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समीक्षाकर

Prabhudayaal · 2005/07/25

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३२, ८०६
mpanjule
समीक्षाकर
अर्थात्
नवीन सांस्य वेदान्तादि के परस्पर विरुद्ध वादी
... का निराकरण और विरोधाभासों का समाधान
संस्कृत तथा देशभाषा में
जिसे
1
पण्डित श्री प्रभुदयालु माफ़ीदार व इलाकेदार
मौजा तेरही जिला बान्दा ने रचा
और करण ।
श्रीस्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती स्थापित वैदिक
पुस्तक प्रचारक फण्ड हार प्रकाशित हुवा
पुस्तक संख्या २६..
प्रार्य अत्सर १८७२९४८
पं० तुलसीरामस्वामी सम्पादक “सामवेदभाष्य” व
"वेदप्रकाश" के प्रबन्ध से स्वामियन्त्रालय
A
मेरठ में
मुद्रित कराया।
५०० प्रति
ता०१।२१९
मूल्य

pe वैदिकपुस्तकप्रचारकफण्ड के सहायतार्थ आई ओपधियां- (इम का अर्ध मल्य भारतोद्धारक की सहायता में लगेगा-शीघ्र मंगावे ) (१) कोष्टवल्ल भावटी म० एक डिबी ॥) इस को खाने से कोष्ट (पेट-मेदा) शुद्ध हो जाता है तथा अफरा, पेट का फूलना, ज्वर, जुरी, तिजारी, वातरक्त मल कोष्ट, गठिया, सिर का दर्द इत्यादि शीघ्र शान्त होता है । (२) रूधिर परिष्कार वटिका अर्थात् आयुर्वेदीय मानसा म० २)-खून को साफ़ करती है अशुद्ध पारा और कोई कच्ची धातु खा ली होवे उम के लिये बड़ी लाभकारी है सिरका दर्द वा चक्कर, जोड़ों का दर्द गर्मी अर्थात् आतशक ओर गठिया को दूर करती है । (३) इन्द्रवज वर्ण मल्य ॥८) बीमो प्रमेह तथा वीर्यक्षय के सब प्रकार के रोग को आराम करती है यह एक महात्मा की बलाई बड़ी लाभकारी महौषधि है, यदि निरोग भनुष्य भी उसे एक महीने में श्राठ बार मेयन करे तो स्वप्न दोष कभी न होवे । (४) प्रमू पारि वटी मूल्य ५) प्रमूता स्त्री के निय यह मंजीवनी है इस मे शरीर की दुर्बलता, हाय पैर व कमर का दर्द आंखो का जलना अन्न का न पचना आदि रोग शान्त हो जाते हैं। (५) गन्धवदी म०॥) इस से अग्नि भन्द, पेट का फलना, वादी से हुकार का आना आदि रोग दूर होते हैं पाचन के लिये रामवाण है। (६) खांसी की गोली ५० का मूल्य ॥) सर्वप्रकार की नई पुरानी खांसी दूर हो जाती है। (७) त्रिपुर भैरव वटी १) यह मुसा करने वालो को अवश्य साथ रखनी चाहिये इस के सेवन मे फैमा भी खराब पानी हो बाधा नहीं करता और हैजा कभी पास ही न आवेगा। (८) दन्त वत्र मजन म० ।) इस के मलने से मसुड़ी से रक्त निकलना, दांतों का पोला पड़ जाना, मुप मे दुर्गन्ध का आना, दांत अथवा डाढ़ का दर्द वा हिलना इत्यादि शीघ्र आराम हो जाता है। (C) अमृत मंजरी गुटिका १) इम मे भर्वप्रकार का नया या पुराना ज्वर प्लीहाज्वर जुड़ी प्रादि दूर होते हैं तथा भूख लगती है कई नेन का दादा है। (१०) अमन संजीवनी बूंदी।) हैजे के लिये बड़ी ही उत्तम लाभदायक है यदि उस समय मेवन की जाय तो हैजा पाम न आवे सर्व महाशय को सदा माथ रखनी चाहिये ।।

. ओ३म् परमात्मने नमः मत्यंज्ञानाकरंनत्वासमीक्षाकरनामकः। सत्यासत्यप्रदायग्रन्थोग्यरच्यतेऽ- टमः॥१॥ निर्मीयमाया मूहयैनंनिर्मितंगणनमया। प्रागनोनिर्मितश्चास्यक्रियतेनि न कंयथा ॥२॥ काणादन्यायमाङ्ख्यानांयोगवेदान्तयोस्तथा । मत्राणांहिविभागे- नभाष्यागयुक्तानिभाषया ॥३॥ प्राशस्तपाद कंनाघ्यं भाप्यं वैशेषिकस्य यत् । कृत- म्तस्यानुवादश्चग्रशावन्योविनिर्मिती ॥४॥एको ज्ञानप्रकाशाख्यःममीक्षाकरना- मकः। द्वितीयोनिर्मिता ग्रन्थाःसर्वेऽष्टम सर्वेऽष्टमसयकाः ॥ ५॥ कश्चिन्माज्ञातुमिच्छेचे विशिष्टमितिचिन्तनात् । पर्वग्रन्याधिकंम्पानांदिस्यते यत्रवर्णनम् ॥६॥ सुम्बापः मुधीःश्रीमान्धर्मात्मामद्गु गान्धितः। जालोगङ्गाप्रमादोमेग्रन्थकत्तःपितामहः ॥७॥ गयाप्रमादस्तस्याद्यश्चतुर्पतन्जेयः। अभृत्तजापकोदानीपुगणश्रवणोरतः॥८॥द्वि- तीयोमयुगापर्वःप्रमादामप्रतापवान्। लोको नतिप्रयत्नेगुदक्षो व्यवहारेष्वभूत् ।। प्यारेलालम्वृतीयोऽभूवैष्णवेभ्योधननिजम् । विप्रेभ्यश्चापिदीनेभ्योददाद्धर्मपर- स्मदा ॥१०॥ लानान्तोमोहनस्तुर्योऽकरोल्कहिकतथा । सपऱ्यांनियतेकालेपु- राणचा गोत्मदा ॥११॥ जानोगयाप्रमादाद्वैमाधवोऽणप्रमादयुक् । मच्छी लस्सु- प्रसिद्ध मातीतस्थात्मजावुगौ ॥१२॥ श्रद्धासुशीलान्वितविष्णुभमःप्राश्याम शब्दान्वितसुन्दरोयः । नाम्सासमहुर्मपरोद्वितीयःसाध्योऽनुजस्तस्यसुतीनबुद्धिः ॥१३॥ राधेपूर्वस्नगोविन्दःख्यात्यादक्षःसुधैर्यवान् । जातंहाखिशियमेतस्मि- न्तस्याग्रओतथा ।।१४॥ तौचापिझम्यक्प्रणयान्वितावमच्छीलवृत्याभशतो*गुरु माम् । लोकोपकागयनिजप्रमियायारामकूपौरचितौहिताभ्याम् ॥१५॥ दाना- दयानर्धर्मात्माप्यारेलालम्तदात्याः । एकःकृष्णा दयालुश्चद्वितीयो यशशुभान्गुणान ॥ १६ ॥ श्राकृष्णशोतवान्पद्यैषियाब ननिर्मितः । दयालोः प्राग्रघुघरस्तु- तीयःप्राक्प्रभुस्त्वहम् ॥१॥ द्वितीयायाशङ्करस्तत्कनिष्ठोजगन्नाथनामापिल- स्यानु जोऽभूत् । मुनामा र अमराज पूर्व:किशोरस्तथाश्यामपर्व किशोरस्तृतीयात् । ॥१८॥ सहायशब्दोबलदेसपूर्वस्तथामहायोहरदेवपूर्वः । इनौसुतौमोहनलाल तोद्वौतयोःकनिष्ठस्यसुतौहियौ ॥१९॥ मरय केशवयुल्लीप्रसादावितिसुसंज्ञाभ्या- मुक्ती । इतिसंक्षेपत उक्तवंशप्रख्यातयेस्यस्य ॥२०॥ नोत्कृष्टिविज्ञापनमात्रहंतुंप्रशं सनंवैनिजवंशजस्य । कस्याप्यतोयत्कथितंममूलंधर्मस्यमूलंहियतोस्तिमत्यम् x . *ताभ्यांपितृव्यत्वसम्बन्धेनवममगुरुत्वंतदध्यापकत्वेनापि। Browmorate १ २ समीक्षाकर ॥ ॥ २१ ॥ त्यक्तंमयाह्य मुख्यत्वादधिकंवंशवर्णनम् । अथेशंप्रार्थयन्पूर्णं ग्रंन्यःप्रार- भ्यतेऽघुना ॥ २२ ॥ अथ भाषानुवादः सत्यज्ञानाकर रूप परमात्मा को प्रणाम कर के सत्य अमत्य के निर्णय के लिये मैं इस आठवें समीक्षाकरनामक अन्य को निर्मित करता हूं ( बनाता हूं) ॥१॥ यह जो अभी बनाया जाता है इस को बने हुये के समान कल्पना फरके (मान कर) इस से पहिले जो ग्रन्थ निर्मित हो गये हैं (बन गये हैं) उन के साथ नीचे के लेख में इस का भी गणन किया जाता है अर्थात् यह भी गिना जाता है ॥२॥ काणाद (वैशेषिक दर्शन) न्याय, साङ्ख्य, तथा योग व वेदान्त इन शास्त्रों के सूत्रों के भाष्य, विभाग से देशभाषा में वर्णन कियेगये हैं अर्थात् इन में से प्रत्येक शास्त्र के भूत्रों का भाष्य पृयक् २ देशभाषा में वर्णन किया गया है ॥ ३ ॥ प्रशस्तपाद ऋषि का बनाया हुआ जो वैशेषिक दर्शन का प्रशंसनीय भाव है उस पर अनुवाद (तरजुमा) किया है और दो अन्थ और बनाये हैं यह यह हैं ॥४॥ एक मिस का ज्ञानप्रकाश व दूसरा जिम का समीक्षाकर नाम है, इसने वह सब आठ ग्राथ निर्मित हुये (बनाये गये) ॥५॥ कदाचित् कोई गुको विशिष्ट जानने की इच्छा करै अर्यात् विशेषता से मेरे जानने की इच्छा तर इस से विशेष परिचय भी लिखना चाहिये इस विचार से पूर्वोक्त मन्यों से वा इस ग्रन्थ से पूर्व सङ्ख्यात जो ज्ञानप्रकाशग्रन्थ है उस से अधिक अर्थात् उस में पिता का नाम वासस्थान व नाममात्र वर्णन किये हुये से अधिक उस मैं (इस ग्रन्थ में) अपनों का अर्थात् वंशगम्बन्धियों का भी वर्णन लिखा जाता है ॥ ६ ॥ सुन्दर स्वरूपवान् सुबु. द्विमान् श्रीमान् धर्मात्मा उत्तम गुणों से युक्त ऐमे गङ्गाप्रमाद नामक मुझ ग्रन्धकर्ता के पितामह हुये ॥ ७ ॥ नन के चार पुत्रों में से पहिले (ज्येष्ठ) गयाप्रसाद हुये वह जाचक (पररोवर के नाम के जप करने वाले) दान करने वाले और पुराणों के अवण में रत हुये ॥८॥ दूसरे मथुराप्रमाद हुये वह प्रता- पवान लोक में उन्नति करने के प्रयनों में (संसार में तरक्की करने की तदबीरों में) और व्यवहारों में (नोकव्यवहारों ने) प्रवीण हुये ॥९॥ तीसरे प्यारेलाल हुये जो अपने धन को धैष्णवों ब्राह्मणों और दीन जनों को देते हुये सदा धर्मनिष्ठ रहे ॥१०॥ चौथे मोहनलाल हुये उन्होंने सदा नियत काल में सब सांमारिक कामों को किया और ऐमा ही मियत काल में पूजन किया और समीक्षाकर॥ ३ पुराण को सदा श्रवण किया ॥११॥ गयाघ्रपाद से माधवप्रसाद हुये वह उत्तम शीलवान अच्छे प्रसिद्ध हुये उन के दो पुत्र हुये ॥ १२ ॥ एक जिन का श्याम- सुन्दर नाम हुआ वह श्रद्धा सुशीलयुक विष्णु भक और सद्धर्मपर हुये और उन के छोटे भाई राधेगोविन्द नामक प्रशंमा के योग्य अच्छे तीव्रबुद्धि (तेज़ अत) धैर्यवान प्रयीण हुये उन में और वैसे ही उन के ज्येष्ठ भ्राता में हृदय से मेरा विशेष स्नेह हुआ॥१३ व १४॥ और यह दोनों भी अतिनम्रतायुक्त उत्तम शील वृत्ति से जैसे गुरु की ( बड़े की ) सेवा करना चाहिये वैसे ही हमारी सेवा करते हैं और मानते हैं लोक के उपकार के लिये और अपनी प्रसिद्धि के लिये इन दोनों ने एक बाग़ लगाया है, और एक जुबां बनवाया है ॥ १५॥ दान के देने वाले दयावान धर्मात्मा प्यारेलाल के प्रात्मज (पुत्र) एक कृष्णदयालु हुये दूसरे जिन्होंने श्रीकृष्ण चन्द्र महाराज के उत्तम गुणों को अपने देशभाषा में बनाये हुए पदों में वर्णन किया है ऐसे रघुवरदयालु हुये और तीसरा प्रभुदयालु मैं हूं ॥१६ व १७॥ दूसरे से दयाशङ्कर उस से छोटा जगन्नाथ और उस मे भी छोटा भाई ब्रजराजकिशोर यह तीन हुये और तीसरे से श्याम- किशोर हुआ ॥ १८॥ बनदेवनहाय व हरदेवमहाप यह दो पुत्र मोहनलाल के हुये उन में से छोटे के अर्थात् हरदेवमय के दो पुत्र हुये ॥१॥ वह सरयूप्रमाद व केशवप्रसाद इन दो नामों से युग में । अपने वंश की प्रख्याति के लिये ( ज़ाहिर होने के लिये ) यह संक्षय ने यंग का वर्णन किया गया ॥२॥ केवल बड़ाई जनाने के लिये इम में कुछ प्रशंगा (तारीफ) किमी अपने वंश में उत्पन्न हुये की नहीं है इस से जो कुछ वर्शन किया गया है वह सब समल है क्योंकि धर्म का मूल सत्य ही है इम में सत्य ही कहा गया है अत्युक्ति नहीं किया ॥ २१॥ इस ग्रन्थ में वंश का वर्णन करना मुख्य नहीं है। इन से अधिक वंश को वर्णन नहीं किया इस मे अनन्तर परमेश्वर से यह प्रार्थना करते हुये कि इस ग्रन्थ को निर्विघ्न पूर्णता को प्राप्त करें अब ग्रन्ध का प्रारम्भ किया जाता है ॥२२॥ अत्रवैशेषिकादिदर्शनार्षग्रन्थान्तर्गतविशेषसूत्राणां बहुभिराधुनिकव्याख्या- कारैरन्यथाव्याख्यातानामर्थं समीक्ष्य तत्त्वं निर्णीयते,येनविद्याभिलाषिसत्पुरुषा- णां हृदयेसत्यार्थोपदेशकाप्तमहर्षिप्रणीतोलमूत्राणांयथार्थाशयः एकाशिष्यतेप्रा. धुनिकतत्तद्भाष्यटीकाकाराश्वपक्षपाततः प्रमादतश्चयत्तेषामयुतमसत्यार्थव्याख्याय धर्मेऽधर्मविद्यायामविद्यांसंस्थाप्यार्थमनर्थकृतवन्तस्तद्भक्ष्यते अतःपान्देशभाषा ४ समीक्षाकर। मात्रज्ञातृभ्यः संस्कृतवाण्यामविशेषाधिकारिभ्योवानार्यावर्तनिवामिविद्या- भिलाषिपुरुषेभ्योवैशेषिकायुक्तदर्शनानां भाष्याणि देशभाषयामयानिर्मितान्य- तोऽस्मिन् तत्तद्विशेषसत्राणामेयव्याख्यानंकरिष्यते येधामाधुनिकटीकाऽथभाध्य- कारैःकृतं व्याख्यानञ्चतत्पाठकान्ह्यविद्याभ्रमावरणअन्यान्धकारएवाक्षिपतियेनते विद्याप्रकाशंसत्यार्थस्वरूपञ्च नोपलभन्तेतस्मात्मविद्याभिलाषियिद्वद्भिः सत्पु- रुपैराप्तर्षिनिर्मितानां बाप्तत्वधर्मयुक्तनिर्मित ग्रन्थानां तत्कृत व्याख्यानभाया- णामेघवापठनपाठनाभ्यासः कर्तव्यः नाधुनिक पक्षपातग्रस्त हृदयपुरुषनिर्मितग्र- न्यानां भाष्याणांवापठनपाठनञ्चशोभनमस्तिएलद्वक्ष्यमाणव्याख्यानाविचार- तश्चनिश्चयपदंयास्यति। यद्यप्युक्तभाष्येषकृत्स्नंव्याख्यानंकृतमस्तितथाप्यत्रपथग व्याख्यानस्यै तत्प्रयोजनपूर्वोक्तदर्शनेषुममीक्षितविशेषस्थलोक्तविषयाणां ता- त्तियाज्ञानस्यात्रैकत्रोपलब्धिर्भवत् अनेकग्रन्थाध्ययनपाठविचारेष्वाकाक्षित- प्रमाधिक्ष्यं तत्र भाव्यालसञ्चनावगच्छेत । अल्पपरिश्रमयथार्थज्ञान नलाभोविद्या- भिलाषिणःप्राप्नुयाञ्चेति । यद्यत्रकुत्रचित्किञ्चिद्दोषयुक्तंप्रतीयततद्विद्वज्जनैर्विमा- जनीयमिति मत्प्रार्थितंवेद्यमिति । तत्रश्रीमद्वात्स्यायनर्षिकृतन्यायमाध्यस्या- शयं प्रगृह्य श्रीमद्व्यासमहर्षिप्रणीतयोगदर्शनभाष्य मनुस्मृत्यन्याययोगदर्शनभाये - निर्मित्ते तयोरार्षाक्तयनुगतत्वाद्विचारतोप्यनवद्यत्वात्ममीक्षात्रनकृतेतिउतरे- पामार्षपराचीनभाष्योपलव्ध्यावे तेपाञ्चार्पशाप्यानुसारतोयानिपूर्वमहाशया- चाय॑र्भाष्याणिनिर्मित्तानि तदाशयसाहाय्यंस्वीकृत्यस्वयिचारतोऽपिभाष्याणि- निर्मायार्षमतविरुद्धव्याख्यातणामाधुनिकवृत्तिभाष्यकाराणांव्याख्यानांसमीक्षात्र प्रारभ्यते ॥ अथास्य भाषानुवादः इस में वैशेषिक आदि दर्शन आर्य ( अधिप्रगीत ) ग्रन्थों के अन्तर्गत विशेष सूत्र जो बहुत प्राधुनिक व्याख्याकारों से अन्यथा व्याख्यान किये गये हैं उन के अर्थ की समीक्षा करिकै तत्व का निर्णय किया जाता है जिस से वि- याभिलाषी मत्पुरुषों के हृदय में सत्य अर्थ के उपदंश करने वाले प्राप्त मह- पियों के बनाये हुये उक्त सूत्रों का यथार्थ प्राशय प्रकाशित होगा, प्राधुनिक उन के भाष्य टीकाकारों ने पक्षपात से वा प्रमाद से जो उन के अयुक्त व असत्य अर्थ को व्याख्यान कर के अर्थ को अनर्थ किया है वह प्रकट होगा। इम से पहिले देशभाषामात्र जानने वाले संस्कृत वाणी में विशेष अधिकार को न प्रास हुये आर्यावर्त देशवामी विद्याभिलाषी पुरुषों के लिये धैशेषिक - समीक्षाकर ॥ S प्रादि दर्शनों के भाष्य देश भाषा में मैं ने निर्मित किये हैं इस से इस में उक्त दर्शनों के उन विशेष सत्रमात्रों का व्याख्यान किया जायगा जिन का आधुनिक टीका अथवा भाष्यकारों से किया हुआ व्याख्यान अपने पढ़ने वालों को अविद्या व भ्रमरुप आवरण से उत्पन्न हुये अन्धकार में डालता वा फेंकता है जिम से वह विद्यारूप प्रकाश को और सत्य अर्थ स्वरूप को नहीं प्राप्त होते वा नहीं जानते हैं। इस मे मब विद्यालिलाधी विद्वान् सत्पुरुषों को प्राप्त ऋषियों के बनाये हुये अथवा प्राप्तधर्म युक्त सत्पुरुषों के निर्मित ग्रन्थ भाष्प व व्याख्यानों के पठन पाठन का अस्पाम करना चाहिये, जिन का हृदय पक्ष- पात से ग्रस्त है ऐसे आधुनिक पुरुषों से निर्मित ग्रन्थ व माव्यों का पड़ना पढ़ाना अच्छा नहीं है यह वक्ष्यमाख व्याख्यान व विचार से निश्चय को प्राप्त होगा। यद्यपि उक्तभाष्यों में मब व्याख्यान कर दिया गया है तथापि यहां पृथक् व्याख्यान करने का यह प्रयोजन है कि उक्त दर्शनों के विशेष स्थलों को जिन की समीक्षा की गयी है उन के तात्त्यिक ज्ञान की यहां एकत्र ( एक जगह ) प्राप्ति हो। जिम से अनेक ग्रन्थों के पढ़ने व विचारने में जो अधिक श्रम प्राकाङ्कित है और जो उस में आलस्य होना सम्भव है वह न प्राप्त होवे थोड़े परिश्रम में यथार्थ ज्ञान विद्याभिलापियों को प्राप्त होवे । यदि इम में कहीं कुल दोष होना संघटित हो अर्थात् कुल दोष हो जावे तौ वह विद्वज्जनों मे विमार्जनीय है (शुद्ध करने योग्य है) अर्थात् विद्वान् जन उस को शुद्ध कर लेवें यह मरी प्रार्थना है। श्रीमान् वात्स्यायन ऋषि के बनाये हुये न्याय के भाष्य का प्राशय ग्रहण करके और श्रीमान् महर्षि व्यास जी के बनाये हुये योगदर्शन के भाष्य के अनुमार पूर्वोक्त न्याय व योगदर्शन के भाप्य बनाये गये हैं वह ऋषियों के कहे हुये भाष्य के अनुरूप होने से और विचार से भी उन के निर्दोष पाये जाने से उन की समीक्षा यहां नहीं की गयी। अन्य शेष रहे हुयों के पराचीन आर्ष भाष्यों के न मिलने पर उन के भाष्य जो आर्य भाष्यों के अनुमार पूर्व महाशय प्राचार्यों ने निर्मित कियेथे उन के प्राशय की सहायता लेकर और अपने विचार से भी भाष्यों को निर्मित करके आर्ष मत के विरुद्ध व्याख्यान करने वाले आधुनिक भाष्यकारों की व्या- ख्याओं की समीक्षा का यहां प्रारम्भ किया जाता है। तर्कसङ्ग्रहमुक्तावल्यादिनिर्मातृभिराधुनिकग्रन्यकारैर्वैशेषिकन्यायविषयप्र- तिपादकैस्स्वग्रन्थेषु- - dows- 40 समीक्षाकर॥ -- द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्त पदार्थाः एवंवर्णितास्तत्रपदार्थसङ्ख्यानेसप्तमोऽभावस्खकल्पनयाग्नुकरणतयावा तैः सन्निवेशितः। यतोवैशेषिकदर्शनेप्रथमाध्यायस्यप्रथमान्हिके चतुर्थ सूत्रेमहर्षिक- णादनपडेवपदार्थाःएवंसङ्ख्याता:- “धर्मविशेषप्रमताद्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवाया- नांपदार्थानांसाधयंवैधाभ्यांतत्वज्ञानानिःश्रेयसम्" अस्य षट्पदार्थसङ्ख्यानस्य श्रीमहर्षिकपिलदेवप्रणीतमाङ्ख्यदर्शनसत्रे- णापिप्रामाण्यमवगम्यते तदिदंसूत्रम्- न वयं षट्पदधिवादिनविशेषिकादिवत् महात्मभिः सूत्रकारैःसाधर्म्यवैधय॑सम्बन्धिषट्पदार्थवर्णनानन्तरंभावाभावी- पृथक्वर्णितौस्तः । तयोःपृथक्वर्ण नस्पायं हेतुरनुमीयो उक्त षट्पदार्थ युकेचिद्गु- णापेक्षयासाधर्म्य केचिद्गुणापेक्षयावैधर्म्यञ्चावगच्छन्ति । तेषांञ्चमामान्य विशेषो- भयरूपत्वमवधार्यते भावस्तुसामान्य माधर्म्यमात्रत्वेनविद्यते । नतद्विशेषत्वम- नुभूयते । अभावश्चतद्वैधर्म्यपत्वेनैवनिश्चीयते । इत्यादिहेतुभ्यस्तद्विलक्षणत्वेन निश्चितीभावाभायौपृथक्त्वेननिरूपितो । सामान्यतस्तूक्तसूत्रेतावप्युपदिष्टा- वितिमन्तव्यौ । यतःसाधर्म्यशब्देनभायावैधय॑शब्देनतदभावश्चविज्ञापितः । ए- वमाशयोनिश्चेतव्यः सुविचारपरैः। अतो यदि “ सप्तपदार्थाः , एवन्नलिखित्वा तेषुभावमपिसंयोज्याष्टोपदार्थाः एवमाधुनिका अलेखिव्यन्ततर्हितल्ले ख उत्तमोऽ- भविष्यत् । यतोभावएव नप्राप्तीसत्यामभावइत्युच्यते न भावं विनाऽभावस्य प्रत्ययः सम्भवति । ज्ञातधर्मधर्मि णोनिषेधएवाभाव इतिव्यवहारोलोकेदृश्यते विचारेणापीदमित्यच्चनिश्चीयते मान्यथेति ॥ अथ भाषानुवादः ॥ तर्कसङ्ग्रह मुक्तावली आदि के बनाने वाले आधुनिक ग्रन्थकार वैशेषिक व न्याय के विषय के प्रतिपादन करने वालों ने अपने ग्रन्थों में द्रव्य गुण कर्म सामान्य विशेष समवाय और प्रभाव सात पदार्थ हैं ऐसा वर्णन किया है। इन पदार्थों के गिनने में सातवां अभाव कोई अपनी कल्पना से और अन्य के ग्रन्थ में लेख देखकर वैसे ही भाप भी लिख दिया है। क्योंकि वैशेषिकदर्शन के प्रथम अध्याय प्रथम प्राहिक में चौथे सूत्र में महर्षि कणाद ने छः ही पदार्थ इस प्रकार से वर्णन किये हैं- A समक्षीकर॥ धर्मविशेषप्रसूताव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधयेवैधाभ्यां तत्त्वज्ञानानिःश्रेयसम् ॥४॥ अर्थ-द्रव्य गुगा कर्म सामान्य विशेष समवाय पदार्थों के साधर्म्य व वैधर्म्य द्वारा धर्मविशेष से उत्पन्न हुबे जान से मोक्ष होता है ॥४॥ इन छः पदार्थ की सङ्ख्या का श्रीमहर्षि कपिलदेव के कहे हुये सासरदर्शन के सूत्र से भी प्रमाण पाया जाताहै वह सूत्र यह है- न वयं षट्पदार्थवादिनो वैशेषिकादिवत् ॥ अर्थ-हम वैशेषिक आदि के समान छः पदार्थों के वादी नहीं हैं। महात्मा सूत्रकार ने साधर्म्य वैधर्म्य सम्बन्धी ( समधर्म व विरुद्धधर्म रखने वाले ) छः पदार्थों के वर्णन करने के पश्चात् भाव और प्रभाव को पृथक् वर्णन किया है इन दोनों के पृथक् वर्णन करने का हेतु यह अनुमान किया जाता है कि उक्त छः पदार्थों में कुछ गुणों की अपेक्षा साधर्म्य ( समधर्म होना) और कुछ की अपेक्षा वैधर्म्य (विरुद्ध धर्म होना) ज्ञात होता है। उन का सामान्य व वि- शेष दोनों रूप होना निश्चय किया जाता है परन्तु भाव का अस्तित्व (होना) मामान्य माधर्म्यमात्र से विदित होता है उस का विशेष होना बुद्धिगत नहीं होता और प्रभाव उस के विरुद्धधर्म होना रूप ही निश्चय किया जाता है इत्यादि हेतुओं से उन षट् पदार्थों से विलक्षण होना निश्चित हुआ। प्रत यह दो पृथक् निरूपण किये गये गये हैं। सामान्य से तो उक्त सूत्र में भी दोनों उपदेश किये गये हैं ऐसा समझना चाहिये क्योंकि साधय शब्द मे भाव और वैधर्म्य शब्द से उस का अभाव विज्ञापित किया गया है । ऐमा प्राशय अच्छे विचार करने वालों से निश्चय करने योग्य है । इम मे "सप्त पदार्थ हैं।,, ऐसा न लिखकर भाव को भी मिलाकर जो आधुनिक उक्त ग्रन्थकोर "आठ पदार्थ हैं,, ऐसा लिखते तो उन का लेख उत्तम होता क्योंकि भाव ही में नञ् अर्थात् नहीं के अर्थवाचक शब्द प्राप्त होने से "अभाव,, ऐमा कहा जाता है। भाव के विना अभाव का बोध होना सम्भव नहीं है । जाने हुये धर्म व धर्मी के प्रतिषेध ही में प्रभाव इस शब्द का व्यवहार लोक में देखा व सुना जाता है विचार से भी यह ऐसे ही है यही निश्चय किया जाता है अन्यथा होना ज्ञात नहीं होता ॥ अत्राधुनिकास्तद्ग्रन्थाध्यापकास्तदध्येतारश्चैवमाहुः। षट्पदार्थाभावरूपा यह ममीक्षाकर ॥ एव । अर्थात्भावन्यैधायिभागम्पा अतोनभावस्य पृयक्षहणमाकाङ्कत मितिम- स्वाऽभावनात्रयवाधिकग्रहण माघश्य विनश्यभप्तभो मायएव ग्रन्थकारैराधि- क्यं न पठितः अतिमिद्वान्तः । नैवंशाध्यंभ्रान्ति मूलकम वेदमुत्तरं यतीमहात्मभिःमू- त्रकारैरवनावोद्रघ्यादीनामे कम्मिन्नप्यन्तर्गतस्पेनपरिमधानध्योनास्तीति लदा- णतोहेतु शनिम्नलिग्थितपूनिभाष्य,गाएथक्स्वेनस्थापितः । भावोऽनुवृत्तरेवहेतुत्वात्सामान्यमेव ॥ अ०१ आक्षिक २ सूत्र ४ अस्य व्याख्यानम् । अनुयत्तिप्रत्ययस्यकारभामान्यमिनिमामान्यस्यलक्षणम्भायःमत्तामनु- तेरेव कोऽर्थः अगुवृत्तिप्रत्ययस्यैव । अनुत्तिःगद्गस्याधिक देशव्याप्तिपतिन- स्याःप्रत्ययस्यैव इत्यर्थःआयो नुवृत्ति प्रत्ययस्यैव हेतुर्भवति तस्मात्मामान्यमेवा- स्ति। अनुवृत्तरे इत्यत्रएबमारे गव्यात्तिप्रत्ययस्थायदादशवृशित्यप्रत्ययन्य व्यवच्छेमापिद्रष्यादिवविवादिषपदेशत्तित्यप्रत्ययस्य ( युद्धेः ) हे. तुर्भवत्यतीभावःसामान्य प्रभवति । नकदापिव्यावृत्तिप्रत्ययह विशेषत्वानो- तीत्यर्थः । भापार्थः इस में अर्यात् ऐमी शंका करने में इम के उत्तर में आधुनिक ग्रन्यकार उन के ग्रन्थों के पढ़ाने वाले व पड़ने वाले ऐमा कहते हैं कि छः पदार्थ भावमय हो हैं अर्थात् भाव ही के विभागलप हैं इस मे भाव का पृथक ग्रहण करना आकांक्षिन नहीं है ऐना मान कर अभावमात्र का हो अधिक ग्रहण आवश्यक विचार कर मातवां अभावमात्र ही ग्रन्यकारों ने अधिक बढ़ा कर कहा है यह सिद्धान्त है । ऐमा कहना युक्त नहीं है ऐमा उत्तर भ्रान्ति में कहा जाता है क्योंकि महात्मा मूत्रकार ही लक्षा से श्रीर हेतु से ऐमा नीचे लिखे हुये सत्रों में निरूपण करके कि छः पदार्थों में से कि मी एक में भी अन्तर्गत मान कर भाव मंख्या करने वा मानने योग्य नहीं है उन से भाव को भिन्न स्थापित किया है। भावोऽनुवृत्तेरेवहेतुत्वात्सामान्यमेव अर्थ-अनुवृत्ति ही का हेतु होने से भाव मामान्य ही है । अध्याय १ प्रा. हिक २ म०४ अनुवृत्ति प्रत्यय का (एक समान ज्ञान होने का) जो कारण हो उस को समीक्षाकर। है सामान्य कहते हैं यह मामान्य का लक्षण है। भाव का अर्थ सत्ता (होना) है "अनुवृत्ति ही का" ऐमा जी सत्र में कहा है उम का अर्थ "अनुत्ति प्रत्यय ही का" ऐसा ममझना चाहिये एक मदृश वृत्ति की अधिक देश में व्याप्ति होना अनुवृत्ति है उस के "प्रत्यय ही का" यह " अनुवृत्ति का " कहने का तात्पर्य है अर्थात् अनुकृतिप्रत्यय शब्द के स्थान में अनुवृत्तिमात्र शब्द समझना चाहिये अनुवृत्तिप्रत्यय ही का हेतु होता है इतने ही कहने से व्यावृत्तिप्रत्यय का वा प्रत्य देश में प्रवृत्ति होने के प्रत्यय (बोध) का निवारण है अर्थात् द्रव्य आदि के समान विशेष आदि के समान भाव कभी अल्पदेशवत्ति होने के प्रत्यय अथवा व्यावृत्तिप्रत्यय का (भेदबुद्धि होने का) हेतु नहीं होता है इस से भाव सामान्य ही होता है कभी व्याकुत्तिबुद्धि के हेतु रूप विशेषता को नहीं प्राप्त होता है यह आशय है ॥ द्रव्यत्वं गुणत्वं कर्मत्वञ्च सामान्यानि विशेषाश्च ॥ ०१ आ० २ १०५ चकारः पृथिवीत्वादीनि द्रव्यगलमातीः रूपत्वादीनि गुणगतजातीः उ- तक्षेपणादीनि कर्म गत जातीःभमुच्चिनोति । द्रव्यत्वेनद्रव्यव्यवच्छेदकत्वेनपृथिव्या- दिद्रव्याणि तथागु गात्वेन रूपादयोगुणाः कर्मत्वेन तत्क्षेपणादीनिकर्माणि सामा- न्यानिविशेषाश्च भवन्ति । भावस्तुपूर्वोक्त प्रकारेण विशेषोनभवति अतएभ्योति- नोभाव इतिवक्ष्यमाणनिगलनाल्यागनहेतुस्थापनम् ॥ अथास्य भापानुदादः ॥ ट्रव्यत्व गुणत्व कर्मत्व आदि मामान्य और विशेष होते हैं अ० १ श्रा०२ सू०५ इस सूत्र के अर्थ में सत्र में जो चकार है उस का अर्थ माशय मे आदि रक्सा गया है क्योंकि चकार सूत्र में ममुच्चयार्थमचक है अर्थात् पृथिवीत्व द्रव्य में प्राप्त जातियों को रूपत्व प्रादि गुण में प्राप्त जातियों को उत्क्षेपण अादि फर्म में प्राप्त जातियों को समुचित करना (समंदना) सूचित करता है अर्थात् द्रव्यत्व आदि के साथ उस पृथिवीत्वादि को भी ग्रहण करना चाहिये यह सचित करता है। द्रव्यत्य से अर्थात् द्रव्यव्यवच्छेदक होने से (द्रव्य से भिन्न वस्तुओं से भेदः जनाने वाले धर्म विशेषता से ) पृथिवी प्रादि द्रव्य तथा गुसत्त्व से सूप आदि गुण, कर्मत्व से उत्क्षेपण आदि कर्म सामान्य और विशेष होते हैं। परन्तु पूर्वोक्त प्रकार में भाव विशेष नहीं होता है इस से इन द्रव्यादिनों से २ समीक्षाकर॥ - भाव भिन्न है। आगे जो हेतुपूर्वक सिद्धान्त निधय किया जायगा उस से पहिले यहां यह हेतु का स्थापन है ॥ अन्यत्रान्त्यभ्योविशेषभ्यः अ० १ आ. २ सू० ६ ॥ अन्त्याविशेषानित्यद्रव्यवृत्तयोयेऽभिहिताः तान्वर्जयित्वा सामान्यविशे. षाभिधानमित्यर्थः उत्पत्तिविनाशयोरन्तेऽवसानेभवन्तीत्यन्त्याविशेषाः तेहि बि. शेषाएवव्यावृत्तिबुद्धिहेतबोनतुसामान्यरूपासपीति ॥ अथ भाषानुवादः॥ अन्त्य विशेषों से भिन्न में । अ० १ पार स०६ यह सामान्य व विशेष होने का कथन अन्त्य विशेष जो है (अन्त में रहे वा होने वाले जो विशेष हैं ) उन से भिन्न में है अर्थात् उत्पत्ति व विनाश के क्रम के अन्त में अर्थात् प्रत्यय में जो रहते हैं वह अन्त विशेष हैं वह व्यावृत्तिबुद्धि के हेतु विशेष विशेष ही हैं वह मामान्य रूप भी नहीं होते ॥६॥ सदिति यतोद्रव्यगुणकर्मसु सा सत्ता ॥ अ० १ आ० २ सू० ७ यतःसत्कोऽर्थः अस्ति इति द्रव्यगुणकर्मसुप्रत्ययोभवति अर्थात्द्रव्यमस्ति गुणो- ऽस्ति कर्मास्ति एवंद्रव्यादीनामस्तित्व प्रत्ययोभवति सा सत्ता भावशब्दवाध्यः पदार्थः ॥ अथ भाषानुवादः॥ जिस से द्रव्य गुण कर्मों में "है" ऐसा ज्ञान होता है वह सत्ता है अ० १ श्रा० २ सू० ७ यह द्रव्य है यह गुण है यह कर्म है इस प्रकार से द्रव्य आदि में होने का ज्ञान जिस से होता है वह मत्ता (भाव) शब्द से वाच्य पदार्थ है। द्रव्यगुणकर्मभ्योऽर्थान्तरं सत्ता ॥ अ० 1 आ० २ सूद क्रियागुणवत्समवायिकारणमितिद्रव्यलक्षणम् अ० १ प्रा० २ सू १५ द्रव्या- अय्यगुणवान्संयोगविभागेष्वकारणमनपेक्षइतिगुणलक्षणम् सू० १६ एकद्रव्यमगुणं संयोगविभागेष्यनपेक्षकारणमितिकर्मलक्षणम् । एतम्लक्षणलक्षितेभ्योद्रव्यगुणकर्म- भ्योर्थान्तरं मत्ता न द्रव्यादिरूपा। ननुद्रव्यगुणकर्मभ्यः पृथग्भावेनसत्तानानुभूयते, ऽतोद्रव्याद्यन्यतममेवसत्ता । यतोहियद्भिन्भवति तत्ततोभेदेनानुभयते, यथाघटः पटात् । मचमत्तातेभ्योभेदेनानुभूयतेइतितदात्मिकैवेत्यताह-द्रव्यादयोऽनन- मताःसत्ताचानुगता । तथाचाऽनुगतत्वाननुगतत्वलक्षणविरुद्धधर्माध्यासेनते.

