संपत्ति हो और जो पैत्रिक संपत्ति अपने भागमें आई हुई हो, वह दूसरेकी न होनेसे और केवल अपनी ही होनेसे उस लर्व संपत्तिका हम स्वयं चाहिए जैसा उपभोग करें, उसमें कोईभी आपत्ति नहीं।" इस हिसे यह अर्थ धर्मकी दृष्टिमें थोडासा गौणही प्रतीत होता है। धर्म ऐसा कहता है कि जो कुछ हमारा धन हो उसका लोभ न करते हुए उसका यज्ञ करना चाहिए अर्थात् “ उसका विनियोग सज्जनोंके सत्कार करनेमें, समान लोफोकी संगतिकरणमें और जिनमें न्यू नता है उनको न्यूनता हराकर पूर्णता करने के लिए दान देने में व्यय करना चाहिए।" यज्ञ अर्थात् 'सस्कार-संगति-दानात्मक सत्कर्म ।' अपने धनका इन कार्यों में उपयोग करना चाहिए। अ. पने धनका ऐसा उपयोग करना यही वास्तविक उपभोग (स्यक्तन भुञ्जीथाः । (मं० १)1 है ऐसा माने, और ऐसा अपने धनका यह करके जो कुछ अवशिष्ट रहे उसका अपने लिए भोग करे। यक्ष- शेष भक्षण यह जो धर्म है, उसका यह ऐसा अर्थ है । यहाँपर दूस. रेके धनका लोम नहीं करना चाहिए इतनाही है यह बात नहीं अपितु अपने धनकामी लोभ न करे ऐसा दर्शाया है । (त्यकेन भुञ्जीथाः) दानसे अपने धनके भोगकी आमा मिलने परभी, (मा गृधः) धनका लोभ मत फर। (कस्य स्वित् धनं) किस एक व्यक्तिका भला धन है ? इसका विचार कर। ऐसा मंत्रको अर्थ सीधा दीखता है। विचारफको उसी समय पता लग जाएगा किन किसी एक व्यक्तिका नहीं है। क्यों कि जो व्यक्ति धन मेरा है ऐसा मानता है वह व्यक्ति थोडेही समयमें सब धन यहीपर ५ १३२ ईशोपनिषद् । छोडकर चला जाता है। इसलिए धन किसीमी पक व्यक्तिका नहा यह सत्य है । धन सब जनताका, समाजका, संघका अथवा जातिका है, व्यक्तिका नहीं । यद्यपि धन पुछ कालके लिए एक व्यक्तिके आधीन होता है ऐसा अनुमय है, तथापि उस धनका वास्तविक स्वामी समाज है और यह व्यक्ति उस समाज के रफ भागका 'पंच' (दृस्टी) है। पंच आने आधीन धनका अ- पने लिए उपमोग नहीं कर सकता, यह जिसका है उसके लिए, उसका उपयोग कर सकता है। ठीक इसी प्रकार यहां प्रत्येक व्य- तिको अपने धनका यश करनेका ही अधिकार है, अर्थात ज- नता के हितार्य कर्तव्यकर्म करने में ही खर्च करनेका उसे अधिकार है। उस धनका अपने भोगके लिए खर्च करनेका उसे अधिकार नहीं। . इस विवेचनसे पाठकोंको पता चला होगा कि "मा गृधः कस्य स्वित् धन? " इस प्रकारके दो वारय मानकर इन दो याश्योका इमने अर्थ किया है। इस प्रकार भिन्न भिन्न अर्थकरना यह चेदकी इतर शिक्षाका अनुसरण करते हुए है और दोनों वाक्योंका पर अर्थ करके दूसरे जैसा करते हैं उस प्रकार अर्थ करना यह अर्थ गौरवको दृष्टिसे फ्या, और घदके इतर उपदेशोंकी दृटिस पया, गौण ही है। 'अपरिग्रह-वृत्ति रखनी चाहिए, ' ऐसा जो यम नियामोके दशविध नियमोमें कहा है, उसका कारण यह ऐसा है। पाठक इसका विशेष विचार करें। अग्नि देवता। शोपनिषद्के अन्तिम मंत्रमें अग्नि 'देवताकी प्रार्थना है। यहां अग्नि शम्दसे किसका पोध लेना चाहिए इसका विचार करता चाहिए । यहुतसे लोक अग्नि शन्दसे 'यममै उपयोगमे आया. .
अग्नि देवता। १३३ लो आग' ऐसा यहां समझते हैं। यद्यपि अग्नि शब्दका ऐसा अर्थ है तथापि यह यहां इष्ट नहीं है। यह संम्पूर्ण सूक एकही देवताका वर्णन करता है। उसी एकही देवके लिए इस सूकमें निम्न नाम आए है- (मं०१) ईश, (मं०४)पकं तत् एनत्, पूर्व (मं०५) तत् , (मं०६-७) आत्मा, (म०८) सः, कविः, स्वयंभूः, (मं०९) सत्य, (मं०१६) पूषा, कपिः, यमः, सूर्यः, (मं०१८) अग्निः। इन शब्दोंपर विचार करनेपर 'सः, तत्, ईशः, स्वयंभूः, कविः, सत्यः, पपा, यमः, अग्निः, आत्मा,' इत्यादि सर्व नाम पकही परमात्माके हैं ऐसा स्पष्ट दीखता है। एक सूक्तम एक देवताकेही गुण दिलाने के लिए ये सब शब्द आए हुए हैं । 'आत्मा' के सि. घाय इस सूकका अन्य कोई देवता आजतक किसीनेभी नहीं माना है। अत: अग्नि आदि शब्द एक आत्माकेही वाचक इस सूक्तम आए हैं यह निर्विवाद है। यही आशय निम्न ऋचाभी दर्शा रही है। " इन्दं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद्विमा यहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥ ऋ.२१६४॥४६॥ इस मंत्रमें एक आत्माइन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्य सुपर्ण, गरुत्मान्, यम, मातरिश्वा ये नाम है ऐसा कहा है। इस घेद मंत्र को देखने से अग्नि, यम आदि शब्द उस एक अद्वितीय स्वयंम् परमात्माकही वाचक है इस विषयमें शंका नहीं रहेगी। द्वैत और अद्वैत । इस सूक्तमें प्रायः बहुतसे मंत्र द्वैतपरक हैं। केवल सातवे मंत्रमें अद्वैतानुभव या एफायका अनुभव ' कहा गया है। अनेक लोक - इन दो । ईशोपनिषद् । देत और अद्वैतके विषयमें वियाद करते हैं। परन्तु केवल हैत पाद या फेवल अद्वत पाद सर्वथा नहीं है। 'जाप्रति और स्वप्न इन दो अवस्थाओका अनुभव करती दुई आत्माको द्वैतका अनुमप मिलता रहता है। उसी प्रकार 'सुषुप्ति और तुर्या' अवस्थाओमें अद्वैतका अनुभव मिलता है। इस प्रकार यह द्वैत मिश्रित अद्वैत अथया अद्वैत मिश्रित द्वैत है। इसलिए यहुधा प्रत्येक ब्रह्मविद्याफे ग्रंथमें इन दोनों अनुभवोंका विचार किया हुआ होता है। उपासना, कर्म, भक्ति आदि सर्व अनुष्ठान जाग्रत अवस्थाम होनेसे ' उसका मैं पासक' इस द्वैत भावनासे किए जाते है। परन्तु जब 'यही सर्वत्र समरस भरा हुआ है। पेसा अनुभव हो. फर उस एकही आत्माका सर्वत्र अनुभव होता है, तब यह उपा- सक ऊपरफी भूमिकामें जा पहुंचता है। उस समयका अनुभव अद्वैतका होता है। ये दोनों अनुभव उपासकको मिलते हैं अतः ये दोनोंही अनुभव सर्वथा सत्य हैं। इसलिए द्वैत और अद्वैतके विष- यम झगडना करना व्यर्थ है । दोनों अनुभवोंके मिलनेसे पूर्णानुभव होता है, यह स्मरण रखना चाहिए । इस प्रकार ईशोपनिषद्का विचार है। यह उपनिषद् सयसे मुख्य है और इसीफे थोडे थोडे सिद्धान्तोका अधिक स्पष्टीकरण करने के लिए इतर उपनिषद् बनी है । इतनी इस उपनिषद्की महिमा है इसका जो जितना मनन करेगा वह उतना इससे ज्ञान प्राप्त होगा। ॐशान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ .
