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Jaimineyasutrani
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॥ श्रीः॥ जैमिनीयसूत्राणि डाटोलियामनिवासि-श्रीपाठकसंगलसेनात्मज- काशिरामविरचितभाषादीकया समेतानि । तानि न श्रीकृष्णदासात्मज-गंगाविष्णोः स्वकीये “लक्ष्मीवेंकटेश्वर " मुद्रणामारे रामचंद्र राघो इत्यनेन स्वाम्यर्थ मुद्रितानि प्रकाशितानि च । 1 संवत् १९७०, शकान्दाः १८३५. • - कल्याण-मुंबई Registered under Act XXV of 1867. ---
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क A 0-19 ज्योतिषग्रन्धान नाम. की.रु.आ.ट.म.रु.आ. ३८१.सर्वप्रकाश ज्योतिष माषा का इसमें तेजी मंदी वस्तु देखनेका विचार है ३८२ अयोध्याजातक ज्योतिष भाषाटीका (इसमें बालकका जन्म जातकादि भलिभाति वर्णित है) ३८३ कालज्ञान भाषाटीका क ०-३ ३८४ कररेखासंख्यावली(छंदवद्ध सुगमसामुद्रिक)क०-४ ३८५ गंगास्थित्वनिर्णय भाषाटीका क ०-२ - ३८६ केरलमत प्रश्नसंग्रह इसमें प्रश्न देखनेके है क' ०-४-! ३८७ गर्गमनोरमा भाषा और संस्कृत टीकासह क ०-५ -॥ ३८८ गर्गजातका मापाटीका क ०-३०- ३८९ प्रहगोचर भा० टी० ०-३ ३९० प्रहलाघव मा० टी. क १-० ०-२ ३९१ ग्रहशांति संस्कृत (अतिउत्तम) श्री ०-१० -१ ३९२ दमस्कारपिन्तामणि भाषाटीका ३९६ जन्मपत्र मार वर्षपत्रके फार्म प्रत्येकका क ०-२|| - ३९४ जातकालद्वार भापाटीका 6-१ ३९५ जातकालङ्कारसटीक.... क ०-६ ०-५ ३९६ जातकामरण मूल ग्लेज १२ आ. रफ् क ०-१००१ ३९७ जातकाभरण भा० टी चिकना कागज क १-८ - xxx जातकाभरण भा. टी. रफ़ क १-४ ३९८ जातकचन्द्रिका भा० टी० (अस्युत्तम जन्मजातक तन्वादि भावफल षडुर्गफल भनेकानेक योग दशादिवर्णित पासमें मवश्य रखने योग्य है) क .०-१२ -२ ३९९ जातक संग्रह माषाटीका इसमें जिन विपयोंकी कि जन्मपत्रफलादेशमें आवश्यकता होती है वेही समस्त विषय अनेक संस्कृत जातकग्रंथोंसे सार २ लेकर भाषाटीकासाहित छपे हैं क २८. २-४ क 1 २ ४०० जमिनिसूत्रसटीक चार मध्याय .... १०१ नैमिनीसूत्र भाटी ४०२ ज्योतिषश्यामसंग्रह मा टी० ग्ले (इसमें बहुत प्रकारसे जन्मपत्रका भाव योगानु योग उच्चादिवल दशा अरिष्ट राजयोगादि भाव भलीप्रकार कह सकते हैं.). फ -1 ४०४ ज्योतिषसार मालाटीका सहित क १-० ४०५ ज्योतिषकी लावणी ४०६ ज्योतिःशास्त्र निघंटु क ०-२ - १०७ ज्योतिषकी चावी भाषामें ४.८ तवदीप ( जातक अन्य देखने योग्य) क -३ ४०९ वाजिकनीलकण्ठी सटीक तन्त्रत्रयात्मक संस्कृत टीकासह खुलापाना. क १-० ११० जिल्दकी.... क १-१ -२ ४११ ताजपनीलकण्ठी महीपरकृत भाषाटीका क १-८०-३ ६१२ ताजिकभूषण मापाटीका ४१३ तिथिनिर्णय मूल संस्कृत ५२४ नष्टजन्मानादीपिका और पंचागदीपिकागदा- पघटीका समेत ( ऐसी उपयोगी कुंनीहँ जो हजारों रु० खर्चसेमी अलम्यहँ ज्योतिषी इससे अमूल्य लाभ पावेगे) ६१५ परीक्षा चक्रावली प्रश्नग्रंथ भा० टी.... क 0-11 ११६ पछीपतन भाषाटीका.... ०-२॥ .-1 ४१७ पत्रीवर्षदीपक मा. टी.(महिधरशर्माकृत)क ०-१००-१ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवेंकटेश्वर" छापाखाना कल्याण-मुंबई.
जय जैमिनीयसूत्रकी विषयानुक्रमणिका । Hd 4ARMANAND MIM ५ विपय. पृष्ठ, विषय. पृष्ठ मंगलाचरण या ग्रंथारंभ १ निसर्गवल ११ ग्रहांका दृश्यभार .... २ विपम समराशिभेद कर राशिदृष्टिचक्र .... র্ণা १२. अगलाकयन ३ क्रमव्युत्क्रमगणनाकी विप- पापग्रहोके योगसे होनेवाली रीतता अगला ४ तत्तद्राशिके दशावर्प लानेके कटपयादिसंख्याचक्र लिये अवधि १३ अर्गलाके वाधा करनेवाले फलविशेपके जनाने के लिये योग राशियोंका भारुढस्थान. १४ नगलायोगके दूर करनेवाले आरूढपदका उदाहरण १६ योगकेभी दूर करनेवाले योग., भावराशियोंके वर्णदस्थान अगलाकारक और अगला ग्रहोंके वर्णदवा निषेध प्रतिवन्धक योग. ६ अन्तर्दशाविभाग कतुग्रहके लिये कुछ विशेष. ७ । होरा द्रेष्काणादिकोंका मात्मकारक उपलक्षणमात्र २० मात्मकारकका उत्कर्ष ९ होराचक्र २१ समात्यकारक ब्राहकारक विषमत्रिशशिचक्र २२ मातृकारक समत्रिंशांशचक्र.... १० नवांशचक्र २३ पुत्रकारक ज्ञातिकारक २४ दारकारक सप्ताशचक्र मतान्तरसे पुत्रकारक आत्मकारकके नवांशका फल.२६ भगिन्यादिकारक भारमकारकके मेषादि नवां- मातुलादिकारक. शोका फल .... पितामहादिकारक आत्मकारकके नवांशका २८ पल्यादि स्थिरकारक ग्रहस्थितिसे फल ...."द्रेष्काणचक्र ...." ..... द्वादशांशचक्र २५ ...."
२ 4- पृष्ट . 1 । 'विषयानुक्रमणिका। विषय. विषय. आत्मकारकके नवांशसे दशम गापद्योग नवांशका विचार ३२ नेत्रभंगयोग आत्मकारकके नवमांशसे चतुर्थ उपपदादिके आश्रयसे फल. ५९ नवमांशका विचार ३३ आयुर्दायका विचार ६८ आत्मकारकके नवमांशसे नवम दीर्घायुयोग नवमांशका विचार ३४ मध्यायुयोग आत्मकारकके नवशिसे सप्तम अल्पायुर्योग नवांशका विचार .३५ लय चन्द्रमा इन दोनोंसे आत्मकारकके नवांशसे तृतीय आयुर्योग नवांशका विचार ३६ आयुयके निर्णय करनेका आत्मकारकके नवांशसे द्वादश तृतीय प्रकार नवांशका विचार ३७ | दो प्रकारसे एकाकार आयु केमद्रुमयोग ४५ आवे और एक प्रकारसे पूर्व कहे हुए फल किस काल भिन्न आयु आवे तहां विशेषमें होते हैं उसका निर्णय निर्णय ४६ जन्मलग्न होरालग्नसे आये आरूढकुण्डलीस्थ ग्रहोंके आ- हुए आयुका निषेध श्रय करके फलोंके कहनेको प्रस्तारचक्र पदका अधिकार ४७ दीर्घमध्याल्पायुर्योगोंके विष लग्नारूढसे एकादशस्थानका ७२ .... इसी विषयमें मतान्तर परमत कहकर निज मत स्थानका फल कथन एकादश स्थानमें व्ययवतही कक्ष्यावृद्धियोग लाभका विचार .... ४९ प्रमाणसिद्ध आयुमेंही भरण होता है या वीच भी आरूढ स्थानसे द्वितीयस्थ आकांक्षा निर्णय यानयोग ...., मरणयोगका निषेध कुछ विशेष लनारूढ स्थानसे द्वादश ...३ ....१८ लनारूद से सप्तम स्थानका मरण हो जाता है इस केतुका फल.... .....५४ शुभ ग्रहोंकी दृष्टि योग न . वली रुद्रका फल . ...." .. . इसका निर्णय विषयानुक्रमणिका। विषय. पृष्ठ. । विपण पृष्ठ होनेपरभी नवांशकाः '... ८२ कालमृत्युका निषेध ७५ | दोनों रुद्रोंका गुणविशेषकर नवांशदशामें राशिवृद्धि हो जावे है तो फिर किस रुद्रांश्रितराशिम मरणयोग. ८३ राशिमें मृत्यु होता है योगभेदसे मरणस्यान इस शंका निर्णय फलविशेषके कहने के लिये अन्य प्रकारसे दीर्घमध्याल्पा महेश्वरग्रहकथन युर्योग द्वितीय प्रकारसे महेश्वर ग्रह. ८९ इस प्रकरणमें कौन वल ब्रह्मग्रह ग्रहण करना चाहिये अन्य प्रकारसे ब्रह्मग्रंह ७६ | बहुत ग्रह ब्रह्मयोगकारक होवें अन्य प्रकारसे मध्यायुर्योग.... ७७ तो कौन ब्रह्मा होता है इस दीर्घादि योगोंक विष शंका निर्णय कक्ष्याबास इस योगमैं कुछ विशेष कक्ष्याहासयोगमें निषेध ....७८ अन्य प्रकारसे ब्रह्मग्रह बृहस्पतिके विपेमी हासवृद्धि यदि अष्टमेश अष्टमस्थ. इन प्रकार दोनोंमें भेद होवे तो कौन पापयोगसे जो कि कक्ष्याहास ब्रह्मा होता है इस शंका कहा उसमें अपवाद ७९ निर्णय स्थिरदशाके भाश्रयसे महादशाभी मरणकारक मरणयोग अन्तर्दशा विशेषकर मरणकालज्ञान मारक ग्रह मरणकारक राशिविशेष मारकका.फल बहुवर्षव्यापिनी दशा होवे मारकमहादशामें मरणकारक तो कब ‘मरण : होगा इस शंकामें निर्णय ....८१ पित्रादिकोंका मरणकाल निर्याणदशाविशेषको अन्य जतानेके लिये पित्रादि प्रकारसे दिखानेके वास्ते कारक कथन ८९ रुद्रग्रहकथनः ..... वली पितृमातृकारकका फलः ९० द्वितीय रुद्रग्रह ...., पितृमरणमें विशेष ८७. ...." ८० ८८ .... अन्तर्दशा । .00 ..."
. ४ ...U विषयानुक्रमणिका। विषय, पृष्ट. | विषय. पृष्ट. बाल्यावस्थामेही मातापित्रके द्वारवाह्यराशियोंका फल ... मरणयोग ९१ उक्त दोपका अपवाद पुत्रमातुलादिकोंका मरणकाल." केंद्रदशाका आरम्भस्यान मरणमें शुभाशुभ भेद ...." | केन्द्रदशाके क्रमभेद १०५ मरणमें देशभेद ९४ । कारककेंद्रादिदशा दशाभेद बलभेद तथा अन्य केन्द्रकी दशा १०७ नवांशदशा ९५ कारकादिदशाके वप वना- स्थिग्दशाका आरम्भस्थान. ९६ नेका विधान राशियोंका निसग बरु .... ९७ ....१०८ स्वामीका बलाबल ९८ निर्याणशूलदशा मंडक दशा ९९ पिताको निर्याणशूलदशा लदशा मांताकी नियःणशूलदशा समस्त साधारण दशाओंके भ्राताकी निर्याणशूर दशा.... १०० आरम्भमैं तथा वर्ष लानमें भगिनी पुत्र इन दोनोंकी निर्याणशूलदशा नक्षत्रदशा १२० ज्येष्ठ भ्रताकी निर्याणशू- योगार्द्धदशा लदशा योगार्द्धदशाके आरम्भराशि. १११ पितृवर्गकी निर्याणशूलदशा. हादशा ब्रह्मदशा १०१ त्रिकोणदशा ११२ ..." | त्रिकोणदशाका फल ....११३ चरदशामें क्रमव्युत्क्रम भेद...१०२ नक्षत्रदशा द्वारगाशे और बाह्यराशि.... १०३ | दशाफ विशेष ११५ इति विषयानुक्रमणिका समाप्ता। ...." कुछ विशेष चतुर्थ वल . पुस्ता मिलनेका ठिकाना--गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, लक्ष्मीवकटेश्वर" छापाखाना, कल्याण-मुंबई.
॥ श्रीपरमात्मने नमः॥ अथ भाषाटीकासहितानि जैमिनीयसूत्राणि। SSISTEG यो हत्वा ध्वान्तमुत्रैः सुरमयति जनायोजयन्कर्ममार्ग । चावलादेवयांसि क्षिपति स विजजमार्चवान्सर्वधर्मान् ॥ यत्पन्थानं घुपेत्य व्रजति यतिगेणा बल निर्वाणधाम । तंध्यात्वा कृत्सरोज तमिह विरहये जैमिनः भूमापाम् ॥१॥ पूर्वजन्माणित कर्मज्ञानसे अनुष्ठान किये हुए काशीवासादि लेिज वृत्तसे जगलके उद्धार करनेकी इच्छावाले करुणासमुद्र जैमिनिमुनि इस प्रारिप्सित ग्रंथके रोकनेवाले विनती शान्तिके लिये श्रीशंकर भगवानको प्रणाम कर समस्त जनाये शुभ अशुभ जतानेवाले जातकशास्त्र की रचना करनेको प्रतिज्ञा करते हैं ॥ १ ॥ उपदेश व्याख्यास्यायः ॥ १॥ उकार इस अक्षरके स्वामी जी कि शंकर भगवान हैं तिनको प्रणाम करते हैं अथवा जिस करके पूर्वजन्मार्जित शुभ अशुभ कर्मों- का फल प्रगट किया जाता है ऐसे उपदेशनाय जातकशास्त्रविशे- पको कहते हैं ॥ १ ॥ इस शास्त्र में अन्य शास्त्रवतही दृष्टिविचार है अथवा अन्य शास्त्र- से विलक्षण है इस संशयको दूर करते हुए कहते हैं । अभिपश्यन्त्यक्षाणि ॥ २॥ पार्थभे च ॥ ३ ॥ १“ उकार शंकरः प्रोक्तः" इत्येकाक्षरकोशः ।।
२ । जैमिनीयसूत्राणि । [ अध्यायः १. ऋक्षनाम राशेि अपने सन्मुख और पार्श्वराशिको देखते हैं। भाव यह है कि चरसंज्ञक मेष, कर्क, तुला, मकरराशि अपने पंचम, अष्टम, एकादशराशिको देखते हैं और स्थिरसंज्ञक वृष, सिंह, वृ- श्चिक, कुम्भराशि अपने षष्ठ, तृतीय, नवमराशिको देखते हैं और द्विस्वभावसंज्ञक मिथुन, कन्या, धनुः, मीनराशि अपने चतुर्थ, स- तम, दशमराशिको देखते हैं ॥ २ ॥३॥ इसके अनन्तर ग्रहोंकाभी द्रष्टदृश्यभाव कहते हैं। तनिष्ठाश्च तहत् ॥४॥ तिन चरादिराशियामें स्थित हुए ग्रहभी उन चरादिराशियोंके समान राशिको देखते हैं । भाव यह है कि जिस प्रकार चरादिराशि अपने अष्टमादि राशियोंको देखते हैं तिसी प्रप्तार चरादिस्य ग्रहमी अपनेमे अष्टमाहि राशियोंको और उनपर युक्त हुए ग्रहोंको १ इस प्रकारको दृष्टिमें प्रमाण वृद्धकारिकाका है। चरं धनं विना स्थारनु स्थिर- मन्त्यं विना चरम् । युग्मं स्वेन बिना युग्मं पश्यतीत्ययमागमः ॥ " अर्थ-चरराशि अपने द्वितीय स्थिरराशिको छोडकर अन्य समस्त स्थिरराशियोंको देखता है और स्थिरराशि अपने पिछले चरराशिको छोडकर, अन्य समस्त चरराशियोंको देखता है और द्विस्वभावराशि अपने प्रथम स्थानको छोडकर अन्य समस्त विरवभाव राशियोंको देखता है। अन्यच्च-"चरा नाग ८ वाणे ५ श ११ राशीन्स्वतो वै स्थिराः पट् ६ वतीयां ३ क ९ राशीन क्रमेण । स्वतः शैलभं ७ वेदभं ४ पंक्तिभं १० च क्रमाद् द्विस्वभावः प्रपश्यन्ति पूर्णम् ॥” इति राशिषु सिद्धम् ॥ अथ राशिदृष्टिचक्रम्. चरसंज्ञक. स्थिरसंज्ञक. द्विस्वभावसंज्ञक द्रष्टा म.क. तु. मष. वृ. कुं.म/क.ध.मी. दृश्य ४|४|४ सिं. व. कुं.वृष. के. तु. म मे.क.मी. मि. ૦૮૦૮૦૮૦૮૦ ૦૦૧ दृश्य वृ.कु.वृष.सि. त. म. म. क. घ. मी.मि.क. १२/१२/११/११/०९/०९/०९/०९,१०१०१०१० दृश्य कुं.वष/सि. मे.क. तु.मी.मि. क. घ. . ७.७७७ IC2 ३ पादः १.] भाषाटीकासहितानि। देखता है । जैसे चरराशिपर जो कि ग्रह स्थित हो वह ग्रह अपनेसे अष्टम, पञ्चम, एकादशराशि और अष्टम, पञ्चम, एकादश स्थान- स्थित ग्रहोंको देखता है और जो कि ग्रह स्थिरराशिपर स्थित हो वह षष्ठ, तृतीय, नवमराशि और ग्रहोंको देखता है और जो कि ग्रह द्विस्वभावराशिपर स्थित हो वह चतुर्थ, सप्तम, दशमराशि और ग्रहोंको देखता है ॥ ४॥ " शुभार्गले धनसमृद्धिः " इत्यादि प्रथमाध्यायके तृतीयपादों आया है कि शुभ अर्गल होवे तो धनकी वृद्धि होते है सो अर्गल शिप्तका नाम इसीको कहते हैं। द्वारभाग्यशूलस्थानला निधातुः ॥६॥ जिस राशिका विचार किया जावे उस राशिका निधाता नाम जो कि देखनेवाला है उससे दार नाम चतुर्थ और माग्य नाम द्वितीय और शूलनाम एकादश स्थानपर जो ग्रह होवें वे अह विचार किये जानेवाले राशिके देखनेवाले ग्रहके अर्गलासंज्ञक होते । अर्गलाको कर्तरीभी कहते हैं ॥५॥ 1 इस प्रकार महाष्टमें वृद्धवाक्य प्रमाण है । " चरस्थ स्थिरगः पश्यस्थिरस्थं चर- राशिगः । उभयस्यं तुभयगो निकटस्थं पिना ग्रहम् ॥ " अर्थ-स्थिरराशिपर स्थित हुआ अह.बरराशिपर स्थित हुए ग्रहको देखता है परन्तु निकटके चरराशिपर स्थित हुए ग्रहको नहीं देखता है इसी प्रकार निकटके स्थिरराझिपर स्थित हुए ग्रहको छोडकर अन्य स्थिरराशिपर स्थित हुए ग्रहको चरराशिपर स्थित हुआ ग्रह देखता है और साथके द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रहको छोडकर द्विस्वभावराशिस्थ ग्रह शेप द्विस्वभावस्थ ग्रहको देखता है। २ "निधातुः " इस मूत्र पदकी व्याख्या स्वाम्यादि आचायने तो " फलदातुः इस प्रकार की है परन्तु यहाँपर वृद्धवाक्यसे "द्रष्टुः" इस प्रकारही अभिप्रेत है क्योंकि 'कहा है। “ भय २ पुण्य ११ दिना ४ भावाद् द्रष्ट्र राहुः शुभार्गलम् ।" इस प्रथमें कटपयादिक्रमकरके अंक ग्रहण करने योग्य हैं क्योंकि उन्हीं अंकोंसे राशिभावज्ञान होता है । कटपयादि क्रमसे आये हुए अंक १२ से अधिक होवे तो १२ के भागसे बचा हुआ · राशिभाव, जानना । कटपयादि क्रमसे अंक ग्रहण करनेमें प्राच्यकारिका प्रमाण है । “ कटपयवर्गभवैरिह पिंडान्त्यरक्षकाः । ननि च शून्यं ज्ञेयं तथा स्वरे 'कैवले कथितम् ॥ ॥ अर्थ-ककारसे लेकर क ख. ग. घ. ऊ. च.छ. ज. झ. अ. " . ४ . जैमिनीयसूत्राणि । [अध्यायः १. यह अर्गला शुभग्रह तथा पापग्रह दोनोंकेही योगसे होनेवाली कही गई. । अब केवल पापग्रहोंके योगसे होनेवाली अर्गलाको कहते हैं। कामस्था भूयसा पापानाम् ॥६॥ पापग्रह अर्थात् सूर्य और कृष्ण पंचमीसे लेकर शुक्ल पंचमी- तकका चन्द्रमा और मङ्गल और पापग्रहोंके साथका बुध और शनैश्चर तथा राहु और केतु इनमेंसे तीन वा तीनसे अधिक पाए- ग्रह जिस राशिके तृतीयस्थानपर स्थित होवें तौ उस राशिके देख- नेवाले ग्रहके अर्गलासंज्ञक होते हैं। सूत्रमें पापग्रहोंका बाहुल्यं कहनेसे तृतीयस्थानपर एक वा दो पापग्रह हो तो अर्गला नहीं होती है.यह अर्गला पापसंबन्धिनी कही ॥६॥ यहांतक और टकारसे लेकर ट. ठ. ड. ढ. ण. त. थ. द. घ. न. यहांतक और पका- रसे लेकर प. फ. व. भ. म. यहांतक और यकारसे लेकर य. र. ल. व.श. प. स. ह. यहांतक इन चारों पिण्डोंमें राशिभावसूचक अक्षर जिस संख्यापर हो उस संख्याको ग्रहण कर वाम रीतिसे लिखता चला जाय । यदि संख्यामें नकार सकार जावे तो शन्य ले लेने और यदि व्यक्षनवर्जित केवल स्वर आ जावे तौभी शून्य लेवे ! यदि यह संख्या १२ से अधिक होवे तौ १२ का भाग देवे । जो अंक शेप बचें वहीं राशिभावसंज्ञक है । उदाहरण-दार इस भावसूचक पदमें दकारकी संख्या ८ है और रकारकी संख्या दो अव दोनोंको वाम गतिसे रखनसे २८ हुए इनमें १२ का भाग देनेसे ४ वचे यहही दारभावकी संख्या है अर्थात् चतुर्थस्थान दारसंज्ञक है। इसी प्रकार समस्तभाव जानने चाहिये । संख्याक्रम चक्रमें है । दारभाग्यशलरथाः अगला निधातुः " इसमें विसर्गका लोप श करनेपर सन्धि हुई है। यह छान्दस है क्योंके सूत्रभी छन्दोवत होते हैं इति ॥ कटपयादिसंख्याचक्रम्. क ख २ ग३ घ४५/ च ६ छ ७ ज झ ९० ट १२|ड ३४] ण ५ त ६ य ७ ८ ९ न० प१ फव३ मम ५ य१र२ ल ३ व ४/शष६ स ७३८ १ इस सूत्रकी कोई प्रेमानाचे आदिक पण्डित ऐसी व्याख्या करते हैं । पापग्रहोंके. ।
भादः १.] भाषाटीकासाहतानि । इसके अनन्तर प्रथम कही हुई अर्गलाके वाधा करनेवाले योगको कहते हैं रिफनीचेकामस्था विरोधिनः ॥७॥ जिस याशिका विचार किया जाये उस राशिके देखनेवाले ग्रहसे यदि दशमस्थानपर कोई ग्रह होवे तो चतुर्थ स्थानमें स्थित हुए अर्गलाकारक ग्रहका बाधक होता है और बारहवें स्थानपर यदि कोई ग्रह होवे तौ द्वितीय स्थानमें स्थित हुए अर्गलाकारक ग्रहका वाधक होता है और यदि तृतीय स्थानपर स्थित कोई ग्रह होवे तो ग्यारहवें स्थानपर स्थित हुए अर्गलाकारक ग्रहका विरोधी होता है। भाव यह है कि चतुर्थ, द्वितीय, एकादश स्थानपर स्थित हुए अर्गलाकारक ग्रहाको अर्गला तब नहीं होती है जब कि क्रमसे दशम, नादश, तृतीय स्थानपर ग्रह स्थित होवें ॥७॥ इसके अनन्तर अर्गलायोगके दूर करनेवाले योगकमी दूर करनेवाले योगको कहते हैं। न न्यूना विदलाश्च ॥८॥ यदि अर्गलाकारक ग्रहोंसे अर्गलाके दूर करनेवाले ग्रह अल्प संख्यावाले हों अथवा अर्गलाकारक ग्रहोंसे अर्गलाके दूर करनेवाले ग्रह निर्वल हो तो वह अर्गलाके दूर करनेवाले ग्रह अर्गलायो- गको दूर नहीं कर सकते हैं । भाव यह है कि जैसे अर्गलाकारक ग्रह दो हो और अर्गलाके दूर करनेवाला एकही होवे तौ अर्गलायोग रहता है और यदि अर्गलाकारक ग्रहोंसे अर्ग. लाप्रतिबंधक ग्रह निर्बली होवें तौभी अर्गलायोग रहता है । मध्यमें जो अधिक अंशवाला हो वह यदि तृतीय स्थानपर होवे तो अगला होवे है। यह व्याख्या सूत्राक्षरोसे असंगत प्रतीत होवे है क्योंकि सूत्रसे तो पापबाहुल्यही सिद्ध होता है । अन्य अर्गलाके वाधक योग हैं परन्तु तृतीयस्थानस्थित बहु पापग्रहोंकर करी दुई अर्गलाका कोई बाधक योग नहीं है इस कारण यह सूत्र 'पृथक् किया है पूर्वसूत्रम संमिलित नहीं किया।
६ जमिनीवसूत्राणि। [ अध्यायः १. ग्रहोंका वल अगाडी कहगे ॥८॥ इसके अनन्तर अर्गलाकारक और अर्गलाप्रतिबन्धक योगको कहते हैं। प्राग्वत् त्रिकोणे ॥ ९॥ त्रिकोणनाम पंचम और नवम स्थानमें ग्रह होनेपर पूर्ववत् अर्गला और अर्गलाप्रतिवन्धक योग होता है । भाव यह है कि जिस राशिका विचार किया जावे उस राशिके देखनेवाले ग्रहसे पंचम स्थानमें ग्रह होवे तौ अर्गला होवे है और यदि उसी देखने- वाले ग्रहसे नवम स्थानमें कोई ग्रह हो तो अगलाप्रतिवन्धकयोग होता है परंतु नवमस्थानस्थित ग्रह अल्प संख्यावाले और नि- बली हो तो पंचम स्थानस्थित ग्रहकी सक्ते हैं ॥९॥ अर्गलाको दूर नहीं कर भय २ . १ अर्गलाकारक योग और अर्गलाप्रतिवन्धक योग वृद्धोनेभी कहे हैं । पुण्य ११ विना ४ भावाद् द्रष्ट्र राहुः शुभार्गलम् । स्फुटां १२ ग ३ तेय १० भावात्तु विपरीतार्गलं विदुः ॥ " अर्थ-जिस राशिका विचार किया जाये उस राशिके देखने. वाले ग्रहसे भयनाम द्वितीय और पुण्यनाम एकादश और विनानाम चतुर्थ स्थानपर कोई ग्रह होवे तो अर्गला होवे है परन्तु उक्त स्थानपर राह होवे तौ शुभ अर्गला होवे है और यदि उसी देखनेवाले ग्रहसे स्फुट नाम द्वादश और अंग नाम तृतीय और ज्ञेय दशम भावमें ग्रह होवे तौ क्रमसे द्वितीय एकादश चतुर्थ स्थानस्थित अर्गलाकारक ग्रहोंके प्रतिबन्धक होवे हैं अर्थात् अर्गलाके दूर करनेवाले होते हैं। २ यदि कहो कि दार ४ भाग्य २ शलेत्यादि सूत्रमें शान्त ५ पदके ग्रहणसे और रिफ १० नीचेत्यादि सूत्रमें धातु ९ पदके ग्रहणसे अर्गला और अर्गलाप्रतिबन्धक योगका लाभ होही सक्ता फिर “प्राग्वत् त्रिकोणे " इस सूत्रकी रचना व्यर्थ क्यों करी ? समाधान-"विपरीतं केतोः" इस सूत्रमें केतुकी जो कि अर्गला और अर्गलाप्रति- बन्धक योगमें विपरीतता कही है वह त्रिकोणनाम-पंचम और नवमस्थानकेही विषे क्रही है। न कि अन्य स्थानों के विषे इस कारण " प्राग्वत् त्रिकोणे " इस सूत्रकी पृथक् आवश्यकता है। यदि इस सूत्रको पृथक् नं करते तो दारभाग्यशालेषु इत्यादि- कम कतुकृत विपरीतता सिद्ध हो जाती और जो कि कोई एक आचार्योंने कहा कि प्राग्वत् त्रिकोणे " इस सूत्रके पृथक करनेके सामर्थ्यसे यह अर्गला अप्रतिवन्धक है । यदि उन आचार्योंके मतसे यह अर्गला अप्रतिबन्धक होती तौ प्रसंगसे “ कामस्थातु भूयसा" .
1 पादः १..] भावाटीकासाहतानि । इसके अनन्तर केतुग्रहके लिये कुछ विशेष कहते हैं । विपरीतंकेतोः ॥१०॥ केतुग्रहका नवम अर्गलास्थान है और पञ्चम अर्गलाप्रति- वन्धक स्थान है। भाव यह है कि केतुके कोई ग्रह नवम स्थानमें स्थित होवे तो अर्गला होवे है और उसी केतुसे कोई ग्रह अल्प संख्या और निर्बलत्वदोपवर्जित होकर पंचम स्थानमेंमी स्थित होवे तौ नवमस्थानस्थित ग्रहकी अर्गला नहीं होने है ॥ १० ॥ इस ग्रंथमें विशेषकर कारकोंसे फलादेश किया जाता है इस कारण कारकोंके कहनेकी इच्छावाले मुनि प्रथम आत्म- कारकको दिखाते हैं। आत्माधिकः कलादिभिनभोगः सप्तानामष्टानां वा।।१॥ सूर्यसे लेकर शनैश्चरपर्यंत सात ग्रह अथवा राहुपर्यन्त आठ ग्रहोंके मध्यमें जो कि ग्रह अंश कलादिनकर सब ग्रहोंसे अधिक होवे तो वह ग्रह आत्मकारक होता है। भाव यह है कि सूर्य, चंद्रमा, भौम, बुध, गुरु, भृगु, शनि, राहु इन ग्रहोंमें जिस ग्रहके अंश अधिक हो अथवा अंशाके बराबर होनेपर कला वा विकलाही अधिक हो तो वह ग्रह आत्मकारक होता है और यदि दो तीन ग्रहों के अंश कला विकला सब वराबर हो तो उनमें जो कि बली होवे सूत्रके अनन्तर इसकी रचना होती और जो यह कहो कि “ विपरीतं केतोः" इसकर केतुकृत विपरीतता सब जगह हो सक्ती है सोभी नहीं क्योंके “काम- स्था " इत्यादि सूत्रके अनन्तर " प्राग्वत् " यह सूत्र होता तो केतुकृत विपरीतता सव जगह हो सक्ती परन्तु “प्राग्वत् " इस सूत्रके अनन्तर “विपरीतं केतोः " इस सूत्रके रचनेसे “प्राग्यत् " इसी स्त्रमेंही केतुकृत विपरीतता है न कि अन्य जगह और जो यह कहो कि “ विपरीत केतोः" इस सूत्रका अगले “ आत्माधिकः” इत्यादि सूत्र में अन्वय हो सका है सोभी नहीं क्योंकि " अष्टानां वा " यह जो कि पद सूत्र में पृथक् रचा है इसीके सामर्थ्यसेही राहुको न्यूनांश होनेपर कारकत्वका लाभ हो गया है फिर इस अन्वयकी तो व्यर्थताही रही और जो यह हो कि “ अष्टानां वा " यह पद सूत्र में अन्यमतसे है सो इसमें कुछ प्रमाण नहीं है ।
८ जमिनीयसूत्राणि । [ अध्यायः १. सोही आत्मकारक होता है और दो तीन ग्रहोंके अंशादिककी समता होनेपर बलवान स्थिरकारकसेही तत्तकारकोंका विचार करने योग्य है। जैसे प्रथम आत्मकारकके देखनेमही दो तीन ग्रहोंके अंशादि समान हो तो उनमें जो कि बली होय उससेही आत्म- कारक जाने इसी प्रकार अन्य कारकोंका विचार करें ।। १५ ।। . १ शङ्का-“आत्माधिकः कलादिभिनभागोष्टानाम "सा पाठ थोटा होनेस होयो ? समाधान-सूत्र में “ अष्टानां वा " इस अधिक पद स्थित होनेसे सर्व बहाक अंशोसे राहुके कम अंश होनेकरही आत्मकारकता होती है इस बातक जताने के लिये " अा- नां वा " यह पद पृथक् कहा है । क्योंकि राहुकी विपरीत गति होने से राहक कम अंश होनेकरही राहुकी अधिकता है। " नभेोगोष्टानाम् सा यदि पाठ होता तो अन्य ग्रहकी रीतिकर राहुकीभी अधिकता प्रतीत हो सत्ता सो है नहीं इस कारण सहकी न्यूनताही अधिकता मानी जाती है। दूसरा कारण यह है कि जब कि दो तीन ग्रहोंका ब्रह्मत्व योगमें प्रसंग होता है तब " राहोयोगे विपरीतम् " इस हितीयाध्यायके प्रथमपा- दसंवन्धी ५० सूत्रकर राहुके योगमात्रसेही कम अंशवाला ग्रह ब्रमा होता है फिर स्वयं राहुको कम अंश होनेसे कारक होने में क्या आश्चर्य है। यहांपर वृद्धवाक्यभी है कारकनि- यमें "भागाधिकः कारकःस्यादल्पभागोऽन्त्यकारकः। मध्यांशो मध्यस्वेटः स्यादपावटेः स एव हि ॥ ” कदाचित कहो कि इस वृद्धयाक्यसे तो ऐसा नहीं प्रतीत होता है कि राहु अल्पांश होनेपर आत्मकारक होता है वहां कहते हैं कि शान्वप्रसिद्ध होनेसे बाल- ऐसा जानते हैं कि राहु अल्पांशही अधिक माना जाता है इसी कारण पृथत करके नहीं कहा है। राहुके अल्पांश होनेपर कारकत्व होनमें वृद्धवाक्यान्तरभी है " मेपा- द्यपसव्यमार्गेण राहुकेतू न कारको अर्थ-पाहु केतु दक्षिणमार्ग अर्थात् मैपवृषादि क्रमकरके कारक नहीं हो सक्ते किन्तु विपरीत क्रमकरके कारक होते हैं। कारक- निर्णयमें राशियोंकी अधिकता अपेक्षित नहीं है किन्तु अंशादिकी अधिकता अपेक्षित है यह संप्रदाय है ।। अथवा अंशादिककर दो ग्रह बराबर होगे तो सप्तम कारक नहीं होगा इस कारण राहुकामी ग्रहण किया है। " अप्टानां या " इस पदके द्वारा और जो कि प्रेमनिधि आदिकोने “विपरीत केतोः" इस सूत्रका आत्माधिक। इस सूत्रमें देहलोदीपकन्यायकर अन्वय किया है सो अयुक्त है । क्योंकि सूर्यादिक्रम त्यागकर प्रथम केतुका निरूपण करना अयोग्य है और ऐसा अर्थभी नहीं हो सता कि राहुकी अंशाधिकतासे कारकता है और केतुकी अल्पांशतासे कारकता है क्योंकि राहु केतुके अंशादि वरावर रहते हैं । शंका-ग्रह तो नौ हैं फिर सूत्रमें “ नवानाम् ऐसा क्यों नहीं कहा, ' समाधान-राहु केतु अंशादि समान होते हैं इस कारण अन्यकारक नहीं हो सक्ता इसीसे “ अष्टानाम् " यह पाठ सूत्रमें उचित है ॥ भी "
पादः १.]
भाषाटीकासहितानि।
इसके अनन्तर आत्मकारकका उत्कर्ष कहते हैं।
स ईष्टे बन्धमोक्षयोः ॥ १२॥
सो यह कहा हुआ आत्मकारक नीच राशि पापयोगसे बन्धनका
सामी होता है और उच्चादि राशि शुभयोगसे मोक्षका स्वामी
होता है । भाव यह है कि नीच तथा पापग्रहसे मुक्त होकर
आत्मकारक . अपने दशान्तर्दशामें बंधनादि दुःख देनेवाला
होता है और उच्चादि शुभग्रहसे युक्त होकर आत्मकारक अपने
दशान्तर्दशाम अन्यग्रहके क्लसे बंधे हुएकाभी मोक्षणकती होरे
अथवा आत्मकारक प्रतिकूल होकर पापकर्म प्रवृत्तिद्वारा संसा-
ररूप बन्धन देनेवाला होता है और अनुकूल होकर ज्ञान काशी-
वासादि साधनोंकर मोक्षकती होवे है ।। १२ ।।
इनके अनन्तर अमात्यकारक कहते हैं।
तस्यानुसरणादमात्यः ।।१३।।
उस आत्मकारक ग्रहमे जो कि न्यून अंशादिवाला ग्रह है वह
अमात्यकारक होता है । भाव यह है कि आत्मकारकसे जिस
ग्रहके अंश कलादि कम होवें वह ग्रह अमात्यकारक होता है।
अमात्यकारक ग्रह उच्चादिमें स्थित हो वा शुभग्रहसे युक्त होवे तौ
राजा वा मंत्री वा स्वामी इत्यादिकोंसे सुख होता है और नीचादि
स्थानमें स्थित हो वा पापग्रहसे युक्त हो तो राजादिकोसे अधिक
दुःखादि होता है ।। १३ ॥
इसके अनन्तर भ्रातकारक कहते हैं।
तस्य भ्राता ।। १४॥
और उस अमात्यकारक ग्रहसे जिस ग्रहके अंशादि कम होवें
वह भ्रातृकारक होता है। भ्रातृकारकसे भ्रातादि सुखदुःखादिका
निर्णय होता है ।। १४ ॥
इसके अनंतर मातृकारक कहते हैं।
तस्य माता॥१५॥
जैमिनीयसूत्राणि। [अध्यायः १. भातृकारक ग्रहसे जिस ग्रहके अंशकलादि कम होवें वह माव- कारक होता है । मातृकारकसे मात्रादिसुखदुःखादिका निर्णय होता है ॥ १५ ॥ इसके अनंतर पुत्रकारक कहते हैं। तस्य पुत्रः ॥१६॥ मातृकारक ग्रह से जिस ग्रहके अंशकलादि कम होवें वह पुन- कारक होता है । पुत्रकारकले पुत्रादि सुखदुःखादिका निर्णय होता है ॥ १६॥ इसके अनंतर ज्ञातिकारक कहते हैं तस्य ज्ञातिः॥१७॥ पुत्रकारकसे जिस ग्रहके अंशकलादि कम होवें वह ग्रह ज्ञाति- कारक होता है। ज्ञातिकारकसे ज्ञातिका निर्णय होता है ॥ १७ ॥ इसके अनंतर दारकारक कहते हैं। तस्य दाराश्च ॥ १८॥ ज्ञातिकारक ग्रहसे जिस ग्रहके अंशकलादि कम होवें वह ग्रह स्त्रीकारक होता है। स्त्रीकारकसे स्त्रीसंबंधी विचार कर्तव्य है ॥१८॥ इसके अनंतर पुत्रकारकको मतांतरसे कहते हैं। मात्रा सह पुत्रमेके समामनन्ति ॥ १९॥ मातृकारकसेही पुत्रकारकका विचार कर्तव्य है ऐसा कोई आचार्य कहते हैं अर्थात् मातपुत्रकारकोंको एकही कहते हैं॥ १९ ॥ इस प्रकार चरकारक कहनेके अनंतर स्थिरकारक कहते हैं तिनमें प्रथम भगिन्यादिकारकोंको दिखाते हैं। भगिन्यारतः झ्यालः कनीयाजननी चेति ॥२०॥ आर नाम मंगलसे भगिनी नाम बहिनी और शाला और छोटा १ सूत्रमें चकार नहीं कहे हुएके कहने के अर्थ है । संमस्थिरकारक पदोपपदादिसेभी स्त्रीविचार कर्तव्य है । केवल दारकारकसेही नहीं इस वार्ताको चकार जनाता है।
पादः १.] भाषाटीकासहितानि। भ्राता और जननी नाम माता यह सब विचारे। यदि मंगल उच्चा- दिस्थानमें वा शुभग्रहयुक्त होने तौ भगिनी आदिका सुख कहना और यदि नीचादि पापग्रहयुक्त होवे तौ भगिन्यादिका दुःख कहना इसी प्रकार अन्य जगहमी विचार कर्तव्य है ।। २० ॥ इसके अनन्तर मातुलादिकारकोंको कहते हैं । मातुलादयो बन्धवो मातृसजातीया इत्युत्तरतः ॥२१॥ भौमसे उत्तर जो कि बुध है तिससे मातुल और आदिपदसे मामाके भ्राता भगिनी आदिक और बन्धुजन और माताकी सपत्नी यह विचारे ।। २१॥ इसके अनन्तर पितामहादिकारकोंको कहते हैं। पितामहः पतिपुत्राविति गुरुमुखादेव जानीयात् ॥२२॥ गुरुमुख नाम बृहस्पत्यादिकसे पितामह नाम पिताका पिता और स्वामी और पुत्र यह सब विचारे । भाव यह है कि बृहस्पतिसे पिताका पिता और शुक्रसे स्वामी और शनैश्चरसे पुत्रका विचार कर्तव्य है ॥ २२ ॥ इसके अनंतर पत्न्यादि स्थिरकारक कहते हैं । पत्नीपितरौ श्वशरी मातामहा इत्यन्तेवासिनः ॥२३॥ अंतेवासी अर्थात् बृहस्पतिसे उत्तर जो कि शुक्र है उससे स्त्री और माता तथा पिता वा श्वश्रू और श्वशुर और माताका पिता यह सव विचारने योग्य है ।। २३ ॥ जब कि दो तीन ग्रहोंके, अंशकलादि समान होते हैं तब निसर्ग वलसेही कारक विचारा जाता है इस कारण निसर्गवल कहते हैं। मंदोज्यायान् ग्रहेषु ॥२४॥ मन्द नाम शनैश्चर सातों ग्रहोंमें दुर्बल है। भाव यह है कि निसर्गवलमें शनैश्चरादिक उत्तरोत्तर बली हैं। जैसे शनैश्चरसे १२ जैमिनीयसूत्राणि। [अध्यायः १ अधिक वली भीम और भौमसे बुध और बुधसे वृहस्पति और बृहस्पतिसे शुक और शुक्रसे चन्द्रमा और चन्द्रमासे सूर्य अधिक चली है ॥ २४॥ इसके अनन्तर चर दशाके वर्ष साधनेमें उपयोगी होनेसे विषम समराशिभेद कर गणना कहते है। प्राची वृत्तिर्विपमभेषु ॥ २५॥ विषमसंज्ञक जो कि मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनुः, कुम्भ में राशि हैं। इनके विषे क्रमसे गणना होती है। जैसे मेप, वृष, मिथुन इत्यादि रीतिते ॥ २५ ॥ परावृत्त्योत्तरेषु ॥२६॥ उत्तर नाम समराशि अर्थात् जो कि वृप, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन ये राशि हैं इन राशियोंके विषे उलटे क्रमसे गणना होती है। जैसे वृप, मेष, मीन, कुम्भ इत्यादि रीतिसे गणला होती है ॥ २६ ॥ इसके अनन्तर क्रमव्युत्क्रमगणनाकी विपरीतता कहते हैं। नक्कचित् ॥२७॥ कहीं विषमराशियोंके विषे कम नहीं है और कहीं समराशियों के विषे व्युत्क्रम नहीं है । भाव यह है विषमराशि सिंह और कुम्भमें क्रमसे गणना नहीं होती है किन्तु उलटे क्रमसे गणना होती है और समराशि वृष और वृश्चिकमें उलटे क्रमसे गणना नहीं होती किन्तु सीधे क्रमसे गणना होती है ॥ २७ ॥ : १ ग्रहोंका निसर्ग बल बृहजातकमें कहा है ।“ शकुबुगुभृचराद्यावृतितो वीर्यवन्तः।" अर्थ-अनैश्चर, कुज, बुध, बृहस्पति, शुक्र, चंद्र, सूर्य ये क्रमसे एक दूसरेसे अधिक वली है। २ शंका-सूत्रमें तो क्वचित्पदका प्रयोग है । सिंह कुम्भ और वृश्चिक वृप इन राशियोंका तो ग्रहण नहीं है फिर भावार्थमें सिंह कुम्भ और वृप वृश्चिकका कैसे ग्रहण हो? समाधान-परंपराकर वृद्धोंसे सुना है । " क्रमाद् वृषे वृश्चिक च व्युत्क्रमात्कु- म्भासिँहयोः।" अर्थ-वृषवृश्चिकके विप क्रमसे और सिंह कुम्भके विषे उल्टे क्रमसे, -- पादः१.] भाषाटीकासहितानि। इसके अनन्तर तत्तद्राशिके दशावर्ष लानेके लिये अवधि दिखाते हैं। नाथान्ताः समाः प्रायेण ॥२८॥ राशिके स्वामिपर्यन्त जितनी संख्या होवे उतनेही वर्ष उस राशिके वहुधाकर होते हैं । भाव यह है कि जिस राशिका स्वामी उस राशिसे जितनी संख्यापर हो उतनेही वर्ष उस राशिके चर- दशामें होते हैं । जैसे मेष राशिका स्वामी मंगल मेष राशिसे द्विती- यस्थानपर होवे तो एक वर्ष तृतीयपर होवे तो दो वर्ष इसी क्रमसे बारहवें हो तो ग्यारह वर्ष मेष राशिके चरदशामें माने जायगे और यदि स्वामी उसी निजराशिमें स्थित हो तो बारह वर्ष उस राशि माने जावेंगे ।। २८ ।। गिने ११ शंका-इन सूत्रोंका तो फलितार्थसंग्रह यह हुआ । भेपादिात्रीत्रभैज्ञेय पदमोजपदे कमात् । दशाब्दानयने कार्या गणना व्युत्क्रमासभे ॥" अर्थ-मेपादि तीन २ राशियोंका पद होता है। विषमपदमें तो क्रमसे गिने और समपदमें दशा वर्ष लानेमें उल क्रमसे गिने १ । इस फलितार्थसे "प्राची वृत्तिपिपमपदे, परावृत्योत्तरे " इस प्रकार दोही सत्र कहने थे फिर इस प्रकार कैसे नहीं कहे । जो इतना फेरकर अर्थ तीन २ सूत्रों में किया ? समाधान-" यावदीशाश्रयपदमृक्षाणाम् ” इस सूत्रके वक्तव्य होनेसे सदहेके भयसे नहीं कहा और “ मालधर्मयोः सामान्यं विपरीतमोजकूटयोः । इस द्वितीयाध्यायके चतुर्यपादके २२ सूत्रके वक्तव्य होनेसेभी नहीं कहा ।। १ स्वामी के निज राशिमें स्थित होनेसे उस राशिके बारह वर्ष होते हैं। इसमें वृद्ध- वचन प्रमाण है। " तानात्तदीशपर्यन्तं संख्यामत्र दशां विदुः। वर्षद्वादशकं तत्र न चेदकें विनिर्दिशेत् ॥ " अर्थ-राशिके वर्ष वह जानने जो कि संख्या स्वामिपयन्त होवे और जो स्वामी राशि एकही स्थानमें स्थित होवे तो उस राशिके वारह वर्ष जानने और जो स्वामी अपनी राशिमें स्थित न होवे तो एकही वर्ष ग्रहण करे ऐसा कोई एक आचार्य कहते हैं। इसी कथनसे “प्रायेण " इस सूत्रपदसे " नाथान्तः समाः " इसका निषेध जनाया गया है और स्त्रमें “ प्रायेण " यह जो कि पद विद्यमान है इसकर, यह जनाया गया कि जो स्वामी उच्च होवे तो दशा में राशिका एक वर्ष बढ जाता और जो स्वामी नीच होवे तौ राशिका एक वर्ष घट जाता है सो वृद्धोंने कहाभी है। " उच्चखेटस्य सद्भावे वर्षमेकं विनिःक्षिपेत् । तथैव नीचखेटस्य वर्षमैकं विशोध.
