Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )
Jvalamalini Kalp
Front matter
मूलमन्द किसनदास का घाइया
जन विजय अस
सरत
33 30 निवेदन रा मार TA जैन शाखोंमें मंत्र शास्त्र और औषधिशास्त्र अनेक हैं उनमें मंत्र शास्त्रकी महिमा तो अपरंपार है। मंत्र शास्त्रों में से श्री ऋषि मण्डल यंत्र कल्प, भक्तामर स्तोत्र कल्प, कल्याण मंदिर स्तोत्र कल्प, मोकार मंत्र फल्प-माहात्म्य तो यंत्रमंत्र क साधननिधि सहित प्रकट हो चुके हैं। लेकिन और में मंत्रशास्त्र अन्धकारमें मौजूद थे व प्रकट नहीं हो सके थे ऐसे समय में मासे ३७ बर्ष पर अब हम सहकुटुम्न श्री शिखरजीकी यात्रार्थ गये थे तब टौटते समय देहली में धर्मपुराको धर्मशालामें ठहरे थे जिसकी सूचना मिलते ही यहां के एक महान् ब्रह्मग विद्वान भी० पं० चन्द्रशेखरजी शास्त्री जो विद्याधारिधि आदि पदवीधारी थे हमसे मिलने आये थे। उनसे जैन साहित्य छ मंत्र शास्त्रोंशी वर्षा करते हुए उन्होंने बताया कि जैन मंत्रशास्त्र तो ससा हैं। "हमने यहां (देहली) के शास्त्र भण्डारसे बड़ो मेहनतले भैरव पद्मावती कल्प, ज्वालामालिनी कल्प, अंबिका कल्प, मंत्र-व्याकरण न बीज कोष मूल प्राप्त करके उनकी प्रेस कॉपी की है व उन्हें हिन्दी अर्थ सहित तैयार किये हैं। यदि माफ इनमें से जो छपाना चाहें मैं आपको उचित मूल्य पर दे सकता हूँ" तो हमने आपको ये प्रेस कापियां मंगाकर देख डी थीं फिर सूरत- जाकर उनमें से ॥ भैरव पद्मावती कल्प यंत्र मंत्र रखापतविधि सहित मापसे मंगा लिया था बाद में अनेक कारणवशात् या ग्रन्थ हम जली प्रकट नहीं कर सके थे लेकिन माजसे १३ वर्षे पूर्व यह प्रन्थ प्रकट किया था जो करीब-करीब विक चुका है। (सिर्फ इनीगिनी प्रतियां शेष हैं) ।
[४] इय प्रबके मुख पृष्ठपर हमने प्रष्ट किया था कि मागे हम "नागमागिनी कल्प" मी प्रकट करने की भावना रखते हैं ऐसा पढ़कर हमारे पास इस कल्पके लिए मांग आती ही रहती थी। इसलिए हमने पं० चंद्रशेखरजी शास्त्रीसे पत्रव्यवहार करके इस "नागमागिनी कल्प" मंत्र-शास्त्र जो हिन्दी अर्थ न यंत्र- मंत्र र मापन विधि सहित है, देहलीसे मंगा लिया था जिसको भी प्रकट करनेमें अनेक कार्यवशात् विलच हुआ तो भी हर्ष होता है कि वह मंत्र-शाल पाज हम साधन विधि न यत्र मंत्र हित प्रष्ट कर रहे हैं। जब "भैरव पन्नावती कल्प" बारहवीं शताब्दिमें श्री मल्लोषेण. सूरिने रचा था, और यह "ज्वालामालिनी कल्प" यत्र-शास्त्र मुनिराज श्री इन्द्रनन्दीने दशवीं शताब्दिमें रचा था। यह मंत्र- शाल दश परिच्छेदों में शास्त्रोक्त मन-पाहे विधान करीब ७५ प्रकारको साधनः विधि सहित हैं तथा इसमें उनकी साधनाके २३ यंत्र भी बड़ा भारी खर्च करके दिये गये हैं। "भैरव पद्मावती कल्प" की प्रस्तावना तो श्री०५० चंद्रशेखरजी शास्त्रीने रिख दी थी लेकिन 'बागमालिनी कल्प' को हमने छापकर पूर्ण किया और आपको इसकी प्रस्तावनाके लिये देहली लिखा गया तप, आपके पुत्र श्री चन्द्रमणिका पत्र पाया कि हमारे पिताजी (पं० चन्द्रशेखरजी शास्त्री ) तो १ वर्ष हुये गुजा गये है बादि । तब हमने इस यंत्रशास्त्रपर किसी महान विद्वानसे प्रस्तावना रिखाना उचित समझा व ऐसे विद्वान् हमें मिल गये जिनका नाम है-प्रो० उमाकांत प्रेमानन्द शाह एम.ए. पी. एच. डी. बड़ौदा। भाप यत्र शास्त्रके बड़े भारी विद्वान हैं व बड़ौदामें बोरिएंटर इनस्टीटयूट में उच्च पद पर आसीन हैं तथा आप जैन रिसर्चके मार्मदर्शक हैं। आपने इस मंत्र शास्त्र की प्रस्तावना बड़ी विद्वत्तापूर्वक ठिन दी है जिसके लिये हम आपका हार्दिक उपकार मानते हैं।
इस प्रन्धके श्लोकोंको जहांतक' हो हमने शुद्ध किये है तो भी इसमें अशुद्धियां रह गई हैं ऐसा प्रस्तावना लेाकका अभिप्राय है तो भी सभी श्लोकोंका हिन्दी अर्थ तो ठीकर किया गया है। हमारे ८ वें तीर्थंकर भगवान चन्द्रमभुकी कुलदेवी श्री ज्वालामाजिनी थी उन्हींके नामसे ही यह मंत्र शास्त्र रचा गया है जो अक्षरशः पढ़ने, मनन करने व साधना करने योग्य है । हां, यह कार्य बडे परिश्रमका है अत: बहुत कम भाई बहिन इसकी साधना कर सकेगे तो भी यह मंत्र शास्त्र प्रत्येकको स्वाध्याय करनेयोग्य तो है ही। इस ग्रन्थकी कोपी में, यंत्रों के ठोक बनानेमें तथा माज- कलकी छपाई व कागजकी मंहगीमें भी हमने इस प्रन्धको प्रकट करने का साहस किया है। माशा है इस मंत्र शास्त्रका भी शीघ्र प्रचार हो जायगा । वीर सं. २४९२, सं २०२३ भाद्रपद वदी ५ रविवार ता. ४-९-६६ निवेदक :- मूलचंद किसनदास कापड़िया-सूरत प्रकाशक IBE BAMCHID प्रास्ताविक lll|||||| श्री० सेठ मूरचन्दजी कापडिया सूरतने " भैरव पद्मावती- कल्प " नामक श्री० मल्लिषेणसूरि कृति ग्रंथ बीर संवत् २४७९ में प्रसिद्ध किया था। यह ग्रंथ स्व० श्री. पं० चन्द्रशेखरजी शास्त्री (देहली ) कुन भाषा टोका समेत छपा था, और उसका सम्पादन भी उन्होंने किया था। इस वर्ष श्री कापडियाजी, मुनिराज श्री० इन्द्रनन्दि-विरचित " श्री बालामालिनी कल्प " प्रसिद्धि में ला रहे हैं। साथमें स्थ० पं० चन्द्रशेखरजी शास्त्री रचित भाषा टीका और यन्त्रादि, विषया. नुक्रम, के अलावा बानामालिनी साधनविधि, मालिनी-स्तोत्र, ब्राह्मादि अष्टमातृका पूजा आदि प्रकट कर रहे हैं जिसके लिए पाप धन्यवाद के पात्र हैं। इन्द्रनन्दी रचित यह प्रन्थ श्री मल्लिषेगके " भैरव प्रद्मावती कल्प" से प्राचीन है। यह प्रन्थ प्रसिद्ध हो ऐसी मेरी माकांक्षा बहुत समयसे थी क्योंकि जैन मन्त्र-तन्त्र शाखके इतिहासमें इस प्रन्थका अनोखा स्थान है। उपलब्ध जैन तन्त्र ग्रन्थों में, खास करके दिगम्बर जैन तन्त्र प्रन्थों में इससे प्राचीन कोई प्रन्ध शायद नहीं है। सद्गत रायबहादुर हीरालालजीने A Catalogue of Sanskrit and Prakrit manuscripts in the Central [७] Provinces and Berar नामक प्रन्थसूची नागपूरसे ई. पर १९२६ में प्रसिद्ध की थी जिसमें इस अन्यका निर्देश था। अपनी Introduction में उन्होंने श्री इन्द्रनन्दीके बारेमें लिखते हुए लिखा कि- By this author we have the work Jvalamalini-Kalpa. It deals with the cult. of propitiating the goddess of fire Jvalamalini. The work openswith an account of the circumstances of the origin. of the cult. Elacharya, a sage and leader of Dravidagana, lived at Hemagrama in Daksinadesa. He had a female pupil named Kamala-Sri. Once she became possessed of a Brahma-Rakshahsa under whoseinfluence she indulged in all sorts of acts and talks decent or indecent. xx Elacharya sought the aid of Vahnidevata that dwelt on the top of the Nilagiri hills. He inculcated the art which Indranandi long after him professes to expose in writing.- जैसा कि इस ग्रंथको पढ़नेसे मालूम होगा, द्रविडगणके नायक श्री हेलाचार्यने अपनी शिष्या कमलश्री जो ब्रह्मराक्षसे प्रहित थी उसकी प्रहपीडा मिटाने के लिए बहु-देवता (ज्वाला- मालिनी देवी) की साधना की थी। यह साधनविधि परम्परासो इन्द्रनन्दीको प्राप्त हुई जिन्होंने इस ग्रन्थ की रचना की । - सायबहादुर हीराबालने इन्द्रनन्दीकी गुरु-परमपसा इम तरह की, है- द्राविड-गण ईन्द्रदेव ईन्द्रनन्दी नासपनन्दी वर्षनन्दी हर्षनन्दी हर्षनन्दी । ईन्द्रनन्दी (इप ग्रन्थ के रचयिता) श्री कापडियाजीने इस प्रन्थको स्व०५० चन्द्रशेखरजी शास्त्रीने अपनी भाषा टीका सहित जो प्रति लिखी थी उसके आधार पर छापा है। इसमें प्रन्धके अंतमें ग्रन्थ कर्ताको प्रशस्ति नहीं है इन प्रशस्ति में प्रन्थ रचनाका समय आदिको महत्वपूर्ण हकीकत है जो रायबहादुर हीरालालजीने दी है और जो मैंने जैन- सिद्धांत-भवन, पाराकी एक प्रतिमें भी देखी है। दशम परि. कछेदके अन्तके बाद, आरावाली प्रतिमें (पृ० ३७ ब से ) निम्न. fe खन पाठ है- द्रविण समय मुख्यो जिनपतिमार्गोचित क्रियापूर्णः । व्रतसमितिगुप्तिगुप्तो हेदाचार्यो मुनिर्जयतु ।। यानरिक्ष तजधिशश काम्बरताराकुगपरा- रतापद्-हेगपार्योक्तार्थ स्थेया मालिनीकल्पः ।।
[९] अनिदिन्द्रादिदेवरतुतपदकर्मीन्द्रनन्दिमुनीन्द्रो। नित्योद्यसचित्रविमलजनिधौतपापोपलेपः Xxxxaiमोद्यत्पगुणगुणभृतीतीणसिद्धा- ताम्भोगशिविलोकयम्बुजवनविषाद पद्यशो राजहंस ।। यवृत्तं दुरितारिसैन्यहनने चण्डासिधारायते । चितं यस्य शरस्सरः सलिलपत्स्वच्छं सदा शीतबम्॥ कोत्तिः शारदकौमुदीशशमृतो ज्योत्स्नेव यस्यामला । स श्रीवासवनन्दि सन्मुनिपतिः शिष्यातदीयो भवेत् ।। शिष्यस्तस्य महात्मा चतुरनियोगेषु चतुरमिति विभवः । श्री वर्षनावगुरुरिति बुधमधुपनिसेवितपदाम:'। बोके यस्य प्रसादादजनि मुनिजनः सत्पुराणार्थवेदी। 'यायाशास्तम्ममूर्धन्यतिविमलयशम्श्रीवितानो निवद्धः ।। xxxxxपौराणिककविवृषभायोतितास्तत्पुराण- व्याख्यानाद्-हर्षनन्दि प्रथितगुणस्तस्य किं पर्यतेऽत्र ।। शिष्यस्तस्येन्द्रनन्दि विमउगुणगणोद्दामधामाभिराम: प्रज्ञतीक्ष्णारधाराविलितबहलाज्ञानवल्ली वितानः। जैने सिद्धान्तबाघों निमलिवहदयस्तेन पद्ग्रन्थतोऽयं, हेलाचार्योंदितार्थो व्यरचि निरुपमो ब्वालिनीमन्त्रबादः ।। अष्टाशतैकषष्टिप्रमाणशकवत्सरेबतीतेषु । श्रीमान्यखेटकटके पर्वण्यक्षयतृतीयायाम् ॥ शतदग्महितपतु:शतपरिमाणग्रन्थरचनया युक्तं । श्रीकृष्णराजराज्ये समाप्तमेतन्मतं देव्याः ।। इति हेगचार्यप्रणीतार्थे श्रीमदिन्द्रनन्दियोगीन्द्रविरचित- प्रन्थसंदर्भ वाहिनी-मते दशविधाकारपरिलेखनं समाप्तम् ।।
[११]
श्री रायबहादुर हीरागरजीने भी प्रन्थ निर्माणका समय
जतानेवाला अन्तिम श्लोक अपने प्रास्ताविक वक्तव्यमें दिया है।
इसके अनुसार, श्री हे (ए?) लाचार्यकृत ग्रंथके तात्पर्यानुसार
श्रीमद् इन्द्रनन्दि-योगीन्द्रने इस वाहिनी-मत संज्ञक ग्रंथकी
रंचनीकी परिसमाप्ति मान्यखेटमें ( वर्तमान मारखेड़-मह राष्ट्रकूट
राजाओंकी राजधानी थो-) शक संन् ८६१ ( = ई० स० ९३९)
में अक्षय तृतीयाके दिन की गई।
प्रन्थ ईसाकी दसवीं शतीके पूर्वार्द्ध का होनेसे
प्राचीन है। इस ग्रन्थकी प्राचीन हस्तलिखित प्रतियां लेकर इन
सबके पाठको देखकर संशोधित पाठमें इसका पुनः सम्पादन
करना भावश्यक है।
श्री कापडियाजीका यह प्रकाशन इस प्रन्थको सर्व प्रथम
असिद्धि में गनेका कार्य करता है। किंतु मुद्रित प्रन्यमें अशुद्धियां
रह गई हैं।
-उमाकांत प्रेमानन्द शाह-बडौदा ।
ता० १-९-६६
अतः
यह
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विषय-सूची पृष्ठ. . १ ३ पकड़ता है प्रथम परिच्छेद (मंत्री लक्षण) | नं. विषय १९. अष्ट दंडकरी देवियां ५७ नं. विषय पृष्ठ २०. यो प्रतिहार १. मंगलापरण २. ग्रंथ रमनाका कारण २१. उस मंडलका उपयोग ५९ २२. स्मय मंडल (कमश्री कथा) २३. पत्य मंडर ६२ ३. ग्रंथकी गुरु परंपरा ४. ग्रंथकी अनुक्रमणिका ९ पंचम परिच्छेद ५. मंत्रीके लक्षण १० २४. भूताकंपन तेल ६५ द्वितीय परिच्छेद दिव्यादिव्य ग्रह षष्ठम परिच्छेद ६. ग्रहोंके पकड़ने के कारण १२ | २५. सर्वरक्षा यंत्र ७. ग्रहोंके भेद २६. प्रहरक्षक पुत्रदायक यंत्र ७२ ८. कौन प्रह किसको २७. वश्य यंत्र (२) ७३ १२ | २८. मोहन वश्य यंत्र (२) ७४ । ९. दिव्य पुरुषप्रहोंके लक्षण १३ २९. स्त्री भाकर्षण यंत्र १०. दिव्य संग्रह और ३०. दिग्बगति सेना जिला और क्रोध स्तंभन यंत्र ७७ १५ ११. दिव्य प्रह "७८ तृतीय परिच्छेद ३२. जिल्हा स्तंभन यंत्र ३३. गति जिल्हा व क्रोध १२. पकनीकरण क्रिया १९ स्तंभन यंत्र १३. प्रह निग्रह विधान २७ १४. बीजाक्षर ज्ञानका ३४. पुरुष वश्य यंत्र ३५. पण पश्य यंत्र ८२ महत्व ३६ ३६. शाकिनी भय हरण यंत्र ८३ १५. पल्लवोंका वर्णन ४० ३७. घट यंत्र १६. साधारण विधि ३८. प चिन्नहरण यंत्र ८६ चतुर्थ परिच्छेद ३९. नाकर्षण यंत्र .१७. सामान्य मंडळ ४६ ४०. परमदेव प्रह यंत्र ८९ १८. पर्वतोभद्र मंडळ ५४ । ४१. वश्य हसन '७५ -- उसके रक्षण L १७ ३१. स्तंभन यंत्र ४४ ८७ नं " " विषय नं. विषय सप्तम परिच्छद ६५. वसुधारा यंत्र १११ ४२. सर्व वशीकरणतिलक(१) ९१ ६६. तपमा यत्र ११२ ४३. लोक वशीकरणतिटक(२) ६७. मुख्य स्नान ११३ ४४. सर्व वशीकरणतिलक(४) ९२ नवम परिच्छेद ४५. सर्व वशीकरणतिलक(४) ६८. नीराजन विधि १५५ ४६. मुख सुगधी हर तिलक ९३ ४७. सर्व वशीकरणअंजन(२) दशम परिच्छेद ४८. सुखदायक अंजन (१) ९६ / ६९. शिष्यको विद्या ४९ सर्वसुखदायकअंजन २) देने की विधि ५०. सुखदायक अंजन (३) ७०. बागमालिनी ५१. सर्वशीकरण अंजन(३) ९७ साधन विधि १३० ५२. वश्य प्रयोग (१) ७१. बालामालिनी स्तोत्र ५३. घश्य नमक ९८ | ७२. ज्वालामालिनी अन्य वश्य साधन विधि १ १३७ ५५. २श्य तेढ (२) ९९ ७३ वागामालिनी तीसरी ५६. बश्य तेल (३) १०० मापन विधि १४१ ५७ वश्य प्रयोग (२) ७४ ब्रझो भादि ५८. कामबाण चूर्ण पष्ट देषियोंकी पूजा १४४ ५९. दशरारिक चूर्ण १०२ ७५. जप व हवन विधि १४५ ६०. योनि शोधन लेप १०३ | ७६. शिष्यको विद्या ६१. संतानदायक औषधि देने की विधि १५१ ७७ बालामालिनी अष्टम परिच्छद माला यंत्र १५२ '६२ वसुधार। स्नान के ७८ बालामालिनी पश्य स्थानकी विधि १०५ मंत्र व यंत्र ६३. सिद्धमिट्टीको परिभाषा १०८ | ७९ चन्द्रप्रमु 'स्तवत १५६ ६४. साधारण पूजन विधि १०९ ] ८० चंद्रप्रमु यंत्र व विधि १५९ ५४. ते (१) " १ ह श्री ज्वालामालिनी देवी ( दक्षिणकी एक धातुकी मूर्ति ) श्री ज्वालामालिनी कल्प ग्रन्थकी श्री चंद्रप्रभुकी अधिष्ठात्रीदेवी ( सेठ माणेकचन्द मलुकचन्द दोशी वकील फलटनसे प्राप्त )
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. HIN FIR श्री पंचगुरुभ्यो नमः । श्री चंद्रप्रभाय नमः। मुनिराज श्री इन्द्रनन्दि विरचित- श्री ज्वालामालिनी कल्प भाषाटीका और मंत्र तंत्र सहित YOG प्रथम परिच्छेद ॥ संगलाचरण | चंद्रप्रभजिननाथं, चंद्रप्रभमिन्द्रनंदिमहिमानं। ज्वालामालिन्यचिंत, चरणसरोजद्वयं वंदे ॥१॥ अर्थ-जिनकी महिमा इन्द्रनन्दिको भी प्रसन्न करनेवाली है, जिनके चरणकमल ज्वालामालिनी नामकी देवीसे पूजे २] ज्वालामालिनी कल्प। जाते हैं ऐसे चंद्रमाके समान प्रमावाले भगवान चंद्रप्रभको मैं नमस्कार करता हूं ॥१॥ कुमुददलधवल गात्रा, महिषमहावाहिनोज्यलाभरणा। मां पातु वह्नि देवी, ज्वालामाला करालोगी ॥ २ ॥ अर्थ-कुमुदके दलके समान श्वेत शरीरवाली, महिषकी सवारी तथा उज्वल आभूषणवाली, अग्निके समान भयंकर अंग- वाली ज्वालामालिनी सेरी रक्षा करे ॥ २ ॥ जयतादेबी ज्वालामालिन्युद्यस्त्रिशूलपाश ऊपा । कोदंडकांड फलवरद, चक्रचिह्नोज्वलाष्टभुजा ॥ ३ ॥ अर्थ-उठे हुए त्रिशूल, पाश, मछली, धनुष, मडल फल वरद (अग्नि) और चक्रके चिह्नसे उज्वल अष्ट भुजावाली ज्वालामालिनी देवी जयवन्त हो ॥ ३ ॥ अहंसिद्धाचार्योपाध्यायान् , सकलसाधुशुनिमुख्यान् । प्रणिपत्य मुहुर्मुहुरपिवक्ष्येऽहं, ज्वालिनीकल्पम् ॥ ४ ॥ अर्थ-मैं अहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, सर्व साधुओं और मुख्य मुनियोंको वारम्बार नमस्कार करके ज्वालामालिनी कल्पको कहूंगा ॥ ४॥ दक्षिण देशे मलय हेम ग्रामे, मुनिर्ममहात्मासीत् । हेलाचार्यों नामा द्रविडगणाधीश्वरो धीमान् ॥ ५ ॥ ।
प्रथम पच्छेद। -- ग्रन्थ रचनाका कारण- कमलश्रीकी कथा अर्थ-दक्षिण देशके मलय हेम नामके ग्राममें द्रविड गणके अधीक्षर हेलाचार्य नामके बुद्धिमान महात्मा मुनि थे॥५॥ वच्छिष्या कमलश्री श्रुतदेवी वा समस्त शास्त्रज्ञा । सा ब्रह्मराक्षसेम ग्रहीता, रौद्रण कर्मक्शात् ॥ ६ ॥ अर्थ-उनकी एक समस्त शास्त्रोंको जाननेवाली दूसरी श्रुतदेवीके समान कमलश्री नामकी शिष्याको भाग्यवश रौद्र ब्रह्मराक्षसने पकड़ लिया ॥६॥ रोदिति हाहाकारैः स्फुटाह हासं तनोति संध्यांयां । जपति पठत्यथ वेदान् , हसति पुनः कह कह ध्वनिना ॥७॥ अर्थ-अब वह कभी तो हाहाकार करके रोती, कभी सायंकालके समय अट्टहास कर करके हंसती, कभी जप करती, कभी वेदोंको पढ़ती और कभी कहकहा लगाकर हंसती ॥७॥ को सा वास्ते मंत्री, यो मोचयति स्वमंत्रशक्त्या मां। बक्तीति सावलेपं, सविकारं जमणं कुरुते ॥ ८ ॥ अर्थ-वह कभी२ कष्टसे कहती, कि ऐसा कौन मंत्र- ४] ज्वालामालिनी कल्प। शास्त्री है, जो मुझे अपने मंत्रकी शक्तिसे छुड़ावे और फिर विकारसे जंभाई लेने लगती ॥ ८ ॥ दृष्ट्वा तामिति दुष्टग्रहेण, परिपीडितां मुनीन्द्रोऽसौ । व्याकुलितोऽभूतत्प्रविधानकर्तव्यतामूढः ॥ ९ ॥ अर्थ-वह मुनिराज हेलाचार्य उसको इस प्रकार दुष्ट ग्रहसे पीड़ित देखकर किंकर्तव्य विमूढ होकर बड़े दुःखी हुए ॥९॥ तद्ग्रहविमोक्षणार्थ, तद्ग्रहसमीपनीलगिरिशिखरे । विधिनैव बसि देवांस, साधयामास मुनिमुख्यः ॥ १० ॥ अर्थ-इसके पश्चात् उन महामुनिने उस ग्रहको छुड़ानेके वास्ते उसके घरके समीप नीलगिरि पर्वतके शिखर पर विधिपूर्वक वह्निदेवी (ज्वालामालिनि ) को सिद्ध किया ॥१०॥ दिन सप्तकेन देव्या, प्रत्यक्षीभूतया पुरः स्थितया । मुनिरुक्तः किं कार्य, तवायं वद मुनिरुवाचेत्थं ॥ ११ ॥ अर्थ-सात दिनके पश्चात देवीने प्रत्यक्षरूपसे सामने आकर उस मुनिसे कहा-हे आर्य ! आपका क्या कार्य है ? मुझे बतलाईये ॥ ११ ॥ मुनिने इस प्रकार कहा- السا प्रथम परिच्छेद । 56 कामार्था हिकफलसिद्धार्थ, देविनोपरुद्धासि । किन्तु मया कमलश्रीग्रहमोक्षायोपरुद्धासि ॥ १२ ॥ अर्थ-हे देवि ! मैंने आपको काम अर्थ आदि लौकिक फलोंकी सिद्धिके वास्ते नहीं बुलाया है किन्तु कमलश्रीको ग्रहसे छुड़ानेके लिये बुलाया है ॥ १२ ॥ तस्मात्तद् ग्रहे मोक्षं, कुरु देव्येतावदेव मम कार्य । तद्वचनं श्रुत्वासा बभाण, तदिदं कियन्मानं ॥ १३ ॥ अर्थ-इस वास्ते हे देवि ! आप उस ग्रहको छुड़ाकर मेरा इतना कार्य कर दीजिए। उसके वचन सुनकर बह बोली-यदि यही है तो यह कितना काम है ? ॥ १३ ॥ मा मनसि कृथाः खेदं, मंत्रेणानेन मोक्षयेत्युक्त्या । मृदुतरमायस पत्रं. विलिखितमंत्रं ददौ तस्मै ॥ १४ ॥ अर्थ-मनमें खेद मत करो, इस मन्त्रसे छुडालो, यह कहकर उसने कोमल लोह पत्र पर लिखा हुवा मंत्र उस मुनिको दे दिया। तन्मन्त्रविधिमजानन् , पुनरपि मुनियो बभाणतां देवीं । माऽस्मिन्वेभिन किमप्य, हमतो वितृत्ये तदभि देहि ॥ १५॥ अर्थ-उस मंत्रकी विधिको न जानते हुए उन मुनि- -
ज्वालामालिनी कल्प।
राजने फिर उस देवीसे कहा-"मैं इसकी विधिको नहीं जानता
हूं" अतएव आप मुझको इसकी पूर्ण विधिको कहें।
तस्मै तया ततस्तद्व्याख्यातं, सोपदेशमथ तत्वं ।
पुनरपि तद्भक्तिवशाददामि तसिद्ध विद्येत्थं ॥ १६ ॥
अर्थ-तब उस देवीने उपदेश सहित उस तत्वको मुनिको
बतलाया और कहा- "उस सिद्ध विद्याको मैं तुम्हारी भक्तिके
अशसे फिर भी देती है।"
साधनविधिना यस्मै, त्वं दास्यसि होमजपविहीनोऽपि ।
भविता ससिद्ध विद्या, नोदास्यसि यस्यसोऽत्र पुनः ॥१७॥
अर्थ-तुम हवन तथा जपसे रहित हो जानेपर भी
साधन विधिसे जिसको भी दोगे यह विद्या उसको ही सिद्ध हो
जावेगी और जिसे न दोगे उसको सिद्ध न होगी ॥ १७ ॥
उद्यान वने रम्ये जिन भवने, निम्नगा तटे पुलिने ।
गिरिशिखरेऽन्य स्मिन्वा स्थित्वा, निर्जन्तुके देशे ॥ १८ ॥
अर्थ-उद्यान, सुन्दर वन, जैन मंदिर, नदीका किनारा,
या पासका प्रदेश, पर्वतके शिखर पर अथवा किसी अन्य एकांत
स्थानमें स्थित होकर ॥ १८ ॥
प्रजाप्य नियतं तथा युतं हुत्वा प्रकरोतु ।
प्रकरोतु पूर्वसेवां प्रणिगद्यैवं स्वधामगता ॥ १९ ॥
प्रथम परिच्छेद । [७ अर्थ---*जप करना चाहिये । और दश सहस्र (अयुत) हवन करके अपने कार्यको पूर्ण करना चाहिये । ऐसा कहकर वह देवी अपने स्थानको चली गई ॥ १९ ॥ , तत्र स्थित एवं ततस्तमसौ दंदह्यमानमाध्याय । दहनाक्षरैरुदन्तं दुष्टं निर्घाटयामास ॥ २० ॥ अर्थ-तब उस मुनिने वहां बैठे-बैठे ही उस पीडा देनेवाले तथा दहन करनेवाले अक्षरोंके बेगसे रोनेवाले दुष्ट ब्रह्मराक्षसको दूर कर दिया ॥ २० ॥ निर्घाटितो ग्रहश्चेद्यात्वेक, देवदहन रररर बीजं । शेप दश निग्रहाणां किमस्त्य, साध्यो ग्रहः कोऽपि ।। अर्थ.---जब जलानेबाले प्रबल बीजाक्षरोंसे एक ऐसा ग्रह दूर हो गया तो फिर शेष दश ग्रहोंमे से किस ग्रहको दूर करना कठिन हो सकता है ? अर्थात् सभी दूर किये जा सकते हैं ॥२१॥ ग्रंथकी गुरु परम्परा देव्यादेशाच्छास्त्र तत्पुनालिनीमतंततश्चेदं । तच्छिष्यो गाङ्गमुनिर्नीलग्रीवो विजाब्जख्यो ॥ २२ ॥ *हवन दशांश होता है । जब दश हजार हवन है, तो जप एक लाख करना चाहिये।
f MAHARATHER ८] ज्वालामालिनी कल्प। अर्थ---उसके पश्चात् ज्वालामालिनीदेवीके मतका यह शास्त्र देवीकी आज्ञासे उस मुनिराजके शिष्य गांग मुनि नील. ग्रीव और विजाब्ज ॥ २२ ॥ भार्याक्षान्तर सब्बा विरुवः क्षुल्लक स्तथेत्यनया । गुरु परिपाट्या विच्चेन्नसम्प्रदायेन वागच्छत् ॥ २३ ॥ अर्थ-भार्याक्षान्तर सब्ब तथा विरुवट्ट नामके क्षुल्लकके पाल इस प्रकार गुरु परिपाटीसे नष्ट न होकर सम्प्रदायसे आया ।। २३ ॥ कंदर्पण ज्ञातं तेनापि स्वनुत निर्विशेषाय । गुणनंदि श्री मुनये व्याख्यातं सोपदेशं तत् ॥ २४ ॥ अर्थ—इसके पश्चात् इसका ज्ञान कंदर्प नामके मुनिको हुआ और उन्होने इसका व्याख्यान उपदेश सहित अपने शिष्य बुगनंदिके सामने किया ॥ २४ ॥ पार्श्वे तयोर्द्धयोरवि तच्छास्त्र ग्रंथतोऽर्थतश्चापि । मुनिनेन्द्रनन्दिनानाय सम्यगीडितं विशेषेण ।। २५ ॥ अर्थ-उन दोनों के पास इंद्र नंदि नामके मुनिने उस शास्त्रको ग्रंथरूपसे तथा अर्थरूपसे भली प्रकार पढ़कर विशेष रूपसे कहा ॥२५॥ 1
प्रथम परिच्छेद ।
[ ९
क्लिष्टं ग्रंथं प्रात्तन शास्त्र तदेति स्वचेतसि निधाय ।
तेनेन्द्रनंदिमुनिना ललितार्या वृतगीतायैः ॥ २६ ॥
अर्थ-प्राचीन शास्त्र बड़ा क्लिष्ट ग्रंथ है। अपने मनमें
यह सोचकर उस इंद्रनंदि मुनिने सुन्दर आर्या गीति आदि
छन्दोंसे ॥ २६॥
हेलाचार्योत्कार्थं ग्रंथपरावर्तनेन रचितमिदं ।
सकलजगदेकविस्मयजगतिजनहितकरं शृणुत ॥ २७ ॥
अर्थ-हेलाचार्यकी प्रशंसाके वास्ते संपूर्ण जगतको
आश्चर्य करनेवाला तथा संसारके प्राणियोंका हित करनेवाला
यह शास्त्र उस प्राचीन शास्त्र के बदले में बनाया इसे सुनो।
-
ग्रन्थकी अनुक्रमणिका
मंत्रिग्रहसन्मुद्रा मण्डलकटुतैलजंत्रवश्यसुतंत्र ।
स्नपनविधिनीराजनविधिरथ साधरविधि श्चेति ॥ २८ ॥
अर्थ-मंत्री ग्रह, बीजाक्षर विधान, मंडल, कम्पन तैल,.
वश्ययंत्र, वश्यतंत्र, वसुधारा स्नान विधि, नीराजन विधि,
और साधन विधि ।
अधिकारादेषां दश, चिदात्मनां स्वरूपनिर्देशं ।
वक्ष्येहं संक्षेपात्प्रकटं, देव्या यथोद्दिष्टं ॥ २९ ॥
१० ] ज्वालामालिनी कल्प। अर्थ-इन दश अधिकारोसे में संक्षेपमें देवीके कथनानु- सार इस ग्रंथका वर्णन करूंगा ॥ २९ ॥ मन्त्रीके लक्षण + मौनीनियमित चितो मेधावि बीजदारण समर्थः । मायामदनमदोनः सिध्यति मंत्रिर्नसंदेहः ॥ ३० ॥ अर्थ-मौनसे रहनेवाला, चित्तको नियममें रखनेवाला, बुद्धिमान, बीजाक्षरोंको अलग करनेमें समर्थ माया कामदेव तथा मदसे रहित मंत्रबाला पुरुष निस्संदेह सिद्धिको प्राप्त कर लेता है। सम्यग्दर्शनशुद्धो देव्यर्चनतत्पुरो व्रतसमेतः । मंत्रजपहोमनिरतो नालस्यो ज्ञायते मंत्री ॥ ३१ ॥ अर्थ-जो शुद्ध सम्यग्दृष्टी देवीको पूजनेवाला व्रती मन्त्र जप तथा हवनको करनेवाला तथा आलस्य रहित हो वह मंत्री मंत्रवाला' होता है ॥ ३१ ॥ देवगुरुसमय भक्तः सविकल्पः सत्यवाक् विदग्धश्च । वाक्पटुरपगतशुक्रः शुचिरौद्रमना भवेन्मंत्री ॥ ३२ ॥ अर्थ-देव शास्त्र तथा गुरुका भक्त सावधान सत्यवादी बुद्धिमान् बोलनेमें चतुर ब्रह्मचारी पवित्र तथा रौद्र मनवाला -मंत्री होता है।
How
प्रथम परिच्छेद ।
[ ११
देव्याः पदयुगभक्तो हेलाचार्यक्रमाब्जभक्तियुतः ।
स्वगुरूपदिष्टमार्गेण वर्तते यः स मंत्री स्यात् ॥ ३३ ॥
अर्थ-जो देवीके चरणकमलका भक्त हो, हेलाचार्य के
चरण कमलमें भक्ति रखता हो और अपने गुरुके बतलाये हुए
मार्ग पर चलनेवाला हो, वह मंत्री होता है ॥ ३३ ॥
विद्यागुरुभक्तियुते तुष्टिं पुष्टिं ददाति खलु देवी ।
विद्यागुरुभक्तिवियुक्त चेनसि द्वेष्टि सुतरांसा ॥ ३४ ॥
अर्थ-देवी विद्या तथा गुरुमे भक्ति रखनेवाले पुरुषको
तुष्टि और पुष्टि दोनों ही देती है, तथा विद्या और गुरुमें भक्ति
न रखनेवालोंसे चित्तमे स्वभावसे अत्यन्त द्वेष करती है ॥३४॥
सम्यग्दर्शनदूरी बाकठपूछांदसो मयसमेतः ।
शून्य हृदयश्च लऊः शास्त्रेऽस्मिन् नो भवेन्मंत्री ॥ ३५ ॥
अर्थ-जो सम्पग्दर्शनसे रहित हो, अशुद्ध वाणीवाला
हो, वेद पाठी हो, भय करनेवाला हो, शून्य हृदय हो, और लज्जा
करता हो, वह इस शास्त्रमें मन्त्री नहीं हो सकता ॥ ३५ ॥
इति हेन्राचार्य प्रणीत अर्थमे श्रीमान् इन्द्रनन्दि मुनि चिचित
ग्रन्य मालामालिनी छल्पकी आचार्य चन्द्रशेखर
शाखी कृत भाषा टीकामें मत्री बक्षणषाला
पहला परिच्छेद समाप्त हुदा ॥१॥
ज्वालामालिनी कल्प। द्वितीय परिच्छेद व्यतर वादा ग्रहोंके पकड़नेके कारण अतिहटमति विषणं भवतिरस्नेहवैरसम्बध । भीतं चान्यमनस्कं गृहाः प्रगृह्णाति भुवि मनुजं ॥१ अर्थ-अत्यन्त प्रसन्न मनवाले, दुःखी मनवाले, अथवा अन्य मनस्क और डरपोक पुरुषको पूर्व जन्मके प्रेम अथवा वैरके सम्बन्धसे ग्रह पकड़ लेते हैं ॥ १ ॥ रतिकामा वलिकामा निहन्तुकामा ग्रहाः प्रग्रहणन्ति । वरेण हन्तु कामा गृहणान्त्यवशेषकारणैः शेपाः ॥ २ ॥ अर्थ-कोई ग्रह रतिकी इच्छासे, कोई बलिकी इच्छासे, कोई मारनेके लिये, कोई वैरके कारणसे घातके लिये, तथा शेष ग्रह अन्य कारणोंसे, पुरुषको पकड़ते हैं ॥२॥ ग्रहोंके भेद तेऽपि ग्रहा द्विधास्यु दिव्यादिव्यग्रहप्रिभेदेन । दिव्याश्चापि द्विधा पुरुपस्त्रीग्रहविभेदेन ॥ अर्थ-वह ग्रह दो प्रकारके होते हैं-दिव्य और अद्विव्य, उनमेंसे दिव्य ग्रहोंके भी दो भेद होते हैं-पुरुष ग्रहः तथा स्त्री ग्रह ॥ - प्रथम परिच्छेद [१३ - + कौन ग्रह किसको पकडता है ? पुरुषग्रहोथ पुरुषं स्त्रियं तथा स्त्री ग्रहो न गृह्णाति । पुरुष ग्रहस्तु वनितां गृह्णाति स्त्रीगृहः पुरुषं ॥ ४ ॥ अर्थ-साधारणतः पुरुप ग्रह पुरुषको और स्त्री ग्रह स्त्रीको ग्रहण नहीं करते, किंतु पुरुष ग्रह स्त्रीको और स्त्री ग्रह पुरुषको ही ग्रहण करते हैं ॥४॥ रतिकामेग्रहनियमः प्रोक्तोऽयं नेतरत्र नियमोऽस्ति । पुरुषगृहोऽपि पुरुपं गृह्णाति स्त्रीगृहोपि वनितानां ॥५॥ अर्थ-यह नियम ग्रहोंके रतिकी कामनासे पकड़नेसे है। अन्यत्र नहीं है, क्योंकि अन्य इच्छाओं में पुरुषग्रह पुरुषको और स्त्री ग्रह स्त्रीको भी ग्रहण करते हैं ॥५॥ दिव्य पुरुष ग्रहोंके लक्षण देवो नागो यक्षो गंधर्वो ब्रह्म राक्षसश्चैव । भूतो व्यंतर नामेति सप्त पुरुष ग्रहास्तेस्युः ॥ ६॥- अर्थ-देव, नाग, यक्ष, गंधर्व, ब्रह्म, राक्षस, भूत, और व्यंतर, यह सात पुरुष ग्रह होते हैं ॥६॥ देवः सर्वत्रशुचिर्नागः शेते भनक्ति सर्वांगं । क्षीरं पिबति च नित्यं यक्षो रोदिति हसति बहुधा ॥७॥ ,
१४ ]
ज्वालामालिनी कल्प।
अर्थ-देव सदा पवित्र रहता है, 'नाग सोता है, सब
भंगको तोड़ डालता है और नित्य दूध पीता है। यक्ष बहुत
प्रकारसे रोता है और हसता है ॥ ७ ॥
गंधर्वो गायति सुस्वरेण सुब्रह्म राक्षसः संध्यायां ।
जयति च वेदान् पठति स्त्रीष्वनुरक्तः सगर्वश्च ॥ ८ ॥
अर्थ-गंधर्व अच्छे स्वरसे गाता है, ब्रह्म राक्षस संध्याके
समय जप करता है, वेदोंको पढ़ता है, स्त्रियोंमे अनुरक्त रहता
है, और बड़ा घमंडी होता है ॥ ८ ॥
.
