Library
Shri Muhamad Bodh Aur Kabhir Bodh
Front matter
सत्य
भारतपथिक कवीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्दद्धारा संशोधित ।
१
7
"-
श्री-मुहम्मदबोध और काफिरबोध ।
खेमराज श्रीकृष्णदासने
बम्बई
निन “श्रीवेङ्कटेश्वर " स्टीम् प्रेसमें
छापकर प्रकाशित किया।
संवत् १९६२, शके १८२७.
सर्वाधिकार रक्षित है.
सत्य नाम।
श्री कवीर साहिव।
श्रीजगद्गुरवे नमः।
REFER
अथ श्रीबोधसागरे
नवमस्तरंगः।
मुहम्मदबोध।
धर्मदास वचन।
साखी-धर्मदास विन्ती करे, कृपा करहुं गुरुदेव ॥
नबी मुहम्मद जस भये, सोसब कहिये भेव ॥
सत्यकवीर वचन-चौपाई।
धर्मदास पूछ्यो भल बानी । सो सब कथा कहूँ सहिदानी ।।
जेहि औसर मुहम्मद औतारा । धरम आपनो जगत पसारा ॥
मारि काटि निजधर्म चलायो। जाते जीव बहुत दुख पायो ।
परम पुरुष दिल दाया आयी । मुक्तामाण कह को बुझायी।
मुक्तामणितुम संसार सिधाओ। काल कष्टते जीव बचाओ।
विगसी कमल उठि असबानी । मुक्तामनि सुनिओ तुम ज्ञानी ।।
भवमें जाओ जीवके काजा ।जीवन कष्ट देत यमराजा ॥
मुक्तामाणि चले शीस नवायी । तेही क्षण भव प्रकटे आयी ।
साखी-दोसौयुग कलि युग गयो, तब आयो संसार ॥
बहुतक जीव चितायऊ, कोइ कोइ हंस हमार ॥
चौपाई।
ऐसे बहुत दिन गयो सिरायी। सिंघल द्वीपमें पहुंच्यो जायी।
तब हम मिले मुहम्मद पीरा । जिन सब हुकुम कीन नगीरा"
w
(६७८)
मुहम्मदबोध।
तहाँ जाय हम कीन सलामा । मात रहे अलमस्त इलामा ।
नजर दिदार जो कीन हमारी । मत्तगयन्द केर असवारी ॥
कहु भाई तुम कहँ भरमाये । कहां ते आय कहा को जाये।
नाहक कोनाह साहब राजी । पढ़ो कुरान पूछौ तुम काजी॥
हुए हैरान नजर नहिं आये । किया नसीहत अल्ला फरमाये॥
मुहम्मद वचन।
साखी-कहाँ ते आये पीर तुम ,क्यों कर किया पयान ।
कौनशक्सका हुक्म है , किसका है फरमान ॥
रमैनी ।
पीर मुहम्मद सखुनजो खोला। अल्लाहमसे परदै बोला।
हम अहदी अल्लाः फरमाना । वतन लांहूत मोर अस्थाना ॥
उन भेजे रूह बारह हजारा । उम्मतके हम हैं सरदारा ॥
तिस कारणजो हम चलि आये । सोवत थे सब जीव जगाये ॥
जीव ख्वाबमें परा भुलाये । तिस कारन फरमान ले आये।
तुम बूझो सो कौन हो भाई । अपनो ईस्म कहो समुझाई ॥
साखी-दूर की बातें जोकरौ , करते रोजः नमाज ॥
सो पहुँचे लाहूतको, खोवे कुल की लाज ॥
कवीर वचन।
कहें कवीर सुनो हो पीरा । तुम लाहूत करो तागीरा ।।
तुम भूले सो मरम न पाया । दे फरमान तुम्हें भरमाया ।
फिर फिर आवे फिर फिर जाई। बद अमली किसने फरमाई ॥
लाहूत मुकाम बीचको भाई । बिन तहकीक असल ठहराई ।
तुम ऐसे उनके बहुतेरे । लै फरमान जाव तुम डेरे॥
१ नाम ।२ इसका वर्णन ग्रन्थ सारमें देखो। ३ स्थान । ४ जाच ।
बोधसागर।
(६७९)
७
साखी-खोजत खोजत खोजियाँ, हुवा सो गूना ट्रेन ॥
खोजत खोजत ना मिला, तब हार कहा बेचून ॥
बेचूने जग चिया, साई नूर निनार ॥
आखिर केरे वक्त में, किसकी करो दीदार ॥
रमैनी।
तुम लाहूत रचे हो भाई। अगम गम्य तुम कैसे पाई ॥
यह तो एक आदि विसरामा। आगे पाँच आदि निज धामा
तहँ ते हम फरमाँ ले आये। सब बदफेलको अमल मिटाये।
उन फरमान जो हम को दीनाः। तिनका नाम बेचून तुम लीना॥
साखी-साहब का घर दूर है, जासु असल फरमान॥
उनको कहो जो पीर तुम, सोइ अमर अस्थान ॥
मुहम्मद वचन-रमैनी।
कहैं मुहम्मद सुनो कवीरा । तुम कैसे पायो अस्थीरा ॥
लाहूत मेटि जो अगम बतायो। खुद खुदाय हमहूँ नहिं पायो ।
हम जानैं खुद आपै आही। तुम कुदरत कर थापो ताही॥
हम तो अर्श हाजिरी आये । तुम तो कुदरतसे ठहराये ॥
तुम्हरे कहे भरम मोहि आयो। खुद खुदाय तुम दूर बतायो।
आप सुनाओ खुदकी वानी । आलम दुनियाँ कहो बखानी॥
लाहूत मुकाम हम निजकर जाना।सो तो तुम कुदरत कर ठाना ।
हलकी मुलकी बासरी भाई । तीन हुक्म अल्ला फरमाई ॥
साखी-साई मुरशिद पीर है, साँचा जिस फरमान ॥
हलकी मुलकी बासरी, तीन हुकुम कर मान ।
कबीर वचन-रमैनी।
सुनो मुहम्मद कहूं खुदवाणी । खुद खोदायकी कहूँ निशानी॥
कादिर थे तब कुदरत नाहीं । कुदरत थी कादिरके माहीं।
(६८०) मुहम्मदबोध ।
ख्वार सभीको चीन्हो भाई । असल रूहको देउँ बताई ।।
असल रूहकी दीदार जो पावे । पावे निज मुसलमान कहावे ॥
हो आवाज जहां परदः पोशी । है वह मर्द कि है वह जोशी ॥
जब लग तख्त नजर नहिं आवे। दिल विश्वास कौन विधि पावे॥
जब खुद की खबर न पावे । तब लग कुदरत भ्रम ठहरावे ॥
हाल माशूक नजर जो आवै । एक निगाह दीदार जो पावै ॥
चार वेद अक्षर निरमाई । चार अंश ताके सुत भाई ॥
एकअंश चौभाग जो कीन्हा । ताते एक गुप्त कर लीना॥
एक अंशते गुप्त छिपाई। तीन अंश संसार पठाई ।।
अंशहि अंश भेद नहिं दीना। यह अचरज अक्षरने कीना।
जो तुम कहा हमारा मानो। तो हम तुमते निर्णय ठानो।
साखी यह प्रपञ्च बेचूनका, तुमते कहा न भेव ॥
आप सोरत होइ बैठा, तुम चार करत हो सेव ॥
मुहम्मद वचन।
कहैं मुहम्मद सुन खुद अहदी । इल्म लडुनी कहु बुनियादी ।
जबनहिं पिण्ड ब्रह्माण्ड अस्थूला। तब ना हतो सृष्टिको मूला ॥
तादनकी कहिय उतपानी। आदि अन्त और मध्य निशानी
साखी-बुजरुग हकीकत सब कहो, किस विधि भया प्रकाश।
जब हम जाने आदिको, तो हमहूँ बांधे आश॥
कबीर वचन।
सुनो मुहम्मह सांचे पीरा । समरथ हुकुम खुद आदिकबीरा
अब हम कहें सुनो चितलायी।आदि अन्तक सब कहों बुझायी।
प्रथमै समरथ आदि अकेला। उनके संग हता नहि चेला ॥
साखी-वाहिदथे तब आपमें, सकल हतो तेहि माह ।।
ज्यौतरुवर के बीजमें, पुष्प पातफल छाहँ ॥
बोधसागर । (६८३)
चौपाई।
आठों अंस त्रिदेव समेता। उतपति जगतकीन प्रभु एता॥
तीनो दीन त्रैलोकको राजू तिन बसपरि जिव भये अकाजू॥
तिन पुनि एक जुक्ति चितदीना। प्रथम ज्ञान चार जो कीना ।।
प्रथम क्षुद्रजो ज्ञान उपजाई । ध्यान अंशको तौन पठाई।
दूसर ज्ञान वाचा है भाई । राज अंशको तौन पठाई ॥
तीसर ज्ञानजोअनुभव कीना। धर्म राय को लेखा दीना॥
चौथे ब्रह्मज्ञान
उपजाई। माया अंश सो ध्यान लगाई ॥
पंचवा ज्ञान सहजकी डोरी। सब जीवनकी बंदीछोरी॥
जहाँसे चार ज्ञानजो आवा ।सोई कला निरंजन पावा ॥
निरंजन भये राज अधिकारी । तिनके चार अंश सेवकारी ।।
चार ज्ञान ते चारो वेदा । तिनते चारो भये कतेबा॥
मूल कुरान वेद की वानी। सोकुरान तुम जगमें आनी ।।
हक्क कुरान जो तुमको दीना । हद्द हुक्म तुम आपन कीना॥
चार कतेब के चारो अंशा । तिनके कहो भिन्न भिन बंशा॥
वेद पढावत ब्रह्मा आये । ऋग वेद को नाम लखाये ॥
यजुरवेदकी वानी । राजनीति सो कीन वखानी॥
तीसर सामवेदकी बानी। यज्ञ होम तिन कीन बखानी॥
चौथ अथर्वन गुप्त छपाये । तौन हुक्म तुम जगमें आये ॥
ऐकै मूल कुरानमें चारी। चार बीर तुम हो सरदारी॥
जब्बूर किताव दाउदने पाई । नास्त मोकाम रहै ठहराई ॥
तौरेत किताब मूसाने पाई । मलकूत मोकाम रहै ठहराई ।
इंजील किताब ईसाने पाई । जबरूत मोकाममें रहे ठहराई॥
फुरकानकिताब नबी तुम पाई । लाहूतमोकाम रहे लोलाई ॥
कुरान वेहहको मरम न पावै । बिनदेखे विश्वास क्या आवै ।।
दूसर यजुरवेदकी
(६८२) मुहम्मदबोध ।
चार मोकाम किताब है चारी। पंचये नाम अचिंतसँवारी ॥
तहतेआइ रूह बारहहजारी। तहाँअचिंत गुप्त व्योहारी॥
साखी-पीर औलिया थाकिया, यह सब उरले तीर ।।
समरथका घर दूरहै, तिनको खोजो पीर ॥
मारफत ।
चौपाई।
औवलमोकाम नासूत ठेकाना।दुजामोकाम मलकूतजोजाना॥
सेउम मोकाम जबरूत ठेकाना। चहारुममोकामलाहूतजोजाना
पंचयें मोकाम हाहृत अस्थाना। छठे मोकाम सोहं जो माना ।
हफतुम मोकामबानी अस्थाना। अठये मोकाम अंकूरठेकाना॥
नवयें मुकाम आहूत निशानी । दशये मोकाम पुरुषरजधानी ॥
बेतुक ।
औवल शरीअत् १॥ तरीकत २। हकीकत् ३ । मारफत् ४ ।
मरौवत् ५। ध्यान दोरहिअत् ६। जुलफकार चंद्र गेटा ७।
हुकुममुरतद ८ा देय ना कासो यही अंत् ९। सचपावेसमरथकाय
१०। अंकार ओंकार कलिमा नबी सचुपावै देखा हद्द वैहद्द
मुहम्मद वचन ।
तम कब्बीर भेद अधिकाये । खुदसमरथकी खवरिजोल्याये॥
अब तुम को हम बूझै अंतू । सो कहिये खुद अहदी संतू ॥
को तुम आहु कहाँते आये । क्यों तुम अपनोवर्ण छिपाये ॥
सात सुरति समरथ निरमाई । यह अस्थान रहो की जाई॥
येती मारफत कहु दुरवेशा। हम मानें तुमरो उपदेशा॥
सात सुरति केहि माहि समाई। जिव बोधे सो कह चलिजाई॥
समरथ गम तुम साँच कबीरा । समरथ भेद कहो मति धीरा॥
* इस विषय में लिखे हुये दश मुकामों का वर्णन पुस्तकके अन्त में देखो ।
बोधसागर।
(६८३)
साखी-मेरे शंका बाढिया, थाके बेद कुरान् ॥
वाहिद कैसे पाइये, समरथको मकान ॥
सत्यकवीर वचन।
सुनो मुहम्मद कहों बुझाई । जो खुद आदि अस्थान है भाई॥
जो जो हुकुम समरथ फरमाई ।सोसो हुक्म हम आनि चलाई।।
सुर नर मुनिको टेरि सुनाये । तुमको बहुत बार समुझाये ॥
तुमपर मोह अक्षरने डारा । तेहि कारण आये संसारा॥
सोलह असंख जुगजबै सिराई।सोलह असंख उतपति मिटिजाई
सात सुरति तब लोकहि जाई । जिव बोधो तेहि माह समाई ॥
सात सुन्य तजि ते अस्थाना । ते सब मिटे होय घमसाना॥
बेद कते बकि छोडो आशा । वेदकतेव अक्षर प्रकाशा ॥
तीन बार तुम जग में आये। फिर फिर अक्षरने भरमाये ॥
अक्षर चीन्हिके छोडो भाई । तीन अंश अक्षर निरमाई ॥
ब्रह्म कि सृष्टि आपको कीना । जीव सृष्टि तीरथ व्रत दीना ॥
माया सृष्टि ईश्वरी जानो । सबमें आतम एक समानो ॥
साखी-खोजो खुद समरत्थको, जिन किया सब फरमान् ॥
पीर महम्मद तहँ चलो, सोई अमर अस्थान् ॥
मुहम्मदवचन ।
पीर मुहम्मद मुख तब मोरा । कछु नहिं चलै तुमारो जोरा॥
अक्षर हुक्मको मेटनहारा । चार वेद जिन कीन पसारा ।।
कवीर वचन ।
सुनिये सखुन मुहम्मद पीरा । हम खुद अहदी आदि कवीरा ।
मेटो अक्षरको बिस्तारा । मेटो निरंजन सकल पसारा ॥
मेटो अंचित्तकी रजधानी । मेटो ब्रह्मा बेद निशानी ॥
चौदह जमको बांधि नचावों । मृत अंधा मगहर लेआवों॥
(६८४) मुहम्मदबोध ।
१२
धर्मराय ते झगर पसारा । निरंजन बांधि रसातल डारा॥
बेदकतेबको अमल मिटावों। घर घर सार शब्द फैलावों॥
समरथ हुक्म चलै सब माही । ब्यापै सत्य असत्य उठिजाही।
मुहम्मद वचन।
पीर मुहम्मद बोले बानी । अगम भेद काहू नहिं जानी ॥
सुना कान नहिं आखिन देखा । बिन देखे को करे विबेखा ॥
जो नहिं देखो अपने नैना। कैसे मानो गुरुको बैना॥
जो तुम खुद अहदी लै आये। हुक्म हजूर फरमान लेआये ॥
जौन राहसे तुम चलि आवो । सोई राह मोकहँ बतलावो।
हँसनको अस्थान चिन्हावो । समरथको मोहि लोक देखावो।
साखी-हंसनको अस्थान लखि, तब मानो परमात् ॥
जो समरथको हुक्म है, सो मेरे परवान् ॥
कवीर वचन ।
सुनो मुहम्मद कहों वुझाई । साहेब तुमको देउँ बताई ॥
चलै सैल को दोनो पीरा । एक मुहम्मद एक कवीरा॥
मोकाम् ।
भूमिते छत्तिस सहस ऊँचाई । मानसरोवर तहाँ कहाई॥
तह नासूत आहि मोकामा । नबी कवीर पहुँच तेहि धामा ।
तहँ दाऊद पयंबर होई । जब्बूर किताब पढे तहँ सोई॥
तहाँ सलामालेक सोइ कीना। दस्तावोस उनहु उठि लीना ॥
मोकाम् । २
तहवाँते पुनि कीन पयाना । चौबिस सहस बैकुंठ प्रमाना॥
तहवाँ पहुंच बैठे ऋषि बासा । देव सबै बैठे तेहि पासा॥
वह बैकुंठ बिष्णु अस्थाना । मलकूत मोकाम मूसाको जाना
मूसा पैगम्बर प? किताबा। उसका नाम तौरेत कितावा ॥
सलामालेक तहाँ हम कीना। दस्ताबोस उनहु उठि लीना ॥
१३
बोधसागर ।
(६८५)
मोकाम । ३
बैकुंठ ते आगे लायो डोरी । सुमेरते सुन्य अठारह कोरी ॥
येतो अधर सुन्य अस्थाना ।जबरूतमोकाम ईसाकोजाना॥
ईसा पैगम्बर पढे किताबा । उसका नाम इंजील किताबा ॥
सलामालेक तहाँ हम कीना। दस्ता बोस उनहु उठिलीना ॥
तहँवा बैठि विस्वंभर राई । वही पीर तो वही खुदाई
उहँते अधर मून्य है भाई। ताकी शोभा कही न जाई॥
मोकाम । ४
महाशून्यको लागी डोरी । ग्यारह पालँग तहाँ ते सोरी॥
लाहूत मोकाम कहावै सोई। जो देखे बहुतै सुख होई ॥
मुस्तफा पैगंबर बैठे तहाँ । फुरकान किताब पढतथे जहाँ॥
सलामालेक तहाँ हम कीना। दस्ताबोस उनहु उठिलीना।
देखतही मुहम्मद अस्थाना । तुम वेचून कहो यही ठेकाना ॥
चारो फिरिश्ते सलामालेक कीना। तब हम आगेका पग दीना॥
मोकाम । ५
तहते चले अचिंत ठेकाना । एक असंख सुन्य परमाना॥
हाहूत मोकामको वही ठेकाना। आगे है सोहं बंधाना ।।
मोकाम। ६
तीन असंख शून्य परमानी । बाहुत मोकाम सो कहो बखानी
नवी कवीर चले तेहि आगे । मूल सुरति बैठे अनुरागे॥
मोकाम । ७
पांच असंख सुन्न विच आही। सात मोकाम कहतहै ताही।
मोकाम । ८
इच्छा सुतिके पहुँचे दीपा । चार असंख है लोक समीषा।
ताको नाम राहत मोकामा । नबी कबीर पँहुचे तेहि ठामा ॥
मुहम्मदबोध ।
१४
मोकाम । ९
तहते सहज. द्वीप परमाना। दोय असंख तहाते जाना॥
ताहि मोकाम नाम आहूता । सोभा ताकी देख बहूता।
मोकाम । ०
साखी-पहुँचे जायके लोक जहँ, सन्त असंख दस लाख ॥
सो मोकाम जाहूतका दसम मोकाम यह भाख ।
चौपाई।
सलामा लेक तहाँ हमकीना । दस्ताबोस उनहु उठिलीना ॥
तहँते अमरलोकको छोरा । नबी कबीर पहुंच तेहि ठौरा ।।
अमरलोकके हंस सब आये । तिनकी सोभा कही न जाये।
भार भरि अंक मिले तहँ आये। देखि मुहम्मद रहे भुलाये ॥
सब मिलि हंस गये पुनि तहँवा। साहेव तखत पै बैठे जहवा ।।
जगर मगर छतर उजियारा । आप धनी का कहो बिहारा॥
असंख भानु पुरुष उजियारा । अमरलोक को कहो विस्तारा।
सकल हंस तहँ दरशन पाई। तिनकी सोभा बरनि न जाई ॥
तहँवा जाय बंदगी कीना। नबी भये जो बहुत अधीना ॥
मुहम्दमवचन ।
चूक हमार बकस कर दीजै । जो तुम कहो सोई हम कीजै ॥
पुरुषवचन ।
कहु मुक्तामान बेगितुम आये । दूसर कौन सँग ले आये ॥
मुक्तामनिवचन।
तब हम बचन पुरुषसे कीना । दोउ.कर जोर बंदगी कीना ॥
तुम जो राज निरञ्जन दीना । तापर हुकुम अक्षरको कीना ॥
दोऊ अंश दोउ दीन चलाये । तामें सृष्टि पकडि भुलाये ॥
तामे एक सो हम लै आये । सोतो तुम्हरे कदम दिखाये ॥
बोधसागर।
(६८७)
नबी मुहम्मद बन्दगी कीना । दर्शन पाय भये लोलीना ॥
तहते फिरि मृत्यु लोकचलि आये। निजमान कहे पानहु पाये ॥
तुम आपन कौल भरि देहो । पीछे पान जीवको पैहो ।
साखी-शब्द भरोसे नामके, दिया नवीको पान॥
तब हम सांचे मानि हैं, जब फिर मिलोगे आन ।
कवीर वचन-चौपाई।
तुम अपनो फरमान चलाई । खुद को भेद तुम घरो छिपाई।
जो यह भेद तुम प्रकट करिहौ । तौतुम कौल के बाहर परिहौ ।
चारो कलमा प्रकट भाखो । पचवाँ कलमा गुप्त जोराखो ॥
पचवाँ कलमा इल्म फकीरी । जाके पढे कुफ हो दूरी॥
हम काशी जात हैं भाई ।तबलो तुम अपनो कौल बजाई।
तुम पर दाया समरथ केरी। पांचों कलमा दिलमें फेरी॥
साखी-हम काशी को जात हैं, तुम मके अस्थान ।।
हम रामानन्द गुरु करें, तुम देओ जगत फरमान ।।
फरमान जगत को दीजिये, उलटी अदल चलाय।।
तुम कलमा का हुक्मले, निर्भय निशान बजाय ॥
इति श्रीबोधसागरे कवीरधर्मदास सम्वादे मुहम्मद
बोध वर्णनोनाम नवमस्ततरंगः ।
अथ ग्रन्थसार।
यद्यपि साधारणतः देखनेमें यह ग्रंथ भी मुसलमानी धर्म
के प्रवर्तक मुहम्मदको कवीर साहिबके बोधदेनेका देख पडता
है तथापि इसका भी अर्थ आध्यात्मिकहींहै क्यों कि, मुहम्म
द साहब के जीवन चरित्र में लिखाहै कि इनके माता पिता
,
,
(६८८)
मुहम्मदबोध ।
१६
दोनोही ईश्वर बिमुखमुर्तिपूजकथे उन्ही से उनकी उत्पत्ति हुई
थी। इसका आशय यह है कि, प्रकृतिपुरुषजब संसारमुखहोते
हैं । तबही अन्तः करण बिशिष्ट होकर चैतन्य जीव ॥
नामधारी होताहै। अर्थात मुहम्मद से आशय है अन्तः करण
विशिष्ट चैतन्य अर्थात् जीवसे ।
फिर मुहम्मदसाहबके उत्पन्नहोतेहीउनकी माताकी मृत्यु
होगयीथी और पिता तो प्रथमही मरचुकाथा इसकारण उनके
जन्म लेनेके पश्चात उनकी फूफूने उनका पोषण पालनकियाथा
उसीने अपने गोद में उन्दे लियाथा इसका आशय यह है कि,
जब जीव अन्तःकरण विशिष्ट होताहै तब पुरुष प्रकृत्तिका तो
अभाव हो जाता है अर्थात् स्वरूप विस्मृति होती है और देहकी
प्राप्ति होती है और देहही द्वारा अन्तःकरण वडा होता है ।
आगे चल कर मुहम्मद साहब ने चौदह विवाह कियेहैं, सो
जीवका चौदह इन्द्रियों के साथ अहंभाव करना है।
आगे चलकर चालीस वर्षकी अवस्थामें मुहम्मद साहबको
पैगम्बरी मिलीहै सो जब यहजीव पाँच ज्ञानेन्द्री,पांच कमेन्द्री,
पच्चीस प्रकृति और पंचप्राणका विचार करके उससे आपको
अलग जानने लगता है तब यह मोक्ष अधिकारी होताहै यही
पैगम्बरी मिलनाहै।
पैगम्बरी मिलने पर मुहम्मद साहेबने जिहाद करके काफिरों
कोमारना आरम्भ कियाथा.और काफिरोंके उत्पात करने पर
मका छोडकर मदीना को गयेथे । सो जबयह जीवअधिकारी
होकर विषयमुख इन्द्रियों को साहिव मुख होनेके लिये उनका
निरोध करता है तब इन्द्रियाँ बहुत उत्पात मचाती हैं तब जीव
प्रवृत्तिरूप मकानगरको छोडकर निवृत्ति रूप मदीनामें जाताहै।
बोधसागर । (६८९)
अर्थात् प्रवृत्तिसे उदासीन होकर निवृत्ति को धारण करता है।
और आसुरी सम्पत्ति रूप काफिरों को दैवी सम्पत्ति रूप
फौज की सहायतासे मारता है।
इससे भी आगे बढकर मुहम्मद साहब मेआराज को जाते
हैं। इस मेआराजके विषयमें अनेक मत भेदहैं । जिसका वर्णन
स्वामीप्रमानन्दजीने कवीरमन्शूरमें बहुत उत्तर रीतिसे कियाहै
पाठकोंके जाननेके लिये उर्दू कवीर मन्शूरसे अनुवाद करके यहां
लिखताहूँ।स्वामी प्रमानन्दजीने प्रमाणकेलिये मुसलमानीकिता
वोंके अरबी प्रमाण दियेहैं किन्तु उन प्रमाणोंका हिन्दी पाठकों
को कुछ उपयोग न होनेसे केवल उनका आशय दिखा दियाहै।
मुहम्मद साहबके हमेआराजका वर्णन ।
मुहम्मद साहवके मेआराजके विषयमें मुसलमानोंका
भिन्न २ मतहै । जो उनके हदीस और किताबोंसे प्रकटहै ।
तारीख मुहम्मदी में लिखाहै कि, जब मुहम्मद साहबको
पैगम्बरी करते बारह वर्ष बीत गये अर्थात् उनकी बावनवर्षकी
अवस्था हुई तब एक रातको-जिवराईल और मेकाईल जो
फिरिस्तों के मुखियों में से हैं मुहम्हमद साहब के पास आये
और उनका सीना(कलेजा) चीर कर उसमें से सब पाप और
बुरे संकल्पों को धोकर शुद्ध कर दिया और जब उनका हृदय
(अतःकरण)शुद्ध होगया तब उन्हे एक ऐसे जानवर पर जिस
का शिर तो मनुष्योंकाथा और नीचेका धड विच्छी के समान
था सवार कराकर खुदाके पास लेगये जबरईल ने तो रिकाब
और मेकाईलने उसका बाग पकड़ा। इस प्रकारसे वह रवाना
हुए। चलते २ वे सबसे पहले बैतअकसा अर्थात वडे हैकल
अर्थात एक वडे भारी वृतके निकट पहुँचे। वहाँ बहुतसे फिरिश्ते
.
मुहम्मदबोध ।
मुहम्मद साहबको प्रणाम करनेको आये जहाँ वह खुराक बाँधकर
जब भीतर गये तब वहाँ सब पैगम्बरोंकी आत्मा को देखा ।
फिर एक सीढी आकाशसे उतरी अरबी भाषामें जिसे
मेआराज कहतेहैं फिर मुहम्मद साहब बुर्राकपर सवार होकर
उस सीढी के मार्ग से ऊपर को चढे । जब प्रथम आकाश
पर पहुँचे तब वहांका द्वार जिबराईल ने खुलवाया और सब
भीतर गये। भीतर पहुंचने पर देखा कि, हजरत आदम बैठे
हुए हैं और उनके वाई ओर नरक का द्वार खुला हुआहै और
दहिनी ओर स्वर्गका । नरक की ओर देख कर हजरत आदम
रोते हैं और स्वर्ग की ओर देखकर हँसते हैं । इस प्रकार से
प्रत्येक आकाश पर होते हुए जिबराईल मुहम्मद साहब को
जब सदर्रह के द्वार पर ले गये तब वहाँसे जिबराईल पीछे हो
लिये। आगे चल कर एक सुनहले पर्दे के निकट पहुंच कर
जिबराईल ने कहा कि इससे आगे हम नहीं जा सकते आप
स्वयम् जाइये । फिर वहां से मुहम्मद साहब ने अकेले सत्तर
मंजिल पार किया । सत्तर पर्दे पार होकर बुर्राक भी ठहर गया
और वहां से एक पक्षी जिसे जफ़ज़फ़ कहते हैं आया और उस
पर चढ कर मुहम्मद साहब खुदा के पास गये और वहां उन्हों
ने खुदा से बहुत कुछ वार्तालाप किया और अपने धर्मके
सब नियम उनको वहांहीसे मिले जिसको लेकर वह लौट
कर अपने स्थान पर चले आये। इस स्थान पर लिखा है कि
यह सब बातें इतनी जलदी हुई थीं कि, मुहम्मद साहेब के
बुर्राक पर सवार होकर जाते समय एक कटोराको धकालगा
था जो पानी से भरा हुआथा। सो धक्का लगतेही वह टेढा
होगयाथा । मुहम्मद साहेब इतनी जल्दी लौटकर आये कि,
उस कटोरे का पानी अभीतक गिरने नहीं पायाथा और
१९
बोधसागर । (६९)
उसको उन्होंने आकर सीधा करके शेष पानी को गिरने ने
बचाया।किन्तु उपरोक्तसत्तर पर्दे जिनको मुहम्मद साहबने
अकेलेही पार कियाथा उनमें से एक २ की दूरी इतनीधी
कि, पाँचौ वर्ष तक वेग पूर्वक चलने से पूरा होता था। ऐने
सत्तर पॉको मुहम्मद साहब ने पार किया। और इधर लौट कर
आने पर क्षण मात्र से अधिक समय नहीं लगा। मुसलमानी
धर्मते इसी वृतान्तको मुहम्मद साहवका मेआराज होना कहते
हैं।इस विषयमें मुसलमानी धर्मके बडे२पण्डितोंमें बहुत मतभेद
हैं। कोई तो कहता है कि, मुहम्मद साहबने स्वप्न देखाथा, कोई
कहताहै केवल संकल्प से वहाँ पहुँचे थे, कोई कहता है केवल
प्रथम भूमिका (बैतुलअकसा) तक गये थे, कोई कहता है
कि, अन्तरदृष्टिमे मुहम्मद साहेब वहाँ पहुँचे,कोई कहताहै केवल
जिवराईलको देखा खुदाको नहीं देखा, कोई कहताहै पांच
भौतिक शरीर सहितही मुहम्मद साहेब आममानपर गये और
इसी प्रत्यक्षकी दृष्टिसे खुदाको देखाविस्तार भयसे अधिक मन
भेदका लिखना छोडकर यथार्थ आशयकी ओर झुकता हूँ।
पैगम्बरी मिलनेकेवारहवें वर्षके पश्चातमुहम्मद साहबको मे
आराजहुआ था उसका आशय है कि, जब मुमुक्षु श्रवण
मनन निदिध्यासन द्वार बारह महावाक्यका विचार कर लेना है
तब यह मोक्ष का आधिकारी होता है । और ५२ वर्षसे आशय
है ५२ अक्षरसे सो जब यह ५२ अक्षर के वृत से बाहर होता
है अर्थात् शब्द जालसे निकलता है तब इस को सच्चे
सद्गुरु की शरणकी प्राप्ति होतीहै । जहाँ शुद्ध बुद्धि रूप जिबरा
ईल जो शुद्ध सतोगुण से प्राप्त होती है और शुद्ध संतोष रूप
मेंकादल जो रजोगुण की शुद्धता से मिलताहै इसके साथ
२०
(६९२)
मुहम्मदबोध ।
होता है । और तमोगुण की शुद्धता से उत्पन्न हुए शौर्य
(धीरता) रूप बुराकपर सवार होकर गुरुकी शिक्षा द्वारा यह
ज्ञान की भूमिकाओंको पूर्ण करता हुआ यथार्थ पद को प्राप्त
होता है। और यथार्थ पदको प्राप्त होकर जीवन मुक्त अवस्था
से अन्य जीवों को उपदेश देकर काल जालसे छुडाता है।
इस मुहम्मद बोध ग्रन्थ के यथार्थ आशय को पारखी
आत्मविद गुरु अधिकार प्रति अनेक रूपकों में समझातेहैं।
और इसको आध्यात्मिकही अर्थ से ग्रहण करने के लिये दश
मुकामी रेखता काभी प्रमाण है । सो यहां दश मुकामी रेखता
लिख देता हूँ
दशमुकामी रखता।
चला जब लोकको शोक सब त्यागिया हंसको रूप सतगुरु
वनायी।ग ज्यों कीटको पलटि भृङ्ग किया आप समरङ्ग दैले
उड़ायी।छोड़ि नामूत मलकूतको पहुंचिया बिष्णुकी ठाकुरी दीख
जायी। इंद्र कुबेर जहाँ रंभको नृत्यहै देव तेंतीस कोटि रहायी
॥१॥छोडि बैकुंठको हंस आगे चला शुन्यमें ज्योति जगमग
गायी । ज्योति परकाशमें निरखि निस्तत्त्वको आप निर्भय
हुआ भय मिटायी । अलख निर्गुण जेहि वेद स्तुतिकरै तीनहूं
देव को है पिताई। भगवान तिनके परे खेत मूरति धरे भागको
आन तिनको रहायी॥२॥ चार मुकाम पर खंड सोरह कहैं.
