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मृत्यु शोक की शान्ति

Lakshhmiidhara · 2005/07/25

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मृत्यु शोक की शान्ति
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लक्ष्मीधर
(मिशन कालिज्ञ, देहली)
MARAwardeesermdarmer
शाकातस्य प्रवृत्ती में श्लाको भवति नान्यथा
(वाल्मीकि)

मृत्यु शोक की शान्ति
लेखक
लक्ष्मीधर
[मिशन कालिज, देहली ]
प्रथम वार
{ फरवरी १६३७

चन्द्र प्रिण्टिङ्ग प्रेस, देहली।

स्वर्गीय आत्माओं की पुण्य-स्मृति
में
सश्रद्धा समर्पित !

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भूमिका अपने ही समझने के लिये यह लेख लिखा था । किन्तु यह समझ कर कि मृत्यु सब लोग पीड़ित हैं, कभी न कभी ऐसी चीज़ की सभी को ज़रूरत पड़ती है । शोकावस्था में किसी प्रकार आश्वासन दिलाना उचित ही है। इस भाव से पुस्तकरूप में यह लेव छपवा दिया, कदाचित् किसी दुखी मनुष्य की दृष्टि पड़ जाय और इसके पढ़ने से उसके शोक-त्रण पर कुछ शीतलोपचार हो ! यदि किसी एक दुखी पुरुप का भी इसे पढकर कुछ दुःख दूर हो सके तो यह परिश्रम सफल होगा। जो स्वतन्त्र विचार इस लेख में प्रकट किये हैं यदि विद्वान उन पर अधिक प्रकाश डालें तो महान उपकार होगा। इन विचारों के समर्थन में जो प्रमाण उद्धृत किये हैं, एक वाक्यता सिद्ध करने के लिये उनकी व्याख्या करना आवश्यक है। किमधिकम- वियुज्यमानेऽपि तरौ पुष्पैरपि फलैरपि । पततिच्छिद्यमाने वा तरुरन्यो न शोचते ।। यस्तु दृष्ट्वा परं जीणं व्याधितं मृतमेव च । स्वस्थोभवति नोद्विग्नो यथाऽचेतास्तथैव सः ।। न चानुर्वतनं तन्मे रुचितं यत्र नार्जवम् । सर्वभावेन सम्पर्को यदि नास्तिधिगस्तुतत् ॥ (अश्वघोप-बुद्धचरितम्) देहली -लक्ष्मीधर १ जनवरी, १६३७ विषय-सूची विषय पृष्टांङ्क २ जीवनसुन्दरी २ मृत्यु कन्या ८-१२ ३ परलोक गमन १३-१७ ४ शोकानुचिंतन १८-२८ शोकसभा २६-५० सरस्वतोभाषण (३०-३२) वाल्मीकि भाषण (३२-३४) व्यास भाषण (३५-३८) बुद्धानुशासन (३९-५०) ६ निर्देश स्थल तथा टिपणियां ५१-८६ ७ परिशिष्ट १-हिंदी के सन्तकवियों द्वारा आश्वासन ८७-८८ २-उर्दू के कवियों द्वारा आश्वासन ८६-६० ३-ईसाई तथा अन्य धर्मों द्वारा आश्वासन ६१-६६ १० ४-Spiritualism, अर्थात पितृ विद्या द्वारा आश्वासन, इसका एक उदाहरण ६७-१०० " ६ जीवन-सुन्दरी एक दुग्वी मनुष्य मृत्यु-शोक से पीड़ित होकर जीवन से हताश, भूमि पर अचेत सा पड़ा है । इस शोकावस्था में उसे अद- भुत मानस-प्रत्यक्ष होता है । एक प्रकाशवती स्त्री उसे आकर प्रबोधित करती है और कहती है-हे प्राणवल्लभ ! मैं जीवन-वधू तुम्हारी मतत-महचरी, तुम्हारे मन्मुग्ब खड़ी हूँ, तुम मुझ से क्यों विमुग्व हो रहे हो ? मैं तुम्हारी परम मख्खा हूँ । मेग तुम्हाग अविनाभाव है । मैं तिरस्कार की पात्र नहीं । जीवन-वधू का यह मधुरालाप सुन कर दुखी मनुष्य के हृदय की वेदना और भी बढ़ने लगी और वह विकल घर से बोला- १ - मृत्यु-शोक की शान्ति रे चपल सुन्दरि ! तेरा विद्युद्विलास हल्लासकारी है। मेरा अब तेरे साथ निर्वाह नहीं । मुझे प्रतीत हो गया, कि तेरा प्रत्यय असत है। तेरी निष्ठुरता लोक परलोक में विदित है। रे पुत्रादिनि ! जिस प्रकार महाराज शान्तनु की स्त्री गङ्गा अपनी सन्तान को आप मार डालती थी, उसी प्रकार तू जिसे पैदा करती है उसे आप खा जाती है ! रोता हुआ बच्चा तेरी गोद में आता है, दूध पिला कर तू उसे बड़ा करती है। फिर एक दिन अपना वार करती है और निर्दयता से उसका दम घोट देती है। रे पतिघ्नि ! चण्डी रूप धारण करके तू अपने शिव-स्वरूप पति का आघात करती है और उसके शव पर हास-पूर्वक नृत्य करती है ! तेरे माधुर्य में हलाहल है ! तेरे वक्षःस्थल में हृदय नहीं पाषाण है ! तेरे सुख का अनु- भव अयथार्थ है ! तेरी आशा असत-ख्याति है ! दुःग्य तेग नित्य दोष है ! तू अनित्य है ! अनात्म है ! दुखी मनुष्य के यह प्रग्वर वचन सुनकर जीवन-सुन्दरी कोमल स्वरसे कहने लगी हे वर ! जिस प्रकार निगम ग्रन्थों में शिवजी पार्वती से उपदेश ग्रहण करते हैं, उस प्रकार तुम भी मेरा वचन आदर-पूर्वक सुनो। दुःख के कारण तुम मेरा निरादर करते हो । सुनो, दुःख मेरा उद्देश्य नहीं । मैं दुःख को प्यार नहीं करती। यह दुःख रूपी भ्रमर मुझ कमलिनि रूप जीवन-सुन्दरी पर मुग्ध होकर मुझे आप आ चिमटता है। किन्तु यह मेरा सगन्ध नहीं । मेरा सुगन्धित रूप २ जीवन-सुन्दरी करे।' इस प्रेम है । इस पर दुःखका पदाघात बलात्कार होता है मानों प्रेम का गुण दुःख है ! मुझे अपने प्रेम-स्वरूप के कारण सब दुःख सहन करना पड़ता है । यदि मैं दुःख का त्याग करूं तो मुझे अपने प्रेम- स्वरूप का भो त्याग करना होगा जो मेरे लिये आत्मघात है। मेरे प्रेम स्वरूप का प्रवाह दुर्दैव से दुःख की धाराओं ही में बहता है । जीवन की ऊर्ध्वगति तथा अधिक सुख की प्राप्ति के लिये मुझे विधिवश मृत्यु का द्वार भी झांकना पड़ता है और सब दुखों का तो कहना ही क्या है ! तुम जानते हो प्रेम का यह रहस्य है कि वह अपने से बाहर जाए और एकमें दो का अनुभव अपने प्रेम-स्वभाववश मैं जीवन-शक्ति एक होकर भी अनेक नाम रूप धारण करती हूँ कि अनेक विशेषों में सामान्य का अनुभव होने से प्रेम की अतिशय तृप्ति हो। मैं देह से उत्पन्न नहीं होती, देह मुझ से उत्पन्न होता है। प्रेमवश देह धारण करती हूँ और प्रेमवश ही देहका परित्याग करती हूँ। मनुष्य मेरे इस जीवन-रहस्य को नहीं जानता और दुःख पाता है। जीवन मेरा स्वभाव है, इसलिये मैं मरती नहीं, अमर हूँ। शरीर मेरा नेपथ्य है। मैं सदा सशरीर हूँ, मुझे नग्न रूप आज तक किसी ने नहीं देखा ! स्थूल शरीर छुटने पर उसका कारण रूप आतिवाहिक २ शरीर मेरे साथ बना रहता है जिसे लेकर मैं परोक्ष गति को प्राप्त होती हूँ और मरने पर मेरी कुछ भी ३ मृत्यु-शोक की शान्ति हानि नहीं होती वरन् उन्नति तथा सुखका द्वार खुल जाता है ।। तुम जिनके मरने का शोक करते हो वह वास्तव में मरे नहीं। पीड़ित शरीर का त्याग कर नाम रूप सहित आनन्दमय शरीर के साथ वह सुखपूर्वक परलोकमें निवास करते हैं, जहां तुमसे उनका अवश्य मेल होगा। वह स्थूल-देहमुक्त होकर अब भी तुमसे मिलते हैं । अविज्ञात रूप से तुम्हारी सहायता करते हैं, पर तुम देहबंधन के कारण उन्हें नहीं देख सकते। मर कर तुम उन्हें देख सकोगे, और सब प्रियजनों से मिल कर उनके साथ पितृवन में विहार करोगे, यह बात निश्चय जानो ! 3 कारण यह, कि जीवित जगत में उत्तरोत्तर विकास को प्राप्त होती हुई मैं जीवन-शक्ति मनुष्य-शरीर पाकर सचेत हो चुकी हूँ। मेरी प्रतिबोधात्मक शक्ति मनुष्य शरीर में विकसित होकर कदापि क्षीण नहीं हो सकती। उत्तरोत्तर विकास को प्राप्त होना मेरा जाति-धर्म है। देखो, पर्वतों में मैं अचेत सोई पड़ी हूँ। वृक्षों में मेरी स्वप्रगति है । पशु-पक्षियों में जाग्रत हुई हूँ पर स्मृतिहीन हूँ। मनुष्यरूप मेरा प्रथम देह है जहां मुझ अपने आप का बोध हुआ है और आत्मप्रतिपत्ति प्राप्त हुई है। लोकयात्रा में मनुष्यतीर्थ मेरा वह पुण्यतीर्थ है जहां मैं स्मृतिशील बनी हूँ, इस तीर्थ को मैं कदापि नहीं भूल सकती। स्मृति मेरी आत्मवृत्ति है, शरीर नाश होने पर इसका नाश नहीं हो सकता। अब स्मृतिशील होकर मेरी निष्कम्प प्रवृत्ति है कि अनेक नामरूप जो मैंने प्रेमवश* ४ जीवन-सुन्दरी रचे हैं इनको अनेकता में अपनो एकता का प्रत्यभिज्ञान हो और प्रेम-जीवन सफल हो। अन्यथा मेरी सारी लोकयात्रा निष्फल है, सब जीवन उपहासमात्र है, वञ्चना है ! इसलिये निश्चय जानो कि तुम्हारा परलोक-गामियों से मेल होकर प्रत्यभिज्ञान होगा, लोक- जीवन अपनी सार्थकता के निमित्त परलोकमें परिपूर्ण होगा। जिस प्रकार पर्वतादि की जड़ प्रकृति में मनुष्य-जीवन के धर्म विकसित नहीं हो सकते उसी प्रकार मनुष्यदेह में, देहोत्तर विकास होने वाला संपूर्ण अमर-जीवन प्राप्त नहीं होता । यह अमर-जीवन प्रत्य- भिज्ञान द्वारा सौहार्द तथा संगतिरूप में, मृष्टिविकास के नियमा- नुकूल, परलोक में स्वतःसिद्ध है। इसलिये शरीरपरिधान के त्याग का शोक न करके, चोला छोड़ने से प्रसन्न होकर मेरी हित- कारी प्रवृत्ति में आशा रखना उचित है। मरनेवाले पर मेरा परमहित है। मेरी प्रेमगति उसके साथ अधिक वेग से काम कर रही है, क्योंकि उसके लिये नवजीवन का द्वार जो औरों के लिये अभी बन्द है, खुल गया है ! मृत्युत्रास जो मनुष्य को सताता है पर्वतादि निकृष्ट सृष्टि को नहीं सताता, जहां मैं अधिक से अधिक तोड़-फोड़ भी करती हूँ। कारण यह कि मनुष्य-जीवन स्मृति-सम्पन्न होनेसे सचेत है और सचेत होकर अभी अप्रतियुद्ध है । इसलिये मनुष्य अपने अनजा- न.पन में प्रत्यक्ष से परोक्ष-भाव होने पर दुःख मानता है। किन्तु मृत्यु-शोक की शान्ति 5 मैं जीवन-शक्ति कदापि मरती नहीं, मरकर भी जीती हूँ । मैं नित्य हूँ और मेरे नामरूप भी, मेरे होने से, नित्य हैं । स्थूल का चिह्न सूदममें सदा बना रहता है, यह बात तुम्हें नवयन्त्र रेडिओ, अमो- फोन, टेलिविजन आदि से भी प्रतीत हो सकती है। वास्तव में सूक्ष्म ही सद्प है इसी की देशकालयुत रूपरेखा का नाम स्थूल शरीर है । स्थूल शरीर मनुष्य का अङ्ग नहीं बाह्य सामग्री है। देखो, नेत्र नहीं देखता; स्वप्नमें मनुष्य बिना नेत्र भी देखता है। ऊंचे वृक्ष पर से फल तोड़ने के लिये मनुष्य जिस प्रकार लकड़ी का ग्रहण करता है, उसी प्रकार बाह्य पदार्थों को ग्रहण करने के लिये हाथ का आयोजन करता है। हाथ कटने पर दूसरा हाथ भी लगा दिया जाता है। लकड़ी के समान हाथ भी मनुष्य से अलग वस्तु है। इसी प्रकार सब शरीरकोजानो। मनुष्य की उपस्थिति, इच्छा, प्रयत्न, इन्द्रियत्व अर्थात मनुष्य का संपूर्ण जीवन स्थूलाकार से परे सुघटितरूप में विद्यमान है, जिसको मृत्यु स्पर्श नहीं कर सकती ॥ स्तम्ब से ब्रह्म पर्यन्त सब जगत् मेरा स्वरूप है। शिव भी बिना मेरी शक्ति के शव समान है, चण्डीरूप इसी अर्थका उदाहरण है। गङ्गा ने शान्तनु के पुत्रों का बध नहीं किया, मर्त्यलोक से गन्धर्व- लोक भेज कर उन्हें उच्चगति शीघ्र प्रदान की-यह इतिहास है । जीवन-मरणके विपयमें मेरी जांच हितकर, प्रीतियुत तथा निर्दोष है, तुम्हारी अल्पज्ञ होनेसे सदोष है। जीवित पुरुष दुखी होने से शोच्य ६

जीवन-सुन्दरी
१
संतप्त हृदय
हो, पर नव-जीवित जो मृत कहलाता है सुखी होने से सदा अशोच्य है !
जीवन सुन्दरी के इस वचनामृत की वर्षा से दुखी मनुष्य का
सिञ्चित
हुआ
और उसमें आशाका अंकुर उत्पन्न होने
लगा। वह बोला, हे जीवन-सुन्दरि ! तुम्हारा वचन शोक निर्वापण
करने में समर्थ है तथापि प्रियवर के देहत्याग का दारुण दुःग्व
मेरी चित्त भूमि में बन से कीलित है । तुम
जीवन की सत्ता हो
इस लिये मरने मारने का अपराध तुम्हाग
नहीं हो सकता, किन्तु
मृत्यु का अवश्य है ! मृत्यु से मेरा समागम होना उचित है, वह
क्या कहती है ! जीवन-सुन्दरी बोली- मृत्यु का मेरे साथ अन्यो-
न्याभाव है। वह मेरे स्थूलाकार का बारंबार प्रध्वंस करती रहती
है । यद्यपि मेरे सूक्ष्म शरीर को हाथ नहीं लगा सकती तथापि मेरे
स्थूल देह पर उसका अधिकार चल ही जाता है। किन्तु यहां भी
उसे हताश होना पड़ता है क्योंकि मैं उसके बिगाड़े रूप को सूक्ष्म
में अधिक सुन्दर बना देती हूँ। मैं उस सपत्नी का मुंह नहीं देख
सकती। जबतक मैं तुम्हारे पास हूँ, वह समीप आ भी नहीं सकती।
लो, मैं तिरस्करिणी रूप धारण करती हूँ, वह आ रही है !
( जीवन-सुन्दरी तिरस्करिणी वेष धारण करती है,
मृत्यु-कन्या प्रवेश करती है)
८