ईशोपनिषद्के मंत्रोंका तुलनात्मक विचार। " अपवा घेदके किसी सूक्तका विचार करना हो तो साथ साथ तत् सदृश विचारवाले अन्य स्थानके चेद मंत्रोंका भी मनन करना अत्यंत आवश्यक है । इससे वेदकी गंभीरताका ज्ञान होता है और चैदिक सिद्धांत समझनेमें भी यडी सहायता होती है। इसलिए ईशोपनि- पदके मंत्रों के साथ अन्यान्य वेद मंत्रोकी तुलना अब करते हैं- मंत्र १ प्रथम मंत्रका सबसे प्रथमका कथन "ईशावास्यमिदं सर्वे" यह है। इसका अर्थ है "ईश इस सबमें व्याप्त है। ईश्वर द्वारा यह सब घेरा जाने योग्य है। यहां ईशका अस्तित्त्व सबसे प्रथम कहा है । यह ईश सबके ऊपर शासक क्यों है, किन गुणोंसे यह सवका ईश्वर हुआ है, इसका विचार करने के समय निम्न लिखित मंत्र हमारे सन्मुख आते हैं- यो विश्वस्य जगतो देव ईशे । ऋ० ७१०१२ त्वं ोक ईशिपे । । ४।३२१७ त्वमीशीय वस्य एक इत् । ऋ० ८।१४१ " जो संपूर्ण जगत्पर एक देव स्वामित्व करता है । तुं ही एक इसका ईश है, इस सय जगत् रूपी धनका तु ही एक स्वामी है।" इस प्रकार इस ईश्वर के स्वामी होने के विपय वेदमें अन्य स्थानमें कहा है। सय जगत्का यही एक देव है। यह ईशोपनिषदका माय ही इन मंत्रों में है। अब देखिये कि यह किस कारण ईश बना है- । सय ईशोपनिषद् ईशानो अप्रतिधुतः। ० १७८ विश्वस्येशान ओजसा।०८।१७९ ऋषिदि पूर्घजा अस्येक शान ओजसा। स० ८६४१ 'यह ईश्वर ऐसा है कि जिसका प्रतिकार कोई नहीं कर सक ता। पद सय जगतका ईश्वर अपने पलसे हुआ हुआ है। यह शानी सघका एक पूर्वज अपने पलसे सबकाश हुआहुआ है।" इन तीन मंत्रोमें उसका सबसे अधिक सामर्थ्य है इसलिए अपने सामर्थ्यसे ही यह सबका ईश पना है, पेसा स्पट शब्दों में कहा है। इसके परायर अथवा इससे अधिक सामर्थ्य किसी अन्यका नहीं है, अन्यों के सामर्थ्य इससे कम है, इसलिए इस एकदी का प्रभुस्य सपपर हुआ है । सामर्थ्यसे ही प्रभुत्व अथवा स्वराज्य मिल स- कता है. स्वराज्यकी प्राप्तिके लिए दूसरा उपाय नहीं है यह योध यहां मिल सकता है। उपनिषदों में भी यही बात कही है देखिये- रामानापोशते देष एकः । ये० ३० १३१० यश अस्प द्विपदयतुष्पदः। ये उ०४।१३ पशि अस्य जगतः। भ्य०६१७ सोलोकानीशत शनीभिः। श्वे० उ० ३१ अधर्य शिरस्५ यः सर्यान् देवानीशत शिनीभिः । क्षर अर्थात् नाशपन्त जगत् और जीयारमा हनपर एक पर. मारमा प्रभुत्य करता है। द्विपाद और चतुष्पादकर यह एक ही श है। सप जगन्हा यह एकही ईश्वर है। सप लोकों का प्रभुरय यह अपनी शक्तियों से करना है। सब देयोंपर भी यह अपनी शक्ति योसे प्रमत्य करता है। (न उपनिपचनोम वरफ पासन शानियां दे जिस कारण यह सयपर स्वामित्व करता है. यह पात वही है। यह तो शतिका प्रमाय हुआ। पल्तु फेयल शक्ति होने सेही कार्य नहीं चल सकता, क्योंकि यलफे. आधिषयसे किसीने तुलनात्मक विचार । १३७ किसीपर अधिकार जमा भी दिया, तो भी उसके चशमें सदा के लिए सयका रहना कठिन हो जाता है। यदि उसने मयको वश किया और उनकी इच्छाओको वश में किया तभी वह सदाके लिये स्वामी माना जा सकता है। परमेश्वरका सबपर पमुन्य इसी कारण है कि उसने सबकी इच्छाओंको पशम किया हुआ है, अर्थात् सयकोसंतोष देकर वशमें किया है, इस विषयमें निम्नलिखित मंत्र देखिये- इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमा अन्यत । सहस्त्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः ॥ ३० १२१९३८ शृप्यन्तं प्पणं चयमियमनष्टयेदसम् । ईशानं राय ईमहे ॥ ३० ॥५४॥८ ईशान इमा भुधनानि वीयसे ॥ ऋ० ९८६०३७ तमीशानं जगतस्तस्थपस्पति धियं जिन्धमघसे हूमहे वयम्॥ ऋ० ११८७ इस ईश्वरके हजारों उपकार है, नहीं नहीं उसलेभी उसके अधिक उपकार हैं, इसलिए अपने बलसे प्रभु बने हुए उस ईश्वरकी स्तुति हम करते हैं । यह हमारी प्रार्थना सुनता है, हमारा पोषण करता है, वह अधिक प्रभावशाली है और उसका अक्षय धन है, इसलिये उस ईश्वरकी स्तुति हम अपने कल्याण के लिये करते है। इन सय भुवनोको प्रगति यह करता है । उस स्थावर जंगमके ईशको प्रार्थना हम अपनी रक्षाके लिये करते हैं। इन मंत्र भागों में उसके वशमै आनन्दसे सब स्थिरबर जगत् क्यो रहा है, इसके हेतु दिये हैं । स्थिरचर जगत् पर उसके अनंत उपकार हैं। सबका पोषण उसके सामर्थ्यसे होता है, किसीकी उन्नति में किसीभी मका- रकी रुकावट नहीं होती, सबकी उत्तम प्रकारसे रक्षाका कार्य वही करता है, सबको धनादि पदार्थ देनेपर भी उसका खजाना जैसाका तैसाही भरा रहता है, इत्यादि गुण उसमें होनेसे उसके 1 ।
ईशोपनिषद्। - अधिकारके अंदर सय आनंदसे रहते हैं । अर्थात् जो राजा अप- नी प्रजाका शासन इस प्रकार करेगा, उसीके वश सय रहेगी, अन्यथा जोराजा फेवल पाशविक यलपर निर्भर रहता हुआ मजाका शासन करताके साथ करेगा, उनके मनोको आकर्षित करने का यत्न न करेगा और उनको वृद्धि करनेका विचार तक नहीं करेगा, उसका राज्य शासन चिरकालतक नहीं रहेगा। इन मंत्र भागोंसे यह बोध मिल सकता है। इतने गुणोंसे ईश्वरका शासन सपपर हुआ है। 'ईशावास्यमिदं सर्व' इस मंत्रमागके साथ इन मंत्रोंका विचार करनेसे दूसरोपर अधिकार चलानेफे विषयको वैदिक कपना अधिक सुल जाती है और घेदका आशय मनमें अधिक स्पष्टताके साथ आसकता है। दान। प्रथम मंत्रमें दूसरा कथन 'त्यक्तेन भुजीया: यह है। त्यागसे भोग कर । अर्थात् दूसरोंके ऊपर उपकार करके पश्चात् अपने लिये भोग कर, अपने भोगके लिये दूसरों के पलोपर छुरा न चला। दूसरोके लिए अपना आत्म समर्पण कर । यहीया है। इस विषया अनेक चार पहिलेभी कह आप है। अनासक्ति रखकर व्यवहार क. रनेका भाव इस विधान है। दानके विश्यमें प्रग्वेदमे एक सूक्त ही है और अन्य सोम अनेक बार दानकी प्रशंसा की है। प्रत्यक्ष परमेश्वर सहलो प्रकार के दान करता है ऐसेभी अनेक मंत्र है, अर्थात् उसका अनुकरण करने की इच्छा हो गई तो भी दान करना चाहिए। ध्यरत्यके गुणों में स्याग और दान एक विशेष गुण है, इस विषयमें दफे आदेश स्पष्ट है। यहां उदाहरण के लिये दान सूकके पक दो मंन देते हैं- ।
