Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Sahitya Suman

Bhat,pt.bal Krishna · 2011/01

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६६
साहित्य-सुमन
।
सपादक
श्रीदुलारेलाल भार्गव
(सुधा-सपादक)

साहित्य की अन्य उत्तमोत्तम पुस्तकें १७,२) ४३), २) १॥ २॥ ॥ २७ |विश्व-साहित्य हिंदी-नवरत मतिराम-प्रथावली पूर्ण-सग्रह +देव और विहारी (बिहारी-रखाकर हिंदी मिश्रवधु विनोद प्र० भाग भवभूति सुकवि-सकीर्तन प्राचीन पदित और कवि निबध-निचय पुष्पाजलि कालिदास और शेक्सपीयर साहित्य-सदर्भ साहित्य प्रभाकर साहित्य-मीमासा साहित्य-दर्पण प्राचीन साहित्य २), २॥ 15, 13 १३, my MEN १७,900 1 । २), २) लगभग २) ३, ४) सब प्रकार की पुस्तकें मिलने का पता- संचालक, गंगा-पुस्तकमाला-कार्यालय, २६-३०, अमीनायाद-पार्क, लखनऊ

गगा-पुस्तकमाला का उनहत्तरवा पुष्प
साहित्य-सुमन
[स्वर्गीय पटित कालकृष्ण महर्जा के रमाले लेसा
का सहन]
प्रकाशक
Nodesanvedanies---
गगा-पुस्तकमाला-कार्यालय
२१३०, श्रमीनाबाट पार्क
लग्वनऊ
नसीयावृत्ति
सजिल्द 120] स. १६८४ वि० [मुल्य ॥2)
क

प्रकाराक श्रीदुलारेलाल भार्गव अध्यक्ष, गगा-पुस्तकमाला-कार्यालय लखनऊ , Magne- मुद्रक श्रीदुलारेनाल भार्गव अध्यक्ष, गगा-माइनआर्ट-प्रेस लखनऊ . निवेदन बहुत दिनों की श्राशा आज पूर्ण हुई। चिरकाल से निश्चय किए ये कि महजी के रसीले लेख पुष्प चुा उनके प्रेमियों के सम्मुख रस, लेकिन जमी ही मन किया, काँटे नज़र आए । अस्तु, किसी न किसी सरह यह अवसर हाथ आया, और अब यह एक रसीली लेख-मालिका पाठकों के सम्मुख रवी जाती है। यह माला टटकी, तत्काल की गुथी हुई नहीं है । भट्टजी के स्वसपादित ३२ साल के 'हिंदी प्रदीप' में स्थान-स्थान पर ये लेस जगमगा चुके है। पर हाकी तरोताज़गी, चट- कोलेपन और रसीलेपन में कहीं से भीयासीपन की गधनहीं झलकती। भद्दजी की लेखनी से निकली हुई तीन पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी है । यह चौथी पुस्तक 'साहित्य-सुमा' के नाम से भाजहिंदी प्रेमियों को भेंट की जाती है । इस लेस-माला में साहित्य और नीति- मबधी सय २५ लेख धुन-चुनकर रक्खे गए है। इन लेखों को पढ़कर भट्टजी की लेखनी का पूर्ण म्वाद मिल सकता है। महजी उन थोडेस प्रतिभाशाली लेखको में से थे, जिन्होंने आधुनिक हिंदी भाषा में गद्य की नींव डाली है। उन्होने अपने "हिंदी प्रदीप" के द्वारा बहुतों को हिंदी लिखना सिखाया । भद्दजी का "हिंदी-प्रदीप" सदा शुद्ध हिंदी की ज्योति से जगमगाता रहा । वह धन्य भापानो के उच्छिष्ट लेखों की सहायता से कभी प्रकाशित नहीं हुभा जिस तरह भजी की भाषा शुद्ध हिंदी रहती थी, उसी तरह उनके लेख भी उन्ही के विचार की उपज रहते थे, किसी की छाया अथवा अनुवाद नहीं । वह जो कुछ लिसते थे, अपने दिमाग से लिखते थे । महजी लेखों में यह प्रधान गुण है। .

[ ६ ] । 4 भट्टजी का हिंदी में भजी की छाप लगी हुई है। उनकी भाषा उन्हीं की थपनी भापा है। महजी की भापा से एक अनोखा रस टपकता है, जो अन्य लेखको की मापा में मिलना प्राय कठिन है। जिस तरह वह अकारण सस्कृत के शब्दों को अपने लेग्वों में नहीं इसते थे, उसी तरह वे उद-फारसी के शब्दों को अपनी भाषा से यीन- बीनकर अलग भी नहीं करते थे। हिंदी लिखते समय वह सस्कृत की विद्वत्तापाबोम अपनी लेखनी से दूर रखते थे । वह जब कभी सस्कृत- साहित्य की परख अपने हिंदी पाठकों को कराने के लिये उस पर अपने अनोखे निबंध लिखते थे, तो अपनी विद्वत्ता के भार से पढने- बालो को दबाते न थे, यरिफ सस्कृत कवियों की कृति और सादर्य को अपनी ही स्वाभाविक सरल भाषा में लिखकर पाठको के सामने रखते थे। भट्टजी जिस विषय पर कोई लेख लिखते थे, भाषा भी उसी के अनुसार रहती थी। यदि वह हास्य या ठठोल लिखते थे, तो मापा भी वैसीही हास्य और ठठोल से भरी रहती थी, यदि किसी पर कटाक्ष करते थे, तो भाषा भी व्यग्य-पूर्ण रहती थीं, यदि शृगार-रस लखते थे, तो मापा भी रसीली और भृगारमयी रहती थी, थोर यदि कोई गभीर विषय उठाते, तो भाषा भी गभीर और साहित्य के गुणो से पूर्ण रहती थी । यह भी भट्टजी के लेखों का एक दुसरा प्रधान गुण । इस संग्रह में दिए गए लेखों से पाठकों को भगी की भाषा का थोडा-बहुत स्वाद अवश्य मिल जायगा । यही समझकर इसे प्रकाशित करने का साहसं किया गया है। विनीत- लक्ष्मीकास मह - १ प्रवचन भारतेंदु बाबू इरिश्चन्द्र के समकालीन प० बालकृष्ण भट्ट वर्तमान युग की हिंदी के जन्मदाताओं में समझे जाते हैं । वह भारत-मासाके गत शताब्दी के उस अल्प-सख्यक सुपुत्रो में थे, जो किसी न किसी रूप में मातृभूमि की सेवा को अपने जीवन का प्रधान उद्देश बना, नर-जन्म के साफल्य का उदाहरण मपादन कर गए हैं। इस गुटिका में जो भट्टजी के लेग्य सगृहीत हैं, ये उनकी उच्च धारणा और अनाक्रम्य सत्य प्रियता के प्रतिक्वि है, उनकी सार्वलौकिक हित- निष्ठा के साथ ही उनकी असाधारण प्रतिभा और उन्दि-प्रखरता के साक्षी हैं। इनका अध्ययन पाठक को असामान्य मनस्विता के प्रासीम साम्राज्य में ले जाकर अपरिमित मनोज्ञता की सैर कराता है । जिस समय के लिये हुए ये लेख हैं, उस समय का चिंतन करते समय सहृदय पाठक के हृदय में लेखक की सुरुचि और प्रवक्ता की ओर प्रेमाप्लुत श्रद्धा उदित होती है, और उनका चटकीलापन चित्त में चिरस्थिरता प्राप्त करता प्रतीत होता है। शेली का यतर्किचित् प्रमोखा- पन जो यत्र-तत्र पाया जाता है, वह भी इनकी उपादेयमा को बदाता ही है, और एक विशेष कौतूहल का उत्पादक है । हिंदी भाषा की चारों ओर प्रतिपल फैलती हुई बढ़ती में या श्राशा कि यह सग्रह अल्प काल ही में अनेक प्रारत्तियो का सौभाग्य अनुभव करेगा, एक अल्प बात है। श्राशा है, समय की प्रगति के साय इन लेखो की ओर लोक-रचि उत्तरोत्तर परिवर्द्विन होती जायगी। . श्रीपनकोट, प्रयाग, फाल्गुाकृ०१४, म० १९७५ . श्रीधर पाठक विषय-सूची पृष्ठ . २५ २८ ४३ 1-साहित्य जन-समूह के हृदय का विकास है २-मनुष्य की बाहरी प्राकृति मन की एक प्रतिकृति है ३-कवि और चितेरे की डाँडामेड़ी ४-पुरप प्रहेरी की स्त्रियाँ अहेर है ५-हमारे मन की मधुप-वृत्ति ६-प्रेम के बाग का सैलानी -पसार-महानाव्यशाला ८-पुरातन तथा श्राधुनिक सभ्यता 8-जवानी की उमगें --पौगड या कैशोर ११-शब्द की आपण-शक्ति १२-माता का स्नेह १३-मुग्ध-माधुरी --चरित्र-पालन -चार चरित्र ---धारमनिर्भरता -चद्रोदय १६-भालपट्ट १९-कश्पनाशक्ति -प्रतिमा २१-माधुर्य २२-माशा २३-यासू -लपमी २५-श्रीशंकराचार्य और गुरु नानकदेव ५७ १४- साहित्य-सुमन । . १-साहित्य जन-समूह के हृदय का विकाश है प्रत्येक देश का साहित्य उस देश के मनुष्यों के हृदय का श्रादर्श रूप है। जो जाति जिस समय जिस भाव से परिपूर्ण या परिलुप्त रहती है, वे सब उसके भार उस समय के साहित्य की समालो. घना से अच्छी तरह प्रकट हो सकते हैं । मनुष्य का मा जब शोक-मकुल, प्रोध मे उद्दीप्त, या किसी प्रकार की चिंता से दोचित्ता रहता है, तब उसकी मुखच्छवि समसाछन, उदासीन और मलिन रहती है, उस समय उसके कठ से जो ध्वनि निकलती है, वह भी या तो फुटही ढोल के समान येसुरी, बेताल, लय या फरुणा. पूर्ण, गद्गद तथा विकृत स्वर-सयुक्त होती है । वही जय चित्त श्रानद की लहरी से उद्वेलिस हो नृत्य करता है और सुख की पर. परा में मग्न रहता है, उस समय मुस विकसित कमल-सा प्रफुल्लित, नेत्रमानो हँसता-सा, और अग अग चुस्ती और चालाकी से फिरहरी की सरह फरका करते हैं, कठवाी भी सब वसत-मदमत्त कोकिला के कलरव से भी अधिक मीठी और सोहाननी मन भाती है । मनुष्य के सपध में इस अनुलाघनीय प्राकृतिक नियम का अनुसरण प्रत्येक देश का माहित्य भी करता है , जिसमें कभी क्रोधपूर्ण भयकर गर्जन, कमी प्रेम का उच्छ्वास, कमी शोक और परिताप-जनित हृदय विदारी करुणा निस्वन, कभी वीरता-गर्व से बाहुबल के दप में मरा हुना सिंहनाद, कभी भक्ति के उन्मेष से चित्त की द्रवता का परिणाम अश्रुपात आदि अनेक प्रकार के प्राकृतिक भावों का २ साहित्य-सुमन उद्गार देखा जाता है । इसलिये साहित्य यदि जन-समूह ( Nation ) के चित्त का चित्रपट कहा जाय, तोसगत है । किमी देश का इतिहास पढ़ने में केवल बाहरी हाल हम उस देश का जान सकते हैं, पर साहित्य के अनुशीलन से क़ौम के सब समय के श्राभ्यतरिक भाव हमें परिस्फुट हो सकते हैं। हमारे पुराने श्रार्यों का साहित्य वेद है । उस समय भार्या की शैशवावस्था थी , बालको के समान जिनका भाव, भोलापन, उदार भाव, निष्कपट व्यवहार चेद के साहित्य को एक विलक्षण तथा पवित्र माधुय प्रदान करते है । वेद जिन महापुरपो के हदय का चिकाश धा, वे लोग मनु और याज्ञवल्क्य के समान समाज के श्राभ्य- तरिक भेद, वर्ण विवेक श्यादि के झगडो में पड समाज की उन्नति या अवनति की तरह तरह की चिंता में नहीं पटे थे, कणाद या कपिल के समान अपने अपने शास्त्र के मूलभूत बीजसूत्रो को श्रागे कर प्राकृतिक पदार्थों के तत्व की छान मे दिन-रात नहीं इये रहते थे, कालिदास, भवभूति, श्रीहर्प श्रादि कषियो के सप्रदाय के अनुसार वे लोग कामिनी के विभ्रम विलास और लावण्यलीला लहरी में गोते मार मार प्रमत्त हुए थे। प्रात काल उदयोन्मुस सूर्य की प्रतिमा देस उनके सीधे-सादे चित्त ने विना कुछ विशेष छाननीन किए उसे अज्ञात और अजेय शक्ति समझ लिया। उसके द्वारा वे अनेक प्रकार का लाम देस कानन-स्थित विहग-कूजन-समान कलकल-रच से प्रकृति की प्रभास वदना का साम गाने लगे, जल-मार-गत श्यामला मेध- माला का नवीन सौंदर्य देन पुलकित्तगात्र हो कृतज्ञता सूचक उपहार की भाँति स्तोत्र का पाठ करने लगे , घायु जब प्रबला वेग से बहने लगी, तो उसे भी एक ईश्वरीय शक्ति समझ उसके शात करने को वायु की स्तुति करने लगे इत्यादि । वे ही सय प्राक् और साम की पावन ऋचाएँ हो गई। उस समय श्रय के समाा राजनीतिक श्रत्या- न . साहित्य जन-समूह के हृदय का विकाश है चार कुछ न था, इसी से उनका साहित्य राजनीति की कुटिल उक्ति- युक्ति से मलिन नहीं हुआ था। नए आए हुए पार्यों की नूतन अथित समाज के सस्थापन में सर सरह की अपूर्णता थी सही, पर सबका निर्वाह अच्छी तरह होता जाता था, किसी को किसी कारण से क्सिीप्रकार का अस्वास्थ्य तथा, थापस में एक दुसरे के साथ श्रय का. सा बनावटी कुटिल बताच न था । इसलिये उस समय के उनके माहित्य वेद में भी कृतीम भक्ति, कृनिम सौहाई, कपट-वृत्ति, यना- बट और चुनाचुनी ने स्थान नहीं पाया। उन पार्यों का धर्म भर के समान गला घोटनेवाला न था । मवके साथ सबकी सहानु- भूति सान पान द्वारा रहती थी। उनके बीच धार्मिक मनुष्य अब के धमध्वजियों के समानदाभिक यन महाव्याधि सदृश लोगो के लिये गलग्रह न थे । सिधाई, भोजापन और उदारभाव उनके साहित्य के एक-एक अक्षर से टपक रहा है । एक नगर महामा ईसा एक मुकुमार मति बालक को अपने गोद में बैठाकर अपने शिष्यों की थोर इशारा करके बोले कि जो कोई छोटे बालको के समान भोला न बने, उमका म्वर्ग के राज्य में कुछ अधिकार नहीं है । हम भी कहते हैं, जो सुकुमार-चित्त वेदभापी इन पार्यों की तरह पद पद में ईश्वर का भय रस, प्राकृतिक पदार्थों के सौंदर्य पर मोहित होकर, बालकों के समान सरलमति न हो, उसका स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना अति दुष्कर है। इन्हीं प्राकृतिक पदार्थों का अनुशीलन करते-करते इन श्रार्यों को ईश्वर के विषय में जो जो भाव उदय हुए, वे ही सब एक नए प्रकार का साहित्य उपनिषद् के नाम से पहलाए । जय इन पार्यों की समाज अधिक बढ़ी और लोगो की रीसि नीति और बर्ताव में विभिन्नता होती गई, तब सबीको एकता के सूत्र में यद्ध रखने के लिये और अपने अपने गुण-कर्म में लोग घल विचल हो सामाजिक . साहित्य-सुमन नियमों को जिसमें किसी प्रकार की हानि न पहुँचाये, इसलिये स्मृतियों के साहित्य का जन्म हुआ । मनु, अनि, हारीस, याज्ञवल्क्य अादि ने अपने-अपने नाम की सहिता यना विविध प्रकार के राजनीतिक, सामाजिक और धर्म-सवधी विषयों का सूत्रपात किया। उन्हीं के समकालीन गौतम, कणाद, कपिल, जैमिनि, पतजलि श्रादि हुए, जिन्होंने अपने अपने सोचो का परिणाम रूप दर्शन- शास्त्रों की बुनियाद दाली । यहाँ तक जो साहित्य हुए, उनमें यद्यपि वेद की भाषा का अनुकरण होता गया, परतु नित्य नित्य उनकी मापा अधिक-अधिक सरल, कोमल और परिष्कृत होती गई । तथापि उनकी गणनावैदिक भाषा में ही की जाती है । इन स्मृतियों और प्रार्प- प्रयों की भाषा को हम वैदिक और आधुनिक सस्कृत के बीच की भापा कह सकते हैं । श्रम से सस्कृत के दो सड होते चले, वेद तथा लोक के नाम से कहे जाते हैं। पाणिनि के सूत्रों में, जो सस्कृतपाठियों के लिये कामधेनु का काम दे रहे हैं, और जिनसे वैदिक और लौकिक सब प्रयोग सिद्ध होते हैं, लोक और घेद फी निरग्स अच्छी तरह की गई है । और, इसी घेद और लोक के अलग अलग भेद से साबित होता है कि सस्कृत किसी समय प्रचलित भाषा थी, जो लोगों के बोलचाल के बर्ताव में लाई जाती थी। वेद के उपरात रामायण और महाभारत साहित्य के बडे-बडे अग समझ गए । रामायण के समय भारतीय सभ्यता का प्रेमोच्छ्वास- परिप्लावित नूतन यौवन था, किंतु महाभारत के समय भारतीय सभ्यता ति-ग्रस्त हो वार्द्धक्य भाव को पहुँच गई थी। रामायण के प्रधानपुस्प रघुकुलावसस श्रीरामचन्द्र थे, और भारत के प्रधान पुरुष, बुद्धि की तीक्ष्णता के रूप, फूट-युद्धविशारद, भगवान् धासुदेव श्रीकृष्ण या उनके हाथ की कठपुतली युधिष्ठिर थे। रामायण के साहित्य जन समूह क हदय का विकाश है समय से भारत के समय में लोगो के हद्गत भाव में कितना अतर हो गया था कि रामायण में दो प्रतिद्वद्वी भाई इस बात के लिये विवाद कर रहे थे कि यह समस्त राज्य और राज्यसिंहासन हमारा नहीं है, यह सब तुम्हारे ही हाथ में रहे। थत में रामचंद्र भरत को विवाद मे पराभूत कर समस्त साम्राज्य उनके हस्तगत कर श्राप पानद-निर्भर चित्त हो सस्त्रीक वनवासी हुए। वही महाभारत में दो दायाद भाई इस बात के लिये कलह करने पर सनन्द हुए कि जितने में सुई का अग्रभाग ढंक जाय, उतनी पृथ्वी भी गिना युद्ध के हम न देंगे-"सूध्यम नैव दास्यामि विना युद्धेन केशव" । परिणाम में एक भाइ दूसरे पर जयलाभ कर तथा जघा में गदाघात और मस्तक पर पदाघात मे उसे वध कर भाई के रायसिंहासन पर बारूद हो सुख में फूल अनेक तरह के यज्ञ और दान में प्रवृत्त हुथा। रामायण और महाभारत के प्राचार्य क्रम से कवि-कुल-गुरु वात्मीकि और व्यास थे। पृथ्वी के और और देशों में इनके समान था इनमे चढ़कर कवि नहीं हुए, ऐसा नहीं है। यूनान देश में होमर, रोम- देश में वरजिल, इटली में डेंटी, इंगलैंड में चासर और मिरटन अपनी अपनी असाधारण प्रतिभा से मनुष्य-जाति का गौरव बढ़ाने में कुछ कम न थे । परतु विचित्र कल्पना और प्रकृति के यथार्थ धनु- करण में चिरसन वृद्ध पाल्मीकि के समान होमर तथा मिल्टन क्सिी अश में नहीं यदने पाण, जिनकी कविता के प्रधान नायक श्रीरामचद्ग अार्य-जाति के प्राण, दया के अमृत-सागर, गाभीर्य और पौरप दर्प की मानो सजीव प्रतिकृति थे। वे प्रीति और समभाव में महानीच पाति चाहाल तक को गले से लगाते थे। उन्होने लकेश्वर से प्रयल प्रतिद्वही शत्रु को भी कमी तृण के बराबर भी नहीं समझा । स्वर्णमदित सिंहासन और तपोवन में पर्णकुटी उन्हें एक-सी मुखकारी हुई। उनके स्मिस-पूर्वामिभापित्व और उनकी बोलचाल की मुग्ध माधुरी 1 ६ साहित्य-सुमन पर मोहित हो दडकारण्य की असभ्य जाति ने भी अपने को उनका दाम माना । यहा । धन्य श्रीरामचद्र का अलौकिक माहात्म्य, धन्य वाल्मीकि की कल्पना-सरसी, जिसमें ऐसे-ऐसे स्वर्णकमल प्रस्फुटित हुए। काल के परिवर्तन की कैसी महिमा है, जो अपने साथ ही साथ मानुपी प्रकृति के परिवर्तन पर भी बहुत कुछ अमर पैदा कर देता है। वाल्मीकि ने जिन-जिन बातों को अवगुण समझ अपनी कल्पना के प्रधान नायक रामचन्द्र में बरकाया था, वे ही सव व्यास के समय में गुण हो गई, जिनकी कविता का मुख्य लक्ष्य यही था कि अपना मान, अपना गौरव, अपना प्रभुत्व जहाँ तक हो सके, न जाने पाये। भारत के हरएक प्रमग का तोड़ अत में इसी बात पर है । शत्रु- सहार और निज कार्यसाधन-निमित्त व्यास ने महाभारत में जो-जो उपदेश दिए हैं, और राजनीति की काट-ब्योंत जैसी-जैसी दिखाई है, उसे सुन विस्माकं-सरीखे इस समय के राजनीति के मर्म में कुशल राजपुरुषो की अक्ल भी चरो चली जाती होगी। इससे निश्चय होता है कि प्रभुत और स्वार्थ-साधन तथा प्रवचना-परवरा भारतवर्ष उस समय कहाँ तक उदार भार, समवेदना श्रादि उत्तम गुणों से विमुख हो गया था । युधिष्ठिर धर्म के अवतार और सत्यवादी प्रसिद्ध हैं, पर उाकी सस्यवादिता निज कार्य-साधन के समय सब खुल गई। "अश्मयामा हत नरो वा कुजरो वा" इत्यादि कितने उदाहरण इस पात के हैं, किंतु उन्हें विस्तार-भय से यहाँ नही लिसते । महाभारत के उपरात भारत और-का-और ही हो गया। उसकी दशा के परिवर्तन के साय ही-साथ उसके साहित्य में भी वहा परि वतन हो गया। उपरात गौद्धों का जोर हुा । ये सब वेद और ग्राक्षणों के बडे विरोधी थे । वेद की भाषा सस्कृस थी । इसलिये उन्होंने सस्कृत को बिगाइ प्राकृत भाषा जारी की। सर से सस्कृत साहित्य जन-समूह के हृदय का विकाश है १७ सर्वसाधारण की योलचाल की भाषा न रही। फिर भी सस्कृतभाषी उस समय यहुत से लोग थे, जिन्होंने इस नई भाषा को प्राकृत नाम दिया, जिसके अर्थ ही यह है कि प्राकृत अर्थात् गीचों की भाषा । श्रतएव सस्कृत-नाटको में तीच पान की भाषा प्राकृत और उत्तम पान ग्राह्मण या राजा श्रादि की भापा सस्कृत रक्सी गई है। कुछ फाल उपरात यह भाषा भी बहुत उन्नति को पहुंची । शौरसेनी, महाराष्ट्री, मागधी, अर्द्धमागधी, पैशाची अादि इसके अनेक भेद है। इसमें भी यहुस मे साहित्य के प्रथ चने । गुणास्य कवि का आबद्ध लक्ष श्लोक का ग्रंथ वृहस्था प्राकृत ही में है । सिवा इसरे शालि. नाहन-पप्तशती श्रादि कईएक उत्तम प्राकृत के प्रथ और भी मिलते । नद और चन्द्रगुप्त के समय इस भाषा की बड़ी उन्नति की गई। जैनियों के सब प्रय प्राकृत ही में है, उनके स्तोत्र पाठ आदि भी मर इसी में है। इसमे मालूम होता है कि प्राकृत किसी समय वे की भाषा के समाज पवित्र समझी गई थी। मस्कृत यद्यपि बोलचाल की भाषा इस समय 7 रह गइ थी, पर हरक विषय के प्रथ इसमें एक से एक बढ़-चढ़कर बनते गए। और, साहित्य की तो यहाँ तक तरकी हुई कि कालिदास आदि कवियों को उक्ति-युक्ति के मुकाबले वेद का भद्दा और रूखा साहिय अन्यत फीका मालूम होने लगा । कालिदास की एक-एक उपमा पर और भवभूति, भारवि, श्रीहर्ष, वाण की एक एक छटा पर वेद के उम्दा- स-उम्दा सूक्त, जिनमें हमारे पुराने पार्यों ने मरपच-साहित्य की बड़ी भारी कारीगरी दिसलाई है, न्योछावर है । सस्कृत के साहित्य के लिये विक्रमादित्य का समय "अगस्टन पीरियड" कहलाता है, अर्थात् उस समय सस्कृत, जहाँ तक उसके लिये परिष्कृत होना ममव था, अपनी पूर्ण सीमा तक पहुंच गई थी । यद्यपि भारवि, माघ, मयूर प्रभृति फईएक उत्तम कवि धाराधिपति भोजराज के समय सक और - साहित्य-सुमन उनके उपरात भी जगनाथ पडितराज सक बराबर होते ही गए, किंतु सस्कृत के परिष्कृत होने की सामग्री उस समय तक पूरी हो चुकी थी। भोज का समय तो यहाँ तक कविता की उन्नति का था कि एक- एक श्लोक के लिये अमरय इनाम राजा भोज कवियो को देते थे। वेद का साहित्य उस समय यहाँ तक दन गया था कि छादस मूर्य की एक पदवी रक्खी गई थी। केवल पाठ-मान वेद जाननेवाले छादस कहलाते थे, और वे अब तक भी निरे मूर्ख होते श्राए हैं। बौद्धों के उच्छेद के उपरात एक जमाना पुराण के साहित्य का भी हिंदुस्तान में हुश्रा । उस समय बहुत-से पुराण, उपपुराण और सहिताएँ दो ही चार सौ वर्ष के हेर-फेर में रची गई। श्रय हम लोगों में जो धर्मशिक्षा, समाज शिक्षा और रीति नीति प्रचलित हैं, वह सब शुद्ध वैदिक एक भी नहीं हैं । थोडे-से ऐसे लोग हैं, जो अपने को स्मात मानते है । उनमें तो अलबत्ता अधिकाश वेदोक्त कर्म का यत्किंचित् प्रचार पाया जाता है,सो भी केवल नाम-मान को, पुराण उसमें भी बीच नीच श्रा धुसा है। हमारी विद्यमान छिन्न भिन्न दशा, जिसके कारण हजार हजार चेष्टा करने पर भीजातीयता हमारे में थाती हो नहीं, सब पुराण ही की कृपा है । जब तक शुद्ध वैदिक साहित्य हम लोगो में प्रचलित था, तब तक जातीयता के दृढ़ नियमों मे जरा भी अतर नहीं होने पाया था । पुराणों के साहित्य के प्रचार से एक बड़ा लाभ भी हुश्रा कि वेद के समय की बहुत-सी घिनौनी रीतियो और रस्मों को, जिनके नाम लेने से भी हम धिना उठते हैं, और उन सब महाघोर हिंसानों को, जिनके सयब से अपने अहिंसा-धर्म के प्रचार करने में यौद्धो को सुविधा हुई थी, पुराणकर्तायो ने उठा- कर शुद्ध साविकी धर्म को विशेष स्थापित किया । अनेक मत-मता- सरों का प्रचार भी पुराणो की ही करतूत है। पुराणवाले तो पचा- यतन पूजन ही सक से सतोप करके रह गए । तत्रों ने बड़ा सहार 1 ।