मृत्यु कन्या ( सूर्य पश्चिम दिशा में डूब जाता है ! लोक में अन्धकार फैल जाता है। चित्ताकाश में एक नीलवर्ण कन्या की छाया दिखाई पड़ती है। उसे देख कर दुखी मनुष्य पुकारता है।) दुखी मनुष्य हे मृत्यु कन्ये ! आओ, आओ ! तुम इतना विलम्ब क्यों कर रही हो । मैं तुम से मिलने के लिये परम उत्सुक हूँ । मृत्यु कन्या-(मुंह मोड़कर ) मैं किसी के बुलाने से नहीं आती हूँ . जब मुझे आना होगा आप आजाउंगी। बाहर के मन से तुम मेरा अनुराग प्रकट करते हो किन्तु तुम्हाग अष्टमन जीवन-सुन्दरी ही को चाहता है। यदि ऐसा न होता तो तुम मृत्यु का शोक न करते । मृत्यु का शोक जीवन का प्रेम है ! - मृत्यु कन्या दुखी मनुष्य-मुझे अपनी मृत्यु का तिल मात्र भी शोक नहीं। प्रियवर के मृत्युशोक से संतप्त हूँ। तुम्हारे शीतल स्पर्श से जीवन-ज्वर अवश्य दूर होगा। आओ, तुम इतनी कठोर क्यों हो कि किसी के बुलाने पर भी नहीं आती हो, और इतनी धृष्ट क्यों हो कि कहीं बिन बुलाये भी चली जाती हो ! मैं तुम्हें अपने प्राण देना चाहता हूँ। आओ, मुझे अपना वर स्वीकार करो, और अपने हिमपाणि के स्पर्श से मेरा चित्तदाह हरो॥ मृत्यु कन्या-मैं कुल की कन्या हूँ। मेरे पिता का नाम काल है। पिता की आज्ञा बिना मैं किसी को नहीं वर सकती। सुनो, मुझ यह शाप भी है कि जिस पुरुष के साथ मैं पाणि-ग्रहण करती हूँ वह मेरे अङ्गस्पर्श के सुखसे तत्काल मूर्छित हो जाता है ॥ मेरे इस सुख-संसर्ग से जब मर्छित पुरुष के शरीर का सब ताप दूर हो जाता है और जब मैं उसे पीड़ित शरीर से छुड़ाकर दिव्य-शरीर के साथ अपनी मृत्यु-क्रीड़ा के लिये ले जाने लगती हूँ तब शीघ्रही उसकी मूर्खा भङ्ग होती है, वह सचेत हो जाता है, और मेरा मुख देखे बिना ही मुझे तिरस्कार कर वह दिव्यदेहधारी जीवन-सुन्दरी को ब्याह लेता है और अपने पितरों से मिलने के लिये पितृलोक को सिधारता है। मैं वंचित रह जाती हूँ। मुझे वर का सौभाग्य कदापि प्राप्त नहीं । मैं तो बस जीवन-सुन्दरी की किंकरी हूँ। उसके लिये वर ढूंढ ढूढ ३ मृत्यु-शोक की शान्ति कर लाती हूँ। वह रानी है मैं उसकी दासी हूँ । वह प्रकाश है उसकी छाया मात्र हूँ। मेरी अलग कोई सत्ता नहीं । मृत्यु-द्वार जीवन-प्रासाद की ओर ही खुलता है ॥ इस लिये मरने की आशा, जो निराशा है, उसे छोड़ कर दिव्य-जीवन की प्राप्ति की चेष्टा करो, और मृत के समान होकर सजीव रहो। अपने तई भुलाकर, अपने प्रियवर के निमित्त, लोकका उपकार करते रहो। मेरा भी यह ही उद्यम है । अपना सुख न पाकर सदा लोक का उपकार करने में तत्पर हूँ। जिस पीड़ित पुरुष पर हाथ धरती हूँ उसे धाई की नाई सुख की नींद सुलाती हूँ। उसके शरीर का रोग हरती हूँ। सब प्रकार के दुःख का उपशमन करती हूँ । नवजीवन का द्वार खोलती हूँ। तिस पर भी लोग मुझे हत्यारी कह कर वृथा कलङ्कित करते हैं और से डरते हैं । रात्रि को सब संसार मेरी शरण आता है फिर भी मुझ से भय मानता है । किसी को भी ज्ञात नहीं होता कि वह किस क्षण सोता है, किस क्षण जाग्रत अवस्था से स्वप्न अवस्था में आता है। यह मू क्षण ही मृत्युकाल है। यह अचेतन-काल चेतन को एक अवस्था से दूसरी अवस्था में ले जाता है। किन्तु इस मृत्युकाल में चेतनाघात नहीं होता और न सूक्ष्मशरीर का नाश होता है, यह बात जाग्रत-स्वप्न दृष्टान्त से स्पष्ट है ॥ मरने पर भी जीवन का सातत्य बना रहता है, और मुझ १० मृत्यु कन्या बिगड़ता नहीं। मरणोत्तर-जीवन स्थूल-शरीर के व्यवधान से दृष्टिगोचर नहीं होता । स्थूलशरीर जीवन की सूक्ष्मगति का वाधक है । मृत्युद्वारा शरीराघात प्रत्यक्ष में है, परोक्ष में नहीं । अवस्थाभेद से परोक्षापरोक्ष है। समानावस्था प्राप्त होने पर जब तुम्हें परोक्ष प्रत्यक्ष हो जायगा तब शरीरसाकल्य भी प्रकट होगा। तुम जिनको मरा समझ कर रोते हो उनका साक्षात्कार होगा। वह मरे नहीं, सशरीर अवस्थान्तर को प्राप्त हुए हैं। मनुष्य के दिव्यशरीर की छाप जो देशकाल पर पड़ती है उसके मिटने को तुम मृत्यु कहते हो । किन्तु प्रतिकृति अर्थात चित्र के मिटने से प्रकृति अर्थात जिसका चित्र है वह नहीं मिटता, क्योंकि वह उससे पृथक् है। इस बातको समझने के लिये विशेष रूपसे शास्त्र पढ़नेकी आवश्यकता नहीं। मरते हुए पुरुष का स्वयं निरीक्षण करो, तुम को विदित होगा कि पुरुष मरता नहीं, शरीर छूटता है-वह भी सूक्ष्म शरीर जो स्थूलको तन्मात्रा अर्थात सद् रूप है और जो मरने पर जू का तूं बना रहता है ॥ मैं कह चुकी हूँ कि मनुष्य को रोग का कष्ट भले ही हो किन्तु मू के वश मरनेका कष्ट नहीं होता । प्राणनिष्क्रमण के समय अङ्गों का स्पन्दन जो दिखाई पड़ता है वह शरीर की अचेत प्रतिक्रिया है । कुसुम के समान कोमल बालक भी मेरी गोद में खेलते हुए आते हैं। देखो यह स्थूल शरीर न कि ११ मृत्यु-शोक की शान्ति वर आसन्नमृत्यु दशामें सामने पड़ा है । मैं इसके साथ पाणि- प्रहण करने जाती हूँ। तुम इसके प्राणो-द्वाह का निरीक्षण करो, तुम्हें वरप्रस्थान का बोध होगा। यह बोध होगा कि यह मरा नहीं इसने शरीर से प्रस्थान किया है । जिस मौत के घाट पर दिनरात संसार उतराचला जारहा है, जो प्रकृतिसुकुमार स्त्रियों और बालकों तक के लिये दुस्तर नहीं, वह मृत्युसमागम इस वीर युवक के लिये अवश्य कन्दु केलि के समान क्रीड़ामात्र होगा ॥ लो अब मैं चली, तुम असाध्वस रहो, नियतकाल पर तुम्हें भी लेने आऊंगी। ( मृत्यु कन्यो चली जाती है और उसकी छाया एक रोगी पर पड़ती दिखाई देती है।) १२ परलोक गमन । . (एक रोगी शय्या पर पड़ा है। वह समझ गया है कि अब नहीं बनूंगा, अन्त समय सब बन्धुओं को बुलाकर प्यार करता है। बीस बरस पहले बचपन की प्यारी बातें दोहराता है। भविष्य में गृहप्रबन्ध की साधु शिक्षा देता है । चित्त प्रसन्न है। मुंह पर मधुर मुसकान है। मुसकरा २ कर सब को धीरज दिलाता है, कहता है, मुझे अब कोई तक- लीफ नहीं है, दिव्यदृष्टि प्राप्त हो गई है ! बातें करते २ मुर्छा पाती है और चली जाती है । फिर धीरज की बातें करने लगता है। फिर मूर्छा पाती है। एक दम अांखें फिर जाती हैं और प्राण छुट जाते हैं ॥ हा ! यह रोगी दुखी मनुष्य का ही प्रियवर है !) प्रिववर की मृत्यु का दारुण दृश्य देखकर दुखी मनुष्य का १३ मृत्यु-शोक की शान्ति हृदय शतशः विदोर्ण होता है पर वह अलोकिक धीरज धर कर विचार करता है। यह क्या लोला है ? क्या मनुष्य शरीर का परिणाम है, जैसे दीपशिखा दोपक का ? तेल बत्ती के न होने पर या प्रवलवात का झोंका लगने पर जैसे दीवे की लौ बुझ जाती है उसी प्रकार देह का नाश होने पर क्या देही का भी नाश हो जाता है ? नहीं । कारण यह, कि जैसे दीपक का प्रकाश भी बिन। द्रष्टा के नहीं होता। दोपक दीपक को नहीं भासता। दीपक का द्रष्टा दीपक से इतर है । इसी प्रकार देही जो देह का द्रष्टा है देह से इतर है, देह का परिणाम नहीं । देह से पूर्व है, क्योंकि देह तथा अन्तःकरण का साक्षी है। उनकी परीक्षा करता रहता है । परीक्ष्य से परीक्षक सर्वथा भिन्न है। यदि देह से देही भिन्न नहीं, तो देह के विकृत होने पर तदनुसार देही विकृत होना चाहिये था। सो नहीं । देखो शरीर के जर्जरित होने पर भी यह प्रियवर अन्तकाल तक सब प्रकार निर्जर रहा। इसके मुख की मुसकान, मन का धैर्य, बुद्धि का विमर्श, अन्त तक, शरीर की पीड़ा तथा मन बुद्धि के विकारों का विप्रतिषेध करते रहे ॥ शरीर का परामर्श करनेवाला होने से यह वशी शरीर से इतरजाति का है । यह स्वयं मरा नहीं, मरने का साक्षी था जो यह कह रहा था- यह कह रहा था-'मैं प्रसन्न हूँ, अब शरीर छुट रहा है !' यदि यह स्वयं देह होता तो इसे देह का प्रतिबोध नहीं हो सकता था ।। स्मृति-बोध-शील-सम्पन्न देही को सहसा देह १४ परलोक गमन त्याग करता देख यह प्रतीति नहीं होती कि वह एक दम अभाव को प्राप्त हो गया ! देही के नाश होने का कोई प्रमाण भी नहीं है। देही का देह पर व्यापार छुटने से देही मरा नहीं कहा जा सकता, फालिज इसका उदाहरण है।। और देहको देही माना नहीं जासकता। विज्ञानवेत्ता जानते हैं कि जीवनके हर मात बरसमें सब देह समूल बदल जाता है । एक ही जीवन में मनुष्य कई देह बदल लेता है। यदि मनुष्य देह होता और उसकी चेतना मस्तिष्कका व्यापार होती तो बीस बरस पहलेके 'पूर्व देह' अथवा 'पूर्व मस्तिष्क'को तादात्म्य स्मृति इस एकही देहमें उसे कैसे उत्पन्न होती ! कालके एक क्षणसे दूसरे क्षण पर वह कैसे पारङ्गत होता ! यदि मनुष्य देह होता तो देह पात होते समय, देह की मरण-प्रकृति के विरुद्ध इसके चित्तमें भविष्य-जीवन की आकांक्षा कैसे प्रस्फुरित होती ! अवश्य ही, देह- पात होने पर देही की सत्ता बनी रहती है। मानव-हृदय की यह अन्तष्टि यदि मिथ्या है, तो सब जीवन ही मिथ्या है ! प्रश्न है, यदि यह प्रतीति सत्य है कि पुरुष मरता नहीं तो मरने का शोक क्यों होता है ? यह संस्कारों का प्रभाव है जो कदाचित ज्ञान से भी प्रबल होते हैं । मनुष्य के मब व्यवहार शरीर के उप- चार से संपन्न होते हैं। उपचारवश शरीर को शरीरी मानकर व्यवहार होता है। शरीर द्वारा ही परिचय, सखाभाव, सब प्रकार के स्नेह की संपत्ति प्राप्त है, इसलिये प्रियप्राणी का शरीर लुप्त मृत्यु-शोक की शान्ति होने पर बन्धुजन के हृदय में शून्य व्याप जाता है, कलेजा कट जाता है, मन अधोर होजाता है, संस्कार रो उठते हैं-हा तात ! हा प्रिय ! यह कह कर सब रोने और पुकारने लगते हैं ! किन्तु शोक यद्यपि संस्कार-जन्य है परन्तु अयथार्थ नहीं। शोक संस्कार- रूप है । संस्कार का आलय विज्ञान है । विज्ञान का आश्रय आत्मा है। बिना विज्ञान आत्मा शून्यवत् है । शोक विज्ञान-रूप होने से आत्मा से सम्बद्ध है, इसलिये यथार्थ है ॥ शोक क्या है ? प्रेम का श्राघात है ॥ प्रेम आत्माका स्वरूप है। इसलिये न केवल संस्कार द्वारा, परंच प्रेमके अनुषङ्गसे भी, शोककी आत्मा से सनाभिता है ।। श्रात्मा के प्रेम-स्वभाव अथवा अभिव्यापी आत्म-संस्कार का, जो अमर रूप है, किंचितकाल के लिये निरोध भला ही हो जाय, परंतु सर्वकाल के लिये आघात नहीं हो सकता | किन्तु मृत्यु द्वारा इस लोक में प्रेम का प्रबल आघात हुआ है, मानव-हृदय पर तीब्र कुठार पड़ा है, इसलिये प्रेम की परलोक में पूर्णतृप्ति होना जीवन की सार्थकता के निमित्त, मानव-हृदय की प्रबल उत्कण्ठा के अनु- रूप, परमावश्यक है। अन्यथा मनुष्यजीवन और उसका सब साहित्य, सब नियमधर्म नीरस और निस्सार है, निर्मूल है, और विडम्बना-मात्र है ! इसलिये यह निश्चय होता है कि हमारा प्रियवर नश्वर शरीर के छुटने पर दिव्य शरीर के साथ सुखपूर्वक परलोक में विराजमान है ॥ हम अवश्य मरेंगे, मर कर उससे मिलेंगे और १६ परलोक गमन हमारे प्रेम की सम्यक तृप्ति होगी। यह भावना न केवल सान्त्ववाद है किन्तु सृष्टि-विधिके अनुकूल सम्यग् दृष्टि है। देहत्याग होने पर मनुष्यका इस लोकमें पुनर्जन्मवाद असमञ्जस है ॥ स्मृति-शील होने के कारण, सृष्टिविकास के नियमानुसार, मरणोत्तर, मनुष्य का स्थान पितृलोक में है; जहां तत्तत् परिचित रूप में प्रियजनों के प्रत्यभिज्ञान का अवकाश प्राप्त है। यह प्रेमरूप प्रत्यभिज्ञान ही मनुष्य जीवन को सार्थकता है ॥ इस प्रकार प्रियवर के सम्मिलन की आशा से दुखी मनुष्य का म्लानचित्त कुछ विकसित हुआ और आत्मघात की चेष्टा मन्द हुई । जब शोक के अन्धतामिस्र पर आशा की सुवर्ण किरण छटकी तो शोक का तमोरूप अन्धकार सतोगुण के प्रकाश से भासमान होने लगा। इस मानस-अवस्था में शोक से विषाद, विषाद से वैराग्य, वैराग्य से कर्मसंशुद्धि तथा ज्ञान की उपलब्धि मान कर दुखी मनुष्य की शोक में प्रबल आस्था उत्पन्न हुई और सात्विक शोक उसके मन का स्थायी भाव बन गया ॥ सुखी मनुष्य अपने हर्षोन्माद में मृत्यु का चर्चा सुनना नहीं चाहते, इसलिये सब से अलग रहकर, जीवन के हर्पविलास से पराङ मुख, यह दुखी मनुष्य, शोक में निमग्न, एकाकी चिन्तन करने लगा। १७ शोका नुचिन्तन यह सब सच है कि मनुष्य-जीवन अमर है तथापि पांच- भौतिक शरीर का त्याग सर्वथा दुःख-जनक है। मारना जैसे पाप है उसी प्रकार मरना भी अवश्य पाप है क्योंकि दोनो दुखदायी हैं। प्रश्न है, मरने मारने के अपराध का भागी कौन है ? मरना कोई नहीं चाहता फिर मौत क्यों आती है ? क्या रोगवश मृत्यु प्राप्त होती है ? यदि एसा है तो आयुर्वेदाचार्य धन्वन्तरि आदि वैद्य अमर क्यों न हुए ? साध्यरोग वैद्यों के लिये असाध्य क्यों हो जाते हैं ? रामकृष्णादि अवतार काल के वश क्यों चल बसे ? जन्म के साथ मृत्यु की अभिव्याप्ति पाई जाती १८ शोकानुचिन्तन है, अवश्य; मृत्यु की मात्रा जन्म के योग में सम्मिलित है। इस लिये मृत्यु नियति के आधीन है। अकाल मृत्यु कोई वस्तु नहीं। मृत्यु काल ही का नाम है ॥ मृष्टि में एसा कोई नियम नहीं कि बालक और युवक न मरें वयोवृद्ध ही मरा करें। इसलिये मरने के उपरान्त यह पछतावा कि यदि एसा न करते और एसा करते तो जान बच जाती, भ्रम है ॥ भवितव्य या होनी बलवान है, वह हो कर ही रहती है। इसका यह अर्थ नहीं कि प्रयत्न वृथा है। रोगादि को पीड़ा शमन करने में प्रयत्न का साफल्य है ॥ भाव यह है, कि प्रकृति अष्ट के आधार पर चलती है। हमारे परिदृष्टमन का आयतन अपरिदृष्टमन है जिसकी विधिसे हम अपरिचित हैं और जिस पर हमारा वश भी नहीं । बच्चे या युवकका मरना हमें विधि की निष्ठुरता प्रतीत होती है, किन्तु विधि को गति कोन जान सकता है ? कदाचित उस बच्चे या युवकके चरितको विकसित होने के लिय मृत्युलोक की अपेक्षा परलोकमें विराजना अधिक लाभदायक हो ! प्रकृति की चेष्टा सर्वथा हितकर है, यह भावना सुसंगत है ॥ हमें मरने का शोक यूं है कि हम जो अपरोक्षदृष्टि हैं, तिर्यक् सृष्टि की अपेतादृष्टि से यह समझने लगे हैं कि मनुष्य-जोवन ही परम सुख है, मरनेवाला मनुष्य-जीवन के सुख से नितान्त वञ्चित हो जाता है ! यदि हमें यह परोक्षदृष्टि प्राप्त हो जाये कि जिस प्रकार मनुष्य-जीवन तिर्यग्जीवन से उत्कृष्ट है, उसी प्रकार परलोक-जीवन १६ मृत्यु-शोक की शान्ति मनुष्य-जोवन की अपेक्षा अधिक स्वतन्त्र है, उसमें सत्ता का अधिक प्रकाश है, अधिक आमोद प्रमोद है; तो एसी दृष्टि प्राप्त होने पर मरना हमें खेल दिखाई देने लगे और परदेशगमनवत मित्र के विछोह का शोक भी न हो ! क्योंकि, परलोकगमन मित्र के लिये अधिक सुखावह प्रतीत होने लगे ! किन्तु शोक के मिटने पर भी, विछोह परलोकगमन का हो अथवा परदेशगमन का, सर्वथा उद्वेगकारी है ॥ विरहवेदना के अतिरिक्त रोगादि की पीड़ा भी लोक में सब प्राणियों के साथ लगी है । दुःखमय जीवन के मरुस्थल में सुखके हरित-प्रदेश विरलदृष्ट हैं ! निस्सन्देह जोवन में दुःख की मात्रा अधिक है । प्रश्न है, क्या दुःख ईश्वर की रचना है ? नहीं ! यदि ईश्वर ने रचा होता तो वह उसे दूर भी कर देता, क्योंकि वह परमदयालु सर्वशक्तिमान तथा सर्वज्ञ है। किन्तु दुखी लोकसे प्रत्यक्ष है कि वह ऐसा नहीं करता ॥ शंका है, यदि परमदयालु भगवान लोक का दुख नहीं हर सकता तो वह सर्वशक्तिमान नहीं ! यदि सर्वशक्तिमान होने पर भी दुख दूर नहीं करता तो वह दयालु नहीं ! यदि सुख के निमित्त दुख देता है तो बिना दुख दिये सुख देने में असमर्थ होने से, सर्वज्ञ नहीं ! यदि ईश्वर के हां दुख में भलाई है, तोहमारे भलाई के प्रत्यय और ईश्वरके भलाई के प्रत्ययमें भेद-भाव होने से, हमारे प्रत्ययानुकूल, ईश्वर भला नहीं ठरता; और भला न होने से उपास्य नहीं रहता ॥ परम संकट है, २० शोकानुचिन्तन . कि ईश्वर की सृष्टि में जरा, व्याधि, मरणादि दुःख तथा पाप की रचना कैसे हुई, जिससे सब संसार व्याकुल है। १! यदि कहो ईश्वर प्रकृतिका स्रष्टा नहीं केवल उसके रूपका निर्माण करता है, तो वह प्रकृति की परसत्ता से मर्यादित है, और उसके गुणों से नियन्त्रित है। वह केवल ब्रह्माण्ड-कुलाल है मंपूर्ण देव नहीं! यदि कहो ईश्वर कर्म-फल का देने बाला है तो ईश्वर से निरपेक्षित कर्म ही प्रधान है। ईश्वर ब्रह्माण्डनगर के कोतवाल के समान भय का पात्र है भक्ति का नहीं ।। यदि कहो, ईश्वर न केवल न्यायाधीश है किन्तु पुण्यकर्म का सहायक भी है, तो वह ऐसा महकारी है जो सर्वशक्तिमान नहीं, क्योंकि वह लोक से पाप तथा दुःग्व का नाश नहीं कर सकता ॥ यदि कहो परमार्थ में दुःखका अभाव है, दुःग्व व्यवहार में है। परमार्थ सत्ता परब्रह्म है जो सत्य है, व्यवहार मिथ्या है जो ब्रह्मकी माया करके भासता है । इस अद्वैत वाद में भी मानना पड़ेगा कि ब्रह्म को एक मायारूपी व्याधि लगी है जिससे संसार रोगी है। रोग कल्पित ही क्यों न हो, ब्रह्म की शक्ति का व्यापार लोक के कल्पित रोग को निवारण करने में असमर्थ है, इसलिये ब्रह्म सर्वशक्तिमान नहीं ॥ ब्रह्म अथवा ईश्वर निर्गुण हो वा सगुण, हो वा न हो, उसके द्वारा दुःख के विषमपद का लोक में परिशोधन नहीं होता ॥ अस्तु, यदि यह प्रतीति सत्य है, कि ईश्वर चराचर जगतका पिता१२ है तो वह अपनी सन्तानके २१ मृत्यु-शोक की शान्ति लिये दुःख का मूल नहीं होसकता ॥ तो फिर क्या दुःख का संभव प्रकृति है ? नहीं, यदि प्रकृति दुःख-शील होती अथवा दुःख इसका उद्देश्य होता तो मनुष्य इसे कदापि प्यार न करता, और इसके साथ दुख पाने पर भी, रमण करने की आशा न रखता ।। क्या मनुष्य अपने लिये आप दुख पैदा करता है ? नहीं, मनुष्य सदा सुख का लोलुप है । दुख भी सुख के निमित्त ही सहन करता है। यह वाद कि दुख सदा अपने पापकर्म का फल है, असमञ्जस प्रतीत होता है। ऐसा होता तो पुण्यशील महात्महात्रों को विशेष दुःख प्राप्त न होता ॥ हरिश्चन्द्र की यातना उनके पापकर्म का फल है या उनकी वीरता और सत्य का प्रज्वलन्त उदाहरण ? सीता तथा राम का कष्ट- मय जीवन किस पाप कर्म का फल था ? देवताओं की सन्तान पाण्डवभ्राता तथा याज्ञसेनी किस अपने पापकर्म का दण्ड भोगने के लिये चिरकाल तक बन बन विचरते रहे और अन्त में उनको पुत्रादि का शोक हुआ ? इन दृष्टान्तों में पूर्वजन्म का सहयोग भी प्राप्त नहीं१४। वास्तव में इस जन्मके दु:ख की व्याख्या के लिये पूर्वजन्मका उदाहरण सांकर्यदोष है। कारण यह, कि विशेष दुखका अनुभव महात्माओंका परम लक्षण रहा है ॥दुःख कदाचित प्रेमका रूपान्तर है, सदा पापकर्मका फल नहीं। निस्संदेह पापका फल पाप और पुण्यका पुण्यहै १५। यह भावना भी सच होसकती है कि पापका फल दुख है, किन्तु इस वाक्यका यह अर्थ नहीं कि सब दुख २२ शोकानुचिन्तन पापकर्म ही का फल है। यह निर्वाचन हेत्वाभास है ॥ स्वाध्याय पुण्य-कर्म है, किन्तु परिश्रम के कारण इसमें दुःख भी है ।। भूयोदर्शन से यह ही प्रतीत होता है कि दुःख की पाप से व्यावृत्ति है, कदाचित व्यासज्यवृत्ति हो किन्तु व्याप्यवृत्ति नहीं । यह बात सर्वथा निर्मूल है कि मनुष्य अपने ही किये का फल पाता है दूसरेके किये का नहीं ६। कारण यह, कि हमारा सब जीवन मिश्रित है। वियुक्त-जीवन आकाश-पुष्पके समान कल्पना-मात्र है । मिश्रित जीवन होने के कारण कृत-कर्म की हानि तथा अकृत की प्राप्ति का दोष उत्पन्न नहीं होता ॥ आकाश-वेम में समस्त जीवन का एक ही तन्तु ओत-प्रोत है ॥ राजधर्म के दोष से समाजधर्म अथवा व्यक्ति-गत धर्म दूषित होता है ॥ रामराज्यमें ब्राह्मण को पुत्र-शोक अपने कर्म-फलसे नहीं किन्तु शूद्रमुनिके तपसे प्राप्त होता है! सीताका परित्यागसंकट पौरजनोंकी निर्मर्यादिता है! वियुक्त अथवा संयुक्तरूप १७ मानकर भी दुःख की जटिल समस्याका विश्लेषण नहीं होता। महामारी, भूकम्प, तोय-विलवादि प्राकृतिक आपत्तियों से निरपराध जीव सहस्रशः मौत के घाट उतरते हैं ! इन सब ईतियों के कारण प्रकृति के परोक्षगर्भ में विलीन हों किन्तु हम उनसे अपरिचित हैं, इसलिये कष्टापन्न हैं । इसी प्रकार मरणादि दुःख भी परोक्ष ज्ञान के न होने से प्राप्त है । विज्ञान द्वारा परोक्ष ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य क्रमशः दुःख पर विजय पारहा है। जैसे तिर्यग्जीवन कर्म-फल २३ मृत्यु-शोक की शान्ति r- की अपेक्षा मनुष्य-जीवन सोत्कर्ष है, उसी प्रकार मरने के पश्चात मनुष्य का परलोक-जीवन अधिक रसमय और संतोष-जनक है, इस तत्व का विज्ञान द्वारा बोध होने पर मरणत्रास का दूर होना संभव है। अब प्रश्न है, क्या मनुष्यको आधुनिक परिस्थिति में मृत्यु-शोक हृदय का दौर्बल्य है अथवा प्रेम की पराकाष्ठा ? हम देखते हैं कि मरने पर शोक उसी का होता है जिसका प्रेम है, जिसका प्रेम नहीं उसका शोक भी नहीं ! इसलिये शोक का अभाव प्रेम का अभाव है । और प्रेम का अभाव स्वार्थभाव है, इसलिये शोकका अभाव स्वार्थपरता है। कहते हैं प्रेम मोह" ८ है, इसलिये शोक मिथ्या है और त्याज्य है ! यह मत हमें असाधु प्रतीत होता है। यदि प्रेम मोह है तो प्रेम का स्वरूप निःस्वार्थ-भाव भी मोह है, स्वार्थ-जीवन ही तथ्य है ॥ किन्तु स्वार्थ-जीवन मनुष्यकुलके लिये अस्वाभाविक है उसकी सम्पूर्णसत्ता के लिये संतोपप्रद नहीं। इसलिये प्रेम जो जीवन की सर्वसंपत्ति है मोह नहीं ठहराया जा सकता, उसके बिना मनुष्य जीवन निस्सार है ! प्रेम-पात्र के मिटने का शोक अथवा परलोकगत प्रियवर को पवित्र स्मृति हमारे जीवन की अमूल्य संपत्ति है, हम इसे कदापि नहीं खो सकते ! काल की क्रूरता देखो कि मार कर भुलाना चाहता है, शरीर का नाश कर प्रत्ययके नाश करनेकी भी चेष्टा करता है ! लोग भी भुलानेका प्रयत्न शोकानुचिन्तन करते हैं । किन्तु प्रेम यदि मृत्यु पर बलवान है तो शोक का परि- शोधन उसके भुलाने में नहीं वरन उसकी संस्कृति में हैं । शोक की भूमिका पर आरूढ हो कर, परलोकगत प्रियवर का ध्यान में संयम करके, उसका सततसाहचार्य प्राप्त कर, उसको अपना अधिक प्रेमास्पद तथा जीवन का निमित्त बनाता हुआ, परलोक- मिलन की आशा से प्रसन्नचित, स्वार्थसुख का परित्याग कर, लोक की निःस्वार्थ सेवा द्वारा जीवन में विचरे। यह प्रमीत की शोक- शान्ति का सदुपाय है न कि उसकी विस्मृति ! इस लिए सशोक होना या शोक में सहानुभूति करना हृदय की दुर्बलता अथवा मूढ़ता नहीं, परम मनुष्यता है ॥ यह अर्थ प्रतिष्ठित महात्माओं के उदाहरणों से सुप्रसिद्ध है। देखो, वसिष्ठमुनि सेपण्डित ज्ञानी अपने पुत्र के मरने पर कैसा विलाप करते हैं। दावानल में जल कर, नदी में डूब कर, भृगुपतन कर के आत्मघात१६ करना चाहते हैं । कालकृत्रिम नहीं, इस लिये मरते नहीं । पुत्रवधू को गर्भवती जान कर कुल की आशा से चित्त में आश्वासन होता है। पौत्र उत्पन्न होता है। वह तात कह कर वसिष्ठ को पुकारता है । दुखी माता कहती है-हा पुत्र ! तेरा तो पिता पितृवन को सिधार चुका है, तू किसे तात ! तात ! कह कर पुकारता है ? यह करुणावचन सुन कर वसिष्ठपत्र शोक से क्षुभित होकर प्रमुक्त-कराठ रुदन करते हैं । भरद्वाजमुनि अपने मृतपुत्र का दाह २५ मृत्यु-शोक की शान्ति कर उसी की चिता में अपना शरीर भस्मसात् करते हैं । वसुदेवजी श्रीकृष्ण के मरने पर पुत्रशोक के कारण प्राण त्याग देते हैं । व्यास मुनि अपने पुत्र शुकदेव के मरने पर जब आप मरा चाहते हैं तो देवता उनके पुत्र की छाया दिखा कर उन्हें जीवित रखते हैं । अर्जुन सा वीर योधा अपने युवक पुत्र अभिमन्यु के मरने पर शोक संवेग से प्रताड़ित हो कर संचूर्णहृदय हो जाता है। धृष्टद्यम्न का मरना सुन कर वीर सेनापति द्रुपदाचार्य का हृद्दलन होता है । वह निःसत्व हो जाते हैं और इस प्रकार शत्रु का वार चल जाने से उनका वध होता है ॥ धृतराष्ट्र अपनी सन्तान का वध सुन कर भूमि पर लुराठन करता है । बारह बरस तक किसी प्रकार शोको- पशमन न पाकर, अन्त में बन को प्रस्थान करता है। बन में व्यास मुनि की कृपा से प्रमीतपुत्रों की छाया देखकर वह कुछ दिन और जीता है। गान्धारी, द्रौपदी, सुभद्रा, उत्तरादि वीर ललनाओं का पति पुत्रादि के शोक पर सोरस्ताड विलाप सुन कर बत्रमय हृदय भी विदीर्ण होता है। अपने पुत्र भीष्मके मरने पर पुनीत गङ्गा भी रुदन कर अश्रु धारा बहाती हैं। धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं बन्धुजन के मृत्युशोकसे विह्वल होकर राजपाठ छोड़ने को उद्यत होते हैं । जनक से ब्रह्मज्ञानी बेटी सीता के परि- त्याग शल्य से पीड़ित होकर सांतपनादि कृच्छ चान्द्रायण व्रत कर आत्मघात की चेष्टा करते हैं। विष्णु भगवानके अवतार श्री रामचन्द्र २६ शोकानुचिन्तन पिता के मरने और भाई के मूर्छित होने पर वीरभाव का त्याग कर, प्राकृतजनों की नाई शोकसंतप्त होकर अधारा बहाते हैं। आप रोते हैं और सब बन को रुलाते हैं । इनके पिता दशरथ पुत्र- शोकसे शरीर त्याग करते हैं। उनके पिता अज पत्नीके विरहमें प्रायो- पवेशन करके आत्मघात करते हैं। अनेक साध्वी स्त्रियां पति- वियोग के कारण सतो हुई हैं ।। स्वयं भगवान सदाशिव महाभारत में एक पुत्र का मरना देख कर करुणाचित्त होते हैं और उसे जीवदान देते हैं । भगवान 'जिन' महावीर के नेत्रपुट लोकसंताप के कारण साश्रुपूर्ण होते हैं। भगवान बुद्ध के महानिर्वाण पर आनन्द भितः सब वैराग भूलकर स्वाभाविक प्रेमवश रो पड़ते हैं । ईश्वरदूत मौहम्मदसाहब बेटी फातमा के मरने पर आंसू बहाते हैं। लोग कहते हैं आप खुदा के रसूल होकर कैसे रोते हैं ! पैग़म्बर साहब साश्रुकराठ उत्तर देते हैं कि वह मनुष्य नहीं, पशु है, जिसकी मरने पर भी आंख न पसीजे ! ईश्वर-पुत्र ईसा मसीह अपने मित्र लैजेरस के मरने पर शोकात हो वाष्पपूर रुदन करते हैं । इन सब महात्माओं के उदाहरणों से ज्ञात होता है कि शोक मानवहृदय की दुर्बलता नहीं, न बुद्धि की मन्दता है, न पाप-कर्म का फल है ! यदि ऐसा होता तो द्रुपद अर्जुन से शूरवीर, व्यास जनक वसिष्ठ से ऋषि मुनि और ज्ञानी, श्री रामचन्द्र से पुण्यात्मा दिव्य पुरुष, शोक तथा दुःख के वशीभूत क्यों होते !