नेत्रे विस्फारयति लंशगति जति मनोति हस्ति च भूतः ।
मूच्छति रोदिति धावति बहुमोजी व्यंतर स्तथा भुवि पतति ॥९॥
अर्थ-भूत आंख फाड २ कर देखता है, शिथिल गतिसे
जंभाई लेता है, मिनर करके बोलता है, और हँसता है।
व्यंतर मूर्छित होता है, रोता है, दौडता है, बहुत भोजन करता
है, और जमीन पर गिर२ पड़ता है ॥ ९॥
दिव्यपुरुषगृहाणां लक्ष्मणमेवं मया समुद्दिष्ठं ।
दिव्यस्त्रीग्रहलक्षणमधुना
व्यावय॑ते
शृणुत ॥ १० ॥
अर्थ-इस प्रकार दिव्य पुरुष ग्रहोंका लक्षण कहा गया
अब दिव्य स्त्री ग्रहोंका लक्षण कहा जाता है ॥ १० ॥
द्वितीय परिच्छेद ।
[ १५:
दिव्य स्त्री ग्रह और उनके लक्षण
काली तथा कराली कंकाली काल राक्षससी जंघी।
प्रेताशिनी च यक्षी वैताली क्षेत्रवासिनी चेति ॥११॥
अर्थ-काली, कराली, कंकाली, कालराक्षसी, जंघी,.
प्रेताशिनी, यक्षी, वैताली, और क्षेत्रवासिनी, यह नौ स्त्री ग्रह हैं।
कृष्णं भवेच्छरीरं हृत्करलोचनानि दह्यते ।
काल्यामपि देहस्य करालिकाकॊ न भुक्तऽन्नं ॥ १२॥
अर्थ-कालीसे पकड़े हुयेका शरीर कृष्ण हो जाता है।
और हथेली हृदय तथा नेत्रोंमें जलन मालूम होती है। करालीसे
पीडित अन्न नही खाता ॥ १२ ॥
मुखमापांडुरमंगं कृशंचकं कालिका गृहीतस्यभ्रमति ।
निशि बदति कौलिकमथाहासं करोति राक्षस्यातः ॥१३॥
अर्थ-कंकालीसे पकड़े हुएका मुख तथा अंग पीला
पड़ जाता है । राक्षसीसे पीड़ित हुआ रात्रिमें घूमता है, ऊंची२.
बातें करता और अट्टहास करके हंसता है ॥ १३ ॥
जंधी ग्रहीत मनुजौ मूर्च्छति रोदिति कृशं शरीरं स्यात् ।
प्रेताशिनी ग्रहीतश्चकितौ वा भी करध्वनिना ॥ १४ ॥
.
N
१६ ]
ज्वालामालिनी कल्प।
अर्थ-जंघीसे ग्रहण किया हुआ मनुष्य मूञ्छित होत
है, रोता है, और उसका शरीर कृश हो जाता है, प्रेताशिनीसे
ग्रहण किया हुआ भय करनेवाली ध्वनिसे शब्द करता हुआ
चकित हो जाता है।
उतिष्ठति दष्टोष्टः स एव वीर ग्रहो बुधैः प्रोक्तः ।
मासद्वि तयात्परतस्तस्य चिकित्सा न लोकेऽस्ति ॥ १५ ॥
अर्थ-ऐसा व्यक्ति होंठ चबार कर उठता है । पंडितोंने
इसीको वीर ग्रह कहा है। इसकी चिकित्सा दो माससे आगे
संसारभरमें नहीं हो सकती ।। १५ ।।
भोक्तं न ददाति न च प्रियांगना संगम तथा कर्तु।
स्वयमेव प्रच्छन्नं जीवति सहते न वट यक्षी॥ १६॥
अर्थ-वट यक्षीसे पीड़ित पुरुष न खाता है । और न
अपनी प्रिय स्त्रीका ही संग करता है। यक्षी गुप्त रूपसे उसके
-साथ रहती है ॥ १६॥
शुष्यति मुखं कृशं स्यादात्रं वैतालिका ग्रही तस्य ।
तत्क्षेत्रवासिनी पीड़ितो नरो नर्ति हा हसति ॥ १७ ॥
अर्थ-वैतालिकासे पकड़े हुएका मुख सूख जाता है और
शरीर कृश हो जाता है। क्षेत्रवासिनीसे पीड़ित पुरुष नाचता
है और हा हा करके हंसता है ॥ १७ ॥
द्वितीय परिच्छेद । [१७० विद्युनिभमावेशं गृह्णाति च वदति कौलिकी भाषां । धावति वेगे नेति स्त्रीग्रहसल्लक्षणं प्रोक्त ॥ १८ ॥ अर्थ-ऐसा व्यक्ति विजलीके समान आवेशको ग्रहण करता है । ऊँची ऊँची बातें करता है और वेगसे, दौड़ता है। यह दिव्य स्त्री ग्रहोंका लक्षण कहा गया ॥ १८ ॥ मिथ्याग्रहस्तथान्ये विद्यन्ते तानपि विद्वान्सः । सत्य ग्रहान् प्रकुर्वन्ति शेमुषी वैभवबलेन ॥ १९ ॥ अर्थ-विद्वान् लोग बुद्धिके बलसे मिथ्या ग्रहों (अदिव्य ग्रहों) को सत्य ग्रह (दिव्य ग्रह ) कर देते हैं ॥ १९ ॥ अ क ख ग घ जैश्च उततपैर्य श र पल सक क्ष व हर लैश्वान्योन्य परिवर्तित रल युतै निदृिष्टं भूत देव कौलिक मे तत् ॥२०॥ अर्थ-इन ग्रहोंका निवारण अ, क, ख, ग, घ, ज, उ, त, त, प, य, श, र, ष, ल, क्ष, व, ह, र और ल, से एक दूसरेको अ और ल से युक्त करके भूत और देवोंका कोलन होता है ॥ २० ॥ अदिव्य ग्रह दंष्ट्राशृङ्खलनामादनु ग्रहाः शाखिलश्च शशनागः । ग्रीवा भंगोचलितौ षड पस्मार ग्रहाः प्रोक्ताः ॥ २१ ।। - १८] ज्वालामालिनी कल्प। अथे— दंष्ट्रा, शृङ्खल, दनु, शाखिल, शशनाग, ग्रीवाभंग, और उच्चलित यह छह अपस्मार ग्रह या अदिव्य ग्रह कहे गये हैं ॥ २१ ॥ ये ते ग्रहा ह्यदिव्या मुंचति न जीवितं विना पुण्यात् । साध्यास्तत्रेप्येषां मंत्रं ध्याने पुनर्वस्तः ॥ २२ ॥ अर्थ-यह अदिव्य ग्रह विना विशेष पुण्यके जीता नहीं छोड़ते, मंत्र शास्त्रसे इनका निवारण सीखकर कष्ट दूर करना चाहिये। इतिश्री हेलाचार्य प्रणीत अर्थमें श्रीमान् इन्द्रनन्दि मुनि विरचित ग्रन्थ ज्यालामालिनी कल्पकी काव्य साहित्य तीर्थाचार्य प्राच्य विद्यावारिधि श्री चन्द्रशेखर शास्त्री कृत भाषाटीकामें दिव्यादिव्य ग्रहाधिकार नामक द्वितीय परिच्छेद समाप्तम् ।।२।।
तृतीय परिच्छेद ।
[ १९
तृतीय परिच्छेद
सकलीकरण क्रिया
सकलीकरणेन विना मन्त्री स्तंमादिनिग्रहविधाने।
असमर्थस्तेनादौ सकलीकरणं प्रवक्ष्यामि ॥ १ ॥
अर्थ मन्त्री पुरुष स्तंभन आदि निग्रहके विधानमें
सकलीकरण क्रियाके विना सफल नहीं हो सकता । अतएव
आदिमें मैं सकलीकरण क्रियाको कहूंगा ॥१॥
उभयकरांगुलिपळसु वं मं हं सं तथैव तं बीजं ।
बिन्यस्य तेन पश्चात्कुर्यात्सर्वांगसंशुद्धिं ॥ २ ॥
अर्थ-दोनों हाथोंकी उंगलियोंके जोडोंमें चं, मं, हं,
सं और तं, बीजाक्षरोंको रखकर फिर सब अंगोंकी शुद्धि
करे ॥२॥
वामकरांगुलिप सु रां, री, रू, रौं, रः, न्यसेच्च रं बीजं ।
हां ह्रीं ह्र ह्रौं ह्रः पुन रेतान्यपि विन्यसेत्तद्वत् ।। ३ ।।
अर्थ-बाएं हाथकी उंगलियोंके जोडोंमें रो, रौं रूं, रौं
और रः बीजको रखकर फिर उसी प्रकार ह्रां ह्रीं ह्रीं ह्रौं और
हः बीजोंको रक्खे ॥ ३ ॥
२० ।
ज्वालामालनी कल्प।
HAR
वामादीन्येतान्येव देवि पाटौ च जघनमुदरं वदनं ।
शीर्ष रक्ष युगं स्वाहां तान्यात्मांग पचके विन्यस्य ॥ ४ ॥
अर्थ-इन्हींको वामांगसे आरंभ करके दोनों पग (पैर)
जघन उदर (पेट) बदन (मुख) और शीर्ष (शिर ) में
लगाकर " रक्ष" और " स्वाहा" लगावे जो इस प्रकार है
ॐ वं रां ह्रीं ज्वालामालिनि मम पादौ रक्ष२ स्वाहा ।
ॐ मंरीं ह्रीं ज्वालामालिनि मम जघनं रक्ष२ स्वाहा ।
ॐ हं रूंह ज्वालामालिनि मम उदरं रक्षर स्वाहा ।
ॐ सं रौं ह्रौं ज्वालामालिनि मम वदनं रक्ष२ स्वाहा ।
ॐ वं रः हः ज्वालामालिनि मम शीर्ष रक्षर स्वाहा ।
आपादमस्तकान्तं ध्यायेजाज्वल्यमानमात्मानं ।
भृतोरगशाकिन्यो भित्वा नश्यति दुष्टमृगाः ॥ ५ ॥
अर्थ-अपनेको चरणसे मस्तक तक अत्यंत प्रज्वलित
ध्यान करे इस प्रकार भूत सर्प शाकिनी और दुष्ट पशु दूर
होकर नष्ट हो जाते हैं।
क्षांक्षी शं झै क्षों क्षौं क्षं क्षः प्राच्यादि दिक्षु विन्यसेत् ।
मूलादापर्यंता दिशाबंधं करोतीदं ॥ ६ ॥
अर्थ-फिर मूलसे चारों ओर पूर्वादि दिशाओंमें क्षां
क्षी झू में क्षौं क्ष और क्षः को र ख दिशाबंध करे ॥ ६ ॥
तृतीय पच्छेद ।
[ २१
आत्मानमभिसमन्ताच्चतुरस्र वज्रपञ्जरमखण्डं ।
ध्यायेत्पीतं धीमानभेद्यमन्यैरिदं दुर्गं ॥ ७ ॥
अर्थ-फिर वह बुद्धिमान् अपने चारों ओर चौकोर
चनमय अखण्ड पिंजरेके समान दूसरोंसे अभेद्य पीत वर्णके दुर्गका
'ध्यान करे ॥ ७॥
मंत्रजपहोमकाले नोपद्रवति सुमंत्रिणं कश्चित् ।
दुष्टाहो जिघांसुर्नलंघते दुर्गमध्यगतं ॥ ८ ॥
अर्थ--इस दुर्गके बीच में बैठे हुए मंत्रीके पास मंत्र जप
तथा होमके समय में कोई भी दुष्ट ग्रह और मारनेकी इच्छा
करनेवाला लांधकर नहीं आ सकता ॥ ८ ॥
भूतिषु सप्तभिषु त्रिभू , कोष्टा सर्व दिग्मुखाः ।
लेख्या विधान वत्त्र्येक, चत्वारिंशत्पद प्रमाः ॥ ९ ॥
अर्थ--सातों प्रकारके भयोंसे पृथ्वीकी रक्षा करनेवाले
उस वज्रमय पिंजरे में सब दिशाओंकी पृथ्वी पर तीन कोठे बनावे।
और उनमें विधिपूर्वक इकतालीस पद लिखे ॥ ९ ॥
अब उन पदोंका विस्तार बतलाया जाता है।
नव तत्वान्येकैकं नवपदविंध्योलिद्विधिक्रमशः ।
तत्कोण त्रिपढ़ चतुष्कः द्वादश पिंडान् प्रदक्षणतः ॥१०॥
- २२ ] ज्वालामालिनी कल्प। अर्थ-नव तत्वों से एकर को लिखे, वह यह हैं- द्रां, द्रीं, क्लीं, ब्लू , सः, हां, आं, क्रों, क्षीं । फिर क्रमसे विध्यके नौ पदोंको लिखे- उसके पश्चात् तीसरे कोठेमें तीन गुण चार अर्थात् बारह पिंडोंको लिखें जो यह हैं— "क्षल्व्यू, हव्यू, भल्व्यू, मन्व्यू, यल्च्यू, पल्यू, घन्व्यू, झल्व्यू' खल्ब्यू, छम्ल्ब्यू, क्ल्व्यू, ९. - क्म्ल्व्यू।" अत्राष्टमे समुद्देशे द्वादश पिंडाक्षाकार पिंडाद्याः । स्तंभादिषु ग्रहाणां निग्रहणं चापि वक्ष्यन्ते ।। ११ ।। अर्थ—इन बारह पिंड आदिको आगे आठवें सम्मुद्देशमें ग्रहोंके स्तम्भन तथा निग्रह आदिके साथ लिखेंगे ॥११॥ विलिखेच्च जयां विजयामजितां अपराजिता स जंभां । मोहां गौरी गांधारी चक्रों ब्लू पार्श्वेष्व ॐ जादिकाः ॥१२॥ स्वाहान्ताः क्षीं क्लीं पार्थस्थेषु ह्रां ह्रीं ह्र हौं ह्रः चतुः कोष्टेषु विलिखेत् । रेखाग्रेष्ठखिलेषु च वज्रान्यथ वज्रपंजरं प्रोक्तम् ॥१३॥ अर्थ-जया, विजया, अजिता, अपराजिता, जंभा मोह, गौरी, गांधारी, क्रों, ब्लू, का, क्षी, और,
तृतीय परिच्छेद ।
[ २३
की को, आदिमें ॐ । और अंतमें, स्वाहा, लगाकर बारह
बिंदु पदोंके स्थानमें लिखे । वह इस प्रकार हैं। ॐ जयायै
नमः । ॐ विजयायै नमः। ॐ अपराजितायै नमः। ॐ जम्माय
नमः। ॐ मोहायै नमः । ॐ गौर्यै नमः । ॐ गांधाय नमः। .
ॐ क्रोनमः। ॐ ब्लू नमः। ॐ क्षीं नमः। ॐ क्लीं नमः । चारों
कोठोंमें " ह्रां ही हूँ ह्रौं ह्रः" इन पाचों शून्योंको लिखे।
और सब रेखाओंके अग्र भागमें वज्रोंको लिखे। यह वज्रमय
लिखे । यह वज्रमय पंजरका बर्णन किया गया।
पिंडेषु ह भानां देव्य विधानं पृथक् पृथक् लिख्यं ।
तान् स्त्री नेके नैव प्रवेष्टयेन्मध्य पिंडेन ॥ १४ ॥
अर्थ-पिंडोंके लिखनेमें ह, म, आदि अक्षरोंको पृथक्-
पृथकपसे लिखकर पिंडोंके अन्दर सावधानीसे लगावे । फिर
मध्य पिंडके द्वारा देवीको वेष्टित करे ॥१४॥
रक्षक यन्त्र
खरकेशर मष्टदलं कमलं वायै क्रमादलेषु लिखेत्
अष्टौ ब्राह्मण्याद्या ब्रह्मादि नमोन्तिमा मातः ॥ १५ ॥
अर्थ-परागमें ज्वालामालिनीदेवीको लिखकर उसके
चारों और अष्टदल कमल बनावे जिनमें क्रमसे आठों ब्राह्मणी
आदि माताओंको आदिमें ॐ और अंतमें "न" लग
कर लिखे ॥१५॥
२४ ] ज्वालामालिनी कल्प। पर घ ऊ प छ ठ व पिंडान् चाष्टौ शेवान् पृथक्क्रमाद्विलिखेत् तथैव प्रण वाद्यान्नवतत्व नमोतिमान्मंत्री ।। १६ ॥ अर्थ-इसके पश्चात् दूसरे क्रमसे, प, र, घ, ऊ, प, छ, ठ, और, व, पिंडोंको आदिमें ॐ और अंतमें "नमः" लगाकर लिखे ॥१६॥ क्रों सर्वदलायेषु ह्रीं सर्वदलांतरेषु लिखेत् । ॐ नव तत्वं न्वालिनी नम इत्या वेष्टयेद्वाद्ये ॥ १७ ॥ अर्थ-सर्व दलोंके अग्रभागमें, क्रों, और बीचमें, ह्रीं, लिखकर बाहर “ॐ ह्री, क्लीं ब्लू द्रां ह्रीं हां आं क्रों क्षी ज्वालामालिन्यै नमः।" मंत्रसे वेष्टित कर दे ॥ १७ ॥ - इत्थं कथि तस्यास्य वाकिन्याः परम मूलमंत्रस्य । मध्ये ध्यायन्मातृभिरष्टाभिः परिवृतां देवी ॥१८ ।। अर्थ-इस कहे हुए ज्वालामालिनीके मूलमंत्रके बीचमें अष्ट मातृका देवियोंसे घिरी हुई ज्वालामालिनीदेवीका ध्यान वर ॥ १८ ॥ . - --
तृतीय परिच्छेद ।
[२५
ज्वालामालिनिका ध्यान
अब ज्वालामालिनिदेवीके स्वरूपका ध्यान
करनेके वास्ते वर्णन करते हैं
चंद्रप्रभजिननाथं, चंद्रप्रभमिन्द्रनंदि महिमानं ।
भक्त्याकिरीटमध्ये, विभ्राणं खोतमांगेन । १९ ।।
अर्थ-ज्वालामालिनिदेवी इन्द्रोंके प्रसन्न करनेवाली
महिमावाले चंद्रमाके समान क्रांतिवाले भगवान् चंद्रप्रभुकी
मूर्तिको भक्तिसे अपने सिर पर मुकुटके अंदर धारण करती
है ॥ १९॥
कुमुददलधवलगात्रां, महिषारूढां समुज्वलाभरणं ।
श्रीज्बालिनि त्रिनेत्रां, ज्वालामालाकरालांगी ॥ २० ॥
अर्थ-वह देवी कुमुदके पुष्पके समान श्वेत शरीरवाली,
भैसेके वाहनवाली, उज्वल आभूषणोंवाली, तीन नेत्रवाली और
अग्निकी शिखाके समूहसे भयंकर अंगवाली है ॥ २० ॥
पाशत्रिशूलकार्मुकरोपण ऊष चक्र फलवर प्रदानानि ।
दधती स्वकरैरष्टमयक्षेवरी पुण्यां ॥ २१ ॥
अर्थ-प्राश, त्रिशूल, धनुष, बाण, मछली, चक्र, फल
और वरदान देनेको अपने हाथोंमें धारण करनेबाली पुण्य
स्वरूप आठवीं यक्षेश्वरी है ॥ २१ ॥
२६ ] ज्वालामालिनी कल्प। श्रीमच्छब्दकशांकुशं हरियुत कूटं स बिन्दु लिखेत् । बाणान् द्वादशपिण्ड' मात्र सहितान् शून्यैश्चतुर्भिर्युतान् ।। क्षत्रिं वज्र सु पंजरांवरगतो दुष्टैरलंध्यो भवेत् । शाकिन्यादि महाग्रहान् वितथान् रौद्रान् समुच्चाटयेत् ॥२२॥ अर्थ---उस समय आगे आनेवाले “श्रीमत आं क्रौ ई श्यां द्रां द्रीं क्लीं ब्लू सः क्षल्ब्यू हल्ब्यू भल्च्यू मल्व्यू गल्च्यू रम्तव्यू ऊल्ब्यू खल्ब्यू छम्ल्यू कम्ल्ब्यू क्षीं क्षु सो क्षः " मंत्रके बज्रमय पिंजरेके बीच में बैठा हुआ मंत्री दुष्ट ग्रहोंसे अलंध्य होकर शाकिनी और रौद्र महा ग्रहों को शीघ्र ही दूर भगा देता है ॥ २२ ॥ पात्रं मुक्त्वा मंत्री बली हि मत्वा गृहाः प्रयान्ति यदि । तत्राप्याशा बंधं कुर्यादित्यं सनापैति ।। २३ ॥ अर्थ-यदि मंत्रीको बली जानकर कोई ग्रह आवे तौ दीशाबंध करनेसे वह दूर हो जाता है। ॐ ह्रां ह्रीं ह ह्रौं ह्रः ज्वालिनी पादौ च जघनमुदरं वदनं । शीपं रक्ष द्वय होमांतम् परगाव पंचके संस्थाप्य ॥ २४ ॥ अर्थ-" " हां ही ह हौं ह्रः ज्वालामालिनी पात्रस्य यादौ जघनं उदरं वदनं शीष रक्ष रक्ष स्वाहा" इत्यादि ऊपरके अनुसार इस मंत्रको अपने पांचों अंगोंमें होमके अन्त तक: स्थापित करके।
T तृतीय परिच्छेद । [ २७ ग्रह निग्रह निधान क्ष ह भ म य र ऊकांत पूछकार पूर्णेन्दुयुक्त निर्विष बीजैः । बिंदूई रेफ सहितैर्मल वरयं संयुत द्विषद्विदबीजैः ॥२५॥ अर्थ-क्ष ह भ म य र उ ख छकार और पूर्णचंद्र (ठ) सहित निर्विष (क) बीजोंसे बिन्दु ऊर्ध्व रेफ सहित मलवर और यं से युक्त शत्रुओंको नष्ट करनेवाले बीजोंसे मुक्त करके, स्तम्भन स्तोभन ताडन मांध्य प्रेषणं दहनभेदनं बंधाः । ग्रीवा भंगं गात्रछेदनहननमाप्यायनं ग्रहाणां कुर्यात् ॥२६॥ अर्थ-ग्रहोंका स्तम्भन, कम करना (स्थिर करके बैंचना) मारना, अंधा करना, जलाना, भेदना, बांधना, ग्रीवाभंग, अंग छेदना, मारण तथा दूरीकरण करे ॥ २६ ॥ हास्यान्निरोधशून्यं स्वरो द्वितीय श्चतुर्थ षष्टौ च । ॐ कारो बिन्दुयुतो विसर्जनीयश्च पंचकलाः ॥ २७ ॥ ॐ कूट पिंड पञ्च स्वर संयुत कूट पंचकं स निरोधं । दुष्ट ग्रहां स्तथा द्विस्तम्भ मंत्र इति फट २ घे घे ॥ २८ ॥ अर्थात् "ॐ क्षल्व्यूँ ज्वालामालिनि, ह्रीं, क्लीं, ब्लू द्रां, द्रीं, क्षा, क्षी, खू, क्षी, क्षः, हाः, दुष्ट ग्रहान् स्तम्भय २. हां, आं, क्रों, क्षी, ज्वालामालिन्याज्ञापयति हुँ फट२ थे वे ॥" - .
२८ ] ज्वालामालिनी कल्प। यह ग्रहोंका स्तंभन मंत्र है। इसमें शृङ्खला मुद्रा होती है। ॐ शून्य पिंड पंच स्वर युत ह बीज पंचकं स निरोधं । स्तोभन मंत्रः सर्वग्र हानथाकर्षय द्वयं संवौषट् ।। २९ ।। अर्था-"ॐ हल्च्यू ज्वालामालिनि ह्रीं क्लीं ब्लूद्रां द्रौं ग्वीं हां ही हूँ हौं हः हाः सर्व दुष्ट ग्रहान्स्तोभय२ आकर्षयर -हां आं को क्षी ज्वालामालिन्याज्ञापयति संवौषट् ।" यह ग्रहोंका स्तोभन मंत्र है । इसमें शिखि मुद्रा होती है ॥२९॥ भक्ति भ पिंडो, भ्रां, श्री, भ्रौं, भ्रः, सन्निरोधसहितं च । दुष्ट ग्रह मथ ताडय हुँ फट् घे घे इति ताडनमंत्रः ॥३०॥ अर्थ-ॐ भन्व्यू ज्वालामालिनि ह्रीं क्लीं ब्लू द्रां द्रीं भ्रां भ्रीं धूं श्रौं भ्रः हाः दुष्ट ग्रहान् ताडय२ हां, आं, क्रों, क्षी, ज्वालामालिन्याज्ञापयति हुँ फट२ घे थे।" यह ताडन मंत्र है । इसमें गद मुद्रा होती है ॥३०॥ विनयादि मपिंडो ग्रां प्रीं यूं नौं प्रस्तथैव सं निरोधः । हुँ फट् घे घे सर्वग्रह नाम्ना वज्रमय शूच्या ॥ ३१ ॥ असीणि विस्फोटय द्वि स्तथैव हुं फट् घे घे । अक्षि स्फोटनमंत्रो मुद्राप्यस्याक्षि भंजिनी नाम ।। ३२ ॥ अर्थ-ॐ मल्च्यू ज्वालामालिनी ह्रीं क्रीं ब्लू द्रां द्रीं
तृनोय परिच्छेद ।
1 २९
मां मी नौं म्रः दुष्टग्रहान् हुँ - फट् सर्वेषां दुष्ट ग्रहाणां
वज्रमय सूच्या अक्षीणि स्फोटय स्फोटय हां आं क्रों थीं
ज्वालामालिन्याज्ञापयति हुं फट् घे थे।
यह ग्रहोंका अक्षिस्फोटन मंत्र है। इसकी सूची मुद्रा है ॥३२॥
भक्त्यादि वायुपिंडो य य य य याः याः ग्रहानथ समस्तान्
हि प्रेषय घे घे हुँ जा जा जः प्रेषण सुमंत्रः ॥ ३३ ॥
अर्थ-ॐ यल्यूँ ज्वालामालिनि ह्रीं क्लीं ब्लू द्रां द्रीं
व य य य याः याः सर्व दुष्टग्रहान् प्रेषय२ घे घे हां आं क्रों
क्षी ज्वालामालिन्याज्ञापयति हुँ जः जः जः।
यह प्रेषण मंत्र है । इसकी छुरिका मुद्रा है ॥३३॥
वामादि रनिपिंडः शिखि मद्देवी ज्वल द्व यं र र र र रां रां,
प्रज्वल हुँ धगयुग धूंधू धूमांधकारिणी ज्वलनशिखे ॥३४॥
देवान्नागान् यक्षान् गंधर्वान् ब्रह्मराक्षसान भूतान् ।
शतकोटि देवतास्ताः सहस्रकोटिं पिशाचराजानं ॥३५॥
दह दह पद प्रतिपदं घे स्फोटय मारयेति युगलं च ।
दहनाक्षि प्रलय धगद्धगितमुखी ज्वालिनी हांहीं ॥३६॥
ह हौं हा सर्वग्रह हृदयं हुँ दह दहेति मंत्रपदं ।
ह ह ह ह हाः हाः फट घे घे होम मंत्रोऽयं ॥ ३७ ॥
-३०]
ज्वालामालिनी कल्प
अर्थ-ॐ रामधुं ज्वालामालिनि ह्रीं क्लीं ब्लू द्रों
द्री ज्वल ज्वल र र र र रां रां जल प्रज्वल प्रज्वल हुँ हुँ
धग धग धू धू धूमांधकारिणि ज्वलशिखे देवान् दह दह
नागान् दह दह यक्षान् दह दह गंधर्वान् दह२ ब्रह्मराक्षसान्
दह२ भूत ग्रहान् दहर व्यन्तर ग्रहान् दह२ सर्व दुष्टाहान्
दह२ शतकोटि देवतान् दह दह सहस्त्र कोटिपिशाचराजानं
दह२ लक्षकोटिअपस्मार ग्रहान् दह दह घे घे स्फोटय स्फोटय
मारय मारय दहनाक्षि प्रलय धगद्धगित मुखि ज्वालामालिनि
हां ह्रीं ह्रौं ह्रः सर्व दुष्ट ग्रह हृदयं हुँ दह२ पचर छिंदर
भिंद२ ह ह ह ह हाः हाः आं क्रों क्षीं ज्वालामालिन्याज्ञापयति
हुँ फट घे थे।"
.