समीक्षाकर॥ १९ । भ्योभेदस्यसिद्धत्वादान्तरं सत्ता । अथ भाषानुवादः ॥ जिस में क्रिया व गुण हों और जो समवायि कारण हो वह द्रव्य यह द्रव्य का लक्षण है । द्रव्य में प्राश्रित हो गुणरहित हो संयोग व विभागों मे कारण न हो और अपेक्षित न हो वह गुण है यह गुण का लक्षण है । एक ही द्रव्य में हो गुणरहित हो संयोग विभागों में साधारण ही कारण हो वह कर्म है यह कर्म का लक्षण है । ऐसे लक्षणयुक्त जो द्रुव्य गुण कर्म हैं उन से सत्ता भिन्न पदार्थ है द्रव्य प्रादि रूप ही नहीं है। जो यह शङ्का की जावै कि द्रव्य गुण कर्मों से सत्ता का (भाव का) भिन्न रूप होना ज्ञात नहीं होता इस से द्रव्य आदि रूप ही है क्योंकि जो जिस से भिन्न होता है वह उस से भेद सहित वा भिन्न रूप से विदित होता है अर्थात् भिन्न ज्ञात होता है जैसे पट से घट । सत्ता द्रव्य आदि से भिन्न ज्ञात नहीं होती इस से द्रव्य मादि रूप ही है। इस के उत्तर में यह कहा है कि द्रव्य आदि से सत्ता भिन्न है अ- र्थात् द्रव्य श्रादि अननुगत हैं अर्थात् सर्वत्र सामान्य रूप से (एक ही सदृश) ज्ञात नहीं होते और सत्ता अनुगत है अर्थात् सर्वत्र एक ही समान रूप से ज्ञात होती है अनुगत होने व अनुगत न होने रूप विरुद्ध धर्म के अध्यास से द्रव्यादिकों से भेद सिद्ध होने से सत्ता उन से भिन्न है ॥ गुणकर्ममु च भावान कर्म न गुणः ९ अ० १ आ० २ नगुणोनकर्मेतिवक्तव्येव्यत्ययेनाभिधानंनद्रव्यत्वमित्यपिसचर्यात । नहि कर्मकर्मसुवर्तते नवागुणोगणेषनवाद्रव्यंगुणेकर्मणिवा,सत्ता तु गुणे कर्मणिचवर्तते तेनद्रव्यगुणकर्मवैधात्तेभ्योभिन्नैव सत्ता ॥ अथ भाषानुवादः॥ गुण कर्मों में होने से न कर्म है न गुण है ॥५॥ कर्मों में कर्म नहीं होता और न गुणों में गुण होता है और गुणों व कर्म में द्रक्ष्य नहीं होता, सत्ता अर्थात् भाव गुण में व कर्म में दोनों में होता है इस से द्रव्य गुण कर्मों के वैधर्म्य से उन से सत्ता भिन्न ही है ॥ ॥ सामान्यविशेषाभावेन च ॥ १० ॥ पूर्वोक्ताद्रव्यादयः सामान्याविशेषाश्चभवन्त्यतस्तेषुमामाम्यविशेषभावो- १२ समीक्षाकर॥ विद्यते, सत्तायाः सामान्यमानरूपत्वात्सामान्यविशेषयोश्चसापेक्षवाच्यत्वात- स्यां विशेषाभावेसामान्यस्याप्यव्यवहारत्वकल्पनया न सामान्य विशेषभावः । तेन सामान्यविशेषाभावेनापिद्रव्यादिभ्योवैधात्तेभ्योभिन्नैव सत्ता ॥१०॥ अथ भाषानुवादः॥ सामान्य व विशेष के अभाव से भी १०॥ पूर्वोक्तद्रव्यादिक मामान्य और विशेष भी होते हैं इस से उन में सामान्य व विशेष का होना विद्यमान है। सत्ता का सामान्य मात्र सूप होने से सा- मान्य व विशेष रूप नहीं होता अर्थात् सामान्य व विशेष दोनों एक दूसरे की अपेक्षा से वाच्य होने से विशेष के अभाव में सामान्य के व्यवहार की भी कल्पना न हो सकने से दोनों का प्रभाव है । इस से मामान्य व विशेष के अभाव से भी द्रव्यादिकों के वैधम्यं से उन से सत्ता भिन्न ही है ॥१०॥ अनेकद्रव्यवत्त्वेन द्रव्यत्वमुक्तम् ॥११॥ द्रव्यत्वमपिन द्रव्याद्यात्मकमित्याह । अनेकद्रव्यत्वंसमवेतत्वसम्बन्धेन नि- त्यत्वंतुमामान्यत्वादेवप्राप्तं तथा चद्रव्यत्वमनेकद्रव्यसमवेतत्वेन नित्यत्वेन च द्रव्यादिभिन्नतयासत्तावदेवोक्तव्याख्यातंज्ञातव्यमित्यभिप्रायः ॥११॥ अथ भापानुवादः ॥ अनेक द्रव्यवान् होने से द्रव्यत्वकहा गया समझना चाहिये ॥११॥ द्रव्यत्व (द्रव्य का भाव ) भी द्रव्यात्मक नहीं है यह विज्ञापन के लिये यह कहा है अनेक द्रव्यवान होने से इत्यादि समवेतत्व सम्बन्ध से ( नित्य- सम्बन्धयुक्त होने के सम्बन्ध से) नित्यता तो सामान्य ही के समान प्राप्त है ऐमा होने में अनेक द्रव्यों के माथ सम्बन्धयुक्र होने और नित्य होने से द्रव्यत्व को भी सत्ता के समान द्रव्य आदि से भिन्न होना व्याख्यात समझना चाहिये११ सामान्यविशेषाभावेन च ॥१२॥ यथाद्रव्याणिसामान्यविशेषाःस्युरेवंद्रव्यत्वंनभवति । यदिव्यत्वजातिव्या- त्मिकैवस्थात् तदातस्यांपृथिवीत्वजलत्वतेजस्त्वादयःसामान्यविशेषाःस्युः, न तस्यांपृथियीत्वादयोभवन्त्यतोनद्रव्यात्मकंद्रव्यत्वं तथागुणाद्यात्मकमपिन इ- तोऽपिसत्तावदेवझे यमिति ॥१२॥ अथ भाषानुवादः ॥ सामान्य व विशेष को प्रभाव से भी ॥१२॥ anwwwes-

समीक्षाकर।।
१३
जैसे द्रव्य सामान्य व विशेष होते हैं ऐमा द्रव्यत्व नही होता।जो द्रव्यत्व
जाति द्रव्यात्मक ही होती तो उस में पृथिवीत्व जलतव तेजस्व प्रादि सा-
मान्य व विशेष रूप से होते परन्तु उस में पृथिवीत्व आदि महीं होते इस
से द्रव्यत्व द्रव्यात्मक नहीं है । ऐसा ही गुण आदि प्रात्मक भी नहीं है इस
से भी सत्ता ही के समान ज्ञातव्य है ॥१२॥
तथागुणेषुभावाद्गुणत्वमुक्तम् ॥१३॥
तथाद्रव्यवत गुणस्वमपिगुणेषुभावान गुणात्मकमर्थात् गुणो गुणोषु न भवति
इतिगुणलक्षणेपूर्वमेवप्रतिपादितं गुणत्वंगुणेषु भवत्यतोगुणवैधाद्गुणत्वंनगु-
खात्मकंसत्तावत्ततोभिन्नमेवेत्यर्थः ॥१३॥
भाषानुवादः॥
ऐसे ही गुणों में होने से गुणत्व कहा गया समझना चाहिये ॥१३॥
ऐसे ही द्रव्यत्य के समान गुणत्व भी गुणों में होने से गुणात्मक नही है
अर्थात् गुण, गुण व गुणों में नहीं होता यह गुण के लक्षण में पूर्व ही कहा
गया है, गुणत्व गुण में होता है इस गुण के वैधर्म्य से गुणात्व गुणात्मक नहीं
है, सत्ता के समान उस से भिन्न ही है ॥१३॥
सामान्यविशेषाभावेन च ॥१४॥
भेदकान्तरभाह । यदि गुणेभ्योगुणत्वमतिरिक्रनस्याद्गुणवत्सामान्यविशे-
षरूपस्यात् नवंभवत्यतःसामान्यविशेषाभावेनगुणत्वंगुणेभ्योतिरिझमेवास्ति
अनेनैवहेतुनाद्रव्यकर्मभ्यामपिभिन्नमितिराद्वान्तः ॥१४॥
भाषानुवादः ॥
सामान्य व विशेष के प्रभाव से भी ॥१४॥
जो गुणत्व गुण से भिन्न न होता सौ गुणों के समान सामान्य व विशेष
रूप होता । परन्तु ऐसा नहीं होता। सामान्य व विशेष न होने से गुणत्व गुणों
से भिन्न ही है इसी हेतु से द्रष्य व कर्म से भी भिन्न है यह सिद्धान्त है ॥१४॥
कर्मसु भावात्कर्मत्वमुक्तम् ॥१५॥
कर्मकर्मसुनभवति तथाद्रव्यगुणावपिकर्मसुनभवतः कर्मत्वंकर्मसुभवत्यतः
कर्मत्वमपिसत्तावद्व्यगुणकर्मभ्योभिन्न मुक्तव्याख्यातंज्ञातव्यमिति ॥१५॥
अस्य भाषानुवादः॥
कर्मों में होने से कर्मत्व उक्त (कहा गया) समझना चाहिये ॥१५॥

समीक्षाकर । कर्मों में कर्म नहीं होता और द्रव्य गुण भी नहीं होते कर्मस्व कर्म में होने से सत्ता के समान कर्म से व द्रव्य गुण से भिसा कहा गया अर्थात् ठया. ख्यान किया गया मानमा चाहिये ॥१५॥ सामान्यविशेषाभावेन च ॥१६॥ कर्मसामान्यविशेषरूपत्वेनभवतिनै कर्मत्व,मनेनसामान्यविशेषाभावेना- पिकर्मत्वंकर्मणोभिन्न,मनेनैवहेतुनाद्रव्यगुणाभ्यामपिभिन्नमेव । इयमेकाकारा- चतुस्सूत्री सत्ता द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वानांचतसणांजातीनां द्रव्यगु गकर्मभेदप्रति- पादनाय एकप्रकरणेनोक्त्यवधेयम् ॥१६॥ अथ भाषानुवादः ॥ सामान्य व विशेष के प्रभाव से भी ॥१६॥ कर्म सामान्य व विशेष रूप से होता है, कर्मत्व ऐसा नहीं होता। इस से सामान्य व विशेष के अभाव से भी कर्मत्व कर्म से मिला है। इसी हेतु से द्रव्य गुणों से भी भिन्न ही है मत्ता द्रव्यत्व गुणत्व व कर्मत्व चारों जातियों का द्रव्य गुण कर्मों से भिन्न होना प्रतिपादन करने के लिये चतुस्सूत्री को एक प्रकार से वर्णन किया है ॥१६॥ सदिति लिङ्गविशेषाद्विशेषलिङ्गाभावाच्चैको भावः ॥१७॥ सदित्याकारकंज्ञानंशब्दप्रयोगोवासत्तायालिङ्गं, तच्चद्रव्यगुणकर्मसुसमाम- मविशिष्टं, तस्मालिङ्गाविशेषाद्भावःसत्ता एकैवतेषुवर्तते । अन्यथाद्रव्यत्वादि भिस्तुल्यव्यक्तिकतयासत्तावानस्यात्तानिवानस्युः विशेषलिङ्गाभावाचेतिविशे- षोभेदस्तत्रयलिङ्गमनुमानंतदभावाञ्चनभेद इत्यर्थः । भवतिहिसएवायंदीपइत्यनु- गमस्तयाविशेषलिङ्गं दीर्घत्वहस्वत्वादिपरिमाणभेदस्तथात्रविशेषलिङ्गनास्ती. तिभावः । एवंसूत्रकारेणप्रतिपादनाद्विचारतोपिभावस्यद्रव्यादिभ्यः पृथक्त्व- स्यैकत्वस्य धसिद्धेःषट्पदार्थाःभावरूपाएवेति कथनंसर्वथाऽयुक्त कणादमहर्षे. मतविरुद्धमेवातोऽमन्तव्यमप्रमाणम् पञ्चत्यवधेयम् । अतोभावोऽष्टमोमन्तव्यो- वाषडे पदार्थाउत्तप्रकारेणग्राह्याः भावाभावौतद्विलक्षणस्वेनसूत्रकारोकरीत्याप. थक्त्वेनैवव्याख्येयो। इति पदार्थवर्णने प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ अथ भाषानुवादः ॥ "है" इस लिङ्ग (लक्षण) के अविशेष (सामान्य) होने से कौर लिङ्ग (चिहू धा लक्षण) विशेष न होने से भाव एक ही है ॥ १७ ॥ "है,, इस प्रकार का ज्ञान वा शब्द का प्रयोग सत्ता का लिङ्ग ( लक्षण समीक्षाकर॥ १५ वाचिह्न) है । यह द्रव्य गुण कमों में विशेषतारहित एक ही समान है इस से और अन्य कोई लिङ्ग विशेष न होने से सत्ता अर्थात् भाव एक ही है । सब द्रव्य आदिकों में सत्ता एक ही है अन्य या द्रव्यत्व प्रादि के समान व्यक्ति- मान होने से मत्ता को न होना चाहिये अथवा द्रवय को न रहना चाहिये। विशेष लिङ्ग के प्रभाव से इस का अर्थ ऐमा भी ग्राह्य है कि विशेष का अर्थ भेद है उस में लिङ्ग अर्थात् अनुमान के प्रभाव से भेद नहीं है यथा यह ज्ञान होता है कि यह वही दीप है इस में जैसे हूस्वत्व दीर्घत्व आदि परि- माण भेद रूप विशेष लिङ्ग होते हैं ऐसा इम में ( भाव में ) विशेष लिङ्ग नहीं है या नहीं होता इम से भाव एक ही है। इम प्रकार से सूत्रकार के प्रति- पादन से और विचार से भी भाव का द्रव्य आदि से पृथक् होना व एक होना सिद्ध होने से "छः पदार्थ भाव सपही हैं" यह कहना सर्वथा प्रयुक्त व कणाद महर्षि के मत के विरूदु ही है इम से न मानने योग्य और अप्रमाण रूप है यह निश्चय करना चाहिये । इस से भाव अष्टम मानने योग्य है अथवा उक्त प्रकार से छही पदार्थ ग्रहण के योग्य हैं उक्त छः पदार्थों से विलक्षण होने से भाव और प्रभाव सूत्रकार की रीति अनुमार भिन्न ही व्याख्यान के योग्य इति समीक्षाकरे श्रीमत्प्रभुदयालुनिर्मिते पदार्थसमीक्षाविषये प्रथमोऽध्यायः॥ १॥ अथ वेदेबुद्धिपूर्वकवाक्यरचनादानाद्युपदेशहेतुभ्यः कस्यचित्परमज्ञानवतोऽ- लौकिकादृष्टफलज्ञातुर्वेदवकृत्वप्रतिपादने धर्मोपार्जनेदुष्ट सज्जनयोः समभिव्या- हारतः पापपुरायफलप्राप्तिवर्णने वैशेषिकदर्शनस्यषष्ठाध्यायस्यप्रथमान्हिकस्य निम्नलिखितसूत्राणां यान्यन्यथाव्याख्यातानि तद्वयाख्यानंसमीदयते तत्रप्रकरण- सम्बन्धविज्ञापनायादिप्रकरणात्क्रमेणसूत्राणांवाक्यार्थोऽत्रलिख्यते तत्रयेषांधष्ठा- दिसूत्राणामुपस्कारनिर्मात्रायदन्यथाव्याख्यानं कृतं तस्यसमीक्षणं तदनन्तरंत- त्सत्यव्याख्यामचक्रियते ॥ बुद्धिपूर्वावाक्यकृतिवेदे ॥ १॥ घेदेवाक्पकृतिर्वाक्यरचनावुद्धिपूर्वास्ति अर्थातशब्दार्यान्वययुक्तत्वात्वि- धिनिषेधधर्मार्थकाममोक्षफलविषयकरावाद्वक्तयथार्थवाक्पार्थज्ञानपूर्वास्त्यतोवानुः परमजातत्वसूचिकेति ॥

समीक्षाकर ॥ अथास्य भाषानुवादः ॥ अथ वेद में बुद्धिपूर्वक वाक्यरचना ज्ञात होने और दान आदि का उपदेश होने के हेतुओं से वेद किसी परम ज्ञानवान् अनी किस प्रदूष्ट फन के जानने वाले से कहा गया है। यह प्रतिपादन करने व धर्मोपार्जन व दुष्ट व मज्जनों के साथ समभिव्याहार से पाप पुण्य फल प्राप्त होने के वर्णन विषय में वैशेषिकदर्शन के छठवें अध्याय के प्रथमान्हिक के निम्न लिखित सत्रों में से जो अन्य या व्याख्यान किये गये हैं उन के व्याख्यान की ममीक्षा की जाती है। प्रयन प्रकरण सम्बध जनाने के लिये आदि प्रकरण मे क्रन से सूत्रों के वाक्यों का अर्थ यहां लिखा जाता है उन में मे छठवें सत्र आदि का जो उपस्कार नामक भाष्य के बनाने वाले व वृत्तिकार ने अन्य या अर्थात् प्रयुक्त व्याख्यान किया है उस की समीक्षा और उस के पश्चात् उन का सत्य व्या. स्यान किया जाता है । बुद्धि पूर्वक वाक्य की रचना वेद में है ॥ शब्द व अर्थ के अन्वययुक्त और विधि निषेध धर्म अर्थ काम मोक्ष फल विषयक वाक्यरचना वेद में होने से यता के ययार्थ वाक्यार्य ज्ञानपूर्वक रचना है ऐसी बुद्धिपूर्वक रचना का होना ज्ञात होता है इस से वक्ता के परमज्ञाता सूचक चक है ॥ १॥ ब्राह्मणेसंज्ञाकर्मसिद्विलिङ्गम् ॥ २ ॥ प्रकारान्तरेणवेदवाक्यानांबुद्धिपूर्वकत्वमाह । ब्राह्मणमिहवेदभागोवेदाङ्ग वाक्षातव्यं सत्रय संज्ञाकर्म नामकरणं तद्युत्पादकस्यबुद्विमाक्षिपति ॥ २ ॥ अथ भाषानुवादः ब्राह्मण में संज्ञा कर्म सिद्धि होने का चिहू है ॥२॥ अब अन्य प्रकार से वेद वाक्य का बुद्धिपूर्वक होना वर्शन करते हैं ब्राह्मण शब्द से यहां वेदमाग वा वेद का अङ्ग समझना चाहिये उस में संज्ञाकर्म अर्थात् नामकरण का वर्णन है वह वर्णन करने वाले की बुद्धि का सूचक इस से वक्ता के ज्ञान होने की सिद्धि का निङ्ग (चिह) है । बुद्धिपूर्वाददातिः ॥ ३ ॥ स्वर्गकामोगांदद्यात् इत्यादौ यद्दानप्रतिपादनं तदानेष्टसाधनसाशामज- न्यंदातिरितिधातुनिर्देशोधात्वर्थदानमुपलक्षयति ॥ ३ ॥ होने की * LEONE समीक्षाकर। १७ प्रतिग्रहीतुः अथ भाषानुवादः बुद्धिपूर्वक दान है ॥ ३ ॥ स्वर्ग की इच्छा करने वाला पृथिवी का गौ को देवै इत्यादि वाक्यों में मो दान का प्रतिपादन है वह दान के इष्टसाधनता के ज्ञान से है अर्थात् दान इष्ट को प्राप्त करने वाला वा सिद्ध करनेवाला है इस ज्ञानपूर्वक है ददाति यह धातु का कहना धातु के अर्थ दान को उपलक्षित करता है अर्थात् दान को सूचित करता है ॥३॥ तथा प्रतिग्रहः ॥४॥ प्रमाणान्तरमाह । प्रतिग्रहप्रतिपादिकाअपिश्रुतयो बुद्धिपूर्विकाः । भूम्या- दिग्रतिग्रहप्रतिपादिन्यः श्रुतयः श्रेयःसाधनतत्पराः । कृष्णसार च- मादिप्रतिग्रहप्रतिपादिकाः श्रुतयः प्रतिग्रहीतुरनिष्टसाधनताबोधिकाः । नघे- ष्टानिष्टसाधने अर्वाचीनपुरुषबुद्धिगोचरे भवितुमर्हतः ॥४॥ अथ भाषानुवादः ॥ वैसे ही प्रतिग्रह है ॥४॥ अन्य प्रमाण को वर्णन करते हैं वैसे ही अर्थात् दान के समान प्रतिग्रह की प्रतिपादन करने वाली श्रुतियां भी बुद्धि पूर्वक हैं अर्थात् भूमि प्रतिग्रह की प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियां प्रतिग्रह करनेवाले के कल्याण साधन में तत्पर हैं कृष्णसार के धर्म के प्रतिग्रह की प्रतिपादक श्रुतियां प्रतिग्रहीता के अनिष्टसाधनता की जनाने वाली हैं यह इष्टसाधम व अनिष्टसाधन लौकिक मनुष्यों की बुद्धि से ज्ञात नही होसक्ने ॥ ४ ॥ आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरेऽकारणत्वात् ॥ ५॥ आत्मान्तरगुणानां पुण्यपापानामात्मान्तरे यो सुखदुःखात्मको गुणौ तयोरकारमात्वात् एवञ्चप्रत्यात्मनिष्ठाभ्यामेवधर्माधर्माभ्यांसुखदुःखे, न व्यधि- करणाभ्या,-मन्यथा यन यागहिंसादिकं न कृतं तस्य तत्फलंस्यादितिकृतहानि- रकृताभ्यागमश्वप्रसज्येत ॥५॥ अथ भाषानुवादः अन्य प्रात्मा में अन्य प्रात्मा के गुणों के कारण न होने से ॥ ५ ॥ अन्य नात्मा के पाप पुण्य रूप जो गुण हैं वह अन्य प्रास्माके सुख दुःख रूप M ३

१८
समीक्षाकर॥
गुणों के कारण नहीं होते अन्य में अन्यात्मा के गुण कारण न होने से प्रत्येक
आत्मा में निष्ठ जो धर्म व अधर्म हैं उनसे प्रत्येक प्रात्मा के सुख दुःख होते हैं
अन्यथा नहीं होते । अन्यथा होने में जिसने यज्ञ हिंसा श्रादि पुण्य पाप नहीं
किया उस को उन का फल होगा ऐसा होने में किये हुये की हानि, न किये
हुवे की प्राप्ति होने का प्रसंग होमा ॥५॥
अथ निम्नलिखितसूत्राणामुपस्कारनिर्मातुयाख्यानं त-
समीक्षणञ्च ॥
तदुष्टभोजने न विद्यते ॥६॥
तदित्याशीर्दानफलंपगमशति दुष्टब्राह्मणाः पात्रानधिकारिणोयत्रश्राद्धेनो-
ज्यन्तेतत्रापिपितरितत्फलंनविद्यतेनभवतीत्यर्थः श्राद्धफलमेवनभवतिपितरीत्यर्थः
एवमुपस्कारनिर्मात्राव्याख्यातमिदंनैतद्वयाख्यानंसमीचीनं कल्पनामात्रेणेवब्राह्मण
श्रादुपितृ शब्दानांग्रहणात् तेषांपूर्वमम्बन्धाभावात्मामात्यतः सूत्रे दुष्टशब्दे चो-
के दुष्टब्राह्मणस्यैषनिषेधेहेत्वाभावादानविधानेब्राह्मणव्यतिरिक्तप्यन्नभोजनदा-
नविध्युपश्यत्वात्॥६॥
अस्य भाषानुवादः ॥
अब नीचे लिखे हुये सूत्रों का उपस्कार नाम भाष्य के निर्माता ( राम-
मिश्र) का व्याख्यान और उस की समीक्षा को लिखते हैं ।
वो
दुष्ट
के भोजन में नहीं होता ॥६॥
यह शब्द दान फल का सूचक है। दुष्ट ब्राह्मण जो अधिकारी पार नई
हैं वे जिस श्राद्ध में भोजन करते हैं उस में पितरों में वह फल नहीं होता
अर्थात् पितरों को फल नहीं प्राप्त होता है न श्राद्ध का फरल होता है ऐसा
यह उपस्कार निर्माता का (वनाने वाले का) व्याख्यान अच्छा नहीं है क्योंकि
विना पूर्व सम्बन्ध व सूत्र शब्दों के साथ सम्बन्ध के कल्पनामात्र से ब्राह्मण
श्राद्ध पितर शब्दों को ग्रहण किया है और सामान्य से सूत्र में दुष्ट शब्द कहने
पर दुष्ट ब्राह्मण ही के निषेध में कोई हेतु नहीं है. और दानविधान में
ब्राह्मण से भिन्न में भी अन्नभोजनदान की विधि ज्ञात होती है इन हेतों
से
अयुक्त
दुष्टं हिंसायां ॥७॥
प्रवृत्त शब्दःशेषःहिंसायामितिनिषिद्धर्ममात्रोपलक्षणं तेन निषिद्धे कर्मणि
प्रवृत्तंदुष्टं विजानीयादित्यर्थः ॥ ७ ॥
है ॥६॥

समीक्षाकर ॥ १ ९ भाषानुवादः ॥ हिंसा में प्रवृत्ते हुये को दृष्ट जानै ॥ ७ ॥ प्रवृत्त शब्द सूत्र में शेष है। हिंसा शब्द उपलक्षण मात्र के लिये है। हिंसा आदि निषिद्ध कर्म में प्रवृत्त को दुष्ट जाने । यह तात्पर्य है ॥७॥ तस्य समभिव्याहारतोदोषः ॥८॥ न केवलं दुष्टब्राह्मणस्य श्राद्धे निमन्त्रितस्य भोजनेफलाभावःपापमपिशवलीत्याह तस्यनिषिद्धे कर्मणि प्रवृत्तस्य एकपतिभोजनसहशयनसहाध्ययनादिलक्षणाघोषः पापमित्यर्थः एतदुपस्कारनिर्मातुर्व्याख्यानम् । अत्रेदंविचारणीयंयदिब्राह्मणव्य- निरिक्तस्यममभिव्याहारात दोषोनस्यात्तहिंदुष्टब्राह्मणमात्रस्य समभिव्याहारा- होषीय नर्थोग्राय स्यात् नैवं किमपिप्रमाणमुपलभते। समभिव्याहारशब्दोनभो- जनमात्रस्यवाचकः “समभिव्याहारातएकपतिभोजनसहशयनसहाध्ययनादिल- क्षणात्" । एवमुपस्कारनिर्मात्रैयोकत्वात् भिन्नार्थवाचकत्त्वमिद्धेः । अतोनश्राद्ध- निमन्त्रितस्येतिकथनरूपविशेषणमाकाङ्कते तथाच सामान्यतउक्तस्यदुष्टस्यत- 'च्छ देनग्रहणयुक्तमितिवाच्यम् । उपस्कारनिर्माता किञ्चित्स्वार्थसाधनेन वा- भिप्रायविशेषणैवंव्याख्यातवान् इत्यनुमीयते ॥८॥ भाषानुवादः ॥ उम के समभिव्याहार से दोष होता है ॥८॥ श्राद्ध में निमन्त्रित दुष्ट ब्राह्मण के भोजन से केवल फल का अभाव ही नहीं होता पाप भी होता है यह कहने के लिये यह कहा है कि उसके (दुष्ट ब्रानण के) ममभिव्याहार से (वर्ताव से) अर्थात एक पंक्ति में भोजन करने साथ सोने व पढ़ने आदि से दोष [पाप होता है इस उपस्कार निर्माता के व्याख्यान में यह विचारणीय है कि जो ब्रामण से भिन्न अन्य के समभिः व्याहार से दोष न होवै तो दुष्ट ब्राह्मण मात्र के समभिव्याहार से दोष होता है यह अर्थ ग्राह्य है परन्तु ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता । समभिव्याहार शब्द विशेष भोजन अर्थ का वाचक नहीं है क्योंकि “एक पति में भोजन करना साथ शयन करना साथ पढ़ना आदि लक्षण रूप समभिव्याहार से ऐसा स्वय उपस्कार निर्माता के कहने से भिन्न अर्थवाचक होना मिद्ध है इस से श्राद्ध में निमन्त्रित होने का विशेषण कहने की प्राकांक्षा वा आवश्यकता नहीं है इस से “उस” केशब्द से सामान्य से कहे हुये दुष्ट का ग्रहण करना युक्त है उपस्कार २० समीक्षाकर॥ वह जी दुष्ट निर्माता ने स्वार्थसाधन व अभिप्राय विशेष से ऐसा व्याख्यान किया है यह अनुमान किया जाता है। तददुष्टे न विद्यते ॥९॥ तत्पापमदुष्ट यथाशास्त्रव्यवह्रियमाणब्राह्मणेश्राद्धेभोजने न विद्यते अत्रव्या- ख्याने “ब्राह्मणे, श्राद्धे” नाभ्यांदिशब्दाभ्यांविशिष्टवर्णकालविशेषमात्रेणव्या- ख्यानं न कर्तव्यम् । श्राद्धे ब्राह्मणव्यतिरिक्तधार्मिकभोजनेपि पापासंभवात् । श्राद्धस्य सम्बन्धाप्राप्तेश्च ॥ अस्य भाषानुवादः नहीं है उसमें नहीं होत ॥९॥ यह पाप ,जो शास्त्र के अनुसार व्यवहार करता है दुष्ट नहीं है ऐसे ब्राह्मण के श्राद्ध में भोजन करने में नहीं होता। इस व्याख्यान में ब्राह्मण व अाह इन दो शब्दों का ग्रहण युक्त नहीं है इन दो शब्दों से विशिष्ट व्याख्यान न करना चाहिये क्यों कि श्राद्ध में ब्राह्मण से व्यतिरिक्त अन्य धार्मिक के भोजन करने में भी पाए का होना संभव नहीं है और श्राद्ध का कुछ सम्ब- न्ध भी नहीं है ॥ पुनर्विशिष्टे प्रवृत्तिः ॥१०॥ श्राद्धेप्रतिग्रहेवाविशिष्टायथाशास्त्रमनुवर्तमानायदिलभन्ते तदानिमन्त्रिता- नपिनिन्दान्परिहत्यतानेवभोजयेत्, ननिमन्त्रितान्प्रत्याचक्षीतइतितुसत्पात्रप- रम् "निंद्यांस्तुनिमन्त्रितान्द्रविणदानादिनासंतोषयेत्” इदंव्याख्यानमयुक्तत रम।मिन्द्यस्यसमभिव्याहारादर्थात्सहभोजनाध्ययनादिलक्षणाद्दोपःपापमित्यु- पदेशामन्तरमुपदेशकेननिमन्त्रणविध्युपदेशासम्भवादुपदेशप्राप्लेननिन्द्यस्यनि- मन्त्रणासंभवान्निन्द्यस्य निमन्त्रणाभावेनिमन्त्रितान्निन्द्यानितिकथनस्यैवाऽयु- कत्वात ॥१॥ अस्य भाषानुवादः ॥ फिर विशिष्ट में प्रवृत्ति उचित है ॥१०॥ श्राद्ध में अथवा प्रतिग्रह में जो विशिष्ट शास्त्र के अनुसार प्राचरण करने वाले मिलें तो जो निन्दित निमन्त्रित भी होय तो उनको त्यागकर विशिष्टों को भोजन करावै जो यह कहा है कि निमन्त्रितों का तिरस्कार न करै यह सत्पात्र के लिये कहा है निन्द्यनिमन्त्रितों को द्रव्यादि से संतुष्ट