अंडको छोर ह्यां ते रहायी। अंडके परे स्थान अचिंत को
निरखिया हंस जब उहां जायी। सहस औ द्वादशैरूह हैं सङ्गमें
करत कल्लोल अनहद्द बजायी। तासुके बदनकी कौन महिमा
कहौं भासती देह अति नूर छायी॥३॥ महल कंचन बंने
मणिक तामें जड़े बैठ तहँ कलश अखंड छाजै । आचिंतके
बोधसागर । (६९३) परे स्थान सोहंका हंस छत्तीस तहवां बिराजै । नरका महल औ नूरकी भूमि है तहां आनंद सो इन्द्र भाजै । करत कहोल बहु भांतिसे संग यक हंस सोहंगके समाजै॥ ४॥ हंस जब जात पट चक्रको वेधिकै सातमुक्काममें नजर फेरा। जोहंगके परे सुरति इच्छा कही सहसवामन जहँ हंस हेरा। रूपकी राशिते रूप उनको बना नहीं ऊपमा इन्दु जौनिवेरा । सुरतिसे भेटिकै शब्दको टेकि चदि देखि मुकाम अंकूर केरा ॥५॥ शून्यके बीचमे बिमल बैकुंठ जहाँ सहज अस्थान है गैर केरा। नवो मुक्काम यह हंस जब पहुंचिया पलक विलंब हाँ कियो डेरा । तहाँसे डोरि मकरतार ज्यों लागिया ताहि चढि हल गो दै दरेरा ॥ भये आनन्दसे फंद सब छोडिया पहुंचिया जहाँ सत्यलोक मेरा ॥६॥ हंसिनी हंस सब गायबजायकै माजिकै कलश वहि लेन आये। युगन युग बीछुरे मिले तुम आइकै प्रेम करि अङ्गसो अँग लाये। पुरुषने दर्श जब दीन्हिया हंसकोतपनि बहु जनमकी तब नशाये। पलटिकै रूप जब एकसे कीन्हिया मनहुं तब भानु षोडश उगाये ॥ ७॥ पुहुपके द्वीप पीयूष भोजन करै शब्दकी देह जब हंस पायी पुहुपके सेहरा हंस औं हंसिनी सच्चिदानन्द शिर छत्रछायी। दिपै बहु दामिनी दमक बहु भांति की जहाँ घन शब्दको घमंड लायी।लगेजहाँ बरपने गरज घनघोरिकै उठत तह शब्द धुनि अति मोहायी॥८॥ सुनै सोइ हंस तहँ यूत्थके युत्थ है एकही नूर यक रङ्गरागीकरत बिहार मन भामिनी मुक्तिमेंकर्म औभर्म सब दूरि भाग । रङ्क औ भूप कोइ परखि आवै नहीं करत कल्लोल बहु भाँति पागे काम औक्रोध मद लोभ अभिमान सब छाँड़ि पाखंड सत शब्द लागे॥ ९॥ पुरुपके वदनकी कौन महिमा कहीं जगतमें उपमांय कछु नाहिं पायी। चन्द्र औ मूर गण ज्योति लागै (६१४) मुहम्मदबोध । २२ नहीं एकही नक्ख परकाश भाई । पान परवान जिन बंशका पाइया पहुंचिया पुरुषके लोक जायी। कहैं कब्बीर यहि भांति सो पाइहाँ सत्यकी राह सो प्रकट गायी॥१०॥ देह नासूत स्वरे मलकूत और जीव जबरूत कोरूह बखाने अरवी में लाहूत कहै जेहि निराकार मानि के मंजिल्ल ठाने ।। आगे हाहूत लाहूत है बाहूत खुद वाविन्द जाहूत जाने । सोई श्रीराम पन्नाह सबै जग नाहि पन्नाह यह अता गाने । इसप्रकारसे सत्यके खोजियोंको तो ऐसे ग्रन्थोंका अध्या त्मिक अर्थही ग्रहण करनेयोग्य है । और स्थूल अर्थतो स्थूल बुद्धिवाले पक्षपातियों के लियेही छोड देना उचित है। इति ।
२३ बोधसागर । (६९५) पृष्ट (६८२)की टिप्पणीमें सूचित किये एहु दश मुकामों का वर्णन । प्रथम नासूत का वर्णन । मासूत मुकाम सुमेरु पर्वतके उत्तर और पृथ्वी से छत्तीस सहस्र योजन ऊँचाहै और यहांपर दयाअंश रहताहै और यह मायाका स्थानहै-महामाया इस जगह अपने तेज सहित निवास करती है । और जब कवीरसाहब और मुहम्मदसाहब उस स्थानपर पहुँचे तब वहां हजरत दाऊद को वैठे तथा जबूर नामक पुस्तकको पढ़ते पाया। वहां पहुँचकर कबीर साहबने अस्सलामअलैक कहा-तब हज़रत दाऊद अलै कमस्सलाम कहकर उठ खड़े हए-और उनके हाथों को चूमकर बड़ी आवभगत किया-तब कवीर साहब मुहम्मद साहबको उस स्थानकी विशेषता और गुणोंको बतलाकर आगे चले। दूसरे मलकूत का वृत्तान्त । दूसरा स्थान मलकूत है-और यह स्थान नासूत से चौवीस सहस्त्र योजन उँचाई पर हैं-और पृथ्वीसे साठ सहस्र योजन की उँचाई पर है । और इस स्थानको दूसरे शब्दों में वैकुण्ठ कहते हैं, और यह वैकुण्ठ विष्णुका स्थान है और इसी स्थानपर पाप पुण्यका लेखा लगताहै-और इस विष्णुको सभामें ब्रह्मा विष्णु शिव इन्द्रादिक समस्त देवतागण उपस्थित रहते हैं- इस विष्णुही का नाम धर्मरायहै-और आपकी आज्ञासे नरक तथा बैकुण्ठ और योनिका फिरना आदि सब कुछ होता है और इसी स्थान से विष्णु महाराजका परिभ्रमण समस्त पृथ्वी और आकाशादिमें हुआकरताह । चित्रगुप्त जी विष्णु के मत्री सबके पाप पुण्यका लेखा तथा।हिसाब रखतेहैं । जब कवीर साहब मुहम्मद साहबको अपने साथ लेकर इस मलकूत पर पहुंचे तो वहां मूसा को बैठे तौरेत पढता पाया-कवीर साहब ने वहां पहुंचकरभी सलामअलैक किया-मूस सलामका उत्तर देकर उठे, और उनका हाथ चूमकर बडी आवभगत की तब कवीर साहबने मुहम्मद साहबको इस स्थान के समस्त गुण बतला तथा वहांके वृत्तान्त से विज्ञ कराकरआगे चले। तीसरे जबरूत का वृत्तान्त । तीसरा जबरूतहै-इस जबरूत स्थान को कवीर साहबने झाँझरी द्वीप कहा ह-और यह निर्गुण ब्रह्म अलख निरञ्जनका स्थान है जो तीनों लोकका कर्ता धर्ता है और यह स्थान, वैकुण्ठसे अठारह करोड योजन ऊपरको ऊँचा है-यह बडा सुन्दर स्थान है-यहांपर चार करोड ज्योतिका प्रकाश है और इस सभामें चारों फरिश्ते उपस्थित रहतेहैं-आर्थत् जिबराईल-इसराफील-इजराईल-और मेकाईल। इन्हीं (६९६) मुहम्मदबोध । २४ चारको ब्रह्मा विष्णु शिव और यम इत्यादिके नामसे पुकारते हैं, । समस्त आज्ञाएँ इसी स्थनसे प्रचलित हुवा करती हैं और चारों फिरिश्ते इन्होंके आज्ञाकारी हैं । वेद तथा पुस्तकें सबके प्रचार कर्ता यही हैं और आपहीके आज्ञाकारी तथा अधीन सब हैं। आद्या तथा निरञ्जन इसी राजधानीमें बैठकर तीनोंलोकका राज्य करते हैं। जब कवीर साहब रसूल अल्लाहको साथ लेकर पहुंचे तो देखा कि हज़रत ईसा वहाँ बैठे हुए इश्लील पढरहेहैं । वहाँ पहुँचकर कवीर साहबने अस्सलामअलैक कहा और हज़रत ईसा सला- मका उत्तर देकर उठ खडे हुए और उनके हाथको चूम लिया-तब कवीर साहब मुहम्मद साइबको उन स्थानों के गुणका विवरण बताकर आगे चले । चौथे लाहूतका वृत्तान्त । चौथा लाहूत है जबरूत और लाहूतके बीचम ग्यारह पालंगका अन्तर हैं, और एक पालंग आठ करोड़ योजनका है, । यह लाहूत स्थान अक्षरका है। यहाँ अक्षर और योगमाया रहते हैं यह बड़ा मुन्दर स्थान है । जब कवीर साहब और मोहम्मद साहब इस स्थानपर पहुंचे तब कबीर साहबने मोहम्मद साहबसे कहा कि हे मुहम्मद ! देखो यह तुम्हारा स्थान है-और यहाँही वह अक्षर पुरुष जिस को तुम बेचुन बेचेरा खुदा कहतेहो रहता है और उस स्थानके गुण दिखलाकर आगेको चले। पाँचवे हाहूतका वृत्तान्त । पाँचवाँ हाहूत हैं-यह हाहूत स्थान एक असख्य योनन शून्यके ऊपर है-अर्थात् लाहूत और हाइतके बीचमें एक असंख्य योजन शून्य और अंधकार है-यह हाहूत रयान अचिन्त पुरुषका है-यहाँ अचिन्त पुरुष सपत्नीक रहता है और यह स्थान बडाही मनोहर है-अचिन्तके सामने तीन सौ अप्सराएँ नृत्य करती रहती हैं-और यह नि:शंक तथा निर्देद रहता है कबीर साहब इस स्थान और अचिन्त पुरुषका सव बिवरण मुहम्मदसे कह करके आगे को चले। छठवाँ बाहूत का वृत्तान्त । यह बाहूत छठा स्थान है। और बाहूत और हाहूतके बीचमें तीन असंख्य योजन सून्य और अँधेरा है और हाहूतसे बाहूत तीन असंख्य योजन की उँचाईपर है- यह अत्यंत भनोहर स्थानहै । इस स्थान में सोहं पुरुष रहता है-और सोह पुरुषको अर्धाङ्गिनीका नाम ओहं है -यह सोहं पुरुष अपनी शक्ति ओहं सहित सिंहासनपर अधिकृत है-और उस स्थान में सदैव सोहका शब्द सुनाई दिया करताहै । जव कवीर साहब मुहम्मद को लेकर इस स्थानपर पहुंचे तो वहांके समस्त गुणोंका विवरण उन्होंने उनसे किया और फिर आगे चले।
२५ बोधसागर । (६९७) सातवें साहूत का वृत्तान्त । यह साहूत बाहूतसे पाँच असंख्य योजन ऊंचा हैं, और बाहूत और साहूतके बीचमें पाँच असंख्य योजन शून्य और अत्यंत अंधकारहै । यह इच्छाका स्थानहै । इस स्थान की सुन्दरता तथा यहां की सुखसामग्रीकाभी विशेष विवरण है कबीर साहब मुम्मद साहबको दिखलाकर आगे चले । आठवें राहूत का वृत्तान्त । राहूत साहूतके ऊपर चार असंख्य योजन ऊंचा है । साहूत तथा राहूत के बीच में चार असंख्य योजन शून्य और अत्यंत अंधकार है और इस राहूत स्थानमें अंकुर पुरुष अपनी शक्ति सहित रहता है-यह अत्यंत सुन्दर तथा मनोहर स्थान है। जब कबीर साहब मुहम्मद साहब को लेकर इस स्थान में पहुंचे तो उसके सब गुण दिखलाकर आगे चले । नववें आहूत का वृत्तान्त । यह राहून के ऊरर दो असंख्य योजन ऊँचा है। और बीचमें शून्य तथा अंधकार है-इस स्थान में सहजपुरुष रहता है और सत्यपुरुषका सबसे बड़ा पुत्र यही कहलाता है-यह नवाँ स्थान सबसेसुन्दर और आनन्द पूर्ण कहलाता है । कबीर साहबने मुहम्मह साहब को वह स्थान दिखालाय और इसका विवरण करके फिर ओग को चले। दशवे जाहूत का वृत्तान्त। आहूत और जाहूत के बीचमें दश असंख्य लाख योजनका अन्तर हैं अर्थात स्थान नाहूत आहूत के ऊपर दश असंख्य लाख योजन ऊँचा है-और यही स्थान सत्यमपुष का है इसकी सुन्दरताका विवरण किया नहिं जासकता है-इसी स्थानसे कवीर साहब सत्यपुरुषकी आज्ञा लेकर पृथ्वीपर आया करते हैं और इसी स्थानके रसूल पाक हैं और इसी सत्य पुरुषके सत्यलोकमें जब हंस पहुचते हैं-तब कालपुरुष उनको नस्नकार करता है और उन हंसों का आवागमन फिर कभी नहीं होता । वे हंस सत्यपुरुषकी स्तुति किया करते हैं और वें सत्यपुरुषके स्वरूपको प्राप्त होनाते हैं । सत्यलोककें आधीन अठासी सहस्र द्वीप हैं और सब द्वीपो में सत्यगुरुके हंस आनन्द करते हैं उनके भोजन तथा वस्त्रादिका विवरण नाहीं हो सकता है।
सत्यकवीराय नमः।
अथ श्रीबोधसागरे
दशमस्तरंगः।
श्रीग्रन्थकाफिर बोध।
मंगलाचरण-सोरठा।
अन्दः श्री सत्य कवीर, कुफर नशाबन जगत गुरु ॥
पों सत गति धीर, टूटे कुफर जंजाल सत्र ॥
ग्रन्थारम्मः।
कौन सो काफिर कौन मुर्दार । दोऊ शब्दका करो विचार ॥
गुम्सा काफिर मैनी मुर्दार । दोऊ शब्दका यही विचार ॥
हम नहि काफिर हम हैं फकीर । जाइ बैठे सरवरके तीर
बोरी नारी दरोग सो डरें। राह सो लेखा सबका करें।
नंगे पायन पृथ्वी फिरै । हाट न लूटै बाट न पारै ।।
हमतो (बाबा) किसीका कछुनविगारीदर्दमन्ददिल दया सबारें ।
दुनिया लोक सो उल्टी करै । सत्यनाम
सिकादेखि न कहिये फकीर । फकीर न कूटे पुरानी लकीर।।
काफिर सो कुफराना करे । अलह खुदाय सो नाहीं डरे॥
कर न वन्दगी फिरे दिवाना । गरभ बांधि फिरै गैबाना ।
बोल कुबोल सबै विसरावै। खून खराफातको दुरि बहावै ।।
दिल में चोर कमर में कत्ती । लोगन के घर भाजे रत्ती॥
अलह के नामे बाँटे खाना । सोकहिये सांचे मुसलमाना ।
मुसलमान मुसावे आप । सिदक सबूरी कलमा पाक ॥
खडी ना छेडे पडी न खाय । सो मुसलमान बिहिश्तको जाय।
१ ऋोध । २ अभिमान । ३ व्यभिचार। जारी।
सदा उच्चरै॥
बोधसागर ।
कलमा पढे न आवै बिहिस्त । हिरदे रहे पाप की दृष्टि ।
हिन्दु मुसलमां खुदाके बन्दे।हमतो योगी(किसीका)न राखेछन्दे
देबी देहरा मसीद मिनार । हमरे तो एक नाम अधार ।।
टाकी ले कौन ऊपर चढै। पाव न दाबें हाथ न गढे ।
तहांन अग्नि पवन का डर।ऐसा अलखपुरुष (जिन्दपीर)काघर
चूना पत्थर बनाइया दादाआदम
की
करनी॥
हमतो रहें अलेख पुरुष जिन्दा पीर की शरनी॥
मक्खी जाय बंधनमें परी । छानत छानत ताही गिरी।
काजी मुलना करे बिचार। मक्खी किया बड़ा अहँकार ॥
मक्खी तो गाये भखे। मक्खी तो सूअर भखे।मक्वी तो हलाल
भक्खे । मक्खी तो मुर्दार भखे॥ मक्वीजायविगारे खाना। तहां
न चले बादशाह परवाना॥ कोरा कलमा बहुतेरा बोले।
खेर मिहर का खीसान खोले । मिहर न बांटेमुर्दार खोरा । खैर
न बांटे अल्लहका चोरा॥अरस परसबीच समाना। मोम दिल
मोम दिल जाना। सिदके सोपरि पहिचाना । दर्दमन्द दुरवेश
बखाना ॥ रहमत है मुरशिद पीरको। जहमत सूम महसूदको ।
निश्चयपरिचे निमाज गुजारै श्रवणनेत्रको बैर निहारै॥ मुहम्मद
मुहम्मद क्या करे । कुरान कलमा क्या पढे । किधर किधर
की राह बतावे । विनु गुरु पीर राह ना पावे॥
साखी-हाजी गाजी दोऊ गुरु, चेला खोजो दस दर्वाजा॥
अलख पुरुष कहँ माथनवाओ, इस विधि करै निमाजा॥
सभै साचे काजी, सांचे मुलना बेद कुरान ॥
कहै कबीर आबसोसब आलम उपजाना। हिन्दूकहिये कीमुसल
माना॥राम रहीम बसे एक थाना।मनको जाने सोई मोलाना॥
दरको जाने सोई दरवेश। हमतोबावानेकी बदी सोन्यारा ।।
दुनिया मति कोइ लावे दोष । हम तो करि हैं अकेले दस्त ।।
-
२८
(७००)
काफिरबोध ।
ताका साहेव मका वस्त । मक्रवन्तकासाहेबअकिल मन्द
अकिलमन्द अकिल सोजाना। मन मुरीद दोस्ती दाना ।
सहर गदाई कौन यार । सिर खुरदनी कौन यार ।
बन्दी खाने कौन यार । तख्त बादशाही कौन यार।
काया यार सिर खुर्दनी। दिल यार मार माहीं ।
जीव यार. बन्दी खाने । मन यार तख्त बादशाही।
मनलाल दिललाललालपोतदार।हमसाही हमसाहसाहपोतदार
इति कबीर साहब का वचन उचार विचार ।
अथा खान मुहम्मद अली पादशाहका प्रबोध ।
कलिक कीमोक लिस रसमें की चशमें । खदयर संयम
करदम । ओजूद राह चक्रित करदम ।
औवल-अक्ले पीर है । मन मुरीद है। तन शहीद है। असल
गदाई है।तकबुर दुशमन है । गुस्सा हराम है। नफ्स शैतान है।
चोरी लानती है । जुवारी पलीदी है । अदब आदि है । बे
आदब कम असल है । राह पीर है। वेराह बेपीर है । सांच
विहिश्त है । झुठ दोजख है। मोमदिल पाक है । संगदिल
नापाक है । हिर्स हैवान है । बहिर्स वली है ॥
लाइ लुइ हरकत है। अचेतबेगुलाम है। असलजादे को सलाम
है। कृतहीन जर्दरू है। दाना जौहरी है। असलकी दोस्ती है।
दाना शायर है । बूझ महबूब है । बन्दगी कबूल है ।
अल्लाह नूर है । आलम हद है। साहिब बेहद है। यकीन
मुसलमान है।शील रोजा है। शर्म सुन्नत है।ईमान मुसलमान है।
बेईमान बेदीन है। दिल दलील है। बाँग बलेल है। फकीरी
सबूरी है । नामबूरी मकारी है। दरोग द्वन्द है।
इति समझौता।
है
२९
बोधसागर।
(७०१)
अथ बन्द।
प्रथमबोलिये मूल बन्ध । दुजे बोलिये कमर बन्ध । तीजे
बोलिये लंगोट बन्ध ।पाँचवें बोलिये दानिश बन्योछठे बोलिये
शस्त्र बन्ध । सातवाँ बोलिये सहस बन्ध । आठवाँ बोलिये
अहूठ हाथकी काया।जाका मर्म काहू विरले पाया॥ मक्के हिर्स
मदीने छाया औवल पीर हिन्दू कौबल वीर मुसलमान कहाया।
मुसलमानकी काटी चोंचनी हिन्दू के छेदे कान । बोलता ब्रह्म
नही हिन्दू नहीं मुसलमान । दादा आदम ने गाया। बडे बडे
पीरन को फरमाया । खुदाने अली पादशाह को चिताया।
हिम्मते बन्दा मददे खुदाया। दुआ फकीरा रहम अल्लाह ।
कदम दर्वेशाँ रद्द बलाय.। दादा आदम मामा हौआ। मके
मदीने में चढा तावा । पहिली रोटी फकीर को रखा । ना देवे
रोटी तो टूटे कठवता फूटे तवा । बैठी रहो मामा हौवा । कुफ
खेले अपनी रावा । इतनी सवाल रतनहाजी ने कह्यो । कहै
कवीर पीर को जानी । काफिर वोध सम्पूरण वानी॥
इति श्री काफिरबोध प्रथम मंज़िल समाप्त ।
फिरिश्तोंका व्यान।
१ औवल फिरिश्ता बसर है। जैसे खुदाकी सूरत मूरत नहीं है
आदि अन्त नहीं है वैसे वसरकाभी कोई रूपरेख नहीं है ।
खुदाने यह फिरिश्ता सब जीवधारीके संग लगादियाहै ।जो
हरएकको बतलाताहै कि, देख कर चलो ठोकर मत खाओ ॥
२ दूसरा फिरिश्ता समेअ (कान ) है उसके द्वारा खुदा
उपदेश करता है कि, मकरूह (बुरा) मरगूब (मला) आवाज
और दोस्त दुशमन की बात को सुनो और समझो।
१ नेवेंद्री कर्णेन्द्री।
(७०२)
काफिरबोध ।
३०
३ तीसरा फिरिश्ताशामा (नाणेन्द्रिय ) है। यह फिरिश्ता
सुगन्धि दुगन्धि को बतलाता है ।
४ चौथा फिरिश्ता लमस (स्पर्शेन्द्रि) है जो बतलाताहै
कठिन और कोमल को।
५ पाँचवाँ फिरिश्ता जायका (रसेन्द्री) है जो छः प्रकार
के रसों का ज्ञान बतलाताहै।
६छठां फिरिश्ता हाथ है जो हाथ से करने योग्य कामों
को सिखाता है!
७ सातवाँ फिरिश्ता पाव है जो चलने फिरने को बतलाताहै।
८ आठवाँ फिरिश्ता ज़बान (जिह्वा) है जो भला और बुरा
वचनबोलने को सिखाता है।
९ नवाँ फिरिश्ता आलातनासुल (जनेन्द्रि) है जो मूत्र
त्याग करने और-संसार की वृद्धि करने का मार्गबतलाता है ।
१० दशवाँ फिरिश्ता मेकअद (गुदेन्द्रि) है जो शरीर के
मलों को बाहर निकालताहै।
११ ग्यारहवाँ फिरिश्ता दिल (मन) है जो इच्छा उत्पन्न
करता है और राग द्वेष करता है। दिल वह नहीं है जिसको
राक्षस मांसा हारी लोग कबाब बनाकर खाते हैं।
१२ बारहवाँ फिरिश्ता इदराक (चित) है जो सर्व पदार्थों का
चिंतन करता है।
१३ तेरहवाँ फिरिशता अहंकार है जो जीवन की रक्षा कर
ता है।
१४ चौदहवाँ फिरिश्ता अक्ल ( ज्ञान ) है जिसे जिबरईल
कहते हैं और जो सब के भेद को जानता है और सबको उप
युक्त मार्ग बतलाता है।
३१
बोधसागर।
(७०३)
१५ पन्द्रहवाँ फिरिश्ता शहवत ( रजोगुण) है जिसको
ब्रह्मा कहते हैं।
१६ सोलहवाँ तमीज (सतोगुण) है जो सत्य असत्य का
बिचार बतलाताहै इसीको विष्णु कहतेहैं।
१७ सतरहवाँफिरिश्ता गज़ब (तमोगुण ) है जो दुखदाई
पदार्थोंसे रक्षा करताहै । इसी को शिव कहते हैं।
इसी प्रकार पांच तत्त्व और सर्व प्रकृतियाँ आदि संसार के
सर्व वस्तु फिरिश्तोहैं और जिस प्रकार शरीर का राजा जीवहै
उसी प्रकार सब जड चैतन्य का स्वामी माहिव है जिसके
शरणमें जानेमे अटल सुखप्राप्त होताहै।
इति काफिरबोध ।
इति श्रीवोधमागगन्तर्मत काफिरबोध नामक दशमम्तरंगः ।
ज्ञातव्य।
काफिर बोध पुस्तक के प्रथम मंजिल की एकही प्रति मेरे
पास है। बहुत प्रयत्न करने परभी उसकी दूसरी प्रति न मिल
सकी इस कारण जैसी प्रतिथी उसी के अनुसार ही रक्खाहै। इस
ग्रन्थ में फारसी और अरबी शब्दों का बहुत प्रयोग किया
किन्तु यह ग्रन्थ लिखा हुआ अशुद्ध हिन्दी अक्षरों में मिलाहे
और दूसरी प्रति न रहने तथा छपने कि शीघ्रता के कारण मे
कितने शब्द शुद्धरन जान पड़ने के कारण जोत्रुटियाँरह गयीह
उनको दूर करने के लिये प्रयत्न कररहाहूँ प्रयत्न सफल हो
करने पर दूसरी आवृत्ति में ठीक कर दिया जायगा
इति।
A . Late CARE pan mech matap Pakesex marwane DMAA PACH ॥ Fe R Boss AAD PAN Hot Line Male watewa m Halarasad इति श्रीबोधसागरान्तर्गत ग्रन्थ मुहम्मदबोधः और काफिरवोधः Gun Homeon W . ra. HEME ल समाप्तः॥ - SE + म -- D
सत्य
भारतपथिक कवीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्दद्धारा संशोधित ।
श्री-सुलतानबोध।
खेमराज श्रीकृष्णदासने
बम्बई
निज " श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेसमें
छापकर प्रकाशित किया।
संवत् १९६२, शके १८२७.
सर्वाधिकार रक्षित है.
