Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Shripaal Raja Ka Raas(sachitra)
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श्रीरसरतरगच्छगगनागणनभोमणि आचार्यवर्य श्रीजिनचद्रसूरीश्वराशावर्ती कविशेखरामहोपाध्याय श्रीजिनहर्पजी गणित श्रीपाल राजाका रास. (सचित्र) संपादक व संशोधक- श्रीखरतरगच्छनायक क्रियोद्धारक शासनप्रभावक श्रीमोहनलालजी महाराजके प्रशिष्यरल व अनुयौपानार्य पंन्यासप्रवर. श्रीमत् केशरमुनिजी महाराज- प्रकाशक उक्त पन्यासजी महाराजकेही उपदेशद्वारा समाप्त अनेकगृहस्थोंकी द्रव्य सहायसे श्रीजिनमतस सवेरी-मूलचंद हीराचंद भगत "निर्णयसागरयत्रणालय" कोलभादलेन २६-२८ नवरमे रामचन्द्र येस शेडगेवाला सर्दिक सपके प्रकाशित किया। विक्रमसव १९ कीमत १-०-० वीरसक्त २४६३ S
३१
शा
०
खिमाजी
छगनलाल
,
चूडा
.
२५
श्रीपाल.
AL
द्रव्यस०
शुभ नाम
रास
॥२॥
द्रव्यसहायकोंके शुभ नाम-
४२५ शा० ताराचंदजी तगाजी, चूंडा, मारवाड.
५० शेठ, मूलचंदजी सोभागमलजी फलोधीवाले, मुंबई.
१०१ शा० छोगमलजी नथाजी, चूंडा.
४१ शा० मोतीजी उदाजी, पादरली, मारवाड.
१०१ झवेरी-केसरीचंद कल्याणचंद, सुरत,
१०१ शा० जीताजी खुमाजी, कवरारा, मारवाड.
२५ शा० जेरूपजी लखाजी, चांद्राई.
१०० शेठ किसनलालजी संपतलालजी लूगावत, पाली, मारवाड.
२५ शेठ फतेचंदजी सीहाल, पाली, मारवाड.
५१ शेठ गणेशमलजी सोभागमलाजी, मुंबई.
२५ शा० शिवाजी वाघाजी, खिवाणदी
५१ शेठ भीमराजजी देवीचंदजी, तींवरीवाले, मुंबई.
२५ शा० मोणसीभाइ वीरचंद, कच्छभुज.
५१ शेठ हरखचंद शिवजी, कच्छभुज.
२१ शा० सेसमलजी हंसाजी, पादरली, मारवाड.
५१ शा० भीकमचंदजी नवलाजी, चूंडा, मारवाड.
११ शा० पूनमचंदजी गुलावचंदजी, दूझाणा, मारवाड.
५१ शा० फोजमलजी कपूरचंदजी, शिवगंज.
५ शा० दलीचंदजी नाथाजी, दूझाणा.
५१ शा० केसरीमलजी नरसींगजी, गुडावालोतरा.
५ शा० रतनचंदजी धूलाजी, गुडाबालोतरा.
५१ शा० माणकचंद थावरभाइ (स्वबंधु मोहनलाल थावरभाइके सर ५ शा० फोजमलजी केशाजी, सेवाडी,
णार्थ), कच्छमांडवी.
४ शा० प्रतापमलजी चुनीलालजी.
५१ शेठाणी फूलकुंवरबाई, कलकत्ता.
३ शेठ रिद्धिलालजी, मुउनवाला.
-
॥२॥
समर्पण. श्रीपाल. समर्पण- वावलम्बिसनलंकृत विद्वशिरोमणि शमदमाद्यनल्पगुणगणरतभंडार अनुयोगाचार्य पन्यासमवर परमपूज्य प्रातःस्मरणीय गुरुदेव श्रीमत् केशरमुनिजी महाराज । आपने इस बालकको आचालकालसे निरतर अपने पास रखकर ज्ञानादिक गुणोंमें स्थिर रहने के लिये जो अनुपम प्रयास किया, हरएक वखत विविध प्रकारकी शिक्षाओं द्वारा उन्मार्ग प्रवृत्तिसे बचाया, और पापाणसम हृदयकोमी ज्ञाना- कुरोंसे पल्लवितफर साहित्यसेवाका अनुरागी बनाया, इत्यादि असीम उपकारॉकी स्मृतिमें आपकाही संपादित व सशो- पित और आपके ही अमृतमय उपदेशसे प्रकाशित होता हुआ यह प्रथरत "श्रीपाल राजाका रास" आपही के स्वर्गीय पुण्यात्माको विनय भक्ति श्रद्धापूर्वक विनयभावसे सादर समर्पित है विनीत- आपका चरण सेवक बुद्धि ज - प्रस्तावना. प्रस्तावना- श्रीपाल. रास ॥४॥ NA जगतमें धर्मही एक ऐसी वस्तु है कि-जिसके आराधनसे जीव संसारसमुद्रसे पार हो सकता है । धर्माराधनके विविधप्रकारों में नवपदाराधनभी एक है, जो सबमें प्रधानता पाया हुआ है, उस नवपद्की महिमागर्भित यह श्रीपाल राजाका रास आज पाठकोंके सामने रखा जाता है, जोकि-विक्रम संवत् १६४० के वर्प, पाटण शहरमें श्रीखरतरगच्छगगनांगणनभोमणि शर्बुजयमहात्म्यरास- उपमितिभवप्रपंचाकथारास आदि विविधरासोंफे रचयिता कविचक्रचूडामणि महोपाध्याय श्रीजिनहर्षजी गणिवरका बनाया है। उद्देश-यद्यपि प्रस्तुत रासके शिवाय इन्हिं कविवरने एक दूसराभी श्रीपालरास बनाया है, जो अत्यंत संक्षिप्त है, परंतु प्रस्तुत 'रास'का वाह्य देह अतिविस्तृत या अतिसंक्षिप्त न होनेसे ओलीके दिनोंमें सुखपूर्वक समाप्त किया जा सकता है, एवं कृतिभी वहुत सरल. और भाववाहि रोचक है, इसकी पहली आवृत्ति रायवहादूर बाबू धनपतसिंहजी दूगड मुर्शिदाबाद निवासीने छपवाइ थी, उसमें बहुत अशुद्धियां थीं और टाइपभी कलकत्तेके थे, जिससे वांचने में बडी असुविधा थी और वह प्रति अव मिलतीभी नहीं, इत्यादि कारणोंसे इसकी पुनरावृत्ति छपवानेकी भावना स्वर्गस्थ पूज्य गुरुदेव के हृदयमें जागृत हुई। तत्पश्चात् छपी हुई प्रति परसेही यथाशक्ति संशोधन करके प्रेसकॉपी तयार करवाई, बादमें एक प्रति हस्तलिखित बीकानेर निवासी इतिहासप्रेमी साहित्यसेवक सुश्रावक अगरचंदजी नाहटा द्वारा मिली, जोकि ज्यादा अशुद्ध नहींथी, उसके आधारपर कॉपीका संशोधन किया गया और पूज्य गुरुदेवकी देखरेख मेंही रास छपभी गयाथा, सिर्फ प्रस्तावना तथा ओलीकी विधि एवं चित्रादिका काम बाकी श्रीपाल. प्रस्तावना. रहाथा, इसके पिचारमें एन अन्यान्य कार्यकी व्यग्रतामें कुछ टाइम निकल गया, इतनेमें "श्रेयांसि बहुविनानि" इस नियमानु- सार संवत् १९९३ के कार्तिक शु०६ के रोज परमपूज्य गुरुदेवका अकस्मात् स्वर्गवास होजानेसे इसके प्रकाशनमें अधिक विलंय हुशा । पहले विचार यहथा कि-कठिन शब्दोंके अर्थ टिप्पनीमें देदिये जॉय और पहले फारममें कियाभी वैसाही, परंतु सयोगकी प्रतिकू- लताके कारण आगे वैसे न करके केवल मूलही उपवाया है। स्थलसफोचके कारण कविवरका परिचय यहा नहीं दिया गया जाननेकी अभिलापावाले वाचक गण देवचद लालभाइ जैन पुस्तकोतार फड सुरत द्वारा प्रकाशित "आनदफाव्यमहोदधि" मौक्तिक चोयेकी प्रस्तावना आचार्य श्रीबुद्विसागरसूरिजी लिखित, तथा मोहनलाल दलीचद देसाइ सोलीसिदर लिखित "गुर्जर कविओ" नामकी पुस्तक देसले। इसके प्रकाशनमें पूज्यपाद प्रातःस्मरणीय स्वर्गस्य गुरुदेवके अमृतमय उपदेशसे जिन जिन महानुभावोंने उदार चित्तसे द्रव्य सहा- यता देके अपनी न्यायोपार्जित लक्ष्मीको सफल करी है, जिनके नाम टाइटलपेजके मुखपृष्ठपर दिये गये हैं, उन सबको यहा धन्यवाद दिया जाता है, अन्य धनवानोंकोभी ऐसे साहित्यसेवाके शुभकार्यमे इनका अनुकरण अवश्य करना योग्य है। अतमें यद्यपि इसका मुद्रण व संशोधन कार्य स्वर्गस्य पूज्य गुरुदेवके करकमलोसे बडी सावधानीके साथ हुआ है, तथापि छानस्थिक खभायानुसार दृष्टिदोपसे या प्रेसके कर्मचारियोंकी गफलतसे जो कोई अशुद्धि दृष्टिगत हो तो सज्जनोंसे नम्र प्रार्थना है कि वे सुधारके पढ़ें। वर्गस्य अनुयोगाचार्य विद्वशिरोमणि परमपूज्य गुरुदेव पन्यासजी-भी १००८श्रीकेशरमुनिजी महाराज इस श्रीपालरासके सपादक व सशोधक हैं अत. उचित है कि उनका कुछजीवनपरिचय करा दिया जाय, इस लिये उनका सक्षिप्त जीवनपरिचय यह आगे दिया जाता है- - श्रीपाल. जीवन- परिचय. ॥६॥ इस ग्रंथके संपादक विद्वत् शिरोमणि अनुयोगाचार्य स्व० पंन्यासप्रवर श्रीमत्केशरमुनिजी महाराजका संक्षिप्त जीवनपरिचय- मारवाड देशकी राजधानी जोधपुरसे दक्षिणमें २० कोशके फासले पर चूंडा नामका एक सुरम्य गाम है, वहांपर वि० सं० १९३२ के माघ वदि अमावसको आधीरातके समय शुभलग्नमें आपका जन्म हुआथा, पिताका नाम शाह रतनाजी एवं माताका नाम रंभादेवी था, आपका खुदका नाम गृहस्थपनमें केसरमलजी था, बाल्य अवस्थासे ही ज्ञानाभ्यास तथा धार्मिक क्रियाओंकी तरफ रुचि अच्छी थी। संवत् १९४६ में आप मुंबई आकर व्यापारमें जुडे और थोडेही दिनोंमें अपने बुद्धिवलसे व्यापार क्रियामें कुशलता प्राप्त करके एक सराफी दुकान उपर भागीदारीमें स्वतंत्र व्यापार करने लगे जिससे आर्थिक लाभ अच्छा होने लगाथा, इधर मुंबईमें सबसे पहले संविज्ञसाधुओंका विहारद्वार खोलनेवाले शांतस्वभावी जगत्पूज्य शासनप्रभावक खरतरगच्छगगनांगणदिनमणि क्रियोद्धारक श्री १००८ श्रीमोहनलालजी महाराजका पधारना मुंबईमें पहले प्रथम संवत् १९४७ में हुआ, व्याख्यानादिमें आते जाते केसरमलजीको महाराजसाहेबका कुछ परिचय हुआ त्योंही कुछ वैराग्यवासनाभी प्रगटी, जबकि १९५१ के वर्ष दूसरी वख्त महा- राजसाहेबका पधारना मुंबईमें हुआ तबसे महाराजजीके परिचयमें केसरमलजी विशेप आने लगे, ज्यों ज्यों अधिक परिचय होता गया त्या त्यों आपकी धार्मिक रुचि बढने लगी, वह इतनेतक बढी कि जो इस असार संसारको सर्वथा त्यागकर दीक्षित होजानेकी भावनामें परिणत होगइ, परंतु वह भावना मुंबइमें सफल होनी मुश्किलथी, कारणकि- सगे संबंधी भाइ बंधु आदि तमाम कुटुंबियोंकी मौजूदगीमें मोहनीयकर्मकी प्रबलतासे अनेक विघ्न आनेकी संभावना थी, अतः आपने अपनी भागीदारीका फैसला पहले करलिया, बादमें परम- " परिचय- १.०८ श्रीमोहनलालीमा मानोगे नासा रतलामीदपर्शियांगरोद गागमें गगागोदी विमान firmriter गजमुनिजी महागारे तुम हमने पिरम 10 गुनगवी १९५२ दरार दिली १९५३ भापारमुर परमीभतिफो Marरी भौर पूगार गारमोहनलालजी महाराणी माशागार श्रीहेममुनिजी महागाफे शिष्य बने । माग रतलानमा, Tीगार राजमुनिती मागापी अध्ययन शुरू किया, Tमशः प्रतिगमणाली पूरेदी गई, मिना चौमासा पीया गुरु धीमान रातमुनिजी मदागरफे माय सावटी (मारयाग)में था, सारण पराग,पीनामा गरे यार मदागारादेवी शामे आपने विहार किया और आमरायार पधारफर पूरीश्रीमोहनलालजी पदागोगो मामागे परिनिया, पदापर गर्ग पूरा मार्ग त्रीजिनयशासूरिजी, उसपरो श्रीमारयशो- निती मदागा भाग्ने पदभार गोगोदहन किये और पेयापुरने ही महागतरे गुभाइयाने आपसीपी दीक्षा हुइ । Hinा पीनामा सरमदायादम र श्रीमार गशोमुनिजी महाराज भारिफ सायम और पौधा पायाँ गोगासा जाम- नगर । र श्रीदेवमुनिती ग सागमें हुमा, इगनेराफर्म व्याकरणारिया अभ्यास भापके ठीक होगयाया, यहीवर आपने फ पर गुपोषिरा धागा पापणी गुरु सरीसी, एट्ठा माायाँ चौमामा सुरत-मुंपईभे महाराज साहेपो साथ हुआ, मोदी पामीर TRY अपाया, मग माय फजूल पातपीक आदि अपचम प्रगृत्ति फगयी, अत• दिनोदिन अभ्याम पा, मोदी यांग मारमा पद्रिका गया सिमांत कौमुदी, गायमें सर्फसमा गुमायती राया सागदावरी आदिप शोर मामिलामी भरमा माछिया।
श्रीपाल. जीवन- परिचय संवत् १९५९ का मुंबईका चौमासा पूरा हुए वाद महाराजसाहेबकी आज्ञासे पंन्यासजी श्रीमान् यशोमुनिजी महाराज आदि ८ साधुओंने मारवाडकी तरफ विहार किया उनमें आपभी शामिलथे, संवत् १९६० का चौमासा गुरुदेव श्रीमोहनलालजी महाराजकी आज्ञासे अन्य दो साधुओंके साथ आपने शिरोहीमें किया, यह सबसे पहला स्वतंत्र चौमासा आपकाथा, इसके बाद प्रायः अधिकांश चौमासे आपके स्वतंत्रहीं हुए। आपंकी व्याख्यान शैली बहुत प्रशंसनीयथी, हरएक वस्तुका प्रतिपादन करतेहुए इसतरह भिन्न भिन्न करके समझातेथे कि मूर्खसे मूर्खभी वस्तुस्वरूपको भलिप्रकार समझ सकताथा। वादशक्तिभी ऐसीहीथी, प्रश्नकार चाहे जैसे जटिल प्रश्न क्यों न करले, परंतु आपकी तरफसे युक्ति व प्रमाण पूर्वक ऐसा उत्तर मिलताथाकि-जिससे प्रश्नकारको आगे कुछ बोलनेका अवकाशही नहीं रहता, लेखन कलाभी कुछ कम नहीथी, इस बातकी सावीतिके लिये आपके बनाये ग्रंथ प्रश्नोत्तरविचार, प्रश्नोत्तरमंजरी, हर्षहृदयदर्पण आदि' विद्यमान है, जिनका प्रत्युत्तर युक्ति व प्रमाण पूर्वक आजतक किसीसे नहीं दिया गया, इसप्रकार आपकी योग्यताके कारणही खरतर गच्छकी वर्तमान संविज्ञशाखाके प्रथम आचार्य श्रीमान जिनयशःसूरिजी उसवख्तके पंन्यासजी श्रीयशोमुनिजी महाराज कि, जिनका फोटु इसी पुस्तकमें आपकी दहेनी तरफ दिया गया है, उन्होंने संवत् १९६६के वर्प लश्कर (गवालियर) में भगवती पर्यंत सूत्रोंके योगोद्वहन कराके आपको गणिपद तथा पंन्यास पदसे अलंकृत कियेथे, उन्हि पूज्य गुरुदेवके साथमें आपने सम्मेत शिखरजी आदि तीर्थोकी यात्रा करीथी आपने चालीस वर्पसे कुछ अधिक समयतक निर्मल चारित्र पाला, इस दीर्घकालीन श्रामण्य पर्यायमें कच्छ दक्षिण और पंजाबके शिवाय प्रायः सभी देशोंमें ज्यादा कम आपका विहार हुआ है, आगे लिखे जानेवाले स्थलोंमें आपके चौमासे इस प्रकार हुए हैं- 5 जीवन- परिचय. श्रीपाल. रास रतलाम २, सादडी १, अहमदाबाद १, जामनगर २, सुरत ५, मुबई ३, शिरोही १, जोधपुर २, पाली ३, बीकानेर १, लश्कर- (गालियर) १, कलकत्ता २, चालुचर (मक्सुदावाद) १, विहार (पावापुरी) १, लखनौ २, दिल्ली १, चूडा (स्वजन्मभूमि ) ५, अगवरी २, गुडावालोतरा १, आहोर १, वरदरा १, पादरली १, पालीताणे १, इनमेंसे स० १९५९ का और स० १९९२-९३॥ के अतिम चौमासे मिलके फुल ३ चौमासे आपके मुंबइमें हुए । पिछले तीन वाँसे आपको लीवरका दर्द लागु पडाथा, जिससे ज्यादा व्याख्यानादि आपसे नहीं बनताथा, तोभी इस गत चौमासे के अंदर दूसरे भादवेमें ८० दिनसे पर्युपण करनेवालोंके आपसमें जय शनि-रविश झघडा ऊठा तव आपने तो कल्पसूत्रके "अंतरावि यसे कप्पइ, नो से कप्पड़ तं रयणि उवाइणावित्त" इस वचनानुसार पचासके अदर ४९ दिने पहले भादवेमें यद्यपि पर्युपण फरलियेथे तथापि गोडिजीमदिरके मेनेजींग टूस्टि श्रीयुत मणिलाल मोहनलालभाइ आदि आगेवानोंके ३-४ वरत आकर अत्यत आग्रह फरनेसे सघर्म शाति रहनेके लिये मगलनिमित्त कल्पसून वाचकर सुनानेके वास्ते गोडिजीमें तथा सेड रोडके उपाश्रयमें अपने शिष्या- दिको भेजनेशी एव समयपर अपने खय पधारनेकीभी जो उदारता वापरीथी उसीका यह नतीजाथा फि-सघमें यत्किंचित्भी शाति रहसकी।' इस अतिम चोमासेमें साधारणतया आपकी तबीयत ठीकही रही, ज्ञान पचमीका उपवास किया, दूसरे दिन पारणा मजेसे किया, दुपहरको आहारपानीभी हमेशाकी तरहही किया, किसीको स्वप्नमेंभी यह सयाल नहीं हुआथा कि-आजही आप इस देहके सवधको सदाके लिये छोउदेंगे, परतु भाविमें जो होनेकोथा यह मिथ्या कैसे होसके, यस उसी दिन याने सवत् १९९३ कार्तिक शुछ ६ शुक्रवारके दिनको सया दो बजे अकस्मात् हार्ट फेल होजानेसे देखते देखतेही पायधुनी-महावीर जिनालयके पिछले मडोवर खरतरगच्छके उपाश्रयमें इस +4
श्रीपाल.