८०
समीक्षाकर॥
करै यह व्याख्यान अत्यन्त प्रयुक्त है मिन्द्य के साथ भोजन अध्यययनादि
रूप समभिव्याहार से पाप होता है ऐसा उपदेश करने के पश्चात उपदेशक
से निन्द्य के निमन्त्रण की विधि का उपदेश संभव न होने से तथा उपदेश
को प्राप्त हुई से निमन्त्रण संभव न होने से निन्द्य के निमन्त्रण का अभाव
होने में “मिन्द्य निमन्त्रित " ये कहमा ही प्रयुक्त है ॥
समे होने वा प्रवृत्तिः॥११॥
ममेस्वमदृशे हीनेस्वापेक्षया गुणादिना न्यूने अदुष्टपात्रेश्राद्धदानादौ प्रवृत्ति-
येषांतेषामेघाशीर्दानास्पितरिसुखमित्यर्थः। यदिपूर्वसूत्रस्यव्याख्यानं यथार्थत्वे-
नकृतंत_दमप्येवंव्याख्येयमासीत्।समेहीनेधार्मिकउपलब्धेनिमन्त्रितानपिनि-
न्द्यान्न भोजयेत्। प्रमादतःस्वव्याख्यानरीतिंविस्मृतवान्व्याख्याताइत्यनुमीयते।
ब्राह्मणमात्रेश्राद्धेभोजनदाननियमेसतिक्षत्रियादिभिः कृतेदानेश्राद्धेवातदपेक्षयास-
मत्वंहीनत्वञ्चब्राह्मणस्यैवसेत्स्थतीदमेवविचार्योपस्कारनिर्मातास्यव्याख्याने
श्रादब्राह्मणशब्दौ द्वावपि त्यक्तवान् । युक्तयोक्तव्याख्यानस्यासंगते ब्राह्मणश्राद्ध-
मात्रनियतत्वेनप्रवृत्तिकथनंप्रशस्तमिति ॥११॥
अथास्य भाषानुवादः ॥
सम अथवा हीन में प्रवृत्ति होना चाहिये ॥१९॥
अपने समान अथवा अपने से जो गुण प्रादि में हीन अर्थात् न्यून अदु-
ष्ट पात्र हो उसमें प्राद्ध आदि में दान आदि की प्रवृत्ति होना चाहिये उन
ही के आशीम व दान से पितरों को सुख होता है। जो पूर्व सूत्र का व्याख्या-
न यथार्थ किया गया था तो यह मूत्र भी इस प्रकार से व्याख्यान के योग्य
था कि जो सम वा हीन धार्मिक प्राप्त हो| तौ निमन्त्रित निन्द्यों को भोजन
न करावै। परन्तु ऐसा अनुमित होता है कि व्याख्यानकर्ता ने प्रमाद से अपने
व्याख्यान की रीति को भूल कर ऐसा व्याख्यान किया है। श्राद्ध में ब्राह्मण
मात्र के लिये भोजन दान का नियम होने में क्षत्रिय प्रादि से किये हुवे श्राद्ध
वा दान में उनकी अपेक्षा सम होना व न्यून होना ब्राह्मण ही का सिद्ध हो
गा यही विचार कर उपस्कारनिर्माता ने इस सूत्र के व्याख्यान में श्राद्ध व
ब्राह्मण इन दोनों शब्दों को त्याग दिया है युक्ति से उक्त व्याख्यान के
युक्त
न होने से ब्राह्मण व श्राद्ध मात्र के नियमयुक्त प्रवृत्ति का वर्णन उत्तम नहीं॥११॥
एतेनहीनसमविशिष्टधार्मिकेभ्यः परस्वादानंव्यारव्यातम् ॥१२॥

२२ समीक्षाकर॥ ययोसरंधमोत्कर्षःहीनादपिभूम्यादिप्रतिग्रहे समादपिस्वापेक्षयाविशिष्टाद- पिधानिकारधर्मइत्यर्थः। परस्मात्स्वस्यधनस्यादानंप्रतिग्रहः,वृत्तिकारस्तुपरस्था- दानं चौर्यादिना परस्खग्रहणं व्याख्यातवान् तथा च श्रुतिः शद्रात्सप्तमे वैश्याह- शमे क्षत्रियात्पञ्चदशे ब्राह्मणात्प्राणसंशये इति क्षुधा पीडितमात्मानं कुटुम्बं रक्षितुं सप्त दिनान्याहारमप्राप्य शूद्राद्भक्ष्यापहारःकार्यः। तथा ग्रेऽपिक्षत्रियादि- षज्ञेयोऽस्ति। अस्मिनुव्याख्यानेचौर्यादिनापरस्यधनापहारत्यकथयात्तिकारस्य कीदृगधार्मिकत्वमवगम्यतेइतिविचार्यमस्ति । यदिक्षुधापीडितेप्राणसंशयेपरध- नापहारित्वं न दोषायभवतीत्युक्तस्यात् तरिकल्पनाव्यतिरिक्तसूत्रशब्दात्पूर्वस- म्बन्धाद्वान कोऽपिहेतुरीदृशकल्पनायाः। संभवादन्ययैतत्प्रकारकव्याख्यानम् ॥१२॥ अस्य भाषानुवादः इसी प्रकार से हीन सम व विशिष्ट धार्मिकों से पर के अर्थात् उन के धन का ग्रहण व्याख्यात समझना चाहिये ॥१२॥ क्रन से यथोत्तर धर्म की अधिकता का कथन है। हीन धार्मिक से भी भूमि आदि के प्रतिग्रह में और मम और विशिष्ट धार्मिक से प्रतिग्रह में धर्म है। पर से धन का ग्रहण प्रतिग्रह है वृत्तिकार ने तो परस्वादान का अर्थ चोरी आदि से पर का धन ग्रहण करना वर्णन किया है वैसे ही श्रुति में कहा कि क्षुधा से पीडित को अपने कुटुम्ब की रक्षा करने के लिये सात दिन तक भोजन न प्राप्त होने पर सातवें दिन शूद्र से तथा दश दिन वैश्य से पन्द्रहवें दिन क्षत्रिय से प्राण हानि होने के संशय में ब्राह्मण से भक्ष्य (खाने योग्य) वस्तु का अपहरण करना चाहिये। इस व्याख्यान में चोरी आदि से परधन का हरण कहने से वृत्तिकार का कैसा धार्मिक होना ज्ञात होता है यह विचार- णीय है । जो यह कहा जावे कि क्षुधा पीडित होने व प्राण हानि होने के संशय में प्राणरक्षा के प्रयोजन से परधन वा भक्ष्य के हरण में दोष नहीं है तो कल्पना के व्यतिरिक्त सूत्र के शब्द वा पूर्व के सम्बन्ध से कोई हेतु ऐसी कल्पना का संभव न होने से इस प्रकार का व्याख्यान अन्यथा ही है ॥१२॥ तथा विरुद्धानां त्यागः ॥१३॥ नकेवलप्राणसंशयेपरस्वादानमनिषिद्धं किन्तुतस्यांदशायामपहर्तुं ये न प्र- यच्छन्तितेषांवधोऽपिकार्यः । नतावताधर्महानिरधर्मप्रादुर्भावोवेत्याह-तस्यांद- शायांविरुद्धानांविपरीताचरतांत्यागोवधः कार्यइत्यर्थः । तदुक्लं, कर्मणायेनके- समीक्षाकर ॥ २३ मापिमृदुनादारुणेनवा ॥ उद्धरेद्दीनमात्मानसमर्थोधर्ममाचरेत् ॥१॥ नैतदपस्कार- निर्मात्राकृतंव्याख्यानंयुक्तविद्वद्भिर्मन्तव्यमस्ति। स्वकल्पनाकल्पितत्वात्यागश- ब्दस्याप्रसिद्धस्यवधार्थस्यग्रहणात् दुष्टंहिंसायामित्यस्मिन्पूर्वोक्तमत्रे हिमायांप्र- वृत्तंदुष्टं जामीयादित्युक्तत्वात्। महर्षि सूत्रकारस्यवाक्याशयाभ्यांविरुद्धत्वात्तथा- स्मान्मनुवचनात् “वर्षेवर्षेऽश्वमेधेनयोयजेतशसंममाः॥ मांसान्नखादयेद्यस्तुतयोः पुण्यकलंसमम्" ।। १॥ मृगपक्षिणोमपिहिंसायानिषेधः अहिंसनेऽश्वमेधकर्तमम पुण्य कलस्यावगमात्तविरुदब्रह्महत्यायामप्यत्रव्याख्यानेविधानस्यसिद्धत्वात् । तथा“अहिंसापरमोधर्मः” इत्याद्याप्तवचनविरुद्धनिषिद्धकर्मप्रवृत्त्यपदेशात् क्षुधा पीडितेप्यात्मनिमप्तदिनान्याहारमप्राप्यशूद्राद्भक्ष्यापहारःकार्यः इत्यादौ । तथा येनकेनकर्मणादीनमात्मानमुद्धरेदितिवर्णने वधस्यस्पष्टोपदेशाभावेवधार्थग्रहणे कल्पनामात्रनिश्चयादापद्धर्मस्यात्रासम्बन्धात्सर्वथाज्युक्तंव्याख्यानमित्यवधेयम् । आसप्तदिनाद्याहाराप्राप्तस्यप्राणसंशयापन्नस्यम्ब विपरीताचरतोविरुदस्यहन्त- त्वमप्यसंभकायमप्ययुक्तताहेतुः ।। अस्य भाषानुवादः वैसे ही विरुद्धों का त्याग करना चाहिये ॥ १३ ॥ प्राणसंशय में पर के धन का ग्रहण निषिद्ध नहीं है केवल इतना ही न समझना चाहिये किन्तु ऐसी दशा में जो धन हरणे वाले को नहीं देते हैं उन का वध भी करना चाहिये वध करने तक में धर्म की हानि नहीं है म अधरम होता है। यह कहने के अभिप्राय से यह कहा है कि वैसी दशा में विरूद्धों का अर्थात् विरुद्ध आचरण करने वालों का त्याग अर्थात वध करचा चाहिये ऐसा कहा भी है कि “मृदु वा कठिन किसी प्रकार के करम से दोन आत्मा को उद्धार करे" और समर्थ हो तो धर्म को" करै यह उपस्कार निर्माता से किया हुआ व्याख्याम युक्त व विद्वान जनों के मानने योग्य नहीं है क्योंकि व्याख्याता की कल्पनामात्र से कल्पित होनेसे और त्याग शब्द का अप्रसिद्ध बध का अर्थ ग्रहण करने से अयुक्त है “दुष्टं हिंसायां" इस पूर्व मूत्र में हिमा में जो प्रवृत्त है वह दुष्ट है ऐसा कहने से महात्मा सूत्रकार के वाक्य व आशय से विरुद्ध होने से और धर्म के परम ज्ञाता मनु जी महाराज के इस वचन से कि “वर्ष २ में जो सौ वर्ष अश्वमेधयज्ञ करै और जो मांसों को न खाय उन दोनों का पुण्य फल बराबर है" मृग पक्षियों के भी हिंसा का निषेध व H- मीक्षाकर॥ हिंसा न करने में अश्वमेधकर्ता के समान पुण्य फल होना सिद्ध होने से और इस व्याख्यान में ब्रह्महत्या का भी विधाम सिद्ध होने से तथा "अहिंसा प. रमधर्म है" इत्यादि प्राप्त वचनों के विरुद्ध निषिद्ध कर्म में प्रवृत्ति होने का उप- देश होने से और क्षुधा से पीडित होने में सात दिन आहार न मिलने पर शूद्र से भक्ष्य का हरण करना चाहिये इत्यादि तथा "मृदु वा कठिन किसी कर्म से दीन श्रात्मा को उद्धार करे" इस वर्णन में वध का स्पष्ट उपदेश न होने में वध का अर्थ ग्रहण करने में कल्पना मात्र निश्चय होने से और आप धर्म का सम्बन्ध न होने से सर्वथा व्याख्यान अयुक्त है यह निश्चय करना चाहिये। सात दिन पर्यन्त प्रादि आहार को न प्राप्त हुये प्राण संशय में प्राप्त हुये का अपने रोकने वाले विरुद्धाचरण करने वाले का वधकर्ता होना भी असंभव है यह भी प्रयुक्त होने का हेतु है ॥१३॥ हीने परे त्यागः ॥ १४ ॥ यदिखस्माद्दीनःपरोनवतियोऽपहर्तनददातितश्यशूद्रादेस्त्यागोवधइति ॥१४॥ भाषानुवादः ॥ हीन में पर में त्याग उचित है ॥ १४ ॥ जो अपने से हीन पर होवै और धन हरण में रोके तो उस शूद्र आदि का वध करना चाहिये ॥ १४ ॥ समे आत्मत्यागः परत्यागो वा ॥१५॥ यदिस्वसदृशेब्राह्मणएवविरोधीभवतितदात्मनएवोपवासादिनात्यागोऽ- वसादःकार्यः। यदिखस्यकुटुम्बस्यबारक्षाप्रकारोनदृश्यतेविरोधीचसमोभवति- तदातस्यैवत्यागोवधइत्यर्थः। अस्य भाषानुवादः॥ सम में भात्मा का त्याग वा पर का त्याग उचित है ॥ १५ ॥ जो अपने समान ब्राह्मण ही विरोधी होवे तो उपवास श्रादि कर के अपने शरीर को त्याग करै जो अपने वा अपने कुटुम्ब की रक्षा का कोई प्र- यत्र न जान पर और विरोधी सम हो तो उसी का वध करै ॥ १५ ॥ विशिष्टे आत्मत्यागइति ॥१६॥ स्वापेक्षयाविशिष्टेवेदाध्ययनादिनोत्कृष्टविरोधिनिमात्मनएवत्यागोविधेय इति। एषामपित्रयाणांसूत्राणांप्रत्येकस्यव्याख्यानेत्रयोदशसहरूपकसूत्रोककाल्प- - समीक्षाकर। २५ निकत्वादिदोषावगमाद्व्याख्यानस्यान्यथात्वमयुक्तत्वञ्चावधेयमिसि । अर्थात् " तदुष्टभोजने न विद्यते " इत्यारभ्यैतदन्तिमसत्रपर्यन्तमधुनाऽन्यथाव्याख्या- तामि सूत्राणि पुनयुक्रसत्यार्थेन व्याख्यायन्ते ॥१६॥ अस्य भाषानुवादः ॥ विशिष्ट में आत्मा का त्याग उचित है ॥१६॥ जो विरोधी वेदाध्ययन प्रादि से अपने से विशिष्ट (श्रेष्ठ) हो तो अपने ही शरीर का त्याग करना चाहिये। इन तीन सूत्रों के भी प्रत्येक व्याख्यान में काल्पनिक होना आदि तेरहवें सत्र में कहे हुये दोष प्राप्त होने के हेतुओं से व्याख्यान का अन्यथा व प्रयुक्त होना जानने योग्य है। अब वह दुष्ट के भोजन में नहीं होता है यहां से प्रारम्भ करके इस अन्त वाले सत्र तक अन्य या व्या. ख्यान किये गये सूत्रों का फिर युक्त व मत्य अर्थ के साथ व्याख्यान किया जाता है ॥१६॥ तदुष्टभोजने न विद्यते ॥ ६ ॥ तत्पूर्वोक्किंदानंदानविशनं वा दानेप्मितकलं या दुष्टभोजनेअर्थात् प्राद्धे वा कस्मिच्चिकालंदानाभिप्रायेणदुष्टभोजनेदुष्टायान्न दाने वा न विद्यते । अर्थात् दुटभोजनेदानविधिर्दानफस्न वा न विद्यते प्रतोदुष्टो न मोजनीयस्तस्मै न दाना- भिप्रायेण किञ्चिदेयमिति को दुष्ट इत्यपेक्षायामाह- भावानुवादः वह दुट के भोजन में नहीं होता है ॥६॥ वह पूर्वोक्त दान वा दानकल अथवा दान से ईप्सित फल दुष्ट के भोजन में अर्थात् श्राद्ध में वा किसी काल में दान के अभिप्राय से दुष्ट को भोजन कराने भोज्य वस्तु देने वा दष्ट के लिये अन्न देने में नहीं होना अर्थात् दुष्ट के भोजन कराने में दानविधि व दानफल नहीं है इम से दुष्ट भोजन कराने योग्य नही। दान के अभिप्राय से उस को कुछ न देना चाहिये। दुष्ट किस को समझना चाहिये यह विज्ञापन के लिये यह कहा है- दुष्टं हिंसायाम् ॥७॥ हिंसायांकोऽर्थः हिंसायांप्रवृत्तंदुष्टंविजानीयादित्यर्थः । प्रवृत्तमित्तिशेषः । क्रिया वाक्षेपेणग्राह्या हिंसायामितिनिषिद्धकर्ममात्रीपलक्षणमितिमत्वा निषिद्धकर्मणि प्रवृत्तंदुष्टंजानीयादेवमर्थोग्राह्यः । : ४ २६ समीक्षाकर॥ अस्य भाषानुवादः ॥ हिंसा में प्रवृत्त को दुष्ट जानै ॥७॥ प्रवृत्त शब्द सत्र में शेष है क्रिया भी शेष है “जामै" यह क्रिया आक्षेप से ग्राह्य है “हिंसा में" यह शब्द निषिद्ध कर्म मात्र के उपलक्षण के लिये है ऐसा मान कर मिषिद्ध कर्म मात्र में प्रवृत्त को दुष्ट जानै ऐसा अर्थ ग्राय है । तस्य समभिव्याहारतो दोषः ॥८॥ दुष्टः सर्वथापरित्याज्यः इत्यभिप्रायेणाह तस्य दुष्टस्यसमभिव्याहारतः सम- भिव्याहारात सहभोजनसहशयनसहाध्ययनादिलक्षणाद्दोषः पापं जायते । तस्स- त्या वार्तया तदनुगुणबुट्युत्पत्या निषिद्धकर्मप्रवृत्तर्भविष्यत्काले वा तत्संभवा- सपरिणामश्रेयोऽभिलाषिभिर्धार्मिकैस्त्याज्यः ॥ भाषानुवादः॥ उस के समभिव्याहार से दोष (पाप) होता है ॥८॥ दुष्ट सर्वथा परित्याज्य है इस अभिप्राय से यह कहा है कि उस के (दुष्ट के) समभिव्याहार से (साथ वर्ताव करने से ) अर्थात् साथ भोजन करने माथ शयन करने साथ पढ़ने आदि से दोष होता है उस की संगति से वार्ता से उस के समान गुण व बुद्धि उत्पन्न होने से निषिद्ध कर्म में प्रवृत्ति होने से अथवा भविष्यत् काल में ऐसा होना संभव होने से परिणामश्रेयोऽभिलाषो (कल्याण चाहने वाले) धार्मिक पुरुषों से वह त्याग करने योग्य है क्योंकि उस के संग करने से कम से भ्रष्ट व नष्ट होना संभव है ॥८॥ तददुष्टे न विद्यते ॥९॥ तत्पापमदुष्टेसत्पुरुषे न विद्यते सत्पुरुषस्यधार्मिकस्य समभिव्याहारतोदो- पोनभवतिधार्मिकेणसहभोजनाध्ययनशय नादिलक्षणकासमभिव्याहारोन प्रति- षिद्धः इत्यर्थः । ननुदुष्टस्यसमभिव्याहारतोदोषः इतिकथनादनेनैववाक्ये नार्था- पत्तेस्त ददुष्टे न विद्यते इप्ति सिद्धेः किमर्थमन्यत्भूत्रंकृतं तत्रायंसमाधिः-श्रेयोर्थिवि- रक्कमुमुक्षूपासकैर्योगिभिः सर्वस्यसमभिव्याहारस्त्याज्यः इति योगदर्शनादिसद् ग्रन्थेषतः सामान्यतः मर्वस्यममभिव्याहारस्यनिषेधावगमेगृहस्थैरविरक्तरदुष्टस्थ सदाचारिणः समभिव्याहारो न त्याज्यःयतस्तस्मैतस्यसमभिव्याहारस्सुखायसुबु द्व्युत्पत्तयेभवति न पापायैतदर्थपृथक्कथनमित्यवधेयम् ॥ भाषार्थः॥ वह अदुष्ट में नहीं होता है ।

समीक्षाकर॥ वह पाप अदुष्ट में (सत्पुरुष में) नहीं होता अर्थात् सत्पुरुष धार्मिक के समभिष्याहार से दोष नहीं होता है धार्मिक के साथ भोजन करना शयन करमा पढ़ना आदि प्रतिषिद्ध नहीं हैं। जो यह शङ्का हो कि दुष्ट के समभिव्याहार से दोष होता है यह कहने से इसी वाक्य से अर्थापत्ति से वह दुष्ट में नहीं होता है यह सिद्ध हो जाने से इस के लिये पृथक् वाक्य कहने की आवश्यकता नहीं थी दूसरा मूत्र क्यों कहा है? तो इस का समाधान यह है कि कल्याणाभिलाषी विरक मुमुक्षु उपासक योगियों के लिये योगदर्शन आदि सद्ग्रंथों में सब का भमभिव्याहार त्याग के योग्य होना कहा है सामान्य से सब के समभिव्याहार का निषेध ज्ञात होने में यह विज्ञापन के लिये कि अविरक्त गृहस्थों से धर्म, वान् मदाचारी का ममभिव्याहार त्यागने योग्य नहीं है क्योंकि उन के लिये अस का समभिव्याहार सुख व सुबुद्धि की उत्पत्ति करने वाला होता है पाप का कारण नहीं होता । पृथक् कथन से यह मन्तव्य है। पुनर्विशिष्टे प्रवृत्तिः ॥ १०॥ यदि ययाशास्त्रमनुवर्तमानोधार्मिकोविशिष्टःश्रेष्ठोलभ्येत वा विशिष्टालम्पेरन् तहिसमहीनाम्परिहत्यविशिष्टेविशिष्टेषु वादानेममभिव्याहारेप्रवृत्तियुक्ता अर्थात् विशिष्टायथाविशिष्टेभ्यएवदानमुचितम्तेनयातैःसहैवसमभिव्याहारोयोग्यः ॥ अस्य भाषानुवादः॥ फिर विशिष्ट में प्रवृत्ति होना चाहिये ॥ १० ॥ जो शास्त्र अनुसार प्राधरण करने याला वा करने वाले विशिष्ट (श्रेष्ठ) मिले या मिलैं तो सब व हीनों को त्याग कर फिर विशिष्ट का विशिष्टों में दान व समभिव्याहार विषयक प्रवृत्ति युक्त है अर्थात् विशिष्ट वा विशिष्टों के लिये दाम उचित है उस के वा उन ही के साथ समभिव्याहार योग्य है ।। समे होने वा प्रवृत्तिः ॥११॥ विशिष्टाभाषेममहीनेवाप्रवृत्तिरुचिता अर्थात्स्यसमेही नेधार्मिकेप्रकृत्तियुक्ता न कदाचिदपिदुष्टेप्रवृत्तेविधिरित्यर्थः ॥११॥ भाषानुवादः ॥ अथवा सम में होन में प्रवृत्ति होना चाहिये ॥११॥ विशिष्ट न होने में सम वा हीन में प्रवृत्ति युक्त है अर्थात् अपने सम या अपने से न्यूम में प्रवृत्ति युक्त है परन्तु दुष्ट में प्रवृत्ति की विथि कभी नहीं है समीक्षाकर॥ अर्थात् दुष्ट के साथ प्रवृत्ति कभी न करना चाहिये ॥ ११ ॥ एतन हीनसमविशिष्टधार्मिकम्यः परस्वादानं व्याख्यातम् ॥१२॥ एसेन कथनेनेवहीनसमविशिष्टधार्मिकेभ्यः परस्वादानमर्थात् परस्मात्स्व- स्यधनस्यादाअंग्रहसं व्याख्यातमस्तीत्यबधार्य नाधार्मिकस्यनिषिद्धव्यवहारा- स्कर्मण उपार्जितत्यधनस्यनिन्द्यत्वात्प्रतिग्रहस्सत्पुरुषैर्धार्मिकैः कदापि कर्तव्य इत्यर्थः ॥ १२॥ अथ भाषानुवादः ॥ इसी प्रकार से हीन मन विशिष्ट धार्मिकों से पर के धन का ग्रहण व्याख्यात समझना चाहिये ॥ १२॥ जैसा कि दान का वर्णन किया गया है ऐसे ही हीन सम विशिधानिकों से पर के धन का ग्रहण व्याख्यात है यह समझना चाहिये अधार्मिक के नि- घिद्ध व्यवहार व कर्भ मे उपार्जित किये हुये धन का प्रतिग्रह मत्पुरुष धार्मिकों को कनी न करना चाहिये क्योंकि ऐसा धन निन्दित है ॥ १२ ॥ तथा विरुद्वानां त्यागः ॥ १३ ॥ यथाधार्मिकाणामुक्तधनस्यप्रतिग्रहोयुक्त उनोवा तथा तद्विरुद्धानामधार्मि- काणांधनस्यत्यागोयुक्तउक्लोवेनिज्ञातव्यः । उक्तीप्ययमोनसमीचीनत्वेननिश्ची- बते दानादानपोःसलाही विशिष्टधार्मिकेभ्यः कथनादेवाचार्मिकेभ्योनिषेधमिद्धे- रनोदानादानकायनानन्तरंतयाशब्द कथनस्यायमाशयोमहर्षेः सूत्रकारस्यावधा- य॑ते । तथा-कोऽर्थः तथासतिवातथाच अर्थात् पूर्वोकप्रकारे मदुष्टस्यसमभिव्या- हारतोदोषस्तस्य दानादानयोरनहत्वञ्च सिद्धेवानिश्चितेसतितद्विरुद्धानामधार्मि- काणां त्यागःकर्तव्यः । अर्याततैःसह दानादानसमभिव्याहारेषुधर्महानिनिश्चित्य तेषां सर्वथात्यागए प्रयुकः नकेनापिहेतुनातत्संग्रहःकार्यइत्यर्थः ।। अथास्य भाषानुवादः ॥ वैसे ही विरुद्धों का अर्थात विरूद्धों के धन का त्याग है अथवा वैना होने में विरुद्धों का त्याग उचित है ॥ १३ ॥ यया धार्मिकों के धन का प्रतिग्रह युक्त वा उक्त (कहा गया) है तथा जन से विरुद्ध अधार्मिकों के धन का त्याग युक्त वा उक्त जानने योग्य है यद्यपि यह अर्थ कहा गया तथापि उत्तम होना निश्चित नहीं होता क्योंकि दान और प्रतिग्रह दोनों का सम हीन विशिष्ट व धार्मिकों के लिये वा धार्मिकों समीक्षाकर॥ २९ से कहने ही से अधार्मिकों के लिये वा अधार्मिकों से दान व प्रतिग्रह का निषेध सिद्ध है इस से दान व ग्रहण कहने के पश्चात् तथा शब्द कहने का महाशय सूत्रकार का यह श्राशय निश्चय किया आता है कि बैसा होने में अर्थात् पूर्वोक्त प्रकार मे दुष्ट के समभिव्याहार से दोय होना उस का दान व प्रादान (ग्रहण) के योग्य न होना सिद्ध होने वा निश्चित होने में व धार्मिक मात्रों के दान व आदान का विधान होने में धार्मिक मे विरूद्धों का अर्यात् अधार्मिकों का त्याग करना चाहिये अर्थात् उन के साथ दान श्रादान व समभिव्याहार करने में धर्म की हानि निश्चय कर के उन का सर्वथा त्याच करना युक्त व उचित है किमी हेतु से उन का संग्रह न करना चाहिये ॥१३॥ हीने परे त्यागः ॥ १४ ॥ यदि कश्चिद्वार्मिक केनचित्कारणेन कस्यचिदधार्मिकस्यससहंप्राप्नुयातहि किकार्यमित्याक्षिल्याह-हीने परे त्यागः । अस्यायमाशयः। यदिपरोदुष्टःस्वस्मा- द्वोनो भवेत्तर्हि परेहीनेत्यागउचितः अर्थाद्विशिष्टेनसमर्थनधार्मिकेणहीनेसतिपर- तस्वहीनस्यत्यागःकर्त्तव्यः । अर्यात्तत्संग्रहसंरक्षणाद्वार्मिकेदोषप्राप्त्यधर्मबुद्ध्यु- त्पत्तिसंभवानसत्याज्यएवेत्यर्थः ॥ १४ ॥ भाषानुवादः हीन में परमें त्याग उचित है ॥ १४ ॥ जो किसी धार्मिक का किसी कारण से किसी अधार्मिक के साथ संग्रह हो जाये तो क्या करना चाहिये यह विज्ञापन वा उपदेश के लिये यह कहा है। हीन में पर में त्याग उचित है । इस का श्राशय यह है कि जो पर दुष्ट अपने से हीन होवै तौ परहीन में त्याग उचित है अर्थात विशिष्ट समर्थ धार्मिक से पर के हीन होने में उस हीन का त्याग उचित है अर्थात् उस के संग्रह रखने से धार्मिक में दोष होना व अधर्म की बुद्धि उत्पन्न होना सम्भव है इस से धार्मिक को उस का त्याग ही करना उचित है ॥ १४ ॥ समे आत्मत्यागःपरत्यागो वा ॥ १५॥ स्वस्मात्समेसतिदुष्टेयेनकेनप्रकारेणतेनात्मत्यागःस्वस्थत्यागःकारयितव्यो वाकेनचित्प्रयनेमप्राप्तसामात्स्वेनपरस्यत्यागकर्तव्योवेति नतत्संग्रहःसंरक्ष- शीयइत्यर्थः ॥ १५ ॥ भाषानुवादः ॥ सम में प्रात्मत्याग वा पर का त्याग उचित है ।१५॥

- ३० समीक्षाकर ॥ अपने समान होने में किसी प्रकार से उम से प्रास्मत्याग अर्थात् अपना त्याग प्राप्त करने योग्य वा कराने योग्य है अथवा किमी प्रयास से प्राप्त हुन्थे सामर्थ्य मे श्राप से पर का अर्थात उन का त्याग करना चाहिये उस का सङ्कह रखने योग्य नही है ॥ विशिष्टे आत्मत्याग इति ॥१६॥ विशिष्टेसतिदुष्टे अर्थाविशेषमामर्यप्राप्तेप्रबलेसतितत्यागेस्वशक्त्यप्राप्ती येन केनप्रयत्ने नस्वस्मिन्तदुपेक्षा वैमनस्यंबोत्पाद्यतेनात्मत्यागः स्वम्य त्यागः प्राप- यितव्यः । यद्वा सर्वोत्तमेहामुत्रसुखसुगतिहेतुधर्मसंरक्षणायात्ममः शरीरस्य त्या- मोमरणमुचितःमहिनिषिद्धक सुप्रवृत्तिःस्वकार्येसि, ईदृगेषांसूत्राणां व्याख्या- नंतात्त्विकंज्ञेयमिति ॥ इति धर्माधर्मविषयवर्णने श्रीमत्पण्डितप्रभुदयालनि- मिते समीक्षाकरे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ अस्य भावानुवादः ॥ विशिष्ट में आत्मत्याग उचित है ॥१६॥ दुष्ट के विशिष्ट होने में अर्थात् विशेष मामर्थ्यवान् प्रबल होने में जो उस से भिन्न होने वा उसके त्याग करने में अपनी शक्ति न हो तो किमी प्रयत्न से अपने में उनकी उदामीनता वा वैमनस्य उत्पन्न कराके अपना त्याग प्राप्त करने योग्य है अथवा सर्वोत्तम इस लोक व परलोक में सुख व सुगति के हेतु रूप धर्म की रक्षा के लिये प्रात्मत्याग शरीरत्याग अर्थात् मर जाना उचित है परन्तु निषिद्ध कर्म में प्रवृत्ति स्वीकार करना उचित नहीं है। ऐसा इन सूत्रों का व्याख्यान यथार्थ ममझना चाहिये ॥ १६ ॥ इति धर्माधर्मविषयवर्णने समीक्षाकरे द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ अथेश्वरविषयेसांख्यसूत्राणांव्याख्यानम् । ईश्वरप्रतिषेधविषयेयानिसां- ख्यसूत्राणिसन्ति वस्तुतःतेषांपूर्वापरसम्बन्धसमीक्षणान्महर्षःसांख्याचार्यस्यन सर्वथेश्वरप्रतिषेधस्याशयोनिश्चीयते किन्तुव्यवहारतर्कायोग्यत्वाद्वयावहारिक श्वरस्यैवप्रतिषेधनंततस्तर्कमात्रेणासिद्धत्वबुद्धिपरत्वप्रतिपादनमेवावधार्यते । सामान्यतःस्थलदृष्टयानिषेधमत्राक्षरैःप्रतिषेधएवावगम्यते। प्रतिषेधपरत्वेनैवप्रा- योव्याख्याकारैस्तानिसत्राणिव्याख्यायन्ते । लोकेजनाःसांस्वाचार्योनिरीश्वर- वादीइतिमन्यन्ते। नैतत्तत्त्वमितिनिश्चयार्थप्रथममीश्वरप्रतिषेधविषयकसत्राणि सार्थानिसाधारणतोविलिख्य तत्सिद्धान्तःप्रदर्श यते ।।

समीक्षाकर॥ ३१ : . ईश्वराऽसिद्धेः । अः १ । स्म० ॥ ९२ ।। ईश्वरस्यासिद्धनेश्वरःइत्याशयः । अथवापूर्वसूत्रान्नदोषःइत्यनुवर्तते । अस्त- एवमर्थोवाच्यः । ईश्वरस्यासिद्धः । ईश्वरेप्रमाणाभावाम्नदोषश्त्यर्थः । ईश्वरा- सिद्धिसिपहेतूनाह ॥ भाषानुवादः ॥ अब ईश्वर विषय में सांख्य सत्रों का ब्यारयान किया जाता है। ईश्वर के प्रतिषेध विषय में जो सांख्य सूत्र हैं वास्तव में उन का पूर्वा- पर सम्बन्ध विचारने से महर्षि सांख्याचार्य का सर्वथा ईश्वर के प्रतिषेध करने का प्राशय निश्चित नहीं होता किन्तु व्यवहार व तर्क के योग्य न होने से व्यावहारिक ही ईश्वर का प्रतिवेधन है उस से तर्कमात्र से सिद्ध न होना व बुद्धि पर होने ही का प्रतिपादन निश्चय किया जाता है सामान्य से स्थूल दृष्टि से निषेध विषयक सत्रों के अक्षरों से प्रतिषेध ही ज्ञात होता है और प्रतिषेध ही पर होने ही के अर्थ से वह सूत्र प्रायः व्याख्याकारों से व्याख्यान किये जाते हैं । लोग सांख्याचार्य को निरीश्वरवादी मानते हैं परन्तु यह यथार्थ नहीं है यह निश्चय होने के लिये प्रथम ईश्वर के प्रतिषेध विषयक सूत्रों को अर्थसहित साधारण से लिख कर उन का सिद्धान्त विदित किया जाता है। ईश्वर की सिद्धि न होने से । अ० १ । स० ॥ १२ ॥ ईश्वर की सिद्ध न होने से ईश्वर नहीं है यह आशय है अथवा पूर्व सूत्र से “दोष नहीं है" यह अनुत्ति मे ग्रहण किया जाता है इस से ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिये कि ईश्वर की सिद्धि न होने से दोष नहीं है। मुक्तबद्वयोरन्यतराभावान्न तत्सिद्धिः ॥ ९३ ॥ ईश्वरोऽभिमतःकिंक्लेशादिमुक्तोवातैर्षदोवा । अन्यतरस्याप्यसंभवान्नेश्वर- सिद्धिः ॥ ३ ॥ भाषानुवादः ॥ मक मबद्ध दो में से एक न होने से उस की सिद्धि नहीं है ॥ ३ ॥ ईश्वर क्लेशादि से मुक्त है या बद्ध है दो में से एक भी संभव न होने से उस की ईश्वर की सिद्धि नहीं है मुक्त वा बद्ध होना सिद्ध नहीं होता हसी को प्रामे मप्र में स्पष्ट करते हैं।

