Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Kalam Ka Majdur Premchandr

Madan Gopal · 2010/12

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कलमका
मज़दूर
प्रेमचन्द

tumi Jinni খাল

1
स
कलमका
मज़दूर
प्रेमचन्द
मदनगोपात

प्रकाशक
राजकमल प्रकाशन (प्रा.) सि.
दिल्ली
मदन गोपाल
प्रथम सस्करण १९६५
नवीन प्रस दिल्ली ६

मुन्नो को

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प्रस्तावना इस पुस्तक को प्रकाशित करते हुए मुझे वहा हप हो रहा है। यह पुस्तक लगभग २० वर्षों में परियम का परिणाम है। इस पर काम तभी भारम्भ क्यिा था जब मैंने १६४२ ४३ म प्रमच क जीवन तथा वृतियो पर एक छोटी सी परिचयात्मक पुस्तक अग्रजी म लिखी थी। (अंग्रजी म इस विषय पर यह पहनी पुस्तक थी।) महायुद्ध र रिनाम कागज की किल्लत थी और मैंन अपनी पुस्तक लिए जिननी मामग्री इसटठी की थी उसका पूरी तरह प्रयोग नपर पाया था। उसी समय मुझे यह ध्यान पाया था रि प्रमचन जी का युग वीता जा रहा है। उनर जितन जीयित मित्र या सहयागी ५ उना पाम भी तर उतरे पर मिम सकते हैं तथा उनस प्रमच जी से सम्बध म कुछ पान भी प्राप्त हो सकता है । उसी समय तया भगो कुछ वर्षों म मैंन लमही पानपुर लखनऊ बनारस इलाहाबार वस्ती हैरावाद साहौर वम्बई प्राति की यात्रामी। बहुत से पत्र या उनसरी प्रतिलिपिया म मतिरिक्त और भी बहुत-सी सामग्री प्राप्त की। इस सामग्री तथा हम और 'जमाना , प्रम मा और शिवरानीदेवी जी पी प्रमपद पर म र मापार पर मैंने र पुस्तर सयारपी। मोर पुस्तर परत प्रमपरजी र पत्रो को सासन के प म तयार की। दूसरी पुरनर रो पब ममृतरायजी दा भागा म धाप रहे हैं। पहली पुस्तक पहार ।। उग पन्तिम म्पदन गा भवरारहीन मिना । म पुम्नव म मन प्रमय जी को मभी पतियो-उपपामा महानिया नाटसा निवपापा मारा दन री पेष्टा भीकी पी। परिणामन पोयी मत मोबन गई। पात्र स दो साल परसे मुझे यह प्यान पाया fr प्रमप को नियों र साराको भाव याना सिसी वि भाषा म ताहा सकती है पर लिया र म पागायो उनकी निया म पगितिराना प्रयत्न तो ऐसा ही होगा जस'उलटे बम बरेनी का। यह सोचकर मैंने किताब को नया रूप दिया। प्रमष दजी की कृतियो के मश निकालकर प्रव यह पुस्तक तीन सौ भटठाइस पन्ने की बनी है । जो मरी रुचि के अनुसार ही है। इस पुस्तक को तयारी में मैंने उपलब्ध सामग्री का भी मावश्यक्तानुसार उपयोग किया है जिनम हस तथा जमाना + प्रेमचन्द अरु शिवरानीदेवी की पुस्तर प्रमचन्द घर में तया कुछ ऐमे निमम्धा के तमह भी है जिनमें प्रमचन्द की कृतिया पर सामयिक मालाचनायें छपी हैं। ये लेख कितनी ही बार छप चुके हैं। पिछले कुछ वर्षों में तो जमाना + प्रमचन् प्रक म छपे लेखो का हिन्दी रूपा तर भी छपा है। अभी तक प्रमचन्दजी पर जितनी पुस्तकें लिखी गई हैं उन सवम इही पुस्तका तथा प्रकाशना का प्रयोग किया गया है। उदू लेखको ने जमाना के विशपा को अपनी प्रतिया का माघार बनाया भौर हिन्दी सेवको ने हस है विशपाक को। इन सब प्रकारानो में एक विशेष त्रुटि यह रही है कि तिथियो मोर घटनाक्रम म स्पष्ट परस्पर विरोध निखाई देता है। मालोचकों ने भी मांख मोचकर इन्ही पुस्तका का अनुकरण किया। मैंने भी अपनी १९४४ में छपी पुस्तिका म तिथियां दा इद्रनाथ मदान में थीसिंज ट्रेण्डस इन माउन हिन्दी लिटरेचर स सी थी। अन्य लेखमा ने भी सी प्रकार तिषियों जहाँ जसे मिली वसे ही स्वीकार कर ली। और तो मौर स्वय प्रमचन्दजी ने एक ही घटना के बारे में भिन्न पत्रों तथा मेसो में विभिन्न तिथियों दी हैं। इन तिथिया के ग़लत होन का पता तब चला जब उन पत्रो के प्राधार पर जांच-परताल की गई। एक कठिनाई यह भी सामने आई कि बहुत स पत्रा पर तिथि ही नहीं दी गइ कयल स्थान ना ही जिक्र है। इसलिए मैंने उनसरी सविम-बुक तथा सामयिक मासिक पनो की सलाम की जहां उनकी व कहानियां सबसे पूर्व छपी थी पौर जिनका जिक्र पत्रो मे है। यहाँ यह यतलाना भावग्या है कि उन सामयिक मासिक पत्रा म से की पूरी फाइलें भी दुलभ हैं एस पत्र जो इस सताम्मी के मारम्भ म निक्लते थे। इस तरह प्रत्मा तयय तया नियिक्रम की जांच-पड़ताल का काम बहुत सरल सिद्ध नही हुमा । कई वार सिफ एक कहानी की तिरिया पन की तारीख निश्चित करने म कई वर्षों की फाइलें उसटनी पड़ी। परतु खोज मौर जांच पडतास का जीवनी लिखने के काय म निस्सह विशप महत्त्व है यह बात मह पुस्तक लिखते हुए मुझ खून अनुभव हुई है। इस पुस्तक में मैंन यथासम्भव घटनामा की वही तिथियां स्वीकार की हैं जिनको पुष्टि इस प्रसार मी खाग सहई है।

मैंने प्रमचन्द द्वारा लिखे गए पया के मशा का सूप प्रयोग दिया है। जिन पत्रों के मा यहाँ उदत किये गए हैं उनकी मूलप्रति या प्रतिलिपि उपल ध मरने के लिए मैंने लगभग गत २० वपों म भारत के विभिन्न भागो में सरहों व्यक्तिया से पन व्यवहार दिया है या निजी भेंट की है। मेरा पत्र-सकलन-काय साहित्यिक क्षत्रा म चर्चा का विषय भी रहा है। इस सम्बय म १९५२ मे भाजक्ल (मस्तूवर) म मेरा एक इटरव्यू भी छपा था। पयो के मिलने का क्रम अब भी चल रहा है । कही-कही स मूल पत्र या उनकी प्रतिलिपियाँ भव भी उपलब्ध हो जाती हैं। सक्लन मा एक महत्वपूण भाग दयानारायण निगम ने १९४१ म कानपुर म मुझे दिया था जब मैं अपनी पुस्तिका लिख रहा था । इन सारे पत्राव मा 'जमाना में छप चुने । निगम साहब ने दूसरे पत्रा को देने का वायदा भी दिया था परतु उनको प्राप्त करने के लिए मुझे अपनी प्रकाशित पुस्तक की एक प्रति दिसाना जरूरी बतलाया था। जब मेरी पुस्तक तयार हुई सब दुर्भाग्य से उनरा देहावसान हा घुमा था। १९५१ में निगम पुत्र से मैंन फिर पूया । उन्हाने पलाया कि उह मेप पत्राम बारे म कुछ पता नहीं है । जिस ममय निगम साहब ने मुझे निएप उसा समय जमाना क मनजर न भी मुझे बारह पत्र लिए थे। लगभग फिर उसी समय मुझे दुर्गामहाय सरूर को लिखा प्रमपदमा पत्र मिला। इमतियाज प्रलो ताज ने लाहौर म मुझ मपन घर पर पवालिम पत्रा को नक्स मरने की मुविधा १६४१४२ म दी थी। १९४८ म भाई भीष्म साहनी न मुझ इन पत्रा मी हिनी प्रतिलिपि भी दी जिनसे मैंने अपनी उदू को प्रतिलिपि म समापन किया । उही निाइ यमावहा को लिखे दरा पत्राको प्रतिलिपि भी मुझ साहनीजी न दी। उपनाय प्रक न प्रमचन ५ पार पत्रा की प्रतिलिपि अपन हाय स परर मुझ दी थी (गत वप उहान बत माया नि मूलप्रति प्रव गुम हा चुकी है ।) रिल्लो म जनकुमार जन न मुझे मयासीग पत्रासोपाल दी जिह मैन नाल रख पातानुगार फाइल लोटा दी। (पम मुझ पता लगा है किई वप वार का मजन उम साह गोल गय मोर वापस नहीं लिया।) प्रमचरमोनल मा महताब राय न भी पत्र नि मागिरलाल जोशी न ए पत्र स्वप भना। विषण प्रभार न भी तीन पत्र दिए। एम ही नागम मभग्यास न व चार पत्र मुझ नि जा प्रमच" न उग्न टोरिया भव य । इसी तरह मनारमीनम चतुर्वगे न मुभ मोलह पनामी प्रतिलिपिया (जा प्राय प्रपत्राम है) दा । इनर प्रतिषित गिरानी देवी विनोगर मास रामा टहन नाप मान भान्त मानरर पत्र मुम कौसल्यायन हिसामुद्दीन गौरी मान वराव जोगी मस्तरहसन रायपुरी इत्यादि का लिखे गए पत्र विभिन पत्रिकामा या पुम्सका म छप चुचे हैं मैंने उन्हे वही से उदत किया है। मेरा पन सग्रह लगभग तीनसो पृष्ठा का बन गया था। कई मित्रा तथा प्रकाशको ने मारह किया रि मैं इसे छपवा हालू । प्रस्सी पृष्ठो की भूमिका के साथ संग्रह १६५१ म तयार था। दो वप बार भाई चद्रगुप्त विद्यालकार ने इसका सशोषन भी कर लिया था परन्तु मैं कुछ सज्जनामा लिखे गए पत्रा की प्रति सिपि की माशा कर रहा था विशेषतया दुलारनाल भागव तया २० एम० मुशी। इस बीच में दो वप हुए भाई अमृतराय न मेरे पत्रो की एक प्रतिलिपि मांगी पोर इनके प्रकाशन की एस योजना बनाई जिसके अनुसार प्रमघटक पत्रा का संग्रह उनके (अमृतराय) तथा मेरे नाम म दो भागो म प्रकाशित होगा- (क) निगम को और (ख) दूसरे मित्रो का लिसे गए पत्र । प्रमतराय ने बतलाया है कि यह सह शीघ्र ही पाठका का उपल घ हो सकगा। इस पुस्तर म मैंने उनका महत्वपूर्ण भाग उदत कर दिया है। इसक लिए मैं उन व्यक्तियो का माभारी हूँ जिहाने मुझ मेरे सक्लन इयारि क नाम म सहायता दी। पत्रा की प्रतियां देनेवाला के अतिरिक्त तो व्यक्तियों ने मुझ बिगप सहायता दी- पमराहील भगतसिंह के साथी क्रान्तिकुमार (पानीपत) ने तथा मास्टर गुरवस्यसिंहजी ने । इस काय म प्रमपन ज्यप्ठ पुत्र श्रीपतराय स मुझ प्रोत्साहन मिलता रहा है। इसके लिए तथा पत्रो कहानियो नियमो में पण उद्धत करने की मात्रा के लिए म उनका विशेषतया मामारी है। इनक पतिरिक्त इस पुस्तक का सम्पूण करने की प्रेरणा मुम श्री चन्द्रगुप्त विद्यालकार श्री जगन्नाथ भागाद तया कमर रईस से मिली। में उनका विशेषतया कृतजह! मारवारी लाइधरी श्री महावीर जन लाइबरी तथा दिल्ली यूनीवसिटी लाइमेरी उस्मानिया यूनिवसिटी लाइभरी हैरावार (श्री मुहम्मद इस्माइल) मदयोयाते उर्दू हैरावाद से भी मुझ मूल्यवान सहायता मिली है । उनका भी मैं पयवाद करता हूँ। -मवन गोपाल नई दिल्ली १५ अगस्त १९६२ सूची ३ ६ १२ १८ २७ प्रस्तावना पटवारीना पोता २ बचपन मोर विद्यार्थी जीवन ३ पहसा विवाह प्रध्यापन रायरा प्रारम्भ ५ साहिरियक दान में प्रवेश ६ नई प्रकार की कहानियो दूसरी शादी देशप्रम के कारण सरकारी कोष ६ प्रम मोर वीर रस की कहानियाँ पत्रार बनने की इन्दा गोरखपुर में अध्यापक के पद पर एर पनरोसा मित्र पोर कहानी सग्रहोपाप्रमान १३ प्रस सगाने के प्रयास सरकारी नौकरी से स्यागपत्र राष्ट्रीय सूल में हेग्मास्टरी सरस्वती प्रसकी स्थापना पला कगे निमा गया। १८ रगभूमि ३२ ४२ ४५ ८७ १७ १२४ १२८ २ रिस मोहरी मापुरी-सम्पादक प्रमपदपदासत में प्रसमा मदर १५३ १६६ १६५

द
२५
२२७
२३४
'हस का शरम्भ भौर पली की जेलयात्रा
माधुरी से त्यागपत्र
फिर बनारस मे
जागरण
मैं कहानी से लिखता हूँ
फिल्मी दुनिया मे
हस भारतीय माहित्य का पत्र
सावजनिक जीवन मौर गादान
मवसान
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२६
३०
7
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२६६
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१ पटवारी का पोता प्रमपला जन्म तमहा गौम म थावण यी १० सम्बत् १९५७ पनिवार (३१ जुलाई १८८०) को हुमा । समही गाँव मोना मैड़या बनारस म मात्रम गद जाने वाली मर पर बनारस से मार मोल की दूरी पर बसा है । छोटा मा गांव है । पायोग दुर्मी है । एक चौथाई घरायस्था + हैं। इन्ही मस एप पायस्थ परान म प्रम का नाम हुमा । मान रखा था जिसे प्रमच राग पटवारी गुरमनामलाल न इस गांव म पात ही यनवाया था। अपन जमाने मोर पटवारिया कातर गुरसहायनाल सात-पीते मादमी थ। माट-पमठ बीघा जमीन भी गरी ली थी। यह पटवारगिरी नी माई थी। गुग्म गरनाल का कुटम्ब प्रतिष्ठित हो रहा हा परवारीजी पिया भी ५ } उस उमान म दो पान भी बोतल मिलती पी। ग्वाही मौका मिलता मपनी पता पर पिर पसे पिनी बहन मली थी। चुपयाप मार पाती रहती। मयम पापरलामीमावरलाल तोमरा सस्वरा भजायरमास मोर पोपा सरता उन्जिनागपालान मागे पिटती हुई देसवे भार सहमार चुप ही जात । परतु इमरा नहर महापारमात पो बहुत सगहा पा यापतो परहार ठा देवा। मनपर महावीरलान मा-मार का बहता पा। मुंगी गुरमहापत्ताल न सामा सारी जमीन उसी र नाम परवा दी थी। हम प मोघा मान प्रपन नाम रमी मोर गाम पह भी महावीरमास पुर बलदवसात र माम बग्दादीपी। गुरसहायमास की मौत का महावारतात रोएर परे भाई न सम यार ािर साह धीमा जमीन हपिया सी। इस प्रसार मार परिवार र पाम रमन ययोमा मौन रह गई जो समान नाम थी। पोरे परमाम मामाने म मुजी बने । उहनि पाने घाटे माई मगायच- साना भी पाने हो महरमम मनी रयाया। मौर मगायरमाम ने परते लम का मजदूर प्रमचन्द छोटे भाई उदितनारायणलाल को मी डाक्खाने में नौकरी लिवाई । कोसश्वर- लाल तीस साल की उम्र म ही परलोक सिधार गए। उनकी विधवा कुछ नि लमही म रही फिर बच्चा को चुनार ले जाकर रहने लगी। उसका नया मातीसाल भी तीस साल की उम्र मा होकर मर गया और अपनी विधवा मोर चार बच्चो को पीछे छोड गया । उत्तिनारायणलाल जा सकलाने म मुशी बन गए थ, सरकारी ग्रवन ५ सिलसिले में सात मास की सजा पा गए । जव लौट ता गम के मारे मुंह न दिखा सके और फिर उनका पता न चला । उना लहका प्रावारा था मौर वह भी घर मे भाग गया। दो लपियों म स एक की घाटी हो चुकी थी दूसरी की शादी होनी थी। इतने बढे परिवार का निर्वाह छ वीघा जमीन से तो न हो सरना था । समान वाले से रेपर एक मजायरलाल थे। उनकी तनख्वाह बीस-पच्चीस सये होगी । इसी म से वह कुछ रुपया भपनी विधवा चाची को भेजते कुछ मोतीलाल की विधवा को भेजत कुछ उदितनारायण को विधवा और बच्चो को भेजते । उनकी लहरी की गादी भी की। मजायबलाल अपने नातटारो को भी कुछ-न- कुछ सहायता देत रहते । दो रिश्तेदारोमो उन्होने भरखान म नौकरी दिनवाई। वीम पचीस रुपये में यह सब कुछ कसे करते यह मचम्भ की बात है । वालाई मामदनी का कोई जरिया न था मगर महगाई नहीं थी । गांव में रहत पे । पहाँ फ बहुत से लोग अपने प्रदेश से बाहर जाकर ममाते थे और मनीमाडर पर भेजते थे । मनपढ कुमिया के नाम पर घिटठी पनी लिम्बना उनके नाम माए पत्र पढना और मनीमार इत्यादि मरना-यह भव काम मजायवलाल करते थे । इनके बदले म उह गेहू चावल सन्नी तथा दूध मिल जाता था। प्रभावलाल की सेहत अच्छी नहीं थी। कमजोर थे। परन्तु मध्यन गर्ने के भलमानस । जहाँ तर हो सकता भला करते । गांव में उनकी इज्जत थी। पर बनाए जाते तो ईमानदारी से अपना मला दतं । गीता मोर दूसरे गास्त्रा का पाठ करते पै परन्तु रस्मी घम म उहे विश्वास न था । पडो पुजारियो में भी विश्वास न था। कहते घमा मूल मापार समाचार है धार्मिक अनुष्ठान तो महज ढकासला है । मजायवलाल को वीवी भी अपने ही उग की मिली थी। माम दीदेवी देखन म को बहुत खूबसूरत पो ही (इमस मधिल खूबसूरत औरत खानान में नही पाई)। अपने पति की तरह यह भी हर एक की महायता करने को तत्पर ली। पिसी से झगग नहीं करती मौरन ही पिसी की चुगली । उसके पिता कारिदा थे। उन्हे निसन का गौक भी था। मानन्दीदेवी योडी पटवारी का पोता पता लिखी थी, पर जितना ज्ञान उम पर उमस घर की दूसरी भोरता को भी उमने लाभ पहुंचाया। मानन्दीधी र पहल तो सक्यिा हम और दाना मर गया तमही की पौरतों न कहा कि उस मापा म प हुए बम बदन दिन बिनहा रह सात । तामरी बार जब बच्चा पैदा हान वाला था पानीदयी मक नहीं गई समदी म ही रही। इस बार भी महकी पहुई परन्तु वह जिन्दा रहा। उसका नाम मुग्गी पहा। इसम म सात भाठ थप वार मान दा दयी के एर सारा हुमा । यही बना भाग बलगर प्रमच क नाम से प्रसिद्ध हुमा । पर का लिया गया नाम धनपतराय था और उसर ताऊ उस प्यार से नवार पुषारत थ । अव धनपतराय ने पहल-पहल लिखना शुरू किया, तब उन्हान 'नवाबराय दो ही मनाया था।

२ बचपन और विद्यार्थी जीवन पूछता कि हम पांच पजायवलास सक्खान की नौकरी के सिलसिले में कई छोटे माटे गांवो भौर कस्को में रहे । कभी वह वाटा माज मगढ वस्ती मोर गोरखपुर मोर कभी मखनऊ में पासपास काम रस रहे । उनकी पत्नी सुग्गी धनपतराय और कभी-कभी भाइया के बच्चे भी उनक साप ही रहते । पर तु पधिकागत वाम बच्चे लमही ५ घर में दूसर भाइयों व कुटुम्ब क साथ रहते थे। जब कोई धनपतराय मे तुम कितन भाई हा तो वह उसर दत भाई हैं। इनमे म एक तो प्रमच द हमजानी थे। दोना इकटठे मौलवी साहब क पास पढन जात । मौलवी साहब क स्कूल का तया वह क्या और कैम पढ़ाते ये इस सबका रोधक घणन प्रेमच न अपनी कहानी चोरी म दिया है। क्स चचेरे भाई ने एक रुपप की पारी की फसे यनपतराय और भाई न इस रपये का भुनवाया क्स पचा को पता लगा फसे उन्होंने स्फून म पाकर लदकों को पकड़ा और घसीटकर ले गए और बस अपन लड को पीटा। मानदीवी ने देवर को मपन लहर को पीटतं देखार धनपतराय को भी पीटना शुरू किया। पपी ने धनपतराय को सुहाया। मुझे हो क्यो छुडाया अपने बच्चे को क्यो नहीं छुहाया यह मैं नहीं जान सका । शायद मेरी दुबलता पर उन्हें दया पा गई हो। धनपतराय दूसर वाचा की तरह चल ५। प्रेमचन्द घर मे नामक पुस्तक म शिवरानीदेवीगी न सके कितने ही उगाहरण लिए हैं। दारी मो धनपतराय से बहुत प्यार था । वह उसे कहानियां सुनाती थी। एक बार अव मनायवलाल जमानियाँ म नियुक्न थे प्रमचन्द को कहानियाँ मुनाने वाला एक पामी हरकारा मिला। कई वर्षों के बाद इसी हरकारे म नाम पर रहाने कजाकी नामक कहानी लिखी । इस हमारे का नाम भी जानी हीथा। यह कमी उन्हें विरहे गाकर सुनाता और कभी कहानियां सुनाता । उसे यचपन और विद्यार्थी जीवन चोरी डाके मार पीट भोर भूत प्रत मी मरडा कहानियां याद पी। मैं ये महानियाँ मुनकर विस्मयपूण प्रानन म मग्न हो जाता। उसकी कहानियो के चोर और डार सच्चे यादा होत थे जो अमीरानो सूटकर दीन-दुग्वी प्राणियों का पालन करते थे। मुझे उन पर घृणा के वाले श्रद्धा होती थी। जाकी बच्चा को कधे पर बठाकर दोडता । उनका खुराकरन के लिए वह अमरद गाजर मोर ईम साता। एक बार एक हिरन कवच को पकड़ने के प्रयत्न म वहा समय लग गया। जावी हाक्यान देर से पहुंचा । देखा मनायवलाल मागवला हैं । पजाकी निकाल दिया गया। धनपतराय को इस पर वडा तरस पाया। दूसरे दिन उहाने काकी को बुलवाया और भहारे से पाटा दाल चावल लाकर दिया। उही के मायह पर कुछ दिनो बाट मजापी को दोवाग रख लिया गया। जव धनपतराय की प्रायु सात या माठ वपरीची मजायवलाइलाहाबाद थे। माननीदेवी बीमारी पडी। वह ५ मा वामार रही। मुग्गी जिसका मुछ दिन पहल ही विवाह हा गया पा पाई । नदी वही थी । धनपतराय के चचर गा दवाइवा प्रव य परत थ। स्वय धनपतराय मा के सिरहान वठे पसा झरते । मानन्दी यी सिरहान के पास ही एर दावार की दातल रखी रहती थी। मामे मो जाने पर धनपत राय एपक स शकार पर हाथ साफ परत रहन । मामी हालत खराब हाती गई। मरन स पहले पनपतराय उन परे भाई पौर सुग्गीगा हाय अजायबलाल पे हाय म एकर बोली यतीना बच्चे तुम्हारे हैं। मानन्गवी मर गई। सब रोय । धनपतराय को तब ममझ म नहीं माया पानि लोग रोगपा रहे हैं। मौर जब समझ म माया मो वह इतना रोयदिपपने माहित्य म मानीवन मात्र प्रम मा वणन परते रह । पाननी वी मी मृत्यु सपा मुग्गी अपनी समुरान गई। दारी भी बीमार पारी और लमही पली गई। 'भया दूघ म सारासार धनपतराय को पिलात । पनरतगय को मौकी या माती पौर पद एकान्न म बटार रोत । मुघ महीनोर वा प्रभावशाल स्वयं बीमार पो पोर नमही गय । पन पतराय लिए पिर वही मौलवी साहब पाला सात । पुराना गायत्रम पाने सगा। गुनी मार मार गाना और ग तोडपर नूमना । पिर मनापरतात रासवाला जोमनपुरमा हुमा । यमायला हर गय । दागी श्रीमनपुर पहुधौ। हर महीन किराया मरान था। निहायत गन्न। उमीरवार पर रोटरी पी जापनपतराय को मिमी।

बलम का मजदूर प्रमचन्द मजायबलाल न दखा कि वगर वीवी के रहना मासान नहीं । उ हाने दोबारा गादी की। बीवी के साय उस छोटे भाई विजय बहादुर भी माय । यह धनपतराय मे थोडे बडे थे। दोना में खूब पटता । प्रमपत विमाता को चाची महते थे । परन्तु षाची दुर्भात करती। मजायवलाल विवश थे। वुढापे की गादी थी। जवान परनी बूढे पति पर रौब जमाती। इसी कारण मनायवलाल की माता तो लमही लौट माई और वही थोष्ठ दिना बाद वह मर भी गई। चाची घर की मालकिन सनी। धनपतराय से उनका व्यवहार ऐसा पा कि घर म भागने काजी करता । जिस कोठरी म सात थे उसका दरवाजा बाहर ही खुलता था। जान पान पर कोई रोग पाम नही थी। धनपतराय ने खुद लिखा है कि वह धाल ही म एफ तम्बाकूवान पे मकान पर चले जाया करते थे। इस सम्बाकूवाले का लडका धनपतराय का सहपाठी या। तम्बाकू के बड़े-बड़े काले पिण्या के पीछे वठार तम्बावाला पौर उसके कई मित्र हुक्का पीते मोर तिलिस्म ए-होशेरुया' की अटूट तिलस्मी कहानियां सुनते । इस प्रय फे १७ भाग निकल चुके थ। एक एक भाग बड़ मामार के दो-दो हजार पृष्ठा से कम न होगा । और इन १७ भागा के उपरान्त उसी पुस्तक के अलग मलग प्रसगो पर पधीसा भाग छप पुरे थे। जिसने इतने बह ग्रम्प की रचना की उमकी कल्पना शक्ति स्तिनी प्रबल होगी इसका मेवल अनुमान किया जा सकता है। कहते हैं ये क्याएँ मौसाना फजी ने अकबर के विनोदाय फारसी म लिखी थी ! इतनी वृहद् कथा ससार की किसी भय भाषा में शायद ही हो । पूरा एसालोपीडिया समझ लीजिए । धनपतराय इन कहानियो म डूब गए । सुनने का यह म नगभग एक साल तक चलता रहा। धनपतराय की चेतना जगी मोर इस उम्र मे रोमाटिक कहानिया का जो बीज पडा वह प्रागे चलकर एम विशाल वृदा बना। फिर घजाययलाल वा तवाला गोरखपुर को हुमा । मकान यहाँ भी उसी तरह का था। इसम भी दरवाज वाली एक कोठरी थी। धनपतराय मिशन हाई स्कूल में छट दर्जे म दाखिल हुए। यही एक पुस्तक वचने वाल से मित्रता हुई। इसका नाम या बुद्धिलाल । प्रद प्रमचन्दाग्दा में- मौलाना शरर पं० रतननाथ सरशार मिर्जा रुमवा मौलवी मुहम्मद अली हरलाई निवासी उस वक्त र सवप्रिय उपयासकार थे। इनकी रचनाएँ जहाँ मिल जाती पो साल की याद भूल जाती पी मौर पुस्तक समाप्त करफ ही बचपन मोर विद्यार्थी जीवन दम लता था। उस जमान म रेनाल्ड उपयासो की धूम पी । उ म उनके अनुवाट पहापड निक्स रह प मौर हापा हाय विस्त थ। मैं भी उनका पाशित पा । स्व० हजरत रियाज ने रेनाल्ड की एक रचना का मनुवाद हरम मरा के नाम से किया था। उसी जमाने म लखनऊ साप्ताहिक अवय पच मे सम्पादन स्य. मौलाना सजाद हुसन ने जो हास्यरस ने भमर क्लागार हैं रेनालल दूसरे उप यास का अनुवाद घोबा या 'तिलस्मी प्रानूस के नाम म दिया था। ये सारी पुस्तफें मैने उसी जमाने मे पढी। और प० रननाय सरचार से तो मुझे तप्ति ही न होती थी। उनकी सारी रचनाएँ मैंने पढ़ हानी। रेती पर एष बुसलर बुदिलास नाम का रहता था। मैं उसकी दूकान पर मा बैठता था और उसके स्टार से उपयास ल-सरर पढता था मगर दूरान पर सारे दिन तो वठ न सकता था इसलिए मैं उसकी दूकान से प्रप्रेज । पुस्तकों की कजियां भौर नोटस सेकर अपने स्कूत क लम्को हाथ बेचा करता था और इसके मुपावर में दूकान स उप यास पर लाकर पढ़ता था। दो-तीन वर्षों में मैंन सरडा ही उपन्यास पढ़ गले हागे। व उप यासोका स्टार ममाप्त हो गया तो मैंने नवलरिचार प्रस से निरले हुए पुराणों व उर्दू मनु भी पढ़। मी पमान म पनपतराय न दिल म लिखने का पौर भी पाहुपा। मैं लिसता मोर फाडता लिसता पोर फास्ता। कभी-कभी मरे पिताजी हमा पीत-पीते मेरी मोठरी म भी मा जाते थे। जो कुछ मैं लिखकर रखता यह दस मत पोर पूछन नवाब बुध सिष रहे हो? मैं शम क मारे गढ़ जाता । मगर इस विषय म पिताजीनोमोई दिलचस्पी म थी। एक सो उन्ह पाम मार छुट्टी हो न मिमती थी दूसर स विषय प यह जानकार भी न थे। पनपतराय की पहली रचनाही दिना लिखी गई। यह नाते र एप मा रगेमाम पर म्यग्य पाप मापपड उम्र सर बिन प्याहे रहे । नातारों न उनमा लिपस्पीन ली। भाखिर यह एक पमारिन पर पापित हो गए। पमारिन घरल पी। एक नि मा न उम पकड लिया। गांव धमार मोग नार मथ। दरवारा तोरसता गया और उनरी गामासी की गई। जूता एतरी घरी सान घूमा मभीमा प्रयोग पिया गया। एक महीने तर गुर पोडे रह । दुपटना मी सबर गारमपुर पहुंची। यमपतराय न भी मुनी। पनि दा पही नात + ए मा गोरपपुर पार और प्रमायालास क माप टहर। गांव वासा पर इस्तगामा दायर परना चाहत थे। इममे पहमे यह नात मा पनपतराय को उपयास पात दगार विगत करत पोर हली मोर कलम का मजदूर प्रेमचन्द मनायवलाल से पिकायत की धमकी देते थे। जब धनपतरायको नात म माम को उक्त कमजोरी का पता लग गया ता अब वह क्यो उनका रोव मानने । उनको गमिदा करने लिए धनपतराय ने मा की दुघटना पर एक नाटक लिख मारा । मित्रो को सुनाया। सबको खूब पसद माया। इसके घाट उम नाटक को साफ़-माफ लिखकर माम साहब के सिरहाने रस स्कूल का रास्ता लिया। स्कूल पहुंचार इसी बात पर सारा दिन सोधन रहे । नाटक पढकर मामू साहब क्या कहा ? माझ को घर पहुंचकर देखा कि मामू साहब चारपाई पर नहा है । समर म सन्नाटा छाया है। मामू माहब के कपडे सप्त गठरी जूता मय नदार हैं। मालूम हुमा मामू साहब एक जरूरी काम से गांव चल गए हैं भोजन नग क्यिा । मैंने मार मारा कमरा छान मारा मगर मेरा ड्रामा-मेरी यह पहली रचना-कही न मिली। मालूम नही मामू साहब न उम पिराग अली के सुपुर्द कर दिया या अपने साथ स्वग ले गए। विनोद लिए धनपतराय को गुल्ली-हे का बहा शौक था। यह खेन सबमला से अच्छा लगता न लॉन की जरूरत नोट की न नट की नथापी का। मज से किसी पेड से एक टहनी काट ली गुल्ली बना ली मोर दो मामी भी पा गए तो सल गुरू हो गया थपन की मीठी स्मृतिया म गुरुली हा सबस मोठी है। यह प्रात फान पर स निकल जाना वह पेट पर घडरर टहनियाँ काटना मौर गुल्सी डण्डे बनाना वह उत्साह वह लगन बह खिलाडिया क जमषटे वह पाना मोर पगना वह लडाई झगड़े वह सरल स्वमाव जिसम छत पछत अमीर-गरीय का बिलकुल भेट न रहता था जिसम प्रमीराना चापला के प्रदान की अभिमान की गुमाइश ही न थी पिताजी चौकी पर बैठे यग स रोटिया पर अपना क्रोध उतार रह है अम्मा की दोह केवल धार सक है लकिन उनकी विचारधारा म मेरा अन्धकारमय भविष्य टूटी हुई नौका भी तरह डगमगा रहा है । पौर में हूँ कि पदाने में मस्त , न नहाने की मुधि है न माने मी । गुल्ली है तो जरा-सी पर उसम दुनिया भर की मिठाइयोकी मिठाम मौर नमानों का मान द मरा हुमा है। रामलीला भी विनोद का एक विनय अवमर था। मुझे रामलीला में मान पाना पा । पान ' तो बहुत हल्ला-सा गर है। वह मानर उमाद म पम न था। सयोगवा उन दिना मरे घर मे बहुन थोड़ी दूर पर रामलीला का मान या पौर जिस पर म नीसा-पात्रों का प ग भरा जाता था वह ता मेरे घर से विलफुल मिला हुमा था । दो मजे दिन से पात्रो की सजावद हान लगती थी। मैं दोपहर ही से वहाँ जा वैठना पौर उरमाह से दौड़-नोहार बचपन और विद्यार्थी जीवन घाटे माटे काम एष पाठरी म राजकुमारा या शृगार होता था। उनकी यह म रामरज पीसार पोती जाती मुंह पर पाउडर लगाया जाता और पाउडर प उपर साल हर-नील रग की वुपिया जगाइ जाती थी। सारा माया भौहें गान ठोष्टी दुरक्यिा म रच उठली थी। एक ही मादमी इस माम म कुगल पा। वही वारी-बारी से तीना पात्रो का शृगार परता था। रग की प्यालिया म पानी लाना रामरज पीसना पखा झलना मेरा नाम था। जब इन तयारिया रे वा विमान निकलता तो उम पर रामचद्रजी पीछ वठार मुझे जो उल्लास जागव जो गेमाच हाता या पद प्रब लाट साहब क दरवार म पुर्सी पर वठकर भी नहीं होता। विनो पा एप और विशप साधन पतग उडाना था। इसका भी धनपतराय मापौर था। घग्यासों मी पान वचारर क्नकौए उड़ाने म वहुत साग ममय ध्यतीत हाटा । मामा दना पन्ने वाधना पतग टूनमिट म भाग नन लिए भी तयारी होती। विश्यबहादुर र साथ वास मिया मान को जाते पौर ननौमों को दबते । निकीमा सूटन के लिए वतहागा भागन। माखें माममानी मोर हाती पौर मन उस भागामी पति को प्रोर जा मन्त गनि स भूमता पतन पी पोर पना जाता । माय-साथ वालवा की एर पूरी मना सग पौर भाडदार बांस लिय उसका स्वागत करने कोदोती। किमी । मपन माग-पीछपी खबर नही। मभी मानो पतग रे साय ही मापा म उठ रह हा जहाँ सव-युष ममता है न मोटर-पार है न ट्राम है न गादिया। पनपतराय (प्रमचर) 4 इस व्यसन पावणन बडे भाई साहब शीपर कहानी म मिलता है। पतग उड़ाने पापोर तो पा मगर पंम पाम न होन पे पयामि नायरमान की प्रापिग स्पिति वहुत पन्छी नहीं थी। प्रषगर पुन पा धमरोषा जूना मैंने बहुत दिनों तर पहना है। जब ता मरे पिता जीवित तब सा उहाने मरे लिए बारह पाने म ज्यादा का जूता भी नहा मुरी। पौर चार पाने गउ म पारापानी नहीं परीग। /पनपतगप को पमानो हम मिान रहती थी। मुझे महीन म सारह मान पोम मानी थी। उन बारहमानों में ग में एबाप भान हर महीन या गाना पा। जिग मुस्म म मैं पा उममें पागे सात साग ५। ये नाग मुभम हार दो पार पसमा सेतामलिए भीमदन म मुझ परीपान होती थी। पर म मा मापी महो। पापीही म मांगता। व युरो सरह मन्नाती। पिता म पहन मोहिम्मत न पो गति माताको या मुझे पार गर मनाती थी।