यह दहन मंत्र और होम मंत्र है ॥३४-३७॥
अग्नि त्रिकोण कुड़े मधुरत्रयसर्वधान्यसर्वपलवणैः ।
राज पलाश शमितरु काष्टैः कुर्याद् बुधो होमं ॥ ३८ ॥
भूर्तरख्यागायत्रीमुच्चार्य त्रिः सकृद्ध मेदग्निं ।
त्रीन्वाराग्नित्यग्ने रादौ संधुक्षणं कुर्यात् ।। ३९ ॥
अर्थ-त्रिकोण कुण्डमें, घृत, दुग्ध और मधु, सब
धान्य, सफेदसरसों, और लवणको लेकर पलाश और शमीकी
समिधासे होम करै ॥ ३८ ॥
तृतीय परिच्छेद । [ ३१ फिर भूताख्य नामके गायत्री मंत्रका तीन नाम उच्चारण करके अग्नि जलावे, फिर संधुक्षण मंत्रसे तीनवार अग्निका संधुक्षण करे ॥ ३९ ॥ भूतारख्य गायत्री मंत्र । " "ॐ वज्र तुण्डाय धीमहि एक दंष्ट्राय धीमहि अमृतं वाक्यस्य संभवेत् तन्नोदहः प्रचोदयात् । प्रणवनपिण्ड पंचकलायुत तलरेफयुत धकार निरोध । धं घं खं खं खड्गै रावण सद्विद्ययाथ घातय मुगलं ॥ ४० ॥ सञ्चंद्रहासेन द्विच्छेदय भेदय द्विः ऊ ऊ स्वं खं । हं सं फट्२ घेर मंत्रोऽयं जठर भेदि स्यात् ॥ ४१ ॥ "घल्ब्यू ज्वालामालिनि, ह्रीं, क्लीं, ब्लू, द्रां, द्रीं, प्रां, घीं, बूं', प्रौ, घ्रः, हाः, चं, घ, खं, खं, खड्गै रावण सद्विद्यया घातय२ सचंद्रहासड्गेन छेदयर भेदय२, ऊं, ऊं, खं, खं, हं, सं, हां, आं, क्रों, क्षी, ज्वालामालिन्याज्ञापयति हुँ फट२ घे थे। यह उदर भेदी मन्त्र है। इसको खड्गै रावण विद्या कहते हैं ॥ ४०-४१ ॥ प्रणवन सहित ऊपिंडो गुप्तोच्चरितः स्ववायु निर्गमनः । हाः पूर्णेन्दु समेतः स्यात् मुष्टि ग्रहण मंत्रोऽयं ॥ ४२ ॥ . -
३२ ।
वालामालिनी कल्प।
अथा-" ॐ झल्च्यू ज्वालामालिनि ह्रीं क्लीं ब्लू द्रा
द्री हाजः" यह मुष्टिग्रहण मंत्र है। इसकी मुष्टिमुद्रा है ॥४२॥
पिंडेन विना हा फट् घे घे मंत्रेण तत्र चान्यस्मिन् ।
कुर्याद्ग्रह संक्रामं मुष्टि विमोक्षेण सन्मंत्री ॥ ४३ ॥
घे घे।" यह मुष्टि विमोक्षण मंत्र
है। इससे भी ग्रह दूर हो जाते हैं ॥ ४३ ॥
अर्थ-" हाः फट घे घे
पिण्डः स एव विनयादिक स्वपंच तत्वान्वितः सन्निरोधः ।
सर्वेषां ग्रहनानां कुरु सन्निग्रहां स्तथा हूं फट् घे घे ॥४४॥
"ॐ झल्ब्यू ज्वालामालिनि ह्रीं क्लीं ब्लूद्रां द्रीं झांझी
श्श झौं झः हाः सर्व दुष्ट ग्रहान् स्तंभय स्तंभय ताडय२
अक्षीणि स्फोटय२ प्रेषय२ भेदय२ हाः हाः हाः आंकों क्षी
ज्वालामालिन्याज्ञापयति हुँ फट् घे थे।"
यह दुष्ट निग्रह कर्म मंत्र होने पर दुष्ट मुद्रावाला
तथा ईसित कर्ममंत्र होनेपर दुष्ट तर्जनी मुद्रावाला होता
है॥४४॥
ॐ कान्त पिण्ड पंच स्वर युत तल रेफ सहित कपरं च ।
हाः फट घे सर्व ग्रह गल भंगं कुरु युगं घे घे ॥ ४५ ॥
तृतीय परिच्छेद । [३३ अर्थ-ॐ खल्व्यूँ ज्वालामालिनि ह्रीं क्लीं ब्लू द्रां द्रीं नां स्त्री स्त्रों स्त्रः हाः फट् घे घे सर्वेषां ग्रहाणां गल मंगंकुरु२ हां आं कोंक्षी ज्वालामालिन्या ज्ञापयति हुँ फट घेघे । यह गलभंग मंत्र है, इसकी खलिन मुद्रा है ॥ ४५ ॥ भक्त्यादि चान्त पिण्डः पंच कला रेफ युक्त चांत निरोधः । सर्वेषां ग्रह नान्ना मंत्राणि छिंद फट फट घे घे ॥ ४६ ॥ अर्थ-ॐ छम्ल्यूँ ज्वालामालिनि ह्रीं क्लीं ब्लू द्रां द्रीं छां छी छं छौं छः हाः सर्वेषां ग्रह नाशा मंत्राणि छिंद छिंद हां आं क्रों क्षी ज्वालामालिन्या ज्ञापयति हुँ फट् थे घे ॥ यह अंत्र छेदन मंत्र है, इसकी अंत्र छेदन मुद्रा है ॥४६॥ भक्तिसहितेन्दुपिण्ड. ब्लीहाः सर्व ग्रहांस्तु पापाणैः । ताडय ताडय भूमौ द्विपातय हूं युगं च फट्र घे घे ॥४७॥ अर्थ-ॐ उन्च्यूँ ज्वालामालिनि ह्रीं क्लीं ब्लू द्रां द्रीं ब्ली सर्व दुष्ट ग्रहान् तडित्पाषाणे: : ताडय२ भूमौ पातय हां आं क्रों क्षी ज्वालामालिन्या ज्ञापयति हुँ फट् धे घे॥ यह ग्रहोंका हनन मंत्र है, इसकी विद्युत् मुद्रा है ॥४७॥ विनयस्य एव पिंडस्तदीयमथतत्वपंचकं निरोधः । सर्वेषां ग्रहनाम्नां कुरुः सर्व निग्रहां सु फट् घे घे ॥ ४८ ॥ अर्थ-ॐ व्यू: ज्वालामालिनि ह्रीं क्लीं ब्लू द्रां द्रीं हाः 3
HNDANA
३४ ]
ज्वालामाग्निी कल्प ।
बां वीं व्रवौं वः हाः सर्व दुष्ट ग्रहान् स्तंभय२ स्तोभयर
ताडयर ऊक्षीणि स्फोटय२ प्रेषय२ दह२ भेदय२ बंधयर
ग्रीवा भंगय२ अंत्राणि छैदय छेदय हन२ हां आं क्रों क्षी
ज्वालामालिन्या ज्ञापयति हुँ फट धे घे।
यह सर्व कार्थक मंत्र है, इसकी तर्जनी मुद्रा है। ॥४८॥
हूं
विनयो निर्विष पिंड स्व पंचतत्वं निरोध सहितं च ।
सर्व ग्रहान् समुद्रे हिर्मजय हूं तथैव फट फट घे घे ॥४९॥
अर्थ-ॐ कम्ज्यू ज्वालामालिल ह्रीं झी ब्लू द्रां द्रीं
क्रां क्रीं क्रू को क्रः हाः दुष्ट ग्रहान् समुद्रे मजय२ हां आं क्रों
धीं ज्वालामालिन्या ज्ञापयति हुँ फट्२ घे घे ॥
यह मजन मंत्र है, इसकी मञ्जन मुद्रा है ॥४९॥
निर्विष पिंडः सं तं वं मं हं ऊं ग्रहानथ समस्तान् ॥
उत्थापय द्वयं नट नृत्य द्वितयं तथा स्वाहा ॥ ५० ॥
अर्थ-झमन्च्यू ज्वालामालिनि ह्रीं ह्रीं ब्लू द्रां द्रीं सं
तं वं मंहं ऊं सर्व दुष्ट ग्रहान उत्यापय२ नटर नृत्य र हां आं
क्रों ही ज्वालामानिन्या ज्ञापयति स्वाहा।
यह अप्यायन मंत्र है, इस ही आप्यायन मुद्रा है ॥५०॥
सर्व निरोधे वाप्यायन मंत्रेणानेन साक्षतं सलिलं ।
अभिमंत्र्य ताडयेत्क्षालयेच्च कृत निग्रहं स्यात् ॥५१॥
तृतीय परिच्छेद ।
1 ३५
अर्थ-इस सर्व निरोध आप्यायन मन्त्रके द्वारा अक्षत
और जलको अभिमन्त्रित करने, अक्षतको मारने और जलसे
धोनेसे सब ग्रहोंका विनाश हो जाता है ॥५१॥
आत्मान्यस्मिन्वा प्रति बिम्बे वाद निग्रहे विहिते ।
ग्रह निग्रहो भनेदिति शिखिमदेवि मतं तथ्यं ॥५२॥
अर्थ-इस या अन्य किसी निग्रह संत्रका प्रयोग करनेसे
ग्रहोंका निग्रह हो जाता है। ऐसा ज्वालामालिनीदेवीका
सिद्धांत है ॥ ५२ ॥
ईषनात्रां नालिका मेकै काक्षर सुविच्ययावेष्टय ।
जप्तेतैः सप्तोत्तर विंशति मणिभिः त्रिसंध्यमप्यष्टशतं ॥५३॥
अर्थ-एकर अक्षरका अपने२ हृदयमें अच्छी तरहसे
ध्यान करके प्रातः दोपहर तया सार्यकालमें सत्ताईस मणियों
द्वारा एकसौ आठ बार जप करना चाहिये ॥ ५३ ॥
1
विषमफणिविषमशाकिनीविषमग्रह विषममानुषां सर्वे ।
निविषतां गत्वा ते वश्याः स्युः क्षोभमेति जगत् ॥ ५४॥
अर्थ-भयंकर सर्प, भयंकर शाकिनी, विषम ग्रह, और
सब विषम मनुष्य निर्विप होकर वशमें हो जाते हैं, और
सम्पूर्ण जगतको क्षोभ प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥
३६ ]
बालामालिनी कल्प।
शब्द कशांकुश चरण हय नागाश्वोदिता यथा यांति बुधैः ।
दिव्यादिव्याः सर्वे नृत्यंति तथैव संबोधनतः ।। ५५ ॥
अर्थ-जिस प्रकार घोड़े और हाथी, शब्द, शकोड़े,,
अंकुश और एडसे आगे चलते हैं, उसी प्रकार पंडितोंके शब्द
पर दिव्य और अदिव्य सभी ग्रह नाचते हैं ॥ ५५ ॥
वाक् तीक्ष्णै बर मन्त्रै भित्वा दुष्टग्रहस्य हृदयं कौँ ।
यद्यचिन्तयति बुध स्तत चोद्यं करोतु भुवि ॥ ५६ ।।
अर्थ-पंडित पुरुष तीक्ष्ण बाणोंवाले उत्तम मंत्रोंसे
दुष्टग्रहके हृदय और कानोंको छैदकर जो जो सोचता है।
संसारमे वही वही होता है ॥ ५६ ॥
बीजाक्षर ज्ञानका महल
तत्कर्म नात्र कथितं कथित्र शास्त्रेषु गारुडे सकलं ।
तभेदमाप्य मंत्री यद्वक्ति पदं तदेव मन्त्रः स्यात् ॥ ५७ ॥
अर्थ-जिस भेदको पाकर मन्त्री जो कुछ कहता है,
वही मन्त्र बन जाता है । वह कर्म यहां नहीं बतलाया गया
बल्कि उसका कथन पूर्णरूपसे गारुड शास्त्रमें कियाः
गया है ॥ ५७ ॥
यद्य चोद्यं कुर्यान्मंत्री कथयतु तदात्म पार्श्व जिनाय ।
पात्रं निश मय्य वचो यद्वक्ति पदं तदेव मंत्रः स्यात् ॥५८॥
तृतीय परिच्छेद ।
[ ३७
अर्थ-मंत्री उसको जानकर जो जो करना चाहिये वह
सब कर करके श्री पार्श्वनाथ भगवानके अर्पण कर दे। ऐसे
मंत्रीके वचनको जो सुनेगा उसके लिये वही संत्र हो जावेगा।
,
छेदन दहन प्रेषण भेदन ताडन सुबंध मांछ मन्यद्वा ।
पार्श्व जिनाय तदुक्त्वा यद्वक्ति पदं मंत्र स्यात् ।। ५९ ॥
अर्थ-बह पुरुष छेदना, जलाना, भेदना, काटना,
मारना और बांधना आदि तथा अन्य भी श्री पार्श्वनाथ भग-
बान्के लिये कह कर जो पद कहता है, वही मंत्र हो जाता है।
दिव्य मदिव्यं साध्यमसाध्यं संबोध्य मध्य संबोध्यं ।
बीज मबीजम् ज्ञात्वा यद्वक्ति पदं तदेव मंत्रः स्यात् ॥६०॥
अर्थ-वह दिव्य और अदिव्य साध्य और असाध्य
कहने योग्य और न कहने योग्य तथा बीज और अबीजको
'बिना जाने हुए भी जो पद कहता है, वही मंत्र होजाता है ।
सृकुटि पुट रक्त लोचन भयं कराह प्रहास हा हा शब्दैः ।
मंत्र पदं प्रपठन्नपि यद्वक्ति पदं तदेव मंत्रः स्यात् ।। ६१ ॥
अर्थ-वह भौं चढ़ाकर लाल नेत्र किये हुए भयंकर
अट्टहास करता हुआ हा हा शब्द करता हुआ अथवा मन्त्रे
पदको पढ़ता हुआ भी जो कुछ कहता है, वह मन्त्र बन
जाता है ॥ ६१ ॥
३८ ।
ज्वालामालिनी कल्प।
यद्यचोद्यं वांछति तत्तत्कुरुते द्विष द्विषद्विदं वीजं ।
तस्माद्वीजं ध्यात्वा यद्वक्ति पदं तदेव मन्त्रः स्यात् ॥६२॥
अर्थ—वह जिस जिस कार्यको करना चाहता है,
शत्रुको जाननेवाला बीज वही २ कर देता है, इस वास्ते
बीजका ध्यान करके जो पद कहा जाता है, वही मन्त्र हो
जाता है ॥ ६२ ॥
अति बहला ज्ञान महांधकार मध्ये परिभ्रमन्मंत्री।
लब्धोयदेश दीपं यद्वक्ति पदं तदेव मन्त्रः स्यात् ॥ ६३ ॥
अर्थ-मंत्री पुरुष अत्यन्त गहन अज्ञानरूपी महा अन्ध-
कारके बीच में घूमता हुआ भी उपदेश रूपी दीपकको पाकर जो
कहता है, वही मंत्र हो जाता है ॥ ६३ ॥
न पठतु माला संत्रं देवी साधयतु नैव विधि नेह ।
श्री ज्वालिनी मतज्ञो यद्वक्ति पदं तदेव मंत्रः स्यात् ॥६४॥
अर्थ-न तो मालाके ही मन्त्रका पाठ करे और न यहां
देवीकी ही विधिपूर्वक साधना करे किंतु श्री ज्वालामालिनी
देवीके मतको जाननेवाला पुरुष जो कहता है, वही मन्त्र हो
जाता है ॥ ६४ ॥
देव्यर्चनजपनीयध्यानानुष्ठानहोम रहितोऽपि ।
श्रीज्वालिनी मतज्ञो यद्वक्ति पदं तदेव मंत्रः स्यात् ॥ ६५ ॥
तृतीय परिच्छेद । [ ३९ अर्थ-देवीकी पूजा, जाप, ध्यान, अनुष्ठान और होमसे रहित होने पर भी श्री ज्वालामालिनीदेवीके सिद्धांतको जानने- वाला जो पद कहता है । वही मंत्र हो जाता है ।। ६५ ।। विनयं पिंडं देवी स्वपंच तत्वं निरोध सहितं च । ज्ञात्वोपदेश गर्भ यद्वति पदं तदेव मंत्रः स्यात् ॥ ६६ ॥ अर्थ-विनय पिंड देवी स्वपंच तत्वको निरोध सहित जानकर जो पद कहता है, वही मंत्र हो जाता है। अर्थात् निम्नलिखित मंत्र सर्वत्र काम दे सकता है। "ॐ क्ष्ल्यू ज्वालामालिनी क्षांक्षी सूक्षों क्षं क्षः हाः दुष्टग्रहान् स्तंभय२ ठं ठं हां आं क्रों क्षी-ज्वालामालिन्या ज्ञापयति हुँ फट् उपदेशान्मंत्रगति मंत्र रूपदेशवर्जितैः किं क्रियते मंत्रो ज्वालामालिन्यदिकृतकल्पोदितः सत्यः ॥ ६७ ।। अर्थ-मन्त्र जिना उपदेशके नहीं रह सकते और बिना उपदेश पाये कुछ किया भी नहीं जा सकता किंतु चाला- मालिनी कल्पके बतलाये हुए मन्त्र पूर्ण रूपमें सत्य हैं ॥६७॥ कर्णा-कर्ण प्राप्त मंत्रं प्रकटं न पुस्तके विलिखेत् । स च लभ्यते गुरु मुखाद्यत्कः श्री ज्वालिनी कल्पे ॥ ६८ ॥ अर्थ-मन्त्र कर्णसे लेकर कर्णमें ही रक्खे, पुस्तकमें न घेघे।
४०)
ज्वालामालिनी पल्प ।
लिखे, जो कुछ भी ज्वालामालिनी कल्पमें है। वह केवल गुरु
मुखसे ही सुना जा सकता है ॥ ६८ ॥
बीजोंका कुछ वर्णन
+
त्रिमूर्ति मूर्तिद्वय मैंद्रयुक्त, पयोधि मैंद्रस्थित मां समेतं ।
स्त्री रेतसो द्रावक सुत मंद्रा, मुमा हृदुद विधुस्त द्रांद्रीं ॥६९॥
अर्थ-त्रिमूर्तिवाला क्लीं, द्विमूर्तिवाला (ल) ऐंद्रयुक्त
समुद्ररूप (ह) ऐंद्र (लं) और लं सहित मंत्र स्वीके रजबने
द्रवित करता है | चंद्ररूप द्रां और द्री लक्ष्मी के हृदयको भेदन
करनेवाले हैं.।। ६९ ॥
शून्यं द्वितीय स्वर बिन्दुयुक्त, स्वरो द्वितीयश्च सबिन्दु रन्यः ।
मृगेन्द्र विवि द्वश कृच्च कूटः, सविष्णु बिन्दुनं भवेदि तत्वं ॥७०
अर्थ-दूसरा स्वर बिन्दुसे युक्त होनेपर शून्य कहलाता
है। आं सहित उसीको दुबारा कूट विष्णु और बिन्दु सहित
लेनेसे अर्थात् " आं आं क्षः ई अं" यह मंत्र सिंहके मार्गको
भी वामे करता है ॥ ७० ॥
कूटशू य भपिडगर्भमपिडनिमितकणिके
पोदश स्वरकेशरोज्वलशेषपिंडदलाष्टके ।
भासुरे नव तत्व वेष्टित पंकजेश निवासिनी
ज्वालिनी ज्यातिप्रभामनुचिन्तु येत्फलदायिनीं ॥७१॥
तृतीय परिच्छेद । अर्थ--एक अष्ट दल कमलकी कर्णिकाके बीचमें क्ष्ल्व्यू बीज रखकर सोलह स्वरोंको परागके स्थानमें और अवशेष पिण्डोंको आठों दलों पर रक्खे। ऐसे तेजस्वी नव तत्वोंसे वेष्टित उत्तम कमलमें रहनेवालोंको ज्वालामालिनी देवी फलको देनेवाला उत्तम तेज देती है ॥ ७१ ॥ नाभौ क्लीं हृदये च ह्रीं शिरसि च । पादयोः क्षी गुदेः द्रां को मूर्द्धन्यज रुद्धतमं कुश मधो य्यू चो परि ब्लू गले । प्यू जान्यो रयतेन रूद्ध समलं पाशं स्वनं कर्णयो रूबों शब्द कशे तनौ चय परं भूता कृतौ विन्यसेत् ॥७२॥ अर्थ-संपूर्ण प्राणीकी आकृतिको कानों जंघाओं, शब्द समूह और शरीरमें निम्नलिखित क्रमसे बीजोंको रक्खे । नाभिमें क्लीं हृदय में ह्रीं शरमें दें दोनों पैरोंमें क्षीं गुद स्थानमें द्रां शिरमें कों दोनों हाथों में कं तथा को थ्यू ऊपर ब्लू गलेसें स्यू घुटनोंमें अं और टं दोनों कानों में तथा आं दोनों जांघों में और भूतकी आकृतिमें सर्वत्र र लगावे ॥७३॥ ॐ हीं रेल चतुष्टयं शिखि मति वाणान्त सः पिण्ड सं भूतं तत्व सु पंच कं जल युगं तत्प्रज्वलं प्रज्वल । है युग्मं दद युग्म माम युगलं धूमांध कारिण्यतः शीघ्र मेह्य मु 'शं कुरु वशद्देव्यास्तु मंत्रः स्फुटं ॥७४ अर्थ-ॐ ही हां ह हौं हः द्रां द्रों क्लीं ब्लू स. जल र
४२ 7
ज्वालामालिनी कल्प।
PAN
Dhce
जल प्रज्वल २ हुँ हुँ दद माम् धूमांधकारिणि शीघ्र एहि
अमुकं वशं कुरु । यह वशमें करनेके लिये देवीका मंत्र
है ॥ ७४॥
अज पिण्ड देवता पंच बाण निज तत्व पंचक निरोधैः ।
स्वेष्ट निरोध पदैः सह जयति समस्त ग्रहान्मंत्री ।। ७५ ॥
अर्थ— अजपिण्ड देवता पंचबाण स्वतत्व पंचक निरोध
और इष्ट निरोध पदोंसे अर्थात् "क्षल्व्यू ज्वालामालिनि द्रां
द्रीं क्ली ब्लू सः क्षां क्षीं झूक्षौं क्षः हाः सर्व दुष्ट ग्रहान्
स्तंभय२ ठः ठः हां आं क्रों क्षी ज्यालामालिन्याज्ञापयतिहुँ
फट घे घे ।" इस मंत्रसे मंत्री सर्व ग्रहोंको जीतता है ॥७५।।
कुछ बीजोंका वर्णन
स्वाहा स्वधा च वपडपि संवौपट हूँ तथैव घे फट क्रमशः ।
शांतिक पौष्टिक वश्या कर्षण विद्वेष सारणोच्चाटन कृत् ॥७६।।
अर्थ-स्वाहा-शांति करनेवाला, स्वधा-पुष्टि करनेवाला,
वषट्-वशीकरण करनेवाला, संवौपट-आमर्पण करनाला हूं-
विद्वेपण करनेवाला, धे-मारनेवाला और फट उच्चाटन करने-
वाला है ॥ ७६ ॥
विनयो ज्वालामालिन्युपेत नव तत्व युत नमस्कारः ।
एष । प्रदान वद्य जातमा ज्वालिनी कल्पे ॥ ७७ ॥
तृतीय परिच्छेद । [ ४३ ९ अर्थ--ज्वालामालिनीकी विनय और नव तत्ब सहित ही नमस्कार ही देनेकी विद्या है यह ज्वालामालिनी कल्पसे जानना चाहिये ।। ७७ ॥ विनयादि देवता पिंडतत्वनवकं निरोध शून्य युतं । वश्या कृष्णायुच्चाटन मारण बीजानि मणिविद्या ॥ ७८ ॥ अर्थ---विनयादि देवता पिण्ड नव तत्व निरोध और शून्य सहित वशीकरण आकर्षण, उच्चाटन मारण मा के बीजोंकी विद्या होती है। अर्थात्-"ज्वालामालिनि क्षम्व्यू हल्च्यू भल्व्यू मल्व्यू यल्यूँ सल्व्यू घल्व्यू झल्व्यू रव्यू रव्यू छम्ल्ब्यू कम्ल्यू वल्ब्यू । ॐ ह्रीं क्लीं ब्लू द्रां द्रीं ह्रीं आं हां संवौषट घेथे इस मन्त्रको वशीकरण उच्चाटन और मारण आदि बीजोंसे युक्त करके भोज पत्रपर लिखकर उक्त लिखित मंत्रकी सत्ताईसकी माला बनाकर उसे प्रातः दो प्रहर तथा सायंकालके समय जपनेसे इच्छित कार्य सिद्ध होते हैं ॥ ७८ ॥ हृदयोपहृदय बीजं कनिष्ठिकायंगुलिषु विन्यसेत । तस्योपर्यो ज्वालिनि जनवश्यं कुरु युगं वपट तत्वमिदं ॥७९॥ अर्थ-हृदय और उपहृदयके बीजको कनिष्टिका आदि अंगुलियोंमें रखकर इस मन्त्रका ध्यान करे ॥७९ ॥ * ज्वालामालिनि मम सर्वजन वश्यं कुरु२ वषट् । यह मन्त्र है। आं को क्षों हाः वषट् "
४४]
ज्वालामालिनी कल्प
mronewwwwanRHA
MARATHI
साधारण विधि
चामर मंत्रमंत्रित निजवेदने नातनोतु जन वश्यं ।
भीमकरण दश त्रासनानि होमं च विदधातुः ॥ ८० ॥
अर्थ-मंत्री पुरुष बाएं हाथसे मन्त्रको जाप कर अपने
मुखसे उसको पढ़ता जावे और दाहिने हाथसे दश प्रकारके
पूर्वोक्त त्रसन और होम करे ॥ ८० ॥
मंत्रजपहोमनियमध्यानविधि मा करोतु मंत्रीति ।
यद्यप्यत्रसयुक्त तथापि सन्मंत्र साधनं जहातु ॥ ८१ ॥
अर्थ-मंत्रीको चाहिये कि वह मंत्र जप होम नियम
और ध्यानकी विधिको पूर्ण रूपसे करे । यद्यपि उसका यहां
विधान साधारण है । तथापि न करनेसे वही मंत्र के साधनको
छोड़ देती है ।। ८१ ॥
एक स्तावद्वन्हिः पुनरपिपवनाहतो न कुर्यातकिम् ।
एक स्तावन्मंत्री जप होम युतास्य किमसाध्यं ॥ ८२ ॥
अर्थ-यद्यपि अग्नि एक होती है। तयापि उसको
हवासे न ऊपका जाने पर वह क्या नहीं करती। उसी प्रकार
मंत्र एक ही होता है। तब भी जप और हवनसे युक्त
होने पर उसके लिये क्या असाध्य है ? ॥ ८२ ॥
HISTORYTHMANTIKARI तृतीय परिच्छेद । [ ४५ तस्मान्मंत्राराधनविधि विधिमिहविधिपूर्वकं करोतु बुधः । नित्य मनालस्य मना यदीष्टसिद्धिं समीपोत ॥ ८३ ॥ अर्थ-इस लिये पंडित पुरुष यदि इष्ट सिद्धि करनी चाहता हो तौ मनसे आलस्यको दूर करके मंत्राराधनविधिपूर्वक इष्ट सिद्धि करे ।। ८३॥ इतिश्री हेबाचार्य प्रणीत अर्थ में श्रीमत् इन्द्रनन्दि मुनि विरचित ग्रन्थमें ज्वालामालिनी कल्पकी काव्य साहित्य तीर्थाचार्य प्राच्य विद्यावारिधि श्री चन्द्रशेखर शास्त्री कृत भाषाटीकामें "द्वादशाषीजाक्षर विधान" नामक तृतीय परिच्छेद समाप्त हुआ ।। ३ ।।
४६]
ज्वालामालिनी कल्प।
चतुर्थं परिच्छेदः
सामान्यमंडल
एकतरौ प्रेतगृहे चतुष्पदे ग्राम मध्ये देशे वा।
नगर वहि भूभागे मंडल मावर्त ये प्राज्ञः ॥१॥
अर्थ-बुद्धिमान् एक वृक्षके नीचे प्रेतके घर (स्मशान)में
चौराहे पर ग्रामके ठीक बीचमें या नगरके बाहर मंडल
बनावे ॥१॥
ईषानाभि मुखः प्रपतितजलशुन्यरहित समभूमौ ।
हस्ताष्टक प्रमाणं नवखंडं मंडलं प्रवरं ॥२॥
अर्थ-उसका मुख ईशान कोणकी ओर हो। वह मंडल
गड्डे जल तथा कंटकरहित समभूमिमें आठ हाथकी जगहमें
बनाया जावे ॥२॥
वर पंचवर्ण चूर्णैः द्वारचतुष्कान्चितं लिखेद्रिपुलं ।
नाना केतु पताका दर्पण घंटान्वितं कुर्यात् ॥३॥
अर्थ-उसको पांचों रंगोंके चूों से च्यार द्वारों वाला
और उसको अनेक प्रकारकी ध्वजा पताका दर्पण और घंटोंसे
सजा देवे ॥३॥
HINN
चतुर्थ परिच्छेद ।
[४७
अश्वत्थपत्र विरचित तोरण तत्पुरुष मंडपोपेतं ।
सकल विदिक्षुनिवेषित मुपलाग्रन्यस्त पूर्णपटं ॥४॥
अर्थ-उसका द्वार पुरुषका प्रवेश करने योग्य बनाकर
पीपलका तोरण लगावे और उसकी सब दिशा विदिशाओंमें
मूशलके समीप जलसे भरे हुए घड़ोंको रख दे ॥ ४ ॥
तस्मिन्प्रच्याद्यष्ट सुकोठेष्विन्द्राग्निमृत्यु नैऋत् वरुणान् ।
मारुत धन देशानान् लक्षण युक्तान् लिखेन्मतिमान् ॥५॥
अर्थ-बुद्धिमान् पुरुष उसके पूरब आदि आठ कोठोंमें
इंद्र, अग्नि, यम, नैऋत, वरुण, वायु, कुबेर और ईशान देवोंको
सब लक्षणों युक्त करके लिखे ॥ ५ ॥
शक्रं पीतं वन्हि वन्हि निभं मृत्युराज मति कृष्णं ।
हरितं नैऋत मपरं शशि प्रभं वायु मसितांगं ॥ ६॥
अर्थ-इंद्रको पीला, अग्निको अग्निके समान, यमको
अत्यंत कृष्ण, नैऋतको हरा, वरुणको चंद्रमाके समान, वायुको
मटियाला ( असित-जो सफेद न हो)॥ ६ ॥
धनदं समस्त वर्ण सित मीशानं क्रमेण सर्बान्विलिखेत् ।
गज मेष महिष शव मकरोघन्मृग तुरंग बृष बाहान् ॥ ७ ॥
अर्थ-कुबेरको सब रंगोंका और ईशानदेवको सफेद
बनावे और इनके बाहन क्रमसे-हाथी, मैंटा, भैंसा, शव, मकर,
दौडता हुआ मृग, घोड़ा और बैल बनावे ॥ ७ ॥
४८ ज्वालामालिनी कल्प। गज्राग्नि दंड शक्त्यसिपाश महा तुरंग दात्र शूल करान् । परिलिख्य लोकपालान् मध्ये माता कृति विलिखेत् ॥८॥ अर्थ-इनके हाथमें क्रमसे बज्र अग्नि दंड शक्ति तलवार पाश, महातुरंग, दात्रि और शूल देकर इन लोक पालों के बीच में माताकी आकृति बनावे ॥ ८ ॥ गंधाक्षत कुसुमायैः स्वकीय मन्त्रः प्रपूजयेत्सर्वान् । सामान्यमंडलमिदं भूत समुच्चाटने प्रोक्त ॥९॥ अर्थ-फिर सबको गंध, अक्षत, और पुष्प आदिसे अपने२ मंत्रोंसे पूजे । यह भूतोंका उच्चाटन करनेवाला सामान्य मन्डल कहा ॥ ९ ॥ यद्येक चेक चेक चैकान् पूर्बादिक्षु विनियुक्तान् । क्रमश स्तान् द्वादश विध मन्त्रान् हे लोकपालकात्मद्वारं ॥१० अर्थ-दो एक, दो एक, दो एक, दो एक इन पूर्व आदि दिशाओंमें क्रमशः लगाये हुए बारह प्रकारके मंत्रोंको हे लोकपालो ! स्वीकार करो ॥ १० ॥ द्विबंध गंध पुष्पं धूपं दीपाक्षतं बलिं चरु कं । गृह्ण द्वय होमान्तान् स्वकीय मन्त्रान् बुधाः प्राहुः ॥ ११ ॥ अर्थ दोनों प्रकारके बंध, गंध, पुष्प, दीप, धूप, अक्षत, बलि, और चरुको दोनों प्रकारके होम ज्वालामालिनीके अंतमें अपने मन्त्रोंसे 'ग्रहण करो ऐसा पंडित कहें ॥ ११ ॥ .
चतुर्थ परिच्छेद। [४९ ॐ ह्रीं क्रौं हल्व्यू झाल्यूं स्वर्ण वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिह्न स परिवार हे इन्द्र ! एहिर संवौषट आह्वाननम् ॥१॥ ॐ ह्रीं क्रौ हल्व्यू झाल्व्यूं स्वर्ण वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिह्न स परिवार हे इन्द्र ! तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ॥ २ ॥ ॐ ह्रीं क्रों हल्! मल्च्यू स्वर्ण वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिह्न स परिवार हे इन्द्र ! मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् ॥ ३॥ ॐ ह्रीं क्रों हल्यूक्ष्म्ल्यू स्वर्ण वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिह्न स परिवार हे इन्द्र ! आत्म द्वारं रक्षर इदमयं पाद्यं गन्धमक्षतं पुष्पं दीपं धूपं चलं बलिं फलं गृह्ण २ स्वाहा । अर्चनम्। ॐ ह्रीं क्रों हल्ब्यूँ फ्ल्यू स्वर्ण वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिह्न स परिवार हे इन्द्र ! स्वस्थानं गच्छर जयः ३ विसर्जनम् । ॐ ह्रीं क्रों झल्व्यू रक्त वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिह्न स परिवार हे अग्ने ! एहि एहि संवौषट् । आह्वाननम् ॥ १॥ ॐ ह्रीं क्रों झल्यू रक्त वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिह्न स परिवार हे अग्ने ! तिष्ठ२ ठः ठः स्थापनम् ॥ ४ ५० ] घालामालिनी कल्प। ॐ ह्रीं क्रों झल्ब्यू रक्तवर्ण सर्वं लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन बधू चित सपरिवार हे अग्ने ! मम सन्निहितो भव भव बषट् सन्निधिकरणम् ॥ ३॥ ॐ ह्रीं क्रों झल्ब्यू रक्तवर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन बधू चिह्न सपरिवार हे अग्ने ! आत्म द्वारं रक्ष२ इद- मध्ये पाचं गंधम क्षतं पुष्पं दीपं धूपं चरुं बलिं फलं गृह्ण२ स्वाहा ।। अर्चनम् ॥ ॐ ह्रीं क्रों झल्यू रक्तवर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन बधू चिह्न सपरिवार हे अग्ने ! स्वस्थानं गच्छ२ जः ३ ॥ विसननम् ॥ ॐ ह्रीं क्रों झल्व्यू कृष्णवर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन बधू चिह्न सपरिवार हे यम! एहिर संवौषट् । आह्वाननम् । ॐ ह्रीं क्रो झल्ब्यूँ कृष्ठावर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन बधू चिह्न सपरिवार हे यम ! तिष्ठर ठः ठः स्थापनम् ।। ॐ ह्रीं क्रों झल्ब्यू कृष्णवर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिह्न सपरिवार हे यम मम ! सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् ॥ ॐ ह्रीं क्रों झन्व्यू कृष्णवर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिह्न सपरिवार हे यम ! आत्मद्वारं रक्ष२ इदमध्य चतुर्थं परिच्छेद । पाय गंधमक्ष पुष्पं दीपं धूपं चरुं बलिं फलं गृह्ण २ स्वाहा । अर्चनम् ॥ ॐ ह्रीं क्रों झल्यूं कृष्णवर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन बध चिह्न सपरिवार हे यम ! स्वस्थान गच्छ२ जाजः जः ॥ विसर्जनम् ॥ ॐ ह्रीं क्रों झल्व्यू हरिद्वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध चाहन बधू चिह्न सपरिवार हे नैऋते ! एहि२ संवौषट् आह्वाननम् ॥ ॐ ह्रीं क्रों झल्ब्यू हरिद्वर्ण सर्न लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन बधू चन्ह सपरिवार हे नैऋते ! तिष्ठ२ ठः ठः स्थापनम् ॐ ह्रीं क्रों झल्व्— हरिद्वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन बधू चिन्ह सपरिवार हे नैऋते ! मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् ॥ ॐ ह्रीं क्रों झल्यू हरिद्वणे सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन बधू चिन्ह सपरिवार हे नैऋते ! आत्म द्वारं रक्षर इद- मयं पाद्य गंधमक्षतं पुष्पं दीषं धूपं चरुं बलिं फलं गृह्ण२ स्वाहा “अच नम्" ॥ ॐ ह्रीं क्रों झल्यू हरिद्वण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध चाहन बध चिन्ह सपरिवार हे नैऋते ! स्वस्थानं गच्छ२ जः जः नः ॥ विसर्जनम् ॥
५२ ] ज्वालामालिनी कल्प । ॐ ह्रीं क्रों घल्ब्यू झल्ब्यूँ श्वेतवर्ण सव लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन बधू चिन्ह सपरिवार हे वरुण ! एहि२ संवौषट् ॥ आह्वाननम् ॥ ॐ ह्रीं क्रों घल्व्यू झल्ल्यू श्वेतवण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन बध चिन्ह सपरिवार हे वरुण ! तिष्ठर ठः ठः ॥ स्थापनम् ॥ ॐ ह्रीं क्रों घल्ब्यू झल्व्यू श्वेत वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिह्न सपरिवार हे वरुण ! मम सन्निहितो भव भव वषट् । सन्निधिकरणम् । ॐ ह्रीं क्रों घन्च्यू झल्च्यू श्वेत वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन बधू चिह्न सपरिवार हे वरुण ! आत्मद्वारं रक्षर इदमयं पाद्यं गंधमक्षतं पुष्पं दीपं धूपं चरुं बलिं फल गृह्ण२ स्वाहा । अर्चनम् । ॐ ह्रीं क्रों घल्यू झल्यूं श्वेत वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन बधू चिह्न सपरिवार हे वरुण ! स्वस्थानं गच्छर जः जः नः । विसर्जनम् । ॐ ह्रीं क्रों खन्यू झल्व्यू कृष्णवर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिह्न सपरिवार हे ! वायो एहि२ संवौषट् । आह्वाननम् । ॐ ह्रीं क्रों खल्व्यू झल्च्यूं कृष्णवर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण -
RECENTERTA
चतुर्थ परिच्छेद ।
[५३
स्वायुध वाहन बधू चिह्न सपरिवार हे वायो तिष्ठ तिष्ट ठः ठः।
स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं क्रों खल्यू झल्च्यू कृष्णवर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण
स्वायुध वाहन बधू चिह्न सपरिवार हे वायो मम सन्निहितो
भव२ वषट् । सन्निधिकरणम् ।
ॐ ह्रीं को खल्! झन्व्यू कृष्णवर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण
स्वायुध वाहन वध चिह्न सपरिवार हे वायो ! आत्मद्वारं रक्षर
इदमयं पाद्यं गंध मक्षतं पुष्पं दीपं धूपं चरं बलिं फलं
गृह्ण २ स्वाहा । अर्चनम् ।
ॐ ह्रीं क्रों खल्यू झल्यू कृष्णवर्ण सर्वलक्षण संपूर्ण
स्वायुध बधूचिह्न सपरिवार हे वायो स्वस्थानं गच्छ२ जः जाजः ।
विसर्जनम् ।
ॐ ह्रीं क्रों छम्ल्यू झल्यू समस्त वर्ण सर्व लक्षण
संपूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिन्ह सपरिवार हे धनद ! एहिर
संवौषट् । आह्वाननम् ।
ॐ ह्रीं क्रों छम्ल्व्यू झल्यूं समस्त वर्ण सर्व लक्षण
संपूर्ण स्वायुध वाहन वध चिन्ह सपरिवार हे धनद ! तिष्ठ तिष्ठ
ठाठः। स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं कों छम्ल्व्यू झम्यं समस्त वणे सर्व लक्षण
संपूर्ण स्वायुध वाहन बध चिन्ह सपरिवार हे धनद ! मम
सन्निहितो भव भव वषट् । सन्निधिकरणम् ।
५४]
ज्वालामालिनी कल्प
ॐ ह्रीं क्रों छम्व्य झम्ल्व्य समस्त वर्ण सव लक्षण
संपूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिन्ह सपरिवार हे धनद ! आत्मद्वार
रक्ष२ इदमध्यं पाद्यं गंधमक्षतं पुष्पं दीपं धूपं चरुं बलिं फल
गृह्ण२ स्वाहा । अच नम् ।
ॐ हौँ क्रों छम्ल्यू झम्व्यू समस्त वर्ण सर्व लक्षण
संपूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिन्ह सपरिवार हे धनद ! स्वस्थान
गच्छ२ जः जः जः । विसर्जनम् ।
ॐ ह्रीं क्रों झम्ल्व्य श्वेत वण सर्व लक्षण संपूर्ण
स्वायुध वाहन बधूचिन्ह सपरिवार हे ईशान ! एहिर संवौषट् ।
आह्वाननम् ।
ॐ ह्रीं क्रों झल्व्यू श्वेत वर्ण सव लक्षण संपूर्ण स्वायुध
वाहन बध चिन्ह सपरिवार हे ईशान ! एहिर तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं क्रों इग्ल्यू श्वेत वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध
वाहन वधू चिह्न सपरिवार हे ईशान ! मम सन्निहितो भव भव
वषट् सन्निधिकरणम् ॥
ॐ ह्रीं क्रों इन्व्यू श्वेत वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध
बाहन बधू चिह्न सपरिवार हे ईशान ! आत्म द्वारं रक्ष२ इदमध्ये
पाद्यं गंधमक्षतं पुष्पं दीपं धूपं चरुं बलिं फलं गृह्ण गृह्ण स्वाहा ।
९.