३२ समीक्षाकर ।। उभयथाप्यसत्करत्वम् ॥ ९४ ॥ ईश्वरस्योभयथाप्यसत्कर त्वमस्ति वा ज्ञायते। अर्थात् मुक्तत्वमतिसृष्टत्वा- द्यक्षमत्वं तत्प्रयोजकाभिमानरागाद्यभावात् बद्धत्वेऽपिमूढत्वाम्नसृष्टघादिक्षम- त्वमित्यर्थः ॥ ४॥ नन्वेवमीश्वरप्रतिपादकश्रुतीनां का गतिरसत्राह- अस्य भाषानुवादः॥ दोनों प्रकार से असत्कर होना ( न करनेवाला होना ) है ॥४॥ ईश्वर का दोनों प्रकार से असत्करत्व है वा जाना जाता है अर्थात् मत होने में सृष्टि में प्रवृत्ति होने के हेतु अभिमान व राग श्रादि न होने से ईश्वर सृष्टि का उत्पन्न करनेवाला नहीं होसक्ता और बद्ध होने में भी मढ़ होने से सृष्टि आदि उत्पन्न करने में समर्थ नहीं हो सका यह अभिप्राय है ॥४॥ जो यह शङ्का होवै कि ऐसा मानने में ईश्वर की प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियों के विषय में क्या उत्तर होगा तो इस का उत्तर यह मुक्तात्मनःप्रशंसा उपासासिस्य वा ॥ ९५ ॥ ययायोग्यंकाचिच्छ्रुतिर्मुक्तात्मनः केवलात्मसामान्यस्य शेयताभिधानाय म- निधिमात्रैश्वर्य वस्तुतिरूपाप्ररोचनार्था काचिच्चसङ्कल्पपूर्वकसृष्ट त्यादिप्रतिपादि- काश्रोतः सिद्धस्यब्रह्मविष्णु हरादेरेवाऽनित्येश्वरस्याभिमानादिमतोऽपिगौणनि- त्यत्वादिमत्त्वान्नित्यत्वाद्युपासापरेत्यर्थः ॥ ५॥ नन्वीश्वराउसिद्धेरितियदुवंतन्नो- पपद्यते । कर्म फलदातृतयातत्सिद्धेरितिचेत्त_दमुत्तरम्- अस्य भापानुवादः ॥ मुक्तात्मा की प्रशंमारूप वा सिद्ध की उपासना पर हैं ॥४॥ यथायोग्य कोई अति मुक्तात्मा का अर्थात् केवल प्रात्मा जाति का सन्नि- धिमात्र से ऐश्वर्ययुक्त जानने के योग्य होना कहने के लिये हैं अर्थात् प्रकृति ( माया ) उम की सन्निधि को अर्थात् समीपता को प्राप्त होने से उस की नमना शक्ति को प्राप्त होकर सुष्टि को उत्पन्न करती है मुक्रर र प्रात्मा को केवल मन्निधिमात्र का ऐश्वर्य है ऐसे सम्मिधिमात्र से ऐश्वर्यवान् कहने के लिये हैं अर्थात् सन्निधिमात्र के ऐश्वर्य से मुक्तात्मा की प्रशंसा करती हैं इस से स्तुति रूप सचि बढ़ाने के लिये हैं और कोई श्रुति जो संकल्पपूर्वक सृष्टि होना प्रादि प्रतिपादन करती हैं वह अभिमानादियुक्त जो ब्रह्मा विष्णु व हर प्रादि समीक्षाकर। ३३ अनित्य ईश्वर सिद्ध रूप हैं उन में गौणनित्यत्व आदि मान कर ऐसे सिद्धके उपासना के लिये नित्यत्व आदि को वर्णन करती हैं इस से नित्यत्वादि वर्णन वा ऐसा वर्णन करने वाली श्रुति सिद्ध के उपाममा पर वा उपासना विषय में हैं यदि यह शङ्का की जाय कि ईश्वर की समिद्धि से ईश्वर नहीं है यह जो कहा गया है यह युक्त नहीं है कर्म फल दाता होने से ईश्वर सिद्ध होता है तो इसका उत्तर यह है- नेश्वराधिष्ठिते फलनिष्पत्तिः कर्मणा तसिद्धेः अ०५ सू० ॥२॥ ईश्वराधिष्ठिते कारणे कर्मफलरूपपरिणामस्यनिष्पत्ति युक्ता । श्रावश्यकेन कर्मवफलनिष्पत्तिसम्भवादित्यर्थः ॥२॥ ईश्वरस्य फलदातृत्वमपिनघटतेइत्याह सूत्रैः॥ अस्य भाषानुवादः॥ ईश्वर के अधिष्ठित होने में फल की सिद्धि नहीं है कर्म से उस की सिद्धि होने से ॥२॥ ईश्वर के अधिष्ठित होने में कर्मफलरूप परिणाम की सिद्धि मानना युक्त नहीं है क्योंकि आवश्यक कर्म ही से फल की सिद्धि होना संभव है अब ईश्वर का फलदाता होना घटित भी नहीं होता यह अगले सूत्रों में वर्णन करते हैं। खोपकारादधिष्ठानं लोकवत् अ० ५ सू० ॥३॥ ईश्वराधिष्ठातृत्बे खोपकारार्धमेवलोकवदधिष्ठानं स्यादित्यर्थः३ भवत्वी- वरस्याप्युपकारः काक्षतिरित्याशयाह- भाषार्थः ॥ अपने उपकार से लोक के समान अधिष्ठान (मुख्य होना) होगा ३ जो अपने उपकार के लिये ईश्वर का अधिष्ठाता होना माना जावे तौ अपने उपकार से लोक के समान उस का अधिष्ठाता होना सिद्ध होगा यह अर्थ है। अब यह शंका कर के कि ईश्वर का भी वा ईश्वर ही का उपकार होना माने तो क्या हानि है यह वर्णन करते हैं। लौकिकेश्वरवदितरथा ॥8॥ ईश्वरस्याप्युपकारस्वीकारेलौकिकेश्वरवदेवसोऽपिसंसारीस्यात् अपूर्णकान- समादुःखादिप्रसङ्गादित्यर्थः ४ तथैवस्वीकारेदूषणान्तरमाह- ५ समीक्षाकर। भाषानुवादः॥ अन्य प्रकार मानने में लौकिक ईश्वर के समान होगा ।४। चेतन मुक्त रूप से अन्य प्रकार मामने में अर्थात् रागयुक्त ईश्वर और उस का अपना उपकार स्वीकार करने में वह भी लौकिक ईश्वर के समान अर्थात् लौकिक ऐश्वर्य को प्राप्त समर्थ राजा महाराजाओं के समान संसारी होगा और अपूर्ण काम होने से उस में भी दुःख प्रादि होने का प्रसंग होगा । जो ऐसा ही माम लेवे तो उस में अन्य दूषण वर्णन करते हैं । पारिभाषिको वा ॥५॥ संसारसत्वेऽपिचेदीश्वरस्तर्हिसर्गाद्युत्पन्नपुरुषपरिभाषामात्रमस्माकमिवभव- तामपिल्यात् । संसारित्वाप्रतिहतेच्छत्वयोर्विरोधाग्नित्यश्वर्यानुपपत्तेरित्यर्थः ईश्वरस्याधिष्ठातत्वेवाधकान्तरमाह । भाषानुवादः॥ अथवा पारिभाषिक (कथन मात्र भेद वाला) होगा । जो संसारी होने में भी ईश्वर मानें तो सृष्टि की श्रादि में उत्पन्न हुये पुरुष में अर्थात् ब्रह्मा में वा विष्णु वा हर में हमारे समाम तुम्हारा भी कथन होगा कथन भेदमात्र होगा संसारी होना व नित्य पूर्ण काम होना इन दोनों में विरोध होने से संसारी होने में मित्य ऐश्वर्यवान् होना संभव नहीं होसका ५ ईश्वर के अधिष्ठाता होने में अन्य वाधक होना बर्थन करते हैं ५ न रागाहते तत्सिद्धिः प्रतिनियतकारणत्वात् ॥६॥ किञ्चरागंविनानाधिष्ठातृत्वंसिध्यति प्रवृत्तौरागस्यप्रतिनियतकारणत्वा- दित्यर्थः उपकारइष्टार्थसिद्धिः रागस्तदुत्कटेच्छेति नपौनरुक्त्यम् नन्येवमस्तुरा- मोपीश्वरे सत्राह। अस्य भाषानुवादः॥ विना राग के उस की (अधिष्ठाता होने की) सिद्धि नहीं हैं प्रति नियत कारण होने से प्रवृत्ति में राग का प्रतिनियतकारणत्व है जिस कारण के विमा जो म होवे वह उस का प्रतिनियत कारण है प्रवृत्ति में राग प्रतिनियत कारण है इस से विना राग के अधिष्ठाता होने की सिद्धि नहीं है उपकार कह कर राग कहने में पुनरुक्क दोष की शंका न करना चाहिये क्यों कि इष्ट अर्थ की सिद्धि समीक्षाकर॥ - उपकार है अति चाह होना राग है इस से दोनों में भेद है ईश्वर में राग मान- ने में क्या दोष है यह धर्मान करते हैं। तद्योगेऽपि न नित्यमुक्तः ॥७॥ रागयोगेऽपिस्वीक्रियमाणेसनित्यमुक्तोनस्यात् ततश्चनित्यमुक्तईश्वरोऽस्तीत्य- स्यसिद्धान्तस्यहानिःकिञ्चप्रकृतिप्रत्यैश्वर्यप्रकृतिपरिणामभूतेच्छादिनान सम्भव- वति अन्योन्याश्रयात् नित्येच्छादिकं च प्रकृतौ न युक्तं श्रुतिस्मृतिसिद्धसाम्याव स्थानुपपत्तेः । अतः प्रकारद्वयमवशिष्यतेतद्यथाऐश्वर्य किंप्रधानशक्तित्वेनास्मद- भिमतानामिच्छादीनांसाक्षादेवचेतनमम्बन्धात् किंवाग्यस्कान्तमणिवत्सबिधि सत्तामात्रेणप्रेरकत्वादिति ७ तत्राद्यपक्षंदूषयति ॥ अस्य भाषानुवादः ॥ उस के भी योग में मित्य मुक्त न होगा ॥७॥ राग का योग भी ईश्वर में स्वीकार करने में वह मित्य मुक्त न होगा ऐसा होने में ईश्वर नित्यमुक्त है यह जो सिद्धान्त है इस की हानि होगी जो यह कहा जाय कि प्रकृति के परिणाम रूप इच्छा श्रादि द्वारा प्रकृति को ऐश्वर्य होना संभव नहीं होता है क्योंकि अन्योन्य (परस्पर) आश्रय होने से असं- भव है नित्य इच्छादिक प्रकृति में होना युक्त नहीं है क्योंकि ऐसा होने में अति स्मृति में जो प्रकृति की साम्यावस्था ( सम होने की अवस्था ) सिद्ध है उस का होना असंभव होगा इस से दो प्रकार रहते हैं एक यह कि इच्छा प्रादि जो हम प्रधान की शक्ति मे हुये वा प्रधान की शक्ति रूप मानते हैं उन का साक्षात् चेतम ही से सम्बन्ध होने से ऐश्वर्या माना जावे अथवा अयसकान्त मणि के समान सन्निधिसत्तामात्र से प्रेरक होने से माना जावे इन दो में से प्रत्येक में दोष देखाने में प्रथम पहिले पक्ष में दोष वर्णन करते हैं । प्रधानशक्तियोगाचेत्सङ्गापत्तिः ॥८॥ प्रधानशक्तरिच्छादेः पुरुषेयोगात्पुरुषस्यापिधर्मसंगापत्तिः । तथाच सयस तत्रपश्यत्यनन्वागतस्तेनभवत्यसंगोयंपुरुषइत्यादिश्रुतिविरोधइत्यर्थःअन्त्येवाह भाषानुवादः॥ प्रधान की शक्ति के योग से है ऐसा माना जाय तो सङ्ग की प्राप्ति होगी। प्रधान की शक्ति जो इच्छा आदि हैं उन के योग से ऐश्वर्या है ऐसा माना जाय तो इच्छा आदि का पुरुष में योग होने से पुरुष में भी धर्मों का सङ्ग होने से सत्र की प्राप्ति होगी ऐसा होने में- समीक्षाकर। - "सयत् तत्रपश्यत्यनन्वागतस्तेनभवत्यसंगोऽयंपुरुषः, अर्थ-जिस से कि वह उक्त ज्ञानवान् विवेक को प्राप्त तिस में अर्थात विवेकप्राप्त होने में मात्मज्ञान होने की अवस्था में अपने प्रात्मा को प्रकृति से भिन्न देखता है वा जानता है तिस से यह पुरुष प्रसङ्ग सिद्ध होता है इत्यादि श्रुतियों का विरोध होगा यह अर्थ है अब दूसरे पक्ष में उत्तर वर्णन करते हैं- सत्तामात्राचेत् सर्वैश्वर्यम् ॥९॥ अयस्कान्तवत्संनिधिसत्तामात्रेण चेञ्चैतन्यैश्वय्यंतर्हि सर्वेषामेवतत्तत्सर्गेषुभोक्त णांपुंसामविशेषेणैश्वर्य्यमस्मदभिप्रेतमेवसिद्धम् अखिलभोक्तमयोगादेवप्रधानेनम- हदादिसर्जनादिति। ततश्चैकएवेश्वर इतिसिद्धान्तहानिरित्यर्थः ॥ स्यादेतदीश्वर साधकप्रमाणविरोधेनैते सत्ताएव । अन्यथैवंविधासत्तर्कसहस्त्रैःप्रधानमपिवाधि तुंशक्यते इतितत्राह- भाषानुवादः॥ सत्ता मात्र से है ऐसा माना जाय तो सब का ऐश्वर्य होगा ॥ जो अयस्कान्त (चुम्बक) के समान संनिधिसत्तामात्र से चेतन का ऐश्वर्य माना जाय तो विशेषतारहित सभी भोक्ता पुरुषों का जैसा हम मानते हैं ऐश्वर्य सिद्ध होवेगा क्योंकि सम्पूर्ण भोक्ताओं के संयोग ही से प्रधान से मह- तत्त्व आदि उत्पन्न किये जाते हैं। ऐसा होने में एक ईश्वर है इस सिद्धान्त की हानि है ॥॥ जो यह कहा जाय कि ऐसा ही हो ईश्वर के सिद्ध करने वाले प्रमाणों के विरोध से यह तर्क असत् ही है ऐसे ही सहस्रों असत्तों से प्र. धान का भी प्रतिषेध होसक्ता है इसका उत्तर यह है- प्रमाणाभावानतत्सिद्विः ॥१०॥ तत्सिद्धिनित्येश्वरेतावत्प्रत्यक्षंनास्तीत्यनुमामशब्दावेवप्रमाणेवक्तव्येतेच न संभवत इत्यर्थः १० इदमेव (असंभवमेव) प्रतिपादयतिसूत्राभ्याम् भाषानुबादः ॥ प्रमाण के प्रभाव से उस की सिद्धि नहीं हैं प्रमाण न होने से उस की अर्थात् नित्य ईश्वर की सिद्धि नहीं होती है प्रमाण के अभाव कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर विषय में प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है प्रत्यक्षमूलक ही अनुमान व शब्द प्रमाण होने से उनका भी होमा सम्भव नहीं होता इसी को अगले दो सूत्रों में स्पष्ट वर्णन करते हैं- १० समीक्षाकर॥ ॥१९॥ सम्बन्धाभावान्नानुमानम् ॥११॥ सम्बन्धोव्याप्तिः अभावोऽसिद्धिः तथा च महदादिकंसकतंककार्यत्वादित्या धनुमानेष्वप्रयोजकत्वेनव्याप्यत्वाऽसिट्स नेश्वरानुमानमित्यर्थः प्रत्यक्षमूलाव्या- प्तिःप्रत्यमानावेव्याप्त्यसिद्धरनुमानस्याप्यभावः ११ नापिशब्दइत्याह- भाषानुवादः॥ सम्बन्ध के प्रभाव से अनुमान नही हैं सम्बन्ध का अर्थ यहां व्याप्ति है प्रभाव का अर्थ प्रसिद्धि है जैसा कार्य कारण मम्बन्ध वा व्याप्ति द्वारा ऐमा अनुमान होता है कि महत्तत्त्व प्रादि सफर्तृक है ( कर्ता कारण सम्बन्धी हैं ) कार्य होने से, इत्यादि अनुमानों में प्रयोजक (प्रेरणकर्ता) न होने से व्याप्य होने की सिद्धि न होने से ईश्वर में अनुमान नहीं है अथवा व्याप्ति प्रत्यक्षमूलक ही होती है प्रत्यक्ष के प्रभाव में व्याप्ति की असिद्धि होने से अनुमान का भी प्रभाव है ११ अब शब्द प्रमाण के निषेध को वर्णन करते हैं । श्रुतिरपि प्रधानकार्यत्वस्य ॥१२॥ प्रपञ्चे प्रधानकार्यत्वस्यैवश्रुतिरस्तिनचेतनकारणत्वस्ययथा प्रजामेकालोहित- शुक्लकृष्णांबड्डीः प्रजाः सृजमानांसरूपाः। तद्वेदंती व्याकृतमासीत् सम्मामरूपा भ्यांच्याभियतेइत्यादिरित्यर्थः याच तदैक्षतबहुस्यामित्यादिचेतनकारणताश्रुतिः सासर्गादावुत्पन्नस्यमहत्तत्वोपाधिकस्यमहापुरुषस्यजम्यज्ञानपराकिंधाबहुभध- नानुरोधात् प्रधानएषकलंपिपतिषतीतिवद्गौणीअन्यथासाक्षीचेताकेवलोनिर्गुणश्चे त्यादि श्रुत्युक्ताऽपरिणामित्वस्यपुसषेऽनुपपत्तेरिति॥अधुनैतवर्णनं समीक्ष्यतेएतेषु सूत्रेषु यदीश्वरप्रतिषेधउक्तः तत्तणासिद्धिदर्शयित्वालौकिकमेवबाधकंप्रतिपा दितमित्येवावधेयम्नसर्वथेश्वरास्तित्वप्रतिषेधस्याशयोमन्तव्यःयतईश्वरासिद्ध रित्यस्मात्प्राक्सूत्रैःसम्बन्धविचारतोऽनुत्तिग्रहणाचायमेवाशयस्सांख्याचार्यस्य महात्मनः सम्यग्निश्चीयतेतदमेनव्याख्यानेनावधार्यमतः माग्विवेकज्ञानस्यसा क्षादुपायः प्रमाणान्येवसन्तीत्यभिप्रायेणप्रत्यक्षानुमानशब्दभेदेनत्रिविधंप्रमाण मितिकथनानन्तरंप्रमाणानांविशेषलक्षणावर्णनेप्रत्यक्षस्यव्याख्यानोपक्रमेतस्यैत- लक्षणमुक्तम्- अस्य भाषानुवादः॥ श्रुति श्री प्रधान के कार्य की है अर्थात् प्रधान के कार्य वर्णन विषय में है १२ प्रपञ्च में (स्टष्टि प्रपञ्चमें) प्रधान ही के कार्य विषय में श्रुति है तन के ३८ समीक्षाकर॥ प्रतिपादन में नहीं है श्रुति यह है । अजामेकां लोहित शुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः अजोटेको जुषमाणोऽनुशते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः॥ अर्थ-एक अजा (उत्पत्ति रहित प्रकृति) लोहित शुक्ल कृष्ण रूप को अर्थात रज सत्व तम गुण रूप को अपने रूप के समान बहुत प्रजाओं को इत्पका करने वाली को एक अज (पुरुष) उस के साथ प्रीति करता हुआ शयन करता है अर्थात् भोग करता है और अन्य अज भोग कर के विराग को प्राप्त हुमा इस भोग की हुयी प्रजा को त्याग देता है तथा- तहेदं तीव्याकृतमासाननामरूपाभ्यां व्याक्रियते इत्यादि । अर्थ-वह यह प्रकृति कार्य रूप प्रत्यक्ष जगत् पूर्व ही नाम रुप रहित अप्रकट था वह सृष्टि समय में नाम रूप से प्रकट किया जाता है अर्थात् प्रकृति से प्रकट किया जाता है इत्यादि और जो तदैक्षत वहुस्याम इत्यादि । अर्थ-ठस ने इच्छा किया कि बहुत होऊ इत्यादि चेतन कारण प्रतिपादक श्रुतियां हैं वह सृष्टि की प्रादि में उत्पन्न महत्तत्त्व उपाधिक महापुरुष के उत्पन्न हुये ज्ञान के विषय में हैं अथवा बहुत होने में तदित प्रधान ही में शीघ्र गिरने वाले कगार में कगार गिरने की इच्छा करता है ऐसा कहने के समान इच्छा वर्णन करने वाली श्रुति गौणी है अन्यथा- साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ।। अर्थ-पुरुष साक्षी चेतन केवल निर्गुण है इत्यादि श्रुति में जो पुरुष का परिणामी न होना कहा है वह पुरुष में होना संभव न होगा।अब इस वर्णम की समीक्षा की जाती है इन सूत्रों में जो ईश्वर का प्रतिषेध कहा गया है यह तर्क से प्रसिद्धि को ( सिद्धि न होने को ) देखा कर लौकिक ही वाधक होना प्रतिपादन किया गया है यही मानना चाहिये सर्वथा ईश्वर के अस्तित्व प्रतिषेध करने का प्राशय नहीं स्वीकार करना चाहिये क्योंकि “ईश्वरासिद्धेः" इस सूत्र से पहिले वर्णन किये गये सूत्रों के साथ पूर्व से सम्बन्ध विचारने व अनुवृत्ति ग्रहण करने से महात्मा सांख्याचार्य का यही प्राशय अच्छे प्रकार से निश्चय किया जाता है यह इस व्याख्यान से निश्चय करना चाहिये कि इस निषेध वर्णन से पहिले से विवेक ज्ञान के साक्षात् उपाय प्रमाण ही हैं इस अभिप्राय से प्रत्यक्ष अनुमान और शब्द भेद से तीन प्रकार का प्रमाण है समीक्षाकर॥ ३९ यह कहने के पश्चात् प्रमाणों के विशेष लक्षण वर्शन करने में प्रत्यक्ष के व्याख्यान के प्रारम्भ में प्रत्यक्ष का ऐसा लक्षण वर्णन किया है। यत्सम्बद्धं सत्तदाकारोल्लेखि विज्ञानं तत्प्रत्यक्षम् अ०१ स०८९ इन्द्रियेणसहयत्सम्बद्धमर्याद व्यवहितसम्बन्धप्राप्तंनिर्दोषयथार्थरूपं वस्तु तस्ययत्तदाकारोलेखिभ्रमविकाररहितं तस्वरूपधारिविज्ञानं तत्प्रत्यक्षप्रमाण- मित्यर्थः ८९ मनुलौकिकजनानामेवप्रत्यक्षएतलक्षणस्यव्याप्तित्वंयोगिनामतीता- मागतव्यवहितवस्तुप्रत्यक्षेऽव्याप्तिः सम्बद्धवस्त्वाकाराभाधादित्याशक्यतस्या- लक्ष्यत्वेमसमाधते ॥ अथ भाषानुवादः जो सम्बद्ध (सम्बन्ध को प्राप्त) सत् (यथार्थ रूप से विद्यमान) है उस का जो तदाकारोम्लखि विज्ञान वह प्रत्यक्ष है ॥ ९ ॥ इन्द्रिय वा इन्द्रियों के साथ जो सम्बद्ध है अर्थात् व्यवधानरहित सम्बन्ध को प्राप्त निर्दोष यथार्थ रूप वस्तु है उस का जो तदाकारोखि अर्थात् भ्रम व विकाररहित तस्वरूप धारण करने वाला जो विज्ञान होता है वह प्रत्यक्ष प्रमाण है॥९॥ अब यह शङ्का करके कि लौकिक जनों ही के प्रत्यक्ष में इस लक्षण की व्याप्ति है अर्थात् उन ही के प्रत्यक्ष सक इस की सीमा है योगियों को भूत भविष्यत् व व्यवहित भी प्रत्यक्ष होता है विना इन्द्रिय सम्बन्ध हुये योगियों के प्रत्यक्ष में इस लक्षण की व्याप्ति नहीं है क्योंकि सम्बद्ध वस्तु के आकार का अभाव है। समाधान वर्णन करते हैं। योगिनामबाह्यप्रत्यक्षत्वान्न दोषः ॥ ९० ॥ ऐन्द्रियकप्रत्यक्षमेवात्रलक्षयंयोगिनश्चाबाह्यप्रत्यक्षकाः अतीमदोषोमतत्प्र- त्यव्याप्तिरित्यर्थः ० वास्तवसमाधानमाह । अस्य भाषानुवादः योगियों के प्रबाट प्रत्यक्ष होने से दोष नहीं है ९० इस में ऐन्द्रियक (इन्द्रिय से हुआ वा इन्द्रियसम्बन्धी) प्रत्यक्ष ही लक्ष्य है योगी जन अबाह्य वस्तु के प्रत्यक्ष करने वाले होते हैं इस से दोष नहीं है उम के प्रत्यक्ष में इस की अव्याप्ति का दोषारोपण करमा युक्त नहीं है वास्तव समाधान को वर्णन करते हैं।

