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Katran

Vibha Devsare · 2011/03

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कतरन
[कहानी-समह]
विभा देवसरे

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1955
मापार
कतरन
विभा देवसरे
नालंदा प्रकाशन, नई दिल्ली-110030

1990
मासंदा प्रकाशन
भूसमुस्मयो रोर, महरोमी
मई दिल्ली 110030
मुद्रक
हरिकृष्ण प्रिण्टर्स
शिवाजी पार्क, धाहदरा
दिल्ली-110032
3000
Katran
(a colloclon of Hindi Short stories)
by Vibba de regasey

(Collection of Short Stories in Hindi)
KATRAN
कहानी-क्रम
1 हर शनिवार/7
2 जमाने के पख/14
3 गलत इकाइयाँ/21
4 जकड/28
5 कांच के उस पार/34
6 टूटती आवाज/40
7ठहरा हुआ दुख/45
8 निर्णय/52
9 गप/58
10 तरते बत्तख/65
11 अमलतास नहीं फूला/70
12 कतरन/78
[कहानी-सग्रह]
कतरन

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हर शनिवार उस कॉलोनी में मार्गरेट विलियम का माना ससार के आठवें आश्चर्य जैसा ही था मार्गरेट विलियम सबके लिए अजूबा पी-सिर्फ अजूबा उनके आते ही पूरे महल्ले में तहलका मच गया था इत्तफाक से उस पूरी कॉलोनी में वही एक ऐसा घर था, जिसका मालिक दिल्ली से दूर मद्रास मे रहता था पर्चा यह थी कि मार्गरेट विलियम मद्रास से ही आयी थी और मालिक-मकान ने वही उनसे 'एहवास' लेकर चाभी सहित उन्हें मकान दे दिया था नही तो अरसे से मकान में ताला पडा या गरमी की छुट्टियो में तो मकान अखाडा बना रहता चहार-दीवारी से कूदकर बच्चे अमरूद तोड ले जाते महल्ले के बच्चों की टीमो मे होड सी बनी रहती कि कौन जाकर पहले उस अमरूद वाले घर मै अड्डा जमाता है 'रिजर्वेशन' के बतौर कोई बच्चा अपनी टीम की निशानी छोड आता फिर घटों उस जगह पर उनका कब्जा बना रहता, लेकिन जब से मागरेट विलियम उस घर मे आ गयी थी, किसी की हिम्मत नहीं होती कि फाटक खोलकर अदर घुस आए पो भी मागरेट विलियम ने गेट पर तख्ती टांग रखी थी, 'कुत्ते से सावधान' सुबह-शाम मागरेट विलियम स्वयं ही अपने कुत्ते को लेकर बाहर निकलती मार्गरेट विलियम को लुके-छिपे देखना सभी को अच्छा लगता पूरा ऊचा कद, पपई रग, 'स्टाइल' से सवरे 'बॉन्ड हेयर', और छरहरा बदन तीखा नाक-नक्श उन लगभग तीस-पतीस के आस-पास महल्ले के कुछ पुरुषों ने तो अपनी 'शेविंग' का समय भी तय कर रखा या मार्गरेट विलियम बसे ही कुत्ते को लेकर बाहर निकलती, लोग अपनी खिड़कियों मे या बेड़े में आ जाते, और 'शेव' करने लगते श्रीमती चोपड़ा और श्रीमती कपूर को तो यो भी अपने-अपने पतियों पर कडी निगरानी रखनी 8 हर शनिवार पडती थी मार्गरेट विलियम के माने से उनका हाजमा कुछ ज्यादा ही विगहा रहता था साख काम का दवाव रहता, बच्चे स्कूल के लिए देर से तैयार होते, पति को लप देने के लिए एक ही सम्जी बन पाती, किंतु अपने पति को मार्गरेट विलियम से वधाने के लिए वे भार-बार 'किचन' से माना न भूलती जैसे ही मार्गरेट विलियम के घर का द्वार खुलता, श्रीमती पोपहा और श्रीमती कपूर चौकन्नी हो जाती और अपने-अपने पतियों पर वडी मुस्तैदी से कहा पहरा देने लगती कॉलोनी की इस नई चकल्लस मे अगर किसी को लाभ हो रहा था, तो यह थी--सुल्लो सुल्लो घरेलू काम करने वाली नौकरानी थी वह सिर्फ उन्ही परो मे काम करती थी, जिनमे खाना 'गस' पर पकता हो, फिज' का ठडा पानी पीने को मिलता हो और शाम के समय मनोरजन के लिए 'टी वी ' देखने में कोई रोक-टोक न हो अगर सुल्लो को अपने इस 'स्ट के मुताबिक कोई ग्राहक न मिलता, तो वह वहा का काम करता मजूर न करती लेकिन मार्गरेट विलियम के थाने के बाद, सुल्लो माई की वही खातिर होने लगी पी सबने उसे 'इफॉरमेशन ऑफिसर बना लिया या उससे ताजी-ताजी खबरें जान लेने के लिए सभी उत्सुक रहते कॉलोनी की मुखिया श्रीमती सेठ उसे गरमागरम चाय और पराठे भी खिलाती सुल्लो के भी नाज नखरे, अदा और अदाज में फक आता जा रहा था नयी मालकिन मार्गरेट विलियम के घर काम करने से मानो उसकी किस्मत को लाटरी खुल गयी पी सुबह मुह अधेरै सुल्लो, मागरेट विलियम की सेवा में हाजिर हो जाती 'वेड टी' भी मागरेट विलियम सुल्लो के ही हाथ से सेती दो तीन महीनों में ही सुल्लो मार्गरेट विलियम के उतारे कपडों में चमकने लगी पी सुल्लो के लिए एक मिसेज सेठ ही ऐसी थीं जिनकी कोठी और मोटर एतबा सुल्लोको कुछ विनम्र बना देता फिर मिसेज सेठ ने माहे वक्त पर सुस्लो की मदद भी कुछ कम नहीं की थी सभी जानते थे कि मिसेज सेठ गरीबों को हमदर्द हैं आहे वक्त पर मुग्गी झोपडी वालों को चारदेती है जो नपार चुकता नहीं कर पाता है, वह रुपयों के ऐवज मे महीनों उनके पर धार-छह घंटे काम कर माता है सुल्लो भी कर्म से दबी थी, पर मसा हर शनिवार 9 हो इन मेम साहब का, जिनकी कृपा से वह मिसेज सेठ का दो सौ रुपया चुका आयी और तो और अब सुल्लो सारे मुहल्ले मे भटक भटककर काम नहीं करती सिर्फ मार्गरेट विलियम के पर सुबह से शाम तक लगी रहती है मागरेट विलियम के आफिस जाने के बाद ग्यारह बजे से लेकर शाम के छह बजे तक सुल्लो ही उस घर की मालकिन होती है मागरेट विलियम के खुसूबदार 'शंपू' और साबुन का इस्तेमाल कर घटो ड्रेसिंग टेबल' पर 'श्रीम' कभी 'पाउडर' और कभी 'लिपिस्टिक' का इस्तेमाल करती है फिर एक दो घटे मागरेट विलियम के गुदगुदे बिस्तर पर सोती है भीनी-भीनी सुगध से महकता मागरेट विलियम का गुदगुदा बिस्तर सुल्ली के लिए क्सिी स्वर्ग से कम नहीं एक रहस्य को सुल्लो आज तक नही समझ सकी और न उसने किसी से उसको चर्चा की हर शनिवार को मागरेट विलियम शाम को सुल्लो को जाने नही देती हैं उस शाम विचन मे बहुत अच्छा खाना बनता है मीट और अडे को कई तरह की सब्जियां, बिरयानी, और भी बहुत कुछ चीजें कुछ सुल्लो बनाती और कुछ स्वय मागरेट विलियम बनाती वह ऐसा अच्छा मसाला भूनती हैं कि सुल्लो कई बार मुह मे आया पानी गले के अदर करती है साढे आठ के करीब जब किचन मे पूरी तैयारी हो जाती हैं, तब सुल्लो को 'डाइनिंग टेबल' लगाने का आदेश देकर मागरेट विलियम बाथरूम मे घुस जाती हैं आधा घटे बाद जब बाथरूम खुलता है, तब एक नये विस्म की खुशबू की भभक चारो ओर फैलने लगती है फिर मागरेट विलियम बहुत भारी सी साडी पहनकर मेकअप करने बैठ जाती हैं रोज से थोडा गहरा मेकअप करके, साडी से मैच करता सेट पहनती हैं सुल्लो मत्र मुग्ध-सी मालकिन का रूप निहारती रह जाती है उसी रात साढे नौ और दस के बीच दो कारें आती हैं कुछ महिलाएं और कुछ पुरुष आते हैं खाने-पीने का क्रम लगभग एक दो चलता है दिनभर की थकी सुल्लो बारह बजे तक खा पीकर मालकिन का आदेश पाते ही शैम्पी कुत्ते को लेकर स्टोरवाले कमरे में सोने चली जाती है सुबह नीद खुलते ही सुल्लो मालकिन को 'बैड टी' देने जब उनके कमरे में जाती है, तब मागरेट विलियम कमरे मे बहुत उदास चुपचाप बैठी होती रात तक 10 हर मानिवार हैं था पेहरा ऐसा लगता है कि सिफ एक ही रात से नहीं, कई रात उहोंने ऐसे ही पिसी पिता मेवर वितायी हो सुल्लो पिछले छह महीनासे मार्गरेट विलियम शेहर शनिवार को बहुत सुदर और इतवार की सुबह पोर चिताओ मडवा पाती है उसको हिम्मत भी नही होती है कि मालरिन से कुछ पूछ सके सिफ इतना ही पूछ पाती है मेम साहम कोई गोली ला दू' और मार्गरेट विलियम सिफ इतना ही कह पाती हैं 'नहीं, कोई जरूरत नहीं' सुल्लो चुपचाप कमरे मे बिसरे सिगरेट के जले टुको समेटती है कांच से सासी गिलास उठाकर कमरे से बाहर चली जाती है सुल्लो ने इस सबकी पर्धा आज तर किसी से नही की है मिसेज सेठ ने कई बार सोद-खोदकर उससे पूछा भी अपनी पुरानी साहियां भी दी लेकिन सच तो यह है कि सुल्लो इतना ही जानती है कि मेम साहब महा विलकुल अकेली हैं सुल्लो स्वय भी शनिवार की शाम और इतवार की सुबह का रहस्य नही समझ सकी है अपने आदमी तक को उसने इस बारे में कुछ नहीं बताया है उस दिन दोपहर को सुल्लो गेट मे ताला मारकर गुप्ता स्टोर गयी थी सुल्लो को देखते ही धूप सेकती महिला महसी ने घेर लिया मिसेज चोपडा बोली, "सुल्लो, तेरी सुदरता तो दिन दूनी रात चौगुनी बढती जा रही है" सुल्लो इस समय अपना महत्त्व आका जाना अच्छी तरह समझ रही पी श्रीमती सक्सेना की बगल मे बठती हुई बोली, "बीबी जी, तुम तो कैसी गुब्बारे-जैसी फूलती जा रही हो, योगासन किया करो" सारी महिला महली 'हो हो कर हस दी मिसेज सक्सेना ने खिसियाते हुए कहा, "बस बस योगासन तू कर और तेरी मेम साहब करें मुझे शो पीस नहीं बनना मिसेज सेठ ने मुद्दे पर पहुचते हुए कहा, "अच्छा सुल्लो ये बता, तेरी मेम साहब ने शादी ब्याह 'सुल्लो ने बात काटते हुए कहा, 'बस अकसर यही कहती हैं, मेरे मा-बाप नहीं हैं" मिसेज सेठ बोली, "कभी किसी से मिलती-जुलती नहीं कोई बाहर से भी नहीं आता?" सुल्लो ने पिढ़ते हुए कहा, "देखो धीवीजी बुरा मत मानना तुम लोग हर शनिवार 11 " भी तो कभी उनका दुस-सुख पूछने नहीं जाती हो बच्चो तक को उनके पास नही भेजती हो ऐसा कौन सा मैल है उनम "मल?" मिसेज घोपडा त मे आ गयी थी "जब से मुहल्ले में आयी है, जवान लडकिया उनका रग-ठग निहारने में लगी रहती हैं, जवान सडके कोठी के आस पास महराते हैं और तो और चार-चार बच्चो के " 'आप कहना क्या चाहती हैं मिसेज चोपडा, मेरे कपूर साहब ने तो कभी परायी स्त्री को अखि उठाकर नही देखा" मिसेज कपूर ने सफाई दी मिसेज चोपड़ा ने कहा, "बहनजी, मैं तो जनरल बात कर रही थी मेरे घोपडा साहब तो जब से क्लास मन हुए हैं, उहें घर मे भी ऑफिस के काम से फसत नही" मिसेज सेठ ने सबको चुप कराते हुए कहा, "हा, तो सुल्लो। तू ये बता कि हम तेरी मेम साहब से मिलना चाहें तो क्या वो मिलेंगी" 'सुल्लो खुश होती हुई बोली, "क्यो नहीं? मैं आज ही कहूगी," और उठ खडी हुई मिसेज कपूर ने कहा, "वैसे आइडिया तो बुरा नहीं है, उनसे मिला तो जा सकता है लेकिन "मिसेज चापहा ने समस्या का समाधान किया, 'औरतें ही मिलें तो अच्छा है" उस दिन फिर शनिवार था हमेशा की तरह सुल्लो और मागरेट विलियम शाम से ही किचन मे लगी थी नहाने के बाद जब मागरेट बाथरूम से निकलीं, तो खुशबू को भभक चारों ओर फल गयी सुल्लो को आश्चय तो इस बात का होता कि भरी सरदी मे भी शनिवार की शाम मेमसाहब नहाती जरूर हैं साढे नौ, पौने-दस के करीब दो गाडिया आयी जिसमें कई महिलाए तथा पुरुष ये खाना-पीना चलता रहा माज मेम साहब के आदेश पर भी सुल्लो सोना नहीं चाहती थी लेकिन मेम साहब के कहने पर उसे शेम्पो को लेकर जाना ही पडा सुल्लो को आज नीद मही आ रही थी वह बड़े हाल के दरवाजे के पीछे खडी हो गयी उसने देखा सभी लोग बहुत खुश हैं कहकहो और शोर के बीच मेम साहब उठती हैं और रेडियोग्राम के ऊपर रखे रिकार्ड वजने के लिए लगा देती हैं डास के लिए उनके परों में थिरकन होती है वह चाहती हैं लोग उनके 12 हर शनिवार साप डांस करें 'यस यस 'रहती हुई, वह हाप बढ़ाती हैं, लेकिन सभी मेहमान बुत बने चंठे रहते हैं मार्गरेट विलियम के चेहरे की सगी अचानक उह जाती है वह उदास होकर पुपचाप गमरी में पाती जाती हैं रिमा बज रहा है वह रिवार हर शनिवार को पार्टी में बजता है सुल्लो उसकी धुन से परिचित है लेकिन रिका बजने पर क्या होता है यह वह नही जानती पो आज जो मेहमान आये थे, उनमे एक नया चेहरा भी पा सुडौल और खूबसूरत उम्र यही कोई चालीस के आस-पास एक बहुत परिचित चेहरा अकल जानी का पा यह अधेड उम्र व्यक्ति जरूर पे लेकिन उनका व्यवहार मागरेट विलियम थे साप बिलकुल दोस्त-उसा था सुल्लो ने सुना-अकल जानी ने नये चेहरे से कहा, "डेविड, बस यहीं से इस कहानी की ट्रेजडी शुरू हो जाती है होता यह पाकि विलियम मद्रास से दूर एक बड़ी फैक्ट्री मे काम करता था शहर से दूर फवदी के वातावरण मे रहना न विलियम को पसद या न मागरेट को सेकिन फक्ट्री का उच्चाधिकारी होने के कारण रोज मद्रास आना भी सभव न था शनिवार की रात वह जरूर आता था उसकी ट्रेन मद्रास सेंट्रल पर कोई सवा नौ, साढे-नी के करीब पहुचती, वह टैक्सी लेकर सीधे घर आता, जहा उसकी प्रिय मागरेट, सभी दोस्तो के साथ पार्टी के लिए प्रतीक्षा किया करती मागरेट को विलियम के आने का इतना पक्का अदाज था, कि यह रिकार्ड शुरू होते ही विलियम जरूर आ जाता फिर डास होता खाना- पीना होता और देर रात को सब लोग अपने-अपने घर चले जाते" अकल जानी अचानक एक ठडी सांस लेकर बोले, "लेकिन एक दिन विलियम की ट्रेन का एक्सीडेंट हो गया फिस प्लेट निकल जाने से इजन और बोगिया उलट गयी थी उनमे विलियम भी था उस रात मागरेट विलियम का इतजार करती रही सवेरे अखबार मे दुघटनाग्रस्त लोगो में विलियम का नाम भी या लेकिन मागरेट पर उस खबर का कोई असर नही हुआ वह बोली नही ऐसा नहीं हो सकता, विलियम को किसी कारण फक्ट्री मे रुकना पडा होगा, एक्सीडेंट मे किसी और विलियम की मृत्यु हुई होगी' मार्गरेट का यह विश्वास बहुत पक्का या अन्त मे मैंने यही निश्चय किया कि इसे दिल्ली ले चलू जगह बदलने से शायद इसे कहा, "डेविड धया 7 असलियत का अहसास हो सके यहां मार्गरेट को एक अच्छी फैक्ट्री मे नौकरी लगवा दी है सब कुछ ठीक है, लेकिन हर शनिवार इसे विलियम का इतजार होता है' अचानक ही अक्ल जानी उठे उहोंने डेविड से तुम मार्गरेट के लिए विलियम नही बन सकते हो? मैं जानता हूँ कि यह शादी "और रिकार्ड बजना अचानक ही बद हो गया मागरेट ने सुई उठाकर स्टड पर रख दी थी सारे माहौल मे सनाटे का करेंट लग गया था सब चुपचाप उठकर डाइनिंग टेबिल पर खाना खाते रहे अकल जानी के गले मे कौर फस जाता है और यह खासने लगते हैं मागरेट उठकर उहें पानी पिलाती है और फिर अकल की सजल आखो मे भाककर पूछती है, "अकल, विलियम अगले शनिवार जरूर आयेगा न?" अकल कुछ नहीं कहते हैं चुपचाप सिर झुका लेते हैं रात गहराने लगती है, धीरे धीरे सब उठकर चले जाते हैं सुल्लो देख रही है, मेमसाहब का चेहरा स्याह और उदास है देर तक वह सबको जाता देख रही है, जैसे सोच रही हों -या हुआ अगर पार्टी खत्म हो गयी ? विलियम फिर भी तो आ सकता है ऐसा पहले भी तो एकाध बार हुआ है आते ही कहेगा, "कोई बात नही डालिग, अब हम और तुम दूर तक फले गहरे अधेरे मे देख रही हैं जाती हुई कारो की रोशनी अपने पीछे अधेरा छोडती जाती है मागरेट विलियम बहुत थकी वेजान-सी अपने कमरे मे आ जाती है सुल्लो चाहती है कि वह अकेली उदास मेम साहब के पास चली जाए पर उसे डर लगता है वह स्टोर मे चली आती है आज सुल्लो मेमसाहब को गोली के लिए भी नहीं पूछ पाती है चुपचाप जले हुए सिगरेट के टुकडे उठाने लगती है काच का खाली गिलास उठा कर बाहर चली जाती है हर शनिवार के बाद अगली सुबह उसे ऐसा हो तो करना पड़ता है "मागरेट दूर- ०० जमाने के पख घर मे खासी चहल पहल थी मेहमानो को चिटिठया भी आनी शुरू हो गई थी शादी के दिन भी तो कुल चार ही बचे थे दीदी का एक पाव घर मे था तो एक बाजार मे महीनो से तैयारी हो रही है, कि कही ऐन मौके पर कुछ कमी न रह जाये, और भागा दौडी को नौवत न आने पाये लेकिन न खत्म होने वाला काम भानूमती का कुनबा होता जा रहा था और तो और रिचा के कपडो का ही बॉक्स नहीं लग पाया था किसी साही का फॉल नहीं लग पाया था तो क्सिी ब्लाउज की फिटिंग ठोक नहीं थी और ब्लाउज फिर से दर्जी को देना पडा था दीदी भी क्या करती अकेली जान कहा-कहा भागे अम्माजी तो दीदी की इन तैयारियो से ऊब उठी थी "अरे हमने भी वेटियो का ब्याह रचाया था पर कोई आसमान नहीं सिर पर उठा लिया था महीनो मेहमान आकर टिके रहते पे पर क्या मजाल कि रसोई मे कभी माचिस की एक तिली भी धम हो पर अब तो जसे जमाने को ही पख लग गये महीनो से शादी की तैयारी हो रही है हजारो का सामान आ रहा है, और घर में मातम सा छाया है वही कोई रौनक नही न ढोल, न मजीरा, न बन बनी कुल बार रोज रह गये हैं शादी के मेहमानो को तो दूर अभी घर वाले ही नही आ पाये हैं मालकिन को खरीदारी से ही फुरसत नही अम्मा जी का ये टेप तभी बजता है जब दीदी घर मे नही हाती हैं मेहमानो के आगमन से दीदी को बडी कोफ्त होती है दीदी नौकरी पेो वाली ठहरी अपनी गहस्थी और तीन बच्चो को सम्हालने के लिए उहें वक्त जुटाना पडता है अम्मा जी साल की दूसरी इनिंग यही बिताती हैं कडाके की ठड,पर मातमाम वाम, स्कूल की नमाम जिम्मेदारियों से तनाव अस्त दोटीका मस्तिष्क, और उसमे अम्मा जी की चटकारा सेती जवान की फरमाइशें "बहू आज बाजरे की कचीडी बनाओ तो आज मक्के की रोटी और सरसो का साग बनाओ" धोदी झुझला उठती हैं अम्मा जी की ये क्यो नही समझ में आता है कि एक आदमी मशीन नहीं हो सकता-फिर स्कूल मे भी सिफ पढाने भर की बात हो तब तो कुछ बाते मोखोती है। जब से दीदी प्रधानाध्यापिका हुई हैं तब से तो दम मारने की भी फुरसत नही मिलती है आज यहा मीटिंग, कल वहा मीटिंग और तो और आये दिन स्टॉफ का कोई न कोई मेम्बर छुटटी चाहता है फिर शिक्षक कल्याण समिति के कुछ मेम्बर इसी स्कूल में हैं बड़े ही धाकड किस्म के हैं सिवाय नेतागिरी के उहें और कुछ करना ही नही आता श्यामली बाई स्कल की चपरासिन दीदी का बहुत ख्याल करती थी अक्सर उनके घर जाकर बहुत से घरेलू काम निबटा देती थी उसे भी इन नेताओ ने जब से भडकाया है तब से हाल ये है कि बिना सरकारी आडर लिए कोई पोस्ट ऑफिस से टिकट भी नहीं लाकर देती है दीदी ने कई बार कभी सीधे और कभी धुमा फिरा कर सचालक महोदय से कहा भी है कि इस विद्यालय से मजूमदार और पाण्डे का तबादला कर दें ये सिर्फ नेतागिरी ही करते हैं, बच्चो को पढाते लिखाते कुछ भी नहीं हैं, परदीदी ये भी अच्छी तरह जानती हैं कि उनकी आवाज तो सिफ सचालक महोदय तक ही है मजूमदार और पाण्डे की आवाज और ऊचे तक पहुचती है इसी लिए दीदी ने रिचा के विवाह से छ महीने पहिले ही छुटटी के लिए अर्जी दे दी थी कही ऐसा न हो कि ऐन मौके पर पाण्डे और मजूमदार कोई हगामा खडा कर दें और दीदी अपनी प्यारी सी बिटिया के ब्याह की तयारी का अरमान सजोये ही रह जाये दीदी को छुट्टी भी मिल गई थी पर होता क्या है अरे शादी ब्याह का काम कोई आसान थोडे ही होता है अम्मा जी के प्रवचन के हिसाब से तो रिचा को दो साडी मे भी विदा किया जा सकता है पर जमाना क्तिना आगे बढ चुका है फिर कुछ गलत थोडे ही है जिसे पहनना ओढना है उसी के मन पसद के कपडे न हो तो किस काम के शादी कोई बार-बार तो होती नही छुट्टी मजूर होते ही दीदी ने अपना और रिचा का दिल्ली था टिकिट बुक करवा लिया लेटेस्ट डिजाइन और वाजिव कीमत दोनों 16 जमाने के पक्ष के ही लिए दिल्ली से उपयुक्त और कोई जगह नहीं हो सकती इसी बहाने अमित के परिवार से भी मिलना हो जायेगा वहा केसी तैयारी हो रही है इसका भी थोडा बहुत जायजा मिल जायेगा दिल्ली के प्रोग्राम से रिपा भी बहुत खुश पी एक सुनहरा अवसर उसे फिर मिलेगा दिल्ली का ट्रिप अच्छा रहा अमित के पसद की कई साडिया रिचा ने ली पर मौसम की तबदीली का असर भला दीदी की माजुक बिटिया कहा झेल पाती, कहा भोपाल की गुलावी ठड, और कहां दिल्ली की कपा देने वाली ठह सो भोपाल लौटते ही रिचा बिस्तर पर पर गई बडे डॉक्टर आये कई तरह को गोलिया, कंपसूल टॉनिक हर घटे फल का जूस दूध, तिमारदारी का काम और बढ गया दीदी के पास वैसे ही समय कम था सुरेश राय भी छुटटी पर थे लाडली विटिया का ब्याह था, बरातियो के आव भगत की तैयारी में लगे थे बीमार बिटिया के पास घटे-आप घंटे बंठने की भी फुरसत नही थी ले देके अम्मा जी पर तिमारदारी का काम डाला गया अम्मा जी रिचाके पास बैठते ही अपना टैप बजाने लगती "अरे तुम तो बीमार हो गई जऊन आब हवा बदला और ठडी लगी हमारी बिटिया तो सादी की घर मे चर्चा का घली कि बीमार जैसे हो जाती रही और उघर शादी का हगामा शुरू हुआ और इधर इनके मांसुअन का बहना सुरू हुआ तो इ समझो जब तक विदा के समय सारा घर न रोये आसू पमते नहीं थे पर मय उ बात कहा रही अब तो जैसे जमाने को पख लग गया है" "रिचा दादी मा के इस टेप से कबती हुई बोली-"दादी मां, आप बहुत बोलती हैं सर मे दद होने लगा। कुछ खीमती सी अम्माजी बोली "अब जब बुखार चढ़ा है तो सर में ददं तो होगा ही उठो ६ गोली खाइय लो, हम तो पहिले ही जान रहे थे, दिल्ली गई है जरूर हाली-बीमारी साथ लेकर लौटेगी, पर हमारी सुने तब तो ? अरे हमारे जमाने में लड़की का म्याह तय हुआ नहीं कि कोई परछाईमहीं देख पाता या परमदतोजसे "जमाने को पस सग गये हैं "रिषा ने दादी मां का वाक्य पूरा जमाने के पक्ष 17 " करते हुए लिहाफ से मुह ढक लिया अम्माजी भी भुनभुनाती हुई हठ गई, "आग लगे इस पढ़ाई को न किसी की इज्जत न किसी का मान सम्मान, भरे लाख जमाना बदल जाये तो क्या सास ससुर और ससुराल का कायदा अदव तो सबको निभाना पड़ता है लेकिन जब मायके में ही बाप भाई का कोई लिहाज नहीं है तो ससुराल तो चार दिन भी नहीं निभेगी एक हमारी बेटिया है इसी घर खानदान की है पर मजाल है- - कि उन्होंने कभी खानदान पर कोई आच आने दी हो अम्माजी ये तो अच्छी तरह जानती हैं कि जिस तरह जमाने के पख लग गये और लोग चलने की जगह उहने लगे हैं, उस हिसाब से अम्माजी के लिए चलना क्या, रेंगना भी मुश्किल हो गया है मन मे अनुभवो की जाने कितनी आधिया पलती रहती हैं किसके आगे अपनी भडास निकाले वक्त इसी तलाश में रहती हैं कि कोई अच्छा श्रोता मिल जाये दीदी को तो बिलकुल ही समय नहीं मिल पाता यो भी अम्मा जी को वो अपना सिर दर्द समझती हैं लेकिन जब से रिचा सयानी हुई है दीदी मन से यही चाहती है कि मम्मा उही के पास बनी रहें सुरेश राय को अपने ऑफिस और दीदी को अपने स्कूल की जिम्मेदारियो से घर के लिए वक्त कम ही मिल पाता है ऊचे ओहदे की नौकरी है माये दिन चार लोगों का आना-जाना बना ही रहता है फिर क्लव और मीटिंग का बखेडा भी कुछ कम नही दीदी को नौकर चाकर पर भी बहुत विश्वास नही, अम्मा जी बूढी ही सही, घर की सुरक्षा में किसी ताले से कम नही पर मम्मा जी की पहरेदारी से रिचा बहुत खीमती है, घर में आने वाले हर जवान लडके पर निगाह रखती हैं, चाहे वो मौसरे भाई हो या फुफेरा भाई कई बार वो दीदी से कह भी चुकी हैं कि उहें मालोक का आना अच्छा नहीं लगता है जब देखो तब रिचा के कमरे में घुसा रहता है उसकी निगाह बहुत अच्छी नहीं है फिर भाग और घी का बहुत पास रहना अच्छा महीं है पर, अम्मा जी के इन प्रवचनो को सुनने का वक्त ही किसी के पाम नही हैं फिर जमाना बहुत आगे बढ़ चुका आलोक दीदी की सगी बही बहन का बेटा है रिचा उसे राखी बापती है आलोक की कोई बहन नहीं है अपने मां बाप का इकलौता बिगहा 18 जमाने के पक्ष नवा - या नो आलोक दीदी और विशेषकर सुरेशराय को भी बहुत पसंद रग पर लिखने मे साढ़े बाइस है, रिसर्च के हिसाब से एक-एक ग्लास का पार्ट करता है रिचा से तीन साल बहा है, रिषा ने एम.एस-सी० पाम र निया और आलोक अभी बी० ए० मे है कई बार सुरेश राय ने बाज IT से आलोक के माने और रिघा से इतना घुल-मिल कर बात कन पर मापत्ति भी उठाई लेकिन सुरेश राम की इस आपति का दीदी न क । विरघ किया और सुरेश राय को ये अच्छी तरह बता दिया है कि गान 'जम प्रतिष्ठित पद पर सुरेशराय हैं उसका श्रेय आलोक के पिता गानि -नव जीजाजी को है आलोक के पिता प्रदेश की जानी-मानी हस्ती है - 7 कौन नही जानता लोग महीनो के परिश्रम के बाद भी उससे मिल नापान ने फिर दीदी भला कैसे उनके महत्व को ठुकरा सकती हैं हर समाचन का घडी मे उहें अपने जीजाजी का हो तो सहारा रहता है स्कूल म न च प ण्डे और मजूमदार ने हगामा किया था और नौबत दीदी के नम्ताप तक आ पहुची थी तो जीजाजी ने ही उस मामले को रफा-दफा किया था तने ढेर से अहसानी से दबी दीजी, भला आलोक के महत्व को कम नकार सकती पी आलोक का इस तरह घुलना मिलना अच्छा तो टाटा कामा नही लगता रिचा सयानी है उसे ही समझा लेती हैं, कि को जालोक में बहुत बातचीत न किया करे पर दीदी उस समय मजबूरी की बान में निलमिला कर भी कुछ नहीं कह पाती हैं-जब आलोक षड- धाना मार साइकिल पर आता है और कहता है "मौसी,रिचा को लेकर पिचर जा रहा हू उसका भी टिकट ले लिया है "दीदी कुछ कहें उससे परन रिचा तयार होने चल देती है पर जब से रिचा का विवाह तय हुआ है, दीदी कुछ आश्वस्त सी हो गर्न , f ना को देखते ही अमित के परिवार वालो ने हामी भर दी थी अमिन मा प्रसन था और रिचा भी अमित की कल्पना से ही रिचा का आचन क्नों से भर उठता और मन ही मन उन फूलों की महक से अभि• भूत । रती अमित पढा लिखा है अच्छी फर्म में इजिनियर है वेतन अच्छा परिवार भी सप्रान्त और आधुनिक है, रिषा की होने वाली माम अग्त मार है, उसकी मम्मी भी पढ़ी लिखी जरूर है पर बस स्कूल की Pora आदशवादी प्रधानाध्यापिका ही लगती है और दादी माझी चौकसी में तो उसे घुटन सी होने लगती है दादी मा अगर ओन वेलिमाने के संग उड पाती तो पहले तो वो जमाने के पख ही कतर डालती अब आलोकी लो, मस्त है मजेदार वातें करता है उसका व्यवहार एकादोस्तै जमा. है रिचा को तो आज तक नहीं लगा कि आलोक में कोई खोर हैन्यही बात उसने मम्मी को भी समझाई है फिर रिचा कोई सोलह साल की बच्ची तो नही है जो अपना भला-बुरा खुद न सोच सके पर उस दिन हगामा मच गया जब रात बारह बजे के बाद भी रिचा घर नहीं लौटी आलोक उसे लेकर मोटर-साइकिल पर वही ले गया था एक दो और तीसरा दिन भी बीत गया माज ही रिचा की बरात आने वाली थी दीदी को तो ऐसा सदमा लगा कि बिस्तर से उठने की भी उनकी हिम्मत नही बची सुरेशराय बिलकुल गुमसुम हो गये थे मेहमानो से घर भरा था हर कोई अपनी तरह टीका टिप्पणी करने के लिए स्वतत्र या एक अकेली अम्माजी थी जो हर चोट को सहने के लिए अलग-अलग ढाली का प्रयोग कर रही थी उहोने ही अपने दामाद से कह कर दिल्ली टेलीग्राम भिजवाया था कि बरात न आये मेहमानो और सम्वधियो से भरे घर मे विचित्र सा मातम छाया या कुछ मेहमान तो अपना बोरिया विस्तर समेट कर चलते बने थे बस कुछ बहुत निकट के सम्बधी ही रह गये थे, जो ये निणय नहीं कर पा रहे थे, कि दीदी और सुरेशराय को इस हालत में छोड़कर जाना ठीक रहेगा भी या नहीं शाम का धुधलका इधर उधर हितगने लगा था घर मे छाई मायूसी उस घुघलके को और गहरा रही थी अकेली अम्माजी थी जो कभी किसी को पानी पूछती, कभी किसी के लिए चाय बना लाती कमर झुकाए झुकाए उठाई-धरी का काम भी अम्मा जी ही कर रही थी दीदी और सुरेशराय को तो जसे पाला मार गया था--अपने ही घर मे बेगाने बने बैठे थे वैसे भी वातावरण इतना ट्रेजिक हो गया था, इसे हर कोई स्वीकार करते हुए भी उसमे कॉमडी टूट रहा था अम्मा जी महरिन को कोसती आगन से वतन समेट रही थी तभी 20 जमाने के पक्ष लगा जैसे कोई दरवाजे से टिका खडा है-अम्माजी दरवाजे की ओर बढी शायद महरी आ गई लेकिन आज पिछले दरवाजे से कसे आई है ? सहसा अम्माजी एक्दम चोख उठी, "अरे, रिचा बिटिया, तुम कहा चली गई थी हाय हाय तुम्हें ये क्या हो गया" रिचा अम्मा जी से लिपट कर फूट-फूटकर रोए जा रही थी गोरा सफेद चेहरा स्याह पड गया था अम्मा जी चीख-चीख कर सारे घर को पुकार रही थी रिचा बदहवास सो रोए जा रही थी-अम्मा जी जब तक रिचा को सम्हाले-कटे पेड सी वो आगन मे बेहोश होकर गिर गई सारे मेहमान इकट्ठे हो गए काई उसके मुह पर पानी के छीटे मार रहा था-कोई उसे उठाकर अदर ले जाने की सलाह दे रहा था--तो कोई डाक्टर बुलाने की बात कर रहा था-दीदी ने देखा तो घणा से मुह फेर लिया सुरेशराय गुस्से से घर पर काप रहे थे रिचा ने वराह के साथ आखें खोली-लडखडाती सी उठी और सुरेशराय के पैरो पर गिर कर फूट-फूटकर रोने लगी-"पापा, मुझे माफ कर दो--मेरी जिंदगी मिट्टी मे मिल गई-अब मैं शादी कभी नहीं कर सकूगी तभी प्रवेश के साप एक भर्राई हुई आवाज आगन मे गूज उठी "कौन कहता है कि तुम्हारी शादी नही होगी--सुरेशराय घबराने को भोई बात नहीं, रिचा मेरे घर की बहू बनेगी_" आलोक सिर नीचा दिए हुए आलोक ने कहा- हा मैं रिचा से 'खामोश हो जा कमीने तू मुझसे ब्याह करेगा नीच हट जा मेरी आंखो के सामने से तुझे शर्म नहीं आती--मुझे अपनी पत्नी बनाएगा और पाण्डे और मजूमदार को क्या मैं रसल बनूगी कमीने पापी तुझे तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी चला जा नहीं तो मैं तुझे मार हालूगी बिजली कडकी और घनघोर काले वादलो मे समा गई सब स्तन्य पे दीदी तान के पत्ते के महल की तरह ढह गई थी शाम पूरी तरह रात में बदल गई थी अम्मा जी रिघा को सम्हाल कहे जा रही थी मैं पहले ही महती पो दिमाग और धीमा एक पास रहना ठीक नही पर जमाने को कौन रोके उसने तोपस लग गए है" , " ..