सत्य नाम।
---
-
--
M
श्री कवीर साहिव।
सत्य पुरुषाय नमः।
+2018
अथ श्री बोध सागरे
एकादशस्तरंगः।
श्रीग्रन्थ सुलतानबोध ।
मंगलाचरण-दोहा।
अजर अमर सत नाम है, भजि शोक तम पुज ।।
तासु चरण मन रमि रहहु, कमल भौर जिमि गुंज ॥
धर्मदास वचन-चौपाई।
धर्मदास उठि विन्ती लाये । सतगुरु मोहि कहो समुझाये ॥
कैसे करिये तजिय संसारा। ताको समरथ कहो विचारा॥
आगे भये बलख के मीरा । माया सुख तजि भये फकीरा ॥
केही विधि तिन तजि पादशाई । सब वृतान्त कहो समझाई॥
सतगुरु वचन।
कहें कवीर सुनो धर्मदासा । बलख भेद कहूं तुम पासा ॥
बलख शहर एक नगर अनूपा । तहसुलतान यक ज्ञान सरूपा॥
बादशाह शाहन सरदारू | प्रेम प्रीति मन माहि विचारू ।
इब्राहीम अद्धम जेहि माना । राज माहि भक्ती जिन ठाना॥
विरह उठी शाह मन माही। कारज अपना कीना चाही।
मनुषा जनम अमोलक पायी। ऐसे तनपाइ खुदा मिल जायी।
जो यहि अवसर अल्लह न पाया। क्षण महँ विनशिजायगी काया।
ऐसी फिकर उठी मनमाई । तब षट दर्शन लिये बुलाई ॥
६
(७१०)
सुलतानबोध
पण्डित साधु सन्यासी आये। जोगी जंगम यती बुलाये ।।
ज्ञानी ध्यानी सबके पीरा । काजी मुल्ला सेख फकीरा॥
सब मिलि भेष जुड़े तहँ आयी। तिनसों बचन बूझा अर्थायी ।
तबहि शाह सब टेर सुनायी।अल्लह रूपमुहि देहु दिखायी।
खुदा मिले कह कौन उपाई। कौन राम अरु कौन खुदाई ॥
एक खुदा यक और को होई । काहे भयो एक अस दोई।
दोऊदीन मिलि कहो समझायी। दोमें सांच कौन ठहरायी।
दोउ करजोडि सबन सो कहेऊ। बहुत अधीन आप तहँ भयऊ ।
होय अधीन तब शीस नवायी। सबसे बूझे मन चित लायी।
सब मिलि कहो खुदाइ सन्देशा। मेरे मनका मेटो अंदेशा ॥
साहब बसे कौन से देशा । सो मुहि बात कहो दुरवेशा॥
दौऊ राह यह किनहि चलायी। किन वैकुण्ठ विहिस्त बनायी ॥
एती सब मिलि कहो दिवाना । नातो दूर करो कुफराना ॥
बिन देखे सबही दिल धरहीं।कान छिदाय अरुखतनाकरहीं।
हमरे दिलका मेटो अंदेशा । हम माने तुमरो उपदेशा॥
हिन्दू सबे बैकुण्ठहि धावें । मुसलमान विहश्त ठहराबैं॥
इनमें कहां खुदा का बासा । विन देखे कीनो विश्वासा ॥
किनहु खुदाकाघरनहिं पाया। झूठ झूठ सब द्वन्द मचाया॥
खुदाकी खबर न कोइ बताही। सबको जडो कोठरी माहीं।
दोऊ दीन यह किन भरमाया।खुदाकी खबर किनहु नाहिं पाया।
साखी-दोऊ दीन समझावहू, मो मन बहुत अन्देश।
कौन खुदा दो दीन रचे, बसे कौन सो देश ।
कोपे इब्राहीम तब, ये सब भरम भुलाहि ॥
सुदा भेद कोउ नाकहे, डारो कोठरि माहि ॥
बोधसागर । (७१३)
चौपाई।
चलीजो बात दशो दिशिजायी। पट दर्शनको साधु रोकायी।
इतनीबात काशी सुनि पाई। तब उठि धाये आप गुसाई ॥
जिन्दा रूप गुसाई कीना। जाइ शाह को दर्शन दीना॥
बैठे तख्त आप सुलताना । जिन्दा दुआसलामा कीना॥
दोआ सलाम हमरीनहिंमाना । माया के मद गर्व भुलाना ॥
सुलतान वचन।
कहे सुलतान सुनो दुरवेशा। जिन्दा रूप कौन को भेशा॥
कहँ से आये कहाँ तुम जाओ। कौन काज हमरे घर आओ।
हम पूछे जो खुदा की बानी इल्म अल्लाह की कहो निशानी॥
कुदरत की कोइ आदि बतावै । सोई मुर्शिद पीर कहावै ॥
हमरे दिल में विरह बहुआया खुदा मिलन कोउ नाहिं बताया।
जिन्दा वचन ।
जिन्दा कहे सुनोरे भाई । षट दर्शन तुम देहु छुडाई ॥
तब हम तुम सों ज्ञान करावें । संशय तुम्हरोसकल मिटावें ॥
पट दर्शन को छोडि तुम देओ। जो चाहो सो हमसो लेओ॥
अब जनि शंका मानो भाई । जो पूछो सो देउँ बताई ॥
सुलतान वचन।
कहे सुलतान सुनो दुरवेशा । कैसे मिटै हमार अदेशा॥
ऐसी बात कहो अधिकाई । क्या तुम दुसरे आय खुदाई ॥
जिन्दा वचन।
तब हम एक कला दिखलायी।भैंसा पास यक साख भरायी।
जबदुरवेश भैंसालगि जायी। भैंसा से यक वचन सुनायी।
भैंसा कहै सांचे दुर्वेशा । मानो शाह इनको उपदेशा॥
यहि दुर्वेश खुदा समजानो। इनसे कर्ता और न मानो ॥
..
(७१२)
सुलतानबोध ।
सुनिके शाह अचम्भो भयऊ । भैंसा साख सो कैसे भरेऊ ॥
यह तो पीर औलिया आये । भैंस पास इन साख दिवाये ॥
शाह के दिल परतीतिअस आयी। यह दुरवेश खुद आयरहायी।
पट दर्शन को बन्ध छुडाये। बन्दी छोर कहिकहि सबजाये ।।
साखी-बन्दीछोर कहाइया, शहर बलख मंझार ॥
छूटे बन्ध सब भेष को, धन धन कहे संसार ।
चौपाई।
तब सुलतान अपने मन जाना। यह दुर्वेश अविगत ठाना ।।
भैंसा पास इन साख भराहीं। यहतो गति आदम कीनाहीं॥
एती कला जान जब पाये । फिरि जिन्दा से पूछन लाये।
सुलतान बचन ।
कहे सुलतान सुनो दुर्वेशा । जिन्दा रूप कौनको भेशा॥
कहाँ से आये कहाँ तुम जाओ। इतनी सनद कही समुझाओ।
तुमही मुर्शिद पीर हमारा हम अपने दिल कीन विचारा॥
साखी-कहाँ से आये जिन्द जी, फेर कहाँ तुम जाव ॥
हिन्दु तुरक में कौन हो, मोहि कही समझाव ।
जिन्दा वचन-चौपाई।
कहे दुर्वेश सुनो रे भाई । जिन्दा रूप खुदाको आई ॥
अल्लाह आप सकल घटमाहीं। दोऊ दीन दोउ राह चलाहीं॥
हम दोजखतजि विहिश्त कोजाये।सौंपन एक चीज तोहिआये॥
तुम हौ दीन दुनी सुलताना । राखो मियाँ सुई सहिदाना ।
जबतुमआओगे विहिश्तकेमाहीं । तबहम सूई लेब तुम पाहीं॥
यही काज तुमरे घर आये । मियाँ सुई धरों तुव ठाये ॥
दीन दुनी के बादशाह कहाओ। इतनी सनद हमारी लाओ ॥
सुई देव जब विहिश्त मझारा । तब हम मानें सांच तुम्हारा ।।
हँसकर शाह सुई कर लीना । सहस्र सुई का कौल तव दीना।
बोधसागर ।
(७१३)
सुलतान वचन।
जाओ विहिश्तमानो विश्वासा। सहस्त्र सुई लेना हम पासा ॥
सतगुरु वचन ।
इतनी गोष्टि शाह सो कीना । तब तहाँ से पयाना दीना ।।
एक सुई उन हम सो लीना सहस्र सुई का कौल तबदीना ॥
साखी-इतना कहि हम उठि चले, चानक शाह लगाय॥
नीमशाम के वक्त में, जुडी अदालत आय ॥
चौपाई।
सबमिलि आय जुडे दरिखाना। बैठे आय तहां सुलताना ॥
शाह के हाथ सुई जब देखा । तब वजीर मन कीन विवेखा ॥
हाथ जोडिके विन्ती लावा। कैसे सुई हाथ में आवा ॥
वजीर वचन ।
कैसे सुई हाथमें लीना । कारन कौन कहो हम चीना ।।
सुलतान वचन ।
कहे सुलतान सुनो दीवाना । बन्दा अल्लाह दिया सहिदाना
दुरवेश एक यहां चलि आया। जिन या सुई दीन हम पाया।
कहा दुरवेश विहिश्त तुम आव। तब या सुई लेव तेहि ठाँव ॥
ऐसे वचन कह्यो दुर्वेशा । सुई हम देन कही तेहि देशा ॥
एक सुई हम उनसे लीना । सहस्र सुईका कौल हम दीना।
इतना वचन कहे सुलताने । सुनत वचन विन्ती तिनं ठाने॥
दीवान वचन ।
दीवान कहे सुनो हो साई । सुई विहिस्त कौन विधि जाई॥
गाम परगना औ ठकुराई । सबही धरा रहै यहि ठाई।
तात मातु सुत सुन्दर दारा ।तन धन धाम सकल परिवारा।।
१ दीवान ।
१०
(७१४)
सुलतानबोध ।
अंत समय ये काम न आवै। आपुचिन्हे तब जिव सुख पावै।।
जह लगि जग में दृष्टिदिखाहीं ।सो सब विनशिजाय क्षण माहीं।।
जतन करे बहुत सुख पावे । सोतन जले गडे मिटि जावे॥
ऐसे कहि वजीर शिर नायो । केसे सुई संग ले जायो ।
समझि देखु अपने दिलमाहीं । सुई संग कौन विधि जाहीं॥
सुलतान वचन।
तब सुलतान वचन असकहई । सुनो वजीर मता यक अहई॥
इतना लशकर संगले जायब । हस्ती चार सो सुई भरायब ॥
वजीर वचन ।
हस्ती संग चले नहि शाहा । खोज करो तुम दिलके माहा ।।
हस्ती घोडा माल खजाना । यह सब संग चले न निदाना॥
सुलतान वचन ।
शाह तबै अस वचन सुना। बैठि सुखपाल विहिश्त कोजावें।।
लेव बाँस में सुई भरायी। यहि विधि सुई संग मम जायी।
वजीर वचन।
तब दिवान कर जोर सुनावे । यह सुखपाल कबरलगिजावे॥
आगे कस तुम करहू साँई । सो मोहि वचन कहो समझाई ।।
सुलतान वचन ।
आगे हम घोडे चढि जायब । लेइ जीन में सूई भरायब।
अहो दिवान ऐसेई करिहौं । ले दरवेश के आगे धरिहौं ।
वजीर वचन ।
सुना दिवान तबै हंसि दीना।दोइ कर जोरि केविन्ती कीना।।
दादा बाबा तुम्हर रहैया। घोडे चढि कोऊ ना गैया ॥.
साखी-इतने में संग नहिं चले,सुनहु शाह चित लाय॥
यह बजूद दिन चार है, सो भी संग न जाय ॥
बोधसागर ।
चौपाई।
मनमें चकितशाह तब भयऊ । झूठी माया हम चित दयऊ ।।
सुई संग चले नहि जाही। झूठी राज पाट सब शाही।
सहस्र सुई का का परसंगा । एके सुई चले नहिं संगा।
अबतो खाना हम तब खावें । जब जिन्दाका दर्शन पावें ॥
इतना ज्ञान शाह घट आवा । जिन्दा दरशको सुरति लगावा
इबराहीम ऐसि मति ठाना। राज मांहि भक्ती जिन जाना॥
साखी-जिन्दाजिन्दा रट लगी, हिरदय रहा समाय॥
जोज़िन्दा अबकी मिले, पूछृ सब घर पाय॥
चौपाई।
ऐसी रटनाशाह तब लावा । जिन्दा मिलन भयो उरभावा॥
बहुत दिवस रट लागी ऐसी। आगे कहूँ भयी गति जैसी ॥
शाह कीन मन माहँ बिचारा । जिन्दा मिले सौ कौन प्रकारा॥
सब सिद्धन को लाउ बुलायी। उनसे पूछो मति अस भाई ॥
जोई सिद्ध अजमत बतलावें । उनसे खबर जिन्दाकी पावें ॥
जबे शाह एसी मन ठानी । लिये बुलाय सिद्ध सबध्यानी॥
साखी-सब सिद्धनको टेरिके, शाह किये सन्मान ॥
देउ करामत सिद्ध मोहि, तब मेरो मन मान॥
चौपाई।
सन्मुखशाह सिद्ध सब आनी। तबही शाह कहे अस बानी ॥
सुलतान वचन ।
अधिक प्यारे तुमही अल्लः को। करामातदिखलाऔअवहमको
ना मैं तुम्हको बांधि झुलाऊँ । ना तो तुम्हको छुरी मराऊँ।
सिद्ध बचन ।
तब बोल सिद्ध चौरासी । हम हरिहर के आहिं उपासी॥
निशिदिन राम नाम गुण गावें करामात ढिग हम नहिं जावें॥
यह सुनिशाह बहुत रिसियाना । हुकम कीन सब बन्दीखाना ।।
(७१६)
सुलतानबोध ।
१२
सुलतान बचन।
तुम काफिर अल्लाह ते दूजा । भूत प्रेत चित लाये पूजा ॥
चकी ढिग इनको बैठाओ निशिदिन इनसे नाज दराओ।
जो नहीं करामात तोहि होई । क्यों कर सिद्ध कहाओ सोई॥
सतगुरु बचन।
बैठे सिद्ध सब चाक चलावें ।चित विस्मय सब हरिगुण गावें।
त्रास देखि मुहि आयी दाया।ततछिनशाहद्वारचलिआया।
सोटा मारा चकी माहीं । घूमहु सतगुरु दया कराहीं ॥
विदा सिद्ध भये हम भय गुप्ती । देख्यो आय शाहके जपती ॥
कहा साह सों तिन्ह कर जोरी ।चकी सब आपहिं चलि दौरी॥
सुलतान वचन।
सुनि के शाह कैफ दिल आयी। कौन शख्श यहचकि चलायी
वेगहि ढूंढि लाओ यहि बारा।चक्कि चलायो सो अल्लह प्यारा॥
सतगुरु वचन।
ढूंढत नगर थके दिल जवहीं। नहिं पायव्याकुल चित तबहीं।
जबहिंशाह घर लगन विचारा। तब हम जीवदया उर धारा॥
तुरतहिं जाय तहां पगु धारा । शाहके महलन चढे गोहारा॥
महल पर देखत फिरों चहुँ खूटा। करों पुकार हेरानो ऊंटा॥
सुनि के शाह क्रोधकरिधाये । कौन हमारे महलपर आये ॥
कहो तुम कौन कहां से आवा। कौन काज महलन पर धावाः॥
तब हम कहा ऊंट यक छूटा । ढूँढत फिरूं मैं अपनो ऊंटा ।।
बहुत अधीन ऊँट हम भायो। खोजत ऊंट महल पर आयो।
सुनिके शाह तबे हंसि दीन्हा । कैसे ऊंट महलपर चीन्हा ।।
जंगल माहि तेहि खोजोजाओ। कैसे ऊंट महल पर आओ।
तब हम कहा सुनो तुम ज्ञाना ।चढे तख्त अल्लह किन जाना॥
ऐसीवझ करो मन माहीं। सत्य वचन धरो मन ठाहीं ॥
बोधसागर । (७१७)
साखी-तख्त चढे किन पाइया, सुनो शाह सुलतान ॥
हरदम साहब याद करु, रचा जिन सकल जहान॥
महल न आवे ऊंट हमारा ।तख्त ऊपर नहिं अल्लाह निहारा
अल्लाह तख्त पर कैसे पावे । जहँ लगि घट महँ गर्ब रहावे ॥
जब तुम छोडो राज शरीरा । अल्लाह लखो तुम अपनो पीरा
छोडो मान गुमान रे भाई । अल्लाह रूप तबही मिलि जाई
सुनत शाह सन्मुख जब आवा। तब जिन्दा से पूछन लावा ।।
सुलतान वचन ।
कौन रूप कौन नाम तुम्हारा । कहो अल्लाह मिले कौन विचारा
जिन्दा वचन ।
सांचे दिलसे सुरति लगाओ। प्रेम प्रीति लौलीन रहाओ।
सुख संपति की करोन आशा । निशि दिन दीया प्रेम प्रकाशा॥
मन अस्थिर करि सुरति लगाओ।तवहीदरश अल्लाह कोपाओ
कहे कवीर खोजे सो पावे । खोजत खोजत अलख लखावे
साखी-प्रेम प्रीति करि खोजिये, हियमें आवे ज्ञान ।।
अलख अल्लाह की खोजमें, जागत भये सुलतान ॥
जिन ढूँढा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठि॥
जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठि ॥
चौपाई।
जब कीन मन शाह अन्देशा। नहिं तहँ ऊँट नहीं दुर्वेशा॥
ऐसे बहुत दिन बीता भाई। काल कला घटआन समाई ॥
बहुरि एक दिन बलख मँझारा।शाहके महलनमें पगु धारा॥
नौरोजा खेले सुलताना । गिलम विछायबहूबिधिजाना।।
महलन माहीं पहुँचे जायी। देखत फिरे महल चौपायी।
इब्राहीम अधम सुलताना । हमको देखत बहु रिसियाना।
,
(७१८)
सुलतानबोध।
सुलतान वचन।
कहे शाह तुम कौन है भाये । केहि कारण तुम महलन आये॥
जिन्दा वचन ।
हम परदेशी दूर दिशारा । देखत फिरहिं सराय बसौरा ॥
सुलतान बचन ।
शाह कहे यह महल हमारा । कहाँ सराय जो करइ बसारा॥
जेहि महल हीरा जड़ा अपारा। तापर धुनी तुम कैसे बारा॥
अब तुम जाओशहर बाज़रा। तहाँ जाइ करो सराय बसारा॥
जिन्दा वचन।
कहे दुर्वेश सुनो तुम शाहा । करि विचार परखो दिल माहा
महल तुमारा तुम कह पावा। करोखोज यह किन निर्मावा ॥
महल 'तुम्हारो होय न भाई । तुम भी मुसाफिर बसोसराई ॥
सुनो शाह तुम चतुर सयाना । सुरति निरति बूझो तुम ज्ञाना ।
बहुत बादशाह तुम आगे भयऊ। महल न संग काहुके गयऊ ।।
दादा बाबा तुम्हरा रहिया । महल काहुके संग न गैया ॥
जो तुम थापा महल हमारा । अन्त काल सबछुटे घर बारा॥
यह जग सकल सराय बसेरा । इनमें नाहिं कोउ केहि केरा।
जहां के ताहां छूटहि धामा। यह सबही दिनचार मुकामा ॥
हरदम साहिब को पहिचानो । महल सराय एक करि जानो।
ज्ञान दृष्टि दिलमें जब आवै । राज छोडि साहिव गुण गावै॥
साखी-ज्ञाने दृष्टि दिल आवई, सब तजि होय फकीर ॥
कहे कवीर सुलतानसे, ज्ञानक लागे तीर॥
१ गुज़ारा, निर्वाह ।
२ इस साखी के आगे एक प्रति में नीचे लिखे पद हैं। किन्तु यहाँ इनका मेल न
मिलने से नोट में लिखा है।
-
१५ बोधसागर । (७१९) चौपाई। यक दिन शाह जु चले शिकारा। चुनि चुनि साथ लीन्ह असवारा छोडे बाज पक्षी गहि आने । देखत शाह बहुत सुख माने । बहुबिधि मारग करत कलोला। जहँ तह फिरे शिकारिन टोला॥ बहुत समय वीति जब गयऊ । एक शिकार हाथ नहिं अयऊ। चौपाई। ज्ञान दृष्टि जब दिलमें आहो । छोड्यो राज पाट बादशाही !! होय फकीर जंगलमें बासा । छोडी रान तख्तकी आसा ॥ शाह जो बैठे जंगलमें जाई ।नगर की सब परजा चलि आई॥ कानी पण्डित शेख मुलाना । महंत महावत गुलाम नफराना ॥ सेठ सेनापति परजा आई । सबही धरे शाह की पाई ।। प्रजा वचन। ऐसी बात न करहु गुसाई । सबही रान भ्रष्ट होय नाई ॥ जो तुम तजो तख्त औ राजू । सब परजा का होय अकाबू ।। सुलतान वचन। नाही तख्त निकट हम नावें । नहिं अपने शिर भार चढावें ॥ यह बादशाही हमसे नहिं होवे । कौन तख्त चढि दोजख जोवे ॥ हम छोडा तख्त बादशाही । फिरि संशय महँ हम नहिं जाहीं॥ विना भक्ति मुक्ति किन पायी। राज करे सो दोजख जायी ।। हमको आय मिले यक सांई । वहि साहब मुझको फरमाइ ॥ मैं अपराधी उन नाह चीन्हा अध बिच छाँडि उन हमको दीन्हा ।। अवतो करौं मैं कौन उपाई ! साई मुझको कस मिलिहै आई। परजा वचन। अब तुम चलो महल के माहीं । हम सब सँग तुम होहु गुसाहीं ॥ तुमको छाँडि एको नहि जैहें । सब मिलि संग पयाना देहे ॥ सब मिलि लाये महल मँझारा । शाह के मनमें शोच अपार ॥ कैसे के निन्दा मैं पाऊं । कैसेके मैं जिव मुक्ताऊं ॥ झुठे झूठ मिल सब संसारा । दोज़ख कुंड में नाखन हारा ॥ साखी-बेर वेर हमको मिले, नाम निन्दा सो आहि ॥ अभरापन यक सुलतान है, किसविधि मिलेंगे आहि ॥
सुलतानबोध ।
(७२०)
१६
तबै शाह बहुत रिसियाना । खोजु शिकार हुकम फरमाना॥
तबै शिकारी दुहुँ दिशिधा । पावें न शिकार मनहि पछतावें ॥
यहि विचलीलाअस भइ भाई । सुनु धर्मनि तुम चित्त लगाई ॥
हरिन एक जो कनक रंग देखा। हीरा रतनमणि जडे विशेखा।
देखि सरुप शाह ललचाई । यहि मिरगा कह घेरो भाई॥
आज्ञा पाइ चले असवारा । घेरचो हिरण सेन मंझारा॥
कहे शाह जो मिरगा जाई । तुमसे मिरगा लेही भाई ॥
सेना सब मिलि रोकत भयऊ । मिरगा भागिशाह तर गयऊ ।।
शाह सब से तब कहे पुकारी। मिरगा मारि लाउँयहि बारी॥
मिरगा संग सुलतान अकेला । नहिं कोइ सेना नाह कोइ चेला
छिन में मिरगा देखि लुपाना । तेहि पीछे धावहि सुलताना ॥
लागी प्यास शाह को भारी । महा भयानक बनाहि मँझारी॥
वट का वृक्ष तहाँ यक देखा । शीतल छाया बहुत विशखा ॥
मिला फकीर एक तहँ वासा । कुत्ता दोय रहै उन पासा ।।
शीतलकलशा पानिहि भरिया। जापर ठिलियामठका धरिया।
खोजत नीर शाह चलि आयो दुआ सलाम करि वचन सुनाये।
सुलतान वचन ।
कहे सुलतान प्यास मुहि भारी । जात जान तुम लेहु उबारी ।।
दुइँश वचन।
फकीर दुवेश कहा। सुरति होय तो भरी पिया।
पियोशाह जललियो निवासा। जिन्दे कीना अजब तमाशा॥
१ दूर से आहू उसे आया नजर । पहुँचा उसपर शाह घोडा मार कर ॥
होके वह अपने सवारों से जुदा । पीछे दो फरसंग तक उसके गया ।
जाते जाते हो गया आहू खडा । बाफसाहत अबिन अद्धम से कहा ।।
तुझको इस खातिर नहीं पैदा किया। वहशियों पर ता करे नौरोजका ॥
है गरज़ ईनाद से तेरे कुछ और । कर ज़रा तू दिल में अपने आप गौर ॥
बात यह कहकर वह गायब होगया। नक्श उसका शाह के दिलपर हुआ ॥
१७
बोधसागर।
(७२३)
साखी-गाकर काढी आगिनसे, मिश्रीतहि मिलाय ॥
न्यामत धरी रिकाबमें, कुत्तासे कहे खाय ॥
चौपाई।
कुत्ता न्यामत खाय न भाई । मारे दुरवेश कुत्ता के ताई।।
ऐसो चरित कीन दुर्वेशा तबशाहके मनमें भयीअन्देशा॥
सुलतान वचन।
कहै शाह तुम सुनो दिवाना। यह पशुजीव न्यामत कह जाना
जिन्दा वचन।
कहे फकीर सुनो बे नादाना । जैसा दिया तैसाही खाना।
जसि करे करतूत कमाई । तैसि देह धरि भुगते भाई ॥
यामें फेर फार नहिं होई । जो बोवे लुनिहे वह सोई ।।
सुलतान वचन।
दोय कर जोरिके विन्ती कीन्हा । साहब तुमरी गति हम चीन्ह ॥
अगम वानी कहो समझाई। आगे कौन हते यह साई॥
दुर्वेश वचन ।
तब दुर्वेश कहे समझायी । सुनो शाह तुम मन चितलायी
बलख शहर यक नगर रहाई । तहके हैं यह दोनो राई।।
इब्राहीम अहै यक राजा। एक बाप अरु दूजो आजा।
राज पाय कछु भक्ति न कीना। ताते जन्म श्वान को लीना॥
यहां जो शाह इब्राहीम अद्धम साहेबके बाप दादे को बलवका बादशाह लिखाहै
यह बात इतिहास और विचार द्वारा एकदम निर्मूल ठहरता है क्यों,कि बलखके बादशाह
शाह इब्राहीम के बाप दादे नहीं थे वरन इसके उल्टा उनके पिता एक महान संत थे
जो परम विरागमान और एकांतवास करने वाले थे। शाह इब्राहीम की उत्पत्ति
की कथा बहुतही रोचक और आश्चर्य दायक है । यहां स्थान भाव से नहीं दे सकता
गुरु की कृपा होगी तो कवीर साहब के जीवन चरित्र के सहित सुलतान चरित्र भी
बृहत स्वरूप में लिखेंगे । यहां दोनो कुत्तोंको बलख के बादशाह और शाह इब्राहीम
(७२२)
सुलतानबोध ।
सुलतान वचन।
तब सुलतान कहे सुनु साई । एक बातऔर कहो समझायी॥
दोय खूटे दोय श्वान बंधाये । तीजा खूटाक्यों खालि रहाये।।
दुर्वेश वचन ।
कहे दुर्वेश सुनोरे भाई । याकी गतिहि कहूँ समझाई।
इब्राहीम नाम जेहि होई । बलख शहर का राजा सोई ।।
राज माहिं बहुत सुख करिहैं । भाव भक्ति नाही मनधरि हैं।
विना बन्दगी जिन छूटे देहीं । वे पुनि जनम श्वान कोलेहीं।
इसमें जई आनि के ताही। तब ये तीनों रहें एक ठाहीं॥
इतनी सुन दुर्वेशहि बाता । शाह के मन में लागी घाता।।
सुलतान वचन।
सुनि सुलतान अचम्भा भयऊ । तब दुर्वेश हि पूछन लयऊ ।।
श्वान योनि कस छूटे साई । ताका भेद कहो समझाई ॥
दुर्वेश वचन ।
कहे दुर्वेश भक्ति जो करई । सो नर खान देह ना धरई ॥
करे बन्दगी साहिव केरी। दया मिहिर की दशा जो हेरी।
प्रेम प्रीति परमारथ नीका । माया मोह जाने सब फीका ।।
सब सुख नामहि से लोलावे । सो जिव श्वान जनमनहिं पावे ॥
सुलतान वचन ।
शाह कहे जो लेइ बचाई । सो दुवैश साँच है भाई॥
सो दुर्वेश खुदा का बन्दा । खान योनि का काटे फन्दा ॥
अदम को बाप दादा बतलाना बहुत ही भूल है इस हेतुसे जाना जाता है कि, इस
पुस्तक में भी उत्तरोत्तर मिलावट होतीगयी है और मिलावट करने वाले भी साधारण
विचार के जान पडते हैं । ऐसी ऐसी मिलावट और भूलके कारण कवीरपंथी
साहित्य की बडी निन्दा होती है । किन्तु बुद्धिमानों को विचार पूर्वकही उसे ग्रहण
त्याग करना चाहिये।
बोधसागर ।
(७२३)
मन में शाहतब ऐसा जाना । यह दुर्वेश है खुदा समाना ॥
बार बार मोहि आनि चिताई । सोइ दुर्वेश आपहै साई ॥
तब अपने दिल कीन्ह विचारा । इनसे कारज होय हमारा ।
जो यह कहे सोई चित दीजे। इनका वचनमानि शिरलीजे.॥
इतना शाह मन करत अन्देशा । नाहि वहँ कुत्ता नहिं दुर्वेशा॥
तबहि शाह मन कीन विचारा। निश्चय है यह सिर्जन हारा।।
पाखी-कहे शाह अबकी मिले , पुरवे मनकी आस ।
कदमें शिरै छुआवहूँ, पलक न छा+ पास ॥
चौपाई।
बन ते शाह नगर में जाई । मन जिन्दा में रहा ममाई ।।
जिन्दा वचन ।
गुप्त रूप तब शब्द उचारा । इब्राहीम सुनु वचन हमारा ॥
नाहक जिव तुम मारि उडाई । तैसा हाल तुझारा भाई ॥
जाहि समय इजराइल ऐहें । महाभयंकर रूप दिखै हैं।
हनि हैं मुगदर धरि हैं चोटी । उठे अगिन तब बोटी बोटी।
ताहि समय पुनि करि हो रोरा। काम न आवे सेन करोरा ।।
मारत पंछी दरद न आई । एक दिन ऐसा तुम पर भाई ॥
बैन सुनत सुरछित मन माहीं। गुप्त भये पछताने ताहीं ॥
कहे शाह खोजो तेहि जायी। जिन ऐसी मुहि बात सुनायी।
खोजि थके पुनि मुहि नहिं पाये।मुरछित शाह भवन चलि आये।
तबहि शाह मन ज्ञान समाना । जिन्दा वचन सांच कर माना।
राज पाट सुख सम्पति देहा । यह सब दीखत स्वप्न सनेहा ।।
ज्ञान दृष्टि दिलमें जब आही। छोडेउ तख्त तबे बादशाही॥
१ मुसलमानी धर्मके विश्वास के अनुसार इजराईल एक फिरिश्ता है जो
सब प्राणियों के आत्मा को शरीर से अलग करताहै तब मृत्यु होती है ।
(७२४) मुलतानबोध ।
२०
होय फकीर जंगल कियो वासा। राज काज कीछाडी आसा॥
सबही लोग नगर के आये। आइ शाह के लागे पाये ।।
काज़ी वजीर औशेखमुलाना। महंत महावत नफर गुलामा।
लागे सबही शाह के पाई । सबही मिलि के विन्तीलाई।
ऐसी बात न कीजे साई । तुम विन यह परजा दुख पाई ॥
जो तुम तख्त न बैठो राजा । सब परजा को होत अकाजा॥
राजा से परजा सुख पावे । जहां तहां आनन्द रहावे॥
सुलतान वचन ।
कहे सुलतान सुनो रे भाई।हमतोतख्त के निकट न जाई।
ना हम पाव तख्त पर लावें । ना अपनेशिर भार चढावें ॥
अब हम तख्त न बैठें आई । बैठेतख्त सो नरकहिं जाई॥
अव हम राजतजी बादशाही । यम की मार सही नहि जाही।
भक्ति विना जिव मुक्ति न पावे । राज करे सो नरकहिं जावे ॥
हमको आज मिले यक साई । सोसाहिब ऐसी फरमाई॥
मैं अपराधी उन्हें न चीन्हा ।अधविचछोडि सो मोको दीना।।
अब हम करि हैं कौन उपाई। वह अवसर मुझको कब आई।
प्रजा बचन।
प्रजा कहे सुनो हो साई । अब तुम चलो महल के माई ॥
जो तुम राज छाडिः बन जैहों । तो सब संग तुम्हारे ऐहों ।
साखी-यहाँ रहन को छोडि के, तुम सँग करिहैं प्यान ॥
ऐसे वचन प्रजा कहि, लाये गृह सुलतान ॥
चौपाई।
जब आये शाह महल मँझारा । उठी बिरह मन माहिं अपारा॥
अब मैं किस बिधि जिन्दा पाऊँ। उनबिनु होय न मोर बचाऊ ॥
यह सब लोक अहै संसारा । नरक कुंड में डारनहारा॥