समीक्षाकर॥ लीनवस्तुलब्धातिशयसम्बन्धादादोषः ॥१२॥ अथवा तदपिलक्ष्यमे वतथापिनदोषोनाव्याप्तिःयतोलीनवस्तषु लब्धयोग- जधर्मजन्यातिशयस्ययोगिचित्तस्य सम्बन्धोघटतइत्यर्थः अत्रलीनशब्दःपरामि- प्रेतासन्निकृष्टवाची, सत्कार्यवादिनां यतीतादिकमपिस्वरूपतोस्तीतितत्स- म्बन्धःसम्भवेदितिव्यवहितविप्रकृष्टेषु सम्बन्धहेतुविध्यालब्धातिशयेतिधिशे- षणम् अतिशयश्चव्यापकत्वकृत्तिप्रतिबन्धकतमोनिवृत्त्यादिश्चेतिअस्मिन्सूत्रेवाभ- दोषःएवंपदच्छेदात्नदोषःप्रयमोंगृह्यतेयोगिनामवाह्यप्रत्य क्षेलौकिकजन जनयुद्ध्या प्रत्यक्षस्याव्याप्तावपिनदोषःवाव्याप्तिरस्त्येवातो दोषः इतिकथनादिदंविज्ञापित लौकिकजनाः स्वैन्द्रियकज्ञान तर्काम्यां सर्वपदार्थान्प्रमातुयथार्थज्ञातुंवानशव- सिनवायेन्द्रियार्थमन्त्रिकर्षजन्यमात्रज्ञानप्राप्तानां लौकिकजनानांबाह्यविषयके- न्द्रियकज्ञानोद्भवतर्कस्यप्रतिष्ठात्वमस्ति यतोलोकएवयोगसाधनेनसामार्थविशे. पप्राप्तानां योगिनां यदवाह्यप्रत्यक्षत्वंतत्रप्रत्यक्षस्यव्याप्त्यभावानुमामस्या- प्यसम्बन्धानतर्कस्यविषयोभवितुमर्हतिपरन्तुप्रत्यक्षस्याव्याप्तौतकैणा सिद्वौसत्यां नवोगिनामवाांप्रत्यक्षत्वस्यासत्यत्वंतस्येन्द्रियकप्रत्यक्षस्याविषयत्वात्तोन- दोषः योगिनामवाह्यप्रत्यक्षवदीश्वरोऽपिप्रत्यक्षतन्मूलकानुमानयोरविषयत्नत्त- के णसाघ्योऽस्त्यतस्तस्यामिद्वेरपिनदोषइतिषनुमाशयेनाह ॥१॥ अस्य भाषानुवादः अथवा लीन वस्तु में प्राप्त हुये अतिशय सम्बन्ध मे दोष नही है ॥ १ ॥ अथवा जो उन का प्रत्यक्ष भी लक्षय ही माना जावै तो भी दोष नहीं है न अव्याप्ति है क्योंकि योग से उत्पन्न हुये धर्म से अतिशय सामर्थ्यवान् योगी के चित्त का खीन वस्तुओं में सम्बन्ध होता है उस से योगी को उन का प्रत्यक्ष होता है इस से दोष नहीं है यहां लीन शब्द जो वस्तु सनिकृष्ट नहीं अर्थात् वाय इन्द्रिय वा लौकिक जनों के इन्द्रियों से सम्बन्ध को प्राप्त नहीं है उस का वाचक है सत्कार्यवादियों के मत में जो पदार्थ भूतकाल में हो गये हैं वा जो होने वाले हैं वह सब कारणवस्तु में विद्यमान ही हैं इस से उन का सम्बन्ध सम्भव है इस से व्यवहित (व्यवधान को प्राप्त) व विप्र. कृष्ट (दूरदेश में प्राप्त) वस्तुओं में सम्बन्ध होने योग्य होने से प्राप्त "अतिशय" यह विशेष कहा है व्यापक होने की वृत्ति के रोकने वाले तम वा प्रज्ञान का निवृत्त होना अतिशय है इस सूत्र में वादोषः शब्द का वा अदोषः ऐसा समीक्षाकर॥ ४१ पदच्छेद करने से दोष नहीं है यह अर्थ ग्रहण किया जाता है कि योगियों के अवाय प्रत्यक्ष में लौकिक जनों की बुद्धि से प्रत्यक्ष की व्याप्ति न होने में भी दोष नहीं है अथवा व्याप्ति है इस से दोष नहीं है। यह कहने से यह विज्ञा- पित किया है कि लौकिक जन अपने इन्द्रिय सम्बन्धी ज्ञान व तर्क से सब पदार्थों के प्रमाण करने व यथार्थ जानने को समर्थ नहीं हो सके और म बाह्य इन्द्रिय व अर्थ के सन्निकर्ष से जन्य (उत्पन्न होने योग्य) मात्र ज्ञान को प्राप्त हुये लौकिकों के बाह्य ही है विषय जिस का ऐमे इन्द्रिय सम्बन्धी ज्ञान से उत्पन्न हुये तर्क की प्रतिष्ठा है क्योंकि लोक ही में योगसाधन से विशेष सामर्थ्य को प्राप्त हुये जो योगीजन हैं उन का जो अबाह्य प्रत्यक्ष करने का सामर्थ्य है उस में लौकिक प्रत्यक्ष की व्याप्ति का प्रभाव होने में अनुमान का भी सम्बन्ध न होने से वह तर्क का विषय नहीं हो सक्ता न तर्क से उस की सिद्धि हो सकी है परन्तु प्रत्यक्ष की व्याप्ति न होने व तर्क से सिद्ध न होने में योगियों के प्रयास प्रत्यक्षत्व को असत्यता नहीं होती क्योंकि वह ऐन्द्रियक प्रत्यक्ष का विषय नहीं है इम से लौकिक प्रत्यक्ष में दोष व लौकिक प्रत्यक्ष से अस- म्भव जात होने से योगियों के प्रबास्य प्रत्यक्ष में दोष नहीं है योगियों के प्रबाट प्रत्यक्ष के समान ईश्वर भी प्रत्यक्ष व प्रत्यक्षमूलक अनुमान का विषय म होने से तर्क से साध्य नही है इस से उस की सिद्धि न होने से भी दोष नहीं है यह कहने के अभिप्राय से यह कहा है- ईश्वरासिद्धेः : ९२ ॥ ईश्वरासिद्धेः इत्यपूर्ण वाक्यतयापूर्तिमपेक्षतेपूर्वान्नदोषइत्यनुवर्तते नुवृत्त्या पूर्त्य मन्तरमोश्चरामिद्धेर्नदोष ईतिसूत्रवाक्यं जायतेअभ्याशयः पूर्वोक्कोपिविशे- घेणात्रवणयंतेयथायोगिनामबाह्यप्रत्यक्षत्वे लौकिकप्रत्यक्षस्याव्याप्तौ तर्कस्या- प्राप्ती वा तणासिद्धावपिवास्तवेनतस्यसिद्धत्वान्नदोषः एवलौकिकतर्केण प्रत्य- क्षादिप्रमाणेनवाईश्वरस्यासिद्धेर्न दोषः ईश्वरस्यापितत्त्वज्ञामं योगिनामबाह्या- तीतानामतव्यवहितवस्तुप्रत्यक्षवद्योगिनएवप्राप्नोतीत्यर्थः इदन्तुलोकेऽप्यनुभू- यते यत्किञ्चित्पण्डितेनज्ञातंसिद्ध वस्तु यदिघालकस्तत्स्वबुद्ध्याविचारेणवाज्ञातुन्न शक्नोतितस्यवालकबुद्ध्यारसिद्धत्वाद्दोषो न भवति न च तस्यमिथ्यात्वंजायते ततुसिटुंविद्यतएवएवं लौकिकतणासिद्धावपीश्वरस्यास्तित्वं नप्रतिषिध्यते प्रय- मेवाशयस्साङ्ख्याधार्यस्य महषैरवधार्यो नान्यथायद्ययमेयाशयो न स्यातही- भराभावादित्यवोच्येततृतीयाध्यायेस्वयमेवाचार्येण सहिसर्ववित्सर्वकर्ता मू०५६ m ४२ समीक्षाकर। 'ईदृशेश्वरमिद्धिःसिद्धा५७' एवमोच्येतअर्थात्माभ्यां सूत्राभ्यांसम्मिधिमात्रेणमि- मित्तकारणसर्वज्ञसर्वकर्तृप्रकारकमीश्वरस्वीकृत्यतस्यसङ्कल्पपूर्वककतत्वमुपादान कारणत्वञ्चप्रतिषेधितवानसांख्याचार्यःअन्यच्च पञ्चमाध्याये समाधिसुषुप्तिमोक्षेषु ब्रह्मरूपता सू० ११६ इत्युकवान अबर माध्यादिषुजीवात्मनोब्रह्मरूपत्वस्वीकृत- मतोऽपिजीवात्परोब्रह्मणस्वीकारोवगम्यतेननुनेश्वरः इति सूत्रेशेषः इतिमत्या ईश्वरासिद्धेनेश्वरएवं सूत्रार्थोवाच्यःइतिवदेवेन्मेवंधाच्यंव्याकरणेऽन्येषु च सर्वदर्शन प्रयेषुपूर्वसूत्रात्परमूत्रप्राप्यानुत्तिर्गृह्यतेपूर्वसम्बधेन ग्राह्यानुतिपरित्यज्यशा- स्त्रशैलीविरुद्वस्वकल्पनयाऽऽक्षेपेण व्याख्यानमा ग्रहभूतममङ्गतमप्रमाणरूपमित्य- वधेयमस्तिननुकार्येणकारणं कर्मणाकर्तेत्यनुमीयतएव अतोजगत्कार्येण णतत्कारणे- श्वरस्यानुमानभवत्यतः प्रमाणतर्काभ्यामीश्वरो न सिद्ध्यत्तिनेवाच्यमितिपू- र्वपक्षनिराकरणार्थ स्व पक्षसिद्धयर्थ मग्रिमसूत्रैस्तणासिद्धिप्रदर्शनार्थ गाहबद्धमुक्त- योरन्यतराभाधान तत्सिद्विरित्यादिइतिराधान्तः प्रयोजनमात्रमर्थात् साङ्ख्या- चार्यस्मसर्वधेश्वरप्रतिषेधस्यामाशयत्वमात्रमत्रप्रतिपादितं ईश्वरविषयेविशेष- जाममस्मन्निर्मितवेदान्तभाष्यदर्शनादवगन्तव्यमिति इतीघरविषये सांस्यसूत्रा- सांव्याख्याने श्रीमत्पण्डितप्रभुदयालुनिर्मितेसमीक्षाकरेतृतीयोऽध्यायः ३ ॥ अस्यभापानुवादः ॥ ईश्वर की सिद्धि न होने से ॥ ईश्वर की सिद्धि न होने से यह वाक्य अपूर्ण है इस से इस में पूर्णता की आवश्यकता है पूर्व सूत्र से दोष नहीं है यह अनुवृत्ति से ग्रहण किया जाता है अमुवृत्ति से वाक्य पूर्ण करने पर ईश्वर की सिद्धि न होने से दोष नहीं है ऐसा सूत्र वाक्य होता है इस का प्राशय पूर्व ही वर्णन किया गया है तथापि यहां विशेषता से वर्णन किया जाता है जैसे योगियों के प्रवाह्य प्रत्यक्ष होने में लौकिक प्रत्यक्ष की व्याप्ति न होने वा तर्क से सिद्ध न होने पर भी वास्तव में उसकी सत्यता होने से दोष नहीं है ऐसे ही लौकिक तर्क से व प्रत्यक्ष आदि प्रमाला से ईश्वर की मिद्धि न होने से दोष नहीं है ईश्वर का भी तत्त्वज्ञान योगियों के अबाह्य अतीत अनागत ( भूत भविष्यत् ) य व्यवहित वस्तुओं के प्रत्यक्ष के समान योगी ही को प्राप्त होता है यह आशय है और लोक में ऐसा अनुभूत होता है कि कोई वस्तु जो पण्डित ज्ञानवान् की बुद्धि में सिद्ध व निश्चित है उम को जो बालक अपनी बुद्धि व अपने विचार से न जाम सकने से प्रसिद्ध समझता है तो बालक की बुद्धि से प्रसिद्ध होने से दोष नहीं समीक्षाकर ॥ होता है न उस वस्तु की असत्यता होती है वह तो सिद्ध विद्यमान ही है ऐसे ही लौकिक सर्क से प्रसिद्ध होने पर भी ईश्वर के अस्तित्व का प्रतिषेध नहीं होता यह प्राशय महर्षि साङ्घयाचार्य का निश्चय करने योग्य है अन्यथा नहीं क्योंकि जो यही आशय न होता तो ईश्वराभावात् ऐसा कहते अर्थात ईश्वर की सिद्धि न होने से ऐसा न कहते ईश्वर के प्रभाव से अर्थात् न होने से ऐसा कहते और तीसरे अध्याय में श्राप ही सांख्याचार्य ने जो ऐसा वर्णन किया है- सहिसर्ववित्सर्वकी स० ५६ ॥ ईदृशेश्वरसिद्धिः सिद्धा ॥५७।। अर्थ-वह सब जानने वाला सब करने वाला है ५६ ऐसे ईश्वर की सिद्धि सिद्ध है ५७ ऐमा वर्णन न करते अर्थात् इम सूत्रों से सबिधिमात्र से निमित्त कारण सर्वज्ञ व सब करनेवाला ईश्वर को स्वीकार करके उस के सङ्कल्प पूर्वक कर्ता होने और उपादाम कारण होने का प्रतिषेध किया है और पांचवें अध्याय में यह कहा है- समाधिसुषुप्तिमोक्षेषु ब्रह्मरूपता ॥ अर्थ-समाधिमुषुप्ति ब मोक्षों में ब्रह्म रूपता होती है सू० ११६ अर्थात् समाधि प्रादि में जीवात्मा को ब्रह्म रुपता प्राप्त होती है अर्थात् ब्रह्म के समाम शुद्ध चेतन रूप इन्द्रियसम्बन्धरहित होता है इस से भी जीव से पर ब्रह्म को स्वीकार करमा सिद्ध होता है जो यह कहा जाय कि ईश्वर नहीं है यह सूत्र में शेष है ऐसा मान कर ईश्वर की सिद्धि न होने से ईश्वर नहीं है ऐसा सूत्र का अर्थ कहना चाहिये तो ऐमा कहना प्रयुक्त है क्योंकि व्याकरण और अन्य सब दर्शन ग्रंथों में पूर्व मंत्र से पर सूत्रों में प्राप्य अनुवृत्ति का ग्रहण किया जाता है सम्बन्ध से ग्रहण करने योग्य अनवृत्ति को त्यागकरके शास्त्र की शैली के विरुद्ध अपनी कल्पना से आक्षेप करके व्याख्यान करना प्राग्रह रुप असंगत अप्रमाण रूप ही निश्चय करने योग्य है। जो यह कहा जावे कि कार्य से कारण व कर्म से कर्ता अनुमान किया जाता है इससे जगत कार्य को देखकर उस के कारण व कर्ता ईश्वर का अनुमान मम्भव होता है इस से प्रमाण व तर्क से ईश्वर नहीं सिद्ध होता है ऐमा न कहना चाहिये इस पूर्वपक्ष के निराकरण ( खण्डन ) के लिये और अपना पक्ष सिद्ध करने के लिये अगले सूत्रों से तर्क से ईश्वर की प्रमिद्धता देखाने वा प्रतिपादन के प्रपोजन से यह वर्णन किया है। --- ४४ समीक्षाकर॥ -- ܘܪܗܟ मुक्तबद्वयोरन्यतराभावान्न तत्सिद्धिः ।। इत्यादि यह मिद्धान्त है यहां प्रयोजन मात्र अर्थात् सांख्याचार्य का भर्वथा ईश्वर के प्रतिषेध करने का आशय न होना मात्र कहा गया है । ईश्वर विषय में विशेष जान हमारे निर्माण किये हुवे वेदान्त भाष्य से प्राप्त करना महिये- इतिश्रीमत्पण्डित प्रभुदयालुनिर्मितेममीक्षाकरे ईश्वरविषये सांख्यसूत्राणां व्याख्याने तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥ अथवेदान्तसूत्रविशेषाणां प्रायन याधुनिकभाष्यटीकाकारैः कृतायुक्तव्याख्या- नस्य समीक्षाप्रारभ्यतेवेदान्तदर्शनस्यप्रथमाध्यायस्यप्रथमपादे एकविशतिसं- ख्यकमिदंसत्रम् ॥ अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ शांकरभाष्यश्रीशंकराचार्यः कृतमस्यसूत्रस्येदं व्याख्यानं इदमानायतेछा- न्दोग्य “ अथयएषोन्तरादित्येहिरण्मयः पुरुषोदृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आपणखात्सर्वएवसुवर्णः सस्ययथाकप्यामपुण्डरीकमेवमक्षिणीतस्योदितिनाम स एषमर्वेभ्यः पाप्मभ्यउदित उदितिहवैसर्वेभ्यः पाप्मभ्यःयएवंवेद" तत्रमंशयः सिंविद्याकर्मातिशयात्प्राप्तोत्कर्षः कश्चित्संसारीजीवः सर्यमण्डलेचक्षुषिधोपास्य- नयतेकिंवानित्यसिद्धःपरमेश्वरः किन्तावत्प्राप्तंसंसारीतिकुतः रूपत्वप्रवणात् यएकोन्तरादित्येहिरण्मयइत्यादि श्रुतिवाक्यात् नचपरमेश्वरस्वरूपवत्त्वं युक्तं "अश दमस्पर्शमरूपमव्ययम्” इतिश्रुतेः अनाधारस्यतस्यसर्वाधाररूपस्ययएषो- न्तरादित्येयएषोन्तरक्षणिइत्याधारश्रवणाच्च, एवंपूर्वपक्षसंस्थापनानन्तरमिदमुक्त- रमुक्तम् परमेश्वरएव अन्तरादित्येप्रक्षणिचोपास्यः न संसारीकुतः तद्धर्मोपदेशात् तस्यपरमेश्वरस्य धर्माश्होपदिष्टास्तद्यथातस्योदितिनामइतिश्रावयित्वाअस्या- दित्यस्यपुरुषस्यनाममएषसर्वेभ्यः पाप्मभ्यउदितः इतिसर्वपापापगमेननिर्वक्ति सर्वपाप्माष गमश्चपरमात्मनएवश्रयतेय । प्रात्माप्रपहतपाप्माइत्यादौ इत्यादिहे- तुभिः परमात्माएवउपास्यइतिस्थितं यएषोन्तरादित्येइत्यादि, अस्याः श्रुतेर- यमर्थः श्रादित्ये अन्तरक्षणिचहिरण्मयः प्रकाशमयः हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेशः प्रकाशमयः श्मश्रुर्यस्यप्रकाशमयः प्रकाशरूपोवाकेशोयस्य प्राप्रणखात्सर्वएव मुवर्णः प्रकाशरूपायःपुरुषः दृश्यतेतस्ययथाकप्यासंपुण्डरीकमेवमक्षिणी अर्थात् कंजलपीयते ( पौपाने इतिधातोः ) इतिकपीनपुंसकलिङ्गत्वाद्हस्वत्वेकपि, । आस्तेश्त्यासंकपिचतदासंकप्यासमर्थात्स्वमूलनालाभ्यांजलपीयतेकोऽर्थः पिव- समीक्षाकर॥ ४५ त्यस्ताभ्यां जलं पीत्वार्द्रत्वंप्रफुल्लनच्चप्राप्तमस्तितदेववास्तेयत्तस्कप्यासमी दृशंपुण्डरीकमर्थात्मस्वनालादिन्नमनाई शोभाहास्यप्राप्तं किन्तुनावस्थपूर्ण शोभाप्राप्तंपुण्डरीकंयथाएवंतस्यपुरुषस्याक्षिणीयदाकंजलंपासलपवेशनइतिधा- तुरपिपूर्वकः वष्टिभागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोरितिवचनादपरकारलोपः क- प्यासंसलिलस्थमित्युक्तं भवतिअथवासूर्यः स्वकिरणैर्जलमाकर्षस्थतः कपिःसूर्यः तस्यासंमण्डलंयथाश्रादित्यमगडलंहदयपुण्डरीकञ्चपरमात्मनउपासनस्थानंतषा तस्योपासकस्याक्षिणीतस्योदितिनामतस्यपुरुषस्य उदितिमामउल्हसिनामेत्य - र्थः उन्नामनिर्वक्तिसएषसर्वेभ्यः पप्मभ्यउदितः उद्गतः सर्वपाप्मास्पृष्टइत्यर्थः शांकरभाष्यटीकायां श्रीगोविन्दामम्देमतस्ययथाकप्यासंपुण्डरीकमेवमक्षिणी इत्यस्यश्रुतिवाक्यावयवस्यायमर्थउक्तः तस्येसिकपेर्मर्कटस्यासंपुच्छभागोत्यन्तते जस्वीततुल्यं पुण्डरीकं यथादीप्तिमदेवंतस्यपुरुषस्याक्षिणीसद्योविकसितरक्तां भोजनयनइत्यर्थःनायमर्योग्राहयः वीभत्सापत्तेरन्योत्तमोपमाकयमेश्रुतिधनुर- क्षमत्वावगमात्रयतिरिक्तान्यवर्मा वत्त्वमपिकपे खासयोः संभवात्पुण्डरी- कशब्दस्यसितांभोजेनियतत्वादसंगतेरनुत्तमत्वादिति ।। अनुकतेस्तस्य च अ० १ पा० ३ सू० २२ ॥ वेदान्तदर्शनेप्रथमाध्यायेतृतीयपादेदहराधिकरणे अर्थात् हृदयषुण्डरीकस्थाम स्यदहरशब्दवाच्यस्योपासनवर्णनेदहरउत्तरेभ्यः इत्यारभ्यानुकृतेस्तस्य च एत- सूत्रपर्यन्तं विमृश्यहेतुभ्योदहराकाशशब्देन परब्रह्मएवोपास्यम् इत्यवधारितं दहरउत्तरेभ्यः इत्यस्यायमर्थः दहराकाश परब्रह्मकुतःउत्तरेभ्योवाक्पमतेभ्वोहेतु. भ्यः एष आत्माऽपहतपाप्माविजरोविमृत्युर्विशोकोविजिघत्सोऽपिपासस्सत्यका मःसत्यसङ्कल्पइतिनिरुपाधिकात्मत्वमपहतपाप्मत्वादिकंसत्यकामत्वं सत्यसङ्क- स्पत्वं वेतिदहराकाशे श्रूयमाणागुणादहराकाशं परं ब्रह्मेतिज्ञापयन्तिात्यादि- निरूपणानन्तरमुपसंहारेअनुकृतेस्तर तस्यच २५ अपिस्मयते” २२ इमेसूत्रेवस्तः तत्रानुकृतेस्तस्यच अश्यायमर्थः तस्यदहराकाशस्यपरब्रह्मणोऽनुकारादपहतपाप मरवादिगुणकोविमुक्तबन्धःप्रत्यगात्मानदहराकाशः तदनुकारस्तत्साम्यंतथाहि प्रत्यगात्मनोविमुक्तस्यपरब्रह्मानुकारःश्रूयतेयदापश्यःपश्यतिरुक्मवर्णकर्तारमीशं पुरुषब्राह्मयोनितदाविद्वानपुण्यपापेविधयनिरञ्जमः परमं साम्यमुपैतीतिमतो- उनुकाप्रजापतिवाक्यनिर्दिष्टः जीवःअमुकार्यब्रह्मदहराकाशःकेचित अमुकृतिर- नुभानमित्युक्तवाननुकृतेस्तस्य च अपिस्मर्यतेइतिसूत्रद्वयमधिकरणान्तरं तन्व ४६ समीक्षाकर ॥ भाम्तमनुभातिसर्वतस्यभासामर्वमिदंविभातीत्यस्याःश्रुतेःपरब्रह्मपरत्वनिर्णयाय प्रपतंवदस्तितत्तअदृश्यत्वादिगुणकोधर्मोकः " धुभवाद्यायतनंस्वशब्दात त्यधिकरणद्वयनतस्यप्रकरणस्य परब्रह्मविषयत्वप्रतिपादनातन्योतिश्चरणा- भिधानादित्यादिषुपरस्यब्रह्मसोभारूपत्वावगतेश्चपूर्वपक्षानुत्थानादयुक्त सूत्रा- करवरूप्यंचअर्थात् अनुकृतिरनुभानमितिकथनमयुक्तकरोतिभात्योरेकार्थस्वाभा- बात् अस्मिन्नेवपादेब्रह्मविद्याधिकारनिरूपणेशूद्रस्याधिकारनिरुपणविषयक- निम्नोकानिसूत्राणिसन्ति- शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात्सूच्यते हि ॥३४॥ अस्य व्याख्यानम् देवादीनामपिब्रह्मविद्यायामधिकारंनिस्प्यशूद्रस्यापितस्यामधिकारोस्ति- वानास्तीतिविचार्यतेकिंयुक्तमस्तीतिअर्थित्वसामर्थ्यप्रयुक्तत्वादधिकारस्यशूद्र- स्यापितत्संभवात् इतिहासपुराणेषुविदुरादयस्तपोनिष्ठास्तथाछान्दोग्योपनिष- द्यपिसंवर्गविद्यायां शूद्रश्यापिब्रह्मविद्याधिकारः प्रतीयतेशुअgहिजानश्रुतिमा- चार्योरैकः शूद्रेत्यामन्त्रप्रतिस्मब्रह्मविद्यामुपदिशतिस्माजहारेमाःशूद्रइत्यादि- अतःशूद्रस्याप्यधिकारोविज्ञायतेइत्येवं प्राप्तमम्बर्गविद्यायारेकस्यजामतिप्रति हेशूद्रातिकथननजानश्रुतेः शूद्रवर्णत्वं हेतुतोऽवधाय॑यतस्तस्यशूदत्यमवगच्छेदि- तिप्रतिपादनायेदमाहशुगस्येत्यादिनस्यसूत्रवाक्यस्यायमर्थः तदनादरवणात कोर्थःतेषांहंसानांतेभ्योहंसेभ्योवाअनादरवणात्स्यजान श्रुतेःशुक्मर्थात शु- गुत्पमातासुधीरेक्काजामश्रुतिप्रतिशूद्रनाजहारेमाःशूद्रस्त्यत्रशूद्रशब्दे मसूचितवा- नवपरोक्ष ज्ञानस्य विज्ञापनायेतिगम्यते अतोरकेमोक्तशूद्रशब्देन जानश्रुतेः शुक् (शोकः) सूच्यतेकथं पुनःशूद्रशब्देनशुगुत्पन्नासूच्यतेइत्युच्यतेतदाद्रवणात् शुचमा- द्रवणात् शुचावारकमभ्याद्रषणात् जानश्रुतिस्तेषांहंसानांतयोहंसयोवचनं श्रु- स्वागुचमभिदुद्रायशुचावारक्कमभिदुद्रावेतिशूद्राषयवार्थसंभवात शुचेर्दश्चतिरम- त्ययेथातोश्वदीपेंचकारस्यदकारेशूद्रातिभवतिग्रस्यव्यारव्यानभ्यवैशद्यायछान्दो- ग्योपनिषदुक्तजानश्रुतिराख्यायिकाऽऽकांक्षिताउतस्सासंक्षेपेण अत्रीच्यतेजाम श्रु- तिनामावहुद्रव्यप्रदोवहनप्रदश्वबभूवतस्यधार्मिकाग्रेसरस्य धर्मेणग्रौतयोः कयो- चिन्महात्मनोरस्यब्रह्मजिज्ञासामुत्पादयिषसोहं ससपेमानिशायामस्याविदूरंग- तोरन्यतरहतरमुवाचभोभोभमाक्षभरलाक्षजानश्रुतेः पौत्रायशस्यसमंदिवाच्यो- तिराततन्तम्माप्रसानीस्तत्वामाप्रथाक्षीदितिएवं जानश्रुतिप्रशंसारूपं वाक्यमुप- मुत्यापरोहंसःप्रत्युवाचकंवरेनमेतत्सन्तंसयुग्धानमिवरेकमात्येतिकंसन्तमेनंजान- समीक्षाकर॥ अतिसयुग्यानं रेवंब्रह्ममिवगुणश्रेष्ठमेतदात्थमब्रह्मज्ञानक्कएवलोकेगुणवत्तरी, म. हताधर्मेणसंयुक्तस्याप्यस्यजानश्रुतेरब्रह्मज्ञस्यकोगुणः यद्गुणजनितंतेजोरक्कतेन- इवमांदहेदित्यर्थः एवमुक्तनपरेणकोऽसौरैवइतिपृष्टोलोकेयत्किञ्चित्साध्वनुष्ठित- कर्मयच्चसर्वे चेतनाङ्गविज्ञानन्तदुभयंयदीयज्ञानकर्मान्तरभूतं सरैवइत्याहतदेतद्वंस- वाक्यंब्रह्मज्ञानविधुरतयाऽऽत्मनिन्दाङ्गगर्भन्तद्वतयाचरक्त प्रशंसारूपंजामतिरुप- श्रुत्यतत्क्षणादेवक्षत्तारं रेक्वान्वेषणायप्रेष्यत विदित्वाउगतेस्वयमपिरैक्कमुपसद्य- गवांषट्शतंनिष्कमश्वतरीरथञ्चरेक्वायोपहत्यरैकंपार्थयामासअनुमएतांभगवोदेवतां शाधियान्देवतामुपास्सेइतितदुपास्यां परां देवतांमामनुशाधीत्यर्थःइतिमचरैकः स्वयोगमहिमधिदितलोकत्रयोजामश्रुतेर्बलज्ञानविधुरतानिमित्तानादरगर्भहंस- वाक्यश्रवणेनशोकाविष्टतान्तदनन्तरमेवब्रह्मजिज्ञासयोद्योगं चविदित्वाऽस्यब्रह्म- विद्यायोग्यसामभिज्ञायचिरालसेवांविनाऽर्थप्रदानेन शुश्रूषमाणस्यास्ययावच्छ- क्रिप्रदानेनब्रह्मविद्याप्रतिष्ठिताभवतीतिमत्वातमनुगृह्णन्मस्य शोकाविष्टस्योपदे- शयोग्यताख्यायिकांशूद्रशब्देमामन्त्रणेन ज्ञापयन्निदमाह अपाहरत्वं शूद्रतवैवसह- गोभिरयरघातवेवमहगोभिरस्त्वितिसहगोभिरयरथस्तवैवास्तनैतावतामयदत्तम ब्रह्मजिज्ञासोःशोकाविष्टस्यतयअलविद्या प्रतिष्ठिताभवतीत्यर्थः सच जानश्रुति - योपिस्वशक्त्यनुगुणमेवगवादिकंधनकन्यां च प्रदायउपससादसरैकः पुनरपितस्य- योग्यतामेघख्यापयन् शूद्रशदेनामन्याहाजहारेमाः शूद्राऽनेनमुखेनालापयि- ष्यथ इति इमानिधनानिशक्त्यनुगुणान्याजहर्थअनेनैववारंणचिरसेवयाविनापि मांत्वमभिलषितब्रह्मोपदेशरूपवाक्यमालापयिष्यसिइत्युक्वा तस्माउपदिदेश- तःशूद्रशब्देन विद्योपदेशयोग्यताख्यापमार्थं शोकएवास्यसूचितोनचतुर्थ वर्णत्व- मितितोगानश्रुतेःशूद्रशब्दामन्त्रणदृष्टान्तेननशूद्रस्याधिकारसिद्धिः ॥ क्षत्रियत्वावगतेश्च ॥३५॥ शर्तृप्रेषणाबहुग्रामप्रदानाद्यैश्वर्ययोगाच्चजानश्रुतेः क्षत्रियत्वावगतिप्रतीतेर्जा- नश्रुतिर्नशूद्रोऽतस्तम्लिङ्गाच्द्रस्याधिकारानुमाननयुक्तम् ॥ उत्तरत्र चैत्ररथेनलिङ्गात् ॥ ३६ ॥ जानश्रुतेरुपदिश्यमानायामस्यामेवसम्बर्गविद्यायाम् उत्तरत्रकीर्त्यमानेमा भिप्रतारिनाम्नाचैत्ररथेन (चित्ररथवंशोत्पन्नेन ) क्षत्रियेणास्यजामश्रुतेः क्ष- त्रियत्वमनुमीयतेकथंशौनकंचकापेयम् (कपिगोत्रपुरोहितं) अभिप्रतारिणंचका- बसेनि (कक्षसेनापत्यं ) परविष्यमाणौब्रह्मचारीविभिक्षइत्यादिनाब्रह्मचारि-

४६
ममीक्षाकर।
भने दमुपास्महत्त्यम्तेनकापेयाभिप्रतारिखोभिक्षमाणस्यब्रह्मचारिणश्चमम्बर्गधि
द्यासम्बन्धित्वं प्रतीयते तेषु चाभिप्रतारीक्षत्रियः इतरौब्राह्मशोमतोस्यांविद्या
यांब्रामणस्यतदितरेषु च क्षत्रियस्यैवान्वयोदृश्यतेनशूद्रस्य प्रतोऽस्यांविद्याया
मन्धितत्वाकाब्राह्मणादन्यस्य जानश्रुतेरपिक्षत्रियत्वमेवयुक्त नशूद्रत्वंमन्ध-
स्मिन्प्रकरणेऽभिप्रसारिणश्चैत्ररथत्वं क्षत्रियत्वञ्चन श्रुतं तत्कथमस्याभिप्रतारिण-
चैत्ररथत्यतथंवाक्षत्रियत्यंतत्राहलिङ्गादितिप्रथहशौनकंचकापेयमभिप्रतारिणं
चकाक्ष सेनिमित्यभिप्रतारिणः कायसम्बन्धः प्रतीयते अन्यत्रचएतेनवैचैत्ररथङ्का
पेयाअयाजनितिकापेय सम्बन्धितश्चैत्ररथस्वंश्रूयतेतयाचैत्ररथस्यतत्रियत्वन्स्व-
स्माचत्ररथोनामैकक्षत्रपतिरजायतेतितोऽभिप्रतारिणश्चैत्ररथत्वं क्षत्रियत्वंच
गम्यते प्रतशोत्ररथेमलिङ्गाज्मानश्रुतेःक्षत्रियत्वानुमानाम्न जानश्रुतेदृष्टान्तेनशू.
द्रस्याधिकारोवगम्यते ।।
संस्कारपरामर्शीत्तदभावाभिलापाच॥ ३७॥
तश्चमशूद्रस्याधिकारोयद्विद्यापदंशेषपनयनादयः मंस्काराःपरामृश्यन्तेतं
होपामिन्येहेभगवइत्यादितंहोपनिन्येश्रर्थात् तंशिष्यमाचार्य उपनीतवानइत्य-
र्थः नारदोपिविद्यार्थीमंत्रमुच्चारयन्सनत्कुमारमुपगतमित्याहहेभगवः (भगवन्
अधीहीतिरुपदिशेतिशूद्रस्य संस्काराभावोभिलप्यतेशूद्रश्चतुर्थोवर्णएकजातिर्न
संस्कारमई तिप्रतश्चनशूद्रस्याधिकारः ॥
तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ॥३८॥
छान्दोग्येजावालस्येयमाख्यायिकाश्रूयतेमृतपितृकः सत्यकामाख्योजावालो
मातरमपृच्छतकि गोत्रीहमितिमातोवाचभर्व सेवाव्यग्रतयाहमपितवपितुर्गोत्रं
म जानामि जावालातु माम्नाहमस्मिसत्यकामनामात्वममीतिएतापज्जानामि
अतःस नावालः ( जावालायाअपत्यं ) गोतममागत्यतेनकिंगोत्रोसीतिपृष्ट उवाच
नाहंगोत्रंवधिनमातावेलिपरंतुमेमात्राकथितं उपनयनार्थमाचार्यगत्वामत्यका-
मोजावानीस्मीतिब्रहीप्तिगोतमोग्नेनसत्यवचनेनतस्य शूद्रत्वाभावोनिर्धारितः
अब्राह्मणाएतत्सत्यंविषिष्यवानाहतीतिनिर्धार्यशावालमुपनेतुमनुशासितुंचप्र-
वक्तेजावालस्येमांकथामनुसंधायेत्याशंपत्यज्ञातगोत्रंजावालंप्रतिगोतमस्योप-
भयनब्रह्म विद्योपदेशाभ्यांप्रवृत्तिः शूद्रस्याप्यधिकारंसूचयतीत्याहतदभावनिर्धा
रोचप्रवृत्तेःसत्यवचनेनतस्यशूद्रत्वस्याभावनिर्धारणेप्रवृत्तःप्रवृत्तिहेतोश्चशूद्रस्या
धिकारोनास्ति ।
श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात्स्मृतेश्च ॥ ३९ ॥

समीक्षाकर॥ ४ यद्युहवाएतच्छमशानं यच्छद्रस्तस्माच्छूद्रममीपे नाध्येतव्यम् अतएवाध्ययनन- तिषधीयस्यसमीपेऽपिनाध्येतव्यं भवति सकश्रुतिमधीयीत । अतः श्रवणार्थप्र- तिषेधादपिशूद्रस्यानधिकारोऽवगम्यते । अधुनास्यामधिकार व्याख्यानस्यतरवं निीयतेशद्रस्ययदनधिकारत्वमुक्तं तच्छूद्रस्यसेवाकारिकुलोत्पत्सितस्सामान्यतः कुन संग कर्मविद्याभावहेतुभ्यस्तस्मिन्नुत्कृष्ट बुद्धायभावे तेन मूक्ष्मलक्ष्यवस्तु दुय- त्वात्तस्मिन्न पात्रे श्रद्धावत्युपदेशनिः फलत्वविचारतोविज्ञेयम् । सद्गुणवतः श्र- द्वालोर्धार्मिकस्य मंधाविनः शूद्रस्याधिकारोऽस्त्येवेत्यवधेयंगुणकर्मणामेवोत्कृष्टि निकृष्टयोर्मुख्यहेतुत्वमिति युक्तिस्मृतिश्रुतिप्रमाण सिद्धमिद्धान्त इतिनिश्चयः सतो गुणकर्मानुसारेणैव वर्णानां श्रेष्ठत्वंजपन्यत्यञ्च विज्ञेयमस्ति नकुलो त्यत्तिमात्रमु- तमत्वानुत्तमत्वयोर्मुस्यंकारसं भवितुमर्ह ति ब्राह्मणकुलोत्पनो यवनेन सहभो- जनाद्वान्यनिषिद्धपापाचरणात्पतित इत्युक्तोदण्ड प्राप्तः कुलात्स्ववर्गात्त्यकोवेति लोकेदुग्यते । यदिकुलोत्पत्तित्पस्यमुख्यत्वं स्यात् तद्युत्तमनिकृष्टगुण प्राप्तावपि शरीरस्यि नौमत्यांयत्कुलोत्पन्न तस्यैववर्णत्वं धर्मत्वं पदत्वच्च स्वीकार्य न क- स्माच्चिदुर्गणारश्वप व यवनादिसहभोजनाद्वातस्य पातित्यं सम्भवति नवलोके व्यवहारो दृश्यते किन्तूतमकुलोत्पन्नोऽधर्म चय॑या निकृष्टोदण्ड्यस्त्याज्योभवति अतो लोकेऽपि गुण कर्म गामवमुख्यत्वमनुभूयते यथाश्रेष्ठवर्णो धर्मचर्ययानिकृष्टो- भवतीत्येव मन्तव्यः सतांधार्मिकाणामाप्तानां पक्षपातरहितानां न्यायतोऽयमेव सिद्धान्तोभवितुमर्हति एवं युक्तयानिश्चीयते ब्रह्मसूत्रनिर्मातुहर प्ययमेवसि- द्वान्तोऽवधायं कयं तदनावनिर्धारणे च प्रवृत्तरत्र सत्रेमत्यकथनमात्राद्गोतमोनह- र्षिरज्ञातगोत्रस्य जावालस्य शूद्रत्वानिर्धारणानन्तरं तसुपनेतुमुपदेष्टुच्च प्रववृते इति विज्ञापनात्यतस्मत्य कथनंनवर्णत्वं गोत्रत्वं वाऽस्तिउत्तमगुणत्वं धर्मत्व- मेव तस्यैव शूद्रत्याभावनिर्धारणहेतुत्वं महर्षिणा स्वीकृतम् अतोयस्यवर्णतो गुणक मतोऽपि शूद्रत्वंतस्याधिकारो नास्ति यस्यतुसत्यत्वादिधर्मगुणश्रद्धालुत्व- सत्कर्मभिर्जावालवच्छूद्रत्वाभावो निर्धारितः तस्याधिकारोऽस्त्येवयुक्तितोहेतु- तश्शब्दतोवानकिमपिप्रमाणं तस्याधिकारनिषेधस्य निश्चीयते । ननु कासुचि- स्स्मृतिथ्वीदृशानिनिषेधवाक्यान्युपलभ्यन्ते “अथास्यवेदमुपए बतखपुजतुभ्यां श्रोअंप्रतिपूर्ण मिति याहवाएतच्छ मशानं यच्छूद्रं तस्माच्छूद्रशमीपेनाध्यतव्य- मितिभवतियोच्चारणेजिठहाछेदो धारणेशरीरभेद इति" प्रतश्शूद्रस्यानधिकारत्व मवगम्यतेइतिचेन्नैवं नेदूशानिवाक्यान्ययुक्ताभिकस्याप्यामस्यभवितुमर्हन्त्यतः कैश्चित्पक्षपातग्रस्तहृदयैःस्वार्थसाधकैः प्रक्षिप्तान्येव ज्ञातव्यानियतोवेदश्रवणंननि- समीक्षाकर॥ षिद्ध कर्म महापापंवायेनश्रोतुर्जिहाछेदनादिदण्ड विधान मुचितस्यास्यदिपरमेश्व- रस्तुतिप्रार्थनोपासनज्ञानकर्मविषयकवेदवाक्येष्वेकत्रानेकशब्दश्रवणे पठनेदण्ड- विधानमस्ति तर्हिपृथक्त्वेनेश्वरब्रह्म परमात्ममवित्रादिवेदोक्तशब्दवतारः श्रोता- रोपिशूद्राः दण्डयाः मन्तव्याः तथाचशूद्रस्येश्वरनामस्तुतिकथनेस्मरणेऽप्यनधि- कारः सेत्स्यतिनेश्वरस्येदृशे पक्ष गातेया हेतुः शूद्रेचिन्तनीयोऽस्तिअन्यच्च “श्राव. येचतुरोवान् कृत्याब्राह्मणमग्रतः” ईदृशवाक्येतिहासपुराणेषुविधिरपिस्मार्यते तुल्यप्रमाणंबलत्वादनेन निषेधवाक्यप्रतिषेधेदवाक्यं स्वीकार्य किंवापरस्परवि. रोधादभयोरत्यागे अन्यत्प्रमाणं मृग्यद्वयोः प्रमाणानुसंधानेविधिवाक्यस्ययुक्त्या- प्रवाक्यस्मृतिश्रुतिप्रमाणसाहाय्येन मयलत्वान्निषेधवाक्यमेवाप्रमाणंत्याज्यञ्च । तद्दुवर्लत्वात् आधुनिकभाष्यटीकाकारैर्यत्सर्वथाऽनधिकारत्वं वर्णितयैश्चस्मृ- तीतिहासपुराणेषुनिषेधवद्विधिरप्युपलभ्यते अतोवेदपूर्वकस्तुत्रास्त्यधिकारइति स्थितएवमुक्तं तदमत्यमार्षमिवान्तवेदविरुद्धमेवप्रतीयतेयनोनिषिद्धकर्मनोब्राह्म- गोऽपिशूद्रत्त्यमनधिकारत्वं च प्राप्नोति शूद्रो धर्मचर्यायाब्राह्मणत्वमधिकारत्यञ्च यद्यपि लोके ईदृशव्यवहारोनसवेत् तयापि न्याय प्राप्तवाक्याच्चायनेवसिद्धान्तो निश्चीयने अप्रमाणमित्याह शुक्राचार्यःशुक्रनीतिनामके स्वग्रन्थे“नजात्या ब्राह्मण- श्वात्रक्षत्रियो वैश्यएवच नशद्रोन चम्नेच्छोयाभेदितागुणकर्मभिः” अ० १ श्लो० ३८- ब्रह्मणस्तुसमुत्पन्नाः सर्वे किन्नु ब्राह्मणाःनवर्ण तोजनकादाब्राह्मयंतेजःप्रपद्यते ३० " तथाहमहोपस्तम्बः “धर्मचर्ययाजघन्योवर्णः पूर्वपूर्ववर्णमापद्यतेजा- तिपरिवृत्तौ अधर्मचर्य यापूर्वःपूर्वोवो जघन्यं गधन्यवर्णमापद्यतेजातिपरिवृत्तौ। सर्वेषांवर्णानां विद्यारूपवेदाधिकारविषयेसाक्षात्यजुर्वेदेषड्विंशतितमाध्याये द्वितीयमन्त्रप्रमाणमस्तिस्माद्वेतोः सत्रकारमहात्मनोपसंहारे श्रवणाध्ययनार्थ प्रतिषेधात्स्मृतेश्च यद्यप्यत्रसूत्रेस्मृतिमात्रस्यैवनामोक्तंचकारः पूर्वोक्तादन्यहेतुप्र- दर्शनार्थःतदभावनिर्धारणेचप्रवृत्तेः इति सूत्रोक्रवदवधेयम् वेदप्रमाणेमतितद्वि- रुद्धस्मृतिवाक्यस्याप्रामाण्यमेवतदुक्तमन्त्रीयम् यथेमांवाचंकल्याणीमावदानि जनेभ्यो ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्रायचार्याय च स्वाय चारणायच अ० २६ मन्त्रः २ अस्यव्याख्यानंयथाइमांप्रत्यक्षभूतांवेदचतुष्टयों कल्याणी कल्याणसाधिकांवाचं घाणों जनेभ्यः सर्वेभ्योमनुष्येभ्यः वदानि प्रहमावदानिकेभ्योजनेभ्य इत्य- पेक्ष्याहब्रह्मराजन्याभ्यां नाश्मणक्षत्रियाभ्याम्भ्रायवैश्याय च शूद्रायस्वारस्व- पुत्रायसेवकायसम्बन्धिनेवाचारणाय अतिशूद्राय । यथातथयोर्नित्यसम्बन्धीग्स- स्तथाशब्दोऽध्याहारेणग्रायः तथाहेविद्वांसः यूयंसर्वेभ्यः इमावाणीमुपदिशत ससीक्षाकर ॥ ५१ अर्थात् सर्वेषां हिताय पक्षपातरहितस्य ममेयवाणीविद्यतेमायुमाभिः सर्वेभ्यो जनेभ्योवनव्या अर्थात्श्रावशीयापाठनीयेत्यर्थः केचिद्वदन्तिजनशब्देनब्राह्मणएव या ब्राहा क्षत्रियवैश्याए बनायाः तेषामेवाधिकारस्यात्नैतद्युक्तं यतोजनेभ्यः इतिशब्दात्परेशागेमन्त्रेपृथक्पृथक् नामान्युक्तानिसन्ति यदिपरमेश्वरोब्राह्मणेभ्यो वा ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यमात्रेभ्योऽधिकारमदास्यत् तेषामेयाधिकारोअविष्यत्त हिशूद्रादीनां पृथक्त्वेन प्रत्येकस्यनामनावदिष्यत् अतीविधिरेवावधा•वेद प्रमाणानुकलतयाऽन्यत्रोक्तविधिवाक्यानामपिसवलत्वमवगम्यते न्यायत प्राप्तो- कप्रमाणतः श्रुतितश्च विधिमिद्धे सर्व यानिषेधस्यप्रामाण्यं स्मृतिवाक्यस्यचरिता- पतवायनिषेवोऽयुक्तप्रकारेणमन्तव्योस्तीतिस्थितंसमाप्तञ्चेदमधिकारनिरूपणम्।। इतिश्रीमत्प्रभुदयालुनिर्मिते समीक्षाकरे चतुर्थोऽध्यायः । ४ । एपा भाषानुवादः॥ अथ वेदान्त के विशेष सूत्रों का जो प्रायः आधुनिक भाष्य वा टीका- कारों से अयुक्त व्याख्यान किया गया है उस की और व्याख्यान में उक्त श्रुति के व्याख्यान की समीक्षा प्रारम्भ की जाती है वेदान्त दर्शन के प्रथम अध्याय के प्रथम पाद न है। अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ अर्य-अन्तर में उम के धर्म के उपदेश से ॥ २१ ॥ शांकरभाष्य में श्रीशङ्कराचार्य जी ने इस मंत्र का व्याख्यान इस प्रकार से किया है लान्दोग्य में ऐसावर्णन है । यएषन्तिरादित्येहिरण्यमयः पुरुषःदृश्यते हिरण्यश्मश्रुहिर ण्यकेशाप्रणखात् सर्वएवसुवर्णः तस्ययथाकप्यासं पुण्डरीकमे- वमक्षिणी तस्यादितिनामसएपसर्वेभ्यः पाप्मभ्यउदिति उदिति वैसर्वेभ्यःपाप्मभ्यःयएवं वेद अर्थ-जो यह सूर्य के मध्य में प्रकाशमय पुरुष देखाजाता है जिस की प्रकाशमय डाढ़ी है प्रकाश ही जिस के केश हैं नख पर्यन्त सब प्रकाश ही रूप है कप्यास कमल के समान अर्थात् वृक्ष में लगा हुआ फूले कमल के स- मान जिसके नेत्र हैं उस का उदिति नाम है वह सब पापों मे रहित है जो उस को ऐसा जानता है वह सब पापों से छूट जाता है। इस में यह संशय में यह सून ५२ समीक्षाकर ॥ .... है कि विद्या वा कर्म के अतिशय से उत्कृष्टता को प्राप्त कोई संमारी जीव है जो सर्पमरष्ठल व नेत्र में उपास्य होना सुना जाता है अथवा नित्य मिद्ध परमेश्वर है। पहले ऐसा ज्ञात होता है कि संसारी है किस हेतु से रूपवान् होना सुनने से अर्थात् जो यह सूर्य में प्रकाशमय है इत्यादि श्रुतियाक्म से परमेश्वर को रूपवान् होना युक्त नहीं है क्योंकि श्रुति में शब्दरहित स्पर्श रहित रूपरहित नाशरहित कहा है आधाररहित सब के साधाररूप का जो यह सूर्य में देखा जाता है ऐसा प्राधार सुनने से भी युक नहीं है ऐसा पूर्व पक्ष स्थापन करके यह उत्तर वर्णन किया है कि परमेश्वर ही सूर्य में व नेत्र में उपास्य है संसारी नहीं है जिस प्रमाण से उस के धर्म के उप- देश से अर्थात् उस के परमेश्वर के धर्म का उपदेश है इस से जैसा यह कहा है कि उस का उदिति नाम है ऐसा सुना कर यह कहा है इस प्रादित्य पु- रुष का नाम है वह यह सब पापों से रहित है ऐसा सब पापों से रहित होने अर्थ से उदिति नाम का निर्व वन अति वर्णन करती है, सब पापों का न होना परमात्मा ही में सुना जाता है । यथा- य आत्मा अपहलपारमा ।। अर्थ-जो मात्मा पापरहित है इत्यादि, इत्यादि हेतुओं से परमात्मा ही उयास्य है । यह सिद्धान्त है “जो यह सर्थ में" इत्यादि इस श्रुतिवाक्यका शब्दार्थ व विशेष व्याख्यान यह है कि सूर्य में व नेत्र में हिशमय अर्थात् प्रकाशमय प्रकाशमयश्मश्रु ( डाढ़ी ) प्रकाशमय केश जिमके हैं मखपर्यन्त सब प्रकाश ही रूप है ऐसा जो यह पुरुष देखा जाता है उस के जैसे कप्यास पुण्डरीक ऐसे नेत्र हैं। कप्यास शब्द के कपि व पास दो अवयव हैं क शब्द का अर्थ जल है व पीङ धातु पीना अर्थ वाचक है इससे जल को जो पीवै यह कपीवाच्य होता है नपुंसक लिङ्ग में हस्त्र होने से कपि होता है जल पीता हुआ स्थित ऐसा अर्थ कप्यास शब्द का होता है अर्थात् अपने मूल व नाल से जो जल को पीता है अर्थात् मृल व नाल से जल को खींच कर श्राद्रता धा प्रफुल्लता को प्राप्त है व स्थित है वह कप्यास है ऐसा जो कमल उस के ममान नेत्र हैं अर्थात् अपने नाल से भिन्न मुरझाया शोभा की न्यून- ता को प्राप्त नहीं किन्तु नाल में स्थित पूर्ण शोभा को प्राप्त जो कमल है वैसे उस के नेत्र हैं अथवा क जल वाचक शब्द और अपि उपसर्ग पूर्वक प्रास ...

