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Prokti [ Swaroop Sanrachna Aur Shali ]

Indu Shitanshu · 2011/03

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प्रोक्ति । स्वरूप, संरचना और शैली

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प्रोक्ति : स्वरूप,
: स्वरूप, संरचना
और शैली
डॉ० इन्दु शीतांशु
र प्रतिभा प्रकाशन
--
होशियार पुर-146001

प्रथम संस्करण: 1989
मूल्य : पचास रुपये
प्रकाशक : प्रतिभा प्रकाशन
11/22 टैगोर नगर,
होशियार पुर 146001 (पंजाब)
मुद्रक : मानस प्रिंटिंग प्रेस, 9/4753,
पुराना सीलमपुर, दिल्ली-110031
PROKTI: SWAROOP, SANRACHNA AUR SHAILI
by lodu Shitaoshu
Rs.50.00

पूर्वा 'प्रोक्तिः स्वरूप, संरचना और शैली मेरी पहली पुस्तक के रूप मे साहित्य- संसार के सामने आ रही है । दर्शन, भाषा और साहित्य विषयक अपने अध्ययन और चितन के क्रम में मैंने लगातार यह अनुभव किया था कि भाषा की सबसे बड़ी इकाई के रूप मे वाक्य की मान्यता को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योकि कही कुछ ऐसा है, जो वाक्य मे ऊपर भी है। मेरे मन की इस भावना को तब ठोस आधार मिला जब मैंने छठे दशक में पश्चिमी जगत् में भापा विज्ञान के क्षेत्र मे 'प्रोक्ति' और 'पाठ' के विषय में की गयी ऐसी स्थापनाओं के विषय में आठवें दशक मे जाना । मैं लगभग 1975 से लगातार इस दिशा में पढने और जानने का प्रयास करती रही हूं। प्रस्तुत कृति मेरे इस व्यवस्थित अध्ययन का परिणाम है। इस पुस्तक का सांचा, इसका विन्यास और इसकी रूपरेखा पूरी तरह मेरी अपनी है । प्रोक्ति की संकल्पना को सुस्पष्टता मे समझने-समझाने के लिए किस रूप में प्रस्तुत किया जाए, उसे मैंने अपने ढंग मे सोचा-समझा है । आरंभ मे मैंने इस पुस्तक के लिए तीन अध्यायों की नियोजना की थी-- 1. प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन 2. प्रोक्ति : संरचना-विश्लेषण 3. प्रोक्ति : शैली-अभिलक्षण इनमें पहले दो शुद्ध रूप में भाषा-अध्ययन से संबंध रखने वाले अध्याय के रूप में सामने आते हैं, किन्तु तीसरे अध्याय के नियोजन-क्रम में मेरा यह विशेष मंतव्य रहा है कि प्रोक्ति की दृष्टि से साहित्य के अध्ययन-संदर्भ मे भी लाभ प्राप्त किया जाए । शैली-अभिलक्षण का विशेष अध्याय इसी दृष्टिकोण से लिखा गया है। बाद में मुझे ऐमा लगा कि इस पूरे विवेचन को पूर्णता देने के लिए प्रोक्ति-विश्लेषण की प्रक्रिया को भी स्पष्ट कर देना जरूरी है। अतः मैंने एक और अध्याय 'प्रोक्ति : विश्लेषण-प्रक्रियाकन' नाम से चौथे अध्याय के रूप मे जोड़ दिया है । इस प्रकार इस पुस्तक मे प्रोक्ति के विषय मे परिपूर्ण सामग्री उपस्थित कर दी गई है, जिससे उमको स्वरूपगत, संरचनागत, शैलीपरक और विश्लेपण-परक-सभी प्रकार के अध्ययन के लिए सामग्री प्राप्त हो जाती है। पुस्तक-लेखन के क्रम में मैंने मूल संदर्भ का पूरा हवाला दिया है, जिससे यदि कोई अध्येता या जिज्ञासु मूल पुस्तक को देखना चाहे तो वह मेरे द्वारा निर्दिष्ट उद्धरण की सहायता से मूल से भी स्वयं परिचय प्राप्त कर सके। मेरी बहुत इच्छा थी कि प्रोक्ति को संकल्पना पर विचार करने के क्रम मे भारतीय काव्य-शास्त्र पर भर्तृहरि के 'महावाक्य' को संकल्पना से भी उसको तुलना कर सकूँ। पर समयाभाव में यह कार्य पूरा नहीं हो सका। अतः उसे प्रस्तुत पुस्तक मे नही दिया जा रहा है । भविष्य मे यदि अवसर मिला तो इस संदर्भ में मैं अपने विचार अलग से पुस्तक रूप में प्रस्तुत करूंगी। मैं 1965-66 सत्र में पटना विश्वविद्यालय में एम० ए० (दर्शन) की छात्रा थी। उसके काफी वर्षों बाद मैंन साहित्य में एम० ए० (हिन्दी) की उपाधि ली और भाषावैज्ञानिक दृष्टि से माहित्य-अध्ययन पर पी-एच० डी० की । अव जबकि दर्शन और साहित्य के बीच मैंने भाषा के अध्ययन को अपना अध्येय विषय बना लिया है और इसी क्षेत्र मे अपना लेखन-कार्य आरभ किया है, मैं आशा रखती हूँ कि मेरी यह पहली पुस्तक हिन्दी की एक साम्प्रतिक आवश्य- कता की पूर्ति कर सकेगी। हिन्दी मे भाषा-अध्ययन-विषय साहित्य-भंडार को निरंतर भरते रहने वाले कई मूर्धन्य ज्ञाता और विचारक हैं, जो अपनी-अपनी दृष्टि से लगातार हिन्दी की श्री-समृद्धि कर रहे हैं । मैं तो इस क्षेत्र मे बड़े संकोच के साथ प्रवेश कर रही हूं। मेरा इतना-सा संकल्प है कि इस क्षेत्र में जो विषय विद्धानो से लगभग अछता रहा है, और जिस पर विवेचन की अभी अपेक्षा है, मैं वैसे ही विषय को अपना विवेव्य बनाऊँ। यही मेरे लिए परितोप-कारक भी है, विवेचित को पुनविवेचित करने में वह मुख कहां जो किसी नये विषय को पहली बार उपस्थापित करने या उसको व्याख्या करने में प्राप्त होता है । इति नमस्कारान्ते ! (श्रीमती) इन्दु 'शीतांशु', टीचर्स फ्लैट-12, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय परिसर अमृतसर

1. प्रोक्तिः स्वरूप-विवेचन
2. प्रोक्तिः संरचना-विवेचन
3. प्रोक्तिः शैली-अभिलक्षण

क्रमशिका विषय पृष्ठ 5 9 9 9 10 10 12 12 12 0.0 पूर्वा 1.0. प्रोक्ति:स्वरूप-विवेचन 1.1. प्रोक्तिः मूल अंग्रेजी संकल्पना और हिन्दी रूपान्तर 1.2. प्रोक्ति : अर्थ-स्पष्टीकरण 1.3, पाठ और प्रोक्ति : अन्तर और अन्तस्सम्बन्ध 1.3.1 पाठ और प्रोक्ति : अन्तर 1.3.2. पाठ और प्रोक्ति : अन्तस्सम्बन्ध 1.4. प्रोक्ति : सामान्य और साहित्यिक 1.5. प्रोक्ति : परिभापांकन 1.5.1. अंग्रेजी परिभाषाएं 1.5.2. हिन्दी परिभापाए 1.6.प्रोक्ति : स्वरूप-निरूपण 1.7.प्रोक्ति : अनुभाग-रेखांकन 1.7.1. लांगकर-लेविनशन का अनुभाग-रेखांकन 1.7.1.1.प्रवेशक 1.7.1,2. अग्रचरण 1.7.1.3. शीर्ष 1.7.1.3.1. पूर्व शीर्ष-कयांश 1.7.1.3.2. उत्तर शीपं-कयांश 1.7.1.3.3. अन्तर शीप कांश 1.7.1.4. वेष्ठक 1.7.1.5. समापन 15 16 17 18 18 18 18 18 19 19 M 21 1.7.2. सिक्लेयर-कूल्टहार्ड का अनुभाग-रेखांकन 1.7.2.1. कार्य-विवरण 20 1.7.2.2. उक्ति बनाम विनिमय 20 1.7.2.2.1. सुम्पष्ट सीमा-विनिमय 21 1.7.2.2 2. वार्तालापी विनिमय 1.7.2.3. प्रगमन 21 1.72.3.1. सीमान्तक आरम्भक 21 1.7.2.3.2. संकेन्द्रक 21 1.7.2.3.3. उद्घाटक 21 1.7.2.3.4. समर्थक 22 1.7.2 3 5. चुनौतीपरक 24 1.7.2.3.6. बद्ध उद्घाटक 27 1.7.2 3.7. पुन: उद्घाटक 27 1.7.2.4.कार्य 27 1.8.प्रोक्ति: प्रकार-विवेचन 27 1.8.1. प्राचल-आधारित प्रकार 27 1.8.1.1. प्राथमिक प्राचल 28 8.1.1.1. उत्तारकीय प्रोक्ति 28 1.8.1.1.2. प्रक्रियात्मक प्रोक्ति 28 1.8.1.1.3. व्यवहार-मूलक प्रोक्ति 28 1.8.1.1.4. व्याख्यात्मक प्रोक्ति 28 1.8.1.2. द्वितीयक प्राचल 28 1.8.1.2.1. द्वितीयक प्राचल : काल-प्रतिबिम्बन की सक्रियता 28 1.8.1.2.1.1. उत्तारकीय प्रोक्ति 28 1.8.1.2.1.2. व्यावहारिक प्रोक्ति 29 1.8.1.2.1.3. व्याख्यात्मक प्रोक्ति 29 1.8.1.2.2. द्वितीयक प्राचल : तनाव की सक्रियता 29 1.3.1.2.2.1. उतारकीय प्रोक्ति 29 1.8.1.2.2.2. प्रक्रियात्मक प्रोक्ति 29 1.8 1.2.2 3. व्यावहारिक और व्याख्यात्मक प्रोक्ति 29 129 1.8.2.1.संलापमूलक प्रोक्ति 29 1.8.2.1.1. गत्यात्मक संलापमूलक प्रोक्ति 30 1.8.2. वार्तालाप-आधारित प्रकार 1.8.2.1.2. स्थिर संलापमूलक प्रोक्ति 30 1.8.2.2. एकालापमूलक प्रोक्ति 31 1.8.2.2.1. गत्यात्मक एकालापमूलक प्रोक्ति 32 1.8.2 2 2 स्थिर एकालापमलक प्रोक्ति 32 1.8.2.2.3. स्वगत एकालापमूलक प्रोक्ति 33 1.8.3. प्रमुक्ति-निर्धारक पर आधारित प्रकार 33 1.8.3.1. क्षेत्राधारित प्रोक्ति 34 1.8.3.2. विधि-आधारित प्रोक्ति 35 1.8.3.3. दिशाधारित प्रोक्ति 35 1.8.4.प्रकार्य-आधारित प्रकार 36 1.8.4.1. मेलिनोस्की के भाषिक प्रकार्यो र आधारित प्रकार 36 1.8.4.2. काल नुहलर के भाषिक प्रकार्यों पर आधारित प्रकार 36 1.8.4.3. मुकारोस्की के भाषिक प्रकार्यों पर आधारित प्रकार 37 1.8.4.4. रोमन याकोब्सन द्वारा निर्दिष्ट भाषिक प्रकार्यों पर आधारित प्रोक्ति प्रकार 37 1.8.4.5. मातिने द्वारा निर्दिष्ट भाषिक प्रकार्यों पर आधारित प्रकार 37 1.8.4.6. एम० ए० के० हैलिडे द्वारा निर्दिष्ट भाषिक प्रकार्यों पर आधारित प्रकार 38 1.9. कथात्मक प्रोक्ति . प्रकार-विवेचन 40 1.9.1. सेमूर चैटमैन द्वारा निर्दिष्ट कथात्मक प्रोक्ति के प्रकार 41 1.9.2. डोलजेल द्वारा निर्दिष्ट कथात्मक प्रोक्ति के प्रकार 1.9.3. ग्रोमा द्वारा निर्दिष्ट कथात्मक प्रोक्ति-प्रकार 41 1.9.4. जेने द्वारा निर्दिष्ट कथात्मक प्रोक्ति के प्रकार 42 1.9.5. डॉरिट कॉन द्वारा निर्दिष्ट कथात्मकप्रोक्ति के प्रकार 45 1.9.6. ब्लादिमिर प्रॉप द्वारा निर्दिष्ट कयामक प्रकार्यों पर आधारित प्रोक्ति-प्रकार 46 1.9.7. ज्वेतान तोदोरोव द्वारा निर्दिष्ट कथात्मक प्रोक्ति-प्रकार 47 1.10. निष्कर्ष 48 2.0. प्रोक्ति :संरचना-विवेचन 49 2.1.प्रोक्तिः बाह्य बनाम गहन संरचना 49 2.1.1.प्रोक्ति : बाह्य संरचना 49 2.1.1 1. लुइस टी० मिलिक के आधार पर प्रोक्ति को बाह्य संरचना 50 २.1.1.2. लांगेकर और लेविनशन के आधार पर प्रोक्ति की वाह्य संरचना 51 2.1.2. प्रोक्ति : गहन संरचना 59 2.1.2.1. वान डिज्क के आधार पर प्रोक्ति की गहन संरचना 60 2.1.2.2. रोजर फाउलर के आधार पर प्रोक्ति की गहन संरचना 65 2.1.2.3. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव के आधार पर प्रोक्ति की गहन संरचना 75 2.2. निष्कर्ष 79 3.0. प्रोक्ति : शैलीपरक अभिलक्षण 80 3.1. सामान्य प्रोक्ति बनाम विशिष्ट प्रोक्ति 80 3.2. अभिलक्षण 81 3.3. शैली 81 3.4.शैलीपरक अभिलक्षण 82 3.4.1. शैली चिह्नक-अभिलक्षण वर्ग 82 3.4.1.1. शैली चिह्नक : अभिलक्षण और इसके प्रस्तोता 83 3.4.1.2. शैली चिह्नक अभिलक्षणः स्वरूप-स्पष्टीकरण 83 3.4.1.3. प्रोक्ति स्तर : शैली चिह्नक अभिलक्षण 85 3.4.2. अग्रप्रस्तुति-अभिलक्षण वर्ग 87 3.4.2.1. अग्रप्रस्तुति और इसके प्रस्तोता 34.2.2. अग्रप्रस्तुति स्वरूप स्पष्टीकरण 88 3.4.2.3. अग्रप्रस्तुति अभिलक्षण : प्ररूप-स्पष्टीकरण 91 3.4.2.3.1. विचलन 3.4.2.3.2.विपथन 93 3.4.2.3.3. समांतरता 93 3.4.2.3.4. विरलता 94 3.4.2.4. अग्रप्रस्तुति अभिलक्षण-निदर्शन 96 3.4.2.4.1. विचलन का निदर्शन 97 3.4.2.4.2. विपथन का निदर्शन 97 3.4.2.4.3. समांतरता का निदर्शन 98 3.4.2.4.4. विरलता का निदर्शन 101 87 91

101
102
102
103
103
3.5. निष्कर्ष
4.0 प्रोक्तिः विश्लेषण प्रक्रियांकन
4.1. प्रोक्ति विश्पण : स्वरूप-स्पष्टीकरण
4.2. प्रोक्ति-विश्लेषणः घटक-स्पष्टीकरण
4.2 1. निल्ज एरिक एक्विस्ट का घटक-स्पष्टीकरण
4.2.2. मैयेशियस द्वारा प्रवर्तित एवं अनेक भाषा विदों द्वारा
विकसित प्रकार्य-मूलक वाक्य परिप्रेक्ष्यीय घटक स्पष्टीकरण
4.3 प्रोक्ति-विश्लेषण : प्रक्रिया-स्पष्टीकरण
431. सामान्य प्रोक्ति. विश्लेषण-प्रक्रियांकन
4.3.2. साहित्यिक प्रोक्तिः विश्लेपण-प्रक्रियाकन
4.4. निष्कर्ष
5.0. सन्दभिका
6.0. प्रयुक्त हिन्दी-अंग्रेजी पारिभाषिक शब्दावली
7.0.परिशिष्ट
8.0. शुद्धि तालिका
:
104
106
106
110
112
113
119

प्रोक्ति। स्वरूप-विवेचन 1. 1. प्रोक्ति : मूत अंग्रेजी संकल्पना और हिन्दी रूपान्तर: 'प्रोक्ति के मूल अंग्रेजी शब्द 'डिस्कोर्स' (Discourse) और 'अंटरेंस' (Utterance) हैं । 'प्रोक्ति' दोनों का हिन्दी रूपान्तर 'अंटरेंस' 'डिस्कोर्स' (Discourse) की अपेक्षा सामान्य शब्द है, पर 'डिस्कोर्स' पाठ- भाषाविज्ञान का पारिभाषिक है। पिछले वर्षों में पांचवें दशक तक भाषाविज्ञान में भाषा को सर्वोपरि इकाई वाक्य को ही माना जाता था। पर आधुनिक भाषाविदों ने भाषा की सबसे बड़ी इकाई को वाक्य से आगे तक विस्तारित किया, जिसे 'वाक्यातीत' (Beyond Sentence) कहा जाता है । 'प्रोक्ति' इसी स्तर को संकल्पना है। 1. 2. प्रोक्ति : अर्थ-स्पष्टीकरण : प्रोक्ति के दोनो मूल अंग्रेजी शब्दों में 'Discourse' का अर्थ जहाँ एक थोर संदर्भ-विशेष में तार्किक अनुक्रम में 'संलग्न वाक्यों का समुच्यय' है वहाँ दूसरी ओर इसका अर्थ 'वार्तालाप' भी है। किन्तु पहला अर्थ इतना व्यापक है जिसके अन्तर्गत दूसरे अर्थ का सहज समाहार हो जाता है, जबकि दूसरा अर्थ अपेक्षतया कही सीमित है और अपने-आप में एक प्रोक्ति-प्रकार के रूप मे ही .. उपस्थित होने वाला है। अनेक वाक्यों में अभिव्यक्ति पाता है। इसी प्रकार अंग्रेजी 'utterance' शब्द एक ओर सिर्फ 'उच्चार' का अर्थ देता है जबकि दूसरी ओर वह एक 'पूर्ण सांदर्भिक कथन' को व्यक्त करता है । वह सांदर्भिक कथन अपनी पूर्णता में कभी-कभी एक वाक्य में, पर प्रायः अंग्रेजी के उक्त दोनों मूल शब्दों को तथा इनके अर्थ-वैविध्य को देखते हए प्रस्तुत प्रबंध लेखन के संदर्भ में 'प्रोक्ति' के लिए अंग्रेजी "डिस्कोर्स' मूस को ही ग्रहण किया गया है। पाठभाषा-विज्ञान के संदर्भ में 'प्रोक्ति' (Discourse) का वाक्यातीत स्तर का तार्किक अनुक्रम में प्रस्तुत सांदर्भिक कपन' वासा अर्थ ही ग्राह्य एवं अभिप्रेत है।

प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन इस दृष्टि से प्रोक्ति के अर्थ-अभिप्राय को स्पष्ट करते हुए इसे दो विशेष- ताओं से युक्त माना जाता है। इसकी पहली आर्थी विशेषता वाक्यों के रेखीय अनुक्रम में इसके संयोजित होने की है तथा इसकी दूसरी विशेषता तार्किक स्तर पर सभी खंडों को पूर्ण स्वीकार्य रूप में ग्रहण किये जाने की है। 1.3 पाठ और प्रोक्ति : अन्तर और अन्तरसंबंध : 1.3.1. पाठ योर प्रोक्तिः अन्तर : 'पाठ' भाषिक सम्प्रेषण की उन सम्पूर्ण इकाइयो के अध्ययन की मांग करता है, जो समंजस वाक्यीय और अर्थगत संरचनाओ के रूप मे उपस्थित हो तपा जिसे बोला और लिखा जा सके। मोटे तौर पर 'पाठ' को 'प्रोक्ति' के माध्यम के बतौर स्वीकार किया जा सकता है । 'पाठ' वह है जो भाषा-पद्धति को समग्र रूप से अथवा साहित्य के विशेष प्रभाग के रूप मे व्यवहृत भाषा को विवेचित करता है, पर 'प्रोक्ति' वह है, जिसमें भापिक तत्त्व साम्प्रेषणिक प्रभाव के रूप में प्रकार्य करते हैं। प्रायः सभी अतिरिक्त भाषिकीय तत्त्व अभिव्यक्त वाक्यों की संरचना में बड़े व्यवस्थित रूप में प्रतिबिम्बित होते हैं। कहना न होगा कि भाषा के रूप ने उसके प्रोक्ति-प्रकार्यों की अनुक्रिया में विकास किया है जिससे सभी वैयक्तिक क्रियाओं, अन्तर-वैयक्तिक सबंधो और संदर्भ के लिए-जो प्रोक्ति के जरिये मध्यस्थित होते हैं ~ अभिव्यंजना का माध्यम मुहैया किया जा सके। 'प्रोक्ति' की संरचना 'पाठ' की अधिक सीमित संरचना के प्रतिकूल सामाजिक शक्तियों की संरचना के अन्तर्गत, जीवित संस्थितियों में लोगों की एक दूसरे के साथ पारस्परिक क्रिया को सम्पूर्ण जटिल प्रक्रिया को प्रतिबिम्बित करती है। प्रोक्ति के रूप मे सम्प्रेषण और पाठ के रूप में सम्प्रेषण के बीच स्पष्ट अन्तर है। प्रोक्ति वक्ता और श्रोता के बीच के कार्य सम्पादन के रूप में प्रस्तुत होने याला भाषिक सम्प्रेषण है। यह एक अन्तर-वैयक्तिक सक्रियता है, जिसका रूप इसके सामाजिक उद्देश्य के द्वारा निर्धारित होता है, पर पाठ वाचिक या लिखित किसी भी रूप में ऐसा भाषिक सम्प्रेषण है, जिसमें श्रोत या चाक्षप माध्यम से संदेश को कूटबद्ध करने वाला भाषिक सम्प्रेषण होता है। इस प्रकार वाचिक भाषा में पाठ ध्वनि तरंगों का रेषीय ढांचा है और लिखित भाषा में कागज पर वश्यं सकेतो का रेखीय अनुक्रम है, जो जव पढ़ा जाता है तब ध्वनि-तरंगों 1. रोजर फाउलर, निग्विस्टिक किटिसिग्म (न्यूयार्क : ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिट प्रेम, 1986), १० 85-86 2. वही, पृ. 70 प्रोक्ति: स्वरूप, संरचना और शैली का रेखीय ढांचा बन जाता है, पर यह कूटवद्ध ध्वनियों का बेतरतीब अनुक्रम नहीं हैं, इसकी भाषिक गुणवत्ताएं होती हैं, जिन्हे वाक्यीय तथा लेखिमिक रूप में देखा जा सकता है। 1.3.2. प्रोक्ति और पाठ: अन्तरसम्बंध: रोजर फाउलर की मान्यता है कि 'पाठ' को 'प्रोक्ति' के रूप में ग्रहण करना वर्तमान रूप में संघटित भाषा-विज्ञान की क्षमता को खीच कर बड़ा देता है तथा वह हमें भाषा की ऐसी सैद्धांतिकी ओर ले चलता है, जो ऐतिहासिक सामाजिक और आलंकारिक संदर्भ में अपने पूर्ण गत्यात्मक प्रकार्य के साथ उपस्थित होता है । 'प्रोक्ति' को उद्गार अभिव्यक्त करने वाले और 'पाठ' समझने वाले लोगों के बीच को अन्योन्य भाषिक क्रिया की सम्पूर्ण जटिल प्रक्रिया के रूप में रेखां- कित किया जाता है। इसलिए प्रोक्ति के रूप में भाषा का अध्ययन करना ऐसी संरचना के पहलुओं की ओर ध्यान की मांग करता है, जो सम्प्रेषण में प्रति- भागियों से व्यक्त पाठों के जरिये निष्पन्न होने वाली क्रियाओं से और उन संदों से सम्बन्ध जोड़ता है, जिनमें प्रोक्ति संचालित होती है । यदि कोई भाषाविद् अपना ध्यान प्राथमिक तौर पर इस ओर देता है कि कसे कोई साहित्य-अंग भाषा-पद्धति को समझाता है तो यहाँ साहित्य को पाठ' के रूप में स्वीकृत किया जाता है । यदि साहित्य का आलोचक साहित्य मे अन्तहित साभिप्रायता की तलाश करता है, काव्य में अन्तहित अनिवार्य कलागत संदृष्टि को उजागर करता है, तब काव्यकृति को 'सदेश' के बतौर लिया जाता है। पर जब साहित्य के इन दो अभिगमो के बीच तीसरा अभिगम उपस्थित होता है, जो विशेष तौर में यह दर्शाने का प्रयत्न करता है कि कैसे एक भाषिक पाठ के तत्व संदेश देने की प्रक्रिया में संयोजित होते हैं और कैसे साहित्यिक लेखन के अंश सम्प्रेषण के रूप में प्रकार्य करने लगते है तब यही पहलू साहित्य में 'प्रोक्ति' कहलाता है। 1. ज्योफी ऐण्ड लोच और मिखाइल एच. शार्ट, 'द रेटोरिक अब टेक्स्ट', स्टाइल इन फिक्शन (लण्डन : लौंगमैन, 1981, चतुर्ष पुनमुद्रण, 1985), पृ० 209. 2. रोजर फाउलर, लिग्विस्टिक क्रिटिसिज्म (न्यूयार्क : ऑक्सफोर्ड यूनिवसिटी प्रेस, 1986), पृ.6 3. एच. जी. विड्डोसन, स्टायलिस्टक्स ऐण्ड द टीपिंग अब लिटरेचर (लहन : लौंगमैन, 1975), पृ. 6 12 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन 1.4. प्रोक्ति : सामान्य और साहित्यिक : साहित्यिक प्रोक्ति समाज की पारस्परिक क्रिया की सामान्य प्रक्रिया से स्थगन में उपस्थित होती है, जबकि सामान्य प्रोक्ति में प्रेषक गृहीता को प्रत्यक्ष संदेश भेजता है। सामान्य संदेश की तरह साहित्यिक संदेश सामाजिक सक्रियता के सामान्य रूप में उत्पन्न नहीं होता। साहित्यिक प्रोक्ति बिना पूर्व स्थिति के उत्पन्न होती है, और किसी भी अनुक्रिया की अपेक्षा नहीं रखती। वह सामान्य सामाजिक जीवन के व्यापार को प्रोत्साहन देने वाले माध्यम के रूप में प्रस्तुत नहीं होती। साहित्यिक प्रोक्ति सन्निहित कोटि की होती है। एक साहित्यिक प्रोक्ति में कई-कई प्रकार की प्रोक्तियां अन्तहित होती हैं। यहाँ प्रच्छन्न रचनाकार प्रच्छन्न पाठक को संदेश प्रेषित करता है । पर यहां प्रच्छन्न पाठक प्रच्छन्न रचनाकार से बातचीत नहीं कर सकता । इतना ही नही प्रच्छन्न रचनाकार का संदेश साहित्यिक प्रोक्ति मे तत्कालीन स्थितिगत संदर्भ से मुक्त होता है। 1.5. प्रोक्ति : परिभापांकन: प्रोक्ति-विषयक प्राप्त परिभाषाओं को अंग्रेजी और हिन्दी परिभाषा के रूप में वर्गीकृत कर इन पर विचार किया जा सकता है- 1.5.1. अंग्रेजी परिभाषाएं 1.5.2. हिन्दी परिभाषाएं 1.5.1. मंप्रेजी परिभाषाएं : अंग्रेजी में ट्रिम, सपोर्टा, कार्टर, लीच, फाजलर, मीयन, एडवई,ज की परिभाषाओं के हिन्दी रूपान्तर नीचे द्रष्टय्य हैं : 1.5.1.1, 'वाक्यों का कोई भी ठोस अनुकम एक अद्वितीय प्रोक्ति को संघटित फरता है।" 1.5.1.2, वाश्यों के बोध के व्यवस्थित सम्बन्धों पर किसी भी नरन्तर्यमूलक प्रोक्ति-पाठ में विचार किया जा सकता है। 1. वही, पृ. 51. 2. जे. एस. एम. उत, रोजर फाउलर, निग्विस्टिक पिरी ऐण ६ स्टो अब लिटरेचर', एसेज आन स्टाइल ऐड सवित्र, सम्मादक रोजर फाउत्तर (लन्दन : स्टलेज एण्ड कोगेन पास, 1965, पुनर्मुद्रग), पृ. 16 3. सोममपोर्टी, 'ए प्रोग्राम फॉर द रिफिनेगन व मिटरेपर, पूनिवसिटी अर्नस व टेक्गार स्टोन इन इंग्मिग, (अंक-36 1958), १.30 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली 13 1.5.1.3. 'प्रोक्ति एक ऐसा छत्रपद है जो भाषा-संघटना के बहुतेरे पहलुओं को आच्छादित करता है । वाक्य के स्तर से ऊपर के स्तर के संबद्ध पाठ को निर्दिष्ट करने के लिए यह व्यवहृत होता है। यह एक विशिष्ट शैली या विद्या का अर्थ भी दे सकता है। 1.5.1.4. 'प्रोक्ति वक्ता और श्रोता के बीच के कार्य-सम्पादन के रूप में प्रयुक्त भाषिक सम्प्रेषण है। यह एक अन्तर-वैयक्तिक क्रियाशीलता है जिसका रूप इसके सामाजिक उद्देश्य के द्वारा निर्धारित होता है ।"2 1.5.1.5. 'प्रोक्ति भाषा का यह गुण है जो अन्तर-थैयक्तिक शब्दों को मध्यस्थता करता है, जिसे सम्प्रेषण की किसी कला के द्वारा संहित होना चाहिए। 1.5.1.6. 'प्रोक्ति-विश्लेषण एक पद्धति है, जो किसी भी पृथक्-पृथक् पंक्तिबद्ध सामग्री को संयुक्त करने का प्रयास करती है । वह भाषा और भापा- सदृश होती है जो एक से अधिक प्राथमिक वाक्यों को संयुक्त करती है तथा कुछ स्थानिक संरचना को एक पूर्ण प्रोक्ति के रूप में निरूपिन करती है। 1.5.1.7. 'जिस पद्धति में भाषिक तत्त्व समप्रेपणशील प्रभाव के प्रति प्रकार्य करते हैं उसे प्रोक्ति कहते हैं। 1.5.1.8. प्रोक्ति एक ऐसी भाषिक निष्पत्ति है, जो अपने आप में बिना लम्बाई की सीमा का ध्यान रखे एक पूर्ण इकाई के बतौर प्रस्तुत होती है। 1. 'द्रष्टव्य, 'ग्लोसरी',रोनाल्ड कार्टर, लैंग्वेज एण्ड लिटरेचर : ऐन इन्ट्रोडक्टरी रीडर इन स्टायलिस्टिक्स(लण्डन : जार्ज ऐरोन ऐण्ड अनविन, द्वितीय मुद्रण, 1984), पृ. 239 2. ज्योफ्री एन. लीच और मिखाइल एच. शार्ट, स्टाइल इन फिक्शन (लण्डन : लौंगमन, घोथा मुद्रण, 1985), पृ० 209 3. रोजर फाउलर, लिंग्विस्टिक्स ऐंड नोवेल (लण्डन : मैथुइन, द्वितीय मुद्रण, 1979), पृ०52 4. उद्धत, रेमण्ड चैपमैन, "वियोंड द सेंटेंस', लिग्विस्टिक्स ऐण्ड लिटरेचर (लण्डन: :: एडवर्ड आर्नल्ड लिमिटेड, 1973), पृ०101 5. एच. जी.विड्डोसन, स्टाइलिस्टिक्स ऐण्ड द टीचिंग अॅव लिटरेचर(लण्डन : लौंगमन, 1975), पृ० 33 6. रेमण्ड चैपमैन, ग्लासरी ऑफ लिग्विस्टिक्स टर्म ज, लिग्विस्टिक्स ऐन्ड लिटरेचर (लंदन : एडवर्ड आर्नल्ड लिमिटेड, पुनमुद्रण, 1974), पृ0 14 14 प्रोक्ति: स्वरूप विवेचन 1.5.1.9. 'एक प्रोक्ति प्रायः बहुतेरे वाक्यों से बनी एक पूर्ण और आत्म- अन्तविष्ट पाठ है। 1.5.1.10 प्रोक्ति के रूप मे किसी भी कथन-शृंखला को पहचानने की योग्यता परस्परग्रथित रूप में अंशतः भाषिकीय ज्ञान पर और अंशत: उस सम्पूर्ण संदर्भ के अभिज्ञान पर सामने आती है, जिसमें शम्द इसके अन्तर्गत बहुतेरे प्रसंगों के भाग और उसके परिसीमन की रचना करते हैं। 1.5.1.11 संक्षेप मे प्रोक्ति को स्वाभाविक भाषा के ऐसे अभिव्यक्ति प्रकार के बतौर परिभापित किया जा सकता है जो वाक्यों के वैसे अनुक्रम को साकार करता है, जिसमे गुणों को परितुष्ट करने की क्षमता होती है । वाक्यात्मक स्तर पर वाक्यों को अनुपाती व्याकरणा- रमकता की अपेक्षा प्रोक्ति द्वारा अभिव्यंजित वाक्यो के अनुक्रम के पाठात्मक स्वरूप को परिभाषित करने वाली सर्वाधिक सुस्पष्ट विशेपता समंजसता की अर्थीय गुणात्मकता है। 1.5.2. हिन्दी परिभाषाएँ: हिन्दी मे गोस्वामी, भाटिया, श्रीवास्तव, शीतांशु एवं ओमप्रकाश की परिभाषाएँ द्रष्टव्य हैं-- 1.5.2.1. 'प्रोक्ति वाक्योपरि स्तर की एक ऐसी इकाई है, जिसके कथ्य में आंतरिक संसक्ति या संयोजन तथा वाक्यों में संदर्भपरक और तर्कपूर्ण अनुक्रम रहता है । 1.5.2.2. 'अनेक वाक्य मिलकर सर्वाग रूप से जब इकाई रूप बन जाते हैं, तब यह इकाई ही 'वाक्यवन्ध' या 'प्रोक्ति' कहलाती हैं । 1. ए. मार. मीयम (सम्पा.), इन्साइक्लोपीडिया अव लिंग्विस्टिक्स, इनो- मेशन, ऐण्ड कंट्रोल (ऑक्सफोर्ड : पर्गमान प्रेस, 1969), पृ० 654 2. ए. डी. एडवड्ज, लैंग्वेज इन कल्चर ऐण्ड क्लास (लण्डन : हेनिमन एजुकेशनल बुक्स लिमिटेड,1976), पृ. 55 3. टी. ए. पानडिज्क, "सिमेंटिक रिलेशंज इन डिस्कोर्स' स्टडीज इन द प्रेग्मे- टिक्स अव हिस्कोस (द हेग : भूतन, 1981), पृ० 268 4. कृष्णकुमार गोस्वामी, शैक्षिकव्याकरण और व्यावहारिक हिन्दी (दिल्ली। मालेख प्रकाशन, 1981), पृ० 95 5. कैलाश चन्द्र भाटिया, 'प्रोक्ति संरचना', परिषद पत्रिका, सम्मा, श्रीरंजन गरिदेव (पटना : बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् जुलाई 1980), १० 80 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली 15 1.5.2.3. 'प्रोक्ति या पाठ बाक्यों का मान जमघट न होकर उनको संरचना स्मक या दूसरे अर्थ में कहें तो सर्जनात्मक रूपान्तरण होता 1.5.2.4. "एक प्रोक्ति उस अर्थवत्ता और साभिप्रायता को उजागर करती है, को मिखरे हुए पाक्यों में उजागर नहीं हो सकती, शब्दों का एक अनुक्रम, जो एक अस्वीकार्य वाक्य का प्रकटन होता है, एक सम्पूर्ण संरचना में ही स्वीकार्य हो सकता है।" 1.5.2.5. "मापा का मूल प्रकार्य सम्प्रेषणीयता है, पर उसका सम्पादन प्रायः वाक्य द्वारा संभव नहीं है । अतः वाक्य को भाषा की इकाई निश्चित करने या स्वीकार करने में सहज कठिनाई आती है। सम्प्रेषणीयता की इस दृष्टि से वस्तुतः जो, भाषिक व्यापार सम्पादित होता है, उसका स्तर वाक्यातीत हुआ करता है और प्रोक्ति इसी वाक्यातीत स्तर को सार्थक इकाई का नाम है। 1.5 2.6. 'प्रोक्ति वह वाक्योपरि संरचना है, जिसमें वाक्य से आगे फैली ताफिक इकाई समाहित होती है।" 1.6. प्रोक्ति : स्वरूप-निरूपण : प्रोक्ति-विषयक उपर्युक्त परिभाषाओं को देखने से प्रोक्ति की निम्नलिखित स्वरूपगत विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं- 1.6.1. प्रोषित की पहली स्वरूपगत विशेषता उसके एकाधिक या अनेक वाक्यों का समुच्चय होने की है, यद्यपि कभी-कभी एक पूर्ण वाक्य स्वरूपतः प्रोक्ति नही होकर भी प्रकार्यत: प्रोक्ति के बतौर अपनी भूमिका निभा सकता है। जिस तरह कभी-कभी एक शब्द स्वरूपतः वाक्य न होकर भी वाक्य का काम करता है, उसी तरह कभी-कभी एक वाक्य स्वरूपतः प्रोक्ति न होकर भी प्रोक्ति की भूमिका में उपस्थित होता है। 1. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, संरचनात्मक शैलीविज्ञान (दिल्ली :आलेख प्रकाशन 1979), पृ०96 2. पाण्डेय शशिभूपण 'शीतांशु', शैलीविज्ञान : प्रतिमान और विश्लेषण (दिल्ली : देवदार प्रकाशन, 1984), पृ० 65-66 3. पाण्डेय शशिभूषण 'शीताशु', भारती को काव्यभापा (करनाल : नटराज पब्लिशिंग हाऊस, 1985), पृ. 90 4. मोमप्रकाश शर्मा प्रकाश, 'प्रोक्ति संरचना', हिन्दी भाषा प्रयोग के स्तर (दिल्ली : पांडुलिपि प्रकाशन, 1982), पृ. 43 16 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन 1.6.2. प्रोक्ति में वाक्यों का ठोस अनुक्रम होता है । इसे वाक्यों के बीच का व्यवस्थित सम्बन्ध भी कहा जा सकता है। प्रोक्ति केवल वाक्यों का समुच्चय नही होती है, बल्कि ऐसे वाक्यों का समुच्चय होती है, जो वाक्य परस्पर अन्तग्रंथित और अन्तस्सम्बद्ध होते हैं । असम्बद्ध वाक्यों की शृखला को प्रोक्ति नहीं कहा जा सकता है । यहाँ जिस पारस्परिक स्वीकार्यता की बात की जाती है, उसके मूल में ताकिक संसक्ति क्रियाशील होती है । इसी के द्वारा प्रोक्ति की आन्तरिक संरचना तैयार होती है। 1.6.3. प्रोक्ति वाक्यों का ऐसा अनुक्रम होती है, जिसके पाठात्मक स्वरूप में 'संसक्ति के अतिरिक्त 'समंजसता' की अर्थीय गुणात्मकता विद्यमान होती है। 1.6.4. प्रोक्ति की चौथी स्वरूपगत विशेषता वाक्यांश और वाक्य तथा वाक्य और वाक्य को सम्बद्ध करने वाले भाषिक तत्त्वों के रूप में उपस्थित होती है। इसी दृष्टि से प्रोक्ति-आवर्तन, सर्वनाम तथा योगात्मक, विकल्पात्मक विरोधात्मक, कारणात्मक, व्याख्यात्मक निष्कपत्मिक जैसे विभिन्न निपातों से स्वरूपित होती है। प्रोक्ति मे इससे ही अन्विति बनती है तथा तारतम्य आता है। 1.6.5. प्रोक्ति अपने स्वरूप में एक पूर्ण कथन या बयान होती है, जो सदर्भ के अनुरूप आत्मालापी, संलापी या सूचनात्मक-किसी भी प्रकार की हो सकती है । इसे केवल सवादात्मकता की सीमा में बांधा नहीं जा सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रोक्ति में सूचनात्मक संदेश होता है। 1.6.6. प्रोक्ति सम्प्रेषणीयता की दृष्टि से भाषा की ऐसी सार्थक इकाई है, जिसमे ताकिक संसक्ति विद्यमान होती है । यह एक अन्तर-वैयक्तिक भाषिक सम्प्रेषण भी है, जहाँ भाषिक तत्त्वो का प्रकार्य सम्प्रेषणशील प्रभाव तक सक्रिय होता है। 1.6.7. प्रोक्ति भाषा की ऐसी पूर्ण इकाई है जिसकी लम्बाई की सीमा मुक्त होती है। इसकी प्रकृति बहुत लचीली होती है । आकार की दृष्टि से यह दो वाक्यों का भी समुच्चय हो सकती है और एक अनुच्छेद में भी स्वरूपित हो हो सकती है । यही नहीं, पूरी-की-पूरी रचना भी प्रोक्ति के रूप में स्वरूपित होती है, जिसके अन्तर्गत कई छोटी-छोटी प्रोक्तियों का समाहार होता है । 1.6.8. प्रोक्ति का स्वरूप प्रकार्यमूलक (Functional) होता है। इसके आधार पर ही प्रोक्ति के प्रकार्यों की पहचान सम्भव होती है। मुख्यतः प्रोक्ति या तो किसी विचार या संकल्पना को व्यक्त करती है या अन्तः वैयक्तिक सम्बंधों को निरूपित करती है, अथवा किसी पाठ की विषयवस्तु का ज्ञापन करती है। 1.7. प्रोक्ति : मनुभाग-रेखांकन : यद्यपि प्रोक्ति के लिए किसी सपतर या प्रदीर्घतर सीमा का प्रतिबंधम :

प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली 11 नहीं है तथापि किसी प्रदीर्घ प्रोक्ति के सम्यक् अवबोध के लिए प्रोक्ति के अनु- भागों का रेखांकन करना समीचीन है। प्रोक्ति के अनुभाग-रेखांकन पर लांगेकर-लेविनशन और सिक्लेयर-कूल्टहार्ड के महत्त्वपूर्ण विचार प्राप्त होते हैं। 1.7.1. लोगेकर-लेविनशन का अनुभाग-रेखांकन : 1.7.1.1. प्रवेशक (Aperture) 1.7.1.2. अग्रचरण (stage) 1.7.1.3. शीर्ष (Marked Peak) 1.7.1.3.1. पूर्व शीर्ष कथांश (Pre-Peak Episodes) 1.7.1.3.2. उत्तर शीर्ष कथांश (Post-Peak Episodes) 1.7.1.3.3. अन्तर-शीर्ष कथाश (Inter-Peak Episodes) 1.7.1.4. वेष्ठक, (Closure) और 1.7.1.5. समापक (Finis) 1.7.1.1. प्रवेशक: किसी भी प्रोक्ति के सूत्रात्मक मारम्भण को प्रवेशक (Aperture) कहा जाता है । भिन्न-भिन्न प्रकार को प्रोक्तियों में प्रवेशक के भिन्न-भिन्न रूप हो सकते हैं । निम्नलिखित कथात्मक प्रोक्तियां अपने सादृश्य-साचे में प्रवेशक की भूमिका में आयी हैं-- 1.7.1.1. "झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अन्दर बेटे को जवान बीबी बुधिया प्रसव- वेदना से पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज निकल रही थी कि दोनों कलेजा थाम लेते थे।" 1.7.1.2. "शहर के एक ओर तिरस्कृत मकान । दूसरा तल्ला ।वहां चौके में एक स्त्री अंगीठी सामने लिए बैठी हुई है। अंगीठी की आग राख हुई जा रही है। वह जाने क्या सोच रही है।" 1.7.1.3. 'ओ मर कल मुंहे ।' अकस्मात घोषा बुआ ने कूड़ा फेंकने के लिए दरवाजा खोला और चौतरे पर बैठे मिरवा को गाते हुए देखकर कहा- 'तोरे पेट में फोनो-गिराफ उलियान वा का, जोन भिनसार भवा कि तान तोड़े लाग? राम जाने, रात के केसन एकरा दीदा लागत है।' , 1. रॉबर्ट लांगेकर ऐंड स्टीफेन लेविनशन, 'फील्ड एनालिसिस अव डिस्कोर्स' करेंट ट्रेड्ज इन टेक्स्ट लिग्विस्टिक्स, सम्पा० वूल्फगैग यू० हेसलर (बलिन : वाल्टर हो गूटर, 1978), पृ. 104-106 +.