. गलत इकाइया "ये मेरे बाँस हैं," मिश्रा ने उनसे मेरा परिचय कराया लम्बा कद, ढलती उम्र में भी स्वस्थ्य शरीर, नाक नक्श बहुत सही नही तो गलत भी नहीं बॉस अपने पूरे बडप्पन के साथ मुस्कराए मैंने हाथ जोड दिये मैं गणित का अध्यापक हू, पायद इस वजह से हर चीज को जोडने घटाने की मेरी आदत सी होती जा रही है सवसेना के बॉस को भी मैं जोडन-घटाने लगा बाम वा जोड इस तरह निकल रहा था उनकी दौडती हुई मोटर, शराब की बोतलें सदा नवयौवना बनी रहने वाली उनकी पत्नी, उनके इदगिद घमचो का हुजुम सबको जोडने पर मुझे एक अदद बॉस साफ नजर आया । उस पार्टी के केद्र बिदु थे, मुझसे हाथ मिलाकर काफी आगे निकल चुके ये काफी व्यस्त हैं मुझ जैसे लोगो से बतियाने का उनके पास समय भी कहा होगा अपनी महत्वहीनता से मैं सुलग उठा मैंने मिश्रा से पूछा "क्यो बैतु इनका धमचा है क्या?" मिश्रा कुछ देर तक निरपक हसता रहा, शायद मेरे मजाक को हल्के म ले रहा हो फिर गभीर होता हुआ बोला "यार तू नहीं जानता, बढी रायल फैमली को बिलाग करते हैं मिसेज तो इनकी बडी स्वीट लेडी हैं वही इटीलेक्चुयुअल भी हैं और ' मैंने मिश्रा को काटते हुए कहा "अरे बम भी कर यार तेरे पास पूरे परिवार का बहीखाता है क्या," मिश्रा कुछ चिढ कर मेरे पास से उठ दिया था यो भी वो बडी देर से मुझसे कब रहा या नीता उस बॉस की बगल में बैठी थी मिश्रा सबकी आवभगत में सग गया बॉस को प्रसन करने का इससे उपयुक्त शायद ही कोई अवसर मिले वो ये नही चाह रहा था कि नीता उसके बॉस के पास से एक मिनट के लिए भी उठे पार्टी अच्छी चल रही थी मिया बार-बार मेरे पास आता और चला 22 गलत इकाइयां करूगा जाता शायद वो कुछ कहना चाह रहा हो काफी लोग जा चुके थे बाम और मुझे लेकर इक्का दुक्का लोग और थे मिश्रा फिर मेरे पास आया, उससे पहले मेरा गणित मेरे मस्तिष्क मे छाने लगा अपनी महत्वहीनता और मिश्रा द्वारा टाले जाने का जोड यही निकल रहा था कि मैं उठ कर चला जाऊ इस बार जब मिश्रा आया तो मैं उठ खडा हुआ था उसने औपचारिकता का सही शब्द इस्तेमाल किया "अरे, उठ दिये कभी फुसत मे आना, तुमसे बहुत जरूरी बातें करनी है" मिश्रा मेर कधे पर हाथ रखते हुए बोला, "चलो तुम्ह स्कूटर से छोड आता हू कहा रात मे अक्ले भटकोगे " मैंने कमरे मे निगाह फेरी, नीताऔर बॉस एक दूसरे से बतियाने मे काफी मशगूल थे नीता के चेहरे का रग बार बार सुखियो म बदल रहा था मैं कुछ सशकित हो उठा मिश्रा के करीब आकर गभीरता स बाला 'लेकिन ये तेरा बास नीता अकेली ' मिश्रा ने मुझे झटकते हुये कहा "अरे यार तू हमारे सम्बयो को नहीं जानता, कभी खुल कर तुझ से बात चल चल जल्दी तुझे छोड आते हैं। मुझे कुछ घसीटता हुआ सा मिश्रा बाहर ले आया मैं रास्ते भर यही सोचता रहा ये सब क्या है, बिना क्सिी गणित की खाई के सम्बध अपने आप जुड़ रहे थे उस दिन इतवार था इदू और बच्चो के बिना पूरा घर साथ-साय कर रहा था इदु इस बीच काफी बीमार रहने लगी थी घर गहस्थी और बच्चो के सग उसे आराम नाम मात्र को नहीं मिल पा रहा था यो उसके पिता के भी दो-तीन पत्र आ चुके थे अत उसे मायके भेजना अनिवाय सा हो गया था लेकिन अब इदू और बच्चो के विना मेरा वक्त जम कर रह गया पा षटने मे ही नही आ रहा था उसपर इतवार को काटना और भी अधिव मुश्किल हो रहा था अचानक ख्याल आया वि मिश्रा ने मुझे फुसत मे बुसामा पा इतवार का दिन ही उसके लिये भी पुसत भरा होगा चार रोटियो का जुगार भी उसीके यहा बैठ जायेगा सोदिया पढ़ते पढ़ते मैं मिश्रा और नीता के प्रति बहुत आत्मीय हो उठा पा दोनों ही मुझे बहुत सम्मान देते हैं वैसे भी उनकी जिदगी को जोड़ने में मेरा रोल खासा है बॉसम बजाने की जरूरत नहीं पड़ी दरवाजा आधा खुला हुआ पा सेक्नि पर्दा हटाते ही मैंने झटके से छोड़ दिया नीता सोफे पर बहुत अस्त-व्यस्त सो -.-.न्य " 2.५ लेटी थी मुझे बॉलबेल वाली औपचारिकता निमीनाही. जाहिये थी नीता को सुबह-सुबह इस तरह अस्त-व्यस्त साडेख कर मेरे मस्तिव मे तमाम प्रश्न उभरने को हो रहे थे कि मैंने कॉलख की स्विच एक मिनिट बाद नीता ने पर्दा हटाया "अरे आप? आइये आइये नोता इस समय काफी सगी सवरी दीख रही थी मैंने पूछा-"कही जाने की तैय्यारी म हो?" नीता कुछ अलसाई सी बोली "नही तो" "फिर ये साडी वाडी, मिश्रा कहा है ?" मैंने बात को मोड दिया "क्यो, क्या विना मिश्रा के आप इस घर मे नहीं बैठ सकेंगे? मुझसे डर लगता है ?" सोफे पर धम्म से बैठती नीता देर तक अपनी ही कही बात पर हंसती रही मैं अपने आप का कमजोर होता हुआ महसूस कर रहा था ऊपरी तौर पर नीता की हसी मे हसी मिलाता हुआ बोला "नही भई मेरे लिये मिश्रा और तुम कोई अलग-अलग तो नहीं क्या लेंगे, चाय या कॉफी?" "कुछ भी चलेगा, पर मिश्रा को तो आ लेने दो नीता ने मुझे छेरते हुए कहा, "मिधा मिश्रा क्या हो गया है उमेश भाई वे तो अपने बॉस के साथ गये हैं पता नही कब तक लौटेंगे इनके बॉस से तो आप मिल हो चुके हैं ही इज सच ए नाइस परसन बॉस की चर्चा करते हुए नीता कुछ अधिक उत्सुक और प्रसन हो उठी थी मुझे खत्म हुई पार्टी, कमरे मे बिखरी हल्की नीली रोशनी, बॉस की पी जाने वाली निगाहे, और उन निगाहो से टकराती नीता, और नीता के चेहरे की सुखिया, याद हो आई मेरा गणित यहा भी जोडो घटाने की प्रक्रिया मे लग जाना चाह रहा था लेकिन उन सारी इकाइयो मै मिश्रावाली इकाई कही भी फ्टि नहीं हो पा रही थी मैं इकाइयो को सिलसिलेवार लगा देना चाह रहा था कि हाथ मे चाय की ट्रे लिये नीता आ पहची नीता ॥