तुलनात्मक विचार । - उतो रयिः पूणतो नोपदस्यत्युताऽपृणन्मर्दितारं न विन्दते ॥ १॥ स इद्भोजो यो गृहये ददात्यन्नकामाय चरते कृशाय । अरमस्मै भवति यामहूता उतापरीपु कृणुते सखायम् ॥२॥ न स सखा यो न ददाति सरये सवाभवे सचमानाय पित्वः । अपास्मात्प्रेयान्न तदोको अस्ति पृणन्तमन्यमरणं चिदिच्छेत् ॥४॥ पृणीयादिनाधमानाय तव्यान्द्राधीयांसमनुपश्येत पन्थाम् । ओहि वर्तन्ते रथ्येव चकाऽन्यमन्यमुपतिष्ठन्त रायः॥५॥ मोघमन्नं विन्दते अप्रवेताः सत्यं जयोमि वध इत्स तस्य । नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलायो भवति केवलादी॥६॥ मा०१०१११७ दान देनेवालेका धन निश्चयस कम नहीं होता। और जो (अपृणन् ) दान न देनेवाला होता है उसको सुख देनेवाला कोई नहीं मिलता ॥१॥ (कशाय) दुर्बल होने के कारण अनकी इच्छा करके (चरते) भ्रमण करनेवाला घर घरमें भीक मांगने की इ- च्छासे घूमता है, उसको जो मनुष्य अन्न देता है (स इत् भोजः) यही सच्चा भोजन करता है। उसके लिये पर्याप्त धन यक्ष लिये मिलता है और वह (अ-परीप) कठीण प्रसंगोंमें सहायक मित्र भी प्राप्त करता है ॥३॥ अन्नकी इच्छा करने वाले भले मनुष्यको भी समयपर दान नहीं देता, यह (नस सखा) वह सच्चा मित्र नहीं है । उससे (अपप्रेयोत् ) दूर भागना चाहिये, उसका घर (न ओकः) सच्चा घर नहीं है । इस लिये दूसरे दाताके पास जाग योग्य है ॥ (तव्यान् ) बलवान् (नाधमानाय पृणीयात) सहायताकी इच्छा करने वाले के लिये अवश्य सहायता देघे । अपने जीवनका (द्राधीयांसं पंथां) अतिदीर्घ मार्ग अपने लिये काटना है, यह मनमें धारण करके दान देवे । क्यों कि (रथ्येव चका ) रथके चक्रमे समान एकसे दूसरेफे पास संपत्ति जाति ईशोपनिषद् । - है॥५॥ (अप्रचेता ) दुष्टयुद्धियुक्त दान न देनेवाला मनुष्य (अमोघ विन्दते ) अन्नको व्यर्थ प्राप्त करता है। मैं सत्य कह- ताकि वह उसका वधही हे। जोश्रेष्ट मनघालेका पोषण नहीं रता और मित्रकी सहायता नहीं करता, यह (केवल-आदी) फरल स्वय खाने वाला (फेवल-अघ:) फेबल पापरुप बनता है॥६॥ इस सूसमें दानका महत्व वर्णन किया है। इससे अधिक दानका महत्व पताना अशक्य है। पूर्वोच पट मंध कहता है कि दान न देनेवाला और अपने लिये ही भोग करनेवाला पापी होता है। इस पापसे पचो के लिये ही ईशोपनिषद्के मत्रमे 'त्यत्तेन भुञ्जी था अर्थात 'दा कर भोग कर ' ऐसा कहा मनुष्य के अन्दरका दान भाव मनुष्यको कर्मशक्तिको सन्मार्गसे बलाता है। दाम भाव मनमैग रहा तो मनुष्यका राक्षस पन जाता है। मनुष्य देव धननेक लिये मनुष्यको दान माघ अपने अन्दर बदाना चाहिये। आगे द्वितीय मन्त्री समका उपदेश ईना है, उसके लिये अन्त करणकी आवश्यक तैयारी परनेके रिये इस ममें दानसे भोग करनेकी आश दीगई है। (मा गृध)ोन न फर, (रपरिषद्धन) किसका भला धन है। ये पाक्यमी मनुष्य का लोभ धनपर न रहे, मनुष्य दान देनेघाला धने, इस भाषके दो सूचर हैं। इस प्रकार प्रथम मत्रको अन्य मनोके साथ तुलना करने के पश्चात् द्वितीय मत्रका विचार करते है- - मंत्र २ " मनुष्य कर्म करते हुए द्वितीय मत्रका उपदेश यह है कि सौ वर्ष जीने की इच्छा को उन्नतिका यही एक मार्ग है दूसरा नहीं। मनुष्यको सपका लेप नहाँ रगता" मनुप्पको कर्म करने तुलनात्मक विचार। १४१ लिये क्यों उपदेश किया है? इसके कारणका विचार करनेसे पता लगता है कि कम करना इसका स्वभाव ही है। मनुष्य प्रयल करे या न करे, इच्छासे करे अथवा अनिच्छासे करे, इससे कर्म होने ही हैं। इसी लिये इसको सत्कर्म करने का उपदेश किया है। कर्म करना इसका स्वभावही होने के कारण इसके प्रयत्नसे शुभ कर्मही हो और अशुभ कर्म न हो. इस बात के लिये प्रयत्न होने चाहिये। अन्यथा अशुभ कर्म होंगे और अवनति होगी। मनुष्यका स्वभाव कर्म करने का न होता, तो उसको यह उपदेश देनेकी आवश्यकता ही न होती। जिस प्रकार कोई एक यंत्र गति उत्पन्न कर रहा है और वह कभी स्थिर रहने वाला नहीं है। तो उसके मालिकको उचित है कि वह उसकी गतिका उपयोग शुभ कार्यमें ही करने का यल करे। इसी प्रकार यहां है। मनुष्य आत्मा, बुद्धि, मन, वाणी, अन्य इंद्रियां और शरीर आदि साधनोंसे प्रतिक्षण कुछ न कुछ कर्म करता ही रहता है और कर्म-हीन नहीं रहता। ऐसी अवस्थामें इसकी कर्म शक्सेि सत्कर्म ही हो और कुकर्म न हो, इस विषयमें सावधानीसे प्रयत्न होने चाहिये । इसी कार्य के लिये संपूर्ण यजुर्वेदका उपदेश है। इसी ईश उपनिषदें मनुष्यका नाम "ऋतु " कहा है। | ऋतुका अर्थ कर्म है। मनुष्य स्वयं कर्मरूप है, यह यात इस शब्दने बतादी है। इसकी आयु १०० वर्षकी है, और प्रत्येक वर्ष एक एक ऋतुके लिये है, इसप्रकार मनुष्य अपनी पूर्ण आयुमें १०० तु कर सकता है, इस लिये इसी मनुष्यको "शत ऋतु " कहते हैं। सौ वर्ष ल- कर्म करने में व्यतीत करनेकी उच्च कल्पना यहां कही है। आयुका कोईभी भाग कुकर्ममें व्यर्थ खर्च नहीं होना चाहिये, यह सूचना यहां मिलती है। इस विषयम निम्न लिखित वेदमंत्र देखने योग्य हैं- प्रथमः कर्मकृत्याय जातः । अथर्व०४।