Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Atharvaved Subodh Bhashya Bhag 1 Kand 1 To3
Front matter
अथर्व वेद
प्रथम भाग
(अथर्ववेदके प्रथम तीन काण्ड )
[ मूल मंत्र, अर्थ, स्पष्टीकरण और ममापितोंका वर्गीकरण सधा
उनके उपयोग करनेकी विधिके साथ ]
देर
प. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर
साहित्य-याचस्पति, पेदाचार्य, गीतालबार
अध्यक्ष- भ्याध्याय मण्डल, पारदी [नि मुग्न ]
स्वाध्याय-मण्डल, पारडी
गल्प ८).
प्रकास:
बातम्त धीपाद सातवटेकर, बो. ए.,
स्वाध्याय मण्डल
पोस्ट- 'स्वाध्याय मण्डल (पारदी)' पर [जि सुरत]
PRESENTED BY
Muutny of Education
Coexpondrest of India
मन्१९५० सवत् २०१५:शक14.
द्विवीय पार
यस मापामास.वी.ए.,
मात-मुश्णालयाचा मगर,
६५. पारगड (anti) Meraj
अथर्ववेदके पहिले तीन काण्डोंका परिचय । " ४ १ ५ १. सूक संख्या पोषक पंचम मनुवाक १ १ । ४ ४ ४ . १५ ५ भयदमें २० का है। इनमें प्रथम तीन काण्डका अनुयं मनुवाक यह प्रथम माग है। इसमें सूक्त मार मंत्र संगया इस दिनीय प्रपाठक रत.याय पर करना सामानधन प्रथम काण्ड प्रथम मनुवाक १९ शत्रुनाशन मपम मपाठक महानIRE मंत्र संध्या प्रमापार पुरिसंवा रोगनिवारण १ विजय ૨૧ स्येवपुरानाशन ३ भारोग्य, मूत्रदोष निवारण कुरजातन ज पीतम दूरीकरण मुपवाहि चितवीपी द्वितीय अनुगा पुरमासन ទំនg उपनगर धन वामि . जापान १ मावाट गुणपति वीरम-14- Rat मोरमुगा तनिधान मपुरिया 11 सरा नमन १५ बरामigy पुर Tam.Net " ४ " पाप मुनि १ - ४ (0) [अथर्ववेदके पहिले १२ मन्त्र है । ७ माजाला एक सूफ है और ९ मत्रोंवाला चतुयं मनुवाक एक मूक है इस तरह- चतुर्थ प्रपाठक ४ मंग्रवाले ३० सक १२० मत्र १८ भारमसरक्षणकावरू शुद्धिकी विधि १९ " घाले २ १२ " " ७ ५ " ९ ५ " " " १५३ कुल मत्र सस्था। २३ ५ सभों की मसफलता ८ इस प्रथम काण्डकी प्रकृति सूतवाले मत्रोंकी है मय द्वितीय कापड देखिये- अप द्वितीय काण्डकी पाठक, मनुवाक, सूक, मन सरपा इस तरह है यह देखिये- २५ गोरस ४८ द्वितीय काण्ड पचम भनुवाक २० विजयपाधि दीर्घायुष्य ७ तृतीय पाठक ५ प्रथम मनुवार . मत्रसह्या ५ मूसध्या १ पतिपत्नीका मेल रोगोत्पादक कृमि ५ ५ २९ २ शीर्षक गुध अध्यात्मविद्या पूजनीयर मारोग्य जरिमगि अविवधर्म ३ पष्ठ मनुवाक १२ . ५ २९ कृमिनाशन यक्ष्मनाथन मुक्तिका मार्ग पक्ष मारमसमर्पण विवाहका मगल कार्य द्वितीय मनुवार ५ ८ লম शापो कोटामा " ५ इस काम ५ मावाले मक २१ है और मत्र . ८ " . . " ५ " " . " " त्रिपोगरमा मग्धिकारकामा दुगविसे बचा मीनमुरार मामा गुग मारामा परिणाम बिनियोगमा दिन मामा " ४ . दिखीsten म सना महतोप को प्रति ५ मा को impमा ११ मा ५ मंत्रों है। नीमो अनुमार, मन मारमा नये- मागाह तीन काण्डॉका परिचय १३) तृतीय काण्ड ८ पंचम प्रपाठक प्रथम मनुवाक ७ सूक संख्या मंत्र संख्या ३८ पशुस्वास्थ्यरक्षा २९ संरक्षक कर एकता पापकी निवृत्ती ११ २३० इसमें ६ मंत्रपाले १३ सूक हैं मंत्र संख्या ७८ है- ६ ४२ शीर्षक शानुसेना-संमोहन ४४ ६ ६ २ " ७ ४ ७ ६ " ४८ ५ ८ . २ १८ " २ " ११ घाला १ , इसकी" ७ ७ १३ ८ ६ ६ ૨ राजाकी राज्यपर पुनः स्थापना राजाका चुनाव राजा और राजाके बनानेवाले द्वितीय मनुवाक ६ धीरपुरुष मानुवंशिक रोगोंका दूर करना राष्ट्रीय एकता क्लेश मतिबंधक उपाय कालका यज्ञ तृतीय मनुवाक हवनसे दीर्घायुष्य १२ गृह-निर्माण १३ १४ गोशाला १५ वाणिज्यसे धनप्राप्ति चतुर्थ मनुवाक पहपाठक १६ भगवानकी प्रार्थना ३१ सक इसमें ६ मंत्राले १३ सूक्त हैं मतः इस काण्डकी प्रकृति ६ मंत्रवाले सूक्तोंकी है ऐसा कह सकते हैं। तीनों कांगकी मंत्र सण्या यह है--- ' का सूत ३५ मंत्र संख्या १५५ ८ ९ २ २०७ " ३ " " ८ ३८ कृषिसे सुख १८ ६ वनस्पति शान और शौर्य १९ ८ तेजस्विताके साथ सभ्युदप २३० ५९० कुल मंत्र संख्या इन सूक्तोंके क्रमको देखनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि, इन सूक्तोंकी स्थापना विषयानुसार नहीं है। इसकी रचना विषयानुसार की जाय, तो पाठकों को वेदका विषय समझ. में सुगमता होगी। इन तीनों काण्डोंके सूक विषया. नुसार इकट्ठे किये तो इस तरह होते हैं- १ ईश्वर-१५ ईश्वरको नमन, २१ मध्यामविधा, २१२ पूजनीय ईश्वर, विश्वम्भरकी भक्ति, १६ मा. वान्की मार्थना, भारमाके • मुक्ति- २३ मुक्तिका मागं। ३शासक- २० महान् शासक, १२, प्रज्ञा पालक, राजाकी राज्यार स्थापना, I राजाका धुमाध, १५ ३१५ राजा और रामाके बनानेवाले, १३ मारा, ११२९ राष्ट्रसंवर्धन, ३२२९ संरक्षक का। ४ युद्ध-श-२ शत्रुसेना संमोहन ! ५ विजय- १२ विनय, २।२० विभप प्रालि, राय पंचम अनुवाक २१ १० २२ कामानिशमन वर्ष प्राप्ति वीरपुत्रप्रालि समृद्धिकी प्रालि कामका वाण २३ २५ ६ ७ २५ ६ पठभनुवाक २६ ४अतिकी दिशा मम्युदयकी दिशा [अथर्ववेदके पहिले भन्युश्य । बढाना। क्षत्रियधर्म, ३११९ ज्ञान पीर शौर्य, २२. वेजस्वितासे २७ धर्म-- ७-८ धर्मप्रचार । २८ जल-११४,५,६,३२,३११३ जल । ६ थुद्धि- ११ बुद्रिका सवर्धन, २०१२ मनका पल २९ काम-२१ कामानिका शमन, ३३५ कामका याण ७ आरोग्य- १॥३,२१३ आरोग्य, १॥३१ जीवनास, ३० कृषि-३१७ कृषिसे सुख । १॥२ रोगनिवारण, ११२२ हृदोगनिवारण, ११२३-२४ ३१ प्रसूति- १११ सुख प्रसूति । श्वेत कुष्ठ, कुटनाशन, 1२५ शीतवर, २१९सधिवातनाशन, ३२ मणि -घारण-१४ जगिदमणि। २८ क्षेत्रियरोगनाश, २३१ रोगोत्पादककृमि, २।३२ कृमि ३३ शाप-२१७ शापको लौटाना। नाशन, २०३३ यक्ष्मनाशन, ३० भानुवशिक रोग दूर करना। ३४ वनस्पति- २२५ पृश्निपणी, ३।१८ वनस्पति । ८ दीर्घमायु- ॥३. आयुष्यवर्धन, १॥३५ पल और ३५ पशु-३१२८ पशुस्वास्थ्य रक्षण । दीर्घमायुप्प, २।२८-२९ दीर्घमायुष्य, ३१, हवनसे ३६ पतिपत्नी- २६३६ विवाह मंगल कार्य, २३. दोघमायुष्य। पतिपत्नीका प्रेम। ९ धन-३५ पाणिज्यसे धनकी ति, २२४ समृ ३७ काल-३।१० कारका यज्ञ। दिकी प्राप्ति । ३. रक्तवाव- १७ रक्तस्राव बद करना। १० पापसे मुक्ति- ११० पापसे मुक्ति, ३३१ ३९ चोर डाकू- पोरनाशन; १११९ . पापसे निति, २१. दुर्गतिसे पचना, २१४ विपत्तिको नागन, ११२८ दुनागन, २०२४ समोकी दामा भसफछता। १ तेजस्विता- ११९, २० वर्ष प्राप्ति । इस तरह सूकॉकी विषयानुसार व्यवस्था की जाय तो १० पा- २१३५ यामें भामसमर्पण। इस व्यवस्थासे पैदिक सूत्रों का बोध शीय और सुखसे १३ संगठन-11१५ सपन यश, २१८,३३० राष्ट्रीय हो सकता है। आशा है कि पाठकगण इसका विचार करेंगे। हमने इस समय जैसी सूहों की यवस्था है वैसी १४ मुममाप्ति- ११२५ मुममाति। ही रखी है। १५ मारमरक्षण-11-1८ मामरक्षक वैदिक सूक्तियाँ १६निमयता-१५ निर्भपीयन । ७पार-वीर पुरस, वीरपुत्र। इम प्रथम दिमाग मोहे र सून. भाग ऐसे है-- मम्युदय -- २० मम्युदय विमा १ ९मनियध-दूर करना । पागमन ५ सपा ५५ पृष्ठमस्या .. शुरना-1-11 प्रति रितीव दनिर्मा-११ पानियाm १ गो प्रथम . " " " मीर " तीन काण्डोका परिचय] (५) . - गरूप रहते हैं। जैसा वीजमें मगज होता है, वैसे मंत्रमें यत्र देवा अमृतमानशानाः समाने योनाच- मुभाषित होते हैं। पाठक इनका विचार करें और प्रयोगमें ध्यैरयन्त । .२/११५ भी ला सकते हैं। ज्यास्यानो लेखों में तथा अन्यप्रकार जहां अमृत पौनेवाले देव उस एक भाश्रय स्थान में रहते हनका बहुत उपयोग होसकता है और जितना इनका उप- हैं। ( वह समर परमेश्वरका अाधार स्थान है।) योग होगा उतना घेद व्यवहारमें लाया गया यह सिद्ध हो प्रातरग्निं प्रातरिन्द्र हवामहे प्रातमित्रावरुणा सकता है। प्रातरश्विना ।प्रातर्भगंपूपणं ब्रह्मणस्पति प्रातः इसके नीचे हम इन तीनों काण्डोंके सुभापित देते हैं सोममुत रुद्रं हवामहे ॥ म.३.१६१ परमेश्वर प्रातः समय अग्नि, इन्द्र, मिम, वरुण, अश्विनी, भग, पूषा, ब्रह्मणस्पति, सोम और रुद्रको चुलाते हैं, इनकी इन तीन काण्डों में परमेश्वर विषयक सुभापित ये हैं- प्रार्थना करते हैं। (एक देवके ये अनेक गुणवोधक नाम है।) यो देवानां नामधा एक पर तं संप्रश्नं भुचना उतेदानी भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व उतमध्ये यन्ति सी भ. २११५३ अह्नाम् । उतोदितो मघवत्सूर्यस्य वयं देवानां वह ईश्वर सब अन्य देवोंके नामों को धारण करता है, सुमतौ स्याम ॥४॥ म. ३१६४ वह एक ही सयका प्रभु है। उस प्रश्न पछने योग्य परमे. हम अत्र भाग्यवान् हो, सायंकाल अथवा दिनके मध्य में, धरके पास सब भुवन पाश्रयायें जाते हैं। सूर्यके ४दय के समय भाग्यवान् हो। हम देवों की सुमतिमें वेनस्तत् पश्यत् परमं गुहा यत् यत्र विश्व भवत्येकरूपम् । म २१11 तं त्वा यौमि ग्रहाणा दिव्य देव । W.२०२।१ जहां सप विश्व एकरूप होता है और जो हृदयकी गुहामें हे दिव्य देव 1 तेरे साथ ज्ञान से मैं संयुक्त होता हूं। रहता है उसको शानी भक्त जानता है। अच्छ त्वा यन्तु हविना खजाता। म.३३ स नः पिता जनिता स उत बंधुर्घामानि वेद सजातीय लोग इविष्य घनके साथ रे समीर आजावें। भुवनानि विश्वा । म. २०१३ उपसद्यो नमस्यो भवेह । परमेश्वर हमारा पिता और जनक है, वही बंधु यहां पास जाने योग्य तथा नमस्कार काने योग्य हो। भी है । वह सप भुवनों और स्थानों को जानता है। नमस्ते अस्तु दिवि ते सधस्थम् । अ. २३२।। परि विश्वा भुवनान्यायमृतस्य तन्तुं विततं तेरा स्थान धुलोकमें है, तुझे मैं नमस्कार करता हूं। दृशे कम्। त्रीणि पदानि निहिता गुहास्य यस्तानि वेद स सत्यके अमृतके सुखमय तन्तुको देखनेके लिये सप पितुप्पितासत् । भवनों में मैं घूम मापा हू । सर्वत्र इस सुखस्वरूप अमर इसके तीन पाद हृदयकी गुहा में हैं, जो दनको जानता मारमरूप इस तन्तुको मैंने देखा है। है वह पिवाका भी पिता अर्थात् वढा होता है। दिव्यो गंधयों भुवनस्य यस्पतिरेक एवं परि द्यावापृथिवी सद्य आयमुपातिष्ठे प्रथम नमस्यो विश्वीड्यः । म. २१२॥ जामृतस्य । भ. २)11 मुवनका एक ही दिम्य गंधर्व स्वामी है जो नमस्कार धावायधिवीमें मैं सबं धूम माया हू और सत्यके योग्य है और प्रजाजनों को स्तुति करने योग्य है । प्रथम प्रवर्तक- परमेश्वरकी मैं उपासना सबंध देखता हूं। मृडाद्गन्धर्वो भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यः प्रतद्वांचेदमृतस्य विद्वान् गंधर्यों धाम परमं सुशेयः। गुद्दा यत्। भ. २०१२ भुषों का एक ही स्वामी जो नमस्कारके योग्य है, जो जो हृदयकी गुहा है वह भगृतका श्रेष्ठ स्थान विधान संसेम्य है वही सपा माघार सयको सुखी करे। वक्ता ही मानकर उRELणन का है। . ७.१५ म. २।२।२ (अथर्ववेद के पाहिले है स देवान् यक्षस उ कल्पयताद्विशः । ३१६ प्रातर्भग 1-प्राप्त काल भाग्यवान प्रभुको भक्ति करते हैं। वह देवोंका यजन करता है, वह निश्चयसे प्रजाओंको उपसद्यो भवेह- यहां पास जाने योग्य हो । समर्थ करता है। दिवि ते सघस्थं- आकाश में तेरा स्थान यस्य चक्षुः, प्रभृतिर्मुसं च वाचा थोत्रेण त्रीणि पदा निहिता गुहास्य- इसके तीन पाद मनसा जुहोमि ! म २१३५१५ बुद्धि में है। यह प्रभु यसका मास है, सयका भरण कर्ता, और अमृतस्य विद्वान् - अमृतका जाननेवाला धन्य है। पशका मुख है। पाणी कान और ममसे में इस यजन घाम परमं गुहा यत्- परम धाम हृदय में है। करताह स उ फल्पयताद्विशः- वह प्रभु प्रजामीको समर्थ दिवि स्पृष्टो यजतः सूर्यत्वम् अषयाता हरसो बनाता है। ध्यस्य । म २२२१२ अवयाता हरसो दैव्यस्थ- देवी दु.खोंको यह ईश्वर लोकमें रहता है, वह पूज्य है, सूर्य के समान प्रभु दूर करता है। तेजस्वी और दयी मापत्तियों को दूर करनेवाला वही यहां जो मुक्तियां दी है। उनके ये टुकड़े हैं। ये भी मूक्तियां ही है और ये वारंपार भजन करने योग्य है। पे मूनिया पारवार पढनेरे, कण्ठ करनेसे, वारंवार 'एक एव नमस्यः' प्रभु अकेला एकही नमस्कार करने मनन करने से परमेशर विषयक वैदिक मिदान्त तत्काल योग्य है । 'दिवि ते सधस्थं ' आकाशमें स्थान है। पानमें मास। देखिये- अवयाता हरसो दैव्यस्य ' देवी दु.खों को दूर करने. यो देवानां नामघा- यह देवों के नाम धारण करने वाला वह प्रभु है । ऐसे वेदमंत्रों के टुकड़े मजन करनेके होते बासा। हैं। भला अपने मनमें इनका मजन करे, मयका समाजमें ते संमने भुवना यन्ति सर्या- सब भुवन उस सैकडों और हजारों मनुष्य भके साथ इन वचनों का मान पाने योग्य प्रभु पाम आते हैं। करें। इस तरहका मजन करने के लिये ही ये टुकड़े हैं। पेनस्तापयत्-शानी उसको देखता है। जिनकी दोपर प्रदा है मधपर पान रखते हुए इन परमं गधा यत्-ओहदयके गुप्त स्थानमें रहता है। यधनोंका मजन करें। यह भजन मनमें भी होता है और मन' पिता जनिता-- यह क्ष और उत्पन तास्वरमें सामूहिक भी हो जाता है। ऐसे मर्यसहित परवान। भान होने लगे तो ये मंग्रभाग 2 मनमें स्थिर होते है, घामानि येद मुयनानि विना-8 मुषों और और इनका उपयोग पोलने घालने के समय होने की सुविधा म्यामाना जाना। होती है। नगमानुं पिन - मुगाया रेला पाठ मनमें से मान करके देखें, मजन करने के समय PRATI- TURAL TRो में देखता हू। मोमपने मन में पूर्ण रीतिसे मार मरकर रखें, इस भपतम्य परनिः- मुग्नता पनि। मंत्री मारसे अपना मन मापूर मरा पेमा, भोप्रोत भरा पर पा ममम्यः-१६ ५ नम का है ऐसा भार मनमें मुरिया रने । ऐमा मम मममें .. मेसेसा म पनिको होता वैसा हम पे ही . बोर।
तीन काण्डोंका परिचय] (७) - इंश्वर विश्वका शासक है, जो शासक होता है वह जो राजा और रामामों को करनेवाले, सूत तथा प्राम. राजा ही होता है, ईश्वर शासक है और निदोष शासक है। नेता हैं हे पणमणे ! मन सयको मेरे समीप उपस्थित कर मतः वह हमारे शासकों के लिये आदर्श है। इस रिसे (उनकी सहायता मुझे प्रास हो ऐसा कर।) ईश्वरके गुण हमारे शासकमें देखने योग्य है। ये इस तरह अहं शत्रुहोऽसान्यसपत्नः सपत्नहा। ष. ११२९।५ देखें जा सकते हैं- मैं शत्रुका नाश करनेवाला, शत्रुभोंका वध करनेवाला शासकका वर्णन तया शत्रुरहित होऊ। वेदमें जो वर्णन है उन मंत्रों में शासक, राजा, अधिका अहं राष्ट्रस्याभीवर्गे निजो भूयासमुत्तमः । जीका वर्णन करनेवाले सुमापित ये है- अ.३०५/२ सर्वास्था राजन् प्रदिशो यन्तु । भ. ३।४।१ मैं राष्टके माप्त पुरुषों में उत्तम निज बनकर रहूं। हे राजन् ! सष दिशा सपदिशा (ओं में रहनेवाले प्रजा. अधा मनो वसुदेयाय कृणुष्य । भ. ३।४।४ जन ) तुम्हें ( अपने रक्षणके लिये ) बुलावें। अपना मन धनदान के लिये अनुकूल पनाभो । तास्त्वा संविदाना द्वयन्तु। स. १७ क्षत्रेणाने स्वेन संरभस्वा म. सा४ वे सम प्रजाएं मिलकर एकमतसे तुझे बुलावें। हे भने ! अपने क्षात्रतेजसे शत्साहित हो त्वां विशो घृणता राज्याय स्वामिमाः प्रदिशः अति निहो, अति सृघो, अत्यचित्तीः, अतिद्विपः पञ्च देवीः । म. ३४२ म. १६५ तुझे ये प्रजायें, तुझे ये पांच दिशामों में रहनेवाली दिव्य मारपीट करनेकी वृत्तिसे दूर रह, हिंसकोसे दूर रह, प्रजाएँ राज्यरक्षणके लिये स्वीकार करें। पापीवृत्तीसे दूर हो, द्वेष करनेवालोंसे दूर रहो । आ त्वा गराष्ट्रं । १. ३ तेन सहस्रकाण्डेन परिणः पाहि विश्वतः। है राजन् ! तेरे पाप्त राष्ट्र भागया है। अ.२०७३ सजातानां श्रेष्ठय आ घेोनम् । भ. ॥९॥३ उस सहन काण्डवालसे सब ओरसे हमारा रक्षण कर । अपनी जातियों में उच्च स्थानपर इसको रखो। शप्तारमेतु शपथः । १. २७५ वर्मन् राष्ट्रस्य ककुदि अयस्ख, ततो न उग्रो शाप देनेवाले के पास ही उसका शाप चला जावे । विभजा वसूनि । प. ३।०२ संशितं म इदं ब्रह्म संशितं वीर्य यलम् । राष्ट्रके धञ्च स्थानमें रहकर, और वहांसे सबके लिये संशितं क्षत्रमजरमस्तु जिष्णुयेपामस्मि पुरोहितः। धोका विभाग कर दो। म.३९ सविसतिरेकरराष्ट्र यं विराज । न. ३.919 मेरा यह ज्ञान तेजस्वी है, मेरा वाय भार बल तेजस्यो प्रजामों का मुख्य स्वामी एक राजा होकर, हूं विराज है। जिनका में विजयी पुरोहित हूं उनका तेजस्वी और क्षीण न होनेवाला क्षात्रतेज बढता रहे। स्वस्तिदा विशांपतित्रहा विमृधो घशी । क्षिणामि ब्रह्मणाऽमित्रानुनयामि स्वानहम् । प्रजापालक कल्याण करनेवाला, शत्रुनाशक और घात. भ. ३.१९३ कोंको वश करनेवाला हो। मैं शानसे शत्रुओंका नाश करता हूं और अपने लोगों को ब्रह्मणस्पतेऽभि राष्ट्राय वर्धय । भ. १।२९।१ मैं उसत करता हूं। है ज्ञानी पुरुष ! राष्ट्रके हित करने के लिये यहाभो । एप क्षत्रमजरमस्तु जिप्ण्वेषां वि विश्वेऽ. ये राजानो राजकृतः सूता ग्रामण्यश्च ये। चन्तु देवाः । भ. १९५ उपस्तान पर्ण मा त्वं सर्वान कृण्यभितो जनान् । इनका क्षात्रतेज भक्षय हो। इनका विभयो चित्त सप म. २५० देव सुरक्षित रखे । - मान् हो। म. ॥२ [अथर्ववेदके पहिले (८) आया. पुत्रा. सुमनसो भवन्तु यहुं चलि प्रति जो तेरी तापशक्ति, हरणशक्ति, वेजाशक्ति, प्रकाशशक्ति. पश्यास उन्नाभ. ३१४३ और तेजनशक्ति है, उससे उनको कष्ट दे जो हमसपको स्त्रियां और पुत्र उत्तम मनवाले हो । बार उग्रवीर बन. कष्ट देता है और जिसका हमसब द्वेष करते हैं। कर यहुत्त करमारको देखें। अभूपीनामभिशक्तिपाया उ । म. २॥१३॥३ पथ्या रेवतीर्घहुधा विरूपाः सर्वाः सगत्य विनाशसे मनुष्यों का रक्षण करनेवाला हो। वरीयस्ते अनन् । अशा विध्यभर विश्वेन मा भरसा पाहि। सन्मार्गसे चकनेवाली भनेक प्रकारको रंगरूपवाली म २।१६५ प्रजायें मिलकर तुम्हें श्रेष्ठ स्थानपर स्थापित करती हैं। है विश्धके भरण कर्ता ! सपूर्णपोषण शक्तिसे मेरा बली क्लेग प्रमृणन् सपत्नान् । भ. ३।५। रक्षण कर । यह बलवान् वीर अपने बलसे शत्रु का नाश करता है । यद् राजानो विभजन्त इष्टापूर्तस्य पोशं ये धीवानो रथकाराः कर्मारा ये मनीषिणः । यमस्यामी सभासद । म ३२९।। उपस्तीन् पर्ण मह्यं त्वं सर्वान् कृण्वभितोजनान् ॥ जिस तरह नियमसे चलनेवाले राजाके सभाके ये समा. अ ३१५१६ सद इष्ट और पूर्तका सोलहवा भाग पृथक् कर रूपसे जो बुद्धिमान है, जो रयकार है, जो कम करनेवाले रखते हैं । लुहार है, और विद्वान् हैं । हे पर्णमणे | तू उन सब जनोंको यासां राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते मेरे समीप उपस्थित कर (बुद्धिमानोंकी सहायता मुझे प्राप्त थवपश्यन् जनानाम् । भ. ॥३३१२ हो ऐसा कर ।) जिनका राजा वरुण लोगोंके सत्य या पसत्य आचरण सजातानांमध्यमेष्ठाराशामने विहव्यो दीदिदीह। देसता हुमा जाता है । १२।६४ ये ऐसे मंत्रमाग इस विषयमें विचार करने योग्य हैं। सजातीयों में मध्यम स्थान में बैठनेवारा हो, और राजामों, इनमें और छोटे ध्यानमें सदा रखने योग्य सुभारित ये है। राजपुरुषों के द्वारा पुछाने योग्य होकर, यहाँ प्रकाशित त्वां विशो वृणता राज्याय- सव प्रजा राज्यके लिये तुझे शासक करके स्वीकार करें। शास इत्या महाँ यस्यामिप्रसादो अस्तृतः । वर्मन् राष्ट्रस्य ककुदिश्रयस्त्र- राष्ट्रके श्रेष्ठ स्थान न यस्य हन्यते सखा न जायते कदाचन ॥ पर रह। 4 १२०१४ विशां पतिरेकराट् त्व विराज- प्रजापालक एक पाभोका नाश करनेवाला, अपराभूत ऐसा यह महान् सजा होकर तू सुशोभित हो। शासक है, भिमकामिग्र मारा नहीं जाता और जिमका स्वस्तिदा विशांपति- यह प्रजापालक कल्याण मित्र कमी पराभूत नहीं होता। कानेवाला हो। उपोहश्च समूहश्च क्षचारी ते प्रजापते । अभि राष्ट्राय वधंय- राष्ट्रके हित करने के लिये परम ताविता यानां स्फाति यहु भूमानमक्षितम् ॥ भ ३१२४७ त्वं सर्वान् एण्यभितो जनान्-- सप अनोंको हे प्रनाराय! पाय छाना और समृह करना ये दोनों अपने चारों भोर इकट्ठा कर । कार्य त् कर, ये कार्य पहा वृद्धिको लाय और बहुत अक्षय मई शहोऽसानि-मनुका नाश करनेवाल। मारनाको प्रासदी होऊगा। पचे तप घर.०, माचिस, शोचि:०, तेजः। अहं राष्ट्रस्याभीनों निजो भूयासं-मैं राष्ट्र के नेन तं प्रतितप योऽम्मान इंष्टि यं वयं द्विष्मः । उत्तम पुरुषों में निज होका बहूगा। म. 11९-२३11-५ मनि द्विप देप करनेवालों को दूर करता हूं। होता रहा कर 1 तौन काण्डाका परिचय ] (९) - । अति स्त्रिया-हिंसकों को दूर करता हूं। 'राष्ट्रीय वर्धय ' राष्ट्रका वर्धन कर । राष्ट्रको क्षति परिणः पाहि विभ्यता-चारों भोरसे हमारी रक्षा कर । राष्ट्रका अभ्युदय हो ऐसा कर। अहंशत्रुहो असा. नि' मैं भयुको मारूंगा। शत्रुको दूर करना हरएका संशितं धीर्य बलम्- हमारा वीर्य और पळ कर्तव्य है । शत्रु तो व्यक्तिके, समाजके, धर्मके तथा राष्ट्रके तीक्ष्ण हो। भनेक प्रकारके होते हैं। इन सब शत्रुमोको दूर करना संशितं क्षत्रमजरमस्तु - क्षात्रवल तीक्ष्ण होकर योग्य है । क्षीण न हो। 'जिष्ण्वेषां चित्त' सय मनुष्यों का चित्त जयशाली क्षिणामि ब्राह्मणाऽमित्रान् ~ शाम को ज्ञान से शीण हो, विजयी हो। कभी चित्त निरुत्साही न हो। न यस्य हन्यते सखा' जिसका मित्र मारा नहीं जाता ऐसा परमे. करता हूं। उन्नयामि सानहम्- स्वकीयोंकी उमति करता हूँ। वर है। राजा भी ऐसा हो, और मनुष्य भी ऐसा हो। इस प्रकार इन सुभाषितोंका मजन, मनन वधा अपने क्षत्रमजरमस्तु-क्षानतेज क्षीण न हो। जीवनमें ढालनेका यत्न करना चाहिये। ईश्वर, विश्वशासक जिष्णवेषां चित्तम्-- इनका रित विजयी हो। है और राजाके गुणधर्म इनमें प्रकट हुए हैं। शासन हुमा तो जायाः पुत्राः सुमनसो भवन्तु-- स्त्री, पुन उत्तम वहां युराइयोंसे, शत्रुगोंसे युद्ध करना ही पड़ता है। इस मनवाले हों। कारण भय युद्धके विषयके सुभाषित देखिये- वली बलेन प्रमृणन् सपत्नान-- बलवान चकसे शत्रुनोंको मारे। सजातानां मध्यमेष्ठा:- स्वजातीयों के मध्य में बैठने दुर्शका शमन करने के लिये जागृत रहकर युद्ध करना वाला हो। चाहिये, इस विषयके ये सुमापित है- शास इत्था महाँ असि-तू शासक ऐसा महान् है। स्वे गये जागृथप्रयुन्छन् । प. २०६३ अपने घरमें प्रमाद न करता हुमा जाग्रत रह । अमित्रतादो अस्तृतः- शत्रुको पराभूत करनेवाला प्रेता, जयता, नर उग्रा वः सन्तु बादयः । और स्वयं अपराजित हो। म.३.१९६६ न यस्य हन्यते सखा- जिसका मित्र मारा नहीं हे धीरो ! भागे बढो, विजय कमायो, आपके बाहू शौर्य करनेवाले हों। उपोहश्च समूहश्च-पास लाना और समूह करना तेऽधराञ्चः प्र प्लवतां छिन्ना नौरिव यन्धनात् । (ये दो कार्य करने योग्य हैं।) ब. ३.६७ इस प्रकार इन सुभाषितों में मननीय वचन हैं। ये चार. जैसी नौका बंधनसे छूटनेपर बह जाती है, उस वरद वे चार चारित करनेसे यहा बानंद पाठ हो सकता है। शत्रु अधोमार्गसे नीचेको भोर चले जाय । "स्वस्तिदा विशांपतिः' यह वचन वारंवार उच्चारनेसे अमी ये चित्रता स्थन तान्यः सं नमयामसि । राजाके कम्य पान में ला सकते हैं और परमेश्वरके गुण मी ३५ मनमे स्थिर होते हैं। परमेश्वर' स्वस्ति-दा' है अर्थात् जो ये विरुद्ध कर्म करनेवाले हैं उनको मैं एक विचार कल्याण करनेवाला है । सबका कल्याण बह करता है । जो वाले करता है। परमेश्वरका गुण है वही गुणराजाने तथा साधारण प्रजाजनमें नश्यतेतः सदान्यः ।. २११६ मी देखना चाहिये। अर्थात हरएक मनुष्य 'स्वस्ति-दा' यहांसे दानववृत्तियां विन हों। कल्याण करनेवाला हो, राज्यका अधिकारी कल्याण वि त्वमग्ने आरात्या: । अ. ३३ करनेवाला हो, राजा मी प्रजाका कल्याण करनेवाला हो। हे भग्ने ! त् शत्रुसे दूर रहता है । ग तुमारे पास परमेश्वर तो सबका करूपाण करनेवाला है ही। नहीं भारत २ (अ.प.) जाता।
(१०) [अथर्ववेदफे पहिले . योऽस्मान्तुष्टि यं वय द्विप्मस्तं वो जम्भे दध्मः । स चित्तानि मोहयतु परेषां निहस्ताश्च कृणव. म ३२०११-६ जातवेदाः । म ३२१ जो एक हम सबका द्वेप करता है और जिस अवेलेका वह हमारा वीर शत्रुके चित्तको मोहित को और उनको इम सब द्वेष करते हैं इसको हे प्रभो ! तुम्हारे जबढेमें इस्तहीन जैसे करे । मोहित होने कारण कर्तव्य भकर्तव्यका विचार करने की शक्ति शत न रहे ऐसा करे । समहमेषां राष्ट्र स्यामि समोजो वीर्य यलम् । अमीषां चित्तानि प्रतिमोहयन्ती गुणानागान्यप्चे वृश्चामि शत्रूणां वाहूननेन हविषाऽहम् ॥ परेहि । म ३।२१५ म ३।१९।२ हे व्याधी । तू इनके चित्तोंको मोहित करके, इनके इनका राष्ट्र बल, वीर्य और सामर्थ्य से मैं तेजस्वी बनाता अवषयों को जकड कर दूरतक चली जा । ह। इस हवनसे मै शनुभों के बाहुओं को काटता हू । स सेनां मोहयतु परेपां निहस्तांश्च कृणवजात. तीक्ष्णीयांसः परशोरग्नेस्तीक्षणतरा उत। वेदा । ३।११ इन्द्रम्य वजातीक्ष्णीयासो येषांमस्मि पुरोहितः। वह चौर शत्रुओं की सेनाको मोहित करे और उनको म. ३।१९।४ हस्तरहित करे। जिनका म पुरोहित हूँ उनके शस्त्र अन फरशीसे तीक्ष्ण, अयमग्निरमूमुहद्यानि चित्तानि वो हृदि । पनि तीक्षा और इन्द्र के वज्र से भो तीखे बनाता है। वि यो घमत्वोकसः प्रचो धमतु सर्वतः । उद्धर्पन्ता मघवन् वाजिनान्युद्वीराणां जयतामेतु अ.३।२ घोपः। १९६६ शनुके हृदयके विचारों को यह अग्रणी मोहित करे । हे इन्द्र । उनके पल उत्तेजित हो। विजयो वोरोंका शत्रुको घरसे बाहर निकाल देवे और शत्रु को सम बोरसे घोप ऊपर उठे। इटा देवे । तीक्ष्णेषयोऽवलधन्यवो हतोग्रायुधा अयलानुः अग्निनों दूत. प्रत्येतु विद्वान् प्रतिदहनभिशस्ति- प्रयाहय.11३।१९६७ मरातिम् । म ३।२।१ है तीपण पाणवारो। उन भायुधोंवालो | उम्र बाहु हमारा तेजस्यो तथा विद्वान् दूत घातपात करनेवाली घाले हो । नियंक धनुष्यवाले निर्बल वीरों को मारो। सनुसेनाको जलाता हुआ पघातान् सर्वान् निग्घि यानह द्वेप्मि येच अभि प्रेहि, निर्दह हरसु शोकैर्माद्यामित्रस्त माम् । भ. ३६३ मसा विध्य शत्रून् । म ३२५ इस तरह साधुओं का नाश कर. जिनका मैं द्वेष आगे बढ, हृदयोंको शोकसे जला दो, मरनेवाल करवा और जो मेरा द्वेष करते है। रोगसे, क्या मूर्यासे शत्रुओंको वध लो। प्रत पत्र. प्रमृण नेतु शन् । म Ur यूयमुना मस्त ईदृशे स्यामि प्रेत मृणत सहयं । तेरा बनसोको काटना हुभा मागे बो। इन्द्र सेना मोहयामित्राणाम् । १ ३१११५ मानेतक छानेवाले बीरो। तुम ऐसे उन धीर दो, हेन्द्रको मेनाको मोहित कर । इसलिये भागे यो, काटो और जीत । इन्द्र चित्तानि मोहयन टाकृत्या चर। भ्रातृव्यक्षयणमसि भ्रानृत्यक्षयण मे दा। यीनस्य धाग्या तान् विपूचो विनाशय । सपानक्षयण मसि समत्नक्षयण मे दा। म ३।१३ भरायक्षयणमसि अरायलयणं मे दाः। देपद त्रु पिताको मोहित एके गुम मकपके पिशाचक्षयणमसि पिशाचक्षयणं मे दाः। पाप हमारे भा। भोर भग्नि और वायु गसे युको सदान्वक्षयागमसि सदाचक्षयणं मे दाः । पति 1411-५ । - - ३१२ तीन काण्डॉका परिचय ] - अ २०१४ वैरियों, सपरनों, निर्धनताओं, मांस भक्षकों तथा आसुरी जो अपना, जो परकीय, जो सजातीय, अथवा जो हीन वृत्तियों को नाशका सामर्थ्य तुझमें है, यह सामथ्र्य मुझे दो। जातीका हमको दास करना चाहता है, हमें दुख देता है, भूतपतिनिरजतु, इन्द्रश्चेतः सदान्याः। ऐसे मेरे शत्रुओंको रुद्र अपने बाणोंसे वाँधे । गृहस्य बुझ्न आसीनास्ता इन्द्रो बजेणाधितिष्ठत। मा नो विदभिभा, मो अशस्तिः । म १॥२०॥ पराभव हमारे पास न भावे, प्रशखता हमारे समीप भूतपति राजा राक्षसी वृत्तियों को यहांसे दूर करे। न मावे। घरकी जहमें जो पुराइयां हों उनको इन्द्र वनसे दूर दरा इतश्च यदमुतश्च यधं वरुण यायय । म ११२०१३ विपूच्येतु कन्तती पिनाकमिव विभ्रती। हे वरुण! यहाँसे और वहांसे जो शख है उनको विश्वक् पुनर्भुवा मनः। म १२७१२ दूर कर। धनुष्य धारण करती हुई, काटती हुई वीरसेना चले भो सीस म इन्द्रः प्रायच्छत्तदंग यातु-चातनम् । अनुसेनाका मन विचलित करे । म ११६२ आरे अस्मा यमस्यथ । म ॥२६११ 'सोसेकी गोली मुझे इन्द्रने दी, वह यातना देनेवाले किसीने मारा पत्थर हमसे दूर हो । दुष्टोंको दूर करती है। अधमं गमया तमो यो अस्माँ अभिदासति । विलपन्त यातुधाना अन्त्रिणो ये किमोदिनः। म ११२१२ ध १७३ जो हमें दास करना चाहता है उसको हीन अंधकार जो यातना देनेवाले, सर्व भक्षक, घातक हैं वे बिलाप पहुंचा दो। करें। (दूसरोंको यातना देना, सब कुछ खा जाना, और अपेन्द्र द्विपतो मनोऽप जिज्यासतो वधम् । सदा क्या खाऊ ऐसा बोलना विलाप करानेवाला है। त्यमग्ने यातुधानानुपयद्धा इहावद । भ. १७७ देभो । हे वीर । देषीका मन बदल दे मोर हमारे हे भने तू यातना देनेवालों को बाधकर यहा ला। नाश करने वाले के शखको दूर कर। यातुधानस्य मजां जहि नयस्व च । म ११८३ इदं विष्कंधं सहते इद वाधते अनिणः । यातना देने वाले शयुकी प्रजाका पराभव कर और उसको अनेन विश्वा ससह या जातानि पिशाच्याः || म. १६३ एवा मे शत्रोद्र्धान विष्पग्मिन्धि सहस च । यह सीसा दुष्टका परामव करता है, यह शत्रुको बाधा थ. ३१६६ करता है, पिशाचों की सय जातियां हमसे पराभूत होती इस तरह मेरे शत्रुके सिर तोड़ दो और उसको जीत लो। हैं। (तीसा-सीसे की गोली मनुका नाश करती है । म हन्तु शन्न मामकान यानहं द्वेमि ये च माम् । आराच्छरव्याऽस्मद्विपूचीरिन्द्र पातय । भ ११९१ यह मेरे शत्रुओं का नाश करे, जिनका मैं द्वेष करता हु है इन्द्र । चारों ओर फैलनेवाले वाण हमसे दूर जाकर और जो मेरा देष करते हैं। अमित्रसेना मघवनम्मायतीमभि। यो ना वो यो अरण, सजात उत निष्ठयो यो युव तानिन्द्र वृत्रहन्नग्निश्च दक्षतं प्रति । अस्मानभिदासति । रुद्र शरव्ययेतान् ममामित्रान विविध्यतु । के इन्द्र ! शत्रुवत् माचरण करनेवाली सेनाको एम भ१९३ और महिमदोनों मिलकर जला दो। - अ १२१10 । गिरे। म ३111३ [अथर्ववेदके पहिले (१०) योऽस्मान्द्वष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः । स चित्तानि मोहयतु परेषां निहस्तांश्च कृणव. म ३।२७११-६ जातवेदाः । १ ३२११ जो एक हम सबका द्वेष करता है और जिस अकेलेका वह हमारा वीर शत्रुके चिसको मोहित करे और उनको हम सब द्वैप करते हैं उसको हे प्रभो ! तुम्हारे जबड़े में इस्तहीन जैसे करे । मोहित होने कारण कर्तग्य अकर्तव्यका विचार करने की शक्ति शत्रुमें न रहे ऐसा करे । समहमेषां राष्ट्र स्यामि समोजो वीर्य वलम् । अमीयां चित्तानि प्रतिमोहयन्ती गृणानाहान्यप्ये वृश्चामि शत्रूणां याहूननेन हविषाऽहम् ॥ परहि । म. ३२५ ५.३।१९।२ हे व्याधी। तू इनके चित्तोंको मोहित करके, इनके इनका राष्ट्र बल, वीर्य और सामथ्र्य से मैं तेजस्वी यनाता अवययोंको जकड कर दूरतक चली जा। हूं। इस इधनसे में शत्रुओंके बाहुओंको काटता हूँ । स सेना मोहयतु परेषां निहस्तांश्च कृणवजात. तीक्ष्णीयांसः परशोरग्नेस्तीक्ष्णतरा उत। वेदाः । ३।१११ इन्द्रम्य वज्रात्तीक्ष्णीयांसो येपांमस्मि पुरोहितः ।। वह धीर शत्रुओं की सेनाको मोहित करे और उनको १.३.१९१४ हस्तावित करे। जिनका मैं पुरोहित हूँ, उनके शस्त्र अत्र फरशीसे तीक्ष्ण, अयमग्निरमूमुहद्यानि चित्तानि वो हृदि । पनि तीक्ष्ण और इन्द्र के व से भो तोखे बनाता हूं। वि वो धमत्वोकसान यो धमतु सर्वतः । उपन्तां मघवन् वाजिनान्युद्वीराणां जयतामेतु अ.रा२ घोपः। १.३।१९।६ शत्रुके हृदय के विचारों को यह अग्रणी मोहित करे । हे इन्द्र ! उनके पल उत्तेजित हों। विजयी वीरोंका शत्रुको घरसे बाहर निकाल देवे और शनुको सब ओरसे घोप ऊपर है। हटा देवे । तीक्ष्णेषोऽयलधन्यवो हतोग्रायुधा अवलानुः अग्निनी दूतः प्रत्येतु विद्वान् प्रतिदहम्नभिशस्ति- प्रयाहकाम.३.१९६७ मरातिम् । म. ३२२।१ देतीण बाणवालो! उग्र आयुधोंवालो ! उन बाह हमारा तेजस्यो तथा विद्वान् दूत घातपात करनेवाली घाले योरों । नियन धनुष्यवाले निर्बल वीरों को मारो। शत्रुसेनाको जलाता हुमा चले। एया तान् सर्वान् निग्धि यानहं द्वेप्मि ये च अभि मेहि, निर्दह हरसु शोकैद्यामित्रांस्त. माम् । अ. ३।६।३ मसा विध्य शत्रुन् । अ. ३१२५ इस तरह सय शत्रुमोका नाश कर. जिनका मैं द्वेष भाग बढ, हृदयोंको शोकसे जला दो, जकहनेवाले करता हूं और जो मेरा द्वेप करते हैं। रोगसे, तथा मू से शत्रुओं को पींध लो। प्रते पत्रः अमृणन्नेतु शत्रून् । प. ३१५ यूयमुना मरुत इंदृशे स्थामि प्रेत मृणत सहध्यं । तेरा शत्रुओं को काटता हुमा मागे वदे अ.३१२ इन्द्र सेनां मोहयामित्राणाम् । १ ३११५ ६ मरनेतक लडनेवाले वीरो। तुम ऐसे उप्र पीर हो, है इन्द्र शर्माको सेनाको मोहित कर । इसलिये भागे बदो, काटो और जीत लो। इन्द्र चित्तानि मोहयानडाक्त्या चर। भ्रातृध्यक्षयणमसि भ्रातृत्यक्षयणं मे दाः । अमेनिस्य धाज्या तान् विपूचो पिनाशय । सपत्नक्षयण मसि समत्नक्षयणं मे दाः। म २१३ मरायक्षयणमसि भरायक्षयणं मे दाः । ६न्द्र ! चित्तोको मोहित करके शुभ संकरपके पिशाचक्षयणमसि पिशाचक्षयणं मे दाः। पाप हमारे पापा। मार मलि मार वायु येसे युको सदान्यायमसि सदान्वक्षयणं मे दाः । परानोगे निकर म.11८11-५ तीन काण्डोंका परिचय अ.२११४॥४ अ.१२१२ वैरियों, सपनों, निर्धनताओं, मांस भक्षकों तथा आसुरी जो अपना, जो परकीय, जो सजातीय, अथवा जो हीन वृत्तियों को नाराका सामर्थ्य तुझमें है, यह सामर्थ्य मुझे दो। जातीका हमको दास करना चाहता है, हमें दुःख देता है, भूतपतिनिरजतु, इन्द्रश्चेतः सदान्याः। ऐसे मेरे शत्रुओंको रुद अपने बाणोंसे वीधे । गृहस्य बुध्न आसीनास्ता इन्द्रोयनेणाधितिष्ठतु। मा नो विददामभा, मो अशस्तिः । अ. १॥२०॥ पराभव हमारे पास न मावे, मप्रशस्खता हमारे समीप भूतपति राजा राक्षसी वृत्तियों को यहांसे दूर करे। न भाये। घरकी जहमें जो बुराइयां हों उनको इन्द्र वज्रसे दूर हटा इतश्च यदमुतश्च यद्वधं वरुण यायय । देवे। अ. १२००३ विपूच्येतु कृन्तती पिनाफमिव विभ्रती। हे वरुण ! यहाँसे और वहाँसे जो शस्त्र हैं उनको विष्यक पुनर्भुवा मनः। म १२७२ दूर कर। धनुष्य धारण करती हुई, काटती हुई वीरसेना चले जो सीसं म इन्द्रः प्रायच्छत्तदंग यातु-चातनम् । शत्रुसेनाका मनः विचलित करे । स.१९१६२ आरे अस्मा यमस्यथ । म. १२६११ 'सोसेकी गोली मुझे इन्द्रने दी, वह यातना देनेवाले किसीने मारा पत्थर हमसे दूर हो। दुष्टोको दूर करती है। अधर्म गमया तमो यो अस्माँ अभिदासति। चिलपन्त यातुधाना अत्त्रिणो ये किमीदिनः। क्ष. १७१३ जो जो हमें दास करना चाहता है उसको हीन अंधकारमें यातना देनेवाले, सर्व भक्षक, घातक हैं घे विलाप पहुंचा दो। करें। (दूसरों को यातना देना, सब कुछ खा जाना, और अपेन्द्र द्विपतो मनोऽप जिज्यासतो वधम् । सद। क्या खाऊं ऐसा बोलना विलाप करानेवाला है। त्वमग्ने यातुधानानुपवद्धां इहावद्द । अ. १६७ हे प्रभो ! हे वीर । द्वेषीका मन बदल दे और हमारे हे अग्ने तू यातना देनेवालों को बांधकर यहां ला। नाश करने वाले के शस्त्रको दूर का। यातुधानस्य प्रजां जहि नयस्व च । १८३ इदं विष्कंधं सहते इद वाघते अत्रिणः । यातमा देने वाले शत्रुको मजाका पराभव कर और उसको अनेन विश्वा ससह या जातानि पिशाच्याः॥ म .६३ एवा मे शत्रोर्मूर्धान विधग्भिन्धि सहस्व च । यह सीसा दुष्टकर राम करता है, यह शनुको राधा करता है, पिशाचों की सघ जातियां इससे पराभूत होती इस तरह मेरे शनुके सिर तोड दो और उसको जीत लो। हैं। (सीसा-सोसेकी गोली शत्रुका नाश करती है । म हन्तु शत्रून मामकान यानहं देग्मि ये च माम्। म ३1६13३५ भाराच्छरव्याऽस्मद्विपूचीरिन्द्र पातय । म. ११९१ वह मेरे शतुओं का नाश करे, जिनका मैं देष काता हूँ हे इन्द्र ! चारों ओर फैलनेवाले धाण हमसे दूर जाकर और जो मेरा देष करते हैं। अमित्रसेनां मघवनम्माञ्छत्यतीमभि । यो नः सो यो मरणः सजात उत निष्ठयो यो युर्व तानिन्द्र वृत्रहन्नग्निश्च ददतं प्रति ।। अस्मानभिदासति । रुद्रः शरव्यौतान् ममामित्रान् विविध्यतु । हे इन्द्र! शग्रुषत् माचरण करनेवाली शसेनाको एम मौर RR म दोनों मिलकर जला दो। ज, ११२३४ भ.३६६ गिरे। भ, 11१९६ B
अथर्ववेदके पहिले
भ २/७३
इन्द्रः सेनां मोहयतु, मस्तो नत्योजसा । अभीया अभिभवः सपत्नक्षयणो मणिः ।
चक्षूप्यग्निरा दत्तां पुनरेतु पराजिता । ३.६ राष्ट्रायमद्य वंध्यता सपत्नेभ्यः पराभवे ॥
इन्द्र (सेनापति) शनुसेनाको मोहित करें। मरुत्
म.१२९१४
(सैनिक ) वेगसे हमला करें। ममि उनकी साखें लेवें।
सभीवर्तमणि शत्रुका पराभव करनेवाला और दुर्भको
इस तरह पराभून होकर शत्रुसेना पीछे हटे ।
दूर कानेवाला है, राष्ट्रहित के लिये तथा शनुमोको पराभूत
विष्वक् सत्यं कृणुहि चित्तमेषाम् । १. ३।१।४ करने के लिये वह मणि मेरे शरीरपर बांधी।
सस्य रीतिसे इन यात्रुओं का चित्त चारों बोरसे व्यन को।
मेम प्रापत्पौरुषेयो यो यः । म १॥३०॥
अजपं सर्वानाजीन् वः । अ २४६
सब युद्धीमें मैंने विजय प्राप्त किया है।
जो मनुष्यनाशक शस्त्र है वह इसके पास न भाये ।
अहा अराति, अविदः स्यान, अप्यभूः भद्रे
(मर्थात् यह न मरे)
सुतस्य लोके ॥ २७
असमृद्धा अघायव । म १२७॥२
पापी लोग समृद्ध न हों।
कृपणताको तुमने छोड़ा है। सुखको प्राह किया है,
कल्याणकारी पुण्यलोकमें तू माया है।
आरेसावादस्तु देतिः । म. १।२६३१
अराती मा तारीमा नस्तारिपुरभिमातयः।
शस्त्र हमसे दूर रहे।
मा नो विदन् विव्याधिनो मो अभिव्याधिनो
भनुदार मानु हमारे भागे न पढ़ें । यो दुष्ट हैं वे मागे
विदन् । क ११९
म पढ़ें।
विशेष वेधनेवाले शनु हमें न प्राप्त करें । चारों मोरसे
चक्षुमन्त्रस्य दुर्हाद पृष्टीरपि शृणीमसि । वेधनेवाले शनु हमारे पास न भावे ।
अ२।७५
हुए मनुष्य के भौख और पीठ हम वोड देते हैं।
यो अद्य सेन्यो यधोऽघायूनामुदीरते।
मा ते रिपन्नुपस तारः । २।६।२
युवं तं मित्रावरुणा अस्मधावयतं परि ॥
भ१२०१२
तो पनुयायी विनष्ट न हों।
देवैर्दत्तेन मणिना जनिडन मयोभुस।
जो साज सेनाके शूर पुरुषोंका वध पापी शत्रुमोसे हो
विधं सर्वा रक्षांसि व्यायामे सहामहे ।
रहा है, हे मित्र वरण ! तुम उसको हमसे दूर कर ।
घिन इन्द्र मृघो जहि, नीचा यच्छ पृतन्यतः।
देवोंने दिये, मुरादायक अगि मणिसे, शोषक रोगको
म २१२
सय रोगमियोचो हम दवा सकते हैं।
है शत्रुनाशक बार हमारे अनुमोको मार, हम.
प्र शहा यादिर हरिभ्याम् । रात
मेजवानोकोहोर स्थिति में पाओ।
मागे पद, दो घोडाको मौतर चलो।
वि मन्युमिन्द्र वृत्रहन अमिप्रस्याभिदासत ।
इन्द्रस्तुरापामित्रो वृत्र यो जघान यतीन ।
ब
.२॥३
है
शत्रुनाशक चौरस हमारे घात करनेवाले यात्रुके उत्सा
पान करनेवालो। समान, परासे हमला करनेवाला हका नाश कर।
एम पानेवाले शत्रुधो मावा रहा।
परीयो यावया यधम् । १२॥
प्रतिदद यामधानान् प्रति देव रिमीदिनः। शके राषको हमारेसे दूर कर ।
स ६८ यातुधान्य । म २४२
देवीमनुप्पेषयो ममामित्रान् वि विध्यत।
पालना देनेवा मला दो। मदा भूगोंगे जहा दो।
पासना देनेवारी पिपको भी जादो।
मनुष्यसि पो गरिम्प बाण, मो शमीको वीषे ।
म २१४१
म २१५/३
म. ॥१५॥
तीन काण्डोका परिचय योग्य है) म १९६९ यातुधानान् विलापय । ११६ 'सब यातना देनेवाले भाका बोलेंकी हम यहां हैं। यासना देनेवालोंको रुलाभो । दस्यो. हन्ता यमुधिय । १७११ नीचेः पद्यन्तामधरे भवन्तु ये नः सूरि मघवानं तू दस्युका विनाशक है। ( दस्युका विनाश करना पृतन्यान् । ३११९६३ जोशनु हमारे धनवान् और विद्वान् पर सैन्य भेजते हैं वि रक्षो विमृषो जहि विवृत्रस्य हनू रुच । घे नीचे गिरे और अवनत हो WR11३ एपामहमायुधा संस्याम्येषां रा; सुवीर वर्धयामि। राक्षसो, शत्रुभोंको पराभूत कर । घेरनेवाले शत्रुके 1 ३.१९१५ जबडे तोड। इनके मायुध में तीक्ष्ण करता है तथा इनका राष्ट्र उत्तम य. सपत्नो योऽसपस्नो यश्च द्विपन छपाति नः। वीरोंसे युक्त करके उन्नत करता हूं। देवास्तं सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्मवर्म ममान्तरम् । पृथग्योपा उल्लय. केतुमन्त उदीरताम् । म ११ जो सपत्न और जो असपल हैं, पर जो शाप देकर हमें झाडे लेकर हमला करनेवाले वीरोंक घोप पृथक् पृथक् द्वेष करके कष्ट पहुचाता है, सब देव उसका नाश करें। ऊपर ट। मेरा मान्तरिक कवच ब्रह्मज्ञान है । अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसंशिते । ज्ञानरूप कवच जो पहनता है, उसका उत्तम रक्षण जयामित्रान् म प्रधस्व, जोषा वरं वरं, होता है। मामीपां मोचि कश्चन । म ३.१९५८ मा नो विदद् वृजिना द्वेप्या या । म २०॥ हे ज्ञानसे तेजस्वी बने शस्त्र दू छोढा जानेपर दूर जा, जो द्वेष करनेवाले कुटिल है वे हमारे पास न आवे । भानुभोंको जीत लो, भागे बढ, शत्रुके बोरों में से श्रेष्ठ-श्रे विप्यस्तो अस्मत् छरव पतन्तु ये भत्ता ये वीरों को मार डाल, इनमें से कितीको न छोट। चास्याः। अथ १/११/२ असौ या सेना मरतः परेपामरमानैत्यभ्योजसा जो फेंके गये हैं, और जो फेंके जानेवाले हैं वे वाण स्पर्धमाना । तां विध्यत तमसापव्रतेन यथे- चारों और हमसे दूर जाकर गिरें । पामन्यो अन्यं न जानात् । भ. ३श६ यत्त आत्मनि तन्वा घोरमस्ति । हे महो। यह जो शत्रुकी सेना वेगसे स्पर्धा करती या केशेषु प्रतिचक्षणे था। हुई हमारे ऊपर बारही है, उसको अपग्रत तमप्तानसे तत्सर्व वाचाप हन्मो वयं । म, १११८३ वीधो शिक्षसे सनमें से एक दूपरेको न जान सके । जो इसके शरीर में, बुद्धिमें, देशोंमें, देखने में पुरा है, उग्रस्य मन्योरदिम नयामि । म 111011 उम्र क्रोधसे इसको उपर मैं ले जाता ह । इस सबको हम वाणीकी प्रेरणासे दूर करते हैं।(याणीसे सपना अस्मधरे भवन्तु । म १९६२,४ सूचना देकर उस दोपको दूर करते हैं।) भाधु इमसे नीधे रहें । शनुका मध पात हो । दहना द्वयाचिन यातुधानान किमीदिनः । जहि पपां शततईम् । १. ४ इन दुष्टों का सेंकडो कष्ट देने का साधन दूर पर, शो दुमुखों, यातना देनेवालों भार मा या घाऊँ से योलनेवाले दुष्टों को भप्ति जार। मेवा है। एपामिन्द्रो यज्रेणापि शीर्षाणि वृश्चतु । प्रेतं- मागे दो। प्रस्फुरतं-पुरती को। न्य पसे इन दुष्टोंके सिर काट दे। पृणतः गृहान यहत- सोप देनेशानी घरजानी। Rधीतु सयों यातुमानयमस्मीयेत्य । 10 । म.१२८१ पराजित कर । म. भ .२०१४ (अथर्ववेद के पहिले (18) १२९६२ अपने - अभिवृन्य सपत्नान् अभि यो नो अपतयः। विद्वान तेजस्वी वीर घातपात करनेवाले शत्रुको weral अमि पृतन्यन्त तिष्ठामि यो नो दुरस्यति । हुआ हमारे शत्रुओपर हमला करे। इन सूक्तियों में विशेष महत्व रखनेवाली ये है-- शत्रुओं को पराभून करके, हमारे अदर जो कंजूप है स्वे गये जागृदि- अपने घरमें जामत रह । उनको दूर करके, सेनासे जो चढाई करता है और जो राष्ट्र में जाग्रत रह। हमसे दुष्टवाका व्यवहार करता है, उन सबको पराभूत करो। उग्रा वा सन्तु वाहवः - सापके बाहु सम्र हो। विश्या घने दुरिता तर । १ २१६३५ प्रेत- शत्रुपर हमला का। सब पापवृत्तियोंको, पापियों को दूर कर । जयत-विजयी हो। स्थयुम्भिर्म स्वेद महे रणाय । अ. २५/४ नश्यतः सदान्यः- दानवोंका यहाँ नाश हो । अपनी योजनासे तू यहां मानन्दित होकर रह और समहमेषां राष्ट्र स्याम- इनका राष्ट्र में तेजस्वी परे युद्ध के लिये तैयार रह। बनाता है। ससद्दे शयून् । २१५३ वृश्चामि शत्रूणां वाहन- शत्रुओंके बाहुओं को सानुका पराभव करता हूँ। काटता हू प्रति तमभि चर योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः । उद्धन्ता चाजिनानि- इनके बल उत्तेजित हो। भ२।११।३ तीक्ष्णेषयोऽयलधन्वना हत-- तुम्हारे तीखे बाणों से उसपा पदाई कर जो अवेर। हम सयका द्वेष करता है। निट शरावाले शत्रुको मारो। मौर जिसका हम स द्वेप करते हैं। एवा तान् सन् निग्धि-- इस सरह उन सब पृश्यामि तं पुलिशेन पक्षं यो अस्माकं मन शों का नाश का। इदं हिनस्ति । म २२३ सेनां मोहयामित्राणां-की सेनाको मोहित कर । जो हमारे हम मनको पिगता है, उसको कुठारसे वृक्ष तान् विपूचो विनाशय-- शत्रुको चारों ओरसे काटने के समान काटताह सपत्नाने अभिमातिजिद् भव । म २६३ स चित्तानि मोहयतु परेपां-वह तुओंके चित्त हेम! सापनों का विनाश होतयारियों को जीतने मोदित करे। पाया ही। स सेनां मोहयतु परेषां-- पह शत्रुको सेवाको भीनमा धाज्या तान् विपूर्ती विनाशय। मोहित को। अभि प्रेधि, निर्दह- आगे पढ, शत्रुको जला दो। पशि भार वायु मे जपा नाश होता? पेसा नारा अभिप्रेत, '-Pळाकाटोमोर मोर पारी मारसे करो। जीर। जदि प्रतीको मनूच' परायः। Ime भूतपतिनिरजतु- भूलोका पति दुगियों को दूर सागुवा, पीप मानेवारी और मानेवाले को यिपच्येतु सन्तती- काटती हुई सेना मागे परे । रिया मारे अरमा- पाया हमसे दूर रहे। भागृणन् यमयो नाधिना इमे, यमित अपेन्द्र द्विपतो मन -८मा मम माल दे। मा रंगण यिनान् । UR मा नो विददभिमा- पामय हमारे पास मनाये । परवान् समानेका रहे नाविन् पिलान्तु यातुधाना - यावना ने रोते ria RuRinाई सामाना । पाना सर विधान भनिएपमित यातुधानस्य प्रजा जदि-- पाना देनेवाली प्रजा निमारमा विनए कर। म ३१ अपरा तीन काण्डोंका परिचय पराभक्ष कर। जाओ। तैयार रद्द। स हन्तु शवून मामफान्- यह मेरे शत्रुओका वध दस्योहन्ता वभूविथ- शत्रुका विनाशक बन । करे। वि रक्षो विमृधो जहि- राक्षसो और हिंसकोंका अपं सर्वानाजोन्- लय युद्धों में मैं विजय प्राप्त करता हूं। मा नो विदद् वृजिना द्वेष्या या- कुटील और पापी अहा अराति- कृपणताको छोडो । मुझे न जाने । यविदः स्योनं-सुखमार्गको जानो। दहनप द्वयाविना-दुमुखोंको में जलाता हूँ। अभू भद्रे सुकृतस्य लोफे- कल्याणकारी पुपय प्रेत -हमला करो। लोकमें रहो। प्रस्फुरतं-- फुरती बढानो। मरातीनों मा तारीत्-कंजूम हमारे पास न पढ़ें। पृणतः गृहान् वहतं- संतोष देनेवालों के घरों के पास मा नस्तारिपुरभिमातयः-- शत्रु हमारे मागे न बढे। प्रबह-मागे बढ़। अभि पृतन्यन्तं तिष्ठ- सेनासे हमला करनेवाले याहि शुर--हे वीर ! भागे बढ । शनुका पराभव कर। प्रतिदह यातुधानान्- यातना देनेवालों को जला दो। विश्वा दुरिता तर- सब पापोंको वैर जा। मेमं प्रापपौरुषेयो बधो य:- मनुष्यनाशक शन मत्स्वेह महे रणाय- बड़े युद्ध के लिये भानन्दसे मेरे ऊपर न पहा असमृद्धा आघायय.~ पापी समृद न हो। ससहे शत्रून्- शनुका पराभव करता हूं। मा नो विदन् विव्याधिन:- वैध करनेवाले शत्रु अभिमातिजिद्भव- शनुका परामव करनेवाला हो। हमें न जाने। शत्रून प्रत्येतु विद्वान्- विद्वान् शनुपर चदाई करे। मो अभिव्याधिनो घिदन्- चारों प्रोरसे आक्रमण इस तरह इन सूक्तियों में अनेक वाक्य भजनमें बोलने करनेवाले शनु हमें न जाने । योग्य हैं। इस तरह वचन तब बोलने होते हैं जय शनुके विन इन्द्र मृघो अहि- हे इन्द्र ' हमारे शत्रुओंको विरुद्ध अपने लोगोंको, अपने बोरोंको उठाना या तैयार करना होता है । ईश्वर मक्ति के वेदवचन उपालनाके समय नीचा यच्छ पृतन्यत:--सैन्यसे हमला करनेवालोंको बोलने होते हैं और ये वीरता बढानेवाले वचन चौता दोन अवस्थामें पहुंचा दो। बढाने के समय उच्चार करने होते हैं।। विवेकी पाठक वरीयो यावया वधम् शख हमसे दूर रख । इसको अच्छी तरह समझ सकेंगे। इपको ममामित्रान विविध्यत- प्राण में शत्रुओं को शनुपराजय करने के लिये अपने राष्ट्रको तैयार रखने के वचन बडे उपयोगी है। राष्ट्रको संजीवित करने के यातुधानान् चिलापय- यातना देनेवालों को सलामो। एषां राष्ट्र सुवीरं वर्धयामि- इनके राष्ट्रको वीर लिये राष्ट्र में एकता प्रस्थापित करने की आवश्यकता होती बनाकर बढाता हूँ। । वह एकताका विषय मय देखिये- जयामिप्रान्-शत्रुपर विजय प्राप्त कर । एकता जोषां वरं चर- शत्रुवीके प्रमुखों को मार! एकता बढानेका उपदेश वेद इस ताकासा है- मामीषां मोचि काश्चन- शत्रुओंमेसे किप्तीको न हो। सहदयं सामनस्यमविद्वेष कृणोमि वः। विध्यत तमसाययतेन- शत्रुको मत तमसास्त्र से म. १३011 सहृदयता भार उत्तम मनवाला होना और विप न सपना असदधरे भवन्तु-शत्रु हमसे नीचे रहें। करना ये तुम्हारे अन्दर हों ऐमा में काम हूं। मार समय - वांधी।
[अधवेदके पहिले . अन्यो अन्यमभिर्यत चसं जातमिवान्या। सध्रोचीनाचः संमनसस्कृणोम्येक अनुष्टीन्सं. थ. ३.३011 चननेन सर्वान् । अ ३३०७ एक दूसरे पर ऐसा प्रेम करो जैसा नवजात बच्चेपर गौ परस्पर प्रेम भावका बर्ताव करनेवाले, साथ साथ पुरु. प्रेम करती है। पार्थ करनेवाले, उत्तम मनवाले और एक नेताको भाज्ञामें अनुवत्तः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः । कार्य करनेवाले मैं तुमको बनाता हूं। अ.३१३०२ देवा इवामृतं रक्षमाणा सायं प्रातः सौमनसो पिताके अनुकूलरव धारण करनेवाला पुन हो और वह वो अस्तु । म. ३१३०७ मातासे समान मनवाला हो। भमतका रक्षण करनेवाले देव जैसे प्रेमसे रहते है वैसा जाया पत्ये मधुमती वाचं वदतु शन्तिधाम् । परस्पर प्रेम भापके व्यवहार में सबेरे और शामको हो । अ. ३३०१२ सं वो मनांसि सं व्रता समाक्तीनमामसि । खी पति के साथ मधुर और शान्त भाषण करे। अ.३८५ मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा। सुम्हारे मनोको एक करो, तुम्हारे मत एक हों, तुम्हारे म ३३०३ संकल्पोंको एक भावसे युक्त करता हूं। भाई भाईसे द्वेष न करे, यहन बहनसे द्वेष न करे । मम व्रतेपु हृदयानि यः कृणोमि सम्यञ्चः समता भूत्या वाचे वदत मद्रया मम यातमनुवनि एत । म. ३६ म ३३०३ मेरे व्रतों में तुम्हारे हृदय सलग्न हो ऐसा मैं करता हूं। मिलजुलकर एक प्रतपालन करनेवाले होकर कल्याण मेरे चाल-चलन के अनुकूल तुम होकर चलो। करनेवाला भाषण करो। अ-दार-सूद भवतु । १. ११२०११ ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वि यौष्ठ संराधयन्तः मापसमें फूट उत्पन्न करनेवाला कोई न हो। सधुराश्चरन्तः। अन्यो अन्यस्मै वस्तु वदन्त अहं गृभ्णामि मनसा मनांसि पत सध्रीचीनान्वः संमनसस्कृणोमि ॥ मम चित्तमनु चित्तेभिरत । प. ३१० अ ३११०५ मैं अपने मनसे तुम्हारे मनोंको लेता हूं। मेरे चित्त के वृद्धोका समान करनेवाले, और उत्तम विचार करनेवाले साथ अपने चित्तोंको चलाओ। बनो, सिदितक यरन करनेवाले, एक धुराके नीचे चलने. यथा नः सर्व इजन. संगत्यां सुमना असत् पाले होकर आपसमें विरोध न करो, परस्पर प्रेम पूर्वक दानकामश्च नो भवत् ॥ . ३३०/६ मापण करनेवाले और उत्तम विचार करनेवाला होकर रहो। हमारे सपूर्ण लोग सातिमें उत्तम मनघाले हो और दान देने की भी इको। समानी प्रपा सद यो मनभागः समाने योपत्रे स चेनयाथो अश्विना, कामिना स च वक्षथः । सद यो युनज्मि । म. १०६ संवा भगासो अग्मत, सं चित्तानि, समुनता। पानी पीने का मापका स्थान एक हो, भापका मसभाग म. २१३०१२ एक हो, एक जोतेक मन्दर साथ-साथ मापको जोतता हूं। है परस्पर कामना करनेवाले मधिदेवो ! मिलकर चलो, सम्यक्षो अग्नि सपयंतारा नाभिमियाभितः । मिसकर बदो, ऐश्वयंको मिलकर प्रास करो, तुम्हारे चित्त म ३०९ एक हो, तुम्हारे प्रत एक हों। मा मिरकर मनिकी पूजा करो और एककी नाभिके शियामिष्टे हृदयं तर्पयाम्यनमीयो मोदिपीमा चारो भोर से मारे दोन है पैसे तुम परस्पर जुरकर सुयची सवासिनी पियतां मन्यमेत अश्विनी रूपं परिघाय मायाम् ॥ म २२२९६ तीन काण्डॉका परिचय ] . कल्याणकारिणी विद्यामों द्वारा तेरे हृदयको तृप्त करता जो ये पांच दिशाओं में रहनेवाली मानवोंकी पांच हूँ । नोरोग और तेजस्वी होकर मानन्दमें रहो । साथ रह. जातियां हैं, वे समृद्धिको मास हो, जिस तरह वृष्टिसे नदी कर अधिनौके रूपको कर्मको कुशळनाको प्राप्त होकर इस बढती है। रसको पीमो। जैसी वृष्टि होने से नदी बढतो है उस तरह सय प्रजा. इस रीतिसे सबकी एकता करने का उपदेश घेद करता जनोंका अभ्युदय हो। मनुष्योंकी सप प्रकारको ऐहिक है। घरकी तथा परिवारको एकता करने के लिये प्रथम स्था पारमार्थिक सरति हो, सवराट एकवासे मपना मभ्यु. दय काने लगेगा तो ही राष्ट्रको उन्नति हो सकती है। मा धाता धातरं द्विक्षन्-- भाई-भाईसे द्वेष न एकता मूलक व उच्चति है। करे। यह मादेश पदि भाई-माई मनमें रखते, तो कौरव राष्ट्रको एकता होने के लिये राष्ट्रमें यज्ञ भावना होनी पौरवोंकी एकता होती और . मापसका कलह न होना चाहिये । सजनोंका सरकार, राष्ट्रको एकता मर्मात् संघटना मोर १८ भौहिणी सेनाका नाश न होवा। और भारत काना मोर दानका माव पे गुण यज्ञ में हैं। इन गुर्गोंसे राष्ट्रका देश क्षात्रतेजसे हीन न होता। कप होता है। सम्यशो अग्नि सपर्यत यज्ञ आरा नामिमिवामित:। अ. ३१३६ ग्रम यक्षं च पधय । म. २०१५ जैसे पके भारे नामिके चारों ओर रहते हैं, इस तरह शान और प्रशम कमको पढामो। बीचमें अग्नि रहे और चारों भोर बैठकर इधन करो पह इमं यज्ञ विततं विश्वकर्मणा देया यन्तु सुमन सामुदायिक उपासना कही है जो एकवा पढानेवासीधी। मस्यमानाः ॥ अ१९५५ सामुदायिक संध्या, सामुदायिक हवन होनेसे समुदायकी विश्वके रचयिताने यह यज्ञ केटाया है। उसमममसे एकता होती थी। इस स्थानपर माज वैयक्तिक संध्या सब देष इस यइने मारे । हो गयी है जो एक दूसरेको पृषक् करती है। उतादित्सन्तं दापयतु प्रजानन् । म. ३२.10 भपने में अदारसृत् भवतु ' मापसकी फूट पढाने दान न देनेवालेको जानयूसकर दान देमकी प्रेरणा कर। पाला कोई न रहे। परंतु भापसकी एकता सप पडावें य ईशे पशुपतिः पानां चतुष्पदामुन यो भौर सप मुसंगठित हो। इस कारण कहा है- द्विपदाम् । निष्फ्रोतः स यशियं भागमेतु, महं गृणामि मनसा मनांसि । म. . रायस्पोपा यजमानं सचन्ताम् । म. २३. मैं अपने मनसे तुम्हारे मनोको एकत्रित करके लेा हूं जो धनुराद पनुमोका यथा निगरों-मनुष्यों का स्वामी भाव में अपना मन ऐसा पनाता हूं कि जो सपके मोहो है, वह परके भागको प्राप्त हो, उसकी उपासना हो, धन मापित करें और सपके विचार एक प्रकारके पनापे मार भोर पोषण यामानको मिले। सबको संnfza को। इस हिसे राष्ट्र के सम होगोंको विमानोरना चाहिये,मापी उपम संपला संगठिन किया जाप भोर राष्ट्रका बल पढापा माप । होनी चाहिपे भौर जो दीन दोगमकी दीना दूर करने हम ६ संघटमा एक ये मंत्र है। पाठक इनका लिप दान देना चाहिये । दान में रियादान, रामधन, विचार कर गौर नापत भुसंपठीक होकर अपने armsh धनादान मोर मंतिम धमा पर इससे राका मम्युम होगा। होना चाहिये । यह रोगा पर इसमें अम्युदप राष्ट्रका पाम सेगा। माया पक्ष प्रदिशो मानयोः पश परयः। मधुरता पृटे शापं नारियेद राति समापदन् । माता का नाम पिरोत रपट बास पा. t [अथर्ववेदके पहिले (१८) मधोरसि मधुतरो मधुधान्मधुमत्तरः। पापी बार दुष्टों के भांख हम तक देते हैं। पापी और दुष्ट दूर हो और उत्तम हृदयसे सबकी एकता में मघसे भी अधिक मीठा हू, मधुर पदार्थ से भी अधिक बढे और एकतासे बल बढे । म 11 मधुर हूं। पाचा पदामि मधुमद् भूयासं मधुसंदृशः । अश्मा तन्वं कृधि । अथर्व ३२ म. ३३ शरीरको परथर जैसा सुरद कर । में याणीसे मीठा भाषण करूगा मौर में मधुरताकी पह्यश्मानमा तिष्ठ, अश्मा भवतु ते तनु मूर्ति बनूगा। म. २११३४ मधुमन्मे निष्क्रमणं मधुमन्मे परायणम् । मा, इस शिलापर चढ, तेरा शरीर पत्थर जैसा सुख भ .३१ मेरा माना मार जाना मोठा हो। धावस्पतिः तेषां तन्यः बला मे अद्य दधातु ॥ जिदया थप्रे मधु मे जिलामूले मधूलकम् । भथर्व 111 म.१॥३१ पाचस्पति उनके शरीरके पलों को मुझमें भाज धारण मेरी मिशाके मूल में मधुरता रह और जिताके प्रभागमे करे । (विश्व में जो पदार्थ हैं उनके बल मुझे प्राप्त हो और मोटाप्त है। मैं उनसे बलवान् बनकर इस विश्वमें विश्वसेवाका कार्य ऐसी मीठास होनेसे राष्ट्र में प्रेम पदता है और प्रेमसे करता रह ।) मगठना होती है। मित्रता बढती है। परस्पर सहायता वीडुवरीयोऽरातीरप द्वेषांस्या कृधि । अथर्व | करने की या बदती है। इससे सबका मिलकर कल्याण होता है। पीडः वरीयः अरातीः द्वेषांसि अपाधि- मित्रता हमारे शरीर बलवान् मार श्रेष्ठ पर्ने । शत्रुभों मोर प करने वालों को दूर कर। यः सुहात रोन नः सह । भ. २०७५ ओजोऽस्योजो मेदाः ।सहोऽसि सदोमेदाः। जोत्तम हस्यालाई म साप हमारी मित्रता हो। यलमसि यलं में दाः। मायुरसि मायुमें सरासायरसभ्यमस्तु रातिः । म. १११ दा! धोत्रमसि धोनं मे दाः। चक्षुरासि पानरूपी मि हमारे साथ रहे। चक्षु में दाः। परिपाणमसि परिपाणं मे दाः । मित्रेणानिमिधा यतम्य I. KIRTv भ.111-. मिलाप मित्र समान व्यवहार कर। सामप्य, शत्रुश पराभव करने की शकि, पठ, मा. सिंग ने पायाधिषी उभे स्तम् ।...॥ काम, मान, संरक्षण पह तुम्हारा रूप है मत मुझे पे टिप पे होमो शुभार पियो लोग ध्याग करणे. गुजरे। घपत्योऽसि, प्रतिसरोऽसि, प्रत्यभिचरणोऽसि। नाममान यायय दिया। म .१२ दिए मम्मन् यायप- जम्मो बाग (मामा) गतिमोर, भागे बापाला ༣ བའི ར་ ་ (༣་ ཀ ཙམའ་་་་ दुस्वारकरनेवाला है। पामापनि रमगार गुमोऽसि. प्राजोऽसि, शरसि, ज्योतिसि । वोw.fa ! VAIR युना মাধবিমাথা বালান। वसुबा पौरान तापीमाम. र पोलि। । पाई। 2.11 तीन काण्डीका परिचय] भच वर्धयेमम् । स २१६२ मयि एव अस्तु मयि ध्रुतम् । अथर्व० ॥२३ इसको विशेष ऊंचा कर । पढा हुभा, सुना हुआ ज्ञान मेरे अन्दर स्थिर रहे । (प्रास सबका पल, तेज, ज्योति, वीर्य, बढे और सब लोग किया ज्ञान भूला न जाय ।) तेजस्वी बने और सबका सामय बढे । संश्रुतेन गमेमहि ।मा श्रुतेन चिराधिपि ॥ भयवं. ११॥ वीरता हम सब ज्ञानसे युक्त हों। हम कभी ज्ञानसे वियुक्त प्रजा त्वटरधि निघेह्यस्मे । भ. २।२९।२ हे त्वष्टा! इसको सुप्रज्ञा दे। इमं वर्धयता गिरः। भ. 14ार आ धीरोऽन जायतां पुत्रस्ते दशमास्यः । वाणियो इसका गुणवर्धन करें । गुणगान करें। म. ३१२३१२ अनागसं ब्रह्मणा स्या कृणोमि । म. 11०1१ तेरे लिये दश मासमें जन्मनेवाला वीर पुत्र हो । ज्ञानसे मैं तुझे निप्पाप करता हूं। अथास्माकं सह वीरं रयिं दा. 1 अ. २०६५ हमें पीरोंके साथ रहनेवाला धन दे। उपास्मान् वाचस्पतिद्वंयताम् । अथर्व ॥४ ज्ञानी हमें बुलावें (और उपदेश करे, हमें मार्ग पता।) सुप्रजसः सुवीरा चयं स्याम पतयो रयीणाम् । म. ३०१०१५ सूर्य चक्षुषा मा पाहि । म. २१६३ हम उत्तम प्रजावाले तथा उत्तम वीरों से युक्त होकर हे सूर्य ! बाखसे मेरी सुरक्षा कर। धनोंके स्वामी बने ।- विढि, शक्र चिया इहि आ नःम. २५/४ तनूपानः सयोनिारो धीरेण मया। म. ३१५८ उत्तम राज्यशासन का, हे इन्न । हमारे पास पुदिकी तू सजातीय पौर मुझ धीरके साथ रहकर शरीर रक्षक है। योजनासे मामो। वृपेन्द्रः पुर पतु नः सोमपा अभयंकरः। एहि देन मनसा सह । पार म.१२११ विष्य मनके साथ इधर (मेरे समोष ) मा। (मनमें पळपान् , शान्ति करनेवाला, सोमरस पीनेवाला शत्रुः दिग्य शक्ति है, उस विध्य शनिसे प्रभावित हुए मनसे यह भाशक पीर हमारा भगुवा बने । भाभो । मनमें रिम्य शनि धारण करके, जहां जाना हो, ज्ञान जाना चाहिये। व्यापस्तृष्णयासरन् । म. 131 घोरा ऋपयो, नमो मस्त्वेभ्यश्चक्षुर्यदेषां मन- जल पासे दूर रहता है। सच सत्यम् । म. १३५।४ एपि पर तंजस्वी है, उनको हमारा प्रणाम प्राप्त हो, इमामग्ने शरणि मीमृपो नाम. इमकी भीख और मन लपवरूप रहते है। म ! मेरी इस भूलको क्षमा करो। येन देवाम वियन्ति नोच विद्विषते मियः। तषि तस्मै वृजिनानि सन्तु प्रायद्विपं धार तारण्मो प्रल पो गृहे संशानं पुरुषेभ्यः । मिसंतपाति म. शा२६ भ.