जीवन-
परिचय.
॥१०॥
विनश्वर शील औदारिक शरीरको त्यागकर आप स्वर्गको सिधारगये, बस फिर क्या कहनाथा, यह दुःखद समाचार थोडीही देरमें
विजलीके वेगसे आखी मुंबई में एवं तारद्वारा अन्यत्रभी सब जगह फैलगये, उसी समयसे दर्शकोंकी जो भीड शुरु हुइ वह रात्रिको
११ बजेतक एवं दूसरे दिन सवेरे पांच बजेसे ९ बजेतक एकसरखी लगी रही।
सप्तमीके दिन आपके देहको वालफेश्वर लेजानेके लिये ठीक ९ बजे हजारों मनुष्योंकी मेदिनीके साथ संस्कार यात्रा निकाली गयी,
रस्तेमें कइ फोटु लिये गये, एक अमेरिकन तो गिरगामसे साथ हुआ सो वालकेश्वर संस्कारभूमितक पैदल चला, रस्तेमें ५-६ फोटु उसने लिये,
अंतमें फोटु लेनेमें किसी तरहकी रुकावट न करनेकी बावत संघका महान् उपकार मानता हुआ १० रु० धर्मादे में देकर अपने स्थानको गया ।
ठीक ११ वजे आपके देहको लेकर सब लोक वालकेश्वर बाणगंगाके पास समुद्रके किनारे हिंदुस्मशानभूमिमें पहुंचे, वहां योग्य
स्थानपर हजारों मनुष्योंके समक्ष केवल चंदनसे आपका अग्निसंस्कार किया गया, उस दिन मुंबई के बहुतसे बाजार बंध रहेथे ।'
आपहीने इस ग्रंथका संशोधनादि किया है अतः पाठकोंकी जानकारीके लिये आपका कुछ जीवन परिचय देना उचित समझा गया,
तदनुसार जो कुछ बना यथा ज्ञात जीवनपरिचय यह उपर दिया गया है, स्थलसंकोचके कारण हालतो इतनेसेही विराम लेताहं, इति शम् ।
संवत् १९९३, मौन एकादशी
महावीर जिन मंदिर, मंडोवर खरतर अनुयोगार्य-श्रीमत् केशर मुनिजी गणिवर चरणाज चंचरीकांतेवासि
उपाश्रय, पायधुनी, मुंबई.
बुद्धिसागर
नम्र प्रार्थी-
-
॥१०॥
श्रीपाल.
रास
स्तुत्यष्टक.
1933
॥११॥
कमित्वलब्धिसपन्न श्रीमछब्धिमुनिजी महाराज रचित समराधित पञ्चप्रस्थानमयसूरिमन्न श्रीखरतर गच्छकी वर्तमान सविज्ञशाखाके आधाचार्य
श्रीजिनयशासूरीश्वर स्तुत्यष्टक-
परतरामलशिष्टगणार्चित, खरतराख्यगण सुतपस्विन । सुविहिताप्तजिनेश्वरमार्गग, प्रवरसरियशःसुगुरु स्तुवे ॥ १॥ मरधरस्थितयो-
धपुरोपण, ततवरौशकवशविभूषण । करकुंनन्दकुवत्सरजन्मका, प्रवरसरियशःसुगुरु स्तुवे ॥ २ ॥ स्वजनकार्पित जेठमलाभिध, स
चतुरकुररसरदीक्षित । खगुरुदत्तयशोमुनिनामक, प्रवरसूरियशःसुगुरु स्तुवे ॥ ३ ॥ सुमुनिमोहनमोहनशिष्यक, प्रचनाष्टकमातृविशोभित ।
निमलपयमहाप्रतधारक, प्रवरसरियशःसुगुरु स्तुवे ॥ ४ ॥ समययोगसुयोगविधायक, गर्जशरोककुवत्सर पं० पद । सकलसूत्रविदं मुनिसत्तम,
प्रवरसरियश:सुगुरु स्तुवे ॥ ५ ॥ संगरसाककुसूरिपद गत, प्रवरसूरिगुणौवविशोभित । प्रशमशान्तदमञ्च जितेन्द्रिय, प्रवरसूरियशःसुगुरु स्तुवे
॥ ६ || गतरूपायमदाश्रनगारव, सकलजीवनिकायरिपालक । खरतर दशधा यतिधर्मप, प्रवरसूरियश:सुगुरु स्तुवे ॥ ७ ॥ खमुनिवेदैविधौ
चरमाईत , शिनपरिनितभूमितले यरे । अनशन प्रनिधाय दिन गत, प्रपरसूरियश:सुगुरु स्तुवे ॥ ८॥ पठति य. सुगुरोरिदमष्टक, प्रतिदिन
शुभभावनया भनी । वमनइच्छितमन परन च, स लभते परकीर्तियश सुखम् ॥ ९॥
॥११॥
स्तुत्यष्टक. श्रीपाल. ॥१२॥ कवित्वलब्धिसंपन्न श्रीमल्लब्धिमुनिजी महाराज रचित वादिगजकेसरी विहितसकलागमयोगानुष्ठान अनुयोगाचार्य पंन्यासप्रवर श्रीकेशरमुनिजी गणिवर स्तुत्यष्टक- यस्याभवन्मरुधरस्थसुरम्यचूण्डा-ग्रामे मुनेः करें-गुणा-इंशशाङ्क वर्षे । जन्म प्रशान्तबदनस्य जितेन्द्रियस्य, पन्यास केशरमुनिः सुगुरुः स जीयात् ॥ १ ॥ यो मालवस्थितजनाकुलवाङ्गरोद-ग्रामेऽग्नि-वाणे-खंग-भूमिगृहीतदीक्षः । वैराग्यरङ्गसुतरङ्गितभावतोऽभूत्, पन्यास केशरमुनिः सुगुरुः स जीयात् ॥ २ ॥ योऽभूलसत्खरतरामलशिष्टिरक्तो विद्वद्वरः सुविहितोऽवर्गमैक्रियावान् । श्रीआर्य मोहनमुनिप्रवरप्रशिष्यः, पन्यास केशरमुनिः सुगुरुः स जीयात् ॥ ३ ॥ पन्यासयुग्गणिपदं प्रवराय गोप-दैछे शरीर-रस-नन्द-शशाङ्क वर्षे । यस्मै प्रदायि गुरुणा प्रविधाप्यः योगान्, पन्यास केशरमुनिः सुगुरुः स जीयात् ॥ ४ ॥ येनाहतीयसमये कथितं यथार्थ-सत्यस्वरूपममलं मुनिना प्रदर्य । स्पष्टीकृतः प्रबलसाग- रिकप्रपश्चः, पन्यास केशरमुनिः सुगुरुः स जीयात् ॥ ५॥ विद्वत्तयोर्जितकुपक्षगणानिरस्यों-हच्छिप्टिकृत्खरतरीयगणोऽखिलोऽपि । वाचंयमेन च जर्जागरितो यक्केन, पन्यास केशरमुनिः सुगुरुः स जीयात् ॥ ६ ॥ प्रश्नोत्तरादिबहवो रचिता वरिष्ठा, ग्रन्थाः शिवार्थिभविवोधकरण येन । सत्पञ्चदुर्धरमहाव्रतधारकेण, पन्यास केशरमुनिः सुगुरुः स जीयात् ॥ ७ ॥ संवद्गुणौङ्कखर्गभूमिसमे च मुम्बा-पुर्या सुरालयमगात्सुसमाधिपूर्व । ध्यायँश्च पञ्चपरमेष्ठिनमस्कृतिं यः, पन्यास केशरमुनिः सुगुरुः स जीयात् ॥ ८ ॥ सद्बुद्धिदं गुरुगुणोधपवित्रितं यः, श्रद्धालुरष्टकमिदं प्रपठेत्सदैव उत्पद्यते झटिति सुव्रतरत्नलब्धि- श्रीबुद्धिसागरतरङ्गगणश्च तस्य ।। ९ ।। (१) ज्ञान । (२) पुरे। ** प्रकटीकृतः। (३) प्रवल। (४) निराकृत्य । (५) सावधानीकृतः । (१) लक्ष्मी। में O ॥१२॥ Seos: आज्ञा
श्रीपाल.
॥ ९३ ॥
सीपाभणी, आले निरमल हार।सा० पहियों कंठे मोहन करे,जाये जिहांजाण हार, सा० पु०
॥१०॥सा० हार तणी महिमा कही, सुर पहुंतो निज ठाण । सा० कुमर गयो कुंडलपुरे,
पहिरी हार सुजाण, सा० पु०॥११॥सा० रूप रच्यो वामन तणो, गयो अखाडा साज।सा०
भणिवा पाठक !तुम्ह कने, हूं आव्यो छू आज, सा० पु०॥१२॥सा० वीणा कला मुझ
सीखवो, मुझने पिण छे हूंस।सा० राजकुमरीने रीझवू, नांखुंमगज विधूंस, सा० पु०॥१३॥
सा० नृप नंदन हड हड हस्या, बोल्यो वामण साच । सा० हूंस करे वरवा तणी, किहां
कंचण किहां काच, सा० पु० ॥१४॥सा० राय कुमर आवो मिली, माहरे पासे आज। सा०
राजकुमरि तेड्या सहू, नाद परीक्षा काज, सा० पु०॥१५॥सा वामण पिण साथे गयो, राज-
कुमरि आवास । सा० ढाल ए उगणचालीसमी, कही 'जिनहरष उल्लास, सा० पु०॥१६॥
दहा-वीणासुर सहुए कर्यो, तंतउतार्या रागापिण किणहीना नादसु, कुमरीचित्त नलाग
॥९३॥
श्रीपाल. ॥९४॥ ॥१॥ वीणा मांगी वामणे, आपे कुमरी अचंभ। आरंभ कीधो नादनो, थंभ्या सहु जिम थंभ ॥२॥सहु को देखेवामणो, नृपकन्या श्रीपाल। कुमरीवर वरवा भणी, कंठ ठवी वरमाल ॥३॥ रूप अनूप कीयो प्रगट, चंपापति तिण वार । मकरकेतुमनहरखसुं, परणावीयो कुमार॥४॥ आप्या कंचण मणिरयण, आप्यावर आवास। कुमर तिहांसुख भोगवे, वारूलीलविलास ५ ढाल ४०मी. देशी "प्यारो प्यारो करती" एहनी-एक दिन रमवा नीकलीयो,वाटे एक पंथी मिलीयो।कुमरे परदेसी कलीयो, पूछे अचरिज अटकलीयो होलाल॥१॥कहो पंथी! किहां जासो ?, किहांथी आया मुझ भासो। दीठो कोई तुम्हे अवल तमासो, मुझ आगलि तेह प्रकासो होलाल,क०॥२॥पंथी कहे चतुर सुजाण!, कुंडनपुर नयर मंडाण।आव्यो तिहाथी सुप्रमाण, जाइस हूं पुर पैठाण हो लाल, क० ॥३॥ कणयापुरमांहे आयो, राजा विजयसेन कहायो।राणी कनकमालामन भायो, जिणे पुन्य थकी सुख पायो होलाल,क०॥४॥ त्रैलोक्य- ॥ ९४॥ ,
श्री
पा
रा
जा
का
रा
म
बुडलपुर नगरमे वीणानादके
घादमें जीतजानेपर गुणसुंदरी राज
पुत्रीके साथ होता हुआ श्रीपालजी
फा विवाद दृश्य।
(पनाक ९४)
AN
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रास. श्रीपाल ॥ ९५॥ सुंदरी तसु बेटी, जाणे रूप कला गुण पेटी। पासे रहे सुंदर चेटी, मननी आरति जिणे मेटी हो लाल, क० ॥५॥ कन्या थई जोवनवंती, दीठी बापे मलपंती। वर जोग्य थई गुणवंती, सरिखे पूगे मन खंती हो लाल, क०॥६॥ सयंवर मंडप मंडाउं, सहू देसाधिप तेडाउं । इण सरिखो जो वर पाउं, तो बेटीने परणाउं हो लाल, क०॥७॥इम चिंतवि चित्त मझारा, मंडप रचीया विस्तारा।जगमाहे नर सिरदारा,आव्या लेई परिवाराहो लाल,क०॥८॥बत्रीस जोयण इहांथी थाये, काल्हे वरिस्येमनभाये। सीपो सांभलि तिहां जाये, पंखी जिम गयण पुलाये हो लाल,क०॥९॥ कणयापुर मांहे आयो,खुंधानो(कुज)रूप वणायो।अचरिज़ देखण ऊमाह्यो, देखी मंडप सुखपायो होलाल, क०॥१०॥प्रतिहार न ये पेसेवा, हथसंकलो दीयो देखेवा आयो जिनहरख' वरेवा, चालीसमी ढाल कहेवा हो लाल, क० ॥११॥सर्व ६९३ दूहा-पूठभाग ऊंचो घणो, ऊर सांकडोप्रदेस।ऊंची नीची नासिका, माथे कपिला केस श्रीपाल. ॥ ९६॥ , , ॥१॥पूठे ढूबड कूबडो, मोटो माथी जास।दांत गदहडा सारिखा, तेहवा दांतऊजास॥२॥ कोटगली वांकी नली, पिंजर नयन विसात । लाल पडे होठ लडवडे, इसो बणायो गात ॥३॥राजहंस सम राजवी, बेठा करे कलोल । काग सरीखो कूबडो, आवी उभो लोल॥४॥ ढाल ४१ मी.देशी श्रीचंद्रप्रभुप्राहुणोरे" एहनी-कहोखूधा! नरपति कहे रे,किम ऊभा? इहां आज रे। जिणे कारणे बेठा तुम्हे रे, ऊभो छु तिणे काज रे, क० ॥१॥हड हड हसीया राजवी रे, रूप बण्यो वाह वाह रे!! तुझ सरिखो वर किहां मिले रे, एहवां राजवीयां मांह रे, क० ॥२॥ कन्या नरवाहन चढी रे, स्वयंवर कीधो प्रवेस रे। ढोल दमामा वाजीया रे, सखर बणाव्या वेस रे, क०॥३॥श्रीपाल रूप मूलगो रे, देखे कन्या तेह रे।प्रमुदित चित्त थयो घणो रे, लागो निविड सनेह रे, क०॥४॥तीखे नयणे ताडिने रे, जोवे वारंवार रे। चुंबक लोह तणी परे रे, मन मिलीयो तिणवार रे, क० ॥५॥ प्रतीहारी आवी हिवे रे, ॥ ९६॥ . , श्रीपाल ॥ ९७॥ लाल छडी ले हाथ रे । स्वयंवर विचमें माल्हती रे, राजकुमरी करि साथ रे, क० ॥६॥ राजवीयांने ओलखे रे, जाणे देस विदेस रे।वंस तणी विरुदावली रे, संभलावे सुविसेस रे, क०॥७॥छोडि चली सहु राजवी रे, जिम भाद्रवडे (भाद्रवे)छाण रे।थांभा पूतलीने मुखे रे, देवतणी थई वाण रे, क० ॥८॥तथाहि-"यदि धन्यासि विज्ञासि, जानासि च गुणांतरं। तदैनं कुब्जकाकार,वृणु वत्से! नरोत्तमं॥१॥" देवतणीवाणी सुणीरे, कुब्जगले वरमाल रे। घाली कन्याये वर्यो रे, मूंकी सहु भूपाल रे, क० ॥९॥धडहडीया कोपे करी रे, मानी नर मूंछाल रे।कहता रेरे!! कूबडा!रे, मेल्हे परि वरमाल रे,क०॥१०॥क्यां मूंकां जीवतोरे, नहीं तो कांजमलोकरे।राजसुताने कारणे रे, काइ मरेतूं फोकरे,क०॥११॥काइ अदेखा राजवी! रे, कांइ वडो करो रोस रे । रूप न पाम्यो जो तुम्हे रे, तो केहनो कहो दोस रे, क० ॥१२॥ नाक तणा मलनी परे रे, तुम्हने तज्या इणे बाल रे। आदरमान देई घणो रे, ॥ ९७ ॥ , श्रीपा रा.
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श्रीपाल.
,
मुझ कंठे ठवी वरमाल रे, क० ॥१३॥भाग्य विना नवि पासीये रे, रायसुता सुकुमाल रे।
कहे 'जिनहरष' मषी (लखी) जिस्यो रे, इकतालीसमी ढाल रे, क०॥१४॥ सर्वगाथा७११॥
दूहा-एहवा वयण सुणी करी, भड भडीया भूपालामारोमारो कूबडो, पाडील्यो वरमाल
१ इस कही ऊठ्या मारवा, खूधे देखाड्या हाय। कायर थई नासी गया, मांडे कुण भारथ २
खूध पराक्रम देखिने, विजयसेन राजाना तवयोल्यो बछ! आपणो, प्रगटो रूप वलवान ३
रूप कीयो निज भूलगो, जाणे अभिनव कामराजारलीयायत थयो, कुमरी सम वर पान ४
परणावी नृप अंगजा, उच्छव' करी अपार । सुंदर मंदिर आपीया, रयण कणय सिणगार ५
सीपो वर सुंदर प्रवर, त्रैलोक्यसुंदरी नार । जोडी जोडी सारिखी, हूंस हुइ किरतार ॥६॥
डाल ४२ मी. देशी “वाळूरे सवायोवयर हूं माहरो रे" एहनी- रायसनाये आव्यो चर
एकदा रे, कहे निसुणो श्रीपाल! देवक पट्टण धण कंचण भर्यो रे, राय तिहां धरापाल, रा०
॥ ९८॥
श्रीपाल.