18 प्रोक्तिः स्वरूप-विवेचन ऊपर की तीनों प्रोक्तियां क्रमशःप्रेमचन्द की 'कफन', जैनेन्द्र की पत्नी और धर्मवीर भारती की 'गुलकी बन्नो' कहानी की आरम्भिक प्रोक्तियां हैं । इनमें पहली उत्तारकीय है, दूसरी वर्णनात्मक और तीसरी मुख्यतः संलापात्मक । पर ये तीनों प्रोक्तियां प्रोक्ति-अनुभाग के बतौर 'प्रवेशक' हैं, क्योंकि इन्ही प्रोक्तियों से तीनों कहानियाँ आरम्भ होती हैं। 1.7.1.2.मप्रचरण: किसी भी कथात्मक प्रोक्ति में प्रवेशक अनुभाग के बाद जो प्रोक्ति-अनुभाग उपस्थित होता है, उसे अग्रचरण (Stage) कहा जाता है । किन्तु कतर प्रोक्तियों में प्रोक्ति-अनुभाग के इस दूसरे चरण को परिचय (Introduction) कहते हैं। इस प्रकार कथात्मक और कथेतर प्रोक्तियो मे प्रवेशक के बाद का चरण अग्रचरण और परिचय के बतौर रेखांकित किया जाता है । प्रोक्ति के मुख्य भाग (Body of Discourse) मे कथांश (Episodes) प्राप्त होते हैं, जो कथात्मक प्रोक्ति मे खांचे के बतौर उपस्थित रहते हैं। इनसे अलग व्यवहारपरक तथा व्याख्यात्मक प्रोक्तियों में खांचो के रूप मे बिन्दु (Points) प्राप्त होते हैं, प्रक्रियात्मक प्रोक्ति में क्रिया-विधि (Procedures) होती है और नाटक की सलापात्मक प्रोक्ति मे अंक (Acts) का विधान होता है। 1.7.1.3. शीर्ष यदि प्रोक्ति तनाव से भरी होती है तो उसके विकास में चरम सीमा के दर्शन होते हैं । यह बहिस्तलीय संरचना का रेखांकित शीर्ष (Marked Peak) होता है । कपात्मक प्रोक्ति में यह शीर्ष गहन संरचना के संघर्षपूर्ण अश को रेखांकित करता उसके निर्वहण को भी उपस्थित करता है । निर्वहण उस बिंदु पर उपस्थित होता है, जहाँ निर्णायक घटना कया को शिपिल कर सम्मावित प्रस्तावना प्रस्तुत करती है। कथात्मक प्रोषित का तीसरा अनुभाग शीर्ष का होता है। इसकी तीन कोटिया होती हैं-1.7.3.1. पूर्व शीर्ष-कांश, 1.7.3.2. उत्तर शीर्प-कपाश- और 1.7.3.3. अन्तर शीर्ष-कपांश। फपेतर प्रोक्तियों में जब प्रोक्ति अपनी विकसनशीलता में सोपं तक पहुँचती है, तब उसके प्रकार-भेद से इस शीर्ष का नामकरण किया जाता है। पदि यह प्रक्रियात्मक प्रोक्ति है, तो वहां यह शीर्ष-बिन्दु प्रक्रिया का होता है। यदि यह प्यवहारमूलक प्रोषित है और उसमें भी उपदेशारमा प्रकृति की है तो गोबिन्दु परम प्रयोधन राहोता है और यदि प्रोक्ति प्याथ्यारमक है तो वही गीर्ष बिन्दु परम परितोप प्रत्त का अपवा परम म्याथ्या का होता है। कार निर्दिष्ट प्रारिमा पापों में से प्रापेक पापा या तो एक मनुष्क प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली 19 के द्वारा स्पष्टीकृत होता है अथवा किसी सन्निहित प्रोक्ति के द्वारा समझाया जाता है। पर ऐसा भी नहीं है कि एक सन्निहित प्रोक्ति की बिल्कुल वही संरचना होती है जो एक असन्निहित मुक्त प्रोक्ति नहीं । शीर्ष और बहिस्तलीय सरचना-शीर्ष के रेखांकन के निम्नलिखित मार्ग हैं: (1) इसका पहला मार्ग भाषणशास्त्रीय और आलंकारिक रेखांकन का है, जहाँ अन्वयन और आवर्तन का व्यवहार होता है। (2) इसका दूसरा मार्ग प्रतिभागियों के केन्द्रण का है। वहां अनेक प्रति- भागी इकट्ठे उपस्थित होते हैं । (3) इसके रेखांकन का तीसरा मार्ग काल-अंतरण के द्वारा प्राप्त काष्ठागत तीक्ष्णता का है। ऐसे अंतरण मे अतीत से ऐतिहासिक धर्तमान में किया जाने वाला काल-अन्तरण, पुरुष-अन्तरण-जैसे अन्य पुरुष के उत्तम पुरुप और मध्यम पुरुष में अन्तरण, कथात्मकता से नाटकीय वार्तालाप में अन्तरण अथवा नाद सौंदर्यवाले अनुरणात्मक शब्दों के जरिये उपस्थित होने वाले अंतरण आते हैं। (4) चौथा प्रकार इकाइयों के आकार वैशिष्ट्य के द्वारा गति और वेग को नियंत्रित करने की दृष्टि से संभव होता है अथवा अल्पतम संयोजकों के व्यवहार तथा दूसरे परिवर्तन-संकेतों के द्वारा संभव होता है। 1.7.1.4. वेष्ठक: किसी भी कलात्मक प्रोक्ति में वह अनुभाग वहाँ होता है जहां पूरी कथा- प्रोक्ति के समापन (Finis) के पूर्व प्रोक्ति को उस रूप में वेष्ठित किया जाने लगता है जो रूप उस प्रोक्ति-विशेष के कथ्य के अनुरूप सुनिश्चित होता है। निम्नलिखित कथात्मक प्रोक्तियां वेष्ठक (Closure) अनुभाग का उदाहरण हैं- (1) घीसू ने समझाया- क्यों रोता है बेटा, खुश हो कि वह मायाजाल से मुक्त हो गयी। जंजाल से छूट गयो बड़ी भाग्यवान थी जो इतनी जल्द माया- मोह के बंधन तोड़ दिये। (2) कालिन्दी ने अभ्यासवश जोर से पुकारा- अचार लाना भाई अचार, मानों सुनन्दा कही बहुत दूर हो, पर वह तो बाहर लगी खड़ी ही थी। उसने धुपचाप अचार लाकर रख दिया। जाने लगी तो कालिन्दी ने तनिक स्निग्ध वाणी से कहा-थोड़ा पानी भी लाना। उपर्युक्त दोनों प्रोक्तियां समापन को तुरंत पहले की भूमिका में क्रियाशील हैं, जहां कथात्मकता अब वेष्ठित होने लगी है। 1.7.1.5. समापन: कथात्मक प्रोक्ति का अनुभाग जहां पटाक्षेप होता है, इसे ही अन्तिम समापन अनुभाग कहते हैं।

20 प्रोत: स्वरूप-विवेपन 1.7.2. सिक्लेपर-कूल्टहाई का अनुभाग-रेखांकन : सिकलेपर और फस्टहार्ड द्वारा किया गया प्रोक्ति का अनुभाग-रेयांकन श्रेणीमाप (Rankscale) प्रतिमान पर आधारित है । इन दोनों के अनुसार प्रोक्ति को पार अनुभागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। यपि सिंपलेपर. कूल्टहार्ड ने प्रोक्ति का वह अनुभाग-रेखांकन कक्षा-पाठीय प्रोक्ति के संदर्भ में किया है, तथापि यत्किचित् अभिवधन से किसी भी प्रकार को प्रोक्ति के प्रसंग में उनका यह अनुभाग-रेखांकन सही माना जाएगा। दोनों विवेचकों के द्वारा निदिष्ट प्रोक्ति के पार अनुभाग निम्नलिखित हैं-~~-1.7.2.1. कार्य-विवरण (Transaction), 1.7.2.2. विनिमय (Exchange), 1.7.2.3. प्रगमन (Move), और 1.7.2.4. कार्य (Act) । यही 1.7.2.2. में निर्दिष्ट 'विनिमय' को "उक्ति' (Uterance) की सहवर्ती या विकल्पात्मक स्थिति में स्वीकार कर लेने मात्र से यह अनुभाग-रेखांकन अत्यंत समीचीन बन जाता है। 1.7.2.1. कार्य-विवरण: किसी भी प्रोक्ति में कम-से-कम एक कार्य-विवरण अवश्य होता है जो किसी संदर्भ में उपस्थित होता है। प्रोक्ति के अंतर्गत इसकी संख्या अधिकाधिक भी हो सकती है । इस दृष्टि से इसे प्रोक्ति का मुख्य रचक माना जाता है। कार्य-विवरण सीमात-आरंभक से, संकेन्द्रक से या उद्घाटक प्रगमन से आरम्भ होते हैं। अत: कार्य-विवरण के सीमान्त की पहचान का आधार भी वही होता है, जो प्रगमन के आरम्भ के लिए होता है। कार्यविवरण स्वतः विकल्पा- स्मक सुस्पष्ट सीमा विनिमय से, ऐसे अनिवार्य वार्तालापी विनिमय से बनता है, जिसमें उद्धाटक प्रगमन प्रवर्तक के रूप में हो। यह वैसे क्रमहीन वार्तालापी विनिमय से बनता है, जिसमे बद्ध उद्घाटक, पुन: उद्घाटक और धुनौतीपरक उसके प्रवर्तक के रूप में उपस्थित हो। 1.7.2.2. उक्ति बनाम विनिमय : किसी भी प्रोक्ति के अन्तर्गत उक्ति (utterance) और विनिमय (Exchange) दोनों का संयोग संभव है । उक्ति में एक वक्ता का योगदान होता हैं, जबकि 'विनिमय' के लिए दो वक्ताओं-~-वक्ता-धोता और श्रोता वक्ता का योगदान अपेक्षित होता है। 1. जे० मका सिक्लेयर और आर०एम० कुल्टहार्ड, आईज ऐन एनालिसिस अव डिस्कोर्स : द इंगलिश पूज्ड बाई टीचर्स ऐंड प्यूपिल्स (लंडन : ऑक्सफोर्ड यूनियसिटी प्रेस, 1975), पृ० 21 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली बटन ने दो प्रकार के विनिमयों का उल्लेख किया है- 1.7.2.2.1. सुस्पष्ट सीमा-विनिमय। 1.7.2.2. वार्तालापी विनिमय । 1.7.2.3.प्रगमन: प्रोक्ति में उक्ति से लघुतर इकाई को 'प्रगमन' कहा जाता है। एक उक्ति में कई 'प्रगमन' संभव है । उदाहरण के लिए कक्षा अध्यापन के क्रम में उपस्थित निम्नलिखित प्रोक्ति को देखा जा सकता है- 'पेरिस, ठीक है।' 'और सुधा, स्वीडेन की राजधानी' ? इस उदाहरण में अध्यापक की उक्ति के दो भाग हैं। पहले भाग में उत्तर सही होने का उल्लेख है, और दूसरे भाग में दूसरे से किया गया ताजा प्रश्न है। इन दोनों को दो 'प्रगमन' के रूप मे रेखांकित किया जाएगा। 'प्रगमन' के सात प्रकार निर्दिष्ट किये गये हैं---1.7.2.3.1. सीमांतक मारम्भक (Framing), 1.7.2.3.2. संकेन्द्रक (Focusing), 1.7.2.3.3 उद्घाटक (opening), 1.7.2.3.4. समर्थक (Supporting), 1.7.2.3.5. चुनौती परक(Challenging).1.7.2.3.6. बद्ध उद्घाटक(Boundopening) और 1.7.2.3.7. पुनः उद्घाटक (Re-Opening) । 1.7.2.3.1. सीमांतक भारंभक: यह प्रायः शीर्ष (Head) से बनता है, जो या तो रेखांकक (Marker) होता है या एक आह्वान (Summon) होता है और विशेपक (Qualifier) के बतौर मौन दबाव डालता है । यह कार्य विवरण के सीमांत का सुस्पष्ट रेखांकक होता है और ऐसे कार्य (Act) को समाविष्ट करता है, जो अपने-आप में ध्यान खीचने वाले पूर्व प्रतिपाद्य (Pre-theme) एकक होते हैं। 1.7.2.3.2. संकेन्द्रक: संकेन्द्रक अपने अंतर्गत विकल्पात्मक संकेत को समाविष्ट करता है। विकल्पात्मक पूर्वशीर्ष (आरंभिक) अनिवार्य शीर्ष (अधिबयान या निष्कर्ष) और विकल्पात्मक उत्तरशीपं (टिप्पणी) के द्वारा अनुसरित होता है। 'सीमांतक- आरंभक' की तरह संकेन्द्रक' भी कार्य विवरण के सीमांत का सुस्पष्ट रेखांकक होता है तथा ध्यानाकर्षी पूर्वप्रतिपाद्य एकक को अपने में समाविष्ट करता है। 1.7.2.3.3. उद्घाटक: 'उद्घाटक 'कार्यविवरण के आरंभ पर आधारित होते हैं । इसमें पहचान 22 प्रोक्ति :स्वरूप-विवेचन के आधार वे ही होते हैं, जो कार्य-विवरण के सीमांत के होते हैं, पर वहाँ 'सीमांतक-आरंभक' और 'संकेन्द्रक' कियान्वित नहीं होते हैं। यहां केवल सूचनात्मक, निर्देशात्मक और उत्पादक सामने आते हैं। तात्कालिक 'उक्ति' के प्रति इसका कोई अधिवृत्तिपरक संदर्भन भी उपस्थित नहीं होता है । हाँ, यहाँ पहले प्रस्तुत होने वाली 'उक्ति' को 'कार्य-विवरण' की निष्कर्षात्मक 'उक्ति' के बतौर भी देखा जाता है। कभी-कभी आंकड़ों की आन्तरिक समस्याएं भी उपस्थित होती हैं, जहां नये 'कार्य-विवरण' की पहचान की जाती है । पर यहाँ किसी दूसरे वस्ता द्वारा व्यक्त अगली उक्ति कुछ ऐसा जोड़ देती है, जिसे सामान्य तौर पर पहले प्रस्तुत कार्यविवरणारम्भ को 'उक्ति' द्वारा बन्द किये गये कार्यविवरण की उक्ति के बतौर जाना जा सकता है। जहाँ ऐसा घटित होता है वहीं समापन और आरम्भक के परस्पराच्छादन के उदाहरण प्राप्त होते हैं, न कि नये कार्य-विवरण का अनुक्रमण प्राप्त होता है । उद्घाटक प्रगमन अनिवार्य तौर पर प्रतिपाद्य को ले चलने वाले एकक के बतौर उपस्थित होते हैं, जिनकी पहचान तत्काल आगे बढ़ने वाली बातचीत में 'नूतन' के बतौर की जाती है। वहाँ के कार्यविवरणरम्भ से आरम्भ नहीं होते। वे सीधे तौर पर 'सीमांतक-आरंभक या 'संकेन्द्रक' का अनुगमन करते हैं। यहां इनका व्यवहार सहप्रतिभागी का ध्यान खीचने के लिए अथवा यह घोपित करने के लिए किया जाता है कि एक नया विषय उपस्थित होने वाला है। - 1.7.2. 3. 4. समर्थक: समर्थक प्रगमन प्रगमन (Move) के अन्य प्रकारों के बाद उपस्थित होता है। प्राय, आंकड़ों के आधार पर यह पाया गया है कि इस प्रगमन की श्रृंखलाएं बनती हैं। अनिवार्य तौर पर समर्थक को धारणा उन एककों को समाविष्ट करती है जो समर्थन करने वाले भारंभिक प्रगमन को सहयोग देती है। माशय यह कि इन शृंखलाओं में प्रत्येक समर्थक प्रगमन को पोछे आये अन्य छह प्रकार के प्रगमन के साथ सम्बद्ध किया जा सकता है। इस रूप में एक समर्थक प्रगमन तथ्यतः दूसरे समर्थक प्रगमन का जहाँ अनुगमन करता है, वहाँ प्रकार्य के बतौर यह पहले आ चुके किसी आरंभिक प्रगमन का ही समर्थन करता है। ध्यातव्य है कि समर्षक प्रगमन की पहचान वस्तुतः प्रोक्ति-सांचे की अवधारणा पर निर्भर होती है। 1.7.2.3.4.1 प्रोक्ति-सांचा: प्रोक्ति-सांचा विनिमय के प्रारंभिक प्रगमन में सुनिश्चित पूर्वानुमान से संबंध 'रयता है। यहां प्रगमन में समर्थक को छोड़कर अन्य कोई भी प्रगमन लिपा गा प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली सकता है । अन्योन्य क्रिया की कोई भी प्रत्याशा उस प्रगमन पर निर्भर होती है। प्रोक्ति-सांचा, जो किसी आरम्भिक प्रगमन के द्वारा संगठिन होता है, के दो पहलू . होते हैं । इसे डिअड़े बर्टन ने हैलीडे का अनुसरण करते हुए दो रूपों में निर्दिष्ट किया है।-1.7.2.3.4.1 1. विचारात्मक और पाठगत्मक (IDeational) और 1.7.2.3.4.1.2. अन्तर-वैयक्तिक (Inter Personal). 1.7.2.3.4.1.1. विचारात्मक और पाहात्मक पहलू : विचारात्मक और पाशात्मक पहल को शब्द-अक्षीय रूप में परिभापित किया जाता है । इसे किसी भी आरम्भिक प्रगमन के विषय-घटक मे व्यवहृत शाब्दिक-एककों में पुनः प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रगमन-निर्भर प्रोक्ति का सांचा उन सारे एककों को समाविष्ट करता है जिन्हें प्रगमन के साथ संसक्त रूप में समवजित किया जा सकता है । हैलीडे और हसन के अनुरूप ये एकक स्थानापन्न, अध्याहार, सहयोजन और शान्दिक संसक्ति के एकक हैं। 1.7.2.3.4.1.2. अन्तर-वैयक्तिक पहलू : अन्तर-वैयक्तिकता का पहलू अन्तर-निर्भर या पारस्परिक विनिमय के कार्यों से सम्बन्ध रखता है । यहाँ कुछ आरंभिक कार्य कुछ अनुक्रियात्मक कार्य के लिए प्रत्याशाओं को संघटित करते हैं। यहां प्रोक्ति-सांचा पूर्व विषय के अनुरूप व्यवहृत कार्यों से अलग रूप मे पुनः प्राप्त किया जा सकता है । उसी तरह से विषय-संवाही प्रगमन मे व्यवहृत कार्यों से भी अलग रूप में प्राप्त किया जा सकता है । यहाँ पूर्व विषय में व्यवहृत कार्यों से कार्य विवरण के विकल्पात्मक भारम्भिक प्रगमन-सीमांतक-आरंभक और संकेन्द्रक~का आग्रहण अभीष्ट है । उसी तरह विषय-संवाही प्रगमनों मे व्यवहृत कार्यों से कार्य-विवरण के अनिवार्य आरंभिक प्रगमन और अनुगत-पुनः उद्घाटक, बद्ध उद्घाटक और चुनौतीपरक --का आग्रहण अभीष्ट है । पूर्व के कार्य (Acts) अपने-आप में निम्नलिखित का समावेश करते हैं। -(1)रेखांकक (Markers).(2) आह्वान (Summons) और (3) अधिवमान (Meta Statements)। विषय के संवाहक कार्य निम्नलिखित को अपने-आप मे समाविष्ट करते । 1. सूचनारमक (Informatives) 2. प्रकाशात्मक (Elicitatious) 1. डिअड़े बर्टन, हायलाग ऐंड डिस्कोर्स (लंडन : रुटलेज एंड कोगेन पॉल, 11984, पेपर बैक, 1984), १० 149 .

24 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन 3. निर्देशात्मक (Directives) 4. आरोपक (Accusations) यदि इन भारम्भिक कार्यों में समुचित और प्रत्याशित द्वितीय युग्म भागों को जोड़ दिया जाये तो प्रोक्ति-सांचे का अन्तर-वैयक्तिक पहलू निम्नलिखित रूप में उपस्थित होगा- 1. रेखांकक (Marker)-पावती अवघानन (Acknowledge) अनुकूल और अविरोधी-मान-सहित । 2. आह्वान (Summous) --स्वीकृति (Acceptance) 3. अधिबयान (Metastatement)-स्वीकृति (Acceptance) 4. सूचनात्मक (Informative) -पावती (Acknowledgement) 5. प्रकाशन (Elicitation) -उत्तर (Reply) 6. निर्देशात्मक (Directive) -प्रतिक्रिया (Reaction) 7. आरोप (Accuse) -क्षमा (Excuse) प्रोक्ति सांचे को उक्त धारणा के अनुरूप समर्थक प्रगमन वह प्रगमन है जो पूर्ववर्ती आरम्भिक प्रगमन के द्वारा संघटित सांचे को समर्थित करता है । यदि वक्ता 'अ' सांचे को संघटित करता है और वक्ता 'ब' इसे समथित करता है तो वक्ता 'अ' भी इसे समथित कर सकता है । इसके मूल में सामान्यतः यह विचार निहित है कि आकस्मिक बातचीत मे वक्ता पूर्व वक्ता की अपेक्षा पूर्व पाठांश को समथित कर सकता है। I.7.2.3.5. चुनौतीपरक : जहाँ समर्थक प्रगमन पूर्व उक्ति में उपस्थित विषय को आगे बढ़ाने का कार्य करता है अथवा किसी पूर्व उक्ति में अन्तहित विषय के योगदान को आगे बढ़ाता है वहाँ आपत्तिकारी प्रगमन किसी-न-किसी रूप मे विषय-प्रवेश अथवा विषय को प्रगति को रोकने का कार्य करता है । ऐसी प्रोक्तियां किसी भी प्रगमन के बाद उपस्थित हो सकती हैं। अपवाद वहाँ होता है जहाँ कोई द्विपक्षीय वार्ता किसी समर्थक प्रगमन से अनुसरित हो रही है। आपत्तिकारी प्रगमन के विभिन्न प्रकार हैं, जिनकी पहचान तीन विभिन्न अवधारणाओं पर निर्भर है- 1.7.2.3.5.1. प्रोक्ति-सांचे को पूर्वोल्लिखित धारणा, 1.7.2.3.5.2. प्रोक्ति-विषय के चरणों को धारणा जो कीनन और शीफलीन के द्वारा उपस्थित की गयी है, और 1.7.2.3.5.3. लेदाय के द्वारा सुझाया गया किसी क्रिया के लिए आग्रह के बतौर किसी उक्ति के हेतु आवश्यक पूर्व शर्तों का विस्तार ।

प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली 30025 । 1.7.2.3.5.1. चुनौतीपरक प्रगमन और प्रोक्ति-सांचा: एक सरल प्रकार का चुनौतीपरक प्रगमन किसी प्रत्याशित और उपयुक्त पारस्परिक कार्य को रोकने से उत्पन्न होता है । ऐमे कार्य की प्रत्याशा पूर्ववर्ती आरम्भिक प्रगमन में ही संघटित हो सकती है । इस प्रकार किसी प्रकाशन के बाद उत्तर की अनुपस्थिति वक्ता के अधिकार के लिए किये गये आग्रह के अथि- बयान की स्वीकृति चुनौती बनकर सामने आती है। इसी तरह धुनौतीपरक प्रगमन अप्रत्याशित और असमीचीन कार्य के मुहैया किये जाने से भी उभरता है, जहां दूसरे के लिए प्रत्याशा पहले से सघटित रहती है । उदाहरण के लिए प्रगमन किसी ऐसे रेखांकक को पेश करने के जरिये उभरता है, जहाँ प्रतिक्रिया समीचीन रूप में निर्दिष्ट होती है । इसके सर्वातिशायी छोर पर व्यवस्था के द्वारा यह चुनौती आगे बढ़ती है और नये कार्य-विवरण का उद्घाटन करती है। यद्यपि बटंग ने स्मृति-विषयक चुनौती को लेते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि यह अनिवार्य तौर पर विरोधिता को दर्शाये यह आवश्यक नहीं है, क्योंकि कोई भी चुनौतीपरक प्रगमन जारी वार्ता को सौहार्दपूर्ण रूप में मोड़ सकता है। 1.7.2.3.5.2. चुनौतीपरक प्रगमन और प्रोक्ति-विषय के चरण : कोनन और शीफ्लीन ने प्रोक्ति-अवधारणा के विषय पर अपना महत्त्वपूर्ण आलेख प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट किया है कि वक्ता की ओर से श्रोता को विषय की सुस्पष्ट जानकारी देने के लिए निम्नलिखित चार चरणों की अपेक्षा होती है। (1) वक्ता को श्रोता का ध्यान निश्चित करना चाहिए। (2) वक्ता को स्पष्ट तौर पर साफ-साफ उच्चारण करना चाहिए । (3) श्रोता के लिए वक्ता को प्रभूत सूचनाएं मुहैया करनी चाहिए, जिससे वस्तु, व्यक्ति और विचारधारा को जो प्रोक्ति विषय में अन्तभुक्त हैं, उसकी पहचान की जा सके। (4) वक्ता को थोता के लिए प्रभूत सूचना मुहैया करनी चाहिए, जिससे प्रोक्ति-विषय में संकेतकों के बीच उपलब्ध अर्थीय संबन्धों को पुनर्निर्मित किया जा सके। चुनौतीपरक प्रगमनो के रूप में पुनः सूत्रबद्ध करने के लिए श्रोता ऊपर निर्दिष्ट स्थिति में निम्नलिखित चार प्रकार की चुनौतियों में से कोई एक धुनौती पेश कर सकता है। चाहे वह विरोध में हो या उसकी समर्थ ग्रहण- शोलता के कारण हो- (1) वह ध्यान देने से इन्कार कर सकता है । (2) वह उक्ति के बावर्तन के लिए पुनः आग्रह कर सकता है। (3) वह प्रोक्ति-विषय मे समाविष्ट वस्तुओं, व्यक्तियों और विचारों की 26 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन पहचान के विषय मे सूचना का स्पष्टीकरण मांग सकता है । वह प्रोक्ति-विषय मे संकेतको के वीच उपलब्ध अर्षीय सम्बंधो से जुड़ी अधिकाधिक सूचनाओं की मांग कर सकता है। 1.7.2.3.5.3. चुनौतीपरक प्रगमन और लेबाव के नियंचन-विषयक नियमः लेबाव ने अपने अन्यतम रूप मे निर्वचन के उपयोगी नियमों में कथित' और 'कृत' को जोडते हुए प्रोक्ति के निवंचन के सम्बध में कार्याग्रह के बतौर एक सामान्य नियम पेश किया है- यदि 'अ' 'ब' से 'क्ष' कार्य सम्पन्न करने के लिए 'ज्ञ' समय पर निवेदन करता है, तो 'अ' को उक्ति तभी एक मान्य निर्देश के रूप में उपस्थित होगी, यदि निम्नलिखित शत पूरी होती हैं-'' विश्वास करता है कि 'अ' विश्वास करता है कि यह 'अ'-'ब' का विषय है कि (1) 'क्ष' को 'न' उद्देश्य के लिए सम्पन्न किया जाना चाहिए । (2) 'ब' में 'क्ष' को सम्पन्न करने की योग्यता है । (3) 'ब' को 'क्ष' सम्पन्न करने की बाध्यता है । (4) 'अ' को 'क्ष' सम्पन्न करने के लिए 'व' को कहने का अधिकार है । डिअड़े बर्टन ने उक्त चार के अतिरिक्त कुछ और पूर्व शर्तों की उक्ति को मान्य सूचनात्मक या मान्य प्रकाशात्मक के रूप मे सुनने के लिए प्रस्तावित किया है-यदि 'अ' 'ब' को 'ड' सूचना का एक अंश सूचित करता है तो 'अ' की उक्ति तभी मान्य सूचनात्मक रूप मे सुनी जायेगी यदि निम्नलिखित पूर्व शतें पूरी होंगी : 'व' विश्वास करता है कि 'अ' विश्वास करता है कि 'अ'-'ब' का विषय है कि- (5) 'अ' 'ब' को 'ड' सूचना देने की स्थिति में है। (6) 'ड' सूचना का एक युक्तियुक्त भाग है । (7) 'ध' 'ड' सूचना को नहीं जानता है । (8) 'ब' 'ड' सूचना में रुचि रखता है। (9) 'ब' 'ङ' सूचना के द्वारा न तो रुष्ट किया गया है न ही अपमानित । यदि 'अ' 'ब' से 'अ' प्रश्न के विषय में 'ब' की भापिक अनुक्रिया के विषय मे पूछता है तो यह तभी मान्य प्रकाशन समझा जायेगा यदि यह निम्नलिखित पूर्व शत पूरी करता है-'अ' विश्वास करता है, कि 'ब' विश्वास करता है है कि यह 'अ'-'ब' का विषय है कि- (10) कि 'ब' 'अ' प्रश्न को ममीचीन प्रश्न के रूप मे सुनता है। (11) 'अ'' को नही जानता है। (12) यह सम्भव है कि 'ब' '' को जानता है । (13) यह ऐसा मामला है कि 'अ' को 'न' प्रश्न कहा जा सकता है ।

गोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली 27 (14) यह ऐसा मामला है कि 'ग' को 'अ' को कहे जाने मे 'ब' को कोई आपत्ति नहीं है। 1.7.2.3.6. बद्ध उद्घाटक : बद्ध उद्घाटक-प्रगमन पहले आये उद्घाटक के बाद आता है तथा उसके द्वारा समर्थित होता है । यह विशेष रूप मे प्रोक्ति-सांचे को मूल उद्घाटक-प्रगमन के विचारात्मक पाठात्मक पहलू को विस्तारित करते हुए और वार्ता में उपस्थित सूचनात्मक और टिप्पणात्मक कार्यों के विविध प्रकारो को अनुप्रयुक्त करते हुए बढ़ा देता है। 1.7.2.3.7. पुन : उद्घाटक : पुनः उद्घाटक-प्रगमन पूर्व उद्घाटक के बाद उपस्थित होता है । बद्ध उद्घाटक या पुनः उद्घाटक को चुनौती प्राप्त होती है। वे विषय को पुनः प्रति- प्ठित करते हैं जिससे कि चुनौती या तो मुड़ जाती है या विलम्बित हो जाती है। 1.7.2.4. कार्य: 'कार्य' को प्रोक्ति की न्यूनतम इकाई माना जाता है । इसकी तुलना में प्रगमन न्यूनतम मुक्त अन्तर-सक्रिय इकाई है, जो किसी एक कार्य के द्वारा क्रियान्वित होता है । पर कार्य इसके विपरीत अनिवार्य रूप मे बद्ध इकाई है। सिक्लेयर-कूल्टहार्ड ने 22 प्रकार के विभिन्न कार्यों की एक तालिका ही प्रस्तुत कर दी है। 18 प्रोक्ति :प्रकार-विवेचन : प्रोक्ति का प्रकार-निर्देश कई आधारों पर किया जा सकता है। इनमें निम्नलिखित आधार महत्त्वपूर्ण हैं । 1.8.1. प्रावल-आधारित प्रकार 1.8.2. वार्तालाप-आधारित प्रकार 18.2. प्रयुक्ति-आधारित प्रकार 1.8.4. प्रकार्य-आधारित प्रकार 1.81, प्राचल-आधारित प्रकार: इसके अंतर्गत प्रोक्ति के विभिन्न प्रकारों को दो प्राचलों के आधार पर निर्दिष्ट-विवेचित किया जाता है । पहले प्रकार के प्रावल को प्राथमिक प्राचल और दूसरे प्रकार के प्रापल को द्वितीयक प्राचल कहते हैं।' 1. रॉबर्ट लांगेकर और स्टीफेन लेविनशन, 'फोल्ड एनालिसिस अव डिस्कोस', करेंट ट्रेंड्ज इन टेक्स्ट लिग्विस्टिक्स (न्यूयार्क : वाल्टर. डी. गूटर, 1978), पृ. 103-104 28 प्रोक्ति: स्वरूप-विवेचन प्राथमिक प्राचल के अन्तर्गत प्रकार काल-क्रमागत-संयोजन और प्रकर्ता- अभिविन्यास पर निर्भर होता है, पर द्वितीयक प्राचल के अन्तर्गत यह प्रति- विम्बित-काल और तनाव पर निर्भर होता है। 1.8.1.1. प्राथमिक प्राचल के संयोजन से चार प्रकार की प्रोक्तियों का स्वरूप उभरता है: 1.8.1.1.1. उत्तारकीय प्रोक्ति : यह प्रोक्ति-काल-क्रमागत सयोजन और प्रकर्ता-उपस्थिति-दोनो की विधेयात्मकता में उभरती है। 1.8.1.1.2. प्रक्रियात्मक प्रोक्ति: इसमें काल-क्रमागत संयोजन को विधेयात्मकता तो होती है, किन्तु प्रकर्ता- अवस्थिति ऋणात्मक होती है । 1.8.1.1.3. घ्यवहारमूलक प्रोक्ति : यह एक ऐसा प्रोक्ति-प्रकार है जिसके अनेक उपभेद प्राप्त होते हैं । इसमें काल-क्रमागत संयोजन तो ऋणात्मक होता है, किन्तु प्रकर्ता-अवस्थिति धनात्मक होती है। 1.8.1.1.4. व्याख्यात्मक प्रोक्ति: इस प्रोक्ति में काल-क्रमागत संयोजन ऋणात्मक होता है, साथ ही प्रकर्ता- अवस्थिति भी ऋणात्मक होती है। ऐसा माना जाता है कि जहां कही भी ऋणात्मक कालक्रमी संयोजन निर्दिष्ट होता है वहाँ इसे अवधारणात्मक सयोजन से प्रोक्ति-प्रकार्य में अन्तरित किया जाता है। प्रोक्ति चाहे कालक्रमी हो या अवधारणात्मक-ताकिक, प्रत्येक प्रोक्ति मे संसक्ति के अपने सिद्धान्त होते हैं। 1.8.1.2. द्वितीयक प्राचल : इसके अन्तर्गत प्रोक्ति-प्रकारों की सघटना के मूल मे काल-प्रतिविम्बन और तनाव दोनों क्रियाशील होते हैं। 1.8.12.1. द्वितीयक प्राचल:काल-प्रतिविम्बन को सक्रियता: 1.8.1.2.1.1. उत्तारकीय प्रोक्ति: इस प्राचल के अन्तर्गत जय काल-प्रतिविम्बन सक्रिय होता है तब उतारकीय प्रोविन के अन्तर्गत सामान्य कहानी और भविष्यवाणी की प्रोक्ति के प्रमशः ऋणात्मक काल-प्रतिविम्बन और धनात्मक दाल-प्रतिविम्यन जैसे दो रूप सामने माते है। इसी प्रकार प्रक्रियात्मक प्रोक्ति में सामान्य प्रक्रियात्मक पाठ काल- प्रतिविम्बन की धनारमकता से जुड़ा होता है । यहाँ अतीत के रीति-रिवाजों के प्रोविज्ञ: स्वरूप, संरचना और शैली 29 विवरण की प्रोक्ति-प्रक्रियात्मकता को ऋणात्मक काल-प्रतिबिम्बन में रेखांकित किया जाता है। 1.8.1.2.1.2. व्यावहारिक-प्रोक्ति : इसमे उपदेशात्मक प्रोक्ति काल-प्रतिविम्बन की धनात्मकता से जुड़ी होती है। 1.8.1.2.1.3. व्याख्यात्मक प्रोक्ति : इसमें काल-प्रतिबिम्बन का महत्त्व नहीं होता है, किन्तु व्याख्यात्मक प्रोक्ति के कई ऐसे रूप हैं, जो घटना के भविष्यचरण का निर्देश देते हैं । ऐसे बहिर्वेशन (Extra Polation) स्पष्ट तौर पर काल प्रतिबिम्बन की धनात्मकता से जुड़े होते हैं। 1.8.1.2.2. द्वितीयक प्राचल : तनाव को सक्रियता: 1.8.1.2.2,1. उत्तारकीय प्रोक्ति: द्वितीयक प्राचल के अन्तर्गत जब तनाव सक्रिय होता है सब उत्तारकीय प्रोक्ति पूरी तरह उपाख्यानात्मक रूप में सामने आती है। यदि यह अनिवार्य तौर पर किसी संघर्ष या कथानक का संवह्न नही करती है, तो ऐसी प्रोक्ति तनावरहित होती है। यहाँ तनाव के साथ उसका सम्बन्ध ऋणात्मक होता है। 1.8.1.2.2.2. प्रक्रियात्मक प्रोषित : कुछ प्रोक्तियां रूटीनी हैं, जो कि कुछ संघर्षों और विकल्पों को अन्तभुक्त करती हैं। यहां उनके साथ तनाव का सम्बन्ध धनात्मक होता है । 18.1.2.2.3. व्यावहारिक और व्याख्यात्मक प्रोक्ति : इन प्रोक्तियों की इतनी विविधताए हैं जिनमें तर्क-वितर्क और वाद-विवाद तक गृहीत हो जाते हैं। अतः ऐसी प्रोक्तियों के साथ भी तनाव का धनात्मक सम्बन्ध पाया जाता है। 1.8.2. वार्तालाप-आधारित प्रकार: वार्तालाप के आधार पर प्रोक्ति के दो प्रकार होते हैं : 1.8.2.1. संलापमूलक प्रोक्ति, और 1.8.2.2. एकालाप मूलक प्रोक्ति । 1.8.2.1. संलापमूलक प्रोक्ति : संलाप में वक्ता और श्रोता दोनों का होना अपेक्षित है। इनके बीच में उक्ति के आदान-प्रदान से प्रोक्ति बनती है। उक्ति के आदान-प्रदान का अर्थ है कि यस्ता क्रमशः श्रोता की भूमिका में तथा श्रोता क्रमशः वक्ता की भूमिका में 30 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन .. आता रहता है। संलापमूलक प्रोक्ति के लिए आवश्यक है कि प्रोक्ति जिस आधार- भाषा में व्यापारित हो रही है, वह आधार-भापा श्रोता और वक्ता दोनों को ही आती हो । संलापमूलक प्रोक्ति के दो भेद होते हैं- 1.8.2 1.1. गत्यात्मक संलापमूलक प्रोक्ति, और 1.8.2.1.2. स्थिर संलापमूलक प्रोक्ति । 1.8.2.1.1. गत्यात्मक संलापमूलक प्रोक्ति : इसमे गतिशीलता वक्ता और श्रोता की भूमिका को निरन्तर बदलती चलती है। एक की प्रोक्ति दूसरे के लिए उद्दीपन बनती जाती है जिस पर पुनः-पुनः अनुक्रिया प्रकट होती रहती है । इस प्रकार गत्यात्मकता क्रियाशील होती जाती है । उदाहरण के लिए निम्नलिखित प्रोक्ति को लिया जा सकता है । स्त्री : वैसे हजार बार कहोगे कि लड़के की नौकरी के लिए किसी से बात क्यो नहीं करती और जब मैं मौका निकालती हूँ उसके लिए तो"" पुरुष एक : हाँक सिंघानिया तो लगवा ही देना जरूर । इसीलिए वेचारा आता है यहाँ चलकर। स्त्री : शुक्र नहीं मनाते कि एक इतना बड़ा आदमी सिर्फ एक बार कहने भर से। पुरुप एक : मैं नही शुक्र मानता ? जब-जब किसी नये आदमी का आना-जाना शुरू होता है यहाँ, मैं हमेशा शुक्र मनाता हूँ। पहले जगमोहन आया करता था। फिर मनोज आने लगा था। स्त्री : और क्या-क्या बात रह गई है कहने को वाकी? वह भी कह डालो जल्दी से । 1.8.2.1.2. स्थिर संलाप मूलक प्रोक्ति : इस प्रकार की प्रोक्ति की विशेषता यह है कि वक्ता अपनी प्रोक्ति तो निवेदित करता है, किन्तु श्रोता उसकी प्रतिक्रिया में वक्ता की भूमिका में उपस्थित नहीं हो पाता है। स्थिर संलापमूलक प्रोक्ति के पुनः दो उपभेद होते हैं, जिन्हें क्रमशः 1.8.2.1.2.1. द्ववाभिमुखी स्थिर संलापमूलक प्रोक्ति और 1.8.2.1.2.2. एकाभिमुखी स्थिर संलापमूलक प्रोक्ति कहते हैं । 1.8.2.1.2.1 द्वयाभिमुखी स्थिर संलापमूलक प्रोपित : इस प्रकार की प्रोक्ति में वक्ता तो सक्रिय रहता है, किन्तु प्रोता वक्ता की भूमिका में नहीं पाता है। हाँ, यह अपनी अनुप्रिया मुद्राओं, संकेतों तथा भाषेतर ध्वनियों से अवश्य प्रकट करता है। पर मापिक दृष्टि से वह मुख्यतः निष्क्रिय ..