मृत्यु-शोक की शान्ति और दुःख इन्हें क्यों सताता ! सब महापुरुष शोकाभरण धारण करते हैं । दुःख का शूल सहते हैं ! दुःख तथा शोक सत्पुरुष का अलङ्कार है, सहृदय की सम्पत्ति है। स्वार्थीजीवन ही शोकशून्य है ! बर्बरलोग ही शोक की वेदना से अनभिज्ञ हैं ! निस्सन्देह सब सात्विक प्रकृति मौत पर रोती है, और मौत का निराकरण करने की भरसक चेष्टा करती है। २८ शोक सभा (दुखी मनुष्य अपनी चित्तशाला में बैठा हुआ यह चिन्तन कर ही रहा था कि महात्मा लोग उसके दुःख से दुखी होकर, अपनी सहानुभूति प्रकट करने के लिये, और दुःख में प्राश्वासन दिलाने के लिये, करुणा- भाव से उसकी चित्तशाला में प्रवेश करते हैं, और आदर पाकर चित्त- विष्टर पर विराजमान होते हैं।) आगे आगे वेदमाता सरस्वती आती हैं। वाल्मीकि ऋषि, व्यास मुनि तथा बुद्ध भगवान उनका अनुसरण करते हैं। इनकी भावना से दुखी मनुष्य का चित्त सपदि सुरभित हो जाता है । वेदमाता के संहिता-रूप धम्मिल्ल का परिमल, वाल्मीकि ऋषि के २६ मृत्यु-शोक की शान्ति श्लोक-परिच्छद का सौरभ, व्यासमुनि की इतिहास-माला का सुगन्ध, बुद्ध भगवान के शान्तिप्रद अनुशापन का श्रामोद, दुखी मनुष्य के विषाद-युत चित्त को अधिवासित कर परमहर्षित करता है ॥ माता सरस्वती पुत्रस्नेह से प्रस्तुतस्तनी होकर, हा जात ! हा पुत्रक ! यह शोकालाप कर, दुखी मनुष्य का परिष्वजन कर उसके मूर्धा का उपाघ्राण करती हैं । वेदमाता के उपाघ्राण से तत्काल ही दुखी मनुष्य का चित्त विशद होता है । वेदमाता अपने आप्त वचन द्वारा!आश्वासन दिलाती हैं-प्रिय जात ! विषाद मत करो ! तुम्हारी हानि तुम्हारे ही पितरोंका लाभ है ! तुम्हारा प्रियवर कुछ दिन तुम्हारे पास रहकर तुम्हारे पुरुषाओं से जा मिला है । अब अपनी संगति से उनको प्रसन्न कर रहा है । तुम अप्रसन्न क्यों हो ? वह मानस-लोक में अब भी तुम्हारे पास ही है। उसे सदा अपने पास समझ कर तुम अपना कृत्य निर्वाह करो। उसका ध्यान कर और उसके निमित्त सुकृत कर उसे परलोक में प्रसन्न करते रहो। तुम्हें शोकावस्था में देखकर तुम्हारे परलोक- गत प्रियवर सशोक होते हैं, क्योंकि वह अपने आपका मरा नहीं समझते ! तुम भी उनको मरा न समझो ! एक दिन तुम्हाग उनसे अवश्य मेल होगा ॥ वेदमाता का यह प्रमाणवचन सुनकर दुखी मनुष्य का चित्त सावलम्ब हुआ और उसने अपने मन की शंका विश्रब्ध भाव से प्रकट की-अम्ब ! तुम्हारा वेदवाक्य अशंकनीय ३० शोक सभा ( सरस्वती भाषण) । है, किन्तु यह वाद कहां तक सप्रमाणित है कि मनुष्य का इस लोक में पुनर्जन्म होता है ? इस वाद से मैं परम हताश हूँ क्योंकि, यदि यह वाद सत्य है तो मेरा प्रियवर से त्रिकाल में भी अब कभी मिलना न होगा, और हम एक दूसरे को कभी न पहचान सकेंगे और न प्यार कर सकेंगे। इस पुनर्जन्म-वाद से मानव-हृदय का अतीव मर्दन होता है। प्रेम का सद्भाव असद् हो जाता है । साहचर्य-जीवन अलीक हाकर स्वार्थ-जीवन प्रतिष्ठित होता है ।। यह सुन कर वेदमाता बोलीं-पुत्र ! निस्सन्देह पुनर्जन्मवाद का यह ही परिणाम है कि प्रेम की निमूल्य वस्तु मोह प्रतीत हो, समस्त जीवन में निराशा हो, समाज-कर्म शिथिल हो, लोक में यह भ्रान्ति हो कि मनुष्य अपने ही कर्मफल का भोक्ता है, सब को अपनी अपनी ही पड़े, लोक डूबे या तरे, अपना परलोक सिद्ध हो ! लोकहित भी स्वार्थहित के निमित्त हो! पुनर्जन्मवाद को सर्वमान्य मानने से ठीक यह ही दशा इस समय आर्यजाति की है । इस वाद के संक्रमण से आर्यजाति वेद के सोत्साह जीवन से पतित होकर निरुत्साह भाव को प्राप्त हुई है। सच जानो, कि मनुष्य की सत्ता कद.पि मनुष्य से पृथक नहीं। मनुष्य की सत्ता का आधार ही प्रेम है जो अकेला नहीं रहना, इसलिये प्रेम अवास्तव नहीं। इसलिए पृथक रहकर, शिलावत् निःसङ्गभाव को प्राप्त कर, आत्म-कल्याण तथा संपूर्ण-जीवन की आशा रखना ३१ मृत्यु-शोक की शान्ति सर्वथा निर्मूल है। मनुष्य मनुष्य का मधु है, यह प्रेम-रहस्य मधु-विद्या२० में प्रबोधित कर दिया गया है। इसलिए प्रकृति की हितकर प्रवृत्ति में, प्रेम का सदाके वास्ते दुराघात नहीं हो सकता । मैं वाग देवता हूँ, यह मेरा प्राप्त वाक्य है, कि सदोष शरीर छोड़कर सुबर्चस्तनु के साथ, पुरुष परमव्योम में अपने घर पितरों के पास निवास करता है, जहां सब प्रियवर मिलकर सुख का अनुभव करते हैं और अमरजीवन को प्राप्त होते हैं ॥२१ मरणमर्यादा केवल पंचभूत के स्थूलाकार की है, स्थूलशरीर से विसृष्ट होने पर पुरुष-जीवन अमर है। इसलिये मरना जीवन की पूर्णाहुति नहीं, किन्तु दिव्यजीवन का द्वार है । विधि की इस आकूति में पुरुषजीवन की समृद्धि तथा प्रेम की संतृप्ति है २२। इस लिये शोक में विषाद न करके प्रेम का अधिक अनुभव करो और पुनर्मिलन की आशा से सजीव हो ! यह विश्वस्तवचन कहकर वेदमाता ने अपने करपल्लव से दुखी मनुष्य का साश्रुमुख प्रक्षालन किया ओर वाल्मीकि ऋषि की ओर अङ्गलि निर्देश से संकेत किया कि सान्त्वभाषण करें । बाल्मीकि ऋषि बोले-देवी सरस्वतीको मेरा नमस्कार है, जिनकी प्रतिभाशक्ति से प्रबुद्ध होकर मैंने रामचरित२3 के यश का गान किया है। बेटा ! तुम्हारा चित्त शान्त करने को रामचरित का एक तत्व निरूपण करता हूँ। सुनो, सीता और रामकी कथा क्या है! पीड़ा, क्लेश, ३२ शोक सभा (बाल्मीकि भाषण ) दुःख का संगम दुःख, व्यथा, संताप, वेदना, कृच्छ्रका भण्डार है ! संसारके इतिहास में ऐसा कोई जायापती दृष्टिगोचर नहीं होता जिसका गृहस्थजीवन सीता और रामके गृहस्थ जीवनके तुल्य कष्टमय हो ! यह सुप्रसिद्ध इतिहास तुमको विदित है, इसकी पुनरावृत्ति की आवश्यकता नहीं ! देखो, सीता संसारिणी स्त्री नहीं, न राम संसारी पुरुष हैं। दोनों का पापरहित तथा पुण्यशील लोकोत्तर जीवन है ! पर दोनों का दुःख भी लोकोत्तर है ! पुण्य और इन दो दिव्य- चरितों में अनुपम रूप से पाया जाता है। दुःख सदा पाप-कर्म का फल है, यह वाद सीता और राम के पुण्य-चरित से असिद्ध है। दोनों स्वयं निरपराध होकर संसार के अपराध से सदा पीड़ित हैं। इस प्रकार सदा व्यथित-हृदय होने पर भी दोनों सदा कर्तव्य- परायण हैं और सहनशील हैं। दोनों का परस्पर निरतिशय प्रेम है, तथापि इनका दाम्पत्य जीवन वियोगान्त है ! हा! ऐसा लोकोत्तर सावुजीवन दुःखान्त हो, यह क्या विधि की वामता है ! मानो, विधि की ऐसी ही गति है कि इस लोक में साधुजीवन दुःखशील हो और परलोक में सुखावह ! इसलिये तुम अपने प्रियवर के इस लोक की संपत्ति से वश्चित होने पर, निराश मत हो । परलोक की अनल्प संपत्ति की अपेक्षा इस लोक की हानि तुच्छ है ! देखो, राम वैदेही ने परलोक-हित के लिये जीवन के समस्त सुखों का स्वयं त्याग कर अनन्त दुःख भोगा। इसलिये हमें भी विपद् ३३ मृत्यु-शोक की शान्ति पड़ने पर परिदेवना न करनी चाहिये। यह समझना चाहिये, कि जिस प्रकार पुरुषोत्तम रामचन्द्र , परलोक में श्रद्धा रखकर, समस्त जीवन दुख भोगते रहे, उसी प्रकार हमें भी दुख पड़ने पर धीरज धरना उचित है । सीता और राम का ज्वलन्त उदाहरण निष्कारण दुख सहन करने में हमारा परम सहायक है। देखो राम पर क्या क्या विपद् पड़ी-घर से निकासा, प्रासाद -घर से निकासा, प्रासाद से बनबास, पितृमरण, सीताहरण, भाई को शक्ति लगना, स्त्री के अपवाद की लज्जा और उसका निष्कारण परित्याग, प्रिया का शोक, और पितृकुल के क्षय की संभावना-इस प्रकार दुःख परम्परा ने राम के जीव- कुसुम की मानो ग्लपित कर दिया था । सीता ने लोकहित के लिये पृथिवी में समाकर अपने जीवन का बलिदान किया, और राम ने मृत-तुल्य हो लोक-हितके लिए जीवित रहकर, इमसे भी अधिक चमत्कार किया ! जीवन मरण का कौनसा दुःख है जो राम पर न पड़ा हो और जो राम ने छाती पर सिल रख कर सहन न किया हो! राम का कष्टमय साधु-जीवन आर्यजीवन का परम आदर्श है, इसका अनुकरण करना आर्य पुरुषों का धर्म है । तुम भी रामवत् परलोक में श्रद्धा रख कर इस लोक में दुख पर विजय प्राप्त करो, और मृत्यु का वीरता से सामना करो ! प्रेम की मृत्यु पर सदा विजय है ! राम का सीता से इस लोक में वियोग होकर परलोक में मेल हुआ ॥ तुम्हें भी परलोक में अपने ३४ शोक सभा (व्यास भाषण) - २४ प्रियवर के साथ नित्य-जीवन का सुख अवश्य प्राप्त होगा। इस प्रकार सान्त्वना करके वाल्मीकि ऋषिने सुतस्नेहवश अपने हितकर पाणि से दुखी मनुष्यका परामर्श कर व्यास मुनि की ओर देखा ॥ पुण्यदेहधारी व्योसमुनि बोले आदिकवि वाल्मीकि ऋषि को नमस्कार है जिन्होंने लोक में रामचरित का गान करके वीररम का संचार किया, और अधीर जगत को सधैर्य बनाया । तात ! सुनो, अपने प्रियवर की मृत्यु पर जब लोग दुखी होते हैं और दुखवश उनकी चित किसी प्रकार नहीं मानता, तो ऐसा लोकस्वभाव है कि एक को देखकर एक को आश्वासन प्राप्त होता है, इसलिये ऐसे समय पर स्वर्गीय लोगोंका इतिहास सुनाते हैं । जिनके सुनने से यह आश्वासन होता है, कि काल ने हम को ही नहीं प्रसा, यह जगत का भक्षक है ! नरनारी, बालक युवा, शत्रुमित्र सब काल के पास हैं-कोई आज कोई कल- अन्तर केवल आगे पीछे का है ! देखा गया है कि मरते समय प्रायः मनुष्य की प्रकृति पलट जाती है । मृत्यु का सामना करने के लिये जीवनसंभारको वह निःस्पृहतासे त्याग देती है और मृत्युके चराग से अतीव मृदुल हो जाती है। इस मृदुभावका करुणात्मक स्मरण करके विरह में बन्धुजन क्षुभित होते हैं। गत पुरुष के जीवनकी सब मीठी मीठी बातें याद आती हैं-कैसा सुन्दर शरीर, कैसा फूल सा बदन, कैसे कुश्चित केश, कैसे नील नेत्र, कैसी स्मितपूर्वाभि- १ ३५ मृत्यु-शोक की शान्ति भाषिता, कैसा मधुरालाप, कैसी आज्ञाकारिता, कैसी सहन-शीलता, कैसी सद्वृत्ति, कैसा आत्मत्याग, कैसा प्रेम-स्वभाव, इत्यादि श्लदण भावों का स्मरण करके सुहृजन वियोग में आलाप विलाप करते हैं ! इस प्रकार मरने पर जो हाहाकार मचता है, जो हृदय- कपाट का उत्पाटन होता है, जो मनोवृत्ति की वियोग में क्ल शा- वस्था होती है, जो क्षमायाचन और क्षमापन के अन्तिम दृश्य होते हैं उन सब का इतिहास में हृदयस्पृश् तथा विचित्र वर्णन सुनने से, जगत् के समान-दुःख का अनुभव होने पर, अपने दुःख की विशेषता लीन होने से, अपने से अधिक दुखियों का मर्मस्पृश् वृत्तान्त सुन कर, मृत्यु की अनिवार्यता का बोध होकर, वियोगि- जनों के चित्त को आश्वासन होता है। यह सान्त्वनात्मक इतिहास मेरी भारतकथा में विशेषरूप से उपलब्ध हैं। अनेक गीताएं इस कथाके अन्तर्गत हैं। इनका परिशीलन कर मृत्युतत्वको समझो, कि मृत्यु है ही नहीं, कोई मरता नहीं, सब परलोक को जाते हैं ! इनमें मृत्युत्रास को दूर करने के लिए अनेक उपपत्तियों का वर्णन है, अनेक दृष्टान्तों का उल्लेख है, तथा अनेक उदाहरणों का निरूपण है । मैंने स्वयं युधिष्ठिर को मृत्युभय से छुड़ाने के लिये उपदेश किया है । भारत कथा क्या है, मानो धर्मजीवन के उपलक्ष्य में मृत्युगाथा है ! देखो, महारथी मरुत्त, सुहोत्र, शिवि, भगीरथ, दिलीप, मान्धाता, ययाति, अम्बरीष, गय, वेन, कौरव ३६ शोक सभा (व्यास भाषण) पाण्डवादि जैसे बलवान प्रतापी राजा, इन्द्रलोक तक जीतकर, सब काल के वश चल बसे ! देखो, कृष्णभगवान जिसके मामू हों, वीर अर्जुन जिसका पिता हो, धर्मराज युधिष्ठिर जिसके संरक्षक हों, उन सबकी साक्षिमें राजयुवक अभिमन्यु का बध हो, सब की ऐसी विपरीत मत हो, यह काल का आधिपत्य है ! स्वयं कृष्णभगवान् व्याध के तीर से काल वश हों, यह काल का साम्राज्य है ! काल हो या स्वभाव, विधि हो या यदृच्छा, दैव हो या भवितव्य, कर्मफल हो या ईश्वरेच्छा-सर्वथा मनुष्य मृत्यु के अधीन है ! मौत भूलसे नहीं आती, न मनुष्य भूल से जीता है ॥ पंचभूतात्मक सृष्टि की यह ध्रुवनीति है ! पंचभूत-प्रकृति की वेदि पर मनुष्य-रूप पशु का बलिदान अनिवार्य है ! जरठश्रोत्रिय के समान यह प्रकृति भी मूढ़ है ! मनुष्य की विवशता देखो कि यह अपनी जान का भी आप मालिक नहीं ! न जाने किस पल पक्षी वृक्ष पर से उड़जाये और जीवन की सब आकांक्षाओं पर पानी फिर जाय ! ऐसी अस्थिर अवस्था में प्राणों की स्थिरता की आकांक्षा करना सर्वथा भूल है ! काल के अबोध से तुम अपने आपको स्थिर मान कर दूसरे के चल बसने का शोक करते हो। इतिहास के नेत्र से देखो तुम भी वर्तमान न होकर अतीत हो ! कालकी दृष्टिमें सब मरे पड़े हैं ! इसलिए, बेटा ! मैं हाथ उठा उठा कर पुकारता हूँ। इस दुःखमय जगत में धर्म का कष्टमय-जीवन ३७ मृत्यु-शोक की शान्ति व्यतीत करो, उससे इस लोक तथा परलोक में सुख है। यहलोक कर्मभूमि है, भोगभूमि नहीं ॥ जिस प्रकार दुखी पाण्डव परलोक में परस्पर सुखपूर्वक मिल कर दिव्य जीवन को प्राप्त हुए, उसी प्रकार तुम्हारा भी प्रियवर से परलोक में अवश्य मेल होगा , यह सृष्टिनियम है। विषाद मत करो, मृत्यु द्वारा परलोक में प्रियवर के सतत-साहचर्य का सुख प्राप्त है ।। यहां का टूटा हुआ प्रेम-तन्तु वहां अवश्य जुडता है, क्योंकि ब्रह्माण्ड का हृदय प्रेम है! इस प्रकार मनोहर वाणी से आश्वासन दिलाकर व्यासमुनि ने दुखी मनुष्य का कातर हृदय अपने करकमल से स्पर्श कर कांचत किया और सप्रेम हाथ पकड़ कर भगवान बुद्ध के सामने उसे जा खड़ा किया ॥ भगवान बुद्ध के शान्त-स्वरूप उनके मधुरावलोकन से दुखी मनुष्य के तरल हृदय में विश्वास उत्पन्न होकर नवजीवन का संचार हुआ।। भगवान बुद्ध करमुद्रा से आश्वासन दिलाकर बोले-आओ, मैं तुम्हारा दुख हरूं ।। तुम पहले यह दृष्टान्त सुनो। मेरे पास एक बार कृशा गोतमी नाम की एक स्त्री रोती हुई आई और कहने लगी-भगव, मेरा पुत्र मर गया है, उसको तुम जिलाओ, और मेरा शोक हरो! उस स्त्री को शोक से परम विह्वल देख कर मैंने एक उपाय चिन्तन किया और उससे कहा-गोतमी, तुम्हारा लड़का जी सकता है यदि तुम को देख कर, ३८ शोक सभा (बुद्धानुशासन जाकर थोड़े से तिल उस घर से मांग लाओ जिस घर में मृत्यु ने कदापि प्रवेश न किया हो ! यह सुन कर गोतमी वेग से दौड़ी और घर घर तिल मांगती फिरी, किन्तु उसे ऐसा कोई घर न मिाल जिस घर में मौत न आई हो। तब वह हार कर मेरे पास लौटी और बोली, “भगव ! मुझे अब ज्ञात हुआ कि मृत्यु अनिवार्य है, इससे कोई घर खाली नहीं। सब जगन् काल का कलेवर है ! मैं अभागिनी पुत्र का रुदन करती हूँ, किन्तु मेरा कोई रुदन करने वाला भी नहीं ! इसलिये आप मुझे अपनी शरण लीजिये। पुत्र की पुण्यस्मृति में मैं आत्मजीवन त्याग कर आज से आपकी उपासिका हूँ .” तुम्हे भी इस दृष्टान्त से संसार की अनित्यता और अनित्यताके कारण उसके दुःख और अनात्म भाव का बोध होना चाहिये । वित्त को सदा प्रबुद्ध और शान्त रखने के लिये ज वनके इस स्वभावरूप त्रिक का मनन करना चाहिये-अनित्य- दुःख-अनात्म-यह स्मरणत्रय है ! वेदमाताके वचन से तुम्हें खोए हुए प्रेम के पाने की प्राशा होकर परलोक में श्रद्धा उत्पन्न हुई और तुम्हारा चित्त बाल्हादित हुआ। बाल्मीकि ऋषि के गान किये हुए राम चरित के उदाहरण से, इस लोक में दुख भोगने और पर. निमित्त दुख का सहर्ष आवाहन करने की शक्ति उत्पन्न हुई । व्यास मुनि की भारतकथा से धर्म-जीवन में आस्था दृढ़ हुई ॥ मेरा भी तुम्हें यही अनुशासन है, कि तुम प्रेम को न भूलकर उसके पूर्ण ३६ मृत्यु-शोक की शान्ति रूप को प्राप्त करो ।। तुम्हारे प्रेम पर बलात्कार आघात होने से तुम्हें दुख प्राप्त हुआ है । इस दुख की निवृत्ति का सदुपाय, पशु के समान प्रेम को भुला देने में नहीं, किन्तु दुःख का विवेचन करते में है ।। तुम को विदित है, जितनी विवेचना दुख की मैंने की है शायद ही किसी ने की हो! जग व्याधि मरणादि दुःख से व्यथित होकर मैंने अपना राज प्रासाद छोड़ा और कापाय-कन्था ग्रहण की ! एक दुःखतत्वके विमर्श में मैंने अपना सारा बल लगाया और बुद्धि की आयोजना की। मुझे बोधि प्राप्त हुई कि जीने की तृष्णा दुःखका मूल है, इसका त्याग सुखपर है । दुःख, दुःख का निदान, उसकी निवृत्ति और निवृत्तिका उपाय यह आर्यसत्य चतुष्टय, मनोविज्ञान द्वारा, मैंने सिद्ध किया। यह सिद्धि प्राप्त करके मेरी ध्रुवचेष्टा हुई कि संसारमात्र का दुःख दूर हो। मैने अपना मत लोक में प्रकाशित किया जिससे अगणित प्राणियों का कल्याण हुआ। मेरे पास बहुत सी बीमारियों के योग नहीं, मैं केवल एक रोग का भिषक् हूँ। यह अभिव्यापी रोग दुःख रोग है, जिससे सब संसार पीड़ित है, और जिसके निवारण करने होके लिये मैं संसार में आया हूँ। मेरे बोधिवृक्ष पर शोक-शान्ति नामक फल लगा है जिसका प्रसिद्ध नाम निर्वाण है। मैंने बताया कि जीने को चाहना दुःख है। जब तक तुम्हें अपने जीने की चाहना बनी है तब तक ही मरने का दुख है ॥ सब की यही चाहना है कि हम शोक सभा (बुद्धानुशासन) सदा जीते रहें, और जिन्हें हम प्यार करते हैं वह भी नित्य बने रहे । किन्तु मनुष्य-जीवन स्वभाव से अनित्य है । अनित्य में नित्य की चाहना असंविधान है। इस असंविधान के कारण सब दुखी हैं । ज्ञात हुआ कि दुःख का कारण अनित्य-जीवन में नित्य- जीवन की चाहना है, इसलिये जीने की चाहना का त्याग, संविधान के कारण, दुख का त्याग है । जीने की चाहना जिस कारण से पैदा होती है उसे जाना जाय, तब उस कारण को दूर करके जीने की चाहना मिट सकती है और निवृत्ति प्राप्त हो सकती है ॥ जीने की चाहना जिसे अभिनिवेश२५ अथवा उपादान भी कहते हैं, उसका कारण तृष्णा है, और तृष्णा का कारण वेदना अर्थात विषय-भोग है । शब्दादि विषयों में सुख मानकर मनुष्य जीने की चाहना करता है। विषयसुख का भोग करने से जीने की चाहना दृढ़ होती है, और विपयका मनसे त्याग करने पर, जीने की चाहना मिट जाती है। और जीने की चाहना मिटने पर संविधानता के कारण मृत्यु का शोक दूर होता है और निवृत्ति प्राप्त होती है। यह सम्यग्दृष्टि दुःख की निवृत्ति का उपाय है। सत्कायदृष्टि का त्याग सम्यग् दृष्टि है। सत्कायदृष्टि मलसंयोजन होने से दुःखरूप बन्धन है। इसकी निवृत्ति निर्वाण है। अविद्यादि प्रती- त्यसमुत्पाद के बोध से, अकरणीयकर्मों का त्याग कर, अष्टाङ्ग- धर्ममार्ग को स्वीकार कर, पञ्चशीलादि का ग्रहण कर, पंचभावना ४१ मृत्यु-शोक की शान्ति - द्वारा, मनुष्य पारमिताप्रज्ञाको प्राप्त करता है, जिससे लोक निष्क्लश होता है और उसका उत्तम मङ्गल होता है ।। मृत्यु का रूप जानने की प्रवल उत्सुकता से भी मृत्यु का भय दूर होता है, यह बात साधारण मनुष्यों को भी सिद्ध है। किन्तु जिसने जीवनाभिनिवेश को मिटाकर अपना आपा ही न रखा हो जिस पर मृत्यु का व्यापार होता है, उसे मृत्यु का भय कैसे व्याप सकता है ! भगवान बुद्ध का यह ज्ञानोत्कर्ष भाषण सुनकर दुखी मनुष्य का चित सचेत हुआ और उसने निःशङ्कभाव से यह शंका प्रकट की- भगवन् ! जीवन के निमित्त ही दुःख की निवृत्ति चाहते हैं । जीवन खोकर दुख मिटा तो उससे जीवन का क्या लाभ है ! शरीर की रक्षा के लिए रोग कीनिवृत्ति चाहते हैं, शरीर पात होने पर रोग गया तो उस का क्या फल है ! बुद्ध भगवान यह शंका सुनकर अधर मुस्कान के साथ बोले-सुनो, जीवन का खोना ही जीवन की प्राप्ति है। अपने जीवन के निषेध में और परजीवन की प्रतिष्ठा में प्रेम के सुख का अनुभव है । अपना जीवन, पर जीवन में देखने से, मनुष्य अपना जीवन खोकर ही, प्रेमरूप परमजीवन पा सकता है। अपनी सत्ता के प्रतिष्ठित करने में परसत्ता का आघात है, और परापर भेद के कारण राग द्वेप की प्रवृत्ति है। जितनी दूरमें तुम हो उतनी दूर में तुम्हारा प्रियवर नहीं । अपना जीवन खोने ही से परापर भेद मिटने पर, अभेद-जीवन प्राप्त ४२ शोक सभा (बुद्धानुशासन) - होकर, दुख दूर होता है॥ यह गम्भीर वचन सुनकर दुखी मनुष्य बोला-भगवन् ! क्या दुख दूर करने के लिये जीवन खोना भीरता नहीं ? वीरमनुष्य दुख से घबराते नहीं उसका सामना करते हैं ! भगवान बुद्ध बोले- जीवन खोना अपना दुख दूर करने के लिये नहीं । अपना दुख मानकर करुणावश दूसरोंका दुख दूर करनेके लिये है।। जीवन खोने में निज दुख निमित्त-मात्र है, परदुख दूर करना उद्देश्य है, इसलिये जीवन खोना कायरता नहीं परम पराक्रम है । जितने अंश में तुम्हारी सत्ता हठकारी है उतने अंश में परसत्ता का अपवाद होने से उसे दुःख है। तुम अपने आप को लिये हुए दूसरों के दुख का कारण हो । इस लिए अपनी सत्ता का त्याग किये बिना पराया दुख हरना दुष्प्राप्य है ।। पराया दुख हरने की चेष्टा में अपना दुख आप अनायास हर लिया जाता है और सुख रूप बन जाता है, यह दूसरी बात है ! तुम्हारा दुःख तुम्हारी अपनी सत्ता की हठ से है । इस हठ द्वारा परसत्ता का तिरस्कार होने से तुम्हारी प्रेमरूप सत्ता का आघात है, जिस आघात का अनुभव क्लश अथवा दुःख है। इसलिये भोगादि विलाससे मुह मोड़कर, अथवा अपने जीवन की हठ तोड़कर, प्रत्याहार से जीवन की तृषा को बुझाकर, तुम परसत्ता में प्रवेश कर, निर्वाणपद को प्राप्त करो ॥ यह निर्वाण- पद सत्ता का अभाव नहीं, जीवन की तृष्णा का अभाव है। पर- , मृत्यु-शोक की शान्ति जीवन में आत्मजीवन पानेसे परमसत्ता की प्राप्ति है। तुम अपना जीवन खोने में जीवन नहीं खोते हो, किन्तु संकीर्ण जीवन से निकल कर उदार जीवन को प्राप्त करते हो जिसमें तुम्हारी परमसत्ता की संतृप्ति है, और निर्वाण है ॥ यह गूढ वचन सुनकर दुखी मनुष्य बोला- यदि इस प्रकार जीवन खोनेका उपाय करके निर्वाणपदकी प्राप्ति फिर भी अपने ही निमित्त है तो यह भी एक स्वार्थप्रवृति है। इससे हमारी प्रेमवृत्तिका सन्तोष नहीं होता। अपने प्रियवरको छोड़कर अपने लिये निर्वाणकी चेष्टा करना प्रेम का श्राघात है ! बुद्ध भगवान बोले-मैं बता चुका हूँ कि निर्वाण की प्राप्ति अपने सुख के लिये नहीं किन्तु परपीड़ा दूर करने के लिये है। यह वात निर्वाण प्राप्ति के उपायसे ही सिद्ध है- जीवनाभिनिवेश का मिटाना ही निर्वाण प्राप्ति का उपाय है । पर- पीड़ा के हरने में निजपीड़ा स्वयम् निष्पीड़ होजाय यह प्रेमरूप सद्- जीवन का स्वभाव है-अनायास है, इसमें मनुष्यका स्वार्थ नहीं ! जैसे मनुष्य, लोक का रोग हरने के लिये भिपक बननेकी कष्ट साधना करता है और उसमें अपना दुःख भूल जाता है, उसीप्रकार लोकहितके लिये निर्वाणपदकी साधना है । इसलिये निर्वाणसिद्धि स्वार्थपरता नहीं, निःस्वार्थ है । यह प्रेमका प्राचुर्य है, आघात नहीं । बोधि प्राप्त करके सदा लोक की सेवा में लगा रहा। अबलोकितेश्वरादि बोधिसत्व निर्वाणपद प्राप्त करने पर भी, जगत की मित्रता के कारण, निर्वाण - मैं ४४ शोक सभा (बुद्धानुशासन) सुख में प्रवेश नहीं करते, और अपनी निर्वाणसिद्धि द्वारा सदा लोक का हित करने में तत्पर हैं । निर्वाण निजजीवन की तृष्णा का बहिष्कार है, ओर प्रेमरूप परिपूर्णजीवन का स्वीकार है॥ तुम्हारा अपना दुख जीवन की लालसा का फल है। यदि तुमने अपनी सत्ता को अपने प्रियवर की सत्ता के आगे मिटा दिया होता और उसकी सत्ता को प्रतिष्ठित किया होता तो तुम्हें उसकी मृत्यु का शोक नहीं व्यापता, क्योंकि एक तो प्रेमाघात का दुःख जो तुम्हारी सत्ता के हठ का फल है न होता, दुसरे तुम उसके मरने से पहले ही मर चुके होते, उसके मरने और तुम्हारे जीवन में कोई भेद-भाव न रहता ।। यह भेदभाव ही दुख का कारण है ।। तुम्हें भासता है कि तुम्हारा प्रियवर निर्जीव है और तुम सजीव हो, इसी विषमता का दुःख है। इस दुख दूर करने का यह ही सहज उपाय है कि तुम भी निर्जीव हो जाओ, और प्रेमजीवन की पूर्ति के लिये निर्जीव होकर सजीव रहो। इस प्रकार प्रियवर को निमित्त बनाकर, निजसुख का त्याग कर, सदा लोक का दुख दूर करने में तत्पर रहो। यह दिव्य-वचन सुन कर दुखी मनुष्य बोला-भगवन् ! आपका वचन सत्य है, आपकी आज्ञा शिरोधार्य है॥ पर इसका क्या कारण है कि आप ईश्वरके सम्बन्ध में कुछ नहीं कहते । मनुष्य स्वभावतः यह चाहता है कि वह अपने ४५ मृत्यु-शोक की शान्ति मैं ऊँचे किसी देवता को पूजे जो उसके जीवन का आधार हो। ईश्वर के न मानने से जीवन आदर्शयुत न रह कर निस्तेज होकर साधारण रूप रह जाता है, और जीवन में कोई स्थिर अवलम्ब न पाकर मनुष्य निराश होजाता है । बुद्ध भगवान् बोले-सुनो, आत्मवाद में ईश्वर का अवकाश है ॥ पहले तुम अपनी सत्ता को मानते हो फिर उसे दृढ़ करने के लिये ईश्वर की सत्ता को ढूढते हो, और उसमें विश्वास कर सावलम्ब होते हो। मेरा शुरू से अनात्मवाद है। कहता हूँ तुम अपनी सत्ता का निषेध करो। जब आत्म-सत्ता ही न रही तो बताओ उसे दृढ़ करने के लिये ईश्वर-सत्ता का अवकाश कहां प्राप्त है ! निस्सन्देह, मनुष्य स्वभावतः ऊपरकी ओर देखता है और अपने लिये अच्छा ही अच्छा चाहता है। अपने से किसी ऊंचे पदको अपने जीवन का सहारा बनाता है और उसके आगे अपना सिर झुकाता है। मैं इस कल्पना का योग न करके जीवन का अवलम्ब जीवनमें से ही हूँढ कर निकालता हूँ और यह उपदेश करता हूँ कि निशारूप निजजीवन की अन्धलालसा का त्याग करो, इसी से संपूर्ण जीवनका सूर्योदय प्राप्त होगा ! मनुष्यका यह त्यागरूप जीवन स्वभाव के अनुकूल होने से, परम सुखकर है । इस दिव्य-जीवन की प्रभा से जीवनान्धकार दूर होकर लोक में प्रकाश होता है। जीवन-ज्वर के नाश होने से जब मनुष्य स्वस्थचित्त होता है तो प्रेम- शोक सभा (बुद्धानुशासन का दुख जरा व्याधि मरणादि दु:ख का आधार मिट जाने से इनके आने पर भी चित्त में बाधा नहीं होती और प्रेम का स्वभाव भी बना रहता है। परपीडा के दूर करने की स्थिरचेष्टा मनुष्य-जीवन का अवलम्ब हो जाती है। परपीडा की निवृत्ति में चित्त प्रसन्न रह कर सब विषाद दूर होता है और परपीड़ा दूर करने के उद्यम में मनुष्य अपनी पीड़ा भूल जाता है ॥ जब निस्पृह भाव से अपने आप ही को भुला देता है तो आप के संरक्षक की चिन्ता का अवकाश भी प्राप्त नहीं होता। जब अपना आपा ही न रहा तो उसका रखवाली कैसा ? और किस दुख की रक्षा ? वह तो औरों बटोरता है ! तुम्हारा मन भी जब दूसरे का दुख देख कर इसी तरह व्याकुल होने लगे जिस तरह मेरा तो तुम्हें भी अपने सब सुख काटने को दौड़ने लगें। जब सुख से निस्पृह हो गए तो बताओ सुख के दाता ईश्वर के चिन्तन का अवसर कहां प्राप्त है ? सुख दुख से निस्पृह होने पर यह बुद्धि प्राप्त नहीं होती कि सुख दुख का दाता जो ईश्वर है उसका भजन करो॥ शत्रु का तीर लगने पर पहले तीर निकालने की चेष्टा की जाती है इस बात के अन्वेषण करने का तत्काल अवसर नहीं कि तीर किसने फेंका । इसी प्रकार परपीडा हरण करने के सतत उद्यम में निमग्न करुणावान् पुरुष के पास ईश्वर के वाद विवाद के लिए एक क्षण भी खाली नहीं। इसलिए मेरे मत में पुरुष के जीवन का मृत्यु-शोक की शान्ति अवलम्ब ईश्वर के स्थान में पुरुष ही है। उस का धर्म ईश्वरोपासना के स्थान में पुरुष मात्र की सेवा करना है। उसकी मुक्ति निज जीवन से मुक्त होने में है नकि कैवल्य प्राप्त करने में । उसकी संतुष्टि बैठकर भजन करने में नहीं किन्तु दूर दूर फिर कर प्राणियों का दुख दूर करने में है। एक प्राणी का भी दुख दूर करने से जो मेरा चित्त प्रसन्न होता है वह लाख पूजा पाठ करने में नहीं। मेरे इस मत में लोक का अधिक हित है, तुम्हें भी उचित है कि तुम आत्मजीवन का परित्याग कर लोक के दुख में दुखी होकर सुख का अनुभव करो। तुमने सुना होगा, मार्कण्डेय पराण में विपश्चित के इतिहास का वर्णन है। विपश्चित के सन्निधिमात्रसे नरकवासियों की पीड़ा दूर होती थी। यह देखकर उसने अपना स्वर्ग स्थान छोड़ दिया और अपना सब सुख त्याग कर दिन रात नरकी जीवों की पीड़ा हरने में सहर्ष लगा रहा। इसी प्रकार तुम भी निज जीवन में सुख न रखते हुए परपीडा के हरने में लगे रहो, इससे मृत्यु-शोक की शान्ति होगी और प्रियवर का अधिक सामीप्य प्राप्त होगा। शोक- शान्ति इस लिए नहीं कि तुम अपने प्रमीत प्रियवर को भूलकर जीवन में सुख भोगो। यह इसलिए है कि तुम उसकी समवस्था को प्राप्त कर उसका सतत सायुज्य प्राप्त करो और उसके निमित्त भाव से लोक का उपकार करो। शोकावस्था में जीवन की चाहना की इच्छा शोक सभा ( बुद्धानुशासन) मैं को अपना सुख बनी रहने से तुम्हें प्रियवर की समवस्था प्राप्त नहीं हो सकती जो तुम्हारी अभिलाषा है। जीवन की चाहना मिटा देने से उपरत भाव को प्राप्त होकर शोक-शान्ति द्वारा प्रियवर की समवस्था प्राप्त होगी, जो तुम्हें अभीष्ट है, और सद्रूप है। जो लोग सुख में हैं वह शंका करते हैं कि मैं जीवन का दुःख वाद प्रचार करता हूँ। यह उनकी भूल है। उन्हें अभी जीवन- मरीचिका का मरुस्थल दिखाई नहीं दिया है । अपने क्षणिक सुख में वह इतना मग्न हैं कि उन्हें पराया दुख दिखाई नहीं देता! कह चुका हूँ कि जब पराया दुख अपना दुख बन जाता है तो दयालु ह्रदय भी दुख रूप हो जाता है। मैं संसार के दुःख बाहुल्य में अपना दुख मान कर, दुःखतत्व का अधिक विवेचन करता हूँ । किन्तु दुख मेरी कल्पना का दोष नहीं, वस्तु- तन्त्र है ॥ मेरा निराशावाद नहीं, क्योंकि मैं संसार के दुख दूर करने का मार्ग प्रदर्शित करता हूँ ॥ तुम्हें भी मेरा यह अनुशासन तुम अपने सुख की आशा छोड़कर दूसरों का दुख दूर करने के यत्न में सुख का अनुभव करो । इस प्रकार निजजीवन से निरपेक्ष होकर तुम्हारा चित्त शान्त होगा और जीवनाभिनिवेश के दूर होने पर तुम अपने प्रियवर के अधिक समीप होगे और लोक का भी उपकार होगा । यह कहकर भगवान बुद्ध ने दुखी मनुष्य का हाथ पकड़ा ॥ भगवान के करकमल के स्पर्श से तथा है कि