24 गलत इकाइयां चाय बनाती हुई इन्दू और बच्चों के बारे मे भी पूछती जा रही थी मैं चाय की सिप लेता हुआ अन्दरूनी तौर पर अपने गणित को पूरा कर लेना चाह रहा था तभी मिश्रा की आवाज सीढियो से होती हुई कमरे में गूज उठी "नीताऽऽ माई स्वीट डालिंग "लेक्नि मिश्रा कमरे में मुझे पाकर एकदम सहम गया इस समय अगर मैं वहा न होता तो नीता उसकी बाहों मे होती मैं मन ही मन सशकित होने लगा कि निश्चय ही मुझे कमरे मे पाकर मिश्रा का जो रोमेटिक मूड काफूर हुआ है उसका प्रतिशोध मुझे सहना पडेगा लेकिन हुआ उल्टा मिश्रा मुझसे बेहद प्रसन्नता से मिला बढी देर तक वो मेरे अहसानी से बोझिल होता रहा कि कैसे मेरी हो मदद से वे और मीता विवाह के सूत्र मे बघ सके नीता जैसी जीवन सगिनी को पाकर वो कितना कृताय हुआ है और ये कि एक मैं ही हू जो रहे यो सब कुछ देता है जिसे सच्ची आत्मीयता का नाम दिया जा सकता है मेरा गणित इसे काफी पहले से ही सावित कर चुका था कि प्रसन्नचित्त होने पर कोई भी, बहुत जल्दी हो महान उच्च विचारो का लवादा ओढ लेता है नीता रसोई में पहुच चुकी थी और ये तय था कि मेरा इतवार अच्छा ही भीतेगा मिश्रा ने बताया कि शीघ्र ही उसका प्रमोशन होने वाला है उसके बॉस नीता और उससे बहुत प्रसन्न हैं मैं बहुत पहले ही ये स्पष्ट कर चुका हु कि गणित का अध्यापक होने के नाते गलत नम्बर काटने की मेरी बादत है यहा बॉस का नीता से प्रसन होना? इसमे गलत इवाइयों का जोह हो रहा था पर मैं चुप हो गया सवाल इतवार बिताने का अधिक महत्वपूर्ण पा मिया की प्रसन्नताको वेस्वादा ही सही मैं भी पीने लगा दूमा गई पी और मैं अपने घर गृहस्थी के गणित को सही योग देने में जुट पा लेकिन कसी विडम्बना थी कि गणित का कुल अध्यापक होरर मी मैं गृहस्थी का सही गणित र पाने मे मैं हमेशा अपो को अस फस पासा मेरी इस समजोरी को बहुत अच्छी तरह जानती थी मरमर ही आपिक अभावों से जगमाई हुई इसाइयों को मैं साफ करता रहता और मुझे इस तरह जुटा हुआ देखकर बराबर ही मेरा साप गलत इकाइयां 25 देती तब मुझे पूरा विश्वास होता कि कभी तो इस गहस्थी का योग सही निकलेगा मौसम बदलने के कारण देवा और अनुमा सर्दी खांसी से बहुत परेशान ये बच्चो को पीहा से इद परेशान थी मैंने पूछा "डॉक्टर बुला लू' गृहस्पो को दोव पेच मे इन्दू काफी अनुभवी हो गई पी बोली--"एलोपैथी से होम्योपैथी दवा अधिक फायदेमद रहेगी कुछ फल ला दोगे तो ज्यादा अच्छा रहेगा"मैं इदू से सहमत होता हुआ दवा लेने सिविल लाइ स की ओर चल पहा शाम का अघेरा टुक्हों मे इधर उधर बिखर रहा था थोड़ी देर मे ही ये सारे टुक्रे सिमट कर काली पतों मे जम जायेंगे मैं अपने मे खोया साइरिल पर चला जा रहा था कि मेरी बगल से सरसराती हुई एक कार निकल गई मुझे लगा कार में बैठी आकृतिया परिचित-सी हैं मैंने साइकिल की रफ्तार तेज कर ली कार प्लाजा के सामने रुकी मैं साइकिल से उतरखर धीमे घलने लगा मैं बहुत खुली हुई आखो से देख रहा था कार से उतरने वाला व्यक्ति मिश्रा का बास था और उसकी बगल मे करीब करीब उससे चिपटी हुई नीता इस बार मेरे गणित को सही अको मे जुड़ने मे देर नहीं लगी लेकिन मिश्रा वाली इकाई क्ट कर जीरो हो गई थी कई दिनो बाद मुझे मिश्रा मिला था मेरे गणित के अनुसार उसे जीरो होना चाहिये या लेकिन मुझे ये देखकर कम आश्चय नहीं हुआ कि उसमे काफी योग पे उसने मुझे बहुत स्पष्ट बताया कि उसका बास बहुत नेक है और उसके सम्बध बॉस के साथ बहुत घनिष्ठ होते जा रहे हैं और ये भी कि उसका प्रमोशन निश्चित है कोहिली को इस बार चास नहीं मिलेगा मिश्रा बहुत आश्वस्त था फिर कई दिनो बाद जब मकान बदलने के चक्कर में मैं मिश्रा से मिला तो उसने मुझसे शहर की अच्छी लेडी डाक्टर के बारे में पूछा था नीता का अबाशन कराना चाहता था खच जो भी होगा पास देने को तैय्यार हैं यहा मेरा गणित फिर गलत इकाइयो पर १ अटक गया था इस बीच मैंने घर बदल लिया था चार एक महीने हो गये थे मिश्रा का कोई समाचार नही मिला एक दिन डिपाटमेटल स्टोर से मैं कुछ 26 गलत इकाइयो सामान ले रहा था तभी नीता दीखी लेकिन इस बार नीता उस अधेड बॉस के साथ नहीं थी उसके साथ कोई नौजवान लहवा या भौता ने ही उससे मेरा परिचय कराया "मिस्टर कोहिली मिथा में साथी हैं" योडी देर की औपचारिक घात के बाद मैंने ही पूछा "भई, तुमने मिथा के प्रमोशन की खबर नही दी " मिश्रा के प्रमोशन की बात पर नीता और कोहिली दोनो एक दूसरे को देखकर हस दिये मुझे अटपटा-सा लगा नीता इसे भाप गई, और मुझे क्नवी स करने की कोशिश म बोली, ' उमेश भाई, मैंने तो इनके प्रमोशन के लिये पूरी कोशिश की लेकिन ये खुद बहुत ढीले है अपनी साख अपने ही आप जब आदमी खो दे, तो उसका क्या इलाज ? एक्टिवनेस तो नाममात्र को नही है " नीता कहते-कहते रुक गई लेकिन अपनी ही बातो को उसने दूसरा मोड दिया मिश्रा के ही बारे में देर तक ऐलान करती रही कि मिश्रा की पसनॉलिटी मे किन किन तत्वा का अभाव है, और मिश्रा किस कदर लिजलिजे हैं ये वही नीता थी जो विवाह से पहले मिश्रा के लिये जान देने को तैयार रहती थी यो ये भी सही था कि मेरी गणित के अनुसार मिश्रा का योग जीरो बहुत पहले हो चुका था पर नीता का गुणाफल इतना होगा ये मैं नही निकाल पाया था मैं देर तक जीरो हुए मिश्रा के बारे में सोचता रहा उसके आगे कोई भी नम्बर नहीं लग पा रहा था मेरा नया घर मिश्रा के घर से बहुत दूरी पर था इसीलिये लम्बे अरसे तक हमारा कोई सम्पक नहीं हो सका एक दिन में देवा को गणित की वेसिक बातें समझा रहा था कि गणित मे जोड, घटाना, गुणा भाग यही चार चोजें हैं जिन पर सारे सवाल टिके रहते हैं किसी एक को भी पूरी तरह जानकारी न होने पर इकाइयो का क्रम इधर उधर हो जाता है- लेक्नि जो इनके प्रति सावधान रहता है, वो कभी गलती नहीं करता है यही गणित के बेसिक तत्व हैं इसी बीच दरवाजा खटका में उठा दरवाजा खोलने से पहले मैंने खिडकी मे से झांक कर देखा गहराती शाम के अधेरे मे एक आकृति दरवाजे की ओर पीठ करके खही थी मैंने खिडकी से ही झाक कर पूछा, 'कोन है?"

गलत इकाइया 27 ?" 7 बहुत धीमी और थकी हुई आवाज थी, "मिश्रा" मैंन झपट कर दरवाजा खोल दिया मिश्रा सर झुकामे अदर आन को मुडा मैं स्तभित रह गया उसकी बढी हुई दाढी, रुखे बाल और कृश- शरीर में अपने को रोक नही सका-"ये तुम्हे क्या हो गया तुमने कमी मिश्रा अपने को टटोलते हुए बोला, कुछ भी तो नहीं और उसकी फीकी हसी मेरे और उसके बीच ढेरो प्रश्न चिह्नो को उगा गई थी "ये तुमने अपनी क्या हालत बना डाली है और नीता कहा है?" नीता का नाम सुनते ही मिश्रा फफा उठा "उमेश भाई नीता मुझसे खो गई" इसी वाक्य को कई-कई बार कह कर मिश्रा बच्चो की तरह अपना अपराध स्वीकार कर रहा था मैंने उसे अपनी ओर खीचा और किंचित झकझोरते हुए पूछा "ये तुम क्या कह रह हो ? साफ-साफ क्यो नही बताते' मिश्रा गभीर होता हुआ बोला "बताने को अब रह भी नहीं गया है कुछ" लेक्नि तुम्हारे प्रमोशन का क्या हुआ "वो तो कोहिली को मिल गया। 'लेकिन मैं ये जानना चाहता हू कि नीता कहा हैं?" इस बार मेरा अधिकार गरज उठा था प्रत्युत्तर में मिश्रा भी गरजा, "नीता भी कोहिली को मिल चुकी है" ओर भटके से कोई चीज टूट जाये कुछ ऐसे ही टूटकर मिया मेरे कधे पर सिर टिकाकर फफक उठा, "उमेश भाई मेरा सब कुछ इस समय में अपनी आदत के अनुसार गणित नहीं कर पा रहा था लेकिन मिश्रा को सहलाते हुए यही सोच रहा था कि गणित के बेसिक तत्व, मैं इसे भी तो समझा सकता था कम से कम जि इकाइया तो नहीं जुडती 2" खो गया ०० जकड़ दस मिनट का श्रेय था, स्टॉफ रूम में सासी पहल पहल थी मिसेज प्रधान की आवाज सबमे अधिक गूज रही पी क्योकि ये थी और इसके लिये वे सदा हावी रहती अपने विचारो को नगीने की तरह जड देने को सही परख, किसी जोहरी से कम नहीं थी उनम किसी को किसी बहाने और किसी को किसी बहाने तराशती किसी न किसी रूप म ये सब पर छाई रहती पूरे स्टाफ में उनका दबदबा था एक आध सहानुभूति के टुकडे फेंक कर वो लोगो को अपनी ओर खीच लेती ऐसा नहीं था कि मिसेज प्रधान के लिए विरोधी स्वर उठे ही न हो, पर उन्हें मिसेज प्रधान के मागे जल्दी ही अपनी हार स्वीकार करनी पड़ती मिसेज़ प्रधान का दावा था कि 'साइकोएनालिसिज' मे उहे काई मात नही द सकता उनकी बात हमेशा वजनदार होती इस दस मिनिट के कम भी लोग उनकी वजनदार बातो से अभिभूत हो रहे थे-"भई, देखो हम तो मह मान कर चलते हैं, कि घड़ी की चलती हुई सूई को पकहा नहीं जा सकता है समय को घेतावनी दिला कर घडी आगे बढ़ लेती है, जो घेत गया वह पा गया और जो?" प्रश्न चिह्न की तरह मुह विचकाते हुए मिसेज़ प्रधान रुचि को ओर इंगित हो उठी थी "का बरसा जब कृषि सुखानी' मिसेज प्रधान की बात समाप्त होते ही पूर स्टॉफ मे हसी गूज उठी मिसेज़ गुप्ता उनके काफी करीब थी उहोने फुसफुसा कर कुछ कहा इस समय भी वह मिसेज़ प्रधान की चम्मच हो रही थी अपनी आवाज मे अतिरिक्त मिठास धोलते हुए बोली 'आज यह समय की बहुमूल्यता पर मिसेज प्रधान और उभर पडो, बात बहुत साधारण है शादी-ब्याह को ही लीजिये, इसकी भी एक उम्र होती है बुढ़ापे में शादी किस काम की" " जकड 29 सबने एक दूसरे की हा मे हा मिलाई हा मे हा मिलाने वाली ये सभी अध्यापिकाये स्टॉफ रूम में पडी बडी टेबुल के इदगिद बैठती है और एक दूसरे के मामले मे अच्छी तरह से दखल अदाजी करती हैं इसी स्टॉफ में रुचि की टेबल एक कोने म है सबसे अलग उस टेबल पर काम करने वाली अन्य दो अध्यापिकाए विज्ञान की हैं जो अधिकतर प्रयोगशाला मे ही रहती हैं फिर रूचि बहुत कम बोलती है इसलिये सवसे उसकी इटोमेसी भी नहीं हो पाती है मिसेज प्रधान की वजन- दार चोट किस पर थी इसे समझने में रूचि को देर नहीं लगी जाच रही कापियो को उसने एक ओर सरका दिया सामने रखे कांच के गिलास को उठा लिया गिलास मे आधा पानी था साफ उजला पानी एक ही स्थिति मे वद बडी देर तक वा उजले पानी को देखती रही उसने धीरे से अपने पेन की निब गिलास के पानी मे छूला दी उजले साफ पानी मे नीले रग की धारिया बनने लगी धारिया फैलने लगी और साफ उजला पानी नीला होने लगा क्षण बीता भी नहीं और एक स्थिति दूसरी स्थिति मे बदलने लगी गिलास के उजले पानी में नील विष लहरिया उसे अपनी स्थिति में ढालने लगी थी स्थितियो के बदलते हुए क्रम में रुचि के सामने एक चेहरा बहुत साफ होकर उभर आया, उसकी मा का, स्थितियो के हावी होने से वो भी कैसी टूटती जा रही है शायद एक दिन ऐसा हो जब महज स्थितिया ही होगी, मा नहीं जानने-समझने की उम्र से, रुचि ने मा के चेहरे पर कोई चटक रग नहीं पाया वही फीका चेहरा और बुझने-बुझने को हो भाई एक जोडी आखें तीज त्योहार पर भी घर की रगी साडी, सिदूर भरी माग, ईगुरी बिदी और पैरो मे महावर इतने सब करके भी मा के अदर वाले सभी रग उसे बदरग कर गये ये सुबह से शाम तक गृहस्थी का बोझ ढोने वाली मा क्या कभी गहस्थी से मुक्त हो सकेगी? रुचि जानती है मा कभी मुक्त नही हो सकेगी रोज उगती नई नई कटीली स्थितिया एक न एक दिन अवश्य ही उसे क्षत विक्षत कर देंगी रुचि इन सारी स्थितियो से दूर रहना चाहती है कार के गिलास का पानी इतनी दूर हो कि उसके उजलेपन मै किसी भी स्थिति का स्पश, 30 जकड हो सके पूरी तरह स्थितप्रज्ञ उसने गिलास एक ओर सरका दिया और कापियो का बडल अपनी ओर खीच लिया मासिक परीक्षा की कापिया थी अधिकाश छात्राओ न उत्तर पूरे नहीं लिखे थे प्रश्न इतने मासान पूछे गये थे कि उत्तर पूरा लिखा जा सकता था उसे इस अधूरेपन से विढ है लेकिन उसकी अपनी ही चिढ ने फिर उसे प्रश्नो के घेरे मे ला खडा किया पूरा और अधूरा मिसेज़ प्रधान की नाप में रुचि अधूरी है, क्योकि वो विवाहित नही है लेकिन मा विवाहित है, चार बच्चो को भी जाम दे सकी है वो क्यो अधूरी है ऐसा क्यो है क्या हर व्यक्ति का नापन के लिए पमाने अलग-अलग हैं? मिसज प्रधान ने रुचि को नाप लिया है और उनके पैमाने पर वो अधूरी है क्या रुचि स्वयं अपने को नही नाप सकती है लेकिन उसन कुछ ढाप लिया है खुल कर सोचने और कहने का का ढग बवजनी ता नही होगा ये जान कर भी वो साफ तरीके से प्रकट नहीं हो पाती है मा उसके दर के छिपाय को जानती है उहोने तब उसे उधेडा भी ह लेकिन उघड कर तो सब कुछ बहुत विस्फोटक हो गया है यही कारण है कि उसने अदरूनी तौर पर अपने को अच्छी तरह से दाप लिया है विस्फोटक स्थितियो से उसे डर लगने लगा है इस महीने दो सप्ताह बीत गये वेतन उमे अब तक नहीं मिला है बाबूजी रोज पूछते हैं 'रुचि तरा वेतन अब तक नहीं मिला प्रिंसिपल से कुछ कहती क्यो नही है " लेकिन वो कहे कसे मिसेज प्रधान के फेंके हुए सहानुभूति के टुकडे उसके आग आ गिरते हैं "भई मिस रुचि इस बार वेतन अब तक नहीं मिला, अरे भाई तुम्ह किस बात की फितर तुम ठहरी छडी, तुम्हें क्या?' इतना सुन कर भी रुचि बोल्ड हो तो क्स वसे भी अपने को ढापते रहने को प्रवत्ति उसकी बढती ही जा रही है उस दिन बाबूजी मा से वह रहे य कि कपि को गादी वर देंगे तो घर का खच केस चलेगा? वच्चा की परवरिता क्या अकेली मेरी कमाई म होगी मा एक दम उबल पडी, तो क्या उसकी उमर हम लागो का वोमा ढोने म ही बीत जायेगी।' 'हम कब कह रहे हैं, हमने पढ़ा लिखा दिया अब अपना घर वार 'बाबूजी ताम बाले मा वेवस सी चीखी, मे तुम कह रहे खोज से me " हो तुमने उसे जम दिया है ऐसा ही था तो मा पूरा बोल भी नहीं पाई थी और बवेजी। रजतो आवाई साथ भरपूर तमाचा उनकी गालो पर जड दिया, दत, जिस थाली म खाती है उसी मे छेद करती है" बाबूजी आपा खो बय और जो हाथ मे आया उसी से मा को उहोंने पीटा छोटे भाई बहन सहमे से एक कोने मे दुवक गये मा को बचाना चाहा था लेकिन मा ने मुझे झटक दिया था, वो बुरी तरह चीख रही थी, "मार डालो, खतम कर डालो मुझे, इहे भी मेरे साथ ही दफना दो ऐसी ही विस्फोटक स्थितियो से रुचि भयभीत होकर अपने को ढापती जाती है, कभी कभी उसका अपराधो मन सिसक उठता, इन विस्फोटक स्थितियो को भडकाने वाला कारण वही थी लेकिन उस दिन का विस्फाट बडा भयानक था घर मे भयानक सनाटा छा गया था अक्सर ऐसा सनाटा मौत के बाद होता है मां की पथराई आखें ऐसी लगती जसे उसके आगे से ढेरा लाश उठ गई हो बाबूजी इस बीच बराबर घर देर से आते रहे और मा अपने को अपन से ही ढकेल कर नशे में धुत्त वाबूजी को सम्हालती उल्टिया साफ करती मुह धुलाती रही छोटे भाई बहन कुछ दिन तक तो सहमे रहे लेकिन वे अपनी जरूरतों के प्रति जधिक जिम्मदार थे और हमेशा की तरह वे फिर मा को नोचने लगे घटा बज चुका था पाचवा पीरियड रुचि का था उसने कापियो का बडल एक ओर सरका दिया अलमारी से पुस्तक और रजिस्टर निकाला पस को कंधे से लटकाकर उठ खडी हुई गिलास का सफेद पानी बहुत पहले हो हल्का नीला हो चुका था नीली लहरिया बनना ब द हा गई थी रुचि का मन हुआ एक बार फिर पेन की निब उसमे छूला दे और चल द लेकिन अपने इस बचकाने इरादे पर मन ही मन मुस्कराती वो क्लास लेने चल दी एक स्थिति का दूसरी स्थिति पर पर हावी हो जाना, मात्र एक दबाव नही है वरन् उसमें एक बहुत बडा गुण है वे एक दूसरे से बहुत जल्दी हो समझोता कर लेती है रुचि भी चाहती है कि समझौते वाले इस गुण को वो भी अपना ले तो अदर कम से कम नीली विप लहरिया तो न महसूस हो 32 जकर निशा रुचि की बचपन की सहेली रही है पढ़ाई लिखाई मे वो शुरू से साडे बाइस रही हर कक्षा मे रुचि या सहारा लेकर वो पास होती रही इन दिनों निगा ससुराल से मायके आई हुई है रुचि को वो कई बार बुलवा चुकी थी निशा से मिलना तो रुचि भी चाह रही थी पर वो टाल गई पी मा ने कई बार कहा भी कि जाकर निशा से मिल क्यो नहीं आती, कई बार बुलवा चुकी है ये वही निशा थी जिसके साप घटो बिता कर भी उसका मन नहीं भरता था और भाग भाग कर उसके घर जाने के लिये उसे फटकार भी सुननी पडती थी लेकिन अब जैसे पिछला सब कुछ पुल पुछ गया हो हार कर निशा ही उससे मिलने आई थी निगा सासी मुटकी हो आई थी, उसकी गाद मे गोल मुह का गदवदा बच्चा था कपडे, लत्ते, गहने, और बेटे से तो गरिमामयी लग ही रही थी फिर बार-बार अपने 'उनके' सदर्भ से उसका व्यक्तित्व और भी दीप्त हो उठता रुचि उसके दीप्त हो रहे व्यक्तित्व से कही बहुत गहरे चोट खा रही थी इस चोट से बचने के लिये निशा से अधिक वो उसके गदवदे बच्चे मे अपनी व्यस्तता जाहिर करने लगी जाते जाते निशा मां को घेता गई, "चाची, रुधि की शादी अब कर क्यो नही देती, नौकरी, धाकरी तो शादी के बाद भी करती रहेगी " और मा अपनी बेवस हो आई आवाज मे सिफ इतना ही कह सकी, कोई अच्छा लहका तू ही बतान।" मा के इस बेबस हो जाने पर रुचि अक्सर खीझ उठती है, फिर उसे दया भी आती है अदर वाले कुछ को ज़ोर से ढाप कर वो सहज हो जाती है निशा अपने में कितनी लीन है ऐसी ही लीन कभी मा भी हुई होगी एक सहज और विस्मत न किया जाने वाला सुख ढापे। कर कुछ प्रश्नचिह्न उभरने लगते हैं 'क्या तू नहीं चाहती कि तेरा भी कुछ अपना हो जिसमे पूरी तरह से लोन हुआ जा सके एक सहज न विस्मत किये जाने वाला सुख ' उसका अपना सुख, ढापे हुये अधकार को चीर कर मुखर हुआ सुख लेकिन स्थितियो की भारी जजीरो ने उसके पैरो को जकड रखा है--उसे वो तोह नही सकती है तोडने पर परिवार को प्रतिमाह साढे आठ सौ रुपये का घाटा हो जायेगा छोटे भाई-बहनो को सम्हालने की जिम्मेदारी क्या अकेले बाबूजी सम्हाल सकेंगे और मा कमा हुए कुछ को चोर

जकर 33
सब सहते सहते कुचत नही जायेगी
हाथ में पकड़ी मैगजीन को रुचि ने एक ओर सरका दिया घटा बज
चुका है, उसे क्लास लेनी है रक्षा मे शोर हो रहा होगा दीवार पर लगी
घडो की सुइयां बिना किसी का इतजार क्येि घूमती जा रही थी उनकी
रफ्तार को कोई रोक नही पाता है रुचि यह तय करती उठ खडी हुई कि
मिसज प्रधान को मात देवजनी नहीं होती
..
।