समीक्षाकर॥ ३ धातु है-वष्टिभागुरिल्लोपमवाप्योपपसर्गयोः इस वचन से अपि के प्रकार का लोप हो गया इस प्रकार से भी जल में स्थित यह अर्थ होता है अथवा सूर्य अपने किरणों से जल को खींचता है इस से कपि शब्द का अर्थ सूर्य है प्रास का अर्थ मण्डल है अर्थात् कप्यास का अर्थ सूर्यमगडल वा हृदयपु- एडरीक परमात्मा के उपासना के स्थान हैं वैसे ही उम उपामक के नेत्र हैं उस पुरुष का उदिति नाम है अर्थात् उत् यह नाम है उत् इति का उदिति होजाता है अब उत् नाम का निर्ध बन श्रुति वर्णन करती है कि, सो यह सब पापों से उद्गत है अर्थात् मब पापों के मेल से रहित है शांकरभाष्य के टीका में श्रीगोवि न्दानन्द ने- तस्य यथाकप्यासं पण्डरीकमेवमक्षिणी ॥ इति । श्रुतिवाक्य के अवयव का ऐमा अर्थ वर्णन किया है कि कपि अर्थात् मर्कट का पास जो पुच्छ का भाग अतितेजवान् है उस के समान रंग का जो पुण्डरीक है ऐसे उस पुरुष के नेत्र हैं अर्थात् हाल का फलाहुआ लाल कमल के समान मेत्र हैं यह अर्थ ग्रहण के योग्य नहीं है क्योंकि इसमें बानर की बैठने की जगह के समान लाल कमल की उपमा देने में बीभत्स अर्थ की प्राप्ति है और अतिवक्ता का अन्य कोई उत्तम उपमा न कह सकने का दोष विदित होता है और कपि के मुख व पास का लाल रंग से भिन रंग होना भी संभव है पुण्डरीक सित कमल ( शुक्ल रंग का कमल ) का नाम है अरुण कमल का पुण्डरीक नाम भी नहीं है इस से उत्तम न होने वा अ- संगत होने से स्वीकार करने योग्य नहीं है । अनुकतेस्तस्य च अ० १ पा० ३ सु० २२ उस की अनुकृति से भी भ०१ पा० ३ ० २२ वेदान्तदर्शन में प्रथम अध्याय में तीसरे पाद में दहर अधिकरण में अर्थात् हृदयपुण्डरीक स्थान में दहर शब्द वाच्य की उपासना वर्णन में “दाहर उत्तरे- भ्यः” यहां से प्रारम्भ करकै “अनुकृतेस्तस्य च” इस सूत्र पर्यन्त विचार करके हेतुओं से दहराकाश शब्द से परब्रह्म ही उपास्य है यह निश्चय किया है- "दहर उत्तरेभ्यः” इस का अर्थ यह है कि दहर अर्थात् दहराकाश परब्रह्म है किस हेतु से उत्तरों से अर्थात् उत्तरवाक्य में प्राप्त हेतुओं से । तात्पर्य यह है कि उत्तरवाक्य में यह वर्णन है कि यह प्रात्मा पापरहित जरारहित मृत्यु ५४ समीक्षाकर ॥ रहिन शोकरहित क्षुधारहित पिपासारहित मत्यकाम सत्यसंकल्प है इस प्रकार से निरूपाध्यात्मक होना पापरहित होना आदिक और सत्यकाम होना सत्यसंकल्प होना श्रादि गुण जो दहर भाकाश में वर्णन किये गये हैं उन से यह ज्ञात होता है कि दहराकाश परब्रह्म है इत्यादि निरूपण करने के पश्चात् अन्त में “अनुकृतेस्तस्य च २२ अपिस्मर्यते” २३ यह दो सूत्र हैं उन में "अमुकृतस्तस्य च" इस मंत्र का यह अर्थ है उस की अर्थात् दहराकाश शब्द से वाच्य परब्रह्म की अनुकृति से अर्थात् परब्रह्म के अनुकार से ( समान गुण रूप होने से ) यह पापरहित होना आदि युक्त बंधरहित जीवात्मा है-दह- राकाश नहीं है क्योंकि मुक्त हुवे जीवात्मा का ब्रह्म के अनकार होना सुना जाता है जैसा कि इस श्रुति में वर्णन है । यदा पश्यः पश्यति रुक्मवर्णम् । इत्यादि अर्थ-जब देखने वाला ज्ञानी प्रकाश रूप कर्ता सब के कारण रूप सर्व समर्थ ब्रह्म पुरुष को देखता व जानता है तब वह विद्वान मायारहित पाप पुण्य को नाश कर परब्रह्म की समता को प्राप्त होता इस से प्रजापति वाक्य में कहा गया जीव अनुकर्ता है अर्थात् समता का धारण करने वाला वा समप होने वाला है और ब्रह्म दहराकाश शब्द से वाच्य अनुकार्य है अर्थात् जिस की अनुकृति प्राप्त होने योग्य है वह है। कोई अनुकृति अनु. मान है ऐसा कह कर “ अनुमतेस्तस्य ध, अपिस्मर्यते” इन दो सूत्रों का भिन्न अधिकरण मानते हैं और ऐसा वर्णन करते हैं कि उसी प्रकाश करते हुये के पीछे वा समान सब प्रकाशित होता है इस प्रकार वर्णन करने वाली जो यह श्रुति है यह परब्रह्म होना निर्णयकरने के लिये है परन्तु “अदृश्यत्वादि गुणको धर्मोक्ने, द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् " इन दो अधिकरणों से पूर्व ही प्रकरण का परब्रह्म विषयक होना प्रतिपादन किया है और “ज्योतिश्चर- णाभिधानात् ” इत्यादि में परब्रह्म का प्रकाश रूप होना पूर्व ही होने से फिर पूर्व पक्ष का उठाना वा स्थापन करना नहीं होसक्का इस से युक्त नहीं है और सूत्र के अक्षरों से भी विरुद्ध वा मेलरहित है इस से प्रयुक्त है। अनु- कृति अनुमान ही है यह कहना भी प्रयुक्त है क्योंकि करोति ( कर्ता है ) भाति (प्रकाशित होता है) इन दोनों का एक अर्थ नहीं हो सका २२, इसी पाद में ब्रह्मविद्या का अधिकार निरूपण विषयकनिम्न लिखित सूत्र हैं । शुगस्य तदनादरश्रवणात् तदाद्रवणात्सच्यते हि ॥ - समीक्षाकर॥ ) (उनके घा उसके अनादरवाक्य सुन्ने से तब जाने से) (रैक प्रति जानेसे) वा उस को (शोक को ) प्राप्त होने से इसका ( जानश्रुति का) जिस से कि शोक सूचित किया जाता है ३४ इस का व्याख्यान यह है देवता आदि को भी ब्रह्म- विद्या में अधिकार होने को निरूपण करके शूद्र का भी उस में अधिकार है वा नहीं यह विचार किया जाता है क्या युक्त है यह विचारने में अर्थी होने व सामर्थ्य होने में अधिकार के होने का विधान विदित होता है शूद्र का भी अर्थित्व वा सामर्थ्य संभव होने से अधिकार है यह सिद्ध होता है। इति- हास वा पुराणों में विदुर प्रादि तपोनिष्ठ हुये हैं और छान्दोग्य उपनिषद् में भी सम्बर्गविद्या में शूद्र का ब्रह्मविद्या में अधिकार है ऐसा प्रतीत होता है ब्रह्मविद्या के सुनने वा आनने की इच्छा करने वाले जानअति को रैव आचार्य हे शूद्र ऐसा सम्बोधन किया है ब्रह्मविद्या उपदेश करने में इन गौओं को तू ने दिया इसी द्वारा हे शूद्र तू हम से ब्रह्म उपदेश कहलावेगा इत्यादि कथन है इस से शुद्र का भी अधिकार होना विदित होता है इस के उत्तर में यह सूत्रवाक्य है प्राशय यह है कि सम्बर्ग विद्या में रैक का आनश्रुति को हे शूद्र यह कहना जानश्रुति के शद्र वर्ण सिद्ध होने का हेतु निश्चय करने योग्य नही है क्यों नहीं है वह हेतु सूत्र में वर्णन किया है सूर का अर्थ यह है कि उन के (हंसों के) वा हंसों से अनादर सुनने से इस को (जानश्रुति को) शोक उत्पन्न हुवा उस्को जान कर रैक ने आनश्रुति से हे शूद्र ऐसा कहा है शूद्र शब्द से शोक प्राप्त यह रैक ने सूचित किया है अर्थात् अपने परोक्षज्ञान को जनाया है इस से रैक से कहे हुये शूद्र शब्द से इस का (जानश्रुति का) शोक सूचित किया जाता है कैसे शूद्र शब्द से शोक हुआ यह मूचित किया जाता है " तदा द्रवणात्" यह कहने से तदाद्रवणात् शब्द का अर्थ उस को प्राप्त होने से वा उस से पाने से वा प्राप्त होने से यह होता है अर्थात् शोक को प्राप्त होने से अधवा शोक से (शोक होने से) रैक के पास आने वा प्राप्त होने से अर्थात् जानश्रुति में हनों के वचन सुमने से शोक को प्राप्त हुआ वा शोक होने से रैक के पास आया शूद्र शब्द का अर्थ शोक को वा शोक से प्राप्त हुआ संभव होने से ऐसा प्राशय अनुमान से ज्ञात होता है। शुवेर्दश्च। इस सूत्र से रप्रत्यय होने व शुबधातु के दीर्घ होने व चकार का दकार हो जाने से शूद्र होता है अब यह व्याख्यान स्पष्ट समझ में माने के लिये छान्दोग्य उपनिषद् में जो जानश्रुति की कथा है उस को यहां संक्षेप से वर्णन करते हैं । जामश्रुति नामक me समीक्षाकर॥ ब्रह्म की कोई बहुत द्रव्य व अन्न का देने वाला हुआ उस धर्मवानों में अग्रगामी जानश्रुति के धर्म से प्रसन्न हुये कोई महात्मा जानश्रुति के चित्त में जिज्ञासा उत्पन्न करने की इच्छा से रात्रि के समय में हंस सूप धारण कर के उम के समीप प्राप्त होकर एक हंम ने दूसरे से कहा कि हं भलाक्ष (हंस) जिस जानश्रुति का तेज सूर्य की ज्योति के समान दीप्तिमान् फैल रहा है उस के पास न जाना व उस को म छूना ऐसा न हो वह तेज तुझे भस्म कर देवे। ऐसी जानश्रुति की प्रशंसा सुन कर दूसरे हंस ने कहा कि क्या तू इस नीच को सयुग्याम् (गाड़ी में स्थित व गाड़ी साथ रखने वाले) रैक ब्रह्मज्ञानी के समान श्रेष्ठगुण वर्णन करता है एक ब्रह्म ज्ञानी रैक ही लोक में श्रेष्ठ गुणवान् प्रशंसा के योग्य है महाधर्मसंयुक्त होने पर भी ब्रह्म ज्ञानरहित इस जानश्रुति का कौन ऐसा गुण है जिस से उत्पन्न हुमा तेज रैक के तेन के समाम मुझे भस्म करेगा ऐसा कहने पर पहले हंस ने पूछा । वह रैक कौन है । इस के उत्तर में दूसरे हंस ने कहा कि लोक में जो साधुओं से अनुष्ठान किया गया कर्म है और सम्पूर्ण जो प्रात्मसम्बन्धी ज्ञान है यह दोनों जिस के ज्ञान व कर्म के अन्त र्गत हैं अर्थात् ऐसा कोई उत्तम कर्म व साधन नहीं है जो उस ने न किया हो और प्रात्म ज्ञान व ब्रह्म ज्ञान विषय में कोई विषय नहीं है जिसको वह न जानता हो वह रैक है ब्रह्म ज्ञानरहित होने से अपनी निन्दायुक्त व रैक के प्रशंसा रूप ऐसा हंस का वाक्य जानश्रुति सुन कर उसी समय दूत को रैक के अन्वेषण (खोज) के लिये भेज कर व पता लगा कर उस के आने पर प्राप भी रैक के समीप प्राप्त होकर छः सौ गौ मोहरें घोड़ा रथ रैक को उपहार (नज़र) देकर यह प्रार्थना किया कि हे भगवन् जिस देवता की भाप उपा- सना करते हैं मुझे भी उस का उपदेश कीजिये रैक्व ने अपने ज्ञाम से यह जान कर कि हंस के अनादर वाक्य सुन कर शोक को प्राप्त होकर ब्रह्म विद्या का उद्योग किया है ब्रह्मविद्या के योग्य है विना बहुत काल की सेवा करने के इस जिज्ञासु के यथाशक्ति दान करने से। ब्रह्मविद्या की प्रतिष्ठा होगी यह समुझ कर जानश्रुति पर अनुग्रह कर के उस के शोक होने व उपदेश के यो- ग्य होने के वृत्तान्त को, हे शूद्र ऐसे शूद्र शब्द के सम्बोधन से जनाते हुये यह कहा कि यह गौओं सहित रथ आदि ले आ, तू अपने ही पास रख। इतना हमको देने से ब्रह्मविद्या की प्रतिष्ठा नहीं होती है प्राशय यह है कि बहुत काल तक ब्रह्मविद्या के लिये सेवा करे अथवा जितनी शक्ति हो उतना दान समीक्षाकर ॥ शद्र का देधै तब ब्रह्मविद्या की प्रतिष्ठा होती है इस से रेकने उक्त दाल की है फर अधिक दान का मनोरष किया है राग वश होकर नहीं किया ! ज ति फिर अपनी शक्ति के अनुसार गौ आदि धन व कन्या को दिया और प्रार्थना किया फिर रेक उमके शोक प्राप्त होने व योग्यता ही फहन के अ- भिप्राय से शूद्र शद से सम्बोधन करके ऐसा कहा कि हे शुद्र तूने यह दान मुझे दिया इसके द्वारा धिना बहुत काल की सेवा तू मुझमे ब्रह्म के उपदेश के वाक्यों को कालावैगा। ऐसा कहकर उसको ब्रल का उपदेश किया इससे शूद्र शब्द से जानश्रुति के शोक ही को सूचित किया है शृद्र वर्ण होने को नहीं कहा। इम से जानश्रुति को शुद्र कहने के दृष्टान्त से अधिकार होना सिद्ध नहीं होता ॥ क्षत्रियत्वावगतेश्च ॥ ३५॥ क्षत्रिय होने की सिद्धि होने से भी ॥ ३५ ॥ दूत भेजने बहुल ग्रामों के दान देने आदि के ऐश्वर्य योग से जान अति के क्षत्रिय होने की प्रतीति होती है जानश्रुति शूद्र नहीं है इससे जानश्रुति के लक्षण मे शुद्र के अधिकार का अनुमान करना युक्त नहीं है । उतरत्रचत्ररथेनलिङ्गात् ॥३६॥ सत्तर में ( उत्तर भाग में ) चैत्ररथ के साथ कथन होने के लक्षण से, जिसमें जानअति का उपदेश है इसी सम्बर्ग विद्या में उत्तर भाग में मभिप्रतारि नामक चैत्ररथ क्षत्रिय के साथ अर्थात् चित्ररथ के वंश में उ- स्पन अभिप्रतारि क्षत्रिय के माथ जानश्रुति का वर्णन होने से जानश्रुति का क्षत्रिय होना अनुमान किया जाता है कैसे अनुमान क्षिया जाता है ऐसा वर्णन न होने से कि कापय ( कपिगोत्रवारले ) शौनक ( शुनक के पुत्र ) और काक्षसेनि ( कक्ष नेन के पुत्र ) अभिप्रतारि दोनों के लिये सूपकारने भोजन परसा उनके भोजन करने के समय में उन से एक ब्रह्मा वारी ने भिक्षा मांगी इत्यादि वर्णन मे हे ब्रह्मचारिन् हम इस की उपासना नही करते यह कहने सक कापेय अभिप्रतारि व भिक्षा मांगने वाल ब्रह्मचारी का तीन का मम्ब. र्ग विद्या में सम्बन्धी होना प्रतीत होता है उन में से अभिप्रतारि ती क्षत्रि- य और अन्य दो ब्राह्मण थे अर्थात् कापेय पुरोहित व ब्रह्मचारी यह दोनों ब्राह्मण थे इससे इस विद्या में ब्राह्मण का उस से भिन्न घरों में से क्षत्रिय ८ ५६ समीक्षाकर॥ V.WArm NAAMANAMAN ANm vivv MALMAANMAHrP/AAAAAAMAnniwww ही के साथ सम्बन्ध होना देखा जाता है शूद् का योग होना विदित नहीं होता । इस से इस विद्या में अन्वित (योग को प्राप्त) होने से रैक ब्राह्मणसे भिन्न जानश्रुति का भी क्षत्रिय होना हो मानना यम है शूद्रत्व मानना युक्त नहीं है। अब यह शङ्का है कि इस प्रकरण में अभिप्रतारि का चैत्ररथ होना घ क्षत्रिय होना श्रुत नहीं है अर्थात् सुना नहीं गया वा जात नहीं होता। कैसे अभिप्रतारि का क्षत्रिय होना व चैत्ररथ होना सिद्ध होता है यह विज्ञा- पन के लिये यह कहा है “लिङ्गात्" अर्थात् लिङ्ग से ( अनुमान से) अर्थात् शौनक कापेय अभिप्रतारि काक्षसेनि इत्यादि कहने से अभिप्रतारिका कापेय के साथ सम्बन्ध होना प्रतीत होता है और अन्यत्र भी कहा है कि इस से चैत्ररथ को कापेयों ने यमन ( पूजन वा या ) कराया इस प्रकार से कापेय के सम्बन्धी का चैत्ररथ होना सुना जाता है ऐसे ही चैत्ररथ का क्षत्रिय होना चैत्ररथ नामक एक क्षत्रियपति हुआ इस वाक्म से शात होता है इस से अ- भिप्रतारि का चैत्ररथ होना व क्षत्रिय होना सिद्ध हाता है। इससे चैत्ररथ के लिङ्ग से जानश्रुति का क्षत्रिय होना अनुमान करने से जानश्रुति के दृष्टान्त से शूद्र का अधिकार होना सिद्ध नही होता ।। संस्कारपरामर्शीत्तदभावाभिलापाच ॥३७॥ संस्कार के परामर्श से और उसका प्रभाव करने से ॥ ३ ॥ छम से भी शूद्र का अधिकार नहीं है कि विद्या प्रदेशों में उपनयन आदि संस्कार विचार किये जाते हैं यथा तंहोपनिन्ये अधीहि भगव" इत्यादि अर्थ-उस शिष्य को प्राचार्य ने उपनयन किया नारद भी विद्यार्थी हो मंत्र को उच्चारण करते हुवे सनत्कुमार के पास जाकर यह कहा कि हे गय अर्थात् भगवन् अधीहि अर्थात् उपदेश कीजिये तब प्राचार्य ने विद्यार्थी शिष्य को उपदेश किया इत्यादि, शूद्र के संस्कार का प्रभाव है शूद्र के संस्कार का विधान नहीं है क्योंकि ऐसा कहा है कि शूद्र चौथा वर्ण एक जाति है सस्कार के योग्य नहीं है इस से शूद्र का अधिकार नहीं है ॥ तदभावनिधारणे च प्रवृत्तेः ॥ ३८॥ और उसके प्रभाव निर्धारण में प्रवृत्ति होने से ॥ ३८ ॥ छान्दोग्य में जावाल की यह प्राख्यायिका (कथा) है कि आवाल का पिता मरगया था ऐसे पितारहित जावाल ने अपने माता से पूछा कि मेरा गोत्र सनीक्षाकर ॥ n कि क्या है माता ले कहा मैं अपने पति की सेवा में व्यग्रवित रहने में तेरे पिता के गोत्र को नहीं जानती हूं मैं इतना ही जामती हूं कि मेरा नाम जावाला है और तेरा नाम सत्यकाम है इमके पश्चात् जावाल (जावामा का पुत्र) गोमम ऋषि के पास उपनयन के लिये प्राया गोतम ने पछा तेरा पपा है जावाल ने सत्य कह दिया कि गोत्र को न मैं जानता हूं न मेरी माता जानती है परन्म मेरी माता ने यह कहा है कि प्राचार्य के पाम उपनयन के : लिये जा ओर यह कह कि मैं सत्यकाम जायाल हूं गौतम ने उस के इस सत्य यवन से उसको शूद्रत्व के अभाव को निर्धारित किया अर्यात् शूद्रता नहीं है ऐना मान लिया अर्थात् विना ब्राह्मणा के ऐमा सत्य विचार का कोई नहीं कर सकता इस विधा में शूद्रत्व को न मान कर ब्राह्मणत्व का निश्चय कनि के जाधाल के उपनयन करने व उपदेश करने में प्रयत हुये । जावान की तुम कया को वित्त में लाकर यह शङ्का करिके कि न जाने डुरे गोत्र मावाल को गोतम जी का उपनयन करना व उत्त को प्राविद्या का उपदेश करमा शूद्र का भी अधिकार होना सूचित करता है यह कहा है उसका अभाव निर्धा- रण में प्रवृत्ति होने से अर्थात् सत्य घचन से उसका शूद्रत्व का अभाव निधा- रण करने पर प्रवृत्ति होने से शद्रत्व होने में उपनयन व उपदेश नहीं किया शूद्र का अधिकार नहीं है। श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात्स्मृतेश्च ॥ ३९॥ और सुनने पढ़ने अर्थ के प्रतिषेध से स्मृति से ॥ ३९ ॥ स्मृति में ऐसा वर्णन है कि शूद्र जो है वह पशु पा श्मशान के समान है तिस से शूद्र के समीप वेद न पढ़ना चाहिये इसी से शूद्र के पढ़ने का निषेध सिद्ध है पोंकि जिस के समीप पढ़ने योग्य नहीं होता यह वेद को स्वयं कैसे पढ़ेगा इस से अक्षण व पठन अर्थ के प्रतिषेध से भी शुद्र का अधिकार न होना सिद्ध होता है। अब इस अधिकार न होने के व्याख्यान का तरव निर्णय किया जाता है शूद्र के अधिकार न होने को जो वर्णन किया है वह शूद्र के सेवा कर्म करने वालों के कुल में उत्पन्न होने व कुल सङ्ग व कर्म योग व विद्या के प्रभाव से प्रायः उस में उत्कृष्ट बुद्धि न होने से सम लक्ष्य वस्तु उस को दुर्शय होने और उस में उस को श्रद्धा न होने से प्रमद्वालु अपात्र में उपदेश का निःफल होना विचारने से जानना चाहिये कि उत्तम गुण वाले समीक्षाकर ॥ -- श्रद्धालु धार्मिक विचारवान् बुद्धिमान शूद्र को भी अर्थात् शद्रकुल में उत्पन्न का भी अधिकार ही है यह निश्चय करना चाहिये गुण व कर्म ही मुख्य व उत्कृष्टता व निकृष्टता के हेतु हैं यदा युक्ति स्मृति श्रुति प्रमाण से सिद्ध सिद्धान्त है यह निधय है इस से गुण कर्म अनुसार ही वर्गों की उत्कृष्टता व निकृष्टता जानने योग्य है कुल की उत्पत्तिमात्र उत्तमता व अनुत्तमता की मुख्य कारण नहीं हो सकती जो ब्राह्मण कुल में उत्पन्न है वह यवन के माथ भोजन का- रने व अन्य निषिद्ध पाप पाचरण से यह पतित होगया यह कहा जाता है दराड को प्राप्त होता है कुल से सम्बर्ग से त्याग दिया जाता है ऐसा लोक में देखा जाता है जो कुल में उत्पत्ति होने की मुख्यता होती तो उत्तम निकृष्ट कर्म प्राप्त होने में भी शरीर की स्थिति होने में जिस कुल में उत्पन्न है उसी कुल का वर्ण धर्म ध पदयी होना मानने योग्य है किसी दुगुस से श्वपध यवन प्रादि के साथ भोजन करने से उम का पतित होना सम्भव नहीं है परन्तु लोक में ऐसा व्यवहार देखने में नहीं आता किन्तु उत्तम कुल में उत्पन्न हुआ अधर्म करने से निकृष्ट दराठ के योग्य व त्याग के योग्य होता है इस से लोक में भी कर्म ही की मुख्यता होना विदित होता है जैसे श्रेष्ठ वर्ण अधर्म आचरण मे निकृष्ट होता है ऐसा ही निकृष्ट वर्ण धर्म आचरण से उत्कृष्ट होता है यही मन्तव्य है-सत् पुरुष धार्मिक प्राप्त पक्षपातरहितों क्षा न्याय से यही सिद्धान्त हो सका है ऐसा युक्ति से निश्चय किया जाता है और ब्रह्म- सूत्रों के निर्माता महर्षि वेदव्यास का भी यही सिद्धान्त निश्चय करने योग्य है अर्थात् उस के (शूद्रत्व के) प्रभाव निर्धारण में प्रवृत्ति होने ने इस सूत्र में सत्य कथन मात्र से गोसम ऋषि ने जावान के शूद्रत्व का निर्धारण करिके अर्थात् शद्रत्व का अभाव मान कर उम के उपनयन करने व ब्रह्मविद्या के उपदेश करने में प्रवृत्त हुये यह विज्ञापन करने से ऐसा निश्चय करने योग्य है क्योंकि मत्य कथन न वर्णव है न गोत्रत्व है उत्तम गुणात्य व धर्मत्व ही है वही शूद्रत्व के अभाव निर्धारण का हेतु महर्षि गोतम जी ने स्वीकार किया है इस से जो वर्ण से गुण कर्म से भी शूद्र है उस का अधिकार नहीं है और जिस के सत्यता आदि धर्म गुण श्रद्धालुत्व व सत्कर्मों से जावाल के ममाम शूद्रत्व का प्रभाव निर्धारण किया गया है उस का अधिकार ही है युक्ति हेतु से शब्द से उम के अधिकार के निषेध का कोई प्रमाण निश्चय नहीं किया जाता। जो यह शङ्का होवे कि कोई स्मृतियों में ऐसे निषेधवाक्य पाये MA AA समीक्षाकर॥ ६१ जाते हैं कि वेद सुनने वाले शूद्र के कान में सीम और लाख भरमा चाहिये तथा शूद्र जो है वह पशु व श्मशान के समान अशुचि है इम से शूद्र के समीप न पढ़ना चाहिये उस के उच्चारण में जिहा का छेदन (काटना) व धारण में शरीर का भेदन उचित होता है इस से शूद्र का अधिकार न होना मिद्ध होता है तो ऐसा नहीं है ऐसा प्रयुक्त वाक्य किसी प्राप्त का नहीं होता इस से किसी पक्षपातग्रस्तहृदय स्वार्थमाधक से प्रक्षिप्त ही जानना चाहिये क्योंकि वेद का श्रवण कोई निषिद्ध कर्म महापाप नहीं है जिस से सुनने वाले के लिये जिहाछेदन श्रादि दशहविधान उचित होवै। यदि परमेश्वर की स्तुति प्रार्थना, उपासना व ज्ञान व कर्म विषयक वेदवाक्यों में एकत्र अनेक शब्दों के पढ़ने व सुनने में दराड विधान है तो भिन्न २ ईश्वर ब्रह्म परमात्मा सविता आदि वेदोन शब्दों के कहने वाले व सुनने वाले भी शूद्र दण्ड के योग्य मन्तव्य हैं। ऐमा होने में ईश्वर के नाम स्तुति कहने व स्मरण करने में भी शूद्र का अधिकार होना मिद्ध न होगा शद्र में ईश्वर के ऐसे द्वेष व पक्षपात होने का कोई हेतु चिन्तन करने योग्य नहीं है और ब्राह्मण को श्रागे करके चारों धों को सुनाये ऐसे विधिवाक्य से इतिहास पुगणों में भी विधि पाई जाती है तुल्य प्रमाणा बल होने से इस विधिवाक्प से निषेध वाक्य का प्रतिषेध होने में यह बिधिवाक्य स्वीकार करना चाहिये अथवा परस्पर के विरोध से दोनों के त्याग में कोई अन्य प्रमाण खोज करना चाहिये दोनों के प्रमाण के अनुसन्धान करने में युक्ति अन्य प्राप्तवाक्य श्रुति स्मृति प्रमाण की सहायता से विधिवाक्य की सबलता होने से निषेध वाक्य ही निर्बल होने से अप्र- माण रूप त्यागने योग्य है। प्राधनिक भाष्य व टीकाकारों ने जो सर्वथा अधि- कार न होना धर्मान किया है और जिन्हों ने ऐसा वर्णन किया है कि स्मृति इतिहास व पुराणों में निवेध के समान विधि भी मिलती है इम से वेद पूर्वक अर्थात् वेदपठनपूर्वक अधिकार नहीं है यह सिद्धान्त है यह अमत्य पार्षसिद्धान्त वा वेद विरुद्ध ही प्रतीत होता है क्योंकि निषिद्ध कर्म से ब्राह्मण भी शूद्रत्त्व वा अनधिकारत्व व अधिकार को प्राप्त हो सका है यद्यपि लोक में ऐमा व्यवहार (वर्ताव) न होवे तथापि न्याय मे और प्राप्त वाक्य से यही सिद्धान्त निश्चय किया जाता है इस में प्रमाण वर्णन किया जाता है शुक्राचार्य जी ने शुक्रनीति नामक अपने ग्रन्थ में यह कहा है कि इस संसार में जाति से अपांत् कुल में जन्म होने मात्र से न ब्राह्मण है न क्षत्रिय है म वैश्य है समीक्षाकर। AAAA १ द म शूद्र है न म्लेच्छ है इन का भेद गुण व कर्मों से है अध्याय १ लोक ३९ सब जीव ब्रह्मा से उत्पन्न होने से क्या प्राण हो सके हैं अर्थात् नहीं। वर्ष से और पिता से ब्रह्म तेज की प्राप्ति नहीं हो सक्ती अ० १ लोक ३९ ऐसा ही श्रीमहर्षि आपस्तम्ब ऋषि ने अपने सूत्रों में कहा है कि धर्माचरण से निकृष्ट वर्ण अपने से उत्तम वर्ण में प्राप्त होता है और यह उस वर्ण में गिना जाये कि जिम २ के वह योग्य होवे वैसा ही अधर्माचरण से पूर्व अर्थात् उत्तम वर्ण वाला मनुष्य अपने नीचे २ वाले वर्ग को प्राप्त होता है और उसी वर्ष में गिना आधे जिस्के योग्य होये और मब वों का विद्यारूप वेद में अधि- कार होने के विषय में साक्षात् यजुर्वेद में छवीमधे अध्याय में दूसरा मन्त्र प्रमाण है इसी कारण से अधिकार निरूपण के अन्तिम सूत्र में महात्मामूत्र- कार ने यह कहा " और अयश अध्ययन अर्थ का प्रतिषेध होने से स्मृति से"। इस सूत्र में निषेध प्रमाण में स्मृतिमात्र का नाम कहा है चकार जिस का अर्थ "और" ग्राम है वह जैसे और "म का" अभाव निर्धार करने में प्रवृत्ति होने से” इस सूत्र में पूर्व कहे हुये हेतु से अन्य हेतु दिखाने के लिये कहा है ऐसा ही इम सूत्र में कहा है इसी से धकार का अर्य और ग्रहण करके । और अवया अध्ययन अर्थ का प्रतिषेध होने से स्मृति से" ऐसा सूत्र का अर्थ कहा गया है वेद का प्रमाण होने में उस के विरुद्ध स्मृति वाक्यों का अप्रामाण्य ही है उक्त मन्त्र यह है- “यथेमां वाचं कल्याणी" इत्यादि इस का व्याख्यान यह है यथा यह प्रत्यक्ष रूप वेदचतुष्टयो-कल्याण हर वा कल्याण की सिद्ध करने वाली वाणी को सब जनों के लिये अर्थात् सब मनुष्यों के लिये मैं कहता हूं या उपदेश करता हूं किन जनों के लिये यह विज्ञापन बा विवरण के लिये यह कहा है ब्राह्मण क्षत्रिय के लिये वैश्य के लिये शूद्र के लिये अपने पुत्र के लिये सेवक सम्बन्धियों के लिये अति शूद्र के लिये यथा के साथ तथा का नित्य सम्बन्ध है इस से यथा कहने से अध्याहार से तथा शब्द ग्राध है तथा के. ग्रहण से यह अर्थ होता है कि यथा मैं इस वाणी को कहा हूं तथा (वैसे ही) हे विद्वान् लोगो तुम सब मनुष्यों के लिये इस वेद वाणी की कहो उपदेश करो अर्थात् मुझ पक्षपातरहित की वाणी सब के हित के लिये है वह तुम को सब के लिये वक्तव्य है अर्थात् वह सब को सुनाने व पढ़ाने योग्य है-कोई कहते हैं कि जन शब्द से ब्राह्मण ही अथवा तीन वर्ण का समीक्षाकर ॥ ६३ . मन्त्र में अधिकार है इस से प्राह्मण मत्रिय व वैश्य तक ग्रहण करना चाहिये। यह उन का कहना युक्त नहीं हैं क्यों कि जनेभ्यः अर्थ जनों के लिये यह कहकर भागे पृथक् २ नामों को कहा है जो ईश्वर ब्राह्मण वा तीन ही वर्ण मात्र को अधिकार देता व उन ही मात्र का अधिकार होता तो शूद्रादियों के पृथक् कर के प्रत्येक के नाम वर्णन न करता इस से विधि ही निश्चय करने योग्य है वेदप्रमाण की अनुकूलता से जो अन्यत्र विधिविषयक धाक्य हैं उन की सव- लता वा पुष्टता मिद्ध होती है न्याय से प्राप्तवचन के प्रमाण से श्रुति से भी विधि सिद्ध होने से सर्वथा निषेध का प्रामाण्य नहीं है स्मृति वाक्य के चरि- तार्थ होने के लिये निषेध भी उक्त प्रकार से मन्तव्य है यह सिद्धान्त है। इत्यधिकारनिरूपण विषये समीक्षाफरे चतुर्थोऽध्यायः ॥ वेदान्त दर्श नस्य द्वितीयाध्याये तृतीयपादेजीवात्मनोऽनुत्पत्तिजामृत्यनिरू- पणाधिकरण प्रसंगात् सवाएपमहानजात्मायोयंविज्ञानमयः प्राणेषुइतिश्रुतेरा- स्मनोविभुत्वंतथाएषोऽणुरात्माचेतनाबेदितव्य इतस्तस्याणुत्वावगमात् किंपरि- माणंतत्वमिनिसंशये उत्क्रान्ति गत्यागतीनाम् इत्यादिसूत्रैरात्मपरिमाणं निरूपितं तेवांयानिसमीक्ष्यानितान्यत्र लिख्यन्ते अद्वैतमतानुसारेण निम्नलिखितजीवात्म- परिमाणविषयकसत्राणांव्याख्यानानन्तरंसिद्धान्तोविचार्यते ॥ अथ भाषानुवादः॥ वेदान्त दर्शन के द्वितीय अध्याय तृतीय पाद में जीवात्मा का उत्पन्न न होना व ज्ञाता होना निरूपण करने के अधिकरण में प्रसंग से इस अति से जिम में यह वर्णन है कि निश्चय से सो यह प्रात्मा महान् प्रम (जन्मरहित) है जो यह प्राणों में (इन्द्रियों में) विज्ञानमय है प्रात्मा का विभु (व्यापक) होना तथा इस श्रुति से कि यह अणु प्रात्मा चित्त से (ज्ञान से) जानने योग्य है आत्मा का अणु होना विदित होने से कौनसा प्रमाण सत्य है यह संशय होने में उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् । अर्थ-उत्क्रान्ति (शरीर से निकलन!) लोका- न्सर का जाना माना सुनने से इत्यादि सूत्रों से प्रात्मा के परिमाण का नि- रूपण किया है उन सूत्रों में से जौन समीक्षा के योग्य हैं वह यहां लिखे जाते हैं निम्न लिखित जीवात्मा के परिमार विषयक सत्रों का प्रवैत मत के अनुसार व्याख्यान करने के पश्चात् सिद्धान्त विचार किया जाता है।