बोधसागर ।
(७२५)
ऐसी करुणा भयि दिल माहीं । जिन्दा महल मिले केहि ठाहीं॥
भयी शाह मन बिरह अपारा । जिन्दा जिन्दा करइ पुकारा ॥
साखी-उन वनमें मुझको मिले, नाम न दिया वताय ॥
इब्राहीम सुलतानको, भयो मिलन को भाय ।।
चौपाई।
मूर्छित शाह भवन चलि आवा। मनमें जिन्दा आनि बसावा ॥
थोडे दिन विरहा अधिकाई । फिरतो धरम जाल फैलाई ॥
माहि पुनि राज तहँ सुख पाये । माया मोह देखि ललचाये ।।
गया ज्ञान सुख में लपटाना काल शाह घट आनि समाना।
उरझे शाह स्वाद सुख रंगा। देखि रंग मन बहुत उमंगा ॥
पुनि कछु दिवस जो ऐसे वीता। विसरे शाह अल्लाह की चिन्ता॥
ऐसी चाल देखि हम राही। राज न छोडे लोभ मनमाही।
तब हम रूप जो कीन खवासा।जेहि ते तख्त की छाडे आशा।।
जैसा जिव तैसा तन धारा । कोइ विधि जिव उतारूँ पारा ।।
चतुर सहेली रूप आपारा। शोभा अंग अंग अधि कारा॥
होय खवास बाग में जायी । फूल लायरचि मेज विछायी।
बहु विधि फूलन सेज विछावें । जहां शाह पौढन नित जावें ॥
ऐसहि करत बहुत दिन गयऊ । तब हम एक अचम्भा कियऊ।
एक दिवस चित ऐसी आयी। ताहि सेज हम पौढे जायी ॥
रूप खवासिन तहँ हम कीना । घडी एक पौढी सुख लीना ॥
आये महल सेज ढिग शाहा। पौढि सहेली करे सुख लाहा ॥
इब्राहीम देखत रिसियाना ।मनमाही बहुते खिसियाना ।
हमरी सेज आई पौढाना । हमरी त्रास तनिक नहिं माना।
हांक मारि तिहि टेरि जगायी । देखत शाह मन कोष समायी ॥
शाह कहे क्यों पोढी नारी। बन्यो क्रोध तब ताजन मारी।
(७२६) सुलतानबोध ।
२२
*छन्द-हुकुम कीन शाह तन छीन लाव ताजन मारिये ॥
ताहि पीछे शीस उतारो पकडि भुजा फटकारिये ॥
मारन लागेउ शाह तेही खन हम कौतुक किन्हे ॥
हंसी सहेली रोवे नहीं त्रास अतिशय तेहि दीन्हे ॥
सोरठा-बुझे तेहि सुलतान, मैं मारी ते क्यों हँसी।
कहो साँची सहि दान, कहो सत ना कुम्हलाय मुख ॥
चौपाई।
बहुत क्रोध करि मारा जबही । बहुतै हंसी सहेली तबही ॥
हँसत सुलतान अचम्भा कीना निकट बुलाय पूछि तब लीना॥
निकट बुलाय आप सुलताना । वखश्यो चूक करयो जिवदाना
सुलतानवचन।
यह तुम मोहि कहो समझायी । मारत तोहि हँसी क्योआयी।
सच सच बात कहो निःशंका । तुम जनि मानो हमारी शंका॥
सहेलीवचन-चौपाई।
तबहि सहेली करे बखाना । सुनो शाह तुम चतुर सुजाना॥
एक घडी सुख हम जो लीना । ता कारण इतना दुख दीना॥
* इस छन्द और उसके नीचेके सोरठाका पुरानी प्रतियोंमें गन्ध भी नहीं है।वरनआगेसे
जो चौपाई चली हैं उसका उसरकी चौपाई के साथ सम्बन्ध है । यह छन्द और सोरठा
किसी महात्मा ने वैराग के जोश में आकर लिखमारा है किन्तु कविताकी कैसी मिट्टी
खराबकीहै उसकी बात पाठक छन्द और सोरठा से समझ जायँगे। देखिये सोरठाके
प्रथम दोनो चरण तेरह २ मात्रा से पूर्ण हैं और तीसरे चरण में भी १३ मात्रा हैं
और चौथे में पन्द्रह । कहाँ तक कहैं इसी प्रकारसे उत्तरोत्तर भट्टाचार्योने ग्रन्थोके
विगाडनमें ऐसा भागलियाहै कि, निस्से कवीरपन्थकी साहित्य मृतपाय होरहीहै । मुझे
सब ग्रन्थों के शोधन में कैसी २ कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं मैंही जानताहूँ तिस
पर भी मुझे कहाँ तक सफलता हुई है पाठक स्वयम समझ सकते हैं । वर्तमान में यद्यपि
कुछ २ विद्याकी ओर झुकाव कवीरपन्थयोंकी होरही है तथापिं अभी तक दोचारी को
छोड कर कोई भी ऐसा कबीरपंथी नहीं है जो अपना कलंक और अपना विचार कवीर
साहब अथवा कवीर पँथी साहित्यके के मत्थे न थोपताहौ।
२३
बोधसागर।
(७२७)
सदा सर्वदा जो सुख करई । तापर मार किती सो परई ॥
कहा करूँ मोहि रही न जायी। ताकरण मोहि हाँसी आयी ॥
उमर भरे सुख कीना ऐसा । ताका हाल होयगा कैसा ।।
या कारण हँसी हम शाहा । कीजे जो तुम्हरे दिल चाहा ॥
राज करइ बहुतै सुख पावे । तन छूटे चौरासी जावे॥
चौराशीमें है कष्ट अपारा। बिना नाम नहिं होय उबारा॥
आखिर खाक होयतन तेरा । वचनमानि ले यह अब मोरा॥
कहा तख्त शज्या सुख पाओ। राह खुदा में चित्त लगाओ।
देह मिलेगी खाक तुम्हारी । चतुर सहेली कहे बिचारी॥
सांची राह गहो तुम शाहा । जन्म पाय कछु लागो लाहा।।
सतगुरु मिले तो भेद बतावै । जाते जीव मुक्ति घर पावै ॥
तहां जाय जिव करे अनन्दा।जनम जनम का मिटे सब फन्दा॥
साखी सद्गुरु भेद जो पावई, होय मुक्ति घर बास ॥
जन्म मरन फन्दा मिटे, तब सुख पावे दास ॥
चौपाई।
वचन सुन्योजबशाह सुजाना । तब कछु दिल में उपज्योज्ञाना॥
तेरा वचन सही सुनु नारी सब सुख छाँडि अल्लाह चितधारी
शाह विचार कीन मन तबहीं निकसि जाउँजंगलविच अबहीं।।
कहे सहेली सुनु सुलताना । दिलमें धरोअल्लाह को ध्याना।।
जंगल बडा जेरी जिन देही । हवा हिर्स तजु निज मति रही।
नेकी करो बदी तुम छाँडो । दया मिहर दिल अपने माडो॥
परमारथ पर सब कछु वारो। पाक ज़ात अल्लाह चित धारो।
सुनत वचन लागा चितघाऊ।शाह वचन सुनि लागे पाऊ॥
कहे सहेली ज्ञान अपारा । जो दिल धरो तो उतरो पारा॥
*यह साखी भी पुरानी प्रतियों में नहीं है ।
( ७२८) सुलतानबोध ।
२४
*सुनि कर शाह अचम्मा भयऊ।ऐसोवचन कवही नहिं कहेऊ॥
भयो ज्ञान शाह सुनि वानी । काल कला फिर आनि समानी
अरुझे शाह स्वाद सुख पायी।भयोमगन मन अति ललचायी
साखी-सखी सहेली सँग लिये, करत रंग अरु राग ।।
विसरे ज्ञान विचार सब, मोह बान उर लाग ।
चौपाई।
यक दिन शाह सेजहीं सोया । तोशक झूल विछौनाजोया॥
देह उष्ण भइ अवसर ताही । नींद न आवे बहुत सिसाही
कोई सखि पंखा पवन दुरावे । कोइ चन्दन घसि अंग लगावे॥
तबहू नींद न आवे शाहा । बहु व्याकुल अतितन भइ दाहा।।
एक चरित्र तहां हम कीना। सखी रूप धरि दर्शन दीना॥
सुबुधि सखी जोरे दोइ पाना । सुनिये एक अरज सुलताना॥
कहूँ वचन परमाथ जानो। सुनत क्रोध जो दिल नहिं आनो
यह तन पाय बहुत सुख कीना। कबहू धनी नहीं दिल दीना ॥
जिन साहिव यह देह बनावा । तख्त सेज सुख राज करावा ॥
कोठा कोट अमीरी भारी ।गज औ तुरंग हरष संग नारी॥
ऐसा साहिव क्यों विसराये । रागरंग चित अति हरषाये ॥
जब वह साहिव कोप कराई । तेहि सभय को होय सहाई॥
साखी-साहिव रीझे जेहि समय, देइ विहिश्त को वास ॥
मालिक मेटे पलक में, करइ राज सुख नास॥
चौपाई।
आखिर देह मिलेगी खाका । साहिव नेह करि होऊ पाका ।।
वचन सुनत चित गहबर भयऊ । आंसू बहुत चक्षु ते गयऊ ।।
१ इस चौपाईसे लेकर आगे जिस चौपाई के अंत में इसी प्रकार का फूल दिया है ।
वहाँ तक पुरानीप्रतियों नहीं है।
२५
बोधसागर ।
(७२९)
तबहि शाह दिल अपने जाना । नारी में अस होय न ज्ञाना ।।
यह तो मुर्शिद मालिक मेरा । धरयो रूप इन नारी केरा ॥
तबहि शाह दिल माहि विचारा । हम कारण इन यह तन धारा॥
जो यह कहे मानि शिर लीजे। जाते कारज अपना कीजे ॥
अब मैं वचन मानि शिर लेऊँ । चरण कमल में मस्तक देऊँ ॥
हम पुनि गुप्त भये तेहि थाना । देखत शाह बहुत अकुलाना ।
कहे शाह कही अस बाता। घाव अचानक किये मुहि जाता
कछु दिन शाह विरहमें रहेऊ ।बहुरिशाहदिल मोह सोगहेऊ॥
तब दिन एक श्वान यक आवा । जाके शीस माहि बड घावा ॥
कीन माथ देह भरि जाहीकल बल करि व्याकुल तनताही
श्वान बिकल डोले चहुंओरा । आयोशाह ढिग तबही दोरा ।।
सखी सहेली मारन धायी। शाह श्वान कहँलीन बुलायी।
कहे श्वान सुनु शाह सुजाना । हमहूँ रहे बडे सुलताना ॥
सुख सम्पति पुनि तिरिया रंगा। जीव सतावे बहुत अस अंगा।
सोना रूप कटक गज बाजा। अंत समयकोइ आवेनकाजा।।
साखी-मातु पिता सुत बाँधव, औरो दुलहिनि नारि ॥
अंत समय सब विछुरई, यह शोभा दिन चारि॥
चौपाई।
प्यासे जल नागे पट दीजै। भूखे नाज मिहर दिल कीजै।
जैसी परी आपकहँ जानौ । तैसी सकल जीव पहिचानो।
हवा हिर्स तन साधो भाई । साधो पीर मिटै दुचिताई ॥
इतना कही खान उठि धाया। सखी सहेली मोह लगाया।
पुनि हम कहा गैबकी बानी । सुनहि शाह सह सखी सयानी
आकाश बानी।
यह नर नरकहि फेर बनाया। तुम तो बहुत नरक मनलाया।
सखी सहेली काम न आवे । जबही धरि यम आनि सतावे
(७३०) सुलतानबोध ।
२६
तात मात सुत नारि खजाना। काम न आवे सब विलगाना॥
झुठे करें खुशामद तेरा । बांधे यम तब देख घनेरा॥
उठिअकुलायशाह चित लागा। देखे नहिं उपजे अनुरागा ॥
दया मिहर घट आन समाना । छोडे जीव वात अभिमाना॥
पीर शाह के घटहि समायी । भूखे नंगे सब दीन बुलायी।
मनमां कहे करो सो पीरा । जिन दिन्ह मोही चेत शरीरा ॥
प्रेम विरह निशिदिन चित लागा। अकह नाम सुमिरन अनुरागा
जेहि दिवस छूटे मम जामा । झूठा सुख नहिं आवे कामा ।
यक दिन शाह किये असवारी । बलख शहर देखा निरुवारी॥
कहवाँ देखों पीर सुजाना। जिन मुहि कहा भेद निर्वाना॥
डेरा सहित सखी रंग सैना । चले बेगि चित नाहिन चैना॥
बैठा एक ऊंट ताज प्राना । पहुँचे आप तहाँ सुलताना॥
देखि ऊँट दिल भये उदासा। रोवेवहुत विकल धरि स्वासा।।
ऐसी गति यक दिवस हमारी। अपने मनमें यही विचारी॥
माया मोह अहै जंजाला । दिना चार का झूठा ख्याला॥
इब्राहीम कह्यो गोहराई । जाहु सबे अपने घर भाई ॥
*छंद-गजसे उतरि ठाढे भये सबदिये भूषण डारिहो ॥
चोला पहिर शिर ताज दे तब चले निर्धार हो।
सेनासकल विलखित बदन सब कराह शोर सहेलियाँ।
मम खबरलय को सखी शिर कूटि मराहिं सहेलियाँ ।
सोरठा-घेरि राह सब लोग, कोइ न छोडहिं शाहको ।
ऐसे सबको सोग, पुत्र मरे जिमि विकल जग ॥
* पुरानी प्रतियोंमें समस्त ग्रन्थभरमें छन्दका गन्धभी नहींहै किन्तु नयीपतियोंमें ये
बेतुकी छन्द कई मिलतेहैं । इसीपकार से कई सोरठे और दोहे ( साखी) की भीपायाहै ।
पुरानी प्रतियों में तो वह हैही नहींहैं किन्तु नई प्रतियोंमें एक दम बेतुक हैं।
.
बोधसागर।
(७३३)
छन्द-कहे शाहको समझ दिल हमरी खबर को लेडगा।
सब माहि दाता सबनको सो सबन भक्षण देइगा।
मां के रहे शिकंम में तहाँ को खबर जग लेत है।
जल थल है घट सकल पूरण जो जहाँ तहँ देत है।
सोरठा-साझ कहे भोरे एक हन, सुनत दिन बीति गये।
शाहदिये नहि चैन, पिछले पहर उठि चले ॥
चौपाई।
निकलत शाह कोई नहिं जाना उठि चल्यो जंगल कहँ सुलताना
नंगे पाव पनही नहिं लीना । ऐसे शाह धनी दिल दीना॥
स्वाद सलाह तजी सुख गेहा । राज पाट जान्यो सब खेहा ।।
साखी-सोलह सै सहेलियाँ, तुरी अढारह लख ॥
साई तेरे कारणे, छोडा शहर बलख ॥
चौपाई।
सकल छोडि के भये फकीरा । लागे विरह बान गंभीरा ।।
पिव कारण तज्यो सव आशा । जगत नेह तजि भये उदासा॥
शाह निपट बहुतहि सुकुमारा तिन सुख तजि गह्यो दुःखपारा।।
क्षुधा लगे कोइ जांचे नाहीं । गहि संतोष रहे मन माहीं॥
छन्द-पाँव छाले पडि गये चलि पंथ पग थहरावई ॥
कोइ संग आगे पाछे नाही धूप लगे कुम्हलावई ।।
अन्न बिना दिन तीन बीते हरष शोक नहिं चित गहे ।।
शाह निशिदिन अति बिरागी नाम अबिचल पद चहे ।।
१ पेट । २ वर्तमान के अथवा इस के थोडेदिन प्रथमके परम भक्त महात्माओंके
विद्वत्ताके नमूने के लिये यह सोरठा जैसाका तैसा रक्खाहौ ।
३ पुरानी प्रतियों में इसी साखी से पुस्तक की समाप्ति होती है किन्तु इसके प्रथम
बहुत कुछ विषय है सो इस पुस्तक में आगे आवेगा इस नोट में इस विषय में विशेष नहीं
लिखा जासकता ग्रन्थ के अन्त में "ग्रन्थ विवेचन" नामक हेडिंगके नीचे लिखा जायगा।
(७३२)
सुलतानबोध ।
सोरठा-तब साहब कछु दीन, रूखा सूखा टूकडा॥
शीस नायके लीन, खरी कसौटी नामकी ।
चौपाई।
कछु भायो कछु औरहि दीना । मनमें नाहि गुनावन कीना ।।
जो मुख पांचो अमृत पावत ।सो मुख सूखा टुकडा खावत ॥
आसन वासन अभूषण नाना । सो सब तजे भूरि मनमाना॥
जेहि लागी तिन ऐसी कीन्हा । कहे कबीर प्रेम मन चीन्हा।।
प्रेम गली अति सांकरि भाई । राई दशवां भाग रहाई ॥
मन अहिरावत किस विधिजावे। विरले संत कोइ मारग पावे ॥
साखी-प्रेम बन्ध अति दुर्लभ, सब कोइ सके न जाय ॥
चढना मोम तुरंग पर, चलना पावक माय ।।
छन्द-मिही सुई को नाको जिमि तिमि इश्क मारग ठानिया॥
ताहीते कोर झीनि होइ के प्रेम अगम गम जानिया ॥
जिन करि फना मरो आपको सो लहें सुखको धामहो ।
कहे कबीर आप जहां तहां नहिं मिलत अराम हो।
सोरठा-मन महँ शाह उदास, कबहुंक दरश मैं पाइहौं ।
पुरवहि मोरी आस, प्रगट रूप जब देखिहौं ।।
जबहि शाह घट विरह समायी। दोय कर जोरि के विन्ती लायी
दीन दयाल दया अब कीजे । अपना दर्शन मोको दीजे ॥
शब्द स्वरूपरहिरूप छिपाओ। प्रकटरूपमुहिदरशदिखाओ ॥
जब हम लगनशाह घट चीन्हा ।तब हमरूपप्रकट तहँ कीन्हा।।
१ पुरानी मतियों में यह चौपाई इस प्रकार है ।
नारि रूप तुम लेउ छिपाई । पुरुष रूप धरि दरश दिखाई ।।
और इसका सम्बन्ध उस कथासे है जहाँ सहेली बादशाहके सेनपर सोगया है और
उसे मार पड़ा है। पर जब सखीने बादशाहको समझाया है तब बादशाह अपने मन
में विचारने लगा है कि।
1
२९ बोधसागर। (७३३) धयो स्वरूप अंग उजियारा । जगमग ज्योति तेज चमकारा। उठत सुगन्ध अंग बहुताई । परिमल बास महेके सब ठाई। बहुत कान्ति दीसे उजियारा । देखि शाह भये हर्ष अपारा॥ तबही शाह चरण लपटाये।दोइ कर जोरिके विन्तीलाये। धन्य भाग मुहि दर्शन दीना पतित जीव पावन कार लीना।। लगे शाह सतगुरु के चरना ।अब मुहि राखो साहब शरना।। धन्य धन्य तुम आपु गुसाई । अपना भेद कहो समझाई ।। कहँ तुम रहौ कहांते आये । वह सब गम्य कहो समझाये ॥ साहिव अपना नाम बताओ। अपना जानि जीव मुकताओ। अबतो यह कलाजानि हम पायी।साहिव हमको दरशदिखायी। तुमविनु दया करे को ऐसा । जनम मरन का मेटे संसा॥ अब मुहि मुर्शिद भेद बताओ। तुम साहिब हम बन्दा आओ। कवीर वचन। कहे कवीर सुनो चित लाये । अमर लोकते हम चलि आये ।। नाम कवीर हमारा होई । हंस उबारन आये सोई ।। चौपाई। कह सहेली जान अपारा । जो दिल धारो तो उतरो पारा॥ तब शाह दिल अपने जाना । नारीमें अस होय न ज्ञाना । यहतो है खुद साहिब मेरा । धरा रूप इन ख्वासिन केरा ॥ तवे शाह दिल माहि विचाग । हम कारन इतना तन धारा॥ जो यह कहे मानि सो लीजै । जाते काज आपनो कीजै । जो मैं वचन मानि शिर ले ऊँ। चरण कमल में मस्तक देऊँ ॥ जबै शाह घट प्रेम समायी । दोय कर जारि उन विन्ती लायी ॥ धन्य भाग मुहि दर्शन दीना । पतित जीव पावन करि लीना ।। शाह लगे सतगुरु के चरना । अब मुहि साहिव राखो शरणा ।। दीन दयाल दया अब कीजे । अपना दर्शन मोकहँ दीजे । नारि रूप तुम लेहु छिपायी । पुरुष रूप धार दरश दिखायी ।। इसके आगे जो पुरानी प्रतियोंमें आयी है सो यहाँ भी वही बात आयीहै ।
(७३४)
सुलतानबोध ।
३०
जो जिव माने शब्द हमारा । सो जिव उतरे भौजल पारा॥
तबही शाह भये आधीना। शिरलेइ चरण कमल में दीना।
चरण पखारि चरणामृत लीन्हा। प्रेम भाव सतगुरु कहँ चीन्हा॥
सुलतान वचन ।
अबकीजे मम साहिब काजा। जाते नहिं छेडे यम राजा।।
सोई नाम मुहि देहु बतायी। जाते जीव अमर घर पायी ॥
कवीर वचन ।
कहें कवीर मुक्ति तब पावे । सुरति निरतिले शब्द समावे॥
उन्मुनि ध्यान रहो लौ लाई। अजपा जपो सदा दिल भाई॥
निशि दिन मनुवा अस्थिर राखोनाम अमीरस रसना चाखो।
नाम प्रताप मुक्ति जिव पावे । जनम मरण को दुःख मिटावे॥
गही नाम सत्यलोक सिधावो । तहां जाय बहुते सुख पावो ।
वहि घर हंसा करई आनन्दा । काटे कर्म कालको फन्दा ॥
बहुविधि शोभा रूप अनूपा । षोडश रवि सो हँसको रूपा ॥
किया चहो तुम अपनो काजो*यम तृण तोरि आरती साजो।
सहज चौका करि दीनो पाना । यम का बन्धन हृदय उठाना॥
अमर अंक जो परवाना पावे काल कलातजि लोक सिधावे॥
प्रथम पान परवाना लेई । पीछे सारशब्द तेहि देई॥
तब सतगुरु ने अलख लखाया। करि परतीति परम पदपाया।
ऐसी रहनी गहे जो कोई । सतगुरु पद पावे नर सोई॥
तन मन धनका मोह बिसारे । सो हंसा सत्य लोक सिधारे।
सौरठा-शाह किये तन खाक, अपने पिव के कारने ॥
खाक मिली भये पाक, आदमते भये औलिया।
* इस आधी चौपाई तक तो पुरानी प्रति के अनुसारहै। इसके प्रथम जो गडबडहै
वह वह टिप्पणियों द्वारा दिखलायी चुकाहूँ । अब यहां से जो गडबडहै सो नवीन प्रति की
पक्ति पूरी हो जानेपर ऐसी फूटके चिन्ह के साथ उसे भीगे।
।
बोधसागर।
सुनो धर्मदास सुजान, शाह भये जीवन मुक्त ।।
पद पाये निर्वान, शब्द परखि करनी किये ॥
चौपाई।
-
धरम दास चित अति हर्षाये । प्रभुलीला तुव वरणि न जाये।
शाह काज धारे प्रभु रूपा । सखी नाम धर कला अनूपा ॥
अमित कला जीवन सुखदाता । भव बूडत राखे शठ त्राता।
अधम उधारण नाम तुम्हारा । बहुत जीव कीने भवपारा ॥
महा नेह तुव चरण लगावा । यश रहयो और परम पद पावा
साखी-सत्य कबीर समरथ धनी, दोऊ दीन के ईश ॥
सुयश सुन्यो सुलतान को, धर्मनि नायो शीश ॥
नबीन प्रतियोंमें पुस्तक यहां आकर समाप्त होतीहै किन्तु
पुरानी प्रतियोंमें ७३२-२८ पृष्टके पक्ति की आधी चौपाई
“किया चहो तुम आपनो काजो" के आगे की बाणी उपर्युक्त
नबीन प्रतिसे एकदम विरुद्ध नीचे लिखे अनुसार है।
और नवीन प्रति से पुरानी प्रतिके अंत के एक समान न
मिलने का कारण उसे पृष्ट की टिप्पणी में दे दियाहै। और
विशेष वृतान्त पुस्तक की समाप्ति में देंगे।
चौपाई।
किया चहो तुम आफ्ना काजू । तुम्हारो राज छोडिदो आजू ॥
सतगुरु नाम गहो विश्वासा। जाते मिटत कालको त्रासा॥
यहि सुनिशाह तख्त तब छाडा। प्रकटे ज्ञान हिया गुण बाडा ॥
तब सतगुरु ने अलख लखाया। करी प्रतीति परम पद पाया।
साखी-सोलह सै सहेलियाँ, तुरी अठारह लख ॥
साई केरे' कारणे, छोडा शहरबलख ॥
॥
इति ।
१ यह सखी एक स्थान में औरभी आगयी है।
(७३६)
सुलतानबोध ।
३२
ग्रन्थ विवेचन।
इस ग्रन्थकी कई प्रतियाँ मेरे पास उपस्थितहैं जिनमेंसे कोई
पुरानी सौवर्षसे अधिक की लिखी हुईभी हैं किन्तु पुरानी प्रति
की अपेक्षा उत्तोत्तर २ जैसे३नवीन पुस्तक लिखी गयीहै सबमें
कुछ वृद्धि और प्रसंगका उलट फेर और छन्दोभंग का
समावेश होता गयाहै। नवीन प्रतियोंके अन्तमें कई पुस्तकोंमें
किसी किसी महात्माओंने अपना नाम लिखकर अपने
को पुस्तकका कर्ता सिद्ध करना चाहाहै । चाहा तो सब कुछ है
किन्तु लिखते लिखते दोहा और सोरठा भी शुद्ध नहीं लिख
सकेहैं । सबसे जो पुरानी प्रति मेरे पास मौजूद हैं वह नवीन
सब प्रतियों से अधिक शुद्ध औरछोटीहै और उसकाआरम्भभी
"बलख शहर एक नगर अनूपा" से होताहै ठीक उसके उल्टा
नवीन प्रतियोंका आरम्भ "धर्मदास उठि विन्ती लाई" से
होताहै। इसी प्रकार से पुरानी प्रतियोंकीअपेक्षा नवीन प्रतियों
के मध्य मध्यमें आधिक कथाएँ इतनी मिलायी गयी हैं कि,
पुस्तक डेवढी होगयीहै । इतनीही नहीं है कि, विषय बढाया
गयाहै किन्तु साथही साथ थोडे २ वचन किसी में एक दोहा
किसी में एक छंद (जो सब अशुद्ध हैं ) वढाकर बढाने वाले
महाशय ग्रन्थ के कर्ता बनगये हैं । यद्यपि मैंने इस पुस्तक
को सब प्रतियोंके अनुसार ठीक करदियाहै तथापि जहां २
विषयोंका उलट फेर अथवा घटाव बढाव हुआहै वहां टिप्पणी
देदीहै । इस ग्रन्थकी पुरानी प्रतिमें कवीर पंथकी अन्य ग्रन्थों
के समान किसी कर्ता का नाम तो है नहीं किन्तु नवीन
प्रतियों में कई कर्ताओंका नाम है इससे किसी एक कर्ताका
नाम निश्चय करने में अशक्ति होकर मैंने किसीका नाम
३३ बोधसागर। (७३७) नहीं दिया है और यथार्थ में हैही यहीबात कि कवीरपंथ की जैसी और पुस्तकों में कर्ता का नाम नहीं है किन्तु वह कवीरपंथी पुस्तक कहलाती हैं और कवीर साहिब तथा धर्म दास साहबके सम्बाद में लिखी गयीहैं। इस पुस्तक के अतिरिक्त और भी निर्भयज्ञान आदि अनेक पुस्तकों में सुलतान इब्राहीम अद्धम के विषय में बहुत कुछ बात आयी है जिनमें परस्पर बहुतही भेद हैं और कितने विषय ऐसे हैं जो एक में हैं और दूसरे में नहीं हैं । इसकारण शाह इब्राहीम अद्धम साहेब का वृतान्त गद्यमें संक्षेप लिखदेताहूँ क्योंकि विस्तारसे लिखने के लिये एक स्वतंत्र पुस्तक लिखने- का विचारहै। सुलतान शाह इब्राहीम अहम साहिबका संक्षेप चरित्र। उत्पति । इस सुलतान इब्राहीम शाह के पिताका नाम अद्धम शाह था। आप संसार त्यागी फकीर थे। अपनी फकीरी और तप- स्यामें पूरेथे। वस्ती से सदा अलग रहतथे । प्रारब्धि से जो कन्द, मूल, फल अथवा नाज मिल जाता था उसी पर अपना समय वितातेथे किन्तु कभी एक स्थान में जम कर नहीं रहते थे। कभी उनने घर नहीं बांधा। कहाभीहै कि, साखी बहता पानी निर्मला, बन्धागन्दा होय । साधू जन रमते भले, दाग न लागे कोय ॥ कुछ समय तक तो ऐसेही निःसंग फिरतेरहे । फिरते फिरते एक बार बलख शहर में पहुंचे । ठहरने के लिये तो शहर से दूर उन्होने जंगल में निश्चय किया किन्तु नित्य शहर में फिरने के (७३८) सुलतानबोध । ३४ लिये जाया करते । एक दिन संयोगसे बलख के बादशाहकी लड़की को देख लिया।अबतो ज्ञानध्यान सब वैराग भूलगया। उस शाहजादी पर उनका मन ऐसा आशक्त हुआ कि, उसी के विरह में दिन रात फिरने लगे । अन्त में उसके मिलने का कोई उपाय न देख कर स्वयम् उन्हों ने बादशाह के पास जा- कर अपने विवाह के लिये प्रार्थना की । उनकी प्रार्थना को सुनकर वादशाह तो सन्न हो गया। वह शोचने लगा कि, ऐसे फकीर भीख मांगते को कन्या देकर उसे दुख सागरमें डुबाना है। बादशाहने ऐसा मनही मन विचार तो किया किन्तु आस्ति क होने के कारणसे दुबैश की बददुआ (शाप) से डरकर कुछ बोल नहीं सका और उसने दूसरे दिन फिर उन्हे आनेको कहा। उनके चले जाने पर बादशाह और वजीर ने परस्पपर विचार करके अद्धमशाह कोटाल देनेका उपाय निश्चय किया और जब नियत समय पर अद्धमशाह बादशाहके पास पहुंचे तब वजीरने उनसे कहा कि, शाहजादीने अपने विवाहके लिये यह प्रतिज्ञा कीहै कि,नमूनेके अनुसार जो कोई दूसरा मोती ले आवेगा उसीके साथ वह विवाह करेगी। अद्धमशाहने वज़ीरको बहुत कुछ समझाया बुझाया गिडगिडाये रोये कल्पे किन्तु वजीरने एकभी नमानी। अन्तमें वजीरसे शपथपूर्वक वचन लेकर वह मोतीकी खोज करनेको निकले और दोवर्षतक देश २ नगर २ ग्राम २ भटकते फिरे अन्तमें यह सुनकर कि मोती खारे समुद्र में उत्तपन्न होताहै खारे समुद्रके किनारे पहुंचे वहां पहुंचकर उन्होने अप- ने खप्परसे पानी भरकर रेतमें फेकना अरम्भ किया, इसप्रका- रसे पानी फेंकते फेंकते जब उन्हें चालीस दिन बीत गये तब परम दयालु सत्यपुरुषकी आज्ञासे सद्गुरु उनके निकट समुद्र तटपर पहुंचे। वहां पहुंचकर सद्गुरुने अद्धमशाहसे पूछा कि, ३५ बोधसागर । (७३९) हे भाई तू यह क्या कररहा है ? समुद्रके पानीको उलचनेने तुझे क्या लाभहै ? अद्धमशाह तो अपने काममें ऐसे मग्नथे कि, उन्हे कुछभी सुधि नहीं हुई कि, कौन मुझसे क्या पूछताहै। जब सद्गुरुने कईबार पूछा और निकट जाकर उन्हे सचेत कर- के कहा कि, तुझे जो चाहिये मुझसे कह तेरेही लिये सत्यपुरु- पने मुझे तेरे पास भेजाहै।