काच के उस पार सीढिया उतरते उतरते मैं यही सोच रही थी कि जव पिछले कई दिनो से किसी को पत्र लिखा ही नही तो फिर जवाब आयेगा भी कहा से । फिर भी आदतन जब मैंने लेटरबॉक्स मे झाक्कर देखा तब उसमे कई चिटिठया पडी देखकर सुखद आश्चय हुआ दो निमत्रण-पत्र थे -दूर की रिश्तेदारी मे शादी थी पोस्टकाड मे भाभी न शिकायत की थी कि बहुत दिनो से मैंने पत्र क्यो नही भेजा और यह कि दिल्ली जाकर मैं बहुत आलसी हो गयी है जबकि महानगरो मे तो लोग काफी चुस्त रहन के आदी हो जाते हैं चौथा पत्र लिफाफा था-कुछ भारी-सा लिखावट भी बडी अनची ही-सी थी क्सिका पभ हो सकता है, यही सोचते सोचते मैं ड्राइग रूम म आकर बैठ गयी पत्र मेरे ही नाम था, इसलिए खोलकर देखा स्कूल की लाइनदार कापी के कई पनो म लिखा हुआ पन था- "आप किस नाम से सबोधित करू, कुछ समझ में नहीं आ रहा है आटी नही यह शब्द मुझे अच्छा नही लगता क्योकि अब इसम फान को गघ ज्यादा आने लगी है अपनापन वही दूर जाकर सिमट गया है हा, दीदी कहना ज्यादा ठीक होगा पर पता नही आपको कसा लगे । बात यही है कि जब हम मिले थे तब आप बहुत बडी थी और मैं सिफ नौ साल को पी अब तो उस बात को भी सात साल हो गये हैं हो सकता है आप मुझे भूल भी गयी हो, पर मैं आपको आज तक नही भूली हू, तभी तो यह पत्र लिख रही हू पापा की मत्यु के कितने दिनो बाद मुझे ऐसा लगा था जसे आपसे मिलकर मेरा अपनेपन का सबध कही फिर से जुड़ गया है आपने मुझ देखा था, उस समय न जाने क्यो मैं यह महसूस कर रही थी कि मेरे अदर जमा हुआ पत्थर पिपल रहा है वैसे होने को मेरे और आपके बीच कांच के उस पार 35 " बडी औपचारिक बातें ही हई थी, लेकिन इसके बावजूद मन को निकटता मैं आज तक वैसी ही म कर रही हू जैसी उस दिन हुई थी पर मे भी यो सभी हैं-मा भी हैं, पापा की जगह डंडी और स्वीटी मेरी बहन, पर पर इन सबके बीच मैंने सदैव ही परायापन अनुभव किया है। "पापा की मृत्यु के बाद हम राउरकेला छोडकर विजयवाडा चले आये थे फिर यहा हमे वैसा ही नयापन महसूस हुआ जसे लोग नये फैशन के कपडे पहनकर कुछ देर के लिए महसूस करते हैं लेकिन मैं राउरकेला के उस पुराने माहोल से कुछ ले आयी थी जिसका मोह कभी नहीं छोड़ सकी- शायद छोडना असभव था पत्र के ये दो पाने में बडी तत्परता से पढ गयी थी स्मतियो के ढेर मे मुझे एक धूमिल-सा चेहरा उभरता नजर आने लगा था। उस परिवार से मेरा परिचय तभी हुआ था जम मैं राउरकेला गयी थी। उन दिनो हम भी बहा नये-नये ही गए थे वहा का मशीनी जीवन मुझे रास नहीं आया था दिखावे के बीच हर किसी को असलियत दबी सी लगती कुछ ऐसी ही अनुभूतिया के बीच मिसेज मेहरा से परिचय हुआ था हम अकसर उनके यहा जाते थे। मिसेज मेहरा का सभी कुछ न जाने क्यो बडा सतही महसूस होता है । उ ही के घर स्वामीनाथन से भी मुलाकात हुई थी। तब उनकी बच्ची मीतू दो ढाई वष की रही होगी। बडी प्यारी लगती थी। हमारा जाना मीतू की ही वजह से होता था। यह पत्र मौत का ही था "डंडी मेरा पूरा ध्यान रखते हैं मेरी जरूरतो के उभरने से पहले ही वे उहे पूरा कर देते है और मुझे सभी कुछ कही ज्यादा मिल जाता है स्वीटी इस बात के लिए झगडती भी है तो डडी कह देते हैं कि मैं बड़ी हू और डडी की बेटी हू । लेकिन मेरे मदर का घाव फिर छिल जाता है-मैं मही सोचती हूँ कि डंडो पापा क्यो नही हो जाते ? जब डडी पापा का मुखोटा लगा लेते हैं तब मुझे खुशी जरूर महसूस होती है, लेकिन मैं पापा का मुखोटा शीघ्र ही डडी के चेहरे से नोच फेंकती हू और डडी की असलियत खुल जाती है एक भयानक सच साकार होने लगता है "काच लगी खिडकी के सामने मैं खडी हू सुबह कुहरे से भरी है एक टॅक्सी घर के सामने आकर रुकती है मैं देखती हू-खून से लथपथ पापा 36 काव के उस पार का शरीर, गरदन एक ओर को लुढक गयी है टैक्सी से दो अनजान आदमी पापा को निकाल रहे हैं थोड़ी देर में पुलिस की जीप हमारे घर आती है मा रो रही हैं, मुझे याश्चय हुआ कि मां क्यो रो रही है । रोज ही तो मा और पापा मे लडाई होती थी शाम को मा अच्छी तरह सजकर स्वामी नाथन अक्त के संग चली जाती और उदास पापा यही मेरे साथ बैठकर कमरे म सिगरेट फक्ते रहते ऐसा पिछले एक साल से हो रहा था फिर आज मा क्यो रो रही हैं ? धीरे धीरे सारा दश्य गडमड होकर जोर-जोर से हिलने लगा था, खिडकी का कोच चटक्ने चटकने को हो गया था और मैं जोर से चीख पड़ी थी फिर मुझे कुछ याद नही • मेरी जब आख खुली तब शाम का घुघलका अपने छोटे-बडे टुकडे लेकर कमरे में घुस आया था मेरा सिर स्वामीनाथन अक्ल (जो मुझे तब जरा भी अच्छे नहीं लगते थे) की गोद मे था वे मेरे बालो को सहला रहे पे सामने मा स्वीटी को लिये बैठी थी मुझे मरा अपना ही घर बहा अपरिचित-सा लगा मा की सफेद साडी के लाल फूल बडे होकर उभरने लगे मुझे पापा का खून से लथपथ शरीर और लुढकी हुई गरदन याद हो आयो थी मैं जोर से चीखी थी, 'सब हट जाओ, मेरे पापा कहा हैं ?' मैं झटके से उठ बैठी और फ्फककर पता नही कब तक रोती रही। 'मेरे आसू भीतर ही भीतर जमने लगे थे हर ओर अजीब-सा खालीपन महसूस होने लगा था मैंने ढेरो कहानिया पढ रखी थी और मुझे अच्छी तरह पता था कि मरनेवाले कभी वापस नही आया करते मैं इस फुसलावे मे नही आ सकी थी कि पापा अस्पताल में हैं और ठीक होने पर आ जाएगे पापा के मरने का दुख मेरे मन मे पत्थर-जसा जम गया था बहुत कोशिशो के बाद भी मैं हस नही पाती, खेल नहीं पाती मा से मुझे चिढ होने लगी थी बदल तो वे पापा के रहते ही गयी थी, लेकिन अब उनका चेहरा भी भयानक-सा लगता नभी मेरे सिर पर हाथ फेरती तो मेरा सिर दुखने लगता था कई बार मैं यही सोचती कि अगर मा का भी शरीर इसी तरह खून से लथपथ होकर आये तो स्वामीनाथन अकल, जिहें लाख विरोधो के बाद भी मुझे इंडी वना पड़ा था और जिनसे मैं पापा के रहते हुए भी बहुत पिढा करती थी, कांच के उस पार 37 । मुझे मा से कुछ ठी लगते स्वीटी भी मुझे अच्छी लगती, मुझे प्यार करती परतु मैं मन ही मन उसके जीने और खुश रहने के तरीके से ईर्ष्या करती, क्योकि वह सब कुछ मुझे नहीं मिलता था, उसे पाने की चाह में मेरे हाय खाली के खाली रह जाते जब कोई मेरे घर मिलने आता और स्पीटी को तरह खुश होकर मैं उससे न मिल पाती तो मेरी बडी पिटाई होती डही के न रहने पर ती मा कोखासा मौका मिल जाता था और वे मुझमे न जाने क्सि दुश्मनी का बदला निकालती थी, और मैं इन सभी क्प्टो को सहकर चुपचाप भीतर ही भीतर सिसकती रहती प्रेशर-धुकर की सीटी बज चुकी थी मैंने जल्दी से उठकर गस वद कर दी और फिर पत्र पढन के लिए बैठ गयी प्रेशर कुकर की आवाज भव भी सिसक सिसककर आ रही थी मुझे याद आया जब हम दोबारा विजयवाडा गये थे, अचानक ही प्रोग्राम बन गया था वहा पुराने परिचितो मे राउरकेलावाली मिसेज मेहरा ही यो-जो अब मिसेज स्वामीनाथन हो गयी थी मेरे मन मे उनसे अधिक मीता से मिलने की लालसा थी मिसेज स्वामीनाथन के घर पहुचने पर हमने देखा कि मेहरा परिवार की विलकुल कायापलट हो चुकी है मिसेज स्वामीनाथन के चेहरे पर इस बात की हलकी-सी भी रेखा न थी जो यह बताती कि कभी वह मिसेज मेहरा थी और मीता? वह बिलकुल बदल गयी थी उसकी चचल आखो में अजीब-सा सूनापन या चेहरे पर अवसाद टिककर बैठ गया था तीन वष और अब नौ वष की मीता मे इतना फासला होगा-~-यह प्रश्न उत्तर की अभिलापा मे केवल लटककर रह गया था लेकिन मीता उस दिन की मुलाकात को शायद नहीं भुला पायी थी उसके इस पत्र ने जसे अनेक प्रश्नो के उत्तर आज खोलकर रख दिये थे- आपको याद होगा जब आप आयी थी तब आपने मेरे उदास चेहरे को देखकर यही कहा था, 'मीता कितनी बदल गयी है, बहुत सीरियस हो गयी है 'तुरत हो आपन मा को कुछ सभलते देखा था, और वातावरण को हलका बना दिया था 'क्यो मीता, कवयित्री तो नही बनना है?' और फिर आप हस दी थी शायद आपने हमारे घर की कहानी सुन ली हागी फिर भी मैंने आपसे बहुत निकटता अनुभव की थी मा अपने ही " 38 कांच के उस पार रग मथी, आपसे मेरी शिकायतें करती रही थी लेकिन आपन मा की बातो को कोई महत्व नहीं दिया था ऐसा आपने ही पहली बार किया था और मुझम दिलचस्पी दिखायी पी "समय पखो के सहारे उह रहा था सब कुछ बदल जाता, लेकिन मुझे अपना बाहर भीतर एक्-जसा ही लगता एक भयानक सच जो अवसर पाकर जब तब साकार हो उठता बद खिडकी के काच के आरपार उभरता दृश्य-पापा का खून से लथपथ शरीर, लुढकी गरदन--सब कुछ भाखो मे गडमड होता रहता, काच चिटक्ने को होता और मैं चीख पडती अपने आप पर काबू पाने की कोशिश मे घटो रोती रहती रोकर पकने के बाद अजीब विद्रोह जागता और फिर काच वे पार खून से लथपथ मा का शरीर दिखायी देता तब मैं विजेता अनुमा करती "इस वर्ष भी मैं हाई स्कूल में परीक्षा नहीं दे सकी मेरे और मा के बोच विरोध बडी गहराई से पनपते जा रहे थे पर मे इस बात को लेकर काफी तनाव रहता डंडी, जो कभी पापा नही हो सकते थे, हर तरह से मुझे समझने की कोशिश करते कई बार डैडी और मा ने मिलकर मेरी पिटाई की थी पर मैं बहुत पहले से पत्यर हो चुकी थी कही कोई सवेदना नही उभरती पी-भला पत्थर पर कुछ उगता है । "मा पिछल कुछ महीनो से ठीक नही पी डडी उनका बहुत खयाल रखते शायद स्वीटी का कोई भाई या बहन आनेवाली थी स्वीटी उसके बारे में तरह-तरह के प्रश्न करतो कि वह कैसा होगा-दीदी अंसा या मेरे जसा मा मुह विचाकार कहती-तेरी दीदी की शक्ल और अक्ल दोनो ही सबसे अलग हैं फिर वह बडे प्रभावशाली अदाज मे कहती कि तेरा भइया तोतरे-जैसा होगा, तेरे डडो-जंसा 'मेरे छोटे बॉक्स मे मम्मी से छिपाकर एक फोटो रखी है उसे मैं अकसर अकेले मे देख लेती हू--पापा मेरे जैसे ये बिलकुल मेरे ही जसे में अक्सर अपने विद्रोही स्वाभिमान को दबाकर मा से कुछ पूछना चाहती आखिर अब मैं बड़ी हो चुकी थी मुझे भी असलियत जानने का हक था, परमा के सपाट चेहरे पर मुझे किसी भी सहारे का आभास न मिलता में अपनी उभरती जिज्ञासाओ को फिर पत्थर के नीचे दबा देती " तपस पार 39 मिस्टर मा मोहापाका गमापार हमने भी मासबार में पड़ा पा गुरासे उनकी मुठभेट गयी थी उसी-उडी राबरें मह भी मिली पारि हाला पोस्यामीमापन और यम मिरोम मेहरामा हाप पा समापार पहार तब मुझे मगा पारि मिटर महरा अपनी हरमा सो मोर पर नाटरपा पटाक्षेप हो गया मीतापा पत्र भी भय मगमगतामहोपा महाभुतिर गयी मेक्षिम स पत्र मागय अम सर नहीं सिरा पामो मोजर स्वीटीपोयह मात्यारान देसर अस्पताल गयी किये समर मया रो माना रही है तब पिर मोटरर नही आपी माया उनमा मग पारीर पदमोपमो तिमी से एक बार फिर मन यही दृश्य दया ऐंबुलेंस से मोगा मत गरीर उतारा जा रहा है नहीं कुछ गडमा महीमा न हीबाय टूटन का बहमागहमा इस बार मृत शरीर पापा मानहा, माधा पारी पुरी तरह रो रहे पे स्वीटी भी सूब रो रही पो में भी पाह रही पीरिमें भी यगा हीरो पर मुझे क्या हो गया है-में यसा नही कर पा रही स्वीटी, ही मुझे अपने-जसे हो दयमीय लग रहे है मून परमी छन से हम सब सटर गये हैं, पता नही जब तर सटो रहेंगे या आप ए मार पिर हमारे यहाँ नही मायेंगी?--गीता" .

टूटती आवाज 'चाहे जितना चीखो चिल्लाओ, पर भला किसे फिकर है ?" फट फट फट झटके से विखरी हुई किताबो को समेटते हुए मीरा की निगाह खिडकी से टिके आइने से जा टकराई हाय पम गये माथे पर तना बल पलको पर झुक आया मीरा ने चाहा थोडी देर तो अपने को गौर से देखे खिसककर जैसे ही आइने के पास जाने को हुई, हल्के से धक्के से सारी वितायें नीचे गिर गई खिडकी पर रसे कागज के गद पडे मल फूल गुल दस्ते मे हिलने लगे मकडी जल्दी-जल्दी फूलो पर बनाए जाले मे उलझने "मीरा एक कमजोर और यकी हुई आवाज थी मीरा रोज सुनती है शायद इसलिए कि सारी सवेदनाओ ने एक साइटिफिक फक्ट ढूढ लिया है इतने बच्चो को ज म देकर मा के शरीर म रह ही क्या गया है ? मीरा ने कमरे को एक बार देखा, गदगी से उबकाई आने लगी उसे क्यो नही समय मिल पाता है कि सभी कुछ व्यवस्थित कर ले किताबो के गटठे को वैसे ही मैज पर पटककर दूसरे कमरे में घुसी और भी अधिक मटमली रोशनी सफद न कहा जानेवाला जगह-जगह से फटा चादर, उठी रूईवाला लिहाफ और उसमे लिपटा मा का जज र शरीर 'बेटी दूध बचा हो तो थोडा सा दे जा बडी भूख लगी है" मां का लिहाफ ठीक करते हुए मीरा को याद आया कि बस की क्यू से अलग होकर लोगो ने टक्सो कर ली थी उसे देर तक यू ही खडा रहना पहा था टन टन टन एक दो तीन और फिर पूरे ग्यारह आज भी

औकात मन्द गोल दापरे बंसा बड़ो पहले सुपर साक्ष्य का
आस हो गया जोऊ कसी भी तरह से उसे देख रहे थे, पण मह पाल
पर दस्तखत कराने गई पी मीरा ररपीसे हो गई थी
और सुपरिटेंडेंट साहब भद्दे सरीरे से हसते रहे निगाह पर
टिकी तो ऑफीसराना रोग फूट पड़ा, 'मिस मिषा' मामा गर
थी
"जी
सर "सहमरर गोरापोली
"आपको इस ऑपिस मे पागरोदोमा लोगो तापको
रहने का तरीका अभी सप माही आया गि पी सी मिजमपू
वालिया भी तो तुम्हारे साथ हैं उगने रहन सहन ) Hinी ॥
यहा रह सकोगी
'जी 'मीरा यो अन्तिम चाय पिणती जागा
गिद्ध जसी हिंसक दृष्टि से देरी Urst HIT THI
मीरा सांप उठी पाइ धम्म से गिरी gitta uff Hin
लोट गया मीरी मे रोजी सपाइ मेटी में
Hims,
फिर तो उस सभीपी मांग यही हhifaHI मगा,
मबाडी जास नाती जा रही थी, that it if yri
गई थी उसकी सप पीर पर महानी fii, Wifi मी
आवाज भी पमहागाई थी कि it fr) की
"
--
औकात जान ही

42 टूटती आवाज "दीदी, मेरी फाइल लाई हो?"नीरू की आवाज ने चौका दिया वह उसी तरह नीरू को देखती रही नीरू का दुपट्टा जगह-जगह से फट रहा है मिस पीटस के बडे गले से झाकती उनकी छाती और मिसेज महल- वालिया के बेहद चुस्त कपडो मे जबडा उनका तन लेकिन वह स्वय भी तो ओफ चीखकर भीरा ने अपना सिर टेबिल पर पटक दिया दीदी "नीरू ने मीरा का सिर थाम लिया, 'तुम्हें क्या हो गया है ? कैसी हो रही हो मकडी के जाल में फस आई दूसरी मक्खी भी तड़प रही थी भन्न- भन की आवाज फिर कमरे मे भरने लगी थी नीरू कहे जा रही थी, "दीदी तुम कहती क्यो नही हो? फाइल नही लाई तो क्या हो गया? अपनी हालत का तो हमे पता है में तो यही सोचती हूं कि कुछ महीने और बीत जाए, फिर तो मैं भी तुम्हारा साथ दूगी' ‘नही मही नीरू तू मेरी जैसी कभी मत बनना मीरा को आवाज मे मक्खी जैसी ही तहप यी नाम की सर्दीली हवा तुपके से कमरे म घुस आई थी मीरा को लगा, जैसे बफ-सी जडता चारो ओर से उसे घेरे है उसने साडी के पल्ले से ठीक से पीठ को ढका और चुपचाप जाकर लेट गई " दीदी, क्व उठोगी चीनी भी नही है चाय कसे बनेगी? बाबू सुबह से ही घूमने निकल गये हैं सब बच्चे शोर मचा रहे हैं क्या पर आवाज कम्बल के भीतर पहुंचकर मी मीरा को नही जगा पाई आखिर नीरू ने कम्बल हटाया, तो भीरा का मापा जलता हुआ मिला "अरे दीदी तुम्हें क्तिना तेज बुखार है" मीरा वेसुध बडबहा रही थी "मुझसे वह सब नही होगा मैं ऑफिम नही जाऊगी' दीटी दीदी 'नीरू ने मीरा को भक्भोर दिया तपती हुई बोझिल पल सुलों बोर मीरा रो पडी, "नीरू, न बाबू से कह दे, में ऑपिस नहीं जाऊगी" दृटती आवाज 43 कमरे मे रात को घुटन अभी भी भरी हुई थी नीरू ने खिड़की का एक पल्लू खोल दिया सद हवा धीरे धीरे भरने लगी सामने छत पर नई व्याही लड़की अपनी लाल धुनरी फैला रही थी हाथ वे वगन एक-दूसरे से टकराकर गुनगुना रहे थे दीदी की साथिन है कैसी भर गई है एक और झोका नीरू को सिहरन दे गया नाम का घुघलका कमरे मे फिर से पब भर आमा, कोई नही जानता मीरा वैसी ही कम्बल मे लिपटी पड़ी थी बुखार कुछ कम था बाबू हड- वडात हुए कमरे में आए "नीरू, ओ नीरू, कहा मर गई अरे जल्दी से दोप्याली चाय बना, मीरा के आफिस का सुपरिटेंडेंट आया है ' और लपक्ते हुए मिधा जी मीरा का कम्बल हटाकर बोले, "उठ बेटी, तेरे ऑफ्मि का सुपरिटेंडेंट आया है तेरी बीमारी का हाल सुनकर देखने आया है बडा नेक और शरीफ है जरा अपना बिस्तर ठीक कर ले" मीरा ने झटके से बम्बल फेंक दिया मिश्राजी जसे लपक्ते आए थे, वैसे चले भी गये मीरा कुछ बोलना चाहती थी, पर आवाज जसे कही गहराइ मे डूब गई थी कुछ ही पल मे मीरा ने सुना, मिश्राजी कह रहे थे 'हुजूर, बस आपकी ही कृपा से इन आठ बच्चो का पेट पल जाता है अगले साल तक मेरी एक और बेटो आपकी सेवा के लिए तयार हो जाएगी" अतिम वाक्य मे कुछ गव था उसे और भी प्रभावशाली बनाने के लिए मिश्राजी घिधियाई हसी बडी देर तक हसते रहे मीरा का लगा कि बाबूजी की आवाज टूटती जा रही है जसे जबरन कोई घिसा रिवाड बजाता ही जाए मीरा ने अपना गोरा नगा सूखा हाथ देखा उठी और कमरे की चिटखनी बद कर ली खिड़की पर रखे छाटे से नीश म अपने शरीर को दखती रही मकड़ी के जाल मे फसी मक्खिया तडपकर मर चुकी थी उनकी सूखी लाशें जाले मे चिपकी हुई थी मीरा इतनी अधिक मासल कि मिस पीटस और मिसेज अहलू- वालिया भी नही पास खडी उसकी परछाई दूर होती जा रही थी उसने दीवाल पर नजर दौडाई धूल और कालेपन के बीच बाबूजी घिघिया रहे थे, मा कराह रही थी, नीरू फटे दुपट्टे मे अपने को छिपा रही थी और बच्चे चाय तथा बासी रोटी के लिए आपस में छीना-झपटी कर रहे थे

44 टूटती आवाज
शीशा फिर उसके सामने था शीशा बडा होता जा रहा था मीरा की घुटन
जैसे उसने रूप को उभार रही पी
पी पी पी
दीदी आई दीदी आई सुपरिटेंडेंट साहब की गाडी मिश्राजी
के दरवाजे पर सडी थी मीरा गाडी से उतरी बच्चा ने उसे घेर लिया
उसके हाथ मे होरे से बघे कई बडल थे मीरा ने मुडकर मुस्करा दिया,
सुपरिटेंडेंट साहब को 'विश' किया और गुनगुनाती हुई घर के अदर हो
गई
००

ठहरा हुआ दुख आज हेम त पूरी तरह ऑफ 'मूड' मे है, और मीना पर खीझे चला जा रह है मोना चुप रहना चाह रही है, पर हेम त का स्वर चढता ही जा रहा है "तुम्हीने सबकी आदत खराब कर दी है, हर जगह ढीलापन नौकर रखने का फायदा भी क्या ? जब सारा काम खुद ही करो और पसे की मार अलग सहो दरअसल तुम्हारे अदर टक्टस हैं ही नही, और यही कारण है कि हर समय बीमार हो जाती हो" हेमत का लेक्चर पूरे जोर पर था काम जितनी जल्दी निबटना चाहिए था, मीना के हाथ उतन ही धीरे धीरे उठ रहे थे हेम त के ऑफ मूड और काम की तत्परता का सन्तु- लन टूटने को हो रहा था यह तय था कि मीना के एक वाक्य से ही हेम त को पिघलते देर नहीं लगेगी और टूटते हुए सतुलन को ढेर सी ताकत मिल जायेगी पर मीना आज चुप ही रहना चाह रही थी फिर हर वार हेमत को अपनी ओर मोड कर उसके अधिकारो का वजन घटाना क्या ठीक था? हेमन्त कुछ गलत तो नही कह रहा है मौना की जाठ दस दिन की बीमारी में महरिन अक्सर देर से आई है, हेमन्त को घर के सारे काम के साथ बतन भी साफ करने पड़े है महरिन कभी समय पर नहीं आती है पर जाने इस बुढिया से मीना के कौन मे कोमलतम भाव जुट गये है हेमत अभी भी गुस्से से भरा बैठा है मीना लच का डिब्बा उसे देते हुए मुस्करा देती है हेमन और झझता उठता है "तुम्ह पता है मरी बस छूट गई, और आज आफिम जाने म कितनी परेशानी होगी देर हो गई "कल से मीना कहते कहते कर जाती है, हेम त उसकी विवशता " 46 ठहराहमा दुख से पिघल जाता है, और उसे बाहो म भर लता है "मीन, तुमसे कितनी बार कहा कि तू बीमार न पहा कर बीमार पड़ जाती है ये कोई अच्छी बात है?" 'अच्छा अब बीमार नही पडूगी, वस अपने छोटे से घर को सवारने का कितना प्यारा सपना है उसके पास, पर अभी तक सारे सपने, क्सिी मखमली जिल्द मे बद पड़े हैं हेमत जा चुका है महरिन के आने के आसार आज भी बहुत कम दिखाई दे रहे हैं मीना आज उससे अच्छी तरह बात कर ही लेगी आखिर यह क्या तमागा बना रखा है जब देखो तब कालबेल बज उठती है महरिन कालबेल बजाकर तो नही आती है फिर कौन हो सकता है रजनी धब्ब धब्ब करती सोढिया चढ रही है रजनी महरिन की पोती है, मीना को समझने में देर नहीं लगती कि आज महरिन फिर लेकिन अपने पर काबू पाकर वह रजनी से ही पूछती है "क्या बात हुई ये रोज रोज ' मीना अपनी सीझ को जब्त नही कर पाती है "बात यह है कि कल रात मेरा चाचा कालका से आया था उसकी तबियत खराब थी, और वह रात को ही मर गया मीना को करेंट छ गया "ये क्या कह रही है, तेरा कालका वाला 7 चाचा भी "हा वो भी मर गया अम्मा चार-पाच दिन मे आयेगी" रजनी के वाक्य से यह स्पष्ट था कि वह दिये गये काम की जिम्मेदारी पूरी कर लेना चाह रही है मीना स्तब्ध रह जाती है महरिन के तमाम दुखा पर एक और परत चढ गई है अभी साल भर पहले ही तो उसका जवान वटा मरा है जिसके दुखो का नासूर जब तब फूट पडता है और अब ? दुखो के तमाम क्टील जगल से क्या कोई महरिन को घसीट सकता है ? रजनी का चेहरा पूरी तरह सपाट है, कोई आते जाते भाव की हल चल नहीं है वैसे उसके उन को पहुच भी इतनी नही है मीना पूछती है- "कौन है तेरी अम्मा के पास?" 'होगा कौन रात से अम्मा चाचा की मिट्टी लिये अकेली है' 'और तेरे अडोसी-पडोसी मिटटी उठायेगा कौन?"