२४ाद . - ईशोपनिषद्। देवस्य सवितः सवे कर्म कृण्वन्तु मोनुपाः ॥ अ०६।२३३३ पहिला यह कर्म करने के लिये ही हुआ है। सूर्य देवका उदय होते ही सब मनुष्य कर्म करने का प्रारंभ करें।" इत्यादि सामान्य आनाएं मनुष्यको कर्मकी प्रेरणा करने के लिये ही दी है। इसी प्र. कार अपने मव अंगों और अवयवोंको उत्तम सत्कार्यम लगाने की प्रतिक्षा निम्न लिखित मंत्रमें है वह यहां देखने योग्य है-. भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिव्यशेमहि देवहितं यदायुः ॥ पा० यजु०२५।२१ "हम कानोसे उत्तम वचन सुनेंगे, आंखोसे उत्तम पदार्थ देखें- गे, और जबतक आयु रहेगी, तयनक स्थिर अंगोंसे देवोका हित करेंगे।" अर्थात् हरएक अवयबसे शुभ कर्म ही करेंगे और कभी अशुभ कर्म नहीं करेंगे। यह वैदिक प्रतिज्ञा कर्मका विचार करने फ समय मनन करने योग्य है। इस प्रतिमाका पालन होनेसे मनुष्यका सुधार निःसन्देह होगा इसमें सन्देह नहीं है, क्योंकि इसमें हरपक अवयव से उत्सम शुभ कर्म कराने का दृढ़ संकप व्यक्त किया है। मंत्र ३ सीसरे मंघम " अन्धतमसे च्याप्त असुर्य लोकमें आत्मघातकी लोक जाते है " ऐसा कहा है। यहां असुर्य लोकका विचार करने के समय निम्न लिखित उपनिषद्वचन सबसे प्रथम देखना चाहिये- अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः । तास्त प्रेत्याभिगच्छन्ति अविद्वांसोऽयुधा जनाः ॥ बुद० उ० घाटा "जहां आनन्द नहीं है ऐसे लोक अन्धतमसे या उन तुलनात्मक विचार। " शब्द है और , । लोकों में अविद्वान् और अज्ञानी लोग जाते हैं।" इस उपनिपद्वचन में "असुर्या नाम " के स्थानपर "अनन्दा नाम "आत्महनो जनाः" के स्थानपर "अविद्वांसोऽयुधा जनाः ये शब्द हैं। इन शब्दोंसे स्पष्ट हो जाता है कि 'आत्मघातकी लोग' ही है कि जो 'अविद्वान और अज्ञानी' होते हैं। और असुर्य लोक' वे हैं कि जो 'आनन्द रहित है और जहां फेवल फट और दुःख है। उपनिषद्वचनोंकी तुलना करनेसे इस प्रकार अर्थ खुल जाता है। अब हम वेद मंत्रों के प्रमाणसे 'असुर्य' शब्दका अर्थ निश्चित करते हैं । असर्य शब्दके विषय में इससे पूर्व मंत्रकी टिप्पणीमें और उसके विवरणके प्रसंग में बहुत कुछ लिखा गया है, अब यहां वेद मंत्रोमें 'असुर और असुर्य' ये शब्द किस अर्थ में आये हैं इसका विचार करना है। इसलिए ऋग्वेद के एक दो मंत्र देखिये हिरण्यहस्ती असुरः सुनीथः सुमळीकः स्वयां यात्वर्वा । अपसेपरिक्षसी यातुधानानस्थाद्देवः प्रतिदीपं गृणानः ॥ ऋ० ११३५।१० "सुवर्णके आभूषण हाथमें धारया करनेवाला, उत्तम नेता, उत्तम स्तुति करने योग्य, आस्मिक बलसे युक्त (अस+र:) जी- चन देनेवाला देघ (अर्वीङ् यातु) हमारे पास आ जाये। (र- क्षसः अपसेधन ) राक्षसोंका नाश करता हुआ और यातुधानो- को दूर करता हुआ, प्रतिदिन स्तुतिको ग्रहण करता हुआ यह देव है।" इस मंत्रमें राक्षसोंका नाश करनेवाला देव । असुर शब्दसे यहां वर्णित हुआ हुआ है। इससे सिद्ध है कि यह असुर शब्द परमेश्वरका यहां वाचक है। तथा और देखिये-- त्वं विश्वेषां वरुणासि राजा ये च देया असर ये चमतः॥ मा०२२७१01 , १४४ ईशोपनिषद् । - . "हे असुर परुण ! जो देव हैं और जो मय है उन सबका तू राजा है।" इस मंत्र में देवोंके ज्येष्ठ देवका नाम असुर कहा है। इस प्रकार असुर दाद परमात्माका वाचक है क्यों कि यही प्राणशक्ति- का देनेवाला है, यही हमें जीवन देता है। इस असुर देवका अ- र्थात् परमात्माका जो सामर्थ्य है वह असुर्य है। अब इस असुर्यके प्रयोग मंगोमेंखिये- धारयन्त आदित्यासी जगरस्था देवा विश्वस्य भुवनस्य गोपाः । दीर्घाधियो रक्षमाणा असुर्यमृतावानश्चयमाना ऋणानि । ३०२।२४ " "सर भुवनों के रक्षक और जगतमें रहनेपाले आदित्य देव इस (असुर्य)प्राणों के पलको रक्षण करते हुए धारण करते हैं। इस मंत्र परमात्माफै इस असुर्य पलका धारण जगद्रक्षक आदि- स्यदेव करते हैं, पेसा कहा है। और देखिये- शानादस्य भुवनस्य भूरे या उ योपद्रद्वादसुर्यम् । ०२१३३१९ यह भुवनोंका स्वामी ईश्वर है, इसकी (असुर्य) शक्ति इससे कोईमी डीन नहीं सकता अर्थात् पद परमात्माकी निजशक्ति दो- मेसे उसके पास सदा रहती है और यह इस शक्तिस सयको जी- पन प्रदान करता है। अब स्वयं परमारमा कहता है- अहं राजा पहणो मां तान्यसुर्याणि प्रथमा धारयन्त । ग्रा०४।२।२ मैं राजा परण हूं मेरे लिये ही ये असुर्य पल सपसे पहिले धारा किये गये थे।" अर्थात् पे सप पल परमात्मा ही है और उनकी सर अन्य देव धारण करते है और उस माणके पलसे यलयान होते हैं। तथा और देखिये- M तुलनात्मक विचार। सत्रापाजानाममवो विभका यहेवेषु धारयथा असुर्यम् ॥ ऋ०६३६१ यह ईश्वर अन्न धन अथवा बल सयको देता है और सूर्यादि देवोंके अन्दर अपना यल धारण करता है।" इस मंत्रमें कहा है कि परमेश्वर अपना पल संपूर्ण देवॉमें स्थापन करता है, अर्थात् इस बलसे सब देव बलवान होते हुए अपना कार्य करनेमें समर्थ हुए हैं। सूर्यके अन्दर वही पल प्रकाशके रूपसे दिखाई देता है । चायुमें गति, और अग्निमें दाहकता आदि गुण उसीके हैं, इसी प्रकार अन्यान्य देवों में अन्यान्य शक्तियां उसी के कारण दिखाई देती है। इसीकारण कहा है कि- महा देवानामसुर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिरदाभ्यम् । ऋ०८/२०११२ "संपूर्ण देवोका यह मुखिया है, इसका कारण यह है कि इसमें (असुर्यः) जीवन देने की शक्ति है और इसमें (महा) महत्त्व भी विशेष है और इसके अन्दर न दयनेवाला व्यापक तेज है। इसमें भी संपूर्ण देघोंका मुखिया यह असुर्य शनिवाला परमेश्वर है ऐसा स्पष्ट कहा है। अर्थात् परमेश्वरकी विशाल सत्ता इस असुर्य शक्तिके कारणही सबफे ऊपर हुई हुई है। अन्य देवोंमें असुर्य शक्ति नहीं है और केवल इस परमेश्वरमें ही वह शक्ति है, इस कारण परमेश्वरका प्रभुत्व सबके ऊपर हुआ हुआ है। ये मसुर्य यल कितने प्रकारके हैं इस विषयमें निम्न लिखित मंत्र अवश्य देखने योग्य है- चत्वारि ते असुर्याणि नामादाभ्यानि महिपस्य सन्ति । त्वमंग तानि विश्वानि पिसे येमिः कर्माणि मघवञ्चकर्थ ॥ ऋ० १०५४४ "तेरे न दबनेवाले चार असुर्य बल है जिससे विविध कर्म त् इंगोपनिषद् । - " - करता है । " इस ईश्वरकी यह अदम्य शक्ति है इसलिये ही इस जगत के अन्दर चलनेवाले अनंत कर्म यह कर सकता है। और इसी कारण यह सबमे धेष्ठ है। 'असर्य' शब्द जिन मंत्रों में प्रयुक्त हुआ हुआ है पेसे मंत्र अनेक है, उनसे कुछ मंत्र यहां दिये है। इनको देखनेसे पाठकोंको पता लग जायगा कि 'असुर्य' शब्दका अर्थ जीवन शक्ति देनेवाले ईश्वरका अदम्य पल ऐसा है । घेदमे इस असुर्य शब्दका दूसरा अर्थ नहीं है। ईशोपनिषद्के इस तृतीय मंत्रमें जो 'असुर्य लोक शब्द है उसमें यह अर्थ स्पीकृत किया जाय तो "जीवन शकिसे युक्त लोक ' ऐसा अर्थ उस शब्दका बनेगा। जीवन शक्तिसे युक्त तो सपही लोक हैं, सब प्राणी तो हैं ही, विशेषतः सब मनुष्य इस जीवन शक्तिसे युक्त हैं। अन्योका विचार हम यहां छोड़ देते हैं। और केवल मनुष्योंका हो विचार करते हैं । सय मनुष्य यदि इस असुर्य शक्तिसे युक है तो उनमें भले और पुरे सभी लोक आगये, यह स्पष्टही है। जिस प्रकार यह असुर्य पल सज्जनों में है उसी प्रकार दुर्जनों में भी है । यह पढकर पाठक आधर्यसे चकित होगे परन्तु इतना आश्चर्य करने का कारण नहीं है, क्योंकि यह (असु-र्य) प्राणोका बल जैसा सजनोंके शरीरों में कार्य कर रहा है उसी प्रकार दुर्जनोफे शरीरोमें भी कार्य कर रहा है। क्या सज्जनों के शरीरमें ही प्राणशक्ति है और दुर्जनोंके शरीरमें नहीं है? यह कोई नहीं कह सकता। प्राणिमात्र, अदम्य प्राणशक्ति है। यह प्राण- शक्ति मारमाको ही शक्ति है । असु शब्दप्राणवाचक है। 'असुर' शब्द पाणशक्ति देनेघाले आत्माका घायक, और असुर्य शन्द उसके अदम्य पर का वाचक है। इससे स्पष्ट विदित होगा कि आत्माकी असुर्य शक्ति प्राणिमात्र में है। यह शक्ति सज्जन और दुर्जनमें समानतया व्याप्त है। दोनों स्थानोपर यह कार्य कररही है। Me तुलनात्मक विचार । १४७ . - सम्वेदादि चारों वेदोंमें 'असुर्य' शब्दका यही अर्थ है और दूसरा कोई अर्थ नहीं है। ऐसी अवस्थामै यजुर्घदके ईशोपनिषद् (अ०४०) में आये हुए 'असुर्य' शब्दका भिन्न अर्थ मानना कठीन है । वेदमें किसी एक स्थानपर आये 'असुर्य' शब्दका भी भिन्न अर्थ होता, तो ईशोपनिषद्के 'असुर्य' शब्दका अर्थ भी मिन्न मानना संभव होता, परंतु वेदके असुर्य शब्दयाले संपूर्ण मंत्र हमने देखे हैं। उनमें एककामी अर्थ इससे भिन्न नहीं है, इस लिये ईशोपनिषद्के इस 'असुर्य' शब्दका अर्थ ' आत्माकी जीवन- शकि ऐसा ही मानना उचित है। यह अर्थ लेनेपरमी बुरे और भले लोकोंकी व्यवस्था उत्तम प्रकार होजाती है, 'अन्धतमसे व्याप्त असुर्य लोक" और " आत्म- प्रकाशसे प्रकाशित असुर्य लोक" ऐसे दो भेद, इसके माननेसे इस शब्दका ठीक अर्थ ध्यानमें आ सकता है। इस विषय में अधिक विवेचन पूर्व स्थानमें लिखा ही गया है। इसलिए अप इसका अधिक विचार करने की अवश्यकतानहीं है। . मंत्र ४ " घद आत्मा एक, अद्वितीय, सयमें पूर्व, स्थिर, अत्यंत घेग- चान् , जानी और मनसेभी गयान् है। यह गतिवाले अन्य पदा- थोके भी आगे पंहुचता है और उसीके आधारसे माताके गर्भ में आनेवाला जीव काँका धारण करता है। इस मंत्रमें जो आत्माके गुण वर्णन किये हैं वे सप प्रसिद्ध है और उपनिषदादि सब ग्रंथों में वे आगये हैं, इसलिये उनके विषय में अधिक लिसनेको आवश्यकता नहीं है। तथापि इस आत्मा एक होने के विषयमें यहां कुछ लिखना आवश्यक है- प्रथम मंत्रमें "ईश" शब्द एकवचनान्त है, इसलिये ईश एकही S
इंशोपनिषद् ।
॥
-
है यह पात सिद्ध होती है, तथापि अधिक स्पष्ट करने के लिये यहां
इस मंत्र 'एक'शम्द रख कर उमी वातका अधिक स्पष्टीकरण
किया है, इसके साथ निम्न लिखित मंत्र देखिये-
न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्यों नाप्युच्यते ॥
न पञ्चमो न पष्ठः सप्तमो नाप्युच्यते।
नाएमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते ॥
तदिदं नगतं सहः स पप एक एकदेक एच ।।
अथर्य० १३४२
यह ईश्वर दूसरा, तीसरा, चौथा, पांचमा, छटा, सातमा,
माठमा, नवमा, दसमा नहीं कहा जा सकता, यह षडा भारी
घलशाली है, यह पकही है, एकही सर्वत्र घेरनेवाला, केवल
पकही है।
ईश्वरके एक होनेके विषय कितना बल इस मंत्रमें दिया गया
है। उसका अवलोकन पाठक करें। ईश्वरके निःसंदेह एक होने के
विषयमें इस मंत्रको देखने के पश्चात् कोई संदेह नहीं रह सकता।
तथापि उपनिषदोके कुछ पचन यहां देखिये--