प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली 31 रहता है । प्रोक्ति का यह प्रकार मुख्यतः मंच से नेता द्वारा सम्बोधित की जाने वाली भाषणात्मक प्रोक्ति में प्राप्त होता है । राजनैतिक, धार्मिक नेताओं की भाषणात्मक प्रोक्ति को प्राय: श्रोता मौन सुनते हैं या सिर हिलाते हैं या करतल- ध्वनि करते हैं, लेकिन सामान्यतः भापिक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते हैं । इसकी दूसरी स्थिति मंच पर क्रियाशील अभिनेयात्मक प्रोक्ति मे देखने को मिलती है। यहां भी दर्शक-श्रोता मुद्राओ के द्वारा अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, लेकिन वक्ता की सक्रिय भूमिका नही निभाते हैं । उदाहरण द्रष्टव्य है- अनाउंसर : (झुनझुना हिलाकर) हम सवालात पैदा करते हैं। (झुनझुना हिलाकर) जो समय और ऋतुओ का दर्पण दमकते हुए हीरों की तरह काट देते हैं। सवालात जो वीरान सड़कों पर छिपे हुए जालो की तरह बिछे रहते हैं । (झुनझुना) मृत्यु को निरुत्तर कर देते हैं । (जोर से झुनझुना बजाती है ।) मृत्यु हमारे सिरहाने लोरिया गाती है। हम अपनी जान को खतरे में डाल सकते हैं । पेंशने नहीं । तीसरी स्थिति की प्रोक्ति कक्षा मे या संगोष्ठियों-सम्मेलनों में दी जाने वाली व्याख्यात्मक प्रोक्ति की होती है, जिसमे श्रोता अधिकांशतः मौन रहते हैं, पर आवश्यकता पड़ने पर एक-दो प्रश्नात्मक प्रोक्ति अनुक्रियावश प्रस्तुत करते हैं । 1.8.2.1.2.2. एकाभिमुखी स्थिर संलापमूलक प्रोक्ति : इसमें वक्ता के सामने श्रोता की प्रत्यक्ष उपस्थिति आवश्यक नहीं होती। आकाशवाणी और दूरदर्शन के समाचार-प्रसारण इसके उदाहरण हैं । निम्न- लिखित प्रोक्ति द्रष्टव्य हैं- 'पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और अकाली नेता श्री प्रकाश सिंह बादल ने आज लुधियाना की सभा में बोलते हुए केन्द्र के साथ तब तक किसी भी प्रकार की सम्भावित बातचीत से इन्कार किया है जब तक केन्द्र पहले उनकी पांच-सूत्रीय योजना को स्वीकार नहीं कर लेता।' 1.8.2.2. एकालापमूलक प्रोक्ति एकालापमूलक प्रोक्ति में एक ही पात्र वक्ता और श्रोता की भूमिका में होता है। प्रकार की दृष्टि से एकालाप को भी संलाप के अंतर्गत ही माना जाता है, क्योकि इसमें वक्ता और थोता दोनों ही उपस्थित होते हैं । ऐसी एकालापमूलक प्रोक्ति भावावेश में बढ़ती है । इसके तीन उपभेद होते हैं- 1.8.2.2.1. गत्यात्मक एकालापमूलक प्रोक्ति 1.8.2.2.2. स्थिर एकालापमूलक प्रोक्ति, और 1.8.2.2.3. स्वगत प्रोषित 32 प्रोषित : स्वरूप-विवेचन : 1.8.2.2.1. गत्यात्मक एकालापमूलक प्रोक्ति : इसमे वक्ता स्वयं ही प्रश्न करता, निषेध करता और योता के रूप में स्वयं ही उत्तर देता है। उदाहरण के लिए निम्निलिखित प्रोक्ति को लिया जा सकता है- मल्लिका : नहीं तुम काशी नही गये। तुमने संन्यास नही लिया । मैंने इसलिए तुमसे यहां से जाने के लिए नहीं कहा था ! "मैंने इसलिए भी नहीं कहा था कि तुम जाकर कही शासन-भार सम्भालो। फिर भी जब तुमने ऐसा किया, मैंने तुम्हें शुभकामनाएं दीपि प्रत्यक्ष तुमने वे शुभकामनाएं ग्रहण नहीं को । (ग्रन्थ को हाथों में लिए जैसे अभि- योगपूर्ण दृष्टि से उसे देखती है।) में यद्यपि तुम्हारे जीवन में नहीं रही, परन्तु तुम मेरे जीवन में सदा बने रहे हो । मैंने कभी तुम्हें अपने से दूर नहीं होने दिया। तुम रचना करते रहे और मैं समझती रही कि में सार्थक हूँ, मेरे जीवन की भी कुछ उपलब्धि है । (ग्रन्थ को घुटने पर रख लेती है।) और आज तुम मेरे जीवन को इस तरह निरर्थक कर दोगे ? (ग्रन्थ को आसन पर रखकर उद्विग्न दृष्टि से उसकी ओर देखती रहती है।) तुम जीवन से तटस्थ हो सकते हो, परन्तु मैं तो अब तटस्थ नही हो सकती । क्या जीवन को तुम मेरी दृष्टि से देख सकते हो ? जानते हो, मेरे जीवन के ये वर्ष कैसे व्यतीत हुए हैं ? मैंने क्या-क्या देखा है ? क्या-से-क्या हुई हूँ ? (उठकर किवाड़ खोल देती है और पालने की ओर सकेत करती है।) इस जीव को देखते हो? पहचान सकते हो? यह मल्लिका है जो धीरे-धीरे बड़ी हो रही है और मां के स्थान पर अब मैं इसकी देखभाल करती हूँ "१ वह मेरे अभाव की संतान है । जो भाव तुम थे, वह दूसरा नहीं हो सका, परन्तु अभाव के कोप्ठ में किसी दूसरे की जाने कितनी-कितनी आकृतियां हैं। (आपाद का एक दिन) 1.8.2.2.2. स्थिर एकालापमूलक प्रोक्ति: गत्यात्मक के विपरीत स्थिर एकालापमूलक प्रोक्ति में वक्ता स्थिर रूप में विचार करता है। वह प्रश्न उठाता हुआ भी शान्ति और स्थिर प्रोक्ति उपस्थित करता है। निम्नांकित प्रोक्ति इसका उदाहरण है--- 'इस साम्राज्य का बोझ किसके लिए? हृदय में अगान्ति, राज्य में मशान्ति, परिवार मे अशान्ति । केवल मेरे अस्तित्व से ? मालूम होता है कि सबकी, विश्व प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली भर की शांति-रजनी में मैं ही धूमकेतु हूँ । यदि मैं न होता तो यह संसार अपनी स्वाभाविक गति से, आनन्द से चला करता। परन्तु मेरा तो निज का कोई.. स्वार्थ नही, हृदय के एक-एक कोने को छान डाला । कही भी कामना की वत्या.. नहीं । बलवती आशा की आंधी चल रही है। (स्कन्दगुप्त) .. ... TAM । 1.8 2.2.3. स्वगत एकालापमूलक प्रोक्ति : ऐसी एकालापमूलक प्रोक्ति स्वगत कहलाती है जहाँ नाटक में पात्र अपने- आप ही बात करते हैं । यहाँ यद्यपि दर्शक उसके श्रोता के रूप मे उपस्थित होते हैं, पर वे कोई अनुक्रिया व्यक्त नहीं करते। निम्नलिखित प्रोक्ति इसका उदाहरण है- मि० सेठ (घूमते हुए) : मेरा वक्तव्य कितना जोरदार था। छात्रो में हलचल मच गयी होगी, सबकी सहानुभूति मेरे साथ हो जाएगी। (टेलीफोन को घण्टी बजती है । मि० सेठ जल्दी से चोंगा उठाते हैं ।) (अधिकार का रक्षक) 1.8.3. प्रयुक्ति-निर्धारक(Determiners of Registers) पर आधारित प्रकार : हैलीडे के अनुसार प्रयुक्ति (Registers) को अर्थ की उस विशिष्ट समाकृति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो किसी विशिष्ट स्थिति- प्ररूप से सम्बद्ध हो । 'प्रयुक्ति अर्थपरक विविधता है तथा अन्तहित अर्थ की अवधारणा है । इस रूप मे प्रयुक्ति अन्तहित अर्थ की ऐसी शृंखला है, जो स्थिति के संकेतार्थी अभिलक्षणों के द्वारा क्रियान्वित होती है। वे भाषिक अभिलक्षण जो स्थितिगत वैशिष्ट्य को समाकृति के साथ विशेष रूप में सम्बद्ध होते हैं और जिनमे क्षेत्र, प्रकार और दिशा-विशेष की विशिष्ट मूल्यवत्ता निहित होती है वे ही वास्तव में किसी प्रयुक्ति को संघटित करते हैं।" प्रयुक्ति की धारणा यह स्पष्ट करती है कि हम जो भापा लिखते और बोलते हैं वह स्थितियों के आधार पर बदलती रहती है। प्रयुक्ति का सिद्धान्त वास्तव में इस वैविध्य को शासित करने वाले सामान्य सिद्धान्तों को तलाशने का प्रयास करता है, जिनसे यह जाना जा सके कि कौन-कौन से स्थितिगत तत्त्व फिन-किन भाषिक अभिलक्षणों को निर्धारित करते हैं । एक से दूसरी प्रयुक्ति का अन्तर वास्तव मे 'क्या कहा जाता है' से 'कैसे कहा जाता है' का भी अन्तर है । इस प्रकार प्रयुक्ति ऐसी अर्थगत समाकृति का मूलक है जो विशेष रूप में 1. एलेक्स डी. जोइया और एड्रियन स्लेनतान, टम्नं इन सिस्टिमिक लिग्वि- स्टिक्स : ए गाइड टु हैलीडे (लण्डन : वेट्सफोर्ड एकेडेमिक ऐण्ड एडकेशनल लि., 1960), पृ० 119 प्रोषित : स्वरूप-विवेचन । स्थिति के संदों के विशेष वर्ग से सम्बन होता है और याद के स्तर को परि- भाषित करता है। हैलीडे ने कहा है कि क्षेत्र, दिशा और प्रकार किसी भी पाठ के वाता- वरणिक निर्धारक हैं। उसके अनुसार प्रयुक्ति का क्षेत्र, प्रयुक्ति का प्रकार और प्रयुक्त की दिशा अपने-आप मे भापा के वैविध्य के प्रकार नहीं हैं, वे तो स्पिति के संदर्भ के ऐसे अभिलक्षण हैं, ऐसे पृष्ठ-पट हैं, जो व्यवहृत भाषा के प्रकार को निर्धारित करते हैं।' दूसरे शब्दों में ये प्रयुक्ति को निर्धारित करते हैं, चयनिव अर्थ को निर्धारित करते हैं और शब्द-भंडार तथा व्याकरण मे इसकी अभिव्यक्ति को निर्धारित करते हैं। यहाँ द्रष्टव्य है कि ये सामूहिक तौर पर, न कि खंडशः प्रयुक्ति को निर्धारित करते हैं। हैलीडे के अनुसार क्षेत्र, प्रकार और दिशातीनों ही समष्टिगत रूप में किसी भी पाठ की स्थिति के सदर्भ को परिभापित करते हैं। वस्तुन: प्रोक्ति के संदर्भ में ये तीन अतिरिक्त, पर परस्पर सम्बद्ध ऐसे आयाम हैं, जो भाषिक प्रयोग के वैशिष्ट्य को परिभाषित करने के मूल्यवान साधन मुहैया करते हैं। ऊपर विवेचित प्रयुक्ति के निर्धारकों के आधार पर प्रोक्ति के निम्नलिखित तीन प्रकार किये जाते हैं- 1.8.3.1. क्षेवाधारित प्रोक्ति 1.8.3.2. विधि आधारित प्रोक्ति, और 1.8.3.3. दिशाधारित प्रोक्ति 1.8.3.1. क्षेत्राधारित (Field based) प्रोक्ति : यह वह प्रोक्ति-प्रकार है जिसमे विषय-वस्तु और उमके अभिव्यक्त अभिलक्षण के मूल में प्रोक्ति का क्षेत्र विषय-रूप मे क्रियाशील होता है । क्षेत्राधारित प्रोक्ति तकनीकी और गैर-तकनीकी दोनों प्रकार की होती है। लम्बे पाठों में प्रोवित का अन्तरण क्षेत्र पर ही आधारित होता है। क्षेत्र के बदलने से प्रोक्ति-प्रकार मे अन्तर आता है। उदाहरण के लिए एक परिवार के भीतर समय के एक ही निश्चित बिन्दु पर एक ही वक्ता के द्वारा विभिन्न क्षेत्रो मे व्यक्त की जाने वाली प्रोक्ति तदनुरूप बदलती जाती है। ऐसा वक्ता यदि एक और अपने यहां आये हुए अतिथि के स्वागत को प्रोक्ति व्यक्त करता है, तो दूसरी ओर अपने मकान की चल रही मरम्मत के विषय में मजदूर को भी कहता है। तीसरी बार अपने पुत्र से बैंक से रकम निकालने के सम्बन्ध में चैक ले जाने की प्रोक्ति भी उपस्थित करता है और 2. वही, पृ. 117 प्रोशित : स्वरूप, संरचना और शैली 35 चौथी ओर शोर कर रही अपनी बेटी के प्रति प्रताड़ना की प्रोक्ति भी प्रस्तुत करता है । यहाँ वह अखबार पढ़ते पाकिस्तानी सीमा पर सैनिक-टुकड़ियों के जमाव को लेकर भी अपनी प्रतिक्रियात्मक प्रोक्ति प्रस्तुत कर सकता है और अपने नौकर के प्रति धुले हुए कपड़ों को 'प्रेस करने की प्रोक्ति भी उपस्थित कर सकता है । प्रोक्ति के इस विशेष प्रकार पर विचार करते हुए डॉ० भाटिया ने स्पष्ट किया है- 'क्षेत्र के अनुसार भापा का स्वरूप बदलता है । वह स्थिति- परिस्थिति जिसमें किसी भाषा का प्रयोग किया गया है, विशेष प्रभाव डालती है। अगर कही चर्चा परिचर्चा में भाग ले रहे है तो भिन्न, इसी तरह किसी शैक्षणिक संगोष्ठी में भाग लेते समय भिन्न प्रकार की भाषा का प्रयोग करना पड़ेगा। इस प्रकार दैनिक संदर्भ हो या किसी भी साहित्यिक कृति का संदर्भ, 'क्षेत्र के परिवर्तन के साथ प्रोक्ति सदैव परिवर्तित होती रहती है । वस्तुतः एक पात्र द्वारा भिन्न-भिन्न पात्रों के साथ एक ही समय मे अनेक प्रकार की उक्ति प्रस्तुत करने से जो अनेकता-विविधता सामने आती है, उसे 'क्षेत्र'-आधारित प्रोक्ति-प्रकार के रूप में ही रेखांकित किया जाता है। 1.8.3.2. विधि आधारित (Mode based) प्रोक्ति : इसके मुख्यत: दो प्रकार हैं- 1.8.3.2.1. वाचिक प्रोक्ति, और 1.7.3.2.2. लिखित प्रोक्ति यहाँ यह तथ्य स्मरणीय है कि प्रत्येक लिखित प्रोक्ति पढ़ी जाती है, किन्तु प्रत्येक वाचिक प्रोक्ति लिखित भाषा मे उपलब्ध हो, यह आवश्यक नहीं है । लिखित प्रोक्ति के विभिन्न रूपों मे समाचारपत्र, विज्ञापन, कहानी और कविता की प्रोक्तियां भिन्न-भिन्न होती हैं । वाचिक रूप में कक्षा का व्याख्यान, नेता का भापण, रेडियो की परिचर्चा का स्वरूप भिन्न हो जाता है। समाचार-पत्र की भाषा मे ही 'खबरों की प्रोक्ति', 'सम्पादकीय' प्रोक्ति और फीचर की प्रोक्ति' मे परस्पर अन्तर होता है । प्रत्यक्ष वार्तालाप की प्रोक्ति और टेलीफोन पर बात करने की प्रोक्ति में भी सष्ट भिन्नता होती है । इस प्रकार के प्रोक्ति-भेद को विधि के आधार पर ही स्वरूपित-निर्दिष्ट किया जाता है । इनकी भिन्नता अनेक उपप्रकारों को सिरज देती है। 1.8.3.3. दिशाधारित (Tenor Based) प्रोक्ति : दशा' औपचारिक और अनौपचारिक होती है। जब प्रोक्ति-प्रकार वक्ता . 1. कैलाशचन्द्र भाटिया, 'प्रोक्ति-संरचना', परिषद-पत्रिका, सं० श्री रंजन सरिदेव (पटना : बिहार राष्ट्रभाषा परिपद, जुलाई 1980). पृ० 86 136 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन और प्रोता के बीच के सम्बन्ध आधार पर स्वरूपित होता है तव प्रोक्ति का दिशाधारित प्रकार सामने आता है । यहाँ प्रोक्तियां एक सातत्य में कार्य करती हैं । यहाँ प्रोषित-प्रकार या तो पूर्ण औपचारिक होगा या पूर्ण अंतरंग । इस आधार पर उपन्यास आदि में उत्तम पुरुप की दृष्टि से और अन्य पुरुप की दृष्टि से प्रस्तुत होने वाली प्रोक्तियों को अन्तरंग प्रोक्ति-प्रकार और औप- चारिक प्रोक्ति-प्रकार के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है । जब कभी सामान्य जीवन में या नाटक में वार्तालाप के दौरान प्रोक्ति-प्रकार की इस दिशा में अंतरण उपस्थित होता है तब प्रोक्ति का ऐसा अंतरण वस्तुत: सम्बन्धों के अंत- रण को अथवा भावमुद्रा के अन्तरण को धोतित करता है। इस तरह प्रोक्ति के अनेक उपप्रकार दिशाधारित होते हैं। यहाँ यह स्पष्ट समझना चाहिए कि प्रयुक्ति के क्षेत्र, विधि और दिशा के आधार पर किया जाने वाला प्रोक्ति का वर्गीकरण न केवल अन्तस्सम्बद्ध है, बल्कि अन्तरसक्रिय भी है । कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जिनकी प्रोक्तियां कुछ विधि' से अपेक्षया अधिक जुड़ती हैं और कभी विधि में होने वाला अन्तरण 'दिशा' के अन्तरण से भी जुड जाता है। 1.8.4.प्रकार्य-आधारित प्रकार : प्रोक्ति के प्रकार को भाषा के प्रकार्यों के आधार पर भी वर्गीकृत किया जाता है। प्रोक्ति के ये प्रकार्य-आधारित प्रकार मेलिनोवस्की, कालंबुहलर, मुकारोवस्की, रोमन याकोव्सन, मातिने तथा एम० ए० के हैलोर्ड द्वारा निर्दिष्ट भापिक प्रकार्यों पर आधारित-स्वरूपित हैं। 1.8.4.1. मेलिनोव्स्की के भाषिक प्रकार्यों पर आधारित प्रोक्ति-प्रकार: भाषा के प्रकार्य पर सबसे पहले मेलिनोस्की ने विचार करते हुए भाषा के तथ्यात्मक (Pragmatic) और जादुई (Magical) नामक दो प्रकार्य निर्दिष्ट किये थे। इस दृष्टि से प्रोक्ति के 1. तथ्यकीय और 2. चमत्कारी जैसे दो प्रकार सामने आते हैं। 2.8.4.2. कार्ल मुहलर के भाषिक प्रकार्यों पर आधारित प्रोक्ति-प्रकार: मेलिनोस्की के बाद काले बुहलर ने 1. कथ्यात्मक 2. अभिव्यंजनात्मक 1. एम० ए० के० हैली, 'लैंग्वेज स्ट्रक्चर ऐंड लंग्वेज फंक्शन', न्यू होराइजंज इन लिग्विस्टिक्स, सम्पा० जॉन लायंस (बाल्टीमोरःपेंगुइन बुक्स, 1970, पुनर्मुद्रण, 1972), पृ० 141 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली और 3. इच्छात्मक, जैसे तीन भाषिक प्रकार्य निर्दिष्ट किए। इस दृष्टि से . प्रोक्ति के 1. कथ्यात्मक 2. अभिव्यंजनात्मक और 3. इच्छात्मक जैसे तीन प्रोक्ति-प्रकार स्पष्ट होते हैं। 1.8.4.3. मुकारोव्स्की के भाषिक प्रकार्यों पर आधारित प्रोक्ति प्रकार : मुकारोव्स्की ने कालं बुहलर द्वारा निर्दिष्ट तीन प्रकार्यों के अतिरिक्त चौथे प्रकार्य के बतौर भाषा का सौन्दर्यात्मक प्रकार्य प्रस्तावित किया। इस तरह भुकारोव्स्की के आधार पर प्रोक्ति के निम्नलिखित प्रकार स्वरूपित होते (1) कथ्यात्मक प्रोक्ति-प्रकार, (2) अभिव्यंजनात्मक प्रोक्ति-प्रकार, (3) इच्छात्मक प्रोक्ति-प्रकार और (4) सौन्दर्यात्मक प्रोक्ति-प्रकार । 1.8.4.4. रोमन याकोब्तम द्वारा निदिष्ट भाषिक प्रकार्यों पर आधारित प्रोक्ति- प्रकार: भाषा के प्रकार्यों पर विचार करते हुए रोमन याकोब्सन ने (1) अभिधे- यात्मक प्रकार्य, (2) आभिव्यक्तिक प्रकार्य, (3) इच्छात्मक प्रकार्य, (4) सम्पर्क-द्योतक प्रकार्य, (5) काव्यात्मक प्रकार्थ और (6) अधिमापात्मक प्रकार्य जैसे छह प्रकार्य निर्दिष्ट किये, जिनके आधार पर प्रोक्ति के (1) अभिधेयात्मक, (2) आभिव्यक्तिक, (3) इच्छात्मक, (4) सम्पकंद्योतक, (5) काव्यात्मक और (6) आधिभाषिक जैसे 6 प्रकार उपस्थित होते हैं 1.8.4.5. मात्तिने द्वारा निर्दिष्ट भाषित प्रकार्यों पर आधारित प्रोक्ति-प्रकार: मातिने ने भाषा के प्रकार्य पर विचार करते हुए भाषा का एक प्रभावात्मक 1. एम० ए० के० हैलीडे, 'लैंग्वेज स्ट्रक्चर एंड लैग्वेज फंक्शन,' न्यू होराइजंज इन खिग्विस्टिक्स, सम्पा० जॉन लायंस (बाल्टीमोर : पेंगुइन बुक्स, 1970, पुनर्मुद्रण, 1972), पृ० 141 2. जे० मुकारोव्स्की, 'स्टैंडर्ड लैंग्वेज, ऍड पोयटिक लंग्वेज' अ प्राग स्कूल रीडर आन एस्थेटिक्स, लिटरेरी स्ट्रक्चर ऍड स्टाइल, सम्पा० पी० एल० गाविन (वाशिंगटन डी० सी० : जार्ज टाउन यूनिवर्सिटी प्रेस, 1964), पृ.17 3. जी० सी० लिप्शी, 'फंक्शनल लिंग्विस्टिक्स : अ सर्व अव स्ट्रक्चरल लिग्वि- स्टिक्स (लंडन : फेवर ऐड फेवर, 1970, पेपर बैंक संस्करण, 1972), पृ.92 38 पोषित: स्वरूप-विवेचन प्रकामं भी निदिष्ट किया। इसको ध्यान में रपते हुए प्रोषित के प्रभावात्मक प्रकार को भी स्वरूपित किया जा सकता है। 1.8.4.6. एम. ए. के हैलो द्वारा निर्दिष्ट भाषिक प्रकार्यों पर आधारित प्रोपित-प्रकार: एम० ए० के हैलोडे ने मापा के प्राय पर विचार करते हुए उसके तीन प्रकायों का उल्लेप किया है- 1.8.4.6.1. विचारात्मक प्रकार्य 1.8.4.6.2. अन्तर वयक्तिक प्रकार्य, और 1.8.4.6.3. पाठात्मक प्रकार्य पुनः हैलीडे महोदय ने इन प्रकार्यो के दो-दो उपभेद किए हैं- 1.8.4.6.1.4. विचारात्मक प्रकार्य 1.8.4.6.1.4.1. आनुभूतिक प्रकार्य 1.8.4.6 1.4.2. ताकिक प्रकार्य 1.8.4.6.2. अन्तर-वयक्तिक प्रकार्य : 1.8.4.62.1. चाचिक प्रकार्य 1.8.46.2.2. वक्ता और श्रोता-विषयक मनोवृत्ति 1.8.4.6.3. पाठात्मक प्रकार्य: 1.8.4.6.3.1. सूचनात्मक प्रकार्य और 1.8.46.3.2. कथ्यात्मक कार्य हैलोडे द्वारा निर्दिष्ट इन आधारों पर प्रोक्ति के निम्नलिखित छह प्रकार स्पष्ट होते हैं- 1.8.4.6.1.1. आनुभूतिक प्रोक्ति 1.8.4.6.1.2. ताकिक प्रोक्ति 1.8.4.6.1.3. वाचिक प्रोक्ति 1.8.4.6.1.4. मनोवृत्तिमूलक प्रोक्ति 1.8.4.6.1.5. सूचनात्मक पोक्ति और 1.8.46.1.6. कध्यात्मक प्रोक्ति 1. (क) पूर्ववत, पृ. 103-109 (ख) द्रष्टव्य : ए मातिने, 'अ फक्शनल विउ अव लग्वेज (आक्सफोर्ड, 1962), 2. एम० ए० के० हैलीडे लिग्विस्टिक फंक्शन ऍण्ड लिटरेरी स्टाइल : ऐन इन्क्वायरी इन टु द लंग्वेज अब विलियम गोल्डिंग्ज द इनहेरिटर्ज', लिट- रेरी स्टाइल : अ सिम्पोजियम, सम्पा० सेयूर चंटमैन (लंडन : आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1971), पृ० 332-334 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली 39 1.8-4.6.1.1. आनुभूतिफ प्रोक्ति-प्रकार हैलीडे के अनुसार वस्तु की अभिव्यंजिका भाषा का स्वरूप विचारात्मक प्रकार्य के रूप में उभरता है । अतः इसके अंतर्गत आने वाले आनुभूतिक प्रकार्य के आधार पर जो आनुभूतिक प्रोक्ति-प्रकार स्वरूपित होता है वह यथार्थ तत्त्वो के प्रति वक्ता और लेखक की अनुभूति तथा उसकी निजी चेतना के आन्तरिक जगत के अनुभव से सम्बद्ध होता है । इसमे वक्ता/रचयिता की प्रतिक्रियाएं, सज्ञानात्मकता, प्रत्यक्षीकरण जैसे तत्त्व जुड़े होते हैं। इस दृष्टि से आनुभूतिक प्रोक्ति के निम्नलिखित उपप्रकार स्पष्ट होते हैं- (1) प्रत्यक्षमूलक प्रोक्ति (2) संज्ञानमूलक प्रोक्ति (3) अनुक्रियामूलक प्रोक्ति (4) प्रतिक्रियामूलक प्रोक्ति (5) प्रेममूलक प्रोक्ति (6) घृणामूलक प्रोक्ति (7) उत्साहमूलक या ओजमूलक प्रोक्ति (8) क्रोधमूलक प्रोक्ति (9) करुणामूलक प्रोक्ति (10) श्रद्धामूलक प्रोक्ति (11) आश्चर्यमूलक प्रोक्ति (12) निर्देशमूलक प्रोक्ति (13) ह्रासमूलक प्रोक्ति (14) रौद्रमूलक प्रोक्ति 1.8.4.6.1.2. ताफिक प्रोक्ति-प्रकार : ताकिक प्रोक्ति-प्रकार कारण-कार्य सम्बन्ध के प्रतिवेदन मात्र के समन्वयन के और अभिप्रायीकरण के प्रोक्ति-प्रकार के रूप में उभरता है। 1.8.4.6.1.2.1. वाचिक प्रोक्ति-प्रकार: अन्तर वैयक्तिक प्रोक्ति-पकार में वाचिक प्रोक्ति मूलतः वृत्तिकता (Modality) पर आधारित होती है । इस प्रोक्ति में विधेय-निषेध, आज्ञा- विधि, विस्मय प्रश्न आदि के रूप में प्रोक्ति के प्रकार उभरते हैं- (1) विधेयात्मक प्रोक्ति (2) निषेधात्मक प्रोक्ति (3) आज्ञात्मक प्रोक्ति प्रोषित: स्वरूप-विवेचन (4) विधिपरक प्रोषित (5) प्रेरणार्थक प्रोषित (6) प्रश्नात्मक प्रोक्ति (7) विस्मयारमा प्रोपित 1.8.4.6.2.2. मनोवृत्तिमूलफ प्रोक्ति-प्रकार : मनोवृत्तिमूलक प्रवृत्ति के अन्तर्गत वक्ता के द्वारा योता के प्रति संचरित मनोवृत्ति के अनुरूप निम्नलिपित प्रोक्ति-प्रकार सामने आते हैं- (1) आदरार्थक प्रोक्ति (2) उपेक्षात्मक प्रोषित (3) औपचारिक प्रोक्ति (4) अन्तरंग-आत्मीय प्रोषित 1.8.4.6 3.1. सचनात्मक प्रोक्ति-प्रकार : पाठात्मक प्रकार्य के आधार पर सूचनात्मक और कप्पात्मक प्रोक्ति-प्रकार सामने आते हैं। सूत्रनात्मक प्रोक्ति-प्रकार किसी भी प्रोक्ति में प्राचीन' और 'नवीन', 'अक्षक' और 'यतक' जैसे प्रोक्ति-अनुभाग के रूप में सक्रिय रहते हैं । 1.8.4.6.3.2. करयालक प्रोक्ति प्रकार: कथ्यात्मक प्रोक्ति-प्रकार पाठ में निरूपित संदेश की विविधता और विभिन्नता की प्रकृति पर आधारित होता है। उदाहरण के लिए पाठ मे यथानिहित 'क्रीड़ा' को प्रोक्ति, राज्याभिषेक' की प्रोक्ति, 'आखेट' की प्रोक्ति, राज्य निष्का- सन' को प्रोक्ति जैसे कय्य-संदेश स्वत: प्रोक्ति-प्रकार की स्वरूपित करते हैं । यहाँ प्रकार का सीमांकन नहीं है, क्योकि वाचिक' अथवा लिखित' संदर्भ में जितने प्रकार के संदेश होगे उतने ही प्रोक्ति-प्रकार भी बनेंगे। "1.9. कथात्मक प्रोक्ति: प्रकार विवेचन : प्रोक्ति पर विचार करने के क्रम में विवेचकों ने सामान्य प्रोश्ति-प्रकार से अलग हट कर कथात्मक प्रोक्ति-प्रकार का भी विवेचन किया है। ऐसे विवेचकों में सैमूर चंटमैन, डोलजेल, जेने, प्रोमा होरिट कोन आदि प्रमुख हैं। अतः वथात्मक प्रोक्ति के प्रकार को इन विवेचको के विवेचन के आधार पर निर्दिष्ट किया जा सकता है-~-1.9.1, सैमूर चैटमन द्वार निर्दिष्ट कथात्मक प्रोक्ति के प्रकार, 1.9.2, डोलजेल द्वारा निर्दिष्ट कथात्मक प्रोक्ति के प्रकार, 1.9.3. प्रोमा द्वारा निर्दिष्ट कथात्मक प्रोक्ति के प्रकार, 1.9.4. जैने द्वारा निर्दिष्ट कपात्मक प्रोकिन के प्रकार और 1.9.5. डोरिट कौन द्वारा निर्दिष्ट कथात्मक प्रोक्ति के प्रकार प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली 1.9.1 सेमूर चंटमैन द्वारा निर्दिष्ट कयात्मक प्रोक्ति के प्रकार : सैमूर चैटमैन ने कथात्मक प्रोक्ति पर विचार करते हुए कथात्मक प्रति- शप्ति (Narrative Discourse) और कम्य की संरचना के आधार पर कथात्मक प्रोक्ति के प्रकार का आधार उपस्थित किया है । इस आधार पर निम्नलिखित प्रकार स्पष्ट होते हैं- 1.9.1.1. कयात्मक प्रतिज्ञप्ति (Narrative Discourse) पर आधारित प्रोक्ति-प्रकार : चैटमैन मूलभूत कथात्मक क्रिया के रूप मे 'करना' (DO) और 'होना (Happen) को रेखांकित करता है, जिनके आधार पर कथात्मक प्रोक्ति के दो प्रकार स्पष्ट होते हैं- 1.9.1.1.1. प्रतिक्रियात्मक प्रोक्ति-प्रकार और 1.9.1.1.2. अस्तित्वपरक प्रोक्ति-प्रकार 3. मूल्यमीमांसी कहानियां IAxiologicai Stories)- इसके अन्तर्गत सत्-असत्, भले-बुरे एवं तटस्थ का अभिव्यंजन होता है । 4. ज्ञान-मीमांसी कहानियां (Epistemic Stories) इसके अन्तर्गत ज्ञान- अज्ञान और विश्वास का अभिधजन होता है । 1.92. डोलजेल द्वारा निर्दिष्ट कथात्मक प्रोक्ति के प्रकार : डोलनेल ने इस प्रकार की कहानियों का वर्गीकरण कथा-व्यवस्था के अन्त- गंत किया है तथा इस व्यवस्था को मुक्त रखते हुए इसके अन्य प्रकारों से जुड़ने की सम्भावना को भी स्वीकार किया है। ...डोलजेल के द्वारा निर्दिष्ट कहानियो के प्रकार के आधार पर कथात्मक प्रोक्ति के चार प्रकार निर्दिष्ट किये जा सकते हैं- 1.92.1. शक्याशक्य प्रोक्ति 1.9.2.2. आचारिक प्रोक्ति 1.6.2.3. मूल्यपरक प्रोक्ति, और 1.9.2.4. ज्ञान-मीमांसी प्रोक्ति 1.9.3. ग्रीमा द्वारा निर्दिष्ट कथात्मक प्रोक्ति के प्रकार : ग्रीमा ने कहानी के तत्वों को जिन तीन रूपों में नियोजित करने का प्रस्ताव 1. सैमूर चैटमैन, 'द स्ट्रक्चरल व नैरेटिव ट्रांसमिशन', स्टाइल एण्ड स्ट्रक्चर इन लिटरेचर, सम्पा० रोजर फाउलर (न्यूयार्क : कार्मल यूनिवसिटी प्रेस, 1975), पृ० 213-214 h 42 प्रोक्ति: स्वरूप-विवेचन किया है, उनके आधार पर फपारमक प्रोषित के निम्नलिपित प्रकार सष्ट 1.9.3.1. अनुबन्धनारमक मनुकाम को प्रोक्ति (Discourse or Contraclual Sequence) 1.9.3.2. निष्पादक अनुपम को प्रोषित (Discourse of Performative) और 1.9.3.3. विस्थापनमूलक मनुषम की प्रोषित (Discourse of Disjunctícnol Sequence) 1.9.3.1. अनुयंधनात्मक अनुक्रम को प्रोषित: यह प्रोक्ति प्रतियुति अथवा दायित्वबोध संघटन अपया किसी प्रस्ताव को अस्वीकृति में उभरती है। 1.9.3.2. निष्पादक अनुक्रम को प्रोक्ति : पह प्रोक्ति क्रिमा-व्यापारों की वास्तविक निष्पन्नता मे प्रस्तुत होती है। 1.9.3.3. विस्थापनमूलक अनुक्रम को प्रोषित : यह प्रोक्ति गतिशीलता और अनेक प्रकार की विस्थापन-मूलकता मे उप- स्थित होती है। 1.9.4.जेने द्वारा निर्दिष्ट कथात्मक प्रोक्ति के प्रकार : जैने प्रोक्ति या आख्यान/कथा (Recit : the discourse or narrative) कपात्मक वस्तु (Narrative content) और कथात्मकता-~-कथात्मक उत्पादन के क्रिया-व्यापार (the act of narrative Production) के बीच अंतर स्पष्ट करता है। जने प्रोक्ति का पारात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता कहानी में तीन प्रमुख पहलुओं को निर्दिष्ट करता है...~1. 9. 4. 1. काल, 1.9.4.2. प्रविधि और 1.9, 4.3. अभिव्यक्ति । 1.9.4.1.काल: काल के अन्तर्गत कहानी मे तिथिक्रमिक नातेदारी का गुच्छ सामने आता 1. जोनायम कॅलर, डिफाइनिग नैरेटिव यूनिट्स, स्टाइल ऐण्ड स्ट्रक्चर इन लिटरेवर, संया, रोजर फाउलर (न्यूयार्क : कार्नेल यूनिवर्सिटी प्रेस, '1975), पृ. 131-132, 2. थामस जी, पावेल, "लिटरेरी नैरेटिवज, डिस्कोर्स ऐंड लिटरेचर, सम्पा. टी. ए. यानजिक (एम्सटर्डम : जॉन बेंजामिन पब्लिशिंग कम्पनी, 1985), पृ.96-101 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली 43 है । विशेष रूप में कथा की प्रोक्ति और कथा की अन्तर्वस्तु के बीच का कालिक सम्बन्ध उभरता है। यह सम्बन्ध भूलतः तीन प्रमुख कोटियों के आधार पर संघटित होता है। इनमें पहली कोटि 'क्रम' (Order) की है, जिसके अन्तर्गत कथात्मक अन्तर्वस्तु की तिथि-वारिकता और घटना की पाठात्मक व्यवस्था के बीच की अन्योन्य क्रिया आती है। दूसरी कोटि 'स्थितिकाल' (Duration) को है, जिसके अन्तर्गत घटना की दीर्घता को उसकी पाठात्मक प्रस्तुति की दीर्घता के आमने-सामने रखा जाता है। तीसरी कोटि 'बारम्बारिता' (Terquency) की है, जिसके अन्तर्गत कहानी में किसी घटना की उपस्थिति-संख्या को पाठ मे इसके वणित होने की समय-संख्या से जोड़ा जाता है । 1.9.4.1. 1. क्रम (Order). क्रम का आरेखन अमूर्त कहानी और पाठ के वीच कातात्मक संयोजन के अभाव अथवा कालदोष (Anechronies) का है । यह कालदोष पूर्व प्रयोग (Prolepses) या पश्चप्रयोग (Retrospections) के रूप में सामने आता है । 1.9.4.1.2. स्थितिकाल (Duration) : यह कालदोष (An chronies) को उत्पन्न करता है, जिसके दो रूप होते हैं -गतिवर्धन (Acceleration) और गतिमन्दन (Deceleration) अत्यधिक गतिवर्धन अध्य्याहार (Elip i) है, जबकि आत्यन्तिक मंदता वर्णनात्मक विरामों (Pauses) के वीच उभरती है । 1.9.4.1.3. बारम्बारिता (Frequencies) : इसका प्रभाव एकात्मक कहानी (Singularative Stories), आद्यात्मिक एकात्मक कहानी (Anaphoric S ngularative Stories), एक बार घटित अनेक आवतितकहानो (Repetifivss.ories) तथा अनेकश. घटित एक बार पुनरुक्त कहानी (Itcrative Stories) के बीच अन्तर स्पष्ट करता है। उक्त तीनों के आधार पर कथात्मक प्रोक्ति के (1) ऋमिक प्रोक्ति (2) स्थितिकालिक प्रोक्ति और (3) बारम्बारी प्रोक्ति जैसे तीन प्रकार स्पष्ट होते हैं । इनमें बारम्बारी के (1) एकात्मक प्रोक्ति (2) आद्यात्मक एकात्मक प्रोक्ति, (3) एकशः घटित अनेकशः आवत्तित प्रोषित और अनेकशः घटित, एकशः आत्तित प्रोक्ति जैसे पुनः चार भेद होते हैं । 1.9.4.2. कपात्मक प्रविधि (Modes): प्रविधि इस तकनीक को निर्दिष्ट करती है जिससे यह निश्चित किया जाता है कि कहानी का कितना अंश पाठ में लिया जायगा। प्रविधि मूलतः दो हैं-- (1) अन्तर (Distance) मूलक प्रविधि (2) परिप्रेक्ष्य (Perspective) मलक प्रविधि।

प्रोक्ति : स्वरूप-वि 44 1.9.4.2.1. अन्तरमूलक प्रविधि : इसके अन्तर्गत जैने ने 'घटनाओं की कहानी' (Stories of events) और 'भापिक कहानी' (Stories of Speech) के बीच अन्तर स्पष्ट किया है। 'भाषिक कहानी' में अन्तर (Distance) के तीन सोपानों के आधार पर तीन प्रकार की कथात्मक प्रोक्तियां सामने आती हैं- (1) प्रतिवेदित प्रोक्ति (Reported Speech) (2) विवरणित सार प्रोक्ति (Narrativized Speech) (3) क्रमान्तरित अथवा मुक्त प्रोक्ति (Transposed or free Indirect Sp.ech) 1.9.4 2.2. परिप्रेक्ष्यमूलक प्रविधि : इस प्रविधि के अन्तर्गत जैने के अनुसार 'प्रविधि की समस्या' और 'अभि- व्यक्ति की समस्या' में अन्तर है। प्रविधि की समस्या का महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि 'कौन देखता है', किन्तु 'अभिव्यक्ति की समस्या' का महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि 'कौन बोलता है।' परिप्रेक्ष्य मूलतः संकेन्द्रण अथवा दृष्टिकोण (Tocati. zation or Point of veiw) के प्रश्न से जुडा है । इस दृष्टि से जने ने कहानियों के चार प्रकार निर्दिष्ट किये हैं--(1) केन्द्रणहीन कहानियां (Non-Focal:- zed)---ऐसी कहानियां सर्वथा कथावाचक के अनुरूप होती हैं । (2) आन्तरिक रूप में सकेन्द्रित कहानियों (Intenally Focalized) इसमें प्रदत्त चरित्र का दृष्टिकोण प्रतिवधित होता है। (3) बाह्यरूप मे संकेद्रित कहानियाँ (Externally Focalized)यह कथावाचक चरित्र की अपेक्षा कम जानता है। (4) बहुरूपात्मक कहानियां (Polymedalities)--ऐसी व्यवस्था जिसमें कहानी के बीच वार-बार यह संकेद्रण परिवर्तित होता है बहुरूपात्मकता (Polymodatities) कहलाती है। परिप्रेक्ष्य के अन्तर्गत उक्त प्रभेदों को देखते हुए कथात्मक प्रोक्ति के (1) अ- संकेन्द्रित प्रोक्ति, (2) आभ्यन्तर रूप संकेंद्रित प्रोक्ति, (3) बाह्य-रूप संकेन्द्रित प्रोक्ति और (4) बहुरूपात्मक प्रोक्ति जैसे चार प्रकार स्वरूपित होते 1. 9. 4. 3. अभिव्यक्ति (Voics): 'अभिव्यक्ति' आख्यान या कथा के उस वर्णन-व्यापार को निर्दिष्ट करती है, जो सदय वणित घटना के अधीनस्थ (Diegetic) स्तर पर स्थित होता है। जैने इस स्तर के कई उपप्रकार निर्दिष्ट करता है, जिनके आधार पर कथा- गोक्ति के निम्नांकित भेद स्पष्ट होते हैं- प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली 45 1.9.4. 3. 1. वहिमिवेशी स्तर (Extra-Diegetic Level) की प्रोक्ति : यह घटनाओं के बाहर स्थित स्तर की प्रोक्ति है। 1.9.4.3.2. अन्तनिवेशी स्तर (Intra-Diegetic Level) को प्रोक्ति : यह मुख्य कहानी से संबंध रखती है। 1.9.4.3.3. अधिनिवेशी स्तर (Meta-Diegctic Level) को प्रोक्ति: यह आख्यानों के एक-दूसरे मे अन्तग्रंथित होने पर उपस्थित होती है। 1.9.4.3.4. समनिवेशी स्तर (Homo-Diegetic Level) को प्रोक्ति : यह कहानी के पात्रों में से किसी एक के कथावाचक बनने से संबंध रखती है। 1.9.4.3. 5. विषमनिवेशी स्तर (Hetro- Diegct c Level) को प्रोक्ति : इसमे कथावाचक कहानी में नहीं होकर कहानी से बाहर होता है । 1.9.5. डॉरिट कॉन द्वारा निर्दिष्ट कथात्मक प्रोक्ति के प्रकार : डॉरिट कॉन ने अपनी पुस्तक 'ट्रासपेरेंट माइन्ड्ज' में समस्यामूलक और समस्याहीन साम्प्रेषणिक स्थिति के बीच तथा कथात्मक घटनाओं के तिथिपरक और तिथिहीन क्रमो के बीच अन्तर स्पष्ट करते हुए 1.9.5,1. उत्तमपुरुष कथात्मकता एवं !. 9. 5. 2. अन्य पुरूष कथात्मकता का वर्गीकरण किया है। इसके आधार पर कथात्मक प्रोक्ति के दो प्रकार उभरते हैं । 1.9.5.1. उत्तम पुरुष कथात्मक प्रोक्ति : कॉन के द्वारा निर्दिष्ट चतुष्पदीय-प्ररूपात्मकता के आधार पर उत्तम पुरुष कथात्मक प्रोक्ति के पुनः निम्नलिखित चार प्रकार स्पष्ट होते हैं- 1.9.5.1.1. कथात्मक-आख्यानक प्रोक्ति: (समस्याहीन स्थिति-तिथिपरक अनुक्रम) 1.9.5.1.2. आत्मकथात्मक एकालापी प्रोक्ति (समस्यामूलक स्थिति-तिथिपरक अनुक्रम) 1.9.5.1.3. आख्यानक प्रोक्ति: (समस्याहीन स्थिति-तिथिहीन अनुक्रम) 46 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन : 1.9.5.1.4. स्मरण-एकालापीय प्रोक्ति : (समस्यामूलक स्थिति-तिथिहीन अनुक्रम) 1.9.5.2. अन्यपुरष कयात्मक प्रोक्ति : इसके अन्तर्गत डेरिट कॉन ने 1.9.5.2.1. मनोवैज्ञानिक कथात्मक प्रोक्ति और 1.9.5 2.2. ऐतिहासिक कथात्मक प्रोक्ति जैसे दो प्रकारों को स्वरूपित किया है। 1.95.2.1. मनोवैज्ञानिक कथात्मक प्रोषित : मह वहाँ होती है जहाँ पात्रों को चेतना के विषम में सर्जकीय वर्णनात्मकता सामने माती है। 1.9.5.2.2. ऐतिहासिक आख्यानक कथात्मक प्रोक्ति : जब प्रविधि आन्तर निरूपित न होकर बाहा-निरूपित होती है तब ऐतिहा- सिक आख्यानक प्रोक्ति सामने आती है ।। 1.9.6. व्लादिमिर प्राप द्वारा निर्दिष्ट कथात्मक कार्यों पर आधारित प्रोक्तिः रूमी लोकताकिक चिन्तक प्रॉप ने रूसी परीकथा के सदर्भ में अनेक क्रियात्मक निश्चरों को रेखाकित करते हुए उन्हें प्रकार्य (Functions) की संज्ञा दी थी। इन प्रकार्यों के आधार पर निम्नलिखित कथात्मक प्रोक्ति-प्रकार स्वरूपित होते हैं । ---(1) अनुपस्थिति (Abs.nce) की प्रोक्नि, (2) निषेधादेश की (Interdics:vij को प्रोक्ति, (3) उल्लघन (Violation) को प्रोक्ति, (4) सर्वेक्षण (Resonnaissance) को प्रोक्ति, {5) प्रदान या वितरण (Delivery) की प्रोक्ति, (6) वंचना या छल-कपट (Fraud) की प्रोक्ति, (7) सह-अपरा- धिता {Compitciti) को प्रोक्ति, 18) छलनायिका (Villany) को प्रोस्ति, (9) अभाव (Lack) की प्रोस्ति, (10) ध्यान (Medilation) : 1. थामस जी, मावेल लिटरेरी नैरेटिन्त्र, डिस्कोमं ऐंड लिटरेचर, संपा. टी. ए. वानहिक (एम्सटर्डम : जॉन बेंजामिन पब्लिगि कम्पनी, 1985), पु. 100-101 2. (क) पामस जी. पावेस 'लिटरेरी नैरेटिन, डिस्कोर्स ऐंड लिटरेचर, संपा. टी. ए. वाहिन, (एम्सटर्डम जॉन शामिन पब्लिशिग क. 1985), पृ. 87 (छ) म्लादिमिर प्रॉप, सा मारफोलेजी। एं। ऐली, 1970). पृ. 1 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली 47 की प्रोक्ति, प्रतिकर्म (Crunter Action) की प्रोक्ति, (11) प्रस्थान (Depar rurt) की प्रोक्ति, (12) आवंटन (Assignment) की प्रोक्ति, (13) परीक्षा (Test) की प्रोक्ति, (14)प्रावधान (Provision) की प्रोक्ति, (15) स्थानांतरण ('ransfer) की प्रोक्ति, (16) संघर्ष (Struggle) की प्रोक्ति. (17) विजय (Victory) की प्रोक्ति, (18 चिह्नाकन (Marking) की प्रोक्ति, (19) अभाव परिसमापन (Lark-Liqu datded) हत्या की प्रोक्ति, (20) वापसी (Retura) की प्रोक्ति, (21) पीछा (Chase) करने को प्रोक्ति, (22) उद्धार (Rescue) की प्रोक्ति, (23) अनभिज्ञात पहुंच (Unrecognized- Arrival) को प्रोक्ति, (24) कठिन पाठ (Difficult Task) की प्रोक्ति, (25) निष्पन्न पाठ (Task Accomplished) की प्रोक्ति, (26) अभिज्ञान (Recognetion) की प्रोक्ति, (27) रहस्य-उद्घाटन को प्रोक्ति (Exposure), (28) रूपांतरण (Transfiguration) की प्रोक्ति, (29) दंड (Punishment) की प्रोक्ति, (30) विवाह (Wedding) की प्रोक्ति । 1.9.7. ज्वैतान तोदोरोव द्वारा निर्दिष्ट कथात्मक प्रोक्ति-प्रकार : ज्वेतान तोदोरोव ने कथात्मक सैद्धांतिकी पर विचार करते हुए कहानी के लिए अर्थगत, वाक्यीय और क्रियात्मक पक्षों की चर्चा की है। कथात्मक वाक्य- रचना की इकाई के रूप में उसने कथात्मक की अवधारणा प्रस्तुत की है, जिसका रचाव उद्देश्य और विधेय से होता है । कथात्मक वाक्य अनुक्रमों मे शृखलित होते हैं । वाक्य की कोटिया व्यक्तिवाचक नामिक विशेषणक और क्रियात्मक से बनती हैं । पात्र-विशेष को सूचनाएँ विशेषणक मे निबद्ध होती हैं जो स्थिति, गुणमिता और स्तरीयता से सम्बद्ध रहती हैं, दूसरी ओर ये सूचनाएँ क्रियात्मक में निबद्ध होती हैं, जो क्रियाओ को परिभाषित करती हैं। तोदोरोव ने यही क्रियात्मक वृत्तिकता (Modality) और कथात्मक अनुकृति के संबंध पर विचार किया है। इन दोनों के आधार पर कथात्मक प्रोक्ति के प्रकारों को स्पष्ट किया जा सकता है। 1.9.7.1. क्रियात्मक वृत्तिकता पर आधारित प्रोक्ति-प्रकार: तोदोरोव के अनुसार क्रियात्मक वृत्तिकता पर आधारित प्रोक्ति-प्रकार निम्नांकित है- 1.9.7.1. 1.निश्चयार्थी प्रोक्ति 1.9.7.2.2. स्वच्छिक प्रोक्ति 1. थामस जी. पावेल, 'लिटरेरी नरेटिब्ज, डिस्कोर्स एंड लिटरेचर, संपा. टी. ए. बागडिज्क (एम्सटर्डम : जॉन बेंजामिन पब्लिशिंग कम्पनी. 1985), प.94 18 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन 1.9.7.2.1.1. इण्टाबोधक प्रोक्ति 1.97.2.1.2. अवश्यकरणीम प्रोक्ति 1.9.7.1.3. आनुमानिक प्रोक्ति 1.9.7.3.1. प्रतिबंधित प्रोक्ति 1.9.7.3.2. भविष्यमूचक प्रोक्ति 1.9.7.1.4. काल्पनिक प्रोक्ति 1.9. 2. 2. कपारमक अनुभम के सबंध पर माधारित प्रोक्ति-प्रकार : तोदोरोव ने कपात्मक अनुक्रमों पर विचार करते हुए जिन दो प्रकार के सम्बंधों को स्पष्ट किया है उनके आधार पर भी प्रोक्ति-प्रकार स्वरूपित होते हैं । कथात्मक अनुक्रम के संबंध दो प्रकार के होते हैं- 1.9.7.2.1. ताकिक संबंध पर आधारित प्रोषित-प्रकार : 1.9.7.2.1.1. संशोधन-परिष्करण की प्रोक्ति 1.9.7.2.1 2. अभिलाषा की प्रोक्ति 1.9.7.2.1.3. अभिप्रेरणा की प्रोक्ति 1.97.2.1.4. परिणाम की प्रोक्ति 1.9.7.2.1.5.दंड की प्रोक्ति 1.9.7.2.1.6. अनुमान की प्रोक्ति 1.9.7.2.2.कारिक संबंधों पर आधारित प्रोक्ति-प्रकार : 1.9.7.2 2.1. बलात्मक प्रोक्ति 1.9.7.2.2.2. प्रतीपनात्मक प्रोक्ति 1.10. निष्कर्ष: इस प्रकार प्रोक्ति के अर्थ-सज्ञान, परिभाषांकन, प्रोक्ति और पाठ के अन्तर एवं अन्तस्संबन्ध, प्रोक्ति के प्रकृति-वैशिष्ट्य एवं अनुभाग-रेखांकन तथा प्रोक्ति के प्रावले,वार्तालाप, प्रयुक्ति एवं प्रकार्य-आधारित प्रकार-निरूपण से वह आधार- भूमि स्पष्ट हो जाती है, जिस पर संरचना को अगली चर्चा शुरू की जा सकती है।