॥९९॥
॥ १ ॥गुणमाला गुणमाला रागिणी रे, तेहने पुत्री रे एक । शृंगारसुंदरी जाणे सुरसुंदरी
रे, जाणे विनय विवेक, रा०॥२॥श्रीजिन सासनना प्रवचन तणो रे, जाणे सयल विचार।
पंचसखी छे ते पिण तेहवी रे, मांहो माहे प्यार, रा०॥३॥प्रथम पंडिता १ वीजी नाम
विचक्षणा २ रे, प्रगुणा ३ निपुणा ४ छेक। तिम दक्षा ५जाणो सखी पांचमी रे, तन जूआ
मन एक, रा० ॥४॥ पांच सखी आगल कहे कुमरी रे, जे नर जिनमत जाण । ते वर
वरवो आपणने सखी! रे,श्रीजिन आण प्रमाण, रा०॥५॥ जेह समस्या रे मननी पुरिस्ये
रे, ते आपण भरतार । पांचे सहाए रे समस्या पद कर्या रे, जिनमत जाणणहार, रा०
॥६॥ एहवी वाणी रे सांभलि राजवी रे, आव्या पंडित जाण। अवर समस्या रे पूरवे ते
सहू रे, पिण मन भाव अयाण, रा० ॥ ७॥ इम ते कुमरी रे रहे छे परखती रे, पिण न
मिले संकेत।कुमर सुणीने रे मनमाहे धर्युरे, कुमरी वरिवा हेत, रा०॥८॥ हार प्रभावे रे
॥९९॥
रास. श्रीपाल. ॥१०॥ , आव्यो पाटणे रे, पहूंतो कन्या आवास । सुंदर सहजे रे रूप सुहामणो रे, निरखी हरखी उलास, रा०॥९॥कुमरे पूछयो रे चित्त समस्या कहो रे, निज मन धारी जेह।कुमरी केरी रे प्रेरी पंडिता रे, तव बोलीगुण गेह, रा०॥१०॥समस्या पदं “मन वांछित फल होइ ॥१॥" सखीमुखे ते रे एणे जो कही रे, तो सेमुख (स्वमुखे) कुण काम। हार ठवीने रे कंठे पूतली रे, मुख बोलावे ताम, रा०॥११॥ए किम बोले रे पत्थर पूतली रे, अचरिज लहे नृपबाल। ढाल थई ए बेतालीसमी रे, कहे 'जिनहरष' रसाल, रा०॥१२॥ पुत्तली वचनं यथा- दूहा-अरिहंताइ सुनवह पद, निय मन धरे जे कोइ। निश्चय ते नर नारियह, मनवां- छित फल होइ ॥ १॥ अथ विचक्षणा पठति-“अवर म झंखो आल॥२॥” पुत्तलिका कथयति-अरिहंत देव सुसाहू गुरु, धम्म तु दया विसाल। मंतुत्तम नवकार पर, अवर म झंखो आल ॥२॥प्रगुणा पठति-“करहु सफल अप्पाण ॥३॥" पुत्तलिका भणति- ॥१०॥ 15
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श्रीपाल.
॥१०२॥
,
धन्याजो०।पंच प्रकार विषय सुख विलसे, पुन्यथकी आस्या सहु फलसे जो०॥३॥भाट भणे
आसीस भली परे, चिरंजीवो महाराय कुमर वर जो।अचरिज एक अपूरव दीठो, कोल्ला-
गपुर रिद्धि समृद्धि अनीठो जो० ॥४॥राय पुरंदर जाणे पुरंदर, राणी विजयादे अति सुंदर
जो० । बेटी गुणपेटी जयसुंदरी, रूपे अभिनव रति मति मंदिर जो० ॥५॥कुमरी प्रतिज्ञा
करी रहि थिरता, राधावेध साधे सोई भरता जो । बाप कन्याने काजे तेडाव्या, दिसि
दिसिना देसाधिप आव्या जो०॥६॥ पिण ते किण ही वेधन साध्यो, कुमरी मन उच्छाह
न वाध्यो जो०।भाट भणी बहु दान देईने, कुमर चल्यो निजहार लेईने जो०॥७॥कोल्ला-
गपुर ऊडीने आयो, राधावेध सझी सुख पायो जो० । जयसुंदरि कन्या वर वरीयो, राये
वीवाह सबल आचरीयो जो० ॥ ८॥ दोइ जण झीले सुख सायरमें, सरिखी जोडि मिली
निज करमें जो०।तिण अवसर मामो तेडावे, नर मेल्हीने खबर करावे जो०॥९॥कुमरे
,
॥१०२॥
श्रीपाठ.
॥१०॥
आराहो धुरि देवगुरु, द्यो सुपत्ते दाण । तव संयम उवयारडो, करहु सफल अप्पाण ॥३॥
निपुणा पठति-"जित्तो लिख्यो निलाडि॥४॥" पुत्तलिका वदति-रे मन! अप्पाखंच करि,
चिंत्ता जाल म पाडि। फल तित्तो ही पामीये, जित्तो लिख्यो निलाडि ॥४॥ ततो दक्षा
पठति-"तसु तिहुअण जण दास ॥५॥" पुत्तलिका जल्पति-अत्थि भवंतर संचियो, पुन्न
समग्गल जास । तसु बल तसु मइ तसु सिरि य, तसु तिहुअण जण दास ॥५॥ कुमर
समस्या पूरवी, हरखी कुमरी चित्त । ए वर मुझ पुन्ये मिल्यो, पूरव भवनो मित्त ॥६॥
ढाल४३ मी.देशी “मोती द्योने हमारो, राजिंदा!मोती द्योने" एहनी-राजा सुणि रीझ्यो
चतुराई, ए वर सरिखो मिलीयो बाई । जोइज्यो पुन्याई तणा फल, जोइज्यो पुन्याई,
एआंकणी॥१॥पुन्याईए आवी मिलीयो,जाणे अकाले आंवो फलीयो जो०, पंच सखी साथे
नृपवाला, सीपा कंठे ठवी वरमाला जो०॥२॥राजा परणावी निज कन्या, लोक सहू भाषे ए
॥१०॥
Mo
श्रीपाल.
,
॥१०४॥
महासेन नृप कुमरी, उसीयो अंग भुयंग । तिलकसुंदरी विषभरी, तिण दुख राय भयंग ५
समसाणे ते ले गया, दुख पीडित भूपाल। तुम्ह मिलिवा तिण वासते, नाव्यो अहो कृपाल!६
ढाल४४ मी. देशी “परदेशी यार! मेरी अंखीयांलगी" एहनी-परउपगारी साहसधीर,
समसाणे पहुंतो वडवीर । उपगारी लाल!ताके पाय नमीजे, पाय नमीजे ताकी सेवा कीजे
उ०।ए आंकणी।नयणे मुझ देखालो बाल, ए जीवाडिस हू ततकाल, उ०॥१॥दीठी कन्या
मृतक समान, महामंत्रनो कीधो ध्यान, उ०। कुमरी कंठे ठवीयो हार, ततखिण बेठी थइ
तिणवार, उ० ॥२॥ विष ऊतरीयो निर्विष प्राण, वाज्या हरष तणा नीसाण, उ० । राजा
महासेन हरख्यो अपार, भेट करे मणि रयण भंडार, उ०॥३॥परणावी निज कन्या तेह,
तिलकसुंदरी घणे सनेह, उ० । देव तणी परे विलसे भोग, पाम्या पुन्यतणे संयोग, उ०
॥४॥ आणो करि चाल्यो श्रीपाल, कटक सुभट दल बहुल विसाल, उ० । सैन्य चढाई
C.
॥१०४॥
श्रीपाल. रास. पिण निज पुरुष पठाया, नारी तेडण सैन्य वुलाया जो० । बंधु सहित सहु सुंदरि आई, सेना बहुत मिली मनभाई जो०॥१०॥हयदल गयदल पयदल मिलीयो, चालंतां अहिपति सलसलीयो जो० । सात सायरनो जल झलफलीयो, जाये किणही नहीं बल कलीयो जो० ॥११॥स्थानापुरी नयरी उतरीयो, मातुल निरखी हरख मन धरीयो जो०।मामे करि अभिषेक सुदिवसे, राजा पद दीधो मन हरसे जो०॥१२॥ पुन्य पसाये लह्या सुख ताजा, श्री श्रीपाल थयो महाराजाजो० तेंतालीसमी ढाल वखाणी, कहे जिनहरष' वखतनीसाणी जो०॥१३॥ दूहा-दस दिसि केरा राजवी, आवी लागा पाय। हय गय कंचणमणि रयण, लेई भेट्यो राय १ हिवे श्रीपाल नरेस वर, लेई सैन्य अपार।चाल्यो उजेणी भणी, मिलवां जननी नार२ विचिसोपारेपाटणे,जई दीधो मेल्हाण(डेरो)। परदल आव्योजाणिने, राय मेल्यो दीवाण ३ श्री श्रीपाल नरिंदने, आवी लागो पाय । कर जोडीने वीनवे, स्वामी! करो पसाय ॥४॥ ॥१०॥ .
श्रीपाल. ॥१०६॥ चुम्मालीसमी ढाले थयो सुख्ख,कहे जिनहरष'टल्यांसह दुख्ख, उ०॥१२॥सर्वगाथा ७६५ दूहा-राति रही निय मंदिरे, जाया जणणी लेय। आयो दिन अणऊगते, निय दल माहि वलेय॥१॥प्रात थयो ऊगो दिवस, भाट भणे कल्याण। सेनानी तेडाविने,भासे इणपरि वाण ॥२॥दूत मोकली वेगसुं, राय करावो जाण। कंध कुहाडे आय मिले,जो राखे निज प्राण॥३॥ तो लसकर पाछो वले, रहे ताहरी माम।आण न माने माहरी, तो कर मुझसुंसंग्राम॥४॥ सेनानी चर मोकल्यो, आव्यो जिहां भूपाल। अम्ह स्वामी बलीयो हठी, परतिख वयरी काल ॥५॥ध कुहाडो करि मिले, तोपाछो वले कटक्का नहीं तो गढ ढंढोलस्ये,लेस्ये नगर झटक्क६ ढाल ४५ मी. देशी "बेबे मुनिवर विहरण पांगुर्या रे” एहनी-दूत वयण सुणि उजेणी धणी रे,मनमां कीधोएह विचार रे।सबलांसुंबल मांडीने वृथा रे, कोण करावेलोक संहाररे, दू०॥१॥ कंध कुहाडो करि अवनीपती रे, सनमुख आवीने ततकाल रे। चतुर समयनो ॥१०॥ E रास. श्रीपाल. ॥१०५॥ , कीधी भूपाल, चडत नगाराथइ करनाल, उ०॥५॥देस देसना राये संजुत्त, चलतां माल- वमांहे पहुत्त, उ० । उजेणी आयो श्रीपाल, चर मुख सांभलीयो भूपाल, उ०॥६॥ त्रिण कण कापड जल मांहे लीध, गढ रोहो मालव पति कीध, उ० । सायर वींटी लंका जेम, उज्जैणी वीटी रह्यो तेम, उ०॥७॥ चिंतातुर नगरीना लोक, अधिक उदासी रहे ससोक, उ०।राति पडी तव थयो उजमाल, चाल्यो माय मिलण श्रीपाल, उ०॥८॥समरे निसि- पति जेम चकोर, मेहागम जिम चाहे मोर, उ०। मधुकर आवे मालति दाइ, मयणासुंदरी तिम अधिक सुहाइ, उ०॥९॥सहु अंतेउर तेडी साथ, निर्भय थई पहूंतो घर नरनाथ, उ०। माइ! उघाडो मंदिर वार, तुम्ह सेवक जिम करे जुहार, उ०॥१०॥उलसी मयणासुंदरीनी देह, वाइ! तुम्ह सुत सादज एह, उ० । झटकि उघाड्यां घरना वार, मिलीया माय सुत विरह निवार, उ० ॥११॥ लागी वहू सहू सासू पाय, मयणासुंसगली मिली आय, उ०। ॥१०५॥ .
रास.
श्रीपाल.
॥१०८॥
पहिरी सुंदर चरणा चीर रे।कसमसता कंचू हीये कस्या रे, सोहे भूषण सयल सरीर रे, दूः
॥९॥एक नारी लाजे साजे नहीं रे, ते विणन पडेनाटक रंग रे।मांहो मांहे अबला हाकिने
रे, ऊठाडी तेहने मन भंगरे, दू०॥१०॥नाटकिणी पेठी ते नाचिवा रे, जोवा मिलीया राणो
राण रे। दूहो एक कह्यो तिण अवसरे रे, मनमोहन मुखे मधुरी वाण रे, दू० ॥११॥हो-
“किहांमालवकिहांशंखपुर, किहां बब्बर किहांनट्टासुरसुंदरीनचावीये, दैवेदल्यामरट्ट१"
जणणी बाप श्रवणे दूहो सुणी रे, कुमरी नाचती नयणे दीठ रे। नाटकणी थइ ए सुरसुंदरी रे,
स्युं कीधो ए दैवे धीटरे, दू२ ॥१२॥ सहू को देखी मन विस्मय थया रे, है है !!! जोवो
एहना कर्म रे।ढाल थई ए पेंतालीसमी रे, कहे 'जिनहरष' खरो जिन धर्म रे, दू० ॥१३॥
दूहा-सभा माहि जई कुमरीने, राणी कंठ विलग्गावात असंभव देखिने, दुख भरि रोवा
लग्ग १ राय सुताने पूछीयो, ए स्यो तुझ सरूप।जोई परणाव्यो हुतो, तुझमनमान्यो भूप २
॥१०॥
रास.
श्रीपाल.
॥१०७॥
जाण प्रवीण ते रे, भेट्यो महाराजा श्रीपाल रे, दू० ॥२॥ चंपापति तव आवीयो सामुहो रे,
सुसराने दीधो सनमान रे।कंध कुहाडो दूर नखावीयो रे, वे वेठा पासे राजान रे, दू०॥३॥
संतोप्यो सनमान्यो वह परे रे, मालवपति चिंते मनमाइ रे।पार न दीसे एहनी रिदिनो
रे, एहसुं सरभर कहो किम थाइ रे, दू०॥४॥तात! तुम्हे वर मुझ दीधो हुतो रे, ते पर-
तिख जोइज्यो ए आज रे। कंध कुहाडो जेणे नखावीयो रे, ओलखिज्यो उंवर महाराज रे,
दू०॥५॥मालवपति मनमा विस्मय थयो रे, वपु वपु जोइज्यो अचरिज एह रे।पुन्य सरिखो
जगों को नहीं रे, एहने फलीयो पुन्य अछेह रे, दू०॥६॥ सीपो मयणा निरखी हरखीया रे,
मिलवा आव्या लोक अपार रे।सोहगसुंदरीने रूपसुंदरी रे, मिलिवा आव्यो सहु परिवार
रे, दू०॥७॥श्री श्रीपाल नरेसर तिणि समे रे, दीधो नाटकनो आदेस रे। नाटक वृंद
बुलावो माहरो रे,जोवे सहु नर नारिनरेस रे, दू०॥८॥नाटक आव्यो तिहां मिलि नाचवा रे,
॥१०७॥
श्रीपाल. ॥११०॥ श्रीपालने। दीधा वली हो. नव नाटक वृंद कि, साथे मुझ निहालिने।हि० ॥३॥ में कीधा हो. नाटक बहुवार कि, मयणा पति आगे खडी। इहां देखी हो. माय बाप कुटंब कि, लज्जा दुख सायर पडी। हि०॥४॥ परणावी हो. आडंबर भूर कि, मान घणो मुझ बापनो।सुख सघलां हो. फीटी थयां दुख्ख कि, फल पाम्यो में पापनो। हि०॥५॥मुझ बहिनी हो. मयणा धन धन्न कि, ए सरिखी जग को नही। दुख मिटीया हो. सुख पाम्या एह कि, सील फल्यो एहने सही। हि०॥६॥ कुल खंपणि हो. हूं थई कुलमांहि कि, सहु पापिणिमांहि पापिणी। में सेव्यो हो. बहु भांति कुसील कि, लही कमाई आपणी। हि०॥७॥सी दाखू हो. मुझ कर्मनी वात कि, तुम्ह आगलि हिवे हूं कहु।पातकना हो. पुन्यनामाइ बाप! कि, परतिख फल देखो सहु । हि०॥८॥श्रीपाले हो. अरिदमण कुमार कि, तेडाव्यो आदर करी। धण कंचण हो. आपी भरपूर कि, आपी वली सुरसुंदरी। हि०॥९॥सुरसुंदरी हो. अरि- ॥११॥ - श्रीपाल. । ॥१०९॥ वलतूं सुरसुंदरी कहे, पिता!सुणो मुझवात । परणी चाली कंतसुं, संखपुर नगर दिखात ३ उतरीया तिहांजई करी,रह्यावगडे बहुदीह।साथसहू घर मोकल्यो,बेठारह्या अवीह४ मारो मारो करती तिहां, आवी धाड अपार।नासिगयो मुझनाहलो, मुझ मेल्ही निरधार ५ तिहां झाली मुझ कोलीए,वेची जई नेपाल।मोल देई मालणग्रही, तिणे वेची ततकाल ६ इम वेचाती अनुक्रमे, एक विणजारे लीध । बब्बर देसे जाइने, गणिकाने घरे दीध ७ गणिका नाटक सीखव्यो, हूं थई निपुण प्रवीण । नाटकणी मांहि सिरे, कला ग्रही अकुलीण ८ ढाल ४६ मी. देशी “मोरा साहिव हो" एहनी-हिवे वव्वर हो.नायक महाकाल कि, नाटकनो रसीयो सही। वेश्याने हो. घरे नाटक साथ कि, तेडी तिणे सहू संग्रही। हि०॥१॥ दिन दिन प्रति हो, नाटक नवरंग कि, राय करावे नवनवा।परणावी हो. कन्या निज भूप कि, मयणसेना सुख आलवा। हि०॥२॥धण कंचन हो. भूषण वहु दीध कि, मयणा पति. ॥१०९॥ थोपा रा.
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रास.
श्रीपाल.
॥११॥
दमण कुमार कि, समकित पाम्या निरमलो। पूरवली हो. परे थाप्यो राय कि, मतिसागर
मति ऊजलो। हि०॥१०॥जे हुंता हो. कोढी सय सात कि, रोग गमी ठाकुर कीया।मोटानो
हो. जोवो उपगार कि, निज सरिखा करि थापीया। हि०॥११॥ नव राणी हो. पटराणी
कीध कि, शृंगारसुंदरीनी सखी । पांचे वली हो. चवदे ए नारि कि, विलसे अपछर
सारिखी। हि०॥१२॥ नीसाणे हो. हिवे चलीयोराय कि, चंपा ऊपरि चालीयो। 'जिनहरषे'
हो. एतलो अधिकार कि, ढाल छेतालीसमी कीयो । हि०॥ १३॥ सर्व गाथा ८०५॥
दूहा-कटक सुभटनाथट गरट,मिलीया एका एक।सुसरा साला मावला,रणवावला अनेक
रण रसीया कसीयाजरद, पहिर्या टोप किरीट।बगतर पहिर्या लोहमय, जाणे काला कीट॥२
पाखरीया हयवर प्रघल,मद झरता गजराज गयणंगण छायो गिरद, गोला नाल अवाज ३
इम चलतो चंपापुरी,आव्यो नृपश्रीपाल। भडयुद्धे नासंतांग्रह्यो, अजितसेन ततकाल ॥४॥
॥११॥
श्रीपाल.
॥११२॥
राज लीयो निज भुजवले,बेठोपितातखत्तापामी अनुपम संपदा, मोटो जास वखत्त ॥५॥
लज्जाणो राजा घj, मन धरतो विखवाद।नासंतांमाहरोथयो, लोकां विचे अपवाद ॥६॥
अजितसेन मनचिंतवे, हूं हुओ द्रोही अपार।राजलीयो भत्रीजनो, चिंतवीयो अपकार॥७॥
गोत्र द्रोहथी जस नहीं, नृपद्रोह नीति विणास । बाल द्रोहथी गति नहीं, निण्हे कर्यां
अभ्यास ॥८॥हिवेदीक्षा जो आदरूं,पालुं संयम सुद्धातो छद्रंए पापथी,बेटे करम विरुद्ध॥९॥
इम सुभ भाव विचारतां, चढतांमन परिणाम।ज्ञानावरणी कर्भनो, क्षयोपसम थयो ताम१०
ढाल ४७मी.देशी हीडोलणानी-सुभ भावना मने भावतां.जातीसमरण उतपन्न,दैव वसे
लीयोसंजम. विशुद्ध जाणी रतन्न।सुमति सूधी गुपति पाले. दोष टाले दुष्ट,क्षमा सागर नमत
नागर. चतुर चारित्र करे पुष्ट॥१॥धन धन्न माई!.जे तजे इण परि क्रोध॥ए आंकणी॥महा-
ज्ञानी महाध्यानी. अभयदानी जेह, भविकने उपगार करता. चरण करण गुण गेह । विच-
॥११२॥
SANJARE
अजितसेन राजासे विजय
प्राप्त करके अपने पिताकी राजधानी
चपा नगरीम श्रीपालजी अपने
सैनिकां सहित प्रवेश कर रहे है।
रा
18
का
(पनाक ११२)
le
CHANA
요 4 요셉 A4 용
Y
WAN
yam
काम
अवधिनानी अजिततेन राजऋपि श्रीपालजी व मयणा-
सुंदरी को धर्मोपदश देते हुए पूर्वभवका स्वरूप सुना रहे है ।
( पत्रांक १९३)
JAN
CAMER
रास.