आरमा या इदमेक एवं अग्न आसीत् । ऐ० २० १११
कत्येव देवा" एक एव । पृ० उ०३९।१
पको देघः सर्व भूतेषु गूढः ॥ श्वे० उ० ६१
पकस्तथा सर्व भूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो घविश्व ।
फठ०५.१०११
"प्रारंभमें पकही आत्मा या कितने देव हैं। "केवल एकही
देव है । पक देव सब भूतोमें व्याप्त और गुप्त है ॥ सब भूतोका
अन्तरात्मा एकही है, यह प्रत्येक रूपके अंदर है और पाहर भी
॥
इन सब उपनिषद्वचनों में भी परमात्मा के एक दोनेके विषय में
तुलनात्मक विचार। १४९ स्पष्ट शब्दोद्वारा कहा हुआ है। यह सब इसीलिये कहा गया है किजिससे ईश्वरके एक होनेके विषयमें किसीको थोडासा भी संदेह न रहे। सय एकही ईश्वरको माने और उसीकी उपासना करके उन्नतिका सानध करें। इसी चतुर्थ मंत्रमें 'मातरिश्वा' शब्द है। 'माताके अन्दर रहनेवाला' यह इसका अर्थ है। पूर्व देह जिसका छूट गया है और जिसका नया देह पन रहा है, यह जीवारमा माताके गर्भमें रहता है, यह पात सब जानते ही हैं। यही अर्थ यहां अपेक्षित है। द्वितीय मंत्रमें "सौ वर्षतफ प्रशस्त फर्म करो" ऐसा उपदेश है। इस उपदेशानुसार किसीने कर्म किये, परंतु अन्तिम समयके क- मोका फल प्राप्त होने के पूर्वही उसका देहान्त होगया, तोघे किये हुए कर्म कहां जाएंगे? इस शंकाका निराकरण करने के लिये, इस मंत्रमें कहा है कि माताके गर्भ में रहनेवाला जीव भी संस्कार रूपसे काँका धारण करता है।' अर्थात् किये हुए फर्म विफल नहीं होते हैं, परन्तु हरएक किये हुए पुरे भले काँका बुरा भला भोग अवश्य मिलता है। घेदने यह बडी भारी महत्त्वकी बात यहां कही है। इसको जान कर पाठक उत्तम कर्म करें और स्मरण रखें कि अपनी किया हुआ कर्म कमी व्यर्थ नहीं जाता। इस मंत्रमें मातरि-वा' शब्द विशेष महत्वका है इसलिये इस शब्दका आशय प्रकट करनेवाले कुछ मंत्र यहां देते हैं- इन्द्रं मित्रं वरणमग्निमाहुरथो दिन्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्यानमाहुः ।। ०९।१६४४६ अ०९।१५।२८ " एकही आत्माके इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, सुपर्ण, गरुत्मान् , यम, मातरिश्या ये नाम हैं।" इनमें "सुपर्ण" शब्द है जो जीवात्मा परमात्माका वाचक प्रसिद्ध है। द्वा सुपर्णा सयुजा ।
इंगोपनिरन् । सखाया इस - मंत्री सुपर्ण शब्द जोपा(माकामी याचक है। इन्द्र शम्द परमात्माका यायसमें शिप्तीको संदेह नहीं है। यह इन्द्र शन्द जीयामाकामी घारक है और इसीसे 'इन्द्रिय काम्द 'इदशक्तिका' पावक यनता है। यदि इन्दियमें इग्दकी शक्ति है तो निसंदेहन्द्रियके पीछे इन्द्र स्वयं है और यह इन्द्र जीधारमादी है। इसी प्रकार 'मातरिश्मा' शब्दमी जीयामाका घायक है। जिसके पाचक 'सुपर्ण, गरुत्मान् , इन्द्र' ये शब्द हैं, उसीका या चक 'मातरिश्या' शब्द है यह ऊपर दिये हुए मंगसे सिद्ध होता है. यह पात इस मंत्रका विचार करनेवाले को कहनेकी कोई आव- स्यकतानहीं है। पाठक यहां मातरिश्वा रामजीवात्माका याचक होने का अनुमान करें। और देखिये- माणमाहुर्मातरिश्वानं चातो प्राण उच्यते ॥ अथर्व०१३।६।२५ "प्राणको मातरिश्या कहते हैं और इस बायको पापभी कहते हैं।" इस मंत्र प्राणका नाम मातरिश्वा कहा है। प्राणभी जीवा- स्माकी सहचारिणी जीवन शकि है। इन दोनोंक विषयका वर्णन निम्न लिखित मंत्रमें देखिये- मातरिश्वा गुहा सन्तं हव्यवाई समीप । क० ३।५।१० यह मातरिश्या युनिके अंदर रहनेवाला प्रत्यक्ष अग्नि ही है।" हमारी गुहाम अर्थात् यद्धि अथवा हृदयके अन्दर रहने पला अग्नि यहा आत्माही है। यह मंत्रमी इस मातरिश्वा शाद का अर्थ जीवात्मा है यही बात सिद्ध करता है। और देखिये- प्रतस्य तन्तुं मनसा मिमानः सर्वादिशः पवते मातरिश्वा । स०१३३११९ " सत्यके तन्तुको मनसे मापने वाला मातरिश्वा सय दिशाओं. को पवित्र करता है या चलाता है।" यहां सत्यके तन्तुका अर्थ . .
तुलनात्मक विचार । १५१ 4 - " . 'परमारमा' है, जिसको सूत्रात्मा भी कहते हैं । इस सूत्रारमाको जीवात्माही अपने मनसे देखता है और स्वयं पवित्र होकर सब दिशाओंको भी पवित्र करता है। इसके विषय में और एक मंत्र देखिये- तन्नपादुच्यते गर्म आसुरो नराशंसो भवति यद्विजायते । मातरिश्वा यदमिमीत मातरि वातस्य सगों अभवत्सरीमणि । ०३।२९।११ (तन्-न-पात् ) शरीरको न गिरानेवाला (मातरि-श्या) माताके गर्भ रहनेवाला जीवात्मा ही (गर्भः उच्यते) गर्भ है ऐसा कहा जाता है । यही (असु-रः) असु नामक जीवाशक्ति देनेवाला है, उस समय (नर-आशंसः) सप लोक इसीकी प्रशं. सा करते हैं ( यत् विजायते ) जब यह उत्पन्न होता है। इस मंत्रभागमें इस मातरिश्वाका नाम 'तनु-न-पात् ' कहा है। शरीरको न गिरानेवाला' यह इसका अर्थ है । जबतक श. रीरमे यह रहता है तबतक यह शरीर गिरता नहीं, और जब यह इस शरीरको छोड़ देता है तब यह शरीर ऐसा गिर जाता है कि फिर उठ नहीं सकता। यह सब वर्णन देखनेसे मातरिश्वा शब्द जीवात्माका वाचक स्पष्ट प्रतीत होता है । इसके अन्य अर्थ बहुत है, परंतु ईशोपनिषदमें मातरिश्या पद माताके गर्मम स्थित जीवा. स्माका वाचक प्रतीत होता है। पाठक इन मंत्रोंका विचार इस मंत्रके साथ करें और आत्माके गुण जानकर उनसे सचित होने. वाला आत्मोन्नतिका मार्ग आक्रमण करनेका यत्न करें। मंत्र ५ से ७ आत्मा समीप और दूर, अन्दर और बाहर सर्वत्र है । (५) जो सब भूतोको आत्मा और आत्माको सब भूतोंमें देखता है .