प्रोक्ति: संरचना-विवेचन प्रोक्ति की संरचना के सम्यक् परिज्ञान के लिए उसकी 2. 1. बाह्य संरचना (surface Structure) और गहन संरचना (Deep Structure) तथा 2. 2. विशद संरचना (Macro-Structure) और सूक्ष्म संरचना (Micro-Structure) का विवेचन अपेक्षित है। 2. 1. प्रोक्ति : बाह्य बनाम गहन संरचना : इसके अन्तर्गत प्रोक्ति की दो संरचनाओं पर विचार किया जाता है। प्रोक्ति जिस वाक्यिकी से निर्मित होती है, उसके संयोजन पर विचार करने वाली संरचना को बाह्य संरचना कहा जाता है, पर प्रोक्ति जिस अर्थ-पक्ष तथा तथ्यकी (Pragmatics) को स्पष्ट करती है उस पर विचार करने वाली संरचना को गहन संरचना कहा जाता है । 2. 1. 1. प्रोक्ति : बाह्य संरचना : बाह्य संरचना पर्यवेक्षणीय होती है । इसके अन्तर्गत वाक्य-रचना तथा शब्द और वाक्यांश का क्रम-विधान आता है । कथा-साहित्य के पाठन/वाचन और निर्माण के लिए बाह्य संरचना के अन्तर्गत महत्त्वपूर्ण विशेषताएं प्राप्त होती है। इनमें एक महत्त्वपूर्ण विशेषता रेखोयता (Linearity) की भी है। रेखीय अनुक्रम आख्यानक काल को उपस्थित करता है । इसके अतिरिक्त बाह्य संरचना ताकिक सम्बन्ध और संसक्ति को दर्शाती है।। प्रोक्ति की बाह्य संरचना का विवेचन चार प्रमुख विचारकों के आधार पर प्राप्त होता है-- 2. 1. 1. 1. लुइस टी. मिलिक के आधार पर प्रोक्ति की बाह्य संरचना। 2. 1. 1.2. लांगेकर और लेविनशन के आधार बाह्य संरचना । 1. रोजर फाउलर, लिग्विस्टिकल्स ऐंड नावेल (लंडन : मेथुइन, 1977, पुन- र्मुद्रण, 1979), पृ० 6, 7, 8 50 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन 2. 1. 1. 3. एम० ए० के० हैलीडे के आधार पर प्रोक्ति को बाह्य संरचना। 2. I. 1. 4. मिल्ज़ एरिक ऍक्विस्ट के आधार पर प्रोक्ति को बाह्य 2. 1. 1. लुइस टी. मिलिक के आधार पर प्रोषित की बाह्य संरचना : मिलिक ने बाह्य संरचना के अन्तर्गत वाक्य और वाक्यांशगत सयोजन (क्लॉजल लिकेज) पर विचार किया है। मिलिक के अनुसार वाक्य और वाक्य या वाक्यांश और वाक्यांश के बीच का संयोजन पूरी प्रोक्ति को संसक्त करता है । यद्यपि किसी 'पाठ' में वाक्य की संसक्ति के कौशल वाक्यांश के संयोजन वाले ही होते हैं, फिर भी वाक्यो के पारस्परिक अन्तर्ग्रथन की दृष्टि से इन कौशलो पर अलग से ध्यान देने की आवश्यकता है । मिलिक ने वाक्य से वाक्य के बीच सम्बन्ध स्थिर करने वाली आठ प्रकार के आधारभूत संयोजकों का उल्लेख किया है। ये संयोजक निम्न- लिखित हैं- 2. 1. 1. 1. आरंभिक (Initial): मिलिक किसी भी अनुच्छेद के पहले वाक्य को और उसके आरम्भिक वाक्य को इस रूप में रेखांकित करता है। यहाँ आरम्भिक शब्द मुख्य ध्यानाकर्षी शब्द के रूप में उपस्थित होता बाद के अनुच्छेदो मे पहले अनुच्छेद के अन्तिम वाक्य से जुड़ता है। 2. 1. 1. 2. योगात्मक (Additive). ये ऐसे निपात हैं जिनका प्रतिज्ञप्ति के साथ किसी प्रकार का मूलभूत संबंध नहीं होता। ये दो वाक्यों को आपस मे में जोड़ने का और निरन्तरता बनाये रखने का काम करते हैं। 2. 1. 1. 3. विरोधारमक (Adversive) : ये ऐसे निपात हैं, जो मूल प्रतिज्ञप्ति या कप्य की दिशा को बदल देते हैं। 'पर', 'लेकिन', किन्तु', 'परन्तु', 'मगर', जैसे निपात इम कोटि के हैं । 2. 1. 1. 4. विकल्पात्मक (Alternative) : इसके अन्तर्गत आने वाले निपात पूर्व कपित प्रतिमप्ति का विवल्प प्रस्तुत 1. सुहरा टी. मिलिक, स्टापलिस्टिग ऑन स्टाइल : हेम्युफ विद सिलवगंज (म्यूपार्क : पानं राइजसं संज, 1969), पृ. 21 प्रोक्ति : संरचना-विवेचन 51 , - करते हैं । उदाहरण के लिए 'या', 'अथवा', 'बा' आदि । 2. 1. 1. 5. व्याख्यात्मक (Explanative): इसके अन्तर्गत ऐसे सयोजक आते है, जो पहले आयो प्रतिज्ञप्ति या बयान को उसकी पुनः परिभाषा अथवा व्याख्या करते हुए प्रस्तुत करते हैं । यहाँ 'जो कि', 'जो यह है, 'ऐसा है, जैसे भाषिक अश संयोजन का प्रकार्य सम्पन्न करते हैं। 2. 1. 1. 6. निदर्शात्मक (Illustrative) : वस्तुत: ये ऐसे भाषिक अंश हैं, जो दृष्टात, निदर्शन या स्पष्टीकरण प्रस्तुत करते हुए वाक्य और बाक्य को जोड़ते हैं। उदाहरणार्थ-'द्रष्टव्य', 'जैसे' आदि के प्रयोग इस कोटि के हैं। 2. 1. 1. 7. परिणाममूलक (Illative) : ये वे संयोजक हैं जिनसे निष्कर्ष निकालने का अर्थ द्योतित होता है । अतः' 'इसलिए', 'अतएव', 'एवं प्रकार' आदि संयोजकों के प्रयोग इस कोटि के है। 2. 1. 1. 8. कारणात्मक (Causal) : पूर्ववर्ती कार्य-रूप प्रतिज्ञप्ति को कारण-संपुष्ट करने के दौरान ऐसे संयोजकों का व्यवहार किया जाता है । 'क्योंकि', 'कारण यह है' जैसे संयोजकों के प्रयोग इसके उदाहरण हैं। 2. 1. 1.2. लांगेकर और लेविनशन के आधार पर प्रोक्ति को बाह्य संरचना : लांगेकर और लेविनशन ने प्रोक्ति को संसक्त करने वाली बाह्य संरचना को निम्नलिखित आठ रूपों में स्पष्ट किया है । 2. 1. 1. 2. 1. काल और पक्ष (Time and Aspect) की भूमिका : किसी भी प्रोक्ति की सम्पूर्ण क्रिया-पद्धति के साभिप्राय खण्डों को प्रकार्य के सन्दर्भ में वर्गीकृत किया जाता है । इस दृष्टि से विकास की मुख्य रूपरेखा के लिए प्रत्येक प्रोक्ति-प्रकार के अपने विशिष्ट काल एवं पक्ष होते हैं। किसी प्रदत्त काल, पद की उपस्थिति अपनी तात्कालिकता मे प्रोक्ति-प्रकार के रूप में पाठ के वर्गीकरण के विषय में हमे संकेत देती है । साय ही आद्यंत 'पाठ' में संसक्ति मुहैया करती है। 1. रॉबर्ट लांगेकर और स्टीफेन लेविनशन, 'फोल्ड एनालिसिस अंद डिस्कोस', करेंट ट्रेड्ज इन टैक्स्ट्स लिग्विस्टिक्स, सम्पा० वूल्फगैंग यू. ईसलर (न्यूयार्क: वाल्टर ही. ग्रटर, 1978), ए. 107-109 52 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन 2. 1. 1. 2. 2. निपात और प्रत्यप (Particles and Affixes) : क्रिया के साथ नियोजित निपात और प्रत्यय एक सीमा में काल और पक्ष को रेखांकित करते हैं । पर जव निपात और प्रत्यय संज्ञा के साथ सम्बद्ध होकर वाक्य या वाक्यांश मे मुक्त रूप में उपस्थित होते हैं तब ये भिन्न प्रकार को समस्या मुहैया करते हैं । ऐसी स्थिति में ये मुख्य प्रतिभागी बनाम केन्द्रीय चरित्र को रेखाकित करते हैं, गीण प्रतिभागी बनाम महत्त्वपूर्ण प्रतिभागी को दशति हैं और केन्द्रीय परिय बनाम द्वितीय महत्त्वपूर्ण प्रतिभागी को भी सामने लाते हैं । ऐसे निपात और प्रत्यय महत्त्वपूर्ण प्रतिभागियों के अतिरिक्त महत्त्वपूर्ण घटनाओं को भी सूचना देते हैं तथा भूमिका की प्रतिकूलता को भी दर्शाते हैं । ये विरोधी घटनाओं और कथ्य का परिचय देते हैं, तथा निराशा, कुठा जैसे अन्य स्थितियों को भी दर्शाते हैं। 2. 1. 1. 2. 3. प्रतिभागी को आध पुनरुक्ति (Participant Anaphora): प्रतिभागियों को उनके नाम के द्वारा, जातिवाचक संज्ञा के द्वारा, सर्वनाम, प्रत्यय के द्वारा यहाँ तक कि शून्य के द्वारा भी पहचाना जा सकता है । आद्य पुन- रुक्ति में इस प्रकार का भिन्नात्मक परिवर्तन सदेव अभिप्रेरित होता है । सामान्य तौर पर प्रतिभागी की आद्य पुनरुक्ति-श्रृंखला का क्षेत्र अनुच्छेद होता है । ऐसी शृंखला अनेक अनुच्छेदों तक जारी रह सकती है, यदि उसे कोई बाधित करने वाला तत्व सामने न हो । इस प्रकार प्रतिभागी की आद्य पुनरुक्ति भी संसक्ति की सृष्टि करती है। 2. 1. 1. 2. 4. संकेतवाचकता (Deictics): कुछ भाषाओं के प्रोक्ति-विन्यास में प्रतिभागियो के पदचिह्न को बनाये रखने के लिए 'यह', 'वह', 'एक', अथवा 'वह' जैसे निश्चित निर्देशी शब्दों का व्यवहार किया जाता है। ऐसे शब्दों के कभी-कभी बड़े ऊँचे विशिष्ट प्रकार्य होते हैं, जो केन्द्रीय चरित्र बनाम अन्य मुख्य प्रतिभागी अथवा मुख्य वनाम गोण प्रतिभागी अथवा उच्चतर श्रेणी बनाम निम्नतर श्रेणी प्रतिभागी अथवा कथा मे पहले से विद्यमान पात्र बनाम नवागत पात्र के द्वारा निश्चित किये जाते हैं। 2.1.1.2.5. शाब्दिक बन्धन और अन्वयन : (Lixicaltiss and Paraphrase) पर्याय अथवा विपरीतार्थकता जैसे शाब्दिक सम्बन्ध और सामान्य अर्थ-क्षेत्र के एकक-द्वय प्रायः सर्वविदित हैं । ये प्रोक्ति को संसक्त करने के सन्दर्भ में बहु- तेरे प्रकार्य सम्पन्न करते हैं। उदाहरण के लिए यह क्रिया, जो किसी प्रोक्ति के पृष्टाधार पर विराजती है, वह कोई इत्तफाकिया तौर पर उपस्थित मही , प्रोक्ति : संरचना-विवेचन dow... . होती, बल्कि इसके विपरीत वह सम्बद्ध अर्थगत क्षेत्रों से जुड़े तौर पर विशेष रूम में प्रस्तुत होती है । पर्यायी अर्थवत्ता, विरोधी अर्थवत्ता, विषयों की आवृत्तिा, संज्ञा पदबंधों के अधिजोड़ और शब्दों के ऐसे एकक जो विधाई, रूप से विशेष रूप तक मधिर क्रम में जुड़े होते हैं-ये सभी अन्वयन की विभिन्नता को सम्भव बनाते हैं। अन्वयन का सम्बन्ध किसी प्रोक्ति में वाक्य और वाक्य के वीच निकटतम बन्धन को जन्म देता है और विशेष रूप में सन्निहित अनुच्छेदों को संकेतित करता है । इस सन्दर्भ में एक विशेष प्रकार के शाब्दिक बन्धन को प्रत्याशा-श्रृंखला (Expectancy Chain) नाम दिया जाता है । इस तरह यदि यह कहा जाय कि 'उसने उस पर गोली चलाई और वह...', तो श्रोता या पाठक के लिए उस रिक्त स्थान पर 'मर गया' का शाब्दिक बन्धन विशिष्ट निपात प्रत्यय और क्रिया-विधि से विशेषीकृत होकर उपस्थित होता है, जिसे कुंठा या विफलीकरण (Frustration) कहते हैं। इसमें ऐसी प्रत्याशा उभरती है अथवा ऐसा सह सम्बन्धन होता है जो पूरा नहीं हो पाता । उदाहरण के लिए उसने बम्बई के लिए प्रस्थान किया, किन्तु वह वहां नहीं पहुंचा। 2. 1. 1. 2. 6. सारांश और पूर्व दर्शन (symmary and Preview): 'सारांश' और 'पूर्व दर्शन' को भी प्रोक्ति की बहिः संरचना के सन्दर्भ में महत्व प्राप्त है । सारांश भी एक प्रकार का अन्वयन है, जिसमें सामान्य लक्षण या प्रकथन और उसके स्थानापन्न का व्यवहार होता है। उदाहरण के लिए- 'वही वह सब कुछ है जो उन्होंने किया ।' 'पूर्व दर्शन' किसी प्रोक्ति मे उस पूर्व भाग को दर्शाता है, जिसका शेषांप बाद में उपस्थित होता है । 2.1.1.2.7. योजक और आरंभक (Conjunction and Introducers) : कई भाषाओं में योजकों की अपार सम्पत्ति भरी पड़ी है। भारोपीय भाषा- परिवार की भापाओ की यह विशिष्ट स्थिति है। दूसरे भापा-परिवार के भाषाओं में इसका काफी अभाव दिखता है । योजकों को प्रायः कालिक बनाम तार्किक योजक के रूप में वर्गीकृत किया जाता है । कुछ योजक स्थानिक होते है । वाक्यों के आरम्भिक के रूप में योजक वाक्य को अनुच्छेद के सन्दर्भ में उप- स्थित करते हैं और अनुच्छेद को प्रोक्ति के सन्दर्भ में । 2.1.1.2.8. पूर्व-संदर्भ (Back-Reference): इस कौशल के अन्तर्गत पूर्वागत वाक्य अथवा उसका भाग आगे आवर्तित होता है। यहाँ पूर्व सन्दर्भन का हू-ब-हू होना अपेक्षित नहीं है। यह नामीकृत हो सकता है, एक पर्याय के रूप में आ सकता है, अथवा किसी दूसरे रूप में भी उपस्थित हो सकता है, महत्त्वपूर्ण यह है कि पूर्व सन्दर्भन के प्रकार्य को संवीक्षित किया जाय । कई भाषाओं में यह इतना सहजात है कि प्रोक्ति को 54 प्रोक्ति: स्वरूप-विवेचन वाचिक अभिव्यक्ति में प्रत्येक परवर्ती वाक्य पूर्व सन्दर्भन के साथ उपस्थित होता है। 2. 1. 1. 3. एम. ए. के. हैलोहे के आधार पर प्रोक्ति को वाह्य संरचना : हैली द्वारा निदिष्ट संसक्ति के निम्नलिखित पांच प्रकार किसी भी प्रोक्ति को बाह्य संरचना का सृजन करते हैं- 2.1.1.3.1. निर्देशन (Refrence) 2.1.1.3.2. प्रतिस्थापन (Substitution) 2.1.1.3.3. अध्याहरण (Ellipsis) 2.1.1.3.4. शाब्दिक संसक्ति (Lexical Cohesion) 2.1.1.3.5. संयोजन (Conjunction) 2.1.1.3.1. निर्देशन (Reference): यह अनुवर्ती वाक्य में प्रयुक्त होने वाला यह शब्द है, जो प्रायः अन्य पुरुष सर्वनाम अथवा अथवा निश्चयवाचक सर्वनाम होता है। यह पूर्ववर्ती वाक्य में आये किसी नामिक या क्रिया-व्यापार को निर्दिष्ट करता है। यहाँ नामिक अथवा क्रिया-व्यापार के साथ पुरुषवाचक अथवा निश्चयवाचक सर्वनाम निर्देशी सम्बंध के बतौर संमक्त होता है। जैसे-~'लतिका नजदीक आ गयी थी। मैंने उसके मुखड़े को गौर से देखा । उसकी मांग सूनी थी।' यहाँ पूर्ववर्ती वाक्य के 'लतिका' नामिक को बाह्य संरचनात्मक रूप मे बाद के वाक्य मे आया "उसके' सार्वनामिक संसक्त करता है। 2.1.1.3.2. प्रतिस्थापन (Substitution) : प्रतिस्थापन के अन्तर्गत अनुवर्ती वाक्य मे आगे वाला शब्द ठीक उसी रूप में पूर्व वाक्य के नामिक को निर्दिष्ट नहीं करता, दूसरी तरफ के एकक को निर्दिष्ट करता है। उदाहरण के लिए निम्नलिखित प्रोक्ति को लें- (1) क्या आपको ऐसी चायदानी चाहिए ? (2) नही मुझे वाकार चाहिए । उक्त प्रोक्ति में दोनों वाक्यों की संसक्ति और के बीच बनती है। यही वर्गाकार 'ऐसी संसक्त हो रहा है। A 1. एम. ए. के. हैली लोंगमन, 1978 (ऑक्सफोर्ड :

प्रोक्ति : संरचना-विवेचन 55 2.1.1.3.2. अध्याहरण (Ellipsis) : 'अध्याहरण' वस्तुत: रूपांतरण-पदों में लोप को कहते हैं। प्रायः अनुवर्ती वाक्य में पूर्ववर्ती वाक्य के सुव्यक्त अंश को छोड़ दिया जाता है जहाँ अनुवर्ती वाक्य अपनी पूर्णता के लिए पूर्ववर्ती वाक्य पर आधारित होता है। वार्तालाप के बीच अध्याहरण को अत्यंत महत्त्वपूर्ण संसक्ति-कौशल के रूप मे लिया जाता है। साहित्यिक वार्तालाप में अध्याहरण आत्मीय निकटता और प्रगाढ़ता को भी दर्शाता है। 2.1.1.3.4. शाब्दिक संसषित (Lexical Cohesion): शाब्दिक संसक्ति के प्रकार वाक्य-रचना के स्तर से जुड़ते हैं। यहां संशा और क्रिया के द्वारा पाठात्मक संसक्ति का निर्माण दो रूपों में किया जाता है-- 2.1.1.3.4.1. शाब्दिक पुनरावृत्ति (Lexical Retiration) : 2.1.1.3.4.2. सन्निधान (Collocolion': 2.1.1.3.4.1. शाब्दिक पुनरावृत्ति (Leixic I Reiteration) : इसमें निर्देशन' और 'प्रतिस्थापन' की तरह सर्वनाम अथवा दूसरे प्रति- स्थापित एकक की अपेक्षा पूर्ण शब्दों का व्यवहार होता है। पहले वाक्य मे आया शब्द अनुवर्ती वाक्य में भी आवर्तित होता है । इस रूप मे या तो वह उस वस्तु को निर्दिष्ट करता है या उसी तरह के दूसरे पदार्थ को स्थापित करता है । 2.1.1.3.4.2. सन्निधान (Coilocation) : इसमे शब्द एक दूसरे की सहजोड़ी में आकर संसक्ति उत्पन्न करते हैं। सन्निधान को पाठात्मक संसक्ति का स्वाभाविक और अदृष्ट पहलू माना जाता है। 2.1.1.3.5. संयोजन (Conjunction): प्रोक्ति में वाक्यों का अनुक्रम परस्पर समंजसता की सृष्टि करता आगे बढ़ता है। इस प्रक्रिया में उनके बीच अनेक प्रकार के संबंध बनते हैं । इसमें कालिक अनुवर्तिता के अतिरिक्त कई प्रकार के तार्किक संयोजन सामने आते हैं, जिनमें निम्नलिखित तीन संयोजक महत्त्वपूर्ण हैं- 2.1.1.3.5.1. योगात्मक (Additive) : 2.1.1.3.5.2. विरोधात्मक (Adversative): और 2.1.1.3.5.3. कारणात्मक (Caurual):

- 56 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन 2.1.1.4, मिल्स एरिक एक्विस्ट के आधार पर प्रोक्ति की याह्य-संरचना: एक्विस्ट ने निम्नलियित संसक्ति-मूलक अवयव को मूलतः पाठ की गति की (Theme Dynamics) के संदर्भ मे निर्दिष्ट किया है, जिसका संबंध प्रोस्ति की बाह्य संरचना से बैठता है।' 2.1.1.4.1. आयतन (Repetition): इसमें पहले वाक्य में आये शब्द अथवा शब्दों को दूसरे वाक्य में दुहराया जाता है। प्रोक्ति में इस दोहराव के जरिये दो वाक्यों को एकसूत्र किया जाता है। आवर्तन प्रोक्ति/प्रतिपाद्य में गतिकी की सृष्टि करता है। एक्विस्ट ने इसे मारंभिक (Initial) और ऑतिक (Final) स्थिति पर आधारित करते हुए इसकी चार स्थितियां निर्दिष्ट की हैं--- (1) 'आ' से 'आ': इस स्थिति में पहले वाश्य का प्रारम्भिक शब्द दूसरे वाश्य में आरंभ में ही आवर्तित होकर आता है। यहाँ आवर्तन प्रोक्ति को ससक्त करता है। (2) 'भा से 'आँ': ऐसी स्थिति में जो शब्द पहले वाक्य के आरम्भ मे आता है, वह दूसरे वाक्य के भारम्भ मे आवर्तित नही होकर उसके अंत में आता है। यह स्थिति प्राधन्ता- वृत्ति को सिरजती है। (3) 'मां' से 'मा': जब पहले वाक्य के अन्त में आगत शब्द दूसरे वाक्य के आरम्भ में आता है तर आवर्तन का यह प्रकार-उपस्थित होता है। इसे आवर्तन का अन्ताद्यावृत्ति मूलक प्रकार कहते हैं। (4) 'ओ' से 'आँ': ऐसी स्थिति में पहले वाक्य के अन्त मे जो शब्द आता है, दूसरे वाक्य के अन्त में भी उस शब्द का आवर्तन होता है। आवर्तन का यह कौशल अन्तावृत्ति निर्भर होता है। 1. निल्ल एरिक एक्विस्ट, लिग्विस्टिक स्टायलिस्टिक्स (द हेग : मृतन, 1973), पृ. 117-118 प्रोक्ति :संरचना-विवेचन 57 2. 1. 1. 4. 2. निर्देशात्मक सन्दर्भ (Reference): इसमें एक वाक्य मे जिस शब्द का प्रयोग होता है दूसरे वाक्य में उसको दूसरे शब्द के द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है, जिससे प्रोक्ति मे दोनों वाक्य एक- सूत्र हो जाते हैं । इस दृष्टि से पहले वाक्य में आये नामिक के लिए दूसरे वाक्य में सार्वनामिक के प्रयोग की अपेक्षा होती है। 2. 1. 1. 4. 3. पर्याय-परकता (Synonymy): इसमे पहले वाक्य में व्यवहृत शब्द का दूसरा पर्याय व्यवहृत होता है। इस प्रकार यहां पर्याय एक प्रोक्ति के दो भिन्न वाक्यों को परस्पर सूत्रबद्ध करने में समर्थ होता है। 2. 1. 11 4. 4. विपरीतार्यकता (Antonymy) : जहां पहले वाक्यांश या वाक्य में सकरात्मक शब्दों के प्रयोग होते हैं वहीं दूसरे वाक्यांश या वाक्य में उसके विरोधी शब्दो के प्रयोग किये जाते हैं। वहाँ संसक्ति से प्रोक्ति को बाह्य संरचना संपुष्ट होती है। उदाहरणार्थ यदि किसी प्रोक्ति के पहले वाक्य में 'पुण्य' का प्रयोग हुआ हो और दूसरे वाक्य मे 'पाप' का या पहले वाक्य 'मुरूप' का व्यवहार हुआ हो और दूसरे वाक्य मे 'कुरूए' का या पहले वाक्य में 'रात' का व्यवहार हुआ हो और दूसरे में 'दिन' का, तो ऐसे वाक्य परस्पर 'विपरीतार्थकता' की दृष्टि से संसक्त होकर प्रोक्ति का निर्माण करते हैं। 2.1.1.4.5. तुलना (Comparison) : इसके अन्तर्गत किसी प्रोक्ति के दो वाक्यों मे पहले वाक्य में व्यक्त स्थिति से तुलना की जाती है। यहां दोनो को समता-विषमता या आनुपातिक कमी- वेशी को निर्दिष्ट करने वाली तुलना के द्वारा प्रोक्ति को संसक्ति प्राप्त होती है। 2.1.1.4.6. उच्चावच अर्थवत्ता (Hyponymy): उच्चावच अर्थवत्ता पर जी. एन. लोच ने विस्तार से विचार किया है। इसे अर्थ का 'अन्तनिवेशन' भी कहा जाता है। यह सम्बध ऐसे दो अर्थों के बीच होता है, जहां एक अवयवभूतार्थी सूत्र दूसरे सूत्र में उपलब्ध अभिलक्षणों को अपने यहाँ भी प्राप्त करता है। उदाहरण के लिए 'स्त्री' शब्द 'वयस्क' शब्द की उच्चावच अर्थवता है, क्योंकि जो दो अभिलक्षण 'वयस्क' को परिभाषित . 1. जी. एन. लीच, सिमेंटिक्स (बाल्टीमोर : पेंगुइन बुक्स लि., 1974. पुन- र्मुद्रण, 1976), पृ. 100-101, 120, 137, 250.

58 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन करते हैं वे दोनों ही 'स्त्री' की अवयवभूतार्थता मे प्राप्त हैं- वयस्क→+मनुष्य +वोट देने का अधिकार प्राप्त स्त्री-+मनुष्य +वयस्क -पुरुष उच्चावच अर्थवत्ता को वर्णित करने का एक दूसरा तरीका वंश (Genus) और व्यवछेदक (Differentia) का है। इनमे जो अधिक विशिष्ट पद होता है उसे उच्चावच अर्थवत्ता कहते हैं और जो अधिक सामान्य पद होता है उसे 'पराकोटि पद' (Supe:- Ordincl) कहते हैं इस तरह उच्चावच अर्थवत्ता अर्थ को दूसरे अर्थ मे समावेशी तौर पर रेखाकित करती है । उदाहरण के लिए 'पूर्वज' की उच्चावच अर्थवत्ता 'पितामह' है। उसी तरह 'लेना' की उच्चा- वच अर्थवत्ता 'चोरी करना है। अंग्रेजी 'Child' को उच्चावच अर्थवत्ता अग्रेजो 'Boy' है । 'फल' की उच्चावच अर्थवत्ता 'सेव' है । उक्त व्यवच्छेदक समावेशी दृष्टि से उच्चावच अर्थवत्ता के दो रूप होते हैं- 2. 1. 1. 4. 6. 1. संकुचनमूलक उच्चावच अर्थवत्ता और 2. 1. 1.4. 6. 2. विस्तारमूलक उच्चावच अर्थवत्ता • 1. संकुचनमूलक उच्चावच अर्थवत्ता : इस रूप में सामान्य से विशेष की ओर क्रियाशीलता होती है। उदाहरण द्रष्टव्य हैं-उत्सव के लिए फूल ले आया हूँ। गुलाब और गेंदा दोनो ही । यहाँ 'फूल' 'गुलाब' और 'गेंदा' की ओर आने के कारण संकुचनमूलक उच्चावच अर्थवत्ता है। 2. विस्तारमूलक उच्चावच अर्थवत्ता : विस्तारमूलक उच्चावच अर्थवत्ता विशेष से सामान्य की ओर क्रियाशील होती है । उदाहरणार्थ निम्नाकित प्रोक्ति को देखें-'तुम्हारे बगीचे मे गुलाब खूब खिले हैं। इस मौसम में और फूल तो होते नही हैं ।' यहाँ 'गुलाब' से 'फूल' की ओर बढ़ने के कारण विस्तारमूलक अर्थवत्ता प्राप्त होती है। .2.1.1.4.7. सहवर्गीयता या सहसदस्यता: जब किसी प्रोक्ति के दो वाक्यों में एक ही क्षेत्र (Field) की एकाधिक- प्रयुक्तियों (Registers) का व्यवहार किया जाय तब यहाँ प्रोक्ति सहवर्गीय शब्दों के कारण संसक्त होती है। उदाहरण द्रष्टव्य है-देव-प्रतिमा के सामने वह पूजा की आसनी पर बैठ गया। सामने घप, दीप, पुष्प, चन्दन, नैवेद्य पड़े थे।

प्रोक्ति : संरचना-विवेचन 59 यहां देव-प्रतिमा, पूजा, नवेद्य, धूपदीप, चन्दन-ये सभी सहवर्गीय शब्द हैं, जो प्रोक्ति को संसक्त कर रहे हैं। 2. 1. 2. प्रोक्ति : गहन संरचना किसी भी प्रोक्ति को गहन संरचना यद्यपि अभूतं होती है, पर बाह्य संरचना के प्रोक्तिपरक ढांचे में यह गहन अर्थ को कार्यान्वित करती है। साहित्यिक या कथात्मक प्रोक्ति में समेकित अप्रस्तुत विधान, अलंकार, अतिशयोक्ति, प्रतितथ्य- परक समीकरण गहन साँचे को लागू करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं । गहन सरचना के अन्तर्गत कथानक और अभिप्राय (Motifs) को भी ग्रहण किया जाता है ।। प्रोक्ति के अन्तहित स्तर (Imnanent Level) के अन्तर्गत प्रकार्यों के प्रारूप और प्रकर्ता की अवधारणा गहन सरचना-स्तर के प्रतिमान में एक सह- जोड़ी मूजित करती है। अन्तहित सतह न केवल कथानक को सार्वभौमिक संरचना को आधार तत्व के बतौर उपस्थित करती है, बल्कि मानवीय चिन्तन की प्रतीयमान सार्वभौम संरचना को भी उपस्थित करती है । प्रोक्ति की गहन संरचना उसकी औपचारिका पुनःरचना है जिसे गैरतकनीकी रूप मे प्रोक्ति का कथ्य या सूचना कहा जाता है। प्रोक्ति को इस गहन सरपना के दो भिन्न तत्त्व होते हैं, जहां वास्तविक वाक्यों और वाक्यों के अनुक्रमों के बीच तथा प्रोक्ति के अंशो और सम्पूर्ण प्रोक्ति के बीच अन्तर किया जाता है । गहन संरचना पाठ-व्यवस्था के आधार को संघटित करती हैं। वानडिज्क ने स्वाभाविक तर्कशास्त्र के रूप में इसे अत्यन्त विस्तार से 1972 में प्रस्तावित किया । इसे ही 'पाठ' का तर्कशास्त्र कहा जाता है। पाठ/प्रोक्ति का यह तर्क- शास्त्र वाक्यों के अनुक्रमो की ताकिक अभिव्यक्ति को प्रजनित करता है और तर्कशास्त्रीय सांचों के रूप मे क्रियाशील व्युत्पत्ति-नियमों को प्रजनित करता है। यद्यपि डॉ० श्रीवास्तव ने वाक्य और पाठ की संरचना का रूपातरण पाठ की विशद संरचना (Macro-Structur.) में तथा वाक्य की बाह्य संरचना का रूपांतरण पाठ की लघु संरचना (Micro Structure) मे निर्दिष्ट किया है, 1. एलेक्जेन्डर झोलकोवस्की, 'पोयम्ज', डिस्कोर्स ऐंड लिटरेचर, संपा० टी. ए. वानडिस्क (एमस्टर्डम : जॉन बेनजामिन पब्लिशिंग कम्पनी, 1985), पू० 110 2. इ.यू. मोमेव, 'फ्रेंच स्ट्रक्चरलिस्ट विउज ऑन नैरेटिव ग्रामर करेंट ट्रेन्डज इन टेक्स्ट लिग्विस्टिक्स, संपा० बूल्फ गैग यू. ड्रेसलर (न्यूयार्क : वाल्टर डी. यूटर, 1978), पृ० 156 0 प्रोषित : स्वरूप-विवेचन जिसफा माधार यानकि का चिन्तन है, किन्तु ई.यू. ग्रोसे (Grorse) ने झांसीसी चिन्तन के आधार पर बाल और गहन दोनों ही संरचनाओं में सर्प और विशद संरचना की बात की है। विशद (sfacro) गह्न (Micro) संरचना यहाँ होती है जहाँ घटनापरकता-निष्पन्नता-परिणाम का कम-से-कन एक प्रफर्ता उपस्थित होता है, परलघु संरचना यहाँ होती है जहाँ घटनापरकता-- निष्पन्नता-परिणाम की शृंगता में उपस्थित रहने वाला प्रकर्ता (Actaust) बिना सार्वनामीकरण के सहकत क (Acturt) में रूपांतरित हो जाता है । अत: प्रोक्ति को गहन संरचना में लघु (Micra) और विशद (Macro) दोनों ही संरचनाओं का विवेचन अभीष्ट है। प्रोपित की गहन-संरचना को तीन विचारकों के आधार पर निम्नलिखित शीर्षको में रेखांकित-विवेचित किया जा सकता है- 2. 1. 2. 1. वानडिस्क के आधार पर प्रोक्ति की गहन संरचना 2. 1. 2. 2. रोजर फाउलर के आधार पर प्रोक्ति की गहन संरचना । 2. 1. 2. 3. रवीन्द्रनाथ धीवास्तव के आधार पर प्रोक्ति की गहन संरचना। 2. 1. 2[ 1. वानडिस्क के अनुसार प्रोक्ति की गहन संरचना : वानडिज्क ने प्रोक्ति के द्वारा व्यक्त वाक्यों की श्रृंखला की पाठात्मक प्रकृति को परिभापित करते हुए जिस सर्वाधिक विशिष्ट विशेषता की चर्चा की है वह समंजसता (Coherence) का अर्थगत अभिलक्षण है । डिज्क ने समंजसता के दो प्रकार बताये है:- 2. 1. 2. 1. 1. स्थानिक समजसता (Local Coherence) और 2. 1. 2. 1. 2. व्यापक समंजसता (Global Coherence) 2. 1.2. 1. 1. स्थानिक समजसता (Local Coherence) : स्थानिक समंजसता लघु संरचना (Micro-Struclure) के स्तर पर क्रियाशील होती है। इसे पाठात्मक अनुक्रम के वाक्यों के बीच के सम्बन्धों पर विचार करने के क्रम में परिभाषित किया जाता है । यह शब्दो, वाक्यांशों और वाक्यों के योग में क्रियाशील होती है । प्रतिज्ञप्तियाँ इन्ही भाषिक सामग्रियों 1. ई. यू. ग्रोसे, 'फंच स्ट्रक्चरलिस्ट विउज ऑन नैरेटिव ग्रामर, करेंट ट्रेन इन टेक्सट लिग्विस्टिक्स, संपा० वूल्फ गैग यू. डेसलर (न्यूयार्क : वाल्टर डी ग्रूटर, 1978), पृ० 156 2. टी.ए. वानडिज्क, स्टडीज इन द प्रेग्मेटिक्स अब डिस्कोर्स (द हेगः मूतन, 1981), पृ. 268 प्रोक्ति : संरचना-विवेचन 61 से स्वरूपित होती हैं । प्रोक्ति की इस लघु संरचना में प्रतिज्ञप्तियाँ क्रमशः किसी कथ्य के व्योरेदार विस्तृत स्वरूप को निरूपित करती हैं। इसके विपरीत विशद संरचना में प्रतिज्ञप्तियां मुख्य घटनाओं के आधार पर पाठ को साकल्यपरक संघटना को निरूपित करती है । लघु संरचना-स्तर पर प्रतिज्ञप्तियां उच्चतर कम इकाइयों में अर्थपरक विशद नियमों के द्वारा संघटित होती हैं । लघु संरचना मे स्मरण की व्यापकता नहीं होने का कारण स्थानिक समंजसता ही है । लघु संरचना-स्तर पर क्रियाशील स्थानिक समंजसता के लिए आधार रूप में व्यापक समंजसता वाली निष्पन्न संरचना की उपेक्षा को नकारा नहीं जा सकता है । निम्नलिखित वाक्यों को लें- 1. मैंने टिकट खरीदा और अपनी जगह पर चला गया। 2. मैंने टिकट खरीदा और प्लेटफार्म की ओर बढ़ गया। 3. मैंने टिकट खरीदा और स्विमिंग पुल मे छलांग लगा ली। कपर उपस्थित प्रत्येक प्रोक्ति-अश सार्थक और स्थानिक तौर पर समंजस है, पर यह सार्थकता और समंजसता इनकी विशद संरचना से संबद्ध है। कहना न होगा कि उक्त प्रत्येक प्रोक्ति-अंश क्रमशः 'मैं सिनेमा गया', 'मैंने ट्रेन पकड़ी', और 'मैंने तैराकी की', जैसी कथ्यबीजात्मक विशद संरचना के सन्दर्भ मे ही सार्थक और समंजस है। वानडिज्क ने लघु संरचनात्मक स्थानिक समंजसता को दो रूपो मे निदिष्ट किया है-2. 1. 2. 1. 1. 1. तथ्य-निर्भर लघु संरचनात्मक स्थानिक सम- जसता और 2. 1. 2. 1. 1. 2 तत्व-निर्भर लघु संरचनात्मक स्थानिक समंजसता। 2. 1. 2. I. 1. 1. तथ्य-निर्भर लघु संरचनात्मक स्थानिक समंजसता : लघु सरचना मे दो प्रतिज्ञप्तियां उस स्थिति में परस्पर संयुक्त मानी जाती हैं जब उनसे व्यक्त होने वाले तथ्य परस्पर संबद्ध होते हैं। ऐसे संबन्ध सप्रतिबंध हुआ करते हैं। प्रतिज्ञप्ति से निरूपित होने वाला पहला तथ्य या तो परवर्ती तथ्य को अनुमत करता है या उसको संभावना बताता है अथवा उसकी अपेक्षा रखता है। यहां तक कि इन तथ्यों के बीच कालिक और क्रियार्थद्योतक सम्बन्ध भी अन्तर्मुक्त होते हैं, कोई तथ्य पहले आ सकता है, कोई साथ-साथ उपस्थित हो सकता है, और कोई पहले का अनुगमन कर सकता है, जहाँ जिसकी और जसी, प्रतिबंधित सम्बन्ध के बतौर, अपेक्षा होती हो। कोई तथ्य महज जोड़ने . 1 वानडिज्क, स्टडीज इन द प्रैग्मेटिक्स अव डिस्कोर्स (द हेग :म्तन 1981), पृ० 268 62 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन : वालीप में रूकड़ी के भी उपस्थित हो सकता है। 2. 1. 2. 1. 1. 2. तत्व-निर्भर लघु संरचनात्मक स्यानिक समंजसता : लघु संरचना के स्तर पर प्रोक्तिपरक (वाक्य और वाक्य के बीच का) समंजस सम्बन्ध विधेप (Predicates) और तक (Argu:nens) जैसे वाक्य- गत तत्वों, (Elem n's) के आपमी सम्बन्धों पर भी निर्भर करता है। इस दृष्टि से संबंधित प्रतिज्ञप्तियो मे गुणधर्म और व्यक्ति ममरूप हो सकते हैं, या उनका सम्बन्ध परस्पर सामीप्य का, अन्तर्भावन का और माधिपत्य का हो सकता है। पर इन सबसे भी स्थानिक समंजसता तभी स्वरूपित हो पाती है जब प्रति- शप्ति के सारे तथ्य सहसंबद हो, तथ्य (Facts)-निर्भर हो । उदाहरण के लिए निम्नलिखित वाक्यों को लें- 'नवीन सिनेमा गया। उसकी आंखें नीली हैं।' यहाँ ये दोनो वाक्य स्थानिक समंजसता का उदाहरण नहीं बन पा रहे हैं, पद्यपि ये दोनों ही वाक्य व्यक्ति विशेष नवीन के ही विषय मे दो संकेत प्रस्तुत कर रहे हैं । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि लघु मंरचना-स्तर पर स्थानिक समंजसता प्राय. एक संभावित समाज, एक स्थिति या घटनामों को एक दिशा से तथ्यों के संबद्ध होने पर ही स्वरूपित हो पाती हैं। वस्तुत. लघु-मरचना (Micro-Sr ucture) के स्तर पर अर्थ-वैज्ञानिक गह- नता प्रोक्ति के बाक्यों के अनुक्रम को प्रनिप्ति का अनुक्रम सौपती हैं। कुछ प्रति- ज्ञप्तियां एक वाक्य द्वारा भी अभिव्यक्त होती हैं, जो अर्थीय, तय्यकीय और शैलीय अवयवों पर आधारित होती हैं। यहाँ वे प्रतिज्ञप्तियो के अनुक्रमों और मिश्रित प्रतिज्ञप्तियों से जुडती हैं । वे मूलतः युग्म तौर पर संग्रथित होती हैं, जैसा स्वाभा- बिक भाषा मे सयोजकों के द्वारा अभिन्यंजित होता है। पर योजकों की स्थितियाँ तथ्यों के बीच के सम्बन्धों पर आधारित होती हैं। ये संभावित समाज में प्रति- ज्ञप्ति के अभिधेयक और प्रोक्ति-विषयक प्रासगिकता पर आधारित होती हैं। कहना न होगा कि संयोजक विशेष प्रकार की समंजसता ही है, जिन्हे प्रतिज्ञप्ति अनुक्रम के बतौर परिभाषित किया जाता है। पर ये केवल प्रोविन के विषय की प्रासंगिकता और सम्भावित समाज में तथ्यों के बीच के सम्बन्ध के बतौर परिभाषित नहीं होते, बल्कि प्रतिज्ञप्तियों के अंशो के बीच आन्तरिक और बाह्य मात के रूप मे परिमापित होते रहते हैं । प्रतिज्ञप्तियो के ये भाग, विधेय, तक 1. धानजिक, स्टडीज इन द प्रेग्मेटियस अब डिस्कोसं (द हेग : मूतन 1981), पु.269 2. टी. ए. वानडिक, स्टडीज इन २ प्रेग्मेटिक्स अव डिस्कोर्स (द हेग : मूतन, 1981), पृ. 269 प्रोक्ति : संरचना-विवेचन 63 और परिमाण वाचक विशेषण के रूप में उपस्थित होते हैं। 2. 1. 2. 1. 2. व्यापक समंजसता (Global Coherence): व्यापक समंजसता विशद सरचना Macro Structure) के स्तर पर क्रियाशील होती है। इसे वाक्यों के सारे पुलकों के रूप में परिभाषित किया जाता है। यहां प्रोक्ति साकल्प के रूप में उपस्थित होती है। व्यापक समजसता को ऐसी प्रोक्ति के साराश, विचार या कय्यवीज के रूप में ग्रहण किया जाता है। विशद संरचना प्रोक्ति की अर्थीय अभिव्यक्ति-स्तर की विशद और व्यापक अर्थवत्ता है । यह कहानी के समंजस निर्वचन के लिए आधार प्रस्तुत करती है। अनुच्छेदों मे विशद प्रतिज्ञप्तियां अर्थीय अभिव्यक्ति की उच्चतर सतह पर दूसरी विशद प्रतिज्ञप्तियो के द्वारा सन्निविष्ट की जाती हैं। विशद संरचना पाठन और वाचन के दौरान क्रियाशील रहती है तथा इसके बाद ही अस्तित्वमय हो पाती है । किसी भी कहानी या कथात्मक प्रोक्ति के अनिवार्य घटक के रूप में विशद संरचना को रेखांकित किया जाता है वानडिज्क ने गहन सरचना की समंजसता पर विचार करते हुए बाह्य संरचना की समंजसता से उसका अन्तर स्पष्ट किया है। उसके अनुसार जो पाठ बाह्य-संरचना के स्तर पर समंजसता नहीं दिखाते वे प्रायिक तौर पर बड़े अनुपात में गहन संरचना के स्तर पर समंजसता दिखाते हैं । वानडिज्क ने विशद सरचना पर विचार करते हुए उसके नियम, उसकी कोटियों और उसकी प्रतिज्ञप्तियो पर विचार किया है। उसका विशद संरचना मूलक चिंतन निम्नलिखित उपशीर्षको मे विवेच्य है-2.1.2.1.2.1. विशद- संरचना के नियम, 2.1.2.1.2.2. विशद संरचना की कोटियां और 2.1.2 1.2.3. विशद संरचना की प्रतिज्ञप्तियां ।। 2. 1. 2. 1. 2. 1. विशद संरचना के नियम : वानडिज्क ने विशद संरचना-विषयक चार प्रकार के नियमों का उल्लेख किया है, जिन्हें उसने एम० आर० (मैक्रो रूल्ज़) कहा है । इन्हें हिन्दी में वि० नि० (विशद नियम) कहा जा सकता है। इन नियमों मे पहला नियम 'अध्या- हरण' का, दूसरा 'सामान्यीकरण का, तीसरा 'चयन' का और चौथा 'प्रवचन' 1. टी. ए. वानडिज्क, स्टडीज इन द अंग्मेटिक्स अव डिस्कोर्स (द हैग: मूतन, 1981), पृ० 268 64 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचना 2.1.2.1.2.1.1. वि०नि०-1 अध्याहरण (Ellipsis) : इसमें प्रतिज्ञप्तियों के अनुक्रम में से अध्याहरण किया जाता है, जो प्रोक्ति-निर्देशी आकस्मिक अभिलक्षण को संकेतित करते हैं । 2.1.2.1.2.1.2. वि० वि०-- 2 सामान्यीकरण Genralization) : यहाँ प्रतिज्ञप्तियों में से किसी लघु प्रतिज्ञप्ति की तात्कालिक परा-अवधारणा को परिभाषित करने वाली प्रतिज्ञप्ति के द्वारा किसी भी अनुवत्तंन को प्रति- स्थापित किया जाता है। 2.1.2.1.2.1. 3. वि०नि०-3 चयन (Selection) : यहाँ प्रतिज्ञप्तियों के अनुक्रम मे से किसी दूसरी प्रतिज्ञप्ति द्वारा संकेतित. तथ्य के परिणाम या घटक या सामान्य स्थिति को अभिव्यक्त करने वाली सभी प्रतिज्ञप्तियों को अध्याहृत कर चयन प्रस्तुत किया जाता है । 2.1.2.1.2.1.4. वि०नि०~4 प्ररचन (Construction): यहाँ प्रतिज्ञप्तियों के अनुक्रम में से प्रत्येक अनुवत्तंन को एक प्रतिज्ञप्ति के द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है, यदि वे उन्हें प्रतिस्थापित करने वाली विशद प्रतिज्ञप्तियों के परिणाम या घटक या सामान्य स्थितियों को संकेतित करते हैं। यहाँ यह द्रष्टव्य है कि वि०नि० -1. और वि०नि०-2 में सूचना अप्राप्य रूप में होती है, जबकि वि०नि० 3. और वि नि० 4 में सूचना आंशिक तौर पर अवधारणा के सामान्य ज्ञान और सामान्य स्थिति--घटको और अनुवर्तन से जुड़े मनोभाव-के द्वारा प्राप्य होती हैं। 2.1.2.1.2.2. विशद संरचना कोटियाँ: वानडिस्क ने प्रोक्ति की विशद संरचना से जुडी कुछ कोटियो का भी उल्लेख किया है। जो निम्नलिखित हैं- 2.1.2.1.2.2.1. परिदृश्य (Setting) 2.1.2.1.2.2.2. जटिलता (Complication) 2.1.2.1.2.2.3. प्रस्ताव (Resolution) 2.1.2.1.2.2.4. मूल्याकन (Evaluation) 2.1.2.1.2.2.5. नीति-वचन (Moral) विशद संरचना को संघटित करने वाली ये कोटियो आख्यानक की ऊया- धर वाक्य-रचना और प्रिया-वर्णन से और अधिक सामान्य अवधारणाओं पर बाधारित होती हैं। ये क्रिया की अवधारणा, प्रिया की सफलता को शता, त्रिया के अनुवसंक पटक और स्थितियों तथा क्रिया के विभिन्न प्ररूपों पर आधारित प्रोक्ति : संरचना-विवेचन : 65 होती हैं । सामान्य तौर पर क्रिया-प्रोक्ति के लिए आधारित होने वाले विशद नियमों को अलग-अलग उल्लिखित किया जाता है, क्योकि यह ज्ञात है कि अभिसूबन-अमूर्तन के खास-स्तर तक किस तरह की प्रतिज्ञप्तियां समीचीन क्रिया- विवरण में प्रासंगिक हैं और किस तरह की नहीं। 2.1.2.1.2.3. विशद संरचना की प्रतिज्ञप्तियां: एक प्रदत्त क्रिया-प्रोक्ति में सामान्य तौर पर निम्नलिखित प्रकार की प्रति- ज्ञप्तियां निकाली जा सकती हैं। 2.1.2.1.2.3.1. क्रिया के लिए कारणों, उद्देश्यों, अभिप्रायों का विवरण और क्रियाओं का मानसिक-अनुवर्तन । 2.1.2.1.2.3.2. घटनाओं के वैकल्पिक सम्भाव्य मार्ग का विवरण । 2.1.2.1.2.3.3. ऐसी सहायक क्रियाओ का विवरण, जो सामान्य हैं । 2.1.2.1.2.3.4. स्थितियो के अभिलक्षणो का विवरण । 2.1.2.1.2.3.5. घोपित आवर्तित और पुनगृहीत या टिप्पणित या दूसरी प्रतिज्ञप्तियों पर टिप्पणी की जाने वाली प्रति- ज्ञप्तियों का अधिविवरण । 2.1.2.1.2.3.6. वार्तालाप का विवरण । इन नियमों का अनुप्रयोग किसी भी क्रिया-प्रोक्ति के लिए एक विशद संरचना प्रस्तुत करती है । आख्यानक कोटियां भी यह अपेक्षा रखती हैं कि प्रत्येक कोटि विशद संरचना में अवश्य प्रस्तुत हो। दूसरे शब्दों में आख्यानक प्रोक्ति की विशद संरचनाएं अपने-आप में आख्यानक संरचना उपस्थित करती हैं । 2.1.2.2. रोजर फाउलर के आधार पर प्रोक्ति की गहन संरचना : रोजर फाउलर ने गहन सरचना, जिसे वाक्य या प्रोक्ति में निहित अमूर्त कथ्य कहा गया है, के दो पहलू निर्दिष्ट किये है1- 2. 1. 2. 2. 1. प्रतिज्ञप्ति (Proposition) और 2. 1. 2. 2. 2. वृत्तिकता (Modality) 2.1.2 2.1. प्रतिज्ञप्ति (Proposition) गहन सरचना के प्रतिज्ञप्तिमूलक भाग का विश्लेषण वस्तुत: संज्ञानात्मक कम्य का केन्द्रक है, जिस पर सारा अर्थ निमित होता है। प्रतिज्ञप्ति वस्तुतः अर्थपरक नाभिक है और प्रतिज्ञप्ति का नाभिक विधेय (प्रेडिकेट) अनेक प्रकार 1. रोजर फाउलर, लिग्विस्टिक्स ऐंड द नविल (लंडन : मेथुइन, 1977 पुन- भदण, 19791,4012 66 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन : अर्म-प्ररूपों में वर्गी होता है। इनमें गढ़ने, दौड़ने, हंगने, अंगो क्रियाएं, विवाग करने, गुनने, जानने, उदा होने जैसी स्थितियों' और तोड़ने, बन्द करने जैसी स्थितियों का पदनाय सम्मिलित होता है। 'प्रतिमप्ति' में किया और स्पितियों का परियतन सामान्यतः क्रियाओं के द्वारा ही अभिय्यमत होता है, जबकि स्पिनिया विशेषण के द्वारा अभिव्यक्त होती है और इनका विधेय (Predicate) जानना, गुनना, देपना, त्रियाओं के द्वारा अन्वित होता है ।। प्रतिमप्तिमूलक विधेय यहुतेरे मूल अपंगत प्ररूपो में उपस्थित होता है, जो उनको दिलचस्प तौर पर इस संसार में बहुत नजदीक से उत्तर देता हुआ दिखाई देता है। यह मनुष्य के द्वारा व्यक्त गुण, धर्म, गर्म और परिवर्तन को प्रत्यक्षा करने के मार्ग का बुनियादी अन्तर भी स्पष्ट करता है । इसमे कुछ कार्य- ध्यापार हैं, जैसे चढना, दौड़ना, हेसना, शोर मरना; कुछ स्थितियां हैं, जैसे विश्वास करना, सुनना, जानना, लम्बा, उदास, चौड़ा, और कुछ स्थितियो का बदलाय है जैसे तोड़ना, बन्द करना, फैलाना । इनमे क्रियाएं और स्थितियो का बदलाय सामान्यत: क्रियाओं के द्वारा अभिव्यक्त होता है, जबकि स्थितिया क्रियाओं और विशेषण के द्वारा । नाभिक प्रायः विधेय से व्युत्पन्न होते हैं, जो विभिन्न अर्थीय प्ररूपो के अन्तहित विधेयों की शृंखला को प्रच्छन्न करते हैं । जैसे भाईचारा (स्पिति), राष्ट्रीयकरण (स्थिति का बदलाय) और घोषणा (क्रिया-व्यापार)। कोई भी प्रतिज्ञप्ति एक संज्ञा या कई संगाओ के साथ विधेय को जोड़कर पूर्ण हो जाती है । यदि एक विधेय एक घटना या किसी मामले की स्थिति को सम्प्रेषित करता है, तो इसमे सहयुक्त सज्ञाएं पटना-विशेष में प्रति- भागियों को निर्दिष्ट करती हैं । विधेय और संज्ञा के बीच दो प्रकार के सहसबंध द्रष्टव्य हैं। पहले तो विधेय का चयन सज्ञा की संख्या को निर्धारित करता है, जिसे साथ चलने के लिए चुना जा सकता है। यहाँ यह उस अर्थ को पूर्णता देने के लिए कभी एक और कभी एक से अधिक नामो को चुनता है । यथा-'मनीष लम्बा है अथवा 'एक प्रसन्न बालिका ।' क्रिया-व्यापार मूलक विधेय एक सज्ञा की अपेक्षा रखता है, जो सक्रिय प्रतिभागी को निर्दिष्ट करती है। जैसे-'बच्चों ने नाचा या 'गाती चिडियां। स्थितियों के बदलाव' का विधेय साथ चलती सज्ञाओं से जुडता है । जैसे- खिडकी टूट गयी। श्वेता ने खिड़की तोडी। स्वेता ने पत्थर से खिड़की तोड़ी। 1. रोजर फाउलर, 'डोप स्ट्रक्चर एड सर्फेस स्ट्रक्चर : एलिमेट्स व डीप स्ट्रक्चर, लिंग्विस्टिक्स एंड द नॉवेल, (लण्डन : मैथुइन, 1977, पुनर्मुद्रण 1979), पृ. 12, 13, 14, प्रोक्ति: संरचना-विवेचन 67 यहां संज्ञा और विधेय के बीच का सम्बन्ध उस तथ्य से जुड़ा है, जिसमें विशेष प्रकार को संज्ञाओं के विशेष प्रकार के विधेय के साथ जुड़ने पर विचार किया जाता है । गहन संरचना में संज्ञाएं विभिन्न भूमिकाएं अदा करती हैं। इन संज्ञाओ के अथं पर विचार किया जाता है । मूलतः कई संज्ञाओ को वहन करने थाले एक विधेयात्मक वाक्य पर, जैसे-'श्वेता ने पत्थर से खिडकी तोड़ी।' तव यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि विभिन्न संज्ञाएं विधेय के साथ विभिन्न भूमिकाए अदा करती हैं। उक्त वाक्य में श्वेता एक क्रिया-व्यापार की सजीव 'उत्तेजक' के बतौर सामने आती है, जहां उसकी भूमिका प्रकर्ता की होती है। इसी तरह 'बच्चों ने नाचा' वाक्य में 'बच्चे' और 'गाती चिड़ियां' में 'चिड़िया' भी प्रकर्ता की भूमिका में हैं। पर पहले आये वाक्य 'मनीप लम्बा है और "एक प्रसन्न वालिका' में 'मनीप' और 'बालिका' प्रकर्ता नहीं हैं, क्योकि वहाँ कोई कार्य-व्यापार सम्पन्न नहीं हो रहा है। इसी तरह खिड़की' प्रकर्ता नहीं होकर कर्म है। पर यह कर्म व्याकरण का बाह्य-संरचनात्मक कर्म है, बल्कि अर्थपरक गहन संरचनात्मक भूमिका अदा करने वाला कर्म नहीं है, जो श्वेता की क्रिया के द्वारा 'टूटने' की स्थिति में आया है । स्पष्ट है कि कोई भी अर्थपरक कर्म बाह्य-संरचनात्मक रूप में वाक्य की बहुतेरी स्थितियों में उपस्थित हो सकता है। यहाँ तक कि वह कर्ता की जगह भी ले सकता है और क्रिया के पहले भी आ सकता है। उदाहरण के लिए खिड़की टूटी', 'चाबी रख दी गयी।' पर प्रतिज्ञप्ति के अधीन इनका अध्ययन गहन संरचना को ही स्पष्ट करता है । वस्तुतः यह संज्ञा और विधेय के बीच का सम्बंध है, जो प्रतिज्ञप्ति के अर्थीय स्तर को प्रतिष्ठित करता है, जहां प्रकर्ता और क्रिया जैसे सम्बंध को रेखांकित किया जाता है। 2. 1. 2. 2. 2. वृत्तिकता (Modality) : वृत्तिकता के अन्तर्गत वैसे सारे अभिलक्षणो का समावेश होता है, जिसे वक्ता या लेखक को अभिवृत्ति, प्रतिबद्धता, किसी उद्गार मे प्रतिज्ञप्तिमूलक वस्तु की अनुप्रयोज्यता या मूल्यवत्ता और सहवर्ती रूप मे सम्बोधिती के साथ उसको नातेदारी के बतौर देखा जा सकता है। यद्यपि भापा में क्रियायद्योतक (Modal) या क्रियाविशेषण के द्वारा अभि- व्यक्त होने वाले प्रतीति-दिशेपक या प्रतिबद्धता-निर्देशक को भापाविज्ञान के पारम्परीण अर्थ मे वृत्तिकता (Modality) को संघटित करने वाला माना जाता है किन्तु फाउलर इसे अधिक बृहत्तर एवं व्यापक अर्थ में व्यवहृत करता 1. रोजर फाउलर, 'एलिमेंट्स अॅव डीप स्ट्रक्चर, लिंग्विस्टिक्स एड द नॉवेल (लडन : मैथुइन एड कं. 1977, पुनर्मुद्रण, 1979), पृ. 13.