ठहरा हुआ दुख 47 "अहोसी पडोसी कह " रजनी के वाक्य मे अडोसी-पडोसी के लिये पूरी तरह हिकारत है फिर कुछ गव से बोली-"मेरा फूफा आ जायेगा वही मिट्टी उठायेगा" रजनी जाने लगती है । मीना कुछ भी सोच नहीं पाती है वह सुन रहा है, महरिन कह रही है 'बहू जो मेरा दुख ठहर गया है ' मीना को महरिन का ठहरा हुआ दुख बडा विचित्र लगता है सप्टि के गतिश्म मे कुछ भी तो ठहरता नही है महरिन का दुख ही कैसे ठहर गया है ? मीना जाती हुई रजनी को पुकार लेती है-"अम्मा न तुमसे पसा के लिए कुछ कहा है। रजनी जवाब में कुछ नहीं कहती है मीना उसे रुकने के लिए कहकर अदर चली जाती है छब्बीस तारीख ? क्या दे रजनी का? तभी उसे बच्चो के गुल्लक की याद हो आती है गुल्लक से दस रपये की रेजगारी को निकाल कर कपडे मे अच्छी तरह बाध कर वो रजनी को थमा दती है मीना जाती हुई रजनी को देख रही है महरिन की थकी जावाज वार बार मीना के कानो मे गूज रही है "बहू जी, मेरे चार लडको मे यही वाला लडका मेरा बहुत रयाल रखता था कहता था 'अम्मा तू बतन मत घिसाकर 'लेकिन बहू जी मुझे इतनी उम्मीदें देकर मेरे सग बेवफाई कर गया आगरा के बड अस्पताल में उसे भर्ती कराया था बचा खुचा सारा चादी का जेवर बेच डाला लेकिन, वह बेईमान मेरा न हो सका उसका भी क्या दोष दुख नो सबके हिस्से मे होता है पर माता जाता रहता है मरे हिस्से वाला दुख ठहर गया है यह समझो कि जम गया है' उस दिन महरिन फिर देर से आई थी मीना चावल साफ कर रही थी ऐसे मौकों पर अक्सर ही महरिन और मीना की बातचीत शुरू हो जाती है पिछले काफी दिनो से महरिन रजनी को लेकर काफी परेशान है। रजनी स्कूल में अक्सर कापी पेसिल खो आती है मोगा कहती है--' इसे तुम इसके बाप के पास क्यो नही भेज देती "बहू जी इसकी मा मर गई है बचपन से मैंने ही इसे पाला मेरे लडक ने दूसरी शादी कर ली है तुम ये जानो कि सौतली मा के जालिम हायो मे .

48 ठहरा हुमा दुख " " इसे डालना नहीं चाहती' मीना महरिन को समझाती है-~-' लेकिन तुम्हारे पास इतना पैसा भी तो नहीं है न हो इसे किसी के घर लगा दो दस-पन्द्रह ऊपर से मिल जायेगे खाने-पीने का भी ठिकाना हो जायेगा फिर दिन भर इधर उधर भटकेगी भी नहीं 'कह तो तुम ठीक रही हो, बहूजी पर मेरे मन म है कि चार अक्षर पढ लेती तो अपना भला-बुरा आप समझ लेती कही इसके मन म ये न रह जाये कि मा नहीं है तो नौकरी करके अपना पेट पाल रही है फिर हमारी जात म जो चार अक्षर पढा हो उसे नौकरी अच्छी मिल जाती है' मीना स्पष्ट देख रही थी कि जिस दायरे मे खडी होकर वह महरिन को सलाह दे रही थी वह काफी सकुचित है मीना के ही घर की लाइन मे चौथे नम्बर के घर में वद्ध महिलायें रहती है एक मकान मालकिन और दूसरी किरायेदारिन मकान मालकिन की विधवा बेटी है जिसका दुख उसके कधो को तोडे डाल रहा है किरायदारिन स्वय विधवा है और इसी वष उसके जवान इजीनियर बेटे का निधन हो गया है बेटे की मौत ने बुढिया को पूरी तरह झिझोड दिया है रा रोकर आखें धूमिल हो गइ उसका छोटा बेटा भी इजीनियरिंग कर चुका है और मा की दौड धूप के बाद उसे मत भाई की जगह पर ही नौकरी मिल गई है दुखो की मारी यह वद्धा काफी दौड धूप भी कर लेती है मन वटे नाम से क्यिा हुआ जीवन बीमे का पसा मिला है उससे घर बनवान के लिए जमीन ले ली है और इन दिनो सीमट की बोरियो के लिए दोट घूप कर रही है गली में ये दोनो बद्धाए पतली और मोटी माता जी के नाम से जानी जाती हैं मीना की महरिन इन दोनो वे पर काम करती है उमीने बताया था कि पतली वाली धडाका और उसका बटा एक ही महान म मरे हैं महरिन से ही प्रसग मे मीना अक्सर इन पतनी और मोटी माताआसवति लेती है पतली वाली बुढ़िया अक्सर यह भी कहती रहती है कि देखो जी, इन छोटी जाति के लोगो का तो दुस महने की आदत हो जाती है एक मुझे देखो मरे घटे की मौत न तोह कर रख दिया है और ठहरा हुआ दुख 49 बुढिया चार घर का काम करके चैन से सो भी लेती है सब उसकी माया महरिन और पतली वाली बुढिया दोनो ही दुखी हैं कि तु स्थितिया के अनुरूप दोनो के पैमाने अलग अलग हैं पतली वाली बुढिया का दुख बहता हुआ है, जबकि महरिन का दुख ठहर गया है इस बीच महरिन पतली वाली बुढिया से कुछ चिढ सी गई है अक्सर मीना से कहती है- "तुम्ही बताओ बहू जी, मेरे और इसके दुख का कोई मुकाबला है क्या मीना अक्सर महरिन के लिए दो रोटिया बचा लेती है उस दिन मीना ने गोश्त बनाया था महरिन के आते ही मीना ने उससे कहा "महरिन य रोटी पहले खा लो" "बहू जी, तुम 'मीट' खाती तो नहीं हो, पका कैसे लेती हो ? 'मीट' में कभी शलजम डालकर पकाना, बहुत अच्छा पक्ता है यो अपनी अपनी पसद है "बहू जी मेरे आदमी को 'मीट' बहुत पसद था, आधा किलो मीट ले आता और पाव भर शलजम अपने चार दोस्तो को बुला लेता फिर, जो शराब का दौर चलता तो सबेरा हो जाता मेरे बच्चे ललचाई निगाह से देखते मैं डर के मारे बच्चो को लेकर कोठरी में बैठ जाती पकाते समय एक आध बोटी खिसका देती थी, उसी से बच्चो को फुसला लेनी" "अरे, तुम्हारा आदमी ऐसा करता था और तुम्हें बुरा नहीं लगता था. "काहे का बुरा बहू जी वह बहुत नेक आदमी था बुरी सगतो न उसे विगाडा शराब बहुत पीने लगा था कोई कुछ काम को कह दे कभी मना नहीं करता था मैं सुबह से लेकर बारह बजे रात तक काम करती दुनिया ने मुझ पर भले ही अगुली उठाई हो पर उसने मुझे कभी बदचलन नही कहा और बहू जी तुमसे सच कह रही हू, मैंने भगवान से दो ही चीजें मागी एक ये कि मैं कभी बुरा काम न करू और दूसरी ये कि कभी चोरी-बेईमानी न करू और ईश्वर ने मुझे आज तक इन चीजो से बचाया है" मोना सोच रही है महरिन और भी तो कुछ अपनी जिन्दगी के लिए माग सकती थी लेकिन उसने तो अपने आस पास तमाम कटीले जगल 50 व्हराहमा दुख उगा लिये हैं घुघलाई आँखो से दूर-दूर तक जिदगी का पुध देखने वाली महरिन अकेले कमरे मे जवान बेटे की सारा लिये बैठी होगी जमे दुस मी परतो पर एक और परत चढ़ गई होगी रजनी कद की जा चुकी है मीना बडी देर से यू ही खाली बैठी है अनायास उसकी निगाह घडी पर जाती है बारह बज रहे हैं अभी खाना तैयार करना है रोहित के आने का समय हो रहा है, फिर हेमत ने आज शाम चार बजे डॉक्टर से भी टाइम लिया है काम का अलाम मीना के धारो ओर बजने लगा महरिन वाला घंप्टर जल्दी ही बद हो गया रोहित को लेकर मीना तीन बजे ही घर से निकल पड़ती है, बस जल्दी ही मिल जाती है विलिंगहन अस्पताल के बस स्टाप पर हेमत दूर से ही दिखाई दे जाता है हेमन्त को दूर से ही देखकर रोहित मचल उठता है हेमत मुस्कराते हुए बताता है कि डाक्टर तो आज छुट्टी पर है मीना बुरी तरह खीम उठती है- 'तुम फोन भी तो कर सकते थे, इतनी दूर आकर "लेकिन मुझे भी तो यही आकर पता चला चलो इसी बहाने तुम घर से बाहर तो निकली "अह" मीना चिढ जाती है हेमत रोहित के प्रश्नो का उत्तर दने लगता है कि ये अस्पताल है और यहा से ऑफिस कितनी दूर है रोहित जिद कर रहा है कि उसे कनाट प्लेस घूमना है हेमत मीना से कहता है.--"चलो ऑफिम चलते हैं कुछ खा पी लेंगे' 'ऑफिस जाकर क्या होगा "नही मम्मी पलो न" रोहित जिद करता है "अच्छा घलो, बस स्टॉप पर जूस पोते हैं" मोना ने हाथ मे जूस का गिलास है लेकिन यह कुछ खोई खोई सी है हेमत समझ जाता है कि आज जरूर कोई न कोई फ्तूिर दिमाग म है हेमन्त मीना के निकट आ जाता है-"क्या बात है आज बहुत ऑफ -?" "हां, मन अच्छा मही है"--मीना टालना चाहती है इस बार मीना हेमन्त को टाल नही सकी, और महरिन के दूसरे " व्हराहमा दुख 51 "ये तो बुरा हुआ ॥ - जवान बेटे के मरने का समाचार सुनाकर हेमन्त के चेहरे पर सवेदना पढने की कोशिश करने लगी इसका मतलब पानी का काम फिर तुम्ही को फरना होगा दो भरी हुई बसें बिना रुके धूल उडाती हुई निकल जाती हैं सामने अस्पताल की ओर से दस-बारह महिलाओ का मुड चला भा रहा है सभी चेतहाशा घीख चीख कर रो रही हैं छाती पीट रही हैं और बालो को नोच रही हैं निश्चय ही उनके किसी सम्बधी की मौत हो गई है सभी मे होड सी लगी है कि कौन कितने अधिक दुख का प्रदशन कर सकता है रोहित धोरे से हेमन्त से कहता है-"पापा वो नीली शलवार वाली बुढ़िया फ्यादा रो रही है" मीना रोहित को झिडक देती है मीना यहा भी अकेली अधेरी कोठरी मे महरिन को ही देख रही है घुपलाई पनीली याखें, सामने जवान बेटे की लाश, धुधलाई आखो से जिन्दगी के लिए दृष्टि और दूर जा भी तो नही सक्ती दुखो की परतें बहुत सस्त हो गई हैं पिघलना तो दूर अब ये नुच भी नही सक्ती सामने एक बस आकर रुक्ती है रोती हुई महिलाओ मे से एक उसका नम्बर पढ़ती है सभी उसकी ओर दौड पडती हैं बस भरी हुई है लेकिन धक्का मुक्की के बाद भी वे उसमे चढ़ नहीं पाती बस चल देती है वे फिर स्टॉप के चबूतरे पर आकर बैठ जाती है और जैसे कुछ याद आ जाये फिर उनका सामूहिक कदन आरम्भ हो जाता है छाती पीटने लगती हैं अपने अपने बाल नोचने लगती हैं हम त बार-बार घडो देख रहा है हमे जिस बस में पढना है अब तक नहीं आई दूर से फिर एक बस आती हुई दिखाई दे जाती है महिलायें अपना क्रन्दन समाप्त पर उठ खडी होती हैं हह. वहाती हुई अपने को समेटती हैं और बस मे चढने के लिये धकमपेल करने । लगती हैं बस चल पड़ती हैं मीना जाती हुई बस को देखती है जाता हुआ दुख, ठहरा हुआ दुख, दोनो अलग-अलग हैं उनका पमाना एक नहीं हो सकता निर्णय सब जा चुके थे। सुबह से मरने वाली हलचल पर स्थाई रूप से मुहर लग गई थी पर की अस्तव्यस्त स्थिति इस बात की परिचायक थी कि योडी देर पहले घर युद्ध का मैदान बन चुका होगा पारो ओर सबके उतारे हुए कपडे विखरे पडे थे डाइनिंग टेबल पर जूठे बर्तनाका अनार लगा पर नेहा सुबह से सबकी जरूरतों को पूरा करने में लगी थी सबके जाते ही उसे लगा कि उसका शरीर बहुत रहा है कुर्सी पर बैठते हुए उसने बसा~ खिया एक किनारे रख दी सुबह की चीख-पुकार अभी भी उसके कानो में गूज रही पी जाते-जाते मम्मी भी उसे कई काम गिना गई थी रोज ही ऐसा होता है घर का हर सदस्य कही न कही जाता है सबके पास जिंदगी की रफ्तार है केवल नेहा के ही पास जिंदगी को गति देने के लिए ये बैसाखिया है लेकिन इही बैसाखियो के सहारे हायर सेकण्डरी की परीक्षा पास की है पढना तो वह आगे भी चाहती थी लेकिन मम्मी पापा ने कहा कि अब आगे पढकर क्या होगा फिर साच तो यह था कि दादा जी की मृत्यु के बाद घर बिल्कुल अकेला छोडा भी नहीं जा सकता था कम से कम नेहा के रहने से घर अकेला तो नहीं होगा पारू दीदी कालेज जाती हैं, अखिल स्कूल और मम्मी और पापा को तो नोरिया है ही घर की रख- वाली के लिए नेहा से उपयुक्त कोई हो ही नहीं सकता था बाज नेहा बहुत पक रही थी घर वा बिखराव भी कुछ इतना अधिक था कि उसे समेट पाने की कल्पना से ही नेहा और अधिक धक रही यो माई भी अभी तक नहीं आई थी बसाखियों पर ध्यान जाते ही नेहा बैसासियो का महारा लकर उठ खड़ी हुई आहट ले ले, शायद पडोस मै माई आ गई हो नेहा बालकनी मे आई ही थी कि सत्येन की साईकिल असे दिसलाई दे गई दीदी वालेज जा चुकी है, यह जानते हुए भी सत्येन श्यों आ रहा है।

निणय 53 नेहा स्वय भी इसका कोई बौद्धिक हल नही खोज सकी है कि सत्येन को देखते ही क्यो वह एक अदरूनी खुशबू से भर उठती है ? नेहा इस बात को अच्छी तरह जानती है कि इस महक को फैलने का अवसर कभी नही मिलेगा लेकिन, वह आनी अदरूनी महक को दबा भी नहीं पाती है आराध्य से बिना कुछ चाहे भी उसकी अचना की थाली सज उठती है जो प्रकट हो सके, वे सभी इच्छाए तो नेहा की ही तरह पगु हैं पर वह यही सोचती है क्या मदिर में दीप बारने का भी उसका अधिकार नहीं है सत्येन को सामने खडा देख दप से उसका दीप जल उठा था "पारू कहा है ?" "कालेज" 'लेकिन, आज तो उसे कुछ लेट जाना था और उसने मेरे साथ चलने को कहा था," सत्येन एक साथ ही सब कुछ बोल गया था अमलाया हुआ सत्येन गुस्से मे नेहा को और भी अच्छा लग रहा था एक क्षण ठिठक कर नेहा बोली, "लेकिन इस तरह आप परेशान क्यो हो रहे हैं ? अदर आइए ठण्डा पानी वानी "नही नही मुझे देर हो रही है" सत्येन ने साईकिल घुमानी चाही थी कि नेहा बोल पडी, "बात यह थी कि सत्येन झटके से साईकिल से उतर पडा "क्यो क्या किसी और के साथ "आप अदर आइए, धूप में आए हैं, ठडा पानी पी लीजिए, फिर " " बताती हू" पराजित सत्येन नेहा के आग्रह को टाल म सका नेहा जानती है कि सत्येन पारू दीदी को बहुत चाहता है बात भी सप है वह किसी एक को नही चाहती है उसकी अपनी कसौटी पर आज तक कोई खरा नहीं उतरा सत्येन शायद यह नहीं जानता कि आजकल रवि को पारू दीदी परख रही हैं शायद रवि उनकी कसौटी पर खरा उतर आए, क्योकि वह रईस बाप का बेटा है पारू दीदी को धरती पर पर नहीं रखने देगा पर ऐसे कई रईसो को पारू दीदी अपनी कसौटी पर सरा साबित कर चुकी हैं सबने सिर्फ सपने ही दिए हैं सस्पेन काफी कुछ जानता है, फिर भी पारू उसकी 54 निणय कमजोरी है उसका आत्म-सम्मान उसकी इस कमजोरी के आगे काफी निरीह बन जाता है नेहा ने बताया कि पारू दीदी रवि के साथ सुबह स्कूटर पर गई है सत्येन का चेहरा और भी अधिक बुझा-बुझा सा हो गया नेहा यही सोचती रही कि आसिर उसके मम को कुरेदने का उसे अधिकार हो क्या पा? सत्येन उठ खड़ा हुआ साईकिल को उसने ऐसे पाम लिया था जसे कोई मरी हुई लाश हो घसाखियों से टिकी नेहा देर तक सत्येन को जाते हुए देसती रही जमा हुआ दद अनजाने पिघलने लगा था अनजाने ही नेता सत्येन के काफी करीब था गई पी सुखद अनुभूतियो को तेज धारा में नेहा बहती जा रही है, पता नही तिनके को कौन सा सहारा मिलेगा यह प्रश्न सलीव पर पगु बना टगाथा पारू दीदी अक्सर कहती हैं कि मम्मी नेहा को बहुत चाहती है नेहा इस बात को अच्छी तरह जानती है कि प्यार के नाम पर ढेरों दया की भीख जब तब उसकी झोली मे आ गिरती है लोगो की दया दष्टि ने उसे इतना अधिक कुचला है कि अब उसे अपने पगु हुए अस्तित्व पर कराहना भी अच्छा नहीं लगता मम्मी अक्सर लोगो के बीच नेहा रे वेपारेपन को लेबर फायदा उठाती हैं लोगो की सहानुभूति से अपने को सहलवाना रहे क्यों अच्छा लगता है ? नेहा आज तक नही समझ सकी नेहा पाहती थी विमम्मी उसे आगे भी पढ़ाए नेहा पाहती है कि पढ़ लिख कर वह अपने मस पर जी सके फिर उस जसे लोगो को तो आजक्स सरकार से भी पूरी सुविधा मिलती है यों भी उसे हायर साण्डरीकी परीक्षा तक पढ़ाई लिए छात्रवृत्ति मिलती रही है उसने मच्छ नम्बरों में परीक्षा पास की थी मातेर की पढ़ाई के लिए उसके मन मे बहुत उमग पी मेरिन मम्मी ने जर कहा, नेहा को कालेज में पढ़ागर गया होगा? उस दिन नेहा बहुत दुसी हुई पो उस दिन उसने पाहा पाकि बंसासियों को तोड दे और दोरती हुई रहीदर यसो गाए पर असहाय नेहा उही बसासियों को पारेदेर तर रोतो हो संयोग से उस हिन भी सरयेन पार दोनी से मिसने माया पामौर हमेतह पार दीदी पर मे नहीं पी नेहाको बत उदास देहार सरन उसरे पास मंठ गया पा नेहा अपने रोमाम निणय 55 नहीं सकी थी और सत्येन के सामने ही देर तक रोती रही थी उस दिन सत्येन ने उसे आश्वासन दिया था कि वह नेहा को प्राइवेट परीक्षा के लिए तैयारी करवा देगा सत्येन की सहृदयता ने नेहा को एक नई ज्योति से दीप्त किया था घर मे पल रहे अपने बेचारे अस्तित्व से आहत हो रहे मन पर पहली बार उसने ठडा लेप महसूस किया था नेहा ने प्राइवेट परीक्षा का फाम भर दिया था सत्येन अक्सर उसे पढाई में मदद करता रहता किताबो आदि की व्यवस्था भी कर देता और नेहा के अतर-मन की खुशबू ने सत्येन की सहृदयता को अपने कोमल- तम भावो से जोड लिया था लेकिन दूसरी ओर नेहा यह भी जानती थी कि सत्येन के लिए पारू दीदी एक कमजोरी है और उसकी निकटता पाने के लिए ही सत्येन नेहा के लिए इतना कुछ करता है लेकिन नेहा जब भी पारू दीदी से सत्येन की बात करती है, पारू दीदी सत्येन को अहमक और लेखक कह कर मजाक बनाती है और जिन दिनो उसकी कसौटी पर कोई नहीं होता तो उसी अहमक लेखक सत्येन के साथ प्यार का अभिनय भी कर डालती है पारू दीदी कई तरह के व्यक्तित्व को एक साथ जी लेती है उसे सुबह, शाम, दोपहर, रात सभी का फक अच्छी तरह मालूम है काश नेहा इस सच्चाई से सत्येन को अवगत करा सकती पर कहीं सत्येन उसे गलत न समझ बैठे उस दिन शाम को मम्मी ने घर में एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया था पारू दीदी का उनीसवा जम दिन था पारू दीदी ने अपने अनेक मित्रो को आमन्त्रित किया था नेहा ने बहुत जोर देकर कहा था कि सत्येन को भी बुलाओ लेकिन पारू दीदी और मम्मी एक ओर हो गई थी सत्येन पर कुछ आरोप लगाए गए कि वह ढग के तो कपडे पहनता नहीं है, पार्टी में क्या आएगा फिर प्रेजेटेशन को भी उससे कोई उम्मीद नहीं है पारू दीदी ने नेहा का मजाक बनाया था कि नेहा के जमदिन पर सत्येन ही मुख्य अतिथि होगा नेहा दुख से सिहर उठी थी बाश कि,सत्येन यह सब कुछ जान पाता सयोग से उसी पार्टी वाली शाम सत्येन पारू दीदी को यह बताने आया था कि राज्य सरकार की ओर से उसकी पुस्तक पर तीन हजार रुपये का पुरस्कार घोषित हुआ है पर पार्टी मे आए लोगो के बीच 56 निणय बिन बुलाए मेहमान का उपहास उसे बुरी तरह मर्माहत कर गया मम्मी के रोकने पर, न चाह कर भी उसे देर तक बंठना पडा पारू दीदी अपने मित्रो के बीच व्यस्त थी नेहा सत्येन के मम को समझ रही थी वह पत्थर के बुत की तरह चुपचाप बैठा था 'फई महीने बीत गए, सत्येन पारू से मिलने नहीं आया और नेहा को आश्चय इस बात का था कि कालेज से लौट कर पारू दीदी रोज ही सत्येन के बारे में पूछती नेहा का इस वप बी० ए० का अतिम वप था वह अपनी परीक्षा की तैयारी म लगी यो परीक्षा समाप्त हो गई थी इस बीच सत्येन एक बार नेहा के पास आया था और नेहा को पढने के लिए दी गई सभी किताबें वापस ले गया था नेहा चाहती थी कि पारू दीदी के बारे म कोई चर्चा हो पर सत्येन बहुत जल्दी चला गया था गर्मिया समाप्त हो गई थी, परीक्षा फल घोषित हुआ नेहा ने प्रथम श्रेणी मे बी० ए० को परीक्षा पास की थी, नेहा के नाम सत्येन का बधाई पत्र आया था इस बीच पारू दीदी बहुत उदास रहने लगी थी उनके कई साथी जिहे वह अपना जीवन साथी बनाना चाहती थी, वे अपने विवाह के निमत्रण पत्र उहे भेज चुके थे सत्येन को पारू दीदी ने कई पत्र लिखे उसे बुलाया भी लेकिन उत्तर सिफ इतना ही आता, इन दिनो रिसच का काम अधिक होने से समय नहीं मिल पाता एक दिन पारू दीदी ने खुल कर कह दिया कि वह विवाह के सम्बध मे एक बार सत्येन से बात करना चाहती है मम्मी के बुलाने पर सत्येन पर माया ड्राइग रूम मे सभी लोग रठे हुए थे मम्मी सत्येन को बताती रही कि पारूने एम० ए० कर लिया है और वह उसका विवाह करना चाहती हैं सत्येन बिना कोई रुचि दिखाए सब कुछ सुनता रहा मम्मी ने जब सत्यन को निलिप्त देखा तो उहोंने सत्येन से, सीधे प्रश्न करना उचित समझा, 'तुम्हारा इरादा क्या है, तुम कब तक विवाह करना चाहते हो?" सत्पेन ने कहा, "वसे तो इन दिनो रिसच मे व्यस्त है लेकिन इरादा आपके सामने ही प्रकट करूगा" मम्मी गदगद होते हुए बोली, "मुझे तो पहले ही मालूम था कि तुम मेरी पारू को सच्चे मन से पाहते हो" सस्पेन ने मम्मी को बीच में टोकते हुए कहा, "लेकिन आप गलत निणय 57 " समझ रही हैं, मैंने दूसरी लडकी पसद की है" सत्येन का यह निणय सुनने के लिए मम्मी तैयार नही थी कुछ उत्ते- जित होते हुए बोली, "लेविन कौन सी ऐसी लडकी है जो मेरी पारू से सत्येन का बहुत छोटा सा उत्तर पा 'नेहा' पारू झटके से उठ खडी हुई मम्मी स्तब्ध रह गई उहें सत्येन की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था नेहा घबरा कर उठ खडी हुई बैसाखी सम्हालते हुए उसे लग रहा था कि उसे अब इन बैसाखियो की आवश्यकता नही रही मन के किसी कोने मे दबी सुखद अनुभूतियो ने तहलका मचा दिया था नेहा उसी मे भीगती जा रही थी, क्या सत्येन सच ही इतना विश्वसनीय निणय ले चुका है ..