मृत्यु-शोक की शान्ति
उनके दिव्यभाषण के प्रभाव से दुखी मनुष्य का चित्त शान्त
और बोधि प्राप्त हुई। जीवनोपादान के त्यागप्रत्यय की
छटा से वह देदीप्यमान हो गया। और नवजीवन के संचार से
उपरतभाव को प्राप्त होकर, अपने प्रियवर के समानभाव तथा
सामीप्य का अनुभव करने लगा ॥ प्रेम की मृत्यु पर विजय पाने
से उसका मन निर्भीक हो हर्षोल्लास में नृत्य करने लगा, और
यह पालाप कर बह भगवान बुद्ध के शरणागत हुआ-बुद्धं
शरणं गच्छामि ॥
ॐ
अनित्य-दुःख-अनात्म
*
५०

निर्देशस्थल तथा टिप्पणियां
१. ( एक में अनेक और अनेक में एकता का अनुभव )-ब्रह्म
का आदिसंकल्प-बृहदारण्यक १.४.३.-तस्मादेकाकी न रमते,
स द्वितीयमैच्छत् ॥ १.४.१७–तस्मादपि एतर्हि एकाकी कामयते
जाया मे स्यात् ॥छान्दोग्य ६.२.३.-तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति ॥
इसलिये अकेली आत्मा का आनन्द मोक्ष नहीं, मोक्ष संगत
रूप ऐक्य है।)
२. ( सब अङ्गों सहित सशरीर पुरुष का परलोक गमन)-
तैत्तिरीय सं०५.३.५.२-सर्वतनुः सङ्गः ॥अथर्ववेद ५.६.११-
त्वा प्रविशामि"सर्वतनूः सह यन्मेस्ति तेन ॥ १८.४.६४-
साङ्गाःस्वर्गे पितरो मादयध्वम् ॥ श. प. ब्रा०-५.६.१.१ ।
-

निदे शस्थल ११.१.८.६ । १२.८.३.३१ ।। वृहदारण्यक ४.४.२-तमुत्क्रामन्तं प्राणोनूत्क्रामति प्राणमनूत्क्रामन्त सर्वेप्राणा अनूतक्रामन्ति(शांकर भाष्य ब्र. सू. २,४,६,१७) श्वेताश्व, ५,१२, सांख्यकारिका ४० ४२. सांख्यसूत्र ६.६.:-लिङ्गशरीरनिमित्तक इति सनन्दा- चार्यः॥ योगवासिष्ठ-आतिवाहिक शरीर ॥ ३. ( परलोकगमन, प्रियजनों से परलोक में मिलना, परलोक में अमर जीवन तथा अधिक सुख की प्राप्ति ) ऋग की प्राप्ति ) ऋग १०.१६.१-- ५॥ (अजो भाग ) ॥ १०. १४.७ ॥ प्रेहि, यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः ॥ ऋग्वेद १०.१४.८-संगच्छस्व पितृभिः संयमेनेष्टापूर्ते नपरमेव्योमन् । हित्वायावद्यं पुनरस्तमेहि संग- च्छस्व तन्वा सुवर्चाः ॥ ६ ११३.११.-यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते । कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्रमाममृत कृधि।। अथर्व १८,४१,३ यत्रादित्या मधुभक्षयन्ति ॥ देखो, 'मधु' नोट २० ॥ ( मृत्यु द्वारा परलोक में नवजीवन की प्राप्ति, मृत्यु में जीव की समृद्धि, ईश्वरेच्छा की पूर्ति, और परम प्रेम की तृप्ति ) काठकश्रुति:-दाहकर्म ( १३, ११)-"श्राकूत्यै त्वा स्वाहा । कामायै त्वा स्वाहा । समृध्ये त्वा स्वाहा ।। (त. सं, ३५,२२) अस्मात्त्वमभिजातोसि, त्वदयं जायते पुनः, असौ स्वर्गाय- लोकाय स्वाहा ॥ देखो (अथर्ववेद ६,१२०,३) नोट २१॥ भूर्भुवः .स्वर्लोक के क्रमानुसार परलोक की स्वतःसिद्ध प्राप्ति और ५२ टिप्पणियां पितृलोक में अधिक प्रानन्द-वृहदार ४ ३. ३३-अथ ये शतं मनुष्याणा मानन्दाः सएक पितृर्णा जितलोकाना मानन्दः ।। ५. (प्रेम जगत का मूलाधार है) कठ, ८, १७-प्रिया वो नात ॥ कापिष्ठल२८,२-विश्वशंभूःसाधुकर्मा ॥ वृहदारण्यक ४,६,२१ सहैतावानास यथा स्त्रीपुमांसौसंपरिष्वक्ती, स इममेवात्मानं- द्वेधापातयत्, ततःपतिश्च पत्नीचाभवताम् ॥ १,१,३-प्रियमि- त्येनदुपासीत ॥ गीता १८,६५-प्रियोऽसिमे ॥ ११,४४ प्रियः प्रियायार्हसि देव सोदुम् ।। ५. (आत्मा साक्षी होने से अमर है )-कौशीतकीय ३, ८,- नरूपंविजिज्ञासीत द्रष्टारंविद्यात ॥ केन, १२-प्रतिबोधविदितं मतम् । भामती-नहि जातु कश्चिदत्रसंदिग्धेऽहंवानाहवेति नच विपर्यस्यति नाहमेवेति ॥ नहि वालस्थघिरयोः शरीरयोरस्ति मनागपि प्रत्यभिज्ञानगन्धो येनैकत्वमध्यवसीयेत । तस्माद् येषु व्यावर्त मानेषुयदनुवत ते तत्तेभ्यो भिन्न यथा कुसुभेभ्यः सूत्रम् ॥ शांकरभाष्य २, २, ५, २८-अन्यस्यावगन्तुश्चक्षुः साधनस्य प्रदीपादिप्रथनदर्शनात ॥ (केन २ ), चक्षुषश्चक्षुः।। आत्मा नित्यः विनाशसामग्रीरहितत्वात -वेदान्त सिद्धान्तमुक्ता चली । इस सबका यह आशय है कि दृश्य के मिटने पर द्रष्टा नहीं मिटता और दृश्म का. समन्वय द्रष्टा के साथ बना रहता है । बिना सूत्र जिस प्रकार कुसुम की माला नहीं । ५३

निदे शस्थल
बनती उसी प्रकार बिना कुसुम, सूत्र मालात्व को प्राप्त नहीं
होता। द्रष्टा दृष्य को साथ लिये रहता है ।। मशको दुम्बुरे
चैकं पृथक्त्वमपिदृश्यते।। म० भा०॥ त्वां विना निःस्वरूपोहं
मां विना त्वं कथं स्थित:-प्रकाशानन्द ।
६. पुनर्जन्मवाद वेदविहित नहीं । उपनिषत्कल से पाया जाता
है । सम्भव है कि आर्यो ने श्रुतिहीन बर्बरजाति के लोगों
से यह ग्रहण किया हो । खौंड लोगों में उनका पुरोहित,
बच्चा पैदा होने के सातवे दिन आकर बताता है
कि पुरुषाओं में से किसका जीव इस बच्चे में पैदा हुश्रा
है, वह ही नाम उस बच्चे को दिया जाता है। असंस्कृत
जातियों का यह मत, महाभाष्यकार पतञ्जलि की इस आज्ञा
का कि पौत्र का नाम पितामह के नाम पर रखना चाहिए,
अाधार प्रतीत होता है । यरुबा लोगों का पुरोहित
बच्चा पैदा होते ही, आकर बताता है कि पुरुषाओं
में से किसने आकर जन्म लिया है ॥ मकूत्री और
जूनी लोग अपने इष्टदेव कच्छप, ऋक्ष, मृग,
और वृक में
मनुष्य के जीव का पुनर्जन्म मानते हैं। साईवेरिया के
गिलयक लोग ऋक्ष ही में मनुष्य का पुनर्जन्म होना बतलाते
॥ दार्शनिकों ने कर्मवाद से समन्वय करने के लिये
पुनर्जन्मवाद स्वीकार कर लिया । यदि इस जन्म में दुःख का
५४

टिप्पणियां कारण पापकर्म नहीं मिलता तो कल्पना की, कि पूर्व जन्म होगा जिसके पापकर्म का फल इस जन्म में दुःख भोगना पड़ा ॥ दार्शनिकों का यह मत वेद-संहिता में प्रतिपादित नहीं ॥ इस कर्मवाद से ईश्वर की वैषम्य और नैण्यदोष से तो रक्षा हो गई किन्तु कर्मप्रधान हो जाने से ईश्वर का अपना मूलच्छेद होगया । स्वाभाविक चेष्टाओं की व्याख्या भी पूर्ण- जन्म की स्मृति के आधार पर करना ठीक नहीं। यदि ठीक भी हो ( योगसूत्र ४. १०. व्यास तथा वाचस्पति) तो कोई हानि नहीं ।। पुनर्जन्म का आक्षेप मनुष्य जन्म की प्राप्ति के उपरान्त प्रारम्भ होता है, जब जीवन स्मृति और विचार सम्पन्न हो जाता है । मनुष्य का पुनर्जन्म स्मृतिक्षय के कारण सृष्टि-विकास के नियम-विरुद्ध पड़ता है और सङ्गतरूप मनुष्य-जीवन की सार्थकता का संहार करता है, जो ब्रह्म के आदि संकल्प और अति के विरुद्ध है ( नोट १. २. ३)। बर्बर जातियों में कर्मवाद जादू के रूप में पाया जाता है ।। उनका जादूगर जादू के कर्म से मेंह बरसा सकता है और अभीष्ट प्राप्त कर सकता है । इनके मत में मनुष्य को जो दुख प्राप्त होता है वह देवता के कोप का फल है । इनका देवता भय का पात्र है प्रेम का नहीं, वह बलिकर्म द्वारा संतुष्ट होता है उपासना से नहीं । इस अन्वेषण से प्रतीत होता है ५५ निर्देशस्थल कि कर्मवाद तथा पुनर्जन्मवाद श्रुतिप्रमाणक नहीं ।। हमारी यह भूल है कि अज्ञात को ज्ञात करने की चेष्टा करने में कोई वाद खड़ा कर लेते हैं, चाहे उसके जानने में हम कितने ही असमर्थ क्यों न हो ! ७. एक ईश्वर में यदि अनेक की प्रतिपत्ति न मानी जाय तो ब्रह्म का यह आदि संकल्प मिथ्या हो जाता है-बहुस्यां प्रजायेय ( तैत्ति-२. ६. १ छां ६.२.३) ॥ रूपाणि देवः कुरुते बहूनि (वृहदा ४. ३. १३) ॥ सोऽत्मानमभिध्यात्वो बह्वीः प्रजा असृजत ( मैत्रा २.६ ) ॥ बह्वीः प्रजाः पुरुषात संप्रसूताः (मुण्डक २. १. ५.) ॥ इसलिये इस लोक के जीवन की मित्रता परलोक में सफल होती है न कि बाधित ॥ ८ (भवितव्य) तादशी जायते बुद्धि र्व्यवसायोपि तादृशः । सहा- यास्तादृशाश्चैव यादशी भवितव्यता ॥ कर्मणा बाध्यते बुद्धिर्न बुध्याकर्म बाध्यते । सुबुद्धिरपि यद् रामो हैमं हरिणमन्वगात ॥ भगवन्तौ जगन्नत्रे सूर्याचन्द्रमसावपि । पश्य गच्छत एवास्त नियतिः केनलवयते ।। नाप्राप्तकालो म्रियते विद्धः शरशत रपि । कुशाग्रेणापिसंमृष्ट : प्रातकालो नजीवति ॥ (मार्कण्डेय) ( वृहदारण्यक २. १. १२ ) नैनं पुराकालान मृत्युरागच्छति ।। तैत्ति. २, ८, १, कठ ६, ३) अस्यभयात-मृत्युर्धावति पंचमः ॥ छान्दोग्य ८, १२. १. शरीरमात्तं मृत्युना ।। (ऐत- :