अर्चनम् ।।
ॐ ह्रीं क्रो इम्ल्व्यू श्वेत वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध
।
. चतुर्थं परिच्छेद । [ ५५ वाहन बधू विह्न सपरिवार हे ईशान ! स्व स्थानं गच्छ२ जः जा जः ॥ विसर्जनम् ॥ सर्वतो भद्र मण्डल रेखात्रयेण परस्पराग्रविद्वेन पंचवर्णेन । चतुरस्रमष्टहस्तं सविस्तरं मंडलं विलिखेत् ॥ १२ ॥ अर्थ-फिर एक आठ हाथके चौकोर विस्तृत मंडलको पांच वर्णकी तीन रेखाओंसे जिनका अग्र भाग आपसमें विधा हुआ हो बनावे ॥ १२॥ चतुसूप दिक्षु द्वे द्वे रेखे दद्यात्तथाई परिमाणे । एवं सति षट्कोण दिक्षु विदिक्ष्वपि च चत्वारः ॥ १३ ॥ अर्थ-चारों दिशाओंमें दोर रेखा आधे परिमाणमें वनावे, इस प्रकार दिशाओंमें छह कोठे और विदिशाओंमें ब्यार हो जावेंगे ॥ १३ ॥ अभ्यन्तराष्ट दिग्गत कोष्टेष्वथ मातृका गणं विलिखेत् । स सनयास्यायुध सहिता प्रतियः शेष कोष्टेषु ॥ १४ ॥ अर्थ-विदिशाओंके अंदरके आठ कोठोंमें मावका गण उनके आसन सहित लिखे और शेष कोठोंमें उनके प्रतिहारोंको लिखे ॥ १४ ॥ ५ -- ५६ ] ज्वालामालिनी कल्प । अष्ट मात्रका गणोंका वर्णन ब्रह्माणी माहेश्वर्यथ कौमारि वैष्णवी च वाराही । एंद्री चामुंडा च महालक्ष्मी मातृका श्वेताः ॥ १५ ॥ अर्थ-ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, ऐंद्री, चामंडी, और महालक्ष्मी, ये मात्रका गण हैं । नीरजवृषभमयूरा वर पद्मराग शशिधर विद्रुम नीलोत्पलेन्द्र नील महा । कुलशैल राज बालार्क हंस वर्णः क्रमेणैताः ॥ १६ ॥ अर्थ-इनके रंग क्रमसे सुन्दर, पद्मराग (लाल), चंद्रमा, मूंगा, नीलकमल, इंद्र ने लमणि, सुमेरुपर्वत, बालसूर्य और हंस हैं। अर्थात् प्रत्येक देवको क्रमसे इनके समान रंगवाली बनावे ।। गरुडवराहगजस्तथा प्रेतः । मूषक इत्येतासां प्रोक्तानि सुबाहनानि बुधैः ॥ १७ ॥ अर्थ—पंडितोंने इनके बाहन क्रमसे कमल, बैल, मोर, गरुड, वराह, ऐरावत, प्रेत, और चूहा बतलाये हैं ॥ १७ ॥ कमलकलशौ त्रिशुलं फलवरदकशौच चक्रमथ शक्तिः । पाशौ बज्र' च कपालवर्तिके परशुरस्त्राणि ॥ १८ ॥ अर्थ—इनमेंसे ब्रह्माके कमल और कलश, माहेश्वरीका त्रिशूल, कौमारीके फल और वरको देनेवाला कोडा, वैष्णवीका
चतुर्थ परिच्छेद ।
[५७
चक्र, वाराहीके शक्ति, और पाश ऐंद्रीका बज्र, चामुण्डाके
कपाल और बत्ती, और महालक्ष्मीका परशु अस्त्र है ॥ १८ ॥
आठ दंडकरी देवियां
वत्प्रतिहाय्य विजया विजयाप्य जिता अपराजिता गौरी ।
गांधारी राक्षस्यथ मनोहरी चेती दंडकराः ॥ १९ ॥
अर्थ-उनके पीछे चलनेवाली क्रमसे जया, विजया,
अजिता, अपराजिता, गौरी, गांधारी, राक्षसी और मनोहरी,
दण्ड करनेवाली हैं ॥ १९ ॥
बाह्याष्ट दिशवथ कोष्टे बिंद्रादि लोकपालांस्तान् ।
निजवाहनानिरूढान् स्वायुधवर्णानितान् विलिखेत् ॥ २० ॥
अर्थ-अब दिशाओं के बाहर आठ कोठोंमें उन इंद्रादि
लोकपालोंके अपने२ बाहन पर चढे हुए शस्त्र और वर्ण
सहित लिखे ॥ २० ॥
तदुभय पार्थाथ स्थित दिष्टिन कोष्टेष्चिंद्रादि लोकपालानां ।
मेघ महामेघ ज्वाल लोल कालस्थितनीलः ॥ २१ ॥
अर्थ--उन इन्द्र आदि लोकपालोंके को ठेसे हो उनके
दोनों तरफसे दो दो प्रतिहारोंको बनावे जो क्रमसे इस
प्रकार हैं ॥ २१ ॥
ANORAN ५८] ज्वालामालिनी कल्प। सोलह प्रतिहार मेघ १, महामेघ २, ज्वाल ३, लोल ४, काल ५ स्थित ६, अनील ७, रौद्रातिरौद्र सजला जल हिमका हिमाचलस्तथा लुलितः । द्वौ द्वौ च महाकालौ नंदीति लिखेत् प्रतिहारौ ॥ २२ ॥ अर्थ-रौद्र ८, (महारौद्र) अतिरौद्र ९, सजल १०, अजल ११, हिमका १२, हिमाचल १३, लुलित १४, महा- काल १५, और नन्दी १६ ॥ इन प्रतिहारोंको लिखे ॥२२॥ बहिरप्यु दधि चतुष्कं पुनरुपरि सु पुष्पं मंडपं रचयेत् । तोरण माला दर्पण घंटा ध्वज विरचनं कुर्यात् ॥ २३ ॥ अर्थ-बाहिर चारों समुद्र फिर ऊपर फूलोंके मंडप बनावे, और उसको तोरण, माला, दर्पण, घंटा और ध्वजाओंसे सजावे ॥ २३ ॥ वरबीज पूर मलयजकुसुमाक्षतचर्चितान् धवल वर्णान् । कोणस्थ मूशल मूर्द्ध सुपूर्ण घटान् स्थापयेद्विधिना ॥२४॥ अर्थ-फिर सुन्दर बीज चंदन पुष्प और अक्षतसे पूजे हुए धवल वण के मुख तक भरे हुए घड़ोंको उनके ऊपर मुशल रखकर कोनोंमें रखकर उनकी विधि पूर्वक स्थापना करे ॥२४॥ मंडलमध्ये भृतं विलिख्य संस्थाप्य मृण्मयं चान्यत् । मंडलमध्येप्याग्नेया कोणेष्ठनु क्रमशः ॥ २५ ।।
Mwx
चतुर्थ परिच्छेद ।
[५९
अर्थ-मंडलके बीचमें दूसरे मिट्टीके जने हुए भूतको
लिखकर मंडलके बीचमें आग्नेय आदि कोणोंमें क्रमशः ।।
कुर्य्यात्रिकोण कुंडं कमल्लिका कटहा वृत कुण्डानि ।
खदिगंगारक तैल सुपानीयांगार पूर्णानि ॥ २६ ॥
अर्थ-तीन कोणेवाले कुण्ड बनावे और कुण्डोंके चारों
ओर कमल्लिका और कडाही रक्खी हों, और वह खैरके
अंगारों. तेल जल और अंगारोंसे पूर्ण हो ॥ २६ ॥
इस यंत्रका उपयोग
ग्रह नाम रकार वृतं पत्रोपरिलिख्य निक्षिपे हृदये ।
पिष्ट घटितस्य सिक्थक मयस्य वा भूत रूपस्य ॥ २७ ॥
अर्थ-फिर पत्ते पर ग्रहका नाम अभूत रूपवाले पिसे
हुए मोमसे लिखकर और उसके च्यारों और रकार लिखकर
उसे बनाये हुए कुण्डके अपूर्व बीचमें रक्खे ॥ २७ ॥
अन्यच्च ग्रह रूपं पत्रे च पटे पृथक् समालिख्य ।
रूपस्य सत्य संधिषु रकार पिंडं लिखेन्मतिमान् ॥ २८ ॥
अर्थ-फिर ग्रहके दूसरे रूपको पत्ते और वस्त्र पर
पृथकर लिखकर बुद्धिमान् पुरुष उसकी संबियोंमें, रकार,
बीज पिण्ड पुरुषको लिखे ॥ २८ ॥
६० । ज्वालामालिनी कल्प। कुण्डे प्रपूरयेतां कभल्लिकायां पचेच पुत्तलिकां । पत्रं कटि परिघटयेत्पटं तापयेत्कुण्डं ॥ २९ ।। अर्थ-फिर कुण्डमें कमल्लिकाको डालकर उस पुत- लीको पकावे और पत्तेको कढाहीमें घोटे तथा वस्त्रको कुण्डमें गरम करे। . " सतत मथ होम मंत्रं प्रपठन्निति निग्रहेषु विहतेषु । दाधोऽस्मि मारितोऽहं हतोऽहमिति रोदिति कठोरं ॥३०॥ अर्थ-इसके पश्चात् निरन्तर होमके मंत्र पढ़ता हुआ इस 'प्रकार निग्रह किये जानेपर ग्रह "मैं जला, खूब चोट लगती है, मैं मरा" कहकर खूब रोता है। प्रावेग सप्तदिवसान् त्रीन्वा लोके प्रसिद्ध लाभार्थ । प्रविनत येद्ग्रहंडला द्विनास्वेच्छाया मंत्री ।। ३१ ।। अर्थ–पहिले सात दिन या ठीक तीन दिन लोकमें प्रसिद्ध और लाम पानेके लिये मंत्री पुरुष ग्रहको खूब नचावे ॥३१॥ पश्चात्सप्तमदिवसे तृतीय दिवसे दिवा महत्यस्मिन् । विधि नैव सर्वतोभद्र मंडले नर्तयित्वा तं ॥ ३२ ॥ अर्थ-फिर सातवें दिन या तीसरे दिन उसको सर्वतो- म्भद्र मडल में विधिपूर्वक नचाकर । -
MonocaHAMY
चतुर्थ परिच्छेद
कृष्णाष्टम्या मथ तद्भूत तिथौ वा कुजांशाभ्युदये ।
दुष्ट ग्रहमशुभग्रह लग्ने प्रविसज्ज येतज्ज्ञः ।। ३३ ।।
अर्थ-कृष्णपक्षकी अष्टमीको या उस भूतकी तिथिको
अथवा मंगलके निकलने पर उस दुष्ट ग्रहको अशुभ ग्रह और
अशुभ लग्नमें छोड़े ॥ ३३ ॥
समय मण्डल
ज
विपुलाष्ट दलं पद्म विलिख वाहेस्य पंच वर्णेन ।
चूर्णेन चतुः कोणं विस्तीर्णं मंडलं विलिखेत् ॥ ३४ ॥
अर्थ-फिर बड़े आठ दलवाले कमलको लिख उस पंच
वर्णके चूण से चौकोर बडा मंडल बनावे ॥ ३४ ॥
हरिण वराह तुरंगमगजवृष महिष करममार्जार मुखं ।
फल वरद हंस युक्तं सालंकार सुलक्षण नारीणां ॥ ३५ ॥
.
अर्थ-फिर, हरिण, वराह, तुरंग, गज, वृष, महिष,
करभ (ऊंट), और मार्जारके मुख, तथा फल, और वरको
देनेवाले हंससे युक्त अलंकार सहित स्त्रियोंके सुलक्षण |॥३५॥
पूर्वाधष्ट सु पत्रेष्वनुक्रमात्सुन्दरं लिखेद्रपं ।
तन्मध्ये षट्कोणं शिखि भवनं शिखिमालिख्य ॥ ३६ ॥
- '६२ ] ज्वालामालिनी कल्प। अर्थ—पूर्व आदि आठों दलोंपर सुन्दर रूपसे लिखे, उसके बीच में छह कोनवाला मोरका भवन बनाकर उसमें मोर बनावे ॥३६॥ ऊध्वोऽधोरेफयुक्त यां यीं यं यौं तथैव यं यः सहितं । पूव्यादि कोष्ठ मध्ये विलिख्य वामं वदग्रेषु ॥ ३७ ॥ अर्थ-ऊपर नीचे रेफयुक्त यां यी यं यौं यं यः बीजोंको उनके पूर्व दिशासे आरंभ करवाई ओरको लिखे ॥ ३७ ।। षटकोण भुवन मध्ये य्यू तत्कोष्ठांतरेष्वपि लिखेच्च । समयं ग्रहितव्यो ग्रहः स्फुटं समयमंडलाऽख्येऽस्मिन् ॥३८॥ अर्थ-षट्कोण भुवनके भीतर और उस कोठेके भीतर भी य्य लिखे, यह ही समय ग्रहको पकड़नेका है। अतएव यह समय मंडल है ॥ ३८॥ रेखा त्रयेण सम्यक् चतुरस्र पंच वर्ण चूर्णेन । प्राग्वद्विलिख्य मंडलमथ तन्मध्ये शिवं विलिखेत् ॥ ३९ ॥ - सत्य मण्डल %D अर्थ-तीन रेखाओंसे पहलेके समान पांच वर्ण के चूर्ण से चौकोर मंडल बनाकर उसके बीचमें शिब लिखे ॥ ३९ ॥ .
। ६३ RANICHAIN . चतुर्थ परिच्छेद । तत्राभ्यन्तर दिग्गत कोष्ठेषु जयादि देवता विलिखेत् । गौर्यादि देवतास्ता वेशानायेषु कोष्टेषु ॥ ४० ॥ अर्थ-उसके अंदरके कोठोंमें जयादि देवियोंको लिखे, और ईशान आदि कोठोंमें गौरी आदि देवियोंको लिखे ॥४०॥ आद्या जयाथ विजया तथाऽजितावाऽपराजिता गौरी गांधारी राक्षस्यथ मनोहरी चेति देव्यस्ताः ॥४१॥ अर्थ-उनमें पहले जया, फिर विजया, फिर अजिता, फिर अपराजिता, फिर गौरी, फिर गांधारी, फिर राक्षसी, और अंतमें मनोहरी देवीको लिखे ॥ ४१ ॥ बाह्येशान दिशि स्थित कोष्ठादिषु कोष्ठकेषु कादीन् विलिखेत् । सत्याख्यमंडलेऽस्मिन् शापयितव्यो ग्रहः सत्यं ॥ ४२ ॥ अर्थ-बाहर ईशान आदि दिशाओंके कोठोंमें कोष्टकके अंदर क आदिको लिखे, इस सत्य नामवाले मंडलमें ग्रह अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ४२ ॥ इन्द्रादि लोकपालान् मंडल पूर्खादि दिक्षुसंविलिखेत् । मध्येचाह प्रतिमा मन्योन्यारीन्मृगान् परितः ॥ ४३ ॥ अर्थ-इन्द्र आदि लोकपालोंको मण्डलकी पूर्व आदि दिशाओंमें लिखे । मध्यमें श्री भगवान अर्हत देवकी प्रतिमा .
६४ ॥ ज्वालामालिनी कल्प। लिखी हो, जिसके चारों ओर परस्पर विरोधी पशु हो ॥४३॥ एतक्रियावसाने प्रदर्शयेत्समवशरण मंडलमतुलं । नत्वा स्तुत्वा वैरं प्रविहाय सयाति दृष्ट्वेदं ॥ ४४ ॥ अर्थ-इस क्रियाके पश्चात् अतुलनीय समवशरण मंडलको बनाकर दिखावे, वह ग्रह इसको देखकर नमस्कार तथा तथा स्तुति करके बैरको छोडकर चला जाता है ॥ ४४ ॥ इतिश्री हेलाचार्य प्रणीत अर्थमें श्रीमान् इन्द्रनन्दि मुनि विरचित प्रन्थमें ज्वालामालिनी कल्पकी, काव्य साहित्य तीर्थाचार्य प्राच्य विद्यावारिधि श्री चन्द्रशेखर शास्त्रो कृत भाषाटीकामें "मंडलाधिकार" नामक चतुर्थ परिच्छेद समाप्त हुआ ।। ३॥
पंचम परिच्छेद । [ ६५ पंचम परिच्छेद भूता कम्पन तैल पूतिक शुक तुण्डिका खलु शुक तुण्डिकाक तुण्डिका चैव । सितकिणि हिकाश्व गंधा भू कूष्मांडिंद् वारुणिका ॥१॥ अर्थ—पूर्तिक शुक तुण्डिका काक तुण्डिका सफेद किणिहिका अश्वगंधा भू कूष्मांडि इंद्र वारुणी । पूति दमनोग्रगंधा श्रीपर्ण्यसकंध कुटज कुकरंजाः। गो शृङ्गि शृङ्गिनाग सर्प विषमुष्टिका जीराः ॥ २ ॥ अर्थ- पूति दमन उग्रगंधा श्रीपर्णी असगंध कुटन कुकरंजा गोशूगि शूगिनाग सर्पविष मुष्टिक अंजीर । नाली रुचक्रांगी खरकर्णी गोक्षुरश्च विष नकुली। कनक वराह्यं कोल्ला अस्थि प्रमश्च लजरिका ॥३॥ न अर्थ-नीलीरुत् चक्रांगी खरकी गोखरू नवलेका विष कनक वराही अंकोल अस्थि प्रभ लञ्जरिका ॥३॥ ५ ज्वालामालिनी कल्प। पाटल काम मदन तरूविभीत तरूरपि च काक जंघा च । बंध्या, च देव दारु च वृहती द्वि तयं च सहदेवी ॥४॥ अर्थ-पाटलिका, काम, मदनतरु, भिलावा, काकजंघा, बन्ध्या, देवदारु, बृहती, सहदेची। गिरिकर्णिका च नदिमल्लिकार्क शैलाके हस्तिकर्णाश्च । स्तुनिम्ब महानिम्बौ शिरीष लोकेश्वरी दान्याः ॥५॥ अर्थ-गिरिकर्णिका, नदिमल्लिका, अर्कशैल, हस्तिकणी, नीम, महानीम, सिरस, लोकेश्वरी, दान्य । पारितरु महावृक्षो कटुक हारोपयोगिमूलानि । सितक रक्तजपाददिब्राह्म द्वय कोकि लाक्षश्च ॥ ६॥ अर्थ-पारिवृक्ष, महावृक्ष, कटुक हार, उपयोगि मूल; सफेद और लाल, जपादंदि और ब्रह्मी, कोकिलाक्ष ॥७-६॥ भृगश्च देवदालिकटुकम्बी सिंहकेशरं चैव । घोपालिका क्कभक्तौ यति मुन्यतिमुक्तक लताश्च ।। ७ ।। अर्थ-मृग, देवदालि, कटुकंबी, सिंहकेशकर, घोपालिका, अर्कभक्ति, पतिलता, मुनिलता, अतिमुक्तकलता । भगपुष्पि नागकेशर शार्दूलनखी च पुत्रजीवी च । शी हु तथैरण्ड स्तुलसी सध्यापमार्गाश्च ॥ ८॥ - . पंचम परिच्छेद । [६७ अर्थ-भगपुष्पि, नागकेशर, : शार्दूलनखी, पुत्रजीवी, शीग्रुहु, एरण्ड, तुलसी, सध्या अपामार्ग । करि करम कर विचूर्णित वृषणाक्षच्छागमूत्रमिश्रेण । तच्चर्मकारुकुन्डांबुनौषधं पेषयेत्सर्च ॥ ९ ॥ अर्थ-और गजमद, इन सबका चूर्ण करके बैल और बकरेके सूतमें मिलावे । तथा उन सब औषधियोंको चमारके कुन्डके पानीसे पीसे ॥ ९॥ कृत्वा द्विभाग मेकां न्यस्य क्वार्थ प्रगृह्यते मूत्रैः । अविर्ते क्वाथे द्वितीय मालोडयेद्भागं ॥ १० ॥ अर्थ—उसके दो भाग करके एक भागका क्वाथ मूत्रके साथ तैयार करे, और आधे क्वाथमें दूसरे भागको. डबोवे ॥१०॥ कंगु करुंजै रंडा कोल्लविभीत द्विनिंब तिल तैलं । सम भागेन गृहीतं क्वाथेनसह क्षिपेक्वाथे ॥ ११॥ अर्थ,-कंगु, करंज, एरंड, अंकोल मिलावे, निंब और तिलके तेलको बराबर लेकर वायके साथ क्वाथमें ही डाल दे ॥११॥ भूत गृहे भूत दिने भूत महिजात मंडपस्पाधः । कुजमारे भौमांशाभ्युदये प्रारभ्यते पक्तुं ॥१२॥ - - .
,
६८]
ज्वालामालिनी कल्प।
अर्थ-और भूतके घरमें भूतके दिन भूतकी पृथ्वी पर
मंडपके नीचे मङ्गल और बुधके अंशके निकलने पर पकाना
आरम्भ करे ॥ १२ ॥
कार्यासकांस गोमय रविकर वितिपतित वह्निना सम्यक् ।
खदिर करंजार्क शमी निंब समिद्भिः पचेवद्वहुद्भिः ॥१३॥
अर्थ-उस क्वाथको सूर्य की किरणोंसे दी हुई अग्निसे
कपास, कांस, गोबर, खैर, करंज, आक, शमी और नीमकी
लकड़ीसे अच्छी तरह पकावे ॥१३॥
क्षिप ॐ स्वाहा बीजः सकलीकरणं विधाय निजदेहे ।
तैरेव बीजमंत्रः पक्तुः सकलीक्रियां कुर्यात् ॥ १४ ॥
अर्थ-क्षिप ॐ स्वाहा' इन बीजोंसे अपने सकलीकरण
करके उन्हीं बीज मंत्रोंसे पकानेकी सब क्रिया करै ॥ १४ ॥
तत्सर्वधान्यसपिलवण घृतैरिंधनान्वित श्चल्यां ।
आपाकांतं मंत्री होमं कुर्यात् स होममंत्रेण ॥ १५ ॥
अर्थ-मंत्री पुरुष उस तेलके पकने तक होमके मंत्रोंसे
सब धान्य सरसों नमक और घीको कुण्ड में डाल २ कर होम
करता रहे ॥ १५ ॥
नीरसभावं गत्वा काथोद स्थल गतो यथा भवति ।
भूताकंपनतैलं मृदुपाकगतं तथा सिद्धं ॥ १६ ॥
पंचम परिच्छेद ।
[६९
अर्थ-जब यह क्वाथ निरस होकर जमीन पर रखने
जैसा हो जावे, तो वह मृदु पाकसे बनाया हुआ भूता कम्पन
तैल सिद्ध हो जाता है ॥ १६॥
1
हिंगुर्मणिद्धिछल्लैला हरिताल पलत्रिकं कटु त्रितयं ।
रजनी द्वितीयं सर्षप लशुनं रुद्राक्ष दान्य वचाः ॥ १७ ॥
अर्थ-हींग, मनसील, इलायची, हरताल, तीन परिमाण
पल और त्रिकुट (सोंठ पीपहलका मिर्च) दोनों रजनी (हल्दी)
सरसों, लहसुन, रुद्राक्ष, दान्य और बच ॥ १७ ॥
-
अजमोद लवण पंचकमरिष्ट फलमुदधिफलमथ त्रिवृता ।
एतानि प्रतिपाक संदद्यादुतारि तैलेन ॥ १८ ॥
अर्थ-अजमोद, पांचों नमक, अरिष्टफल, समुद्र फल
तथा त्रिवृता इन वस्तुओंको प्रत्येक पाकके साथ तेलमें
मिलावे ॥१८॥
पश्चात्
खङ्गै रावण विद्या मंत्रेण मंत्रयेन्मंत्री ।
दश शत वारानेवं विधिनातः सुसिद्धं स्यात् ॥ १९ ॥
अर्थ-फिर मंत्री पुरुष उस तेलको खङ्गै रावण विद्या
मंत्रसे एक सहस्रवार विधिपूर्वक अभिमंत्रित करै ॥१९॥
७० ]
ज्वालामालिनी कल्प।
शाकिन्योऽप स्माराः पिशाचभूतग्रहाच नश्यन्ति-॥
निर्विषतां यातिविष तैलस्यामुख्यनस्येन-॥ २० ॥
अर्थ-इस विष तैलकी सुगन्धीसे ही शांकिनी, अपस्मार,
पिशाच, भूत और अन्य ग्रह निर्विष हो जाते हैं ॥२०॥
इतिश्री हेलाचार्य प्रणीत अर्थमें श्रीमान् इन्द्रनन्दि मुनि विरचित
ग्रन्थमें ज्वालामालिनी पल्पकी, प्राच्य विद्याचारिधि काव्य
साहित्य तीर्थाचार्य श्री चन्द्रशेखर शास्त्री कृत.
भाषाटीकामें "भूता कम्पन तैलविधि" नामक
पंचम परिच्छेद समाप्त हुमा ॥३॥
षष्टम परिच्छेद।
AMARAN
अथ षष्टम परिच्छेद
सर्व रक्षा यन्त्र
नामावेष्ट्यासकार सान्तल पर ग्लौं युग्म पूर्णेदुभिः
दिव्य क्ष्माक्षरमस्तकै परिवृतं कोणस्थरान्त वृति।।
बाह्ये षोडश पत्र. पद्ममथ तत्पत्रेषु देया स्वराः।
कोणे क्ष्माक्षर दिग्गतेन्द्र सहितं बाह्ये च भूमंडलं ॥
अर्थ-एक सोलह दलबाला कमल बनाया जाये, उसके
प्रत्येक पत्रके ऊपर स्वरोंको लिखना चाहिये। उसु कमलके
बाहर पत्तोंके कोणोंमें क्रमसे निम्नलिखित बीज लगाने चाहिये।
अ, ए, क, च, त, प, य, श, ह्रीं, ग्लौं, ग्लों, र, प, ल
और स उसकी कर्णिकामें नामको स, ह, च, ग्लौं ग्लौं और पूर्ण-
चन्द्रसे वेष्टित करे, और सबके बाहर पृथ्वी मंडल बनावे ॥१॥
एतत्तु सर्वरक्षा यंत्रं लिखितं सुगन्धिभिद्र व्यैः ।
अपहरति रोगपीडामपमृत्यु ग्रह पिशाच भयं ॥ २ ॥
अर्थ-यह सर्व रक्षा यन्त्र है। सुगन्धित द्रव्योंसे लिखा
जाने पर रोगकी पीडा, अप मृत्यु,, भय ग्रह और पिशाचको
दूर करता है ॥ २॥
७२] ज्वालामालिनी कल्प। ग्रह रक्षक पुत्रदायक यंत्र अदठ हकार कूट सकल स्वर वेष्टितं सत्प्रणम भू । भूमंडल वेष्टितं समभि लिख्य निवेप्सित नाम तद् वहिः ॥ पोडश सत्कलान्वित वकार वृतं शशि मंडला वृतं । स्वरयुत यांत वेष्ट्य मिन विम्बवृतं स्वरयुक्तयावृतं ॥ ३ ॥ अर्थ-अद ठ ह क्ष सब स्वर और ओं को मंडलाकार लिख उसके अन्दर नाम लिखे-फिर एक भूमंडलमें सोलह स्वरोंको लिखकर उसके चारों ओर वं बीजका मंडल बनावे ॥३॥ अष्ट दलांबुज प्रतिदलं द्विकलोद्य जमाशका नमः । पाश गजेंद्र वरा होम पदांत सुमंत्रमालिखेत् ॥ जल निधि सप्तकं बहिरपि स्वर युक्त । यकार वेष्टितं पवन त्रितयेन वेष्टितं ॥४॥ अर्थ-उसके , चारों ओर अष्ट दल कमलका बनाकर प्रत्येक दलमें । ॥ ॐ आं शं ञ ट द द्वि कलाद्य ज माशूका नमः स्वाहा" मंत्र लिखकर उसको चारों ओर सात के मंडल उसके बाहर स्वर सहित य कार और उसके बाहर तीन यं के मंडल हों॥४॥ 7 T .
षष्टम परिच्छेद । । ७३ मंत्र मृत्यु जिताह्वयं विलिखितं सत्कुकुमायैरिदं । यो धत्ते निजकंठबाहुबसने तस्यैह नस्याद् भयं ॥ कुठारी भमृत वारिधि नदी चोरापमृत्युद् भवं । रक्षत्या युध शाकिनी ग्रह गणाद वंध्यास्त्रयः पुत्रदं ॥५॥ अर्थ-जो व्यक्ति इस मृत्युके जीतनेवाले यन्त्रको कुंकुम आदिसे लिखकर कंठ या भुजामें धारण करता है, उसको कुठार, हस्ती, समुद्र, नदी, चोर और अप मृत्युसे होनेवाला भय कभी नहीं होता। यह यन्त्र बंध्या स्त्रीको पुत्र देनेवाला है । और शस्त्र शाकिनी तथा ग्रह समूहसे रक्षा करता है ॥५॥ वश्य यन्त्र षांत हकार लांत परिवेष्टित नाम वृतं त्रिमूर्तिना । प्रवरकिरातनाम वलयं द्विगुणाष्ट दलांबुजं वहिः ॥ षोडश सत्कला लिखित दलेषु शिरो रहिते स्वरावृतं । बहिरपि च त्रिमूर्ति परिवेष्टितमजाधिक वर्ण वेष्टितं ॥ ६ ॥ अर्थ-एक सोलह दल कमलकी कर्णिकामें स, ह, व, क्लीं, इन चार बीजोंसे घिरा हुआ नाम लिखकर सोलह दलोंमें बिना शिरवाली सोला कलाएं लिखकर बाहर भी एक मंडल में सोलहों स्वर और उसके बाहर ही, लिखकर क्ल, क्रों से वेष्टित करे ॥६॥ .
1 ७४.] स्वालामाग्निी कल्प] कंकुम कर्पूरा गुरु मृग मद रोचनादि मियमिदं । परिलिल्य भुज पत्रे समर्चयेत्सर्व वश्यकरं ॥ ७ ॥ अर्थ-इस यंत्रको भोजपत्र पर कुंकुम, कपूर, अगर, कस्तूरी और गौरोचन आदिसे लिखकर पूजा करे तो सब वशमें हो ॥ ७॥ मोहन वश्य यंत्र हरि गर्भ स्थित नाम तत्परि वृत्तं 'रुद्रत्रि मूर्ध्या हतः । पुटितं से नवकार संपुट गतं वेष्टयन्तु टान्त स्वरैः ॥ बहिरष्टांबुज पत्र केष्व यजया जंभादि सम्बोधनं । बिलिखेन्मोहय मोहया मुक्रनरं वश्यं कुरुद्विषट् ।। ७ ॥ अर्थ---एक अष्टदल कमलकी कर्णिकामें नामको ईईई स स व व और ठसे घेर कर उसके चारों ओर गोलाकारमें सोलहों स्वर लिखे फिर बाहरके आठों पत्रों में पूर्वादिक्रमसे निम्नलिखित आठ मंत्र लिखे- अये जये मोहय मोहय अमुकं नरं वश्यं कुरु कुरु वषट् अये जमे मोहय मोहय अमुकं नरं अये विजये मोहय मोहय अये मोहे मोहय मोहय अये अजिते मोहय मोहय अये स्तम्भे मोहय मोहय " " " 1 m "
षष्टम परिच्छेद।
[७६
"
अये अपराजिते मोहय मोहय अमुक नरं वश्य 'कुरु कुरु वर्षट् ।
अये स्तंभिनि मोहय मोहयः
कों पत्राय मतं तदन्तर गतं ह्रीं ह्रीं च बाह्ये लिखेत्
श्रां श्रीं श्रू पुनरुक्त मंत्र बलयं श्रों श्रः पदं तद् वहिः ।
यंत्रं मोहन वश्य संज्ञकमिदं भूजें विलिख्यार्च येत्
धतूरस्य रसेन मिश्र सुरभि द्रव्य भवेन्मोहनं ॥ ९ ॥
अर्थ-पत्रको कोनेमें अंदरकी ओर क्रों और बाहर
दोनों ओर ह्रीं ह्रीं लिखकर गोल मण्डल बनाकर उसमें "श्रां
श्री श्रृं श्री श्रः" बीजोंको लिखे। इस मोहन वश्य नामके
यंत्रको भोजपत्र पर धतूरके रस और सुगन्धित द्रव्योंसे लिखनेसे
मोहन होता है ॥ ९॥
स्त्री आकर्षण यंत्र
ह्रीं मध्यस्थित नाम दिक्षु विलिखेत् क्रोतद्वि दिक्षुप्यजं ।
बाह्ये स्वस्तिक लांछनं शिखि पुरं रेफै बहिः प्रावृतं ॥
तद् बाह्यग्निपुञ्ज त्रिमूर्तिबलयं वन्हेः पुरं पाबकैः
पिंडैर्वेष्टितमग्नि मंडल मतस्त. द्वेष्टितं चांकुशैः ॥ १० ॥
अर्थ-एक स्वस्तिकका चिह्न बनाकर उसकी दिशाओं में
ह्रीं के मध्य नाम और विदिशाओंमें कों लिखे, उसके चारों
ओर तीन अग्नि मण्डल र सहित बनायें। इसके पश्चात् तीन
वायु मण्डल यं बीजसे बनाकर यंत्रका क्रों से निरोध:
कर दे॥१०॥
- •७६ ] ज्वालामाटिनी कल्प। बाह्ये पावका मण्डलं वर युतं मंत्रेण देव्यास्ततो । वायूनांत्रितयेन वेष्टनमिदं यंत्रं जगत्युत्तभं ॥ श्री खंडा गुरु कू कुमाई महिषी कपूर गौरोचना। कस्तूर्यादिभि रुदधभूज लिखितं कुर्यात्सदा कर्षणं ॥११॥ अर्थ-इस यन्त्रको भोजपत्र पर श्री खण्ड अगर और कुंकुम आदि महिषी, कपूर, गोरोचन और कस्तूरी आदिसे लिखने पर सद। आकर्षण होता है ॥ ११ ॥ लाक्षा पांशु सुसिद्ध सत्प्रति कृती कृत्वा हृदीदं तपो- यंत्रं स्थापय नाम पत्र सहित लाक्षां प्रपूऱ्यांदरे । भीत्वा योनि ललाट हुत्सुपर पुष्ट क्षस्य सत्कंटकैः, रेका कुण्डतले निखन्य च परांबद्धाग्नि कुण्डोपरि ॥१२॥ अर्थ-इस यन्त्रको सिद्ध करनेके वास्ते अपनी इच्छित स्त्रीकी दो मूर्तियां लाखकी बनवावे । उस मूर्तिमें योनि, मस्तक, हृदय, ओष्ट आदि स्पष्ट रूपसे खुदे हुए हों, फिर उपरोक्त यन्त्रको उन मूर्तियोंके हृदयमें रखकर एक मूर्तिको कुण्डके नीचे 'गाडकर दूसरीको कुण्डके ऊपर बांधकर रक्खे ॥१२॥ लाक्षा गुग्गुल राजिका तिल घृतैः पात्रस्थ नामान्वितैः । संयुक्त लवणेन तत्सति युतः संध्या सु साष्टं शतं ॥ मंत्रेणानल देवतस्य जुहु वादा- सप्त रात्रा चधे। , रिन्द्राणी मपि चानयेत् क्षितिगत स्त्रयाकर्षणे का कथा ॥१३ . .
..