३ पहला विवाह धनपतराय जन नवी मा म पढेष तो उनकी उम्र पद्रह साल की हागी। मजायपताल ने मार कुटुम्ब को समही भेजा हमा था । मलवे वस पुन म उन्होने पूछा था कि पठाई के लिए स्तिन रुपये माहवार की भावश्यकता होगी। पनपाराम ने कहा पा पान रुपय दे दिया कीजियेगा। प्रभापवलाल ने सोका मस्त हा पू। यह रकम उन दिनो भातम मोले रपय पीस के एक सपा दूध का दो रुपय किताब पहे मानि। नतीजा महानिहाय सा रहता। पनपतराम बनारस के क्वीन काल में दाखिल हुए। सबेरे गुर और घबना लेकर गांव से बनारस मात दिन मर शहर म पाने मोर शाम को पर लोकर गुप्पी के सामने टाट पर बठकर पढ़ते । नवी पास ने वार्षिक इम्तिहान व कुछ दिन पहस प्रायवलाल के समुर ने धनपतराम की शादी का प्रकप क्मिा । पिता ने गुर परीदने क लिए पांच रुपय भेज । पाँच रुपये का एक मन गुरु माया पाची ने गुड को मन म रखा मौर उसन मुहको एक सकोरा रपरर मिट्टी म मन कर दिया। मामा पिता बीमार थे इसलिए पापी वान महोन के लिए मायरे गई। पनपत राय की वार्षिक परीक्षा ननदोष थी इसलिए वह नहीं जा सरते थे। मायक जात समम पापी न पाहा-सा गुह एक हाही में मलग स रख दिया और पनपतराय स महा कि मटा मत सोमना । परन्तु भाभी में जाते ही धनपतराय मधेर माई सपा मित्रो ने गुड का तस से खाना शुभ लिया। रोज काफ-सा गुड उ जाता। जब अजायबलाल घर माय भौर चाची से गुड मांगा नब पता लगा कि बहुत-सा तो हम हा गया है। गुड कसे साया गया इसमा वन प्रमपर न अपनी कहानी हाती को छुट्टी म को रोषा ग स किया है । मह लिषत है- 'सवेरे दूध माय गुरु दोपहर को रारियो साय गुह, शाम को दाना पहला विवाह ये साथ गुड़ रात सा दूध के साथ फिर गुष्ठ । यह तो वाजिब ही सच था। मगर मदरस स पार वार पानी पीन पर माना और दो-एक टुकड़ियाँ निकाल पर खा लना इसकी गुजायश न थी। परन्तु गुड का ऐमा चस्सा पड गया या कि हर वक्त ना सवार रहता। घर में मानामतलव था गुष्ट की शामत माना। एक हफ्ते म हाँडो खरम हो गई। परतु मटका खोलने पर पावन्दी थी। चाची के माने म भभी पौने तीन महीन वानी य ।एर दिन तो रिसी-न रिसी तरह मन किया, सेपिन दूसरे दिन सन्न नहीं रखा जा सरा। मटर पर निगाह पाते ही हो जाता रहा। मटका खोलकर एक हाही गुड निकालनर मटक वो बदरिया पौर प्रण दिया कि इस हांडी को तीन महीने पलाऊगा चन या न चल मैं पलाय जाऊगा। मटमे को मैं मजिल हफ़्तस्वो समझगा जिसे रुस्तम भी न सोम सापा। मैंने मट' में पिडिया को कुछ इस तरह रची नगारर रखा पसे माउ दुकानदार दियासलाई सी डिविया खोलकर रख दत हैं । एज होठी गुड खाली हो जान पर भी मटमा सबरज था। प्रम्मा मो पता ही न सग । मुभावजागी नौरत से माएगी। मगर दिन मोर जमान में कम का शुरू हुई कि क्या पहूँ भोर हर यार फतेह जमान ही के हाथ रहनी। यह गे पगुल जवान पाहडोर पहलवान को नपा रही थी जसे मारी बार को नपाए । उसो जो भासमान में उडता है और फल्कुलफलार मन्सूने बापता है मोर अपने जौम मे फिर उनको भी कुछ नहीं समझता । बार-बार इरादा परसा मिनि भर म पाच मितियो से रयान याऊँगा । लेफ्नि यह इराग गमियो की समग्मा स स्पा दरपा न होता था। घटे-दो घटे स ज्यादा न टिपता। अपने पाप पर हसता नफरीन करता गु को साया रहे हो मगर भग्गात म सारा जिस्म सह जाएगा । गम्या का मरहम लगाए घूमाग । कोई तुम्हारे माप घटना भी पमदन परगा। पस्म माता-इल्म पी मौकी विर की मगर उनरा वहीत्य होता। दूसरा हप्ता सत्म हात होत होही खरम हो गई। उग नि मन को सुन व तुजू म साप वर से प्रापना पो भगवान् या मरा घपल मन मुझे पर गान कर रहा है । मुझे पति दो दिसा मा म रग सर। मुझ महत-हात पा लगाम दो जो इमरे मह भी गमदू। यह सम्बन मुझ मम्मा म पिग्वाने पोर पुरियो मुनवान पर तुला हुमा है। तुम ही मरी रक्षारोता पण सरता हूँ। मरी प्रायो स इम और प्रदरियन मागे धार मामुपों को भी गिरी सस्निपर ने भी कुछ ममाप्रत न पी पोर गुरमी मशाहि मुझ पर गालिय रही यही ता कि मरी ही की मरमियानी सी नौरस पापी। हुम्म इति सहीं निो तीन दिन मतम का मजदूर प्रमचन्द की नाताल हुई घौर में ननिहात गया। मम्मा ने पूधा गुर का मटवा देवा है? पीटे ता नही लग } सील तो नहीं पहुंची। मैंन म को देखने की भी समम गाकर अपनी समातमन्ना का सबूत यि । मम्मा ने मुझे गहरी नगरा से या मोर मरी हमपरवरी मिन म मुझे एम हाही निकाल लेने पी इजाजत दे दी 1 तारी भी परीमि मह प्रच्छी तरह व कर दना। भव तो यहाँ मुझे एक दिन PF एक जुग मालूम होने लगा। चौथे गिन पर पाते हा मैंने पहला काम का पिया यह माय का सोलर हाही भर गुर निकालना मा। एक्वारगी पान पिंडलियो उहा गया। फिर वहीं हारबाजी गई। पर क्या गम है ? मामा की इजाजत मिल गई थी। सयां भय कोतवाल--- पौर हारी माप । माखिर मैंने अपने शिल की कमजोरी से मजबूर होगा मटके को कोठरी के दरवाजे पर कुफल डाला और इसकी कुजी दीवार है एक माट निगाफ में डाल दी। पब स तुम म गह सात हा। इस फि में म कसी निकालन में य मानी थे कि लोन हाय दीवार खो डाली जाए । यह EिRY मुझमे न थी। मगर तीन दिन म ही मन मा पमाना छलर वा मोर इन तीन दिनो में भी मिल की जो हालत थी वह चमान स वाहर है । हिजरा पीरी नी तरफ वारपार गिरता मोर बे-सब निगाहो से दवा और हाम मल भर रह जाता। ई वार पल खटपटाया स्त्रीचा झटके लिए मगर जालिम खद भी म हमसा। पई बार दम गिगाफ पा जायजा लिया। इसम भापकर दवा एक सही से इसकी गहराई का मनाजा भरने की कोीि मगर "मकी नह न मिलो। तबीयत खोई हुई-सी रहती। न म्यान पान म कुछ मजा पा न खेलन दिन मानस मार-बार मिन्स और महियोगायल करने की कोगिरता । मामिर गुरु और किस मरज की दवा है ! मैं इमे फेरे ना देना नहीं पाता ही तो है। क्या प्राज माया का एक माह बाद इसमें कपा मम्माजान न मुमानियत सी है वेशक लक्नि उह मुझे एक जाय पाम म धान रमन का क्या हम है। मगर व माज फह खेलने मत जामो पा परमता पर मम पाडो या तालाव म तरने मस आमोमा चिहियोग लिापम्रा मत लगामा मिलियाँ मत पकडा तो क्या मैं मान कता हूँ? प्राविर मरे भी कुछ हार है या नही' मा कि इस मुग्रामल में क्या अम्मा की मुमानिपत पर अपनी मारमूना मोर साहिताको पात र प्राविर बोये नि मफम ने फतह पाई। मैंने पलस्सुबह एक शाम लार दीवार मानापुर किया । सिंगाफ था ही। सोन म स्याला पिरत न हुई। माघ घरे की मेनन यावार से कोई गज भर मावा मोर सौन इच मोटा वापर , - पहला विवाह छूटकर नीच गिर परा पौर निगाफ की तह म यह कलीद कामयावा पठी हुई भी जम समन्दर की तह म मोती पी सीप पर्ग हो । मैन झटपट इसे निराला और फौरन दरवाजा खोला। मटक स गुह निकालकर हाँडी म भरा और दरवाजा बंद कर दिया। मटप में इस दस्ते बुर से काविले महसास कमी वाक्यिा हो गई थी। हजार तरकीबें माज़माने पर भी इसका खला पुर न हा सका। मगर मन की वार मैंने इस चटोरपन का मम्मा जान की वापसी तक खात्मा पर दन के लिए, कुजी कुए म डाल दी। फिस्सा तवील है । मैंने कस कुक्ल तोड़ा से गुड निकाला भौर मटका खाली हो जाने पर कसे इसे साडा मोर इसके टुकरे रात का कुए में फेंके और अम्मा माइ सो मैंने रसे रो रोकर उनसे मटम मे चोरी जान मी दास्तान कही। यह वयान वरने लगा तो यह वादिया जो मै प्राज लिखने बैठा ह नातमाम रह जाएगा। खर पानी की तयारी हुई। धनपतराय बहुत सा थे। मपम लिए बोस सुपाटे । बरात रामापुर (रमवापुर) गई। ससुर जमीगर थे। रीति-रिवाज र अनुगार दूल्ह स हमी-मजाप हमा। धनपतराय न खुगी स सब रस्मो म हिस्मा लिया। मिगई हर ऊँटगाडी स समही परे। कई रोज मी यात्रा यार पर पहुँच । गाडी म उतरते ही दुसहिन न दूल्ह मा हाथ परकर चलना शुरू पिया। यह गांव की जिगी म एक नई बात थी। सब परित रह गए। पनपतराय झिमन । दुलहिन को ऐसा। उम्र म दूल्हे स वही थी । एफरपा दूमर सरुवा रगपाला। जब मैंने उसकी मूरत गीता मरा सून मूम गया। पिता ने महपाई की हरकत देख ही ली थी। जब उन्हें मालूम हुमा नि दुहिन पिसनी मयूरत है तो पायमलाल न अपनी बीवी से महा 'लालाजी न मरे लहर को कुरा म ढपेस लिया। प्रफमोस मेरा गुमार-सा सहा पोर उसकी यह स्त्री | मैं तो उगती दूसरी पारी का गा। पापी न पहा दमा मागा। सुध ही दिन पा प्रजापवलास जमानियां वापस गये। दुध दिन बाद उनरी बीवी भी वहां गई मोर जाते हुए पनपतराय की बीवी को भी साप सती गई। घ महीने या पत्रायवनान का सवादमा मापनकबाहुपा। गोपी पौर यह को लमहा मर गए । पनपतराय यहाँ पहल मय हो। पनपतराय पीपीवी जान की भी मीठी न थी। यह इन्सान पोर भी पूरा दता है। पतिकी सोनी मांस उसरी महा पटी। हर वन पानी भारोती। कार पानी एकान्त में यह फो शिरायत परती। पदो पाराम पिगने वाली बात थी। दोना मोर स पनातरापको २२ इसमका मजदूर प्रमय व प्राफत । सुबह प ल शहर म भाकर सारा दिन सूल में पटना शाम को खाक छानत हुए गांव वापस माना और इम पर गज की इस वक्-वक का मामना । प्रजापवलान समरणी के मरीज य । बीमार पड़े और लमही पाये । छ महीने बिस्तर पर पड़े रहने के बाद वह परलोक मिधार गए । घर में आमन्नी एक पम को न पी और जो कुछ पूजी थी वह उनकी बीमारी पर खच हो गई थी। इस सरह चलते समय यह अपने पद्रह साल के बेटे जिसके पांव में जूत न घे भोर बन्न पर फटेपथ घ पर अपनी जवान बीवी और उस दो बच्चा मा भार भी छोड़ गए। यों तो पजायवलाल बटे विधारगीर जीवन-पथ पर मा सोलकर चलने वामे मादमी थे परन्त भाखिरी दिना में दूसरी शादी भरखे कोपर खा गए। वन तो गिरे ही छोटी उम्र म लहके की शादी करने से भी गिरा दिया । खर क्वीज पालेज के हेडमास्टर ने पीस मुपाफ पर दी। मगर मंहगाई का जमाना था। स मेर जो थे । कुन का पेट तो पालना था ही। इसका एक ही तरीका था। प्राइवर टयान की जाए । बाम फाटक पर एक लड़के को पड़ाना शुरू किया। पर स पाठ बज निकलते स्पून म पढ़ते मोर वहाँ से तीन वम छुटटी मिलने की बाम फाटर जाते । लक्ष्य का पढाकर छ' बने टयून पम पर लमही वापस लौटते । रात के पाट व घर पहुँचते। खाना सार कुप्पी के मामने बैठकर पढने 1 दिन भर की थकावट हाती। पता नही पद नीद पाजाती। इस हालत में मट्रिक की परीक्षा दी। पास तो हो गए परन्तु दूमरे दर्जे मी कधीज कालज का फायदा या निवेवल पहले दके गरीब लडनो को पीस मुग्राफ की जाती थी इमनिए धतपत राय की फीस मुमाफी का प्रश्न ही न उठता या न कालेज में दाखन मा। और धनपसराम को परमान या एम.ए. पाम पर वरील बनने का। पांव म लोहे की नहीं प्रष्ट धातु की वेड़ियाँ पड़ी हुइ थी भोर मैं चदना चारता था पहार पर। इसस मागे प्रमचन्दी स्वयं सिस्मत है- माग में उसी माल सेंट्रन हिमालेज पुन गया था। मैंने इस नये पालेश म पढनेगा निश्चय किया। प्रिंसिपल ये मि रिवहसन । उन+ मकान पर गया वह पूर हिन्दुस्तानी वेप म थे। कुर्ता प्रौर धोती पहन फर्श पर बटे लिस रह थे। मगर मिजाज को तीन रेग्ना इतना प्रामान नपा। मेरी प्रायना मुनकर-पाधी ही रहने पाया पा धोल म घर पर कालेजरीवातचीत नही करता काल में पायो । सर मालन गया । मलाबात तो हुई पर निराशा पहला विवाह जनर । पीस मुप्राफ न हो मक्ती थी। मव क्या कर ? अगर प्रतिप्टिन । मिफारियों ला सक्ता तागायद मेरी प्राथना पर कुछ विचार होता मक्नि देहाती युवा कापाहर में जानता ही कौन था? रोज घर म चलता कि कही म सिफारिश लाऊँ पर बारह मीन की मशिन मारगर शाम को घर लौट पाता । क्सिस कहूँ? कोई अपना पुछत्तर न था। पई रिना बाद एस सिफारिश मिली। एक ठाकुर इनारायणसिंह हिन्दू कालम की प्रव पकारिणी समा म थ। उनस जाकर रोया। उह मुझ पर दया मा गई । सिफारिशी चिट्ठी । दी। उस समय मेरे मानन की सीमा न पी। स होता हुमा पर पाया। दूसरे दिन प्रिंसिपल से मिलन का गदा था। सकिन घर पहुंचते ही मुझे ज्वर मा गया। मोर दो सप्ताह स पहल न मिला। नीममा मादा पीते-पीते नाक में दम मा गया। एक दिन द्वार पर वठा पानि मरे पुरोहितजी मा गए । मेरी दगा दखबर समाचार पूछा पोर नग्न राता मजार एजह सोट साए और उसे धोकर सात दान पानी मिघ पे साप पिमयार मुझे पिला लिया। उसने जादू मा असर पिया । उपर चरन म पष्ट ही भर की दर पी। इस पौषध ने मानो जागर उमा गना ही दवा दिया। मैंने पनिजी मे यार-बार उस जडी रा नाम पूछा पर उहाँने न बताया।पहा नाम बतानेन स उसमा पसर जाना रहेगा पर महीने बाद मैं फिर मि. रिवहसन से मिला और मितारिनी पिठी निवादा प्रिसिपल ने मेरी सरफ सीव नेत्रों स दबार पूछा इसने निरहा थ बीमार हो गया था। 'या बीमारी थी? में इमप्रन लिए सयार न पा| प्रगर ज्वर बनाता है तो पाप सादर मुझे भूटा समझे। सर मरी ममम म हली-मी चीश पी जिमर किए इतना सम्यो ग्रहाजिरी पनाव पर पी। दो ऐसी बीमारी बनानी पाहिए जो पानीपष्ट माध्यता नपारण दया को भी उभार । उस वक्त मुझे मार ग्मिी बीमारी मा नाम या न पाया । टापुर नारायणसिंह मे जव में मिफ्राणि लिए मिसा पा सो उदोने अपन मिकी पारनी धामारीपीपदी थी। वह शाम मुम पापा गया। मन हा 'पलस्टेिशन पॉप हाट मर! गाहर ने विस्मित हार मरी पोर देगा पौर या प्रब तुम बिनाम मा । - 7 'मोहा।

अलम का मजदूर प्रमचर मच्या प्रवा-पय भरसर लाम्रो । मैंन समभा मेडा पार हुमा । फ़ाम लिया। मानापूरी को मोर पंग कर दिया। साह्य उस समय कोई क्लास ल रह थ । तीन बजे मुझे फाम वापस मिला। उस पर लिखा था- इसका याग्यता की जांच की जाए। यह नई समस्या उपस्थित हुई । मेरा लि वठ गया । अग्रेजी र सिवा पौर किसी विषय म पास हान की मुझे भागा न यो और वीजगणित पौर रखा गणित स ता मरी म्ह वापती थी। जो कुछ यार था वह भी भूल भाल गया या लेकिन दूसरा उपाय ही क्या था ? भाग्य का भरोसा से क्लास म गया मोर अपना फाम दिखाया । प्रोफसर साहब वगाली ५ । अग्रजी पढा रहे थे। वाशिंगटन इविंग का रिप वान विस्त' था। मैं पीच की फ्तार म जाकर बठ गया पौर दो-ही-चार मिनट म मुझे नात हो गया कि प्रोफमर साहब अपन विषय कमाता हैं। पटा समास होन पर उहान मान क पाठ पर मुझसे कई प्रन निए पौर मेर फ्राम पर सन्तोषजनम लिख दिया। दूसरा घटा बीजगणित का या। इसक प्राफसर भी बगाली थ। मैंन अपना काम दिखाया। नई सस्थामा म प्राय वही छान माते हैं जिन्ह कही जगह नहीं मिलती । यहाँ भी यही हान था। क्लासा म प्रयाग्य छात्र भर हुए थे। पहले रल म जो भाया वह भरती हो गया । भूम म साग-पात सभी रुचिकर होता गया। प्रव पेट भर गया था। छात्र चुन-चुनकर लिये जात ५ । इन प्रोफ़मर साहब न गणित म मेरी परीक्षा ली और मैं फेल हो गया। फाम पर गणित के खाने में ममतोषजनक लिख दिया। खर मैं निराग होनर पर तो लौट माया लक्नि पठन की लालसा भी तम बनी हुई थी। पर वठार क्या करता? पिसी तरह गणित को सुधार मोर पालेज म भरती हो जाऊँ यही धुन थी। इसके लिए शहर मे रहना जसरी था। सयोग से एक वकील साहब + सडको को पढ़ाने का काम मिल गया। पांच रुपये वेतन टहरा। मैंने दो रुपये म प्रपनी गुज़र करके तीन रपये घर के स्वच के लिए देने का निश्चय किया। पील साहब के प्रस्तबल में ऊपर एक छोटी-सी सच्ची कोठरी थी । उसम रहन की भाशा ले ली । एक टाट का टुकड़ा विधा लिया। बाजार से एक छोटा-सा सैम्प साया और शहर में रहने लगा। पर से कुछ वमन भी उठा लाया । एक्वात खिचड़ी पका लता मौर बरतन घो मानकर लाइबेरी चला जाता ! गणित तो वहाना या उपयास प्रादि पढा करता । परित रतननाप सरशार मा पिसाना-ए माजा उही दिनों पड़ा। पद्रकाना सन्तनि भी पड़ी। यस्मि बाबू उर्दू मनुवा जितने पुस्तरातय पहला विवाह २५ म मिल सब पद डाल । जिन वकील साहब के लडको को पढ़ाता था उनके सान मरे साथ मट्रिक्युलगन म पढते थे । उही भी सिफारिश से मुझे यह पद मिना था। उनम दोस्ती थी इसलिए जब पारत होती, पस उघार न लिया परता था। वेतन मिलने पर हिमाव हो जाता था। कभी दा रुपय हाथ मात कभी तीन । जिस दिन वेतन के दो-तीन रुपये मिलते मेरा सयम हाथ स निकल जाता । प्यासी तप्पा हलवाई की दुकान की पोर खीच ल जाती । दो तीन पान की मिठाई खार ही उठना । उसी दिन घर जाता मोर गेलाई रुपय दे माता । दूसर दिन स फिर उधार लेना शुरू कर देता लेकिन सभी पभी उधार मांगने में भी सकोच होता मोर निनादिन निराहार व्रत रखना परजाता। म सरह चार-पांच महीने वीत । इस बीच एक बजाज स दो-ढाई रुपये के मपरे लिये थ । रोज उघर स निकलता या। उसे मुझ पर विश्वास हो गया पा। जय महीन-गे-महीने निरल गए और मैं रपय न यका सवा तो मैंने उपर म निरसना ही छोड़ दिया। चकार देकर निकल जाता। तीन साल रे वार उमप रूपय पदापर मका। उसी जमाने म राहर ना एक बेलार मुझस कुछ हिन्दी पढ़न पाया करता था। परी7 साहव र पिछवाडे उसरा मान था। जान मो भया उसमा सगुन सक्यिा था। हम लोग उसे जान लो भया ही पहा परत ५। एक बार मैन उमसे भी माठ माने पम उधार लिय थ। वह पस उसने मुझस मेरे गाँव म पर जाकर पांच साल वार वमूल पिए । मरी पत्र भी पड़ने की इग्छा थी लक्नि दिन दिन निराण होठा जाता था। जी चाहता यापही मौरी पर सू । पर नौररी रम मिलती है और नही मिलती है यह न जानना था। जादिन पे। पास एम सीन थी। दो गिन एक-एक पसा पवना यार आटे पे। मेरे महाजन ने उपार दने स इनसार रल्यिा या या मावा मैं उमम मांग न सरा था। चिराग जस सुप थे। मैं एमपुर मलर पीपान पर एक रिवार बेचन गपा । पश्य: गणित पीजी पी। दा सास हुए सरोगी पी। पब सर उस मर जान से रगे हुए था पर मान पारो पोरस निराहोर मैन उम ऐचना निश्चय पिया। पिताव । रुपयको घी मेक्नि एक पर सौगटीरहपा। मैं पया नगर पान म उतरा तोपारिएरीमती मुंघो वाम सौम्य पुरष ने को उम रान पर बठे ए मुझमे पूपा तुम यही परत हा पाता तोपही नहीं है पर पाया परता हूँ किरही नाम .