टिप्पणियां रेय.२, ४) मृत्युरपानो भूत्वा नाभि प्राविशत् ।। (गीता १०, ३४) मृत्युः सर्वहरश्चाहम ।। ( १८-६० ) ईश्वरः सर्वभूता नाम्-भ्रामयनसर्व भूतानि ।। (रघुवंश८, ४६)-स्रगियं यदि ज.वितापहा, हृदये किं निहिता न हन्ति माम । विषमप्यमृतं क्वचिद् भवेत, अमृत वा विषमीश्वरेच्छया ॥ व्यास भाष्य (योगसूत्र ६.१५ ) में चित के अपरिदृष्ट धर्म का वर्णन है, जो दिष्ट है-चित्तस्य द्वयेधर्माः परिदृष्टाश्चा परिष्टाश्च इत्यादि।। (E-पहला ) यदि प्रकृति की प्रवृत्ति को बुद्धिसंगत न माना जाय तो यह प्रत्यय कि पुरुष मरकर परम गतिको प्राप्त होता है मिथ्या हो जाता है। इस के मिथ्या होने पर जगत भ्रमरूप हो जाता है और धर्म विप्लव होता है, जिसे मानने को मानव हृदय कदापि तय्यार नहीं ॥ विधि की सार्थकता पुरुष के निमित्त ही मानी जा सकती है अन्यथा नहीं, क्योंकि पुरुष ही सब मूल्य का उपमान है। इसी लिए पुरुष अमर है ।। (E-दूसरा ) अर्जुन के आश्वासन के लिए व्यास परलोक से अभिमन्यु को बुलाना चाहते हैं, पर कहते हैं वह आयेगा नहीं, क्योंकि परलोक में इस लोक की अपेक्षा अधिक सुख है ॥ देखो नोट २४ ज०। १०. षट् दर्शनों में प्राय: अनीश्वरवाद ही पाया जाता है । पर- लोक का न मानने वाला नास्तिक कहलाता है, न कि निदेशस्थल . ईश्वर का न मानने वाला-(पाणिनि ४. ४. ६०) अस्ति नास्ति दिष्टं मतिः ॥ केवल कारणरूप ईश्वर का तिरस्कार, देखो, (ब्रह्मसूत्र २. २. ७. ३७) पत्युरसामञ्जस्यात. ॥ वेदांत में ईश्वर परमसत्ता नहीं, वह भी निर्गुण ब्रह्म में लीन हो जाता है । वृहदा १. ६. १०- अथयोऽन्यां देवतामुपास्ते ऽन्योसावन्योहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेव सदेवानाम ।। सांख्य का अनीश्वरवाद प्रसिद्ध है। योग में जहां साधन के और उपाय हैं वहां एक ईश्वर भी है, ईश्वरोपासना की कोई विशेषता नहीं-ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥ वैशेषिक तथा न्याय ईश्वर को कर्म से मर्यादित करते हैं । शंकराचार्य ने भी लिखा है । ईश्वरस्तु पर्जन्यवद्रष्टव्यः ॥ वात्सायन का कहना है कि पुरुषकारमीश्वरोऽनुगृह्णाति ॥ किन्तु पूर्व मीमांसा में इस मत का इस प्रकार निराकरण किया है-ईश्वरेच्छा यदीप्येत सैवस्याल्लोककारणम । ईश्वरेच्छावशित्वे हि निष्फला कर्म- कल्पना ( श्लोक वार्तिक)॥ बोधिर्चया में इसी आशय को यूं प्रकट किया है-ईश्वरतः कर्मण एव महतसामर्थ्यमेव प्रकाशित स्यात । तद्वरं कमै व पर्युपास्यम ।। पूर्व मीमांसादि मतों ने ईश्वर का तिरस्कार कर कर्म प्रधान माना है-न तावत षड्गुणईश्वर: सेडुमर्हति(न्याय कणिका वाचस्पति) ।। महाभारत में द्रौपदी विधाता का इस प्रकार निरा- ५८ टिप्पणियां करण करती है-हिनस्तिभूत भूतानिच्छद्रकृत्वायुधिष्ठिर । न मातृपितृ गद् राजन् धाताभूतेषुवत ते ॥ रोषादिवप्रवृत्तोऽयं यथायमितरो जनः ( वन. ३०.१-४३)॥ किन्तु महाभारत के इस पद में कर्म का निराकरण कर ईश्वर ही को सुख दुःख का दाता माना है-अज्ञोजन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुख- दुःखयोः । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत स्वर्ग वाश्वभ्रमेववा ॥ इस ईश्वरवाद के अनुसार मनुष्य का दुःख उसका अपना कर्म- फल नहीं किन्तु सब दुःख ईश्वर की ओर से परोक्ष सुख के निमित्त प्राप्त होता है:-(ऋग्वेद १०. १२४. ४.) यंकामये तम्तमुग्रं कृणोमि ॥ निजपद पर लाने के लिये ईश्वर जीव को शोक में डालता है-वाकलमन्त्रोपनिषत - स्मियानो अविवरस्य शोकं किंसीमिच्छरणं मन्यमानः । न हत्वाहम- प्रणीयस्वविष्ठामित्थाजहामि शपमानभिन्नु । काठक श्रुति में दुःखका आवाहन इस प्रकार किया है-यमोराजा प्रमृणीभिः पुनातु।। लक्ष्मीतन्त्र में भगवानका यह उपदेश है कि जिसका मैं भला करना चाहता हूँ उसकाधन छीन लेता हूँ, उसका या उसके बन्धुजन का नाश करता हूँ, और उसके लिए रोग उत्पन्न करता हूँ-यस्यानुग्रहमिच्छामि, तस्य वित्तं हराम्यहम् ॥बँधूनवानाशयि प्यामि व्याधीनुत्पादयाम्यहम् । इन वचनोंके अनुसार दुःख कर्म- फल नहीं, ईश्वरप्रसाद है।।गीतायाम्-मत प्रसादात तरिष्यसि ।। -परः ५६ निर्देशस्थल भ मार्कण्डेय पुराणे-महामाया हरेश्चैषा तया सँमोह्यते जगत् ॥ ११. मनोविज्ञान द्वार। यह कहा जा सकता है कि सँगमें कि सँगमें दुःख है इसलिये दर्शनों में निःसङ्गभाव का प्रतिपादन किया है (बहुभि- योगे विरोधो रागादिभिः कुमारी सँखवत -सांसू. ४, ६॥ तस्मानिःसँबन्धो निर नन्दश्चमोत:-पार्थसारथिः ॥ प्रात्य- न्तिकदुःखनिवृत्तिलक्षण. पाषाणसदृशो मोतो भवतीति वशेपिकमतम्-प्रपँचहृदय ॥ दग्धेन्धनानलवदुपशमो मोक्षा- प्रशस्तपाद भाष्य ।। ममेति मलं दुःखम्य न ममेसि च निर्वृतिः महाभारत तथा मार्कण्डेयपुराण ।। ३५.६॥ किन्तुमनोविज्ञान की यह रीति धर्मोपदेश नहीं ठहराई जा सकती, इस में और स्वार्थवाद में क्या भेद है ! अपरञ्च चैतन्य का शिलाभाव होना ब्रह्म के आदि सँकल्प के विरुद्ध है जिसमें बहुत्व का प्रतिपादन किया है, तदनुसार निःश्रेयस संगतिरूपसौहर्द में संपन्न है अन्यथा नहीं ।। मानवहृदय दुःख भोगना स्वीकार करता है, दृषद्वत होना उसके लिये अस्वाभाविक है ॥ प्रेम प्रकाश की प्राप्ति के लिये दुख की छाया उसे सदा स्वीकृत रहा है ! वरं वृन्दावने रम्ये शृगालत्वं व्रजाम्यहम् । न च वैशेषिकी मुक्ति प्रार्थयाति कदाचन-गदाधर मुक्ति- वाद तथा वेदान्त सिद्धान्त मुक्तावली ॥ १२. आर्य धर्म न ईश्वर को पिल माना है, इस्लाम ने नहीं- में चलना ६० टिप्पणियां (ऋग्१,१,६) सनः पितेव सूनवे, ।। (वाजसनेयीसं०) पितासि पितानोबोधि ॥ (वृहदारण्यक १,५,१) मेधया तपसा जनयत् पिता ।। ऋग-त्वं जामिर्जनानाम् ।। (गीता ६,१७ । ११,४३ ४४। १४,४)-पिताहमस्य जगतः, पितासिलोकस्यचराचरस्य, पितेव पुत्रस्य सखेवसख्युः, अहंबीजप्रदः पिता ॥ इस पिता- पुत्र सम्बन्ध में दुःख का स्थान कयंचित, श्रद्धाके आधार पर, पत्र के हितकर ही माना जा सकता है । १३. कर्मवाद यह है कि मनुष्य अपने ही किय का फल पाता है, अनर्जित दुःख का भागी नहीं होता ॥ यह मत, वेद-संहिता में नहीं पाया जाता । वेद में वरुणादि देवताओं के रक्षा करने पर ही मनुष्य की रक्षा होती है। ब्राह्मण ग्रन्थों में कर्म प्राधान्य है, किन्तु कर्म यज्ञविधि है, जो जादू की सी क्रिया है ॥ स्त्री पुरुष के संसर्ग से प्रजा की वृद्धि होती है, इसलिए यज्ञ पर तत्सादृश्यकर्म किया जाता था कि लोक परलोक की वृद्धि हो (तैत्ति० ब्रा०५,५, ३-४ रेतः सिचम् ॥ तत्ति ब्रा० ६,५, ८ ॥ कठकापिष्टल-यत पत्नीपउपप्रवर्त यति मिथुन एव रेतः प्रसिञ्चति ॥ द्राह्यायणश्रौत-मिथुनौसम्भवेतां यौवर्णोलभरन् । जैमिनी ब्राह्मण-गोसवः, तस्यव्रतम् । उप- मातरमियाद्, उपस्वसारम, उपसगोत्राम्, सेनेहपुण्यकेशो यौधे- निरीजे शेव्योराजा ।। उपनिषत काल में कर्म का यज्ञरूप अर्थ निर्देशस्थल न रहा और पुण्यापुण्य कर्मके वश पुनर्जन्म मानाजाने लगा। याइवल्क्य ने चुपके से आतभाग को यह मत समझाया-बृह- दारण्यक (३.२.१३)बौद्धोंने इस मत का घर घर प्रचार किया, दर्शनों ने इसे स्वीकार किया। इस प्रकार कर्म तथा पुनर्जन्मवाद हिन्दू सभ्यता का अंग होगया। किंतु दार्शनिकोंका यह मत भक्ति वाद को अभी तक स्वीकृत नहीं। कर्म और ईश्वरप्रतिपत्ति,पुन- जन्म और परलोकगमन के विषय में जो शास्त्रों में एकार्थता का प्रयत्न किया गया है वह अभी तक सफल नहीं हुआ। कम प्रधान होने से ईश्वरप्रसाद वार्तामात्र है स्वर्ग से लौट- कर पुनर्जन्म की प्राप्ति सृष्टिविकास के नियम का उल्लङ्घन है। परलोक में कर्मफल भोग कर इस लोक में फिर जन्म लेकर कर्मानुसार फल भोगना कर्मवाद के असङ्गत है।श्रेय को प्राप्त कर हेय की ओर लौटना परलोकस्थितिका वृथा तिरस्करण है। संगति रूप प्रेम का आघात इस लोक में हो अथवा परलोक में, मानव हृदय की सद्भावना के सदा प्रतिकूल है ॥ हन्दू धर्म में यह विसंवाद बराबर जारी है ॥ मानव. हृदय की तुष्टि जो जीव के पितृलोक में जाने से होती है इस लोक में पुनर्जन्म से नही ॥ कालिदास अज को स्वर्ग भेज कर प्रिया से मेल कराने में सन्तुष्ट हैं-पूर्वाकाराधि- कतररुचा सङ्गत: कान्तयासौ लीलागारेष्वरमत पुनर्नन्द- । ६२ टिप्पणियां नाभ्यन्तरेषु ।। स्वर्ग में अकेले रहना कदापि रुचिकर नहीं, सब बन्धुजन की वहां संगति होना मानवहृदय की तुष्टि और सृष्टि की सार्थकता के लिए परमावश्यक है। इसलिए महाभारत स्वर्गारोहणपर्व में युधिष्ठिर कहते हैं कि मे भ्रातृविहीनस्यस्वर्गेण सुरसत्तमाः। यत्र ते मम स स्वर्गा नाय स्वर्गोमतो मम ॥ न तैरहबिनारंस्ये भ्रातृभिर्जातिभिस्तथा ॥ महाभारत का वियोगान्त जीवन स्वर्ग के संयोगान्त जीवन ही समाप्त होता है । युधिष्ठिर सब अपने प्रियजनों से मिलते हैं, उन्हें पहचानते हैं, और उनके साथ वहां सदा निवास करते हैं-भीमसेनमथापश्यत तेनैववपुषान्वितम् । दीप्यमानं स्ववपुषा सादृश्येनैव सूचितम् इत्यादि ।। १४. जब कर्मवाद का प्रचार बढ़ा तो पुण्यशीलजनों का दुःख देख कर ऐसे अनेक कथानक बनाये गये जिससे यह सूचित हो कि इस जन्म का दुःख पूर्वजन्म के कर्म का फल है, कर्मवाद मिथ्या नहीं। जैसे दशरथका पुत्र-वियोग, श्रवणके बधका फल है। किन्तु रामको दशरथ का शोक जो व्यापा वह ऐसा सामान्य दुख है कि उसकी कोई विशेष कथा न बन सकी। इसी प्रकार महाभारत में अणी माण्डव्य का धर्म को शाप, जिसके वशधर्म ने विदुर का जन्म लिया, कर्मवाद की पुष्टि मे वार्ता है । इस वार्ताने अणी माण्डव्यके सहनशील जीवन को किस बुरी तरह ६३ निर्देशस्थल M बिगाड़ा है । (म, भा, आदि १८७, १०८) अणो माण्डव्य पर चोरीका झूठा अपराध लगाकर इन्हे शूली दीगई थी। शूली पर यह न मरे और न इन्होंने शूली देनेवालों को बुरा कहा-दोषतः कं गमिष्यामि नहि मेऽन्योपराध्यति ।। यह शूली पर से जीते उतार लिये गये ।। धर्म ने कहा कि तुमने बचपन में पक्षियों की पूंछ में तिनके चुभोये थे इसलिए तुम्हें शूली दी गयी। उन्होंने धर्म को शाप दिया कि वह शूद्र का जन्म ले और यह मर्यादा स्थापित की कि चौदह बरस को आयु तक मनुष्य को कोई पातक न लगे। आचतुदेशकाद्वर्षान्न भविष्यति पातकम्।। जो अणीमाण्डव्य शूली पर भी किसी को बुरा नहीं कहता,वह धर्म को शाप दे, यह कर्मवादियों का हाथ है ! तथापि चौदह बरस तक कर्म-फल प्राप्त न हो यह कर्मघाद का स्पष्ट तिरस्कार है। चोरों को भी शरण देने वाला, औरों के पाप से शूली पाने वाला, पापियोंका भी भला चाहने वाला,धर्म अर्थात 'law'का बन्धन न मानने वाला,कर्मवादका भङ्ग करनेवाला,यह तपस्वी अणीमाण्डव्य महाभारत का मसीह है,जिसने निरपराध शूली खाकर यह सिद्ध किया, कि दुःख कर्म फल नहीं, ईश्वर कुपित होकर दण्ड नहीं देता, वह प्रेम है, दुःख दूसरों की खातिर 'अनर्जित भी होता है ।। शाप के वश दुख की जो व्याख्या की जाती है, इससे भी दुःख,कर्म फल सिद्ध नहीं होता,क्योंकि शाप ६४

टिप्पणियां
शाप देने वाले के स्वभाव के अधीन है, जैसे दुर्वासाका शाप
उसके अपने कोप-स्वभाव वश है । शापगतदुःख
अनर्जित ही है क्योंकि इसका निजकर्म की कार्य-कारण
शृंखला से कोई सम्बन्ध नहीं ॥ सत्य की परीक्षा के
लिये भी देवता मनुष्य को दुख देते हैं ऐसी अनेक
कथाएँ पुराण शास्त्रों में पाई जाती हैं। परीक्षोत्तीर्ण
होने पर देवता प्रसन्न होते हैं आकाश से पुष्पवृष्टि
होती है । हरिश्चन्द्रादि के अनर्जित दुःख के उदाहरण
कर्मवाद का अपवाद हैं। इसी प्रकार देवता का प्रसाद, जैसे
वायुसंहिता में महादेव के प्रसाद से कृष्ण को पुत्र का लाभ,
और कर्म से निरपेक्षित गणिका आदि का वरना कर्मवाद
का अपवाद हैं।
१५. बृहदारण्यक ३. २. १३–'पुरायो वै पुरायेन कर्मणा भवति
पापः पापेनेति' इसका वह ही अर्थ है जो अंग्रेजी के इस
महावरे का,--Virtue is its own reward.'। इससे
सुख दुख का कोई सम्बन्ध नहीं ॥ पुण्यपाप को शारीरक
सुख दुख से मिश्रित करना न्याय विरुद्ध है और पुण्य-पाप
के प्रत्यय का घोर अपमान है। इस व्यामिश्र के कारण ही
हिन्दू-जीबन चैतन्यशून्य होकर समाजधर्म लुप्त प्राय हो गया ।।
१६ मनुष्य दूसरे के किये का फल भी भोगता है, यह

निर्देशस्थल शिक्षा महाभारत के शान्तिपर्व', ७३ वें अध्याय में, ऐलकश्यप संवाद से प्राप्त है-कश्यप उवाच, यथैकगेहे जातवेदः प्रदीप्तः, कृत्स्नंग्रामं दहते चत्वरंवा । विमोहनं कुरुते देव एष, ततः सर्व स्पृशते पुण्यपापैः । २१ । ऐलउवाच, यदिदण्डः स्पृशतेऽपुण्यपापं, पापंपापे क्रियमणे विशेषात् । कस्यहेतोः सुकृत नामकुर्याद् दुष्कृत वा कस्य हेतोर्न कुर्यात् ॥ कश्यप उवाच-असंयोगात् पापकृतामपापांस्तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्र- भावात् । शुष्कणाई दह्यते मिश्रभावान्न मिश्र: स्यात पाप- कृद्भिः कथंचित् ।। ऐलउवाच-साध्वसाधून धारयतीह भूमिः साध्वसाधू स्तापयतीहसूर्यः । साध्वसाधूश्चापिवातीहवायुः, आपस्तथा साध्वसाधून्पुनन्ति ॥ कश्यप उवाच-एवमस्मिन वत ते लोक एष नामुत्र वर्तते राजपुत्र, प्रेत्यैतयोरन्तरावान विशेषो योवैपुरायं चरते यश्चपापम् ।। ( यह वचन इस लोक में कर्मफल भोगने का निषेध है जो कर्मवाद के विरुद्ध है) पुरायस्यलोको मधुमान् घृतार्चिहिरण्य- ज्योतिरमृतस्यनाभिः । तत्रप्रेत्य मोदते ब्रह्मचारी न तत्र- मृत्युनंजरा नोतदुःखम् ॥ पापस्यलोको निरयोऽप्रकाशो नित्यं- दुःखशोकभूयिष्ठमेव, तत्रात्मानं शोचति पापकर्मा बह्वीः समाः प्रतपन्नप्रतिष्ठः ॥ ( यह वचन पुनर्जन्मवाद का अपवाद हैं ) ॥ अनुशासनपर्व के छटे अध्याय में उदाहरण- द्रिये हैं। ६६ टिप्पणियां 1 कि किस प्रकार एक के किये का फल दूसरा भोगता है- पुरा ययातिर्विभ्रष्टश्च्यावितः पतित; क्षिती पुनरारोपितः स्वर्ग दौहित्रैः पुण्यकर्मभिः ३०–३३ ।। अपने ही सुकृत से स्वर्ग मिले यह बात नहीं-अश्वत्थामा च रामश्च मुनिपुत्रौ धनु- धरौ। न गच्छतः स्वर्गलोकं सुकृतेनेह कर्मणा ॥ यह बचन गीता में आया है कि पुत्रादि के कर्मभ्रष्ट होने से पितर दुख भोगते हैं-लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ।। श्राद्ध विधि का आधार मिश्रित कर्म है, न कि अपना ही सुकृत ॥ अथर्ववेद की यह श्रुति है कि एक के अपराध का भागी अथवा दूर करने वाला दूसरा भी होता है-(६. ११६. २.-३) यदीदं मातुर्यदिवापितुर्नः परिभ्रातुः पुत्राच्चेतस एन आगन, यावन्तो अस्मान् पितरः सचन्ते तेषां सर्वेषां शिवोऽस्तुमन्युः ॥ देखो (अथर्व ६. १२०. १.) काठक ब्राह्मण मे एक पर से दूसरे के कर्मफल को दूर करने का वर्णन है-या अलक्ष्मीर्मात- मयीपितृमयी संक्रामणी सहजावापि तां निणु दामि ।। महा- भारत (शान्ति ८१, १३) में नारदजी वासुदेव से कहते हैं कि तुम्हारा दुख अपने किये का फल है किन्तु मनुष्य ऐसा दुख भी भोगता है जो उसका अपना कर्मफल नहीं-आपदो- द्विविधाः कृष्ण वाह्याश्चाभ्यंतराश्चह । प्रादुर्भवन्ति, वाष्णे यस्वकृतायदिवान्यतः ॥ सोऽयमाभ्यन्तरा तुभ्यमापत्- ६७ निर्देशस्थल कृच्छा स्वकर्मजा ॥ दुःख की निज कर्म से अतिव्याप्ति होने के कारण यह कर्मवाद का अपवाद है। १७. शान्तिपर्व, अश्मगीता में कर्मवाद का खण्डन. इस प्रकार किया है--शीतमुष्णं तथा वर्ष कालेनपरिवत ते एवमेव मनुष्याणां सुखदुःखे नरर्षभ । नौषधानि न मन्त्राश्च न होमा न पुनर्जपाः । त्रायन्ते मृत्युनोपेत जरयाचापिमानवम् ॥ शान्ति पर्व में २२३ अध्याय से २२७ तक, शक के प्रह्लाद, बलि, नमुचि संबाद में, कर्म का तिरस्कार कर, काल या स्वभाव का प्राधान्य माना है-यथा वेदयते कश्चिदोदनं वायसो ह्यदन् । एवं सर्वाणि कर्माणि स्वभावस्यैवलक्षणम ॥ नीलकण्ठ ने इसकी यह व्याख्या की है कि 'कर्माणि स्वभाव प्रकाशयन्ति नतुवर्तयन्ति ॥ बली इन्द्र से कहता है ( २२७. अ.)' सुख- दुःखे हिपुरुषः पर्यायेणाधिगच्छति। पर्यायेणासिशक्रत्वं प्राप्तः शक न कर्मणा ॥ यान्येव पुरुषः कुर्वन सुखैः कालेन युज्यते पुनस्तान्येषकुर्वाणो दुखैः कालेन युज्यते ॥ (२२४. ४५.) नाहंकर्ता नचैवत्वं नान्यःकर्ता शचीपते, पर्यायेण हि भुज्यन्ते लोकाः शक्र यदृच्छया ॥ २२३. १८' यदिस्यात् पुरुष: कर्ता शक्रात्मश्रेयसेध्रु वम् । आरंभास्तस्य सिद्ध थे युनतुजातु पराभवेत् ।। १८. यदि मनुष्य-प्रेम मोह है, तो ईश्र-प्रेम भी मोह है ।। निःसंग ६८ विप्पणियां भाव स्वार्थपरता का ही दूसरा नाम है, केबल केन्द्रभेद है, विषयपरता के स्थान में अपना अमुत्र चिन्तन है। जीवना- भिनिवेश जो प्रेमाग्नि में दग्ध हो जाता है, नि:संगमाव में सूक्ष्मरूप से बना रहता है। १६. (महात्माओं को विशेष दुख ) महाभारत में धृतराष्ट्र मे ठीक कहा है कि दुःख का मूल होने के कारण मनुष्य जन्म ही पर धिकार है-धिगस्तु खलुमानुष्यम् || महात्माओं को विशेष दुग्व प्राप्त है-(म. भा. व. १३०.६ ) अत्रैव पुत्रशोकेन वसिष्ठोभगवान ऋषिः । वद्ध वात्मानं निपतितो विपाश : पुनरुत्थितः ॥ [ व १३७. १६ ] विलप्यैवं बहुविधं भरद्वाजोऽदहत सुतम । सुसमिद्धततः पश्चाद् प्रविवेश हुता- शनम् ॥ व्यास जो युधिष्ठिर को आश्वासन दिलाते हैं अपने पुत्र के मरने पर आप कैसे सशोक हैं-[शा. ३३३ ३८] तमुधाचमहादेवः सान्त्वपूर्वमिंदवचः, पुत्रशोकाभिसं- तप्त कृष्णद्वैपायनं तदा ॥ छायां स्वपुत्रसदृशी सर्वतोऽनपगां सदा, द्रदयसे त्वं च लोकेस्मिन् मत्प्रसादान महामुने । सोऽनुनीतो भगवता स्वयं रुद्रेण भारत, छायां पश्यन् समा- वृत्तः स मुनिः परया मुदा ।। भीष्म के मरने पर गङ्गा माता रुदन करती हैं, [शा. १६८. २१--] ततो भागीरथी देवी तनयस्योदके कृते, उत्थाय सलिलात् तस्मात रुदती शोक- ६६ निदेशस्थल विह्वला ॥ दामोदर आश्वासन दिलाते हैं-वसूनेष गतो देवि पुत्रस्ते विज्वरा भव ॥ शिवजी मनुष्य के मृत्यु सँकट से दुखी होते हैं (शा. १४३.१११) देव्या प्रणोदितोदेवः कारुण्यार्दी- कृतेक्षणः, ततस्तानाह मनुजान वरदोऽस्मीति शंकरः ॥ वसुदेव के पुत्र राम और कृष्ण का किस करुणावस्था में दाह दिया जाता है [ मौ७.३१ ] ततः शरीरे रामस्य वसुदेव स्यचोभयोः, अन्विष्य दाहयामास पुरुषैराप्तकारिभिः ॥ उत्तररामचरितमें वियोग के समय सीता के इन थोड़े से शब्दों में दुःख को कैसी वेदना भरी है-"हा दैव, एष भया विनाहमप्येतेन विनेति स्वप्नेऽपिकेनसम्भावित- मासीत् "! राम कीभी कैसी करुणावस्था है, "हन्त ! पर्यव- सितंजीवितप्रयोजनं रामस्य!” राम रो रोकर जीते हैं-शोकक्षो- भेचहृदयं प्रलापैरेव धार्यते ॥ देखो, द्रोण पर्व ५२ में अभिमन्युवध पर अर्जुन का विलाप, स्त्री पर्व में गान्धारी आदि स्त्रियों का विलाप ॥ हेमचन्द्रयोगशास्त्र में, महावीर को लोक के दुःख पर रोता दिखाते हैं-Hail to the Jina bero's eyes Whose pupils are rigid with pity, And wet with tears, from pity, Even for him who has comınitted sin ( 1.3 ) The वर्णन चैतन्य को शिलात्वमुक्ति का और कर्मवाद का विरोधी टिप्पणियां है ॥ जड़चैतन्य का भेद मान कर आत्मा,को केवल चिन्मात्र मानने से चैतन्य का शिलात्ववाद उत्पन्न होता है, किंतु जड़ की अलग सत्ता नहीं, चैतन्य में इसका समावेश होने से चैतन्य प्रबुद्धअवस्था में प्रत्ययशून्य नहीं कहा जा सकता ॥ द्रष्टा-दृश्य मिथुन की विसृष्टि नहीं ॥ २०. मनुष्य निःसंग नहीं। ईश्वर का मनुष्य, , मनुष्य का ईश्वर और मनुष्य का मनुष्य मधु है । यह सदा एक दूसरे के साथ हैं:-[ वृहदारण्यक २. ४. १. ] इदं मानुषं सर्वेषां भूतानां मधु । अस्यात्मनः सर्वाणिभूतानिमधु ।। (म. भा द्रो. ७६ ) कृष्ण भगवान ने कहा है कि मनुष्य मेरा आधा शरीर है शरीरार्धममार्जुन : । यस्त द्वेष्टि समांद्वेष्टि यस्तं चानु स मा. मनु ॥ 'उद्योग'४० ब्रह्मा कहते हैं- नारायणोनरश्चैव सत्व- मेकं द्विधा कृतम् ।। २१ ऋग् १०. १४. ८. देखो नोट ३॥ अथर्व वेद ६. १२०, ३- यत्रा सुहार्दः सुकृता मदन्ति विहाय रोगं तन्वः स्वायाः, अप- श्लोणा अङ्गै रहताः स्वर्गे तत्र पश्येस पितरौ चपुत्रान् ॥ इस श्रुति के अनुसार परलोक में सशरीर पिता पुत्र सब मिल कर सुख भोगते हैं । परलोक से फिर लौटना नहीं होता, 'अथर्व १८. ३. ६२.' परैतुमृत्युरमृतं न एतु ।। अमृते भुत्व ॥ १८ ४.४: स्वर्गालोका अमृतेन विष्ठा १८.४, ६४' साङ्गाः ७१ निःशस्थल स्वर्ग पितरो माइयध्वम् ।। परलोकगत पितरों के लिए ही श्राद्ध कर्म होसकता है । पुनर्जन्मवाद में श्राद्ध असमञ्जस है। इसकी यह घृणात्मक और हास्यास्पद स्थिति है-'योगत. उप. ४' या माता सा पुनर्भार्या ।। यः पिता स पुनः पुत्रो, यः पुत्रः स पुमः पिता ॥ २२. काठक श्रुतिः ( १३.११)-प्राकूत्यैत्षा समृधेत्वा कामायत्वा स्वाहा । देखो नोट ३ ॥ अथर्नवेद ( ११. ४. ११) की श्रुति है कि मृत्यु जीवन है-प्राणो मृत्युः ॥ २३. बाल्मीकीय रामायण-(मसुज्य अपनी जान का आप मालिक नहीं, क्योंकि यह पैदा होने और मरने में विवश है, दुःख की समान विधि, मर कर सब को परलोक गति का सुख) पिता का मरना सुनकर राम अचेस होकर भूमि पर गिर पड़ते हैं-बभूवगतचेतनः, भुवि पपात ह-बिलक विलक कर (नेत्राभ्यामश्रुपूर्णभ्यां ) रोते हैं और सीता और लक्ष्मण को पुकारते हैं-सीते मृतस्ते श्वशुरः पितहीनोऽसिलक्ष्मण ॥ फिर धीरज धरकर भरत को आश्वासन दिलाते हैं-नात्मनः कामकारोहि पुरुषोऽयमनीश्वरः । इतश्चेतरश्चैनं कृतात: परिकर्षति ॥ सर्वेक्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः, संयोगाविप्रयोगान्तामरणान्तं च जीवितम् ।। आत्मानमनुशोचत्वं किमन्यमनुशोचसि । श्रायुस्तु हीयते यस्य स्थितस्यास्य गत- टिप्पणियां स्यच ॥ ॥ यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महार्णवे । समेत्य तु व्यपेयातां कालमासाद्य कंचन ॥ एवंभार्याश्चपुत्राश्च ज्ञातयश्च वसूनिच । समेत्य व्यवधावन्ति ध्र वोह्येषां विनाभवः ॥ यथा हि सार्थं गच्छन्तं ब्रूयात् कश्चित् पथिस्थितः । अहमप्याग- मिष्यामि पृष्ठतो भवतामिति । एवंपूर्वैर्गतोमार्गः पितृ पैतामहै ध्र वः । तमापन्नः कथं शोचेद् यस्यनास्ति व्यतिक्रमः ॥ सजीर्णमानुषं देहं परित्यज्य पिता हि नः । देवीमृद्धिमनुप्राप्नो ब्रह्मलोकविहारिणीम् ॥ ( अयोध्या, सर्ग, १०३, १०४ ) इस बात पर ध्यान देने से कि हम भी अवश्य मरेंगे, प्रियवर के मरने का शोक कम होता है-तू चल मैं आया वाला हिसाब है ।इस बात पर भी ध्यान देना उचित है कि जाबालि का राम को यह उपदेश कि कोई किसी का नहीं है ( नास्तिकश्चिद्धिक- स्यचित् ) इसलिये दशरथ के मरने का शोक न करना चाहिये; वाल्मीकि ऋषि ने निन्दित किया है-धर्मापेत- मिदंवच:-(अयोध्या म. १०६) राम का दुख भोगना, दशरथ का मर कर स्वर्गति को प्राप्त करना, राम का संगति तथा सौहार्द में आस्था रखना- यह सब वर्णन कर्मवाद, पुर्नजन्म तथा प्रेम के मोहवाद का अपवाद है ॥ 'उत्तरकाण्ड ६८' सीता के रसातल प्राप्त होने पर राम रुदन करते हैं-सरुदित्वाचिरं कालं बहुषोवाष्पमुत्सृजन ॥ ब्रह्मा आकर उन्हें समझाते हैं कि