श्रीपाल.
॥११३॥
रता भूलोक ऊपरि.अजितसेन मुणिंद, आवीया चंपा नयरि अनुक्रमे. लोकने थयो आणंद,
ध०॥२॥श्रीपाल सांभली सुगुरु आगम. वांदवा मनरंग, आवीयो आडवरे करि. भाव
भगति अभंग। प्रदक्षिणा त्रिण्हे देइ वंदी. वेठो आगलि राय, देसना इक चित्त निसुणे.
भाषे मुनि निरमाय, ध०॥३॥दोहिलो मानव भव चतुर गति. मांहि भमतां एह, देस आरज
सुकुल उतपत्ति. सुगुरु संग लहेह । तत्त्वरुचि पिण दोहिली तिम, श्रवण आगम वाणि,
धर्म उद्यम छोडि आलस. मानव करे सुख हाणि, ध० ॥४॥धर्मनो संयोग पामी. कीजीये
जिनधर्म, राज्य लीला सकल संपति. धर्मथी सिवसर्म । देसना मुनिराय दीधी. सांभली
चितलाय, राय हिवे श्रीपाल पूछे. कहोज्ञानी मुनिराय!,ध०॥५॥ किणे करमे वालरोगी?.
हुवो किम नीरोग?, रिद्धि पामी एतली किम?. डूंबनो संयोग । केम सायर पड्यो कुसले.
नीकल्यो कहो केम?, नारि परण्यो एह सुंदरि. ज्ञानी पूछयो मुनि एम, ध०॥६॥ मुनि
॥११३॥
रास.
श्रीपाल.
॥११४॥
कहे सांभल तूं नरेसर!. चतुर गति संसार, जीव कर्मे लहे सुख दुख. जाणिजे निरधार
करे जेहवा कर्म प्राणी. तेहवा फलअंत, तिणे तूं हिवे ताहरा नृप!. सांभल कर्म वृतंत,
ध० ॥७॥ इणे भरते हिरण्यपुर वर. सिरीकंत नरेस, श्रीमती राणी जग वखाणी. दया
पाले विसेस । राय आखेटक निरंतर. भमे हणिवा जीव, नारि कहे प्रिय ! जीव हणतां.
पामीये दुख्ख अतीव, ध०॥८॥ बीहता नासे त्रिणा मुखेल्ये. क्षत्रि न हणे तास, वारीयो
पिण कह्यो न करे. व्यसन लागो जास। उलंठ लेई सातसे. इक दिन आहेडे जाय, गहन
वनमें निजरे पडीयो. खीणकाया मुनिराय, ध०॥९॥ हाथ ओघो देखी राजा. कहे चामर धार,
कोई कोढी एह दीसे. सहु कह्योतिणवार। यष्टि मुष्टि करिय ताड्यो. सातसे उल्लंठ, साधुने
इम कष्ट दीधो. चीकणी बांधी गंठ, ध०॥१०॥ मुनि भणी उपसर्ग करीने. मृग हणी सुख
पाय, सात सयां वंठ उल्लंठ साथे. आवीयो घरे राय । वली इक दिन गयो मृगया. एकलो
॥११४॥
रास. श्रीपाल. ॥११५॥ नरनाह, नदीतटे इक साधु दीठो.नाखीयो सलिल अगाह,ध०॥११॥नदीमांहे देखिदुखियो. थयो करुणावंत, नदीजलथी काढीयो मुनि. सुमतिवंत महंत । कह्यो निजकृत नारि आगे. रागिनी कहे एम, अवर जीव न पीडीये तो. पीडीये मुनिवर केम?, ध०॥१२॥ साधु हीला हानि थाये. हास्य रोगीजाणि, निंदा थकी वध बंधना वलि. ताडणादि पिछाणि । इम सुणी काईक हीये आयो. धर्मनोपरिणाम, ढाल सेंतालीसमी एथई. जिनहरष' तमाम,ध०॥१३॥ दूहा-दिवस कितलेके गये, गोखे वेठोभूप।मल भूपित कृशकाय मुनि, दीठो एहवो रूप ॥१॥सीख वयण गयो वीसरी, सेवकने कहे राय।नगर विटाल्यो इंबडे, काढो परोधकाय २ तिणे पुरुषे तिमहीज कर्यो, श्रीमति राणी दीठ। कोपकरी राजा प्रते, निभ्रंछे धिग धीठ ॥३॥ साधु भणी किम निंदीये, जे गिरुआ गुणवंत। तारे आपण आतमा, परने पिण तारंत ॥४॥ ढाल ४८ मी. देशी "धन धन श्रीरिषिराज अनाथी" एहनी-राणीने ओलंभे लाग्यो, ए में ११५॥ -*
श्रीपाल.
रास.
॥११६॥
कीधो अकाज जी।बोधिलता कापी पापी में, तेडाव्यो रिषिराज जी, रा०॥१॥नमी खमावी
कीधी स्तवना, श्रीमती कहे कर जोडी जी। भगवन! राये तुम्हने दूहव्या, तेह थकी हिचे
छोडी जी, रा०॥२॥ मुनि भाषे पातक रिषि घातक, छूटे ते ततकाल जी। सिद्धचक्र आरा-
धन करतां, आणी भाव विसाल जी, रा०॥३॥ श्रीमती राणीने राजाये, आराध्यो गुण
निधि जी। राणीनी जे आठ सहेली, तिणे अनुमोदन कीधि जी, रा०॥४॥ तप पूरे ऊज-
मणुं कीg, वंठ नरे सय सात जी।धरम काम नृपना अनुमोद्यां, सुभ भावन विख्यात जी,
रा०॥५॥ स्वामी वयणथी ते इक दिवसे, सीह रायनो गाम जी । भांजीने गोधण लेई
वलीया, सीह केडे थयो ताम जी, रा०॥६॥करि संग्राम हण्या सय साते, क्षत्री कुल उत-
पन्न जी।रिषि उपसर्ग थकी थया कुष्टी,बिगड्यो सहुनो तन्नजी, रा०॥७॥पुन्य थकी श्रीपाल
थयो तूं, श्रीमती मयणा एह जी।पहिली पिण ताहरी हितवांछक, इण भव परम सनेह जी,
॥११६॥
रास.
भीपा.
रा० ॥८॥ मुनिने जल पीडा उपजाची, सायर पडीयो तेण जी। इंव कह्यो ते डूंब कहाणो,
कुष्टी वयण वसेण जी, रा०॥९॥श्रीमती वयणे पूज्यो पहिली, सिद्धचक्र गत पापजी।इण
भव पिण मयणाने वयणे, भागो सह संताप जी, रा०॥१०॥ रिदिलही सिद्धचक्र पसाये,
आठ सहेलीजेह जी।अनुमोदनथी ए थई राणी, धरम तणा फल एह जी, रा०॥११॥धर्म
प्रसंसाथी सय साते, थया नीरोगी देह जी । सीह ग्रही व्रत अणसण अंते, अजितसेन
एह जी, रा० ॥१२॥वालपणार्थी राज्य लीयो में, पूरव वैर संभाल जी। करम जिसा करीये
भोगवीये, ज्ञानी वचनरसाल जी, रा०॥१३॥राजा सुणि चमक्यो चितमांहे, ऐ ऐ!! करम
विरूपजी।ढाल थई अडतालीसमी ए, कहि 'जिनहरष' अनूप जी, रा०१४ सर्व गाथा८४६
दूहा-रायकहे सुणो साधुजी,दीक्षासगतिनमुझाजेजाणो मुझ योग्यता,ते कहो पूछं तुझ१
नवपदएआराधितूं,शास्त्रो(क्ति)गतिविधिजोगाएथीसहुसुखपाभिस्यो,लहिस्योउत्तमभोगर
॥११७॥
श्रीपाल.
॥११८॥
सहुयेनरसुरभवकरी,भोगविअनुपमसुख्खानवमेभववलतांसही,लहिस्योअविचलसुख्ख३
ढाल४९मी.देशी"इम धन्नोधणने परचावे"एहनी-इण परे सुगुरुतणीसुणिवाणी,हरख्या
राजा राणी रे।आराधे ऊलट मन आणी, सिद्धचक गुण खाणी रे, इ०॥१॥श्रीनवकार गुणे
सुभ भावे, जिनवर पूजा रचावे रे। जैन धरमसुं निज चित्त लावे, जीर्णोद्धार करावे रे, इ०
॥२॥सामायिक पोषध व्रत पाले, कुमति कदाग्रह टाले रे। श्रीजिनवर मारग उजवाले,
पापथकी मन वाले रे, इ० ॥३॥ इण परि सिद्धचक्र आराधी, चढती सुरगति बांधी रे।
इण भव पिण एहवी रिद्धि लाधी, कीरति त्रिभुवन वाधीरे,इ०॥४॥राजा राणीमाइसंजुत्ता,
समकित गुण सुभ चित्ता रे। आयु पूरण करि सुरगति पत्ता, पाम्या भोग समत्ता रे, इ०॥५॥
तिहांथकी चवि नर भव पामी, होस्ये सुर सुख कामी रे। च्यार वार इमसुर नर नामी, नवमे
सहु सिद्धिगामी रे, इ०॥६॥धन धनजगमें श्रीपाल नरिंदा,मयणासुंदरी सुख कंदारे।पाली
॥११८॥
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श्रीपाल.
रास.
,
॥१२०॥
H
J
.
-
.
चिरनंदो रे, भ० श्री० ॥७॥ज्ञान पद सातमे दाख्यो, चारित्र पद आठमें भाख्यो रे, भ.
श्री०
०॥८॥तप पद नवमे साख्यो, जेम वीरजीने वचने राख्यो रे, भ० श्री०॥९॥श्रीपालने
मयणालीधो, नवमे भवे कारज सीधोरे,भ० श्री०॥१०॥नवपद महिमा जाणी, 'जिनचंद्र'
हीयेमन आणी रे, भ० श्री० ॥११॥” इम जाणी नवपदसुंराता, सिद्धचक्र जेध्याता रे। नृप
श्रीपाल तणी परे माता, रहे सदा सुख साता रे, इ०॥९॥संवत सतरेसे चालीसे, चैत्रादिक
सुजगीसे रे। सातम सोमवार सुभ दिवसे, पाटण विसवा वीसे रे, इ०॥१०॥श्रीखरतर-
गच्छ महिमा धारी, जिनचंदसूरि जय कारी रे । शांतिहरष वाचक सुखकारी, तास सीस
सुविचारी रे, इ० ॥११॥ कहे 'जिनहरष' भविक नर सुणिज्यो, नवपद महिमा थुणि-
ज्यो रे।उगुणपचासे ढाले गुणिज्यो, निज पातक वन लुणिज्यो रे, इ०१२सर्व गाथा ८६१
॥ इति श्रीसिद्धचक्र महिमोपरि श्री श्रीपाल महाराजाका रास समाप्त मंगलं भवतु ॥
४
,
॥१२०॥
रास.
श्रीपाल.
॥११९॥
जिनवर आण अमंदा, काप्या भव भवना फंदा रे, इ०॥७॥इम श्रीपाल चरित्र मनरागे,
श्रेणिक नरवर आगेरे।कह्योगोयम गणहर वडभागे,सांभलतांमति जागे रे,इ०॥॥तथा-
श्रीवीर वांदी श्रेणिक राय, नवपद महिमा सुणी हरखाय रे।आतम नवपद जाणो राय, तस
ध्याने ते स्वरूपी थाय रे ॥१॥ एथी देवपाल पुंडरिक गणधर, पाम्या भवनो पार रे।
परदेशी राजा सुर अवतार, एम तार्या बहु नरनार रे॥२॥उक्तं च-"श्रीसिद्धचक्र आराधो,
मनवांछित कारज साधो रे, भवियां! श्री०॥१॥ए आंकणी। पद पहेले अरिहंत ध्यावो,
जेम अरिहंत पदवी पावोरे, भ० श्री०॥२॥पद दूजे सिद्ध मनावो, जेम सिद्ध सरूपी होइ
जावो रे, भ० श्री०॥३॥सूरि बीजे गुणवंता,जसना एक जगजयवंता रे, भ० श्री० ॥४॥
चोथे पदे उवज्झाया, जेणे मारग आण बताया रे, भ० श्री०॥५॥साधु सकल गुण धारी,
पद पंचमे जग हितकारी रे, भ० श्री०॥६॥ दरिसण पद छठे वंदो, जेम कीरति होय
,
॥११९॥
श्रीपाल.
नवपद
विधि.
रास
॥१२२॥
४ जिस पदके जितने गुणहो उतने साथिये करना, उतने खमासमणे तथा प्रदक्षिणा देना, उतने ही लोगस्सका काउस्सग्ग करना,
एक एक प्रदक्षिणा तथा खमासमणा देके एक एक गुणका नमस्कार कहे ।
५ पदके गुणोंकी संख्यानुसार यंत्रमें लिखे मुजब अथवा हर एक पदका २००० दो हजार गुणणा (माला फेरना) करे ।
६ विधिपूर्वक पच्चक्खाण पारके एक उन्हा पाणी और एक खानेकी वस्तु, ऐसे दो द्रव्योंसे आंविल करे, वाद इरियावही-
पडिक्कमके जयउ सामिय चैत्यवंदन करे।
पडिलेहण विधि-खमा० इरियावही, खमा० 'इच्छा संदि०भ०१ पडिलेहण संदिसाउं?, इच्छ' खमा० 'इच्छा० संदि० भ०!
पैडिलेहण करुं?, इच्छं' कहके खमा० देके मुहपत्ती पडिलेहे, इसीतरह २ खमा०देके 'अंगपडिलेहण संदिसाहुं ?' तथा 'अंगपडिलेहण
करुं?, इच्छं, कहके खमा० देके मुहपत्ती तथा कंदोरा धोतीया पडिलेहे, खमा० 'इच्छकारि भगवन् ! पसाओ करी पडिलेहणा
१ आवश्यक टीका निशीथ चूर्णि प्रत्याख्यानखरूपगाथा आदि प्राचीन शास्त्रकारोने आंविलमें एक अन और दूसरा पानी इन दो चीजोंके शिवाय तीसरी कोइ
चीज लेना नहीं लिखा, देखो "दोहिं दधेहिं अविलं" निशीथ चूर्णि, तथा "जावइयं उवजुजइ, तावइयं भायणे गहेऊणं । जलनिव्वुडं काउं, भुत्तवं
एस इत्थ विही ॥१॥" अर्थ-जितना (अहार) चाहिये उतना भाजनमें लेकर पानीमें डुवाके खाना, यह ऑविलमें (आहारका) विधिहै (प्रत्याख्यानखरूपगाधा),
इससे यह बात स्पष्टहै कि-आबिलका पचक्खाण करके विविध वस्तुएं खाना शास्त्र संमत नहींहै, नवांग टीककार श्रीअभयदेवमूरिजी महाराज अनुत्तरोपपातिक-
दशांगकी टीकामे साफ लिखते हैं कि-"आयंविलं ति-शुद्धौदनादि" अर्थात्-जिसमें नमक (मीठा) वगेरह कुछभी न पडाहो वैसा शुद्ध ओदन (चावल) आदि
आहार आविलके लायकहै। २ सांझको-खमा० 'इच्छा० संदि० भ०! बहुपडिपुला पोरिसी' कहके । ३ सांझको 'करु' । ४ सांशको 'पोसहसाला. प्रमा?' कहे ।
॥१२२॥
नवपद. विधि. श्रीपाल. रास . दिन ॥१२॥ नवपद ओली करण विधि यंत्र- नवपद ओलिकी विधि- नवपद ओलीकी तपस्या शुभ मुहूर्तमे विधिपूर्वक गुरुमुखसे नयफर |फा०४ वर्ण आहार पदों के नाम गुणणा पाली उचरे, याद आसोज तथा चैत्रकी सुदि ७ से, जो कोइ तिथि तूटी ११ ॐ हीं नमो अरिहताण २०-१२१ १२ घेत घायल होय तो ६ से ओर जो वधी होय तो ८ से पूनमतक ९ आंबिल २/ही नमो सिद्धाण २०-८ गा। पूरे करने, पर्पमें दो परसत करते साढेच्यार वर्षमे ९ ओली पूरी ३ / ॐ श्रीं नमो आयरियाण २०-३६/३६ / पीलो पणा करनी ओलीके दिनोंमे हमेशा नीचे लिखे मुजप कार्य करने- ॐ हीं नमो उपज्झायाण २०-२५ २५ नीलो मूग १ सांझ सवेर दोनों वसत राइदेवसी प्रतिक्रमण, तथा ५ॐ हाँ नमो लोए सबसाण २०-२७ २७ फालो उद्धद | पडिलेहण, एवं राइ आलोयणा पूर्वक द्वादशावतविधिरी गुरु- ॐ हीं नगो दसणस्स यंदन करके गुरुमुससे पचक्याण फरे । श्वेत पायल २०-५ / ६७ २ नव मंदिरोमे या नव प्रतिमाओंके आगे रोज नवपदके ॐ नमो नागरस २०-५/ ५५ | नव चैत्यवंदन करे। ॐ नमो चारित्तस्स २०-२०/७० ३ त्रिकाल देवपूजा तथा दुपहरको आठ धुइरो देववंदन करे। *हीं नमो सयरस २०-२५० १यपपिरमसागरम दोप्रतिफगाफ शियायसीन पसतमपुरा पपपदामारना रकारसगळे लोगरसकी र, समासमणाकी ,प्रणाली तथा साथियों की संस्था लिसाह, परंतु ऐरो परोसे पाचपरात देवपदा हो जाते , पासा पाच पक्षन + रस हिसापसे रह हमारगुणमा होता है। गह शिव, राह देयी प्रकिगणक दो और एष दुपदरमोarak ६ ॥१२॥ भोपा रा.११
श्रीपाल.
नवपद०
विधि.
रास
॥१२४॥
पहले दिन अरिहंत पद आराधन विधि-सवेरे राइ प्रतिक्रमण, अरिहंत पद आराधन काउस्सग्ग १२ लोगस्सका तथा
गुणणा माला २० या १२, सवेरकी पडिलेहण, गुरुवंदन, पञ्चक्खाण, वासक्षेपपूजा, नव मंदिरादिमें नवपदके नव चैत्यवंदन करे।
अरिहंत पद चैत्यवंदन-जय जय श्रीअरिहंत भानु, भवि कमल विकाशी। लोकालोक अरूपि रूपि, समस्त वस्तु प्रकाशी।१।
समुद्घात शुभ केवले, क्षय कृत मल राशी । शुक्ल चरम शुचि पादसे, भयो वर अविनाशी । २। अंतरंग रिपु गण हणीए, हुए
अप्पा अरिहंत । तसु पद पंकजमें रहत, 'हीरधर्म' नित संत । ३।
स्तवन-"पूजो मनरली, हाहो दादा कुशलसारद पू०” ए देशी-श्रीतेरम गुण वसिके कंत, कर्मकुं भंजे श्रीअरिहंत, मन!