३१३० ज्ञानका देप करने वाले इस दुजोरा alr. भिमसे ज्ञानी मापसमें पहले नहीभीर मापसमें देप वापरू। उस नामष्टाको माSIT मत करे। भी मही करते, १६ मंशान भार परके पुरुषों के लिये में मूर्यमृतं तमसो माया अधिया मुध्यता भाग: करता हूं। जपिएस.1016 प्रमाणस्ने यशसा सन्तु, माये । भ. २०१२ देयाने बंध षा पासे धन it शानी होती या मागी बने, म मरे । सत्यवती मरा [अथर्ववेद के पहिले प्रापेयं सर्वा आकृतीमनसा हृदयेन च । प्राणवायु मय मोरसे मुझे घेरे और स्वष्टा मुझे पुष्टि देखें। अ २०१९ इष्टापूर्तमवतु नः । म रा मनसे और हृदयसे मद मकल्पोंको प्राय कर सकू। इष्ट कर्म तथा पूर्व कर्म हमारी रक्षा करें। (इच्छापूर्वक ब्रह्म वा योनिन्दिपत् नियमाणम् । किया कर्म इष्ट और अपूर्णको पूर्ण करनेका कर्म है।) म २१२१६ धन जो हमारे ज्ञानकी निंदा करता है। (वा पतापको त्वं नो देव दातवे रयिं दानाय चोदय । प्रात हो) म ३/२०१५ तेजस्विता हे देव तू दान देनेवाले के लिये दानके भ, धनको प्रेरित करो। सद घर्चसौदिहि । प ३ ये पन्यानो यहवो देवयाना अन्तरा धावा तेजक साथ उदयको प्राप्त हो। पृथिवी संचरन्तिा ते मा जुपन्तां पयसा घृतेन तेन मामध वर्चसाग्ने पर्वस्विन कृणु । यथा नीत्वा धनमाहराणि म ३५२ म ३१२२।३ जो सज के जाने मानेके यहुदसे मार्ग धावा पृषि वीके म! टस से मुझे माज तेजस्वी कर। पोममें चल रहे हैं, वे मुझे घी और दूधसे तृप्त करें। देवासा विश्वघायसस्ते माअन्तु वर्चसा। जिनसे चटकर क्रयविक्रय करके में धनको मात करू। म २२२२२ यमध्यानमगाम दूरम् । मका धारण करनेवाले देव मुझे से वेजस्वी करें। शुनं नो अस्तु प्रपणो विक्रयश्च प्रतिपण देया इम उत्तरहिन् ज्योतिपि धारयन्तु । फलिन मा कृणोतु । ल ५४ मैं मार्गपर गाया हु। ऋविश्य हमे हितकारी . 11९11 तीन काण्डोका परिचय - इन्द्र इयेन्द्रियाण्यधि धारयामो अस्मिन्तदक्षः और यह हमारा भग भने । (इन्द्र-शत्रुका पिदारण माणो विभरद्धिरण्यम् । भ. १३५ार करनेवाला) इन्द्र के समान हम इंद्रियों को धारण करते हैं जो दक्ष याचदशे ब्रह्मणा वन्दमान इमां धियं शतसे. तासे सुवर्ण धारण करता है ( उसमें उराम इंद्रिय शक्ति याय देवीम् । र, ३५३ रहती है।) जिससे इस विम्य मुदिका ज्ञान द्वारा सन्मान करता नैनं रक्षासिन पिशाचा सहन्ते देवानामोजः हुमा में संकटों लिहियोको माप्त करने योग्य हो। प्रथमजे ह्येतत् । अ. १३५२ शुनं नो अस्तु चरितमुत्थितं च ! अ. ३१1५1५ इस सुवर्णको राक्ष और पिशाच (सूक्ष्मरोग कृमि) हमारा चालचलन और सरधान हमें सामदायी हो। नहीं सह सकते। क्योंकि यह देवोंका पहिला सामय है। भग प्रणेतर्मग सत्यराघो मगेमो धियगुदया तं जाननग्न आरोहाघा नो वर्षया रयिम् । ददग्नः।भ. ३.१९३ म.३१२०० ई मग, है 4 नेता, सत्य सिदि देने वाले प्रभो। इस भो ! उस मार्गको जानकर ऊपर पढ़ और इमो युद्धिको देकर हमारा क्षण कर । धन बना दो। भग एव भगयाँ अस्तु देवस्तेन ययं भगवन्तः नुदनराति परिपन्थिनं मां स ईशानो घनदा म्याममि. 1104 अस्तु मह्यम् । म.३1111 भाग्यवान् मगदेव मेरे साथ रहे, इसके साथ रहनेसे मागंपर लूटनेवाले, दूढते रहनेवाले शत्रुको दूर करके, 4६ ६म भाग्यवान् । ईश्वर मुझे धन देनेवाला होये । भगस्य नायमारोह, पूर्णामनुपदस्थतीम् । मगप्रणो जनय गोभिरश्वभंग नृभिवन्तः तयोपप्रतारय, यो परः प्रतिकाम्यः ॥ १. २५५५ स्पाम.म.१६३ पूर्ण तथा पर ऐसी नौकापर , मौका हे भग! गोमो मार मौके साप हमारी संतान पृदि सपा शो पर तो कामना पोग्य हो। राम मछे मानवों के साथ रहकर मानवासे युक्त हो। परिमां, परि मे प्रजा परिणावादियदनम् । तं त्या भग सर्य रजोदधीमि स नो भग पुर. 4.1010 एता भयेछ । म .५ मेरी रक्षा कर, मेरी प्रा0 THIS, मो पी हे भगवान् श्मो ! तुमको मेस प्रभात भाता है। पहवाहमा भगुमा हो। उधनिष्ठ मदते सोमनाय IR, Int मयि पुप्यत यद्वा , ३६१०९ परेमाभापलिये पाहा गोगा! जोधन है हमसे मेरे साप मर- अस्मिन् तिट या रयिा। . ॥५१ अपास्मभ्यं सहवीररपि !.५ हममें पति एन । हमें वीर साफ न हो। रपि देवी दधातु मे।स. ॥२॥ रक्षाका को। समुपमा तीन कापडोंका परिचय ] म ।" मोर घर कर तास त्वान्तरस्या धामि, प्र यक्ष्म पतु महामवहम कुरुरूमम । अलगण्डर नितिः परावैः । १. ३११०५ रसर्याउलुनाक्रमीचसा जम्भयामसि । मुझको वृद्धावस्था में धारण करता है । क्षय रोग क्या म.२२ अन्य सय कष्ट तुमसे दूर चले जाय । दोलनेवाले, न दीखनेवाले कृमियों को मैं मारता है। अशी रक्षोहामीश्चातनः । अ. 11२०११ गने वाले कृमियोंको में विनय करता ह। पितो पर रहने. अनि राक्षसों का नाश करके रोगों को दूर करने शला है। वाले सप कमियों को प्रयास में नय करना है। (रक्षा- रोगकृमि) निशालां धृष्णु धिषणमेवाचां जिघरसम् । अनुसूर्यमुदयता होतो हरिमा च ते । सर्वोचण्डस्य नप्पयो नाशयामः सदान्याः । गोरादितस्य धणेन तेन त्या परिश्मसि ।। अ. १/२ धादार न होना, मपमीत होना, एक एनो निRIBE तुम्हारा हरयविकार या कामिला पा पीलापन - बुदिका नाश काना, ग्रोधको स माने, दामरिया श्यके तार मानेवाले लाल किरणों के लाल वर्णसे मुझे चारों सादिक हम मशवे है। र करता प्राहि माह यातनं तस्या इन्द्रासी प्रमुमुक्त- किलासं च पलितं च निरितो नाशय पृषत् । मेनम् । म ३) पदि करनेवाले रोगने हसको पE स्या हो, तो उस इस शरीरसे कुछ व सफेद धो दूर कर । पीडाले बन्दमोर मानिसको छाये। अस्थिजस्य किलासस्य तनूजस्य च यस्यचि । आत्या स्यो पिशतां वर्णः पराशनि पातय । दृष्या कृतस्प ब्रह्मणा लक्ष्म वेतमनीनशम् । म. RR म २५ दोपके कारण स्वपापर उत्पन हुए, मस्थिसे तथा शरीरसे तुम्हारे हा निसणे म्ह पाप होमी शरे अप हुए, दुश्मन को मार निदेखो हम शामसे पूरा हो। पिन करते। अमुफ्षा यक्ष्मात् दुरितादयवाद् इदः पाशा शेत्मक शेरम पुनों यन्तु यातयः पुनदेतिः माहाचोदमुफ्याम. In किमीदिनः । यस्य स्य तमच, यो यः प्राई क्षयोग, पार, नियम, प्रोटियों पर भी मारने. चमत, स्था मांसायचा. २१२ या रोग मादिमे में तुम्हें गुरावा । देवरवा शहारे यातना देनेवा सम, दुप्पा पिरसि, देत्या देतिरसि, मेन्या मानसि। योग! तुम न हो इसको साभो, मिने प, मेमानको नासो, अपने ही मांस सानो । (म दोपोर नेमामापिपरा पिपा, 1 सुरक्षित) (मामा) गिरिमेना भाषेप कपमान जोषितपोपनान् । भार [अथर्ववेदके पहिले नो वधंया रयि-हमारा धन बढामो। उद्यन्नादित्यः कृमीन्हन्तु, निम्रोचनहन्तु रश्मिभिः । ईशानो घनदा अस्तु मां- परमेश्वर मुझे धन ये अन्तः किमयोगचिम. २३२१ देनेवाला हो। उदय होनेवाला सूर्य रोगकृमियों का नाश करे, भख होने. मयि पुप्यतु यद्वसु- जो धन है वह मेरे पास पदता वाला सूर्य किरणों से कृमियों का नाश को जो कृमि भूमि रहे। पर हैं। अस्मभ्यं सहवीरं रयिं दा:- हमें वीर पुरोहित विश्वरूपं चतुरक्षं क्रिमि सारंगमर्जुनम् । धन दो। शृणाम्यस्य पृष्टीरपि वृश्यामि यच्छिरः ॥ रयि देवी दधातु मे- देवी मुझे धन देवे। अ. २२३२२ रपि च नः सर्वधार नियच्छ- धन मौर वीर पुत्र भनेक रूपोवाले, चार मांखवाले, रंगनेवाले, तरंग. हमें दो। वाळे ऐसे अनेक प्रकार के कृमि होते हैं, उनके पोठ मोर ययं भगवन्तः स्याम- हम धनवान हो। सिर में तोहता हूं। मगस्य नायमारोह- ऐवपकी नोक पर चढ। त्रिवः किमयो हान्म कण्यचजमदनियत् । परिणः पाहि यद्धनम्-हमारे धनका सरक्षण कर। अगस्त्यस्य ब्रह्मणा सं पिनफ्यहं कृमीन् । उथ तिष्ठ मदते सौमगाय-परे सौभाग्य के लिये अ.२॥३२॥ उठकर सा1 भनि, कण्य, जमदपिके समान में कृमियों का नाश करवा अस्मिन् तिष्ठतु या रयि:- इसके पास धन रहे । हूं। मगरस्यकी विधासे मै कृमियों को कुचलता हूं। ऐसे वचन है जो मन में रखने योग्य होते हैं। इनमें से हतो राजा कृमीणां उतषां स्थपतितः। कोई एक वपन मनमें १०।२० वार विचारपूर्वक रसिपे । इतो इतमाता प्रिमिहंतभ्राता हतस्पसा" पेमा करनेसे घना महप पान मा जायगा और धन क. २॥३२॥ पाम रहने से कमा सुध रोगा, इसका भी पता लग जायगा। कृमियों का राजा मारा गया, इनका स्थानपति मा आरोग्य गया है । कृषिको माता, बहन और माह मारा गया। सेना ते तन्य कर, पृथिव्यां ते निषेचनं हनासो अस्य शसोहतासः परिवेशतः। यदिऐ सन्तु यालिनि । मप 1३11-५ भयो ये क्षुलका व सर्वे ते कृमयो हताः । समे nireeपाण हूं, धियोपरता गुखम् गहना सेतो मे दोष दूर हों। इस कृमि रिचारक मारे गये, इस सेवक पीसे गरे, भाग्यशपिण्यमयो पापं समीन् । भुजम् मिस मारे गपे है। भागापरंथिमीन् ययसा जम्पयामसि । प्रते पामिना या चितुदायमे। म.१११५ तीन काण्डोंका परिचय तासु त्यान्तरस्या दधामि, प्र यक्ष्म एतु दृष्टमदृष्टमतहमथे। कुरुरूमम । अलाइन् नितिः पराचैः । . २११०५ सिन्छिलुनाक्रिमान्यचसा जम्भयामसि ।। तमको पृद्धावस्था में धारण करता हूं। क्षय रोग तथा म .१२ अन्य सब कष्ट तुझसे दूर चले जाय । दोखनेवाले, न दीखनेवाले कृमियों को मैं मारता है। अग्नी रक्षोहामीवचातनः । म. ॥२८॥ रंगनेवाले कृमियोंको में विनष्ट करता हूं। विस्तो पर रहने. अनि राक्षसों का नाश करके रोगों को दूर करने वाला है। वाले सर कृमियोको पचासे में भर करता हूं। (रस- सेगकृमि) निमशालां धृष्णु धिपणमेवाचां जियरत्वम् । अनुसूर्यमुदयता द्योतो हरिमा च ते। सर्याश्चण्डस्य नप्यो नाशयामः सदान्याः । गोरोहितस्य चर्णेन तेन त्या परिदमसि । म.२॥10 १. 1)२२१ घादार न होना, मयभीत होना, एकवचनी नियामक तुम्हारा हरयविकार तया कामिला पा पीलापन स्पो बुद्धिका नाश करना, ग्रोधको स साने, दानवतियां दय हार मानेवाले लाल किरणों के बाल वर्णसे तसे चारों मादिका हम नाश करते है। मोर घर कर में दूर करता हूं। प्रादिगाह यघेतदेनं तस्यान्द्रासी प्रमुमुता. किलासं च पलितं च निरितो नाशय पृपत् । मेनम् । म. अ.११२१२ यदि जानेवाले रोगने इसको कर रखा हो, तो उस इस शरीरसे कुष्ठ व सफेद घरसे दूर कर । पोगले इन्द्र मोर ममि इसको दुधगये। अस्थिजस्य फिलासस्य तनूजस्य च यत्त्वचि । मात्या स्वो विशतां वर्णः परामानि पातय । दृप्या रुतस्य ब्रह्मणा लक्ष्म श्वेतमनीनशम् । म.१२२ म. १५२३४ दोपके कारण वापर सरपच हुए, मस्थिसे तथा शरीरसे तुम्हारे शरीरका निवर्ण मुम्हें प्राप्त हो और आप सपन हुए, कुरा जो प्यार चिन्ह को हम ज्ञानसे दूर हों। विनट का है। अमुक्या यक्ष्मात दुरितादयवाद् हुदा पाशाद शेरमक शेरम पुनयों यन्तु यातयः पुनतिः प्राधाधोदमुपथा। म. २०१० किमोदिनः । यस्य स्थ तमत्त, यो यः माहे क्षयरोग, पार, नियम, दोरियों के पास भीर नहाने. तमस, वा मांसान्यत्तम. १२॥ पासे रोग आदिमे में है। देवध करनेवाले शहारे यातना देनेवा राम, दृप्या इपिरसि, देत्या देतिरसि, मेन्या मेनिरसि। तपाई चाउगों! तुम जिनके होसको ग्रामो, जिन्होंने पाई भेगा है होमो, अपने ही मांस मानो । (हम दोषको र नेवाला, इपिचारा पिया, पत्र मुरक्षित हैं। कर(मामा) है। गिरिमेना मावशय कण्यान जोयितयोपनान् । दशश मुन्धेम रस ET अधि में हम बीविता नाश करनेयाम, पोप नेपाछे कमियों को जमाद पर्य। मपा पनं पनमा जोगानो पार (रोगामि में ₹1) लोरगुलया 1 क्षेत्रियाया निपा जामिसाद इदो समयमो मारोग मी) मुशामि पाणस्य पाता। म. सा. रोग पर भानुशिकरोग , Hiवार, दाता बसतमोजीमा mms uो पारे में माता है। समासानायरममे मा रापोनित म.३१५१५ तीन काण्डों का परिचय] व्याा पयमान: । म. ३३२ यहां हमारे साथ अच्छी तरह बोल । हमारे सन्मुख शुद मनुष्य पीडासे दूर रहता है। उसम मनवाला हो। मुञ्चामि त्या हविषा जीवनाय कमज्ञात यक्ष्मा. विपन्थानो दिशं दिशम् । म. ३१३१५ दुत राजयक्ष्मात् । १. ३१॥ मार्ग मिस दिशाओं भिन्न-भिन्न होकर जाते हैं। सुखपूर्वक जीवन के लिये तुझको हम मज्ञात रोगसे ये यध्यमानमनु दीध्याना अन्वक्षन्त मनसा तथा राजपक्ष्मासे हवन द्वारा छुड़ाते हैं । चक्षुषा च। अग्निष्टान प्रमुमोक्तु देवो मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकभ्यस्कृधि । विश्वकर्मा मजया संरराणः ॥ १, २॥३४॥३ म. १३१२ पदको जो मनसे भोर मांससे प्रेमपूर्वक देखते हैं, हमारे भारी को सुख हो, हमारे बाळपोंको सुख दो। उनको विश्वका बनानेवाला और प्रजा के साथ रहने वाला वि महच्छर्म यच्छ, वरीयो यावया वधम् । ममि देव प्रथम मुरू करे । अ.१२.३ पृहस्पतये महिप घुमन्नमो, विश्वकर्मन्, नम. बदा शान्तिसुख हमें दो, शत्रुकाशस्त्र हमसे दूर कर दो। स्ते, पाह्यस्मान् ॥ १. २१३५४ कामो दाता, कामः प्रतिग्रहीता । म. २९७ महाशळिमान् ! शानो सेजस्वी विजके रचयिता, मारको काम दासा और काम ही लेनेवाला है। हमारा नमस्कार हो, मापको नमस्कार है, हमारी सुरक्षा कृतस्य कार्यस्य चेद स्फाति समावह। म.३१२४५ स्वर्णोप त्यां मदाः सुवाचो अगुः । १. २।५।२ किये हुए कार्पकी यहाँ वृद्धि कर । स्वर्गीय आनंद के समान उत्तम मापणसे होनेवाले भार यत्रा सुहार्दः सुक्रतो मदन्ति विहाय रोग तुम्हारे पास पहुंचे हैं। तन्यः स्वाया। तं लोकं यमिन्यभिसंघभूय सुपदत, मृडत, मृडया नस्तनूम्पोमयस्तोके- सानो मा हिंसीत् पुरुषान् पशून् । म. ३२२८५ भ्यस्कृधि। म. ॥२॥ माधय दो, मुत्री करो, हमारे को मुखी रखो। महा मुहद तपा सस्कमकर्ता, अपने शरीरके रोगको स्था कर मानंदसे रहते हैं, हे जुळ्ये पये देनेवाली गौ ! उस इमारे बालपर्यों के लिये मानंद प्राप्त हो ऐपा करो। स्थानपर जाकर रह हमारे मनुष्यों और पशुमोकी हिंसा इमां देवा असापिपुः सौभगाय । M. 3 इस कन्याको देवोंने सामाग्य के लिये जपा की है। सर्यान् कामांपूरयत्याभयन् प्रमयन्मवन् । शं मे चतुभ्यों गेभ्यः शमस्तु सन्ये मम। आकृतितोऽपित्तः शितिपानोप दस्थति। म. १२९२ 'मेरे चारों भगोरे लिये पायो, मो शरीपे यह दिया हुमा करमार सय प्रमाके संशोको पूर्ण नीरोगिता हो। करता। हिंसकोकोदशाता है। माका रक्षण करता है। मचि विश्वशंमुयम् । म. It प्रभावी पत्रका, मनिया रक्षerat और विनाश मतिम प्रकारका मुख देनेवाला। बचाता है। यो ददाति शितिपादपि लोकेन समितम् । यिभ्यं मुभूत सुपित्रं नो अस्तु । . 1m स नाकमम्यारोहति पत्र शुलो मापने EAR लिये यह विषम सहायक सपा ज्ञान मयलेन पलीय ब. Ret देने वाला हो। को डोगसे ममानिक सिमामा मामा म मा पदेना प्रत्यार ना सुमना भय। परमादेशाबास स्थानो माम पर है,aunted गि। ४ (म..) - (२४) [अथर्ववेदके पहिले म १२९।३ स.२॥1॥५ मृणामि। यो अन्येारुभयारभ्येति तृतीय पितेव पुत्रानभि रक्षतादिमम् । म. २।१३।। काय नमोऽस्तु तक्मने ॥ १ ॥२५॥४ पिता पुत्रोंकी रक्षा करता है इस तरह इसकी रक्षा करो। जीतपरके लिये नमस्कार, रूक्ष ज्वरके लिये नमस्कार आशीर्ण, ऊर्जमुत सौप्रजासत्वं, दक्षं धत्तं जो एक दिन छोडकर पाता है, जो दो दिन आता है, जो द्रविणं सचेतसो । जयं क्षेत्राणि सहसाय. तीसरे दिन भाता है इस ज्वरके लिये नमस्कार दी। मिन्द्र कृण्वानो अन्यानधरान्सपत्नान् । अर्थात् पह ज्वर हमसे दूर हो । यदिस्थ क्षेत्रियाणां यदि पुरुषेपिताः। दमें भाशीर्वाद दो, हे संतुष्ट मनावालों ! बल, सुप्रजा, यदि दस्युभ्यो जाता नश्यतेतः सदान्याः । दक्षता तथा धन हमें दो। यह अपने बलसे विविध क्षेत्रों में जय प्राय करे और दूसरे शत्रुमोको नीचे करे । विश्वा रूपाणि विभ्रतः त्रिपप्ताः परियन्ति । यदि मानुवशिक दौर हैं, यदि मनुष्यकी प्रेरणासे हुए अथर्व 11 हैं, पक्षिरयुमोले हुए हैं वे सम दोष रहा हो। सय रूपोंको धारण करके, तीन गुणा सात (गर्भाव आसुरी च प्रथमेदं किलासभेपमिदं इक्कोस ) पदार्थ सर्वत्र चलते हैं। (ये इक्कीस पदार्थ विधर्म फिलासनाशनम्। अनीनशत् किलासं सरू. दीखने वाले पदार्थोके रूप धारण करते हैं।) पामकर त्वचम् ॥ म १२४२ यः सहमानश्चरति सासहान इव ऋपमा । मामुरीने पहिले यह कुष्टनाशक औषध बनाया। इससे तेनाश्वस्थ त्वया वयं सपत्नान्सहिपीमहि । पुदिन दुपा और स्वचा मान रंगवाली धनी। भारोग्पो विएपमें रोगकृमिका नाश करना मुख्य है। जो बलवान् शत्रुको दबानेवाला, सामर्षवान् होकर म्यादा की माय, शुद्ध वायु आग। हे, सूर्यप्रकार चलता है, उस वीरसे हम शत्रु को पराजित करेंगे। मालाय, हवन गौके धोका होना रहे ये सब बातें भारोग्य. मनुष्य के जीवन में शत्रुका पराभव करना और विजय सधनके लिये पत्यावश्यक है। प्राप्त करना मुख्प पाते हैं। इसीसे मनुष्य सुखी हो मर्प रोमियों का नाशक मुख्यतया है। सूर्यप्रकार सकता है। MRI करनेवाला सदिय रहने घर सूर्यप्रकाशा मुसप्राप्ति विमानाचार . स्वस्ति मात्र उत पित्रे नो मग्री सदाऽमीपचातनः । अस्तु जगते पुरपेभ्यः 1 8 1॥३१॥४ nangi RINTAIT रोग दूर करनेवाला। माता, पिता, गौ, पुष तथा पहनेवाले प्राणियों को मंत्रका विचार करना चाहिये । मुघ प्राप्त हो। विजय ते पिशि क्षेममदीघरन् । न. ३।०५ प्रजातनों में वेरा क्षेम धारण करें। सान-क्षपणी मागिराएं। पिगतदिः । मातेयास्मा अदिते शर्म यच्छ। म. २०१५ पपादप पौराणां पिराजानि जनस्य । मदिन ! माता ममान इसे मुम्मदे। एत समाजानामुपिता पुरः । प. १२७॥ भ.३०४ स्वस्ति गोम्यो मतिमे तीन काण्डॉका परिचय ] वि महच्छम यच्छ, च्याया पवमान:म. ३३२ यहां हमारे साथ अच्छी तरह बोल। धमारे मुख शुद्ध मनुष्य पीडासे दूर रहता है । अत्तम मनवाला हो। मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञात यक्ष्मा. विपन्यानो दिशं दिशम् । म. ॥३॥ दुत राजयक्ष्मात् । भ. ३.११! मार्ग मिन दिशाओं में भिन्न-भित्र होकर जाते हैं। सुखपूर्वक जीवन के लिये तुझको हम मज्ञात रोगसे ये यध्यमानमनु दीध्याना अन्वक्षन्त मनसा तथा राजयक्ष्मासे हवन द्वारा छुडरते हैं । चक्षुपा च। अग्निष्टानने प्रमुमोक्तु देवो मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकभ्यस्कृधि । विश्वकर्मा प्रजया सरराण: म. २१३३ म .१३२ पदको जो मनसे और मांखसे प्रेमपूर्वक देखते हैं, हमारे शारीरीको सुख हो, हमारे घालयचोंको सुख दो। उनको विश्वका सनानेवाला और शाके साथ रहनेवाला वरीयो यावया वधम् । अग्नि देव प्रथम मुक को। अ.११२०३ वृहस्पतये महिष घुमन्नमो, विश्वकर्मन्, नम. मा शान्तिसुख में दो, शत्रुनाशन हमसे दूर कर दो। स्ते, पाह्यस्मान् ॥ १. २६३५४ कामो दाता, कामःमतिग्रहीता। म. ३।२९।। महाशक्तिमान् ! ज्ञानी तेजस्वी विश्वके रचयिता, मारको काम दाता भौर काम होछेनेवाला है। हमारा नमस्कार हो, भापको नमस्कार है, हमारी मुरक्षा शतस्य कार्यस्य चेद फाति समावह। कर। म.३।२४।५ स्वर्णोप त्वां मदा सुवायो माः । म. रापार किये हुए कार्यकी यहाँ वृद्धि कर । स्वाप पानंदके समान इत्तम मापणसे होनेवाले मार्नर यत्रा सुहार्दः सुकृतो प्रदन्ति विहाय रोगं तुम्हारे पास पहुंचे हैं। तम्यः स्वाया। तं लोकं यमिन्यभिसंबभूव सुप्दत, मृहत, मृडया नस्तनूम्यो मयस्तोके. भ्यस्कृधिम. १२१ सानोमा हिंसीत् पुरुषान् पशून् ॥ ४. ३:२८०५ मामय दो, मुखी को हमारे शरीरोको मुसी रही। हो मुहद पा सकर्मकर्ता, मपने शरीर रोगको स्याग कर मानंदसे रहते हैं, हे तुरवे पथे देनेवाली गौस हमारे बालों के लिये भानंद मा हो ऐमा। -स्थानपर जाकर रह हमारे मनुष्यों मार पशुओंडी दिसा इमां देघा बसायियुः सौभगाय । भ. १८२ सम्माको देवाने तामाप किये वापरही है। सर्यान् कामांन्पूरयत्यामवन् प्रमयन्मयन् । शं मे चतुम्यों अंगेन्या शमस्तु तन्ये मम । म. १२५ आतिशोऽपितः शितिपानोप दस्यति । 'मेरे भगा लिये भाग्य से, मेरे शरीरहिये म. १२९/२ यह दिया हुमा करमार सम प्रमाके संबोडो पूर्ण नीपिता हो। परासिकोको दबाता है। प्रजाका रक्षण करता है। मनि च यिभ्यशंमुयम् । म. It प्रभावी बनकर, मनिषा रक्षण कर और विनाशसे मसिब प्रकारका मुख देनेवाला। बचाता । यो ददाति शितिपादवि लोकन समितम् । यिभ्यं सुभूत सुविदर्भ नो मस्तु । र, mur स माझमभ्यारोति पत्र शुरुको म प्रीयते RRRRहिये यह विधत्तम सहाया हा ज्ञान भयलेन पलीयस म. देनेवाला। को होगोंसे मानिसमायरा मेरा मो समय पदमा प्रस्पर नामुमना मय। मार देगा की स्थाmart ..५५ है,REE हिरे पर होगा।
[अथर्ववेदके पहिले (२६) दीर्घ आयु म.RI118 इस तरह सुख प्राप्त हुआ तो मनुष्यकी भायु दीर्घ होती जरा, सात एपा । तया त्वं जीव शरदः है। रोग दूर हो, स्वास्थ्य प्राप्त हो, मन आनन्द प्रसन्न रहे सुवर्चा, मा त मा सुस्रोद्भिपजस्ते मक्रन् ।। भ. १२९७ तो मनुष्य दीर्घायु होता है। इन्द्रने भक्ति करनेपर अस, पल, धारकशक्ति, मक्षीणता मादिको उत्पन्न किया, यह शक्ति नुम्हारे लिये है। इससे इस प्रकरणमें पाये मत्रों का विशेष उपयोग है। इन तू युक्त होकर बहुत वर्ष जीवित रह, तेजस्वी बन, तेरे लिये मंत्रमागों का जप करनेसे लाम होता है- शरीरमस्याहानि जरसे घहतं पुनः। घ. ३१११६ न्यूनता न हो । वैधोंने तेरे लिये यह रसयोग बनाया है। इसका शरीर और इसके भवयव वृद्धावस्यातक पहुंचाओ। अभि त्या जरिमाहित गामुक्षणमिव रज्या । भ315910 ये देवा दिवि ष्ठ, ये पृथिव्यां, ये अन्तरिक्ष जिस तरह गाय और बैलको रज्जुसे मांधते हैं पैसा ओपधीपुपशुप्यन्तः। ते कृणुत जरसमागुरस्मै वृद्धावस्या तेरे साथ बंधी रहे। शतमन्यान् परि वृणक्तु मृत्यून् ॥ १. ११३०१३ जराये त्वा परिददामि । भ. ३1110 जो देव घुलोक, अन्तरिक्ष और पृथ्वीपर हैं। जो प्रोप- धियों और पशुओं में हैं। वे देव इसके लिये वृद्धावस्था- वृद्धावस्था के लिये सुझे देता है। तकको मायु करें । सैकडों अन्य प्रकार के मृत्यु दूर हों। वि देवा जरसावृतम् । स. १३१ देव जरासे दूर रहते हैं। कृण्वन्तु विश्वे देवा आयुटे शरदः शतम् । स्वस्त्येन जरसे यहाथ । भ. ११३०२ इसको वृद्ध मायुधक सुखसे पहुंचा दे। सब देव तेरी भायु सौ वर्षको करें। विश्वेदेवा जरष्टियथासत् । अ. २२२८५ तं नियासं बहु रोचमानो दीर्घायुत्वाय शत. सब देव या वृद्ध होनेतक जीवे, पेमा करें । शारदाय। म. १५४ जरायै निधुवामि ते । अ. ३1110 उस प्रियको प्राप्त कर, बहुत प्रकाशित होकर, सौ वर्षका वृद्धावस्थातक तुझे पहुंचाता हूं। दीर्घायु प्राप्त करू। जरा त्वा भद्रा नेष्ट । म. ३११११७ दशमीमुमः सुमना वोह . ३०० सुझे वृद्धावस्था सुख देवे । र यहां उग्रवीर तथा उत्तम मनवाला होकर दसवीं वि यक्ष्मेण, समायुपा । . ३।३१-११ दशक ठक सम राज्यको अपने वश में (मर्थात् अपने अनु यमरोगसे मैं दूर रहूं। दीर्घायुसे में संयुक्त रहू। मित्र एनं वरुणो वा रिशादा जरामृत्युं कृणुतां परि घत्त, घत्त नो वचंसेमे जरामृत्युं कृणत संविदानी । म, २०२८२ दीर्घमायुः । ऋ. २११३२ मित्र तथा शत्रुनाशक वहण जानते हुए इसको जराके हमारे इस पुरुषको धारण करो, तेजसे युक्त करके इसका पश्चात् मृत्युको प्राप्त होनेवाला दीर्घायु करें । धारण कयो, दीर्घायु इसको देकर रावस्या के पश्चात् इसका दीर्घायुत्याय मदते रणायारिप्यन्तो दक्षमाणाः गायु रोपेपारो। सदैव । मणि विष्कन्धपणं जगिडं निभृमो शतं च जीय शरदः पुरुची, रायस्पोपमुपसं. घयम् ॥ भ, २१ ध्ययस्वाभ.२१ दीर्घायु प्राप्त हो, परा मानंद प्राप्त हो, भोपकरोग सात पूर्ण तसे जीमों और धन और पोषण दूर हो इसके लिये अगिर मणिको, हम सब विनष्ट होने समलिसे माओ। वाले और अपना बल पदानेकी हा करनेवाले सदेव एद पता सएमे पिनो मप्र ऊजा स्पघाम मारण करते हैं।
तीन काण्डोंका परिचय] (२७) म॥२२१२ रायस्पो सक्तिरा सुवास्मै शतं जीवाति यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरतिकं शरदस्तवायम्। २।२९।२ नीत एव । तमा हरामि नितिरूपस्थादस्पार्प धन और पोषण, हे सविता ! इसे तु दे। और यह ते॥ मेनं शतशारदाय ॥ म २ पनकर हो वर्ष जीवित है। पदि इसकी मायु समाप्त हुई हो, यदि या मृत्युके इन्द्रो यथैन शरदो नयात्यति विश्वस्य दुरि समीप पहुचा हो, तो मी विनाशके पाससे मैं इसको वापस तस्य पारम् । १.३।१११३ हा हू और इसको सौ वर्षतक में जीवित रखता है। सप पापजानित दुखके पार इसको इन्द ले जाय और यो विभर्ति दाक्षायण हिरण्यं स जीपु घह सौ वर्षको भायु इसे मिले ऐसा को। स्णुते दीर्घमायु । ॥३५२ शतं जीव शरदो वर्धमानः नातं हेमन्तान जो दाक्षायण सुवर्ण शरीरपर धारण करता है यह हातमु घसन्तान् । म ३011 जीवों में दीर्घायु धारण करता है। सो घर्षतक पढता हुमा जीवित रह । सौ हेमन्त, सौ परित्या रोहितदीर्घायुस्राय दम्मसि । वसन्त मोर सौ शरद ऋतुतक जीवित रहे । यथायमरपा असदयो अहरितो भवत् । सहस्राक्षेण शतवीर्येण शतायुपा हविषा हामेनम् । म २१३ लाल रगोंके किरणों में मैं तुझे दीर्घायु प्राप्त होने के लिये सहनों शक्तियों से युक्त, सौ बीयोंसे युक, शतायु करने घरता ह। इससे यह नोरोग होगा और पीलिमा भी पाले हानसे इसको मै मृत्युसे वापस लाया है। इससे दूर होगी। शतायुश हविषाहार्पमेनम् । १. 1911 उदायुपा समायुपोदोपघीनां रसेन । सौ वर्षकी मायु देनेवाले हयनसे मैं इसे वापस 23120 टाया भायुष्यसे उपयन, दो पुसे युद्ध हो, भौधियों भात जीयाति शरदस्तयायम् । रससे उमतिको प्राप्त हो। मुम्हारा यह मनुष्य सौ वर्ष जीवित रहे। यस्यापिरयं मणिरयो मरातिदूषि । आयुरस्मै घधि जातवेद । म २१२९।२ अयो सहस्साअनिरमप मायपि तारियता जाये। इसको दीर्घायु दे। यह जगह मणि दिमामे पधानेवार, गोडो यस्त्या मृत्युरम्यघत्त जायमानं सुपाराया। दूर करनेवाला है मार बस पानेवाला है, पर हमारी तं ते सत्यस्य हस्ताभ्यां उदमुनगृहस्पतिः ।। मायुधो बहारे। म 11114 यदा पमन्दाक्षायणादिरण्यं शतानीकाय मम जि गुप्युने र उपम होते ही संध पसा है इस नस्पमानात याम्यायुषे पचं से पलाप मणे परस्पति सत्य हायसे पुरा देता है। दीर्घाणत्याप शतशारदाप 1431 नुम्पमेप जरिमन यर्धतामयं मेममन्ये मृत्ययों राम मनवाडे पीमिया मेरे दिसिपुशत ये। २॥२८॥ चंठ पुर मेsurat rite grl पदावापे की आयु या मनुष्य परे। ये मो (भाग) वर्ग दोis, anRI. खो गा महो। ब, मोगा से पहिलो इममा मायुपे पर्यसे नप प्रियं रेतो पण परीरसंघar मित्रराज 10 114 বৌ ঘর গযব বানায় । परममित्र ! सो पंवान् परीषापुरा। Adrentry रो।
२८) [अधर्वघेदके पहिले - है - था पर्जन्यस्य पृष्स्योदस्थामामृता वयम् । एपिता और पिवी मावा ज्ञानपूर्वक इसको जराके म. ॥३॥११ पश्चात् मृत्यु हो ऐसा करें। पजन्यकी पृष्टिजससे हम उतिको प्राप्त हो और हम मनुष्य दीर्घ मायु चाहता है । इसलिये दीर्घायु पाहने ममर बने। हमें सीम मृत्यु न माये। वाला मनुष्य यही दिये, पचनों का जप को, वारंवार रचा. दय स्तं प्राणापानी माप गातमितो यूयम् । रण करें, वारंवार भजन करें। लाम अवश्य होगा जसा- म. १६ शरीरं अस्याङ्गानि जरसे यहतं- इसका शरीर माग मोर सपान यहाँ रहो, तुम इससे दूर न जाभो। मौर इसके अंग वृद्ध अवस्थावक पहुंचा दो। माणेन प्राणतां माणदेव भय, मा मृथाः यह वचन अपने शरीर के विषय में भी वारंवार पोका जा म. ॥३॥९ सकता है । मन त विश्वाससे लाम होता है। क्या- जीवित रहनेवालही जती मागशक्ति प्राप्त कर और कृणुत जरसं आयुः अस्मै- इसकी मायु पुर पजीवित १.ममा जा। अवस्थाठक करो। माणापानाभ्यां गुपितः शतं हिमाः। म. २२२८१४ रुण्यन्तु विश्वे देवा आयुटे शरदः शतं-- सय देव माग तथा मपान द्वारा सुरक्षित हो यह सौ हिम. सो पोंकी मुम्हारी मायु करें। हास-मी पर्पजीवित रहे। दशमी उग्रः समना यशेह-यह उप्रवीर बनला पायुप्मतामायुष्यतां प्राणेन जीय, मा मृथाः । दसवीं शतक जीवित रहे। म.३१२१ जरामृत्युं रणुत दीर्घमायु:- इसको दीर्घायु करके सीमापाला और मायुप्प बनाने वालों की मी माग आरे पश्चात् मृत्यु हो। सनसे मीवित र, म मर जा। जातं च जीय शरदः पुरुची:- सौ वर्षकी दीर्घायु प्रासापानी मृत्योर्मा पातं । म. सा. है भाग मोर नपान ! गापुसे मेरी मुरक्षा करो। त्यं जाय शरदः सुपर्चा:- सम तेजस्वी होता प्रपितं प्राणापानायमस्याहायिय प्रजम् । मौजीवित रहा इसे मिले।
तीन काण्डोंका परिचय] म.१२॥ मा मृथाः- :-मते मर। आयुरस्मै धेहि- इसको नायु प्रदान करो। आनुवंशिक रोगको दूर करनेवाली यह औषधि मानु. मेममन्ये मृत्ययो हिंसिपुः शतं ये-सैकडों मृत्यु वैशिक रोगको दूर करे। इसका नाश न करें। श्यामा सरूपं करणी पृथिव्या अध्युद्धृता। इमन आयुपे वर्चसे नय-६ भन्ने ! इसे मायु मौर इदमूपु प्रसाधय पुनः रूपाणि कल्पर्य । तेजके लिये ले जा। अस्पार्पमेनं शतशारदाय- सौ वर्षकी मायुके लिये श्यामा वनस्पति सरूप करनेवाली है, पृथिवी से घर मैं इसे स्पर्श करता हूं। उखाडी गयी है, इस कर्मका इसम साधन कर और पुनः तत्ते वनामि मायुपे- आयुष्यकी प्राप्ति के लिये तुझे पूर्ववत् पारीरका रंग कर । यह मणि बांधता हूं। शं सोमः सहौषधीभिः स. २।१०।२ औषधियों के साथ सोम कल्याण करनेवाला हो। प्राणेन जीव-माणसे जीवित रह । इदं जनासो विदथ महदहा वदिष्यति । प्राणापानौ मृत्योर्मा पातं--प्राण और अपान मृत्युसे न तत्पृथिव्यां नो दिवि येन प्राणन्ति वीरुधः। प .१३ मुझे बचाये। हे लोगों ! यह जानो कि ज्ञान बची घोषणा करके जरा मृत्यु कृणुतां- बराके पश्चात् मृत्यु हो इस तरह अन्यान्य बचोका भी उपयोग हो सकता कहेगा। जिससे वनस्पतियां नौवित रहती है यह पृथियो है। कोई बीमार परा हो, तो पवित्र होकर सिको सोरसे नहीं है और न धुलोकौ है । असित ते प्रलयनमास्थानमसितं तय । पावत अपने ज्ञापोंको घुमाना और ये मंत्रभाग बोटना, आसिक्यसि ओषधे निरितो नासया पृषत् ॥ मन में ही निप्रहपूर्वक बोलना। पारंवार बोलना। अपने म. १२३ हायोंमें बीमारी दूर करने की शक्ति है ऐसा मानकर तेरा व्यस्थान कृष्ण है और मास्थान मी कृप्यावर्णका इससे बीमारी दूर होगी ऐसे विश्वातसे यह करना । है। हे औषध! काले धर्णवासी है, इसलिये इसके रोगीका भी साथ-साथ विचास हो तो लाम शीघ्र होगा। वेत धरवे दूर कर। अन्य वचन मन्य समय घोड़ने के लिये हैं। पर विचार सरूपत्वमोपधे सा सरूपामिदं कृधि । करके पाठक जान सकते हैं म. २०१३ वनस्पति भोपधे । तसरूप पचाको करनेगली है। बता शं नो देवी पृश्निपण्यंशं निर्वस्या अकः । स्वचाको मरूप का। वधू हेभिपणा देवी, हमारे लिये कल्याण कर, और सोमजुष्टं ग्राजुष्टं अर्थरणा संभूतं भगम् । ज्याधियों को दुःख प्रास हो। धातुदयस्य सत्येन कृणोमि पतिवेदनम् । बरायममुक्पायानं यश्च स्फाति जिद्दीति । गर्मादं काय नाशय पृश्निपर्णि सहस्य च ॥ भारमशानीसे सेवित, प्राणों द्वारा सेवित, श्रेष्ठ गन. म. २०२५३ वालेने हटा किया यह मधातादेव मनियमा. तोमाटानेवाला, रक पीनेवाला, जो पुष्टिको हराता है, नुसार पतिकी प्राप्ति रिप में इसको सुयोग्य वाहूं। गर्भको सानेवाछा जो रोगीय है इसकानाय कर। हे इदंदिरण्यं गुलगुल्ययमोक्षोपयो मगः। भिपनि ! दुःखको दूर कर। पते पतिभ्यस्यामदुः प्रतियामाय पेत्तये । पीकत क्षेत्रियनामान्यप क्षेत्रियमुच्छतु। म. २९ वह उत्तम मुर्ग, पद और २४ । । अ.२।१५१ म. रा॥२ म.३८२-५ [ अथववेदक पाहल ये पतिकी कामना के लिये और तेरे लामो लिये तेरे पतिको तास्त्वा पुत्रविधाय देवी प्राचन्त्वोषधयः। म. ३१२३॥ आ नो अग्ने सुमति संभलो गमेदिमा कुमारी वे दिव्य औषधियां पुत्रप्राप्तिके लिये तेरी रक्षा करे । सह नो भगेन । भ. २१३॥ एवा भगस्य जुठेयमस्तु नारी सम्प्रिया पत्या. है भने! धनके साथ उत्तम वक्ता पति इम उत्तम बुद्धि विराधयन्ती । भ. २१३६।४ मती कुमारी के प्रति मा जावे । ऐश्वर्यसे सेवित हुई यह स्त्री पतिको प्रिय और पतिसे यदन्तरं तद्वाहां यद्वाह्य तदन्तरम् । विरोध न करती हुई यहारदे । कन्यानां विश्वरूपाणां मनो गृभायौपधे । पुमांसं पुत्रं जनय तं पुमाननु जायताम् । अ. २२३०१४ भवासि पुत्राणां माता जातानां जनयाश्च यान् ।। जो मदर हो वही बाहर हो, जो बाहर हो षही मन्दर म.३२३१५ हो । विविध रूपवाली फम्यामोंका मन प्रहण कर । पुरुष पुन उरपन कर, उसके पीछे भी पुत्र ही होते रहें। या शहाने शोपयति कामस्येपुः सुसमता। तू पुत्रों की माता हो, जोहो चुके तथा जो होनेवाले सम अ. ३।२५.३ पुष ही हों। कामका याण लगनेपर लोहाको शोषित करता है। तं त्या धातरः सुधा बर्धमानमनु जायन्तां यर्थदं भूम्या अघि तृण बातो मथायति । वहवः सुजातम् । म. २११३३५ एका मन्नामि ते मनो, यथा मां कामिन्यसो, उस तुम हत्तम जन्मे हुए पढते हुएके पीछेसे बहुतसे यथा मनापगाससःn.२.३011 पढनेवाले भाई पस हों। हे पी! जैसा यह वीपरका घार घायु दिलाता है पति-पत्नी धंसा मैं तेरे मनको हिला देवा . मेरी इच्छा करनेपाली हो, गुमसे दूर जानेवाली न हो। परित्या परितत्नुनेचणागामयिद्विपे । यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा मसात शिया मय पुरुषेभ्ये गोम्यो भयेभ्य: शिया । सियाम सर्यस्म क्षेत्राय शिया न दैधि। स. १३ तीन काण्डोका परिचय (३१) प्रेरित करें। 1411 कार्य कर सय कार्य उसके दाहिनी और कर, जो वर ती विद्वान् अविद्वान्- कार्य करने के लिये जिस देशमें सिद्ध कामनाके अनुकूल है। रहते हैं, वह देश विजयी होता है।) देवा गर्ने समैरयन् तं न्यूर्णवन्तु सूतचे। त्वष्टा दुहिने वहां (वि) युनक्ति। ३३५ म.R पिता पुरीको दक्षेत्र देने के लिये मला करके रखता है। देव इस गर्मको प्रेरणा करें, प्रसूतिके लिये उस गर्नको सुसप्रसूति आ ते योनि गर्भ पतु पुमान् याण इपुधिम् । अहमस्मि सहमानाथो त्वमसि सासहित भ. १२३२ उभे सहस्वती भूत्या सपत्नी मे सहावहै ।। जैसा बाण मातमें भाता हे वैसा यह पुरुषका गर्म रे भ ३५ गर्भाशयमें आवे। (माण सनाश करता है पैसा यह गर्भ मैं विजयी हूं और तू विजयी है। दोनों विजयी होकर वीर धने, शत्रु नाश को।) सपनीका पराभव करेंगे। मा योनि गर्भ एतु ते । ३.३५ पत्या सौभगत्वमस्त्वस्मै । भ. २॥३॥ तेरे उससे पुरस गर्म हो। इस कुमारीको इस पतिसे सौभाग्य प्राप्त हो । रक्तस्राव दूर करना इयममे नारी पति विदेष्ट सोमो हि राजा तेभिमें सर्यः संसाधनं संघावयामसि । सुभगां कृणोति । अ. २०३६३३ है भने । यह नारी पति को प्राप्त करे, राजा सोम इसको इन सब घोसे हम मम धनको सम्पतिमा उत्तम भाग्यवतीको। वृक्ष यद् गायः परिपस्वजाना अनुस्फुरं शर. नियमसे चलना मर्चन्त्यभुम् । पर्व ॥२३ वृक्ष परिपस्वजाना गायः भुं शरं अनुस्फुरं पारस्पतिनियच्छतु । मय 112 अर्चन्ति- पक्ष (से उत्पा धनुष्य के साथ रहकर ) शिक्षा नियमसे बनाये ।(विज्ञान नियममे सम्प (धर्मसे बनी टोरिया) सोधे याणको स्फूर्ति साथ जिम हो चलें, भिमसे उनकी सति होगी।) तरह फेंकती है। इस तरह पुरे साथ मिलकर रहनेवाली विपा पूर्तिले पोर पुत्रको दागुपर भेजें।) परोदं पासो अधिधाः पातये । म. २०१५ धनुप्पी को पुश है, औरी दी है, न पुत्र इस बखो मापने पापे धारगयो। वागत र धनुष्य त्रुपा बाण फैलता है उस जहिदो जामाद् विसराद् विघामितो. वरह गृहस्थ अपने पुत्रको यरवान् बनार पर भेने चनात् । मणिः माययायः परिपानु भोर धपामा का। विपता न. २ दियामि चि तनु उभे भारीप ज्पया। पनि माय पोयामे तुम रोमेरे रामग. म हाईशीना, गोरोग, नपा सो गए. (उभे न सपा ) धनुष्पा दोनों माँ नि, मोमिसन रोगमे तने ते ३,हम ६ ( ममि दिन) मयं विधामनेऽ याने मन्त्रिपः। २०ी दोनोमोमा (धनुष्योभनमय दोनों मनोविश्यमेपोलिया Star पोदे, विलोसिप मिला। LER में होगी-10-ओर, धीमा हक बागमnिtent.murt मणि धारण [अथर्ववेद के पहिले . करने वाले मिमियोंको साधा पहुचाता है, यह सच औषधी व्यहं सर्वेण पाप्मना । अ. ३३।१-५, १०-११ शक्तियोंसे युक्त है यह पापसे हमें बचावे । सब पापोंसे में दूर रहता है। शणश्च मा जगिडश्च विष्कधादभि रक्षताम् । वि शक्र. पापकृत्यया । म ३३१२ अरण्यादन्य आभृत कृष्या अन्यो रसेभ्य ॥ समर्थ मनुष्य पापकर्मसे दूर रहता है। म २५ सजातानुग्रेहा वद ब्रह्म चाप चिकीहि नः। क्षण और जागिद ये दोनों शापक रोगसे मेरा रक्षण म119012 करें। एक वनसे लाया है और दूसरा खेतीके रसोंसे हे उन वीर! स्वजातियों से घोषणा करके कह दे कि बनाया है। हमारा ज्ञान ही दोर्पोको दूर कर सकता है। काम आत्मरक्षण कामेन त्वा प्रति गृह्णामि, कातते । १ ३.२९/० तं त्वा विश्वेऽवन्तु देवाः । म २।१३।५ कामसे तुझ लेता है । यह सब हे काम ! तेरा कर्तृत है। सब देव तेरी सुरक्षा करें। पापसे बचना सूरिसि, वर्णोधा असि, तनूपानोऽसि । यदेनश्चयान् , बद्ध एप, त विश्वकर्मन् प्रमुञ्चा म २1111४ सस्तये । १.२३५३ द् ज्ञानी है, तू तेजस्वी है, तू शरीरका रक्षण करने इसने पाप किया, इसलिये यह बद्ध हुआ है। है पाला है । विश्व के रचना करनेवाल प्रभु' उसको कल्याण प्राप्त हो अन्न-जल इस किये उसे मुक्त कर । तौलस्य प्राशान । म ७२ पापमाईत्वपकामस्य कर्ता ।। २।१२१५ तोलकर खामो। ( मिस भोजन करो। अनिष्ट कार्य करनेवाला पापको प्राप्त दोधे । मातेव पुत्र प्रमना उपस्थे मित्र एन मित्रिया क इद कस्सा अदात् काम कामयादात् । म २२९/० स्पायम । २१२८१ मी माता मेमसे पुत्रका गोद में लेती है। उस तरह किसने यह किसको दिया । मित्र मिनधि पापसे इसको बचाव । देता है। ते नो नित्या पाशेभ्यो मुञ्चताहसो-अहस । दानाय चोदय। म २२010 दानके लिये प्रेरणा कर। म १1१२ ये देव यिनामके पागोसे तथा पापसे इसे मुक्त करें। शतहस्त समादर सहरहस्त स फिर। विश्व गुम्न निचिकेपि दुग्धम् । १२ म २४१५ हे प्रवीर! सब पापको स् जानता है। पाप कह। शात इम्तोंसे प्राप्त कर और हमार दायोंसे दान कर। रहता है यह जानता है घृत पीत्वा मधु चार गव्यम् । भशा ध्यानय एपामिताथो चित्तानि मुहात । मीठा मुन्धर गौका घी पीभो। अथो यदधेपा हदि तदेपा परि निजदि । ६ पुष्टिरित रस ३६ सदघसातमा मय । मा२४ पशुन् यमिनि पोपय। म २८४ इम मोके सहयों और मक चित्तोको मोहित पहा पुट और पहा रसायजाम देनेवाली करो। और जाम अयमे विचार है उन सपका नाश होकर रहा थप देनेवाली गौ ! पहा पशुमोको पुर काम ही कामके लिय तीन काण्डाका परिचय प्य देवे। सा न आयुष्मती प्रजा रायस्पोपेण संस्ज। घरुण्यसि शाले वृहाच्छन्दा प्रतिधान्या । भ.३11०1३ म .१२ यह ६६मारी दीर्घायुवाली प्रजाको धनको पुष्सेि युक्त हे घर! द य उववाला और पवित्र धान्याला होकर धारणाक्तिसे युक्त होकार । अविस्तस्मात् प्रमुञ्चति दत्तःशितिपावधा। सुणं वसाना सुमना मतस्त्वं । म. १२५ 4. १२९॥ पासको पहनेवाला घर हमारे लिये उत्तम मनपाला यह ( सोलहवां भाग कर ) दिया हुमा रक्षक घनकर हो। हिंसकोंसे रक्षण करनेवाला था मपनी धारणा करने वाला मानस्य पत्नि शरणा स्पोना देवी देवेभिर्नि: होता है, भोप दुःखसे मुक्त करता है। मितास्यग्ने। म .१५ दुहां मे पञ्च प्रदिशो दुहामुर्ची यथायलम् । संमानका रक्षक, रहने पोप, पुसकर पनि पर भ. ३१२०१९ देवाद्वारा पहिले पनाया गया था। पडी दिशायें यह पृष्त्री यथाशक्ति मुझे साम. ऋतेन स्थूणामधि रोक्ष शोमो विराननप वृश्य शन् । बारा पप वां द्यावापृथिवी उपस्येमा क्षुधन मा रुपन् । समरने सीधमनसे अपने मापार घारह । म.१२५४ उमोर बमका मोको हरा दे। भावापियो! यह सम्हारे समीप रहता हुमा धासे নাই । বাবদ যেখা। अथवा पासे दुःखी न हो। गृहनिर्माण है पर! सोa यात दो मोवा जीवित रहेंगे। मानलुभ्यतो वयं संपिशेमोप गोमतः। एमां कुमारस्ताणमा यत्सा जगता सद। म. 1111 हमारे पर यदुत पाय दो मोर दिसीपाको न्यूनता एमां परिता कुम्म भादमा पलीरगः । इम पाक पाप मारना, साप, पामा तंन्या शाले सर्ययोराः सुयोरा मरिथ्वीरा पहनेवाले गोगामामी बाबा म उपसंचरेम। मामा85 augat है पर !रे चारोंमोर हम 8 समीर, उत्तम पाम करते हुए संचार रहेंगे। मसी यो मघराद गृह मप्र सम्पगरयः। देय भुया निशालेकायती गोमतीम. सम्र सेदिम्पच्यतु मां पातुपाप तायती। अजस्पती पृतमी पपारयुगायस्थ मदते सौभगाया जो परमीच पाnिtatil, परमहीम रा रस, गौमी सर पारे। घोर पुष, मरमसमधान घोसे युर, भसे पुरु माते सिग्नुपमा घामाम् । समान सीमापसे परोहा पान प्रयोग गरी मा रया पासो गर्मदा पार माधनयः साप. पूर्ण नारि पुग्मन मायामा मापमाना:- सन मनाम् । गमगा गमपी. atment सोनार erniमाम सापal.1 है!.rintment in then नरहे।
(३५) [ अथर्ववेदके पहिले इस गोशाला में पशु धाराको अच्छी तरह भरकर ले लामो पीनेवालों को अच्छी इमं गोष्ठं पशवः सं सवन्तु । अ. २२२६॥ तरह भर दे। यज्ञ और मखदान इस घरका रक्षण करते हैं। अध्यावतीर्गोमतीन उपासो वीरवतीः सदमु. गौ च्छन्तु भद्राः। घृतं दुद्दाना विश्वतः प्रपीता स नः प्रजास्वात्मसु गोपु प्राणेपु जागृहि । यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः॥ म. ३।१५० वह तू हमारी प्रजा, मामा, गौवों और प्राणों के विषय में कल्याण करनेवाली उपायें घोड़ों और गांवों के साथ जागा रह। वया वीर पुत्रोंके साथ हमारे घरोंको प्रकाशित करें। पी इहैव गाव एतनेहो शव पुष्यत । देखें, सब बोरसे संतुष्ट होकर माप सदा हमें कल्याणों से इयोत प्रजायध्वं मयि संज्ञानमस्तु वः ॥ सुरक्षित रखें। अ.३.१४ तीवो रसो मधुपृचामरंग आ मा प्राणेन सह हे गौरों ! यह मामओ, साकके समान पुष्ट बनो, यहाँ वर्चसा गमेत् । अ.३11३१५ घरचे उत्पन्न करो और आपका प्रेम मुझपर रहे। यह मधुरतासे भरा तीय जलरूप रस, भाण और तेजक मया गावो गोपतिना संचय अयं वो गोष्ट साथ मुझे प्राप्त हो। इह पोपविष्णुः । रायस्पोषेण वहुला भवंती. ऊर्जमस्मा ऊर्जस्वती धत्तं पयो अस्मै पयस्वती जीवा जीवन्तीरुप वः सदेम ॥ अ. ३/१४६ के गौवों 1 मुझ गोपतीके साथ मिली रहो। तुम्हारा धत्तम् । ऊर्जमस्मै द्यावापृथिवी अघातां विश्वे. देवा मस्त ऊर्जमाफः॥ पोषण करनेवाली यह गोशाला यहाँ है । सोमायुक्त वृति के साथ बदती हुई, जीवित रहनेवाली तुमको हम सय प्राध अन्नवाली ( द्यावाशिवी) इसे भर देवे, दूधवाली करते हैं। इसे दूध देवे, यावापृषियी इसको पल देवे, सब देव, संजग्माना अविभ्युपरिस्मिन्गोष्ठे करीषिणी। मस्त और जल इसे शक्ति प्रदान करे। विधती सोम्यं मध्यनमीवा उपेतन ॥ या हरामि गवां क्षीरं आहार्य धान्यं रसम् । थ ३१४३ थाहता अस्माकं धीरा आ पत्नीरिदमस्तकम् ॥ इस गोशालामे मिलकर रही हुई, निर्भय होकर गोवरका सम खाद उत्पन्न करनेवाली, शान्ति पय करने. मैं गौओंका दूध लाता हूं, धान्य मौर रस लाता हूं। वाले रस-दूध-का धारण करती हुई हमारे पास हमारे हमारे वीर भागये है, ये पस्निया है और यह घर है। समीप गौमा जाय। संसिचामि गवां क्षीरं समाज्येन बलं रसम् । शियो यो गोष्ठोमवतु शारिशाफेव पुष्यत । सं सिक्ता अस्मार्क वीराभुषा गायो मयि गोपतो। योत प्रजायध्यं मया घः संस्जामसि । भ,२/२९१५ म. २२५ 4 म.२१२१ तीन काण्डॉका परिचय] अ.11६४ रहेगा। यदि नो गां इंसि यद्यश्यं यदि पूरुपम् । ईमूगे परिपक धान्यको हमारे निकर ले भावें। तंत्या सीसेन विध्यामो यथा नोऽसो अवीरहा। विराजा श्रुष्टिः सभरा असनः। भ३७२ भन्नको उपज हमारे लिये भरपूर हो जाये। यदि हमारी गौका बध तू करेगा, यदि घोडका या यदि सीरा युजन्ति कवयो युगा वितन्वते पृथम् । पुरुषका वध करेगा, तो तुझे प्लीको गोलीसे वेध करूंगा, धीरा देयेषु सुन्नयो॥ भ,३१७ जिससे हमारे समीप कोई वीरों का नाश करनेवाला नहीं जो ज्ञानियों में उत्तम मनवाले बुद्धिमान् कवि हैं वे हल जोतते हैं । और शुभाको पृथक् करते हैं। कृषि भगो नो राजा नि कृर्षि तनोतु । म.३।१२।४ सीते वन्दामहे त्याची सुभगे भव । राजा भग हमारे लिये कृषिको वडाधे । यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः ।। युनक्त सीरा, वियुगा तनोत, ते योनी घप- अ. ३११७१८ तेह बीजम् ॥ अ ३१९७२ है इलको पा! तुझे हम वन्दन करते हैं, तू संमुख हो, हल जोतो, जुमोको फैला दो, भूमि तैयार करनेपर और भाग्यवाली हो । तू उत्तम इच्छावाली हो और सुफल बीज वहीं यो दो। देनेवाली हो। जल शुनं वाहा, शुनं नरः, सुनं रुपतु लांगलम् ।" अप्सु मे सोमोऽब्रवीत् । अन्तर्विश्वानि भेषजा ॥ शुनं वस्त्रा वध्यन्तां शुनमष्ट्रामुदिङ्गध ॥ अथर्व ॥६२ ज,३१७१६ सोमने मुझे कहा कि जल में सम औषधिया है। बैल सुखी हों, मनुष्य प्रसर रहें, इल सुखसे जमीन अप्सन्तरमृतं अप्सु भेषजम् । अपर्य खोदें, रस्सियो सुखसे बांधी जाय, और चायूक सुखसे शलमें अमृत है, जलमें मौषधि गुण है। घलाया जाय। आपः पृणीत भेप वरूथं तन्ये मम । म. १५ घृतेन सीता मधुना समका विश्वदेवैरनुमता है जलो । मुझे मौरव से और मेरे शरीरको संरक्षण दो। मद्भिासा ना सीते पयसाम्याववृत्स्वोर्ज ईशाना यार्याणाम् । क्षयन्तीश्चर्षणीनाम् । स्वती घृतधरिपन्यमाना !! er.३१७१९ अपो यावामि भेषजम् ॥ मयं ११५४४ घी और मधसे सिंचित हलकी रेपा सय देवों और वायु- वरणीय मुखौका स्वामी जळ है। मानियोल निवास मोसे मनुमोदित हुई । हे हलकी रेपा! तू धीरो सिंचित जल है । इस अउसे मैं बोपधही याचना करता है। होकर हमें यह देनेवाली होकर दूधसे युक्त कर । आप इदा उ भेपजीरापा अमीषचातनीः । शुनं सुफाला वि तुदन्तु भूमि शुनं फीनाशा, आपो विश्वस्य मेरजीस्तास्त्या मुञ्चन्तु क्षेत्रियात् । अनुयन्तु वाहान् । गुनासीरा हविषा तोश. म.आप माना सुपिप्पला ओषधीः कर्तमस्मै न. १५ जल भौषधी है, जल रोग दूर करनेवाला है, सर सुन्दर हलके पाल भूमिको रसम रीतिसे सोदकिमान रोगकी मापी है, इस जलसे मानसिक रोगसेतो मुखसे पैसोंको चकावें । यायु और सूर्य ! तुम इविसे मुम करता है। सन्तुष्ट होकर इसके लिये उत्तम फरयुक्त धान्य देखें। अपां तेजोज्योतिरोजो यलंच पनपतीनामुन न्द्रः सीतां नि गृहातु तां पूपाभि रक्षतु । पीयांनि । अम्मिन्नधि धारयामा १५ सानः पयस्वती दुदामुचरामुत्तरां समाम् । जहा सेश, पास, मोज, बल मौर वनस्पक्षिपोपी म. 10 (इम गुर्ग १) सना हम पार करते है। रुद्र इष्टको पाकी रक्षा को, पूषा उसकी चारों मोरसे (थापा) महे रणाय चक्षसे (धानन)। रा।यह रसयुमस होकर भागोवा में हमें मधिक मधिक रस प्रदान करें। मस परीणीपार चनो बिमें भाग नेदीय स् एण्यः पफमायन् । (६मारे सदा रमणीयता से) म.11012 [ अथर्ववेद के पहिले अ.१६४ अ. १६४ अ.११६४ । तान आपः शं स्याना भवन्तु । म. १६३३११-४ भापो हि या मयो भुवः ता न ऊर्ज दधातन । घे जल हमारे लिये सुखशान्ति देनेवाले हों। अपवं. १५ इमा आपः ममराम्ययक्ष्मा यक्ष्मनाशिनीः । जल सचमुच सुखदायी है, वह जल हमें शक्ति हैं। गृहानुपमसौदामि ममृतेन सदाग्निना ।। शं नो देवीरभिएये । पर्व, n, अ. ३११२१९ दिग्य जल इमें शान्तिसुख देवे । रोगनाशक और रोगरहित जल में भर लाता है । तस्मा अरंगमाययो यस्य क्षयाय जिन्वय।। अमृत, अन्न और भमिके साथ मैं घरों में जाकर बैठता हूं। मपर्व. ११५३ शं नःखनित्रिमा आप! 19 १६ जिसके निवास के लिये माप यरन करते हैं, आपसे खोदकर निकाला जल हमें सुख देवे । पर्याप्त मात्रा (वह पल ) प्राप्त हो। शिवा नः सन्तु वार्षिकोः । अ. १६६४ अपामुत प्रशस्तिभिरश्वा भवथ वाजिनः । वृष्टि से प्राप्त जल हमें कल्याण करनेवाला हो। गावो भवथ वाजिनी अवं. १४४ समु सन्तु अनूप्याः। जलके प्रशंसनीय गुणों से घोडे लवान होते हैं और जलपूर्ण प्रदेशका जल हमें शान्ति देवे। गौवं बलशालिनी होती हैं। शमु या कुम्भ आभृताः सुभापितोंका उपयोग जो जल घड़े में रखा है वह हमें शान्ति देवे । शंन आपो धन्यन्याः। अथर्ववेद के पहिले तीन काण्डोंके सुमाणित यहाँ दिये रेतीले प्रदेशका जल हमें कल्याण करनेवाला हो। है । ये इतने ही हैं ऐसा नहीं। संख्या में ये सुभाषित घृतश्चुतः शुचयो याः पावकारता न आपः अधिक मी हो सकते हैं । ये किस तरह अधिक हो सकते हैं अ.१३३४ यह इस लेख में पताया ही है। पबहारमें उपयोगी सार्थ सेजस्वी, पवित्र, शुद्धता करनेवाला जल हमारे लिये मन माग सुभापित कहा जाता है। मुखदायी हो। सूरिरसि, पर्योधा असि, तनूपानोऽसि । शंयोरभिखवन्तु नः । हमें शान्ति और इस प्राप्ति देनेवाला होवे । शानी हे, तेजस्वी है, तू शरीर रक्षक है। यह शिवया तन्योप स्पृशत त्यचं मे। एकमंत्र है, पर इसमें तीन सुभाषित हैं। मापना कल्याण करनेवाले शरीरसे मेरी स्वधाको स्पर्श करो। सीसेकी गोली (हे यापः!) यो का शिवतमो रसः तस्य 'तं त्या सीसेन विध्यामा ! उस तुझको सीसेसे माजयते इनः। प्रथर्व, पार इम वेध करेंगे । सोसेसे वेध करनेका अर्थ सीसेकी गोलोसे है जलो ! जो भाप कल्याण करनेवाला रत है, उसका वेध करेंगे । गौका घध करनेवाले को या पुरुषका वध करने हमें भागी करो। (हमें यह कल्याण करनेवाला तुम्हारा पालेको सोसेको गोलोसे वैध करनेका दण्द कहा है। भाग मिले। सौसा था, सीसको गोटी यी और गोलीसे वैध करनेका आपो जनयथा च नः । भय ५३ साधन बंदूक जैसा कुछ था ऐसा यहां पता लगता है। जलो। हमें बामो। जलचिकित्सासे सब रोग दूर होते हैं ऐसा पाठक जलके आपो भवन्तु पीतये । मपर्व 1 मुभाषितम देखेंगे । सुमापितों का उपयोग करनेकी नीति जल हमारे पीने के लिये, रक्षण के लिये हो। यहां बताई है। वेदके उपदेशको मानवी माघार और शियन मा चक्षुषा पश्यतापः । म. mm व्यवहार में लाने की गति यह है। पाठक इसका अपयोग है भलो ! ल्याणकारी नेवसे भाप मुझे देखो। कर वैदिक जीवन से व्यवहार करके अपना काम प्राप्त करें। शं श्योना भवन्तु। अथर्व १६ म .११12 म. ११३३४
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अथर्ववेद
का
सुकाध माय ।
प्रथमं काण्डम् ।
लेखक
पं. श्रीपाद दामोदर सावरकर,
साहित्य-चाचस्पति, वेदाचार्य, गीतालदार,
मध्यक्ष स्वाध्याय मंडल, मानदाश्रम पारडी [ सूरत ]
तृतीय वार
गार..., 11, गन १९५.
-
797001949PS
HASKARARIA
Case
ब्रह्म और ज्येष्ठ ब्रह्म।
ABCASikheknamanchakGARGE.
RAISAACKGRO
ये पुरुपे ब्रा विदुस्ते विदुः परमेष्ठिनम् ।
यो वेद परमेष्ठिनं यश्च वेद प्रजापतिम् ।
ज्येष्ठं ये ब्राझणं विदुस्ते स्कुम्भमनुसंविदुः ॥
(अपर्व० 101010)
" (ये) जो (पुरुष मह) पुरपमें ब्रह्म (विदुः) जानते हैं, ये (परमेटिनं) परमेष्ठीको
जानते हैं, जो परमेष्टीको जानता है, और जो प्रजापतिको जानता है, तथा जो (ज्ये प्रामणे)
श्रेष्ठ प्रहाको जानते हैं, ये स्कम्भको (मनुमविदुः) उत्तम प्रकार जानते हैं।"
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ॐ अथर्ववेद के विषयमें - स्मरणीय कथन । (१) अथर्ववेदका महत्व । सिद्धिक कर्म, (राजकर्म) राज्यशासन, समाजव्यवस्था आदि अथर्ववेदका नाम "ब्रह्मवेद, अमृतवेद, सामवेदन आदि कर्मके यादेश होने के कारण यह वेद प्रजारितको से विर है. इससे यह आरमज्ञानका वेद है, यह पसलय महत्व रखता है । इस विषयमें देखिय- कहा है, कि- यस्य राज्ञो जनपदे मया शान्तिपारगः। श्रेष्ठो ह वेदस्तपसोऽधि जातो अाज्ञानां हृदये संयभूष ॥ निवसत्यपि तदाः पर्धवे निरपदयम् ।। (अपपरिशिष्ट. ४) (गोपय मा. ।।९) एतद्वै भूपि महा यद् मृग्वगिरसः। येऽशिरसः स रसः। स्थापन के कर्मपर निरत रहता है, यह राष्ट्र उपदपरहित होकर " সিভ সে যতম অধ্যই নিৰবাৰা যি ধৰি पेऽयाणस्वनेपनम् । यसेपर्ज तदमृतम्। यदसतं तदा (गोपय मा. ३।४) बहता जाता है। चत्वारोया इमे वेदा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदो ब्रह्मवेदः॥ (२) अपर्व-शासा। (गोपथ प्रा. २ । १) १ पैप्पलाद, २ सौद, मौद, ४ छोराय, ५ भावल, " (6) यह श्रेष्ठ वेद है, प्रदशानियों के हृदयमें यह यासाभेद है। इनमें इस समय पिप्पलाद और शेनर ये दो ६ जलद, ७ यावाद, ८ देवदर्श, . पारणवश ये अपनी प्रविध रहता है । (२) भृग्यंगिरस या प्रद्म शान है, जो सताय पन्ध है, अन्य पसल नहीं हैं। इनमें घोटा अंगिरस है वही रस अपात् सस्त है, जो अपार वह मेरा मंत्रपाठभेद और सूक्तं मभेद भी है, अन्य व्यवस्था प्राय (दग) है, जो भेपर है यह अमृत है, ओभरत है वही समान। मम । (6) ऋक्, रज, गम और मन येही यार ये हैं।" मपर्ववेदको इस पचनमें भेपर' अर्थात् रोगदोष दूर (३) अधर्वके कर्म। करनेवाली औषधि, 'भगत 'मयात् गस्युरो दूर करने 1 स्यालीपाक अमागडा • अपन, ''नहाये तीन प्रम पर्व २ मेधावननम् -दिदिनेक उपाय। दश महरप सट तिरम्पार कर है।और दैनिये-- { সব पोराण, प्रा अदा पपर्वमन्त्रसम्मापया सर्वसिविरिष्यति। भाम-नगर-राष्ट्र-पर्धनम् प्राम, र रायमाप्रति और ना ना (भीष्टि ॥५) ५ पुरनाम्यशालीगीतागापामोलिदिल. "अरमि रोगमा मिदन" रि-१, प. पन, न्य. ग. पी. mn . या पत्राय मारइस रद (ति) पोप, TAMIR TAM पति पारेकमime) नादिदि - उपाय।
.) अथर्ववेदका सुवोध भाप्य [काण्ड - ६ साम्मनस्यम्-जननामें ऐक्य, मिलाप, प्रेम, एकता इत्यादि अनेक विषय इस वेदमें आनेके कारण इसका अभ्य- आदिकी स्थापना के उपाय । यन विशेष सूक्ष्म दृष्टि से करना आवश्यक है। ये सब उपाय और ७ राजकम-राजाके लिये करनेयोग्य कर्म । कर्म मनुष्यमानके अभ्युदय नि.श्रेयसके साधक होने के कारण ८ शगुनायनम्-शत्रुको क्ट पहुचाने का उपाय । मानव आतिके लिये लाभदायक है, इसमें कोई सदेह नहीं हो ९ सम्रामविजय. युद्ध में विजय सपादन करना । सकता। परन्तु यहा विचार इतनाही है कि, ये सब विषय अथर्व- १. शस्त्रनिरारणम्-शनुओंके शस्त्रों का निवारण करना। वेदके सूतोंसे हम फिम रीतिसे आनर अनुभवमें ा सकते हैं। ११ परसेनामोहनीद्वैजनस्तभनोचाटनादीनि नि सदह यह महान् और गंभीर तथा कसे ज्ञान होनेयारेय शानुसगामें मोह भ्रम उत्पन्न करना, उनमें उद्वेग- विषय है । इसलिये यदि सुविज्ञ पाठक इसमें अपना सहयोग भय उत्पन्न करना, उनकी हलचलको रोकना, उनको दो तोही इस गंभीर विषयका कुछ पता लग सकता है, और उखाड देना आदिका साधन । गुप्त विषय अधिक खुल सकता है। क्योंकि किसी एक मनुष्यक १२ स्वमेनो माइपरिरक्षणाभयार्थानि- अपनी सेनाग प्रयत्नमे इस कठिन विषयकी उल्झान होना प्राय. अशक्य उत्साह बडाना, और उसको निभय करना। ही है। १३ समाम जयपराजयपरीक्षा- युद्ध में जय होगा या परा. (४) मनका संबंध। जय होगा इसका विचार अथर्ववेदद्वारा जो कर्म किये जाते हैं ये मन की एकाग्रतासे १४ सनापन्यादिप्रधानपुरराजयकर्माणि-मेनापति मंत्री उत्पन्न हुए सामर्थ्यसे ही किये जाते हैं, क्योंकि आमा, मन, मादि मुख्य मोहदेदारों के विजयका उद्योग। १५ परसनामचरगम् -शकी सेनामें संचार करके गुप्त विशेष संबंध है, इस विषयमें देखिये- बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि अत शकियोंसे ही अपवेदका रोनिमे सर ज्ञान प्राप्त करना और वहाके अपने ऊपर थानेवाले अनिष्टाको दूर करना। मनसैव ब्रह्मा यज्ञस्यान्यतरं पक्षं संस्करोति (गोपय ग्रा० ३१२) १६सयामादिनस्य राइ पुन म्पराष्ट्रप्रयेशनम् - शा. दाग उपहे गये अपने राजाको पुन स्वराष्ट्रमें तद्वाचा प्रय्या विद्ययकं पक्षं संस्करते । मनसैव ग्रहा संस्करोति ॥ (ऐतरेय ग्रा० ५।३३) स्थापन करने के उद्योग। १. पापक्षयमं-नके माधनों को दूर करना । अर्थात् "ऋग्वेद यजुर्वेद और सामवेद द्वारा पाणीपर १८ गोपमृतिपिपुष्टितराणि-गो येल आदिकोंग संवर्धन संस्कार होकर एक भाग सुसंस्कृत होता है और अथर्ववेद और ऋगि पोषग करना। द्वारा मनपर सस्कार होकर दूसरा भाग मुसंस्कृत होता है।" गृहमरणरागि-पाकी शोभा बढाने के फर्म। मनुष्यमै वाणी और मन ये ही मुख्य दो पक्ष हैं। उन दोनोसे ..भरल्यानि-रोगनिवारक औषधियो। ही मानवी उमतिके साधक अभ्युदय निधेयस विषयक धर्म गमापानादि फम-(गय संस्कार) होते हैं। माापरापनम् -मभामें जय, विवादमें जय श्रीर शरीर के रोग दूर करना हो अथवा राष्ट्रका विजय संपादन कर शांत करने के उपाय। करना हो, तो ये राम में मानसिक गामध्यसे ही हो सकते हैं। २१ पृष्टिमापनम्-योग्य समपार T2 हगनेग उपय! ही ये अथर्व वेदने मन.पिही अभिदि द्वारा उस धर्म २४ पानाम-पराई करना । और विविध पुरणार्थ मिस करने, टपाय पत्ताये है। २५ याांगायराम --प्रय सिमादिम साम। ()तिकर्मक विभाग। .६ रिमांचनम् -17 तारना । समान तपा में ति स्थापन करना अपविदा मभिमानिगा-गम भानावर करना। मुष्प विषय है। मनाय, आता भादि गाय दूर नाएर उपाय। पर मित्रता, एरियार, गुमनाग भासियदि करना पापदम् -मुगदर भमा। भदरा गायतमी पगिदिनिय भारत 1.पापा-Nep गि प्रारतिय , 11 सिसा पोशमा नया करना उतिरे- - .. - - स्मरणीय कथन । (५) - १ भूचाल, विद्युत्पात आदिके भय निवारण करनेके लिये २५ दुर्गतिसे बचाने के लिये नैति शान्ति । महाशान्ति। २६ वलवृद्धि करनेवाली मारुद्गणी शान्ति । २ आयुष्य प्राप्ति और वृदिके लिये वैश्वदेवी शाति। २७ घोडॉकी अभिवृद्धि करने के लिये गान्धर्वी शान्ति। ३ भग्न्यादि भयकी निवृनिके लिये भानयी शाति। २८ हाथियोंकी अभिवृद्धि करनेके लिये पारावती शान्ति । ५ रोगाद निवृत्ति के लिये भार्गवी शान्ति । २९ भूमिके सरंधी कष्ट दूर करनेके लिये पार्थिवी शान्ति। ५ ब्रह्मवर्चस-ज्ञानका तेज प्राप्त करनेके मार्गमें आने ३० सब प्रकारता भय दूर करनेवाली अभया शान्ति वाले विघ्न दूर करनेके लिये ब्राह्मी शान्ति । ६ राज्यलक्ष्मी और ब्रह्मवर्चस प्राप्त करने के लिये अर्थात् होता है। इनक नामोंका भी यदि विधार पाठक करेंगे, तो ये और इस प्रकारको अनेक शन्तिया अथर्ववेदसे सिद्ध क्षान और ब्राह्म तेज की वृद्धि करनेके लिये उनको पता लग जायगा कि मनुष्य जीवन सुसमय करने के चाईस्पत्य शान्ति । लिये ही इनका उपयोग नि संदेह है। वेदमंत्रोश मनन करके • प्रजा क्षय न हो और प्रजा पशु अन्न आदिकी प्राप्ति हो प्राचान ऋषि मुनि अपनी उन्नति की विद्याएं किस रीतिसे इसलिये प्राजापत्या शान्ति । सिद्ध करते थे, इसकी कल्पना इन शान्तियों का विचार करनेसे पशुद्धि करनेके लिये सावित्री शान्ति । हो सकती है। कई शान्तियोंकि नाम पता लग सकता है कि ९ज्ञानसम्पन्नताके लिये गायत्री शान्ति । विस अयिकी सोजसे किस शातिकर्मकी उत्पति हुई। यदि १० धनादि ऐश्वर्य प्राप्ति करने, शसे होनेवाला भय वैदिक धर्म पित और जापत रूपमें घिर अपने विनमें दूर करने और अपने शत्रुको उखाड देनेके लिये ढारना है तो पाठकोंको भी इसी दृष्टि से विचार करना अत्याव- मागिरसी शान्ति । श्यक है। ११ परचन दूर हो और अपने राष्ट्रका विजय हो तथा अपना यल, अपनी पुष्टि और अपना ऐश्वर्य वढे वैदिक धर्म है, वह उस यातकी सिस्ता करनेके रिय हो विविध इटिया, याग, ऋतु, मेघ वादिकी जो योगना इसलिये ऐन्द्रि शान्ति। है। इन सपा विचार कैसा है और इनकी गिदि कि १२ राज्यविस्तार करने के लिये माहेन्दी शान्ति । रीतिसे का जा सकती है इसायपामति विचार आगे डिया २३ अपने धनका नाश न हो और अपना ऐश्वर्य यदे इस. जायगा । परन्तु यहाँ निवेदन है कि पाठक भी अपनी पुलि- लिये करनेयोग्य कौबेरी शान्ति । याँको इस सर्टिसे काममें सर्वे और जो पोर होगी पर १४ विद्या तेज धन और भायु पदानेवाली भादिया शान्ति। प्राशित करें। क्योकि अनेक पुलियों के एघार होते ही १५ भनकी विपुरता करनेवाली वैष्णवी शान्ति । १६ धैभव प्राप्त करानेवाली तथा यन्तु सस्कारपूर्वक यह विया पुनः प्रकट हो सकती है अन्यथा इसके प्रस्ट होने कोई समव नी है। महादिकी शान्ति करनेवाली यास्तो पत्या शन्ति । 10 रोग मौर आपत्ति धादिक कष्टोंसे बचानेगली रौदी (६) मन्त्रोंके अनेक उद्देश्य । शान्ति । १८ विजय प्राप्त करानेवारी अपराजिता शान्ति। ९ गायुका भय दूर फरनेराडी याम्या शान्ति । २० जलमय दूर करनेवाली यारगी शान्ति । २१ यायुभप दूर करनेवाली यायग्या शान्ति । २२ अक्षय फरनंगली भौर पुरवृद्धि करनपानी सन्तनिशान्ति। २१ पत्राहि भाग पानेगी सपा कारीगीमी पृषि करनेपानगी ना २४ पारडॉग एउगेमपणे लाने निपामारी जाग्नि .