१५२ ईशोपनिषद् । इस " यह किसीका तिरस्कार नहीं करता । (६)जिस समय आत्माही सप भूत प्रतीत होने लगा उस समय सर्वत्र एकत्व देखने वालेको शोक और मोह नहीं होते। (७)" यह इन तीन मौका भाव है। में आत्मा शब्द महत्त्वपूर्ण है। इस आरमाके गुणोका विचार वैदिक मंत्रोंसे अब करते है। देयो न यः सविता सत्यममा करवा मिपाति वृजनानि विश्वा। पुरुषशस्तो अमतिर्न सत्य आत्मेय शवो दिधिषाय्योऽभूत् ॥ स० ११७३३२ 'जो सत्यविचारवाला सविता देव है यह अपनी कर्मशकि द्वारा संपूर्ण दुष्कृत्योंसे रक्षा करता है। यह अत्यंत प्रशंसनीय सत्य. निष्ट देव आरमाके समान ही सेवनीय है। इस मंत्रमें कहा है कि जिस प्रकार आरमा सेवनीय है, उसी प्रकार सविता देव भी है । अर्थात् आत्माको परिचर्या अवश्यही करनी चाहिये। कई लोग बाह्य पदार्थीको सेवा करते हैं, कई अपने शरीरकी, और कई लोग अपने इंदिगोको सेवामै रमते हैं। कई अपनी घुद्धीकी पृद्धि करते हैं और कई अपने मनकी तर्कना शक्ति बढाते हैं । इतने सय प्रयत्न करते हुए भी लोग अपने आत्माकी उतनी सेवा नहीं करते, कि जितनी आत्मासे भिन्न अन्य पदार्थों की किया करते हैं। यह बड़ा भारी आधर्य है। इसलिये इस मंत्रमें सूचित किया है कि आत्माहो प्रथम उपास्य और सेयनीय अथवा संभजनीय है। इसलिये कहा है- आरमा यशस्य पूर्व्यः । का० ९।२।१० 'आरमाही यश सपसे पूर्व उपास्य है। इसका अर्थ यह है कि आरमाके सुधार करने का विचार मनुप्यको सबसे प्रथम कर- मी चाहिए, और उससे मिन्न अन्य पदार्थीका सुधार करने का विधार उसके पश्चात करना चाहिये । प्रायः लोग पाह्य पदापोंक - 11 तुलनात्मक विचार । " सुधारका यत्न करते हैं, पर आमसुधारको ओर कम ख्याल क. रते हैं । इस कारण मनुष्यको उन्नति जितनी होनी चाहिये उतनी नहीं होती। पाठक इसका विचार करेंगे तो उनको अपने सुधार के कार्यमें बहुत घोध प्राप्त हो सकता है। यह आत्मा सब देवों- कामी आत्मा है इस विषयमें निम्नलिखित मंत्र देखिये- आरमा देवानां भुवनस्य गर्भो यथावशं चरति देव पपः। प्रोपा इदस्य शृण्विरेन रूपं० ॥ ऋ० १०११६८४ यह देवोंका आत्मा, भुवनोंका गर्भ है। यह अपनी इच्छाके अनुरूप चलता है। इसका रूप नहीं दिखाई देता है फेवल इसका घोप सुनाई देता है। इस मंत्रमें वायुफे वर्णनसे आरमाका य. पनि किया है । जिस प्रकार वायु का शब्द सुनाई देता है परंतु अप नहीं दीखता, उसी प्रकार आत्माका रूप नहीं दीखता, परंतु उसके कार्य दिखाई देते हैं। यह सबमें रहकर सपको प्रेरणा देने चाला एक आत्मदेव सय देवोंकाभी आत्मा है। शरीरमें सब इंद्रि याण देवताओके अंश हैं, उनको जीवन देनेवाला यह आत्मा है, और इन सब इंद्रियोंकी उत्पत्ति करनेवाला किंवा अपनी शक्तिको विविध इंद्रियों में विविध कार्य करने की योग्य स्थिति में रखनेवाला यह आत्मा है। पाठकोंको चाहिये किये अपने आत्माकी यह शक्ति अपने अंदर अनुभव करें और 'मैं आत्मा हूं' ऐसा समझकर, मैं अपनी शक्ति जिस इंद्रियमें चाहे रखंगा और जिसमें से चाहे वाए- स लेलंगा पेसा निश्चय करके अपनी शक्तिपर इस प्रकारका प्रभुत्व संपादन करें। जो आत्माकी शक्ति जिधर मरजी उधर भटक रही है उस शक्तिको अपनी इच्छानुसार सत्कर्ममें लगानेका नाम संपम है। यह इस अनुष्ठानसे साध्य हो सकता है। मैं इस संयम शकि से कदापि दूर न होऊ ऐसा संकल्प करने की सूचना निम्न लि- खित मंघ देरहा है, उसको अब देखिये- ईशोपनिन्द। माहं प्राणेन मारमना मा प्रजया प्रतिगृह विराधिपि । अथर्व० ३।२९।८ । 'मैं आत्मा, प्राण और प्रजा इन शक्तियों से अलग न होऊ।" अर्थात् मेरे पास ये शक्तियां उत्तम अवस्था रहें और मेरी उन्नतिकी साधना में इनसे सहायता प्राप्त हो। कभी ऐसा न हो कि अल्प आयमें प्राण चला जाये, प्रजा नष्ट हो जाये और आत्मामी हीन बल होकर गिर जाने । कभी इस प्रकारकी संभवना उत्पन्न न होने पाये। मनुष्यको प्रयत्न करके आत्मिक, प्राणसंबंधी और सुप्रजानिर्माण विषयक पल अपने अंदर स्थिर और स्वाधीन करना चाहिये। केपल पल यदनेसे कार्य नहीं होगा परंतु उस घलपर अपना प्र. भुत्व होना चाहिये । इस प्रकार अपनी शाकि पढ़ते बढते सर्वात्म- भाव की स्थिति प्राह होती है जिसका वर्णन निम्न लिखित मंत्र में पाठक देखें- सूर्यो मे चक्षुर्वात प्राणोऽन्तरिक्षमात्मा पृथिवी शरीरं । अस्तृतो नामाऽहमयमस्मि से आरमानं निदधे धावा- पृथिवीभ्यां गोपीचाय "सूर्य मेरा चक्षु है, घायु मेरा प्राण है, पृथिवी मेरा शरीर है और अन्तरिक्ष मेरा आत्मा है। मैं (अ-स्तृतः) कभी न मरने घाला हा ऐसा मैं अपने आपको द्यावापृथिवी द्वारा सुरक्षित होने के लिये समर्पित करता हूं।" परमात्मामें अपने आत्माको लीन करनेसे अपने अन्दर सर्वात्मभाव आजाता है, इस अवस्था में यह ज्ञानी अपने आत्माको सर्वात्मरूप देयता है। उस समय यह कह- ता है कि मेरी आंख सूर्य है और पृथ्वी शरीर है तथा वायु प्राण है। अपने प्राकृतिक अनुभवकी दशामें भी यह सत्य है । क्यों कि सूर्यके विना हमारे नेत्र क्या कर सकते हैं? हमारे नेत्र देखते हैं तो ये सूर्यकी सहायतासे ही देखते हैं । इसी प्रकार हमारा शरीर अथर्व० ५।९।७ । ।