साहित्य जन-समूह के हदय का विकाश है ६ । किया। उन्होंने अनेक शुद्र देवता-भैरव, काली, डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रेस तक-की पूना को फैला दिया। मद्य-मास के प्रचार को, जिसे चौद्धों ने तमोगुणी और मलिन समझ उठा दिया था, तात्रिकों ने फिर बहाल किया। पर पल-वीर्य की पुष्टता से, जो मासाहार का प्रधान लाभ था, ये लोग फिर भी वचित ही रहे । नि सदेह तात्रिकों की कृपा न होती, तो हिंदुस्तान ऐसा जल्द न डूबता । वेद के अधि- कारी शुद्ध ब्राह्मण के लिये तानिक दीक्षा या तनमन अति निपिद्ध है । जाहाण तत्र के पठन-पाठन से बहुत जल्द पतित हो सकता है, यह जो किसी स्मृतिकार का मत है, हमें भी कुछ कुछ सयुक्तिक मालूम होता है । बहुत-से पुराण सत्रों के बाद बो। उनमें भी तात्रिकों का सिद्धात पुष्ट किया गया है। हम ऊपर लिख पाए हैं कि हिंदू-जाति में वौमियत के छिन्न होने का सूत्रपात पुराणो के द्वारा हुआ, और सत्रों ने उसे बहुत पुष्ट किया। शैव, शाक्त, वैष्णव, जैन, बौद्ध इत्यादि अनेक जुदे-शुदे फिरके हो गए, जिनमें इतना दृढ़ विरोध कायम हुआ कि एक दूसरे के मुँह देखने के रवादार न हुए, तय परस्पर का एका और सहानुभूति कहाँ रही। जब समस्त हिंदू-जाति की एक वैदिक सप्रदाय रही, तो वही मसल चरितार्थ हुई कि "एक नारि जन दो से फंसी, जैसे सत्तर वैसे अस्सी"। हमारी एक हिंदू-जाति के प्रमख्य टुकडे होते होते यहाँ तक ग्वड हुए कि अब तक नए-नए धर्म और मतप्रवर्तक होते ही जाते हैं। ये टुकडे जितना वैष्णवों में अधिक है, उतना शैव शाक्तों में नहीं और आपस में एक का दूसरे के साथ मेल और सान-पान जितना कम इनमें है, उतना औरो में नहीं । राम के उपासक कृष्ण के उपासक से लड़ते हैं, कृष्ण के उपा. सक रामोपासकों मे इत्तिफाक नहीं रखते । कृष्णोपासकों में भी सरया- नासिन थनन्यता ऐसी भाडे आई है कि यह इनके आपस ही में बड़ा पटपट लगाए रहती है।

साहित्य-सुमन प्राकृत के उपरात हमारे देश के साहित्य के दो नमूने और मिलते हैं, एक पद्मावत और दूसरा पृथ्वीराज-रायमा । पद्मावत की कविता में तो किसी कदर कुछ थोड़ा-सा रस है भी, पर पृथ्वीराज-रायसा में सारीफ के लायक कौन-सी बात है-यह हमारी समझ में बिलकुल नहीं पाता । मारुत से उतरते-उतरते हमारी विद्यमान हिंदी इस शकल मे कैसे आई, इस बात का पता अलबत्ता रायसा से लगता है। मत-मतातर के साथ-ही-साथ हमारी मापा भी गुजराती, मरहठी, बगाली इत्यादि के भेद से प्रत्येक प्रात की जुदी- जुदी भापा हो गई। इन एकदेशी भापायो में बगानी सबसे अधिक कोमल, मधुर और सरस है , मरहठी महाकठोर और कर्ण कटु, तथा पजागी निहायत भद्दी, कठोर और रूखापन में उर्दू की छोटी बहन है। श्रय थपनी हिंदी की ओर श्राइए । इसमें सदेह नहीं, विस्तार में हिंदी अपनी बहनों में सबसे पढ़ी है । प्रजभापा, बुदेलसडी, बैसवारे की तथा भोजपुरी इत्यादि इसके कईएक अवासर-भेद हैं। व्रजभापा म यद्यपि कुछ मिठास है, पर यह इतनी जानी बोली है कि इसमें सिवा शगार के दूसरा रस पा ही नहीं सकता। जिस बोली को कवियों ने अपने लिये चुन रक्सा है, वह युदेलरसद की योली है। इसमें सब प्रकार के काव्य और सय रस समा सकते हैं। अपनी अपनी पसद निराली होती है-"भिन्नरूचिर्हि लोक "हमें असवार की मर्दानी बोली सबसे अधिक भली मालूम होती है। दूसरी भाषाएँ जैसे मरहठी, गुजराती, बँगला की अपेक्षा कविता के श्रश में हिंदी का माहित्य यहुत चढ़ा हुआ है तथा मस्त ही न्यून है। किंतु गद्यरचना "प्रोज" हिंदी का यहुत ही कम और पोच है। सिवा एक प्रेमसागर-सी दरिद रचना के इसमें और कुछ है ही नहीं, जिसे हम इसके साहित्य के माढार में शामिल करते।

मनुष्य की याहरी थाति मन की एक प्रतिकृति है १३ इस मन की भावनाएँ या तरगें जो प्रतिघण इसमें उठा फरती है, मनुष्य के याहरी प्राकृति से प्रकट होती हैं। इसलिये इस याहरी आकृति को यदि मन की एक प्रतिकृति कहा जाय, तो अनुचित न होगा। किमी के चेहरे को देखकर कोई कहता है कि इनके चेहरे पर जनानापन यरस रहा है। यह जनानापन क्या चीज़ है ? यही मन की एक प्रतिकृति है, जो सर्वथा उस प्रकृति के विरुद्ध है, जो पुरुप-जाति की होनी चाहिए । पुरुषों के समान वीरता, उत्साह श्रादि पौम्पेय गुण स्त्रियों के मन में कहाँ रहते हैं। इसी तरह नियाँ भी बहुतेरी ऐसी होती है, जो कितनी बातों में मदों के फान काटती हैं, जिससे यही प्रकट होता है कि अनेक पौरपेय गुण उनके मन में बसे रहते हैं। ऐसा ही शूर-बीर का चेहरा कायर और भगोरे से, नम्र का अमिमानी से, ज़िद्दी हठीले का सरल सीधे स्वभाववाले से, कुटिल का सरल से, चालाक का गावदी मे नहीं मिलता । इतना ही नहीं, जगत् के बाह्य प्रपच का जो कुछ असर चित्त पर होता है, वह सब प्रादमी के चेहरे से प्रकट हो जाता है। किसी रूपवती सुदरी नारी को देख कामी, दार्शनिक या विरक्त योगी के मन में जो असर पैदा होता और जो भावनाएँ चित्त में उठती हैं, वेसय अलग-अलग उन उन लोगों के चेहरे से जाहिर हो जाती हैं। कामी कामानुर हो जाने के बाहर हो जाता है, लाज और शरम को जलाजलि देकर हजारों चेष्टाएँ उससे मिलने की करता है, दिन-रात विकल रहता है और अपनी कोशिश से कामयाब न हो कभी-कभी तो वियोग में जिंदगी से हाथ धो बैठता है। ऐसे ही दार्शनिक तत्ववेत्ता ज्ञानी उस मुदरी को पाच- भौतिर पदार्थों का परिणाम मान, उसके एक-एक श्रग की शोभा निरस, की निर्माण चातुरी पर मन ही मन प्रसन्न होता है। विरक्त मास, विष्टा, मूत्र आदि मलिन और दूपित पदार्थों की में वैराग्य प्रदीप के प्रकाश को यधिक स्थान देता - २-मनुष्य की बाहरी प्राकृति मन की एक प्रतिकृति है बुद्धिमानों ने वेदादि अधों में मन के अनेक जुदे-जुदे काम लिखे हैं। तद्यथा-- यज्जाग्रतो दूरमुदेति देव यदु सुप्तस्य तथैवेति, दूरगम ज्योतिषा ज्योतिरेक नन्मे मन शिक्सकल्पमस्तु । अर्थात्-जो जाग्रत् दशा में दूर-से-दूर चला जाता है, अर्थात् जो मनुष्य के शरीर में रहता हुश्रा भी दैवी शक्ति सपन्न है, जो मोती दशा में लय को प्राप्त होता है, अर्थात् न जाने कहाँ कहाँ चला जाता है, जो जागते ही फिर लौटके आ जाता है, अर्थात् पहले के समान अपना सब काम करने लगता है,जो दूरगामी है, अर्थात् जहाँ नेत्र श्रादि इद्रियाँ नहीं जा सकतीं, वहाँ भी पहुँच जाता है, जो भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों को जान सकता है, जो प्रकाशात्मक है, अर्थात् जिसके प्रकाश से श्रतिवाहित हो इद्रियाँ अपने-अपने विषयो में जा लगती हैं, वह मेरा मन मल्याण की बातों का सोचनेवाला हो। सुपारथिरश्वानिव यमनुष्यानेनीयतेऽभीपुभिवाजिन इव , हृत्ततिष्ठ यदजिर यविष्ठ तमे मन शिवसकल्पमस्तु । अर्थात्-अच्छा सारथी बागडोर के द्वारा जैसे घोड़ों को ले जाता है, वैसे ही जो मन प्राणिमात्र को सारथी के सदृश ले चलता है, जो कभी जीर्ण नहीं होता, अर्थात् शरीर में जैसे बाल्य, यौवन और बुढ़ापा आ जाते हैं, वैसे ही जिसमें बाल्य, यौवन और बुढ़ापा नहीं पाते, जो अत्यत वेगगामी है, ऐसा मेरा मन कल्याण की बातों का सोचनेवाला हो।

मनुष्य की बाहरी श्राकृति मन की एक प्रतिकृति है - । इस मन की भावनाएं या तरगें जो प्रतिक्षण इसमें उठा करती है, मनुष्य के बाहरी श्राकृति से प्रकट होती हैं। इसलिये इस बाहरी आकृति को यदि मन की एक प्रतिकृति कहा जाय, तो अनुचित न होगा। किसी के चेहरे को देखकर कोई कहता है कि इनके चेहरे पर जनानापन बरस रहा है। यह ज़नानापन क्या चीज़ है ? यही मन की एक प्रतिकृति है, जो सर्वथा उस प्रकृति के विरद्ध है, जो पुरुष-जाति की होनी चाहिए । पुरुषों के समान वीरता, उत्साह श्रादि पौरुपेय गुण स्त्रियों के मन में कहाँ रहते हैं। इसी तरह स्त्रियाँ भी बहुतेरी ऐसी होती हैं, जो कितनी बातों में मदों के कान काटती है, जिससे यही प्रकट होता है कि अनेक पौरपेय गुण उनके मन में बसे रहते हैं। ऐसा ही शूर-वीर का चेहरा कायर और भगोते से, नन का अभिमानी से, ज़िद्दी हठीले का सरल सीधे स्वभाववाले से, कुटिल का सरल से, चालाक का गावदी से नहीं मिलता। इतना ही नहीं, जगत् के वाह्य प्रपच का जो कुछ असर चित्त पर होता है, वह सय आदमी के चेहरे से प्रकट हो जाता है। किसी रूपवती सुदरी नारी को देख कामी, दार्शनिक या विरक्त योगी के मन में जो असर पैदा होता और जो भावनाएँ चित्त में उठती हैं, वेसय अलग-अलग उन. 7 लोगों के चेहरे से जाहिर हो जाती हैं। कामी कामातुर हो जाने के थाहर हो जाता है, लाज और शरम को जलाजलि देकर हज़ारों चेष्टा उससे मिलने की करता है, दिन-रात विकल रहता है और अपनी कोशिश से कामयापन हो कभी-कभी तो वियोग में जिंदगी से हाय धो बैठता है। ऐसे ही दार्शनिक तत्ववेत्ता ज्ञानी उस सुदरी को पांच- मौतिक पदार्थों का परिणाम मान, उसके एक-एक श्रग की शोभानिरख, सृष्टिकर्ता की निर्माण चातुरी पर मन ही मन प्रसन्न होता है । रिक्त शानी उमेहाद, मांस, विष्टा, मूग्र आदि मलिन और दूपिस पदार्थों की समष्टि समझ मन में पैराग्य प्रदीप के प्रकाश को अधिक स्थान देता . . , - साहित्य-सुमन है। इसी तरह धन देख चोर, साह, लोभी कदर्य के मन में जुदे- जुदे भाव उदय होते हैं, जिनका सस्वीर प्रत्येक के चेहरे पर उतर श्राती है । चार का मन धन देखते ही उसके लेने की फिकर में लगता है। उसका यह मानसिक भाव श्रॉस धौर चेहरे से स्पष्ट हो जाता है। दियानतदार उस धन को साधारण वस्तु जान बेजा किसी का एक पैसा न लेना इस दृढ़ निश्चय को उस धन से अधिक क्रीमती मानता हुया, उसी के अनुसार वर्तसा है। यह भाव उसकी उदार, प्रसन्न मुखावि, ईपत् हास्ययुक्त फरकते हुए श्रोष्ठ आदि मर्दाने ढग से प्रकट हो जाता है । लोभी और कदर्य का याहरी श्राकार, जिसको रुपया ही सब कुछ है और जो "मर जैहो तोहि न भजेही"वाली कहावत का नमूना है, उसकी मलिन राक्षसी प्रकृति को अच्छी तरह से प्रकट करता है । बाहरी श्राकार से मन की बात पहचाननेवाले बुद्धिमान् इसके द्वारा अपना बढ़ा. बहा काम निकाल लेते हैं। यह एक हुनर है। पुलिस के महकमे में कितने ऐसे ताइवाज़ इस मन के उस्ताद है, जो देखते ही चोर, ठग या खूनी को पहचान लेते हैं, जिससे साफ जाहिर है कि प्राकृति मन की प्रतिकृति है । इसी, तरह किसी भक्तजन की मुख- भवनि से मन में भक्ति के उद्गार की बानगी जाहिर होती है। पहचाननेवाले कपटी, मक्कार, दाभिक मे परल, सीधे, सच्चे भक्त को चट पहचान लेते हैं । बुद्धिमानों ने मन की मुकुर के साथ उपमा दी । मुकुर में जो प्रतिबिंब पड़ता है, उसका नमूद थाहरी श्राकृति ही में होता है। बाह्य श्राकृति सर्वोपरि मुख है, जिससे मानसिक भाव चट प्रति- विधित हो जाता है । मन में किसी प्रकार की वेदना या विकार उत्पन्न होते ही फिर उसका छिपाना कठिन ही नहीं, बरन् असभव है। मन की कोई बात यदि प्रकट होगी, तो मुरयतर मुख ही के .

मनुष्य की बाहरी थाकृति मन की एक प्रतिकृति है द्वारा। किसी मनुष्य को यदि कोई मानसिक वेदना है, या उसने चार दिन से कुछ नहीं साया, या वह और किसी प्रकार की पीड़ा से धाकात है, तो उसके लास छिपाने पर भी मुख पर अवश्य ही कुछ शिकन मी मालूम पडेगी और उस पीड़ा का असर अवश्य मुस पर मराक पडेगा । यदि न झलके, तो वह उस योगी के समान है, जिसने मन को जीत लिया है। जिस समय चित्त में कुछ विकार रहता है, उस समय श्रादमी के चेहरे से यह मानसिक भोव चट प्रट हो जाता है। जिस समय चित्त में क्रोध रहता है, तो भी चट चढ़ जाती है, घाँस ताल हो जाती हैं, चेहरा तमतमा उठता है। इसी तरह जय कुछ शोक का उदय मन में रहता है, तो बाह्य प्राकृति उदास, चेहरा उतरा हुया, मुख मलिन, प्रॉस में आँसू डरडवाया रहता है। इसी तरह भयभीत का चेहरा ज़र्द, मुंह सूसा हुथा, श्राकृति नितात दीन हीन होती है। जब चित्त प्रसन्न रहता है, तय गाय प्राकृति टटके फूले हुए गुलाब की-सी, चेहरा मनोहर और रौनकदार मालूम हाता है। ये सब लक्षण तात्कालिक चित्त और चेहरे के परिवर्तन के हैं। इसी तरह बहुत-से चित चेहरे या और और अगों के भी होते हैं, वे चित, चाहे मनुष्य के हो या किसी पशु पक्षी के हों, उसके मानसिक भाव को प्रकट करते हे । मुग्व मे मानसिक भाव प्रतिर्विबित होता है। यह मामुद्रिक विद्या का एक सून है, जो मालूम होता है, बहुत जाँच के बाद निश्चित किया गया है । वराहमिहिर ने गृहत्सहिता में पचमहापुरुष के लक्षण तथा एक एक अध्याय में गौ, बैल, बकरा, मैदा, हाथी, घोड़ा, ऊँट श्रादि पशुओं के अलग अलग लक्षण दिए हैं । पचमहापुरष के लक्षण जैसे, पडे बडे नेत्र, चौड़ा लिलार, उतार-चढ़ावदार सीधी सुग्गा की टोंट-सी नामिका, गढेदार सीधी छुट्टी इयादि भाग्यवानी ६ चिह्न हैं । कजी आँखवाला, कोसी गरदनगला तथा पस्ताद साहित्य-सुमन - . अवश्य कुटिल और फसादी होगा । एव जिसके आगे के दो दति बढे हों, वह मूर्ख न होगा। इसी प्रकार “कचित् सल्वाट निर्द्धन इस वाक्य के अनुसार यह प्राय देसा गया है कि खल्वाट या गजी चाँदवाला अर्थात् जिसके चाँद में बाल न हों, वह कदाचित् ही निर्द्धन होगा । कानी आँखवाला साधु न होगा, সালাম अर्थात् जिसका हाथ इतना लगा हो कि खडे होने पर घुटने तक र जाय, वह बड़ा वीर, विक्रात, दानी, उदार प्रकृतिवाला होगा। स्त्रियों में जिसके शरीर में रोना अधिक हो, वह चढी, कलहप्रिया, महाकर्कशा होगी और जल्द विधवा हो जायगी इत्यादि । इसी से लिसा है- "श्राकारणव चतुरास्तकयन्ति परेंगितम् ।" अर्थात्-चतुर लोग चेहरा देखते ही मन में क्या है, चट भाप लेते हैं । सचमुच यही तो चतुराई है। चेहरा देखते ही मन में तुम्हारे क्या है, न जान गए, तो चतुर और गावदी में अंतर ही क्या रहा। साधारण मनुष्यों का मन टटोलना सो कुछ बड़ी बात नहीं है, अलपत्ता ऐसो का मन टटोलना कठिन है, जो या सो बढे गभीर हैं या महाकुटिलहृदय हैं । ऐसा ही के मानमिक भाव के विवेचन के लिये सामुद्रिक का यह सूत्र है- "मुस से मानमिक भाव प्रतिविरित होता है।" तो सिद्ध हुआ कि मुख मानो एक मुकुर या दर्पण है, जिसमें चित्त की छाया पढ़ा करती है। कोई मनुष्य भाग्यवान् है या अभागा, मूर्म है या विद्वान्, चतुर है या गावदी, चालाक-मयाना है या सीधासादा इत्यादि, इन सब बातों का परिज्ञान आदमी के चेहरे ही से होता है और यह परिज्ञान केवल बुद्धिमान् ही को हो । यह बात केवल एक व्यक्ति पर नहीं, परन् समस्त जाति पर सुघटित होती है । चेहरा या शरीर का निर्माण उम जाति की - सकना मनुष्य की बाहरी आकृति मन की एक प्रतिकृति है मानसिक शक्ति प्रकट करता है। फसही नाम, मोटे होंठ, मोटे याल जैसे हाशियों के होते हैं, बुद्धितत्व के हास के द्योतक हैं। जिसमें ये लक्षण मिलते हों, अवश्य उसमें बुद्धितरच की कमी होगी। केवल यही नहीं, वरन् वह अत का भोंग और शरारत का पुतला होगा। जाावरों में भी एक-एक गुण ऐया देखा जाता है, जिससे उस विशेष गुण का उसी से नाम पड गया है । जैसे "काकचेप्टो" अर्थात् कोए की सी चेष्टा, "कध्यान" बगुले के समान ध्यान लगाना । अब जिसकी चेष्टा कौए की सी या ध्याा यगुले के समान हो या जिसके चेहरे पर कौवा-बगुले का-सा भाव प्रकट होता हो, बस जाा लेना चाहिए कि इसमें उस जीव का कुछ गुण अवश्य है । इसी तरह पर "घोढमुहा" अर्थात् घोडे का-सा लवा मुँहवाला कुनही और जी का कपटी होगा। यही बात तुखरी-सा मुंहवाल में होगी इत्यादि । और भी भारी सिरयाला बुद्धि का तीचण और गभीर विचार में प्रवीण होगा। लबकण अर्थात् जिसके कान के नीचे की लौर लपी होगी, वह अवश्य दीर्घजीवी होगा। जिसकी जीभ प्रमाण से अधिक लबी होगी वह या तो चटोरा या बड़ा बवादी होगा । निदान "यत्राकृतिस्तत्र गुणा वसन्ति" सामुद्रिक शास्त्र का यह सिद्धात बहुत ही ठीक है। इसी से कालिदास श्रादि कवियों ने यहे लोगो के शरीर के वर्णन में- "न्यूटोरस्को पम्कध शालप्राशुमाभुज आत्मकमलम देह नानो धम इवाश्रित ।" इत्यादि अनेक श्लोक इस विषय के लिये है। १ साहित्य-सुमन चिनकारी मे झयिता में इतनी विशेष बात है कि चित्र उतना चिरस्थायी न रहेगा, जितना कविता रह सकती हैं। तस्वीर तथा काव्य से मनुष्य की प्रकृति का पूरा परिचय मिल जाता है। हमारे यहाँ के अमीरों के ढाइग-रूम में नगी तस्वीरों का रहना फैशन में दाखिल हो गया है । लसनऊ के नवावो के सिलवतगाह में वेश्या और हसीनों की तस्वीर न हो, तो उनकी हुस्नपरस्ती में सामी समझी जाय । उर्दू-फारसी के काव्यों का प्रधान अग केवल शृगाररस है। थाशिली-माशूक्री का दास्तान जिसमें न हो, वह कोई शायरी ही नहीं है। उस भाषा के शायर इश्क को जैसी उम्दी तरह पर कह सकते हैं, बेसा उम्दा प्रौर नव-रसों में दूसरे रस का वर्णन उनसे न बन पडेगा, और सो भी उनका इश्क बहुधा पुरुषों पर होगा, स्त्रियाँ उनकी माशूका बहुत कम पाई जाती है। हमारे देश के रामागतीवाले भही पसद के महाजनो तथा मारवाड़ियो की दूझानों पर बनारस की बनी निहायत भद्दी देवताथो की भोंड़ी तस्वीर के सिवा और कुछ न पाइएगा, जिन तस्वीरो की भद्दी चिनकारी के सामने मानो कलकत्ते का पार्ट-स्टूदियो और पूना की चित्रशाला मख मारती है । इनकी निराली पसद के ठीक उपयुक्त "दानलीला", "मानलीला" इत्यादि के आगे हम लोगों के प्रौद लेख की चातुरी कब इनके मन में स्थान पा सकती है। किसी ने "ये गारक करान के तुम सीना कर वान।" इसी सरह प्रकृति के प्रेमियों को शाति-उत्पादक धन, पर्वत, श्राश्रम, नदी का पुलिन, ऋतु, हरियाली श्रादि के चित्र पसद पाते हैं। उनके स्थान पर जाने से प्राय ऐसे ही चित्र पाइएगा। किसी अगरेजी के विद्वान् का कथन है.--"A picture in the 10om 1s the picture of the mind of the man who hungsıt अर्थात् कमरों में लटकी हुई तस्वीर लटकानेवाले के मन की तस्वीर कवि और चितेरे की दाँदामेड़ी २३ है। इसी तरह पर भक्तजनों के घर जाइए, तो सत, महत, महापु. रयों के चित्र पाइएगा, जिाके देसने-मान से एक अद्भुत शाति-रस का उद्गार मन में भा जायगा । पॉलिटिक्स की मदिरा के नशे में चूर प्रसिद्ध राजनीतिज्ञों के स्थान पर कामवेल, विस्मार्क-सरीखे पटुबुद्धिवालों का चित्र देखिएगा, बाल-विवाह की सर्वस्व नाश करनेवाली कुरीति ने हिंदू-जाति के मताना की वृद्धि और उपचय को कहाँ तर सत्यागश में मिलाया, किस घृणित दशा में इनको पहुँचा दिया। और इस कुरीति की विषमय वायु से बचकर मनुप्य यल, पुष्टता, सेम, काति, सौदर्य का कहाँ तक सचय कर सकता है, इस बात को प्रत्या करने के लिये हमें चाहिए कि मुगल तथा योरप देश के फ्मनीय बालक, युनती और दाग पुरपों की कुछ तस्वीरें अपनी चिनसारी में टॉग रक्सें और सदेव उनको देखा परे । कनि भोर चितेरे में कहाँ तक ढाँडामेडी या परस्पर की स्पद्धा है इसे हम अपने पाम्को को दरशा चुके हैं। अब इन दोनों में बड़ा अतर देवल इतना ही है कि सभ्यता का सूर्य ज्यों-ज्यों उठता हुअामध्याह्न को पहुँचता जाता है, त्यों-त्यों चित्रकारी में नई-नई तराश-वराश की बारीकी चौगुनी होती जाती है, पर कवियों की वाग्देवी जिस सीमा को पहले ज़माने में पहुंच चुकी है, उससे बरा- पर अब तक घटती ही गई, यद्यपि हाल की सभ्यता, बुद्धि-वैमन, शाइस्तगी के मुकाबले वह जमाना बहुप्त पीछे हटा हुना था। लॉर्ड मेकॉले ने अपने एक लेख में इस बात को यहुत अच्छी तरह पर सिद्ध कर दिखाया है । मेकाले पहते हैं कि "लोग इस सभ्यता के समय दर्शन, विज्ञान और दूसरी दूसरी बुद्धि का विकास करने- वाली बातों में प्रवीणता प्राप्त पर पहले की अपेक्षा अधिक सोच सक्ने हैं, अनेक प्रथों के सुलभ हो जाने से अधिक जान सकते है सही, किंतु उस अपनी सोची या जानी हुई यास को बुद्धि की अधिक ।