कसम का मजदुर प्रमचद
सिखा र गा।
मट्रिमयुलेशन पास हो?
जी हाँ।
नौरी करने की इच्छा तो नहीं है
नौकरी कही मिसती ही नहीं ।
यह मज्जन एक छोट-से सूल म हेडमास्टर ५ । उहें एक सहकारी अध्या
पर की जरूरत थी। पठारह रुपये वतन था। मैंने स्वीकार कर लिया । भठारह
रुपये उस समय मेरी निराशा-व्यथित कल्पना की ऊँची-से ऊपी उखान भी
ऊपर थे। मैं दूसरे दिन हम्मास्टर साहब से मिलने का वादा रखे पला तो
पाय जमीन पर न पडसे थे। यह सन् १८६६ की बात है।

४ अध्यापन-कार्य का आरम्भ चुनार ऐतिहासिक स्थान है। बीसवी गतान प्रारम्भ म यू०पी० की मात्र एरिफार्मेंटरी यही मी थी। इस क्षेत्र म ईसाई बनाने का काम भी पूर्व पोरा पर था। पादरियों न सूल भी चला रखा था। धनपतराय पुनारगन पे इमी मिशन स्कूल म नौकर हुए थे। साथ विजय वहादुर भी थे । खाने-पीन का इन्तजाम विषयवहादुर ही परत । यतन पठारह रपय पा । पाप रेपप टयूगन से मिल जाते । माईमा अधिक भाग पर भेजा जाता। यानी जो बचता यह तुरन्त ही खच हो जाता । मेया भगर एर स्पयरामाता तो चार-छ रोज ही म सक्षम हो जाता। याडिंग हाउस का बनिया उपार दता । रोटियां भी उधार पर पलती पी । इसलिए पतन मितने म पहने ही सप जाता था। हालारि घुनारगढ बनारम स बहुत दूर नहीं है परन्तु पगामा प्रभाव होने पे पारण धनपतराय बहुत बार पर न मा पात । पसों में प्रभाव पा दृष्ान उ हाने स्वय लिया है एक मार की बात है में पर माया । घार पार नि पर रहा । जिस रोज मुझे वापस जाना पा पापी गे पये मांगे। पानीबोनी रपय पर हो गए। गांव म रिममे उधार लता? गालीप वहा पहले मैं और विजयबहादुर चल !ि एप सास पहल मैंने पी मुनिना म ए गरम पोट बनवाया था। मगर गाहा ममी मूती पहन पर उस बड़े जान सणापा। अब इसे शहर मदा पय मरगा। सब में पौर विजयहादुर पुनारगर पर। एट्टी मुरिस म मिलती थी। प्रेममा प्रारम्मिा प्रध्यारन-गायन की भनर तासीधी पहानी म मिमनी है। निगते हैं मुझेप प्राइमरी मरम में जगह मित गा पी यो मरेपास ग्यारह मील पर पा। हमार हेमार माहरा लियो म मा वान रागन था। रातमा गाना गाकर मदरम में पा पान पोरामाष्टर गाव पारपाई पर सार २८ कलम का मगदूर प्रमयद तावा मची अपन खर्राटा म उहें पाया मरत । जव लहको म धौन धप्पा मुम्हा जाता भौर शारगुत भवन लगता तय एकटम पचा नीद म चौक पहले भौर नका को चार तमाचे लगारर फिर स्वप्न का मजा लन लगत । ग्यारह बारह वज रात तक यही ड्रामा हाता रहता यहाँ तक कि नडर नीद स वनरार होकर वही टाट पर सा जाते अप्रल म मालाना इम्तिहान हान वाला था इसलिए जनवरी ही स हाप हर थी । सहकारी अध्यापका को इतनी रियायत थी कि रात की मलासा म उह न बुलाया जाता था। मगर छुट्टी विलकुल न मिलती था । सोमवती अमावस माई मौर निकन गई। वसन्न पाया और चला गया। शिव रात्रि भाई और चली गई। पौर इतवारो का ता जिक्र ही क्या है ! एक नि र निए कौन इतना बडा सफर करता । इससिए कई महीना स मुझे घर जान का मौका न मिला था। मगर भव में मैंने पक्का इराग कर लिया था कि हाली पर जकर घर जागा चाह नौकरी मे हाय ही क्या न धोना पड़। मैंने एक हफ्ता पहल हो स हेडमास्टर माहब को अलटिमटम द लिया रि २० माच को होली की छुट्टी शुभ होगी पौर वन्न १६ को गाम मो रखसत हो नाएगा। हेडमास्टर साहब ने मुझे समभाया कि भभी ला हो। तुम्हें मया मालूम नौकरी क्तिनी मुश्किल स मिलती है पौर वितनी मुशिला स निमती है नौकरी पाना इतना मुश्किल नहीं जितना इमका निभाना। ८ अप्रल का इम्तिहान हान वाला है। तीन चार दिन मरसा व रहा तो बतामा क्तिने न पास हगि ? साल मर की महनत पर पानी फिर जाएगा कि नहीं । मरा कहना माना । इस छुट्टी म न नामो इम्तिहान में या ईस्टर की पार दिन की छुट्टी होगी। मैं एक दिन के लिए भी न रोगा। मैं अपन मोरचे पर स्टा रहा। उपटे र पौर जवाबतलवी-किसी तक का मुझ पर असर न हुआ । १६ को ज्यों ही मदरसा बदहमा मैने हडमास्टर को सलाम भा न किया पौर सुपरे से अपने निवासस्थान पर पता माया । उर्ह सलाम करने जाता सा वह एक्-न-एव काम निकालकर मुझे रोज दस ! रजिस्टर म फीम का जार निमालते जामा । पोसत हाजिरी लगाने जाम)। लडो की अभ्यास भी पापियां इमरठी करके उनमें सुधार कर दा भोर तारीख मारिवाल दो। जस पह परा पाखिरी सफर है और मुझे हिलगी रे सारे काम भी खत्म करने पाहिए। मकान पर भाकर मैंन मापट अपनी कितावा का बुझ्धा उटापा । अपना हा-मा लिहाफ घ पर रखा पौर सेगन पर चल पडा। गाडा पांच बार पांच मिनट पर जाती थी। मगरम सी घडी हाजिरी में वान हमेगा प्रध्यापन-कायका प्रारम्भ ૨૯ प्राधा घटा तेद्र मौर रवानगी वक्त प्राधा घटा सुस्त रहती थी। चार बज मारसा वन्द हुप्रा था। मर मयाल म स्टयन पर पहुंचने मकाफी वक्त था । फिर भी मुमाफिरा को गाडी की तरफ म प्राय जो हर लगा रहता है और जो घडी हाय म होने पर पौर गाडी का वक्त मही मालूम होन पर भी दूर स पिमी गाडी को गडगडाहट या सीटो सुनपर कटमो को तेज मोर दिन को डोला बाला कर लिया करता है वह मुझे भी लगा हुआ था। वितावों का युषचा भारी था। इस पर मय पर निहाफ । वार वार हाय बालता था पोर लपका चना जाता था। स्टशन दो पलांग स नज़र माया। सिगनल टाउन था। मेरी हिम्मत भी इस सिगनल पी तरह कमजोर हो गई। रिल जर नहर से एर सो पदम पागे गोडा मगर यह निरागा की हिम्मत थी। मेरे देखते-गवत गाहो पाई। एर मिनट ठहरो मोर रवाना हो गई। मदरस की घडी प्रतिदिन से भी साल मुस्त थी। धनपतराय ने मिशन स्कूल म नौकरी पर तो ली थी-और वही मिलती ही नहीं थी-परन्तु यहाँ वहुन वा न थ। इसका एक कारण तो यह पा नि माय ममाज के मनुगयी प्रमपन्द ईसाई पारियो द्वारा प्रचार' को देखकर दुखी हाते थे। उनका विचार था कि ईसाई पारियों का प्रचार हिंदू समाज लिए पातर होगा। बहुत दिन नहीं गुजरन पाए पनि धनपतराय न गवनमेंट रिस्ट्रिक्ट सूल बहराइच में नौकरी का प्रबंध पर लिया और २ जुलाई १९०० सो उस स्कम म पाच प्राध्यापक भर्ती हुए। दाताई महीन वा ही पनपतराय पासवाला प्रतापगर पोहुमा । गवनमेंट स्पून प्रतापगढ़ म उनका काम सन्तोपजनर ही रहा हागा यानि गुमाई १६०२ म उ प्रध्यापकापी दृनिंग म एप योग पनिए इलाहाया भेजा गया। सार प्रान ममवल यही एक ऐमी संस्था पी जो मध्यापाको दृनिंग देती थी। यही मे पनपतराय न दूनियर सर्टिपिका टीपर'मी मन- मी। प्रिमिपस सपा छात्रापापर उनम मुरा। सन (रिप्लोमा) पर निगा पानि गरिणत पडान भी पाग्यता नहा रणसे बातचन मन्नोपना है भोर समय र पाबर है। पनपतराय न अपना नाम गूब मनन सौर पच्ची नगरिया। पनपतरायाम म उना प्रिगि श्री.सो.पार विशपनया प्रेमना गने गार में मि! झपक मिनी मामा मात ३० लिम का मजदूर प्रमपद प्रस न ५ । ट्रनिंग खत्म कर अब धनपतराय प्रतापगर पहुँचे नव जल्दी ही प्रिसिपल साहव न उर मॉडल स्कूल का हेडमास्टर नियुक्त करन के लिए इलाहाराट बुला लिया। इस पद पर नियुक्ति स उन्ह दस रपय माह्यार का विशप एलाउस भी मिलना शुरू हुमा । यही से तीन महान वाद धनपतराय का तयाला कानपुर गवनमट स्कूल का हुमा । कानपुर के जीवन का जिक्र करने मे पहले हम धनपतराय के कालेज के जीवन के बारे म कुछ कहना प्रावश्यक जान पड़ता है। धनपतराय में एक सहपाठी लाल कृष्ण ने उनके बारे म एक सस्मरणास्मा लेस लिखा है। इस सख स धनपतराय । इलाहाबाद जीवन पर काफी प्रका पडता है। वह लिखत हैं- उस जमाने में मैं ट्रनिंग कालेज के सीनियर मलास म पड़ता था। हम मब लोग मर्याद पध्यापक मॉडल स्कूल मालेस होस्टल म रहते थे। इसको माध्यारिमन मारर्पण समझना चाहिए कि मेरा मुशी (धनपतराय) साहब से खासतौर पर परिचय हुमा मौर बहुत जल दास्ताना तमाल्लुकात हो गए। (धनपतराय) बहुत गरतमन्द व जहीन थे। भारम्भ हो स किता। परन का शौक था। एक रोज मरे साप मिस्टर सचिन- सिहा भनिररी सेक्रटरी मायस्थ पाठगाला से जिन्हे मैं पहले से जानता पा भेंट की ताकि कभी भी उन पुस्तकालय स लाभ उठात रहे । एक बार कही से मौलवा जकाउल्ला साहब देहलवी का लिखा भारतीय "तिहास ले माए मोर पारे ही दिनों में इसकी तीन या पार मोटी मोटी जिलों को खरम पर साला पौर इम ध्यान से पढ़ा जसे इस पर कोई समालोचना लिखनी हो। बाद धनपतराय छोट कर क दुवल-पतल पादमी थे मगर में मजबूत । पना सानने पर उगलिया को माडना साधारण मामी के लिए पासान न पा। उनका पहनावा सादा पा। मचान-पायजामा या म्वुल गले का नम्बा कोट पहनते थे। सम्भव है कि कमी पतलून भी पहनते हा परन्तु याद नहीं पहना। उस जमाने में मिली फगन का भृत लोगा के सिर इतना पयाग सवार न पा। सिर पर हिदुस्तानी टोपी या पगडी हुमा करती थी। जिस तरह उनका सहन रहन सीधा साना था उमी सरह उनकी मादसे मौर चरित्र भी सीधा सच्चा और बनावटीपन स खाली था। प्राधाज ऊँची थी। वामस्वाह किसी से दवन पाल न ५। हास्टर म लग्न झगडने का तो जिक्र ही मया प्रापका कभी किसी स सहल या सज्जनता के पर बातचीत करत हुए भी नहीं देखा गया । नौकरी के साथ भी मच्छी तरह बर्ताव करत ये। इससे स्पष्ट है कि यह क्निने हसमुख समझौता करने वाल तथा हमाद परन्तु स्वाभिमानी पुरुष थे । ।

प्रध्यापन कायाभारम्भ पढ़त पित समय अपना कमरा बन्द कर दिया परत थ मोर भवना क ममम दिल सोनार सफरोह करत । प्रापको प्रौर (मत) वादू गिरजाकिनार माहब प्रमिस्टेण्ट कमि नर सिंचाई व द्वारा हमारा एक छोटा-सा लाफिंग क्लव बन गया था। इसकी रोजाना मीटिंग मेर हो क्मर म हुमा करती थी। सम एक्-दो पौर साहब भी थ बहरहाल इनम सभी हसने वाल थ। मगर धनपत राय गजव परते थे। जव हसत तो सब हसते और वहम हा-पर-बहरहा लगाते पर जाते। इसी वजह से हम लोग खासकर मैं पौर गिरिजापितार उनका बम्बूब कहा करते थ। सम्भव है यह नाम मेरा ही दिया हुमा हो। प्राय इमी नाम स खतो-क्तिावत हुपा करती थी। यहाँ एक पौर यात का उल्लष परना मावश्यक है। धनपतराय ने इलाहायर यूनिवसिटी से इसी साल उदू तथा हि म स्पेशल व फ्युलर इम्तिहान भी पास पिया। इसराय यह हुमा दि १६०४ तर उहाने मच्छी हिदी भी लिखनी शुरू कर दी थी। जिन लोगो न यह कहा है कि प्रमचन्द उदू र पपौर उर्द म हिन्दी म माए उनका वक्तव्य सौ प्रतिशत ठौर नहीं है। पनपतराय का गुरु स हिन्दी से प्रम पा । इसका एक कारण तो शायद यह था कि यह पाय समान स ब प्रभावित थे। उस युग म प्राय समाज न दे। म एक नई पतना ला दी थी। स्वराज्यपी मोर लोगा को प्ररणा दन म ता इस सस्था पा यहा हाप पाही। इस सस्था ने रूढिवार से टकार ली स्त्रिया मो पद से मुक्त पिया उनकी शिक्षा का प्रचार पिया मोर हिनी को राष्ट्र मापा मनाने का रास्ता निपनाया। धनपतराय (प्रमच ) की प्रारम्भिक पिसागरा म भी हिन्दी का राष्ट्रभाषा पनान मम्ब ध म जगह जगह हवाल मिलत है। परन्तु हिदीस प्रम हात हुए भी प्रमचन्द पो हिदी म पिन गरि भवगर नही मिला था। मरवारी भाषा उन पिना उ धीमापस्य परिवारा म जहाँ उनम ई मित्र भी य उ हो मा प्रचार था। उत्तर प्रदश र मिन पाना या देहाता म जहाँ व पात ५ वही मी उदूरा पनती थी। उम क्षत्र मजा मासिक पत्रिका सोरप्रिय पीव भी उ म ही थी।

५ साहित्यिक क्षेत्र में प्रवेश पनपतराय ने मय और महाँ सिखना प्रारम्भ किया इसके बारे में निश्चित रूप से कुछ कहना बहन कठिन है। इस मम्बघ म यह भी बतलाना पावापर है कि स्वय प्रेमच" ने भिन भिन्न स्थानो पर भिन्न तिथियों दी है। इस अलावा उनले प्रकाशन के बारे म भी उनके वपना मे बड़ी गलतियां हैं। एक पत्र' म प्रमद ने लिखा पा लिटरेरी डिरगी १६०१ मे गुरू को। रिमाला जमाना म लिखता रहा । ई साल तक मुतपरिष मजामीन लिम् । १६ ४ म एर हिन्दी नावन प्रमा लिखकर इण्डियन प्रसम शाया पराया। एक दूसरे पत्र मनिम्बा हमखुर्मा भो-हम-मवाव' जिसका हिन्दी अनुवाद प्रमा' के नाम से छपा घ विना गालिवन १६० की तसानीफ है। परवगै १६२ क हम म प्रमचन्द न लिसा-- उप यास तो मन १६ १ ही म लिखना शुरु किया। मेरा एक उपन्याम १६०२ में निफ्ला पौर दूसरा १६ म । ऊपर लिखी पक्तियो स एसा सगता है कि प्रमचर ने निव य लिखना काम १६ या १९०१ में प्रारम्भ किया और उसी समय उप पास भी सिखन भारम्म पिए । यह ठीक नही है। जमाना' का पहला परषा विषद्रतलाल वमन ने येसरी प्रस बरेली से १६ ३ म निकाला। अमन साल एक खानगो हादिमा से इस कदर मुतपस्सिर हुए मि सीन महीने के लिए जमाना की इशारत दयानारायण निगम क मुपुर्य पर गम गलत करने के लिए सर चौर सफर में मागूल हो गए और फिर अपनी खिमत पर वापस न हुए। इसरे कुछ वाट ही दयानारायण निगम ने परचे को पानपुर से निकालना शुरू किया मयादि जमाना १६ ३५ पाखिरी महीन म निपला, इसलिए प्रेमचन्द की सवम पहली रचनामा का त्यानारायण निगम को लिखा गया एक पत्र जिसे प्रेमचर ने १७७२६ को निरा। २ इम्तियान मलो दाम को लिग्ना जनवरी १९ २१ पत्र।

साहिरियक क्षत्र मे प्रवेश इसमें प्रकाशित होन मा प्रश्न ही नहीं उठता। उस समय के दूसरे परचे प्रव उपल ध नहीं हैं। इसलिए उनक मुतपरिक मज़ामीन ना पता नहीं चलता। पारिवार के रेवल ना लवा तया एक नावल मा पता लग सका है। ये वनारस ये साप्ताहिक मावाज खल्ल म छपे थे। लेख का विषय या मोलियर सामवेल। धनपतराय का पहला नावल भगवर १९०३ स लेकर फरवरी १९०५ तक बरावर विपता म यपता रहा। इसना गोपर या असरारे माविद (पुजारी) मा रहस्य और ससक मा नाम था धनपतराय उप नवावराय भलाहावादी मनाहावादी का प्रयोग महत्वपूर्ण है । य रचनाए शायद सेण्टल द्रनिग मालज इलाहावार से ही प्रकाशनाय भजी गई होगी। मसरारे माविक पारे म पुछ रहने स पहन हम यह बतलाना प्रादयर मममत हैं कि रतननाथ सरशार की मृत्यु १६०२ म हुई थी। सम्भव है प्रमयद का यह विचार भी माया हामि सरतार में बार उनी जगह साली है पौर वह स्वयं उसकी पूर्ति कर सकते हैं । यह मसरार माविद जो प्रमच पा पहला प्रमाणित उपयास है सरणार नावलो व तरोष पर ही लिसा गया है । इसरी विशेषता यह है कि इसम नागी पण्डो पर व्यग्य है । उपयास म पारम्भ म ही एक पन्या बीबीजान पहा यशानन्द कमरे म गजलें गाती है। मित्र पितारी भी घटे हैं। यह भी बीवीजान पर मोहित है । परतु मोवी जान यशोदानन्द की पोर मारपित है। उनसे कुछ इनाम मी पाया करती है। Tण्डा योगन भी बीवीमान स प्यार का प्रशन परत हैं। यह वीबीजान पूपते हैं- क्या वोमा लने मी इजाजत है? बीबीजान तमाचा रमीद ग्मी है और यगोदान र घर स भाग निरसती है। पणा योगन, इम क्षत्र म महारयो है। इमरा प्रमाण है प्रयमी रामाली स सम्बम्य । रामपली वनारम म अपन पिता पर पर रहती है। पनि म यही नहीं जाती। यगान' म उमरी मागनाई है। यह उनप पाम पापर (मार भाग म) पमन परती है । पराव पोरर पर पढेक्ती है और जब यह दपती है दि उमरा पनि उस लिवा ल जान पनि प्रापा है मो व बीमारीप बहान स प्रपन नग मोटाती है। नारा पनि उमा निम्नर पाम पठा गया है। राय सी बाबू स उम मा जाती है । परतु मम पामीको पुछ समझ म नहीं पाता। भगस नि रामासी मो पनि र नहीं जाना पाहतो पार मपाती है रिउमर गहने । समा पारीहा पा है। पर मोर है और इमो ने म यह पनिर पर नहीं जाती। राम पोनदरे पास पपता है जो अपनी पटिनाप्यामा भीषण असम का मगदूर प्रेमघर चिन समश्नी को बताते हैं। यीशेजान पर पहुंचनी है ना दगती है कि उसके गुमाइन भूग है। यह बतलाता है कि भिलोपीनाथ न काम विगार पिया वरना यह कुछ-न-कुछ लेर माती। पर तु वहाँ ता प्रफीमची भूस भाडा तथा गमारता की भूल वेज हाती जा रही है । नीजान के गल का नक्सा हार लेकर (रतननाम मरणार मोजी की तरह) पचन इत्यानिहासपर बाजार म वचन जात है। पिलारीनाथ की मद" स व नकली हार का एक अमीरजादे को प्रसनी हार भाव बघत है। प्राहा इस तलाम है कि किसी पुराने घरान की माला मिल । त्रिलोकीनाय चुपक सधपनी सहायता वदल म मुनाफ का भाषा हिस्सा मांगता है। उप याम सरशार के उप यासों की तरह होला-बाला है। जोर दातालाप पर प्राधारित है। करक्टर भी सरलार क खोजी भोर राधी के मांच महल हैं। भश्लीलता के समान भी हैं। रामकली सवल परसटर की झसर हम धनपतराय मगल उपन्यास में मिलती है। बीमी पानाम्नी के पारम्भ म दा महत्वपूण उदू मासिर पत्र निकल थे- मखमन' पौर जमाना । मखजन + सम्पाप ये दाब पन्दुर फारि मोर जमाना क मुखी दयानारायण नियम। मखजन का दावा था कि इसन पजावी ममनमाना का उदू लिखन का गसिग्दलाया ( मह तो माफ है कि इसम लिखत प्राय मुमसमान ही थे और उनम भी मधिकतर पभाधी मुसलमान । परन्तु जमाना' मा का विस्तृत पा । इसम भारतवप के विभिन प्रान्ता के सबक लिमये थे- हिन्दू और ममसमान दोना ही। उमाना मन्यादर न पत्र का स्तर प्रमा ऊचा किया मोर कुष्ठ मुसलमान लसा जाप-बीम साल मे लिखना छाड वठेप वे भी इसम लिवन लगे । जमाना का महत्व एक और दृष्टि से भी पा। यह मो साहित्यिक मालाचना भौर मामयिक घटनामो पर टिप्पणी । साहित्यिा मालोचना को ला इमन नीव ही डाली। पचरका भी इस वाय म यहा हाथ था। जमाना म धनपतराय भी मो पहली रचना थपी वह हकीम परहम र नावल कृपण घर की माताधना दी। यह परमरी १६ ५६ कमाना में धपी (उस समय धनपतराप इलाहाराट म ट्रेनिंग लकर प्रतापगड सौर सुष प। इमा मेसक सम्पय मसिस गए एक पत्र म निगम लिपा में बडे निया म मुन्ततिर पापने मरा नावस अभी तर पढ़ा या नही। जवाब म सरपराम फरमाइय। यह पत्र ३ जनवरी १९०२ का लिसा हमा है।

हात्या क्षत्रम प्रषश जिस उपयास मी मार सक्त है वह गायर हम सर्मा मा हम सदाव रमर उपलग्य प्रथम संस्करण पर काइ तारीख नहीं है। प्रस का नाम भा नहीं छपा है । पुस्तक का पहला विमापन दिसम्बर १९०६ के जमाना म मिलता है। इसम लिखा है- नाजरीन जमाना म जिन हजरात न नावन कृष्ण कवर पर मिस्टर नवावराय की पुरजोर तनकोट गौर से पढी है व जानत हैं कि मिस्टर मौमूफ उमूले नावल निगारी से रिस हद तक वाकिफ है। इस हालत म उन पनम स निकला हुमा नावल किन खूबिया का मजमुमा होगा इमरी तारीह की चन्दा जरूरत नही । बहरफ यह नावल हम खुर्मा मो हम सवाव' मिस्टर मौसूफ पी ताजा और मछूती तसनीफ है जो हाल ही म पाया हुई है। किस्स भी दिलघम्पी के साथ मुनिफ की जादूनिगारियां बहुत बड़ी तारीफ की मुस्तहिर हैं। इस पाया ये नावल उदू म बहुत कम शाया हुए है । हम पाहत हैं नि माम दायमीन एक-एक जि मगार लुत्फ उठाए पौर मुमन्निफ की दिमागसोडी तवाई पोर वसीह मालूमात की दाद दें। फी जिल्द बारह मान डीमत पर मनपर अमाना कानपुर से फौरन तस्य परन पर मिन माता है। 'हम पर्मा मा हम सवार उदू म घपन कुछ ही समय वा हिरी म भी छपा। इसका प्रपम संस्करण इण्डियन प्रस जाहाबार से १९०७ म छपा। मूल्य दस माने पा। इस संस्करण पर पुस्तर मा नाम इस प्रकार है प्रमा भद दो सम्मियोगा विवाद सया नाम है बावू नवावराय मनारमी दस पुत्तर म एक वितप्ति भी एपी है जिमम लिया है - विन्ति होरि यह प्रमा उप पाग इण्डियन प्रम प्रयागमापार म छपार प्रकाशित पिया गया है । इसलिए इस पोई पपान का मान्म न पर पारि मैन इसरा मर्वाधिकार (पापीरादर) इण्डियन प्रस का गौप लिया है-नयाद राय प्रपती प्रमा यास्तव म हमसर्मा मा हमसवार महिनी अनुवा' है । दाना म ५६१२१ पत्र में पनपतराव ने शमनियारीमान रिग पिर नामर प्रेम समन में पाया। निगम मार ने नियालि इमर माप प्रमाने दारापनसमामा नबर र प्रम में rrn रमा मानी।

३४ प्रतम का मजदूर प्रमपद चित्र रामकली को बताते है । बावीमान घर पहुँचती है तो देखती है कि उस गुमाश्त भूमे हैं। वह बतलाता है कि त्रिलोकीनाप ने काम विगाड दिया धरना वह कुछ न कुछ लेकर माती। परन्तु यहाँ तो प्रफीमची भूसे भाँडा तथा गुमाश्ता की भूम्प तप हाती जा रही है । मोवीमान के गले का नकली हार नकर (रतननाथ सरगार र योगी की तरह) भचक्न इत्यादि कालपर बाजार म बचन जाते हैं। निलोकीनाथ की मदद से वे नका हार को एक प्रमीरजादे को असली हार के भाव वेचत है। ग्राहक इस तनाग म है कि किसी पुराने घराने की माला मिल । पिलाकीनाथ पुपके स अपनी सहायता से बदने म मुनाफ मा साधा हिस्सा मांगता है। उप यास सरशार के उपन्यासों की तरह ढीला-ढाता है। जोर वार्तालाप पर पाधारित है। फ्रक्टर भी सरसार के बाजी पोर रावी के संधेि म उसे हैं। प्रश्लीलता के सक्त भी हैं। रामश्नी व पचल करमटर की झलक हमें धनपतराय क मगम उप याम म मिलती है। बीसवी ताब्दी के प्रारम्भ मे दो महत्वपूण उदू मासिक पत्र निकल थे- मखजन' और अमाना । मखपन सम्पादक थे पार पन्दुन कादिर पौर जमाना' फ मुची न्यानारायण नियम । मसजन का दावा था कि इसन पजाबी मुसलमानो को उर्दू निस्सन का ढंग सिखलाया। यह तो माफ़ है कि इसम लिखत प्राय मुसलमान ही थे मोर उनमे भी अधिकतर पजायी मुसलमान । परन्तु जमाना या क्षन विस्तृत था । इसमें भारतदप में विभिन्न प्रान्ता के लेखक लिखते थे-- हिंदू मौर ममलमान दोनो ही। जमाना के सम्पादक न पत्र का स्तर प्रमा ऊंचा किण और कुछ मुसलमान लखक जा पद्रह-बीम माल से निखना छोर यठे थ ये भी इसम लिखने लगे। जमाना का महत्त्व एक और दृष्टि से भी था। यह थी साहित्यिक मालाधना और सामयिक घटनामों पर टिप्पणी । साहित्यिा मालोचना को ना इमन नीय ही डाली। प्रमधना भी इस काय मचा हाथ था। जमाना म धनपतराय की जो पहनी रचना छपी वह हकीम वरहम + नावल कृपण कंवर की मालोचना थी। यह फरवरी १९०५ के जमाना में छपी (उस समय घनपतराय इलाहावा- स इनिंग लकर प्रतापगढ़ लौट चुक ये । इसी सेब क सम्बघ में लिखे गए एक पन म निगम को लिला में वरे इतियाक स मुन्तज़िर हमि मापन मरा नावल अभी तक पढ़ा या नहीं। जवाब में सरफराज फरमाय 1 यह पत्र ३० जनवरी १९०५ का लिखा हमा है।