सद्गुरुकी इतनी वातको सुनकर अधम- शाहको कुछ चेत हुआ और उन्होने अपना सब वृतान्त आदिने अन्ततक सुनाकर सद्गुरुसे कहा कि यदि सत्यपुरुषने कृपाकी- है और आप मेरे दुखको दूर करनेके लिये आयेहैं तब मुझको वैसाही मोती जैसा शाहजादीने मांगाहै दीजिये। अद्धमशाहकी ऐसी इच्छाको सुनकर सद्गुरुने उन्हे समझाया कि, तू उस सच्चे साहिबका भजन कर जिसने तुझे और शाहजादी दोनोंको उत्पन्न कियाहै । सद्गुरुने बहुत कुछ ज्ञान और विवेक बैगगका अद्धम शाहको उपदेश किया किन्तु उन्होने एकभी नहीं माना वरन उलटकर उनने उत्तर दिया कि, मैंतो मोतीका मिलना और शहाजादीसे विवाह करनाही परम भजन समझताहूँ मुझे दूसरेसे कछ सम्बन्ध नहीं है" ? फिरसद्गुरुने कहा समुद्रका पानी तू क्यों उलचता है! तब अद्धम शाह ने उत्तर दिया कि,इसी प्रकार से उलचते उलचते समुद्रको सुखा दूंगा और समुद्र के सूखनेपर मोती लेकर जाऊंगा तब शाहजादीसे विवाह करूंगा । सद्गुरुने हंसकर कहा कि, भला यह कब सम्भवहै कि, तेरे उलचनेसे समुद्र सूख जाये और तू मोती पावे अद्धम शाहने उत्तर दिया कि, समुद्र सूखे या न सूखे जब तक दममें दमहै तबतक मैं अपने कामसे पीछा न फिरूंगा। इतना कहकर उनने कहा यदि सत्य पुरुपने आपको (७४०) सुलतानबोध । मेरा दुख दूर करनेको भेजाहै तो आप मुझे उसी जोडके मोती दीजिये ! जब सद्गुरुने देखा कि, अद्धमशाह अपने निश्चयसे नहीं टलताहै और उसको मोतीके सिवाय दसरा कुछ नहीं सूझता है तब सद्गुरुने कहा कि,हे अद्धमशाह आंख बन्दकर। सद्गुरु की आज्ञाको पाकर अद्धमशाह आंख बन्द करके अन्तरमें सद्रू का ध्यान करने लगे। उधर तो वह ध्यानमें मस्तथे इधर सद्ध- रुकी आज्ञा पाकर समुद्रने लहर मारा और हजारों सीप रेतमें डाल गया। लहरके हटजानेपर जब अद्धमशाहने आंख खोली तब क्या देखा कि, सहस्रों मोतीके सांपोंका ढेर लगाहै । मोतियोंका ढेर तोपड़ाहै किन्तु सद्रुका पता नहीं है। फिरतो अद्धमशाहने मोती देखना आरम्भ किया। देखते २ वह ऐसे आश्चर्यमें फंसे कि, उन्हे यह निश्चय करना कठिन होगया कि, किसको लेवें और किसको न लेवें । अन्तमें चालीस बडे २ मोती चुनकर अपने कमरमें रक्षापर्वक बांधकर रवाना हुए। चलते २ कुछ दिनोमें जब बलखमें पहुचें तब सीधे धड धडाते हुए बादशाहकी कचहरीमें पहुंचे। उस समय बादशाह की कचहरी लगी हुईथी। इनके पहुंचतेही बादशाह और वजीर दोनोंकी दृष्टि उनपर पड़ी। देखते ही वजीर आग बगोला बन गया । वजीरके क्रोधकरनेका कारण यह था कि, जिस समय अदमशाह और वजीरसे इस बात की प्रतिज्ञा हुईथी कि, मोती लेकर आनेपर शाहजादीसे उनका विवाह करा दिया जायगा, उसी समय वजीरने अद्धमशाहसे ऐसी प्रतिज्ञा लीथी कि, यदि मोती तुम न ला सको तो बलख शहरमें फिर , " बोधसागर । (७४३) दुवारा नहीं आना। और यदि आओ तो तुम्हारी गर्दन मार्ग जाय। वजीरको अद्वमशाहसे ऐसी प्रतिज्ञा लेनेका यह आशय था कि, अद्धमशाह जैसे फकीरकोन मोती मिलेगा न वह फिर आयगा और न उसका विवाह शाहजादीसे होगा। यही कारण था कि, अद्धमशाहको देखतेही वजीरने क्रोध करके कहा कि, ओ अद्धम ! तू अपनी प्रतिज्ञाको भूलकर फिर यहां आयाहै ? इस कारण प्रतिज्ञाके अनुसार तेरा शिर धडसे अलग किया जायगा। वजीरके अहंकार भरे वचनको सुनकर अद्वमशाहने कहा ओ बेखबर तुझे क्या खवरहै कि, प्रभुने तेरे नमूनेके मोतीसे भी बढकर बहु मूल्य इतने मोती मुझको दियेहैं कि, जितना तेरे संकल्प में भी नहीं आ सकताहै । प्रभुने तो बहुत दियेथे किन्तु मैंने चालीस चुनकर लेलियेहैं । अद्धमशाहने इतना कहकर अपनी झोलीसे चालीसो मोती निकालकर बादशाहके मसनदपर गिनके पंक्ति लगाकर रख दिये ॥ मोतियोंके निकलतेही चारों ओर उसके प्रकाश फैल गया। जौहरियों और परखियोंसे आश्चर्य में आकर अवाक रहने के अतिरिक्त कुछ न बन पडा। बादशाहकी तो बुद्धिही ठिकाने न रही वह शोचने लगा कि, अबतो अवश्य शाहजादीका विवाह इसके साथ करदेना पडेगा। अन्तमें बादशाह ने तो यह निश्चय किया कि, अब शाहजादी का विवाह उसी फकीरसे कर देना अच्छा है किन्तु राजदार का कामहै। राजनीति के नियमानु सार बादशाह एकान्तमें जाकर अपने वजीर और-परिवारोंसे इस विषयमें विचार करने लगा कि, शाहजादीको अद्धमशाहसे विवाहना चाहिये कि नहीं, उस समय उसी वजीरने जिसने प्र- थम बार प्रतिज्ञा कराकर अधमशाहको मोतीलानेकेलिये भेजा "
(७४२)
सुलतानबोध ।
३८
था उस समय भी विघ्न डालनेके लिये कहना आरम्भ किया।
पूछी फिर शाहने बजरोिसे सलाह।
सब सगीरों कबीरोंसे
सलाह ॥
जो कि औवलमें हुआथा नेशजन ।
फिर हुआ इस प्रकारका वह बेखकुन ॥
उक्दसे माना हुआ फिर वह वजीर ।
क्योंकि था हर अमरमें शहका मशीर ॥
हीलाव हुज्जत व्याँ करने लगा।
नुक्ता औ ऐब उनके अयाँ करने लगा।
कुबह कुछ उसने किये ऐसे बयाँ ।
होगया खामोश वह शाहे जहाँ।
उसबज़ीरफित्नेजोनेफिरकहा । आपघरमेंहूजियेरोनकफिज़ा ॥
अहदओपैमाँमुझसेहैदुर्वेशका । आपअन्देशानकोजेकुछजरा ॥
सौंपिये यह काममेरीरायपर। लाइयेदिलमेंनकुछग्वाफोखतर॥
याद रखियेआपयहमेरीहदीस । इसकेहैताबाकोई जिन्नेखबीस ॥
कअरसेदरियाकेगोतामारकर लादियेहैंउसनेयह नादिरगोहर ॥
यहकरामतपरनहीं इसकीदलीलोहैबनाबटइसकीऐशाहेजलील।।
ऐसेमरवादीदवरन यहफकीर । लाताक्योंकरऐशहेआफ़ाकगीर॥
हैनजरबन्दोमें भी यहदस्तगाह । गुर्देःनानको बना देतेहैं माह॥
योंकियाहैइसनेयहमकरोदगलापासइसकेहकोई सिफलीअमल ॥
संगरेजाजिससेआतेहोंनज़र । खल्ककीआँखोंमेंताविन्दःगोहर ॥
यहजोयोरोशनतरअज़ खुर्शदहैं । यहबनावटहीके मरवारीदहैं।
मोतियोंमेंयहदरखशानीकहाँ । यहचमकयहनूरअफशानीकहाँ ।
अबकुछइसकोनसमझेजन्नबद । नूरताविन्द हैमर्दुमकीखेरद ॥
मुझको आताहै नज़रउसनूरसे । मकरवहीलाइसगदाकादूरसे ॥
बोधसागर।
(७४३)
सादिकोबरहकहैयहकौलेलवीब । हैव्यानेआदमीसिहरेअजीब ॥
बादशाहसुनकरयहतकरीरेवज़ीर । होगयादामेतवहुममेंअसीर ।
करकेआखिरकारतावीज़वज़ीर। बादशाहघरमहुआरौनकपज़ीर
कहगया उससेकितृमुखतारहै । नेकवबदकाइसकेतुझपरबारहै ।।
लैकबदअहदी है इन्दुल्लाहबद । है नतीजा ऐ खेरदआगाह बद॥
कीजियोकुछतदबीरऐसीवज़ीर । तंगजिससेहोनयहमर्देफकीर ।।
घरमेंअपनेबादशाहदाखिलहुआरहगयाउसकावजीरऔरवहगदा
इस प्रकारसे बादशाहको समझा बुझाकर वज़ीरने महलमें
भेजदिया। अब अद्धमशाह और वजीर रह गये तब वजीरने
अद्धमशाहसे कहा-
उसको धमकाकर लगाकहने वजीर।
क्या हुआहै तुझको ऐ मरद कफ़कीर ।
तूजोयों गुस्ताखेकरतौहकलामावरमलालेताहेशहजादीकानाम।
तुझकोहकुछअक्कभी ऐ बेहया । शहजादीवहहैतृमुफलिस गदा॥
नाम शहजादीका गरतूने लिया। होगाहरहरबन्दतेराजुदा ।।
काटकर तेगोंसे मैं तेरीजुबाँ । दारपरखीचूँगा तुझको बेगुमाँ ॥
जिस्तगरचाहेतोइश्तगफार कर । इसख्यालेखामसेअपनेगुज।।
वजीरकी धमकी और विश्वासघातकी बातको सुनकर
अद्धमशाह बहुतही दुःखी हुए और फिर अपनेको सँभालकर
वजीरसे कहने लगे-
जबसुनीअद्धमनेउसकीगुफ्तगू। बोलाऐबदअहदनासंजीदःखू ॥
भूलताहैउसखुदायपाकको । जिसने यह रुत्वः दियाहै खाकको।।
तूनेवहजामिनदियाथादरम्याँ जिससेकायमैहजमीनोआसमाँ ।
आलिमोदामा व दारायजहाँ।कादिरे मुतलक शहे शाहन शाहाँ।।
गुलजार इब्राहीमसे।
(७४४)
सुलतानबोध ।
४०
क्याहुएवहअहदोंपैमा ऐवजीर । कौलो एकरारेईमाऐवजीर ॥
अहदकरतेहैंवफाअपनाकरीमाकिज्ववबदअहदीहैकिरदारेलईम ।
उक्दउसकागरमुझसेकरनानथा। अहदक्योंतूनेकियाऐबेवफा ॥
अद्धम शाहने वजीरसे कहा यदि तुझको अपनी प्रतिज्ञा परी
करनीही नहीं थी तो तूने मुझसे प्रतिज्ञा करके और मुझसे प्रतिज्ञा
कराके दोवर्ष तक मुझे क्यों भटकाया। देख तूने ईश्वरको साक्षी
रखकर प्रतिज्ञा की और करायीथी अब विश्वासघात मतकर
इस विश्वासघातकाफल अच्छा न होगा। देख ! आज उच्च पदवी
को पहुंचाहै तो फकीरों और दीन दुखियोंको इस प्रकार दुःख
देताहै, विचारकर ! किसीका अभिमान आजतक नहीं रहाहै।
इस संसारमें आकर मायाके चमक दमकमें पड़कर जिस
जिसने गर्ब कियाहै सबका गर्ब टूटाहै किसीका गर्बभी रहा
नहीं है ? अब तू विश्वासघात मत कर और जिस प्रकार मैंने
अपनी प्रतिज्ञा पूरी की, उसी प्रकार तूभी अपना वचन रख ।
इसीप्रकारसे परस्पर अनेक प्रकारकी नोक झोंककी बातें होनेके
पश्चात् वजीर बहुत क्रोधित हुआ और उसने अपने नौकरों
को आज्ञादी कि, अद्धमशाहको इतना मारो कि, यह जीता
न बचे। फिर क्याथा वजीरकी आज्ञाको पाकर निर्दयी नौकर
चारों ओरसे टूट पड़े। किसीने लकडी उठायी तो किसीने
कोडा लिया । संक्षेपतः यह कि, जिसको जो मिला उसने
वही ले लिया और चारों ओरसे अद्धमशाहके ऊपर मार पड़ने
लगी। अन्तमें जब वह एक दम अचेत होगये श्वासोच्छास
की क्रिया रुक गयी जब मारनेवालोंने समझ लिया कि, वह
मरगयाहै तब वजीरकी आज्ञासे वस्तीसे दूर जंगलमें डाल आये
इधर अद्धमशाहकी यह गति हुई उधर बादशाहकी बेटीके
बोधसागर । ( ७४५) हृदयमें शूल उठा और उस दर्दने थोडीही देर में ऐसा बल पकडा कि, हजारा वैद्य और उपाय करनेवालोंके रहते हुएभी शाहजादी को कुछ आराम नहीं हुआ। तीन चार घडीमें वह मरगयी । अब क्या था बलख शहर में हाहा कार मचगया । शोकने आकर समस्त नगर में निवास किया । यदि उस समयके शोकका वर्णन लिखने लग जाऊं तो एक दूसरी और बड़ी पुस्तक बन जाये इस कारण संक्षेपमें लिखना यह है कि, बादशाहको सिवाय इस शाहजादीके दूसरी संतान न होनेके कारण सर्वत्र शोकही शोक फैल गया। संक्षेपतः यह कि शाहजादीकी मृतकको लेकर कत्रकी अन्तिम क्रिया करके सबलोग लौटकर चले आये। इधर अद्धमशाहकी आयु शेष रहनेके कारण सद्गुरुकी कृपासे दिनभर अचेत पडे रहने के पश्चात दोघडी दिनरहते वह सचेत हुए।सचेत होतेही शिर उठाकर देखा तो जंगलके सिवाय कुछ नहीं दीख पडा। नतो शाही महलहै, न वजीरका दर्बार न उनके मोती। इस प्रकारसे चारों ओर शुन्यही शुन्य देखकर अद्धमशाह प्रथम तो आश्चर्यमें आये किन्तु उनका आश्चर्य जाता रहा और इश्कका जोश फिर अन्तःकरणमें उठा । फिर तो अद्धमशाह सीधा शहरको पहुँचे।शहरमें पहुँच- कर उनने चारों ओर शोक फैला हुआ देखकर जिससे पूछते वही कहता कि,शाहजादी मरगयी। प्रथमतो उन्हे लोगोंके कह- नेका विश्वास नहीं हुआ किन्तु जब शाही महलके द्वारपर पहुँचे और वहांभी लोगोंको शोकमें विकल देखा और चारों ओरसे हाय ! हाय ! की ध्वनि सुनी तब उन्हें विश्वास हुआ कि, सच मुचशाहजादीका परलोकवास होगया।इस बातके निश्चय होतेही (७४६) सुलतानबोध । ४२ उनके हृदयपर ऐसा आघात लगा कि, जहां खडेथे वहाँ ही वह अचेत होकर गिरगये और उसी अवस्थामें उससमय तक पड़ेरहे जब तक बादशाह शाहजादीकी अंतिम क्रिया करके कब्रस्थानसे फिर कर आये। बादशाहके कबरसे लौटकर एकबार फिरभी रोने पीटने और हाय बोय करनेकी वह धूम मची कि,जिसका वर्णन करना कठिनहै । उसी हाय बोय शोककी चिल्हाहट में अद्धम- शाहकोचेतआया चेत आतेही उससमयकी सभादेखकर पागल विक्षिप्त चित्तके समान होकर वहाँसे वह चल पडे।एक तो अंधेरी रात दूसरे शोकसे कातर अद्धमशाह आधीराततक तो जंगलमें इधरउधर भटकते और ठोकरखाते रहे किन्तु आधीरातके पश्चात् प्रभु कृपासे भटकते २शाही कब्रस्तानके निकट पहुँच गये। वहाँ जाने पर उनके हृदयको कुछ धैर्यसा हुआ और कुछ चेतनाभी आयी, फिर तो एक वृक्षकी आड़में खड़े होकर उन्होंने कत्रके रक्षकोंको ध्यान पूर्वक देखना आरंभ किया। संयोगवश दिनभ- रके थके हुए पहरेवाले ऐसी निद्रामें अचेत हुए कि उन्हें किसी बातकी सुधि न रही। पहरेवालोंको बेसुध देखकर इश्ककीतरंगमें अद्धमने एक ओरसे कनात फाड दिया और अन्दर पहुंचकर वह चोरोंके समान धीरे धीरे कबरतक पहुंचे। कबके निकट पहुंच कर वह प्रथमतो कबसे लपटकर थोडीदेरके लिये अचेत होगये फिर चेत आनेपर उन्हे यह विचार आया कि, एकवार माशूकका ददिार कर लेना चाहिये । दीपक तो चारों ओर जलही रहेथे उसी प्रकाश में उन्होंने कबरकी मिट्टीअलग करके ताबूत से शाहजादीकी मृतक को बाहर निकाला और दीपकके सामने उसे लिटाकर उसके मुखको एकटक देखने लगे। देखते देखते उनके हृदयमें ऐसा तरंग उठा कि इसे अपने पर्णकुटीतक
४३
बोधसागर।
(७४७)
लेजाना चाहिये । बस । फिर क्या था कवकी मिट्टीको ज्योंका
त्या करके वह शाहजादीकी लाश उठाकर अपनी कुटीपर
पहुंचे सद्गुरुकी ऐसी कृपा हुई कि,जबतक यह अपनी कुटीतक
नहीं पहुंच गये तबतक किसी पहरेदारने करवटभी नहीं ली।
अद्धमशाहने अपनी कुटीमें शाहजादीकी लाशको दीवारके
सहारे बैठा दिया और जंगली लकडियोंको जलाकर उसीके
प्रकाशमें उस मृतकको सम्बोधन करके कहने लगा।
होगयी आतश जब वहां शोआले जन ।
बैठा उसके रूबरू यह खिस्तःतन ।।
रोशनीमें आगक वह नीमजाँ ।
देखता था हुस्न रूए दिलस्ताँ॥
बादिले पुरदर्द चश्मे अश्कवार ।
देखता था उस परीरू की बहार ॥
गोरे तनपर वह उसके पैठा कफन ।
जामये शबनभमें गोया यासमन ।।
चिहरेका आलम कफनमें जो कि था।
बिर्द कबदे चांदनीमें वह मजा ॥
करके उसकी लाशको अद्धम खिताव ।
यों लगा कहने जेराहे इजतराव ॥
ऐवुते संगी दिले ना आशना ।
क्यों क्या मुझको बलामें मुबतिला ?॥
क्यों दिखाकर दफेतन अपनी फबन ।
रंजमें डालाथा ऐ नाजुक बदन ॥
दर्द व गममें अपने करके मुबतला ।
एक मुद्दत तक मुझे रुसवा किया।
(७४८) सुलतानबोध ।
मुझसे क्यों चाहेथी वह नादिर गोहर।
दो बरसतक क्यों रखाथा बहू पर ॥
अहद गर तुझको वफ़ा करना न था।
मुझको जिन्दः छोडकर मरना न था।
तुझमें कुछ बूए वफादारी नहीं ।
यार होकर शेवये यारी नहीं।
तुझको गर दुनियांसे करना था सफर ।
साथ लेना था मुझको ऐ सीम्बर ॥
रूह तेरी बाग जन्नतको गयी।
देगयी इस रख्त जांको बकली ॥
हालकी मेरी खबर भी है तुझे।
कल नहीं पडती किसी करवट मुझे।
बाग जन्नतमें किया तूने वतन ।
मैं रहा बहरे अलम में गोते जन ॥
हैफ है सद हैफ दीदारे हबीब ।
बाद मरनेके हुआ मुझको नसीब ॥
वाह ऐ चदै सितमगर वाहवाः।
तने जालिम क्या सितम मुझपर किया।
जीस्त में माना रहा दीदार से।
बाद मरनेके मिलाया यारसे ॥
देखलेती यहभीमेरीबेकली ।
जोबरआती सब तमन्नाये दिली॥
इसको भी शायदथाकुछमेरा कलक ।
होगयी जो दमके दम में जांबहक ।
खागयी इसको गमें पिनहानः इश्क ।
बोधसागर।
(७४९)
आतशे उलफत तुफे सोजान इश्क ।
कत्ल जालिम तने दोनों को किया।
इस परी रूसे जुदा मुझको किया ॥
जान इसकी तो हुई तनसे बदर ।
जिन्दगी में मैंह मुर्दा से बतर ॥
यह तो मर कर हिज्रके गमसे छुटी ।
तलमलाहट मुझको है अबतक वही ॥
वहशियों की तरह अपना माजरा
कह रहा था उस परीरू से गदा ॥
बा जबाने हाल वह देती जवाब ।
इश्कहै आ सौतरहके पेच ओ ताव ॥
मुझसे अपने दर्द गम कहता है क्या ।
मरगयी मैं तू तो जिन्दाभी रहा।
इससे वरतर क्या है दर्द ओ रंज इश्क ।
जीती मैंने वाजिये शतरंज इश्क ॥
जीको अपने करदिया उसमें फना।
मुझसे त कहता है क्या यह माजरा ॥
देखकर अद्धम के यह रंजो महन ।
हो गया बहरे तरहुम मौजज़न ॥
देख कर उसमर्दक दिलका कलक ।
जोश में आयी इनायतहाय हक ॥
कुदरते हक ने किया असबाब जमा।
जिससे यह दोनों हुए अहबाब
इसप्रकार से अद्धमशाह शाहजादी के मृतकसे अपने विरह
की बातेंकरता औररोता जाताथा उसकी ऐसी दशाको देखकर
(७५०) सुलतानबोध । साहिव का कृपा सागर लहराया। फिरक्या देरथी सब सामग्री इकट्ठी होगयी। अर्थात् । भूलकर जुल्मतसे रहको कारवाँ।कुदरते हकसे वहाँवादिदहुआ॥ अंधेरी रात के कारण कोई ब्यापारी काफला राह भूल कर उसी बन में आकर उतरा । जाडेकी ऋतु के कारण जब काफ- लेके आदमी आगकी खोज करने लगे तब दूरसे आगके प्रकाश को देखकर एक आदमी अद्धमशाहकी कुटी परभी पहुँचा। कारवांमेंसे कोईमरदे खुदा। देखकरबनउजाला आगका॥ दिलमें अपने पुख्तः करके गुमाँ । खानए दुर्वेश है शायद यहाँ।। आगलेने को वहांआया चला।ताकरे वहअपनी कुछ हाजतरखा। सुतसिलहुजरेकेजबपहुँचावहमदीरंगअद्धमका हुआदहशतसेजर्द उसकी आहट पाकर अद्वमतो मारे डरके घबरा गये और कुटीके कोनेमें बने हुऐ गुफामें छिपगये । इधरतो यह हुआ, उधर वह आदमी जब कुटीमें आया तो भीतरके दृश्यको देख- कर एकदम घबरा गया। अद्धमशाहने समझाथा कि, कबरके रक्षकोंको सबहाल मालूम होगयाहै इससे उन्हीमेंसे कोई मुझे पकड़ने आयाहै और उस आदमीको मालूम हुआ कि, न जानें यह क्या चलाहै कि, शून्यसान घरमें कफनसे ढकी हुई मृतक देह बैठी हुईहै और सामने आगजल रहीहै किसी जीवित पुरुष- का पता नहीं है। वह अपने मनहीमन बहुत डर गया और पिछले पा फिरकर अपनी मंडली में गया। वहां जाकर उसने अपने सरदारको सब देखी हुई बातें एक एक करके सुनायीं जिसको सुनकर लोग बड़े आश्चर्यमें आये। कुछ देरतक शोच विचार करके मण्डलीके सरदारने काफलेके साथके वैद्य और अन्य कई मनुष्योंको साथ लेकर अद्वमशाहकी कुटीपर जाने-
बोधसगर।
(७५१)
का विचार किया। और प्रथम मनुष्यको जो वह सबदृश्य
देखकर आयाथा आगे करके कुटीपर जा पहुंचा।
थाक़ज़ायकारउनेंमएकतवीवाहाजिरकोदानावहुशियारोलबीब।
लेके साथउसकोअमीरे कारखाँ।सुनतेही इसबातकेपहुंचावहां ॥
थी जहां रौनक फिजा वह हरजाद ॥
पहुंचे यह दोनों वहां मानिन्द बाद।
बे तअमुलबेतवकुफ़केदवाँ । यह गयेवहरोशनथीआतशजहां ॥
जाके देखा फिर हकीकतहैवही। जिसतरहकहताथावहमरदरही।
देखकर उस हालको शुसदर रहे।लबगुजाँ हैरत जदा मुजतररहे।
आइनेसाँ शक्ल जब आयीनज़र । होगये हैरानदोनों देख कर ॥
बोला आखिरवह हकीमें नुकतेदाँ । रंगमुदैके यह रौनक कहाँ।।
वहां जाकर उन्होंने सब दृश्य वैसेही ठीक ठीक देखा जैसा उप
युक्त मनुष्य ने कहाथा। प्रथम तो वैद्य सहित वह व्यापारी
आश्चर्यमें आया किन्तु थोड़ी देर तकशाहजादीकी और ध्यान
पूर्वक देखनेपर वैद्यने जब कहाकि,यह औरत मरी नहीं है किन्तु
सकते के रोग से ग्रसित हो अचेत होगयी है तब तो उपरोक्त
(काफलेके) सर्दार और भी अधिक आश्चर्य में आया उसने
वैद्य से कहाँ क्या यह (शाहजादी) अच्छीभी हो सकती है ?
वैद्य ने उत्तर दिया अभी अच्छा करताहूँ । पश्चात् वैद्यने अपने
पाससे नशतर निकाल कर शाहजादीके हाथ की रग को
नशतर से छेदा जिससे रक्त बहने लगा। थोडी देर तक लोह
निकलता रहा और जब दूषित रक्त शरीर से निकल गया तव
शाह ज़ादी सचेत होगयी।
सचेत होतेही शाहजादीने जैसेही आँख खोली अपने सामने
दो-अपरिचित मनुष्योंको खड़े देखकर लज्जा और आश्चर्यमें
(७५२) सुलतानबोध । आकर चूंघट तानने लगी। तबतो अपने शरीर पर कफन देख कर भय और आश्चर्य में आयी। फिर जब इधर उधर दृष्टि डालकर घरकी दशाको देखने लगी तब तो आश्चर्य, भय लज्जा और व्याकुलता तथाशाही रोबह सबही उसके सन्मुख, आकर खड़े होगये । एकदो क्षण तक तो पत्थरकी मूर्तिके समान चुप बैठी रही फिर चकित दृष्टि से सन्मुखके खडे आद- मियोंसे शील और लज्जा पूर्ण वाणीसे इस प्रकार बात चीत करने लगी। शर्मसे सरको किया फरो । पूछा उसने तुम बताओ कौनहौ ? ॥ मैं कहाँ हूँ और है यह किसका मकाँ । घरसे मुझको कौनलायाहै यहाँ ॥ है कहाँ वह ताज व तखते.जरनिगार । जामें लालो कूजेहाए आबदार ॥ खानए जरवक्तपोश अपना कहाँ । मखमलोदीबारकाफर्शअपना कहाँ। शाहजादीने कहा कि मेरे राजमहलसे उठाकर क्यों और किस प्रकारसे मुझे यहा जङ्गलमें कफन पहिना कर किसने बैठाया है! इसका वृतान्त मुझसे कहो।शाहजादीकी बातोंको सुनकर हकीम और ब्यापारीने उत्तर दिया कि, हम लोगोंको इन बातों की कोई भी खबर नहीं है कि, तुम कौनहौ ? तुम्हारा घर कहाँ है ? और यह घर किसकाहै ? तुम्हे कफन किसने पहिनाया है ? और यहां लाकर किसने बैठायाहै ? हमारा कारवाँ अँधेरेके कारण मार्ग भूलकर इसओर आ निकाला था। हमारे साथ का एक आदमी आगको ढूँढ़ता ढूँढ़ता यहाँ आया और तुम्हें , बोधसागर। मृतकके समान किन्तु बैठी हुयी देखकर उसने डर कर पीछे पाँव जाकर हमको समाचार दिया। जिससे आश्चर्य में आकर कौतूहल वश हम यहाँ तुम्हें देखनेको आये। यहाँ आकर हमारे हकीम साहिबने तुम्हें देखकर कहा कि तुम मरी नहीं हो किन्तु सकतेकी बीमारीमै अचेत होगयीहो। फिर उन्होंने तुम्हारी दवा करके अच्छा किया है जिससे अब तुम बात चीत करने को समर्थ हुयी हो।इतना कह कर ब्यापारीने कहा इसके अति- रिक्त और हम कुछ नहीं जानते अब तुम अपना वृतान्त सच्चा सच्चा हमसे बर्णन करो कि तुम कौन हौं ? तुम्हारे माता पिता का नाम ग्राम क्याहै ? औ तुम्हारे ऊपर क्या २ बीतीहै ॥ १॥ कर व्याँ किस गुल्सितां का गुलहै तू। पायीह किस बोस्ताँ में रंग व बू । इधर तो यह बातें होरही थीं उधर तहखानेमें बैठे हुए अद्धम शाह कबरके पहरेदारोंके भ्रमसे भयके मारे डरते हुए बडी सा- वधानी से कान लगाकर बाहरकी बातें सुन रहेथे । जब उन्होंने शाहजादीको बात करते सुन लिया तब उनकी और ही दशा होगई। अब बाहर निकलकर शाहजादीके पास जानेको बार बार वह साहस करने लगे।फिर तोगारके द्वारसे उन्होंने मुहँ नि- काल कर दोनों आदमियोंको बडे ध्यानसे देखकर जब निश्चय- करलिया कि वे कबरके पहरेदार नहींहैं तब एकदम बाहर निकल आये। बाहर निकलकर उन्होंने कुटीके बाहर अन्धेरेमें खडा होकर शाहजादी और व्यापारीकी बात चीत सुनने लगे। और जब उन आदमियोंके रूप रंग और शारीरक लक्षणों से यह बात निश्चय होगई कि, वे नतो जासूसहैं न कोई बुरे आदमी, तब आनन्दके समुद्र में गोते खाते हुए एकदम कुटीके भीतर ४८ , ( ७५४ ) सुलतानबोध । ५० जाकर खड़े होगये और उपरोक्त दोनों नवागत पुरुषोंको देश कालके आचारके अनुसार नमस्कार आदि करके शाहजादीकी ओर देखते हुए खड़े होगये । इनको वहाँ आता देखकर उनके वेष और स्वरूप परसे उन लोगोंने निश्चय किया कि, इस पर्णकुटीका स्वामी यहाँहै। ऐसा निश्चय करतेही वहां और शाहजादीके पूर्ण वतान्त जानने की पूरी इच्छा व आशा उनके हृदयमें निश्चय होगयी।उनलोगोंन अनुमानसे यहभी निश्चय कर लिया कि, हो नहो यह इस स्त्रीके उपर आशिक है जिससे प्रेममें पागल होकर इसके मृतक- कहोंसे यहां उठालायाहै अब क्षणरमें उनकी उत्कण्ठा वढनेलगी जिससे अधिक समय तक न ठहरकर व्यापारी और हकीमने अद्धमशाहसे पछा कि, ऐ बन्दः खुदा सचा कहना तू कौन है ? और यह अनूपम शोभामयी सुन्दरी कौन है ? तू इसे यहां कहांसे और किस प्रकारसे लायाहै ? सब वृतान्त सत्यरकहदे। उनकी बातको सुनकर अद्धमशाहने आदिसे अन्त तक शाह- जादीपर आशिक होना, वज़ीरका मोती मांगना, दोवर्षतक संसार में भटककर मोती लाना, फिर वजीरकी प्रतिज्ञाभंगक- रके उन्हे मारकर फेकवा देना, चेत आनेपर शाहजादीकी मृ- त्युका समाचार पाकर कबरस्थानमें जाकर पहरे बालोंकी आंख बचाकर कब्र खोदकर लाश बाहर निकालकर लाना आदि सब वृतान्त कह सुनाया। अद्धमशाहके आश्चर्य- मय वृतान्तको सुनकर उन दोनोंके सहित शाहजादी भी चकित होगयी। अपने लिये अद्धमशाहके महानकष्ट उठानेकी बात और उसके सच्चे प्रेमके वृत्तान्तको सुनकर शाहजादीभी मनही मन उनपर आशिक होगयी। , .