56 निणय बिन बुलाए मेहमान का उपहास उसे बुरी तरह मर्माहत कर गया मम्मी के रोकने पर, न चाह कर भी उसे दर तक बैठना पडा पारू दीदी अपने मित्रो के बीच व्यस्त थी नेहा सत्येन के मम को समझ रही थी वह पत्थर के चुत की तरह चुपचाप बैठा था कई महीने बीत गए, सत्येन पारू से मिलने नहीं आया और नेहा को आश्चय इस बात का था कि कालेज से लौट कर पारू दीदी रोज ही सत्येन के बारे मे पूछती नेहा का इस वष बी० ए० का अतिम वप था वह अपनी परीक्षा की तैयारी म लगी थी परीक्षा समाप्त हो गई थी इस बीच सत्येन एक बार नेहा के पास आया था और नेहा को पढने के लिए दी गई सभी किताबें वापस ले गया था नेहा चाहती थी कि पारू दीदी के बारे म कोई चर्चा हो पर सत्येन बहुत जल्दी चला गया था गमिया समाप्त हो गई थी परीक्षा फल घोषित हुआ नेहा ने प्रथम श्रेणी मे बी० ए० की परीक्षा पास की थी, नेहा के नाम सत्येन का बधाई पत्र आया था इस बीच पारू दीदी बहुत उदास रहने लगी थी उनके कई साधी जिहें वह अपना जीवन साथी बनाना चाहती थी, वे अपने विवाह के निमत्रण पत्र जहें भेज चुके थे सत्येन को पारू दीदी ने कई पत्र लिखे उसे बुलाया भी लेकिन उत्तर सिफ इतना ही आता, इन दिनो रिसच का काम अधिक होने से समय नही मिल एक दिन पारू दीदी ने खुल कर कह दिया कि वह विवाह के सम्बध मे एक बार सत्येन से बात करना चाहती है मम्मी के बुलाने पर सत्येन घर आया डाइग रूम मे सभी लोग बठे हुए थे मम्मी सत्येन को बताती रही कि पारू ने एम० ए० कर लिया है और वह उसका विवाह करना चाहती हैं सत्येन बिना कोई रुचि दिखाए सब कुछ सुनता रहा मम्मी ने जब सत्यन को निलिप्त देखा तो उहोंने सत्येन से, सीधे प्रश्न करना उचित समझा, "तुम्हारा इरादा क्या है, तुम कब तक विवाह करना चाहत हो" सत्येन ने कहा, "वसे तो इन दिनो रिसच में व्यस्त है लेकिन इराग आपके सामने हो प्रकट करूगा" मम्मी गदगद होते हुए बोली, "मुझे तो पहले ही मालूम था कि तुम मेरी पारू को सच्चे मन से पाहते हो' सत्येन ने मम्मी को बीच में टोकते हुए कहा "लेकिन आप गलत पाता निणय 57 " समझ रही हैं, मैंने दूसरी लडकी पसन्द की है" सत्येन का यह निणय सुनने के लिए मम्मी तैयार नही थी कुछ उत्ते- जित होते हुए बोली, "लेकिन कौन सी ऐसी लडकी है जो मेरी पारू से सत्येन का बहुत छोटा सा उत्तर था 'नेहा' पारू झटके से उठ खडी हुई मम्मी स्तब्ध रह गई उसे सत्येन की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था नेहा घबरा कर उठ खडी हुई बैसाखी सम्हालते हुए उसे लग रहा था कि उसे अब इन बैसाखियो की आवश्यकता नही रही मन के किसी कोने मे दबी सुखद अनुभूतियों ने तहलका मचा दिया था नेहा उसी मे भीगती जा रही थी, क्या सत्येन सच ही इतना विश्वसनीय निणय ले चुका है ०० गैप . "मुझ से बार-बार आप ये क्यो पूछना चाहते हैं कि मैं कई बार आप से कह चुकी है कि किसी भी सच्ची घटना को झूठी कहानी नहीं बनाया जा सकता है • लेकिन अगर कुछ कह लोगी तो दद "हल्का हो जायेगा, यहीन ? वही सदियों पुराना दकियानूसी फामूला कि कहने से दद हल्का हो जायेगा मैं सिफ अपने आप में विश्वास रखती हू अपने को समझने और जानने की ताकत मुझ मे है मैं नही चाहती कि कोई भी मेरे दुख या सुख गेयर करे इस बार वोरेन बाबू तिलमिला उठे, "मीरा क्या मेरा कोई भी अधि- कार नहीं कि मैं तुमसे "वीरेन बाबू आप मुझ से बड़े हैं मैंने बचपन से ही आपको आदर दिया है पिता और भाई से कम नहीं जाना लेकिन इसका ये मतलव तो नहीं कि मेरी व्यक्तिगत जिदगी मे आप हर वस्त "ठीक है अगर तुम नहीं चाहती हो तो मैं तुमसे कुछ नहीं कहूगा दरअसल मन नही मानता है तुम्हारा दुख देखा नही जाता है आज मशुमन होता तो मैं तुमसे बुर भी नहीं पूछा लेकिन अब तुम बिल्कुल अकेली हो गइहा ये सर कुछ मुभ नरगीर परवाने लगता है इसीलिा' 'सरिअप मन कुरे रहे हैं आपको अशुमन के बारे मे वात वरोरसा गुग्ग मित लाता है क्या आप इसी को ठीक मते हैं कि नापी बात करके हर समय मेरे प य को कुरेदे वीरेन वाबू मैं टूट जरूर गई है लेकिन अभी विसरना नही चाहतो मुझे मेरे सूट से ही वपा रहो दीजिये प्लीज' और मोरा फोककर रो उठी वीरेन वायू भी अपन वो नही रोक रावे अपनी आखें पोंछते हुए बोले, गैप 59 " "अरे पगली रोती है । इतनी दृढता और इतना साहस सजोने के बाद इस तरह कमजोर होना क्या अच्छा लगता है | फिर इस तरह मन छोटा करेगी तो अशुमन की जिम्मेदारी कोन निभायेगा?" मीरा ने मटके से बीरेन बाबू का हाथ अपने सिर से हटा दिया। "बस कीजिये बीरेन बाबू, मैं अपनी जिम्मेदारियो को अच्छी तरह समझती हूँ उसे निभा लेने की मुझमे ताकत है क्या कभी आप मुझमे देख रहे हैं और बीरेन बाबू सच मे ही देख रहे थे कि वो कौन सी कमी है--वो कैसा गैप है जहा मीरा सुख और दुख को सहज अनुभूति को स्वीकार नहीं कर पाती उसको अपनी भावनाए रहस्यमय हो उठती हैं ये तो निश्चित है कि मीरा एक सख्त चट्टान बनना चाह रही है पर मीरा इसे भी नही मुला मकी है कि उस सस्त चट्टान के नीचे कुछ तरल सा रिसता रहता है, जिस खूट से वो बधकर अपनी जिदगी के लिए छाव ढूढ रही है वहा भी बहुत सी दूरबीनी निगाह, मीरा को समूचा निगल लेने के लिए उग आई हैं मीरा आहत है, हर आर से आहत आखिर लोग उसे क्यों नही जीने देना चाहते है, अशुमन उसका था अपने और अशुमन के सम्बधों को विज्ञापित परवे वो अशुमन का महत्त्वहीन नहीं बनाना चाहती है फिर मीरा की अपनी पीडा है मन की गहरी जडो मे समाया पश्चाताप है जिसकी अग्नि को धधका कर वो स्वय जलना चाहती है कोई सहानुभूति, कोई दया का छोटा उसे स्वीकार नही यही अब उसका व्रत है यही तपस्या है पर बीरेन बाबू ही केवल ऐसे हैं जो मीरा को आरोप लाछना और अपमान से ऊपर उठा हुआ पाते हैं वे केवल इतना ही चाहते हैं कि मीरा अपने दुलो को सहज स्वीकृति दे दे जो समाज में स्वीकृत हो व्यथ ही उसने अपने चारो ओर एक ज्वाला धधका रखी है जबकि पिसी शीतल छाव के लिए उसका मन भटर रहा है तो क्या बीरेन बाबू ये गनते थे कि अशुमन को मत्यु के बाद मीरा किसी और की हो जाता चाहती है या कि फिर उसका एकदम से अपने सगे सम्बधियो नाते रिश्तेदारों से अलग हो जाना उसकी अपनी स्वतत्रता को बनाये रखना था भीरा अशुमन को जी जान से प्यार करती थी अशुमन भी मीरा को 60 गंप बहुत प्यार करता था पर अक्सर ऐसा होता अशुमन और मीरा जीवन के एक मोड पर अकेले हो उठते अमन आहत होकर अपने ही अपराध बोध से निरीह हो उठता और मीरा का दप उस चूर चूर कर डालता ऐसी ही मानसिक असतुलित स्थितिया उभरती लेकिन गहस्थी की डोर पामे वे फिर एक-दूसरे के करीब हो उठते पर तब भी बीरेन बाबू ने महसूस किया था कि अशुमन और मीरा के बीच एक गैप है इस गैप के लिए वे मीरा को ही दोषी पाते मीरा की ताकि मनोवृत्ति, बुद्धि से आपसी सम्बध को जीना चाहती है जबकि आत्मीय सम्बयो के लिए प्यार और विश्वास की अधिक आवश्यकता होती है। पर मीरा को बीरन बाबू बचपन से जानते हैं क्यों और कस की विश्लेषणात्मक प्रवत्ति उसे किसी भी स्वीकार से खोचती रही है परम्परा वादी विचारधारा को उसने सदा अवहेलना को पुरुषवादी समाज के अ याय और अत्याचार को अक्सर जब वो चर्चा करती तो वीरेन बाबू अपनी पत्नी से हसते हुए कहते "इदु तुम इस लडकी के पास मत उठा बैठा करो इसका क्या कल को ये तुम्हारे हाथ मे भी मारी आदोलन का झडा पकडा देगी मेरी एक- मात्र पली छिन जायेगी और मेरा बेडा गक हो जायेगा बाबू की पत्नी कहती "देखते रहिये यही मीरा कसे बदलेगी फिर दुनिया भर की पुरुष जाति उसे सिफ इसलिए बुरी नहीं लगेगी क्योकि उसका पति भी पुरुष होगा।" और सच मे ही अशुमन से विवाह होते ही मीरा बदल गई थी विवाह के बाद पहली बार जब मीरा घर आई तो बहुत गुम-सुम थी मीरा की मा घबराई हुई बीरेन बाबू के पास आई और बीरेन बाबू से बोली, "मइया मीरा को जाने क्या हो गया बहुत चुप रहने लगी है तुम्ही पता करो ससुराल मे कोई दुख तो नही है इधर ससुराल से आये मीरा को आठ दिन भी नही हुए थे और अशुमन को दस चिट्ठिया आ गई थी नौवे दिन अमन मीरा को लेने आ पहुचा अशुमन की बात और व्यवहार से किसी को भी रचमान बात का भाभार नही मिला कि मीरा का अशुमन से कोई दुख होगा अशुमन का मीरा के "और बीरेन गप 61 खाता प्रति प्यार किसी दीवाने प्रेमी जैसा या परिवार के बीच मीरा को रहना नही था कि सास-ससुर या ननद-देवर की आलोचना या अत्याचार का शिकार होना पडे अशुमन शराब और सिगरेट, यहा तक कि पान भी नहीं अच्छा कमाता था, हर तरह की सुख और समद्धि थी पर ऐसा जरूर होता कि आपसी बातचीत के दौरान एक ऐसा मोड आता जहा पति-पत्नी के आपसी सम्बधो मे एक गप आ जाता अशुमन किसी अपराध बोध से कायल होकर निरीह हो उठता और मीरा अपने ही दप से चूर होकर असहज हो उठती वो गैप क्या था इसे बहुत चाह कर भी बोरेन बाबू नही जान सके तब भी मीरा ने यही कहा था मैं सिफ अपने आप मे विश्वास रखती हूँ अपने सुख-दुख को समझने की ताकत मुझ मे हैं मैं नहीं चाहती कि मेरे व्यक्तिगत मामले मे कोई शेयर करे और आज अशुमन की मृत्यु के बाद भी मीरा यही चाहती है अशुमन की मत्यु पर सबने ये चाहा कि मीरा फूट फूट कर रोये, पत्थर से सिर फोड ले लेकिन मीरा किसी पुरानी चट्टान की तरह सख्त बनी रही अपने प्रिय की मत्यु आदमी को पागल बना जाती है आदमी टूट जाता है जीवन की सारी आस्थाए बिखर जाती हैं पर अशुमन को मृत्यु ने मीरा को जड बना दिया ऐसा क्यो ? मीरा कहती है कि वोटूट गई है बिखरना नही चाहती न बिखरने के पीछे आखिर वे कौन सी आस्थाए हैं जिहे लेकर मीरा सख्त चट्टान हो गई है बीरेन बाबू मीरा को पहेली मानने को तैयार नही हैं बार कुरेदना चाहते हैं पर मीरा बीरेन बाबू की इन अधिकार पूण चेष्टाओ पर ऐसी मुहर लगा देती है कि बीरेन बाबू तिलमिला उठते हैं ये तो सच है कि वीरेन बाबू का मीरा से काई सम्बध नहीं है उनका अपना परिवार है, अपनी जिम्मेदारिया हैं उसे न भी पूछे तो उनका क्या बनता बिगहता है पर पता नहीं क्यो मीरा अपनी सी लगती है, इसीलिए उसके दुख को शेयर कर लेना चाहते हैं एक दिन मीरा बीरेन बाबू के घर आई और कुछ मुडे हुए कागजो को बीरेन बाबू को थमाती हुई बोली "निराशा और दुख से भरी हुई ये कुछ कविताए हैं ' और डायरी के पन्ने लेकर बीरेन बाबू उत्सुकता से उसे बार- 62 गंप बोले--"क्सिकी हैं? ' अशुमन की हैं उसकी डायरी और फाइलो मे मिली हैं" "अशुमन कविता करता था तुमने कभी जिक्र नहीं किया" "दुखी मन कवि होता है बीरेन बाबू लेकिन अपने दुखो को कह देने का ये माध्यम भी कितना सुखद होता है " और बीरेन बाबू कुछ क्हें इससे पहले ही मीरा खटखट करती सीढिया उतर गई बीरेन बाबू ने डायरी के पने उलटे पूरी डायरी खाली थी आरभ के कुछ षष्ठो मे निराश दुखी मन की अनुभूतिया थी वही कही अपराध बोध से छटपटाते मन की अभि व्यक्ति बोरेन बाबू समझ नही पा रहे हैं कि अशुमन पयो इतना दुखी था भया भीरा ही उसके दुख और निराशा का कारण थी? इसी बीच बीरेन बाबू का ट्रासफर हो गया कानपुर लखनऊ मेरठ और अब रिटायर होकर वे फिर अपने पुश्तैनी मकान मे बनारस आ गये थे मीरा के बारे मे उन्हें बराबर समाचार मिलता रहा लेकिन माठ वप के अतराल के बाद जब वे मीरा से मिले तो ये उसे पहचान नही सके जिदगी की आधियो ने उसे उम्र से पहले ही बुढापे को देहलीज पर पटक दिया था बीरेन बाबू देख रहे थे मीरा को उसके चेहरे पर उसी दभ की खोज लेना चाह रहे थे जो मनुमन की मत्यु के बाद बना हुआ था--- याद आया क्तिने आत्म विश्वास से मीरा ने पहा या-मैं टूट चुकी है लेकिन बिखरना नहीं चाहती लेकिन समय ने मीरा को हर ओर बिखेर कर उसके अस्तित्व को मिटा देने में कोई कसर नहीं छोडी बनारस आते ही बीरेन बाबू बहुत व्यस्त हो गये घर गृहस्थी के बहुत से भमेले उहें निपटाने थे आने वाली सदियो म बेटी का विवाह भी या पत्नी ये बई बार कहने पर भी वे मीरा के घर मही जा सके एक दिन मीरा का बेटा उहें बुलाने माया मोरा कई दिन से बीमार थी बीरेनवाबू मीरा को देखते रह गये थे चार दिन की बीमारी में मीरा विल्कुल हड्डी का दोधारह गई थी आँखोपे गाठों मे विचित्र-सा सूनापन छा गया था बोरेन बाबू ने उसका सिर सहलाते हुए पहा, इतनी हालत बिगह गई है, पहले क्यों नहीं खबर दी? 'एक लम्बी सांस सोचते हुए मीरा बोली- हासत गंप 63 तो ऐसी ही बनी रहे तो ठीक है बीरेन बाबू, बाप से बहुत कुछ कहना चाहती थी एक बार अपने आप को साफ कर लेना चाहती है जिसे आपने कई बार जानने की कोशिश की उसे आज मैं बिना क्सिी दुराव छिपाव के आपसे कह लेना चाहती हू मैंने हमेशा माप से प्यार भरा सम्बल पाया है आज उसी के सहारे टिक जाना चाहती हू "अशुमन को जब मैंने पहली बार देखा था तभी से मैं उसकी हो गई इतना प्यार मैंने अपनी जिदगी में किसी से भी नहीं किया, अपने बच्चो से भी नही अशुमन को देखते ही न जाने कितने इ द्रधनुषी सपने मेरे मन पर छा गये लेकिन मेरे सपने पहली रात ही बिखर गये जब अशुमन ने बहुत ईमानदार होकर अपनी बात साफ कर ली थी कि वो प्यार किसी और से करता था लेकिन उससे उसका विवाह मही हो सका अशुमन ने अपनी बात कह ली और वो मुझ पर पूरी तरह से आश्रित हो गया था मुझे बेहदप्यार करता लेकिन मैं उसे माफ नहीं कर सकी मैं इस कल्पना से ही अपना सतुलन खो बठती कि मेरे जीवन का प्रथम और अतिम पुरुष क्सिी और को भी अपनी बाहो मे बाघ चुका है अशुमन ने हर तरह से अपनी हार मेरे सामने स्वीकार की होगी लेकिन मन से हर तरह से अशुमन को स्वीकार करने के बाद भी मैं प्रगट रूप से कुछ न कह सकी और मेरे इस कुछ न कह सकने का जहर हम दोनों के बीच एक गैप बनाता रहा मैं अपने अहम से अपने को मिटाती रही पर मैं खुद मिट जाऊगी, मेरी समूची जिंदगी एक गैप हो जायेगी, मैं नही जानती थी बीरेन बाबू ये मुझे नही मालूम था" और मीरा फफक फफक कर रो उठी बीरेन बाबू की आखें नम हो आइ मीरा को पुचकारते हुए बोले, 'अब सब कुछ बीत गया, अपने को दुखाने से भला क्या मिलेगा "नही बीरेन बाबू, माज मुझे टोकिए नही, मैं सब कुछ कहना चाहती हू अशुमन की मत्यु के बाद मैंने अपने को हर ओर से सिफ इसलिए कंद कर लिया कि मैं प्रायश्चित की अग्नि मे तप सकू मैं नहीं चाहती कि कोई भी सहानुभूति या दया मुझे शीतल छींटा दे मैंने अशुमन को बहुत सताया अशुमन मौन होकर सब सहता रहा मैं भी मौन होकर अपने पापो की सजा भोगना चाहती हू में हर मोर से प्रताडित होना चाहती थी, सिर्फ इसलिए 64प कि अपने और अशुमन के बीच का गैप मिटा सक बीरेन बाबू आप बोलते क्यो नही ? क्या मेरा प्रायश्चित उस गैप को अभी भी नहीं मिटा सका है मुझे आप बताते क्यो नही है " और बीरेल बावू देख रहे पे मौरा बुरी तरह अपना सिर दीवाल मे पटक रही थी जो पत्पर अशुमन की चिता देखकर नहीं पिघला था, आज चटक चटक कर फट रहा था प्रायश्चित की अग्नि मे तपती मीरा निश्चय ही अपने को शेप कर चुकी थी, लेकिन उसके और अशुमन के बीच का गैप क्या और बढ नहीं गया था 7 ०० तैरते बत्तख । आज फिर उसे यही लग रहा है कि कमरे मे घिरती शाम की यह मन- हसी वेववत आई है। पता नहीं क्यो इस मनहूसी के साथ उसके दिमाग की नसें एकदम से तन जाती हैं और उनमे बिलबिलाते हुए कीडे रेंगने लगते हैं । नसो के लाल रग मे बिना हाथ पैर वाले गोल मूड और पतली पूछ वाले ये घिनौने कोहे उसे बहुत बुरे लगते हैं उसे मितली-सी आने लगती है पर कीडो की रफ्तार कितनी तेज है इस तेज रफ्तार से कुछ सीखा भी तो जा सकता है उसकी जिदगी मे क्तिना ढीलापन आ गया है, सब कुछ बधा हुआ, का हुआ बालकनी मे खडी बडी देर से एक ही ओर देखते हुए वह थक सी गई एक बार फिर उसने नसो मे रेंगने वाले कीडो की रफ्तार को ज्यो का त्यो पाया सामने वाले घर की दीवार पर पास लगे पेड की परछाइ खूब बडी होकर मकान पर चढ़ आई थी अक्सर शाम को उस घर मे ताला लटका होता है नौ बजे रात के बाद स्कूटर आता है पति पत्नी और न हे दो बच्चे शाम को ताजी हवा लेकर घर वापस आते हैं बच्चे थोडी देर मे खाना खाकर सो जाते हैं पति-पत्नी के कह- कहो की आवाज रोज दस साढे दस तक सुनाई देती रहती है उसे इस बात का पूरा यकीन है कि सामने वाला पेड उस घर पर शाम की मनहूसी उतरने नहीं देता है गले मे बडी देर से महसूस होने याला अटकाव नीचे उतर जाता है दिमाग की खिंची हुई नसें अपने आप ढीली पड़ जाती हैं उनमे रेंगने वाले की जैसे किसी एटीसेप्टिक के स्पश से निश्चेष्ट हो जाते पारुल और ऋम् नीचे से खेल कर आ गये हैं दोनो ही खाने के लिये अच्छी चीज की माग कर रहे हैं उसका आँचल पकड-पकड कर खीच रहे हैं "मम्मी अच्छी चीज खायेंगे" वह सोच रही है कि अच्छी कौन सी चीज 66 तरते यत्तस खाने को दे उसे गुस्सा भी आता है, वे बच्चे हर समय उसका आचल क्यों खींचते हैं जसे उसका अस्तित्व ही खीच लेना चाहते हैं बच्चे चोसे चले जा रहे हैं नितिन अपने कमरे से चिल्लाते हैं "अरे, मीना कुछ रखा हो तो दे दो न?" नितिन की सिफारिश सुनते ही वह सिर से पैर तक जल उठती है- 'रखा है तो दे दो, न जाने कौन सी मेवा मिठाई ला कर रखी है जो दे दू" झुमलाहट और उदासी की स्याह लकीरें दीवारो पर चढने लगती हैं उसके मुह से 'मिठाई' शब्द सुनकर ऋभ मिठाई के लिए मचलने लगता है पारुल मा का गुस्सा देख सहम जाती है लेकिन ऋम बराबर मिठाई के लिये जिद किये जा रहा है वह रसोई घर से एक कटोरी में सब्जी और तश्तरी मे रोटी लाकर ऋभ के आगे रख देती है ऋम सब्जी का क्टोरा उलटा देता है तहाक से एक चपत ऋम के गाल पर पहता है वह जोर से चीखती है-'निकल जा यहाँ से" पारुल रोते हुए ऋम का हाप पकड लेती है, और उसे खीचते हुए कहती है "चल ऋम हम पापा से नितिन के व्यवहार से उसे बुरी तरह खीझ हो रही है-हर समय अपने मे लीन या फिर बच्चो की व गलत वह तो जैसे कुछ है ही नहीं कभी लडो भगदो तो ऐसा फुसलाएगे कि बस वह ही बुद्ध रह गई है कल्पना के ढेर के ढेर सपने मेरे सामने बिखेर देंगे या फिर "क्या करू मीनू, सुबह से शाम तुम्ही सबके लिये तो एक करता हू-पैसा नहीं है वरना तुझ क्या से क्या ऋम रोते रोते नितिन से चिपक कर सो गया है--नितिन उसे लेकर टहल रहे हैं उसके अदर का बहुत बडा सा फफोला फट जाने को होता है पता नहीं क्यो कभी-कभी वह बहुत क्रूर हो उठती है छोटे छोटे घेरा मे केवल उसी का स्वाथ क्यो मडराता है कभी भी नितिन की जरूरता के लिए नही सोच पाती है जिस वर्ष हमारी शादी हुई थी नितिन क्तिना हसते थे, कितना बच्चो जसा उसे छेडा करते थे पर अव क्तिने गम्भीर हो गये हैं कभी खुल कर हसते नही हैं उसने देखा नितिन ऋम को सुलापर अपने कमरे मे जा रहे थे उसे लगा नितिन के कधे दिन पर दिन झकते जा रहे हैं वह एकदम से परेशान हो गई, जसे अदर के ढेर से फफोले एक तैरते बत्तख 67 सग ही फूट जायेंगे पाच वध ढेरो समस्याओ सहित जीवन पर लद आये थे अब उसके और नितिन के बीच केवल कुछ औपचारिक बातें ही रह गई हैं घर का बजट कैसे सतुलित हो, या फिर उसे घर का सभी काम वरना पडता है और अगले महीने से महरिन जरूर लगा लेंगे इन्ही सवेदनात्मक सदभॊ के बीच नितिन एक आशा की डोर उसके हाथ में थमा देता