समीक्षाकर॥ तद्गुणसारत्वात्तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् । सूत्र० ॥२९॥ तुशब्दःपक्षपावर्तयतिनैतदस्त्यणुरात्मंतिपरस्यैवतुब्रह्मणः प्रधेशप्रवणात् तादात्म्योपदेशाचपरमेय ब्रह्म जीवइत्युक्तं परमेवचेद्ब्रह्मजीवः तस्माद्यावत्पर व्र मतावानेवजीवोभवितुमर्हति परस्यब्रह्मणोविभुत्वमानातं तस्माद्विभुर्जीवः तया च सवाएषमहानजात्मायोयंविज्ञानमयः प्राणष इत्येव जातीयका जीवविष याविपुत्ववादाःसमर्थिताभवन्तियदि जीवोविभुःकयंता गुत्वादिध्या देशइत्यत शाह नद्गुणसारत्वात्तद्वयपदेशइतितस्याः युद्धेर्गुणाः तद्गुशा इच्छाद्वेषासुर दुःख- मित्येवमादयस्तद्गुणाः सारंप्रधानंयस्यात्मनः संसारित्वंसंभवन्तिमतद्गुणसारः तस्यभावस्तद्गुणसारत्वं नहियुद्धेगुणैर्वि नाकेवलस्यात्मनः समारित्वमन्तिबुद्- ध्युपाधिधर्माध्यामनिमित्तहिकर्तृत्वभोकृत्यादिलक्षणां संप्तारित्वम स्तुरभोनुवा- सप्तारिणोनित्यमुक्तस्यसतप्रात्मनस्तस्मात् तद्गुगामारत्याबुद्धिपरिमाणेनास्य परिमाणव्यपदेशात्तदुत्क्रान्त्यादिभिश्चास्योत्क्रान्त्यादिव्यपदेशोनस्वतः जीव- स्यौपचारिकमणत्वं पारमार्थि कंधानन्त्यम् उपाधिगुणसारत्वाज्जीवस्याणुत्व- व्यपदेशःप्राज्ञवत्यथाप्राज्ञस्यपरमात्मन सगुणोपासनेषपाधिगुणासारत्वादणी- यस्त्वादिव्यपदेशःणीयान्त्रीहेयवादामनामयः प्राणशरीरइत्येवंप्रकारस्त- द्वत्स्यादेतत्यदिबुद्धिगुण मारत्वादात्मनःसंसारित्वकल्पेतततोबुद्ध्यात्मनोभिग्न- योः संयोगावमानमवश्यंभावीत्यतीबुद्धिवियोगेसत्यात्मनोविभकस्यालक्ष्यत्वम- सस्वमसंसारित्वंवाप्रसज्यतेत्यतउत्तरंपठति । अथ भाषानुवाद ॥ तद्गुणसारत्वात्तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् । सु० ॥२९॥ यही प्रधान गुण है जिस का ऐसा होने से उस का कथन है प्राज्ञ के समान ॥२०॥ मात्मा अणु नहीं है क्योंकि परब्रह्म ही का जीय रूप से प्रवेश करना सुना जाता है और तादात्म्य को अर्थात वही रूप होने को भी उपदेश है पर ब्रह्म ही जीव है यह कहा गया है पर ब्रह्म ही जीव है तिस से जितना पर ब्रह्म है उतना ही जीव होना चाहिये अति में ब्रह्म को विभु कहा इस से जीव भी विभ है ऐसा होने में निश्चय से सो यह आत्मा महान् प्रज है जो यह प्राणों में विज्ञानमय है इस प्रकार की जीव विषय वाली विभु की प्रतिपादन करने वाली श्रुतियां घटित होती है जो जीव विभु है तो है समीक्षाकर॥ मुख्यता भणु होने का कथन क्यों है इस संदेह के निर्णय के लिये यह कहा है कि उस के अर्थात् बुद्धि के इच्छा द्वेष सुख दुःख आदि गुण ही सार होना ( प्र- धान घस्तु) जिस भात्मा के संसारी होने में संभव होता है अर्थात् संसारी अवस्था में बुद्धि के गुणों ही की प्रात्मा में है विना बुद्धि के गुणों के प्रात्मा का संमारित्व नहीं है। बुद्धि उपाधि धर्मों के अध्यास के कारण से कर्ता होना भोक्ता होना आदि रूप प्रात्मा का संसारित्व (संसारीपन) शुद्धरूप प्रात्मा असंसारी नित्यमुक्त न कर्ता है न भोक्ता है। तिम बुद्धिगुणसार होने से बुद्धि के परिमाण से इस प्रात्मा के परिमाण का कथन है उसी की तत्क्रान्ति प्रादि (शरीर से निकलना अर्थात् मरण आदि) होने से इसकी (प्रात्मा की) उत्क्रान्ति आदि होना कहा जाता है स्वतः मात्मा का उत्क्रान्ति आदि होने का अभाव है। इम से जीव का औपचारिक अणुत्व ( अणुरूप होना) है पारमार्थिक रूप से आत्मा अनन्त है। उपाधिगुणसार होने से जीव का अणु होना कहा है प्राज्ञ के समान अर्थात् जैसे प्राज्ञ परमात्मा का सगुण उपासना उपाधिगुणसार होने से अणु होने आदि का कथन है जैसे यह कहा है "मणीयान् वीर्वायवाद्वामनोमयः प्राणशरीरः" अर्थ-धान्य से यव से प्रति- सूक्ष्म मनमय प्राण शरीर रूप है इत्यादि इस प्रकार के श्रुति वाक्यों में कथन है वैसे ही यह जीवात्मा का अणु कथन है। अब यह शङ्का है कि जो बुद्धिगु. यासार होने से प्रात्मा का संसारित्व है यह निश्चित होता है कि भिन्न प्रात्मा ध बुद्धि के संयोग का अन्त अवश्य होने वाला है इस से बुद्धि के वियोग होने में आत्मा के असंसारी अस्तित्वरहित अलक्ष्य होने का प्रसंग होगा इस का उत्तर वर्णन करते हैं। यावदात्मभावित्वाचन दोषस्तदर्शनात् ॥३०॥ नैवंशङ्कनीयंकुनः यावदात्मभावित्वात् बुद्धिसंयोगस्ययावदात्मासंभारीभव तितावदस्यसम्यग्दर्शनेनसंसारित्वं न निवर्तते तावदस्यबुद्ध्यासंयोगोनशाम्यति यावच्चायंबुद्ध्युपाधिसम्बन्धस्तावदेवास्य जीवस्यजीवत्वं संसारित्वञ्चपरमार्थ- तस्तु न जीवोनामबुद्ध्युपाधिपरिकल्पितस्वरूपव्यतिरेकेशास्ति नहिनित्यमुक्त स्वरूपातसर्वज्ञादीश्वरादन्यश्चेतनधातुद्धितीयोवेदान्तार्थनिरूपणायामुपलभतेना- न्योऽतोऽस्तिद्रष्टाश्रोतामन्ताविज्ञाताइत्यादिश्रुतिभ्यः कथं पुनरवगम्यतेयावदा- स्मभावीबुद्धिसंयोग इतितद्दर्शनादित्याहतथाहिशास्वंदर्शयति,योऽयंविधाममयः माणेषुहृद्यम्तोतिः पुरुषः ससमानः सन्नुभौलोकावनुसञ्चरतिध्यायतीवलेलाय- समीक्षाकर॥ 4141AN. .. तीवइत्यादितनविज्ञानमयःइतिबुद्धिलयइत्येतदुक्तं भवतिसनमानः मनमोलोका. वनुसञ्चरति इतिचलोकान्तरगमनेप्यवियोगंबुद्यादेर्दर्शयतिकेनसमानस्तयैवधु- याइनिगम्यतेसंनिधानाचतप्रदर्शयतिध्यायतीवले नायनीय इत्येतदुक्कभवतिना. यंस्वतोध्यायतिनापिचलतिध्यायन्त्यां बुद्धोध्यायतीवचलन्त्यां वलतीयेतिअपि चमिथ्याजानपुरस्सरोयमात्मनोबुद्ध्युपाधिसम्बन्धः न च मिथ्याज्ञानस्यमम्य- गज्ञानादन्यत्रनिवृत्तिरस्तीत्यतोयावत् ब्रह्मात्मतानवबोधस्तावदयंबद्ध्युपाधि- सम्बन्धोनशाम्यतिननुसुषुप्तिप्रलययोर्नशक्यते बुद्धिसम्बन्ध प्रात्मनोऽभ्युपगन्तुम् । सतासोम्यतदासम्पन्नोभवतिस्वमपीतोभवतिइतिवचनात् कृत्स्नविकारमलया भ्युपगमाञ्चतत्कथंयावदात्मभावित्वंबुद्धिसम्बन्धस्येत्यत्रोच्यते ॥ अथ भाषानुवादः ॥ यावदात्मभावित्वाञ्च न दोपस्तदर्शनात् ॥३०॥ मात्मा के रहने तक होने वाला होने से दोष नहीं है वह देखनेसे ॥३०॥ मात्मा के रहने तक रहने से यह शङ्का करने योग्य नहीं है जब तक प्रात्मा संमारी रहता है यथार्थ आत्मज्ञान न होने से संमारित्व निवृत्त नहीं होता तब तक बुद्धि का संयोग रहता है जब तक बुद्धि का संयोग नहीं छूटता तब तक इस जीव का जीवस्य व संमारित्य है बुद्ध्युपाधि मे कल्पना किये गये रूप से भिन्न परमार्थ से जीव नामक वस्तु नहीं है। वेदान्त के अर्थ निरूपण में नित्यमुक्तस्वरूप सर्वज्ञ ईश्वर से भिन्न अन्य दूमरा चेतन धातु व पदार्थ नहीं है क्योंकि श्रुति में कहा है- नान्योऽत.स्ति द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता इत्यादि ॥ अर्थ-इसमे अन्य देखने सुनने मामने जानने वाला नहीं है इत्यादि श्रुति थों से एक ही होना सिद्ध है ये कैसे सिद्ध होता है कि बुद्धि का संयोग प्रा- ला के संसारी रहने तक रहता है इस के लिये यह कहा है वह देखने से अर्थात् जीय का बुद्धिसम्बन्ध से जो कर्तृत्व भोगत्व है वह शास्त्र में देखने से बुद्धि का संयोग रहना सिद्ध होता है यथा इभ श्रुति में देखा जाता है अर्थात् इस श्रुति में यह वर्णित है- योयं विज्ञानमयः प्राणेषु० इत्यादि। इम सम्पूर्ण श्रुति का अर्थ यह है जो ये हृदय के भीतर इन्द्रियों में विज्ञानमय पुरुप है सो विज्ञान (बुद्धि) के ममान हुआ अर्थात् बुद्विरुप हो - ममीक्षाकर॥ ६७ NA འགག འབ,ཀའ་ན་ ANA... ... or - दोनों लोक में बुद्धि के साथ ध्यान करता व लीला करता हुआ बुकिश- मान जाता व विचरता है। इस प्रकार से प्रात्मा के लोकान्तर के जाने में भी बुद्धि का वियोग नहीं होता यह श्रुति देखाती है । आत्मा आप से न ध्यान कर्ता है न चलता है ध्यान करती हुई बुद्धि में ध्यान करता व चलती हुई बुद्धि में चलता है ऐसा बुद्धि के समान होना विदित होता है । यह जो अ... । स्मा का बुद्ध्युपाधि सम्बन्ध है वह मिथ्याज्ञान पूर्वक है सम्यग्ज्ञान से ( अ. च्छे प्रकार तत्वज्ञान होने से) भिन्न अन्य उपाय से मिथ्यासान की मिन्स नहीं होती इम से जब तक ब्रह्मात्मा का बोध नहीं होता तब तक बुदध्य पाधि का सम्बन्ध नहीं छूटता यदि यह शङ्का हो कि सुषुप्ति व प्रलय में वृद्धि सम्बन्ध प्रात्मा के साथ नहीं कहा जा सका क्योंकि श्रुति में- सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतीभवति ।। अर्य-हे सोम्य ! सब सत् शब्दवाच्य ब्रह्म में प्राप्त होता है अपने में लीन होता है इत्यादि ऐसा कहा है प्रलय सुषुप्ति में सब विकार का लय हो । ना अंगीकार करने व बुद्धि का सम्बन्ध ज्ञात न होने पर प्रात्मा के रहने तक बुद्धि का सम्बन्ध कैसे मानना युक्त है इस के उत्तर में यह वर्णन करते हैं- पुंस्त्वादिवत्तस्य सतोभिव्यक्तियोगात् ॥३१॥ यथालो के पुंस्त्वादीनि वीजात्मनाविद्यमानाम्येववाल्यादिष्यमुपलभ्य- मानानि अविद्यमानवदभिप्रेयमाणानि यौवनादिष्याविर्भवन्ति नाविद्यमाना- न्युत्पद्यन्ते खाडादीनामपितदुत्पत्तिप्रसङ्गात् एवमपिबुद्धि सम्बन्धः शक्त्यात- मनाविद्यमानएव सुषुप्तिप्रलययोः पुनः प्रबोधप्रसवयोराविर्भवति तस्मात् सि- द्वमेतद्यावदात्मभावीबुद्ध्युपाधिसम्बन्ध इति । अथ भाषानुवादः ।। पुंस्त्वादिवत्तस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात् ॥३१॥ पुंस्त्यादि के समान उस विद्यमान ही की प्रकटता होने के योग से ॥३१॥ जैसे लोक में पुंस्त्व (युधापन वा जवानी) आदि बीजरूप विद्यमान ही रहते हैं परन्तु वाल्यावस्था प्रादि में ज्ञात नहीं होते अविद्यमान के स मान बने हुये यौवन (जधानी) आदि में प्रकट होते हैं अविद्यमान उत्प नहीं होते जो अविद्यमान की उत्पत्ति होती तो नपुंसक में भी पुरव ...