बोधसागर ।
(७५५)
इश्कने अद्धमके वह तासीकी ।
वह परीरू उस पै आशिकहो गयी।
देखकर एहवाल अद्धमका तबाह ।
चश्म नम गमसे हुई वह रश्केमाह ॥
गुज़री जोजो उसपै थी तकलीफ ओ दर्द ॥
सुनके दुखतर होगयी दहशतशेजर्द ॥
देखकर अद्धमको यों पजमुर्दे हाल ।
आया दिलमें उसपरीरूके ख्याल ।
मेरी खातिर इसने यह रंजो बला।
लेके सरपर कर दिया जीको फिदा ।
खीचकर क्या २ अजीत औ बला।
मिहनतो तकलीफो जे लादवा ॥
बादमरनेकेभी यह आशुफतः हाल ।
लाश मेरी कबसे लाया निकाल ॥
इसके बायस फिर खुदानेदी हयात
जीस्तका मेरी सबबहै इसकी जात ॥
गर न होता मुझपे आशिक यह जवां।
कबमेंसे क्यों यह फिर लाता यहाँ ।
रुकके दम यकदममें मैं होती फना॥
जिस्म होता तमए मूरो मारका ॥
थी यह इस दुर्वेशकी तासीरइश्क ।
मुर्दा जिन्दाहो है यहतदबीरइश्क ।
जीस्तदुनियाकीहै वसख्वाबोख्याल।
इस जहाँकी इश्क पर तू खाक डाल॥
तालिबेदुनिया नहो अब जीनहार।
सुलतानबोध ।
दिलसे करतूभी.फ़कीरीअखतियार ।।
हैयहजबतक यहजिन्दगीमुस्तआर ।
करइसे मसरूफ यादे किर्दगार
लज्जते दुनियाय, से दरगुजर ।
यादहकमें वांध चुस्त अपनी कमर
दमजो बाकी है न इनको यों गँवा ।
सीख इस वंश से राहेखुदा ॥
जीतेजी तू आपको मुर्दाबना।
खाकमें इसजिस्म खाकीको मिला।
करइसी दुर्वेशसे अपना निकाह ।
दोनों आलममें होता तुझको फलाह॥
शाहजादी मनहीमन अद्धमशाहके साथ रहकर अपना जीवन
व्यतीत करने का प्रण कर रहीथी इतनमें व्यापारीने अदमशाह
और शाहजादी दोनोंको सम्बोधन करके कहा कि, तुम दोनों
के वृतान्त ज्ञात हुए। तुम दोनोंकी दशा ऐसीहै कि, परमात्माने
दोनोंको परस्पर एक दूसरेके प्राण रक्षा का कारण बना दियाहै,
अब तुमलोग यह कहो की, तुम्हारी इछा क्याहै! अब तुमलोग
क्या करना चाहते हो! । यदि तुम्हे हमारे साथ चलना हो तो
संध्याको अपना कारवाँ यहांसे जानेवालाहै हमारे साथ चले
चलो तुम्हे किसीप्रकारसे दुख न होगा। हम अपनी शक्ति
अनुसार तुम्हारी सेवासे कदापि नहीं चूकेंगे। यदिहमारे साथ
चलना स्वीकार न हो तो जो तुम्हारी इच्छा हो सो प्रकटकरो।
सौदागरकी बातको सुनकर परम कृतज्ञता प्रकट करते हुए
अद्धमशाहने कहा कि, यदि मेरा रोम२ जिह्वा बनजावे तबभी
तुम्हारी भलाईका पुरस्कार मुझसे नहीं दिया जा सकता। तुम्हारी
५३ बोधमागर । ( ७५७) ही कृपासे शाहजादी फिर जीवित होकर मेरे जीवनका कारण बनी है । तुम्हारे इस पुण्यका फल परमात्मा तुम्हे देगा किन्तु जबतक मेरे शरीर में प्राणहें नवतक मैं तुम्हाग कृतज्ञ रहूंगा। अब मुझे सिवाय शाहजादीसे विवाह करनेके किमी प्रकारकी और इच्छा नहींहै । यदि यह स्वीकार करले तो धर्मानुसार तुम दोनों अपने मन्मुम्ब साक्षी बनकर हम दोनोंका सम्बन्ध जोड़दो। अदमशाहकीवातको सुनकर व्यापारीने शाहजादीको कहा कि हे शाहजादी ! यदि अद्धमशाह न होता तो तू कबकी कबमें मरकर संसारसे चलवसी होती। इसके अतिरिक्त उसने तेरेलिये कैसे २कष्ट उठाये हैं अब उचित है कि,तृभी उसे स्वीकार करले। इसप्रकारसे अनेक वातोंके समझानेपर शाहजादीने उत्तर दिया कि, आप लोगोंकी में बहुत कृतज्ञ हूँ आप लोगोंकी आज्ञा कदापि उलंघन नहीं कर सकती किन्तु अद्धमशाह इस वातका प्रण करे कि, वह कभी मुझसे अलग न होगा और न कभी मेग आज्ञासे बाहर जायगा तबमैं इसको स्वीकार करूंगी और मेरे विवाह का यही मुहेर होगा। शाहजादीकी बातको सुनकर अधमशाह आनन्दके मारे उछल पड़े और शपथ पूर्वक शाहजादीके कहे अनुसार प्रतिज्ञा करके शाहजादीके उत्तरकी प्रतीक्षा करने लगे। फिर शाह- जादीने व्यापारी और हकीमसे कहा कि शरअ ( मुसलमानी- १ मुसलमानी धर्मानुसार विवाह करने के समय वरकी ओरसे कन्याके लिये मुहर की रीति पूरी की जातिहै। जिसमें वर अपनी प्रतिज्ञाके लाथ २ नियतरुपया या अश- रफी का दस्तोवज अपनी स्त्रीकेनामसे लिखदेताहै कि, वह आजसे उसके इतने रुपये का ऋणी हुआ प्रथम तो कमी वह उसे रुवीको छोडहीगा नहीं यहि किम्ती कारण वश उसे छोडना चाहे तो अमुक रकम देकर केही छटकार पासकेगा जब तक वह ऋण उसका न चुकादे तब तक वह उसको कदापि नहीं छोड़ सकता इसी का नाम मुहर है शाहजादीने अपना मुहर यही मांगा कि जावजीवन अद्धमशाहछोडकरकहीं न जोवा 0 (७५८) मुलतानबोध । धर्मशास्त्र) के अनुसार विवाहके लिये दो साक्षीकी आवश्यक ताहै सो तुम दोनों हमारे विवाहके साक्षी होजाओ जिसमें लोक परलोकमें हम पापके भागी न होवें तब मैं विवाहको स्वीकार करूँगी। उन दोनोंने शाहजादीके बचनको मानकर साक्षी बनना स्वीकार किया और दोनोंकी गाठ जोड़ (पाणि ग्रहण) करा दिया। पश्चात् वे दोनों तो अपने कारवांनमें चले गये और अद्धमशाह शाहजादीको पाकर परम आनन्दितहो अपनी पर्णकुटीमें बास करने लगे। दोनोंमें परस्पर ऐसा प्रेम हुआ कि, कोई किसीक वियोग को क्षणमात्र के लिये भी सह नहीं सकता था।जङ्गलके फल फूल पत्ते और कन्द मूलपर वे अपना दिन विताते और स्वर्गसेभी बढ़के आनन्दको मनाते थे। कुछ दिनोंके पश्चात् शाहजादी गर्भवती हुयी और समय पूरा होनेपर परम सुन्दर पुत्रको प्रसव किया।उसी पुत्रका नाम अद्धम शाहने इब्राहीम रक्खा । किताबोंमें लिखाहै कि, अद्धमशाहके संगके प्रतापसे शाहजादी भी सर्व शुभ गुणोंसे सम्पन्न महान तपस्वीनी और भजनानन्दी होगयी थी। जिस समय उसे गर्भ स्थित हुआ था उस समय समस्त बन नाना प्रकारके फल फूल और मेवोंसे सम्पन्न होगया था। सदा बसन्त ऋतुकाही आनन्द वहाँ दीखने लग गया था। नाना प्रकारके पशु पक्षियों ने आकर वहाँ बास किया था। जिससे वह बन कानन बन- बन कर स्वर्गके समान सुखदाई हो रहा था। इब्राहीमके जन्म लेनेपर उनकी आकृति सम्पूर्ण रूपसे हजरत इब्राहीम खली लुल्लाहसे मिलती थी इसी कारणसे उनका भी नाम इब्राहीम रक्खा । जिस समय शाह इब्राहीम का जन्म हुआ वह एक सो एकसठ ( १६१) हिजरी थी।
बोधमागर। (७५२) माता पितान बड़े प्रेमसे इब्राहीमको पालना आरम्भ किया दो वर्षके पश्चात् उनको अन्न प्रासन कराया। दोबरसपूरेकाजबवहहोगया।औरगिज़ाफिलजुमलेबहखानेलगा। गैंबसेआनेलगेनादिरतआमाकुदरते एजिदसेउसकाविलदवाम।। उसकीबर्कतसेलगअशजारपराअच्छी अच्छीवज़अकेशी समर कुदरतेहकसेहुआवहदश्तोबर । गुलशनोगुलजारपरभीफ़ौकतर। आखिरकार देखते देखते बालक इब्राहीम सात बरसके होगये। अब अद्धमशाहको इस बातकी चिन्ता हुई कि बालक को विद्या अभ्यास कराना चाहिये सबसे पहले जैसा मुसल- मानोंमें रीतिहै बालकको कुरान पढ़ाना आरम्भ किया । जब कुछ दिनों तक घरमेंही पढ़ाकर देख लिया तब एक दिन वालक को गोदमें लेकर अद्धमशाह शहरमें गये वहाँ ढूँढ़ते ढूँढ़ते एक सज्जन मोलवी साहेब मिले जिनके यहाँ इब्राहीमके पढ्नेको ठीक करके उनसे कहदिया कि, सबेरे मैं इब्राहीमको यहाँ रख जाया करूँगा और शामको आकर लेजाया करूँगा। अलगरज हर सुबह वह मर्दैनेको । लाता उस मुकतबमें इब्राहीमको । उलफते कलवीसे अपने बिलदवाम । फिर उन्हें लेनेको आता वक्त शाम ॥ था यही हररोज अद्धमका शआर। आते जाते शहरमें बिलइजतरार ॥ थी जेबस शफकत उन्हें बेइन्तहा तनहा आना जाना दिलपर शाकथा । ( इब्राहीम अद्धमका बादशाह बनना ॥) जबसे बलखके बादशाहकी इकलौती बेटीका उससे वियोग हुआ तबसे बादशाह बहुत उदास और दुखी रहने लगा।
(७६०)
सुलतानबोध ।
उसका चित्त संसारसे उदास हुआ वह सदा दुर्वेश फकीर और
ईश्वरके भक्तोंके संगमें रहने लगा। जहाँ किसी महात्माका
समाचार पाता वहीं उनके दर्शनको चला जाता और अपनी
शान्तिके लिये उनसे प्रार्थना करता। दूसरी आदत उसकी
सदासे यह थी कि, जब कभी वह शहरमें निकलता तब मदरसे
और मुकतबोंमें जाकर लड़कोंका पढ़ना सुनता और उन्हें
मिठाई वगैरह देकर खुश करता और शिक्षकों को भी इनाम
देकर लड़कों को छुट्टी दिलाता।इसके अतिरिक्त एक संतने भी
उसे कहा था कि,मुकतबके लड़कों को खुश रखनेसे तेरी मुराद
कभी न कभी पूरी होजायगी।सो एक दिन बादशाहकी सवारी
संयोगसे उसी मुकतबके पाससे निकली जिसमें इब्राहीम
अदम पड़ते थे। जिस समय बादशाकी सवारीमुकतबके पास
पहुँची उस समय बादशाहके कानमें बहुत मीठा और रीतिके
अनुसार कुरान पढ़ते हुए किसी बच्चेका शब्द सुनपड़ा। बाद
शाहने एकदम सवारी रोकली और कुछ देरतक बहाँ ही खड़ा
खड़ा सुनता रहा। फिरतो उस शब्द पर इतना मोहित हुआ
कि, सवारीसे उतरकर मुकतबमें पहुंचा।
गुज़राउसमुकतबकेआगेनागहाँ । मसहफइब्राहीमपढ़ताथाजहाँ।।
बादशाहनेजवसुनीउसकीसदा । दिलपैउसकेकुछअसरपैदा हुआ
करकेउसजाअपनेघोड़ेकोखड़ा। पढ़नाइब्राहीमका सुनतारहा।
मुखरिजे इलफाज उसके मदवशद ।
सुनके अशअशकर गया हर जीखरद ।।
था हमेशासे तरीका शाहका ।
जिसजगह मुकतब सरेरह देखता ॥
सुनता पढना जाके हरेक तिफ्लका।
करता फिर इनआम हरयकको अता॥
५७
बोधसागर ।
(७६१)
आता पढना जिसका खातिर में प्रसन्द ।
उसको देता नकद औरों से दो चन्द ॥
देके जर उस्ताद को शाहे निको ।
छुट्टी दिलवाता था फिर हर तिफलको ॥
अपने सदा की आदतके अनुसार बादशाहने मुकतबके हर
एक लड़के का पढ़ना सुना और सबको इनाम भी दिया।
परन्तु जब इवाइमि की वारी आयी तब उस छोटेसे बच्चे का
शुद्ध शुद्ध पढना, उसकी अदब के साथ बात चीत और उसके
रंग रूप को देख कर बादशाह एकदम आश्चर्य सागर में गोता
खाने लगा। उसके हृदयमें उस बच्चे का इतना प्रेम प्रवाह
उमड़ चला कि वह हैरतमें पड़ गया। आखिर अपने प्रेम
प्रवाह को रोक नहीं सका एक दम इब्राहीम को गोदमें उठाकर
प्यार करने लगा। यद्यपि वादशाही गेव दाब से यह बात
कदापि मुमकिन नहीं थी तथापि अन्तर्गत हृदयमें किसी अन
जानी शक्तिने ऐसा काम किया कि वादशाह अपना पद एक
दम भूल गया और इब्राहीम को उठाकर गले लगा लिया।
इब्राहीम के हृदय में भी खून ने जोश माग वहभी बादशाह के
हृदयसे चिपटगया। अब बादशाहके हृदय पर और भी बड़ा
भारी प्रभाव पड़ा।
जुज्वकोहै जुज्वसे पैवस्तगी।
खून को है खून से दिलवस्तगी।
दाब शाही से यह विलकुल दूर था।
लैकवह इस अमरमें मजबूर था।
दिलको अपने जब गो उसने किया।
जोश उलफत पर न उससे रुकसका।
सुलतानबोध । (७६२) जुज्वकोहै गर्ने जायद इजतरार । कलको भी बेजुज्वके कबहोकरार ॥ गो नहीं जाहिर का पैगामों सलाम । जुज्व कलमेंहै मगर पिनहाँ कलाम।। दिलको हरेकके खलिशहै जो यहाँ । है अनासिरकी कशिश यह ऐ जवाँ ।। जज्व अपने जुज्वको करतेहैं कल । उस कशिशकाहै बदनमें शोरोगल ॥ हरबशरको है जोदिलमें इजतराब । खींचतीहै उसको पिनहानी तनाब ॥ रिश्तए उलफतसे रहताहैबंधा। जुज्व अपने कुलके साथ ऐ बाखुदा॥ जुज्व तनकोहै जो कुलके साथरब्त । है कशिशसे उसकीतेरी अवखब्त ।। अपनी गुफलतसे तुझे है यह गुमाँ । मुझको जोफे कलब और मादा है अयाँ । बादशाह दिल भरके इब्राहीमको प्यार करलेने पर जैसे ही गौर से उसकी ओर देखने लगा वैसेही उसे अपनी लडकी की याद आयी। लड़की की याद आतेही उसकी सूरत बाद- शाह के सामने आखड़ी हुई । अब बादशाह देखताहै तो इब्रा- हीमकी और उसकी लड़की की शकल में बाल बराबर भी भेद नहीं है। कहते हैं कि, उस समय बादशाह इतना रोया कि, उसका चेहरा लाल होगया और आगे के कपड़े आंसू से भींग गये। फिर जब मन कुछ ठहरा तब बादशाहने मुल्लाजीसे पूछा कि, यह लड़का कहां रहता है ? इशका बाप कौन है ? यह बोधसागर । (७६३) यहां कितने दिनोंसे पढने आया है ? मुल्लाजीन बादशाहके प्रश्नोंका यथा योग्य उत्तर दे दिया। दस्त बस्तः यों मुअलिमने कहा। बाप इसका हैं फकीरे बेनवा।। रहताहैसहरामें आबादीसेदूर । अहल दुनियासेनिहायतहैनफर॥ अद्धम उसका है लकबऐनेकपै । इसपेसरका नाम इब्राहीम है। एक बरस गुजराकिपढ़नेकोयहां । आताहैयहतिफ्लऐशाहजहाँ। सुबहको लाताहै बाप इसका यहां शाम को लेजाताहैआकरवहाँ है जेबस दुर्वेश वह साफी निहाद । है मुझे हबसे ज्यादा एतकाद।। जसतनअल्लाहइसेबहरेसबाबायादकरवाताहूं रब्बानी किताब। मुल्लाजीकी जबानी अद्धम शाहका नाम सुनतेही बादशाह चौक उठा। उसे पहलेकी सब बातें:-अद्धमशाहका शाहजादी पर आशिक होना, उसका मोती लाना, वजीरका उसे धक्का देकर निकाल देना, उसका छातीपर मुक्का मारना और शाह जादीका मरजाना इत्यादि-याद आगयीं। तब बादशाहने अपने मनमें अनुमान किया कि,हो न हो इसमें जरूर कोई छिपा हुआ भेद है।नहीं तो इस बालकके उपर मेग इतना प्रेम क्यों होता ? दूसरे इसका रूप मेरी बेटीसे पूरा पूरा मिल रहाहै । सोइसमें अवश्य कुछ भेद छिपा हुआहै । इसलिये इस बालकको अपने महलमें लेचलकर बादशाह बेगमको दिखलावें जिसमें उसके हृदयमें कुछ संतोपहो । इतना सोचकर वादशाह इब्राहीमको गोदमें लिये हुए उठ खड़ा हुआ और मुल्लाजीसे कहा कि, जब इस लड़के का वाप आवै तब उसे मेरेपास भेज देना वहीं से वह अपना लड़का लेजायगा । फिर मुल्लाजीको बहुत कुछ इनआम देकर रवाना होगया। महलमें पहुंचकर बादशाहाने बेगमको बुलाकर इब्राहीको उस- ,
(७६४)
सुलतानबोध ।
६०
की गोदमें रखदिया।बेगमने जैसेही इब्राहीमको गौर करके देखा
वैसेही लड़कीकी शकल देखकर एकदम बेहोश होकर गिरपड़ी।
फिरतो महलमें धूम मचगयी। बेगमको होशमें लानेके सैकड़ो
उपाय कियेगये। जब वह होशमें आयी तब इब्राहीमको गो-
दमें लेकर बार बार बलाएँ लेने और नाना प्रकार के संकल्प
विकल्प मनमें करने लगी।
गोदमें फिर उसकोलेकरनागहाँसिांस ठंढीभरके करती थीव्याँ।
ऐ मेरे लखते जिगरके हम शबीह । ऐ मेरे नूरे बसरके हम शबीह ॥
ऐ मेरे रशके कमरकेहमसिफताऐ मेरे गुल बर्गतरके हम सिफत॥
ऐ मेरे उस गुल बदनके हाजनांऐ मेरे शीरी दहनके हम निशाँ।।
ऐ मेरे उस लावुते चोंके करीं। ऐ मेरे आहुए मिराकोंके करी ॥
ऐ मेरेताबिन्दः अखतरकीशबीहाऐ मेरे मेहरे मनौवरकी शबीह ॥
ऐमेरे नादीदः दुनियाँके मिसालाऐमेरे फरजन्द जेबाके मिसाल।
ऐ मेरे यूसुककहमतोंतराश। ऐ मेरेलैलाकेहम वजअवकमाश!।
ऐ मेरे जाने जहांके हमअनाँ । ऐ मेरे गुचः देहाँके हमअनाँ ॥
ऐ मेरे उस मूकभरके हम कमर।ऐ मेरे याकूत लबके हम गोहर।
देताहै हर जुज्य तेरा वे गुमाँ ।
युसुफे गुम गश्तः मेरे का निशाँ ।
है जो हर हर जुज्य तेरा विलएकी।
यादगार लैलीय महमल नशी॥
इस प्रकार अनेक तरहसे बेटीका स्मरण करलेनेके पश्चात
बेगम ने इब्राहिम से पूछा कि, तेरीमां और बापका नाम क्या
है ? इब्राहमिने बापका नाम अद्धम शाह और मां का नाम वही
बतलाया जो बादशाह की लड़की का नाम था।
शाहकी दुखतरका जो कुछ नामथा।वहीबाहीम ने मांका लिया।
६१
बोधसागर ।
(७६५)
और बतायानामअद्धम बापका।दश्त अपनाकहीरहनेकीजा ॥
अद्धम शाहके नाम को बलख निवासी स्त्री पुरुष वच्चे
से बूढे तक सभी जानतेथे क्यों कि वह शाहजादी पर आशिक
था। और शाहजादी का मरजानाभी अद्धम शाहकेही शापका
फल लागान मान रखाथा । यही कारण है कि,अद्धमशाहको
सब लोग महात्मा सिद्ध समझते थे। इब्राहीमके मुखसे बादशा
हजादी और अद्धम दोनाको नाम सुनकर लोगोंको बड़ा आश्चर्य
हुआ। बादशाह और बेगमके अन्तःकरणमें न जाने कितनी
कल्पनाएँ आतीथीं और कितनी आशा और निराशा उनके
चारों ओर फिररहीथी। आखिर बादशाह बेगमने अपने हाथसे
इब्राहीमको स्नान कराकर अच्छे २ कपडे पहनाया और उत्तम
उत्तम पदार्थ उसे खानेको दिया। फिर बादशाह इब्राहीमको
बेगमके पास छोड़कर अपने खानगी स्थान में जा बैठा और
इस भेद पर विचार करनेलगा। अन्तमें बादशाहने निश्चय
किया कि,अहमशाहसे इसका वृतान्त पछना चाहिये वह संसार
त्यागी फकीर है वह कदापि झूठ नहीं बोलेगा।
बादशाहके दिलमें आया यों ख्याल ।
पूछिये अद्धमसे उस दुखतर का हाल॥
फर्कउसकीरास्तगोयीमें नहीं।जो कहेगा वह सच्चहै विल यकीं।
मर्द हक है पाय वन्द रास्ती । झुठ हर्गिज न बोलेगा कभी॥
इतना विचार कर बादशाह ने दरवान को बुलाकर हुक्म
दिया कि, अगर कोई लड़का लेने आवे तो उसे द्वार पर मत
रोकना बलाकै उसे सीधा मेर पास पहुंचाना।उसको प्रतिष्टापूर्वक
ले आनाःखबरदारउसके मन में किसी प्रकारसे चुरानलगने पावे।
इतना हुक्म देकर बाहशाह अदमशाहकी इन्तजारी करने लगा।
सुलतानबोध ।
(७६६)
उधर अपने नियत समय पर जब अद्धमशाह इब्राहीमको लेनेके
लिये मुकतबमें आया तब उसे मालूम हुआकि, इब्राहीम को
बादशाह अपने महल में ले गयाहै और कहगयाहै कि अद्धमशाह
वहाँही से उसको लेजावे । उसे किसीप्रकार डरना नहीं चाहिये
जिस समय वह आयेगा उसी समय अपना लड़का लेजायगा।
यह सुनतेही अद्धमशाहनेबेकरारहोकर सीधे बादशाहकी ड्योढ़ी
पर जा खड़ा हुआ और दरवानसे कहाकि, बादशाहसे जाकर
कहदेकि, इब्राहमिका बाप उसे घरलेजाने आयाहै । जल्दी उसे
बाहर भेजदो।
जैसैही अद्धमशाहके आनेकीखबर बादशाहको पहुंची वैसेही
बादशाहनेउसे अन्दर अपने पास बुलालिया और बडी प्रतिष्ठा
के साथ उच्चासन पर बैठाकर ईश्वरका शपथ देकर उनसे पूछाकि
सचबतातुझकोसौगन्देखुदा । नामहैइसतिफ्लकीमादरकाक्या॥
हैवहकिसकीदुरवतरेआलीगोहर । रास्तकहदेकौनहैउसकापदर।
बादशाहकी बातको सुनकर अदम शाहने कहा “ऐ बादशाह
वहवही तुम्हारी लडकी है जिसपर मैं आशिक हुआथा" ।
सुनकरअद्धमनेकहाएबादशाह । हैवहदुखतरआपकीबेइश्तबाह ॥
मादरइसकीहैवहीरशकेकमर । जिसपैमआशिकहुआथादेखकर॥
नामभीउसकादियाउसकोबतादुखतरेसुलतानकाजोकुछनामथा
अद्धमकी बातको सुनकर बादशाहके आश्चर्यका पारावार नहीं
रहा उसने आश्चर्य मुद्रासे अद्धमशाहसे कहा कि मेरी बेटी को
मरे हुए तो मुद्दत होगयी । उसको हम लोगोंने कबमें गाइदिया
उसकी तो हड्डी तक गलगयी होगी।वह अब तुम्हारे घरमें कहांसे
आगयी? क्या कोई आजतक मरकरके भी जियाहै?