मानले । अष्ट समयमें समय तीन, सर्व आहारथी होवे हीन, मन० ॥१॥ बादर काये मन वच भोग, तनु तनुसे फुन दृढ योग,
मन० । सूक्षम कायते मन वच रोक, निजविर्ये ताकुं कर फोक, मन० ॥२॥ संज्ञी मात्रके मन व्यापार, बेइंद्रीने वाक्य प्रचार,
मन० आदि समय रह्यो पनक सुजीव, सूक्षम लह्यो तिण जोग अतीव, मन०॥३॥ एसा योगथी समय एक, हीनासंख गुणो करी
छेक, मन० । समयासंखे जोग निरोध, कृत्वा जो लह्यो जोगी सोध, मन० ॥४॥ वेद समे अनाहारता पाय, 'कुशल' कहे ते
श्रीजिनराय, मन० । तेरमे गुणमें गुण समे देव, आपो सा जगहू नितमेव, मन० ॥५॥
थुइ-सकल द्रव्य पर्याय प्ररूपक, लोकालोक सरूपो जी; केवल ज्ञानकी ज्योति प्रकाशक, अनंत गुणे करी पूरो जी । बीजे
भव थानक आराधी, गोत्र तीर्थकर नूरो जी; पारे गुणां करी एहवा अरिहंत, आराधो गुण भूरो जी ॥१॥
सिद्ध पद चैत्यवंदन-श्रीशैलेशी पूर्वशांत, तनु हीन तिभागी । पुव पओग पसंगसे, ऊरध गति जागी ॥१॥ समय एकमें
-
॥१२४॥
.
धीपाट.
नवपद
विधि.
॥१२३॥
,
पडिलेहावोजी' कहके थापनाचार्य पडिलेहे, समा० 'इच्छा संदि० भ० उपधिमुहपत्ती पडिलेहुं १, इच्छ' कहके खमा० देके मुह-
पत्ती पडिलेहे, समा० 'इच्छा० सदि० भ० ओहि पडिलेहण सदिसाई, इच्छ' समा० 'इच्छा संदि० भ० ओहि पटिलेहण
करूं, इच्छं' कहके बाकी रहे सब कपडे पडिलेहे, काजा निकालके जयणासे परठे, खमादेके इरियावही पडिकमे ।
देववंदन विधि-खमा० देके 'इच्छा सदि० भ०! 'चैत्यवंदन करुं?, इच्छं' कहके चैत्यवंदन तथा नमुत्थुणं कहे, खमा०
देके दरियापही, समा० 'इच्छा० सदि० भ० चैत्यवदन करूं?, इच्छ' कहके चैत्यवंदन कहे, वाद जं किचि० नमुत्थुणं, अरिहंत-
इआणं आदि कहते हुए देवसी पडिकामणेकी तरह च्यार धुइसे देव वादे, फिर बैठकर नमुत्थुणं कहके वैसे ही च्यार थुइसे देव वांदे,
पाद बैठकर नमुत्युणं-जारति चेइयाइ०-जावंत केवि साहू-नमोहद कहके स्तपन तथा जय वीयराय कहे, बाद नमुत्युणं
कहके खमा० देके अविधि आशातना खमावे ।
पचक्याण पारण विधि-खमा० देके इरियावही पडियामे, खमा० 'इच्छा० सदि० भग! पञ्चखाण पारवा मुहपत्ती
पडिलेहुँ , इच्छं' कहके खमा० देके मुहपची पडिलेहे, खमा० देके 'इच्छा० संदि० भ०! पद्यक्खाण पारुं?, यथा शक्ति' समा०
'इच्छा० सदि० भ०! पञ्चक्खाण पार्य ?, तहत्चि' कहके मुट्ठी बंध करके भूमि उपर स्थापे, बाद भावनागाथा आतीहो तो एक नव-
| कार गिणके भावनागाधा बोले उपर १ नवकार गिणे, नहीं तो ३ नवकार गिणे, बाद समा० देके चैत्यवंदन जय वीयराय तक
| कहे, फिर २ खमा० पूर्वक सज्झायके आदेश मांगके आठ नवकारकी सज्झाय करे ।
१ चलवदन न बहफ सीधा ही नमुत्युण फहनेकागी विधि है। २ चैत्यादन तथा सज्झाय फरे बाद मुहपत्ती पहिरोहण आदि करनेकाभी विधि है।
॥१२॥
श्रीपाल.
नवपद०
विधि,
रास
॥१२६॥
ऋज्वादिक जिनराज गीत, नयं तन विस्तारी । भवकूपे पापे पडत, जगजन निस्तारी ॥२॥ पंचाचारी जीवके, आचारज पद
सार । तिनकुं वंदे 'हीरधर्म', अठोत्तर सो वार ॥ ३ ॥
स्तवन-"नणदल ! बींदली ल्ये” ए देशी-खंती खडगथी जेणे, हण्यो क्रोध सुभट सम देणे हो; गणपति गुणपेखी ।
मान महागिरि वयरे, अतिसोभन मद्दव वयरे हो; गण० ॥१॥ दंभ रूप विपवेली, वर अजव कीले ठेली हो; गण । मूर्छा
वेलथी भरीयो, लोह सागर मुत्ते तरीयो हो; गण॥२॥ मदन नाग मद हीनो, दम शम मंत्रे कीनो हो; गण । मोह महा मल्ल
ताड्यो, पुण वैराग मुग्गरे पाड्यो हो; गण० ॥ ३॥ दोपगयंद वस कीनो, धरी उपशम अंकुश लीनो हो; गण ॥ अंतरंग रिपु
भेद्या, सुरवर पिण जिण निषेध्या हो; गण॥ ४॥ रस कृति गुणथी लीनो, सूत्र अर्थे आगम पीनो हो; गण० । आचारज पद
एहवो, धरी जीव! 'कुशलता सेवो हो; गण० ॥५॥
थुइ-पंचाचारकुं पाले उजवाले, दोष रहित गुण धारी जी; गुण छत्तीसे आगम धारी, द्वादश अंग विचारी जी । प्रवल सबल
घन मोह हरणकुं, अनिल समो गुण वाणी जी; क्षमा सहित जे संजम पाले, आचारज गुण ध्यानी जी ॥१॥
उपाध्याय पद चैत्यवंदन-धन धन श्रीउवज्झाय राय, शठता धन भंजन। जिनवर दर्शित द्वादशांग, धर कृत जनरंजन ॥१॥
गुण वण भंजन मण गयंद, सुयशृणि किय गंजण । कुणालंध लोय लोयणे, जत्थ य सुयमंजण ॥ २ ॥ महाप्राणमें जिन लह्योए,
आगमसे पद तुर्य । तिनपे अहनिश 'हीरधर्म, वंदे पाठकवर्य ॥३॥
स्तवन-“सांवलिया ! अलंगा रहोने” एदेशी-हुयने हुयने हुयने, दूरी हुयने चेतन भाँखे शठने, दूरी हुयने । तूं मुझ
॥१२६॥
श्रीपाल.
नवपद
विधि.
॥१२५॥
लोक प्रात, गये निगुण नीरागी । चेतन भूपे आतमरूप, सुदिशा लही सागी॥२॥ केवल दंसण नाणयी ए, रूपातीत खभाव ।
सिद्ध भये तसु 'हीरधर्म', वंदे धरी शुभभाव ॥३॥
स्तवन-धारे महेलां ऊपर मेह झबूके वीजली, म्हारा लाल ! झवृके०" ए देशी-अष्ट वरस नग मास, हीना कोडी
पूर्वमे; म्हारालाल! हीना० । उत्कृष्टे करे वास, सयोगी धाममें, म्हारा० स०॥ अजोगीके अत, तजे भव भव्यता, म्हारा० त०।
शैलेशी लहे कष्ट, दले गुणश्रेणिता, म्हारा० द०॥१॥ इखाक्षर पंच काल, रहे ते योगमे; म्हारा० २० । तेरस प्रकृतिनो अंत,
करीने अतमे, म्हारा० क० ॥ गमन करे नग रजसे, अक्रिय होयने म्हारा० अ० । पुध पओग पसंग, स्वभाव अपंधने म्हारा०
स्व०॥२॥ इषु गुण नव परिमाण, जोजन लक्षे कही, म्हारा जो०। वर्तुल विशदाभास, नीरालंबन सही; म्हारा० नी०॥मध्ये
जोजन अए, घनाकृति अतम म्हारा०प० । मक्षी पक्षयी हीन, भणी सिद्धातमें; म्हारा० भ०॥३॥ तनुपन्भारा नाम, शिलासे
जोजन म्हारा ०शि० । लघु अगुल बत्तीस, प्रमाण अवगाहना, म्हारा०प्र०॥ वृद्ध धनु शत पंच, गुणांसे हीनता, म्हारा० गु० ।
मिलिया एकमेऽनंत, आनाधा नालही; म्हारा० आ० ॥ ४ ॥ अष्ट प्राण धरि रम्य, सिरि ही जो सही, म्हारा०सि० । वीजो पद
श्रीसिद्ध धरो मन गेहमे; म्हारा०प०॥ 'कुशल' भये जग जीव, मिलेगा तेहमे, म्हारा० मि०॥५॥
थुइ-अष्ट करमकुं दमन करीने, गमन कियो शिववासी जी, अव्यायाध सादि अनादि, चिदानंद चिदरासी जी। परमातम पद
पूरण विलासी, अघ धन दाप विनासी जी; अनंत चतुष्टय शिवपद ध्यावो, केवलज्ञानी भासी जी ॥१॥
आचार्य पद चैत्यवंदन-जिनपद बुलमुस रस अनिल, मित रस गुण घारी । प्रबल घन मोहकी, जिण ते चमुहारी ॥१॥
॥१२५॥
श्रीपाल.
नवपदक
विधि.
रास
॥१२८॥
मु०। तो पिण तिण जगमें लही, साहिबा ! त्रिक धन गुणनी ख्यात हो; मु०॥४॥रयण त्रयसे शिवपथे, साहिवा ! साधन
परवर जीव हो; मु० । साधु हवइ तसु धर्ममें, साहिवा ! 'कुशल' भवतु जगतीव हो; मु० ॥ ५ ॥
थुइ-सुमति गुपति कर संजम पाले, दोष वयांलिस टाले जी; पटकाया गोकुल रखवाले, नवविध ब्रह्मत्रत पाले जी। पंच महा-
व्रत सूधा पाले, धर्म सुकल उजवाले जी; क्षपक श्रेणि करी कर्म खपावे, दमपद गुण उपजावे जी ॥१॥
दर्शनपद चैत्यवंदन-हुय पुग्गल परिअट्ट, अठ्ठपरिमित संसार । गंठि भेद तव करी लहे, सब गुण आधार ॥१॥ क्षायिक
वेदक शशि असंख, उवसम पणवार । विना जेण चारित्र नाण, नहीं हुवे शिवदातार ॥२॥ श्रीदेव गुरु धर्मनीए, रुचि लच्छन
अभिराम । दर्शनकुं गणि 'हीरधर्म', अहनिश करत प्रणाम ॥३॥
स्तवन-"रामचंद्रके वाग, आंवो मोहि रह्योरी" एदेशी-देव श्रीजिनराज, गुरु ते साधु भण्योरी । धर्म जिनेश्वर प्रोक्त,
लक्षण बोधितणो री ॥ १॥ बोधिलाभके काज, सप्तम नरक भलोरी । तेण विना सुरलोक, ताते आधिक चुरो री ॥२॥ मिथ्या
तापे तप्त, बोधही छाँह लहे री । उपशम क्षायिक वेदक, ईश्वर तीन कसोरी ॥३॥ भवसागर है अपार, फुन अस्ताघ को री।
जसु लाभे ते होय, गोसपद मात्र खरोरी॥४॥ यदभावे अप्रमाण, नाण चारित्तभलोरी । वोध धर्ममें जीव, लाभे 'कुशल' कलोरी॥५॥
थुइ-जिण पण्णत्त तत्त सूधा सरधे, समकित गुण उजवाले जी; भेद छेद करी आतम निरखी, पशु टाली सुर पा(था)वे जी ।
प्रत्याख्याने सम तुल्य भाँख्यो, गणधर अरिहंत सूरा जी; ए दर्शन पद नितनित वंदो, भवसागरको तीरा जी ॥१॥
ज्ञान पद चैत्यवंदन-क्षिप्रादिक रस राम चदि, मित आदिम नाण । भाव मिलापसे जिन जनित, सुय वीस प्रमाण ॥१॥
1.
॥१२८॥
श्रीपाट.
नवपद.
विधि.
॥१२७॥
पान फ्यु आवे , दु०, तुदाने गुण पतलाये ?, दु० ॥ए आंकणी ॥ तो सगे निज पंचद्रीनो, रचना चरम भूलाणो। नाणावरणी
गप उपशमसे, भाद्री मडाणो, दू० ॥ १॥ द्रव्ये ते परजाप्ते कीना, जाती नाम म्पपदेश । एवं वो गो तुरंग गजादिक, फिण
फर्म उपदेश, दु० ॥२॥ इत्यादिक या मुझहुं शंका, तेरे सगे लागी । नीलचरणकी समतासेती, में भयो तोसुं रागी दू.
॥ २ ॥ उप फाहिये हणीयो भवियानो, अधिया लाभत आय | आधीना मन पीडा नामे, मायो येन विलाय दू० ॥ ४ ॥
आधिक्ये सरीपे पर आगम, यससे ते उपज्झाय । तत्सेवाते हणि सठतापु, पेतन ! 'कुशल'ता थाय, दू० ॥५॥
शुइ-अंग ग्यारे पउदै पूरब, गुण पचवीसना धारी जी, सर अरथ धर पाठक कहिये, जोग समाधि विचारी जी । तपगुण
पूरा नागम पूरा, नय निक्षेपे वारी जी, मुनि गुण धारी युध विस्तारी, पाठक पूजो अविकारी जी ॥१॥
साधुपद पैत्यवंदन-दसण नाण चरित्त करी, पर शिवपद गामी । धर्म शुम्ल शुचि चासे, आदिम सप कामी ॥१॥ गुण
पमच अपमचते, भये अचरजामी । मानस इदिय दमनभूत, शम दम अभिरामी ॥२॥ चारु तिघन गुणगण भर्योए, पंचम पट
सुनिराज । तत्पद पंकज नमतह, 'हीरधर्म के काज ॥३॥
स्तयन-"मालन मालन मती कहो" ए देशी-नि:कपाया जग जन कहे, धारे चउ गति वसनसे रोप हो मुणिंदजीरागहीण
भय तू करे, साहिया! शिव रमणीसे हेव हो मुगिंदजी! ॥१॥ सर्व प्रमाद तजी रहे, साहिवा! छठे पूरव कोड हो, मु० । शत
सो गम आगम करे, साहिया! लघुकाले गुण आदि हो; मु० ॥२॥ स्त्यानी निद्रा उदे, पामे कर्म निकंद हो; मु०॥ प्रचला
निद्रामें रही, साहिया ! पारम गुणनो पास हो; मु०॥३॥ स्थिति रस घात प्रमुख करे, साहिवा! जो गुण सख्यातीत हो;
॥१२७॥
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नवपद
विधि.
भोपाल.
-
॥१२९॥
भव-गुण पसर ओहि दोय, मण लोचन नाण । लोकालोक सरूप जाण, इक केवल भाण ॥२॥ नाणाचरणी नासपीए, चेतन
नाण प्रकाश । सप्तम पदम 'हीरधर्म', नित चाहत अरकाश ॥३॥
स्तवन-"म्हारे अति उछरगे" ए देशी-जिनवर भापित आगम भणिया, तच यथास्थिति गमिया जी म्हारे जगजन तारू ।
ते उत्तम पर नाण कहिये, भविजन अहनिशि चाहे जी, म्हारे जगजन तारू ॥१॥ भक्ष्याभक्ष्य कुपथ सुपंथा, पेयापेय अग्रंथा जी
म्हारे । देव कुदेव अहित हित धारी, जाणे जेण विचारी जी; म्हारे० ॥२॥ श्रुत मति दोय छ इद्री सारू, तेणे परोक्ष
विचारू जी, म्हारे । ओहि मण केल है यारू, जीव परतक्ष सुधारू जी, म्हारे॥३॥ अअवि जस्स चले जग जाणे, लोका-
दिक अनुमाने जी; म्हारे । विभुवन पूजे जासु पसाये, धारी शुभ अध्यवसाये जी, म्हारे०॥४॥ नाणावरणी उपशम क्षयची,
चेतन नाणकु विलसे जी, म्हारे । सप्तम पदमे भविजन हरखे, निशदिन 'कुशल'ता निरखे जी; म्हारे० ॥५॥
थुइ-मति श्रुव इंद्रि जनित कहिये, लहिये गुण गंभीरो जी; आतमधारी गणधर विचारी, द्वादश अंग विस्तारो जी | अवधि
मनपर्यव केरल, प्रत्यक्ष रूप अवधारो जी, ए पाच ज्ञानकुं वदो पूजो, भविजनने सुखकारो जी ॥१॥
चारित्र पद चैत्यवंदन-जस्स पसाये साहु पाय, जुग जुग समितेद । नमन करे शुभ भाव लाय, फुण नरपति धुंद ॥१॥
जंपे धुरि अरिहतराय, करी कर्म निकंद । समिति पंच तिगुप्ति युत, देवे सुक्ख अमंद ॥ २ ॥ इपु कति मान कपायथीए, रहित
लेश शुचिवंत । जीव चरित्नकुं 'हीरधर्म', नमन करत निवसंत ॥३॥
स्तवन-निर्विकल्प अज निर्गुणी, चिदाभास निस्संग, सुज्ञानी ! साभलो । मृर्ती हीन चेतन करे, रूपी पुदगल रग; सुज्ञानी!
॥१२९॥
श्रीपाल. नवपद० विधि. रास. ॥१३॥ सांभलो ॥१॥ स्पर्द्धक कारण वर्गणा, कार्ये कारण भावः सु० । कृत्वा जोग सुधामता, लब्धासंख स्वभावः सु०॥२॥ पर्याप्ता लघु जोगमें, वृद्धि लहे जुगमान; सु० । मध्ये वसु समये लहे, अंते द्वौ ते जाण; सु० ॥३॥ सहकारी मानस मुखा, कारण रम्य वलेणसु० । प्राप्ता घस्र प्रकारता, सप्त प्राभृतका तेण; सु० ॥ ४॥ तद्रोधन रूपी भलो, चेतन संयम धाम; सु० । कर घन मिल पद धर्ममें, 'कुशल' भवतु अभिराम; सु० ॥५॥ थुइ-करम अपचय दूर खपावे, आतम ध्यान लगावे जी; बारे भावना सूधी भावे, सागर पार उतारे जी । पटखंड राजकुं दूर तजीने, चक्री संजम धारे जी; एहवो चारित्र पद नित वंदो, आतम गुण हितकारे जी ॥१॥ तप पद चैत्यवंदन-श्रीऋपभादिक तीर्थनाथ, तद्भव शिव जाण । विहि अंतैरपि वाह्य मध्य, द्वादश परिमाण ॥१॥ वसु कर मित आमोसही, आदिक लब्धि निदान । भेदे समता युत खिणे, दृग्धन कर्म विमान ॥२॥ नवमो श्रीतप पद भलोए, इच्छा- रोध सरूप । वंदनसे नित 'हीरधर्म !", दूर भवतु भवकूप ॥३॥ स्तवन-चारस भेद भण्या जिनराजे, वाह्य मध्य तणा जग काजे रे शिवपद श्रेणि । तिण भव सिद्धि तणा वर ज्ञाता, जिनवर पिण तपना कर्ता रे शिवपद श्रेणि ॥१॥ समता सहिते जिन ते भारी, भली कर्म चमु पिण हारी रे, शिव०। जीव कनकसे कर्म कचोरा, दहे तप पावकका जोरा रे शिव० ॥२॥ तप तरुवरना कुसुम है ऋद्धि, देवनरना फल ते सिद्धी रे, शिव० ! पाप सकल है तमनी रासी, तप भानुसे जाये नासी रे शिव०॥३॥ जस्स पसाये लहिये वारू, लब्धि सगली जगहित कारू रे; ॥१३०॥ "
श्रीपाल.