68 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन है। वह इसे भापा के साम्प्रेपगिक व्यापार में वैयक्तिक और अन्तर-वैयक्तिक प्रतिभागिता, प्रतिज्ञप्तिमूलक सामग्री तथा सम्बोधिती के प्रति प्रसन्न वक्ता की अभिवृत्ति, निष्पन्न होने वाला विशेष वचन-कर्म और जहां प्रासंगिक हो, वहाँ श्रोता और सम्बोधिती पर उसके अभिप्रेत प्रभाव के साथ जोड़ता है । फाउलर के अनुसार आख्यानक प्रोक्ति में वृत्तिकता सीधे तौर पर 2.1.2. 2.2. 1. दृष्टिकोण, 2.1.2.2.2.2. लेखकीय और उत्तारकीय स्वर 2.1.2.2. 2.3. रचनाकार और चरित्र-सबंध, 2.12.2.2.4. व्यक्ति शैली और 2.1.2. 2.2.5. सामाजिक संरचना की विकसित बनाम प्रतिबंधित भाषिकता से जुड़ती 2.1.2.2.2.1. दृष्टिकोण (Point of View): वृत्तिकता के अन्तर्गत दृष्टिकोण को व्यापक महत्त्व प्रदान किया गया है । इसका विवेचन दो रूपो मे प्राप्त होता है- 2.1.2.2.2.1.1. दृष्टिकोण . परिप्रेक्ष्य (Point of View : perspective) 2.1.2.2.2.1.2. दृष्टिकोण : अभिवृत्ति (Point of View : Attitude) परिप्रेक्ष्य जहाँ देखने की बाह्य स्थिति के साथ जुडता है वहाँ अभिवृत्ति आन्तरिकता के साथ जुड़ती है। 2.1.2.2.1.1. दृष्टिकोण : परिप्रेक्ष्य (Point of View : perspective): वृत्तिकता के अन्तर्गत दृष्टिकोण का परिप्रेक्ष्य चाक्षुष कलाओ मे देखने की स्थिति से जुड़ता है। वस्तुतः यह वह कोण है, जिससे अभिव्यक्त होने वाली वस्तु को देखा जाता है। चित्रकला प्रायः परिदृश्यात्मक सांचे मे रची जाती है । यह सांचा एक विशेष नुकते से देखे जाने की मांग करता है। चित्रकार अपनी कृति को ऐसी संरचना इस रूप में प्रदान करता है, मानो वह दृश्य स्थिति आदर्श दर्शक को अपनाने का अधिदेश दे रही है। ठीक उसी प्रकार साहित्यिक पाठों मे भी रचनाकार और पाठक के बीच के रिश्ते और उसकी समस्या होती है । इसमें स्थल और काल दोनो दृष्टियों से स्थिति का अंकन अन्तर्हित होता है । रचयिता और कथाकार को बहुत दूर या बहुत नजदीक रहना होता है । उसे 1. रोजर फाउलर, ‘एलिमेट्स अॅव डीप स्ट्रक्चर, लिग्विस्टिक्स ऐंड द नावेल (लंडन : मैयुइन एण्ड कं., 1977, पुनर्मुद्रण, 1979), पृ.43 2. वही, पृ.71-122 प्रोक्ति : संरचना-विवेचन ऐतिहासिक तथ्यों के सम्पादक के बतौर पेश होना पड़ता है अथवा 69... गवाह के बतौर सामने आना होता है। ऐतिहासिक कहानियों और में रचनाकार अपने और पाठकों के बीच काल का ऐसा, अन्तराल करता है। कालगत दूरी भूतकालीन वाक्यों के द्वारा छूट चुकी आदतो रीतियों को अच्छी तरह पेश करती है। हेमिग्वे के यहाँ आख्यानककार मो अप्रतिवद्ध दोखता है। पर वह एक निश्चित दश्य स्थिति किसी भोजनकक्ष 'फिट' किए गए कैमरे की तरह मुहैया करता है। इस तरह परिदृश्य के अन्त- गंत स्थलीय और कालिक चेतना को महत्त्व दिया जाता है ।। स्पष्ट है कि परिप्रेक्ष्य वस्तुतः यह दृश्य अक्ष है, जिसके अन्तर्गत घट रही घटना को 'समय' और 'स्थान' के नजरिये से निर्दिष्ट किया जाता है। हिन्दी में डॉ. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ने 'दृश्य' अक्ष पर फाउलर के चिंतन के सन्दर्भ में विचार किया है तथा डॉ. 'शीतांशु' ने भारती को 'काव्य-प्रोक्ति' 'मुनादी' का इस दृष्टि से विवेचन किया है।' 2.1.2.2.2.1.2. दृष्टिकोण : अभिवृत्ति (Point of View : Attitude) परिदृश्य के साथ अभिवृत्ति का नुकता महत्त्वपूर्ण है । इसके अन्तर्गत अभि- व्यक्त वस्तु के प्रति निश्चित दृष्टि को ग्रहण किया जाता है, जिसका महत्त्व संरचना में बुनियादी तौर पर मान्य है । 'दृष्टि' में रचयिता के स्वर को रेखां- कित किया जाता है। वस्तुतः रचनात्मक प्रोक्ति मे यह 'प्रच्छन्न' वक्ता होता है, जो अपने विषय के साथ खासतौर पर जुड़ा होता है और पाठकों के प्रति मुद्रा ग्रहण करता चलता है । सी. बूथ (C. Booth) के अनुसार कोई भी रचना जो रचनाकार द्वार रची जाती है, वह न तो तटस्थ होती है और न वस्तुनिष्ठ । हमें प्रत्येक रचना के भीतर से एक प्रच्छन्न वक्ता झांकता हुआ मिल सकता है । बूथ कृति की संरचना में निहित इस 'दृष्टि' को केन्द्रीय तथ्य के बतौर स्वीकार करता है। वस्तुत: भाषा एक अत्यंत सशक्त और प्रतिबद्ध माध्यम है, जो हमे बिना किसी 'दृष्टि' को अभिसूचित किये कुछ भी कहने के लिए अनुमत नहीं करती है। जब हम वोलते या लिखते हैं, तो हमारे वे शब्द या वाक्य, जिन्हें - 1. रोजर फाउलर, 'डिस्कोर्स', लिग्विस्टिक्स ऐण्ड द नावेल, (लंडन : मैयुइन एण्ड कं., 1977, पुनर्मुद्रण 1979), पृ. 72 2. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, 'प्रोक्ति और दृष्टिशैली' संरचनात्मक शैली-विज्ञान (दिल्ली: आलेख प्रकाशन, 1979), पृ. 87-88 3. पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु' 'मुनादी: दृश्य अक्षीय विश्लेषण, भारती की काव्यभापा (करनाल : नटराज पब्लिशिंग हाउस, 1985), पृ. 91-93 प्रोक्ति : स्वरूप-विवेचन i या थोता के लिए हम चुनते हैं, इस तरह की सशक्त साभिप्रायता का वहन करते हैं। भाषा के साथ सांसारिक दृष्टि और समुदाय दोनों की निस्संदिग्ध पारस्- परिक संबद्धता भी प्रोक्ति की गहन संरचना की अभिवृत्ति से जुड़ी है। यही अन्तर-वैयक्तिक भापिक संरचना को विचारात्मक उत्तर प्राप्त होता है। दृष्टिकोणमूलक अभिवृति का एक और रूप भापा की गहन संरचना में चयनित वाक्य-संरचना और शब्दावली से जुड़ा है, जहाँ यह सामाजिक वर्ग को प्रकृति और संरचना का द्योतक सिद्ध होता है । दृष्टिकोणमूलक अभिवृत्ति के रूप में प्रोक्ति-भाषा रचनाकार की विषय- वस्तु की अवधारणा से अभियोजित होती है । आख्यानकीय प्रोक्ति मे उत्तारक की भाषा पात्रों की चेतना की भाया के प्रति और संरचना के प्रति अपनी प्रति क्रिया व्यक्त करती है। मिखाइल बख्तिन के अनुसार यही 'एक स्वर का दूसरे स्वर पर प्रभाव, एक पात्र की चेतना का उत्तारकीय भाव-बोध और वाकोपवयाकी (डॉयलॉजिक) 'संरचना' है।' 2.1.2.2.2.2. लेखकीय और उत्तारकीय स्वर (Author's and Narrator's Voice) कोई भी आख्यानक प्रोक्ति लेखकीय/आख्यानकीय स्वर से युक्त होती है । गहन संरचनात्मक स्तर पर इसे पहचानने और सुनने की अपेक्षा होती है। बूथ ने लिखा है कि रचना में बोलने वाले बहुतेरे स्वरो के बीच अन्तर करने को आवश्यकता है। उसके अनुसार किसी भी आख्यानक को सीधे या नाटकीय रूप में केवल 'दिखाया' या पेश नहीं किया जाता है। कोई भी रचना बिना रचनाकार की दखलअदाजी और टिप्पणी के स्वरूपित नहीं हो पाती है। किसी भी रचनात्मक प्रोक्ति में बराबर एक वक्ता बना होता है जो अपनी दखलअंदाजी और टिप्पणी से बाज नहीं आता। रूसी रूपवादियो ने जो 'फेबुला' और 'सुजेत' का अन्तर किया था, उनमे 'सुजेत' इस दखलअदाजी को ही पेश करता है जहाँ रचना रचनाकार केद्वारा व्यवस्थित और सम्पादित की जाती है। प्रश्न यह उठता है कि रचना मे वस्तुतः यह बोलने वाला व्यक्ति कौन है ? बूथ के अनुसार एक वास्तविक रचयिता होता है और एक प्रच्छन्न रचयिता । वास्तविक रचयिता वह है जो नाश्ता के बाद अपनी मेज पर अपनी कलम या टाइपराइटर लेकर बैठ जाता है, पर रचना मे इस वास्तविक रचना- कार की दृष्टि या अनुभवों के विषय में नहीं सोचा जाना चाहिए। यह सही है कि किसी रचनाकार की रचना को पढ़ते हुए रचनाकार के विषय में हम 1. उत्त, रोजर फाउलर, "हिस्कार्म', लिंग्विस्टिक्म ऐंड द नावेल (संडन : मपुइन एण्ड कं. 1977, पुनर्मुद्रण, 1979), पृ. 78.