६८ समीक्षाकर। .in AN vNA nh N उत्पत्ति होती ऐसा ही यह बुद्धिसम्बन्ध है शक्ति प्रात्मा से अर्थात् शक्ति कारणरूप से सुषुप्ति वा प्रलय में भी विद्यमान रहता है सृष्टि होने व जागने के समय में प्रकट होता है इस से बुद्धिसम्बन्ध का यावदात्मभावी होना अर्थात् आत्मा के रहने तक रहना सिद्ध है ॥ ३१ ॥ नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसंगोऽन्यतरनियमोवान्यथा ॥ ३२ ॥ तच्चारमनउपाधिभूतमन्तः करणं मनोबुद्धिर्विज्ञानं चित्तमितिघानेकधातत्र तत्राभिलप्यतेक्वचिच्चवृत्तिविभागेनसंशयादिवृत्तिकं मनइत्युच्यतेनिश्चयादिव- त्तिकाबुद्धिरितिनच्चैवंभूतमन्तः करणमवश्यमस्तिइत्यभ्युपगन्तव्यम्। अन्यथाह्य- नभ्युपगम्यमानेतस्मिन्नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गस्यात् सात्मेन्द्रियविषया- णामुपलब्धिसाधनानांसन्निधानेसतिनित्यमेवोपलब्धिः प्रसज्ञ्येत अथवा सत्य- पिहेतुसमवधानेफलाभावस्ततोऽपिनित्य मेवानुपलब्धिः प्रसउज्येत । नचैवंदृश्य- तेतस्माद्यस्यावधानानवधानाभ्यामुपलब्ध्यनुपलब्धीभवतः तन्मनः अन्तः- करणशब्देनवाच्यमनसोवृत्तिरेवबुद्धिर्यतः कामादयश्चास्यमनसोवृत्तयइतिश्रुति- दर्शयतिकामः सङ्कल्पोविचिकित्साश्रद्धा श्रद्धाधृतिरधति रित्येतत्मयं मन एवइतितस्माद्युक्तमेतत्तद्गुण सारत्वात्तद्यपदेशइति। नैपांसूत्राणामीदृग्व्यारयानं युक्तमित्यवगन्तव्यंयतोविवेचनेनात्मपरमात्मनोस्सर्वथाऽभेदत्वंबुद्ध्युपाधिमा- त्रेणजीवत्वंपरमात्मनोजीवस्यभिन्नत्वञ्च परमार्थतएकत्वंसम्यग्दर्शनेनजीबाद- दुःसंयोगनिवृत्तित्वन्नोपपद्यते। कुतःनित्यसर्वज्ञपरमात्मनिनाविद्याप्राप्तिःसंभव- तिययातस्यबुद्ध्यनुगुणत्वंतदुपाध्युपहितत्वं च स्यात्। तत्प्राप्तौवापरमात्मनःसर्व शत्व हानिरतस्तत्स्वरूपप्रतिपादकश्रुतेरनृतत्वञ्चावगम्यते सम्यग्दर्शनेजीवात्म- नोविभक्का बुद्धिभिन्नत्वेनतिष्ठति वा परमात्मनि लीयते परमात्मनोऽन्य प्रदेश संयुज्यकञ्चिदन्यं जीवमुत्पादयति वेतिजीवाद्वियोगेबुद्धेरन्तःकरणस्य वा का ग- तिरिति विवेचनीया “ नासतोविद्यतेभावोनाभावोविद्यतेसतः” इतिस्मृति घबनात्तकैणाप्यस्यैव सिद्धर्न सर्वथाबद्धरभावोनिश्चीयतेबुद्धिमत्तानिश्चितेयदि सम्यग्दर्शनेजीवाद्विभक्कासाप्रमणिलीयतेतर्हि जीवपरयोरभेदत्वेजीवएवप्राप्तासे त्स्यतिएवंसतितस्यानित्ययोगएवमिद्वौसत्यां सम्यग्दर्शनेसंसारित्वनिवृत्तौबु- द्व्यासंयोगः शाम्यतिइत्युक्तरसंगतिर्गम्यते ब्रह्मणोऽन्यस्मिन्प्रदेशेप्राप्याऽन्य जीव मुत्पादयतिचेद्वियुक्तजीवस्याप्येवमुत्पत्यनुमानेतत्संयोगवियोगाभ्यां जीवस्यो- त्पत्ति विनाशसिद्धौ सत्यामेषमहानजनात्माइतिश्रुतायुक्तमजत्वमनृतस्यात्य- दिब्रह्मणि प्राप्ता बुद्धिः स्वेन जीवत्यजनकधर्मेण जीवत्वं नोटपादयति तर्हि समीक्षाकर॥ स्यात् वियुक्तजीवेऽपितत्संयोगेनधर्मेण धा जीवत्वप्रतिपादननसंभवति तस्या ब्रह्मणि प्राप्तौवोकप्रकारेणजीवेद्य वप्राप्तौवाध्यायांनदीवाद्वियुक्तास्यात् ब्रह्म गोविभा- गत्वेनस्थितायांद्वैतसिद्धेरद्वैतकथनं बुद्धिसंयोगवियोगाभ्यां च जीवत्वाजीवत्वं ब्रह्माज्ञानत्वकथनच्चायुक्तमेवावगम्यते अन्यच्च एवंममीक्षितं श्रीभाष्येयदि मन्धी- तउपाध्युपहितं ब्रह्म जीवः सचाणुपरिमाणः शखुल्बच्चावच्छेदकस्यमनसोऽणुत्वा तसचावच्छेदोऽनादिरेवमुपाध्युपहिते देशे सम्बध्यमानाः दोषाअनुपहिते परे ब्रह्मणि न सम्बध्यन्तेइत्ययं प्रष्टव्यः किमुपाधिनायच्छिन्नोग्रल खण्डोऽणुरूपो जीवउसाच्छिन्न एवाणुरूपोपाधिसंयुक्तोब्रह्म प्रदेशविशेषः । उतोपाधिसंयुक्त प्रम स्वरूपम् उसोपाधिसंयुक्तंचेतनान्तरम् । अथोपाधिरेवेतिनछेद्यत्वाद्ब्रह्मणः प्र- थमकल्पोनकरयतेआदिमतवं च जीवस्यस्यात्एकस्यसतोवैधीकरणं हि छेदनं द्वितीयेतुकल्पेब्रह्मणएयप्रदेशयिशेपे उपाधिसम्बन्धादौपाधिकास्सर्वेदोषास्त- स्यैवस्युः उपाधौगच्छत्युपाधिनास्वसंयुक्तब्रह्मप्रदेशाकर्षणायोगादनुक्षणमुपाधि संयुक्तब्रह्मप्रदेशविशेषभेदात्क्षणे क्षणेबन्धमोक्षौस्याताम् आकर्षणेचाछिन्नत्वात् कृत्स्नस्य ब्रह्मणआकर्षणं निरंशस्यव्यापिनाकर्षणं न संभवतीतिवेत्त- थुपाधिरवगच्छतीतिपूर्वोक्तएयदोषःस्यात् अच्छिन्नब्रह्मप्रदेशेषुसापाधिसंसर्ग सर्वेषां ध जीवानांब्रह्मणएवप्रदेशत्वेनाभेदप्रतिसंधानस्यात् प्रदेशभेदादिप्रति संधानेचैकस्यापिस्वोपाधौगच्छतिसतिप्रतिसंधानं न स्यात् तृतीयेतुकरपेब्रह्म स्वरूपस्यैवोपाधिसम्बन्धेन जीयत्वापातात् तदतिरिक्तानु पहितब्रह्मासिद्धि स्यात् सर्वेषु च देहेष्वेकएवजीवःस्थात् तुर्येतुकल्पेब्रह्मणोऽन्य एवजीव इति जीवभेदस्यौपाधिकत्वं परित्य लंस्यात्चरमेपक्षेचार्वाकपक्षएव गृहीतः स्यातके चिदद्वितीयत्यंब्रह्मणोऽभ्युपयन्तएवंवदन्तिएकस्यब्रह्मणः प्रतिबिम्बभूतानां जीवानांसुखित्वदःखित्वादयएकस्यैवमुखस्यप्रतिबिम्बानांसूर्यस्यप्रतिबिम्बा- मां वामणिकृपाणदर्पणादिषपलभ्यमानानाभल्पत्व महत्वकं पत्य स्थिरत्वम- लिनत्वविमलत्वादिवत्तत्तदुपाधियशाद्वयवस्थाप्यन्तेतत्रेदंविमर्शनीयम्अल्पत्य मलिनत्वादयऔपाधिकादोणः कदानश्येयुः मणिदर्पणाद्युपाध्यपगमे इति धे- त्किंतदल्पत्वाद्याश्रयप्रतिविम्वः तिष्ठतिनषा ? तिष्ठतिचेत् तत्स्थानीयस्यजी- वस्यापिस्थितत्वादनिर्मोक्षप्रसङ्गःनश्यतिचेत्तद्वदेवजीवनाशात्स्वरूपोच्छित्ति- लक्षणोमोक्षः स्यात् किंचयस्यह्यपुरुषार्थदोषप्रतिभासः तस्यतदुच्छेदः पुरुषार्थः तत्रकिमीपाधिकदोषप्रतिक्षासोविम्वस्थानीयस्य ब्रह्मणःउतप्रतिबिम्बस्थानी- यस्यजीवस्य उनान्यस्यकस्यचित् प्राद्ययोः कल्पयोर्दृष्टान्तोऽयं न संगच्छतेमु- समीक्षाकर॥ खस्य मुखप्रतिबिम्बस्य पाल्पस्वादिदोषप्रतिभासशून्यत्वात् नहिमुखंमुखप्रति- बिम्बं वा चेतयते ब्रह्मणोदोषप्रतिभासेब्रह्मणोऽविद्याश्रयत्वप्रसंगञ्च,नहिकश्चित सत्वाभान्तिरहितःप्रतिविम्बितवस्तुनितदुपाधिदोषेण स्वसकलस्वरूपस्यतदव- यवरूपस्य वा प्रतिविम्बमरूपत्वदीर्घत्वमलिनत्वकम्पनत्वादियुक्तान्यथाभावेन दृष्टास्वरूपं प्रतितनिश्चिनोतितेनस्वरूपं प्रतितस्याभावएवानुभूयते एवमुपा- घिदोषेण सर्वज्ञभ्रान्तिदोषासंस्पृष्टब्रह्मणोप्यन्यथाप्रत्ययोन संभवति तृतीयोऽपि कल्पोनकलप्यतेविम्बप्रतिबिम्बस्थामीयजीवब्रह्मव्यतिरिक्तस्यद्रष्टुरभावात् कि- वाविद्याकल्प्यस्यजीवस्यकल्पकः कइतिविचारणीयंनतावदविद्या अचेतनत्वात् नापिजीवात्मानयदोषप्रसंगातशुक्तिकारजतादियदविद्याकल्प्यत्वाञ्चजीवभा- वस्यब्रवकल्पकमितिचेत् ब्रह्माज्ञानमेवायातम् तदयुक्तश्रुतिविरुद्धग्रह्मस्वरू- पानावरूपमयुक्तमप्रमाणमस्वीकार्यमितिमतउक्त सूत्राण्येयव्याख्येयानि- अथ भाषानुवादः ॥ नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसंगोऽन्यतरनियमोवाऽन्यथा ॥३३॥ अन्यथा मानने में अर्थात् बुद्धि उपाधि न मानने में नित्य उपलब्धि वा अनुपलब्धि होने का प्रसंग होगा अथवा दो में से एक का नियम होगा ३३ श्रात्मा का उपाधि रूप अन्तःकरण, मन, बुद्धि विज्ञान चित्त अनेक प्रकार से वृत्ति भेद से कहा जाता है कहीं वृत्ति विभाग से संशयादि वृत्ति वाला मन कहा जाता है निश्चय आदि वृत्ति रूप बुद्धि कही जाती है इस प्रकार का जिस की संशय प्रादि, निश्चय प्रादि वृत्तियां हैं ऐसा कोई अन्तःकरण. वस्तु अवश्य है यह मानने योग्य है ऐसा न मानने में प्रात्मा में नित्य उ- पलब्धि वा अनुपलब्धि (ज्ञान होने व ज्ञान न होने ) का प्रसंग होगा अथवा उपलब्धि के साधन जो प्रात्मा इन्द्रिय व विषय हैं उन के सन्निधान होने में (समीप वर्तमान होने वा संयोग होने में) नित्य ही उपलब्धि होगी अथवा जो पदार्थ ज्ञानं धारण करने का हेतु होने में भी उस के फल का अभाव है तो नित्य ही अनुपलब्धि का (ज्ञान न होने का) प्रसंग होगा परन्तु ऐसा होना विदित नहीं होता इस से जिस के संयोग होने से उपलब्धि होती है और न होने से उपलब्धि नहीं होती वह मन है अन्तःकरण शब्द से वाच्य मन की वृत्ति ही बुद्धि है क्योंकि काम प्रादि सब मन ही की वृत्तियां हैं ऐमा श्रुति वर्णन करती है यथा “कामः संकल्पो विचिकित्सा" इत्यादि इम श्रुति में यह कहा है कि काम संकल्प संशय श्रद्धा श्रद्धाधृति (धैर्य) अधृति लज्जा समीक्षाकर॥ ७१ बुद्धि भय ये सब मन ही हैं। इस से बुद्धिगुणप्रधान होने से बुद्धि के समान प्रात्ना का अणु होना कहना युक्त है। इन सूत्रों का ऐसा व्याख्यान यथार्थ न समझना चाहिये क्योंकि विचार करने से आत्मा व परमात्मा का सर्वथा अभेद होना बुद्ध्युपाधि मात्र से जीव होना व परमात्मा से जीव का भिन्न होना परमार्थ से एक होना तत्त्वज्ञान से जीव से बुद्धि के संयोग की निवृत्ति होना सिद्ध नहीं होता है क्योंकि नित्य सर्वज्ञ परमात्मा में अविद्या का प्राप्त होना सम्भव नहीं होता है जिस से ब्रह्म का बुद्धि के अनुगुण होना व बुद्धि के उपाधि से उपहित होना माना जाय अविद्या की प्राप्ति मानने में परमात्मा के सर्वश होने की हानि होती है उस से परमात्मा के स्वरूप का नाश होना व सर्वज्ञता प्रतिपादन करने वाली श्रुति का असत्य होना सिद्ध होता है और यह विचार करने योग्य है कि जीव प्रात्मा से विभाग को प्राप्त हुई बुद्धि भिन्न रूप से स्थित होती है अथवा परमात्मा में लीन होती है अथवा परमात्मा के अन्य प्रदेश में संयोग को प्राप्त हो किसी अन्य जीव को उत्पन करती है जीव से वियोग होने में बुद्धि वा अन्तःकरण की क्या गति होती है असत् से ( जो नहीं है उस से ) भाव नहीं होता है जो सत् है उस का प्रभाव नहीं होता है इस गीता स्मृति के वचन से और तर्क से भी यही सिद्ध होने मे सर्वथा बुद्धि का अभाव होना निश्चित नहीं होता बुद्धि का होना या रहना निश्चित होने में जो सम्यग्ज्ञान वा तत्वज्ञान के होने में जीव से विभक्त (भिन्न हुई) बुद्धि ब्रह्म में लीन होती है तो जीव व परमात्मा ब्रह्म के भेद न होने में जीव ही में प्राप्त होना सिद्ध होगा ऐसा होने में उस का नित्य योग ही सिद्ध होने में सम्यग्दर्शन होने में (पूर्ण ज्ञान वा तत्वज्ञान होने में) संसारित्व निवृत्त होने में बुद्धि का संयोग शान्त होता है वा नहीं रहता ऐसा कहना असंगत विदित होता है जो ऐसा माना जावे कि ब्रह्म के अन्य प्रदेश में प्राप्त हो अन्य जीव को उत्पन्न करती है तो वियुक्त ( वियोग को प्राप्त ) जीव को भी ऐसा ही उत्पत्ति अनुमान करने में उस के संयोग व वियोग से जीव की उत्पत्ति व विनाश सिद्ध होने में य एष महानमाला अर्थ-यह आत्मा महान् वा अज (उत्पत्ति रहित ) है इस श्रुति में कहा हुआ अजत्व असत्य होगा जो ब्रह्म में प्राप्त भी बुद्धि अपने जीव उत्पन्न करने के धर्म से जीवत्व को उत्पन्न नहीं करती है तो वियुक्त जीव में भी उस के संयोग से व धर्म से जीवश्व का प्रतिपादन संभव नहीं होता है अथवा १२ समीक्षाकर ॥ उम के ब्रह्म में प्राप्त होने ने उक्त प्रकार से जीव ही में प्राप्ति वाच्य होने जीव से वियुक्त न होगी ब्रह्म से भिन्न उस की स्थिति होने में द्वैत सिद्ध होने से अद्वैत कहना बुद्धि के संयोग य वियोग से जीवत्तव अजीवत्त्व वा ब्रह्म का अज्ञानत्व कहना अयुक्त ही विदित होता है और श्रीभाष्य में प्रत मत की ऐसी समीक्षा की गई है कि जो ऐसा माने कि उपाधि उपहित ब्रह्म जीव है व अणुपरिमाण है और अणुत्व अवच्छेदक (व्यावृत्ति धर्मयुक्त) मन के अगा होने से और यह अवच्छेद (पृथक्ता वा व्यावृत्तिधर्म) अनादि है ऐरो उपाधि उपहित देश में सम्बन्ध को प्राप्त हुये दोष उपाधि को न प्राप्त हुये परब्रह्म में सम्बन्ध को नहीं प्राप्त होते तो अद्वैतवादी से यह प्रश्न करने योग्य है कि उपाधि से अवच्छिन्न ( भिन्न हुना) ब्रह्म का खरष्ठ अणुरूप जीव है प्राथवा अछिन्न ही (भिन्न न हुआ) अणुरूप उपाधिसंयुक्त ब्रह्म का प्रदेश विशेष है अथवा उपाधिसंयुक्त ब्रह्मस्वरूप है अथवा उपाधिसंयुक्त अन्य वेतन अथवा उपाधि ही है ब्रह्म के अछेद्य होने से (काटने वा खण्ड करने योग्य न होने से) प्रथम कल्प कल्पित नहीं हो सकता वा कल्पना योग्य नहीं है और जीव का आदिमान होना सिद्ध होगा विद्यमान एक को काटकर दो करना छेदन है ऐसा न होमकने से ब्रह्म अछेद्य है । दूसरे कल्प में ब्रह्म ही के प्रदेश विशेष में उपाधिसम्बन्ध होने से सब औपाधिक दोष ब्रह्म के होंगे उपा- धि के चलने में उपाधि से संयुक्त जो अपना ब्रह्मप्रदेश है उस के शाकर्ष- पा का योग न होने से अर्थात् उस का उपाधि से पृथक् करलेना न हो सकने से उपाधिसंयुक्त ब्रह्म के प्रदेश विशेष होने के भेद से क्षण क्षण में वन्ध व मोक्ष दोनों ब्रह्म को होवेंगे आकर्षण करने में अखण्ड होने से सम्पूर्ण ब्रह्म का आकर्षण होगा परन्तु अंशरहित व्यापक का आकर्षण संभव नहीं होता है जो यह कहा जावे तो उपाधि ही चलती है यह सिद्ध होने वा मानने में पूर्व उक्त ही ( जो पहले कहे गये वही ) दोष होवेंगे। अछिन्न (अखण्ड ) ब्रह्मप्रदेशों में सब उपाधियों का संसर्ग होने में और सब जीव ब्रह्म के प्रदेश रूप होने से सब जीवों का भेदरहित प्रतिसंधान ( ज्ञान व स्मरण ) होगा प्रदेशभेद से प्रतिसंधान न होने में अपनी उपाधि के चलने में एक का भी प्रतिसंधान न होगा। तृतीय कल्प में उपाधि सम्बन्ध से ब्रह्मस्वरूप ही का जीयत्व होने से उससे भिन्न उपाधि रहित ब्रह्म की सिद्धि न होगी और सब देहों में एक ही जीव होगा। चौथे कल्प में ब्रह्म से जीव अन्य ही होगा समीक्षाकर॥ NavnAyaNA । ऐसा होने में औपाधि जीव होने के पक्ष का त्याग होजायगा और अन्त के पक्ष में धारवाक मत का ग्रहण होगा वेदान्त मत का त्याग होगा कोई ब्रह्म अद्वितीयत्व के मानने वाले ऐमा कहते हैं कि एक ही ब्रह्म के प्रतिषि- म्ब रुप जीवों का मुखी व दुःखी होना भादि मणि कृयागा दर्पण आदि कों में प्रत्यक्ष हुये एक ही मुग्य के वा सूर्य के प्रतिबिम्बों का छोटा होना बढ़ना घ- टना कांपना मलिन होना आदि के समान भिन्न २ उपाधियश से भेद को प्राप्त होते हैं इम में यह विचारने योग्य है कि अल्पत्व मलिनत्व आदि प्रो. पाधिक दोष कब न होंगे वा कब नष्ट होंगे। जो यह कहा जावे मणि दर्पण के न रहने में । तो यह विचारणीय है कि उन अल्यत्व त्रादि का आश्रयप्रति- बिम्ब स्थित रहता है या नहीं जो स्थित रहता है तो प्रतिबिम्ष स्थानीय जीय के भी स्थित रहने से मोक्ष न होने का प्रसंग होगा और जो नष्ट होता है तो वैसे ही जीव का नाश होने से स्वप नाश होना राप मोक्ष होगा जिस कोोपों का प्रतिम होता है उसको उस का नाश पुरुषार्थ होता है इम में यह निर्णय के योग्य है कि श्रीपाधिक दोष प्रति भाम ( दोषों का प्रतिभाषित होना ) बिम्ब स्थानीय ब्रह्म का है अथवा प्रतिबिम्ब स्थानीय जीव का ? अथवा किसी अन्य कर ? पहले दोनों बल्यों का दृष्टान्त घटित नहीं होता क्योंकि मुख व मुख के प्रतिबिम्ब को अल्पत्व आदि दोषों का प्रतिभास नहीं होता क्योंकि मुख वा मुख का प्रतिबिम्ब नहीं जानते ब्रह्म को दोष प्रतिभाषित होने में ब्रह्म अविद्या का आश्रय होगा अर्थात् ब्रह्म में अघिद्या प्राप्त होने का दोष प्राप्त होगा कोई तत्त्वज्ञ भ्रांति रहित प्रतिबिम्बित वस्तु मणि दर्पण जल आदि में उस के उपाधि दोष से अपने सम्पूर्ण रूप व अवयव रूप के प्रतिबिम्ब अल्पत्य दीर्घत्व कंपनत्व म- लिनत्व आदि अन्यथाभावयुक्त देख कर अपने स्वरूप में वैसे ही होमा निश्चय नहीं करता है अपने स्वरूप में उपाधि दोष का न होना ही करता है ऐसे ही सर्वज्ञ भ्रान्तिदोषरहित ब्रह्म को उपाधि दोष से अन्यथा प्रत्यय होना संभव नहीं होता है तीसरा कल्प भी फरिपत नहीं हो सकता क्योंकि बिम्ब प्रतिबिम्ब स्थानीय ब्रह्म व जीव मे भिन्न देखने वाले का प्र- भाष है अर्थात बिम्ब प्रतिबिम्ब अपने को देखते व जानते नहीं हैं तीसरा कोई देखनेवाला नहीं है इस से उक्त कथन प्रयुक्त है अन्य विचार यह है कि अविद्या कल्प्य ( अर्थात् अविद्या से कल्पना के वा होने के योग्य ) जीव का १० ४७ समीक्षाकर॥ HV. NAL AN कल्पक ( कल्पना करनेवाला) को है पहले अचेतन होने से अविद्या नहीं है आत्माश्रय दोष होने के प्रसङ्ग से जीव भी नहीं है सीप व चांदी के समान अविद्या कल्प्य होने से जीव भाव का ब्रह्म ही कल्पक है ऐसा कहा जावे तो ब्रह्म का अज्ञान मिद्ध हुआ यह भयुक्त श्रुतिविरुद्ध ब्रह्मस्वरूप के भ. भाव रूप अप्रमाण स्वीकार करने योग्य नहीं है इस से उक्त सूत्र इस प्रकार से व्याख्यान के योग्य हैं। तद्गुणसारत्वात्ततव्यपदेशः प्राज्ञवत् २९ विज्ञानेतिष्ठन् विज्ञानंयशंतनुतेज्ञानस्वरूपमत्यन्तभिर्मणम् परमार्थतत्या- दिषु ज्ञानमेवात्मेति व्यपदिश्यते अतोनज्ञाताऽऽत्माइतिगम्यते इतिपूर्वक्षाश- कायामिदमाहतद्गुण सारत्वात्तु इत्यादि तुशनचोद्य व्यावर्त यति लद्गुगामार- त्वात् विज्ञानगुणमारत्वादात्मनोविज्ञानमिलिव्यपदेशः विज्ञान यास्मसार- भूतोगुमाः प्राज्ञवत् अर्थात् ययाप्राज्ञस्यानन्दस्सारभूतोगुणः इति प्राज्ञा नन्दशब्देन व्यपदिश्यते। यदेष प्राकाशानन्दोनस्यात् प्रानन्दोन प्रतिव्य जानादितिमासस्य प्रानन्दः सारभूतोगुणः सएकोब्रह्मणामन्द प्रानन्दंब्रह्म गोविद्वानबितिकुत- वनेतियथावा मत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेलिविपश्चितः प्राशस्य ज्ञानशब्देनव्यपदेशः प्राशस्यशानंसारभूतोगुखइतिविज्ञायते॥ अथ भापानवादः ॥ तद्गुणसारस्वात्तुतड्यपदेशःप्राज्ञवत् ॥ २९ ॥ वही ( विज्ञान हो ) गुणसार होने से उस का कथन है प्राज्ञ के समान ॥ विज्ञाने तिष्ठन विज्ञानं यज्ञं तनुते ज्ञानस्वरूपमत्यन्तं निर्मलम् ।। अर्थ-विज्ञान में स्थित हुआ विज्ञान यज्ञ को करता है विज्ञानस्व- रूप अत्यन्त निर्मल है इत्यादि श्रुति वाक्यों में विज्ञान ही (बुद्धि ही) आत्मा है यह कहा है इम से प्रापा ज्ञाता नहीं है यह सिद्ध होता है इस पूर्व पक्ष की शका के उत्तर में यह कहा है कि वही गुणसार होने मे उस का कथन है अर्थात् विज्ञाम नाम कथन है अर्थात् विज्ञान नाम से आत्मा कहाजाता प्राज्ञ के समान अर्थात् जैसे प्रानन्द गुणसार होने से प्राज्ञ परमात्मा मान- न्द शब्द से कहा जाता है या कहागया है यथा- यदेपाकाशमानन्दोनस्यात् ॥ है PP समीयाकर। ७५ अर्थ-यह आकाश श्रानन्द न होता। इत्यादि तथा अन्य श्रुति में ऐसा वर्णन है॥ आनन्दोब्रह्मव्यजानात् ॥ अर्थ-मानन्द ब्रह्म को जाना । तथा- आनन्दंब्रह्मणीविहान न विभेति कुतश्चन। अर्थ-मामन्द ब्रह्म को माननेवाला किसी से भय को नहीं प्राप्त होता है इत्यादि । अथवा जैसे- सत्यज्ञानमनन्तंब्रह्म ॥ अर्थ -मत्य जाम राप अनन्त ब्रह्म है। इम श्रुति में प्राक्ष के ज्ञान गुणसार होने मे प्राज्ञ को ज्ञान शब्द से कहा है ऐसे ही विज्ञानगुणसार होने से जीव को विज्ञान शब्द से कहा है यह ज्ञात होता है । यावदात्मभावित्वाचनदोषस्तदर्शनात ३० विज्ञानस्ययावदात्मनाविधर्मत्वेनतद्वयपदेशोनदोषः तथा च स्वगडादयो यावत्स्वरूपभाविगोत्वादिधर्मशब्देनगौरितिव्यपदिश्यमानादृश्यते स्वरूपनि- रुपणधर्मत्वादित्यर्थःचकारीशान यदात्मनोपिस्वप्रकाशत्वेन ज्ञानमितिव्यपदेशो न दोष इतिसमुचिनोति ययात्मा ज्ञस्वभावस्स्यात् विज्ञानमेवस्वसारभूतोनुणो- पास्यात् तहिं सुषुप्त्यादिषुतस्यज्ञानामावोनस्यात् सुषुप्त्यादिषुशानाभावाचा भानस्य स्वरूपानुषन्धिधर्मत्वमित्याशङ्कायाउत्तरभाह । भावानुवाद यावदात्मभ वित्वाचनदोपस्तदर्शनात् ॥३०॥ मात्मा के रहने तक रहने वाला होने से दोष नहीं है यह देखने से ३. विज्ञान के यावदात्मभावी धर्म होने से प्रात्मा को विज्ञान नाम से क- हमा दोष नहीं है ऐमा लोक में भी देखा जाता है फिर खण्डादि यावत् स्वरूपभावी (स्वरूप रहने तक रहने वाले) गोत्य प्रादि धर्मशब्द से गौ ऐमा कहे जाते हैं। जो आत्मा ज्ञान स्वभाव होता अथवा विज्ञान ही इस का सार गुश होता तौ सुषुप्ति आदि में उस के ज्ञान का प्रभाव न होता सुषुप्ति प्रादि में ज्ञान के प्रभाव से ज्ञान स्वरूप ज्ञान संयुक्त ही सदा रहना आत्मा का गुण वा धर्म नहीं है इस शङ्का का उत्तर वर्णन करते हैं ३० समीक्षाकर ॥ .... AAAAA.. पुंस्त्वादिवत्वस्यसतोऽभिव्यक्तियोगात् ३१ तुशदश्चोक्तशङ्कानियत्ययः नेदृशीशङ्का कर्तव्या कुनः अस्यज्ञानस्यनुषुप्ति- प्रनपयोर्विद्यमानस्य प्रबोधप्रसवयोरभिव्यक्तिसम्भवात्स्वरमान बन्धिधर्मत्वो- पपत्तिः । पुंस्त्वादिवत्यथापुंस्त्वादीनियोजात्मनाविद्यमानान्येववाल्यादि- प्यनुपलभ्य मानानि विद्यमान वदभिप्रेयमाणानि यौवनादिष्वाविर्भवन्ति सप्तधात्मयत्वंहि शरीरस्य स्वरूपानुबन्धि वाल्यावस्थायांविद्यमानपुंस्त्वस्ययु- वस्वे मभिव्यक्ति वत्सु गुप्तीविद्यमानस्यज्ञानस्य प्रबोधेऽभिव्यक्तिर्भवति एवंप्रलय मूयिस्य योर्विद्यमानस्य सृष्टिस्वास्थ्ययोरूपलब्धि ज्ञातव्येतितोज्ञातृत्वमे- वात्मनःस्थल ज्ञाताणु परिमाणश्यायमात्माइत्यवधेयम् अन्यथाज्ञानमात्रत्वपक्ष सर्वगतत्यपक्षं च दोषोनुमीयते को दोपः तमाह- अथ भाषानुवादः पुंस्त्वादिवत्वस्यसतोऽभिव्यक्तियोगात् ॥३१॥ पुंस्त्वादि के ममान इम विद्यमान की प्रकटता होने के योग से ॥३१॥ यह शङ्कायुक्त नहीं है क्योंकि सुषुप्ति व प्रलय में विद्यमान ही ज्ञान की जाग्रत् अवस्था में व सुष्टि ममय में प्रकटता सम्भव होने से ज्ञान का याव. दात्मनात्री होना भिड होना है पुस्त्वादि के समान अर्थात् जैते पुस्त्व मादि बीज रूप मे बाल्य अवस्था प्रादि में विमान ही रहते हैं परन्तु झात नहीं होते वह विद्यमान ही अविद्यमान के ममान समझे गये यौवन (युधावस्था वा जवानी) में प्रकट होते हैं मप्तधालुमय होना शरीर के स्वरूप का सम्बन्धी है पुंमत्व जो वाल्य अवस्था में विद्यमान रहना है उसकी प्रकट- ता युवत्य (जवानी) में होने के मनान सुषुप्ति में विद्यपान को जागने में प्र- कटता होती है ऐसे ही प्रलय व मी अवस्याओं में विद्यमान ज्ञान की सृष्टि मा स्वास्थ्य में प्रकटता जानने योग्य है इम से आत्मा का ज्ञाता होना ही स्वरूप है ज्ञाता व अणु परिमाण यह प्रात्मा है यही निश्चय करना चाहिये अन्यथा ज्ञाम मात्र होने के पक्ष में और मर्वव्यापक होने के पक्ष में दोष होमा अनुमान किया जाता है क्या दोष है वह वर्णन करते हैं। नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसंगोऽन्यतरनियमोवान्यथा ३२ अन्य यासर्वगतत्वपक्षेतस्यज्ञानमात्रत्वपक्षे पनित्यमुपत्नध्यनुपलब्धीसहे- वप्रसज्येषाताम्यन्यतरनियमोवाउपलब्धिरेवयानित्यंस्पादनुपलब्धिरेमवाएत- समीक्षाकर॥ 99 AAA MAA AANA दुक्तंभवतिलोके तावत्वर्तमानयोरामोपलभ्यनुपलभ्योरयं ज्ञानात्मासर्वगतो हेतुः स्यात् उपलठिघरेवया अमुपलब्धिरेववाउभयहेतुत्वेसर्मदासर्वोभयंप्रस- ज्येतयधुपलब्धिरेवसर्वस्य सर्वदासर्वत्रानुपलम्भो न स्यात् प्रधानुपलब्धिरेवम- वंदासर्वोचलधिनस्यात् अस्माकमोश रस्यान्तरेव वा वितरवादात्मनस्त- बोपलब्धिर्मान्यन्नेतिव्यवस्थामिद्धिः करणाय तस्योपलउधेरपि सर्वेषामात्मनां सर्वगतत्धेनसधैः करणैः सर्वदासंयुक्तत्वात् अदृष्टादेरप्यनिय गादुक्त दोषः नमानः इति ननुजीवपरमात्मनोर्भेदस्वीकारे नान्योन्तोऽस्तिद्रष्टाश्रोतामन्ता विज्ञाता इत्यायद्वैतवादिन्यः श्रनयोमिथ्यास्युरिति चेन्नैवं चैतन्य जातिपरत्वेनात्मपर- मात्ममोरेकट्वानुसंधानेमात आत्मनोऽन्यः कश्चित् श्रोतामन्ताविज्ञातानाती- त्युक्तयदा अतःपरमात्मनोऽधिकः कश्चिद्योतामन्ताविज्ञातानास्तीत्याशयः जा- सिपरत्वेमेकत्वस्वीकारेनाद्वैतवाक्ये दोषः । नाद्वैत अतिविरोधोजातिपरत्वात् ॥ अ० १ ० १५४ इति सांख्य सत्रप्रामाण्यात् चितितन्मात्रेणातदात्मकत्वादि. त्यौड लोमिरितिवेदान्तमत्रस्यैवप्रामाण्याच इति संक्षेपत उपलक्षावार्थ वेदान्तस्य विशेषसूत्राणिव्याख्यातानि एवंयत्रमंशयोभवेत्तद्विषये ह्यार्षग्रन्यभाष्यवृत्युकवा- क्यैराषमतानुयाय्यन्य पक्षपातरहितमहाशयनिर्मित ग्रन्यवाक्यै स्वादिलोपिम- म्यग्विचारतम्त स्वार्थी मृग्यःविशिष्टाद्वैत परब्रह्मसूत्रवृत्तिनिर्मात महाविबौधायन- मतधिरुद्धपूर्वापरसम्य वचाराच्छीमत्सूत्रकाराशयस्यापि विरुद्धत्वावगमाखाद्वैः तमतमन्तव्यमित्यपधंयम् वेदान्तविषयेऽतोऽधिकमस्मत्कृतब्रह्मसूत्रभाष्यद्रष्टव्य- म् अत्रमर्षवेदान्तवाक्याशयल खने इदमन्यवेदान्तभाष्यम्यात् प्रतः पूर्वाधार्यमता- न्यभुमृत्यस्तबुद्धिधिधारतोमहर्षिबौधायनमतानुसारेणघतत्वमवधार्यवेदान्तभा- ष्यनिर्माणानन्तरंविद्यार्थिभ्यउपनक्षणाकतिपयमूत्राणामर्थएवात्रवर्शितःपूर्यो- तग्रन्ये वक्त दर्शनसत्राणां भाष्याणि प्रागेव निर्मितान्यतोत्राधिकविस्तरोनकृतः। इतिशम् ॥ इति श्रीमत्पष्ठित प्रभुदयालुमिर्मितेममीक्षाकरे ब्रह्मसत्र- विशेषव्याख्याने पञ्चमोध्यायः ॥ उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीदेवंप्रधानमिति कापुरुषावदन्ति । देवंविहायकुरुपौरुषमात्मशक्त्यायत्न कतेयदिनसिध्यतिकोत्रदोपः।

समीक्षाकर। अथ भाषानुवादः नित्य पलब्ध्यनपलब्धिप्रसंगोऽन्यतरनियमोवाऽन्यथा ॥३२॥ अन्य था मामले में नित्य उपलब्धि था अनुपलब्धि होने का प्रसङ्ग होगा अथवा दो में से एक का नियम होगा ॥३२॥ अन्यथा अर्थात् आत्मा के मर्यगत (व्यापक ) होने के पक्ष में और ज्ञान- मात्र होने के पक्ष में साथ ही नित्य उपलब्धि नित्य अनपलब्धियों के होने का प्रसङ्ग होगा अथवा दो में से एक के होने का नियम होगा अर्थात् उप- लब्धि ही नित्य होगी या अनुपलब्धि ही नित्य होगी। प्रथम लोक में वर्त- माम जो उपलब्धि वा अनुपलब्धि हैं उन का सर्वव्यापक श्रात्मा हेतु होगा अथवा उपलब्धि ही वा अनुपलब्ध ही का। दोनों हेतु होने में सर्वदा सर्वत्र दोनों हांग यदि उपलब्धि ही मात्र होगी तो सब को सदा मर्वत्र अनुपलब्धि म होगी अथवा अनुपलब्धि ही होगी तो सब को सदा सर्वत्र उपलब्धि न होगी ऐमा होने में अवस्था भेद की सिद्धि न होगी हमारे मत में शरीर के भीतर भी आत्मा की स्थिति होने में शरीर ही में उपलब्धि होली है अन्यत्र नहीं होती इम मे व्यवस्था (अवस्या भेद) की सिद्धि है अन्तःकरण के प्राधीन उपलब्धि होने में भी सब प्रात्माओं के सर्वव्यापक होने में सब के अन्तःक- रक्षों से सब के सर्वदा संयुक्त होने से और अदृष्ट प्रादि से भी नियम न होने से उक्त दोष पूर्व ही के समान हैं। जो यह शङ्का होवे कि जीव व परमात्मा के भेद मानने में। नान्योअतोऽस्तिद्रष्टाश्रोतामन्ताविज्ञाता ॥ इत्यादि । अर्थ-इस मे अन्य कोई देखने वाला सुनने वाम्मा मानने वाला जानने वाला नहीं है । इत्यादि भवैत प्रतिपादन करने वाली श्रुतियां मिथ्या होंगी तो ऐसी शङ्का करना युक नहीं है अद्वैत श्रुति चैतन्य जाति एक होने के प्राशय से मात्मा व परमात्मा की एकता का श्रम मन्धान कर के इन आत्मा से अन्य वस्तु कोई द्रा प्रोता मम्ता व विज्ञाता नहीं है यह कहा है अथवा ऐसा अर्थ ग्राम है कि इस से अर्थात् इस सर्वव्यापक सर्व परमात्मा से अधिक कोई द्रष्टा प्रोता मम्ता विनाता नहीं है जातिपरत्व से एकता स्वीकार करने में अद्वैत धाप में दोष नहीं प्राप्त होता और जातिपर होने से अद्वैत अति में विरोध नहीं है ऐसा सांख्य दर्शन में अ० १ सू० १५४ में बहने के प्रमाण से और स्वयं - समीक्षाकर। 98 ..... महात्मा वेदान्तसूत्रकार ने शाम तम्मान मे तदात्मक होमे से एकता कायम है ऐमा औठुलोमि भाचार्य मानते हैं ऐसा घेदाम्त दर्शन के अ०४ पा० ४ सू०६ में कह कर अपनी भी मम्मलि इम के अनुकल विज्ञापित किया है उस से चेतग लजातीयभाष से एक मान के एकता का कथन है यह सक्ष से उप- लक्षण के लिये वेदाम्त के विशेष सूत्रों का व्याख्यान किया गया है ऐसे ही जहां जहां संशय होथै उस विषय में नार्षग्रन्ध भाष्य व वृत्तियों में कहे हुये पाक्यों से और अपनी बुद्धि से भी अच्छे प्रकार से विचार करके सत्य का खोग करना चाहिये विशिधापर अन प्रवृत्ति के निर्माता महर्षि वौधा- यम के मत से विरुद्ध होने से व पूर्वापर अच्छे प्रकार मे विधारने से श्री मान् सप्रकार के प्राशय से विरुद्ध होना सिद्ध होने में प्रति मन मनाय मी है वेदान्त विषय में इस से अधिक हमारे वर्णन किये हुये वेदान्तमाध्य में दं वना चाहिये इस में मब वेदान्तवाक्यों का प्राशय लिखने में यह अन्य वेता- न्त साध्य हो जाता इन में पूर्वाचार्यों के मत अनुसार और अपनी बुद्धि के विचार से महर्षि बौधायन के मत के अनुसार तत्व का निश्चय करके वेदा. न्तभाष्य के निर्माण के पश्चात् विद्यार्थियों के लिये उपलक्षगा के अर्थ थोड़े सूत्रों ही का अर्थ यहां वर्णन किया है पूर्वोत ग्रन्थों में उता दर्शनों के सत्रों के भाष्य पहले ही निर्माण किये गये हैं इस से यहां अधिक विस्तार नहीं किया शमस्तु। श्रीमप्यारेलालात्मज वांदा मगहलान्तर्गत तेरहीत्याख्यग्रामनिवासि पण्डित प्रभुदयालु निर्मिते समीक्षाकरे ब्रह्म सत्रविशेषाणां व्याख्याने पञ्चमोऽध्यायः समाप्तवायग्रन्थः ॥

- वैदिकपुस्तकप्रचारकफण्ड कार्यालय-सदर मेरठ के विक्रयार्थ पुस्तकों का सूचीपत्र ॥ वैदिक पुस्तक प्रचारक फण्ड से छपी पुस्तकें-हिन्दु आर्य और नमन्ते का अन्वेषण मूल ) ( पं० लेखराम कृत ) क्या स्वामीदयानन्द मक्कारथा ? )।। पुरुपसूक्र )।। मनुष्यसमाज )। मनुष्य जन्म की सफलता )॥ श्री १०८ स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज का जीवनचरित्र)॥ क्रिश्चीयनमत दर्पणा)।। ईसाईमतखगडन १ भाग ), दूसरा )। ईमाईमतलीला )। महाशङ्कावली १ भाग )। दूमरा भाग )। नीतिशिक्षावली )। सुशीलादेवी )। रामायण का प्रा. ल्हा )। पं० रामचन्द्र वेदान्ती का उत्तर )। शिवलिङ्गपूजाविधान )। श्रीरामजी का दर्शम )। कस्मि युग लीना काशीमहात्म )। नित्यकर्नविधिः)। पुराण किसने बनाये, शङ्करानन्द के अनमोल उपदेश डेबीस की राय आधा २ पैसा ॥ अन्य पुस्तके-खेतीविद्या के मुख्य सिद्धान्त ॥=) वेदान्तप्रदीप ॥) वैद्या- नन्दप्रकाश ॥) चिकित्सानिन्धु २) लण्डनयात्रा ।-) श्रीछत्रपति शिवा जी का जीवन चरित्र ।) नारायणी शिक्षा ११) भास्करप्रकाश १ खण्ड (4) श्वेताश्वत- रोपनिषद्भाष्य 12) संस्कृत की प्रयमपुस्तक )॥ द्वितीय -)। तृतीय =)॥ च- तुर्य ॥) चारों की जिल्द ॥-) विश्वकर्माप्रकाश १।) वैदिकधर्मप्रचार ॥) स्वधर्म रक्षा ।) आर्यममाजपरिचय ।) भगवद् गीताभाष्य १॥) वीर्य्यरक्षा ) ( स्त्री शिक्षा की पुस्तक ) स्वीधर्मनीति १) भारत की विख्यात रानियों के चरित्र ॥) सीताचरित्रनावल १ भाग ॥) ( भजनों की पुस्तक ) आर्यसंगीत पुष्पावली ।।) सभाप्रश्न ।)!! प्रमोदयभजनावली ) भजनामृतसरोवर =) संगीत रत्न कर =) संगीत सुधासागर -) भजनेन्दु ) ( उत्तम देखने योग्य उपन्यास ) दिवनिवारण ॥ सुवर्णलता ॥) मधुमालती ॥) चितौड़ की चानको ॥ अमलापत्तान्तमाला ॥) इला ॥३) प्रमिला ॥८) जया ॥) अकबर ॥) अद्भुत लाश ।८) चन्द्रकला ।) संसारदर्पण २) वेश्यानाटक )। अंगरेजी की सीढ़ी।=) अज्ञाननिवारण -)" वैदिकदेवपूजा -)॥ ईश्वर और उसकी प्राप्ति -) हार- मोनिम गाईड १ भाग 1) दूसरा ।) लेखदीपिका ।) स्वास्थक्षा ॥) हमारे यहां श्रीस्वामीदयानन्द सरस्ती जी महराज कृत पं० भीमसेन जी कृत पं० तुलसीराम जी स्वर्गवासी पण्डित लेखराम जी कृत उर्दू पुस्तके, तथा पं० कपाराम जी के उर्दू ट्रेक्ट और मुं० चिम्मनलाल जी कृत आदि पुस्तकें हैं डाक व्यय सब को अलग पड़ेगा ॥ कृत पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध (११) योगराज गुग्गुल वटी १०० बटी का मू० १)-इस के सेवन से सदर के सब रोग, पाण्ड रोग, वात, कफ के रोगों पर सब प्रकार का प्रमेह पेचिश भादि शीघ्र पाराम होते हैं । (१२) सुधांजन सुरमा तोला ॥) आज कल बारीक अक्षर पढ़ने वालों को तथा नेत्र के सब रोगों को अति लाभदायक है। (ऊपर लिखी सर्व श्रोषधियों का बड़ा सूचीपत्र तथा खाने की विधि का पत्र अलग दवाई के साथ मिलता है) मिलने का पता-मेनेजर भारतोद्धारक सदर-मेरठ अशुद्धमुद्रितशब्दानां शुद्ध्यर्थमिदं शुद्धिपत्रम् । शुद्ध पूय पूत्यै ३० तद्भक्ष्यते तदभिव्यक्ष्यते १२ अवगच्छन्ति अवगम्यते २१ ११ नाव इति भाव इति १० १९ १२ १३ अनेकद्रव्यत्वं अनेकद्रव्यवत्वेन १४ षडेपदार्था पड़ेवपदार्था कौर और. १५ उपस्कार निर्मात्रा उपस्कारनिर्मात्रा वृत्तिका २ १ ३ น . प्रत्यय प्रलय २८ १२ १८ २० सामात्यतः नहीं होत नहीं धनापहारत्वकथयात् अपहतुर्य धार्मिक में विरुद्धौं का सामान्यतः नहीं होता नहीं है धनापहारत्वकथनात् १६ २२ २७ अपहतु ये २९ २९ १२ कि कार्य धार्मिक से विरुवों का किं काय स्वीकार्यति বগায়ি मत्त्वानित्यत्वाद्युपासा स्वकार्यति मत्राणि मश्यान्नित्यत्वाद्युपासा २९ ३२ ११ Recenemy Nirman ३६ ३ विज्ञान वह ५ पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध ३४ १७ मित्यऐश्वर्यवान् नित्यऐश्वर्यवान् व्याप्यत्वाऽसिद्धय व्याप्यत्वाऽसिद्ध्या ३ ११ विज्ञान है वह २८ उस के प्रत्यक्ष उन के प्रत्यक्ष १९ सिद्धिप्रदर्शनार्थवाह सिद्धिप्रदर्शनार्थमाह ४४ यं आत्माअपहतपाप्मा य प्रात्माअपहतपाप्मा २३ २५ अपिस्मर्य्यते २२ २२ अपिस्मयंते २३ १४ शूद्रेत्यामंत्रप्रतिस्म शूद्रेत्यामंत्रयति स्म ५० नेश्वरस्येदृशेपक्षपातेर्षाः नेश्वरस्येदृशपक्षपातेष्यां ५३ १९ इतिश्रुतिवाक्प इस श्रुतिवाक्य ५३ १३ फला हुमा ५४ १५ प्राप्त होता प्राप्त होता है ५४ १७व१८ अनुमान अनुभान ५४ २४ पूर्व ही होने से पूर्व ही वर्णित होने से ५४ २७ अनुमान अनुभान ५५ २५ जान श्रुति में हंसों जानश्रुति हंसों ५७ २२ वर्णन न होने से वर्णन होने से क्योंकि उत्तम यदा यही नहीं होता नहीं हो सका २६ अनधिकारत्व व अधिकारको अधिकारत्व को फला हुआ कि उत्तम 북 ६१ ५ १ लोक ३ झोक ३६ ६५ १९ १० १६ १३ यह निश्चित ७२ उत्क्रन्ति उत्क्रान्ति तो यह निश्चित वाच्यं मनसः वाज्यस्य मनसः वाच्य होने वाच्य होने से दोष प्रतिभास दोष का प्रतिभास (प्रतिभाषित होना) (प्रतिभासित होना) भीतर भी भीतर ही समाप्तमिदं शुद्धिपत्रम् ॥ ७३ १५ १३

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समीक्षाकर

Author
Prabhudayaal
Title
Samiikshhaakar
File name
समीक्षाकर
Text
OCR done
Published
2005/07/25
Publisher
Shriisvaamii Brahmaanand Sarasvatii, Pustak Prachaar Phand-da, Meratha
Language
Sanskrit
Pages
85
Library
University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
Classification
LANGUAGE LINGUISTICS LITERATURE
DLI number
477355
Barcode
99999990173202.00
Scanning centre
C-DAC, Noida
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
1DZCQs3pSxJ
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