9 कहा जाता . . अथर्ववेदका सुबोध भाष्य [को०१, (७) सूक्तोंके गण । (८) अथर्ववेदका महत्व । अथर्ववेदके सूक्तों और मंत्रोंके कई गण हैं, जिनके नाम ऋग्वेदसे ज्ञान, यजुर्वेदसे उत्तम कर्म और सामवेदखे उत्तम "समय गण, अपराजित गण, सामामिक गण इस प्रकार पुरुषकी उपासना, इन तीन काण्डोंश अभ्यास होने के पश्चात भनेक है। प्रथम कांडमें अपराजित गणके सूक्त निम्न- आत्माका ज्ञान और बल प्राप्त करनेके मार्ग बतानेका कार्य लिखित है- अथर्ववेद करता है । इस कारण इसको " ब्रह्मवेद ॥ अथवा विभा शरस्य पितरं . (१२) "भात्मवेद" भी कहते हैं। २ मा नो विदन् वि व्याधिनः (१।१९) उत्तम ज्ञान, प्रशस्त कर्म और उत्तम पुरुषकी उपासना द्वारा ३ पदारसद्भवतु देव . (१।२०) अंतःशुद्धि होनेके पचात् ब्रह्मका ज्ञान संभवनीय है, इसलिये . स्वस्तिदा विशां पतिः । (१।२१) यह पूर्वोक वेदत्रयी मिन्न यद्द " चतुर्थ वेद " इसके पश्चात् पष्ठकाण्डमें अपराजित गणके सूक्त निम्नलिखित है- है। ५ अव मन्युः (६ । ६५) उपासक लोग आत्माको जगत्में ढूंढते ढूंढते पक गये, उस निहस्तः शत्रुः (६।६६) समय उनको साक्षात्कार हुआ कि " आमाको अगत्में att ७ परिवरमानि (६।६७) ढूंढते हो ? यहा आओ और अपने पासही उसे ढूंढो।" ८ अभिभूर्यज्ञः। (६ । ९७) अथाानमेतास्वेवास्वविच्छेति, तद्यदमवीदयावान- ९इन्द्रो जयाति . (६ । ९८) मेतास्वेवाप्स्वन्विच्छति, तदाऽभवत् ॥ १९ भाभि स्वेन्द्र (६ । ९९) (गोपथ-ग्रामण :-) कौनसा सूत किस गणमें है, यह समझनेसे उसका अर्थ अब पासही उसे ढूंढो!" यह पासही है। यह बात इस करना, उसके अर्थका मनन करना और उससे बोध लेना, अथर्व [ अथ+अर्वाक्-अथर्वा ( क ) वेदने कही, इसी लिये परा पुगम हो सकता है। तथा गणों के मंत्रोंके अंदर परस्पर इसका नाम "अथर्ववेद" हुआ है। यह गोपय माणका संबंध देसना मी सुगम हो जाता है। इसलिये इस गणोंका कथन अथर्ववेदका ज्ञानक्षेत्र कहांतक है इसका वर्णन स्पष्ट विचार वेद पढने के समय अवश्य ध्यानमें धरना चाहिये। शन्दोंमें कर रहा है। आत्माका पता अपने पासही लगना है, इम मागे बतायेंगे कि कौनसा सूक किस गणमें आता हे और यह पताना अथर्ववेदके श नक्षेत्रमें है। इसी लिये इसका नाम उसका परस्पर संबंध किस परति देखना होता है। " ब्रह्मवेद " है क्योंकि यही प्रामका शान पताता है। शेक शांतियामि मिन जिन शान्तियाँध संबंध राग्यव्यय. "पर्व" शब्द चंचलतामा पाचक है। भार "-. स्पासे है, उन शान्तिकमाके माय अपरारित गणके मंत्रोंका पान्द भातिका अथवा एकाग्रताका द्योतक है। भारमानभव संपरे, इस एक पातसे पाठक बहुत कुछ बोध प्राप्त कर अथवा मासाक्षात्कार जो होना है, वह चित्तकी चंचलता हटने के हो । एक एक गणके विषयमें हम स्वतंत्र नियंध लिखकर पधान और चित्तत्तियोका निरोध होकर उसमें शांति पाने के उसरा अधिक विचार आगे करेंगे । उसका अनुसंधान पाठक पधान् ही होना है। यह मात्मशान के मार्गकी सूचना इस प्रकार र सीलिये यागात यापी है। अपने मामसे ही इस अर्यवेदने बता दी है। वेदके मामौका कर इन पर गोच विचार हो जायगा करावेद ही महत्व पाठक यहाँ देख सकते हैं। पिनासरती २, अन्यथा नहीं। यहां यह भी स्ट "अथर्वन् " (अप+अर्यन ) इस धन्दका "म पना भापकिसूफ दि गगरे साप सम्बन्ध इस भार" ऐण होता है। वात्में दो पदार्प है, एक में और मोसे भार स्वतंत्र अपना उनका सम्बन्ध दूसरा मैले मित्र संपूर्ण जगत् एक मनुष्य माता पर समान रिमा मन्य मूग मारे। कि मेरो मिन पदार्पो हो मुन्नमें शक्ति भात वर्ष "सतंत्र-गात" और "गण-"नपरिपार र भक्त हूं मार फि गरो प्रार होता है। इस सर्वसाधारण गय सत्र पतरे मंत्रों मनन स्वतंत्रनिगरमा शिरणे मिल पातु भायंत पन्य रिपार भो भर जनता पनि बारमा मनन गंगोड गो. धन्मुख रचना पाता है," मी पहिरो "रिगामापारि । निये मपनी भोर" लोक में या नियम रेयो । - स्मरणीय कथन । कि वृद्धि मंदरसे होती है, नृक्ष अंदरसे बढते हैं, बालक अंदर- यह वेद संपूर्ण रीतिसे समझना कठिन है, इसलिये इस वेदक से बढते हैं, अर्थात् शक्तिकी वृद्धि अंदरसे हो रही है, इस- जितने मंत्र समझमें आवेंगे, उनी साध्याय करना है। जिन- लिये अपने अंदर अपनी ओर देखकर विचार करो । बाह्य का ठीक प्रकार ज्ञान नहीं हुआ उनके विषयमें हम कुछ भी जगत्में न देखते हुए, परंतु उसके साथ अपनी शकियाँको नहीं लिखेंगे। तथा जो मंत्र स्वाध्यायके लिये यहां लेंगे उनके जोडकर अपना उन्नति हेतु अपने संदर देखो, शक्ति अपने विश्यमें थोडेसे थोडे शब्दामही जो कुछ लिखना दोषह लियेगे अंदर है न कि बाहर है। यह अथर्ववेदर्श शिक्षा अत्यंत अर्थात् बहुत विस्तार नहीं करेंगे । परंतु अहातक हो सके यहा- महत्व है। तक कोई घात संदिग्ध नहीं छोड़ेंगे। इससे स्वाप्पाय करने इस भथर्ववेदका स्वाध्याय करना है। ब्रह्मवेद होने के कारण वालोको यही सुविधा होगी।
अथर्ववेदका सुबोध भाष्य [का १ अथर्ववेद। प्रथम-काण्ड। इस प्रथम काडमें छ अनुवाऊ, पैंतीस सूक्त और १५३ मत्र हैं। १ प्रयम अनुवाफमें छ: सूक्त हैं, तीसरे सूक्तमें ९ मंत्र है, शेष पाच सूक्तोंमें प्रत्येकमें चार चार हैं । इस प्रकर इस अनुवाकमें २९ मन है। १ द्वितीय अनुवाक्में ( ७ से ११ तक) पाच सूक्त हैं । सप्तम सूक्तमें ७ और ग्यारहवें में ६, शेष तीनमें प्रत्येकमें चार चार मन हैं । इस प्रकार कुल २५ मन है। ३ तृतीय चतुर्थ और पचम अनुवाकों ( १२ से २८ तक सूचों) के प्रत्येक सूकमें चार मंगवाले क्रमश पाच, पाच और सात सूक्त है। इन तीनोंकी मनसख्या ६८ है। ४ पष्ठ अनुवाकमें सात (२९ से ३५ तक ) सूक्त हैं । २९ वें सूस्तमें छ मंत्र और ३४ वें में पाच मन है, शेषमें चार चार हैं। इस प्रकार कुछ मनसत्या ३१ है। इस ३५ सूतोंमें चार मनवाले सूक ३७ है, पाँच मरवाला एक, छ: मंगवाले दो, सात मनवाला एक, और नौ मत्रवाला एक है। यह सूक्त और मनविभाग देखनेसे पता लगता है कि यह अथर्ववेदका प्रथम काण्ड प्रधानतया चार मञवाले सूकोंका हा है। इसका प्रथम सूक्त यह है इसमें बुद्धि पढानेका विषय कहा है जिसका नाम " मेधा-जनन" है- सं० १,०१] (९) 8 मेधाजनन। (१) बुद्धिका संवर्धन करना। (ऋपि-अथर्वा । देवता-वाचस्पतिः।) ये त्रिपुप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि विभ्रतः । वाचस्पतिला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे ॥१॥ मन्वयः-विधा रूपाणि विभ्रत, ये नि-सप्ताः परियन्ति, तेषां तन्वः यला पाचस्पतिः अब मे दधातु ॥१॥ अर्थ- सब रूपोंको धारण करके,जो तीन-गुणा-सात पदार्थ सर्वन व्यापते हैं, उनके शरीर के बल पाणीका स्वामी भाग मुझे देव ॥१॥ पदार्य दो प्रकार के हैं एक रूपकाले और दूसरे माहिती भरने नेम का पल, इसी प्रकार भन्यान्य बल बढ़ा कर अपनी भारमा परमारमा रूपरहित हैं और सपूर्ण जगत् रूपवाले दक्ति पराकाष्टातक यहानी चाहिये । यह अथर्ववेदा मुख्य पदार्थोंसे भरा है। पदायोंके विविध रूप जो मनुष्य पशु पक्षी विषय है। पर पनस्पति पाषाण आदि में दिखाई देते हैं-कौन धारण जगवा तत्वशन आनकर, जगत् का अपने साप संबंध करता है, ये रूप कैसे पनते हैं । इस शंकाके उत्तरम घेद कह अनुभव करके, अपना बल बगने विद्या का अध्ययन करके, रहा है, कि जगत के मूलम ओ सात पदार्थ-पृथ्वी, आप, तेज, उस अनुष्ठान हरना चाहिये । यह सप्ततिा मूल मंत्र इस प्रथम मायु, आकाश, तन्मात्र और महंभार हैं ये ही संपूर्ण जगत में मंघम यताया है। यहां प्रश्न होता है, कि यह विधा कौन देगाना दिखाई देनेवाले विविध रूप धारण करते हैं। ये सात है? उत्तरमें मंत्रने बताया है कि " वाचस्पति"दोरक ज्ञान पदार्थ तीन अवस्थामें गुजरते हुए जगत् के रूप और साकार देने समर्थ है। धारण करते हैं। (1) सत्त्व अर्यात् समावस्या, (२)म " वाचस्पति" कौन है ! यार, याच , वागी, पाय, अर्थात् प्रतिरूप अवस्पा और { ३) तम अर्थात् गतिहीन उपदेश, व्याख्यान से समानार्थक बार से अवस्या, नतीन भास्थानामें पूर्वोक सात पदार्थ गुजरनेसे वाला वर्गार तम उपदेशक गुरु ही या यावरणतिसे अमि. हुल इकीय पदार्थ बनते जो संपूर्ण शिका रूप धारण प्रेत है । इछ अर्पको लेने इस मंत्र निमार मा. करते है। "मूल सात तार मान भयस्थामागे गुजर र गप पटिके हरएक आगरधारी पार्यमें यही शनि है। हमारा जगत्के संपूर्ण पदार्पोरे रूप बनाते हुए मां पर है। पर भी पुष्टि के अंतर्गत होने एक मन पदार्थ है और इनके दलाको भरने मंदर धारण करने या पायाला इसमें भी पूर्वोचतीन गुण गात " पदार्प और गुरु मागही मुझे पारे।" कारण घरी अंदरकइन मत संप वागा रोक इस हत्या गाय है। पारीररा सरप्य या ऐगीपन र संभालने और न होनेा भवपित है। परान्त सोधेबाग जगतोलाय योग्य संपरपरे द्वारा अपना आरोग्य रियामानान अंदरी नाय मंसाराह मित्रहो पुणे मना me an TV - अथर्ववेदका सुबोध भाष्य [कां०१, सन्धयः- " पुनुरेहि वाचस्पते देवेन मनसा सह । वसोप्प नि रमय मय्येवास्तु मयि श्रुतम् ॥२॥ डुहैयामि वि तनूभे आनी इब ज्यया । वाचस्पतिर्नि यच्छतु मय्येवास्तु मर्यि श्रुतम् ।।३॥ है याचस्पते 'देवेन मनसा सह पुनः एहि । हे वसोप्पते ! निरमय । श्रुतं मयि मयि एव अस्तु ॥२॥ ज्यया उभे आनी इव, इह एव उभौ अभि वि तनु । वाचस्पतिः नि यच्छतु । श्रुतं मयि मयि एव अस्तु ॥ ३ ॥ अर्थ- हे वाणीके स्वामी ! दिव्य मनके साथ सन्मुख आओ। हे वसुओंके स्वामी 1 मुझे आनंदित करो। पढ़ा हुआ शान मुझमें स्थिर रहे ॥२॥ डोरीसे धनुप्यकी दोना कोटीयोंकी तरह, यहांही (दोनोंको)तनाओ। वाणीका पति नियमसे चले। पढा हुआ शान मेरम स्थिर रहे। इस मंत्रमें प्रारंभ में ही" पुनः" शब्द है। इसका अर्थ "वारंवार, हे उत्तम उपदेश करनेवाले गुरु ! देव भावसे युक्त पुनः पुन अथवा संमुख" है । शिष्य विद्याकी एक और और गुरु मनसे ही शिज्यके सन्मुख जा। हे भान्यादि वसुओं के गरी ओर होता है,इसलिय गुरु शिष्यके सन्मुस और शिष्य प्रयोग कर्ता गुरु! तू शिष्यको रमाता हुमा उसे विधा गुरुके सन्मुरा होते हैं । इन दोनोंको इसी प्रकार रहना पढाओ । शिष्य भी कहे कि पदा हुमा ज्ञान अपने अंदर चाहिये । यदि ये परस्पर सन्मुस न रहे तो पढाई असंभव है। स्थिर रहे ॥" गुरु ( देवेन मनसा ) देवी मावनासे युक्त मनसेही शिष्यके अथर्ववेद पिप्पलाद-संहितामें मंत्रका प्रारम "उप नेह" गाय याच करे । मन दो प्रकारके है-एक देव मन, और शब्दसे होता है भार" वसोप्पते "के स्थानपर "असोप्पते" पाठ पुगग राक्षम मन । राक्षस मन अगत् में झगडे उत्पन्न करता है। अमुपति (असोः पति ) का अर्थ प्राणोंका पति गुरु । १ और देव मन जगत्में शांति रसता है। गुरु देवमनसे ही शिष्यको पटारे। 'प्राणोश पति" अर्थात् योगादि साधनद्वारा प्राणीको स्वाधीन गुरु विन्यो ( नि रमय) रममाण करे, अर्थात् ऐसा लक्षण बता रहा है । रखनेवाला उत्तम योगी गुरु हो । यह शब्द भी गुरुका एक उत्तम पटार कि जिमसे शिष्य आनंदके साथ पढ़ता जाय । इम पदके द्वारा पाईयो" रमण पद्धति "घेदने प्रकट की है। धनुष्यकी दोनों कोटायाँ डोरीसे तनी रहती हैं इस तनी पगमे भिन्न "रोदन परति " है जिसमें रोते हुए शिष्य पदाये हुई अवस्था में ही धनुष्य विजयका साधन हो सकता है। जिस समय दोनों कोटियोंसे मेरी हट जानी है उप समय पर धनुभ्य शत्रुनाश या विजय प्राप्त करनेमें अमस हो जाता है। इसी प्रकार जाति या समाजरूपी धनुष्यकी दो कोटियां गुरु और शिष्य है, इन दोनीको विधापी गयी है और इस रीसे यह धनुष्य तना हुआ अर्थात् अपने कार्यमें सिद रहता है । समाजको यह धनुष्य पदा सिर राना चाहिये। इसीको सिमतासे आी, समा या राष्ट्र जीवित. जाप्रत और उन्नत सतासि समय विशाही गुरु शिष्यपी पनुष्पगे हट जाती है उस समय महान-युग होने के कारण जाति पतित हो जाती है। जाते है।
२०१, ०२-५] मेधाजनन उपहृतो वाचस्पतिरुपास्मान्याचस्पति यताम् । सं श्रुतेर्न गमेमहि मा श्रुतेन वि संधिपि ॥ ४ ॥ मन्वयः- वाचस्पतिः उपहूतः । वाचस्पतिः अस्मान् उपद्यताम् । श्रुतेन सगमेमहि । श्रुतेन मा वि राधेिषि । ॥४॥ अर्थ-- वाणीका स्वामी बुलाया गया । वह वाणीका स्वामी हम सबको बुलावे । ज्ञानसे हम सब युक्त हाँ दम ज्ञानके साथ कमी विरोप न करें ॥४॥ स्थिर रखने के लिये अति दक्ष रहे। पहिले पड़ा हुआ शान अंदर स्थिर करनेकी विद्या ] गुरु हमें मिसावे ॥ १॥ हे गुरु ! स्थिर रहा तो ही आगे आधिक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। तू मनमें शुभ संकल धारण करके हमारे सन्मुख का, हम यह भाव प्यानमें धरनेसे इस मंत्रका अर्थ निम्न प्रकार होता रमाते [ हुए पढा] पास किया हुमा ज्ञान हममें स्थिर रहे ॥२॥दोरीने दोनों धनुष्कोटियोंकि सनारके समान यहां तू " जिस प्रकार डोरीसे धनुम्यकी दोनों कोटियां विजय- [विद्यासे हम दोनॉग] तना [कर यांध दे ] गुरु नियम के लिये तनी होती है, उसी प्रकार गुरु और शिष्य ये चले और हमें चलाये ।मान हममें स्थिर रहे ॥ ३ ॥ समानको दो कोटियां विद्यासे सज रखिये। भाचार्य स्वयं गुरमे प्रभ पूछते हैं, यह हमें उत्तर देये । हम मय हानी यनों नियमानुसार चलें और शियोंको नियमानुसार पला । कोई भी शनका विरोध न करे ॥४॥ शिष्य मध्ययन किया हुभा शान रद करके भागे यदे।" इन मंत्रोंक जितना मनन होगा, इनपर जितना विचार उपहूत बुलाया. पुकारा, आह्वान किया होगा, उतना ज्ञान बढानेछा उपाय-(मेधाजनन )- हो सकता अथवा पूछा गया है। उत्तम व्याख्याता गुरुको दमने युनाया है। मारा है कि पाठक इस योग्य विचार करें और भी मौर उसे प्रश्न पूछे गये अर्थात् विद्याका व्याख्यान करने के परिस्थितिमें अपने ज्ञानही वृद्धि करने के नपाय माय । इसमें मिल लिये उसे माहान किया गया है। गुरु मी शिम्यके प्रम सुनकर लिखित पाच मातोंडा अवश्य विचार हो-- उनके प्रसाका उचित उत्तर देकर उनका समाधान करे । रिया- जिनसे जगन् पता है उन मूलनायो र अर्थात् गुरु कोई यात शिष्य छिपांग नरसे। इस प्रकार प्राप्त करना भोर उनका अपनी उमतिमे संबंध देराना सभा दोनोंक परस्पर प्रेमसे विद्याकी हॉद होती रहे। उसका अनुष्ठान करनेहा रिषि गनना, यही मोरानेयोन्य हरएक अपने मनमें यह इच्छा रखे कि " हम समझानगे विधा है। युफ हों, जानकी पति करते रहें यार कमी ज्ञानको प्रगति याधान डालें, शानका विषम करें और मिस्या ज्ञाना प्रचार न करें। इस सटीकरण शिकार करनेसे इस मंत्रा भयं निम्न प्रकार प्रतीत होता है- "माय व्याख्याता गुरमे प्रार्थना करते हैं। यह हमें योग्य उपर देवेम [ प्रोताकी गनिमे हम सब ] शान युक्त होते रहे मोर कमी हमपे शानकी उपरिम "बाधा उत्पन हो।" कार्य (१२) अथर्ववेदका सुबोध भाष्य [को०१, विजय-सूक्त। રા ॥३॥ यह " अपराजित गण" का प्रथम सूक्त है जिसका ऋषि " अथर्वा और देवता''पजन्य है । विद्या शरस्य पितर पर्जन्यं भूरिधायसम् । विद्यो यस्य मातरै पृथिवीं भूरिवर्षसम् ॥१॥ ज्या के परिणो नमाश्मानं तन्य कृधि । वीडवरीयोऽरातीरप द्वेपास्या कृषि वृक्षं यद्गावः परिपस्वजाना अनुम्फुरं शरमर्चन्त्यभुम् । शरुम॒स्मद्यावय विद्युमिन्द्र यथा द्यां च पृथिवीं चान्तस्तिष्ठति तेज॑नम् । एवा रोग चाम्रा चान्तस्तिष्ठतु मुञ्ज इन्॥४॥ अर्थ--(शरस्य ) शरका, घाणका पिता (भूरि-धायसं पर्जन्य ) बहुत प्रकारसे धारण पोषण करनेवाला पर्जन्य है यह (विन) हम जानते हैं । तथा ( अस्य) इसका माता ( भूरि-वर्षस ) बहुत प्रकारकी कुशलताओंसे युक्त पृथिवा है, यह हमें (मुविझ) उत्तम प्रकारसे पता है ॥१॥हे (ज्याके) माता ! (नः) हम सब पुनोंको (परि नम) परिणत कर अर्थात् हमारे ( तन्वं ) शरीरको ( अश्मानं ) पत्थर जैसा सुदृढ (कृषि) कर (ोडः) बलवान बनकर (भ-राती ) भदान के भावोंको तया (द्वैपांसि ) द्वेषोंको अर्यात् सब शत्रुओंको (वरीयः) पूर्ण रीतिसे (अप कृषि ) दूर कर ॥२॥ (यन) जिस प्रकार (वृक्ष) वृक्षके साथ ( परिषस्वजाना ) लिपटी हुई या बंधी हुई ( गावः) गौएं अपने (ऋभु शरं) तेजस्वी पुग्न शरको (अनुस्फुरं) पुतीके साथ (अर्चन्ति ) चाहती है, उसी प्रकार हे इन्द्र । (अस्मत् ) हमसे (दिघु शरूं) तेश- पुत्र पाणको (याय)दर बढा ॥ ३ ॥ जिस प्रकार (या) द्युलोक और पृथ्वीके ( अन्तः) याचमें (तेजन) तेज (तिष्ठति) होता है, (ज्य) इसी प्रकार यह (मुज.) मुंज (रोगं च भासावं च) रोग और स्रावके ( अन्तः) बीचमें (इत् तिहत ) निययसे रहे ॥४॥ भावार्थ- धारण-पोषण उत्तम प्रकारसे करनेवाला पिता पर्जन्य है, कुशलतासे अनेक कर्म करनेवाली माता पृथ्वी है, इन दोनोंसे शर सरकंडा-पुन उत्पन्न होता है। ॥१॥ माता पुत्रके शरीरपर ऐसा परिणाम करावे कि जिससे यह बलवान बनकर शत्रुओं को पूर्ण रीति से दूर करने में समर्थ हो सके ॥ २॥ जिस प्रकार वृक्ष के साथ बंधी हुई गौवे अपने पछडे को वेगसे प्राप्त करना जाती है, उसी प्रकार है ईश्वर ! तेज शर हममे आगे पढे ॥३॥ जिस प्रकार धुलोक और पृथ्वीके बीच में प्रकाश होता है, उसी प्रगर रोग और साव घाव के बीचमें शर ठहरे ॥४॥ ५ गुरु शिष्य- सम धनुष्यके दोनों नोक जिस प्रकार टोरीसे करनेके मूलभूत नियम बताये है। गुरु, शिष्य तथा विद्यालय तने रहते हैं, उस प्रकार विद्यारूपी डोरीसे समाजके गुरू-शिष्य- आदिका प्रबंध किस रातिसे करना चाहिये, गुरु किस प्रकार म्पी दोनों नोक एक दूसरे पूर्णतया मुसंबंध रहे। कभी उनमें पढाये, शिष्य किस ढंगसे पो और दोनों मिलकर राष्ट्रकी हालेपन म भाजावे। उमति पिस रीति करें इसका विचार पिया गया । यह सब सूक्त शिष्य मुराद्वारा पारित होने के समान इसके पधात् विद्याकी पढाई शुरू होता है, जिसमें मपरा सो अनुमान होता है कि गुरुको लाने, रसने आदिक जित गणमा सात "विया रस्य पितरं " यह है । अपर्व प्रालि उत्तरदाय शिष्यों या शिष्यों के संरक्षों में यह दितीय मत है। तृतीय सूक्त भी इसी बायो परमार प्रारम होता है। इन दोनों गूक्तोंका विचार भागे। यह भाव पं भी परिपूर्ण नहीं क्योकि इन मंत्रो र अनुगन्धान भाग पछिका संबंध देवर भी मार म्यत रोता रे, गा ११ अपम "मेपासन" मां इंदिरा गंधर जानकर मंत्री सपा मारा जानना चाहिये। बा माय, . .
सू०२, मं०१-४] विजय-सूका म . देखने के लिये भागेका स्पष्टीकरण देखिये- (३) माताके गुण-धर्म-कर्म। (१) वैयक्तिक विजय। माता, पृथिवी, रिवर्पस् ज्याका, गो"ये पाच पान्द पूर्वोक्त मन्त्रों में माताके गुणधर्मकर्मोको प्रकट कर रहे हैं। इस सूक्तमें पहिला वैयक्तिक विजय प्राप्त करनेके उपदेश इनका अर्थ देखिये- निम्न प्रकार वसाय है- १ माता-बालकोंका हित करनेवाली। १ उत्तम मातापितासे जन्म प्राप्त हो, (मंत्र) २ शरीर बलवान बनाया जावे, (मंत्र २) २ पृथिवी- क्षमाशाल, सहनशील, पुत्रोंकी उन्नति के लिये आवश्यक कष्ट सहन करनेवाली। ३ रोगादि शत्रुओंको दूर रखा जावे, (मंत्र २) शरीरमें फुर्ती लाई जावे, (मंत्र ३) ३ भरिवर्पसू-(भूरि ) बहुत (पर्पस्) कुशलतासे कर्म ५ जगत्म अपना तेज फैलानेका यत्न किायजावे, (मंत्र ) करने में समर्थ, कर्ममे अत्यंत पुशल, सदा कर्म करने ६काधनों से रोगोंको दूर किया जावे, (मंत्र) दक्ष,परिवारको चन्नति के लिये उत्तम कर्म करनेवाली। ४ ज्या, ज्याका-( ज्या-जया) जयका धन करनेवाली। पाठक विचारकी दृष्टिसे इन मत्रोंका विचार करेंगे तो उनको माता, पृथिवी, रस्सी, बलशालिनी । उक्त छः भाव वैयक्तिक उन्नति के साधन पूर्वोक्त चारों मंत्रोंके ५ गोः- प्रगतिशील, दुग्धारिद्वारा पुत्रोंकी पुष्टि करनेवाली। अन्दर गुप्तरूपसे दिखाई देंगे। इनका विशेष विचार होने के किरण, स्वर्ग, रन, वाणी, सरस्वती, माता, जल, नेत्र, लिये यहाँ मनके शब्दार्थ और स्पष्टीकरण दिये जाते हैं- श्राकाश सूर्य आदिक शुभगुणसे युक। (२) पिताके गुण-धर्म-कर्म । माताके गुणधर्म इन शब्दों द्वारा व्यकदो रहे । पूर्वोक्त मंत्रोंमें पिताक गुणधर्म यतानेवाले ये शब्द आये अर्थात्- " पालयोंका हित करनेवाली धमाचौल, पोकी हैं-" पिता, पर्जन्य,भरिघायस्, वृक्ष, यौ।" इनके अपोंका उप्राप्ति के लिये करनेयोग्य कमा सदा दक्ष रहनेपाती, रोध होनेसे पिताके गुण धर्म कमाका बोध हो सकता है, बहुतही पुशलतासे अपने स्टुंबकी उमति करनेमें समर्थ, बल. इसलिये इनका भाशय देखिये- शालिनी, गौके समान दुग्धादिद्वारा बामकॉकी पुष्टि करनेयानी, १पिता-(माता) रक्षक, समालनेवाला। किरणों के समान प्राश करनेवाली, सर्गके समान गुरदायिनी, २ पर्जन्यः-(पूर्ति मन्या) पूर्ति करनेवाला, पूर्णता करने के समान परकी शोमा पढानेवाली,शम भाषा में वाला । न्यूनताको दूर करनेवाला। चतुर, विदुषी,अलके समान ति मानेकाली, नेत्र गमान २ भूरिधायम्- (भरि) बहुत प्रगारसे (धायस्) मार्ग दर्शानेवाली, आगधरे रामान सबको आप्रय देनेवाली, धारण पोपग करनेवाला, पाता, उदारचरित। सूर्य के समान मशानाधार र करनेवाली माता बानी पादियो" ५ वृक्षा- आधार, स्वयं धूप बहकर दूसरोंको छाया पिताके गुगपमं पहिले बनाये, और यहो माता गुग देनेवाला। धर्म रताये। ये भादर्श माता पिता, इनसे पुत्र पेदारोगा और पाला तथा बाबा जया गया पुत्रही होगा तथा पुत्री भी गी प्रार वारा बनेगी ममय संदेह - अथर्ववेदका सुबोध भाष्य [कां.१, ४ भु:-बुद्धिमान् , दुशल, कारीगर, तेजस्वी । बाही बोध प्राप्त हो सकता है। पुत्रकी उन्नतिमें माता ५शरु:-शनुका नाश करनेवाला। पिताका कार्य कितना होता है इसकी ठीक कल्पना इस अलंकार- ६ दियु:-तेजस्वी। से पाठकोंके मनमें सकती है। ७ तेजन:-प्रकाशमान । डोरीके विना केवल धनु जैसा शत्रुनाश करनेमें असमर्थ है ८ मुङ्गः-(मुमति मार्जयति ) शुद्धता और पवित्रता उसी प्रकार स्त्रोके विना पुरुष असमर्थ है । तथा जिस प्रकार करनेवाला। धनुके विना डोरी कार्य करनेमें असमर्थ है उसी रीतिसे पुरुषके पुन ऐसा हो कि जो "शत्रुका नाश करनेमें समर्थ हो, विना स्त्री असमर्थ है । माता पिता की योग्य प्रेरणा और योग्य सुदृढ अंगवाला हो,शूर, बुद्धिमान,कुशल, कारीगर, तेजस्वी, शिक्षाद्वारा सुशिक्षित पना पुत्रही जगत्में यशस्वी होता है । यशस्वी और पवित्र आचारवाला हो।" माता पिताको यह अलंकार गृहस्थियोंको बहाही बोधप्रद हो सकता है । उचित है, कि वे ऐसा यत्न करें कि पुरमें ये गुणधर्भ और मै पिताके सूचक " पर्जन्य, वृक्ष" आदि शब्द तथा माताके पढ़ें और इन गुणों के द्वारा कुल का यश फैले । सूचक" पृथिवी" आदि शन्द उनका ऋतुगामित्व होकर यह बात स्पष्ट ही है कि पूर्वोक्त गुणधर्म कमोसे युक्त मंडलद्वारा प्रकाशित "ब्रह्मचर्य" पुस्तकके अंदर अथर्ववेदीय ब्रह्मचारी होनेकी सूचना कर रहे हैं। [ इस विषयमें स्वाध्याय मातापिता होंगे तो उनके पुत्रों और पुत्रियमिं ये गुणधर्म ब्रह्मचर्य सूक्तको व्याख्यामें पृथ्वी, पर्जन्य और वृक्षोंके ब्रह्म आ सकते हैं। चर्यका प्रकरण अवश्य देखिये ] (५) एक अद्भुत अलंकार (६) कुटुम्बका विजय। व्यक्तिको उन्नतिकै विषयों पहिले बतायाही है कि वैय- पिता क्तिक विजय की सूचनाएं इस सूक्तमें किस रूपमें हैं । कुटुंबके या परिवार के विजयका संबंध पूर्वोक्त अलंकार तथा स्पष्टी- करणके देखने से स्पष्ट हो सकता है। कुटुंबका विजय माता पिताके उत्तम कर्तव्य पालन करने और सुप्रजा निर्माण करनेसे ही प्राप्त होना है। (मंत्र 1) जैसा " अनेक प्रकारसे पर्जन्य पिता ऋतुगामी होकर वर्षा ऋतुम अपने जलरूपी वीर्यका सिंचन उत्तम उपजाऊ भूमिमें करता है और शररूपी विजयी संतानकी उत्पत्ति करता है," ऋतुगामी होकर वीर पुत्र उत्पन्न करें। (मंत्र २) "हे जयका साधन करनेवाली माता ! अपने पुत्रों का शरीर पत्थर जैसा सुदृढ बना, जिसे पुत्र बलवान धनकर अपने पुत्रुओंको दूर कर सके।" इस सुस्त ग, धनुष्य और मेरी प्रकार एक (मंत्र ) महसपूर्ण तप प्रा किया है। अनुप्पा सस्त माग जिस प्रकार के साथ बंधी हुई गौ अपने तेज बछरेको चाहती है"[मा प्रचार पिता साप मिर गई माता है यह पुरषरूप समझिये, गेरी रहती हुई माता भी अपने लिये तेजम्दी पुन प्रसन्न भनेका मा लोभीर पुत्र बागरूप है। पिताका दल और माता- होइया करे । अथवा- " (पृक्षं) पनुप्यके साथ रामे पलाइन पुस्त दोर पुत्र संसारमें पैसा बाता है। गाली गरी तेजस्वी (कर) माग ही वेग छोती है।" र बार बने रात्रुभाष नाश या मागो उसी प्रचार पतिकी पापना करनेवाली श्री और पुत्र गरम भरा रिचार पारा तो उनकी इस होनेही हो ममिनगरे1]" (एम) परमा. माता पुत्र बाण पोषण करनेवाला तद्वत् माता पिता पनु सू०१, मं०१-४॥ विजय-सूक्त। (१५) स्मन् ! हमसे तेजस्वी ( शहा) चाणके समान तेजस्वी पुत्र वनसे युक्त होकर उन्नति के नियमों के पालनसे अपनी गतिको चले अर्थात् उत्पन्न हो।"[ मातापिता परमात्माको प्रार्थना एक मार्गमें रखता हुआ अपने, कुटुंबके, जातिके तथा राष्ट्रके ऐसी करें कि हे ईश्वर ! हमारा ऐसा पुत्र हो कि जो दूर शत्रुओंको भगा देनमें समर्थ होता है। दूर जाकर जगत्में विजय प्राप्त करे।] पहिले सूतके तृतीय मंत्रमें धनुष्यको उपमा देकर बताया (मंत्र ४) - " जिस प्रकार [ पिता ] [लोक और माता है कि "गुरु शिष्यरूपी धनुष्यकी दो कोटियो विद्यारूपी दोरीसे पृथिवीके मध्यमें विद्युत् आदि तेजस्वी पदार्थ [पुत्ररूपसे ) तनी हैं।" प्रथम सूकमें यह अलंकार मिन उपदेश दे रहा रहते हैं," [ उसी प्रकार माता पिता के मध्यमें तेजस्वी है और इस सूक्षका धनुष्यका दृष्टांत भिन्न उपदेश दे रहा है। सुंदर बालक चमकता रहे।]" जैसा मुञ्ज शररोग और सावके दृष्टोसमें एकदेशी यातको ही देखना होता है, इसलिये एक पावके यांचमें रहना है" अर्थात् उनको दूर करता है ही दृष्टातसे भिन्न उपदेश देना कोई दोष नहीं है। प्रथम उसी प्रकार [ यह पवित्रता करनेवारा पुत्र रोग घावक सूतके दृष्टांतमें भी डोरीका स्थान विद्या माता अर्थात् सरस्वती मध्यमें रहता हुआ भी स्वयं अपना बचाव करे और कुलका देवीको दिया है उसमें मातृत्व का सादृश्य है। भी उद्धार करे] जंगलमें रक्षके चाय बंधी हुई गाय भी अपने बछडेका यह भाव पहिलेकी अपेक्षा अधिक विस्तृत है और इसमें स्मरण करती रहती है, गायका बछडेके कार का प्रेम सबसे स्पष्टीकरण के लिये पूर्वापर संबंध रखनेवाले अधिक वाक्य जोड पढिया प्रेम है । इस प्रकारका प्रेम अपने पालकके विषयमें दिये हैं, जिससे पाठकों को पता लग जायगा, कि यह सूक्त माताके हृदयमें होना चाहिये । अपना पालक अति तेजस्वी कुटुंबके विजयका उपदेश किस ढंगसे दे रहा है। जातिके या हो, अति यशस्वी हो, यही भावना माता मनमें धारण करे राष्ट्रके विजयकी बुनियाद इस प्रकार कुटुंबकी सुस्थितिपर तथा और इस भावनाके साथ यदि माता अपने मालकको दूध मुप्रजा निर्माणपर ही अवलंबित है। जो लोग राष्ट्रको उन्नति पिलावेगी, तो उक्त गुण पुत्रमें नि संदेह उतरेंगे। इस विषयमें चाहते हैं, वे अपनी उन्नतिकी बुनियाद इस प्रकार कुटुंबमें रखें। तृतीय मंत्र मनन करनेके योग्य है । आदर्श कुटुंब व्यवस्था ही सब विजयका मुख्य साधन है। (८) कुटुम्बका आदर्श । (७) पूर्वापर सम्बन्ध चतुर्थ मनमें आदर्श कुटुंबका नमूना सन्मुख रखा है। पहिले स्क्तमें विद्या पढानेका उपदेश दिया है। इस द्विर्ताय सूक्तसे पढाईका प्रारंभ हो रहा है । विद्याका प्रारंभ युलोक पिता, भूमि माता और इनके बीच का तेजस्वी गोलक इनका पुत्र है। अपने घरमें भी यही भा होथे। भाका बिलकुल साधारण बातसे ही किया गया है । पास को और वीमें जैसा सूर्य होता है उसी प्रकार पिता और माताके उत्पत्तिका विषय हरएक स्थान के मनुष्य जानते हैं। " मेघसे मय बालक धमकता रहे । कितना उच्च आदर्श है। हरएक पानी गिरता है और पृथ्वी पास उगता है इसलिये घासका गृहस्थी इसका स्मरण रखें। पिता मेघ और माता भूमि है।" इतना हा विषय इस सूक्तके प्रारंभमें बताण है । इतनी साधारण घटनाका उपदेश (९) औपधिप्रयोग। करते हुए "पिता-माता-पुत्र" रूपी कुटुंयकी उन्नतिकी शिक्षा किस दंगसे घेदने बताया है यह पाठक यहां देख चुके है । मुज पास अपने रस आदि अनेक रोगों मोर भने पायो- पासके अंदर मुभ या चार एक जातिका पास है। यह सर- को दूर करता है, क्योंकि मुष गोषक, सुरता तथा निर्माता कंडा स्वयं शत्रुका बघ हरनेमें समर्थ नहीं होता। क्योकि कानेवाला है । इसलिम सट है कि यदि गोपाता और धेमल रहता है। परंतु जप उसके साथ कन छोडेका संयोग पवित्रता प गुण अपने अंदर बारा गय तो रोगामि किया जाता है और पीछे पर लगाये जाते हैं, तम यही कोमल दूर रह करते हैं। हरएके लिये यह सूचना अपनाने योग्य है। सरका धनुष्यपर बहकर डोरको गति प्राप्त करके धनुषा मुक्ष या शर भापपिच प्रयोग गरे पावके रोग तथा नारा करने में समर्थ होता है। इसी प्रकार कोमल शला गुरु मूत्रापात आदि रोग होते है। विषयका मक उर. गृहकी कठिन तपस्या करता हुमा समय पालनापी कठिन देश इस सूखके मन्तमें है। रेप मोग इस विरार . अथर्ववेदका सुबोध भाष्य [को०.१, (१०) राष्ट्रका विजय । पुत्रके गुणधर्मकर्म यहां राष्ट्रीय क्षेत्रमें अतिविस्तारसे देखने से इस क्षेत्रकी बात पाठकको अतिस्पष्ट हो जायगा। इस व्यक्ति, कुटुंब, जाति, देश तथा राष्ट्रके विजयपूर्ण अभ्युदय- भावको ध्यानमें धारण करनेसे इस सूचका राष्ट्रीय भाव निम्न- के नियमोंमें समानता है। पाठक इस बातको अच्छी प्रकार लिखित प्रकार होगा- जानते ही हैं । व्यक्तिका कार्यक्षेत्र छोटा और राष्ट्रका विस्तृत है, छोटेपन और विस्तृतपन की बातको छोडनेसे दोनों "प्रजाका उत्तम धारण पोषण और पूर्णता करनेवाला स्वामोंमें नियमों की एकरूपताका अनुभव आ सकता है। राजा ही शूरका सच्चा पिता और उसकी माता बहुत कमाकी प्रेरणा करनेवाली मातृभूमि ही है ॥ १॥ हे मातृभूमि ! हम मुटुंबका ही विस्तृत रूप राष्ट्र है, ऐसा मान लें और पूर्व स्थानमें सबके शरीर अति सुदृढ हों, जिससे हम सब उत्तम बलवान एक घर या एक परिवारके विषयमें जो उपदेश बताया है, बनकर अपने शत्रुओंको भगा देंगे ॥२॥ जिस प्रकार गौ वही विस्तृत रूपसे राष्ट्रमें देखेंगे तो पाठकोंको राष्ट्रीय उन्नति अपने बछडेका हित सदा चाहती है, उसी प्रकार हे ईश्वर ! का विषय पूर्वोक्त रीतिसे ही ज्ञात हो जायगा । मातृभूमिके प्रेमसे बढे हुए वीर भागे बढें ॥३॥ जिस घरमें पिता शासक है, राष्ट्रमें राजा शासक है; घरमें माता प्रकार आकाश और भूभिके बीचमें तेजोगोलक होते हैं प्रबंधकी है, राष्ट्र में प्रजाद्वारा चुनी हुई राष्ट्रसभा प्रबंधकी उसी प्रकार राजा और प्रजाके मध्यमें वीर चमकते रहें। है । परमें पुत्र वीर बनाया जाता है और राष्ट्रमें घालचमुमि तथा वे पवित्रता करते हुए रोगादि - भयसे दूर वीरता बढाई जाती है । इत्यादि साम्य देखकर पाठक जान हों॥४॥ सकते हैं कि यह सूक्त राष्ट्रीय विजयका उपदेश किस ढंगसे साधारणत: यह आशय अतिसंक्षेपसे है। पाठक इस प्रकार देता है । पूर्वोत स्थानमें वर्णन किये हुए पिता, माता और विचार करें और वेदके आशयको समझनेका यल करें । । , आरोग्य-सूक्त। (३) पूर्ण सूक्तका अभ्यास करनेसे यह ज्ञान हुआ कि पर्जन्य पिता है, पृथ्वी माता है और इनके पुत्र वृक्षवनस्पति आदि सय हैं । यहाँ शंका उत्पन्न होती है कि, क्या पर्जन्यके समान सूर्य, चंद्र, वायु आदि भी वृक्षवनस्पतियोंके लिये पितृस्थानीय है वा नहीं, क्या इनके न होते हुए, केवल अकेला एक ही पर्जन्य तृणादि की उत्पत्ति करने में समर्थ हो सकता है ? इसके उत्तरमै यह तृतीय मूक्त है- [मापि-अथर्वा । देवता-(मंत्रोंमें उक्त अनेक ) देवताएँ] विधा शुरस्य पितर पर्जन्यं शतप्ण्यम् । सेना ते तन्वेई शं करं पृथिव्यां ते निपचनं हिष्टै अस्तु पालिति ॥ १॥ विद्या शरस्य पितरं मित्रं शतवृष्ण्यम् । तेनाते तन्वेः शंकर पृथिव्यांत निपेचनं बुद्दिष्ट अस्तु चालित ॥२॥ विद्या गुरस्य पितरं वरुणं अतवृष्ण्यम् । वेना ते तन्ये वे कर पृथिव्यां से निषेचन यहिटै अस्. पालिति ।। ३ ।।
सू०३, मं०१-4] आरोग्यसूक्त। विद्या शरस्य पितर चन्द्रं शतवृष्ण्यम् । तेना ते तन्ये ई शं कर पर्थिव्या ते निपेर्चनं पहिष्ट अस्तु नालिति ।। ४ ।। विद्या शरस्य पितरं सूर्य शतष्ण्यम् । तेना ते तन्ने शंकर पृथिव्यां ते निपेचनं राहिदै अस्तु वालित ॥५॥ अर्थ-(विद्मा) हमें पता है कि शर के पिता (शत-वृष्ण्य ) सैकडों पलोंसे युक्त पर्जन्य, मिन, रुग, चद्र, सूर्य (ये पाच) है। (तेन) इन पांचोंक वीर्यसे ( ते तन्व ) तेरे शरारके लिये मैं (श कर ) आरोग्य का । (पृथिव्या ) पृथिवारे अन्दर ( से निपेचनम् ) तेरा सिंचन हारे और सत्र दोष (ते) तेरे शारखे (बाल इति) शीमही ( यहि अस्तु) यादर हो जाने ॥१-५॥ भावार्थ- तृणादि मनुष्यपर्यंत साटंकी माता भूमि है और पिता पर्नन्य, मित्र वरुण चद्र, सूर्य ये पाच हैं। इनमें अनत बल है। उनके पलों का योग्य उपयोग करनेसे मनुष्य के शरीरमें आरोग्य स्थिर रह सकता है, मनुष्य का जावन दीर्घ हो सस्ता है भीर उसके शरीरसे सब दोप बाहर हो जाते हैं। आरोग्यका साधन। जाती है, पाठक विरार करें और लाभ उठावे- पर्जन्यसे आरोग्य। पांच मनोका मिलकर यह एकहा गणमत्र है और इसमें मनु पर्नयका शुद्ध जत जो साती आदि मध्य नोट प्राप्त प्यादि प्राणियों तथा वृक्षवनस्पतियोंक आरोग्य के मुख्य मायन किया जा सकता है वह यहा आरोग्यप्रद है। दिनके पूरे लपन का दिये हैं। शर' शब्द घास वाचक हाता हुआ भी सामा य के समय यदि इसरा पान दिया जाय तो शरोरके सपूर्ण दोर अर्थसे यहाँ उपलक्षण है और तृणसे लेकर मनुष्यतक सूत्रिका दूर हो जाता है और पूर्ण नारोगता प्राप्त हो सस्ती है । आर्य उममें है। विशेष अर्थमें "शर' सज्ञक वनस्पतिका लके मानसे शरीर के गुष्क गुजरी आदिम निवारण होता है। गुणधर्म यताया जाता है यह बात भी स्पष्ट ही है। अतरिक्षमें शुद्ध प्राग विराजमान है पह के जादुओके इन मत्रोंमें पाच पिता कहे हैं। पिता शन्द पाता अर्थात् माय भूमिपर भाता है। इसलिये पृष्टि नलका प्रान आरोग्य रक्षा, सरक्षण करनेवाला इस अर्थमें यहा प्रयुक्त है । तृणादिसे वर्धक है । लेकर मानव-सृष्टिपर्यंत सय की सुरक्षा करनेका कार्य इनका मित्र (प्राण) वायुसे आरोग्य । ही है। ये पाँची सब सुरिकी रमा कर ही रहे हैं। देखिये प्राणायामसे योगमापनमें भारोग्यरक्षणका जो उपाय प १पर्जन्य वृष्टिद्वारा जलसिंचन करक सबका रक्षण करता है। किया है वह य । अनुमंधेय है। दोनों नागिहार नाम २ मित्र प्राणवायु है और इस वायुसे ही सब जीवित रहते हैं। तिमे, भनियस अयया जलको नातो सार . ३ वरुण अरकी देवता है और यह जल सयका जवन ही संत रसनेस पापायुमार जाटा र दाम पारसता कहलाता है। करता है । गुरी यायमै म पडे नगर कर मा १च औरधियोंका अधिराजा है भार औषधियों सार पाला वायुधान वा बागेग्यवधा है। ओ मा पत्रा अथर्ववेदका सुबोध भाष्य [को०१, - . प्रात होता है। अन्य जल अर्थात् नालाय, यूए, नदी अदियोंके विचार करें और इस निसर्गनियमों का पालन करके अपना जलके स्नानमे उनमें उत्तम प्रकार तैरनेसे भी कई दोष दूर हो आरोग्य प्राप्त करें। जाते हैं। जलावासाका यह विषय है वह पाठक यहाँ पृथ्वीमें जीवन । अनुमधान करके दख । यह बडा ही विस्तृत विषय है क्योंकि प्राय सभी बीमारेया जलचिकित्सासे दूर हो सकती हैं। पृथ्वीमें प्राणिमारका सामान्यतः और मनुष्यका उच्च जीवन विशेषत उक्त पाचौ शक्तियोंपर ही निर्भर है। मंत्रका चन्द्र (सोम) देवसे आरोग्य । "निषेचन" शब्द "जीवनस्प जल" का सूचक है । इसलिये-- चद औषधियाका राजा है, इसका दूसरा नाम सौम है। ते पृथिव्यां निषेचनम् । गोमादि औषधियोंसे भागेश्य प्राप्त करनेका साधन चरकादि इस मंत्रमागश आशय "तेरा पृथ्वी में जीवन" पूर्वोक थाचार्योंने अपने वैद्य प्रथोंमें लिखा ही है । इसी साधना पाचा देवताओं के साथ संबंधित है यह स्पष्ट है । जो शरीर दूसरा नाम " वैद्यक है। का आरोग्य, शरीरका कल्याण करनेवाले हैं वेही जीवन अथवा सूर्यदेवसे आरोग्य । दीर्घ जीवन देनेवाले निश्वयसे हैं । इनके द्वारा ही- सूर्य पवित्रता करनेवाला है। सूयावरणसे जीवनका तत्व ते बालू इति बहि मस्तु । सर्वत्र फैलता है। सूर्यकिरणोंका स्नान नंगे शरीरसे करनेसे "तेरे शरीर के दोष शीघ्र बाहर हो जाय।" पूर्वोक पाचों अर्थात् धूपमे अपना शार तपानेसे आरोग्य प्राप्त होता है। देवोंके यग्य सबंधसे शरीरके सब दोष शरीर से बाहर हो सूर्य करणेसे चिकित्या करनेका भी एक बहा मारी शान है। जाते हैं । देखिये- (१) वृष्टिजल पान पूर्वक लंघन करनेसे मूनद्वारा शरीर पञ्चपाद पिता। दोष बाहर हो जाते है। ये पाच देव भने प्रकारसे मनुष्य, पशुपक्षी, वृक्ष, धन (२) शुद्ध प्रागके अंदर जानेसे रसगुद्धि होती है और रपति आदि का आरोग्य साधन करते हैं। वृक्षवनस्पति और उच्छ्वासद्वारा दोष दूर होते है। भारण्य क पा उस्त पंचपाद पितरों अर्थात् पाचों देवोंके साथ (३) जलचिकित्साद्वारा हरएक अवयवके दोष दूर पांचों लिभीके पाच-पाचौ रक्षकोंके साथ नित्य रहते हैं, इस किये जा सकते हैं। ग्यि सा आरोग्य पपन्न होते हैं । नागरिक पशुपक्षी मनुष्यके (४) सोम आदिक औषधियों औषधि नाम इसलिये प्रतिम धनावगर्जवनयेषित होनेके कारण रोगों से अधिक है, कि वे शरीरके (दोष-धी ) दोष को धोती हैं। प्रस्त होते हैं। जगी रोग प्रायः सीदे सादे रानेके कारण (५) सूर्यकरण पसीना लाने तथा अन्यान्य रतियाँस अधिक नारोग होने हैं। परतु नागरिक लोग कि जो सदा तंग शरीरके रोगवाज दूर कर देते हैं। महानाम रहत है सदा तंग वनासे वाटत होते हैं और जल वायु तथा सूर्य प्रकाश भादिकोंसे अपन आएगे दूर रयत हैं। इस गतिमे पाठक अनुभव करें कि ये पाच देव किस थर्थान् जो अपने पनपिनामि हो विमुख रस्ते हैं वेहा अधिक प्रकार शरीरका (शंकर) कल्याण करते हैं। आरोग्य देते रो पारेक रोगी होते हैं और प्रति दिन इन गा पा है, ( निषेचन ) जीवन यदाते हैं, और (यदि ) दोपोंको नागीय गंगाम हाध रोग बढ है और अस्वास्थ्यसे बाहर निकाल देते हैं। गेहा सदा दुखी होते है। "" शब्द "शौति" का सूचक है। शरीरमें "शांति, समता, दलिये वेद कहता है कि पर्नय, मित्र ( प्राग) वायु, मुख" भादि स्थापन करना आरोग्यका भाव बता रहा है। ये जरदय यरुण, चंद्र, देव इन पांच देवोको अपना पिता देव"" करनेवाले हैं, इसका तात्पर्य यही है कि, ये भाग्य अपां अपनारक जानी और बढ़ानवाले हैं। आरोग्य यहानेके कारण जीवन बढानेवाले अर्थात् दीर्घ जीवन करनेवाले हैं और सदा सर्वदा दोपौंको शोर थाहर करनेवाले हैं। पाठक इस मंयके मननसे अपने भारोग्यके मुख्य मिदान्तका ज्ञान स्पष्टतया प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार आरोग्य के मुख्य साधनका सामान्यतया उपदेश करके ग्यदोष निव रणध विशेष उपाय मति है- मू०३, मं०६९] मूत्रदोष-निवारण। (१९) मूत्रदोष-निवारण । पदान्येषु गवीन्योर्यगुस्तावधि संभ्रुवम् । एवा ते मूत्र मुच्यता पहिलिति सर्वकम् ॥६॥ मते मिनाम मेहन वन्नै वेशन्त्या इत्र । एवा ते मूत्रै मुच्यता पहिर्यालिनि सर्वकम् ॥७॥ विपितं ते वस्तिविलं समुद्रस्यौदधेरिव । एका ते मूत्र मुच्यतां बहिलिति सर्मकम् ॥८॥ यथेषुका परापंतदवसृष्टाऽधि धन्ननः । एवा ते मूत्र मुच्यता पहिर्यालिवि सर्वकम् ।।९।। भर्थ- ( यत् )जो ( भान्पु) आंतोंमें ( गवीन्यो) मूत्र नाडियोम तथा जो { धम्ती ) मूत्राशयमें मूत्र (संधुनं )इस्हा हुआ है। वह तेरा मूत्र (सर्वकं ) सयका सब एकदम बाहर । मुच्यताम् ) निरुल जाव ॥६॥ (वेदान्त्याः ) शीलके पानी (वर्ग) बंधको ( इव ) जिस प्रकार सोल देते हैं तद्वत् तेरे (वेहनं ) मूत्रद्वारको (प्र भिना । मैं सोल देता ह . ॥७॥ समुद्रके भयवा ( उदधेः ) बडे तालावके जलके लिये मार्ग सुना करने के समान तेरा (वस्ति-बिल) मूत्राशयका पिलं मन (विपितं ) खोल दिया है... ॥ ८॥ जिस प्रसार धनुष्यसे छूटा हुआ (इपुका ) वाग (परा अपतत् ) दूर जाता है, उग प्रकार तेरा सर मून शीघ्र बाहर निकल जावे ॥७॥ भावार्थ-तालाव लादिसे जिस प्रकार नहर निकाल देते हैं जिससे तालाव।। पानी सुखपूर्वक बाहर जाता है उसी प्रकार मूत्राशयसे मूत्र भूतनादियों द्वारा दियसे पाहर निकल जावे । - - मूत खुली रतिसे बाहर जानेसे शरीरके बहुत दोष दूर करते हैं मूत्रद्वारमे कोमा दूध अथवा जल आदि बदर गणारा. हो जाते हैं । शरीरके सब विष मानो इस मूनमें इकट्ठे हाते हैं यमें सोचने और उसके द्वारा गुयायको शुद्ध करने और ये मूत चाहर जानसे विष भी उसके साथ बाहर जाते है सामध्यं अपने पढ़ाते है। इसका अभ्यास पनेरोन येवल और मारोग्य प्राप्त होता है। इसीलिये किमी रोगी का मूत्र मूत्राशयपर प्रभुत्व प्राप्त होता है, परंतु गर्ग वीर्य नाहियों मंदर रक जानेसे मूनक विष शरीरमें पलते है और रोगी शीघ्र समेत संपूर्ण पाशियपर मी प्रभुप प्राप होता है । कपरता ही मर जाता है। इस कारण भारोग्यके लिये मना उत्म होनेको निदि इसी योग्य अभ्यास प्रार होती है। मोगा नियमपूर्षक होना भ यत आवश्यक है । यदि वः मूत्र मूग्राश- लोग इम अभ्यासको अतिगुप्त गते हैं और योग्य परीक्षा यमें एक आय तो मूत नलिकाको खोल कर मूयका मार्ग खुला होने के पक्षात ही यह अभ्यास शिष्यगे सराया जाद। करना आवश्यक है । इस कार्यके लिये शर या मुश औषधि प्रार्य रहना इसी अ-मासमे गार होता है। सरक का प्रयोग यहा सहायक है । वैद्य लोग इसका उपयोग करें। धर्म पालन करते हुए भी पूरी प्रनय पावन दोन.प. इसपर दूसरा उपाय म्सद्वार सोने है, इसके लिये लोहा इस अभ्यामरो हो सकती है। परितयं (Catbeter tथेटर) का प्रयोग करनेगी एपना इन पत्रों की माने मिलती है। यह मनाशय पंन सोने, चादर या लोडेका यनाया जाता है, यह बारीक नलिसमारंभमें गोली हाती है, माल यह रबर आदि भयान्य परायाम भी बनायनाया मिला है। इस समय रएको हरएक टाके पास 736 देस पहने। यह मून दिय गुलाशय योग्य तिने दाता आता है। वह यहां पहुंचनेर महमा मूय गरे अंदर नलामे पार पोशाता। मोगी की सहायतासमेही भादिगिएं शलाका, -
100)
अथर्ववेदका सुयोध भाष्य ।
कां०१,
सुक्ता।
पूर्वापपर सम्बन्ध
शास्त्रका ज्ञान अवविद्याके यथावत् जानने के लिये अत्यंत
आवश्यक है। मूत्राशयमें शलाकाका प्रयोग विना वहाके अवय-
द्वितीय सूक्तमें आरोग्य माधनका विषय प्रारंभ किया था। वो जाननेसे नहीं हो सकता । शारीरशास्त्रको न जाननेवाला
उसी आरोग्य प्राप्तिस विस्तृत नियम इस तृताय सूतके प्रथम
पाच मंगोके गणमें कहा है। सबके आरोग्यका मानो यह मूल- भी यथा योग्य रीतिसे प्राप्त नहीं कर सत्ता ।
मनुष्य योगसाधन भी नहीं कर सस्ता, तथा अथर्ववेदका शान
मन ही है। हरएक अवस्था सुगमतया आरोग्यसाधन करने
उपाय इस गणमंत्रमें वर्णन किया है। इस तृतीय सूक्तके अंतिम यह "अगि-रस" का विषय है, अर्थात् अंगोंके रसोंबाही
चार मंत्रों में मूत्राशयके दोपको दूर करनेका साधन बताया है।
यह अथर्वशान है। अर्थात् जिसने अंगोंको ज्ञान नहीं प्राप्त
इस सूक्तका "शन पृण्य" शब्द अत्यत महत्त्वपूर्ण है। किया है, अंगोंको अंदर के जीवन रसोंका जिसको कुछ भी
"ण्य" शब्द बल, वीर्य, उत्साह, प्रजननसामर्थ्य आदिका ज्ञान नहीं है वह अथर्वविद्यासे बहुत लाभ प्राप्त नहीं कर
याचक है। ये सैकडों बल देनेवाले पूर्वोक्त पाची देव हैं यह
यहाँ इस सूस्तसे स्पष्ट हुआ है। वार्यवर्धक अन्य उपायोंका डाक्टर लोग जिस प्रकार मुर्दोको चीर फाड करके शरीरा-
अवलयन न करके पाठर यदि इन पाचोंको ही योग्य रीतिसे गोंका यथावत ज्ञान प्राप्त करते हैं उसी प्रकार योगियों और
वर्तते रहेंगे तो उनको अनुपम लाभ हो सकता है।
अथर्वागिरतविद्याके पढनेवागेको करना उचित है।
द्वितीय सूक्तमें, "भूरि-धायस" शब्द है जिसका अर्थ
हमने यहा सोचा था कि इस सूक्तमें वर्णित शलाकाके
अनेक प्रारसे धारण पोषण करनेवाला" पूर्व स्थानमें दिया प्रयोग के लिये आवश्यक अवयवों का परिचय चित्रोंद्वारा किया
है। यह भी पन्यके साहचर्यके कारण इस सूक्तमें अनुवृत्ति जावे, परंतु इससे कई लोग अधिक भ्रममें भी पड सकते हैं
से आता है और पाचों देवों का विशेषण बनता है। पाठक इस और जो चित्रोको ठीक प्रकार समझ नहीं सकते दे उलटादी
शो रेकर मनोमा अर्थ देखें और घोध प्राप्त करें। प्रयोग करके दोपके भागी हो सकते हैं। इस भयको सामने
"भूरि-धायम" शब्दका "शत वृष्ण्य ' शब्दस निक्ट सबध देखकर इस यातको चिनोंसे स्पष्ट परनेका विचार इस समय
है, मानो ये दोनों शब्द एक दूसरे के सहायक है। विश्व के लिये दूर कर दिया है। और हम यहा पाठकोंसे निवेदन
प्रकार धारण पोषण करनेवाला ही सवों यायोको देनेवाला हो करना चाहते है कि वे इस प्रयोगका ज्ञान विश अक्टरी
सकता है। क्योंकि पुष्टि के साथ ही यलका संबंध है। इस प्रकार ही प्राप्त करें तथा ऊपर दिये हुए योग-प्रक्रियाका शान किसी
पूर्व मुफ्तरो इम सूक्तका सबंध देखिये ।
उत्तम योगी के पास जाकर ससि क्योंकि अंगरस चिस्त्यिाम
शारीरशास्त्र का ज्ञान ।
इन याताको भावश्यकता है । इनके विना केवल मंत्रार्थ पटनेसे
अथवा शाब्दिक शान समझने मानसे भी उपयोग नहीं हो
इस मूक्त मननसे पठनोंने जन ही रिया रोगामि जारीर- सकता।
-
जल-सूक्त।
पूर्व में भायगाधा का रापसे वर्णन किया है इसलिये भय उसी जलका विशेष वर्णन कमसे भागे के तान
पग पग-
(प्रापि:- सिन्धुदोपः । देवता [अपानपात्, सोमः-] आपः।)
अम्पयो पन्त्याप मिमियो अपरीयताम् । पृचन्तीमधूना पर्यः ॥ १॥
अमूर्या उप सर्प पामिया मर्यः मह ! ना नी हिन्वन्त्यम् ॥२॥
सू०५-५, मं०१-४१-४] जलसूना (२१) अपो देवीरुप हये यत्र गावः पिबन्ति नः । सिन्धुभ्यः कवं हविः ।। ३ ।। अपव पन्तरमृतमप्सु में जम् । अपामुत प्रशस्तिमिरचा भवथ याचिनो गायौ भयथ वाजिनीमा अर्थ- (अध्वरीयतां) यज्ञकर्ताओंके (जामय.) यदिनों के समान और (भग्ययः ) माताओं के समान अलसी नदिया (अध्वभिः यन्ति ) अपने मार्गासे जाती है जो मधुना) मधु-शहद के साथ (पयः) दूध या जल (जन्ती:) मिलाती है ॥१॥ (याः) जो (अमू.) ये नदिया (उप सूर्ये) सूर्यके सम्मुख होती हैं अथवा (यामि.) जिनके साथ सूर्य होता है। वे हम सबका (अध्वरं) यश (हिन्वन्ति) सांग करती हैं ॥ २॥ (यत्र) जहां हमारी (गार.) गावे पानी (पियन्ति ) पीनी है उन (देवी. आप.) दिव्य जलोंकी (सिन्धुभ्यः ) नदियों के लिये हवि करनेके कारण (उप हये) में प्रशंसा करता हूं ॥ ३ ॥ (मप्सु भन्तः) जलमें अमृत है, (अप्सु भैपर्ज) जलमें दवाई है ।( उत) और (भपा प्रशान्निभि.) जलके प्रधमनीय गुण पोसे (भश्वाः वाजिनः) घोडे बलवान (भवथ) होने और गौवें मलयुक्त होती हैं ॥ ४ ॥ भावार्थ-जल उनके लिये माता और बहिनके समान हितमारक होता है जो उनका उत्तम उपयोग करना जानते हैं । जलकी नदियो बह रही हैं, मानो वह दूधमें शहद मिला रही हैं। जो जर सूर्यकिरणसे शुद्ध बनता है अथवा जिसकी पवित्रता सूर्य करता वह जल हमारा मारोग्य सिद्ध करे । जिन नदियों में हमारी गौवें जा पीती हैं और जिनके लिये हवि पनाया जाता है उनके जलका गुणगान करना चाहिये । जल में अमृत है, जल में औषर है, जलके शुम पुग से घोडे बलवान् बनते हैं और गोवे भी बलवती बनती हैं। है (ऋपिः-सिन्धुद्वीपः । देवता-[अपानपात् , सोमः] आपः)। आपो हि या मयोभुवस्ता ने ऊर्जे दधातन । महै रणाय चक्षसे ॥१॥ यो : शिवर्तमो रसस्तस्य भाजयतेह नः । उशतीरिव मातरः ॥ २॥ तस्मा अरं गमाम यो यस्य क्षयाय जिन्वय । आपो जनयथा च नः ।। ३ ।। ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम् । अपो योचामि भेषजम् ॥ ४ ॥ अर्थ-हे (भापः ) जलो ! (हि) क्योंकि भाप (मयोभुवः ) मुमधरक (म्य) हो इसलिये (ता.)ो तुम (न: अ) हमारे पल लिये तथा (महे रणाय घनमे) ही रमीयतारे दर्शन के लिये हमें (पान) पुष्ट करो ॥१॥ (प.) ओ (4:) आपके अंदर (शियनम रमा) अत्यन्त कल्याणकारी रम है (सम्प) मा (न इ६ भाजयन ) हमें यहां भागी करो (इस ) सी (उशती मावरः) इच्छा करनेवाली माताएं रती है ॥१॥? अलोजिके क्षयाप) निशमरे लिये आप (न्यय) सति करते हो ( तस्मै) उसके लिये हम (प: म माम) मापको पूर्णतया प्राप्त करेंगे। और मार (ना) हमें (जनयय) पटामो ॥३॥ (पायंगा) या दरोग्य गों (शाना ) स्वामी इसलिये (वर्षणीनां ) प्रागिमात्रक (क्षयन्ती ) निगमके हेतु ऐसे (प.) मनो) (भप याय) भोपपती याचना करता। मावार्य- अल मुमार, उममे मत रहता है, मनीता प्राप होती है और पुटि भी र पुगे माता पये दिमाग मिता, उसी पर सो दररे सनम MAn fayd aati होती है, पाप हम प्राा हो मोर उससे हमारी से भर Amit रिपरिना , उसमे में प्राररोज ॥
- ( अथर्ववेदका सुबोध भाष्य [को०१, [६] [ऋषि:- सिन्धुद्वीपः । देवता (अपानपात्) आपः, २ आपः सोमो अग्निश्च] शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । शं योरभि संवन्तु नः ॥ १ ॥ अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेजा । अग्निं च विश्वशंभुवम् ॥२॥ आपः पृणीत भैपज वरूथं वन्ये मम । ज्योक् च सूर्य दृशे ॥ ३ ॥ शं न आपो धन्वन्या: शर्मु सन्त्यनूप्याः । श नः सनित्रिमा आपः शमु याः कुम्भ आभृताः शिवा नः सन्तु वार्षिकीः ॥ ४ ॥ अर्थ- (देवी आप ) दिव्य जल (न श) हमें सुख दे और ( अभिष्टये ) इष्ट प्राप्तिके लिये तथा ( पीतये ) पीने के लिये हो और हमपर शातिमा ( भभि सन्तु ) स्रोत चलावे ॥ १॥ (में) मुझे ( सोम अन्नवीत ) सोमने कहा कि ( अप्स अन्त ) जलमें ( विश्वानि भेषजा) मय औषधिया है और अग्नि ( विश्व-श-भुवं ) सत्र कत्याग करनेवाला है ॥ २ ॥ (आप) जलो। ( भैषज पृणीत ) औषध दो और (मम तन्वे ) मेरे शारीरके ( परूथं ) संरक्षण दे जिससे मैं सूर्यको ( ज्योक् हो) दीर्घकालतक देख ॥ ३ ॥ (म.) हमारे लिये (धन्यन्या आपः) मरुदेशका जल (4) सुखकारक हो, ( अनूप्या) जर पूर्ण प्रदेशका जल सुसारक हो, (खनितिमा ) खोदे हुए कूचे आदिका जल सुखदायक हो, (कुंभे) घडेमें भरा जल सुखदायक हो, (वार्षिकी ) टिका जल सुखदायक होवे ॥४॥ भावार्थ-दिव्य जल हमें पीनके लिये मिले और वह हमारा मुख पडावे ॥१॥ जलमें सब भाषध रहते हैं और अमि सुस बढानेवाला है ।॥ २॥ जलसे हमारी चिकित्सा होवे और शरीरका बचाव रोगास होकर हमारा दीर्घ आयु मने ॥३॥ मरदेशका, जलमय देशा, कुवेका, पटिका तया घहोंमें भरा हुआ जल हमारस सुख बढानेवाला होये ॥ ४ ॥ ये तीन सूक्त जल का वर्णन कर रहे हैं। तीनों सूक्त ६ सनिग्रिमा भापः (६४)-खोदकर बनाये हुए कूए रहे है इसलिये तीनौका विचार यहाँ इकटाही करेंगे। यावलीसे प्राप्त होनेवाला जल । जलकी मिन्नता। राष्टिसे प्राप्त होनेवाला जल भी रेतीले स्थान, अल निन्न प्रकारका है यह बात पूर्व सूक्तान कही है- मिट्टी के स्थान आदिमें गिरने भिन्न गुण धर्मोसे युक्त होता है । जिस स्थानमें सालों साल चड मना रहता है, उसमें १ देशी (दिग्या ) भार (३)-मागरासे बयान पड़े हुए पानीही अवस्था भिन्न होती है और तीसे प्राप्त मेपोरो प्राप्त होनेवाला जल, इसी का नाम "शापिंकी" हुए पानीके गुणधर्म भिन्न है। इसी कारण ये सभ जा विभिन्न गुणधर्मरो युक्त होते है। जल का उपयोग आरोग्य के २ वार्षिकी भाषा (१४) -गणिसे प्राप्त होनेवाला लिये करना हो, तो प्रथम मासे उत्तम शुरु और पवित्र जल प्रास करता यावश्यक है। yि:(n) नदी सपा समुरी प्राप्त होनेवाग उप जल जो बाहर प्राप्त होता है वह परमें लार पगमें रखने के कारण उसके गुगधर्म, पदल होता है। भार अनुप्या मारः (u)-मय प्रदेश प्राप्त होने पेश लामा पानी जो गुगधर्म रगता है, यही परमे लाल (पमे भान्ताः (v) पढे में कई दिन रसनेपर गिम . पम्माया मा (0)-प्रदेश, रेसा में, अप! गुगश्माम युक्त होना भर है। तया प्रमाणे नदी पाती मारोपने देगमे मिमनेरमा मल। मौर रेरिधर पानी गुगपर्म भी भिन्न वने। कीचडको 1 - उस सू०.६, मं०१-४] जलसून । (२३) " - इसी प्रकार एक ही जल विभिन्न स्थानमें और विभिन्न हो जल है यही पात मंत्र कहता है- गुणधमोसे युक्त होता है। यह दर्शाने के लिये निम्नलिखित अप्सु अमृतम् । (४।४) मंत्रमें कहा है- अप्सु भेषजम् । (४।४) अमूर्या उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह । (१२) "जलमें अमृत है, जलमें औषध है, जल अमृतमय है वह जल जो सूर्यके सन्मुख रहता है, अथवा जिसके और औषधिमय है । मरनेसे बचानेवाला अमृत कहलाता है, साथ सूर्य रहता है ।" अर्थात् सूकिरणों के साथ स्पर्श और शरीरके दोषोंको धोकर शरीरकी निर्दोषता सिद्ध करनेवाला करनेवाला जल भिन गुणधर्मवाला बनता है और सदा भेषज कहलाता है। जल इन गुणों से युक्त है। इसी लिये अंधेरेमें रहने के कारण जिसपर सूर्यकिरण नहीं गिरते उसके जलको कहा है- गुणधर्म भिन्न होते है। जिन वापर वृक्षादिकी हमेशा छाया शिवतमः रसः। (५२) होती है और जिनपर नहीं होती उनके जलोंके गुणधर्म भिन "जल अत्यंत कल्याण करनेवाला रस है ।" केवल "शिवो होते हैं । तथा- रस:" कहा नहीं है, परंतु "शिवतमो रस:" कहा है, इससे स्पष्ट अम्बयो यन्त्यध्वभिः। (४) है कि इससे अत्यंत कल्याण होना संभव है। यही यात अन्य "नदियां अपने मार्गसे चलती हैं। इसमें जलमें गतिका न्दौसे भी वेद स्पष्ट कर रहा है- वर्णन है। यह गतिमान जल और स्थिर जल विभिन्न गुण- भापः मयोभुवः । (५) धर्मोसे युक्त होता है। स्थिर जलसे कृमिकीटक तथा सहावट "जल हितकारक है ।" यहाँका "मयस्" शब्द "सुस, होना संभव है उस प्रकार गतिवाले जलमें नहीं। इसी प्रकार धानंद, समाधान, तृप्ति" आदि अर्थका बोध कराता है। यदि जल गतिकी मंदता और तेजीके कारण भी जलके गुणधर्मों में भेद पूर्ण आरोग्य साधक न होगा तो उससे आनंद पढना असंभव होते हैं। तथा- है। इसलिये जल अमृतमय है यह स्पष्ट सिद्ध होता है इसी. पृञ्चन्तीमधुना पयः। (४) लिये कहा है।- "मधु अर्थात् पुष्प-पराग आदिसे जलमें मिलावट होती अप्सु विश्वानि भेषजानि । (२) है।" इससे भी पानीके गुणधर्म बदलते हैं। नदी तालावके "जलमें सब दवाइयां है।" जलमें केवल एकही रोग की तटपर वृक्षादि होते हैं और उस जलमें वृक्षवनस्पतियोंसे फूल, औषधि नहीं प्रत्युत सय प्रशरकी औषधियां हैं। इसीलिये फूलके पराग, पत्ते आदि गिरते हैं, जलमें सहते या मिलते हैं। हरएक बीमारीक' जलचिकिस्सामे इलाज किया जा सकता है। यह कारण है कि जिससे जलके गुणधर्म बदलते हैं तथा योग्य वैद्य और पथ्यपालन करनेवाला रोगी होगा, तो आरोग्य या गावः पियन्ति । (४।३) निःसंदेह प्राप्त होगा। इसलिये कहा है- जिस जलाशयमें गावे पानी पीती हैं," जहां गावे, भैये मापः शृणीत भेषजम् । (६।३) आदि पशु जाते हैं, जलपान करते हैं। उस पानीको अवस्था अपो याचाभि भेषजम् । (५४) भी बदल जाती है। "जल औषध करता है। जलसे औषध मांगता है।" जल लेनेके समय इन बातोंश विचार करना चाहिये । जो अर्थात् जलसे चिकित्सा होती है। रोगोंकी निरनि जलचित्रिण जलकी अवस्थाएं वर्णन की है, उनमें सबसे उतम अवस्था- से हो सकती है। रोगोंके कारण शरीरमें जो विषमता होती पाला जल ही पाने आदि कार्यके लिये योग्य है। एक है से दूर करना और शरीरके राप्त पानुमाम समता स्थापित अवस्था प्राप्त होनेवाला जल लाभदायक नहीं होगा। वेदने करना जलचिकित्सागे संभवनीय है। ये सब जलकी अवस्थाएं बनाकर स्पष्ट कर दिया है कि जलमें समता और विषमता। भी उत्तम मध्यम अधम अवस्थाका अल हो सकता है और शरीरको समता भारोग्य है और विषमता रोग। समता यदिउत्तम मारोग्य प्रार करना हो तो उत्तमसे anम पवित्र स्थापन करनेडी सूचना के", ति" मादि पर बरसे जलही लेना चाहिये । पाठ इन मायामोका उतम विचार है भार विषमता दूर नेहा मा":" पर करा दोनों मिलकर "-यो:"द पनन है। इगरा संग जलमें औषधी तापर्य"सममा स्थापना और लिमहारारना"। जालका नाम ही "भमृत" है अर्थात् जीवन प रम हो इगलिया- " - सू०७, मं०१७] धर्म-प्रचार-सूक धर्म-प्रचार-सूक्त। (पि।- चातनः । देवतः- अग्नि (जातवेदा), ३ अग्नीन्द्री) स्तुवानमन आ यह यातुधानं किमीदिनम् । त्वं हि देव चन्दितो हुन्ता दस्योर्चभूविथ ॥१॥ आज्यस्य परमेष्ठिन् जातवेदस्त वशिन् । अग्ने तौलस्य प्राशान यातुधानान् विलोपय |॥२॥ विलंपन्तु यातुधानो अन्त्रिणो ये किमीदिनः । अथेदममे नो हविरिन्द्रश्च प्रति हर्यतम् ॥३॥ अग्निः पूर्व आ रमतां प्रेन्द्रो नुदतु बाहुमान् । बीतु सौ यातुमान्यमस्मीत्यत्य ॥४॥ पश्याम ते वीर्य जातवेदः प्रणों ब्रूहि यातुधानानृचक्षः। त्वया सर्व परितप्ताः पुरस्तात्त आ यन्तु प्रत्रुवाणा उपदम् आ रभस्त्र जातवेदोऽस्माकार्थाय जज्ञिपे । दूतो नौ अग्ने भूत्वायातुधानान् वि लोपय त्वममे यातुधानानुपवद्धाँ इहा बह । अथामिन्द्रो वजेणापि शीपाणि वृश्यतु ॥७॥ अर्थ- हे अमे ( स्तुवान) स्तुति करनेवाले ( यातुधानं किमीदिन ) घातक शत्रुओंको भी (गा यह ) यहा ले आ। (हि) क्योंकि हे देव । ( वन्दितः त्वं ) नमनको प्राप्त हुआ तू ( दस्योः ) अरका (हन्ता) हनन या प्रति करने वाला (यभूपिथ) होता है ॥ १॥ हे ( परमेष्ठिन् ) श्रेष्ठ स्थानमें रहनेवाले ( जातवेदः) ज्ञानको प्राप्त करनेवाले और (नन-वशिन् ) शरीरका संयम करनेवाले अमे! तू. (तौलस्य भाज्यस्य ) तोले हुए घी आदि का (प्राशन ) भोजन कर और ( यातुधानान् ) दुशेरो (वि लाफ्य ) विलाप करा ॥ २॥ (ये) जो ( यातुधानाः) दुष्ट ( अमिणः) भटकने गले और (किमीदिन. ) पाना है घे (दिलपन्तु ) विलाप करें। ( अथ ) और अब, हे भने ! ( इदं हरिः) यह हवि तू और (इन्द्र) इन्द्र (प्रनिह. यंतम् ) स्वीकार करो ॥ ३ ॥ (पूर्व. अमिः भारभतां ) पहिला अमि आरंभ करे, तया पश्चात् ( पाहुमान् इन्द्र प्र नुदा पाहुबलवाला इन्द्र विशेष प्रेरणा फरे, जिसे (सर्मा यातुमान् ) सय दुष्ट लोग (एत्य) आर (प्री) योरे, कि) (भयं भास्म इति) यह मैं हूं ॥४॥हे (जानवेद.) ज्ञाना । (ते वीयं पश्याम ) तेरा पराकन हम देखें । है (न-च:) मनुष्यों के मार्ग दर्शक ! ( यातुधानान् ) दुष्को ( नः) हमारा आदेश (प्र महि) विशेष रूपो कह दे । (पया) मे (पुरस्तात् ) पहिले (परितप्ताः )पे हुए (ते सर्वे) ये सर (इ मुपागा ) यह कहते हुए ( उप मापन्नु ) हमारे पाग माजाचें ॥५॥हे (जातरेदः) नी ! (भारभर ) भारंभ कर ( भस्माकम्भर्याप ) हमारे प्रयोजन किये ग (गाणे) उत्तम हुआ है। हे भो। तू हमारा दत पनकर यानुपानाको विशप करा ॥६॥हे अप्ने तू [पाधानान् ] दुर्गा [उपपदान् ] पि हुए मर्या माघार हि भा यह ] यहाँ लेआ। [भय ] और इन्द्र माने यममे [पमा]ि इनके मस्तक पृयतु] फाट डाले ॥७॥ इनका भाव हम सबमे पी लिया क्योंकि इस सूक्सरे ठीक भयानमें न भागा, राग गुप उरई। कई गन्दा भोंका विचार पहिले करना चाहिये । इरा एक्त के गमान मी भागासागर "भाम" ना कई पद भम उत्सा करनेवाले और सता रानिय निधिय करा पारि- ४.भ.प.भा स.)
अथर्ववेदका सुवोध भाष्य [काण्ड १, वाला। अग्नि कौन है ? पर पहुंचाने वाला यह दूत धर्मका उपदेशक ही है। इस सूरतमें अमिपद से किसफा ग्रहण करना चाहिये, ७ देवः-प्रकाशमान, तेजस्वी । इममा निश्य कराने वाले ये शब्द इस सूक्तमें हैं-"जातवेद, ८ अग्नि:- प्रकाश देकर अन्धकारका नाश करनेवाला, परमेष्ठिन्, तनूवाशिन्, दृश्क्ष , यन्दित , दूतः, देवः, अमिः ज्ञानकी रोशनी बढाकर अज्ञानान्धकार का नाश करनेवाला। इन शब्दास अर्थ देखकर अनिस स्वरुप सबसे प्रथम हम उष्णता (गर्मी) उत्पन्न करके हलचल करने वाला। देखेंगे- ये सब शब्द योग्य उपदेशक का ही वर्णन कर रहे हैं। इस १जानवेद --- [जातं वेत्ति ] जो घनी हुई मृष्टिको ठीक है । तथा 'इन्द्र" शब्द क्षत्रियका वाचक है । प्रकार वेदमें "अमि" शब्द ज्ञानी उपदेशक ब्राह्मगका वाचक र जानता है। ज्ञात-घेदः] जिसने ज्ञान प्राप्त किया है । अर्थात् शानी सृष्टिविद्या और आत्मविद्या का यथावत् जानने ब्रह्म क्षत्रिय । ब्रह्म क्षनिय" शब्द ब्राह्मण और क्षनिय का बोध करता २ परमेष्टिन्-(परमे पदे स्थाना) परमपद में ठहर- है। चेदमें ये दो शब्द इक्ठे कई स्थानपर गये है। यही पाला प्रधान रमाधिको अतिम अवाधाको जो प्राप्त है, भाव "अमि-इन्द" ये दो शब्द वेदमें कई स्थानोंपर व्यक्त आ मानुभय जिराने प्राप्त किया है, तुर्या-चतुर्थ अवस्थास १र रहे हैं । अनि शब्द ब्राह्मगका और इन्द्र शब्द क्षत्रियका अनुभव करनेवाला। पाचक है । अग्नि शब्दका बाझग अर्थ हमने देखा, अब इन्द्र ३ सनूमशिन्- (लन-पशिन) अपने शरीर और इन्द्रियोंो शब्दका अर्थ देखेंगे- ग्वाधान यरन वाला, इन्द्रिय संयम और मनोनिग्रह करनेवाल', इन्द्र कौन है? आगनाद योगाभ्यास जिसने अपनी कायासिद्धि की है। यही स्वयं इन्द्र शब्द क्षत्रिय वाचक है, क्योंकि इसका अर्थ मनुष्य" परमे.टन " होना संभव है। ही शत्रु नाशक है- ४ नृपक्ष-" चसम्" शब्द पट शन्द द्वारा उपदेश दने । भार यता रहा है। मनुष् को जो योग्य धर्म मार्गा १ इन्दः- ( इन्द्रः) शत्रुओको छिन्न भिन्न करनेवाला। २ याहुमान- पावाला, भुनावाला, अर्थात् पाहुयल के लिये सुप्रसिद्ध । हरएक मनुष्य भुजावाला होता ही है, परन्तु क्षत्रियको हो " पाहुमान् " इसलिये कहा दे, कि उसका कार्य उपदेश देता है।
सू.म.१-७ धर्म-प्रचार-सूक्त। (२७) - दस्यु, अत्रिन् । समान ही है । वास्तव में मालन कपडे को ही धोकर स्वच्छ जो कि बेदमें कई स्थानोंमें आते हैं, हीन और दुष्ट लोगा। करना चाहिये, इसी तरह अधार्मिक वृत्तिके लोगों को ही वाचक हैं । भव और दोसये- धर्मोपदेश द्वारा सुधारना चाहिये, यही सच्चा धर्म प्रचार है, ५ निव- अत्री (अतति ) सतत भटकता रहता है। यह यह बताने के लिये इस सूक्तमें धर्म प्रचार करने योग्य लोगोंका शब्द भी पूर्व शब्द का ही भाव बताता है । इसका दूसरा भाव वर्णन निम्न लिखित शब्दोंसे किया है--"यातुधान, किमीदिन, ( अत्ति ) खानेवाला, सदा अपने मोगके लिय दुमका गला काटनेवाला। जो थोडेसे धनके लिये खून करते हैं, इस प्रकार के अब इनका आशय देखिये दुष्ट लोगोंका वाचक यह शब्द है। १ यातु-"यातु" भटक्नेवाले का नाम है। जिसको घरदार ६ किमीदिन- (किं इदानी ) भव क्या साय, इस प्रकार कुछमी नहीं है और जो वाय पशुके समान इधर उधर भटकता की शत्तिगले भने किंवा पेटके लिये ६ दूसरोंग घात पात रहता है उसका नाम “यातु" है । भटकने का अर्थ बतानेवाला करनेवाले दुष्ट लोग। "या" धातु इसमें है। ७ दस्यु-(दस् उपक्षये) घातपात करनेवाले, दुसरीका २ यातुमान्- यातुमान, यातुवान्, यातुमत् शब्दका भाव नाश करनेवाले हर प्रकारके दुष्ट लोग। "यानुवाला" हे अर्थात् जिसके पास बहुतसे यातु (भटकनेवाले) ये सय लोग समाजके सुखा नाश करते हैं, इनके कारण लोग होते हैं । अर्थात् भटकने वालों के जमाव का मुखिया। समाज के लोगों को कष्ट होते हैं। ये ग्राम में आगये, तो ग्राम में ३ यातुमावान् - बहुतसे यातुमानों को अपने कामें चोरी, डकैती, सून, घरमार होती है, वो रिश्यक अयाचार रखनेवाला। होते है, सज्जनोंगे अनेक प्रकारके पद होते है इसलिये इन लोगों को धर्मोपदेश द्रा मुधारना चाहिये, यह इस सूफ का बादेश ४ यातुधान:- यातुओका धारण पोषण करनेवाला, अर्थात् है। जो परदारसे हान है, जो जगलों और यनों में रहते , जो भटकनेवालों को अपने पास रखकर उनसे पोषण करनेवाला । चोराना आदि दुष्ट कर्म करते है । उनको धो देश द्वारा “यातु धान्य" भी इसी भावना वाचक है। सुधारना चाहिये। अर्थात् जो नगरिक है, जो पहिलो पाठोंने जान लिया होगा, कि ये शब्द विशेष यातको व्यक ही धर्म प्रेमी है उनमें धर्म की जागृति कानी योग्य, पांगु कर रहे हैं। जिसको घरदार झोपुन भादि होते हैं, और जो फुटुंपमें जिनके पास धर्म की भायाज नही पहुची भार मिनरा जीरन. रहता है, यह उतना उपद्रव देनेवाला नहीं होता. जितना कि कम ही धर्मवाय मार्ग से सदा चलता रहता है, ना गुधार निमका परदार कुछमी न हो, और जो भटकने पाला होता करके ही उनको उत्तम नागरिक यनाना पाहिये । परदेश है। यह सदा भूखा रहता है, किसी प्रकारका मनका समा. यह सपना कार्य क्षेत्र देखें। धान उसको नहीं होता, इसलिये हरएक प्रकारका उपद्रव धर्मोपदेश के गुण, शासन कार्य में नियुक क्षत्रिय के गुर देने के लिये वह तैयार होता है, इसी कारण "यानु" चन्द और जिन लोगों में धर्म प्रचारपरी भयन भायउने र "बुरी पृत्ति पाला" इस अर्थमें प्रत होता है। दुष्ट, राकु, गुणन हमने इस सूक के आधारगे देगे। मप इन रामायके चौर, लटेर, परमार आदि इसी इन्दके अध भागे जाकर पने प्रकाश में यह सूल देखना- है। ये चोरसा जबतक अकेले अकेले रहने है,नय तक उनका दृष्टीका सुधार। माम "यानु" है, ऐसे दोचार हाकुओरो अपने वश रसार मयम मंत्र-" धादिशा! गुम्हारी प्रमाने. का गलनेवाला "यातु-मान, यानु-यान, यानमत्" अर्थात् बालं दुष्ट कनों को महाभा, पपॉटर पंदना En पागला किंवा गागला कहा जाता है । पहिले की अपेशा करनेपर दस्युभोग नाशक होता है"atn इस समाजको भापक पर पहुंचते हैं। इस पर डटे इम पहिले प्रयदरियन गरमाके बने मधाको मरने भाधीन सपने वाय" यानु, मा-वान्' भयात् सामोधी ई जमातोसो भाने साधीन रपनेला मा सी भरक्षा भघिर पर प्रामो भोर प्रोतों को भी पंपासा. नाम "शन मात्र थापामगान सरते?, RR न .