तुलनात्मक विचार। भी पार्थिव ही है । यह तो स्थूल अर्थमे सत्यही है। परंतु यहां सर्वात्मभावकी दृष्टि से कहा है। सर्वात्मभावकी दृष्टिसे ही जय जोवात्मा परमात्मामें लीन होता है तब वह साधक अपने आपको अपने शरीरसे भिन्न और महान समात्माले संयुक्त अनुभव करता है। इस समय इसका रक्षण इसके मातापिता नहीं करते प्रत्युत जगत् के मातापिता द्यावापृथिवी उसके रक्षक धनते हैं । यह भी अपने आपको उनके सन्मुख रख देता है और उनसे सुरक्षित होता हुआ अपने आपको अमर अनुभव करता है। इसी समय साधक का भाग्य खुल जाता है और उसमें दिव्य शक्तिका आवि. र्भाव होजाता है। दूसरोके दुःख दूर करने के लिये उनके दुःखोको अपने सिरपर लेता है और अपना सुख दूसरों की शांति बढाने के लिये उनके लिये अर्पण करता है तथा अपने अन्दर सुखदुःखोंको सम देख कर सुखदुःख आनेपर हर्षशोक नहीं करता । इस प्रकार इस सर्वात्मभाव की सिद्धि है। यह आत्मा अमर है और शरीर नाशवंत है, ऐसा माननेसे शरीरको किसीसमय आत्मा छोडता है और पुनः धारण करता है, यह यात स्वयं सिद्ध होती है। इसीलिये साधक आत्मा ऐसी प्रार्थना करता है- पुनः प्राणः पुनरात्मा न एतु पनश्चक्षुः पुनरसुन एतु । वैश्वानरो अदधस्तनपा अन्तस्तिष्ठाति दुरितानि विश्वा ।। अथर्व०६।५३१२ . पुनरिवन्दियं पुनरात्मा ॥ अथर्व० ७६१ "मेरी चक्षुः प्राण और आत्मा मुझे पुनः प्राप्त हो, सब इंद्रिय मुझे पुनः प्राप्त हो । म दयनेवाला, शरीररक्षक, विश्वका नेता, आमा मेरे अन्दर है। " इत्यादि मंत्र इंद्रियादियों को पुनः पुनः प्राप्ति होती है, इस पातको बता रहे है। इंद्रियादियोंकी पुनः पुनः १५६ ईशोपनिषद्। प्राप्ति होने का अर्थ पुनर्जन्मका होनाही है। जिस प्रकार इस जन्म में सय दिपादिक पयायोग्य हैं उसी प्रकार अगले जन्ममें प्रास हो और मैं उनकी सहायतासे उन्नतिको प्राप्त करूं। यह आशय इस प्रार्थना का है। इस रीतिसे पुनर्जन्ममें यह चलता रहता है। इस मृत्युभयसे दूर होने का उपाय है या नहीं, अथवा जन्ममृत्युका दुःख इसको अखंड ही भोगते रहना चाहिये ? इस शंकाका निरसन यह मंत्र - निएकाम, अकामो धीरो अमृतः स्वयंभू रसेन तृप्तो न कुतश्च नो नः। तमेव विद्वान विमाय मृत्योरारमानं धीरमजरं युधानम् ॥ अथर्व० १०1८४४ परमात्मा आप्तकाम, सदातृप्त, धीर, अमर, स्वयंम्, सर्वत्र व्याप्त, अजर, युघा और धीर है। उसको जान से मृत्युका भय नहीं होता।" यह मत्युके डरको इटानेका उपाय है। सर्यात्मभावसे पनने का अर्थ इन गुणों से युक्त यनना है। स्वयं तृप्त, संतुष्ट, निर्भय और तरुण जैसे उत्साही पनने और अन्यान्य गुण अपने आत्मामें बढानेसे यह निर्भय वृत्ति अपनेमे स्थिर हो जाती है। एक बार यह भाप अपनेमें पढ गया तो फिर मृत्युका भय उसको नहीं रहता। इस प्रकार इन मंत्रों का मनन पाठक ईशोपनिषद्के ५से. तक के तीनों मंत्रों के साथ करें और आत्मोनतिके वैदिक मार्गको जानकर स्वयं अपने प्रयलसे अपनी उन्नति करें। शोपनिषद्के शेप मंत्रोका माव स्पष्ट है और उस कारण अन्य मंत्रोसे तुलना करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यहां ईशोपनिषद्के मंत्रोंका तुलनात्मक विचार समाप्त हुआ।
ईशोपनिषदका रूपान्तर।
१५७
ईशोपनिषद्का रूपान्तर
श्रीमद्भागवतमें
ইয়াব
श्लोकांक
१ आरमावास्यमिदं विश्वं यत्किय जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।।
श्री० भागवत १०
६ सर्व भूतेषु यः पश्येद्भगवद्भायमात्मनः ।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥
श्री० भागवत १११२१४५
६ आत्मानं सर्व भतेषु भगवन्तमवस्थितम् ।
अपश्यत्सर्वभूतानि भगवत्यपि वात्मनि ।
श्री भागवत ३१२४४६
७ यदा तु सर्वभूतेषु दारुण्यग्निमिय स्थितम् ।
प्रतिवक्षति मां लोको जह्याचहींव कमलम् ॥
श्री० भागवत० ३११/३२
महाभारतमें
६ स्वयि सर्वाणि भूतानि सर्वभूतेषु चासि च ।
गुणानां हि प्रधानानामेकत्वं त्वयि तिष्ठति ॥
म० भारत सौतिकपर्व ५८
[इस प्रकार इतिहास और पुराणों के ग्रंथोंमें ईशोपनिषद्का
सपान्तर है। विद्वान पाठोंको उचित है कि ये इसकी अधिक
खोज करें और रूपान्तरके श्लोक निकाल कर उनकी तुलना
ईशोपनिषद् के साथ करें और सवित घोध प्राप्त करें।
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विषयानुक्रमणिका १५९ विषयानुक्रमणिका. ४ ५ विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ यजुर्वेदकी संहितायें। ३ संभूति और असंभूति। ૨ अध्याय का नाम दैतवाद और अद्वैतवाद । ४८ इस सूक्तका देवता। মায়া। अनेक नामोले पक ईशोपनिषद् । ५३ तत्वका वर्णन एक मार्ग। ५४ इस अध्यायका ऋषि। १० यजुर्बेद संहिता-पाठः। ५५ ब्रह्मदेव। ११ काण्व-संहिता-पाठ ईश उपनिषद्का महत्व। १३ । ईशोपनिषद् का शांतिमंत्र । ६१ इस अभ्यायको रचना। १४ आत्मोन्नतिका मार्ग। ६३ মায়াঙ্কা গান। १६ / आत्मघातका मार्ग। ६७ वेदांत के अध्ययनका आत्म-तत्वका वर्णना काला १८ समबुद्धि । ७३ निष्काम कर्मयोग। २१ सर्वत्र आत्मवार। शन और कर्मफे समुच्चयका परमात्माके गुणवर्णन। मुरय हेतु। २४ । मान-क्षेत्र। ७७ आत्म वाचक शब्द। २५ / कर्म-क्षेत्र । ૮૨ विशेष नामोंका परस्पर सत्यधर्मका दर्शन। संबंध। २८. उपासना। आत्मज्ञानकी आवश्यकता। ३५/ आत्मपरीक्षण । विद्या और अविद्या। ३७ / मार्थना।
इंचौपनिषद्।
पृष्ट विषय
सूचना।
विषय
पृष्ट
परमेश्वरका नामसंकीर्तन । ९५ तीन मार्ग।
प्रहण करने योग्य गेध। ९८ विरोधका परिहार
१०४ असुर्य लोक।
मनुष्यका साया १०५ लोक।
साधना
१०५ घनका अपहार।
कर्ममार्ग।
१०६ अग्नि-देयता।
आग्यात्मिक कार्यक्षेत्र। १०७/देत और अद्धत।
१३३
आधिभौतिक कार्यक्षेत्र। १०८ मंत्रोका तुलनात्मक विचार।१३५
आधिदैविक कार्यक्षेत्रा
-यह और अपना
१०९ मंत्र २१
कर्म, अकर्म और विकर्म । ११० मं।
२४२
अमरत्य प्राप्तिका मार्ग। १११ मंत्र ४।
सत्यनिष्ठा
सिंहावलोकन।
११६ श्रीमद्भागयतमें और
वेदका आदेश १९७ महाभारतमें शोपनिषद्के
उपनिषदका मायार्थ। २२० मंत्रोंका रूपान्तर
१४०
११६ मंत्र से
५७