निदे शस्थल
सुख की
।
संताप मत करो, सीता से तुम्हारा परलोक में मेल होगा-
स्वर्गे ते संगमोभूयो भविष्यति न संशयः ॥
(तुलसीकृत रामायण से उद्धृतपद-प्रेम तथा दुख की स्वाभा-
विकता और ईश्वरेच्छा की प्रबलता,) श्रवण कुमार मरते
समय भी अपना दुख भूल कर माता पिता के
चेष्टा करता है और दशरथ को यह रुलाने वाला संदेश
देता है:-तिनको हित से नीर पिवाई । पाछे कहियो मम
समुझाई ॥ करहिं न शोच करहु उपदेशा
करहु उपदेशा । सत्यसंध
रघुवंश नरेशा । जव दशरथ श्रवण के माता पिता को जल
पिलाने लगे। तब मोतापिता यह करुणबचन बोलेः-पुत्र न
बोलत आज तुम हम से सुन्दर बैन । कारण कवन सो
कहहु तुम, जासो हो जिय चैन । और पुत्र के मरने का
दारुण वृत्तान्त सुनकर विलाप कर उन्होंनेप्राण त्याग कर दिये ॥
राम के वियोग में दशरथ मरते समय कहते हैं:-प्राण
पियारे बनहिं सिधारे । अब तक प्राण न गये हमारे ॥ अब
सुख
कौन मिलहि जगमाहीं । जेहिते प्राण न तनु ते जाहिं ।।
प्रिय सरवन की कथा ते अब मोहिं रहयो न धीर ॥ पुत्र
बिना जे नहीं जिये धनधन ते नर वीर ॥ दशरथ का मरना
सुनकर राम अतीव व्याकुल होते हैं। मरणहेतु निजनेह
विचारी । भयो अतिबिकल धीरधुरधारी ॥ लक्ष्मण के मूर्छित

टिप्पणियां होने पर राम विलाप कर रोने लगते हैं। सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ । बंधु सदा तब मृदुल स्वभाऊ ।। जो जन- तेऊ वन वन्धु विछोहू । पिताबचन मनतेऊ नहि श्रोहू ।। बहु विध शोचत शोचविमोचन । स्रवत सलिल राजिवदल- लोचन ॥ तुलसीदास का यह भाव सराहनीय है कि मनुष्य के दुख में ईश्वर भी दुखी होता है-उमा अखण्ड एक रघुराई । नरगतिभक्ति कृपालु दिखाई ॥ रावण भी पुत्रशोक में रुदन करता है-हासुतसंतत आज्ञाकारी । करि विलाप दशकंध पुकारी ॥ मन्त्री समझाते हैं-सुत वित नारि त्रिविध सुख कैसे । उपजहिं घटा जाहि नभ जैसे ॥ तडित विदित देखी घन माहीं । रहै न थिर तहं तुरत छिपाहीं । यह जिय जानि सुनहु दशभाला। बचहिं न कोउ जग आये काला ॥ तुलसीदास एक और प्रसंग में संसार का सब दुख इस उपदेश द्वारा दूर करते हैं तात जाइ जनि करहु गलानी । ईशअधीन जीवगति जानी ॥ भाव यह है कि ईश्वर जो कुछ करता है जीव की भलाई के लिये ही है। २४. महाभारत में विचार-स्रोत अभी सूखे नहीं पड़े हैं। अनेक विचारों की धाराएं बहरही हैं ।। यथा, (शान्ति ३२. १२) ईश्वरोवाभवेत् कर्ता पुरुषोवापि भारत। हठोवावत ते लोके कर्मजंवाफलं स्मृतम् ॥ इधर बौद्धमत पुराणगाथाओं का रूप निदेशस्थल . पलट पलट कर कर्म, पुनर्जन्म, और म्नेहशून्यता के मत का प्रतिपादन कर रहा है, यथा शान्ति १. ६७. ४६॥ इस कारण एकार्थता और भी भङ्ग हो रही है ।। यहां पर दिग- दर्शन मात्र कुछ संदर्भो का अवतरण किया जाता है-(क.) 'ईश्वरवाद' भीष्मस्तवराज, ईश्वर का कर्तृत्व-~-योमोहयति भूतानिस्नेहपाशा नुबन्धनैः। सर्गस्यरक्षणार्थाय तस्मै मोहा- त्मनेनमः ।। भीष्मपर्व में भीष्म की ईश्वरार्पणबुद्धि का प्रज्व- लन्त उदाहरण (५६ ६७-६८) एह्येहिदेवेश जगन्निवास नमोऽस्तुतेमाधवचक्रपाणे। प्रसह्य मां पातय लोकनाथ रथो- त्तमात सर्वशरण्यसंख्ये ॥ त्वया हतस्यापिममाद्य कृष्ण श्रेयः परस्मिन्निह चैवलोके । सम्भावितो स्म्यन्धक वृष्णिनाथ लोकै- स्त्रिभिर्वीर तवाभियानात ॥ श्राश्वमेधिकपर्व ३' में व्यास युधिष्ठिर को समझाते हैं-ईश्वरेण चयुक्तोऽयं साध्वमाधु- चमानवः । करोति पुरुषः कर्म तत्र का परिदेवना ॥ 'व. २७३- युधिष्ठिर ' मन्येकालश्चभगवान् दैवंचविधिनिर्मितम ॥ भवि- तव्यं चभूतानां यस्यनास्तिव्यतिक्रमः ॥ धात्रातुदिष्टस्यवशे- किलेदं सर्वजगत्ति ठति न स्वतन्त्रम ।। (ख, -कर्मफल ( अनुशासन १, ७२)-सर्वेकर्मवशावयम् ॥ ६,५-नाबी- जंजायतेकिंचित् ॥ ७, २२ '-यथा धेनुसहस्रेषु वत्सोविन्दति मातरम् । एवं पूर्वकृत कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥ · ५, २०'- ७६ टिप्पणियां अकृत्वा मानुषंकर्म यो देवमनुवर्तते । वृथाश्राम्यति सम्प्राप्य पतिक्लीवमिवाङ्गना ॥ (ग, 'भवितव्यता ) शान्ति १७४, २७- देवायत्तमिदंसर्व सुखदुः :खे भवाभवौ॥ (शा, २२६, १०) भवितव्यं यथा यच्च भवत्येव तथा तथा ॥ २२-प्राप्तव्या- न्येव चाप्नोति दुःखानिच सुखानिच ॥ 'शा, २३२, २०- व्यास' पौरुषंकर्मदे वंच फलवृत्तिस्वभावतः । त्रयएतेऽपृथग- भूता न विवेकं तु केचन ।। (घ, काल का प्रभुत्व) भीष्म युधिष्ठिर को समझाते हैं (अनुशा १, ८२) नैवत्वया कृत कर्म नापिदुयो धनेनवै कालेनै तत्कृत विद्धि निहतायेन पार्थिवाः ।। (शान्ति--व्यासयुधिष्ठिर को समझते हैं ) नाकालतो म्रियते जायते वा ॥ अश्मगीतायाम्-विचित्रः कालपर्ययः, विचित्र विधिचेष्टितम् ।। ( उद्योग ११२, २० नारद ) कालोहि पर- मेश्वरः ) (च, 'दुःख सुग्व के निमित्त है' इसका सहन करो) व, १८३, ६५' मार्कण्डेय युधिष्ठिर को समझाते हैं- माभूद्विशङ्का तव कौरवेन्द्र दृष्ट्वात्मनः क्लेशमिमं सुखार्हम ॥ (शा. ३२१. २३) व्यास शुकको उपदेश करते हैं-ब्राह्मणस्य तु देहोऽय नकामार्थायजायते इहक्ले- शायतपसे प्रेत्यत्वनुपमं सुखम ।। (व ३२) युधिष्ठिर द्रौपदी को धर्म का स्वरूप बताते हैं-नाई कर्मफलान्वेषी राजपुत्रि चराम्युत । ददामिदेयमित्येव यजेयष्टव्यमित्युत ॥ धौम्य ७७ निदे शस्थल युधिष्ठिर को दुःख की व्यापकता बताते हैं ‘व. ३१५. १२' देवैरप्यापदः प्राप्ताः ।। शान्तिपर्व में यह वचन है-प्राप्त प्राप्त- मुपासीत हृदयेनापराजीतः ॥ द्रौपदी वीर के मरने पर प्रसन्न होतो है----अधर्मः सुमहानेषयच्छय्यामरणंगृहे ॥ म्रियते रुदतांमध्येज्ञातीनां नसपूरुषः ॥ अशोच्योहिहतः शूरः स्वर्ग- लोके महीयते ॥ शान्ति पर्ण ( १८०. २७) में कश्यप इन्द्र को समझाते हैं कि आत्मा ऐसी रहस्यात्मक वस्तु है कि शोक और उसके दूर करने का उपाय दोनों इसी में मौजूद हैं-अस्त्येव नायि शोकोपि हर्षश्चापि तथात्वायि । सुख- दुःखे तथाचोभे तत्र का परिदेवना ।। (छ. 'मृत्यु है ही नहीं' ) 'व. २०६. २६' व्याधउवाच-न जीवना- शोस्ति हिदेहभेदे, मिथ्यैतदाहुर्मियतीतिमूढाः । जीवस्तु देहा- न्तरितः प्रयाति, दशार्धत वास्य शरीरभेदः ॥ ‘उद्योग ४२' धृतराष्ट्र सनतसुजात से पूछते हैं—नमृत्युरस्तीतितव- प्रवादम् ? सनत्सुजात कहते हैं, ठीक है-प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमि, तथाप्रमादममृतलां ब्रवीमि ।। 'शान्ति ३१८. ७' न देहभेदे मरणं विजानताम् । 'स्वर्गारो ५.६.३' जीवोनित्यः ।। 'शा० १८७. २६' सचेष्टते चेष्टयते च सर्वम् ॥ शरीर से निकलते हुए जीवको दिव्यचक्षु : से सिद्ध लोग देखलेते हैं-'अनुगीता १७. २६,३३' निष्क्रामन् कम्पयत्याशु तच्छरी- ?

टिप्पणियां रमचेतनम ॥ पश्यन्त्येवंविध सिद्धा जीवं दिव्येनचक्षुषा ।। मनुष्य मरता नहीं, जिसतरह चांद गहन में आता है उस तरह छुप जाता है 'शाह' यथा चन्द्रो ह्यमावस्यामालिगत्वान्नदृश्यते। नच नाशोऽस्यभवति तथा विद्धिशरीरिणाम् ।। 'शा. ३३०. १६' नारद शुक से कहते हैं, जीने में दुख है और मरने में सुख है-सुखाद् बहुतरं दुःखं जीविते नात्र संशयः । स्निग्धत्व चेन्द्रियार्थेषुमोहानमरणमप्रियम ॥ योगभाष्य में भी व्यास ने लिखा है-पशून धिकृत्य मनुष्यजातिः श्रेयसी: देवानृषीश्चां- धिकृत्यनेति '४. ३३.' ॥ जैगीषव्य उवाच, यत् किंचिदनु- भूत तत्सर्व दुःखमेवप्रत्यवैमि ३,१८ ' (ज. मरकर परलोक गति, पुनर्जन्मका अपवाद')-'स्त्री पर्व ११' विदुर कहते हैं, प्रमाणं गदि शास्त्राणि गतास्ते परमां गतिम् ॥ तेषांकाम- दुघांल्लोंकान , इन्द्रः संकल्पयिति ।। 'शा ३२१.८०' मनुष्य- पद के उत्तर स्वर्गारोहण है, यह क्रममुक्तिवाद है अर्थात पुनर्जन्मवाद नहीं-सोपान भूत स्वर्गस्य मानुष्यंप्राप्यदुलर्भम। नारद, अकम्पन को उसके पुत्र के मरने पर समझाते हैं कि शोक मत करो तुम्हारा लड़का मरा नहीं स्वर्ग को प्राप्त हुओ है (द्रोण ५४, ४८ ) सर्वेदेवा मर्त्यसंज्ञा विशिष्टास्तस्मात् पुत्र माशुचोराजसिंह । स्वर्ग प्राप्तो मोदते ते तनूजो नित्यं रम्यान वीरलोकानवाप्य ।। 'द्रो. ७१. १४ व्यास' परलोक ७६ निदेशस्थल लोक में इस से अधिक सुख है,-नतुस्वर्गादयं लोकः काम्यते स्वर्गवासिभि:-इसलिए अभिमन्यु को वापिस नहीं लासकते- नचेहानयितु शक्यम्-क्योंकि वह स्वर्ग का सुख छोड़ कर अब इस लोकमें आना पसन्द न करेगा ।।(सौप्ति ५६)स्वर्गमें मिलने की आशा, कृप कृतवर्मा, दुर्योधन से प्रकट करते हैं-स्वर्गेनः संगमः पुनः ।। युधिष्ठिरादि सब बन्धु जन स्वर्गारोहण कर स्वर्ग में मिलते हैं । (ट-मृत्यु पर आश्वासन ) श्रीकृष्ण अर्जुन को अभिमन्यु के मरने पर यह आश्वासन दिलाते हैं-सर्वेषामेप वै पन्थाः ।। सुभद्रा को भी समझाते हैं कि स्वर्ग तो मर कर ही जाते हैं उसमें रोना कैसा ! गतस्तव वरारेहे पुत्रः स्वर्ग ज्वरं जहि ।। (शा० २६) नारद सृञ्जय को उसके पुत्र के मरने पर समझाते हैं कि हम सब को दुःख भोगना और मरना है-सुख दुःखें रहं त्वं च प्रजाः सर्वाश्च सृञ्जय, अविमुक्ता मरिष्याम स्तत्र का परिदेवना ॥ अनुगीता में वर्णन है कि वैद्य भी औषध सेवन करते२ मरते हैं-ते पिवन्तः कषायांश्च सी षि विविधानि च । न मृत्युमतिवर्तन्ते वेलामिव महोदधिः ।। हम अपनी जान के भी आप मालिक नहीं-नायमत्यन्तसम्वासो लभ्यते जातु केनचित् । अपिस्वेन शरीरेण किमुतान्येन केनचित् ॥ व्याधि मृत्यु का ही रूपान्तर है [शा० २५८, ४२] तस्याश्चैव व्याधय- ८० टिप्पणियों स्तेश्रुपाताः । प्राप्त काले संहरन्तीह जन्तून् ॥ [द्रो० ७१८-१८) व्यास अर्जुन से कहते हैं-जीवन्त एव नः शोच्या नतु स्वर्ग- गतोऽनघ ॥ [आदि० २३३] जरिता के विलाप पर नीलकंठ यह ब्याख्या करते हैं-अत्र संसाराटव्यां मातापिनत्रातु समर्था किंतु सर्वे स्वार्थकामाः ॥ कहते हैं कि महाभारत में महा- रथियों की मृत्युगाथा का वर्णन इसलिये किया है कि एक का दुःख सुनकर दूसरे को धीरज हो-ननुसृत्योःस्वाभाविकत्वेऽपि गुणवत्पुरुषवियोगो दुःखायेत्येवा शङ्कय 'दुःखेदुःखाधिकान् पश्यत् तेन शोकोपनीयते' इत्युक्तेः ॥ सेनजित को, पुत्र शोक पर, ब्राह्मण समझा ताहै-[शान्ति १७४]-शोच्यः किं- मनुशोचसि । यदा त्वामपिशोचन्तः शोच्यायास्यन्तितांगतिम्, सर्वे तत्र गमिष्याम यतएवागतावयम् ॥ आत्मापिचायन मम।। जिस प्रकार महाभारत के अन्त में पाण्डव भ्राता मरकर 'परलोक में फिर मिल गये इसी प्रकार हमें मरकर अपने प्रियवरों से फिर मिलने की आशा सजीव करती है । (ठ. मृत्यु कीविधि अटल है)-(शा. १७५) अनवाप्तेषु कामेष मृत्युरभ्येति मानवम् ॥ सुभद्रा रोती है कि उसके बेटे को कोई न बचा सका-धिग्बलं भीमसेनस्य धिक् पार्थस्य धनु- छमताम् । धिगवीर्य वृष्णिवीराणां पञ्चालानां च धिग्बलम् ।। हावीर ! दुष्टो नष्टश्च धनं स्वप्न इवासि मे ॥ अहो हयकाल निदेशस्थल - प्रस्थानं कृतवानसि पुत्रक । विहाय फलकाले मां सुगृद्धां तव दर्शने ॥ मौत को घड़ी को ईश्वर भी नहीं टाल सकता- मौसल पर्व में कृष्ण की साक्षी में (कृष्णस्य पश्यतः) उनके अपने यादवकुल का नाश हो गया और वह कुछ न कर सके- कृतान्तमन्यथा नैच्छत्कर्तुं स जगतः प्रभुः ।। (स्त्री पर्व) व्यास धृतराष्ट्र को समझाते हैं-न च दैवकृतो मार्गः शक्यो भूतेन केनचित् । घटतापिचिरंकाल नियन्तु मिति मे मतिः ॥ विदुर का यह महत्व पूर्ण भाषण है-उत्तिष्ठ राजन् किं शेषे माशुचो भरतर्षभ । एषावे सब सत्वानां लोकेश्वर परागतिः । अयु- ध्यमानो म्रियते युध्यमानस्तु जीवति । कालं प्राप्य महाराज न कश्चिदतिवर्तते ॥ एकसार्थप्रयातानां सर्वेषां तत्र गामिनाम् यस्य कालः प्रयात्यने तत्र का परिदेवना ॥ यांश्चापि निहतान युद्धे राजस्त्वमनुशोचसि । न शोच्या हि महात्मानः सर्वे ते त्रिदिठांगताः ॥ न जानपदिकं दुःखमेकः शोचितुमर्हसि ॥ अशाश्वतमिदम् सर्व चिंत्यमानं नरर्षभ। कदली संनिभोलोकः सारोह्यस्य न विद्यते ॥ यथा च मृन्मयं भाण्डं चक्रारूढ़ विप- द्यते । किंचित् प्रक्रियमाणं वा कृतमात्रमथापिवा ॥ [एवम् ] यौवनस्थोपि मध्यस्थो वृद्धोवापि विपद्यते।।प्राक्कर्मभिस्तु भूतानि भवन्ति न भवन्ति च । एवंसांसिद्धिकेलोके किंमर्थ मनुतप्यसे ।। विदुर का आशय यह है कि हर दृष्टि से मृत्युकाल नियत है ८२ टिप्पणियां - और मरकर सबको परामति प्राप्त होती है इसलिये मृत्यु अशोचनीय है॥ [ड-महाभारत का धर्मोपदेश]-तुलाधार ने जाजलिसे कहाहै- [शा०२६२-५३] कारणाद्धर्ममन्विच्छन् न लोकचरितं चरेत् ।। नीलकण्ठ व्याख्या करते हैं-न गतानुगतिकः स्यादित्यर्थः अन्त में [स्त्री- ४-१२-१६] जल प्रदानिक पर्व में विदुर साम्य- वाद का कैसा प्रभावशाली उपदेश करते हैं:-अहो विनिक- तो लोको लोभेन च वशीकृतः । लोभक्रोधभयोन्मत्तो नात्मान- मवबुध्यते ॥ कुलीनत्वे च रमत दुष्कुलीनान् विकुत्सयन् । धनदर्पण तृप्तश्च दरिद्रानपरिकुत्सयन् ॥ मूर्खानिति परानाह नात्मानं समवेक्षति । दोषान् क्षिपति चान्येषां नात्मानं शास्तु- मिच्छति ॥ यदा प्राज्ञाश्च मूर्खाश्च धनवन्तश्च निर्धनाः । कुलीनाश्चा कुलीनाश्च मानिनोऽथाप्यमानिनः । सर्नेपितृवनं प्राप्ताः स्वपन्ति विगत त्वचाः । विशेष न प्रपश्यन्ति तत्रतेषां परेजनाः। येन प्रत्यवगच्छेयुः कुलरूपविशेषणम् ॥ यदा सर्वे समंन्यस्ताः स्वपन्ति धरणीतले । कस्मादन्योन्यमिच्छन्ति प्रलब्धु मिहदुर्बुधाः।।अध्र वेजीवलोकेस्मिन् योधर्म मनुपालयन जन्म प्रभृति वतेत प्राप्नुयात्परमांगतिम् ।। [इन पदों की टीका करने में नीलकंठ को बड़ा भ्रम हुआ है वह मान्य नहीं'] गीता (अध्याय २-११-३०) यह बात ध्यान देने योग्य है कि