है कि कुछ ही महीना मे उसका प्रमोशन होने वाला है तब नितिन उसकी चिबुक उठा कर प्यार से कहता है-प्रमोशन हो जाने पर तो अपनी मीना को महारानी बना दूगा" नितिन की इस बात से अब उसकी आखो मे अजीब सा सुख तरने लगता है नितिन की बडी-बडी आखों में भी उस तैरते सुख की पूरी स्वीकृति होती है आखो मे तरने वाला सुख उसे बहुत अच्छा लगता है बचपन मे तालाब मे तरते हुए बत्तख उसे बहुत अच्छे लगते थे ये तैरता हुआ सब सुख भी उसे कुछ-कुछ वैसा ही लगता है इस तैरते हुए सुख के लिये वह अपने हृदय मे एक टेपरिकाडर फिट कर लेती है, और जब तब नितिन की आवाज को प्लेबक करके देर तक आखा मे उस सुख को तैरने देती है सभी तो कहते हैं कि नितिन बहुत परिश्रमी है लगन के बहुत पक्के हैं अभी क्या, अभी तो जीवन की शुरूआत है, आगे तो नितिन के जीवन में बहुत अच्छे दिन आने वाले हैं उसकी आखो म तैरने वाले सुख की रफ्तार तेज हो जाती है तरता हुआ सुख बड़े अच्छे अच्छे चित्र बनाने लगता है छोटा सा फूलो की क्यारियो से सजा बगला, पोच मे वही गाडी, वह सुदर सा मेकअप किये भारी साडी पहने निकलती है नितिन गाडी का दरवाजा खोलकर उसे अपने पास बैठाते हैं पारुल और ऋम् पीछे की सीटो पर बैठ मस्ती कर रहे हैं तेज रफ्तार मे गाडी आगे बढती जाती है, सिलसिलाहटो का स्वर हवा मे चारो ओर गूजने लगता है कभी-कभी उसने मस्तिष्क मे दो चीजें बहुत समान भाव से आती हैं तब उसे लगता है कि उसके मस्तिष के अदर कोई कुशल बनिया बठा है और बड़े हिसाब से पाप जोस कर रहा है अपने बारे में उसे इतना सोचना पहता है कि तरह-तरह के कटपटाग प्रतीको का निर्माण उसने यपने आप 68 तैरते बत्तख " ही कर लिया है, जैसे नसो म रेंगने वाले बिना हाप पर के गोल भूट और पतली पूछ वाले कीडे, बत्तखा जैसा तैरता सुख, या फिर मस्तिष्क का कुशल बनिया उसने इस बात को बहुत गहराई से सोचा है कि शाम को उसके मस्तिष्क का बनिया उसे इस बात के लिये सचेत किये रहता है, कि उसका अस्तित्व बहुत सिमटा हुआ है एक तरह से कई भागो में बट गया है तब फौरन उसक दिमाग की नसो मे लाल खून के सग बिना हाप पैर तथा गोल मूड वाले कोडे तेज रफ्तार से घूमने लगते हैं फिर जैसे ही तसल्ली देने वाला एटीसेप्टिक छूता है, कीडे अपनी शक्ति खोने लगते हैं सूत को सफेद बत्तखें तरने लगती है और उसे नितिन की एक ही बात याद आती है "मीना दिमागी स्तर पर प्यार नहीं टिकता है उसके लिये तो अन्तमन का द्वार खुला हाना चाहिए आज पूरे चालीस दिन हो गये, अस्पताल के जनरल वाड मे वो बीस नम्बर की पलग की रोगिणी है नितिन रोज पारुल और ऋभ को लेकर उसके पास आते हैं फिर जब नितिन बच्चो को लेकर वापस जाते हैं तो वह देर तक नितिन को बच्चो के सग जाता हुआ देखती है आखों के मासू यमना नहीं चाहते हैं, इस बीच नितिन कसे हो गये हैं बच्चे क्तिने कमजोर हो गये हैं घर जाकर वह बच्चो का पूरा ख्याल करेगी बच्चो को कभी नही मारेगी मला कसी माहू, इतने प्यारे कोमल बच्चो को कोई मारता है अदर के ढेरो फफोले फूट जाते हैं और यह देर तक रोती रहती है आज उसे घर की बहुत याद आ रही है सारे घर मे विष भरा उसका अस्तित्व छाता जा रहा है दो मासूम बच्चे, चिन्ताओ के बोझ से लदे हुए नितिन, उसका जी पाहता है कि आज इतना रोये कि मन का सारा मल घुल जाये आज डॉक्टर सुबह से उसे ग्लूकोज चढ़ाने को कह गये हैं मोना को बूद-बूद हो कर नसो मे रिसन वाली ग्लूकोज की बूद वैसी ही लग रही है जसे गोल और लम्बी पूछ वाले कीडे, लाल रक्त मे तेज रफ्तार से दौर रहे हो दूसरी ओर तैरते हुए सुख वाली सफेद बत्तस, जो उसी की है लेशिन विमी और की आखो म तर रही है मीना अपने से अजनबी बनी सब दख रही है नितिन लाल साडी में लिपटी नववधू का गोरा मुसा सरते बत्तख 69 उठा रहे हैं और उससे कह रहे हैं-"तुम्हें महारानी बना कर रखूगा' लाल साडी का गोरा मुखडा शरमा कर नितिन के सीने मे अपना मुख छिपा लेता है पारुल और ऋम् मीना का पल्ला खीच रहे हैं मोना चाहती है कि अपने को हर ओर से समेट कर अपने बच्चो को अपने आचल में छिपा ले 'पर उसकी नसो मे रेंगने वाले गोल मूड और लम्बी पूछ वाले कीडे उसे बुरी तरह जकड लेते हैं नसों मे फैल कर वे मीना को बडे चाव से चूस रहे हैं मीना के मस्तिष्क का बनिया किसी अच्छे दाम पर उसके तैरने वाले सुख के बत्तखो को बेच आया है ०० - अमलतास नहीं फूला इस बार भी अमलतास के पेड मे फूल नही आये तमाम पत्तियो के झड़ने के बाद कलियो के गुच्छे जरूर लटक आये हैं लेकिन चिटकी हुई कलिया जमीन पर गिर जाती हैं पेड फूलो से नही लद पा रहा है इस पेड का भी विचित्र हिसाब है एक तो पत्तियो के झड जाने के बाद कलिया आती हैं, फिर विना पत्तियों के फूलो से भर उठता है लेकिन पिछली बार की तरह इस बार भी सिफ कलियो के गुच्छो मे से एक एक कली चिटक चिटककर गिर रही है, और गली के बच्चे, उन कलियो को नोच-नोच कर उनसे हाथी बना रहे हैं तनु अक्सर इस पेड को देखती है---करे भी क्या, पैड बिलकुल खिडकी के सामने जो है यो सोचने, समझने सुलझाने के लिए उसके पास कुछ कम समस्याए नहीं हैं लेकिन फिर भी कोई बेतुकापन अनचाहे सोचने की प्रक्रिया के साथ पेचअप हो जाता है और मजा तो यह है कि इस बेतुवेपन से तनु स्वय ही नही दोभित को भी ग्रसित होने के लिए मजबूर करती है उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ "तुम नाश्ता नहीं कर रही हो" शोभित ने पत्रिका के पने पलटते देख रही हू इस पेड मे इस बार फिर फूल नहीं खिलेंगे कलिया पिटा विट पर नीचे हो गिरती जा रही है --पता नहीं ऐसा क्यो हाता " तुमी विचित्र हो नोभित कुछ बीम उठा इतना पहन निसने ये यादी सालिड पिपिंग पर तुम जीरो हो ‘में क्या हूँ, यह मैं तुमस नही जानना चाह रही है तनु की शान हा स्रोपन से कहा पाभित ने कुछ सहजता भीकोस्सिम पहा, साने अमलतास नहीं फूला 1 " "लेकिन तनु ने "छोटो छोटी बातो का बुरा मान जाती हो, आज छुट्टी का दिन है, और तुम्हारी यह निगेटिव थिकिंग सारा दिन बेकार करने का मूड है क्या अरे पगली हमे पेड से क्या मतलब कौन सा हमे उन फूलो से सब्जी बनानी है या घर सजाना है "वह बात नहीं है, तुम्हारी कुछ आदत ही पडती जा रही है मुझे टालने की 'तनु, तुम तो बिना मतलब बात बढा रही हो " और शोभित पत्रिका के पने पलटने लगा तनु भी बिना नाश्ता किए ही उठ गई ऐसा अक्सर होता है अम्मा जी उसे जब-तब डाट देती हैं उसका मूड ऑफ हो जाता है लेकिन शोभित पर उसका कोई असर नही होता यही कह कर टाल देता है "अरे यार चलता है, हर घर मे यही सब कुछ होता है तुम हर बात को इतनी गभीरता से मत लिया करो शोभित की बात को और अधिक गम्भीरता से लिया और अपने और शोभित के बीच उसने तीन और छ की खाई को पनपते पाया अपनी जिंदगी को मिफ घसीटते हुए पाया है ऐसी उदास और निराश स्थितियो म उसे प्राय ही दिखने वाला वह सपना याद आया है जब परीक्षा भवन में घबराई हुई अकेली वह बैठी है उसे किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं याद आ रहा है पर यह सपना सच नहीं है तनु जिदगी के हर प्रश्न का उत्तर देन मे पूरी तरह सक्षम है अपने अन्तद्वद्व से भले ही हार कर वह इस तरह के सपने देखे, लेकिन सामने आई स्थितियो की जागरूकता को उसने हमेगा गहराई से पहचाना है वह बात और है कि उसकी अपनी सगी बहन जया अधिक सुखी और सम्पन है अब भी वह अपने पति के सग आती है लगता है किस्मत की लॉटरी जमा के नाम ही खुल गई है तनु ने जया का मजा बनाया है-"पढी लिखी मूख है आज यह व्रत, कल वह त्यौहार पी ममय को जागरूकता को पकड़ने की कोशिश नहीं की महारानी जी गोगा पढ़ेगी रामायण पढ़ेंगी पर घर मे रोज आने वाला समाचारपत्र रद्दी के लिए इक्टठा करेंगी सब ढकोसला है परम्परा को अपने से चिप- टाए रहो, सिफ इसलिए कि य दर का व्यक्ति जागने न पाये " 72 ममलतास नहीं फूला " . "हा, यह तो तुम ठीक वह रही हो पर तनु, सुख खोजने से नही मिल पाता है "सुख मान लेने से ही सुख की अनुभूति होने लगती है अब इस पेड को ही ले लो कलियो के तमाम गुच्छों के लटकने के बाद भी पेड फूलो से नही लद पा रहा है क्यो? कारण जान पाना आसान है क्या ?हमने यह मान ही तो लिया है कि इस बार भी इस पैड मे फूल नहीं जायेंगे ' शोभित के इस तरह प्यार से समझाने पर तनु को कई-कई बार कमविस होना ही पड़ा है उसे वह सपना भी याद आया है, जिसे कई बार उसन देखा है परीक्षा भवन में अकेली तनु है जिसे प्रश्नपत्र का कोई उत्तर नही आ रहा है जो भी हो, तनु ने क्यो और कैसे को विश्लेषणात्मक स्थितियों में अपन विचारों को सदा ईमानदार पाया है उसे पूरा विश्वास है कि जिन्दगी को आज नही तो कल वह अपनी तरह बना ही लेगी तनु के पडोस मे श्रीमती कश्यप रहती हैं श्रीमती कश्यप बहुत सुलझी और अनुभवी महिला हैं उनका अपना ही मत है कि उहोंने जिन्दगी के जितने भी फार्मूले तैयार किये हैं ठीक उही फार्मूलो पर उनकी जिन्दगी दौड रही है तनु अक्सर श्रीमती कश्यप के पास बठती है और जब तब अपनी समस्याओं को भी उनके सामने रखती है पर श्रीमती कश्यप ने तनु की बात को बहुत गम्भीर होकर सुनने के बजाय यही कहा-"तनु, विवाह की पहली शत ही आपसी समझौता है "जबकि तनु ने इस समझौते शद को ही बहुत लिजलिजा पाया है और घटो मिसेज कश्यप से बहस भी की तनु हारना नही चाहती अपने विचारों की जागरूकता पर उसे अटल विश्वास है फिर मिसेज कश्यप स्वय पढी लिखी महिला हैं बौद्धिक अभि- रुचि है, आखिर उनकी समझ मे यह क्यो नही आता कि बदलते जीवन मूल्यों के साप नारी जीवन को भी बधी हुई ,परम्पराओं और रूढिग्रस्त मा यताओं से मुक्त होना ही चाहिए कब तक वह बघे-वधाये दायरो मे घुटता रहेगा क्या उसका मूल्यारन कभी नही हो सकेगा? श्रीमती कश्यप ने उत्तेजित होती हुई तनु को शात करने के प्रयास मे, अपने सफेद गालों पर हाप फेरते हुए सिफ मही कहा है, "तनु, तुम्हारी बात सियोत हो सकती है, कोई लेख या किताव हो सकती है लेकिन चली आई ममलतास नहीं फूला 73 " " मायताओ का रूप नहीं ल सकती है तनु खोज उठती है-"मैं नहीं समझ पा रही है कि, मिसेज कश्यप आप कहना क्या चाहती हैं क्या चले आये समाज की परम्पराओ, माय- साओ और रूढिगत आस्थाओ पर परिवतन का कोई नियम नही लागू होता? फिर एक बग विशेष अपनी सुविधा से अपने लिए मनचाहा समाज भी बना लेता है, सुविधा भी जुटा लेता है लेकिन जो दब गया उसे उभरने का मौका ही नही मिल पाता श्रीमती कश्यप अच्छी तरह समझ रही थी कि आज सनु हारने वाली नही है फिर वह यह भी जानती हैं कि तनु तार्किक भले ही हो, समझौते को लिजलिजा कह कर भी उसने उसे अपनाया है श्रीमती कश्यप ने बात बदल दी और बहुत सहज होकर पूछा-"क्यों, तनु, तुमने शोभित के प्रमो- शन के लिए बुधवार का व्रत आरम्भ किया था अब तो प्रमोशन हो गया उद्यापन कर डालो क्यो अपने शरीर को सुखा रही हो कुछ मिठाई विठाई चढाओगी तो हम लोगो का भी भला होगा" तनु को समझते देर न लगी कि इस अप्रासगिम बात से धीमत्ती कश्यप ने उसे चोट दी है, हराने का प्रयास किया है क्योकि नारी मुक्ति आदोलन का नारा बुलद करने वाली तनु स्वय भी कब पारम्परिक सस्कार बघनों से मुक्त हो पाई है जिन्दगी के संघर्षो का भय जब तब उसे इन जड आस्थाओ से बोध जाता है उन दिनो शोभित बहुत परेशान था उससे जूनियर लोगा का प्रमोशन हो गया था तभी तनु ने भी निश्चय किया था कि जब तक शोभित का प्रमोशन नही होगा वह भी बुध का व्रत किया करेगी श्रीमती कश्यप ने बताया था कि बुध का व्रत गणेश जी के लिए किया जाता है और गणेश जी सब की मनोकामना पूरी करते हैं तनु विवश है—दो विचार धाराओ के अतद्वद मे वह दोनो को ही विजयी पाती है एक विचारधारा उसके अपने ही सस्कारों की है, जहा मा, दादी, भाभी, सब उसके साथ रहती हैं दूसरी विचारधारा उसके अपने पहचान की है, जिसके लिए क्यो और कैसे को विश्लेषणात्मक स्थितियो मे उसने अपने विचारो को सदा ईमानदार पाया है और आज नहीं तो कल मह अपनी पहचान बना सकेगी अपने अनुकूल वातावरण बना सकेगी 74 अमलतास नहीं फूला इसका उसे पूरा विश्वास है तभी यह अपने तरीको कभी मात नहीं साने देती है जया या सुस इमलिए उस बहुत छिछला और सतही लगता है- जववि अपने सुखो के लिए यह एप प्रांति चाहती है श्रीमती पश्यप की एव ही छोटी बेटी है जो अपने ससुराल में काफी सम्पन है, मां के घर से उसे पापी पुछ मिला है ससुराल में उसका बहुत आदर और सम्मान है मिसेज पश्यप यह कहते नहीं थकती हैं कि उनकी बिटिया ने अपने घर को स्वर्ग बना दिया है यही कारण है कि ससुराल म सभी बड़े छोटे उसका आदर करते हैं पति तो उसे बहुत चाहता है इतनी बार मिसेज पश्यप की बेटी की प्रासा सुन-सुन कर तनु काजी जलने लगता है, उसे यही लगता है कि मिसेज कश्यप उसे नीषा दिखाने के लिए ही अपनी बटी की इतनी प्रशसा करती है पता चलेगा तब जव घटे का ब्याह करेंगी और बहू पर लायेंगी तब सारा आदश मिट्टी में मिल जायेगा और यही मिसेज कश्यप जो विवाह की पहली पात समझोतेका नारा लगाते नहीं थकती हैं, किसी खूसट बुढ़िया सास पा रोल निभाने लगेंगी ऊट जब तक पहाड़ के नीचे नही आता अपने को सबसे ऊचा समझता है आज शोभित के माफिस जाने से पहले ननु ने उससे कुछ रुपये चाहे थे, और शोभित चिढ़ गया-वह स्तिनी बार तनु को समझा चुका है कि आखिर उसकी भी कुछ सीमाए हैं फिर महीने के भासिर मे पसा आयेगा कहा से ? इस महीने से भी बड़े बेटे की परीक्षा फीस देनी पड़ी है मा बीमार है, उनकी पूरी दवा नही आ सकी है शोभित को यही आश्चय होता है कि तनु क्यो नही समझ सकी है कि यह घर उसका है-यहा का सुख- दुख भी उसका है तनु ने भी इससे अलग नही समझना चाहा है लेकिन शोभित के समझाने पर वह ताविक हो उठी है और शोभित को ताना मारा है- 'मैं भी नौकरी करना चाहती हू, आखिर कब तक छोटी छोटी इच्छा को दफन करती रहूगो" तनु की यह बात शोभित को किसी विषदश से धम नही लगी लेकिन उसने हर बार विष का घूट पिया है और तनु को प्यार किया है क्योकि दोभित जानता है तनु जो कहती है उससे अलग भी एक तनु है तनु पिछले आठ महीने से पूरी तरह से टूट चुकी है आस्थाओ की अमलतास नहीं फूला 75 गहरी चोट ने उसे एक विरक्ति दी है, जीवन को विचित्र शूयताओ से भर दिया है अब वह घटो मिसेज कश्यप से बहस नही कर पाती है शोभित से अपने अधिकारो के लिए झगड नही पाती है मन मे उसके विचित्र सा खोखलापन समाता जा रहा है जीवन के सभी चटक रग घुल पुछ गये हैं तनु के भाई के आकस्मिक निधन से, उसने अपने अस्तित्व के बारे मे भी सोचना छोड दिया है भाई के मौन स्नेह से सारा का सारा परिवार बघा था और अब ऐसा लगता है जितना ऊचा आकाश है शायद उतनी ही नीची धरती पर कही टिके नहीं है-सिफ सब हवा मे लटक रहे हैं कोई अदृश्य सूत्र है कब टूट जाये कुछ पता नही ऐसा क्यो होता है कि सब कुछ समेटने वाले हाथ पसरे रह जाते हैं भाई के जाने से सब बिखर गये हैं-सब के दुख के अलग-अलग पैमाने हैं-भाभी के आगे बहुत बडा रेगिस्तान है और पैरा मे दायित्वो की वैडिया, अपना सब लुटा कर भी उहे भइया की अमा- नत को सम्हालना ही पडेगा-रिश्ते की यह विवशता भी कितनी कटु है लेकिन क्या जवान बेटे की अर्थी उठते देख कर तनु के मा, बाबूजी भी जी पा रहे हैं जिन्दगी के पूरे हो आये दिनो मे इतनी गहरी चोट, हाथ मे खाली पिजडा रह गया है और घुघली आखें आकाश की ओर टग कर रह गई हैं आठ महीने होने को आए तनु की मां भी चल बसी मा, जिहें हो। सभालने के बाद तनु ने बहुत दुवला और कमजोर पाया मा परम्परा- वादी थी दुपले कमजोर शरीर मे सस्कारो को कट्टरता निभाने की भा में अद्भुत क्षमता पी हर तीज-त्यौहार पर रहें परम्परागत रीति-रिवाजो को निभाते देखकर यही लगता मां ग्यप ही इन याह्य आडम्बरो को मा यता देती हैं, जिससे स्वय उहें तथा परिवार के अप सदस्यो को भी कष्ट होता है लेकिन सनु जानती है उन मास्याओं के पीछे मां की पायद एप ही भावना थी अपने परिवार के लिए शक्ति जुटाना, जो बहुत कुछ आध्यात्मिक होती, मां चाहती थी कि उनरे बच्चों में ईश्वर का भय बना रहे, और अहवार न आने पाये जिससे जिंदगी अपने आप में महज हो जाये, तनु ने अक्सर तारे आगे मा को हारते हुए देखा था क्योंकि मां पड़ी लिसी नहीं पो और न ही पुदि प्रधान लेकिन अपने हृदय की पवित्रता 76 अमलतास नहीं फूला मे वह बौद्धिक तकों को कभी भी प्रधानता नही दे सकी इसीलिए उनका व्यक्तित्व किसी के ऊपर कमाड नहीं कर सका व्यवहार से दुनियावी या फिल्मी सास, मा, नानी दादी का आदश नहीं हो सकी मा की एक बात केवल तनु को ही नहीं सभी भाई बहनो को बुरी लगती जब वह बच्चो की निस्सीम आकाक्षाओ को एक दायरे मे बाधने का प्रयत्न करती पता नहीं क्यो मा को ऐसा विश्वास था कि खुले आकाश मे बिना धरती से टिके पक्ष फडफडाने से कोई ओर छोर नही मिलता तनु ने मा को कभी स्वाभिमानी बने घाभी का गुच्छा लटकाए नही देखा इतना बड़ा बगला, पति की ऊचे ओहदे को नौकरी, घर म ढेरो नोकर चाकर के रहने पर भी मा को कभी किसी पर रोब गाठते नहीं देखा वे झूठे स्वाभिमान से सदैव दूर रहीं दुनिया की जिन व्यवहार कुशलताओ को प्राप्त करने में वह असफल रही, उही असफलताओ ने उहें ईश्वर के और निकट किया अपने जीवन मूल्यो की स्थापना मे मा ने कुछ छाटी- छोटी सी आस्थाए समेट ली थी क्योकि उनका हृदय बहुत निमल था दोहरा व्यक्तित्व जी पाना उनके लिए सभव न था लेकिन पिछले आठ महीने तनु जानती है, भाई की मृत्यु के से मां की आखो मे रेगिस्तान समा गया था अपनी पूरी जिन्दगी में जिस माने दुख और सुख को समभाव से स्वीकारा, वही सतुलन पूरी तरह से चक्नाचूर हो गया था मा ने इतने कठोर वज्रघात के बाद भी ताकिक होकर अपने ईश्वर से यह नहीं पूछा कि तूने इतनी बड़ी सजा क्यो दी? तनु जानती है, मा, एक पवित्र और ईमानदार जिदगी मे विश्वास रखती पी, उहोंने इतनी बडी सृष्टि मे कोई बहुत ऊची आकाक्षा नहीं की लेकिन जब अपने ही टुकडे को मिट्टी में मिलते देखा, तो मां को अपनी ही गक्ति और आस्थाओं मे जहर घुलता गया अन्दर की सहनशील पाक्तियो ने विद्रोह कर दिया विषाक्त हो बाई शक्तियो को भी मा चुपचाप पोती रहीं विष अदर उतरता रहा दैनिक दिनचर्या मे फिर भी कोई कमी नही आई ईश्वर का पूजन बसे ही होता रहा किन्तु सहनशक्तियो का विद्रोह एक दिन उनकी मौन संवेदनाओ पर प्रश्नचिह्न अक्ति करता हुआ सदा- सदा के लिए शान्त हो गया बाद अमलतास नहीं फूला 77 आज तनु और उसके भाई बहन एकत्रित हुए हैं लेकिन ऐसा क्यो है कि मा के जाने का दुख किसी को नही है मा जिस दुख से आहत हुई थी वही दुख सबके बीच लटक आया है तनु सभी आस्थाओ के छिन भिन्न हो जाने के बाद भी जानना चाह रही है क्या मा को पवित्र आत्मा को इतना बडा दुख मिलना चाहिए था पर शायद हर प्रश्न का उत्तर नही होता--- कुछ बातें माननी ही होती हैं और शोभित ठीक ही कहता है कि अमलतास पेट पर कलियो के गुच्छे लटकने के बाद भी अगर कलिया चिटक-चिटक कर गिरती हैं, और पेड फूलो से नही लद पाता है तो इसका कारण नही खोजा जा सकता यही मानना होगा कि इस बार अमलतास मे फूल नही आये ..