२२ साहित्य-सुमन पैनी आँख से देखना उन पुराने कवियों ही को पाता था।" इसमें सदेह नहीं, इन दिनों के विशेषज्ञ विद्वान तक बहुत अच्छा कर सकेंगे, जो बात उनके तर्क की भूमिका है, उसका रूप सदा कर देंगे, अत्यत साधारण बात को अपने वागजाल से महाजगड्वाल कर डालेंगे, विज्ञान और शिल्प में नई-नई ईजाद कर खुदाई का भी दावा करने को सन्नद्ध हो जायेंगे, पर उन कवियों की प्रतिभा-स्वरूप सूक्ष्म बुद्धि की छाया भी न पा सकेंगे। जिसे उन्होंने दो अक्षर के एक शब्द में सरस और गभीर भाव पूर्ण करके प्रकट किया है, उसे ये आधे दर्जन शब्दों में भी न प्रकाशित कर सकेंगे। हमारे कवियों की पैनी बुद्धि का कारण यह भी है कि पूर्वकाल में जब हमारी समाज यालक-दशा में थी, उनके लिये "ज्ञातव्य-विपय" (जानने के लायक बात ) बहुत थोडे थे । जिधर उन्होंने नजर दौड़ाई, उधर ही उन्हें नए-नए जानने के योग्य पदार्थ मिलते गए। बुद्धि उनकी विमल थी, चित्त में किसी तरह का कुटिल भाव नहीं आने पाया था, क्योंकि समाज अब के समान प्रौढ़ दशा को नहीं पहुंची थी , इसलिये बहुत बातों में सभ्यता की बुरी हवा का झकोरा मी उन शिष्ट पुरुषों तक न पहुँच सका था। जन पान बड़ा होगा, और जो वस्तु उस पात्र में रक्सी जायगी, यह कम होगी, सो वह वस्तु उसमें बहुत अच्छी तरह समा सकेगी। पुन्द्रि उनकी जैसी तीव्र थोर विमरा थी, वैसा ही मन में उसके किसी तरह की कुटिलता और मैरा न रहने में जिस यात के वर्णन में उन्होंने अपने नयाल को रुजू किया, यह सागोपाग पूरा उतरा । तात्पर्य यह कि एक अर्थात् फविता के लिय यह नई सभ्यता विप हो गई, दूसरी अथांव चित्रकारी के लिये यह अमृत का काम दे रही है। इसी से कान्य दिन दिन घटता गया, और चित्रकारी रोज-रोज पढ़ती गई।

४-पुरुष-अहेरी की स्त्रिया अहेर है "fan is the hunter, and woman is his game, The slech, and shining creature of the chase, W'c hunt thein for the beluty of their shins" Tennyson. यह पढी पुरानी कहानी है। शिशुता की झलक के मिटते ही ज्यों ही तरुणाई की गरमाहट का सचार होने लगता है कि यह अहेरी चारों ओर अपने अहेर की खोज में प्राँसे दौड़ाने लगता है। पर लाचार केवल इतने ही से हो जाता है कि किसी किसी अवस्था में समाज के जटिल बधन उसे ऐसा जकद लेते हैं कि वह अपने स्वेच्छा- चार को बार म नहीं ला सकता और कभी-कभी अपने हस्त- गत शिकार को भी छोड़ बैठता है। यह नरपशु तभी तक सुमार्ग पर चलता है, सभी सक स्वभाव का सरल, विनीत और साधु है और तभी तक लोक-लाज, लोकनिंदा तथा अपवाद या राजदढ की याता से यचा हुश्रा है, जब तक दरसट में पड़ा हुआ अपने स्वेच्छा- प्रवृत्त नहीं हो सकता । कितनी ऐसी दत-कथाएँ, गँवारू किस्से-कहानियाँ, जो गाँव के केवल दश-पाँच घर तक प्रचलित है, और बहुत-से ऐसे इतिहास, कथा, हादसे और वर्णन, जिन्हें कवियों ने पद्यनन्द्ध कर डाला है, जैसे पद्मावत, पारहा-ऊदत की बहानी, रामायण, होमर की इलियड, युसुफ़ जुलेखा, लैला-मजन इत्यादि और प्रसिद्ध नावेल (उपन्यास) जो अँगरेज़ी और फ्राम की भाषा में लिखे गए है, हमारे इस लेख के उदाहरण हैं। बल्कि उन-उन उपन्यासों की भूमिका में ही थाप यह पाइएगा कि धमुक ट्यूक या प्रिंस या शाहजादा ने अमुक सुदरी, नाजनीन या हूर की खूबसूरती 1 चार २४ साहित्य-सुमन गए या गोरे चाम पर आशिक हो इतनी-इतनी तकली उठाई और अत को वह अपने प्रयत्न में इस तरह पर कृतकार्य हुआ या जान तक से हाथ धो बैठा । इसी गोरे चाम की लालच या तलाश में सैकड़ों-हज़ारों हमारे भाई मुसलमान और क्रिस्तान हो और रावण-सरीसे न जाने क्तिने जद-पेड़ से उच्छित हो गए । पुरानी तवारीखे गवाही दे रही है कि मुगलों की मुगलानी और पठानों की पठानी का निचोड यही था। एक-दो कौन कहे, उनका हरम का हरम इस गोरे चाम के शिकार से भरा हुया था। हम लोगों में औरतो को परदे में रखने के दस्तुर की बुनियाद भी यही हुआ बाल्य विवाह की कुरीति इसी कारण से चल पड़ी कि कन्याश्रो को सात भाँवर फिराकर किसी को सौंप दें, जिसमें उसके सतीत्व की रसा रहे और जवानी की झलक पाने पर कहीं ऐसा न हो कि दुष्ट अत्याचारी यवन अहेरी इसे अपना शिकार कर डालें। और शिकारों से इस शिकार में यह बडा ही अनूठापन है कि तरुणी जन पहले एक बार दूसरे का अहेर यन जन्मपर्यंत उस अहेर करनेवाले को उलटा अपना शिकार बना लेती हैं, और उसके तन, मन, धन सर- का अहेर कर पुरुष-पशु को घरेलू जानवर, क्रीडामृग, खेलौना, क्रीत दास, या वशवद तथा तानेदार कर लेती हैं । नूरजहाँ ने जहाँगीर को जो नाच नचाया, वह मदारी अपने बदर को क्या नचावेगा । एक बार जहाँगीर का शिकार बन उसो जन्म-मर के लिये दिल्ली के नामी बादशाह को विल्ली बनाकर रस छोड़ा।जहाँगीर केवल नाम का बादशाह रह गया, सलतनत का कुल इतिज़ाम नूरजहाँ करती थी। जहाँगीर ने एक ग्राम हुक्म दे दिया था कि जिस सिरके पर उसके नाम के साथ नूरजहाँ का नाम खुदा हो, उम सिक्के का दामः सौ- अधिक समझा जाय । जहाँगीर का एक दृष्टात एक उपलक्षण- मात्र है, किंतु हम तुम सब इसी भँवर-जाल में पडे गोसे गा रहे हैं। गुना . ५-हमारे मन की मधुप वृत्ति आदमी का मन भी एक क्या ही गोरख धधा है, जिसे नई-नई धात सुनने, नए-नए दृश्य देखने तथा नई-गई चीज़ सीसने की सदा अभिलापा रहती है। मनुष्य को इा यातो की भोर मुकावट और उनको खोजने की लालसा परिपफ्युद्धि होने पर उपजती हो, सो नहीं, परन् लड़कपा मे ही, जय यह अन्यत सुकुमार-मति रहता है, इस यात का अकुर उसके चित्त में जमता है । कोई बालक कैमा ही खिलवादी हो, उसे भी सेल के नए रास्ते की सोज होगी, और यह तो बहुधा देखने में आया है कि जो लोग दिन-भर कोई फायदे का काम नहीं करते, यान् खेल-कूद में दिन गंवाते हैं, उनको भी जिस दिन पोई गया तरीका मेलो या दिल बहलाने का मिल जाता है, उस दिन उनके चित्त की प्रसन्नता का श्रोर-छोर नहीं रहता । परन्तु सच पूछिए तो निरे खेल-कुद में दिन काटना मनुष्यत्व या मनुष्य-शब्द के श्रर्थ पर आक्षेप परना है। हमारे यहाँ के मननशील पूर्वकाल के दार्शनिकों ने श्रादमी का पर्याय जो मनुष्य रक्सा है, सो यही देख- कर कि वह अपनी भली या चुरी दशा को सोच सकता है, उसके चारो ओर जो ससार के अनेक प्राकृतिक कार्य हो रहे है, उनका भेद लेकर उनकी असलियत जान सकता है, और नित्य नई विद्या और विज्ञान की वृद्धि कर सकता है । वह जिंदगी को मज़दार करने की जरूरत पेदा परता जाता है और उन श्रावश्यकताओं को पूरा कर अपने जीवन को सुख और आराम से काटने का नया नया टैग याता जाता है। यही कारण है कि आज दिन जो सकड़ी सरी श्राशाइस के निकल पड़े हैं, हमारे पहले के लोगों का आराम और ६-प्रेम के बाग का सैलानी "प्रेम का याग़" यह हम इसलिये कहते है कि इस याग में सब भाँति प्रेम ही प्रधान है। प्रेम ही इस बाग का माली है, प्रेम ही की सुगधित कली सृदय के प्रालयाल में खिल इस यगीचे के सैलानीको प्रमुदित करती है। इस प्रेम-वृक्ष की जद बहुत नीचे है । इसकी प्रस्फुटित कली वियोग की एकात चिंता थोस से सिंचित हो मुर- झाने पर भी अपनी महक नहीं छोड़ती, किंतु बार-बार की सुधरूपी प्रात समीरण से अधिक-अधिक पुष्ट पड़ती जाती है, और अपने प्रेमी से मिलने की प्रसर इच्छा के सूर्योदय से इस कली की प्राशा रूपी पखुरियाँ खुलती जाती हैं । इसके चारो ओर भाँति-भाँति के मनोरथ के वृक्ष हैं, जिनमें कोई फूलते फलते है, किसी में केवल पत्ते-ही पत्ते देख पटते हैं और किसी के अकुर-मात्र निक्लकर रह गए हैं । इस प्रेम-वृक्ष की मुकुलित दशा सौंदर्य है, जिसकी अनिर्वच- नीय शोभा यादि से शत तक वर्णन कर कौन पार पा सकता है। मन गुलाब प्रफुल्लित और इच्छा-वायु के झोके से प्रेरित हो नार बार इसके चुबन है। इसके स्वर्गीय वीज को सौंदर्य का चोखा परखनेवाला पक्षी उस स्थल से उठा लाया है, जिसको वैकुठ- भवन का सार-प्रदेश कह सकते हैं। विषयी कामीजन, जो नित्य नई जारिणी ललनायो के विलास-लालसा में लालायित रहते हैं और झूठी चाह दिखला पाकदामन सावित्री-सी सती कुलागनाओं को बहकाया करते हैं, कभी इसकी पवित्रता का अनुभव कर सकते हैं? कभी नहीं । इसको तो वही जान सकता है, जो अपने श्राराम और सुख से हाथ धो दुसरे के सुख में प्रसन्न होनेवाला है । इस प्रेम की को मुकता प्रेम के नारों का सैलानी - धारा का प्रवाह यद्यपि भोगवती गगा की भाँति पाताल में गुप्त है, किंतु उदारमाव के साथ जो प्रेम के सच्चे पुजेरी हैं, उनके लिये इसकी प्रच्छन्न विमल धारा में गोते मारना यहुत सहज है। इससे निश्चय हुश्रा कि निश्छलता, अकुटिलमाव, सचाई ये सब प्रेम के बड़े पके सहवर्ती हैं। अहा ! "प्रेम" यह शब्द ही कैपा कोमल और मधुर है । संव पुस्तको के सिद्धात का साराश इस दो अक्षर के एक शब्द में रस दिया गया है। "दो हा ग्रासर प्रम का पदै, सो पडित होय।" प्रेमासक्त वियोगी की एक ही ठडी साँस एकसाय चारों समुद्र उमड़ थाने से प्रलय-काल की आँधी का नमूना है। सयोग और वियोग में अनत कोटि स्वर्ग और नरक के सुख-दुम्ब की झलक दिग्वलाई पड़ती है। प्रेम महामोह का सारभूत, निश्चलता का लोहस्तम, करुणा का अपार समुद्र, नैराश्य का गगनस्पर्शी उच्च पर्वत, सहिष्णुता का जनक, मन की गति का सोमा चित, सुख और दुख दोनों का निश्चित सिद्धात है। भय और निर्भयता, लालमा और वैराग्य, ढिठाई और शरम, नैराश्य और श्राशा, शोक और हर्ष, दोनों विद्वधर्माश्रयी भी परस्पर प्रतिस्प हो अपनी पूरी ताकत से इसके साथ लगे रहते हैं। यह हृदय के उस तहखाने के सोलने की कुजी है, जिसके भीतर अनत शानद-रस-राशि मा पाकर सुगम है। यह एक विचित्र ऐनक है, जिसको ओख पर रखते ही जुड़े जुदे रंग की वस्तु सय एक रग को दीगो लगती है, और यह अपना है तथा यह पराया है-इस वैविध्य कीजद कट जाती है। यह.भाय हृदय में उदय होते ही मनुष्य पृथ्वी-भर को अपना ही समझने लगता है और- "उदारचरितानातु यमुधैव कुटुम्बकम् ।" इस पचन का अनुगामी दो जाता है।

३२ साहित्य-सुमन है। एक ओर जयध्वनि-पूरित हपंनिस्वन, दूसरी ओर क्लेश और करुणा में भरी हुई रोने की आवाज़ तथा जीवराशि-रूपी अद्भुत यत्र के अनोखे तान दर्शकों के मन में एक ही क्षण हर्प और शोक में मिला हुना अनिर्वचनीय भाव पैदा करते हैं । सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, सरित, समुद्र, अभ्र लिह, अत्युच्च शिखरवाले हिमधवलित पर्वत इत्यादि कारण-सामग्री लासो वर्ष की पुरानी हो जाने पर भी उनके द्वारा जो अभिनय दिसलाए जाते हैं, वे सब नए-से नए और टटके से टके होते हैं। अचिंत्य-चातुर्य-समन्वित, विराट् मूर्तिमय यह सपूर्ण जगत् देस देखनेवाले के मन में रौद्र, वीर, भयानक, श्रद्भुत श्रादि रस एकसाथ स्थान पाते है और उस "पुरष पुरातन", "महाकवि" की महिमा का विस्तार प्रतिपद में प्रकट करते हैं। अब अतर उस बडे नद के नाटक और हम लोगों के नाटक में यह है कि हम लोग इस दृश्य-काव्य नाटक में असल की शकल कर दिख- लाते हैं और वह अपने नाटक में जो कुछ नक्कल कर रहा है, वह माया जवनिका के कारण हमें असल और सत्य मालूम होता है। देखनेवालो के चित्त में उसकी भांति-भाति की नकल का यहाँ सक सच्चा असर होता है कि वे विवश हो झूठ को सच मान तदाकार हो जाते है और उसके अचिंत्य दिव्य रूप को, जो सूक्ष्म से-सूक्ष्म, बडे- से रक्षा, ऊँचे-से-ऊँचा, दूर-से-दूर, समीप से-समीप है, सर्वथा भूल जाते है तथा उसे और-का-और समझ गोते खाया करते हैं। और निमानये के फेर में पढ़ इस चक्कर के याहर कमी होते ही नहीं । माया की फाँसी से जकड़े हुए हम लोग उससे अपने को अलग मान अपनी मलाई और तरकी की अनेक चेष्टा करते है किंतु किसी थइष्ट देवी शक्ति से प्रेरित हो जो चाहते हैं, वह नहीं होता- "अपना चेता होत नहि, प्रभु-चेता तत्कान" जिमश कमी सपने में भी खयाल नहीं किया जाता, यह मा मसार महानाट्यशाला पड़ता है। हमें पार पाकर जिस अभिनय को उसने हमारे द्वारा करना प्रारम किया था, वह यदि पूरा उत्तर पाया, तो हम फूले नहीं ममावे श्रार भाग्यवानों की श्रेणी में अपना प्रबल दरजा कायम कर लेते हैं। सवथा पच्छद निरकुश हो उस दिशी देवी शक्ति पर जरा भी ध्यान न दे "हम मर भाँति मम हे" यही समझने लगते हैं, बड़े शूरवीर योद्धा सम्राट चक्रवर्ती जिनकी एक बार की च कुटि- विक्षेप में भूढोल था जाने की सभावना है, उनके भी हम महाप्रभु हैं, राम, युधिष्ठिर तथा सिक्दर और दारा प्रमृति विजेता जगद्विमयी हमारे आगे किप गिनती में है , उशना और वाचस्पति को तो हमारा वाग्वेभव देख शरम श्राती ही है , चतुरानन भी अपनी चतु- राई भूल अचरज में श्राफर हवा सफा बन पैठता है, हम सब भाँति सिद्ध हैं, पूर्णकाम है, न हमारे सदृश किसी ने यज्ञ किया होगा, न हम-मा दानी कोई दूसरा है , अाज हमने एक मुल्क फ़तेह किया, कल दूमरा अपने वश में कर लेंगे, अपने विपक्षी शग्रुयो को बीस- यीनकर खा डालेंगे, एक को भी जीता न छोड़ेंगे , कटक से अटक तक हमारी पताका फहरा रही है, ससार की कोई जाति या फिरके नहीं बचे, जिनके बीच यदि हमारा नाम लिया जाय, तो वे धर्रा न उठते हाँ, हम सभ्यता की चरम सीमा को पहुँचे हैं, किसकी इतनी हिम्मत या ताक़त है, जो हमारी बराबरी कर सके, तुम जित हो, हम विजेता है, हम तुम्हारे स्वामी हैं, प्रभविष्णु है, हम जो करेंगे या सोचेंगे, सब तुम्हारी भलाई के लिये फरेंगे और सोचेंगे, हम जो कापून गढ़ दें, वही तुम्हारे लिये व्यवस्था है, तुम हमारे वशवद हो, इसलिये हम जो कहें, वह तुम्हें करना ही पडेगा, हमारा खार, हमारा पान, हमारी रहन, हमारी सहन सबमें हमारे समान बनो, देसो, सम्हले रहो, कहीं किसी बात में अपनापन न पाने पावे , तुम्हें जय हम किसी बात में अपनापन जाहिर करते देखा तो .

३६ साहित्य-सुमन . - स्मिक उन्नति में विना बाधा पढे याय भौतिक (Mater) उनति उम समय लोगों को स्वीकृत थी। इस समय "मेटीरियल" ( भौतिक) उन्नति पर जोर दिया जाता है, जिसका परिणाम यह है कि हम श्राध्यात्मिक विपय में दिा-दिन गिरते जाते हैं। हमारी थाधुनिक सभ्यता बिलकुल रपए पर निर्भर है । रुपया पास न हो, तो श्राप सकल-गुण-वरिष्ट शिष्ट-समाज के शिरमौर होकर भी श्रद्धास्पद नहीं हो सकते । सर्वसाधारण को जय यह निश्चय हो गया कि केवल रुपया सय इज्जत और प्रतिष्ठा का द्वार है, जैसे अने, वैसे रपया इकट्ठा करना ही हमारा उद्देश्य हो गया और हमारी प्राध्यात्मिक शक्ति का हास दिन पर दिन होने लगा। किंतु तत्र के लोगों में ऐसा न था। श्राभ्यतरिफ शक्तियों को विमल रस रुपए का लाभ होता हो, तो वह लाभ उन्हें ग्राश था। एक कारण इसका यह भी कहा जा सकता है कि तब देश सब ओर से रंजा- पुँजा था, धन की कमी न थी, अब इस समय मुरक में गरीबी बढ़ जाने से लोगो को रपया कमाने में यल ( Struggle ) विशेष करना पड़ता है । योरप और अमेरिका के श्रादयतम देशो में इस अाधुनिक सभ्यता की पोल इसलिये नहीं खुलने पाती कि वहाँ कोशिश ( Strugglc ) इसनी नहीं है । यहाँ सब भाँति प्रभाव और तीणता है, इससे इस वर्तमान सभ्यता की भरपूर पोल खुल रही है। सभ्यता का देश के जल-वायु के साथ बड़ा घनिष्ठ सबध है। किसी देश में प्राकृतिक नियमानुसार जो बात या जो बर्ताव जल- वायु के अनुकूल पढ़ता है, वही वहाँ की सभ्यता समझी जाती है। जैसे हमारा देश कृषि प्रधान है, तो जो कुछ यहाँ की खेती के अनु- कृल या-पृथ्वी की उपज का बढ़ानेवाला है, उसकी वृद्धि या उसका पोपण इस देश की सभ्यता का एक अंग है । जैसे गोरक्षा या गो- ।

पुरातन तथा आधुनिक सभ्यता पालन यहाँ की सभ्यता का श्रेष्ठ अंग है। सामयिक सभ्यता में गोधन की क्षीणता महापातक-सा देश-भर को आक्रमण किए है। हमारे पूर्वज प्रकृति को छेड़ना नहीं पसद करते थे, बरन् प्रकृति में विकृति-भाव विना लाए सहन में जो काम हो जाता था, उसी पर चित्त देते थे। श्राधुनिक सभ्यता, जो विदेश से यहाँ आई है, हमारी किसी यात के अनुकूल नहीं है, किंतु इससे प्रतिदिन हमारी क्षीणता होती जाती है। भोग विलास आधुनिक सभ्यता का प्रधान अंग है। दरिद्र का विलासी होना अपना नाश करना है। देखिए- "उपर्युपरि पश्यन्त मव ण्व दरिद्रनि" अर्थात्-अपने से अधिकवाले का अनुकरण करने से कौन नहीं दरिद्र हो जाता । तस्मात् श्रत को यही सिद्ध होता है कि "साधा- रण जीवन और ऊँचा विचार" यही पुष्ट सभ्यता है । अस्तु- जिन हिरन देखे वे कुसुम, गइ सो बात बहार श्रय भलि रही गुनाव की, अपन कटीला टार। T साहित्य-सुमन नई-नई उमंगो का एक अग समझा जाता है, पर उसका न पानी बहुत बड़ा सौभाग्य समझना चाहिए । जाहिरदारी या नुमाइश को दूर रखकर जो उमगें उठती हैं, वे नौजवान के भविष्य जीवन में महोपकारी हो उसको महापुरुष (Greatm th) बना देने में सहकारी होती हैं । इस प्रकार की उमग से वह धीरे-धीरे चुपचाप अपन महत्त्व की प्रालीशान इमारत लगातार बनाता जाता है । कुँचार कातिक में जो शरत्कालीन बादल उठते हैं, वे जितना गरजते हैं, उतना बरसते नहीं। पर बरसात में जो बादल पाते हैं, वे इतना गरजते नहीं, पर बरमके वसुधा को सब ओर मे जलमग्न कर देते हैं । वैसा ही श्रोछे-छिछोरे भड़क बहुत दिखलाते हैं, पर करतूत बहुत कम उनमें देखी जाती है। किंतु जो गुरवा-संपन्न होते हैं वे मुख से कुछ नहीं कहते, बल्कि करके दिखला देते हैं- "फलानुमेया प्रारभा सस्कारा प्राक्तना इव ।" "करतृती काहि देन पाप नहिं कहिए माह ।" "गजति शरदि न वर्षति, वपति वपासुनि स्वनो मेघ नीचा वदेतिं न कुरुते, नवदनि सुजन करोत्यवश्यम्।" ये मब वाक्य ऐसों ही के लिये कहे गए हैं। नौजवानी की उठती उमर ऐसे अहड़पन की होती है कि इस उमर में दूरदेशी (precaution ) या पूर्वाधार बिलकुल नहीं रहता, बल्कि बुरी आदतें एक-एक करके पड़सी जाती हैं। जिस समय उन वरार आदतों का पाना प्रारम होता है, उछ नहीं मालूम होता, जैसा पहाड़ों पर जय वर्फ गिरने लगती है, तय कभी किसी के ध्यान मैं भी नहीं आता, पीछे थोड़ा-थोड़ा फरके जमा होते होते यही हिम सहति (Amlanchc ) हो जाती है। तब सूरज की तेज गरमी - जवानी की उमंग भी उसे नहीं टिपला सकती। इसी तरह अल्हड़पन की उमग में खराब श्रादतें जय श्राना शुरू होती हैं, तब उस पर यहुत ध्यान नहीं जाता, पीछे वही इतनी हद और बद्धमूल हो जाती हैं कि अामरणात जन्म-भर के लिये दामनगीर हो जाती हैं, हजार हजार उपाय उनके हटाने के किए जाते है, कोई कारगर नहीं होते। इससे जन तक गदह-पचीसी का यह नाजुक वक्त गुज़र न जाय, तब तक बड़ी साव- धानी रखनी चाहिए । इस नाजुक वक्त में यदि भलाई का बीज न बोया जाय, तो घुराई श्राप से श्राप आ जाती है, जैसे खेत, जिसकी धरती बहुत फलवत और उर्वरा है, जोता-जोया न जाय, तो लगी लगी घास उसमें खुर-बखुद उपज जाती है- "Vicc quichly sprungs unless we gondness , Ruukest werds in uchest quden grow बुद्धिमानो का सिद्धात है कि पादत या बान पड़ते-पढ़ते पीछे दृढ और बदमूल हो स्वभाव हो जाती है। योरप के एक दार्शनिक का मत है कि "मनुष्य पाप या पुण्य प्रादि जो कुछ करता है, वह मर उसकी वैसी यान पहें जाने का रतीजा है।" खुलासा यह कि स्वभाव से बहुरी कम काम होते हैं, जो कुछ किया जाता है, यह सब श्रादत है। सो श्रादमी क्या है, मानो जुदी-जुदी तरह की शादसों का एक गट्ठर है। इसी से यह कहावत चल पडी है "Habit ka second nturem अथात् पादत दूसरे तरह का एक स्वभाव है। इस कहावत का सबूत यह है कि यदि धैय, गांभीर्य, विचारशीजता, सयम अापकी प्रादतो में दाखिल हो जाये, तो छिछोरापन, टुश्शापन, साहस प्रादि से श्रापको चिढ़ हो जायगी। ऐसा ही जो श्रोछी छिछोरी आदत का है, उसको सममी, विचारवान्, गभीराशय काहे को भले लगेंगे । एव चुगली-चवाव, हेर फेर, कुटिलाई इत्यादि जिसकी आदत में दाखिल हो जाते हैं, उसको चैन नहीं पड़ती और अन नहीं पचता, जय तक वह ४२ साहित्य-सुमन किसी का कुछ चवाव या किसी की चुाली श्रथवा हेर-फेर को कोई एक बात न कर ले । तो नवयुवक को सावधान रहना चाहिए कि ये धुरी श्रादतें उसमें कदम न जमाने पावें, नहीं तो वे जन्म-भर छुटाए न छूटेंगी। ये सब गुण अवगुण जिन्हें हमने ऊपर कहे है, प्रतिक्षण रडे जोर के साथ बढ़ते हुए श्रादमी के चरित्र को या तो शोभित करते हैं या उसे दगीला कर डालते हैं, जिससे वह अपने में चरित्र पालन की शेष बातों को भी नहीं बचा सकता । जो सफ़ेद कपड़ा पहने हुए है, वह कपड़ों के मैले होने के भय से जहाँ-तहाँ वेठते सकु- चता है, जो मैला कपड़ा पहने हुए है, उसे क्या, वह जहाँ चाहे, वहाँ बैठ सकता है- यथा हि मनिनैवयन तत्रोपविश्यते , एव चलितवृत्तस्तु वृत्तशेष न रक्षात । जैसे उजाला छोटे-से छिन्द्र के द्वारा भीतर प्रवेश कर अधकार को दूर हटा देता है, वैसे ही आत्मगौरव का श्रणु-मात्र भी खयाल मनुप्यों को बुराई या बुरी आदतों की ओर से अलग करता है। जिनके आँख का पानी दरफ गया है और शरम और हिजाब को धो बैठे हैं, उन्हें नीचे से नीचा काम करने में सकोच नहीं रहता। नौजवानों में इसके नमूने बहुत-से पाए जाते हैं । नई उमग में बहुधा नौजवान आत्मगौरव का ध्यान 7 रख पड़ों की बढ़ाई रखने में चूक जाते हैं, जिससे वे ससार में बदनाम हो थाशालीन और धृष्ट की उपाधि पाते हैं । इसलिये बड़ों की बड़ाई रखना मानो अपना बड़प्पन बढ़ाना है। , ।