रास
नवपद
विधि.
॥१३॥
शिव० । अतिदुकर फुण साध्यता हीना, काम ताते वारू कीना रे शिव०॥४॥ इच्छा रोधन रूपी कहिये, तप पदही चेतन
पहिये रे, शिव० । पाठक 'हीरधर्म कपासे, नवपद 'कुशला' कुं भासे रे शिव०॥५॥
धुइ-इच्छा रोधन तपते मॉख्यो, आगम तेहनो साखी जी, द्रव्य भावसे द्वादश दाखी, जोग समाधि राखी जी । चेतन
निजगुण परिणति पेखे, तेहिज तप गुण दाखी जी; लब्धि सकलनो कारण देखी, 'ईश्वर'सेमुख भॉखी जी ॥१॥
वादमे अष्टद्रव्यसे जिनपूजा स्नानादि करके १२ साथिये करे, १२ प्रदक्षिणा तथा समासमणे देता हुआ आगे लिखे नमस्कार बोले.
अरिहंत पदके १२ गुणोंके खमासमण- नमस्कार-
१ अशोकवृक्ष प्रातिहार्य सयुताय श्रीअरिहंताय नमः। २ पुष्पवृष्टि प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ।
३ दिव्यधनि प्रातिहार्य सयुताय श्रीअरिहंताय नमः । ४ चामर युग प्रातिहार्य सयुताय श्रीअरिहंताय नमः।
५ स्वर्ण सिंहासन प्रातिहार्य सयुताय श्रीअरिहंताय नमः । ६ भामंडल प्रातिहार्य सयुताय श्रीअरिहंताय नमः ।
७ दुंदुभि प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः। ८ छत्र त्रय प्रातिहार्य सयुताय श्रीअरिहंताय नमः।
९ज्ञानातिशय संयुताय श्रीअरिहंताय नमः। १० पूजातिशय संयुताय श्रीअरिहंताय नमः।
११ वचनातिशय संयुताय श्रीअरिहंताय नमः। १२ अपायापगमातिशय सयुताय श्रीअरिहंताय नमः ।
मध्याहमे ८ थुइसे देववदन, पञ्चक्खाण पारना, आविल करना, फिर चैत्यवंदन, तीजे पहोरकी पडिलेहण, सध्याको देवदर्शन
आरति, देवसी प्रतिक्रमण करे वाद राइसथारा पोरिसी भणाके सोवे ।
॥१३॥
श्रीपाल.
नवपद०
विधि.
रास
"
॥१३२॥
पहले दिनकी तरहही आगेके आठों दिन प्रतिक्रमण पडिलेहण तथा नव मंदिरादिमें नवपदके नव चैत्यवंदनादि विधि करना,
फक्त जिस दिन जो पद होवे उस पदके जितने खमासमणे हो उतने लोग्गस्सका काउस्सग्ग करना. उतनी प्रदक्षिणा तथा खमासमणे
देना, इतनाही फरक है, इसलिये आगेके दिनोंकी विस्तृत विधि न लिखके केवल खमासमणे दीठ कहनेके नमस्कार ही लिखते हैं-
सिद्ध पदके ८ गुणोंके खमासमण-नमस्कार-
१ अनंत ज्ञान संयुताय श्रीसिद्धाय नमः ।
२ अनंत दर्शन संयुताय श्रीसिद्धाय नमः ।
३ अव्याबाध गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः। ४ अनंत चारित्र गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः ।
५ अक्षय स्थिति गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः। ६ अरूपि निरंजन गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः।
७ अगरुलघु गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः। ८ अनंत वीर्य गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः ।
आचार्यके ३६ गुणोंके खमासमण-नमस्कार-
१ प्रतिरूप गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः । २ सूर्यवत्तेजस्वि गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
३ युगप्रधानागम गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः।
४ मधुरवाक्य गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
५ गांभीर्य गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
६ धैर्य गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
७ उपदेश गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
८ अपरिश्रावी गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
९ सौम्य प्रकृति गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः। १० शील गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः।
।
॥१३२॥
श्रीपाल. रास नवपद विधि. ॥१३॥ ११ अविग्रह गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः। १३ अचपल गुण सयुताय श्रीआचार्याय नमः । १५ क्षमा गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः। १७ प्राजु गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः। १९ द्वादशविध तपो गुण सयुताय श्रीआचार्याय नमः। २१ सत्यनत गुण सयुताय श्रीआचार्याय नमः । २३ अकिचन गुण सयुताय श्रीआचार्याय नमः । २५ अनित्य भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः। २७ संसारस्वरूप भानना भावकाय श्रीआचार्याय नमः । २९ अन्यत्व भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः। ३१ आश्रय भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः। ३३ निर्जरा भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः। ३५ बोधिदुर्लभ भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः। १२ अविकथक गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः। १४ प्रसन्न वदन गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः। १६ मृदु गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः । १८ सर्वसंग मुक्ति गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः। २० सप्तदशविध सयम गुण सयुताय श्रीआचार्याय नमः। २२ शौच गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः। २४ ब्रह्मचर्य गुण सयुताय श्रीआचार्याय नमः। २६ अशरण भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः । २८ एकत्व भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः। ३० अशुचि भानना भावकाय श्रीआचार्याय नमः । ३२ सवर भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः ३४ लोकस्वरूप भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः। ३६ धर्मदुर्लभ भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः । ॥१३॥ श्रीपा, रा.१२ .
नवपद विधि. श्रीपाल.. रास ॥१३४॥ उपाध्याय पदके २५ गुणोंके खमासमण-नमस्कार- १ श्रीआचारांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः।२ श्रीसूयगडांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः। ३ श्रीठाणांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः। ४ श्रीसमवायांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः। ५-श्रीभगवती सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । ६श्रीज्ञाताधर्मकथांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः। ७ श्रीउपासकदशांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय०1८श्रीअंतगडदशांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः ९ श्रीअणुत्तरोववाइयदशांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपा०१० श्रीप्रश्नव्याकरणांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय० ११ श्रीविपाक सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । १२ श्रीउत्पादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । १३ श्रीअग्रायणीपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः ।१४ श्रीवीर्यप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः १५ अस्तिप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः। १६ ज्ञानप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः १७ सत्यप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः।१८ आत्मप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । १९ कर्मप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । २० प्रत्याख्यानप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः। २१ विद्याप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । २२ अविध्य(कल्याण)प्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्या० २३ प्राणा(वाय)यामप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपा० । २४ क्रियाविशालपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । २५ लोकबिंदुसार पूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । ॥१३४॥ . "
श्रीपाल.
नवपद
विधि.
साधु पदके २७ गुणोंके खमासमण-नमस्कार-
१ प्राणातिपात विरमण गत सयुताय श्रीसाधवे नमः । २ मृपावाद विरमण व्रत सयुताय श्रीसाधवे नमः।
३ अदत्तादान विरमण व्रत संयुताय श्रीसाधवे नमः । ४ मैथुन विरमण व्रत संयुताय श्रीसाधवे नमः।
५ परिग्रह विरमण व्रत सयुताय श्रीसाधये नमः । ६ रात्रि भोजन विरमण ब्रत संयुताय श्रीसाधवे नमः।
७ पृथ्वीकाय रक्षकाय श्रीसाघवे नमः।
८ अप्पकाय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः।
९ तेउकाय रक्षकाय श्रीसाघवे नमः।
१० बाउकाय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
११ वनस्पतिकाय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः।
१२ त्रसकाय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
१३ एकेंद्रिय जीव रक्षकाय श्रीसाधवे नमः।
१४ येईद्रिय जीव रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
१५ तेइंद्रिय जीव रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
१६ चउरिद्रिय जीव रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
१७ पंचद्रिय जीव रक्षकाय श्रीसाधये नमः।
१८ लोभ निग्रह कारकाय श्रीसाधवे नमः ।
१९ क्षमा गुण युक्ताय श्रीसाधवे नमः ।
२० शुभ भावना भावकाय श्रीसाधवे नमः।
२१ प्रतिलेखनादि क्रिया शुद्धकारकाय श्रीसाधवे नमः । २२ संयम योग युक्ताय श्रीसाधवे नमः।
|२३ मनोगुप्ति संयुक्ताय श्रीसाधवे नमः।
२४ वचन गुप्ति संयुक्ताय श्रीसाधवे नमः।
॥१३५॥
496 श्रीपाल. नवपद विधि. रास ॥१३६॥ २५ कायगुप्ति संयुक्ताय श्रीसाधवे नमः । २६ शीतादि द्वाविंशति परीपह सहन तत्पराय श्रीसाधवै नमः। २७ मरणांत उपसर्ग सहन तत्पराय श्रीसाधवे नमः। दर्शन पदके ६७ गुणोंके खमासमण-नमस्कार- १ परमार्थ संस्तवरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । २ परमार्थ ज्ञातृ सेवनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। ३ व्यापनदर्शन वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । ४ कुदर्शन वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । ५ शुश्रूषारूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । ६ धर्मरागरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । ७ वैयावृत्यरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । ८ अर्हद्विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । ९ सिद्ध विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । १० चैत्य विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। ११ श्रुत विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। १२ धर्म विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । १३ साधुवर्ग विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। १४ आचार्य विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। १५ उपाध्याय विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । १६ प्रवचन विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । १७ दर्शन विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। १८ "संसारे जिनः सार"इति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। १९ "संसारे जिनमतं सारं"इति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। २० संसारे जिनमतस्थित साध्वादिसारं इति चिंतनरूप श्रीसदर्शना० २१ शंका दूषण रहिताय श्रीसद्दर्शनाय नमः । २२ कांक्षा दूषण रहिताय श्रीसद्दर्शनाय नमः। COM ॐॐ स
श्रीपाल.
नवपद.
विधि.
.
+
२३ विचिकित्सा पण रहिताय श्रीसद्दर्शनाय नमः। २४ कुदृष्टि प्रशसा पण रहिताय श्रीसद्दर्शनाय नमः।
२५ तत्परिचय दपण रहिताय श्रीसदर्शनाय नमः। २६ प्रवचन प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
२७ धर्मकथा प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
२८ वादि प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
२९ नैमित्तिक प्रभारफरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
३० तपखि प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
३१ प्रज्ञप्त्यादि विद्याभृत्प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। ३२ चूर्णाजनादि सिद्ध प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
३३ कपि प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
३४ जिनशासने कौशल्य भूपणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
३५ प्रभावना भूपणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
३६ तीर्थसेवा भूपणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
३७ धैर्य भूपणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
३८ जिनशासने भक्तिभूपणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
३९ उपशम गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४० संवेग गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४१ निर्वेद गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४२ अनुकंपा गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
४३ आस्तिक्य गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४४ परतीथिकादि वंदन वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
४५ परतीर्थिकादि नमस्कार वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। ४६ परतीर्थिकादि आलाप वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४७ परतीथिकादि सलाप पर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। ४८ परतीथिकादि आसनादि दान वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४९ परतीथिकादि गधपुप्पादि प्रेपणवर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। ५० राजाभियोगाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
-
॥१३७॥
श्रीपाल. नवपद विधि. रास ॥१३८॥ ५१ गणाभियोगाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः । ५२ बलाभियोगाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः । ५३ सुराभियोगाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः। ५४ कांतारवृत्त्याकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः । ५५ गुरुनिग्रहाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः । ५६ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्य मूलमिति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। ५७ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मपुरस्य द्वारमिति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शना०५८ सम्यक्त्वं चारित्रधर्मस्य प्रतिष्ठानमिति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनायक ५९ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्वाधारमिति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनाय०६० सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्य भाजनमिति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनायक ६१ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्य निधिसन्निभमिति चिंतनरूप श्रीस०६२ अस्ति जीव इति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दर्शनाय नमः । ६३ स च जीवो नित्य इति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दर्शनाय०। ६४ सच जीवः कर्माणि करोतीति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दन । ६५ स च जीवः कर्माणि वेदयतीति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीस०६६ जीवस्सास्ति निर्वाणमिति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दर्शनाय० ६७ अस्ति पुनर्मोक्षोपायेति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दर्शनाय नमः ज्ञान पदके ५१ गुणों (भेदों)के खमासमण-नमस्कार- १ स्पर्शनेंद्रिय व्यंजनावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । २ रसनेंद्रिय व्यंजनावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । ३ घ्राणेंद्रिय व्यंजनावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । ४ श्रोत्रंद्रिय व्यंजनावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । ५ स्पर्शनेंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । ६ रसनेंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । ७ घ्राणेंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । ८ चक्षुरिंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । - ॥१३॥ t पिणे ॐ श्रीसिदचकाय नमः श्रीखरतरगच्छनभोमणि आचार्य श्रीजिनचंद्रसूरीश्वर वाचक श्रीसोमगणि- र शिष्य महोपाध्याय श्रीशांतिहर्प गणि शिष्य कविवर महोपाध्याय श्रीजिनहर्ष गणिकृत श्रीनवपद महात्म्य गर्भित श्रीपाल राजाका रास. दूहा-श्रीअरिहंत अनंतगुण, धरीये हीयडे ध्यान । केवल ज्ञान प्रकाश कर, दूर हरण अज्ञान ॥ १ ॥ चउद राज ऊपर रहे, सिद्ध अनंत समृद्धि । मुगति युवति सुख भोगवे, दायक अविचल सिद्धि ॥२॥ आचारिज पय युग नमू, पाले पंचाचार । गुण छन्नीस विराजता, आगम अरथ भंडार ॥ ३॥ कर जोडी नित प्रति नमू, चोथे धीपा रा १
नवपद०
विधि.
रास
श्रीपाल. ३७ श्रीसपर्यवसित श्रुतज्ञानाय नमः ।
३८ श्रीअपर्यवसित श्रुतज्ञानाय नमः ।
३९ श्रीगमिक श्रुतज्ञानाय नमः।
४० श्रीअगमिक श्रुतज्ञानाय नमः
४१ श्रीअंगप्रविष्ट श्रुतज्ञानाय नमः ।
४२ श्रीअनंगप्रविष्ट श्रुत ज्ञानाय नमः ।
॥१४०॥४३ श्रीअनुगामि अवधिज्ञानाय नमः ।
४४ श्रीअननुगामि अवधिज्ञानाय नमः ।
४५ श्रीवर्द्धमान अवधिज्ञानाय नमः ।
४६ श्रीहीयमान अवधिज्ञानाय नमः।
४७ श्रीप्रतिपाति अवधिज्ञानाय नमः ।
४८ श्रीअप्रतिपाति अवधिज्ञानाय नमः ।
४९ श्रीऋजुमति मनःपर्यवज्ञानाय नमः ।
५० श्रीविपुलमति मनःपर्यवज्ञानाय नमः ।
५१ लोकालोक प्रकाशकाय श्रीकेवलज्ञानाय नमः।
चारित्र पदके ७० गुणों (भेदों) के खमासमण-नमस्कार-
१ प्राणातिपात विरमणरूप श्रीचारित्राय नमः।
२ मृपावाद विरमणरूप श्रीचारित्राय नमः।
३ अदत्तादान विरमणरूप श्रीचारित्राय नमः।
४ मैथुन विरमणरूप श्रीचारित्राय नमः।
५ परिग्रह विरमणरूप श्रीचारित्राय नमः।
६ क्षमा धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः।
७ आर्जव धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः ।
८ मृदुता धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः ।
९ मुक्ति धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः ।
१० तपो धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः ।
ॐॐड
...
॥१४॥
नवपद
विधि
भोप अविपदाप भीमतिझानाय नमः।
११ पनदिप भीमनिशानाय नमः।
१३ मार्गदिपरा भीमतिमानाप नमः।
१५ भोहिया धीमनिशानाप नमः ।
१७मनिद्रिय अपाय धीमनिशानाय नमः।
१९ भापदिय पाप धीमतिशनाय नमः ।
२१ थोपेंद्रिय पाय भीमतिमानाय नमः।
२२ परमंद्रिय पारणा श्रीमतिनानाप नमः।
२५ प्रागंद्रिय पारणा भीगतिमानाय नमः ।
२७ धादियभारमा धीमति मानाप नमः।
२९ धीमवर धुनमानाय नमः ।
२१ भातही सुनानाय नमः ।
२३ धानायर शुतमानाय नमः ।
३५ भीसादिधुवज्ञानाय नमः।
१० भनो अर्यापनहाय धीमतिज्ञानाय नमः।
१२ सनेद्रिय ईहा श्रीमतिशानाय नमः ।
१४ चरिद्रिय ईशा श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
१६ मन ईदा श्रीमतिनानाय नमः ।
१८ रमनेद्रिय जपाय धीमतिज्ञानाय नमः ।
२० परिद्रिय अपाय श्रीमतिलानाय नमः।
२२ मन अपाप धीमतिज्ञानाय नमः ।
२४ रणनेंद्रिय धारणा थीमतिमानाय नमः।
२६ चक्षुरिंद्रिय पारणा श्रीमतितानाप नमः ।
२८ मनो धारणा श्रीमतिमानाय नमः ।
३० धीअनवर थुततानाय नमः।
३२ श्रीअसंही तगानाय नमः।
३४ श्रीमिथ्या श्रुतगानाय नमः।
३६ श्रीजनाटि भुवनानाय नमः ।
श्रीपाल. नवपद विधि. ॥१४॥ ३९ श्रमणोपासक वैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः। ४. संघ चैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः । ४१ कुल वैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः । ४२ गण चैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः। ४३ पशुपंडगादिरहितवसतिवसनब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः। ४४ स्त्रीहास्यादि विकथा वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः । ४५ स्त्रीआसन वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः । ४६ सीअंगोपांग निरीक्षण वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः। ४७ कुड्यंतरस्थित स्त्रीहावभाव सुणन वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारि०४८ पूर्वभुक्त स्त्रीसंभोग चिंतन वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः। ४९ अतिसरस आहार वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः । ५० अतिआहार वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः। ५१ अंगविभूपा वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः । ५२ अनशन तपोरूप श्रीचारित्राय नमः । ५३ ऊनोदरी तपोरूप श्रीचारित्राय नमः । ५४ धृत्तिसंक्षेप तपोरूप श्रीचारित्राय नमः। ५५ रसत्याग तपोरूप श्रीचारित्राय नमः। ५६ कायकिलेस तपोरूप श्रीचारित्राय नमः । ५७ संलेपणा तपोरूप श्रीचारित्राय नमः । ५८ प्रायश्चित्त तपोरूप श्रीचारित्राय नमः । ५९ विनय तपोरूप श्रीचारित्राय नमः ६० वेयावच्च तपोरूप श्रीचारित्राय नमः । ६१ सज्झाय तपोरूप श्रीचारित्राय नमः । ६२ ध्यान तपोरूप श्रीचारित्राय नमः । ६३ कायोत्सर्ग तपोरूप श्रीचारित्राय नमः। ६४ अनंत ज्ञान संयुक्त श्रीचारित्राय नमः । ६५ अनंत दर्शन संयुक्त श्रीचारित्राय नमः । ६६ अनंत चारित्र संयुक्त श्रीचारित्राय नमः । ॥१४॥ है
भोपाल.