साहित्यिक क्षत्र मे प्रवश जिस उप पास की भोर सकत है यह गायट हम सर्मा प्रा हम सवाय ' हो । इमर उपल ध प्रथम सस्करण पर काई ताराख नहीं है। प्रस ना नाम भा नही छपा है। पुस्तक का पहला विनापन दिसम्बर १९०६ ५ जमाना म मिलता है। इसम लिया है - नाजरीन जमाना म जिन हज़रात न नावल कृपा फंवर पर मिस्टर नवापराय की पुरजार सनकोट गौर स पढी है व जानत हैं मि मिस्टर मौमूफ उसूले नावलनिगारी से किस हद तक पाकिफ है। इस हालत म उनके मम स निक्ला हुमा नावल किन यूवियो का मजमुमा हागा इसकी तारीह की चना जबरत नहीं। वहररफ यह नायल 'हम वर्मा मो हम सवाव' मिस्टर मौसूप की ताजा पोर अछूती तसनीफ है जो हाल ही म शाया हुई है। किस्से भी रिलचम्पी न साथ मुसा नफ सी जादूनिगारियां बहुत बडी तारीफ की मुस्तहिक हैं। इस पाया र नावल उदू म यहुत कम गाया हुए है । हम पाहते हैं कि भाम पायकोन एक्-एव जिल्ट मगारर लुत्फ उठाएं पौर मुमनिफ की रिमागसासी तपाई मौर यसीह मासूमात की गद दें। फी जिला वारह पान कीमत पर मनजर उमाना कानपुर स फौरन तल्व पग्न पर मिल मरता है। हम खमा मा हम सवाद उदू म छपन व कुछ ही समय बाद हिती म भी छपा। इसरा प्रपम सस्करण इण्डियन प्रस इलाहाबाद से १९०७ म पा । मूल्य दस मान था । इम संस्करण पर पुस्तर या नाम इस प्रकार है प्रमा प्रदि दो समियो । विवाह सत्ता का नाम है बाबू नवापराप बनारमी हरा पुस्तर म एस विनप्ति भी षी है जिसम लिया है- विनिहारि यह प्रमा उपयाग इण्डियन प्रम प्रयाग मी मार म पारर प्रकाशित पिया गया है । इसलिए इसे साई पान का माहम न पर पाकि मन इसका मर्वाधिकार (पापीरा) इण्डियन प्रम को गौप दिया है-नयाव रायपपर्ता। प्रमा यारतव म हमवर्मा पा हमसवाव दाहिनी मनुवा है। दाना म ११२१ पत्र में बननगर नमनियारीमानको निगपाकि नाम नबर मनाया।निगममा ने निगरि म माय प्रमार पना ने पनागगनबर शेर मर्म | R एमपर मानस फ्लम मजदूर प्रेमचर मतर नहीं के बराबर है। हो प्रमा का अन्त एष तुलसीदास के दोहे से होता है जहि क जहि पर सत्य सनेहू सो तेहि मिनत न कछु म देहू । जब हम खुर्मा मो हम सवाव तथा इसका अनुवाद प्रमा' प्रकाशित हुए तब धनपतराय कानपुर म मास्टर थे। उनके दयानारायण निगम को लिखे पत्रा तथा प्रेमा के इण्डियन प्रेस इलाहावाद से प्रकाशित होन से ऐसा लगता है निदानो पुस्तका क लेखन तथा प्रकारान का प्रब घ गाय- तभी हुमा हो जय धनपतराय इलाहाबाद में पढते य या हहमास्टर (फर्स्ट टीचर) थे अर्थात् यह माय १४ ५ १९०५ तक हो चुका था जय घनपतराय की नियुक्ति कानपुर के दिस्ट्रिक्ट स्कूल में हुई। घनपतराय (प्रमचन्द) के उन निों के जीवन की झलक कानपुर से प्रकाशित होने वाल एक पत्र में मिलती है। यह शायद मप्रल-मई १९.६ मी गरमा की छुटिटया का जिक्र है जब धनपतराय अपने घर लमही म गये। उन्होन निगम को लिखा था गरमी को कुछ कफ्यित न पूछिय । कप्लान को नो माहवे मकान हू भोर खदा के फजल से मकान भी सारे गांव का महसूद है । मगर रह्न काबिल एफ कमरा भी नहीं। काठे पर भाग बरमती है । वठा पार पसीना चोटो से एड़ी को पला । नीच मा कमरा सब गला (परेशान)। क्सिी म वल बघता है किसी म उपले अमा हैं कही भनाज फा र है किसी मे जात धसी मोसली मूसली घगरा जुलूस फर्मा हैं । कोई वठ कहाँ ! सोये पहा ! मजदूरन अनाज के घर में एक चारपाई की जगह निकालता है। उस पर दिन रात पढा रहता है। मस घूमने कही जाऊ ? इस गरमी म सा पढना कैमा निवना ! सुबह के वक्त घटा प्राधा पटा परम गर्दानी कर लेता हूँ। पाकी रात दिन मैं हूँ मौर धारपाई । सुलकार दम है मगर नीर भी कुछ मेरे घर फी सौंडी नहीं । उस पर सरद्द द अलग । कहाँ रसी-मजाक म दिन कटतः पा कहाँ चुपकी मिठाई या गूंगे का गुड खाकर घठना पडता है । प्रजय लीक म जान मुनिला है। भाई अल्ली में छुटी स्टै और फिर यारो के जलसे मौर पहपह कहकहे हा । काई धीम गिन से पयादा गुजरे मगर मम ले लो जो जवान स प्यारा पर घबूक एक बार भी निकाना हो। इम पत्र को साहित्यिक छटा कित करने योग्य है। जमाना से धनपतराय का सम्बध दिन ब दिन घनिष्ठ होता जा रहा था । १ अगस्त १६ ५ म मलिका विष्टारिया पर एक मेख छपा मक्तूबर १९०५ म गमा मानसिंह पर पोर नवम्बर दिसम्बर १६ ५ म मानरबल गोपालकृष्ण गोखन पर । शुरू म उन्हें निवम्घ लिखने का विशेष गौक न या परतु नया साहिस्पिा क्षत्र में प्रवेश दयानारायण निगम स मित्रता हार्न के कारण उहें कसमभिसाई भी करनी पही। उमाना की जड़ कुछ मजबूत हो चुकी थी। निगम तया 'जमाना' दूसर लेखका स मित्रता हुई मौर एक प्रकार स एक माना मसव बन गया । नौवराय नजर प्यारलाल पारि मेरठी' इत्यादि इस ग्रुप म यकभी कभी मामा विजयवहादुर भी माय होत । प्रतिदिन शाम को बैठक हाती और दुनिया भर मी धाता पर शतचीत हाती । हसी ए हाह मुनाई दत । एक पार पडोस म मिसी की छत पर बट शपE का 'लागि माग , का रिकार्ड बज रहा था। कुछ दर ता धनपतराय मुपके रठे रह फिर कहने मग लीलिए मै भी इसा हाहम इसका नाम देता हूँ। और उमर साय-साय हंसने लगे। उही रिनो धनपतराम ने एम लख लिखा था, जिसरशीपक है दमी मगिया का योकर परोग हा सरता है ? निगम लिखत हैं, बाज महम वनको भी उमाना लिए सिम्ही जो भी उनके नाम से घोर कमी विना नाम दायाहर। इना पसाया 'नवावराय सामयिक विषया पर भी बहुत दुध लिपत । उनका घटना मुशिल है । १६०५ तमा १९०६ क प्रकों में यो सामयित पटनामा (रफ्तार जमाना) विषय इस प्रकार ५ सान' कौमी जनस, ब्रिटेन में नई सरकार' स्पटगी मस्ट मिस्टर म मास नरसीमेवपाल रामने की उम्मो सरम , स का हालत गिरगू 'फारस म सल्फ गवनमट की मांग' हिस्तान म हरताल मिस म इगलिस्तान निसाफ बदामह हिलस्वान पर पासियामण्ट म यहस' समसीमे बगाल शिमा कप्ता म जलसा इस्पासिामयिक विषयों पर विपतया पर राष्ट्रीय विषयो पर लियन का नवावराय को बहुत शौर था। 'जमाना तथा उस सम्पा दयानारायण निगम स उनमा कितनी घनिष्ठ मित्रता सम्बन्ध होगा, इसरा मक्त हमें उन १६० र लिसे एप पत्र में मिलता है। इसम लिया-- रूपये प्रापने रवाना पिय । पहेच । सत्त म हो मुमत हासिम हुई। सीन बार सरम न पड़ा होगा । तिा पौर परागर । ए मुमल्ला हस्व मामूस मुस्त है । 'जमाना को धपाई पर की दोएर परमून मी न थी। मपना मोर कानपुर को किताबत म साफ पार पाहा है। भाई माई सिपाई एच को नहीं मिटा सकी। मार पा पर्वा निास तो य सब बागुजारिन मुप्राफी हैं। अगर देर ही में निरासना है तो अपनी गविण म यो सट्टा सगायें ? जून परषा निस्सत ही दम जिस्मय पार-पौष प्रबरीपापी रवाना धिप । उसक पपीही मानिद रवाना फहरिस्त पार पाग पहुँको होगी। मापद - ܫܝ लम का मजदूर प्रमवाद - इतमीनान र माविन भी हो। जी तो चाहता था कि पचास वरीनारा नाम एकवारगी लिखता मगर फिलहाल सोलह ही पर पनामत की। उनके नाम परष भेन दीजिए मफर गाजीपुर माजमगढ यलिया गोरखपुर भोर बनारस का करूगा । बनारम ही म पह-बीस गरीदार हो जाएंगे। जरा तवीयत ठिान हो जाए तो पाम शुरू करें। इसी पत्र में भाग लिगते हैं- मघवीच म चाहने वाले मौर होगे । यहाँ तो जब एक बार बाह पक्ही तो जिन्दगी पार लगा दी। नौवतराय न पायें क्या अहाँ मुर्गा न होगा वही मुबह न होगी? एरीटोरियल में सव पर लगा । सतो कितायत जो मुमामना की है वह मैं मर सू गा। सास एमीटर की तवज्जोह फे पाविल जो सतूत होंगे वह खिदमते गरीफ म पेश होंगे। धौर काम करने का बटोबस्त होना जरूरी है। लवल छपा लेंगे। माने का वक्त पाएगा तो मावरा हो रहेगा। जान पाढे म न डालो। हिम्मत मरण मदद सुदा। हिम्मते एडीटरान मदरे दोस्तान । हो यह ऐलान करना जरी होगा कि नवावराय स्टाफ में दाखिल हो गए बस । जमाना मे जून १६०६२ मय में विनप्ति मिलती है जिसके अनु सार उमाना २०डिटोरियस स्टाफ म प्रतावा नायिल दीगर हजरात में जमाना ५ मपवून मजमून निगार नवावराय भी मुस्तक्लि तौर पर शामिल हो गया है। उद पत्रकारिता में प्रमच की शीघ्र ही इतनी धार बठ गई कि इण्डियन प्रस इलाहाबाद के मालिक श्री चितामगि घोप (जो सरस्वती भी निकालते थे) ने एक उदू मासिर पत्रिका प्रारम्भ करने के लिए नवावराय का ही सुना। नवाबराय से बातचीत हुई । वह तैयार थे। वेतन का फसला हुपा। पत्रिका का नाम फिीस तय पाया। परन्तु जब नवावराय न अपने मित्रो से सलाह की तो सबने राय दी पि मरारी स्वन मास्टरी स इस्तीफा देना मुनामिद नीं । ए साल की छुटी लकर देयो। यदि पर्चा चल निकले तो ठीक परना पापमपाकर अपने ढरें पर बटो। नवावराय को मान जपी। पर पहले पर के लिए प्रम ने तैयारी शुरूपी। लेखा ने सिए पत्र लिने । निचितापक्रम में मनुमार मामिष के पहल भर मा प्रकाशन १५ जनवरी १६.८ कोनय पाया था। नीच हम प्रम- के उस पत्र का उद्धरण देते हैं जा १७ नवम्बर १६ ७ को दुर्गामहाय सार जहानाधार पीलीभीत को लिया। हस्ताक्षर धनपतराय मास्टर गवन में सूल कानपुर में नीम नवावराय लिम्बार पाट लिया गया है। पत्र प्रारम्भ म लिया है-- मुझे तो प्रवंश साहित्यिक क्षत्र माप पायर भूम गए । अब या हानी करता है। उसके वा लिखा है माह जनवरी १९०८ से इलाहावा ३ इण्डियन प्रम ने एक माला दर्जा का उ रमाला शाया करन की नीयत की है और उसमा एोटरी की खिदमत मैंन माप मासा की मानत र भरोड पर अपन ऊपर तो है । पहना नम्बर १५ जनवरी का निकल जाएगा। रमाला वातस्वीर होगा। तसावीर और उमदा पिसा पराई भौर कागद्ध काम सूसियत से लिहाज रखा जाएगा। पाप जानन हैं इण्डियन प्रम सा मालार है। वह जिस फटा चाह सरफ पर मरता है । मैं पाहता हूँ कि पहल नम्बर म नक्षम साम तौर पर जोरदार हा मोर एमी न जमा * लिए पापक सिवा और क्सिस इल्तजा का ? मुप्रापिजा जा कुछ मुनासिब होगा या जो कुछ माप फरमाएंगे प्रौदत से हाजिर विदमन होगा। पोर रसाला के मुकारल में पाए इस प्यार पाएगे । यह पलतमास करन की जरूरत नही कि पहली पर भाप हा की होगी। यह रसाला पॉलिटिकल होगा।' कुछ कारणो से यह सीम मागे न चल सस।। दाम मा इण्डियन प्रम ने 'पीव निकाला तो प्यारेलाल रि' मेरठी इस मम्पादक बन (यह भी जमाना में सम्यकीय विभाग माम पर पुरे थे)। नादिर न हमको पतनाया है धनपतराय (नवारराय) से गिनावें पड़ने का घमा गौर पापाय हो कोई विषय हो जिस पर एक पाम स्तिाव उनकी नजरों से न गुजरी हो। इस साम हो हाफिजा भी बला मा था। साहिस्पिा मोर रामनोतिर वितावा सपा रसाइल को पार उन विषयो पर ऐस वोमत थे जैम उम दोहरा रहनिम्मा-नहानी पर पाद रखते हो में। इसी समम बारे म सिसत हुए एप सप न निम्ना है मि पास निम रुपा गर पार पारलगभग गार हा नायस प्रम ने पढ़ पा जय एए में याद दूसरे उपन्याम रे स्थान मार म यह होमते तो सब प्रभावित हो । सरयूनारायण तिवारी जो वम ममय पृथ्वी नारापण हाई मूल भानपुर में मप्यार प, अहान वार नवापराय में साफ पहा 'माप म्वप उप पाम लिएर भारतीय साहिपास्तर या ऊँचा नहीं कराते नवारापागला उपयाराना था। मगस्त उमाना मसरा fonपन मिलता है। १४२ गयी यह पुनर हरियन मान रिणाम मीरा पत्ता नम्बर पीमि उपन्याम बी ए भी प्रति उपराप नही है। इसम सियोरे गहना ग सगार पर पर दिया गया पा। इमी समस्या परमार रमारमा प्रशन भी किया। जमाना न पडूबर-नवम्बर १९ मा म लिना ? पानापना कलम का मजदुर प्रेमचन्द छपी है। हम उमे उखत परते है- यह भी एक नायल है और हमार सोशल रिफाम स ताल्लुक रखता है। जमाना मगहर मजमून निगार मुशी नवाबराय माहव बनारसी इम मुसनिफ है जो फन नावल नवीसी पर उपदा मयूर रखते हैं । उहान पौरत म जघर के पजूल शौक की मछी चपाड को है । गोया यह एक एसी पौरतरी लाइफ है जिसे पदरात का शौन नहीं लि जुनून था। इस जनन यो तस्वीर खिाने म नायक मुसनिक में बहुत कुछ पोर कलम सफ किया है। ताहम प्रफरात व तफरीना की वजह से यह सस्त मसली नहीं बलिन मसनूई मालूम हाता है। साथ ही शादी-ब्याह में गाज रमम का भी खाका उहाया गया है। सुमूमन एक मम मुना का परार दार पौर उसका सली स वसूल भरना बेक एक नामाल रस्म है । अग्नि सा निम्मतीस मुहरिजम परवान बोम राज-रो। इसक सिलाफ होते जात है। पौर मुहरडब शहा भोर तालीममाफ्ता हलको में इसका रिवार उठता जाता है। उन्ही के नमूने पर देशात व याशिदे भी अपनी इस्लाह पर समय हैं जो निहायत इसरी है। मलयप्ता गादिया क मौक पर मणी व मुसर्रता महार नाजिमी है परना दादी य गमी तकरीया में इम्तियाज महाल हा जाएगा पोर पोम स जिलालिमी का मादा तरी जापल हा जाएगा जो वजीर का जुरचे प्रनम है । रिताच म जो जमान इस्तेमाल की गई है यह मुशी साहन को मोह तहरीरो म बहुत कम मिलती है। गालिबन यह बयार इसलिए इस्तेमाल को गई है कि जिस फिरपा की इम्साह मा सूर है उसन लिए लिचस्प हो। हम मुसन्निफ की बालिग नपरी स जिस भमर का सहन तमा न है यह उमूल फन से तमारतुक रखता है। माती उन्हाने किमाना को साला धनपारी माल से पहले ही सीन में मिलाया है जो सोशल रिफामरो म निहायत मुरिगण व मुमताज है लेक्नि उहोने अपनी स्यूक खिलाफ गरीब विना ये जनून या कोई मास इलाम नही किमा और इसलिए हीरो ने अपने इनमे और मान को कायम रखने म नागरामी उठाई । फन की नमाक्त यह चाहती थी कि लाला धनरधारीलाल की कोशिश से किशना का जुनून पर हो जाता और वह अपने सपना के लिए एक महसूवा बनती। बहालत मौजूदा यह एक ऐसा नावल है जिमम काई होरा मा हीरोइन नहीं है और इस एक नावल पहना भी महाल है। दरममन यह नावम है भी नहीं बल्कि एक मजमूम मजाक नमानी का साका उडाया गया है, जिसे अंग्रेजी म करेपर कहते हैं । भोर माहिरियर क्षत्र में प्रये इम मिहाज से यह तसनीप' जरूर कार की मुस्तहिक है। जैस असरारे माविद और हमखुर्मा मो हमसवाव म हम रामकली का करेकर मिलता है वसे ही हमसुर्मा पा हमसवाव और किना' दोनो ही में प्रचारक धनरधारीलाल कापरेकर मिलता है। वियना लोकप्रिय हुमा या नहीं इसके बारे म कुछ कहना कठिन है । परन्तु नयावराय का पहला उप यास (हमखुर्मा प्रो-हमसवाव) जरूर लोकप्रिय हुमा होगा। एक हद साल में पहला सस्करण खत्म हो गया। सितम्बर १९०७ क जमाना म एस विशप्ति म इसका मूल्य वारह माने से बढ़ाकर एक रुपया सर दिया गया। यह दूसरे सस्करण का ही मूल्य होगा। १ १४ में दो मरी अंग्रेशा पुग्नक में मने लिया था कि 'पवन 'विराना के भाधार लिमी गर म माप में भगतराय ने दो कमर रामको २३४-५८को एक । लि- राना नाममा मोर छोटा नारन था और यालियन पहल ठर में छपा। मगर म म पार नहीं है। ममग्माम इस कोशिश में लक्नि भरत को मन मिलाया नारत में मिी मर नाम स साया मा या नहीं परमीनाराम ना किराना मे तुम भी सानुक, २६ मरी समझ मैनहाभाना -कमर राम पए १४६ ६ नई प्रकार की कहानियाँ - जिन दिनों वापराय के उपयासो की पर्चा व्याप प मे चली उही दिनो नवावराम ने एक नई दिशा म लिखना शरू किया । यह था कहानिया का क्षम जिह उन दिनो हिन्दी म गल्प पहा जाता था। अपने पास्म कथारमा लेख मे प्रमचर ने सिसा है- डाक्टर रवीनाय टगोर की कई गल् मन भग्रेजी मे पड़ी थी और उनका मनुवाद उद पत्रिकामा म छपवाया था। (ये अनुवाद रही छपवाय इसरा पता नहीं चल सका) उसी संस म भागे चल- कर निखा मेरी पहली कहानी का नाम था दुनिया का सबसे अनमोल रन । वह १९०७ म उमाना म छपी । उसके बाल मैंने पार पाँच कहानिया धौर लिखी। हैरानी की वास है कि दुनिया का सबस मनमोल रत्न शीपा कहानी अमाता को प्राइलामको नजर नहीं पाई। नवावराय की जा पहली कहानी पही मिलती है यह है 'इदुनिया पोर हुवे वतन (मप्रल १६ )। परतू जिन कहानिया की भोर तारा है वे छपी अवश्य उसी समय । य कहानियाँ इस प्रकार हैं - दुनिया का सबसे मनमोल रल T मखमूर यही मरा बतन है सिलाए मातम तया एके दुनिया और हुव वतन । मिम भाषा में ये कानियां लिपी गई उस पर पारमी का गहरा प्रभाव है। सन-11 भी क्लिट है। य कहानिया है - दुनिया का मवस मनमोल रल स्या है? हा ममाना मावेन्पात ताजमरी जामेहम नाने ताऊम पोर र परव। दुनिया का सबस मनमोल रल हानी इस प्रकार मारम्भ हानी है- दिलपिगार एक पुरपार दर नीच दामनमार बठा हुमायून क मामू पहा रहा था। वह हुस्न कापी यानी मलिना दिनपर मचा और जांना मागिय था। उन माम म नही जा इस अमल म बमार मौर ४३ नई प्रकार की कहानियाँ निवास फासिरा से समार प्राशि क भेष म माशूकियत का दम भरत है बल्कि उन सोपे-साने, भोले भाले फिगइयो म जोकोहे विधानान मे सर टकरासे पौर नाला फरयाद मचात फिरने हैं। दिलफरेब न इसमे कहा था रि अगर तू मेरा सच्चा मागिक है तो जा भौर दुनिया को सरम वेगवहा पर मर दरवार म मा । तव मैं तुझे अपनी गुलामी म बूत करेगा। भागे निखा है- 'अब सिपिगार एम ऊचे पहाड़ की चोटी पर सहा होता है एक मम्पोर मत प्रमामा ओघ एस हाय म तस्वीह और दूसरे हाप म मसा लिये वरमामद हुए भौर हिम्मत एफना सहजे म पोले, दिल फिगार नान सिकिगार ! यह ममा बुदिलाना हरक्त है । इस्तमाल राह हर की पहली मरित है म वन मौर यू हिम्मत न हार । मारिप की तरफ एष मुल है जिसका नाम हिन्दुस्तान है । वहाँ जा मेरी पार पूरी होगी। पहानी मा पन्त इस प्रकार है- एकाएर पर्गर निगार हट गया भोर लिपिगार | FREE दावार हुम्न मारास्ता नगर पापा जिसकी एक नारनोन र जमलायी। तिफरर सदाने रमाई मन जरीवार पर जलमा मराज थी। दिलपिगार यह तिनिस्मे हुस्न दपकर मुनहेमर हा पया पोर नाश दीवार पी सरह मरने म पा गया तिरिसपरेन ममन स उटी पौरपई पदम मागे पडवर उसा हममागोश हो गई। पासान गिमनवार ने शाल्यिाने गाने शुरू पिए। हानिफा नगीना ने, दरबार न सिपिगार को नजरें गुमरानी पोर माह व गुरगीर को सारत तमाम मसन पर रठापा । य सहारियो उर्दू साहित्य म ए नये दौर का प्रतार यो । सिला-ए-मातम यो छोरर बाकी भाग महानिया मप्रम की भनक थी। माहिम म यह VE नई पारा पो जो भाग पर बहुत प्रयन ई और जिमन गुन भी गिनाय। महानियोग प्रमपी भावना ग पात प्रोत थी। गनपूत पूरमामारा पोनिगान तपार परायीन हानेर मारणा का विमपण भा इनम पा जसे स्टी रानी मा इम मम्बयम प्यारेमार गाबिर ने सिगा है- एन सिरिता में मुा (प्रभार) ने मान भी घर का निरा। गोमा पर मायाह हो उनम मिन मना पागिा। मोहीम दापितहमा ता उन्ह सम पर प्रसार शान सपा । परप पर पौध पो है। पाना में परमाग पर उठो हहै। मामन का हितार गुनो हुई है। पम योग बन रहा है और रसमी पारगाप-गाम भी परार हिम रहा । मुपर गयान मा रिम र रिमोरिनार पर क्लममा मजदूर प्रमपद तनकीर लिची जा रही है । घर पहुंचते ही मैंन दरयाफ्त क्यिा- कहिय किसकी तवाजा हा रही है ? हसकर जवाब रिया तवाजा तो किसी की नही हो रही । प्राज भरा हठी रानी' को मना रहा है। २ मी राना, जो मोल मा और भगात ।। ७ में पो थी एक हिन्दी पुग्तक का मनु वाया जिम माराय ने किया। (मूल पुग्नक शायद वीप्रमार की लिखी थी 1) ७ दूसरी शादी माहिरियर क्षत्र म पत्रकार निम य लेखक तथा उप यासकार व रूप म जो नवावराय (पनपतराय) दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की पर रथे उनका ववाहिम जीवन दुखी था । मजायब नान न छोटी उम्र म धनपतराय की शादी पर अपन इस प्रत्यायु पुत्र के लिए वरीयरी समस्याए सरी परी पी। उसन सिर पर बहुत भारी मोम रसपर वह म्वय चल यम । पिता की मृत्यु में बार पानी पत्नी, विमाता विमाता न भाई विजय बहादुर तथा उन दो पुत्रों मा भार धनपतराय किमी तरह सहत रह । परिवार समही म रहता पा इमम पनपतराय अपनी माय या पति भाग घर भेज देते थे। मुट्टिया म पर पाते मोर बहुत दुगी होत । बीवी तथा विमाता म यमचा मचा रहता। विमाता पौम जमानी बीवी धाम नही मानती। धनपतराय पर मात ही दोना उनमे पियन परता। धनपतरायपी हालत घसीम दो पाटा ने धीच की थी। उनप रम ही मुनिय- 'एर बार धामी (विमाता) प्रश्न मापर गई हुई थी। मरी बीवी पी में था। पर म मेरी पसी पनेरी भाभी पी।गर उन रिना उनर पर मतालीप यो । भीमभी वे भूत प्रन मी तर हाव भाव करनी पी। एक पण्डित मामाई पापाम परत पे बचा भी माम परत थे। मरी पची ने गहा उन्हें युना मापा । मैं उन्हें मुनासाया। पण्डितजी प्राय पोर मोमा मी तरह पुष उहनि प्रताप पनाय पिया। मैं भी दोपहर सा मठा बटा उहा समापन परता रहा। पर ममानिस रनेको तल बनाया। मैंने उन्ही सनम बनवाया। उना परोपा मानिसपरनसि नाइन टीरी। बय प्रधी १५ ता पुभम बहन को बुनान पामहा। मैंने यह भी दिया। इस पर जर पाषा पर पर पार तो पापा हमार उरान पूपा। मैंन बना लिया नियम तरह रामहागा। हिमा- पियाग मम पापीबी निगाह म मैन दो लम का मजदूर प्रमचार यड़ी धुराइयां की। मेरी बहन को भी होने काफी तकलीफ़ दो। भगहा पाए हुमा करना । मगहा इतना बड़ा कि ए माल बाद यात्री को माम लिए घर छोडना १४ जर धनपाराय गरमियो की छुट्टी पर पर प्राय ता वहाँ से निगम को लिसे गए उनके एक पत्र का पढ़कर उनकी परिस्थिति का प्रदाउ हो सकता है। वे - - ज-तू कारक एक मशरा काटा था कि सानगी रद्द दात का ताना वधा । मौरता ने एक-दूमर का ना क्टो मुनाई। हमारी मखदूमा न बल मुनकर गरम पानी लगाई। मान माघा रात को भांपा दगडी उसको रिहा पिया सुबह हुई। मैंन वपर पाई। भन्लामा विगा लानस मुलामत की। बीवी साहिबा न मर जिद पाडो कि यहाँ न रईगी मर जाऊँगी। मरे पाम रुपया ने पालापार सच का मुनाफा पमूल दिया। उनकी पिसती को तयारी की। यह रा-धोकर चली गई। मैंने पहुंचाना भी पमन्द न विपा। मान उनको गय माठ राब हुए। न खत है न पार । मैं उनस पहले ही पान था। प्रयता सूरत से वेवार हैं । गालियन भय को जुलाई दामी सावित हो । तर परे ऐसा ही हो। मैं विना वीषी व रहेगा। दिल्ली वश मुर्गा लहरा ही रहणा । उधर ननिहाल मे पालिदा की तरफ से बिन है निम्याह रचे पौर जरूर ग्चे । जन कहता हूँ मैं मुफलिस हूँ गाल हूँ सान । मुयम्मर नहीं तो वालिदा साहिबा कहती हैं तुम अपनी रजामन्दी बाहिर परी सुमसे एक मौसी न मांगी जाएगी । सुनता है बीवी हमान है वाऊर है जव से खर्चे बगर मिली जाती है फिर तवियत क्यो न पुरभुगमे मोर गुदगुली नपा ने पेश हो ? ईश्वर जानता है। दानीन बार उसका स्वाव भी देख चुका है। बहरहास अबकी सा गमा छुरा ही लूगा । प्राइन की बात नारायण हाथ है । जसी पापकी समाह होगी धसा ही परगा। इस बारे में अभी फ्रि मावरा करने पी उरन बारी है। कई पप वा. शिवरानीन्दी को यमलाया धटिया क दिन थ। मैं पर पाया था। उही गिना मुभम और मेरी बीवो म झगा हो गया था और इसके साभ साथ पाची ने काफी शिकायत भी उनकीवीपी। भोप म भाकर मैंने उनकाटा। ये भी मुझ पर भन्साइ। मैंने कहा-मम कही वहसर होगा तुम अपने घर जानो। मैंने विजय बहादुर से कहा इनका पड़ेगा पापो। मरा कहना था कि उन्हें पहुंचा माये । रिदसे में कई प्रस्ताव प्राय परन्तु धनपतराय नम पार म रिसा को 1 .

दूपरी गादी प्रामान न देन ५ । यह म्यम पत्नी का वापस स मान लिए तयार न य परन्तु उनका विचार या दिनाय उनकी बीवी लौर पाय। कई माल तक पन्तजार करन क बाद उनि तय किया कि दूसरी पारीता की जाए परन्तु किमी बाल विधवा स । निगम ने लिखा है-- उनका उस दवा मालम गवाब था। और वह एक हममुम्न जिन्याग्नि मारा रुत मोर सात माव नोरयान थे। श्रीवास्नव पि में जिमम उना सपास्लुफ या बरार दा की रस्म माम है मोर हजार-दो हजार सप ना तो उनसे पासानी समिर सरता था। पौर यह रकम वस म उनक लिए बड़ी रकम थी। उन महल मानत देवा विवाह के खिलाफ थे। मगर वह अपन फ्मान पर माल रह।' सलीमपुर (जिला वहपुर) मुशी दवावमा भी सहनी, विरानो-वी ग्यारह साल की हार विषया हो गई पा। मुगीजी दुपी ५ पार पाहस 4 इम वेचारी का दूसरा विवाह हो। पणिता स पूया । समाचारपत्रो म तिहार निरलयाया। इस जवाब मन पर पाए । इनम म एक धनपतराय का पा। इमम पानी शिक्षा तथा नोपरी बार म लिया पा (पौर शाय? पहा रि पहनी बागा मर पूरी है)। दवाप्रमार न उन्ह नहपुर बुलाया पसल किया परदादाभोर किरायपस यि । पनपाराय में परवात विधवा विवाह के विरुद्ध ५ मिलिए धनपतराय न राह पर त नगे। विधवा स विवाह परसा इनकी लिरी या । बह गमार दरियानूमी वपन मोरना चाहते थे । पापा गिरानी यो पनि पर माई पोर पोहनि रहा। घरसहिमार पिसाब पोर या । पापी पी चरता गिनी-यी परारती पो। पाचोरा प्यार एमा ही होगा, जमा प्रेमचट परी पहसी पावी सपा । इमति नहीं तर सम्म हावा शिवरानी दवा माया में रहना पर पाती। पानपुर र ओपन के सारे म शिवरानी की निता है-मार मुरह भार पत्र उदत ५। पर गौर जात हाय मुह पात मोर आ मिल माना उगोगा नाता रख सनी माय बंटरर निसन म यदूर्ग प पारो की तरह समपनती थी। गाममा निगम तथा मरे मित्राक मायतीग पर सौट। पानपुर रिदिए एल स पापरामराय राई भार पर हर। सभी मार पाने मारटर भी शावरे और भी नौ।

४ सम का मजदूर प्रेमचन्द अब कानपुर ही म ५ उमो समय धनपतराय (नवावराय) की सोमवतन' (महानिया या सग्रह) छी । इसका पहला दिनापन कमाना व पगस्त १९०८ प्रक में मिलता है । इस समह म पांच कहानियां हैं दुनिया का सबसे अनमोल पल दास मगर यही मरा पतन है सिल-ए मातम रव दनिया मोर हुम्चे वतन । जसा हम पहले कह चुके हैं सिल ए-मासम को छोडकर बाकी समी कहानिया देश प्रेम म रगी है । लेखक की प्रस्तावना स उनके दृष्टिकोण का पूरा पता चलता है । इसे हम उखत परस है- हर एक कौम का इस्मो पदव अपने जमाने की सम्ची ससवार हाता है। जो खयालात मोम के दिमाग को मुवहरिप करते हैं और जो जमात कोम पिता म गूंजते हैं धन नरम व नमर के सपहा म ऐसी सफाई से नजर पाते हैं उस पाईने मे सूरत । हमारे लिटरचर का इनदाई दौर यह था कि लाग गफलत नशे में मतवाल हो रहे थे। इस जमाने की मल्वी यादगार बजुज मालिकाना गाला मौर चन्द सिफ्ला हिस्सों के मोर पुछ मही। इस दौर उसे समझना चाहिये पय कौम के नये पार पुगने सयालात में विगी और मोस की सडाई शुरू हुई घोर इस्लाह समदुन की तजयी सोची जाने लगी। इस अमान के किस्से प हिकापात पातर इस्लाह और तनदी हो मा पग्लू है। मद हिदुस्तान के कोमो खयासामत ने बलोगित में जीने पर एफ पदम मोर यदाया है और हम्बे वतन र असनात लोगा के हिसा म सर उभारने एगे हैं। माफि मुमकिन पापि इसका मसर पदव पर न पाहता ये च दहानियाँ इस अमर का पागान है पोर यकीन है कि ज्या या हमारे खयाल गोह हात जाएँग इस गये लिटरेचर को रोज अफजूं फरोग होता जाएगा । हमार मुल्क को ऐसी कितावों की प्रशद उम्रत है जो नई नसण के जिगर पर हुल्वे पत्तन की असमत मामला जमा-नवावराय । सोज पतन' के प्रकाशनमा समय देश म राजनीतिक जापति का काल था। जितने ही पत्रो न इस पुस्तम की प्रशमा की। जमाना में दी गई विप्नि में माय गजट स्वराजप हिम्नस्तान मिनर्वा तथा 'जमाना में की गई मालोचनापा शरिप गाए । मागे चलकर इस पुस्तर कारण धनपतराय पर एम पापत मी पाई इसलिए मावश्यक है कि हम जमाना की समालोचना उदत गरें। यह नवम्बर १९८२ प म छपी थी उमाना ने मक्यूल मउमून निगार मिस्टर नवावराय न उदू फसाना निगारी पा एम निहायत ही दिला नमूना पेश पिया है जो मारनन नाम स मौमूम है । म किताइ म पांच छोटे-छोटे किस्म जमा किन गए हैं जो निहामठ लिय हुए ४ दूसरी गादी मापार और लिपरख हैं और जिनम मक्स पाला हुन वानी है । परना निस्मा दिन हातमताइये तग्ज पर लिया गया है जिमम एक मालिक मापि अपनी महबूबा की नरमीत फरमाण लिए निालता है जा दुनिया रामवर यादहा धोड मागता है और मनुवातिर नाकामिया 4 वा गाहर मामू हाप लगता है। दूसरा रिस्मा व वयान ऐनवार स एव जुगगाना नमूना पण करता है सपिन मास बहा हुन्छुलवतनी है और निस्वतन पान अच्छा है । लक्नि सवम उमग नोमग पिम्मा है। पीय विस्त मा हुम्बुलयतनी म कोई वास्तुर नहीं भोर इस लिहाज स म मिलमिल म स्याग ताल्लुफ नहीं रखता । मगर तिमी प एलबार स मह स्मिा भी बड़े-बड़े किमाना निगारा को जोर कलम से या गिलाता है। पानये किम्म मला क माहर हुन्छ वसन ओजफ़ मचीनी र हातात दज क्यि गए हैं मोर दिखाया गया है कि समका बुसयतनी मी सम्ची पार गरफानी थी। इन मिस्सा सिवन म काबिल फमानानिगार ने नाजरीन शी जिराफ्नलदा का बल बहा लिहाज रखा है और उन प्रवासी ममाम राजा बाहिर निहायत पर मातम हान हैं एमा सिनस्य सिवराम पहनाया है जो उडू य विरान नया और आविस मामी है। मगर व पिसा बहुत ही मुम्लामर हैं सक्ति य नमार उमून बलगन पर मवनी है। पानी इनम प्रमकाज कम है और मवालिब स्थान। पार सास राम रिमा जाता तो यही बरे-बड़े सिम्म हो सकत । बजुज भीमरे किस्म म हर विस्म म हुम्न पारी धनी मोडू है और उमर ओ हाय गए है यह एक निहापन ही नाप माल नायर , मिका हर शाम पाहिम्मा नही । हालांकि य विग्न नय म है और शेरा-मुमन गइईका साथ नहीं। साम महा जा माता है कि इनसो ममनीष म शायरी गई है, यार सुफ नरम म हामिल हो सकता है पर इम नमः म मौर है। हम शिला मुबालिगा वह मरत है मोठे पतन पार की समानी म पनी मरो बलरोन तमनी महलाना मुम्नहिर है । इमा frम पन हुए मारा उद्दू र महतरान प्रमानानिगारा मी या पानी है। जानकी मात्रा ययान को रवाना किती मोर प्लाटरी नीरा कारण पार और ममाम परसान म गरी म म धारामा पिलाय में समा गनियमागता तारीफ करना चाहता है। हमारी गद ८ मापन ममार पनना मरदा राहगा। उनम एमी मनोरेल हमारी योगेंदर म मुनरिपी। नवावराय मारन मारनावत भी मगना frutमगर इन सबम हमारा RT सम्पपीन की ५० कसम का मजदूर प्रमचन्द खामियो भोर कमजारियां दिखानी पडी। लेकिन इस तसनीफ पर जिस पदर फम्बर दिया जाए कम है। पाखिर म हम उम्मीद करते है कि इस किस्म की तसनीफ की मुल्क मे तरक्की होगी और नाजुब खयाल पहले कप्तम इस तज में अपनी जुलाना कलम रे जौहर रिखाने में दरग न करगे। इस पुस्तक ने १६०८-६ म क्तिनी खलबली मचा दी होगी इसका मगज इस बात से हो सकता है कि इण्डियन प्रस इलाहाबाद की मासिक पत्रिका सरस्वती म-इसम प्रेमा तथा कृष्णा की मालोचना तो नहीं मिलो-इस उदू कहानी सग्रह की मालोचना हुई। दिसम्बर १९०८ की सरस्वती मे निखा है- सोजवतन पुस्तक उर्दू म है। इसमे स्वदेश प्रेम-सम्बन्धी पाँच भासपायिवाए हैं । माख्यायिकाएँ मनो रजम पौर उपदेशपूर्ण है। हहे पठार स्वदेश भक्ति का पवित्र भाव हृदय म भकुरित हो जाता है। प्राजक्ल ऐस मिस्सा की वही आवश्यक्ता है । इह पढकर लोग बहुत लाभ उठा सकते हैं। कागज़ मौर छपाई उत्तम है। इसकी रचना उदू के प्रसिद्ध लसक धीयुत नवावराय ने की है । मूल्य साढे चार मान । मिलने का पता-बाबू विजयनारायणलाल नया चौक पानपुर । विजयनारायणनाल धनपतराय नी विमाता के भाई 4 पौर ऊपर दिय गए पते से ज्ञात होता है कि इस पुस्तक को धनपतराय ने स्वयं ही प्रकागित किया। प्रेम एक्ट के अधीन हर पुस्ता पर प्रस का नाम छपना जरूरी था। इम मलावा लेखर का नाम पता और हस्ताक्षर भी भेजने होते पे । 'जमाना प्रस म छपी यह पहली किताव थी। शायर मानून का उन्हे पता न था इसी से नवक का पता नही दिया गया था। प्रस का नाम भी न छापा। ।