१०-पौगड या कैशोर बालक की पाँच मे चौदह या पद्रह तक जो अवस्था है, उसे पौगह पा केशोर अवस्था कहते हैं । तारुण्य के विकाश के पहले जो समय मनुष्य का होता है, वह कैसे सुख का रहता है। उस समय बालक का चित्त तुर्त के मथे मक्खन के समान कोमल, निर्मल और सर्वथा विकारशून्य रहता है । उस समय जो-जो बातें उसके नेत्रगोचर होती हैं, उन्हें उसका निष्कपट, सरल चित्त, विना शका-समाधान के ऋशु- भाव से ग्रहण कर लेता है । सरुणाई का प्रवेश होते ही याल्यकाल के वे सब सुख सपने के खयाल-से हो जाते हैं । सरल भाव, अकु- टिल निष्कपट प्रीति, उदार व्यवहार और पहले फा-सा यह अल्हड़पन अब कहीं नाम को भी न रहा। स्कूल या पाठशाला में नित्य का जाना, मोटी-मोटी विसावों का योझ लादने का अभ्यास, सहपाठियों के साथ एकात गोष्ठी, अध्यापक या मास्टर साहब की उत्साह यदाने- पाली उपदेश-सनी यानी, मेला, तमाशा या तरह-तरह के खेल-यूद में नई-नई उमग का श्रय कहीं सपर्फ भी न रहा । हमारे साथ के पदनेवाले सय मिन भय हमें अवश्य भूल गए होंगे जिन्हें कुछ याद भी होगी, तो यही स्नेह प्रय को होगा, जैसा उस समय था, जप हम साफे माथ एक ही पेंच पर सटकर बैठते थे और मास्टर साहय को अनेक सरह का मुलाया और जुल दे काना पुस्की में भौति भाँति की हाप्य हॉक-हक प्रसन्न होते थे। मास्टर साहब जैमा देखने में कटे और सस्तमिजाज थे, यह हमसप खूब जानते थेोन फेयल इमी, परन् हमारे समान नटएट जितने सदके है, सभी जानते होगे।हमलोगों में से जो कोई कभी रनी हया के प्रतिकूल कोई काम फर गुरसापा, *४४ साहित्य-सुमन तो वह सपेरे की जून स्कूल खुलते ही साक्षात् रुद-मूर्ति अध्यापक महा शय की भी चढ़ी तिरछी चितवन देखते ही चट भाँप लेता था कि, देखें, अाज हम पर क्या भद्रा उतरे, ईश्वर ही कुशल करे । सदा व कड़ाई करते रहे हों, सो भी नहीं, कभी कभी हँसाते इतना और ऐसी बात बोलते थे कि हंसते-हँसते पेट फूलने लगता था । जब वे क्रोध में भर शेर सा तड़प गरजने लगते थे, तब क्लास-भर में सलाटा छा जाता था और हम सब लोग मौन हो बकरी सा दवक ये रहते थे। उनकी ये सब बातें ऊपर से केवल रोब जमाने के लिये थीं।भीतर से वे ऐसे कृपालु, कोमल और सरस हृदय थे, मानो दास- , करा - . उपरि करवालधाराकारा मुजगमपुगवा , अत साक्षादाक्षा दीक्षागुरवो जयन्ति केपि जसा ।" जो घुढ़कते झिड़कते थे, सो सब इसीलिये कि हम अपना पाठ याद करने में सुस्त और भालसी न हो जायँ । अँगरेजी के प्रसिद्ध कवि गोल्डस्मिथ ने अपने काव्य Deserted Village में कैसा अच्छा चित्र इसी का उतारा है, "A man severe he was nd stern to men, I knew him well and all the truant kuer Well hud the bodmg, tiemblers learn’d to trace The day's disasters in his morning fice , Full well thcı laugh'd with countu fietcd glee At his jokes for many i johe had be, Full well the busy w hisper cucling round, Consejed the dismal tiding when he flownd, Yet he was kind or scsere in fught, The love he bore to leuning was in fault" - r पोगट या कैशोर ४५ . अब वह कोई बात न रही। यर कैसे-कैसे कुटिल, नीरस कपट- नाटक की प्रस्तावना के सदृश मासिक भाव हमारे चित्त में उठा करते हैं। बहुत चाहते हैं कि वे सुग्व-चैन के दिन अब फिर भावें, पर वे अब क्यों नहीं पाते ? जी चाहता है, मोहन, वचन, छुन्नू से फिर वैसा ही गप्प हाँके, तब कैमा कहकहे मारमार हँसा करते थे और विना कारण हँसी पाती थी, अध्यापक महाशय कितना सिज- लाते-गुमलाते थे, पर हम एक नहीं मानते थे। अब वैसी हंसी एक चार भी थावे, तो नोन, तेल, लकडी की चिंता के कारण दु ग्व-दुर्भर हृदय के दु ख का बोम कितना हलका हो जाय, पर वैसी हँसी अब काहे को श्रावेगी। श्रर पहले के माफ़िक हम उन छोटे-छोटे बालकों में धेधड़क क्यों नहीं जा मिलते ? अब हमारा उनके साथ मिलना सींग कटा पछुटा बनना क्यों जान पड़ता है ? पहले के समान सरल श्रकुटिल भार से चे श्रर हमसे क्यों मिलगे? कवियों ने युवावस्था को “सन सुखों को खान" लिसा है, किंतु वह सब उन धुर्ती की जल्पना-मानहै-"कवय किन जल्पन्ति ।" इस समय तो हमारा पूर्ण यौवन है, फिर हमें सुख क्यों नहीं मिलता ? माना कि जवानी का आलम बड़ा मजेदार और दिलचस्प होता है। इसमें हमें दुनिया की सब तरह की लज़्ज़तों का मज़ा मिलसा है ! आशिकी का मजा उठाते है , माशूली की लास चम्बते हैं, नवयौवा के उमग में यडे-बडे काम सहज में कर डालते हैं, , नइ जवानी, नया जोश, नई उमर, नवीन उत्साह, नूता थमिलाप, जितनी बात सय नई, पुरानी कोई नहीं। किंतु विचार- इष्टि से देखो, तो सिवा हिसं हवा के लड़कपन का वह यास्तविक मया सुख कहीं नाम को नहीं । धिक् ! यह वह समय है, जिसमें जो कुछ करते हैं, किसी से तृप्ति और ससोप नहीं होता । जितना भोग विलास करते जाते हैं, जी नहीं उयता, परन् चौगुनी लालसा यदती है- साहित्य-सुमन जब 1 . Convey cd the dismal tiding when he ironn'd, सो वह सवेरे की जून स्कूल खुलते ही साचात् रुद्र-मूर्ति अध्यापक महा शय की भी चढ़ी तिरछी चितवन देखते ही चट भांप लेता था कि देखें, अाज हम पर क्या भद्रा उतरे, ईश्वर ही कुशल करे । सदा व कदाई करते रहे हों, सो भी नहीं, कभी कभी हँसाते इतना थे और ऐसी बात बोलते थे कि हँसते हँसते पेट फूलने लगता था। क्रोध में भर शेर सा तड़प गरजने लगते थे, तय क्लास भर में सबाटा छा जाता था और हम सब लोग मौन हो बकरी-सा दवक बैठ रहते थे। उनकी ये सब बातें ऊपर से केवल रोब जमाने के लिये थीं। भीतर से वे ऐसे कृपालु, कोमल और सरस हृदय थे, मानो दास रस हों। उपरि करवालधाराकारा कृरा भुजगमपुरावा अत साक्षाद्राक्षा दीक्षागुरवो जयन्ति केपि, जता ।", जो घुड़क्ते झिड़कते थे, सो सब इसीलिये कि हम अपना पार याद करने में सुस्त और श्रालसी न हो जायें। अँगरेज़ी के प्रसिद्ध कवि गोल्डस्मिथ ने अपना Deserted Tillage में केसा अच्छा चित्र इसी का उतारा है- "A man seveie be uns und stain to viel, I knew him well and all the truant huck , Well had the boding tremble's learn'd to trice The dny 's disasters in bis morning face , Full sell the laugh'd with counterfietéd glee At his jokes for many a joke bad he , Full well the busy whispe circhng round, --- - - L Yet he was kind or severe in qught, The love he bore to leirning yes in fult" पौगठ या शोर चय पद कोई यात न रही । श्रर कैसे-कैसे कुटिल, नीरस फ्पट- नाटक की प्रस्तावना के सहश माविक भाव हमारे चित्त में उठा करते हैं। बहुत चाहते है कि वे सुख-चैन के दिन अय पिर यावे, धे अब क्यों नहीं पाते ? जी चाहता है, मोहन, ययन, छुपू से फेर पैसा ही गप्प हाँके, तय कैसा काहबहे मारमार हंसा करते थे और बिना कारण हसी पाती थी, अध्यापक महाराय किता सिज- जाते-मुफजाते थे, पर हम एक नहीं मानते थे । अब वैसी हसी एक गर भी नावे, तो नोन, तेल, लकड़ी की चिंता के कारण दुःम्पदुर्भर हृदय के दुप का योम फितना हलका हो जाय, पर वैसी सी पर हे को धागी । श्रय पहले के माफ्रिक हम उन छोटे छोटे यालकों में धड़क क्यों नहीं जा मिलते ? अब हमारा उनके माय मिलता पींग कटा चदा यनना क्यों जाा पडता है ? पहले के समान सरल प्राटिल मार से वे अब हमसे क्या मिलेंगे? कवियों ने युवावस्था को "सर सुखों की खान" लिखा है; किंतु वह मय उन धूतों की जरपना मात्र है-"काय किन्न पाल्पन्ति।" इस समय तो हमारा पूर्ण यौवन है, फिर हमें सुख क्यों नहीं मिलसा ? माना कि जवानी का आलम यहा मजेदार और दिलचस्प होता है। इसमें हमें दुनिया की सब तरह की लाज़तों का मज़ा मिलता है। आशिकी का मज़ा उठाते है , माशूक्री की लास चखते १, नवयौवन के उमग में यढे यडे काम सहज में पर डालते है , नई जवानी, नया जोश, नई उमर, नवीन उत्साह, नूतन अभिलाप, जितनी बात सर नई, पुरानी कोई नहीं। किंतु विचार- दृष्टि से देषो, तो सिवा हिर्स इचा के लइकपा का वह वास्तविक सया सुख कहीं नाम को नहीं । धिक। यह वह समय है, जिसमें जो कुछ करते है, किसी से तृप्ति और सतोप नहीं होता। जितना भोग विला- करते जाते हैं, जी परन् चौगुनी लालसा बढ़ता साहित्य-सुमन "हविषा कृष्णवमेव भूप एवाभिवद्धते।" जैसे आग में घी छोड़ने से प्राग चौगुनी धधकती है । अनगिनती रुपया पैदा किया, नदी-बड़ी विद्याएँ सीखीं, वहुत तरह के गुण उपा जंन किए, ससार में सब ओर अपना यश फैलाया, पर तृप्ति न हुई, हवम नित नित बढ़ती ही गई, सदा यही इच्छा रहती है, थोडा और होता, तो अच्छा था । श्राज एक काम सिद्ध हो जाने पर मन श्रानद से पूर्ण हो जाता है, उस समय यही मालूम होता है, मामा स्वर्ग-सुस भी तुच्छ धौर फीका है। वही किसी काम के बिगड़ जान पर ऐसी उदासी छा जाती है कि समस्त ससार प्रसार जंचता है) सुतग श्रत को यही सिद्धात ठहरता है कि यौवन-सुख केवल अनुत लालसानो के सिवा और कुछ नहीं है। सच्चे सुख का समय के थाल्य-श्रवस्था है । - ।

११-शब्द की आकर्षण शक्ति । - "शब्द की पारर्पण-शक्ति"न्यूटन की थाकर्षण शक्ति से लद-मान भी कम नहीं कही जा सकती। यरिफ शब्द की इस शक्ति को न्यूटन की श्राकर्षण-शक्ति से विशेष कहना चाहिए। इसलिये कि जिस भाकर्पण- शक्ति को न्यूटन ने प्रकट किया है, यह केवल प्रत्यक्ष में काम दे सक्ती है। सूर्य पृथ्वी को अपनी ओर खींचता है, पृथ्वी सदमहल को, यों ही जितने बडे पदार्थ हैं, सब छोटे को आकर्षण कर रहे है । वितु एक पदार्थ दूसरे को तभी आएपण करते हैं, जब वे दोनो एक दूसरे के मुकारले मे हो । पर शब्द की आकर्षण शक्ति में यह आवश्यक नहीं है । यह बात जरूरी नहीं है कि शन्द की पाकर्षण शक्ति सभी ठहर सकती हो, जब नेत्र भी वहाँ योग देता हो। इन शब्दो का जितना ही अधिक समूह मदता जायगा, उतनी ही उनमें प्रार्पण- शक्ति भी अधिक होती जायगी । प्रत्येक जाति के धम मय इसके प्रमाए हैं । वेदादि धर्म-प्रथ जो इतने माननीय है, सो इसलिये फि उनमें धर्म का उपदेश ऐसे शब्द-समूहों में है, जो चित्त को अपनी ओर खींच लेते है और ऐसा चित्त में गढके बैठ जाते है कि हटाए नहीं हटते । न्यूटन ने जिस आकर्पण-शक्ति को प्रकट किया, वह उसके पहले किसी के दिलो को श्राफर्पित न कर सकती थी । वृक्ष से फल फा टूटकर नीचे गिरना साधारण-सी बात है, पर क्मिी के मन में इसका कोई असर नहीं होता । न्यूटन के चित्त में अकस्मात् पाया कि "यह फल ऊपर न जा नीचे को क्यों गिरा ?" अवश्य इसमें कोई यात है। देर तक सोचने के उपरात उसने निश्चय किया कि उसका कारण यही है कि "यडी चीज़ छोटी को खींचती है।" पर शब्द की प्रावण 1 . - - में इतनी प्रतिष्ठा नहीं पाता । यदि किसी काव्य में पदलालित्य के कामाग्नि से व्याकुल हो अपनी सहेली से कह रही है-"कामना के दूर करने को जो तुमने यह घनसार ( चदन) हमारे शरीर में माहित्य-सुमन शक्ति में इतना असर है कि वह मनुष्य की कौन कहे, यन के मूगो को भी मुग्ध कर देती है। कोयत का पचम म्बर में थलापना सदरों को क्यों भाताहे, इसीतिये किमीठी प्राधाज़ (Heflodiousvorce) सनोंको है। बीन इत्यादि बारे भी लोगों को क्यों रचते हैं, इसीलिये कि वे कान को सुसद और मन को श्राकर्पण करनेवाले हैं। केवल शब्द की मधुर ध्वनि में जा इतना प्रलोभन है, सब थीद उन शब्दों में अर्थचातुरी भी भरी हो, तो वह कितना मन को सीद- चाला न होगा । श्रलकारी में अनुप्रास ( Alliteration ) कितना कर्णनसायन है, पर अर्थचातुरी न रहने से वह पालकारिकों माथ-साथ अर्थचातुरी भी हो, तो उसके समान यहुत कम काय निक्लेंगे। जैसा दामोदर गुप्त का यह श्लोक है- "अपमारय धनसार कुरु हार दूर एवं कि कमलै अलमलमालि मृणालैरिति कति दिवानिश बाला।" अर्थात्-कोई विरहिणी नायिका अपने प्रियतम के वियोग मै पोत रक्सा है, उसे थपसारय (दूर करो ), इसलिये कि चान तो और भी कामानिधधक उगी। मोतियों का हार उतार खो। कमलों से क्या होगा, वह भी ठटक न पहुंचा सकेंगे। अलमलमावि मृणाल (उडक के लिये जो मृणाल मेरे ऊपर धरा है उसे हटायो)- इस भाँसि वह याला दिन रात कहर-शहर तुम्हारे वियोग में रोया तुलसी और विहारी के काव्यो में ऐसा बहुत ठौर भा गया है। जहाँ अनुप्रास की मिठास और अर्थचातरी दोनों एक्साथ भाई हैं। कुछ उदाहरण उमके यहाँ पर हम देते हैं- करती है।

शब्द की आकर्षण शक्ति ( ར "टटकी घोर धोवती चटकीली मुख जोति , फिरत रमोह के घरन जगर-मगर यति होति । मानहु मुख तिसरावना दुलहिनि करि अनुराग , सासु सदन मन ललन हु सौतिन दियो सुहाग । (भूपन भार सम्हारिई किमि ये तन सुकुमार ) ( सूधे पाय न धरि परत महि मोमा के भार ।) ( लगानगी लोचन कर, नाइक मन बधि जाय ) देह दुलहिया की वहै ज्यों ज्यों जोबन जोति, त्यों-त्यों लसि मोते सबै बदन भनिन दुति होति । तुलसी का जैसा- "तुलसी सराहत सकल मादर साव सहज मनेह की।" "पिा मोहि भयउ बेनु बन भागी। दुसह दाह दुप दृपन भागी ॥ मुनी बहोरि मातु मृवानी। मीन मरल रमसाना । अँगरेज़ी में भी कहीं-कही पर ऐसा है। जैसा पोप, की इस पक्ति में- "The sound should seem an echo to the sense अर्थात्-शब्द ऐसे होने चाहिए, जिनमें कि अयों की गंज-सी निफले । जैसा कालिदास का- "कयाललामकमनीयमजस्य लिप्मो ।" मवभूति का जैसा- "कूजलुजकुटीरकौशिकपटा"। इत्यादि पैदी रीति और प्रसाद-गुण इस तरह के फाप्यों के प्राण है। पोप की एक और मी बानगी है- - - ३ - How high His Highness holds hus haughty head") साहित्य-सुमन । सुम्हारी गोद में जो देहधारी-मान का शरीर धा गिरे, मो शातकमा पर इसमें अर्थचातुरी का अभाव है। शेक्सपियर के- His heavy-shotted hammer shroud" इस पद में अनुप्रास अर्थ-चातुरीसहित है। तात्पर्य यह कि जो अनुप्रास विना प्रयास भा जाय तथा जिसक द्वारा अर्थ मे भी अधिक सौंदर्य बढ़ जाय, तो वह सर्वथा प्राय है। पर जिस अनुप्रास के पीछे अर्थचातुरी की हत्या करना पड़े, तो वह अनु पास किस काम का कालिदास के- "श्यमाधिकमनोशा दत्कलेनापि तन्वा किमिव हि मधुराणा महन नाकृतीनाम् ।" इस श्लोक में अनुप्रास विना बनारट के आ गया है । इससे पा. पहुत उत्तम अनुमोस का उदाहरण है। जयदेव कोकिलकठ इसीरिये कहनाए कि उनके पदों में लालित्य अर्थचातुरी से कहीं पर सारी नहीं है। जैसा- "ललितलवगलतापरिशालनकोमलमलयममारे ।" प्रसाद-गुण विशिष्ट "परमेश्वर परिपाल्यो भवता भातापभातोहम्" वैदर्भी रीति का अनुप्रास, जैसा- "कुतोऽवाचिवाचिम्तव यदि गता लोचनपथम् त्वमापीता पातावरपुरनिवास वितरमि। त्वदुत्सगे गगे ' पतनि यदि कायस्तनुभृतान ' शासक्रतवपढलाभोन्यतिलघु ॥" अर्थात्-हे गगे ! तुम्हारी पीचि ( लहर ) यदि नेत्रपय में शाय, सो अवीचि (नरक या पाप) कहाँ। तुम जलरूप में जो पी. स गायो, सो पीतावरपुर (वैकुट धाम) यास दे देती हो। अनुप्रास, जैसा- नदा मात (श्व के) पद का लाम भी बहुत थोड़ा है। ।

माता का स्नेह १३ है के उपरात पिता अलग हो जाता है। दश मास तक गर्भ में धारण का क्लेश, जनने के समय की पीड़ा, उसके पालन-पोषण की चिंता और फ्रिकर, उसे नीरोग और प्रसन्न देख चित्त का हुलास, रोगी तथा अन- मन देख अत्यत विकल होना इयादि राब माताही में पायाजाता माता और पिता के स्नेह कातारतम्य इससे अधिक स्पष्ट और क्या हो सकता है कि लड़का कुपूत और निकम्मा निकल जाय, तो याप कमी उसका साथ नहीं देता, यल्कि घर से निकाल अलग कर देता है, पर माँ बहुधा सात भॉवरवाले पति को भी त्याग निकम्मे पुत्र का साथ देती है। बगालियों में सथा हमारे देश के कनौजियों में, जिनके बीच बहुविवाह प्रचलित है अर्थात् पुरुष पहुत-सी स्त्रियों को व्याह लेने की बुराई को बुराई नहीं समझते, इसके बहुस से उदाहरण पाए जाते हैं। दो चार नहीं, बरन् हजार पाँच सौ ऐसी भी देखी गई है, जिन्होंने बालक की प्रत्यत कोमल अवस्था ही में पिता के न रहो पर चकियाँ पीस पीस अपने पुत्र को पाला और उसे पढ़ा लिखाकर सर भौति समर्थ और योग्य कर दिया। पुन भी ऐमों के ऐसे-ऐसे सुयोग्य हुए हैं कि जैसे सब भाँति भरे-पुरे घरानो में भी न निकलेगे। जय महाकवि श्रीहर्ष केवल पाँच वर्ष के थे, तो उनके पिता ने बाद में पराजित हो लाज ये तन स्याग दिया । सय उनकी माँ ने चिता- मणि-मन का उसे जप करयाकर तथा सरस्वती देवी का कृपा- पात्र कर अन्यत उद्भट पदित उन्हें पना दिया और पीछे से अपने पसि के परास्त फरनेवाले परितो को इनके द्वारा बाद में हराफर पूरा बदला चुका लिया। पुराणों में ऐसी अनेक कथाएँ मिलती हैं, जिनमें माता का चासत्य टपक रहा है । माँ का एक यार का प्रोरसाहा पुन के लिये जैसा उपफारी और उसके चित्त में असर पैदा करनेवाला होता है, वैमा पिता की सौ यार की नसीहत घोर सादना भी नहीं" । रे- १२-माता का स्नेह वात्सल्य रस की शुद्ध मूर्ति माता के सहज स्नेह की तुलना इस जगत् में, जहाँ केवल अपना स्वार्थ ही प्रधान है, कहीं ढूँदने स मी न पाइएगा। . सच है- - "कुपुत्रो जायेत कचिदपि कुमाता न भाति ।" मातृस्थानापन्न दादी, दादा, चाचा, ताऊ धादि का स्नेह बहुश श्रौचित्य विचार और मर्यादा-परिपालन के ध्यान में देखा जाता है। किंतु माता तथा पिता का स्नेह पुन में निरे चासल्य-भाव के मूत्र पर है। अब इन दोनों में भी विशेष भादरणीय, सच्चा और निस्वार्थ प्रेम किसका है ? इसकी समालोचना आज हमारे इस लेख का मुख्य उद्देश्य है। लोग कहते हैं, लाड प्यार से लड़के बिगड़ते हैं, पर सूक्ष्म विचार से देखिए, तो बालको में हरएक अच्छी बातों का अकुर गुरु पर प्यार ही से जमता है । विलायत के एक चतुर चितेरे ने लिखा है कि "मेरी माँ के एक बार चूम लेने ने मुझे चित्रकारी में प्रवीण कर दिया।" गुरु और उस्ताद जितना हमें पाठशालो में भय और ताड़ना दिखलाकर वर्षों में सिखला सकते हैं, उतना अपने घर में हम सुस-वत्सला माँ के भाई त्रिम सहज स्नेह से एक दिन में सीस लेते हैं । माँ के स्वाभाविक, सच्चे और बेवनावटी प्रेम का प्रमाण इससे बढ़कर और क्या मित्र सकता है कि लड़का कितना ही रोता हो या विरमाया माँ की गोद में जाते ही चुप हो जाता है। इसी तरह जहाँ योदी देर तक लड़के ने दूध न पिया, तो माँ के स्सन भी दूध से भर भाते हैं, दूध टपकने लगता है और वह विकल हो जाती है। विदुपात । हुधा हो, माता का स्नेह - के उपरांत पिता अलग हो जाता है। दश मास सक गर्म में धारण का कैश,जनने के समय की पीदा, उसके पालन-पोषण की चिंता और फ्रिकर, उसे नीरोग और प्रसन्न देय चित्त का हुलास, रोगी तथा अन मन देस अत्यत विकल होना इत्यादि राय माताही में पाया जाता है माता और पिता के स्नेह कातारतम्य इससे अधिक स्पष्ट धौर क्या हो सकता है कि लड़का कुपूत और निकम्मा निकल जाय, तो याप कभी उसका साथ नहीं देता, यरिक घर से निकाल अलग कर देता है, पर माँ यहुधा सात भोवरवाले पति को भी त्याग निकम्मे पुत्र का साथ देती है। गालियों में तथा हमारे देश के कनौजियों में, जिनके वीच यहुविवाह प्रचलित है अर्थात् पुरुप यहुत-सी स्त्रियो को ब्याए लेने की बुराई को बुराई नहीं समझते, इसके बहुत से उदाहरण पाए जाते हैं। दो चार ही, परन् हजार पाँच सौ ऐसी भी देसी गई हैं, जिन्होंने यालक की अत्यत कोमल अवस्था ही में पिता के 7 रहने पर चकियाँ पीस पीस अपने पुत्र को पाला और उसे पढ़ा लिसाकर सप माँसि समर्थ और योग्य कर दिया। पुत्र भी ऐपो के ऐसे-ऐसे सुयोग्य हुए हैं कि जैसे सब भाँति भरे-पुरे घरानो में भी न निकलेंगे। जय महाकवि श्रीहर्ष केवल पाँच वर्ष के थे, तो उनके पिता ने बाद में पराजित हो लाज से सन स्याग दिया । तब उनकी माँ ने चिंता- मणि-मन का उनसे जप करवाकर तया सरस्वती देवी का कृपा- पाय कर अत्यत उद्भट पदित उन्हें घना दिया और पीछे से अपने पति के परास्त करनेवाले पडितो को इनके द्वारा वाद में पूरा यदला चुका लिया। पुराणों में ऐसी अनेक कथाएँ मिलती है, जिनमें माता का वात्सल्य टपक रहा है । माँ का एक यार का प्रोत्साहन पुत्र के लिये जैसा उपकारी और उसके चित्त में असर पैदा करनेवाला होता है, वैसा पिता की सौ बार की नसीहत और साइना भी नहीं हराकर साहित्य-सुमन प्रेम करने पर प्रेम करते हैं। दूसरे वे हैं, जो तुम चाहे प्रेम करो या न करो, तुम से प्रेम करते हैं। तीसरे वे, जो ऐसे कहर हैं कि उनसे फितना ही प्रेम करो, तो भी नहीं पसीजते । इसके उत्तर में भगवान् ने कहा है जो परस्पर प्रेम करते हैं, वह तो एक प्रकार का बदला है, स्वच्छ स्नेह उसे न कहेंगे, काम पड़ने पर मित्र शनु बना ही करते हैं, उसमें सौहार्द धर्ममूलक नहीं है, किंतु दोनों परस्पर स्वायी हैं, और जब स्वार्थ हुआ, तो कुछ-न-कुछ कपट उसमें अवश्य ही रहेगा, कपट का मन में लेश भी पाया कि स्वच्छ स्नेह की जड़ कर गई । जिसमें केवल धर्म हो, जो स्वछ स्नेह को दर्पण के समान प्रकाश कर देनेवाला हो सथा जिसमें बदला पाने की कहीं गघ भी न हो, वह स्नेह वही है, जो दया की मानो साक्षात् स्वरूप माँ पुत्र में रसती है । इस मातृक स्नेहरूपी अनमोल मोती की तारीफ में पेज-का-पेज रँगते जाय, तो भी हम भोरछोर तक नहीं पहुंच सकते । .