चतुर्थ परिच्छेद।
[७७
अर्थ-~और लाख, गुग्गुल, सफेद सरसों, तिल, घी,
और नमकसे, संध्या समय पात्रके नामके पीछे स्वाहा लगा
लगाकर सात रात्रि तक होम करे, ऐसा करनेसे इन्द्राणी तकका
भी पृथ्वीपर आकर्षण होता है। स्त्रीके आकर्षणकी तो क्या
बात है ॥ १३॥
दिव्य गति सेना जिह्वा और क्रोधस्तंभन यंत्र
नामा लिख्य प्रतीतं कपरपुट गत टांतवेष्टय चतुर्भिः
बौबिद्धं चरांतं कुलिशविवारगं वामबीजं तदने ।
बज्र चान्योन्यविद्धं घुपरिलिखबहिर्विष्णुना त्रिः परीतं ।
स ज्योतिश्चांद्रबिंदु हरि कमल जयोः स्तम्भ बिंदुलकारे ॥१४
अर्थ-नाम को, ख, की पुटमें लिखकर उसको बज्राकार
रेखाओंसे बांधकर वज्रके छेदोंके सामने ॐ, बीज लिखे और
मध्यमें लं, लिखे । परस्पर बिंधे हुये इस वज्रके मंडलके ऊपर
ई के तीन मंडल बनावे । इस यंत्रमें, लं, के साथ स्वां, ई,
और ग्लैं, बीज भी लिख दे ॥ १४ ॥
तालेन शिला संपुट लिखितं परिवेष्टय पीत सूत्रेण ।
दिव्य गति सैन्य जिह्वा क्रोधं स्तंभयति कृत पूजं ॥ १५ ॥
अर्थ-इस यंत्रको तालसे दो शिलाओं पर लिखकर दोनों
यंत्रोंका मुख मिलाकर पीले धागेसे लपेटे और पूजा करनेसे
दिव्य गति सेना जिह्वा और क्रोधका स्तंभन होता है ॥१५॥
७८ ]
ज्यालामालिनी कल्प
स्तंभन यंत्र
बज्राकाराग्ररेखानवककृतचतुःषष्टिकोष्टान् लिखित्वा ।
बाह्ये बिंदु त्रिदेहं तदनुलिखितदंतश्च लीन्तस्य वान्तः ।।
ग्लौं दद्यान्नाम गर्ने कुलिशयुगलविद्वततस्त द्वि दिक्षु ।
रान्तं वज्रान्तराले वलयविमथत स्वेन मंत्रेण बाये ॥१६॥
अर्थ-बज्राकार रेखाओंके प्रत्येक ओर आठ२ कोठे
बनाकर कुल चौंसठ कोठे बनावे । उनमेंसे प्रथम चारों ओर
ॐ फिर ह्रीं फिर ली और फिर भ लिखकर बीचके स्थानमें
दो बज्रोंसे बिंधे हुए नामको ग्लौंके अंदर. बनावे । और उसकी
विदिशाओंमें ल लिख देवे। समस्त यंत्रके चारों ओर बाहर निम्न
लिखित मंत्र लिख दे ॥ १६ ॥
-
आवेष्टन मंत्र
"ॐ बज्रक्रोधाय ज्वल२ ज्वालामालिनि ह्रीं झी ब्लं द्रा
द्रीं ह्रां ह्रीं ह्र हौं ह्रः देवदत्तस्य, क्रोधं गति मतिं जिह्वां च
हन२ दह२ पचर विध्वंसयर उत्कृष्ट क्रोधाय स्वाहा ।"
यंत्रमिदं सुविः पलके कुडचे भूचे विलिख्य तालेन ।
मंत्रेण पूजितं स कुर्य्याहृदयेप्सितं स्तंभ ॥ १७ ॥
अर्थ-इस यन्त्रको पृथ्वीपर कुड्य पर -अथवा भोज
पत्र पर तालसे लिखे । और मँत्रसे पूजन करनेसे इच्छानुसार
स्तंभन होता है ॥ १७॥
षष्टम परिच्छेद । [७९ wwwwwwmwin AALWAY Na -- जिह्वा स्तम्भन यन्त्र नानः कोणेषु दत्वा-ल मथ परि वृतं वार्धिना बिंदु नाव्व । लं, बीजै वें ष्टितं तत्कुलिश वलयितं वेष्टितं व त्रयेण ॥ भूजें गौरोचना कुकुम लिखितमतः कुम्भकाराग्रहस्तान् । मृत्स्नामादाय कृत्वा कृतिमथतदयत्रमास्ये निधाय ॥१८॥ अर्थ-नामके कोनों में लं, लिखकर उसको बिंदु सहित च, से वेष्टित करे । फिर उसके चारों ओर दो मंडल बनाकर पहिलेको, लं, बीजोंसे और दूसरेको तीन ठ, से भरे इस यन्त्रको भोज पत्र पर गौरोचन और कुंकुमसे लिखे । फिर कुम्हारके हाथकी मिट्टी लाकर उसे अपने प्रत्यर्थिकी छोटीसी मूर्ति बनाकर उसके मुख यह यंत्र रख दे ॥ १८ ॥ तद्वत परपुष्टकंकटाचयीत्वा शराबद्वय ॥ स्यांतस्तां प्रणिधाय सम्यगथ जंभे मोहिनी संयुजा । स्वाहा मंत्र पदेन पीत कुसुमैःरम्पर्य यातः पुमान् । प्रत्यर्थि व्यवहारिणो विजयते तजिह्वकाः स्तम्भयेत् ॥१९॥ अर्थ-उस मूर्तिका मुख मजबूत काटोंसे चीरकर उसको दो मिट्टीके शराबोंमें रखकर निन्नलिखित मंत्रसे उसकी पीले पुष्पसे . पूजा करता है। उसके विरोधी व्यवहारीका जिह्वा स्तम्भन हो जाता है।
८० । ज्वालामालिनी कल्प। मंत्र-ॐ जंभे मोहे अमुकस्य जिह्वा स्तंभय २ ठः ठः ठः स्वाहा"। गति जिह्वा और क्रोध स्तम्भन यन्त्र नामालिख्य मनुष्यवक्रविवरे तन्द्रांतसांता वृतं । लान्नग्लौंत्रिशरीरवेष्टितमतः कोणस्थलं बीजकं ॥ दिक्स्थं क्षी धरणीतलं च विनथं जिह्वा स्तंभिनी मोहसत्- मंत्रणानितमातनोति गतिजिह्वा क्रोधसं स्तम्भनं ॥२०॥ अर्थ-मनुष्यके मुख में नामको क्रमसे ल ह व ग्लौं और ह्रीं के मध्यमें लिखकर उसको रेखासे वेष्टित करके कोनों में लं बीज और दिशाओंमें “ ॐ क्षि क्षी" लिखे। इस यंत्रको "ॐ जिह्वा स्तम्भिनी क्षि क्षीं स्वाहा" इस मंत्रसे पूजनेसे गति जिह्वा और क्रोध स्तंभन होता है ॥ २० ॥ ओदनरजनीखटिकास्संपेष्य तदीयवर्तिकालिखितं । यंत्रमिदंपाषाणे तत्पिहितं खेष्टसिद्धिकरं ॥ २१ ॥ अर्थ-चांवल हल्दी और खडियाको पीस कर उसकी बत्तीसे इस यंत्रको पापाण पर लिखे पश्चात् सिद्ध होने पर मुखमें रखनेसे सिद्धि होती है ॥ २१ ॥ पुरुष वश्य यन्त्र – मध्ये लिख नाम तत्क्रमलवैर्विद्धं क्षतैर्वे टितम् । . बाह्येप्पष्टदलाम्बुजं प्रतिदलं स्वाहांतवामादिकां ॥
षष्टम परिच्छेद ।
॥ ॐ वारायै स्वाहा
देवीं गौर्य पराजिते च विजयां जंभा च मोहां जयां।
वाराहीमजितां क्रमाल्लिख बहिवामादि सः पदाः ॥२२॥
अर्थ-एक अष्ट दल कभलकी कर्णिकामें क्रू क वी क्ष
और मैं बीचमें नामको लिखकर आंठों पत्रों में पूर्वादिक्रमसे
* ॐ गौर्यै स्वाहा" “ॐ अपराजितायै स्वाहा" "ॐ
विजयायै स्वाहा" "ॐ जुभायै स्वाहा " "ॐ मोहाय
॥ ॐ जयायै स्वाहा
" "ॐ
स्वाहा
अजितायै स्वाहा" मंत्र लिखे। और उसके बाहरके मंडलमें
"ॐ जसः" बीजोंको लिखे ॥ २२ ॥
स्त्रीपुरुषसुरतसमये योन्यां विनि पतितमिद्रियं यत्नात् ।
कार्यासेन ग्रहीत्वा भूमि परिहत्य संस्थाप्य ॥ २३ ॥
अर्थ-स्त्री पुरुषकी सुरतके समय योनिमें गिरी हुई
इन्द्रियको यत्न पूर्वक कपासकसे पकड़ कर पृथ्वीके अतिरिक्त
स्थान पर स्थापित करके ॥ २३ ॥
काश्मीर रोचनादिभि रेतयंत्रं विलिख्य भूजंदले।
यावक पिहितं तदुपरि विकीर्य सित कोकि लाक्ष बीजरजः ।।
अर्थ-इस यंत्रको भोजपत्र पर गोरोचन केशर आदिसे
लिख कर अग्निसे ढक कर उसके ऊपर श्वेत कोकिलाक्षके बीजोंकी
धूल डाले ॥ २४ ॥
८२] ज्वालामागिनी कल्प। जल मिश्र रेतसा तन्निसिंचय सूत्रावृतं कटौ विधृतम् । पुरुषं निजानुरक्त करोति पंढं परस्त्रीषु ॥ २४ ॥ (क) अर्थ-उस यंत्रको जलमे मिलाये हुए अपने वीर्यसे सींच कर तागेसे लपेट कर यदि स्त्री अपनी कमरमें बांध तो उस स्त्रीमें अनुरक्त पुरुष दूसरी स्त्रियोंके लिये नपुंसक हो जाचे ॥ २४॥ कणयवश्य यंत्र ही मध्ये नाम युग्मं शिखि पुर पुटितं तस्य कोष्ठेषु वाम । हीं जमे होममन्यत्पुनरपि विनयं ह्रीं च मोहे च होमं ॥२५॥ हीं तत्कोष्टांतरालेष्ठथ गजवशकद्वीजमन्यतदने । बाह्ये ह्रीं स्वस्य नानांतरित मथ वहिः श्रृंलिखेत्साध्य नाम्ना ॥२६ अर्थ—र" बीजकी पुटके अंदर ही उसमें अपना और साध्य दोनोंका नाम लिखे, उसके बाहर छह कोण कोठे बनाकर एकरको छोड़२ कर "ॐ ह्रीं जंभे स्वाहा" और "ॐ ह्रीं मोहे स्वाहा"-मंत्र लिखे । कोठोंके अंतराल में हीं और कोनोंमें क्रों लिखे। उसके बाहर दूसरे मंडलमे अपने नाम सहित ह्रीं और उसके बाहर दूसरे मंडलमें साध्यके नाम सहित श्रृं लिखे ॥ २५-२६ ॥ कुंकुमहिममधुमलयजयावकगौक्षीररोचनागुरुभिः । मृगमदसहितेर्विलिखेत् कणयसुयंत्रं जगदाकृत् ॥ २७ ॥ ..
HAR KHN ANWAN षष्टम परिच्छेद ! [ ८३ अर्थ-इस जगत्के वशमें करनेवाले कणय नामके यंत्रको कुकुम, हिम, मधु, मलयज, जौके दूध, गौरोचन, अगर और कस्तूरीसे लिखे ॥ २७॥ शाकिनी भय हरण यंत्र ॥३॥ नाक ॐकारमध्ये पुनरपि वलयं षोडशस्वस्तिकाना- माग्नेयं गेहमुद्यन्नवशिखमथ तद्वेष्टितं त्रिकलामिः । दद्याद् बहेः स्य चत्वार्य्यमरपतिपुराण्यं तरालस्थ मंत्रा- नेतयंत्र सुतं त्रैलिखितमपहरेच्छाकिनीमयः प्रभीति ॥२८॥ अर्थ-क्रौं, के बीचसे पअने नामको लिखकर उसके चारों ओर सोलह स्वर लिखे। उसके चारों ओर मंडलाकार स्वस्तिक बीज, लु, ऊ, और द, को लिखकर उसके चारों ओर अग्नि मण्डलमें रं, बीज लिखे । और इसके चारों ओर ही, का मण्डल बनाकर उसकी चारों दिशाओंमें चार नगर बनाकर उनमें निम्नलिखित मंत्र लिखे ॥ पूरब दिशामें- "ॐ वज्र धरे बंध२ वज्र पाशेन सर्व मदुष्ट विनायकानां ॐ ह क्षं फट योगिने देवदत्तं रक्ष२ स्वाहा ॥ दक्षिणमें ॐ अमृत धरे धर धर रिशुद्ध ॐ ह्रीं फट् योगिनि देवदत्तं रक्षर स्वाहा ॥"
८४ ]
ज्वालामालिनी कल्प।
पश्चिममे-
"अमृत धरे डाकिनि गर्भ सुरक्षिणी आत्मबीज है.
फट् योगिनि देवदत्तं रक्षर स्वाहा ॥"
उत्तरमें
"ॐ रु रु चले हां हां हूँ ह्रौं ह्रः क्ष्मां क्ष्मी क्ष्मू मैं
क्ष्मः सर्व योगिनि देवदत्तं रक्ष२ स्वाहा ।।"
अर्थ-यह यंत्र विधिपूर्वकर लिखा जानेसे शाकिनियोंसे
भय नहीं होने देता ॥ २८ ॥
घट यंत्र
नाम सकारान्तर्गतमंबुधिटान्तावृतं बहिश्च कला ।
वलयितमनिलाद्यष्टमावेष्ट्य हंसः पदं वलयं ॥ २९ ॥
अर्थ-नामको स, आ, थ, और ठ से क्रमशः वेष्टित
करके उसके चारों ओर सोलहों स्वर लिखे । उसकी आठों दिशा-
ओंके वायु मंडलमें 'य' बीज और उसके चारों ओरके मंडल में
'हंसः' लिखे ॥ २९ ॥
टांतेन बहिर्वेष्ट्य को प्रों त्री ठस्सु बीज वलयं च ।
भान्तेन सु सम्पुटे तं तद्वलयितममृत मंत्रेण ॥ ३० ॥
अर्थ-उसके बाहरके बलयमें "ठ, क्रों, प्रों, त्री, ठ"
बीजोंको लिखकर उसके दोनों ओर म, बीज लिखे और फिर
उसके चारों ओर निम्नलिखित मंत्र लिखे ॥३०॥
षष्टम पारच्छेद । ८५ ॐ पक्षि स्वः इवी इचं हूः वं क्षः हः हंसः जः जा जा थक्षि स्वाहा । क्षः संः सः हर हुं हः । इत्यमृतमंत्रोऽयं ॥३१॥ अमृत मन्त्र "ॐ पक्षि स्वः इवी इचं हू: वं हंसः जा जा जः पक्षि क्षः सं सं स. हर हुँ हा" कमलदलसहित मुख बुनामृतकलशेन वेष्टितं बाह्ये वं वन्दनदलेषु लिखेत् बुध्नदलांतर्गतं लं च ॥ ३२ ॥ अर्थ-फिर यंत्रको - कमल दल मुख पर रक्खे हुए अमृत कलशमें चेष्टित करे। उस कमलके पत्रोंके बाहर 'क' और अन्दर 'लं' लिखे। कूटस्थनालमूले घट यंत्रमिदं विलिख्य भूर्जदले । काश्मीररोचनागुरुहिममलयजयावकक्षीरैः ॥३३॥ अर्थ-उस कमलकी नालकी मलमें 'क्ष' बीज लिखे। इस यन्त्रको भोजपत्र पर केशर, गौरोचन, अगर, हिम, मलयज और जौ के दूधसे लिखे ॥ ३३ ॥ सूत्रेण बहिर्वेष्ट्यं सिक्थकपरिवेष्टितं ततः कृत्वा । मलयज कुसुमाद्यर्चितनवपूर्ण घटे क्षिपेन्मतिमान् ॥ ३४ ॥ अर्थ-इस यन्त्रको सिक्थक (मोम) में लपेट कर बाहर
८६ 1
ज्वालामालिनी कल्प।
तागेसे बांधकर फिर इसको चन्दन पुष्प आदिसे पूजे हुए
नवीन घड़ेमें रख दे।
सर्व विघ्नहरण यंत्र
स्वरगर्भटान्तवेष्टितसम्पुटमध्यगतं नामखण्डशशिवेष्ट्य ।
टान्तेन च भान्तेन च वेष्ट्य हंसः पद वलयं ॥ ३५ ॥
अर्थ-नामको क्रमसे ठः के सम्पुट अर्धचन्द्र ठ, और
'म' से वेष्टित करके उसके चारों और " हंसः" पदका वलय
बनावे ॥ ३५॥
वहिरमृतमंत्रचलयं दद्यात्स्वरयुक्तषोडशदलाब्ज ।
मंत्रमिदं घटबुध्ने खटिकाहिम मलयजैर्बिलिखेत् ॥ ३६ ॥
अर्थ-उसके बाहर निम्नलिखित अमृत मंत्र और उसके
बाहर षोडश दल कमलमें सोलहों स्वर लिखे। इस यंत्रको
घड़ेके अंदर खड़िया हिम और चंदनसे लिखे ॥ ३६॥
"ॐ अमृते अमृतोद्भवे अमृत वर्षिणि अमृतं स्रावय २
सं २ क्लीं २ ब्लू २ द्रां २ द्रीं २ द्रावय द्रावय स्वाहा ॥
अमृत मन्त्रोऽयं
समार्जित भूमितले लोहमयत्रिपादिका परिनिधाय ।
कलशं तं तस्य मुखं कांस्यसवृतेन पिहितव्यं ॥ ३७॥
षष्टम परिच्छेद । [८७ अर्थ-एक शुद्ध स्थानमें लोहेकी तिपाई पर इस कलशको कांसोके गोल ढकनेसे ढके ॥ ३७ ।। कांचीद्वय युत मुशलं, जल धौतं सरस मलय जालिमं । सुरभितरकुसुमवेष्टं, तवृतकमस्तके स्थाप्यं ॥ ३८ ॥ अर्थ-~-उस ढकनेके ऊपर जलसे धोये हुए चंदनसे पुते हुए सुगंधित पुष्पोंसे वेष्टित मूसलको दो कांची (करधनी) सहित रक्खे ॥ ३८ ॥ भूशलोपरि प्रदीपं निधाय कांस्यमयभाजनं कलशतले । बहिरर्चयेत्समंनादगंधाक्षतकुसुमचरुकायैः ॥ ३९ ॥ अर्थ-फिर कलशके नीचे कांसीके पात्रको और मूसलके ऊपर दीपक रखकर उसकी चंदन, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य आदिसे पूजा करे ॥ ३९ ॥ क्रूरारिमारशाकिन्युरगनवग्रहपिशाचचोरभयं । अपहरति तत्क्षणादिह तत्सलिलद्रव्यसमासेत्कः ॥ ४० ॥ अर्थ-इस घडेके जलको छिड़कनेसे क्रूर, शत्रु, बीमारी, शाकिनी सर्व नवग्रह, पिशाच और चोरका भय उसी क्षण दूर हो जाता है ॥४०॥ आकर्षण यंत्र कुटाकाशमपिण्डमध्यनिलये नाम स्वकीयं पृथक् । दत्वा तत्परिवेष्टितं भपरसत्पिड़ेन गुह्येन च ।।
ON ८८ ] ज्वालामालिनी कल्प बाह्येद्व्यष्ट दलाब्ज मष्ट कमले प्वन्यच्च पिंडाष्टकं । पत्रेणान्तरितं लिखेत्स्वरयुगं शेषे च पत्राष्टके ।। ४१ ॥ अर्थ-एक ऐसा अष्ट दल कमल बनावे । जिसके आठों दलोंके बीचमें स्थान छूटा हुआ हो। उसकी कर्णिकामें क्षन्व्यू हल्व्यू और मल्व्यू के बीचमें अपना नाम लिखकर बाहरके पत्रोंके अंतरालोंमें पूर्वादिक्रमसे झल्यू यल्यू रम्ल्यू घल्यू डमरव्यू खल्व्यू म्ल्यू और कम्ल्यूं लिखकर आठों दलोंमे पूर्वादि क्रमसे अ आ आदि दो २ स्वर लिखे ॥४१॥ स्वर युगलस्यावस्ता च्छब्दं पाशं तथा कुशं क्षीं च । दत्वा तेषां चाधः ह्रीं क्लीं ब्लू सः द्रो द्रीं क्रमाद्यात् ॥४२॥ अर्थ-और उन स्वरोंके पश्चात् "हां आं क्रों क्षीं ह्रीं क्लीं ब्लू सः द्रां और द्रीं" बीजोंको क्रमसे लिखे ॥ ४२ ॥ बाणान्पद्मदलान्तरेष विलिखे च्छब्दं कसं चांकुशं । क्षी पत्राग्र गतं लिखे दथ नमः पर्यंत वामादिना ॥ पत्राग्र स्थित बीज बाण शिखनि शीघ्रं तमाकर्षय । तिष्ट द्विर्मम सत्य वादि वरदे मंत्रेण चेष्ट्य वहिः ॥४३॥ अर्थ-इसके पश्चात् इस यंत्रको बाहर निम्नलिखित मंत्रसे वेष्टित करे। “ॐ ह्रां आं क्रों क्षीं ह्रीं क्लीं ब्लू सः द्रां द्रीं ज्वाला- षष्टम परिच्छेद । [ ८९ मालिनी देवि शीघ्रं देवदत्तमाकर्षय २ तिष्ठ २ मम सत्य वादि वरदे नमः" ॥४३॥ परम देव ग्रह यन्त्र बाह्ये ह्रीं शिरसावृतं त्रिरथ तद्रे खाप्रयोन्या कृते । मध्ये क्ली उपरिस्थ कोण युगले द्रां द्रींमधो ब्लू लिखेत् ॥ बाह्ये दिक्षु विदिक्षु रान्त धरणी बीजान्वितै द्र पुरं । तद्वाह्ये लिख दिग्वि दिगातल कारांरान्वितं वारिधिः ॥४४॥ अर्थ-बाहर ह्रीं की तोन रेखाओंसे घेरकर मध्य में क्लीं को लिखे । क्लीं के ऊपर दो कोनोंमें द्रां द्रीं और नीचे ब्लें बीजको लिखे। उसके बाहर अष्टदल कमलका इंद्रपुर बनाकर उसमें हीक्लीं बीजको लिखे । उसके आठों दिशाओंमें ब्लं लिखे ॥४५॥ देव्या ज्वालामालिन्योक्तमिदं परम देव ग्रह यंत्र। पुण्यार्के शुभतंत्रबिलिख्य भूजे पदे चापि ॥४६॥ अर्थ-देवी ज्वालामालिनीके कहे हुए इस परमदेव ग्रह यंत्रको पुष्य नक्षत्र में भोजपत्र पर सुगन्धित और पवित्र वस्तुओंसे लिखे ॥ ४६॥ वश्य हवन। शिखि मद्देवी हृदयोऽपहृदय मंत्रेण पूजितं सततं । जपित हुतं च सकलं स्त्रीनृपरिपुभूतवश्यकरं ॥ ४६ ।। - LXX MRAMMAMALNIRWINAMANNAINA और अपहृदय ९०] ज्वालामालिनी अर्थ-ज्वालामालिनी देवीके हृदय मंत्रोंके द्वारा पूजन जाप और हवन करनेसे स्त्री, राजा, शत्रु, और भूत वशमे हो जाते है ॥ ४६ ।। मधुरत्रयेण गुग्गुलदशांगपंचांगधूपमिश्रेण । जुहुयात्सहस्रदशकं वशंकरोतीन्द्रमपि कथान्येषु ॥ ४७ ॥ अर्थ-घृत, दुग्ध, शर्करा, गूगल, दशांग और पंचांग धूपको मिलाकर उससे दश सहस्र हवन करनेसे इन्द्र भी वशमें हो जाता है । औरोंकी तो क्या कथा है ॥ ४७ ।। इतिश्री हेलाचार्य प्रणोत अर्थमे श्रीमान् इन्द्रनन्दि मुनि विरचित प्रन्थमें ज्वालामालिनी कल्पकी, प्राच्य विद्यावारिधि काव्य साहित्य तीर्थाचार्य श्री चन्द्रशेखर शास्त्रो कृत भाषाटीकामें "वश्य यंत्र अधिकार" नामक षष्ठ परिच्छेद समाप्त हुआ।। ६ ।। , .
सप्तम परिच्छेद ।
[ ९१
अथ सप्तम परिच्छेद
सर्व वशीकरण तिलक
शरपुंखी सहदेवी तुलसी कस्तूरिका च कर्पूरं ।
गौरोचना गजमदो मनः शिला दमन कश्चैव ॥१॥
अर्थ-शरपुंखी, सहदेवी, तुलसी, कस्तूरी, कपूर,
गौरोचन, गजमद, मनःशिला, दमनक ॥ १ ॥
जातिशमीपुष्पयुगं हरिकान्ता चेति दिव्यतंत्रमिदं ।
समभागेन ग्रहीतं तिलकं कुरु भुवनवश्य करं ॥२॥
अर्थ-जातिपुष्प, शमीपुष्प और हरिकांताको समभाग
लेकर तिलक करनेसे सब लोक वशमें हो जाते हैं, यह
दिव्य तंत्र है ॥ २॥
लोक वशीकरण तिलक और अंजन
एलालवंगमलयजतगरोत्यलकुष्टकुकुमोशीरः ।
गौरोचनादिकेशरमनशिला राजिकाकुटजं ॥३॥
अथा-इलायची, लौंग, चन्दन, तगर, कमल, कूट,
कुंकुम, उशीर, गौरोचन नागकेशर, मनशिल, राजिका (लखों).
कुटज ॥ ३ ॥
९२ ।
ज्वालामालिनी कल्प।
हिक्का तुलसी पनकमिति समभागं मुषारमलिलेन ।
पुष्पे चन्द्राभ्युदये मुकन्यकापेषयेत्सर्वं ॥४॥
अर्थ-हिक्का, तुलसी और पद्मकको समभाग लेकर पुष्य
नक्षत्रमें चंद्रोदय होनेपर शीतल जलसे कन्यासे पिसवावे ॥४॥
तिलकं कुर्य्यादमुना विदधात्वथवांजनंतथान्योन्वं ।
तिलकत्रिभुवनतिलको गजमदकुनटिशमीपुष्पैः ॥ ५॥
अर्थ-गजमद, कुनटि, शमीपुष्प इसका तिलक तथा
अंजन दोनों ही तीन लोकको जीतते हैं ॥ ५ ॥
सर्व वशीकरण तिलक
नरकन्दपत्रकन्याहिमपद्मोत्पलसुकेशरं कुष्टं ।
हरिकान्तामलयरुहं विकृतिस्तिलको जगद्वशकृत् ॥ ६॥
अर्थ-नरकन्द, पत्रकन्या, हिम, पद्म उत्पल, केशर,
कुष्ट, हरिकान्ता, मलयरुह और विकृतिका तिलक सम्पूर्ण
जगतको वशमें कर देता है ॥ ६ ॥
सर्व वशीकरण तिलक
कनकसहजातपुष्पैमलनजनृपलोचनामृगमदैश्च ।
समभागेन ग्रहीतैस्तिलकं त्रैलोक्यजनवशकृत् ॥ ७ ॥
अर्थ-कनक पुष्प, सहजात पुष्प, मलयज, नृपलोचन,
और कस्तूरीको ममान भाग लेकर तिलक करनेसे तीन लोक
वश ने हो जाते हैं ॥ ७ ॥
सप्तम परिच्छेद ।
मुख सुगंधि कर तिलक
पावकवर्जितलक्ष्मी सहदेबी कृष्ण मल्लिका तुलसी ।
हरिकांता नरकंदेश्वरि शीतोशिरपिकाश्च ॥ ८ ॥
अर्थ-बिना अग्निकी लक्ष्मी सहदेवी कृष्णमल्लिका तुलसी
हरि कांता नरकंद ईश्वरि शीत शिर पक्क ॥ ८॥
जातिशमीकुसुमयुगं दमनक गौरोचनापमार्गश्च ।
काश्मीरकायंकमृगमद धतूरकमरुगपत्राणि ॥ ९ ॥
अर्थ-जाति पुष्प शमी पुष्प दमनक गोरोचन अपामार्ग
काश्मीरक कार्यक मृगमदधतूरा अरुग पत्र ॥ ९ ॥
शर पुल कनैति च समभागग्नहीतदिव्य शुभ तंत्रैः ।
पुष्पार्के संयुक्त र्मुख वासो भवे तिलकः ॥ १० ॥
अर्थ-शरपुर और कनैतिको समान भाग लेकर पुष्य
नक्षत्रम तिलक करनेसे मुखमें सुगंधि होती है ॥ १० ॥
सर्व वशीकरण अंजन
लोहरजः शरपुची सहदेवी मोहिनी मयूरशिंखा ।
काश्मीरकुष्टमलयजकप्पू रशमीप्रसूनं च ॥ ११ ॥
अर्थ-बोहरज शरपुङ्खी सहदेवी मोहिनी मयूरशिखा
काश्मीर कुष्ट मलयज कपूर शमी पुष्प ॥ ११ ॥
बालामालिनी कल्प।
राजावर्तभ्रामकदिवसकरावतमदजटामांसि ।
नृपपूलिकेशचंदन बालागिरिकर्णिका श्वेता ॥ १२ ॥
अर्थ-राजावर्त भ्रामक दिवस कर आवर्तमद जटामांसी
नृपपूलि केशर चंदन बालागिरि श्वेत कर्णिका ॥ १२ ॥
श्रोतोंजन नीलांजन सौवीराजन रसांजनान्यपि च ।
पद्माहि सिंह केशर शार्दूल नखं च विकृतश्च ॥ १३ ॥
अर्थ-श्रोतांजन नीलांजन सौवीरांजन रसांजन पद्म
अहिसिंह केशर शार्दूल नख विकृत ॥ १३ ॥
गौरोचनाऽश्व बंदन हरिकान्ता भृङ्ग तुत्थ मित्येषां ।
चूर्ण मलक्तक पटले विकी- परिवेष्ट्य कुरुवति ॥ १४ ॥
अर्थ-गौरोचन अश्व वंदन हरिकांता मृग और तुत्थके
चूर्णको अलक्तक पटल पर बखेर कर लपेट कर बत्ती
बनावे ॥१४॥
सूत्रेण पंचवर्णेन परिवृतां भावयेत् तरुक्षीरै ।
कारुक कुच भव पयसा पुनरपितां भावयेत्सम्यक् ॥ १५ ॥
अर्थ-फिर उस बत्तीको पांच रंगके तागोंसे लपेटकर
वृक्षोंके दूधमें भावित करे और उस बत्तीको कारुकीके दूधमें
मावित करे ॥ १५॥
वातया प्रदीपं विबोध्य कपिलाघृतेन सिद्धस्थाने ।
धतूरभंग मर्दित नवखप्पजनं द्रियते ॥ १६ ॥
सप्तम परिच्छेद।
। ९५
अर्थ-उस बत्तीको सिद्धस्थानमें कपिला गऊके घीमें
डालकर दीपक जलाये और फिर धतूरा और भांग मले हुए
नए खर्पटक पर अंजन बनावे ॥ १६ ॥
ॐ हरिणी हरिणी स्वाहा मंत्र पठतांजनं दाय्यं ।
प्रपठं स्तमेव मंत्र करोतु नयनांजनं चापि ॥ १७ ॥
अर्थ_ॐ हरिणी हरिणी स्वाहा ।"
यह मन्त्र पढता हुआ अंजन बनावे । और इसी मंत्रसे
अंजनको आंखोंमें भी लगावे ॥ १७ ॥
सकल जगदेकरंजनमंजनमिदमातनोति सुभगस्त्वं ।
स्त्रीपुरुषराजवश्यं करोति नयने द्वयं भक्त ॥ १८ ॥
अर्थ-इस संपूर्ण जगतके एक ही अंजनको आंखों में
लगानेसे सुन्दरता बढती है । और स्त्री-पुरुष, तथा राजा तक
वशमें हो जाता है ॥ १८॥
सुखदायक अंजन
भ्रामकहिमनीलांजनबालालक्ष्मीसुमोहिनीभक्ताः ।
व्याघ्रनखी हरिकांतावरकंदे रोचनायुक्त ॥ १९ ॥
अर्थ-भ्रामक, हिम, नीलांजन, बाला लक्ष्मी, सुमोहिनी,
भक्ताव्याघ्रनखी, हरिकांता, वर कन्दगौरोचन, और ॥ १९॥
केकिखेत्येतेषामलक्तपटले विलिख्य संचूर्ण
प्रागुक्त विधिसमेतं जनरंजनमनरंजनं तदिदं ॥ २० ॥
९६]
ज्वालामालिनी कश्प।
अर्थ-मयूरशिखाका चूर्ण, अलक्तक पटलपर बखेरकर
पूर्वोक्त विधिसे अंजन बनाने । यह अंजन पुरुषोंको प्रसन्न
करनेवाला है ॥ २० ॥
सर्व सुखदायक अंजन
हरिकान्ता केकिशिखा शरपुखी पूतिकेशसहदेव्यः ।
हिममदराजावत विकृतिः कन्यापुरुषकंदः ॥२१॥
अर्थ-हरिकांता, मयूरशिखा, शरपुंक्षी, पूतिकेश,
सहदेवी, हिम, मद, राजा, वर्त, विकृति, कन्या, पुरुष,
कंद ॥ २१ ॥
पुरुपद्मकेशरं पामोहिनीतिसमभागतः कृतं ।
चर्ण प्राविधियुतमंजलमिदमखिलजगद्रंजनं तत्थं ॥ २२ ॥
अर्थ-पुरु पद्मकेशर और पामोहिनोको समभाग लेकर
पूर्वोक्त क्रमसे अंजन बना कर सेवन करे तो समस्त जगतको
आनंद हो ॥ २२ ॥
सुखदायक अंजन
शार्दूलनखिभ्रामकनीलांजनमोहिनसुकपरं ।
गौरोचनायुतं विधिवदं जनं लोकरंजनकृत् ।। २३ ॥
अर्थ-शार्दूल, नखि, भ्रामक, नीलांजन, मोहिनी, कपूर
और गौरोचनका पूर्वोक्त विधिसे बनाया हुआ अंजन लोकोंको
प्रसन्न करता है ॥ २३ ॥
सप्तम परिच्छेद ।
[९७
सर्व वशीकरण अञ्जन
काश्मीरकुष्टमलयजकमलोत्पलकेशरं च सहदेवी।
भ्रामकन्यानृपहरिकांताविकृतिर्मयूरशिखा ॥ २४ ॥
-
अर्थ-काश्मीर, कुष्ट, मलयज, कमल, उत्पल, केशर,
सहदेवी, भ्राम, कन्या, नृप, हरिकांता, विकृति, मयूर-
शिखा ॥ २४॥
कप्पररोचनमोहिनीनीलांजनकुकुमं च समभागं ।
पूर्वविधियुक्तमंजनमिदमखिलजगद्वशीकरणं ।। २५ ॥
अथे--कपूर, गौरोचन, मोहिनी, नीलांजन और कु'कुमको
समान भाग लेकर पूर्वोक्त विधिसे अंजन सेवन करनेसे सब जगत
वशमें हो जाता है ॥ २५ ॥
वश्य प्रयोग (१)
एरंडकभक्तकरसेन दिवसत्रयेण पृथकृष्णतिलाः ।
भाव्याः शुनीपयोनिजमूत्रेणानंगजयबाणाः ॥ २६ ॥
अर्थ-काले तिलोंको, एरण्डक रस, भक्तक रस, कुत्तीका
दूध, और अपने मूत्रमें तीन दिन तक भावित करै तो यह
कामदेवकी विजयके बाण बन जावेंगे ॥ २६ ॥
९८] ज्वालामालिनी कल्प वश्य नमक रक्तकणवीरविकृतिद्विजदडी वारुणी भुजंगाक्षी । लजरिकागोवंदिन्ये तटिकाः प्रकृत्य बहूः ॥ २७ ॥ अर्थ-रक्त, कणबीर, विकृति, द्विजदंडी, वारुणी, भुजंगाथी, लजरिका, और गोवंदिनी, इनकी बहुत सी गोलियां बना कर ॥ २७ ॥ ग वटिकाभिः सह लवणं प्रक्षिप्य सुभाजने स्वपत्रेण । परिभाब्य पचेत्पश्चालवणमिद भुवन बशकारी ।। २८ ।। अर्थ-इन गोलियों के साथ एक वरतनमें नमक और अपना मत्र डाल कर भावित करे तो यह नमक लोकको वशमें करनेवाला होता है ॥ २८ ॥ वश्य तेल (१) पंचदशा नव चतुः षड् भागान् विकृतिनभक्त मोहनिका । लज्जरिकाणां ज्ञात्वाभावस्यायां शनैव्वारे ॥२९ ।। अर्थ-शनिवारी अमावस्याके दिन, विकृति पांच भाग, नमक नव भाग, मोहनिका च्यार भाग और लञ्जरिका छह भाग लेकर ॥ २९ ॥ संपिष्याजापयसा कल्का मजापयोयुतं कथयेत् । अविर्ते क्वाथे द्वितीयभागं क्षिपेतत्र ।।३० ।।
तेल डालकर सप्तम परिच्छेद 1 [ ९९ अर्थ-सबको बकरीके दूधमें पीसकर आधेका बकरीके दूधमें काथ बनावे । क्वाथके आधा उठ आने पर दूसरा भाग भी उसीमें डाल दे ॥ ३० ॥ मधुनो द्विगुणं तैलं वाथसमं मिश्रित पचेद्विधिना । वनितामदनाभ्यंगनतैलमिदं त्रिजगतीवश कृत् ॥ ३१ ॥ अर्थ-फिर उसमें बराबर मधु और दुगुना सबको विधिपूर्वक पकाकर तेल बनावे । यह तेल स्त्रियों के लगानेसे तीन लोकको वशमें कर लेता है ॥ ३२ ॥ वश्य तेल (२) स्वमेव मृताहि सुखे क्रमुक फलानां दलानि निक्षिप्य । तन्म्दोमयलिप्तं संस्थाप्यकांतशुभदेशे ॥ ३३ ॥ अर्थ-स्वयं मरे हुए सपके मुखमें क्रमुक फलके टुकडे डाल कर उसको गोबरसे लिपे हुए एकांत उत्तम स्थानमें रखकर तान्यादाय दिनै निभिरथकनक सुफलपटे समास्थाप्य । गिरिकणिकेंद्रवारुण्यनलहलिन्यांगनाचूर्णैः ॥ ३३ ॥ अर्थ-उसको तीन दिनमें और फिर उसको गिरि, कर्णिका, इन्द्रवारुणी, और अनल हल्यंगनाके चूर्ण ॥३३॥ मंदारशुनिक्षीरैः स्वमूत्रसहितैर्विभावयेद्भहुशः कुलिकोदये शनैश्चवारेकनकेंधनो स्याग्नौ ॥ ३४ ॥ - -
.