५ देश-प्रेम के कारण सरकारी कोप सौरपतन' मा दश प्रम की कहानियांधी ही धनपतराम निबरमौर खाम भील प्रम मी मनर मिलती है। एक दुनिया और हन्ध वतन का माघार नो महिनी का नौवन पा। नवावराय ने गरीबालीमा रेखाचित्र भी निगा। मई १९.८ म स्वामी विवेकानन्द पर एक लेप लिया । इनर अनाया मई जून १९०६ र म एक अन्य महत्वपूण लग भी लिया, मिराका विषय उनकी नौकरी स मम्बर या । विषय था पू०पी० म इनिदाई तालीम } इस पर पपुछ पर हम यहाँ उत्पत करते हैं, जिनस धनपतराय क मामाजिर और राजनीतिर प्टिवारण का पता चलता है-- 'सिम्बर १९०८ क 'मारन रियू म मट निहातमिह ने एप नागर मड मून निसा है जिसम अमरीरा एक मौसा की पंप्रियत वयान की है। उस पर हरत भी होती है और मामी भी। हैरत इसलिए कि सालीद की जा मासानिया पोर पमवाय इस गौम है य हिन्दुस्तान व धो-बड़े महा को मसोर भी। मौर मायूमा लिए किया हिन्दुस्तान की किस्मत म सरसीला तिश ही नही। दो हजार पावारीमा मौडा पौर हाई गुम । रमती इमारत इस युमुवयाना इसर सवारेटरी पर हिन्दुस्तान पाको पानिन नाउ पर सरमा है । मान्दुिमान र भी कभी एग नमीब होगे ? पर ए सरप वाइम दगती ममगा को रपिय और दूसरी तरफ एप fryस्नानी देहावी मरस का समान लिए। एर दस्त नाप निगा "पर उधर रामसर पहा , मोर हो गाय वरमा म भार नहीं पाई wr परे पुरान टार पर रीस-सापीर REP 4ट अप रह है। मामन एयही हाकुरसी और पुराना मह है । उग पर हररत मुगको जान मुक्ति है। मार भूम-भूपर पहो ए ए हैं। - frat Pन पर मावन मा महागा। पाती रान आरसा पो हुई। महा- पुती मूरले गुगगना ।

५२ असम का मजदूर प्रमवाद चहरे पममुर्ग। यह धार्याक्त का मारसा है जहाँ विसी उमान म तक्षशिला भोर नरिया दारुल उलूम 2 मिस का तफावर है ! हम तहजीव की दौड म दीगर परवाम से किस कर पीच है रि शायः यहाँ तक पहुँचने माहौसला मी नहीं कर सकते। हमारी गई तालीम के इम्लाह और सरक्की के लिए मवस यडी जरत लापर मुरिमोरी है और लायफ मामी माठ रुपय या नौ रुपय माहवार मगाहरे पर दुनिया कप मनही नही मिल सस्त । जिस म का पित मुभा मे पाजारीकी नसीध न होगी यह तालीम की तरफ क्या खाक रख होगाऐस बहुत-स मजला है जहाँ अभी सर मुरिसो को चार मोर पाम रुपये से पारामाहरा नहीं मिलता। ऐसे प्रादमिया हायो म हमारी सरकार ने रियापा फी तापीम रख दी है। पोर ताज्जुब किया जाता है कि तानीमी हालत क्यों ऐसी रही है। जब सरकारी मुदरिसा पा मह हाल है तो इमदादी मुरिमा का जिक्र ही क्या ? इनम कम से कम तीन भौथाई ऐसे हैं हि सरकार चार मे माहवार इमार देती है और इसम एक पाना मनी माडर का महमूल कट जाता है। तीन पिया पE माने म कौन महीने भर दमरी गवारा करे । पहराम महाराको तनयाह घमौर मात रुपया माह पार है। बल्कि बिसा मौकात इसस भी ज्यान मामूली मजदूर घार माने पम रास कमा लेता है मगर गरीव मुरिस नसे भी जत्तील मममा जाता है। मजबूरन या तो वह गरीब खेती की तरफ रजू हा जाता है या सरकारी काय + बिलाफ पान माता की जगह एक माना या उससे पमा पीस लेना शुरू करता है। जिसका नतीजा यह है कि लरको की सादा म पनी नही होने पानी । यहा से इमगदी मदरसे तो मिफ इसलिए कामम है कि एक गरीब मारमी सीन पार पये पर बठे पा जाता है । खोप नाम लिख लिय जान है पोर जब कोई अफसर ममाम लिए पहुँच जाता है तो भ* सड़के दएर उधर स जमा करके दिसा दिए जाये मध्यापाकी कठिनाइयानी मोर ग र पाग लिखा-'नारमत स्कला सा सोप मजेतालीम सीखकर माते हैं वे मी मारमा म पाकर अपना मय तरीका भूल जाते हैं । चारे क्या करें । महाँ उह एक वान एक की तालीम का समर दिया गया यह उह एर वस धार द पठान को मिले। उन उमूसा पर योर समस पर एक दरे पडाने म माल हुए ता दुसरे दरें का हिसाब दिया किमी का लिपना रिसीमा को अगराधिपा। पान मा एक ही है। कम लिसन को इस्लाह रे । यस हिसाव समझाये । - दाप्रमारण सरकारी का । से वाकाय तौर पर जगराफ्यिा का तापम ६ मज एक हावाग-सा मचन लगता है । लहवा ने गतान मु रिम को मागृत देया ना घोर पप्पा भुर रिया। मध्यापररा की सख्या वडानमपील पर और इस काय पर व्यय का शिश पर नवावराय लिए। है- गुभिदता मूवा मुसाहिता म १६ लास इलदाइ सालीम में सरफ हमा मोर बहिमाय पोसत पी नालिबे इस्म साडे तीन पाना । यह मौमन दूसरे मुहग्गिर मुला मुकावल म वन की पम है । क्या सरकार ऐस पार काम + लिए परास साब सालाना भी बच नहीं कर सकती ' स्पय की निल्लत एक एमाहीसा ए गई है जा गवनमट लिए कभी सादिक नहीं महा जा माता । गवनमेंट र जराशा मामहद है और इतनी रकम वह पासानी स खच र सकती है । जय जगी मसारिप इम कसरत से साल-ब-साल यवत बन जात है पामरा रे ए और सहलिपना पर रुपया कोहिया की तरह गुनाया जा रहा है तानास मा गस्तीमाहीमा भी काबिन यकान नहीं ठहर साता। यह भी गवनमेंट पी एक चालासी है घिउमन रिस्ट्रिक्ट वोहों पर तालाममा भार सासर सपने सर पसार पिया। पौर पर एमरम जान पाल, मसल पर अमल कर रही है । वोर पहाँ से रूपया लगाए 'जब प्रागिन गनमेंट भरने मुरिराह हिस्मा का सती स पमूल बरसी पती जाती है। भाग पलपर मवायराम रहत हैं कि मध्यापरा को गाय पास्ट पापिम जापान दार उनर पपने प्रयापन माम म हावट सलना है। मगान रे मल म एर-एर लिन पाई-मई सोमनीमारमा जाने है और हर एर मनीमार पर मुरिम को कुछ पाने-पम मिल जाते हैं। यह महत नेपृरत बात है कि मुरिस असी पोती मिमतापातमी रात फापान मौलाना हाथ म न जाने दे। मसोस की बात है कि हमारी गवन मर मी निगाहो म हमारी तासीम रो रोई मामत नहीं। प्राइमरी शिसारे महत्व मो पनलार मिसयम बारेमवह तिष्ठत है-- हमारा गायान है मार प्राइमरी दी तापीम मगर इरा और या बमोह कर दी जाए तो का सारा मरीया मे लिए काफी है। रें ओम बस पुरबिर है जबान सि सब नागारा है और उनर पान से पाक पर मामूमी बासपास न तो हिना मान जानत है पोर न उदु । उनको जान से ममाह होनी चाहिए तारि सम रामापण ता सममम । पापरत नहीं। गारिजरना चाहिए। जुगरापिपा की ठातीम पाती है। हिमा म भी एप रमरमही है । ममनी मवानात भीमस कसम का मजदूर प्रमचर ज्यादा होनी चाहिए । ड्राईंग फिजून है । इसके बजाय तन्दुस्म्सी ५ मुतमाल्लिक एक छोटी-मी प्राइमर होनी चाहिए । मोर क्वायद जवान की जगह पर जरामत 'कुछ उमूल सिखाय जाने चाहिए । इस वक्त तो क्तिावत का तरीका नहीं सिखाया जाता। यह एक यहून जरी श है और इसका भी इतजाम हाना चाहिए । तब इमिनाई तालीम का मसला गोया हल हो जाएगा! मदरसा के लिए इमारत का नक्शा उहाने इस प्रकार मीचा है-- मारसो को इमारती हासत निहायत अफमोसना है। तहसीलो मदरसा मे तो कही- कही पुरुना मकानात बन गए हैं मगर लोमर प्राइमरी और अपर प्राइमरी मरसो की हालत बहुत रद्दी है । उ हें देखकर मवशीखाना या मोहताजखाना का खयाल पदा होता है। दीवारें वोसीता दरवाज गिस्ता हात छतें गिरी हुई फ जमीन कच्ची । यहाँ भी रिश्वत भौर गवन की गरमवाजारी है। अगर क्सिी तामीर के लिए हजार रुपया मजूर हुमा है तो यह यकीनी बात है कि मम भज-कम निस्फ रकम जरूर दरमियानी मनाजल तय करने में सफ़ हो जाएगी। जिम्मेवार पफमरो म हमीयत का माला ऐमा मरद हो गया है कि इस बारे खर की अमानत मे भी खयानत करने से गुरेज नहीं करते । मागे चलकर नेतामो के रवये पर दो मौमू बहाये है- हमारी तालीम का तो यह हाल है मोर हमारे पब्लिक काम करने वाले इन मसलोनी तरफ से बिलकुल गाफिन बैठे हुए हैं। कितने ऐसे अखबारनवीस हैं या रेजोल्यूगन पास करने वाले फ्ला है जिन्हान विसी जिला मे दौरा करके यह तहकीक किया है कि कितने मदरमा म इमारत है और स्तिना मे नही । डाइरेक्टर साहब की रिपोट से जाहिर नहीं होता कि फीसनी क्तिने मनारस सरकारी इमारत पर पस कर सरते हैं। डिस्ट्रिक घोड के मेम्बर साहबान जैसे लायक और तालीम याफ्ता होते है उनमे यह उम्मीद करता कि इन मसलो पर वह कुछ तहरीक पर मस्त हैं विलन गवस है। यह भी क्या यूव धात है निजव यह लख धनपतराय ने जमाना में छपन के लिए भगा उन। हिस्ट्रिकर बोड हमीरपुर के अधीन सब डिप्टी इन्स्पेक्टर मोफ स्मज पर पर नियुक्ति की वात चल रही थी। २४ जून १६६ को रहोंन महोवा म इम नय पदपा चाज निया। उनका वमन भी तीस रपया महीना मे वर पर पचास रुपया महीना हो गया । इम पद की स्वीकृति का एक पारण यह या नि विजयनारायण धनपतराय के साथ ही रहते थे और धनपतराय ने माचा कि जब जिल का दौरा करेंग तब उह घर वानो की विरुप चिला न परनी होगी। ।

देशप्रेम र सरकारी कोप जिंस मोहल्ले में उन्होंने घर लिया वह कायस्था + मोहल्ला था। धनपतराय मयक माय भाईचार का व्यवहार करत । सब डेग तीज त्यौहार पर उनसे यहां पाते। एक बार जब वहाँ की प्रथा के मनुमार सोगा * रिमी बारात में चले जान पर एक हाथ म प्रारती और दूसरे म बेलन लिये मौरत गा बमा रही थी, धनपतराय पीछे रह गए थे। जव मौरते मरदा की परम्मत करने को माइ सो धनपतगय पर क मार वाहर परवान के पास भारपाई स जठार पर ममम माग गय । महाश म यह भी प्रथा थी जिससारी अफसर दूध घी मुफ्त नेने में। गार भी मेत थे । धनपतराय न यह मब सने सहार किया। यहां के रईसा न महा परि माप वाद पर घी सा भाग स य लोग किसी को कुछ न गे। उनके पार डालने पर धनपतराप केवल इतना ही माने हि मैं तो न लूँगा मर नौर से की । दूध तो इतना मिरता था जिनौर लोग सोया वनावर मात थे। स्थानीय प्रपा भनुसार अब लोग विलर मगारर करया दत ता धनात राप दही पक्षन माप पर लगवा लेठे पान-मोड़ा मुह म हाल मेने पौर वगन गीर हो मते परन्तु रुपमा न मते । महत यमरे निदान विमाफ है । भाप हमर पिm मुझे मारें। घनपतराय मानहनो स पित्र का व्यवहार मरम । जाउन मका होता, उसमीपजत परत गिरिमागरे अक्मर भी उनमा। जर मह महोया प्राय तो चापा, उनपे भाई और पुन भी माय प्राम प। तीन महान याद पापी प्रपन दूमरे भाई से यहाँ पानपुर लौट गई। पुष निागर विपनारामण की मृत्यु हो गई। विजयनागयण सनर दौरे पर जाने वा नर घरमा ध्यान न प पनपनरायनी उन देहान म वहा दुगहमा । म म मा ग पर हर गई मितपत हो गई। जिम इम्पपी पीडी मारा और तमन्नामा म या सित frया था वही प्रय जीमाबमास हो रहा है। वीवा का तनहा छोटार मेरे परगनाई। पनपतराम मोवी ग पहले, सुम भी दौरे पर मेर माए पना | यही तुम परतो पहो रही हो यहाँ मुझ पित रहता है।' पान्नु शिवरानीरवी मारे पर जाना पम” न था। गौन frनानी अपनी बीवी को सारगैरे पा घूमनाएर समाणमा हागा। में पारा तुम पुरानी माता को पपन शिपाग निराम ! मुझेना समाया-मानमानुमायो । दसा सिमने माराम महत महिमान है।

कलम का मजदूर प्रमच व तभी तो परेशान होत है । मैं दौर पर रह पौर तुम यहाँ अक्ली इसम क्या लाभ है ? नज्जा मालूम होती है। और फिर माम यहाँ कल वहाँ । क्या माराम होगा? मैं भी तो रोज घूमता फिरता हूँ। मापको तो घूमने के लिए सरकार वेतन देती है ऊपर से भत्ता। शिवरानी यी नहीं मानी। दौर पर जान की अपेक्षा वह माली रहना बेहतर समझती थी। दौर पर भी लिखने का काम जारी रहता। जव मुमाइना करना होता तो उस काम को मुग्सिो के हाथ देते । कहते क्या करूं मैं जो मुमाइना मरता हूँ तो मुरिस सोग लरको के सामने पर्चा छोर पाते है। इस वास्त यह काम मैं उन्ही पर छोड़ देता है । कम-से-कम जिसस यह तकलीफ उहे न उठानी पढे । ये वेचार खुश भी रहते । म या मुमाइना हो जाने पर उनकी तरक्कियाँ भी होती हैं। उह अपने अफसरो की सहानुभूति तो नहीं मिली। मातहना के साथ मापने माईचारा हमेशा किया क्योकि अफ्मरी करना उहे पसन्द न पा । उनका कहना था कि अफसर वनकर इन्सान इन्सान नहीं रह जाता। ईयर मुझे इससे इमेगा दूर रमे । धनपतराय घोड़े पर चढकर गैरा करते थे। अपने घोडे का वह बड़े प्यार से रखते । सर्दियों में वह स्वय कम्वल मोढते और दुशाला घोड़े को मोठाते । फिर बैलगाही की बात चली। बलगाडी ल लता तो कम से कम वीस रुपया उसका भत्ता मिलता । पर क्या करूँ ? रुपय नहीं है। पाखिर गिवरानीदेवी ने अपनी जोडी पूजी के डेढ़ सौ रुपये उनको दिये। बनगाडी मा गई। एक दार धनपतराय सपरिवार इसम वैठकर चरखारी में मला देबन गये । चरखारी रियासत के राजा ने खूब प्रावभगत की 1 गियरानी देवी लिखती है-- कभी-कभी घूमन की मेरी इच्छा होती तो मैं कहती कि जगल मे चलना चाहिए । माप सहप तैयार हो जाते । हम दोनो जगल के शुरुपात ही में गाड़ी छोडकर भीतर चले जाने । दिन भर यही झरना म पानी पीते पल खाते पहाडा पर चढकर सर करते । गाम तक महावा मा जाते। महोबा हो म धनपतराय में दो लड़कियां हुई। एक तो बाल्यावस्था ही में मर गई दूसरी कमला जीवित रही। कमला का जन्म १६१२ म हुमा था। धनपतराय को सारे जिल का गेरा करना होता या और कभी-कभी तो डगे महीना वह लगातार दौरे पर ही रहते थे।

देश प्रम कारण सरकारी कोप - एक बार वर दौरे पर ही यदि एर महत्वपूर्ण घटना घटा । इसका मम्ब घ उन पहाना मह व प्रकाशन स था। जमा हम वर चुके है 'माजवतन पर प्रिंटर पोर पनिार का नाम नही छपा या । 'नातजुर्वकारी भौर प्रस एप यायम नावारफीयत' म गलती हो गई थी। मजिस्ट्रेट ने इस भूल लिए पोटर 'जमाना पर पचास रुपमा जुर्माना किया। मी० भाई० 10 द्वारा जापगतान म यह भी पता लग गया कि नवावराय ता देवन उपनाम है वास्तव म TT क्षिा विभाग में एक मरकारी नौर धनपतराम है। एक मरपारी मुनाठिम और 'सायनन जसो मसमूम पिसाय का मुसनिक सावा। तोवा, सी० माई डी० की रिपाट जार हिस्ट्रिपट पटर तक पहुंची। पब सुनिय प्रेमच रे अपने पारणेम- एक दिन मैं रात को अपनी राइटी म वठा हुमा या रिमो नाम लिसापीर या पाना पहुँचा मुमम तुरन मिलो । जाड दिन ! साहय दौर पर ५। मैन वनगाही जुतका पोर गत रात तास पालास मील तर पर दूसरे रिन माहव स मिला । साब सामन मोजपतन का प्रति रती हुई थी। मा माथा ठना । म वश में नवावराय के नाम म सिखा करता था। मुझे मका कुप पुष पता मिन पुना था कि युपिया पुलिम इग किनाम से सवय सी गार म है । समझ गया उन सोगा न मुझमाज निमारा मोर उमी दी जवाब-ही परत न मि0 मुझे बुलाया है। माहब ने मुझम पूमा- यह पुस्ता तुमन मिमी है? मैंन स्पीरार रिया। माय न मुझम एम ए सनी पारय पूपा मोर मन म बिगहार याम-'तुम्हारी कहानिया म मिओपन भरा हमा है। पपन भाग्य को क्यानो रिपती समसगरी महामुगलों का गम्प हाता ता तुम्हार दाना हाप काट लिए जाय । तुम्हारी सानिया एकागी , सुमने पाना सरकारमा सौहीन पो है पानि झगमा यह हमारि मैं गोरेवतन' की सारी प्रतिया सराय (वारसा पोर गाय का अनुमति बिना समी रुघन लिए। मैंने गम्भा पा मम्न । पर हर प्रतियां पी पी । प्रमी मुस्लिम सोनगो यिसभागातमो नियामने 'हमाना पार्यापय मगवार गारपी गवामपपरा रस। मन गमना सामना र पिपितमि रोलनी यामानी म मनाम मा मुममा माममा तिमाहब ने म विश्व में सिप ममाशिम पगम पिया । मुगरिर पुरिम रिण ५ कसम का मजदूर प्रेमवर मसकर मौर डिप्टी इसपेरटर-जिनका मैं मातहत पा-मरी तकरीरमा फैससा सरने बछ । एक डिप्टी क्लकार साहब ने गल्पो स उदरण निकालकर सिद्ध किया कि इनम मादि में अन्त तक सिडीशन में मिवा मोर कुछ नही है । पौर सिलीगन भी साधारण नही बलि महामक । पुलिस क देवता ने कहा-- ऐसे खतरनाक मामी को जरूर सरून ससा देनी चाहिए। हिप्टी इसपेकर साहब मुझमे बहुत स्नेह करते थे । इस भय से कि कहीं मुमाममा सूल न परह ल उन्हाने यह प्रस्ताव किया कि वह मित्र भाव स मर राजनीतिक विधारो की पाह लें पौर उस पमटी म रिपाट पेश करें । उनका विचार था कि मुझे समझा दें और रिपोट में लिम्व दें कि लेखक क्वल कलम का उग्र है और राजनतिक भादोलन से उसका कोई सम्म घ नहीं है । रमेटी ने उनमें प्रस्ताव को स्वीकार किया। हालांकि पुलिस ५ देवता उस वक्त भी पतर बदनते रहे। सहमा फ्लक्टर माहब ने डिप्टी एसपक्टर से पूछा-मापको माना है कि वह आपसे अपने दिल की बातें कह देगा। डिप्टी साहब ने कहा- जी हाँ उनसे मरी घनिष्ठना है। माप मित्र बनकर उसमा भेट लेना चाहते । या तो मुखबरी है। मैं इमे कमीनापन समझता हूँ। किष्टी साहब अप्रतिम होर हामाते हुए बोले-~-मैं ता हुजूर पहुक्म साहब ने यात काटी- नही । यह मरा हुमम नहीं है । मैं ऐसा हुक्म नही देना पाहवा । अगर पुस्तक मे लेसर ना सिडीगन साबित हो सके तो मुली मालम म मुक मा चताइए नही धमनी देकर छार दीजिए। मुह म राम बगल मे पुरी मुझे पस नहीं। जय यह दत्तान्त डिप्टी इरमपेकर साहब ने कई रिन पाये खुर मुझसे कम तो मैंने पूमा-या भाप सचमुच मरी मुसबरी परत ? वह इसकर बोल-असम्भव । काई पास स्पय भी देता तोन करसा। मैं तो देवल मालती कारवाई रोगना पाहता था और वह म गई । मुकदमा मदालत म जाता तो ससा हो जाना यकीनी था। यहां प्रापकी परवीरले वाना भी वाईन मिसता मगर साहव है शरीफ मारी। मन स्याकार किमा-बहुत-ही शरीफ धनपतराय का प्रतिमा लनी पडी मि माजवतन बार जो उसे मसार का निवारर उनी ग्राना लकर ही छपन के लिए भरेंगे । सोपा मस्ते छूट गए परना नपा प्रजब या मौरस मी हवा बानी पडती ! घर पर मारर बीवी का मारा रिस्मा मुनाया। मुघ निगे रेगप्रम के कारण सरकारी कोप ५६ शिवरानी देवी ने पूछा 'तो फिर लिखना मी भव बन ही समझू? धनपतगय बोले, लिवू गा क्यों नहीं ? उपनाम रखना पड़ेगा। धनपतराय किमनी दुविधा में हांगे, इसका पता इस बात से लगता है कि माना से माच, १९१० के मन में उनकी एक कहानी गुनाह का अग्निमुण्ड' छपी। इमरे अन्त में सेना का लिया गया नाम था अफसाना पुहन । अप्रल मक म मर दरवरी से पहली रिप्त द लखर का नाम भूत स नवावराय छा गया परन्तु मई जून और जुलाई में मसराम नपारराय का नाम नहीं छपा। मई, १६१० के एक पत्र म दयानारायण निगम को उन्होंने लिया--- जसा भाप परमात हैं वसा ही होगा। मेर किस्से प्रवकही न जाएंगे। मुप्राविधा का कि मुझे मुद मकरूह मालूम होता है मगर बात यह है कि छोटे रिसों के गढ़ने म दिमागी उसमन बहुत रपारा होती है। और तापते कि तबियत को यह भर न हो कि इसस दुध मुबलिए बसून होंगे वह उस माम की तरफ नहीं होती। हर मानिस यही मार है। नयायगय नो ग्रासियन दुध दिना के लिए इस महान स गय। दावारा पार पहानी हुई है तुमने मुनाहिता म गा अपवारो मजामीन नही मिरा मगर उमरा मना हर स्मि की तहरीर मे पा। गाया में कोई मजमून साह रिमी मजमून पर -हाथीदांत पर ही सपो न हो-मित मुझे पहल पह जनाय ने मार सकर साहस यहादुर यो विमान में पाना पड़ेगा। पौर मु. प-पमाहे सिखना नहीं पर ता मा रोज का पाधा हराहा माह एप मजमून माह बाबा की विग्मत म परेगा तो वह ममगे मैं मपन पराई गरगारी में गयानन परला है। भोर पाम मर सर पोरा जाएगा। इममिए युध निार सिरा मायगय मरहूम हर उन जानगीन कोई मौर माहव हागे । मार मरा मउपून निवारण रगन रे या मी निरागमती मो देपा नगगे। मप्रात्रा भी निस्वस को मापने परमापा वह मुझे मनूर है। पगर मनमून मना रहा कि एर नम्मर म निरनam तो गम्स और पगा TRP नम्बरा म निबन-दश नोन म-नो उमरा यमग भर । "मैं प्रबरिलाह और पहल भी रह थापा मगर रिमा पना ग पर रिमा पाने नगरपावरपा या मुरनिगान मैं परन सगर र मी साउगा ! E मरहम पगमागान नपर होग! तपोभूमार मम पर मौनाएन पपरवा पौर समाना नाम न ना गित माग ग गाउपर समायम होगाsir मापना पाहै मगर mal| गर मामान कलम का ममदूर प्रमच द जिनका मागाज कुण्ड स होता है पौर श्वर न चाना ता गायन कुछ गिना तर यह सिलसिला जारी रह जल्द या वर पिस्सा का गान म निकलगे। गगर पाप निरानेंगे ना चोयाई नपा मरा मौर में निकाल गा ता चौथाई नफा आपका । गोया मेरा मोर मापका इन पर वगवर का मम्निमार रहगा । मरा नाता उनसे जमाना म निक्ल फुक्न क बाट भी लगा रहगा। किताबी की फहरिस्त भजी थी। उनकी कीमत मनजर साहब न न लिखी। स्वामी रामताय के लिए मैं क्या फिक्र करू। अगर माप इमे टम्ट दुर बमला में भेजकर इनाम की मट म मजूर करा लें ता मलवत्ता सौ-पचास जिल्ने निकलवा सक्ता ह। पाप मय कभी कभी इलाहावार पी सर करते नजर माया करें और इनामी किताबें शाया वरन की फिक करें। मैं इम काम म भापको बलमी मुमायिनन करने को मामाना है। फ्तिावा की लिम्बाई वगैरा मची हा भोर मजूर हो जाएं तो कुछ फाय* की मूरत निकल मक्सी है। मोर कहिय क्या खवर है ? बन्ना तो कगए प्रातणीन म पडा भुन रहा है । इमसान सस की टट्टी वनवाई कि नहीं? वाह क्या ठडी हवा है और क्या फरनबरश ! यार स रूह पड गई। वाए बरहाल मा कि इम टट्टी की बहार से रहे हाग 1 मैंन मख जन मांगा था वह मापने न भेजा । काई नाव न गुरहो बाजार से लिया हो तो वह भी बरग भेजिय । इलाहाबाद की लाइबरी को निस्वन दपित किया था मगर वह माऊट स्टेशन म पिसाव नही भेजते । अव की इलाहाबाद जाऊँगा तो अपने खुम जाना को मपना कायम मुकाम बना भाऊगा। यह अपने नाम से किताबें लेकर मेर पास भेज दिया करेंगे । जून म इनाहावाट यनारम वगरा की गरम हवा खाऊँगा। सी पत्र म लिखत है हिदी परचा का क्या हश्र हुमा ? यानी उसकी तजवीज वटा म पड गई या वानी है ? निकलने वाना हो तो हि लिखने की मादत डालूं । अव की मरस्वती ने नारद वगरा पर तीन तसवीरें मच्छी निकानी पौर मूर स पर मजमून मछा है । माप भी हिन्दी लिटरघर पर मजामीन लिबाने का तुग निशानिर । सूरज नारायण महर' शायर निखें । मोर नजदीक व दूर तरी जो खबर हा पास-पडोम भी उसस मुत्तिला कीजिए। नजर साहब ने अपने रसाले को बिलकुल इमलामी ग पर चलान मा मीरा ढाया है। प्रगानी कहानी 'रानी सारधा जमाना के प्रगस्त सितम्बर १९१० मा में देश प्रेम के कारण तरपारीकोप पषी । मगर इस पर सपा का नाम नहा छया। बस सवाधिरार सुर्गन रम्ब गए हैं। पाव इनाहावार में कहानी पौर साप पत। इन पर वन सिखा जाता। यही वहन सौपे रसवाई सिंग तला मोर गाय वगरर मामिन पहातो भी इसी मासिक म मुसी। हम पार का ध्यान इस तथ्य को पार भी पीचना चाहते हैं वि मार घनन पर पाति वटाए जाने के बावज भी धनपतराय अपना दूसरा पहानी सग्रह पचाने म लिए उत्सुक य । एमबहानी विज्ञमालित्य का तगा समाना को भेजत हुए निगम को लिपत है- यह frस्मा मिनार मरे पाँच विस्सों का मजमूमा निकालने को पापी ममाला जमा हो जाएगा। अग्निकुण्ड सर (दरवर), मार पा गरज मागिन (जो पदीच मनिनलगा) और विक्रमानित्य का सगा। अगर माप इस मसपा को निपानंगे सो मैं इसमे पागउ मोर निम्बाई रे मुनमानिक जिमकर सो माप सनवीर पगे दूगा। मौर पर पाप पर निकाल सो और भी पन्या असा मुनासिब समझ, करें । मगर एमा हो कि नये साल का सपारी हो जाए। इस मनपा का नाम वर्ग सम्म साषा है। नायर माँ जनामा पमनपाए। माय इनसिएनिमें नामाम भापकी पसरा . 'पानारापण निगम ही ने नवागराम पे गानगीन ग म प्रमचन RTI पनपनाप ने निगम को मिला प्रमान प्रधा नाम है । मुझे भी पर" माम मिए यह है कि पोस-य सान म मवावराय र प ६ने सीमाना मी गई वह गर मारप हो गई। यह भरत निस्मत महा महर और पाय रहेंग। समाना निमार १९१ मा एपहानी गो पर पी वीके मननयमन niraसरिए किराण निगरको मेटेलन' करेपरासी राममा भारसान' मेन परमा (द) में हम श्री गुरनने में मरनेस रिमा पनकर मनसे दरी नाना पार पा ११ ला पण परपरा में पा| पुग्न यो मापा परमिदमत्रमे पन्यादानी irth परमामsasrt में ग्लिो कलम का मजदूर प्रमचव शीन से छपी । इस पर पहली बार प्रमधन का नाम छपा। बहुत दिना तक प्रमचन्त के उपनाम से लिखे विस्स कवल जमाना ही म छपवाय गए। मोव के मम्पाक प्यारलाल गादिर न एक बार पूछा कि पाप प्रमच' का नाम उन कहानिया पर क्या नहीं लिखत जो प्रदीव को भजत हैं ? धनपतराय ने उत्तर दिया- मैं मुगी दयानारायण निगम से वायदा कर चुका है कि प्रमचन्द के नाम से किसी मोर पर्चे मन लिम्बूगा। बिला पज उनका रिस दुस्याना मुझे मजूर नहीं । इसका एक कारण मौर मी था जो उनके निगम को लिखे पत्र के मश में विरित होता है। लिखते है-- मव मुछ रुपया पदा करने की बातचीत अव की एजूने गगनल गजट इलाहावा न जमाना से नक्ल दिए है मगर वाला नहीं दिया। खर। वह जमाना के कायल जरूर मालूम होते है । क्या यह मुमकिन नहीं कि आपकी तरफ से मैं उसके लिए कभी-कभी मजामीन लिखा करूं? मर लिए कनर का हर एक मजमून रिखाने की ऐसी वी पख लगी है कि एक मज़मून महीना मे लौटकर माता है पोर छठ महीन छपना है। रियासत भोपाल अब जार छपा है । मगर एडीटर साहव तवील मजमून लते ही नही । मगर भाप इसम काई ग्रन खिलाफ शान न समझे तो मैं कभी-कभी एक प्राप मज़मूर उर्दू और हिन्दी म तिखकर मापके पास भेज पौर माप इस प्रपनी जानिय मे इसपर साहब नारमल स्कूल के पास भेज द । यही इस गजट के एडीटर हैं। मेरे खयाल में इसम कोई हज नहीं है और न मोई कलमी वेईमानी है। इसका जवाब जरूर दीजिएगा। पाग प्रेमचन्द' का नाम मैं वहाँ नहीं देना चाहता । नहीं मानूम यह हजरत हाय-पर संभालने पर क्या लिख वठे । इहे विस्मा गो ही रहन दीजिए। वैठे- वठे प्रम मोर वीर रस के निस्से लिखा करें।