कार . प्रोक्ति : संरचना-विवेचन जितना जानते हैं, उसके साथ-साथ उसे समझने की कोशिश को जाते 71 एक व्यक्ति-रचनाकार के विषय मे हम जो भी जानते हैं, उसे दूसे रचनाकार के संदर्भ में लागू नहीं कर सकते हैं। बूथ ने इसके बावजूद द्वारा पेश किये गये रचनात्मक सिद्धांत के बतौर 'प्रच्छन्न रचना की धारणा को अधिमानता प्रदान की है। किसी रचनाकार का अभिको उसके लेखक और उसके पाठक दोनों को उपस्थित करता है । यह वास्तव मे रचना की संरचना है, जो रचनाकार की परिभाषा करने में अपना योगदान करती है । रचना में कौन बोलता है, इसका उत्तर यह दिया गया है कि रचना स्वयं बोलती है, पर यह भी कहा गया है कि रचना के अर्थ का एकमात्र उत्पादक केवल पाठक होता है । 'प्रच्छन्न रचनाकार' की धारणा के साथ इन दोनों मान्यताओं की संगति बैठती है । 'पाठ स्वय बोलता है---यह धारणा अपना सही स्रोत या उत्स आख्यानक प्रोक्ति के स्वर के लिए भाषा की जनपरम्परा में प्राप्त करती है, जहां रचनाकार एक सरलीकृत माध्यम के रूप में प्रस्तुत होता है। रचना जो एक बार लिखी जाती है लेखन-कर्म से मुक्त हो जाती है और 'जन' की हो जाती है। आख्यानक रचना संस्कृतियो की परम्पराओं की अन्तर-क्रियाओ से उत्पन्न होती है तथा अन्तर-वैयक्तिक रूप मे प्रस्तुत होती पाठक औपन्यामिक प्रोक्ति में निहित उन संकेतो की पहचान करता है, जो उपन्यासकार के द्वारा 'प्रच्छन्न रचनाकार' 'उत्तारक' या 'मैं' प्रतिमा या चरित्र का पुनरंचक स्वर या वैयक्तिक भूमिका के स्तर पर किसी औपन्यामिक प्रोक्ति की वाकोपवाकी संरचना में प्रतिभागियो के लिए विशदीकृत किये जाते हैं। लेखकीय और उत्तारकीय स्वरों को पहचानने के लिए 'मैं' प्रतिमा (I- Image) की विविध भूमिकाओ को रेखाकित करने की अपेक्षा होती है । आख्यानक प्रोक्तियों में यह 'मैं' प्रतिमा उत्तारकीय स्वर और लेखकीय स्वर-- दोनों ही भूमिकाओं में सामने आती है। 'मैं' प्रतिमा का पहला प्रकार वह है, जहां वह लेखकीय अभिज्ञान से परे उत्तारकीय पहचान के बतौर सामने आती है, जहाँ वह अपना वैयक्तिक इतिवृत्त एक नितात वैयक्तिक शैली में उपस्थित करती है। फाउलर ऐसे स्वर को अपराध- स्वीकारी उत्तारक का स्वर मानता है। एक दूसरे प्रकार की 'मैं' प्रतिमा ऐसे कथावाचक को उजागर करती है, जो अपराध स्वीकारी उत्तारक की ही तरह लेखक से स्पष्ट तौर पर अलग होता है, पर यहां वह अपने क्त पर कम रोशनी डालता हुआ उन घटनाओ की कतार के विषय में अधिक बताता है, जिसका 1. रोजर फाउलर, 'डिस्कोर्स', लिग्विस्टिक्स एण्ड द नावेल (लहन : मंयुइन एण्ड कं0 1977, पुनर्मुद्रण, 1979), पृ. 83 प्रोक्ति: स्वरूप-विवेच प्रश्मदीद गवाह रह चुका होता है। एक तीसरे प्रकार की 'मैं' प्रतिमा वहाँ प्ति होती है, जहां वह किसी ऐसे अन्य पुरुष के इतिवृत्त को बताती है, जिससे वह बहुत निकटता-अंतरंगता से परिचित रही हो। इन सभी उतारकीय स्थितियो में प्रच्छन्न लेखक के द्वारा 'मैं' प्रतिमा को व्यंग्यपूर्ण रूप मे ग्रहण किया जा सकता है । उत्तारक का स्वर यहां आत्मप्रवंचक भी हो सकता है अथवा प्रच्छन्न लेखक उसे सीधे ही दबाव डालकर प्रस्तुत कर सकता है। चोये प्रकार की 'मैं' प्रतिमा वह है, जो प्रच्छन्न लेखक के साथ अत्यंत नाजुक रिश्तेदारी में उपस्थित होती है । यहाँ 'मैं' प्रतिमा वस्तुतः वह 'वक्ता' है, जो काल्पनिक न होकर वास्तविक लेखक होने का दावा करता है। 2.1.2.2.2.3. प्रोक्ति में रचनाकार और चरित्र-सम्बन्ध रचना मे रचनाकार प्रोक्ति की गहन संरचना में वृत्तिकता के द्वारा अपने चरित्र या पात्रों के क्रिया-कलाप, विचार, प्रस्तुति और दूसरी गुणवत्ताओं को नियंत्रित करता है । पर अपने पात्रों की उपस्थिति में वह न तो प्रकट होता है और न गोपन रहता है । वह चाहे तो कठपुतली नचाने वाले उस्ताद (Puppet. Master) के बतौर सामने आ भी सकता है और नही भी आ सकता है। उसके पास बहुत-सारे विकल्प होते हैं, जिनके जरिये यह निर्णीत हो पाता है कि "कितना' और 'कैसे' वह अपने पात्रो की चेतना को मुक्त होने के लिए अनुमत करे । यही यह भी तय होता है कि किस सीमा तक और कैसे वह अपने विचारो से उन्हें प्रेरित और प्रभावित करे । रचना या आख्यानक मे यह सब कुछ भाषिक विकल्पों के जरिये ही सम्पन्न होता है। यहां कोई भी रचनाकार के शब्दों के चयन और उसकी वाक्यगत सरचना के जरिये एक-दूसरे के प्रति व्यक्त किये जाने वाले रुख को समझ सकता है। फाउलर ने रचनाकार के साथ चरित्रो से बन रहे इस सम्बन्ध का 2.1.2.2.3.1. आभ्यंतर दृष्टि और 2.1.2.2.3.2. बाह्य दृष्टि के रूप में रेखांकित किया है। 2.1.2.2.2.3.1. आन्तरिक दृष्टि । फाउलर के अनुसार आन्तरिक दृष्टि पात्रों को मस्तिष्कीय स्थिति, उनकी प्रतिक्रियाओं और अभिप्रायों मे देखी जाती है । इसे रचनाकार की टिप्पणी अथवा स्वगत, एकालाप चेतना-प्रवाह जैसी तकनीक मे देखा जाता है । आन्तरिक परिप्रेक्ष्य की परम्परा के भीतर एक लेखक अपनी आख्यानक प्रोक्ति में चरित्रो की वैचारिक बुनावट की छाप प्रस्तुत कर भी म । 1. रोजर फाउलर, लिंग्विस्टिक्स ऐंड द नावेल ( पुनर्मुद्रण, 1979), पृ० 89.93 aro प्रोक्ति: संरचना-विवेचन 73 नही भी कर सकता है । उसका यह रवैया सहानुभूतिपूर्ण भी हो सकता है और आलोचनात्मक भी। चरित्रों को व्यक्ति-शैली को उजागर करने के लिए मांत- रिक प्रोक्ति में निर्णय भी प्रस्तुत किये जा सकते हैं । 2.1.2.2.2.3.2. बाह्य-दृष्टि: बाह्य परिदृश्य मे दूसरे लोगों के अनुभव की गोपनीयता सामने आती है। जब रचनाकार एक विधि से दूसरी विधि पर छलांग लगाता है तब बाह्य रूप में पान को स्पष्ट करने वाली चीजें ज्यादा उभरती हैं । उत्तारक के बहुतेरे घेण्य भापिक संकेत चरित्रों की चेतना से बाहर स्थित होते हैं । अनुमानात्मक क्रियाएं-'प्रतीत होता है', 'मान लो कि', अथवा तथ्यात्मक प्रतिवेदन की जगह नियंचन को प्रभावित करने वाले क्रिया-विशेषण और योगात्मक निपात- 'निश्चय ही', 'शायद', 'तप है', और गोपनीय आंतरिक स्थिति को सुबोध बनाने के लिए ज्ञात तथ्यों को उद्धृत करने वाली तुलना-जैसे', 'को तरह', 'मानों,-- जैसी निश्चयात्मक या अनिश्चात्मक अभिव्यक्तियाँ प्रोषित-संदर्भ में पार्थश्यमूलक गन्द (Words of Estrangemant) कहलाती हैं । बोरित उस्स्को के अनुसार इस प्रकार का प्रोक्ति-अभिव्यंजन तब उपस्थित होता है जव उत्तारक चरियों की आंतरिक स्थिति को निरूपित करने के लिए किसी वाह्य दृष्टिकोण का अवलम्ब लेता है। ऐसी कोई भी पार्थक्यमूलक प्रोवित किसी कारणवश ही चुनी जाती है । वास्तव में यह ऐसी प्रोक्ति होती है, जिसे रचनाकार उत्तारक को प्रदान करता है । 'निष्कपटता' या 'फाराले' का अभिनय करने के लिए सौन्दर्यात्मक कारण को निरूपित किया जाता 2.1.2.2.2.4. प्रोक्ति-संरचना और व्यक्ति-शेली: मह यत्तियता ही है जो प्रोषित-मंरचना में व्यक्ति-शैली का उद्भावन करती है। व्यक्ति-शैली के रूप में प्रोक्ति किसी वैयक्तिक मानसिकता की विशिष्ट भाषिक अभिव्यक्ति को निर्दिष्ट करती है। प्रोक्ति में व्यक्तिगती तव उपस्मिा होती है जर पिसी चरित के मानमिक जीवन को कमोवैग मूलभूत रूप में पिग्लेपित किया जाता है। व्यक्ति-जली व्यक्ति की मानसिकता के अपेक्षाकृत मूलभूत और अतिरिक्त पहलुओं से भी मंबंध रपती है। प्रोक्ति के अन्तर्गत पह पेवना विचारों की समयसता और संरचना को नाटकीय पना देती है । वृत्तिरता का यह पहन ऐसे विषयों को उपस्थित करता है जिनके प्रति पात्र अपने पूर्वग्रहों, 1. बी० ए० उग्ररो. ए पोटिल अंदपम्पोजीशन, अनुयाएर घोरिन और एम. मिदिन (वरो और लॉस एंजेल : यूनिमिटी अंध मो. फौनिया प्रेस, 1973), १० 136 74 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली : पूर्वअधिकारों, परिप्रेक्ष्यों और मूल्यों को प्रतिबंधित करता है। ये विषय पक्के तौर पर चरित्रों के सांसारिक दृष्टिकोण की तरफदारी करते हैं, पर इनके प्रति- चरित्र अनभिज्ञ होते हैं। इस दृष्टि से विभिन्न प्रकार की प्रक्ति-संरचना विभिन्न प्रकार की तकनीक को अपेक्षा रखती है। यहाँ वृत्तिक्ता रचनाकार या उसके द्वारा सूचित पान को व्यक्ति-ौली को समझने के लिए प्रोक्ति में उपस्थित होने वाली शब्दमाला या वाक्य-रचना पर आधारित होती है। यहाँ वृत्तिकता भद्रता, स्पष्टता, मानसिक नमनीयता, निष्ठुरता, विचारात्मक दृढ़ता, हठशीलता, बौद्धिकता जैसी अनेक गुणमिताओं के द्वारा व्यक्ति-शैली को उजागर करती हैं। हैलीडे ने विलियम गोल्डिंग के 'द इनहेरिटर' का विश्लेषण करते हुए आदिम मनुष्य की संभानात्मक सीमाओ की भाषिक सम्प्रेषणीयता को रेखांकित किया है। हैली के अनुसार वहां जो क्रिया-व्यापार का अनुक्रम प्रत्यक्ष होता है वह अपने इद-गिर्द के संसार को नियंत्रित करने के सिलसिले में मनुष्य को दुर्वल शक्ति- क्षमता को साभिप्रायता प्रदान करता है। शतं वावकता (Agency) और सजीवता (Aairacy) ऐसी वृतिपरक माषिक संरचना के मूलभूत पहलू है, जो व्यक्तिशैली को साभिप्राय रूप में निर्धारित करते हैं। वे दोनों शैलिकीय संघटना के वैविध्य की विस्तृत श्रेणी मे उपस्थित होते हैं। फाउलर प्रोक्ति के अध्ययन-क्रम में व्यक्तिशैली के सदर्भ में इनको परीक्षा की संस्तुति प्रदान करता है। प्रोक्ति की गहन संरचना में यह वृत्तिकता का ही पहलू है, जहाँ एक प्रमुख परम्परा चरित्र को परिदृश्य से इस तरह जोड़ देती है जिसमें मनो- वैज्ञानिक तासियाँ क्रीड़ा करती पाई जाती है। ये परिदृश्य रहस्यमय, विलक्षण तथा प्रतिकूल होते हैं। ये परिदृश्य कमोवेश लोगों को प्रभावित करने की शक्ति द्वारा प्राणीकृत होते हैं। किसी भी प्रोक्ति की संरचना में मैदान के 'अदृश्य हो जाने' या सड़क के 'रुक जाने' की अभिव्यक्तियां अविश्वसनीय लगती हैं। कहना न होगा कि ऐसी अभिव्यक्तियां आसानी से अन्य विकल्पो के द्वारा मी व्यक्त की जा सकती हैं। पर जब प्रोक्ति में ऐसी अभिव्यक्तियां उपस्थित हो पड़ती है तब ऐसी अभिव्यक्तियों में मैदान की गतिशीलता' या सड़क की 'स्थिरता' का कहा जाना उतना अभीष्ट नहीं होता जितना अभीष्ट लेखक या वक्ता के दृष्टिकोण के परिवर्तन में नजर आता है। फाउलर ने कई कथाकारों की प्रोक्सियों से अपने इस मंतव्य को सथित एवं सम्पुष्ट किया है। व्यक्तिशैली की दृष्टि से प्रोक्ति में सक्रिय-क्रिया के लिए 'संज्ञा का प्रतिस्थापन', 'कर्तृवाचक प्रकार्य का दमन', 'विशेषणों का नामिकीकरण', "स्थितिमूलक विधयों का 1. रोजर फाउलर 'हिस्कोस', लिग्विस्टिक्स ऐण्ड द नॉवेल (लण्डन : माइन, 1977. पुनर्मुद्रण, 1979), पृ. 106 75 प्रोक्ति : संरचना-विवेचन नामिकीकरण' आदि ऐसे तत्त्व हैं, जिनसे बन रही वृत्तिकता व्यक्तिशैली को उजागर करती है। 2.1.2.2.2.5. आख्यानक प्रोक्ति में सामाजिक संरचना विकसित बनाम प्रति- बंधित संकेत-पद्धति (Codes) : वृत्तिकता से द्योतित होने वाले इस पहलू के लिए समाजशास्त्री वैसिल बर्न स्टीन (Basil Burn Steia) द्वारा प्रतिबंधित बनाम विकसित संकेत- पद्धति को धारणा विचारणीय है। इस धारणा के अनुरूप एक भापा-भापी समुदाय का वक्ता जिस सामाजिक वर्ग मे जन्म पाता है, उस सामाजिक वर्ग की छाप अपने परिवार की संरचना पर होने के कारण वह उस प्रभाववश उसी विशेष प्रकार की भापा उपलब्ध करता है। इस सिद्धांत की मान्यता के अनुसार कामकाजी वर्ग के परिवार के बच्चे को भाषा का प्रतिबंधित प्रकार ही सुलभ हो पाता है, जबकि इसके विपरीत मध्य अथवा उच्च वर्गीय बच्चों को भाषा का कही विकसित संदर्भ प्राप्त होता है। स्पष्ट है कि इसके मूल में समाज- शास्त्रीय कारण सक्रिय होते हैं। ऐसा देखा जाता है कि विकमित सकेत पद्धति को अधिकृत करने वाले प्रायः अधिक गतिशील होते हैं। वे अपनी तात्कालिक सम्प्रेषणिक स्थिति के प्रति कम बंधे होते हैं तथा सामान्यीकरण करने के योग्य होते हैं। वे भाषा को वस्तु से जोड़ने के संदर्भ मे प्रतिबधित संकेत-पद्धति वालों की अपेक्षा अधिक प्रतीक-समर्थ और व्यंग्य-क्षम होते हैं। इसके प्रतिकूल प्रतिबंधित संकेत-पद्धति का व्यवहार करने वाले तात्कालिक स्थिति में प्रच्छन्न अर्यों के प्रति सीमित होते हैं। उनमें विकसित संकेत-पद्धति का व्यवहार करने वालों को सुलभ अर्थ के विशेषीकरण का और संकेतपरक संरचनाओ के अवबोध का अभाव होता है। आख्यानक की प्रोक्तियों में उक्त सामाजिक वर्ग के अनुरूप प्रतिबंधित और विकसित भापिक संकेत-पद्धति को गहन संरचना वृत्तिकता ही स्पष्ट करती है। 2.1.2.3. रवीन्द्रनाय धीवास्तव के आधार पर प्रोक्ति की गहन-संरचना : रयोन्द्रनाप श्रीवास्तव ने प्रोक्ति की गहन संरचना पर विचार करते हुए पाठलर की तरह ही प्रतिज्ञप्ति और वृत्तिकता को महत्व दिया है। उनके अनु सार, किसी भी वाक्य को गठन-सम्बंधी एक बाह्य-संरचना होती है, जो अर्थ-संबंधी आभ्यन्तर संरचना फे रूपांतरण का परिणाम होती है । आम्मन्तर संरचना के मूल में एक और पत्तिवाचक तत्त्व होता है और दूसरी ओर प्रतिज्ञप्ति वाचक तत्त्व । प्रतिमप्तिवाचक तत्त्व अपने मूल में विधेयपरक संघटक और विभिन्न संभाल संघटक के संबंधों का परिणाम होता है ।"x < 'वृत्तिदायक तत्य वक्ता की 1. रवीन्दनाय श्रीवास्तव, मरवनात्मक शैलीविज्ञान (दिल्ली : बाय प्रवाशन, 1979), पृ. 69 74 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली पूर्वअधिकारों, परिप्रेक्ष्यों और मूल्यों को प्रतिक्षित करता है। ये विषय पर तौर पर परियों के सांसारिक दृष्टिकोण की सरफदारी करते हैं, पर इनके प्रति- परिन मनभिग होते हैं । इरा दृष्टिरी विभिन्न प्रकार की प्रीवित संरचना विभिन्न प्रकार की तकनीक की अपेक्षा रयती है। यहाँ यतिरता रचनाकार या उसके द्वारा मूपित पात्र की व्यक्ति-सी को समाने के लिए प्रोक्ति में उपस्थित होने वासी सदमाता या यावय-रचना पर आधारित होती है। यहाँ यतिकता भरता, सप्टता, मानमिक नमनीयता, निष्ठुरता, विचारात्मक दृढ़ता, हटशीलता, घोदिकता जैसी अनेक गुणमिताओ के द्वारा व्ययित-शती को उजागर करती हैं। हैली ने विनियम गोलिंग के 'द इनहेरिटर' का विश्लेषण करते हुए आदिम मनुष्य की संज्ञानात्मक सीमामो की भाषिक सम्प्रेषणीयता को रेयांकित किया है। हैली के अनुसार यहाँ जो क्रिया-व्यापार का अनुक्रम प्रत्यदा होता है यह अपने इर्द-गिर्द के संसार को नियंत्रित करने के सिलसिले में मनुष्य की दुर्बल शक्ति- क्षमता को सामिप्रायता प्रदान करता है। कतं मापकता (Agency) और सजीवता (Aniracy) ऐसी वृतिपरक मापिक संरचना के मूलभूत पहलू हैं, जो व्यक्तिली को सामिप्राय रूप में निर्धारित करते हैं। वे दोनो शैलिकीय संघटना के वैविध्य को विस्तृत श्रेणी में अस्थित होते हैं। फाउलर प्रोक्ति के अध्ययन-क्रम में व्यक्तिशैली के सदर्भ में इनकी परीक्षा की संस्तुति प्रदान करता है। मोक्ति की गहन संरचना में यह वृत्तिकता का ही पहलू है, जहाँ एक प्रमुख परमरा चरित को परिदृश्य से इस तरह जोड़ देती है जिसमें मनो- अंशानिक फंतासिया कीड़ा करती पाई जाती है । ये परिदृश्य रहस्यमय, विलक्षण तथा प्रतिकूल होते हैं। ये परिदृश्य क्मोवेश लोगों को प्रभावित करने की शक्ति द्वारा प्राणीकृत होते हैं। किसी भी प्रोक्ति की संरचना में मैदान के 'अदृश्य हो जाने या सड़क के "हक जाने' की अभिव्यक्तियो अविश्वसनीय लगती हैं। कहना न होगा कि ऐसी अभिव्यक्तियां आसानी से आय विकल्पो के द्वारा भी व्यक्त की जा सकती हैं। पर जब प्रोक्ति मे ऐसी अभिव्यक्तियो उपस्थित हो पड़ती हैं तब ऐसी अभिव्यक्तियो मे मैदान की 'गतिशीलता' या सड़क की 'स्थिरता का कहा जाना उतना अभीष्ट नहीं होता जितना अभीष्ट लेखक या वक्ता के दृष्टिकोण के परिवर्तन में नजर आता है। फाउलर ने कई कथाकारों की प्रोक्तियों से अपने इस मंतव्य को समथित एवं सम्पुष्ट किया है । व्यक्तिली की दृष्टि से प्रोक्ति में सक्रिय क्रिया के लिए 'संज्ञा का प्रतिस्थापन', 'कर्तृवाचक प्रकार्य का दमन', 'विशेषणों का नामिकीकरण', "स्थितिमूलक विधेयों का 1. रोजर फाउलर 'डिस्कोर्स', लिंग्विस्टिक्स ऐण्ड ६ नॉवेल (लण्डन : मैथुइन, 1977. पुनर्मुद्रण, 1979), 4. 106 .. 75 प्रोक्ति : संरचना-विवेचन नामिकीकरण' आदि ऐसे तत्त्व हैं, जिनसे बन रही वृत्तिकता व्यक्तिशैली को उजागर करती है। 2.1.2.2.2.5. आख्यानक प्रोक्ति में सामाजिक संरचना : विकसित बनाम प्रति- बंधित संकेत-पद्धति (Codes): वृत्तिकता से द्योतित होने वाले इस पहलू के लिए समाजशास्त्री बेसिल वनं स्टीन (Basil Burn Steia) द्वारा प्रतिबंधित बनाम विकसित सकेत- पद्धति को धारणा विचारणीय है। इस धारणा के अनुरूप एक भापा-मापी समुदाय का वक्ता जिस सामाजिक वर्ग में जन्म पाता है, उस सामाजिक वर्ग की छाप अपने परिवार की संरचना पर होने के कारण वह उस प्रभाववश उसी विशेष प्रकार की भाषा उपलब्ध करता है। इस सिद्धांत की मान्यता के अनुसार कामकाजी वर्ग के परिवार के बच्चे को भाषा का प्रतिबंधित प्रकार ही सुलभ हो पाता है, जबकि इसके विपरीत मध्य अथवा उच्च वर्गीय बच्चों को भाषा का कही विकसित संदर्भ प्राप्त होता है। स्पष्ट है कि इसके मूल में समाज- शास्त्रीय कारण सक्रिय होते हैं। ऐसा देखा जाता है कि विकसित सकेत पद्धति को अधिकृत करने वाले प्रायः अधिक गतिशील होते हैं । अपनी तात्कालिक सापणिक स्थिति के प्रति कम बंधे होते हैं तथा सामान्यीकरण करने के योग्य होते हैं। ये भाषा को वस्तु से जोड़ने के संदर्भ में प्रतिबंधित संकेत-पद्धति वालों को अपेक्षा अधिक प्रतीक-समर्थ और व्यंग्य-क्षम होते हैं। इसके प्रतिकूल प्रतिबंधित संकेत-पद्धति का व्यवहार करने वाले तात्कालिक स्थिति में प्रच्छन्न अर्थों के प्रति सीमित होते हैं। उनमें विकसित संकेत-पद्धति का व्यवहार करने वालो को सुलभ अयं के विशेषीकरण का और संकेतपरक संरचनाओ के अययोध का अभाव होता है। आख्यानक की प्रोक्तियों में उक्त सामाजिक वर्ग के अनुरूप प्रतिबंधित और विकसित भाषिक संकेत-पद्धति को गहन संरचना की वृति कता हो स्पष्ट करती है। 2.1.2.3. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव के आधार पर प्रोक्ति की गहन-संरचना : रयोन्द्रनाप श्रीवास्तव ने प्रोक्ति की गहन संरचना पर विचार करते हुए पाउनर की तरह ही प्रतिमप्ति और वृत्तिकता को महत्त्व दिया है। उनके अनु- सार, किसी भी वाक्प को गठन-सम्बंधी एक वाह्य-संरचना होती है, जो अर्थ-संबंधी आपन्तर संरपना के रूपांतरण का परिणाम होती है। आम्यन्तर संरचना के मूल एक ओर वृत्तिवाचक तत्व होता है और दूसरी ओर प्रतिमप्ति याचक तत्त्व । अति तिवाचक तत्व अपने मूल मे विधेयपरक संघटक और विभिन्न संभा- संपटक के संबंधों का परिणाम होता है।" x < 'यक्तिवाचक तत्य वक्ता की 1. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, संरचनात्मक शंसोयितान (दिल्ली : आले प्रकाशन, 1979), पृ. 69 में 76 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली वृत्तियों के संवाहक होते हैं। यथा, वह प्रश्न पूछ रहा है, किसी को आज्ञा दे रहा है या बलार्थक भाव से अपनी बात कह रहा है। प्रतिज्ञप्तिवाचक तत्व कथ्य का वह विषय-पक्ष है जो मूल में विधेय परक (क्रिया-प्रकरण) और विभिन्न संज्ञा-सघटक (कारक प्रकरण) के सम्बंधों को प्रकृति पर आधारित होता है।" पर श्रीवास्तव ने प्रविज्ञप्ति और वृत्तिकता का अलग-अलग विस्तृत विवेचन प्रस्तुत नही कर केवल वृत्तिवाचकता पर प्रकाश डाला है । उन्होंने वृत्तिवाचकता के अन्तर्गत 2.1.2.3.1. कथानक के नियमों और 2.1.2.3.2. दृष्टि-मौली पर अच्छी तरह विचार किया है। 2.1.2.3.1. कथानक के नियम : श्रीवास्तव ने प्रोक्ति की गहन संरचनात्मक वृत्तिकता के अन्तर्गत कपा- नक की समझ के लिए वेस्लोवस्की के अभिप्राय (Motif) की अवधारणा को स्पष्ट किया है। उनके शब्दो में 'कहानी को कथानक मे रचनांतरित करने वाले नियमों का प्रेरक तत्त्व वृत्तिवाचकता होती है। यह वृत्तिवाचकता ही कथानक के मोटिफ (Motir) को जन्म देती है। अभिप्राय जहाँ वृत्तिवाचक होता है, वहाँ पात्र और उनके कर्म-विधान प्रतिज्ञप्ति-वाचक होते हैं। वस्तुत: वृत्ति- वाचकता से ही कथानक का जन्म होता है । 'अभिप्राय' की यह सक्रियता चार रूपों में उभर कर सामने आती हैं, जिन्हें क्रमश: 2.1.2.3.1.1. विधेय-विधान का नियम 2.1.2.3.1.2. घटनाओं को पुनरावृत्ति का नियम 2.1.2.3.1.3. संकेतन-सार्थकता का नियम और 2 1.2.3.1.4. व्यतिरेकी पक्षपदी का नियम कहते हैं। 2.1.2.3.1.1 विधेय-विधान का नियम : जब किसी कथात्मक प्रोक्ति मे किसी व्यक्ति की क्रूरता को दर्शाना अभीष्ट होता है तब इसके लिए सिर्फ भाषिक अभिव्यक्ति प्रभूत नही हो पाती, अपितु इस अभिप्राय के लिए ययापेक्षी-घटना का विन्यास करना पड़ता है। इसी के आधार पर उस पात्र को क्रूरता स्पष्ट तौर पर निरूपित हो पाती है । कथात्मक प्रोक्ति में घटना के इस नियोजनात्मक क्रम को विधेय-विधान' का नियम कहा जाता है। कहना न होगा कि कथात्मक प्रोक्ति में प्रोक्तियां अनिवार्य तौर पर इस नियम के अन्तर्गत आती हैं। .. 1. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, संरचनात्मक शैलीविज्ञान (दिरली : पालेष प्रकाशन, 1979), १० 68-69 2. यही, पृ. 73 प्रोक्ति : संरचना-विवेचन 2.1.2.3.1.2. घटनाओं की पुनरावृत्ति का नियम : कथात्मक प्रोक्ति में अभिप्राय केन्द्रक बनकर सामने आता है। ऐसी स्थिति में घटनाओं को कई रूपों में घटित होता दिखाया जाता है । यद्यपि बाह्य तौर पर इनमें रूपाकार की भिन्नता होती है, पर इनकी मूल वृत्तिकता में एक ही आभप्राय क्रियाशील होता है। इसे ही घटनाओं की पुनरावृत्ति का नियम कहते हैं। एक रक्तसम्बंध को लेकर भिन्न-भिन्न घटनाओं में एक ही अभिप्राय का आवर्तन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। 2.1.2.3.1.3. संकेतन-सार्थकता का नियम : कथानक प्रायः रचना के संकेतन-विधान से युक्त होता है। यह दो रूपों में क्रियाशील होता है । इसका एक रूप भाषा के व्यावहारिक पक्ष से इसके जुड़ने का है, और दूसरा रूप इसके मिथक-पक्ष से जुड़ने का है । इनमे व्यावहारिक पक्ष वस्तु का बाहरी पक्ष होता और मिथक पक्ष उसको आन्तरिक गुणवत्ता का पक्ष । कथानक की प्रोक्ति में ये दोनों पक्ष अलग-अलग क्रियाशील रहते हैं। वास्त- विकता यह है कि इनके तनाव से ही कृति को सार्थकता प्राप्त होती है । अतः कहानी में प्रोक्तियों द्वारा संकेतन-सार्थकता के नियम को दर्शाने की संभावना विद्यमान रहती है। 2.1.2.3.1.4. व्यतिरेको पक्ष-पदों का नियम : व्यतिरेकी पक्षपदों का नियम पात्र या घटना के संदर्भ में क्रियाशील होता है। यहाँ कथानक या क्रिया की सार्थकता व्यतिरेक के द्वारा स्पष्ट होती है। यहाँ पात्र अथिम के रूप में सामने आता है, जो अथिम नही होकर सार्थक अर्थ- पदों का समुच्चय होता है । व्यतिरेक की संकल्पना पक्षपद का आधार बनती है, जिसे पुल्लिग-स्त्रीलिंग, पाप-पुण्य, दिन-रात के बीच की विरोधिता मे देखा जा सकता है। वस्तुतः यहां प्रोक्ति विरोधी समातरता के स्तर पर क्रियाशील होती है। 2.1.2.3.2. प्रोक्ति और दृष्टि-शैली : फाउलर की तरह ही श्रीवास्तव को मान्यता है कि 'हर कहानी के कथन के बीच से उसके कथाकार की आवाज सुनी और पहचानी जा सकती है। प्रोक्ति के रूप में कया-साहित्य को देखते समय यह जरूरी हो जाता है कि हम देखें कि भौतिक घटना या घटनाक्रम को भापिक रूप में बांधते समय कहानीकार स्वयं को कहाँ तक उसमे बांधता है-वह कहाँ तक वक्ता के रूप में अपने विश्वास, दृष्टिकोण और मूल्य आदि को सम्प्रेष्य बनाता है और कहाँ तक और किस 78 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली प्रकार अपने और श्रोता (पाठक) के बीच सम्बंध-स्थापन करने की सम्भावना उसमें भरता है। अतः श्रीवास्तव ने यहां गहन संरचनात्मक वृत्तिकता से दृष्टि-शैली को जोड़ते हुए उसके 2.3.2.3.2.1. दृश्य अक्ष और 2.1.2.3.2.2. दृष्टि-अक्ष जैसे दो भेदों पर प्रकाश डाला है। 2.1.2.3.2.1. दृश्य अक्ष: किसी भी कथात्मक प्रोक्ति में जो घटनाएं अभिव्यक्त होती हैं उनके अभि- विन्यास का एक महत्वपूर्ण पक्ष समय या स्थान की दृष्टि से घटना को देखने का है। इसी से घटना की दृश्यमानता उभरती है। यहां घटना को दृश्य रूप में प्रस्तुत करने का काल और स्थल-सम्बधी आधार सामने आता है। भाषिक अभिव्यक्ति पाकर काल और स्थान का स्वरूप विशिष्ट हो जाता है। तब ये काल-बोध और स्थानबोध बन जाते हैं। तेषक यदि किसी ऐतिहासिक रचना में भूतकाल का प्रयोग करता है तो वहीं कालगत दूरी सामने आती है । उसी तरह यदि वर्तमान कालिकता का प्रयोग किया जाता है तो यहां एक नकट्य की अनुभूति प्राप्त होती है। काल की अतीतता को दर्शाने के लिए क्रिया के अति- रिक्त मंशापदों में भी काम लिया जाता है। इसी तरह कोई भी पटना किसी विशेष स्थान पर ही घटती है । प्रोक्ति-विशेष की वृत्तिकता मे इस विशेष स्था- निकता का भी महत्व होता है। मांचलिक उपन्यासो में घटने वाली घटना को गहत संरचना की पुत्तिकता ही दृश्य अक्षा को स्थानिकता के जरिये वह स्थानीय रंग प्रदान करती है, जिससे आंचलिकता का स्वरूप ससष्ट एवं पुष्ट होता है। 2.1.2.3.2.2. दृष्टि अक्ष: दृष्टि-मक्ष वस्तुतः प्रोक्ति के भीतर से सर्जक को निकलने वाली अभिवृति- मूलकता का अक्ष होता है। यहां विषयवस्तु के प्रति भाषा की गहन सरचना के द्वारा सर्जक के दृष्टिकोण को रेखांकित किया जाता है। डॉ० श्रीवास्तव के शब्दों में 'बोलने-लिखने के समय जिन शब्दों का हम चयन करते हैं, जिस सरचना को अपनाते है और जिन भ्याकरिणा शब्दों द्वारा वाक्यो को एक दूसरे से जोड़ते हैं वे सभी सार्थक होते हैं और उनको सार्थकता की प्रकृति व्यक्तिगत न होकर सामाजिक और संस्थागत होती है। भाषा की इस सामा• जिक और संस्थागत प्रकृति से जूझते हुए ही साहित्यकार अपने कथ्य को सम्प्रेषणीय बनाता है। इस जूझने की प्रक्रिया के साथ ही वह काथ्य-वस्तु का 1. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, संरचनात्मक शैलीविज्ञान (दिल्ली : आलेख प्रकाशन, 1979), पृ. 86-87 प्रोक्ति : संरचना-विवेचन 79 निर्माण करता है। इसलिए स्वामाविक है कि भाषा में बंधकर कथ्य एक खास कोण के साथ उमरे और काव्य-वस्तु एक विशेष दृष्टि का परिचय दे। शब्द-चयन के क्षेत्र में 'सुमन' और 'कुसम' के प्रयोग में या 'अबला' या 'रमणो' के प्रयोग में 'सुमन' और 'अवला' के चयन में सर्जक के विशेष दृष्टि- कोण का परिचय मिलता है। इसी तरह वृत्तिकता कर्मवाच्य और कर्तृवाच्य के अन्तर से अभीष्ट दृष्टि को उन्मीलित करती है । डॉ० श्रीवास्तव ने दृष्टि के इस अंतर को निम्नलिखित दो वाक्यों के आधार पर स्पय्ट किया है-(1) दूसरे के लिए बनाये जाल में मोहन अपने को फंसाता चला गया, (2) दूसरे के लिए बनाये जाल में मोहन स्वयं फंसता चला गया। यहाँ पहले वाक्य में फंसने का दायित्व मोहन स्वयं वहन कर रहा है, किंतु दूसरे वाक्य में इसका कारण मोहन नहीं रहता, बल्कि परिस्थिति हो जाती है। इसीलिए श्रीवास्तव के अनुसार, 'वक्ता जब इन दो वाक्यो में किसी एक वाक्य का चुनाव करता है तब ज्ञात-अज्ञात रूप से उसके मन की वृत्तियां उसके चुनाव के कारण पर प्रकाश डालती हैं। 2.2, निष्कर्ष: इस प्रकार प्रोक्ति की बाह्य संरचना के अन्तर्गत क्रमशः मिलिक, लांगेकर लेविनशन, हैलीडे और एक्विस्ट तथा गहन संरचना के अन्गतं वान डिज्क, रोजर फाउलर और श्रीयास्तव द्वारा निर्दिष्ट अवयबो की जानकारी प्राप्त कर लेने के बाद वह भूमिका तैयार हो जाती है, जिसके आधार पर किसी भी प्रदत्त पाठ । प्रोक्ति की संरचना का विश्लेपण किया जा सकता है। 1. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, संरचनात्मक शैलीविज्ञान (दिल्ली: आलेख प्रकाशन, 1979), पृ. 90 2. वही प्रोक्ति : शैलीपरक अभिलक्षण 3.0.प्रोक्ति : शैलीपरक अभिलक्षण प्रोक्ति के शलीपरक अभिलक्षणों को निर्दिष्ट करने के संदर्भ में पहला विचारणीय तथ्य यह है कि क्या प्रोक्ति के शैलीपरक अभिलक्षण भापा की अन्य इकाइयों के शैलीपरक अभिलक्षणों से अलग होते हैं अपवा अन्य इकाइयों के अभिलक्षणों के समान होते हैं। यहां ध्यान देने योग्य है कि शैलीपरक अभिलक्षण वास्तव में भापा का होता है और भाषा अपनी सभी इकाइयों के साथ ही पूर्ण होती है तथा सभी भाषाई स्तरों पर क्रियाशील रहती है। पर भाषा के कुछ शैलीपरक अभिलक्षण अलग-अलग प्रतिमान के रूप में सभी भाषिक इकाइयों और स्तरों पर एकवत् अपनी क्रियाशीलता नहीं दिखा पाते हैं। किसी-किसी अभिलक्षण के ऐसे अपवाद होते हैं। जैसे-'चयन-संयोजन' के अभिलक्षण प्रोक्ति स्तर पर क्रियाशील नही होते हैं, क्योंकि वाक्य-स्तर का संयोजन ही प्रोक्ति के रूप में उपस्थित हो पड़ता है। अतः प्रोक्ति के संदर्भ में शैलीररक अभिलक्षण का निरूपण एवं विवे वन निरपवाद रूप मे ही करना समीचीन है। 3.1. सामान्य प्रोक्ति बनाम विशिष्ट प्रोक्ति: प्रोक्ति के संदर्भ में शैली का अभिलक्षण सामान्य प्रोक्ति को पृष्ठभूमि में विशिष्ट प्रोक्ति को सामने उपस्थित करता है। सर्जनात्मक भाषा के सदर्भ में इस विशिष्ट प्रोक्ति का ही महत्त्व होता है। यह विशिष्टता वहां उपस्थित होती है, जहां पापा का सौंदर्यात्मक कार्य क्रियाशील होता है । शैली इसी विशिष्ट भाषिक प्रयोग में होती है । वातुत: यह प्रोक्ति का शैलीपरक अभिलक्षण ही है, जो प्रोक्ति को सामान्य से विशिष्ट बना देता है। 1. पाण्डेय शशिभूपण 'शीतांश', 'चयन-संयोजन प्रतिमान, शलीविज्ञान : प्रकार और प्रतिमान (चंडीगढ़ : हरियाणा साहित्य अकादमी, 1977), पू० 150 प्रोक्ति : शैलीपरक अभिलक्षण 81 3.2. अभिलक्षण (Features): अभिलक्षण उस गुण-धर्म को कहते हैं जिससे वस्तु-विशेष की विधेयात्मक एवं व्यवच्छेदक, स्वरूपगत विशेषता का द्योतन हो । जब 'अभिलक्षण' का व्यव- हार 'शली' के संदर्भ में किया जाता है तब इसका मंतव्य शैली को रेखांकित करने वाली उसको स्वरूपगत एवं व्यवच्छेदक विशेषताओं के निरूपण से लिया जाता है। 3.3. शैली (Style): शैली की अनेक परिभाषाएं की गयी हैं। आस्गुड एवं बारबर्ग ने इसे 'चयन' के रूप में देखा है, तो हैरिस ने 'वितरण' या संयोजन के रूप मे, रोमन याकोब्सन ने इसे 'चयन-संयोजन' के रूप मे रेखांकित किया है तो लिविन, मेरो आदि ने 'विचलन' के रूप मे। विम्सेट और वर्ड स्ले ने इसे अर्थ को साभि- प्रायता के रूप में रेखांकित किया है, तो याकोब्सन' ने 'समांतरता' के रूप में निर्दिष्ट किया है। कृष्णकुमार शर्मा ने इसे सामूहिक विशेपताओ के समुच्चय 1. (क) चार्ल्स ई. आरगुड, 'सम इफेक्ट्स अव मोटिवेशन ऑन स्टाइल अव इनकोडिंग', स्टाइल इन लैंग्वेज, सम्पा. टी० ए० सिवियोक (न्यूयार्क : एम० आइ० टी० प्रेस, 1960), पृ० 293 (ख) जे० बारबर्ग, 'सम आस्पेक्ट्स अव स्टाइल', द टीचिंग अव इंग्लिश, विवर्क ओर स्मिथ (लंडन : 1959), पृ. 50 2. जेड. हैरिस, स्ट्रक्चरल लिंग्विस्टिक्स (शिकागो : 1960), पृ. 10-11 3. रोमन याकोब्सन, लिंग्विस्टिक्स ऐण्ड पोटिक्स', स्टाइल इन लैंग्वेज, सम्पा. टी० ए० सिवियोक (कैम्ब्रिज : मास : एम. आई. टी० प्रेस, 1960), पु. 348 4. एस. आर. लिविन, उद्धृत, 'एडिटर्स इंट्रोडक्शन' लिटरेरी स्टाइल : ए सिम्पोजियम, सम्पा. सैमूर चैटमैन (लंडन : ऑक्सफोर्ड यूनि.प्रेस, 1977), पृ. 13 5. पी. गेरो. उद्घत, तोदोरोव, 'द प्लेस अव स्टाइल इन द स्टक्चर अव द टेक्स्ट', लिटरेरी स्टाइल : ए सिम्पोजियम (लंडन : ऑक्सफोर्ड यूनि. प्रेस, 1971), पृ. 130 6. विम्सेट और बई स्ले, उद्धृत, लिटरेरी स्टाइल : ए सिम्पोजियम (लंडन : ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1971), पृ. 12 7. रोमन यासोन्मन, लिग्विस्टिक्स ऐण्ड पोयटिक्स' स्टाइल इन लैंग्वेज, सम्पा. टी० ए० सिवियोक (कम्यिज, मास : एम. आइ. टी. प्रेस, 1960), पृ० 348 82 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली के रूप में और भापातात्विक इकाइयों के अन्तःसम्बंध के रूप मे निर्दिष्ट किया है।' ४.० शर्मा ने इसे व्याकरण की सभी संभावनाओं के उपयोग के बतौर और सादमिक सम्भावनाओं की समष्टि के बतौर निरूपित किया है। एक्विस्ट' और कृष्णकुमार शर्मा ने इसे शैलीविला के रूप में रेखांकित किया है तो हॉ पीतांशु. ने इसे मुकारोवस्की को 'अप्रप्रस्तुति' के रूप में। इस प्रकार प्रथम दृष्टि में 'शैली' एक ऐसे विवादास्पद शब्द के रूप में उपस्थित होती है, जिसका अर्थ-निरूपण और अभिप्रायांकन कई दृष्टियों से किया जाता है । यह अपनी अयंता में जितना व्यापक शब्द है उतना ही नमनीय भी। पर भाषा-साहित्य के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि शैली विशिष्ट सौंदर्यात्मक प्रकार्य को उपस्थित करती है। 3.4.शैलीपरक अभिलक्षण : अबतक गैलीविदों द्वारा शैली पर किये गये विचार के आधार पर निम्न कित पोलीपरक अभिलक्षण स्पष्ट होते हैं। 3.4.1 शैलीचिह्नक (Style Marker) वर्ग, और 3.4.2. अग्रस्तुति (Foregrounding) वर्ग। 3.4.1. शैलीचिह्नक (Style Merker) वर्ग : जब शैलीपरक अभिलक्षण को विशेषतः सीमित या केन्द्रित करने को अपेक्षा व्यापक तौर पर मुक्त छोड़ दिया जाता है और किसी भी संदर्भबद्ध भाषिक एकक को उसकी पहचान के बतौर रेखाकित किया जाता है तब शैलीपरक अभिलक्षण का-शैली चिह्नक' वर्ग उपस्थित होता है। 1. कृष्णकुमार शर्मा, शैलीविज्ञान की रूपरेखा (जयपुर: संधी प्रकाशन, 1974), पृ० 39 2. कृष्णकुमार शर्मा, शैलीविज्ञान की रूपरेखा (जयपुर : संधी प्रकाश, 1974), पृ. 48-49 3. निल्स एरिक एक्विस्ट, 'ऑन डिफाइनिंग स्टाइल' लिंग्विस्टिक्स ऐण्ड स्टाइल, जॉन स्पेंसर (लहन: आक्सफोर्ड यूनिवसिटी प्रेस, 1964), पृ० 35-36 4. कृष्णकुमार शर्मा, शैलीविज्ञान की रूपरेखा (जयपुर: संधी प्रकाशन, 1974), पृ.51 5. पाहप शशिभूषण 'शीनाश', शैलोविज्ञान प्रतिमान और विश्लेषण (दिल्ली: देवदार प्रकाशन, 1984), पृ. 30 प्रोक्ति: शैलीपरक अभिलक्षण : 83 3.4.1.1. शैलोचिह्नक अभिलक्षण और इसके प्रस्तोता : 'शैलीचिहक' मूलतः अंग्रेजी 'स्टाइल मार्कर' का हिन्दी रूपांतरण है । इस अवधारणा के प्रस्तोता स्वीडेन के शैलीवैज्ञानिक निल्स एरिक एक्विस्ट हैं। इन्होने अपने निबन्ध-'आन डिफाइनिंग स्टाइल' (On Defining Style) में इसे प्रस्तावित किया है ।' हिन्दी मे डा० कृष्ण कुमार शर्मा ने एंक्विस्ट की इस अवधारणा का विवेचन अपनी 'शैलीविज्ञान की रूपरेखा' पुस्तक मे किया है । पर उन्होने भी एक्विस्ट की तरह शैलीचिह्नक के स्पष्ट अवयवों का निर्धा- रण नहीं कर उसे अस्पष्ट व्यापकता मे छोड़ दिया है । जब यह कहा जाता है कि वाहे अलंकार हो या व्याकरणिक तत्व या ऐसा कोई भी भाषिक एकक जो संदर्भबद्ध होने पर शैलीचिहक बन जाता है तब प्रत्येक भापिक स्तर पर भाषा. वैज्ञानिक अवयव के बतौर उसे सुनिश्चित नहीं किया जाता। शैलीचिह्नक के अभिलक्षण की इस दिशा मे सुस्पष्टता की अपेक्षा है । 3.4.1.2. शैलीचिह्नक-अभिलक्षण : स्वरूप-स्पष्टीकरण : निल्स एरिक एक्विस्ट के अनुसार :- 3.4.1.2.1 शैली चयन वस्तुतः शैलीचिह्नक होता है । 3.4.1.2.2. शैली-चिह्नक सदर्भबद्ध होते हैं । 3.4.1.2.3. शैली-चिह्नक शैली के रूप में चिह्नित होते हैं । 3.4.1.2.4. कई बार विभापा के प्रयोग द्वारा नये शैलीचिह्नकों का निर्माण होता है। 3.4.1.2.5. शैली-चिह्नकों का प्रयोग ध्वनि, शब्द, रूप, वाक्य, प्रोक्ति और अर्थ—सभी स्तरों पर हो सकता है । 3.4.1.2.6. जो तत्त्व शैलिकीय दृष्टि से प्रतिबद्ध होते हैं वे शैली- चिह्नक कहलाते हैं । इसके विपरीत शैलिकीय दृष्टि से निस्संग या तटस्थ भाषिक तत्त्व, शैलीचिह्नक नहीं होते । उदाहरणार्थ :--'ऐज एवरीबाडी नोज अर्थ इज फ्लैट' बीसवी शताब्दी में हास्य-संदर्भ की उक्ति है । वैज्ञानिक संदर्भ में इसका प्रयोग नहीं होता। अत: अगर इसका कोई महत्त्व है तो वह केवल शैलीपरक 1. निल्स एरिक एक्विस्ट, 'आन डिफाइनिंग स्टाइल' लिग्विस्टिवस, ऐण्ड स्टाइल, सम्पा. ग्रेगरी ऐण्ड स्पेन्सर (लंडन : आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1964), पृ० 34 प्रोक्ति स्वरूप सनरपना और शैली शैलीचिहक सन्दर्भबद्ध भाषिक एकक होते हैं। यहाँ भाषिक एकक से तात्पर्य भापा के ध्वनि, पान्द, रूम, वाक्य, अर्थ जैसे किसी भी स्तर के ऐसे एकक- विशेष से है जो सन्दर्भवत हो। प्रायः किसी भी कृति में भाषिक एककों की प्रस्तुति दो प्रकार की होती है :- (1) सन्दर्भबद्ध प्रस्तुति (2) सन्दर्भ-सामान्य प्रस्तुति धौलीचिह्नक सन्दर्भवत प्रस्तुति से संबंध रखता है । सन्दर्भवता लीबिलक को साभिप्रायता देती है, जबकि सन्दर्भ-सामान्य प्रस्तुति शैलीचिह्नक को अर्थ देती है । साभिप्रायता और अर्थ में अन्तर होता है। साभिप्रायता गहन संरचना से जुड़ी होती है। निल्स एरिक एक्विस्ट ने शैलीचिह्नक को परिभाषित करते हुए लिखा है~~-संदर्भ के एक ही वर्ग मे अधिक अपवा अल्प-प्रयुक्त भाषिक एकक शैली- चिह्नक कहलाते हैं। यहाँ अधिक प्रयुक्त होने से आवर्तन का तथा अल्प प्रयुक्त होने से विरल का आशय ग्रहण होता है। आवर्तन प्रतिपाद्य शब्द (Theme) को और विरलता उन्मीलक (Rarity) शब्द को जन्म देती है। हिन्दी में कृष्णकुमार शर्मा ने शैलीचिह्नक को परिभाषित करते हुए लिखा है कि ऐसे मापिक एकक जो शैलीगत वैशिष्ट्य को प्रकट करते हैं शैलीचिह्नक कहे जाते हैं । यहाँ भाषिक एकक से तात्पर्य भापिक इकाई या मापिक स्तर पर ब्यवहृत एकक से है। इसके लिए निल्स एरिक एविवस्ट ने 'एन टी टी' शब्द का प्रयोग किया है। यह एकक सन्दर्भवत होने पर शैलीचिह्नक है। शैलीचिह्नक अभिलक्षण के प्रस्ताव के अनुसार सभी भाषिक इकाइयों में शैलीचिह्नक की भूमिका परिलक्षित हो सकती है । सर्वश्वर की विवशता' कविता में कितना' का आवत्तित प्रयोग शब्दस्तर का शैलीविहक बन जाता है। इसी तरह अलंकारों का निश्चित प्रयोग भी साभिप्राय होते ही शैलीचिह्नक बन जाता है। जैसे- । 1. निल्स एरिक एक्विस्ट, लिग्विस्टिक्स एण्ड स्टाइल (लंडन : आक्सफोर्ड यूनिवसिटी प्रेस, 1964), पृ. 35 2. कृष्णकुमार शर्मा, शैलीविज्ञान की रूपरेखा (जयपुर:संधी प्रकाशन, 1974), प्रोक्ति : शैलीपरक अभिलक्षण 85 'नोल परिधान बीच सुकुमार, खिल रहा मृदुल अधखुला अंग, खिला हो ज्यों बिजली का फूल, मेघ वन बीच गुलाबी रंग।" यहाँ अलंकार की साभिप्रायता अलंकार को शैलोचिह्नक के रूप मे उपस्थित कर रही है। इसी तरह ध्वनि स्तर की भी सन्दर्भबद्धता शैलीचिह्नक बनकर उपस्थित होती है । 'निराला' को निम्नलिखित पंक्तियों को देखें :- 'बहुत दिनों बाद खुला आसमान निकली है धूप, हुआ खुश जहान । यहां पहली पंक्ति में ध्वनि-स्तर का शैलीचिह्नक है, जहाँ 'बाद' 'खुला' और 'आसमान' में प्रयुक्त 'आ' जैसी विवृत स्वर ध्वनि व्यापकता का निर्देश करती है। इसका यहाँ सांदर्भिक प्रयोग किया गया है। तभी लगता है कि आकाश यहाँ से वहां तक पूरी तरह मेघमुक्त हो गया है । उपर्युक्त विवेचन के आधार पर स्पष्ट हो जाता है कि सांदमिक संभा- वनाओं की समष्टि ही शैलीचिह्नक है । आशय यह है कि जिस पाठ मे जहाँ सन्दर्भबद्ध शैलीचिह्नक है, वह शैलीयुक्त हैं, पर जिस पाठ में, और जहाँ सन्द- मबद्ध शैलीचिह्नक नहीं है वह शैलीहीन है । इस प्रकार शैलीचिह्नक अभिलक्षण शैलीहीन और शैलीयुक्त अभिव्यक्तियों का अन्तर स्पष्ट करने मे पूरी तरह समर्थ है । एवविध शैलीचिह्नक अभिलक्षण के अनुसार शैलीवैज्ञानिक अध्ययन का तात्पर्य शैलीचिह्नको की सूची प्रस्तुत करना तथा उनका सन्दर्भबद्ध वितरण एवं विश्लेषण करना है । वितरण से तात्पर्य वैसे समस्त परिवेशो का कथन है जिनमे किसी शैलीचिह्नक के उपस्थित होने की संभावना और असंभावना होती है । 3.4.1.3. प्रोक्ति स्तर : शैलीचिह्नक अभिलक्षण : प्रोक्ति-स्तर के शैलीचिह्नक भी सन्दर्भबद्ध होते हैं । सन्दर्भ में वह परिवेश भी शामिल होता है, जिसमे कोई प्रोक्ति कही जाती है। एक्विस्ट ने एक उदा- हरण दिया है।' वर्षा का दिन है श्री एवं श्रीमती 'क' वर्षा के दिन आग के पास बैठे हैं। श्री 'क' कहते है 'कितना घृणित दिन है ।' श्री 'क' का कथन संदर्भवद्ध 1. जयशंकर प्रसाद, कामायनी (इलाहाबाद : लीडर प्रेस, एकादश सं०), पृ.54 2. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' 'खुला आसमान', राग-विराग, सम्पादक राम- विलास शर्मा (इलाहाबाद : लोकभारती प्रकाशन, प्रथम संस्करण), पृ० 124 3. अनूदित एवं उद्धृत, कृष्णकुमार शर्मा, शैलीविज्ञान की रूपरेखा (जयपुर : संघी प्रकाशन, 1974), पृ० 55 86 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली है। सन्दर्भ है 'पर', आग के पास, यर्पा का दिन, पति का पत्नी से वार्तालाप। श्री 'क' की यह प्रोक्ति शंतीपरप है या नहीं इसके लिए उक्त सम्भावनाओं की तुलना की जाती है । यदि श्री 'च' पत्नी के साथ बैठकर वर्षा के प्रति अपनी प्रतिक्रिया अच्छे शब्दों में अथवा 'श्री' 'क' के शब्दों की अपेक्षा अन्य शब्दों में ध्यक्त करते हैं तो एक स्तर पर 'श्री' 'क' को प्रोक्ति को जलोपरक कहा जा सकता है । यदि यह प्रोषित श्री '' के यगं के अन्य व्यक्तियो द्वारा भी प्रयुक्त होती है और समाज के दूसरे वर्ग द्वारा इसी सन्दर्भ में दूसरी प्रोक्ति कही जाती है तो श्री 'क' का कयन सामूहिक शैलीचिह्नक बनकर भी उपस्थित हो सकता है। अन्य व्यक्तियो से भिन्न होने पर श्री 'क' की शैली वैयक्तिक भी हो सकती है। यदि वह श्री 'क' को आग के पास बैठकर की गई अधिकांश वातों में प्रयुक्त होती है तो वह थी 'क' की पारिवारिक शैली को विशेषता भी हो सकती है।' डा. शर्मा ने वैयक्तिक शैली को स्पष्ट करने के क्रम में बताया है कि यदि सुमित्रानंदन पंत नदी को सदैव नारी रूप में वर्णित करते हैं और अन्य कवि किसी दूसरे रूप में नारी का चित्रण करते हैं तो ऐसी नारी विषयक- प्रोक्ति को सन्दर्भबद्धता कवि पंत की वैयक्तिक शैली-विषयक विशेषता होगी। शलीचिह्नक को मुक्त, व्यापक प्रकृति के कारण यदि किसी कृति या पाठ में कोई विशेष प्रोक्ति एक या एकाधिक घार आवत्तित होती है, सन्दर्भवत होती है, उसकी अभिप्राय गहन संरचना होती है तो वहां भी प्रोक्ति स्तर का शैलीचिह्नक उपस्थित होता है । यहाँ आवर्तन स्थानिक (Local) या साकल्यपरक (Global) किसी भी संरचना के अन्तर्गत साभिप्राय रूप में उपस्थित हो सकता है। उदा- हरण के लिए 'नदी के द्वीप को जिस प्रोक्ति को अज्ञेय की कथा-भाषा पर विचार करते हुए डा० शीतांशु ने सन्दर्भगत आवृत्ति का उदाहरण माना है। वह प्रोक्ति भी प्रोक्ति-स्तर का शैलीचिह्नक है- 1. वह कहता गया-राह चलते जिस दिन बैठे-बैठे जानूंगा, मेरे कोई है और मुड़कर नहीं देखूगा और यह झुककर अपने खुले बाल मेरी आंखों के आगे डाल देगी उस दिन मैं जान लूगा कि मेरी खोज कि मेरे लिए खोज समाप्त हो गयी और पड़ाव आ गया। 1. कृष्णकुमार शर्मा, शलोविज्ञान की रूपरेखा (जयपुरःसंघी प्रकाशन, 1974), पृ.56 2. पाण्डेय शशिभूपण 'शीताशु', 'अज्ञेय को कपाभाषा' अजय, सम्पा. विश्व- नाथ प्रसाद तिवारी (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 1978), पृ. 203-204 3. अज्ञय, नदी के द्वीप (इलाहाबाद : सरस्वती प्रेस, तीसरा संस्करण), पु० 205 87 प्रोक्ति : शैलीपरक अभिलक्षण 2. 'भुवन की दोनों हाथों की उंगलियों ने ढरके हुए बालों की एक लट पकड़ ली फिर एक हाथ उसने छोड़ दिया, हाथ बढ़ाकर गौरा के माथे को धीरे-धीरे थपकने लगा।" राह चलते जिस दिन बैठे-बैठे जानूंगा कि मेरे पीछे कोई है और मुड़कर भी नही देखूगा और फिर झुककर अपने खुने बाल मेरी आंखों के आगे डाल देगी, उस दिन मैं जान लूंगा कि मेरी खोज"मेरे लिए खोज, समाप्त हो गयी और पड़ाव आ गया।" 3. 'मंसूरी में-मैंने सहसा देखा कि आगे एक मेघ है और वह तुम्हारे बालों का है तो जान लिया तुमने कह दिया और मुझे लगा कि जानकर ही तुमने कहा है, नही तो तुम भी कैसे कह पाती? मैंने तुम्हें कहा था- -कुछ हंसी मे ही सही कहा तो था-कि जिस दिन ऐसा होगा जान लूगा कि मेरी खोज-मेरे लिए खोज समाप्त हो गयी और पड़ाव आ गया पर...2 यहाँ भुवन का गौरा के प्रति यह कथन अत्यंत साभिप्राय है। फलतः यह प्रोक्ति-स्तर का शैलीचिह्नक है । 3. 4. 2. अप्रप्रस्तुति (Foregrounding) अभिलक्षण वर्ग : जब शैली पर पाठक-भावक की दृष्टि से विचार किया जाता है तब शैली- परक अभिलक्षण का अग्रप्रस्तुति अभिलक्षण-वर्ग उपस्थित होता है। शैलीचिह्नक वर्ग के विपरीत इस अभिलक्षण-वर्ग में प्रत्येक भाषाई स्तर के अभिलक्षणों को केन्द्रित-निरूपित किया जाता है। इसके मूल में पाठकीय-भावकीय पाठ-प्रक्रिया की अवधान-चेतना सक्रिय रहती है। 3.4.2.1. अग्रप्रस्तुति और इसके प्रस्तोता : 'अप्रप्रस्तुति अग्रेजी 'फोरग्राउंडिंग' का हिन्दी अनुवाद है। हिन्दी में इसके कई रूपांतर किये गये हैं, जिनमे अग्रप्रस्तुति, अग्रगामिता, तथा पेशबन्दी प्रमुख है। पर इनमें अधिक प्रचलित तथा स्वीकार्य रूपांतरण अग्रप्रस्तुति ही है । इसका • मूल चेक भाषा का (Aktualisace) शब्द है। इस अभिलक्षण के प्रस्तोता प्राग स्कूल के भापविद् हैनिक और मुकारोव्स्की हैं । डा. 'शीतांशु' के शब्दों में चित्रकला के क्षेत्र में इस शब्द का भाषाविज्ञान में पहला व्यवहार विश्वयुद्ध- पूर्व भाषाविज्ञान के प्राग-निकाय द्वारा किया गया था । तब अग्रप्रस्तुति मोटे तौर पर अद्भुत विचलन' का अर्थ संवहन करने वाली अवधारणा के रूप में उपस्थित 1. वही, पृ. 296 2. वही, पृ० 326 88 प्रोक्ति: स्वरूप, संरचना और शैली हुई थी। हिन्दी में इस अभिलक्षण-वर्ग के विषय में डा० रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव और डॉ० पाण्डेय शशिभूपण 'शीतांशु' ने विचार स्पष्ट किये हैं। डा० श्रीवास्तव ने जहां इसे अभिलक्षण-अवधारणा के रूप मे स्पष्ट किया है वहां डा० 'शीताशु' ने इसकी अभिलक्षणपरकता को स्पष्ट करते हुए इसे प्रतिमान के रूप में प्रतिष्ठापित किया है । डा० श्रीवास्तव ने ज्योफ्री एन. लीच के आधार पर इस आच्छादक पद के जहां दो अभिकरण-प्ररूप माने हैं वहां डा० 'शीतांशु' ने इसके चार अभि. लक्षण-प्ररूपों को स्वरूपित-निरूपित किया है. जिसमे तीसरे अभिलक्षण के लिए हैलीडे का आधार लिया गया है और चौथे अभिलक्षण को मौलिक रूप मे प्रस्तुत किया गया है। 3.4.2... अग्रप्रस्तुति : स्वरूप-स्पष्टीकरण : 'अग्रप्रस्तुति' के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए डा. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ने लिखा है, 'कला के क्षेत्र मे 'पेशवन्दी' (Foregrounding) से तात्पर्य अभिव्यक्ति- माध्यम के किसी पक्ष के वक्रभंगिमा के साथ उभरने से है। अपने लक्ष्य में पेशबन्दी रूठ और यांत्रिक संवेदनाओं को तोड़ती है। अतः इसका संबंध अनुभूत और अनुभूतियों के प्रत्यक्षीकरण साथ बना रहता है। तकनीकी अभिकरण के रूप मे पेशवन्दी एक ओर सहेतुक विचलन का रास्ता अपनाती है और दूसरी और समातरता का, पर इन दोनों अभिकरणो का लक्ष्य प्रत्यक्षानुभूति को सघनता देना है, दोनो का उद्देश्य हमारे अनुभवो के बहु-आयामी पक्ष को उमा- रना होता है और दोनो ही का प्रयोजन कृति को चुनावट को और अधिक ऐन्द्रिय रूप प्रदान करना रहा है । इस प्रकार डा० श्रीवास्तव ने अग्रप्रस्तुति की स्वरूपगत विशेषता के तोर रूड़ और यांत्रिक सवेदना को तोड़ने की प्रकृति तथा यक्रमंगिमा पूर्ण प्रस्तुति को निर्दिष्ट किया है । इसके अभिकरण के रूप में 'सहेतुक विचलन' तथा 'समांतरता' के द्वारा प्रत्यक्षानुभूति को दी जाने याली सपनना, ऐन्द्रियता और अनुभव को बहुआयापिता को स्पष्ट किया है सपा इसके द्वारा प्राप्त होने वाली अनुभूत और अनुभूतियों के प्रत्यक्षीकरण की एकात्मकता को रेगापित किया है। 1. पाय गशिभूपण 'शीयां', मोविज्ञान : प्रतिमान मोर पिनेपण (दिल्ली : देवदार प्रागन, 1984), पृ. 29 2. पाय गनिभूपण 'गीतांग गंमोयितान : प्रविमान और विश्लेषण, (हिन्ली: सदार प्रागन, 1984), पृ.29 3. पोमनाप योगाशय, 'म गामिना या पेगरी', गरपनामा मोरिशान, (दिपी: मानपान, 1979).2.48 89 प्रोक्ति:शलीपरक अभिलक्षण .. डा. 'शीतांशु' ने इसे पृष्ठभूमि बनाम अग्रभूमि की धारणा के बतौर स्वरूपित करते हुए लिखा है कि 'वस्तुत: अग्रप्रस्तुति चित्रकला के क्षेत्र का एक ऐसा रूपकात्मक (Metaphorical) पद है, जिसे गेस्टाल्ट मनोविज्ञान की आकृति- भूमि सम्बंधी विरोधिता (Contrast) के द्वारा समझा जा सकता है । आकृति- भूमि-सम्बंध में भूमि पर आकृति का प्रत्यक्ष सम्भव हो पाता है। आकृति और भूमि-सम्बंध की उत्कृष्ट व्याख्या किसी सामान्य आकृति को उलटते-पलटते हुए उसमें से भूमि को अलगाकर विशेष आकृति को खोज निकालने की क्रिया में प्राप्त होती है। जब किसी मुल-भुलैया वारे चित्र या रेखांकन में से छिपी हुई आकृति को सहसा ढूंढ़ निकाला जाता है, तो उसके सिवा वहां उपस्थित सभी रेखाए भूमिमात्र रह जाती हैं । इस प्रक्रिया में आकृति-भूमि से एक उन्मुक्ति के रूप में पृथक् छिटककर अपना महत्त्व सिद्ध कर जाती है। इसी प्रकार साहित्य में उक्त भूमि की तरह स्थान रखने वाली सामान्य भाषा सिर्फ वहां तक प्रासगिक सिद्ध हो पाती है, जहाँ तक अग्रप्रस्तुति के लिए उसके संरचित विन्यास और फैलाव के लिए वह पृष्ठभूमि मुहैया कर पाती हैं । आकृति की ही तरह भाषिक अग्रप्रस्तुत प्रयोग इस पृष्ठभूमि से उन्मुक्ति की तरह छिटकते और पाठक-भावक घ्यान को आकर्षित कर अपनी साभिप्रायता कर रेखांकन करने लगते हैं। इस प्रकार अग्रप्रस्तुति का सम्बंध पाठक के मनोविज्ञान और भावकीय सहृदयता से भी बैठता है। डा० 'शीताशु' ने अग्रप्रस्तुति के स्वरूप को और स्पष्ट करते हुए आगे बतापा है कि हैनिक और भुकारोवस्की के अनुसार सामान्य सम्प्रेष्य सन्देशों में भाषिक तत्त्व नियमतः स्वचालित (आटोमेटाइज्ड) होते हैं जबकि कविता में यह गैर-स्वचालित (डि-आटोमेटाइज्ड) होते हैं। स्वचालित भाषिक तत्व रूढ़ होने के कारण पाठक के मन को आकर्षित नहीं करते, वे सम्प्रेषण-मात्र करते है। पर गैर-स्वचालित भाषिक तत्व अपनी भव्यता और वक्र भंगिमा कारण अपनी ओर पाठक का ध्यान आकर्षित कर लेते हैं । वस्तुतः गैर-स्वचलता भापा के रूढ़ और यांत्रिक व्यवहार को तोड़ती है। इसमें भापिकीय घटकों का सौंदर्यपरक सोद्देश्य अन्यथाकरण होता है । इस प्रकार डा. 'शीतांशु' अग्रप्रस्तुति को विक्टर श्वलोवस्की के 'अपरिचयीकरण' को मूल अवधारणा पर आधारित मनते हैं । उनके अनुसार 1. पाण्डेय शशिभूषण 'शीताशु', 'अग्रप्रस्तुति प्रतिमान', शैलीविज्ञान : प्रकार और प्रतिमान (चंडीगढ : हरियाणा साहित्य अकादमी, 1987), पृ० 132-33 2. पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु, शैलीविज्ञान : प्रतिमान और विश्लेषण (दिल्ली : देवदार प्रकाशन, 1984), पृ. 29 90 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली - इस आच्छादक पद के अंतर्गत मुकारोवस्की की 'अग्रप्रस्तुति' (Foregrounding) कीआरंभिक घोपणा-(1) "विचित्र विवलन' रोमन याकोब्लन की- (2) समांतरता (Parallelism) नामक अभिलक्षण, एम. ए. के. हैलीडे द्वारा निर्दिष्ट--(3) विपथन (Divation) नामक अभिलक्षण तथा इनसबके बाद स्वयं उन्ही के द्वारा प्रस्तावित-(4) "विरलता' नामक अभिलक्षण समाकलित है । इस प्रकार डा. 'शीतांशु' ने अग्रप्रस्तुति की स्वस्पगत विशेपता को 'गेस्टाल्ट' मनोविज्ञान को भूमि-आकृति-संबंधी अवधारणा के आलोक मे स्पष्ट करते हुए, उसे भावकीय-पाठकीय सहृदयता तथा उसकी अवधान-चेतना से जोड़ते हुए इस आच्छादक पद की मूल संकल्पना-सक्रियता को स्वचलतेतर (De-Automatized) बताते हुए इसे 1. साभिप्राय विचलन 2. समातरता 3. विपथन और 4. विरलता, जैसे चार अभिक्षलणों के द्वारा उत्कृष्ट भाषा के सौन्दर्यात्मक प्रकार्य के रूप मे निरूपित किया है। ज्योफ्री एन. लीच के अनुसार अग्रप्रस्तुति विकल्पक्रमी (पाराडिग्मेटिक) और विन्यासक्रमी (सिटैनग्मेटिक) जैसे दो अक्षो पर स्वरूपित होती है । लीच ने विकल्पक्रमी अग्रप्रस्तुति को विचलन' (डिविएशन) कहा है और विन्यासक्रमी अग्रप्रस्तुति को 'समांतरता' (पैरेलेलिज्म) । वास्तव में विकल्पक्रमी और विन्यासक्रमी-ये दो भापिक संबंध-स्तर है। जब भाषा व्यवस्था के किसी एक बिन्दु पर उपस्थित विकल्प-कुलक' के कई संभावित विकल्पों में से किसी एक विकल्प को चुन लिया जाता है तब विकल्पक्रमी सम्बध उभरता है । इस सम्बंध- दृष्टि से प्रस्तुत होने वाली अग्रप्रस्तुति को विचलित अग्रप्रस्तुति कहा जाता है। पर इसके विपरीत जब भाषा-व्यवस्था में सामने आने वाले भाषिक एकक क्रमिक श्रृंखला में आपस में सहभावी होकर प्रस्तुत होते हैं नव विन्यासक्रमी सम्बंध प्रस्तुत होता है । इस स्तर पर सक्रिय होने वाली अग्रप्रस्तुति भाषा मे सामान्य गठन की सतह की अपेक्षा अधिक सतहो के सक्रिय होने की पूरी गुजाइश रखती है । यहाँ कम-से-कम एक और सतह की अधिकता अतिरिक्त नियमितताको जन्म देती है। यह अतिरिक्त नियमितता भाषा के सभी स्तरों पर संभव है । इस प्रकार इस संबंध- दृष्टि से प्रस्तुत होने वाली अग्रप्रस्तुति 'समांतरित अग्रप्रस्तुति' (पैरलेल फोरमा उडिंग) कहलाती है। याकोब्सन के शब्दों मे यही 'चयन के अक्ष से संयोजन वे अक्ष तक समतुल्यता के सिद्धांत का प्रक्षेपण होता है । 1. ज्योफी एन. लीच, "लिग्विस्टिक्स ऐण्ड द फिगर्ज अव रेटोरिक', एसेज ऑन स्टाइल ऐण्ड लग्वेज, मम्पा. रोजर फाउलर (लण्डन : रूटलेज ऐण्ड कीगेन पाल, 1979), पृ. 144-146 2. रोमन याकोब्मन, लिंग्विस्टिक्ष्म ऐण्ड पोयटिक्स', स्टाइल इन लैंग्वेज (कम्-ि ब्रज, एम. आई. टी. प्रेस, 1960), पृ० 358 प्रोक्ति : शैलीपरक अभिलक्षण .. 91 अपने बाद के 'स्टायलिस्टिक्स' (Stylistics) शीर्षक निबंध में लीच ने यह दिखाने का प्रयत्न किया है कि 'अग्रप्रस्तुति' मूलत: 'विचलन' मात्र है और 'समांतरता' भी 'विचलन' का ही एक भेद है । वह आसामान्य अनियमितता और असामान्य नियमितता दोनों को ही विचलन का प्रभेद मानता है। उसके अनुसार विरोध, सादृश्य, समान्तरता और अनुहार (Mimesis)-इन सब में विचलन ही क्रियाशील होता है। पर विचलन को अग्रप्रस्तुति का पूर्ण पर्याय मान लेना उचित नहीं है। नियमों का अतिक्रमण और अतिरिक्त नियमों का आरोपण- ये दोनों एक ही स्थितियां नहीं हैं, जिनके लिए "डिविएशन' या 'विचलन' जैसे नाम का प्रयोग किया जाय । हां, 'अग्रप्रस्तुति' दोनों ही स्थितियों में बनती है । इसलिए आच्छादक पद के रूप में 'अग्रप्रस्तुति' ही स्वीकार्य है, जिसके अन्तर्गत सभी अभिलक्षणों का समाहार हो जाता है। बानपीयर ने अपने शोध-प्रबंध 'स्टाइलिटक्स ऐण्ड साइकोलॉजी : इनवे- स्टिगेशन अव फोरग्राउंडिंग' में विचलन और समांतरता दोनों के अलग-अलग अस्तित्व को स्वीकार किया है तथा उन्हे अग्रप्रस्तुति का अभिलक्षण माना है।' 3.4.2.3. अनप्रस्तुति-अभिलक्षण : प्ररूप-स्पष्टीकरण अग्रप्रस्तुति के पूर्वकथित चारों अभिलक्षणों को निम्नलिखित रूप में परि- भापित-स्वरूपित किया जाता है। 34.2.3.1. विचलन : विचलित अग्रप्रस्तुति का मूलाधार विचलन की संकल्पना है । यह अंग्रेजी Devition का हिन्दी रूपांतर है। विचलन की संकल्पना मानक की संकल्पना से सम्बद्ध है । प्रत्येक भाषा का अपना मानक रूप होता है । जब उस भाषा का रचनाकार भाषा के इस मानक रूप का अतिक्रमण करता है तब विचलन उप- स्थित होता है। यहां विचलन की संकल्पना अव्याकरणिकता पर आधारित होती है । पर विचलन अस्वीकार्यता पर भी आधारित होता है । अव्याकरणिक विचलन ध्वनि, रूप शब्द और वाक्य के स्तर पर क्रिणशील होता है, किन्तु अस्वी- कार्य विचलन अर्थ और प्रोक्ति के स्तर पर क्रियाशील रहता है। आचार्य विद्यानिवास मिश्र ने 'विचलन' को काव्यभाषा की उस सर्जन- 1. ज्योफ्री, एन. लीच, 'स्टायलिस्टिक्स' डिस्कोर्स, ऐण्ड लिटरेचर, संपा. टी. ए. वानडिज्क (एम्सटर्डम : जान वनजामिन्स पब्लिशिंग कम्पनी, 1985), पृ. 46-47-48 2. बानपोयर, स्टाइलिस्टिक्स ऐण्ड साइकोलाजी : इन्वेस्टिगेशन अव फोर- ग्राउंडिंग (लण्डन : म हेल्म, 1986) 92 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली क्षमता का प्रमाण माना है, जो क्षमता सन्दर्भ के बीच स्थिर और सुनिश्चित सम्बन्धों को तोड़ती है, सर्जनात्मक वाक्य-विन्यास को उपस्थित करती है, चालू भाषा के वाक्य-विन्यास को मोड़ती है और इस प्रकार काव्य-भाषा की संरचना की दिग्बोधक चुम्बकीय सुई बन जाती है। उनके शब्दो में, जिसे गद्य की दृष्टि से मानक रूप में विचलन (डेविएशन) कहा जाता है, वह काव्यभाषा के गठन की दृष्टि से भापा की सर्जन क्षमता का प्रमाण बन जाता है।"xx "चूंकि सामान्य भाषा का उद्देश्य सीमित है इसलिए वह संकेत और संदर्भ बीच के स्थिर और सुनिश्चित संबंधों को तोड़ने की आवश्यकता नहीं महसूस करती, किन्तु काव्यभाषा इन सम्बन्धों को तोड़ने के लिए इस कारण लाचार है कि काव्यभाषा पूर्व-निश्चित सम्बन्धो को एक नयी वास्तविकता से अभिभूत करके विचलित करती है ।2xx 'वस्तुतः विचलन मुख्यतः सर्जनात्मक कृति के निजी वाक्य-विन्यास का ही एक आवश्यक उपकरण है।xx 'काव्यात्मक वाक्य-विन्यास काच्याथं की दृष्टि से चालू भापा के वाक्य-विन्यास को मोड़ने की एक प्रक्रिया है ।4xxx 'यह (विचलन) वस्तुतः काव्यभाषा के अपेक्षित अन्वय की पूर्ति के लिए ही उपयोजित किये जाते हैं और इस दृष्टि से इन्हें विच- लन न मानकर काव्यभाषा की संरचना की दिग्बोधक चुम्बकीय सुई मानना चाहिए, जो काव्य के ध्र व-बिन्दु की ओर एक झटके में बल खाकर मुड़ जाती विद्यानिवास मिश्र ने विचलन की अभिव्यक्ति को निम्नलिखित रूपो में निर्दिष्ट किया है- (1) वाक्य-रचना में क्रमभग के रूप में। (2) वाक्य में प्रत्याशित समनुहार (वचन, पुरुष, लिंग, काल आदि की अन्विति के मंजन के रूप मे)। (3) व्याकरणिक कोटि के अन्तरण (क्रिया को कर्म, कर्म को क्रिया मे रूपांतरित करना) के रूप मे । (4) वाक्य को बाह्य संरचना के स्तर पर अपूर्ण छोड़ देने मे । 1. विद्यानिवास मिश्र, 'काव्यभापा का गठन और साभिप्राय विचलन', रीति- विज्ञान (दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन, 1973), पृ० 75 2. विद्यानिवास मिश्र, 'काव्यभापा का गठन और साभिप्राय विचलन', रीति- विज्ञान (दिल्ली: राधाकृष्ण प्रकाशन, 1973), पृ. 76 3. वही, पृ०79 4. वही, पृ. 80 5. वही, पृ० 83 प्रोक्ति : शैलीपरक अभिलक्षण 93 डॉ० रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव के अनुसार-सहेतुक विचलन को शैलीविज्ञान दो निश्चित सन्दर्भो मे ग्रहण करता है-व्याकरणिकता (ग्रामेटिक लिटी) का सन्दर्भ और आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) का सन्दर्भ डॉ० पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु' के शब्दों में-विचलन में सामान्य गद्य भाषा के मानक (नाम) से अतिक्रमण होता है । यह अतिक्रमण अव्याकरणिकता (अनग्रामेटिकेलिटी) और अस्वीकार्यता (अनएक्सेप्टिविलिटी) जैसी दो दिशाओं में होता है। 3.4.2.3.2. विपथन: 'विपथन' अंग्रेजी Deflection का हिन्दी रूपांतर है । इसके मूल में भी मानक से अतिक्रमण को अवधारणा क्रियाशील होती है । किन्तु यहाँ मानक भाषा के व्याकरण का न होकर युग, प्रवृत्ति, रचनाकार अथवा विशेष रचना का अपना मानक होता है । डॉ० पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांश' ने 'विपथन' को विचलन से अलगाते हुए लिखा है-'जब रचनाकार अपने द्वारा स्वीकृत और सुस्थिर एक मानक की प्रत्याशा से अतिक्रमण कर जाता है, और इसके समांतर या विरोध में दूसरे मानक को उपस्थित करता है, तब वहाँ विपथन होता है।' यहाँ मानक की पद्धति लगातार प्रत्याशित रहती है, पर प्रायः वृतिकार कृति के अन्त मे इस प्रत्याशा को तोड़ता हुआ इससे अतिक्रमण कर जाता है । यह अति- क्रमण ही विपथन वनकर उपस्थित होता है । यहां अंत की जगह कृतिकार अपनी कृति के पूर्वांत मे अथवा मध्य में भी यह अतिक्रमण कर सकता है । किसी युग मा साहित्य प्रवृत्ति की प्रत्याशा को बाधित करने से भी ऐसा विपथन उपस्थित होता है। विचलन की तरह विपथन भी भाषा के सभी स्तरों-ध्वनि, शब्द, रूप, वाक्य, अर्थ, प्रोक्ति-पर क्रियाशील होता है। 3.4.2.3.3. समांतरता: समांतरता अंग्रेजी Parallelism का हिन्दी अनुवाद है। यह एक ओर किसी भी भाषिक एकक की आवृत्ति-नियमितता मे क्रियाशील होती है तो दूसरी ओर किसी भी भाषिक एकक की व्यतिरेकिता को भी उपस्थित करती है। डॉ. भोलानाथ तिवारी समांतरता को परिभाषित करते हुए कहते हैं, 1. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, संरचनात्मक शैलीविज्ञान (दिल्ली:आलेख प्रकाशन, 1979), पृ० 49 2. पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु', शैलोविज्ञान : प्रतिमान और विश्लेषण (दिल्ली : देवदार प्रकाशन, 1984), पृ० 30 3. वही, पृ. 31 ..