(२८) [कां०१, अथर्ववेदका सुबोध भाष्य समझा दे, उन दुष्ट क्मों से उन को वद निवृत्त करे, जब ये खाना चाहिये । ये उपदेशक सदा भ्रमणमें रहने के कारण तथा टंक प्रसार जानेंगे कि चोरी आदि उनके व्यवसाय बुरे हैं और जलवायुके सदा परिवर्तन होने से इनकी पाचक शक्तिमें विगाड मानयात्री रक्षा करनेवाला सत्य धर्म भिन्न है और वह सत्य होना संभव है। अतः जितनी पाचक शक्ति होती है, उससे भी धर्म इस धर्मापदेशरसे प्राप्त हो सकता है, तब वे इसके पास कम हो खाना इनके लिये योग्य है । इस कारण वेद कहता है, श्रद्धा भक्तिमे आवेगे, इसकी प्रशंसा करेंगे और इसके सामने कि उपदेशक तोलकर ही घी आदि पदार्थ खावें ।। कभी मिर झुकायेंगे अर्थात् इनको प्रणाम करेंगे । जब उनमें इतनी अधिक न खावें । श्रद्धाभक्ति यटेगी, तब उना डापनका नाश या हनन स्वयं हा हो जायगा। इमलिये मंन रहता है कि "धर्मोपदेशक दुष्ट मंत्रमें दुसरी वात "दुष्टोंको रुलाने" की है। यदि उपदे- मनु योको अपने उपदेशद्वारा अपनी प्रशंमा करनेवाले बनाकर शक प्रभावशाली होगा, और यदि उसके उपदेशसे श्रोताओंको अर्थात् अपने अनुगामी बनापर, अपने समाज में ले आये, अपने दुराचारका पता लगा तथा उनके अंत.करणम धर्म और उनमे नमसार प्राप करके उनका घातक बनें।" भावना जागृत हो गई तो उनके रो पडने में तथा अपने पूर्व दुग. 'जिनसे नारदार प्राप्त करना उनकाही घात करना" प्रथम नहीं है। इस प्रकार द्वितीय मंत्रका भाव देखनेके पश्चात् अप चारमय जीवन विषयमें पूर्ण पचाताप दोने में कोई सन्देहही विचित्र मा प्रतीत होता है, परन्तु अधार्मिक दुष्ट मनुष्यों के तीसरा मंत्र देखिये- गुधार करनेवालेसे ऐमाही मनता है । जय दुष्ट मनुष्य धार्मिक पन लाता है उस समय यह पहिले धोदेशक के सामने दुष्ट जीवन का पश्चाताप अपना सिर झुकाता है और सिर झुकाते ही दुष्ट मनुष्य के रूपसे तृतीय मंत्र- "दुष्ट लोग रो पड़ें, और हे धर्मोपदेशक! मर कर धार्मिक गवजीवन प्राप्त करने द्वार। वह मानो नया तेरे लिये यह हमारा दान है, क्षत्रिय भी इसका स्वीकार ही मनुष्य बनता है । यदि एक डाकुधर्मोपदेश सुनबर धार्मिक रे"॥३॥ पनगया, तो उसमा सामाजिक दृष्टिसे सत्य अर्थ यही है कि एदार मर गया और एक मया धार्मिक मनुध्य नया पदा सचे धर्मोपदेशक के धर्मोपदेश सुनकर दुष्ट लोगोंको अपने इमा। अप टगरा मन देखिये- दुराचारया पश्चाताप होवे बार रो पडें । तया जनता ऐसे धर्मोपदेशको तथा उनके सहायक क्षत्रियोंको भी या शति सू.७ म.१-७] धर्म-प्रचार-सूक्त। धर्मका दूत। . ऐसा हो, कि सब दुष्ट दुराचारी मनुष्य साना आचरण सुधारले वडे भावदा सूचक है। भय छठे मंत्रश भावार्थ देखिये- और खुले दिलसे उपदेशकोंके पास आकर कहें कि “हम अत्र आपकी शरणमें आगये हैं। यही धर्म प्रचारका साध्य है। धर्म पष्ट मंत्र-" हे ज्ञानी पुरुष! अपना कार्य भारंभ कर । प्रचारसे दुराचारी डाकु सुधर जाय और अच्छे धार्मिक बनें, वे हमारे कार्य के लिये ही तुम्हें भागे किया है । हे उपदेशक ! अपने पूर्व दुराचारका पश्चाताप करें, तथा जब पूर्व दुराचारका तू हमारा धार्मिक संदेश पहुंचाने वाला दूत बन कर दुष्टॉको उनको स्मरण आवे उस समय उनको रोना आवे । क्षनियके पश्चात्तापसे रला दे॥॥६॥ बल की अपेक्षा न करते हुए केवल ब्राह्मण ही अपनी धार्मिक धर्म प्रचार के लिये बाहर जानेवाले उपदेशको लोग कहते और आत्मिक शक्तिसे यह कार्य करें। पिछले क्षत्रिय उनको है कि- "भब तू अपना धर्म प्रचारका कार्य आरंभ करदो। विना मदत पहुंचाये । क्षत्रियके जोरसे जो धर्म प्रचार होता है, वह डर देशदेशातरमें जा और वहा सत्यधर्म का प्रचार कर । यही सत्य नहीं है, परन्तु ब्राह्मण अपने सात्विक वृत्तिसे जो हृदय हमारा कार्य है और इसी कार्यके लिये तुम्हें आगे भेजा जाता है, पलटा देता है, वही सचा धर्मपरिवर्तन है । इस प्रकार चतुर्थ अथवा आगे रखा जाता है। हमारा धार्मिक संदेश जगत्में मंत्रका आशय देखने के पश्चात् अव अगला मंत्र देखिये फैलाना है, इन संदेशको स्थान स्थानमें पहुंचानेवाला दूतही तू है। अब जा और धार्मिक संदेशको चारों दिशाओम फैला दी दुष्टों की पचात्तापसे शुद्धि। और इस समय तक जो लोग अधार्मिक वृत्तिमे रहते हैं, उनको पंचम मंत्र-- " हे ज्ञानी उपदेशक ! हम तुम्हारा पराक्रम अपने सदुपदेशद्वारा शुद्ध करो और उनको अपने पूर्व दुराचारवा देखेंगे। हे मनुष्योंको सन्मार्ग बतलानेवाले! तुम दुष्टोंको पूर्ण पश्चात्तार होने दो। उनके दिलोंगो ऐसा पलटा दीकि हमारे धर्मका उपदेश करो। तुम्हारे प्रयत्नसे पद्याशाप जिससे वे अपने पूर्वाचरणका स्मरण करके रोने लगे।" इस को प्राप्त हुए सब दुष्ट लोग हमारे पास भावे और वैसाही प्रकार जगन्ना सुधार करने के लिये धर्मों को भेजा जाता कहें।"॥५॥ डाकुओको दण्ड । कि प्रकारका सद्या धर्मोपदेशक जिम समय धर्मोपदेश के लिये चलने लगता है, उस समय उसका गौरव करते हुए इतना धर्मोपदेश होकर भी जो मुधरेंगे नहीं और अपना लोग कहते हैं कि "हे उपदेशक ! अब तू उपदेश करने के लिये दुराचार जारी रखेंगे भयका पूर्वाक प्रकारके घेट धर्मादेश । जा रहा है, हम देखेंगे कि तुम अपने परिशुद्ध सदुपदेशमे पराकाष्टाके प्रयन करनेपर भी ओ अपना दु? नाचरण नही कितने लोगोंके हदमें पलटा उत्पन्न करते हो और किननों छोडते और जनताको चोरी उनी भादिय अयंत कष्ट देते ही को सत्य धर्मकी दीक्षा देते हो । इमामे तुम्हारे पराममा रमें रहेंगे, उनको योग्य दाइ देना Bामा कार्य नहीं, यह पार्य पता लग जायगा । तुम जाओ, हम तुम्हारा गौरव करते हैं। क्षत्रियका है यह आशय अगले मंत्रमें हार- सत्यधर्मका संदेश सय जनता तक पहुंचा। तेरे उपदेश की सप्तम मंत्र- "धर्मापदंशक ! तुम्हारे प्रपद परनेपर मी शानामिसे तपे हुए और पश्चात्ताको प्राप्त हुए लोग हमारे अंदर दुष्ट धातु धादिभपने दुराचार छोडते नहीं उनमेयोच कर यहाँ मा भार कई कि दमने भय धर्मामृत पाया है। और अय लागौर पश्चात् क्षत्रिय उनके पिर नगारमे धार दे""" हम भापके घने है।" घेष्ठ धादिशा भरना पोपदेशका प्रया को और "तम, संतम, परता" ये शब्द पश्चाताप के सूचक है । तप शतपकर शुद्ध होनेवा सूचक है। अमितरावर सोना, चांदीताया आदि धातुओमे शुदरता है अर्थात् उनके लोको दूर करता है। इसी प्रकार यहाँका आम-जो शनी भोशिक है-या अपनी सानामि सर दुष्टतो तराना है और माछो प्रकार उनके मला दूर करता है। शादेको यहाँ गिध दे। भोग आपनको छोडकर सरक जीवन में भाना ही पार्मिबनना है। इस गइम मंत्राt-तमा" पद -
(१०)
अथर्यवेदका सुबोध भाष्य
(को०१
अन्योको भी यह उपदेश मिल सकता है, कि हम भी धार्मिक वेदमें जहा " हनन, दहन, परिताप, विलाप " आदि शब्द
चननेसे बच सकते हैं, नहीं तो हमारी भी यही अवस्था आते हैं वहां सर्वत्र एकसाही अर्थ लेना उचित नहीं । वे शब्द
बनेगी।
ग्राह्मण के लिये प्रयुक्त हुए हैं वा क्षनिय के लिये हुए है यह
ब्राह्मण और क्षत्रियोंके प्रयत्नका प्रमाण ।
देखना चाहिये । हनन से शनुको संख्या घटती है, ब्राह्मण,
क्षत्रिय दोनों अपने अपने शनसे हनन करते हैं, परन्तु कार
इस सूफमें ब्राह्मगके प्रयान के लिये छ मन हे और एकही यतायाही है, कि ब्राह्मग विचार परिवर्तन द्वारा शनुका नाश
मनमें क्षत्रियका कठोर दण्ड आगे करनेको सूचित किया है। करता है और क्षत्रिय शिरच्छेदादि द्वारा शत्रुको घटाता है । इसी
इससे स्पष्ट है कि कमसे कम छ गुणा प्रयन ब्राह्मण अपने प्रकार विलाप" भी दो प्रकार का है । क्षत्रिय शत्रुको कतल
मदुपदेशन करें, इतने प्रयत्न करनेपरभी यदि वे न सुधरे, कमसे करता है उस समय भी शत्रुके लोग विलाप करत है और रोते
कम छ बार प्रयत्न करनेपर भी न सुधरे छ वार अवसर देने- पीटते ही है। उसी प्रकार माह्मण धर्मोपदेश द्वारा जिस समय
पर भी जो रोग दुरता नहीं छोडते, उनपर ही क्षत्रियका वन श्रोताओंफ हदयमें भक्तिभाव और धर्मप्रेम उत्पन्न करने द्वारा
प्रहार होना योग्य है । क्योंकि उिनको जमसे ही दुतारने कृत दुराचारका पाताप उत्पन्न करता है उस समस भी के
का अभ्यास होगा वे एक बारके उपदेशसे पट जायगे अथवा लोग रोते हैं और आसू बहाते हैं। इन दोनों आंसू बहाने में
सुधरेंगे यह कठिन अपवा अशक्य है । इसलिये भिन्न वहा भारी भेद है। जो इस परिवर्तन ब्राह्मण कर सस्ता है,
उपायोगे उनको अधिक अवसर देने चाहिये । इतना करनेपर वह क्षारय दापि नहीं कर साना। यही बात "परितार,
भी जो नहीं सुधरते उनको या तो बंधन में डालना या सन्ताप' आदिके विषयमें समझनी चाहिये ।
शिरछेद करना चाहिये।
ब्राह्मण भी हनन करता है और क्षत्रियभी करता है परन्तु
इस सूचका अर्थ करनेवाले विद्वानाने इस ब्रह्मक्षत्रिय प्रणा•
दोनों हननों में यहा भारी भेद है। पहिले मन्त्र में ब्राह्मण
लोके भेदको न समझने के कारण इन शब्दोंके अर्धाका वडा
की रीति बनाई है और सप्तम मत्रमें क्षत्रिय की पदति बतादी अनर्थ पिया है। इसलिये पाठक इस भेदा पहिले समझे
है । एप्रिय की राति यही है कि तलवार लेकर दुष्टका गला काट और पश्चात् मन्त्रों के उपदेश जाननेगा यत्न करें । यह पात
पारना, अथवा दुसरी कारागृह में पान्धार रसना । बाह्मग
एकार ठीक प्रगार समझमें भागई, तो मन्त्रोंग आशय समा-
की राति इससे भिन्न है। मानण उपदेश घरता है, उपदेश में कोई कठिनता नहीं होती, परन्तु ब्राह्मणों और क्षत्रियों के
द्वारा श्रोताओंक दिलीको पलटा देता है, उनको अनुगामी यना प्रमश कोमल और तीक्ष्ण मार्गोंका भेद यदि टोक प्रकार सम
देता है. उनके मनकी दुता का नाश करता है। दोनों में नहीं आया, तो का अनर्थ प्रतीत होगा । इगाये
टोस्य दादी सा या कम करने का ही होता है, परन्तु प्राण दुष्टोका समया ब्राह्मण सि प्रकार घटाना है और क्षत्रिीस
दुर्गाको सुधारने प्रयत्न करता है, हृदय गुट बनाना प्रभार पटाता है, इसी प्रकार ये दोनों शत्रुओंग म राति
या गया पगता है। और हाय उनको हते हैं, तपाते है और जाते है, यह पाठ अपने विचार से
उनका या पटासा | सालिगमा प्रयन मोर यहा पताये मार्ग ठीक यम और ऐसे गूफोगा तात्पर्य
भार सवियर गरे ।
जाने।
(८)
(पि:-चातनः । देवता-अमिः, पृहस्पतिः)
हषिपातुधानान् नही पनमिया बहन् । य इदं स्त्री पुमानकरिह म स्वतां जन ॥१॥
अपं पान आर्गमदिन म पनि दयंत । यदग्पत पा लम्पानीपोमा विविध्यनम् ॥२॥
पानुपानम्प गोमप हि प्रजा नपथ र 1 नि म्यानम्मे पातय परमानापरम् ॥३॥
सू०८, मं०१-४] धर्म-प्रचार-सूक्त ~ यौपामने जनिमानि वेत्थ गुहाँ सत्तामत्रिणां जातवेदः । तांस्त्वं ब्रह्मणा वावृधानो जो पां शतहमने ॥४॥ अर्थ-(नदी फेनं इय) नदी पेन को जैसी लाती है उस प्रकार (इदं हविः ) यद दान ( यातुधानान् भारहत) दुधों को यहो लावे । (यापुमान् )जो पुरुष अथवा जो स्त्री (इद अका) यह पाप करती रही है । (साजना) वह मनुष्य तेरी (स्तुघतां ) प्रशंशा करे 11 १॥ (स्तुपानः अयं ) प्रशंपा करने वाला यह डाऊ (आम) आया है, (इ) इसका (स्म प्रति हर्यत) अवश्य स्वागत करो। हे (बृहसते ) ज्ञानी उपदेशक ! इस को (वशे लब्ध्या) वशमें रसर, है (अग्नी. पोमो) ममि और सोम ! (विविध्यतं ) इसा विशेष निरीक्षण करो ।। २ ।। हे (सोमर ) सोमपान करनेवाले ! (यासुधानम्य प्रजा) दुष्टवी सन्तान के प्रति (जहि ) जा, पहुंच और ( च नयर ) उन्हें लेजा अर्यार सन्मार्गसे चला । तया (स्तुवानस्य ) प्रशंसा करनेवालेका ( परं उत अवर) घेष्ठ और रनिष्ठ (अशि) आरा (नि पातय ) नीचे कर दो॥ ३ ॥ हे (माने जातवेदः) तेजस्वी ज्ञानी पुरुप ! (यत्र गुहा) जहा कहाँ गुफा (एषा ) इन (भत्रिगां सतां ) भटरने वाले सजनों के (जनिमानि ) कुलों और संतानों को (चैत्य ) तू जानता है ( तान् ब्रह्मणा वावृधानः ) उनको ज्ञानो पदाता हुआ (पा सतत जहि ) इनके सरडा कटोका नाश कर ॥ ४ ॥ यह सूत भी पूर्वसूक्त का है। उपदेश विशेष रीतिसे यताता हो या पुरुष हों, जो ओई उनमें पागरण करनेवाला हो, यह है। दुष्ट लोगोंको किस रीतिसे सुधारना योग्य है इसम पिचार उपदेश सुनते ही धर्म मापसे पेरित होरर तथा धर्ममें लाने के इस सूक्तम देखने योग्य है। इस सूकमे ग्राह्मण उपदेशक का लिये उत्सुर होकर, धर्म प्रशंसा करे और अपनीयता एक और विशेष भागया है वह "यहरुपतिः" है। इसका अर्थ निंदा परे । पाठर ध्यान रखें, कि हृदय भाव परिवर्तित ज्ञानपति प्रसिद्ध है, बृहस्पति देवोंका गुरु ब्राह्मण ही है; इस- होने का यह पहिला लक्षण है । धर्ममें प्रविष्ट होने पमान धर्म- लिये इस विषयों का ही नहीं है। "सोम" शब्द इसीका पके लोग वयस प्रकार पायरण को इस विषयमा उप. घामक इस सूक में है। " सोमोऽस्माकं ब्राह्मगाना राजा।" देश द्वितीय मंत्रमें देखिये- प्रामगों का मुखिया सोम है, उसी प्रकार वृहस्पति मी श्रेष्ठ ज्ञानी मारण हो। पाठक इन शब्दोंको पूर्वोक सहके ग्रामण वाचक नवप्रविष्टका आदर । शब्दों को साथ मिलाकर देरों और समरा मिलकर मनन करें, द्विीप मंग्र-"यह म्नुनि करता हुभा गागया है, गरा सो उनको पता लग जायगा कि धर्मोपदेशक मामण किन गुगामे स्वागत फरी। हे ज्ञानी पुरण ! समग गपने पारण कर, युक्त होना चाहिये। भय प्रमश: मन्याश भाशय देखिये- माम मोर उनका मुपिया ये उस पर न २॥" -
०.१,०१-४]
पाति-सूत।
(३)
वर्चःप्राप्ति-सूक्त।
यह सू "वर्चस्य-गण" या प्रथम सूरू हे । वर्चम्पगणक सूको "तेज संवर्धन, बलसवर्धन, धनको प्राप्ति, परवी पुष्टि,
समाज या राष्ट्रम सम्मानप्राप्ति" आदि अनेक विषय होते हैं। वर्चम्यगगमें कई सूक्न हैं, उनका निर्देश भागे रमी उसी
स्थानपर किया जामगा-
-
[प्रापिः-अथवी देवता-यस्वादयो नानादेवताः
अस्मिन्बसु वसवो धारयन्त्विन्द्रः पूषा वरुणो मित्रो अमिः।
हुगादित्या उत विश्वे व देवा उत्तरस्मन् ज्योविपि धारयन्तु
अस्य देवाः प्रदिशि ज्योतिरस्तु सूर्यो अमित वा हिरण्यम् ।
सपना अस्मदरे भवन्सूत्तम नामधि रोहयेमम्
येनेन्द्रीय समभाः पोस्युत्तमेन प्रणा जातवेदः ।
तेन त्वमन हुह वर्षयेम सजातानां श्रेष्ठय आ घेखेनम्
एपौ यज्ञमुत यों द्देऽहं रायस्पोपमुव चित्तान्यो ।
सुपत्नो अस्मदर्धरे भवन्तूतमं नाकमधिरोहमम्
॥२॥
॥४॥
मर्थ-(अस्मिन) इन पुरुषमे (पसपः) यमु देवता तथा इन्द्र. एषा, वरुण, मित्र, अग्नि ये देव (पशु) धनगे (भारय.
तु) धारण फरें। भादित्य विधे देव (इमं ) इम पुरुषको (उरारस्मिन् ज्योतिषि) पनि आम तेजमें धारण पाँ
॥ १॥ हे ( देवाः ) देवो । ( भस्य ) इस पुरके ( प्रदिशि ) मादेश ज्योति, सूर्य, अनि श्रीर रिय (म) हो ।
(सपरमाः ) पानु (मस्मत् भधरे ) हमारे नाचे (भवन्त ) होवे और ( इम) इसको (उराम नारं ) TR मुगमे (गधि
रोहय ) तुम पढाभो ॥२॥हे (जातवेदः ) शानी उपदेशक । (येन उसमेन मझगा) जिस उत्तम सनसे इसके लिये
(पयोगि समगः ) दुग्धादि रा दिये जाते है (ग) उस उत्तम गानगे, हे ( ममे ) देशस्वी पुणवर्ग) गो(१८)
यहा र वर्धय ) बागो और (एनं ) इसको (समानां श्रेष्टये ) मानी जातिमें श्रेष्ठ मानमें (माहि) स्थानि ॥२॥
(भाने तेभरवी पुरस। ( प ) इनके या, (वर्ष ) तेभ, (रायः पो) पनकी यि और पित्त भादि (1t
भादरे) में प्राप्त करता हूं। (मना ) शत्रु हमारे नाचेके स्थानमें रहे और (इम )ग मनुष्यो उनम गुसमें (मधि रोप)
पहुंचा दो॥४॥
अथर्ववेदका मुयोध भाष्य। [को०१, रक्तादिधात शुद्ध वायु अमशन यारा .. क्षानतेश स्यपि देवनाश समाज देवता विश्वमें देवता इस सूक्तमें प्रारंभ हो "असिन्" पद है इसका अर्थ "इस निवासक साकियां समास्यतिकी पसवा (अ) मनुष्य" ऐसा है। प्रश्न होता है कि किस मनुष्यके मेश्यसे पाठ शक्तियाँ यह शब्द यहां आया है ? पूर्व सूक्त के साथ इस सूका संबंध स्थूलशरीर मातृभूमि पृथ्वी देखनेस स्पष्टतापूर्वक पता लगता है कि इस सब्दका संबंध जल नदी नद आदि भा पूर्व सूक्तमें वर्णित "नवप्रविष्ट शुद्ध हुए" मनुष्य के सपही है । परीरका तेन अग्नि विद्युत् आदि तेजः ज्योतिः जो मनुष्य मनको वृत्ति पदलनेके कारण अपने धर्म प्रविष्ट राण वायुः हुआ है, उसकी सबसे अधिक उन्नति करनेकी इच्छा करना स्थान आकाशः प्रत्येक मनुष्यका आवश्यक कर्तव्यही है। अपने धर्ममें जो थे. औषधि, वनस्पति धान्यादि सोमः से श्रेष्ठ प्राप्तव्य है. वह उसको शीघ्र प्राप्त हो, इस विषयको प्रकाश अह इच्छा मनमें धारण करनी चाहिये, अर्थात् उसको विशेष तेज इन्द्रिय गग साधारण जनता नक्षत्राणि, देवाः प्राप्त हो ऐमा इन्छा घग्ना चाहिये । यद्यपि इस सूक्तका पूर्वा- ग्राभग, ज्ञानी मनुष्य मान् पर संबंध देखनेसे यह सूफ नव प्रविष्ट की तेजस्कि लिप ? क्षत्रिय वीर ऐसा प्रतीत होता है। तथापि हरएक मनुष्यकी तेज हदिक सा. पुष्टि राष्ट्रपीपक अधिकारी पूषा मान्य निर्देश भी इसमें है और इस दृष्टिसे यह सामान्य सूफ सातभाव जनाधिकारी सम मनुष्य के उपयोगी भी है । पाठक इसका दोनों प्रकारसे मिसमाप मिन जन मित्रः विवार करें। पानी शनी उपदेशक सातंत्र्य अय यहां पूर्वोक मंत्रोंग भावार्थ दिया जाता है और पा खतंत्र विचार के लोग आदित्या नेत्रदर्शनशक्ति दार्शनिक विद्वान् भावार्थ देनेके समय व्याक्षिमें जो देवतांश है उनको लेकरती सूर्य गय दिस गुण राम विद्वान्, कारीगर दिया जाता है। पाठक इसकी तुलना पूर्वोक्त कोएकसे करे- विश्वेदेवाः हिरण्य उम्भतिका मूलमन्त्र सपत्नाः प्रथम मंत्र " इस मनुष्य को नियासक शक्तियाँ है तथा मानंद नाक (वर्ग) धार पल, पुष्टि. शाति. मित्रता तपा पाणी आदिकी शकियां सेगा उत्तम ज्योतिः हैं, ये सप शकिया इसमें धन्यता स्थापित करें। इसके स्वतंत्र मप्यमं॥ विचार और इसकी सब इंद्रियां इसको उत्तम सेगमें धारण करें थपमं ॥ "" पुममें अंशयारका दैदिक भाव वर्णन बिरार अपत्य परिष(सायाप मंसदारा पक्ष्या अग्नि धन दुष्ट विचार साधानता " मप " TENTITM) ०९, म०१-४] वर्चप्राप्ति-सूक्त। . अंदर समता और शांति रखना, (५) मनमें मित्रभाव पढाना तात्पर्य-मनुष्य इन्द्रिय-संयम और मनोनिन करके अपनी श. और हिंसक भाव कम करना, तथा (६)वाशीकी शाफ विकसित किशेको अपने आधीन रखे। अपनी इन्द्रियों को अपने आधान करना। इन छः शक्तियों के बढ जानेसे मनुष्य हरएक प्रकारका रखना आत्मविजय प्राप्त करना है। इस प्रकारका आत्मावजयी धन प्राप्त कर सकता है और उससे अपने आपको धन्य बना मनुष्यही शत्रुऑको दया मुकता और उत्तय सुख प्राप्त कर सकता है। यहां का " वसु" शब्द धनवाचक है परंतु यह सकता है । यादे जगत् में विजय पाना है, शत्रुआको दयाना है, धन केवल पैसाही नहीं, परंतु यह वह धन है, कि जिससे तथा उत्तम सुख कमाना है, तो अपनी शाफोम सबसे प्रथम मनुष्य अपने आपको श्रेष्ठ पुरुषों में धन्य मान सकता है । इस खाधान करना चाहिये, यह महत्वपूर्ण उपदेश यहाँ मिलता है। मसुम सच निवासक शक्तियों के विकाससे प्राप्त होनेवाली धन्यता अब सृतीय मंत्र देखिये- मा जाती है। (१) "निवासक शक्ति, (२) क्षात्रतेज, शानसे जातिमें श्रेष्ठवाकी प्राप्ति। (३) पुष्टि, () समता, (५) मित्रभाव, (६ वक्तृत्त्व," इन छ: गुणोंकी वृद्धि करने की सूचना इस प्रकार प्रथम तृतीय मंग्र-" जिस उत्तम ज्ञानसे क्षत्रियको उत्तमोत्तम मंत्रक प्रथमाधम दी है और दूसरे अर्थ में कहा है कि (0) रस प्राप्त होते हैं, हे धर्मोपदेशक ! उसी उनम मानसे यहा इसके स्वतंत्र विचार और ( ८ ) इसकी इदिय शक्तियां इनको इस मनुष्यकी वृद्धि कर मौर अपनी जाति में इसे घेता प्राप्त हो ॥३॥ उत्तमोत्तम तेजस्वी स्थानमें पहुंचायें । मनुष्य के खनन विगरही मनुष्यको उठाते या गिराते हैं, उसी प्रकार इद्रिया स्वाधीन सानियको. इन्द्रो अथवा रामागे जिस शन उत्तम भोग रही तो ही वह संयमी मनुष्य श्रेष्ठ बनता है अन्यथा इद्रियों के प्राप्त होते हैं और जिस शानरे वह सो श्री सनमा जाता है, बाधीन बनकर दुर्व्यसनी बना हुआ मनुष्य प्रतिदिन हीन होता वह शान इस मनुष्यो प्राप्त हो और यह मनु य भी माही भाता है । मनुष्यको निःसंदेह उन्नति करनेच यह अपविध अपनी जातिमें अथवा अपन राष्ट्रमें श्रेष्ठ रन । राष्ट्रके हरएर साधन प्रथम मंत्रने दिया है। वह हरएक मनुष्यको देखने. पुरुषको धेठ ज्ञान प्राप्त करने के म साधन पुले रहने चाहिये। योग्य है । भव दूसरा मंत्र देखिये- यह मनुष्य नूतन प्रवष्ट हो वा उसी शातिमें उत्पन्न हुआ हो। तथा हरएक मनुष्य में यह महत्वाकांक्षा होनी चाहिये मैं विजयके लिये संयम । भी उस ज्ञानको प्राप्त करके पैसाही ? यन ग, में माना जा द्वितीय मन-" हे देवो! इस मनुष्यकी भाशामें तेज, तिका नेता बनूंगा और अपने देश घेता प्राप्त करना। यह भेत्र, शाणी भोर धन रहे। हमारे शत्रु नीचे हो जाय और मंत्रा आराय हरएको नित्य सरगमे रखना उचित है। इसको सुपकी उत्तम अवस्था प्राप्त हो ॥२॥ भगला मंत्र देखिये- इस मंत्रम " ( अस प्रशिशि सूर्यः अस्त । इसकी आशामें सूर्य रहे" यह वाक्य है । पाठक जान सहते है कि रिसो भी मनुष्यही माशामें सूर्य रह ही नहीं सकता, क्योंकि वह मनुष्यही धाधिमे बाहर है. परन्तु सूर्य मंश जो शरीरमें नेत्र स्थानमें रहता है और जिसने इन्द्रिय कहते है वह तो संयमी पुरुषके मापीन बह सकता है। इससे पूर्व बोटकी बात सिर होती है कि व्यक्केि विषय में विचार करने समय देवतामा परीरस्थानीय अंग्रही लेने चाहिये अमा किपाले मत्रमें किया है और इस मंत्र में भी करना है। "
सू०१० म०९-४]
(३७)
असत्यभाषणादि पापोंसे छुटकारा।
(अपि-अप देवताः१ असुर, २-४ वरुणः।)
अयं देवानामसुरो वि राजनि पशा हि सत्या वरुणस्य राज।
रातपरि ब्रह्मणा शाशदान उग्रस्य मन्योरुदिम नयामि
नमस्ते राजन्वरुणास्तु मन्यवे विश्व छ नि निचिकेपि द्रुग्धम् ।
सहसमन्यान्न सुवामि सार्फ शतं जीपाति शुरदस्त वायम्
॥२॥
यदुवस्थानृतं जिहाँ जिनं बहा राजस्था सत्यधर्मको मुशामि बरुणाहम्
मुञ्चामि त्या पैश्वानरादर्णयान्मदुतस्परि । सजातानुग्रदा यद मम चापं चिकीहि नः ॥४॥
अर्थ-(भयं) मठ (देवानां असुरः) देवाको भी जीरन देनेवाला ईश्वर (पिरानति) प्राता है। (हियोकि (IT:
पदणस्य ) राजा परण देव अर्थात् ईश्वर से (क्सा | इच्छा ( सत्या )बल है । (सः परि ) इतना होनेरर मी (मागा)
भागसे (HITदाना ) तीण बना हुभा में ( उमाप मन्योः) प्रचंट वरके मोपये (इम) इस गपो (उग मयामि)
ऊपर उठाता | 2n हे (परण राजन ) ईश्वर (से मन्यये ) तेरे मोपो (नम भरनु ) नमसार होते। ( उम)प्रचंड
वर! तू (पिथं हुग्धं ) सर दोहादि पापोको (निधिकेपि ) टीक प्रसर जानता है । ( सदर भन्यान नारों योग(सार)
साप साप मैं (प्रसुवामि) प्रेरणा परता हूँ। (प) यह मनुष्य (तप) तेरा पनहर ही (पदारदः) यी पर्ष (जागति)
जीता रह सकता है ।। २॥हे गरम्य (पद) जो (अनून वृजिनं ) पसरप और पार पपन (निया) बिहाये ( यदु उपरप)
यदुतसा सू बोला है, उससे तथा (सपा) संये न्यायो (श: यस्गात ) राजा का देव ईश (भई) (या)
गएको (मुखामि) सुमताई ॥३॥ मनुष्य क्या हुसको (महराः येशनराव भणंगम् )२टे समुपये समान ना.
यक देयो (परि मुशामि) घुगताई।हे (उम) RTC) हो (मगठान ) अपनी मातिगो (माया) पारे
भीर (ना) दमारा (मा) शाग (भप चिदि) गन ॥1॥
(३८) अथर्ववेदका सुबोध भाष्य। testo & शरदस्तवायम् । "- . पापसे छुटकारा पानेका मार्ग आकर रहते हैं, हम अपने आपमे तेरी इच्छामें समर्पित करते यद्यपि यह सूक्त अति सरल है तथापि पाठकों के विशेष है। तू ही हमारा तारनेवाला है। तेरे विना हम किसी अन्यको सरल बोधके लिये यहां थोडासा स्पष्टीकरण किया जाता है। शरण जानेयोग्य समझते नहीं। ( मंन २) इस सूक्त में पापसे छुटकारा पानेका जो मार्ग बताया है वह (३.)" शतं जीवाति निम्नलिखित है- वर्ष जीवित रहेगा जो तेरा बनेगा। जो परमेश्वरका भक्त बनकर एक शासक ईश्वर। रहेगा उसका नाश कौन कर सकता है ? (मंत्र २) ॥ देवानां असुरो विराजति "-सूर्यचंद्रादि पाठक इन तीन मंत्रमागोंमें ज्ञान और ईशभकिसे पाप- देवोंको विविध शक्ति देनेवाला एक प्रभु ईश्वरही सब जगतका मोचनकी संभावना देख सकते हैं। सृष्टिविद्या के नियमोंको जा. परम शासक है । इससे अधिक शक्तिशाली दूसरा कोई नहीं नकर तदनुकूल आचरग करना, मात्मविद्याको जानकर परमा- है। (मंत्र १ त्माको सार्वभौम सत्ताधारी मानना, भक्तिसे ईश्वरके सन्मुख नम्र (२)" राज्ञो वरुणस्य वशा हि सत्या "-उस प्रभु. बनना और ईश्वरका भक्त बनकर आनन्दसे उसका होकर रहना ईश्वरका मत्य शासन है । उस की इच्छा सोपरि है। यही पापमोचनका सीधा और निश्चित मार्ग है । पाठक इस अपूर्व शासनका कोई उल्लंघन कर नहीं सकता। (मंत्र १) सूक्तमें यह मार्ग देखें । इस सूकमें जिस मार्गसे पापमोचनकी (३) विश्वं हथुम निचिकेपि दुग्धम् "-हे प्रभु संभावना कही है वह यही मार्ग है और यही निश्चित और सीधा ईश्वर ! तु हम सबके पापोंको ययावत जानता है । अर्थात् मार्ग है। कोई मनुष्य अपने पाप उससे छिपा नहीं सकता। क्योंकि प्रायश्चित्त । यह सर्वश है इसलिये हम सबके बुरे भले कर्म वह यथावत् पापसे बचने के लिये प्रायश्चित भी यहां कहा है और वह उसी समय जानता है। (मंत्र २) यहां देखनेयोग्य है- ईश्वरको सनोपरि मानना, सबसे सामर्थ्यशाली वह है यह (१)" ब्रह्म अपचिकीहि । "-पूक्ति ज्ञान आनकर सारण रखना और उससे छिपाकर कोई मनुष्य कुछ कर नहीं अपना उत्तम ज्ञान प्राप्त करना, तथा संक्षपसे जो नियम सकता, यह निश्चित रीतिसे समझना, पापसे बचने के लिये आ ऊपर बताये हैं उनको जानना यह उन्नतिका निश्चित साधन पश्यक है। पापसे बचानेवाले ये तीन महत्त्वपूर्ण विश्वास इस है । जब इस ज्ञानसे अपने अवगुणों का पता लगेगा, अपने दु सूक्तम कहे हैं, पाठक इनका मनन करें और इनको अपने अंदर राचारका ज्ञान होगा तब पश्चातापसे शद्धि करनेका मार्ग है, स्थिर करें । येही तीन भाव मनुष्यका पापसे बचाव कर सकते है। यह इस प्रकार है-(मंत्र.४ ) ज्ञान और भक्ति। (२)" सजातानुदा वद। मनुष्यो। पापसे बचानेवाले ज्ञान और भक्ति ये दो ही हैं। Ma Ta Taal पुरुषों के सम्मुख अपने अपराधों जातिके पुरुषों के सामने अपने सब अपराध कह दे। यही प्राय: इनका वर्णन इस सूक्तमें निम्नलिखित शैतिसे किया है- (१)" प्रह्मणा शाशदानः | "ज्ञानसे तीक्ष्ण पना हुआ को न छिपाते हुए कहना, यह वहा भारी प्रायश्चित्त है और इसमें मनुष्य पापमे पच जाता है और दूसरोंको भी बचाता है। मनुयके मनकी शुद्धि होती है । ( मंत्र ४) सरिक सथा भारमाके यथार्थ विज्ञानको "ब्रह्म" कहते हैं। ज्ञान प्राप्त करनेक पक्षात् या जिस समय पश्चात्ताप हो उस यामा अर्थात् सृष्टिविद्या और आत्मविद्याका उत्तम ज्ञान STHAT की पवित्रता हा कार्य है । हरएक मनुष्य समय अपने सब अपराध अपनी जातिके सम्मुख कहना बडा मनुष्यको ताश बनाता है। भयात् तेज बनाता है। जिस प्रकार तेन शान शत्रुका नाश करता है उसी प्रकार ज्ञानका तेन शस्त्र इस प्रकार प्रायश्चित्त नहीं कर सकता । प्रायः मनुष्य अपने अपर भी महान पाप भादि अनुओं का नाश करता है। मनुष्यको धोको छिपाने ही यरन करते हैं परंतु जो लोग अपने दोषोंको मंत्री उमतिका यही साधन है। (मंत्र!) जनताके सम्मुख कह देते है शख बनकर शीघ्रही बडे ()"नमस्ते राजन् परगाम्त मन्यवे।" हेश्वर महात्मा पन जाते हैं। तेरे पोषके सामने हम नमन करते ,तेरे धामनके सामने इस सूक्तमें "वक्षण" आदि छन्दों द्वारा परमारमा वर्णन रम नपना सिr एकति है। भर्पत रम तो पण, हुमा है, " मुनामि " भादि पदोंसे पापिलोको पापसे " -हे वार ! तू अपनी ।
२०११, ० १.६] सुख-प्रसूति-सूना . छुडानेवाला मोपदेशक कावर्णन है और "इम' आदि शब्दोंसे धोखा । धोखा देना, काया-वाचा-मनसे विश्वासपात करना, महा पापी मनुष्योंका भी वर्णन हुआ है। धर्मोपदेशक पापियोंको पापसे पाप है। इसमें बहुनसे पाप मा जाते हैं। (मं• २) बचानका उपदेश परमेश्वरभक्तिका मार्ग बताकर कर रहा है, जिज्ञासे यह बात इस सूक्तके शब्दों में स्पष्ट होती है। अर्थात् धर्मोपदेशक असत्य तथा पापभाव युक्त वचन बोलना भी बड़ा पापका कर्म (२)" यदुवश्यावृतं शिलया जिन बहु".- इची मार्ग स्वयं पापसे बचें और दूसरोंको पारसे बचावें। है (म०३) द्रोह करना और असत्य बोलना, इन दोनों में प्रायः सब पाप पापी मनुष्य सहसों प्रकारके पाप करता है, परंतु इस मूक्त. समा जाने हैं। इन पापी मनुष्यों का सुधार पूर्वोक्त रोतिसे ही होना कुछ मुख्य पापोंकाही बोन किया है, वह भी यहां देखने- सभव है। धर्मोपदेशक तथा सापारण जन यदि इस सूस्तका योग्य है- विचार करेंगे तो उनको पापमोचन के विषय में बहुतही योग्य बोध ()"वि दुग्ध। - नोह भर्णत सब प्रकारका मिल सकता है। यह पापमोचन-प्रकरण समा। पापी मनुष्य । सुख-प्रसूति-मूक्त। । (११) [पिः-अथर्वा । देवता-पूपादया नाना देवताः ] वर्षट् पूपमस्मिन्सतोपर्यमा होतो कृणोतु वेधाः । सिस्रता नार्यतजाता पि पीणि जिहां सूनवा उ घस्रिो दिनः प्रदिशश्वतम्रो भूम्या उत । देवा गर्भ समरयन् तं पूर्णवन्तु सतवे ॥२॥ सूपी न्यूणोतु वि योनि हापपामसि । श्रुथपा सुपणे त्वमव त्वं विकले सज ॥३॥ 'ने मांस न पीसि ने मजस्वाहतम् । अवैतु पक्षि शेवल शुनै जराय्वत्त्वेऽव जरायु पदनाम् विते मिनमि मेहनं वि योनि वि गुरुनिके। वि मावरं च पुत्रं च चि कुमारं जरायणाचे जरायु पयताम् पवा वातो यथा मनो यथा पतन्ति पक्षिणः। एवा त्वं देशमास्य साऊं जराणा पता नरायु पयताम् भर्प-२ (पन ) पोर !(हे पपट् ) से लिये हम माना अग कामभर ए) MAY नमा होजायेगा)मा मनसा दावा विभाग महासा()(ग) निमगारों - मशनवरका एबो भाय। [को०, अन्म देनेशली (गा ) सी (सिसा) पक्षनासे रहे । मा अपने (पोगि) गंगोंको (सूतये उ) सुखप्रसूतिके ळिगे (रिजिहां ) डाले करें ॥ १ ॥ (वि.) शाराही ( उस ) तथा (भूम्या. ) भूमि की (चतसा प्रादेशः ) चारों दिशा भीमें रहनवाले (पेशाः ) देवाने (गर्ग समेरयन् । गर्भ को पनाया, इसलिये वही ( सूतये ) उसकी मुसप्रतिके लिये (सेरि ऊर्युरन्तु ) उसको प्रकट परें, उसको याहर गला रे ॥ २॥ (स्पा ) उत्तम संधान उत्पन्न करनेवाली माता ( ब्यूर्णोतु ) अपने अगोको सुला करे । हम ( योनि ) योनिको ( विहापयामसि ) खोलते है । हे (सूपणे ) प्रसूत होनेवाली, खो। ( स्यं ) तू भी ( श्रथय ) अंदरसे प्रेरणा कर और हे ( विफले ) वीर ली । ( स्वं )त. ( अवसग ) पालकको उत्पा- फर ॥ ३ ॥ (गर मासे ) नहीं तो गायमें, (न पारसि ) न चामें, और (न मासु ) म ती मजामें घई (आहरा ) लिपटा है । ( पृश्नि शेरलं ) नरग सेवारके समान (जरायु ) जेला (शुने भचये ) युके लिये खानेको (भयत ) गोचे आवे, (जरायु ) जेली ( अवपद्यताम् ) नीचे गिर जावे ॥ ४ ॥( मेहग ) तेरे गर्भके मार्ग हो, (योनि) योनिको तथा ( गयीनिके ) दोनों नाडियोंको (बि पि वि मिनभि ) विशेष रीतिसे सुला करता है । ( मातरं पुनं प.) माता और पुनको (नि) असम करता हूँ तथा ( कुमार जरायुगा ) वर्षको जेरीसे अलग करता हूं। (जरायु ) जेरी (अय पद्यताम् ) नीचे गिर जावे ॥५॥ जो घायु, जैसे मग और जैसे पक्षी ( पतन्ति ) चलते है ( एय ) इसी प्रकार हे (दामास्य ) दश महिनेवाले गर्भ ! तू (जरायुणा साकं ) जेरीके माप ( पत ) नीचे या तपा (जरायु अवपद्यताम् ) जेरी नीचे गिर जाये॥ ६॥ भावार्थ-हे सबके पोषण करनेवाले जगदीश! तेरे लिये हम अपना अर्पण करते हैं। इस प्रसूतिके समय सय जगतका निर्माता सूही हमारा सहायक यम । यह सी भी दक्षता रहे और इस समय अपने संगोंको बोला करे ॥१॥ आकाश भौर भूमि की गारों दिशामि रहनेवाले सूर्यादि सम्पूर्ण देवोंने इस गर्भ को बनाया है। और वे ही इस समय अपनी सहायतासे इसको सुरा पूर्वक गर्भस्थानसे बाहर लायें ॥ २ ॥ स्त्री अम अपने अंग सुले करें, सहाय करनेवाली धाई योनि हो खोले । हे स्त्री 1 तूही मनसे अंदरसे प्रेरणा कर और मुखसे थालको उत्पन्न कर ॥ ३ ॥ यह गर्भ मास, चया या मामें चिपका नहीं होता है । वह पानी परयरॉपर धननयाले गरम सेवार के समान अति कोमल थैलीमें लिपटा हुआ होता है, यह राय थैलीकी थैली एकदम पाइर भावे और यह नालके साथ जैली कुत्ताको खाने के लिये दा जाये ॥ ४ ॥ यौगि, गर्भस्थान और पिछली गाड़ियोंको डीला किया जावे, प्रसूति होनेही मातासे बचा गलग किया जावे और योसे जेली नाल समेत अलग की जाये। नाल समेत सब अली पूर्णता पाहर निकल आवे ॥ ५॥ जिस प्रकार मन वेगसे विषयोन गिरता है. जो वायु और पक्षी वेगसे आकाशमें चलते हैं उसी प्रकार दसवें महिमेमें गर्ग औरीके साथ गर्भस्थागसे याहर गाने और जेरी आदि सय नीचे गिर जावे अर्थात् माताके गर्भस्थानमें उसका पुछ भाग अवशिष्ट न रहे ॥६॥ प्रसूति प्रकरण । ईशभक्ति । इस सूफसे मया प्रकरण प्रारंभ हुआ है। यह प्रकरण विशेषराः परमेश्वरकी भक्तिही मनुष्यको दु.खोसे पार कर सकती है। प्रिय के लिये और सामान्यतः मयके लिये विशेष MINS गृहस्पी यीपुरुष यदि परमेश्वरके उत्तम भरू इंगि तो उसे है। पियाको प्रसूतिके जितने कष्ट सहने पहते है उनका दुस पारवारकी नियोंको प्रसूतिके कष्ट न होंगे, यह मताने के लिये इस निर्गही जानती हैं। प्रतिके समय न्यून कष्ट होना प्रयत्नसे सूक्त के प्रथम माके पूर्वार्धम ही सयसे पहिले ईश्वरकी • मानस गाथ्य है । गर्भधारणामे लेकर प्रसूतिके समयता अM नाश वर्णन किया है । धारणासे भी पूर्व समयमें भी जो नियम पालन फरगयोग्य " यषद् " शब्द " स्वाहा "अर्थमें अर्थात् " भारमसमः होते हैं, उन योग्य रीसे पालन करनेसे प्रसूति के पट महु पंग ; के अर्धमें प्रयुक्त होता है। (हे पूषन् । ते पषद् ) है सखे रहना संभव है । इस विषयम आगे यहुत उपदेश ईश्वर । तेरे लिये हम अपने आपको समर्पण कर रहे हैं। भानवाना है। यहां इस सूपमें सितना विषय माया है, उसको हो (अर्य मा) सजनका मान कानेवाला अर्थात् हिता ताप मा रेमिये- ३.२ही (धा ) पर वगतका रमिता और निर्माता। - . ..सुख-प्रसूति-पूल 1. - 1 . भार सूहा ( होता ) सब सुनाका दाता है। इसलिये हम तेरे उनको पता लगेगा कि गर्भाधान रामविकार पोरगक हिमे आश्रयसे रहते हैं और तेरे लियेही पूर्णतया समर्पित होते हैं। नहीं है परंतु उच्च शफियों की धारणा के लिये ही है 1 अस्व यहाँ पूर्व सूक्तमें वर्णन किये ईश्वरके गुण नुसंधानसे देखने गर्भिणी ना अपने गर्भके विषयमें इतना च भव मम धारण योग्य हैं । " सब सूर्यादि देवताओंको शक्ति देनेवाला एक करे और समझे कि जिन देवताओं के अंश गर्भ इकडे हुए ईश्वर है और उसका शासनको सर्वोपरि है।" इत्यादि भाव वेही देवताएं गर्भका पोषण और सुख प्रसूाने अश्य सहायता जो पूर्व सूफमें कहे हैं, यहा देखिो। " सबसे समर्थ प्रभु दें । अर्थात इस प्रगर देवताओं की सहायता और परमाता ईपर मेरा महायाग है, और मैं उसकी गोद में हू" इत्यादि का आधार मुझे है इसलिये मुझे छोई कष्ट नहीं होंगे। भकिके भाव जिसके हृदयमें अकृत्रिम प्रेमके माय रहते हैं, वह पाठ इस दृष्टि से इस सूफा द्वितीय मंत्र पते। मनुष्य विशेष शाकिसे और आरोग्यसे युक्त होता है और प्राय गर्मवती खो। ऐसा मनुष्य सदा आनंदमें रहता है । पूर्वोक्त भाव गर्भवती अपने अंदर इतासे धारण करें। काम विकाका संयम करने के लिये परमेश्वर मकिही एक भव गर्भवती स्त्री अथवा गृहस्थाश्रममें रहनेवाली मानिस दिम्य औषधि है । कामविरका नियमन हुआ तो नियोके बातोंका विचार करें- प्रसूतिके दुःख यौमें नौव्व कम होंगे, क्योंकि कामको अति १ नारी-जो धर्मनीतिसे ( नृगावि ) चलती है भीत् धर्म होनेसेही त्रियां अशक्त बनती है और अशक्तता के कारण नियमासे अपना आचरण करती है, तथा ( नर पुरुष मार्ष प्रसूति के पट अधिक होते हैं तथा प्रसूतिके पश्चात् के क्षदि रहता है, यह नारा कहल ती है। अर्थात् विशेष गास्यधर्मी रोग भी रट देत हैं। इसलिये कामभोगका नियमन परमेश्वर नियमोश पालन करने का भाव इस शब्दो सूचित होता है। भात करने का उपदेश हरएक स्त्रीपुषको यही अवश्य मानमें (मंत्र) धरना चाहिये। २R+प्रजाला--() सत्यनियमानुस मसाता) देवोंका गर्भमें विकास। प्रजनन कर्मसे युए। अयांत गर्भधारण, गर्भ-गोपग और सादि देवताएं अपना अपना अंश गर्भमें रख है, सब प्रसूति बादि सब कर्म जिसके सत्य धर्मानय के अनार देवताओका तार गर्भ होने के पश्चात् आमा में होते है । अनुगामी होना, गर्भ पार पक्षात् हान यस भाता है । इयादि विषय वेदमें स्थान स्थानगर आया है। इस उपान्त अथवा बालक दूध पीना दे सत्यवान अनुगमी विषयमें खाध्यायमंडल द्वारा प्रकायत " ब्रह्म " पुस्तकम होना, इत्यादि सर निमाहा पालन करने मला मी मुरा "यो अंशावतार" की विस्तृत लेग भय पदिय प्रसूत होता है । (मंत्र ) विविध पेदवारा यह विषय स्पष्ट कर दिया है। ] तात्पर्य १एश, पूरा-निम श्रीगे प्राति र मग होने गभर्ने अपने अनेक देवताएं रहता है और न अर्षात को सुसते प्रस्त होता है। खियोगे योग्य नियमोरे बार देवताओं के साप है। भूमि और बारह बारों पाठन द्वारा यह गुण भन्ने माना चाहिये । ( मंत्र। दिशा में रहनेवाली सब देवताएं अपने गर्भ बंशरपसे रिकर-पार की अपात धरतीनिको भरने भागई है, मानो उनका संमेलन ( समरपन् )हा गर्भ मा मदर पैर्य बनाना भारस्यक है। वो हर रोने तो २और उनका भविष्याता भागमा भी उसो गर्भ है । परानाना चाहिये। ये उनको बना पाहिए. (1) सविधास गर्भ धारण एनेगती मत होना चाहिये। गर्भनियोगेनों अर्थात् जो गर्भ अपने मंदार पने काम मोपभोग नेपालतिरोन काल मसरे,परंतु उसमें और मासपूर्ण भाम. हम गुणोराभाग पिका और देवी का है। ऐमा मत गमती और स्थिर मे भरतीसारमभंसपोरन भी मा: गर्भाधानो समरमें भी दो भाडार णध गर्भा म"rut दिया जाता। उस समय मंर मे १४ो मर्म "ET Entegrat.mtiriniti - - 1 गर्म। . 'म अथर्ववेदका सुबोध भाष्य। - गर्भका समय बता रहा है। दसवें माइनेमें प्रस्तिका ठीक समय इलादि पाक्याँस उसका धीरज पारे । है। दस महिने पूर्व जो प्रसूति होती है, वह गर्भ अपक्ष २ भावश्यक्ता होनेपर योनिस्थान उचित रीतिसे खुला करे। अबाधा होने के कारण मानके कष्ट पडाती है। गेग्य समयके (मंत्र ) पूर्व होनेवाले गर्भपात और गर्भाव ये सब मानाके कष्ट घटाने.. ३ जेरीके अंदर गर्भ होता है। गर्भ के साथ मेरी मार पाले हैं और ये सर दु व गृहस्थाश्रयी ना बगेके नियमरहित यादि सब बाहर आजाय और कोई उसका पदार्थ माता यावसे ही होते हैं। जो गृहस्थाश्रमी स्त्री र अन्य नियमोम MANTRE इस विषयमें धाई दक्षतासे अपना कार्य पालन करते हैं, उनकी स्त्रियोंकी सुखसे प्रति होता है। करे । वह पदार्थ अंदर रहनेसे बहुतही दुख होना सभा है । सुस प्रसूतिके लिये आदेश। (मंत्र) श्री परमेश्वरकी भक्ति करे ।(मंत्र १) ४ प्रसूनिके समय गर्भमार्ग, योनि और पिउले अवयव • अपन गर्नमें दवताओंका अशावतार हुआ है ऐसा भाव खुले करने चाहिये । उनको यथायोग्य रीतिसे खुले करे, शाकि मनमें धारण करे । (मन २) प्रमूति सुमसे हो । ( मंत्र ५) ३ (सिवता) दक्षतासे अपना व्यवहार करे। (भंग १) ५ प्रसूति होतेही मानके पास पुनको भरग करके ४ प्रसात के समय (पागि विजिहता ) अपने अगों उसपरका जेरीका वैप्टन हराकर जो आवश्यक कार्य करना हो - दीना कर । (मत्र १) यह सब योग्य रातिसे करे । (मन ५ ५ (सूण व्यूगो ) सुखपति चाहनेपाली को अपने अगोंकी वाला भया सुला करे अर्थात् सख्त न पनाये। यह विषय शारीरशास्त्र का है, केवल पाडिया नहीं है। (मत्र) इस सूक्तक शन्दोमा अर्थ मा शारीरशको प्रसूति प्रकरके ६ (सूपगे। ये प्रथय) मुख-प्रसूति चाहनेवाली घो अनुाही सनमना उपित है। इस ये जो वैध या स्तर मनदी इशा शाकिसे भा अंदरमे प्रेरणा करे, तमा मनसे हैं, जिन्होंने सुन-प्रति शास्त्र का विचार किया है. तथा जिन प्रतिक को प्रेरित करे । यह प्रेरणा स्वयं उस श्री को ही याका ज्ञान सय अछा अनुभव भी है, अदरमे करनी चाहिये । (मन) उनको इस सूचना अधिक विचार करना चाहिये । को इस धाईकी सहायता । सपके " सिन्नता, विजिहता, मूगों " आदि पदोंगे 1 प्रगति के गम पाई की सहायता भायश्यक होता है। हा प्रकार समझते है और ही इस सूक्तको ठीक मारमा जापाई भी प्रसून होने से मौको त सूचनाएं देती रहे कर सकते हैं। र धारपद रहे।' परमेश्वर तेरा साया है और सर भाग है कि प्रति-शाह अभ्यासी इसका सम्मान हारे में है बस टन भी हायता " को और अधिक निर्दोष मारमा कर सकेंगे। सूचना। [वि द्वितीय अनुवाक समात । ]
(8)
९० १२, #०१-४]
श्वासादि-रोग-निवारण-सूक्त।
:
[ऋपिः-भृग्वंगिराः । देवता-पक्ष्मनाशनम् ]
जरायुजः प्रथम उत्रियो घृपा पातंभ्रजा स्तनयन्नेति वृष्ट्या ।
स.नौ मृडाति तब ऋजुगो रुजन् य एकमोजस्वेधा विचक्रमे
॥१॥
अझै-अङ्गे शोचिपा शिश्रियाणं नमस्यन्तस्त्वा हविषा विधेम ।
अङ्कान्समझान् विपा विधेम पो अग्रभीत्पीत्या ग्रभीवा
मुश्च शीर्पक्त्या जुत कास एवं परुष्पराविवेशा यो अस्य ।
यो अभ्रजा वातजा यश्च शुष्मो वनस्पतीन्सचता पर्वतांश्च
॥३॥
शं मे परस्म गात्राय शमस्त्तवराय मे। शं में चतुर्यो अझैम्यः शमस्तु तन्वे मम॥ ४ ॥
॥२॥
अथर्ववेदका सुबोध भाष्य [को०१, महत्वपूर्ण रूपक। यह भावार्थ मंत्रोंके अर्थो के अनुसंधानसे पाठक पढेंगे तो परंतु यहा नूतनोत्पन्न पालका वर्णनही करना नहीं है, किंतु उनके ध्यानम मूक्तका ता पर्य आजायगा क्योंकि यह सूक्त जीवनदाता सूर्यकाही वर्गन अर्थात् सूर्य के जीवन-पोषक रश्मि- सरल और सुरमहा है । तथापि पाठाके विशेष बोधके लिये रसायन का वर्णन करना है। वह करनेका प्रस्ताव इस प्रकार यहा विशेष बातोंका स्पीकरण किया जाता है। यह " तक्म- इस सूक्त के प्रारंभमे किया है। और इस प्रस्तावसे पूर्व सूज नाशन गण " का सूक्त है अर्थात् रोगादिनाशक भाव इसमें है। के साथ इस सूक्तका संबंध जोड दिया है। प्रायः प्रसूतिके समय तथा पश्चात् नियों अशलताआ आती सबसे पहले प्रथम मत्रमें वर्णित महत्त्वपूर्ण रूपक विचार है और नाना रोगोंकी मभावना उत्पन्न होता है। इसलिये इस करनेयोग्य है । पूामूक्तमें " ( जरायुजः देशमास्य पुत्रः) कष्टको दूर करना सुगमताने किस रीतिसे साध्य होता है, यही ओर से वटित उत्पन होनेवाले दशमासत में रहनेवाले बताना सक्ता मुख्यतया विषय है । मानो इस मिषसे आरोग्य पुन" का वर्णन है । उसके साथ इस सूक्ता सबध मतानेके का विषय इस सूक्तमें प्रदर्शित किया है । लिये इम सूक्त के प्रारभमें ही "जगयुज प्रथमः" ये शब्द आरोग्यका दाता। भागये हैं। यहा मुसका वर्णन यडे महत्त्वपूर्ण रूपसे किया है। इस रूप में सूर्य ही सूर्य हा आरोग्यका दाता है यह बात इस मुक्तके प्रथम है सूर्य के पुत्र मंत्र के उत्तराधमें सट कही है निका वर्णन वेदमें अनेक स्थानमें आगया है। यहाका यह न समर्म आनेके लिये पछ निसर्गकी और ध्यान देनेशी स नो मृदाति तन्चे जुगोरुजन् । ( मंग.) भावश्यकता है। "वह (सूर्य) हमारे शरीरीको भाग्य देता है, साधा जाने. - • " भू०१२, मै०१-४1 सुख-प्रदात-सूक। (४५) - संक्षेपसे सूर्यका हमारे आरोग्यसे संबंभ । पाठक विचार करें और युक्किमे केवल सूर्य किरणाचेकि सास बहुतसे रोग दूर करना भाषिक ज्ञान प्राप्त करें। सभव है । यदि सहन हो सके इतने उष्ण सूर्य प्रकाशमें नगा इस रीतिसे प्रथम मंत्रमें भारोग्यका मूलमंत्र बताया है और शरीर कुछ देरता तपाया जाय तो भी सर्वसाधारण शरीर उपमासे यह भी कहा है कि जिस प्रकार पर बाल्करुपी की नीरोगता बढ़ती है । शीतकालम यह करना उत्तम है, सूर्यका उदय होता है उसी प्रकार विश्वमें दिवस्पुत्र मर्यका परंतु गाके दिनों और उन देशोंमें विचारसे और युति हो उदय होता है । पर छोटा विश्व है तथा विश्वही यहा पर है। इसका प्रयोग करना चाहिये। नहीं तो मारोग्यके स्थानपर इसलिये इस घरके सूर्यका भार विश्वके सूर्यका संबंध देखना अनारोग्य भी होगा इसलिये यह सब अभ्यास युक्तिसे ही चाहिये । आगेग्य के लिये तो इस घरके सूर्यका विवके साय बढाना चाहिये। "संबंध करना चाहिये अर्थात् जहातक हो सके वहातक बालक तृतीय मंत्रमें (सीरया ) सिरदर्द, (कास) alमी, को घरमें बंद न रखते हुए विश्वसूर्य खुले प्रशशमें शनैः शनैः (पर) संधिस्थान के रोग उक्त प्रकार हटाने की सूचना दी लानेका यरन करना चाहिये, जिससे घरका सूर्य भी नीरोग है। (पातजाः ) यात, ( शुष्मा ) वित्त, ( ममजाः ) और बलवान बन सके। सफडे प्रकोपके शरण उत्पर हुए ये सपा मन्य रोग मी रसी सूर्यकिरणोंसे चिकित्सा। युकिसे दूर करने सूचना तृतीय मंत्रमें है। (पर्वतार सचा) तथा पर्वतों पर रहार (पनस्पतीन सपा ) उचित बनौर मागे द्विनीय मंत्रमें कहा है कि ( अंगे मंगे दोचिषा पपियोंका सेवन करनेका भा उपदेश इसी मंत्र है । वनौषभित शिश्रियाणं । शरीरके प्रत्येक अंगमे ते के अंशसे यह मूर्य योका सेवन दो प्रकार से होता है, एक सादिकों के नीचे रहना रहता है, उनमे (नमस्यन्तः )नमन करना चाहिए, अर्थात् और दूसरा योग्य औषधियों के रसादिक्षा उपयोग करना। जमा आदर करना चाहिये, सूर्यके सेजसे अपने तेजको पर्वतोंक रच शिसरोपर निवास और शाके नीचे बैठना बढाना चाहिये । जो लोग परके अंधेरे कमरे अपने आपको उठना या आरोग्यदायक है, यह बातें हमने रोकार चंद रसते हैं ये निरंतर होते है, जो खुली हवा में घूमते युक्तिसे अजमाई है और हमारे अनुमनसे पनी सामायक हुए सूर्यप्रकाशसे अपना तेज बहाते हैं वे तेजस्वी होते आले सिम हुई है। पाठ भी इससे लाभ उसरें। चतुर्थ मंघमें सिर मादि तमांग तथा पाव भादि अम. तापर्य सय शरीरका स्वास्थ्य-पूत राति प्राप्त करने शरीरके प्रत्येक ( पर्व । ओमें यह अंश रहता है, इस सूचना प्रार्थना मंत्रद्वारा दी है। सूर्यके भैशने इस स्थानपर (प्रमीता) सपना अधिकार जमाया है। हरएक अवयवमें इसके (मंकान् ) चिनोको सर्वसाधारण उपाय। पहनना चाहिये भारसमंकान् ) मिले रले चिन्दाको भी इस सूच मे सर्व सागपके लिये भी बा को मारो पहचालता चार सास ते सहा निवास , Baat मुख्य पान ने दर. अन्य स्थानों में अन्य अंशॉरी है । या जानना चाहिये । नाम घूमने र अयान भन्ने शरीरको पहिरो ताने. मोर जिस स्थानमें अनारोग्य या बीमारी हुई हो उस स्पान) उनको धर्म, गामी, दमात्याय भार रोग रोती बारेभ्य सूर्य-प्रकाशमा उचित रिसे प्रयोग करके मरना नही। ये ग उनको हकमे मंगे- हये । सबके मद सूर्य के प्रधर में तुली मानसे सूर्य बिम रिपनही सेते, अयान मामा मामाने देखते रहनेरो भयः नेत्ररोग दर होगाते हैं । विशेष प्रसंगार बेठते है कोरम प म म मनाम पार लिये विश किसे सूर्य हिरण प्रयोग करना आदि। रसाद कीमिये परमामही ""माग पि गरे लिये मी विशेष पुर्हगे । किरमा प्रयोग है। यदि पाटा भरो पायो " *परप मागे परमा मापारण मारोग्यनियमाणिष मास चोरे उfveram सूहिजो तपानमे भी तथा प्रर्य से महार। इस सिनेमामा माये। - - अथर्ववेदका सुबोध भाष्य । [को०१, अन्तर्यामी ईश्वरको नमन। ॥२॥ -- . क्योंकि तू t (१३) [ऋपि:- भृग्वाङ्गिराः । देवता-विद्युत् ] नमस्ते अस्तु विद्युत्रे नमस्ते स्तनयित्नये । नमस्ते अस्त्वश्मने येना दुडाशे अस्यसि ॥१॥ नमस्ते प्रवतो नपाद्यतस्तपः समूहमि । मृडया नस्तनूम्यो मयस्नाम्यस्कृधि प्रतो नपानम एवास्तु तुम्यं नमस्ते हेतये तऍपे च कृष्मः । विद्म ते धाम परमं गुहा यत्समुद्रे अन्तर्निहितासि नाम: ॥३॥ यो त्यो देवा अजन्त विश्व इपुं कृण्वाना असंनाय धृष्णुम् । सा नौ मृड विदथै गृणाना तस्यै ते नो अस्तु देवि ॥४॥ मर्थ-(विद्युते ते)विशेष प्रकाशमान तुझको (नमः) नमस्कार (भस्तु हो । (स्तनयिलवे ते नमः) गडगडानेवाले तुझको नम स्वार होवे । ( अश्मने ते नमः अस्तु ) ओ के रूप तुझको नमस्कार होवे । (येन) जिसमे तू (दूडाशे अस्यसि ) दुःखदायीको दूर फेंकता है ॥१॥ हे (प्रवतः मपात ) उच्चतान गिरानेवाले! ( ते नम ) तेरे लिये नमस्कार हो । ( यतः (तपः समूहसि ) तपो इक्ट्ठा करता है । ( नः तनूभ्यः मृड्य ) हमारे शरीरोंको सुख दे और ( तोकेभ्यः मयः कृधि ), परबाके लिये सुख प्रदान कर ॥२॥ है ( प्रवतः नात् ) उच्चतासे न गिरानेवाले ! (तुभ्यं एत्र नम. अस्तु ) तुम्हारे लिये है नमस्कार होवे । (ते देतये तपुरे च नमः कृण्मः ) तेरे वज्र और तेजके लिये नमस्गर करते हैं। ( यत् ते धाम ) जो तेरा स्थान (परमं गुहा) परम गुग अर्थात् हृदयरूपी गुहा है वह हम (पिन ) जानते हैं । उस ( समुदे मंतः ) समुद्र के अंदर (नाभिः निहिता भसि ) तू नाभिप रहा है ॥ ३॥ हे (देवि देवी । (असनाय) शत्रुपर फेंकने के लिये (] इषं कृण्वानाः) बलवान सुरद बाग करनेवाले (विश्वे देवाः ) सब देव ( यां त्वा ) जिस तुमको (असृजन्त ) प्राट करते हैं, (.तस्यै ते नमः अस्तु ) उस तेरे लिये नमस्कार होवे । ( सा ) यह तू (विदये गुणाना । युदमें प्रशसित होनेवाली (न मृद)हमें । मुख दे॥४॥ भावार्थ- हे देवि ! ईश्वरी । तू बिजली आदिमें अपना तेज प्रकट करती है, मेघोंमें गर्जना कराती है और अपनी शक्ति मोले भी परमाती है, इन सब बातोंसे तू हमारे सय दुखोंको दूर करती है, इसरिये तुझे हम सब प्रगाम करते हैं ॥ ॥ है उच्चतासे न गिरानेवाला देवी ईश्वरी 1 तू तपोमय जीवनको हमारे अंदर स्टा करता है अर्थात् हमारे तप.शक्ति बढाती है, उस तपसे हमें तथा हमारी संतानों सुखी कर. तेरे लिये प्रगाम करते हैं ॥२॥ हे उच्चतासे न गिरानेवाली देवी ईश्वरी । हम जानते हैं कि तेरा स्थान हृदयरूपी श्रेा गुफा है, वहाके समुद्र के अंदर तू म य आधाररूप होकर रहती है, इसलिये तेरा तेज और तेरे दुष्ट विघातक शस्त्रास्त्र अथ त् तेरो शक्ति के सन्मुख हम सिर झुकाते हैं ॥३॥ हे देवो ईश्वरी 1 नुको दूर करने के लिये शमान बनानेवाले सप विनयेच्छु लोग सदा तेरी मति करते हैं इस कारण युद्धोंमें प्रशंसित होनेवासे तू हमें सुख दे । हम पप तसे प्रणाम करते हैं ॥४॥ सूक्त की देवता। से ही हुआ है, तथापि विद्युत् का वर्णन करना मुख्य उद्देश्य इस र मूक्तका देवता " विद्युत् " है । यद्यपि विद्युत्का अर्थ देवताओं के मिपसे परमात्माका वर्णन होता है, उसी प्रकार सूक् में नहीं है । जिस प्रकार अन्यान्य सभा में अमि आदि पिनटा है, और इस सक्तका प्रारंभ मेघस्थानीय विद्युतके वर्णन विद्युत् रूप त्री देवताके मिसे ईश्वरका, जगन्माता, - भादिमाता सू०१३ मं०१-३ अन्तर्यामी ईश्वरको नमन। किया है। 1 - देवीके रूपमें, परमात्मा ही वर्णन यहाँ हुआ है, इस बारको इस सूक्तको परमारमा तेजस शाकाही मुख्यतया वर्णन स्पष्ट व्यक्त करनेवाले इसी सूरत के निम्न मंनभाग यहा देसने करना है । और वह घर्गन नीरूप देवांके वर्णनद्वारा पहा योग्य है ., "प्रपतः न-पात्" -"प्रवत्" शब्दका अर्थ उच्च स्थान देख नहीं सकता किंतु हृदयस्थानीय आरमाकी शाकेसे हा देख जिस प्रसार मनुष्कान देखता है, परंतु अपनी शक्तिसे है । उच्च अवस्थ, उच्चता आदि भाव इस शब्दसे प्रस्ट होते हैं। उच्चतासे न गिरानेवाला यह "प्रवतो न-पात्"का भाार्य है। होरह अपना कार्य करता है । जैसी यह यात शरीरमें है, सकता है; इमो प्रगर अन्यान्य इंदियों मारमा शालिये प्रेरित परमात्मा ही मनुष्यमात्र उच्च अवस्थामे रखनेवाला और वहासे उसी प्रकार जगतको सूर्यादि देवताएँ तेज फैलाना आदि कार्य न गिरानेवाला है । (मगर, ३) अपनी शक्ति से नहीं कर सकी। विधम्यापी परमारमा २ ते परम धाम गुहा" - परम धाम हृदय की शक्ति लेकर ही सूर्य प्रकाशन, विद्युत् चमकती और पायु मइया गुफामें है। हृदयमें आमाका निवास है, वही उमा रम है। इसलिये सूर्यगासे, विद्युत्को माटो अपना पवित्र निवास स्थान है, यह उपनिषदादिमें अनक पार वा वेगमे न फेल इन देवताओं को सकियो प्रकट हो रही आगया है। है, परंतु परमात्माकी हा शिवध को प्रकट हो रही है। ३ “समुद्रे अन्तः नाभिः निहिताऽमि | "मी यह भाव ध्यानमें रखकर यदि पाठक इस सूक विचार करेंगे समुदमें मध्यभाग तू है। हृदय गुमें मानस सरोवर है, तो उनको इस सूफमें विद्युत्को मधहमे परमारमा समुद्र है, विचारोंका अथवा भावनाओंग महासागर है । उ47 फेल रहा है यही मात्र विदेत होगा। इस त म पूजा. 'नामी उसका आधार स्थान, वही आत्मा है । कोकि इस वियर करना चाहिये। समुद्रकी सप लहरें उसकी ही प्रेरणा से अपना शक्तिी उठती प्रथम मंत्रमें विद्युत्को भनाइट, मेघोंकी प्रचंड गर्जना, हैं और उसी की भक्ति इस समुदमें शांति स्थापित होती है। मेघोंसे प'को टि अपया जलकी प्राष्टेि आदि द्वारा परमारमा "पो या देवा असूजन्त वि।" - प्रचड कार्य देखना उचितगामे परमारमा प्रागिमात्र तुमको सय देव प्राट करते हैं । आमा देवीद्वारा प्रापर करता है । रिसे अम और मल प्रार करण होना बेदमें अनंत स्थानों में स्पष्ट हुआ है। शरीर में प्रादि प्राणियों अनंत क्लेश दूर हो रहे हैं। यही परमात्माकी पाहै। पदियों द्वारा भामाश प्रकाशन हो रहा है। यदि नेपादि इंदिर नहो, सोभारमाका अस्विर भी सात नही हो ससा । इस बार सथ इंद्रियादि देव शरीरमें आ माको प्रष्ट करते हैं । विश्वन सूर्यचंदादि देव परम रमाको महिमा प्रकट कर रहे हैं। मनुष्य सभाममें सब मान परमेश्वरको प्रश रहे हैं। इस प्रकार सर्वत्र देवोदारा भामा प्रकाशित होता है। जिस - * अथर्ववेदका सुबोध भाष्य। (४८) कि P परमधाम । इस परमात्माची सहायता सब चाहते हैं । मरण, दुःख आदि तृतीय मंत्रमें परमेश्वरके परम धामका पता दिया है। कारण मनुष्य परमात्माकी खोज करते हैं। इसीलिये बो परमेश्वरका परम धाम हरएक के हृदयमें है, विशेषतः भक्तके सरपुरुष दुःखको स्वीकारते हैं और अन्योंको सुख देते हैं। यही हृदयमें ही है। परमधरके भक्त ही उस धामको जानते है और दु.खका महत्व है। पर्गन करते हैं। शैन दूसरा उसको जान सकता है और वर्णन चतुर्थ मंत्रमें कहा है कि " सब देव उसको प्रकट करते कर सकता है ? यही स्थान जानना और इसाका अनुभव है।" इसीका स्पष्टीकरण इससे पूर्व किया जा चुका है। लेना मनुष्या साध्य है। "युद्धमें उनकी प्रशंसा ग स्तुति प्रार्थना होती है" इमका भी मनुष्य ममुरके अंदर गिर पड़ा है, इस समुद्र की लहरें कारण स्पष्टतापूर्वक हपने देखा है । यह मय इसलिये करते हैं यही भारी लग रही है. प्रचंड वायु चल रहा है, धूवाधार कि "शत्रुको दूर भगाने के लिये प्रबल शक्ति प्राप्त हो।" जो मेघ बरस रहे हैं. बिजलियां चमका सी है, और यह मनुष्य परमात्मा सबै भक्त हेते हैं, या तो उनके सन्मुस कोई शत्र ऐसे प्रक्षुब्ध सदमें सहायता के लिये पुकार है। उसका ना ठहर सस्ता, अथवा जो उनकी अनुता करता है, पर स्याल है, सहायता बाहरसे आनेवाला है। यही मनुष्यका स्वयं न हो जाता है । अपात् परमेश्वर भक्तिही एक परी भ्रम है, यही अशान है और यही कमजोरी है। भारी शक्ति है, जो संपूर्ण शत्रुभाका नाश कर सकती है। मह तृतीय मंत्र स्पष्ट शब्दोंसे कह रहा है, कि उस प्रभुन्ध समका केन्द्र पटी परमात्मा है और वह भकके हृदयमें विरा- नमन । अता है। हे भक्त! यदि तू सचमुच इसकी सहायताके लिये पुकार रहा है तो अपने हृदयमेही उसे ढूंढनेका यत्न कर, वही है, अर्थात् यहाका अनेक बारका नमन सिद कर रहा है कि इस चार मंत्रों के सूकमें परमेश्वरको सात बार नमन किया.. नसभा परम धाम है । और वहांदी वह अपने भवसे प्रकाश को सार्वभौमसत सामने सिर झुकाना, उसको सर्वत्र पाठको । आप यह प्यान में रचिये कि आपमे हरएक के लिये अत्यावश्यक को छोडकर किसी दूसरेको उपस्थित समझना, उसीको सर्वतोपर समझना मनुष्यको : हृदयमें यह मारमज्योति है। यही सप उन्नति की सहायक पफि है। आप उसे पका लीजिये, तो भापती उत्पति निः. नमन न करने के संबंध " तुभ्यं एव नमोऽस्तु" (मंत्र ।) मत हो जायगा । स ग अरसे या, याहरसे ERROR अन्य पाना में नहीं करता, हे ईधर यह मंत्रभाग देखने योग्य है। "मैं तुझे ही नमन करता है।" नहीं। भापी रमतिका मी यही नियम है। तेरे मामने ही मैं सिर मुहाता हूं। मुझे मनुशीत कर .. युद्ध में सहायता। कृतार्प र । इस सूफ सर्वोत्कृष्ट उपासना ही है, पाठ युदके पमय, भरमगा होने के प्रसंगमें, रके ममयमें इसका उपयोग उपासना के समय कर सकते हैं। - - कुलवधू-मूक्त [प्रापि:- मृगशिराः । देयता-पमा ] (१४) मगमस्या पर्ष आदिपार वृक्षादिव स्रजम् । महायुन इस पानी ज्योक् पिप्पास्ताम् ॥१॥ एपा ते राजकन्या यनि धाना यम । सा मातुपैम्पती गृहेऽपो म्रातुरथी पितः ॥२॥ एपा में कुटपारराजन्ता, ते पार पसि । पोक् पिढीसाना आशीर्णः समाप्पाद ॥३॥ प्रतिर पसार गस्प प । अन्त:कोशर्मिष जामयोऽपि नमामि मगेमू 10 स.१४, मं.१-४] कूलवधू-सूका. (४९) . अर्थ-(वृक्षात् अधि नजं ईव ) वृक्षसे जिस प्रकार फूलोंको माला लेते हैं, उस प्रकार (भस्याः भगं वर्चः भादिपि) इस कन्याका ऐश्वर्य और तेज में स्वीकारता हूं । ( महाबुनः पर्वतः इव ) यहे जडवाले पर्वतके समान स्थिरतासे यह कन्या (पिपु ज्योक भास्ता ) मातापिताके घर बहुत समयतक रहे ॥ १॥ हे ( यम राजन् ) नियमपालन करनेवाले स्वामिन् ! (एषा कन्या ) यह कन्या (ते वः) तेरी वधू होकर (निधूयतां ) व्यवहार करे। (अयो) अथवा ( सा ) वह माता, भाईके (भयो ) किंवा पिताके (गृहे वध्यताम् ) घरमें रहे ॥ २ ॥ है ( राजन् ) हे स्वामिन् ! ( एपा ) यह कन्या (ते फुल-पा) तेरे कुलका पालन करनेवाली है। (वां) उसको ( उ ते परिदमसि) तेरे लिये देते हैं। यह ( ज्योक् ) उम्र समयतक ( पितृपु भासातै ) मातापिताके घरमें निवास करे ( आ शीर्णः समोप्याद ) जबतक सिर न बनाया जावे ॥ ३ ॥ (असिवस्य बंधन रहित (कश्यपस्य ) द्रष्टा (च) और (गयस्य) प्राण साधन करनेवाले (ते) तेरे (ब्रह्मणा ) ज्ञान के साथ में [ते भग अपि नयामि] तेरे ऐश्वर्यको बांधता हूं, [जामयः मंतः कोश इव] त्रियां अपनी पिटारीको जैसे बांधती है ॥ ४ ॥ भावार्य [1] वृक्षसे फूल और पत्ते निकाल कर जैसी माला बनाकर लेग पहनते हैं उसी प्रकार इस कन्याका सौंदर्य और तेत्र में स्वीकारता हूं और उसपे अपने आपको सजाना चाहता हूं। जिस प्रकार बड़ी जडवाला पर्वत अपने ही आधारपर स्थिर रहता है; उस प्रकार कन्या भी अपने मातापिताओं के घरमें निडर होकर देरतक सुरक्षित रहे ॥ १ ॥ [२] हे नियमपालक पति ! यह हमारी कन्या तेरी वधू होकर नियमपूर्वक व्यवहार करे । जिस समय वह आपके घर न रहेगी उस समय वह पिता, माता अथवा भाईके घर रहे, परंतु किसी अन्यके घर जाकर न रहे ॥ २ ॥ हे पति ! यह हमारी कन्या तेरे कुलका पालन करनेवाली है, इसको तेरे लिये हम समर्पण करते हैं। जबतक इसका सिर सजाने का समय न आने तबतक यह मातापिताके “घरमें रहे ॥ ३॥ वंधनहित, इष्टा और प्राणोंको स्वाधीन करनेवाले तेरे ज्ञान के साथ इस कन्माके भाग्यका संबंध में करता हूं। जिस प्रकार स्त्रियाँ अपने जेवर संदूक्में बंद रखती है, उस प्रकार इसका भाग्य सुरक्षित रहे ॥ ४॥ पहला प्रस्ताव। उसके साथ विवाह करने की इच्छा प्रकट करता है। अर्थात भावी पति कन्याकी प्रार्थना उसके माता पिता के पास करता है। इस सूकमें चार मंन हैं। पहले मंत्रम मावी पतिका और साय यह भी कहता है कि, कन्या पुछ समयतक माता- प्रस्तावरूप भाषण है । पति कन्याके रूपको और तेजको पिताके घर हो रहे अर्थात् योग्य समय मानेता कन्या माता- पसंद करता है और उस सेजका स्वीकार करना चाहता है । इस पिताके घर रहे, तत्पश्चात् पतिके घर भावे ! योग्य समय की विषयमें मंत्रका रूपक अतिस्पष्ट है- मर्यादा आगे तृतीय मनमें कही जायगी। "वृक्षवनस्पतियोंसे पचे फूल और मंजरियो लेकर लोग इस मंत्रके विचारसे पता लगता है कि पुरुष भरनी माला यनाते है, और उस मालाको गलेमें धारण करते सहधर्मचारिणी को पसंद करता है। पुल अपनी रवि है। इस प्रकार यह कन्या सुगंधित फूलोंवाली यही है, के अनुसार कन्याको पुनता है और अपना मानस कन्यारे इसके फूल और पचे ( मुखकमल और इसपछव ) मातापितामोसे निवेदन करता है । कन्या मातापिता इस मथवा इसका सौदर्य और तेज में लेता हूँ और प्रस्ताव का विचार करते हैं और भावी पतिको योग्य उत्तर उससे में सुशोभित होना चाहता हूँ। मर्यात् मैं इस देते हैं। कन्याफे साथ गृहस्थाश्रम करनेकी इच्छा करता हूं। जैसा पर्यंत अपने विशाल भाधारपर रहता है, उस प्रकार यह कन्या भपने मातापितामोंके मुष्ट माघार पर रहे । मयांत् मातापितामोंसे सुशिक्षा पाकर यह कन्या सुपोग्प बने मोर पसार मेरे (पविके) पर + - . यह माव प्रपम मंत्रम है। इसमें भाषी पतिध प्रथम प्रतार भावी पनि न्याय दिन भोर ते पद करता है पार ७ (प. . मा.की..)
(५०) अपर्ववेदका सुबोध भाष्य। [काण्ड, ३ मसित - परंतु भावी पति और मन्या के मातापिता या पालकोंका अर्थ यह लेना योग्य है। ) रात्र शब्दका अयं “प्रकृतिका दो भाषण है । इससे अनुमान होता है कि, कन्याको उतना रंजन करनेवाला।" गृहस्थधर्म, धर्मपत्नी पुरुष को प्रनते ही अधिकार नहीं है, कि जितना पतिको है । है। उस धर्मपनीका संतोष बढानेवाला। तसो मनमें कन्या पालक कहते हैं कि, हम [वे तां (भ-सितः भवः) धनरहित । मात् परि दामि ] तलिये इस कन्याको समर्पण करते हैं।" जिसका मन स्वतंत्रताका चाईनेवाला है। गुलामौके भाव जिसके रह मत्रभाग सष्ट बता रहा है कि, कन्या इस विषयमें मनमें नहीं हैं। परतम है। मत्रमें दो बार आया है कि 'कन्या पिता माता अण्वा माईके घर में रहे" अय३] भागे जाकर हम १ कश्यपः- ( पश्यकः ) देसनेवाला । अपनी परिस्थितिको कह सस्ते हैं कि विवाह होनेपर वह पति के घर रहे । समझनेवाला। उत्तम गतिसे जाननेवाला और अपने कर्तव्यको ठीक प्रकार परन्तु यह भी स्वतन्त्रतासे न रहे। जिम प्रकार पृषका आधार नसकी जड है, अथवा पर्वतका जिसन अपने प्रागोंका बल बढाया है। (प्रागयलयुक्तः) प्राणायामादि योगसाधनद्वारा भाधार उसको अति विस्तृत युनियाद है, उसी प्रकार कन्याका पहला भाधार मात पिता अथवा भाई है, और पक्षात्का आधार ६प्रझगा युक्त:- ज्ञानसे युक्त । ज्ञानी। पनि हो है । इमसे भिन किसी अन्यमा अाधार स्त्रीको लेना ये छः शब्द इस सूक्तमें पतिक गुणधर्म बता रहे है। उचित नहीं है। ५गय.- सू.मं.१-४] कुलवधू-सक्त। मंगन का समय। पाठक पर परीशाके विषयों इन बातों ध्यान रखें । भर दोषयुक्त हो, वह कन्या विवाह के लिये योग्य नहीं है। वधू परीक्षा करनेके नियम देखिये- वधू-परीक्षा। इस सूक्त से विद्या के समय का ठीक ज्ञान नहीं होता, क्योंकि इस सूक्तमें वधूपरीक्षाक भिन्नलिखित मंत्र माग हैं उसका ज्ञापक कोई प्रमाग यहा नहीं है ।। 'कन्या सिर सजाने के कन्या- [कमनीया ] कन्या ऐसी हो, कि जिपको समयके पूर्व माताकै घर देरतक रहे" इस तृतीय मनके कथा- देखने मन में प्रेम उत्पन्न हो । रूप तेज, अवयवोंको मुंद. से मंगनीका समय ऋतुपार होनके पूर्व कुछ वर्ष-अधिकसे रता, स्वच्छता, ज्ञान आदि सब बातें, जिससे देखनेवा के अधिक एक दो वर्ष-ना संभव है। तथासि क्यूरीक्षा जो मनमें प्रेम उत्पन्न होता हो, इस शब्द ज्ञात हो जाती छः लाग ऊपर बनाये हैं, वे लक्षग सष्टतया व्यस्त होने लिये प्रौढ दशाकी प्राप्तिको अत्यंत आवश्यकता है । "पति के पर २ अधु- [उ पतिगृहं ] जो पतिके घर जाकर जानेको कपना " जिस भवन्या कन्याके मन में आती है वह रहना पसंद करती है । जो पतिके घर को ही अपना सभा अवस्या मंगनीकी प्रतीत होती है । ये छ शब्द अच्छी, प्रौद, घर मानती है। प्रबुद्ध, करीब उपवर, कन्याकी अवस्था बना रहे हैं। पाठक सब ३ कुलपा-कुलका पालन करनेवाली । पिताके तथा पति शब्दोंका विचार अच्छी प्रकार करेंगे, तो उनको कन्या की के कुलोको मर्यादाओंका पालन करनेवाली । जो अपने सदा- आयुमैं मंगनी होनी चाहिमे इस विषयस निरय हो सकता धारसे दोनों कुलोका या पदाती है। ४ ते [पत्युः] भगम् -धर्मपत्नी ऐसी होनी चाहिये, मावी पति मंगनी करे और कन्या के माता पिता पूर्वोच कि जो पतिका भाग्य बढावे । जिससे पतिको धन्यता लक्षणों का खूब विचार करके भावी पतिके प्रस्तावका स्वीगर या अनुभव हो। अस्वीकार करें। इस सूक्नमें वरके मातापिताशे तथा अन्या ५ पितृषु मास्ताम् - विवाह के पूर्व अथवा आपत्कालमें अपना मत देने का आधेकार है ऐसा मानने के लिये एक भी मातापिता अथवा मा. इनके घर में रहनेवाली और विवाहके प्रमाण नहीं है। यह यात यदिशीमा भन्म मूक्त, भागे मिल पथात् पतिके पर रहनेवाली। किसी अन्य के घर जाकर रहने की जायगी, तो उस समय ही जायगी। इच्छा न करनेवाली कन्या होनी चाहिये । सिरकी सजावट । ६ वृक्षात् धन-वृक्ष पुष्पमालाके समान कन्या हो, पिताके कुलरू रक्षको पुष्पमालारूप कन्या सुगंधित करे । तृतीय मंत्रमें कहा है "उपोर पितृवासाता मा धीगं: ये छ. मंत्रमाग कन्याकी परीक्षा करने के नियम यता से समाप्यात् ।" ( देरतक मातापिताके घरमें कन्या रहे, जब है • पाठक इनका उत्तम विचार करें और इन उपदेशक तक सिर सजाने का समय आजावे ।) यहां एक यात कहना आवश्यक है, कि जिस समय सी अनुमती गती, उरा मनुकूल कन्याकी परीक्षा करें। कन्याके गुणधर्म। समय उसको "पुषवती" कहते है। एरवी अनं फूलों से अपने भाडो सजाने योग्य । प्रपन मन प्रयन भानु कन्या मुस्प तथा वेजस्विनी हो. पतिके पर प्रेमपूर्वक रह प्राप्ति भयका प्रथम पुपवती हाते । उमा मा सनम नेवाली हो, दोनों कुलोंकापशमपने सदाचरणसे यदानेवाली प्रथा विशेषत: उसामिर ने समाने राप्रपा मारताना हो, पविका भाग्य बनानेवासी, पौवन के पूर्व पिताके परमें समय में भी है सिरमौर महासमोरतोवरले पाधान सया पोषन प्राप्त होने के पश्रात् पतिके पर रहनेवाली, क्या प्रसंग लिये को हानि इस THRE समाव: पुपमा समान अपने कुलकी शोमा बगनेशासी हो। म साये आते है। मुंगी मी ई जातिवान या प्रथा है। इस प्रकारकी जो मुलक्षणी कन्या हो सोही पसंद करना अन्य जातियोरेन है, पाठ सिरम न पानधारकार योग्य है। इस प्रगति समय निषि पार सो पौधी, निस्तेर, दुर्मुखी, पति पर जानेधारण प्रतिदिन कम होता है। एक भार कारण और बरामी, राचारिणी, पति भाग्य पटानेवानी, GUसाह ममार के पारमा म्न रो रहा है। - .