जैमिनीयसूत्राणि। [अध्यायः १. इसके अनंतर फलविशेपके जनानेके लिये राशियोंका पढ़ नाम आरूढस्थान कहते हैं। यावदीशाश्रयं पदमृक्षाणाम् ।। २९॥ येत् ॥ " अर्थ तो पूर्व कहही दिया है । “प्रायेण " इसी पदसे यहभी जनाया गया है कि वृश्चिक और कुम्भके दो २ स्वामी हैं। प्रमाण वृद्धवाश्य है। “जसौरी केतु- राहू राजानावलिकुम्भयोः । झुजसौरी केतुराइ युक्त तत्र स्थिती यदि ॥ वर्षद्वादशक तत्र न चेदेकं विनिर्दिशेत । " अर्थ-वृश्चिक राशिके नंगल और केतु दोनों राजा है और कुम्भराशिफ शनैश्चर और राहु ये दोनों राजा है । भाव यह है कि वृधिक राशिका राजा मंगल और केतु दोनों से अकेला नहीं हो सता विन्तु दोनही राजा हैं। ये दोनों मिलकर अपने राशिपर स्थित हो तो उस शिके बारह वर्ष होते हैं और यदि अपने राशिएर एकही एक स्थित होवे तो स्वामी नहीं है और उस राशिके चारह वर्षभी नहीं हो सक्ने और यदि जिस स्थानमें ये दोनों मिलकार स्थित हो तो उस स्थानतक गिननेसे जितनी संख्या होवे यह वर्ष इन वृश्चिक, मकर राशियोंके होते हैं और जो दोनों स्वामी भिन्न २ स्थानोंपर स्थित होवे तो रनमें जो कि स्वामी बलवान् होने उस स्वामी के स्यानतक गिननसे राशिके वर्ष ग्रहण करे ऐसा वृद्धोंने कहामी है। “ दिनायक्षेत्रयोस्त्र निर्णयः कप्यतेऽधुना । एकः स्वक्षेत्रगोऽन्यस्तु परत्र यदि संस्थितः । तदान्यत्र स्थितं नार्थ परिगृह्य दशां नयेत् । अर्थ-दो स्वामियोंके राशिका निर्णय कहा है। एक ग्रह तो अपने राशिपर स्थित होवे और दूसरा अन्य गशिपर स्थित होवे तो जो कि ग्रह अन्य राशिपर स्थित है उसतक गिनकर दो स्वामीवाले राशिकी दशा लावे । “ द्वावप्यन्यक्षगौ तौ चेत्स ग्रहो बलवान् भवेत् । ग्रहयोगसमानत्वं चिन्त्यं राशिवलादलम् ॥ चरस्थिरदिस्वभावाः क्रमात्स्युर्बलशालिनः । राशिसत्त्वसमानत्वे वहुवर्षों वली भवेत् ॥ " अर्थ-जो दोनों स्वामी अपने राशिसे अन्य राशिपर स्थित होवें तो उनमें जो कि बलवान् हो उसतक गिनकर राशिफे पोका निश्चय करे। यदि दोनों स्वामी वलवान् हो तो राशिवलसेही वल जाने अर्थात् जो ग्रह राशि- वलसे वली होवे उसतक गिनकर राशिवर्षों का निर्णय करे और यदि दोनों स्वामि- योका राशिवलभी समान होवे तो जिस ग्रहंतक गिननेसे अधिक वर्ष आ उस ग्रह- तक गणना करे। चर स्थिर द्विस्वभाव यह राशि क्रमस वली होते हैं। भाव यह है कि चरसंज्ञक राशित स्थिरसंज्ञक राशि बली है और स्थिर राशिसे द्विस्वभावराशि बली है एकः स्वोच्चगतस्त्वन्यः पात्र यदि संस्थितः । ग्राहयेदुचखेटस्यं राशिमन्यं विहाय ॥ नायान्ता इति रीत्या यो बहुवर्षवती दशम् । करोति बहुवर्षोऽसौ स्वराशेर्ट- पादः १.] भाषाटीकासहितानि। १५ जितनी संख्यापर जिस राशिका स्वामी हो उस स्वामीसे उतनी संख्यापर जो कि राशि होवे वह राशि उस राशिका आरू- ढस्थान होता है। भाव यह है कि जिस राशिका स्वामी अपनी राशिसे जितनी संख्यापर हो उतनी संख्या स्वामीसे लेकर जहां रगः खगः ॥ एवं सर्व समालोच्य जातस्य निघनं वदेत् । ” अर्थ-दोनों स्वामियोंमें एक स्वामी उनका होवे और दूसरा अन्य स्थानपर होवे तो उस स्वामीतक गिने जो कि उच्चका होवे और यदि दोनों स्वामियोंमें एक उच्चका होवे और दूसरा बहुत वाँवाला हो तोभी उसी ग्रहतक गणना करे जो कि ग्रह उच्चका होवे इस प्रकार दशा विचार करके उत्पन्न हुएका निधन कहे औरभी वृद्धोंने राशिवल कहा है। "न्यासयोहहीनत्वे वैकस्यान्येन संयुती । ग्राह्यो राशिहाभावस्तत्वाम्युच्चं गतो यदि । एकत्र स्वर्भगः खेटश्चान्यन्त्र द्वौ ग्रही यदि । बहद्वययुति हित्वा ग्राहयेत्पूर्वमें सुधीः ॥ " अर्थ-लम और सतमस्थान इन दोनों में यह न अथवा दोनों के मध्यमें एक स्थान- पर स्वामी विना कोई ग्रह हो तो उन दोनों में जो कि राशि न्यायकर निर्वल होने यहही राशि तब बलवान होता है । जब कि उस राशिका स्वामी उच्चका हो तो और अन्य ग्रहयुक्त राशि बलवान् नहीं हो सक्ता और एक राशि तो स्वक्षेत्री ग्रह होवे और अन्य राशिमें दो ग्रह होवें तो उनमें जो कि राशि स्वामियुक्त होने वही राशि बलवान होता है न कि दो अयुक्त राशि वलवान हो सकता है । राशियोंकि.. स्वामी तया उच्च अन्य जातकसे जानने । " क्षितिजसितज्ञचंद्रबिसौम्यसितापनिजाः । सुरगुम्मंदसौरिगुरवञ्च ग्रहांशकपाः ॥ ". अर्थ-मंगल, शुक्र, बुध, चन्द्र, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनैश्चर, शनैश्वर, बृहस्पति, ये क्रमसे भेपादि राशियों के स्वामी हैं। अजवृपभमृगांगनाकुलीरा झपवणिजौ च दिवाकरादितुंगाः । दशशिखिमनुयुक्तिथीन्द्रि-. सोधिनस्काविंशतिभिश्च तेऽस्तनीचाः ।" अर्थ-सूर्य भैपके १० अंशतक, चन्द्रमा वृषके ३ अंशतक, मंगल मकरके २८ यंशतक, बुध कन्याके १५ अंशतक, बृहस्पति करके ५ अंशतक, शुक्र मानके २७ अंशतक, शनैश्चर तुलाके २० अंशतक उन्धका होता है और यही ग्रह सातवें राशिमें नीच होता है। इस प्रकार ग्रह और राशिबलका चरदशामें विचार करे “ पंचमे पदक्रमात् प्राक्प्रत्यक्त्वम् ” इस द्वितीय अध्यायके सृतीयपादके २८ सूत्रके अभिप्रायसे जो लमसे नवममें विषमपद होवे तो तनु, धन, भ्रास, सुहृद आदिकोंकी दशाका भोग होता है और यदि समपद होवे तो तन, व्यय, आय, कर्म आदिकोंकी दशाका भोग होता है ! दशाके आरम्भको अवधि है ! "चरदशामामत्र शुभः केतुः " इस द्वितीयाध्यायके तृतीय पादके २८ सनके अभि- बायसे इस दशाका नाम चरदशा है ।।
जैमिनीयसूत्राणि । [अध्यायः १. १६ समात होवे वह स्थान उस राशिका आरूढस्थान होता है।॥ २९ ॥ इसके अनन्तर आरूढपदका उदाहरण दो सूत्रोंसे कहते हैं। स्वस्थे दाराः ॥३०॥ लग्नसे चतुर्थ स्थानमें लग्नस्वामी स्थित होवे तौ सप्तमस्थ राशि लग्नका आरूढस्थान है ॥ ३०॥ सुतस्थे जन्म ॥ ३१ ॥ लनसे लग्नस्वामी सुत नाम सप्तमस्थान में स्थित होवे तौ लग्नका आरूढपद लग्नराशिही होता है ॥ ३१ ॥ इसके अनन्तर भावराशियोंके वर्णदस्थान कहते हैं। सर्वत्र सवर्णा भाग राशयश्च ॥ ३२॥ समस्त भाव और राशि अपने वर्णद राशियोंसे संयुक्त होते हैं। भाव यह है कि जिस भावका विचार करे उसका वर्णदराशि देखे कि और जिस राशिका विचार करे उसकामी वर्णदराशि देखे क्योंकि माव और राशिके सब प्रकारले विचार करने में वर्णद राशिकीमी अपेक्षा होती है। वर्णदाशिक बनानेका । १ आरूढस्थानका निर्णय वृद्धोनेभी कहा है। " लमायावतिये तिटेदाशी लगेश्वरः क्रमात् । ततस्तावतिय राशि जन्मा प्रचक्षते ॥ " अर्थ-लमसे जितनी संख्या वाले राशिपर लभस्वामी स्थित हो उस स्वामीसे उतनीही संख्यावाला राशि लमका आरूढपद होता है। २ इस उदहरणमें औरमी प्रमाण है । “ यदा लमाधियो समे सप्तमे वा स्थितो. यदि । आरुन लपमेवात्र निर्दिशेत्कालवित्तमः ॥ " अर्थ-जब कि लनस्वामी लपमें अथवा सप्तम स्थानपर स्थित होये तो लमका आरुढपद लमरााश होता है ऐसा ज्यो- तिषी कहते हैं। स्वस्थे दाराः, सुत्तस्थे जन्म " इन आरुढस्थानके उदाहरणरूप. स्त्रोंको जो कि कोई आचार्योंने यह व्याख्या की है कि लमस्वामी चतुर्थ स्थान में स्थित हो तो स्त्रियोंका विचार को और लनस्वामी सप्तम स्थानमें स्थित होवे तो मातृजन्म- का विचार करे सो यह व्याख्या असंगत है। . ३ वर्णदराशिसे वृद्धोंने फलभी कहा है। " पापदृष्टिः पापयोगी वर्णदस्य त्रिकोणके। यदि स्यात्ता, तद्राशिपर्यंतं तस्य जीवनम् ॥ रुद्रशूले तथैवायुमरणादि निरूप्यते । तथैव । वर्णदस्यापि त्रिकोणे पापसंगमे ॥ " अर्थ-वर्णदराशिके पंचम नवम स्थानमें पापग्रहोंकी । .
. १७ पादः १. मापाटीकासहितानि। यह प्रकार है कि जो विपमराशिमें जन्मलग्न होवे तौ मेपसे क्रमपू- वक जन्मलग्नतक गिने और यदि समराशिमें जन्मलग्न होवे तौ मानसे उल्टे क्रमसे अर्थात् मीन जुम्भ इस रीतिसे जन्मलग्नतक गिने जो कि अंक आवे उसको पृथक् रख देवे फिर होरालयको देखे कि होरालग्न विपमराशिमें है अथवा समराशिम है । यदि होगलम विपमराशिम होवे तो मेष वृष इत्यादि रीतिसे होरालयतक गिने और यदि समराशिम होवे तो मीन कुम्भ इत्यादि रीतिसे होरालगतक गिने । जो अंक आने उसको पृथक् रख देवे । यदि जन्मलन और होगलग्न दोनों स्त्रीसंज्ञक वा पुरुषसंज्ञक हो तौ उन आये. हुए दोनों अंकाको जोड देवे और यदि जन्मलग्न और होगलग्नमें एक स्त्रीसंज्ञक होय और दूसरा पुरुषसंज्ञक होय तो उन दोनों अंकोंको परस्पर घटा । जो अंक जोडनेसे अथवा घटानेसे आवे वह यदि १२ से अधिक होवे तौ १२ का भाग देवे जो वचे उतनी संख्या यदि जन्मलग्न विषम होवे तो मेप दृष्टि अथवा योग होवे तो उसी राशिकी दशापर्यन्त उसका जीवन होता है और रुद्रसं. बक ग्रह जो कि अगाडी कहा जायगा। उसके शलयोगमें आयुका मरणादि कहा है और यदिशि नवन पंचम राशि यदि पापयुक्त हो तो उसी राशिके दशापर्यन्त मरण कहा है । अन्यत्र- “ वर्णदात्सप्तमादाशेः कलत्रादि विचिन्तयेत् । एकादशादग्रजंतु तुनीबानु यवीयसम् ॥ पंचमे तनुज विद्यान्मातर तुर्थपंचभे । पितुरतु नवमान्मातुः पंच- मावर्णदम्यं तु ॥ झालराशिदशायां वै प्रबलायामारष्टकम् । " अर्थ-वर्णद राशिसे जो कि सनम राशि है उससे कलत्रादिको विचारे और ग्यारहवें राशिसे बडे भ्राता और तृतीय राशिल छोटे भ्राताओंको विचारे और पंचम राशिसे पुत्रको विचारे और चतुर्थ और पंचमसे माताको और नवमसे पिताको विचारे । वर्णदराशिसे पंचम राशिसे शाल- दहा प्रवल होनेपर माताको औरष्ट होता है और वर्णदराशिसे नवमराशिसे शूलदशा प्रबल होनेपर. पिताको औरष्ट होता है । कोई आचार्य इस सूत्रकी यह व्याख्या करते हैं इस समस्त ग्रंथमें भाव और राशि वर्षों में प्रतीत होते हैं । भाव यह है कि इस समस्त ग्रंयमें जो कि भाव और राशि कहे जावेंगे उनकी प्रतीति अन्य शास्त्रके समान नहीं किन्तु एकादि संख्याके जतानेवाले अक्षरोंसे जाने जाते हैं । यह व्याख्या संमत नहीं, क्योंकि सिद्धमन्यत् इस अगाडी कहे जानेवाले सूत्रके अभिप्रायसे शिवतांडवादि ग्रंथोंमें कटपयादि वर्णोद्वारा जनाई हुई संख्या प्रसिद्ध है । इससे वर्णपद. राशिपर है ऐसा जताने के लिये यह सूत्र कहा है ॥ । २ १८ जैमिनीयसूत्राणि । अध्यायः १ वृषादि क्रमसे और यदि जन्मलग्न • सम होवे तौ मीन कुम्भ इत्यादि क्रमसे जिस राशिपर समाप्त होने वह राशि जन्मलग्नका वर्णदराशि होता है ॥ ३२॥ नाथा- १ वर्णदराशिक बनानेकी रीति इसी प्रकार वृद्धोंने कही है । "ओजलमप्रस्ताना मेषादेणियेत् क्रमात । युग्मलमप्रस्तानां मौनादेरपसव्यतः ॥ मेपमानादितो जन्मलग्नान्त गणयेत्सुधीः । तथैव होरालमान्तं गणयित्वा ततः परम् ॥ पुंस्त्वेन वीतया चैते सजातीये उभे यदि । तहिं संख्ये योजयति वैजाये तु वियोजयेत् ॥ मेपमीनादितः पश्चायो राशिः स तु वर्णदः।' न्ही श्लोकोंके अर्थसे टीकामें वर्णद राशि बनानेकी सीत लिखी है इस कारण इनका अर्थ यहां प्रत्येक श्लोकानुसार नहीं किया । अम वर्णद दशाके बनानेकी रीति लिखते हैं । होरा और लमराशिम जो राशि निवर, होवे उससे वर्णद दशाका आरम्भ होता है क्योंकि कहाभी है ! " होरालाभयौनिया दुर्वलाद्वर्णदा दशा । " वर्णददशाके वप लानेका विधानभी वृद्धोंने कहा है 1 " यत्संख्या वर्णदो लगातत्तत्संख्याक्रमेण तु 1 क्रमव्युत्क्रमभेदेन दशा स्यात्पुरुषत्रियोः ॥ " अर्थ-र- असे जिस संख्यापर वर्णद राशि होवे सोइ सोई संख्या क्रमसे विषम सम लपक अनुसार करके तिन २ राशियोंकी दशा होवे है । भाव यह है कि जिस प्रकार कि " न्ताः " इत्यादि सत्रमें अपने २ राशिके स्वामी पर्यन्त वर्ष लाये गये हैं तिसी प्रकार यहाँ लमसेही अपने वर्णद राशिपर्यन्त वर्ष लाये जाते हैं । जैसे लम मेप है और ; उसका वर्णद राशि मिथुन है । भेष विषमराश है इस कारण क्रमसे भिधुनराशितक गिननेसे दो संख्या हुई ये वर्ष मेपलमके ए और यदि लय समराशिमें होता तो लमसे उलटे क्रमसे वर्णद राशिसे गिननसे जो संख्या आती वही वर्ष लाके माने जाते । इसी प्रकार धनादि भावोंके राशियोंके वर्णद निकालकर वर्णद राशितक धनादि भावोंसे पूर्वोक्त रीतिसे गिननेस जो संख्या आवे वही घनादि भावोंके दशावर्ष होगे । यह वात्ती सूत्रमें जो कि सर्वत्र पद है उससे जनाई है । यदि कहो कि वर्णदका बनाना और वर्णदशाका बनाना सूत्रसे नहीं सिद्ध होता फिर यहां कैसे कहा है ? समाधान- " सिद्धमन्यत् " इस सूत्राभिप्रायसे अन्य ऋपियोंक शास्त्रद्वारा वर्णद और वर्णद दशाका निश्चय होने से यहां सूत्रमें नहीं कहा और तिसी प्रकार है । अन्य शाबके मतसे, गुलिककाभी निश्चय किया जाता है। जिस प्रकार कि वर्णराशि लमके . विषम सम होनेसे भेष मोनादि गणना करके जन्मलम होरालम पर्यन्त संस्थाशसे लाया जाता है तिसी प्रकार भावलमको जन्मलम कल्पना कर भावका वर्णदराशि बनाना चाहिये ! भावलमका तथा होरालयका बनाना वृद्धोंने कहा है ! " सूर्योदय समारभ्य घटिकानां तु पंचकम् । प्रयाति जन्मपर्यन्तं भावलमं तथैव च ॥ तथा सार्द्र द्विघटिकामिताकालादिलप्रभात । प्रयाति लयं तन्नाम होरालयं प्रचक्षते ॥ " अर्थ-सर्यके उदयसे लेकर जन्म इष्टपर्यन्त जितनी घटिका-जावें उनमें पांचका भाग 1 पादः १.] माषाटीकासहितानि । १९ . इसके अनन्तर ग्रहोंके वर्णदका निषेध कहते हैं। नग्रहाः॥३३॥ सूर्यादिक ग्रह वर्णदराशिसहित नहीं होते हैं। भाव यह है कि जिस प्रकार कि भाव और राशियोंके वर्णदराशि होते हैं तिस प्रकार ग्रहोंके वर्णदराशि नहीं होते हैं इस कथनसे यह जनाया गया कि भावराशियोंकी वर्णदराशि होते हैं । सूर्यादि ग्रहोंके नहीं होते हैं ॥ ३३ ॥ इसके अनन्तर अन्तर्दशाविभाग दिखाते हैं। यावद्विवेकमावृत्तिर्भानाम् ॥३४॥ मेष, वृष, मिथुन इत्यादि राशियोंके मध्यमें प्रतिराशि जो कि चरस्थिरादि दशाओम सिद्ध हुए दशावर्ष हैं उन वर्षोंके वारह विभाग करके वारह राशियोंकी आवृत्ति होते है । भाव यह कि चरस्थिरादि संज्ञक दशाओंके विषे जो कि मेषादि बारह राशि- योंके दशावप हैं उनमें प्रत्येक राशिके दशावर्षों के बारह भाग करे जितना प्रथम भाग हो उतने पर्यन्त उसी राशिकी अन्तर्दशा रहती है और जितना दूसरा भाग हो उतने पर्यन्त उस राशिद- शाम दूसरी राशिकी अन्तर्दशा रहती है । जो लम विषमराशिम होरे तो मेप, वृष, मिथुन इत्यादि क्रमसे अन्तर्दशाका भोग होता वे लय मिले वह राशि होते हैं। शेपको ३० से गुणाकर ५ का भाम देनसे जो लब्ध . मेले वह अंश होते हैं फिर शेपको ६० से गुणाकर ५ का भाग देनेसे जो लन्ध मिले यह कला होते है । यह राशि आदिक संख्या जन्मलमसे गिननेसे जहां समाप्त होवे वह भाव लय होता है । होगलमके वनानेकी यह रीति है कि इष्ट घटिकाओंमें अढाईका भाग देनेसे जो लय मिले वह राशि और शेपको ३० से गुणाकर अढाईका भाग इनसे जो लन्ध मिले वह अंश और इसी प्रकार कला निकले हैं। यह राशि आदिक संन्या. यदि जन्मलम विषम होवे तो सूर्यके राशिमें गिननेसे और यदि जन्मलम सम ये तो जन्मलमसे गिननेसे जहां समाप्त होवे वह राशि होरालय होता है ।। १ कोई आचार्य इस सूत्रको यह व्याख्या करते हैं । जिस प्रकार भाव और राशि . स्वर्ण है अर्थात संख्याबोधक अक्षरोंसे जाने जाते हैं तिस प्रकार ग्रहसंख्याबोधक क्षरोंसे नहीं जाने जाते किन्तु अपने प्रसिद्ध पोकरही जाने जाते हैं ।
. २० जैमिनीयसूत्राणि । [ अध्यायः १. है और यदि लग्न सम होवे तो उलटे क्रमसे अर्थात् वृप, मेष इत्यादि रीतिसे अन्तर्दशाका भोग होता है' ॥ ३४ ॥ इसके अनन्तर ग्रन्थान्तरमसिद्ध होरा द्रेष्काणादिकोंको उपलक्षणमात्र कहते हैं क्योंकि इस ग्रन्थमें कहे जाने- वाले सूत्रोंके विषे होराद्रेष्काणादिका ग्रहण है। होरादयः सिद्धाः ॥ ३९ ॥ होरा और आदिशब्दसे द्रेष्काण, त्रिंशांश, सप्तांश, नवांश, शानशांश यह शास्त्रान्तरमें प्रसिद्ध हुई मेपादि गणना करके प्रसिद्ध है किन्तु दृष्टि और अर्गलाके समान गुप्त नहीं इस कारण इनका विवरण यहां नहीं किया है ॥ ३९ ॥ १ अन्तर्दशाविभाग वृद्धोंने कहा है । “कृत्वा या राशिदशां राशे क्तिं क्रमावदेत् ॥ एवं दशान्तर्दशादं कृत्वा तेन फलं वदेत् || " अर्थ-राशिदशाके १२ विभाग करके राशिके अन्तर्दशाका भोग कमसे कहे इसी प्रकार समरत दुझाओंशी अन्तर्दशा करके उसीते फल कहे । “एकैकमावस्यकैक वर्षे लनादि कल्पयेत् । सा पर्यायदशा समे युग्मे तु न्युत्क्रमादेत् ॥ लमं युग्मं यदा तर्हि सन्मुखं तस्य चादिभम् । " अर्थ-दशा- वपमें एक र भावक एक २ लयादिको कल्पना करे यह अन्तर्दशा होवे है। यदि लम सम होवे तो उलटे क्रमसे एक २ भावक एक २ लनादिको कहे। जैसे वृपसे मेप। सूत्रमें जो कि विवेकपदका ग्रहण है तिससे यह जाना जाता है कि जिस प्रकार एक राशिके १२ भाग होते हैं इसी तरह बारह राशियोंके अन्तर्दशामें एक सौ चवालीस भाग होते हैं और जो कि कोई आचार्योंने यह कहा है कि उपस्थित होनेसे दशाके आरम्भकी अवधि अपना २ लम है सो यहभी नहीं क्योंकि कारिकावचन है। होरालयभयो या दुर्बलावर्णदा दशा" ॥ २ होरादिकोंके जाननेके विषयमें वृद्धवचन है। राशेरई भवेद्धोरा ताश्चतुर्विंशतिः स्मृताः, । मेपादि तासां होराणां परिवृत्तिद्वयं भवेत् ॥ राशिविभागा द्रेष्काणास्ते च पट्- त्रिंशदीरिताः । परिवृत्तित्रयं तेषां मेपादेः क्रमशो भवेत् ॥ सप्तांशकारत्वोजगृहे गणनीया निजेशतः । युग्मराशौ तु विज्ञेयाः सप्तमक्षाधिनायकात् ॥ नवांशेशाचरेत्तस्मात . स्थिर तनवमादितः । उभये तु तत्पंचमादेरिति चिन्त्यं विचक्षणैः ॥ द्वादशांशस्य गणना तत्तत्क्षेत्रादिनिर्दिशेत् । " होरा, नेकाण, त्रिशांश, सप्तशि, नवांश, द्वादशांश इस पड्वर्गके जाननेका विधि चक्रोंमे लिखा है इस कारण इन श्लोकोंका अर्थ यहां नहीं लिखा है। .
पाद १.] होराचक्रम्, भेष वृषभ मिथुन, कर्क | सिंह कन्या तुला वृश्चिक धनः सिंह कन्या तुला वृश्चिक धनः मकर कुम्भ | मीन लग्नग्रह केराशि १५ अंसूर्य चंद्र सूर्य | चंद्रु | सूर्य चंद्र सूर्य | चंद्र सूर्य चंद्र सूर्य चंद्र होराके शतक सिंह, कर्क सिंह । कर्क सिंह । कर्क | सिंह | कर्व कर्क सिंह | कर्के सिंह | कर्क - सिंह क़क ग्रहाशि ३० अचंद्र सूर्य चंद्र सूर्य चंद्र | सूर्य चंद्र सूर्य चंद्र | सूर्य चंद्र सूर्य चंद्र सूर्य होराके शतक कर्क। सिंह | कर्क | सिंह | कर्क कर्क । सिंह / कर्क | सिंह कर्क सिह । कक सिह कक सिंह ग्रहराशि द्रेष्काणचक्रम्. मेष | वृषभ | मिथुन कर्क | सिंह (कन्या, तुला वृश्चिक) धनुः | मकर कुम्भ | मीन ग्रहलग्रा. १०अमष वृषभ, मिथुन कर्क | सिंह | कन्या तुला वृश्चिक धनुः | मकर कुम्भ, मीन द्रेष्काणके शतक | मंगल शुक्र बुध चंद्रमा सूर्य बुध शुक्र | मंगल वृहस्प. शनि शनि बृहस्प. ग्रहराशि २० मं सिंह | कन्या तुला वृश्चिक धनुः मकर कुम्भ मीन मेष वृषभ मिथुन कर्क द्रेष्काणके शतक सूर्य बुध मंगल बृहस्प. शान | शनि बृहस्प. मंगल शुक्र बुध चंद्रमा ग्रहगाश ३० अं धनुः मकर कुम्भ | मीन | मेष वृषभ मिथुन कर्क सिंह | कन्या तुला वृश्चिकाद्रेष्काणके शतक बृहस्प. शनि शनि बृहस्प. मंगल शुक्र । बुध बुधचंद्रमा सूर्य बुध शुक्र मंगल ग्रहराशि भाषांटीकासहितानि। २१
जमिनीयसूत्राणि। [अध्यायः १,
विपत्रिंशांशचक्रम्.
मिषामि.लि. तु.ध.कुं. ग्रहलनकराशिा
५/माम म म मं ५मंशतक
५ शशशशशश १० अंशतक
८/वृ/वृ|| १५ अंशतक
७ बुबुबु बु बु बु २५ अंशतक
५ शाशु शु शुशु शु/३० अंशतक
समत्रिंशांशचक्रम्,
वृ.क.क. वृ.म.मी. ग्रहलग्नकीरा.
५ शुशुशुशुशुशु.५ अंशतक
७ बुबु बु बु बु बु १२ अंशतक
८ वृवृबू बृ
२० अंशतक
५/शशशशशश २५ अंशतक
दाम म म म म म ३० अंशतक
maa
पादः.१.] कर्क शुक्र वृषभ मिथुन कके] सिंह कन्या तुला वृश्चिक धनुः | मकर कुम्भ मी ग्रहल.रा. ३ अंश. मेष मकर तुला कर्क मप मकर तुला कके मेप मकर तुला कर्क ३।२० २० कला मंगल शनि शुक्र 'चंद्र मंगल शनि शुक्र चंद्र मंगल शनि शुक्र चंद्र ६ अंश. वृपभ कुम्भश्विक सिंह वृषभ कुम्भ राश्चिक सिंह वृषभ कुम्भवृश्चिक सिंह ४०. कला | शुक्र शनि मंगल सूर्य शुक्र शनि मंगल सूर्य शक्र शनि मंगल| सूर्य ६।४० १० अं. मिथुन मीन धनु । कन्या मिथुन मीन धनः कन्या मिथुन मीन | धनुः कन्या १० अंश तक बुध वृहस्प.वृहस्प. बुध बुध वृहस्प.हस्प. बुध बुध हरुप. वृहस्प. तक १३ अंश. मेष मकर तुला कर्क मेष मकर तुला | कर्क मेष, मकर तुला २० कला चंद्र मंगल शनि १३२० चंद्र मंगल शनि शुक्र चंद्र मंगल शनि शुक्र १६ अंश. सिंह वृषभ | कुम्भ ाश्चक सिंह वृषभ | कुम्भ वृश्चिक सिंह वृषभ कुम्भ शश्चिक १६४० ४० कला सूर्य । शुक्र शनि मंगल | सूर्य शनि मंगल सूर्य शुक्र शनि मंगल २० अंश. कन्या मिथुन मीन धनुः कन्या मिथुन मीन धनुः कन्या मिथुन मीन धनुः२० अंश तक बुध बुध बृहस्प. बृहस्प.) बुध बुध वृहरूप.बृहस्प. बुध बुध वृहस्प.वृहस्प. तक २३ अंश. तुला कर्क | मेष | मकर | तुला काका मेष मकर तुला का मेष मकर २० कला शुक्र २३।२० मंगल| शनि शुक्र मंगल शनि शुक्र चंद्र मंगल शनि २६ अंश. वृश्चिक सिंह वृषभ कुम्भ वृश्चिक सिंह वृषभ कुम्भ वृश्चिक सिंह | वृषभ कुम्भ २६४० ४० कला मंगल सूर्य शुक्र शान मंगल सूर्य शुक्र शनि मंगल सूर्य शुक्र शनि ३० अं. धनु कन्या | मिथुन मीन धनुः कन्या मिथुन मीन धनुः कन्या मिथुन मीन ३० अंश शतक बृहस्प.) बुध बुध बृहस्प.बृहस्प. बुध बुध वृहस्प.बृहस्प.) बुध बुध वृहस्प.) तक नवांशचक्रम् । भाषाटीकासहितानि । चंद्र चंद्र २३ २४ अथ द्वादशांशचक्रम्. मष वृषभ | मिथुन/ कर्क सिह कन्या तुला । वृश्चि.। धनुः मकर कुम्भ [ मीन ग्रहलग्नकरा. मे मं..शुक्रमि.बुध क.चं.सं.म्पक. तु. तु. शु. ६. म. ध. बृ.म.श. कुं.श.मी. बृ./२अं.३. क. . शुक्रमि.बुध/क.चंद्र ति.सूर्य क. बुध. . . म. ध. वृ. म. श. कुं.श.मी. वृ.मिप मं.५ अंशतक. मि.बुधाक. चंद्रसिं.सूर्य क. बुध तु. शु. म. ध. वृ.म. श. कु. श.मी.वृ.म.म. पृ. शु. ७३०. क. क.चंद्र सि.सू. क. बुध तु. शु. १. म.ध. धृ.म. श.क. श.मा. वृ. मेष म. कृ. श.मि. यु.२० अंशतक. सिं.सू.क. बुध त. शु.इ. मं.ध. वृ.म. श. कु. श. मी. वृ.मे मं.. शु.मि. बु.क. चं.१२ ३० क. क.बुधातु.शुक्रवृ.मं. .बु. म. श. कुं. श.मी. ६. मेप मं..शु.मि. बु.क. च.सि.सूर्य २५ अंशतक. तु.शु./. म. ध. कृ. म. श. कुं. श.मी.यू. मेप मं.. श.मि. ७.. चं. सि. सू. क्र बु.)२७ अं.३०क. वृ. मं. धनु बृ.म.श. कुं. श.मी. बृ.मेष म.इ. श.भि. बु.क. चं.सि.सूर्य क..तु.शु.२० अंशतक. ध. बु.म.श.कुं. श.मी. वृ.मेप.मं. वृ. शु.मि. व.क. चं.सिं सूर्य क. ७. तु. शु. ३. मं.२२२३० क. म.श. कु. मी..प मं... मि.यु.क. चं.स.सूर्यक.बु. तु. शुक्र व. मं. ध. .२५ अंशतक. कुं.श. मी वृ. मेप मं..श. मि.बु.क. च.सि.सय क. बु./त. शु. वृ. म.ध. वृ.म. श.२७अं३० क. मी. वृ. मेप मं..शु.मि. बु./क. चं. सिं.मयों क. चु. तु... म. ७.ध. म. श.इं. श.३० अंशतक. जैमिनीयसूत्राणि ।। [अध्यायः १.
पादः.१. --- - अथ सप्तांशचक्रम् मेष । वृषभ मिथुना कर्क | सिंह कन्या सिंह कन्या | तुला (वृश्चि.| धनुः मकर कुम्भ | मीन ४ अ.१७क. मेष वृश्चिक मिथुन मकर | सिंह । मीन तुला वृषभ धना कर्क कुम्भ| कन्या ८ विकलातक मंगल मंगल बुध शनि सूर्य शुक्र शुक्र शुक्र बृह. चंद्र | शनि बुध ८अं. ३४कः वृषभ धनः। कर्क | कुम्भ | कन्या| मेष | वृश्चि. मिथुन मकर ! सिंह, मीन | तला. १६ वि. तक शुक्रबृह. चंद्र शनि | बुध मंगल मंगल बुध शनि ) सूर्य । बृहः: शुक्र १२.५१क. मिथुन मकर | सिंह मीन तुला | वृषभ धनु: कंक | कुम्भ | कन्या मेष | वृश्चि. २४ वि. तक बुध सूर्य बृह. शुक्र शुक्र बृह. चंद्र शनि बुध मंगल मंगल २७ अं.८ क. कर्क | कुम्भ कन्या मेष . वृश्चि. मिथुन मकर - सिंह. मीन तला वृषभ- धनः ३२ वि. तक चन्द्र बुध | मंगल मंगल बुध बृह. शुक्र | शुक्र. बृह २१.२५क. सिंह | मीन तुला | वृषभ | धनुः कर्क कुम्भ | कन्या| मेष | वृश्चिः मिथुन मकर ४० वि. तक | सूर्य बृह..शुक्र হ बृह. 'चंद्र | शनि बुध | मंगल | मंगल बुध शान २५अं. ४२क. कन्या मेष वृश्चिक मिथुन मकर | सिह | मीन तुला | वृषभः धनुः कर्क कुम्भ ४८.वि. तक बुध । मंगल मंगल बुध |शनि सर्य बृह. शुक्र शुक्र. चंद्रशनि तुला वृषभ धनुः | कके | कुम्भ कन्या मेष वृश्चि | मिथुन| मकर सिंह- मनि ३० अंशतकं शुक्र बृह. चंद्र | शनि जुध । मंगलैमंगल शनि | सूर्य इति श्रीजैमिनीयसूत्रे प्रथमाध्याये श्रीनीलकंठीयतिलकानुसतभाषाटीकायां श्रीपाठकमंगल- सेनात्मजकाशिरामाविरचितायां प्रथमः पादः समाप्तः ॥ १ ॥ शनि शनि सय भाषाटीकासहितानि । शुक्र २६ जैमिनीयस्त्राणि । [अध्यायः १.. अथ द्वितीयपादः। इनके अनन्तर आत्मकारकके नवांशका फल कहनेको आरम्भ करते हैं। अथ स्वांशो ग्रहाणाम् ॥ १॥ सूर्यादिक जो कि ग्रह हैं उन ग्रहोंके मध्यमें जो कि आत्मका- रक है उस आत्मकारकका जो कि नवांश है उससे पल विचारने योग्य है ॥ १॥ प्रथम आत्मकारकके मेपादि नवांशोका फल कहते हैं। पञ्च मूपिकमार्जाराः॥२॥ यदि आत्मकारकम मेपनवांश होवे तो मूपिक और मार्जार जीव दुःखदायक होते हैं ॥२॥ तत्र चतुष्पादः॥३॥ यदि आत्मकारकम वृष नवांश होवे तो चार पांववाले पशु सुख- का होते हैं ॥३॥ मृत्यौ कंडूः स्थौल्यं च ॥ ४॥ यदि आत्मकारकम मिथुननवांश होवे तो शरीरमें खाज और शरी- रमें स्थूलता हो जाती है ॥ ४॥ दूरे जलकुष्टादिः॥५॥ यदि आत्मकारकमें कर्कनवांश होवे तो जलसे भय और कुष्ठा- दिक रोग होता है ॥५॥ १ शङ्का-मूषिकादिक दुःखदाई होते हैं और चतुष्पाद सुखदाई होते हैं यहांपर एकही अर्थ अपेक्षित है भिन्न २ अर्थ करनेमें क्या कारण है ? समाधान-इसमें वृद्धवचन प्रमाण है ! " वृषतौल्यंशकगते तस्मिन्वाणिज्ययान्. भवेत् । मेपसिंहांशकगते बयान्मूपकदंशनम् ॥ कारके कार्मुकांशस्ये वाहन त्पतनं भवेत् । " अर्थ-यदि आत्म- कारक ग्रह वृष वा तुलाके नवांशमें हो तो वाणिज्य कर्मवाला होता है और यदि मेष वा सिंहके नवांशमें होवे तो मूषकभय होता है और धनुके नवांशमैं होवे तो वाह- नसे पतन होता है। । .
पाद. २.] भाषाटीकासहितानि । शेषाः श्वापदानि ॥६॥ यदि आत्मकारक सिंहनवांश होवे तो श्वान आदिक जीप दुःख देनेवाले होते हैं ॥६॥ मृत्युवजायानिकणश्च ॥७॥ यदि आत्मकारसमें कन्यानवांश होवे तो मिथुननवांशवत् फल . होता है और अग्निकणभी दुःख देनेवाला होता है अर्थात् शरीरमें खाज और मोटापन तथा अग्निभय होता है ॥ ७ ॥ लामे वाणिज्यम् ॥८॥ यदि आत्मकारकमें तुलानवांश होवे तो वाणिज्यकर्म करनेवाला होता है ।। ८॥ अत्र जलसरीसृपाःस्तन्यहानिश्च ॥९॥ यदि आत्मकारकमें वृश्चिकनवांश होवे तो जल और सादिक दुस देनेवाले होते हैं और माताको स्तन्य नाम दुग्ध सूख जावे है॥९॥ समे वाहनादुच्चाच्च कमात्पतनम् ॥१०॥ यदि आत्मकारकमें धनुर्नवांश होवे तो वाहनसे अथवा ऊंची जगहसे पतन होता है परन्तु वह पतन एकसाथ नहीं होता है किन्तु कहीं २ रुक २ कर होता है ॥ १० ॥ जलचरखेचरखेटकंडूजुष्टबन्थयश्च रिःफे ॥ ११ ॥ यदि आत्मकारकमें मकर नवांश होवे तो जलचारी मत्स्यादिक जीव और खेचर पक्षी और खेट नाम ग्रह ये फलदायक होते हैं और खाज और दुष्ट ग्रंथि गण्डमाला आदिक रोग होते हैं ॥ ११ ॥ तडागादयो धर्मे ॥ १२॥ यदि आत्मकारकमें कुम्भनवांश होवे तो तडाग, वावडी, कूप आदिकोंके करनेवाले होते हैं ।। १२ ।। उच्चे धर्मनित्यता कैवल्यश्च ॥१३॥ ? ॥
२८ जैमिनीयसूत्राणि । [ अध्यायः यदि आत्मकारकम मीननवांश होवे तो धर्मकी नित्यता और मोक्ष होता है' ॥ १३ ॥ इसके अनन्तर आत्मकारकके नवांशका ग्रहस्थितिसे फल कहते हैं। तत्र खो राजकार्यपरः ॥ १॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें सूर्य स्थित हो तो राजकर्म करने- चाला होता है ॥ १४ ॥ पूर्णेन्दुशुक्रयाभोंगी विद्यानीवी च ॥ १६ ॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें परिपूर्ण चन्द्रमा और शुक्र ये दोनों स्थित हो तो मोगकर्ता और विद्यासे जीविका करनेवाला होता है ॥ १५॥ धातुवादी कौंतायुधो बहिजीवी ॥ १६॥ यदि आत्मकारक नवांशमें भीम स्थित होवे तो धातुवादी नाम रसायनविद्यावाला और वरछी शस्त्र बांधनेवाला तथा अग्निसें जीवि- का करनेवाला होता है ।। १६ ॥ १ आत्मकारक नवांशादि गुणोंकर फल वृद्धांने कहा है । " शुभराशी भांशे का कारकांशै धनी भवेत् । तदशकेन्देषु शुभे राजा तनं प्रजायते ॥ " अर्थ-यदि आत्म- कारक ग्रहका नवांश शुभ राशिम अथा शुभग्रहके नगंशमें हो तो धनी होता है और यदि आत्मकारक ग्रहके नवांशके कुण्डलीमें जो कि केंद्र होवे उनमें यदि शुभ ग्रह होवे तो निश्चयही राजा होता. है 1 अन्यञ्च-" कारके शुभराश्यंशे समांशस्थे शुभग्रहे । उपग्रहस्य पाश्चात्ये स्वोच्चस्वःशुभक्षंगे ॥ पापडग्योगरहिने कैवल्यं तस्य निर्दिशेत् । मिश्रे मित्रं विजानीयाद्विपरीत विपर्ययः ॥ " अर्थ-यदि आत्मकारक शुभग्रह होकर शुभराशिर्के नवांशम और लमके नवांशमें स्थित होवे और उपग्रहके पिछाडी स्थित होने और अपने उच्चका अथवा निज राशिका अथवा शुभग्रहके राशिका होवे और पापग्रहको दृष्टि और योगसे वर्जित हो तो मोक्ष होता है और यदि पापग्रह तथा शुभग्रह इन दोनोंकी दृष्टि बा योगसे युक्त होवे तो मिश्रस्वर्गवास होता है और बबि फेवल पापग्रहको दृषि और योगसेही युक्त हो तो न मुक्ति होती है न स्वर्गवास होता है । अन्यच्च-" चंद्रभृग्वार्कवर्गस्थे कारके पारदारकः । अर्थ-प्रदि आत्मकारक चन्द्र, शुक्र, मंगल,इसके वर्गमें स्थित होवे, तो परस्त्रीसे भाग करनेवाला होता है . .