बादशाहकी बातको सुनकर अद्धमशाहने शाहजादी के जीने
और विवाहहोने आदिका सबवृतान्त कह सुनाया।
।
६३
बोधसागर ।
( ७६७)
जबकहाअद्धमने आलमपनाह मुबतलासकतेमेंथीवहरश्कमाह
खल्कउसदुखतरकोमुर्दाजानकर।कनमेंचुपरखकेआयीअपनघर।
कबमेंउसकोकियाथादफनजबाएकपहरभरसेसिवागुजरीथीतब॥
मिट्टीजोडालीथीउससन्दूकपर।जिसकेअन्दरथीवहमाहेसीमवर
कुदते हकसे हवाका रास्ता। रहगयाथा कबके अन्दर खुला ॥
था जिलाना बसाक मञ्जरे खुदा । इस सबब से कत्रमें रखना रहा
मुझको जज्वे इश्कमें आयी तरंग । कपर उसके गया मैंबेदरंग॥
पासबाने कब सोते देखकर । लाश दुखतर को किया मैंनेबदम्।।
लाशको मैंने निकालाकबसे । फिरकिया हमवार मिट्टी डालके ।
मैं वलेमुहीउसकोजानकर । रखके उसकीलाशकोबालायसर।।
जल्दतरउस दश्तोबरमें लेगया।थी जहां ऐ शह मेरीरहनेकीजा।।
करकेरौशन आग में बैठा वहां। बा हजारौ दर्द व अन्दोहोफिगाँ।।
देखताथा हुस्नकी उसके बहाराऔर रोताथा निहायत जारजार॥
कुदरते हकसे हुआ बारिद वहां ऐन उस हालतके अन्दर कारवाँ।।
देखकर आतशकोरौशनएकजवां।आगलेने के लिये आया वहाँ।।
पास वाने कब उसको जानकर ।
फर्त दहशतसे हुआ दिलमें मुनतशिर ॥
दश्तमें मुर्दे को तनहा देखकर।होगया दहशतसेलरजाँ वह बशर॥
कारवाँमें जाके दी उसने खबर। उसमें था मर्द तबीबे पुर हुनर॥
साथ लेकर उसको मारे कारवां ।
सुनतेही उस बातके आया वहां ॥
देखकर दुखतरको उसने योंकहा। हैयहसकतेकेमर्ज़में मुबतला॥
कहके विसमिल्लाह नशतर को लिया।
उससे की झट पट रगे कैफान वा ॥
जबकिनिकलाउसकेतनमेंसेलहाहोगयीहुशियारवहफख़ुन्दःखू॥
(७६८) सुलतानबोध । करदियाआंखोकोउसनेअपनेवा।पूछाउनदोनोंसेक्याहैमाजरा ॥ कौन हौ तुम और यह किसका है मकां । घर से मुझको कौन लाया है यहाँ ॥ मैं भी आखिर सुनके उनका मकाल। अन्दर आया करने को दरियाफ्त हाल।। देखकर जिन्दा मैं उसको ऐ शहा । लाया सिजदए शुक्र यजदांका बजा॥ पूछा मुझसे फिर उन्होंने माजरा। मिन व अन एहवाल मैने कह दिया। मेरा औरदुखतरका एजाबो कबूल होगया पेशे गवा हानेअदूल।। फिर हुआजोलुफइनआखुदा। पैदा इब्राहीमयह उससेहुआ। माजराहै यह बेला कम और कास्त। जो कहा मैंने यहहै सब रास्त रास्त॥ अद्धमशाहके द्वारा अपनी बेटीका सब वृतान्त सुनकर बादशाह मारे खुशीके उछलपड़ा। वह उसी समय उठकर मह- लमें गया और बादशाह बेगमसे सब बृतान्त कह सुनाया। बेगमने बेटीके मिलने की खुशीमें दान पुण्य खैरात करना आरम्भकरदिया। उधर बादशाह ने शाहजादीके बचपनकी सखी सहेलियों और उसको दूधपिलानेवाली बुढियों को पा- लकी पर सवार करा करा कर शाहजादीकी जांच करनेको भेज दिया। तब तक आप अद्धमशाह को बातोंमें फंसा रखा। थोडीदेरमें जांच करने बालियों ने आकर बादशाहसे कहा कि, सच मुच वही शाहजादी है। फिर तोबादशाहने बेगमको साथ लेकर उसी समय बेटी से मिलने के लिये जंगलमें जाने की तैयारी की। आगे आगे बेगमोंके मुहाफे और पीछे सब बोधसगर । (७६९) दरवारियों सहित बादशाहकी सवारी खाना हुई । जब अहम- शाहकी कुटीके निकट सवारी पहुँची तब बादशाह नीचे उतर पड़ा और बेगम को साथ लेकर पाय प्यादे झोपड़ी की ओर चला। बादशाहने देखा कि, एक टूटी फूटी झोपड़ीमें सैकड़ों जगह से फटे हुए कपड़े पहनी हुई घास की टूटी चटाईपर बैठी हुई शाहजादी निमाज पढ़ रहीहै । जब वह निमाज पढ़चुकी तब लौडियों ने हाथ जोड़कर कहा कि, आपके पिता और माता आपसे मिलने को आये हैं । दासीकी बात सुनतेही शाहजादी दौड़कर माता पिताके पग पर गिरपड़ी। फिर दोनों ने उसे उठाकर गले लगाया और शकुन के आंसू बहाकर उसे शाही महल में अपने साथ ले जाने की इच्छा प्रकट की। शाहजादी ने कहा आपकी आज्ञा मेरे शिर पर है किन्तु पतिकी आज्ञा विना मैं यहां से एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकती । बादशाहने अद्धमशाह से आज्ञा दिलादी । फिरतो उसके वह फकीरी वेष को उतार कर शाहाना कपड़ों से उसे सजाया और बेगम ने अपनी पालकीमें साथही बैठाया। वैसेही अद्धमशाह और बादशाह एकही सवारीमें बैठ कर शाहीमहल को खाना हुए। बादशाहने महलमें पहुँच कर उत्सव करने की आज्ञा दी राह हकमें माल व जर विलकुल दिया। इस कदर खैरात की बेइन्तहा ।। इस प्रकार खूब धूम धामके साथ आनन्द मनाया गया ! चौथे दिन अद्धम शाहने बादशाहसे कहाकि, फकीरों का एकान्तमें रहनाही अच्छा है इसलिये मुझे तो जंगलमें ही जाने दीजिये । अगर आप चाहें तो मेरी स्त्री और मेरा लड़का आपकी सेवामें रहेगा। बादशाह ने बहुत प्रकार से समझा
(७७०)
सुलतानबोध ।
कर अद्धमशाह को अपने पास रखना चाहा किन्तु उन्होंने
एकभी नहीं माना आखिर मजबूरीसे बादशाहने उन्हें
विदा किया। अद्भमशाह अपनी उसी कुटीमें जाकर रहने लगे
जब उनकां जी चाहता तब आकर अपने लडके और स्त्री को
देख जाते । कहते हैं कि, जबतक जीते रहे तबतक उनकी यही
रीति रही।
बादशाहने अपने घर लाकर इब्राहीमको पढ़ाने के लिये
अच्छे अच्छे शिक्षक सबप्रकार की विद्या और गुणसे पूर्ण देश
देशसे वुलाकर रखा। "होनहार विरवान के होत चीकने पात"
के अनुसार इब्राहिमकी बुद्धि ऐसी तीबथी कि शिक्षकलोग यदि
एक बात बतलाते तो इब्राहीम उससे दश अधिक निकालते
इसप्रकारसे सद्गुरू की कृपा द्वारा इब्राहीमने थोडेही वर्षों में
अनेक विद्या और कला कौशल तथा राजनीतिमें योग्यता प्राप्त
करली। समय पाकर बादशाहने इब्राहीमको राज्य सिहांसन पर
बॅठाकर बलख का बादशाह बनादिया।
नानाकी गद्दी पर बैठकर इब्राहीम अब इब्राहीमशाह हुए।
राज्यके कामको इस योग्यता से किया कि,शत्रु और राज्य के
लालची दूसरे बादशाह लोगोंने स्वम प्रशंसा करके उनसे
दोस्ती करली।
इस प्रकारसे रामराज्य सा राज्य करने परभी इब्राहीमशाह
को फकीरों दुर्वेशों की संगति का ऐसा चसका लगा था कि,
दिन रातमें राजकाजसे जभी अवकाश मिलता तभी साधु सन्तो
के पास पहुंचते । चाहे कितनेही दूर पर किसी अच्छे महात्मा
के रहने का समाचार पाते जरूर वहां जाकर उनसे सत संग
करके लाभ उठाते। इसी प्रकार राज्य करते हुए कई वर्ष
६७
बोधसागर।
(७७३)
वीतने पर उनके नानाका जिन्होंने अपना राज्य इन्हें देकर
आप भजनके लिये एकान्त बास कियाथा देहान्ता होगया ।
नानाके मरजानेपर इब्राहीमशाहके मन पर बडा धक्का लगा
उनका चित्त संसारसे एक दम वैराग्यको प्राप्त हुआ अंब उन्हें
दिन रात परलोक की चिन्ता रहने लगी।
याने इब्राहीमशाहे दो जहाँ ॥
करताथा जाहिरमें गो कारे शहां ॥
लैक था दुनियासे दिलबरदाशता ॥
बेवफा व वेबका पिन्दाशता ॥
कारदुनियाँसे नथी चसपीदगी।
कुछ तहेदिलसे नथी गरवीदगी॥
जानता था कार दुनियाँ मुस्तआर ।
करताथा बहरे जरूर तकारो बार।
मुल्क रानी उसनेकी बा आब वताब ।
दसवरम वल्लाह आलम बिलसवाब।
अदल अपने असिरमें ऐसा किया।
महो मुतलक होगया जोरो जफा॥
शमआ परवानेकोदे तकलीफ अगर ।
किता जल्द उसका करे गुलगीर सर ।
जुल्मसे तोड़े जो बुज ठन्नी हरी।
फेर दे कस्साब गर्दन पर छुरी॥
इसके आगे नानाकी मृत्यु देख कर इब्राहीमशाहके हृदय में
विराग का अंकुर विशेप वृद्धिको प्राप्त हुआ और सदरुने जिस
प्रकार उन्हें उपदेश देकर सत्य पदको प्राप्त कराया उसका
६८
(७७२)
सुलतानबोध ।
विशेष वृतान्त सुलतान बोधमें लिखा है । यद्यपि और और
लिखने वालों के विचार और लिखनेसे सुलतान बोधमें बहुत
कुछ भेद पड़ताहै तथापि सबका लक्ष एकही है औ सबने अन्त
में फलभी एकही दर्शाया है। इस कारण और यहाँ पुस्तक बढ़
जानेके भयसे अधिक न लिख कर शाह इब्राहीम अद्धमके
फकीर होजाने पश्चात् की करामात औ प्रचा की बातों में से
थोड़ी सी बातें यहाँ लिखकर यह ग्रन्थ समाप्त किया जायगा।
शाहइब्राहीम अहम का स्फुट वृतान्त ।
वाती ।
कहते हैं अद्धम हुए जिस दम फकीर ।
छोड़ सुलतानी का सब तोजो शरीर ॥
मालोजर जितना खजाने बीच था।
लेके दरियामें दिया सारा डुबा ॥
पूछा एक ने क्या किया यह ऐ मलिक ।
क्यों न हर एक को दिया यह ऐ मलिक॥
दर जबाब उसको कहा यह मालोजर।
याँदये बोजंब हसंद नखवत का घर ॥
यों सुनाहै मैं बुर्जुगोंसे कलाम ।
जानतेहैं इस मिस्लको खास व आम ॥
आप पर जो चीज होवे ना पसन्द ।
गैरपर उसको मत रखना पसन्द ॥
१ बादशाही, राज्य । २ राजमुकुट । ३ राजसिंहासन । ४ धनदौलत । ५ बादशाहा५
६उत्तरमें। ७ पूंजी । ८ कीना, गुस्सा, क्रोध, आंटी। ९ ईर्षा । १० अभिमान । ११ बड़ों
से । ११ दूसरा।
६९
बोधसागर ।
(७७३)
* वार्ता २।
बादशाहत छोड़कर अद्धम चले।
कोहं व सिहराकी तरफ़को शहरसे ॥
बेटेको अपने किया कायममुकाम ।
बादशाहत वह लगा करने तमाम ॥
आपली फिर राह सिहरा की ग़रज ।
कुछ न रखी माल दुनियाकी गरज ॥
साथ एक प्याला लिया और बोरिया।
एक मिसर्वाक और एक तकिया लिया।
एक सोजन खलका सीनेके लिये।
साथ यह असबाब जरूरी ले लिये।
शहरसे बाहर
निकलजोकी
नजर।
सोते देखा एकको वाँ खाकपर ॥
बोरिया फेंका वहाँ और यह कहा।
खाकसारोंको जमीन है बोरिया ॥
आगे जा देखा तो एक बेचारः आप ।
औकसे पीता है बैठा बे हिजाब ॥
हाथसे प्यालेको भी फोडा वहीं।
यानी पी लेवेंगे हम पानी योहीं।
आगे देखा एक सोताहै गरीब ।
हाथको रखे सिन्हाने बेनसीब ।।
तकिया भी छोडा फजूली जानकर ।
यानी एक यह भी है मुझपर बौरसर ।।
* इस बार्ता में जिन २ शब्दोंपर अंक दिये गये है उनका अर्थ वार्ताके भन्तकी
'टेप्पणी में देखो ।
(७७४) सुलतानबोध ।
आगे जाकर देखा तो एक नेक खो।
उंगलियोंसे मांजताहै दांतको ।
हाथसे मिसवाकभी तब फेंकदी।
मिस्ल ईसौं एक सोजनही रखी।
सैर करते करते आखिर एक जाँ।
एक पहाड़ पर गुजर उनका हुआ।
आदमी वाँ था न वाँ हैवान था।
यातो था वह कोहे या मैदान था।
दूरसे एक झोपड़ी आयी नजर ।
देखा एक दुर्वेशको उस कोह पर ॥
करके इश्क अल्लाह पै बैठे वहां।
बैठना इनका हुआ उस पर गिरौं ।
बोला वह दुर्वेश ऐ दुर्वेश ! तू।
रातको रहना नयाँ दिलरेश तू ॥
यां न दाना है न पानी है कहीं।
मसलेहत तेरा यहां रहना नहीं।
तब यह बोले उससे ऐकम हौसला।
रिकका हरगिज न करियो तू गिलौ।।
तेरा में मिहमाँ नहीं ऐ तकियेदार ।
जिसका मिहमाँ हूँ वही है गमगुसार।
जिसने दी है जान वह देवेगा नॉन ।
गर नहीं बावैर तो करले इमतहान ॥
जो किसीके पास आता है अँजीज।
किस्मतअपनीसाथलाताहै अँजीज।।
है खुदा सबका नहीं करता शरीक ।
बोधसागर ।
(७७५)
रिज्कमें बाहम किसीको लाशरीके।
देख आते मत किसीको सहम जा।
उसकी किसमतकाहैसाथउसकेधरा।।
कहके यह और हँटै वहांसे जा रहे ।
सामने तकियोंके जा सुस्ता रहे ।
शामको एक लोटा और दो रोटियाँ।
तकियाँवालेको वहां पर उतरियाँ ।
और उनके वास्ते स्वाने तआम ।
यक पुलाओंकी रिकाबी एक जाम ।।
जर्फ चीनी और उनपर ख्वान पोश।
यक तकल्लुफसे उनमें नाय नोर्श ॥
खाके इब्राहीमने पानी पिया।
शुनेआमतकाफिरयकसिजदाकिया
यह तो नेअमत लेके बस चलते रहे।
वह जो तकियादार थे जलते रहे।
शाम जब आयी वही फिर उतरियाँ ।
साथ यकलोटाके वा दो रोटियाँ।।
मारे गुस्साके उन्होंने यों कहा।
मैं नहीं खानेका खाना आपका ॥
एककोतुमभेजो कुलियाऔरपुलाओं।
मुझकोजोकी रोटियाँरुखीखिलाओ।
जैसा वह दुर्वेशे मैं दुवैश हूँ।
जैसा वह दिलरेश मैं दिलरेश हूँ।
क्यों बढ़ायी एककी यह इज्वैशाँ।
हैं फकीर आपसमें सब एकसाँ।
७२
(७७६)
सुलतानबोध ।
जबकियायहशिकवःउसने आशकार।
तब हुआ उसपर खताबे किर्दगार ॥
कि ऐ फकीर!इतना न भूल अपने तई।
तुझकोशरम इसबातपर आती नहीं।
उसकी गैर पछे तो वह तो बादशाह ।
मेरी खातिर तज दिया ताजो कुलाह।।
छोड़ कर लज्जात दुनियाकी तमाम ।
वहशराबऔवह कबाब औवहतआम ।।
वहहुकूमत साहिबी सब अपनी छोड़ा।
बन्दगीमें मेरी आया हाथ जोड़ ॥
साहिबी जो छोड़ कर होवे गुलाम ।
क्योंन_मैं उसकोयकवाने तआम।।
तेरी इस रोटीसे यह खाना है कम ।
याद कर उसके वह नाजो नअमे ।।
और अपना वक्त भी तू याद कर ।
किस तरह औकात होती थी बसर ।
एक घसियारा था तू मर्दै गरीब ।
खोदता था घास तू ऐ बेनसीब ।।
जङ्गलोंमें खोदता फिरता था घास।
एक टका आताथा उसका तेरे पास।।
तू हुआथा छोड़ कर उसको फ़कीर ।
मांन बेगम थी न बाबा था अमीर।
उस मुशत से बसर करता था तूं।
सर पर गढे लेके नित मरता था तू ॥
तुझको मैं पकी पकायी रोटियाँ।
७
बोधसागर।
७७७ )
भेजता हूँ साथ पानीके यहां ॥
गर रजा पर मेरी तू राजी नहीं।
तो ठिकाना अपना कर यांसे कहीं।
दिल फकीरीसे अगर तेरा फिरा।
जाली और खुरपा यह है तेरा धरा॥
आशकीसे तू हमारे बाज आ।
लेके खुरपा घास अपनी खोद खा॥
जो खुदा किस्मतमें देवे बेश ओकम ।
मत रजाँसे उसकी रख बाहर कदम ॥
तरफ से अपने न कर बाहर तलब।
खींच मतले फायदा रंजो तब ॥
उसने जो समझा हैं सोई खूब है।
तालिबोंको नित रजा मतलूब है ।
अपने तई सबके बराबर तू न जान।
फहम कर यह मोलंबीकी बात मान॥
हम भी ऐसे हैं यह कहना है बुरा ।
इज्जमें वह आदमी गर है भला।
यां सुंदीमें और खुदामें बैर है।
किस तरफ भटका फिरे है खैर है ।।
वन्दगाने हक हैं मिसकीनों गरीब ।
कुबसे दूर और जिल्लत से करीब ॥
इनंत व गुरबतही वहां मञ्जर है।
कुत्र है जिसम सो हकसे दूर है।
(७७८) सुलतानबोध । पकके गिरपड़ताह मेवा मेवा खाके पर। खाँम है जब तक रहे इफलाक पर ।। साखी दास गरीबी बन्दगी, सत गुरुकाउपकार। मान बड़ाई गर्बका, पचि पचि मरै गवाँर ॥ मान बड़ाई कूकरी, धरमराय दरबार । दीन लकुटिया बाहिरे,सब जग खाया फार।। मान बड़ाई कूकरी, संतन पायी जान। पाण्डव जग पान नभई,सुपच विराजे आन॥ १ राज्य । २ पहाड । ३ जंगल। ४ स्थानापन्न । ५ टाट । ६.सर्द । ८ गुदडी। ९ जमीन मिट्टी । १० पानी । ११ अगली । १२ लज्जा, शरम । १३ बोझ । १४ नेक = अच्छा। खो = स्वभाव । अर्थात् अच्छे स्वभावको भलेमानस आदमी । १५ ईसा पैगम्बर इसाई धर्मके प्रवर्तक मूल पुरुष । १६ अन्तम । १७ जगह । १८ वहीं, उस जगह । १९ फकीर दो प्रकार के होते हैं। एक तो गदा (भीखमांगनेवाले ) जिनको संसारी वैभ- वकी बहुत लालसा है मगर उनको मिलतानही। दूसरे दुवंश जिन्होंने संसारको अपने विचार द्वारा त्याग दियाहै । २० इस जगह । २१ दिल = हृदय; रेश = जखम घाव । आशय हृदय पर चोट खायेहुआ अर्थात् संसार से उदास हुआ पुरुष। २२ बिहतरी, भलाई,नसीहत, उपदेश, उत्तम उपाय।२३ हौसला = हिम्मत, उत्साह कम हौसला = कमाहम्मत, अनउदार ॥२४ रोजी, भोजन । २५ कदापि नहीं; कभी नही २६। शिकायत्, उलाहना । २७ । अतिथि । २८ दुस्ख मिटाने वाला, सहानुभूति दिखाने वाला । ३० रोटी । ३१ विश्वास, यकीन । ३२ परीक्षा ३३ निकट । ३४ प्यास । ३५ भाग्य । ३६ एकसाथ । ३७ साथ । ३८ डरता! ३९ हटकर । ४० मठ । ४१ थाल। ४२ गिलास। ४३ वर्तन । ४४ थालीका ढकन । ४५ तैयारी । बनावट ४६खानेपीने के सामान । धन्यबाद । ४८ मुसलमानी एक खाना । ४९ प्रतिष्टा । ५० बराबर, समान । ५१ निन्दा,शिकायत । ५१ जाहिर प्रकट । ५३ क्रोध, कोप । खतावे किर्दगार = ईश्वर का कोप । ५४ कर्ता। ५५ लेना ॥५७ खुशी, लिये। ५८ लज्जात = स्वाद । लज्जात बहुवचन है लज्जात को अर्थात् बहुत स्वाद । लज्जात दुनिया ॥ संसारी विषय घासना का सुख ॥ ५९ पीनेकी चीज। ६० भोजन, खाना । ६१ लाड । ६२ प्यार । ६३ समय । ६४ करना: गुजरना । ६५ परिश्रम । ६६ अधिक । ६७ मर्जी, इच्छा, आज्ञा । ६८ दुख । ६९ चाहने वाला । ७० चाह । ७१ समझ। ७२ यहां मोलवासे मतब है मौलाना रूम।७३ अधीनता।७४ अभिमान । ७५ ईश्वरके भक्त । ७६ गरीब ७७। आभिमान । ७८ अपमान । ७९निकट। ८० गरीबी, दीनता। ८१ सत्य । ८२ कच्चा । ८३ आसमान । -
७५
बोधमागर।
(७७९)
माया तजे तो क्या भया, मानहि तजा न जाय।
मानहिं बड़ मुनिवर गले, मान सबन कोखाय ।।
कविरा अपने जीवते, ये दो बातां धोय ।
मान बड़ाई कारने, अछता मूल न खोय ॥
वार्ता ३ ।
शाह इब्राही अद्धम संसार त्याग देनके पश्चात् मस्त फकीरों
के वेषमें इधर उधर फिरा करतेथे। न कोई उनका विशेष वेष
था न चिन्ह । इसलिये लोग उनको पहचान नहीं सकते थे।
एकबार ऐसेही फिरते हुए किसी अमीर आदमी ने उन्हें पकड़-
कर अपने बाग में माली के काम पर लगा दिया । सद्गुरु की
इच्छा जानकर वे अच्छी तरह बाग का काम करने लगे । एक
बर्ष जब वागवानी करते उनको हो गया तव एकदिन बाग का
मालिक अपने कइ मित्रोंको साथ लिये हुए बागमें आया।शाह
इब्राहीम साहबने उस समय बाग में जितने फल फूल थे सब में
से थोड़ा थोड़ा लेकर एक डाली बनायी और मालिकबेगके
पास ले गये।जब उस अमीर ने डाली में से अनारोंको लेकर
खाया तब सब अनार खट्टे निकले।उसनेशाहशाहब को बुलाकर
पूछा कि, मेरे लिये ये खट्टे अनार क्यों लाया ? उन्होंने जवाब
दिया कि, मुझे खट्टे मीठे की कुछ खबर नहीं है । उस अमीर
ने कहा कि, तुम कितने दिनसे इस वाग में रहतेहौ ? उन्हों ने
कहा एक वर्षसे । अमीर ने कहा एक वर्षसे बागबानी करके
भी तुमने आजतक बाग के खट्टे मीठे अनारों को नहीं यह
जाना ? शाह इब्राहीम ने उत्तर दिया तुमने मुझे बाग की रक्षा
करने के लिये रखाथा कि, फलों को खाने के लिये ? अमीरने
(७८०) सुलतानबोध ।
७६
कहा रक्षाके लिये उन्होंने कहा तब मैं फल कैसे खा सकता
था ? अगर रक्षक भक्षक बनजाये तब तो रक्षा का नामही सं-
सार से उठ जाय । आपकी बात को सुनकर वह अमीर बड़े
आश्चर्य में आया । फिर जाँच करने पर उस अमीर
को मालूम हुआ कि, वहतो शाह इब्राहीम अद्धम हैं तब तो वह
हाथ जोड़ कर उनके पैर पर गिरपड़ा और अपना अपराध
क्षमा कराने लगा। तब वे हँसकर उस अमीरको उपदेश देकर
चलदिये.
वार्ता ४ ।
कहते हैं कि,बादशाहत त्याग देने के पश्चात् सुलतान इत्रा-
हीम अद्धम शाह दस वर्ष तक नेशापुर के जंगल की एक गुफा
में रहकर भजन करते रहे । आठवें दिन वे गुफा से निकल कर
जंगलकी लकडियां इकट्टी करके बस्ती में लेजाकर बेंचआते
और उससे जो कुछ मिलता उतनेही में आठ दिन के भोजन
का सामान खरीद कर लेआते और आठ दिनतक बैठे भजन
करते।
लिखाहै कि,इस दस वर्ष की तपस्या और एकान्त बाससे उन्हों
ने अपने मन तथा इंद्रियों को पूर्ण रीतिसे जीत लियाथा।इसके
प्रमाणमें लिखाहै कि,जब नेशापुर से शाहइब्राहीम अद्धम रवाना
हुए तब एक जहाज़ पर चढ़ कर अरब को चले। संयोगसे उस
जहाज़ पर एक अमीर भी जारहाथा। उस अमीर के साथ सब
अमीराना सामान नाचराग वगैरह थे।ठट्ठा मसखरी से अमीरों
को खुश करने वाले भाट्ट भी उसके साथ थे । एक रातको
भांडो ने कहा अगर कोई आदमी मिलता तो उसपर से हमलो
ग अपनी मसखरी उतारते।उस अमीर ने हुक्म दिया कि,देखो
७७
बोधसागर।
(७८१)
जहाज़ में कोई गरीब भूखा मिल जाय तो उसे रुपया दो रुपया
देकर अपना काम निकाल लो। आखिर कार ढूंढते ढूंढते उस
अमीर के आदमियोंने शाह इब्राहीम अहमको किसी कोने में
बैठा हुआ पाया । इनका विचित्र वेष और बढी हुई दाढी वगै-
रह देखकर सबने पागल समझ कर उन्हें पकड़ लिया और
अमीर के मजलिस में लाकर बैठा दिया। फिर तो भांडों
ने मनमानी की जितने खेल खेलते अन्तमें सब उन्हींपर उतारजे
अंतमें जब उन्हें बहुत तकलीफ हुई तब आकाशवानी हुई कि,
अगर तुम कहो तो इस जहाज को डुबाकर इन सब मूर्ख बदमा
शों को इनके कियेका दण्द देहूँ । शाह इब्राहीमने बड़े धीरज
के साथ कहा कि,
खींच कर सीने में अपने एक आह ।
बोला इब्राहीम ऐ मेरे अल्लाह ।।
कुछ नहीं इस अमरमें इनकी खता।
करता अगर बसरित इनको तू अता॥
कजरवी क्यों करते ऐ दानायगज ।
फेल बद से आप करते एहतराज ॥
राह में गर बेबसर के चाहहो।
जो न रोके उसको वह गुमराह हो ।
मर्दबीना को है लाजिम दे बता।
वरनः गोया उसका खुन उसने लिया।
वह है या रष्ब जुर्म असियां से वरी।
कुछ नहीं उसमें खता उनकी जरी॥
क्यों कि गुफलतसे है मसलूबुल हवास।
जेहल नादानी से मकलूबुल हवास ॥
७८२) सुलतानबोध । फिर उनने कहा कि,हे प्रभु!क्या मैं तेरा बन्दा इस काबिल हूँ और ऐसा नापाक हूँ कि,मेरे स्पर्श के पाप से इतने बड़े जहाज को डुबाकर इतने निष्पापों का अन्त करेगा। प्रभु ! तूतोदयालु है अधम उद्धारनहै ऐसा क्यों नहीं करता कि यदि केवल मेरेही कारण से तुझे इतनी हत्या करनी मड़ती हो तो मुझको ही डुबादे अगर नहीं तो इन सबों को वह ज्ञान दे कि, ये तेरी बड़ाईको समझें और इनका हृदय दया और ज्ञान से पूर्ण हो जावे। उनके इस प्रकार आशिरबर्बादे करनेके पश्चात् तत्का- लही अमीर सहित समाज के सब आदमियों का हृदय शुद्ध और ज्ञान से पर्ण होगया।उस समय सबने उनको पहचाना। फिर तो सब उनके पगपर गिरकर क्षमा कराने लगे । उन्होंने सबको उपदेश देकर संतोष दिलाया। वार्ता ५। एकबार एक स्मशान में बैठे हुए शाह इब्राहीम अहमसे किसीने पूछा कि, बादशाही छोड़कर मरघटों में क्यों बैठते फिरते हौ ? उन्होंने उत्तर दिया कि, संसार के मनुष्यों को मैं चार प्रकार का देखता हूं। १ कोई तो जीताहै और संसार में मौजूद हे ॥२॥कोई मांके पेटमें है।३। कोई अपना कर्म पूरा करके आनेही चाहताहै । ४ । कोई मरगये हैं इनमें से मरे हुए लोग पुकार रहे हैं कि, ओ संसार के आद- मियों! जल्दी जल्दी मरो कि, क्यामत जल्दीहो और हमलोग कत्रके कष्ट से छूटें । जो माताके पेठ में आयुके हैं और जो आने वाले है वे पुकार रहे हैं कि, ओ संसार के मनुष्यो। जल्दी संसारको छोड़ो कि हमारे आने को स्थान मिले। आशय यह है कि, एक ओर से भगाते हैं और
बोधसागर ।
(७८३)
दूसरी ओरसे बुलाते हैं । इस दशा में संसारमें रहने की इच्छा
किस प्रकार होसकती है । इसलिये मैंने मौतको और मरघट
को अन्तिम स्थान जानकर सेवन करना आरम्भ कियाहै ।
वार्ता ७ ।
एक बार फकीर होजाने के बहुत दिन पीछे शाह इब्राहीम
अद्धम बलखमें गये और शहर से बाहर एक जलाशय के कि-
नारे बैठे । आने जाने वालों ने उन्हे देख कर पहचाना और
उनके बेटे को जो उस समय वहां के बादशाह थे उनके आने
की खरबरदी।
बादशाह बापके आने की खवरको । सुनकर चट सवारी
मँगाकर बहुतसे मुसाहेब और नौकर चाकरों को साथ लिये हुए
वहां पहुचा । शाह इब्राहीम के आनेका समाचार जैसेही बलख
के लोगों को पहुंच वैसेही जो जिस दशामें था अपना अपना
काम छोड़कर दौड़ पड़ा थोड़ी ही देरमें शाह इब्राहीम के
निकट बड़ा भारी मेला लग गया।
सुलतान इब्राहीम के पास में सिवाय एक गुदड़ी के दूसरा
वस्त्र या पात्र आदि कुछ नहींथा। कठिन तपस्या के कारणसे
उनका शरीर भी बहुत दुबला पतला और कमजोर देख पड़-
ताथा। वापकी वह दशा देखकर बादशाह बने हुए आत्म दृष्टि-
से शून्य बेटने कहा पिताजी ? आपने बादशाहत छोड़कर
संसार भरका कष्ट अपने शिर उठाके क्यालाभ उठाया।
जो आपका शरीर मखमल और फूलोंकी सय्या पर सोने
वाला था अब उसके लिये टाट भी आपके पास नहीं है। जि-
सके सम्मुख हजारों दास दासियाँ सेवा करनेके लिये हाथ जोड़े
खडेरहते थे आज वही इस प्रकार बेकस और लाचारक समान
.