प्रेम और वीर रस की कहानियाँ प्रमच द प नाम म ही मुछ जादू है। कोह काफ की परियारा हातिम ताई २ पिस्सोंपा मोर फ़ारसी साहित्य का प्रभाव जो १९०७ स १९१० तक को निती गई नवावराय पहानिया म प्रदान है प्रमचन का उपनाम ग्रहण करते ही यह मध्याय समाप्त हो जाता है। बरे घर की यटी प्रमपन की सर्वोतम महानिया प स है और उस ससार यो अच्ची-समयी कहानिया म गिना जा सकता है। वेगरज मोहसिन पोर माह वेश्म (गरीय की हाय) म सामाजिय जीयन विशपतया निधन पर तु स्वाभिमानी सागा 4 जीवन पर रोशनी पाती है । परन्तु इस समय की प्रपिपतर पहानियाँ पीर रम की हैं। स्टी रानी पा शिष हम ऊपर पर पुष हैं। उसस विलित है कि प्रमन (पब हम धनपतराय तया नवावराय मे नाम स विग सेते हैं) पर राजस्थान ५ इतिहाम मा यहा प्रभाव था। १९१. के या की पहानियां हमीरपुर (महोवा) , पर उपर क्षत्रा म प्रमलित कहानिया तया एतिहासिक पटनापा से पापार पर लिपी गइ। गरीव मी हाय कहानी म प्रमचत स्यय यु सग की दा प्रचलित क्यामा पाहवासा दत है। पौर प्रमघर की बहुत सीपलानिया म बु"तगण्डर भूगामा भी वणन नम्पिों पहारा तपा म्पानाम नाम मोरया गरिय गए हैं। हमीरपुर दिला उत्तर म यमुना नगै स सारण मदिप पहाड़िया तर पनाहमा है । दर्शणी भाग म विग्म की छोटी छोटी पहारिया है जिनस वार रामनया धमान सपा मिरमा नन्यिा महनी है । पहारिया पर वृक्ष बहुत पम है। वर्षा हा पोगी होती है । परन्तु पला रागापो मुगुम तपा मराग रारापो ने पानी बोराहा परन मि जगह जगा बनाया भी बना निपाणु यह न बन रमणीय बन गया। महारा र पाम एष मीन है जिसरा पेग पार मीन है।

कलम का मजकूर प्रमचन्द हमीरपुर म पांच तहसीलें हैं । महोबा तया कुलपहाड तहसीलो को मिला पर एक सब डिवीजन बनाया गया था। महावा नगर का विशेष स्थान है। इसका इतिहास भी कानी पुराना है । बहुत दिनो पहले यहाँ गदरवार राजपूतो का राज्य था। नवीं शतालीम बानो ने अपना राज्य स्थापित किया। इनकी रामधानी महोबा ही थी। फिर मुसलमान माये । १६८० ई० म प्रसिद्ध बुदेल सुरमा छत्रसाल ने मुगलो को हराया। बुन्नेलो को मराठा सेनामो ने पराजित किया। फिर भप्रेज माये । इतने प्रातक के कारण इम डिस्ट्रिक्ट में जगह जगह छोटे छोट, क्लि है जहाँ छोटे छोटे राजे अपनी सुरक्षा का प्रबघ करते थे। रानी सारया का किला घसान नदी के रिनारे पर या मोर यह क्या भी एक बुन्देल राजा की है। राजा हरदौस भी एक बुदल राजा की कहानी है। पाल्हा कहानी भी चल इतिहास से ली गई है। गरीय को हाय म एवं स्थान पर प्रमचन्द ने लिखा है कि रानी सारधा पौर राजा हरदौल की पहानियाँ प्रचलित हैं। गुनाह का मग्निकुण्ड (पाप का मग्निकुण्ड) राजपूताना के इति हास की एक घटना पर माधारित है। विक्रमानित्य झा सेगा या सम्बव महाराजा रणजीतसिंह (मिसकी जीवनी पर प्रमपद न १६११ में एक लख लिम्वार जमाना में छपवाया) से है। इस कहानी के बारे में प्रमचन्द ने निगम को सिखा था- यह किस्सा मेरे खयास में कई महीने से पा । मैंन मपने खयाल म रवी नाथ (ठाकुर) ता की कामयाबी के साथ परवी की है। मगर दुरी नकल नहीं है । प्लाट बिलकुल पारिजिनल है। मैंने तो कई मलम ताह दिए हैं। पौर दस पांच वक मी काले पर डास है। मालूम नही प्रापको मी पसन्द माता है या नहीं। राजहठ में छोटी-छाटी रियासतो के शासन का मजाक उगकर दिखाया गया है कि कोई राजकुमार यदि कुछ करना चाहे तो कर सकता है। मजिसे मकसूद का प्लाट कुछ नहीं है । एक पद्यात्मक कहानी है । प्रालिम इबेममल म एक पति क छिछोरेपन का मजाक उहाया गया है ! नमक का दारोगा म ईमानदारी र परिणाम पर रोगनी डाली गई है। तिरिया चरित्र ममावस की रात मघर निगाहे नाज मिलाप बौका जमीनगर, मिफ एक मायाज मी इमी समय प्रकागित हुई। ममता म रिवाया गया है कि मां का प्रम क्या कुछ कर मक्ता है । इमम ईसाई पादरिया रे माय तथा प्रायसमाज के प्रपार की पोर संक्त भी है । विक्रमादित्य मा सेना' पहानी के सम्बन्ध म एक पत्र म प्रेमचट न निगम का ममत - प्रम और वीर रस की कहानियाँ लिपा- रामारण का मन मुझे उप वक्त मिला जब डामा लिखने व निरा एक हफ्ना की मालत भी न थी। दुआ में प्रौर कुजा मा । गाना बिलरा ना जानता। अगर मा' गाना (रिलाय) ना मैं अपन विक्रमारित्य का नया का ड्रामा वना माना। इभी एत्र म भाग पसार एक वाक्य है- क्या नावल गुरु कर लिया है मगर इस लिए राजस्थान र मुतलिमा की उम्रत है। (यह पत्र १६१० ५ पामिरी परण का है। दिवमारिस्य वा तगा पनवरा १६१११ मा म पा पा) सफा समेत शायद 'जनवाना ईशार की भोर है। इम १६१२ म दरियन प्रम, इनाहारा न झापा था। इस भाव बारे म दुध पिसन स परल हम सामयिर नावन सम्बयम प्रमय के विधारा क बार म मुछ पटना पावश्यक मममन हैं । इस सम्बयम हम प०र० प भगस्त १९१० में पीय' म 'उदु जान पोर नायल के दीपर से धप एक सय र म मा उखन करत है। धमी पर्न जमाना नहा गुजराशि उद्र उमान म नापस नवीमी और नापलमवाना वाम थी। ५० ग्लनाथ सरशार मोसवी पारम हलीम परर मुनी मासिन मौर हीम मुहम्मद मती प रस्मगरापी उही रिनामा या है य सोग इस मनफे प्राय म पारोमा नाम कर गए। (योनि उडू दुनिया र लिप नादल ए पता चोर यो) रेनाल में नासा बारिक करत हुए मोहापान्हाम विगत प प्रमचर लिम है- हमसे मारिम न नावल लिपना शुरू नियामन पोर सलिम पतुलमा मोर मापूमी तिमाल झोग, बिहे मी पमास प्रामार या' हा गए मम सरमा गा और ममा धना गुरूपियाई म मा यमर पार मी न पावारी हन माला लिम्मा मा गर पौर मरवार + मिवा परीरमरीर ममी ने यही सर अग्निपार रिया मागिर नावना मी परान हा गरि पान वाम तामा गए पन दमो मामा सार महागा। हारत र नरिम्य मिलना - पर पिा मुरम्प भनी मारव नमाना निगारी रामर या हा पारा मुनिक एमा नहीं है बिम हम गुगमिपन नामनिराशर गुमाल धौर मगाम म नापनाकोगेश-बगेर पाती माती है। मगर (प्रिय मानरे नामसमा साम) सरित मपि है। पान पर नावल एवम पा जात है तार मीनाराम तिमी निगाह पाता है frमानाना पाया कलम का मजदूर प्रेमचन्द की भी आज इतनी पदर नहीं है जितनी माज सुबईमात यहस पो इसलिए जारी मालूम होता है । सरद बाजारी व कारही प्रमवाय से वितानजर करके मानवी पसबाब ढूंदने की कोशिश की आए प्रफ्साना प्वौ तबके की ना दो यहे हिमा म मुनकमिम की जा मस्ती है। एक मामियाना मजा वाल पौर दूमर सजील मजार वाल । उदू नावल इन दाना को मायूस करता है उटू पा वाल्स डिक्स मौजूद है मगर उद्या पवरे पाल्म रीड मरी वारेली जाज इलिपट प्रभी व ग नली माय बद्नावर नवी सो पब तक वजूज मरमार के तक्रोवन मब मुमलमान । पौर उन्होंने अपनी किताबा मे इस हिन्दू जजवा की मुतलिक परवा न पो जा मुमल मान हीरो और हिन्दू हीरोइन के ताशु म पदा हाला है नावला की इस मला वाहारी पावर मरदम करने के लिए हम तयार हो जाते अगर इसका मसर हमारी नावल नवीसी के मयार को ऊँचा र देता अगर फिसाना नगार तवाए इसानो न मच नमून पेश नग्न लग । विस्मती में इसका असर नावलों को मुल्क मन्म की तरफ ल जा रहा है । १८ क उन मतमात की फहरिस्त दपने से मानूम होता है रि इस मया म सिफ दो नावल पाया हुए। जरूरी मासूम होता है कि उधू जबान में शोई मोर मुमावनीन इस खयाल को दूर करने की कोशिश करें कि नावल पढना सम्व महज और तसनीहीकास है परवी दुनिया में पिस्सा का वही स्लया है जा पिसी महफिर म सदरे मजलिस का। किसी जयान का भाव ल लीजिए अफ्माना पा रग गालिय पाएगा गुजराती बंगाली क नावला का हवाला देते हुए पोर जान लक की उस कितावमा जिमम उहोने मो सर्वोत्तम पुस्तको का वरणन किया है हवाला हुरा प्रमचन्न लिम्बते हैं कि कैवल अमीर लोग ही तारीख गजनीति पल सपा इतिहास हिसाब मा अध्ययन कर सकते हैं मगर भावारीका बहुत बड़ा हिस्सा वही है जिम चौवीम घण्टो म से बारह घण्टे फिक्ने मुमारी की नजर मरने परत हैं । ये गरोच मा तो नावल पद सक्त है या कुछ भी नहीं पद मक्स सब का मन्तिम भाग इस प्रकार है-- नावल नवीसा को भी सयाल रखना चाहिए कि उर्दू नावल सा मुस्तर विस उसके हाथ में है। वह उस्तादाने फन की ससानीफ का गौर करना चाहिए । उनका फ्रज है कि नवा इसानी का नकर शायर से महिला परें और सच्चे जबात + नमून पेरें। पग्लिर का मदनी मयार रोज-बगेड उभा होता जाता है पोर अग्रेजी तालीमयाना लोग अपनी प्रधान म भी वही सूचियाँ देगने को मतना है जिनकी उनकी निगाह हो - - । प्रम और वीर रस की कहानियाँ रही हैं । वनिता मजिहत सपालात म ताजगी जजयात मममर अग्छ नावर जरूरी लवाजम है । वंगला जवान क नावला का मुनलिया उनर लिए बहुत सबो मामोज सावित होगा । नावल लिक्ना मासान काम नहीं । साय पिसी म फे सब म इस कदर जरत्र खपाल । इस कदर दिमागी इनहमार और इस कार ससययुल की जरूरत नहीं होती । उन्ह रातें खयाल मजवर काटनी हामा। उन्ह सुबह शाम तनहापुर फिजा मकामात को सर करनी होगी। उह इसजा सतीम के रसाम की सगाचीनी वरना होगी। तब रही उनकमसम स पुरजार नावल निरलेगा। पर वह उमाना नहा रहा जर पग्लिर वेगिमाना मागिता से मामूग हो जाती यो। पब्लिक का नुक्ता निगाह भत्र पुषता होता जाता है। हमार नामल नदीम प्रगर जिन्ना रहना चाहते है तो उह जमाना माप र म बहाना चाहिए। उडू उपन्यास की १९१० की परिस्थिति तथा प्रमयर पी (नापत वारे म) राय का जिक्र कर हम प्रमपन भगल उपयाम जलवाए ईसार का परिपप दसे हैं । उस सस मे पपने समय हा प्रमच न भपना नया उपायास लिखना माराम पर निया पा। इसम राजस्थान या नसर इतिहासकोमा भरता नहीं मिलती, परन्तु यह उप यास १९१२ म इडियन प्रस इलाहावार स प्रालित मा और इस पर समर का नाम 'नवारराय ही पा । मम्भव है इसका उन्हान स्वप इरियन प्रस, मनजर को लिया हो मोर नवावराय र नाम पर प्रतिवय सगन रा विष न लिया हायहहान यह उपयास नवारराय नाम सामाघिरी मति है। इस उप यास (बलास-मार) भै मारम्भ म ही मुवामाग्यो म यर गान मागतो है यह उम एर मपून मटा दे। सपून कौन होता है? से गुम मा नाम रोशन रे?' "नहीं। १३मन- पुत्र ममतारा ने सिउरे जहाँ तक मालामा सामान्य का जिमninविशाम मुसगनापा नि गोरी न माना पुन 'ममम ममा प्रममा उस्या र अपामर शहरोमा नप में दम गुमाएर भान सिर स्यानामनिरम ने, गाउन Fort प उमगलान नाममा तो मार मार मे पारामार माने गन'नरेन पर पानी भर जाना ।

६८ लिम का मजदूर प्रमदद प्रमथर . जो मवाप की सेवा कर? नहीं जो विद्यावान हो भौर बलवान हो । नती। जाता फिर सपूत बेटा किसे कहते हैं ? जो अपने देश का उपकार करे। प्रतापपर की मां पति की मौत के बाद पुत्र को गरीबी म पालती है। पुत्र मा उसी घर म रहने वाली एक लड़की नजरानी से प्रम हो जाता है परन्तु धजरानी का विवाह एर बाइज्जत घर के निखटल लहर से है। प्रजरानी का पति एक हादसे म मर जाता है। प्रतापचन सयासी वन जाता है। देश के उपकार काय मे इस लगन से लग जाता है कि उसकी धूम मच जाती है। बजरानी बानाजी (प्रतापचन्द) की प्रासा और सम्मान देख- कर बहुत प्रसन होती है मोर कविता नियती है। पाज पचाम धष वा जलवा ए ईसार' को क्मिी भी दृष्टि से उत्तम उपयास नहीं कह सकते परन्तु १९१२ म जब यह प्रकाशित हुमा था उस समय यह उपयास सारी कमजोरियो क वावजत एक नई पीजमा। प्रदीप (माच १६१३) ने इसे मुशी नवाब राय का मोरिजिनल और अछूता नायन बनाया और कहा नि पापकी तसनीफात हम खुर्मा पो हम सयाव सोजवतन दिगना वगरा इसमे पेशतर मुहर में इतनी गोहरत हासिल कर चुकी है कि जरूरत नहीं कि आपको निस्बत पुष मोर लिम्बा जाए। जपाना की मालोचना अदीब भी मालोचना से थोडी भिन्न है। इसमे मानोचक ने जो लेखा का नाम गलती से नवावराय की जगह नौबतराय लिखा है (नौवतराय के नाम के भी एक और लेखा जमाना म लिखते थे) नवावराय की नई पुस्तन की घज्जिमा तराई मगर एक इतनी महत्त्वपूर्ण वात निखी कि हम मालाधना का एक मा उद्धृत गरते हैं। 'मुशी नवावराय साहब मुमन्निफ सोजवतन गिना वगरा का यह पुरलुरफ नावस बहुत-स अम्लाकी व मुमाश्रती लिपस्पिया का गुजीना है जो इदियन प्रस इलाहाबार में शाया हुआ है । हुम्न मा-इश्क की चागनी 4 साथ साय इसम ईसार नफ्स पोर हुन्बुलवतनी बा बजा भी मौजूद है। पौर दररकोक्त नावल का माहसल भी यही है। पहन ही सीन म सुवामा दवी से एक मपूत वेग मांगती है जो अपने देश का उपचार करे। एक जाहिल भौरत की यह इस्तदा पिस पदर मुबारिक है जिसकी खुट देवीजी ने गा दी है।

प्रेम और योर रस की कहानियाँ ६६ प्रतापचन नावल रा हीरा है जा मुवामा की रवाहिश + मुतावित मत निरला विरजन पाम दास्तान की होराइन पर सपन है जिमन वापर एक दूमर रारूप य माय गारो हान व भी प्रताप को उस मुहवत का हक मा रिमा जो दोनो चरन म पग हो गई थी। नावल का यह हिम्मा बहुत लिस्प है मोर पाय मुहबत व जजबात एक खाम लिप शा रखत है । माया प्रफमाना नवीस ने मनफाज को सहरतराजी स सारा दास्तान का Pार बनाया है। लेकिन प्रताप दा उपचार का दास्तान इस बार मुनासिर है रिदासो यतास सफाहात की हजाम किताब म "समा हाना-न हाना यासी है। ऐसा मानम हाता है कि मुनिफ ने प्रपन नावल + गई भरवावलायम परन हो म मारा जार तबीयत खत्म कर लिया और प्रापिर म मामाजा प्रताप मा उपर कमारनामा को प्रसनी तौर पर हम पदर घयान पर नाजरीन का टाल दिया कि उहनि गोपाल मोर मजुन मभार पायम की। बहानो दा उपसारनी कारगुजारिमा रमा तक्मीय घाती थी जिनका इस्तसारस नायर की बहुत-मी पत्रिका का राम नहीं हान देना । विरजन बहन जस्ती यवा हो गई थी। पौर वर प्रताप की मुदतन म मास तौर पर सरकार रही। लग्नि मासिर म माधुरी भी एक परेसर है जो प्रताप रग म सरतार हार जागन हो गई मोर वन भर एर मतवाली नागन मा हसियन स दरवार को मार छानती रही। पफमोम frm उपर की तरह यह दास्तान भी निहापच मुलमिर है जिम किस्म पा मशा निरनिराहा जाता है। मापुरीमा घोर नुस्स भी नगर पाता है। याना यह ब्राह्मणा थी और प्रताप गारियन पापम्य या पारि उस मालिका माम मती मामगराम बनाया गया है जो साधुपा पोर प्राह्मण न पा माला । इस गूगल म मापुरीमा शारीनागपाल ही सपमा प्रपर विरमन पी तालीम ने उग ज्या रान सपान बना लिपा पा मोर मुगन्निको गमरमरिम र मगमा पर राना बतायीता बहार हाता कि दानामा annanा मगर दामागे मन उम उम्र ठानिया रर और गापुमा की तरह गिररत रहरिगसग मारी तामा । यतो दिन मुगन्निापामा ति पता है कि or नापनिस्ट हागे इन गा" गुगावा पर भी रवा गार गुमिता गो यातरीन मगानी म शुमार न र नपि।

७० कलम का मजदूर प्रेमचन्द जनवा ए ईसार १९१२ म एक नई चीज था। देश प्रेम स्वाभिमान दगोपकार इत्यादि इन सब रमो से भरपूर है। विगी शासन पुलिस की करता तथा हिदी भाषा के बारे में भी इधर-उधर जिक्र है। एन समालोचक' + मनानुसार यालाजी (प्रतापचन्द) का करेसर विवेकान के साँच म ढला है । जसा कि हम पहले कह चुके है 'जमाना के मई १६ ८ मा म समचत (नवावराय) का विवकानन्द पर एर लेख छपा था। जलवा-ए ईसार को भाषा हमनुमा पो हमसबाब तथा मोजवतन से मिन है। फारसी के गम्गे की जगह प्रति हिन्दी या संस्कृत के सम्म का अधिक प्रयाग हुमा है। इसका एक कारण तो प्रेमचद पर भार्यममात्र का प्रभाव था। बस ता हमसर्मा मा हममबाव का पहला दृश्य भी पायसमाम मन्दिर म एक लवर से सम्बंधित है। घनमधारीलाल प्रमबद के प्रवक्ता ही हैं। परन्तु महोवा के क्याम (१९१ १४) म प्रमचन्द प्रायसमाज के प्रौर भी निकट मा गए । महोवा तथा निक्ट में क्षत्रा मे ईसाई पादरी गरीब नागा को वही तजी स ईसाई बना रहे थे। इसको रोक्न के लिए मायसमाज ने भी अपने प्रचारको को वहां भगा। १९१२ के मध्य में एक प्रचारक (मौनवी मालिम फाजिल) महाप्रमा तथा उनर हो मायी महावा प?ष और प्रमवन के घर पर ही ठहरे। उहोन लिखा हम तीनो ना सत्कार उन्होन निरन्तर सात-आठ रोम तक जिस प्रेम व नम्रता क साय क्यिा उसको हम कभी नही भूल प्रम तथा तीना प्रचारक साथ हा भाजन करत और विविध विषया पर वातचीत भी करत । विषयथ -(१) मनोवा से सम्बध रखन वानी एतिहासिक बात (२) ईमाई पारियो मा महोवा ही नहीं हमीरपुर जिले में काम-प्रम चन्द के अनुमार यह हमारी सामाजिक त्रुटियो का ही फल है कि महोबा भयवा बुन्दनपण्ड के म्याना में हिन्दुओं के मनेर नहनी नह ईसाइया के घरों म पहुँच जात है । (३) पायसमाज और उसके काय-सम्ब घी नाते । अपनी कहानी खून सफर म प्रमाद ने दिखलाया है कि जब ईसाई पादरी एक गरीब पिमान से लड़के को लालच देकर ईसाई वना लत हैं तो उनके बीच मे रहार उसम स्निना परिवतन पा जाता है । परिवतन उस ही मे नही उस गांव वाला म भी मा जाता है क्योकि जब वह वापस लौटता है ता गाँव बाम उसम टूपात परते है जमे उसका बन ही सप" हो गया हो। सकते। पमर राम।

१० पत्रकार बनने की इच्छा सोडपतन क बारे म हुई पारवाई से प्रमय वरे पुग्ध थे । प्रपत्रों के विष्ट उन्हे नमे एणामी हा गई थी। एक बार जब निगम ने सुध पक्ष हाविमा को एप सही की जाये रे अवसर पर पपन घर सुनाया सा प्रमरन ने निगम को लिया कि मापन मम हुसार पीवत नाहर की। भातिर इमसपा फायदा समझा ? निगम स्यय लियत है --- जहाँ सा में ममता यह बयान उतर सहन नगीन हा गया या उप पप्रेस हम हिदुस्तानिया से मिलान मसग पसा रहत हैं तो हम सोगावा भी उनम दूर ही रहना पाहिए। कौमी मुम्हारी म यह बो हामी ५ और परवी हिगीराई जमान म ससारी पतसरात न उन माय जो नामुसिफाना बरताव दिया उगमा मसर उना लि सभी आइल नही हुमा मोरयतन फ मुतमल्लिका हम की हारवाई सगमर या पी वारि उमा पिम्मा मान या किस पर उनो शिलार ईशानुनी कारवाई मी का सपना । प्रयम-रसारमोनियोभनमारकामपरी बारमारते गर निगम प्रबय प्रगया 4 स्टाप माननीयातचीन पनी। निगम न प्रमरा पलाया और उनसे पूछा प्रमचनमा उत्तर मनिए- पवम मावार पाल मुसामल (1) क्या जवाया। गनी पडू यह है fr यहाँ नेर मामानी सामगीता जाना है। दौरे सागर पौर मुमाजिमाको मनमा सामिन नही तो गे महान व भी पी। मोर ममाफि मानूर । गगर पाय म महा पापही (गर पुगे Fगानीम) पहन पास पाप गनामी में Afriपमा भर पर नहीं पता पोरनरोई पारदी है।निए मारामा मानम हानी है।ग मनापपरी शशिरी मागी जाम रागना पगार नो साता । हिमत नहीं पतय: मिटरसमसमामा-मपरोह है।