पादः२.] भाषाटीकासहितानि ।
वणिजस्तन्तुवायाः शिल्पिनो व्यवहारविदश्च सौम्ये १७
यदि आत्मकारकके नवांशमें बुध स्थित होवे तो वणिक् और
वस्त्र बुननेवाला तथा शिल्पविद्यावान् और समस्त व्यवहार जानने-
वाला है होता ॥ १७॥
कर्मज्ञाननिष्ठा वेदविदश्च जीवे ॥ १८ ॥
यदि आत्मकारकके नवांशमें बृहस्पति स्थित होवे तो वैदिका-
ममें निष्ठा रखनेवाला तथा ज्ञानी और वेदको जाननेवाला होताहै१८॥
राजकीयाः कामिनः शतंद्रियाश्च शुक्रे ।। १९ ॥
यदि आत्मकारक नवांशमें शुक्र स्थित हो तो राजाके अधि-
कारवाला और बहुत स्त्रियोंके भोगनेमें इच्छा रखनेवाला और सौं
वर्षपर्यन्त जीवन धारण करनेवाला होता है ॥ १९ ॥
प्रसिद्धकर्माजीवः शनी ॥२०॥
यदि आत्मकारक नवांशमें शनैश्वर स्थित होवे तो लोकप्रसिद्ध
कमसे जीविका करनेवाला होता है ।। २० ॥
धानुष्काचोराश्च जांगलिका लोहयंत्रिणश्च राहो ॥२१॥
यदि आत्मकारकके नवांशमें राहु स्थित होय तो धनुष रखने-
वाला और चोरी करनेवाला होता है अथवा जांगलिक और लोहयंत्र
रखनेवाला होता है ।। २१॥
गजव्यवहारिणश्चोराश्च केतौ ॥२२॥
यदि यात्मकारकत नवांशमें केतु स्थित होवे तो हाथियोंका
व्यवहार करनेवाला तथा चोर होता है ॥ २२॥ .
रविराहुभ्यां सपनिधनम् ॥ २३॥
यदि आत्मकारकके नवांशमें सूर्य और राहु दोनों स्थित होतें
तो सर्पसे मृत्यु होता है ।। २३ ॥
शुभदृष्टे सत्रिवृत्तिः ॥ २४॥
- ३० जैमिनीयसत्राणि । [अध्यायः १. यदि आत्मकारकके नवांशमें स्थित हुए सूर्य राहु ये दोनों शुभ ग्रहने देखे होवें तो सर्पसे मृत्यु नहीं होती है ॥ २४ ॥ शुभमात्रसंबन्धानांगलिकः ॥२५॥ यदि आत्मकारक नवांशमें स्थित हुए सूर्य राहुके विषे शुभग्रह मात्रका योग होवे तो जांगलिक नाम विषवैद्य होता है ॥२५॥ कुजमात्रदृष्टे गृहदाहकोऽग्निदो वा ॥२६॥ यहि आत्मकारकके नवांशमें स्थित हुए सूर्य राहु ये दोनों मंगलने देखे होंय तो अपने गृहको जलानेवाला अथवा अग्नि देने- वाला होता है ॥ २६ ॥ शुक्रदृष्टेन दाहः ॥२७॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें स्थित हुए सूर्य राहु इन दोनोंपर शुक्रकी दृष्टि होवे तो गृहको जलानेवाला नहीं होता है किन्तु अनिका दाह मात्र करनेवाला होता है ॥ २७ ॥ गुरुदृष्टेस्वासमीपगृहात् ॥२८॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें स्थित हुए सूर्य राहुपर बृहस्पति- की दृष्टि होवे और शुक्रकी दृष्टि न होवे तो समीप गृहपर्यंत दाह हो जावे, अपने गृहमात्रका दाह न होवे ॥ २८ ॥ सगुलिके विषदो विषहतो वा ॥ २९ ॥ यदि आत्मकारकका नवांश गुलिकसहित होवे तो दूसरेको विष देनेवाला तथा स्वयं विष खाकर मरनेवाला होता है ॥ २९ ॥ १ गुलिक बनानेकी रीति वृद्धोंने कही है " रविवारादिशन्यन्तं गुलिकादि निरूप्यते। दिवसानष्टवा कृत्वा वारेशागणयत् क्रमात ॥ अष्टमोंऽशो निरीशः स्याच्छन्यशो गुलिका स्मृतः । रात्रिमप्यष्टधा भक्ता वारेशासंचमादितः। गणयेदष्टमः खंडो निप्पात: पति- कीर्तितः । शन्यंशे गुलिकः प्रोक्तो गुर्वशे यमघंटकः ॥ भौमांशे मृत्युरादिष्टो रव्यंशे कालसंज्ञकः । सौम्यांशेऽईपहरकः स्पष्टकर्भप्रदेशकः ॥ ॥ शनैश्चरपर्यन्त गुलिकादि योग को हैं। दिनमानके आठ भाग करे और उस दिन जो वार होवे उससे कमकरके गिने। आठयां भाग स्वामीकर वर्जित होता है अर्थात । " अर्थ-विवारसे लेकर पाद: २.] भाषाटीकासहितानि । चंद्रदृष्टौ चौराऽपडतघनश्चौंरो वा ॥३०॥ यदि गुलिकसहित आत्मकारकके नवांशपर चन्द्रमाकी दृष्टि होवे तौ चौरोंकर चुराये हुए धनवाला वा स्वयं चोर होता है ॥ ३० ॥ बुधमानदृष्टे बृहद्रोंजः ॥३१॥ यदि गुलिकसहित आत्मकारकका नवांश केवल बुधहीने देखा हो और अन्य ग्रहकी दृष्टि न होवे तौ वडे २ वृषणोंवाला होता है ॥३१॥ तत्र केतो पापदृष्ट कर्णच्छेदः कर्णरोगो वा ॥ ३२ ॥ आठवें भागका कोई स्वामी नहीं होता है। उन आठों भागोंमें जो कि शनैश्चरका भाग है यह गुटिक कहा है। इसी प्रकार रात्रिमानके आठ भाग करे और उस दिन जो वार हो उससे जो कि पांचवां वार है उससे क्रमकरके गिने जो आ- ठवां भाग हो वह स्वामिवर्जित होता है । उन आठों भागोंमें जो कि शनैश्चरका भाग है वह गुलिक होता है और जो कि बृहस्पतिका भाग है वह यमघंटक होता है और जो कि मौमका भाग है वह मृत्युयोगसंज्ञक होता है और जो कि सूर्यका भाग है वह काल्योगसंज्ञक है और जो कि बुधका भाग है वह गदैमहरसंज्ञक है। जैसे रविवारके दिन दिनके सांतवे भागमें और रात्रिके तीसरे भागों गुलिकयोग रहता है और सोमवारके दिन दिनमें छठे भागमें और रात्रि के द्वितीय भागमें गुलिकयोग रहता है और भौमवार के दिन दिनके पांचवें भागों और रात्रिके प्रथम भागमें गुलिकयोग रहता है। इसी प्रकार बुधके दिन दिनके चतुर्थ भागमें और रात्रिके सप्तम भागमें और बृहस्पतिके दिन दिनके तृतीय भागमें और रात्रिके छठे भागमें और शुक्रके दिन दिनके द्वितीय भागमें और रात्रिके पचम भागमें और ऑनै- अरके दिन दिनके प्रथम भागमें और रात्रिक चतुर्थ भागमें गुलिकयोग रहता है। इसी प्रकार अन्यवचनभी है । " तथा च रविवारादौ दिने गुलिकसस्थितिः । सप्तर- वेदत्रिद्दिकुखण्डेपु हि क्रमात् ॥ रात्री त्रिविकुसप्तर्तुपंचतुर्येषु तस्थितिः ! ” अर्थ-रवि- चारादिक वार के विषे दिनमें क्रमसे सप्तम, पष्ट, पंचम, चतुर्थ, तृतीय, द्वितीय, प्रथम इन भागों में गुलिकयोग रहता है और रात्रिमें तीय, द्वितीय,- प्रथम, सप्तम, पष्ट, पंचम, चतुर्थ इन भागों में गुलिकयोग रहता है । जिस समय गुलिकयोगका आरम्भ होवे उस समय जो लत विद्यमान हो उस. लमका जो नाश उस समय होवे वहही नवांश आत्मकारकका यदि होवे तो वह आत्मकारकका नवांश सगुलिक कहा जाता है ऐसा जानना ॥
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जैमिनीयसूत्राणि ।
[अध्यायः १.
यदि आत्मकारकके नवांशमें पापग्रहोकर देखा हुआ केतु स्थित
होवे तौ कर्णच्छेद अथवा कर्णरोग होता है ॥३२॥
शुक्रदृष्टे दीक्षितः॥३३॥
यदि आत्मकारकके नवांशमें स्थित हुआ क्षेतु शुमने देखा होने
तो किसी एक यज्ञक्रिया करके दीक्षित होता है ॥३३॥
बुधशनिदृष्टे निर्वीर्यः ॥३४॥
यदि आत्मकारकके नवांशमें स्थित हुआ केनु बुध और शनै-
श्वर दोनोंने देखा होवे तो नपुंसक होता है ॥ ३४॥
बुधशुभदृष्टे पौन-मुनिको दासीपुत्रो वा ॥ ३९ ॥
यदि आत्मकारकके नवांशमें स्थित हुआ केतु, बुध और शुक्र
दोनोंने देखा होवे तो वार २ को हुए वचनके कहनेवाला होता
अथवा दासीका पुत्र होता है ॥ ३५ ॥
शनिदृष्टे तपस्वी प्रेष्यो वा ॥ ३६॥
यदि आत्मकारकके नवांशम स्थित हुआ केतु अन्यग्रह और
शनैश्चरने देखा होवे तो तपस्वी अथवा दास होता है ॥ ३६॥
शनिमात्रदृष्टे संन्यासाभासः ॥ ३७॥
यदि आत्मकारकके नवांशमें स्थित हुआ केतु अन्य ग्रहने तो
देखा न होवे केवल शनैश्चरने देखा होवे तौ कथनमात्र संन्यासी
होता है। परिपूर्ण संन्यासी नहीं होता है ॥ ३७ ॥
तत्र रविशुकदृष्टे राजप्रेष्यः ॥३८॥
यदि आत्मकारकका नवांश सूर्य और शुक्र दोनोंने देखा होवे
तो राजाका सेवक होता है ।। ३८॥
इसके अनन्तर आत्मकारकके नवांशसे दशम नवांशका
विचार करते हैं।
रिफे बुधे बुधदृष्टे वा मन्दवत् ॥३९॥
पादः २.] भाषाटीकासहितानि । ३३ यदि आत्मकारकके नवांशसे दशम स्थानपर बुध स्थित होते अथवा आत्मकारकके नवांशसे दशम स्थान बुधने देखा होवे तौ“ प्रसिद्धकर्मा जीवः शनौ " इस सत्रका कहा हुआ फल होता है अर्थात् लोकप्रसिद्ध कर्मसे जीविका करनेवाला होता है ॥ ३९ ॥ शुभदृष्टेस्थेयः॥४०॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे दशम स्थान बुधको त्यागके अन्य शुभ ग्रहोंने देखा होवे तो स्थिर स्वभाव होता है, चंचल नहीं होता है ।। ४०॥ खो गुरुमात्रदृष्टे गोपालः ॥ ४॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे दशम नवांशमें स्थित हुआ सूर्य केवल बृहस्पतिने देखा होवे और किसी ग्रहने न देखा होवे तो गौओंकी रक्षा करनेवाला होता है ।। ४१॥ इसके अनन्तर आत्मकारकके नवमांशसे चतुर्थ नवमांशका विचार करते हैं। दारे चन्द्रशुक्रहग्योगात्प्रासादः॥४२॥ यदि आत्मकारकके नवमांशसे चतुर्थ नवमांशपर चन्द्र शुक्र इन दोनोंकी घटि अथवा योग होनेसे उत्तम २ राजमन्दिरोंवाला होता है ॥ ४२ ॥ उच्चग्रहेऽपि ॥४३॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे चतुर्थ स्थानपर कोई उसका ग्रह स्थित होवे तोमी उत्तम २ राजमन्दिरोंवाला होता है ॥ ४३ ॥ राहुशनिभ्यां शिलागृहम् ॥४४॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे चतुर्थ स्थानपर राहु शनैश्चर. दोनोंकी स्थिति होवे तो शिलाओंका रचा हुआ गृह होता है॥४४॥ कुजकेतुभ्यामेष्टकम् ॥ ४५ ॥ -- जैमिनीयसूत्राणि । [अध्यायः१. यदि आत्मकारकके नवांशसे चतुर्थ नवमांशपर मंगल केतु ये दोनों स्थित होवे तो ईंटोंका रचा हुआ गृह होता है.॥ ४५ ॥ गुरुणा दाखम् ॥१६॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे चतुर्थ नवांशपर बृहस्पतिकी, स्थिति होवे तो काष्ठका रचा हुआ गृह होता है ।। ४६ ।। ताण रविणा ॥१७॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे चतुर्थ नवांशपर सूर्यकी स्थिति होवे तो तृणका रचा हुआ गृह होता है ॥ ४७ इसके अनन्तर आत्मकारकके नवमांशसे नवम नवमांशका विचार करते हैं। समे शुभढग्योगाद्धर्मनित्यः सत्यवादी गुरुभक्तश्च ४८॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे नवम नवमांशपर शुभ ग्रहोंकी • अथवा योग होवे तो धर्मनिष्ठ और सत्य बोलनेवाला तथा गुरुजनोंका भक्त होता है ॥ ४८ ॥ अन्यथा पापैः॥४९॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे नवम नवमांशपर पापग्रहोंकी दृष्टि तथा योग होवे तौ धर्मसे विपरीत चलनेवाला तथा झंठ बोलने- वाला तथा गुरुजनोंका भक्त नहीं होता है ॥ ४९ ।। शनिराहुभ्यां गुरुद्रोहः॥५०॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे नवम नवमांशपर शनि, राहु, इन दोनोंकी दृष्टि अथवा योग होवे तो गुरुसे विरोध करनेवाला. होता है ।। ५०॥ गुरुरविभ्यां गुरावविश्वासः॥५१॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे नवम नवमांशपर बृहस्पति, सूर्य इन दोनोंकी दृष्टि अथवा योग होवे तो गुरुमें विश्वास नहीं होता है ॥५१॥ 1
पादः २.] भाषाटीकांसहितानि ।
३५
तत्र भृग्वंगारकवर्गे पारदारिकः ॥१२॥
यदि आत्मकारक नवांशसे नवम नवमांशमें शुक्र वा मङ्गलका
पड्वर्ग होवे तो परस्त्रीगामी होता है ॥ ५२ ॥
दृश्योगाभ्यामधिकाभ्यामामरणम् ॥५३॥
यदि आत्मकारकके नवांशसे नवम नवमांशमें शुक्र वा मङ्गलका
पड्वर्ग होवे और शुक्र व मंगलकी दृष्टि अथवा योग होवे तौ मरण-
'पर्यन्त परस्त्रीसे गमन करनेवाला होता है ।। ५३ ॥
केतुना प्रतिबन्धः ॥५४॥
यदि आत्मकारकके नवांशसे नवम नवमांशमें केतुकी दृष्टि अथवा
योग होवे तो मरणपर्यन्त परस्त्रीसे विमुख रहता है ।। ५४ ॥
गुरुणा स्वणः ॥२९॥
यदि आत्मकारकते नवांशसे नवम नवमांशमै बृहस्पति की दृष्टि
अथवा योग होवे तो स्त्रीके आधीन रहता है।॥ ५५ ॥
राहुणार्थनिवृत्तिः ॥५६॥
यदि आत्मकारकके नवांशसे नवम नवमांशमें राहुकी दृष्टि
अथवा योग हो तो परस्त्रीसंगसे धनका नाश होता है ॥५६ ॥
इसके मनन्तर आत्मकारकके नवांशसे सप्तम नवांशका
विचार करते हैं।
लाभे चंद्रगुरुभ्यां सुन्दरी ॥१७॥
यदि आत्मकारकके नवांशसे सप्तम नवांशमें चन्द्र बृहस्पति इन
दोनोंका योग होवे तो स्त्री सुन्दरी होती है ।। ५७ ॥ ..
राहुणा विधवा ॥२८॥
यदि आत्मकारकके नवांशसे सप्तम नवांशमें राहुका योग होने
तो गृहमें विधवा स्त्री होती है ।। ५८॥
शनिना वयोधिका रोगिणी तपस्विनी वा ॥१९॥
जमिनीयसूत्राणि । [ अध्यायः १. ३६ यदि आत्मकारकके नवांशसे सप्तम नवांशमें शनैश्चरका योग होने तो आपसे अधिक अवस्थावाली अथवा गोगिणी वा तपस्विनी स्त्री होती है ॥ ५९॥ कुजेन विकलांगी ॥६॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे सप्तम नवांशमें मंगलका योग हो। तो दुर्लक्षण अंगवाली स्त्री होवे है ॥ ६०॥ रविणा स्वकुले गुप्ता च ॥६॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे सप्तम नवांशी सूर्यका योग होने तौं अपनी स्त्री मरणपर्यन्त अपने घरमें रक्षित रहती है और स्वातंत्र्यसे इधर उधर फिरनेवाली नहीं होती है और सूत्रमें. जो कि चकारका ग्रहण है तिससे विकलांगी अर्थात् दुर्लक्षण अंगवालीभी होती है ॥ ६१॥ बुधेन कलावती ॥१२॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे सप्तम नवांशपर बुधका योग होवे तौ स्त्री गाने में तथा वजानेमें बहुत निपुण होती है ।। ६२ ।। चापे चंद्रेणानावृते देशे ॥६३॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे चतुर्थ नवांशपर चन्द्रमा होवे और पूर्व कहे हुए स्त्रीकारक योग विद्यमान होवे तो अनाच्छादित देशमें प्रथम स्वीका संग होता है अथवा आत्मकारकके नवांशसे सप्तम नवांशमें धनुराशि और चन्द्रमा स्थित होवे तो अनाच्छादित देशमें प्रथम स्त्रीसंग होता है ।। ६३ ॥ इसके अनन्तर आत्मकारकके नवांशसे तृतीय नवांशका विचार करते हैं। कर्मणि पापे शूरः ॥ ६॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे तृतीय नवांशमें पाप ग्रह स्थित : होवे तो शूर वीर होता है ॥ ६४॥ . -- भाद: २.] भाषाटीकासहितानि। ३७. शुभे कातरः ॥ ६॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे तृतीय नवांशमें शुभग्रह हो तो कातर नाम डरपनेवाला होता है । ६५ ।। मृत्युचिन्तयोः पापे कर्षकः ॥६६॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे तृतीय और षष्ठ नवांश दोनोंमें पापग्रह होवें तो खेती करनेवाला होता है ॥ ६६ ॥ समे गुरौ विशेषेण ॥ ६॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे नवम नवांशमें बृहस्पति होवे तो विशेष करके खेती करनेवाला होता है । ६७ ॥ इसके अनन्तर आत्मकारकके नवांशसे द्वादश नवांशका विचार करते हैं। उच्चे शुभे शुभलोकः ॥ ६८॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे द्वादश नवांशमैं शुभ ग्रह होवे तौ शुभ लोककी प्राप्ति होवे है ॥ ६८ ॥ केतो कैवल्यम् ॥ ६९॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे द्वादश नवांशमें केतु होवे तो मोक्ष होता है अथवा आत्मकारक नवांशमें शुभ ग्रह होवे तो मोक्ष होता है ।। ६९ ॥ क्रियचापयाविशेषेण ॥ ७० ॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें मेषराशि अथवा धनुराशि होवे और शुभ ग्रहके साथ स्थित होवे तो विशेषकरके मोक्ष होता है अर्थात. सायुज्य मोक्ष होता है अथवा आत्मकारकके नवांशसे द्वादश नवां- शमें मेष वा धनुराशि स्थित होवे और सातवें केतु स्थित होवे तो. सायुज्य मोक्ष होता है ॥ ७० १ शुभग्रहकी अपेक्षासे केतुको पापग्रह होनसे केतुः सायुज्यमुक्तिको देनेवाला नहीं' हो सकता इससे “ केतौ कैवल्यम्, क्रियचापयोविशेषेण ” इन सूत्रोंपर. यह व्याख्याही जैमिनीयसूत्राणि । ३८ [अध्यायः १. पापैरन्यथा ॥१॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे बादश नवांशमें और आत्मकारक नवांशमें पापग्रहोंका योग होवे तो न शुभ लोक होता है न मुक्ति होती है ॥ ७१॥ रविकेतुभ्यां शिव भक्तः ॥७२॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें सूर्य और केतु दोनों मिलकर स्थित हो तो शिवका भक्त होता है ।। ७२ ॥ चंद्रेण गौर्याम् ॥ ७॥ यदि आत्मकारकका नवांश चन्द्रमाकरके युक्त होवे तो गौरीका भक्त होता है ॥७३॥ शुक्रेण लक्ष्म्याम् ॥ ७४ ॥ यदि आत्मकारकका नवांश शुक्रकरके युक्त होवे तो लक्ष्मीका भक्त होता है ।। ७४ ॥ कुजेन स्कंदे ॥ ७५ ॥ यदि आत्मकारकका नवांश मंगलकरके युक्त होवे तो स्कन्द भगवानका भक्त होता है ।। ७५ ॥ बुधशनिभ्यां विष्णौ ॥ ७६ ॥ यदि आत्मकारकका नवांश बुध शनैश्वर दोनोंसे युक्त हो तो विष्णुका भक्त होता है ।। ७६ ॥ गुरुणा सांबशिवे ॥ ७७ ॥ N उचित है । आत्मकारकके नवांशमें शुभग्रह होवे तो मुक्ति होती है और आत्म-- कारकके नवांशमें मेप वा धनु राशि स्थित होवे और साथमें शुभग्रह हो तो सायु- ज्यमुक्ति होवे है । स्त्रकारने केतुको शुभग्रह नहीं कहा है और जो कि, " चरदशा-- यामत्र शुभः केतुः" इस अगाडी कहे जानेवाले सूत्रमें केतुको शुभकरके कहा है से चरदशामेही केतु शुभ है और जगह नहीं ऐसा अर्थ जानना ॥ १ “राविकेतुभ्यां शिव भक्तः" इस सूत्रसे लेकर" अमात्यदास चैवम् " इस सूत्रप- यन्त "केतौ " इस पदकी अनुवृत्ति जाननी ॥ ;
पादः२.. भाषाटीकासहितानि। यदि आत्मकारकका नवांश बृहस्पति करके युक्त होवे तो पार्व- तासहित शिवका भक्त होता है ।। ७७ ॥ राहुणा तामस्यां दुर्गायाम् ॥७८ ॥ यदि आत्मकारकका नवांश राहुसे युक्त होवे तो तामसी देवता और दुगाका भक्त होता है ।। ७८ ॥ केतुना गणेशे स्कन्दे च ॥ ७९ ॥ याद आत्मकारकका नवांश केतु से युक्त होवे तो गणेश और स्कन्दका भक्त होता है ॥ ७९ ॥ पापः मंदे क्षुद्रदेवतासु ॥ ८०॥ यदि आत्मकारक नवांशम पापराशि और शनैश्चरयुक्त होवे तौ कर्णपिशाचादि देवताओंका भक्त होता है ॥ ८॥ शुक्रे च ।। ८१॥ चदि आत्मकारक नवांशमें पापराशि और शुक्र स्थित होवे तोमी कर्णपिश चादि देवताओंका भक्त होता है ।। ८१ ॥ अमात्यदासे चैवम् ।। ८२ ॥ आत्मकारक ग्रहसे कम अंशकलादिवाला ग्रह अमात्यकारक होता है उस अमात्यकारक ग्रहसे जो कि क्रमसे गिननेसे छठा ग्रह है वह ग्रह अमात्यदास संज्ञक है । यदि अमात्यदाससंज्ञक ग्रह आत्मका- रकके नवांशमें स्थित होवे और पापराशिभी उस आत्मकारकके नवांशमें विद्यमान होते तोभी क्षुद्र देवताओंका भक्त होता है ॥२॥ त्रिकोणे पापद्वये मांत्रिकः ॥ ८३ ॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें पंचम और नवम नवांश इन दोनोंमें क्रमसे दो पापग्रह स्थित होवें तो मंत्रवेत्ता होता है ॥ ८३ ॥ १ कोई आचार्य यह कहते हैं कि यदि यह अर्थ सम्मत होता तो “ पापः मदंश क्राऽमात्यदासेपु क्षदेवतासु " ऐसा सूत्र एकही रचित होता फिर पृथक् २ सूत्र रचना ४० *, जैमिनीयसूत्राणि। [अध्याय १. पापदृष्टे निग्राहकः॥ ८॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे जो कि पंचम और नवम नाश हैं वे दोनों पापग्रहोंसे युक्त हो और पापग्रहोंने देखे हो तो भूता- दिकोंका निग्रह करनेवाला होता है ॥ ८४ ॥ शुभदृष्टेऽनुग्राहकः ॥ ८५॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे पंचम नवम ये दोनों पापग्रहासे युक्त हो और शुभग्रहोंने देखे होवें तो लोकम अनुग्रह करने- वाला होता है ॥ ८५॥ शुकेन्द्रौ शुक्रदृष्टे रसवादी ॥८६॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें स्थित हुआ चन्द्रमा शुक्रने देखा होवे तो रसोंके बनानेवाला होता है ।। ८६ ॥ बुधदृष्टे भिषक् ॥ ८७॥ यदि आत्मकारक नवांशम स्थित हुआ चन्द्रमा बुधने देखा होवे तो वैद्य होता है ।। ८७ ॥ चापे चंद्र शुक्रदृष्टे पांडुश्वित्री ॥ ८८ ॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे चतुर्थ नवांशमें स्थित हुआ चन्द्रमा. शुक्रने देखा होवे तो श्वेत कुष्टवाला होता है ॥ ८८ ॥ कुजदृष्टे महारोगः ।। ८९॥ यदि आत्मकारक ग्रहके नवांशसे चतुर्थ नवांशमें स्थित हुआ चन्द्रमा शुक्ने देखा होवे तौ महारोग अर्थात् कुष्ठ रोगवाला होता है ।। ८९ ॥ व्यर्थ है सो एक सूत्र नहीं हो सका क्योंकि यदि इस प्रकार एकही स्त्र होता तो यह अर्थ हो सका। शनैश्वर शुक अमात्यदास यह ग्रह मिलकरके आत्मकारकके नवांशमें पापराशिक विषे स्थित होवे तो क्षुददेवताका भक्त होता है और जो कि शनैश्चर शक अमात्यदास इनमेसे एक २ को पापराशिमें स्थिति करके क्षुददेवताकी भक्ति होती है तिससे योगविभागके लिये पृथक् २ स्त्र रचना उचितही है ।
पादः २.] भाषाटीकासहितानि । ४१ केतुदृष्टे नीलकुष्ठम् ॥ ९० ॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे चतुर्थ नवांशमें स्थित हुआ चन्द्रमा केतुकर देखा होवे तौ नीलकुष्ठ रोगवाला होता है ॥ ९ ॥ तत्र मृतो वा कुजराहुभ्यां क्षयः ॥ ९ ॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे चतुर्थ नवांशमें अथवा पंचम नवां- शमें मंगल राहु होवें तौ क्षयरोगवाला होता है ।। ९१ ॥ चंद्रहौ निश्चयेन ॥ ९२॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे चतुर्थ नवांशमें अथवा पंचम नवां- शमें स्थित हुए मंगल और राहुपर चन्द्रमाकी दृष्टि होवे तो बडा प्रबल क्षयरोग होता है ।। ९२ ॥ कुजेन पिटिकादिः॥ ९३ ॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे चतुर्य नवांशमें अथवा पंचम नवां- शमें मंगल स्थित होवे तो पिटिकादिक रोग होते हैं ।। ९३ ॥ केतुना ग्रहणी जलरोगो वा ॥ ९ ॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे चतुर्थ नवांशमें अथवा पंचमन- चांगमें केतु स्थित होवे तौ संग्रहणी अथवा जलोदरादिकं रोग होते हैं ॥ ९४॥ राहुगुलिकाभ्यां क्षुद्रविषाणि ॥ ९५ ॥ यदि आत्मकारकके नवांशसे चतुर्थ नवांशमें अथवा पंचम नवां- शमें राहु और गुलिक हो तो मूषिकादि विष होते हैं । भाव यह है कि गुलिकयोगके आरंमके लग्नका नवांशही आत्मकारकके नवां- शका चतुर्थ वा पंचम नवांश होवे और तहां राहु स्थित होवे तौ क्षुद्रजीव मूषिकादि विष होते हैं ।। ९५ ॥ तत्र शनो धानुष्कः ।। ९६ ॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें और उससे चतुर्थ नवांशमें शनैश्चर स्थित होवे तौ धनुपविद्यामें निपुण होता है ॥ ९६ ॥ " जैमिनीयसूत्राणि। [अध्यायः१. ४२ केतुना घटिकायंत्री ॥ ९७॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें और उससे चतुर्थ नवांशमें केतु स्थित होवे तौ घटिकायंत्रको रखनेवाला होता है ।। ९७ ॥ बुधेन परमहंसो लगुडी वा ॥९८॥ यदि मात्मकारकके नवांशमें और उससे चतुर्थ नवांशमें बुध स्थित होवे तौ परमहंस अथवा दण्डी होता है ।। ९८ ॥ राहुणा लोहयंत्री ॥ ९९॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें और उससे चतुर्थ नवांशमें राहु स्थित होवे तौ लोहरचित यंत्र रखनेवाला होता है ।। ९९ ।। रविणा खड्गी॥१०॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें और उससे चतुर्थ नवांशमें सूर्य स्थित होवे तौ तलवार रखनेवाला होता है । १०० ॥ कुजेन कुन्ती ॥१०१॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें और उससे चतुर्थ नवांशमें मंगल स्थित होवे तौ कुन्तशस्त्र रखनेवाला होता है ॥ १०१॥ मातापित्रोश्चन्द्रगुरुभ्यां ग्रंथकृत् ॥ १०२॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें अथवा उससे पंचम नवांशमें चन्द्रमा और बृहस्पति ये दोनों स्थित होवें तौ ग्रंथवनानेवाला होताहै १०२ शुक्रेण किञ्चिदूनम् ॥ १०३॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें अथवा उससे पंचम नवांशमें चंद्र- सहित शुक्र स्थित होवे तौ ग्रंथ बनाने में कुछ कम शक्तिवाला होता है ॥ १०३ ॥ १ शंका-सूत्रमें तो केवल शुक्रकाही ग्रहण है फिर साथमें चंद्रमाका कैसे किया है । समाधान-यहां पूर्व सूत्रसे चंद्रमाको अनुवृत्ति है केवल शुककाही ग्रहण नहीं क्योंकि केवल शुक्रका फल अगाडी कहा जावेगा। यदि कहो कि " शुक्रण किञ्चिद्नम्, शुक्रेण कविग्मिी काव्यज्ञश्च” इन दोनों सूत्रोंका यह अर्थ करे कि ग्रंथकार होने में कुछ न्यून और कवि वाग्मी और काव्यवेत्ता होता है सो यहभी नहीं कहा जा सका ग्रहण १ पादः २. ] भाषाटीकासहितानि । ४२ बुधेन ततोऽपि ॥१०॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें अथवा उससे पंचम नवांशमें चन्द्रसहित बुध स्थित होवे तो शुक्रकी अपेक्षा करके ग्रंथ बनाने में औरभी कुछ कम शक्तिवाला होता है ॥ १०४ ॥ शुक्रेण कविर्वाग्मी काव्यज्ञश्च ॥ १०६॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें अथवा उससे पंचम नवांशमें केवल शुक्रही स्थित होवे तौ कवि और कहने में अति चतुरवाणीवाला तथा कमव्योंका जाननेवाला होता है ॥ १०५ ॥ गुरुणा सर्वविद ग्रन्थिकश्च ॥ १०६॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें अथवा उससे पंचम नवांशमें केवल बृहस्पति स्थित होवे तौ सर्वज्ञ तथा ग्रन्थकर्ता होता है ॥ १०६ ॥ न वाम्मी ।। १०७॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें अथवा उससे पंचम नवांशमें बृह- स्पति हो तौ वक्ता नहीं होता है ॥ १०७ ॥ विशिष्यवैयाकरणो वेदवेदांगविच्च ॥ १०८॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें अथवा उससे पंचम नवांशमें बृह- स्पति होवे तौ विशेष करके व्याकरणशास्त्रका जाननेवाला तथा वेद वेदांगोंका जाननेवाला होता है ।। १०८ ॥ सभाजडः शनिना ॥ १०९॥ यदि आत्मकारकके नवांशमें अथवा उससे पंचम नवांशमें शनै- श्वरस्थित होवे तो समाजड अर्थात् सभामें बोलनेवाला नहीं होता है ॥ १०९॥ क्योंके यदि ऐसा अर्थ होता तौ“शुक्रेण किश्चिनं कविवाग्मी काव्यज्ञश्च" ऐसा एकहीं सूत्र होता सो है नहीं इस कारण इस सूत्रका चंद्र इस पदकी अनुवृत्ति द्वारा अर्थ करना उचित है। यदि कहो कि समासके मध्यमें स्थित हुए पदोंके एक अंशकी अनुहात्ति उचित नहीं है सो यहभी नहीं कहा जा सक्ता है क्योंकि इस ग्रंथमें इस प्रका- रको अनुदात्त करनेकी रीति है ॥ . Co-
जैसिनीयसूत्राणि।
[ अध्यायः १.