। १३- मुग्ध-माधुरी मुग्धता की छवि ही कुछ निराली है । मुग्धता में चेहरे के भोले- पन के साथ ही-साथ एक अद्भुत पवित्र, स्थिर और सत् मनोवृत्ति प्रतिषिवित होती है। जिस सौंदर्य में भोलेपन की झलक नहीं, वह यनापटी सौंदर्य है। बनारटी सौंदर्य में सागर के समान प्रसन, गभीर और स्थिर भाव कभी ढूँदने से भी न मिलेगा। भोलेपन से खाली तथा दगीली खूबसूरती पहले तो कोई वयसूरती ही नहीं है, और कदाचित् हो भी, तो कुटिलाई और याँकापन लिए हाव भाव दूपित, मलिन और अपवित्र मन की खोटाई के साथ ऊपर से रंगी-चेंगी, सुदरता छूत के समान देसनेवालों के मन में अवश्य अपवित्र और दूपिन भाव पैदा करेगी। साभाविक सरल सौंदर्य वही है, जिसमें भोला- पन मिला हो और जो देसनेवालों के चित्त में अपवित्र और दूपित भाव पैदा करने के यदले प्रकृति के अद्भुत लोकोत्तर कामों का स्मरण दिलाता हुआ भक्ति-प्रवण मन-मधुप को सर्वशक्तिमान के चरणकमलों के ध्यान में रजू करता है। बहुतेरे ऐसे दृष्टास मिलते है कि हिंसक ठग लोग भी ऐसों के सौंदर्य पर मोहित तथा उनकी मुग्ध-माधुरी के घशी- भूस हो हिंसा के काम से निरस्त हो बैठे। हमारे "नृसन ब्राह्मचारी" का किस्सा इसका एक उदाहरण है। जैसा ग्रामण और पियों के चालको में पुश्त-दर पुश्त की तपस्या तथा ज्ञानकुल प्रसूत राजपियों में जानतेज की से उत्पन्न महवर्चम् - 9 भट्टना का यह "नूतन ब्रह्मचारी" नाम का पुरतक भी हमारे यहा मे मिरता है, जो बहुत ही शिक्षाप्रद प पटगे योग्य है ।-अकाराक साहित्य-सुमन दमक निराली होती है और छिपाए नहीं छिपती उसी तरह रूप के ससार में मुग्ध-माधुरी भी छिपाए नहीं छिपती । नागरिक स्त्रियों की अपेक्षा ब्रजवनिता गवारिन गोपियों में कौन-सी ऐसी बात थी कि हमारे कविगण रूप-वर्णन में अपनी कविता का सर्वस्व उनकी रूप- माधुरी को सौंप बैठे । कोक्लिक जयदेव, फवि पर्णपूर तथा धौर- और लीलाशुक प्रमृति कवियो की कोमल कविता का उद्गार इन्हीं घजवनितायो ही के रूप-वर्णन में क्यों हुना ? इसका कारण यही मन में श्राता है कि इन लोगो को नगरवधू तथा प्रसिद्ध राज-पन्याओं के रूप में यह यात न मिली। वह येवल वेधनावटी भोलापा था, जिससे कृष्ण-ऐसे रसिकशिरोमणि इन पर मोहित हो इनके पीछे- पीछे खोलते फिरे । हजार में नौ सौ निनाावे लोग तेल और पानी मिली हुई हल्दी की वार्निश से चमकाए गए, वार-बनिताओं के जिस सौंदर्य तथा रूप को देखकर कीट-पतग की गति भुगतते हैं, वह सौंदर्य तथा रूप के जौहर के सच्चे जौहरियों की दृष्टि में अत्यत तुच्छ और हेय है । परन् संयोगवश कभी उनकी नजर भी ऐसे सुदरापे पर पड़ जाती है, तो उन्हें घिन पैदा होती है । यह स्वाभाविक बनावटी सौंदर्य ग्राम में ही पाया जाता है । यह सुकुमार पौधा नगर की दूपित घायु के लगने से मुरझा जाता है । राजर्षि दुष्यत के राज-भवन में कितनीराजमहिपियों के होते हुए भी वल्कल और छाल से सन टॉपे हुए ग्राम्य नारी शफुतला ही उनको सोहावनी हुई-- "इयमधिकमनोश वल्कलेनापि तवी" यह एक अद्भुत बात है कि जिसने शुद्ध पदार्थ है, वे बाहरी देखनेवालों को रिझानेवाले गुणों में उनसे कम मालूम होते हैं, जिनमें मिलावट है। शुद्ध सोगा उत्सना T चमकेगा, जितना मिलाया हुअा। अपने यावटी रूप पा अभिमान करनेवालों का अभिमान' सणिक होता है। जैसा हल्दी का रंगा पर बड़ा चटकीला होता है, परतु धाम ।

मुग्ध-माधुरी
के लगते ही सब घटक उसकी एक छिन में बिला जाती है । लावण्य
का लालित्य बढ़ाने में स्वाभाविक सौंदर्य सार पदार्थ है। इसी स्वाभा.
विक सौंदर्य को हम मुग्ध माधुरी कहते हैं । रूप की इस मुग्ध
माधुरी का कुछ कम ही निराला है कि जो मुपथवि रेख भीनते.
भीनते पूनो के चाँद-सी सोहती थी, वही जवानी के आते ही मोछों
की कालिमा से कलुपित हो सेवार के जाल से ढेपे हुए कमल की
शोभा धर लेती है । प्रस्तु, इस विगही दशा में भी यह छवि बहुत
दिनों तक नहीं रहती। धुओं से जैसा चिन, हिमसहति से जैसा
फमल, अंधियारे पाख से जैमा चद्रमा ढुक जाता है, उसी तरह घुदापे
से यह छवि भी आमात हो जाती है । भवभूति महाकवि ने इस
मुग्ध-माधुरी का कई जगह बहुत उत्तम चित्र अपने उत्तर-राम-परिन में
खींचा है। यथा-
“प्रतनावरले प्रातो मील मनोहरकुन्तले
र्दशनमुकुलैमुग्धालोक शिशोदधता मुखम् ,
ललितललितज्योत्स्नापायरकृतिमविभ्रमै
रकृतमधुररम्बाना मे कुतूहलमगके ।
अलसलुलितमुग्धान्यध्वसंजातखेदा
दशियलपरिरम्भदत्तसवाहनानि ,
परिमृदितम्पालीदुबला यगका
स्वमुरसि मम कृत्वा यत्र निद्रामवाप्ता ।
कविकुलमुकुट फालिदास ने भी पार्वती के कोमल अगों के वर्णन
है-
भसमृत मदनमगयष्टेरशामवारय करगा
फामरय पुष्पन्यतिरितमन्न बाल्यापर माय बय प्रपदे ।
उन्मानित तूलिकयेव नित्र सूयागामाममिवारावन्दम् ,
तस्पारचतुरसशोभि यपुर्विमक्त नवयौवनेन ।
.
.
ममब

साहित्य-सुमन
.
रग।
विहारी ने भी लिखा है-
छुटी न मिसुता की झलक, झलक्यो जोवन अग
दीपति-देह दुडून मिल, दिपति ताफना
तिय तिथि तरनि किशोर वय, पुन्य काल सम दोनु ,
काहू
पुन्यनि पाइयत,
वैस-सधि सक्रोनु ।
चितवनि भोरे भाव की, गोरे मुह मुसकानि ,
लगनि लटकि प्राली गरे, चित खटकत निन आनि ।
।

. १४-चरित्र-पालन चरित्र में कहीं पर किसी तरह का दारा न लगने पावे, इस यात की चौकसी का नाम चरित्र पालन है। हमारे लिये चरित्र पालन की श्रावश्यकता इसलिये मालूम होती है कि चरित्र को यदि हम सुधा- रने की फिकर न रक्खें, तो उसे बिगड़ते देर नहीं लगती, जैसे उर्यरा फलवत धरती में लयी-नयी धास और कटीले पेड थाप-से श्राप उग पाते हैं और धन प्रादि के उपकारी पौधे बटे यत व परिश्रम के उपरात उगते हैं। सच तो यो है कि त्रिगुणात्मक प्रकृति ने चरिन में विकार पैदा कर देनेवाले इतने तरह के प्रलोभन ससार में उपजा दिए हैं, जिनसे श्राफर्पित हो मनुष्य चात-की-यात में ऐसा बिगड़ जा सकता है कि फिर यावजीवन किसी काम का नहीं रहता। महल के पनाने में क्तिना यत और परिश्रम करना पड़ता है, पर जब वह बाकर तैयार हो जाता है, तो उसे दहाते देर नहीं जगती । इसी यात पर लक्ष्य फर कवि शिरोमणि कालिदास ने - "विकारहेती मति विनियन्ते येषा न चेतासि त एव धोरा ।" अर्थात्-जो यासे विकार पैदा करनेवाली हैं, उनके होते हुए भी जिनके मन में विकार न पेदा हो, वे ही धीर हैं। महाकवि भारवि ने भी ऐसा ही कहा है- "विक्रिया न खलु कालदोपजा निमलप्रकृतिषु विरोदया ।" अर्थात्-निर्मल प्रवृतिघालों में काल की कुटिलता के कारण जो ६२ साहित्य-सुमन विकार पैदा होते हैं, वे चिरस्थायी नहीं रहते । चरित्र-रक्षा एक प्रकार की सदली ज़मीन है, जिस पर यश सौरभ इत्र के समान बनाए जा सकते हैं, अर्थात् जैसे गधी सदल का पुट देकर हर किस्म का इन उसमें से तैयार करता है, वैसे ही चरित्र जब श्रादमी का शुद्ध है, तो वह हर तरह की योग्यता प्राप्त कर सकता है।शुद्ध चरित्रवाला मनुष्य सब जगह प्रतिष्ठा पाता है, और वह जिस काम में सनद्ध होता है, उसी में पूर्ण योग्यता को पहुंच हर तरह सरसब्ज़ होता है। यथा हि मालनवलैर्यत्र तत्रोपविश्यते , एव चलितवृत्तस्तु वृत्तशेष न रक्षति । अर्थात्-जैसे मैला कपड़ा पहने हुश्रा मनुष्य जहाँ चाहता है, वहाँ बैठ जाता है, कपड़ों में दाग लग जाने का नयाल उस श्रादमी को बिलकुल नहीं रहता, उसी तरह चलितवृत्त अर्थात् जिसके चाल- चलन में दाग लग गया है, वह फिर थानी अपने और धरियों को भी नहीं बचा सकसा, बरन् वह नित्य नित्य बिगड़ता जाता है।मन, जिला और हाथ का निग्रह चरित्र पालन का मुख्य अंग है। जिन्होंने मन को कुपथ पर जाने से रोका है, जीभ को दूसरे की चुग़ली-चयाई से या गाली देने से रोका है, और हाथ को दूसरे की वस्तु पुराने से या बेईमानी से ले लेने में रोक रक्खा है, यही चरित्र-पालन में उदाहरण दूसरों के लिये हो सकता है। ऐसा मनुष्य कसौटी में कसे चाने पर खरे-से-खरा निकलेगा। वर विन्ध्याटव्यामनरानपातस्य मरण घर सपाकाणे हयापिदितप निपताम् , पर गांव गहनबालमध्ये विलयन गालाभियो भवतु कुमजस्य अतवत । सप, कुलीन समझदार सायर के लिये परित्र में दाा लगना ऐसी ही करी पास है कि उसे अपना जीवन भी बोम मालूम होने . ।

प्ररित्र-पाला - -- - . लगता है। जैसा ऊपर के श्लोक में कवि ने कहा है कि विध्य पहाड के या में मुम्बाप्पासा हो मर जाना अपरा, तिनकों से टके सों से भरे कुएं में गिर कर प्राण दे देता श्रेष्ठ, पानी के भंवर में यकर विला जाना उत्तम, पर शिष्ट पढ़े लिसे मनुष्य का चरित्र से व्युत हो जाना अच्छा नहीं।" राया पैसा हाथ का मैल , माता- जाता रहता है, किंतु यात गए गत फिर नहीं बनती। इसीलिये धन फा दरिद्र, यदि वह सुचरित्र में श्रादय हो तो, दरिद्र नहीं कहा जा माता, जिनकी आँख का पानी हरफ गया है, उनको चरित्र पालन कोई बसी यात नहीं है, और न इसकी कुछ कर उन्हें है, किंतु जो परित्र को मबसे बड़ा धन माने हुए है, ये अत्यत समय के साथ बड़ी सावधानी मे ससार में निवहते हैं। यावत् धर्म, कर्म और पर- मार्थ साधा सबका निचोड़ वे इसी को मानते है। ऐसे लोग जन- समाज में यहुत कम पाए जाते हैं, हजारो में कहीं एफ ऐसे होते हैं, और पेसही लोग समाज के अगुमा, राह दिखलानेवाले, श्राचार्य, गुरु, रसूल या पैरायर हुए हैं और प्राप्त तथा शिष्ट माने गए हैं। उनके एक- एक शब्द जो मुम्य से निकलते हैं तथा उनका उठना-बैठना, चलना- फिरना अलग-थलग चरित्र-पालन में उदाहरण होता है। जो प्रतिष्ठा पडे मे पडे राजाधिराज मन्नान, यादशाह, शाहशाह को दुर्लभ है, यह चरितमान् को सुलभ है, और यह प्रतिष्ठा चरित्र पालनवाले को सहन ही मिल गई हो, सो नहीं, वरन् मच कहिए सोयह असिधारा- बत है, ससार के अनेक सुखो को लात मार अदे यदे क्लेश उठाने के उपरात मनुष्य इसमें पका हो सकता है। प्ररित्र से यहुत मिलती हुई दूसरी बात शील है। शील का चरिन ही में प्रतर्भाव हो सकता है। चरित्र पाला में चतुर शील- मरक्षण में भी प्रवीण हो सकेगा, किंतु शील-सरक्षण में विचक्षण मनुष्य चरित्र पालन में प्रवीगा नहीं हो सकता । अंगरेजी में शील के 1 साहित्य-सुमन लिये "फाटक्ट" (Conduct) और चरित्र के लिये "कैरेक्टर" (Character) शब्द है । आदमी की याहरी चाल चलन का सुधार शील या "काडक्ट" अथवा "बिहेवियर" (Behaviour) कहा जायगा, किंतु मनुष्य का श्राभ्यतर शुद्ध जब तक न होगा, तब तक थाहरी सभ्यता 'चरित्र' नहीं कहलावेगी। श्रीरामचद्र, युधिष्ठिर, बुद्धदेव तथा महात्मा ईसा के चरित पालन का समाज पर वैसा ही श्रसर होता है, जैसा रक्त-सचालन का शरीर पर । सुस्निग्ध पुष्ट भोजन से जो रुधिर पैदा होता है, वह शरीर को पुष्ट और नीरोग रखता है, वैसा ही जिस समाज मे चरित्र-पालन की कदर है और लोगा को इसका ख़याल है कि हमारा चरित्र दगीला न होने पावे, वह समाज पुष्ट पढ़ती जाती है और उत्तरोत्तर उसकी उन्नति होती जाती है । जिस समाज मे चरित्र-पालन पर किसी की दृष्टि नहीं है और न किसी को "चरित्र किस तरह पर मनता व विगडता है" इसका कुछ ख़याल है, उस बिगड़ी समाज का भला क्या कहना! कुपथ्य भोजन से विकृत रुधिर पैदा होकर जैसा शरीर को च्याधि का भालय यना नित्य उसे तीण, धौर जर्जर करता जाता है, वैसा ही लोगो के कुचरित्र होने, से समाज नित्य तीण, नि सत्त्व और जर्जर होती जाती है। जिस समाज में चरित्र की, बहुतायत होगी, वह समाज सर्वोपरि दीप्यमान होकर देश और जाति की उन्नति का द्वार होगा । हमारी प्राचीन पार्यजाति, चरित्र की खान थी, जिनके नाम से इस समय हिंदू-मात्र पृथ्वी-भर में विख्यात है। अनसोस ! जो कौम किसी समय दुरीया के सब लोगों के लिये चरिन शिक्षा में नमूना थी, यह श्राज दिन यहाँ सक गई-बीती हो गई कि दूसरे से सभ्यता और चरित्र पालन की शिक्षा लेने में अपना शहोगाग्य सम- झती है । समय सेलाड़ी ने हमें अपना खिलौना बनाकर जेसा चाहा, वैसा खेल खेला । देखें, धागे अव वह कौन खेल पेलता है। - 4 १५--चारुचरित्र मनुष्य के जीरन का महत्व जैसा चार चरित्र से यपादित होता है, वैमा धन, ऊँचे पद, ऊँचे दरजे की तालीम इत्यादि के द्वारा नहीं हो सकना । ममाज में जैसा गौरव, सैसी प्रतिष्ठा या जात, जैसा जोर लोगों के बीच में शुद्ध चरित्रमाले फा होता है, वैसा बडे से बडे धी और ऊँचे-से ऊँचे श्रोहदेवाले का कहाँ ? धनवान् या विद्वान् को जो प्रतिष्ठा दी जाती है, या सर्वसाधारण में जो यश या नामरी उसकी होती है, उसकी स्पा सको होती है। कौन ऐसा होगा,जो अपो वैभव, अपनी विद्या या योग्यता से चोरों को अपो नीचे रखने की इच्छा न करता हो? शाति का एकमात्र श्राधार केवल चार चरिजगले में शनरत्ता या नहीं देखा जाता। वह यह कभी नहीं चाहता कि चरित्र के पैमाने में, थर्थात् चरित्र क्या , इसकी नाप जोख में, दूसरा हमारे ग्रागे 1 बदने पावे। कार्य-कारण का बड़ा धरिष्ठ मयध है। इस सूत्र के अनुसार देश या गाति का UP-TE प्यक्ति सपूर्ण देश या जाति की सभ्यता रूप कार्य का कारण है, अर्थात् जिस देश या जाति में एक एक मनुष्य अलग- अलग अपने चरित्र के सुधार में लगे रहते है, यह समग्र देश-का-देश उन्नति की थतिम सीमा तक पहुँच सभ्यता का एव यहुत अच्छा मूना मन जाता है। नीच में नीचे कुल म पैदा हुधा हो, बहुत पड़ा लिया भी 7 हो, थड़ा मुग्रीवेघाला भी न हो, न किसी तरह की कोई अता- धारण पात उसमें हो; किंतु परिन की फमोटी में यदि यह धामी तरह केस लिया गया है, तो उस भादरणीय मनुष्य का सभम और आदर समाज में फौ। ऐसा इयत होगा, जो न करेगा और - . माहित्य-सुमन ईयावश उसके महत्व को मुक्त कठ हो स्वीकार न करेगा ? नीचे दरजे से ऊँचे को पहुंचने के लिये चरित्र की कसोटी से बढ़कर और कोई दूसरा जरिया नहीं है । चरित्रवान् यद्यपि धीरे-धीरे बहुत देर में ऊपर को उठना है, पर यह निश्चित है विचरिन-पालन में जो साय धान है, वह एक न-एक दिन अवश्य समाज का मापा मार लिया जायगा । हमारे यहाँ के गोत्रप्रवर्तक ऋषि, मिझ-भिय मत या । मप्रदायों के चलानेवाले प्राचार्य, नबी, अविया, प्रौलिया आदि मय इसी क्रम पर श्रारूढ रह लाखो-करोडों मनुष्यो के गुरोर्गुर,' देववत माननीय पूजनीय हुए, वरन कितने उनमें से ईश्वर के अश और र अवतार माने गए। यो सो दियानतदारी, सत्य पर अटल विश्वास, शाति, कपट शौर कुटिलाई का प्रभाव वादि चरिनपालन के अनेक अंग है, किनु बुनि- याद इन सब उत्तम गुणो की, जिस पर मनुष्य में चार चरित्र का पवित्र दिशात मदिर खड़ा हो सकता है, अपने सिद्धातो का रस और उसूलों का पफा होता है। जो जिता ही अपने सिद्धातो हद और पहा है, वह उतना ही चरित्र की पवित्रता में एक्सा होगा। चरित्र की मपत्ति के लिये सिधाई तथा चित का अकुटित भार भी एफ ऐसा यहा स्रोन है, जहाँ से विश्वास, अनुराग, दया, मृता, सानुभूति के सरस प्रवाह की योय धारा यहती है। इनमें से किसी एक धारा में नियम पूर्वक स्नान करनेवाला मनुष्य भलमनसाहत, सभ्यता, थामिजान्य या कृतीनता तथा भिटसा का नमूना पर जामा है। श्योकि चतुराह पिना चित्त की मिधाई के, ज्ञान या विद्या विना विवेक या अनुदान के, मनुष्य में एक प्रकार की शक्ति अथवा योग्यता चस्प है, पर यह योग्यता उसकी वैसे ही जैसे गिरह काटगेवालों में और या गाँठ काट रपए निकाल लेने की योग्यता या शाळाफी रदमी है। ] चार चरित्र मात्मगौरव भी चरित्र का प्रधाा श्रग है। सुचरित्र-सपन नीचा काम करने में सदा मचित रहता है। प्रतिक्षण उसे इसके लिये बड़ी चौरमी रखनी पड़ती है कि कहीं ऐसा काम न यन पडे कि प्रतिष्ठा में ही हो । उसका एक-एक दाम और एक एल शब्द सभ्य समाज में नेकचलनी के सूत्र के समान प्रमाण में लिया जाता है । जिसके लिये उसने 'हाँ' कहा, फिर उसी के लिये उससे 'नहीं' कहला मनुष्य-मात्र की शक्ति के बाहर है। उरकोच या किसी तरह का लालच दिखलाकर उसके उसूल को यदलवा देना या दृढ़ सिद्धातो से उसे अलग करना वैसा ही है, जैसा प्रकृति के नियमों का बदल देना । यह कुछ अत्यत आवश्यक नहीं है कि जो बड़े धनी है या किसी वदे ऊँचे श्रोहदे पर हैं, ये ही सच्ची शराफत या चोची-से- चोखी सजाता अथवा नेकचलनी (AtInd ard) के सूत्र हो। थपिच ग़रीव तथा छोटा थादमी भी सजनता की कसौटी में अधिक- सर बोया और सरा निकल सकता है। किसी ने अच्छा कहा है- "श्रक्षाणो पिना पौण वृत्ततस्तु तो हत ।" अर्थात्-धन पास न होने से गरीब शरीर नहीं है, परन् जो मन वृत्त नेकचलनी मे रहित है, वही गरीय है। धनी सब कुछ अपने पास रखकर भी मय भौति हीन है, पर निर्द्धनी पास कुछ न रख- कर भी यदि सद्वृत्त है, तो सय भौति भरा पुरा है । उसे भय और नैराश्य कही से नहीं है । वही सवृत्त विहीन चितवान् को पग-पग में भरा है। उसका भविष्य इता धुंधला है कि जिसका धुंधलापन दूर होने को कहीं से साशा की धमक का नाम नहीं है। यश जिसका सब कुछ नष्ट हो गया, पर भैय, चित्त की प्रसमता, पासा, धर्म पर दता, यात्मगौरव और सत्य पर अटल विश्वास बना है, उसका मानो सय पना है। कहीं पर किसी भश में यह दरिद नहीं कहा जा सकता । - .