" (७८४) सुलतानबोध । भूखे प्यासे जमीन पर सोता और दुःख उठाता फिर रहाहै। पूज्य पिता जी ! एक चीज को छोडकर मनुष्य दूसरी वस्तुको उन्नति की आशासे स्वीकार करताहै । आपने तो उलटा प्राप्त सुख को भी खोकर अपनी ऐसी दशा बनाली है जिसे देखकर मुझे शरम आती है और आपकी यह प्यारी प्रजा आठ आठ आसूं रो रहीहै । इसी लिये मैं आपसे पूछता हूँ कि, आपको इस त्याग में क्या प्राप्त हुआहै । बेटेकी बातको सुनकर उसे कुछ उपदेश देने के विचारसे सुलतान ने कहा, बेटा ! मैंनेजो कुछ कमाया है वहतो पीछे ब- ताऊंगा पहले तू बतला कि, बादशाही पाकर तूने अपनी उन्नति कहांतक की है ? बापकी बात को सुनकर बेटा हंसकर बोला कि, देखिये आपके राज्य छोडकर चले जानेके पश्चात् मैंने अमुक अमुक देश अपने बाहु बलसे जीतकर स्वाधीन कर लियाहै और अमुक अमुक सुधार राज्यमें फैलायाहै । मेरे आधिकारमें क्या नहीं है ! जिसको चाहूं आज गरीब बनार्दू जिसको चाहूं आज कुबेर कहलादूं। जिसको चाहूं उसका जान बखशी करदं जिसको चाहूं मार डालूं। मेरे नाम को सुनकर शत्रु डरते है। मेरी आज्ञा को कोई तोड नहीं सकता। इतना सुनकर सुलतानने कहा कि, बेटा ! अगर सच मुच तुझमें ऐसी सत्ता आगयीहै तो ले मेरी यह सुई इस तालाब मेसे निकलवादे । इतना कहकर गुदड़ी सीनेकी सूईको तालाब में फेंकदिया। यह देखकर बेटा (बादशाह) ने हंसकर कहा यह कौन बडी बातहै । एक नहीं लाखों सुई आपको मंगवा देताहूं।सुल- तान ने कहा मुझे दूसरी सुई नहीं चाहिये मुझे तो मेरीही सुई चाहिये।
बोधसागर।
( ७८५)
बादशाह ने उसी समय वजीर को आज्ञादी और आनन
फानन में देखतेही देखते हजारों पानी में डुबकी मारनेवाले
और जाल डालने वाले हाजिर होगये । यद्यपि सूईका निकाल
लेना बादशाह सहल काम समझता था तथापि सब उपाय
करने परभी मूईका पता नहीं लगा। तालाब के तह में जमें
हुए सब काँदों कीच साफ होगये। मगर सूईका पता नहा लगा।
तबतो बादशाह अपने मनमें शरमाकर पिताके पास जाकर
कहने लगा कि, वह सूई तो नहीं मिली उसका मिलना
असम्भव है दूसरी सुईयां हाजिर हैं जितनी चाहिये लीजिये।
सुलतान इब्राहीम ने कहा कि, बेटा तूने यह क्या उन्नति
की कि, एक सुई भी तालाब से नहीं निकलवा सकता ! खैर
अब मेरी कमाई को भी देख और अपनी कमाई से मिला।
इतना कहकर सुलतान ने आंख बन्द करली एक क्षण
के बाद आंखखोल कर तालावकी ओर देखा तब
आगिनित जल चर मछली आदि जीवधारियों को किनारे
जलमें खड़ा देखा। बादशाहने उनसे कहा प्यारी ईश्वरकी सृष्टिकी
मछलियो ? क्या तुम मेरा एक काम कर सकोगी ! सब
जल चरोंने एक जबान होकर कहा जो आपकी आज्ञा हो करने
को तैयार हैं। जल चरों को बोलते सुनकर बादशाहसे प्रजा
तक सब आश्चर्य में आगये । सुलतानने मछलियोंसे कहा कि
मेरी एक सुई पानीमें है उसे ढूंढकर लादो । इतना सुनतेही
मछलियां गोता लगा गयीं । थोडीदेरमें एक मछली सूई
मुहंमें लिये हुई किनारे आयी । बादशाहने अपने हाथ से सूई
लेकर देखी तो वही सूई थी। फिरतो वह बापके पगपर गिरकर
गेते और अपनी अज्ञानता के अपराध को क्षमा कराने
(७८६) सुलतानबोध । ८२ लगा । प्रजा चारों ओर से जय जयकार वाणी उच्चाारने लगी। इतने में सुलतान इब्राहीम अदमसाहब वहां से अन्तरध्यान होगये। वार्ता ८॥ कहते हैं कि, जब सुलतान इब्राहीम अद्धम मका के निकट पहुँचे तब सुना कि मका के पुजारी और यात्री लोग उनकी अगुवानी को आरहेहैं । तब वो जमात से निकल कर अलग होकर आगे चले गये जिसमें उनको कोई पहचान न सके। मक्का के महात्माओं के सेवक लोग जो अपने अपने मालिकों से आगे आरहे थे पहले सुलतान इब्राहीम अद्धम से मिले । उनलोगों ने आपसे पूछा क्या सुलतान इब्राहीम अद्धम यहांसे नजदीक हैं ? सब महात्मा लोग उनसे मिलनेको आरहे हैं। आपने उत्तर दिया कि, वे उस अधर्मीसे क्या चाहते हैं ? सेवकों ने गाली देते सुनकर आपको खूब मारा और गर- दनियां दी और कहने लगे कि, तू ऐसे महात्मा को अधर्मी कहता है ? असल में तूही अधर्मी है। आपने कहा हां भाई सोई तो मैंभी कहरहा हूं। वे सब तो आपको मारकूट के आगे बढ़े और आप अपने मनसे कहने लगे कि, क्यों ओ दुष्ट तूने अपने किये का फल पाया या नहीं ? अभी कैसा खुश हो रहा- था कि, मका के महात्मा लोग हमारी अगुवानी को आरहे हैं। इसी प्रकार से आपही आप आप अपने मनको समझा रहेथे इतने में लोग आगये और आपको पहचान कर आपसे क्षमा मांगने लगे। फिर आप मका में जाकर बहुत दिनों तक रहे। आपके बहुत से चेले भी हो गये । आपके चेले गुदड़ी ओढते और खड़ी टोपी पहनते थे। -
८३
बोधसागर।
(७८७)
बार्ता ९।
जब आप बलख छोड़ कर फकीर हुए थे उस समय
आपका एक छोटा पुत्र था जब वह लड़का बड़ा हुआ तब
उसने अपनी मांसे पूछा कि मेरा बाप कहां है? मांने सब
हाल कह सुनाया और यहभी कहा कि सुननेमें आता है कि,
आजकल मकामें रहते हैं। लड़के ने मांसे कहा "अगर
आपकी आज्ञा हो तो मैं भी मक्का जाऊँ, तीर्थभी करूँगा और
पिताको ढूंढकर उनका दर्शन भी करूँगा" मांने कहा अकेले
तू क्यों जायगा मैं भी मक्का की जेयारत को जाऊँगी । फिरतो
लड़केने वजीरों को हुक्म दिया कि,शहर भर में डौंडी पिटवादो
कि, जिसको मका चलना हो वह चले उसका सब खर्च मेरी
ओरसे दिया जायगा। फिर चार हजार आदमी मका जानेको
तैयार हुए। सबको साथ लेकर लड़का मका पहुँचा। वहाँ
जाकर गुदड़ी वाले फकीरों की एक जमात देख कर उनसे
पूछा कि, तुमलोग इब्राहीम अद्धम साहब को जानते हो ?
उन्हों ने कहा वे तो हमारे गुरु हैं। फिर पूछा वो कहां हैं? उत्तर
मिला कि वो लकड़ियों के गड्ढे लाने जंगलमें गयेहैं । क्योंकि
जब वो जंगल से लकड़ी लेकर आयेंगे और बेचकर रोटी
लायेंगे तब हमलोग खायेंगे। इतना सुनकर लड़का जंगल
की ओर खाना हुआ। आगे जाकर एक बुड्ढेको लकड़ियों का
गट्ठर शिर पर रखे हुए आते देखा । लड़का सुलतानकी वह
दशा देखकर रोने लगा। फिर उनके पीछे पीछे बाजार तक
गया। जहां जाकर उन्होंने लकड़ी रखकर पुकारा कि कोई है
जो माल हलाल (सुकृति की कमाई) को माल हलालके
बदले लेवे । एक आदमी आया उसने आपसे लकड़ियाँ लेली
"
(७८८) सुलतानबोध ।
और उसके बदले में रोटियाँ देदीं। आप रोटी लेकर जमातमें
आये और साथियों के आगे रखदी। लोग रोटी खाने लगे
और आप भजन में लगे।
सुलतान इब्राहीम अद्धम साहेब सदा अपने चेलों से कहां
करते थे कि, "देखो बेदाढी मूंछके लड़के और स्त्रियों से सदा
सचेत रहना उनकी ओर कभी ध्यान देकर मत देखना"।
उनके शिष्यवर्ग सदा उनकी आज्ञाका पालन करते थे।
काबाकी परिक्रमाके समय संयोगसे सुलतान इब्राहीम
अद्धमका लड़का उनके सन्मुख आगया । आपने दृष्टि
भरकर उसकी ओर देखा । शिष्य लोग उनके उस कामसे
आश्चर्य में आये । जब परिक्रमा कर चुके तब आपके शिष्योंने
आपसे हाथ जोड़कर विनय किया कि दीनबन्धु हमको तो
आपने आज्ञा दी है कि, बिना मूंछ डाढी वाले बालकों और
स्त्रियोंकी ओर दृष्टि मत करना किन्तु परिक्रमाके समय
आपने स्वयम् एक बालककी ओर टकटकी लगाकर देखा था
इसका क्या कारण है?
शिष्योंकी बातको सुनकर आपने उत्तर दिया कि,जिस समय
मैं बलख छोड़कर चला था उस समय मेरा एक छोटा लड़का
था मुझे इस लडकेको देखतेही ऐसा जान पड़ा कि यह वही
लडका है।आपकी बात सुनकर आपके शिष्योंमेंसे एक शिष्य
यात्रियोंके स्थानमें गया और बलखके यात्रियोंको ढूँढते ढूंढ
ते आपके पुत्रके पास पहुँचा । उस समय वह लड़का अपने
खीमेंमें बैठा हुआ पुस्तक पढ रहा था और रो रहा था उस
शिष्यने जाकर उस लड़केसे पूछा कि आप कहाँसे आये हैं?
लड़केने कहा-बलखसे आया हूँ। फिर उसने पूँछा आप
N बोधसागरः। (७८९) किसके लड़के हैं ? उत्तर मिला कि, इब्राहीम अद्धमके। उसने Jछा कि, आपने उनको देखा है ? लड़केने कहा कलके सिवाय मैंने उनको कभी नहीं देखा। किन्तु मुझे यह भी निश्चय नहीं है कि, जिनको मैंने देखा है वह मेरे पिता हैं कि, नहीं।मैंने उनसे इस डरके मारे कि, वो तो हमही लोगोंसे भाग कर यहां आये हैं कहीं हमको जानकर यहांसे भी कहीं भाग न जावें कुछ न पूछा । आपके उस शिष्यने कहा कि, आप मेरे साथ आइये मैं आपको आपके पितासे मिला हूँ । फिर तो दोनों मां बेटे और बहुतसे आदमी उस शिष्यके साथ चले। जब सब आपके सामने आये तब आपकी स्त्रीने आपको देखलिया देखते ही वह विकल होगयी । और रोने लगी। फिर लड़केसे बतलाया कि, देखो तुम्हारे बाप यही हैं। लड़का भी रोने लगा। उस समयकी दशा ऐसी करणा- पूर्ण थी कि, आपके सब शिष्य भी उनके साथ रोने लगे। मोहने करुणाके स्वरूपमें सबके ऊपर अपना जाल फैलाया। लड़का रोते रोते बेहोश होकर गिरपड़ा जब चेतमें आया तब बापके पगपर गिरकर प्रणाम किया। आपने उसे गले लगाया फिर उससे उसके पढ़ने लिखने और धर्मकी बातोंको पूछकर आपने चाहा कि, वहांसे उठकर चले जावें। किन्तु आपके पुत्र और स्त्रीने न छोड़ा। तबथोड़ी देरतक चुप रहनेके बाद आपने आसमानकी ओर मुहँ करके कहा हे प्रभु! तू मेरी सहायता कर! आपका इतना कहना था कि पुत्र आप- हीके गोदमें मृत्युको प्राप्त हुआ। शिष्योंने लड़कको मरते देखकर पूछा या सतगुरु ! यह क्या हुआ? आपने कहा जिस समय मैंने इस लड़केको गले
(७९०)
सुलतानबोध ।
८६
लगाया था उस समय मेरे हृदयमें मोहका संचार हो आयाथा
तब परमात्माकी ओरसे आज्ञा हुई थी कि, ऐ इब्राहीम तू मेरे
प्रेम और भक्तिका दम भरता है और स्नेह दूसरोंसे करता है।
जिस बातके लिये शिष्योंको सबसे अलग रहनेको कहता है
उसीको तू आप पकड़ता है। जब मैंने यह सुना तब मैंने
आशीर्वाद किया कि, हे प्रभु ? मेरी रक्षा तेरेही हाथमें है, यदि
मेरे पुत्रका मोह मुझे तुझसे अलग करने वाला है तो यातो
मुझे मृत्यु देदे या उसीको । बस जो कुछ साहबने किया सब
ठीक किया। इतना कहकर आप वहांसे शिष्यों सहित उठकर
चले गये । बलख वाले लोग रोते पीटते लाशको दफन करनेके
लिये ले गये।*
वार्ता १.०।
एकबार हजरत इब्राहीम अद्धमक पास कोई आदमी
एक हजार दिरम लाया और विनय पूर्वक प्रार्थना की कि,
आप इसे स्वीकार कर लीजिये। आपने उससे कहा कि, मैं
मँगतों से कुछ नहीं लेता । उस आदमीने कहा मैं मँगता नहीं
हूँ बलकि बड़ा धनवान हूँ। तब आपने उससे पूछा कि,
जितना तेरे पास है उससे अधिक मिलनेकी इच्छा तेरे हृदयमें
है कि, नहीं ? उसने कहा हां अधिकतो जरूर चाहता हूँ। तब
आपने कहा कि, तब तो तू बड़ा भिखमँगाहै इसलिये मैं तुझसे
कुछ नहीं लेसकता। मैं उसीसे लेता हूँ जो इतना पूरा है कि,
कुछ नहीं चाहता
* वर्तमानके त्यागके अभिमानी साधु और महतोको विचार करना चाहिये क्यों
कि, येभी तो अपने को सुलतान इब्राहीम अद्धमसे बढकर त्यागी बतलाते हैं।
,
बोधसागर।
(७९१)
वात्ता ११॥
एकवार एक आदमी दसहजार अशरफियाँ लेकर आपके पास
आया और उनको स्वीकार करानेके लिये हठ करने लगा।
आपने उससे कहा कि, तू इस थोड़ेसे सोनेके बदले मेरी
साधुता मोल लेके मुझे त्यागियोंकी जमाअतसे निकलवाना
चाहता है ? इतना कहकर आप वहांसे उठकर चले गये।
धन्य है इस त्यागको । आजकलके वैरागी भी अपनेको
महान त्यागी मानते हुए भी एक एक पैसाकेलिये संसारी
तुच्छ जीवोंके पास दीनता करते और झूठी खुशामद किया
करते हैं। क्या कोई सच्चा विचारवान उन्हें वैरागी कह सकता है ?
कदापि नहा।
वात्ता १२॥
एक आदमी ने आपसे विनय किया कि, आप मुझे ऐसा
उपदेश दीजिये जिसपर अमल करके मैं सन्त पदवी को पा
सकूँ। आपने उससे कहा-सन्त बनने के लिये सबसे पहली
बात यह है कि, लोक और परलोक दोनोंसे चित्त उठाकर के-
वल साहबमें लगादे । साहब के सिवाय अपने हृदयसे दूसरा
सब कुछ निकाल दे । दूसरे-हरामकी कमाई छोडकर सुकृति
कमाईसे उदरनिर्वाह कर। क्योंकि जिसका आहार शुद्धहै उसका
हृदय शुद्ध होताहै,और जिसका हृदय शुद्ध होताहै,उसीके अन्तः
करणमें साहबका सच्चा प्रकाश प्रगट होताह । जिसने अपना
आहार शुद्ध किया है वह अवश्य अपने पदको पहुंचा है। तीर्थव्रत
और नाना प्रकारके ऊपरी तपस्यासे चित्त शुद्ध नहीं होता बरन
आहार शुद्ध होनेसे ही अन्तः करण शुद्ध होता है ।
(७९२) सुलतानबोध । ८८ वार्ता १३॥ " एक बार लोगोंने हजरत इब्राहीम अद्वमसे कहा कि, अमुक सन्त बडा सिद्ध और ईश्वरतक पहुंचा हुआहै। वह सदा ध्यान में ही रहता है और दूर दूर देशकी बातोंको कह देता है। और सदा तपस्या में ही रहता है । आपने उन लोगोंसे कहा कि, मुझे उसके पास लेचलो मैं उसका दर्शन करूंगा। लोग आप को उसके पास लेगये । आपने वहां जाकर देखा कि वह उससे भी बढकर सिद्धिवाला है। उस सिद्धने आपसे प्रार्थना की कि, आप तीन दिन तक यहां रहिये आप रहगये। उसके व्यवहार को देखकर आपने विचार किया तो मालूम हुआ कि, उस का भोजन आदि निर्वाह दम्भकी कमाईसे चलता है । तब आप- को उसकी दशा पर दया आयी। तीन दिनके बाद आपने उस सिद्ध को नेवता देकर अपने कुटी पर बुलाया। जब वह आप के पास आया तब दूसरे ही दिन उसकी सिद्धि लुप्त होने लगी तीसरे दिन तो वह कोरा कोरा सन्त रह गया। तबउसको बड़ा आश्चर्य हुआ उसने आपसे कहा कि, आपने मेरे ऊपर क्या करदिया मेरा सब चमत्कार जाता रहा ? आपने उसको उत्तर दिया कि, पहले तुम हरामकी कमाईसे अपना पेट भरते थे इस कारण काल ने तुम्हारे हृदयमें प्रवेश करके तुम्हे अनेक प्रकारकी सिद्धि का लालच दिखाकर साहब के देशसे काल देशमें लेगया था। अब तुम तीन दिनसे सुकृति की कमाई का भोजन करतेहो इस कारण कालका राज्य तुम्हारे हृदय से उठ गया है । अब तुम चाहो तो साहिबका भजन कर सत्य लोक का साधन कर सकते हो। सुलतान इब्राहीम की बात उस समयतो उसको अच्छी नहीं बोधसागर । (७९३) लगी परन्तु जब वह लौटकर अपने स्थानपर आया और सुलतान इब्राहीम अद्धम साहेब के आचार विचार को अपने कर्तव्यों से मिलाने लगा तब उसे प्रत्यक्ष ज्ञात होगया कि, वतो अपने उचित परिश्रम द्वारा अपनी संसार माया चलाते हैं और वह अपनी संसार यात्राके लिये नाना प्रकार के वेष और दम्भकी बातोंसे संसार को बहकाकर अपना नाम बढ़ा- ता है । जिन बातोंके भेदको वह स्वयम नहीं जानता उस- को जानने का डौल बनाकर लोगा का ठगता आर भ्रममें डालता है । इस प्रकार से बोध होतेही उसने पश्चात्ताप करके अपने सब स्वांगों को तिलांजली देकर काल दशसे निकलने और सत्यराज्य म प्रवेश करने के लिये सच्चे संतोका संग करना आरम्भ किया। वार्ता १४। एक दिन परिश्रम करने पर भी आपको भोजन नहीं मिला। आपने साहिब को धन्यवाद दिया। इसी प्रकार सात दिन तक आपको भोजन नहीं मिला और बराबर आप साहिब का धन्यवाद करतेरहे । आठवें दिन निर्बलता बहुत बढ़गयी तब आपके मनमें कुछ भोजन मिलने की इच्छा हुर्द । साहिब की कृपासे एक मनुष्य आकर खड़ाहुआ और विनय करने लगा कि, आप मेरे यहां भोजन करने चलिये। उसके प्रेस और भक्ति भाव को देखकर आप उसके साथ गये। जब आप उस आदमी के घरपर पहुंचे तब उसके अमीराना ठाट और मका- नात के देखनेसे मालूम हुआ कि, कोई बडा धनी आदमीहै। उसने आपको एक सजी हुर्द कोठरीमें लेजाकर बैठाया फिर वह आपके परा पर गिरकर विनय पूर्वक कहने लगा कि, मैं (७९४) सुलतानबोध । आपका मोल लिया हुआ दासहूँ सो यह सब वैभव आपकी सेवामें अर्पण करताहूँ, आप इसे स्वीकार कीजिये। आपने उसी समय उससे कहा कि, आजसे मैं तुझे दासत्त्व से स्वतंत्र करताहूं और यहसब माल असबाब भी तेरेही को देताहूं । इत- ना कहकर आप वहांसे उठकर जंगल में चले आये और साहि वसे प्रार्थना करने लगे "हे प्रभु ! मैं आजसे तेरे सिवाय दूसरा कुछ न चाहूंगा। तूतो टुकड़े रोटीके बदले संसार भरकी माया मेरे गले बांधना चाहता है। कहते हैं कि, आपने मनका दण्ड देनेके लिये कई दिनों तक और भी भोजन नहीं किया। सद् ने सबसे अधिक मनके ऊपरही ध्यान रखने को बारंबार कहा है। यथा- साखी-मनके मते न चालिये, छाडि जीवकी बानि । कतवारीके सूतज्यों, अलटि अपूठा आन ॥ मनके मते न चालिये, मनका मता अनेक । जो मनपर असवारहै, सो साधू कोइ एक ॥ चिंता चित्त विसारिकै,फिरी न बूझिये आन । इन्द्री पसारा मेटिये,सहज मिले भगवान ॥ मनको मारो पटकिके, टूक टूक बै जाय । टूटे पीछे फिर जुटै, बीच गांठ रहि जाय ॥ मनका विशेष वर्णन मनबोध ग्रन्थमें देखनेसे मालूम होगा। वार्त्ता १५॥ सुलतान इब्राहीम अद्धमसाहबको निद्रा नहीं आतीथी। एकबार बहुतसे आदमियोंने मिलकर इस बातकी परीक्षा ली। आपसे पूछा कि, आपको निद्रा क्यों नहीं आती? आप- ने उत्तर दिया जिस कालने बडे बडे ऋषि मुनि, पीर, पैगम्बर , बोधसागर । (७९५) और औलियाओंको साहिबसे विमुख करदिया। वह सदा जाग कर सत्यपथके जीवोंको भटकानेकी युक्ति रचता रहताहै, तब हमको सोनेकी फुरसत कैसे मिलसकतीहै ? सचहै । साहबने कहाह। काल खडाशिर ऊपरे, जागु बिराने मीत । जाको घर है गैलमें, सोकस सोवै निचिंत ॥ वार्ता १६। एकबार सुलतान इब्राहीम अद्धम साहब एक टूटेहुए मका- नमें ठहरे हुएथे। उसमें औरभी बहुतसे मुसाफिर उतरे थे। रातको ठंढी ठंढी हवा और साथही साथ पानीके छीटेंभी पड़- नेलगीं। उस मकानका द्वार टूटाहुआथा। इससे मकानके अन्दर ठंढी हवा और पानी आकर मुसाफिरोंको कष्ट पहुचा रहेथे । आपसे उनका कष्ट देखा न गया।आप चुपचाप उठकर द्वारपर जाखड़े हुए। जिससे अन्दरके मुसाफिरोंको तो आराम हुआ किन्तु आप ठंढसे ठिठुरगये । सवेरा होनेपर लोगोंने देखकर पहचाना। और आगसे सेकनेपर जब आपको होश आया,तबलोगोंने पूछा कि, आपने ऐसा क्यों किया तब आपने कहा कि, बहुतसी जानोंको बचानेके लिये एक का जान काम- मेंआवे और बहुतोंकी तकलीफ दूर करनेकोलिये एकको थोड़ी तकलीफ उठानी पड़े तो इससे बढकर अच्छा काम क्या होसक ताहै । इसलिये मैं द्वार पर खड़ा होगया जिससे एक मेरी तकलीफ के बदले इतने मुसाफिरों को आराम होवे । सचहै दया भाव जानै नहीं, ज्ञान कथे बेहद । तेनर नरक जायँगे,सुनि सुनि साखी शब्द ।।
(७९६) सुलतानबोध । वार्ता १७ । सहलविन इब्राहीम नामक संतने काह है कि,एकबार वो सुल- तान इब्राहीमके साथ सफरमेंथे, संयोगसे वो बीमार पड़गये। सुलतानके पास जोकुछ बस्त्रादियाबेंचकर उनकी रक्षामें लगा- दिया। अन्तमें जब कोई सवारी भी नहीं रही तब सहलबिन इब्राहीने कहा "मैं बहुत कमजोर होगयाहूँ अब आगे कैसे जासङगा?" आप उन्हे अपनी गर्दनपर बैठाकर तीन मंजि- लतक लेगये, जबतक वो अच्छे भी होगये। * वार्ता १८ सुलतान इब्राहीम अद्धमके साथ जो कोई रहनेकी इच्छा प्रकट करताथा। आप उससे तीन बचन लेलेतेथे तब उसको अपने साथ रखतेथे। १ पहला नियम उनका यह था कि, आप किसीसे सेवा नहीं कराकर सबकी सेवा आपही करते थे। २ दूसरा नियम यह कि, भजन करनेके समय का सबको सूचना देना अपने ऊपर रक्खाथा । ३ नियम यह था कि, मण्डली का कोई आदमी भी सुकृति की कमाई से जो कुछ कमा के लाता था उसको मण्डली में समान उपयोगमें लगाते थे। इन नियमों में से एक भी नियम जिसको अस्वीकृत होता था उसको अपनी मण्डली से बाहर करदेते थे। *नोट-धन्यहै इस पर उपकारको । आजकलके साधुओं को ध्यान देकर इसबातको विचारना चाहिये क्योंकि, वर्तमान मे साधुओंकी यह नतिी होगयी है कि, सफर तो सफर किसी विशेष स्थानपर भी कोई बीमार पडजाय तो उसे एक गिलास पानी तक देना बुरा समझते हैं। मैंने बहुतसे ऐसे दृष्टान्त देखेहैं और स्वयं भी उनके संग रहकर भोग लियाहै। "
बोधसागर।
( ७९७)
आज कलके महंतोंको इसबात पर ध्यान देना चाहिये क्यों
कि, वर्तमान के महंत या मण्डली के मुखिया साथके साधुओं
की पूजा और भेट को भी हड़प जाते हैं।
वार्ता १९
एकबार किसीने सुलतान इब्राहीम अहम साहबसे पूछा कि,
आपका पेशा (धन्धा) क्या है ? आपने उत्तर दिया "मैंने
संसारको तो उसके चाहने वालोंपर छोड़ दिया है और परलो-
कको परलोकके चाहने वालों के लिये। किन्तु अपने लिये
मैंने केवल साहबका भजन रखाहै । सच है साहबने कहा है।
साखी-माला जपूं न कर जपूं, मुखसे कहूं न राम ।
मेरा हरी मोंको जपे, मैं पाऊं विश्राम ।।
वार्ता २०।
एकबार किसीने सुलतान इब्राहीम अहमसे पूछा कि,
आपने ऐसी अधीनता और दासापन कहाँसे सीखी। आपने
उसे उत्तर दिया कि "एक बार मैं ने एक दासको मोल लिया।
जब उसे साथ लेकर अपने स्थान पर आया तो उससे पूछा
कि, तेरा नाम क्या है ? उसने उत्तर दिया कि, जिस नाम से
आप पुकारें वही मेरा नाम है । फिर मैंने पूछा तू खाता क्या
है ? उसने कहा जो आप खिलावें । फिर मैंने पूछा कि, तू
पहनता क्या है ? उसने जवाब दिया जो आप पहनावें। फिर
मैंने कहा तू करता क्याहै ? उसने कहा जो आप हुक्म
देवें। फिर मैंने कहा तू चाहता क्या है ? उसने कहा
जो दास ह उसको अपनी इच्छा कहां है ! जिसको अपनी
इच्छा है वह दासही नहीं है । आप फरमाते हैं कि, उस दास
की बातों को सुनकर उसीदम उसको दासत्व से मोक्ष देदिया
(७९८) मुलतानबोध । और उसीदम से अपना सब कुछ साहब को सौंपदिया । फिर जैसा वह चाहता है करता है। मैं नतो आधीनता करता हूं न दासातन जो कुछ है साहब का है मेरा कुछ नहीं। नोट-वर्तमान काल के दास पदवी के अभिमानी कवीर पंथी साधुओंको उपर्युक्त सुलतान के दास के वचनों पर ध्यान देना चाहिये क्यों कि, यद्यपि आजकल के कवीरपंथी साधुओं के नामम दास शब्द अवश्य जुटा होता है और उनके मनमें भी दास शब्दका बड़ा भारी अभिमान रहता है यहां तक कि, यदि किसी कवीर पंथीके नाम में दास शब्द न जुटाहो अथवा किसीका नामही ऐसाहो कि, उसके नामके साथ दास शब्द का जोड़ न मिलता हो तो उस दास शब्द से हीन सच्चे दास- को भी वचनों और ब्यंगों के मारे तंग करते रहतेहैं। और बल पूर्वक उसके सुन्दर प्रसिद्ध नामको विगाडने का प्रयत्न करते हैं। और आप दास कहलाकर भी स्वामी पनेके ऐसे दम्भ और अहंकार में पड़े रहतेहैं कि,अपने गुरु (जैसे माता पिता, दीक्षा गुरु आदि)से भी मान चाहते और उनसे अपना पग पुजवा- तेहैं। और सतगुरु के वचन का ध्यान भी नहीं रखते। क्यों कि, सतगुरु का वचन है। गुरुको नीचा करि जानई, गुरु से चाहे मान । सोनर नरके जायगा, जन्म जन्म होय स्वान ।। दासातन तो हृदय नहि, नाम धरावै दास। पानीके पीये बिना, कैसे मिटे पियास ॥ नाम धरावै दास जो, दासान हो लीन। कहै कबीर लौलीन बिनु,स्वान बुद्धि कहि दीन । दासातन हृदय बसै, साधन सों आधीन।
बाधमागर। (७९९) कहै कबीरा दास सो, दास लक्ष लौलीन। स्वामी होना सोहरा, दोहरा होना दास । गाड़र आनी उन को, वांधी चरै कपास निर्बन्धन बन्धा रहै, वन्धा निर्बध होय । कर्म करै कर्ता नहीं, दास कहावै सोय ॥ वार्ता २१॥ एक ने आपसे एकदिन प्रार्थना की कि, आप मुझे उपदेश दीजिये । आपने उसको कहा कि, एक साहिब को याद रख और संसार को भूलजा। एक दूसरे ने भा आपसे उपदेश मांगा। आपने उसे कहा कि, बन्धे को खोल और खुलेको बांध । उस आदमीने कहा मैंने इसका अर्थ नहीं समझा।तब आपने उसको समझाया कि, थैली का मुहं खोल अर्थात् जोकुछ तेरे पासहै उससे परमार्थ कर और-जवान को बांध अर्थात् बहुत बोल ना छोडदे । सत्य है सत्य गुरुने कहाहै। जिव्हाको दै बन्धन, बहु बोलना निवार । सो परखीसे संग करु, गुरुमुख शब्द विचार ॥ इसी प्रकार से सुलतान इब्राहीम अहम साहब के विषयमें हजारों वार्ता प्रसिद्ध हैं । यहा ग्रन्थ बढजानके भयसे मेरे पास जितनी बार्ताओंका संग्रह है उन सबोंको नहीं लिखस- कते । आपकी जीवनीके साथ अधिक लिखने का प्रयत्न किया जायगा। इति सुलतान इब्राहीम अद्धम साहबका संक्षित जीवन चरित्र समाप्तः। इति बोधसागर पूर्वाई समाप्तमिदं ।
No text on this page.