बुधेन मीमांसकः ॥ ११०॥
याद आत्मकारकके नवांशमें अथवा उससे पंचम नवांशमै बुध
स्थित होवे तौ मीमांसाशास्त्रका जाननेवाला होता है । ११०॥
कुजेन नैयायिकः ॥ १११॥
यदि आत्मकारकके नवांशमें अथवा उससे पञ्चम नवांशमें मंगल
स्थित होवे तो न्यायशास्त्रका जाननेवाला होता है ॥ १११
चंद्रेण सांख्ययोगज्ञः साहित्यज्ञो गायकश्च ॥११२॥
यदि आत्मकारकके नवांशमें अथवा उससे पञ्चम नवांशमें चन्द्रमा
स्थत होवे तो सांख्ययोगका जाननेवाला तथा साहित्यका जानने-
वाला और गान करनेमें निपुण होता है ॥ ११२ ॥
रविणा वेदान्तज्ञो गीतज्ञश्च ॥ ११३ ॥
यदि आत्मकारकके नवांशमें अथवा उससे पञ्चम नवांशमें सूर्य
स्थित होवे तौ वेदान्तशास्त्रका जाननेवाला तथा गीतोंका जाननेवाला
होता है ॥ ११३ ॥
केतुना गणितज्ञः॥११॥
यदि आत्मकारकके नवांशमें अथवा उससे पञ्चम नवांशमें केतु,
स्थित होवे तो गणितका जाननेवाला होता है ॥ ११४ ॥
गुरुसंबन्धेन संप्रदायसिद्धिः ।। ११५॥
यदि इन कहे हुए समस्तयोगोंके विषे बृहस्पतिकी दृष्टि और
बृहस्पतिका षड्वर्ग सम्बन्ध होवे तौ जिस २ शास्त्रके जाननेका जोर
योग है उस २ शास्त्रकी सम्प्रदायसिद्धि अर्थात् समस्त भेद
जाननेकी गति होती है । भाव यह है कि जिस शास्त्रके जाननेका
जो योग पाया जावे यदि उस योगपर बृहस्पतिकी दृष्टि अथवा
षड्वर्ग संबन्ध होवे तो उस शास्त्रके समस्त गम्भीर भावका जानने-
वाला होता है ॥ ११५॥
भाग्य चैवम् ॥ ११६॥
है पादः २.] भापाटीकासहितानि । ४५. जिस प्रकार कि आत्मकारकके नवांशमें अथवा उससे पञ्चमां- शमें पूर्व कहे हुए चन्द्र बृहस्पति आदिकोंके योग करके ग्रन्थकर्तृ- त्वादि फल विचारा जाता है तिसी प्रकार आत्मकारकके नवांशसे द्वितीय नवांशमें चंद्र बृहस्पति आदिकोंके योगसे ग्रन्यकर्तृत्वादि फल विचारना चाहिये ॥ १६ ॥ सदा चैवमित्येके ॥ ११७॥ आत्माकके नवांशसे तृतीय नवांशमेभी पूर्व कहे हुए चन्द्र, वृहस्पति आदिक प्रहोंके योग करके पूर्व कहा हुआ ग्रन्थकर्तृत्वादि फल दिवाना चाहिये ऐसा कोई आचार्य कहते हैं ॥ ११७ ॥ भाग्ये तो पापहष्टे स्तब्धवार ॥ १८॥ यदि आत्मारकके नशंशसे द्वितीय नवांशमें पापग्रहकर देखा हुआ केतु स्थिर होवे तो कुछ रुक २ कर बोलनेवाला अथवा शीघ्र उत्तर देने में असमर्थ वाणीवाला होता है ॥ ११८ ॥ इसके अनन्तर केमदुमयोग कहते हैं। स्वपितृपदादाग्यरोगयोः पापे साम्ये केमद्रुमः।।११९॥ अपने जन्मलग्नसे अथवा जन्मलग्नके आरूढ स्थानसे द्वितीय और अष्टमराशिपर केवल पापग्रह हो अथवा इन्हीं स्थानापर पाप ग्रह और शुभ ग्रह समान संख्यावाले होवें तौ केमद्रुम योग होता है। भाव यह है कि अपने जन्मलग्नस वा जन्मलग्नके आरूढ स्थानसे जो कि द्वितीय और अष्टमराशि है उन दोनोंपर जो केवल पापग्रह हो तो केमद्रुमयोग होता है और इन कहे हुए स्थानोंपर एक २ पापग्रह के साथ एक २ शुभग्रह हो अथवा दो २ पापग्र- होंके साथ दो २ शुभग्रह होवें अर्थात् पापग्रह और शुभग्रह बरा- बर स्थित हो तोभी केमद्रुमयोग होता है और जो न्यूनाधिक होवें तो केमद्रुमयोग नहीं होता है ॥ ११९ ॥ १ शङ्का-सूत्रमें जो कि स्वशब्द है तिससे आत्मकारकके नशिका बोध हो सक्ता है सो कैसे नहीं कहा ? समाधान-यदि स्वशब्द आत्मकारकके नवांशका बोधक होता. ।
जैमिनीयमन्त्राणि। [अध्यायः १. ४६ - चंद्रदृष्टौ विशेषेण ॥ १२०॥ यदि केमद्रुमयोग होनेपर जन्मलग्नसे अथवा आरूढ स्थानसे द्वितीय और अष्टम स्थानपर चं माकी दृष्टि होवे तो विशेष करके केमद्रुमनाम दरिद्रयोग होता है । १२० ॥ ये पूर्व कहे हुए फल क्या सब कालमें होते हैं अथवा किसी कालावशेषमें होते हैं इसका निर्णय कहते हैं। सर्वेषां चैवं पाके ॥ १२१॥ समस्त राशियोंकी दशामें ये पूर्व कहे हुए फल होते अथव समस्त राशियोंके दशारम्भ कालमेंभी इस प्रकार केमद्रुमयो- गका विचार करना चाहिये ! केमद्रुमयोग होनेपर दशामें दारिज होता है ॥ १२१ ॥ इति श्रीजैमिनीयसूत्रप्रथमाध्याये श्रीनीलकंठीयतिलकानुसृतमाषा- टीकायां श्रीपाठकमंगलसेनात्मजकाशिरामकृत्तायां द्वितीय- पादः समाप्तः ॥ २॥ , तौ "पितृपदात " इस वाक्यसेही आत्मकारकके नवांशका लाभ होनेपर फिर रवा. ब्दका ग्रहण करना निरर्थक होता और जव कि स्वशब्द न होता तो “ पितृपदात इस पदसे यह अर्थ होता आत्मकारपके नवांशसे और आत्मकारकके नवांशके आरूर स्थानसे सो यहां यह अर्थ अपेक्षित नहीं है। यहां तो अपने जन्मलनसे और अपने जन्मलगके आरूढ स्थानसे ऐसा अर्थ अपेक्षित है क्योंकि ऐसे अर्थमें वृद्धवचनमी प्रमाण है " आरूढाज न्मलग्राहा पापो स्त्रीहानिगौ यदि । केवलौ सग्रहत्वेऽपि समसंख्या शुभाशुभौ ॥ चंद्रदृष्टो विशेषेण योगः केमद्रुमो मतः । " अर्थ-जन्मलप्रसे अथवा जन्म- उनके आरूढस्थानसे हित्तीय अष्टम स्थानपर केवल पापग्रह होवे अथवा पापग्रह और शुभमह उक्त स्थानोंपर वरावर संख्यावाले होयें तो केमद्रुमयोग होता है और चंद्रमाकर देखे गये हो तो विशेषकरके केमद्रुमयोग होता है और इस स्त्रकी व्याख्या स्वाम्या- दिकोंने इस प्रकार की है। आत्मकारकसे और अपने लासे और आरूढ स्थानसे द्वितीय अष्टम स्थानोंपर पापग्रह हो अथवा पापग्रह और शुभ मह बराबर संख्यावाले. होकर स्थित हो तो केमद्रुमयोग होता है। यह व्याख्या वृद्धसमत नहीं है।
पादः ३.] भापाटीकासहितानि । अथ तृतीयपादः। इसके अनन्तर बारूढकुण्डलीस्थ ग्रहोंके आश्रय करके फलोंके कहनेको पदका अधिकार करते हैं। अथ पदम् ॥१॥ इसके अनन्तर आरूडका दूसरा नाम जो कि पद है उसका अधिकार इस प्रकरणमें कहते हैं । भाव यह है कि “ याददाश्रयं पदमृक्षाणाम् " इस सूत्रमें जो कि आरूढके दूसरे नाम पदका विवेचन किया है उस पदका अधिकार इस प्रकरणमें करते हैं ।। १॥ इसके अनन्तर लग्नारूडसे एकादशस्थानका फलं कहते हैं। व्यये सग्रहे ग्रहहष्टे श्रीमन्तः ॥२॥ लनारूढ स्थानसे एकादश स्थान किसी ग्रहसे युक्त होकर किसी ग्रहकर देखा गया होवे तो लक्ष्मीवाले पुरुप होते हैं ॥२॥ शुभैाय्यो लाभः॥३॥ यदि लग्नारूढ स्थानसे एकादश स्थान शुभ ग्रहोंसे युक्त होकर शुभ ग्रहोंने देखा होवे तो न्यायमार्गसे धनका लाभ होता है ॥ ३ ॥ पापैरमार्गेण ॥४॥ यदि लग्नारूढ स्थानसे एकादश स्थान पाप ग्रहोंसे युक्त होकर पाप ग्रहोंने देखा होरे तो शास्त्रविरुद्ध मार्गसे धनका लाम होता है ॥ ४॥ उचादिभिर्विशेषात् ॥५॥ उच्च और अपने ग्रहादिकोंपर स्थित हुए ग्रहोंके योग करके विशेष धनकी प्राप्ति होते है । भाव यह है कि लग्नारूढ स्थानसे . एकादश स्थान उच्च स्वगृहादिस्थ शुभ ग्रहोंसे युक्त होकर उच्च स्वगृहादिस्थ शुभ ग्रहोंकर देखा होवे तौ न्यायमार्गसे विशेष धनकी जैमिनीयसूत्राणि । [ अध्यायः १. ४८ प्राप्ति होवे है और लग्नारुढ स्थानसे एकादश स्थान उच्चस्वगृहा- दिस्थ पाप ग्रहोंसे युक्त होकर उच्च स्वगृहादिस्य पाप ग्रहोंकर देखा होवे तौ शास्त्रविरुद्ध मार्गसे विशेष धनकी प्राप्ति होते हैं' ॥५॥ इसके अनन्तर लग्नारूढ स्थानसे द्वादश स्थानका फल कहते हैं। नीचे ग्रहहम्योगाव्ययाधिक्यम् ॥६॥ लग्नारूढ स्थानसे द्वादश स्थानपर ग्रहोंकी दृष्टि और योग होवे तौ खर्चकी अधिकता रहती है। भाव यह है कि लग्नास्ट स्थानसे द्वादश स्थान शुभग्रहयुक्त होकर शुभ ग्रहनेही देखा होवे तौ सन्मा- गैमें खर्च बहुत होता है और पाप ग्रहोंसे युक्त होकर पाप ग्रहोंनेही देखा होवे तो असन्मार्गमें खर्च बहुत होता है ॥ ६ ॥ रविराहशुकपात् ॥७॥ लनारूढ स्थान द्वादश स्थानपर सूर्य राहु शुक्र ये इकडे होकर अथवा एक २ ही स्थित होवे तौ राजद्वारमें खर्च होता है ।। ७ ॥ चंद्रदृष्टौ निश्चयेन ॥ ८॥ लग्नारूढ स्थानसे द्वादश स्थानपर स्थित हुए सूर्य राहु शुक्रपर . १ यहाँपर वृद्धवचनभी है “ आरूढालामभवनं ग्रहः पश्येत्तुन व्ययम् । यस्य जन्मनि सोऽपि स्यात्मवलो धनवानपि ॥ द्रष्टाहाणां बागुल्ये तदा द्रष्टर तुंगगे । सार्गले चापि तत्रापि बह्वर्गलसमागमे ॥ शुभग्रहार्गले तत्र तत्राप्युञ्चग्रहार्गले । सुखानि स्वामिना दृष्टे लायभाग्याविपेन वा ॥ जातस्य पुंसः प्राबल्यं निर्दिशदुत्तरोत्तरम् ।" अर्थ-लमारूड स्थानसे ग्यारहवें स्थानको ग्रह देखता होवे और बारहवें स्थानको न देखता होवे तो अत्यन्त धनवान होता है। यदि आरूढ स्थानसे, एकादश स्थानके देखनेवाले बहुत ग्रह हो तौ औरभी अधिक धनवान होता है और यदि देखनेवाला ग्रह उच्च हो तो औरभी अधिक धनवान होता है और यदि देखनेवाला ग्रह अर्गलासहित होवे तो औरभी आधिक धनवान होता है और यदि देखनेवाले ग्रहपर, बहुत अर्गलाओंका समागम होवे तौ औरभी अधिक धनवान होता है और यदि शुभ ग्रहकी अर्गला हेवि तो औरभी अधिक धनवान होता है और यदि उन्च ग्रहको अर्गला होवे तो औरभी अधिक धनवान होता है और यदि स्वामी अथवा लम भाग्यनायने देखा होवे तो औरभी अधिक धनवान होता है. परन्तु इन योगोंमें कोई ग्रह बारहवे स्थानको न देखता हो ।
पादः३.] ॥ भापाटीकासहितानि। ४१. चन्द्रमादी दृष्टि होवे तो निश्चय करके अवश्यही राजदारमें खर्च होता है और चन्द्रष्टि न हो तो राजद्वारके खर्चमै सन्देह रहता है ॥ ८॥ बुधेन ज्ञातिभ्यो विवादाना ॥९॥ लनास्ट स्थानसे बादश स्थानपर बुध स्थित हो तौ जातिके निमित्त अथवा झगडेसे धनका खर्च होता है ॥ ९ ॥ गुरुणा करमूलात् ॥१०॥ स्मारूड स्थानसे बादश स्थानपर बृहस्पति स्थित होवे तो किसी करके वहानेसे धनका खर्च होता है ॥ १० ॥ कुजशनिभ्यां मातमुखात् ।। ११॥ लनारूढ स्थानसं द्वादश स्थानपर मङ्गल और शनैश्चर दानों स्थित हो तो भ्रातादिकाके द्वारा धनका खर्च होता है ॥ ११ ॥ इसके अनन्तर एकादश स्थानमें व्ययवाही लाभका विचार करते हैं। एनर्णय एवं लालः ॥१२॥ लग्नासह स्थानसे द्वादश स्थानपर स्थित हुए जिन ग्रहोंसे कि जिस प्रकार कि जिस मार्गद्वारा खर्च कहा है तिसी प्रकार एकादश स्थानपर स्थित हुप उन्हीं ग्रहोंसे उसी प्रकार करके उसी मार्ग- द्वारा लाभभी होता है ॥ १२ ॥ इसके अनन्तर लग्नारूढसे सप्तम स्थानका फल कहते हैं । लाभे राहुकेतुभ्यामुदररोगः ॥ १३॥ लग्नारूढ स्थानसे सप्तम स्थानपर राहु अथवा केतु स्थित होने तौ उदरका रोग होता है ॥ १३ ॥ इसके अनन्तर आरूढ स्थानसे द्वितीयस्थ केतुका फल कहते हैं। तत्र केतुना झटिति ज्यानि लिंगानि ॥ १४॥ VP N जैमिनीयस्त्राणि । [अध्यायः १. लगारूढ स्थानसे द्वितीय स्थानमें केतुके योग करके शीघ्रही थोडी अवस्थामें बुढापेके चिह्न होते हैं' ॥ १४ ॥ चन्द्रगुरुशकेषु श्रीमन्तः ॥ १६॥ लग्नारूढ स्थानसे द्वितीय स्थानमें चन्द्र वृहस्पति शुक्र ये समस्त अथवा एकही एक स्थित हावे तो लक्ष्मीपाले होते हैं ॥ १५ ॥ उच्चन वा ॥ १६॥ लग्नारूढ स्थानसे द्वितीय स्थानमें कोई उनका शुभ ग्रह अथवा उनका पाप ग्रह स्थित हो नी लक्ष्मीवाले होते हैं ॥ १६ ॥ वांशवदन्यत्प्रायेण ॥ १७॥ जिस प्रकार कि आत्मकारक नवांशसे फल कहा है तिसी प्रकार बहुधा करके लग्नारूढ स्थानसे फल जानना चाहिये । भाव यह है कि जिप्त २ प्रकार कि आगशरकके नवांशसे जिस जिस स्थानमें कि जो २ फल विचारा जाता है तिमी २ प्रकार लग्नारुढ स्थानसे उसी २ स्थानमें उसी २ फलमा विचार कर्तव्य है ॥ १७ ॥ लाभपदे केंद्रे त्रिकोणे वा श्रीमन्तः ॥ १८ “तत्र केतुना झटिति " इस स्त्र जो कि तत्र पद है तिसका अर्थ "लामे" इस पदको अनुवृत्तिसे " सप्तमे " ऐसा स्वाम्यादिकोंने किया है सो अनुचित है क्योंकि, यदि ऐसा अर्थ होता तो “ केतुना झटिति ज्यानि लिंगानि " ऐसा सूत्र उचित होता फिर “ तत्र " इस पदकी क्या आवश्यकता थी । दूसरे-" चंद्रगुरुशकेषु श्रीमन्तः " इस स्त्रके अगार वक्तव्य होनेसे सप्तममें घनका विचार नहीं किया जाता है । धनका विचार तो द्वितीय स्थानमेंही किया जाता है इस कारण इस सूत्रमें “तत्र " इस पदका प्रयोग है । द्वितीय स्थानमें धनका विचार वृद्धोने भी कहा है। "आरूढात्पष्ठभे पापे चौरः स्याच्छुभवजिते । आरूढाद्वापि सौम्ये तु सर्वदिश्यधिपो भवेत् ॥ सर्वज्ञस्तत्र जीवे स्यात्कायवादी च भागवें । " अर्थ-आरूह स्थानसे द्वितीय स्थानपर पाप ग्रह हो और शुभग्रह वर्जित होवे तो चोर होता है और बुध होवे तौ सर्व दिशामें राजा होता है । यदि बृहस्पति होवे तौ सर्वज्ञ होता है। शुक्र हो वे तौ कवि और वादी होता है । २ सूत्रमें जो कि “प्रायेण " ऐसा पद कहा है तिसकरके सब जगह कारकांशक्त फल नहीं विचारना चाहिये क्योंकि औपदेशिक शास्त्र के विरुद्ध अतिदेशिकशास्त्रकी प्रवृत्ति नहीं होता है।
बादः ३.] भापाटीकासहितानि । लग्नाल्ड स्थानसे केन्द्र नाम प्रथम चतुर्थी सप्तम दशम स्थानमें बथवा त्रिकोण नाम पञ्चम नवम स्थानमें सप्तम भावका आरूढ राशि होवे तो लक्ष्मीबाले होते हैं ॥ १८ ॥ अन्यथा दुःस्थे ॥ १९॥ लनारूढ स्थानसे दुःस्य नाम पठ अष्टम द्वादश स्थानपर सप्तम- भावका आरूढ राशि स्थित होवे तो लक्ष्मीवाले नहीं होते हैं किंतु दरिद्री होते हैं ॥ १९ ॥ केंद्रे त्रिकोणोपचयेषु द्वयोमैत्री ॥२०॥ लग्नाल्ड स्थानसे केंद्रम अथवा त्रिकोणमें अथवा उपचंय नाम तृतीय दशम एकादश स्थानमें सप्तमभावका आरूढ राशि स्थित होते तो दोनों मार्या और भीम परस्पर मित्रता रहती है । इसी प्रकार लग्नालडसे केंद्र त्रिकोण उपचय स्थानमें पुत्रादिभाक्का आरूढ राशि स्थित होवे तौ पुत्रादिक की मित्रता विचारने योग्य है ॥ २०॥ रिपुरोगचिन्तासु वैरम् ॥ २१॥ लनारूढ स्थानसे रिपु नाम पष्ठ और रोग नाम अष्टम और चिंता नाम द्वादश इन स्थानोपर जिस २ पुत्रादिभावका आतड राशि स्थित होवे तो उसी २ पुत्रादिसे वैर होता है। जैसे लग्नारूढ स्थानसे पुत्रभावका आरूढ राशि पष्ठ अष्टम द्वादश इन स्थानोंपर स्थित होवे तो पुत्र और पिताका परस्पर वैर होता है । तिसी प्रकार स्त्री माता पिता वान्धव आदिकोंका वैर विचारना चाहिये ॥२१॥ १ यहां उपचयसंक्षक स्थानोंके मध्यमें पष्ठस्थानका ग्रहण नहीं है क्योंकि पठस्थानका फल "रिपुरोगचिन्तासु वैरम् " इस सूत्रमें कहा जायेगा । २ " लाभपदे केंद्र " इससे लेकर "रिपुरोगचिन्तासु धैरम् " इसपर्यन्त जो कि ! विषय कहा है उसके पुष्ट करनेमें वृद्धवचनभी है। “लनारूढं दारपदं मिथः केंद्रगतं यादि। चिलाभे या त्रिफ़ोगे या तथा राजान्ययाऽधमः ॥ आरूढी, पुत्रपित्रोस्तु त्रिलाभकेन्दगी -यदि । योमैत्री त्रिकोगे तु साम्यं देपोऽन्यथा भवेत् ॥ एवं दारादिभावानामा पत्यादि- मित्रता । जातकदयमालोक्य चिन्तनीयं विचक्षणः ॥ " इन तीनों कोंका अर्थ सुंगम है।
કરે जैमिनीयसूत्राणि। [अध्यायः १. पत्नीलामयोर्दिष्टया निराभालार्गलया ॥२२॥ लग्नारूड और सप्तमारूढ इन दोनोंकी अप्रतिवन्ध अर्गला होवे तो उसकरके भाग्यवान होते हैं । भाव यह है कि लग्नारूढ राशि और सप्तम भावका आरूढ राशि इन दोनाका अर्गलायोग होवे और उस अर्गलायोगका वाधकयोग न होवे तो भाग्यवान् होता है' ॥ २२॥ शुभार्गले धनसमृदिः ॥२३॥ लग्नारूढ और सप्तमारूढ इन दोनोंकी अर्गला यदि शुभ ग्रहोकरके हो तो धनकी बहुत वृद्धि होवे है। इस कथनसे यह जनाया गया कि लग्नारूढ और सप्तमारूढ इन दोनोंकी अर्गला पाप ग्रहोकरके होवे तो धन मात्र होता है और शुभ ग्रहांकरके होवे तो धनकी विशेषता होवे है। पूर्वसूत्र में शुभ पाप साधारणी बाधस्योगवर्जित अर्गला करके धनादि होने के लक्षणवाला भाग्ययोग कहा है और इस सूत्रमें शुभग्रहमान अर्गलाकरके धन वृद्धि और पापग्रहमात्र अर्गलासे धनकी यथावत् स्थिति और शुभ पापग्रह दोनोंकी अर्ग- लाकरके किसी समय धनकी वृद्धि और किसी समय धनी यथा- वत् स्थिति होती. है ऐसा कहा ह ॥ २३ ॥ १ भाग्ययोगकी प्रबलतामें प्राचीनोंने कहाभी है। यस्य पापः शुभो वापि ग्रह- स्तिष्ठेच्छुभागले । तेन द्रष्ट्रेक्षितं लमं प्रावल्यायोपकल्पते ॥ यदि पश्येद् ग्रहस्तन्न विपरी- तागले स्थितः । " अर्थ-जिसके प्रतिवन्धवर्जित.अर्गलामें शुभ ग्रह अथवा पाप ग्रह स्थित होवे और उसी ग्रहने आरूढ लम देखा होवे तो भाग्ययोगकी प्रबलताके लिये कल्पित होता है और प्रतिवन्धयुक्त अर्गलामें ग्रह स्थित होवे तो भाग्यकी प्रबलताके लिये नहीं कल्पित होता है। २ शङ्का--" शुभागले ” इस सूत्रका अर्थ यह कैसे नहीं किया जा सक्ता है कि बाघकयोगवजित अर्गला होनेपर धनकी वृद्धि होती है ? समाधान यदि ऐसा अर्थ किया जावेगा तो दोनों सूत्रोंमें एकही अर्गला हुई और जब कि एकही अर्गला हुई तो पूर्वसूत्रसे यह सूत्र व्यर्थ हो सक्ता है इस कारण शुभ शब्दसे शुभ प्रहकाही ग्रहण है । यदि कहो कि भाग्ययोग और धनयोगमें भेद है सो यहभी नहीं कहा जा सक्ता है. क्योंकि धनके विना भाग्यसिद्धि नहीं हो सक्ती है ।
मापाटीकासहितानि । ५३ जन्मकालपटिकास्वेकदृष्टासु राजानः ॥ २४ ॥ जन्नलम और होरालग्न और घटिकालग्न ये तीनों किसी एक हतर देखे हो तो राजा होते हैं । भाव यह है कि इन तीनोंको एक ग्रह देखता राजा होते हैं न कि एक दो लग्नके देखने यहां एक अहमी दृष्टिविषयकी अपेक्षा है न कि एक प्रह- मात्री ।। २४ ॥ पत्नीलाभयोश्चराइयशकटकाणे ॥ २६ ॥ जन्मशिगुण्डली और नवांश कुण्डली और ट्रेष्काणकुण्डली इन नीनाले विष प्रथम और सप्तम स्थान इन दोनाको एक ग्रह देखता होये तो राजा होते हैं। भाव यह है कि राशिकुण्डलीके प्रथम सप्तम स्थान और नवांशकुण्डलीके प्रथम सम्म स्थान और द्रेष्काण कुण्डली प्रथम सप्तम स्थान ये छःओं स्थान एक ग्रहकर देखे जावं ती परिपूर्ण राजयोग होता है। यहां राशिशब्दसें चन्द्रराशि अपेक्षित है न कि लग्नराशि ।। २५ ॥ तप्वेकल्पिन्न्यूने न्यूनम् ॥ २६ ॥ जन्मलन और होरालग्न और घटिकालग्न इनके विपे और राशि- कुण्डली और नवांगकुण्डली और द्रेष्काणकुंडली इनके . विषे एक स्थान एक ग्रहकी दृष्टिम न्यून हो तो न्यूनराजयोग होता है। साव यह है कि जन्मलन होरालन घटिकाल्न इनमें दो लनको एक ग्रह देखता होवे तो न्यूनराजयोग जानना और राशिकुण्डली द्रेष्का- कुण्डली और नवांशकुण्डली इनमें दो कुण्डली के सप्तम स्थानको एक वह देखता होये तौभी ल्यूगराजयोग होता है ॥ २६ ॥ १ घटिकालनके बनानेकी रीति वृद्धोंने कही है । "उन्मादेकघटीमात्रं याति लानं दिने देने । परन्तु वटिकालनं निर्दिोत्कालवित्तमः ॥ " अर्थ-जन्मल्मसे एक घटीमात्रमें टिका लन व्यतीत होता है। इष्ट घटीको जन्मलमकी संख्या में जोडकर १२ का भाग निसे जो वचे वहीं वटिकालम होता है। २ इस कथनकी पुष्टतामें वृद्धवचन है । विलमघटिकालमहोरालमानि पश्यति । चगृहे राजयोगो लमद्वयमथापि वा ॥ राशेट्टकाणतोऽशाच्च राशेरशादयापि वा ।
६४ जैमिनीयसत्राणि। [अध्यायः १.. एवमंशतो हक्काणतश्च ॥२७॥ जिस प्रकार कि जन्मकुण्डली के साथ होरालय और घटिकालग्न इन दोनोंका ग्रहण है तिसी प्रकार नवांश कुण्डली के साथ और द्रेष्काणकुण्डलीके साथ पृथक २ होराकुण्डली और घटिकाकुण्डली इन दोनोंका ग्रहण है । भाव यह है कि जैसे कि जन्मलग्न होरालग्न वटिका लग्न ये तीनों एक ग्रहकरके देखे हो तो राजयोग होता है। तिसी प्रकार नवांशलग्न होरालग्न घटिकालग्न ये तीनों एक ग्रहकरके देखे हो तौ राजयोग होता है और द्रेष्काणलग्न होरालग्न घटिका- लम ये तीनों एक ग्रह करके देखे हो तौभी राजयोग होता है ॥ २७ ॥ इसके अनन्तर यानयोगका कहते हैं। शुक्रचंद्रयोमिथोदृष्टयोः सिंहस्थयोर्वा यानवन्तः ॥२८॥ यहां कहाँ स्थित हुए शुक्र चन्द्रमा ये दोनों परस्पर देखे गये हो तौ पुरुष सवारीवाला होता है अथवा शुक्र चन्द्रमा दोनोंमें यद्वा राशिटक्काणाभ्यां लग्नद्रष्टा तु योगदः ॥ प्रायेणायं जातकेपु प्रभूणामेव दृश्यते ।" अर्थ-जन्मलम घटिकालम होरालम इन तीनोंको उच्चगृहमें स्थित हुआ ग्रह देखता हो अथवा इन तीनमिसे दोहींका उच्चस्य ग्रह देखता होवे तो राजयोग होता है। गालिम काणलय नवांशलम इन तीनोंको उच्चग्रह देखता होवे अक्या इन तीनोंमें राशिला और नवांशलम इन दोनोंको अथवा राशिलम और द्रेष्काणलम इन दोनोंको उच्चस्थ ग्रह देखता होवे तौभी राजयोम होता है । राजयोगमें अन्य वाक्यभी हैं। “जन्मकालघटीलोप्यकेनैवेक्षितेषु तु ! उच्चारले तु संप्राप्ते चंद्राकान्ते विशेषतः ।। क्रान्ते वा गुरुशुक्राभ्यां केनाप्युञ्चग्रहेण वा। दुष्टामलग्रहाभाचे राज्योगो न संशयः ॥:" अर्थ-जन्मलम और होरालम और घटिकालम ये तीनों एकही रहने देखे हों और वह देखनेवाला ग्रह उच्चका हो अथवा चंद्रमाके साथ होवे अथवा बुह- स्थवि शुक्र वा किसी उच्च ग्रहके साथ होवे, दुष्टार्गलग्रहका अभाव होवे तो राजयगो होता है इसमें संशय नहीं। १ अन्यराजयोम यहां ग्रन्थान्तरसे लिखते हैं । "निशाच्च दिनाञ्च परं सादिना डेका । शुभात्तदुद्भवो राजा धनी वा तत्समोऽपि वा । " अर्थ-अर्द्धरावसे ऊपर और दोपहरसे ऊपर अढाई घटिका शुभ कही हैं उनमें उत्पन्न हुआ राजा वा धनी वा राजसमान होता है। .
पादः ३.] भाषाटीकासहितानि । ५५. एकसे दूसरा तृतीय स्थानपर स्थित होवे तौभी पुरुष सवारीवाला होता है। भाव यह है कि कुण्डलीमें जिस किसी स्थानमें स्थित हुआं शुक्र चन्द्रमाको देखता हो और चन्द्रमा शुक्रको देखता हो तौ यानयोग होता है और शुक्रसे चन्द्रमा तृतीय स्थानपर स्थित होवे तौमी यानयोग होता है' ॥ २८ ॥ शुक्रकुजकेतुषु वैतानिकाः ॥२९॥ यदि शुक्र मंगल केतु ये तीनों परस्पर एक दूसरेको देखते होवें अथवा परस्पर तृतीय स्थानपर स्थित हाव तौ वितानादि राजचि- हवाले होते हैं । भाव यह है कि कुण्डलीमें शुक्र-मंगल और केतुको और मङ्गल-शुक्र और केतुको और केतु-मंगल और शुक्रको देखता हो तौ वितानादि राजचिह्नवाले पुरुष होते हैं अथवा शुक्रसे मङ्गले केतु तृतीय स्थानपर स्थित हों अथाा मंगलसे शुक केतु तृतीय स्थानपर स्थित हो अथवा केतुसे शुक्र मंगल तृतीय स्थानपर स्थित हो तौभी वितानादि राजचिह्नमाले पुरुष होते हैं ॥ २९ ॥ स्वभाग्यदारमातृभावसमेषु शुभे राजानः ॥३०॥ आत्मकारकग्रहसे जो कि द्वितीय चतुर्थ पञ्चमभावके राश्यादि हैं उनके समानही शुभ ग्रहोंके राश्यादि होवें तौ राजा होते हैं। भाव यह है कि आत्मकारकग्रहका जो कि राश्यादि है उससे द्वितीयभावका जो कि राश्यादि है. और चतुर्थभावका जो कि राश्यादि है और पञ्चमभावका जो कि राश्यादि है इन तीनोंके समान शुभ ग्रहोंके राश्यादि हो तो राजा होते हैं इसी प्रकार पुत्रादिकारकवासे पुत्रादिकोका फल. विचारना चाहिये । यदि पुत्रादिकारकोंके विषेभी राजयोगंबल होवे नौ पुत्रादिकोंकाभी राज- योग कहना चाहिये ॥ ३० ॥ । इसमें वृद्धवचनभी प्रमाण है । " चंद्रः कावें करिश्चन्द्रं पश्यत्यपि तृतीयगे शुकाबन्द्रे ततः शंके हवीये वाहनार्थवान् ॥इसका अर्थ सुगम है । - ५६ जैमिनीयसूत्राणि। [अध्यायः १. कर्मदासयोः पापयोश्च ॥ ३१॥ यदि आत्मकारकाहसे जो कि तृतीयभावका राश्यादि है और जो कि छठे भावका राश्यादि है इन दोनों के समान दो पाप ग्रहोंके राश्यादि हो तौभी राजा होते हैं ॥३१॥ पितृलाभाधिपाचैवम् ॥ ३२॥ लग्नेशसे और सप्तमेशसे द्वितीय चतुर्थ पञ्चमभाव इन तीनोंके राश्यादिके समान शुभ ग्रहोंके राश्यादि हो और लानेशसे और सप्तमेशसे तृतीय पष्ठ इन दोनों मावोंके गश्यादिके समान दो पाप ग्रहोंके राश्यादि होवें तौ राजा होते हैं ॥३२ ।। मिश्रेसमाः ॥३३॥ लग्नेशसे और सप्तमेश द्वितीय चतुर्थ पञ्चम इन भावोंके विष शुभ ग्रह तथा पाप ग्रह दोनों हो और तृतीय भाव और पष्ठ भावमेंमी पाप ग्रह दोनों हो तो राजाके समान होते हैं ॥३३॥ दरिद्रा विपरीते ॥ ३४ यदि पूर्वोक्त स्थानों के मध्यमें शुभ स्थानों के विषे पाप ग्रह और पाप स्थानों के विषे शुभ ग्रह हो तौ दरिद्री होते हैं ॥ ३४ ॥ मातरि मुरो शुझे चंद्रे वा राजकीयाः ॥ ३५ ॥ यदि लग्नेशसे और सप्त देशसे पञ्चम स्थान के विषे बृहस्पति अथवा शुक्र वा चन्द्रमा स्थित होवे तौ राजकार्यके अधिकारवाला होता है ॥ ३५ ॥ कर्मणि दासे वा पापे सेनान्यः ॥ ३६॥ लग्नेशसे और सप्तमेशसे तृतीय अथवा षष्ठ भावमें पाप ग्रह होवे ता सेनाधिपत्ति होते हैं ।। ३६ ॥ १ शङ्का-इस पादमें तो आरूढस्थानका अधिकार है इससे पिटशब्दसे आट- स्थान कैसे नहीं ग्रहण किया : समाधान- “जन्मकाल " . इस स्त्रसे सूत्रकारने कहीं कारक और कहीं जन्मलनका ग्रहणं किया है। दूसरे इस ग्रंथमें पहुंधाकरके पिटशब्दसे जन्मलमकाही ग्रहण है । ' । -- - पादः३.] भापाटीकासहितानि । ५७ स्पपितृभ्यां कर्मदासस्थष्ट्या तदीशदृष्टया मातनाथया च धीमन्तः ॥ ३७॥ आत्माको और लयमे तृतीय और पष्ट स्थ नमें स्थित हुए ग्रहकी आत्मकारक और लापर दृष्टि होवे अथा आत्मकारकसे और लग्नमे तृतीय स्थानका स्वामी और षष्ट स्थानका स्वामी आत्मजाक लगको देखता हो अथवा पञ्चम स्थानका स्वामी आत्मारक और लमको देखता होये तो बुद्धिमान होते हैं ।। ३७॥ दारेशदृष्टया च सुखिनः ॥ ३८॥ आत्मकारको और लग्नले चतुर्थ स्थानके स्वामीकी दृष्टि आत्म- कारक और लमपर हो तो सुखी होते हैं ॥ ३८ ॥ रोगशष्टया दरिद्राः ॥ ३९ ॥ आत्मज्ञारक अथवा उनसे अष्टम स्थानके स्वामीकी आत्मकारक और लग्नपर दृष्टि हावे तो दरिद्री होते हैं ॥ ३९ ॥ रिपुनाथदृष्टया व्यवंशीलाः॥४०॥ आत्मकारक और लग्नसे द्वादशस्थानके स्वामीकी दृष्टि आत्म- कारक और लग्नपर हो तो खर्चीले स्वभाववाला होता है ।। ४० ॥ स्वाभिदृष्ट्या प्रवलाः ॥११॥ लग्नपर लग्नेशकी दृष्टि होवे और आत्मज्ञारकपर आत्मकारका- श्रित राशिके स्वामीकी दृष्टि हो तो बलवान होते हैं । ४१ ।। इसके अनन्तर आपद्योग कहते हैं। पश्याद्रिपुभाग्ययोहसास्यं बन्धः कोणयो रिपुजा- ययोः कीटयुग्मयोदाररिफयोश्च ॥ १२॥ लग्नरो द्वितीय और द्वादश- स्थानमें और पञ्चम और नश्म स्थानमें और द्वादश और षष्ठ स्थानमें और चतुर्थ और दशम स्थानमें ग्रहोंकी तुल्यता होवे अर्थात् एक होवे तो एक और दो होवे तौ दो और तीन होवे तो तीन इस रीति ग्रह वरावर स्थित -
जैमिनीयसूत्राणि। [अध्यायः १.
होवें तौ कारागृहमें बन्धन होता है। भाव यह है कि जो द्वितीय
स्थानपर एक ग्रह होवे और बादश स्थानमेंभी एक ग्रह होवे और
जो दो वा तीन ग्रह द्वितीय स्थानमें होवें और द्वादशस्थानमेंभी
दो वा तीन ग्रह स्थित होवें इसी प्रकार पञ्चम और नवम इन
दोनोंमें ग्रह बराबर स्थित हों और द्वादश और षष्ठ इन दोनोंमें
अह बराबर स्थित हों और चतुर्थ और दशम इन दोनों ग्रह
बरावर स्थित होवें तौ कारागृहमें बन्धन होता है। यदि इन
स्थानोंपर शुभ ग्रह स्थित हों अथवा शुभ ग्रह देखते हों अथवा
इन स्थानों के स्वामियों के साथ शुभ ग्रह होवें अथवा स्वामियोंको
सुभ ग्रह देखते हो तो विना वेडी वन्धनके कारागृहमें नाममात्रका
बन्धन होता है और यदि इन स्थानोंपर पाप ग्रह स्थित होते
अथवा पाप ग्रह देखते हों अथवा इन स्थानोंके स्वामियों के साथ
पापग्रहोंका संबन्ध होवे तौ बेडी आदिकोंसे बन्धन होकर कारागृहमें
निवास होता है ॥ ४२ ॥
इसके अनन्तर नेत्रभंगयोग कहते हैं।
शुक्रागोणपदस्थो राहुः सूर्यदृष्टो नेत्रहा ॥१३॥
लग्नसे पञ्चम राशिके आरूढ स्थानमें स्थित हुआ राहु सूर्यने
देखा होवे तौ नेत्रोंके नाशकर्ता होता है ।। ४३॥
स्वदारगयोः शुक्रचन्द्रयोरातोचं राजचिह्नानि च ॥१४॥
आत्मकारकके स्थानसे चतुर्थ स्थानपर शुक्र चन्द्र दोनों विद्यमान
होवें तौ आतोद्य नाम बाजे और राजचिह्न पताकादिको धारण
करनेवाले होते हैं । ४४ ॥
इति श्रीनैमिनीयसूत्रप्रथमाध्यायेनीलकंठीयतिलकानुमृखभाषाटीकायां
श्रीपाठकमंगलसेनात्मजकाशिरामकृत्तायां तृतीयः पादःसमाप्त: ॥३॥
:- पादः ४.] भाषाटीकासहितानि । अथ चतुर्थपादः। . -- इसके अनन्तर उपपदादिके आश्रयसे फल कहते हैं। प्रथम उपपदको दिखाते हैं। उपपदं पदं पित्रनुचरात् ॥ १॥ लगसे जो कि द्वादश राशि है उसका जो कि आरूढस्थान है वह उपपदसंज्ञक है ॥१॥ तत्र पापस्य पापयोगे प्रव्रज्या दारनाशो वा ॥२॥ उपपदसे जो कि तत्र नाम द्वितीयस्थान है उसमें पापग्रहकी राशि विद्यमान होने और पापग्रह उसमें स्थित हो तो संन्यास होता है अथवा स्त्रीका नाश होता है ॥२॥ उपपदस्याप्यारूढत्वादेव नात्र रविः पापः॥३॥ शङ्का-पित्रनुचरपदसे द्वादशस्थानका ज्ञान कैसे हुआ ? समाधान-पितलम है अनुचर द्वितीय जिसका इस व्युत्पत्तिस द्वादश स्थानका ज्ञान होता है और “ पित्र- नुचराद " इस पाठकोही स्वीकार करके इस पदके अक्षरोंकी संख्या पिंडसे सप्तसंख्याके. लाभकर “सप्तमात्पदमुपपदम् " ऐसी व्याख्या जो कि कोई आचार्योंने करी सो अयुक्त है। यदि यह व्याख्या युक्त मानी जावे तो थोडा होनेसे “ उपपदं पदं लाभाव ' ऐसा स्त्र रचित होता ॥ २ शङ्का-जिस प्रकार कारकाधिकार. और पदाविकार इन दोनों में इस पदसे “कारके पदे " ऐसा अर्थ होता है तिसी प्रकार इस प्रकरणमें इस पदसे “ उपपदे " ऐसा अर्थ कैसे नहीं किया ? समाधान-यह कथन सत्य है पान्तु यहां " तत्र " यह पद अधिकार में स्थित नहीं इस कारण पसे दिसंख्याके लाभसे ." उदपदं द्वितीये " ऐसा अर्थ कहा है। दूसरे ऐसा अर्थ अनु- भवसिद्ध है क्योंकि इसमें वृद्धवचन है । " आरूढात्पष्ठभे पापे चौरः स्याच्छुभवाजी। मारूढावापि सौम्ये तु सवैदिश्यधिपो भवेत् ॥ सर्वज्ञस्तव जीवे स्यात्कविदि च 'भावे " अर्थ-आरूढ नाम उपपदते द्वितीय स्थानमें शुभवर्जित पाप. ग्रह होवे तो चोर होता है बुध हो तो सब दिशामें अधिप और बृहस्पति होवे तो. सर्वज्ञ और शुक होवे तौ कवि होता है । शङ्का-आरूढशब्दसे उपपदका अर्थ कैसे ग्रहण करते हो. आटकाही ग्रहण करना चाहिये । समाधान-आख्दपदसे आरूढाधिकारही आफ्टका पदण है और यहां आरूढपदसे आरूढका ग्रहण नहीं उपपदकाही ग्रहण है। तत्र तत्र तत्र .
. जैमिनीयसूत्राणि । [अध्यायः १. इस विषयमें सूर्य पापग्रहसंज्ञक नहीं होता है किंतु शुभग्रहसंज्ञक होताहै । इस कथनसे यह जनाया गया कि उपपदमे द्वितीय स्थानमें सिंहराशिपर अथवा मेपादि पापग्रहोंके राशिपर विराजमान होकर सूर्य स्थित होवे तो संन्यास अथवा स्त्रीनाश नहीं होता है ।। ३ ।। शुभहयोगान् ॥ ४॥ उपपदसे द्वितीय स्थानपर शुभग्रहकी वष्टि अथवा योग होवे तो पूर्वोक्त योगके होनेपाभी यह फल नहीं है ! भाव यह है कि उपपदसे द्वितीय स्थानमें पाप ग्रहो राशिपर स्थित होकर पापग्रहयुक्त होवे और उपपदने द्वितीय स्थानपर शुभ ग्रहकीभी दृष्टि अथवा योग हो तो संन्यास अथवा स्त्रीनाश नहीं होता है ।। ४ ॥ नीचे दारनाशः ॥६॥ उपपदले द्वितीय स्थानमें नीचग्रह स्थित होवे अथवा नीचग्रहका नवांश स्थित हो तो स्त्रील नाश होता है ॥ ५ ॥ उच्चे बहुदारः ॥ ६॥ उपपदसे द्वितीय स्थान में उच्चग्रह स्थित होवे अथवा उच्चग्रहका नवांश स्थित होरे तो बहुत स्त्रियोंवाला होता है ।। ६ ॥ सुम्मे च ॥७॥ उपपद द्वितीय स्थानमें मिथुनराशि होवे तोभी बहुत स्त्रियों- वाला होता है ।। ७ ॥ तत्र स्वामियुक्त स्वते वा तदेताडुत्तरायुपि निदरिद उपपदसे द्वितीय स्थानमें स्वामीसे युक्त होवे अथवा उपपदके द्वितीय स्थानका स्वामी अपनेही राशिमें स्थित होवे तो उत्तर अवस्थामें स्त्रीवर्जित हो जाता है अर्थात् वृद्धावस्थामें स्त्रीका नाश हो जाता है ।। ८॥ १ शङ्का-स्वाम्यादिकोंने तो ततशब्दसे दारकारकका भ्रहण किया है फिर ऐसा मार्थ कैसे किया है ? समाधान-जय कि आदिमें दारकारकका'ग्रहण नहीं फिर . .