.. 94 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली 'सर्मातरता से आशय है किसी रचना में समान या विरोधी भाषिक इकाइयों का समानांतर प्रयोग । डा० रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव के अनुसार-'समांतरता का अर्थ है किसी भाषिक लक्ष्य या विधान की पुनरावृत्ति की नियमितता। डा० 'शीतांशु' समांतरता के दो प्रकार स्वीकार करते हुए कहते हैं-'समांतरता मे समता और विरोध की दो दिशाएं खुलती हैं । विविध प्रकारो की आवृत्ति- निर्भर समांतरता समतामूलक समांतरता बनकर आती है और विरोध-निर्भर समातरता विरोधी समांतरता बनकर । इस तरह इसके दो रूप हो जाते हैं-3.4.2.3.3.। समतामूलक और 3.4.2.3.3.2. विरोधमूलक । समांतरता को अन्य भाषिक अभिलक्षणों के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है-3.4.2.3.3.3. संसक्तिमूलक समांतरता और 3.4.2 3.3.4. समंजसतामूलक समांतरता । इसके अतिरिक्त किसी भी कृति में स्थानिक संरचना (Lccal Structure) और साकल्यपरक सरचना (Global Structure) के आधार पर भी इसके 3.4.2.3.3.5. स्थानिक समांतरता और 3.4.2.3.3.6. साकल्यपरक समांतरता जैसे भेद किये जा सकते हैं । स्थानिक समातरता में भावृत्ति, विरोध को नरंतर्य मे रेखाकित किया जाता है, पर साकल्यपरक समातरता मे पूरी कृति के सन्दर्भ में । समां- तरता भी 'विचलन' और 'विपथन' जैसे अभिलक्षणो की तरह भापा के सभी स्तरों-ध्वनि, शब्द, रूप, वाक्य, प्रोक्ति अर्थ-पर क्रियाशील होती है। 3.4.2.3.4. विरलता : समांतरता में जहाँ विशेष भाषिक एकक की बहुलता देखी जाती है, वहां विरलता में विशेष भाषिक एकक की विरलता देखी जाती है । इन दोनो को प्रतिपाद्य (Theme) और उन्मीलक (Key) की सकल्पनाओ से जोड़ा जाता है। प्रतिपाद्य की सकल्पना आवर्तनमूलक होती है। किन्तु उन्मीलक की संरचना विरल होती है। यहां ध्यान देने योग्य है कि विरल रूप मे कभी-कभी विचलन और विपथन भी उपस्थित हो सकता है, पर तब वहाँ विरलता नाम का अभिलक्षण क्रियाशील नहीं होगा, बल्कि विरल तत्त्व विचलन और विपथन के अंतर्गत ही क्रियाशील होगे। विरलता तब उपस्थित होती है, जब समातरता, विचलन 1. भोलानाथ तिवारी, शैलीविज्ञान (दिल्ली : शब्दकार, 1977), पृ. 88 2. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, संरचनात्मक शैलीविज्ञान (दिल्ली : आलेख प्रकाशन, 1979), पृ० 58 3. पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु', शैलीविज्ञान : प्रतिमान और विश्लेषण (दिल्ली : देवदार प्रकाशन, 1984), १० 63 - प्रोक्ति: अलीपरक गिलक्षण 95 और विपपन-तीनों में से कोई भी अभिलक्षण रियाशील नहीं होता है । इसकी मंघटना को स्पष्ट करते हुए डा० शीतांशु' ने लिया है कि 'यद्यपि पाठ की मापिक प्रमुपता या अपप्रस्तुति अयं से जुड़कर को 'विचलन' के सहारे उप- स्थित होती है तो कभी 'विपथन' के सहारे और कभी रामोतरता' के सहारे, किन्तु प्रति अपया पाठ में कभी भी ऐसी स्थिति भी उत्पन्न होती है, जब यहाँ न तो विचलन' होता है, न हो यिरपन, और न ही समातरता फिर भी गद प्रमुख होकर हमारा ध्यान यापित करते हुए अप्रप्रस्तुत हो जाते हैं। यस्तुतः ऐसे गन्द उन्मोलक मन्द (पी-यड) होते हैं, जो कृति अथवा पाठ को गहन संरचना से जुड़कर अयता का संचालन करते हैं । इनके हाथ में पति और पाठ के कम्य का नियंत्रण-मूत्र होता है । कृति अथवा पाट में शब्द-प्रयोगों की प्रायः दो कोटियों को गई है-(1) प्रतिपाय शब्द (पीम-यह) और (2) उन्मीलक शब्द (को-वई)। प्रतिपाद्य पद किसी कृति अपया पाठ में अनेकशः आवृत्त होते हैं । इसके विपरीत उन्मीला सन्द प्रयोग विरल होते हैं । प्रतिपाद्य शम्द को क्रियाशीलता को सदेव समांतरता के अभिकरण के सहारे रेखांकित किया जाता है, किन्तु उन्मीलक शब्द को सदैव 'विचलन' फे राहारे रेखांकित नहीं किया जा सकता। यदि अव्याकरणिकता और अस्वीकार्यता उसके मूल में नहीं है तो विचलन नहीं होगा और यदि रचनाकार को 'प्रायिक प्रत्याशित' पद्धति के समनु- रूप है तो, 'विश्पन' भी नही होगा। दूसरे शब्दो मे "विरलता' का अभिकरण निम्नलिखित 'अवयवभूतार्यता'(Componential analysis) को प्रस्तुत करता विरलता- -अव्याकरणिकता -अस्वीकार्यता -समांतरता +लेखकीय विरलता +प्रायिक प्रत्याशा +गहन संरचना ऐसे में यहां प्रमुपता शुद्ध रूप में 'विरलता' (रेयरनेस) पर आधारित होगी। विरलता ही यहाँ अग्रप्रस्तुति का अभिकरण बनेगी। डा० 'शीतांशु' विचलन को लिविन के अनुरूप आंतरिक और बाह्य रूप में वर्गीकृत नहीं कर उसे उसकी समांतर अवधारणा के रूप में ग्रहण करते है तथा तकंपूर्वक 'विरलता' को अलग अवधारणा के बतौर स्वरूपित करते हैं। उनके प्राब्दो में, 'मुझे ऐसा लगता है कि विचलन की अवधारणा को इतनी व्यापकता देना, जिससे 'विपथन' और 1. पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु', शैलीविज्ञान : प्रतिमान और विश्लेषण (दिल्ली : देवदार प्रकाशन, 1984), पृ० 32 96 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली "पिरलता' को सांख्यिकीय तुलनात्मक विश्कता के आधार पर उसके अन्तर्गत कर लिया जाय, उचित नहीं है, क्योंकि दोनों अवधारणाएँ उसके प्रभेद-रूप में स्वरूपित नही होकर उसके समांतर चलती हैं। तुलनात्मक विभेदकता एक ही रचनाकार को कृतियों के सन्दर्भ में विचलन' के रूप में उपस्थित न होकर विपथन' के रूप में उपस्थित होती है और कई रचनाकारो की कृतियों के संदर्भ में उनके अलग-अलग शैलीपरक अभिलक्षण का चिह्न बनकर। विपयन' के रूप में क्रियाशील तुलनात्मक विभेदकता व्याकरणिक शब्दरूप - मंशा, क्रिया, विशेषण आदि को तो रेखांकित कर सकती हैं, किन्तु गन्न-विशेष को नहीं । एक तथ्य है कि किसी विरल शब्द प्रयोग की पृष्ठभूमि में लेखकीय प्रायिक प्रत्याशा से अतिक्रमण हुआ ही हो, यह यावश्यक नहीं है। दूसरे, किसी भी रचना मे इकहरे या विरल प्रयोग वाले अनेक संज्ञा या विशेषण मादि शाद हो सकते हैं। पर उनमें साभिप्राय या गहन मेरचना से जुड़े शब्द एक-दो ही मिलेंगे । अतः सारे संज्ञा, विशेषण जैसे पाब्दों को रेखांकित कर भी अभीष्ट सामिप्रायता वाले शब्द को अलग से रेखाकित नहीं किया जा सकता है, जो वस्तुतः अग्रप्रस्तुत होते हैं । जहाँ तक कई रचनाकारों की कृतियों में इसके सहारे विभेदकता को स्पष्ट करते हुए शैलिकोय अभिलक्षण को रेखांकित करने का प्रश्न है, वहीं विभेदक शैलीतत्त्व तो सचमुच स्पष्ट हो सकते हैं, परन्तु "विचलन' का वहाँ कोई अस्तित्व नहीं होगा, क्योकि विचलन सदेव ज्ञात मानक से ही होता है और ऐसा अधिक सम्भव है कि एक रचनाकार ने दूसरे रचनाकार की कृतियों को पढकर अपने शॉलकीय अभिलक्षण नहीं अलगाये हो । हिन्दी मे तो चतुरसेन शास्त्री ने किमी दूसरे हिन्दी उपन्यासकार, कहानीकार को कोई भी पुस्तक नहीं पढ़ी थी, पहाँ तक कि 'गोदान' भी नहीं पढ़ा था। फिर उनके और प्रेमचंद के शैलिकोय तत्वों में तुलनात्मक विभेदकता विचलन-प्रसूत शैली को को रेखांकित कर सकती है ? स्पष्ट है कि सोपाधिक या सापेक्ष रूप मे भी मानक की स्थापना सभी स्थलों पर नहीं की जा सकती है। तुलनारमक विभेदकता और विवेच्य विरलता' का एक बड़ा अन्तर इनके अनुप्रयोगी घोपान (एप्लिकेशन-स्केल) और प्रकार्यात्मक मोद्देश्यता का भी है । तुलनात्मक विभेदकता की सोद्देश्यता 'स्टाइलोमीट्रिक' होने की है, जिसे 'एट्रीब्यूटिव' कहा जाता है, जबकि विरलता' की विशेषता स्टायलिस्टिक' होने मे है जिसे 'इन्टरप्रेटिव' कहा जाता है।" 3.42.4. प्रोक्ति-स्तरः अग्रप्रस्तुति अभिलक्षण-निदर्शन प्रोक्ति-स्तर पर अग्रप्रस्तुति के अभिलक्षणों का निदर्शन निम्नलिखित रूप मे द्रष्टव्य है- 1. पाण्डम शशिभूपण 'शीतांशु', शैलीविज्ञान : प्रतिमान और विश्लेषण (दिल्ली : देवदार प्रकाशन, 1984), पृ. 32-33 प्रोक्ति : शैलीपरक अभिलक्षण 9 : 3.4.2.4.1. विचलन का निदर्शन 3.4.2.4.2. विपथन का निदर्शन 3.4.2.4.3. समांतरता का निदर्शन 3.4.2.4.4. विरलता का निदर्शन 3.4.2.4.1. विचलन का निदर्शन: प्रोक्ति-स्तर का विचलन वहाँ होता है जहां एक पूरी प्रोक्ति में कथित कई अंशों मे कुछ अंशों की तो आगे व्याख्या की जाती है, पर कम-से-कम एक या कुछ अंशों की व्याख्या का अध्याहार कर दिया जाता है। प्रोक्ति-स्तर पर विचलन का निदर्शन द्रष्टव्य है- 'कह रहे थे कि मुसलमानों के रहने की जगह का यह नाम किसने दे दिया ? क्या सारे मुसलमान कसाई होते हैं।" 'दरअसल रहमान भाई गरीबों के मुहल्ले को कोई नाम दे दो, क्या फर्क पड़ता है । गरीब लोगों को बसने के लिए कोई चुनाव थोडे करना पड़ता है । जहाँ सस्ती जगह या मकान मिला उसमें समाने की कोशिश करते हैं । कुछ कसाई पहले यहां रहते होंगे, एरिया उपेक्षित रहा होगा, धीरे-धीरे गरीब मुसलमान यहां बसने लगने होगे, बस गई कसाई चाल 12 यहां पहली प्रोक्ति के पहले अश में मुसलमानों के मुहल्ले के नामकरण के बारे में पूछा जाता है और दूसरे अंश में यह पूछा जाता है कि क्या सारे मुसल- मान कसाई होते हैं, पर दूसरी प्रोक्ति मे सिर्फ मुसलमानों के मुहल्ले के नामकरण के बारे में बताया जाता है पर 'क्या सारे मुसलमान कसाई हैं,' पूर्व प्रोक्ति के इस अंश का कोई उत्तर नही दिया जाता है । इसका अध्याहार कर दिया जाता है। इस प्रकार सिर्फ मुहल्ले के नामकरण का कारण बताने और सारे मुसलमान के कसाई होने वाले प्रश्न का उत्तर नहीं देने के कारण यहाँ प्रोक्ति-स्तरीय विचलन प्रस्तुत होता है। 3.4.2.4.2. विपथन का निदर्शन: प्रोक्ति-स्तर का विपथन वहाँ उपस्थित होता है, जहाँ आधार-भाषा में अपने द्वारा आनाये गये मानक का रचनाकार अतिक्रमण कर जाता है। यहाँ यह ध्यानीय और महत्वपूर्ण होता है कि प्रायः प्रोक्तियाँ आधार-भाषा में रचना- कार का मानक बन कर आएं, पर नयो प्रोक्ति इसका अतिक्रमण कर जाए । 1. रामदरश मित्र, दूसरा घर, (नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन, 1986), पृ० 170 2. वही,

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प्रोक्ति : शैलीपरक अभिलक्षण 99 मोती कांप रहा है । सारे गीत में वह लड़की उसे पराई लगती रहती है, पर आखिरी पक्ति गाती हुई वह लड़की उसे अपनी हो गयी लगती है ।"x-'तब एक की उम्र बीम बरस थी, दूसरी की चालीस बरस और फिर यह दहलीज और भी हंसी"जब एक बारात इस दहलीज से बाहर गयी और एक डोली इस दहलीज के अन्दर बायो। पहले उदाहरण में 'परायी लगने' और अपनी हो जाने की प्रोक्तिपरकता विरोधमूलक है तो दूसरे उदाहरण मे दहलीज से बाहर जाने और दहलीज के अन्दर आने की प्रोक्तिपरकता विरोधमूलक । अतः यहाँ प्रोक्ति-स्तर की विरोध- मूलक समांतरता स्पष्ट होती है। 3.4.2.4.3.3. संसक्तिमूलक समांतरता : संक्तिमूलक समांतरता के समतापरक एवं विरोधपरक दोनों ही भेदों के प्रोक्ति-स्तरीय निदर्शन नीचे द्रष्टव्य हैं- 3.4.2.4.3.3.1. समतापरक संसक्तिमूलल समांतरता : प्रोक्ति स्तर पर इसका उदाहरण द्रष्टव्य है- 'रानी ने पहले गुलाब का फूल तोड़ा और उस मर्द के कोट में ताग दिया, फिर अपने होठों की मुस्कान छुई और उस मदं के होठो पर रख दी। 3 यहाँ संसक्ति शब्द के आवर्तन के साथ-साथ प्रोक्ति को संरचना में भी क्रियाशील है । फलतः कथित प्रकार की समांतरता है। 3.4.2.4.3.3.2. विरोधी ससक्तिमूलक समांतरता : प्रोक्ति-स्तर पर निम्नांकित निदर्शन द्रष्टव्य है- 'पहले मेरा दायो हाथ सुन्न हुआ, फिर दायी बांह, दायां कन्धा फिर बायां हाथ, बापी बांह और बायां कन्धा । यहाँ पहले, फिर और दायां, बायां की विरोधी शाब्दिक आवृत्ति तया विरोधी संरचना इस प्रकार की प्रोक्ति समांतरता को उद्भूत कर रही है । 1. अमृता प्रीतम, ' जाने कौन रंग रे', अमृता प्रीतम की चुनी हुई कहानियां, (दिल्ली : भारतीय ज्ञानपीठ, 1982), पृ० 125-126 2. अमृता प्रीतम, 'जरी का कफन', अमृता प्रीतम की धुनी हुई कहानियां, पूर्ववत्, पृ. 131 3. अमृता प्रीतम, 'मलिका', अमृता प्रीतम की चुनी हुई कहानियां, पूर्ववत्, पृ. 103 4. अमृता प्रीतम, 'एक शहर की मौत', अमृता प्रीतम को चुनी हुई कहानियां, (दिल्ली : भारतीय ज्ञानपीठ, 1982), पृ० 97 100 संरचना और सो - 3 342 434 गमंजस मूल समारता 142434 | रपालिका रामगगतागफ रामांगरता गा। उसहरपष्टप- 'गूयं dि मोर का होम गुमाय पी एम टरनी यो हवा, एक मां को नजर मी और ने रानी ने हाटा या धुआ।" यहां सपा और न की प्रतिणि पाली म्यानिा समंजमा ममारता पो गष्टि यार रही है। 3 42 43 42. साप पपरक समंगरा शामरा समारता ऐसी प्रोशितगन ममाला पूरी यूनिक आधार पर अपना म्वरुप स्पष्ट फरती है । इग दृष्टि ग 'अम्बानी' की निम्नामित प्रोधियो विचारणीय है-- तेरे चरणों पर हगार-हे गार राजयुमारा पे मुकुट लोटंग । 2 'मधु हजार गार राजकुमार । उफ, यह भी कोई जिन्दगी होगी। मेरा तो अबला 3 ज्योतिषी ने अम्बापाली ग पहा-'हजार हजार राजकुमारो के मुकुट तुम्हार चरणी पर ताटेंगे।" 4. मुमना, हाँ, हो, इम उग्न म मब लडपियाँ, राजकुमारो का ही सपना देगती हैं. हजार-हगार गजकुमार ? लाग-लाय देवकुमार । 5 मेरी रानी, अभी तू देखने-दिखाने से क्यो कांपती है और जब हजारो- हजार रामकुमार । 6. मे राजनतंकी मधु, मधु, मैं राजनर्तको 'हजार-हजार राजकुमारो के मुकुट · हो हो हो हो मरे, चरणो पर रे मेरे चरणो पर' मधु · तू पूर क्यो रही है . मैं राजनर्तकी।' 7. ..."राजनर्तकी... राजनतंकी · अरुण मै राजनर्तकी 'राजनर्तकी... राजनर्तकी "हा"हा हा हा ''हमार-हमार"राज। 8. हमे अपना सिर उनके निकट झुगाने की जरुरत नहीं होती। उन्ही के हजार-हजार राजमुकुट चरणों की धूत चाटने लगते हैं। हम नारियो को भी एक महिमा है । यह क्यो भूत जाती है भोली लडकी। 1. वही, पृ० 103 2. रामवृक्ष बेनीपुरी, अम्बपाली (दिल्ली : राजपाल ऐड सज, 1986), पृ. 15 ३ वही, पृष्ठ 15 5. वही, पृ० 20 7. वही, पृ. 32 9. वही, पृ० 38 4. वही, पृ. 17 6. वही, पृ० 27 8. वही, पृ० 33 thakareer 1 प्रोक्ति :शैलीपरक अभिलक्षण 9. इस चांद की तरह, जो हजार, हजार तारों से घिरा रहकर अपनी हास्य-ज्योत्स्ना से जगत को हमेशा पुलकित-प्रफुल्लित किए रहेता है। नारी के लिए बीच का रास्ता नही है चयनिके ।' 10. वहाँ एक पुरुष हजार नारियां, आज होगी एक नारी और हजार-हजार "हो हजार-हजार राजकुमार। 11. जिसका सिर तुम्हारे चरणों पर अवनत था, उसके चरणो पर हजार- हजार राजकुमारों के मुकुट लोटते हैं। अरुणा हजार हजार । ओ हो"हजार-हजार राजकुमारों के मुकुट ।' ऊपर हजार हजार राजकुमारों के मुकुटों के अम्बपाली के चरणो मे लोटने को प्रोक्ति 'अम्बपाली' नाटक मे ग्यारह बार आवर्तित होकर साकल्यमूलक समंजसतापरक समांतरता की सृष्टि कर रही है । ज्योतिषी की यह भविष्यवाणी अम्बपाली के जीवन मे साकार हो जाती है और वह राजनर्तकी बनती है । वाणी की संभावना सार्थकता प्राप्त कर लेती है। 3.4.2.4.4. विरलता का निदर्शन : प्रोक्ति स्तर पर सूक्ति बनने वाली विरलता का निदर्शन द्रष्टव्य है-- 'नहीं दोस्त अब तक जो कुछ सीखा है, असली सीखना वही है । वही तुम्हारी पूंजी है। वही हम सबकी पूंजी है । अब जो कुछ सीखेंगे, वह असली नहीं होगा। तुममें ताकत होगी तो अब तक के सीखे हुए सत्य को नई परि- स्थितियों मे निखारोगे, विकसित करोगे और निरन्तर एक शक्ति अनुभव करते जाओगे।" प्रस्तुत प्रोक्ति पूरी कृति में एक ही बार प्रयुक्त हुई है जो कृति के लक्ष्य को खोलने में सहायक सिद्ध होती है । इस प्रोक्ति में लेखक ने सत्य की पहचान के विषय में बताया है-यदि भीतर की शक्ति नहीं होगी तो सत्य को खो देंगे। यदि वह शक्ति होगी तो विकास का और निखार होगा। इस प्रकार यहाँ भीतरी शक्ति की पहचान पर प्रकाश डाला गया है। 3.5. निष्कर्ष उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रोक्ति के शैलीपरक अभि- सक्षण की प्रकृति विशिष्ट होती है, वह गहन संरचना से जुड़ी होत है और उसमें भाषा का सौंदर्यात्मक प्रकार्य क्रियाशील होता है। साप ही यह विवेचन किसी भी पाठ। प्रोक्ति के शैलीपरक अभिलक्षणों का विश्लेषण-विवेचन करने के लिए सम्यक आधार प्रदान करता है। 1. रामवृक्ष बेनीपुरी, अम्बपाली (दिल्ली: राजपाल एंड संस, 1985), पृ. 47 2. वही, पृ. 49 3. वही, पृ.70 4. रामदरश मिश्र, दूसरा घर (नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन, 1986), १.60 प्रोक्ति : स्वरूप, 100 संरचना और शैली 3.4.2.4.3.4. समंजसतामूलक समांतरता: 3.4.2.4.3.4.1. स्थानिक समंजसतामूलक समांतरता: इसका उदाहरण द्रष्टव्य है- 'सूर्य की किरणें झुकी और उन्होंने हौले से गुलाब की एक टहनी को छुआ, एक मर्द की नजरें झुकी और उन्होंने हौले से रानी के होठों को छुआ।" यहाँ 'झुकने' और छूने की प्रतिज्ञप्ति वाली स्थानिक समंजसता समांतरता की सृष्टि कर रही है। 3.4.2.4.3.4.2. साकल्यपरक समंजसतामूलक समांतरता : ऐसी प्रोक्तिगत समांतरता पूरी कृति के आधार पर अपना स्वरूप स्पष्ट करती है । इस दृष्टि से 'अम्बपाली' की निम्नांकित प्रोक्तियो विचारणीय हैं- 1. 'तेरे चरणो पर हजार हजार राजकुमारों के मुकुट लोटेंगे। 2. 'मधु हजार-हजार राजकुमार ( उफ, वह भी कोई जिन्दगी होगी । मेरा तो अकेला... 3. ज्योतिषी ने अम्बापाली से कहा-'हजार"हजार राजकुमारों के मुकुट तुम्हारे चरणो पर लौटेंगे। 4. सुमना, हां, हां, इस उम्र मे सब लड़कियां, राजकुमारों का ही सपना देखती हैं "हजार-हजार राजकुमार? लाख-लाख देवकुमार । 5. मेरी रानी, अभी तू देखने-दिखाने से क्यो कांपती है और जब हजारों- हजार राजकुमार 6. मैं राजनतंकी मधु, मधु, मैं राजनतंकी "हजार-हजार राजकुमारों के मुकुट'"हो"हो"हो' 'हो । मेरे, चरणो पर रे मेरे चरणो पर" मधु''तू पूर क्यो रही है। मैं राजनतंकी। 7. .."राजनर्तकी.."राजनर्तकी "अरुण मैं राजनतंको."राजनर्तकी राजनतंकी हा "हा.हा.हा.. हजार-हजार"राज" 8. हमें अपना सिर उनके निकट झुकाने की जरूरत नहीं होती। उन्ही के हजार-हजार राजमुकुट चरणों की धूल चाटने लगते हैं। हम नारियों को भी एक महिमा है। यह क्यों भूल जाती है भोली लड़की। 1. वहीं, पृ. 103 2. रामवृक्ष बेनीपुरी, अम्बपाली (दिल्ली : राजपाल ऐंड संज, 1986), 3. वही, पृष्ठ 15 4. वही, पृ. 17 5. वही, पृ० 20 6. वही, पृ० 27 7. वही, पृ. 32 8. वही, पृ० 33 9. वही, पृ. 38 16 पृ. 15 moi : : मुकुट 'बनती है। प्रोक्ति :शैलीपरक अभिलक्षण 9. इस चांद की तरह, जो हजार, हजार तारों से घिरा रहो हास्य-ज्योत्स्ना से जगत को हमेशा पुलकित-प्रफुल्लित किए रहता। नारी के लिए बीच का रास्ता नहीं है चयनिके ।' जार-हजार 10. वहाँ एक पुरुप हजार नारियां, आज होगी एक नारी और हर "हाँ हजार-हजार राजकुमार । र हजार- 11. जिसका सिर तुम्हारे चरणों पर अवनत था, उसके चरणों हजार राजकुमारों के मुकुट लोटते हैं । अरुणा हजार"हजार । ओ हो "हजार-हजार राजकुमारों पर हजार-हजार राजकुमारो के मुकुटों के अम्बपाली के चरणों मे लोटने की प्रोक्ति 'अम्बपाली' नाटक मे ग्यारह बार आवर्तित होकर साकल्यमूलक विष्यवाणी समंजसतापरक समांतरता की सुष्टि कर रही है । ज्योतिषी की यह भी अम्बपाली के जीवन में साकार हो जाती है और वह राजनतंकी। वाणी की संभावना सार्थकता प्राप्त कर लेती है । 3.4.2.4.4. विरलता का निदर्शन: प्रोक्ति स्तर पर मूक्ति बनने वाली विरलता का निदर्शन द्रष्टव्य। 'नही दोस्त अब तक जो कुछ सीखा है, असली सीखना वहीं, है। वहीं तुम्हारी पूंजी है। वही हम सबको पूंजी है । अब जो कुछ सीखेंगे, नही होगा। तुममे ताकत होगी तो अब तक के सीखे हुए सत्य को नई परि- स्थितियों में निखारोगे, विकसित करोगे और निरन्तर एक शक्ति अन् बुभव करते जाओगे।। प्रस्तुत प्रोक्ति पूरी कृत्ति में एक ही बार प्रयुक्त हुई है जो कृति को घोलने में सहायक सिद्ध होती है । इस प्रोक्ति में लेखक ने सत्य के विषय में बताया है यदि भीतर की शक्ति नहीं होगी तो सत्य के यदि वह शक्ति होगी तो विकास का और निखार होगा। इस प्र कार यहाँ भीतरी शक्ति की पहचान पर प्रकाश डाला गया है । 3.5. निष्कर्ष: उपयुक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रोक्ति के शैलीप एक अमि- लहम की प्रकृति विशिष्ट होती है, वह गहन संरचना से जुड़ी हो उसमे भाषा का सौंदर्यात्मक प्रकायं श्यिाशील होता है। साथ ही या विवेचन किसी भी पाठ। प्रोदिन के शैलीपरक अभिलक्षणों का विश्लेषण-विवे चन करने के लिए सम्यक् बाधार प्रदान करता है। 1. रामवृक्ष बेनीपुरी, सम्बपाली (दिल्ली : राजपाल ऐंड संस, 198547 2. वही, पृ० 49 3. वही, पृ० 70 4. रामदरश मिय, दूमरा पर (नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन 1986), वह असली के लक्ष्य की पहचान खो देंगे। .

100 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शीली 3.4.2.4.3.4. समंजसतामूलक समांतरता: 3.4.2.4.3.4.1. स्थानिक समंजसतामूलक समांतरता: इसका उदाहरण द्रष्टव्य है- 'सूर्य की किरणें झुकी और उन्होंने हौले से गुलाब की एक टहनी को छुआ, एक मदं की नजरें झुकी और उन्होंने हौले से रानी के होठों को छुआ।" यहाँ 'झुकने' और छूने की प्रतिज्ञप्ति वाली स्थानिक समंजसता समांतरता की सृष्टि कर रही है। 3.4.2.4.3.4.2. साफल्यपरक समंजसतामूलक समांतरता : ऐसी प्रोक्तिगत समांतरता पूरी कृति के आधार पर अपना स्वरूप स्पष्ट करती है । इस दृष्टि से 'अम्बपालो' की निम्नांकित प्रोक्तियां विचारणीय हैं--- 1. 'तेरे चरणों पर हजार-हजार राजकुमारों के मुकुट लोटेंगे।" 2. 'मध हजार-हजार राजकुमार । उफ, वह भी कोई जिन्दगी होगी। मेरा तो अकेला... 3. ज्योतिषी ने अम्बापाली से कहा-'हजार"हजार राजकुमारों के मुकुट तुम्हारे चरणो पर लोटेंगे। 4. सुमना, हाँ, हाँ, इस उम्र मे सब लड़कियां, राजकुमारों का ही सपना देखती हैं "हजार-हजार राजकुमार ? लाख-लाख देवकुमार । 5. मेरी रानी, अभी तू देखने-दिखाने से क्यों कांपती है और जब हजारो- हजार राजकुमार । 6. मैं राजनर्तकी मधु, मधु, मैं राजनर्तकोहजार-हजार राजकुमारों के मुकुट "हो"हो. "हो"हो “मेरे, चरणो पर रे मेरे चरणोपर.. मधु"तू घूर क्यो रही है। मैं राजनतंकी। 7. ..."राजनर्तकी.."राजनर्तकी 'अरुण मैं राजनर्तको "राजनतंकी" राजनर्तकी "हा"हा"हा"हा"हजार-हजार""राज 8. हमें अपना सिर उनके निकट झुकाने की जरूरत नहीं होती। उन्ही के हजार-हजार राजमुकुट चरणो की धूल चाटने लगते हैं । हम नारियों की भी एक महिमा है । यह क्यों भूल जाती है भोली लड़की । 1. वही, पृ० 103 2. रायवृक्ष बेनीपुरी, अम्बपाली (दिल्ली : राजपाल ऐंड संज, 1986), पृ. 15 3. वही, पृष्ठ 15 5. वही, पृ० 20 7. वही, पृ० 32 9. वही, पृ. 38 4. वही, पृ०17 6. वही, पृ० 27 8. वही, पृ० 33 प्रोक्ति : शैलीपरक अभिलक्षण Porn.doi - 9. इस चांद की तरह, जो हजार, हजार तारों से घिरा--रहकर अपनी- हास्य-ज्योत्स्ना से जगत को हमेशा पुलकित-प्रफुल्लित किए रहता है। नारी के लिए बीच का रास्ता नही है चयनिके।' 10. वहाँ एक पुरुष हजार नारियां, आज होगी एक नारी और हजार-हजार "हाँ हजार-हजार राजकुमार । 11. जिसका सिर तुम्हारे चरणो पर अवनत था, उसके चरणों पर हजार- हजार राजकुमारो के मुकुट लोटते हैं। अरुणा हजार"हजार । ओ हो"हजार-हजार राजकुमारो के मुकुट ऊपर हजार-हजार राजकुमारों के मुकुटो के अम्बपाली के चरणो मे लोटने को प्रोक्ति 'अम्बपाली' नाटक में ग्यारह बार आवर्तित होकर साकल्यमूलक समंजसतापरक समांतरता की सृष्टि कर रही है । ज्योतिषी की यह भविष्यवाणी अम्बपाली के जीवन में साकार हो जाती है और वह राजनतंकी बनती है। वाणी की संभावना सार्थकता प्राप्त कर लेती है । 3.4.2.4.4. विरलता का निदर्शन: प्रोक्ति स्तर पर सूक्ति बनने वाली विरलता का निदर्शन द्रष्टव्य है- 'नही दोस्त अब तक जो कुछ सीखा है, असली सीखना वही है। वही तुम्हारी पूंजी है। वही हम सबकी पूंजी है । अब जो कुछ सीखेंगे, वह असली नहीं होगा। तुममें ताकत होगी तो अब तक के सीखे हुए सत्य को नई परि- स्थितियों मे निखारोगे, विकसित करोगे और निरन्तर एक शक्ति अनुभव करते जाओगे।" प्रस्तुत प्रोक्ति पूरी कृति में एक ही बार प्रयुक्त हुई है जो कृति के लक्ष्य को खोलने में सहायक सिद्ध होती है । इस प्रोक्ति में लेखक ने सत्य की पहचान के विषय में बताया है-यदि भीतर की शक्ति नहीं होगी तो सत्य को खो देंगे। यदि वह शक्ति होगी तो विकास का और निखार होगा। इस प्रकार यहाँ भीतरी शक्ति की पहचान पर प्रकाश डाला गया है। 3.5. निष्कर्ष: उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रोक्ति के शैलीपरक अभि- लक्षण की प्रकृति विशिष्ट होती है, वह गहन संरचना से जुड़ी होत है और उसमे भाषा का सौंदर्यात्मक प्रकार्य क्रियाशील होता है। साथ ही यह विवेचन किसी भी पाठ। प्रोक्ति के शैलीपरक अभिलक्षणों का विश्लेषण-विवेचन करने के लिए सम्यक् आधार प्रदान करता है। 1. रामवृक्ष बेनीपुरी, अम्बपाली (दिल्ली: राजपाल ऍड संस, 1985), पृ. 47 2. वही, पृ० 49 3. वही, पृ० 70 4. रामदरश मिश्र, दूसरा घर (नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन, 1986), पु.50 प्रोक्ति : विश्लेपण-प्रक्रियांकन 4. 1. प्रोक्ति विश्लेषण : स्वरूप-स्पष्टीकरण : प्रोक्ति-विश्लेषण एक पद्धति है जो, किसी भी पृथक्-पृथक् पंक्तिबद्ध सामग्री को संयुक्त करने का प्रयास करती है। इसे भाषा और भाषा-सदृश माना गया है जो एक से अधिक प्राथमिक वाक्यों को संयुक्त करती है तथा कुछ स्थानिक संरचना को एक पूर्ण प्रोक्ति के रूप में निरूपित करती है।' प्रोक्ति-विश्लेषण में उन तत्त्वों तथा तत्वों के अनुक्रमों को जमा किया जाता है, जो दूसरे तत्त्वों के समान अथवा समतुल्यार्थक परिवेश रखते हैं। इन पर परस्पर एक दूसरे के समतुल्य होने के अथवा एक ही समतुल्य-वर्ग के सदस्य होने के संदर्भ में विचार किया जाता है ।। प्रोक्ति-विश्लेषण का अर्थ है एक वाक्य से बृहत्तरपाठ का संरचनात्मक विश्लेषण प्रोक्ति विश्लेषण के विषय में यह मान्यता भी है कि यह 'किया गया' से 'कहा गया' का अन्तर स्पष्ट करता है । व्याकरणिक दृष्टिकोण से वाक्यों की प्रकार-संख्या कम है। प्रमुख तौर पर बयान, प्रश्न, अवश्यकरणीय, आज्ञार्थक आदि हैं, जिन्हें प्रोक्ति-नियम जोड़ने में समर्थ है । इसी तरह शब्द के साप किये जाने वाले कार्य-व्यापार को भी प्रोक्ति कहीं बृहत्तर कुलक के द्वारा जोड़ने की स्थिति में होती है। शब्दों के द्वारा व्यक्त किये जाने वाले ऐसे कार्य-व्यापार कही 1. उद्धृत, रोजर फ़ाउलर, लिग्विस्टिक थिअरी ऐण्ड द स्टडी ऑव लिटरेचर, एसेज ऑन स्टाइल ऐण्ड लैंग्वेज, सम्पादक रोजर फ़ाउलर (लंडन : रूटलेज ऐण्ड कीगेन पाल, 1965, पुनर्मुद्रण, 1979) पृ. 17 2. रोबर्ट एम. डब्ल्यू. डिक्शन, ह्वाट इज लैंग्वेज : ए न्यू एप्रोच टु लिंग्विस्टिक डिस्क्रिपशन (लण्डन : लौंगमन्स ग्रीन ऐण्ड कम्पनी लिमिटेड, 1966), 3. वेस्टर्स यह न्यू इंगलिश डिक्शनरी, खण्ड-एक (शिकागो : विलियम बेंटन पब्लिशर्ज, 1967) पृष्ठ 84 प्रोक्ति : विश्लेषण-प्रक्रियांकन 103 बड़े और बहुतेरे हैं, जिन्हें उद्गार के नियमों के द्वारा जोड़ने की स्थिति सामने आती है । अस्वीकृति, चुनौती, वापसी, अपमान, संकल्प, धमकी आदि के द्वारा।' प्रोक्ति-विश्लेषण को साहित्य में दो भिन्न वस्तुओं को निर्दिष्ट करने के क्रम में व्यवहृत किया जाता है । अपने पहले निर्देशी अर्थ मे यह विड्डोसन, हेरिस, हैलिडे और हसन के द्वारा व्यवहृत हुआ है, जहाँ वाक्यों के संयोजन और वाक्य-व्यवहार के रूप में इसे ग्रहण किया जाता है। यहां सम्बद्ध पाठ में प्रायः वाक्य संरचना के पुनर्गठन पर विचार किया जाता है, साथ ही उन कौशलों को भी रेखांकित किया जाता है, जिनके द्वारा वाक्यो को संग्रथित करने से पाठ का निर्माण सम्भव हो पाता है। अपने दूसरे निर्देशी अर्थ मे वह लेबाव के दृष्टिकोण को उजागर करता है। यहाँ इस तथ्य पर बल दिया जाता है कि वाक्य-समूह किस तरह क्रिया-व्यापार को निष्पन्न करने के लिए व्यवहृत होते हैं।' 4.2. प्रोक्ति-विश्लेषण : घटक-स्पष्टीकरण : 4. 2. 1. निल्ज एरिक एंक्विस्ट का घटक-स्पष्टीकरण : किसी भी समंजस प्रोक्ति के लिए अन्तर-वाक्यीय समंजसता अपेक्षित है, जो विहित क्षेत्रीय अभिलक्षणों से जुड़ी होती है । इसे भाषावैज्ञानिक पदो के जरिये पित और विश्लेपित किया जाता है । एन. इ. एक्विस्ट ऐसे अभिलक्षणों को तीन मुख्य रूपों में समूहित करते हैं : (1) टॉपिक (Topic), (2) फोकस (Focus) और (3) लिंकेज (Linkage)। इन्हें हिन्दी में क्रमशः विषय, केन्द्रण और संयोजन कहा जा सकता है। विषय के अन्तर्गत प्रोक्ति जैसी इकाई का मुख्य कथ्य प्रयुक्त शब्दों की पारस्परिक संसक्ति और प्रोक्ति के क्षेत्र को लिया जाता है । केन्द्रण मे उन शब्दों और शब्द-समूहों के चयन और उनके प्रकार्य का रेखाकन किया जाता है, जो किसी वाक्य या वाक्यांश मे संयोजित होते हैं । इनमे प्रायः केन्द्रण के दिलचस्प कौशल वहां उभरते हैं, जो अग्रप्रस्तुत होकर हमारे ध्यान को खीचते हैं । यह केन्द्रण ध्वनिस्तर और वाक्यस्तर के विभिन्न कौशलों 1. डब्ल्यू सेवा, लैंग्वेज इन द इनर सिटी : स्टडीज इन द ब्लैक इंगलिश धर्ना- पमूलर (फिलाडेलफिया : यूनिवर्सिटी ऑब पेनिसिलवानिया प्रेस, 1972) पृ० 298-99 2. विजय गंभोर, 'लग्वेज टीचिंग ऐण्ड डिस्कोस', लैंग्वेज : स्टाइल ऐण्ड डिस्कोर्स, सम्पा० ओंकार एन. कौल (नई दिल्ली : बाहरी पब्लिकेशन, प्राइवेट लिमिटेड, 1986), पृ. 170 1. एन. इ. एंक्विस्ट, 'स्टाइल इन सम लिग्विस्टिकल पिअरीज', लिटरेरी स्टाइल : अ सिम्पोजियम, सम्पा. सेमूर घंटमैन (लण्डन : ऑक्सफोर्ड यूनि- वसिटी प्रेस, 1971), पृ० 57 104 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली में व्यक्त होता है । संयोजन वह तत्त्व है जो वाक्यांश, योजकों, सर्वनामों, काल- अनुक्रमो और समनुहारों को नियोजित करता है। ये ही वे तत्त्व हैं जो प्रत्येक वाक्य को उसके प्रोक्तिगत परिवेश में वहिः संरचना के स्तर पर संयोजित करते हैं। 4. 2. 2.मयोसियस द्वारा प्रवर्तित एव अनेक भाषाविदों द्वारा विकसित प्रकार्यमूलक वाक्य परिप्रेक्ष्यीय घटक-स्पष्टीकरण : प्रोक्ति-विश्लेषण के घटक स्पष्टीकरण के संदर्भ मे चेकमयेमियस भाषाविद का नाम महत्वपूर्ण है। इसने प्र. आ. प. या प्रवर्तन किया, जिसे बाद में डेन्स और फायरवास आदि ने विकसित किया है। प्रोक्ति-विश्लेषण के घटक तत्त्व को समझने के लिए प्रकार्यमूलक वाक्य परिप्रेक्ष्य (Perspective) का व्यवहार किया जाता है। किसी भी प्रोक्ति के विश्लेषण के लिए इसकी जानकारी अपेक्षित है । इमका व्यवहार व्यक्तिमूलक धाराओ मे सहश्रेणीमूलक तत्त्वो की अधि. काधिक विभेदकता के अनुरूप निम्नलिखित तत्त्वो को निर्दिष्ट करने के क्रम में किया जाता है- 1. वाक्य में उन खण्डों के बीच विभेद करना सम्भव है, जो संदर्भ और स्थिति से उभरने वाली ज्ञातव्य सूचनाओं को उपस्थित करती है और जो ऐसी नपी सूचनाओं को सूचित करती हैं, जिनका अनुमान श्रोता नहीं लगा सकता है। 2. सन्दर्भ-निर्भर ऐसे सण्डों के बीच विभेद करना संभव है, जो उसी पाठ के वाक्यों के दूसरे घण्ड के माथ जुड़े होते हैं। 3. किमी वाक्य के ऐसे गण्डों के बीच अन्तर संभव हो सकता है जिनमे महत्तर या न्यूनतर माम्प्रेषणिक क्षमता होती है, ऐमी क्षमता जो वक्ता को उद्देश्य फा मयाल पैदा करती है। 4. यह सम्भय है कि सम्प्रेषण में फिमी वस्तु रूप 'र' को किसी दूसरी यस्तु '' के बारे मे करने के लिए एक निश्चित अनुमोदित कम हो यो भाषय में मग हो, जहाँ '' सदेव' के आगे-आगे चलता है। 5. यह सम्भय है कि चाय का एक तत्व व्यतिरेक के द्वारा दूसरे मभी तत्वों के द्वारा मलीन हो रहा हो। यह पक्ष प्रापः पतिरेक अभिप्रेरण के प्रश्न के सापyा हो और रेगीय स्वनिक क्रियान्वयन में उपरिपा हो। फापरवास ने (Firbas) साम्प्रेषणिक गति को धारणा प्रस्तुत की है। यह एक एपीय संप है। महा यह मान्यता है कि अवधारणा को परिपत करने का यह तरोरा मापनि महत्व के मनुपान पर आधारित होता है। 1. पाया और बी. पानेर, फागन मटेंग पतक्टिव ऐशट मिम्पिटिम', कर वन टेषगर मिलिटिग, मा. मह उस्मर (पुरा :पारर.पूटर, 1978). T. 212,213, 214 . 105 प्रोक्ति : विश्लेषणा-प्रक्रियांकन साप्रेषणिक गति को धारणा इस आ. शिल्प पर टिकी है कि सम्प्रेपण स्थैतिक नहीं होता है, वह गतिशील होता है वस्तुत: यह गति की एक प्रकार की गुणवत्ता है जो सम्प्रेषण के विकास की अग्रगामिता में उपस्थित होती है । यह सम्प्रेषण में सूचना की क्रियान्वित होने वाली विकसनशीलता में उसके उद्घाटित होने की भूमिका में उपस्थित होती है । किसी वाक्य-तत्व के द्वारा संवहित सम्प्रेषणिक गतिकी के अनुपात के द्वारा वह छोर स्पष्ट होता है, जहां वाक्य-तत्त्व अगले सम्प्रेषण के विकास में सहायक होता है। सम्प्रेपित गतिकी की अवधारणा को भावाश्रित और आगमनात्मक तौर पर स्थापित किया जा सकता है। इस अभिगम को ग्रहण करते हुए यह पाया जाता है कि यहाँ संदर्भ-निर्भर तत्व ज्ञात सूचनाओं को मुहैया करते हुए सम्प्रेषण के अगले विकास की दृष्टि से उन तरवों की अपेक्षा कम योग- दान करते हैं, जो अज्ञात सूचनाओं को, संदर्भ-स्वतंत्र तत्वों को मुहैया करते हैं। संदर्भ-निर्भर तत्त्व संदर्भ-स्वतंत्र तत्वों की अपेक्षा गतिकी के न्यूनतर अनुपात का मेवन करते हैं। फायरबास बोलिंगर से सहमत है कि अर्थपरक वस्तुएं अपने साम्प्रेषणिक महत्त्व को बढ़ाती हैं । प्रत्येक सूचना इकाई में सूचना-नाभिक का प्राथमिक विन्दु अथवा द्वितीयक के द्वारा अनुगमित प्राथमिक बिन्दु होता है । सूचना- नाभिक एक प्रकार का पाप है। यहाँ वक्ता एक भाग को रेखांकित करता है । यह भाग संदेश का सम्पूर्ण भी हो सकता है, जिसे वह सूचना-रूप में निर्वचित करना चाहता है । यहाँ जो केन्द्रक (फोकल) होताहै, उसी मैं नयी सूचना होती है। फायरवास (FIARBAS) ने संदर्भ के बहुतेरे स्तरों को समेकित करने वाला एक कधिर-क्रम निर्दिष्ट किया है। इसमे सबसे सामान्य स्तर अनुभव का है, जिसे वक्ता और श्रोता के द्वारा साझें तौर पर सामान्य ज्ञान के जरिये मुहैया किया जाता है । इन्हीं स्तरों मे तात्कालिक अनुभव का तदर्थ (Ad-hoc) संदर्भ भी होता है । यह अभिव्यक्ति के क्षणों में स्थिति के द्वारा सामने प्रस्तुत होता है। इस तरह का अनुभव पहलर प्रतिवध के अनुपात को संघटित करता है। यहाँ उदयं शाब्दिक संदर्भ, याक्प से प्रारम्भ होने वाला संदर्भ होता है । फापरवास ने सबसे छोटा स्तर वाक्य का माना है। मही वह विशिष्ट इकाई है, जिससे फायरवास संदर्भ-निर्भरता और संदर्भ-मुक्तता को धारणा को व्युत्पन्न करता है, जैसा यह वक्ता के मंतव्यानुरूप अपने अभिव्यंजन मे होता है। फायरवास तात्कालिक साम्प्रेषणिक उद्देश्य की भी बात करता है । यह वक्ता का साम्प्रेपणिक संदर्भ ही है. जो परिमित्त दृश्य (Narrow Scene) उपस्थित करता है । यह परिमित दग्य सांदर्भिक अनुकूलन होता है ।। 1.जेड. पावलोमा और वी, पालेक, 'फंक्शनल सेंटस पसंपेक्टिव ऐंड टेक्स्ट लिग्विस्टिक्स', करेंट ट्रेड्स इन टैक्स्ट लिंग्विस्टियम, सम्पा. फोग यू. ऐसलर (न्यूयार्क : वाटर डी. यूटर, 1978), पृ. 214-215 106 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली फायरवास की यह 'साम्प्रेषणिक गतिको भी प्रोक्ति-विश्लेषण के घटक तत्वों का निर्देश करती है। 4.3. प्रोश्ति-विश्लेषण : प्रत्रिपा-स्पष्टीकरण . प्रोक्ति-विश्लेषण की प्रक्रिया का स्पष्टीकरण दो रूपो मे द्रष्टव्य है । अपने पहले रूप में यह सामान्य प्रोक्ति-विश्लेषण की प्रक्रिया का स्पप्टीकरण है और दूसरे रूप मे साहित्यिक प्रोक्ति-विश्लेषण को प्रक्रिया का स्पष्टीकरण । यह स्पष्टीकरण मूलतः विश्लेपण का प्रक्रियांकन है : 4. 3. 1. सामान्य-प्रोक्ति : विश्लेपण-प्रक्रियांकन 4. 3. 2. साहित्यिक प्रोक्ति : विश्लेषण-प्रक्रियांकन 4. 3. 1. सामान्य प्रोक्ति : विश्लेषण प्रक्रियांकन : सामान्य प्रोक्ति का विश्लेषण-प्रक्रियांकन अत्यंत व्यापक है। इसके अंतर्गत किसी भी प्रकार की प्रोक्ति का विश्लेषण किया जा सकता है । यहाँ अक्षक- 'वर्तक', 'प्रदत्त-नवीन एवं 'बनावट'-'बुनावट' को विश्लेषण-प्रक्रिया विचार णीय है। एम. ए. के. हैलीडे ने प्रोक्ति की विश्लेषण-प्रक्रिया में वाक्य की इकाई में 'थीम' अर्थात् 'अक्षक' और 'रीम' अर्थात् 'वर्तक' की संकल्पना को प्रस्तुत किया है । बाक्य का प्रस्तोता वाक्यांश मे अथवा वाक्य में 'अक्षक' और 'वर्तक की द्विविभागीय संरचना प्रस्तुत करता है। इस संरचना के अनुक्रम में 'अक्षक' आरंभिक स्थिति में आता है । 'अक्षक' एक ऐसा भाषिक एकक होता है, जिसे आगे की प्रोक्ति से पुन प्राप्त किया जाता है। पर ऐसा अनिवार्य नहीं है कि यह चमन सदर्भ-मुक्त हो । हैलीडे के अनुसार, 'थीम' अथवा 'अक्षक' प्रकार्यमूलक वाक्य-परिप्रेक्ष्य का वह तत्त्व है, जो पहली स्थिति में क्रियान्वित होता है और उमसे पूर्व आगे किसी एकक के साथ उसका कोई सम्बंध नही होता है। हैलीडे ने 'प्रदत्त' (Given) और 'नवीन' (New) का द्विविभाजन (डिकोटामी) भी प्रस्तुत किया है। यह सूचना-नाभिक और सूचना एकक की धारणा के जरिए सामने आता है । यह वह प्रक्रिया है, जिसमे स्वनिक क्रिया- न्ययन का परिज्ञान पूर्वानुमित होता है। प्रत्येक सूचना-इकाई यहाँ एक तान. वर्ग में क्रियान्वित होती है । हैलीडे प्रोक्ति-पटक के विषय में स्पष्ट करते हैं कि अपनी कूटबद्ध सम (Equative) संरचना के द्वारा उन साधनों को मुहैया करता है जो आनुभविक प्रकार्य को प्रत्येक सम्भव तौर पर 'अक्षक', 'वर्तक' और 1. एम. ए. के. हैलीडे, 'द प्लेस अब फंक्शनल सेटेंस पसंपेक्टिव', द सिस्टम अव लिंग्विस्टिक डिस्त्रिप्शन, सं. डेन्स, पृ. 53 प्रोक्ति : विश्लेषण प्रक्रियांकन 107 'प्रदत्त', 'नवीन' के रूप में विभाजित करता है। हैलीडे ने 'प्रदत्त' और 'नवीन' को 'अक्ष' और 'वर्तक' से स्पष्ट तौर से अलगाया है । उसके अनुसार दोनों परस्पर एक दूसरे से अलग हैं। 'प्रदत्त' और 'नवीन' की संरचना भाषिक तत्त्वो के अनुक्रम से क्रियान्वित नहीं होती है। 'प्रदत-नवीन' तथा 'अक्षक-वर्तक' के वीच जो आशिक समानता दीखती है यह वस्तुत: वाक्यांश और सूचना-इकाई के बीच की समानता है, जो प्रदत्त सूचना इकाई को संघटना को 'बायो' ओर से दायो' ओर अग्रसारित करने की प्रवृत्ति में परिणामित होती है । यदि वह उपस्थित है तो नवीन की ओर उन्मुख 'प्रदत्त' और 'नवीन' ऐसे विकल्प हैं, जो वक्ता के भाग में उपस्थित होते हैं। इसे पाठपरक या स्थितिपरक परिवेश के द्वारा निर्धारित नहीं किया जा सकता । जो 'नवीन' है, वह वस्तुतः इस पर निर्भर करता है कि वक्ता 'नवीन' के रूप में उपस्थित करने के लिए किसे चुनता है, क्योंकि प्रोक्ति से ऐसो सम्मा- वनाओं में केवल उसके निप्पन्न होने की ऊंचो सम्भावना पाई जाती है। 'प्रदत्त' प्रकार्य का यह आशय है कि वह पुनः प्राप्य सूचना के रूप में वक्ता के द्वारा उपस्थित हुआ है । साथ ही वह ऐसा सूचना-घटक है. जिसे पाठ या स्थिति से अपनी तई व्युत्पन्न करने के लिए श्रोता से प्रत्याशा नहीं की जा सकती है । इसी प्रकार 'नवीन' के रूप में विशेषीकृत घटक वह है, जिसे वक्ता अव्युत्पन्न सूचना के बतौर, जो कुछ पहले कहा जा चुका है, उसके योगात्मक रूप में या उसके विरोधात्मक रूप में, निर्वचन के लिए रेखांकित करता है। प्रदत्त' को आद्यावृत्ति के तौर पर या स्थितिगत तौर पर पुनः प्राप्त करने के लिए उपस्थित किया जाता है। इस प्रकार 'प्रदत' और 'नवीन' दोनों ही 'अक्षक' और 'वर्तक' से भिन्न हैं, यद्यपि दोनों पाठात्मक प्रकार्य हैं। यहां 'प्रदत्त' का अयं उस एकक से है. जो यहाँ सम्पर्कन के उस नुकते से जुड़ा है, जिसे आप जानते हैं। इस तरह वह वाक्य-संरचना के तत्त्व से बंधा हुआ नहीं है, जबकि 'अक्षक' का अर्थ है कि वह 'शीर्ष' (Heading) है, जिसे 'मैं' कह रहा हूं। 'प्रदत्त' नाम के सन्देश- 1. एम. ए. के. हैलोडे, 'नोट्स ऑन ट्रांजिटिविटी ऐंड थीम इन इंग्लिश', जर्नल अव लिग्विस्टिक्स, भाग-2, 1967, पृ. 202 2. एलेक्स डी. जोइया और ए. स्टेनटॅन, टम् इन सिस्टिमिक लिंग्विस्टिक्स, (लंदन : वेट्सफोर्ड एकेडेमिक ऐड ऐडकेशनल लि., 1980), पृ. 31 3. एलेस डी. जोइया और ए. स्टैनटन, टम्ज इन सिस्टिमिक लिग्वि- स्टियस (लंडन : वेट्सफोड एकेडेमिक ऐण्ड ऐड़केशनल लि., 1980), पृ. 32 । 108 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली भाग का पाठात्मक संघटना मे विशेष प्रकार्य होता है। यह सूचना-एकक को शेष प्रोक्ति से जोड़ता है । 'प्रदत्त' से हम यह भी समझते हैं कि यह सदेश का वह भाग है, जिसे अंग्रेजी मे 'सुर-तान' के द्वारा दिखाया जाता है, जिससे प्रोक्ति की श्रृंखला में एक सम्पर्कन सघटित होता है । वस्तुत: सदेश के प्रत्येक एकक के लिए एक ऐसा भाग भी है, जो दूसरी तरह की संघटना के लिए अनिवार्यतः संवाद नही बनता। यह वक्ता का 'नवीन' संकेत होता है, जिसके विषय में वह स्पष्ट रूप मे उसे अपुनः प्राप्य सूचना के बतौर प्राप्त करता है । यही यह स्पष्ट हो जाता है कि 'प्रदत्त'-'नवीन' संरचना वाक्य की संरचना न होकर सूचना-एकक की संरचना है, जो अनुफम के द्वारा क्रियान्वित न होकर सुरतान के द्वारा क्रियान्वित होती है, जवकि 'अक्षक'-'वर्तक' संरचना वाक्य-संरचना है, जो भाषिक एकक के अनुक्रम के द्वारा क्रियान्वित होती है, और वहां 'अक्षक' पहले आता है । 'प्रदत्त' श्रोता-निर्भर और संदर्भ-सम्बद्ध होता है, जबकि 'अक्षक' वक्ता-निर्भर और संदर्भ-मुक्त होता है । प्रदत्त का तत्व ऐच्छिक है, पर 'नवीन' प्रत्येक सूचना-एकक मे उपस्थित होता है, क्योंकि बिना इसके अलग से किसी भी सूचना-एकक का अस्तित्व नही होता है । सूचना-संरचना पाठ की संघटना को 'प्रदत्त' और 'नवीन' के बतौर संकेतित करती है ये प्रायः 'टॉपिक' (Topic) और 'कामेट' (Comment) के तहत 'अक्षक' और 'वतंक' के साथ सम्मिलित होने लगते हैं। यहां यह ध्यान देने योग्य है कि 'टॉपिक' और 'कामेट' किसी विषय के बारे मे परम्परित और संश्लिष्ट अवधारणा है, जहाँ 'अक्षक' के साथ 'प्रदत्त' का और 'वर्तक' के माप 'नवीन' का साहचयं देखा जाता है, । यहा चयन की स्वतंत्रता होती है। किंतु 'अक्षक' 'प्रदत्त' के साथ सहबंधित होता है और 'वर्तक' 'नवीन' के साथ, जब तक कि किसी दूसरे संरेखन मे चयन के लिए कुछ और कारण सामने नही आ जाते हैं । सूचना-एकक में अनिवार्यत: नयीन तत्त्व का समावेश होता है, क्योकि यदि वहां नया कुछ भी नहीं हुआ तो कोई सूचना ही नही होगी। सूचना- एकक को हैलीडे संरचनात्मक एकक मानते हैं, पर ऐसा एकफ, जो व्याकरण मे संघटनो की सूचना-इकाइयो के कधिर-कम को पार कर जाता है। वस्तुत: यह प्रोक्ति का 'प्रतिपाद्यीकरण' है, जो वास्य-संरचना के 'अक्षक' और 'वतंक' जैसे प्रकार्य निर्धारित करता है। 'अक्षक' को प्रोक्तिपरक सूचनात्मक अवयव से सम्बद किया जाता है। 'असर': प्रोक्ति में- साचे के अन्तर्गत सम्प्रेषण-कार्य की मंरचना से एकक के असीमन और उनमें सूचना के वितरण वह है, जिसके विपर में बात की जाती है। यह प्रस्थानपरक नाता होता है को घुनने का प्रसार के बतौर । .