कसम का मजदूर प्रमषन्द जनवा र ईसार १६१२ म पर नई पीत या। देगप्रेम स्वामिमान दशोपकार पत्यादि इन सब रमों से भरपूर है । घिी शासन पुलिम की फरता तया हिन्दी भाषा में बार म भी इधर उधर त्रिक है। पर समालोचा' के मवानुमार बालाजी (प्रतापचन्द) का करेक्टर विवेशान के सांचे में ला है। जसा कि हम पहल कह चुके है जमाना के मई १९०८ प्रकप प्रमचन्त (नवापराप) का विवकानन्द पर एक लाय छापा। जलवाए ईसार की भाषा हमयुर्मा मो हमसवाव तथा माजपतन से भिन्न है। पारसी में पारा की जगह प्रचमित हिन्दी या सस्कृत शाका प्रधिक प्रयोग हुमा है। इसका एक कारण तो प्रमय पर मार्यसमान का प्रभाव था । यसे ता हमखुर्मा मो हममवाब का पहला दृश्य भी भायममाम मन्दिर में एक सक्चर से सम्बधित है। धनकधारीलाल प्रेमचन्द के प्रवक्ता ही हैं। परन्तु महोवा के क्याम (१६१ १४) म प्रमचन्न पायसमाज के और भी निकल मा गए । महावा तमा निक्ट के क्षमा मे ईमाई पादरी गरीव लोगो पावही तेजो म ईमाई बना रहे थे। इसको रोवन के लिए पायसमाज ने भी मपन प्रचारपाका वहां भेजा। १९१२ मध्य में एक प्रचारक (मौसमी प्रालिम फाजिल) महेशप्रमार तथा उनक दो साथी महोबा पहुंचे पौर प्रमबदरे घर पर ही ठहरे। उहान लिया हम तीनो का मरवार उन्होने निरतर साव माय रोज तक जिस प्रम घ नन्नता के साप क्यिा उसको हम कभी नहीं भूल सकते। प्रेमचल तपा तीना प्रचार साथ ही भाजन करत पोर विविध विषया पर वातचीत भी करत । विषय थ-(१) महोवा से सम्बध रखन वाला एतिहामिर बात (२) साई पारिया या महोबा ही नही हमीरपुर जिले में काम---प्रम चन्द ५ अनुसार यह हमारी सामाजिव श्रुटिया वा ही पल है कि महोया अथवा बुदलव स्थाना म हिन्दुग्रा व मनेर तीमार ईसाइया मे घरो म पच जान है। (३) पापसमाज और उसके माय सम्बधी बातें। पानी कहानी पून मफ्त में प्रमच द ने विसलाया है कि नय साई पारी पर गरीब विमान क ल ये लालच देकर ईसाई मना सेते हैं तो उनरे बीन ग पर उसम विनना पग्विलन ग्रा भाता है। परिवतन उस ही मे नही उसर गाय या राम भी पा जाता है पारि जब वह वापस लौटना है सा गांव वाल उमसे मरते है जसे उसमापन ही राम हो गया हो। समरमा १० पत्रकार बनने की इच्छा सोमवतन के बारे म हुई कारवाई से प्रमपद वरे सग्य थे। मप्रजो में विरुस उन्हें नसे पूणा-मी हो गई थी। एक बार जब निगम ने कुछ प्रमज हारिमों को एक सही मी गादरी अवसर पर अपने पर बुलाया तो प्रमचन्द न निगम को लिया मि मापने मज हुशाम की दावत नाहक की । भाखिर इससे क्या फायता समझा निगम स्वय लिखते हैं- जहाँ तक मैं समझता हू यह सयार उनर बहन नगीन हा गया था कि जब भग्रेज हम दुिस्तानिया से बिलकुल अलग-थलग रहते हैं तो हम लोगा को भी उनसे दूर ही रहना पाहिए। सौमी घुटदारी यह बरे हामी थे मौर मन्बी जिगी में इस्लाई जमान म सरकारी अफसरान ने उनके माप जो नामुसिफाना वरताम दिया उमरा प्रसर उन गिल से भी जाइल नहीं हुमा सोडवतन + मुनमस्तिक माम को पारवाई सगर वजा यी पोरि उमरा पाई पिम्मा ऐमा न पारिम पर उनने बिलाप मोई मानूनी मारवाई री जा सकती। प्रमन- मरारी नोररीछाकर रिसीपयवार ममामारनपीयातमोचते थे। एर पार निगम पच पवार स्टाफ म जान की बातचीत चली। निगम न प्रमपदरा मनमाया पोर उनम पूछा । प्रमच का उत्तर मुनिए- पवप पखमार वास मुमामल (म) क्या जवार ? मानो पहलू यह है fr पहा नट मामानी प्रस्मा गरिमी सरह बार नहीं है। गरेका गम भोर मुलाजिमा की मुनगाह सम नामिन नही है। बगैव यही गलत वहां भी पी। पौर ममारिफ यातूर । मगर पाम म पराप्रा है। यही (मव स्प्युरी न्मापारी म) यहुन पाया है पाव गतामील भूमि का पफ्सर सर पर नीरारापोरन को वारली है । इसलिए पारामी मालूम हाती है। दम पर मे पापपरमोशशिरी निमागी राम रोजाना प्रसार जी जाता है। हिम्मत नहीं पाती। यह सिगरी काम बमनमा-ए-नपरोह है । वहाँ पह ७२ बलम का मजदूर प्रमयद ममा हो जाएगा हालाकि ट्रम्प की पहाइ और माइला जियो की रफ्तार खयाल स यह मौका युग नहीं है मगर काम का सरत इरादा का मुम्नविल ना हान दनी । बहरहाल में भी दुविधा म । मगर मौका मिल तो माप प्राइटर स जिकीजिागा। उम परत तक गायत राक्सिी तरफ जम जाए। इसी पत्र म मित्रत है- मरे क्सिस मजमए का पयास रखिएगा और जब पाप अवध पदवार म पहुँच जाए उस वक्षस इस निकालने भी फिक्र करना मुनामिय हागा । मुमकिन है आपका अषध भसवार म पट्टेधना मर सिए कोई बहतरी को सूरत पदा करे। क्या जरूरत है कि मैं अपना सून जिगर (या उगलियों स निक ने वार पतरा ए स्कून) को किसी गर जगह फै। मगर अपने घर म कद्र हा तो या दूमर का तम्मनगर हाऊँ ? हालांकि मैंन हमद का कोई प्रया विस्सा नहीं पा साहम अगर उनर लिए और कोई गुमाइ हाती नो मैं यही न देता। हाँ पसारा न होना चाहिए। भाप पास ईश्वर न चाहा तो परसो किम्मा पहुँचगा इसी पत्र म प्रापने मरी तनम्बाह बढा दी। इसका मघापूर हूँ याकि यह प्राइवेट टयूशन है । अब मुझे पाठ रपय माहवार मिलेंगे। 'जमाना म सा प्रमघर का शुरु ही से दिलचस्पी थी। वह चाहते थे कि यह मासिक एक इतनी भहम पत्रिका बन जाए कि उसका स्कूध नाम हो । मरी दोस्ताना सलाह यह है कि मा माठन रिष्मू फी जगह पीव को लेन दीजिा पोर तुल निदुस्तान रिथ्यू की जगह लीजिए। निगम पाहत ५ कि मटीव की तरह 'जमाना में भी तसवीरें हा। प्रमय न लिया-~~ अपनी हार मान सने म पराई नही है। पाप इरियन प्रस के वमाइल कहाँ से लाएंगे अमाना की पूर्वी मजामीन पर होना चाहिए मवावीर पर नही तसावीर की शिफामत कागज और छपाई की इमला म सफ कीजिए और मौजूदा ममाइल पर मजामीन लिदान को पिक कानिए । वामू के बिल पर कोई मजमून न निरला गापम व दिन न कहाँ तक सरकारी यो मुहम्मन्न यूनिवर्सिटी की वात्स्टीट्यान वगरा मसले पर कुछ होना चाहिए था। मतलब यह है कि जमाना अपडेट पालिटर पेपर हो। जौक पर प्राधा परचा भरना मैं अच्छा नही समममा। हम बौक का रोना रान म मा मिन जाता है ? जोर छ नाम पर रान वास बहन है। यह काम प्रदीय कारन जिए और प्राप इमम बस्तर काम म मसाप हो जाए। जब १६१२ मदयानारायण निगम ने 'जमाना मासिक ५ अलावा एक उदु माप्ताहिक और मागे चलकर दनिक भी निकालन मा कमला किया तो प्रमपद निगम पा लिया कि पताबार कामरह नमन का होना पत्रकार बनने की इच्छा पाहिए भगर पालिसी हित । अव मेरा हिन्दुस्तानी कौम पर एतकार नहीं रहा भौर उसकी कागिश फिजूल है।' प्रेमव ने माताहिम का नाम भी हिदू रखने को कहा था। यावि हिन्दू' नाम का कार पर्चा पसाव से निरमने लगा था इसलिए दूसरा नाम रफ्तारे जमाना' तजवीज हुपा । पापन भी तो यही नाम पसन्द किया था। नाम तो यही रखिए मुझे यकीन है रिएर हिदू पर्चा जिसका माछा पागज हो अच्छा पाई हो उसफ लिए काफी गुमादा है। हमारी यही कोशिश होगा कि उर्दू परचा म 'रफ्तारे जमाना एर तारत हो जाए । उसका राया का दूसरे भखबार सतवास परें। प्रमन निगम की सहायता करने को तत्पर थे। प्राप सनहा एए मसिस्टेंट की मार से हातावार प्रखबार इसी हालत में पा सकेंगे, जबलम যা যা লা বনাই । ম দশ বন্ধ বিলাপ্যঃ wণ विदमन म भेज दिया फल्गा पुछ ना होंगे चन पहा सो कोई एगेटोरियल सभी रिमी मजमून का सर्जुमा नभी पुछ । वरा नाम मकर शुरू कीजिए। मुभम जो मद हो मागी रमा ,गा । तिहास मेरी हालन मुझे इजाजत नही देतो विष ईसार रस। यकीन मानिए, मापसे मिरे सि रहता हैरिज से यहाँ माया, लिए दो मी रपये भर पास जमा हुए हैं। और मह भी मो पर नायल पा मुभावना है और सौ काय म कोई तीस रुपये इश्विन एम से मिल पाया तीस या पैतीस रुपये मापने दिय और समीपद एजूरेशनम गरम में मिला । मरी तनख्वाह पोर भत म कौड़ी की बचत ना हुई। हो, या रहिए तो कमाई महिए हो भीवीजान की भरमा मी विद पर रफा गिरापत में लिए गए वनवाया जिसमा गरमा पवना न भूना । म विरत पर मैं क्या ईमार' माठ सय सनम्बाह है पानोरा पिय पापौरत। पौर नही मानूम यही कानपुर र मुकारने या पप मा गया है। वर! पानीस परम गुर हो जाती पी पह! उगा दुगुने म रोना पटापा है पौर वाहए मगराज मोरना मुझ पर तो नहीं पूरा पर मिलर होमा गैर मार प्रमगरको हालत देगरबा को पगला रसरंगा कि मेरे लिसा गाना या मीषा है। यही ग ग्यमत सार एमा पागा पौर जिम महनन पोरोतिसार हागा उग रेप मा वा भर है मैं मगर पना सर अगर ए मार प्रसार कुछ निरमा, तो में हापगर पनामा दाना पाना मा मा मेरर अपने पुरान घर पर पगा। मार मार पाय मे कम पर मेरा गुरारा नहीं हो रहा। परमारमा पालो पाना सोश मोर मा ममनार रक्षा में " ७४ लिम का मजहर प्रमचर काम स जी नही चुराता । न इस कद्र मुतालिबा चाहता हूँ गोया मैं कही का महा मुशी-ए विनार हू। नही सिफ गुजारा चाहता हू पौर गुजारा साठ रुपये मे कम म नहीं हो सकता । दूसरी बात मापन जमाना मय तक निज के तौर पर चलाया है । इसका खर्च और मापका जेव-सच दोना एक ही मन में सुमार होत रह जिसरी वजह से मक्सर परेशान होते रह । मापन अपना जाता स्वच बहुत बढा लिया है । साफगोई में लिए मुसाफ फरमाइयगा। रफ्नारे-जमाना का मुमामला निज का मुमामला न होगा। इसका हिमाव किताव मौर खर्च मयका मद भाप जब-खर्च से विलकुन अलग होगा। इन्ही उसूला पर काम घल सस्ता है प्रख राजात की तफ्सील जो आपने दी है वह में पल भी देस गुफा हू । बहरहाल में काम करने के लिए तयार हूँ ऊपर लिखी हुई गों पर पौर उस हालत मे अयति माली हालत मुसकिल हो । पौर में किराये का टिटू बनकर काम न करूगा बल्कि सच्चे जोश से। या तो माप मभी मेरी खिदमत तलब पर या जब अखबार की हालत कुछ मालूम हो तव । इसी प्रकार कई बार बातचीत मौर खतो दितावत भी हुई। १२ सिम्बर, १६१२ का साप्ताहिक भाषा निकला। फिर इसे दनिर बनाने का विचार हमा। एग यार छुट्टियो म प्रमचन्द कानपुर गये। उनका खयाल पा कुछ फस ना हो सकेगा पर वहाँ इस बारे में कोई यात न हुई । छुट्टियां खत्म होने पर प्रमचन्द अपनी नौकरी पर वापस लौट भाए। निगम ने बुरा मनाया। जली भुनी लिम्बी । प्रमचन्द का उत्तर सुनिए-- मताब नामा जिसे प्रापका इनायतनामा पहना चाहिए घमूल हुमा । पई दिन हो गए। सोचता रहा किन लपजा में जवाब दूं। कैसे गुस्सा ठग कम् । कुछ मक्स ने काम न दिया। न गेर पो-शापरी स मम है कि दो चार वढिया शेर पसपा कर दू ! बिल माखिर गिल ने यही फ्मला दिया कि तुम खतावार हो मिजाजे यार मे जो कुछ पाए क्हन दा मोर जवान पर किए मुने जाम्रो। यह कहना कि मैं देखता हूँ गालिवन प्रापके नमी पोई मानी नहीं रपता क्योकि पापको गुरूर है कि आप च अजीज भी मुनाग्रिमे सरकार है और माप क्याइ स वापिफ हैं। मगर मुप्राफ कीजिएगा अगर मैं प्रज कसरि मापने अपनी उम्र मा सबमे वेगवडा हिम्सा मरी तरह सरकारी मुनाजमस म मरफ क्यिा होता तो भाप इतनी बेखौफी मे यह अलफाज नलिसते । मैंने मसत लने में कोई टकीला नही चाहा। दो दरल्यास्त भी तार दिया। दरस्पास्मोनो बाद मज वरती गइ और ना मर पाम रखी ई है। ये मैंन मेडिकल सर्टिफिकट देन की कोशिश नहीं की लेकिन मुझे पत्रकार मनने की क्ष ७५ यहाँ इम मिलने की उम्मी भी न थी। य इलजाम हिदरख्वास्त मो बार पत्र वन दी गइ मरे मर क्याटा-मे-ज्यादा दस से है, यानि मरे पहले हाता एकपामे कानपुर म तो मापन रोशाना यगरह का कोई डायरेवर सजारा नहीं पिमा । जिक्र रिया तब जब मेरी मसत गरम होने कोपाई घोर फसमा उम वन मा अव दुल तीन गिन रह गए। ऐसी हालत म मरे बसा जरामा रामामी बजुम इसरे पोर पा कर माता था कि रमसत सेने पीगिस माह मान र मोर न मिल सक ता मजदूरन व साचारन अपनी नौकरी पर वापस पाए । पाप ही फरमाइये मुझे क्या गरज पड़ी थी क्या दवाव पा कि मैं पहले गाम सुरु करता मोर नर माग रहा होता । मापने मरा गला नहीं दबाया पा भौर न दवा सक्त थे। मापने मुझे किमी सेविपास करने पर मजबूर नही पिया, न मैंने बोई सरिफाइस री। मेरा माली पायदा था। पिर एमा कौन मन था, जो मी रेगिमी वाइम होता । हमीरपुर म मैं ऐसे पार पर्दुमा नब मरी एवसन समाम होन म सिफ चौबीस घट की देर थी। १४ मिनम्बरमी शाम को समाम दाने वाली थी। मैं १३ की शाम से पला और इतार नि। freी इन्सपेपर दौर पर। गरब हमीरपुर में ऐसा कोई मर न था जिसस में रछ समाह-मारा स सरता क्यो िहमीरपुर में मेरे जानने वाने गिनती रे मामी भी नहीं है। यही भागा भोर पार सने में सम भी ब दिन रोदर हो गई, जिसमा सवार मुझसो दना पहा । यह है मेरा बयाने हलफो। मय दूसरे पहलू पर नबर सीजिय । मापसे मर भाग निरनने पर नाराज होनरी मरत नहीं है, मारिया पार पाप पाहने है वह सम तनहाइ और मरकाम निमम माता मोर निरान रहा। मालूम नहीं इसकी गायत गया है मापन मुझे यकीन है मिरी पा मिमन पापम है। एक मामूमी रोल और मासूमी नियामा मामी ऐमा पवार निसान ममता है रिममे बहन-मा मोरिजिनमन लिपना परे। मानम नहीं मापन रासाला भाश पारा नाम रिया। न मुझे पूपने सपा शामिल है। सेपिन याननगरविवारसाईनगा साप हा गया होगा। मोर १८ परपर मला उसको मिरपोर लिए किमी मी मसाल की पातमासीन रहगी। प्रपौर प्रगर पानी का यही गमाम करो मुझे मुमार कोशिशरि गवाना गरीधारमा पनी भूरव माने बामा सीमारी पहिया परम मुरिरममता है और एक बारम निरमा नाम निएमा। ।

सिमका मगदूर प्रमचन्द प्रम-पचीमी गालिबन पर गव यस मन छप सक्गो क्याकि राजाना भखबार को जरूरियात कब प्रस का सामागबठन देगी। में भापस मज कर पुरा हूँ कि मर पाजाद' और 'उमाना के मजामीन के मुनमस्लिव स बहत्तर रपय मात है। छप्पन पय पहले थे इन दा ताजा विस्सा भी उजरत नामिल र बहसर पिय हो जाते हैं। मापन फरमाया था कि प्रम-पनीमी साडे चार जुस्प छप चुकी है और इसके प्रखराजास मय कितावत-बागज वगरह बहत्तर रुपय हुए हैं। गाया हमारा मोर पापका हिमाव यहाँ सब सार है। अब मगर पाप पचीमी का निकालना पस करें पोर पाप निरफ नफा-नुकसान मशरीक हा सा साठ पार पत्र और छपवाइए ताकि नो जुज्य को एक खासी क्तिाब हा जाए । गालिवन इस नौ जुग्य म मारह कहानियां मा जाएंगी। मगर मेरा नरतीय क मताविश बारह निस्सनमा सक्त हाता मा जरा-सी तरमीम करके इस नौ जुज्य में बारह मिपा सकत है। यह गाया पचीसी का पहला हिस्मा होगा। दूसरा हिम्मा हसद भरत पौर मातहत मा को शापा कर लिया जाएगा। लेकिन मगर मापका प्रेम इतना वस ही न निकाल सकता मैं घमा मजग्री यह इस्तमाम कमा नि या तो मेर घहतर म्पय मुझ प्रता फर्माय आए या प्रेम पचौसी के साढ़ पार जुग्न थपे हुए रेल व रिय स मेरे पास भेज रिप जाए। गालियन इन दरस्वास्ता म मैं गर-मारूलियत स काम नहीं स रहा है । मैं रिसी दूमर परि को दगा। और न मिल सका ता इची साद घार जुज्य जाएगाटल पेज लगार सा घार ग्ध की किताब बना सँगा। सिर्फ देवात्रा और टाइटर की जरूरत होगी । और यह भी न हो सका तो शह पौर थी सगाकर इन पौराम-परीगान को धागा मौर समगा जरेखद मारवारम वामयाए मह्ना व मी पोरम् । बहरहार मारा कुछ तमफ्यिा करें जल्द करें और मुझे मुतला फरमा। सवस सरस नुमया वस पहुए जय को भेज देना है। इसम मापको सिर्फ हमने भी दर है। पारी ने गटया बनवाया भोर रस पर रम्य पाए । सापको को तालोपन हुई। मैं अब सिर्फ मी गुरकी विमाव निकामना पसन्द करता है कn माप परीक हो और जल्द रिलाय वो निकाल म। दयामत के इन्तजार म घठन से का यही बहार है कि जो कुछ सवाब इस वस्न मिलता है मिल जाए। सब हिरीएमपकार पॉप सूल की नौकरी म प्रमचनमा हमीरपुर जिला ७. पत्रकार बनने कोठा पारा करना पड़ता था। यहा प्रमवन दो पचिस की गिरायत हुई जिसस पसीस वर्ष बाद प्रमच की मृत्यु हुई। उनक अपने ही शो म सुनिय--- गरमी के दिना म सोई हो तरसारी न मिलती थी। एर पार मई दिन तक सगातार मूम्बी घुइयां खानी पड़ीं। यासा मैं घुइया मो विच्छू समझता ह पोर तव भी सममता पा सेक्नि न जान क्यार यह धारणा मन म हो गई मि पजवायन स घुइयों सा वालीपन जाता रहता है। खूब मजवायन डलवार खा लिया करता । दस-बारह दिन तक विसी तरह का कष्ट न हुमा। मैंने समझा शापर युदेलवण्ड मे पहाडी जलवायु ने मेरी दुबल पाचन शक्ति को सीन पर पिा लग्नि एक दिन पेट मद शुरू हुमा पौर सारे दिन में मछली की भांनि तहपता रहा । परियां माइ पट पर गरम बोनन फेरी जामुन नाम पिया- देहात म जितनी गवाए मिल सकती थी साइ-मगर द न मम हुमा । दूसरे निम पेचिश हो गई मल साप पांच पाने लगा लक्नि दद जाता रहा। एक महीना बीत मुपा था। में एक रम्ये म पहुँचा तो वहां रे पानेदार साहब ने ममम थाने ही म ठहरन और भोजन परने पापाग्रह पिया। नई दिन म मूंगपी दाल पाते पोर पम्प परते परते कर उग था। गोचा गया हल है भाज पही टहरो। भोग्न तो स्वारिष्ट मिलगा। थाने ही म प्रहहा जमा दिया । दारोगाजी न जिमीवर का सालन परवाया पोष्टियां दही-बडे पुलाव । मैंने हतियान से सापा-डिमीर तो मैंन गवस दा का माइ सपिन मा पीपर जर पाने सामने दारोगाजीम पूग, मगने में सेटा तो दोना पटे या पट में फिर ६ होन मगा। सारी रात पौर प्रगम नि भर मराहता रहा। गोरे की दो यातने पीने के यार हुई तो नारर चन मिला। मुझे विश्वास हो गया पह मिमीपर पीपारस्तानी है। पदयों स पहली मरी पुटटी हो मुरी पी। पप निमी- स भी घर हो गया। तब से इन गानों पारा की मूरत देगार में नप जाता। वो पिर जाता रहा पर पेचिन परा जमा लिया। पेट म पौडीमा पटे तनाव बना रहता पारा हुमा परता। सयम र माप पार-पांच मीन रएमने गाता मापाम परता पप्प मनोरन परता कोई-न-कोई पोपपि भी पायापरता frन्तु पेपित टमने का नाम म सनी पी और यह भी घनमी माती पी। बार पानपुर बार रामपार महीन भर प्रयाग म पारी पोर पासपोरपियों का सपन पिया पर पोई पाप नहीं। तय मन तपा मारायाापाता पामगा पर गया तामि म पोर हारा भी पा मिमा रो नपान पीनगई है। यह जुमा ११४ को कलम का मजदूर प्रममन्द बात है। भार महीन बार निगम को लिखा-~~-पापन चारमाय मील हवा सान की सलाह दी है उसरी तामील कर रहा हू। पांच दिन से सगातार तीन चार मील घूमता है। उम्मीद है कि तबीयत टिचन हागी। सारी दुनिया का सनेटोजन फायदा करती है मुझे इसस भी कुछ नहुमा । होरस यह है कि वहत बड़ी चीज है । जिसन हमनी कद्र न की उस लिए वश राने और सर धुनने ने भोर का इलाज नहीं है। प्रमपद पाहत पनि सरकारी नौकरी छोड़कर कुछ और काम परें। जब निगम न एक नये अखवार के मारे म लिखा सा प्रमघर ने उत्तर दिया--- पति विश्वनाथजी अखबार निकालन वाले हैं यह प्रश्छी खबर है। मैं अपनी मोरदा हासत + एतवार से रोजाना मसवार 4 लायक रिसी तरह नहीं है। उदू मोर हि दो दानाका भार मुझसयार घमेगा । अगर प्रखवारी काम करना होता सो मागाद क्या बुरा था। उसी को निकालता रहता। एक दूसरे पत्र म--- मैं जो भानिजह यह मातहती स । वाम एसा करना पाहता हूँ जिसम बज मेरी सदीयत के पोर किमी पा सकाजाम हो । जी म माए तो रात दिन काम करता रह मौर की चाहे तो फौरन प। मगर यह सिफ मालिकाना हैनिमत से हा सरसा है। निमी काम + लिए धन की पावश्यक्ता पी और प्रमचल पाम बुध हो न हो धन नहीं था। इसलिए मेरे लिए सो अध यही मुनासिब है कि विसी प्राइवेट एम को मास्टरी पर जहाँ से माहवार मिल कोई प्राइवर सन की मुरिसी की वर्षा हो तो मेरा खयाल रखिएगा (योकि मैं मब इससे देवार हो गया हूँ।) इसी साप-माप ऊमाना' मोर माजा को खिदमन करूं। इस तरह मुझे साठ-सत्तर रुपये माहवार मा प्रोसन पता जाए। इसस श्या की स्वाहिश नहीं मार न इससे ज्यादा पा सरता हूँ। रूपामस्वाह तकार से क्या ला बुछ किसान लिगा कुछ मपनी पिसारें छपवाऊगा। पाप-छ सौ मरी नमा है इसे इन्ही कामा म मरफमगा पौर विल प्रापिर जद लिटररी पोहरत हासिल कर सगा तो कोई माहवार रसाला निकालकर गुपरगा। मौर मगर इससे पहल हयात ने जवाब दे लिया तो फिर राम नाम सत्त है स्या र मापने मुझे उसालने में कोई कसर नही रखी। स्वून उछामा। मगर में ही स्मिताया है कि उथलकर परदार नहीं पर सपना बधि नीच गिरन+लिए हरता हूँ घरता शिववतमास वमन पो तरह चैन से शिगी यमर पता पाप मगे पिताव पदी छपवा दीजिए तारि सकी पत्रकार बनने को इण्या ७६ करानी दसरर मर हिम्मे में हाय लग पौर मुछ नफा भी हो। माघ १६१४ र प्रेमच दुविधा में पकिस लखन गली रो अपनाएँ। उन दिना फ ए पत्र म निगम को लिखते हैं- 'मुझे अभी तक इमानान नहीं हमातिसौन-सा तर महरीर मनियार झा | भी ता क्मि को नाल परता हूँ कभी पाजार के पीछ पलता हूँ।माजवन कारट तारसताय न किस पर सुपाई। तब से कुछ इसी २ग की नगए तबीयत माइल है। यह अपनी कमजोरी है मोर मया । यह हिस्सा जो मैं रवाना कर रहा हूं इसम सरफ सहरीर क मुनलय कोपित नहीं की गई सीधी माती बातें लिखी हैं। मालूम नही पाप पसी या नहीं।' एक बार प्रपच मस्ती से इलाहाबाद जा रहे थे। सरज नसी पार करनी थी। प्रेमरन्द रानो देवी तथा मला स्टीमर मठ मष ऊची जगह पर ए पोर उनकी गोद में कमला बठी पो नीच कश पर गिरानी *पी। एर पचीम वा पुवा पूरपर शिवगनी वी मी पोर देख रहा या और पीर परे पास माता पा रहा पा । शिवरानी देवी ने प्रमचन्द म पारा पराया। प्रम- का ध्यान जो पिसीस मारनेरी मोर लगा था इस पोर पारपित हुमा । उहें काय माया । मधी को मां की गो म देकर उसमी गन परमी पोर माफी दूर तक ले जाकर बोस- सरजू मई " मैं तो पाया। मन मा गुनाह रिया है ? 'स्विर सिर पर पहले हो । दोबारा पमान निवासी सो सरजू म भार 'या तुम्ही रािया दिया है? पिसी मिर पर बरन लिए निरासा देर पाप हा प्रमपद प्रापद मारे महामोर या साहामा इसान रात जा रहे । पस्नी म पति मोर रह गई पो। प्रेमपर न ५ महीन शेट्टी मौ। पगनको परिकम नियम इसार रवाया परम् निराशा हुई। फिर राणी भार एर म स मार । तान पार महीन पार पोड़ा-सा पाल मामूमपा पर गौमारी जागर पुषीपी बस्ती मौत हो दुगनी IR हो गई। तब मनोरोनरी मलम पो मौररी लिए दापोर मान र मास्टरी पर बाण भगत है। पारमाम एमर पर हम भा गया और माराम frगोरगरजीह ला िनरामीको है। मगर मुमे पराग प्री कसम का मगदूर प्रेमधद रपये देगा तो यखुती चला जाऊगा। ऐसा ही हुमा । मई १९१५ में वह बस्ती में ही पचास स्यय पर सहायक मास्टर नियुक्त हो गए। यहाँ मस्ती म ही शिवरानी दवी को पता लगा कि उनकी सौत अभी जिदा है । उहीं के शो में सुनिये- एक दिन की घटना है कि दरवाजे पर उन पहले साले घठे थे। माप उही से बातें कर रहे थे। इत्तिफा से मरी दो साल की लरकी कमला बका दरवाज पर चली गई । मैं उसे देखने के लिए दरवाज़ की तरफ गई । मैंने देखा सहकी उनके साले साहब की गोद में थी । वे वडे प्यार से उस घुमकार रहे थे। इसी बीच मे रजीदा स्वर में मोले- अगर हमारा सम्बध भाईचारे का भी हाता तो क्या मेरी बहन इसे प्यार न करती ! इस पर माप खामोश थ! वे महुत-सी बातें अपनी बहन के विषय म कहते मैं बड़े ध्यान से उनकी बात माह मे सुनती रही। मेरे भी बदन का खूप गरम हो रहा था उस समय । उसक वाद.व चले गए। माप सहनी को कर मर माय । वही पहला दिन पा जव मुझे मालूम हुमा कि 4 अभी जिन्दा है। मुझे तो घोखा दिया जाता रहा था कि वे मर गई हैं।" पर पाकर इस पर बहस हुई। प्रमधन की धारणा थी कि जिससो इन्सान समझे जीवित है वही जीवित है जिसे समझे मर गया वह मर गया। शिवरानी देवी ने कहा- कृपा करके उन्हे से पाइए । प्रमचन- मैं तो लन नहीं जाऊगा। शिवरानी देवी-- क्यो नहीं पाइमेगा शादी हुई थी तमाशा नहीं पा ! प्रमपन्द- मैंने शादी नही मी थी। मरे बाप ने शादी की थी। गिवरानीदेवी-बाप ने तो जो अपनी शादीमी थी उस माप गले बाँध फिर रह हैं। बाप की गादी की ज़िम्मेदारी तो आपके सिर है अपनी नही ? यह जिम्मेदारी पा तुर मही है। प्रेमपद- चाहे हो या न हो मैं साऊंगा नहीं। शिवरानी देवी ने लिखा है कि उहोने सौत को पत्र लिसा और उह बुलाया भी। चौथे रोज उनका जवाब पाया कि अब वे पद लेने पाएंगे तो मैं पगी। प्रेमपद लेने नहीं गय। फिर उन्हे मैं मरावर खम लिना करती पी। उनका खत कैयी म लिवा रहता था। उसे मैं यह दरिया परती। प्रेमचन्द मस्ती म ही से जव प्रम-पचीसी (उर्दू) का पहला भाग प्रकाशित हमा । इमर्म य कहानियां पी-(१) ममता (२) विक्रमादित्य ना तगा' पत्रकार बनने की इच्या (३) बड़े परकी बेटी (1) रानी मारघा (५) राजहट (६) राजा हरदौल (७) नमाना दारोगा (८) मामिम ए-चममल , (६) गुनाह का निकृण्ड (1.) वगरउ माहसिन (११) माह-वेस और (१२) प्रारहा । प्रम-पचीसी भी प्रस्तावना क बार में प्रमचन्द ने पत्र म निगम मो निलाइन हजरत ने तारीफ मादा की है फाहन शाहपुरी ग्याग पौमू पादमी हा साते ॥ मगर वह म सिाब सके तो प्लीको रहने दीजिरा । मगर मम्नर ऐसा होना चाहिए कि एक पन्थर से पयाग न हो। प्रापको सरफ स मैंने एक मालमिर दीवाचा लिव दिया है । अगर मापको पसन्द पा तो इस अपनी तरफ से दज कर दीजिए । भापकी महनत मौर तर रफा हो जाएगी। 'प्रम-रघोसी (भाग १) पर बिठना सच हपा पह प्रमचन्द ने अपनी जेब ही से लिया । पुस्तर की विक्री का प्रमय भी प्रेमवत से स्वयं ही सरना पहा । पगस्त २९१५ म उहन निगम म पूधा मगम भदव मुझमे प्रम-पनीमो बधन रे लिए नसव परत हैं। उनरी निस्वन पापराया गया है ? निम्मा दोयम की मायत के मुमल्लिर भी यह प्रामा पापका जवाब मा जाग मा उहें जवाब दू. हे मही वा लिया~प्रम पचीसी (हिस्सा भवन) पापरातुन मायर पाम ध नि भन दी हैं मोर दुध हिन्दुसानी म सम सीम परा । मगर प्रमी तर पुरा नतीजा नहीं निकमा मापन इसके लिए कोशिश भी? "नामी पुतुब मिममिले म मयूर हो जाएगी ? हिस्मा दोयम माप ही परवाए। मगर माता प्रसार छाप मा ता इसमे पोरगया वहतर होगा। अगर पाप धावाएँ तो फिर पेमला हो जाना चाहिए। मैं माप हो सर पर परी हजागा।" इमी पत्र म उनि निगम चपाई दी कि उनके भाई रामशरण निगम, रिटीरमार ने मनीनान म मरान निमा। "मरा छ मोर हार मुनन के लिए मुनार है भाभी-रमी गरमिमो में बंगलामा मानना मौरा मिलगा और गाया पदर मे निमार भी यस सर मानि पह मारान गमको भूतम पाएँ। प्रमपरा रम्प टीम हुपा। जून १९५१ एप पत्र मनिगम । मिला-- मेरे मिस युद्धापकारिन है। मरिमागरमा मौरी माना पाहो पा माता राममपि रन भीभी यात तित पती प्रमनिराम यो नि है- समाना भूमि या दिसुन पग मन माा है मग लमना मदूर प्रमवग्य 1 चमका नेम इतना वेगवीमत नहीं है जितना दूमरो हालत म हाता ! मैं उसरी भीमन एक हजार ग्यास परता हूँ क्यापि गुह नेम रे माम ही इममें वह नम को भी भामेजित है। बहरहाल मरा तखमीना यह है-मरा खयाल है कि मगर कोई नया माहवार पाबलियत के माध ऐडिट किया जाए और इस पर एक हजार रुपया सा कर लिया जाए तो इसे इतनी मुखहरी हासिल हो जाएगी। यह मैं तसलीम करता हूँ कि भापका इम माहवारी व लत बहुन जर मार होना पड़ा जिसकी मिस्टार गालिवन तीन या चार हजार तर हा मगर गालियन मुते बाजा म इस जिम की इतनी कीमत हरगिज न मिल सकेगी। पौर फिर इस चमारा के और भी सवाल है मिना फीस की यही करत नहीं। अगर एक हजार गुड नेम की कीमत हा ता इसका निस्प निम्मा पांच सौ होता है। मैं इस रकम को दो या तीन साल में पता करना जिम्मवार हो सकता है। मूद बारह बाजार महसूद करन को भी रजाम है। में इसका एडीटोरियल और बड़ी ह तक मनेमीरियल घाज मेने पर सयार हूँ। प्राप मिफ अपने रमूख पौर जाती प्रसर स पोर नीस इश्विहारात के मुतमल्लिक नितना मुनासिब समझे काम परेंगे । मैं कोशिशरा नि जहाँ सब मुमकिन हा उसका वध कम हो । इममें मनाया पाइनेंशियल चाज बिलकुल पापा रहेगा~यानी कागज पितामस थपाई कटाई पोस्टल पाजें। इनका हिसाब माप माहवार मदा करन पादयस्व करेंगे। माविका बकाया का हिसाब इसस मलग रहेगा। तारीख पारस्ति से पाप जिसना रुपया लगाएंगे यह हर माह रे माखिर में या हमब गुमाइश दिसम्बर या जनवरी म मा होगा। जितना नफा या नुक्सान होगा इसम हम मौर माप बपधर से गरीम होग। मरा खयाल है कि जनवरी तक हम इन रकम को अदा कर सकेंगे। मेरिन मगर उस वक्त भी रमी रहे पौर दूसरे माल के लिए रुपया की क्या जरूरत हना फिर हसव जहरत कोई सबील करेंगे। मगर तावक्ने के ये जिम्म पारियो वेराक न हो जाएं। मामनी म स जहाँ सक इमकान में होगा कुछ न सगे। डीटर पाहे पाप रहें या मैं । अगर प्रापरे नाम से ज्याापामदा हो तो मुझे का शिकायत नहीं। वरना मुझे हो जायद एसेटर रहना होगा। मगर यह परायत मापको सर्मीमात रे साप तय हो जाएँ तो हम लोग दिमम्बर तक चार-पांच नम्बर पाल पर निकालपर बुध विसरायमर लेंगे और बनवरी स गामिवन पादा फायदा में माय मागार हा। मैन माली जिम्मवारिया सब पाप पर रखी है । इसव यह सुनिय । मर पास इन छ माह की रमसन का पाठ सो गय है। तीन सौ रपये मन तीन प्रसामियों का पठारह पत्रकार बनने की इच्छा ८३ फीसती मूर पर पद दिय है। मेरा नका सरमाया इस वक्त मुल पांच सो रपये है। इसे मैं उस का तक के लिए सूरा वसीला समझना हूँ जब तक fr जमाना से मुझे माई फापर न हो। पौर मौन जानता है इस मुबारिष वन क लिए कितन दिना ता इन्तजार करना पड़े। गुज में माली जिम्मेवारिया का बोझ उठान के बिलकुल नासाबिल हूँ। इमी भसना म मगर सूटक की तय हो गई तो गालिवन यह रकम भी मर हाप से निकल जाएगी। हर इस साल फन हो गए यही हैं। मूल लीविंग म नाम लिख दिया है। पापी नहा पाइ। मकान पर हैं। तजनारायण भी यहाँ हैं। मपन मकान पर हैं। मैंन अपनी माली हालत का जो शिस्मा लिखा है यह हप-च हफ सही है। मैं भापर जवाब मा इन्तजारगा। पाग बनकर लिया- मापने मेरी निस्वन को दुख परमाया है यह धार मही होने क हम सखामी है। हर एक शाम को पाप घाना चाहते है इमम पर शरीररूरत पहल ही पानी है। रुपया न मापस पास है न परे पाम । रसाइस नाम धारर पस? एटरप्राइज खाली बस से या महज हवाई वाता पर सो नही हा सरती-पाप यह तालीम रंगेरि इन्सान कोतफानी जमरियास लिए पममो रमना पाहिए। मेरे पास रस इतना ही है। इतना सरमाया नहीं जिसस कोई तिवारती ममूग बांधा जाए। बस पाप मुझम ईमारतरावरत । मैं अपन से इस मामिल पाता नहीं। मेरे पास माठ काप माहवार सापता हुमा है वह किस तरह पता नही छोड मरता माप बाई एसी मूरत यहा प जिमप में अपनी रोटी हासिर परत परमार पर पर सई। दमा लिए यथम पहली बार यह होगी कि पाप सरमाया पदा परें । म तापनी ही रमत सार भापरे यहो गया था मगर ग मायाम ऐया मामी मुगरिमात नगर पाई।म बहस शाहम हवाह उसमता विकून रामभा। मगर प्रापमा मानी हालत बमुनावमा सारि रहार हा गई है तो मार मुझे कुमारय महागिरगा। मोर गहमी मार्ग गोई मूरत निरामेंगे। एर पार पनी गपालपुर गप। वहाँ गए र विणार्थी स भैरहा। रियापीजीन रहार ही म तार' निसाना पापियामास्वप मारा काम गत सार प्रमप ममावित हुए और पार निरालाबीम रा-निशानी या मेहनती है। पानसरापाराम पानीमा परत ।मही पुगाम कहा है। मा सरह बामियाना Sri ८४ मलम का मजदूर प्रेमघाव जरूरत है। ऐसे ही मामी अपने जीवन को सफल बना सकते हैं। मरी भी इच्छा है कि नौकरी छोकर कहीं एका त म वठार साहित्य की सवा कई मरे पास दस बीघा जमीन हाती तो मैं अपने माने भर का गल्ला पदा कर सता पौर चुपचाप एकान्त म बठकर साहित्य की सेवा करता। बहुत दिन नहीं गुजरे थे कि प्रमचन्द ने हिरी में दोबारा लिम्बना गुर क्यिा ! 'प्रेमा और हमखुर्मा मो हमसवाद साथ-साथ दपी थी। इसका एक कारण यह भी था बिस्ती में प्रमचन्त का सम्बघ कुछ हिन्दी साहित्यिको स हुमा। इनम से एक मन्नन द्विवेदी गजपुरी थे। यह डोमरियागजक तहसीलदार थे । प्रमचा के शटरी में द्विवेदी वहा मसखरा मामी है साथ ही मानदार भी है। इन्हें साहित्य से वडा प्रेम या । और जब भी प्रेमचन्द तथा द्विव जी की भेंट होती साहित्य चर्चा चनती। जब दौरे पर होते तो एक- दूसरे के घर पर ठहरते। प्रेमच ने हिम मी गल्प' छपवाना शुरू पिया। सरस्वती म छपी इनकी पहली गल्प वस्ती स ही भेजी गई थी। जब पहना हिन्दी कहानी सग्रह छपा तो इसकी प्रस्तावना द्विवत्रीजी ने ही लिम्बी (जव १६२१ में गजपुराजी की मृत्यु हुई तो प्रेमच ने जमाना सिम्बर १९२१ + अ में इन पर एक लख लिखा जिसम कहा- प्रफसोस है कि गजपुरीजी की ज़िन्दगी का वेशतर गिम्मा सरकारी कागजात पी यानापुरी में सफ हुमा । पिक्रमापा ने मापको मुमाजमन के दायरा से बाहर न निक्लने दिया । इसी समय के एक पत्र म निगम को निम्वा- प्रेम-पचीसी (उ) के हिती तर्जुमे के लिए कई जगह स असरार हो रहे हैं। मैं खुद ही इस काम को हाय म लूंगा। प्रव हिनी लिखने की मश्क भी कर रहा हूँ। उदू म प्रव गुजर नही है। मालूम होता है कि बानमुकन्द गुप्त मरहूम मी तरह मैं भी हि लिखने म जिनगी सफ कर दूगा। उनधीमी में क्सि हिंदू को फ्ज हुमा जो मुझे हो जाएगा मनूवर १९१५+ एक मोर पत्र म जमाना के लिए एक किस्सा लिखा है अब मैं हिन्दी म लिख रहा हूँ। सरस्वती को एक मजमून' दिया। प्रताप १ प्रायुत भमिकाप्रसाद वानपेवी ने माने साहिस्पिक मरमरण में लिम्बा कि प्रेमचरकाई गगो का हि-मनुवार कलकत्ता के 'मारतमित्र में एपा था। ये मनुवार 'जमाना मविप माोय परनु उमाना का नाम नहीं लिया जाना था जैसे राम हरीला मनुवार । प्रेमचन पर्चा में प्राय मामून का भाशय कहानी है।