. .'.- । गादः ४.] भाषाटीकासहितानि । ६१ उच्चे तस्मिन्नुत्तमकुलादारलाभः ॥९॥ उपपदसे द्वितीय स्थानका स्वामी यदि उच्च राशिमें स्थित होने तो उत्तम कुलसे स्त्रीका लाभ होता है ॥ ९ ॥ नीचे विपर्ययः ॥१०॥ उपपदसे द्वितीय स्थानका स्वामी यदि उच्च राशिमें स्थित होने तो नीच कुलसे स्त्रीका लाभ होता है ॥ १० ॥ शुभसम्बंधात् सुंदरी ॥११॥ उपपदसे द्वितीय स्थानमें शुभग्रहका पड्वर्ग वा शुभग्रहकी दृष्टि अथवा शुभग्रहका योग होवे तो स्त्री सुन्दरी होती है ॥ ११ ॥ राहुशनिभ्याभपवादात्यागो नाशो.या ॥ १२॥ उपपदसे द्वितीय स्थानमें राह और शनैश्चर दोनोंका योग होवे तो लोकनिंदासे स्त्रीका त्याग अथवा नाश होता है ।। १२ ॥ शुक्रकेतुभ्यां रक्तप्रदरः ॥ १३॥ उपपदसे द्वितीय स्थानमें शुक्र और केतु इन दोनोंका योग होने तो रक्तप्रदर रोगवाली स्त्रीकी प्राप्ति होते है ।। १३ ।। अस्थित्रावो बुधकेतुभ्याम् ॥ १४॥ उपपदसे द्वितीय स्थानमें बुध और केतु इन दोनोंका योग होके तो अस्थिलावरोगवाली स्त्रीकी प्राप्ति होते है ॥ १४ ॥ शनिरविराहुभिरस्थिरज्वरः ॥ १६ ॥ उपपदसे द्वितीय स्थानमें शनैश्चर सूर्य राहु इन तीनोंका योग होवे तो अस्थिवरखाली स्त्रीकी प्राप्ति होते है ॥ १५ ॥ बुधकेतुभ्यां स्थौल्यम् ॥ १६॥ ववशब्दसे दारकारकका ग्रहण करना अनुचित है । शङ्का-चंद्र सूर्य इन दोनोंका तो एकही एक राशि है उसके विपे “ स्वः तदेती " इस अंशका संभव नहीं होसक्ता। समाधान-मत होवो चन्द्रसूर्यमें, इसमें हमारी का हानि है। शेष ग्रहोंमें तो होते है ६२. जैमिनीयसूत्राणि । [ अध्यायः उपपदसे द्वितीय स्थानमें बुध और केतु इन दोनोंका योग होने तो स्थूल स्त्रीकी प्राप्ति होवे है ॥ १६ ॥ बुधक्षेत्रे मंदाराभ्यां नासिकारोगः ॥ १७॥ उपपदसे द्वितीय स्थानमें बुधका राशि स्थित होने और शन- श्वर मंगल दोनोंका योग हो तो नासिकारोगवाली स्त्रीकी प्राप्ति होवे है ॥ १७ ॥ कुजक्षेत्र वा ॥ १८॥ उपपदसे द्वितीय स्थानमें मंगलका राशि स्थित होवे और शन- श्वर मंगल इन दोनोंका योग होवे तोभी नासिकारोगवाली स्वीकी प्राप्ति होते है ॥ १८॥ गुरुशनिभ्यां कर्णरोगो नरहका च ॥ १९ ॥ उपपदसे द्वितीय स्थानमें बुधका राशि अथवा मंगलका राशि स्थित होवे और बृहस्पति शनैश्चर इन दोनोंका योग होवे तो कर्ण- रोगवाली और नाडिकानिस्सरण रोगवाली स्त्रीकी प्राप्ति होते है।। १९ ॥ गुरुराहुभ्यां दन्तरोगः ॥२०॥ उपपइसे द्वितीय स्थानमें बुधका राशि अथवा मङ्गलका राशि होवे और बृहस्पति राहु इन दोनोंका योग होवे तौ दन्तरोगवाली स्त्रीकी प्राप्ति होते है ।। २०॥ शनिराहुभ्यां कन्यातुलयोः पंगुर्वातरोगो वा ॥२१॥ उपपदसे द्वितीय स्थानमें कन्या अथवा तुलाराशि होने और शनैश्चर राहु इन दोनोंका योग होवे तो पंगुली अथवा वातरोगवाली खीकी प्राप्ति होते है ॥ २१॥ शुभहग्योगान ॥२२॥ यदि उपपदसे द्वितीय स्थान में शुभ ग्रहकी दृष्टि अक्षा योग होवे तो यह पूर्व कहे हुए दोष स्त्रीमें नहीं होते हैं ।। २२ ।।
६३ पादः ४.] भाषाटीकासाहितानि । सप्तमाशग्रहेभ्यश्चैवम् ॥ २३ ॥ उपपदसे जो कि सप्तमभाव है उससे और सप्तमभावमें स्थित जो नवांश है उससे और सप्तमभावका जो कि स्वामी है उससे और सप्तमस्थ नवांशका जो कि स्वामी है उससे जो कि द्वितीय स्थान है उसमें भी यह पूर्व कहे हुए फल विचारने चाहिये जो कि उपपदसे द्वितीय स्थानमें विचारे गये हैं ॥ २३ ॥ बुधशनिशुक्रे चानपत्यः ॥२४॥ उपपदमे जो कि सप्तम स्थान है और जो कि सप्तमभावस्था नवांश है और जो कि सप्तम भावका स्वामी है और जो कि सप्तम- भावस्थ नवांशका स्वामी है इनके विषे बुध शनैश्चर शुक्र इन तीनोंका योग होवे तो पुरुष सन्तानहीन होता है।॥ २४ ॥ पुत्रेषु रविराहुगुरुभिर्वहुपुत्रः ॥२५॥ उपपदसे सप्तमस्थानसे और सप्तमस्थ नवांश मे और सप्तम भावके स्वामीसे और सप्तमस्थ नवांश के स्वामीले जो कि पश्चम स्थान उनमें यदि सूर्य राहु बृहस्पति इन तीनोंका योग होने वो बहुत पुत्रोंवाला होता है ॥ २५ ॥ चंद्रेणैकपुत्रः ॥२६॥ उपपदसे जो कि सप्तम स्थान है और जो कि सप्तमस्थ नवांश है और जो कि सप्तम भावका स्वामी है और जो कि सप्तमस्थ नवां- शका स्वामी है इन संवते जो कि पञ्चम स्थान है उनमें यदि चन्द्रमा स्थित होवे तौ. एक पुत्राला होता है ।। २६ ॥ मित्रे विलम्बात्पुत्रः ॥२७॥ उपपदसे जो कि सप्तम स्थान और सप्तमस्थान नवांश और सप्तम भावस्थामी और.सप्तमस्थ नवांशस्वामी है इनसे पञ्चम स्थानोम सन्तानहानिकर्ता तथा बहुसन्तानदायक इन दोनों प्रकारके ग्रहोंका लोग हो तो विलम्बसे पुत्रलाम होता है ।। २७ ।। : इसमें वृद्धवचन प्रमाण है । " सतमेशादितीयस्येप्येवं फलमुदाहृतम् ।।
. जैमिनीयसूत्राणि । [ अध्यायः १. ६४ कुजशनिभ्यां दत्तात्रः ॥२८॥ उपपदके सप्तम स्थानसे सप्तमस्थ नवांशसे और इन दोनोंके स्वामियोंसे पञ्चम स्थानों में मंगल और शनैश्चर ये दोनों स्थित होवें तौ दत्तकपुत्रका लाम होता है ॥२८॥ ओजे बहुपुत्रः॥२९॥ उपपदके सप्तमस्थानसे तथा सप्तमस्थ नवांशसे और इन दोनोंके स्वामियोंसे पञ्चम स्थानों में विषम राशि होवे तो बहुत पुत्रवाले होते हैं ।। २९ ॥ युग्मेऽल्पप्रजः ॥३०॥ उपपदके सप्तम स्थानसे तथा सप्तमस्थ नवांशसे और इन दोनोंके स्वामियोंसे पञ्चम स्थानों में सम राशि होवे तो बहुत पुत्रवाले होते हैं ॥ ३० ॥ बृहनमात्कुशितदीशपंचमांशमहेश्यश्चवम् ॥३१॥ जिस प्रकार कि जन्मलग्नसे क्रमसे भावोंका विचार किया जाता है तिसी प्रकार कुक्षि नाम उपपद और उपपदके खामी इत्यादि- कोसभी विचार करे। कुक्षि नाम उपपढ़ और तदीश नाम उपपद- स्वामी इन दोनों से जो कि पंचमस्थान है और जो कि पञ्चमस्थ नवांश है और जो कि पश्चमस्थानस्वामी है और जो कि पञ्चमस्थं नवांशस्वामी हैं इन सबसेभी पूर्वोक्त फलका विचार करना चाहिये३१॥ भ्रातृभ्यां शनिराहुभ्यां भावनाशः ॥ ३२ ॥ १ कुक्षिपदसे प्रकरणपठित उपपदकाही ग्रहण होता है । स्वास्यादिकोंने “कुक्षि- तदीशी " इनका अर्थ-“सिंहरवी " ऐसा कहा है सो सर्वसाधारण होनेसे योग्य नहीं क्योंकि विशेषकर इस शास्त्रमें अक्षोंसे सिद्ध किये हुए अंकोंकाही ग्रहण किया गया है। “भ्रातभ्यां शनिः" इत्यादि सूत्रों में उपपद और उपपदरखामोसे विचार करना चाहिये क्योंके जहां जिसका संभव होता है उसीकी अनुवृत्ति अगले सूत्रों क जाती है।
पादः ४.] भाषाटीकासहितानि । ६५ उपपदसे और उपपदस्वामीसे भ्रात नाम तृतीय एकादश स्थानमें शनैश्चर राहु ये दोनों स्थित होवें तौ भ्राताका नाश होता है। भाव यह है कि उपपदसे अथवा उपपदके स्वामीसे तृतीय स्थानपर शनैश्चर राहु ये दोनों स्थित होवें तौ छोटे भ्राताका नाश होता है और एकादश स्थानपर शनैश्चर राहु ये दोनों स्थित हो तो बडे भ्राताका नाश होता है ॥ ३२ ॥ शुक्रेण व्यवहित गर्भनाशः ॥३३॥ उपपदसे और उपपदके स्वामीसे एकादश अथवा तृतीय स्थानमें शुक्र स्थित हो तो माताके पहिले और पिछले गर्भका नाश होता है ।। ३३ ॥ पितृभावे शुक्रदृष्टेऽपि ॥ ३४॥ लग्न अथवा लग्नसे अष्टम स्थान शुक्रकर देखा गया हो तवभी माताके पूर्व और पिछले गर्भका नाश होता है ॥ ३४ ॥ कुजगुरुचंद्रबुधैहुभ्रातरः॥३५॥ उपपदसे और उपपदस्वामीसे तृतीय अथवा एकादश स्थानमें मंगल बृहस्पति चंद्र ये स्थित होर्वे तो बहुत भ्राता होते हैं ॥ ३५ ॥ शन्याराभ्यां दृष्टे यथा स्वधातनाशः॥३६॥ उपपदसे और उपपदस्वामीसे तृतीय और एकादश स्थान शनैश्वर मंगल इन दोनोंकर देखा गया होवे तौ स्थानानुसार भ्राताका नाश होता है अर्थात् तृतीय स्थान शनैश्चर मंगलकर देखा गया होवे तौ छोटे भ्राताका नाश होता है और एकादश स्थान शनैश्चर मंगलकर देखा गया होवे तो बडे भ्राताका १.शङ्का-उपपदसे और उपपदस्वामीसे ऐसा अर्थ यहां कहांसे लिया ? समाधान- गृहकमात्" इस सूत्रमें कुक्षि और तदीश ये दो पद हैं तिनसे. ऐसा अर्थ ग्रहण. किया है। यदि कहो कि समासपतित पदोंके एक अंशकी अनुवृत्ति नहीं हो सक्ती सो यहभी कथन अनुचित है क्योंकि अन्यपदोंसे भ्राविचार अयोग्य है इससे एक अंशकी अनुवात की गई है। . . ५ जैमिनीयसूत्राणि । [अध्यायः १. नाश होता है और यदि दोनों स्थान शनैश्वर मंगलकर देते गये हो तो छोटे बड़े दोनों भ्राताओंका नाश होता है ।। ३६ ॥ शनिना स्वमात्रशेषश्च ॥ ३७॥ उपपदसे और उपपदस्वामीसे तृतीय और एकादश स्थानमें केवल शनैश्चरकी दृष्टि होवे तो केवल आपही शेष रहता है और सब भ्राता मर जाते हैं ॥ ३७॥ केतो भगिनीबाहुल्यम् ॥३८॥ उपपदसे और उपपदस्वामीसे तृतीय और एकादश स्थानपर केव स्थित होवे तो यथास्थान वहिनी बहुत होती है अर्थात् तृतीय स्थानपर केतु स्थित होवे तो छोटी वहिनि बहुत होते हैं और एका- दशस्थानपर केतु स्थित होवे तो बडी बहिनि वहुत होते हैं ॥३८॥ लाभेशाद्भाग्यभे राहो दंष्ट्रावान् ॥ ३९ ॥ उपपदसे जो कि सप्तम स्थानका स्वामी है उससे द्वितीय राशिपर राहु होवे तौ स्थूल डाढोंवाला होता है ॥ ३९ ॥ केतो स्तब्धवाक् ॥ ४०॥ उपपदसे जो कि सप्तम स्थानका स्वामी है उससे द्वितीय स्थान- पर केतु स्थित हावे तो अप्रकट अक्षरोंवाले वचनका कहनेवाला होता है ॥ ४०॥ मन्दे कुरूपः॥११॥ उपपदसे सप्तम स्थानके खामीसे द्वितीय स्थानपर शनैश्चर होने तो भयानकरूपवाला होता है ॥ ४.१ ।। १ यहाँपर अन्य प्राच्यवचनभी हैं । “सप्तमेशाद्वितीयस्थे राही मकः खले स्थिते । अदन्तोऽधिकदन्तो वा दंष्ट्रायुक्तोऽय वा भवेत् ॥ पवनव्याधिमान् केतो यहास्यादस्फुटो- क्तिमान् । तत्र नानामहैयोंगे मिश्रं फलमुदाहृतम् ॥” अर्थ-उपपदसे जो कि सप्तमेश है उससे द्वितीय स्थानमें राहु स्थितं होवे तौ मूक होता है और खलग्रह स्थित होवे तो विना दांत अथवा अधिक दांतवाला होता है और केतु स्थित होवे तो वातव्याधि-, वाला होता है अथवा अप्रकट बचन कहनेवाला होता है और अनेक ग्रहोंका योग होव तौ मिला हुआ फल कहे ॥
पाद: ४.] भाषाटीकासहितानि । ६७ स्वांशवशागौरनीलपीतादिवर्णाः॥४२॥ आत्मकारकका जो कि नवांश है उसके स्वभावसे गौर नील पीतादिक वर्ण जातकके कहे । भाव यह है कि आत्मकारकके नवां- शका जो कि अन्यजातक प्रसिद्ध वर्ण है वही गौर नील पीतादि वर्ण जातका जानना और इसी प्रकार :पुत्रादिकारक नवांशवशसे पुत्रादिकोंका गौर नील पीतादि वर्ण जानने ॥ ४२ ॥ अमात्यानुचराद्देवताभक्तिः॥४३॥ अमात्यसंज्ञक ग्रहसे अंश कलादिमें जो कि ग्रह कम होवे उससे देवताभक्ति विचारनी चाहिये । भाव यह है कि अमात्यसंज्ञक ग्रहसे अंशकलादिमें जो कि ग्रह कम होवे वह देवताकारक होता है उससे देवताभक्ति जाननी । यदि देवताकारक ग्रह शुभ होवे तौ सौम्य- देवताकी भक्ति होवे है और क्रूर होवे तौ क्रूर देवताकी भक्ति होवे है। यदि देवताकारक ग्रह उच्च अथवा स्वराशिस्थ होवे तो दृढभक्ति और नीच अथवा स्वराशिका देवताकारक ग्रह होवे तो अदृद्ध भक्ति होते है ॥४३॥ स्वांशे केवलं पापसम्बये परजातः॥४४॥ आत्मकारकके नवांशपर केवल पापग्रहोंका दृष्टियोग आदिक सम्बन्ध होवे तो जारसे उत्पन्न हुआ जानना । यहां सम्बन्ध शब्दसे दृष्टियोग पड्वर्ग जानने ॥ ४४ ॥ नात्र पापात् ॥१५॥ यदि आत्मकारक पाप ग्रह होवे नौ यह फल नहीं होता है। 'माव यह है कि आत्मकारकके नवांशपर आमकारकसे अन्य पाप ग्रहका संवन्ध होवे तो यह फलः कहना न कि पापग्रहरूप आत्मकारकसे अथवा अत्र नाम अष्टम स्थानमें पाप ग्रह होवे तौमी -यह योग नहीं होता है ॥ ४५ ॥ शनिराहुभ्यां प्रसिद्धिः॥ ४६॥ :'. --
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जैमिनीयसूत्राणि। [अध्यायः १..
यदि आत्मकारके नवांशपर शनैश्चर और राहुका योग छोटे
पडवर्ग होवे तो जारसे उत्पन्न होनेकी प्रसिद्धि होवे है ॥ ४६ ।।
गोपनमन्येभ्यः॥४७॥
यदि आत्मकारकके नवांशपर अन्य पापग्रहोंका योग दृष्टि पड्वर्ग
होवे तौ जारसे उत्पन्न होनेकी प्रसिद्धि नहीं होते है किन्तु जारसे
उत्पन्न होने में छिपावट रहती है ॥ ४७ ॥
शुभवर्गऽपवादमात्रम् ॥ १८॥
यदि आत्मकारकके नवांशपर पाप ग्रहोंका जारजातकत्व योग
होवे और शुभ ग्रहोंका षड्वर्ग सम्बन्ध होवे ता जारसे ती उत्पन्न
न हुआ हो केवल जारसे उत्पन्न होनेका कलंकमात्रही होवे है॥४८॥
दियहे कुलमुख्यः ॥१९॥
यदि आत्मकारकके नवांशमें दो ग्रहोंका योग होवे तो कुलमें
सुख्य होता है ॥ ४९ ॥
इति श्रीजैमिनीयसूत्रप्रथमाध्याये श्रीनीलकंठीयतिलकानुसृतभाषा-
टीकायां श्रीपाठकमंगलसेनात्मजकाशिरामकृतायां चतुर्थः पादः
समाप्तः॥४॥
अथ पंचमपादः।
more
इसके अनन्तर आयुर्दायका विचार करते हैं।
आयुः पितृदिनेशाभ्याम् ॥१॥
लग्नेश और अष्टमेश इन दोनोंसे आयुःप्रमाण विचारना
चाहिये ॥१॥
प्रथम लग्नेश अष्टमेश दोनोंकी स्थितिवशसे दीर्घायुर्योग कहते हैं।
प्रथमयोरुत्तरयोर्वा दीर्घम् ॥२॥
पाद: ५.] भाषाटीकासहितानि । ६९ प्रथम नाम चरराशिपर अथवा स्थिर द्विस्वभाव इन दोनोंपर लगेश अष्टमेश ये दोनों हो तो दीर्घायु होते है । भाव यह है कि जहां कहींभी लग्नेश अष्टमेश ये दोनों चरराशिपरही केवल स्थित होवे तो दीर्घायु होवे है अथवा लग्नेश अष्टमेश इन दोनोंमें एक स्थिरराशिपर और एक द्विस्वभाव राशिपर स्थित होवे अर्थात् लग्नेश स्थिरराशिपर होवे तो अष्टमेश द्विस्वभाव राशिपर होरे अथवा लग्नेश द्विस्वभाव राशिपर होवे तो अष्टमेश स्थिर राशिपर होवे तवमी दीघायुयाग होता है ॥ २॥ इसके अनन्तर मध्यायुर्योग दिखाते हैं । प्रथमद्वितीययोरन्त्ययोर्वा मध्यम् ॥३॥ चर स्थिर इन दोनों राशियोंपर अथवा केवल द्विस्वभाव राशि- परही लग्नेश अष्टमेश दोनों स्थित होवें तो मध्यायु होवे है। भाव यह है कि लग्नेश अष्टमेश इन दोनों से एक चर राशिपर स्थित होने और एक स्थिर राशिपर स्थित होवे अर्थात् लग्नेश चर राशि पर होवे तो अष्टमेश स्थिर राशिपर होवे और अष्टमेश चर राशिपर होवे तो लग्नेश स्थिर राशिपर स्थित होवे तो मध्यायुर्योग होता है अथवा लग्नेश अष्टमेश दोनों जहां कहींभी केवल द्विस्वभाव राशिपरही स्थित होवें तोभी मध्यायुर्योग होता है ॥ ३॥ इसके अनन्तर अल्पायुर्योग कहते हैं । मध्ययोराधन्तयो हीनम् ॥४॥ केवल स्थिर राशिपरही लग्नेश अष्टमेश ये दोनों स्थित होवें तो अल्पायुर्योग होता है अथवा लग्नेश अष्टमेश इन दोनोंमेंसे एक चर राशिपर और एक द्विस्वभाव राशिपर स्थित होवे अर्थात् लग्नेश चर राशिपर तो अष्टमेश द्विस्वभाव राशिपर स्थित होते. वा अष्टमेश चर राशिपर तो लग्नेश. द्विस्वभावराशिपर स्थित होवे तो अल्पायुर्योग होता है ॥ ४॥ .
७० जैमिनीयसूत्राणि । [ अध्यायः १. जिस प्रकार कि लग्नेश अष्टमेश इन दोनोंके राशिस्थिति भेद- कर दीर्घायु और मध्यायु और अल्पायुर्योग कहा तिसी प्रकार लग्न चन्द्रमा इन दोनोंसेभी कहा है। एवं मन्दचंद्राभ्याम् ॥६॥ जिस प्रकार कि लग्नेश अष्टमेश इन दोनों से दीर्घायु मध्यायु अल्पायुर्योग कहे तिसी प्रकार लग्न चन्द्रमा इन दोनोंसे दीर्घायु मध्यायु अल्पायुर्योग विचारने चाहिये ॥५॥ इसके अनन्तर आयुर्दायके निर्णय करनेका तृतीय प्रकार कहते हैं। पितृकालतश्च ॥६॥ जन्मलग्न और होरालग्न इन दोनोंसेभी पूर्वोक्त प्रकारसे दीर्घमध्या- ल्पायुर्योग विचारने चाहिये । भाव यह है कि जिस प्रकार कि लग्नेश अष्टमेश इन दोनोंसे आयुर्विचार किया जाता है तिसी प्रकार जन्म- लग्न होरालग्न इन दोनोंसे आयुका विचार कर्तव्य है' ॥६॥ . । इस स्त्रमें जो कि होरालमका ग्रहण किया है सो होरालयका बनाना पूर्व का चुके हैं । वृद्धवचनोंसे तीन प्रकारसे दीर्घमध्याल्पायुयोगों के विचारमें वृद्धवचनभी प्रमाण । “लमेशरन्ध्रपत्योश्च लगन्दोलनहोरयोः । सूत्राण्येवं प्रयुआयात्संवादादायुषां त्रये ॥" अर्थ-लगेश अष्टमैश और लमचन्द्र और लाहोरा इन तीनोंमें से दो प्रकार कर जो आयु आवे वह ग्रहण कर्तव्य है न कि एक प्रकारकर आया हुआ आयु ग्रहण करना चाहिये दीर्घ मध्य अल्पायु प्रस्तारचक्रमें देखना चाहिये । प्रस्तारश्लोकः । "चरे चरस्थिरइन्द्राः स्थिरे द्वंद्वचरास्थिराः । द्वन्द्वे स्थिरोभयचरा दीर्घमव्याल्पकायुषः ॥" अर्थ-यदि चरराशिपर लमेश और चाहाराशिपर अष्टमेश अथवा लपचन्द्र वा लमहोरा पर ये स्थिर होवे तौ दीर्घायुयोग होता है और चर और स्थिरपर स्थित हो तो मध्यायुयोग होता है और चर और द्विस्वभाव राशिपर स्थित होवें तौ अल्पायुयोग होता है और यदि स्थिरराशि और द्विस्वभाव राशिमें स्थित होवें तौ दीर्घायुर्योग होता है और स्थिर और चरसशिपर स्थित होवें तो मध्यायुयोग होता है और स्थिर और स्थिरही राशिपर स्थित होवे तो अल्पायुयोग होता है। यदि द्विस्वभाव और स्थिर राझीपर स्थित हों तौ दीर्घायुयोग होता है और द्विस्वभावमर और द्विस्वभावपर स्थित : ।
पाः ५.] भाषाकासहितानि । ७१ जो तीन प्रकारके मायुयनिर्णयके उपाय हैं उन तीनोंमें एकाकार आयु आवे तो कुछ विवाद नहीं और जो दो प्रकारसे एकाकार आयु आवे और एक प्रकारसे भिन्न आयु आये तहां निर्णय करते हैं। संवादात्मामाण्यम् ॥ ७॥ दो प्रकारसे जो कि आयु आवे वही ग्रहण करने योग्य है न कि एक प्रकारसे आया हुआ आयु ग्रहण करने योग्य है ॥ ७ ॥ यदि तीनों प्रकारसे भिन्न २ आयु आवे तहां निर्णय करते हैं। विसंवादे पितृकालतः॥८॥ यदि तीनों पक्षोंकी विरूपता होवे तो जन्मलग्न होरालग्नसे आया हुआ आयु ग्रहण करने योग्य है । भाव यह है कि यदि तीनों प्रकारसे मिन्न २ आयु आवे तौ जो कि जन्मलग्न होरालयसे आया हुआ आयु है उसीका ग्रहण करना चाहिये ॥ ८॥ तीनों प्रकारसे भिन्नता होनेपर जन्मलग्न होरालग्नसे आये हुए आयुका निषेध कहते हैं। पितृलाभगे चंद्रे चंद्रमंदाभ्याम् ॥ ९॥ तीनों प्रकारकी भिन्नता होनेपर यदि लग्न अथवा सप्तम स्थानपर होते ती मध्यायुर्योग होता है और विस्वभाव और चर राशिपर स्थित होवे तो अल्पा, युयोग होता है। इसी प्रकार प्रस्तारचक्रमें जानना ॥ प्रस्ताचक्रम् । दीघ युः | मध्यायुः अल्पायुः चर | लग्नेश अष्टमेश स्थिर द्विस्वभाव लग्नचंद्र लग्नहोरा लग्नेश भष्टमेश स्थिर | स्थिर स्थिर | लग्नेश अष्टमेश लग्नचंद्र लग्रहोरा द्विस्वभाव चर स्थिर लग्नचंद्र लग्नहोरा लग्नेश अष्टमेश द्विम्वभा - द्विस्वभाव द्विस्वभाव लग्नेश अष्टमेश लग्नचंद्र लग्रहोरा स्थिर द्विस्वभाव चर .लग्न चंद्र लग्नहारा चर लग्नेश अष्टमेश लग्नचंद्र लाहोरा - -- . जैमिनीयसूत्राणि । [अध्यायः? चंद्रमा स्थित होवे तौ चन्द्रमा और लग्नसे आया हुआ आयु ग्रहण करने योग्य है ॥९॥ इसके अनन्तर दीर्घमध्याल्पायुर्योगों के विषे कुछ विशेष कहते हैं। शनो योगहेतो कक्ष्याहासः ॥१०॥ यदि शनैश्चर आयुयोगके करनेवाला होवे तो एक खण्डकी न्यूनता हो जावे है । तात्पर्य यह है कि शनैश्वर यदि आयुर्योगका करने- वाला होवे तौ दीघायुमें मध्यायु रहता है और मध्यायुमें अल्पायु रहता है और अल्पायुमें कुछभी नहीं रहता ॥ १० ॥ ५ अल्पायुप्यादिक कहोने कहा है । वात्रिंशापूर्वमल्पायमध्यमायुरततो भवेत् । चतुःपष्टयाः पुरस्तात्तु ततो दीर्घमुदाहृतम् ॥" अर्थ-बत्तीस वर्षसे पूर्व अल्पायु होवे और बत्तीस वर्षसे पश्चात चौसाठ वर्षपर्यन्त मध्यायु होने है और साठि वर्षस ऊपर छयानवे वर्षपर्यन्त दीर्घायु होघे है । जन्मसे बनीसपर्यन्त और वीससे चीसठि · वर्ष पयन्त और चौसठि वर्षसे छयानवे वर्षपर्यन्त आय ए आयुदयका रप करना गृहोंने कहा है। "प्रयमयोत्तरयोगों दीयम् ।" इत्यादि सूत्रोंकर जो कि आयु निर्णीत हुआ है वह यदि दीर्घायु होवे तो मध्यमायुके अवधि चौसाठि वपपर्यन्त निःसंदेह सिद्ध मायु होही गया उससे उपर बत्तीस वर्षके दीर्घायुके खण्डमें कितने वर्थ लेने चाहिये इस संशयक दर करने के लिये यहां वृद्ध वचन है। "पूर्णमादी हानिरन्तेऽनुपाती मध्यतो भवत् । राशिदयस्य योगांद वर्षाणां स्पटमुच्यते ॥" अर्थ-यदि लमेश अष्टमेश ये दोनों राशिक आरम्भमें विद्यमान हो तो बत्तीस वर्षका दीध मध्याल्प आयका खण्ड पूर्ण ग्रहण करना चाहिये और यदि राशिक अन्तभागमें हो तो उस बत्तीस वर्षो खण्डका विनाश हो जाता है और यदि मध्यमें स्थित हो तो राशिकसे खण्डका एक देश ग्रहण करना चाहिये । भाव यह है कि लमेश अष्टमेश राशिक आरम्भमही स्थित हो तो दीर्घायुके योगमें छयानवें उपतक आयुका प्रमाण है । मत्यायुके योगमें चौंसठि वर्षतक आयुका प्रमाण है । अल्पायुके योगमें बत्तीस वर्षतक आयुका प्रमाण है और यदि लमेश अध्मेश राशिके अन्तमें स्थित हो तो दीर्घायके योगमें चौसाठ वर्षतक आयुका प्रमाण है और मव्यायुके योगमें बत्तीस वर्पतक आयुका प्रमाण है । अल्पायु योगमें कुछभी आयुका प्रमाण नहीं है और यदि लनेश अष्टमेश राशिक मध्यभागमें स्थित होवे तो त्रैराशिक करनेसे जो वर्ष आ वह यदि दीर्घायुके हो तो चौसाठि वर्ष जोड देखें और मध्यायुके हो तो वतीस वर्ष जोड देवे और यदि अल्मायुक होयें तो वह आये एही वर्ष निज आयुके जानने परन्तु त्रैराशिक लमेश और अष्टमेश इन दोनोंका पृथक् २ करके दोनोंको जोड आधाकर लेवे जो फल आवे उसको दीर्घ मध्याल्पयुक्त खण्ड जाने न कि एक र के त्रैराशिक फलको राशिक करनेका यह पाद:५.] भाषाटीकासहितानि। ७३, इसके अनन्तर इसी विषयमें मतान्तर कहते हैं। विपरीतमित्यन्ये ॥११॥ कोई आचार्य कहते हैं कि यदि शनैश्चर आयुर्योगकर्ता होवे तो यह पूर्वोक्त वचन नहीं होता किन्तु शनैश्चर योगकारक होनेसे यथास्थित आयु रहता है ।। ११ ॥ इसके अनन्तर परमत कहकर निज मत कहते हैं। सूत्राभ्यां न स्वक्षतुंगगे सौरे ॥१२॥ केवलपापहम्योगिनि च ॥ १३॥ यदि शनैश्चर अपने राशिपर अथवा उच्चराशिपर स्थित होते तथा शुभ ग्रहसम्बंधि दृष्टियोगसे वर्जित होकर केवल पाप ग्रह- संबंधि दृष्टियोगसे युक्त होवे तो कक्ष्याह्रास नहीं होता है अर्थात् यथास्थित आयु रहता है अन्यथा हास होवे है ॥ १२ ॥ १३ ॥ इसके अनन्तर कक्ष्यावृद्धि योग कहते हैं। पितृलाभगे गुरौ केवलशुभग्योगिनि च कक्ष्यावृद्धिः१४ यदि वृहस्पति लग्न अथवा सप्तम स्थानमें स्थित होवे और पापग्रहसंवन्धि दृष्टियोगसे वर्जित होकर केवल शुभग्रहसंबंधि दृष्टियोगसे युक्त होवे तौ कक्ष्यावृद्धि होवे है अर्थात अल्पायु होवे विधान है जब कि लगेश वा अष्टभेशके तीस अंश चले जाते तो बत्तीस वर्ष प्राप्त होते अब एक अंश चला गया है तो क्या प्राप्त होवेगा तब बत्तीसको एकसे गुणकर तीसका भाग दिया लब्ध मिला १ । इसी प्रकार लमेश अष्टमेश दोनोंके त्रैराशिकसे वर्ष स्पष्ट करके परस्पर जोड देवे फिर आधा करके जो फल आवे उसको दीर्घायुयोग होवे तो चौसाठ वर्षे जोड देवे जो जोड फल आवे वही दीर्घायुका प्रमाण जानना और यदि मध्यायुयोग होवे तो बत्तीस वर्ष जोड देवे जो जोड.फल आवे वहीं मध्यायुका प्रमाण जानना और यदि अल्पायुयोग हो तो वही जन्मस, लेकर आयुका प्रमाण होता है इसी प्रकार लमचंद्रमा और लमहोरा इनके आये हुए आयुमें खण्डका स्पष्टीकरण जानना चाहिये । अन्य वचन है। " होरालमादिमांश तु पूर्णमन्ते न किचन । स्पष्टीकरणमत स्यादधिमध्याल्पकायुपि ॥ " अर्थ-और त्रैराशिक पर्यवतही होता है। इस कथनसे होर सभी अंशादियुक्त दिखाया है ।।.. .
. जमिनीयसत्राणि। [अध्यायः १. : तौ मध्यायु और मध्यायु होवे तो दीर्घायु और दीर्घायु हो तो छयानवे वर्षसेभी अधिक आयु होवे है ॥ १४ ॥ प्रमाणसिद्ध आयुमेंही मरण होता है या वीचममी मरण हो जाता है इस आकांक्षामें कहते हैं। मलिने द्वारवाद्ये नवांशे निधनं द्वारद्वारेशयो- श्व मालिन्ये ॥१५॥ द्वारराशि और बाह्यराशि ये दोनों स्वयं पाप और पापग्रहोंसे युक्त तथा पापग्रहोंकर देखे गये होवें तौ द्वारराशि और बाह्यरा- शिकी नवांशदशामें मरण हो जाता है तथा द्वारराशि और द्वाररा- शीश ये दोनोंभी स्वयं पाप और पापग्रहोंसे युक्त तथा पापग्रहोंकर देखे गये होवें तौ द्वारराशि तथा द्वारेशाश्रित राशिकी नवांशदशामें मरण हो जाता है' ॥१५॥ इस मरणयोगका निषेधभी कहते हैं। शुभहायोगान॥१६॥ झारराशि और बाह्यराशि और द्वारेश इनपर शुभ ग्रहोंकी दृष्टि तथा योग होवें तौ द्वारराशि तथा बाह्यराशि तथा दारेशराशि इनकी नवां- शदशामें मरण नहीं होता है ॥ १६ ॥ १ "दशाश्रयो द्वारम्, ततस्तावात बाह्यम् ” द्वितीय अध्यायके चतुर्यपादसंबान्ध द्वितीय तृतीय इन स्त्रों में हारराशि और बाह्यराशिका लक्षण कहा है । जिस कालमें जिस राशिकी जो कि दशा चरस्थिरनामसे होवे उस दशाश्रय राशिको द्वार कहते हैं, इसीका दूसरा नाम पाकराशि है और लगसे जितनी संख्यापर द्वाराशे होवे उत- नौही संख्यापर द्वारराशिसे बाह्यराशि कहा है इसी बाह्यराशिको भौगराशि कहते हैं। ... यहां लगशब्दसे वह राशि ग्रहण करना चाहिये जिस राशिसे कि प्रथमसे दशाका प्रारम्भ होता है कहीं तौ लमसेही दशाका आरम्भ होता है और कहीं सप्तमसेही दशाका आरम्भ होता है और कहीं ब्रह्मग्रहके राशिसे दशाका आरम्भ होता है इनमेसे आयदशाकी राशि जो हो रही पाकरराशिकी अवधि होती है न कि प्रसिद्ध लगा । "विषमे तदादिनवांशः " इस द्वितीय अध्यायके तृतीयपादसंबन्धि प्रथम सत्रमें नवांशदशा कही है नवांशदशा समस्त राशियोंकी होवे नवांशदशामें प्रत्येक राशिक नौ.२ वर्ष होते हैं यदि लममें विषमराशि होवे तो लमसही नाशदशाका आरम्भ होता और यदि समराश होवे तो सप्तमराशिसे नवांशदशाका आरम्भ होता है ।
पाद: ५.] भाषाटीकासहितानि । ७५ इसके अनन्तर शुभ ग्रहोंकी दृष्टि योग न होने परभी नवांशका कालमृत्युका निषेध कहते हैं। रोगेशे तुंगे नवांशवृद्धिः ॥ १७॥ जन्मलग्नसे अष्टमस्थानका स्वामी यदि उच्चराशिपर स्थित होते तो कहा हुआ मृत्युयोग होनेपरभी नवांशदशामें मृत्यु नहीं होता। है किन्तु उससे ऊपर नौ वर्षकी वृद्धि हो जाते है ॥ १७ ॥ यहि कहो कि नवांशदशामें राशिवृद्धि हो जावे है तो फिर सिस राशिमें मृत्यु होता है इस शंकामें कहते हैं। तत्रापि पदेशदशांते पदनवांशदशायां पितृदि- नेशत्रिकोणे वा ॥१८॥ वृद्धिपक्ष होनेपरमी लग्नारूढ स्थानके खामीका जो कि. आश्रित राशि है उसकी दशाके अन्तमें मरण होता है अथवा जन्मलग्नारूढ राशिके नवांशदशामें मरण होता है अथवा लग्नेश अष्टमेशसे लग्न पञ्चम नवम इनमेंसे किसी राशिकी दशामें अथवा इनकी अन्तर्दशामें मरण होता है ॥ १८ ॥ इसके अनन्तर अन्य प्रकारसे दीर्घमध्याल्पायुर्योग कहते हैं। पितृलाभरोगेशे प्राणिनि कंटकादिस्थे स्वतश्चैवं विधा१९ लग्नसे सप्तम स्थानका जो कि स्वामी है और लग्नसे अष्टम स्थानका जो कि स्वामी है इन दोनोंमें जो. किं बली होवे वह यदि केन्द्र पणफर आपोक्लिम संज्ञक स्थानमें स्थित होवे तौ क्रमसे तीन प्रकारकर दीर्घमध्याल्पायुयोग होता है। भाव यह है कि लग्नसे सप्तमेश अष्टमेशमें जो कि बली होवे वह यदि केन्द्र नाम लग्नसे लग्न चतुर्थ सप्तम दशम इन स्थानोंपर स्थित होवे तौ दीर्घायुर्योग होता है और यदि पणफर नाम लग्नसे द्वितीय पञ्चम अष्टम एकादश इन स्थानोंपर स्थित होवे तो मध्यायुर्योग होता है। और यदि आपोल्लिम . नाम लग्नसे तृतीय षष्ठ नवम द्वादश इन .
जैमिनीयसूत्राणि। [अध्यायः १. ७६ स्थानोंपर स्थित होवे तो अल्पायुर्योग होता है और इसी प्रकार आत्मकारकसेभी योगत्रय जानने । आत्मकारकसे सप्तमेश अष्टमेशमें जो कि बली हो वह यदि केंद्रमें स्थित होवे तौ दीर्घायुर्योग होता है और पणफरमें स्थित होवे तो मध्यायुर्योग होता है और आपो- क्लिममें स्थित होवे तो अल्पायुर्योग होता है ॥ १९ ॥ योगात्समे स्वस्मिन्विपरीतम् ॥२०॥ जन्मलनसे जो..कि सप्तम स्थान है उससे जो कि सम नाम: नवम स्थान है उसमें यदि आत्मकारकग्रह स्थित . होवे तौ. विपरीत होता है अर्थात् “पितृला," इत्यादि सूत्रके कहे हुए योग नहीं होते हैं किन्तु दीर्घायु आया हो तो मध्यायु होता है और मध्यायु आया हो तो अल्पायु होता है और अल्पायु आया हो तो कुछभी नहीं अथवा कोई आचार्य ऐसा अर्थ करते हैं दीर्घायु होवे तो अल्पायु और अल्पायु होवे तो दीर्घायु और मध्यायु होवे तो मध्यायुही होता है ॥२०॥ इस प्रकरणमें कौन वल ग्रहण करना चाहिये इस शंकामें कहते हैं। राशितःप्राणः ॥२१॥ १ यहां आयुयविषयमें वृद्ध कुछ और विशेष कहते हैं।" एकोऽष्टमेशः स्वोच्चस्थः 'पर्यायाई प्रयच्छति । नीचस्था नाशयेत्पर्यायार्द्धमायुपि निश्चिते ॥ नीचरन्धेज्ञसंयुक्ताः "पाया पृथक् पृथक् । यहा विनाशयन्त्येवं निर्णीत परमायुपि ॥ उच्चरन्धेशसंयुक्तग्रहैः प्रत्येकमुन्नयेत् । एकैकम पर्यायं परमायुपि निश्चिते ॥ अर्थ-एक अष्टमेश उच्चका. होवे तो अपनी दशाका अर्द्धभाग देता है और नीचका होवे तो अपनी दशाका अर्द्ध भाग निश्चित किये आयुमैसे दर कर देता है । भाव यह है कि "पिटदिनेशाभ्यां इस स्त्रमें जो अष्टमेश ग्रहण किया है वह अष्टमेश यदि उच्चका होवे तो अपनी दंशाका अर्द्ध भाग देता है अर्थात् “ नाथान्ताः "इश सूत्रकी रीतिसे जितना आयु आवे उसमें उसीका आधा और जोड देदे और यदि नीचका होवे तो आयुमसे अर्ध भाग दूर कर देवे । इसी प्रकार और ग्रहभी यदि नीच अष्टमेशसे युक्त होवे तो अपनी आयुका अर्ध भाग पृथक् २ दूर कर देते हैं और यदि उच्च अष्टमेशसे युक्त होवे तो अपनी दी हुई आयुमें अपनी दशाका अर्द्ध भाग अधिक देते हैं । इसी प्रकार लमेशादिक ग्रहभी उच्च नीच गुणसे वृद्धि और हास करते हैं ।
७७ पाद: ५.] भाषाटीकासहितानि । यहां राशिसे वल ग्रहण करना चाहिये । भाव यह है कि "कार- कयोगः प्रथमो भानाम्" इत्यादि सूत्रद्वारा कहे जानेवाला राशि- बल ग्रहण करना चाहिये न कि अंशाधिक्य वल ग्रहण करना चाहिये ॥२१॥ इसके अनन्तर अन्य प्रकारसे मध्यायुर्योग कहते हैं। रोगेशयोः स्वत ऐक्ये योगे वा मध्यम् ॥ २२ ॥ लनसे अष्टमेश तथा सप्तमसे अष्टमेश इनका आत्मकारक साथ ऐक्यता होवे अथवा इनके साथ आत्मकारकका योग होने तो मध्यायु होते है । भाव यह है कि लग्नसे अष्टमेश आत्मकारक हो अथवा लग्नसे अष्टमेशके साथ आत्मकारकका योग होवे या सप्त- मसे अष्टमेश आत्मकारक हो अथवा सप्तमसे अष्टमेशके साथ आत्मकारकका योग होवे तो " पितृलाम० " इत्यादि सूत्रसे प्राप्त हुए दीर्घायुवालोंकीभी मध्यायु होते हैं' ॥ २२॥ इसके अनन्तर दीर्घादि योगोंके विषे कक्ष्याहास कहते हैं। पितृलाभयोः पापमध्यत्वे कोणपापयोगे वा कक्ष्याहासः॥२३॥ लग्न और सप्तमं स्थान इन दोनोंको पाप ग्रहके मध्यवर्ती होने- पर कक्ष्याह्रास होता है । भाव यह है कि लग्नकुण्डलीके द्वितीय और वारहवें स्थानमें और छठे और आठवें स्थानमें पापग्रहोंके योग होनेसे लग्न और सप्तमस्थानको पापमध्यत्व होता है । यदि लग्न सप्तम स्थानका पापमध्यत्व योग होवे तौ दीर्घायुर्योगमें मध्यायु और मध्यायुर्योगमें अल्पायु और अल्पायुर्योगमें कुछभी नहीं होता है अथवा लग्न और सप्तमसे जो कि कोण नाम लग्न पंचम नवम स्थान हैं इन सबमें पाप ग्रहोंका योग होवे तबभी कक्ष्या- हास होता है ॥२३॥ १ अन्य जातकशास्त्रमें लमकी और इस ग्रंथमें आत्मकारककी प्रधानता होनेसे अष्टमेशके योगकर आयुका हासही होता है.ऐसा जानना । ।
जमिनीयस्त्राणि । [ अध्यायः १. स्वस्मिन्नप्येवम् ॥ २४॥ आत्मकारकभी लग्नकुण्डलीवत् होता है। तत्पर्य यह कि आत्म- कारकके राशि और आत्मकारकके सप्तमराशिको पापग्रहके मध्यवर्ती होनेमेंभी कक्ष्याह्रास होता है अथवा आत्मकारकसे त्रिकोण नाम लम पंचम सप्तम स्थानोंपर सब जगह पापग्रहोंका योग होवे तवभी कक्ष्या- हास होता है।॥२४॥ तस्मिन्पापे नीचेऽतुंगेऽशुभसंयुक्ते च ॥२५॥ यदि वह आत्मकारक पापग्रह होकर नीच राशिपर स्थित हो तवमी कक्ष्याहास होता है अथवा पापग्रह होकर आत्मकारक अपने उच्च राशिमें स्थित न हो किन्तु अशुभ ग्रहोंसे संयुक्त होने तोमी कक्ष्याह्रास होता है ॥ २५ ॥ इसके अनन्तर कक्ष्याहासयोगमें निषेध कहते हैं। अन्यदन्यथा ॥२६॥ लग्न सप्तम अथवा आत्मकारक सप्तम यह अन्यथा नाम शुभ ग्रहोंके मध्यवर्ती होवे अथवा लग्न और सप्तमसे अथवा भात्मकारकते प्रथम पंचम नवम इनमें सब जगह शुभ ग्रहोंका योग होने अथवा आत्मकारक शुभ ग्रह होकर नीचका न होवे अथवा आत्म- कारक शुभ ग्रह होकर उच्च राशि और शुभ ग्रह संयुक्त होने वो अन्यत् अर्थात् कक्ष्यावृद्धि होवे है याने अल्पायुर्योग होवे तो मध्यायु होता है और मध्यायुयोग होवे तो दीर्घायु होवे है और दीर्घा- युर्योग होवे' च्यानवे वर्षसेभी अधिक आयु होवे है इस कथ- नसे यह जानना चाहिये समस्तयोग पापात्मक हो तो कक्ष्याहास होता है और समस्त योग शुभात्मक होवें तो कक्ष्यावृद्धि होते है और समस्त योग शुभ पाप दोनोंसे वर्जित हो तो न कक्ष्यादि और न कक्ष्याह्रास होता है ।। २६ ॥ इसके अनन्तर हासवृद्धिप्रकार बृहस्पतिके विषेभी दिखाते हैं गुरौ च ॥२७॥ . -
७९
पादः.५]
भाषाटीकासहितानि ।
वृहस्पतिमी लग्नकुण्डलीवत् होता है भाव यह है कि बृहस्पतिसे
द्वितीय द्वादश षष्ठ अष्टम त्रिकोण इन स्थानोंके विषे पूर्व कथना-
नुसार पाप ग्रहोंका योग होवे तो कक्ष्याह्रास होता है अथवा बृह-
स्पति नीच हो या उच्चसे वर्जित होकर पाप ग्रहोंसे युक्त होने
तोमी कक्ष्याहास होता है और जो अन्यथा होये तो अन्यथाही
फल होता है अर्थात् बृहस्पतिसे द्वितीय द्वादश षष्ठ अष्टम त्रिकोण
इन स्थानोंपर पूर्वकथनानुसार शुभ ग्रहोंका योग होवे तो कक्ष्या-
वृद्धि होवे है अथवा वृहस्पति उच्चका होकर शुभ ग्रहोंसे युक्त होने
वोभी कश्यावृद्धि होते हैं ।। २७ ॥
पूर्णेन्दुशकयोरेकराशिवृद्धिः ॥२८॥
शुभग्रहयोगप्रकरणमें लग्न आत्मकारक बृहस्पतिसे जो कि स्थान
कहे है उनमें यदि पूर्णचंद्र और शुक्रका योग होवे तो निर्णीत
हुए आयुमें कक्ष्यावृद्धि नहीं होती किन्तु एक राशिवृद्धि होवे अर्थात्
लग्न यात्मकारक वृहस्पत्यादिको से जिससे कक्ष्यावृद्धि होती है
उस राशिके दशावर्षोंकी वृद्धि होते है ॥ २८ ॥
पापयोगसे जो कि कक्ष्याहास कहा उसमें अपवाद दिखाते हैं।
शनो विपरीतम् ।। २९॥
पापयोगप्रकरणमें लग्न आत्मकारक बृहस्पतिसे जो कि स्थान
कहे हैं उनमें यदि शनैश्चर होवे तौ कक्ष्याहास नहीं होता है किन्तु
एकराशि हास होवे है अर्थात् लग्न आत्मकारक बृहस्पत्यादिकोंमेंसे
जिससे कक्ष्याह्रास होता है उस राशिके दशावर्षों का ह्रास होता है
इन दोनों सूत्रोंके कथनका यह अभिप्राय है चंद्र शुक्र शनैश्चर
इनको प्रधानतासे योगकारक होनेकर अन्य ग्रहों को योगकारक हुए
-संतभी एक राशिकी वृद्धि वा ह्रासही होता है न कि कक्ष्याकी ॥२९॥
इसके अनन्तर स्थिरदशाके आश्रयसे. मरणयोग कहते हैं ।
स्थिरदशायां यथाखंडं निधनम् ॥ ३० ॥
. तो जैमिनीयसूत्राणि । [अध्यायः १.. स्थिर दशामें आयुखण्डके अनुसार गरण होता है । भाव यह है कि परमायुके दीर्घ मध्य अल्पायु नामसे तीन विभाग को पूर्वोक्त रीतिसे आयुका जो खण्ड आया होवे उसमें यदि मरण लक्षणयुक्त राशिकी स्थिर दशा आ जावे तो मरणलक्षणयुक्त राशिकी स्थिर दशामही मरण होना है और मरणकारक खण्डसे पूर्व खण्डमें मरणलक्षणयुक्त राशिकी स्थिर दशा आ जाये तो उसमें मरण नहीं होता है किन्तु क्लेश अधिक होता है ॥ ३० ॥ यदि कहो कि दीर्घ मध्य अल्पायुभेदने मरणखण्ड ती नि- गीत हो गया पर विशेषकर मरणकालज्ञान इससे नहीं हुआ तहां कहते हैं। तवर्तविशेषः ॥ ३१॥ तिस मरणमें राशिविशेष है। भाव यह है कि मरणकारक कोई राशिविशेप होता है ।। ३१॥ यदि कहो कि कौन मरणकारक राशिविशेष होता है तहां कहते हैं। पापमध्ये पापकोणे रिपुरोगयोः पापे वा ॥३२॥ दो पाप ग्रहोंके मध्यमें जो कि शशि होवे उस राशिकी दशा में अथवा प्रथम दशाप्रद राशिसे त्रिकोणमें और द्वादश अष्टम स्था- नमें पाप ग्रहोंका योग होवे तो उस राशिकी दशामें मरण होता तदीशयोः केवलक्षीणेन्दुशुकदृष्टौ वा ॥ ३३ ॥ -----rahane १ " शशिनन्दपावकाः क्रमादब्दाः स्थिरदशायाम् " स्थिर दशाके चोंके लानेका राति इस द्वितीयाध्यायके तृतीयपादसंवन्धि तृतीयसूत्र में कही है। २ यह वृद्धोंनेभी कहा है। “शुभमध्ये मृति व पापमध्ये मृतिर्भवेत् " कोई आ- चार्य " पापकोणे० " इत्यादि पदोंका यह अर्थ. करते हैं लपसे वा. आत्मकारकसे पापयुक्त विकोण राशिकी दशामें अथवा पापयुक्त द्वादशाष्टमराशिकी दशामें मरण होता है।
पादः.१.] भाषाटीकासहितानि । .८१ द्वादश स्थानका स्वामा और अष्टम स्थानका स्वामी इनपर अन्य ग्रहोंकी दृष्टि तौ होवे नहीं किन्तु केवल क्षीणचंद्र और शुक्र इनकी दृष्टि होवे तौ द्वादश और अष्टम राशिकी दशा मरण होता है ॥ ३३॥ यदि कहो कि वहुवर्षव्यापिनी दशा होवे तो कब मरण होगा इस शंकामें कहते हैं। तत्राप्यद्यारिनाथश्यनवभागाहा ॥३४॥ जो कि मरणकारक राशिदशा कही हैं उनमेंभी जो कि प्रथम दशापद राशि है उसका स्वामी और उससे छठे स्थानका स्वामी इन दोनोंकर नवांशकुण्डलीमें जो कि राशि देखा गया हो उस गाशके अन्तर्दशामें मरण होती है।। ३४ ॥ इसके अनन्तर निर्याणदशाविशेषको अन्य प्रकारसे दिखानेके वास्ते रुद्रग्रहको कहते हैं। पितृलाभभावेशप्राणी रुद्रः ॥ ३५ ॥ लग्न और सप्तम स्थानसे जो कि अष्टम स्थानके स्वामी हैं उन दोनोंमें जो कि वली होवे वह रुद्रसंज्ञक ग्रह होता है ।। ३५ ॥ इसके अनन्तर द्वितीय रुद्रग्रहको कहते हैं। अप्राण्यपि पापदृष्टः ॥ ३६॥ लग्न सप्तम स्थानसे अष्टम स्थानके स्वामियोंमें जो कि दुर्वलग्रह होवे वह यदि पापग्रहने देखा हो तौ रुद्रसंज्ञक होता है। दो रुद्र होते हैं एक वली और दूसरा निर्बली ॥ ३६ ।। १ कोई आचार्गाने आयशब्दसे दशम राशि और अरिशब्दसे षष्ठ राशि ग्रहण किया है सौ जन आचार्योंकी इस प्रकार व्याख्यायोग्य नहीं क्योंकि जब कि आयशब्दसे दशम राशि लिया तो आईशब्दसे अष्टम राशि लेना चाहिये था और यदि ऐसा तात्पर्य ग्रंथकर्ताका होता तो " फितन्तुनाथदृश्यनवभागाडा " ऐसा मूत्र होना चाहिये था। ६ .