विधि
११ सपम धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः।
१३ शौच धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः।
१५ ब्रह्मचर्य धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः।
१७ उदक रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
१९ चाउ रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
२१ वेइंद्रिय रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
२३ चौरिद्रिय रक्षा सयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
२५ अजीच रक्षा सयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
२७ उपेक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
२९ प्रमार्जन संयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
३१ वाक्संयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
३३ आचार्य चैयाश्त्यरूप श्रीचारित्राय नमः।
३५ तपखि बयाकृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः।
३७ ग्लान साधु वैयाहत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ।
१२ सत्य धमेरूप श्रीचारित्राय नमः।
१४ अकिचन धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः।
१६ पृथ्वी रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
१८ तेउ रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
२० वनस्पति रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
२२ तेइंद्रिय रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
२४ पंचेद्रिय रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
२६ प्रेक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
२८ अतिरिक्त वनभक्तादि परठवण संयमरूप श्रीचारिक
३० मनः संयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
३२ कायसंयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
३४ उपाध्याय वैयावृत्य रूप श्रीचारित्राय नमः।
३६ लघुशिष्यादि वैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ।
३८ साधु वैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ।
॥१४॥
। श्रीपाल.. -- . नवपद विधि. ( ५ ॥१४४॥ - . १ ग A १ २३ ज्ञानविनयरूप तपसे नमः। २४ दर्शन बिनयरूप तपसे नमः। २५ चारित्र विनयरूप तपसे नमः। २६ गुर्वादिकं प्रति (शुभ मनः प्रवृत्ति) विनयरूप तपसे नमः। २७ गुर्वादिकं प्रति (शुभ वचन प्रवृत्ति) विनयरूप तपसे नमः ।२८ गुर्वादिकं प्रति (शुभ काय प्रवृत्ति) विनयरूप तपसे नमः। २९ औपचारिक विनयरूप तपसे नमः । ३. आचार्य वेयावश्च तपसे नमः। ३१ उपाध्याय वेयावश्च तपसे नमः। ३२ साधु वेयावञ्च तपसे नमः। ३३ तपस्वि वेयावच तपसे नमः। ३४ लघु शिष्यादि वेयावश्च तपसे नमः। ३५ गिलाण साधु वेयावच्च तपसे नमः ३६ अमणोपासक वेयावश्च तपसे नमः। ३७ संघ वेयावच्च तपसे नमः। ३८ कुल वेयावश्च तपसे नमः । ३९ गण वेयावश्च तपसे नमः । ४० चायणा तपसे नमः। ४१ पृच्छना तपसे नमः। ४२ परावर्तना तपसे नमः। ४३ अनुप्रेक्षा तपसे नमः। ४४ धर्मकथा तपसे नमः। ४५ आर्तध्यान निवृत्ति तपसे नमः। ४६ रौद्रध्यान निवृत्ति तपसे नमः । ४७ धर्मध्यान चिंतन तपसे नमः। ४८ शुलध्यान चिंतन तपसे नमः । ४९ बाह्य उपसर्ग सहनरूप तपसे नमः। ५. अभ्यंतर उपसर्ग सहनरूप तपसे नमः । २ SSSSSSRॐ . ग १ ॥१४॥ १
नवपद
विधि.
श्रीपाल.
॥१४॥
६७ क्रोधनिग्रह करणरूप श्रीचारिनाय नमः । ६८ माननिग्रह करणरूप श्रीचारित्राय नमः।
६९ माया निग्रह करणरूप श्रीचारिनाय नमः । ७० लोमनिग्रह करणरूप श्रीचारित्राय नमः
तप पदके ५० गुणों (भेदों)के खमासमण-नमस्कार-
१ यावत्कधिक तपसे नमः।
२ इत्वरिक तपसे नमः।
३ बास ऊनोदरी तपसे नमः ।
४ अभ्यंतर ऊनोदरी तपसे नमः।
५ द्रव्यतः पृत्तिसंक्षेप तपसे नमः ।
६ क्षेत्रवः वृत्तिसक्षेप तपसे नमः।
७ कालतः पृत्तिसंक्षेप तपसे नमः।
८ भावतः वृत्तिसंक्षेप तपसे नमः।
९कायकिलेस तपसे नमः।
१. रसत्याग तपसे नमः।
११ इंद्रिय कपाय योग विपयक संलीनता तपसे नमः। १२ स्त्री पशु पंडकादि वर्जित स्थान अवस्थित संलीनता तपसे नमः।
१३ आलोयण प्रायश्चिच तपसे नमः।
१४ पडिकमण प्रायश्चित्त तपसे नमः।
१५ मिथ प्रायश्चिच तपसे नमः।
१६ विवेक प्रायश्चित्त तपसे नमः।
१७ उत्सर्ग प्रायश्चित्त तपसे नमः।
१८ तपः प्रायश्चित्त तपसे नमः।
१९ छेद प्रायश्चित्त तपसे नमः ।
२० मूल प्रायश्चित्त तपसे नमः।
२१ अनपस्थित प्रायश्चित्त तपसे नमः।
२२ पारचिय प्रायश्चित्त तपसे नमः।
॥१४३॥
श्रीपाल.
॥ २॥
पद उवज्झाय । द्वादशांग मुख उपदिसे, भवियण जण सुखदाय ॥४॥ अढी द्वीपमाहे
नमू, साधु सकल गुणवंत । सुमति गुपति सूधी धरे, राखे जगना जंत ॥ ५॥ पंच
परमेष्ठि नमी करी, आणी भाव विसाल। श्रीश्रीपाल नरिंदनो, रचसुं रास रसाल
॥६॥ मंत्र यंत्र जडि ओषधी, आछे अवर अनेक । पिण नवकार समो न को,
जोवो आणि विवेक ॥ ७॥ सिद्धचक्र आराधीये, गुणीये श्रीनवकार । भवसायर
तरीये सुगम, जईये मुगति मझार ॥ ८॥ नवपदनो महिमा कहूं, सांभलजो नर
नार ! । सांभलतां सुख पामसो, सफल हुसे अवतार ॥९॥
ढाल १ ली. चोपईनी-जंबू नामे द्वीप विसाल, दक्षिण भरत छे तास विचाल।
देस कह्या बत्रीस हजार, मगधदेस रिद्धिवंत अपार ॥ १ ॥ वीर जिणेसर
आव्या घj, सकल देशमें उत्तम भणुं । राजगृही नगरी गुणभरी, जाणे रची
R
॥२॥
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महाराजा
रे
।
एहथी
सहु
सुख
संपजे
रे
लाल
,
भवसायरनी
नाव
महा
०
,
ए
०
॥१
॥
श्रीपाल.
॥४॥
धरम तणी सामग्री लही, श्रीजिनधर्म करो ऊमही । इण भव पामे रिद्धि समृद्धि, परभव
पामे अविचल सिद्धि ॥ ९॥ इम गौतम दीधो उपदेस, सांभलियो नर नारि नरेस ।
पहिली ढाल एही अटकलो, कहे 'जिनहर्ष' हिवे सांभलो ॥ १०॥ सर्व गाथा १९॥
दूहा-दान सील तप भावना, भेद धरमना च्यार । इह भव परभव एहथी, लहीये
सुख श्रीकार ॥१॥ दान सील तप मांहि जो, चोथो भाव भिलंत । तो कारज सीझे
सहू, वंछित सकल मिलंत ॥ २॥ निश्चल मन राखी करी, परिहरि मननो ताप ।
भाव विशुद्ध हीयडे धरी, जपीये नवपद जाप॥३॥अरिहंत १ सिद्ध २ सूरीस वर ३,
उवज्झाया ४ मुनिपति ५। दंसण ६ नाण ७ चरित्त८ तप९, इणसुं धरीये चित्ति ॥ ४ ॥
ढाल २ जी. अलबेलानी- ए नवपद आराधीये रे लाल, आणी निरमल भाव
॥४॥
श्रीपाल. महियल सुरपुरी॥२॥ कूआ वावि सरोवर घणा, विवहारीयानी नहीं कांई मणा। तिण नयरी श्रेणिक नरनाह, जिणवर आण धरे उच्छाह ॥ ३॥ न्याये पाले नरवर राज, सारे सहुना वांछित काज । मंत्रीसर छे अभयकुमार, च्यारे बुद्धिनो धारणहार ॥४॥ किणिहिक अवसर त्रिभुवनस्वामि, राजगृहीने पासे गामि । समवसर्या तिहां आवी करी, सहु हरख्या मन आणंद धरी ॥५॥ गौतमने दीधो आदेस, जाओ राजगृही सुविसेस । तव गौतम आव्या तिहां वही, लोक सहु हरख्या गहगही॥६॥ वांदण आव्या श्रेणिक राय, नगर लोक पिण वांदण जाय।आपे प्रभु गणधर उपदेस, सजल जलद अनुहार विसेस ॥७॥ अहो भव्य प्राणी! तुम्हे सुणो, ए मानव भव दुर्लभ गिणो । आर्य क्षेत्र उत्तम कुल जाणि, ते पिण दुर्लभ छे मन आणि ॥८॥ १ जमीन उपर । २ देव नगरी । ३ कमी। ४ राजा । ५ तीनलोकके स्वामी वीरप्रभु।६ पाणी सहित । ७ मेघके । ८ समान ।
+ स रास. श्रीपाल. ॥६॥ कण कंचणसुं भरी रे लाल, जाणे अलका नाम महा०, ए० ॥७॥ लोक तिहां सहु को सुखी रे लाल, साधे त्रिणे वर्ग महा० । पाले जिनवर आगन्या (आज्ञा) रे लाल, जेथी पामे स्वर्ग महा०, ए० ॥ ८॥ राजा राजे तिणे पुरी रे लाल, प्रजापाल इण नाम महा० । न्याय निपुण पुहवी तिलो रे लाल, रूपे जाणे काम महा०, ए० ॥९॥ तास घणी अंतेउरी रे लाल, तेहमें दोइ अत्यंत महा० । रूप अधिक रलियामणी रे लाल, सोभागिणी गुणवंत महा०, ए० ॥१०॥ पहिली सोहगें सुंदरी रे लाल, सोहँग तणो निधान महा० । बीजी पिण अधिकी वली रे लाल, रूपसुंदरी अभिधान महा०, ए०॥११॥ रूपे रंभा हरावती रे लाल, सुख विलसे सुकमाल महा। बीजी जिन हरखे' कही रे लाल, अलबेलानी ढाल महा०, ए०॥१२॥ सर्व गाथा ३५॥ १ अलकापुरी नामकी देवनगरी । २पृथ्वीके तिलक तुल्य । ३ कामदेव । ४ सौभाग्य । ५ नाम की। ६ नामकी अप्सरा देवी रे रास ॥ ५॥ नवपद संघाते जपे रे लाल, सिद्धचक्र (सड्ढ) चउ साल महा० । ते लहे मंगल मालिकारे लाल, जिम लह्यां नृप श्रीपाल महा०, ए० ॥२॥ श्रेणिक कहे भगवन ! कहो रे लाल, कुण ते नृप श्रीपाल महा० । किम पामी सुख संपदा रे लाल, किम लह्यां भोग रसाल महा०, ए० ॥३॥ गौतम कहे मगधेसने रे लाल, आराध्यो सिद्धचक्र महा० । रोग गयां वंछित लयां रे लाल, जाणे अभिनव शक महा०, ए. ॥४॥ श्रीगोतम ! मुझने कहो रे लाल, एहनो सहु अधिकार महा० । सांभलवा मन उमद्यो रे लाल, सुणसे सहु नर नार महा०, ए० ॥५॥ दक्षिण भरते दीपतो रे लाल, मालव देस विख्यात महा० । दुरभिक्ष न पडे जिहां कदी रे लाल, 'केही कहीये वात महा०, ए० ॥६॥ तिणे देसे नयरी भली रे लाल, उजेणी अभिराम महा० । धण १ गाढे नार वर्ण । २ राजा | ३ मगघदेशके स्वामी श्रेणिक । ४ नवा उत्पन्न हुआ इंद्र । ५ दुकाल। ६ क्या।७ कहें। ८ मनोहर।
जोवो ० ॥७ ॥ एक धरमथी शिव सुख लहीये , दहीये कर्म कठोर रे । एक थकी श्रीपाल. ॥८॥ जिनधर्म रे। मलिन कुचेल नहीं पवित्राई, स्युं ते नोडे कर्म रे, जोवो० ॥२॥ रूपसुंदरी कहे सांभलि बहिनी !, कसिये कंचण जेम रे । कीजे धर्म परीक्षा करीने, आले न जपीये एम रे, जोवो० ॥३॥ धरम धरम सहु कोई भाषे, पिण अंतर असमान रे । साकर लूण सरीखा दीसे, काच पाँच समवान रे, जोवो० ॥४॥ सूरज खजूये जिवडो अंतर, अंतर राजा रंक रे।अरकं दूध गोदूधे अंतर, अंतर सुख आतंक रे, जोवो० ॥५॥ चंदन आक धत्तूरे अंतर, अंतर विष पीयूष रे । जैन धर्म (समो नहीं कोई) मोटो जगमाहे, जेहथी जाये दूष रे, जोवो० ॥६॥ धरम अनेक अछे जगमांहे, पिण ते हिंसा मूल रे, धरम जैन अधिको जोवंतां, जीवदया अनुकूल जन ॥८॥ १ खराव ( मलिन ) वस्त्र । २ झूटा कलंक । ३ बोलना । ४ मणि । ५ आकका दूध । ६ कष्ट-दुःख । ७ अमृत । ८ मोक्ष रास श्रीपाल. ॥७॥ दूहा-पहिली मिथ्यात्वी कुले, अवर जैन कुल जाणि । जैन शास्त्र रूपसुंदरी, भणी सुधारसवाणी ॥१॥ समकित गुण निर्मल धरे, जाणे अरथ विचार । धरम थकी चूके नहीं, जो हुवे लाख प्रकार ॥२॥ शिवशासन विद्या भणी, सोहगसुंदरी नार । मिथ्या मति राती रहे, चाले निज आचार ॥ ३ ॥ सोकि पणे वे सुंदरी, पिण अत्यंत सनेह । आप आपणा धर्मसुं, रंगे राती जेह ॥४॥ प्रीति परस्पर अतिघणी, एक जीव तनु दोइ । पिण निज निज मतने विषे, विसंवाद नित होइ ॥५॥ ढाल ३ जी. "धन धन संप्रति राजा साचो” एहनी अथवा "सेबूंजे साधु अनंता सीधा" एहनी- जोवो दृष्टिरांग अति गिरुओ, छूटे दोहिलो एह रे । दृष्टिराग राता नर नारी, किमहि न समझे तेह रे, जोवो० ॥१॥ दृष्टिराग करी सोहगसुंदरी, उत्थापे १ बीजी । २ अमृत । ३ एकही पतिकी दो खिया, जिसको शोक कहते हैं। ४ शरीर । ५ खमतका राग-प्रेमबंधन ।
श्रीपाल.
॥ १०॥
वरस पांचनी ते थई, दीठां परम प्रमोद ॥४॥ भणिवा सारिखी थई, बुद्धितणो
भंडार। मातपिता देखी करी, इणपरि करे विचार ॥५॥
ढाल ४ थी. "हरीया! मन लागो" एहनी, कन्या दोइ भणावीये, भणिवा अवसर एह
रे, दोइ कन्या (भणावीये) भणे। बालपणे सहु आवडे, नाण विन्नाण अछेह रे, दो० ॥१॥
सुभदिन सुभ मुहूरत घडी, भणिवा ठवी बे बाल रे, दो० । सुरसुंदरी सिवभूतिने, मयणा
सुबुद्धि नीसाल रे, दो० ॥२॥ प्रथम सुता पंडित कन्हे, भणे सदा चित लाइ रे,
दो० । गणित लिखित लक्षण कला, तर्क साहित्य सहाइ रे, दो० ॥३॥ ज्योतिष)
क वैद्यक सहु भण्या, भरहे संगीत पुराण रे, दो० । मंत्र जंत्र जडी ओषधी, थई
सिवसास्त्रनी जाण रे, दो० ॥४॥ रागरंगे सहु रीझवे, गावे वीण बजाइ रे, दो० ।
१ शरीरमें रहे चक्र आदि । २ न्यायशास्त्र । ३ काव्यशास्त्र । ४ भरत नामका नाटक ग्रंथ । ५ अढारे पुराण शास्त्र ।
॥ १० ॥
रास. श्रीपाल. पिंड पापे भराये, लहीये नरक अघोर रे, जोवो० ॥ ८॥ धरमतणी चरचा माहोमांहे, करे अहोनिसि एम रे । प्रीति रीतिसुं वे वे सुंदरी, पाले पूरो प्रेम रे, जोवो० ॥९॥ सुखे समाधे इणपरि रहती, धरती पिउसुं रंग रे । विषयतणा सुख विलसे बहुपरि, दिनदिन अति उठेरंग रे, जोवो० ॥ १०॥ काल न जाणे किमही जातो, पिउ प्रिया इक राग रे। कहे 'जिनहर्ष' ढाल ए बीजी, गावो आस्या राग रे, जोवो० ॥११॥ दूहा-सुख विलसंती चे जणी, जनमी पुत्री दोइ । राय करे उच्छव घणो, हीयडे हर- पित होइ ॥१॥ राणी सोहगसुंदरी, दरीभरी गुणप्रेम । तासु सुता सुरसुंदरी, नाम बुलावी तेम ॥२॥ रूपसुंदरी बीजी प्रिया, तेहनी पुत्री जेह । मयणासुंदरी तेहनो, नाम ठव्यो गुणगेह ॥ ३॥ पांच धाइ पालीजतां, करतां ख्याल विनोद । शरीरमें रहा आत्मा २ रात दिन । ३ पतिसे । ४ भोगवते हैं । ५ उल्लसित मनसे । ६ स्वीभार । ७ गुणागुफा । ८ प्रेमपोपक ।
श्रीपाल.
॥१२॥
जैन भाव संघला लहे, निश्चयने विवहार रे, दो० । कहे 'जिनहर्ष' चोथी थई, ढाल
इणे अधिकार रे, दो० ॥ १३ ॥ सर्व गाथा ६९ ॥
दूहा-जिनमत धर अध्यापके, कुमरी भणावी जेह । मिथ्यामत राचे नही, धरम
रंगाणी देह ॥१॥ एकज सत्ता दुविध नय, काल त्रिण गति च्यार।अस्तिकाय पांचे छ
द्रव्य सात नय धार ॥२॥ आठ करम नव तत्त्व तिम, दसविध मुनिवर धर्म । पडिम
इग्यारस वार व्रत, जाणे एहवा मर्म॥३॥ मूलुत्तर कम्मपयडि, इगसो अट्ठावन्न । कर्म-
बंधना हेतु पिण, जाणे सत्तावन्न ॥ ४॥ बंध उदय उदीरणा, सत्ता जाणे तेह । सुहुम
विचार सवे लहे, प्रवचन भाख्या जेह ॥५॥
ढाल ५ मी. "इडर आंबा आंबली रे"एहनी-सुंदरि ए सुरसुंदरी रे, जोवन पहूंती
जोर । भणी गुणी सगली कला रे, चतुरपणे चित्त चोर ॥ १ ॥ सुगुणनर ! जोवो
॥१२॥
रास.