पत्रकार बनने की इस . के लिए लिखा ! मम पयादा काम करने में मार हैं। यहाँ हम बात पा जिर परना जरूरी है कि इस समय प्रमचल प्राइवर नौर पर एफ. ए. पास करना चाहत ५। 'माजवाम एफ. ए. मी धुन म कुछ लिटरेरा काम नहीं होता। यही से तहरीर भी नहीं हुई पोर मृफ्त मनतम घिसना फ्नूिल मासूम होता है। हेढ़ महीन बाल-भाजल कोस को दुतुब के लिए इनामात ऐनान हमा है। अगर पाप समान में माना पाहता में इसम भी भापता माय दने को तयार हूँ। कज पॉफ इडिया' सीरीर तरह चौसम सफहात पर गवनरों के सवानह लिसन मा इरादा है। एफ. ए. भी हावा रहगा। इमर लिए में पटा भर में क्या वक्त नहीं सर्फ करता । मैं करना तो बहुत कुछ चाहता है, मगर मुझमें न एटरमाज है और न रुपया । भापक पास एटरप्राइव है मगर रुपया नएजव तक रोई सरमाया वाला परीष न हो से मपन मारम-नपारमा निवध म प्रमचन्द ने लिखा था कि 'गणित मेर लिए गौरीगवर मी पाटी थी। वमा उस पर न पड़ सपा । परमीडिएट म दोधार गणित म पन हुमा पौर निराश होकर इनिहान दना घोड दिया। दम मारह साल बार जव गणित परीक्षा म अस्नियारी हा गई सब मैंन दूसरे विषय सार उम मामानी म पाम पर लिया । एम० ए० म उन लिय हुए विषय प-प्रजी फारसी प्राधुनिक इतिहाम तथा तर । प्रमच १९१६ म दुमरी थेरणी म पाम हुए। यस्ती म रहन हा प्रमपन ने मल-मी रहानियो लिसी। धरनामम प्रकार है-पिारी राममार, शामसभा-रामान पहनाया 'गुरत सौरटार बटामा धन, दो माई पनापन (पप परमपर) मरे पुर पर जगन की पमा प्रमत , मी गम', मनाउन, नीरा गवा गीत मनाप मायो । जसमा दर्गगे नानियों में मई प्रम-गरीमो (भाग २) म पी! मरहम २ "पारभित्रनुर र शरार पERE. TRIमना र पुनम मुलि ११ गोरखपुर मे अध्यापक के पद पर भगस्त १९१६ में प्रमचन्द का तबादला बस्ती से गोरखपुर के नामल स्कूल का हमा। इस स्कूल में प्रमधन ने साढे चार वष काम किया। गृहस्थ- जीवन प्रध्यापन-चार्य तथा हिन्दी साहित्य के क्षत्र म ख्याति की दृष्टि से उनमें जीवन मा यह चरण वहुत महत्वपूर्ण था। जब प्रमचटजी अपनी पली सपा पुत्री के साथ गोरखपुर पहुंचे सो शिष रानी देवी भासल प्रसपा पी मौर जिस क्वाटर में प्रेमचन्द को ठहरना था यह खाली न था। इसलिए प्रमपदमी को सपरिवार स्कूल ही म ठहरना पड़ा। लगभग एक दर्जन मास्टर मोर दा सौ छात्र उह घेर बठे। शिवरानी देवी की हालत खराब देखकर एक मास्टर उह अपने घर स गए। उमी रात को एक लहका पैदा हुमा 1 इमका नाम श्रीपतराय (पुन्न) पदा । इस अवसर पर सारे स्टाफ को दावत दी गई। नामल स्पून + हेग्मास्टर वेचनलाल प्रेमचन्द से बहुत खुश थे । जम एक मारमा म एका रिप्लोमा कोस से मिए इलाहाबाद भेजने का प्रश्न उठा ना वचनलाल ने प्रेमच ही को चुना । इस कोस ने पास करने से प्रेमपत के बनन म दम रुपये की वृद्धि हई। गोरखपुर जाते ही पचास रुपये से माठ राय हुए थे। अब सत्तर) स्पय हा गए । इसम स पपीस रुपय वह छोटे भाई को भगत । चाची (विमासा) साप थी। चमचम्म रहता । दूध तो अपने बच्च को पिलान्ती भोर माठ मीन ए पुन्नू को साबूदाना पानी में पकाकर रिया जाता (गिवरानी देवी को बुखार माता पा)। एक बार जब प्रमपन पत्री मोर उनके चचेरे भाई की वीयो साप प्लग म बचने के लिए गोरखपुर पा गए सो पानी को प्रधान लगा पौर भगडा मा। एक बार वहन मपन एरुषों को भगर इन्सुण्जा से वचन के लिए गोग्ग्यपुर माई (गिवरानी देवी मीमार पी भौर पर या बहन-मा नाम प्रमपर स्वयं ही मरते प) इस पर भी पापी गोरखपुर में अध्यापक के पद पर ८७ मालाइ । माबिर यह विदा दिया गया। प्रमरन के एक शिप्य महासहा मलीम ने एक सस्मरण म लिया है--- मापका मामूल या कि म्यून म ममूमन और वन पर पहप जान । रहने व लिए मारको मलम मरकारी मान मिला था । घण्टा बजा मोर मार शायराना भन्दा म नि । मम्मर माप खुल सर बाल पान और एप पोट पहन हए जिसके बटन खुस रहते भाम तौर पर पोती पहन एर पनीर भन्दास रफ्तार से स्कूल पाते थे। लहरे जितना उनका प्रदव परत य विमी दूसरे का नहीं करत थे। मरी जमात को तारीप पढ़ात ५ । उनका दस्तूर मह थानिमुद सारीष की क्विाब लेकर पढ़ते चले जाते। चूंकि लाइफ मिहिन और निंग पास होते थे, इसलिए गाना रियरस नही पड़ती थी। एक घण्टा म जो दुध पाना हाता पद्रह मिनट म पदारर सारीख र मुतमल्लिप ३ वात बपान परने को उस तारीख म न होती । नही मालूम उनकी मालूमात कितना वमाह थी। परसर ऐसा होता कि जो दुध शारीम म पटकर सुनान उसब खिलाफ मुघप्तलिफ़ सारीची हवासा स बयान परते। याउ वापियात न मुतपस्लिव मह भी दिमलात frमहत्व हिन्दू मुसलमानो म न पा करन लिए नियी गई है। गरस उनरायण्टा पनीरो-गरीब मालूमात का पटा हाता । पम्य खरम होने के निम्मा यह भी पर्मादेन कि देखो जो सुख मैन बयान दिया है यह ममझने की और है। इम्तिहान में यही लिखना जा तुम्हारी स्तिान म है धरना प्रमहोपाभोग। "नाम म उनक पाते ही मी हिदिमी पर हो जाती थी कि हर एस उनी सरफ मुमानिय हा जाता । यह उहली न पानि या समवाट पदाना है वही पहाया मार मलि प्रिंस मौकी सरफ उना रहनान या पास साहुपा बमान पुग्मान मग । मगर बताग म पाम व पोई हमी की पारमा गई नो मनियार हमने सग । लिमीमा पोरोहराम ना! पा मालारा वानिया है नि इनपर साहर मुमाना - मि पाय। गाबू मेघननाम हमारर यो बहन सौप मामी दुपपरीमार-म ५ तमाम सार भी पान-अपने मग भाराना य मगरामारे उम्मा रा रही प्राप्तम पा बा परम शिग पुराना मर पाप पोशान करना गमा हपानार माय राग म पाय मार मा भीमा नटुमा दुध पराम मुसहुई। उगर गनपत माहर पर गत। ली पात्रापार मताया है उम उमाना , मिरमान मिल गए और रिणानाम भेर गर तरीसन पूरनुम मरे गार Eि to क्रलमा मसदूर प्रमबग्द के बीच मित्रता तथा सहानुभूति मौर प्रम का सम्बध था। छात्राध्यापक तो इस यात की टोह म रहत कि प्रमचद उनसे क्मिी नाम के लिए पहें परन्तु उघर प्रमचन्द ये शिकभी रिमी स निजी नाम नहीं लेते थे। जहाँ प्रमचद अपने पिप्या से स्नेह का व्यवहार करते थे वहाँ अपन उच्च अधिकारिया से उनका रवया एक अत्यन्त स्वाभिमानी पुग्प पाया। यही गोरखपुर में ही एक बार प्रमचन्न नी गाय मग्रज पलपटर के महाते म घुम गई। रसक्टर ने उसे गाली मारने की धमकी दी मोर गाय + मालिक को बुलवाया। इससे पहले कि क्लकार का चपरासी प्रमपद के घर पहुँचता कनपटर के घर के बाहर दो-ढाई सौ मातमी इक्टठे हो गए। धमकी का जयाव धमनी से दिया गया- यदि गौवध हुमा तो हगामा हो जाएगा। भीड 4 गोरगुरु को सुनकर प्रमचन् स्वय यहां पहुंचे। वाद विवाद जारी था। प्रमचन्न जनसमूह की बातें सुनकर रहा गो बहुत अच्छा जानवर है मगर उसके मरने पर इतनी मापत्ति की कोई जरूरत नहीं। वाह साहम जव मुसलमान गाय को मारते हैं तो मन हो जाता है। यह डग ठीक नहीं है । जव मप्रजो ने यूपहसाने म सका ही गाया का प्रतिदिन वध होता है तब भाप कुछ नही करत क्सकार में सामने पहुंचे मापने मुझे याद क्यिा?" हो यह गाय पापका है? हो मरी ही है। यह हमारे महाते म घुम माया है। हम इमरो गोली से मार देगा। यदि मारना ही था सो मुझे याद क्या किया? मार डालत । हो हम मार सक्ता है। हम अप्रत है मसपर है। पाप मज हैं पलकर हैं। ठीक है। मगर पटिसन नी राय भी तो एक चीज है। पार्क मानवाया। मशन के मामने एक नीम का था जिमरे नाम पर प्रमचन भाना लेखन-काय पिया करते थे। म तो भर नहीं है पर तुमी स्थान पर सगमरमर का चबूतरा बनव या नामल स्कृपा भाषा या द्वारा किया गया या काम पामरान यह। इस साथ हा कुष उमाहगना अभ्यापक ने मवर म पापनकाण दात्री की शिक्षा विभागका भार मे एक प्रश्नावी भिया जिमने प्रावन के बारे में सम्मरण मगाये। इन सस्मरण में प्रेमचनरन पराशनी परी। इन सम्मरणा पक्ष रामे माम में घरे उनमें मम्दामने ऊपर उस रिया।

११ गोरखपुर मे अध्यापक के पद पर प्राज हम इसे छोड़ देता है । अगर फिर माया तो मार डालगा। परन्तु अगली बार मुझे या न नीजिएगा। इसी तरह एक बार स्कूल का मुप्राइना हुप्रा था। प्रमचन् एक रोज ता इमकार व माय रहे परन्तु दूमर ग्नि जय सेल सने जाने लगे तो माप पर बन गए। इसेपर न मारम जाते देखारि प्रमप” कुर्सी पर वठे पर रहे हैं और उटार मलाम भी नहीं दिया। गारी ठहराई । चपरासी भेजार चुलाया। प्रम-ने पूछा पहिय क्या है? सुम बड़े मगर हो। तुम्हारा मफसर तुम्हारे दरवाज से निकल जाता है और तुम उठार सलाम भी नहीं करते। में जब स्कूल में रहता हूँ तव नौरर है। बाद म में भी अपने पर पा बादशाह है। पपने जा महा यह कहार भन्दा नहीं दिया। इस पर मुझ अधिकार है कि प्राप पर पेस चलाऊ । स्पिकर चला गया। मापने मित्रो से सलाही मिरिम प्रसार इज्जत हतर पा दावा दिया जाए। मित्रा ने दवाव सलगर प्रमचन को मुादमा दायर परन स रोग। गोरखपुर मारे पार साल से परमे म प्रमयन की हिन्दी साहिरियर क्षत्र म भी प्याति हुई। बस्ती म प्रमचन की मित्रता मन्नन Pिदेती गजपुरी से हुई थी। यहाँ गोरपपुर म उनी मित्रता श्री दारयप्रसाद द्विवेदी तपा महावीरप्रसाद पोगर मे हुई। इनगेना म्पनियो ने प्रमचन्द को पूण्नपा हिदीम पानी प्ररग्गा दी। महावीरमगाद पोहार गोरसपुर मी हिनी पुस्तर एज सी प माविक य । वही इंग गम्या प पवम्यापर । पोद्दारणी ने हो राप्त सरोम नाम म प्रमपदा पहताहिती गल-मन्द | यर १९१७ म प्रापित हुपा। इस गरम प सात कहानियां है-(१) यो पर को बरी (२) मौत र1ि प्रेम पर में मयि | गार में इस प्रकारात मुनन में परनुकसान पर मर मिन बारे में मी पानाकरवाना। परमनिरपरेली में समागमा पारने in Armom मनिमरियायनाने मप्रमोग निमा १० ।

१२ सिम का मतदूर प्रमचन्द (३) सज्जनता का दण्ड (४) पच परमेश्वर' (५) नम का दारोगा (६) उपग' और (७) परीक्षा । इनम स सौत सज्जनना काम पच परमेश्वर सवस पूष सरस्वती में १९१५ १६ म छपी थी। सरस्वती द्वारा की गई सप्त सरोज की ग्रामोचना इस प्रकार धी- प्रमचन्दजी के नाम से सरस्वती ये पाठन परिचित नहीं हैं । मापी लिखी कितनी ही कहानियां सरस्वती म निकन चुकी हैं। मापरी भाषा सरल बोल पाल की मोर मुहावरेदार होती है। अब तक माप उ म ही अपने विचार प्रकट परते थे। अब कुछ दिना से मापने हिदी को अपनाया है। कहानियो म स्वाभाविक्ता भी है और उनसे कुछ-न दुध शिक्षा भी मिसती है। मनोरजन भी खूप हाता है । पुस्तक पढन लायर है। सन सरोज र प्रागन पर हिती साहित्यिक क्षयो म धूम-सी मच गई। विताव हाथो-हाय विकी। उन दिनो हिदी की सषषष्ठ मानी जाने वाली प्रमान-सस्था हि प्र यरत्नावर वम्बई न भी प्रमपद से एक कहानी सग्रह मांगा पौर प्रमचन्द ने नौ कहानियो का समह उस सम्या को प्रकाशन के लिए दिया। सग्रह नवनिधि 'फे नाम स छा। इस लिए प्रममत को दो सौ रुपय मिले। इस संग्रह में वे कहानिया थी जो प्रमचा न हमीरपुर में लिपी पी पौर जो उद प्रमपचीसी (भाग १) म भी एपी थी। यहानियां थी-(१) राजा हरटोल (२) रानी सारधा (३) मर्यादा की वटी (४) पाप का अग्नि कुण (५) जुगनू की चमक (६) पोखा (७) प्रमावस्या की रात्रि (८) ममता मोर (6) पछतावा । नवनिधि से प्रकाशन के पोडे ही दिन या प्रम पूरिंगमा नाम एक सपह भी निरसा । इसम भी कुछ नहानियाँ हमीरपुर के समय की पी मोर जो प्रम पचीसी (भाग १) म छप चुकी थी। ये रहानियां इस प्रकार हैं--(१) ईश्वरीय याय (२) पावनार (३) सन सफर (४) गरीब को हाय (५) दो भाई (६) बटी का धन (७) धम-सस्ट' (८) दुर्गा मा मन्दिर (6) सवा माग १ लिप बहुत-म भालोचक ने यह समभर कि 'नानिधि और प्रेम पूर्णमा । कहानिया सप्त सरोज की कहानियों काट लिपी गई प्रेम-की कला में हाम की भनक दया प्रकारावर गुन लिप्यते हैं--प्रेम पूर्णिमा में मचर की कहानी मा में दुध विधाम नहुमा नया मुरम सेसने पर सप्त सम भार प्रेम गिमा ये बीच उनकमा कामहीमा। काराव भानोची सोय भोर मेत म कहानिया का ठीक निधि पना परने का विमो परिणाम पर पदो।

६३ गोरखपुर म प्रध्यापन पर पर (१०) fरी रामकुमार (११) 'सिंगन (१२) 'दोष (१३) सम्पाई का उपहार', (१४) "वालामुखी (१५) और 'महातोय । यह साह भी सूत्र पि प्रमय की पुस्तकारी मांग बढ़ती जा रही थी। हिली पुस्ता एजेसी ने जिसने सम मरोग छापा था, प्रमच से ख मा पर एक पुस्ता लिखया पर छापी। इमरे पाठ र साली की वित्ता और उनम परित की महिमा का यज्ञान हा साता है। भी प्रामस्था ने प्रमचनशर उप माम भी प्रागित रिमा । यह उप याग पहल उदूम लिखा गया । इमरा मूल नाम पा- वाकार हुन । परन्तु इमका हिनी गातर सवा सन उन समारएसको चार यप पहल पर। उपयास पाभारम्भ १८१६ मलम दिया गया था। जनवरी १९१७ से ए परम प्रमर जो न निगम से लिया- 'पागल एक पिस्मा तिसते निपत नावन वियपना । को मौ सप सा पर सुना है। इसी वजह से UPTire न निव सव इम नाव म एसा भी सा गया है कि दूसरा काम परत । जो नही पाहता। मगर माघ (मक) सिए दो-मीन दिम अमर धनगु भगा । परवरी नि ममयूरी है। मगर माप इस नापन का मुमलगलगना चाहें ता माद' रिमाल भी मौजूर जयामत इस रोम को नही समान मरती। रिस्मा सिचम्प है मौर मुझ एमा ययास होता है कि में भय की वार नावन-नदीमी मरमपार हो सवंगा तीन महीना २५ माष १९१७ दलिंग पानि इलाहाल से तिपा---'मग नाव पर रहा है। पर बराइमीनान हा जाए ता सरम भूव हो । है । पाहता हूँ म पजाम सरी तरफ स। उमो समय र पोर पर - वागरान भामुन पुमडी काशिरार हा रहा है पाएपरिको म घाटे मि मिमनारस मी मरा मीन सिवनी जिमा निमा एकसाम दा मानिसकार नहीं भमान गाता। तर या मरो मामा गरता है। या नामावन लिए यानि नापन म ए हो जाट का है। पोर इमरा नियना सता मन किनारमाह दोनीन सानिया मिराना सगरेमपन पा पारम्म म गमाप्तहमा । ये मम पापान ममतारामालमीतही परनीती परतु मा मन माप माना एवमी ने १६ प्रतिrent मेरा मनमा मे मतमोपमाग यि कलम का मजदूर प्रमचाद ग्दिी पत्रा तथा समालोचना न संवा मटन का दिल बोलकर स्वागत दिया। सरस्वती न वश्या-नृत्यादि बहुतरी सामाजिक कुरीतिया का दिवसान वाली इस पुस्ता की भाषा को सरल रहा मौर उसक की दाली को राचक वतनाया। एक मातोचर कालिलाम कपूर न प्रेमचन्त स पूर्व हिी उप याम साहित्य की तुलना एक एसे उद्यान स की जिसम सभी कुछ याहर से मांगा हुमा था। मसार भर के भले-बुर पौधे यहां मौजूद हैं। इधर देखिये तो यगाली वस्मि और रवीन्द्र साहित्य मुमनो की क्लम है उपर गुजरात से लाई हुई सरस्वतीचन्द्र की बल है। यही ह्य गो और टयूमा क ऐतिहामिक उपयासो की कलम लगाने की कोशिश हो रही है। यही कुछ सउमन प्रमजी माहित्य के पूरे घर स याटिया को सुगभित करने का प्रयत्न कर रहे हैं । एक माघ कोने म छिपे हुए इने गिने माहित्य प्रमी अपनी सच्ची साहित्य-सेवा पा वीज बोन दिखाईते हैं। श्री मालिदास गपूर ने सामयिर हिनी उप यासा का जिक्र करत हुए महा- परतु माशा की भलर दिखाई दे रही है। मध्य उपन्यासो का मादर पत्ता जाता है चाह य अनुवादित ही क्या न हो। ऐस समय में साहित्य सेवियों का यह पम है कि पच्छे उपयासो की मार जनता का ध्यान पाकप्ट परें और उनके मखका का उत्साह बढाते रह । इसी धर्म को यथाबुद्धि नियाहन से लिए माज हम पाठा सेवा सन्न का परिचय कराते हैं। पीयुत प्रमचद की मामयायिकामा स तो ये परिमित ही होगे । यह उही की लेखनी से निकला हुमा पहला उप यास है। इस नेस का मन्तिम पराग्राफ इस प्रकार है- माशा करत है कि मेवा महागय की लेखनी सौर भी मछ-प्रच्छे उप यासों की सप्टि होगी। ईश्वर कर यह समय शीन पाए अब हम यह कहने का सौभाग्य प्राप्त हो निहिती साहित्य म भी पैररे हिक्स स्वॉट मोर रयो द्र को कमी नहीं है। सेवा सरन की बहुत स्याति हुई। भारत की दूसरी भापामो म भी इसके मनुवाद पो । प्रव प्रमचन ने अपने असवाए ईसार (१९१२) का हिन्दी म अनुवाद किया और हिन्दी प्रय रलार सम्बई स इसे वरदान म नाम स प्रकाशित करवाया। जसवाए ईसार' पर लेखर का नाम नवावराय पा परन्तु इसर हिनी रूपान्तर वरदान पर प्रमचन नाम था । मिस प्रकार पालावरों को प्रम हुमा या कि नवनिधि मोर प्रम पूरिणमा कीरहानियां सप्त मरोज' की पहानियो क मा मिसी गई उसी तरह वरान में समालोषका ने भी सोचा कि वरदान म प्रमचद की रला का हास हमा

Kalam Ka Majdur Premchandr

Author
Madan Gopal
Title
Kalam Ka Majdur Premchandr
File name
Kalam Ka Majdur Premchandr
Text
OCR done
Citation
1965
Published
2010/12
Publisher
Delhi,raj Kamal Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
101
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
History
DLI number
514948
Barcode
4990010022614.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
1b46yXQgMa8
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