१००
ज्वालामालिनी फ्ल्प ।
अर्थ-मंदारके दूध, कुत्तीके दूध और अपने मूत्रमें,
बहुत प्रकारसे भावना दे। फिर शनिश्चर वारको कुलिकाका
उदय होनेपर धतूरेके ईंधनकी आगमें ॥ ३४ ॥
गुजा सुगन्धिका कनकबीजचूर्णाहिकृतितिलतलैः।
रद्ध पितानि भाजनविवरेणानंगशस्त्राणि ॥ ३५ ॥
अर्थ-गुल्जा, सुगन्धिका और कनकबीज सर्प कृति तथा
काले तिलोंके तेलके साथ पकाकर सेवन करे । यह तेल काम-
देवका शस्त्र है ॥ ३५ ॥
वश्य तेल (३)
गोबंधिनींद्रवारुण्यवनीदरकर्णिका सुगंधिनिका ।
खरकर्णीत्येतेषां चूणौँः सहपृगशकलानि ॥ ३६ ॥
अर्थ-गोबन्धिनी, इंद्रवारुणी, अवनी, दरकर्णिका,
सुगंधिनिका और खरकीके चूर्ण के साथ पूग फलके
इकडोको ॥ ३६॥
उन्मतकमांडगता न्यात्मसुमूत्रेण रक्त करवीर--
द्रवरासभीशुनीकुचपयसा भाव्यानि तानि पृथक् ॥ ३७ ॥
अर्थ-उन्मतकके बरतनमें रखकर अपने मूत्र, रक्त-
करवीरका रस, गधी और कुत्तीके दूधसे पृथक् पृथक्
भावित करे ॥ ३७ ॥
\\HAMAYA सप्तम परिच्छेद । [ १०१ उन्मतबीजगुञ्जासुगन्धिकासप्पंकृतितिलतैलैः । कनकेन्ध नाग्नि सद्ध पितानि कुसुमास्त्र शास्त्राणि ॥ ३८ ॥ अर्थ-फिर उसको उन्मतकके बीज, गुजा, सुगन्धिका सप्प, कृति और तिलके तेलोंके साथ कनकके इंधनकी अग्निपर पकाकर तेल बनावे । यह तेल कामदेवका शस्त्र होता है ॥३८॥ वश्य प्रयोग (२) कन्येद्रवारुणिनागसप्पपातालगरुडरुद्रजटा- चूर्णयुतैः ऋमुकफलान्यात्ममलैर्विपुलकनकफले ॥ ३९ ॥ अर्थ-कन्या, इंद्रवारुणि, नागसर्प, पाताल, गरुड़ और रुद्रजटाके चर्णके साथ ऋमुकफल अपने पांचों मल और बडे धतूरेके फलको ।। ३९ ॥ संभाव्य शुनिदुग्धप्लुतानि सद्ध पितानि पुनः । जैत्रास्त्राणि मनोजस्येत्युक्त गांगपति गुरुणा ॥ ४० ॥ अर्थ-कुत्तीके दुग्धमें मावित करके धूपमें सुखानेसे यह कामदेवके विजयी शस्त्र बन जाते हैं। ऐसा गांग पति गुरुने ॥ ४० ॥ कामबाण चूर्ण रुद्रजटा सितगुज्जा लञ्जरिकाः संनिधाय सर्पास्ये । दिवसै स्त्रिभिरादाय प्रचूर्णक्षिपयेत्स्वमलैः ॥ ४१ ॥ कहा Mw १०२] ज्यालामालिनी कहप। अर्थ-रुद्रजटा, श्वेत गुञ्जा और लज्जरिकाको सप्पके मुखमे रखकर तीन दिनके पश्चात् निकालकर सबका चूर्ण करे । और अपने पांचों मलोंमें डाल दे ॥ ४१ ॥ गोमय लिप्ते हरि निकंदे परिभाव्य पाचयेद्विधिना । चूर्णमिदं सकलजगद्वश्यकरं कामबाणाख्यं ॥ ४२ ॥ अर्थ-किर इसके गोबरसे लिपे हुए हरिनिकंद में भावित करक विधिपूर्वक पकावे । यह समस्त जगतको वशमे करनेवाला कामबाण नामका चर्ण है ॥ ४२ ॥ दशरारिक चूर्ण कनकेन्द्रवारुणीखर कर्णिकात्रिसंध्यानां । विस्फोटनलञ्जरिकाद्विजदंडीनां वहिज़टिका ॥ ४३ ॥ अर्थ-कनक, इंद्रवारुणी, खर कणिका और त्रिसंध्या, बिस्फोटन, लञ्जरिका और द्विजदडीके साथ, सबकी गोली बनाकर ॥ ४३ ॥ भांडे निधाय तस्मिन् पृथकर मरीचलवणसर्षप शुठी। धान्याजमोदचर्णकहरितककमुकपिप्पल्य. ॥ ४४ ॥ अर्थ-बरतनमें रक्खे और उसीमे पृथक २ मिरच, नमक, सरसों, सोंठ, धान्य, अजमोदका चूर्ण हरीतक, क्रमुक और पीपलको ।। ४४ ॥
शप्तम पविच्छेद। [ १०३ . " भाव्याः स्वमलैः सम्यक् तद्ध पै द्ध पिताः पृथक् पृथगिति च । दशरारि कामि धानाः सकलजगद्वश्यकारिण्यः ॥ ४५ ॥ अर्थ-अपने मतोंमें भावित कर के सुखावे । यह सब जगतको वशमें करनेवाले दशरारिक नामवाले चूर्ण हैं ॥४५॥ योनिशोधक लेप द्विरदमदकुष्टमृगपदक्रप्पू रोन्मतपिप्पली कामं । रुद्रजटामधुसैंधवनागरमुस्तासुयष्टीकं ॥ ४६ ॥ अर्थ-गजमद, कूठ, मृगजद, कपूर, उन्मत्त, पिपलि, काम, रुद्र, जटा, मधु, सैंधव, नागरमोथायष्टीक ॥४६॥ सूरणटंकणपिपलिशपुखीमातुलिंगचणकोष । महकाम्लसमेतं भगनिर्जरकारणं लिप्तं ॥४७॥ अर्थ-सूरण, टंकण, पिप्पलि, शरपुखी, मातुलिंगी, चने, सहकार और आंवला लेपे जानेसे योनिका संशोधन करते हैं ॥ ४७ ।। कपूरैलामाक्षिकलञ्जरिकायुक्तपिप्पलीकामं । भगनिज्जैरं प्रकुर्यात् कुरुटिकाक्षीरसंयुक्त ॥ ४८ ॥ अर्थ-कपूर, इलायची, माक्षिक, लञ्जरिका, पिपलि और कामको कुत्तीके दूध में पीसकर लेप करनेसे योनि संशोधन होता है ॥४८॥ सन्तानदायक औषधि शिपफणीफलचव्यचित्रकमहीकूश्माडिनिःपर्णिकाः । , १०४ ] घाटामालिनी पल्प । - . ब्रह्मीददुरपूयिका मितबराहाकाखल्यन्विता ॥ पाठा लक्ष्मणिकत्यमून्यसितगोदुग्धेन पिष्टापिचेत् । वंध्या पुप्पवती रबस्त साहिता पुत्रं लभेत ध्रुवं ॥ ४९ ॥ अर्थ-शिप, फणी, फल, चव्य, चित्रक, मही, कूप्मांडी, निःपर्णी, ब्रह्मी, दर्दुर, श्वेतवराही, खली, पाठा और लक्ष्मणि- काको गऊके दूधमे पीसकर सेवन करनेसे वंध्या स्त्री भी ऋतु- कालमें पति संगम करनेसे निश्चयपूर्वक पुत्रको पाती है ॥४९॥ त्वामृतौपधमिदं दिवसचतुष्टयमुभावपि स्थित्वा । नि त्यैकोद्देशे भुजेयातां मधुरमन्नं ॥ ५० ॥ अर्थ—इस अमृत औषधिका पान करके दम्पति चारदिन तक ठहरकर उत्तम स्थानमे भोग करे मधुर अन्नको खावे ॥५० स्नात्वा चतुर्थदिवसे स्वमत संकल्पमाप्यनिशिवनतानि । पुत्री पुत्रं लभते वामेतरपाचे संसुप्ता ।। ५१ ॥ अर्थ-चौथे दिन स्नान करके स्त्रियां अपने पतिके संकल्पसे उसकी दाहिनी ओर सोकर पुत्र और बाई ओर सोकर पुत्रियों को पाती है ॥ ५१ ॥ इतिश्री हेलाचार्य प्रणीत छर्थ में श्रीमत् इन्दनन्दि मुनि बिरचित अन्धमें ज्वालामालिनी कल्पकी, प्राच्य विद्यावारिधि काव्य साहित्य तीर्थाचार्य श्री चन्द्रशेखर शास्त्रो कृत भाषाहीकामे 'चश्य अधिकार" नामक सप्तम परिच्छेद समाप्त हुआ ॥ ७ ॥ ।
अधम परिच्छेद । [ १०५ अश अष्टम परिच्छेदः वसुधारा स्नानके स्थानकी विधि ईशानाशाभिमुखाबुपातसंयुक्तरम्यशुचिदेशे सम्माजिते कपिलागोमयदधिदुग्धघृतमूत्रैः॥१॥ अर्थ-एक पवित्र स्थानमें ईशान कोणकी ओर मुख करके पहले जल डाल कर फिर उस स्थानको कपिला गौके गोबर, दही, दूध, घी, और मूत्रसे, साफ करे ॥१॥ नामकला पुर्णेन्दुसमेतं मध्ये विलिख्य तस्य वहिः । कोकनद कुमुदकुवलयरक्तोत्पलजलजकुसुम युतं ॥२॥ अर्थ-इसके पश्चात् उस स्थानके मध्यमें नामको "आं ई ऊ एं" बीजोंके बीचमें लिखे। और उसके चारों ओर कुमुद, लाल कमल, नील कमल, और श्वेत कमल, अपने पुष्पों सहित ॥ २॥ , चक्राहुबलबलाकासारसकल हंस मिथुनसंयुक्त। कर्कटककूर्म दईर ऊपमकरतरतरंगयुतं ।। ३ ।। अर्थ-चकवा, बगुला, बलाका, सारस, सन्दर हंसोंके र - १०६ । रामामालिनी कल्प। युगल, केकडा, कछवा, मैंडक, मछली, और नाकेको चंचल नलकी तरंगोंसे युक्त ॥ ३ ॥ चूर्णेन पंच वर्णेन परिविलिखेद्विपुलपशिनिखंडं । तद्वहिरपि चतुरस्त्रमंडलमालिख्य विधिनैव ॥ ४ ॥ अर्थ और बडे२ कमल समूहोंसे युक्त पंचवर्ण चूर्णसे बनाये । और उसके चारो ओर विधिपूर्वक एक चौकोर मंडल बना देवे ॥४॥ कोणेषु सत्यमलयजककुमकुसुमार्चितान् धवल वर्णान् । सहिरण्यान् पूर्ण घटान् विधाय वरवीजपूरमुखान् ।। ५।। अर्थ-उस मंडलके कोनों चंदन कैकुम और पुष्पोंसे पूजा किये हुए श्वेतवर्णवाले, स्वर्णयुक्त और सुदर बीजोंसे मुख तक भरे हुए घडोंको रक्खे ॥ ५ ॥ तदुपरि विधाय सत्पुरुषमंडपं तस्य मध्य देशेतु । चक्री कृत रंध्रनवकं बिलंबमानं घटं बद्धा ॥ ६ ॥ अर्थ-इतना कार्य करनेके पश्चात् , उस मंडलके ऊपर सुदर मडप तान देवे । और उसके बीचमें एक ऐसा घडा लटका दे । जिसमे गोलाकार बराबर२ नौ छिद्र हों ॥ ६ ॥ मृत्युञ्जयारव्ययंत्रं नामसमेतं विलिव्यं भूजंदले । सिक्थक्वेष्टितमेतत् सहिरण्यं निक्षिपेत्कुम्भे ॥ ७ ॥ " अष्टम परिच्छेद । [ १०७ . अर्थ-फिर भोजपत्रपर मृत्युंजय नामके यंत्रको नाम सहित लिखकर और मोमसे लपेटकर सुवर्ण सहित उस घडे में डाल दे ॥ ७॥ मृत्सदेवीसौम्याक्षीरतरुत्वकसुवर्णहरिकान्ता- पक्कोशीरहरिद्रादूर्वाकाश्मीरकुसुमानि ॥ ८ ॥ अर्थ-फिर मिट्टी, सहदेवी, दूधवाले वृक्षोंकी छाल, सुवर्णलता, हरिकांता, पका हुआ उशीर, हलदी, दूब और केशरके फूल ॥ ८॥ मलयरुहागुरुचंदनमित्येतान्यंबुना समापिष्य । पंच दशभिश्च मंत्रः प्रत्येक मंत्रयेत्क्रमशः ॥९॥ अर्थ-लाल चंदन और सफेदचंदनको जलसे पीसकर पन्द्रह मंत्रों से प्रत्येकसे पृथक् पृथक् अभिमंत्रित करे ॥ ९ ॥ एकैकोनोद्वर्तनकेन समुद्वत्यो देवदतं तं । मध्यपतितैम्स लैस्तैः पुतलिका कारयैदेकां ॥ १० ॥ अर्थ-और एक एक करके प्रत्येकसे उस साधक देव दत्तका उबटन करके उबटन करने में जो मल नीचे गिरे उसे पृथ्वीपर न गिरने देकर उससे एक मूर्ति बनावे ॥ १० ॥ प्रवराष्टदिशापालकपुतलिकाः स्वस्वर्णसंयुक्ताः । लक्षण युक्त दिव्या श्चकारयेत्सिद्ध मृतिक्या ।। १ ।।
AR
१०८]
वारामालिनी पल्प ।
अर्थ-फिर सिद्ध मिट्टीसे अपने अपने वर्ण और सब
लक्षणोंसे युक्त आगे लोकपालोंकी दिव्य मूर्तियां बनवावे ॥११॥
सिद्ध मिट्टीकी परिभाषा
राजद्वारचतःपथकुलालकरुवामलूरसरिदुमय तटः
द्विरदरदवृषमशृङ्गक्षेत्रगता मृतिका सिद्धा ॥ १२ ॥
अर्थ---राजद्वार, चौराहे, कुम्हारके हाथ, उत्तम नदीके
दोनों किनारे, हाथी दांत, और बैलके सींगके ऊपरकी मिट्टी
सिद्ध मिट्टी कहलाती हैं ॥ १२ ॥
असितं पीतं लोहितमसितं हरितं शशिप्रभं कृष्णं ।
बहुवर्ण सितवर्ण चरुकं गंधादिभियुक्त ॥ १३ ।।
अर्थ-फिर काली, पीली, लाल, काली, हरी, स्वेत
काली, बहुत रंगवाली और सफेद चंदन, गंध आदिसे
युक्त ।। १३ ॥
नव पटलिका सुदत्या प्रथमायां स्थापयेन्मलप्रतिमां ।
शेषास्विद्रादीनां प्रतिमान् संस्थापयेत्क्रमशः ॥ १४ ॥
.
-
अर्थ-नव पटडियों को लेकर पहिली पर उस मलवाली
प्रतिमा को और शेष आठों पर क्रमशः इन्द्र आदि आठों लोक-
पालोकी प्रतिमाओंको स्थापित करे ॥ १४ ॥
अप्तम परिच्छेद । १०९ WALK Menue HATANAMAHALWe वहिरप्येके देशे मंडलमन्वद्विलिख्य च प्राग्वत् । तत्रोष्णवारिणा स्नापयेत्पुरा देवदत्तं तं ॥ १५ ॥ अर्थ-बाहर भी पूर्व के समान एक और मंडल बनाकर वहां पहले उस साधक देवदत्तको उष्ण जलसे स्नान करावे ॥ १५॥ - साधारण पूजन विनयं ज्वालामालिन्युपेतमय हूं युगं ततः सर्लान् । अपमृत्यून द्विघातं सं वं मं देवदत्त मथ रक्ष युगं ॥ १६ ॥ शांतिं कुरु कुरु सद्वरुणां देवते निज बलिं च गृह्ण युगं । स्वाहा मंत्रं प्रपठन निवर्द्धयेत् समल चरुकेण ॥ १६ ॥ अर्थ-निम्नलिखित मंत्रको पढ़ता हुआ मलवाली मूर्तिको चरु देवे ॥ १७ ॥ मंत्र-ॐ ज्वालामालिनि हुँ२ सर्वाय मृत्यून् घातय२ सं वं मं देवदत्तं रक्ष२ शांतिं कुरु कुरु सद्वरुण देवते निज बलि. गृह २ स्वाहा ॥ १७ ॥ एवं निवर्धयित्वा चरुकं मंत्रेण निक्षिपेन्नद्यां । दिग्पालक चरु कैरपि निवर्द्ध येत्स्वेन मंत्रेण ॥ १८ ॥ अर्थ-इस प्रकार उस चरुको देकर नदीमें विसर्जित
११०]
जवालामालिनी छल्प ।
कर दे और आगे दिक्पालोंके चरुको भी इस मंत्रसे
देकर ।। १८॥
ॐ कूट पिण्ड शिखिनी संवं मं हं च देवदत्तस्य ।
शांति तुष्टि पुष्टिं कुरु युगं रक्ष युगलं च ।। १९ ।।
दिग्देवते बलि गृहण मंत्र सराब होमान्तं ।
एवं निवर्ध्य विधिना बलिं क्षिपेत्स्वदिति जल मध्ये ॥२०॥
ॐक्ष्म्ल्यू ज्वालामालिनि सं वं मं हं देवदत्तस्य शांति
तुष्टिं पुष्टिं कुरु२ रक्ष२ दिग्देवते बलिं गृह्ण २ स्वाहा ।
इत्यष्ट दिग्पालक विवर्धन
अर्थ-विधिपूर्वक सुन्दर जलमें विसर्जित कर दे ।
मंत्र- म्ल्यू ज्वालामालिनि सं वं मं हं देवदत्तस्य
-शांति तुष्टि पुष्टिं कुरु कुरु रक्ष२ दिग्देवते बलिं गृह्ण २ स्वाहा ।"
दिव्याम्बरभूपाकुसुममलजालं कृतोतमशरीरः।
उत्थाप्य तत्प्रदेशाव्रजतु ग्रहपादुकोढः ॥ २१ ॥
अर्थ-फिर दिव्य वस्त्र आभपण पुष्प और सुगन्धि
आदिसे अपने शरीर पर शोभित करके वहांस उठकर खडाऊ
'पर चढ कर चले ॥ २१ ॥
कुसुमाक्षतांजलिपुटोललाटहस्तः प्रदक्षिणीकृत्यः ।
. तन्मंडलं ततोसावभिमुखमुपविश्व तन्मध्ये ॥ २२ ॥
6ष्टम परिच्छेदः -- अर्थ-पुप्प और अक्षत दोनों हाथोंमें लेकर मस्तक पर हाथ रक्खे हुए उस मंडलकी प्रदक्षिणा देकर सामने मुख करके उसके मध्यमें बैठ जावे ॥ २२ ॥ Ohco वसुधारा मन्त्र "ॐ वसुधारदेवते ज्वालामालिनि जल २ विजल विजल सुजल २ हेम२ शीतल २ देवि कोटिभानु चन्द्रांशु कुरु २ त्रिभुवनसंक्षोभिणि क्षा क्षीं सूक्षौं क्षः देवि त्वं आत्मपरिवार देवता सहिते देवदत्तस्य -तुष्टिं पुष्टिं शीघ्र वर देहि २ सद्धम्श्री वलायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धि कुरु२ सर्वोपद्रवमहाभयं नाशयर सर्वाप मृत्यून् घातय२ शीघ्रं रक्ष२ नव ग्रहा एकादशस्था सर्वे फलदा भवन्तु ह्रां ह्रीं ह्र ह्रौं हः स्वाहा सर्व वश्यं कुरुर क्रौं क्रौं वं मंहं सं तं स्वाहा ।" वसुधार मंत्रमिदं प्रपटंस्तीर्थोदकं च गौमूत्रं गव्यानि पंचतकं दधि त्रिमधुरं तथा क्षीरं ॥ २३ ॥ अर्थ-इस वसुधारा मंत्रको पढता हुआ तीर्थों के जल, गौमूत्र, और गऊके पांचों गव्य तक्र,दही, त्रिमधुर, दूध ।।२३॥ वर पंच पल्लवोदकमपि च प्रक्षिप्य लंबमान घटे । संस्थाप्यावस्थं तं पश्चाद्गंधोदकं दद्यात् ॥ २४ ॥ अर्थ-पांचो उत्तम पत्ते और जलको उस लटकते हुए 'घडे में डालकर फिर उसको नीचे रखकर गंधोदक देवे ॥२४॥ , ११२ व रामानो पला । पिष्टममयानि नवग्रहरूपाणि स्वणवर्णयुक्तानि । तान्यात्मवचनचरुकस्योपरिसंस्थापयेत् प्राग्वत् ॥ २५ ॥ अर्थ-फिर पिसे हुए द्रव्यके स्वर्ण वर्णवाले, नवग्रहोंके रूप बनवा कर उनको पूर्ववत् अपने चरुके साथ स्थापित करे ॥२५॥ रक्तौ मास्करभौमौपीतौ बुधसुरगुरू शशांक शुक्तौ । श्वेतौ च शनिश्वरराहुकेतवः कृष्णवर्णाः स्युः ॥ २६ ॥ अथा-सूर्य और मंगलको रक्त वर्ण, बुध और गुरुको पीत वर्ण, शुक्र और चंद्रमाको श्वेत वर्ण तथा शनैश्चर राहु और केतुको कृष्ण वर्णका बनावे ॥ २६ ॥ सुरभितरमलयजाक्षतकुसुमोज्वलदीपधूपसंयुक्तः। चस्कैनिवेदयेतैः क्रमेण तं त्वेतमंत्रेण ॥ २७ ॥ अर्थ-फिर अत्यन्त सुगन्धित, चंदन, अक्षत, पुष्प, उज्वल दीपक, धूप और चरुको, लेकर उनको निठा लिखित मंत्रसे दे ॥ २७ ॥ नवग्रह मन्त्र ॐ ज्वालामालिनि सर्वाभरणभूषिते ग्लौं२ हक्लौं२ क्लीं२ ल२ ल२ सर्वमृत्यून् हन२ त्रासय त्रासय हूँ हूँ शू२ हंसः फट घे२ सर्व रोगान् दह२ हन२ शीघ्रं देवदत्तं रक्ष२ नवग्रह देवते बलि गृह्ण २ घे२ स्वाहा ।
अष्टम परिच्छेद। ११३ एवं निवर्धयित्वा तं चरक निक्षिपेनदी मध्ये । स्नानोद्भवमंडल कं वरेणसहितेन मंत्रेण ॥ २८ ॥ अर्थ-इस प्रकार स्नानके पश्चात् उस मंडल में इस मंत्रसे चरु, देकर नदीमें विसर्जित करदे ॥ २८ ॥ स्नानान्तरमथ वस्त्रालंकाररत्नकलशाचं । नान्यस्य त प्रदेयं स्वयं ग्रहीतव्यमात्मयोग्यमिति ।। २९ ॥ अर्थ-स्नानके पश्चात् वस्त्र अलंकार और रत्न कलश आदिको दूसरेके लिये न देवे क्योंकि वह अपने योग्य होते हैं । परिदातुमलंक दत्वांबर भूषिताम्बरभूषणादि तस्यात्पत् । पवादन्यत्र शुचौ देशे संमार्जिते चतुष्कयुते ॥ ३० ॥ अर्थ-किन्तु अपने दूसरे वस्त्र आभूपण आदि दे सकता है। इसके पश्चात् चौक पूरे हुए अन्य पवित्र स्थानमें ॥ ३० ॥ बधातु ततः पश्चात् ग्रीवायामस्य देवदत्तस्य । रोगाय मृत्युहर्ति विद्यां मृत्युञ्जयां सद्यः ॥ ३१ ॥ अर्थ-इस देवदत्तकी गर्दनमें रोग अपमृत्युको नष्ट करनेवाले मृत्युजय नामके यंत्रको बांधे ॥३१॥ धौतसितवस्त्रपिहिते पट्टकपीते निवेद्य विधिनैव । अतिसुरभिपुष्पवृष्टि स्नानेन स्नापयेन्मंत्री ॥ ३२ ॥ मुख्य स्नान अर्थ-मंत्री इस प्रकार उसको श्वेत वस्त्र ढके पटडे पर विधिपूर्वक बैठाकर अत्यंत सुगंधित जलसे निम्नलिखित मंत्रसे स्नान करावे ॥३२॥ . हुए पीले ८ ११४ । न्वालामालिनी कल्प। "ॐ को ज्वालामालिनि ह्रीं क्लीं ल्लूद्रां द्रीं ह्रां आं क्रों क्षी देवदत्तं सुगंध पुष्पस्नानेन सर्वशांति कुरु२ वषट् पुष्पवृष्टि स्नानं मंत्र" एवं विधिना स्नातस्य देवदत्तस्य शिखिमती देवी। श्री सौरभ्यारोग्यं तुष्टिं पुष्टिं ददाति सदा ।। ३३ ।। अर्थ-ज्वालामालिनि देवि इस प्रकार स्नान किये हुये देवदत्तको सौभाग्य आरोग्य तुष्टि और पुष्टि निरंतर देती है ॥ ३३ ॥ आयुर्वर्द्धयति ग्रहपीडामपहरति हंति शत्रुभयं । नाशयति विक्षकोटि प्रशमयति च बहुविधान् रोगान् ॥३४॥ अर्थ-आयुको बढाती है। ग्रह पीडाको दूर करती है। शत्रु भयको नाश करती है। और बहुत प्रकारके रोगोंको शांत करती है ॥ ३४॥ एत ज्वालामालिनोक्त सपिमृत्युनाशकं । वसुधाराव्यं स्नानं करोतु शांतिबिधिनियुक्त ॥ ३५ ॥ अर्थ-ज्वालामालिनीके द्वारा कहे हुये सब आप मृत्युके नाश करनेवाले इस वसुधारा नामके स्नानको शांति विधि पूर्वक करना चाहिये ॥३५॥ इतिश्री हेलाचार्य प्रणीत अर्थ में श्रीमद् इन्द्रनन्धि घोगींद्र विरचित अन्धमें छालामालिनी कल्पकी, प्राच्य विद्यावारिधि काव्य सहित्य तीर्थाचार्य श्री चन्द्रशेखर शात्री कृत आषाटीकामें "वसुधारा स्नानविधि" नामक अष्टम परिच्छेद समाप्त हुमा ॥८॥ .
नलम परिच्छेद । [ ११५ WANT अथ नवम परिच्छेदः नौराजन विधि परिमदितेन पिष्टेन कारयेत्सर्ववर्णयुक्तानि । प्रवराष्टमातृकानां मुखान्यलंकारसहितानि ॥१॥ अर्थ---मलकर पिसी हुई सिद्ध मिट्टीसे सर्व वर्ण युक्त पूर्वोक्त मुख्य अष्ट मात्रका देवियोंके मुख अलंकार सहित बनावे ॥१॥ बहुभक्षचरूकमलयजकुसुमाक्षतदीपधूपसहितेन । एकैकेन मुखेन तु निवत्येत्प्रतिदिनं विधिना ॥ २ ॥ अर्थ-और बहुत प्रकारके भक्ष्य, चरु, चंदन, पुष्प, अक्षत, दीप, और धूपसे प्रतिदिन एक एकके मुखका भोग लगावे ॥२॥ कूट ऊकांत भांत ठकारांबुधि सांत पिंड संभृतः । मंत्र निवधयेन्मातृके बलं गृहण गृहण हो मांते ॥३॥ . मल्व्यू, , , अर्थ-ॐ, क्ष्ल्यू, झम्ल्यू, बम्ल्यू, उम्ल्व्यू, कम्ल्यू, और मल्व्यू, बीजोंमें उस उस मातृकाका पूर्वोक्त क्रमसे नाम लगाकर ॥ 1 .
११६ ।
ज्वालामालिनी फल्प।
"मातृके बलिं गृह२ स्वाहा" मंत्रसे बलि देवे।
एकैकमपि निवर्धनमनेकदोपापहारि भवति नृणां ।
एवं निवर्धयित्वा जलमध्ये तं बलिं दद्यात् ॥ ४ ॥
अर्थ-एकर को ही बलि देनेसे पुरुषोंके अनेक दोष
नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार करके उस बलिको जलमें
विसर्जित करदे ॥ ४॥
काली च महाकाली मालिनी लान्या तथैव कंकाली।
सत्कालराक्षसीवरजंधे श्री ज्वालिनी तैब ॥ ५॥
अर्थ-काली, महाकाली, मालिनी, कंकाली, कालराक्षसी,
अग्निरूप वरजंघा ॥ ५ ॥
विकरालीवैतालीत्येतासां दिव्यदेवतानां तु ।
कृत्वा मुखानि लक्षणयुतानि सत्सिद्धमृतिकया ॥ ६ ॥
अर्थ-विकराली और वैताली, इन दिव्य देवियों के
लक्षण सहित मुख सिद्ध मिट्टीसे बनावे ॥ ६ ॥
तीक्ष्णनखदंष्ट्राग्राणि वृतनयनानि लुलितानि जिह्वानि ।
कुसुमाक्षतमलयजदीपधूपबहुभक्षयुक्तानि ॥ ७ ॥
अर्थ-इसके तीक्ष्ण नख, और डाट, गोलनेत्र, और
जीभ निकली हुई हो । इनका भक्ष पुष्प, अक्षत, चंदन, दीप
और धूप होता है ॥ ७ ॥
नवम परिच्छेद ।
। ११७
एकैकेनमुखेनप्रतिदिवसं कारयेन्निवर्धनकं ।
प्रारभ्य चतुर्दश्यां नवदिवसं सप्तमी यावत् ।। ८ ।।
अर्थ-इनमेंसे प्रत्येकके मुखमें प्रतिदिन बलि दे। यह
प्रयोग चतुर्दशीसे प्रारम्भ करके नव दिन अर्थात् सप्तमी तक
किया जाता है ॥८॥
वृद्धिकरमशुभनाशं कृत्वा नीराजनं शचिमंत्री।
शतर मुखरिपु मंत्रेण तु जलमध्ये तं बलिं दद्यात् ॥९॥
अर्थ-पवित्र मंत्री वृद्धिके करनेवाले, अशुभका नाश
करनेवाले, नीराजनको करके शत रिपुमंत्रसे जलमें बलि देवे ।
.
वीरेश्वराश बटुक: पंचशिराविघ्ननयकश्च महा।
कालश्चेत्येषां मुखानि पिष्टेन कार्याणि ॥ १० ॥
अर्थ-विरेश्वराश, बटुक, पंचशिरा, विघ्न नायक और
महा कालके मुखोंको भी पिसी हुई सिद्ध मिट्टीसे बनावे ।
उग्राणि लोचन त्रय युतानि मूर्द्धस्थ दीप्तदीपानि ।
बहुभक्षकुसुममलयजसुगन्धधूपश्चसहितानि ॥ ११ ॥
अर्थ-इनके उग्र तीन नेत्र, शिरपर चमकते हुय दीपक
और बहुत प्रकारका भक्ष, पुष्प, चन्दन और सुगन्धित
धूप हो ॥ ११ ॥
.
Arhal
११८]
ज्वालामालिनी कल्प।
तेनैकेन निवर्द्धयेन्मुखेन्द्रवैरिमंत्रेण ।
ग्रहरोगमारिपीडामपहरति बलि लेक्षिप्तः ॥ १२ ॥
अर्थ-इन्द्र वैरि मंत्रसे इनको बलि देकर नलमें फैंकनेसे
ग्रह रोग और मारि पीडा दूर होती है ॥ १२ ॥
दधिघृतमिश्रेण सुमर्दितेन शाल्योदनेन तत्कृत्वा ।
दुईनरदनदंष्ट्रं सुसिद्ध वागीश्वरी रूपं ॥ १३ ॥
अर्थ-फिर पिसी हुई सिद्ध मिट्टीमें दही, घी और
चांवलोंके जलको मिलाकर उससे तीक्ष्ण नख, दन्त और डाढ-
वाले सिद्ध वागेश्वरीका रूप बनावे ॥ १३ ॥
प्रज्वलितसिद्धवर्तिमूर्द्धनि दीपं समुजन्वं दद्यात् ।
जिह्लाष्टकमक्षणामध्यष्टशतं कारयेच्चान्यत् ॥ १४ ॥
अर्थ—उनके सन्मुख सिद्धबत्ती जली हुई हो, मस्तक पर
उज्वल दीपक रक्खा हुआ हो । आठ जीभ और एकसौ आठ
आंखें हों ॥ १४ ॥
कृश रोश द्योतनगन्धकुसुमबलिमक्षधूपसहितेन ।
रूपेण तेन कुर्यान्निवधनं निशि समस्तदोपहरं ॥ १५ ।।
अर्थ-इनको सुगंधित चंदन धूप और पुष्पोंकी बलि
देने से रात्रिमें समस्त दोष दूर हो जाते हैं ॥ १५ ॥
अन्तम पच्छेद
wn
हु
hr
,
-
तीक्ष्णोन्नतसितदंष्ट्रं विलुलितजिव्ह त्रिनेत्रमयनाशं ।
पिष्टेन कारयेद्विकरालं वागीश्वरी रूपं ॥ १६ ॥
अथा-फिर तीक्ष्ण उन्नत और श्वेत दाढोंवाली, निकली
जिह्वावाली, तीन नेत्रवाली, वागेश्वरी देवीके विकराल रूपको
पिसी हुई सिद्ध मिट्टीले बनाये ।। १६ ॥
रूपेण तेन बहुभक्षाचारदीपधूपसहितेन ।
कुर्यानिवर्धनं सकलदोष हृतं खडगमंत्रेण ॥ १७ ॥
अथे—इनको, चरू, दीप, और धूपकी बलि खड्ग मंत्र
देनेसे संपूर्ण दोष नष्ट हो जाते हैं ॥ १७ ॥
योगनिका दिव्यमहायोगिनिका सिद्धसंत्रेण योगिनी चैव ।
अन्युजनेश्वरीप्रेवावासिन्यथ शाकिनी देवी ॥ १८ ॥
अर्थ-दिव्य योगिनी, महायोगिनी, योगिनी । अन्पु-
जनेश्वरी । प्रेतावासिनी, और शाकिनी देवी ॥ १८ ॥
रूपाण्यासां पिष्टेन कारयेद्भक्षसहितबलिचस्काणि ।
जिह्वाष्टकमष्टश्चतं नेत्राणां कारयेत्प्रागवत् ॥ १९ ।।
अर्थ-के रूपोंको पिसी हुई सिद्ध मिट्टीसे आठ जिह्वा
और एकसौ आठ नेत्रबाला बनावे ॥ १९॥
घंटा पतिकिका माल्यदीप युक्त मंत्रेण ।
रूपेण कैकन प्रतिदिवसं कुरु निवर्धकं ॥ २० ॥
- १२० ] वालामालिनी कर अर्थ- इनके सन्मुख घंटा पताका और माला आदि रखकर सिद्ध मंत्रसे चरुकी बलि प्रतिदिन पृथक्र देनी चाहिये ॥२०॥ पुरुषातीतायुवर्ष संख्यया तंदुलांजलिनादाय । तत्पिष्टेन कुर्य्याद्ग्रहरूपं लक्षणसमेतं ॥ २१ ॥ अर्थ-पुरुपकी बीती हुई आयुके वर्षोंकी संख्या प्रमाण चांवलोंकी अंजुलिको लेकर उसको पीस कर लक्षण सहित ग्रहोंका रूप बनावे ॥ २१॥ तद्रुपं बहुबलिभक्षगंध समाल्यदीपधूपयुतं । अम्ने निधाय तस्या तुरस्य नव पटलिका तस्थं ॥ २२ ।। अर्थ-उनको अपने सन्मुख पटडों पर स्थापित करके गंध उत्तम माला दीप और धूपकी बहुत प्रकारकी बलि देवे ।। २२ ।। खड्गै रावण विद्या मुच्चैरुच्चारयन्मंत्री । पुष्पैर्निवर्ध्य पूर्व स तंदुलै गृहमुखं हन्यात् ॥ २३ ॥ अर्थ-फिर मंत्री खड्गै रावण विद्याका जोरसे उच्चारण करता हुआ पहले पुष्पोंकी बलि देकर फिर उनके मुख पर चांवल मारे ॥ २३ ॥ रूपेण तेन पश्चान्निवर्ध्य विधिना जलस्पमध्ये तु । दद्याल निशायां समस्त दोषान् हरत्याशु ॥ २४ ।।
मा मिलेर। [ १२१ अर्थ-फिर उस रूपको रात्रि में विधिपूर्वक बलि देकर जलमें स्थापित कर दे तौ समस्त दोष शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ २४ ॥ यह ज्वालामालिनीदेवीकी कही हुई इस प्रकारकी " नीराजनविधि " ग्रह, भूत, शाकिनी और अपमृत्युके भयको शीघ्र ही दूर करती है ।। २५ ॥ इतिश्री हेलाचार्य प्रणोत अर्थ में श्रीमत् इन्द्रनन्दि योगींद्र विरचिव ग्रन्थमें ज्वालामालिनी कल्पकी, प्राच्य विद्यावारिधि काव्य साहित्य तीर्थाचार्य श्री चन्द्रशेखर शखी कृत भाषाटीलामें नोराजन विधि, नषम परिच्छेद समाप्त हुआ ।। ९ ।। नामक
१२२]
नद्यालामालिनी कपा
WowNwANWwwal
अथ दशम परिच्छेदः
शिष्यको विद्या देनेकी विधि
ईशानदिगभिमुखजलनिपातयुतशून्यजिनगृहोद्देशे
अपतित गोमय गोमूत्र विहित सम्माजिते रम्ये॥१
अर्थ-जिन मंदिरके एक स्थानमें ईशान कोणकी ओर
द्वार बनाकर पहिले जल छिड़ककर फिर उसे पृथ्वी पर न
गिरे हुए गोबर और गौमूत्रसे लीप पोतकर शुद्ध करे ॥ १ ॥
चूर्णेन पंचवर्णेन समानहस्तायतं चतुष्कोणं ।
रेखा त्रयेण विधिना सत्याख्यं मंडलं विलिखेत् ॥ २॥
अर्थ-फिर वहां पर पंच वर्ण चर्णसे समान हाथ लंबे
चौड़े चौकोर निम्नलिखित सत्य नामवाले मंडलको तीन
रेखाओंसे विधिपूर्वक बनाये ॥ २ ॥
तस्यवहिारिनदीभ्रांतावर्तो भिजलचराकीणां ।
पश्चिमदिशिजल मध्ये रूपं वर्णस्यलिखितव्यं ॥ ३ ॥
अर्थ-उसके बाहर पश्चिम दिशामें समुद्र बनावे, जिसमें
नदियोंका जल आ रहा हो लहरें उठ रही हों और जलचर
मरे हुए हों फिर उस समुद्रमें वरुणका रूप बनावे ॥ ३ ॥
दशम परिच्छेद ।
१२३.