-- [अध्यायः२, जैमिनीयसूत्राणि। ८२ . इसके अनन्तर बली रुद्रका फल कहते हैं। प्राणिनि शुभदृष्टे रुद्रशूलान्तमायुः॥३७॥ जो कि वलवाद रुद्रसंज्ञक ग्रह है वह यदि शुभ ग्रहोकर देखा गया हो तो रुद्रग्रहसे शूल नाम प्रथम पंचम नवम राशिके दशा- पर्यन्त आयु होवे है अथवा बलवान् रुद्रसंज्ञक ग्रह शुभ ग्रहोंने देखा होवे तहां यदि अल्पायुर्योग होवे तौ रुद्रग्रहसे प्रथमराशिदशापर्य- न्तही आयु होवे है और मध्यायुर्योग हो तो रुद्रग्रहसे पञ्चमरा- शिदशापर्यन्त आयु होवे है और दीर्घायुर्योग होवे तो रुद्रग्रहसे नव. मराशि दशापर्यन्त आयु होवे है ॥ ३७ ।। तत्रापि शुभयोगे ॥ ३८॥ यदि द्वितीय निर्वली रुद्रके विषेभी शुभ ग्रहोंका योग होवे नोभी रुद्रग्रहसे प्रथम पंचम नवम राशिदशापर्यन्त आयु हावे हैं ॥ ३८ ॥ व्यर्कपापयोगेन ॥३९॥ सूर्यको त्यागकर अन्य पाप ग्रहोंका योग यदि रुद्रसंज्ञक ग्रहवे. विषे होवे तो यह फल नहीं होता है अर्थात् रुद्रग्रहसे प्रथम पंचम नवम राशिदशापर्यन्त आयु होनेका फल नहीं होता है किन्तु सूर्यके योगमें रुद्रग्रहसे प्रथम पंचम नवम राशिदशापर्यन्त आयु होनेका फल होता है ॥ ३९॥ इसके अनन्तर दोनों रुद्रोंका गुणविशेषकर फल दिखाते हैं। मंदारेंदुदृष्टे शुभयोगाभावे पापयोगेऽपि वा शुभदृष्टौ वा परतः॥४०॥ बली अथवा निर्वली रुद्र, शनैश्चर, मंगल, चंद्र इनकर देखा गया हो और उस रुद्रपर शुभ ग्रहका योग होवे नहीं एक योग यह है और वली अथवा निर्वली रुद्र शनैश्चर, मंगल, चंद्र इनकर देखा गया हो और उस रुद्रपर पापग्रहका योग होवे द्वितीय योग यह है और वली अथवा निवली रुद्र शनैश्चा, मंगल, चंद्र इनकार .
पार. १.] भापाटीकासहितानि । देखा गया हो और उसपर शुभ ग्रहोंकी दृष्टि होवे तृतीययोग यह है। इन तीनों योगौमसे कोई योग संपूर्ण होवे तौ रुद्रग्रहसे प्रथम पंचम नवम राशिदशापर्यन्तभी अगाडीतक आयु होवे है' ॥४०॥ . कदाचित् रुद्राश्रितराशिमेंभी मरण होता है इसी योगको कहते हैं। रुनाश्रयेऽपि प्रायेण ॥४१॥ रुद्राश्रित राशिमंभी आयुकी समाप्ति होते है । भाव यह है कि जिस राशिम रुद्र ग्रह स्थित होते है उस राशिकी दशाभी कदा- चित् मरण होता है । सूत्रमें प्रायःशब्दका प्रयोग होनेसे रुद्राश्रित राशिमे पहिले वा पीछेभी आयुकी समाप्ति होते है ऐसा ध्वनित होता है ।। ४१ ॥ १ इस सत्र में जो कि दो याकार है "याकारद्वयमनास्थायाम् " इस प्रकार कहकर वे दोनों बाकार पंधौने दो योगके जतानेहीवाले कहे हैं सो यह पथवचन युक्त नहीं क्यों कि दोनों वाकारोंकी अनास्थाकल्पनामें कोई प्रमाण नहीं इससे दोनों वाकारोसे तीन योगही प्रकट होते हैं। इस प्रकरणमें शुभ पापग्रहोंका लक्षण वृद्धोंने कहा "अकोरमंदफाणिनः क्रमात का ययाश्रयम् । चंद्रोऽपि कर एवात्र क्वचिदंगारकाश्रये । मुवनकाविज्ञाः स्युर्ययापूर्व शुभग्रहाः । " अर्थ-सूर्य, मंगल, शनैश्चर, राहु ये क्रमसे ययाश्रय नाम का राशिपर स्थित हो तो कर होते हैं और शुभ राशिपर स्थित हो तो कर नहीं होते किन्तु शुभही होते हैं और बृहस्पति, केतु, शुक्र, बुध ये ययापूर्व शुभमन होते हैं। व्यसै शुक्र, शुक्रसे केतु, केतुसे वृहस्पति ये उत्तरोत्तर शुभ ग्रह है। जिस प्रकार कि कर ग्रहोंको काराशिमें स्थित होनेसेही करता होवे है और शम राशिमें स्थित होनसे शुभता होवे है तिसी प्रकार बृहस्पति आदिकोंकी शुभ राशिमें स्थित होनेसे शुभता होवे है और पापराशिमें स्थित होनेसे शमता नहीं होती । ऐसा वृद्धोनेभी कहा है । " प्रत्येकं शुभराशिस्य उच्चस्थो वा बुधः शुभः । गुरुङ्गको च सौम्यस्थी ततोऽन्यत्राऽशुभाः स्मृताः ॥" यदि रुद्रयालमें मरण कहा तो किस शलमें मरण होना चाहिये इस विषयमें वृद्धोंने विशेष कहा है । " पापमात्रस्य शलवे प्रयमझे मृतिर्भवेत् । मिश्रे मध्यमाला शुभमात्रैऽन्त्यभे मृतिः ॥ " अर्थ-यदि दोनों रुद्र पाप ग्रह होवें तो रुद्रग्रहसे प्रथम राशिकी दशामें मरण होता है और यदि एक रुद्ध पाप ग्रह होवे और द्वितीय शुभ ग्रह होवे तो रुद्रग्रहसे पंचम राशिको दशामें 'मरण होता है और यदि दोनों रुद्र शुभ ग्रह तो रुद्रग्रहसे नवम राशिकी दशा में मरण, होता है। * 1 .
४. जैमिनीयसूत्राणि । [ अध्यायः २. ऋये पितार विशेषण ॥४२॥ जब मेष जन्मलग्न होवे तौ विशेषकर रुद्राश्रित राशिमेंही आयुकी समाप्ति होते है। भाव यह है कि जन्मलग्नमें मेपराशि होवे तौ जिस राशिमें रुद्रग्रह स्थित होवे उस राशिकी दशामंही आयुका समाप्ति होवे है ।। ४२ ॥ इसके अनन्तर योगभेदसे मरणस्थान दिखाते हैं। प्रथममध्यमोत्तमेषु वा तत्तदायुपाम् ॥ १३ ॥ अल्प मध्य दीर्घायुर्योगवालोंकी प्रथम मध्यम उत्तम नाम प्रथम द्वितीय तृतीय रुद्रशूलोंके विषे क्रमसे आयुः समाप्ति होवे हैं । भाव यह है कि अल्पायुर्योग होवे तौ प्रथम रुद्रशूलमें आयुकी समाप्ति होते है और मध्यायुर्योग होवे तौ द्वितीय रुद्रशूलमें आयुकी समाप्ति होवे है और दीर्घायुर्योग होवे तो तृतीय रुद्रशूलमें आयुकी समामि होवे है। इस प्रकार रुद्रशूलराशिकी महादशामें मरणयोगसिद्ध हो चुका उसीकी किसी अन्तर्दशामें मरण हो जाता है ॥ ४३ ॥ इसके अनन्तर फलविशेपके कहने के लिये महेश्वरग्रहको दिखाते हैं। स्वभावेशो महेश्वरः ।। ४४ ॥ आत्मकारकग्रहसे जो कि अष्टमराशिका स्वामी है वह महेश्वर संज्ञक ग्रह होता है ।। ४४ ॥ खोचे स्वगृहे रिपुभावेशः प्राणी ॥ १५ ॥ यदि आत्मकारकसे अष्टम राशिका. स्वामी उच्च व अपने गृहमें स्थित होवे तो आत्मकारकसे द्वादश अष्टम राशियोंके स्वामियों में जो बलवान होता है वह महेश्वरसंज्ञक होता है और यदि आ- १ सूत्रमें वाशब्दके प्रयोगसे यह ध्वनित होता है कि रुद्रशलसे मरण योग हुए संतभी अन्य बलवान् योगवशसे रुद्रालद्वारा मरणका बाधभी हो जाता है।
. पादः १.] भाषाटीकासहितानि । ८५ मकारकसे द्वादश अष्टम राशियोंके स्वामी दोनों बलवान् हो तो दोनों महेश्वरसंज्ञक होते ॥ ४२ ॥ इसके अनन्तर द्वितीय प्रकारसे महेश्वर ग्रहको कहते हैं । पाताभ्यां योगे स्वस्य तयोर्वा रोगे ततः ॥४६॥ आत्मकारकमा पात नाम राहुकेतुमेंसे किसीके साथ योग होवे अथवा आत्मकारकसे अष्टम स्थानपर राहुकेतुमेंसे किसीका योग होवे तो आत्मकारकसे सूर्यादिगणनाके क्रमसे जो छठा ग्रह होने वह महेश्वर होता है। दो तीन महेश्वर होनेके योगमें जो बली होता है वह महेश्वर होता है ॥ ४६॥ इसके अनन्तर ब्रह्मग्रह कहते हैं। प्रभुभाववैरीशप्राणी पितृलाभप्राण्यनुचरो विषमस्यो ब्रह्मा ॥४७॥ लग्न सप्तम इन दोनों राशियोंमें जो कि बलवान होवे उससे जो कि पष्ठ अष्टम द्वादश इन स्थानों के स्वामी हैं उनमें जो कि बलवान् हो वह यदि लग्न सप्तममेंसे वलवान राशिसे पृष्ट राशिस्थ होकर मेष मिथुनादि विपमराशिपर स्थित होवे तो वही ग्रह ब्रह्मा होता है। लग्नके पृष्ठ राशि सप्तमसे लेकर द्वादशपर्यंत होते हैं और सप्त- मके पृष्ठराशि लग्नसे लेकर पष्टपर्यंत होते हैं ॥ ४७ ॥ इसके अनन्तर अन्य प्रकारसे ब्रह्मयह कहते हैं ! ब्रह्मणि शनो पातयोर्वा ततः॥४८॥ यदि शनैश्वर ब्रह्मलक्षणयुक्त होवे अथवा राहु केतु ब्रह्मलक्षण.. युक्त होवें तौ शनैश्चर वाराहु केतुसे जो कि छठा ग्रह है वह ब्रह्मा होता १" स्वोच्च सग्रहे रिपुभावेशः प्राणी " ऐसा सूत्र होनेपर यह अर्थ निकलता है कि. आत्मकारकका उच्च राशि यदि ग्रयुक्त होवे तो आत्मकारकसे अष्टम द्वादश राशियों के स्वामियोंसे चली ग्रह महेश्वर होता है । २ लनसे द्वादश पुकादश दशम नयम अष्टम सप्तम ये राशि पृष्ठ हैं और सप्तमसे.पष्टः . पंचम चतुर्थ तृतीय द्वितीय लय ये राशि पृष्ठ हैं ।
.८६ जैमिनीयसूत्राणि। [अध्यायः २. है न कि शनैश्चरादिक । भाव यह है कि यदि शनैश्चर वा राहु केतु इनमेंसे कोई ब्रह्मयोगकारक हो तो ये ब्रह्मा नहीं होते किन्तु इनसे छठा ग्रह ब्रह्मा होता है ।। ४८ ॥ यदि कहो कि बहुत ग्रह ब्रह्मयोगकारक हो तो कौन ब्रह्मा होता है। इस शंकामे कहते हैं। बहूनां योगे स्वजातीयः॥४९॥ यदि बहुत ग्रह ब्रह्मयोगकारक हो तो उनमें जो कि आत्मका- रकजातीय अर्थात् अधिक अंशवाला ग्रह है वह ब्रह्मा होता है।॥४९॥ इस योगमें कुछ विशेप कहते हैं। राहुयोगे विपरीतम् ॥ ५० ॥ ब्रह्मसंज्ञक ग्रहके साथ यदि राहुका संयोग होवे तो विपरीत होता है। भाव यह है कि ब्रह्मसंज्ञक ग्रह राहुके साथमें होवे तो बहुतसे ब्रह्मयोगकारक ग्रहोंमें कम अंशवाला ग्रह ब्रह्मा होता है। इस कथनसे यह जनाया गया कि शनैश्चर राहु केतु इनमेंसे ब्रह्मयोग होनेपरमी ब्रह्मा नहीं हो सत्ता परन्तु राहुका ब्रह्मयोग होनेपर यदि बहुतसे ब्रह्मयोगकारक ग्रहोंके मध्यमें. राहु न्यूनांश होवे, ब्रह्मा हो सक्ता है ॥ ५० ॥ इसके अनन्तर अन्य प्रकारसे ब्रह्मग्रह कहते हैं। ब्रह्मा स्वभावेशो भावस्थः ॥५१॥ आत्मकारकसे अष्टमस्थानका स्वामी और आत्मकारकसे अष्टम स्थानपर स्थित हुआ ग्रह ब्रह्मा होता है. ॥५१॥ १ इस सूत्रको कोई आचार्य यह व्याख्या करते हैं कि आत्मकारकसे अष्टम राशिका स्वामी आत्मकारकसे अष्टममें स्थित होवे तो वह आत्मकारकसे अष्टम स्थानका स्थानी ब्रह्मा होता है । यह व्याख्या उचित नहीं क्योंकि इस स्त्रकी ऐसी व्याख्या होने "विवादे वली " यह सूत्र इसमें न घटनेसे यह स्त्र अयोग्य हो जावेगा क्योंकि मन्त- रको प्राप्त होनेसे पूर्वान्वितभी यह सूत्र नहीं है। दूसरे “बहूनां योगे " इस सूत्रसेही पूर्व शंका दूर होही चुकी है इससे मध्मैश और अष्टमस्य इन दोनोंमें एकको निर्वियाद ब्रह्मत्व होता है। तो १ पादः १ भाषाटीकासहितानि। यदि अष्टमेश अष्टमस्थ इन दोनोंमें भेद होवे तो कौन ब्रह्मा होता है इस शंकामें कहते हैं। विवादे बली ॥१२॥ यदि ब्रह्मलक्षणयुक्त दोनों ग्रहोंको ब्रह्मत्व होये तो उनमें जो कि वली है वह ब्रह्मा होता है अथवा समस्त ब्रह्मसंज्ञक तुल्यांश होवे तो विना ग्रहवाले राशिसे ग्रहवाला राशि और एक ग्रहवाले राशिसे हो ग्रहवाला राशि और दो ग्रहवाले राशिसे तीन ग्रहवाटा राशि वली होता है इस रीतिसे जो ग्रह वली होवे वह ब्रह्मा होता है ॥ ५२ ॥ इसके अनन्तर ब्रह्म महेश्वर दोनोंका बल कहते हैं। ब्रह्मणो यावन्महेश्वरदिशांतमायुः ॥५३॥ स्थिर दशामें ब्रह्मग्रहाश्रित राशिसे लेकर महेश्वराश्रित राशिकी दशापर्यन्त आयु होवे है । भाव यह है कि जिस राशिका ब्रह्मग्रह होवे उस राशिसे और आरम्भकरके जिस राशिका कि महेश्वर ग्रह है उस राशिकी स्थिरदशापर्यन्त आयु होवे है ॥ ५३॥ इसके अनन्तर महादशाभी मरणकारक जो कि अन्तर्दशा है उसको कहते हैं। तत्रापि महेश्वरभावेशत्रिकोणाब्दे ॥५४॥ जिस राशिका महेश्वर हो उस राशिकी स्थिर दशाभी जव कि महेश्वराधिष्ठित राशिसे अष्टम राशिके स्वामीका जो कि त्रिकोण नाम प्रथम पंचम नवमरूप राशि है उसका जब कि एक दो वर्षरूप अन्तर्दशाकाल होवे उसमें मरण होता है' ॥ ५४ ॥ इसके अनन्तर दो सूत्रोंसे मारकग्रहको दिखाते हैं। स्वकर्मचितारपुरोगनाथप्राणिमारकः ॥१५॥ - १. सूत्रमें अब्दशब्दका प्रयोग राशिंदशाके बारह वर्षके अभिप्रायसे किया गया है । यदि न्यूनसंख्याकर दशा होवे वौ वर्षसे न्यूनही अन्तर्दशाओंकेभी विषे लाना चाहिये ।
cc जमिनीयस्त्राणि । [अध्यायः २ आत्मकारकसे तृतीयः षष्ठ द्वादश अष्टम इन स्थानों के स्वामि- योंके मध्यमें जो कि बलवान होवे वही मारक ग्रह होता है और यदि सब ग्रह.समान बली हो तौ सबही ग्रह मारक होते हैं। यदि कहो कि बहुतसे ग्रह मारक हो तो किसकी दशामें मरण होता है तहां यह जानना कि अल्प मध्य दीर्घायुओंमें जिसका जहां जहां संभव होवे उसी राशिदशामें मरण होता है ॥ ५५ ॥ इसके अनन्तर मारकका फल कहते हैं। तहादशायां निधनम् ॥५६॥ जिस राशिका मारक ग्रह होवे अथवा जिस राशिका मारक ग्रह स्वामी होवे उसकी चरस्थिरादिरूप महादशामें मरण होता है॥५६॥ इसके अनन्तर मारकमहादशामें जो कि मरणकारक अन्तर्दशा है उसको कहते हैं। तत्रापि कालाद्रिपुरोगचित्तनाथापहारे ॥२७॥ मारकग्रहकी दशाभी आत्मकारकके सप्तमसे द्वादश अष्टम .. षष्ट " १ वहुधा मुख्यताकर आत्मकारकसे पठेशही भारक होता है। यहां वृद्धोनभी कहा " पष्ठाष्टमेशा भवतो मारकावटमेश्वरः। प्रायेण मारको राशिदशास्वत्राविशेषतः ॥ फन्भे पापायष्टे पष्टेशो मुख्यमारकः । पाठविकोणको वापि मुख्यमारक इप्यते ॥ म. ध्यापि मातः पाठदशायामष्टमस्य यां । पष्ठत्रिकोणस्य पुनर्दीचील्पविषये भवेत् ॥ पष्टे व.. लयुते तस्य विकोणे मृत्तिमादिशेत् । पशश्वेदलान्यः स्यात्तत्रिकोणे मृति वदेत् । व्य-: यस्थय समस्तापि कारकादिदशास्वपि । बलिनः शुक्रशशिनार्याहा भष्टाष्टमादिकम् ॥ अर्थ-यदि पटेश अष्टमेश दोनों मारक हौवें तो बहुधाकर अष्टमेशही मारक होता है । यदि पाष्टराशि अधिक पाप ग्रहोसे युक्त होवे तो मुख्यतासे पष्टेश मारक होता है अ. थवा पठेस त्रिकोणस्थानपर स्थित मां ग्रहभी मारक होता है। यदि मध्यायु होवे तौ पाठ अथवा अष्टमराशिकी दशामें मरण होता है और दीर्घायु वा अल्पायु होवे नौ पष्ट राशिसे त्रिकोण नाम प्रथम पंचम नवम राशिकी दशामें मरण होता है। यदि पष्ठराशि वलयुक्त होवे तो उसके त्रिकोणराशिमें मरण कहे और यदि बटेश. बलवान् होवे तौ पष्ठेशसे त्रिकोणराशिमें मरण कहे । लमसप्तममें जो बकी होवे उससे षष्ठ अष्टमादिक ग्रहण करने चाहिये यही समस्त व्यवस्था कारकादिदशाबोंमें भी होने ॥ ..
पादः२.] भाषाटीकासहितानि स्थान इनके स्वामियोंके मध्यमें जो वलवान होवे उसका जब अन्त- देशाकाल आवे उसमें मरण होता है' ॥ ५७ ॥ इति श्रीजैमिनीयसूवद्वितीयाध्याये श्रीनीलकंठीयतिलकानुसृतभाषा- टीकायां श्रीपाठकमंगसेनात्मजकाशिरामकृतायां प्रथमः पादः समाप्तः१ अथ द्वितीयपादः। इसके अनंतर पित्रादिकोका मरणकाल जतानेके लिये पित्रादिकारकको कहते हैं। रविशकयोः प्राणी जनकः ॥१॥ सूर्य और शुक्र इन दोनों के मध्यमें जो बलवान होवे वह पि- कारक होता है ॥ १॥ चंद्रारयोर्जननी ॥२॥ चंद्रमा मंगल इन दोनोमें जो कि वली होवे वह मातृकारका होता है ॥२॥ अप्राण्यपि पापदृष्टः ॥३॥ सूर्य शुक्र और चंद्र मंगल इनके मध्यमें जो निर्वली हो वह यदि पापग्रहने देखा होरे यथाक्रम पितमातृकारकताको प्राप्त १ यहांपर वृद्धाने विशेष कहा है। चरे चरास्थिरबन्दा इति यो राशिरागतः।.स एव मारको राशिर्भवतीति विनिर्णयः ॥ बहुराशिसमावेशे वलवान् मारकः स्मृतः ॥ अर्थ-रमेश अष्टमेश तथा लमचंद्र तथा लग्रहोरा यह दो दो आयुर्दायकारक जिस राशि- पर स्थित होव वह राशि मारक होता है और यदि वह राशि बहुतसे होवें सौ विना ग्रहके राशिसे ग्रहयुक्त राशि और एक ग्रहयुक्त राशिसे दो ग्रहयुक्त राशि बली होता है, इस रीतिसे जो राशि बली होवे वह मारक होता है। उस मारकराशिका स्वामी - जिस राशिपर स्थित हैवि उस राशिको दशामें मरण होता है और अन्य ऐसा कहते है। "चर इत्यादिनायुयंत्तत्समास्युचितो भवेत् । योराशिः स तु विज्ञेयो मारकः सूत्रसंमतः ॥ अर्थ-"चरे चरस्थिरदाः " इस श्लोकसे. जो कि आयु आया है. वह दीर्घमध्या स्परूप आयु जिस राशिमें समाप्त नव वही राशि मारक होता है । .
जैमिनीयसूत्राणि। [अध्यायः २.. होता है । भाव यह है कि सूर्य शुक्र इन दोनों में जो कि निर्वली होने वह यदि पापग्रहने देखा हो तो पितृकारक होता है और चंद्रमा मंगल इन दोनों में जो कि निर्वली होवे वह यदि पापग्रहने देखा होवे तो मातृकारक होता है ॥३॥ इसके अनंतर बली पितृमातृकारकका फल कहते हैं। प्राणिनि शुभदृष्टे तच्छूले निधनं मातापित्रोः॥ १॥ वली पितृकारक अथवा वली मातृकारक शुभ ग्रहने देखा होवे दो जिस राशिपर पितृकारक वा मातृकारक स्थित होवे उस राशिसे त्रिकोणराशिकी दशामें पिता और माताका मरण जानना ॥ ४॥ तद्भावेशे स्पष्टवले ॥६॥ तच्छूल इत्यन्ये ॥६॥ वली हो अथवा निर्वली हो ऐसे दोनों प्रकारके पितृमातृकारको अष्टम स्थानका स्वामी पितृमातृकारकसे अधिक वली अर्थात अधि- कांश हो तो जिस राशिका अष्टमेश होवे . उस राशिसे त्रिकोण नाम प्रथम पंचम नवम राशिकी दशामें पितृमातृका मरण जानना . ऐसा अन्य आचार्य कहते हैं। पितृकारकसे ऐसा योग होवे तो पिताका मरण और मातृकारकसे ऐसा योग होवे तो माताका मरण जाने ॥ ५॥६॥ आयुषि चान्यत् ॥ ७॥ पितृआदिकोंके आयुके विचार किये जानेपर पितृआदिकोका कारक और अन्य प्रकारसे कहे हुए निर्याणशूलदशादिककाभी विचार करना चाहिये ॥७॥ इसके अनंतर पितृमरणमें विशेष कहते हैं। अर्कज्ञयोगे तदाश्रये लग्नमेषदशायां पितुरित्येके ॥ ८॥ लग्नसे क्रिय नाम बादशराशि वह होवें है जो कि सूर्यदुधाश्रय १"तद्भावेश पटवले " इस स्त्रमें जो कि " अधिबले पदके ,जगह " स्पष्ट चले " ऐसा पद कहा है उससे मंशाधिक बळ ग्रहण करना चाहिये।
९१ -- पाद २:] भाषाटीकासहितानि । अर्थात् सिंह मिथुन कन्या है और उसमें सूर्य और बुधका योग हो तो लग्नसे पंचम राशिकी दशामें पिताका मरण होता है ऐसा कोई आचार्य कहते हैं। भाव यह है कि लग्नसे द्वादश सिंह मिथुन! कन्यामसे कोई हो और उसमें सूर्य बुध इन दोनोंका योग होवे तो लग्नसे पंचम राशिकी दशामें पिताका मरण होता है॥८॥ इसके अनन्तर बाल्यावस्थामही मातापिटके मरणयोगको कहते हैं। व्यर्कपापमात्रदृष्टयोः पित्रोः प्राग्द्वादशाब्दात् ॥९॥ बली हो अथवा निर्वली हो ऐसे दोनों प्रकारके पितमातृकारक यदि सूर्यवर्जित अन्य पापग्रहमाउने देखे होवें तो बारह वर्षसे पूर्वही पितृमातृका यथाक्रम मरण होता है। भाव यह है कि बी वा निर्वली पितृकारक सूर्यवर्जित पापग्रहमात्रने देखा हो तो पिताका मरण होता है और वली वा निर्मली मातृकारक सूर्यवजित पापग्रह- मानने देखा हो तो माताका मरण होता है और सूर्य वा शुभ ग्रहकी दृष्टि होवे तो यह योग नहीं होता है ॥ ९ ॥ इसके अनन्तर स्त्रीमरणकाल कहते हैं । गुरुशूले कलचस्य ॥१०॥ जिस राशिपर बृहस्पति स्थित होवे उस राशिसे त्रिकोणराशिकी दशामें स्त्रीका मरण होता है ॥ १० ॥ इसके अनन्तर पुत्रमातुलादिकोकाभी मरणकाल कहते हैं। तत्तच्छूले तेषाम् ॥११॥ पुत्रमातुलादिकारक जिस २ राशिपर स्थित होवें उसी र राशिसे. त्रिकोणराशिकी दशामें पुत्रमातुलादिकोंका. मरण होता है ॥ ११ ॥ इसके अनन्तर मरणमें शुभाशुभ भेद दिखाते हैं। कर्मणि पापयुतदृष्टे दुष्टं मरणम् ॥ १२॥ १" अझयोगे तदाश्रय क्रिये लमे मेपदशायर्या पितुरित्येके ? यदि ऐसा पाठ होस जो यह अर्थ हुआ यदि क्रियनाम मेषराशि सूर्य बुध इन दोनोंके योगसे युक्त होकर अमें होवे तो मेपराशिकी दशामें पिताका मरण होता है। ।
- - ९२ जैमिनीयसूत्राणि। [ अध्यायः २. उनसे अथवा कारकसे तृतीय स्थान पापग्रहकर युक्त होवे अथवा पापग्रहने देखा हो तो दुष्ट मरण होता है ।। १२ ॥ शुभं शुभदृष्टियुते ॥ १३ ॥ लनसे अथवा कारकसे तृतीय स्थान शुभ ग्रहसे युक्त होवे अथवा शुभ ग्रहने देखा होवे तो शुभ मरण होता है। अग्निसे जलसे गिर- नेसे बन्धनादिसे जो मरण होता है वह दुष्ट कहाता है और. ज्वरा- दिरोगसे जो मरण होता है वह शुभ कहाता है ॥ १३ ॥ मित्रेमिश्रम् ॥१४॥ यदि लय वा कारकसे तृतीय स्थानपर शुभ अशुभ दोनोंकी दृष्टि अथवा योग होवे तो शुभाशुभरूप मरण होता है ॥ १४ ॥ आदित्येन राजमूलात् ॥ १५॥ यदि लग्न वा कारकसे तृतीय स्थानपर सूर्यका योग वा दृष्टि होते तो राजाके निमित्तसे मरण होता है ।। १२ ।। चंद्रेण यक्ष्मणः ॥१६॥ यदि लग्न वा कारकसे तृतीय स्थान चन्द्रमासे युक्त वा देखा गया हो तो क्षयरोगसे मृत्यु होता है. ॥ १६ ॥ कुजेन व्रणशस्त्राग्निदाहाद्यैः ॥ १७॥ दि लग्न वा कारकसे तृतीय स्थान मंगलसे युक्त वा देखा गया जो व्रण शस्त्र अग्निदाहादिसे मरण होता है ॥ १७ ॥ . शनिना वातरोगात् ॥ १८॥ यदि लग्न वा कारकसे तृतीय स्थान शनिसे युक्त वा देखा गया हो तो वातरोगसे मरण होता है ।।.१८ ॥ मंदमांदिभ्यां विषसर्पजलोधनादिभिः ॥ १९ ॥ यदि लग्न वा कारकसे तृतीय स्थान. शनैश्चर और गुलिकसे पादः २.]. भाषाटीकासहितानि । युक्त वा देखा गया हो तो विप सर्प जल बन्धनादिकसे मरण होता है ॥ १९॥ केतुना विषूचीजलरोगाद्यः ॥२०॥ लम वा कारकसे तृतीय स्थान केतुसे युक्त वा देखा गया हो तो विपूचिका जलरोगादिकांसे मरण होता है ॥ २० ॥ चंद्रमादिभ्यां पूगमदानकवलादिभिः क्षणिकम् ॥२१॥ यदि लग्न वा कारकसे तृतीय स्थान चन्द्र और गुलिकसे युक्त वा दृष्ट हो तो सुपारी मद तथा अन्नग्रासादिसे शीघ्रही मरण हो जाता है ।। २१ ॥ गुरुणा शोफाऽरुचिवमनायेः ॥२२॥ यदि लग्न या कारकसे तृतीय स्थान बृहस्पतिसे युक्त वा दृष्ट होवे तो शोक नाम सूजन और अरुचि और वमन इत्यादिकसे. मरण होता है ।। २२ ॥ शुक्रेण महात् ॥ २३॥ यदि लग्न वा कारकसे तृतीय स्थान शुक्रसे युक्त वा दृष्ट होवे तो प्रमेहरोगसे मृत्यु होता है ॥ २३ ॥ मिश्रेमिश्रात् ॥२४॥ यदि लन वा कारकसे तृतीय स्थानपर अनेक ग्रहोंका योग वा दृष्टि होवे तो अनेक रोगोंसे मरण होता है ॥ २४ ॥ चंद्रग्योगानिश्चयेन ॥ २५ ॥ यदि लग्न वा कारकसे तृतीय स्थानपर जिस ग्रहका योग अ- थवा दृष्टि होवे और तहां चन्द्रमाकाभी योग वा दृष्टि होवे तो अव- श्यही उसी ग्रहके रोगसे मरण कहना चाहिये । इस कथनसे यह सिद्ध हुआ कि तृतीय स्थानपर चन्द्रमाका योग वा दृष्टि न होवे १ गुलिकके स्पष्ट करने का विधान प्रथमाध्यायकै द्वितीयपादसंबन्धि उन्तीसवें सू. की टिप्पणीमें लिख आये हैं।
जैमिनीयस्त्राणि ।। [अध्यायः २.. तो जिस ग्रहसे कि तृतीय स्थान युक्त वा दृष्ट है उस ग्रहके रोगसे मरणमें संदेह रहता है ॥ २५ ॥ इसके अनंतर मरणमें देशभेदको दिखाते हैं। शुभैः शुभे देशे ॥२६॥ यदि लग्न वा कारकसे तृतीय स्थानपर शुभ ग्रहोंका योग और दृष्टि होवे तौ काश्यादि पुण्यभूमिमें मरण होता है ॥ २६ ॥ पापैः कीकटे ॥२७॥ यदि लग्न वा कारकसे तृतीय स्थानपर पापग्रहोंका योग दृष्टि होवे तो मगधादि पाप देशमें मरण होता है और यदि शुभ पाप अह दोनोंका योग और दृष्टि होवे तौ न काश्यादि शुभ देशमें और न मगधादि पाप देशमें किन्तु सामान्य देशमें मरण होता है ।। २७ ।। गुरुशुक्राभ्यां ज्ञानपूर्वम् ॥२८॥ यदि लग्न वा कारकसे तृतीय स्थान बृहस्पति शुक्र इन दोनोंसे युक्त वा देखा गया हो तौ ज्ञानपूर्वक मरण होता है अर्थात मरण- समय बुद्धि यथावत् रहती है ॥ २८ ॥ अन्यरन्यथा ॥२९॥ यदि लग्न वा कारकसे तृतीय स्थान बृहस्पति शुक्रको त्याग अन्य किसी ग्रहसे युक्त वा दृष्ट होवे तो अज्ञानपूर्वक मरण होता है। अर्थात् मरणसमय बुद्धि नहीं रहती है ॥ २९ ॥ लेपजनयोर्मध्ये शनिराहकेतुभिः पित्रोन संस्कर्ता ३० लग्न और द्वादश स्थान इन दोनों के मध्यमें शनैश्चर राहु अथवा . शनैश्वर केतु ये दोनों ग्रह होवें तौ मातापिताका दाहादिरूप संस्कार करनेवाला नहीं होता है ॥ ३०॥ लेपादि पूर्वार्दै जनकाद्यपरादें ॥३१॥ लग्नसे आदि लेकर प्रथमके छ: भावोंमें और बादश स्थानसे आदि लेकर पिछले छ. मावोंमें राहु शनैश्वर अथवा केतु शनैश्चर 4 .