कतरन गली नम्बर चौदह मे मुडते ही जो तीसरे मम्बर का पर है, उसमे मैडम मारिया रहती हैं मंडम मारिया के विखरे घर म गली के बहुत से कुत्तो को पनाह मिल जाती है मैडम मारिया काफी बूढी हो चली हैं, इसलिए घर की सफाई अब उनसे हो नहीं पाती है मैडम मारिया को ढेर-सी कतरनें और उलझी ऊन तथा धागे जमा करने का बेहद शौक है इसी मे मैडम मारिया की खुगी छिपी रहती है मंडम मारिया की इस खुशी को शायद कोई नही जानता सब अपनी ही तरह मडम मारिया के बारे मे सोचत और कहते हैं कुछ लोगो के अनुसार मडम मारिया सठिया गई हैं तो कुछ उहें सिरफिरी बुढिया कहते हैं गली मे मैडम मारिया से कोई मतलब नहीं रखता, न ही मैडम मारिया को किसी की जरूरत महसूस होती है अकेली एक रामकली जमादारिन है, जिसे मेम साहब पर बहुत तरस आता है और वह उनके कमरो मे झाड लगा देती है गली मे केवल रामकली ही है, जो जानती है कि कतरनो के ढेर उलझे धागे और कन बटोरने के पीछे महज मेम साहब का पागलपन नही है कोई गहरा दद है, जिसे कई बार रामकली समझार भी समझ नहीं पाती है मडम मारिया का घर बहुत बड़ा है दो कमरे हैं एक छोटा-सा बरामदा और रसोई घर एक कमरा तो हमेशा बद रहता है मडम मारिया की असली कमाई की तिजोरी यही क्मरा है इमी मे उनकी मोह-माया कैद है जिमके आसपास वह हर समय मडराती रहती हैं इस कमरे को खिडकी और रोगनदान कभी नही खुलते हैं बाहर दरवाजे पर एक बडे ताले के सग दो और छोटे छोटे ताले लटके रहते हैं इस कमरे मे जगह जगह कतरनो के ढेर, उलझे मन और धागो के ढेर हैं महम मारिया अपने कतरन 79 इस खजाने को देर तक निहारती हैं इन कतरनो और उलझे उन के धागो के बीच, घण्टो तृप्त होकर बैठी रहती हैं मंडम मारिया गली के बच्चो को देखकर बहुत नाक भौह सिकोडती रामकली अकसर मैडम मारिमा से पूछती, "ऐ मम साहब, काहे तुम्हे मानुस गघात है?"लेकिन मैडम मारिया के लिए बच्चो को बरदाश्त करना बडा मुश्किल था घर के आसपास बच्चो को देखती, तो छडी लेकर दौडती गली के बच्चे भी कुछ कम न थे सबेरे जब मैडम मारिया निकलती, तो झुड के झुंड बच्चे उह छेड़ने के लिए खडे रहते बच्चो को मडम मारिया की अजीबोगरीब ड्रेस देखकर बडा मजा आता मडम मारिया को एक परमानेंट ड्रेस थी, लाल छापेवाली लम्बी फ्रॉक या फिर नीले चौखाने की फ्रॉक, उसी के ऊपर वह फ्टा हुआ हरा स्वेटर पहनती और पैब द लगा काला कोट गरमियो मे स्वेटर और कोट उतर जाते, लेकिन बच्चा का कौतूहल उनके भूरे रंग के उस गदे टोप से जुड़ा रहता मैडम मारिया। रोज टोप को सजाती उनके टोप मे हर रोज नये तरीके से रग बिरगी कतरनें लटकती और ऊन के धागो के रग बिरगे फुदने भी लटकते सबेरे जब मडम मारिया थेले टागे निकलती तो शुरू मे सब यही सम मते थे कि मैडम मारिया नौकरी करने जाती हैं लेकिन ऐसा कुछ नही था मडम मारिया घर से निकलकर सीधे सिविल लाइस पहुचती वहा बदी टेलस की दुकान पर धरना देकर बैठ जाती नोकर आता दुकान खुलती झाडू लगाकर नौकर कतरनो का देर मैडम मारिया के आगे कर देता मैडम मारिया नौकर को बहुत बहुत आशीर्वाद देती फिर कतरनो का खजाना जल्दी-जल्दी थलो मे भर लेती कभी कभी बहुत खुश होने पर पाच या दस पसे भी नौकर को दे देती बेदी टेलस की दुकान से उठकर महम मारिया सरदारजी की दुकान पर जा बैठती उस दुकान का नौकर मैडम मारिया को देखकर चिढने लगता, लेकिन मडम मारिया उसकी, बिलकुल परवाह नही करती उहे मालूम था कि सरदारजी जब आएगे तब जरूर उलझी ऊन उहें देंगे साथ ही रुपया या आठ आना पाय ये लिए देंगे मडम मारिया इन कतरनो, उलझे ऊन और धागो का क्श 80 कतरन " यह भी एक रहस्य ही है यो सब यही समझते कि वह उनसे खिलौने, कुशन या टीकोनी आदि बनाती होगी लेकिन रामकली ने गली की औरतो को राज की बात बतायी है, "भुढिया मेमसाहब एक कमरे में ढेर-सी क्तरन और उलझे पागे-ऊन जमा करती है और कजूस बनिये की तरह अपनी इस तिजोरी को खोलकर खुश होती है अरसे से मैडम मारिया अकेली हैं, ये सभी जानते हैं एक दिन सोगों के आश्चय का ठिकाना न रहा, जब गली नवर घोबह में एक मौजवान मैडम मारिया का घर पूछता हुआ आ पहचा पता चला कि भौजवान मैडम मारिया का भतीजा है और इस शहर मे नोकरी करने आया है उसका नाम रोवट है पहले तो मडम मारिया को रॉक्ट का आना अच्छा नहीं लगा लेकिन रॉवट ने जब मैडम मारिया को उनके नये मप दिसाये, खाने के लिए लाया हुआ सामान दिखाया, तब मैडम मारिया बहुत खुप रॉपट ने मैडम मारिया को बहुत खुश देखकर अपना इरादा जाहिर किया, "ओटी, अब मैं तुम्हारे साथ ही रहूगा, तुम्हारी खूष सेवा अरूमा मंडम मारिया एक्दम तन गयी और रूसी होकर गोली, "क्यों, मेरे सग क्या रहोगे?" रॉपट सपपरा गया, उसने कुछ सम्हलते हुए कहा, "नहीं, ऐसी कोई मात नहीं है, में रही और पर देस सूगा दरअसल मेरे लिए यह बाहर बिलकुल नया है, दो चार दिन तो मुझे "पर मेरे पास तो एक ही कमरा है मंगम मारिया ने साफ जवाय " दूमरा कमरा भी तो विट अभी कुछ मौरबहता निमरम मारिया जोर से घोसी,' असे उस ममरे में हरगिज नहीं तोलूगी तुम नही और अपना दिवाना तीन सो' बात पूरीतह निगा पुषीपी फिर भी रोबर ने एप पांगारा, "कोई मार नहीं माटी, दुम्हारा मैमरा भी खासा माहै इम टूटी पुरमीमो में बाहर रख दूंगा मोर अपन लिए यही पारलाई सुगा' पुछ देरतर गोषती हुई माम मारिमा योमी 'माघाटी मेरिण बतरन 81 एक शत है, तुम इस कमरे मे जाने की कभी कोशिश मत करना "नहीं, नही आटी, ऐसा कभी नही होगा तुम विश्वास रखो फिर तुम जब इस कमरे मे ताला लगाकर रखती हो, तव भता भला में मना र सकूगा? मैं तो यो भी सुवह आफिस चला जाकामा और शाम देर से। लौटूगा शाम को रॉबट मारिया को टैक्सी में बिठाकर बाजार ले गया कुछ जरूरत के बरतन, खाने पीने का सामान और एक छोटा चोखा भौट कुरसी खरीदी सालो से एक ढर्रे पर चले आये घर म जो तूफानो परिवर्तन आया था, उसे मैडम मारिया बहुत अच्छी तरह पचा नहीं पा रही थी लेकिन विरोध कर सकें, ऐसा भी कोई कारण नहीं ढूढ पा रही थी रॉबट रोज सवेरे उठवर बिस्तर में मंडम मारिया को चाय पहुचाता ऑफिस जाने से पहले अपने और मडम मारिया के लिए ब्रेकफास्ट तैयार करता, शाम को लौटते समय अक्सर ही खाने का ढेर सा सामान लेकर आता छुट्टी वाले दिन अपने कपडो के सग मडम मारिया ने भी कपड़े धो डालता ताजा सब्जी व मीट खरीद लाता और खुद ही पकाता एक दिन ऑफिस से लौटते समय रॉबट मडम मारिया के लिए दो सिली सिलामी फ्रॉक और एक स्वेटर ले माया रॉबट ने खुश होकर कहा, "देखा, माटी, मैं तुम्हारे लिए पपा लेकर माया हू अब तुम ये पुरानी फ्रॉक मत पहना करो देखा ये दितनी फट गयो है और वदरग भी हो गयी है और हा, आटी, अव तुम कतरनें इकटठा करने भी मत जाया करो तुम्हारी देखभाल अब मैं " रॉबट अपनी धुन मे बोले जा रहा था तभी अचानक उसे लगा जसे मैडम मारिया पत्थर हो गयी हो वह घबराकर मैडम मारिया को झवझोरने लगा, "आंटी आटी तुम्हें क्या हो गया है ? तुम्हारी तबियत तो ठीक है, क्या तुम्हें ये कपडे पसद नहीं आये" "नहीं, अच्छे हैं "मैडम मारिया ने बहुत यकी हुई आवाज मे कहा फिर जाओ, आटी जल्दी से इहें पहनकर तैयार हो जामो ये देखो मैं टिवट साया हू आज तुम्हें पिपर दिखाने ले चलूगा' रॉबर्ट को बई वप पहले उसरी मा ने मैडम मारिया के बारे मे बताया था कि बसे पति द्वारा कराये जाने के बाद भी बड़े विश्वास के साथ करूगा 82कतरन जटिल सपों को सुलमाती हुई वे अपने बच्चो के लिए नये सिरे से जी रही यो बड़े होकर बच्चो के पख भी मजबूत होते गये और एक एक करके वे भी उनसे अलग हो गये कठिन मेहनत से जुटाई सपत्ति और जीवन की सारी आस्था और विश्वास एक झटके मे खतम हो धुकी थी उनकी जिंदगी कतरनो, धागो और ऊ। वे ट्रक्डो जैसी बिसर गयी थी और वह मन मे बैठे एक अनजान विश्वास के सहारे कतरनो, धागो और ऊन के ढेर को बटोरने में जुटी हुई थी उनके इसी विचित्र रहस्य को रॉबट अब तक नही समझ पाया था रॉबट के बहुत कहने पर मैडम मारिया अब कतरनें बीनने नहीं जा पा रही थी दिन भर घर मे बैठकर कभी कभी विचन मे कुछ अच्छा खाना पकाती और उसे खाने की टेबिल पर सजाकर रॉबट का इतजार करती रामकली जमादारिन को भी अक्सर बचा हुमा खाना दे देती रामकली गली के हर घर मे यह बात प्रचारित कर चुकी थी कि अब बुढिया मेम साहब का दिमाग ठीक हो गया है गली के बच्चे जरूर इस बात से दुखी थे कि मनोरजन का एक मुलभ साधन अब ममाप्त हो गया था बहुत जल्दी ही सब कुछ व्यवस्थित हो जायेगा ऐसी उम्मीद रॉबट को नही थी मन ही मन वह बहुत प्रसन था और निश्चित भी उसने अपनी मा को इस सफलता के बारे में सूचना दी साथ ही पह भी कि उसकी तरक्की हो गयी है, वह जल्दी ही पर आयेगा और मेरी से विवाह करेगा मेरी को भी यहा ले आयेगा उस रात रॉवट ने जब मैडम मारिया को अपने और मेरी के विवाह के बारे मे बताया, तब वह कुछ नहीं बोली अगली सुबह रॉबट आफिस जा चुका था मडम मारिया अपने बिस्तर से उठी, उहोने रॉबट के सब कपडे निकाले अपने वे नये कपडे जो रॉबर्ट लाया था, उसे भी निकाला स्वेटरो को छाटकर एक ओर रख दिया फिर कची लेकर कपडो के ढेर के पास बैठ गयी और सभी पदो की कतरन बना डाली फिर स्वेटरो को उघेडकर उनकी कन के टुकड़े-टुकड़े कर डाले सारे दिन इस काम को करने के बाद उनके चेहरे पर एक विचित्र-सा यात्म सतोष छा गया वह मारे खुली के जोर-जोर से हसने लगी तभी रॉबट ने दरवाजा खटखटाया, खुशी से भागती हुई मैडम मारिणी ने दरवाजा खोला कतरन 83 रॉबट समझ नहीं सका कि आखिर मडम मारिया आज इतनी खुश क्यों हैं ? मैडम मारिया रॉबट को घसीटती हुई कमरे मे ले गयो कपडो को कतरनो और उलझे ऊन के ढेर को दिखाती हुई बोली, "देखो रॉवट, आज मैंने इहै घर मे ही बनाया है, मैं बाहर नही गयी पी" रॉबट को समझते देर नहीं लगी कि कतरनो के इस ढेर में उसकी कमोज को कतरनें भी हैं, उसका स्वेटर भी उघड चुका है रॉबट गुस्से से कापने लगा उसने चाहा कि खुश हो रही आटी को झकझोर डाले और उनसे पूछे कि ये सत्यानाश उहोंने क्यो किया है ? आखिर रॉबट ने उनका क्या बिगाडा है ? अभी रॉबट चीखना ही चाहता था कि बहुत भारी और गभीर आवाज मे मैडम मारिया बोली, "तुम यहा से चले जाओ" रॉबट हतप्रभ-सा खडा था न ही उसकी समझ मे यह मा रहा था कि उससे क्या गलती हुई है और न ही ये कि आखिर उसने मैडम मारिया के लिए इतना सब कुछ क्यो किया? थोडी देर में उसने अपनी खाली अटैची उठायी और चल पडा दूसरे दिन गली के बच्चों ने देखा मैडम मारिया लाल छापवाली गदी फॉक के ऊपर पटा हरा स्वेटर, पंबद लगा काला कोट पहने सिर पर गदा भूरा टोप, जिसमे गदी कतरन और फूदने लगे हैं, पहनकर जा रही थी बच्चो का मनोरजन फिर भारभ हो गया था रामकली गली मे झाड लगाती सबसे कह रही थी, "बुढिया मेमसाहब फिर से पगला गया है, जाने काहे ओका मानुस गधात है अब फिर से कतरन बटोर लागी है 000 " "

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Katran

Author
Vibha Devsare
Title
Katran
File name
Katran
Text
OCR done
Citation
1963
Published
2011/03
Publisher
Nalanda Prakashan New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
88
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
550994
Barcode
4990010031779.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
1U0RtTXkGZ8
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