- (५२) अथर्धवेदका सुबोध भाष्य। [को०१, धनी लोग इस प्रसंगके लिये सोने और रत्नोंके भी फल यह हमारी कन्या तेरे कुलका पालन करनेवाली है, इसलिये बनाते हैं और पुष्पवती स्त्रीके चतुर्थ दिनमें उसका सिर बहुत उसको तेरे लिये हम प्रदान करते हैं । सजाते है। जिन प्रांतोंमें धूंगट निकालनेका रिवाज है, उन ३ ते भगं भापिनद्यामि तेरा भाग्य [ इस कन्या के साथ ] प्रांतोंमें यह रिवाज कम है ऐसा हमारा ख्याल है, परंतु सच्ची बांधता हूं, अर्थात् इससे तू अलग न हो। बात वहा के लोग ही जान सकते हैं । इससे हम अनुमान कर सकते हैं कि पूंगटको प्रभा अवैदिक कारणोंसे हमारे समाजमें पश्चात् शीघ्र ही विवादका समय होता है । यद्यपि इसमें समय ये मंत्रमाग स्पष्ट बता रहे हैं कि मंगनीका स्वीकार होने के घुस गई है। का साक्षात् उन्लेख नहीं है, तथापि [१] मंगनी, [२] कन्या- मंग के पश्चात् विवाह । दान की संमति,[३] सिर सजानेके समय तक अर्थात् पुष्पवती इस सूक्तके देसनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि, मंगनीक है, कि मगनी के पश्चात् विवाह होने के बाद ऋतुमती और पुष्प होनेतक कन्याकं पितृघरमें निवास का विधान स्पष्ट बता रहा पश्चात् विवाह का समय बहुत दूर का नहीं है । प्रयम मंत्रमें dil हो तर कन्याका पति पर निवास होनेका क्रम दिखाई पर पहला प्रस्ताव अर्थात मंगनीका प्रस्ताव हुआ है । और देता है। पाठक इस विषयमें अधिक विचार करें। यह द्वितीय तथा तृतीय मेत्र में ही कन्याके अर्पण का विषय आगया विषय अन्यान्य सूक्तों के साथ संबंधित है, इसलिये इस विवाह है। दखिये-- प्रकरणके सूक्त जहा जहां आवेंगे वहां वहां इसके साथ संबंध, १ एपा कन्या वे वधूः निधूयताम यह हमारी कन्या तेरी देखा ही सब बातोंका निर्णय होगा । पाठक भी इस विषयमें पत्नी बनकर निःशेष व्यवहार करे । तथा-- अपने विचारों की सहायता देंगे, तो अधिक निर्दोष निश्चय हाना २ एपा [पन्या ] ते कुलपा, तां उ ते परिदमास:- संभव है संगठन-महायज्ञ-सूक्त। [अपिः- अथर्वा । देवता-सिंधुः] ॥१॥ सं सं संवन्त सिन्धवः से वाताः स पत्रिणः । इमं युझं प्रदिवों मे जुपन्तां संसाव्येण हविषो जुहोमि उदय हबमा यति म इह संस्रावणा उतेमं वर्धयवा गिरः । हुँदैतु सर्वो यः पशुस्मिन् तिष्ठतु या पिः ॥२॥ ये नदीना संयन्त्पुत्सासः सदमक्षिताः । तेमिम सबैः संसावैर्धन सं बियामासे ॥३॥ ये मर्पिः संम्रन्ति धीरस्य चोदकस्य च । भिम सः संम्रावैर्षनं सं साबयामसि || मई-- [मिघवा ] नदियां [में सघयन्त] उत्तम रीति से मिनर बहती रहे, [ पाता सं] वायु उत्तम होतो मनहर बने रहे, पिक्षिण संपली मा म गति मिलकर उवे हैं । इस प्रकार (दियः) उत्तम रिम्स जन ( में इमं या ) मेरे इस यज्ञ (जन्त) सेपन करें, क्योंकि में (संग्राम्येण विमा संगठन के भग (होमि ) दान कर रहा हूँ ॥ १॥ (दह एप । महा। मेरे यह प्रति (भाषा) मानों 7 सं०.१५,०१-31 संगठन-महाय- (उत) और है ( संसावणाः) संगठन करनेवाले [ गिरः] वक्ताओ 1 [ इमं वर्धयद ] इस संगठनको बढाओ । [य: पशुः जो सब पशुभाव है वह (इह एत) यहाँ मावे और (मस्मिन् ) इसमें (या रयिः) जो संपत्ति है, यह (तिष्ठतु ) रहे ॥२॥ (नदीनां ) नदियों के जो (अक्षिताः उत्सासः) अक्षय स्रोत इस (सदं ) मंगठन स्थानमें (संघवन्ति) बह रहे हैं, (तेभिः मे सर्वैः संसाः) उन मेरे सब स्रोतों से हम सब (धनं) धन (संस्राययामसि ) इक्ट्ठा करते हैं ॥३॥ (ये) जो (सर्पिपः) पीकी ( क्षीरस्य ) दूधको ( च उदकस्य ) और जलको धाराएं( संस्रवन्ति) यह रही हैं, (नेमिःमे सर्वैः संसाः । उन सभ धाराओं हम ( धनं समावयामसि ) धन इकट्ठा करते हैं ॥४॥ : मावार्थ-नदियां मिलकर यहती है, वायु मिलकर बहते हैं, पक्षी भी मिलकर उड़ते हैं, उस प्रकार दिव्य जन भी इस मेरे यज्ञमें मिल जुलकर समिलित हों, क्योंकि मैं संगठन के पढानेवाले अर्पगये ही यह अंगठन का महायज्ञ कर रहा हूं ॥१॥ सौधे मेरे इस संगठन के महायज्ञमें यात्राओ और हे संगठनके साधक वक्ता लोगो ! तुम अपने उत्तम संगठन बढानेवाले वक्तृत्वास इस संगठन महायज्ञको फैला दो। जो हम सबमें पशुभाव हो, वह यहां इस यज्ञमें आवे और हम सबमें धन्यताच भाव चिरलतक निवास करे ॥ २॥ जो नदियों के अक्षय स्रोत इस संगठन महायज्ञमें रह रहे हैं उन सब स्रोतामे हम अपना धन संगठन- द्वारा बढाते हैं ॥ ३ ॥ क्या घी, क्या दूध और क्या जलकी जो धाराएं हमारे पास यह रही है, उन सब धाराओंस हम अपना धन इस संगठनद्वारा बढाते है॥४॥ संगठनसे शक्तिकी वृद्धि । समय शके पत्ते भी नहीं दिलते, परंतु वही व रक होकर प्रचंड वेगसे जय बहने लगते हैं तब महारक्ष टूट जाते हैं और यह संगठन महायज्ञका सूक्त है। इसके प्रथम मंत्रमें मनुष्य मी डर जाते हैं। पाठक इन संसावात भी संगठन. संगठनसे शक्ति बढनेका वर्णन है, वह संगठन करनेवालों को देखना के बलका उपदेश ले सकते हैं । इस प्रकार वायु भी संगठनका और उसपर खूप विचार करना चाहिये । देखिये-- उपदेश मनुष्यों को दे रहा है। सिंघवः-नदियां । जो जल बहती है उसको स्रोत ३ पक्षी-पक्षी भी संगठन करते हैं। जब एकएक पक्षी कहते है । इस प्रकारके सेकों और हजारों स्रोत जय इकट्ठे होता है तो उसको दूसरा कोई मी मार सका है, परंतु जय होते हैं और अपना भेदभाव छोडकर एकरूप होकर बहते हैं, सैकडों और हजारों विटियां एक फलापमें रहकर भरना तब उसका नाम "नदी" होता है। नदी भी जिस समय महा- संगठन करती है, तर उनकी शक्ति यही भारी होती है। पूरसे महती है,उस समय विविध छोटे स्रोतोंके एकरूप होकर इस प्रकारके पक्षियों के कलाप बरे बटे सेतो धान अल्प बहने के कारण जो महाशक्ति प्रस्ट होता है, वह अपूर्व ही शक्ति समयमें प्राप्त करके खा जाते हैं। यह सगठनका मर्प पाठक है। यह नदी इस समय बढे व ओंको उखा देती है, जो देखें और अपना संप बनाकर मरना ऐर्य । पक्षी यह उसके सामने माजाते हैं उनको भी अपने साथ यहा देती है। उपदेश मनुष्यों को अपने माचरण दे रहे हैं। बरे पृक्ष, बरे यडे पाट भी महानदी बेगके सामने इस प्रचार पहिले मंत्रमें येन उदाहरण मनुप्यों के मुप तुच्छ हो जाते है। यह वेग कहासे नाता है! रखर संगठनका महत्व बताया है। यदि पाठर न पाठक विचार के गे तो पता लग जाएगा कि यह अंग छोटे उदाहरणांचा उत्तम मनन करेंगे, तो उनको पता मग जापण प्रोतमें भी होता, परंतु जब मनंत छोटे होत रूप होकर कि अपना संगठन किस पर किया भार। भार अपना भेदभाव मष्टकर एकरूपसे बहने लगते हैं। अर्थात् पक्षम संगविकरण। अनंत छोटे मोत अपना संगठन करते है, तभी उनमें पर अधुतपूर्व शाकि नप रोती है। इस प्रार नदिए मनुष्यो "पसमें गंगठन दोपहारा ऐसा नही "संगठन द्वारा अपनी सिगनेहा उपदे" देगी। समें संगतिहरण न हो। हा मुख्य म गठन है। प्रथम मंदितीया 0 पामरिर, २ यातः-वायु भी इसी प्रसार मनुष्यारी संगठनक बायुभाम और पशियों संगटनग दि मनुमर ५. उपऐ२२ ओटे रेायु मिस समय १ उस प्रारर मंगठन बनाने में हमारे माना . मकान, (५०) अथर्ववेदका सुबोध भाष्य । [कां. संगठनका प्रचार । हमारे देश, जाति या राष्ट्रके लोग, इस संगठन महायज्ञमें वह भयंत आवश्यक है । इसके विना कोई संगठन हो ही नहीं संमिलित हो । एक स्थानपर जमा होना पहिली सीढी है। सकता। इसके पश्चात् परस्पर समर्पण करनेसे संगठनकी शक्ति बढने पशुभाव छोडनेका फल । लगती है । हवनमें सात प्रकारकी समिधाए एकत्रित होती हैं और अग्निद्वारा प्रकाश करती है। यदि एक एक समिधा पशुभाव छोडने और मनुध्यत्वका विकास करनेसे तथा अलग होगी तो अनि बुझ जायगा। इसोप्रचार जातिके मब लोग संगठनसे अपनी शक्ति बढानेसे जो फल होता है उसका वर्णन संगठित होनेसे उस जातिच यश चारों दिशाओंमें फैलता है, द्वितीय मंत्रके चतुर्थ चरणमें दिया है- परंतु जिस जाति में एकता नहीं होती, उसकी दिन प्रति दिन "जो धन है वह इस हमारे समाज में स्थिर रहे।" संग- गिरावट होती जाती है। इससे यहां स्पष्ट हुआ कि सगठन उनका यही परिणाम होना है। जिससे मनुष्य धन्य होता है करनेवाले लोगों परस्परके लिये आत्मसमर्पण का भाव अवश्य उसका नाम धन है। मनुष्यको धन्य बनानेवाले सब धन चाहिये। मनुष्यको अपने संगठन करने के पश्चात् ही प्राप्त हो सकते हैं। इस प्रकार प्रथम मंत्रने संगठन करनेके मूल सिद्धान्तोंका इस द्वितीय मंत्रमें संगठन के नियम बताये हैं, वे ये हैं- उत्तम उपदेश दिया है। १ एक स्थानपर समिलित होना, सभा करना, २ उत्तम वक्ता जनताको संगठनका महत्व समझा देव; ३ अपने अंदरका पशुभाव छोडकर, पशुमावसे मुक्त "सब लोग यहा आजाय, उनकी एक परिषद् बने और होकर, लोग वापस जाय, सर लोग मनुष्य बनकर संगठन बढानेवाले उत्तम वक्ता अपने ऐक्यभाव बढानेवाले परस्पर वर्ताव करें। धक्तृत्वमे इस संगठन महायज्ञका फैलाव करें।" यह द्वितीय मंरके पूर्वाधा भाव है। इन बातोंके करनेमे संगठन होना संभवनीय है। इस प्रकार जो लोग सगठन करेंगे, वे जगत् धन्य हो जायगे । सभा, परिषद्, महासमा भादि द्वारा जातियों का संगठन करने की गति इस मंत्रार्धमें कही है। सब लोग इसका महत्त्व तृतीय और चतुर्य मत्रमें फिर नदियों और जलोंके स्रोतों जानते ही है । भागे जाकर इसी द्वितीय मंत्रमें एक महत्त्वपूर्ण पुनःहा है। संगठन कानेगलोंको घी, दूध दही भादि का वर्णन आया है, जो पूर्वोक्त रीतिसे एकताका उपदेश पुनः बात कही है यह अवश्य यानसे दखने योग्य है- पदार्थ भरपूर मिल सकते हैं, मानो उनमें इन पदापोंकी नदियाँ पशुमारका यज्ञ । ही बहेंगी 1 इसलिये संगठन करना मनुष्योंची मातेका एक. "जो सब पभाव हम सबमें हो वह इस यज्ञमें पाजावे, मात्र प्रधान साधन है। और यही रहे अर्थात् फिर हमारे साथ वह पशुभाव न रहें।" इस कारण तृतीय और चतुर्थ मंत्रों के उत्तरार्धमें कहा है, पशुमावकी प्रधानता जिन मनुष्यों में होती है, उनमें ही आपके कि " इन सपटित प्रयत्नोंसे हम अपना धन बढाते हैं । भगडे होते हैं। यदि पशुभाव संगठन के लिये दर किया जाय संघटित प्रय नॉस ही यश, धन और नाम बढता है। और मनुष्यत्वम माव बढाया जाय, तो आपसके सगडे नहीं होंगे। इसलिये पशुभाव का यशमें समाप्ति करने की सूचना संगठनद्वारा अपनी पुरूषार्थ शाक बनाकर अपना यश बारों पाया है कि पाठक इस सूता अधिक विचार करेंगे और इस द्वितीय मत्रके तृतीय चरणमें दी है भोर संगठन के लिये दिशाओम फैलायेंगे।
सू०१६, मं०१-५] (५५) चोर-नाशन-सूक्त। [षि चातनः। देवताः अमित, इन्द्रः, वरुणा ] (१६) वैऽमावास्याई रात्रिमुदधुर्वाजमन्त्रिणः । अग्निस्तुरीयो यानुहा सो अस्मभ्यमा प्रवत् ।।१।। सीसायााह वरुणः सीसायामिरुपांपति । सीसै म इन्द्रः प्रायच्छ्त्तदङ्ग यांतुचातनम् ॥२॥ इदं विष्कन्धं सहत इदं बांधते अस्त्रिणः। अनेन विश्वा ससहे या जातानि पिशाच्याः ॥३॥ यदि नो गां हंसि यद्यश्व यदि पूरुपम् । वे त्या सीसेन विध्यामो यथा नोऽमो अवीरहा ॥४॥ अर्थ-(ये मत्रिणः ) जोगाकू घोर । ममागस्यां रात्री ) अमावसकी गाने के समय हमारे (माज ) समूहपर (उदस्युः हमला करते हैं, उस विषयमें ( यातहासः तुरीयः अप्तिः) चोरों का नाशक वह चतुर्थ अमि अस्मभ्यं हमें (मधिप्रात) सूचना देंवरुणने सोपे विषयों ( मध्याह ) कहा है । भाग्ने सीमे हो ( उपावति ) रक्षा कहता है । इन्दने तो (मे) मुझे सीसा (पापच्छत् ) दिया है । ३(मंग )य (बत् यातुचाउनम् ) वासा स्टाने गला है ॥ २॥ (इ) यह मांसा (विध कावट करनेवालोंको सहते राता है । यह सौसा (पत्रिगः ) गोंको (पाप भी देता है। (मनेन ) इससे (पिशाच्या या विश्वा जातानि ) पिशाचों की जो आतिग है, उन हो (ससहे) मैं इटावा ॥३॥ (यदि नः गां इंसि) यदि हमारी गायको तू मारता है. ( यदि स ) यदि घोडेको और (पदि पूरुष ) यदि मनुष्यको मारता है (वा) तो उस मुसको (सीसेन विष्यामः ) सीके हम वेधते है, (पा) जिससे तू (मःम-धीर-हा मतः) हमारे वारोंका नाश करनेवाला न होवे ॥ ४॥ भावार्य-अमावास्या को अंधेरी रात्रि समय जो हा हमारे सपार हमला करते है, उस विषयमें हम ज्ञानीसे उपदेश मिला है॥ १॥ जल रक्षक तथा उपदेशक सीमेकी गोली का प्रयोग करने को प्रेरणा देते हैं। घर पारने तो मोमेडी गोली हमें रखी है । हे धुमो । या डाकुओंको हटानेवाली है ॥ २ ॥ यह सीसे ही गोली नामाको हटाती है और प्रतिवरनेवालों दूर करती है। इससे सून पशाली सब जातियों को दूर भगाया जाता है॥३॥हे चोर । यदि तू हमारी गाय, हमारा पोरा अपवा मनुष्यका वध करेगा, तो सार हम गोली चलावेंगे, जिससे हमारा नाश करने के लिये फिर जीवित न पकेगा น हा सीसेकी गोली। गोतीस से ही रोज वेश करना चाहिये । माठी सोटी समान या पानी प्रयोग होताना इस सूकमें मासेकी गोली घपयोग सभोर करनेग्रे यहां पठाना है। कहा है। सूज करल "सी" पद है, गोधवाचक शब्द नहातमापि "सासेन रियामः" (सामे द्वारा वेध करेंगे। इस प्रयोगसे सांस शासे होवेही गोली मार "अदित. या" मादिगन्दा मर्प सपप-गलो सिजमें प्रमभना हरित है। केवल सोहा उपपोग दामोर नागमें दिये , पाठ देखें । ये गा पदबहरे ही डिस अन्य प्रकार भानीय ना दोखा है। रामः) अर्थात् मोमो पारा । इनगे भित्र देप का भार एमे दिमाग के ममात्र निशाना मारता है। पदोपदणसे पूर्व विचार मामा परि से माम सोसेली गोमा बती ना रखार से पाने - पेते गण मी पप्पासोनियाने पराग पिम्म-परमेना. समताप्रा- है। गरम मंत्री पर पो मार गि
अधर्ववेदका सुबोध भाष्य
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७
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२ पिशाच, पिशाची रक्त पीनेवाले और कचा मास इस सूफमें “वण" शब्द आया है। वरुण समुद्र भयवा
खानेवाले फूर लोग, जो मनुष्यका मास भी खाते हैं। जरका आधिपति वेदमें तथा पुराणों में प्रसिद्ध है। जलस्थान,
ये सब तथा ( भनिन् } भूठे ढाकू, ( यातु ) चोर ये सब नदी आदि तथा समुद्र परसे जो शत्रुके हमले होते हैं उनसे
समाजके शत्रु है । इनको उपदेशद्वारा सुधारनेका विषय पूर्व रक्षा करने का यह ओहदेदार है। जिस प्रकार “ अमि।
आये हुए (का० १, सू० ७, ८) धर्मप्रचारके सुस्ता शब्द माह्मणत्ववाचक, " इन्द" शब्द क्षात्रधर्मका बोधक है
बाचुका है । जो नहीं सुधरते उनको दंडके लिये क्षत्रियोंके उसी प्रकार " वरुण" शब्द जलमार्गसे आनेजानेवाले और
आधीन करनेकी आज्ञा भी सक्षम सूतके अतमें दी है। देशातमि व्यापार करनेवाले वैश्योंका अथवा वैश्यत्वका सूचक
उपदेश और दण्ड इन दो उपायोंसे जो नहीं सुधरते उनपर यहा प्रतीत होता है । इसलिये गोली चलाने के विषयमें
साँसेको गोलीका प्रयोग करने का विधान इस सूक्तम भाया है। (ममि) ब्राह्मण, (इन्द्र ) क्षत्रिय और (घरण ) वैश्यने
अपने संगठन करनका उपदेश पूर्व मुक्त करने के पश्चात् भी संमति दी है और ( इन्द । क्षनिय ने तो सीसेकी गोलियां
इस सूक्में शत्रुपर गोली चलानेकी आज्ञा है यह विशेष हमारपास दे रखा हैं, इत्यादि द्वितीय मंत्रका भाव इस प्रकार
ध्यानरो देखना चाहिये। जिनका आपममें उत्तम संगठन नहीं है स्पष्ट हो जाता है । सप्तम सूक्तम दिये उपदेशानुसार भामण
यदि ऐसे लोग शनुपर हमला करेंगे, तो संभव है कि वे खयं प्रचारकाने प्रयत्न किया और उन्होंने कहा कि ये डाकू सुधरते
ही नष्टभष्ट हो जायगे । इसलिये " प्रथम अपना संगठन और नहीं हैं, इत्रियों ने भी कहा कि अनेक बार देहदंड देनेपर मी
पयात पनुपर चढाई " यह नियम ध्यान में रखना चाहिये ।
इन दुधौा सुधार नहीं हुआ, वैश्य तो लूटे जानेके धारण करते
हो रहे, इस प्रकार तीनों वर्गोको परिपने जय गोली चलाने की
आज्ञा दी, तब इस सूचके आधारपर गोली चलायो
अमि इन्द्र आदि विषयमें सूत सातके प्रसंगमें वर्णन जा सकती है। पाठक यह पूर्वापर संबंध अवश्य ध्यानमै
माया ही है । (अनिशानी उपदेशक, ( इन्द्रः । शवार ये रखें।
भावार है यह पहिले यताया है। इन दो शब्दोंसे ब्राह्मण और
क्षत्रियों का बोध होता है यह पात पहिले बतायी जाचुकी है।
सूक्तकी शेष बातें रपष्ट है। इसलिये भधिक विवरणकी
आवश्यकता नहीं है।
(यहा तृतीय भनुवाक और पहिला प्रपाठक भी समाप्त हुआ।)
आर्य धीर।
(
रक्तस्राव बंद करना।
[ऋपिः ममा । देवता-योपित्]
(१७)
अपो यन्ति योपिता हिरा लोदिनवाससः । अनातरव जामस्तिरन्तु हवामः ॥१॥
विष्ठापरे तिष्ठ पर उव व तिष्ठ मध्पमे। कनिष्ठिका च विष्ठति विष्ठादिद्ध मनिही ॥२॥
चुतस्प मीना महस्य हिराणाम् । अस्युरिन्मभ्युमा हुमाः साकमन्ता अरंसव
पार या सिर्फवापती पहपक्रमीन् । विष्ठतिलयता सु कम्
- (MPE ) पदको (सौदिय-पाग. ) रस्त मारले पनी हु (पोषित) प्रिया मा हात
metrin) परि rai (farm) सराय अनि मना बनाएका (व) am
॥३॥
॥४॥
२०१७, म०१-४] रकमाघ वद करना। (५७) प्रगर (म मातरः) विना माईके (इत पर्चसः ) निस्तेज बनी (जामयः ) यहिनै ठहर जाती हैं । १. (अवरे तिष्ठ) हे नाचेकी नाही! तू ठहर । ( परे तित्र) हे वाली नार) 1 तहार । ( उत मध्यमे ) और वीव वाली (पं तिष्ठ) तू मी ठहर । (कनिष्ठिका च विष्ठति ) छोटी नाडी भी ठहरती है तथा (धमनिः इत् तिठात् । बडी नाडी भी ठहर जावे ॥ २॥ (धमनीनो शवस्य ) को धमनियों के और ( हिरागा सहसस्य ) हजागे नाडियों के बीच में । इमामध्यमा अस्Yः) य मध्यम नाडियां ठहर गई हैं। (साकं ) साथ साथ ( अंवा ) अंत माग भी (भरंसत ) ठीक हुए हैं ॥३॥ (वृहती धनः ) बडे धनुष्यने (वः परि अक्रमीत ) तुमपर हमला किया है, मतः (सिकतायती खेत) रेतवाली अथवा घरावाली बनकर ठहर आओ, जिससे ( क ) मुख (सु इलयत ) प्राप्त करोगे ॥४॥ भावार्थ-शरीरमें राल रंगका रक्त शरीरभर पहुंचानेवाली धमनिया हैं । जब घाव लग जावे तब उनकी गति रोक्नी चाहिये, जिस प्रकार दुर्भाग्यको प्राप्त हुई भाई रहित बहिनोंकी गति हरु जाती है ॥ १ ॥ नीचे गली, अरवाली, लपा बाँचवाली छोटी और वही सब नाडियों को बंद करना चाहिये ॥ २॥ सकडों और हजारों नाहियोगमे आवश्यक नाईयों को बंद को থ্যর उनके कटे हुए मंतिम माग तक किये जा ॥ ३॥ मनुष्य के रहे मासे धमनियों पर हमला होकर नाडिया फर गई है, उनके धर्करा के साथ संबंध करने से शीघ्र आरोग्य प्राप्त हो सकता है ॥४॥ घाव और रक्तस्त्राव । पति जीवित रहनेपर स्त्रियां बडे बडे समारंभोंमें और उत्सा. में जा सकती हैं, उस प्रकार पति मर जाने के पात् वे ? शरीरमें शमादि घाव होने पर घावके कारकी और नाचेकी नहीं सकनी अर्थात उनकी गति का जाना है । पहले उनकी नादियोंको बंद बांधने से रक्तका साव बंद हो जाता है । पाव गति सर्वत्र होती थो, परंतु दुर्भाग्यवश होने पद्यात उना देवार ही निधय काना चाहिये, कि कौनसे भागपर पंद लगाना भ्रमण नहीं ले सकता। चाहिये । यदि रक्तभाव इस प्रकार बंद किया जाय तोही रोगीको चीन भारोग्य माप्त हो सकता है, अन्यथा रक्तके यहाँ खीविषयक एक येदिक मर्यादाका पता लगा कि बहुत साव होने के कारण ही मनुष्य मर सकता है। इसलिये पति मरने के पक्षात् खी उस प्रकार नहीं घूम सस्ता किसी इस विषयमें सावधानता रखनी चाहिये। पतिके होने के समय घूम सकती है। परमें रहना, रथयों के इसमे पूर्व सूजमें शत्रुको गोली मारने की गुलना दी है। मृतपात मा हार की गति या प्रतीत होता है। मानंद प्रसगों न जाना, मंगोमयोंमें माम न लेना इनादि इस सनई में सरपर पाप होना समा है, इसलिये इस रफसाय बंद करने के विषयमें इस एकमें पोश दिया है मृतपति श्री भाई होनेपर भाई पर जा सकता है, माई सिझमावती " अर्थात् रेतवाली भषा शर्करावाली पनी न रहनेपर चिा पिता माता न रहनार उनको दुःसमें दो करनेसे रक्तावांद होता है। भारांक मित्रीका बारीक पूर्ण रहना होता है। इस समय यह दुर्भाग्यस्ती भी पामेशर मगानेसे सार बंद होता है, यह कयन विचार करने योग्य है। भारी अपना समय गुजारे और पपघरो॥ - अथववेदफा सुबोध भाष्य (कॉ०१, भन्यान्य रंग मिले जुले हैं। तो मे सब रंग के कपड़े पहनती पाठक इस विषय में अधिक विचार करें, क्योंकि इस हैं । केवल श्वेत पत्र भी विधवा स्त्रिया पहनती हैं, यह श्वेत विषयका निश्चय होने के लिये कई अन्य प्रमाणों की आवश्यकता बस्नका रिवाज सपूर्ण भारतवर्ष एक जैसा ही है। सौभाग्य-वर्धन-सूक्त । ॥२॥ ॥३॥ ॥४॥ (१८) (अपिः-द्रविणोदाः । देवता--वैनायकं सौभगम् ) निर्लक्षम्य ललाम्य निरराति सुवामसि । अथ या भद्रा तानि नः प्रजाया अति नयामास निररणि सविता साविपक् पदोनिहस्तयोर्वरुणो मित्रो अर्यमा । निरस्मभ्य॒मनुमती राणा प्रेमां देवा अंसाविपुः सौभगाय यत आत्मनि तन्यौ घोरमस्ति यद्वा केशेषु प्रतिचक्षणे वा । सर्व ताचार्य हन्मो वयं देवस्त्वां सविता संदयतु रिश्यपदीं पंदती गोपेधा विधमामुत । बिलीट्यं ललाम्य ता अस्मिन्नांशयामसि अर्थ-( ललाम्यं ) मिरपर होनेवाले ( लक्ष्य ) युरे चिन्हको (निः) निःशेषतासे दूर करते हैं; तथा (भ-राति) बज्मी आदि (नि सुवामसि )निःशेप दूर करते हैं। ( अप या भदा) और जो कल्याण कारक चिन्ह हैं ( तानि नः प्रजाप) ये सय हमारी सतान लिये हम प्राप्त करते हैं और (अराति ) कमी अदिको (नयामसि ) दूर भगाते हैं ॥ १ . सविता, वरुण, मित्र और अर्थमा ( पदो हस्तयोः ) पावों आर हातोंकी । (अण) पीडाको (निः नि साविषद ) दूर करें। ( रराणा अनुमति ) दानशील अनुमानेने ( अस्मभ्यं निः ) हमारे लिये निःशेष प्रेरणा की है। तया ( देवाः ) देवान (इमा) इस नीको ( सौभगाय ) सौभाग्यके लिये( प्र असाविपुः ) प्रेरित किया है ॥२॥ (यत् ते आत्मनि) जो तेरी आरम्मान तथा ( तन्यां । गारमें ( वा यत् केशेषु । अथ जो केशीम ( या प्रतिवमो) अयाजो टाटमें (घोरं मस्ति) भयानक चिन्ह है ( तत् सर्व ) वह सब ( वय वाचा इन्मः ) हम वागोसे हटा देते हैं । ( सविता देवः ) सविना देव (स्वा सूदयतु ) तुझे मिद करे अर्थात् पारपक्क बनावे ॥ ३ ॥ (रिस्यपदी ) हरणके समान पाववाली, ( वृषदती ) बेलके गमान दातवारी, ( गोघां) गायके समान चलनेवाली, (विधा) विरुद्ध शब्द बोलनेवाली, जिसका शब्द कठोर है ऐसी श्री (उत लायं मिली ) और सिरपरका कुलशग यह सब हम ( अस्मत् नाशयामति) अपनेसे नाश करते हैं ॥४॥ भागार्थ-सिरपर तथा वर्गापर जो दुरुक्षण होंगे उनको दूर करना चाहिये तथा अंत.वरणमें कंजूसी भादिजो दुर्गुण हैं उनको दूर करना चाहिये, और जो मुलक्षण हैं उनको आने त्या अपने संतानों के पास स्थिा करना अथवा बताना चाहिये। तथा जूसी थादि मन के पुरे भावों को हटाना चाहिये मित्र, अर्थमा, अमति आदि सब देव और देवता हाथों और पायोसी पाराको दूर करें, इस विषयम ये हमें उपदेश दे । क्योंकि देवाने स्त्री और पुरुषको उत्तम भाग्य के लिये बनाया। ॥ २ ॥ म्हारे ा मा भयया मनमें, शरीरम. मि तथा राष्टिमें जो कुछ युलक्षण हो, को कुछ भी दुर्गुण हो उनको हम २०१७०१-81 सौभाग्य-यधन-सूत। - घननसे हटाते हैं । परमेश्वर तुम्हें उत्तम लक्षणों से युक्त बनावे ॥ ३॥ हरिणके समान पाव, पैल के समान दांत, गायके समान चललकी आदत, कठोर बुरा अवाज होना तथा सिरपरके अन्य कुलक्षग यह सब हमसे दूर हो ॥ ४ ॥ कुलक्षण और सुलक्षण। इसलिये पाठक इन दोनों सूक्तोंका साथ साथ विचार करें। इस सूक्में शर रके तथा मन, बुद्धि, आत्मा आदिक मीजी इन युलक्षोसे कई लहग केवल स्त्रियों में और कई पुरुषों कुलक्षण हो उनको दूर करन तथीं अपने आपको पूर्ण सुरक्षा नीषने दिखाई देना भी संभव है। तथा कई दानों में होंगे । अथया सब रक्षम न्यूनाधिक भेसे युक्त पनानेका उपदेश किया है । इस सूक्तमें वर्गित कुलक्षण ये पुलक्षण दूर करना और इनके विरोधी मुलक्षण अपमें (1) ललाम्य लक्ष्य-सिरपरका लक्षण, कपाल छोटा सुरक्षा का भी मान हो सस्ता है। जिसस शरीर सुदौर घटाना हरएका कर्तव्य है । इन कुलक्षणोंग रिचार करनसे होना, मालपर बाल होने, बुद्धिहीन दर्शन आदि कुलक्षण । दिखाई देता है वे शरीरके सुलक्षण सममने चाहिये । " (मत्र.) (२) ललाम्यं विलीन्य-मिरर बालोंके गुछे रहने और प्रकार इदिग, मन, यदि पाना आदिके भी सुलक्षण है। इन सरका निमित शान करके अपमेये युनक्षम दूर करना उससे सिरकी शोमा निमार मदिभुलक्षण । (मत्र १) और सुरक्षा अपने बढाना हरएका आवश्यक कर्तव्य है। (३) रिश्यपदी-हरिण के समान कृश पनि । (मत्र ४) (1) वृपदती-लके समान बरे दति । (मंत्र ४) पाणीसे कुलक्षणोंको हटाना । (५) गोपेधा-गायके समान चलना । ( मंत्र) मत्र ३ में " मर्व तशाचाप हन्मो वयं । " अर्थात् हम (नि-धमा कानाको युरा लगनेवाला भावार, जिसरा सब कुरक्षण वाणीमे दूर करते हैं, अपवा पागे इनपुरक्षा मोठा मंजुल आवाज नहीं। (मंत्र ) नाश करते १, कहा है, तथा साथ साथ " देवरवा मसिन ये अतिम ( ३-६) चार कुलक्ष घीलिंग निदेश स्त्रियों के सूदयतु " अर्थात सरिता देव में पूरा सुरक्षागयुक्त एन. लिो बहुत युरे है अधांत नियों में ये न हों। वधू पसद क ने कहा है। परमेश्वर पृशमे मनुष्य सुलक्षगाने युरू हो शा" धमय इन क्षणों विचार करना योग्म है। है, इसमें किसीको मदह नहीं हो ममता, पातु बागाने पु" (0) केशेषु घोरं-पालोम ऋरता अथवा भयानकता गोंको दूर करने विषयम बहुर लगोको रद होना at दिखाई देना अर्थात् थारो कारण मुघ या दोसना। है, अत इस विषय पुछ netsel माया। (मंत्र" वेदमें यह विषय कई सूसने साधा है। इमतिय पाठक इसका (6) प्रविचक्षणे -नेत्रों में क्रूरता, भयानक नेत्र, र विगर करें। भयानकर (मंत्र) (१) सन्या शरीर, मनकता, अपांन चार भवया के टेढामे होने के कारण माना । ( में. ३) (1) मारमनि st-मन, पाय, वितबारमा करता मार होना । (मंत्र) (B) शर्वि-करमा, उसरमावध ममाप । । (१) पो हमपो अ-रगि:-4 भारतायो।
- अथर्ववेदका सुबोध भाष्य Int०१, करने योग्य है । "मैं हीन हूँ, दीन है" आदि विधार जो लोग मंत्रमाग है, परंतु सबके लिये भी यह माना जा पहता है। आज कल बोलते हैं, वे विचार मनमें प्रतिबिंबित होनेसे मनपर अर्थात् मनुष्य मात्र स्त्री हो या पुरुष हो वह अपना फरगण कुसंस्कार होने के कारण हमारी गिरावट के कारण हो रहे हैं। साधन करने के लिये ही उत्पन्न हुआ है और वह यदि परमेश इसलिये शुद्ध वाणीका उच्चारही हमेशा करना चाहिये, कभी भी भक्ति करेगा तथा शुद्ध वाणोकी सूचनासे अपने मनको प्रभावित अशुद्ध गिरे हुए मावोंसे युक्त शन्दोंका उच्चार नहीं करना करेगा तो अवश्यमेव सौभाग्यका भागी बनेगा । हरएक मनुष्य चाहये । वाणको शुद्ध प्रेरणाके विषय में साक्षान् उपदेश इस वैदिक धर्म के सिद्धांत मनमें स्थिर करे । अपनी उमतिको देनेवाले कई सूरू आगे आनेवाले हैं, इसलिये इस विषयमें मिद करना हरएक्के पुरमार्थपर अवलंबित है । यदि अपनी रदो इतना ही लेख पर्याप्त है। अस्तु इस प्रकार शुद्ध पाणीद्वारा अवनति हुई है तो निश्चय जानना चाहिये कि पुरुषार्थ पुटी और परमेश्वर मतिद्वारा अपने लक्षणों को दूर करना और हुई है। अपने अंदर सुरक्षाको पढाना हरएक मनुप्पो योग्य है। सन्तानका कल्याण हाथों और पागेका दर्द। यदि अपनेमें कुछ कुलक्षम रहे मी, क्यापि अपनी संतानों में द्वितीय मंत्रमें कहा है कि सविता (सूर्य), वरुण (जल), सब सुलक्षण आजोय ( या भद्रा तानि न प्रजायै ) यह प्रथम मित्र ( प्राणवायु ), अर्यमा । आगला पौधा ) ये हाथों और मंका उपदेश हरएक गृहस्थीको ध्यानमें धरना चाहिए । पापोंके दर्दको तथा सर दर्दको दूर करें । सूर्यप्रगश, भपनी संतान निदोष और सुलक्षगोंसे तथा सद्गुणीच युद्ध समुद्र आदिका जल, शुद्ध वायु, भाकके पत्तीका सेक आदिसे मने यह भाव यदि हरएक गृहस्था में रहेगा, प्रति पुरतमें बहुतसे रोग दूर हो जाते है। इस विषयमें इससे पूर्व बहुत मनुष्योंका सुधार होता जायगा और राष्ट्र प्रतिदिन उमति उ कहा गया है और आगे भी यह विषय वारंवार भानेवाला टोपर चढगा। यह उपशहरएक प्रकारसे कल्याग करने- है । भारोग्य तो इनसे ही प्राप्त होता है । वाला है इसलिये इसको कोई गृहस्थी न भूले । सौभाग्यके लिये। इस प्रकार पाठक इस सूकच विचार करें और अपने "इमा देवा असाविपुः सौमगाय। " इसको देवीने रक्षों को दूर करके अपने अदर सुलक्षण बदनिका प्रपल सामान्यतये बनाया है। विशेष फरक भोके उद्देश्य से यह करें। शत्रु-नाशन-सूक्त । (१९) (प्रापि:-प्रया । देवता-ईश्वरः, प्रम) सू.१९, मं०१४) श-नाशन-सूक। - वाले बाण समूहाँको (मसत् भारात् पाठप ) हमसे दूर गिरा ॥ १॥ (ये मस्साः) मो फेंके हुए और (पेप मस्पाः)गे फेंक जायगे, वे सब (विप्वयः शरवः) चारों ओर फैले हुए बाण मादि शस्त्र (यस्मर पतन्त) हमसे दूर जाकर गिरें (देवीः मनुष्येषवः ) हे मनुष्यों के दिव्य वाणो 1 ( मम भमित्रान् ) मेरे शत्रुओंको ( विवियत ) वेध फर दालो ॥२॥ (यः नः स्वः) जो हमारा अपना अथवा (यः भरगः ) जो दूसरापरीय हो, किंवा जो (स-जातः) समान उच जातिय फुलान ( उत ) अथवा जो (निष्टयः ) भिन्न जातिवाला या संर जातिका हीन ( भस्मान् मभिदासति ) हमपर पढाई का हमें दास बनानेकी चेष्टा करे, [ एतान् मम भामत्रान् ] इन मेरे शत्रुओंको [दः लानेवाला चौर [शरम्पया विविप्पत] पाणोंसे वेष करे ॥ ३॥ [] जो [ सपानः ] विरोधी और [पः भ-सपानः ] को प्रकट विरोधी नहीं है। धमः द्विषन् | और जो द्वेष करता हुआ (नाशपाति ] हमको शापता है [वं] उसका [ सर्वे देवाः ] सन देव (पूर्वन्त] नाश करें । [ मम मन्तर वर्म ] मेरा भौतरिक कवच [ प्रा ] ब्रह्मज्ञान ही है ॥ ४ ॥ भावार्य-हमारे धारोंका शौर्य ऐसा हो कि हमारा नाश करने की इच्छा करनेवाले सब शत्रु इमसे समाए रहे और हमतक कभी न पहुंच सकें । उनके शस्त्र भी हमसे दूर रहे ॥१॥ सब शस्त्र हमसे दूर गिरें । और हमारे शत्रुओपर ही सर शम गिरते रहे ॥ २ ॥ कोई हमारा मित्र या तु. हमारी जातिवाला वा परगतीचा, कुलीन या दोन, कोई भी क्यों न हो, यदि वह हमें दास बनाने या हमारा नाश करने की चेष्टा करता है तो उसका नारा से करना योग्य है। प्रकट या छिपा हुआ शत्रु हमारा नाश करना चाहता है या हमें युरे बन्द बोलता है सर सजन उसको दूर। मेरा भौतरिक कवच सत्य सान ही है॥४॥ यह “प्रामिक गण" का स्वत है, इस कारण "अपराजित विषयक आस्तिस्य युदियुज शान इतना वर्ष इस शन्दो गण" के मक्तोंके साप भी इसका संबंध है, अतः पाठक समझना योग्य है। इस गणके सूत्रों के साथ इसका भी विचार करें। इस सूक्तके दो दिमाग। आन्तरिक कवच। इस सूकडे दो विमाग होते हैं, प्रथम दिमागमें भारंगो इस सूकमें जो सबसे महत्व पूर्ण बात कही है पर मौतरिक चतुर्व मंत्र तृतीय परणतको स मंत्र माते है और द्वितीय कवाकी है। देशके कयय पर्वत, दुर्ग और समुद्र होते हैं, विमागमें पतु मंत्र पर्ष परणय ही समावेश होता। इनके होने के कारण बाहरके शत्रु देशमें घुस नहीं सकते। इन विभा देसकर इसका विचार करनेसे बनाए भामकं कपच किले होते हैं इनके कारण आधु माममें घुस नहीं मिलता है। सकते । धरके कवर सोईके अपवा तारके बनाये जाते। वैदिकधर्मका साप्प मास पर। जिनके कारण के पात्र परपर साते नहीं और शरीर सुरक्षित राता है। अंदर मामा और तारण है, मन, बुद्धिति और मकार मिलकर अंताकरण होता है, इसी साप मारमारे लिये राती है। इस भन्तःकरण" रिये" पर " अयस्य चाहीये. जो इस गनाशन मन पर्म ममाताम्" दाया है। भानरूप परमेरामती निमामा सूजने ॥
अथर्ववेदफा सुबोध भाष्य
[काण्ड,
शक्तिका ही माश्रय करते हैं ।। अतः हम कहते हैं प्रथम विभा. प्रतिकार करना योग्य है। क्षात्रसाधसे युद्धोंके बहुत होनेसे
गके मंत्र पाशवी शक्तिका विचार करते हुए साधारण जने का ही मनुष्य इन साधनों की क्रूरताका अनुभव करता है और
मार्ग बता रहे है और द्वितीय विभागका मंत्रमाग आरिमक ब्राह्मसाधनको स्वीकारनेका यन करता है।
दिव्य शकिका मानवी अंतिम ध्येय बता रहा है।
इम प्रगर युद भी मनुष्यको ब्राह्मसाधनतक पहुंचानेवाले
'" आत्मिक शाकि या भास्मिक ज्ञान ही मेरा सबसे बडा मार्गदर्शक बनते हैं।
चच है, जिससे में सब प्रकारके शत्रुभोंसे सुरक्षित रह सकता
दासभावका नाश।
हूं, मेरे अंदर अहिंसाका भार पूर्ण रूपसे स्थिर रहा,तो जो जो मेरे
पास आयेंगे उनके अंदरसे भी शत्रुताका भाव दूर हो जायगा
तृतीय मंत्र में कहा है कि "जो अपना या परग्या हमें दास
इत्यादि वैदिक धर्मको शिक्षा अन्तिम साध्य है, मनुष्यको राष्ट्रीय पारतंय शारीरिक दास भावका द्योतक है, इसके
बनाने की चेष्टा करता है उसका नाश करना चाहिये।"
यही पात अंतमें स्वीकारनी है, परंतु यह स्वीकार बाह्य दबावसे तारक मानसिक, बौद्धिक तथा वाचिक, पारतंत्र्य भा है
नहीं होना चाहिये, परंतु अंत.स्कृति ही होना चाहिये, अपना और ये सबसे अधिक घातक हैं। किसी प्रकारका भी पारतंत्र्य
स्वभाव ही ऐमा बनाना चाहिये । इसी भावसे मनुष्य का सबसे जो अपने का कारण हो वह स्वीकारना नहीं चाहिये,
अधिक कल्याण है।
परंतु उसके कारणको दूर करना चाहिये । मायाँको दास कमी
अन्य कवच । क्षात्र कवच ।
नहीं बनना चाहिये। स्वाधीनता ही मनुष्यका साध्य है।
शरीरके, नगरोंके तथा देशों के अन्याय कवच उक्त विश्वासके ज्ञान और पुरुषार्थसे स्वाधीनता-बबन मुक्ति प्राप्त होतो
अभावमें आवश्यक ही हैं। स्वसंरक्षणके शस्त्रास्त्र आदि सय है, इसका भी आशय यही है। मनुष्य के सब दुःख दासत्वके
इस अवस्थामें ही सहायक है । अर्थात् जबतक जनता पक्त कारण हैं। इसलिये कोई मनुष्य या कोई राष्ट्र दूसरे मनुष्यको
अधिकार के लिये योग्य नहीं होती, तबतक शूरवीर भत्रियगण या राष्ट्रो दासत्वमें दबानेका यत्न न करे और याद किसांसे
राष्ट्रका संरक्षण इन शनाखोंसे करें। ये क्षार साधन हैं । ज्ञान ऐसा प्रयत्न हुआ तो सब मनुष्य उसका विरोध करें ।
कवचसे सुरक्षित होना नाम साधन और लोके कवना तथा दामभावो हटाने उपदेश पाठक इस सूक्तमें विशेष
शनायासे सुरक्षित होनाक्षान-साधन है । ब्राह्ममाधन स्वीकारने प्रभारसे देखें और उसको अपने जाव में घटावें । पारक
योग्य जनताकी उमति धर्मसाधनसे करनी चाहिये और जबतक
इस सूतकं इस प्रचार विचार करनेसे बहुत ही बोध प्राप्त
उतनी उमति नहीं होती, तबतक छात्रसाधनसे अनुओंका कर सकते है ।
-
महान् शासक।
(२०)
(ऋपिः-अथर्वा । देवता--सोमः)
अदारसद् भवतु देव सोमास्मिन्यज्ञे मरुतो मुडतां नः ।
मा नौ विददाभिमा मो अशस्तिर्मा नौ विदद् घृजिना द्वेष्या या
यो अध सेन्यौ योऽधायनामुदीरते । युवं तं मित्रावरुणावस्मर्यावयतं परि
इनव यमुतश्च यधं वरुण यावय । वि महच्छम यच्छु वरीयो यावया यधम्
शास इत्या महाँ अस्यमिप्रसाहो अस्तुतः । न यस्प हन्यते सगा न नीयत कदाचन ।। ४ ॥
॥१॥
॥२॥
सु०२०,मं०१-४] महान्-शासक। अर्थ-है (देव मोम ) सोम देव ! (अ-दार-सृत् भवत) आपसको फूट उत्पन्न करने का कार्य न हो। है (मरुतः मरत्ती । ( भस्मिन् यज्ञे ) इस यज्ञमें ( नः मृहत ) हमें सुखो करो। ( अभि-भाः न. मा विदद् ) पराभव हमारे पास न आवे, (अशस्तिः मो) अकीर्ति हमें प्राप्त न हो, (या द्वेप्या वृजिना) जो द्वेष बढानेवाले कुटिल कृत्य हैं वे भी (नः मा विदद् ) हमारे पास न हो ॥ १ ॥ (अधायूनां ) पापमय जीवनवालोंका (या सेन्यः वधः ) जो सेनाके शर वारोसे वध ( अप उदीरते ) आज हो रहा है । हेमन और वरुणो । (युर्व) तुम (तं भस्मत् परि यावयतं ) उसमे हमसे सर्वथा हटा दो ॥ २॥ हे (वरुग) सर्व श्रेष्ठ ईश्वर ! ( यत् इतः च यत् अमुतः ) जो यहाँसे और जो वहाँसे वध होगा उस ( वधं यावय ) उपको भी दूर कर दे। ( महत् शर्म दियच्छ ) मडा सुख अथवा आश्रय हमें दे और (यथं घरीयःयावय वघको अतिदूर कर दे ॥ ३ ॥ (इत्था महान् शास ) इस प्रकार सत्य और महान शासक ईश्वर(म-मित्र-र -साह मस्तृतः) शत्रुका पराजय करनेवाला और कभी न हाानेवाला ( भामे । तू है । ( यस्य सखा ) जिसका मित्र (कदाचन न हन्यते ) कभी भी नहीं मारा जाता और (न जीयते) न पराजित होता है॥४॥ भावार्थ-३ ईश्वर । आपसकी फूट बढानेवाला कोई कार्य हमसे न हो । इस सत्कर्मसे हमें सुख प्राप्त हो 1 पराजय, अपाति, अयश, द्वेष आर कुटिलता हमारे पास न आवे ॥१॥ हे देव ! शूरवीग के द्वारा जो पापियोंक पर हो रहे है, वैसे वोंके प्रसंग भी हमारे अंदर न उत्पन हो ॥ २ ॥ हे प्रभु ! हमारे अंदर अथवा दूसर के अंदर वध करनेका भाव न रहे। वधका भाव ही हम सबमे दूर कर और तेरा बा आश्रय-सुखपू आश्रय-में ॥३॥ इस रीलिसे तेराही महान् सत्य शासन सबके ऊपर है, तूही सच्चा शतुओंका दूर करनेवाला और सर्वदा अपराजित है, तेरा मित्र बनकर जो रहता है न उस वध कमी होगा और नही उसका कभी पराजय होगा॥४॥ पूर्व सूरवसे संबंध । चाहिये । राष्ट्रीय सुखकी यही मुनियाद है। पूर्व सूक्तके अंतमें “ईश्वरमाफियुक्त सत्यशान ही मेरा भारसको फूट हट जाने के पक्षात् ही(मान) सुम्न होने सचा कवच है " यह विशेष मात कही है, उसीमा विशेष वर्गन की समावना है। अन्यथा सुसमे माशा नहीं है । आपसी इस सूक्तमें हो रहा है। सबसे पहिले मापसी फूटको दूर फूट हटानेसे जो लाभ होगा यह निम्नलिखित प्रकारस प्रथम करनेकी सूचना दी है। मंत्र उतरार्धमें वर्णन किया है। आपसकी फूट हटा दो। १ अभिभा नः मा विदद-पराजय हमारे पामन भावे, "ब-दार-सूत् भवतु हमारा भाचरण पूट हटाने २ मशस्तिः मोजाति हमारे पास न भावे, बाला हो, यह इस उपदेशका तात्पर्य है। दखिये- ६ जिना नः माटित कृत्य हमसे न हों, दार-कूट (टना पातु) ४ देप्या न मा रिदत्-दिप भार हमारे पास न भावें। दा+पुर-भरका प्रयत्न, इटका कार्य । जिम ममय हम बापसी फूर हटायेगे, उस समय में मदार+सत्-फूट हटानेवाला धर्य । किसी के द्वेष करनका कोई कारण नहीं रहेगा, जिगामे कपट- "महार+सत् भवतु" अर्थात् "आपकी फूट हटानेवाला युक्त टिल प्यार करनेकी भारस्यता नी पडेगी. हमारा कार्य हम सबसे हासा रहे ।" भाग्स की फूट के कारण कमी पराभव न होगा अपदा हमपर गई भारत का पतु हमला करते हैं और शत्रुओं हमले हो जानेर हमें आयेगी और हमारी अपति भीनही सगी भर गहम शानुभोधे भगाने का यान करना पाता है। इसलिये भारसको फूट हटाहर माना उत्तम संगठन ने मार एल दुमका कारण आपण की पूर है । यदि मापसी पर न के बलसे भागेबगे, उस समय मरोन हमारे मित्र बार होगी और एक लोग एक मतो रहेंगे तो इमो भोग हमारे साथ मित्रता , हम मी सुको साप हमला करने के लिये भी रेगे। जो भाग होता है सरल पार करते रगे, एमापन हमारा बगा बा भोंका मा है। यमिये एमांध मोर उसमे कमी पगमारोगा सपा मारा १० भारसा फूटमें देपना मोर भारत की पर पूरकामा खडा भागा। () - मार दाल, [वस्य हुन् विम] घरका हमला करनेवाले दोनों जोंको तो दे। (वृत्रहन र गुना प्रमो1ि दिपक मनःमर)पी मन परल।[विम्यासता वर्ष मप हमारी आयुध नाय मनेवाले माचार्य-प्रमानात मार मंगल करनेवाला, प्रामाशा टहन पालन करनेवाला, मेरा नारकरनेवाले अनुहारकारे. [भाग, अथर्ववेदका सुबोध माध्य द्वितीय और तृतीय मंत्रमें गे सेनिक बोरोड होनेवाले किसी अन्य अधिकार नहीं है, सब उसके शम्नमें धर्य दुष्टों के सहारा वर्गन है, वह धर्मन भी हमारी मासुकी फूट करते हैं. वहीं सर्वोपरि है। वह गुनाका सञ्चा नाराह और के कारण हो दुष्ट रोग हमें सताते हैं और उनकार करना कभी पराजित न दोनेवाला है। यदि ऐसे समय प्रमुख प्रयोजन रसन्न होता है, अर्थात् यदि हमारा समाज सुमंगान बनकर कोई रहे तो उसका कभी नाश न होग, और कमी होगा तो उस वजही नष्ट होनेसे वह दघ मी नहीं पराजय मी न होगा । अर्थात् प्रभुका मित्र बनकर व्यवहार होंगे और हमें (मइन् धनं ) दहा सुख प्राप्त होगा । "" बाबालेका यस सत्र लेगा और सा हो भान स्वंत्र सन्दा भयं “हस और आश्रय" है । पूर्वार संबंधप यहां होगा।( मंत्र) परमेश्वरका आशय अमोष्ट है। क्यो सच्चा मुख मो परमात्मा के बायसे ही होता है। मंत्र. २, ३) पूर्व सूक्त में जिस "झान-कवच. ब्रह्म-नर्म" का वर्णन किंग है वह ब्रह्म-स्वच यही है कि "परमेश्वरा शासन सागर बडा शासका मानना और उसका सखा बनकर व्यवहार करना। आया है कि पाठक इस प्रकार प्रमुझे मित्र बननेघ्र पस्न एक कर ही सबसे पा शायनम्ना है, सबके ऊपर करेंगे, " ॥४॥ प्रजा-पालक-सूक्त। (२१) (झापः-अपर्वा । देवता-इन्द्रः) स्तुस्तिदा वा पतिपत्रहा विमृधो बनी । पेन्द्रः पुर एंतु नः सोमा अभयंकरः वि न इन्द्र मृबहि नीचा यच्छ पृतन्युतः । अधर्म गमपा तमो यो अस्पा अभिदासति ॥ २॥ विरक्षो नि मृधौ जहि वि त्रस्य इन रुष । मुन्यमिन्द्र वृत्रहन्नमित्रसामिदासंतः ॥३॥ अपेन्द्र विपुतो मनोऽप जिज्यासतो बघम् । वि मुहळम यच्छ वरीयो यावपा वधम् वर्ष-(स्वीट-दा) मंगल देनेवाला, (विशां पतिः) प्रजाओंका पालवृत्र हा ) पानेवादे अनुध नाश करनेवाला, र डि-मुधावी) विशेष दिसो वने अनदाना, (इषा ) अनदान् । सौम पा) टोमका पान करनेवाला, (अमर करः) अमय देनेदाटा () () हमार (एआगे चले, इमारा नेता ने ॥ ११ (नाम) हमारे भानुभाको ( विदि ) मार डाल। (पृतन्यतः सेनाके द्वारा हमपर हमला बसानेवालोंटो ( सीधा पा) मा प्रतिप र (यामानान् भाभदासादि जो हमें दास बनाना चाहता है. या इमारा पान करना चा है, जो असमागम हान TERE FOR Tों और अमे ! (भिदाम्पतः अमित्रस्य ) हमारा ना करनेवाले (मन् विना उसादको टोड ॥ हे (ल.) एच (मान् शर्म दियष्ट) मृत से दे और (वर्ष वरीपः पाप ) वधको दुर कर ॥४॥ बाजा, बर्मा, अपरान भाडामा, प्रनामे अभय देनेवाला मामा अगामी बने । प्रदेश ८.२२, म.१-४] हृदयरोग तथा फामिलारोगकी चिकित्सा (६५) कर, सेना लेकर हमला करनेवाले शत्रुको दवा दे, जो घातपात और नाश करना चाहता है उसको भगा दे॥ २॥ हिंसक कर शत्रुओंको मारडाल, और कर सतानेवाले दुष्टोंको काट दो, सप प्रकारके शत्रुओंका उत्माह नाश कर दे ॥ ३ ॥ शओंके मन हो बदल दे अर्थात् वे हमला करनेका विचार छोड दें, नाश करनेवालों को दूर कर दे, पातात आदिको दूर कर और सप प्रजाको सुखी कर ॥४॥ क्षात्रधर्म। सकती है। अन्य तीन मंत्रोम विविध प्रकार के शाओंका वर्णन का सूक्त है। इस सूक्में क्षात्रधर्मका है और उनका प्रतिकार करनेका उपदेश है। सय प्रकार उपदेश और राजाके कर्तव्योंश वर्णन है उसका मनन पाठक अतांश शत्रुओंका प्रतिकार करके प्रजाको अधिक से अधिक करें। उत्तम राजाके गुण प्रथम मंग्रमें वर्णन किये हैं। इस सुखी करना राजाका मुख्य कर्तव्य है । यह सूक्त अति सरल है मंत्रकी कसौटोसे राजा उत्तम है या नहीं इसकी परीक्षा हो इसलिये इसका अधिक सटीकरण आवश्यक नहीं है। [चतुर्थ अनुवाक समाप्त ] समयगण" हृदयरोग तथा कामिलारोग की चिकित्सा (२२) (मपिः-प्रझा । देवता-सूर्यः, हरिमा, हृद्रोगः) अनु सूर्यमुर्दयता द्योतो हरिमा च ते । गो रोहितस्य वर्णेन वेन त्या परि दध्मति परि वा रोहितदीर्घायुत्वाय दध्मसि । यथाऽयमरपा असुदयो अहेरितो मुद ॥२॥ ये रोहिणीदेवस्याई गावो या उत रोहिणीः । रूप-रूप ययो-वयस्ताभिंष्ट्या परि दध्मसि ॥ ३ ॥ शुका ते हरिमाण रोषणाकासु दध्मसि । अयो हारिद्रवेपु ते हरिमाणं नि दमसि ॥४॥ मर्थ-(वे हद्-वोसः ष हरिमा) तेरे हृदयी जल-(और पीलापन सूर्य मनु उदपताम् ) सूर पारे पर गाये । गोके अपना सूर्य के (रोहितस्य तेन यन ) उस लाल रंगमे ( या परिदमसि ) मे सम प्रहर 2 vdiu 10 (रोहित वर्गः ) लाल रंगास (स्था) नुमचे (दीर्णयुयाय परिदमसि ) दर्प आयुरे लिये पनि (या) जिये (अ) यह (मरपा मसत् ) नारोग हो जाय भौर (म.हरितः भुगन् । पांना राग मुटहो या २ ॥ (पा. देवत्या रोहिणीः गावा) दिग्य मान रंगी गौवें । ( उठ पाहणीः ) और गे indn (मि) उणे (रूप रूप) मुंदरता और (पाइपः । बम अनुमार (हा परि दप्मांम) मे प.. (मि) पामक रोगो मुगु रोगामुप) नेते और धार रंगीन (ममि) पल At (भयो ) . (परमा) तेरा सान ER (हारिदये सानियाँ (दिप्मपि tri. भाग- हसन और पाल रोग मूड मार बर र परागण Antat ktrin मान मिले सरदारा मायनोपमा प्रयोग मापन 2. (ब.स.मा..."
मथर्ववेदका सुबोध भाष्य। [को०१॥ यह सूफ दूर होता है और नीरोगता प्राप्त होती है ॥ २ ॥ लाल रंगली गो और लाल रंग सूर्यकिरणे दिग्य गुगासे युक होती हैं। स्प और बल के अनुमार उनके द्वारा रोगी घेरा जावे ॥३॥ इस लाल रंगकी चिरिया रोगीकापलापन तथा फीकापन दूर होगा और वह हरे पक्षा और हरी वनम्पतियोंमें जाकर निवास करेगा, अर्थात् रोगी पार फिर नहीं आवेणा ॥४॥ वर्णचिकित्सा। सूर्यकिरण कमरेमें लेकर उसमें नंगे शरीर रहना और रिको " वर्ग चिकित्मा " के महत्वपूर्ण विषयका उलट पुलट का के सब शरीरके माय लाल रंग सूर्यकिरणों का उपदेश दे रहा है। मनुष्यको हृदयका रोग और कामला संबंध करना परिधारण विधिका तापर्य है । नामक पाला रोग कष्ट देते हैं । अपचन, पेटके विकार, तमाखू, रोहिते वगैः परिदमासे । ( मंत्र) मद्यप्राशन आदि अनेक करण है, जिनके कारण हृदयके दोष २ दीर्घायुत्वाय परिदध्मसि । (" ) उत्पन्न होते हैं । तरुण अवस्थामें वीर्यदोष हानेके कारण भी ३ गो रोहितस्य वर्णेन त्वा परिदमसि । (मंत्र ) हृदयके विकार उत्पन्न होते हैं। कामिला रोग पित्तके क्षित ४ ताभिष्ट्वा परिदमासे । ( मत्र.३) होनेक कारण उ पन्न होना है। इन रोगों कारण मनुष्य कृश, निस्ते ये मर मंनभाग क वर्ग: मूर्यकिरणोंग स्नान अर्थात् तेर, पी दुबल और दीन हाना है। इसलियन रोगों का हटाने का उपाय इस सूकमें वेद बता रहा है । सूय के शोर करत वर्गक शोशणाले कमरमें रखने और उसके " परिधारण करने विधान कर रहे हैं। रोगीको नो रणों द्वारा चिकित्सा तया लाल रंगवाली गौओंके द्वारा चिकित्सा शरीरका संवा रक्त वर्गको सूर्यकिरणों के साथ करनेसे यह करनेसे उक्त दोष दूर होते है और उत्तम स्वास्थ्य मिलता है। पारधारण हो सकता है और इस रागना, दापं आयुष्य प्राप्ति तया बलप्राप्ति भी हो कती है। अन्यान्य रोगों के निवारण के लिये अन्य वर्गों के किरणों को स्नानों की योजना करना चतुः वोका बुद्धिमत्तापर निर्भर है। - ९०.२३, ०१-21 श्वेत-कुष्ठ-नाशन सूक। (६७) । स्मानार अनारोग्य होगा। अपवा कठोर प्रकृतिकालेको अल्प लाल गौवोंके दूधका तथा अन्यान्य गोसाका उपयोग हृदय प्रमाणमें देने से उसपर कुछ भी परिणाम न होगा । इस दृष्टीसे विकार और कामिला रोगकी निगति के लिये करने का विधान तृतीय मंत्रा उत्तरार्ध बहुत मनन करने योग्य है । है। यह विवान मनन करनेमे बडा बोधप्रद प्रतीत होता है। और इसके मनन करनेसे अन्यान्य रोगों के लिये अन्यान्य रंगीन गोके दूधसे चिकि सा। गौवोंके गोरसा उपयोग करने का उपदेश भी प्राप्त होगा इसी मूकप रंगीन गौके दूधये रोगीकी चिपिरसा करनेकी वर्णविरसा का ही तत्व गोदुग्ध चिकित्साके लिये बर्ता विधि भी बना दी है। गौ पफेद, काले, लाल, भूरे, नमवारी, आयग । दोनों के बीच में तत्र एक ही है। बादामी तशा विविध रंगके घावाला होती हैं। सूर्यकिरणे पथ्य। मौकी पीठपर गिरता है और उस कारण रंगके भेदके अनुसार दूधपर भिन्न परिणाम होता है। श्वेत गोके दूधका गुणधर्म वर्ण चिविस्माके साथ साथ गोरस सेवनमा पथ्य रखनेसे मिन होगा, काले रंगकी गौका दूध भिन्न गुणधर्मवाला होगा, अत्यधिक लाभ होना संभवनीय है । अपान् लालरंगके किरणों के लाल गौका दूर भिम गुणधर्मवाला होगा, उसा पकार अन्यान्य परिवारण करने के दिन लाल के दूधम सेवन करना, रंगवाली गौओं दूध के गुगध भिन्न होंगे। एक बार वर्ण इत्यादि प्रगर यह पथ्य समसना उचित है। चिकित्म तत्व मन्नेपर यह परिणाम मानना ने पड़ता है। इस प्रकार इस सूकरा विचार करके पाठक यहुत लाम प्रास इसीलिये इस मूक मंत्र ३ में 'रोहिणी: गायः " अर्थात् कर सकते हैं । श्वेतकुष्ठ-नाशन-मूक्त। (२३) (पिः- प्रदेश्ता--ओपधिः) नक्तंजानास्योपधे रामे कृष्णे आमिकिन च । हुदै जनि रजय किलाम पलितं च यत् फिलासं च पलितं च निरितो नाश्या पृषत् ! आ त्या स्वो विशता वर्णः परा शुक्लानि पादय॥ आमित ते प्रलयनमास्थानममित त । असिकन्यस्योपधे निरितो नशया पृर्पद अस्थिजस्य किलासंस्य तनूजस्य च यत्चचि । दृप्या कृतस्य प्रणा लक्ष्म श्वेतर्मनीनशम् ।। ४ ।। मर्थ-रे रामा कृष्णा और अमिन औराध ! तू 1 नावं जाग ममि ) रात्रि समय उसल हुई है। (खनि ) रंग देनेगली ! (यत् किलासं पलित ) जो कुछ और थे। पुट है (इद रजप ) उमघे रंग दे (इतः ) इस पर (किलास पलिवं) और वेत ४ तया ( पृपद ) धने आदि मा निः नाशय । नष्ट कर दे। (गुलानि परा पालर) श्वेत पोरकर ( सावर्ग ) अपन रस { तुमे ( माnिal ) प्राम हो ॥२॥ ( प्रल) तेरा Pr र असित) कृष्ण वर्ग है तथा (तव अवस्यान ) तेरा स्थान भी ( मसित ) काला है, आधा दरात (भगिनी ममि) खाले रगवाली है इसलिये (इत यामे (पा । प. (नि. नाराय )नट कर ॥३. (दूमा कारोबारा उपाहुए ( मास्ववस्य तबस्स च) हमे तथा शरीरस उलट हुए (मिलामस्य पद गरि सन ) स्वरापरत मिसको (ममा मनीनतम् ) पजनमे मैंने ना यिा || भावार्ष-रामा मा मसिनी रे भौरियाना शिमर में पार्षद - - . (६८) मथर्ववेदका सुवीच भाग्य इसलिये इनके लेपनसे श्वेत कुष्ठ दूर होता है ॥१॥ शरीरपर जो श्वेत कुष्टके धन्धे होते हैं, उन श्वेत धन्नों इस औषधि लेपनसे दूर कर दे और अपनी चमडी असली रंग शरीरपर आने दें।॥ २ ॥ यह वनस्पति नष्ट होनेपर भी काला रंग बनता है, उसका स्थान काले रंगका होता है और वनस्पति भी स्वयं काले रंगवाली है, इसी कारण यह वनस्पति श्वेत धयों को दूर कर देती है ॥ ३ ॥ दुराचारके दोषोंसे उत्पन्न, हहीसे उत्पन्न, मासे उत्पन्न हुए सब प्रकार के श्वेत कुष्टके धनोंको इस ज्ञानसे दूर किया जाता है ।। ४॥ श्वेत कुष्ठ। करने के लिये हो सकता है, यह निश्चय केवल शब्द शास्त्रज्ञ शरीरका रंग गन्ना सा होता है। गोरे काले भेद नहीं कर सकता; न यह विषय केवल कोशोंकी सहायतासे हल होनेपर भी चमडी का एक विलक्षण रंग होता है। जो रंग हो सकता है । इस विषयमें केवल सुयोग्य वैद्य ही निश्चित मत नष्ट होनेसे चमडीपर श्वेतसे धब्बे दिखाई देते हैं। उनका नाम दे सकते हैं. तथा वे ही योग्य मार्ग से खोज कर सकते हैं । इस- ही श्वेत कुछ होता है । यह श्वेत कुष्ठ शरीरपर होनेसे शरीरका लिये इस लेखद्वारा वैद्यों को प्रेरणा देना ही यहां हमारा कार्य सादय नष्ट होता है और सुडौल सुंदर मनुष्य भी रूपसा है । वेदमें बहुत विद्याएं होने से अनेक विद्याओंके पंडित विद्वान दिखाई देता है, इसलिये इस(वेत लक्ष्म ) श्वेत चिन्ह-वेत कुष्ठ मिलनेपर ही वेदको खोज हो सकती है । अतः सुयोग्य वैयाँको -दूर करनेका उपाय वेदने यहा बताया है। आयुर्वेदविश्यक वेदभागको खोज लगनी चाहिये और यह निदान । प्रत्यक्ष विषय होनेसे इन औषधादेका प्रयोग करके ही इसका वेद इस श्वेत कुष्ठ के निदान इस सूक्तम निम्न प्रकार देता डाक्टर इस विषयमें योग्य सहायता देंगे । सप्रयोग प्रतिपादन करना चाहिये । आशा है कि वैद्य और रंगका घुसना । (१)दूप्या कृतस्य-दोषयुक्त कृत्य अर्थात् दोषपूर्ण भाचरण । सदाचार न होनेसे अथवा आचारविषयक कोई दोष कई लोग समझते हैं कि कार ही ऊपर वनस्पतिका रस युलर्भ रहने से य? कुष्ठ होता है। जिस प्रकारसे व्यक्तिदोषसे आदि लगानेसे चमडीका ऊपरका रंग बदल जाता है, परंतु तथा कुलके दोषसे भी यह कुछ होता है। यह सत्य नहीं है। इस सूतके द्वितीय मंत्रमें- (२) अस्यिजस्य-अस्थिगत दोपसे यह होता है । आ त्वा स्वो विशतां वर्णः। (३) वन्जस्य-शारीरिक अर्थात् मासके दोषसे होता " अपना रंग अंदर घुस जाय " यह मंत्रमाग बता रहा है कि इन औषधियों का परिणाम चमडीके अंदर ही होना (४) त्वधि-चमके अंदर कुछ दोष होनेसे भी यह अमीष्ट है, न कि केवल कार ही कार । ऊपर परंतु " विशतां " क्यिा " अंदर घुसने " का भाव बता रही ये दोष सबके सब हों या इनमें योडे हो यह कुष्ठ हो है। इसलिये चमडीके अंदर रंग घुस जाता है और वहां वह जाता है। स्थिर हो जाता है। यह मंत्रका कथन स्पष्ट है। दो भेद और उनका उपाय । औपधियोंका पोपण। इस युष्टमें दो भेद होते हैं, एक शिलाप और दूसरा पलित। औषधियों का पोपग दिनक समय होता है या रात्रिक समय परित शन्द केवल तत्वका ही बोध होता है इस कारण यह प्रश्न परे शास्त्रीय महत्वका है। भौषियोंका राम पावत धयाका वाचक सर है । इसको छोडकर दूसरे कुष्ठका नाम लिलाम प्रतीत होता है, जिसमें चमडी विरूपसी बनता है। समय होता है। यही बात न जाता "शब्दोंमे इस मुफ में सोम-चंद्र-है, इसलिये औषधियों पोषण और पर्धन शारिक गुयोन्य यंग इन पान्दोका अर्थ निश्य करें। बतायी है । राधिक समय बनी बढी ग पुष्ट हुई औषधि होती रामा, कृष्णा, अमिकनी " इन औषधियोंका इस कुछ है। प्रायः सभी औषधियों के संबंधमें यह बात सत्य एमा पर उपयोग होता है। ये नाम निधयमे दिन आपधियोंके हमारा ख्याल है। वनस्पति विद्या जाननेवाले लोग इस कथना बोध र मोरनि भौषधियांचा उपयोग इस कुटके निवारण मषिक विचार करें। परिणाम हो . - २०२४, मं०१-४] कुष्ठ-नाशन सूका सौमाग्य-वर्धन " के (१८) सूकमें सौंदर्यवर्थन पाठक इस सूफको पूर्वोक १८ वें सूत के साथ पढे । मारा है उपदेश दिया है, इसलिये उस कार्य के लिये श्वेत कुष्ट यदि कि पाठक इस प्रकार पूर्वापर सूफौध संबंध देखकर सूचार्यसे किको हो, तो उसको दूर करना भावश्यक ही है। अतः अधिक से अधिक लाभ उठा। कुष्ठ-नाशन सूक्ता (२४) (ऋपिः-अक्षा । देवता-आसुरी वनस्पतिः।) सुपर्णो जातः प्रथमस्तस्य त्वं पित्तमासिथ । तदापुरी युधा जिना रूपं चक्रे वनस्पती ॥१॥ आसुरी चक्रे प्रथमेदं क्लिासभेपजामिदं किलामनाशनम् । अनीनशस्किलाम सरूपाम पचम् ॥२॥ सरूपा नाम ते माता सरूपो नाम दे पिता । सुरूपकृचमोषधे सा सरूपामेदं कृषि श्यामा सरूमकरणी पृथिव्या अधुपुर्द्रता । इदमू पु प्र साधय पुना रूपाणि कल्पय ॥४॥ मर्य-पुरर्ग (प्रथमः जातः ) सबसे पहिले हुमा (तस्य पितं ) उसका पित (त्वं मासिय) सूने माम किया है। (युधा निता ) युसे जाती हुई वह आसुरी ( यनस्पतीन् ) वनस्ाति को (वत् रूपं घमे) यह रूप करती रही। (प्रथमा मासुरी ) पहिली आमुगने (इदं किलास-भैप ) यह फुटका भाषध (पर) पनाया। (इ) यह (किलास- भासनं ) कुष्ट रोगका नाश करनेवाला है। इसने (फिलासं ) कुका (मनीनार ) नारा किया और (ग) पगई (स-रूपों) समान रंगवाली ( मकरत् ) मना दिया ॥ २॥ हे और सीमाना (सरूपा) समान गरानी है सपा तेय पिता भी समान रंगवाला है । इसलिये (वं स-रूप-कृत् ) तू मा समानरूप करनेवाला है ( सा ) वह तू (इदं सरूप) इसको पमान रंगरूपवाला ( पधि) कर ॥३॥ सामा नामक वनस्पति (सरूप-करणी) समान पण पनानेवाली है। यह (अधिन्या भप्युझवा ) पप्पाने उसादी गई है। (दं मु प्रसापय ) यह कर्म ठीक प्रारकिर और (पुनः स्थाणि कालय)फिर पूर्ववत रंगरूप मना ॥४॥ भावार्थ-मुपर्ण नाम सूर्य है उसकी किरोपित्त पाने की गति है। सूर्यकिरणों द्वारा यह रित्तयनस्पतियार सरित होता है। योग्य उपायर्यास साधीन पनी हुई बरपायो रूप रंगमा सुधार करने में सहायक होती है मामुरा मनरपतिले कुन रोगडे लिये आम भोपप बनता है। यह निषो कुछ रोग दूर करता है और इसमे 10 सवा समान रंग पral बनती ॥१॥ दिन पौधोके संयोगसे यह इनसते बनती है, ये पाये (अर्यर सके माता Pापी मी) UIRST रंग सुधारनेवाले है। इसलिये या नरपति भी रंगधा गधार में समर्ष १ 11 RETAT बन र दीपमत रंगटक नेपाली पद भूमि उणीयाधी है। भा. हम योगी परंग गुभारा पनस्पतिके माता पिता। जपमे सरदार आम शरण इस फोन में वनरातो मामाभागमा भाग तिसरी र मार दो सहयोगगे बने बानी पर earn कर पनपक्षिय बोनीमा संशRRIRोरम
अथर्ववेदका सुयोध भाष्य
thi,
नाम माता और जिसकी शाखा उसपर विपायी या जोडी सूर्यका ही प्रभाव है । ( म. १)
जाती है वह उसका पिता तथा उम संयोगसे जो नयी वनस्पति
सूर्य से वीर्य-प्राप्ति ।
बनती है वह उक्त दोनोंका पुत्र है। पाठ इस उद्यानविद्याको
इस मंत्रमें देखें । ( मंत्र ३)
सूर्यसे नाना प्रभारके वीर्य प्राप्त करनेकी यह सूचना बहुत
ही मनन करने योग्य है।
सरूप-करण।
सूर्य मात्मा जगतस्तस्थुषश । (ऋग्वेद ।।१५)
शरीरके वास्तविक रंगकं समान कुष्टरोगके स्थान के चमडेका रंग
बनाना "सरूपारण" का तात्पर्य है आयुरी श्यामा वनस्पति यह भी यहाँ मनन करना चाहिये । जब सूर्यसे नाना प्रकारसे वीमे
मूर्य हा स्थावर जंगम का आत्मा है" या वेद हा उपदेश
करती है इसीलिये कुष्टरोगपर इसका उपयोग होता है । (मं.२-३) प्राप्त करके हम अधित वीर्यवान हो जायो तभी यह मंत्रभाग
वनस्पतिपर विजय ।
हमारे अनुभव में आ सकता है।
"युरसे जीती हुई आमु। वनस्पति औषध बनाती है।" नंगे शगैर मर्यकिरणों में विच'नेसे और सूर्यकिरणोद्वाग
यह प्रथम मंत्रका कथन विशेष मननीय है । वैद्यको एक अपनी चमडी अच्छी प्रकार तानसे शरीर के अंदर सूर्यका
दवापर इस प्रकार प्रभु व संपादन करना पड़ता है । औषधि जानन पंचारित होता है इसी प्रकार सूर्यसे
तपा हुआ वायु
उसके हायमें अनेकी आवश्यम्ता है । वनस्पतिक गुगधोंमें प्राणाय मसे अंदर लेनेके अभ्यासमे क्षयोगमें भी बड़ा लाभ
पूर्ण परिचय और उपका उपयोग करने उत्तम ज्ञान वैको पहुंचता है । इसा प्रकार कई गतियोंसे हम सूर्यमे वीर्य प्राप्त
होना आवश्यक है। नहीं तो औषध सिद्ध नहीं कहा जा कर सकते है । गठ स्वयं इसका अधिक विचार करेंगे तो
सकता । (मं..)
उनसे बहुत बोध प्राप्त हो सकता है।
सूर्यका प्रभाव ।
वैद्योगी उमित है, कि वे खोजसे श्यामा वनस्पतिको प्राप्त
सूर्यमें नाना प्रकारके वीय हैं। वे वाणिों द्वारा को और उमठे योगसे कुछ रोग दूर करें। तथा सूर्यमे अनेक
पनस्पनियों में जाते है । वनस्पतिद्वारा वे ही वीर्य प्राप्त होते है वार्य प्राप्त करने के उपाय ढूंढकर निकाल दे और उनका उपयोग
और रोगनाश भया बलवर्धक करते हैं। इस प्रकार यह सब आरोग्य वहानमें करते रहें।
शीत-ज्वर-दूरीकरण सूक्त।
(२५)
(ऋपिः भृग्याङ्गिराः । देवत'-अग्निः, तक्मा।)
यमिरापो अदहत्पविश्य यप्रायन धर्मनो नमांसि ।
वर्ष आहुः परमं जनि म : संविद्वान् परि ग्धि तक्मन्
पनिदि वाम शचिः कल्पपि यदि या ते जनिनम् ।
नहर्नामामि हरितस्य देव म नं: मंविद्वान् परि ग्धि तक्मन्
यदिशाको पदि याऽमिशीको यदि या रामो यरुगस्पासिं पुनः ।
हनामामि परितस्य देर स नः सविन परि ग्धि उपमन्
॥२॥
५५५, म.१-४ शीत ज्वर-दूरीकरण -सूक्त नमः शीताय तुक्मने नौ रुगर्य शोचिय कणोमि । यो अन्येयुरुभयोरभ्येति तृतीयकाय नमो अस्तु तुमने ॥४॥ मर्थ-यन्त्र ) जहाँ ( धर्म-धृतः ) धर्मका गलन करनेवाले सदाबाग लोग ( नमामि कृण्वन् ) नमस्कार करते हैं, यहां (पविश्य ) प्रवेश करके । यत् अग्नि ) जो अग्नि ( मापः भदहत ) प्रागधारक जलतत्त्वो जाता है (ब) वहाँ । ते परमं जनित्रं ) रा परम जन्म स्थान है, ऐसा (माहुः ) कहते हैं। (तस्मन् । कष्ट देनेवाले ज्वर ! (सः संविधान ) जानता हुआ तू (नः परि ग्धि ) हमको छ । दे। ( यदि मर्थिः । यदि त ज्वालाप, ( यदि वा शोधिः मसि ) अथवा याद तापरूप हो, (यदि ते जनित्रं ) यदि तेग जन्म स्थ न (शक्य हरि) अंगप्रसंगमें परिणाम करता है, तो तू (हडः नाम मसि) हुड [ अर्यात् गति करनेवाला | इस नामका है। अतः हे । हरितस्य देव तक्मन् । पालक रोगको उत्पन्न करनेवाले स्वर दव 1 (सः सविद्वान् । वह तू यह जानना हुआ ( नः परि वृश्यि ) हमें छोड़ दे॥२॥ ( यदि शोकः) यदि तू पीडा देनेवाला अथवा ( यदि भभि शोक ) यदि • पाडा उत्पन्न करनवाला हो, (यदि वरुणस्य राक्ष पुषः असि) किंवा वरुण गजाका तू पुत्र ही क्यों न हो, तुम्हारा नाम हुई है। है पलग वान करनेगले ज्वर देव तु हम सबको यह जानका छोड़ दे॥३॥ शीताय सन्मने नमः ) शी ज्वाके लिये नभाकार, ( स्लाय शोषिये नमः कृणोमि ) को तापको भी नमस्कार करता हूं। ( य. भन्येयु ) जो एक दिन छोडकर आबाला वर है. ( उभय) को दो दिन भानेवाला (मभ्येति ) होता है, जो( तृतीयकाय ) निहारी है, उस ( सामने नमः मस) ज्वरके लिय नमस्कार होने ४॥ भावार्थ-धार्मिक लोग जहां प्राग यामद्वाग पहुंचते और प्रागश कैका महत्त्व जानार उसको प्रणाम भी करते हैं उस प्राणके मूलस्थानमें पहुंचकर यह ग्वरका अमि प्राणधारक भार तत्सको जला देता है। यही इस ज्वरका परम स्थान यह जानकर इससे मनुष्य बचे ॥ १॥ यह र बहुत जोरकी तपिश बढानेवाला हो किंवा अंदर ही अंश तपनवाला , किंवा हरएक अंग-प्रसंगो कमजोर करनेवाला हो, वह हरएक जीवन के अणु हिला देता है इसलिये इसको "हा" कहते हैं, या কী সমকা কামিতা ইসঞ্জী সংবঙ্গ নাই, অং সান সু সখ হন না ঘষ ॥ ক স য়ঃ अंगमें दर्द उपर करते है और नई संपूर्ण अंगमस्यगम या उत्पन करते हैं, जलगर हमसे इसी तरपनि होता है, यह हरएक अंगप्रत्यंगको हिला देता है और पाल गंग शरीरमें उतराम कर देता है। इसलिये हरएक मनुष्य इससे बता रहे ॥३॥ शीत पर, क्ष ज्वर, प्रतिदिन आनेवाला. एकदिन छोकर बानेवाला, दो दिन छोड़कर भानेवाला, तीसरे दिन भानेवाला देखें बने प्रकार को ग्वर है उनकी नमसार हो अर्थात् ये हम सबमे दूर रहे ४॥ ३ (७२) अथर्ववेदका सुशेष भाग्य [को०१, - । . हुडु" पाठ है। यह " माग्नः आपः मदहन ॥ (मंत्र १) एक बार आया हुआ हिमश्वर अपना परिणाम स्थिर रूपसे "यह ज्वर जावनरस हो जला देता है।" इसी कारण शरीरमें रख जाता है और उसके निवारणके लिये वर्षांतक और ज्यासे शगरका शक्ति कम होती है । आग्नस शणशक्ति का बडे व्ययसे यत्न करने आवश्यक होते हैं । धारण करनेवाला है । ( आपामयः आप्तत्वमय प्राण है यह हिमज्वरके नाम। उपनिषदोंका कथन है। प्रागक आश्रयका शारीरस्थ आप तत्व इस ज्वा के द्वारा जल जाता है, इसी कारण ज्वर आनेपर जीवन इस सूक्तमें हिमज्वरके निम्नलिखित नाम दिये है- शचि कम हो आ-है। इसी कारण इस ज्वरको पालक १-हूड-गति उत्पन्न करनेवाला, शरीरमें फंप उत्पन रोगमा उत्पादक रहा है । देखिये- करनेवाला, ज्वरका शीत जिस ममय प्रारंभ होता है, उस हरितस्य देव! ( मंत्र२,३) समय मनुष्य कांपने लगता है। मराठी भाषामें इस हिम ज्वरका नाम " हुडहुडा ताप " है, यह शब्द भी वैदिक "पीलापन उत्पन्न करनेवाला" पोस निस्तेज बननेवाला, हड" शब्दके साथ मिलता जुलता है । यही शब्द विभिन्न पीलकरोग, मामिला, पांडुरोग, जोवन' सका क्षय करनेवाला हस्तलिखित पुस्तकोंमें निम्नलिखित प्रकार लिखा हुआ मिलता इन सबका उपादक ज्यर है। यह ज्या इतने भगानक रोगी न्हा तुम्हड. दुड, मह, हृदु, रुह, हुडू" । अथर्ववे- तत्पन्न करनेवाला है, इसीलिये इससे मनुष्य को अपने आपका दको पिप्पलाद शाखा की संहितामें बचाव करना चाहिये। यह ज्वर प्राणको मूल स्थान पर हमला करके उसाको कमजोर करता है। इस विषयमें यह मंत्र है। मंत्र २,३) दृडु" शब्द मराठी " हुडहुडा " शब्दकेही सहा धब्द देखिये- २ शीत:-जो ज्वर शीत लग कर प्रारंभ होता है । यह यदमिरापो मदहत् प्रविश्य यताकृण्वन् प्रतिदिन अनिवाला समझना उचित है । ( मंग) धर्मधृतो नमासि ॥[ मंत्र १] ३ अन्येद्यु.-एक दिन छोडकर आनेवाला । (म०४) "जहां धार्मिक लोग जाकर मनन करते है वहां प्रविष्ट कर ४ उभयपुः-दूसरे दिन आनेवाला अथवादा दिन छोडकर यह मान-ज्वर-प्राग धारक जीवनरमको जलाता है।' आनेवाला । (मं. ४) योगादि साधनद्वारा धार्मिक लोग समाधि अवस्यामै हृदय' कमलमें प्रविष्ट होते हैं, उसी हृदयमें जीवनका रस है, वही रस- आनेवाला अथवा नियत दिन बीचमै छोडकर मानेवाला । ५ तृतीयक तीसरे दिन आनेपाला किंवा तीन दिन छोडकर रसे जलता है । अयात् ज्वरका हृदयार बहुत पुरा परिणाम (मं०४) होता है, जिससे बहुत कम जारी भी उत्पन होती है । इसी ६ तक्मा..- जीवन दुखमय बनानेगला ज्वर । कारण यह ज्वर पालक रोग अथवा पाडुग उत्पन करता है ऐकामको द्वितीय मंत्रमें कहा है। यह हिमयर जिमको ७ अधिः-अग्निको ज्वालाएं भडने के समान जिसकी था" मलीया " कहा जाता है वहत बहुत ही हानि- उष्णता बाहर बहुत होती है । (मं.२) कारक है । इसलिये उसकी हा एक प्रयत्न से दूर रखना चाहिये, ८ शोचिः, शोकः-जिसन शरीर में पीड़ा होती है (म.१) मही निम्नलिाखत मंत्रमागमें सूचित किया है.- ९ शकल्य-इशि-अंग-प्रसंग अलग अलग होन के समान शिथिलता आती है । ( . २) स नः संविद्वान् परिधि सक्मन् ॥ (मत्र १,२,३) १० अभिशोक जिसमें सय शरीर बहा ददं करता है । "यह बात जानता हुआ ज्वर दूर रसा आय" अर्थात् पपरके कारण दूर करके उसका हम मनुष्यार न हो इस (मं०३) विषयमें योग्य प्रमान किये जय । ज्वर थाने के बाद उसके इन नामका विचार करनेसे इस ज्वरके सरूपका पता लग प्रतिघरध यग्न करना चाहिये इसमें घिमा विवाद नहीं हो सकता है और निश्चय होता है कि यह वर्णन शोतग्या नि माना, पातु इस सरद्वारा वेद ही उन्देश देना चाहता है, मलेरिया आजकल कहते है इसका ही है। हिमपने परी और ग्राम व्यवस्था मनुष्य इस प्रहार रखे परके पास अल सहता न रहे, घरकै पाकी भूमि अयो हि या मरिया र आसीन भौर उसके निवारण के लिये रहे और किसी भी स्थानमें इम रोग उत्पत्ति हेने योग्य पाया पानान क्योंकि यह विश इतना पातक परिस्थिति न हो, इसा प्रघार माममें और प्राम भासपाय मी २०२५, मं०१-31 है सुख माप्ति-सूका (७३) स्थान योग्य और आरोग्य कारक हैं, जिससे यह रोग उत्पन्न है। यहांका यह नमनवाचक शब्द घातक मनुष्यको दूर रखने के ही न होगा । क्योंकि यह ज्वर जलके दलदलसे उत्पन्न होता लिये किये जानवाले नमस्कारके समान उस ज्वरसे बचनका है । इसीलिये “ जल देवताका पुत्र " इसका एक नाम इसी भाव सूचित करता है ऐसा हमारा ख्याल है। कोशेमें सूकमें दिया है। यदि पाठक इसका योग्य विचार करेंगे तो " नमस्कर, नमस्कारी" शब्द औषधियों के भी वाचक है उनको इससे बचनेका उपाय ज्ञात हो सकता है । आशा है कि यदि " नमः" शब्दसे किसी मापधीका बोध होता हो तो वह वे इसका विचार करेंगे और अपने भापको इससे बचायेंगे । खोज करना चाहिये। " नमः" शब्दक अर्थ " नमस्कार, अन्न, शस्त्र, दण्ड " इतने प्रसिद्ध हैं," नमस्करी, नमस्कार, नमः शब्द। नमस्कारी" ये शब्द औषाधेयोंक भी पाचक हैं। अतः इस इस सूकके अंतिम मंत्रमें " नमः" शब्द तीनवार आया विषयका अन्वेषण वैद्य लोग करें। सुख प्राप्ति सूक्त। (२६) (ऋपिः-प्रक्षा । देवता:-इंद्रादयः) आरे । सावस्मदस्तु हेतिर्देवासो असत् । आरे अश्मा यमस्यथ ॥१॥ सखासावस्मम्पमस्तु रातिः सखेन्द्रो भगः सविता चित्ररांधाः ॥२॥ यूयं नः प्रयतो नपान्मरुतः सूर्यत्वचसः । शर्म यच्छाथ सप्रया सुपूदत मुडत मुडयो नस्तनूभ्यो मर्यस्तो केम्पस्कृधि ॥४॥ मर्य-हे ( देवासः ) देवो। (बसी हैतिः ) यह शन (मसत् भारे मस्तु) हमसे दूर रहे। और (पं अस्यय ) जिरो तम फेंकते हो वह (अश्मा भारे असत् ) पत्थर भी हमसे दूर रहे ॥ १ ॥ (मसौ रातिः) यह दानशील, (मग.) धनयुक्त सविता, (चित्रराषः इन्द्रः ) विशेष ऐश्वर्य से युक्त इन्द्र हमारा ( ससा मस्तु ) मिन्न होवे ॥२॥ है ( प्रवः नगर) अपने पापका रक्षण करनेवालेको न गिरानेवाले! हे ( सूर्यरचसः मरुतः ) सूर्यके समान तेजस्वी मात देवो! (पूर्व तुम (नः) हमारे लिये ( समयः शर्म ) विस्तृत मुस ( यच्छाय) दो ॥ ॥ ( सुपुदत ) तुम हमें आश्रय दो, (मृत) में करो, (नः वनभ्यः मृदय) हमारे शरीरीको आरोग्य दो तथा (सोकैम्यः मयः कृधि) मालपयों के लिये मानन्द करो ॥ ४॥ भावार्थ-हे देवो! आपका दररूप शस्त्र आदि हमारे ऊपर प्रयुक्त होने का अवसर न आवे, अर्थात् मग ऐमा कोई कार्य न हो कि जिसके लिये हम दण्डके भागी बन ॥१॥ इन्द्र सविता भग भादि देवगण हमारे सहायक हो ॥ २ ॥ मदन देव हमारा मुरा पावे ॥ ३ ॥ सय देव हमें उत्तम माघार दें, हमारे शरीरका आरोग्य बढा, हमारे मनकी प्रति घगत करें, हमारे बाल वको कुशल रखें और सम प्रचार हमारा मानंदपावे ॥४॥ देयोंसे मित्रता। हमारने पदे, और दूसरे मंत्रमें प्रार्थना गरी इन्द्र माविता, भग, मरुन मादि देवाचे मिना करने से मुह हमारे मित्र हमारे सहायक बनम हमारा मुनबमो,भपा मिलता है और उनके प्रतिम भाषण करने से इस प्राप्त हमारा ऐमा भारएम बने लिये हमारे गाल में और होता है। इसलिये प्रथम मंत्रमें प्रापनाउन देण्गदर विरोधी न हो । देखिये इएस मार- १० (म.प्र.मा..."