पादः ३.] भापाटीकासहितानि । ९५.. ये दोनों विद्यमान हो तो क्रमसे माता पिताके दाहादिरूप संस्कार करनेवाला नहीं होता है । भाव यह है कि लग्नसे आदि लेकर छ: भावोंमें शनैश्चर राहु अथवा शनैश्चर केतु ये दोनों विद्यमान होवें नौ माताके दाहादिरूप संस्कार करनेवाला नहीं होता है और सप्तमसे आदि लेकर छः भावोंमें शनि केतु विद्यमान होवें तौ पिताके दाहा- दिरूप संस्कार करनेवाला नहीं होता है' ॥ ३१ ॥ शुभहग्योगान ॥३२॥ यदि लग्नसे लेकर छ: भावोंमें और बादश स्थानसे लेकर पिछले छ: भावोंमें शुभ ग्रहोंकी दृष्टि और योग होवे तो यह कहा हुआ योग नहीं होता है किन्तु मातापिताके दाहादिरूप संस्कार करने- वाला होता है ।। ३२॥ इति श्रीजमिनीयमूत्रद्वितीयाध्याये श्रीनीलकंठीयतिलकानुसृतभाषा- टीकायां श्रीपाठकमंगलसेनात्मजकाशिरामकृतायां द्वितीयपादः समाप्तः ॥२॥ अथ तृतीयपादः। इसके अनन्तर दशाभेद वलभेद कहते हैं तिसमेंभी प्रथम नवांशदशाको कहते हैं। विपमे तदादिर्नवांशः ॥ १॥ अन्यथाऽऽदादिः ॥२॥ यदि विषम लग्न होवे तौ लग्नसे आदि लेकर नवांशदशा होवें है और अन्यथा अर्थात् समराशि लग्नमें होवे तौ आदर्शादि नाम सप्तम राशिसे आदि लेकर नवांशदशा होवे है इस नवांश- १ शङ्का-शनैश्चर राहु केतु इन तीनोंका एक जगह होना क्यों नहीं कहा है क्योंकि मुबर्मे तो “शानिराहुकेतुभिः " ऐसा पद कही है.। समाधान-राहु केतकी स्थिति एक जगह नहीं हो सक्ती इससे तीनोंका एक जगह होना नहीं कहा ॥
. जैमिनीयसूत्राणि। [अध्यायः २. ९६ दशाम प्रत्येक राशिके नौ नौ वर्ष होते हैं इसीसे इसका नाम नवां- शदशा जानना ॥ १॥२॥ शशिनंदपावकाः क्रमादन्दाः स्थिरदशायाम् ॥३॥ स्थिर दशामें चर स्थिर द्विस्वभाव राशियोंके क्रमसे सात व आठ व नौ वर्ष होते हैं अर्थात् मेष कर्क तुला मकर इनके सात २ वर्ष होते हैं, वृष सिंह वृश्चिक कुम्भ इनके आठ आठ वर्ष होते हैं, मिथुन कन्या धनु मीन इनके नौ नौ वर्ष होते हैं ॥ ३॥ इसके अनन्तर स्थिरदशाका आरम्भस्थान कहते हैं। ब्रह्मादिरेषा ॥४॥ जिस राशिपरब्रह्मग्रह स्थित होवे उस राशिसे आरम्भ करके यह स्थिरदशा प्रवृत्त होती है ॥४॥ अथ प्राणः॥५॥ इसके अनन्तर बलाधिकारमें राशियोंका बल कहा जाता है ॥५॥ कारकयोगः प्रथमो भानाम् ॥६॥ राशियोंका प्रथम बलकारक योग होता है अर्थात् विना ग्रह- वाले राशिसे ग्रहवाला राशि बली होवे है ॥६॥ साम्ये भूयसा ॥७॥ यदि दोनों जगह ग्रहयोगकी समानता होवे तो बहुतसे ग्रह- योगकरके राशियोंका वल होता है अर्थात् थोडे ग्रहवाले राशिसे बहुत ग्रहवाला राशि बली होता है ॥ ७ ॥ ततस्तुंगादिः ॥८॥ यदि ग्रहोंकी बाहुल्यताभी बराबर होवे तो उच्चादियोग राशि- १ यहां आदर्शशब्दका अर्थ संमुख है लास संमुख सप्तमराशिही होता है। " स्थिर राशेः पठराशिश्वरस्याष्टम एंव सः। द्विस्वभावस्य राशिस्तु सप्तमः सम्मुखो मतः ॥ अर्थ-स्थिरराशिका कर राशि और चरराशिका अष्टमरामि और द्विस्वभाव राशिका सप्तम राशि सम्मुख होता है ऐसा जो कि पंथोंने कहा है सो यहां नहीं हो सकता क्योंकि यह पंथवचन भिविषममेंही है कि अन्य विषयमें ।। ":
पादः ३.] भाषाटीकासहितानि । योंका बल होता है अर्थात् दोनों जगह ग्रह वरावर स्थित हो तौ जिस राशिपर उच्चका अथवा स्वराशिका वा. मित्रगृहका ग्रह स्थित हो वह राशि वली होता है ॥ ८॥ इसके अनन्तर राशियोंका निसर्ग बल कहते हैं। निसर्गस्ततः॥९॥ उच्चादि वलके अनन्तर निसर्गबल ग्रहण करना चाहिये । भाव यह है कि यदि दोनों जगह उच्चस्थ वा स्वगृहस्थ वा मित्रगृहस्थ ग्रह विद्यमान होवे तो चरसे स्थिर और स्थिरसे द्विस्वभाव इस रीतिसे जो कि राशि बली हो वह ग्रहण करना चाहिये ॥९॥ तदभावे स्वामिन इत्थंभावः ॥ १० ॥ जिस राशिका यह कहा हुआ कारकयोगादिनल न होवे तो उस राशिके स्वामीकाही यह कारकयोगादिवल ग्रहण करना चाहिये अर्थात् जिस राशिका स्वामी बली होता है वह राशिभी चली होता है ।। आयायतोऽत्र विशेषात् ॥ ११॥ यदि एक राशिपर बहुतसे ग्रह विद्यमान हों और उन ग्रहोंका राश्यादिकवलभी समान होवे तो उन ग्रहोंमें जो कि आनायत नाम अग्रगामी अर्थात् अधिक अंशवाला हो वह विशेषकर इस ग्रंथमें वली होता है ॥ ११॥ प्रातिवेशिका पुरुषे ॥१२॥ विषमराशिमें पार्श्ववर्ती ग्रह अपने बलके करनेवाला होता है। 'भाव यह है कि विषमराशिसे द्वितीय और द्वादश स्थानपर जो कि ग्रह स्थित हो वह अपने बलको उसी विषमराशिमें देता है ॥ १२॥ १ यहां वृद्धवचनभी है । " अग्रहात्सग्रहो, ज्यायान सग्रहेष्वधिकग्रहः । साम्ये चर- स्थिरद्वन्द्वार क्रमात्स्युर्वेलशालिनः ॥” अर्थ-विना ग्रहवालेसे ग्रहवाला और ग्रहवालेसे आधिक ग्रहांला राशि बली होता है और यदि इस प्रकारभी समानता होवे तो चरसे स्थिर और स्थिरसे द्विस्वभाव बळी होता है । १ - .९८ जैमिनीयमंत्राणि । [अध्याय:२. इति प्रथमः ॥ १३॥ इस प्रकारसे राशियोंका प्रथम वल कहा है ॥ १३ ॥ स्वामिगुरुज्ञहग्योगो द्वितीयः ॥ १४॥ स्वामीका योग और वृहस्पतिका योग और बुधका योग यह एक २ बारह राशियोंका बल होता है और स्वामीकी हार और बृहस्पतिकी दृष्टि और बुधकी दृष्टि यह एक २ वारह राशियोंका वल होता है । इस प्रकार जो कि छः वल हैं वह राशियोंका द्वितीय वल कहाता है । भाव यह है कि जिस राशिंपर स्वामी बहस्पति बुध इनका योग या दृष्टि होवे तो वह राशि बली होता है।॥ १४ ॥ स्वामिनस्तृतीयः ॥१५॥ जो कि राशिके स्वामीका बल है वह राशिका वतीय कल कहा है ।। १५ ॥ इसके अनन्तर स्वामीका बलावल दिखाते हैं। स्वात्स्वामिनः कंटकादिष्वपारदौर्बल्यम् ॥१६॥ आत्मकारकसे केंद्र पणफर आपोक्किम इन स्थानों के विषे स्वामीकी क्रमसे अपारनाम शून्य एक द्विगुण दुर्वलता होवे है। भाव यह है कि आत्मकारकसे प्रथम चतुर्थ सप्तम दशम इन स्थानों में जिस राशिका स्वामी स्थित हो वह राशि और स्वामी पूर्ण वली होते हैं और आत्मकारकते द्वितीय पंचम सप्तम एकादश इन स्थानों- पर जिस राशिका स्वामी स्थित होवे वह राशि और सामा अई- बली होते हैं और आत्मकारकसे तृतीय षष्ठ नवम द्वादश इन स्थानोंपर जिस राशिका स्वामी स्थित होवे वह राशि और स्वामी दुर्बल होता है ॥ १६ ॥ १ "द्वितीये भाववलं चरनवांश " इस अगले स्त्रमें जो कि भावाल ग्राह्य का यहां स्पष्ट किया है। २" अपार " इस शब्दका अर्थ कटपयादिसंख्याके अनुसार हैं । कटपयादि संख्यामें स्वर शन्य माना जाता है इससे प्रकारका अन्य थय लेनेसे दुर्बलताकी झ. ।
९९ " पाद ३.] भाषाटीकासहितानि । चतुर्थतः पुरुषे ॥१७॥ चतुर्य बलसेभी विषम राशिमें वल होता है। भाव यह है कि पापग्योगस्तुंगादिग्रहयोगः" इस सूत्रमें जो कि चतुर्थ बल कहा है उस बलसे विषमराशिही बली होता है ॥ १७ ॥ इसके अनन्तर निर्याणशूलदशा कहते हैं। पितृलाभप्रथमपाण्यादिशुलदशानिर्याणे ॥ १८॥ लग्न और सप्तम इन दोनों में जो कि प्रथम बली होवे उससे आरम्भ करके जव कि लग्न सप्तमसंबन्धी उसी बली राशिसे प्रथम पंचम नवम राशिकी दशा आवे तब मृत्यु होता है। इस निर्याण- शूलदशामें प्रत्येक राशिके नौ २ वर्ष ग्रहण करने चाहिये ।। १८ ॥ इसके अनन्तर पिताकी निर्याणशूलदशा कहते हैं। पितृलाभपुत्रः प्राण्यादिः पितुः ॥१९॥ लग्नसे और सप्तमसे जो कि नवम राशि है उन दोनों नवम राशियोंमें जो कि बलवान् होवे उससे आरम्भ करके जब कि लग्ना- सप्तमके वली नवम राशिसे प्रथम पंचम नवम राशिकी दशा आवे नव पिताका मृत्यु होता है ॥ १९ ॥ इसके अनन्तर माताकी निर्याणशूलदशा कहते हैं। आदादिर्मातुः ॥२०॥ लग्नसे और सप्तमसे जो कि चतुर्थ राशि है. उन दोनोंमें जो कि नता प्राप्त हुई अर्थात् पूर्ण वल रहा और आकारकी संख्या एक है इससे पाकारका एक अर्थ लेने से दुर्बलता एकगुणी रही अर्थात् अर्द्ध चल रहा और रकारको संख्या दो है इससे रकारकी दो संख्या लेनेसे दुर्बलता दोगुणी रही अर्थात् बलकी शून्यता रही ॥ कोई आचार्य इस स्वका यह अर्थ करते हैं कि विषमराशिमें चतुर्थ वल है सो यह मर्थ योग्य नहीं क्योंकि ग्रंथकारका ऐसा- अभिप्राय होता नै " चतुर्थः पुरुष ऐसा सूत्र होता तस्प्रत्यय न होना । यदि कहो कि चतुर्थ वल कौनसा है इस शंकाके हर करनेको " इति चत्वारः " ऐसा माग कहेगे । यदि कहो कि फिर वह बल यहाँही क्यों नहीं. कहा ? तहां जानना कि चतुर्थ बलका इस समय उपयोग नहीं इससे उप- योगी वल कहकर कुछ दशाओंको दिखाय आंगे कहगे ।
१०० जैमिनीयसूत्राणि। [अध्यायः.२. बली होवे उससे आरम्भ करके जव कि लग्न सप्तमके बली चतुर्थ राशिसे प्रथम पंचम नवम राशिकी दशा आवे तव माताका मृत्यु होता है ॥२०॥ इसके अनन्तर भ्राताकी निर्याणशूलदशा कहते हैं। कादिर्धातुः ॥२१॥ लग्नसे और सप्तमसे जो कि.तृतीय राशि है उन दोनों वतीय राशियोंमें जो कि बली होवे उससे आरम्भ करके जव कि लम सप्तमसे बली तृतीय राशिसे प्रथम पंचम नवम राशिकी दशा आवे तब भ्राताका मृत्यु होता है ॥ २१॥ इसके अनन्तर भगिनी पुत्र इन दोनोंकी निर्याणशू- लदशा कहते हैं। मात्रादिर्भगिनिपुत्रयोः ॥२२॥ लग्नसे और सप्तमसे जो कि पंचम राशि है उन दोनों पंचम- राशियोंमें जो कि बली होवे उससे आरम्भ करके जब कि लन सप्तमके बली पंचम राशिसे प्रथम पंचम नवम राशिकी दशा आवे तब बहिनी और पुत्र इन दोनोंका मरण होता है ॥ २२ ॥ इसके अनन्तर ज्येष्ठ भ्राताकी निर्याणशूलदशा कहते हैं। व्ययादिज्येष्ठस्य ॥२३॥ लग्नसे और सप्तमसे जो कि एकादश राशि है उन दोनों एका- दश राशियोंमें जो कि बली होवे उससे आरम्भ करके जब कि लग्न सप्तमके बली एकादश राशिसे प्रथम पंचम नवम राशिकी दशा आवे तब बडे भ्राताका मरण होता है ॥ २३॥ इसके अनन्तर पितृवर्गकी निर्याणशूलदशा कहते हैं। पितृवपितृवर्गः ॥२४॥ लग्नसे और - सप्तमसे जो कि नवम राशि है उन दोनों नवम राशियोंमें जो कि बली है उससे आरम्भ करके जब कि लम सप्त- मके बली नवमराशिसे ११५१९ राशिकी दशा आवे तव पिह- १०॥ पादः ३.] भाषाटीकासहितानि । बर्ग नाम पितृव्यादिकोंका मरण होता है । इस निर्याणशूलंदशाम सब जगह प्रत्येक राशिके नौ २ ही वर्ष होते हैं ॥ २४ ॥ इसके अनन्तर ब्रह्मदशा कहते हैं। ब्रह्मादिपुरुषे समा दासांताः ॥ २९॥ जन्मलग्न विषम होवे तो जिस राशिमें ब्रह्मग्रह स्थित होते उससे आरम्भ करके ब्रह्मदशा प्रवृत्त होते है। ब्रह्मदशामें प्रत्येक राशिके वर्ष के होते हैं जो कि,राशिसे अपने छठे स्थानके स्वामी- तक संख्या है। भाव यह है कि अपनेसे जितनी संख्यापर अपने छठे स्थानका स्वामी स्थित हो उतने वर्ष राशिके ब्रह्मदशामें होते हैं ॥ २५॥ स्थानव्यतिकरः ॥२६॥ यदि जन्मलग्न विषम होवे तो जिस राशिपर ब्रह्मयह स्थित होवे उससे आरम्भ करके क्रमसे अन्य राशियोंकी दशा होवे है और यदि जन्मलग्न सम होवे तो जिस राशिपर ब्रह्मग्रह स्थित होरे उससे जो कि सप्तम राशि है उसकी प्रथम दशा तत्पश्चात् उल्टे क्रमसे अन्य राशियोंकी दशा होवे है । भाव यह है कि लग्न विषम होवे तो ब्रह्माश्रित राशिसे क्रमानुसार और सम लग्न होवे. तो ब्रह्मसप्तमराशिसे व्युत्क्रमानुसार दशा लाई जावे है ॥ २६ ॥ इसके अनन्तर चतुर्थ बल कहते हैं। पापडग्योगस्तुंगादिग्रहयोगः ॥२७॥ पापग्रहोंकी दृष्टि और योग राशिका बल होता है, और अपने उच्च तथा मूल त्रिकोण तथा स्वराशि तथा अतिमित्रराशि तथ : १ शंका-दासशब्दकरके पष्ठराशिके स्वामीका कैसे ग्रहण किया है । क्योंकि कटप- यादि संख्याद्वारा दासशब्द पष्ठकाही वाचक है ।' समाधान-षष्ठराशिपर्यन्तही सव राशियों के वर्ष लानेमें वहत्तार वर्षसे कपर वर्ष नहीं आ सक्ते इससे दासान्तंशब्दका महस्वाम्यन्त ऐसा अर्थ योग्य हैं। शंका यदि कहीं कि समस्त राशियोंके वर्म लाने में ब्रह्मानित राशिसंही गणना होवे है ऐसा अर्थ इस सूत्रका होना चाहिये । समाधान- पदि ऐसा सत्रार्थ होता तो " पुरुषे ब्रह्मादिसमा दासान्ताः" इस प्रकार संघ होता । - १०२ जैमिनीयस्त्राणि । [ अध्यायः २. मित्राशि इनपर स्थित हुए. शुभग्रहका योगभी राशिका बल होता है ॥ २७ ॥ इसके अनन्तर प्रथमाध्यायमें वर्ष लानेमात्र कही हुई चरदशामें क्रमव्युत्क्रम भेद कहते हैं। पंचमे पदक्रमात्प्राक्प्रत्यक्त्वम् ॥२८॥ मेषराशिसे तीनं २ राशियोंका एक २ पद होता है इस प्रकार बारह राशियोंके चार पद होते हैं । प्रथम मेषादि विषम पद, द्वि- तीय कोदि सम पद, तृतीय तुलादि विषम पद, चतुर्थ मकरादि समं पद है । यदि लमसे नवम स्थानमें विषमपदसम्बधी राशि होवे तो क्रमसे दशा रक्खे और यदि लग्नसे नवम स्थानमें सम पद. सम्बन्धी राशि होवे तो उलटे क्रमसे दशा रक्खे; चरदशामें दशाके आरम्भका अवधि लग्नही है चरदशा वर्ष तो नाथान्ताः समाः प्रायेण" इस सूत्रद्वारा पहिले कह आये हैं । क्रमव्युत्क्रमभेद, नहीं कहा था सो अब कह दिया ॥ २८॥ चरदशायामत्र शुभः केतुः ॥२९॥ इस चरदशामें केतु शुभग्रह माना जाता है. अर्थात् केतु शुभ फलदायक होता है ॥ २९॥ इति श्रीजैमिनीयसूत्रद्वितीयाध्याये श्रीनीलकंठीयतिलकानुसृतभाषाटीका यां श्रीपाठकमंगलसेनात्मजकाशिरामकृतायां तृतीयपादः समाप्तः ॥३॥ १शका-तुंगादि और ग्रहयोग इन दोनोंका विभाम करके जो कि पंथोंने तुंगादि बल ओर महयोगवल पृथक् ग्रहण किया है सो यह पैयवच्न योग्य नहीं क्यों क "पापग्योग० " इस सूत्रद्वारा जो कि पापयोगबल कहा सो " ग्रहयोगः" इसी पदसेही उस अर्थका तो लाभ होनेसे पापदृक् इस शब्दके अगार योगशब्दका प्रयोग करना तय हो जायगा । तिससे यह भाव हुआ कि पापग्रह कहींभी स्थित हो उनके रोयमें राशिका बल होता है और शुभग्रह जब कि, उच्चादिमें स्थित होये तब उन योगमें राशिका बल होवेगा इस प्रकार चार कारकयोग हैं तीनं तौ पहिले कह बह एक चतुर्थ है ।
पादः ४.]. १०१ मापाटीकासहितानि । अथ चतुर्थपादः। • - .. द्वितीयं भावबलं चरनवांशे ॥३॥ चरराशिकी नवांशदशामें द्वितीयमाववल फलादेशके लिये ग्रहणं करना चाहिये। भाव यह है कि “स्वामिगुरुज्ञग्योगो दिनीयः" इस सूत्रमें जो कि द्वितीयराशिवल कहा है वह चरराशिकी नशंशद- शामें फल कहनेके लिये ग्रहण करने योग्य है ॥ १ ॥ इसके अनन्तर द्वारराशि और बाह्यराशि इन दोनोंको दिखाते हैं। दशाश्रयोद्वारम् ॥२॥ जिस कालमें जिस राशिकी चरस्थिरनामसे दशा होवे वह दशा- श्रय राशिद्वार कहाता है और उसीको पाकराशिभी कहते हैं ॥ २॥ ततस्तावतिथं पाह्यम् ॥३॥ लग्नसे जितनी संख्यापर द्वारराशि होवे उस द्वारराशिसे उतनीही संख्यापर · वाह्यराशि होता है उस बांझराशिको भोगराशिभी कहते हैं ॥३॥ १ जन्मकालमें जिस राशिसे प्रयमकी दशाका प्रारम्भ होता है, वह राशिही लम- शब्दसे यहां ग्रहग करना चाहिये या तौ जन्मलनही हो वा सप्तमराशि हो अथवा ब्रझमहावित राशि हो इनमेंसे जहां जिसका. योग होवे वही दशा आरम्मकी राशि वापराशिका अवधि होता है न कि केवल प्रसिद्ध लमही और यदि जन्मलमही पाक- । राशिका अवधि माना जावेगा तो " स एव भोगराशिश्च पर्याये प्रथमे स्मृतः ।" यह वाक्य-नहों लोगा क्योंकि जहां सप्तमसे वा ब्रह्माश्रित राशिसे दशाको प्रवृत्ति है. तां पाकमोगाशि नहीं हो सकेंगे और वृद्धीने पाकभोगराशि समस्त दशाओं में कहे हैं। "चरस्थिरदिस्वभावेष्वोजेषु प्राक् क्रमो मतः । तेष्वेव त्रिषु युग्मेपु ग्राहं व्युत्क्रमतोऽखि लम् ॥ एवमुलिखितो राशिः पाकराशिरिति स्मृतः । स एवं भोगराशिश्च पर्याये प्रथमे स्मृतः । लमायावतियः पाक: पर्याये यत्र दृश्यते । तस्मात्तावतियो भौगः पर्याये तत्र माताम् ॥.. तदिदं चरंपर्यायास्थिरपाययोर्दयोः । त्रिकोणाख्यदशायां च पाकभी- गमकल्पनम् ॥ अथ केंददशामें यदि चर स्थिर द्विस्वभाव राशि : विषमपदमें होते. तो . . -- १०४ जमिनीयसत्राणि। [अध्यायः २... इसके अनन्तर द्वारबाथराशियोंका फल कहते हैं। तयोः पापे बंधयोगादिः॥४॥ यदि उन द्वारवाह्यराशियोंपर पाप ग्रह विद्यमान हो तो दार- बाह्यराशियोंकी दशामें बन्धनादि क्लेश होता है' ॥ ४ ॥ इसके अनन्तर उस उक्त दोषका अपवाद कहते हैं। स्वक्षेऽस्य तस्मिन्नोपजीवस्य ॥६॥ उस पापग्रहयुक्त द्वारराशि अथवा ब्राह्मराशिमें अपने राशिपर उस पापग्रहको बृहस्पतिके समीप स्थिति होवे तौ बन्धनादि क्लेश नहीं होता है । भाव यह है कि द्वारराशि अथवा वाह्यराशिमें स्थित हुआ पाप ग्रह अपने राशिमें बृहस्पतिके साथ संयुक्त होवे तो उक्त दोष नहीं होता है ॥ ५ ॥ भग्रहयोगोक्तं सर्वमस्मिन् ॥६॥ इस कहे हुए द्वारराशिमें अथवा बाह्यराशिमें राशि ग्रह दोनोंसे प्राप्त हुए योगोंका समस्त शुभ अशुभ फल जानने योग्य है। भाव यह है कि राशि और ग्रह इन दोनोंसे उत्पन्न हुए जो योग उनमें जो कि शुभ अशुभ फल कहा है वही फल द्वारराशि और बाह्यराशिमें जानना चाहिये ॥ ६ ॥ इसके अनन्तर केंद्रदशाके आरम्भस्थानको दिखाते हैं। पितृलाभप्राणितोऽयम् ॥७॥ लग्न और सप्तम राशिमें जो कि राशि वली होवे उस राशिको आरम्भ करके केन्द्रदशा प्रवृत्त होते हैं ।। ७ ।। क्रमसे लिखे हुए राशि और चर स्थिर द्विस्वभाव राशि समपदमें हो तो उलटे रीतिसे लिखे हुए राशिपाक और भोग नामसे होते हैं। लमसे जितनी संख्यापर, पाकराशि होव उतनी संख्यापर पाकराशिसे भोगराशि होता है। पाकराशि और भोगगाश चर- दशा और स्थिरदशा दोनोंमें होते हैं तथा त्रिकोण नाम. देशामेंभी पाफभोगकल्पना होती है। 3 इसमें वृद्धवाक्यभी प्रमाण है । "पाकै भोगे च पापादथे देहपीडा मनोव्यया ।। २ इसमें द्रवचनभी प्रमाण है। "बालनः शुक्रशशिनो केंद्राच्या तु दर्शा नयेत .
१०६ - पादः ४. भापाटीकासहिचान। इसके अनन्तर केन्द्रदशाके क्रमभेदोंको कहते हैं। प्रथमे प्राक्प्रत्यक्त्वम् ॥८॥ यदि लग्नसप्तमसंबंधी बलवान् राशि चरसंज्ञक होवे तो अनु- मित माग कर केंद्रदशाक्रम होता है । तिसमेंभो यदि लग्नसप्तमसं- बन्धी बलवान् चर राशि विषम पदमें होवे तो प्रथम द्वितीय तृती यादिक्रमसे केंद्रदशाका आरम्भ होता है ॥ ८ ॥ द्वितीये रवित्तः॥९॥ यदि लग्नसप्तमसंबंधी बलवान् राशि स्थिरसंज्ञक होवे तो विषम- समपदभेदसे छठे २. राशिके क्रमकर केंद्रदशाप्रवृत्ति जाननी । भाव यह है कि लग्नसप्तमसंवन्धी बलवान् स्थिर राशि विषम पदमें होरे तो सीधे क्रमसे छठा फिर उससे छठा राशि इस क्रमसे केंद्रदशाप्रवृत्ति होवे है और यदि लग्नसप्तमसंवन्धी वलवान् स्थिर राशि समपदमें होने तो उलटे मार्गसे छठे २ राशिकी केंद्रदशा होते है ।। ९ ॥ पृथक्क्रमेण तृतीये चतुष्टयादि ।। १० यदि लग्नसप्तमसंबन्धी वलवान् राशि द्विस्वभावसंज्ञक हो तो विषमसमभेदसे चतुर्थादि केंद्रसे पृथक् क्रमकरके अर्थात् लग्न पंचम नवमादिसे केंद्रदशा प्रवृत्त होते है । भाव यह है कि लग्नसप्तमसंबन्धी वलवान् द्विस्वभाव राशिः विषमपदमें स्थित होवे तो प्रथम तो उसकी फिर सीधे क्रमसे पंचम पणफरकी, फिर उससे पश्चात् नवम आपोलिमकी तदनन्तर चतुर्य केन्द्रकी तदनन्तरः चतुर्थद्रले पंचम फणपरकी पश्चात नवम पणंफरकी तदनन्तर सप्तम केंद्रकी फिर सप्तम केंद्रसे पंचम पणफरकी, फिर नवम आपोलिमकी तदनन्तर दशम केंद्रकी, पश्चात् दशम केंद्रसे पंचम पणफरकी; फिर, पुरुषश्चेत्ततो नया स्त्री चेदपणतो नयेत् ॥ " अर्थ-यदि पुरुष जातकवान हो तो लम सप्तममें जो कि बली है उससे केंद्रदशा लावे और यदि स्त्री जातकवता हो तो केवळ मतमसेटी केन्द्रदशा लावे जैमिनीयसूत्राणि । [अध्यायः नवम आपोक्किमकी. दशाप्रवृत्ति होते है और यदि लग्नसप्तमसबन्ध बलवान् द्विस्वभाव राशि समपदमें होवे तौ प्रथम उसीके फिर उलट रोतिसे पंचम पणफरकी फिर नवम आपोक्लिमकी इत्यादि रोतिसे केंद्रदशाप्रवृत्ति होवे है.। इस केंद्रदशामें प्रत्येक राशिके नौ २ ही वर्ष ग्रहण करने चाहिये ॥ १० ॥ इसके अनन्तर कारककेंद्रादिदशा कहते हैं। स्वकेंद्रस्थाद्याः स्वामिनो नवांशानाम् ॥ ११ ॥ आत्मकारकसे केंद्र पणफर आपोक्लिम इन स्थानों में क्रमसे स्थित हुए राशि नवांशदशाओंके स्वामी होते हैं । भाव यह है कि या म- कारकसे प्रथम केंद्रस्थित फिर पणफरस्थित फिर आपोक्लिमस्थित जो कि राशि है वह क्रमसे नवांशदशाके वर्षों के स्वामी होते हैं परन्तु तिसमेंभी सबसे अधिक बली राशि प्रथमका फिर उससे कम बल- वाला द्वितीयका फिर उससे कम बलवाला तृतीयका इस रीतिसे सर्व दुर्बल पर्यंत जानने चाहिये । जैसे केंद्रमें चार राशि स्थित होते हैं उनमें जो कि अधिक बली. है वह प्रथमका और उससे अल्पवळ- वाला द्वितीयका इत्यादि रीतिसेही पणफर आपोक्किमस्थ राशियोंका विभाग करना चाहिये । अथवा आत्मकारकसे केंद्र पणफर आपोक्किम १ इन तीनों सूत्रोंका फलितार्थ वृद्धोंनेभी स्पष्ट किया है। चरेऽनुहितमाः स्यात्वष्ठपठादिकाः स्थिरे । उभये कंटका ज्ञेया लगपंचमभाग्यतः ॥ चस्थिरदिरवभा- वेष्वोजेषु प्राक्क्रमो मतः । तेष्वेव त्रिषु युग्मेषु ग्राह्यं ब्युत्न मतोऽखिलम् ॥ " अर्थ- चरमें आरम्भसे द्वित्तीयादि वा द्वादशादि क्रमसे स्थिरमें आरम्भसे क्रम व्युत्तम भेरकर षष्ठपष्ठादि क्रमसे और द्विस्वभावमें आरम्भसे बमव्युत्क्रम भेदकर लम पंचम नक्म क्रमसे चारों केंद्रोंकी दशा जाननी । चर स्थिर द्विस्वभाव ये विषम पदमें हो तौ क्रमसे और सम पदमें हो तो व्युत्क्रमसे गिने । २.यहां वृद्धवचन विशेष है । " प्रतिभं नव वर्षाणि कारकाश्रयराशितः । जन्म संपमित क्षेमः प्रत्यरिः साधको वधः । मैत्रं परममैत्रं चेत्येवमंतर्दशा नयेत् ।" अर्ब जिस राशिपर आत्मकारक स्थित होवे उस राशिसे आरम्भ करके प्रत्येक राशिके नी. कल होते हैं उन नौ वर्षोंके मध्य प्रत्येक वर्षके जन्म, संपत, विपत, क्षेम, प्रत्यो, सोधक, वध इन नामोंसे अन्तर्दशा होवे है ।
पादः ४. .. ]. मापाटीकासहितानि । १०७ इन स्थानोंमें स्थित हुए ग्रह नवग्रहोंके दिये हुए वर्षोंके स्वामी होते हैं। भाव यह है कि आत्मकारकसे प्रथम केंद्रस्थित फिर पणफ- रस्थित फिर आपोक्किमस्थित इन ग्रहोंकी क्रमसे दशा होते हैं परन्तु उन ग्रहोंके वर्ष वही होते हैं जो कि “ स तल्लामयोरावर्तने " इस सूत्रद्वार कहे हैं। केंद्रस्थित ग्रहोंमेभी प्रथम वलीकी फिर उससे कम बलीकी इत्यादि रीनिसे दशा जाननी चाहिये ॥११॥ इसके अनन्तर अन्य केन्द्रदशा कहते हैं। पितृचतुष्टयवैषम्यवलाश्रयः स्थितः ॥ १२ ॥ लग्नादि चारों केंद्रोंमें जो कि सबसे अधिक बलयुक्त राशि वह प्रथम केंद्रदशामद निश्चित किया है। भाव यह है कि केंद्रस्थित राशियों में जो कि अधिक बली है प्रथम उस राशिकी फिर अल्प- वलकेन्द्रस्थ राशिकी दशा होवे है इसी प्रकार पणफर आपोल्लिम स्थित राशियोंकी दशा होवे है। इस केन्द्रदशामें प्रत्येक राशिके नवरं वर्ष दशावर्ष होते हैं ॥ १२ ॥ इसके अनन्तर कारकादिदशाके वर्ष बनानेका विधान कहते हैं। स तल्लाभयोरावर्तते ॥ १३॥ सो आत्मकारक लग्न और सप्तम इनके विषे वर्तता है। भाव यह है कि लग्न और सप्तमसे विषम समपदसे अनुसार व्युत्क्रमसे आत्मकारकपर्यंत गिने लग्न सप्तम दोनोंके बीच जिससे आत्मकारकपर्यन्त गिननेसे राशिसंख्या अधिक आवे वही संख्या आत्मकारकके कारकेन्द्रादिदशामें वर्ष जाने और अन्य ग्रहाके मध्य ग्रहसे आत्मकारकपर्यन्त विषमसमपदुके अनुसार क्रमव्यु- कम रीतिसे गिननेसे जितनी संख्या आवे वही. वर्ष उस प्रहके कारकेन्द्रादिदशामें होते हैं परन्तु जो कि ग्रह आत्मकारकके साथ १ यह अर्थभी सूत्रकारको समत है क्योंक सूत्रका यह अर्थ न किया जावेंगा तो इस लाभयारावतते." सह-सूत्र व्यर्थ हो जावेगा ।
ܘܙ जैमिनीयसूत्राणि । [अध्यायः युक्त होवे उसके दशावर्ष आत्मकारकके वर्षों के बराबर होते हैं ॥१३॥ इसके अनन्तर फल कहते हैं। स्वामिवलफलानि च प्राग्वत् ॥ १४॥ दशाके स्वामी जो कि राशि और ग्रह हैं उनके बल और फल पूर्वोक्त शास्त्रवत् जानना चाहिये ॥ १४ ॥ इसके अनन्तर मंडूकदशा कहते हैं। स्थूलादर्शवषम्याश्रयो मंडूकस्त्रिकूटः ॥ १५ ॥ लग्न और सप्तम इन दोनोंमें जो कि राशि बलवान् हो उससे आरम्भ करके मण्डूकदशा प्रवृत्त होवे है। प्रथमदशा केन्द्रस्थ राशि- योंकी पश्चात पणफरस्थ राशियोंकी फिर आपोलिमस्थ राशियोंकी होवे है । तिसमेंभी केन्द्रस्थ पणफरस्थ आपोक्लिमस्थोंमें प्रथम दशा अधिक वलीकी फिर उससे न्यून वलीकी इत्यादि क्रमसे दशाप- वृत्ति होते है और यदि पुरुष जातकवान होवे तो लग्न सप्तममें जो अधिक बली हो उससे मडूकदशा प्रवृत्त होते है और यदि स्त्री नातकरती होवे तो वलयुक्त सप्तम राशिसेही मण्डूकदशा प्रवृत्त होवे हैं ॥ १५ ॥ । इस ग्रहदशाके बनानेमें वृद्धवाक्य प्रमाण है। "लमात्कारकपर्यन्तं सप्तमाहा दशां नयेत् । उभयोरधिका संख्या कारकस्य दशासमाः ॥ तयुक्तानां च तत्तुल्यं प्रत्येक 'स्युर्दशाः क्रमात 1 महाः कारकपर्यन्तं संख्यान्यस्य दशा भवेत् ॥ कारकस्तात्तश्चादी तत्केन्द्रादिस्थितास्ततः । दशाक्रमेण विज्ञयाः शुभाशुभफलमदाः ॥ ” अर्थलमा वा सप्तम दोनोंमसे विपमसम पदानुसार जिससे कारकपर्यन्त संख्या अधिक आवे यही वर्ष दशामें कारकके होते हैं । जो कि ग्रहकारकके साथ युक्त होवे उस ग्रहके वर्ष कारकके वर्षों के बराबर होते हैं और ग्रहोंके वर्ष वेही होते हैं जो कि इसे कारकप- यन्त गिननेसे संख्या होवे है। जहाँ कारक स्थित होवे उसको केन्द्र मानकर प्रथम केन्द्रस्थ बलियोंकी दशा होवे है तत्पश्चात , अल्पबलियोंकी इसी प्रकार पणफरापो- हिमस्थोंकी दशा जाने । २ इसमें वृद्धवचनभी है। "चलिनः शुक्रंशशिनो या मंड्कदा दंशा । पुरुषवे. ततो नया स्त्री चद्दर्पणतो नयेत् ॥ " अर्थ-- लम सप्तम इनके मध्य जो कि बली होवे वससे यदि पुरुष जातकवान होवे तो मकदंशा प्रवृत्त होते है और 'श्री जातकवती पादः ४.] . भाषाटीकासहितानि । १०९ इसके अनन्तर फल कहने के लिये शूलदशा कहते हैं। निर्याणलाभादिशूलदशाफले ॥१६॥ मरणकारक राशिसे जो कि सप्तम राशि है उससे आरम्भ करके शुभाशुभ फल कहनेके निमित्त शूलदशा प्रवृत्त होते है। यह शूलदशा अनेक प्रकारकी होवे है क्योंकि रुद्रशूल और रुद्राश्रय राशि और महेश्वराश्रय और मारकराशि ये सव मरणकारक स्थानही हैं। यहां शूलदशामेंभी प्रत्येक राशिके नव २ वर्ष ग्रहण करना चाहिये ॥१६॥ इसके अनन्तर जिन दशाओंमें कि कोई विशेष विधान नहीं ऐसी समस्त साधारण दशाओंके आरम्भमें तथा वर्ष लाने में कुछ विशेष कहते हैं। पुरुषे समाः सामान्यतः ॥ १७ ॥ जिन दशाओंमें कि विशेष विधान नहीं उन समस्त दशाओंमें बाद आरम्भ राशि विषम होवे ती विषम सम पदानुसार क्रमव्यु- क्रम रीतिसे उसी आरम्भराशिसे दशाप्रवृत्ति होते है और सामान्यसे प्रत्येक राशिक नव २ वर्ष होते हैं और यदि आरम्भ राशि सम हो तो उस आरम्भ राशिसे जो कि ससम राशि हैं उससे आरम्भ करके विषम तदानुसार क्रमव्युत्क्रम रीतिसे दशाप्रवृति होते है। कोई आचार्य इस सूत्रकी यह व्याख्या करते हैं कि यदि पुरुष जातकवान होवे तो आरम्भराशिसेही दशा प्रवृत्त होते है और यदि स्त्री जातकवती होय तो आरम्भराशिसेही जो कि सप्तम राशि है उससे दशा प्रवृत्त होते हैं ॥ १७ ॥ होवे तो बलवान् सप्तमसेही मंडूकदशा प्रवृत्त होवे है ।, मण्डूकदशामें प्रत्येक राशिक नब २ वर्ष ग्रहण करने चाहिये । चर स्थिर हिस्वभावरूप निकटघटित होनेसें अथवा केन्द्रादि त्रिसमुदायघटित होने से इस दशाका विकट नाम है । १ इसमेंभी वृद्धवचन है । " ओजे लयं तदेव स्यायुग्मे तत्सप्तमः भवेत् । दशौज- क्रमतो ज्ञेया युग्मे व्युत्क्रमतो मता ॥ " अर्थ-विषमराशिमें लम हो तो उसीसे और सम राशिमें लम हावे तो उससे सप्तम राशिसे क्रमव्युत्क्रमरीतिस दशा २ इसमेभी वृद्धवचन है। " पुरुषश्चेत्ततो नयां स्त्री वेदपणती नयेत में । .
११० .......... जैमिनीयसूत्राणि । [अध्यायः २. इसके अनन्तर नक्षत्रदशा कहते हैं। सिद्धा उडुदाये ॥१८॥ विंशोत्तरी अष्टोत्तरी आदिक रूप नक्षत्रायुर्दायमें जातकान्तर- प्रसिद्ध वर्ष ग्रहण करने चाहिये ॥१८॥ इसके अनन्तर योगाई दशा कहते हैं। जगत्तस्थुपोरदै योगा ॥ १९॥ प्रत्येक राशिके आये हुए चरदशावर्ष और स्थिरदशावर्षको जोडकर आधा करे जो वर्ष आवें वही वर्ष योगादशाके होते हैं। माव यह है कि चरदशामें जिस राशिके जितने वर्ष हो और जितने वर्ष स्थिरदशामें हो उन दोनोंको जोड लेवे फिर आधा करे जोवर्ष होवे वेही उस राशिके योगाईदशामें होते हैं ॥ १९ ॥ १ अथ विंशोत्तरीदशासाधन अन्यजातकसे लिखते हैं। " कृत्तिकामवाध कृत्वा भरण्यवधि गण्यते । नवभिस्तु हरेदागं शेषं सूर्यादिका दशा ॥ षडादित्ये दश चरे सात वर्षाणि भूमिजे । अष्टादश तथा राही पोटश च बृहस्पती ॥ एकोन- शतिर्मदे वुधे सप्तदशैव च । सात वर्माणि केतौ च विंशतिभगवे तया ॥ विंशोत्तरी- शा ज्ञेया भोगवर्षाणि निश्चितम् ।" अर्थ-कृत्तिकासे लेकर जन्मनक्षत्रतक गिने संख्या में ९ का भाग देवे एक बचे तो सूर्य, दो बचे तो चंद्रमा, तीन बचे तो मंगल, चार बचे तो राह, पांच बचे तो वृहस्पति, छः बचे तो शनैश्चर, सात बचे तो इध, आठ बचे तो केतु, शन्य चचे तो शुक्रकी प्रथम विंशोत्तरी दशा होये है। सूर्यके ६ वर्ष, चंद्रमाके १० वर्ष, मंगलके ७ वर्ष, राहुके १८ वर्ष, बृहस्पतिके १६ वर्ष, शन- श्वरके १९ वर्प, बुधके १७ वर्ष, केतुक ७ वर्ष १ झनके २० वर्ष विंशोत्तरदशा में होने हैं। यदि स्पष्ट परमायुः १२० वर्षकी होवे तो यह कहे हुए वही सूर्यादि ग्रहोंके होते है और यदि स्पष्ट परमायुः १२० वर्षसे कम आवे तो त्रैराशिकरी दिसे प्रत्येक ग्रहके वशावर्षमी स्पष्ट करे। जैसे स्पष्ट परमायुको स्याँदिकोंके कहे हुए वर्षोंसे गुणे १२० का भाग देवे जो लय मिले वह सूर्यादिकोंके स्पष्ट परमायुमें स्पष्ट वादि होते हैं। 'परमायुके स्पष्ट करनेकी रौतिभी अन्य जातकसे लिखते जन्मक्षयातघटिका वेदना रामभाजिता । लब्धमभ्रातः शोध्यं शेषमायुः रफुट भवेत् ॥ " अर्थ- जन्मनक्षत्रके स्पष्ट घटिका जितने व्यतीत हुए हों उनको ४ से गुणकर ३ का भाग देवे जो लब्ध आवे उनको १२० मेसे घटा,देवे जो शेष रहें वही स्पष्ट परमायु होवे । अन्य अष्टोत्तरी आदिकोका विवरण विस्तरभयसे नहीं लिखा है।
- -- पादा-४.]. भाषाटीकासहितानि। इसके अनन्तर योगाददशाके आरम्भराशिको कहते हैं। स्थूलादर्शवेपम्याश्रयमेतत् ॥२०॥ लम और सप्तम दोनोमसे जो कि बली होवे उसके आश्रय यह योगाईदशा होवे है। भाव यह है कि यदि लग्न सप्तमसे जो कि वली होवे उससे विषम सम पदानुसार क्रमव्युत्क्रमरीतिसे योगार्द्धदशा प्रवृत्त होते है । यदि स्त्री जातक्वती होवे तो बलवान् सप्तमसेही मौर पुरुष जातकवाद होवे तो लम सप्तम दोनोंमें बलीसे योगा- दशाका आरम्भ होता है ॥२०॥ इसके अनन्तर दृग्दशा कहते हैं कुनादित्रिकूटपदक्रमेण हादशा ॥२१॥ लग्नसे नवमादि त्रिकूटपद क्रमकरके दृग्दशा होते हैं । भाव यह है कि लनसे जो कि नवम राशि है प्रथम उसकी फिर वह रात्रि जिन राशियोंको दृष्टिचक्रमें देखता हो उनकी क्रमानुसार दशा होती है फिर लनसे जो कि दशम राशि है उसकी पश्चात् वह दशम राशि जिन राशियोंको दृष्टिचक्रम देखता हो उनकी क्रमानुसार होवे है फिर समते एकादशराशिकी फिर एकादशराशि दृष्टिचक्रमें जिन राशि- योंको देखता है उनकी क्रमानुसार दशा होवे है । लग्नसे नवम दशम एकादश राशियोंकी दृग्दशा होवे है । नवम दृग्दशा, दशम दृग्दशा, एकादश हग्दशा यह फलितार्थ है' ॥ २१ ॥ १ ऐसा वृद्धोनेभी कहा है । “वलिनस्तु दशा नेया राहोहि शशिशुक्रयोः । स्त्रीचे. दृर्षणतो नेया पुरुषश्चेत्ततो नयेत् ॥" २ लास प्रथम नवम राशिकी दृग्दशाकी फिर दृष्टिचक्रमें नवमका जो कि सप्तम साशे है उसकी किर नमसे कहीं क्रमसे और कहीं व्युत्क्रमसे पंचम राशिको फिर नवमसे कहीं क्रमसे कहीं व्युत्क्रमसे एकादशराशिको दशा होते है। फिर लमसे दशम एकादश राशियोंकी इसी प्रकार दृग्दशा जाननी । शंका-नवम दशम एकादश इनसे . प्रथम संमुख राशि कैसे कहीं क्योंकि प्रमाणन होनेसे हम प्रथम 'पंचम राशिका 'ग्रहण करसते हैं। समाधान-"अभिपश्यत्यक्षाणि पाव च " दृष्टिदिपयमें "प्रथम सब शशि अपने सम्मुख राशियों को देखते हैं पश्चात पार्श्वराशियोंकोदेखते हैं ऐसा इनसूत्रोंका अभिप्राय होनेसे प्रथम पंचम राशि नहीं ग्रहण की है। . . .
११२ . जैमिनीयसूत्राणि। [ अध्यायः २, मातृधर्मयोः सामान्यं विपरीतमोजकूटयोः ॥२२॥ यथा सामान्य युग्मे ॥२३॥ पंचम एकादश इन दोनोंका क्रम विपम पदमें तो विपरीत है और सम पदमें यथार्थ है । वृष वृश्चिक विपमपदी हैं इससे विपरीत गतिसे पंचम एकादश ये दोनों दृष्टियोग्य है और सिंह कुम्भ समपड़ी हैं इससे विपरीत रीतिसे पंचम एकादश ये दोनों दृष्टियोग्य होते हैं। द्विस्वभावराशिमें पंचम एकादश दृष्टियोग्य है नहीं तहां यह क्रम है कि लग्नसे नवम, दशम, एकादश इन स्थानों में द्विस्वभाव राशि होवे तो प्रथम उन्हींकी फिर उनसे सप्तमकी फिर यदि द्विस्व- भाव राशि विषम होवे तो क्रमसे चतुर्थ दशमकी और यदि सम होवे तो उलटे रीतिसे चतुर्थ दशमकी दशा होवे है । भाव यह है कि लग्नसे नवमादि स्थानों में चर राशि होवे तौ क्रमसे पंचम नवम इन राशियोंकी हग्दशा होवे है और लमसे नवमादि स्थानों में स्थिर राशि होवें तौ उल्टे रीतिसे पंचम एकादश इन राशियोंकी दृग्दशा होने है और तिसी प्रकार पार्श्वराशिदशाक्रम जानना और लग्नसे नवमादि स्थानों में द्विस्वभाव राशि होव तो प्रथम नवमादिककोही दशा होवे है फिर सप्तमकी फिर यदि दिखभाव विषम हो तो क्रमसे चतुर्थकी फिर दशमकी दशा होवे है और यदि द्विस्वभाव सम होवे तौ उलटे क्रमसे चतुर्थकी फिर दशमकी दशा होते है। इस दृग्दशामेभी प्रत्येक राशिके नव २ वर्ष ग्रहण कर्तव्य हैं।२२।।२३।। इसके अनन्तर त्रिकोणदशा कहते हैं। पितृमातृधर्मप्राण्यादिस्त्रिकोणे ॥२४॥ १.यदि लमसे नवममें चर राशि होवे तौ प्रथम तो उसी नवमकी फिर नवमसे जो कि अष्टम पंचम नवम राशि हैं उनकी क्रमस दशा होवे है और यदि स्थिर राशि हावे. तौ प्रथम तौ उसी नवमकी फिर नवमसे उलटे क्रमसे पष्ट, पंचम, नवम इन राशि:- योकी दशा होवे है और यदि द्विस्वभाव राशि होवे तौ प्रथम तो उसी नवमकी फिर दिस्वभाव राशि विषम होवे .तो क्रमसे सप्तम चतुर्थ दशमकी और सम होवे तो उल्टे क्रमसे सप्तम चतुर्थ दशमकी दशा होवे है। इसी प्रकार लमसे दशम एकादश इन, स्थानोंकी दशा नाने । यह स्पष्ट भावार्थ है। .