साहित्य-सुमन एक चुद्धिमान् ने इन बातों को पवित्र चरिन का मुख्य अग निश्चय किया है -लपटता अर्थात् छल-कपट का न होना, रुपए पैसे के लेन देन में सफाई, यात का धनी और अपने पादे का सच्चा होना, श्राश्रितों पर दया, मेहनत से न हटना, थाने निज परिश्रम और पौरुप पर भरोसा रसना, अविकल्यन अर्थात् अपने को बढ़ाकर न कहना-इनमें से एक-एक गुण ऐसे हैं, जिस पर किताब की किताब लिखी जा सकती है। चार चरित्र का एक सक्षेप विवरण हमने कह सुनाया । जिस भाग्यवान् में चरित्र के पूर्ण अंग है, उसका क्या कहना ! यह तो मनुष्य के तन में साक्षात् देवता या जीवन्मुक्त कोई योगी है । जिन बातों से हमारे में चरित्र आता है, उसकी दो एक यात भी जिसमें है, वह धन्य और प्रशमा के योग्य है। हमारे नवयुवकों को चरित्र-पालन में विशेष प्रवणचित्त होना चाहिए। वे दरजे की शिक्षा विना चरित के सर्वथा निरर्थक है। चरित्र सपन साधारण शिक्षा रखकर जितना उपफार देश या जाति का कर सकता है, उतना सुशिक्षित पर चरित्र का छा नहीं करेगा। ।

। १६-धात्मनिर्भरता धात्मनिर्भरता (अपने भरोसे पर रहना) ऐसा श्रेष्ठ गुण है कि जिसके न होने से पुरप में पौरपेयरव का प्रभाव कहना अनुचित नहीं मालूम होता । जिनको अपो भरोसे का पल है, वे जहाँ होगे, जल में बी के समान सरके ऊपर रहेंगे। ऐसी ही के चरित्र पर लक्ष्य पर महाकवि भारवि ने कहा है- "लघयर खलु सेगसा जगप महानिच्छनि भनिगन्यन ।" अर्थात्-तेज और प्रताप से ससार भर को अपने नीचे करते हुए उँची उमगवाले दूसरे के द्वारा अपना वैभव नहीं बदाा चाहते। शारीरिक वा, चतुरगिणी सेना का यल, प्रभुता का बल, में पैदा होने का बल, मित्रता का यत, मात्र तर या बल इत्यादि जितने बल है, निज याहुयल के भागे सय क्षीणबल हैं, वरन् आत्म- निर्भरताकी उनियाद यह बाहुबल सय तरह के पल को सहारा देनेवाला योर उभारनेवाला है। योरप के देशों की जो इसनी उन्नति है, तथा अमेरिका, जापान प्रादि जो इस समय मनुष्य जाति के सिरताज होरहे हैं, इसका यही कारण है कि उन उन देशों में लोग अपने भरोसे पर रहना या कोई काम करना अच्छी तरह जानते हैं । हिंदुस्ता का जो सरयानाश है, इसका यही पारण है कि यहाँ के लोग अपने भरोसे पर रहना भूल ही गए । इसी से सेवकाई करना यहां के लोगों से औसी मूबसूरती के साथ बन पड़ता है, वैसा स्वामित्व नहीं । अपने मोसे पर रहना जर हमारा गुण नहीं, तय क्योंकर सभव है कि हमारे में प्रभुत्व-शक्ति को अवकाश मिले।

साहित्य-सुमन जितनी के निरी किस्मत और भाग्य पर वे ही लोग रहते हैं, जो आलसी है। किसी ने अच्छा कहा है- "देव-देव आलसी पुकार ।" ईश्वर भी सानुकूल और सहायक उन्हीं का होता है, जो अपनी सहायता अपने आप कर सकते हैं। अपने श्राप अपणी सहायता करने की वासना श्रादमी में सची तरकी की बुनियाद है। अनेक सुप्रसिद्ध सत्पुरपों की जीवनी इसका उदाहरण तो है ही, परन् प्रत्येक देश या जाति के लोगों में बल और भोज तथा गौरव और महत्व ( National ugour and strength) के आने का प्रारम निर्भरता सच्चा द्वार है । बहुधा देखने में आता है कि किसी काम के करने में बाहरी सहायता इतना लाभ नहीं पहुँचा सकती, यात्मनिर्भरता। समाज के बंधन में भी देखिए, तो बहुत तरह सशोधन सरकारी कानूनों के द्वारा वैसा नहीं हो सकते, जैसा समाज के एक-एक मनुष्य का अलग-अलग थपना सशोधन अपने आप करने से हो सकते हैं। कडे-से-कड़ा कानून श्रालसी समाज को परिश्रमी, अपव्ययी या फ़िजूल ख़र्च को किफायतशार या परिमित व्ययशील, शरावी को परहेजगार, क्रोधी को शात या सहनशील, सूम को उदार, लोभी को सतोपी, मूर्स को विद्वान्, दपांध को नत्र, दुराचारी को सदाचारी, कदर्य को उन्नतमना, दरिद्र भिखारी को श्राव्य, भीरु डरपोक को वीर धुरीण, झूठे गपोडिएको सञ्चा, चोर को सहनशील, व्यभिचारी को एक पत्ती व्रतधर इत्यादि नहीं बना सकता, किंतु ये सब बातें हम अपने ही प्रयत और चेष्टा से अपने में ला सकते हैं। सच पूछो, तो जाति या क्रीम भी सुधरे हुए ऐसे एक-एक व्यक्ति की समष्टि है। समाज या जाति के एक-एक श्रादमी यदि अलग अलग अपने को सुधारें, तो जाति-की-जाति या समाज-की-समाज सुधर जाय । - आत्मनिर्भरता - सभ्यता और है क्या? यही कि सभ्य जाति के एक-एक मनुष्य 'श्रामाला, वृद्धावनिता सबोमें सभ्यता के सब लक्षण पाए जाय । जिसमें प्राधे यातिहाई सभ्य है, वही जाति पद्धशिक्षित कहलाती है।। कौमी तरकी भी अलग-अलग एक-एक आदमी के परिश्रम, योग्यता, सुचाल और सौजन्य का मानो टोटल है । उसी तरह क्रीम की तनाली कौम के एक-एक श्रादमी की सुस्ती, कमीनापन, नीची प्रकृति, सार्थ-परता और भाँति-भाँति फी बुराइयां का ग्रेड टोटका है। इन्हीं गुणो और अवगुणों को जाति-धर्म के नाम से भी पुकारते हैं, जैसा सिक्खों में वीरता और जगली असभ्य जातियों में सुटेरा- पन | जातीय गुणों या अवगुणों को गर्नमेंट कानून के द्वारा रोक दे या जब पेड़ से नेस्तनाबूद कर दे, परतु वे किसी दूसरी शा में न सिर्फ फिर से उभद आवेंगे, यरन पहले से ज्यादा सरोताजगी और सरस-जो की हालत में हो जायेंगे । जब तक किमी जाति के हरएक व्यक्ति के चरित्र में श्रादि से मौलिक सुधार न किया जाय, 'तष राक अन्चल परजे का देशानुराग और सर्वसाधारण के हित की पाया सिर्फ कानून के अदल बरलपन से या नए कानून जारी करने से नहीं पैदा हो सकती । जालिम से-जालिम पादशाह की हुकमत 'में भी रहकर कोई कौम गुलाम नहीं कही जा सकती, परन् गुलाम पही कौम है, जिसमें एक-एक व्यक्ति सब भाँति कदर्य, म्वार्थ परायण और चात्तीयता के भाव से रहित है। ऐसी क्रीम, निमकी नस में 'दास्य भाव समाया हुआ है, कभी सरफी नहीं करेगी, चाहे कैसे ही उदार शासन मे यह शासित क्यों न की जाय । तो निश्चय हुमा । कि देश की स्वतनता की गहरी और मजवून नींव उस देश के एक- पक आवमो के धामनिर्भरता धादि गुणों पर स्थित है। ऊँच-से-केंगे परमे की सालीन यिजल फायदा है, यदि हम अपने ही महारे अपनी बेहतरी न कर सकें। जॉन शुभर्ट मिल का सिद्धात है कि- - - ७२ साहित्य-सुमन - , । - "राजा का भयानक-से-मयानक अत्याचार देश पर कभी कोई बुरा असर नहीं पैदा कर सकता, जब तक उस देश के एक-एक व्यक्ति में अपने सुधार की अटल वासना दृढ़ता के साथ बद्धमुल है।" पुराने लोगो से जो चूक और गलती बन पड़ी है, उसी का नतीजा , वर्तमान समय में हम लोग भुगत रहे हैं। उसी को चाहे जिस नाम मे पुरिए-यथा जातीयता का माय जाता रहा, एक नहीं है, श्रापस की हमदर्दी नहीं है इत्यादि । तब पुराने फ्रम को अन्धा मानना और उस पर श्रद्धा जमाए रखना हम क्योकर अपने लिये उपकारी और उत्तम मानें । हम तो इसे निरी चलाने की गप समझते है कि,"हमारा धर्म हमें श्रागे नहीं बढ़ने देता, अथवा विदेशी राज से शासित हैं, इसी से हम तरछी नहीं कर सक्ते ।" वास्तव में सच पूछो, तो श्रात्मनिर्भरता अर्थात् अपनी सहायता अपने श्राप करने का भाव हमारे बीच है ही नहीं। यह सय हमारी वर्तमान दुर्गति उसी का परिणाम है, बुद्धिमानों का अनुभव हमें यही कहता है कि मनुष्य में पूर्णता विद्या से नहीं, यरन् काम से होती है। प्रसिद्ध पुरषों की जीवनी पढ़ने ही से नहीं, वरन् उन प्रसिद्ध' पुस्पार्थी पुरुषो के चरित्र का अनुकरण करने से मनुष्य में पूर्णता पाती है। योरप की सभ्यता, जो आजकल हमारे लिये प्रत्येक उति की बातो में उदाहरण-स्वरूप मानी जाती है, एक दिन या एक थादमी के काम श परिणाम नहीं है। जय फई पुरत तक देश-का-देश चे काम, ऊँचे पयाल और ऊँची पासनानों ही भोर प्रयल-चित्त रहा, तय ये इस अवस्या को पहुंचे है। वहाँ के हरएफ गिरने, जाति या घर के लोग धेय के साथ धुन गाँधको परामर अपनी अपनी सरपी में लगे हैं। नीचे-से-नीचे दरजे के मनुष्य- फिसान, छुली, कारीगर श्रादि-नौर ऊँचे-से ऊँचे दरबाले-पयि, दारांनिफ, रागनीतिज्ञ ( Politician)-सयोंने मिलकर नौमी - ।

प्रारमनिर्भरता सरकी को इस दरजे तफ पहुँचाया है। एक ने एक यात को प्रारम कर उसका डाँचा खड़ा कर दिया, दूसरे ने उसी ढांचे पर मावित- पदम रह एक दरजा और वहाया, इसी तरह क्रम-क्रम में कई पीढ़ी के उपरात नह यात निसका फेवल ढाँचा-गान पहा था, पूर्णता और सिद्ध अवस्था तक पहुंच गई । ये अनेक शिल्प और विज्ञान, जिनकी दुनिया भर में धूम मची है, इसी तरह शुरू किए गए थे, और दाँचा छोदनेवाले पूर्वपुरप अपनी भाग्यवार भावी सत्ताल को उस शिल्प कौशल और विज्ञान की बढ़ी भारी मीरास या प्रपौती का उत्तराधिकारी यना गए। प्रारमतर्भरता या "अपने शाप अपनी सहायता" के सबंध में जो शिक्षा हमें मेतिहर, दूफादार, बदद्, लोहार प्रादि गरीगरों से मिलती है, उसके मुकाबले में स्यूत और कॉलेजों की शिक्षा कुछ नहीं है, और यह शिक्षा हम पुस्तक या कितावों से नहीं मिलती, परन् एक पक मनुष्य के चरित्र प्रात्मदमा, दृढ़ता, धैर्य, परिश्रम, स्थिर अध्यवसाय पर दृष्टि रपो से मिलती है। इन मय गुणों से हमारे जीवन की सफलता है। ये गुण मनुष्य जाति की उद्धति का छोर है, और हमें जन्म ले क्या करना चाहिए, इसका साराश है। बहुतेरे सत्पुरपी के जीवन चरित्र धर्म-पथ के समान है, जिनके पढ़ने से हमें उछ न कुछ उपरेश जरर मिलता है। यहप्पा किसी जाति विशेप या पास दरजे के प्रादमियों के हिस्से में नहीं पढ़ा जो कोई बड़ा काम परे या जिससे सर्वमाधारण का उपकार हो, यही बड़े लोगों की कोटि में था सक्ता है। वह चाहे गरीब-से- गरीव गा छोटे-से-छोट दरजे का क्यो न हो, बटे-से-बरा है। यह मनुष्य के सा में साशत् देवता है। हमारे यहाँ अवतार ऐसे ही लोग हो गए हैं। समेरे उठ जिसका नाम ले लेने से दिन-भर के लिये मगल की गारटी समझी जाती है, ऐसे महामहिमशाली जिस माहित्य-सुमन कुल में जन्मते हैं, वह कुल उजागर और पुनीत हो जाता है। ऐसों ही की जननी धीरप्रसू कही जाती हैं। पुरुषसिंह-ऐसा एक पुन अध्या, गीदड़ों की खासियतवाले सौ पुन भी किस काम के ! पुत्र-जन्म में लोग यही गुशी मनाते है, शहनाई बजाते हैं, फूले नहीं समाते । हमें पछतावा और दुख होता है कि जहाँ तीस करोद गीदड़ थे, वहाँ एक की गिनती भौर नदी, क्योंकि हिंदुस्तान की हमारी विगढी गिरी क्रोम में सिंह का जन्म सर्वथा धसभव-सा प्रतीत होता है, और हम लोगों के ऐसे पुण्य के काम हैं कि हमारे बीच सब सिंह ही- सिंह जन्म लें। ता हमारी इतनी थधिक बढ़ती जैसी पाल्य विगाह की कृपा से हो रही है, किस काम को सिवा इसके कि हिंदुस्तान की पृथ्वी का बोझ बढ़ता जाय । समाज में ऐसे-ऐसे कुसस्कार और निंदित रीतियाँ चल पड़ी है कि प्रात्मनिर्भरता पास तक नहीं फटकने पाती। बहुत तरह के समाज-बधन तथा सान पान आदि की कैद, जो हमारे पीछे लगा दी गई है, उन मरका यही तो परिणाम हुआ कि आजादी, जिस पर प्रारमनिर्भरता या किसी दूसरे पौरपेय गुण की लपी-चौड़ी इमा- रत खड़ी हो सकती है, शुरू ही से नहीं आ पाती । जब कि योरप के भिन्न भिन्न देशों में माँ-बाप अपने लड़कों को तालीम देने के साथ ही साथ अपने भरोसे पर जिंदगी की किश्ती को किस तरह पर खे ले जाना चाहिए, यह लड़कपन से सिखाते हैं, तन यहाँ दुधमुहे बालक-बालिकाओं का ब्याह कर स्वय अपने भरण-पोपण तथा अन्य समस्त पौरपेय गुण की जड़ पर कुल्हादा चलाने का प्रयास किया जाता है। योरप के देशों में पिता पुन को शक्ति भर उत्तम-से-उत्तम शिक्षा दे उसे जीवन-सग्राम के लिये तैयार कर देता है, जिसमें वह अपने भाप निर्वाह कर सके। वहाँ के माँ बाप हम लोगों के माँ-बाप की तरह अपने पुत्र के मित्रमुख गनु नहीं है कि विना मोचे-समझे लपक भारमनिर्भरता पन स चक्की का पाट गले में बांध उस बेचार को सब तरह पर हीन, दीन और लाचार कर डाले और श्राप भी चिता पर पहुंचने तक लड़को की फिकर मे सुचित्त न रहें। इतिहास से पूरा पता लगता है कि जब से यहाँ ब्रह्मचर्य की प्रथा उठा दी गई और दुधमुहो का व्याह जारी कर दिया गया, तर से श्राज तक बराबर हमारी घटती ही होती जाती है। हम तो यही कहेंगे कि जैसा पाप हमसे धन पड़ता है, उसके मुकाबले में हमें कुछ भी दष्ट नहीं मिलता । दस या पारह वर्ष की कन्याओं के विवाह-रूपी महापाप की इतनी सजा मिली, सो कुछ न हुआ। अस्तु, हमारे में आत्मनिर्भरता न होने का पाल्य विवाह एक यहुत बड़ा प्रधान कारण है । इसी का यह फल है कि हम नया कुधा सोद गया स्वच्छ पानी पीना जानते ही नहीं। । हमारे देश की कुल पायादी के दस हिस्से में से आठ हिस्सा ऐसा है, जो केवल बाप-दादों की कमाई या परपरा प्राप्त जीविका अथवा धृत्ति से निर्वाह करता है। सौ में एक ऐसे मिलेंगे, जो अपने निज वाहुयल और पुरुषार्थ के भरोसे हैं, सो भी उनके सय पुरपार्थ, करतूत या सपूती का निचोड़ फेवल इतना ही है, जैसा किसी कवि ने "अनपाननिता दारा मफल तस्य जीवनर ।" अर्थात्-मफल जीवन उमी का है, जिसने अन्न-वस्त्र से अपने लड़के और स्त्री को प्रसन्न कर रक्सा है। इतना जिमने किया, यह पक्षा सप्त - और पुरपापी है। इधर पचास-साठ वर्षों में अंगरेजी राज्य के अमन चैन का फायदा पा हमारे देशवाले किमी मलाइ की ओर न मुके, पर परवर्ष की गुड़ियों का ध्याह फर पहले से ड्योढ़ी-दूनी सृष्टि धनमाने सगे। हमारे देश की जनसख्या अवश्य घटनी चाहिए और का - साहित्य-सुमन सुगम उपाय केवल याल्य विवाह का रुक जाना है। गवर्नमेंट को चाहिए कि यह बाल्य विवाह को जुर्म में दाग्निल कर पूरे सिर पर श्राने के पहले जो अपने कन्या या पुत्र का विवाह करे, उसके लिये कोई भारी मजा या जुर्माना शायम कर दे। तब कदाचित् यह बुराई हम लोगो में से दूर हो, नहीं तो सीधी तरह से ये कभी राह पर नहीं श्रानेवाले है । आत्मनिर्भरता में हड़, अपने यूपते-बानू पर भरोसा रखनेवाला, पुष्ट वीर्य, पुष्ट वत, भाग्गवान् एक सतान अच्छी, कुकर सूकर से निकम्मे, रग-रग में दास भाव से पूर्ण, परभाग्योपजीवी दस किस काम के। "एकेनापि सुपुत्रेण सिहा स्वपति निभयम् ।" श्रादमी के लिये आजादी एक वेश-कीमत मोती है। वह आजादी सा ही हासिल हो सकती है, जब हम अनेक तरह की फ़िकर और चिंता से निद्व हों और हमारी तबियत में आत्मनिर्भरता ने दखल फर लिया हो । इस दशा में बड़ी-से-बढ़ी चिंता और फिकर हमें उतनी शसस्य न मालूम होगी कि यह हमारी स्वचदता को जड़ से उखाइ सके। किसी वस्तु का जब बीज बना रहता है, तो उसको फिर बढ़ा लेना सहज है । यात्मनिर्भरता की योग्यता सपादन किए बिना ही हम तोगों के मां-बाप लड़कपन में श्रपो लड़कों का व्याह फर यानजीवन के लिये उनकी स्वच्छता का बीज नष्ट कर देते हैं। उपरात उनका शेष जीवन बोझ और अपाढ़ होजाता है । इंगलैंड और अमेरिका, जो इस समय उन्नति के शिसर पर चठे हैं, सो इसीलिये शिव गृहरथी पता हरएफ शादमी की इन्चा पर निर्भर है। यहाँ माँ बाप को कोई अधिकार नहीं रहता कि निरे नापालिरा का प्याह पर दें। यही सवय है कि उन उन देशो में प्राय सब ही बड़प्पन का दावा कर सकते हैं। हमारे यहाँ भी शकर, पावक, कनीर, कृष्ण, चैतन्य, युद्धदेव, तथा हाल में स्वामी दयानद, जिनका घड़ । .

धारमनिर्भरता - प्पन हम लोग मुक्तक हो स्वीकार करते हैं और जिनका नाम लेते चित्त गद्गद हो जाता है, सप के-सब गृहस्थी के योग से स्वच्छद थे। पारमनिर्भरता इन महापुरपा में पूरा प्रभाव रखती थी। किसी का मत है-मुलक की तरफी औरतों की सालीम से होगी, कोई कहता है-विधवा विवाह जारी होने से भलाई है, कोई कहता है- साने पीने की वेद उठा दी जाय, तो हिंदू लोग स्वर्ग पहुँच इन का आसन छीन ल, कोई कहता है-विलायत जाने से तरकी होगी, कोई कहता है-फ़िजूल खर्ची कम कर दी जाय, तो सरकी की सीढ़ी पर लपके घद जाय । हम कहते हैं-इन सब यातों से एछ न होगा, जब तक याल्य विवाहरूपी कोढ़ हमारा साफ न होगा । 'म जानते हैं, हमारा यह रोना-मोसना केवल अरण्यरोदन मान है, फिर भी गला फाइ-फाइ चिल्लाते रहेंगे, कदा चित् किसी की तयियत पर कुछ असर पैदा हो जाय और धात्म. निर्भरना-ऐसे घेष्ट गुण को हम लोगों के बीच भी प्रक्ट होने का यवश मिले। मुल्क अभी ។ है 7 १७-चंद्रोदय अँधेरा पारा श्रीता, उँजेला पाय आश पश्चिम की ओर सूर्य या, और वक्राकार हसिया की तरह चटमा उसी दिशा में दिखलाई पहा । मानो फर्कगा के ममान पश्चिम दिशा सूर्य के प्रचड ताप मे दुखी हो क्रोध में श्रा इमी हमिया को लेकर बौड़ रही है और सूर्य भयभीत हो पाताल में छिपने के लिये जा रहा है। अब तो पश्चिम ओर श्राकाश सर्वत्र रक्तमय हो गया। क्या सचमुच ही इस कर्कशा ने सूर्य का काम तमाम किया, जिससे रक्त यह निकला ? आधा सूर्य भी क्रुदु हुआ, जिससे उसका चेहरा तमतमा गया और उसी की यह रक्त आभा इस्ताम धर्म के माननेवाले नए चद्र की बहुत पसरी इज्जत करते हैं, सो क्यो ? मालुम होता है, इसीलिये कि दिा दिन तीण होकर नाश को प्राप्त होता हुआ चद्रमा मानो मदन देता है कि रमज़ान में अपने शरीर को इतना सुसायो कि वह नष्ट हो जाय, सब देखो फि उतरोत्तर कैसी दृन्द्रि होती है। अथवा यह कामरूपी श्रोत्रिय ग्राह्मण के निय जपने का प्रोकार महा मन है, या श्रधकार महागज के हटाने का अक्श है, या विरहिणियों के प्राण कतरने की बैंची है, अथवा शृगार-रस मे पूर्ण पिटारे के खोलने की कुंजी है, या तारा मौक्तिको मे गुथे हार के बीच का यह सुमेर है, अथवा जगम जगत्-मान को उसनवाले अनग भुजग के फा पर का यह चमकता हुआ मणि है, या निशा नायिका के चेहरे की मुमकिराहट है, या सध्या-नारी के काम केलि के समय उसकी छाती पर लगा हुमा नख क्षत है, अथवा जगज्जेता कामदेव की धन्या है, या नारा-मोतियों की दो मोपियों में से एक मीपी है। .

घद्रोदय इसी प्रकार दून से बदते-बढ़ते यह चद्र पूर्णता को पहुँचा। यह पूनो का पूरा संद किसके मन को न भाठा होगा? यह गोल-गोल माश का पिट देख भांति-भाँति की रपा मन में उदय होती हैं कि क्या यह निशा-मभिसारिका के मुस देखने की प्रारमी है , उसके कान का कुढल अथवा फल है, या रजनी रमणी के लिलार पर घुझे का मफेद तिलक है, अथवा स्वच्छ नीले आकाश में यह चद्र मानो त्रिनेत्र शिव की जटा म चमा हुणा कुद से मफेद फूलों का गुछा है। काम बलमा रति की श्रटा में गजता हुशा यह कयूनर है, अथवा श्राफाश रूपीबाज़ार में तारा रूपीमोतियां का बेचनेवाला सौदागर है । कुई की फलियों को विनाशित करते, मृगनयनियों के मार को सनूल उन्मीलित करते दिटकी हुई चोदनी से सब दिशाशो को प्रयलित करते, 'अधकार को निगलते बद्रमा सोड़ी-दर-सीढ़ी शिरसर के समान साफाश रूपी विशाल पर्वत के मध्य भाग में चदा चला पा रहा है । क्षपा-तमस्कार का हटावाला यह चद्रमा ऐसा मालूम होता है मानो शाकाश-महासरोवर में रचन ममल खिल रहा है, जिसमें बीच-बीच जो कलक की कालिमा है, मो मानो भोरे गूंज रहे हैं । अथवा सौंदर्य की अधिष्टाग्री देनी मम्मी के स्नान करने की यह यावदी है, या कामदेय मी वामिती रसि का यह चूना पोता धरल गृह है, या भावाश गगा के तट पर विशार करनेवाला इस है, जो सोती हुई वृदयों जगाने को दूत बार आया है, या वेद-नदी आगश-गगा का पुटरीक है, या चाँदती या अमृत कुंट है; अथवा आकाश में जो सारे देख पाते हैं, वे सब गौर है, उन मर में यह मरद है या यह हीरे से जहर हुमा पूर्व दिगगना या कर्णपूल है, या कादय क पापों को घोसा करने के लिये सान घरो का सन्दे गाल पायर है, या सध्या-नायिका के मेलने का गेंद । । इसके उदय के पहले - - . १८-भालपट्ट कवि लोग लिलार की उपमा पटरे से देते हैं। सच पूछो, तो विधना को अपने अमिट अक्षरों के लिखने के लिये यह भालपट्ट ही एक मज़बूत स्लेट मिली है, जिस पर बालिश ब्रह्मा लड़कों की भाँति आज तक खरी-पट्टी लिखने का अभ्यास नहीं छोडता और जन्मत्तुए फी छुट्टी के दिन नए-नए मालपट्ट पाकर फिर-फिर याल क्रीड़ा का अनुभव किया करता है । बालक तो लिखकर मिटा हाल सकते है, पर यह लेख ऐसा अमिट है कि कोई कितनी ही चेष्टा करे, कभी मिट नहीं सकता- "करम रेस ना मिटे, करै कोर लासा चतुराइ ।" चतुरानन की चतुराई का चमस्कार कुछ लिलार ही के संबंध में देखा जाता है। अच्छे-अच्छे विहान, गुणवान्, कृत विद्य भी भाग्य. वान के सामने हाथ पसारकर दीन बनते हैं। इसी बात पर कुकर किसी कति ने कहा है- "भाग्यवत असूयेथा मा शृरान् मा च पडिनान् " धन्य है वे भाग्यवान् पुरुष, जिनको हरएक के सामने माथा नहीं नवाना पड़ता, तथाहाथ नहीं पसारना पडता । मूर्य नासमझ कोसम- झाकर राह पर लाने को हजार-हजार माथा पटको, कुछ नहीं होना- "मुरम्य को समझाइना गान गाठ को जाय ।" "मानलवदुर्विदग्ध प्रणापि त नर न रजयात ।" घर में चोरी हो गई, चोर सेंध देकर सब माल मता दो ले गए, इधर दौडे, उधर दौडे, पुलिस लाए, मामी सदबीरें कीं, कुछ न हुश्रा, श्रत को माया ठोक बैठ रहे । यह मालपट्ट मा भौं के ऊपर मालपह ८३ माड़ी बेल की भूमि या जमीन है। सांझीगाज़ जानते हागे कि पहले जमीन माफ कर तय बेल-यूटे उठाए जाते हैं । अथवा भी रप सोमनी तहरीर क याद यह सिलार ही ऐमी चौड़ी वेल श्रा पद्धती है, जिसमें ललाजन सौभाग्य-सूचक सिंदूर, रोरी या श्याम भजनी आदि के रग यिरगे भांति भौति ३ टेकावर टिकुली रपी खुदा उसमें जद, लिलार को पूरी साँझी यना, अपने मंदिर्य को शताण विशेप करती है। दार्शनिकों के समस्त शिनों का श्राश्रयभूत चित्त अथरा मन दसों इदियों का राजा या प्रभु माना गया है । उस मन का सहकारी तथा ज्ञात या बुद्धि का निवास स्थान मस्तिष्क है, जो इम लिलार ही में रक्खा गया है । इसी से हमारे शास्त्रकारों ने इसे उत्तमाग माना है। योरप में इसीलिये अपूर्व, अद्भुत प्रतिभावालों का सिर विकता है। नसीर, विस्मत, करम, भाग, लिलार, दिष्ट आदि इसी भालपट्ट के नाम हैं। नसीय के सितारे की चमक को कोई सितारा नहीं पाता । लोग कहते हैं, करम की रेस श्रमिट है- "यदाना नितमालपट्टलिरित त माजिद के नम ।" करम की रेस में मेन मारना बिरले चतुर सयाने पुरपार्थियों का काम है । हम भी उसी मेख मारो के ख़याल से पढ़नेगलो को भाँति भाँसि की चतुराई दिवाया चाहते हैं कि ग्राहक थडे, पर इस पन ( हिंदी प्रदीप) की फूटी विस्मत नहीं जगती, लाचारी है। - -- । १६-कल्पना-शक्ति मनुष्य की अनेक मानसिक शक्तियों में कल्पना शक्ति भी एक अद्भुत शक्ति है । यद्यपि अभ्यास से यह शतगुण अधिक हो सकती है, पर इसका सूक्ष्म अकर किसी किसी के प्रत करण में धारभ ही से रहता है, जिसे प्रतिमा के नाम से पुकारते हैं और जिसका कवियों के लेख में पूर्ण उद्गार देखा जाता है । कालिदास, श्रीहर्ष, शेक्सपियर, मिल्टन प्रभृति कनियों की कल्पना-शक्ति पर चित्त चकित और मुग्ध हो, अनेक तर्क-वितर्क की भूलभुलैया में चार मारता, टकराता, श्रत को इसी सिद्धात पर आकर ठहरता है कि यह कोई प्राक्तन सस्कार का परिणाम हे या ईश्वर-प्रदत्त शक्ति (Genius) है। कवियों का अपनी करपना-शक्ति के द्वारा ग्रह्मा के साथ होड़ करना कुछ अनुचित नहीं है, क्योंकि जगत्स्रष्टा तो एक ही बार जो कुछ बन पड़ा, सृष्टि निर्माण-कौशल दिखलाकर भाकल्पात रागत हो गए, पर कवि जन नित्य नई-नई रचना के गढ़त से न जाने कितनी सृष्टि निर्माण चातुरी दिसलाते रहते हैं यह कल्पना-शत्ति कल्पना करनेवाले के हृद्गत भाव या मन के परखने की कसौटी या भादर्श है। शात या वीर प्रकृतिवाले से गार-रस-प्रधान फल्पना कभी न बन पडेगी। महाकवि मविराम और भूपण इसके उदाहरण हैं। भृगार-रस में पगी जयदेव की रसीली तबियत के लिये दाख और मधु में भी अधिकाधिक मधुर गीतगोविंद ही की रचना विशेष उपयुक्त थी । राम-रावण या कर्णा जो के युद्ध का वर्णन कमी उनसे न बन पड़ता । यावत् मिथ्या और दरोरा को निवलेगाह इस कल्पना-पिशाचिनी का कहीं ओर छोर । ।