निदेशाथल
छब्बीसवें श्लोक में पुनर्जन्मवाद को सिद्धान्त न मानकर केवल
मतरूप से प्रकाशित किया है-अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा
मन्यसे मृतम् ।। सिद्धान्त यह है कि जीव अज और अमर है ॥
सुख दुख इस शरीर का है और शरीर से परे भी जीव सजीव
होने से अशोच्य है अर्थात परम सुख में है। इसलिये मुसकुरा-
कर मौत का सामना करो!
शोच अशोची का करत, कहत ज्ञान की बात । शोच नहीं
पंडित करत, जीव न विनसै न जात ॥ ११ ॥ हम तुम और
सब नर जिते, इनका नाश न मान । तीन काल में थिर रहैं,
ऐसा सबको जान ॥ १२ ॥ बाल युवा और वृद्धता ज्यों एकी
देह में होय । त्यों देही की देहगति, धीर न मोहत सोय
॥ १३ ॥ अर्जुन इन्द्रियचित मिले, विषय जो सुख दुख
देत । आवे जावे न थिर रहे, यासे कीजे न हेत ॥ १४ ॥ जो
है सो विनसै नहीं, जो विनसै सो नाहि । जो इन तत्वन को
लहै, गिनिये ज्ञानी ताहि ॥ १६ ॥ अंतवंत सब देह हैं,
जीव रहत है नित्त । अविनाशी वह बस्तु है, युद्ध करो किन
मित्त ॥१८॥ यह न मरे उपजे नहीं, भयो न आगे होय। अजर
पुरातन नित्य है मारे मरे न सोय ॥२०॥ जैसे पट जीरण
तजे, पहरत नर जो नवीन । देह पुरानी जीव तजि, नई
गहत परवीन ॥ २२ ॥ यह कटे न हथियार से, पावक सके न

टिप्पणियां जार। जल में घीलि न हो सके, शोष सके न बयार ।। २३ ।। कटे, जले, सूखे नहीं, और न भीजे योग । नित्य रहै सब ठौर थिर, अविनाशी बिनरोग ॥२४॥ प्रकट नहीं जो अचिन्त है, अविकारी तू जान । ऐसा वाको जानके शोच न कीजे मान ॥२५॥ जो तू जानत जीव को, जन्म मरण पुनि होय । तऊ शोक तू मत करै, मन दृढ़ता में गोय ॥ २६ ॥ जो उपजै सो बिनसि है, मरे जो उपजै प्राय । होनहार सो होत है, तहां न सोच बढ़ाय ॥ २७ ॥ पीछे ताहि न जानिये, आगे पड़े न जान । मांझहि में कुछ देखिये, ताको सोच न मान ॥ २८॥ जीव कभी मरता नहीं, बसत सबन के देह । ताते सोच न कीजिये, जानिये जीव सदेह ॥ ३० ॥ २५. बुद्धानुशासन और बौद्धमत में भेद है। हमने बुद्धानुशासन का प्रतिपादन किया है न कि बौद्धमत का । विस्तार के भय से इस भेद की व्याख्या यहां नहीं कर सकते ॥ इस बुद्धानुशासन का समर्थन इन योग सूत्रों द्वारा होता है-[२-३] अविद्यास्मि- तारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः । [२-३३] वितर्क वाधने प्रति पक्ष भावनम् ॥ [१-३३] मैत्रीकरुणा-मुदितोपेदाणां सुख- दुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्त प्रसादनम् ॥ योग- भाष्य व्यास [३-१८] जैगीषव्य उवाच-दुःखरूप स्तृष्णातन्तुः, तृष्णादुःखसन्तापापगमात तु प्रसन्नमवाधं सर्वानुकूलम् सुख निदेशस्थल मिदिमुक्तमिति ।। २६. [मार्कण्डेयपुराण, अध्याय १५] विपश्चित् अपना स्वर्ग छोड़ कर नरक में दुखियों का दुख दूर करने के लिये निवास करता है। इन्द्र के बुलाने पर भी स्वर्ग नहीं जाता और कहता है-न स्वर्ग ब्रह्मलोके वा तत्सुखं प्राप्यते नरैः । यदातजंतु- निर्वाणदानोत्थमिति मे मतिः । ५७ । तस्मान्नतावद्यास्यामि यावदेत. सुदुःखिताः । मत्सन्निधानात सुखिनो भवंति नर कौकस : ।६०। धिग्क्तस्य जीवितं पुंसः शरणार्थि नमागतम् । योनार्त मनु गृह्णाति वैरिपक्षमपि ध्रुवम् । ६१ । प्राप्यते ते यदि सुखं वहवो दुःखिते मयि । किं वा प्रप्त मया नस्यात् तस्मात लां वदमाचिरम् । ६६ । नरके मानवा धर्म पीडयमानाः सह- प्रशः । त्राहीत्यमीच–दन्ति मामतो न ब्रजाम्यहम् । ६६ । कधस्पृहां करिष्यन्ति मत्संपर्काय मानवाः । यदि मत्संनिधावेषा मुत्कर्षो नोपपद्यते । ७६ । तस्माद्यत सुकृतंकिंचिन् ममास्ति त्रिदशाधिप । मुच्यतां तेन नरकात पापिनो यातनागताः ।७७। . ८६

परिशिष्ट-१
( मृत्यु के सम्बन्ध में हिन्दी सन्त कवियों की अनुभव
वाणी, मृत्यु तथा दुःख की अनिवार्यता, महत्माओं को विशेष दुःख,
दुःख का स्वागत तथा मृत्यु द्वारा पिय मिलन की आकांक्षा ॥)
वैद धनन्तर मर गया पलटू अमर न कोय ।
सुर नर मुनि जोगी जती सबै काल बस होय ॥ -पलटू
चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोय ।
दो पाटन के बीच में साबित रहा न कोय ॥ -कवीर
माली आवत देख के कलियां करें पुकार ।
फूली फूली चुन लिये कालि हमारी बार ॥ -कबीर
दूलन यह परिवार सब नदी नाव संयोग ।
उतरि परे जहं तहं चले सबै बटाऊ लोग ।।
-दूलन
मित्रां दोस्त माल धन छडि चले सब भाई।
संगी न कोई नानका उह हंस अकेला जाई । -नानक
सम्पतिविपति, विपतिसेसम्पत, देहधरेकोयहीसुभाई।
तरुवर फूले फले परिहरे अपने काल ही पाई ॥ -सूरदास
मुनि वसिष्ठ से पंडित ज्ञानी सोध के लगन धरी ।
सीता हरन मरन दसरथ को बन में विपत परी॥ -कवीर

निदे शस्थल
"
"
"
नीच हाथ हरिचन्द बिकाने बलि पाताल धरी ।
पांडव जिनके आप सारथी तिन पर विपत परी॥
सुख के माथे सिल परे नाम हृदय से जाय ।
बलिहारी वा दुःख की पल पल नाम जपाय ।।
हंस हंस कन्त न पाइया जिन पाया तिन रोय ।
हांसी खेले पिउ मिले तो कौन दुहागिन होय ।।
जहां जहाँ दुख पाइया गुरु का थापा सोय ।
जवहीं सिर टक्कर लगै तब हरि सुमिरन होय ॥ -मलूक
सुन
लो
पलटू भेद यह हंसि बोले
दुग्व के भीतर मुक्ति है सुख में नरक निदान ।। -पलटू
ऐसी
जरना चाहिये
का अङ्ग ।
मुख से कळू न कहत है. तन को खात भुजङ्ग ॥ --ग़रीवदास
नया पुराना होय ना घुन नहीं लागै जासु ।
सहजो मारा ना मरै भय नहीं व्यापै तासु ।। -सहजो
भक्त मरै क्या रोइये जो अपने घर जाय ।। -कवीर
भगवान।
ज्यों चन्दन
45

मर्ग इक वकका परिशिष्ट-२ (मृत्यु के सम्बन्ध में उर्दू के महा कवियों का सूक्ष्म अनुभव- भवितव्यता, संसार से निरपेक्षता तथा परिलोकगत आशावाद का महत्वपूर्ण वर्णन ।) लाई हयात आये क़ज़ा ले चली चले । अपनी खुशो न आए न अपनी खुशी चले । जिन्दगो का यानि श्रागे चलेंगे दम ले कर ॥ -मीर न घबरा ऐ दिलेदामांदा अब मंजिल करीब पाई। इसी बसती के आगे और एक श्राबाद बसती है ।। -अमीर नुदा जाने यह किसकी जलवगाहेनाज़ है दुनिया। बहुत आगे गये रौनक़ वोही बानो है महफ़िल की। -असीर रहे जिसमें पस ऐ जिन्दगो ऐसी हस्ती से गुजरे॥ अगर ये जानते चुन चुन के हमको तोड़ेंगे। तो गुल कभी न तमन्नाए रङ्गोबू करते ॥ -जौक गुल से येही इशारएशबनम है बाग़ में । रोने का है मक्काम ये हंसने की जा,नहीं ॥ प्रब-पं०बिशननरायणदर शमश्र की मानिन्द हम इस बज्म में । चश्म तर आये थे दामन तर चले ॥ खतरा सदा नेस्ती का। -हसन

परिशिष्ट-२
।
चाक को तक़दीर के मुमकिन नहीं हरगिज र फू।
सोजने तदबीर भी गो सौ बरस सीती रहो ॥-मीरमौहम्दशाकिर
मुनहसर मरने पे हो जिसकी उमीद ।
नाउमीदी उसकी देखा चाहिये, -ग़ालिब
ग़मेहस्ती का असद किससे हो जुज़मर्ग इलाज ।
शमश्र हर रङ्ग में जलती है सहर होने तक ।। -ग़ालिब
ए शमश्र सुबह होती है रोती है किस लिये।
थोड़ी सी रह गई है इसे भी गुज़ार दे॥ -नामालूम
क़यामे जिन्दगी बहरेफ़ना में गैरमुमकिन है ।
ये कश्ती तीर की सूरत चली जाती है तूफां में ॥–श्राबादलखनवी
हस्ती के लिये जरूर इक दिन है फ़ना।
तेरा दलील जाने की
की है ॥
-अनीस
जो शै है फ़ना उसे बक़ा समझा है।
जो चीज़ है कम उसे सिवा समझा है।
गर लाख वरस जिये तो फिर मरना है।
पैमानएउम्र दिन भरना है ॥
क्या खूब है मौत पाए जो सबसे मुझे पहले।
नाजुक है ये दिल दागे अजीजां न उठेगा । -असीर
जीस्त कहते हैं जिसे है इजतराब ।
मौत कहते हैं जिसे आराम
-असीर
आना
"
sher
।
६०

परिशिष्ट-३ (ईसाई तथा अन्य धर्मों में मृत्यु पर आश्वासन) “Blessed are they that mourn, for they shall be comforted” (Jesus Christ) “Are not two sparrows sold for a farthing? And one of them shall not fall on the ground without your Father. But the very hairs of yuor head are all numbered. Fear ye not therefore you are of more value than many sparrows' Jesus Christ. सेंट एम्ब्रोस अपने भाईके मरने पर दुखी होकर कहते हैं कि भाई मुझे भी शीघ्र बुलालो, और कोई मेरे चित्त की शान्ति का उपाय नहीं । पुनर्मिलन द्वारा ही शान्ति प्राप्त हो सकती है। "What other consolation is left me but this that I hope to come to thee, my brother, speedily, that thy departure will not entail a long separation between us, and that power may be granted me by thy intercessions, that thou mayest summon me who long to join thee more speedily." --St. Ambrose. ६१ निदेशस्थल FY STRT A AJ69.99 for aña ao --God's speed of love'. Ibid. नीचे लिखे पद्यों में परलोक-जीवन की उत्तमता तथा ईश्वर के माध्यम द्वारा पुनर्मिलन की आशा प्रकट की है- Earth has no sorrow that Heaven cannot cure. (Wordsworth'. Anaxagoras the philosopher being told that both his sons were dead, laid his hand upon his heart and after a short pause consoled himself with a reflection couched in these words, 'I knew they were mortal'. Mohamet at the death of his son said:, My heart is sad, mine eyes are flowing with tears at parting with thee, () my son, and still greater would be my grief, did I not know that I must soon follow thee, for we are of God, from Him we come, and to Ilim we must return.----Irving's Life of Mohamet. He is not dead, the child of yolil affection, But gone into that School, Where he no longer needs your poor protection, And Christ Himself dothr ule. Death hides but it does not divide- ६२ fecafturgi Thou art but on Christ's other side; Thou art with Christ and Christ with me, In Him I still am close to thee. मैंट फ्रांसिस ईश्वरेच्छा के आधीन इस प्रकार शान्ति प्राप्त करते हैं “Be praised my Lord, for those... who endure sickness and tribulation; blessed are they who endure in peace, for by Thoe Most High shall they be crowned.” “Be praised, my Lord, for our bodily death from which no living man can escape, woe unto them who die in mortal sin.--Verily I say unto thee that no man may call himself a perfect friend of God until he hath passed through many temptations and tribulations: So great the blins I hope to see, that every pain delighteth me. (St.Francis of Assisi) अधोलिखित विचारों द्वारा भी शान्ति प्राप्त होती है :- “When we are called upon to suffer, let us l'ecall to mind the tormenty our Lord, endured, and imme diately everything will become light and sweet to us. (St. Francis De Sales) "Death and love are the two wingswhich bear परिशिष्ट-३ men from earth to Heaven Michael Angelo. “Why will you call it 'Death's dark night ? Death is the entrance into Light; Behind its cloudy purple gates, The everlasting morning waits". (C.Noel.) "Dead are not lost but gone before'. “We are all around you without your seeing us”. “Life is real, life is earnest And the grave is not its goal, Dust thou art to dust returnest Was not spoken of the soul" (Long fellow) "It is God's will that His creatures should have many troubles and that they should die" ; Natural law is God's way of doing things. We lose the high signification of omnipotence, when after admitting that God or good is omnipresent and has all power, we still believe that there is another power named evil. (Mrs. Eddy) Yea, though I walk through the valley of the shadow of death, I will fear no evil: for Thou art with me; thy rod and thy staff, they comfort ine. Psalm 23,4 "His soul is not his own, for it is subject to birth."

ईसाई तथा अन्य धर्मा द्वारा आश्वासन
seen are
"Whom the Lord loveth, He chasteneth"
In all adversity, He is no adversary.--(Isaiah
LX 111.9] The things which are
temporal, but the things which are not seen
immortal-Rashdall. "Non omnis moriar-I
shall not all die ( Marcus Aurelius ) 'Thou
hast departed living, thou hast not departed
dead.' [Pyramid Texts] 'I live after death like the sun
daily.' 'I live and am saved after the foe death'. 'I go
forth from this day a pure spirit'. 'It is in glory'. 'I am
unchangeable' (The Book of the Dead-Egyptian)
"All goes onward and outward, nothing collapses
And to die is different from what any one supposed,
and luckier”. “It is not chaos or death-it is form,
union, plan-it is eternal life--it is happiness". "The
past and present wilt-I have filled them, emptied
them, And
my
next fold in the future.”
“What is known I strip away, "I launch all men
and women forward with me into the Unknown. The
clock indicates the moment --but what does eternity
proceed to fill
..EX

fata teemat indicate.” Births have brought us richness and variety. And other births will bring us richness and variety. I do not call one greater and one smaller. That which fills its period and place is equal to any” “And I will show that there is no imperfection in the present and can be none in the future, And I will show that whatever happens to anybody, it may be turned to beautiful results. And I will show that nothing can happen more beautiful than death”. (Walt Whitman) There is nothing shocking in early death- “Whom the gods love die young". (Dean Inge) 13 & परिशिष्ट-४ - (Spiritualism पितृ विद्या का एक उदाहरण ) महाभारत में वर्णन है कि व्यास मुनि की सहायता से पर- लोकगत कौरवपाण्डवों को धृतराष्ट्रादि लोग देख सके थे और महादेव की कृपा से व्यास को अपने स्वर्गवासी पुत्र शुक की छाया देखने का सामर्थ्य प्राप्त हुआ था। यह भी वर्णन है कि सिद्धपुरुष जीव को शरीर छोड़ते हुए देख सकते हैं (नोट १६,२४) ॥ छान्दोग्य उपनषिद में यह बचन है कि सिद्ध पुरुष के संकल्प में यह बल होता है कि वह पितरों से भेट कर सकता है- स यदि पितृलोककामोभवति संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्टन्ति (६, ८, २, १) (ब्र. सू. शांकरभाष्य ४, ४, ४, ८) योगशास्त्र के अनुसार ऐसी सिद्धि संयम द्वारा प्राप्त होती है। किन्तु ऐसे पुरुष भी संसार में पाये जाते हैं जिन्हें यह संकल्पसिद्धि जन्म से प्राप्त है । हमारे प्रियपुत्र पंडित चन्द्रशेखर जी कल्ला का २४ वर्ष की आयु में २१ मई सन् १६३६ को रूार्गवास होनेपर उन की एक नेकटाई लेकर हमारे मित्र मिसर रिचर्डसन प्रोफेसर मिशन कालिज देहली, सितम्बर १६३६ में लन्दन जाकर फ्रैंक ली साहब से मिले । इनका पूरा नाम और पता यह है-Frank Leah, ६७ परिशिष्ट-४ - Grotrian hall, wigmore street, London W॥ ली साहब पितरों से भेट कराने में संकल्पसिद्ध-प्रसिद्ध हैं ।। नेकटाई को स्पर्श कर यह ध्यानानस्थित हुए और उन्होंने चन्द्रशेखर जी का यह संदेश उच्चारण किया- No one to worry about me-very happy-(bow gone alısolutely cold.) It was time for me to go. No doctor's could save me, Don't worry about doctor's mistakes. It is natural to grieve but if one grieves unnaturally, it grieves those for whom one grieves. Hindu professor dealing in dead languages. अर्थात मेरी कोई चिन्ता न करो ! मैं बहुत खुश और अच्छी तरह हूँ। मेरा यह काल नियत था । डाक्टर नहीं बचा सकते थे, उनको ग़लतियों की चिन्ता मत करो। तुम्हारे अधिक शोक करने से मुझे शोक होता है । यह सन्देश हिन्दू प्रोफेसर के लिये है जो मुदा- जबानों को पढ़ाते हैं" । इन बचनों से यूँ प्रतीति होती है कि मरने से पहले ही चन्द्रशेखर जी यह कहने लगे थे कि मैं अब बिलकुल अच्छा हूं। और उन्हेंा ने मुसकराते हुए मौत का सामना किया था। मरने के पीछे इनके इलाज के भूल की चिन्तो भी यहां सबको बहुत दुख देती रही है। मरने से पहले मब को दुखी देख कर यह भी कहते थे-दुखी मत हो तुम्हारे दुख से मुझे दुख ६८

पितृ विद्या का एक उदाहरण
होता है ॥ मुरदा ज्ञ बानों के पढ़ाने का मज़ाक़ यह पहले भी
किया करते थे । ली साहव को जो शकल दिखाई दी, उसका
चित्र उन्होंने खेचा जो यहां छपा है ।।
इस चित्र में छोटी मूछे, नाक, आंखें, चोड़ा माथा, असली
शकल से मिलते हैं ।। २७ नवम्बर १९३६ की चिट्ठी में ली साहब
६६

परिशिष्ट-४ लिखते हैं कि उन्हें चन्द्रशेखर जी फिर दिखाई दिये, मगर इतनी जल्दी में कि ली साहब अांखें ही अच्छी तरह देख सके, जिनको देखकर यह प्रतीति होती थी कि चन्द्रशेखर जी आश्वासन दिला रहे हैं । ली साहब लिखते हैं कि फिर अच्छी तरह दिखाई देने पर वह चन्द्रशेखर जी की एक साफ तसवीर खेचकर भेजेंगे और जो संदेश प्राप्त होगा वह भी लिखेंगे ॥ विज्ञान वेत्ताओं की साक्षी से पितृविद्या में विश्वास उत्पन्न होकर चित्त को आश्वासन होता है १०४

मृत्यु शोक की शान्ति

Author
Lakshhmiidhara
Title
Mrxtyu Shok Kii Shaanti
File name
मृत्यु शोक की शान्ति
Text
OCR done
Published
2005/07/25
Publisher
Chandra Printinga Presa, Dehalii
Language
Sanskrit
Pages
107
Library
University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
Classification
RELIGION THEOLOGY
DLI number
477309
Barcode
99999990173151.00
Scanning centre
C-DAC, Noida
Digital publisher
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मृत्यु शोक की शान्ति