मलयजकुसुभाशवचर्चितान् सितान् वीजपूरपिहित मुखान् ।
पूर्णघटान् सहिरण्यान् तत्कोणचतुष्टये दद्यात् ॥ ४ ॥
अर्थ-उस मण्डलके चारों कोनों में चंदन, पुष्प और
अक्षतसे पूजे हुए बीजोंसे मुखतक भरे हुए हिरण्प सहित चार
श्वेत घडोंको रखे ॥ ४॥
सौवर्ण रौप्यं वा पदयुगलं कारयेन्नतेव्याः
अभिषिच्य पंचगव्यैः दधिघृतसत्क्षीरगंधजलैः ।। ५ ॥
अर्थ-फिर वहांपर देवीके चरण सुनहरे या रौप्य वर्णके-
बनाकर उनका पंच गव्य दही घी दूध गंध और जलसे.
अभिषेक करे ॥ ५॥
मंडल हक्षिणदेशे पदयुगलं पूजितं निवाय तयो ।
नैऋत्यादिषु दिक्ष्यस्यान्वय चरणद्वयानि लिखेत् ॥ ६ ॥
अर्थ-इन चरणोंको मंडलकी दक्षिण दिशामें बनाक
पूजा करे और दूसरे चरण नैऋत्य आदि दिशाओंमें
बनावे ॥ ६॥
अहत्पदकमल युगं मंडलमध्ये विलिख्य चूर्णेन ।
कोणेषु सिद्धसूर्यपदेशकमुनिपदयुगानि लिखेत् ॥ ७ ॥
अर्थ-मंडल के मध्यम चूर्णसे भगवान अहंत देवके.
चरण बनाये । और कोनोंमें सिद्ध सूरि उपदेशक और मुनियोंके.
चरण बनावे ॥ ७॥
१२४ ॥ ज्वालामालिनी कल्प। गंधाक्षतकुसुमसुदीपधूपचरुकैः समञ्चयेत्सब । तदुपरिविचित्रपुष्पै मर्नोहरं मंडपं रचयेत् ॥ ८ ॥ अर्थ-इन सबकी गंध, अक्षत, पुष्प, दीप, धूप, और चरुसे पूजा करके इनके ऊपर अनेक प्रकारके पुष्पोंसे शोभित मंडप बनावे ॥ ८ ॥ सत्यं मंडलमेवं विलिख्य पश्चात्सगंध कुसुमाद्यः । कंकणकर्णामरणांबरादिकरचयेगुरौश्चरणौ ॥ ९ ॥ अर्थ-इस प्रकार इस सत्य मंडलको बनाकर पीछे सुगन्धित पुष्प आदि कर्णाभूषण और वस्त्र आदि देकर गुरुके चरण बनाये ॥ ९॥ मणिकनक रजत सूत्रः पुस्तकमावेष्ट्य दिव्यवस्त्रश्च । शिखिदेवी पदयुगले निधाय गंधादिपिश्च जयेत् ॥ १० ॥ अर्थ-मोने और चांदीके तारोंमें परोई हुई मणियोंकी माला और दिव्य वस्त्रसे पुस्तकको लपेटकर उसे ज्वालामालिनी देवीके चरणोंमे रखकर उसका गंध आदिसे पूजन करे ॥१०॥ कुसु र क्षतांजलि पुटं ललाटहस्तं कृतप्रदक्षिणकं । मंडलमध्यनिवेष्टं घटोदकः स्नापयेच्छिष्यं ॥ ११ ॥ अर्थ-फिर पुष्प और अक्षतोंको हाथोंमें लेकर हाथ न म प रच्छः । शिष्यको जोड़े हुए प्रदक्षिणा करनेवाले मंडल के बीचमें बैठे घडोके जलसे स्नान करावे ॥ ११ ॥ स्नानाम्बरभूषादिकमुचितं नान्यस्य तद्गुरो रुचितं । परिधातुमस्य पश्चादन्यद्वस्त्रादिकं देयं ॥ १२ ॥ अर्थ-उस समयके वस्त्र आभूषण आदि गुरुको ही देने उचित हैं । शिष्यको दूसरे वस्त्र आदि देवे ॥ १२ ॥ देवीमुनिगुरुचरणप्रणतायसुधर्मभक्तियुक्ताय । धृतपुस्तकाय तस्मै विद्यादिना देया ।। १३ ॥ अर्थ-फिर देवी और मुनिके चरणौमें झुके हुए धर्म तथा भक्ति युक्त धारण किये हुए उस शिष्यको साध्य आदि युक्त विद्या दी जावे ॥ १३ ॥ पर समयाय न देया त्वया प्रदेशा स्वसमय भक्ताय । गुरुविनययुताय सदा चेतसे धार्मिकनराय ॥ १४ ॥ अर्थ-तुम यह विद्या अन्य मतावलम्बीको न देना । किंतु अपने शास्त्रके भक्त, गुरुको विनय करने वाले, दयालु, और धार्मिक पुरुषको ही देना ॥ १४॥ ऋषिगौस्त्रीहत्यादिषु यत्तत्पापं भविष्यति तवापि । यदि दास्यसि परसमयायेत्युक्तवातः प्रदातव्याः॥ १५ ॥ ग
१२६ ।
ज्वालामालिनी कल्प।
अर्थ-यदि तुम यह विद्या अन्यमतावलम्बीको दोगे तो,
तुमको, ऋषि, गऊ, और स्त्रीकी हत्याका पाप लगेगा यह कह
-कर उसको विद्या दे देवे ॥ १५ ॥
4
क्षितिजलपवनहुताशनयजमानाकाश सोम सूर्यादीन् ।
ग्रहतारागण सहितान् साझोकृत्वा स्फुटं दद्यात् ।। १६ ॥
अर्थ- उस समय पृथ्वी, जल, पवन, अग्नि, यजमान,
आकाश, चन्द्र, सूर्य, ग्रह, और तारागण आदिको साक्षीसे
उसको विद्या दे देवे ॥ १६॥
त्वां मां शिखनद्देवी, हेलाचार्य च लोकपालांश्च ।
साक्षीकृत्य मयेयं, तुभ्यं दत्तेति खलु वाच्यं ॥ १७ ॥
अर्थ-तुमको मैंने ज्वालामालिनीदेवी, हेलाचार्य और
लोकपार्लोकी साक्षीसे यह विद्या दी उस समय यह कहे ॥ १७॥
साधनविधिना देया विधिना शिष्येण साधनाधिना देया ।
विधिनाग्रहीतविद्या शिष्योऽसौ सिद्ध विद्यः स्यात् ।। १८ ॥
अर्थ-यह विद्या शिष्यको साधन और उसकी विधि
सहित देनी चाहिये । यह शिष्य विधिपूर्वक विद्या पाकर तुरंत
ही विद्याको सिद्ध कर लेगा ॥ १८ ॥
कविकरणसमयमुख्ये जिनपति मार्गोचितक्रियापूर्णः ।
व्रतसमितिगुप्तिगुप्तो हेलाचार्योमुनिज यति ॥ १९ ॥
दशम परिच्छेद।
[ १२७
अर्थ-कवियोंको बनाने के शास्त्रमें चतुर, जिनेंद्र मगवान्के
मार्गके योग्य क्रियाओंसे पूर्ण व्रत, समिति, और गुप्तियोंसे रक्षित,
श्री हेलाचार्य मुनि जयवंत हों ।। १९ ।।
एवं क्षितिजलधिशशांकांबरताराकुलाचलास्तावत् ।
हेलाचार्योक्तार्थे स्थेयाच्छीज्वालिनीकल्पे ।। २० ।।
अर्थ-इस प्रकार श्री ज्वालामालिनी कल्पमें श्री
हेलाचार्य के कहे हुए अर्थको, पृथ्वी, जल, चंद्रमा, आकाश, तारे
और कुलाचल, पर्वत स्थिर रक्खें ॥ २० ॥
इतिश्री हेलाचार्य प्रणीत अथैमें श्रीमद् इन्द्रनन्दि मुनि विरचित
अन्यमें नगालाबालिनी शल्पकी, प्राच्य विद्यावारिधि काव्य
साहित्य तीर्थाचार्य श्री चन्द्रशेखर शास्त्री कृत
भाषाढीकामें साधन विधि" नामक
दशम परिच्छेद समाप्त हश्रा ॥१०॥
१.८ । बाल मालिनी कर श्री चंद्रनाथाय नमः । श्री अनंतनाथाय नमः। " मंत्रि लक्षण" प्रथम परिच्छेदे पद ग्रंथाः पंच त्रिंशत् (३५) ग्रहाधिकार द्वितीय परिच्छेदे पद ग्रंथाः द्वा विंशति (२२) द्वादश बीजाक्षर विधान तृतीय परिच्छेदे पदग्रंथात्रयशीति (८३) मंडलाधिकार चतुर्थ परिच्छेदे पद ग्रंथाश्चतुश्चत्वारिंशत् (४४) भूताकंपन तैल विधि पंचम परिच्छेदे पद ग्रंथाः विंशति (२०) वश्य यंत्राधिकार षष्ट परिच्छेदे पद ग्रंथाः सप्त चत्वारिंशत् (४७) वश्य तंत्राधिकार सप्तम परिच्छेदे पद ग्रंथाः एक पंचाशत् (५१) बसुधारास्नान विधि अष्टम परिच्छेदे पद ग्रंथाः पंच त्रिंशत् (३५) नीराजन विधि नवम परिच्छेदे पद ग्रंथाः पंच विंशति (२५) साधन विधि दशम परिच्छेदे पद ग्रंथाः विंशति (२०) उभेय ग्रंथ ४५१ मंत्र गदवरददावे श्रीः श्री: अर्थः-"मन्त्रिलक्षण"वाले प्रथम परिच्छेदमें श्लोकसंख्या (३५) "ग्रहाधिकार" नामवाले द्वितीय परिच्छेदमें श्लोक संख्या (२२) "द्वादश वीजाक्षर विधान" नामवाले तृतीय परिच्छेदमें श्लोक संख्या (६९) 'मंडलाधिकार" नामवाले चतुर्थ परिच्छेदमें श्लोक संख्या (४४) 'भृताकंपन तैल विधि' नाम पंचम परिच्छेदमें श्लोकसंख्या (२०) 'वश्य तन्त्राधिकार' नाम षष्टम परिच्छेदमें श्लोक संख्या (४७)
दशम परिच्छेद।
[ १२९
"वश्य तंत्राधिकार" नाम सप्तम परिच्छेदमें श्लोक संख्या (५१)
"वसुधारास्नान विधि" नाम अष्टम परिच्छेदमें श्लोकसंख्या (३५)
"नीराजनविधि" नाम नवम परिच्छेदमें श्लोकसंख्या (२५)
"साधन विधि" नाम दशम परिच्छेदमें श्लोकसख्या (२०)
सम्पूर्ण ग्रंथकी श्लोक संख्या तीनसौ अडसठ (३६८)
इतिश्री मालामालिनी कल्पकी काव्य साहित्य तीर्थाचार्य
प्राच्य विद्यावारिधि श्री चंद्रशेखर शास्त्री कृत
भाषाटोका समाप्त हुई।
Q
१३०]
पालामालिनी कल्प ।
अथ ज्वालामालिनी विधि
चतुर्दशी पुष्पा उपवासं कृत्वा जाप १२००० त्रिसंध्यं
अर्ध रात्रौ एवं ४८००० एकासनेनेदं मंत्राक्षरेण "क्षां क्षीं हूं क्षौं
क्षः क्षाच्यू र र र र र र शत्रून्मदेय२ नाशं कुरु२ स्वाहा" ।।
अनेन होमं कुर्यात्
ह्रीं क्लीं ब्लू छां छीं छछौं छः छम्न्च्यूँ ख ख ख
भस्मं कुरु२ स्वाहा"।
खादय२ शत्रून्
जाप्य होम विधि
चतुर्भुज मूर्ति महिषवाहन पीतवर्ण अंशुक रक्तवर्ण उज्वल
भूषणं महिष श्यामवर्ण तस्याभरण पीतवर्ण खङ्ग त्रिशूल पाश
शरासना युधं उत्तमासनेन स्थापितं तस्याने जाप्यं रक्त पीत्त
उज्वल फलानि मध्प रात्रे लवंग जाप्यं ।।
होम विधि
पोडशांगुल कुडं चतुरस्त्र अवगाहित मध्ये होमं पंचामृत
दशांगपूपैः खीर खांड नालिकेरैः शरीर संस्कार विस्नान पीत
जलेन ह्रां ह्री ह ह्रौ हः हल्च्यू अनेन सप्त वाराभि मंत्र शिखा
बंधनं रक्तां वरं धार्यते पीतासने पद्मासनेन उपविशेत् "प्रां प्रीं पूं
दशम परिच्छेद। 1 १३१ प्रौं प्रः पल्व्यू आत्मरक्षां कुरु२ हौं फट्स्वाहाः" इदं मंत्र २१ वार पढे, वपु रक्षाकारयेत् जाप्य होमा कर्षणं कृत्वा स्तोत्रं पठनीयं बस्नाभरणे नाह्वाननं दत्वा एक पूर्वा १४ द्विपूर्वा १४-१५ त्रिपर्वा त्रयोदशी चतुर्दशी अमावस्या इति ज्ञात्वा स्थापनीयं कृष्ण पक्षे झा झी झंझौं झः झल्ब्यू अंजसंचकार अचुक भूषणानि संग्रहतां संग्रह्यतांर सन्निधिकरणं प्रातरुत्थाय करणीयं आंकों ही इदं मंत्रेण विसर्जनं कुर्यात् कुमारी भोजन दानं पश्चात् भोजनं क्रियते सर्वकार्य सिद्धिः॥ ॥ इति सधि सूत्र प्रथम सधि छमाप्तम् ।। अर्थ-चतुर्दशी पुष्य नक्षत्रके सूर्यमें उपवास करके निम्न लिखित मंत्रका एक आसनसे प्रातःकाल मध्याह्न काल सायंकाल और अर्द्धरात्रि बारह२ हजार जप करे । अर्थात् च्यारों समयमें ४८००० पूर्ण करे ॥ मंत्र यह है- "ॐ क्षांक्षी सूक्षौं क्षः क्षल्ब्यू ररररररर शत्रून्मर्दयर मर्दय नाशं कुरु२ स्वाहा।" जाप और होम की विधि पहिले देवीकी एक मूर्ति बनावे, मूर्तिमें निम्न लिखित विशेषताएं रक्खे-च्यार सुजाएं, महिपकी सवारी, शरीरका रंग पीला, देवीके वस्त्रोंका रंग लाल, उज्वल आभूषण, महिपका रंग श्याम, उसके आभूषणोंका रंग पीला, देवीके चारों हाथों में क्रमसे १३२] जनालामालिनी कप। KHAN । ~ खड्ग, त्रिशल, पाश और धनुषबाण हो । ऐसी देवीको मूर्तिको उत्तम आसनसे स्थापित करके उसके आगे जप करे। जपके समय लाल, पीले और उज्वल पुष्प तथा अक्षत और काले, नीले, पीले तथा उज्जल फल और लौंग रक्खे ॥ होम विधि सोलह अंगुल लम्बे चौडे तथा गहरे हवनकुण्डमें पंचामृत दशांग धूप, खीर, खांड और नारियलसे हवन करे । पहिले पीले जलसे स्नान कर ले । फिर:- " ह्रां ह्रीं ह्रीं ह्रौं हः हल्ब्यू" इस मंत्रसे सात वार अभिमंत्रित करके शिखा बंधन करे, लाल कपड़े पहिने, पीले आसन पर पन्नासनसे बैठे। फिरः 'प्रां प्रीं प्रौं प्रः पन्च्यू आत्मरक्षां कुरुर ह्रौं फट् स्वाहा।' इस मंत्रको इक्कीस वार पढकर शरीर रक्षा करे और इसके पश्चात् जाप होम आकर्षण कर के स्तोत्र पढ़े वस्त्र और आभरणसे आह्वानन करके पहिले तेरह फिर चार और फिर पन्द्रह वार करके त्रयोदशी चतुर्दशी और अमावस्या जानकर कृष्णपक्षमें स्थापना करे। मंत्र यह है:- झा झो झझौं झः इन-अंज संचकार अंचुक भूष- णानि संगृह्यतांर सन्निधिकरणं ।"
दशम परिच्छेद ।
[ १३३
यह प्रातःकाल उठकर करे । और- 'आं क्रों ह्रीं'
इस मंत्रसे विसर्जन करे। फिर कुमारिको जिमाकर स्वयं
भोजन करे।
(इति संधिसूत्र प्रथम संधि समाप्त।
अथ मन्त्राकर्षण द्वितीय विधि
जम्मव्यू हिं ह्रीं ह्रीं क्लीं ब्लू देवान् नागान् यक्षान्
गंधर्वान् ब्रह्मान् भूतान् व्यंतरान् सर्व दुष्टग्रहान् आकर्षय २ ॥
अनेन मत्रेण आवेशनं स्थापनं ।
"ह्रां ही ह ह्रौं ह्रः ज्वल२ र र र र र र र र"
अनेन संत्रेण होस कुण्डमध्ये मरिचाणि निक्षिपेत् ।
"देवग्रहान् नागग्रहान् यक्षग्रहान् गन्धर्वग्रहान् ब्रह्मग्रहान्
राक्षसग्रहान् भूतग्रहान् व्यंतरग्रहान् सर्वदुष्टाहान् शतकोटिदेवतान्
सहस्रकोटि पिशाचान् दह२ पचर छिन्द२ भिन्द२ ह्रां हुँ हुँ
फट् स्वाहा
अनेन संत्रेण देवीशक्त्या देववशीकरणं शाकिनी डाकिनी
शत्रुग्रहान् अनेन मंत्रेण होमं कुर्यात् सहन १२००० शत्रुनाशं ।
अनेन मंत्रेण गजेन्द्रनरेन्द्रसर्वशत्रुवशीकरणं पूर्वमंत्र स्मरणीयम् ।
इति मालामालिनी ग्तोत्र साधनं मत्रविधि सम्पूर्णम् ।
१३४ ] स्वालामालिनी कल्प । Here अथ भाषा अर्थ "जम्न्व्यू हिं ह्रीं ह्रीं क्लीं ब्लू देवान् नागान् गन्धर्वान ग्रह्मान् भूतान् व्यन्तरान् सर्वदुष्टग्रहान् आकर्षय२ ॥" इस मंत्रके द्वारा बुलावे और स्थापना करे। फिरः- "हां ह्रीं ह्रीं ह्रौं ह्रः ज्वल ज्वल र र र र र र र र इस मंत्रके द्वारा होमकुण्डमें मिरचोंको डाले । फिर- "देवग्रहान् नागग्रहान् यक्षग्रहान् गन्धर्नग्रहान् ब्रह्मग्रहान् राक्षसग्रहान् सर्वदुष्टाहात् शतकोटिदेवतान् सहस्रकोटिपिशाचान् दह२ पचर छिन्द २ भिन्द२ ह्रां हुँ हुँ फट् स्वाहा ।" इस मन्त्रके द्वारा देव शक्तिसे देवताओं, शाकिनी, डाकिनी, और शत्रग्रहोंको वशमें करो इस मंत्रसे १२००० होम करे तौ शत्रु नाश हो, इस मंत्रसे गजेन्द्र, नरेन्द्र और सब शत्रुओंको वशमें करे । और पूर्व मंत्रको स्मरण रक्खे । इति ज्वालामालिनी स्तोत्र साधन मंत्र विधि सम्पूर्णम् । अथ ज्वालामालिनी स्तोत्र प्रारंभ श्रीमदैत्योरुगेंद्रामर मुकुटतटालीटपादार विन्दे । माद्यन्मातंगकुम्भस्थलदलनपटश्रीमृगेंद्राधि रूढे ॥ *यहांसे तमाम पाठ विद्यानुवाद अध्याय ४ श्लोक १६४ से मागेसे लिखा गया है। -- । १३५ PRERNATRAPremwww दशम पारच्छेद । ज्वालामाला कराले शशिकरधवले पद्म पत्रायताक्षी। ज्वालामालिन्य भीष्टे प्रहसितवदने रक्षमा देवि नित्यम् ॥१॥ हां ह्रीं ह्र हौं महेचेक्षण रुचिरुचिरां गांग दै देव मं है। वं सं तं बीज मंत्रकृत सकल जगतक्षेम रक्षाभि धाने । क्षां भी झूझें समस्त क्षितितहमहिते ज्वालिनी रौद्र मूर्ते । स क्षों क्षौं क्ष क्षः बीजै रहितदशदिशाबधने रक्ष देवि ॥२॥ हकारारावथोरभ्रकुटिपुटहटद्रक्तलोलेक्षणाग्नि । न्याला विक्षेपलक्षक्षपित निजविपक्षोदयार्ण रक्षे ।। भास्वत्कांचीकलापे मणिमुकुटहटज्ज्योतिषां चक्रवाल- चंचचंडाशु मन्मंडल सगर जया पादिके रक्ष देवि ॥३॥ ॐ ह्रीं कारोपयुक्त र र र र र र रां ज्वालिनी संप्रयुक्तम् । ह्रीं क्लीं ब्लूद्रां द्रीं सरेफ विपद मल कला पंच कोद्भासि ह धू धू धूमांधकारिण्यखिलमिहजगदेवि देह्याशु वश्यम् । षो मे मन्त्रं स्मरंतं प्रतिभयमथने ज्वालिनी मम वत्वम् ॥४॥ ॐ ह्रीं क्रों सर्व वश्यं कुरु २ सर संक्रामणी तिष्ठ । हूं हूं हूं रक्ष रक्ष प्रबल बल महा भैरवा राति भीते ॥ द्रां द्रीं द्र द्रावय२ हन फट फट वषट् बंध बंध । स्वाहा मंत्र पठंतं त्रिजग दभिनुते देवि मां रक्ष रक्ष ॥५॥ हं झं झीं वीं स हंसः कुवलयवकुले भूरसंभूत धात्रि । यी झूह पक्षि हं हं हर हर हर हुँ पक्षिपः पक्षि कोपः ।।
१३६. ज्वालामालिनी कल्प। वं झं हंसः परं शौं सर सर सर सू सत्सुधा वीज मंत्र- वालामालिनि स्थावर विष संहारिणि रक्ष रक्ष ॥ ६ ॥ एोहि हौंकारनादै ज्वल दनल शिखा कल्प दीर्घोज़ केश- झामास्यैती बलंत्र विषम विष धरालं कृतैस्तीक्ष्ण दंष्टैः । भूतैः प्रेतैः पिशाचैः स्फुट घटित रुपा बाधितो ग्रोप सर्गम् । धृलीकृत्य स्वधामा धन कुच युगले देवि मां रक्ष रक्ष ॥७॥ क्रौं मैं क्रौं शाकिनीनां समुपगत मत ध्वंसिनी नीर जास्य । ग्लौं क्ष्म व दिव्य जिह्वा गति मति कुफ्ति स्तंभिनी दिव्य देहे फट फट् सर्व रोग ग्रह मरण भयोचाटिनी घोर रूपे । आंकांक्षी मंत्र रूपे मद गज गमने देबि मां पालयत्वं ॥८॥ इत्थं मंत्राक्षरोत्थं स्तवन मनुपमवह्नि देव्याः प्रतीतम् । विद्वेषोच्चाटन स्तंभन जन वशकृत पाप रोगापनोदि । प्रोत्सप्प जंगम स्थावर विषम निष ध्वंसनं स्वायुवा रोग्यै । श्वर्यादीनि नित्यं स्मरति पठति यः सोऽक्नुतेऽभीष्टसिद्धिम् ॥९ अर्थ-इस प्रकार यह मंत्राक्षरोंसे निकाला हुआ ज्वाला- मालिनीदेवीका अनुपम स्तोत्र है। जो इसको नित्य स्मरण करता है और पढ़ता है वह अपनी इच्छित सिद्धिको पाता है। और इसी स्तोत्रसे विद्वेपण उच्चाटन स्तोभन और वशीकरण होते हैं। यह पाप तथा स्थावर और जंगम विषको नष्ट करता है। तथा आयु आरोग्य और ऐश्वर्य आदिको देता है ॥९॥ इतिश्री उषालामालिनी स्तोत्र मातम् ।
मशम पच्छेन [ १३७ , अथ ज्वालामालिनीकी अन्य साधन विधि पाश त्रिशूल ऊष चक्र धनुः शिरा च, सन्मातुलिंग फल दान कराष्ट हस्ता। मातङ्ग तुङ्ग महिषाधिप वाहयाना, सा पातु मां शिवमति शरदिंदु वर्णा ॥ १ ॥ अर्थ-पाश, त्रिशूल, मछली, चक्र, धनुष, बाण, आतुलिंग ( बिजौरा फल ) और वरदान सहित आठ हाथोंजाली हाथीके समान ऊंचे भैसे पर चढ़कर चलनेवाली। और शरत कालके चंद्रमाके समान वर्णवाली ज्वालामालिनी मेरी रक्षा करे ॥१॥ द्रां द्रीं सुखीज सुख होम पदांत मंत्री, राज्वालिनी प्रमुख गै मम पाद नाभिं । वक्षस्थलाननशिरांसि च रक्ष रक्ष, त्वं देव्यमीभि रति पंच विधैः सु मंत्रैः ॥२॥ ) अर्थ-उत्तम बीज द्रां द्रीं की आदिमें सुख (ॐ) लगाकर ज्वालामालिनी मम पादौ नाभि वक्षः स्थलं आननं शीर्ष रक्ष२ पदोंके पश्चात् अंतमें होस (स्वाहा) पद सहित पांच सुन्दर मंत्रोंसे शरीरकी रक्षा करे ॥ २ ॥ मंत्रोद्धार ॐ द्रां द्रीं ज्वालामालिनि मम पादौ रक्ष२ स्वाहा ।
१३८]
ज्वालामालिनी कल्प।
ॐ द्रां द्रीं ज्वालामालिनि मम नाभिं रक्ष२ स्वाहा ।
ॐ द्रां द्रीं ज्वालामालिनि मम वक्षः स्थलं रक्ष२ स्वाहा ।
ॐ द्रां द्रीं ज्वालामालिनि मम आननं रक्ष२ स्वाहा ।
ॐ द्रां द्रीं ज्वालामालिनि मम शीर्ष रक्ष२ स्वाहा ।
कूटाक्ष पिंड प्रथ शून्य भपिंड युग्मं,
तद्वेष्टितं भपर पिंड कलत्रि देहैः।
बाह्यष्ट पत्र कमलं परघादि पिंडान् ।
विन्यस्य तेषु परतो नव तत्व वेष्ट्य ॥३॥
अर्थ-कूटाक्षर पिंड शून्य पिंड दो। भ, य, र, पिंडसे
वेष्टित करके निकल त्रिदेह (स्वरों)से वेष्टित करे । उसके पश्चात्
आठ पत्रोंमें य र ध आदिके पिंडोंको लिखकर बाहर नव
तत्वोंसे वेष्टित करे ॥३॥
हा मां पुरोद्विप वशीकरणं तदने,
क्षी वीजकं शिखि मती वरपंच बाणैः ।
मंत्रा नमोन्त विनयादिक लक्ष जाप्यं,
होमेन देवि वरदा जपतां नराणां ॥ ४ ॥
मूल मंत्र-
अर्थ-हां आं द्विप वशीकरणं (क्रों) क्षीं के पश्चात्
देवीका नाम और पांच बाण सहित मन्त्रके आदिके विनय
(ॐ) और अंतमें नम लगाकर एक लक्ष जप करके होम
करनेसे देवी जप करनेवाले पुरुषोंको वर देती है ॥ ४ ॥
दशम पविच्छेद ।
[ १३९
मन्त्रोद्धार
ॐ ज्वालामालिनी द्रां द्रीं क्लीं ब्लू ह्रीं आं हां क्रों क्षीं नमः'
ताम्बूल कुंकुम सुगन्धि विलेपनादीन् ।
यः सप्तवार मभि संत्र्य ददाति यस्यै ॥
सातस्य वश्य मुपयाति निजानुलेपात् ।
स्त्रीणां भवे दभिनवः स च कामदेवः ॥५॥
अर्थ-इस मंत्रको सिद्ध करनेवाला पुरुष तांबूल कुंकुम
और सुगन्धित लेप आदिको इस मन्त्रसे सातवार मन्त्रित करके
जिसको देता है । वह स्त्री या पुरुष सेवन करते ही साधकके
वशमें हो जाते हैं। यह साधक स्त्रियोंके लिए नया कामदेवः
बन जाता है ॥ ५ ॥
मायाक्षरं प्रणव सम्पुट मा विलिख्य,
बाह्येग्नि सम्पुट पुरं र र कोण देशे।
तद्वेष्टितं शिखि मतीवर मूल मन्त्रा,
दायाति देव वनितापि खराग्नि तापात् ॥६॥
अर्थ-माया अक्षर (ही) को प्रणव (ॐ) के संपुटमें
लिखकर बाहर अग्नि मण्डलोंका संपुट बनाकर उनके कोनोंमें
"" बीज लिखे । सबसे बाहर ज्वालामालिनी देवीके
मूल
मन्त्रसे चेष्ठित करके तेज अग्निकी आंच देनेसे देवताओंकी भी
स्त्री आ जाती है ॥६॥
- १४० जमालामालनो कल्प। आकर्षण यन्त्र वशीकरण यंत्र विधान पत्राष्ट काम्बु रुह मध्य गत त्रिमूर्ति, शेषाक्षराणि च विलिख्य दलेषु देव्याः। माया वृतं मध समन्वित भांड मध्ये, निक्षिव्य पूजयति द्वादशमेति साध्याः ॥ ७ ॥ अर्थ-अष्ट दल कमलकी कर्णिकामें त्रि मर्ति (ह्रीं) लिख कर देवीके शेष अक्षरोंको आठ दलोंमें लिखे । और ह्रींसे वेष्ठित कर दे । इस मंत्रको मधुरक्त बरतनमें रखकर जो इसका पूजन करता है, उसके वशमें इच्छित स्त्री पुरुष हो जाते हैं ॥७॥ स्त्री द्रावण ध्यान रामा वरांग वदने स्मर वीज कंत्त, त्तस्योद्धं भाग तल भाग गतं त्रिमूर्ति । पार्श्वद्वये च पुन रेवल पिंडमेकं, ध्यायेद्भुतं द्रव मुपैति नदीव नारी ॥ ८ ॥ अर्थ-स्त्रीके योनि प्रदेशमें स्मर बीज (क्लीं) शिर और पैरमें, ही, और दोनों करवटोंमें एवल पिंड (ब्लें) का ध्यान करनेस ही तुरंतही द्रवित हो जाती है ॥ ८ ॥ इत्य पंडित मल्लिषेण रचितं श्री ज्वालिनी देविका स्तोत्रं शांतिकरं भयाप हरणं सौभाग्य संपत्कर
दशम परिच्छेद ।
। १४१
प्रातमस्तक सन्निवेशित करो नित्यं पवेद्यः पुमान्
श्रीसौभाग्य मनोभि वांच्छित फलं प्राप्नोत्य सौ लीलया ॥९॥
।। इति श्री ज्वालामालिनी देवी स्तोत्र विधान ।।
अर्थ-यह पंडित मल्लिषेणका बनाया हुआ ज्याला-
मालिनीदेवीका स्तोत्र शांति करता है। भयको दूर करता है।
सौभाग्य और संपत्तिको उस पुरुषके लिये करता है जो इसका
प्रातःकालके समय, प्रतिदिन सिर पर हाथ जोडकर पाठ
करते हैं ॥९॥
॥ इति ॥
अथ ज्वालामालिनीकी तीसरी साधन विधि
पाश त्रिशूल कामुक रोपण ऊप चक्र फल वर प्रदानकरा ॥
महिषारूढाप्ट भुजा शिखि देवी पातु मां साच ॥१॥
अर्थ-पाश, त्रिशूल, धनुष, बाण, मछली, चक्र, फल
और वर प्रदान मुक्त आठ हाथोंवाली, मैंसे पर चढ़ी हुई वह
देवी ज्वालामालिनी मेरी रक्षा यरें ॥ १ ॥
पत्रेत्थमुक्तरूपां तां सुखांतां ज्वालिनी तथा ।
आचरं नूप चाराणां पंचकं साध कोर्चयेत् ॥ २ ॥
अर्थ-साधक पुरुष उस देवी ज्वालामालिनीको एक
पत्रके ऊपर२ कहे हुए रूपवाली लिखकर उसका पांचों
उपचारोंसे पूजन करे ॥ २ ॥
१४२ ]
ज्वालामालिनी कल्प
ब्रह्मावशिष्ट पिण्ड ज्वालिनी नव वत्व पूर्व मेहि युर्ग ।
स्वाहा संवोपडिति ज्वालिन्या ध्यान मंत्रोऽयं ॥३॥
अर्थ-ब्रह्म (ॐ) शेष पिंड ज्वालामालिनी नवतत्व
तथा दो बार 'एहिर' के पश्चात् स्वाहा और संवौषट्युक्त
मंत्र ज्वालिनीदेवीका ध्यान मंत्र है ॥ ३ ॥
ध्यानमन्त्र या आह्वानन मन्त्रका उद्धार
"* यल्च्यू, मल्व्यू, घल्यू, भल्ब्यू, खल्च्यू, बल्ब्यू,
वल्यू, कल्च्यू, सम्पूर्णेन्दु स्वायुध वाहन समेते स परिवार
हे ज्वालामालिनि ह्रीं क्लीं ब्लूद्रां द्रीं हां आं क्रों क्षी एहिर
स्वाहा । संवौषट् ।
क्ष ह भ म पिंड ज्वालिनि नव तत्वेन्वेष मन्त्राचार्य ।
स्वनिधन पद समुपेत स्त्रितये संस्थापना दीवां ॥ ४ ॥
अर्थ-क्ष, ह, भ और म, अक्षरों के पिंड ज्वालामालिनी
देवी और नव तत्वोंका उच्चारण करके अपने अन्तके पदों सहित
स्थापना आदिके मंत्र बनते हैं ॥ ४॥
उक्त्वा मुमेत्र मंत्रं नश्पत् संदर्यत् संदर्य योनि मुद्रां च ।
ब्रूया
द्वि सृष्टि समये महा महिष वाहने छतं ॥५॥
अर्थ-इन उपरोक्त मंत्रोंको बोलता हुआ विनोंको
नाश करता हुआ योनि मुद्राको बार बार दिखलाकर अन्तमें
" महामहिषवाहने " यह पद भी कहे ॥ ५ ॥
दशम परिच्छेद । [ १४३ S स्थापना मन्त्रका उद्धार ॐ क्षयूं हल्व्यू भल्व्यू मल्यू धवल वर्ण सर्व लक्षण सम्पूर्णे स्वायुध, वाहन, समेते, सपरिवारे ज्वालामालिनि ह्रीं क्लीं ब्लूद्रां द्रीं हां आं क्रों क्षीं तिष्ठ२ : ठः । स्थापनम् । सन्निधिकरण मन्त्रका उद्धार ॐ क्षयूं हल्व्यू भल्ब्यू भव्यू मल्यू धवल वणे सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध महा महिष वाहन समेते सपरिवारे ज्वालामालिनि, द्रां, द्रीं, क्लीं, ब्लू, ही, हां, आं क्रों, क्षी, मम सन्निहितो भव भव वषट् । सन्निधिकरणं । पूजन मन्त्रका उद्धार ॐ क्ष्ल्यूं हल्ट) भल्व्यू मल्यू धवल बर्ण सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध महा महिष वाहन समेते सपरिवारे ज्वालामालिनि द्रां द्रीं क्लीं ब्लू ह्रीं हां आंज्ञी इद मध्यं पायं गंधमक्षेतं पुष्पं दीपं धूपं चरुं कलं बलिं गृह २ नमः । अर्चना मंत्र। विसर्जन मंत्रका उद्धार ॐ क्ष्ल्यूं हल्व्यू म्ल्यू म्म्ल्यूं धवल वर्ण सर्व- लक्षण संपूर्ण स्वायुध महामहिष वाहन समेत स परिवार ज्वाला- मालिनि, द्रां, द्रीं, क्लीं, ब्लू, ह्रीं, हां, आं, कों, क्षी, स्वस्थान १४४ ज्वालामालिनी कल्प। गच्छ गच्छ पुनरागमनाय जः जः जः ।। विसर्जनम् ।। अथ ब्राह्माद्यष्ट देवतानां पूजा ब्र'झो बादि पाठों देवियोंका पंचोपचार क्रम । ब्रामथादि देवता नांतु पूजा पिंडः सम ध्रुवं । ब्राह्मयादि यादिभिः सम्यक् कुर्यातनामतः सुधीः ॥ १ ॥ ब्राह्मी आदि देवियोंका पूजन भी उन२ के नामसे पिण्ड लगाकर पंडित पुरुष करे ॥ ब्राह्मी देवीका पूजन मानन मत्र। ॐ ह्रीं को यल्व्य पराग वर्णे सर्व लक्षण सम्पूर्णे स्वायुध वाहन समेते स परिवारे हे ब्रह्माणि एहिर संवौषट आह्वाननम् । ॐ ह्रीं क्रों यन्व्य पहराग वर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते स परिवारे हे ब्रह्माणि तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । ॐ ही क्रों टम्ल्यू पत्नराग वर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेत स परिवारे हे ब्रह्माणि मम सन्निहितो भव भव सन्निधिकरणम् ।
दशम परिच्छेद । १४५ दृ ॐ ह्रीं क्रों यल्ब्यू पद्मराग वर्णे सर्वलक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे ब्रह्माणि इदमध्यं गंधमक्षतं पुष्पं दीपं धूपं चलं फलं बलिं गृहर स्वाहा । अर्चनम् । ॐ ह्रीं क्रों यल्व्य पद्मराग वर्णे सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन समेत सपरिमारे हे ब्रह्माणि स्वस्थानं गच्छ २ नः जः नः (विमर्जनम् )। ।। इति ब्राझीदेवी पूजन ।। निज पिंड देह वर्णाख्या योगादष्ट भावमापन्ना । पंचोपचार मंत्र मतिः सं प्रार्यये देभिः ॥ २ ॥ अर्थ-अपने देह पिंडके वर्ण नामयोग और आठों भावों सहित पंचोपवार मंत्रोंसे उन माता ॐ का पूजन करे ॥२॥ माहेश्वरीदेवीका पूजन ॐ ह्रीं क्रों मन्यू शशधरवणे सर्वलक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेत सपरिवार माहेश्वरि एहि एहि संवौषट् । आह्वाननम् । डॉ ही क्रों मल्च्यू शशधरवणे सर्वलक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन ममेत म परिवार साहेश्वरि तिष्ट तिष्ठ ठः ठः । स्थापनम् । ॐकी को मन्व्यू शशधरवणे सर्व लक्षण मंपूर्ण स्वायुध वाहन समन सपरिवारे माहेश्वरी मम सन्निहिता भव भव वपट । मन्निधिकरणम् ।
१४६ । मालामालिनी कल्प। wwww ॐ ह्रीं क्रों मल्व्य शशघर वर्णे सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे माहेश्वरि इदमय गंधमक्षतं पुष्पं दीपं धूपं चरूं फलं बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा । अर्चनम् । ॐ ह्रीं क्रों मल्च्य शशधरवणे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे माहेश्वरि स्वस्थानं गच्छ२ ज. जः जः । (विसर्जनम् )। कौमारीदेवीका पूजन ॐ ह्री क्रों यल्यू प्रवाल वर्णे सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे कौमारि एहिर संवौषट् (इत्याह्वाननम् ) ॐ ह्रीं क्रों यल्व्यू प्रवाल वर्णे सर्वलक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे कौमारि तिष्ठ२ ठः ठः । स्थापनम् । ॐ ह्री क्रों यम्लयू प्रवाल वणे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे कौमारि मम सन्निहिता भव भव वषट् । सन्निधिकरणम् । ॐ ह्रीं क्रों यन्व्यू प्रवाल वर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे कौमारि इदमयं गंधमक्ष पुष्पं धूपं दीपं चरुं फलं बलिं गृह्ण २ स्वाहा । अर्चनम् । ॐ ह्रीं क्रो. यल्व्यू प्रवाल वर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेत सपरिवारे हे कौमारि स्वस्थानं गच्छ२ जः नः जः। विसर्जनम् ।
देशम परिच्छेद । १४७ वैष्णवीदेवीका पूजन ॐ ह्रीं क्रों झल्व्यू नीलोत्पल वर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते स परिवारे हे वैष्णवि एहि२ संवौषट् । इत्याह्वाननम् । ॐ ह्रीं क्रों झन्दयू नीलोप्तल वर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे वैष्णवि तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । स्थापनम् । ॐ ह्रीं को झल्ब्यू नीलोप्तल वर्णे सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे वैष्णवि मम सन्निहिता भव२ वषट् । सन्निधिकरणम् । ॐ ह्रीं क्रों झल्यूँ नीलोप्तल वणे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे वैष्णवि इदमयं गंधमक्षतं पुष्पं धूपं चरुं फलं बलिं गृह्ण २ स्वाहा । अर्चनम् । ॐ ह्रीं क्रों झल्यू नीलोप्सल वणे सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे दैणवि स्वस्थानं गच्छ जः जः जः। विसर्जनम् । वाराहीदेवीका पूजन ॐ हीं को खव्यू इंद्र नील वर्णे सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन समेत सपरिवारे हे वाराहि एहिर संवौषट् । इत्याह्वाननम् । ॐ ह्रीं क्रो खल्ब्यू इंद्रनील वर्णे सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध १४८] ज्वालामाटिनी कल्प। वाहन समेते सपरिवारे हे वाराहि मम सन्निहिता भव२ वषट् । सन्निधिकरणम् । ॐ ह्रीं क्रों खल्च्यू इंद्र नीलवणे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे वाराहि इदमयं गंधमक्षतं दीपं धूपं चरूं फलं बलिं गृह्ण २ स्वाहा । अचेनम् । ॐ ह्रीं क्रों खल्व्यू इंद्र नीलवर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे वाराहि स्वस्थानं गच्छ२ जः जः जः। विसजनम् । ऐंद्रीदेवीका पूजन ॐ ह्रीं क्रों भरव्यू हंस वर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे ऐंद्री ऐहि२ संबौषट् । आह्वाननम् । ॐ ह्रीं क्रो भल्च्यू हंस वर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे खायुध वाहन समेते सपरिवारे हे ऐंद्री तिष्ठ२ ठः ठ । स्थापनम् । ॐ ह्रीं क्रो भल्व्यू हंस वर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिबारे हे ऐंद्री मम सन्निहिता स्व२ वषट् । सन्निधिकरणम् । ॐ ह्रीं क्रों भल्ब्यू हंस वर्णे लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे ऐंद्री मम सन्निहिता इदमयं गंधमक्षतं पुष्पं दीपं धूपं चरूं फलं बलिं गृह्ण२ स्वाहा । अर्चनम् । ॐ ह्रीं क्रों भल्ब्यू हंस वर्णे सव लक्षण संपूर्णे स्वायुध दशम परिच्छेद । [ १४९ वाहन समेते सपरिवारे हे ऐंद्री स्वस्थानं गच्छ२ जः जः जा। विसर्सजनम् । चामुण्डा देवीका पूजन ॐ ही क्रों कल्यूं हंस वर्णे सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे चामुण्डे एहिर संवौषट् । आह्वाननं । ॐ ह्रीं क्रों कयूं हंस वर्णे सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे चामुण्डे तिष्ठ२ ठः ठः । स्थापनम् । ॐ ह्रीं क्रों कन्च्यू हंस वर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते हे चामुण्डे अत्र मम सन्निहितो भव२ वषट् । ॐ ह्रीं क्रों कल्ब्यू हंस वर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे चामुण्डे इदमयं गंधमक्ष पुष्पं दीपं धूपं चरूं फलं बलिं गृह्ण२ स्वाहा । अर्चनम् ॐ ह्रीं क्रों कल्ब्यू हंस वर्णे सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे चामुण्डे स्वरथानं गच्छ२ जः जः नः । विसर्जनम् । महालक्ष्मीदेवीका पूजन महालक्ष्मी एहि२ संवौषट् । आह्वाननं । ॐ ह्रीं क्रों कल्च्यू हंस वर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवार हे महालक्ष्मि तिष्ठ२ ठः ठः। स्थापनम् ।
११५०, । जमालामालनी कल्प। 1. ॐ ह्रीं क्रों कल्व्यू हंस वर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे महालक्ष्मि मम संहिता भव२ वषट् । सन्निधिकरणम् । ॐ ह्रीं क्रों कन्व्यू हंस वर्णे सर्व लक्षण संपूर्णे स्वायुध वाहन समेते सपरिवारे हे महालक्ष्मि इदमध्य गंधमक्षतं पुष्पं दीपं चरुं फलं बलिं गृह्ण२ स्वाहाविसर्जनम् । । इति ब्राह्म 'द अष्ट देवनाना परोपकार क्रम: ज्वालिन्या सन्निधौ देव्या। मूल विद्यामिमां सुधी- लक्षमेकं जपेत्पुष्पै । संवृतैररुण प्रभः ॥ १॥ अर्थ-बुद्धिमान् पुरुष ज्यालामालिनिदेवीके सन्मुख मल मंत्रका लाल पुष्पोंसे एक लाख जप करे ॥ १ ॥ तन्निष्ठान निशायां हिम कुकुम लघु पुरादिभि द्रव्यैः । रचिताभि गुलिकाभिः जुहुयाद युतं यथा विहितं ॥ २ ॥ अर्थ-फिर रात्रिके समय हिम (चंदन), कुकुम (केशर) लघुपुरा (शुद्ध गूगल) आदि द्रव्योंकी गोली बनाकर उनसे दश सहस्त्र हवन करे ॥ २ ॥ अम्बादेवी सन्निहिता शुभमशुभं यथा फलं निखिलं । संपादये दभिमतं साधन विधि संग्रहीत विद्यस्य ॥३॥ अर्थ-इस प्रकार इस साधन विधिसे विद्या सिद्ध करने-
दशम परिच्छेद ।
वालेको वह माता ज्वालामालिनी देवी पास आकर संपूर्ण शभ.