कल्पनाशक्ति किसी ने पाया है। अनुमान करते-करते हैरान गौसम-से मुनि "गोतम" हो गए। कणाद किनका खा-खाकर सिनका पीनने लगे, पर मन की मनभावनी कन्या कल्पना का पार न पाया। कपिल बेचारे पचीस तत्त्वों की कल्पना करते-करते "कपिल" अर्थात् पीले पड़ गए। व्यास ने इन तीनो मझादार्शनिकों की दुर्गति देख मन में सोचा, कौन इस भूतनी के पीछे दौडता फिर, यह सपूर्ण विग्य, जिसे हम प्रत्यक्ष देव- सुा सकने है, सय कपनाही करपना, मिथ्या, नाशवान् और क्षण- भगुर है, अतएव हेय है। उन्हीं की टेम्पादेसी चुदेव ने भी अपने उद्धव का यही निष्कर्ष निकाला कि जो कुछ पल्पनाजन्य है, सर माणिक और नश्वर है। ईश्वर तक को उन्होंने इस कल्पना के श्रत गंत ठहराकर शून्य अथवा निर्वाण ही को मुख्य माना। रेसागणित के प्रवर्तक उक्लैदिस ( यूक्लिष्ट) ज्यामिति की हरएक शक्ल में बिंदु और रेसा की कल्पना करते-करते हमारे सुकुमार-मति इन दिनों के धानों का दिमाग ही घाट गए। काँ तक गिनावें, सपूर्ण भारत- का-भारत इसी कल्पना के पीछे गारत हो गया, जहाँ कल्पा ( Theory) के अतिरिक्त करके दिखाने योग्य (Practical ) कुछ रहा ही नहीं। योरप के श्रीक वैज्ञानिकों की कल्पना को शुष्क कल्पना मे करांच्यसा (Practice) में परिणत होते देय यहोवालो को हाथ मल-मल पछता और 'कलपना' पड़ा। प्रिय पाठक यह कल्पना दुरी बला है। चौकस रहो, इसके पेंच में कमी न पढ़ना, नहीं तो पछताओगे। आज हमने भी इस क्ल्पना की कल्पना में पड़ बहुत-सी मठी मॅठी कल्पना कर आपका योदा-मा समय नष्ट किया, क्षमा करिएगा। ।

- २०-प्रतिभा प्रतिभा युद्धि का यह गुण थौर मनुष्य में वह शक्ति है, जो स्वाभा- विक होती है और अभ्यास से अधिक-अधिक पढ़ाई जा सकती है । काव्य-रचना इसकी कसौटी है। यह कहना कि विना प्रतिमा के कवि होगा ही नहीं, सर्वथा सुसंगत है। प्रतिभाहीन मनुष्य अभ्यास के बल से दो-चार पद गढ़ ले, तो गद ले, किंतु प्रतिमा न होने से वह निरी गढ़त रहेगी, रस उसमें कहीं से न टपकेगा । साहित्य दर्पण में- "काव्य रसात्मक वाक्यम्" यह काव्य का लक्षण उस गढ़त में सुघटित न होगा । प्रतिभा में भी तारतम्य है। कालिदास में जैसी प्रतिभा थी, चेसी भवभूति, भारवि और श्रीहर्ष में न थी। सूर, तुलसी, विहारी में जो प्रतिमा थी, वह केशव, मतिराम, भूपण और पद्माकर में न थी। शेक्सपियर और मिल्टन के समान अँगरेजी के और कवियों में प्रतिभा कहाँ है ? आधुनिक कवि टेनिसन की रचना चाहे अधिक गभीर और शिक्षाप्रद ( Instructive ) हो, पर वह रस उनके काव्य में नहीं टपकता, जैसा शेक्सपियर की रचना में है । अस्तु, प्रत्येक कवि की प्रतिमा का नारतम्य एक जुदा विषय है, जिसे हम कभी अलग दिखावेंगे। आज केवल प्रतिमा का स्वरूप मात्र दिसलाने का हमारा प्रयत्न है । फिर भी इतना यहाँ सूचित कि देते हैं कि प्रतिमा का प्रसाद-गुण के साथ बड़ा धनिष्ठ सम्ध है। कालिदास की प्रतिभा, जो सबसे अधिक मानी गई, सो इसीलिये कि उनकी रचना प्रसाद-गुण-पूर्ण है। कविता में प्रसाद-गुण दायरस के तुल्य है, जो स्वाद में मिनी से अधिक 1 प्रतिभा मीठा होता है, पर मुख के किसी अवयव को जरा भी उबसे क्लेश नहीं होता । जीभ पर रक्सा नहीं कि घट गए और कवियों की रचना में चाहे रम हो भी, तो पद और भाव इतने हिट होते है कि बिना थोड़ी देर सोचे रस नहीं मिलता। प्रतिमा फेवल चयिता ही में नहीं, परन् और क्तिनी नातो में भी अपना दलल जमाए हुए है। यहाँ के प्रसिद्ध चित्रकार रविवर्मा में चित्रकारी की अद्भुत शक्ति प्रतिभा ही का परिणाम है । योरप तथा पशिया के कईएक प्रसिद्ध विजयी सीजर, हार्नवाल, सिकदर, नेपोलियन बोनापार्ट, समुदगुप्त, रणजीतसिंह श्रादि सन प्रतिमा- शाली थे, और डाकी प्रतिभा युद्ध-कौशल की थी। युद्धदेव, शकर, रामानुज, गुरु नानक, स्वामी दयानद, ईसा और महम्मद आदि सब भतिभावाले महापुरुष थे, और उनकी प्रतिभा या नया धर्म चलाने में थी। बहुधा ऐमा भी देखा जाता है कि यह प्रतिभा यरायर वश- परपरा तक थाती गई है। हमारे यहाँ जो एक एक पेशेवालो की अलग थलग एक-एक जाति कायम कर दी गई है, उसका यही हेतु है कि उस जाति के मनुष्य में उस पेशे की प्रतिभा बराबर दौड़ती आती है। किसी किसी में यह पूर्ण रीति से मलक उठती है, और उत्तने अश में यत्किंचित् विपिछति विशेष प्रतिभा ही कही जायगी। मनुष्य में प्रतिभा का होना पुनर्जन्म का वडा पा सबूत है । क्या कारण कि एक ही शिक्षक दो बालकों को पढ़ाता है, एक में प्रतिभा- विरोप रहने से वह बात, जो गुरु पतलाता है, उसे जल्द था जाती है, और उस विद्या में वह विशेष चममता है। दूसरे को गुरु की यसलाई दुई गस आती ही नहीं, भाई भी, तो देर में और अधिक परिश्रम के उपरात।तो निश्चय हुआ कि एकका पूर्व सस्कार,जो श्रय प्रतिमा के नाम से 'यदल गया है, स्वछ यौर विमल था और दूसरे का मलिन था, इसी से प्रतिभा उसमें न प्राई । "अल्पायाम महरफनम्" अधात् "परिश्रम मर साहित्य-सुमन थोड़ा, फल बहुत अधिक" यह बात प्रतिभा ही में पाई जाती है। छात्र-मराली में बहुत-से ऐसे पाए जाते हैं, जो थोड़े परिश्रम में बड़े- बढे दार्शनिक पडित और कवि हो जाते हैं; पर बहुत से ऐसे भी होते हैं, जो घोख पोखकर थक जाते हैं, पर अत पात या बोध उन्हें यथावत् नहीं होता । गीता में भगवद्विभूति को गिनाते गिनाते भगवान् ने कहा- "हे थर्जुन ! अब हम कहाँ तक तुमसे अपनी विभूति गिनाते रहें । जिस मनुष्य में कोई बात असाधारण और लोकोत्तर पात्रो, उसे भगविभूति ही मानो।" यह लोकोत्तर चमत्कार प्रतिभा ही है, जिसे कृष्ण भगवान् ने अपनी विभूति कहा है । धन्य हैं वे, जिनमें किसी तरह की प्रतिभा है । सफल जन्म उन्हीं का है।

3 २१-माधुर्य 'माधुर्य' उस प्रकार के स्वाद को कहते हैं, जो मिठाइ या मिठास के नाम से ग्रहण किया जाता है। यद्यपि और भी रस है, पर मिठास फा जो कुछ अनोग्या असर मनुष्य के चित्त पर होता है, वह और दूसरे रमी में नहीं होता । इसी से चित्त को प्रसन्न करनेवाले दूसरे रस भी मधुर या मीठे कहे जाते हैं । देहाती लोग अपनी बोली में कहते हैं-"नार के रोटी भल मिठात है।" तो निश्चय हुआ कि जो मन को भाये या रचे, यह मिठास है । सब माधुर्य से तात्पर्य यह हुधा कि जो चित्त को कटुना न मालूम हो-चाहे उसका ज्ञा हमको पाँच इदियों में से किसी भी इद्विग के द्वारा हुआ हो वह मोटा कहलावेगा । कोई अच्छी सूरत, जो नेत्र को सुहावनी मालूम दुई, तो कहते हैं, इसकी स्प-माधुरी चित्त को सींचे लेती है। जो यात कान को भली लगी, जैसा यालकों की तोतली योली या किसी का प्यारा पचन, सो उसे मीठा घचन कहते है। जैसा यहा भी है- कागा काको धन हर, कोयल काको देय , मारो बचन मुनायक, जग अपनो कर लेय। इसी तरह मदार, मालती, चमेली, जूही श्रादि की सुगध को मीठी सुगध कहते हैं । चपा, केवड़ा, बेला श्रादि कई फूलों की मदक को कर्फश या कड़ी महक कहते हैं, इसीलिये कि थोड़ी देर में उससे जी ऊब जाता है और फिर उसे अधिक संघने को जी नहीं चाहता। मिठास के जहाँ और सय गुण या सिनते हैं, वहाँ एक यह भी है कि उसके चिरकाल और निरतर सेवा से भी जी नहीं अग्रता, बल्कि यही मन होता है कि यह यौर भी अधिक मिलती जाय, सो अश्या १० साहित्य सुमन तव हो । इसी तरह जो वस्तु छुने मे कोमल, चिक्षण और सुखद है, उसे मधुरस्पर्श कहते हैं । महाकवि भवभूति ने स्पर्श सुख की मिठास को "उत्तर-चरित" के कई श्लोकों में बहुत अछी तरह पर दिखाया है। तद्यथा- विनिश्चतु शक्यो न नुममिति था दु सामेति वा प्रमोहो निद्रा का विमु चिपविसप किमु मद म्पों परों मम हि परिमूटेन्द्रियगणा विकारश्चनय श्रमयति च समानयति च। जिह्वा के द्वारा जिस मधुरता का अनुभव हम करते हैं, वह प्रत्यक्ष ही है । किसी भांग छनते माहाण या मथुरा के चौये से इस मधुरता के बारे में पूछ लो, जिनका मिनात है--जिसे मीठा न रचता हो, उसकी बाह्मणता में कुछ कसर समझना चाहिए।' प्रसाद, पोज, माधुर्य, कविता के इन ती गुणों में माधुर्य भी एक है । कोकिल-फट जयदेय की कविता गीतगोविंद, श्रादि से प्रत तक, माधुर्य-गुण- विशिष्ट है । माधुर्य का गुण दटी ने काव्यादर्श में इस तरह पर दिया है- मधुर रसवाचि यत्तु यपि रमरिणी येन माधन्ति भामतो गधुनेव मधुनता । अर्यात्-जिस पाक्य में रस टपकता हो, यह मधुर जो प्रतिपादित होता है, उसमें भी रस रहता है। गार, फरणा और गात-रस में माधुर्य, समास का होना है, या समास हो भी, तो यहुत थोडे और छोटे-छोटे दो या तीन पद के हो पर अपर मय कोमल हों, टपर्गादि मृदन्य वर्ग 7 हो । जयदेव के काय मये । । इसलिये गीतगोविंद माधुर्य का पूर्व उदाहरण है। हास्य, भन्नुत तथा मया रस में माधुर्य सभी पासा, जय ग, , दप धादि भार पाहुन हों और ममाग भी न यास कम, १ है । यास्य से और न पहुरा

माधुर्य
अधिक हो । वीर, बीभत्स तथा रौद्रनसा में जर अक्षर बडे विकट
और कडे हों, और लवे-लवे ममास हो, तभी माधुर्य पैदा होता है। जैसे
भौंरा फूल स चूस मतवाला हो जाता है, वैसे ही नागरिक जन
(मामीण हल जोतनेवाले नहीं) जिसे सुन मतवाले-से हो उठे,
वह रस है । यम, माधुर्य का मुख्य लक्षण यही है। किसी का
"पृयकपदत्व माधुयम् ।"
अर्थात्-
(-अलग पदो का होना माधुर्य है । जैसा-
"वामा मुघति भतरो पिलुरति त्वमागमानोफत ।"
प्रया-
"अपसारय धनसार कुर हार दूर एव कि कमले
अलमलमानि मृणालरिति वदनि दिवानिश बाला ।"
साहित्य-दर्पणकार माधुर्य का लपण यह देते हैं---
"चित्तद्रवीभावमयो इलादो माधुयमुच्यते ।"
अथात्-चित्त के पिघलानेवाले मानसिक भानों से जो एक प्रकार
का पानद चित्त में हो, वह "माधुर्य" है। यथा-
लताकुल गुरु मदवालियुन चपल्यन्
समाल गनग द्रुततरमनग प्रालयन् ।
मरुन्माद मन्द दलितमरविन्द तरलया
रजो वृन्द गिन्दा किरति मकरन्द दिशि निशि ।
उत्तम नायक या नायिका का एक अलकार भी माधुर्य है।
सा-
"सतोमेश्वप्यागो माधुर्य परिकीनिंतर।"
थर्थात्-शोभ या घड़ाहट पैदा करावाली यात के होने पर भी
चित्त में उद्वंग होना माधुर्य है । और भी-
"मवावस्थापिपपि माधुय रमायता ।"

साहित्य-सुमन 1 ७ - अर्थात्-कैसी ही अवस्था में होकर भी जो मन को रमावे वह माधुर्य है-जैसा शकुंतला के रूप-वर्णन में कालिदास ने लिया है- सरसिजमनुविद्ध शैवलेनापि रम्य मलिनमपि हिमाशालदम लदमी सनीति, इयमाधिकमनोज्ञा घरकलेनापि तन्वी मिमिवाहि मधुराणा मण्डन नाकृतानाम्। माधुर्य का यह विवरण तो वह है, जो कवियों ने निश्चय कर रक्सा है। अब लौकिक बातचीत में जो बात मृदुता पूर्वक की पाती. है, उसमें भी मिठास का शब्द लगाया जाता है । जैसा मीठा बैर, मीठी धुरी, मीठी नींद । नींद में भला क्या मीठापन होगा? किंतु बड़ी देर तक मेहनत के उपरांत लेट गए, एक झपकी मी श्रा गई, सब हो गई, शरीर स्वस्थ और फिर परिश्रम करने को सरो- ताज़ा हो गया । वह "मीठी नींद" कहलाई। इससे तात्पर्य यह निकला कि जो सतोप के बोधक या सुखद पदार्थ हैं, उन सबों में मधुर या मिठास का प्रयोग किया जाता है। तो निश्चय हुश्रा माधुर्य जगत्कर्ता की अद्भुत शक्ति है, जिसके द्वारा सात्विक भावां का उद्गार मनुष्य के चित्त पर हुश्रा करता है। बल्कि यों कहा जाय, सो ठीक हो कि न केवल साविक ही, बल्कि राजसिक और साम- सिक का भी जो उत्तमोत्तम भाग या सारांश है, यह मिठास था माधुर्य के नाम से कहलावेगा, क्योकि कडुए और तीते में भी जो रुचे और अत्यंत स्वादिष्ट हो, वह भी तो मिठास है"--ऐसा पहा जाता है। इत्यादि ऊहापोह से निश्चय हुआ कि इस दृश्य-जगत् में जो इद्रियों को प्रलोभनकारी और मन का प्राकर्षक हो, वह माधुर्य है। थकावट । 1 1 लजा, . २२-याशा हमारे यहाँ के प्रयकारों ने 'काम' को मनसिज कहा है। यदि मन- सिज शब्द का अर्थ केवल इतना ही लिया जाय कि "मन में उपहुए भाव", तो हमारी समझ में 'याशा' मे बढ़कर मीठा फल देनेवाली हदय की विविध दशाओं में से दूसरी कोई दशा नहीं हो मकनी । यद्यपि हमारे यहाँ कवियों ने 'स्मर' की दस दशा माना है, किंतु उम रास्ते को छोड़ मोटे हग पर ध्यान दे और मान लें कि 'काम' या तो उस पशु-बुद्धिरूपी मोहाधकार का नाम है, जो मनुष्य नम्रता श्रादि गुणों की मीठी रोशनी का नाम पर देता है, और जो उस दशा में मनुष्य जाति का फलक है, अथवा वह मसार के सब मभव और अमभव प्यार-मात्र का नमूग है, सथ भी हम यह नहीं कह सकते कि हा ऊपर लिखे हुए काम के दो रूपों के पाश में उतने लोग फंसे हो, जितने स्वेच्छया थानद-पूर्वक अपने को श्राशा के पाश में बाँधे हुए है । 'काम' एक रोग है, जिससे चाहे थोदा सासुख भी मिलता हो, पर उस रोग के रोगी इसकी दवा धन्पन ही दूदते हैं। पर 'पागा' को देखिए, तो वह स्वय एक पेमे यढे भारी रोग की दवा है, जिसकी दूसरी दया सोचना असभव है। यह रोग नैराश्य है, जिससे दारुणतर ऐश की दशा मनुष्य के चित्त के लिये हो ही नहीं सकती। इसवास्ते जो हमारे यहाँ की कहावत है कि- "श्रा हि परम दुसराश्य परम सुग्वम् ।" यह हमारी समझ में नहीं पाता। यदि वर्ष के मिस मिस भौसिमों की तरह मनुष्य के हृदय में भी सरह-तरह की दशाओं का दौरा हुया करता है और उसमें भी प्रीप्म, वर्षा, शिशिर इत्यादि साहित्य-सुमन शतु एक दूसरे के बाद पाते हैं, तो यही कहना पडेगा कि नैराश्य के विस्ट शीतकाल की रात्रि के बाद प्राशा ही रूपी ऋतुराज के सूर्य का उदय होता है। हृदय यदि प्रमोद उद्यान है, तो उसका पूर्ण सुन्न शाशा ही रूपी वसत ऋतु में होता है। क्या ईश्वर की महिमा इसमें नहीं देखी जाती कि दुखी-से-दुयी जनों का सर्वस्वचला जाने पर भी श्राशा से उनका साथ नहीं छूटता । यदि मान और प्रतिष्ठा बहुत बड़ी चीज़ है-जिसको उसके भक्त, धन के चले जाने पर भी, अपने गाँठ में बांधे रहते हैं तो सोचा चाहिए कि वह कितनी प्रिय वस्तु होगी, जो दैवात् प्रतिष्ठाभग होने पर भी मनुष्य के हृदय को ढाढ़स और आराम देती है। प्रागा को यदि मनुष्य के जीवन रूपी नौका का लगर कहें, तो ठीक होगा। क्योंकि जैसे बडे-से-बड़े तूफान में जहाज़ लगर के सहारे स्थिर और सुरक्षित रहता है, वैसे ही मनुष्य भी अपने जीवन में घोर विपदायों को झेलता हुमा श्राशा के सहारे स्थिर और निश्चलमना बना रहता । मनुष्य के जीवन में कितना ही धरा से-बदा काम क्यो न हो, उसके करने की शक्ति का उद्भव या प्रसव भूमि यदि इस प्राशा ही को कहें, तो कुछ धनुचित न होगा, क्योंकि किसी बडे काम में श्राशा से बढ़कर बुद्धिमत्ता की अनुमति देनेवाला और कौन मयी होगा ? मनुष्य के सपूर्ण जीवन को बुद्धिमानों ने विविध भावनाओं के अभिनय की केयल रगभूमि माना है । परदे के पीछे से धीरे धीरे वह शब्द यतला देनेवाला, जिससे हम चाहे जो पात्र बने हों और चाहे जिस रस के नाटक का अभिनय अपने चरित्र द्वारा करते हो, उसमें दृढ़ता पूर्वक लगे रहते हैं, इस भाशा के अतिरिक्त दूसरा चौर कौन (Proupter ) है ? और भी यदि ससार को भिन्न भिन्न कलह की रण-भूमि मानें, तो उस अपरिहार्य रण-भूमि में घामलों के घाव पर मरहम रखापाला जर्राह प्राशा ही को कहना चाहिए। है ।

प्राशा जिम किसी ने समार में श्राकर किसी बात का य न किया हो और किमी वस्तु की खोज में अपने को न डाल दिया हो, उससे यदकर व्यर्थ और तरस जीवा किमका होगा ? जब यह बात है, तो बतलाइए, किसी प्रकार के प्रयत-मात्रफी जान आशा को छोड़ किसी दूसरे को कह सकते हैं ? क्याकि केमे सभव है कि मनुष्य किमी प्रिय वस्तु की प्राप्ति के प्रयास में लगा हो और पाशा से उसका हृदय शून्य हो ? किसी काम के अभिलपित परिणाम में थमृत का गुण भर देना यह शक्ति सिवा पाशा के और विममे है ? ससार में जो भलाई हुई है या होगी, उस सयका मूल सदा प्रयत्न है और इम प्रयल की जान श्राशा हे। क्या अती श्राशा से भी किसी को कुछ दुख हो सकता है ? स्या झूठी भाशा से नैराश्य अच्छा है ? नहीं, नहीं, सच पूछिए, तो ऐसी कोई वस्तु ससार में ही नहीं, जिससे नैराश्य अच्छा हो, बल्कि नैराश्य से बढकर बुरी दशा मन के वास्ते कोई है ही नहीं। यदि धाशा केवल मृग तृष्णा ही है, तब भी वह ना उम्मेदी से अच्छी है। इस श्राशा रूपी प्रगल वायु से हृदय-रूपी सागर में जो दूर तक की तरगें उठती है, उन तरगों की अवधि नज़र में नहीं पा सक्ती। मसार-मात्र इस प्राशा को ररसी से कमा दुया है। इसे हम कई तरह पर सिद्ध कर चुके हैं। श्रर भागे चलिए, म्बर्ग या यमुठ क्या है ? मनुष्य के हृदय में भाँति भाँति की सालसा और पाकाक्षा का देवल माही- मात्र । वास्तव में स्वर्ग है या नहीं, इसरा तर्क-वितर्क इस समय यहाँ हम नहीं करते। कहन का तात्पर्य केवल इतना ही है फि स्वर्ग-शन्द की सत्ता ही मनुष्य के लिये प्रबल भाशा का सबूत है। क्योंकि जब इस बात को साचार चिरा दुखी होता है कि अपनी इदि के अनु- सार जैसा ठीक न्याय चाहिए, वैसा इस संसार में ही देखते, तो उसी - h साहित्य-सुमन . चित्त के लिये स्वर्ग के सुखों के द्वारा समझानेवाली आशा को छोड़ और दूसरा फोन गुरु है ? प्राशा ही एफ हमारा ऐसा सथा सुहृद् है, जो लड़कपन से अतकाल तक साथ देता है, और आशा ही के द्वारा उत्पन्न वे भाव हैं, जो हमको भरने के बाद की दशा के बारे में भी सोचने को रुजू करते हैं। हमको कुछ ऐसा मालूम होता है कि अपने में प्राशा की दृढ़ता चाहना ही मनुष्य के हृदय की प्राकृतिक दशा है । ध्यान देकर सो-- चिण, तो नैराश्य की श्रनस्था मनुष्य के जीवन में केवल क्षणिक है। नैराश्य के भाव मन में उदय होते ही चट प्राशा का अवलयन मिल जाता है। कितने थोडे समय के लिये प्रादमी नैराश्य को जी में जगह देता है, और कितनी जल्द फिर उसको निकालकर बाहर फेंक देता है। सिर्फ यही यात इमका पक्का सबूत है कि प्राकृतिक हित मनुष्य का प्राशा ही में है। श्राशा ही वह पुधई है, जिसे साकर श्राप जो चाहें, वह काम करिए, शिथिलता और श्रालम्य आपके पास न फटकने पावेगा , क्योंकि यह असभव है कि आशा मन में हो, फिर भी मनुष्य शिर नीचा किए हुए रज में बेठा रहे। श्राशा की उत्तेजना यदि मन में भरी है, तो ऐसी कातर दशा आगे ही न पावेगी। इससे यदि प्राशा ही को शादमी की जिंदगी का पड़ा भारी मर्ज़ माने, सो कुछ अनुचित नहीं है, क्योंकि हम देखते है कि श्राशा ही के विद्यमान रहने पर हम अपने सबों को पूरी-पूरी तरह से अदा पर सफ्ते है । पर इसी के साथ ही एक बात और ध्यान देने योग्य है । वह यह कि सामान्य श्राशा को अपने जीवन की हटता के लिये अपना साथी रखना और बात है, पर किसी एक धान की प्राप्ति की प्राशा पर अपने जीवन-मात्र के सुख को निर्भर मानना दूसरी बात है। पहले रास्ते पर चलने से चाहे जीवन में हमें सुम्प का सामना हो या दु य का, हम दोनों में एक-सा दृढ़ है, किंतु .