पादः ४.]. मापाटीकासहितानि । ११३ लन्न पंचम नवम इन राशियोंमें जो कि बली होवे उससें त्रिको- गदशाका आरम्भ होवे है। आरम्भराशिसे लेकर क्रमसे और व्युत्क- मसे द्वादशराशियोंकी दशा होवे है । भाव यह है कि यदि पुरुष जातकवान होते तो आरम्भराशिसे लेकर क्रमसे द्वादश राशियोंकी दशा होवे है और स्त्री जातकवती होवे तो आरम्भराशिसे लेकर उल्टे क्रमसे द्वादश राशियोंकी दशा होते हैं। त्रिकोणदशाके वर्ष घरदशाके समान जानने ॥ २४ ॥ इसके अनन्तर त्रिकोणदशाका फल कहते हैं। तत्र वाह्याभ्यां तदत ॥२५॥ त्रिकोणदशामें द्वारवाह्यराशियोंकी कल्पना कर पूर्वोक्त दशा- मोंके समानही फल जाने ॥ २५ ॥ घासगरिकात्पनीकरात्कारकैः फलादेशः ॥ २६ ॥ सप्तम तृतीय प्रथम नवम इन स्थानोंसे तत्तत्कारकोंद्वारा फला- देश कर्तव्य है । भाव यह है कि सप्तमसे स्त्रीविचार तृतीयसे छोटे भ्राताका और आत्मकारकसे अपना और नवमसे पिता और धर्मका विचार कर्तव्य है ॥ २६ ॥ इसके अनन्तर नक्षत्रदशा कहते हैं। तारकांशे मंदायो दशेशः ॥ २७॥ १ इसमें वृद्धवचन प्रमाण है । " लमत्रिकोणयो राशिबलवानुक्तहेतुभिः । तदार- भ्योनयेच्छीमचरपर्यायवद्दशा ॥ युग्मराशिभूषां पुंसामोनं गृहीत सम्मुखम् । ओजरा- शिभुवां स्त्रीणां युग्मं गृहीत संमुखम् ॥ ओजराशिभुवां पुंसां गृह्णीयादोजमेव तु । युग्म- राशिभुवां बीणां युग्नमेव समाश्रयेत् ॥ क्रमोत्क्रमाभ्या गणयेदोजयग्भेष राशिषु ॥ " अर्थ-लन पंचम नवम इन राशियोंमें वली राशिसे त्रिकोणदशाका आरम्भ होता है परन्तु त्रिकोणदशाके वर्ष “नायान्ताः” इस स्त्रकी कही शक्ति के अनुसार जाने इसीसे यह दशा चरदशासमान कही है । यदि पुरुष जातकवान् होवे तो आरम्भदशासे लेकर क्रमस द्वादश राशियोंकी दशा होवे है और क्रमही मत्येक राशिक वर्ष राशिसे स्वामी- पर्यन्त गिननेसे होते हैं और यदि स्त्री जातकवती होवे तो उलटे क्रमसे द्वादश राशियोंकी दशा होवे है और उलटे क्रमसेही शिसे स्वामीपर्यन्त गिननसे. वर्षे होते हैं । २ ऐसा वृद्धनिभी कहा है । " तदिदं चरपर्यायस्थिरपर्याययोईयोः ! त्रिकोणंदशायां, च पाकभोगप्रकल्पनम् ॥ " इसका अर्थ सुगम है और पहिले लिखभी आये ॥ khao जैमिनीयसूत्राणि । [अध्यायः २. जन्मदिन जो कि चंद्रमाका' नक्षत्र है उसके समस्त घटिका जितने होवे उनके बारह विभाग को प्रथम भागसे लेकर वारहों विभागों में क्रमसे लग्नादि द्वादश राशि होते हैं। जिस विभागमें जन्म होवे उस विभागकी जितनी संख्या होवे उस संख्यातक लगसे लेकर गिने जो कि राशि आवे उससे लेकर यदि पुरुष जातकवान् होवे तो क्रमसे और स्त्री जानकवती हो तो उलटे क्रमसे द्वादश राशि- योंकी नक्षत्रदशा हो है । नक्षत्रदशामेंभी प्रत्येक राशिके नव २ वर्ष होते हैं ॥ २७ ॥ तस्मिनुचे नीचे वा श्रीमंतः॥२८॥ नक्षत्रलनका स्वामी यदि उच्चमें अथवा नीच राशिमें होवे नौ उत्पन्न हुए नर लक्ष्मीवान होते हैं । भाव यह है कि जन्मनक्षत्रके समस्त घटिकाओं के बारह खण्ड करनेसे जिस खण्डमें जन्म होवे उसकी संख्या लग्नसे आरम्भ करके गिने जहां समाप्त होने उस राशिको नक्षत्रलम कहते हैं। यदि नक्षत्रशनका स्वामी उच्च अथवा नीच होवे तो मनुष्य लक्ष्मीवान् होता है ।। २८ ।। स्वमित्रभे किंचित् ।। २९॥ यदि नक्षत्रलनका स्वामी अपने मित्रगृहमें स्थित हो तो थोडी लक्ष्मीवाला होता है ॥ २९ ॥ दुर्गतोऽपस्था ॥३०॥ यदि, नक्षत्रलग्नका स्वामी शत्रुराशिमें स्थित होवे तो दरिद्र होता है' ॥ ३०॥ १ ऐसा वृद्धोने भी कहा है। “जन्मतारे द्वादशधा विभक्त यत्र चंद्रमाः । लमाता- चतिथे राशौ न्यौदाद्यदशाधिपम् ॥ स यद्योऽय वा नीचे तदा स्याद्राजसेवकः । स्वमि- त्रः सुखी शत्रुराशौ निःस्वः समे समः ॥ " अर्थ-जन्मनक्षत्रघटिकाओंके बारह विभाग करे जिस विभागमे जन्म होवे उसकी जितनी संख्या होवे वह संख्या लास लेकर जिस राशिपर समात होर उसकी प्रथम दशा होने है । यदि उस राशिका स्वामी उच्च वा नीच राशिमें होवे तो राजसेवक होता.है और मित्रराशिमर होने तो सुखी होता है और यदि शत्रुराशिमें स्थित होवे तो निधन होता है और यदि. सम राशिपर. हरित सम होता है।
पाः४.] भाषाटीकासहितानि । १.१५. स्ववेषम्ये यथा संक्रमव्युत्क्रमो ॥३१॥ आत्मकारककी विषमता होवे तौ राशिस्वभावानुसारही कम व्युत्क्रम जानने । भाव यह है कि आत्मकारक यदि विषमपद और विषम राशिमेही स्थित होवे तो अन्तर्दशाका भोग क्रमानुसार होता है और यदि आत्मकारक विषम पदमें सम राशिमें स्थित होये तो अन्तर्दशाका भोग उलटे क्रममे होता है ।। ३१ ॥ साम्ये विपरीतम् ॥३२॥ आत्मकारककी समता होवे तौ क्रमके स्थानमें व्युत्क्रम और व्युत्क्रमके स्थानमें क्रम होता है । भाव यह है कि आत्मकारक सम पद: सम राशिपर स्थित होवे तो अन्तर्दशाका भोग क्रमानुमार होता है और आत्मकारक सम पदमें पिम राशिार स्थित होने तो अन्तर्दशाका भोग उलटे पसे होता है ।। ३२ ।। शनौ चेत्येके ॥३३॥ जिस प्रकार कि आत्मकारको विषम सम पदके मेदसे क्रम व्युत्क्रम और व्युक्रम क्रम ये होते हैं तिसी प्रकार शनैश्चरके विवें होते हैं ऐसा कोई आचार्य कहते हैं । भाव यह है कि शनैश्चर विषम पद और विषम राशिमें स्थित होवे तो क्रम और यदि शनैश्चर विषम पदमें सम राशिपर स्थित हावे तौ व्युत्क्रम होता है और यदि शनै- श्वर समपदमें सम राशिपर स्थित होव तो क्रम और समपदमें विषम राशिपर स्थित होवे व्युत्क्रम होता है ।। ३३॥ अंतर्मुत्यंशयोरेतत् ॥३४॥ आत्मकारककी अन्तर्दशामें और उपदशाही यह रीति जाननी न कि अन्य जगह ॥ १४ ॥ इसके अनन्तर दशाफलविशेष कहते हैं। शुभा दशा शुभयुते धाम्न्युच्चे वा ।। ३५ ॥ जो कि राशि शुभ ग्रहसे युक्त हो अथवा उच्च ग्रहते युक्त : -- ११६ जमिनीयसूत्राणि। [मध्याय २० होवे अथवा जिसका स्वामी उच्च राशिमें होते तो उस राशिकी दशा शुभ होवे है ॥ ३५ ॥ अन्यथान्यथा॥ ३६॥ और जो कि राशि न शुभ ग्रहसे न मित्र ग्रहसे न उच्च ग्रहसे युक्त होवे तो उस राशिकी दशा सम होवे है और जो कि राशि नीचादि ग्रहोंसे युक्त होवे उसकी दशा अशुभ होवे है ॥ ३६ ॥ सिद्धमन्यत् ॥३७॥ जो कि विषय इस ग्रन्थमें नहीं कहा है और अन्य शास्त्रमें प्रसिद्ध है वह अन्य शास्त्रसेही लेना चाहिये ॥ ३७॥ इति श्रीजैमिनीयसूत्रद्वितीयाध्याये श्रीनीलकंठीयतिलकानुस्- तभाषाटीकायां श्रीपाठकमंगलसेनात्मजकाशिराम- कृतायां चतुर्थपादः समाप्तः ॥ ४ ॥ श्रीमन्मंगलसेनसूनुप्रवरश्रीकाशिरामो ह्यमू- भाषा जमिनिसूत्रके विरचिता तेन वाणांकको ।। संवञ्चाश्विनमासि पर्वणि तिथौ चंद्रक्षये विदिने विद्वद्भिः खलु दृश्यतां शुभदृशा संशोध्यतां यत्रुटिः ॥ १॥ दोहा-जिला मुरादावादके, अन्तर्गत ढाढोलि। पैजोई थाना निकट, काशिराम कुलमौलि ॥ १ ॥ दिन रचि जैमिनिसूत्रपर, नीलकंठ अनुसार। भाषा गंगाविष्णुके, अर्पण कियो सुधार ॥२॥ , पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवेंकटेश्वर" छापाखाना कल्याण-मुंबई.
अथ तृतीयोऽध्यायः। अथ राजजनिताभ्यां योगेयोगे लेयान्मेषाधिपः॥३॥ उचनीचस्वांशवती तादृशदृष्टिश्च शुभमादृदृष्टे यदि महाराजः ॥२॥ लेयलाभयोः परकाले॥३॥ लाभलेया- भ्यां स्थानगः ॥ ४ ॥ तत्र शुक्रचंद्रयोर्यानवंतः ॥५॥ तत्र शनिकेतुभ्यां गजतुरगाधीशः ॥६॥शुक्रकुजकेतुषु सभाग्यदारेषु स्थितेषु राजानः ।। ७ ॥ पिहलाभधन- प्राणयोश्च ॥ ८॥ पत्नीलाभयोः समानकालः ॥९॥ भाग्यदारयोहयुक्तसमानेषु सांप्रतः ॥ १० ॥ तत्र उच्चे करसंख्या राज्ञां च ॥ ११ ॥ पितृधर्मयोयलाभयोरी चंद्रशुभहग्योगे मंडलांतः ॥ १२॥ तत्र बुधगुरुग्योगे युदजो वा ॥ १३ ॥ तस्मिन्नुच्छे नीचे पितृलाभयोः श्रीमंतः ॥ १४ ॥ स्वभावनाथाभ्यां शुक्रचन्द्रग्यो- गयोः ॥ १५ ॥ तत्र शुभवर्गेषु श्रीमंतः ॥ १६ ॥ दार- शूलयोश्चंद्रगुरौ ॥ १७ ॥ शूले चंद्रे रिःफयुरौ धनेषु शुभेषु राजानः ॥ १८ ॥ पत्नीलाभयोश्च ॥१९॥ एवमंशतो दृक्काणतश्च ॥२०॥लेयलाभश्चंद्रे गुरो शुभ- ग्योगे महातः ॥२१॥ लाभचंद्रेऽपि ॥२२॥ पापयो- गाभावे शुभग्योगिनि च ॥ २३॥ अत्र शुभदृग्योगे राजप्रेष्यः॥ २४ ॥ शुभवर्जेषु त्रिकोणकेंद्रे वा ॥२५॥ स्वाशयोगे राजवंशः ॥ २६ ॥ उच्चांशे ताशष्टिश्च १९८ - जमिनीयस्त्राणि [.. राजराजा वंश्यो वा ॥ २७॥ अशुभग्योगानचेन चेन ॥२८॥ पंचमांशपदेऽपि समेषु शुभेषु राजानोवा ॥२९॥ स्खलेयमेवाभ्यां राजचिह्नानि ॥ ३० ॥ इत्युपदेशसूत्रे तृतीये प्रथमः पादः ॥१॥ यज्ञननेशाभ्यां स्वकारकाभ्यां निधनम् ॥१॥ निधनं लेयलाभयोः प्राणिनाम् ॥२॥ गुरो केंद्र मंदा- राभ्यां दृष्टे शनिभोगहेतौ कक्ष्यापवादः ॥ ३ ॥ रिपुरोगयोश्चंद्रे ॥ ४ ॥ स्वभावगैश्च ॥ ५ ॥ रोगतुं- गयोवी ॥६॥ तत्र शनौ प्रथमम् ॥ ७ ॥ राहोदि- वीयम् ॥ ८॥ केतोस्तृतीयं निधनम् ॥ ९ ॥ तत्तु त्रिकोणेषु ॥ १० ॥ चरे प्रथमम् ॥ ११॥ स्थिरे मध्यमम् ॥१२॥ इंवेऽन्त्यम् ॥१३॥ एवं चरस्थिरद्वंद्वच- राभ्याम् ॥१४॥ स्वपितृचन्द्राः॥१६॥ तत्रशनिवश्या- हासः ॥ १६॥ रिपुषष्ठाष्टमयोश्च ॥ १७॥ प्रथममध्य- मयोरत्यमध्यमयोः ॥ १८ ॥ शुभग्योगान ॥ १९॥ पितलाभेशयोरस्येव योगे वा ॥ २० ॥ अप्रसंगवादा- प्रामाण्यं रोगयोः प्राणिसौरदृष्टियोगाभ्याम् ॥२१॥ द्वारवालयोरपवादः ॥२२॥ द्वारे चंद्रग्योगान ॥२३॥ केवलशुभसंबंधे बाह्ये च ॥ २४ ॥ लेयरोगराश्रयेऽपि ॥२६॥ रोगत्रिकोणदशाब्दे ॥२६॥ रोगनवांशदशा- भ्यां निधनम् ॥ २७॥ तत्रापि शनियोगे॥२८॥ मिश्रे शुभयोगात्र ॥२९॥ लोद्रो वे स्वलाभयो वयोः . . १ तृतीयोऽध्यायः। कर रुद्राश्रयेऽपि ॥३०॥ नवापवादानि ॥३१॥इनशु- काभ्यां रोगयोः प्रामाण्य निधनम् ॥३२॥ महेश्वरन- झयोराधन्तयोः ॥ ३३ ॥ चरनवांशदशायां निधनम् ॥३४॥ चित्तनाथाभ्यां रिपुरोगचित्तकर्मणि ॥ ३९ ॥ क्रूरग्रहेषु सद्योरिष्टम् ॥ ३६॥ शनिराहुचंद्रयोगे सबोरि- एम्॥३७॥ कोणाश्रयेषु सद्योरिष्टम् ॥३८॥ सर्वमेवं पाप- ग्रहेषु च ॥३९॥ केवलरिपुरोगचित्तनाथाभ्याम् ॥४०॥ तत्रापि चित्तनाथापहारे ॥४१॥ इत्युपदेशसूत्रे तृती- ये द्वितीयः पादः॥२॥ लेयलाभयोः पदम् ॥ १॥ पदभावयोश्चरे ॥२॥ क्रांतराशौ कर्मणि दुष्टं मरणं कर्मणि पापे राजाभ्यां यथा सबुधे ॥३॥ दिने दिने पुण्यम् ॥ ४ ॥ तत्र कर्मादि ।। ५॥ तत्र कर्मादि ॥ ६ ॥ चराचरयोवि- परीतकाले ॥ ७॥ ततः कोशे ॥ ८ ॥ पत्नीदृष्टमात्रगु- रुयुक्त ॥९॥ पापहम्योगे॥१०॥ पाषाणमरणे ॥११॥ अत्र केतुयुक्ते ॥ १२ ॥ दोषेण हननम् ॥ १३ ॥ केतो पापदृष्टौ वा ॥ १४॥ अत्र शुभयोगे॥१६॥ मलिनभावे क्रांतराशा कर्मणि दुष्टं मरणम् ॥ १६॥ क्रूराश्रये सर्व- शूलादि ॥ १७ ॥ राहुदृष्टौ निश्चयेन ॥ १८॥ राहुश- निभ्यां दुष्टबलादि ॥ १९ ॥ तत्र प्रतिबंधः ॥ २० ॥ कुजकेतुभ्यां नित्यं च ॥ २१॥ वाशीयोग्यफूलदें (?) ॥ २२ ॥ मृत्युरोगाभ्यां राहुचन्द्राभ्यां यथास्वं मृत्युः १२० जैमिनीयसूत्राणि। ॥२३॥अत्र भावकरादि ॥२४॥तुरगवृषवगें ॥२६॥ अत्र कुजास्फोटकादिकुंडलपरश्च ॥२६॥ रत्नाकरयोगे ॥२७॥ कालदंडान्मरणम् ॥२८॥ शेषा भुजंगादि ॥२९॥ कीटवृषवृश्चिकांशे ॥३०॥ रोगमातृदृष्टयो- भाव मूषकादिमृतिः॥३१॥ तत्र मंदे ॥ ३२ ॥ विष- पानादि ॥३३॥ सौम्यदृग्योगाभ्यां मंडूकभेदादि ॥३४॥ स्वांशग्राह्यावर्णनामभिः ॥ ३९ ॥ लेयान्मृत्युः॥३६॥ चले मृत्युः ॥३७॥ भाग्ये दंडात् ॥३८॥ कम वि- पभक्षात् ॥ ३९ ॥ दारे ज्वरभयम् ॥ १०॥ माता श- त्रुहतः ॥ ११ ॥ शनो रिपुभयम् ॥ ४२ ॥ लाभे कुष्ट- रोगः ॥ १३ ॥ विषूचीजलरोगादि देहे ॥४४॥. धने खड्गादौ ॥ ४५ ॥ नित्यदुर्मरणम् ॥ ४६॥ तत्र रवियोगे . रिपुशस्त्राग्निभयम् ॥ १७॥ चंद्रेण कूपे ॥४८॥ कुजेन व्रणस्फोटादि ॥ १९ ॥ बुधेन वृक्षपर्वतादयः ॥५०॥ , गुरुणा स्ववैषम्येऽरो पावकः ॥५१॥ शुक्रेण शुक्रमेहात् ॥५२॥ शानिना विषभक्षणादि ॥ ५३॥ राहुकेतुभ्यां विषसर्पलोष्टबंधनादिभिः ॥५४॥ शनिराहुभ्यांराहुणा दढादि ।। ५५ ॥ तत्र गुरुराहुभ्यामभिचारादि ॥५६॥ तत्र गुरुशनिभ्यां दृष्टे यथा स्वनाशः ॥५७ ॥ स्वत्रि- शांशे कोलकाफलरोगादि ॥ ५८ ॥ ललाट प्रथमम् ॥६९॥ केशं द्वितीयः॥६॥बधिरं तृतीयः॥६॥ चतुर्थों नेत्रे ॥६२ ॥ सिंहादौ पंचमे ॥.६३॥ षष्ठं जि- - १२१ ..- तृतीयोऽध्यायः। बामे ॥६॥ पूर्वषट्के राहुकेतुभ्यां स्वजिह्वादि ॥६६॥ तत्र शनिमांदिभ्यां गलदादि ॥६६॥ तत्र कुजे शोषः ॥६७ लाभांशे मरणम् ॥ ६८॥ तत्र खो प्रतिबंधः ॥६९॥ कौंतायुधधनौ रोगे ॥५०॥ सायकैर्धनम् ॥७॥ मशनिहतकाये ।। ७२ ॥ मार्गे मागें रिपूणां वैरिवर्गश्च स्ववेषम्ये रिपुः ॥ ७३ ॥ राश्रयाले रिपुहतः ॥७॥ शन्यारफणिवर्गाथैः ॥ ७९ ॥ भावेशानांतराशिस्थः ॥ ७६ ॥ रवियुक्त दृष्टे प्राथमिकः ॥ ७७॥ तत्र चंद्रा- निश्चयेनाकुजेन ज्ञातिभ्यः ॥ ७८ ॥ तत्र शनी मृत्युवा- दानिकरणश्च ॥ ७९ ॥ स्वांशेऽपि ॥ ८० ॥ अन्यतरां- शश्च ।। ८१ ॥ नीचाश्रये विपरीतम् ।। ८२॥ तत्र शनो रूपे ।। ८३ ॥ विषभक्षणादि ।। ८४ ॥ तनुतनौ दंडह- रम् ॥ ८५ ।। तत्र भावविशेषः ॥ ८६ ॥(?) अघशव- निधनम् ॥ ८७ ॥ मातापित्रोद्वितीयः ॥ ८८ ॥ ज्ञाति- वर्गभ्रातादिम्तृतीयः ॥ ८९ ॥ कलत्रं चतुर्थम् ।। ९० ॥ पुत्र पंचमम् ॥ ९१ ॥ शत्रुवर्ग षष्ठम् ॥ ९२ ॥ तत्र पा- पानां सन्निकृष्टम् ।। ९३ ।। जनने ॥ ९४ । लाभे स्त्रिया विपत्तिः ॥९५॥ भावे स्वकर्मचित्तांशात्स्वांशे निधनम् ॥ ९६॥ स्वभूचात्पतनम् ॥ ९७ ॥ शूले मृतिः॥९८॥ घनेन ज्ञानवान्मरणम् ॥ ९९ ॥ नयने ग्रहणीरोगादि ॥१०० ॥ शूले शत्रुमरणम् ॥ १ ॥ उच्चे ग्रहभातिः ॥२॥ तत्र रविशनिभ्यामोजे कूटराशौ युग्मे निर्णयः १२२ जैमिनीयस्त्राणि । ॥३॥ धनमुखाभ्यां पादरोगः॥ ४॥ तनुविक्रमाभ्या- मंमुलिरोगः ॥ ५॥ तत्र केतुना अंगहीनश्च ॥ ६॥ तत्र पापदृष्टे पादहीनः॥७॥ अथ बलानि ॥ ८॥ प्राणिनि शुभयुक्ते ॥ ९॥ राशिबलभागे ॥ ११०॥ चरपर्यायेन ॥ ११॥ शुभदृष्टे पादहीनः ॥ १२ ॥ शुभदृष्टित्रिशूले ॥ १३॥ अंशत्रिशूले वा ॥ १४॥ भावकोणाभ्यां नि- सर्गतः॥ १५ ।। आश्रयतो बलिष्ठः ॥१६॥ यादिर्भ- राशो पितृलाभयोः ॥ १७॥ स्वकर्मभेदेन ॥१८॥ मूर्तित्वे परिपाताभ्यां जघन्यायुपि तत्र परिपाके ॥१९॥ एवं निवनं मातापित्रोः ॥ १२० ॥ भूम्यंशश्च निवृत्ति- कारकः ॥ २१ ॥ नायांतसंज्ञाः स्युः ॥२२॥ कर्मस्था चरपर्याये ॥२३॥ भाग्यदारयोः स्थिरोभयोः॥२४॥ भाग्यकारकाभ्यां मंगलपदम् ॥ २५ ॥ मृत्यु मृत्युषि ॥२६॥ अन्यरन्यथा ॥ २७ ॥ भूतमन्यत् ॥ १२८॥ इत्युपदेशे आयुयापवादे तृतीये तृतीयः पादः॥३॥ पुनः पदः पदे ॥ १॥ उपग्रहयुक्ते श्रीमंतः ॥२॥ आधानपितुलेयमेषम् ॥ ३॥ सूर्यात् कर्मणि पित्रोः ॥४॥ पुनः पद उत्तरयोः॥६॥ पदाभ्यां भृगुसौम्य- व्यतिरिक्ते ॥६॥दिनकरे लाभेयोरेनिसंज्ञाः स्युः(१) ॥७॥ प्रियानुपपत्तिः॥८॥ तत्र पाकर्म ॥ ९॥स्व- कर्मव्याघ्रश्च ॥ १० ॥ दिनकरत्रिकोणे लाभपदे गर्भसं- पूवे ॥११॥ तत्र गर्भपाते ॥ १२॥ रविकत्वंशे शुक-
- १२३
...
इतीयोऽध्यायः
शोणितो ॥ १३ ॥ गुरुत्रिंशांशे ॥ १४॥ चंद्रग्योगे
॥ १५॥ सुकलिषुवयोः ॥ १६॥ शुक्लरेतौ ॥ १७ ॥
वर्णपरिपाकम् ॥ १८॥ यस्याधानं चंद्रग्योगे ॥१९॥
यथा आधानपरिपाके च चंद्रबुधभूगुयोगाभ्यामाधानप-
रिमिते ॥२० ॥ सुवर्णारणिसंयोगे ॥२१॥ शनिचं-
द्राभ्यां नाभेरधः॥२२॥ गर्भवायुपरिवृन्ते ॥२३॥ तत्र
केतुना पुष्करस्रना रव्यादिके त्वंतम् ॥२४॥ महान
विरतः॥२५॥ अन्ययोनिगभप्वजः ॥२६॥ राहुचं-
द्राभ्यां वीरतमः ॥२७॥ अवीरोपपत्तिः कर्मणि पाके
एवं गर्भनिर्णयम् ॥२८॥ स्थानाद्यैः स्वांशगश्च ।। २९॥
यथा धर्मशीले ॥ ३० ॥ स्वांशग्रहनींचउचयोः॥३१॥
क्रियमेषलग्नेषु ॥३२॥ अथ रविप्राणाः ॥३३ । नेस-
निकालेष्वभियोगशूल इह जायते ॥ ३४ ॥'पुमान
॥३५॥ वाण इति ॥३६॥ अत्रोदाहारः ॥३७॥
केतुशनिभ्यां रक्तप्रदरः ॥ ३८॥ शनौ पातयोगे कृष्ण-
वर्णः ॥ ३९ ॥ शनिशुकाभ्यां श्यामवर्णः ॥ ४० ॥
गुरुशशिभ्यां गौरवर्णः ॥ ४१ ॥ शनिबुवाभ्यां नील-
वर्णः ॥ ४२ ॥ शनिकुजाभ्यां रक्तसुवर्णः ॥१३॥
शनिचंद्राभ्यां श्वेतवर्णः॥४४॥ स्वांशवशाद्दौरनीला-
दीनि ॥४५॥ तथाप्युदाहरति ॥४६॥रेतः सिंचन्प्रजाः
प्रजनयमिति विज्ञायते ॥ १७ ॥ चरे. पापडग्योगे
पुत्रनाशः ॥ १८॥ शुकहग्योगे पुत्रलाभः ॥४९॥
जैमिनीयस्त्राणि। पाशुभग्योगाभ्यांप्रथमवर्णक्रमेण हासावृत्तिः॥ १०॥ यन्नवभागे नवांशाभ्यां संख्यावृद्धिः ॥५१॥ वीजयुग- वल्योबिदुपतनकाले यमलाभ्यामूलतः शुभपापयोश्च रस्थिश्योरई तोतादिकनेत्रविकृतोष्टनासिकमुखकर्ण शतपटलपादांगहीनकुन्जबधिरमूलांगोपांगसुशिरकेशा- वर्तचक्रवीनविपर्यासकुनखी वृषोन्नतबृहन्नाभिनेत्रः पाश्व- दृष्टयोरंधकुब्जवामनसत्त्वस्वरनीचस्वरहीनस्वरेत्यादि- वपि पितृमात्रोर्बलानि ।। ५२ ॥ एवमृक्षाणां बलानि ॥५३ ।। स्वपितृभाग्ययोः परिपाककाले ॥५४॥ इति तृतीयाध्याये गर्भवर्णननिर्णयो नाम चतुर्थः पादः ॥४॥समाप्तश्चाध्यायः॥३॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः। पितृदिनेशयोः प्राणिदेहः ॥ १॥ लाभचंद्रयोः प्राणिहृदयम् ॥२॥ लेयचंद्रयोः प्राणिशिरः ॥३॥ भाग्यचंद्रयोः प्राणिमुखम् ॥ ४॥ कामचंद्रयोः प्राणि- कंठः॥५॥दारचंद्रयोः प्राणिबाहुः ॥६॥ मातृचंद्रयोः प्राण्युदरम् ॥ ७॥ ततश्चद्रयोः प्राणिजवनम् ॥ ८॥ लाभचंद्रयोः प्राणिपृष्ठः॥९॥ दिनचंद्रयोः प्राणिगुदः ॥१०॥धनचंद्रयोः प्राणिपादौ ॥११॥ रिफचंद्रयोः प्राणिनेः ॥ १२ ॥ शूलचंद्रयोः कर्णयोः प्राणिको । चतुर्थोऽध्यायः। ॥१३॥ रौप्यचंद्रयोः प्राणिनासिके ॥ १४ ॥ एवं दादशभावानाम् ॥ १५ ॥ प्राणिबलानि ॥ १६॥ अप्राण्यपि पापदृष्टः॥१७॥प्राणिनि शुभदृष्टे ॥१८॥ तत्तद्भावे जन्म सूचितम् ॥ १९ ॥ आजन्मादिर्वपुःषु ॥२० ।। पित्रोः प्राकूकाले ॥२१॥ शरमेव मातापि- तरौ जनयतः॥ २२ ॥ अशोणितो क्लीवश्च ॥ २३ ॥ एवं भावविचारः॥ २४॥ अंकुशाभ्यां तु ॥२५॥ वर्णभेदाश्रयेण ॥ २६ ॥ जीवेंदुवुधादयः ॥२७॥ ब्राह्मणश्च रविः कुजःक्षत्रः ॥ २८ ॥ शनिः शूद्भश्च ॥ २९ ॥ राहुर्रजातिः ॥ ३० ॥ केतुश्चांडालः ॥३१॥ वर्णभेदेन पुत्रलाभाभ्यां मृगवर्णम् ॥ ३२ ॥ आसुरवयं च ॥ ३३ ॥ यदि पापवाहुल्यं तत्र रमणी- जालः॥३४॥ सुखकेशानि ॥३५॥षडानि ॥३६॥ शनिराहुकेतुजेषु वैपरीत्यम् ॥ ३७ ।। तालुतेफोफस्य- शेवलेमित्रावरुणवले (१) ॥ ३८ ॥ मृत्युना कैवल्यम् ॥३९॥ शृंगारे लाटः ॥ ४० ॥ प्राणपाणी बले ॥ ४२ ॥ मृत्युविचित्ते ॥ ४२ ॥माधुरीकन्ये ॥४३॥ मांजिष्टे मृगे ॥४४॥ मानुषि कुरूपः ॥४५॥ मरणे. माने ॥४६॥ मायामालिंगे॥ १७ ॥ शुभेन कर्मणि पितृनियोजयो जयेत् ॥ ४८ ॥ पापे मातरि मिश्रे भ्रातरः।। ४९ ॥ शुभपापमिश्रे विरूपः ॥५०॥ मातुनाशोकः ॥ ५१ ॥ चंद्रागुहग्योगानिश्चयेनास्वमू- १२६ जैमिनीयसूत्राणि । तिपुरुषे कालरूपः ॥५२॥ तिर्यग्दृष्टो प्रायो निर्वृत्ति कारकः॥ ५३ ॥ शूलेशयोदरियोशतोषं गुरुदृष्टे च ॥५४॥ इति उपदेशे चतुर्थे प्रथमः पादः ॥१॥ बलपदयोः प्राणिमारकः॥१॥रदाश्रयेऽपि ॥२॥ भावेऽपि बलदृष्टांतः ॥३॥ ओजयुग्मयोः प्राणिवलम् ॥४॥ अभिपश्यति भावानि ॥६॥शुभान्यतराणि च ॥६॥प्रत्यक्शुले नित्यविक्रमे बुधशकाभ्यां दंतोष्टपट- लपार्थपाः ॥७॥ करकर्णाभ्यां मृत्युचित्तयोविपरीतम् लग्ने पित्रकभावेऽपिकामनाथयारक्ये यमलः॥९॥ कामनाथप्राणिनि शुभम् ॥ १० ॥ स्वनाथपाणिनिच्युत- योः॥११॥भावयोःप्राणिनि कक्ष्याह्रासः ॥ १२॥शुभ- योगपलाञ्चवम् ॥ १३ ॥ मिश्रेसमाःप्राणिहीने विपरीतम ॥१४॥ समे नित्यम् ॥ १५ ॥ भाग्ययोर्बलम् ॥१६॥ गुरुचंद्रयोधर्मघनैक्ये कर्मबले ॥ १७॥ मेषे विपरीतम् ॥ १८॥ ततः प्राणाः स्वपितृयोगः ॥ १९॥ शुद्धःस्व- काले ॥२०॥ अनुकूललेये तुंगे नीचे ॥ २१॥ भावब- लाभ्यां तु ॥२२॥ केंद्रत्रिकोणोपचयेषु राहुकुजो जानुहा- वीरिकेवलराहो तत्रानिधनम् ॥ २३॥भौमहम्योगानिश्च- येन ॥२॥ तत्र शनो गुरुहायोगे सेतुयोग्य स्वत्रिकोण- राशिषु ॥२६॥ पदे चापदभावे स्वामिन इत्थम् ॥२६॥ हलफलादिशुभवर्गयुतिशेषास्त्वन्थे ॥ २७ ॥ मूर्ति च ॥ २८ ॥ खकारकव्यतिरिकेषु ॥ २९॥ भावपले - 'चतुर्थोऽध्यायः। १२७ चंद्राश्रयेऽपि ॥३०॥ दारे मित्रस्वपितृभ्याम् ॥३१॥ भावशूलदृष्टयाच ॥३२॥ पितृनाथदृष्टया रोगः॥३३॥ पुत्रनाथदृष्टया दरिद्राः ॥३४॥शूलनाथदृष्टया व्ययशा- लः॥ ३५ ॥ रिपुनाथदृष्टया कर्म ॥३६॥धननाथह- घ्या निरोगी च ॥३७॥ माननाथदृष्टया प्रबलः ॥३८॥ दारेक्षदृष्ट्या सुखिनः ॥ ३९ ॥ कामेशदृष्टया प्रध्वंसः ॥४॥ भाग्यनादृष्टया सुरूपः ॥४१॥ सर्वदृष्ट्या प्रपलः ॥ १२॥ दारभाग्ये च ॥४३॥ वर्णपदाश्रयको- गेषु ।। ४४ । शुक्रे च।। ४५ ॥ कोणयोःशुभेषु मित्रत्रा- गपवर्गे ॥ ४६॥ केंदनिकोणयोः शुभे कालवलानि ॥४७॥इत्युपदेशसूत्रे चतुर्थेऽध्याये द्वितीयः पादः॥२॥ बुधशुक्रयोर्युग्मे स्त्रीजननम् ।। १ ॥ कालनिर्णयादि ॥२॥अंशभेदेन लिप्तविलिप्ताः॥३॥कालकाः॥४॥ अनुलिप्ताश्च ॥ ५॥ द्विना द्विचतुःसंख्यादि ॥६॥ नव भागशेपे ।।७॥ आवंशके ॥ ८॥ ग्रहकमेण वर्णम्।। ९॥ पुमान् प्रजः ॥ १० ॥ अन्ये स्त्रियः ॥११॥ क्लीवे पूर्वा- परी ॥ १२॥ एवं वर्णसंज्ञाः स्युः॥१३॥नीचे दारांश- कः॥१४॥ आधादिस्ववर्णः ॥ १५॥ मित्रभेदाभ्यां चरपर्यायेण संज्ञाः स्युः ॥ १६॥ धात्वादिरूपवर्णेन ॥१७॥ स्वांशगैश्व बलः ॥१८॥ रविकुजौ रक्तौ ॥१९॥ बुधशुको श्यामौ ॥२०॥ कृष्णेतसः स्युः॥ २१ ॥ त्रि- त्रिभागे चरस्थिरोभयपर्याय ॥२२॥ घटिकापष्टिनिर्णये - १२८ जौमिनीयसूत्राणि । ॥ २३ ॥ अंशस्येकस्य पंचघटिकाः ॥२४॥ एवं द्वाद- 'शा पंच स्युः विघटिकादिक्रमेण ॥ २५ ॥ ओजे पुरुषः ॥२६॥ युग्मे स्त्रियः ॥२७॥ ओजयुग्मयोः स्त्रीपुरुषो ॥२८॥ यथा मातरि वणे ॥१९॥ मात्रा प्रसवकालमुखे- ॥३०॥ राहिदुभ्यां स्त्रीजननम् ॥३१॥ पुरुषतरा: ॥३२॥ शन्याराभ्यां पुरुषः ॥३३॥ शनिबुधाभ्यां स्त्रियः ॥ ३४ ॥ शनिचंद्राभ्यां कुजः॥ ३५ ॥ शनिशु- काभ्यां रूपवत्या ॥ ३६॥ शनिकेत्वोारिणी ॥३७॥ तत्र बुधांशे बहिनारिणी॥ ३८॥चंद्रशुको कामी प्रवीण- तमश्च ॥ ३९ ॥ अंशभेदेन ॥ ४० ॥बुधशुक्राभ्यां का- मी विरागतः॥ ११॥ तत्र केत्वंशे ॥ १२॥ गोपमन्य- तरः॥४३॥ केत्वंशे बुधचंद्रदृष्टे सर्ववर्णाश्रयेषु संचरितः ॥४४॥ पापहष्टे पुंश्चली ॥ १५॥ सप्तमाष्टमयोः पापव- ल्ये विधवा (१)॥४६॥ तत्राष्टमे कुजे केतुषु ।। ४७॥ हायोगाभ्यां भर्तृहंत्री॥ १८ ॥ एकांशेन ॥ १९॥ ओजयुग्ममार्गया ॥ ५० ॥ नीचे विपर्ययः ॥५१॥ षडादौ सन्निपातहनने ॥५२॥ भूतौ रूपम् ॥ ५३॥ भाग्यांशगैश्चंद्रबाहुल्ये बुधशुकाभ्यां सुमतिः ॥५४॥ तत्र केतुना केत्वंशे दुर्गंधी ॥ ५५ ॥ रविष्टे दंतवक्री ।। ५६॥ कुजदृष्टे क्रोधकरी ॥१७॥ इतरग्रहहग्योगः ॥५८॥ सौम्यश्च ॥ ५९॥ पापे पापबाहुल्या ॥६॥ शुभे गुणवती ॥ ११॥ मि समाः॥६२ ॥ एवम-
चतुर्थोऽध्यायः ।
१२९
धमः सप्तमा हरितः ॥ ६३ ॥ विकोणात्रिपडायेषु
॥ ६ ॥ नीचे विपर्ययः ॥ ६६ ॥ द्विामाग्ययोरानुकू-
त्ये॥६६॥ शुभेतरमिश्रतरो च ।। ६७॥ चक्षुर्वर्णभे-
देन नित्याश्च ॥ ६८ ॥ यत्ने अंशतः॥६९ ॥ राज्ये
नीचे ॥ ७० ॥ धने कामी॥७॥ धर्मे मोक्षी ॥७२॥
धने पापी ॥ ७३ ।। तत्र व्यंशे पालविधवा ॥ ७ ॥
रवित्रिकोणेषु च ॥ ७५ ॥ चंद्रे कामिनी ॥ ७६ ॥ चन्द्र-
त्रिकोणेषु च कुजकुरूपिनोधी ।। ७७ ॥ कुजत्रिकोणेषु
च ॥ ७८ ॥ बुधे बंध्या ॥ ७९ ॥ वुधेत्रिकोणेषु चारों
पतिभक्तिपरायणी ॥ ८० ॥ गुरुत्रिकोणेषु च ॥ ८१ ॥
शुक्रे सर्वसौभाग्यकारिणी ॥ ८२ ॥ शुक्रत्रिकोणेषु च
॥ ८३ ॥ शनी कामिनी च पुरुषः ॥ ८ ॥ शनिात्र-
कोणेषु च ॥ ८५ ॥ राहुसर्वकर्मात्मकेषु राहुत्रिकोणे-
पु च ॥८६॥ केतो चंडाली तत्समावर्ती ॥ ८७ ॥
तत्रिकोणेषु च ॥ ८८॥ एवं वर्णसंज्ञाः स्युः ॥ ८९ ॥
चक्षुहीनम् ॥ ९० ॥ वर्णाविंशांशे आद्य पहारे ॥ ९१॥
पापत्रिकोणेषु च ॥ ९२॥ यथास्वं नीचेषु च ॥ ९३॥
अंशग्रहवलानाम् ॥ ९४ ॥ रविशुकाभ्यां प्रथमम्
॥९५ ॥ रविचंद्राभ्यां द्वितीयम् ॥ ९६ ॥ रविकुजा-
भ्यां तृतीयम् ॥ ९७ ॥ रविबुधाभ्यां चतुर्थम् ॥ ९८ ॥
रविराहुभ्यां सप्तमम् ॥ ९९ ॥. रविकेतुभ्यामष्टमम्
॥ १०० ॥ एवं सर्वे रन्ध्रभाग्ययोर्वर्जयेत् ॥ १॥
१३०
जैमिनीयस्त्राणि।
लाभे च तत्र लभयोः ॥२॥शुभेन दोषः ॥३॥
शुभपापयोर्न क्वचित् ॥ ४॥ रंधापवादे सौम्यत्रिकोणे
मृगवर्गादि ॥ ५॥ स्वत्रिंशांशः स्वनीचभवने ॥६॥
यथा मृगतौल्यादि ॥ ७॥ आवंशभेदेषु ॥ ८ ॥ राहु-
केतुभ्यां प्रबंधः ॥ ९॥ वर्गोत्तमकाले ॥११०॥ प्राणी
बलानि ॥ ११ ॥ नवविषडाययोरंशः ॥ १२॥ सप्ताष्ट-
गुणचेष्टिताः ॥ १३ ॥ गुभागेल कर्तव्यम् ॥१४॥
लक्षलक्ष्यापपादयोः ॥ १६॥ क्रमाकूरे शुभाभ्यां च
व्युत्तमादुअयाययोः ॥१६॥ भ्रसप्तमयोरेतत् ॥१७॥
बलसचरिते धुवाः ॥ १८॥ एतयोगविहीनस्तु निश्चि-
स्या स्त्रीजातके ॥ १९॥ इति गुरुणाभ्यां वर्णः ॥१२०॥
स्वपितृवर्णश्च ॥ १२१ ॥ इत्युपदेशसूत्रे चतुर्थाध्याये
तृतीयः पादः॥३॥
गुणेषु गुणरमणी॥ केंद्रधिकोणेषु शुभवर्गेषु
॥२॥ अकारमंदफल्योः पुमांश्च ॥ ३ ॥ चंद्रबु-
धाभ्यां स्त्री च ॥ ४ ॥ दृग्योगाभ्यामपि ॥५॥
यथा निर्हरणम् ॥ ६ ॥ रोगे पापे वैधवी पापह-
ग्योगा निश्चयेन ॥ ७॥ उच्चे विलंबात् ॥ ८ ॥ नीचे
क्षिप्रम् ॥ ९॥ मिश्रे मिश्रात् ॥ १० ॥ चंद्रकुजहष्टो
निश्चयेन ॥ ११॥ आद्या आत्मजस्त्री ॥ १२॥ कायें
पापे कोणे वा ॥ १३ ॥ पापडग्योगकाले वियोनिसंज्ञा-
यां विधित्वादिति ॥ १४॥ धात्वादिवर्णकाले ॥१५॥
१३१ चतुर्थोऽध्यायः। भावपरिवेधनेन ॥ १६ ॥ उच्चे स्वांशवर्गः ॥ १७ ॥ अधोशे पश्वादियोनिसंबंधः ॥ १८ ॥ मध्ये मृगाः ॥ १९॥ अंत्ये कीटकादयः ॥२०॥ एवमुभी शुभ- लोके ॥ २१ ॥ रविशुक्राभ्यां पापपूर्वम् ॥ २२ ॥ अन्यैरन्यथा ॥ २३ ॥ अत्र शुभः केतुः ॥ २४ ॥ पाप- दृश्योगात्र ॥ २६ ॥ रविराहशुक्राः ॥२६॥ गुरुश्चक- कालाहण्योगमिति ॥ २७ ॥ यथा चंद्रम् ॥ २८ ॥ तत्र गुरुवर्गे स्वाम्यंशे च ॥ २९॥ स्वेशभूमिवनीचांशकच ॥ ३० ॥ पूर्णदुराबारांतरालाश्च ॥ ३३ ॥ शुभवमें शुभदृष्टियुतः ॥ ३२॥ अझे मित्रभेदात् ॥ ३३ ॥ स्वानंदतुल्ये वा॥३४॥ वो नवांशश्च ॥ ३५ ॥ तत्र ज्ञानाज्ञानेषुः ॥ ३६॥ पुत्रमणिरमणी ॥३७॥ बुधकेतुर्वा ॥३८॥ शुभचंद्राभ्याम् ॥३९॥ स्खलननाथाश्च४०॥ इत्युपदेशसूत्रे वियोनिभेदो नाम चतुर्थाध्याय- स्य चतुर्थः पादः समाप्तः ॥ ४॥ इति जमिनीयमूत्राणि समाप्तानि । पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, लक्ष्मीवेंकटेश्वर " छापाखाना, कल्याण-मुंबई.
Ramageaaaanemaratea emamalinsansamanarmanan नूतन पुस्तकें. अध्यायका ... .. रफ.... " TEESEVERE सतानगोपाकस्तान .-२ { ग्रहगोचरण्योतिष भा. टी. . विवाहविचार जगन्नाथमाहात्म्य महा ४९ संकल्पकश्पना घौतालचंद्रिका +-४ | राधागोपालपंचा समासकुसुमावळि .-३ वियोगवैराग्यशतक भलोकरहस्य o-४ मंत्रीधर्मप्रकाश भाषाटीका घाम्पनीति भाषाटीका परनमलमतका सांगीत .... मदनपालनिघंटु भाषाटीका ३-४ | भेजनसागर ग्लेज মূল্পান-লামা १२ मात्मघोष मा टी. मासचिंतामणि भा. टी. श्रीपराशरस्मृति छोटी .... •-३ श्रानिधान भाषाटीका.... •-६ पपंचाशिका माषाटीका.... .-६ केनल गीता माताटीका मुक्तिकोपनिषद् मावाटीका .-५ रामाश्वमेघ अक्षर बा मल २-८ तर्कसंग्रह भागाटीका जगमायमाहात्म्य छोटा.... •-६ स्वरतालसम्ह (सितारका पुस्तक):-८ संगीत सुधानिधि द्वितीय भाग .-३ / हारीतसंहिता भाषाटीका... ३.. भक्तिविलास ०-२ वृहदवकहडाचक्र (होडाचक्र) वैपावतंस मापारीका भावाटीका हितोपदेश मा. टी. १-४ राजवाभानिघण्टु भाषाटीका १-८ मोजमधमा टी. गीतामृतधारा.भाषा भैरवसहस्रनाम भागवत भाषा खुलापत्रा.... ६-. संवत्सरफलदीपिका लघुजातक भा. टी. पनकोश भा. टी. नासिकेत भाषा वार्तिक.... -४ बीरवर अकबरका उपहास.....-८ मरहटासरदार और रोशनगारा आल्हारामायण (आरण्यकाड) •-६ मौरंगजेबकी पुत्रीका प्रेम •-- भोजप्रबंध भाषा मारामासीया लावणीसंग्रह गोविंदगुणवदाकर जीवनचरित्र तुलसीदासजीका •-८ दिल्लगीकी पुडिया ५भाग प्रत्येक गूजरगीत मंगल.... मागकी कीमत सूर्यकवच •-१ सूर्यकवच भान्टीका शिवकवच •- आदित्यवतकथा भान्टी. -२ पुस्तक मिलनेका ठिकाना-गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, 'लक्ष्मीवेंकटेश्वर' छापाखाना,कल्याण-मुंबई. SECREENERGENEURE SEKORATORRECRer ... .... T Prahimsawal कायमंजरी ... Receisex
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