और अशुभ फलको कहती है ॥३॥
मंत्र जप होम नियम ध्यान विधि मा करोतु सन्मंत्री ।
यद्यप्यत्र समु तं तथापि सन्मंत्र साधनं त जहातु ।। ४ ।।
अर्थ-यद्यपि अग्नि एक होती है। तथापि उमको हवासे
क्यों न उबका जावे। उसी प्रकार यद्यपि मंत्र एक ही होता है।
तब भी जप और हवनसे युक्त होने पर उसके लिये क्या
असाध्य है।
शिष्यको विद्या देनेकी विधि
शाल्यक्षतैर्मन्डलमाविलिरव्य, विहस्तमानं चतु रस्र कं तत् ।
जिनेन्द्रबिंब शिखिदेवतायाः, सुवर्णपादौ च निवेश्य तत्र ॥५॥
अर्थ-सांठीक चांवलोंसे दो हाथ लंबा चौडा चौकार
मंडल बनाकर उसमें जिनेन्द्र भगवानको प्रतिमा और
ज्वालामालिनी देवीके चरणोंकी स्थापना करे ॥ ५॥
अष्टोत्तर शतपूगै रष्टोतर, शतक भक्ष दीपाद्यः ।
जिन शिखि देवी पदयोः, पूजा गुरु भक्तितः कार्या ॥६॥
अर्थ-फिर उन भगवान और देवीके चरणोंकी एकसौ
आठ सुगारी और एकसौ आठ नैवेद्य दीप आदिसे गुरुमें भक्ति
लगाकर पूजा करे ॥६॥
'६५.1 नट माटिनो कार। चंद्रादयः साक्षिणा इत्यथोक्ता हिरण्य निक्षिप्त घटस्य तोयैः। दद्यात्ततः साधक सव्य हस्ते विद्या प्रदता भवते मयेति ॥७॥ अर्थ-"चन्द्रमा इत्यादिकी साक्षी करके मैं तुमको यह विद्या देता हूँ" यह कहकर शिष्यके बाएं हाथमें सोनेके कलश- मेंसे जलकी धारा डाले ॥ ७ ॥ . श्री जैन धर्मानु रताय विद्या, त्वया प्रदेयेति च भाषणीयं । मिथ्यादृशे दास्यसि लाभ तश्चेत् , प्राप्नोति गौ ब्राह्मण घात पाप ॥ ८ ॥ अर्थ-"फिर उससे कहे" तुम यह विद्या जैन धर्ममें अनुरक्त पुरुषको ही देना । यदि मिथ्यादृष्टिको दोगे तो तुमको "गो" और ब्राह्मणकी हत्याका पाप लगेगा ।। ८ ।। इति शिष्यको विद्या देनेकी संक्षिप्त विधि । x X X ॐ नमो भगवते श्री चन्द्रप्रभ जिनेन्द्राय शशांक शख गौक्षीर हार धवल गात्राय घाति कमनिमलोच्छेदनाय जाति जरा मरण विनाशनाय संसार कांतारोन्मूलनाय अचिंत बल पराक्रमाय अप्रतिहत महा चक्राय त्रैलोक्य वशंकराय सर्व सत्व हितं कराय सुरासुरोरगेंद्र मुकुट कोटि घटित पाद पीठाय त्रैलोक्य नाथाय देवाधि देवाय अष्टादश दोष रहिताय धर्म, चक्राधीश्वराय सर्व विघ्न हरणाय सर्व विद्या परमेश्वराय
-
नाम नचिकेद
[ १५३
कुविद्यानकाय त्वत्पाद पंकजाश्रय निषेवनी देवि शासन देवते
त्रिभुवनजनसंक्षोभिण त्रैलोक्य शिवाय कारिणि स्थावर
जंगम विष मुख संहारिणि विष मोचिनि सर्वाभिचार कर्माय
हारिणि परविद्योच्छेदिनी पर मंत्र यंत्र प्रणाशिनि अष्ट महा
नाग कुलोचाटिनि काल दंष्ट्र मृतकोच्छायिनि सर्वरोग प्रमोचिनि
ब्रह्मा विष्णु रुद्रो रगेन्द्र चन्द्रा दित्य ग्रह नक्षत्रोत्पात भय
मरणभय पीडा संमर्दिनि त्रैलोक्य महते विश्वलोक वंश
करे भुविलोक हितकरे महा भैरवे भैरव शस्त्रोपधारिणि
रौद्र · रौद्र रूप धारिणि प्रसिद्ध सिद्ध विद्याधर
यक्ष राक्षस गरुड गन्धर्व किन्नर किम्पुरुष दैत्यो
दैत्योर गेंद्र पूजिते ज्वालामाल कराल दिगन्तराले महा महिष
वाहिनि खेटक कृपाण त्रिशूल शक्ति चक्र पाश शरासन शंख
विराजमान षोडशार्दू भुजे एहि२ हल्ब्यू ज्वालामालिनि ह्रीं
क्लीं ब्लू हां ही ह ह्रौं ह्रः ह्रीं देवान् आकर्षय२ नाग
ग्रहान् आकषय २ यक्ष ग्रहान् आकर्षय २ गंधर्व ग्रहान् आकर्षयर
ब्रह्म ग्रहान् आकय२ राक्षस ग्रहान् आकर्षय२ भूत
ग्रहान् आकर्षय२ व्यंतर ग्रहान् आकर्पय२ सर्व दुष्ट ग्रहान्
आकर्षय२ कड कड कम्पाय२ शीर्ष चालय २ गात्रं चालयर
बाहु चालय २ पादं चालय २ सर्वांगं चालय२ लोलयर
'धनु२ कंपय२ शोघ्रमवतारय२ गृह्ण२ ग्राह्यर अबोडयर
आवेशय२ जल्ब्यू ज्वालामालिनि ह्रीं ह्रीं क्लीं ब्लू ह्रां ह्रीं
ज्वल २ रररर घगर घूमांद्य कारण ज्वल २ ज्वलन शिखेर्देव
१५४ ] ज्वालामालिनी कल्प। ग्रहान् दह२ यक्ष ग्रहान् दह२ वाग ग्रहान् दह२ गंधर्व ग्रहान् दह दह ब्रह्म ग्रहान् मह२ राक्षस ग्रहान् दह२ भूत ग्रहान् दह२ व्यंतर ग्रहान् दह२ सर्व दुष्ट ग्रहान् दह२ शत कोटि देवान् दहर सहस्त्र कोटि पिशाचानां राज्ञे दह२ घेर स्फोटय स्फोटय मारय२ धगर धगित मुखे ज्वालामालिनि ह्रां ह्रीं है ह्रौं हः सर्व शत्रु ग्रह हृदयं दह२ पचर छिंदर भिंद भिंद हः हः हा हा स्फुटय२ घे घे क्षल्यू क्षांक्षी झू क्षौं क्षः स्तंभय २ भल्यू भ्रां भ्रीं भ्रू' भौं भ्रः ताडय ताडय मल्यूं मां मी मू नौं म्रः नेत्रे स्कोटय२ दर्शय२ फव्यूं यां यी यू यौ यः प्रेषय२ घल्यू घ्रां घी बूं घौ घ्रः जठरं भेदय२ डम्ल्यू ड्रा डू डू ड्रौं ड्र. मुष्टि बंधेन बंधय२ खन्यू खां स्त्री स्त्र स्त्रों स्त्रः ग्रीवां भंजय २ छम्ल्यू छो छी छ छौं छः अंबान छेदय २ ढल्व्य दां महा विद्युत्पाषाणा स्त्रेहन २ वल्व्यू बां वीं बृं बौं वः समुढे मजय२ हल्च्यूं ह्रा ह्रीं हूँ ह्रौं ह्रः सर्व डाकिनी मर्दय २ सर्व योगिनी स्तर्जय२ सर्व शत्रन ग्रासयर ख ख ख ख ख ख ख खादय २ सर्व दैत्यान् ग्रासय २ सर्व मृत्युन् नाशय२ सर्वोपद्रवान स्तंभय२ जः जः जः दह दह पच पच घरु२ षरु२ खड्ग रावणम् विद्यां घातय२ चंद्रहास खड्गेन छेदय २ भेदय २ डरु२ छरुर हरु२ फुटरु घे घे आं क्रों क्षांक्षी क्षौ ज्वालामाविनी आपयति स्वाहा । अयं पठित संसिद्ध, श्री ज्वालिन्याधि दैवत । ढी
देशम पारच्छेद..
१५५९
माला मंत्रः प्रजाप्या दै, गृहरोग विषादिहृत् ॥१॥
अर्थ-यह श्री ज्वालामालिनीदेवीका माला मंत्र केवल
पढनेसेही सिद्ध हो जाता है। इसका जप इत्यादि करनेसे
ग्रहरोग और विष आदि नष्ट होते हैं ॥१॥
इतिश्री मालिनी माला मत्र माप्तम् ।
ज्वालामालिनी वश्य मंत्र
"ॐ ह्रीं क्लीं आं क्षीं ह्रीं क्लीं ब्ळू द्रां द्रीं हंसः यहीं
ज्वालामालिनी देवदत्तस्य सर्वजन वश्यं कुरु२ स्वाहा ।"
नित्य २१ दिन जपै रक्त विधानेन सर्वजन वश्यं वार
७-२१-१०८ अबीर मंत्र सिरपर नाखे स्त्री-पुरुष वश्य होंय,
सवा पैसेकी सीरनी बांटे।
अथ श्री चंद्रप्रभ स्तवनम्
ॐ चन्द्र प्रशु प्रभाशीघीशं, चन्द्र शेखर चंद्रर्ज।
चंद्र लक्षम्यांक चंद्रांक, चंद्र बीज नमोस्तुते ॥ १ ॥
ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं चंद्रप्रभः, ह्रीं श्रीं कुरु कुरु स्वाहा ।
इष्ट सिद्धिः महारिद्धि, तुष्टि पुष्टि करोद्भवः ॥ २ ॥
द्वादश सहस्र जप्तो, बांछितार्थ फलप्रदः ।
महता त्रि संध्यं जप्तवा, सर्व व्याधि विनाशकः ॥३॥
MAHARANA १५६ ] स्वा मालिनी काप सुरा सुरेन्द्र सहिता, श्री पांडव नृप स्तुतः श्री चंद्रप्रभु तीर्थेशः, श्रियो चंद्रो जलां कुरुः ॥ ४ ॥ श्री चंद्रप्रभु विद्येयं, स्मृता सद्य फल प्रदा। भवाब्धि व्याधि विध्वंसी, दायिनी मे वर प्रदा ॥ ५ ॥ इनि मत्र रूप चद्रप्रभ 1 त्र समाप्तम् । विधि पूर्वक ए मंत्र साधे, ज्वालामालिनी स्तोत्र नित्य पढ़े, सर्व कार्य सिद्धि कारक मंत्रोयम् । श्री चंद्रप्रभु स्वामी स्तवनम् देवैः स्तुष्टुचे तुष्टैः, सोम लांछित विग्रहः, दद्याचंद्रप्रभः प्रीतिः, सोम लांछित विग्रहः ॥१॥ येपा पूजां विधिः कर्मा, जनहृत्कमलालयः, तेजिनाः पातुवो भव्य, जनहत्कमलालयः ॥२॥ कुतीथिं सार्थेन दुरा, सदं भोग्या निरंजनः, श्रुतं सेवेत मोहानि, सदं भो ज्ञानि रंजनः ॥३॥ पीतु गीर्वाः कृत्वा विद्यो, परमा कमलासना, यत्प्रभोवा जनै ल भे, परमा कमलासना ॥४॥ इति श्री चद्रमु स्वामी परम् अथ श्री चन्द्रप्रभ स्वामी स्तवनम् मौक्तिक दामादि वृत वद्ध षट् भाषा रचना चमस्कृति
दशम परिच्छेद । [ १५७
युक्त यथा । संस्कृत, प्राकृत, शौरसेनी, मागधी, पैशाचिक,
चलिका, पैशाचिक, अपभ्रंश ।
संस्कृत-
.
नमो महासेन नरेन्द्र तनुज, जगद् जन लोचन भृग सरोज ।
शरद्भव सोम सम द्युति काय, दया मय तुभ्यमनंत सुखाय ॥१
सुखी कृतु सादर सेवक लक्ष, विनिर्जित दुर्जय भाव विपक्ष ।
सुरासुर बंद नमस्कृत नंद, महोदय कल्प महीकर कंद ॥२॥
प्राकृत
जयनिरसिप तिहुयण जं तुभंति,
जय मोह महीकह वन नन्दति ।
जय कुद कलिय समदंत यंति,
जय जय चंद्र प्यह बंद कंति ॥३॥
जय पणय पाणि गण कप्परूरक,
जय जगडिय अपयड कसय परक ।
जय जिम्मल केवल नाण गेह
जय जय जिणिंद अप्पडि मदेह ॥४॥
.
विगद दुह देहु मोहारि केदयं,
दलिद गुरु दुरिद मध विहिद कुमुद क्खयं ।
नातं नमदिजो सदट नद वत्सलं,
लहदि निच्चदि गदि सोददं णिम्मलं ॥५॥
१५८ ]
ज्वालामालिनी कल्प।
मागधी-
असुल सुल विलसन लनाय सेविव पदे,
नमिल जय जंतु तुदिन्नसिव पुल पदे ।
चलन पुल निलद सिंसालि सलसी लुदे,
देहि महसा मिवं सालि सासद पदे ॥६॥
'पेश 'कं-
तलिता खिलतो सतया सतन,
मदना नल नील मनान गुणं ।
नलिना रुण पात तला पमते,
जिननो इधतं सशिवं लभते ॥७॥
चूलिका पैशाविक-
कल नालिक नातुल तप्प हलं,
चलनी कल चालु यशप्प सलं ।
लल नाचन कीत कुनं लुचिलं,
चिन लावम हंस मला मिचिलं ॥ ८ ॥
अपभ्रश-
सासय सुख निहाणु नाहन दिठो जेहिं तउं
'पुन विहूण उजाणु निफल जं मुतिहं नर पशुहं ॥ ९ ॥
निम्मल तुह मुह चंदुजे पहु पिक्खुई पसरिसिउं
इय निरूवय आणं दतिह मुनि सामी विष्फरड ॥१०॥
दशम परिच्छेद ।
[ १५९
द्वयं सम संस्कृतं
हारि हार हर हास केंद्र सुंदर देहा भय ।
केवल कमला केलि निलय मंजुल गुण गण मय ।।
कमला रुण करचरण चरण भर धरण वल।
बल मिहिर मणि संगम विलास लाल समल मयदल ॥ ११ ॥
भव नव दव जल वाह विमल मंगल कुल मंदिर ।
वाम काम कर केलि हरण हरिधर गुण बंधुर ।।
मंदर गिरी गुरु सार सबल कलि भू रूह कुंजर ।
देहि महोदय मेव देव सग केवलिं कुंजर ॥ १२ ॥
इति जगदभिनंदन जन हृदि चंदन चंद्र प्रभ जिन चंद्रवर ।
पड़ भाषा भिष्टुत मम मंगल युत सिद्धि सुखानि विभो विस्तर॥१३
।। इति श्री शन प्रभ सूरि कृत चंद्रप्रभ स्वामि स्तवनं समानम् ।।
ॐ नमो भगवते चंद्रप्रभाय चन्द्रेन्द्र महिताय,
चंद्र प्रभावमिति सर्व मुख रंजिनी स्वाहा ।
प्रभाते उदक ममि मंत्र्य मुखं प्रक्षालयेत् ,
सर्वजन प्रियो भवति ।
अथ चंद्रप्रभु मंत्र
ॐ नमो भगवते चंद्रप्रभ जिनेंद्राय,
चंद्र महिताय कीर्ति मुख रंजिनी स्वाहा ।।
चंद्रप्रभ जिन स्यास्य, शरचंद्र समुद्यतैः ।
मंत्रो नेक फल : सिद्धि, मायात्यऽयुत जाप्यतः ॥१॥
१६. मालामालना कल्प। - . अर्थ-शरत्कालीन चंद्रमाके समान कांतिवाले श्रीचंद्रप्रभ भगवान् का यह मंत्र दश सहस्र जपसे सिद्ध होकर अनेक फल देता है ॥ १॥ तमने दक्षिणे वामे, पृष्टे च सं जपेत्क्रमात् । वंद्यमानं जिनं ध्यायेत् , शक्रार्क श्रींदु चक्रिभिः ॥ २॥ अर्थ-इस मंत्रको क्रमसे भगवान्के आगे दाहिने बाएं और पीछे जप करे फिर उन भगवान्का ध्यान इंद्र सूर्य लक्ष्मी चंद्रमा और चक्रवर्ति रूपसे करे ॥ २ ॥ जपोस्य सर्व मप्यर्थ, साधये दभि बांछितं । विनिहंति च निःशेष, मभिचारोद्भवं भयम् ॥३॥ अर्थ-इस यंत्रका जप सब इच्छा किये हुए प्रयोजनोंको सिद्ध करता है। और सब मारण आदि अनुष्ठानोंसें पैदा हुए भयोंको नष्ट करता है ॥३॥ अभिषेको गव्यैर्वा, क्षीर तरु त्वक् कृषा सलिलै । वातायै ; संजप्तैः, क्षुद्र ग्रह हृद्धवेदमुना ॥४॥ अर्थ-उन भगवान्का गौ के दूध अथवा दूधवाले वृक्षोकी छालके बनाए हुए जल अथवा केवल जलसे अभिषेक करके जप करनेसे सब क्षुद्र ग्रह नष्ट हो जाते हैं ॥ ४ ॥ ॥ इति श्री चंद्रप्रभ स्तवनम् ॥ इति दानामालिनी फल्प सम्पूर्णम् ।
MootLLLLLLLLETEDSP UPLIESELELENSENSE Pety आनोलाममाये म नमामो माहास ताली तामूलीही महापद्वारा दामनकर ही मन ( Raji नजीओमाहाना हानाम : KEFFEERPRE [१] ज्दा . Pons ही को CRecipari. y. १६६६६ 57 s 'मकोकाहारीमा मन पy माळी है है 15 मन लि S HR कों सत्यूहयूगल्यू आर्ता REEEE “ช ਨੇ ਖੈਰ ਗਲੁ ਜਪੱਤੇ FREEREY द्रा res मल्लूपमा श " फ्ल्यू स्य ब्लू को 488 --- रक्षक यंत्र-परिच्छेइ तोन श्लोक २५ से २८. पृ० २५
[२]
सामान्यतंडला
N
चथुर्थ परिच्छेद, धोक १०-११
पृष्ठ ३६ से
[३]
शाकु
सर्वतोभद्र मंडल
दुसावलि
दुको
129
इदंभिकोण कुंड
ୱେଷ୍ଟ
दंतकुंड
सर्वतो सद्र मण्डल
चतुर्थ परिच्छेद, श्लोक १२ से १४
पृ० ५५
[४] सर्व रक्षा यंत्र॥१॥ सि ल ल श्रो her ल सिं * 51 a. लं सिं परिच्छेद ६ श्लोक १-२ पृ. ७१ .
10 anARTY PAIGANAar [५] । यह ३ पुत्र श्यक संन्न २॥ प त R a Pune Itute YLE ३ ३ SESEREUS मगर स 2. 93 FIR मम 1010 USLR १ ४ IMADUN RARARY सिनो । a प परिच्छेद ६ श्लोक ३ से ५ पृ. ७२ [६] ॥ बश्य यंत्र॥३॥ ओ ऐ وم श्री A. v *. ः a : स 찍 * ना s- भ us A परिच्छेद श्लोक ६ से ७ पृ० ७३ Arav मकुम २ वषद सोममे मोहम २ अमुक नर अमेजभेमोइम मोहमयमुकये विजये मोहय मोहय समुक नावश्यकुतरवषर गये विजय मोहय मोहय अमे मोहे मोहन - अमुमाना जिले मोरयरसमुक वश्यकुवा अपराजित मोहम मोहन प्रोममिनि मोरम अमुक नरसोअमे मोहम२ अमुक नर ABावश्यकुरुरवा करनय कुस वषद मेजित मोरयरसमुक नाये रन मोहय मोहयामुवाये अपराजित मोहम मोहम) नरवश्य कुसर चपर मां श्री ओं: श्री श्रः [७] मोहन वश्य यंत्रम ४ ए । श्रों नः को को ओर my लू टू স্ম ক্ষী : aप कुरु२ वषद म कौं व कुवर म मी यो का व ॐ ज को मां श्री भ्रूनों श्रः को म श्री श्री श्रू ओंशः का है । प्रभु श्री श्रः . परिच्छेद ६ श्लोक ८-९ ३०० N [८] ॥स्त्री आकर्वा यंत्र॥५॥ य य य 4 य य DIYE THE 4 क श्री a h परिच्छेद ६ श्लोक १०-१३ पृ० ७५
ge ल रवा ३ ने
ॐ
[९]
दिय गति सेना निव्हा औरोध सतना
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परिच्छेद ६ श्लोक १४-१५
पृ० ७७
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[१०] ਵਜੇਬਸ ਥੋਕ 1 दह दह पच पच विध्वंसन विध्वंसय उलष्ट ॐ | 2008 88 8 ए 18 सोधाय स्वाहा S seam ली ली | २RR " | हू. देशदास्य को गति प्रति जिव्हां च हन हन नि 8 931996 | ले मन TERAI ती ली FIR 19 8 Tree हो DIRE ॐ बजू कोधाय ज्वल ज्वल ॐ ॐ ॐ ज्वाला मालिनि हो ही लू द्रां ही हो ही हूं ह्रो परिच्छेद ६ श्लोक १६-१७ पृ० ७८
[११]
॥जिव्हा स्तंभन यंत्र॥
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परिच्छेद ६, श्लोक १८-११
पृ० ७९
[१२]
गति जिन्दा और क्रोधस्तंभनयंत्र॥
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ॐक्षिक्षी
नामा
ॐ क्षि क्षी
ॐ सिसी
परिच्छेद ६, श्लोक २०-२१
पृष्ठ ८०
[१३]]
"पुरुष वश्य यंत्र॥
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सः जूं ॐ
सः यूं ॐ
अजितायै स्वाहा
वारोही स्वाहा
जयायै स्वाहा
सः बूं ॐ
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* मोहाय स्नास
* अपरामिता साहा
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ॐनभाय स्वाहा
सः चूं ॐ
अरिजयाय स्वाहा
सः — ॐ
सः जू
ॐ
परिच्छेद ६ श्लोक २२-२४
पृ०८२
[१४] ॥कायन पूरा यंत्र॥१॥ नदय नरव Yeat 22 नरहे मो वाहे य नरजय . ਜਰੂ ਕਦੇ ਵੀ ह जहरीॐ स्वाभ जहीॐ स्वाभ नरतय भ नरव जर देवदत्त यान कार मोहा नरम नरवरे मोही R नवदेहा नेदे जय भू को जही स्वाभे हा स्वाम/ नरव नदत्तय को नदरेही नरम नरम परिच्छेद ६ श्लाक २५-२७ पृ० ८२ [१५] ॥शाकिनी भय हसा यंत्र ॥२॥ ॐ अमन थो हाकिरिगर्भ मुरविणा यामसिसि फट् योगिनि देवक्षत रक्षनाहा मा "don "Kaune भ २ 卐 tra म ॐ मनधरे घर पर विशुद्ध हूँ फर योगिनि देवदत रक्ष रक्ष स्वाहा है अ. ar เ๕ ต้ म) देवदत्त रस रसस्वाहा ॐ चले ही छहूं हीद स्मा क्ष्मी स्यू मा म. सर्व योगिनि क म दम २ सन १ 로 卐 렸 द 4. ॐ door हू यू फर योगिनि देवदन रक्ष रक्ष स्पहा ॐ बनधरे बंधक बन पाशेन सर्वदुष्ट विनविनायकानां ॐ परिच्छेद ६ श्लोक २८ पृ. ८३
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परिच्छेद ६ श्लोक २९-३४
पृ० ८४
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परिच्छेद ६ श्लोक ३६ से ४०
पृ० ८६
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ॐ ही आक्रोशी लीनस
[१८]
॥साका यंत्र॥
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परिच्छेद ६ श्लोक ४१ से ४३
पृ०६८
[१०]
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॥रमदेव ग्रह यंत्र॥
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परिच्छेद ६ श्लोक ४४ से ४६
पृ० ८९
[२०]
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ज्वालामालिनी विधि।
पृ० १३०
[२१] या काय संतोष मालय AN- पी मलक ॐ ज्वाला A . R मालिनी A नाकर्षण ही ही यंत्र दीदी की आकर्षण यंत्र । पृ० १३३
[२२]
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वशीकरण यंत्र ।
पृ० ११०
दर्शम दर्शप कोटयर विवारेजय कुंतर पुत्रान् देहि २ दुष्टान् लभय नम-मल्य मालि-य/म्ल्यू प्राप्रीम प्रोप्रा आणि देहि देहि भालामालियनम् चालामा My द्राली दा लिन 35 हो मरलवायरलवायरल m देहि२ हा मरन lod ne परलव ज्वालामालिनी मंत्र। है। नम धू चौ घ्र जर भेदय भेदय ज्वाला मालिन्यै नमः फ्ल्यूं प्रांत्री यरलवायरलव यरलवायरल लेवनीया मूर्ति नाथज्वालामालिनी HERE ही नम ही नम ज्वालामालिन्यै नम ह्यूँ क्रांकी दादी कह दुष्टाना नार्थपर हूँ नम यरल नयनव 8 मुष्टि बधय २ मना LeuriteYRIES परल Dzied PREM वाला / दो दि भीभूभौभ्र नाउय २ ही नम हानम ही नम मरल वायरलन यरलव ज्वालामालिन्यैनम'मास्तालाजालामालिन्यै नमा सालासलिन्सनम ays नम नार मन्त्रालय मपट्यानलमा (B) ਵੀ ਰਸ होना ज्वाला मालिन्यै नम कल्यू दो ही हूँ , मन्—ानी मौन नालिन्यै MARRIBEWELLER HEREnted RA नम रक्कम श्वा स्त्रीरो महाविद्युन्या माणास्त हन हन हनीप्रीत ButuR हाकुर२२ स्व्रग्रीवाभनया भजय साक्षाचाला huyY Nger पृ० १५६ ॐ ज्वालामालिन्य हो या कोंडी झू दाद्री नमः वि मंत्रनित्य जपै मुख्यैः कावा दीजन्य दुशन् मनोभास रिचरवरवारयम मानसासयम नीमईयरमशकिनी प्रेषय निमा यसशत्रूनारारपररवल। जज ₹ १२५२२ घर
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