(७४) अथर्ववेदका सुबोध भाष्य काण्ड, - सूचनाका इस प्रचर १ सविता-सूर्यदेव है, यह स्वय मित्रता करने के लिये हमारे कितने रोग उत्पन्न हो सकते हैं, इसका ज्ञान पाठकोंसे छिपा पास नहीं आता है, परन्तु सवरे उदय होने के समयसे अपना नहीं है। अर्थात् शरीरस्थनीय सूर्य सविताके अश रूप देव हाथ हमारे पास भेजता है और हमसे मिलना चाहता है, परतु के सखा वनकर न रहने से मनुष्यत्री आपत्तियोंकी संख्या कितनी पाठक ही ख्याल करें कि हम अपन आपको तग मकानों में बद बढ सकती है इसका पाठक ही विचार करें। रखते ह, और सविता देवके पवित्र हाथक पास जाते ही नहीं। २ इसी प्रकार मरुत् वायु देव फेफडोंमें तथा शरीरके नाना सूर्य ही आगेग्य की देवता है, उसके साथ इस प्रकार विरोध स्थानों में रहते हैं । यदि उनका भी प्रकोप हो जाय तो नाना करनेसे उसका वज्राघात हमपर गिरता है जिसने नाना रोगके विचारोंकी उत्पत्ति हो सकती है। दुखोंमें गिरना आवश्यक होता है। इसी प्रकार इन्द्रदेव अंतःकरण के स्थानमें तथा अन्यान्य देव २ मरुत् नाम वायु देवता का है। यह वायुदेव भी हमारी शरीरके अन्यान्य स्थानों में रहते हैं । पाठक विचार करके जान सहायता करनेके लिये हरएक स्थानमें हमारे पाहलेसे ही उपस्थित सकते हैं कि उनके " सखा" बनकर रहनेसे ही मनुष्य मात्रको है, परन्तु हम खुली हवा सेवन नहीं करते हैं, परिशुद्ध वायु स्वास्थ्य और मानद प्राप्त हो सकता है । इनके विरोधी बनने हमारे घरों और कमरोंमे आवे ऐसी व्यवस्था नहीं करते, 'दु खका पारावार नहीं होगा। इतना ही नहीं परन्तु वायुको बिगाडनेके अनत साधन निर्माण करते हैं । इत्यादि कारणोंस नायु देवताका क्रोध हमपर होता पहले मनमें "देवोंके दण्डसे दूर रहने की ' और दूसरे है और उनका वज्राघात हमें सहन करना पडता है। जिससे मनमें " देवोंसे मित्रता रखने की " विविध बीमारिया वायुके क्रोधसे हमें सता रही है। विचार पाठक करें और यह परम उपयोगी उपदेश अपने इसी प्रकार अन्यान्य देवोंका सबध जानना उचित है। इस तर " इसी आचरणस विस्तृत सुख मिलता है। थाचरणमें ढालने का प्रयल करें और परम आनद प्राप्त करें। विषयमें भयर्ववेद स्वाध्यय का । सूक्त ३, ९ देखिये, इन सक्ताके स्पष्टीकरणके प्रसङ्ग में देवताओंसे हमारे साधका 'वह कपन अब सुस्पष्ट ही हुआ है। वर्णन किया है । इसलिये इस सूक्त के साथ उन 'सूक्ताच चतुर्थ मत्रमें जो कहा है कि ये ही देव हमें सहारा देते अग्ध अवश्य देखना चाहिये। है, हमें सुखी रखते हैं, हमारे शरीरका आरोग्य बढाते हैं और जिस प्रकार ये व ह्य देवत ए हमारे मिन बनकर रहने से भी बालबच्चों को भी आनंदित रखते हैं, "यह कथन अब पाठकोको हमारा स्वास्थ्य और सुख बढ सकता है, उसी प्रकार न भी दिनके प्रकाशके समान प्रत्यक्ष हुआ होण । इसलिये प्रतिनिधि-जो हमारे शरारम स्थान स्थानमें रहे हैं उनको मित स्वास्थ्य और सुख की प्राप्ति के इस सचे मार्गका अवलयन पाठक बनाकर रखनेसे भी हमारा स्वास्थ्य और आरोग्य रह सकता है, इस विषय, अब योडासा विवरण देखिये- विशेष सूचना। १ सविता सूर्य देव आकारमें है, उसीय प्रतिनिधि अरारूप विशेष कर पाठक इस घातका अधिक ख्याल रखें,किवेद मुख व इमारी आसमें तथा नाभिस्थानके सूर्यचक्रमें रहा है। स्वास्थ्य और आनंद प्राप्त करने के लिये धनादि साधन नही प्रमश. इनके काम दर्शनास्ति और पाचनशक्ति के साथ बताता है, प्रत्युत जल, वायु,सूर्य आदि के साथ सख्य करो" बपित है । पाठक यहा अनुभव करें कि ये देव यदि हमारे यहाँ मापन पता रहा है। यह हरएक कर सकता है। चाहे मित्र पन कर रहें तो ही स्वास्थ्य और आरोग्य रह सकता है। धन किसीको मिले या न मा मिले, परद जलवायु यदि प्रास्त किसी समय धोखा देने, अथवा रूपके विषय में सूर्य प्रमश "तो हरएक को मिल सकता है। इस स्वास्थ्य नाहन हाकर दान मानि इस गगरको रे चले, उससे प्राप्त अति मुलभ साधनका पाठ अधिक विचार करे,'वेश्की । Pानवाली शरीर का कटमय दया की कल्पना पाठक ही कर शैलीमा अवश्य मनन करें और उपदेश के अनुसार आचरण सकते है। इसी प्रकार पेटी पाचन शक्ति ठक न रहनेसे करके राम उठावें । । और २०७ मं०१४] विजयी स्त्री का पराक्रम । -- - - (२७) (ऋपि: अथर्वा । देवता इन्द्राणी) अमूः पारे पदाकत्रिपुप्ता निर्जरायवः । तासौ' जरायुभिर्वयमक्ष्या वर्षि व्ययामस्यघायोः परिन्थिन: ॥१॥ विच्येतु कन्तती पिनाकमिव विभ्रती । विष्वक्पुनर्भुवा मनोऽसमृद्धा अघायः ॥२॥ न बहवः समशकन्ना का अभिदापुः । वेणोरगा इवाऽभिवोऽसमृद्धा अाययः ॥ ३ ॥ प्रेत पादौ प्रस्फुरतं वहतं पृणतो गृहान् । इन्द्राण्ये तु प्रथमाजीतामपिता पुरः ॥ ४॥ मर्य-(ममूः पारे') वह पारमें (निर्जरायवः ) झिसे निक्ली हुई (त्रि-सता ) तीन गुणा सात (पदारः ) सपिणियोंके समान सेनाएं हैं। (.तासां) उनकी (जरायुभिः) केंचुलियोसे (वयं ) इम (अघ-आयोः परिपंथिन ) पाप दुष्टशत्रुकी ( भक्ष्यौं ) दोनों आखें (मपि न्ययामास ) ढके देते हैं ॥ १॥ ( पिनाकं इव विभ्रती ) धनुष्य धारण करनेवाली, और शत्रुको ( कन्वती) काटने वाली पारसेना (विपुषी एत) चारों और आगे बढे। जिससे (पुनर्भुग.)रि इकटीमें हुई सेनाका ( मनः विष्वक् ) मन इधर उधर हो जावे । और दसवे ( मयायवः ) पापी शनु (मसमृदा ) निर्धन हो आयें ॥२॥ (बहवः न समशकन्) बहुत शत्रु, मी उनके सामने ठहर नहीं सकते। फिर (मभकार) जो यालक हैं वे (न मनि दापुः ) धैर्यही नहीं कर सकते । (वैणोः अद्गाः इव) बासके रोंके समान (भभितः ) सब ओरसे ( मघाययः ) पापील ।। (असमृदा) निर्धन होवें ॥ ३ ॥ हे (पादौ ) दोनों पांवो ! (प्रेतं ) आगे घडी. (प्रस्फुरतं ) फुरती करो, (गत. गृहान पहत) संतोष देनेवाले घांकि प्रति हमें पहुंचाओ। (भजीता) विना जीती, (ममुपिता) विना टी हुई और (प्रयमा । मुखिया बनी हुई (इन्द्राणी) महारानी (पुर एत') सबके मागे पडे ॥ ४ ॥ भावार्य-कधुलोसे बाहर भायी हुई सरिनीके समान घपल सेनाएं तीन गुने सात विभामि विमत होकर युद्ध दिये सिद्ध हैं, उनकी हलचलोंसे हम सब पापी दुष्योंकी भाखें बंद कर देते है ॥ १ ॥रान धारण करनेवाली और शत्रुको चाटनेवाल वीरोंकी सेना चारों दिशाओम आगे बढ़े, जिससे शत्रुसेनाका मन तितर बितर हो जावे और सब पापी शानिधन हो जावें ॥२॥ ऐसी थर पारीकी सेनाके सन्मुख बहुत धनु मी ठहर नहीं सने फिर कमजोर बालक केसे ठार मकेंगे ! बाँसके मोमल और भशफ अंबुरके समान चारों ओरसे पापी शत्रु धनहीन र नाशको प्रतिरोगे ॥३॥ विजयी अपराजित और न ही गई बार श्री महारानी मार्खिया बनकर आगे पढे, इतर लोग उसके पीछे चलें, हरएक धारके पांव आगे बढ़ें, शरीर फुना पो और सर लोग संतोष पटानेवाला घरोतक पहुंच जाय ॥ ४ ॥ इन्द्राणी, पात सिराय सीता का है देखिये- राम रागा वाचक है असा-नरेन्द्र (मनुप्यों- इन्द्राणी सेनाय देवगा. मं. ११३ कागमा ) मगर (मृगोंजा गा), पगै( पाहियोग- मागी सयाद है।" र गरी रामा ) ला पल इन्द्र शन्द भोगगरा ही पार है, ना माना पाकम दिया और विजय SIH परते हैं। भोर "न्दा महन्गनी, रामासी गनी. महारानी, चीर गो। पनीका पार पान्दाणी मेनाय रकवार "दारीमार राना स्ना मुपित नार नगरे अथर्ववेदका सुयोघ भाप्प। - प्रोत्साहन देती हुई आगे चले, हरएक्के पांव आगे बढे, जहा ऐसी वारागनाएं समर्थ है उन रोगों के सामने बड़े बड़े हा एकका मन उत्साहसे युक्त रहे, संतोष बढाने वाले सजनोंके अनु मी ठहर नहीं सकते, फिर अल्प शकिराले कमजोर घमि ही लोग जाय।" परतु जो लोग सतोएको कम करने मनुष्यों की बात ही क्या है ? घासके अंकुरकि समान उनके शत्रु वाले, उत्साहका नाश करने वाले, और मनको साशाका घात नष्टभ्रष्ट ही हो जाते हैं।" (मन) करनवाले हो उनक पास कोई न जाये, क्योंकि ऐसे लोग अपने हीन भावामे मनुष्यों को निरूत्साहित ही करते हैं । यह मंत्र ४ शववाचक शब्द । का भाव विचार करने योग्य है। इस सूक्तमें शनुवाचक कुछ शब्द है उनका विचार यहाँ करना आवश्यक है- जिस राष्ट्रमें स्त्रियाभी ऐसी शूर और दक्ष होंगी वह राष्ट्र १ मयायु = आयु मर पाप कर्म करनेवाला। सदा दिया ही होगा इसमे क्या सदेह है? जिस देश में २ परिपन्यिन्- वटमार, बुरे मार्गसे चलनेवाला। निया रोनाको चला सकेंगी उस देशके पुरुष कितने शूर और पापीलोग ये हैं और इनके बुरे आचरणके कारण हो ये कैसे वीर होगें । क्या ऐसी वीर स्त्रियोंको कोई हीन मनवाला शुनुव करने योग्य है । "असमृदा अपायव " यह शब्द प्रये, आदमी धमका सकता है और ऐसी शूर स्त्रियों किसी इस सूक्तमें दोवार आया है।" पापी समृद्धिसे रहित होते है। रणनपर कोई बेइजता कर सत्ता है । इसलिये आत्मसमान यह इसका भाव है। पापसे कभी वृद्धि नहीं होगी। पारसे रखनेका इच्छा करने वागेको उचित है, कि वे स्वय मर्द यनें मनुष्य गिरता ही आता है । यह भाव इसमें देखने योग्य है। और अपनी नियोग भी ऐसी शिक्षा दें कि वेभी शूरवीर जो मनुष्य पाप कर्म द्वारा धनान्य बनना चाहते हैं उनको यह बनकर अपने समान की रक्षा कर सकें। मन भाग देखना योग्य है । यह मत्र उपदेश दे रहा है कि "हायम शस्त्र धारण करती हुई, शत्रुको काटती हुई " पापी कभी उन्नत नहीं होगा," यदि किसी अवस्थासे वह आगे बढे, जिसका वेग देखकर शमन उत्सादरहित हो। धनवान् हुआ, तो भी वह उसका मन उसके नाशका ही हेतु और शनु निर्भन अर्थात् परास्त हो जायें।" यह द्वितीय निसदेह बनेगा । तात्पर्य परिणामकी दृष्टिसे यह स्पष्ट ही मनका भाव भी चतुर्य मत्र के साथ देखने योग्य है। क्योंकि समझना चाहिये कि पापी लोग अवश्य ही नाश प्राप्त हो । यह मत्र भी बार धाका पराकम ही बता रहा है। यह सेना तीन गुणा सात । का वर्णन करता हुआ भी वीर खीका वर्णन करता है (मनर) सेनाके तीन गुणा सात विभाग हैं। रथयोधी, गनमोधी, योधी, पदाती, दुर्गयोधी, जलयोधी तथा कूटयोधी ये सात वरिविको उपमा केंचुलीसे निकली हुई सर्पिणीको इस प्रकारके सैनिक होते हैं। प्रत्येकमें अधिकारी, प्रत्यक्ष युद्धगरी सूकमें दी है । स्वभावत सर्पिणी वडी तेज रहता है और और सदायक इन तीन भेटेसे तान गुणा सान सैनिक होते हैं। अति पुत्तासे शनुपर हमला करती है। परंतु जिस समय वह निर्जरायु । केंचुलासे बाहर माती है उस समय अतितेजस्वी और अतिचा पल रही है क्य के इस समय यह नवजीवनस युक्त होती है। 'जरायु शब्द झिली, जेरीका वाचक है परन्तु यहां वार्यसे वीर वो ऐसी ही होती है । स्त्री स्वभावतः चपल होती है, प्रयुक्त है । यहां इसका अर्थ ( जरा+भायु । पृद्धापमा अथवा परतु जिस समय कार्यवर राष्ट्रीय आपतिसे प्रेरित होकर, जागता किंवा थकावट, तया आयुष्य । नि+-आयु । धामसमानकी रक्षा के लिये छई वायत्री अपने अतो जो जोर्गदा, थकावट, वृद्धावस्था अथवा आयुकी पर्वा न करने चुलीमें बाहर आती है, उस समय उसकी तेजसिताका वर्णन पाले होते हैं, अर्थात् जो अपने जीने मरनेको पर्वाह न करणे पारना है । यह उस समय सचमुच सHिim रहते हैं, जो अपनी अवस्थाकी तथा मुखदुख को पर्वाह न चमकती हुई, बिजली के समान तेखिनी बनकर बरसेनामा करते हुए अपने यशके लिये ही लाते रहते हैं उनमें "निरायु को प्ररित करती है। उस समयका उत्साह वीर पुरुष ही अर्थात् ' जरा और आयुके विचारमे मुक्त कम्पनासे गन सकते हैं।" उसके ते अनुकी आस ही जावित की आग छोडकर रहनेवाले मैनिक । अपीयन आता है" और उसके सब नि सत्व हो जाते इस सूचकै मन वीरा ली विषयक तया सेना विरया अर्थ बताते हैं, इसलिये ये मत्र विशेषमनमायने योग्य हैं। " कहते हैं। है।( मंत्र" स.२८,म.१-४] । दुष्ट-नाशन-सूक्ता (७७) तथा इसमें कई शब्द द्वेष अर्थ बताने वाले भी हैं जैसा कि ऊपर घोर पुरुष उत्पन्न करेंगे और अपना यश चढानेका परम पुरुषार्थ वताया है। इन सब बातोंका विचार करके यदि पाठक इस करेंगे। सूक्तका अभ्यास करेंगे तो उनको बहुत बोघ मिल सकता है। यह सूक “स्वात्ययन गण" का है इसलिये इस गणके माथा है कि इस प्रकार पाठक अपने राष्ट्रमें वीरा नी और अन्य सूतोंके साथ पाठक इसका विचार करें। दुष्ट नाशन सूक्त। (२८) (ऋषिः-चातनः । देवता-स्वस्त्ययनम् ।) उप प्रागाईवो अग्नी रक्षोहामीवचातनः । दहुन्नप द्वयापिनो यातुधानान्किमीदिनः ॥ १ ॥ प्रति दह यातुधानान्प्रति देव किमीदिन: । प्रतीचीः कृष्णवर्तने सं दह यातुधान्यः ॥२॥ या शशाप शर्पनेन याचं मूरमादधे । या रसंस्य हरणाय जातमारमे तोकमत्त सा ॥३॥ पुत्रमंतु यातुधानीः स्वसारमुत नुप्त्यम् । अधा मिथो विकेश्यो । विनंता यातुधान्यो ३ वि तृह्यन्तामार्य: ॥ ४॥ मर्य- अमीर चातनः) रोगोंको दूर करनेवाला और (रक्षोहा) राक्षमाका नाश करनेवाला भग्निदेव ( किमीदिनः) सदा भूखोंको ( यातुधानान् ) लौरों को तथा (इयाविनः ) दुमुखे काटियोंको (मप दहन ) अलाता हुआ ( उप प्रगात् ) पास पहुंचा है ॥1॥हे अग्निदेव! (यातुधानान् प्रति दह) लुटेरों को जलादे तथा ( किमीदिन भवि) सदा भूनको भी जलादे । हे (कृगवर्तने ) कृष्ण मार्गकाले अग्निदेव! (प्रोवीः यातुधान्यः) संमुख भानवाली 20 बियाँको भी (संदह) ठीक जला दो॥ २ ॥ यह दुष्ट लुटेरी स्त्रियां (सपनेन शाप ) आपसे शाप देती है, (या मधं रं भाद) जो पाप ही प्रारंमसे स्वीकारती हैं, (या रसस्य हरगाय ) ओ रस पाने के लिये ( जातं तो मारेमें) जन्मे हुए बालको खामा प्रारंभ करती हैं और (साभ) पुत्र साती है ॥ ३ ॥ (यातुधानी.) पापी खो (पुत्रं मनु) ५५ साती है। (स्वसारं उव नभ्य ) बहिन को तया नाती को साता है। (भय ) और (विकेश्यः) केश प पर कर(मिय. Rat), मापसमें सगाता हैं । ( भराय्यः यातुधानीः ) दानभाव-रहित पातका स्त्री (वितान्ता, ) मापसमें मारगेट करती हैं। भावार्थ-रोग दूर करनेमें समर्थ अर्थात् उतन क्य, मामुर भाव हटाने वाला, मरिनके समान तेजस्वी, उदेशक स्वाची उरे तथा पटियो दूर करता हुआ भागे चले ॥१॥ हे उपदंशकात लौरे स्यापा दुष्टोको नारकर, ला सामने माने पाली दुर वियोंकी भी दुष्टता दूर कर दे॥३॥ इन दुष्टोन रक्षण यह है कि आपसमें गालियां देते हैं, एम पाप हेतुसे करते हैं, यहातक ये रोते है कि रस्त पीनेही इच्छा नये उत्तम भो ही मना भारंभ कर देते हैं ॥ ३ ॥ इनकी श्री अग्ने पुरधे साती है, बहिन पान तो मोखाती है, तया एक दूसरे बार Rm मा हरता रहती है ॥४॥ पूर्वापर संबंध । प्रसंग धर्मप्रबार में Re प्रपर 7 इसी प्रपम - तपा २ पुष म्यामाई उदार दया र सिमर माय अथर्ववेदका सुबोध भाष्य को - " ब्राह्मण संबंध देखें। दुष्टोंको सुधारता है, इत्यादि सव विषय अतिस्पष्ट कर दिया है। ५ यातुधानी पुत्रं स्वसारं नप्त्यं मात्ति- यह दुष्ट' आसुरी' इसलिये इन ७ और चे सूक्तके स्पष्टीकरण पाठक यहां पहिले स्त्री बचा, बहिन अथवा नाती को खाती है। पढे और पचात् यह सूक्त पढ़ें ६ विकेश्यः मिथा विघ्नता, वितृयन्ता- आपसमें केश संस्कृतमें " वि दग्ध " ( विशेष प्रकारसे जलाहुआ )यह पकड कर परस्पर मार पोट करती है।' शब्द "अति विद्वान् " के लिये प्रयुक्त होता है । यहां अज्ञा- ये सब दुर्जन स्त्रीपुरुषों के लक्षण हैं। बालबत्रों को खानेवाले नका दहन जलन आदि अर्थ समझना उचित है । जिस प्रकार लोग इस समय अफ्रिामें कई स्थानोंपर हैं, परंतु अन्य अग्नि लोहे आदिको तपाकर शुद्ध करता है उसी प्रकार उपदे- देशों में अब ये नहीं है। जहां कहाँ ये हों, वहाँ धर्मोपदेशक शह द्वारा प्रेरित ज्ञानाग्नि अज्ञानी मनुष्योके अज्ञानको जला चला और उनको उपदेश देकर उत्तम मनुष्य धना देवे, कर शुद्ध करता है । इस कारण के लिये वेदमें ज्ञानी बनावे, उनकी दुष्टता दूर करके उनको सज्जन पना " अग्नि " शब्द आता है। ब्राह्मण और क्षत्रियके वाचक देवे । घेदमें "अग्नि और इन्द्र " शब्द प्रसिद्ध हैं । ब्राह्मगधर्म अग्नि देवताके और क्षात्रधर्म इन्द्र देवता के सूक्तोंसे प्रकट होता है। धर्मोपदेश देकर उनमे सुधारनेका यत्न करनका उपदेश होने ऐसे मनुष्य-भक्षक दुष्ट, क्रूर, हिंसक, मनुयाम भी आकर इत्यादि बातें विस्तारसे ७ और प्रसंगमे स्पष्ट कर दी हैं। वही धर्म प्रचार की बात इस सूक्तमें इससे कुछ सुधरे हुए किचित् ऊपरली श्रेणीके मनुष्योंमें धर्म है.इसलिये पाठक उक्त पूर्व सूक्तों के साथ इस सूक्तका जागृति करनेका आशय स्वयंही स्पष्ट हो जाता है। दुष्टोंका सुधार। इस सूक्तमें "अमीव-चातनः" (रोग दूर करनेवाला) यद शब्द विशेषण रूपमें आया है। यह यहां चिकित्सा द्वारा उनको दुष्टता उपदेश भादि द्वारा हटाकर उनको सभ्य बनाना दुष्ट लोगों में दुष्टता होने के कारण ही वे असभ्यासमझे जाते हैं। रोग दूर कर सकने वाले उत्तम वैद्यका बोध करता है। उपदे. ब्राममार्ग हैं और उनको दः देकर डरावेसे उनका सुधार शक जैसा शास्त्र में प्रवीण चाहिये वैसा ही वह उत्तम वैद्य भी करायल करना हान्न मार्ग है। वेदमें अनिदेवता से पाहिये । वैद्य होनेसे वह रोगोंको चिकित्सा करता हुआ धर्मका I और इन्द्र देवतासे क्षात्र मार्ग बताया है । अलाते प्रचार कर सकता है। धर्म प्रचारकके अन्य गुणसूक्त ५,८ या तपाते तो दोनों ही हैं, परंतु एक उपदेशद्वारा उनके भज्ञान- को जलाता है और दूसरा शन दण्ड भी इसीप्रकार के कठोर दुर्जनोंके लक्षण। अपायोसे पीडा देकर उनको सुधारता है। इस सूक्तमें दुअनकि पूर्वको अपेक्षा कुछ अधिक लक्षण कहे हैं जो रक्त में कहे लक्षणों की पूर्ति कर रहे हैं। इस के उपाय प्राणों के ज्ञानामिद्वारा तपानका उपाय अधिक मुधार तो दोनों होता है, परंतु क्षत्रिय के द्वारा तपाने । लिये जनरा विचार यहाँ फरते हैं- उत्तम है और इसमें कष्ट भी कम है। १ पायिन- मनमें एक माय और बाहर एक भाव ऐसा पाठक पनि शब्द से आगका प्रहण करके उससे दुष्टोंगे' कपट कामेयासे । (मं.1) "किमदिन, यातुधानु" इन जलाने का भाव इस मूतसे न निगल, क्योंकि इप' सूक्ता पला माव गक्त ७, ८ की व्याख्या के प्रमग यताया ही संबंध आगेपी के अनेक सूक्तोंसे है और भाषिके गुणों के प्रमाण १ । इस गल्तमें दर्जनों के कई प्यवहार बनाये है, वेमी यहां देकर जाना उपदेशक हा अग्निशब्दसे से सोम अमर देखिये- है यह स्क्त ७, ८ के प्रसंगमें स्पष्ट पाया हो। इसके २ दापनेन दावा- आप शाप देना, पुरे शब्द बोलना, अतिरिक्त करनेवाला नि" इस सूक्तमें 1 t. गारिया देना इ. ३ यदि यह उन लोगो जलाही देव तो उ रोगमुस्त, ३ अपं रं भाव प्राममें पार भाव रखता है। रनेके गुणमे क्या लाभ हो सकता है। इसमिरे या एमम पाप राम दो रमपप्रारमना। अमिय जलाना"शागानिस भानना जमाना है। सरप ण ा तो भारेमे पाने के ये गुणधोना और यहां गुणधर्म स्पारित करमा गाव सोनी पहा अमौर है भोर इणलिये रोगमुक्त करनेवाला हम - । में देखिये।
९०.२९,म०१-६] राष्ट्र-संवर्धन-सूक विद्यही धापदेशकका कार्य करे, यह सूचना इस सक्तम हमें 'सावे ऐसा होता है.परंतु " शशाप -आदधे " इन क्रियाक मिलती है। क्योंकि -रोगीके मनपर वैयके उपदेशका जैसा अनुसंधानसे "अतु" के स्थानपर "अति' मानना युक्त है। असर होता है वैसा वक्ताके व्याख्यानसे श्रोताओंपर नहीं श्योंकि यहां यातुधानोंकी राति बताई है जैसे (शाप) होता। रोगीका मन आतुर होता है इसलिये श्रवण की हुई देते रहते हैं, (अधं आदधे) पाप स्वीकारते रहते हैं, (तोके अति) उत्तम बात उसके मनमें जम जाती है और इस कारण वह सब यह अर्थ यहां अभीष्ट है ऐसा हमें प्रतीत होता है । पञ्चेको साते रहते हैं अर्थात् यह उनकी गति है। पूर्वापर शीघ्र ही सुघर जाता है। तथापि पाठक अधिक योग्य और कोई अन्य बात इस सूक्तम [ यह तृतीय और चतुर्थ मंत्रमै “अत्तु" शब्द है जिसका अर्थ देखेंगे, तो थर्थकी खोज होने में अवश्य सहायता होगी इति पंचम अनुवाक समाप्त । राष्ट्र-संवर्धन-सूक्त । . •(२९) (मापिः-वसिष्ठः । देवता-अमीरों मणिः) अभीवन मणिना येनेन्द्रों अभिवावृधे । तेनास्मान् ब्रह्मणस्पतेऽमि राष्ट्राय वर्धय ||.१ ॥ अभिवृत्य सपमा नभि या नो अरांतयः । आमि पृतन्यन्तै तिष्ठामि यो नौ दुरस्पति ॥२॥ अभि.त्या देवः सविताभि सोमो अवीवृधन् । अभि त्या विश्वा भुतान्यभीवों यथासंसि ॥ ६ ॥ 'अभीवों अभिभवः सपत्नुक्षयंणो मणिः । राष्ट्राय मा वध्यता सपत्नैम्पः परामुर्वे ॥४॥ उदसौ.सूर्यो अगादुदिदं मामकं वचः । यथाई शत्रुहोऽसान्यसपना संपरनहा .॥५॥ सपत्नक्षयणो वृपाभिराष्ट्रो विपासहिः । यथाइमेपां वीराणां विराजानि जनस्य च ॥ ६॥ मर्थ-हे ( मझगस्पते) शानी पुल ! (येन इन्दः अभिवायुधे ) जिससे इन्द्राभित्रय माया,(न मभिवन ममिना) उधविश्य करनेय ले माणसे ( मरमान ) हमको ( राष्ट्राय ममिय) एट्रो नियम दो 11 (पा: मामाप.) "जो हमारे च है उनको तया अन्य ( सपणान् । रियाग (ममिय) पराभूत करके, (यामा पुरस्पति) गोहमसे • दुष्टताका आचरण करता है तथा जो ( पृतन्यन्तं ) सेनाये हमपर चदाई करता है समये (मभि ममिति) पुरो लिये स्थिर हो आभो ॥ १॥ (सरिता दंग देखने तथा (सोमः) मा देने मी (सा) ( मा अभि. मीयत ) सर प्रारसे बरपा है ।(विधा भूतानि )स भूत( या मामे । इसे रोहित (मनि: m. सि ) पशुधे दगने वाला हुमा है ॥ ३ ॥ (मभिपत. ) मा परनेगला, (मिमयः) UN परामा पना, .( सपरनपणा) प्रतिपहियाघ्र नाथ कानेरारामा (मगि माग है । यह (सरनेम्प परामरे) विधि एमा घरने लिया ( रा ) हे अभ्युदयो नि ममं real) मुधार सामागो (ो पूर्व सार) या पूर्व राजा मारे (माम पसद)मा मेहरमन भीप्रसाद() fol(मगर) "ए मारा कालवाय, (सारमा) विcिer ma ने रम (एसपनामानि) Tar..
(८०) मथर्ववेदका सुवोध भाग्य [कां० १, (यथा ) जिससे (महं ) मैं ( सपन-क्षयगः ) प्रतिपक्षियोंश नाश करनेवाला, (वृषा) बलवान और ( विषासहिः) विजयी होकर ( अभिराष्ट्रः ) राष्ट्रके अनुकूल बनकर तथा राष्ट्रको सहायता प्राप्त करके (एषां वीराणां) इन वीरोंका(जनस्य च ) और सब लोगोंगा (वि राजानि ) विशेष प्रकारसे रंजन करने वाला राजा होऊ ॥ ३॥ भाार्य-हे राष्ट्रके ज्ञानी पुरुषो ! जिस राजचिह रूपी मणिको धारण करके इन्द्र विजयी हुआ था, उसी विजयी माणसे हमें राष्ट्रके हित के लिये बढाइये ॥ १॥ जो अनुदार शत्रु हैं और जो प्रतिपक्षी है उनको परास्त करने के लिये; तथा जो हमसे पुरा व्यवहार करते हैं और जो हमपर सेना भेजकर चढाई करते हैं उनको ठीक करने के लिये अपनी तैयारी करके भागे बदो ॥२॥ सूर्य चन्द्र आदि देव तथा सय भूतमात तुझे सहायता देकर बढा रहे हैं, जिससे तू सब शत्रुओंको दबानेवाला बन गया है। ॥ ३॥ शत्रुको घेरनेवाला, वैराका पराभव करनेवाला, प्रतिपक्षियोंको दूर करनेवाला यह राजीवह रूपी मणि है । इसलिये प्रतिपक्षियोंका पराभव करने के लिये और अपने राष्ट्रा अभ्युदय करने के लिये मुझपर यह मणि बांध दीजिये ॥ ४॥ जैसा यह सूर्य उदय हुआ है, वैसा यह मेरा वचन भी प्रक्ट हुआ है, अब तुम ऐसा करो कि जिससे मैं शत्रुका नाश करनेवाला, प्रतिपार्शयोंको दूर करनेवाला होकर शत्रु रहित हो जाऊं ॥५॥ में प्रतिपक्षियों का नाश करके बलवान बनकर, विजयी होकर अपने राष्ट्रके अनुकूल कार्य करता हुआ अपने वारोंका और अपने राष्ट्रके सब लोगोंका हित साधन करूंगा ॥६॥ अनुसन्धान हैं तथा जो हमारे राष्ट्र के साथ बुरा व्यवहार करते हैं और हमपर गणक सप सूक्तों के साथ इसका विचार करना योग्य है। तथा जिससे तू शत्रुको दबा सकता है ॥३॥ यह सूक्त राज प्रकरणका है इसलिये इसी कांडके अपराजित सैन्यसे चढाई करते हैं उहाँको परास्त करने की तैयारी करो ॥२॥ सूर्य, चंद्र तथा सब भूत तुम्हारी सहायता कर रहे हैं। भागे आनेवाले राज प्रकरणके सूक्तोंके साथ भी इसका संबंध देखने योग्य है । इससे पूर्व अपराजित गणके सूक्त २. १९, राजा- पुरोहित जी! यह राजचिन्ह रूपी मणि शत्रुको २०, २१ ये आये हैं, इसके अतिरिक्त अभय गण, सांग्रामिक घेरने, वैरीका परामर करने और प्रतिक्षियोंको हटानेश गणके सूक्तोंके साथ भी इन मुक्तो ग विचार करना चाहिये। सामयंदनवाला है। इसलिये विरोधियोंका पराभव और अपने अभावत मणि। राष्ट्रका अभ्युदय करने के कार्यमें मुझे समर्थ बनाने के लिये मुमपर १ मा प्रकारका "मावत मागि' भी एक राजचिन्ह है । इसके RTHAT नाश कर सई ॥५॥ में बलवान जिस प्रकार राजाके चिन्द राजदर, छत्र, चामर ब्यादि होते यह माण यांप दीजिये ॥ ४ ॥ जैसा सूर्य उदयको प्राप्त होता है वैमाही मेरे शब्दों का प्राश होता है, इसलिये आप ऐसा पारण करने के समय यह मुक्त बोरा जाता है। देवीका राजा इन्द्र है. उसद्य पुरोहित वृहस्पति ब्रह्मणस्पति के अनुकूल कार्य करता हुआ अपने यारोंचा और राष्ट्रय पनकर प्रतिपक्षियों को दूर करेगा और विजयी होकर अपने है। यह पुरोहित इन्द्र के शरीरपर यह अमावर्त मणि बांधता हित करूंगा ॥६॥ है। अर्यात राम पुरोहित हो रामाके शरीरपर यह राजचिन्ह मी मगि बाघ देवे । यही संबंध देखनसे स्पष्ट प्रतीत होता पाठक यह मंगद विचारसे परेंगे तो उनके प्यानमें इस कि यह मूस्त संवाद रूप है। यह संवाद इस प्रकार है। सूक्तका आश्य शीघ्रतामे मासकेगा । राग रामचिन पाल देखिये- करता है, उस समय पुरोहित राम प्रजातिको कुछ ग इस एक्तका संराद। करने के लिये कहते है और राजा भी राष्ट्रहित करने प्रति रामद पुरोहित ने भारत मा इन्द्रो परपर प्रतिनिधिका मानाति पुरोति उस समय करता है। पुरोहित प्रालिका और रास दो गुरासलिने बांध दिया था भौमिम इन दिवियों मुझमे या उपदेश राणाको करती है, राम दुमा शानिमा ममि मेरे वापर आ गय रखना मन रखना राष्ट्र प्रादेशिक भान kurt.मि में पवन ममपं हो जाना चाहिये । अनि म मापी शालिनी परिवरे पानी को अनुदार समारोह पारिया suma ani aie ०.२९, मं०१-६] श्वेत-कुछ-नाशन-सूक (८१) H शुगेकी हुकूमत न रहे, परंतु शूर ज्ञानालोगोंके आधीन कार्य यह शब्दभी इसो अर्थमें ( म. में) आया है। करें। राष्ट्रको (Civil and military) ग्राम तथा क्षात्र ७ वृषा- चलवान् । सर प्रकारके बलोंसे युक्त राजा होना शकि एक दूसरेके साथ कैमा वर्ताव करे, यह इस सूक्तमें स्पष्ट चाहिये, अन्यथा वह परास्त होगा । (मं. ६) हुआ है। ब्राह्मशक्ति द्वारा संमत हुआ राजा ही राजगद्दीपर ८ विधासहि:-शत्रुके हमले होनेपर उनको सहन करके मासकता है अन्य नहीं। अपने स्थानसे पीछे न हटने वाला । (मं०६) राजाके गुण। ९ वीराणां जनस्य च निराजानि-राष्ट्रके शूरवीर तथा राष्ट्रको इस सूक्तम राजाके गुण बताये हैं, वे निम्न शब्दोंद्वारा संपूर्ण जनता इन सबको संतुष्ट करनेवाला । (मं. ६ ) पाठक देख सकते हैं- १० प्रतिपक्षियों को दवाना, वैरियों का नाश करना, सेनाके अस्मान् राष्ट्राय अभिवर्धयन्हमारी शक्ति राष्ट्रको उन्नति साय चढाई करनेवालेका प्रतिकार करना और जो दुष्ट व्यय. के लिये बढे अर्थात् राजाके अंदर जो शक्ति बहती है वह राष्ट्रकी उन्नति के लिये ही मार्यमें लगे, यह भाव के हार करता है उसको ठीक करना आदि राजाके कर्तव्यामंत्र०२) अंदर रहे। अपनी बढी हुई तन मन धन आदि सब शाके अपने भोगके लिये नहीं है प्रत्युत राष्ट्रकी भलाई के लिये ही है योग्य है । ये सब कर्तव्य वही भाव यता रहे हैं कि राजा अपने ये दश कर्तव्य राजाके इस मूकमें कहे हैं ये सव मनन करने यह जिस राजाका निधय होगा वही सच्चा राभा कहा जासकता भोगके लिये राजगद्दीपर नहीं आता है, प्रत्युत राष्ट्रवाहित है। (मंत्र ) करने के लिये ही आता है । यदि राजालोग इस सूफ का अधिक २ रादाय मां बध्यतां सपरनेभ्यः परभुवे राष्ट्रको उन्नति और वैरियोंका पराभव करनेके लिये राणाहरूप माण मेरे मनन करके अपने लिये योग्य बोध सो तो बहुत ही उत्तम होगा। (राजाके) शरीरपर बांधा जावे। मणि आदि रश्न तथा अन्य राजवित जो राजा धारग करता है वह अपनी शोभा बढाने राजचिह। के लिये नहीं है, प्रत्युत घे केवल दो ही उद्देश्य के लिये हैं, छन, चामर, राजदण्ड, मणि, रन, रनमाला, मुराद, (१) राष्ट्रको उन्नति हो, और ( २ ) जनताके शव दूर ये विशेष पटेल, राजसभाका टाठ, हाथी, घोटे मादि सय जांय । राजाके अंदर यह शक्ति उत्पा करने के लिये ही उसपर जो राजचिन्ह रूपमें समझे जाते हैं, इन धिन्दो धारण करनेसे राजचिन्ह पदाये जाते हैं। (मंत्र ) जनतापर कुछ विशेष प्रभाव पड़ता है और उसप्रभाव के कारण ३ अभिराष्ट्रः-(अभितः राष्ट्रं यस्य) जिसके चारों ओर राजाके इदं गिर्द शक्ति केन्द्रीभूम हो जाती है । यार इस राष्ट्र है, ऐणा राजा हो । अर्थात् राजा अपने राष्ट्रमें प्रत्येक चिन्हमें कोई विशेष पछि नहीं होती, तथापि राबविन्द धारण करनेवले गाधारण सिपाही मी अन्य सामानारी रहे, राष्ट्र के साथ रहे, राष्ट्रका पनकर रहे । राजाम हित राष्ट्रहित ही हो, और राष्ट्रका हित राहित हो, अपेशा कुछ विशेष कि होनेश यनुमय हरएक करमण मर्यात दोनाक हित संवर्धमें परक न रहे । राजाके प्रभर टक चिन्हों के कारण भमून राज शामनका Psar प्रभाव जनतापर पड़ता है जिस कारण गाजिनान्द्र लिये राष्ट्र मनुकूल रहे और राष्ट्र के लिये राजा अनाल हो । राष्ट्ररितका उप प्येय अपने सामने रखनेवाले राजाम पनता है। जिस समय अपने पिन्होंगे और गरी ठमेराग বাবা ই ব ন ত মা সমাৰ আশান पोप इस सम्दसे होता है। जिस रामाके लिये अपनी जान देने के लिये राष्ट्र तैयार होता है उस राजाचा यह नाम है। यह पर पाता है, इसी हारर रागमें घटिया है। सन्द भाव रामाय पाया है। (मंग ) इस सक्त यं मंत्रमें • यह मनि ही सपने पाला, प्रभाव पानेगारा, राष्ट्रहिन सापन माना" ४ पह:-राग नाश करने वाला। (म०५) इलादिया, टमम्र भाग २ प्रार मागम ५असपन-भर प्रतिपक्षी या पियपी निसको न हो । friend गोपि मो (मं.५) पति रवि नही ! - it सनरा-प्रविशाप नाश एनेस पर सार होली सन्दिों पर प्रविरशिदोघा रामबरने वाला(मंत्र५)"प-पग:" झारनामा - ११(म.ए. मा..." - सबकी सहायता। । अथर्ववेदका सुबोध भाष्य [काण्ड १, शत्रुके लक्षण । दने । हमारा शरीर सुदृढ हो, हमारी आयु दीर्घ हो, इमारे इस सूकमें निम्नलिखित प्रकारमें शत्रुके लक्षणोंशवर्णन किया इंद्रिय अधिक कार्य क्षम बनें, हमारा मन मननशकिसे युक्त हो, हमारी बुद्धी ज्ञानसे परिपूर्ण हो, हममें आत्मिक पल बढे, तथा १ यः दुरस्यति = जो दुष्ट व्यवहार करता है । ( म. २) हमारी कौटुंबिक, सामाजिक तथा अन्यान्य शकिया बढे । पे २ सपत्न. = भिन्न पक्षमा मनुध्य । राष्ट्रमें जितने पक्ष सब शकिया इसलिये बढ़े कि इनके योग से हमारा राष्ट्र अभ्यु होगे, उत्ने पक्षवाले आपसमें सप न होंगे। सपन शब्द दयसे युक्त हो । इन शक्तियों की वृद्धि इसलिये नहीं करनी है कि ( Party Pohtics) पक्ष भेदका राजकारण बता रहा है । इनसे केवल व्यक्षिका ही सुख बढे, केवल एक जातीके हाथमें धरातिः = अनुदार, जो मनमें थेष्टभाव नहीं रखता। अधिकार रहे, या किसी एक कुल के पास परम अधिकार हो ४ पृतन्यन् = सेन्यसे चढ़ाई करनेवाला। जाय, परतु ये शक्तिया इसलिये बढानी चाहिये कि इनके इन शब्दोके विचारसे शत्रुका पता लग सकता है। इनमें संयोगसे राष्ट्रको प्रगति हो, राष्ट्रको उच्चता हो । कई अंदर के शत्रु है और कई याहरके हैं। सामान्य अर्थ देखने के समय इस प्रथम मनका "अस्मान' शब्द वडा महत्त्व रखता है। इसका अर्थ होता है " हम तृतीय मंत्र में कहा है कि " सूर्य चंद्र सार सम भूतमान greगत करो। इसका स्पष्ट तात्पर्य यह है कि किसी एकको सबको " । अर्थात् हम सबको मिलकर राष्ट्र दितके लिये जिस राजाके सहायक होते हैं वह शत्रुकोपराजित करता है।" (मं० ३) इसमें सूर्य चंद आदि शब्द वाय माष्टकी सहायता नहीं है, पातु सकी प्रतिमा विकास यहाँ अपेक्षित है । राष्ट्रीय ही उति या किसी एककी शक्तिका विकास ही यहाँ अपक्षत यता रहे हैं, ( Natare's help) निसर्गकी सहायता के लिये जो प्रजाजनोंकी शादि का विकास करना है वह राजावा हाधिका एक महत्त्वपूर्ण भाग है। राष्ट्रको रचना ही एक प्रजानका, किसी प्रकार भी पक्षपात न करते हुए ऐसी हो कि जहां शनुका प्रवेश सुगमतासे न हो सके। यह एक शक्ति है। करना चाहिये । अर्थात् जातिविशिष्ट या संघविशिष्ट पक्षपात के लिये यहो कोई स्थान रहना नही चाहिये। दूसरी शक्ति (विश्वा भूतानि ) सप भूत मासे प्राप्त होती है । पचमहाभूतास शक्ति प्राप्त करनेकी भी यात इसमें सुगमतासे जो में करता हूं वह राष्ट्र के लिये समर्पित हो यही भाव भत हो सम्नी है । " भूत " भाग्दका दूसरा प्रयिं हरएनके मनमें रहना चाहिये । "प्रा.ी, मनुष्य " ऐसा होता है । जिस राजाको राष्ट्रके सय राष्ट्राप मध यध्यता। प्राणी और सप मनुष्य सहायक हो, उसका शक्ति विशेष होगी सपरनेभ्य. पराभुपे ॥ (म.) दी, हमें क्या सदेह है। यही सय जनताको शुभ इच्छासे मुसे राष्ट्रके लिये यांध दे ताकि में राष्ट्र के सभाका प्राप्त होनेवाली हाकि है जो राजाको अपने पास रखनी चाहिये पराभव कर सकें । " यह भाव मनमें धारण करना चाहिये । क्योंकि इभ पर रागका चिस्यापि च अवलवित है। वैदिक राम गरे विषयमें इस सूची पहा सरधा उपदेश जुराय कि यह कभी न टूटे, राष्ट्रवाहित और मेरा Rत एक मैं राष्ट्रके साथ पाया गऊँ, मेरा अपने राष्ट्रके साप ऐसा सरंध है। यदि प ठक अधिक मनन करेंगे तो उनको राजमारणके बने, में राष्ट्र के लिये ही आवित रहे, इलादि प्रसारके भाव पर पत म निदेशइम सूत में मिल सकते है। मंत्री जो जिके साय गंधा जाता है उसी छाप रहल है। यदि खराष्ट्राभिमानमें मनुष्य राष्ट्र के साथ एक बार मण प्राार कमार यांधा जाय तो बायोगे नही हटेगा। इसी प्रकार मनुष्य याने राष्ट्र साप बाधे जोय यौ। ऐसा परस्पर संबंध जुम्ने के कारण राष्ट्र में अपूर्व संप शकि उपभो या बेद अमीष्ट है। - .
सू० २९, मं० १.६] शत्रु-नाशन-सूका (८३) आमत रहे। इस प्रकार जिसके मनके सामने राष्ट्रका विचार आंख अपनी ओर खींच सकता है वही वैदिक दृष्टिमे राष्ट्र है। सदा जामत रहता है, उसीको वेद 'अभिराष्ट्र' करता है अन्य मानवी समुदाय राष्ट्र नहीं है । इस प्रकार के राष्ट्र विस्तार (अमितः राष्ट्र) अपने चारों ओर अपना राष्ट्र है ऐसा छोटा हो या बडा हो, वह राष्ट्र ही कहलायेगा। पलं जी माननेवाला हरएक अवस्थामें अपने संमुख अपने राष्ट्रको विस्तारसे अति प्रचंड हो, परंतु याकी दृष्टि जिसमें चमघट देखनेवाला जो होता है उसका यह नाम है। न हो तो वह राष्ट्र नहीं होगा। वैदिक धर्मियाको भरने परिमसे अपने राष्ट्रमै इस प्रकारका तेज उरसा करना चाहिये 'राष्ट्र' का अर्थ और पढाना चाहिये, तभी उनके देशका नाम दिक रीति राष्ट्र शब्द केवल देश अथवा केवल जनताश याचा वेदमें राष्ट्र होगा। घेदमें राष्ट्रवर्धन विषयक अनेक सूरू। और नहीं है । फेवल भूमिके एक विमागपर रहनेवाले मनुभ्य समाजका उनका परस्पर निकट संबंध भी है। पाठक जिस समय इन बोध 'राष्ट्र' शब्दसे वेदमें नहीं होता है। इस प्रकार के राष्ट्र सूक्तोंका विचार करने लगे उस समय भागे पीछे हे राष्ट्रीय भूमिपर बहुत होंगे, परंतु वेद जिसको राष्ट्र कहता है, से सूक्तोंका संबंध अवश्य देखें और उप उपदेशका इच्छा मनन राष्ट्र हिनने होंगे इसका विचार पाठकों को अवश्य करना चाहिये वेदमें 'राष्ट्र' शन्द ( राजते व राष्ट्र ) जो चमकता है, यह पाठक इस प्रकार मंत्रों के सामान्य उपदेशोंसे अधिक मनन राष्ट्र है। इस भयंका गोधक है। ओ मनुष्योंका समुदाय भूमाल करके शोध उठाने । वेदमें राष्ट्राइतके टरदेश सिप्रार स्पष्ट पर अपने कमाये यशसे चमकता है और सब अन्य लोगोंको स्पमें है यह इस रीतिसे १४ देस राते है। - आयुष्य-वर्धन-सूक्त । (३०) (ऋषि:- अथर्ग आयुष्यकामः । देवता विखे देवा.) विश्वे देवा यसवा रक्षतेममुतादित्या जागृत ययमस्मिन् । मेमं सनाभिरुत वान्यनाभिर्मेमें प्रापत् पोहोपो बधो यः ये वो देवाः पितरी ये च पुत्राः सचतमो मे शृणुतेदमुक्तम् । सर्वेभ्यो यः परि ददाम्येत स्सस्त्यैनं जरमै यहाथ ॥२॥ ये देया द्विपि । ये पृथिव्यां ये अन्तरिक्ष औपंधीपु पशुपन वे कंणुत जरसमापुरस्मै शुनमन्पानपरि पस्नु मृत्यून् येपा प्रयाजा उत यांनुपाजा हुतमांगा बहुमादय याः । पेपौ पः पर्थ प्रदिगो विमस्तास्तान अम संप्रमदः पुनामि ॥2॥ -३ (R) देगे।( प ) (इभ minuitm} for:) मादिल से पूर्व भाम सो) Tril (Rai (rn} मर-मिा) रा रा (या माTERLERREATER -
(४)
अथर्ववेदका सुबोध भाष्य
[को १
जो पुरुष प्रयत्नसे होनेवाला घातपात है वह भी ( इमं मा प्रापद ) इसको प्राप्त न करे ॥ १॥ है। देवाः) देवो (ये वः पितर)
जो सापके पिता है तथा ( च ये पुयाः)जो पुन हैं वे सव (स चेतस.) सावधान होकर (मे इदं उक्त ऋणुन ) मेरा यह
कथन अपण करें ( सर्वेभ्यो पः एतं परिददामि ) सब आपकी निगरानी में इसको में देता हूं ( एनं जरसे स्वस्ति बहाय)
इसी वृद्ध आयुतक मुसपूर्वक पहुंचा दो ॥ २ ॥ ( ये देयाः दिवि स्य) जो देव युलोकमें हैं, (ये पृथियां, ये अन्तरिमे) जो
पृथ्वीन और अंतरिक्षमें हैं और जो ( ओपधीयु पशुपु गप्पु मन्तः) औषयि, पशु और जलोंके अंदर हैं (ते भस्म जरसं.
मायुः शुत ) वे इसके लिये रहावस्थावाली दीर्घ आयु करें। यह पुरुष (शत अन्यान् मृत्यून परिवणरतु ) सेंकडों भय
अपमृत्युको हटा देवे ॥३॥ (येषां ) जिन तुम्हारे मंदर (प्रयाजाः) विशेष यजन करनेवाले, ( उत वा अनुयाजाः) अथवा
अनुकूल यजन करनेवाले तथा (हुत-मागा' बहुतादः च देवा ) हवन में भाग रखनेवाले और हवन किया हुआ न सानेवाले
जो देव है, ( येषां यः पर प्रदिश. विभक्ताः ) जिन आपकी ही पांच दिशायें विभक्त की गई है, (ठान् वः) उन तुमको
(मसै) इस पुरुषको दीर्घ आयुके लिये (सत्र-सदः कृणोमि ) सदस्य करता हूं ॥४॥
भावार्थ-हे सब देवी, हे वमुदेवो ! मनुष्यको रक्षा करो ! है आदिल दंयो । तुम मनुष्यों जाप्रत रहो । मनुष्यका उसीके
संधुगे अथवा कोई अन्य मनुष्यसे अथवा कोई पुरुषसे वध न हो॥१॥ हे देवा । जो तुम्हारे पिता है और जो तुम्हारे पुत्र है
धे राय मेरा कथन मुने ! मनुष्यको पूर्ण दीर्घ आयुतक ले जाना तुम्हारे आधीन है, अतः मनुष्यको दीर्घ आयु करो ॥ २ ॥ जो देव
युलोक, अंतरिक्षक, भूलोक, ओषध, पशु, जल आदिमें हैं वे सब मिलकर मनुष्यकी दीर्घ मयु करें। तुम्हारी सहायतामे मनुष्य
मेरों अपमन्युरो य ॥ २ ॥ विशेष याजन करनेवाले, अनुकूल याजन करनेवाले, हवनका भाग लेनेवाले तथा हवन किया हम
न सानवाले जो देव हैं और जिन्होंने पाच दिशाए भिक की है, वे सब आप देव मनुष्यको बायुष्यवर्धक समाके सदस्य बने और
मनुप्पकी आयु दीपं यनाने में सहायता करें ॥४॥
सू०१५, म.१-४] आयुष्य वर्धनस्क्त तब तक मनुष्यकी आयु क्षीण ही होती जायगी । इसलिये वध है, ये सब जगत्के निवासक देव होनेके कारण ही इनको फरनेको वृत्ति अपने समाजमें से दूर करनेका यत्न मनुष्य प्रथम वमु " कहते हैं। सबके जो निवासक होते हैं वे सबको रक्षा करें। अवश्य ही करेंगे। देवोंके आधीन आयुष्य । सब वसुओका भी परम वमु परमात्मा है क्योंकि यह जैसा मनुष्यका समाज जितना अहिंसात्तिवाला होण उतनी सब जगत् को बताता है इसी प्रकार जगत के संरक्षक एवं उसकी आयुष्यमर्यादा दीर्घ होसकती है। यह बात जितनी सिद्ध देवोंको भी वशता है। उसके बाद पृथ्वी, आप, अग्नि, मायु होगा उतनी सिद्ध करके आगेका मार्ग आक्रमण करना चाहिये। भाकाश, सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, ये अष्टवसु है ऐसा कहा जाता है । आगेका मार्ग यह है कि-" अपना आयुष्य देवोंके आधीन भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, आदि के साथ है, देव हमारी रक्षा कर रहे है" यह भाव मनमें धारण करना। हमारे क्षणक्षणके आयुष्यका संबंध है, इनमें से एकका भी इसकी सूचना प्रथम मंत्रके पूर्वार्धने दी है, उसका आशय यह संबंध हमसे टूट गया तो हमारा नारा होगा। इतना महत्त्व इनका है और इसी कारण इनके रक्षणमें सदा मनुष्य रहता है "हे सब वसुदेवो । मनुष्यको रक्षा करो। हे सब आदियो । ऐसा ऊपरवाले मेनमें कहा है। इससे स्पष्ट हुआ कि मनुष्य मनुष्यमें जागते रहो।" ( मंत्र) की रक्षा इन देवों के कारण हो रही है और अति नि:पक्षपान इस मंत्र में भी दो माग है । पहिले भागमें वसु देवकी रक्षा हो रही है। ये देव कमी किसीका पक्षपात नहीं करते हैं। सूर्य सबपर एकसा प्रकाराता है, वयु सपके लिये एकमा बह शक्तिके साथ संबंध बताया है और दूसरे मागमे आदिल रहा है, जल सबके लिये शाकाशसे गिरता है, पृथ्वी सबको देयोंको मनुष्य के अंदर, मनुष्य के देहमें, जाग्रत रहने की सूचना समानतया आधार दे रही है, इस प्रकार में सब देव न केवल दी है। ये दोनों बातें दीर्घ आयु करने के लिये अत्यंत आवश्यक सकी रक्षा कर रहे हैं प्रत्युत सबके साथ नि:पक्षपातय भी है। अब इनका संबंध देखिये चाव कर रहे हैं। सपने पहिले मनुष्य यह विचार मनमें धारण करे कि संपूर्ण देव मेरी रक्षा कर रहे हैं, पर पामात्मा सधा सर्व समर्म हमारे जीरनके साथ इनका संबंध इतना पनिट कि प्रभु मेरी रक्षा कर रहा है और उसकी आघनिता में सूर्यादि इनके विना हमारा जीवन ही भराय है। पायुके दिना प्राग सय देव सदा मेरी रक्षा कर रहे है । मैं परमात्मा ममृत धारणा कैसी होगी। सूर्यके विना जीयन ही असंभव होगा, पुत्र हूं इसलिये मेरा परमपिता परमात्मा मेरी रक्षा करता था, इत्यादि प्रकार पाठ देखें और मनमें निषयपूर्वक यह बात करता है और करताही रहेगा। परमारमाके आधीन अन्य राम धारण करें कि परमामा नियमके आधीन रहते हुए ये गए देव होने के कारण वे भी उस परमात्मके पुनकी रक्षा अपम देव हमारी रक्षा कर रहे है। इस प्रकार संपूर्ण देष मेरा संरक्षण करते है इसलिये में हम क्या करते हैं? विर्भय हूं यह विचार मनमें हर का मनके अंदर जो सब देख तो हमारी रक्षा रही है, परंतु मा मोचिन्ताके विचार पायेंगे उनसे हटाना चाहिय और विधास- कर रहे हैं, हम उनग रक्षा रदने म मान रहेका से मनछ ऐसी र अवस्था पनानी चाहिये कि जिसमें पिता उनकी रवा बाहर रोने सनम MERगर पाटो विसरहान उठे और स्तिरहित निर्भय होने के मार आनंद करना शाहिये । देखिये, परमामा और हम तिरेय मनमें हैं। दार्थयुस के लिय इस प्रथा परमामा से बाहर आते १-परमारमार Trutोरमने रे पर तथा अन्याय चाकी संयक्तिर अपना पूर्ण विधास परमामा मारतो ग म परमाता रखना चाहिये, अन्यथा दोर्प भायुप्प प्राप्त होना मना है। भी उनी रा रा है नती मार दस पाठक सामन्यास देवमारी राय है, परंतु ये भरिधामी मोगरी र साये माम प्रभर रहे रिप गरे पूनारसोग उठाते। अभिषाप गरम निीि कर भागमा पनि से सभी परिवार पर है। परमे महाग पुणे AM पाठक जानकपन में me पातमा रमापEिEfreनरि।
अथर्ववेदका सुयाध भाप्य ।
"
इसके बाद सूर्य अपने प्रकाशसे सबको जीवनामृत देकर आदित्य शक जाग्रत हो जाती है, ध्यान धारणा द्वारा मात्र-
सबकी रक्षा कर ही रहा है, परंतु मनुष्य सूर्य प्रकाशसे दूर रहते ककी आदित्य शक्ति जापत होती है, तथा नाटक आदि अभ्यास
है, तंग गलियोंके तग मकानों में रहते हैं, दिनभर कमरोंमें द्वारा नेत्रकी आदित्य शक्ति जाग्रत हो जाती है । इस प्रकार
अपने आपको बंद रखते हैं और इस प्रकार सूर्यदेवकी सरक्षक योगाभ्यास द्वारा अपने अंदरकी आदित्य शक्ति जाप्रत और
शक्ति से अपने आपको दूर रखते हैं। इनके लिये भगवान् बलयुक्त करनेसे मनुष्य दीर्घजीवी हो सकता है।
सहस्ररश्मी सूर्यदेव क्या कर सकते हैं ? इसी प्रकार वायु और इस प्रथम मंत्रके ये उपदेश यदि पाठक ध्यानमें धारण
जल आदि देवों के विषयमें समझना उचित है। ये देव तो करेंगे और इन उपदेशोंका योग्य अनुष्ठान करेंगे तो उनकी
सबकी रक्षा कर ही रहे हैं परंतु मनुष्योंको भी चाहिये कि वे आयु बढ जायगी इसमें कोई संदेह ही नहीं है। " समाजमें
इनकी उत्तम रक्षासे अपने आपको दूर न रखें और जहातक निर्भयता, परमेश्वरपर दृढनिष्ठा, वायु जल सूर्य आदि देवताओं
होसके उतना प्रयत्न करके उनको रक्षाम अपन आपको अधिक अधिक संबध करना और अपने अदर आदित्य शक्तियोंकी
रखें।
जामती करना
यह संक्षेपसे दर्घाियु प्राप्त करनेका मार्ग है।
पाठक यहा समझ ही गये होंगे कि संपूर्ण देव मनुष्यमात्रकी इसी मार्गका थोडासा स्पष्टीकरण आगेके मत्रों में है, वह
क्सि रीतिसे रक्षा कर रहे हैं और मनुष्य उनकी रचाये किस अब देखिये-
प्रकार दूर होते हैं और स्वयं अपना नुकसान किस प्रकार कर देवोंके पिता और पुत्र ।
इस भायुष्यवर्धन सूतके द्वितीय मंनमें कहा है, कि " हे
आदित्य देवोंकी जानती।
देवो । जो तुम्हारे पिता है और तुम्हारे पुत्र हैं वे मेरी बात
इस प्रयम मनमें दीर्घ आयुष्य वर्धक एक महत्त्वपूर्ण बात सुनें । मैं तुम्हारे ही आधीन इस मनुष्यको करता हूं, तुम
कही है वह यह है-" हे आदित्य देवो! इस मनुष्यमें जाप्रत इसको दीर्घ आयुष्य तक सुखसे पहुंचाओ।
रहो। " मनुष्यके अंदर आदित्यसे ही सव जीवन शाक
इस द्वितीय मंत्रमें " देव, देवोंके सब पिता और देवकि सब
पारही है। यह जीवन शक्ति जैसी मनुष्यमें कार्य करती है पुत्र ये सब मनुष्यको सुखसे दीर्घ आयुष्य तक पहुंचानेवाले
उमा प्रकार सब जगतमें कार्य कर रही है । इसी शक्तिसे सय हैं " ऐसा कहा है, यह सूचना मनन करने योग्य है । यह मंत्र
जगत् चल रहा है । परतु यहां मनुष्यका ही हमें विचार करना ठीक समझमें आने के लिये देव कौन हैं, उनके पिता कौन हैं और
है। मनुष्यमें यह आदित्य शक्ति मस्तिष्कम रहती है, नेत्रमें उनके पुन कौन हैं, इसका विचार करना यही अत्यंत आवश्यक
रहती है और पेटमें रहती है । मस्तिष्कमें मजाकेंद्र चलाती है, है । अवेदमें इन पिता पुत्रोंका वर्णन इस प्रकार आया है-
पेटमें पाचक केंद्रको चेतना देती और नेनमें देखनेश व्यापार
दश साकमजायन्त देवा देवेभ्यः पुरा ।
करती है। इनमें कोई भी आदित्य शक्ति कम हुई तो भी यो पै तान्विद्यारप्रत्यक्ष स घा अद्य महददेव ॥५॥
मनुप्या आयुष्य घटता जायगा। मास्तष्का मजाकेंद्र आदित्य प्राणापानौ चक्षुःश्रोग्रमक्षितिश क्षितिश या।
शासि से हीन होगया तो संपूर्ण शरीर चेतना रहित हो जाता है
प्यानोदानी यादमनस्ते या माकूतिमायहन् ॥ ४ ॥
पेरका पायक केंद्र आदित्य शक्मेि हीन होगया तो हाजमा
कुत इन्द्र कुतः सोम. कुतो भनिरजायत ।
विगट जाता है, नेप्रकी आदित्यशाक हटगई तो मनुष्य अंधा
बनता है और उसके सय व्यवहार ही बंद हो जाते हैं। इतना
कुतस्त्वष्टा समभवत्कुतो धाताऽजायत
इन्द्रादिन्द्रः सोमारसोमो अमेरनिरजायत ।
महरष स आदित्य शतिका मनुष्य अपवा प्राणीके
स्वष्टा ह जसे स्यष्टुातुर्धाताऽनायठ
परिमें है। इसलिये येदमें छा है कि-
येत भासन्दरा जाता देवा देवेभ्य पुरा ।
गूर्य मामा जगतस्तस्थुपम । वेद.१1११५।।
पुनेम्या छोकं दरया कस्मिस्ते रोक मासते
" यह दिल सूर्य ही रथावर जंगमनात्मायामा है।"
(अथर्व 11.]
पाठक इस मंत्र भाशय प्यानमें ररों और अपने अंदरकी
बादिस पदि गुदा मामत राने। ननुशन करें । सूर्यभेदन ( मनाया ) साथ साप उत्पन्न हुए । आइनको प्रयास
(पुरा ) सबसे प्रथम ( देवेभ्यः दर देया ) देवो दरा देव
पाराम भार गगदी प्राणायाम द्वारा पेट रस नमें रहनेवाली आनेगा, (माय मदत पदे) वह घर के विषदम
(मग २)
॥८॥
२०३०,म०२-३] आयुष्य-वर्धन-सूक्त ॥१०॥ बोलेगा । वही ब्रह्मा ज्ञान कहेगा ॥ ३ ॥ प्राण, अपान, चक्षु, और यह संबंध अत्यंत लाभकारी है। श्रोत्र, (अ-क्षितिः) अविनाशी बुद्धि, और (क्षितिः) वायु सूर्य आदि देवासे हमारा संबंध किस प्रकार है और नाशवान चित्त, व्यान, उदान, वाचा और मन ये दस देव उसका हमारे आरोग्य और दीर्घ आयुसे कितना घनिष्ठ संबंध तेरे ( आकूतिं थावहन् ) संकल्पको उठाते हैं ॥ ४ ॥ कहांसे है, यह हमने प्रयम मंत्रके व्याख्यानके प्रसंगमें वर्णन किया इन्द्र, सोम, और अग्मि होगये ? कहाँसे त्वष्टा हुआ, और ही है इसलिये उनको दुहरानेको यहाँ आवश्यकता नहीं है। धाताभी कहासे हो गया ? ॥ ८॥ इन्द्रसे इन्द्र, सोमसे सोम, माण, चक्षु, कर्ण आदि देवपुत्र हमारे शरीर में ही रहते हैं। अमिसे अग्नि, त्वष्टासे त्वष्टा, और धातासे धाता हुआ है योगादि साधनोंसे इनका बल बढ सकता है। इसलिये इनके ॥९॥ (ये पुरा देवेभ्यः दश देवाः ) जो पहिले देवोंसे दश व्यायामके अनुष्टानसे पाठक इनकी शक्ति विकसित करें और देव हुए हैं, (पुन्नेभ्यो लोकं दत्वा) पुनको स्थान देकर वे अपना शरीर नीरोग और पलवान बनाकर दीर्घायुके अधिकारी स्वयं ( कस्मिन् लोके आसते) किस लोकमें बैठे हैं ! बनें। इस प्रकार मनुष्यका दीर्घ आयुष्य के साथ देवों, देवोके इन मंत्रोंमें देव, देवों के पिता और पुत्र कौनसे हैं इसका पितरों और देवोंके पुगेका संबंध है। यह जानकर योग्य- वर्णन है। प्राण अपानादि दश देव इन्द्रादि देवसे मने हैं और अनुष्ठान द्वारा आयुष्यवर्धन का प्रयत्न करें। वे पुन रूप देव इस शरीरमें रहते है, इन पुत्रदेवोंके पिता देव परमपिता परमत्मा यद्यपि एक ही है तथापि वह संपूर्ण सूर्य, इस जगत्में हैं और उनके भी पिता परमात्मामें रहते हैं, चंद्र, वायु, रुद्र आदि अनेक देवताओंकी विविध शक्तियोंसे युक्त इसका स्पष्टीकरण यह है--प्राणरूप देव मनुष्य शरीरमें है, है, इसलिये संपूर्ण देवताओंका सामुदायिक पितृत्व उसमें है, वह जगत्में संचार करनेवाले वायुका पुन है, और इस वायु- ऐसा काव्यमय वर्णन मंत्रमें किया है वह उचितही है। इस कामी पिता-वायुका भी वायु-परमपिता परमात्मा है । इसी प्रकार इस मंत्रमें मनुष्य के दीर्घ आयु के अनुष्ठान का मार्ग प्रकार चक्षुरूपी पुत्रदेव शरीरमें रहता है, उसका पिता सूर्यदेव इस मंत्र में उत्तम और स्पष्ट शब्दोंद्वारा बताया है । पाठक धुलोको है, और सूर्यका पिता-सूर्यका भी सूर्य-परमपिता इसका विशेष विचार करें। परमात्मा है । इसी प्रकार अन्यान्य देवोंके विषयमें जानना योग्य है । यह विषय इससे पूर्व आचुका है, इसलिये यहाँ देवोंके स्थान । अधिक विवरण की आवश्यकता नहीं है। तृतीय मंत्रमें देवों के स्थान रहे हैं । यह तृतीय मंत्र या सबका सारांश यह है कि पुन रूपी देव प्राणियों के इन्द्रियों भाशय प्रकट करता है, कि" धुलोक, अंतरिक्ष, पृथियो, और अवयवोंमें अयंत् शरीरमें रहते हैं । इनके पिलादेव औषधि, पशु, जल, इन, स्थानों में देव रहते हैं, ये मनुष्य के भू-भुवः स्वः इस त्रिलोकीमें रहते हैं और इन सूर्यादि देवोंके लिये दार्थ आयु करते हैं और जिनकी सहायता सेका भी पिता विशेष शक्तिके रूपसे परमारमामें निवास करते हैं। अपमृत्यु दूर हो जाते हैं।" (मंत्र ३) यह मंत्र का विरार हमारी शांत सूर्य के विना कार्य करने में असमर्थ है और करने योग्य है। सूर्य परमात्मा और महाशक्तिके दिना मरना कार्य करने में दुलोकमें सूर्यादि देव, अंतरिक्षमें वायुसस, इन्द्र, चन्द्रमादि असमर्थ है । इसी प्रकार संपूर्ण देवों और उनके पिता पुत्रों के देव, पप्पो में अग्नि मादि देव, पोषधियोंमें रसामा सोमदेव विषयमें जानना योग्य है। इन सबके आधीन मनुष्यका दीर्घायु पशुभमि दुग्धादिरूपसे अमृत देव, बल, बरग मादिदेर निवास करते हैं । ये सय देव मनुष्यको भायु बढाने कार्य इसलिये जो दोर्ष भादुष्पके इच्छुक है, वे भक्तियुक्त सहायक होते हैं। सूर्य देव जोरन देता है, वायु प्रा देता । मेत करणारे अपना संबंध परम पिता परमारमारे हल करें। इन्द्र और पन्द्र मश: गुपुति और आनि म और यह परमपिता पररमा स्थ भी सूर्य, वायुग मी वायु, प्राग अय्यप मनके संबाला देवदैमस प्रोवाना का भी प्राग, अर्थात् देवोंका मा देव है और यहां हम सपा है,अनि या संबंध रा. भौमितिमा पिता है । इस मस्ति यदि मंतःकरणमें 7 हो गई तो तय दवाइस बनाएर मनुमा छायता परती भोग मन मना रिपर रह सकती है और उमसे दोघे आयु प्राप्त दुग्प लाभग्नमित्ता,जस समे वीर्य बना १.५ होती है। इस प्रकार देयों मितार मनपा होता है प्रथा अन्यान्य देश मनुप गारपदं मानदार - अथर्ववेदका सुबोध भाष्य [फा०.१, मनुष्यने उनसे लाभ उठानेका पुरुषार्य करना आवश्यक है। देवताओंके चार वर्ग। इन सय देवोंसे अपना संबंध सुरक्षित करके, उनसे यया. योग्य लाभ लेनेका यान करनेसे आयुष्य बढ सकता है । इन इस प्रकार तीन मंनोंमें देवताओंसे अमृतरस प्राप्त करके देवखि नाना प्रकारको चिकित्साएं बनी है, युलोके देयोंसे अमरत्व प्राप्त करके अर्थात् दीर्घायु बननेके अनुष्टानका स्वरूप सौरचिकित्सा वर्णचिकित्सा, प्रकाशकिरण-चिकित्सा; अंतरिक्ष बतानेके पश्चात् चतुर्य मंत्रमें देवताओंके चार वर्गीका वर्णन स्थानीय देवोसे वायुचिकित्सा, विद्युचिकित्सा, मानचिकित्सा किया है और इन देवताओंके अपने सहकारी सदस्य बनाने का अथवा चांदचिकित्सा, पृथ्वीस्थानीय देवोंके अग्निचिकित्सा, उपदेश किया है । इस चतुर्थ मनका आशय यह है- खनिजपदासि रमचिरित्सा, शस्त्रचिकित्सा, औषधियोंसे तथा " देवोंमें प्रयाज, अनुयाज, हुतभाग और बहुताद ये चार वनस्पतियोंसे भैपज्यचिकित्सा, पशुओंके दूधसे दुग्धचिकित्सा वर्गके देव हैं । इन देवासे ये पाचों दिशाएं विभक्त हुई है। अर्थात् पशुओं को विविध भौषधिया सिलाकर तथा विविध ये सय देव मनुष्यके सहकारी सभ्य बनें । " (मंत्रा) रंगोंकी गौओंके दूधका उपयोग करनेसे, तथा पशुके मूनादि. इन चार वर्गाके देवोंके लक्षण इनके वाचक शब्दोंडे ही के उपयोगसे विविध चिकित्साएं सिद्ध होती हैं, जलसे जल व्यच होते हैं। ये लक्षण देखिये-- चिकिसा, इस प्रकार अनेकानेक चिकिमाएं होती हैं। प्रयाजाः-- विशेष यजन करने वाले, इन सय चिकित्सामोंका अर्थ ही यह है कि विविध रीति से २ अनुयाजा:- अनुकूल यजन करने वाले, इन सब देवोंकी दिव्य शचियाँस लाभ उठाना । प्राचीन काल. ३हुतभागा:- हवन का भाग लेने वाले, के प्रषिमुनियोंने इन सब देवासे लाभ उठाने के जो जो प्रयत्न ४ अहुताद:- हवनका भान खानेवाले। किये, उनका फल ही ये सर चिकित्साएं हैं। आजकल भी इस पाठक इन देवोंको अपने शरीर में सबसे प्रथम देखें-() दिशासे विविध प्रयत्न हो रहे हैं । इन देवताओंमें विविध और जिनपर इच्छा शक्तिका परिणाम नहीं होता, परंतु मो अवय अनंत शधियां है, उनकी समाप्ति नहीं होगी, इसलिये मनुष्यों अपनी हो गतिसे कार्य करते हैं उन अवयवोंका नाम प्रयास को विविध रातिसे यत्न करके इन देवताओंसे विशेष लाभ है, जैसे हदय आदि अवयव । ( २ ) जो श्रवमय अपनी Tr उठाने के लिये यान करना चाहिये । इतने प्राचीन कालमें शतिरी भनुल कार्यमें लगाये जा सपते हैं उनको अनुयाल ऋषिलोग यह उद्योग परते थे और लाभ उठाते थे और दोर्पजीवी से हाथ, पाव, मांस आदि । (३) हुतभाग ३ मी बने थे। यह सिलसिला टूट गया है, तथापि आजकल इन्द्रिया है जो भोग की इच्छुक हैं और कार्य करने थकती प्रयान करने पर उसी मार्गसे यहुत खोज होना संभव है। जो भीर विनाम तथा ARTA मिलनेसे पट होता है। (४) पाठक इस क्षेत्रमें कार्य कर सकते हैं कार्य करें और विद्याकी उन्नति शरारमें बहुताद केवल ग्यारह प्राण ही हैं, क्योंकि ये शर र पायक भागी मने अनुसार इन देयताओं कार्य करते है और स्वयं भी भोग नहीं देते, कि अपने अंदर लेने और उस शक्तिको अपने अंदर रिपर जन्म लेकर मरनेता परापर कार्य करते हैं। करने मनुष्य दो बायुष्य प्राप्त कर सकता है। साधारण धाधारण प्रपनसे भी बड़ा नाम हो सकता है। पाया प्रामावि उपनिषदमें शरीर यही इस प्राणका वर्णन तथा अन्य इन्द्रियोंका वर्णन या प्रार पहा पूर्य मिलेम अपना नंगा मर स्पानेगे, पायुमें नरें र मनेगे, अष्ट में सरनेये उत्तम श्रीपभियाचा रस पीने से प्रयाग और अनुयाज का वर्णन इस प्रकार है.. गोदाय मानिये गापारग परिस्पिनिमें रहने वाले शरीरयशस्य के प्रयागा' फेऽनुपाजाः ॥ मनुष्य भी तमाम उटा गुरते हैं। पिरोपियंत्र महामूवानि प्रयामा निमसाइन देवा जियोग अधिगम उठानेकापुरमा मवान्पनुपात्रा पागामिहोत्र.11-1 रंगे रन दिएप पदापना । इस प्रकार दे देवताएं शरीरमे पते हुए यशके प्रयास भोर मनुपात्र कोन गरे माना जितनाप दाना बादो माा उतना A Wri TV मा और area मन पनि पदोन तया पानाम किया महामत प्रयान और भून मात्र बार वभाग IPL नगरला भगत मिलेगा भीगा दिया है। रोना { মা যায় দায়ে এসে মি আল सू०३१, मं.१-४] आशा-पालक मुक्त। - उसका वर्णन यहां करनेकी आवश्यकता नहीं है। अनुयाजों से जो देवताओंके अंश रहते हैं उनमें मुरय अवयवोंका विशेष प्रयाज अधिक महत्त्व के हैं तथा हुक्मागों से अहुताद विशेष ख्याल करना, उनकी शक्ति बढानेका और उनकी कमजोरी महत्त्व रखते हैं। जो शरीरशास्त्र जानते हैं उनको इसका न पड़े इसका विशेष विचार करना चाहिये । इसके पश्चात् गोग अधिक वि.तार करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वे जानते अवयवोंका विचार करना उचित है। वासर्मस्थान, मज्जा- हो हैं कि इच्छा शक्तिको नियंत्रणासे चलनेवाले हस्तपादादि संस्थान और हृदयसंस्थान सादि महत्वपूर्ण संस्थानोंका बल अवयवोकी अपेक्षा अनिच्छासे कार्य करनेवाले हृदयादि अंतरव• बढना चाहिये और स्नायु आदि उनके अनुकूल रहनेयोग्य यव अधिक महत्त्व के हैं। तथा अहुताद अर्थान् कुछ भी भाग न शक्तिशाली बनने चाहिये । जन्मसे मरनेतक अविश्रान्त कार्य करनेवाले प्रागादिक अधिक श्रेष्ठ हैं और नेत्र, कर्ण आदि अवयव जो थमसे यकते हैं, गोगा भाव बताता है। ये सब देव हमारे चारों ओर राप यंत्रका प्रयाउ शब्द मुख्यका मार और अनुयाज शन्द विश्राम करते है और भोग भी भोगते हैं ये उनसे गौण है। दिशाओं में विभक्त हुए हैं और उन्होंने संपूर्ण स्थानको विभक यह मुरय गोगका भेद देखकर दीर्घायु प्रालिका अनुदान किया है। ये सब देव हमारे शरीरमें चलनेवाले शतसांवत्सरिक करनेवाले को उचित है, कि वह अपने अंदर के मुख्य देवों अर्थात् स भागो मने, अर्थात ये इस सौ वर्ष घलनेवाले दिन इंद्रियशफियों को अधिक बलवान् करे और अन्यों को भी बलवान रूपी महायश के हिस्सेदार है ही, परंतु ये अपना कार्य करनेमें फरे, परंतु यह ख्याल रखे कि गौण अवयवों को शक्ति बढ़ाने के समर्थ बनाकर अपना यज्ञका माग उत्तम रीतिरी पूर्ण करने में कार्य करते हुए मुख्य अवयवों की क्षीणता न होने दें। उदाहरण समर्थ हो, अपना यशश भाग मातम रीतिसे पूर्ण करें और के लिये पहलवानों के प्यायाम ही लीजिये। पहलवान लोग अपने निर्विमतासे यह पतसविसरिक यज्ञ भलाने में हमारे सहकारी शरीरके पुट्टोको यलवान बनाने के यम बहुत करते हैं, परंतु हृदय आदि अंतरवयवों का ख्याल नहीं करते हैं, इससे ऐसा होता है कि उनका स्थूल शरीर यहा यशाली होता है, परंतु हृदयादि इस प्रकार इन मंका आशय है, ये मंत्र स्पष्ट धार विशेष महत्त्वके अवयव कमजोर हो जाते है । इसस परिणाम बहुत बोधप्रद है। यदि पाठक इस वेगसे अनुष्ठान करेंगे तो अल्पायुमें उनकी मृत्यु हो जाती है। उनको नि:संदेह लाम हो सस्ता है । यद यदि ये लोग साथ हृदयको भी बलवान बनाने का या करेंगे का सूत है और पाठ इस विरयके अन्य सूतों के गाय इराघ तो ऐमा नहीं होगा इसलिये यहो कहना यह है कि अपने अंदर पिचार करें। आयुष्य-7" आशा-पालक-सूक्त। (३१) (ऋषि:- प्रधा। देवता- आशापाला, यास्तोपविः) आर्शनामाशापालेभ्य॑वतुम्यो अमृतम्यः । हुदै भूतस्याप्यक्षेम्पो विधर्म हषिपा ययम् य आर्शनामाशपालाचत्वार स्थन देवाः। ते नो नित्पाः पाचैम्पो मुशठाईमो-हमः ॥ २॥ असामस्त्वा हाषा यजाम्पसणस्त्वा धृतेन जुहोमि । प आर्शनामाशापालस्तुगयो देवः ग ना समतमेह यक्ष स्वस्ति माग उन पिन नो अस्तु पस्ति गोम्यो जगते पुरसम्या। विध मुमूर्त सुविदय नो अस्तु ज्योगेय शिम गुपैम् ॥४॥ ११(भ... भा.ज.)