श्रीपाल
॥११॥
रसीयाना मन मोहती, दीठी आवे दाइ रे, दो० ॥५॥जोवन रूपे आगली, अणीयाला
दोइ नैण रे, दो० । मुखडे जीत्यो चंद्रमा, अवे सुधारस वैण रे, दो० ॥६॥ रूप
अधिक सोहे वली, चतुराई गुणमेलि रे, दो० । सोवन मुद्रा मणि जडी, दूधे साकर
भेलि रे, दो० ॥७॥ भणी गुणी चोसठ कला, अपछरने अणुहार रे, दो० । पहिले गुण-
ठाणे थई, गुरु संगति सुविचार रे, दो० ॥८॥ मिथ्यात्वी सिरसेहरो, सिवभूति पंडित
तेह रे, दो० । शिष्यणी पिण सुरसुंदरी, तेहवी कीधी तेह रे, दो० ॥ ९॥ मिथ्यामत
थापे घj, तत्त्वथकी विपरीत रे, दो० । काने पिण न गमे सुण्यो, जैनधर्म सुं प्रीत रे,
दो० ॥१०॥ हवे वीजी कन्यातणो, सुणो पठन अधिकार रे, दो० । शास्त्र भण्या
जिनमततणा, आगम अरथ विचार रे, दो० ॥ ११॥ चोसठ महिलानी कला, जाणे
गुरु सुपसाय रे, दो० । अवसरे धर्म करे वली, प्रणमे जिनवर पाय रे, दो० ॥१२॥
श्री
पा
अभ्यंतर सभामं बैठा हुआ
राजा प्रजापाल अपनी दोनों राज
पुत्रीयोके विद्याभ्यासकी परीक्षा
जा
का
रा
स
ले रहा है।
(पत्रांक १३)
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श्रीपाल,
॥ १४ ॥
॥ ९॥ लोक खुस्याल सहू थया रे, रंज्या राणी भूप। सहु को लोक कहे इसूं रे, एतो
सरसति रूप, सु० ॥ १०॥ तुझे पिण मयणासुंदरी ! रे, समस्या पूरो एह । अनुमति
लहि निज तातनी रे, कहे कुमरी गुणगेह, सु० ॥ ११ ॥ विनय विवेक प्रसन्नता रे,
सीलसुं निर्मल देह । शिवपदनो मेलावडो रे, “पुण्ये लहीये एह", सु० ॥ १२॥ मात
पिता हरषित थया रे, हरख्या लोक न जात। प्राये मिथ्यात्वी भणी रे, न गमे उत्तम
वात, सु० ॥ १३॥ उत्तमने उत्तम गमे रे, नीचने नीच सुहाइ । ढाल थई ए पांचमी
रे, कहे 'जिनहर्ष' बनाइ, सु० ॥ १४॥ सर्व गाथा ॥ ८८॥
दूहा-कुमरीनी इणपरि करी, बुद्धि परीक्षा राय। आगलि जे थाये हिवे, ते सुणज्यो
चितलाय॥१॥कुरुजंगल देसे अछे, संखपुरी इण नाम । नगरी तेहनो राजवी, दमि-
तारि अभिराम ॥ २ ॥ उज्जेणी राजातणी, नितप्रति सारे सेव । निज बदले एकण
॥ १४ ॥
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nkave रास. श्रीपाल. ॥१६॥ दिखाय, कु०॥४॥ बापे जाण्यो नेह सुतातणो, पुत्री! सांभल तूं सुविचार, कु०। जे मन माने जेहसुं प्रीतडी, ते परणावू भरतार, कु०॥५॥ हीयडे हरखी कुमरी इम कहे, लोक तणी तजि लाज, कु० । वांछयो वर पामुं तो एहने, परणावो महाराज!, कु० ॥६॥ अथवा तुझे मुझने परणावसो, माहरे तेह प्रमाण, कु० । बाप दीयो वर कन्या वरे, ते सुकुलीणी सुजाण, कु० ॥७॥ तुमथी लहीये वंछित बापजी!, तुमथी सुख लहीये श्रीकार, कु० । पोतानी जाणी सुखिणी करो, तुझे माहरे किरतार, कु० ॥८॥ इण वचने राजा तूठो कहे, जाणी अंतरभाव, कु० । ए अरिदमन कुमर पुत्री ! वरो, जुगतो सरल सभाव, कु० ॥९॥ सहु कोने मन मानी वातडी, भलो कह्यो महाराय, कु० । सरीसा सरीसी ए जोडी मिली, आवी सहु कोने दाय, कु० ॥ १०॥ लोक सहु को राजाने कहे, होस्ये इहां रंगरोल, कु०। एह जमाई सोभे तुह्म घरे, जिम मुख सोभे श्रीपाल. वरस, मुक्यो अंगज हेव ॥ ३ ॥ नाम तास छ अरिदमन, अरि दमि कीधा जेर । जाणे सूरति कामनी, नारि रहे नित घेर ॥४॥ भमरो केतकि गंधसुं, मांडि रहे जिम मोह । तिम सुख पामे नारियां, कुमर निहाली सोह ॥५॥ ढाल ६ ठी. “मुजरो मानो हे जालम जाटणी" ए जाटणीना गीतनी-मदन मनोहर कुमर कलानिलो, देखी जोवन वय सुकमाल, कुमरी मोही हो कुमर सुजाणसुं। सुरसुंदरी मुख पंकज भाल, नयणे जोवे हो फिर फिर कुमरने, पामे सुख मुख तास निहाल, कु० ॥१॥ दीठां हीयडो हेजे ऊलसे, दीठां पाखे अंदोह, कु० । एतो अणखाधे पाणी रसो, एहवो पापीरे मोह, कु० ॥२॥ ढाक्यो न रहे किम ही नेहलो, जो करे कोडि उपाय, कु० । आग छिपाई घास पलालमें, परगट ते खिणमांहे थाय, कु० ॥३॥ चोवा चंदन कुसुमनी वासना, छानी धरीये छिपाय, कु०।तो हि खिणमाहे परगट हुवे, तिम ए नेह श्रीपाल, ॥१८॥ . रे, पूरव लिखित प्रमाण । ते सघलो आवी मिले, होजी केहो इहां विन्नाण? ॥१॥ पिताजी!, कर्म सबल जगमांहि, कर्म करे तेहिज हुवे, होजी सुख दुख अरति उच्छाहि, पि० ॥ २॥ जिण वेलाये जेहवा रे, जीवे कीधा कर्म। उदय थया तिण अवसरे, होजी लहीये फलनो मर्म, पि० ॥३॥ रंक फेडी राजा करे रे, राजा फेडी रंक । एहवो कुण ? फेडी सके, होजी कर्म लिख्या जे अंक, पि० ॥४॥ राय कहे पुत्री ! सुणो रे, तुं मुझ प्राण आधार । वार वार तुझने कहूं, होजी मांगो वंछित भरतार ॥ ५॥ सुताजी !, हुं सबलो जगमाहि, मुझ तूठे सहु संपजे, होजी सुख दुख अरति उछांहि, सु० ॥६॥ माहरी आस्या सहु करे रे, निबलाने बलवंत । हूं तूठो दालिद्र गमूं, होजी रूठो जाणि कृतंत, सु०॥७॥ रंक प्रते राजा करूं रे, राय भणी करूं रंक । सबला ते पिण माहरी, होजी माने मनमां संक, सु० ॥ ८॥ करण मते ते हूं करूं रे, सुख दुख माहरे हाथ । ॥ १८॥ AAG रास. श्रीपाल ॥१७॥ तंबोल, कु०॥११॥राजा पिण रलीयायत थई करी, कीधो वचन प्रमाण, कु० । छट्ठी ढाल सगाइ नृप करी, कहे 'जिनहर्प' सुजाण, कु० ॥ १२॥ सर्व गाथा ॥ १०५॥ दूहा-हिवे मयणाने पूछीयो, पिण बोले नहीं तेह । नीची दृष्टि निहालती, मुखडे लाज करेह ॥ १॥ पुनरपि राजा पूछीयो, पुत्री ! मुझने भाप । ताहरा मनमाहे हुवे, वरनी जे अभिलाष ॥२॥ वार वार इम पूछतां, कुमरी थई सलाज । मुख मुलकी कहे तातने, पूछणसुं स्यो काज ? ॥ ३॥ चतुर विचक्षण छो तुम्हे, जाणो छो सहु नीति । कुलकन्याने पूछीये, एह नहीं जुगती रीति ॥ ४॥ कुलवंती कहो किम कहे ?, मुझ परणावो एह । मात पिता जेहने दीये, तेहिज वरसुं नेह ॥ ५॥ निश्चयसुं जो जोईये, ते पिण बाह्य निमित्त । सुख दुख पामे प्राणीयो, निज निज पूरवक्रित्त ॥६॥ ढाल७मी. "मया मोहि दिखणी आणि मिलाइ” एहनी-मयणा कहे सुणो तातजी
रास
श्रीपाल.
॥ २० ॥
ते सहू मुझ पसाय ॥२॥ मयणा कहे सुणो तातजी!, हूं तुम्ह कुल उत्पन्न । में पामी
सुख साहिबी, ते मुझ पोते पुन्न ॥३॥ मयणा इणिपरि भाषतां, राजा थयो कृतंत ।
जिम पावक घृत सींचीयो, वाधे झाल अत्यंत ॥४॥ भाग्यहीण ए दीकरी, दीसे
छे परतक्ष । कह्यो न माने माहरो, लीयो न मेल्हे पक्ष ॥५॥ क्रोध वसे थयो रातडो,
धमधमीयो नरनाह । सगपण बेटी बापनो, भागो मन उच्छाह ॥६॥
ढाल ८ मी. नायकानी-मयणा कहे सुणो तातजी! रे, इवडी म करो रीस मोरा
तातजी! रे,। जाण तुझे सहु वातनारे लाल, तुझे मोटा अवनीस मो०, मयणा०॥१॥
फोगट गरव न कीजीये रे, गरवे सहु गुण जाइ मो० । इंद्र नरेंद्र पिण गर्वथीरे लाल,
लघुता पणो लहाइ मो०, म० ॥ २॥ तुझे कहो जे हूं करूं रे, सुखीया दुखीया लोक
मो० । करता हरता हूं सहीरे लाल, ते तो इमही फोक मो०, म०॥३॥तुम सेवाथी
॥ २०॥
श्रीपाल. रास. कारण रूठो जमघर मोकलं, होजी तूठो करुं नरनाथ, सु०॥ ९ ॥ वलतूं मयणा वीनवे रे, तात! सुणो मुझ वत्त । तुमने पिण करमे किया, होजी राजन! राज निमित्त, पि० ॥ १० ॥ जेहने पोते पुन्य छे रे, तेहने तूसे राय। पुन्य विना तूसे नहीं, होजी जो करे लाख उपाय, पि० ॥ ११ ॥ छोरू पिण मोटा तणा रे, सुखीया दुखीया होइ। छे सहु कर्मनो, होजी गरव म करज्यो कोइ, पि० ॥ १२॥ थाप्यो कुमरी कर्मने रे, उत्थाप्यो नृप वैण । रीसवसे थयो आकरो, होजी कीधा राता नैण, पि० ॥ १३॥ गरच करे खोटो जिके रे, तेहमें किसो सवाद? । ढाल थई ए सातमी, होजी 'जिन हरष' सुता नृप वाद, पि० ॥१४॥ सर्व गाथा ॥ १२५॥ दूहा-रीसाणो नृप इम कहे, रे रे मूढ गमार! । तूं लीला सुख भोगवे, ते सहू मुझ उपगार ॥१॥ पहिरे कंचण आभरण, नव नव वेस बणाय । खाणा पीणा खेलणा, - श्रीपाल. रास. ॥ २२ ॥ रीसावीयो रे, सांभल(संभलावी) एहवा बोलरे दु० । मोटा बोली दीकरीरे लाल, मुझ लेखव्यो तृण तोलरे दु०, म०॥११॥मुझने इणे उत्थापीयो रे, थाप्यो वखत सहायरे दुः। कहे 'जिनहरष' सहू सुणोरे लाल, आठमी ढाल कहायरे दु०, म०॥१२॥ सर्व गाथा १४३ । दूहा-रोषातुर नृप देखिने, मंत्री चिंते एम । ठारूं वयण सुधारसे, सीतल थाये जेम ॥१॥ महाराय! रयवाडीये, रमवानो छे लाग । जईये रमवा आज प्रभु!, फूल रह्यो छे बाग ॥२॥ अंतरगत दाझी रह्यो, क्रोधागनि विकराल। ऊठ्यो तुरत उतावलो, मानि वचन भूपाल ॥३॥ चरवादार प्रते कहे, करो तुरंग तइयार। हुकम सुणी आण्यो तुरी, सपलाणो तिणवार ॥ ४॥ चतुरंगसेना परिवर्यो, राय थयो असवार । हिवे आगलि जे नीपजे, ते सुणज्यो अधिकार ॥५॥ ढाल ९ मी. “रे हमीरीयारे रहि वैरी नैण झकोलतो"एहनी-राय रयवाडी संचर्यो, ॥ २२॥ .
रास.
श्रीपाल.
॥ २२ ॥
जो हुवेरे, सुखीया सहु जगमांहि मोतुझ सेवा करता नथीरे लाल, ते तो सुखीया
कांहि ? मो०, म०॥४॥ राय कहे रूठो थको रे, तूं निरधन वर जोगरे दुहागिणि!।
ए मतिसारू नवि मिलेरे लाल, तुझने उत्तम भोगरे दु० ॥ ५॥ मयणा! सुण मुझ
वातडी रे, ताहरे पोते पापरे दु । तो सूझे तुझ एहरे लाल, पामिस बहु संतापरे
दु०, म० ॥६॥ हठमाती पोतातणे रे, जाणे हूं बुद्धिवंतरे दु०।समझावी समझे नहींरे
लाल, अवगुण एह महंतरे दु०, म० ॥७॥ राती निज गुण ज्ञानमें रे, मूरख निगुण
निटोलरे दु० । लेखवती केहने नथीरे लाल, मूढ न जाणे बोलरे दु०, म० ॥ ८॥ हूं
जाणूं सुखिणी करूं रे, परणावू वर साररे दु०।पिण माहरो न करे कह्योरे लाल, थाइस
दुःख भंडाररे दु०, म० ॥९॥ मयणा कहे तुझने रुचे रे, ते परणावो नाह मोरा तातजी!
रे। मुझ पोते पुन्य जो हुस्येरे लाल, तो मुझ होस्ये उच्छाह मो०, म० ॥१०॥ गाढेरो
॥ २१॥
श्रीपाल.
॥ २४ ॥
द्रादमंडल कोढे गल्या, दीसंता विकराल रा०।सेवक तास दोहागीया, राध रुधिर परनाल
रा०, रा०।९। देसाधिप पासे लीये, मननो मान्यो माल रा०। ना कोई न कही सके,
एहवी एहनी चाल रा०, रा०॥१०॥ तेह भणी बीजी दिसे, चालो श्रीमहाराय! रा०॥
जावा द्यो ए कोढीया, जिम दरिसण नवि थाय रा०,रा० ॥ ११ बीजी दिसि राजा
चल्यो, मारग छोडी जाम रा० । कोढीवृंदे निरखीयो, हूकल करता ताम रा०, रा०
॥१२॥आव्या ते ऊतावला, नृप साम्हा तिणवार रा०तब राजा एहबूं कहे, सुण मंत्री !
सुविचार मं०, रा० ॥ १३ ॥ परचावो पासे जई, मुह मांग्यो द्यो माल मं० । पिण दूरे
रहाविज्यो, करिज्यो मुख लालमपाल मं०, रा०॥ १४॥ हुकम दीयो मुहुताभणी,
बीहंते भूपाल मं० । कहे 'जिनहरष' पूरी थई, नवमी ढाल रसाल मं०, रा० ॥१५॥
दूहा-गलितांगुलि ऊतावलो, उंबरनो परधान । ते पहिली आवी कहे, सांभल हो
॥ २४ ॥
रास.
श्रीपाल.
॥ २३ ॥
आगलि उडे खेह मंत्रीसर!।राजा चकित थई कहे, आवे छे कुण एह मं०, रा०॥१॥
आडंबर करता थका, न धरे किसि प्रवाह मं०। कोलाहल हलवोलसुं, मंत्री कहे सुणि नाह!
राजेसर !, रा०॥२॥ ए पेडो कोढी तणो, सात सयां परिवार राजेसर! । कोढी
सहु भेला थया, व्याप्यो रोग अपार रा०, रा०॥३॥ राजकुंवर एक नान्हडो, आवी
मिलीयो मां(य)हि रा० । ते पिण कोढी फरसथी, उंबर रोग लहाय रा०,रा०॥४॥उंबर
रोग थकी थयो, उंबर राणो नाम रा० । ते आवे छे ए चल्यो, ए असमाधिनो ठाम
रा०, रा०॥५॥असवारी वेसर तणी, परिवरीयो परिवार रा०। गतनासा चामर धरे,
गलित त्वचा छत्रधार रा०, रा० ॥६॥घंटा हाथे झालिने, मुहर चले गत कर्ण रा०।
लोकांने वीहावतो, मूंडो जेहनो वर्ण रा०, रा० ॥ ७ ॥ कोढ मंडल अंग ओलगू,
गलितांगुलि मंत्रीस रा०। सर्व गलित कोटवालछे, तेहमें उंवर ईस रा०, रा०॥ ८॥
॥ २३ ॥
रास. २६ ॥ . नहीं, दोतड पडीयो भाई रे, रा०॥४॥ नृपने मयणा सांभरी, कन्या ए वर जोगी रे। अविनयनो फल जिम लहे, थाये दुखिणी रोगी रे, रा०॥५॥ कीरति कहो किम हारीये, दोहिली जे जगमाहे रे । कन्या देतां जस रहे, तो जस गमीये काहे रे, रा०॥६॥ मुझ मंदिर तुम्हे आवज्यो, इम कही पाछो वलीयो रे। राय गृहांगण आवीयो, सासीनो हलफ- लीयो रे, रा०॥७॥ तेडी मयणा सुंदरी, राय कहे सुण बेटी ! रे । हूं तुझने सुख चिंतवू, तूं अवगुणनी पेटी रे, रा०॥८॥ बाप सुकरमी जो हुवे, वंछित वर परणावू रे। हठ परि- हर सठ बालिका!, दोहग दूरे गमावू रे, रा०॥९॥ जो आपकरमी तूं हुवे, तो वर उंबर राणो रे। तुझ करमे ए आणीयो, परणेवानो टाणो रे, रा०॥१०॥ मयणा मुलकीने कहे, वखत लिख्यो वरराजो रे। ते मुझ सिरनो सेहरो, माहरे तेहसुं काजो रे, रा०॥ ११॥ राये ते तेडावीयो, सपरिवारसुं आयो रे । करमसंयोगे नृप कहे, तूं वर मयणा पायो रे, ॥ २६॥ ORG