: प्रोक्ति : विश्लेषण-प्रक्रियांकन 109 यह कहा जाता है कि यह वह है, जिसके विषय में 'आप' बात कर रहे थे या जिसके विषय में 'मैं पहले बात कर रहा था; इतना ही नहीं 'भक्षक' वह है, जिसके विषय में 'मैं बात कर रहा हूँ और जिसके विषय में 'मैं' 'अभी' बात कर रहा हूँ। हैलीडे ने उद्देश्य (Subjer)की बात करते हुए उसके चार विशिष्ट संश्लिष्ट प्रकार्यों का भी उल्लेख किया है, जिनमे तीन प्रकार्य संरचना के प्रकार्य हैं- 1. प्रकर्ता-यह तार्किक उद्देश्य होता है । इसमे विचारात्मक प्रकार्य क्रियाशील होता है। 2. मानक उद्देश्य (Model Subject)-'मॉडल सब्जेक्ट' मूलतः व्याकरणिक उद्देश्य होता है। इसमें अन्तर वैयक्तिक प्रकार्य क्रियाशील रहता है। 3. अक्षक-इसमें मनोवैज्ञानिक उद्देश्य होता है। इसमें पारात्मक प्रकार्य क्रियाशील रहता है। 4. प्रदत्त-यह मनोवैज्ञानिक उद्देश्य-संख्या-2 है, जो सूचना इकाई के तहत पाठपरक प्रकार्य के रूप मे उपस्थित होता है । एफ० डेन्ज ने 'प्रदत' और 'नवीन' जैसे दो शोपंकों के तहत दो मूलभूत संदर्भ- मुक्त पहलुओं पर विचार किया है । डेन्ज के अनुसार आनुक्रमिक रूप मे इकट्ठी की गई सूचनाओं की संख्या प्राय: इतनी विस्तृत होती है, कि वक्ता को जो प्रोक्ति-संवहन करता है, उस समूह मे से अपना चयन निश्चित करना होता है और वह इनमे से 'अक्षक' के उद्गार का चयन करता है, जब तक कि इसके अलावा किसी और को चुनने का विशेष कारण सामने न आता हो। किसी भी हालत मे ज्ञात सूचनाओं का भाग जो किसी उद्गार मे सामने माता है वास्तव में वैसे तत्व हैं, जो चुने गए 'अक्षक' के साथ नजदीकी तौर पर जुड़ते हैं और 'वर्तक' के साथ परोक्ष तौर पर। प्रामाणिक तौर पर यह जरूरी हो जाता है कि पाठ मे एक निश्चित बिन्दु तक जमा हुए सूचना-समुच्चय और इस संवहित सूचना के भाव के बीच विभेद स्पष्ट किया जाय। यह अन्तर ही प्रत्येक उद्गार के लिए ज्ञात सूचनाओं के बीच से चयन को स्पष्ट करता है । ऐसा माना जाता है कि यह चयन 'वर्तक' उद्गार के चयन के द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष तोर पर निर्धारित होता है। रूकैया हसन ने पाठ और प्रोक्ति के बीच बनावट (टेक्स्चर) और बुनावट (स्ट्रक्चर) की बात की है। उसके अनुसार बुनावट वह तकनीकी पद है जो निरूपित पाठ में सम्बद्ध व्याकरणिक इकाइयो को निर्दिष्ट करता है तथा जिसके कारण अनुच्छेद मे भाषिक ससक्ति विद्यमान होती है। 'बुनावट' को गुणवत्ता एक ओर पूर्ण और अपूर्ण पाठ के बीच अन्तर करती है, तो दूसरी ओर विभिन्न साहित्य-रूपों के बीच विभेद स्पष्ट करती है। वस्तुतः यह पाठ के साहित्य-रूप से सम्बद्ध है, और उसके प्रकार से सम्बद्ध है। यह एक सामान्य संरचित सूत्र है, जो वास्तविक संरचना के क्रम-विन्यास (Array) 110 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली को अनुमत करता है। बनावट के सूत्रीकरण में आरम्भ, मध्य और अन्त के तत्वों पर ध्यान दिया जाता है। प्रोक्ति-विश्लेषण से यह आशय लिया जाता है कि यह सन्दर्भ, पूर्वानुमान, अर्थापति तथा अध्याहार का आधार लेकर किसी प्रोक्ति-विशेष के अन्तर-वाक्यीय सम्बन्ध का इस तरह विश्लेषण करे कि उस प्रोक्ति की निजी अस्मिता भी स्पष्ट हो सके । इममे सन्दर्भ के तहत निर्दिष्ट होने वाली वस्तु के साथ शब्द का मम्बध स्पष्ट किया जाता है, पूर्वानुमान मे व्यवहारवादी या तथ्यवादी संकल्पना के माधार पर कथन के समान पृष्ठभूमि को लिया जाता है, अर्थापत्ति में सन्दर्भ-आधारित लक्ष्यपरक अर्थ लिये जाते हैं तथा अध्याहार मे लुप्त अंश को प्राप्त कर उद्गार की पूर्णता के आधार पर भाष-विपोप को निरूपित किया जाता है। उपर्युक्त आधार-प्रक्रिया प्रोक्ति-विशेष के बाश्य-प्रथन को प्रतिपाद्य इकाई मे बाटकर विश्लेषण को प्रस्तावित करती है । इस रूप मे प्रोक्ति मे बाक्य के अनुकमी रूप को अक्षक-वर्तक, प्रदत्त-नवीन और उद्देश्य विथेय के आधार पर विश्लेपित किया जाता है। हिन्दी मे डा कृष्णकुमार गोस्वामी ने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के 'शोध निबंध का प्रोक्ति-विश्लेषण 'अक' (थीम) और 'वर्तक' (रीम) के के आधार पर प्रस्तुत किया है । पर साहित्यिक प्रोक्ति-विश्लेषण की दृष्टि में यह विश्लेषण समर्थ सिद्ध नहीं हो सका है। 4.3.2 साहित्यिक प्रोक्ति : विश्लेषण-प्रवियांकन साहित्यिक प्रोक्ति एक विशेष प्रकार की प्रोक्ति होती है । अत: यदि प्रोक्ति का उद्देश्य पाठ में अर्थ के उत्पादन का और इसमें भी अशेष नये अर्थ के उत्पादन का, उसको साभिप्रायता का अध्ययन करना है, तो केवल सामान्य प्रोक्ति के विश्लेषण के साये और प्रक्रियाकन से काम नहीं चल सकता। इस दिशा में एक और मुकारोस्की के सौन्दर्यात्मक भाषिक प्रकार्य की अवधारणा और दूसरी और प्रजनक व्याकरण के विकास और कलाकृतियों की भाषा में अव्याकर गिकता को सकल्पना में पैदा हुई सामान्य दिलरस्पी ने एक विशेष प्रकार के 1. रूकंपा हसन, "टेवार इन द सिस्टिमिक फरशनल मॉडल', करेंट ट्रेन इन टेक्स्ट तिग्विस्टिवम. सम्पा. यूरफ गैग यू.पलर, (न्यूयार्क : डी यूटर, 1978), पृ. 228-229 2. हॉ० कृष्ण कुमार गोस्वामी, 'आचार्य रामचन्द्र गुबन के निधन्धों या प्रोक्सि-विश्नपण', आचार्य रामचन्द्र शुक्ल मोर भारतीय समीक्षा, मम्पादक डॉ. सुरेश कुमार (आगरा : केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, 1987), 10 208. 219 प्रोक्ति : विश्लेषण-प्रक्रियांकन 111 व्याकरणिक विमर्श की आवश्यकता दिखाई है। विशिष्ट प्रोक्ति के सन्दर्भ में साहित्यिक भाषा के निदर्शन के बतौर व्याकरणिकता से विचलन की संकल्पना को रेखांकित किया गया है, जिसमें काव्यात्मकता की क्षमता निहित है। वायर- घाख ने प्रजनक व्याकरण के सांदे में प्रजनक काव्यशास्त्र के विकास के लिए प्रयास किया है, जिससे भाषिक सर्जनात्मकना मे अभिरुचि को पुनर्नवीकृत किया जा सकता है। इसके अनुगत रूप में काव्यात्मकता के अन्य निर्देशी तत्त्व भी भी सामने आये हैं ~वह वर्थता, संश्लिष्टता, समतुल्यार्थक सरचना, समान्तरता आदि । इस दृष्टि से विचार करने वालों मे वॉम गॉटनर (1965-1969) वायर- वाप (195) ग्रीमा (1967, 70, 72) लीच (1966) लिविन (1962-63) स्टोपले (1972) पैटमैन (1971) डेवी (1963) फाउलर (1966) गादिन (1964) सिवियोक (1960) आदि प्रमुख हैं। रोमन याकोब्सन ने मुकारोव्स्की को ही तरह भाषा के छह प्रकार के प्रकार्यों में उसके काव्यात्मक प्रकार्य की बात करते हुए उसके विशिष्ट विश्लेषण का संकेत किया है । पटोफी ने काव्यात्मक पाठ की रचनात्मक इकाइयो और अर्थपरक निर्वचन के बीच के संबंधों का विश्ले- पण किया है। ईटन ने साहित्यिक कृति की सर्जना करते हुए रचनाकार के के मस्तिष्क में निहित सारे प्रासंगिक सन्दर्भो की समग्रता का अध्ययन किया है तथा उसमें और साहित्य के अर्थ-विधान के बीच अन्तर स्पष्ट किया है । उसकी दृष्टि में साहित्य के अर्थविज्ञान का आशय उस-'सिमिक्स' (Sen ic.) का अध्ययन करना है जो किसी रचना को पढ़ते हुए पाठक के मस्तिष्क में सभी प्रासंगिक सन्दर्भो की समग्रता का अध्ययन बन जाता है ।। इन सभी प्रयत्नों में भाषा के सौन्दर्यात्मक प्रकार्य के तहत 'अग्रप्रस्तुति' (Foregrounding) के विकसित प्रतिमान के आधार पर साहित्यिक प्रोक्ति की विश्लेपण-प्रक्रिया अधिक सार्थक एवं महत्त्वपूर्ण है। उपयुक्त तत्वो तथ्यों को देखते हुए साहित्यिक प्रोक्ति का विश्लेषण एकाधिक रूपों में करना ममीचीन है। एक प्रविधि प्रोक्ति के प्रकारों के विश्लेपण की है, जिसमें प्रोक्ति-विशेष में अनुप्रयुक्त प्रोक्ति के विभिन्न प्रकारो को विश्लेपित कर सामने रखा जा सकत है। प्रोक्ति के ऐसे विश्लेशण को प्रकार-आधारित विश्लपण कहा जाता है, जो यह सूचना मुहैया करता है कि किसी प्रोक्ति-विशेष में उसके कितने प्रकारों क व्यवहार किया गया है । इस दृष्टि से उमका फलक कितना विस्तृत है या कितन सीमित तथा यह भी कि कौन-सा प्रोषित प्रकार बार-बार आयतित होत 1. गोज वाइनोल्ड, 'टेक्स्ट लिग्विस्टिक एप्रोचिज टु रिटेन यस अव आर्ट' फरेंट ड्ज इन टेक्स्ट् लिग्विस्टिक्स, सम्पा. वूल्फ गैगयू. हेसलर (न्यूयार्फ याल्टर डी. यूटर, 1978), पृ. 137-140 110 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली की अनुमत करता है । बनावट के सूत्रीकरण में आरम्भ, मध्य और अन्त के तत्वों पर ध्यान दिया जाता है।' प्रोक्ति-विश्वेषण से यह आशय लिया जाता है कि यह सन्दर्भ, पूर्वानुमान, अर्यापत्ति तथा अध्याहार का आधार लेकर किसी प्रोक्ति-विशेप के अन्तर-वाक्यीय सम्बन्ध का इस तरह विश्लेषण करे कि उम प्रोक्ति की निजी अस्मिता भी स्पष्ट हो सके । इसमे सन्दर्भ के तहत निर्दिष्ट होने वाली वस्तु के साथ शब्द का सम्बध स्पष्ट किया जाता है, पूर्वानुमान में व्यवहारवादी या तथ्यवादी संकल्पना के आधार पर कथन के समान पृष्ठभूमि को लिया जाता है, अर्थापत्ति मे सन्दर्भ-आधारित लक्ष्यपरक अर्थ लिये जाते हैं तथा अध्याहार में लुप्त अंश को प्राप्त कर उद्गार की पूर्णता के आधार पर भाव-विशेष को निरूपित किया जाता है। उपयुक्त आधार-प्रक्रिया प्रोक्ति-विशेष के बाक्य-प्रथन को प्रतिपाद्य इकाई में बाटकर विश्लेषण को प्रस्तावित करती है । इस रूप में प्रोक्ति मे वाक्य के अनुक्रमी रूप को अक्षक-वर्तक, प्रदत्त-नवीन और उद्देश्य-विथेय के आधार पर विश्लेपित किया जाता है । हिन्दी मे डा० कृष्णकुमार गोस्वामी ने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के 'शोध' निबंध का प्रोक्ति-विश्लेपण 'अक्षर' (थीम) और 'वर्तक' (रीम) के आधार पर प्रस्तुत किया है। पर साहित्यिक प्रोक्ति-विश्लेषण की दृष्टि से यह विश्लेषण समय सिद्ध नहीं हो सका है। 4.3.2 साहित्यिक प्रोषित : विश्लेषण-प्रप्रियांकन साहित्यिक प्रोक्ति एक विशेष प्रकार की प्रोक्ति होती है । अत: यदि प्रोषित का उद्देश्य पाठ में अर्थ के उत्पादन का और इसमें भी अशेष नपे अर्थ के उत्पादन का, उसको साभिप्रायता का अध्ययन करना है, तो केवल सामान्य प्रोक्ति के विश्लेषण के सांचे और प्रक्रियांकन से काम नहीं चल सकता । इस दिशा में एक ओर मुकारोव्स्की के सौन्दर्यात्मक भाषिक प्रकार्य को अवधारणा और दूसरी ओर प्रजनक व्याकरण के विकास और कलाकृतियो की भापा मे अव्याकर णिकता की संकल्पना में पैदा हुई सामान्य दिलवस्पी ने एक विशेष प्रकार के 1. रूकंपा हसन, 'टेक्स्ट इन द सिस्टिमिक फंक्शनल मॉइल', करेंट ट्रेन्ड्ज इन टेक्स्ट लिंग्विस्टिकम. सम्पा. वूल्फ गैग यूसलर, (न्यूयार्क : ही यूटर, 1978), पृ. 228-229 2. डॉ० कृष्ण कुमार गोस्वामी, 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निवन्धो का प्रोक्ति-विश्लेषण', आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और भारतीय समीक्षा, सम्पादक डॉ. सुरेश कुमार (आगरा : केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, 1987), पृ. 208- 219 ..

प्रोक्ति : विश्लेषण-प्रक्रियांकन 111 व्याकरणिक विमर्श की आवश्यकता दिखाई है। विशिष्ट प्रोक्ति के सन्दर्भ में साहित्यिक भापा के निदर्शन के बतौर व्याकरणिकता से विचलन की संकल्पना को रेखांकित किया गया है, जिसमें काव्यात्मकता को क्षमता निहित है । वायर- बाख ने प्रजनक व्याकरण के सांचे में प्रजनक काव्यशास्त्र के विकास के लिए प्रयास किया है, जिससे भाषिक सर्जनात्मकता में अभिरुचि को पुनर्नवीकृत किया जा सकता है । इसके अनुगत रूप में काव्यात्मकता के अन्य निर्देशी तत्त्व भी भी सामने आये हैं -वह वर्थता, मंश्लिष्टता, समतुल्यार्थक संरचना, समान्तरता आदि । इस दृष्टि से विचार करने वालो में वॉम गॉटनर (1965-1969) वायर- वाख (19 5) ग्रीमा (1967, 70, 72) लीच (1966) लिविन (1962-64) स्टोपले (1972) पैटमैन (1971) डेवी (1961) फाउलर (1966) गादिन (1964) सिवियोक (1960) आदि प्रमुख हैं। रोमन याकोब्सन ने मुकारोव्स्की की ही तरह भाषा के छह प्रकार के प्रकार्यों में उसके काव्यात्मक प्रकार्य की बात करते हुए उसके विशिष्ट विश्लेषण का संकेत किया है । पैटोफी ने काव्यात्मक पाठ को रचनात्मक इकाइयो और अर्थ-परक निर्वचन के बीच के संबंधों का विश्ले- पण किया है। ईटन ने साहित्यिक कृति की सर्जना करते हुए रचनाकार के के मस्तिष्क में निहित सारे प्रासंगिक सन्दर्भो को समग्रता का अध्ययन किया है तथा उसमें और साहित्य के अर्थ-विधान के बीच अन्तर स्पष्ट किया है । उसकी दृष्टि में साहित्य के अर्थविज्ञान का आशय उस–'सिमिक्स' (Sell ic.) का अध्ययन करना है जो किसी रचना को पढ़ते हुए पाठक के मस्तिष्क में सभी प्रासंगिक सन्दर्भो की समग्रता का अध्ययन बन जाता है ।। इन सभी प्रयत्नी में भाषा के सौन्दर्यात्मक प्रकार्य के तहत 'अग्रप्रस्तुति' (Foregrounding) के विकसित प्रतिमान के आधार पर साहित्यिक प्रोक्ति की विश्लेपण-प्रक्रिया अधिक सार्थक एव महत्त्वपूर्ण है। उपर्युक्त तत्वों एवं तथ्यो को देखते हुए साहित्यिक प्रोक्ति का विश्लेषण एकाधिक रूपो में करना ममीचीन है। एक प्रविधि प्रोक्ति के प्रकारों के विश्लेषण की है, जिसमें प्रोक्ति-विशेष में अनुप्रयुक्त प्रोक्ति के विभिन्न प्रकारों को विश्लेपित कर सामने रखा जा सकता है । प्रोक्ति के ऐसे विश्लेशण को प्रकार-आधारित विश्लेषण कहा जाता है, जो यह सूचना मुहैया करता है कि किसी प्रोक्ति-विशेष में उसके कितने प्रकारों का व्यवहार किया गया है । इस दृष्टि से उसका फलक कितना विस्तृत है या कितना सीमित तथा यह भी कि कौन-सा प्रोक्ति प्रकार बार-बार आवर्तित होता 1. गोत्ज वाइनोल्ड, 'टेक्स्ट लिंग्विस्टिक एप्रोचिज टु रिटेन वक्स अव आर्ट', करेंट ट्रेंड्ज इन टेक्स्ट लिग्विस्टिक्स, सम्पा. वूल्फ गैग मू. ड्रेसलर (न्यूयार्क : वाल्टर डी. यूटर, 1978), पृ. 137-140 112 प्रोषित : स्वरूप, संरचना और शैली है, कौन-सा सामान्य रूप मे उपस्थित होता है और कौन-सा विरल रूप में सामने आता है। प्रोक्ति-विश्लेषण की दूसरी प्रविधि संरचना-आधारित है । इसके अन्तर्गत प्रोक्ति के गठन को वाह्य सरचना एव आन्तर संरचना के विभिन्न तत्वों के आधार पर किसी प्रोक्ति का विश्लेषण किया जाता है। इससे यह जानकारी प्राप्त की जाती है कि प्रोक्ति-विशेष के अन्तर्गत वक्ता या लेखक ने कितने प्रकार के बाह्य संरचनात्मक या कितने प्रकार के गहन सरचनात्मक कौशलों का उपयोग किया है। इन कौशलो के आवत्तित, सामान्य या विरल प्रयोग के आधार पर वक्ता या लेखक के शैली-तत्त्वी को प्राप्त किया जा सकता है । प्रोक्ति के विश्लेषण की तीसरी प्रविधि शुद्ध तौर पर शैली-लाक्षणिक है । इसके अन्तर्गत किसी भी प्रोक्ति-विशेप में प्रोक्ति स्तर पर शैली के प्रकट होने वाले विभिन्न अभिलक्षणों को रेखाक्ति किया जाता है। मुख्यतः साहित्यिक प्रोक्ति के विश्लेषण में इस प्रकार की विश्लेपित प्रविधि का उपयोग अधिक होता है । यहा शैली-अभिलक्षणो को विशेष प्रतिमान के अनुरूप गृहीत किया जाता है । अग्रप्रस्तुति के अन्तर्गत विचलन, विपथन, समान्तरता और विरलता जैसे तत्त्वो का रेखाकन किया जाता है। 4.4. निष्कर्ष: उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि सामान्य प्रोवित का विश्ले- पण जहाँ केवल अक्षक-वर्तक सम्बन्ध की गतिकी के द्वारा परिचालित होता है, वहाँ साहित्यिक प्रोक्ति का विश्लेषण प्रोक्ति के विभिन्न प्रकारो, प्रोक्ति की विभिन्न संरचनाओ और प्रोक्ति के शैलीपरक अभिलक्षणो को तिहरी पुष्ट आधार- भूमि पर सार्थकता प्राप्त करता है ।

सन्दभिका 1. अजय 2. आस्गुड, चार्ल्स ई० 3. उस्स्की, बी० ए० 4. एक्विस्ट, निल्स एरिक नदी के द्वीप, इलाहाबाद : सरस्वती प्रेस, तीसरा संस्करण । 'सम ईफेक्ट्स मोटिवेशन ऑन स्टाइल अव इनकोडिंग', स्टाइल इन लैंग्वैज़ (संपा०) टी० ए० सिबियोक, न्यूयार्क : एम० आई० टी० प्रेस, 1960 ए पोयटिक्स अव कम्पोजीशन, (अनु०) बी० जैवरिन और एस० विटिग, बर्कले और लॉस एजेल्स : यूनिवर्सिटी मॅव कैलिफोनिया प्रेस, 1973 'ऑन डिफाइनिंग स्टाइल', लिंग्विस्टिक्स ऐंड स्टाइल, (संपा०) जॉन स्पेंसर, लडन : ऑक्स- फोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1964. लिग्विस्टिक स्टालिस्टिक्स, द हेग : मूतन, 1973 लैग्वज इन कल्चर ऐण्ड क्लास, लण्डन : हेनिमन ऐजुकेशनल बु० लि०, 1976 लैंग्वेज ऐण्ड लिटरेचर : एन इन्ट्रोडक्टरी रीडर इन स्टायलिस्टिक्स, लण्डन : जॉर्ज एलेन ऐण्ड अनविन, 1984 डिफाइनिंग नरेटिव यूनिट्स, स्टाइल ऐण्ड स्ट्र- क्चर इन लिटरेचर (सपा०) रोजर फाउलर, न्यूयार्क : कानल यूनिवर्सिटी प्रेस, 1975 लग्वेज टीचिंग एण्ड डिस्कोर्स लैंग्वेज: स्टाइल ऐण्ड डिस्कोर्स, (संपा०) ओंकार एन० कौल, नई दिल्ली : बाहरी पब्लि०, 1986 5. एक्विस्ट, निल्स एरिक 6. एडवई, ए. डी. 7. कार्टर, रोनाल्ड 8. कलर, जोनाथन : 9. गंभीर, विजय - 114 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली . : 10. ग्रोसेव, ई० यू० फॅच स्ट्रक्चर लिस्ट विउज ऑन नरेटिव ग्रामर, करेंट ट्रेन्ड्ज़ इन टेक्स्ट लिंग्विस्टिक्स, (संपा) वूल्फ गैग यू० ड्रेसलर, न्यूयार्क : वाल्टर डी० ग्रूटर, 1978 11. गोस्वामी, कृष्ण कुमार 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबन्धों का प्रोक्ति- विश्लेषण', आचार्य शुक्ल और भारतीय समीक्षा (सपा०) सुरेश कुमार, आगरा : केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, 1987 12. गोस्वामी, कृष्ण कुमार शैक्षिक व्याकरण और व्यावहारिक हिन्दी, दिल्ली : आलेख प्रकाशन, 1981 13. चैटमैन, सैमूर 'द स्ट्रक्चरल अंव नैरेटिव ट्रांसमिशन', स्टाइल ऐंड स्ट्रक्चर इन लिटरेचर, (संपा०) रोजर फाउलर, न्यूयार्क : कार्नल यूनिवर्सिटी प्रेस, 1975 14. चैपमैन, रेमण्ड लिंग्विस्टिक्स ऐण्ड लिटरेचर, लण्डन : एडवर्ड आर्नल्ड लि०, 1974 15. जोइया, एलेक्स डी० ए टम्स इन सिस्टिमिक लिंग्विस्टिक्स, लन्डन : और स्टेनटेन वेट्सफोर्ड एकेडेमिक ऐण्ड एजूकेशनल लि., 1980 16. जोइया, एलेक्स डी. टर्स इन सिस्टिमिक लिंग्विस्टिक्स : ए गाइड और स्लेनलान, एड्रियन टु हैलीडे, लण्डन : वेट्सफोर्ड एकेडेमिक एण्ड ऐजूकेशनल लि., 1980 17. झोलकोवस्की, एलेक्जेण्डर 'पोयम्स', डिसकोर्स एण्ड लिटरेचर, (सपा०) टी० ए० वानडिस्क, एमईम जॉन बेनजामिन पब्लिशिंग कम्पनी, 1985 18. डिक्शन. रोबर्ट एम. ह्वाट इज लैग्वेजः ए न्यू एप्रोच टु लिग्विस्टिक डब्ल्यू डिस्क्रिप्शन, लण्डन : लौंगमनस, 1966 19.ड्रेसलर यू०, वूल्फगैग करेंट ट्रॅवज इन टेस्ट लिग्विस्टिक्स, बलिन : वाल्टर डी यूटर, 1978 20. डोलजेल, एल. एसेज इन स्ट्रक्चरल पोयटिक्स ऐंड नरेटिव सिमेटिक्स, टोरेंटो: विक्टोरिया यूनिवर्सिटी, 1979 21. तिवारी, भोलानाथ शैलीविज्ञान, दिल्ली : शब्दकार, 1979 सन्दमिका 115 22. निराला, सूर्यकान्त त्रिपाठी 23. पावेल, थामस जी० 'खुला आसमान', राग-विराग (संपा०) राम- विलास शर्मा, इलाहाबाद : लोकभारती प्रका- शन, प्रथम संस्करण। 'लिटरेरी नैरेटिव्ज', डिस्कोर्स ऐंड लिटरेचर, (संपा०) टी० ए० बान डिपक, एम्सटर्डम : जान बेंजामिस पब्लि० कं०, 1985 'फंक्शनल सेंटेंस पसंपेक्टिव ऐंड टेक्स्ट लिग्वि- स्टिक्स', करेंट ट्रैड्ज़ इन टेक्स्ट लिग्विस्टिक्स (संपा०) वूल्फ गैग, न्यूयार्क : बाल्टर डी० 24 पावलोका, जैड और पालेक बी० ग्रूटर, 1978 25. प्राप, ब्लादिमिर 26. प्रसाद, जयशंकर 27. प्रीतमा, अमृता , 28. काउलर, रोजर 29. फाउलर, रोजर 30. वेनीपुरी, रामवृक्ष 31 भाटिया, कैलाशचन्द्र ला मारफोलेजी, द कुन्त, पेरिस : ट्रैडक्सन म डेरीज एंड ऐली, 1970. कामायनी, इलाहाबाद : लोडर प्रेस, एकादश सस्करण। अमृत प्रीतम की चुनी हुई कहानियां, दिल्ली : भारतीय ज्ञानपीठ, 1982. एसेज ऑन स्टाइल ऐण्ड लैग्वेज लन्दन : रुटलेज कीगेन पाल, 1965 लिंग्विस्टिक क्रिटिसिज्म, न्यूयार्क ; ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1986 अम्बपाली : राजपाल ऐड संज, 86 'प्रोक्ति संरचना', परिपद् पत्रिका, (संपा०) श्री रजन सूरि देव, पटना: बिहार राष्ट्रभापा परिपद्, जुलाई, 1980 अ पंक्शनत विउ अॅव लैंग्वेज, आक्सफोर्ड : 1962 स्टायलिस्टिक्स ऑन स्टाइल : ए हैंड बुक विद सिलेक्शंज फॉर एनालिसिस, न्यूयार्क : चाल्स स्काइब्जर्स सज, 1969 दूसरा घर, नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन, 1986 'काव्यभापा का गठन और साभिप्राय विचलन', रीतिविज्ञान, दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन, 1973 32. मातिन, ए. 33. मिलिक, लुइस टी० 34. मिश्र, रामदरश 35. मिश्र विद्यानिवास 116 प्रोक्ति : स्वरूप, संरचना और शैली 36: मोथन, ए० आर० (संपा०) इन्सालक्लोपीडिया, अब लिंग्विस्टिक्स, ऑवरा- फोर्ड : पर्गमैन प्रेस, 1969 37. मुकारोन्मकी, जे. 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118 प्रोक्ति :स्वरूप, संरचना और शैली 66. सिक्लेयर जे० मक और कूल्टहार्ड,आर० एम० 67. सोलसपोर्टा 68. हैरिस, अँड. 69. हैलिडे, एम० ए० के० और हसन रुकया 70. हैलीडे, एम० ए० के० 'टुअर्ड्स ऐन एनालिसिस अव डिस्कोस, द इग्लिश पूण्ड बाई टीचर्ज़ ऐंड प्युपिल्ज, लण्डन : ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1975 'ए प्रोग्राम फॉर द डेफिनिशन अॅव लिटरेचर', टेक्साज : यूनिवर्सिटी अंव टेक्साज, अंक-36, 1958 स्ट्रक्चरल लिंग्विस्टिक्स, शिकागो : 1960. कोहिश्जन इन इंग्लिश, लन्डन : लोगमैन, 1976 'लिंग्विस्टिक फंक्शन एंड लिटरेरी स्टाइल : एन इन्क्वायरी इन टु द लैंग्वेज अव विलियम गोल्डिंग्ज द इनहेरिटर्ज', लिटरेरी स्टाइल : ए सिम्पोजियम, (संपा०) सेमूर चैटमैन, लन्डन : ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1971 'लग्वेज स्ट्रक्चर ऐंड लैंग्वेज पंक्शन', न्यू होरा- इजंज इन लिंग्विस्टिक्स, (संपा०) जास लायंस, बाल्टीमोर : पेंगुइन बुक्स, 1972 'द प्लेस अव पंक्शनल सेंटेंस पर्सपेक्टिव' द सिस्टम अंव लिंग्विस्टिक्स डिस्क्रिप्शन (सपा०) डैन्स एफ०, 1974 'नोट्स ऑन ट्रजिटिं विटी ऐंड यीम इन इंग्लिश', जर्नल अव लिंग्विस्टिक्स, भाग-2 1967 71. हैलोडे, एम० ए० के० 72. हैलीडे, एम० ए० के० 73. हैलीडे, एम० ए० के० प्रयुक्त हिन्दी-अंग्रेजी पारिभाषिक अंक Paints Stage अपचरण अग्र प्रस्तुति अधिबयान अधिभाषात्मक अधिनिवेशी-स्तर अधीनस्थ स्तर अध्याहरण अनभिज्ञात पहुंच अनुपस्थिति अनुप्रयोगी सोपान अनुसन्धानात्मक मनुक्रम अनेकशः आवर्तित अन्तर अन्तर-निवेशी स्तर अन्तर-शीर्ष कांश अन्तर-वैयक्तिक अभाव अभिधेयात्मक अभिलक्षण अभिव्यक्ति अभिव्यक्तिक अभिव्यंजनात्मक अभिज्ञान अवश्य करणीय-प्रोक्ति अव्याकरणिकता अवयवभूतार्थता Foregrounding Meta-Statemenr Mera-Linguistic Meta-Diegetive Level Diegetic Level Ellipsis L'niecognized Arrival Absence Application Scale Contractual Sequence Repetitive Distance Jotra-Diegetive Level Tatra-Peak Episodes Inter-Personal Lack Depotative Features Voice Expressive Expressive Recognition Obligative Discourse Uogramaticality Componential Meaning Demur प्रोक्ति: स्वरूप, संरचना और शली 120 अस्वीकार्यता आख्यान आद्यात्मक-एकात्मक आनुमानिक-प्रोक्ति आनुभूतिक आन्तिक आन्तरिक आरम्भिक आरोपक आह्वान इच्छात्मक इच्छाबोधक-प्रोक्ति उक्ति उच्चावच अर्थवत्ता उत्तर उत्तर-शीपं-कथांश उद्घाटक उद्धार उद्देश्य उन्मीलक शब्द उल्लंघन एकात्मक कठिन पाठ कध्यात्मक कथात्मक प्रतिज्ञप्ति कथात्मक यस्तु काव्यात्मक क्रम क्रम-विन्यास मान्तरित फर्त वाचकता कारणात्मक काल और पक्ष काल्पनिक प्रोक्ति Unacceptability Recit Anaphoric Singulasative Hypothetical Discourse Experiencial Final Internal Initial Accusations Summons Conative Optative Discourse Utterance Hyponymy Reply Post-Peak-Episodes Opening Rescue Subject Key-word Violation Singularative Difficult Task Thematic Varrative Proposition Narrative Content Poctic Order Airay Transpassed Agency Causal Time and Aspect Visionary Discourse प्रयुक्त हिंदी-अंग्रेजी पारिभाषिक 121 क्रियार्थ-द्योतक केन्द्रण गहन संरचना । जादुई तथ्यात्मक तथ्यिकी तदर्थ ताकि तुला द दिशाधारित दृष्टिकोण दृष्टिकोण : अभिवृत्ति दृष्टिकोण : परिप्रेक्ष्य ध्यान नवीन निदर्शात्मक निपात और प्रत्यय निषचयार्थी-प्रोक्ति Modal Focus Deep Structure Magical Pragmatic Pragmatics Adhoc Logical Gomparision Punishment Tenor-based Point of Vicw Point of Vew : Attitude Point of Vew : Perspective Meditation New Illustrative Particles und Affixes Indicative-Discourse Performative Sequence निप्पादक अनुक्रम Reference निर्देशन निर्देशात्मक सन्दर्भ निषेधादेश निष्पन्न-पाठ नीति-वचन पराकोटिपद पर्यायपरकता परिचय परिणाममूलक परिदृश्य परिप्रेक्ष्य Interdication Task Accomplished Moral Superordinal Synonymy Introduction Illative Setting Perspective Narrow Scene Test Text Textual परिमित दृश्य परीक्षा पाठ पाठात्मक 122 प्रोवित : स्वरूप, संरचना और शैली पाठ-भापा विज्ञान पाठ की गतिकी पावती-अवधानन पुनः उद्घाटक पूर्वशीपं कयांश पूर्व सन्दर्भ प्रकार्य प्रकाशात्मक प्रकर्ता प्रगमन प्रतिक्रिया प्रतिक्रम प्रतिवेदित प्रतिभागी की आद्यपुनरुक्ति प्रतिस्थापन प्रतिज्ञप्ति प्रतिपाद्य शब्द प्रतिबन्धित प्रोक्ति प्रत्याशा श्रृंखला प्रदत्त प्रभावात्मक प्रयुक्ति प्रयुक्ति-निर्धारक प्ररचन प्रवेशक Text-Linguistics Theme-Dynamics Acknowledge Re-opening Pre-Peak Episodes Back-referance Function Elicitations Actant Move Reaction Counter Action Reported Participant Apaphora Substitution Preposition Theme word Gonditional Discourse Expectancy Chain Given Impressive Register Determiner of Registers Construction Aperture Departure Resolution Model Provision Discourse Utterance Body of Discourse Discourse Level Bound-Opening Extra-Diegetive Level Poly-Modelity प्रस्थान प्रस्ताव प्राचल प्रावधान प्रोक्ति प्रोक्ति का मुख्य भाग प्रोवित-स्तर बद्ध-उद्घाटक यहिनिवेशी-स्तर बहुरूपात्मकता प्रयुक्त हिंदी-अंग्रेजी पारिभाषिक 123 बारम्बारिता बाह्य बाह्य-संरचना बिन्दु भविष्य-सूचक प्रोक्ति मानक उद्देश्य मूल्य-मीमासा मूल्यांकन मैं-प्रतिमा योगात्मक योजक और आरम्भक रहस्य-उद्घाटन रूपान्तरण रेखीयता रेखांकक लेखकीय और उत्तारकीय स्वर वक्ता और थोता-विषयक मनोत्ति वंचना वंश वाक्यातीत वाक्यांशगत-संयोजन वाचिक वापसी वार्तालाप विकल्पात्मक विचलन विचारात्मक/पाठात्मक विजय विपथन विपरीतार्थकता विफलीकरण वितरण विधि-आधारित विधेय विनिमय विरलता विरोधात्मक विवाह विवरणित विशद-संरचना Frequencies External Surface Structure Points Predictive-Discourse Model Subject Axiological Evaluation 1-Image Additive Conjunction and Introducer Exposure Transformation Linearity Marker Author's and Narrator's Voice Attitude towards speakers and listeners Fraud Genus Beyond-Sentence Clausal Linkage Verbal Return Dialogue Alternative Deviation Ideational Victory Deflection Autonymy Frustration Delivery Mode-based Predicates Exchange Rarity Adversive Wedding Narrativized Macro-Structure 124 प्रोषित : स्वरूप संरचना और शैली विस्थापनमूलक अनुक्रम विषय विपम निवेशी-स्तर वेष्ठक वृत्तिकता व्यवच्छेदक व्याख्यात्मक शाब्दिक पुनरावृत्ति शाब्दिक संसक्ति शाब्दिक बन्धन और अन्वयन शीपं सकेत-वाचकता संघर्ष सजीवता सन्निधान सन्दर्भबद्ध संपर्क-द्योतक समंजसता समर्थक सम-निवेशी-स्त. समापक Disjunctional Seqence Topic Hetero-Dicgetive Level Closure Modelity Differentrative Explanative Lexical Reitiration Lexical Cohesion Lexicalities and Paraphrases Peak Focusing Deictics Struggle Animacy Collocation Ceotext-Bound Phratic Coherence Supporter Homo-Diegative Level Finis Equative Parallelism Combibation, Conjunction Linkage Structure Reconnaissance Complicity Acteurs Global Structure Framing Informative Micro-Structure Aesthetic Local Structure Transfer Duration Acceptance Voluntary Discourse सम समान्तरता संयोजक संयोजना संरचना सर्वेक्षण सहअपराधिक सहकतंक साकल्यपरक सीमान्तक-आरम्भक सूचनात्मक सूक्ष्म-संरचना सौन्दर्यात्मक स्थानिक संरचना स्थानान्तरण स्थितिकाल स्वीकृति स्वच्छिक प्रोक्ति.

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Prokti [ Swaroop Sanrachna Aur Shali ]

Author
Indu Shitanshu
Title
Prokti [ Swaroop Sanrachna Aur Shali ]
File name
Prokti [ Swaroop Sanrachna Aur Shali ]
Text
OCR done
Citation
1967
Published
2011/03
Publisher
Pratibha Prakashan Tagore Nagar Punjab
Language
Sanskrit
Pages
139
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551257
Barcode
4990010032016.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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1VSe2kmqAFj
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