आशा ३७ दूसरे रास्ते पर चलने में यह चूफ होगी कि हमने जिस आशा पर अपना बिलकुल सुख छोद रक्खा है, वह प्राशा यदि टूट गई, सो हमारी हानि ही हानि है। कहने का तात्पर्य यह है कि जहाँ ईश्वर ने भनत ऐसे रास्ते मनुष्य की प्रकृति को ६, सहनशील और विमन करो के खोले हैं, उन रास्तों में प्राशा ही पर चलकर मनुष्य शनै शनै अपना कार्य सिद्ध करता है। इस कारण मनुष्य को अपनी भलाई के लिये प्राशा से बढ़कर और क्या हो सकता है, और मित्रगणों को भी, यदि आवश्यकता हो, तो आशा से बदकर और कौन भेट दी जा सकती है ? यदि अतकाल में चिकित्सक श्राशा ही के द्वारा रोगी को प्राण- पान सक कर सकता है, तो इससे बढ़कर गुण आप किस चीज़ में पाइएगा। साराश यह कि इस संसार में अपनी और दूसरे की भलाई का परम श्राधार आशा ही है, और परलोक तो, हमने जैसा ऊपर कहा, श्राशा का रूप ही है। थस्तु, हम भी यही आशा करते हैं कि यह लेस थाप लोगों को कुछ न कुछ रोचक हुधा होगा। - ।

२३-ऑसू मनुष्य के शरीर में प्राँस् भी गडे हुए खजाने के माफ्रिक है। जैसा कभी कोई नाजुक वक्त आ पड़ने पर सचित पूंजी ही काम देवी है, उसी तरह हर्ष, शोक, भय, प्रेम इत्यादि भावों को प्रकट करने में जब सब इद्रियाँ स्थगित होकर हार मान बैठती हैं, तब आँसू ही उन-उन भावों को प्रकट करने में सहायक होता है । चिर- काल के वियोग के उपरात जब किसी दिली दोस्त से मुलाकात होती है, तो उस समय हर्ष और प्रमोद के उफान मे अग अग दीजे पद जाते हैं, वाप-गद्गद कट रूंध जाता है, जिह्वा इसनी शिथिल पड़ जाती है कि उससे मिलने की ख्नुशी को प्रकट करने के लिये एक- एक शब्द मनो बोझ-सा मालूम पड़ता है। पहले इसके कि शब्दों से यह अपना असीम आनद मकट करे, सहसा आँसू की नदी उसकी आँख में उमड़ पाती है, और नेत्र के पवित्र जल से वह अपने प्राणप्रिय को नहलाता हुश्रा उसे यालगीर करने को हाथ फैलाता है । सच्चे भक्त और उपासक की कसौटी भी इसी से हो सकती है। अपने उपास्यदेव के नाम-सकीर्तन में जिसे अश्रुपात न हुआ, मूर्ति का दर्शन कर प्रेमाश्रुपात से जिसने उसके चरण-कमलो का अभिषेक न किया, उस दाभिक को भक्ति के आभास मात्र मे A फल ? सरस कोमल चित्तवाले अपने मनोगत सुख-दुख के भाव को छिपाने की हजार हजार चेष्टा करते हैं कि दूसरा कोई उनके चित्त की गहराई को न थहा मकै, पर अश्रुपात भाव-गोपन की सब चेष्टा को व्यर्थ कर देता है । मोती-सी आँसू की बूद जिस समय महसा नेत्र से मरने लगती है, उस समय उसे रोक लेना बढे- मास् . बड़े गमीर प्रकृतिवालों की भी शक्ति के बाहर होता है। भवभूति ने, जिनको प्रकृति का चित्र अपनी कविता में खींच देना य मा. लूम था, कई ठौर पर अश्रुपात का बहुत उत्तम वर्णन किया है, जिससे यही प्राशय निकलता है। यथा- "प्रयते वापौवरान इव नुक्कामाणमग विमपन् धारामिलुठति धरणा जजरकगा निगदोप्यावेग स्फुरदधरनामापुटनया परेपामुन्नेयो भवति च भगध्मानहृदय ।" विलितमतिपूरैवापमानन्दशाक प्रभवमवसजती तृपायोत्तानापा म्नपयति हत्येश नहीनयानना ते धवलबालमुग्धा दुग्धकन्यव दृष्टि । यदि सृष्टिकर्ता अत्यत शोक में अश्रुपात को प्राकृतिक म कर देखा, तो बज्रपात-सम तरुण दुम्ब के वेग को कौन सम्हास सकता? इसी भावार्थ का पोषक भवभूति का नीचे का यह श्लोक बहुत उत्तम है- "पूरीपाद नागम्य पराबाट प्रतिनिया , गोफनोम'च हदय प्रलापरव धायने।" अर्थात्-बरसात में तालाय जय लयालब भर जाता है, तो बाँध सोड़ उसका पानी बाहर निकाल देना ही सुगम उपाय यचाव का होता है। इसी तरह अत्यत शोक से क्षोभित तथा प्याकुल मनुष्य को अश्रुपास ही हदय को विदीर्ण होने से बचा लेने का उपाय है। यल्कि ऐसे समय रोना ही राहत है। जैसा कि भवभूति ने लिखा है- पर विश्व पान्य विधिव-भियुक्ता प्रियागोको जीव कुसुममिव यम पिलपनवितोऽयमुनम- नदपाप्युच्छ्वासा भवति ननु नाभी इ मादनमः । । मनमा भमान, पिय स्याग . २३- आँसू मनुष्य के शरीर में आँसू भी गठे हुए खजाने के माफ्रिक हैं। जैसा कभी कोई नाजुक वक्त आ पड़ने पर सचित पूँजी ही काम देती है, उसी तरह हर्ष, शोक, भय, प्रेम इत्यादि भावो को प्रकट करने में जय सय इद्रियाँ स्थगित होकर हार मान बैठती है, तब आँसू ही उन-उन भावो को प्रकट करने में सहायक होता है। चिर- काल के वियोग के उपरात जब किसी दिली दोस्त से मुलाकात होती है, तो उस समय हर्ष और प्रमोद के उफान में अग अग दीले पड़ जाते हैं, वाप्प-गद्गद कट रुंध जाता है, जिता इतनी शिथिल पद जाती है कि उससे मिलने की खुशी को प्रकट करने के लिये एक एक शब्द मनो बोम-सा मालूम पड़ता है। पहले इसके कि शब्दों से वह अपना असीम प्रानद प्रकट करे, सहसा आँसू की नदी उसकी आँख में उमड आती है, और नेन के पवित्र जल से वह अपने प्राणप्रिय को नहलाता हुभ्रा उसे बालगीर करने को हाथ फैलाता है । सच्चे भक्त और उपासक की कसौटी भी इसी से हो सकती है। अपने उपास्यदेव के नाम-सकीर्तन में जिसे अश्रुपात हुअा, मूर्ति का दर्शन कर प्रेमाश्रुपात से जिसने उसके चरण-कमलों का अभिषेक न किया, उस दाभिक को भक्ति के आभास-मात्र से क्या फल ? सरस कोमल चित्तवाले अपने मनोगत सुख-दुख के भाव को छिपाने की हजार-हजार चेष्टा करते हैं कि दूसरा कोई नके चिस की गहराई को न थहा सके, पर अश्रुपात भाव गोपन की सब चेष्टा को व्यर्थ कर देता है । मोती-सी आँसू की बर्दै जिस समय सासा नेत्र से मरने लगती है, उस समय उसे रोक लेना बडे- ॥ " । , प्रभवमवसूजन्ता १ - आँसू चई गमीर प्रकृतिवालो की मी शक्ति के बाहर होता है । भवभूति ने, जिनको प्रकृति का चित्र अपनी कविता में खींच देना खूय मा- लूम था, कई और पर अश्रुपात का बहुत उत्तम यर्णन किया है, जिमसे यही श्राशय निकलता है। यथा- "प्रयते वापापस्नन्ति इव मुक्तामागमरा विमपन् धागमिल्ठति धरणा जजरकगा निम्झोप्यावेग स्फुरदधरनामापुटनया परेपामुन्नेयो भवति च भराध्मानहृदय ।" विलुलितमतिपूरैवाष्पमानन्दगोक तृपयायोत्तानाधा स्नपनि हृदयेश स्नेहनिप्यन्निा ते धवलबहलमुग्धा दुग्धकुत्यव दृष्टि ।" यदि सृष्टिकर्ता अत्यस शोक में अश्रुपात को प्राकृतिक न कर देता, तो वज्रपात-सम दारण दुम्प के वेग को कौन सम्हाल सकता? इसी भावार्थ का पोपक भवभूति का नीचे का यह श्लोक बहुत उत्तम है। "पूरापाट तटााग्य परीवाह प्रतिक्रिया , ' शाफनामे च हृदय प्रलापरव धायते।" अर्थात् -बरसात में तालाय जब लबालब भर जाता है, सो बाँध तोड़ उसका पानी थाहर निकाल देना ही सुगम उपाय बचाव का होता है। इसी तरह अस्यत शोक से शोभित तथा म्याकुल मनुष्य को अश्रुपात ही हदय को विदीर्ण होने से बचा लेने का उपाय है । बल्कि ऐसे समय रोना ही राहत है । जैसा कि भवभूति ने लिखा है- द विश्व पाल्य विधिवदभियुक्तन' मनमा प्रियागोको जीव कुसुममिव घम म्वय त्याग विनपनविनतोऽप्यमुलभः स्तदयाप्युच्छ्वामो भवति ननु 'लामा ह भारतम - . । समयति, कृत्वा -- - २४-लक्ष्मी पुराणों में लिखा है कि लक्ष्मी का स्वरूप चतुर्भुज है तथा वे कमलासन पर सुशोभित उल्लू पत्ती को अपना वाहन किए हुए हैं। उनके रल और शक्ति का वारापार नहीं है । यद्यपि कईण्क महा रमानों ने लिखा है कि लक्ष्मी और सरस्वती का बिरला साथ होता है अर्थात् जो सरस्वती के कृपापात्र होते हैं, वे बहुत कम लक्ष्मी के भी कृपापात्र होते हैं, पर बहुधा मरसती के पूर्ण कृपापात्र लक्ष्मी की परवा नहीं करते । उनको इच्छा तो इसके पाने की अवश्य होती है, पर कठिनाई यह है कि हर तरह की लक्ष्मी को वे स्वीकार नहीं करना चाहते और शुद्ध रीति पर जैसा वे चाहते हैं, वैसा इसका धाग- मन होना दुप्फर-सा रहता है। यदि लक्ष्मी महाराणी ने कृपा भी की, तो वे लोग उसको वैसा प्यार नहीं करते, जेसा उसके मुख्य कृपापान एक-मात्र भक्त उसका आदर करते हैं। उनका कथन यह है-"माता ' तुम्हारे रहने ही मात्र मे कुछ उपकार और फायदा - - नहीं, यरन्- . . मेरे कर पंडा करो, जित चाहो तित नाव।" अर्थात्-मेरे हाथ में पहले थायो, जिससे मैं जो चाहूँ, सो मुझे मिल जाय । मेरे हाय से गुजरकर सर तुम जहाँ चाहे, वहाँ जायो, मैं तुम्हें फ़ैद कर नहीं रसना चाहता, ससार के कौन-से पदार्य हैं, जो तुम्हारे द्वारा नहीं मिल सकते, तब तुम्हें कैद कर रखने में कौन-मा बड़ा लाभ है । हो, उन मनहूसों की तो यात ही निराली है, जिन्हें नुमको केंट कर रखने ही में मजा मिलता है। ।

लक्ष्मी - समार में जितनी यातों से फाष्ट मिलता है तथा भय होता है, वे सब लपमी के थाने से पेसी दूर हो जाती हैं, जैसा वर्षा काल म थाकाश मे मेघ उड़ जाते है । सच पूलो तो, पेमा कोई न होगा, जिसको इसकी आमादा न हो। जितना उधम मनुष्य करता है, सय इमी के लिये जय या महाराणी पाती है, तो इसनी जल्दी और इतने प्रकार से तथा इतने भित्र भिन्न द्वार से आती है कि इनके कृपापात्र को इनके रखने का और ही नहीं मिलता। ऐसा ही जब ये स्टकर जाने लगती है, तो इसनी जल्द चली जाती है कि कितना ही थाँभो और गहके पक्डो, पिर उस भाग्यहीन के पास ये किमी तरह पर नहीं रहतीं। "गजभुक्त कपित्य" की भाँसि यह ऊपर का थाटपर-मात्र रह जाता है और भीतर-भीतर सब शोर से पोला पड़ जाता है। किसी ने अच्छा कहा है- "समायाति यदा लनमानारिकेलफनाम्यवत् , पिनियाति यदा सदमागभुक्तकापत्यवान् ।" श्रर्थात्-लक्ष्मी जब भाती हैं, तो उपर से कुछ नहीं मालूम होता, पर भीतर-भीतर मनुष्य अत सारवान होता जाता है। जैसा नारियल के फल में बार ऊपर से कुछ नहीं मालूम होता, पर भीतर उसके दूध-सा पानी भरा रहता है--पर शय ये जाती है, तय हाथी के निगले कैथे की भांति मनुष्य सुवस हो जाता है-हाथी को कैथा दो, तो यह सहिगे का-पहिगा निगल जाता है और वैसा ही समूचा लीद कर देता है, पर भीतर उसके गूदा विलकुल नहीं रहता । लक्ष्मी की कृपा होते ही यावत् काम सब भारभ हो जाते है-मकान भी छोड दिया जाता है. जमींदारी भी खरीदी जाने लगती है-लड़की-लड़की के व्याह में भी ऊँची-से उँची परतूत होने लगती है। पर धन जाते ही उसके सब काम ऐसे ही अध. कपडे पढे रह जाते हैं, जैमा गरमी के दिनों में तुद्र नदियाँ सूखके - १०४ - - साहित्य-सुमन रह जाती हैं। बहुधा देखा गया है, लक्ष्मी के आने के साथ खूब- सूरती, तरहदारी और कुलीनता भी बढ़ती जाती है और लक्ष्मी के जाने के साथ ही ये तीनों घट जाती हैं। बहुधा देखने में आया है कि लक्ष्मी का एकात भक्त चित्त का उदार नहीं होता । उसको इनसे ऐसा प्रेम हो जाता है कि यह इनको किसी तरह पर अपने पास से नहीं हटने देता । मसल है- "मर जैहौं तोहि न भुजैहौं।" वह लक्ष्मी को यहाँ तक आँखों के श्रोट नहीं किया चाहता कि चाहे सब कुछ चला जाय तथा जीवन से भी वियोग हो जाय, किंतु धन का वियोग उसे न होने पाये । सूम के पास लक्ष्मी क्यों जाती है, इस पर किसी कवि ने कहा है- "शूर त्यजामि वैधव्यादुदार लज्जया पुन , सापल्यात्पण्डितमपि तस्मात्कृपणमाश्रये ।" अर्थात्-शूरवीर के पास मैं इसलिये नहीं जाना चाहती कि वह जय अपनी जान पत्ते पर रखे हुए लड़ाई में प्राण खोने को उग्रत है, तो उसके जीने का कौन ठिकाना, तब मुझे वैधव्य का दुख सहना होगा । उदार के पास भी जाते लज्जा होती है कि उदार मुके सबके सामने फेंका करता है। पडित के पास इसलिये नहीं जाती कि वहाँ मेरी सौत सरस्वती गाज रही है। इसी से मैं कृपण का सहारा लेती हूँ कि यह मुझे आदर से रक्खेगा। दूसरी बात यह भी देखी जाती है कि धनी बहुधा मूर्ख होते हैं, सो क्यों इसको भी किसी कवि ने वही उत्तम रीति पर दाया है- "पने मूढजने ददासि द्रावण विद्वत्सु कि मत्सरो नाह मत्मरिणी न चापि चपला नैवास्मि मूरता मूचेभ्यो द्रविण ददामि नितरा तत्कारण श्रूयतों विद्वान्सर्वजनेषु पूजिततनुमूर्सस्य नान्या गति ।"

लक्ष्मी , - कवि कहता है-"लक्ष्मी, तुम मूर्स के पास जाती हो, पढ़े लिखे विद्वानों से तुम्हें क्यों ईप्या है, जो वहाँ नहीं जाती ?" सब लक्ष्मी नवाय देती है-"हमें विद्वानों से कोई ईर्ष्या नहीं है, न हम चचना है--मूसों को जो हम धन देती है, उसका कारण यह है कि विद्वानों का तो सब लोग मान और प्रतिष्ठा करते हैं, मूखों को कौन पूछता, यदि हम भी उनके पास न जाती।" ऐसी ही लक्ष्मी और सरस्वती के सवाद में अनेक कल्पनाएँ फपियों ने की है। उनमें यह एक बड़ी उत्तम है- "विदास कृतयुद्धय ससि मम द्वारि स्थिता नित्यश श्रीमन्तोपि मया विना पशुसमारतरमादह अयसी , श्रीवाग्देवतयोरमूनि वचनान्याकण्य वेधाश्चरा दूचे श्रेयतरे उभे यदि भवेदेको विवेको गुण ।" लक्ष्मी सरस्वती से कहती हैं-"सखि, विद्वान् पदे लिम्वे मेरे कृपापात्रों के द्वार पर नित्य हाथ पसारे खड़े रहते हैं।" सय सरस्वती ने कहा-"हाँ ठीक है, पर धीमत भी मेरे न रहने से परातुल्य देखे जाते हैं, तब हमी न अच्छी हुई।" इस सरह पर विवाद के उपरांत दोनों ने घमा को पच यदा । ब्रह्मा दोनों की बात सुन देर तक सोचने के उपरांत बोरो-"तुम दोनों ही अच्छी हो, यदि एक विवेक-गुण रहे सो-अर्थात् विवेक शून्य न तो लक्ष्मी का कृपापान अच्छा, न सरस्वती हीका।" खुरा-से-थुरा काम- म-जिसका करनेवाला राजा के यहाँ से दर पाने योग्य होता है, और जो समाज में अत्यत घृणित है-उसे भी धन के लिये करते लोग जरा नहीं सकुचाते । इसी से उद के नामी शायर सौदा का क्रौल है- "मादर, पिदर, बिरादर, चो जो कहो, सो जर है।" फारसी के एक दूसरे शायर का भी ऐसा ही कौल है-

साहित्य-सुमन
"धन ! तू ईश्वर नहीं है, पर जितने रोष हैं, सबोंका दाँपनेवाला
है, और मनुष्य के जीवन में जितनी आवश्यकताएँ है, सबोंका पूरा
करनेवाला है।"

, २५--श्रीशंकराचार्य और गुरु नानकदेव ये दोनों हिंदुस्तान के प्रसिद्ध पुरपी में श्रमगण्य और बडे महात्मा हो गए है । पजार में जेसे गुरु नानकदेव माननीय है, वैसे ही दक्षिण तथा महाराष्ट्र देश में श्रीशकराचार्य माने जाते है। प्रतिमा-पूजन के सिद्धातो को काटनेवाले और ईश्वर की निर्गुण उपासना के पोपक दोनो थे। किंतु शकराचार्य जाति के ब्राह्मण थे, इसलिये पाहणों के उसगने मे, जिसमें प्राह्मणों की जीविका में याधा न पहुँचे, पचायतन पूजा अर्थात् विष्णु, शिव, गणेश, सूर्य और शक्ति की पूजा और धाराधना फिर से स्थापित की, और बौद्धो को इस देश से निकलवा दिया। इसके विरुद्ध नानकशाह ने ब्राह्मणों का जोर बहुत ही तोड़ दिया, और नाम के माहात्म्य को अधि- काधिक यदाया । सच भी है-नाम-सकीर्तन में लगा हुश्रा, चित्त का शुद्ध , सीधा सादा मनुष्य कुटिलचित्त, निवेदज्ञ ब्राह्मण से श्रेष्ठ है। शकर पूर्ण विद्वान् तथा वेदात-दर्शन के प्रवर्तक थे। ये उस समय हुए, जर मुसलमानों का ज़ोर न बढ़ने में सस्कृत का पठन पाठन देश में पूरी तरह जारी था, और देश के हरएक प्रास में मदन मिश्र के समान नामी पडित विद्यमान थे । उस समय शकर ही का-सा विद्वान् प्रतिष्ठा पा सकता और सर्वग्राह्य हो सकता था। दृमरे यह कि बौद्ध लोग, जिनके मुकाबले शकराचार्य उठ खडे हुए, घढे दार्शनिक थे। शकर ही का-सा सुयोग्य पढित उनसे पार पा सकता था। इधर नाक जिस समय और जिस देश में हुए, उस समय और उस देश में मुसल- मानों का बहा अत्याचार था, चाल चलन, रीति-वर्ताव, रहन-सहन लोगों के यावनिक हो गए थे, बोली और पहनावे ता में मुसलमानी . .

। । साहित्य-सुमन ( Forms and ceremonies ) को तुच्छ समझतथा नाम-सकी सन प्रादि के द्वारा ईश्वर की भोर भक्ति-भाव और थास्तिक्य-शुद्धिक मुख्य समझ, उसी के अनुसार अपने अनुयायियों को चलन के लि कहा और अपने शिष्यों को वैसी ही शिक्षा दी। श्रत को इसका परि ‘णाम यह हुथा कि गुरु गोविंदसिंह और रणजीतसिंह ऐसे नरस पजाब में पैदा हुए, और श्रय तक भी सिक्खों में जैसा कौमी जोश है, बैसा समाम हिंदुस्ताा के किसी प्रात के लोगों में नहीं है। शकराचार्य ने पक्षपात और अपने मत कीपींच यहां तक खसी किये सर्वसम्मत न हो सके। गुरु नानक के उदार चित्त में न पक्षपात था और न किसी से विरोध या अपने मत की खींच थी। इसलिये न केवब पजाय-भर में, यरन और प्रास के लोगो में भी वे सर्वसम्मत हु। 'प्रस्तु, ये दोनो महात्मा जैसे रहे हों, सर्वथा माननीय है, किंतु इन दोनों के मत के फ़कीर, सन्यासी और उदासी देश के अकल्याण बढे भारी द्वार है । अव भी कहीं-कहीं दो एक सन्यासी ऐसे देवे जाते हैं, जो विरक्ति, त्याग तथा पाडित्य में सन्यास पाश्रम की शोमा है । किंतु उदासी तो बहुधा ऐसे ही पाए जाते हैं, जो विपयासक्ति में गृहस्थों के भी कान काटते है। उदासी बहुत बिगड हुए हैं, सन्यासी श्रावारगी में कुछ ही उनसे कम है। अब तो सन्यासी यनने के लिये केवल गीता की एक पुस्तक पास रहना श्रावश्यक है। और गुरुमुखी अक्षरों से परिचय रखना, जिससे प्रथ साहब का पाठ यह कर ले, उदासी के लिये योग्यता की कसौटी है। अथ साहय का पाठ करना शाता हो, मानो वह गुरु नानक का प्रतिनिधि हो गया। गुरु नानक का हेडक्वार्टर रणजीतसिंह का यनवाया अमृतसर का स्वर्ण मदिर है। शकराचारियों के प्रधान मठ धार हैं। उनम स एक 'गेरी मठ है, जिसके प्रधान हस्तामलकाचार्य थे। शकर के दस शिष्यों में पुरी, भारती और सरस्वती नाम के इन तीन सप्रदायवालों के अधिकार श्रीशकराचार्य और गुरु नानकदेव - मे यह मठ है। यह मठमगिरिपर्वतपर है,जोरामेश्वर के रास्ते में मदरास- = पास में है। दूसरा 'शारदा-मठ' है, जो द्वारका में है। शकर के सबसे मुख्य शिप्य पमपाताचार्य के अधिकार में यह मठ रखा गया था। ती और "माधम' दो सप्रदाय के सन्यासियों के अधिकार में यह मठ है। 'जोशी-मठ' नाम का तीसरा मठ हिमालय में पदरी और केदार के रास्ते में कहीं पर है। तोटकाचार्य इसके प्रधान पिए गए थे। गिरि, पर्वत, और सागर तीन सप्रदाय के सन्यासीइसके अधिकारी हैं। चौथा 'गोवर्द्धन-मठ' है, जो जगनाथपुरी में है। सुरेश्वराचार्य, जो पहले मदन मिश्र के नाम से प्रसिद्ध थे, इस मठ के प्रधान किए गए। वन और अरण्य दो समदाय के सन्यामीइसके अधिकारी हैं। इन-इन गलियों पर अब जो रहते हैं, ये शकराचार्य कहलाते हैं और जगद्गुरु की उपाधि उन्हें दी जाती है। मुख्य शक्राचार्य महाराज की यह कभी इन्धान हुई थी कि हम जगद्गुरु कहलावे, किंतु जो अब उस गद्दी पर बैठते हैं, अपने को जगद्गुर कहते और मानते हैं। मदरास और यबई प्रात में जगद्- गुर शकराचार्य का बड़ा ज़ोर है। सामाजिक और धर्म-सबंधी मामलों में विना जगद्गुर की व्यवस्था के कोई काम पचद्राविडों में नहीं हो मकता 'सौंदर्य-लहरी' आदि अनेक स्तोत्र शकर के नाम से प्रचलित हैं, पर वे मुख्य शकर के बनाए नहीं हैं। इसमे सिद्ध है कि ये जगद्गुरु शकरा- चार्य उस्कृष्ट पदित होते थाए और है भी। "सत्यमसि", "महब्रह्मास्मि", "प्रजानमानद ब्रह्म" सथा "अयमात्मा ब्रह्म", ये चार महावाक्य इन चार मठों के अलग अलग माने गए हैं। शकराचार्य के प्रधान शिष्य पमपाद, हस्तामलक, सुरेश्वराचार्य, तोटकाचार्य, समित्पाणि, चिद्वि- लास, ज्ञानकद, विष्णुगुप्त, शुद्धकीर्ति, भानुमरीचि, कृष्णदर्शन, पुद्धि- वृद्धि,विरचिपाद,शुद्धानत,यानदगिरि, सुधन्वाराना,कविराज राजशेखर इत्यादि थे। इसमें सदेह नहीं, यौद्धों के उपरात शक्राचार्य वर्तमान साहित्य-सुमन हिंदू-धर्म के बड़े पोपक हुए। ये न हुए होते, तो देश-का-देश या तो बौद्धमतावलबी बना रहसाया सब-के-सव यवन(मुसलमान) होजाते। गुरु नानक की भी तेरह गदियाँ हैं, उनके जुदे-जुदे पथ है। इनके दस अवतार माने गए हैं। चेलों में सबसे मुख्य सुथरा था।

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Sahitya Suman

Author
Bhat,pt.bal Krishna
Title
Sahitya Suman
File name
Sahitya Suman
Text
OCR done
Citation
1914
Published
2011/01
Publisher
Ganga Pustakmala Karyalye Lakhnau
Language
Sanskrit
Pages
108
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546462
Barcode
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C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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