अथर्ववेदका सुबोध भाष्य । [को०१, अर्थ-(भूतस्य अध्यक्षेभ्यः ) जगत्के अध्यक्ष ( अमृतम्यः) अमर (भाशानां चतुभ्यः बाशपालेभ्यः) दिशाओंके चार दिशागलोंके लिये (वयं ) हम सब ( हविषा इदं विधम ) इविव्यसे इस प्रकार अपंग करते हैं ॥१॥ हे ( देवाः) देवो! (ये माशानां चस्वारः माशापालाः स्थन ) जो तुम दिशाओंके चार दिशापालक हो ( ते नः )वे तुम हम सबको (निर्गस्याः पाशेम्यः ) अवनातेके पार्शोसे तथा ( अंहसः मंहसः) हरएक पापसे (मुघतां) छुडाओ॥२॥ (अ-वामः ) न थका हुआ में ( हरिपा स्वा यजामि ) इविदव्यसे तेरा यजन करता हूं। (अ-श्लोणः स्वा घृतेन जुहोमि ) लंगडा न होता हुआ सुझो घोसे अपंग करता हूं। यह ( आशानां माशापालः तुरीयः देवः ) जो दिशाओंका दिशापाल चतुर्य देव है (सः नः सुभूत इस सावक्षन् ) यह हम सबको उत्तम प्रकारसे यहां पहुंचावे ॥ ३ ॥ (नः मारे उत पित्रे स्वस्ति मस्तु ) हम सबकी माताके लिये तथा हमारे पिताके लिये आनंद होवे । तथा ( गोभ्यः जगते पुरुषेभ्यः स्वस्ति) गावों के लिये, चलने फिरनेवालों के लिये और पुरु. पोंके लिये सुख होवे । (नः मिश्वं सुभूतं सुविदत्रं अस्तु ) हम सबके लिये सब प्रकारका ऐश्वर्य और उत्तम ज्ञान हो और हम (सूर्य ज्योर पर शेम ) सूर्यको बहुत कालतक देखते रहें अर्थात् हम दीर्घायुषी हो ॥४॥ भावार्थ- चार दिशाओंके चार अमर दिक्पाल हैं, वे इस बने हुए जगत् के अध्यक्ष हैं। उनकी पूजा हम करते हैं ।।। चार दिशाओके चार दिक्पाल हैं, वे हमें हरएक पापसे पचावें और दुर्गतिसे भी हमारा छुटकारा करें ॥ ३ ॥मैं न थकता हुआ उनका समर करता हूं, लंगडा लूला न घनकर में उनको घी देता हूं, जो इन चार दिक्पालोके चतुर्ष देव है वह हमें गुमपूर्वक उत्तम अवस्थातक पहुंचावे ॥५॥ हमारे माता पिता, हमारे अन्य इष्टमित्र, हमारे गाय घोडे आदि पशु तथा जो भी हमारे प्राणी हों वे सब इस इस प्रकार सुखी हों। हमारा सब प्रकारसे अभ्युदय होवे और हमारा ज्ञान उत्तम प्रचारगे पढे तथा हम दीर्घायु हो ॥४॥ - सू०.५१, ०१-४) na आशा-पालक-एक । इस द्वार से जानेसे उपतर अवस्था प्राप्त होती है। हटनेका या मर जानेका इच्छुक होता है। यह विचार यदि यह द्वार मजा केन्द्र के साथ संबंधित है । इसी मजा केन्द्रक पाठकों के मनमें जम जायगा, तो उनको पता लग जायगा खाय संबंध रखनेवाला निचला द्वार शिन है जिससे वर्यिका पात कि यह सूत मनुष्य के साथ स्तिना घनिष्ठ संबंध रसता है। होता है। इसके योग्य नियम पालनसे सुयोग्य संतति उत्पन्न जिस समय "भाशा" शब्दका अर्थ "आशा, आकांक्षा," होती है, परंतु इसके नियम में चलानेसे मनुष्यको अमो. आदि किया जाता है उस समय यही सूक्त मनुष्या अभ्युदयता गति होती है। ये दो द्वार मनुष्यको उच्च और नाच बनाने में मार्ग बताता है । तथा जिस समय इसी "आशा" शब्दका अर्थ समर्म है। ब्रह्मचर्य पालनद्वारा उत्तर मार्गसे जानेका पान- "दिशा" कियाजाता है, उस समय यही सूक्त गद्य जगत् तथा पदोंका वर्णन इसी उत्तर मार्गको चित करता है, इसीका नाम राष्ट्रके प्रबंधका माव बताता है । सूक्तको यह शब्दरचना "रामण ( उपर+अयन ) भाव उत्तर मार्गसे जाना है। विशेष गंभीर है और वह हरएक को वेदकी अद्भुत वर्णन इसके विरुद्ध "दक्षिणायन" अर्थात् दक्षिण मार्गसे आना है, शैलीका स्वरूप बता रही है। जिसके संयमसे उत्तम गृहस्थधर्मपालनपूर्वक उन्नति होना रक्तका मनुष्यवाचक मावार्थ । समय है, परंतु असंयमसे मनुष्य इतना गिरता है कि उसका मनुष्यकी चार आशाएँ हैं, उनके चार अमर पालक है। इन कोई ठिकाना ही नहीं होता । ये दो मार्ग मज्जातंतुओंके साथ भूताध्यक्षोंकी हम हवनसे पूजा करते हैं ॥१॥मनुष्यकी चार संबंध रखनेवाले हैं। भाशाकि चार पालक हैं, वे हमें पापसे पचावें भोर दुष्ट इस प्रकार पूर्वद्वार और पश्चिमद्वार ये शरीरमें अन्ननलिका भवस्थासे मी वचावें ॥ न थकता हुआ और संगोप के साथ संबंध बताते हैं तया उत्तर द्वार और दक्षिण द्वार ये दो दुर्वल न होवा हुमा हविसे तथा घृतसे इनको तृप्त करता हूं मार्ग मचातंतुओंके साथ संबंध रखते हैं। ये चार द्वारोंके चार इन चार भाशाओंके पालकोंमें से चतुर्य पालक जो है वह संरक्षक देव हैं परंतु ये देव राक्षसोंके हमले के अंदर दवने नही हमें उत्तम मानंदको प्राप्त करने में सहायक होये ॥३॥ इनकी चाहिये। सहायतासे हमारे माता, पिठा, इष्ट, मित्र, गाय, घोडे आदि सब सुखी हों। हमारा मभ्युदय होवे और हन आशा और दिशा। शानी बनकर दांर्घायु पर्ने। इस सूफमें दिशावाचक "आश" शब्द है और, उसके "माशा" शब्दका अर्थ ठीक प्रकार ध्यानमें आने पालकका नाम "आशापाल" मंत्रों में आया है। "आ" व्यक्तिविषयक उन्नति के मानके संबंधों कैसा उत्तम उपदेश शब्दके दो अर्थ है । एक "दिशा" और दूसा "आशा, महत्त्वा- मिल सकता है यह पाठक यहा देखें। यह उपदेश इतना कांक्षा, उम्मीद"। मनुष्य की जैसी आशा, इच्छा, महत्त्वाकांक्षा महत्त्वपूर्ण है कि इसके अनुसार चलनेसे मनुष्य ऐहिक अभ्युदय और उम्मीद होती है उसी प्रकार की उसकी कार्य करने की दिशा तथा पारमार्थिक निःश्रेयस प्राप्त कर सकता है । इस सूफार होती है। मनुष्य जिस समय भाशाहीन हो जाता है, बहुत लिखा जा सकता है, परंतु यहा संक्षेपसे ही इसका विवरण निराश होता है, हताश होता है, उस समय यह इस जगत्से करेंगे। मनुष्यों केवल एक चार द्वारोंकी चार आशाएँ। मनुष्य के शरीरमें चार द्वार है, इस बातका वर्णन इससे पूर्व पहोके कार्यक्षेत्र में पुरुशर्थ करनेकी होती है। वास्तामें इस रियाही है। इन चार दारों के कारण चार आशएं मनुष्य के मनमें शरीर में अनेक द्वार है, इसमें नौ द्वार है, ऐसा अन्यत्र कई उत्पन होती है। जिस प्रकार घरके जितने द्वार होते हैं उनसे स्थानोंमें कहा है । देखिये- बाहर जाने और उन दिशाओंसे कार्य कानेकी इच्छा परके मष्टाचका नवदारा देवानां परयोप्या । मालिक की होती है, उसी प्रकार इस शरीरपो परके स्वामी तस्यां हिरण्ययः को स्वगों ज्योधिपाऽऽमृतः ॥ भारमदेवको भासार इस परके द्वारा जगदमें गमन करने (सर्व १.२" * (९२) अथर्ववेदका सुबोध मान्य {कां. १, 1 " "आठ चक और नौ द्वारोंसे युक्त यह देवोंकी अयोध्या चकवाले पृष्ठवंशके ऊपर मस्तिष्कसे भी ऊपर के भागमें विति नामक नगरी है, इसमें मुवर्णमय कोश है वही तेजस्वी स्वर्ग नाममे प्रसिद्ध है। इसका वर्णन अथर्ववेदमें इस प्रकार है- इस जर्व श्रुतिमें शरीरका और हृदय गुहाका वर्णन करते मूर्धानमत्य संसोन्याथर्वा हृदयं च यत् । हुए कहा है, कि इस गरीरमें नौ द्वार है । ये द्वार हैं इसमें मस्तिष्कादूर्ध्वः भैरयत् पवमानोऽधि शीर्षतः ॥ कोई संदेह ही नहीं है। दो नाक, दो आस दो कान, एकमुख, (अथर्व० १०२।२) गुदा और शिन्न ये नौ द्वार यहां कहे हैं। इनमें से मुख पूर्व "मस्तक और हृदय को सीकर अर्थात् एक केन्दमें लीन द्वार, गुदा पश्चिम द्वार, शिम्न दक्षिग द्वार इन तीनों संबंध करके मस्तरसे भी ऊपर सिरके बीच में से प्राण फेंका जाता इस अपने प्रचलित सूतके मंत्रमें है। जो चतुर्थद्वार है वह भाठ है।" विति-द्वारसे प्रवेश। वरुण यापु पर्पत सू०३१,मं०१-21 माशा-पालक सूफा मस्तकम विद्यतिद्वार विरतिद्वारसे तैतीस देवोंके साथ आग्माका शरीरमें प्रवेश। मंदर मानेपर यह द्वार बंद होता है। पश्चात् प्राणसाधन द्वारा अपनी इच्छासे इसी द्वारसे वापस जानेपर मुक्ति। साधारण जन देहत्याग करनेके समय किसी अन्य द्वारसे बाहर जाते हैं, परन्तु केवळ योगी ही अथर्ववेदके कहे मार्गसे मस्तिष्कके परे इसी दारसे जाता है और मुक्त होता है। इस मंत्रमें "मस्तिष्पात् ऊर्षः । अधि शीर्षत ।। आदि शब्दों द्वारा मस्तकके कार ले उत्तर द्वारका वर्णन किया है। अर्थात् जो चार द्वार हमने इस मंरके व्याख्यानके प्रसंगमें निश्चित किये है उनका वेदमें मन्यत्र वर्णन इस प्रकार भाता है। नीद्वारोंमेंसे तीन और इस मरमा सस्थानका एक मिलकर चार द्वार है और उनकी चार आशाए अथवा दिशाए हैं। अब ये भाशाएं देखिये- . वितिद्वार द्वार १ पश्चिमद्वार = गुदा আঘা -की आशा विसर्जन करना। शरीरधर्म । मधुर भोजन करना। सहस्त्रा जाड़ा- २ पूर्वद्वार = मुख " अप्राधि। S " विधुडि अनाहत-पा पूर्व मणिपूरकर स्वाधिष्ठान ३ दक्षिणद्वार - शिर मोगका उपभोग करना ।काम । उत्तरद्वार - विति , बंधनसे मुक्त होना। मोक्षा आरोग्यका आधार इसमें पश्चिमद्वारसे जो भाशा है वह केवल "शरीरधर्म" पालन करने की ही है तथापि इस शौच धर्मसे अर्थात् पवित्र पनने के कर्मसे शरीर शुद्धि होनेके कारण इससे शरीर स्वास्थ्यको प्राप्ति होती है। सब अन्य भोग इसके आश्रयसे हैं यह बात हरएक जान सकते हैं । इस द्वारका कार्य बिगड जाने से शरीर रोगी होता है और अन्य द्वारों की आशाएं पूर्ण होने की असमर्थ. ता होती है । इसके झाम प्रकार कार्य करनेपर अन्य शाशाए सफल होनेकी संभावना है। इसलिये हम कह सकते हैं, कि इस पश्चिम द्वारकी भाशा मनुष्यके मनमें "भारोग्यको प्राप्ति" रूपसे रहती है । इस माशाका कार्यक्षेत्र बहुत बड़ा है, मनुभ्य इस विषयमें जितना कार्य करेगा उतना वह स्वस्थता प्राप्त करेगा और वह यदि ऐसे व्यवहार करेगा कि इस पश्चिम द्वारके व्यवहार ठीक न चले तो उसके रोगी दोनेमें कोई शंकाही नहीं (कुनिनी) मूलाधार- सहस्त्रार चक्र पृष्ठवंशम चक्रोंके सान। पृष्ठवंश n- भयर्ववेदका सुबोध भाष्य । [को०१७ करण पढ़ें- खानपान। बनने के लिये ही ये सब धर्ममार्ग हैं। जिस समय आये हुए मार्गसे यह जीवात्मा वापस जानेको शाक्त प्राप्त कर सकेगा अब पूर्वद्वारको माग देखिये । संक्षेरसे इतना कहना इस विषयम पर्याप्त होगा कि इस द्वारसे मनुष्य उत्तम और उस समय इसको कोई बंधन कष्ट नहीं पहुंचा सकता हरएक उत्तम पान करने की इच्छा करता है। मधुरतारा प्रेम करते बंधन को दूर करने इच्छा इसमें इस द्वारके कारण है। करते मनुष्य इतना अधिक साता है कि वह अजीर्णो धीमार इस प्रकार चार द्वार की चार भाशाएं है और हरएक मनुष्य हो जाता है । इसलिये इस विषयमें प्रय नपूर्वक संयम रखना पिता है या ठता है। इन आशा के कार्यक्षेत्रको कल्पना इन माशाओंके कार्यक्षेत्रमें बुरा या भला कार्य करता है और चाहिये । परिका गुलाम और रिहाका दास जो बनता है Timlain प्रकार होगई, तो इस सूक्तके मंत्रोंका विचार उसी थायु कष्टप्रद ही होती है। हरएक इन्द्रियके विषयमें समानेमें कोई कठिनता नहीं होगी। इसलिये प्रथम इन चार यही बात है । इस प्रश्चर इंदिय भोग के लिये धनकी आवश्यक द्वारोंका विचार पाठक वारयार मननद्वारा करें और यह गत ता है इमरेतु इस द्वारकी आशा " अर्थकी प्राप्ति " ही है। लोक प्रकार प्यान में धारण करें। तत्पश्चात निम्नलिखित स्पटी- यह माग अत्यधिक बगनेसे कट होंगे और संयम द्वारा मत्यावश्यकता के अनुसार मोग सेनेसे सुख बढेगा, उमति होगी। मुखदारसे शन्द बोलनेका भी एक काम होता है। अमर दिक्पाल। उत्तम सन्द प्रयोग जगत में पानि फैलती है और कान्दके इस सूक्त के प्रथम मंत्रके कपनमें तीन बातें कही है-") प्रयोगसे अशांति फलती है । इस विषयमें भी जिवापर संयम चार माशाओं के चार अमर साशा पालक हैं । (२) ही चार रहना आवश्यक है। अन्यथा अनर्थ होने कोई नहीं भूताध्यक्ष है । (३) उनकी पूजा हम इवनसे करते है ।" लगेगी। इस प्रकार इस द्वितीय द्वारकी मायाका संबंध मनुष्यकी उसतिक साप है। मनुष्यमें चार आशाएं बनती हैं, उन भागाभोंका स्वरूप क्या है और उनके साप मनुम्बके पतन भपया उत्थापनका कामोपमोग। किस प्रकार संबंध है, यह पूर्व स्पलमें बताया ही है पार सासरा दटिग द्वार है। इस शिनद्वारा जगदमें उसम करना, (२) मोग प्राप्त करना, (१) कामा भोग डरना और माशाएं मनुष्य के अंदर सनातन है, (मारपर्मका स्याल प्रजनन अर्थात मुशाजनन करना आवश्यक है। परंतु जगत् में पसे निवृत्त होना, ये चार भावनाएं अपना कामनार इस मसंयम को बन रहे है। मनुष्य सदा जाता है, में तथा प्राशमें ये समानता रहेको इराका संयम मदरण्यास प्राप्य होता है। पता होना है। पतियोम भी अल्पांसे में रहती है अर्थात् भूतमात्रमें ये दिभमा साप्य है। इसके विचारसे इस धारकी बाणा सदा रहता है, इसलिये इनचा सनातन भाधिधर प्राणीमात्रार पता जग जायग'। यह में अत्यंत महारता है, परंतु जनता मानो ये ही भूत अपक्ष । इनको अभ्यत इसतिये । अस इसके पर्यो बिगाड दानेही ओर अधिक है और प्ररणाम हा प्राणी मापने अपने सब म्यार करते मुभारमानने प्रयत्न मति फम है। हैं। यदि ये भाशाएं प्रागिरि मंदर न सी हो उनमा पंधनका नाश। भी बंद हो जावणी । मनुप्पले संपूर्ण प्रयत्न इन मापीन में सू. ३१,०१-४] आशा-पालक-सूत। (९५) . पूजा से लोग अपना हो घात कर रहे हैं । इतनी बात सत्य है गुदाका कार्य ठीक रहनेसे मुखको रुचि ठीक रहती है। इस कि उत्तरद्वार जिसका नाम विदति है उसके पूजक अत्यंत प्रकार ये एक दूसरेपर नियमन करते हैं। इसी प्रकार मस्तिष्क अस्प हैं और पधिमद्वार की पूजा करना थोडे ही जानते हैं। और शिस्ल ये परस्परका नियमन करते हैं। यदि शिस्नदेवने परिमद्वार को पूजा योगमें प्रसिद्ध " अपनायाम " से की अतिरेक किया तो मस्तिष्क हलका होता है, और मनुष्य बुद्धि- जाता है। जिस प्रकार नासिका द्वारसे करनेका प्राणायाम का कार्य करनेमें असमर्थ होता है, पागल यनता है, निकम्मा होता है उसी प्रकार पश्चिम गुद दरसे अपानायाम किया जाता होता है । तथा मस्तिष्कमें सुविचारोंको स्थिर करनेसे वे सुवि- है। इसकी क्रिया मी थोडे लोग जानते हैं । यह क्रिया योग. चार शिस्नदेवका संयम करनेमें सहायक होते हैं। इस प्रकार शास्त्रमें प्रसिद्ध है और इससे नाभिक निचले भागा आरोग्य परस्पर उपकारक भी हैं और घातक भी है। पाठक सोच श्राम होता है। उत्तरद्वार वितिके उपासक साम योगी होते कर जानने का प्रयत्न करें कि ये किस प्रकार उपकारक होते हैं है वे इस स्थानको चालना करके अपनी मुक्तता प्राप्त करते हैं। और कैसे पातक होते हैं तथा इनकी उपासना किस प्रकार इनकी हवनसे पूजा यह है- करनी चाहिये और इनके प्रकोपसे किस प्रकार बचना चाहिये। १ पूर्वद्वार--(मुख)- महपानादिके हवनसे पूजा अब द्वितीय मंत्रका विचार करेंगे २ दक्षिणद्वार- (शिस्न)- भोगाविद्वारा कामदेवकी पापमोचन । पूजा। ६ पश्रिमवार - (गुदा)-- अपानायाम- अपानका द्वितीय मंत्रका आशय यह है- "चार आशाओंके चार प्राणमें हवन करके पूजा। माशापालक देव है वे हमें पापसे तथा अधोगतिक पाशसे पचावें। इसका उल्लेख भगवद्वीता। अपाने जुद्धति पूर्वोक्त वर्णनसे पाठकोंने जान लिया होगा कि ये चार देव प्राण प्राणेऽपानं वमा परे । हमें किस प्रकार बचा सकते हैं और किस प्रकार गिरा सकते (म० गी० ॥२९) है। देखिये- उत्तरद्वार-- (विरति )-- मस्तिष्कके मज्जाकेन्द्र के १ पूर्वद्वार-मुख-जिहाको गुलामोसे खानपानमें आतिरेक सहचारचको ध्यानादिसे होकर, पेटका बिगाड और स्वास्थ्यका नाश । इसी शिशाके संयमसे आरोग्य प्राप्ति। यहाँ पाठक आन गये होंगे, कि पहिली दो उपासनाएं जगत् २ पश्रिमदार-गुदा पूर्वोक्त संयम और असंयमसे ही में अधिक हैं और दूसरी दो कम हैं। परंतु बीजरूपसे हैं। इसका लाम या हानि प्राप्त होनेका संबंध है। प्रथम मंत्रमें " हम धारों अमर भाशापालोंकी हवनद्वारा पूजा ३ दक्षिणद्वार-शिस्न-ब्रह्मवर्यद्वारा संयमझे उमति, संयम- करेंगे" ऐसा स्पष्ट कहा है। यह इसलिये कि हरएक मनुष्य पूर्वक गृहस्थधर्म पालनसे सुपजाप्राप्ति और असंयमसे आय । चारोंकी उपासनाद्वारा अपना उद्धार करे। ४ उत्तरद्वार-विदति--पूर्वोक्त संयम और असंयमसे इसके यहां नियमन की बात पाठकों को ध्यानमें धारण करनी लाम और हानि प्राप्त होने संबंध है। चाहिये । यह नियमन इस प्रकार है- इसका मनन करनेसे ये किस नियमसे पापसे छुडा सकते हैं पूर्वद्वार उत्तरदार सिरमें विवि इसका ज्ञान हो सकता है। पापसे छुडानेसे ही निर्गति के पान- से मनुष्य छूट जाता है। नितिका अर्थ नाश है। पाप करने. वालेको निति के अर्थात् विनायके पाश याध देते हैं। और पुण्यवानों को उनसे कोई कष्ट नहीं होता। इस मंत्रका यह कयन पबिमद्वार दक्षिणद्वार ०शिख बडा मोधपद है कि ये चार द्वारकी चार आशाएं मनुरको पापसे छुड़ा सकती हैं और बंधनसे भी मुक्त कर सकती है ।पाठक पूर्व तथा पविमद्वार ये हमारे भांतोंके विरुद्ध दिशाके मुख अपनी अपनी अवस्थाका विचार करें और प्रारमपरीक्षाद्वारा हैं। मुखका अतिरेक होनेसे गुदाका कार्य विपडता है, और जानने का यल करें कि उनके परिमें क्या हो रहा है। यदि - मात्र नमधोत पृष्ठवंश मजास्रोत ० गुदा आशा-पालक-सूका [काण्ड १, " कोई आशपाटक उनके विरुद्ध कार्य करता हो, या शत्रुके चार्थ मंत्र इस प्रकार हमारे सम्मुख आता है-"इन मागपालों थाधीन हुआ हो, सो सावधानीसे अपने बचावका यत्न करें। की सहायता से हम तथा हमारे माता, पिता, इष्ट, मित्र, गाय, इस प्रकार द्वितीय मंत्रका विचार करनेसे इतना वोध मिला, घोडे आदि सब सुखी हो। हमारा अभ्युदय होवे तथा हम सय तृतीय मंत्र देखते है। ज्ञानी बनर निःश्रेयसके भागी बनें और दीर्घायु पर्ने ।" इस चतुर्थ देव । मंत्रमें चार बातें कहीं हैं- तृतीय मंत्रका आशय यह है.."मे न थकता हुआ और १ स्वस्ति (मु+ आस्ति )= सयका उत्तम अस्तित्व हो गोले दुर्वक न होता हुआ हवनसे तथा घाँसे इनकी तृप्ति अर्थात् इस लोकका जीवन सुखपूर्वक हो । करता हूं। इन चार आशापालाम जो चतुर्य आशापालक देव २ सुभूतं = (सु+ भूति) = उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त हो, यह है वह हने सुखो यहां आनंद स्थानमें पहुंचावे।" उत्तम अभ्युदयका सूचक विधान है। इस मंत्रमें कहा हुआ “ तुरीयः देवः" अर्थात् चतुर्य देव ३ सुविदत्रं = (सु+ विद +) = उत्तम शान मिले। वितिद्वारका रक्षक मोक्षको आशा पालक है । इसो देवकी आत्मज्ञान हो सब ज्ञानाम उत्तम और नियमका हेनु है कृपा अन्य सब द्वारोंका नियमन हो सकता है। इसी दृष्टि से वह हमें प्राप्त हो। अन्य मव कार्य व्यवहारका नियमन होना चाहिये । वैदिक ४ ज्योक् = दीर्घकाल जीवन हो । यह तो अभ्युदय और धर्म संपूर्ण कार्य-व्यवदार इसी दृटिसे रचे गये हैं। मोक्षके निःश्रेयस सहज ही प्राप्त हो सकता है । मार्गके ध्यानसे जगत्के सब व्यवहार होने चाहिये । इसीका मर्यात् नाम धर्म है । बंधनसे मुक्त होना मुख्य साध्य है, उसके वेदमंत्रोंमें वारंवार " ज्योक् च सूर्य दशेम" " दीर्घकालतक सूर्यको हम देखते रहें । सदायकारी सप अन्य व्यवहार होने चाहिये । अन्यया जगतके है, इसका तात्पर्य " हमारी आयु अतिदीर्घ हो व्यवहारको अधिक महत्त्व देने और मोशधर्मको कम महत्त्व पातु यहां ध्यान विशेषतया धारण करनेकी बात यह है कि त्यागपूर्ण जीवन और भोगपूर्ण जीवनका भेद यहां स्पष्ट होता हा दोध आयु प्राप्त करने का उपदेश वेदमें आया है यी यही मंत्रमें कहा है कि न थकता हुआ और अवयवोंसे विकल सूर्यका संबंध अदस्य यताया है। इसलिये जो लोग दी भाई न होता हुआ मैं इन देवोंकी पूजा करूंगा। इस कथनका भाव प्राप्त करना चाहते हैं वे सूर्य के साथ आयुष्यवर्धनका संबंध मर है कि मनुष्य प्रयत्न करके अपना र मुना है यह बात न भूलें । ब्रह्मकी कृपा दोर्ष आयु प्राप्त होती है और अनेक पुरुषार्थ करनेका उत्साह मनमें स्थिर करे। इस विषयमें अपर्ववेद में भन्यत्र कहा है- इन चार देवी अनादिरी तथा पी भादिरो तृप्ति करनी यो ये तो ब्रह्मगो पेदामृतेनावृतां पुरम् । चाहिये । नियम जो हवन है उसीके अनुाल उसका घी भी तस्मै प्रम घ प्राहाम चक्षुः प्रागं प्रजा ददुः ॥ २९ ॥ है। पर जैसा जिस देना यह ययायोग्य रीतिसे देकर न वैतं चक्षुर्जहाति न प्रागो जरसः पुरा । उसकी तृप्ति करनी चाहिये । इस विषयमें पावट करना योग्य पुरं यो प्रागो येद पस्याः पुरुष उच्यते नहीं। न परते हुए और न प्रोत होते हुए ये मोग प्राप्त करने योर योग्य प्रमागसे उनका सौचर भी करना चापिये। अर्थात् दक्षतामा पार करना है। उस साधा अन्य देव, धागो "ओ निधयरो मनकी अमृतसे परिपूर्ण नगरीको गन परंतु गप ग्यवहार करते हुए पर्प देवता गंगदन करने. अनुमपान माना चाहिये। क्योकि समाज का नहीं दी मापुरीको जानता है और नि पुन प्रमा देते है ॥ २९ ॥ अति सावस्थामे पूर्व उमit or मानंद, नि, यश भादि की यहाँ प्राप्ति होती है और मद्राने सने कारण इसका पुष्प को 11.h" भी मिन ग्रहती। यह एक मुहावरा यह " - (अपर्व ११) स. ३१, मं.१-४] जीवन-रसका महासागर । (९७) इस प्रकार यह ज्ञानी मनुष्य इस परलोकमें यशस्वी होता है। इस सूक्तम यह श्लेपालंकार बड़ा ही महत्व पूर्ण है। और यही इस सूक्तका उपदेश है। जो इस सूचको केवल बाह्य दिशाओंके लिये ही समझते है वे विशेष दृष्टि। इसके महत्वपूर्ण उपदेशसे वंचित ही रहते हैं। पाठक इस यह सूक्त केवल बाह्य दिशाएं और उनके पालकोंका ही वर्णन दृष्टिसे इसका अध्ययन करें नहीं करता है । बाह्य दिशाओंका वर्णन इस सूक्तमें है, परंतु इस सूक्तका संबंध आयुष्य गण, अपराजित गण आदि अनेक दिशा शब्द न प्रयुक्त करते हुए" आशा" शब्द का प्रयोग गोंसे विषयकी अनुकूलतासे है । यह सूक स्वयं वास्तोष्पति इसमें इलिये हुआ है कि मनुष्य अपनी आशाओं और गण अववा वसु गण का है। इसलिये “यहांके निवास" के साथ उनकी पालक शक्तियों को अपने अंदर अनुभव करे और उनके इसका अपूर्व संबंध है । इस प्रकारकी दृष्टिसे विचार करनेसे संयम, नियमन, और योग्य उपासन आदिसे अपना अभ्युदय पाठक इससे बहुत बोध प्राप्त कर सकते है और उसको आचरणमें और निःश्रेयस सिद्ध करे ढालकर अपना अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त कर सकते है जीवन-रसका महासागर। (३२) (ऋपि- ब्रह्मा । देवता-द्यावापृथिवी) इदं जनासो विदर्थ महद्ब्रह्म वदिष्यति । न तत्पृथिव्यां नो-दिवि येन प्राणन्ति वीरुधः ॥१॥ अन्तरिक्ष आसां स्थानं श्रान्तसदामिव । आस्थानमस्य भूतस्य॑ विदुष्टद्वेधसोनी ॥२॥ यद्रोदसी रेजमाने भूमिश्च निरक्षितम् । आर्द्र तय सर्वदा समुद्रस्यैव स्रोत्याः विश्वमन्यामभीवार तदन्यस्यामधिश्रितम् । दिवे च विश्ववेदसे पृथिव्यै चाकरं नमः ॥४॥ अर्थ-दे (जनासः ) लोगो।(इदं विदथ ) यह ज्ञान पास करो। वही ज्ञानी (महत् ग्रस चदिप्यति ) यदे अदाके विषयमें कहेगा । ( येन वारुधः प्राणन्ति ) जिससे ओषवियां आदि प्राण प्राप्त करती है, (तत् पृथिव्यां न, नो दिवि ) पद पृथ्वीमें नहीं और नहीं झुलोक में है ॥ १॥ (भासां अन्तरिक्षे म्याम ) इन औषधि आदिकोंका अन्तरिक्षमें स्थान है, (श्रान्तसदां इव ) थक कर बैठेहुओंके समान (अस्य भूतस्य भास्थानं ) इस बने हुएका स्थान जो है (तत् वेधसः विदुः पान ) वह ज्ञानी जानते हैं वा नहीं ! ॥ २ ॥ ( यत् रेजमाने रोदसी ) जो हिलनेवाले यावापृथिवीने और ( भूमि.च) केवल भूमिने भी (निरतक्षतं ) बनाया (तत् अद्य सर्वदा भाई) वह आजतक सदासर्वदा रसमय है ( समुद्रस्य स्रोत्याः इव) जैसे समुद्रके स्रोत होते हैं ॥ ३ ॥(विश्वं) सब ने (अन्यां अभीवार ) दुसरीको घेरलिया है, (सत् ) वह (भन्यस्यां अधिभितम् ) दुसरीमें आश्रित हुआ है। (दिवे घ) [लोक और ( विश्ववेदसे घ पृथिम्पै ) संपूर्ण पोसे युक्त श्रीधी के लिये (नमः मकरं ) नमस्कार मैंने किया है ॥ ४ ॥ भावार्य हे लोगो ! यह समझो कि जो तत्वज्ञान समझेगा वही ज्ञानी उसका विवरण करेगा। तत्वज्ञान यह है कि-गिरामे बढनेवाली वनस्पतियां भादिक अपना जीवन प्राप्त करता है यह जीवन सत्व पृथ्वीपर नहीं है और नहीं गुलोस में है ॥ ॥ इन वनस्पति आदिका स्थान अंतरिक्ष है। जैसे थमादे विश्राम करते हैं उसकार ये वनस्सनि भाविक अंतरिसमें रहते हैं। हुए जगतका जो आधार है उसको कौनसे ज्ञानी लोग जानते हैं और कौनसे नहीं जानने ॥१॥ हिनने जुने गले १३ (म. सु. मा. को."
समयसे लेकर इस समयतकबराबर जीवन रखसे परिपूर्ण होने के अथर्ववेदका सुयोध माष्य [काण्ड १, युलोक और पृथ्वीलोक के द्वारा जो कुछ बनाया गया है, वह सब इस समयतक बिलकुल नया अर्थात् जीवन रससे परिपूर्ण जैसा है, जैसे सरोवरमे चलनेवाले स्रोत रससे परिपूर्ण होते हैं ॥ ३ ॥ यह सब जगत् दूसरी शक्तिके ऊपर रहा है और वहमी दूसरी के ही आश्नयसे रहा है । द्युलोक और सब घोंसे युक्त पृथ्वी देवीको मैं नमन करता हूं ( क्योंकि ये दो देवताए इस जगत् का निर्माण करनेवाली हैं। ) ॥४॥ स्थूल सृष्टि । आगे के मंत्रोंमें आजायगा । जो सृष्टि दिखाई देती है वह स्थूल सृष्टि है, इसमें मिट्टी भूतमात्रका आश्रय। पत्थर आदि असिस्थूल पदार्य, वृक्षवनस्पत्यादि बदनेवाले द्वितीय मंत्रमें कहा है कि-"इस सृष्टिगत संपूर्ण पक्ष पदार्थ, पशुपक्षी आदि बढने और हिलनेवाले प्राणी तथा या आश्रयस्थान अंतरिक्ष है । इन स्थून पदार्थ मात्रका मनुष्य बटने हिलने और उन्नत होनेवाले उच्च कोटीके प्राणी हैं। जो अंतरिक्षम आश्रय स्थान है वह ज्ञानी भा जानते हैं परयर मिट्टी आदि स्थिर सृष्टीको छोड़ा जाय और वनस्पति वा नहीं ?" अर्थात् इसका ज्ञान सब ज्ञानियोंको भी एकसा पशु तथा मानव सृष्टिमें देखा जाय, तो ये उत्पन्न होते हैं, है वा नहीं। शानियों में भी जो परिपूर्ण श नी होते हैं वे घटते हैं और प्राण धारण करते हैं यह बात स्पष्ट दिखाई देती ही केवल जानते हैं । सृष्टि विद्याके जाननेवाले इस बातको है। इसमें दिखाई देनेवाला जीवनतत्व कौनसा तत्व है ? नहीं जान सकते, परंतु आत्मविद्याका ज्ञान जाननेवाले हो क्या यह स्थल ही है या इससे भिन्न और कोई तत्व है इस इसको यथावत् जानते हैं । ( मंत्र ) या विचार इस सूक्तमें किया है। इस द्वितीय मंत्रमें" भूत" शब्द है, इसका अर्थ "बना सप लोग इस जीवन रसका ज्ञान प्राप्त करें। यदि उनको हुआ पदार्थ । " जो यह बनी हुई सष्टि है इसका नाम भूत जीवनसे आनंद प्राप्त करना है तो उनको उचित है कि वे इस है और इसकी विद्याका नाम भूनविद्या है। इस सब सृष्टिका (जनास. ! विदथ ) ज्ञानको प्राप्त करें। यह मनन करने भाधार देनेवाला एक सूक्ष्मतत्त्व है जिसका ज्ञान अध्यात्मविदा योग्य सूचना प्रयम मंत्रके प्रारंममें ही दी है । ( मंत्र १) जाननेवाले ही जान सकते है। इसलिये जीवनरस विशाका यह जीवन रसका विद्या कौन देगा? किससे यह प्रास अध्ययन करनेवाले ऐसे सद्गुरु के पास जावें, कि जो इसक होगा ? यह शका यहां आती है, इस विषयमें प्रथम मने ही ज्ञाता हो और उसके पाससे यह जीवनकी विद्या प्राप्त करें आगे जाउर कहा है कि, जो इस विद्याको जानता होगा, यह ही ज्ञानी ( महत् ब्रह्म वरिष्यति ) यहे ब्रह्मका शान पदी ( महत् मन पदिष्पति ) यडे माझे विषयों अर्थात् इस रहेगा । इस प्रकार द्वितीय मंत्रका प्रथम मंत्रके साथ संगी। मदत्यपूर्ण ज्ञान के विषयमें कहेगा । जिसको इस विद्याकी प्राप्ति परन हटा हो, पर ऐसे विद्वानके पास जाये और ज्ञान सनातन जीवन। प्राप्त करे। या अन्य के पास जानेकी कोई धावश्यक्ता नहीं है। हुआ पदार्थ मात्र वह सदा सर्वदा, जिस समय बना है। तृवीय मंत्रमें कहा है कि-"जो इस द्यावापृथिवी के अंदर बना कारण नवीन सा रहा है, इसमें जायन रस ऐसा भरा है in सरोपररी पलनेवाले विरोरा बस पलता है।" ?
सू. ३१ मे १-४] जीवनक-रसका महासागर । विविध नामा में से किसी नामका प्रयोग क्रिया है और जगत्की सबका एक आश्रय। मूल उत्पादक शकियों का वर्णन किया है। चतुर्थ मंत्रका कथन है कि-"संपूर्ण विश्व अर्थात् यह स्थूल जीवनका एक महासागर । जगत् एक दूसरी शक्तिके ऊपर रहता है और वह शक्ति और वेदमें द्याका पृथिवी-घुलोक और पृथ्वीलोग को दूसरी शक्तिके आश्रयसे रही है । वही आधारका तत्व पृथ्वी जगत् के माता पिता करके वर्णन किया है क्योंकि सम्पूर्ण और दुलोकके स्वरूपमें दिखाई दे रहा है इसलिये मैं युलोकम जगत् इन्हीके अंदर समाया है। यह बना हुभा जगत् यद्यपि उसकी प्रकाशशक्तिको और पृथ्वी में उसकी आधार शक्तिको बननेके पक्षात् पढता और बिगडता भी है तथापि बने हुए नमस्कार करता हूँ।" अर्थात् संपूर्ण जगत्में उसकी शक्ति ही जगत् संपूर्ण पदार्थामें जो जीवन तत्त्व व्याप रहा है वह एक रुप के रूपमें प्रकट होगई है ऐसा जानकर, जगत्को देखकर उस से व्यापता है, इसलिये सपूर्ण जगत्के नियम अटल और एक शक्तिका स्मरण करता हुआ उस विषयमें अपनी नम्रता प्रकट जैसे हैं। हजारों वर्षोंके पूर्व जैसा जीवन संसारमें चलता था करता हूं। वैसा ही आज भी चल रहा है । इससे जीवनामृतको अगाध सत्ता की कल्पना हो सकती है। स्थूल सूक्ष्म और कारण । जिस प्रकार एक ही सागरसे अनेक स्रोत चलते हों तो उनमें इस मंत्रमें विश्व "शब्द" स्थूल जगत्का बोधक है इस स्थलका एक ही जीवन रस सबमें एकसा प्रवाहित होता रहता है, उसी आधार (भन्या) दूसरा है, इससे सूक्ष्म है और वह इसके अदर प्रकार इस संसारके अंदर बने हुए अनंत पदार्यों में एक ही अगाध है अथवा उसके बाहर यह सब विश्व है। प्रत्येक स्थूल पदार्थके जीवनके महासागरसे जीवन रस फैल रहा है, मानो संपूर्ण अंदर यह सूक्ष्म तत्त्व है और यह भी तीसरे आतिसूक्ष्म तत्त्व पदार्थ उस जीवनामृतसे भातप्रोत भरपूर हो रहे हैं। पर आत्रित है। यह तीसरा तत्त्व ही सबका एक मान आधार है और इसीका जीवन अमृत सबमें एक रस होकर व्याप रहा है। पाठक क्षणभर अपने आपको भी उयी जीवन महासागर में इसी जावनके समुद्रमै सब विश्व पदार्थ तैर रहे हैं अथवा संपूर्ण ओतप्रोत भरनेवाले एक परेके मान समझें और अपने अदर पदार्य रूपी छोटे बड़े स्रोत उसी एक अद्वितीय जीवनमहासागर वही जीवन स्रोत चल रहा है इसका ध्यान करे । जिस प्रकार से चल रहे हैं। इनमें उसीका जीवन कार्य कर रहा ह यह तैरनेवाला मनुष्य अपने चारोंभोर जलका अनुभव करता है उसीप्रकार मनुष्य भी उसी जीवन महासागरमें तैरनेवाला है इसका अनुभव यहा होता है । घताना इस सूक्तका उद्देश्य है। अनेकों में एक ही जीवन भरा एक प्राणी है, इसलिये इस प्रकार ध्यान करनेसे उस जीवनामृतक महासागर को अल्पसी कल्पना हो सकती यह सूक्त केवल पढनेके लिये नहीं है, प्रत्युत यह मनकी है । यह जीवन सदा ही नवीन है, कभी भी यह पुराना धारणा करके अपने मनमें धारणामे स्थिर करन में अनुष्ठान के नहीं होता, कभी बिगडता नहीं। अन्य पदार्थ बनने और लिये ही है। जो पाठक इसकी उक्त प्रकार धारणा कर सकेंगे वे बिगडने पर भी यह एसा नवीन रहता है। और यही सरको ही इससे योग्य लाभ प्राप्त कर सकेंगे। पाठक या देखें कि जीवन देता है। (तत् अद्य सर्वदा आई) व माज और सदा छोटेसे छोटे सूक्तों द्वारा वेद कैसा अद्भुत उपदेश दे रहा है। सर्वदा एक जैसा अभिनव रसपूर्ण रहता है। सबको जीवन देने निःसंदेह यह उपदेश जीवन पलटानेमें समर्थ है। परंतु यह पर भी जिसकी जीवन शक्कि रतिमात्र भी कम नहीं होती, इतनी लाभ यही प्राप्त करेगा कि जो इसको जीवनमें ढालनेका यन अगाध जीवन शाकि उसमें है। करेगा।
(१००) जलमूक्त ॥१॥ ॥२॥ ॥३॥ ॥४॥ (३३) (ऋपिः-शन्तातिः । देवता आप: । चन्द्रमाः) हिर॑ण्यवर्णाः शुचयः पावका यासु जाता सविता याग्निः । या अग्निं गर्भ दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु यासां राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते अपश्यन् जनानाम् । या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु यासाँ देवा दिवि कृष्णन्ति भक्षं या अन्तरिक्षे बहुधा भवन्ति । या अग्निं गर्भ दधिरै सुवर्णास्ता न आपः शं स्पोना भवन्तु शिवन मा चक्षुपा पश्यतापः शिवयां तन्वोपं स्पृशत त्वचं मे । घतश्रुतः शुचयो याः पौवकास्ता न आपः शं स्याना भवन्तु अर्थ-जो ( हिरण्य-यणी ) सुवर्णके समान चमक्नेवाले वर्णसे युक्त (शुचय पावका ) शुद्ध और पवित्रता बढानेवाला ( यामु सविता जात ) जिनमें सविता हुआ है और ( यासु भनि ) जिनमें अमि है, ( या सुपर्णा ) जो उत्तम पर्णवाला जल (भनि गर्भ दधिरे ) अमिको गर्भ धारण करता है ( ताबा ) वह जल ( न श स्योना भवन्तु ) हम सबको शाति और सुख देनेवाला होवे ॥ १ ॥ ( यासा मध्ये ) जिस जलके मध्यमे रहता हुआ ( चरण राजा) वरुण राजा ( जना ना सयान्ने अवपश्यन् ) जनों के सत्य और असत्य काँका अवलोकन करता हुआ ( याति) चलता है। (या सुवर्णा ) जो उत्तम वर्ष वाला जल अगिको गर्भमें धारण करता है वह जल हम सबको शाति और मुख देनेवाला होवे ॥ २ ॥ ( देवा दिवि) दव गुलोरमें ( याया भक्ष पृण्यन्ति ) जिनका गक्षण करते है, और जो ( अन्तरिक्ष यहुधा भवन्ति ) अन्तरिक्षम भनेक प्रकार मे रहता है और जो उत्तमवर्णवाला जल अमिको गर्भमें धारण करता है वह जल हम सयको शाति और मुख देनेवाला होने ॥ ३ ॥ हे ( भार ) जत्रा (शियन चक्षुपा मा पश्यत ) कल्याणकारक नेत्र द्वारा मुझको तुम देखो। (शियया तन्या पय उपस्पृशत ) कल्याणमय अपने शरारसे मेरी त्वचाको स्पर्श करो।ओ ( पृतश्चुत ) तेज देनेवाला ( शुचय. पापका ) गुर और पवित्र ( भाप ) जल है (ता न श स्योना भयन्तु ) वह जल हमारे लिये शाति और मुख देनेवाला होवे ॥४॥ भागयं-अरिदमें सचार करनेवाले मेघमटलमें तेजस्वी पवित्र और शुद्ध जल है, जिन मैंचामेरी सूर्य दिखाई देता हो, जिनमें विशर पी अमि कभी व्यक्त और कभी गुप्त रूपसे दिखाई देता हो, पजल में शाति और भारोग्य देनेाना हो ॥ १ ॥ जिनमे यरूण राग पूमता है और जाते जाते मनुष्योंके सत्य और अपाय विचारों भोर को निरीक्षण परता दे दिन मेघोंने विपु पी अनिको गर्भ के रूपमें धारण किया है उन मेघोंका उदक हमें गुरु और मारोग्य देवे ॥ २ ॥ गुरोक २ देव निराध भाग करते हैं और जो विविध परगवाले अतरिक्षस्थानीय मेपोमें रहता है सपा जोषियुवा मारण करते 7 पास जस हमारे लिये गुरा और भारोग्य देवे ॥ ३ ॥ जल हमारा कल्याण करे मोर उस हमारे शरीर माप दानेपाना पलं हमें माहार देनेवाला प्रतात दो। मैपौग गरयो भोर पवित्र जल में जाति और गुण दीवाना होने ४ ॥
सू०, ३३, मं०१-४] मधु-यिद्या। (१०१) वृष्टिका जल । होता है। सामान्यतया दृष्टि जल शुद्ध ही होता है परंतु इन चारों मंत्रोंमें पृष्टिजलका काव्यमय वर्णन है। इनमत्रोंका जिस दृष्टिमें सूर्यकिरण भी प्रकाशती हैं उसकी विशेषता अधिक वर्णन इतना काव्यमय है और छंद भी ऐसा उत्तम है कि एक है। इसी प्रकार चंदमाको किरणोंका भी परिणाम होता है। स्थरसे पाठ करनेपर पाठकको एक अद्भुत आनंदका अनुभव होता है । इन मंत्रोंमें जलके विशेषण "शुचि, पावक, सु-वर्ण" इस सूक्तके चतुर्थ मनमें उत्तम स्वास्थ्यका लक्षण बताया है आदि शब्द वृष्टि जलकी शुद्धता बता रहे हैं। ग्रीष्ट जल जितना वह ध्यानमें धारण करने योग्य है-" जलका स्पर्श हमारी शुद्ध होता है उतना कोई दूसरा जल नहीं होता । शरीर चमडाको आल्हाद देवे ।" जबतक शरीर नीरोग होता है शुद्धिकी इच्छा करनेवाले दिव्यलोग इसी जलका पान करें तबतक ही शीत जलका स्पर्श आनंद कारक प्रतीत होता है, और भारोग्य प्राप्त करें। इसके पानसे शरीर पवित्र और निरोग परंतु शरीर रुग्ण होते ही जल स्पर्श बुरा लगने लगता है। BHAT VIDYA मधु-विद्या। 9311५ A-7 ARYAN (३४) (ऋषिः-अधर्वा । देवता-मधुवल्ली) इयं वीरुन्मधुजाता मधुना त्वा खनामसि मारधि प्रजातासि सा नो मधुमतस्कृधि ॥१॥ जिव्हाया अग्रे मधु मे जिव्हामूले मधूलकम् । ममेदह क्रतावसो मम चित्तमुपायसि ॥२॥ मधुमन्मे निक्रमण मधुमन्मे परायणम् । वाचा बंदामि मधुमद् भूया मधुंसंदृशः ॥३॥ मघौरस्मि मधुतरो मान्मधुमत्तरः । मामित्किल त्वं वनाः शाखा मधुमतीमिव ॥४॥ परि त्वा परितत्नुनेक्षुणांगामविद्विपे । यथा मां कामिन्यसो यथा मनापंगा असः अर्थ-(इयं पीरूत् मधुजाता) यह वनस्पति मधुरताके साथ उत्पन्न हुई है, म (त्वा मधुना खनामसि ) तुझे मधुसे खोद- ता हु। (मधो अधि प्रजाता असि) शहद के साथ तू उत्पन्न हुई है अत (सा) वह तू (न मधुमत कृधि) हम सबको मधुर कर ॥ १॥ (मे जिह्वाया अग्रे मधु ) मेरी जिह्वाके अम भागमें मधुरता हे । ( जिह्वामूले मधूलक ) मेरी जिवाके मूल्में माँ यौठास रहे । हे मधुरता! तू (मम ऋतौ हत् अह अस ) मेरे कर्ममें निश्चयसे रह । (मम चित्तं उपायसि) मेरे चित्तमें मधुरता बनी रहे ॥ २॥ (मे निकमणं मधुमत्) मेरा चालचलन मीठा हो। (मे परायगं मधुमत्) मेरा दूर होना भी मीठा हो। में (पाचा मधुमत् वदामि ) वाण से मीठा बोलता हु जिससे मैं ( मधुसन्दश. भूयास ) मधुरताकी मूर्ति चनूंगा ॥ ३॥ मैं (मधी मथुतर अस्मि ) शहदसे भी अधिक मीठा है। (मधुधात् मधुमत्तर ) मधुरपदाथसे अधिक मधुर है । (मां इत् किस रव वना) मुझपर ही तू प्रेम कर (मधुमती शाखां इव ) जैसे मधुर रसवारी वृक्ष शाखासे प्रेम करते हैं ॥ ४ ॥ (अविद्विपे) वैर दूर फरने के लिये (परितनुना इक्षुणा त्या परि भगाम् ) फैले हुए इसके साथ तुझे घेरता हू। ( यथा मां कामिनी मस ) जिसमे तू मेरी कामना करनेवाली हो और (यथा मत् न अपगा. अस ) जिससे तू मुझसे दूर न होनेवाली होवे ॥५॥ भावार्थ- यह इस नामक वनस्पति स्वभावसे मधुर है और उसको स्गानेवाला और उखाडनेवाला भी मधुरता की भाग्नासे ही उसको लगाता है और उखाडता है । इस प्रकार यह वनस्पति परमात्मासे मीठास अपने साथ लाती है, इसलिये हम चाहते हैं कि यह हम सबको मधुरतासे युफ बनावे An मेरी जिहाके अग्रभागमें मधुरता रहै, जिसके मूल में और मध्यमें मधुरता (१०२) अथर्ववेदका सुवोध भाष्य । [को०१ रहे। मेरे कर्ममें मधुरता रहे, और मेरा चित्त भी मधुर विचारोंका मनन करे ॥२॥ मेरा च लचलन मीठा मेरा आना जाना मीठा हो, मेरे इशारे और भाव तया मेरे शब्द भी मीठे हो। ऐसा होनेसे मैं अंदर बाहरसे मीठास की मूर्ति ही 'बनूंगा। ॥ ३ ॥ मैं शहदसे भी मीठा पनता हूं, में मिठाईसे भी मीठा बनता हूं, इसलिये जिम प्रकार मधुर फलवाली शाखापर पक्षी प्रेम करते हैं इस प्रकार त मुझपर प्रेम कर ॥ ४ ॥ कई किसीरा द्वेष न करे इस उद्देश्य से व्यापक मधुरवल्लियोंका अर्थात् व्यापक मधुर विचारोंकी वाढ चारों ओर बनाता हूं ताकि इस वाढमें सब मधुरता ही बढे और सब एक दूसरेपर प्रेम करें और विद्वेषसे कोई किसीसे विमुख न हो ॥५॥ मधुविद्या। मीठा है। ये पौधे भूमिके विविध रसों में से अपने स्वभावके वेदमें कई विद्याएं हे अध्यात्मविद्या, देवविद्या, जन विद्या, युद्ध अनुयूल रम लेते हैं और उनको लेकर जगत् में प्रकट होते हैं। विद्या; इसी प्रकार मधुविद्या मी वेदमें है। मधुविद्या जगत् की मनुष्यमें भी यही बात है। विभिन्न प्रकृतिके मनुष्य ओर किस प्रकार चाहिये वह दृष्टिकोण ही मनुष्यमें विभिन्न गुणधर्म प्रगट कर रहे हैं, उनको एक ही खजानेसे उपन्न करती है। अनिपदों में भी यह मधुविद्या वेद मंत्रोंसे एकही जीवन के महामागरसे जीवन रस मिलता है, परंतु एस्में ली है। यह जगत् मधुरूप है अर्थात् मीठा है ऐसा मानकर वही जीवन शान्ति बढानेवाला और दूसरेमें अशान्ति फलाने- जगत् की ओर देखना इस बातका म विद्या उपदेश करती वाला होता है। ये स्वभाव धर्म है। एक ही जल मेघोंमें है। दूसरी विद्या जगत् को कष्टका आगर बताती है, इसको जाता है और मोठा बनकर पृष्टिसे परिशुद्ध स्थितिमें प्राप्त पाठक कटुविद्या कह सकते हैं। परंतु यह कटुग्द्यिा वेदमें नहीं होता है, जिसको पीकर मनुष्य तृप्त हो सकता है वही जल है । वेद जगत् की ओर दुःख दृष्टिसे देखाता नहीं, न ही दुःख समुद्रमें जाता है और खारा बनता है, जिसको कोई पी नहीं दृष्टिसे जगत्को देखने का उपदेश करता है। वेदमें मधुविद्या सस्ता नहीं यह स्वभाव भेद हैं । इसीलिये है कि इसका ज्ञान प्राप्त करके लोग जगत् की और मधुदृष्टि से देखनेवी बात सीसें । इस विद्या के मंत्र अथर्ववेदमें सामनेतक उनमें बदल नहीं होता। परंतु मनुष्य योनि अन्य पदार्थ अथवा अन्य योनिया अपने स्वभाव बदल नहीं भी बहुत हैं और अन्य वेदमि भी हैं, उनका यहा विचार करने हो एक ऐ योनि है कि जिस योनिक लोग सुनियोंकि की कोई आवश्यकता नहीं है। इस सूको मंत्र ही स्वयं आचरणसे अपना स्वभाव बदल सकत हैं। दुष्टके सुष्ट कर उक्त विद्यान्न उत्तम उपदेश देते हैं। पाठक इन मत्रोंका विचार सस्ते हैं, मूर्लके प्रबुद्ध बन सकते हैं, दुराचारियोंके सदाचारी करें और उचित बोध प्राप्त करें। हो सकते हैं, इसीलिये वेद मनुष्योंकी भलाई के लिये इस जन्म स्वभाव । मधु विद्याका उपदेश दे रहा है । मनुष्य अपनी कडवाहट पक्षोंमें क्या और प्राणियोंमें क्या हरएक का व्यक्तिनिष्ठ कम करे और अपनेमें मिठास बढाये यही यहां इस विद्यका जन्मभ्यभाव रहता है जो बदलतानहीं। जैसा सर्वका प्रकाशना, उद्देश्य है। अमिका उम होना, इसका मीठा होना, करेलेका कडवा अब मधुविद्याका प्रथम मंत्र देखिये- "यह इस नामक होना, इत्यादि ये जन्मन्वभाव है। ये जन्मन्बमाय महासे आते यनस्पति मिठाम के साथ जन्मी है, मनुष्य मोठी भावनाके साथ है यह विचारणीय प्रश्न है।रा मिठाम साता दे और फो। टसे मोदते हैं। यह मधुरता लेकर आगई है, इसलिये हम कावाट माता दे। यही भूमिमें उगी ये दो वनस्पतियां रापको यह पण मिठाससे युक्न करे। "(मंत्र १) परस्पर मिन दो रमको अपने साप रगती है। कमी करेलेमें मांग रस नहीं होता और न ही ईसमें कया। ऐसा क्यों होता स्वयं मोठे स्वभाव का होना. (२) माठे स्यभाव पारीसे यह प्रथम मंन यहा भयंपूर्ण है। इसमें चार चाते है-11) कहां गे र५आते है। करना, (3) स्वयं मार जीवन व्यतीत करना, और (४) बोटे कदेगा कि भूमिी । कयोंकि भूमिमा नाम "रमा"। दमरोंडो मोठा बना देना। पाठ दो दि-(१) म ग भूमिय विपि रोते है। जोओ पापा उसके पास जाता ममामे मोठा होता,(२) मोठा उरा रही इस ३, पद अपने गमायके अगुगार भूमी रग गांचना है और पाल बिधानों टमाटी मित्रता होता, (३) स्वय मोठा नगदेना। मेरा मानना है और मरा औरन रस अपने माय माता है और () त्रिम बीज आप .
सू०३४, मं. १-५] मधुविधा (१०) " मिलता है उसको मीठा बनाता है। क्या पाठक इस आदर्श चिंतन करेगा। इस प्रकार चित्तके विचार और वाणी के उचार एक मोठे जीवनसे बोध नहीं ले सकते? रूपता से मांठे बन गये तो मेरे (ऋतु) आचार व्यवहार अर्थात् ये चार उपदेश है जो मनुष्यको विचार करने चाहिये। यह कर्म भी मोठे हो जायगे । इस प्रकार विचार उचार भाचारमें ईस अपने व्यवहारसे मनुष्यको उपदेश दे रहा और बता रहा मोठा बना हुआ मैं जगत् में मधुरता फैलाउंगा। मेरे विचार है कि इस प्रकार व्यवहार करनेसे मनुष्य मीठा बन सकता है। से, मेरे मापसे और मेरे आचार व्यवहार से चारों और 'इसके मननसे प्राप्त होनवाले नियम ये है- मिठास फैलेगी।" (१)भपना स्वभाव मठिी धानाना । अपनेमें यदि कोई (तीसरा मंत्र). "मेरा आचार व्यवहार मीठा हो, मेरे पासके कटुता, कठोरता या तीक्ष्णता हो तो उसको दूर करना और दूरके व्यवहार मीठे हों, मेरे इशारे मीठे हो, मैं वाणीसे तथा प्रति समय भारत्मपरीक्षा करके, दोप दूर करके, अपने मधुर ही शब्द उच्चदंगा और उस भाषणका मशयमी मधुरता मंदर मीठा स्वभाव बढानेका यत्न करना। पढानेवाला ही होगा। जिस समय मेरे विचार व्यार और (२) मनुष्यको उचित है कि वह स्वयं ऐसे मनुष्यों भाचार में स्वामाविक और अकृत्रिम मधुरता टपकने लगेगी, के साथ मित्रता करे कि जो मोठे स्वभाव वाले हाँ अयया उस समय में माधुर्य की मूर्ति ही पनूंगा।" मधुरता फैलाने के इच्छुक हों। (चतुर्थ मंत्र)- " जय शहदसे मी में अधिक मीशा (३) अपना जीवन ही मीठा बनाना, चालचलन, बोलना यनूंगा, और लड्डूसे भी मैं अधिक मीठा यग तप तुम सब चालना मीठा रखना । अपने इशारेसे भी कटुनाका भार लोग नि.संदेह मुझपर वैश प्रेम फरोगे कि जैसा पचिगण मौर व्यक्तन करना। फलोंसे युफ शशाखापर प्रेम करते हैं। (५) प्रयस इस पातका करना कि दूसरोंके भी स्वभार ये तन मन कितना अद्भुत उपदेश दे रहे हैं इसका विचार मोठे मनें मोर कठोर प्रकृतिवाले मनुष्य भी सुधर कर उसम पाठक अवश्य करें। ऊपर भावार्थ देते समय ही भावार्प ठीक मधुर प्रकृतियाले बनें। व्यक्त करने के लिये युछ अधिक शम्द रौं है, उनके कारण पाठक प्रथम मंत्रका मनन करेंगे तो उनको ये उपदेश मिल इनका भय अधिक स्पष्टीकरण करने की कोई गायस्यकता सकते हैं। इस स्वयं मीठा मीठा चाहनेवाले किसान से नहीं है। मित्रता करता है, अपनेमें मधुर जीवन रस लाता है और प्रतिज्ञा। जिसमें मिल जाता उनको मीठा बना देता है।" इस प्रथम ये मंत्र प्रतिज्ञा के रूपमें हैं। मैं प्रतिमा इस प्रकार करता मंत्रके चार पार्टीका भाव उक्त चार उपदश दे रहे हैं। पाठक यहभाव इन मंत्रोमें है। जो पाठक इन मंत्रास अधिक अधिक इन उपदेशको अपनाने का प्रयत्न करें। (मंत्र लाम उहाने इच्दुक है ये यही प्रतिमा कर, यदि वन्दान देगी यहाँ अन्योक्ति अलंकार है। पाठक इस काव्यमय मंश प्रनिशा की और उस प्रकार दनका धारण दुमा तो उनका यह अलंकार देखें और समझें । वेदमें ऐसे अलंकारोंसे यहुस यश सर्वत्र का जायगा । यह पूर्ण हिंगा की प्रतिमा है। उपदेश दिया है। अपने विचार, उपार,थापारपेरिमी प्रभार किमीही मीन मीठा जीवन। न हो, रिगीका द्वेषन हो, सियर न हो, fein गुना पूर्वाक प्रथम गंभके तामरे पादमें अन्योक्ति अलंकारसे न हो, इस प्रकार अपना आदर्श जारन बननेर जगमे भानं. सूचित किया है कि मनुष्य मिठास के वाय जीवन व्यतीत दा हो गाम्राज्य बन जाएगा। इस मनंदा सामाग्य स्थान करें ।" अर्थात् अपना जीवन मधुर बनाये । नी काना कि धर्मियोग परम धर्म हरीर दीजियेग बातको व्याख्या अगले तीन मंत्रीम सय बेद करता है। साल मधुरिया मदेश दम एटम प्रा है। उक्त तीन मौका मार घोविस्तार में यहां देते है- (दूसरा भन"मेरी किनारे मूल, मप / प्रमागर्ने मिठाग रहेगार मवाना मपुर पद मोगा। कमी पर शम्दा प्रपोपलने और रामे नही गालि प्रिमो जगमेना मेरा मित्र मो मोठे बिपाशा
(१०४)
अथर्ववेदका सुयोध भाष्य ।
[कां०१
-
भाव आदि शत्रु-उस तक न आसकें। यह बाड अपने मनमें उतना ही अन्य परिवारों और मित्रजनोंके अविद्वेष और प्रेम
मुविचारोंकी हो, अपने इंद्रियोंके साथ संयम की हो, अपने घरमें बढानेके विषयमें सत्य है । परंतु अपने चारों ओर मोठी बाड
परस्पर प्रेमकी हो, समाजमें परस्पर मित्रताकी हो । अपने सब करनेकी युक्ति पाठकोंको अवश्य जाननी चाहिये । अपने साथ
मिनभा उत्तम मीठे विचार जीवन में लाने और मधुरता फैलाने ईख की गंडेरिया लेनेसे यह कार्य नहीं होगा। यह कार्य करने के
वाले हों ऐसी पाड होगई तो अंदरका मिठासका खेत बिगडेगा लिये जो ईख चाहिये घे विचार, उच्चार और भाचारके तथा
नहीं । इस विषयमें पंचम मंन देखने योग्य है.
मनोभावना की ईख चाहिये । जो पाठक अपने अंतःकरणके क्षेत्र
(पंचम मंत्र)-" मै विद्वेषको हटानके लिये चारों ओर वे ही ये चैदिक उपदेश आचरणमें ढाल सकते हैं।
में ईख लगायगे और उसको पुष्टि अपने मीठे जीवन से करेंगे,
फैलनेवाले मीठे ईखोकी बाड तुम्हारे चारों ओर करता हूं जिससे
ये मंत्र स्पष्ट हैं। अधिक स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं
तू मेरी इच्छा करेगी और मुझसे दूर भी न होगी।"
है, परंतु पाठक इनको काव्य की दृष्टीसे समझनेका यत्न करेंगे
यह जितना स्त्री पुरषके आपसके भविद्वेषके लिये सत्य है तभी वे लाभ उठा सकेंगे।
तेजस्विता बल और दीर्घायुष्य
की प्राप्ति ।
॥२॥
(३५)
(अपिः-अथर्वा । देवता-हिरण्यं, इन्द्रामी, विश्वेदेवाः)
यदाभन्दाक्षायणा हिरण्यं शतानीकाय सुमनस्यमानाः ।
तते बध्नाम्यायुपे वर्चसे चाय दीर्घायुत्वाय शतशारदाय
नैनं रक्षासि न पिंशाचाः सहन्ते देवानामोज: प्रथमजं होईतत् ।
यो विमति दाक्षायणं हिरण्यं स जीवेषु कृणुते दीर्घमायुः
अपां तेजो ज्योतिरोजो वलं च वनस्पतीनामुत वीर्याणि ।
इन्द्र इवेन्द्रियाण्यधि धारयामो अस्मिन्तद्दर्भमाणो विभद्धिरण्यम्
सांनां मासामृतुभिष्ट्वा वयं संवत्सरस्य पयसा पिपर्मि ।
इनामी विश्वे देवास्तेऽनु मन्यन्तामणीयमानाः
॥४॥
अर्थ -( मुमनस्यमानाः दाक्षायणा शुभ मनवाले और बलकी वृद्धि करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष (शत मनीकाय) पलके सी विभागों
दे गचालक के लिये (यन् हिरण्यं भवान् )जो सरग याधते रहे (तत्) वह
(आयुपे वर्चसे) जीवन, तेज, (पलाय)
पल और (शारदाय दीर्घायुस्वाय) सो घडी दोष मायुके लिये (ते यतामि) तेरे ऊपर पिता है ॥ ॥ (न रक्षांति,
म शिया ) सक्षम भोर न पिशाच (एनं महन्ते ) इस पुरवा हमला मह सकते हैं (हि) क्योंकि (एतत् देवना प्रथम
॥३॥
सू. ३५, मं.१-४ तेजस्विता, बल और दीर्घायुष्य । (१०५) भोजः) यह देवासे प्रथम उ-पन्न हुआ सामार्य है। (यः दाक्षायणं हिरण्यं निभर्ति ) जो मनुष्य दाक्षायण सुवर्ग धारण करता है (सः जीवेषु दीर्घ आयुः कृणुते) वह जीवों में अपनी दोध आयु करता है ॥ २ ॥ (भपां तेजः ज्योतिः भोजः बलं च) जलका तेज, कान्ति, पराम और बल (उत ) तथा (वनस्पतीनां वीर्याणि ) औषधियों के सब वीर्य (अस्मिन् अधि धारयामः) इस पुरुषमें धारण कराते हैं (इन्द्रे इन्द्रियाणि इव) जैसे आत्मामें इन्दिय धारण होते हैं । इस प्रकार ( दक्षमाणः हिरण्यं विभ्रत) बल बढाने की इच्छा करनेवाला सुवर्णका धारण करे ॥ ३ ॥ (समानां मामा अतुभिः) सम महिनाके तुओं के द्वारा ( संवत्सरंस्य पयसा ) वर्ष रूपी गौके दूधसे ( त्या वयं पिपर्मि) तुझे हम सय पूर्ण करते हैं। (इन्द्रामी) इन्द्र और अमि ( विश्वे देवाः) तथा सब देव ( अ-हणीयमानाः) संकोच न करते हुए ( ते मनु मन्यन्तां ) तेरा अनुमोदन करें ॥४॥ भावार्थ- बल बढानेवाले और मनमें शुभ विचारों की धारणा करनेवाले श्रेष्ठ महात्मा पुरुष सेना संचालकके देवपर बल द्धि के लिये जिस सुवर्णके आभूषणको लटका देते हैं, वही आभूषण मैं तेरे शरीपर इसलिये लटकाता हूं कि इममे तेरा जीवन सुधरे, तेज बढे, बल तथा सामर्थ्य वृद्धिंगत हो और तुझे सौ की पूर्ण भायु प्राप्त हो ॥ १॥ यह भाभूपण धारण करनेवाले वीर पुरुषके हमले को न राक्षस और नही पिशाच सह सकते हैं । वे इसके हमलेसे घबराकर दूर भाग जाते हैं, क्योंकि यह देवा से निकला हुआ सबसे प्रथम दर्जेका कल ही है । इसका नाम दाक्षायग अर्थात् बल बढानेगला सुवर्गका आभूषण है। जो इसका धारण करता है वह मनुष्योंमें सबसे अधिक दीर्घ आयु प्राप्त करता है ॥ २ ॥ हमसब इस पुरुषमें जीवन का तेज, पराक्रम सामर्थ्य भौर पल धारण करते हैं। और साथ साथ औषधियोंसे नाना प्रचारके वीर्यशाली मल भी धारण करते हैं। जिस प्रकार इन्द्र में अर्थात् आत्मामें इंद्रिय शफियां रहती हैं उसी प्रकार इस सुवर्गका अभूपग धारण करनेवाले मनुष्य के अंदर सब प्रकारले बल रहें, वे बाहर प्रगट हो जाय ॥३॥ दो महिनों का एक ऋतु होता है । प्रत्येक ऋतुकी शक्ति अलग अलग होती है मानो संवत्मररूपी गौवा दूध ही संवत्सरकी छह ऋतुओंमें निचोडा हुआ है। यह दूध मनुष्य पीवे और बलवान बने । इसकी अनुकूलता इंद ममि तथा सब देव, करें ॥ ४ ॥ . दाक्षायण हिरण्य । सुवर्ण शरीरमें सेवन करना । सुवर्ण शरीरमें सानेकरोति वैद्यप्रयो हिरण्य शनाका अर्थ सुवर्ग अथवा सोना है, यह परिशुद्ध में प्रसिद्ध है । सब अन्य धातु तथा औषधियां सेवन करनेपर स्थितिमें बहुत ही बलवर्धक है । यह पेट में भी लिया जाता है शरीरमें नहीं रहती, परंतु सुवर्ण की ही विशेषता है कि यह और शरीपर भी धारण किया जाता है। श्री. यास्काचार्य शरीर के अंदर हरियों के जोहोंमें जाकर स्थिर रूपमे रहता है और हिरण्य शब्दके दो अर्थ देते हैं-" हितरमणीयं, हृदयरमगी" मृयुके समय तक साथ देता है। इस प्रकारको गुर्गधारणागे अर्थात् यह मुवर्ग हितकारक और रमणीय है तथा हृदयको अनेक रोगोंगे मुकता होती है । इग रीतिरो धारण कि मा रमणीयता बढानेवाला है । सुवर्ण पलवर्धक तथा रोग नाशक है मुवर्ण देह मृत होनेपर उसके जलाने के बाद शरीरकी राम इलिये आरोग्य चाहनेवाले इसका उपयोग कर सकते हैं। सबका सय मिलता है। भान् यदि किसी पुरूषने एक तोला इस सूक्तम " दाक्षायण" शन्द (दक्ष अयन ) अर्थात् सुवर्ण वैद्यकीय रीतिगे सेवन किया तो यह तोलामा गुणं गत पलके लिये प्रयत्न करनेवाला इस अर्थमें प्रयुक्त हुआ है। प्रथम शके दाह होने के पश्चात् उगरे संधियों को प्राप्त हो गाना मंगमें यह शब्द मनुष्यों का विशेषण है और द्विताय मंत्रमें यह है ।ग प्रभार कोई हानि न करता हुआ यह गुर्म बल भोर सुपर्णका विशेषण है। तृतीय मंत्रमें इसी अर्थक" दक्ष-माण" आरोग्य देता है। शब्द जो शातिमानरा वाचक है। पाठक विचार करेंगे तो उनको निधय होगविदाक्षायण और दशमा" ये दो याद जो वैव इस मुवर्ग पारग रिपियो जानने में उनका नाम करीय शक्तिमान के हावा हैं। पद देश में बलवान "दाक्षायण " प्रथम माने हादगार पर प्रमिल है। इस प्रकार इस टूल में पल बानेश को मार्ग बताया बलपर्धक है नगे उगा नाम भा "है, उसमें सबसे प्रपन हिरण्यधारण दिरण्यधारण दो प्रथमे द्वितीय गगन ला दी है। जो मनुष्य प्रकार गुपन पर होता, एक भाभूगर शरीरपर धारण करना और दूसरा विधिगे अपना मायुभ्य बनाना साना उमर भी मरने १४ (म.म.भा..." ॥ - (१०६) अथर्ववेदका सुबोध भाष्य [काण्ड, - मौ वर्षकी आयु" इत्यादि तृतीय मंत्रम' दक्ष-माण यताया है। इस प्रकार यह सूक्त धातु है जो जीवन शकिग वाचक प्रसिद्ध है। इसलिये जीवन बलवर्धन की बात प्रारंभसे अंत तक बता रहा है। शक्तिका अर्थ भी अर्नाक शब्दमें है। इस अर्थके लेनेसे दाक्षायणी विद्या। "शतानीक" शब्दका अर्थ "सी जीवन शक्तियां, अथवा सौ जीवन घल पढानेको विद्याा नाम दाक्षायणी विद्या है। (दक्ष+ शक्तियोंसे युक्त होता है। यह भाव लेनेसे उक्त मंत्र भागका अयन:) पल प्राप्त करने के मार्गका उपदेश इस विद्या में होता अर्थ ऐसा होता है कि- । इस विद्या मनके साथ विशेष सबध रहता है (सु+ शतानीकाय हिरण्य यसामि । (मंत्र ) मनस्यमान. ) उत्तम मनसे युक्त अर्थात् मनका विशेष शक्तिसे "सौ जीवन शक्तियोंकी प्राप्तिके लिये मैं सुवर्णका धारण गंपन । कमजोरीकी भावनास मन अश्वन होना है और सामर्थ्य करता हु।" सुवर्गके अंदर सेकडो वीर्य हैं, उन सबकी प्राप्तिक की भावना से बलशाली होता है । मनका गाक्ति ढाने की जो विद्या लिये मैं उसका धारण करता है। यह आशय प्रथम मंत्र भाः । उस विशके अनुसार मन सुनियम से युक्त बनानेवाले श्रेष्ठ का है। इस प्रथम मंत्रमें इनमे कुछ गुण कद्दे भी है- रोग "सुमनस्यमानाः दाक्षायणाः" श दों द्वारा वेदमें बताये है। पाठक अपने मनकी अवस्था साथ अपन गला सबंध देखें आयुपे । घर्चसे । यलाय। दीर्घायुयाय । शतशारदाय । और इन शब्दों द्वारा जो सुमनर होने की सूचना मिलती है, वह शब्द जावन शक्तियों के ही सूचक है । इनका थोडामा परिगणन 'आयु. तेज, पल, दीर्घ आयु, ले और इस प्रकार मानसिक धारणास अपना बल बढावें। यहां किया है । इससे पाठक अनुमान कर सकते हैं और जान सकते हैं कि इसी प्रकार अनेक जीवन शक्तिया" है, उनकी प्रामि अपने अंदर करनी और उनकी वृद्धि भी करनी वैदिक धर्मका उद्देश्य है। इस विचारसे शात हो सकता है कि यहाँ "शतानीक" शब्दका अर्थ "जीवन के सौ वीर्य, जीवन की सकडों शक्तिया" अभीष्ट है । यद्यपि यह अर्थ हमने मंत्रार्थ करते समय किया नहीं है तथापि यह अर्थ में यहाँ प्रतीत हो रहा है। इसलिये प्रसिद्ध अर्थ ऊपर देकर यहां यह अर्थ लिला है। पाठक इसका अधिक विचार करें। इस प्रकार प्रथम मंत्रका मनन करने के बाद इसी प्रकार एक मंत्र यजुर्वेदमे थोडेसे पाठभेद भाता है उसको पाठकों के विचार के लिये यहाँ देते हैं- पदायभन्दाक्षायणा हिरण्यं पातानीकाय सुमनस्पमानाः । सम्म मायामि शततारदायायुप्माजराष्टयधामम् ॥ 10 गज 111५२) सू. ३५, मं०१-४] तेजप्रता, पल और दीर्घायुष्य। (१०७) । सुवर्णके गुण। प्रथमा वैसाका वैसा ही है । यहां प्रथम मंत्रका विवरण समा जैसे आरमामें इंद्रिय शक्तियां धारण हुई है। इसी प्रमर पल हुआ, अब द्वितीय मंत्रका विशर करते हैं। - घडानेकी इन्छा करनेवाला मनुष्य सुवर्गका भा धारण करे।" राक्षस और पिशाच । जलमें नाना औषधियोंके गुण हैं यह बात इस पूर्व आओ नरमांस भोजन करनेवाले राक्षम होते हैं और रक्त पीनेवाले हुये जल सूक में वर्णन हो चुकी है। वे सूक्त पाठक यह दने । पिशाच होते हैं। ये सबसे क्रूर होने के कारण सब लोग इनसे औषधियोंक अंदर वीर्यवर्धक रस है. इसीलिये वैद्य अषाय बरते रहते हैं। परंतु जो पूर्वोक्त प्रकार "सुवर्ण प्रयोग करता है प्रयोग करते हैं, अथर्ववेदमें भी यह यात आगे आनाया। उमके हमलेको राक्षस और पिशाच भी सहनहीं सकते। जिस प्रकार जल अंतर्याय पवित्रता करके बल आदि गोकी इतनी शक्ति इस सुवर्ण प्रयोगस मनुष्यको प्रात होती है। वृद्धि करता है, इसी प्रकार नाना प्रकारती वीर्यवर्ध? सुवर्णमें इतनी शक्ति है। क्योंकि "यह देवोंका पहिला ओज आषधियोंके १५य हिन मित अन्न भक्षण पूर्वक सेवन से मनुष्य है।" अर्थात् संपूर्ण देवोंकी अनेक शातियाँ इसमें संग्ररित हुई रल प्राप्त करके दीर्घ जयन भी प्राप्त करता है । सुवर्ण सेवनसे भी है । इसलिये द्वितीय मनके उत्तरार्धम कहा है कि-"जो यह पल अथवा सुवर्णादि धातुओंके सेवनसे भी इसी प्रकार सा पक सुवर्ण शरीर में पारण करता है यह सब प्राणियों से भी अधिक होते हैं, इसका वेधशास्त्र नाम " रस प्रयोग" है। यह रस दीर्घ आयु प्राप्त करता है । " अर्थात् इस सुवर्ण प्रयोगसे प्रयोग मुयोग्य वंय ही के उपदंशानुसार करना चाहिये । यहाँ शरीरका बल भी बढ़ जाता है और दीर्घ आयु भी प्राप्त होती यजुर्वेदका इसी प्रकारका मंत्र देखिये- है। यह द्वितीय मंत्रका भाव पहिले मंत्रका ही एक प्रकारका स्पष्टीकरण है, इसलिये इसका इतना ही, मनन पर्याप्त है। यही मंत्र गजुर्वेदमें निम्न लिखित प्रकार है- आयुष्य वर्चस्यं रायसोरमौद्धिदम् । मतदक्षासि न पिशाचास्तरन्ति देवानामोजः प्रथमर्ज होतत् । इदं हिरण्यं वर्चस्तक्षेत्रायाविशतादु माम् ।। यो विमति दाक्षायणं हिरण्यं स देवेषु कृणुते दार्घमायुः वा. यजु. ३४।५० स मनुष्येषु कृणुते दीर्घमायुः॥ यजु०१४॥५१ " (आयुष्य ) दीर्घ आयु करनेवाला, (वर्षस्य ) कान्ति यह देवोंसे उन्म हुआ पहिला मेज है, इसलिये राक्षय घटानेवाला, (रायपोष) शोभा और पुष्टि पढानाला और पिशाच भी इसके पार न हो सकते। जो दाक्षायण सुवर्ण (भौद्रिद ) खानम उत्पन्न होनेवाला अपना कार उठानेवाला, धारण करता है वह देवोंमें दीर्घ आयु करता है और मनुष्योंमें (वर्चस्वत् ) तेज बढानेवाला (जेयाय) विनय के लिये भी दीर्घ आयु करत है।" (इदं हिरण्यं) यह एवर्ग (मो अविशता ) मुझे अपना इस मंत्रके द्वितीयार्धमें थोडा भेद है और जो अथर्व पाठमें मेरे शरीरमें प्रविष्ट हो।" "जीवपु कृणुते दीर्घमायुः " इतनाही था, वहाँ ही इसमें सुवर्णका सेवन । "देवेषु और मनुष्येणु " ये शम्द अधिक हैं। "वेषु" शम्दका ही यह " देवेषु, मनुष्येषु" आदि शब्दोंद्वारा अर्थ हुभा है । इस प्रकार अन्य घाखासहिताओंके पाठभेद देखनेरो भर्प विषय करने में वही सहायता होती है। यहा तक दो मंत्रोका मनन हुआ। इन दो मनोमें और पर मुवर्ण धारण करनेकी बगतका उपदेश किया है अब अगले दोमंत्रोंमे जल वनस्पति तण अनुशलानुमा सा होनेवाले भन्य बलवक पदापाका नीमा सेवन करनेको मालपून विपा दी जाता है, उनका पाठक विष प्यानमे मनन करे। तृतीय मंत्र साद-"जल और भोभियों तंग, ति, गलि, दल और वर्धक मोको हम पारण करते हैं। .
कां० १, अथर्ववेदका सुबोध भाष्य (१०८) मनुष्य के शरीरमें दवाके अंश । स्थलेकि- लूप दिशा- अश्विनी कुमार जामि पर्वत जाकाश- यायु वायु मरुत् इंद्रमतत् भुषाफ- प्रम्ह -आत्मा तेज सरस्वती -सूर्य आप जाप पृयी -पृथ्वी भूलोक- - अगत्में जो अग्नि आदि देव है उनके अंश शरीर में हैं। इनके स्थान इस चित्रमें बताये है। इसके मननसे ज्ञात हो सकता है किवाय जगन् के भमि आदि देवोंकी सहकारिताके साथ शरीर के स्वास्थ्यका कितना घनिष्ट संबंध है। फाली कामधेनुका ध। को पुष्टी करती है। प्रत्येक ऋतु के अनुकूल न ना प्रकार के फल इस चतुर्थ मैत्रमें कहा है कालरूपी संवरसरका ( काली याम और फूल संवत्सर देता है, इसलिये वेदमें संवत्सरो पिताभी धनुका ) दप जो ऋतुओके द्वारा मिलता है, उससे मनुष्यको कहा है और यहां मधुर दुध देनेवाली कामधेनु कहा है । इरएक पूर्णता करते हैं। इस कार्यम इन्द्र अग्मि विश्वदेव धादि सब ऋनु चुछ नवीन फ्ल, पल, धान्य आदि मिलता है, यही पूर्णता भनुयूल रहें।" म धेनुम दूर है। यह दूध हरएक मरतु इस संवसर पी संयन्मर-वर्ष अथवा बार-यह एक पानधेनु है। काल संबंधी गासे निचोर मनुष्यादि प्राणियोंको देते हैं, यह भन्नुत पर धेनु होनसे इमो काली धेनु कहते हैं, यह इसलिये अलंकार इस मंत्रमें बताया है। पाठक इस काम्यपूर्ण मतंकार या अस्वाद यहां से। फामधेनु हो गई है कि मनुष्यादिकोंके इरिहत फल धान्य भारि गदा ऋतमो अनुक्ल देकर यह मनुप्यादि प्राणियों प्रत्येक मागमें प्रत्येक ऋदने तथा प्रत्येक जलमें जो जो सू० ३५, म.१-४] तेजस्विता, बल और दीर्घायुष्य (१०९) फल फूल उत्पन्न होते हैं उनका योग्य उपयोग करने से मनुष्यके करें और अपनी उन्नतिका साधन करें। पल, तेज, वीर्य, आयुष्य आदि बच सकते हैं। यह इस मंत्रका इस मंत्रके उत्तरार्धका भाव मनन करने योग्य है।" इन्द्र आशय हरएक मनुष्यको मनन करने योग्य है। मनुष्य अपने अमि आदि सब देव इसकी अनुकूलतासे सहायता करें " अनि पुरुषार्थ व प्रयत्नसे ऋतु के अनुसार फल फूल धान्य आदिको आदि देवताओंकी सहायता विना कौन मनुष्य के उमतिको अधिक उत्पत्ति करे और उनके उपयोग से मनुष्योको लाभ प्राप्त हो सकता है ? भमि ही हमारा भन्न पकाता है, जल ही पहुंचावे। हमारी तथा शांत करता है, पृथ्वी हमें आधार देनी है, बिजली पूर्व मंत्रमें "(अपो वनस्पतीनां च वीयर्याणि) जल तथा सबको चेतना देती है, वायु सबका माग पनर प्राणियों का वनस्पतियोंके वार्य " धारण करनेका जो उपदेश हुआ है धारण करता है, सूर्यदेव सबको जीवन माफि देता है, चंद्रमा उसीका स्पष्टीकरण इस चतुर्थ मंत्रने किया है। जिस ऋतुमें जो अपनी किरणोंद्वारा वनस्पतियोंका पोषण करनेमे हमारा सहायक जल और जो वनस्पति उत्तम वीर्यवान् प्राप्त होने की संभावना बनता है, इसी प्रकार अन्यान्य देव हमरे सहायक हो रहे हैं। हो, उस ऋतु में उसका संग्रह करके, उसका सेवन करना चाहिये। इनके प्रतिनिधि हमारे शरीरमें रहते है और उनके द्वारा भऔर इस प्रकार भायु, बल, तेज, कांति, शक्ति वीर्य भादि गुण ये सब देव अपने अपने जीवनाश हमतक पहुंचा रहे हैं । इस अपने में पढाने चाहिये। विषयमें इसके पूर्व बहुत कुछ लिया गया है, इसलिये महा. अधिक विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। यह वेदका उपदेश मनन करने और आचरणमें लाने योग्य है। इतना उपदेश करनेपर भी यदि लोग निर्यि, इतने विवरणसे यह यात पाठकोंके मन में भाई होगी कि निःसत्त्व, निस्तेज, निर्मल रहेंगे और वीर्यवान पननेका यत्र अग्नि आदि देवताओं की सहायता किस रीतिसे हमें हो रही है नहीं करेंगे तो वह मनुष्यों का ही दोष है । पाठक इस स्थानपर और यदि इनकी सहायता अधिक से भीष प्राप्त करते विचार करें और निधय करें कि वेदका उपदेश आचरणमें और उससे अधिको अधिक स्लम उठानेकी विधि शात हो गई, सानेका यम ये कितना कर रहे हैं और कितना नहीं जो पैदिक तो मनुष्यों का महुत ही लाभ हो सकता है। आग है कि पाठक भी लोग अपने वैदिक धर्मके उपदेशको भाचरणमें नहीं इसका विचार करेंगे और अपना भायु, भारोग्य बल और वीर्य ढालते थे पीघ्र प्रयत्न करके इस दिशा योग्य सुधार अवश्य बताकर जगत् में यशस्वी होंगे। - यहां पष्ठ अनुवाक और प्रथम काण्ड समाप्त ।
(११०) अथवेदका सुयोध भाष्य। [at०१५ प्रथम काण्डका मनन । थोडासा मनन ।" इस प्रथम काण्डमें दो प्रपाठक, छ: अनुवाक, पैतीस सूक्त और १५३ मंत्र हैं। इस काण्डके सूक्तोंके ऋषि, देवता, और विषय बतानेवाला कोष्टक यहां देते हैं-जो पाठक इस काण्डका विशेष मनन करना चाहते हैं उनको यह कोटक बहुत लाभदायक होगा- अथर्व वेद प्रथम काण्ड के सूक्तों का कोटक । प्राषि देवता विषय अथर्वा वाचस्पति पर्चस्यगण मेधाजनन पर्जन्य अपराजितगण विजय यांप्रामिक गण मंत्रोक्त( पृथ्वी, मित्र, वरुण, चंद्र, सूर्य) भारोग्य सिंधुद्वीपा सूक्त गण १ २ ३ " ५ आप: ५ " " . ६ " " ७ शवनाशन ८ " " ५ यस्य गण १. तेजकी प्राप्ति पापनियति सुखप्रसूति " " (इति प्रथमोऽनुवाका) घातन; इन्द्राग्नी अमिः, वृहस्पतिः अपर्वा वस्वादयः असुरो वरुणः पूषा (इति द्वितीयोऽनुवाका) मृग्वंगिरा: यश्मनाशन तक्मनाशनगण विद्युत् यमो वदगो वा अपा सिन्धु अग्नि, ईन्द्र. पणः शत्रुनाशन गण (इति पोऽनुवाकः प्रपमः प्रपाठकश्य समाप्तः 1) रमा योचित प्रविगोदाः विनायक, सौभाग्य प्रमा सामामिकगग अप मोम " रोगनिवारण ईशनमन कुलवधुविवाह संगठन गंगनाथन " 14 विरा, प्रन रक्तस्त्राव-दरीकरण सौभाग्यवर्धन গলায়ল महान पर प्रनापालन . भमयगग मथम काण्डका मनन। (११९ ) -- ब्रह्मा " " (इति चतुर्योऽनुवाकः) सूर्य, हरिमा, होगः हृदोग तथा कामिला रोग नाशन भी भोषधिः कुष्ठनाशन आसुरी वनस्पतिः २५ भूग्वंगिराः अग्निः, तस्मा तरमनाशनगण ज्वरनाशन २६ मना इन्द्रादयः स्वस्त्ययनगण सुखराप्ति अथर्वा इन्द्राणी विषयी स्त्री २८ चातन: स्वस्त्ययन दुष्टनाशन (इति पंचमोऽनुवाकः) वसिष्ठः अभीवर्तमाणः राष्ट्रवर्धन अया विश्वेदेवाः आयुष्यगण आयुष्यवर्धन भाशापाला:,वास्तोष्पतिः वास्तुपण आशापालन द्यावापृथिवी जीवनतरव शन्ताति आप: चन्द्रमा: शांतिगण अपवळ मधुबली मीठा जीवन हिरण्यं, इन्द्राग्नी विश्वेदेवाः पार्षायु (इति पठोऽनुवाको द्वितीयः प्रपाठकच समासः) इति प्रथम काग्दम्। इन सूका मनन करने के लिये ऋषि और गणका विमाग जानने की भी भान भावश्यकता है। इसलिये देकोट मारे -- " " .. विवाह । - " " सूक्त ये हैं। तथापि इसरे साथ संबंध रसनेवाले अभय पूर्वापर सबधका अनुमान करने और पूर्वापर संबंध स्मरण गकती है। स्मरणशक्तिका यदना और पूर्वापर संबंध जोडनेका (१९२) अथर्ववेदका सुबोध भाष्य ३ चावन ऋपि-शत्रुनाशन, दुष्टनाशन । ३ तक्मनाशन गण-इम गणके सूक १२, २५, ये हैं तथापि ४ भृग्वगिरा पिः-रोगनिवारण, ज्वरनाशन, ईशनमन सब रोग नाशक और आरोग्यवर्धक . सूक्त इस गणके सूत्रोंके साथ पढना : ५ सिंधुद्वीप ऋपि -जलसे आरोग्य । चाहिये। जैसे सूक्त ३-६, १७, २२, ६ द्रविणे दा ऋषिः-सौभाग्यवर्धन । २३, २५, ३३, ३५, आदि- ७ वसिष्ठ अपिः-राष्ट्रसंवर्धन । ४ म्वस्त्ययनगण- इस गणके सूक्त २६, २७ ये हैं। ८ शान्ताती ऋषिः-दृष्टि जलसे स्वास्थ्य । ५ आयुप्यगण-इस गणके सूक ३०, ३५ ये हैं, तथापि स्वस्त्ययन गग, वर्चस्यगण, तक्मनाशन- इस प्रकार किन ऋषियोंके नामोंसे किन किन विषयोंका संबंध है यह देखना बडा बोधप्रद होता है। (१) सिंधुद्वीप गण तथा शांतिगणके सूक्तोंका इससे । संबंध है। ऋषिकै नाममें " सिंधु" शब्द जल प्रवाह का वाचक है और ६ शांतिगण-जल देवताके सव सूक्त इस गणमें आते हैं । यही जल देवताके मत्रोंका ऋषि है। (२) चातन ऋषिके नामका अर्थात् ॥ ७ अभयगण- इसका सूक्त २१ वां है, तथापि इसके चातन शब्दका अर्थ घबरादना साथ संबंध रखनेवाले गण स्वस्त्ययनगण, भगादेना, शत्रुनो उखाड देना " है और इस ऋषिके सूक्तोंमें अपराजितगण, तक्मनाशनगण, चातन- भी यही विषय है। इस प्रकार सूक्तांके अंदर आनेवाला विषय और ऋषिनामोंका अर्थ इसका कई स्थानोंपर घनिष्ट संबंध दिखाई देता है। इसका विचार करना योग्य है। इस प्रकार यह सूतोंके गणोंका विचार है और इस रीतिसे सूक्तोंका विचार होनेसे बहुत ही बोध प्राप्त होता है। सूक्तों के गण। अध्ययन की सुगमता । जिन प्राचीन मुनियोंने अथर्व सूॉपर विचार किया था, उन्होंने इन सूक्तोंके गण बना दिये हैं। एक एक गण के संपूर्ण कई पाठक शट्वा करते हैं कि एक विषयके सब सूत इकठे सूत्रोंका विचार एक साथ होना चाहिये । ऐसा विचार करने क्यों नहीं दिय और सब विषयों के मिलेजुले सूक्त ही सब काण्डोंमें से अर्थशान भी शीघ्र होता है और शब्दोंके अर्थ नियत करना क्यों दिये हैं? इसका उत्तर यह है कि यदि जल आदि विषयोंके भी मुगम हो जाता है। इस प्रथम काडक पैंतीस सूतोंमें कई संपूर्ण सूक्त इकटे होते, तो अध्ययन करनेवालेको विविधताका सूक्त कई गणकि अदर आगये हैं और कई गणोंमें परिगणित अभाव होनेके कारण अध्ययन करनेमें बडा कृष्ट नहीं हुए हैं । जो गोंमें परिगणित नहीं हुए हैं उनको अर्थको अध्ययनकी सुविधाके लिये ही मिरजुले सूक्त दिये हैं। अच्छी दृष्टि से हम अन्यगणों के साथ पढ सकते हैं। इस प्रकार गणशा पाठशालाओंमें घण्टे दो घण्टेमें भिन्न भिन्न विषय पढाये जाते विचार करनेगे सूतोंका बोध शीघ्र हो जाता है, देखिये- हैं, इसका यही कारण है कि पढनेवालके मस्तिष्कको कर १ वर्चस्य गण इसके सूक्त १, ९ ये हैं । तथापि तेज, न हो। सरेसे शामतक एक ही विषयका अध्ययन करना हो तो भारोग्य आदि बढाने का उपदेश करनेवाले पढने पढानेवालोंको अतिकष्ट होते हैं। इस बातका अनुभव सुक्त हम इस गणके साथ पढ़ सकते हैं, हरएकको होगा। -सूक-६.१८,२५, २६,३० इससे पाठक जान सकते है कि विषयोंकी विभिन्नता रखने के ३१,३४,३५मादि। लिये विभिन्न विषयोंके सूफ मिलेजुले दिये हैं। २ अपराजित गण, सांसामिकगण इसके सूफ २, १९ ये है इसमें दूसरा भी एक हेतु प्रतीत होता है, वह यह है कि, मणकेमुक्त है । तथा राष्ट्रशासन और रखने का अभ्यास हो। यदि जलसूक्त प्रथम कांडमें आया हो, राज्य पालनके सब सूक इन सा तो आगे जहाजल सूक्त आजाय पहावा इस स्मरण पूर्व गंधित है, असे-सूक्त ७, ८, १५, १६, अनुसंधान करना चाहिये । इस प्रकार स्मरणशक्ति भी कर १५,२०,२१,२५, २७,३१ भादि। जाता। - प्रथम काण्डका मनन ४ अभ्यास होना ये दो महत्वपूर्ण अभ्यास इस व्यवस्थासे साध्य कम इस पार बार मनन पूर्वक करना चाहिये। होते हैं। व्यक्तिके विषय में उपदेश । इस प्रथम काग्डके दो प्रपाठक हैं, इस"प्रपाठक" का तात्पर्य ये दो पाठ ही है। दो प्र-पाठ-क" अर्थात दो विशेष पाठ है। प्रथम काण्डके ३५ सूजा में करीर १६ सूफ ऐसे हैं कि जो गुरुसे एकवार जितना पाठ लिया जाता है उतना एक-प्र पाठ क मनुष्य के स्वास्थ्य, आरोग्य, नीरोगता, बल, आयुष्य, पुचि होता है । इस प्रकार यह प्रथमकाण्ड दो पाठौकी पढाई है। आदि विषयोंका उपदेश देने के कारण मनुष्यके दैनिक व्यवहार अमवा एक अनुयाकका एक पाठ अल्पबुद्धिवालोकरिये माना के माय संबंध रखते हैं। हरएक मनुष्य इस समय में भी इनके जाय तो यह प्रथमकाण्ड की पढाई छ पाठोंकी मानी जा उपदेशसे लाभ उठा सकता है। आरोग्यवर्धनके वेदिक सकती है। एक अनुवाकमें भी विषयों की विविधता है और एक उपायोंकी मोर हम पाठोग विशेष प्यान आकर्षित करना प्रपाठकमें मी पाठ्य विषयों की विविधता है और इस विविधता चाहते हैं। जो इस गणके सूफ हैं उनका मनन पाठा सबसे के कारण ही पढने पढानेवालोंको पडा रोचक्ता उत्पन्न हो सस्ता है अधिक करें और अपनी परिस्थितिमें उन उपायोंको दालनेका आजकल इतनी पढाई नही हो सकती, यह युद्धि कम होना जितना हो सस्ता है उतना यन करें। मारोग्यानो या माहकता कम होनेका प्रमाण है। यह अथर्ववेद प्रमुख उपायों में सारांशरूपसे इन उपायों का वर्णन विशेष पए के माग विद्यार्थीके ही पढनेका विषय है। इसलिये भरछे प्रयुर तथा य काण्डमें किया है- अन्य शास्त्रोंमें कृतपरिश्रम उक्त प्रकार पढाई कर सक्ते है, जलसे मारोग्य- जलग आरोग्य होता है, दाम शाति, इसमें कोई संदेह नहीं है। मुस, नीरोगता आदिमाप्त होती है यह पताने वाले जल देवता अथर्ववेद के विषयोंकी उपयुक्तता। के चार सूरत दिये हैं। अनेक प्रकारके जलोंकाइन सूक्तोंमे वर्गन करने के बाद दिव्य जल' अर्थात् मेघोंग प्राप्त होनेयाले मलका जो पाठक इस प्रथम काडके सब मंत्रों को अच्छी प्रकार पडेने महत्व बताया है वह कभी भूलना नहीं चाहिये । पाटेरे दिनों में और थोरामनन भी करेंगे तो उनको उसी समय इस बात का पता जिन दिनाम शुरु गरकी इष्टि होती है-उन दिनों में हम जर लग जायगा कि, इस वेदका उपदेश इस समयमें भी नवीन और समह हरएक गृहस्थी फर मम्ता है। जहां टि बहुत पार्टी भस्मत उपयोगी तया माज ही अपने भावरणमें लाने योग्य है। होती है वहाकी मात सोड दी जाय तो भन्या जन सूक पाने के समय ऐसा प्रतीत होता है कि, यह उपाय आग सालमरके पीने के लिये पर्याप्त प्रमागमें मिल सकता ही हम भाचरण में लायेंगे और अपना लाभ उठायेंगे । उपदेश स्मरण रखना चाहिये कि परके परपर जमा हुमा मल को जीवितता और जापतता इसी बातमें पाठकोंक मन पट लेना नहीं चाहिये परंतु छत पर तुले भार को मुराण स्पसे सही हो जाता है। बन रराकर उसमें गांधी पृष्टिधाराओं परना देर सब थोसे पुराने ग्रंथ होनेपर भी नयान से नवीन है चाहिये । भपात ऐगा इतनाम करना चाहिये जिनकी मोर यही इनकी "सनातन पिपा"१९ यह विदा मां पाराएं गीधी भरने में मात्रा । काम , पर पुरानी नहीं होती। जो निस समय और मिस अमरपाम पटेगा आदि विनीय सम है। इस परमा उसको उसी अवस्था और उसी समय अपनी उमनिका उमेश प्रत स्वर और निमंस नारे भरखर पर्नेगे कमर धाम से माना है। इस प्रथम पर सूक्त पर पाठक रहता है और बिगाला नहीं। यह बात साने मानका भनुमत करें और शिका माल अपने दो पता तार इगा मन गुप मन पर करें। मनुमा भारोतरा।
अथर्ववंदका सुबोध भाप्य । - चाहिये और भोजन अत्यन्त ला होना चाहिये। हरदिन भी तंग कपड़े पहननेवाले या लोगोंको होता है, इसका कारण पानेके लिये इसका उपयोग करनेवाले बडा ही लाभ प्राप्त कर यही है कि, जिनका शरीर सूर्य किरणोंके माथ संबंध होने के सकते ह। इसका नाम 'अमरवारुणा का पान' है। इसीको कारण नीरोग रहता है वे तन्दुरुस्त रहते हैं और जो नाना कपडे 'गुरा' भी कहते हैं । मुग गन्द केवल मद्य अर्थम आजकल पहनने के कारण कमजोर चमडी याले बनते हैं ये अधिक बीमार प्रयुक्त होता है, परंतु प्राचीन ग्रथामें इसका अर्थ 'दृष्टि जल' हो जाते हैं। भी था। वरुण का जन साम्राज्य मेघ मडल में है और वही इस आरोग्य वर्धक वृष्टि जल को देता है । इसका वर्णन वेदके रामायण महाभारतके समयमें रामकृष्णादि वीर अतिदोप अनेक सूत्ता में है। आयुवाले थे। वे वीर लोग धोती पहनते थे और धोती ही ओढने थे। प्रायः अन्य समय शरीरपर एक उत्तरीय पहनने वेदका यह आरोग्य प्राप्तिका सीधा, मुगम और व्ययक विना थे। पाठक इनके वर्णन यदि पटेंगे तो उनरे ध्यान में यह बात प्राप्त होनेवाला उपाय यदि पाठक व्यवहारमें लायेंगे तो वे बडा आजायगी कि सभाओंमें भी ये लोग केवल धोती पहनकर ही ही राभ प्राप्त का मस्ते ह । इगलिये हम सानुरोध पाठकों से बैठते थे। इसकारण इनके शरीरके साथ वायु और सूर्य प्रकार निवेदन करते है कि ये इम विषयमें दत्तनित्त हों और अपना का संबंध अच्छी प्रकार होजाता था। अनेक कारणों में यह भी लाभ उठायें। एक कारण है कि जिस हेतु वे अतिदीर्घायुषाले और अति आरोग्य साधनके अन्य उपाय । बलवान् थे। वह सादगी इस समय नहीं रही है और इस जना पश्चात् आरोग्य स धन के उपाय ओ नेदने बताये ने पारणाम हमारे अल्पायु दुर्थल और रोगी होने में हो रहा है। ममय यही निमता हमारे जावन व्यवहार में आगयी है इसका अप देगिय- पाठक वेदके उपदेशके साथ इस ऐतिहासिक बातका भी मनन । करें। सूर्य प्रकाश इतने विपुल प्रमाणमें भूमिपर आता है कि वह भावश्यकामे कई गुना अधिक है । इतना होते हुए भी लग गलियों, तंग मकान, अधेरे कमरे और उनमें अ यधिक मनुष्यो. की संख्या होनेके कारण जोवन देनेवाला सूर्यनारायण हमारे आरोग्यवर्धनके लिये प्रातदिन आना है, तथापि हमारेलिये वह सतना लाभ नहीं पहुचा सकता जितना कि वह पहुचाने में यमर्थ हैं । ये मय दोष मनुष्यकृत है । ऋषिजीवनका हमें इस विषयमें बहुन विचार करना चाहिये और जहातक हो सके वहां तक यत्न करके वह सादगी हमारे खागपान, वत्राभूषण तथा भन्याय व्यवहार में आनी चाहिये । वेदके उपदेशानुसार प्रणिः अपना व्यवहार रखते थे, इसलिये ऋषि लोगोंको भतिदीर्घ आयु प्राम होती थी, और हम उसके बोल कुल उसटे जारहे है, इमलिये ग-युके वशमें हम अधिक हो रहे हैं।
प्रधम काण्टका मनन । ही है । खुली वायु और तुला सूर्य प्रकाश मनुष्यों को पूर्ण आयु राष्ट्रीय जीवन । प्रदान करने में समर्थ है, परंतु जो मनुष्य उनसे दूर भागते हैं जमे वैयक्तिक जीवन के लिये वैदिक उपदेशको पयोगिताई उनका लाभ कैसे हो सकता है। सृष्टिजल, सूर्य प्रकाश और उमी प्रकार सामाजिक और रानीय जीवन के लिये भी बदके शुद्ध पायु ये तीन पदार्थ वेद मंत्रों द्वारा आरोग्य बढानेवाले उपदेश अनि मनन करने योग्य है । यह विषय आगे मागे बताये हैं और आजकलके शानभी उस बात की पुष्टि कर रहे हैं, विशेष रातिमे आनेवाला है, और वहीं इसका अधिक निरूपण इतना ही नहीं परतु युरोप अमेरिकामें जहा शीत अधिक होता होगा। इस प्रथम कांडो भी राष्ट्र विषयक मंत्र यडे ओजम्ची है, उन देगोमें भी ऐसी संस्थाएं स्थापित हुई हैं कि जहा आरोग्य और अत्यंत बोधप्रद हैं। वर्धनके लिये सूर्य प्रकाशमें करीब करीब नगा रहना आवश्यक माना गया है । जिन लोगोंने तग कपडे पहनने रिवाज जारी सेवा करने के लिये यह आभूषण मेरे शरीरपर बांधा जा' उनत्तीसवें मूक्तमें राष्ट्रो लिये मुझे बढावो,' तथा 'राकी क्येि, वे ही युरोप अमरिकाके लोग इस प्रकार ऋषिजीवन की भोर झुक रहे हैं यह देखकर हमें वदी सचाईका जग में इत्यादि ओतस्वी उपदेश हरएक गगयों और हर एक के विजय हो रहा है यह अनुभव होने अधिक ही आनद होता मनुष्यों और राजपुरुषों के लिये आदर्श रूप है। राष्ट्रीय हाण यह वसिष्ठ सूक्त हरएर मनुष्यको चिनार करने योग्य है। है। विना प्रचार किये हुए ही लोग भूलते और भटकते हुए इस प्रथम बाडमें कई महत्त्वपूर्ण विषय आगये है उन राम वैदिक सचाईका इस प्रकार ग्रहण कर रहे हैं; ऐसी अवस्थामें यदि हम अपने वेदका अध्ययन करेंगे, उन वेद मंत्रोंके उपदे- यहाँ विचार करनेके लिये स्थान नहीं है। उग उग सून प्रसग ही विशेष यातमा दिग्दर्शन किया है। इगलिये मो शको अपने भाचरणमें दालेंगे, और अनुभव लेनेके पथात् भपने धार्मिक जीवनंस उस सचाईश जगत्में प्रचार करेंगे तो दुहराने भी यहां कोई आवश्यक्ता ही नहा है। पाठ दश संडका वारवार मनन करेंगे तो मनन उनो मनमें ही विशेष जगत् में इस सचाईका विजय होने में कोई देरी नहीं लगेगी। पातें स्वयं स्फुरित हो जायगी, जो ऊपरके विवरणमें लिखी नहीं इसलिये हम पाठकोंसे निवेदन करना चाहते है कि वे वेदका है । वेदका अर्थ जानने के लिये मना ही करना चाहिये। पाठ केवल मनोरंजकताके लिये न करें, केवल पारलौकिक भागा है कि पाठक मनन पूर्वक इम काटमा अन्याय यरेंगे भावनाये भी न करें, प्रत्युत वह उपदेश इस जगन् के व्यवहार भीर इस उपदेशसे अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करने में किस प्रकार ढाला जा सकता है, इसका विचार करते हुए यत्न करेंगे तथा जो विशेष यत अनुभवमें आ जायगी उम्ररा वेदका अध्ययन करें। तर इसके महत्त्वका पता विशेष रीतिगे प्रकाशन जनतारी मलाई लिये रंगे। इस प्रकार करने मका ही भला हो जायगा। लग जायगा।
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अथर्ववेदका सुबोध भाष्य। प्रथमकाण्डकी विषय-सूची। ४ ३ पृथ्वी में जीवन । मुमदार निवारण। पूर्वापर सम्बन्ध। शारीर शान का शान। ४जकता ४ " " ६ " २२ " जलकी मिलता। अलमें औषध समता भोर विषमता। ८ " ९ पसी पृद्धि। २४ सूक विषय अथर्ववेद के विषय में स्मरणीय कथन । मयदेदका महत्व । अपर्वशाखा। अपर्वके कम। मनका सम्बन्धी शान्तिर्म के विभाग। मन्त्रों के अनेक उद्देश्य । सूक्तोंके गण। अथर्ववेदकामहत्व। भयवेव प्रथम काण्ड। मेधाजनन। बुदिका संवर्धन करना। मनन। अनुसंधान। २विजयसूक्त। यधिक विजय पिताके गुण-धर्म- मानाके गुण-धर्म-कर्म। पुश्के गुण-धर्म-कमा एक भबुत भलंधर। इदम्पका विश्या पर सम्ममा युटरमा भार्ग। भोरपि प्रयोग। " १२ दो मायुष्यच माना प्रजनन शकि धर्म-प्रचार-मूत। अमिशन है। शानी उपदेशक । मम क्षत्रिय। १३ " " दोन है। " १४ . थमोपदेशका क्षेत्रा दुधोरामपार । मित भोगनरी दुष्ट जीवरका पधार भोपज पार्य पन्धरे दृष्टीपथानामा . " . एक विजय " " ८ समारोप का भारोप का पापना से मारोग्य। मित्र (प्राय)पुगेगारोम्म। पाल (1) मारोग्या माम्म। से भारोग्य। पार W औरोरा नविन धर्म-प. धमारीमाया नगर। Trte १" (११८) अथर्ववेदको सुबोध भाष्य परकी परीक्षा। पतिके गुणधर्म । " वधू परीक्षा। " " ९ वर्च: प्राप्ति का देवताओंका सम्बन्ध । उमतिका मूलमन्न। विजयके लिये संयम । भानसे जातिमें श्रेष्ठताकी माप्ति । जनताकी भलाई करना। उमतिकी चार सीनियर इन सूक्तोंका स्मरणीय उपदेश । १० भसत्य भापणादि पापोंसे छुटकारा पापसे छुटकारा पानेका मार्ग। एक शासक ईश्वर । ज्ञान और भक्ति। प्रायश्चित्त । पापी मनुध्या ११ सुख-प्रसूति सूक। प्रसूति प्रकरण। ईशभक्ति। देवोंका गर्भ में विकास। गर्भवती स्त्री। ३०॥ कन्याके गुणधर्म। मानीका समय। सिरकी सजावट। मंगनीके पश्चात् विवाह। १५संगठन-महायज्ञ-सूक्त संगठनसे शक्तिको वृद्धि। यज्ञमें संगतिकरण । संगठन का प्रचार। पशुभाव वा यज्ञ पशुभाव छोदनेका फल। १६ चोर-नाशन--सूच सीसेकी गोली। . " १९ " " रानु। " " गर्भा . ५८ " " आर्य वीर। १७ रक्तस्राव बन्द करना। घाव और रचनाव। दुर्भाग्य की ली। विधवाके वन। १८योमाब-वर्धन 1- सूक्त। कुलक्षण और सुलक्षण। वाणीसे कुलक्षणों को हटाना। वाणीसे प्रेरणा हाथों भौर पाचौंका दर्द। सौभाग्यके लिये। सन्तानका कल्याणा शत्रु नाशन - सूक्त । भान्तरिक कवच। इस सूकके दो विभाग। वैदिकधर्मका माध्य । मासक्नच भन्य कवचाक्षात्र पवन। दासभाषका नाशा २. महान् शासक। पूर्व सूक्त सम्बन्धी मापसकी फूट हटा दो। बहा शासका मुख प्रतिके लिये भादेश । धाईकी सहायता सूचना। १५ श्वापादि रोग निवारण युक्त। महत्त्वपूर्ण रूपक भारोग्य का दाता। सूर्य किरणों से चिकित्सा सर्व साधारण उपाय। १३ मन्त्रयांमी ईश्वरको नमन । सूक्त की देवता। तपका महत्व। परम धाम! युदमें सहायता। नमन। १४ दुरूवमुच। पहिरा प्रस्ताव। प्रस्नारा मनुमोदन। " 4 " " " " प्रथम काण्डको विषय सूची। ( ११९) २१ प्रज्ञा पालक-सूक . धान धर्म। " दुष्टीका सुधार ६५ २९ राष्ट्र-सवर्धन सूक्त । भनुसन्धान। भभावर्त मणि • इसे सूक्तका संवाद । राआके गुण राजचिह्न । বু লগ । सनकी सहायता। केवल राष्ट्र के लिये। ६८ १० भाष्य-र्धन-मूछ। " " ८२ 'राष्ट्र' का अर्थ ८३ D " आयुका सवर्धन। " २२हृदयरोग तथा कामिलारोगको चिकित्सा । वर्ण चिकित्सा। सूर्यकिरण चिकित्सा। परिधारण विधि। रूप और बल। रंगीन गौके दूषसे चिकित्सा। पथ्य। २३ चेत-कुछ.. नागन मून। श्वेतकुछ। निदान। दो भेद और उनका उपाय रंगका धुसमा। औषधियोंका पोषण। २४ कुछ- नागन-सूक्त। वनस्पतिके माता पिता। सकपकरण बनस्पतिपर विजय। सूर्यका प्रभाव । सूर्यसे वीर्य प्राप्ति। २५ शीत-पर-दूरीकरण सक्त। ज्यरकी उत्पत्ति ज्वरका परिणाम। हिमश्वरके नामा नमान्दा २६ सुख प्राप्ति-मूपत। देयोंसे मित्रता। " ८५ " सामाजिक निर्भयता। देवोंके आधीन आयुष्या हम क्या करते हैं। आदित्य देवोंकी जानती। देवकि पिता और पुन । . देवोंके स्थान। देवताओंके चार वर्ग। ८६ " ८७ + ८८ " ९० " .:: :: :: :: :: :: :: :: : " বিই মূৰনা " ३. माशा-पालक-मूक्त । दिक्पाल । देहमें चार दिक्पाल। आशा और दिशा। सकका मनुष्य वाचक भावार्थ। मनुष्यमें बार दारोंकी चार आशाएं। विशनि-दरसे प्रवेश ! (चित्र) द्वार, आशा मारोग्यका भाधार। मस्तम्म विशति द्वार। (चित्र) पृष्ठ वंश (चित्र) वितिद्वार, सहचारचक्र, पृष्ठ- वहमें वकों के स्थान। (चित्र) सानपान। कामोपभोग। बंधनका नाशा मगर दिक्पाल। " " " २५ पिजयीबीका पराक्रम। इन्द्राणी। नौर (ग्री। शत्रुधायक शमा सीन गुणा साता निर्जरायु। २८ दुध नारान प्रता पूर्यापर सम्पन्ध । दुनार लक्षण। " " " " " (१६) मथचदका सुबोध भाष्य " हवनसे पूजन । पापमोचन चतुर्थ देव। दार्थ आयु। विशेष रहि। प्रतिज्ञा -मीठी बाई ३५ तेजस्विता, बल और दीर्घायुष्यकी प्राति । दाक्षायण हिरण्य दाक्षायणी विद्या १०५ ९७३ सुवर्ण धारण *-- राक्षस और पिशाच सुवर्णके गुण " १.८ " १२ जीवन रसका महासागर स्थूल मष्टि। जीवन का रस भूतमात्रका माध्य। *सनातन जीवन जगत् के मातापिता जीवनका एक महासागर सपमा एक आश्रय म्थूल सूक्ष्म और कारण ३३ जल सस्त । पृष्टिया जल ५८ मधु विधा। मधु विधा। जमस्वभाव मोठा जीवन ३ h " सुवर्ण का सेवन शरीरमें देवोंके अश (चित्र) काली कामधेनुका दूध प्रथम पाण्डका मनन । सूफोंका कोष्ठक ऋषिविभाग सूक्तोंक गण अध्ययन की सुगमता अथर्ववेदके विषयोंकी उपयुक्तता व्यकिके विषयमें उपदेश आरोग्य साधनफे अभ्य उपाय राष्ट्रीय जीवन १०० १." १.२ " १.।
अथर्ववेद
का
सुको माध्य।
द्वितीयं काण्डम् ।
लेखक
पं० श्रीपाद दामोदर सातवळेकर,
साहित्मवाचस्पति, वेदाचार्य, गीतालङ्कार
अध्यक्ष-स्वाध्याय मण्डल, आनन्दाधम किला पारडी (जि सूरत)
तृतीय वार
सयत् २००८, शके १८७३, सन १९५१
033933333339929999999999333999999999REEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEED . . SEEEEEEEE SEGREEEEEEEEEEEEEEEEEEEEESEE सबका पिता। ececetter स नः पिता जनिता स उत बन्धुर्धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यो दुवानो नामघ एक एव तं संप्रश्नं भुवना यन्ति सौ ॥ ३ ॥ अथर्ववेद २०१३ "वह ईश्वर हम सयका पिता, उत्पादक और वन्धु है, यही सब स्थानों और भुवनोंको यथावत् जानता है । उसी मरेले इश्वरको अन्य सम्पूर्ण देवों के नाम दिये जाते हैं और सम्पूर्ण भुवन उसी प्रशंसनीय धरको प्राप्त करने के लिये घूम रहे हैं।" साया IE- पर. भारत मुगलप, स्थायाय मंडल, पररा(परत) Immmm.mmmmmmmmmmmmmmutnmnmeterrertertterror ॐ अथर्ववेद का सुबोधभाष्य । द्वितीय काण्ड । - इस द्वितीय काण्डका प्रारंभ "वन" सूतसे और "वेन" शब्दसे होता है। यह मंगल वाच शब्द है । ' वेन" शब्दका अयं " स्तुति करनेवाला, ईश्वरके गुण गानेवाला भक" ऐसा है । परमात्मा पूर्ण रीति स्तुति करने योग्य होनेसे उसीके साक्षा. एकारके और उसीके गुण वर्णन के मन्नोंका यह सूफ है। इस परमात्माको विद्या के नाम गुप्त विद्या, गूढ विद्या, गुय विद्या, परा विद्या, आत्मविद्या" आदि अनेक हैं। इस गुह्य विद्यामें परमात्माका साक्षात्कार करने के उपाय बताये जाते हैं । यह इस विद्याकी विशेषता है । विद्याममि श्रेष्ठ विद्या यही है जो इस काण्डके प्रारंममें दी गई है, इसलिये इसका अध्ययन पाठक इस दृष्टिसे करें। जिस प्रकार प्रथम काण्ड मुख्यतया चार मंत्रवाले सूफोंका है, उसी प्रकार यह द्वितीय काण्ड पचि मन्त्रवाले सूक्तोंका है। इस द्वितीय काण्डमें ३६ सूक्त हैं और २०७ मन्त्र हैं। अर्थात् प्रथम काण्डकी अपेक्षा इसमें एक सूत अधिक है और ५४ मन्त्र अधिक हैं । इस द्वितीय काण्डमें सूकोंकी मन्त्र संख्या निम्नलिखित प्रकार है। . . ५ मंत्रों सूक्त २२ हैं, इनकी मंत्र संख्या ६ ५ ३. " " ७ " . " " ८ १ U " " ३२ कुल सूक संख्या ३६ मंत्र संख्या इस द्वितीय काण्डके ऋषि देवता छंद आदि निम्नलिखित प्रकार है- मैन अपि देवता प्रथमोऽनुवाक: मा,मारमा विप ३ बगती मादनामा गर्य, मप्सरा १दिरानगती, विगदिरानाम गायत्री ५ मरिगनुष्ट ५ " कां०२ अंपर्यवेदका सुयोध भाग्य। २४) छंद मंत्र ऋपि अंगिराः देवता भैषज्यं, भायुः, धन्वन्तरिः चन्द्रमा, जनिडा ४ " अनुष्टुप, ६ स्वराहुपरिष्टा- न्महावृहती. र विराट् प्रस्तारपंक्तिः त्रिष्टुपः १,२वपरिधाबृहती 1 १ निचूत, २ विराट् । विराट् पथ्या यहती, ५ जगती पुरोविराट ५ अथर्वा भृगुः (भापर्वणः) ७ द्वितीयोऽनुवाका भतिः ४ .4 " शौनकः ( संपत्कामः) अथर्वा भैषज्यं, भायुः, ७ " बनस्पतिः धनस्पतिः यक्ष्मनाशनं, " ८ मृगुः (मांगिरसः) नुप्पदापों पंक्तिः ५विराट मस्तारपंक्तिः मनुष्टुप, ' भरिक, ४ पिराहुपरिटाहती ३ पप्पापंक्तिः, विराट ५ मिव पथ्यापरितः १ विराट प्रस्तारपात १ त्रिष्टुप्, २ सतपादष्टिः ३-५, ८ (१) समपदी धतिः सप्तपदी अंत्यष्टिः (२,३) दीपादा राणिहो। ९ निक्रति, ८ " " पावापृथिवी, नानादेवताः नृतीयोऽनुवाकः शुका कृत्यावूपणं, हत्यापरिहरणं १चतुष्पदा विराट, २-५ त्रिपदा पनि ४ पिपीलिकमप्पा नित २जगती,. ८ त्रिष्टुप मरदामा अपर्वा पावनः ममी मनुष्टुप विरामी ६ मानादेववाः भमिः शाळा, मंत्रोकदेवताः प्राणा,पाना, अतिः, अनुपए २ भूरिक, परिशिपाटी प्रिपाद्वायत्री. ४ ममा " . ., एस्पानिपुर, १५पागुरीजिए nिnel कपि-देवता-इंद-सूची। सूक मंत्र ऋषि देवता " " १६ एकपयासुरी मिष्टुप, मासुरी उणि ७ -- चतुर्थोऽनुवाका मति साली यहवी. चातन (सपरन क्षयकाम ) अपर्वा . १-४ निद्विपमा गायनी ५ भूरिश्विरमा २. यायु सूर्य " २१ ૨૨ " . ॥ २३ आप " " " 4 पापुष्य वनस्पति ५ चातनः सविता पंति अनुष्टुप, ४ भूर प्रिएप ३ वणीदिगती ४,५ मनुभुमो (४ भरिर) पञ्चमोऽनुवाका २७ कपिजल: बनस्पति २८ २९ पाम्भुः मपर्या शरिमा, मायु देवता . ३. मभापति मधिनी मिथुर १ गतो, ५ भरिए अनुप पापुरती नि प्रसारपनि मनुष्प, पप्पानि भूदि २पारागिरती । মাৰিদৎ प्रागुफा पती, ५ शानिए १ काव मही, पनमा, " .
अथर्ववेदका सुबोध भाष्य । मन ३४ ३५ ऋषि अथवा आगरा: देवता पशुपतिः विश्वकर्मा " " - त्रिप १ यूहतीगर्मा, ५ भूरिक १ भूरिद २,५-७ भनुष्टुप. ८ पतिवेदन: मग्नीपोमो ८ निवृ.पुर इष्णिम् २ २ " १ " इस प्रकार सूचोंके ऋषि देवता और छंद हैं। स्वाध्याय करने के समय पाठकों को इनके ज्ञानसे बहुत लाभ हो सकता है । अब हम पित्रमसे सूतोंका कोष्टक देते हैं- १ अर्वा- ४,७,१३, १९-२३, २९, ३४ ये दस सूक्त । १मझ, भात्मा-१ यह एक सूक्त। प्रक्षा- १५-१७,२४, ३३, ये पांच सूक्त । २ गंधर्व:- १ आगिरसो भृगुः-८-१० पे तीन सूक्त । ३ इन्द्रः- चावनः-१५,१८,२५, ४ मतिः ५ गिरा:-३, ३५, ये दो सूक्त । ६, १३, १४,१८, १९, ये पांच सूत । ५ वनस्पतिः - ३, ७-६, २५, २७ ये छ। सूक्तः । ६ काण्वः ३१,३२ ६ दीर्घायुष्यं - ३, ७, १५-१७, २४,२८ ये सात सूत। मायणो भृगु.-५ यह एक सूक्छ । ७ मारोग्यं - ८, ९, ११, १५-१७, २८ ये सात पूछ। ८ येन:- ८चंद्रमा- ४, २२, ३१, ३३ ये पार पक। ९ मातृमामा- जगिः -४ यह एक सूक्त १. शौनकः- १. नितिः - " २ " " " ११वायुः -२० " १२ -२१ . -१२ " " " २८ १५ मधिनी " " " " १२ भरद्वाज:- १२ सूर्गः १५ सविता-- २६ " १३ आदित्यः १४ कपिल १४मापः १५म्मू- ११ प्रजापति:--. १६ विश्वकर्मा -१५ १. पनिवेदन:- १० मनीयमी -३ ये परमानुसार सूत । सब देवता-प्रमानुसार १८ पशुपति एकामाना देखिये- १९पनुः भन्य मूतों में भनेक देवताएं है, जो प्रत्येक मंत्र के विवरण में पाठक देख प्रकते । प्रमान देवता एका अपार ९ साप रमा पर। अपंवार नरे समय ये क पार के लिए करे योगी से गाते है। इसे कितने विप र माप गार ना पारिए । यह बा १४८ जान त ? भार इस प्रकार विचार र मंत्री बार सूप अनुमान है। हनी पदिनीय भर्थ विचार - -१४ " " - सूक्त १ मं०१-३] अधर्ष वेदका सुबोध माध्य द्वितीय काण्ड । गुह्य-अध्यात्म-विद्या। - [ऋपि-वेनः । देवता-बदा, आत्मा ] पेनस्तराश्यत्परमं गुहा यद्यत्र विश्वं भवत्येकरूपम् । इंदं पृश्निरदुहुज्जायमानाः स्वर्विदो अभ्य नूपत वाः प्रतद्वोचेदुमतस्य विद्वान् गन्धर्यों धाम परमं गुहा यत् । श्रीणि पदानि निहिता गुहांस्य यस्तानि वेदु स पितुष्पितासद ॥ २ ॥ स नः पिता जनिता स उत बन्धुर्धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यो देवानी नामघ एक एव तं संप्रश्नं भुवना यन्ति सी अर्ध-- ( वेनः तत् परमं पश्यत् ) भक्त ही उस परमश्रेष्ठ परमा माको देखता है, ( यत् गुहा)जो हृदय की गुफा है और ( पन्न विश्व एकरूपं भवति ) जिसमें सम्पूर्ण जगत् एकरूप हो जाता है । ( इदं पृभिः जायमानाः पदुत्) इसीका प्रकृतिने दोहन करकेही जन्मलेनेवाले पदार्थ यनाये हैं और इसलिए ( स्वभिः याः) Hको जानकर मत पालन करनेवाले मनुष्यही इसकी (मम्यनूषत ) उत्तम प्रकारसे स्तुति करते हैं ॥१॥ (पत गुहा) जो हृदयकी गुफा में है (तत् अमृवस्य परम धाम ) वह अमृतका श्रेष्ठ स्थान (विद्वान् गन्धर्व प्रवोचत् ) ज्ञानी षष्ठा कहे । (अस्प ग्रीणि पदा) इस के तीन पद ( गुहा निहिता) हदय की गुफा रखे है, [ तानि वेद ) जो उनको जानता है (स. पितु. पिता मसत् ) वह पिताका भी पिता भदि यहा समर्थ हो जाता है ॥२॥ [सः नः पिता) पद हम सबका पिता है, (जनिता ) जन्म देनेवाला (उत सः) और वह भाई है, वह (विश्या मुवमानि धामानि पेद) स भुवनों और स्थानों को जानता है । ( यः एकः एव ) वह मछाही एक (देवानां नाम-धः) सम्पूर्ण देवों के नाम धारण करनेवाला है,(सं-प्रभ) सी उतम प्रकार से पूछने योग्य परमात्मा. के प्रति ( सर्या भुपना पन्ति ) संपूर्ण भुवन पहुंचते हैं ॥३॥ भाषा-जिसमें जगत् की विविधता भेदका त्याग कर एकरूपता प्राप्त होती है और जिसका निवास में है, उस परमारमाचो मी अपने हृदयमें साशात देखता है। इस प्रतिने उसी एक बारमाही विविध शक्तियोको निचोड पर उता होनेवाले इस विविध जगत को निर्माण किया है, इसरिए आरमज्ञानी मनुष्प सदा उसी एक भारमा गुगान एते २०१४ बोअपने हृदयमें ही है उस अमृत के परम धाम वन बामनी सदमी पता हो । सोही पार उदय प्राप्त है, जो नको जानता है, या परम झाना होता है॥२॥ वही म सा पिता, अन्मदाता और भाई मोहोनियो गड परीयार नामा रेपन मनाली एक और मम भादिपूर्ण व देवार माम मोरे ने अरोरा Rirl जन उप विजय पारंपार मेरान Wataहुए भन्नमें उd...
(८) अथर्ववेदका सुयोध भाष्य [कां०२ परि द्यावापृथिवी सद्य आयमुपतिष्ठे प्रथमजामृतस्य । वाचमिव वक्तार भुवनेष्ठा धास्युरेप नन्वे पो अग्निः ॥४॥ परि विश्वा भुवनान्यायमृतस्य तन्तुं विततं दृशे कम् । यत्र देवा अमृतमानशानाः समाने योनावपरयन्त भर्य- ( सधः ) शीघ्र ही ( धावा-पृथिवी परि मार्य ) दुलोक और पृथ्वी लोकमें सर्वग्र मैं घूम भाया हूं और भग (तस्य प्रथमजा उपातिगे ) सरपके पहिले उत्पादक की उपासना करता हूं। ( वतरि पाचं इघ ) पका जैसी वागी रहती है, उसी प्रकार यह ( भुवने-स्थाः ) सय भुवनों में रहता है, और ( एषः धास्युः ) यहो सका धारक और पोषक है, (ननु एषः अप्तिः ) निश्वयसे यह पग्नि ही है ॥ ४ ॥ (यग्र ) जिसमें ( अमृतं मानशाना: देवाः) अमृत थानेवाले सव देव (समाने योनौ) समान भाभयको (अप्पर पन्त ) प्राप्त होते हैं, स ( ऋतस्य ) सत्यके (विततं के तन्तुं दृशे ) फैले हुए सुखकारक धागेको देखने के लिए मैं [विश्वा मुनगान परि माय ] सव भुवोंम घुम भाया हूँ ॥ ५॥ भाग- शुलोक और पृथ्वी लोकके अंदर जो अनंत पदार्थ है,उन सबका निरीक्षण करने के बाद पता लगता है,कि मदत सग्य नियमों का पहला प्रवर्तक एकही परमात्मा है, इसलिए मैं उसांकी उपासना करता हूं। जिस प्रकार घक्ता पाणी इमा है, उसी प्रकार जगत के सयपदा प्राणियोम वह साधारण पोषण तो एक मारमा रहता है, उसको अग्नि मी कह सकते है अर्थात् जैसा अग्नि लकडीमें गुप्त रहता है उसी प्रकार यह सब पदार्थों में गुम रहता है। जिस एक परमात्मामें ममि वायु सूर्यादि देव समान रीतिसे आश्रित है और जिसकी अमृत मयी शक्ति संपूर्ण ठरू देवान कार्य हा रही है, यही एक सर्वत्र फैला हुआ व्यापक मान्य है, उसी का साकार करने के लिए सब वस्तुमात्रका निरीक्षण मैंने किया है और पक्षात् पारे दर वही एक सूत्र फेला है यह मैंने अनुभव किया है । ५॥
(९)
पूर्व तयारी (प्रथम अवस्था)
गूढविद्याका अधिकारी।
सम विद्याओंमें यह गुह्य विद्या मुरय है, इसलिए हरएक को इस विद्यारी प्राप्ति के लिये यत्न करना चाहिए। वास्तवमें
देखा जाय, तो समी मनुष्य इसकी प्राप्तिके मार्ग में लगे हैं, कई दर के मार्गपर हैं और कईयोंने समीपका मार्ग पका है, इन
अनेक मागमिसे कौनसा मार्ग इस सूकको मभीष्ट है, यह बात यहाँ अप देखेंगे-
देन: तत्पश्यत
-
'वेनही उसको देखता है, यह प्रथम मंत्रका विधान है। यहां प्रत्यक्ष देखता है, जिस प्रकार मनुष्य स्र्यको
भाकाशमें प्रत्यक्ष देखता है उस प्रकार यह भक इस मात्मा को अपने हृदयमें प्रत्यक्ष करता है, यह माव स्पष्ट है। यह मधि-
कार 'वेन' का ही है यह 'वेन ' कौन है ? ' ' धातु के अर्थ- 'मजन पूजन करना, विचार से देखना, भक्ति करना,
तथा इसी प्रकार के उपासनाके कार्य करने के लिये जाना ' ये हैं। ये ही अर्थ यहा वेन शब्द में है। जो ईश्वर का भजन पूजन
करता है, हृदयसे उसकी भक्ति करता है, विचारकी दृष्टि से उसको जानने का प्रयत्न करता है । इस प्रकारका जो ज्ञानी मक
है, यह वेन शब्द यहां अभिप्रेत है। इसलिए केवल " वाद्धमान " मर्य ही यहाँ लेना उचित नहीं है। कितनी मो युद्धिको
विशालता क्यों न हुई दो, जयतक उसके हृदयमै भक्ति की लहरें न उठती हो, तपता उस प्रकार शुष्क ज्ञान परमारमाका
साक्षात्कार नहीं हो सकता, यह यहा इस सूक द्वारा विशेष रीतिसे बताना है।
द्वितीय मंत्रमें कहा है कि-
भमृतस्य धाम विद्वान् गंधर्वः॥२॥
"अमृतके धाम को जाननेवाला गंधर्व ही उसका वर्णन कर सकता है।" इसमें "" दाद विशेष महत्वपूर्ण है। गंधर्व
शब्द का अर्थ "संत, पविजारमा" कोशों में प्रसिद्ध है और यह शब्द वेन शब्द पूर्वोच के साथ मिलता जुलता भी है।
तथापि "गोवाणी धारयति" अर्थात् " अपनी वाणीका धारण करनेवाला" यह अर्थ यहाँ विशेष योग्य है। यणीका धारण तो
सप करते ही हैं, परंतु यहां माणीका बहुत प्रयोग न करते हुए अपनी वापशक्तिका संयम करनेवाला, अत्यन्त आवश्यता होनेपर
ही वाणीका उपयोग करनेवाला, यह भयं गंधर्व शब्दमें है। विशेष अर्थ से परिपूर्ण परंतु अल्प शब्द बोलनेवाला विज्ञान गंधर्य
शब्दसे यहो लिया जाता है । प्राया भारमशानो वक्ताका वक्तृत्व मूरतासे ही होता है, किंवा थोडे परंतु अर्थपूर्ण शन्दोयेही आमदनी
पवित्रामा आठ पुरुष जो कुछ कहना है, कह देता है। अतक लौकिक विद्याका ज्ञान मनुष्येक मनमें हलबली मचार। गहना
है, सप तक ही मनुष्य मेघगर्जना के समान वक्तृत्व करता रहता है, परंतु इसका परिणाम श्रोताओंपर विशेष नही होता । जय
भात्मशान होता है और ईश्वर साक्षाकार होता है, तब इसका वक्तृत्व मल्प होने लगता है। परंतु ममा माता जाता है।
पाशकिपर संयम होने लगता है। यह गन्धर्व भवाया समझिये।
यह "वेन और गंध ये दो शब्द भारमशान के अधिकारों के पाचक शब्द है। उपासक,मक सपा ममीर शब्दों का प्रयोग
संयम के साथ करने वाला जो होता है, वही परमात्माचा साक्षात्कार करता है भार यही उसका वर्णन मीर राहता है।
पूर्व तैयारी । (प्रथम अवस्था)
उज उपासक भारमशानी हो सकता है, परंतु इसके बनने के लिये पूर्वतयारी हो जाता है, यह सिर
लिखित शब्दों द्वारा उस वक्त में बताई है-
सपःचावाषिकी परि मापम् ॥ ४ ॥
विधा मुवनानि परिमायम् ॥५॥
अथवेदका सुबोध भाष्य । कुछ किया, मनुष्यको जो जो अभ्युदय विषयक करना संभव है, वह सब किया। यह गूढतत्वके दर्शनको प्रथम अवस्था है। इस अवस्था में भोगेच्छा प्रधान होती है। द्वितीय अवस्था । इसके बाद दूसरी अवस्था आती है, जिस समय विचार उत्पन्न होता है, कि ये नाशवन्त भोग कितने भी प्राप्त क्येि,तथापि इनसे सच्चो तृप्ति नहीं होती। इसलिये सच्ची तृप्ति, सच्चा मनका समाधान प्राप्त करनेके लिये कुछ यत्न करना चाहिये । इस द्वितीय अवस्थामें भागोंकी ओर प्रवृत्ति कम होती है और अभौतिक तत्त्व दर्शन की ओर प्रवृत्ति बढती जाती है। इसका निर्देश इस सूकमें निम्न लिखित प्रकार किया है- अमृतस्य विततं कं सन्तुं दृशे विश्वा भुवनानि परि मायम् ॥५॥ "अमृतका फैला हुआ सुखकारक मूल सूत्र देखने के लिए मैनें सब भुवनोमें चकर मारा, " अर्थात् इस द्वितीय अवस्थामें इसका चार इसलिये होता है, कि इस विविधतासे परिपूर्ण जगत्के अंदर एकताका मूल स्रोत होगा तो उसे देखें; इस दुःख कष्ट भेद लडाई झगड़ों से परिपूर्ण जगत्में सुख आराम ऐक्य और अविरोध देनेवाला कुछ तत्व होगा तो उसको ढूंढेंगे, इस उदेश्यसे इसका भ्रमण होता है । यह जिज्ञासूकी दूसरी अवस्था है । इस अवस्था का मनुष्य तीयों क्षेत्रों और पुण्यप्रदेशों में जाता है, यहां सज्जनों से मिलता है, देशदेशांतर में पहुंचता है और वहासे ज्ञान प्राप्त करता है इसका इस समय का उद्देश्य यही रहता है, कि इस विभेद पूर्ण दु खमय अवस्थास अभेदमय सुखकारक अवस्थाको प्राप्त करें । इतने परिश्रम करनेसे उसको कुछ न कुछ प्राप्त होता रहता है और फिर वह प्राप्त हुए ज्ञानको अपने में स्थिर करने का यत्न करने की तैयारी करता है । इस प्रकार वह दूसरी अवस्था तासरी अवस्थामें पहुंचता है। इस तीसरी अवस्थाका वर्णन इससूक्तमें निम्न लिखित शब्दों द्वारा किया है- तृतीय अवस्था। घावापृथिवी परि भाप सद्यः तस्य प्रथम उपाति ॥ ४॥ "मैं दुलोक और पृथ्वीलोक में खूप घूम आया हूं और अब मैं सत्य के पहिले प्रवर्तक की उपासना करता हूं।" जगत् मरमें घूमकर विचार पूर्वक निरीक्षण करने से इसको पता लगता है कि, इस विभिश जगत् में एक अमिन तव और वही (क) मा मुख देवाला है । जब यह ज्ञान इसको होता है, तब यह उसके पास जाने की इच्छा करता है। उपाधनासे भिन्न कोई अन्य मार्ग उसको प्राप्त करने का नहीं है, इसलिये इस मार्ग में अब यह उपासक भाता है। ये अवस्थायें इस सूचके मंत्रों द्वारा व्यक होगई है, इन मंत्रों के साय यद वाजसनेयी संहिता के मंत्र देसनेसे यह विषय अधिक सुल जाता है। इसलिये ये मंत्र भय यहां देते हैं- परीत्य भूतानि परीत्य लोकापरीत्य सर्पाः प्रदिशो दिशश्च । उपस्थाय प्रथमजामृतस्यारमनारमानमभि सं विषेशn परि घावापृथिवी सच इवा परि लोकापरि दिशः परि स्वः। अवस्य तन्तुं विततं विस्य पदपश्यत्तदमयत्तदासीत् ॥ १२॥ वा. यशुम, ३२ ( भूतानि पख) सब भूतोंको जानकर या भूमि पूमकरके ( लोकान् परीय) लोकोंमें भ्रमण करके (सर्गा दिशा दिशप परीय) दिशा और उपदिशामोमें भ्रमण करके अपात् इन सबको पावत् जानकर ( अतस्य प्रथम उपरथाय ) वस्य पहिले नियम के प्रवर्तक उपापना करके (भारमना पारमानं ) केवल मारमा परमारमा प्रति (मि पवि३०) गब प्रकार प्रविष्ट रोताहूँ॥1॥ है ॥
पूर्णावस्था। , ये दो मंत्र उपासककी नातिके मार्गका प्रकाश उत्तम रीतिसे कर रहे हैं । जगत् में घूम आनेकी जो पात अथर्ववेदने कही थी, उसका विशेष ही स्पष्टीकरण इन दो मंत्रोंके प्रथम भाद्वारा हुआ है : “सब भूत, सब लोकलोकान्तर, सब उपदिशाएँ, गु और पृथ्वी के अंतर्गत सब पदार्य, अथवा अपनी सत्ता जहाँ तक जासकती है, वहाँ तक जाकर, वहांतक विजय करके, पहा. तक पुरुषार्थ प्रयत्नसे यश फैलाकर तथा वन सबका परीक्षण निरीक्षण समीक्षण आदि जो कुछ किया जाना संभव है, वह सब करके देख लिया । इतने निरीक्षणसे ज्ञात हुआ कि अटल सत्यनियमोंको चलानेवाला एकही सूत्ररूप आत्मा सबके अंदर हैं, वही सर्वत्र फैला है, उसीके आधार सब कुछ है, उसके आधार के बिना कोई ठहर नहीं सकता। जम यह जान लिया तप उसकी ही उपसना की, और केवल अपने आत्मासेही उसमें प्रवेश किया । जब वहाँका अनुभव लिया, तब उपायक वैषा पन गया, जैसा पहिले था। पाठक इन मंत्रों के इस आशयको देखेंगे तो उनको पता लग जायगा, कि जो अथर्ववेदके इस सूक के मंत्रों द्वारा आशय व्यक हुआ है, वही बढे विस्तारसे इन मंत्रोंमें वर्णित हुआ है । और ये मंत्र उन्नतिकी अवस्थाएं भी स्पष्ट शन्दोंद्वारा पता रहे हैं, देखिये- १ प्रथम भवस्था-(मज्ञानावस्था)-अपने या जगत के विषय का पूर्ण अज्ञान । २ द्वितीय अवस्था-(भोगावस्था)-जगत् अपने भोग के लिये है, ऐसा मानना, और जगत्को अपने स्वाधीन करनेका यत्न करना। जगत् पर प्रभुत्व स्थापित करना । इसी अवस्थामें राज्यश्वर्य भोग पढाये जाते हैं। ३ तृतीय अवस्था-(त्यागावस्था)-जगत्के भोगोंसे असमाधान होकर विभक्तोंमें व्यापक अविभक सत्ताव छी सदस्तुको ढूंढने का प्रयत्न करना । वह जिज्ञासूकी अवस्था है ५ चतुर्थ भवस्था (भक्तावस्या )-मनुष्य विभिन्न विश्वमें व्यापक एक अभिन्न प्रारमतत्वो देसने लगता है और श्रद्धा भक्ति उसकी उपासना करने लगता है। ५ पंचम अवस्था-(स्वरूपावस्था)-उपासना और मति दृढ और पहज होनेपर वह तद्रूप हो जाता है, मानो उसमें एक रूप होकर प्रविष्ट होता है, या जैसा या वैमा बन जाता है। यही साक्षात्कार की भवस्या है, यहाँ इयको मस शान प्रत्यक्ष होता है। यही मार्ग इस अपर्व सूतमें वर्णन किया है। यहाँ पाठकों को स्पष्ट हुभा होगा कि पूर्व तैयारी कौनसी है और भगेका मार्ग क्या है। पूर्णावस्था। पूर्वोक्त यजुर्वेद के मंत्रों में कहा है कि- उपस्पाय प्रपमजामृतस्य मारमनारमानमभि से विदेश ऋठस्प पन्तुं विततं विवृत्य । पपश्यत्तदमवत्पदासीन "त्य पहिले प्रवर्तक परमारमाजी उपाधना करके मारमा परमात्मामें प्रविष्ट हुमा । मुम्ब फले पानमा देवर वैसा हुआ जैसा कि पहिले पा। यह वर्णन पूर्ण अवस्था॥ सो निनलिपिक शरामस एपमहा- स्वविदःमाः पम्पनराव ॥12 पा.प.अ.१२ " अमाप पाम विज्ञान पशानिरपितुष्पिताइमर अथर्ववेदका सुबोध भाष्य। [काण्ड . - (मा) व्रत पालन करनेवाले ( स्वर्विदः ) मात्मज्ञानी उसी की स्तुति करते हैं। वे अमृतके धामको जानते हैं । जो ये धाम जानता है वह पिताका पिता अर्थात् सयमें अधिक ज्ञानी अथवा सबमें अधिक समर्थ होता है । " यह अंतिम फल है पूर्ण अवस्या में पहुंचने का निश्चय इससे हो सकता है। प्रथम मंत्रमें "वा." शब्द बढा महत्त्व रखता है । व्रतों या नियमों का पालन करनेवाला अपनी उन्नति के लिय जो नियम भावश्यक होंगे उनको अपनी इच्छासे पालन करनेवालेका यह नाम है। नियम स्वयं देखकर स्वयंही उस व्रतका पालन करना बेटे पुरुषार्थसे साध्य होता है । इसमें व्रतभंग होने पर अपने आपको स्वयंही दंड देना होता है, स्वयं ही प्रायश्चित करना होता है । महान् आत्माती ऐसा कर सकते हैं । हरएक गनुष्य दूसरे पर अधिकार चला सकता है, परंतु स्वयं अपने पर अधिकार चलाना प्रति कठिन है। अपनी संपूर्ण शक्तिया अपने आधीन रखनी और कभी कुविचार आदि शत्रुओंके आधीन न होना इत्यादि महत्व पूर्ण बातें इस आत्मशासनमें आती हैं । परतु जो यह करेगा, वही आत्मज्ञानी और विशेष समर्थ बनेगा और उसीक महत्त्व आप लोग मानेंगे। सूत्रात्मा। मणियोंकी माला बनती है, इस मालामें जितने मणि होते हैं, उन सबमें एक सूत्र होता है, जिसके आधारसे ये मणि रहते हैं । सूत्र टूट गया तो माला नहीं रहती और मणि भी बिखर जाते है। जिस प्रकार अनेक मणियों के बीचमें यह एक सूत्र या तंतु होता है, उसी प्रकार इस जगत् के सूर्यचद्रादि विविध मणियोंमें परमारमाका व्यापक सूत्र तन्तु या धागा है, जिसके आधारसे पह सब विश्व रहा है, इधीका दर्शन नहीं होता, सथ मालका ही वर्णन करते हैं, परंतु जिस घागेके आधारसे ये सब मणि मालारूपमें रहे हैं, उस सूनका महत्व सत्त्वज्ञानी ही जान सकता है और वह उस जगदाधार को प्राप्त कर सकता है । बेदमें "तन्तु, सूत्र" आदि शब्द इस अर्थमें आगये हैं। जगत्के संपूर्ण पदार्थ मानके अंदर यह परमात्माका सून फेला है, कोई भी पदार्थ इसके आधारफे विना नहीं है। यह जानना, इस ज्ञानका प्रत्यक्ष करना और इसका साक्षात्कारसे अनुभव लेना गट विद्याका विषय है, जो इस सूक द्वारा पताया है।
एकरूपा (१३) - " इस गुह्य विद्याका अनुभव लेने के विषयों पडा लाभानिःसंदेह होता है; परंतु यह एक बाह्य साधन है । सची गुफा हृदय की गुहा ही है । हृदा की गुफा सब जानते ही है। इसी में इस गुद्यतत्वकी खोज करनी चाहिए। सब प्राणी तथा सब मनुष्य बाहर देखते हैं, इस बहिदृष्टि से गुद्यतत्वकी खोज नहीं हो सकती। इस कार्य के लिए दृष्टि अनर्मुख होनी चाहिए, अपनी इंद्रिय शजियों का प्रवाह अंदर की ओर अर्थात् उलटा शुरू होना चाहिए। तभी इछ गुह्य तत्व की खोज हो सकती है। अपने हृदयमें ही उस गुय आत्माको देखना चाहिए । अर्थात् इसकी प्राप्तिके लिए बाह्य दिशाओं में भ्रमण करने की आवश्यकता नहीं है, अंतर्मुख होकर अपनी हृदयकी गुफामें देखना चाहिए। चार माग यह अमृतका धाम हृदयमें है। यदि इस अमृत के चार भाग मान लिए जाय, तो तीन भाग अंदर गुप्त हैं और केवल एक भाग ही बाहर व्यक्त है । जो बाहर दिखता है, जो स्थूल दृष्टि से अनुभवमें माना है वह अत्यंत अल्प है, परंतु जो अंदर गुप्त है, वह बहुत विस्तृत ही है । अपने शरीर में भी देखिये आत्मा-युद्धि, मन, प्राण ये हमारी अंतःशक्तियां अदृश्य है और स्थूल शरीर यह दृश्य है। यदि शफिकी तुलना की जाय तो स्थूलशरीर की शकि को अपेक्षा आंतरिक शकियां बहुत ही प्रमाव- शाली हैं । अर्थात् स्थूल और व्यक की शक्तिको अपेक्षा सूक्ष्म और भव्यक की शाकि बहुतही यही है । यही यहां निम्नलिखित शब्दोंद्वारा व्यक हुआ है श्रीणि पदानि निहिता गुहास्य यस्तानि वेद स पितुष्पिताऽसत् ॥ २५ ॥ इसके तीन पाद गुहा में गुप्त है, जो उनको जानता है वह समर्थ से भी समर्थ होता है।" अर्थात् स्थूलशरीरकी शक्तिकी स्वाधीनता होनेकी अपेक्षा भातरिक शक्तियोंपर प्रभुत्व प्राप्त होनेसे अधिक सामध्य प्राप्त होता है । इसी विषयों में मंत्र देखिये- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥३॥ त्रिपादूर्व उदेस्पुरुषः पादोऽस्पहाऽभवत्पुनः ॥ ४ ॥ ऋ० १०1९.वा. य.३१ त्रिभिः पद्भिर्यामरोहरपादोत्यहाऽभवरपुनः । त्रिपाद्रा पुरुरूपं वितष्ठे तेन जीान्ति प्रदिशश्चततः। अथवं. ९/१०९ " उसके एक पादसे सब भूत भने हैं और तीन पाद अमृत दुलोक में है । तीन पाद पुरुष का ऊपर उदय हुआ है, और एक पाद पुरुष यहां वारंवार प्रकट होता है । तीन पार्यो स्वर्गपर चढा है और एक पाद यहां पुनः पुनः होता है ॥ तान पाद ब्रह्म बहुत रूप धारण करके ठहरा है, जिसमें चारों दिशाएं जीवित रहती है।" इन पक्ष मनोका तात्पर्य वही है, जो इस सूक्त के ऊपर दिए हुए भागमें बताया है। उस अमृतको अल्पछी शक्ति स्थूल में प्रकट होती है. शेष अनंत शक्ति मप्रकट स्थिति में गुप्त रहती है और उस गुप्त शत्तिासे ही इस व्यक्त में कार्य होता रहता है। पाठक मनकी शक्ति की शरीरकी शक्ति के साथ तुलना करेंगे, तो उक्त बातका पना उनकी लग जायगा । मनकी शक्ति- बहुत है उसका थोडासा माग शरीरमें गया है और यहाँ कार्य कर रहा है। यह स्थूल में कार्य करनेवाला अंशरूप मन वारंवार मूल गुप्तमनकी शक्तिये प्रभावित होता है, नवजीवन प्राप्त करता है और वारंवार शरीरमें आकर कार्य करता है। यही बात अधिक मस्यता अमृततत्व के साथ संगत होती है। उस केवल एक अंश प्रकट है, शेष अनंत शक्ति गुप्त है, इसके साथ অথনা ৰথ সানা মুনিয়াঙ্কা ট্রা मथर्व १९।६ 1 अगत् में विविधता है और इस भात्मतत्त्वमें एकरूपता है । जगत्में गति है इसमें शांति है, जगतमें मिलता है इसमें एकता है। इस प्रकार जगत्का और मारमाका वर्णन किया जाता है, सब लोग इस वर्णन के साथ परिचित हैं, इछ सूक्तमें भी देखिए- (१४) अथर्ववेदका सुबोध भाष्य । [कां०३ 1 - वेनस्तस्पश्यत्परमं गुहा यद्यत्र विश्वं भवत्येकरूपम् इंदं पृश्निरदुइज्जायमानाः स्वर्षिदो अभ्यन्षत वाः॥१॥ "ज्ञानी मक्त ही उसको देखता है, जो हृदयकी गुदामें है और जिसमें सम्पूर्ण विश्व अपनी विविधताको छोडकर एकरूप हो जाता है। इसकी शक्तिको प्रकृति सींचती है और जन्म लेनेवाले पदार्थ पैदा करती है। इसलिये आत्मज्ञानी व्रतपालन करने. वाले भक्त उस आत्माका ही गुण गान करते हैं।" पाठक अपने अंदर इसका अनुभव देख लें, जाग्रतीमें जगत्की विविधता का अनुभव आता है, स्वप्नमें भी काल्पनिक सृष्टि में विविधताका अनुभव आता है, परंतु तृतीय अवस्था गाढ निद्रा--सुषुप्ति में भिन्नताका अनुभव नहीं आता और केवल एकतत्वका अनुभव व्यक्त करना असंभव है, इसलिए उस समय किसी प्रकारका मान नहीं होता । सुषुप्ति, समाधि और मुक्तिमें ब्रह्म रूपता" होती है, तम-रज-सत्व-गुणोंकी भिन्नता छोड दी जाय तो उक्त तीनों स्थानों में ब्रह्मरूपता, भाम- रूपता अथवा साधारण भाषामें ईशरूपता होती है और इस अवस्थामें भिन्नत्वका अनुभव मिट जाता है, इसलिए इस अवस्थाको एक-व" कहते हैं। इसी उद्देशसे इस मंत्रमें कहा है कि- पा विश्वं एकरूपं भवति ॥ १ ॥ " जहां संपूर्ण विश्व एकरूप होता है। " भाव जिसमें जगत् की विविधता अनुभवमें नहीं आती, परंतु उस सप विवि- धता को एकताका रूप या आजाता है । वृक्ष के जह, शाखा, पल्लव आदि भिन्न रूपताका अनुभव है, परंतु गुठली में इन भिन्नता की एक रूपता दिखाई देती है। इसी प्रकार इस जगद्रुपी वृक्षकी विविधता मूल उत्पत्तिकारण में जाकर देखनेवे एकरूपता में दिखाई देगी । इसी मुख्य आदि कारणसे विविध शक्तियां प्रकृति अपने अंदर धारण करके उत्पत्ति वाले पदार्थ निर्माण करती है। इस रीति न उत्पन्न होनेवाले एक तबसे उत्पन्न होनेवाले अनेक तत्त्व बनते हैं। इनका ही नाम उक्त मंत्रमें 'जायमानाः पहा है। इनमें मनुष्यमी समिलित हैं और अन्य प्राणी तथा अप्राणी भी हैं। इनमें मनुष्यही ( माः) व्रतपालनादि सुनियमोंसे अपनी उन्नति करके आदि मुलको जानता और अनुभव करके ( स्वादः) प्रकाश प्राप्त करके प्रतिदिन अनुष्ठान करता हुआ समर्थ बनता जाता है। अनुभव का स्वरूप । आत्मज्ञानी मनुष्य अमृत धामका अनुभव किस प्रकार होता है, उसके अनुभव का स्वरूप अब देखना चाहिये-'भारम- शानी मनुष्य अमृतधाम को अपनी हृदयकी गुहामें अनुभव करता है, अनंत शफियां वहाँ ही इकछी हुई हैं, यह उसका अनुभव है।'(मंत्र २ देखो) और यह अनुभव करता है कि- 'यही परमारमा हम सबका पिता, उत्पादक, और भाई है, वही सर्वज्ञ है। (मंत्र) इतनाही नहीं परंतु "यही हमारी माता और यही हमारा मचा मित्र "यह मा का अनुभव है। यहाँ ऋग्वेद और अपर्व मंत्रोंजी तुलना कीजिये- स नः पिता जानता स उत बन्धुर्धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यो देवाना नामय एक एव संप्रमं मुरना यन्ति सर्वा । भयवं. २ पोमा पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद मुवनानि विश्वा । पो देवानां मामधा एक एप संप्रभं भुवना यन्त्यन्या ॥ ऋग्वेद 1010 समोसाघुनिता स विधाता पामानि धेद भुषनानि विधा। तिमें दुध पाठभेद है, परंतु सपा तात्पर्य अपर बताया दी है। यही ज्ञानी मझा अनुभव है। और एक अनुमय पद मंत्री दिया है वो भी पर देखिये- -- पा.यजु. ३२१.
वह एकही है। - जगत् का ताना और वाना। वनस्तस्पइयरपरमं गुहा सद्यत्र विश्वं भवत्येकनीडम् । तस्मिविद सं च विचैति सर्वस मोत. प्रोतश्च विभू प्रजासु ॥ वा. यजु. ३२।८ 'ज्ञानी भक उस परमात्माको जानता है जो हृदय की गुहामें है और जिसमें संपूर्ण विश्व एक घोसले में रहने के समान रहता तथा जिसमें यह सब विश्व एक समय (सं एति ) मिल जाता है या लीन होता है और दूसरी समय (वि एति) अलग होता है । (: विभूः) यह सर्वत्र व्यापक तथा वैभवसे युक्त है और ( प्रजासु ओतः प्रोतः) प्रजाओं में ताना और पाना किये हुए धागों के समान फैला है।" धोती में जैसे ताने और बानेके धागे होते हैं, उस प्रकार परमात्मा इस जगत् में फैला है, यह उम्र ज्ञानीका अनुभव है। चालक पर आपत्ति आती है उस समय वह बालक अपने माता पिता, बडे भाई, चचा, दादा, नाना आदिके पास सहायतार्थ जाता है। वही पालक बडा होनेपर आपत्ति आगई तो अपने समय मित्र के पास जाता है और उसमे सहायता लेता है। इसी प्रकार अन्य प्रसंगों में गुरु, राजा, आदिकों की सहायता लेता है। ये सब संबंध परमात्मामें ज्ञानी अनुभव करता है अर्थात् ज्ञानी मतके लिये परमात्माही सम्राट्, राजा, सरदार, शासक, शिक्षक, गुरु, माता, पिता, मित्र, भाई आदि रूप हो जाता है। एकके अनेक नाम एक ही मनुष्यको उसका पुत्र पिता कहता है, श्री पति कहती है, उसका भाई उसको बंधु कहता है, इस प्रकार विविध संबंधी सस एकही पुरुषको विविध संबंधों के अनुभव होने के कारण विविध नामोसे पुकारते हैं । इस रीतिसे एक मनुष्यको विविध नाम मिलने पर भी उसके एकत्त्वमें कोई भेद नहीं आता है इसी ढंगसे परमात्मा एक होने पर भी उसके अनंत गुणों के कारण और उपके ही अनंत गुण सृष्टीके अनंत पदार्थोमें लाने के कारण उसको अनंत नाम दिये जाते हैं । जैसा अग्निमें उष्णता गुण है वह परमात्मा से प्राप्त हुआ है, इसलिये अमिका अनि नाम पास्तविक गुणकी सत्ता की दृष्टि परमात्माका ही नाम है, क्योंकि वह अमिकाही अग्नि है। इसी प्रकार अन्यान्य देवोंक नामोंके विश्यमें जानना योग्य है। शरीरमें भी देखिये-आख नाक कान आदि इंद्रियां स्वयं अपने अपने कर्म नहीं कर सकती, परंतु आत्माको शक्तिको अपने अंदर लेकर ही अपने कर्म करने में समर्थ होती हैं । इसलिये सब इंद्रियों के नाम आत्मामें धार्य होते है, अत: मामाको मोखका आख, कानका कान कहते हैं। इधौ प्रकार परमात्मा सूर्यका सूर्य, विद्युतका विद्युत है। देवोंके नाम धारण करनेवाला परमारमा ऐया जो तृतीय मनमें कहा है, वह इस प्रकार सत्य है । यह एकही है। परमात्मा एक ही है, यह बात इस तृतीय मंत्रमें एक एव' (यह एक ही है ) इन शब्दों द्वारा जोरसे कही है । किसी- को परमात्माके अस्तित्व के विषयमें यत्किचित् मा शंका न हो, इसलिये एव पदकी योजना यहाँ की है। मक को भी ईश्वर के एफरवका अनुभव होता है, क्योंकि विभकॉमें भविमक' आदि अनुमय उसको होता है, इत्यादि विषय इससे पूर्व बताया ही है। शानी भफका विशेष अनुभव यह है कि, वह परमारमा "म-प्रश्न" है अर्थात् प्रश्न पूछने योग्य भौर रखने उत्तर लेने योग्य है । मक्सेि जब भक्त उसे प्रश्न पूछता है, तब वह उसका उत्तर साक्षागार से देता है। कठिन प्रगामें उसकी सहायता की याचना की, और एकान्त में अनन्य शरण वृत्ति से उसकी प्रार्थना की, तो वह प्रार्थना नि देह सुनता है, और मतके कष्ट पूर करता है। अन्य मित्र सहायतार्थ समयपर आसकेंगे या नहीं इसका नियम नहीं, परंतु यह परमारमा ऐur मित्र है, कि यह मनन्य मावळे शरण जानेपर सदा सहायतार्य सिद्ध रहता है और कभी ऐसा नहीं होता कि वह रणगत की सहायता न करे इसलिये पहायतार्थ यदि किसीसे पुछना हो, तो अन्य मित्रों की प्रार्थना करने की अपेक्षा इसने ही प्रार्थना करना योग्य है। क्योंकि हर धमय यह सुनने के लिये तैयार है और इसका उदार दयामय हस्त सदा हम सबपर है। - अथर्ववेदका सुयोध भाष्य। कां०२ - यह सबका (धास्यु ) धारण पोषण करनेवाला है और ( भुवने-स्था:) सपूर्ण स्थिरचर जगत्में ठहरा है अर्थात् हरएक पदामें व्याप्त है । कोई स्थान उससे खाली नहीं है । वकामें जैसा वक्तृत्व है, उस प्रकार जगत्में यह है, पचमुच यह अभि ही है। (मत्र ४) इसी प्रकार पाठक कह सकते हैं कि, यह सूर्य है और यही विद्युत् है, क्योंकि पदार्य मात्रकी सत्ता ही यह है, फिर अमि वायु रवि यह है यह कहने की आवश्यकता ही क्या है । परन्तु यहा सबकी सुबोधताके लिये ऐसा कहा है। मनुष्यका शब्द भारमशक्ति उत्पन्न होता है उसी प्रकार सूर्य भी परमात्माकी शक्तिसे प्रकाशता है। देवोंका अमृतपान । इस सूक्तके पांचवें मंत्रमें कहा है, कि उस परमात्मा देव अमृतपान करते हैं- पत्र देवा अमृतमानशाना समाने योनावध्यैरयन्त ॥५॥ "उस परमात्मामें देव अमृतपान करते हुए समान अर्थात् एकही पाश्रयमें पहुंचते हैं।" अर्थात् सब देव उसमें समान अधिकार से, समान रूप अथवा अपनी विभिन्नताको छोडकर एक रूप धनकर उसमें लीन होते है और वहां का अनुपमेय अमृत पीते हैं मुक्ति, समावि और सुपुति में यह बात अनुभवमें आती है मुक्ति और समाधि तो हरएक के अनुभवमें नहीं है,परतु सुषुप्ति घरएफ के अनुभवमें है। इस अवस्थामें सय जीव ब्रह्मरूप होते हैं। इस समय मानवी शरीरमें रहनेवाले देव अर्थात् सब इन्द्रियाँ अपना भेदभाव छाटकर एक आदि कारणमें लीन होती हैं और वहां आत्मामें गोता लगाकर अमृतानुभव करती हैं। इस अमृतपानसे उनकी सम थकावट दूर होती है और जब सुपुप्ति से हटकर ये इद्रिया जामतावस्था पुन लौट आती हैं, तर पुन तेजस्वी पनती हैं। यदि चार आठ दिन सुषुप्ति न मिली, तो मनुष्य-शरीर निवासी एक भी देव अपना कार्य करने के लिये याग्य नहीं रहेगा । बीमारी में भी जबतक सुषुप्त प्रतिदिन आती रहती है, तबतक बीमार की अवस्था चिताजनक समनी नहीं जाती । परतु यदि चार पांच दिन निद्रा पद हुई तो वैद्यमी कहते हैं कि, यह रोगी आसाध्य हुआ है । इतना महत्व तमोगुणमय सुपुप्ति अवस्था में प्राप्त होनेवाली ब्रह्मरूपताका और उसमें प्राप्त होनेवाले अमृतपानका है। इससे पाठक अनुमान कर सकने है कि समाधि और मुक्ति में मिलनेवाले अमृतपान कितना लाभ और क्तिना आनंद होता होगा। यम यही मत्र थोडे पाठ भेदसे आगया है वह भी यहां देखने योग्य है- पत्र देया अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ॥ का यजु. ३२॥१०॥ "बहा देव अगृत का भोग करते हुए सीपरे धाम में पहुचते हैं। " पूर्वोक मंत्र में जहां 'समाने योनी' शब्द हैं वहां इस मंत्रमें "तृतीपे घामन्" शब्द है । समान योनी का ही अर्थ तृतीय धाम है । जाग्रत्, खप्न, सुषुप्ति यदि ये तीन अवस्थाए मान भी जाय,तो तीसरी अवस्था सुषुप्ति ही भाती है जिसमें सब देव अपना मेद भाव छोटकर एक रूप होकर ब्रह्मरूप बनकर भगत पान करते हैं । स्थूल, सूक्ष्म, कारण ये प्रकृति के रूप यहाँ लिये, जाय, तो सब इन्द्र चन्द्र सूर्यादि देव अपनी भिन्नता स्यागकर उस मनमें लीन होकर अमृत रूप होते हैं। कानी भक्त महात्मा साधुमत ये लोग अपने समान मावसे मुक्त अवस्थामें सीन होते हुए भाव मोगरे महानदयो प्राप्त होते हैं। इस प्रकार इरएक त्यानमें इसका अर्थ देखना चाहिये 1 [पाठक इस सूकका मनन का ॥ ५ भोर २. इन दो सच्यक साथ करें] पहा इस प्रथम गुरुका विचार समाप्त होता है। यदि पाठक इस सूतके एक एक मंत्रालया मंके एक एक भागकारिकार करेंगे, भार उगपर अभिमनन गतो उनके मन गुपियाली बात स्वयं स्पुरित होगा। इस कमें शद पुन पुन १० और एक शब्द विशेष माष बता रहा है। विशेष विचार करने मुगमता के लिये अदा और यजुद के पाठ भी कहा कि से पाक अधिs मनन करते है। द यह विशेष विद्या है, इसलिये इसके मन में जितना अपित मागे एटना अधिक मा।
अथर्ववेदका सुबोध भाग्य। [ कां०२ यह सबका (धास्युः) धारण पोषण करनेवाला है और ( भुवने-स्था) संपूर्ण स्थिरचर जगत्में ठहरा है अर्थाद हरएक पदार्थ में व्याप्त है। कोई स्थान से खाली नहीं है । वका जमावत्व है, उस प्रहार जगत्में यह है, सचमुच यह भमि ही है। (मंघ ४ ) इसी प्रकार पाठक कह सकते हैं कि, यह सूर्य है और यही विद्युत् है, क्योंकि पदार्य मात्रकी सत्ता ही यह है। फिर श्रमि वायु रवि यह है यह कहने की आवश्यकता ही क्या है ? परन्तु यहा सबकी सुबोधताके लिये ऐसा कहा है। मनुष्य अन्न भामकि उसय होता है उसी प्रकार सूर्य भी परमात्माको शकिल ही प्रकाशना है । देवोंका अमृतपान । इस सतके पांचवें मंत्रमें कहा है, कि उस परमारमा देव अमृतपान करते हैं- या देवा अमृतमानशानाः समाने योनायध्यैरयन्त ॥५॥ "aa परमारमा देव अमृतपान करते हुए समान अर्थात् एकही मात्रयमें पहुंचते हैं।" अर्थात् सर देव उसमें समान अधिकार से, समान रूपसे अथवा अपनी विभिन्नताको छोडकर एक रूप बनकर उसमें लीन होते है और वहां का अनुपमेय अमृत पीते हैं। मुक्ति, समापि और पुपुर में यह बात अनुभवमें आती है मुति और समाधि तो हरएक के अनुभवमें नहीं है,परंतु मृति हरएक के अनुभव है। इस अवस्थामें सब जीव ब्रह्मल होते हैं। इस समय मानवी शरीर में रहनेवाले देव. अर्थात सर दिया-अपना भेदभाव छाटकर एक बादि कारणमें लीन होती हैं और वहां आत्मामें गोता लगाकर अमृतानुभव का। ६५ अमृतपानसे उनकी एक यकावट दूर होती है और जर सुप्ति से हटकर ये इंदिया जामतावस्था पुनः लौट want, as पुनः तेजस्वी बनता है। यदि पार आठ दिन मुषुप्ति न मिली, तो मनुष्य-शरीर निवासी एक भी देव अपना कार्य करने के दिन माय मागाीमारी में भी जाता सूपुप्त प्रतिदिन आती रहती है, तस्तक मार को अवस्था पिताजनक सममी नही बाती । परंतु यदि चार पाच दिन निदा पंद हुई तो वैयभी कहते है कि यह रोगी आपाय हुआ है। इतना महस्य तमोगुणमा मुगुरित अवस्था प्राप्त होनेयासी प्रदापामा भीर उसमें प्राप्त होनेवाले अमृतपानका है। इससे पाठक अनुमान र २ माघ और मुषि में मिलने वाले अमृतान कितना लाभ और कितना आनंद होता होगा। पर यही मंत्र पोरे पाठ भेदसे आगया है यह भी कहा देयने योग्य है- (१८) अथर्ववेदका सुवोध भाष्य । [कां. २ अप्रिये दिद्युम्नक्षत्रिये या विश्वावसुं गन्धर्व सर्चचे । ताम्यौ वो देवीनम इत्कृणोमि याः क्लन्दास्तमिपीचयोऽक्षकामा मनोमुहः । ताम्यो गन्धर्वपत्नीभ्योऽप्सराम्यौऽकर नमः पर्थ- (अन्-अवद्यामि भाभि. ) दोपरहित ऐसे इन प्राणशक्तियों के साथ वह ( 3 स जग्मे ) निवयसे मिला रहता है और (अप्सरासु अपि ) इन प्राणशक्तियों में भी (गन्धर्यः आसीत् ) भूमि भादियोंका धारक देव विद्यमान (भासा स्थान समुद्रं ) इनका स्थान अन्तरिक्षमें है, ( यता) जहाँसे (सद्यः) शीघ्र ही ये (भा यान्ति ) भाती हैं पौर (परा पन्ति च ) परे जाती है। यह पाव (मे पाहु ) मुझे बतायी है ॥ ३ ॥ (अनिये दिद्युत् ) धादलोंकी विद्युत् में अथवा ( नक्षानिये ) नक्षत्रों के प्रकाशमें भी ( या ) जो तुम (विवार उसु गन्ध ) विश्वके वसानेवाले धारक देव को ( संचवे ) प्राप्त करती हो अथवा उसकी सेवा करती हो, इसलिए है (देवी ) दवियो।(ताम्य वः) उम तुमको ( इत् नम कृणोमि ) निश्चय पूर्वक मैं नमन करता हूँ ॥४॥ (या लदा ) जो बुलानेवाली या प्रेरणा करनेवाली, (तमिपी--बया ) ग्लानिको हटानेवाली, (अक्ष-कामा) पांखोंकी कामना तृप्त करनेवाली, ( मनो-मुह ) मनको हिलानेवाली है ( ताभ्य गन्धर्व-पनीय अप्सराम्य ) जन गर्वनीरूप अप्सरामोको अर्थात् सर्वधारक आमाको प्राणशक्तियोंको ( नम. अकरम् ) मैं नमस्कार करता ह॥५॥ भावार्थ- इसके साथ जीवन की अनत दल ए है, इतना ही नहीं परतु वह तन जीवन शक्तियोंके अंदर मी है। इन सबका निवास मध्यलोद-अतरिक्ष-है, जहासे ये सब शक्तियां प्रकट होती है और जहां फिर गुप्त हो जाती है ॥३॥ मादलोंके मदर चमकनेवाला विद्युत में क्या और नक्षत्रों के प्रकाशमें क्या यह सब जगत्का पालन फतो एक रस भए 1, और इसाकी सेवा सपूर्ण जादनकी शक्तिरूप देवियों कर रही हैं, इसलिए उनको भी नमन करना योग्य है ॥४॥ ये प्राणशक्तियां सबको प्रेरणा करनेवाली, मनको चलाने वाली, पावटको दूर करनेवाली, माखोकी कामना तृप्त करनेवाली और मनको हिलानेष ली है। यहाँ आमाको शक्तिये हैं, इस दृष्टि में इनको नमस्कार करता हु ( अयं त् वह इनको किया शुभा मेरा नमस्कार भी उस बद्वितीय ईश्वर को ही पहुचेगा, क्योंकि ये शक्तिया उसी के आधारसे रहती है )॥५॥ पूर्व सम्बन्ध प्रथम सूक्तम " गुप अध्यात्मविद्या " का वर्णन किया गया है, तय सूक्तमें जिस परमात्मा देवका वर्णन किया गया है। इसीका वर्णन यदा " गंधर्व शाद से किया गया है। प्रथम ती मन्द है, इस पूर्व गुणाम सूत के साप सबध स्पष्ट हो जाता है। " (२०) अथर्ववेदका सुबोध भाष्य [कर । ७ सूर्यत्वम्--महान् महसरदमी सूर्य भगवान ही इसका देह है, अर्थात् यह उस में भी है इतनाही नहीं, परंतु उसका बदा तेज भी इसीसे प्राप्त हुआ है। यह इसकी महिमा है (मं.)। इसी प्रकार अन्यान्य पदार्थोंमें इसकी सत्ता देखनी चाहिए। यह शब्द एक उपलक्षण मान है। ८ विश्वा-पसुः (गंधा -विश्वका यही निवासक है । (मं. ४) ये लक्षण स्पष्ट कर रहे है कि यहाका यह गंधर्वका वर्णन निःसंदेह परमात्मा का वर्णन है। किसीभी अन्य पदार्थ में ये सब अर्थ पूर्णरूपसे सार्थ नहीं हो सकते। इसलिए पाठक इन लक्षणों का मनन करके अपने मन में इस परमात्म देव की माफि स्थिर करें, क्योंकि यही एक सबके लिए पूजनीय देव है । ब्रह्मकी बाम उपासना । इस परमात्माकी प्राप्ति इसकी उपासनासे होती है। इस सूक्तमें इसकी 'ब्राह्म उपासना' करने का विधान बना महरव. . . १ त स्वा यौमि ब्रह्मणा । (मं..) २ नमस्यः। (मं० १,२) नमस्ते मस्तु । (मं०१) ३ विक्षु इंध्यः । ( मं०१) ४ सुशेवाः। (मं०२) ये चार मंत्र भाग इसकी ब्राझ उपासना करनेके मार्ग की सूचना दे रहे हैं। ब्राह्म उपासना का अर्थ 'ब्रह्मय ' अथवा मन द्वारा करने की मानस उपासना' ही है। आमा वुद्धिचित्त मन आदि अंतःसाधनासे हो यह परमात्म पूजा होती है, इन शक्यिोंका नामही शरीर में ब्रह्म है। ब्रह्म शब्दका अर्थ मत्र भी है और मंत्रका आशय मनन ' है। मननसे यह उपाधना परनी होती है, मन के मनन से ही यह हो सकती है, किसी अन्य रीतिसे यह नहीं होती है, यह स्पतिया बताने के लिए यहां ब्रह्मणा राम इस मंत्र में प्रयुक हुआ है। यह बात ध्यान में धारण करके उफ चार मंत्रभागोंका भई ऐसाता:- १ वा यौमि मह्मणा-उस तुझ परमात्माको मनन प्राप्त होता हूं। (मनन ) २ नमस्यः [नमस्ते]-द ही एक नमस्कार करने योग्य है । (नमन) ३ यिभुईय:-सब जगत्में न हो प्रशंसा करने के लिए योग्य है। (सर्वत्र दर्शन ) 'मु-या:-तूही उपम सेवा के लिए योग्य है । ( सेवन ) इन चार मंत्र भागोंके मननसे मानस पूजाको विधि ज्ञात हो जाता है । (१) प्रभु के गुगोंडा मन मनन करना, (२) ससाको मनसे नमन करना, (३) प्रायक पदार्थ में तथा प्राणिमात्रमें उसका दान करना मोर (1) 84 वर्म उull पने लिए करना, ये चार भाग उप प्रभुरी उपासना है। इन चार भागों में से जितने भागोंका अनुन हुमाया, रतनी उप.ना ही प्रमाण या मनना चाहिए। 18 विचार करे और अपनी उपासना पET Esसोर्ट एक मनुष्य भान मापको परमामाय उपासक मानता है, परंतु उससे जो उपाधना हो रही है, या इस वैदिक माना TIो पिप गिनी सती है, वह भी देखना चाहिय। इस टीशर मंत्र भाग Aarti मरर un 'मनन, नमन, सदर और चन' ये पानाA H शमान पापना के पार गरि ६० मने aati मनन " म म मनमे सिरातीहै। cinamala भाता: "MAR TRICgमा, भात प्रामने कोन bar - अपने अंदरकी जीवन शक्ति। (२१) है। मनन के पश्चात् की यह स्वाभाविक ही अवस्था है ३" दर्शन " मननसे ही उसकी सार्वत्रिक सत्ता का मी अनुभव होता है। स्थिर चरमें एक रस व्यापक हैनिका साक्षात्कार होनेकी यह तीसरी उच्च अवस्था है। जगत्के अंदर प्रभुका ही सर्वत्र साक्षात्कार इस अवस्था में होता है। ये तीनो मानसिक क्रियाएं हैं। इसके पश्चात् यह भक अपने आपको परमात्माके परम यज्ञमें समर्पण करता है, वह सेवा- वस्था है। - "सेवन " यह इस अवस्थामें उसका सेवक बनता है । सेवन और भजन' ये दोनों शब्द समान अर्थके ही है- सेवन और भजन एकही अर्थ बताते हैं। प्रभु के कार्य के लिये अपने आपको समर्पित करना, यही भक्ति या सेवा है। 'दोनों का उद्धार' करना, साधुओंका परित्राण करना, सज्जनोंकी रक्षा करना, दुर्जनोंको दूर करना, ये ही परमात्मा के कर्म हैं। इन कमी को परमात्मार्पण बुद्धिसे करने का नाम ही उसकी भक्ति या सेवा है। नामस्मरण । नामस्मरण का भी यही तात्पर्य है, जैसा " हरि" (दु.खाका हरण करनेहारा ) देव है, इसलिए मैं भी दु:खिताका दुःख यथाशक्ति हरण करूगा और दूसरों को सुख देने के धर्म से ईश्वर की सेवा करूंगा।' राम' (आनंद देनेवाला) ईश्वर है इसलिये मैं भी दीन दुःखी मनुष्यों या प्राणियोंकी पीड़ा दूर करनेके यान द्वारा परमात्माकी भाफि या सेवा करूंगा । नामस्मरण ' का यही उद्देश्य है । यद्यपि आजकल केवल नाम का स्मरणही रहा है और उससे प्राप्त होनेवाले कर्तव्य का पालन नहीं होता है, तथापि वस्तुतः इससे महान कर्तव्य सूचित होते हैं, यह पाठक विचारसे जाने और परमेश्वरके इतने नाम कहनेका मुख्य उद्देश्य समझ लें। भनेक ग्रंथ पढने से जो कर्तव्य नहीं समझता, वह एक नाम के मननसे समझमें आता है, इसीलिये वेदादि ग्रंथों में परमात्माके अनेक नाम दिये होते है और वे सब बड़े मार्गदर्शक हैं, परंतु देखनेवाला और कर्म करनेवाला भक्त चाहिये । अस्तु । ईश्वर पासना के ये चार भाग हैं, इसका अधिक विचार पाठक करें और इस मार्गसे चलें । यही सीधा, खरल और अतिसुगम मार्ग है। बाह्य उपासना का फल। पूर्वाफ प्रकार मानस उपासना करने से जो फल प्राप्त होता है, उसका वर्णन भी इन मंना पाठक देख सकते हैं- वं स्वा यौमि-परमेश्वरके साथ मिलना, ब्रह्मरूप अवस्था प्राप्त करना । ( मं०१) २ देष्यस्य हरस भवयावा-परमात्मा सव महापीडाओं को दूर करनेवाला है, इसलिये सब पीडा उसकी प्राप्ति से दूर हो जाती है । (मे. २) ३ मृडात्-वह आनंद देता है । (मं. ३) इन शब्दोके मनन पाठकोंको पता लग जायगा कि, उपासना का फल परमानंद प्राप्ति ही है । वह प्रभु मरिचदानद स्वरूप होने से उसके साथ मिल जानेसे वही आनद उपासकमें आ जाता है और जितनी उपासनाकी दृढ़ता और पूर्णता होगी, उतना वह मानंद दृढ और पूर्ण होता है। यह फल प्राप्त करने काही पूर्वोक वैदिक मार्ग है। यहा पहिले दो मंत्रों का विचार हुआ। इसके पश्चात् के तीन मंत्रों का वर्णन ठीक प्रकार समझमें भाने के लिये उस वर्णनको प्रथम अपने शरीर में अनुभव करना चाहिये और पचात् वही भाव वेशाल जगत् में देखना चाहिये- अपने अंदरकी जीवन शक्ति। इससे पूर्व बताया गया है कि, जलतरयके भाषण कार्य करनेवाली प्राणशक्ति या जीवन शाकि ही 'अप्सरा' शब्दसे इस सूकमें कही है, देखिये इसका वर्णन- -