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Yagyavalkyashiksha
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SHRI SARKATI wall ॥ श्रीः ।। याज्ञवल्क्यशिक्षा। श्रीमद्याज्ञवल्क्यमहर्षिप्रणीता। (यजुर्वेदसंहितापाठस्वरादिज्ञानोपयोगिनी) मुरादाबादनिवासि स्व० पण्डित श्रीज्वालाप्रसाद- मिथविरचितया भाषाटीकया समलंकृतार सेयं क्षेमराज-श्रीकृष्णदासघोष्टिना मुम्बय्यां स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम् ) मुद्रणालये मुद्रयित्वा प्रकाशिता। संवत् १९७५, शके १८४०, सर्वाधिकार "श्रीवेङ्कटेश्वर" यन्त्रालयाध्यक्षने स्वाधीन रक्खा है। KARNIRAO मसान यह पुस्तक खेमराज श्रीकृष्णदासन खेतवाडी ७ वी गली सम्बाटा लैन, निज "श्रीवेस्टेश्वर" स्टीम् प्रेस वम्बईमे अपने लिये छापकर प्रकाशित किया.
श्री।
अथ याज्ञवल्क्यशिक्षा प्रारभ्यते
,53
राज
श्रीगणेशाय नमः।
अथातस्त्रयलक्षणव्याख्यास्यामः ॥
उदात्र धानुदात्तश्चस्वरितश्चतथैवच ॥
लक्षणवर्णयिष्यामिदैवतंस्थानमेवच ॥१॥
अव यजुर्वेदियोंके उपयोगिनी याज्ञवल्क्यशिक्षाका आरंभ करते हैं। प्रथम
तीनों स्वरोंका लक्षण कहते हैं, उदात्त अनुदात्त और स्वरित यह तीन स्वर हैं ।
इनके लक्षण देवता स्थान वर्णन करता हूं ॥१॥
शुकमुच्चं विजानीयानीचंलोहितमुच्यते ॥
श्यामंतुस्वरितविद्यादग्निरुचतुदैवतम् ॥२॥
उदात्त स्वर शुक्ल, अनुदात्त लाल, स्वरितका श्याम रंग है, उदात्तका अनि
देवता ॥२॥
नीचेसोमंविजानीयात्स्वरितेसविताभवेत् ॥
उदात्तंबामणंविद्यान्नीचःक्षत्रियउच्यते ॥३॥
अनुदात्तका चन्द्रमा, स्वरितका सविता देवता है, उदात्त ब्राह्मण, अनुदात्त
क्षत्रिय, ॥३॥
वैश्यंतुस्वरितविद्याद्भारद्वाजमुदात्तकम् ॥
नीचंगौतममित्याहुर्गाय॑चस्वरितविदुः ॥ ४॥
स्वरितस्वर वैश्य वर्ण है. उदात्तका भरद्वाज, अनुदात्तका गौतम और स्वस्तिका
गाय ऋषि हैं ॥ ४॥
विद्यादुदात्तंगायत्रंनीचं त्रैष्टुभमुच्यते ॥
जागतंस्वरितविद्यादतएवं नियोगतः॥५॥
उदासका गायत्री, अनुदात्तका त्रिष्टुप्, स्वरितका जगती छन्द जानना
चाहिये ॥५॥
गांधर्ववेदेयेप्रोक्ताःसप्तषड्जादयःस्वराः ॥
तएववेदेविज्ञेयास्त्रयउच्चादयःस्वराः ॥६॥
.
(४) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे-
गान्धर्व वेदमें जो षड्ज मध्यम धैवत पंचम ऋषभ गांधार निषाद यह सात स्वर
कहे हैं, वे वेदमें उदात्त अनुदात्त स्वरितके अन्तर्गत जानना ॥ ६ ॥
उच्चौनिषादगांधारौनीचौऋषभवती ॥
शेषास्तुस्वरिताञयाःपड्जमध्यमपंचमाः ।.७ ।।
निषाद गांधार उदात्त हैं, ऋपभ धैवत अनुदात्त हैं, पड्ज मध्यम पंचम यह
स्वरित है ॥ ७॥
पड्जोवेदेशिखंडीस्याटपभःस्थादजामुखे ॥
गावोरटंतिगांधारंक्रौञ्चाश्चैवतुमध्यमम् ॥ ८॥
वेदमें षड्ज स्वर मयूरकी वाणी है, वकरीके मुखसे ऋपभका शब्द होता है, गौ
गांधार और कौंच (चकवा) मध्यम स्वरसे बोलता है ॥ ८॥
कोकिलःपञ्चमोज्ञेयोनिपादंतुवदेद्गजः॥
आश्वश्वधैवतोज्ञेयःस्वराःसप्तेतिगीयते ॥ ९ ॥
कोकिला पंचम स्वरसे, हाथी निषाद स्वरसे, घोडा धैवत स्वरसे बोलता है.
इसप्रकार यह सात स्वर हैं ॥ ९॥
निमेषमात्रःकाल स्याद्विद्युत्कालस्तथापरे ॥
अक्षरात्तुल्ययोगाचमतिःस्यात्सोमशर्मणः ॥ १० ॥
जितनी देरमें पलक लगे इतने कालका नाम निमेष है, कोई कहते हैं जितने
समयमें बिजली चमकै इतने कालको निमेष कहते हैं, वर्गों के असमान सम्बन्धके
उच्चारणमें जितना समय लगे वह एक मात्रा कहाती है. यह सोमशर्माका
कथन है॥१०॥
सूर्यरश्मिप्रकाशाद्याकणिकायत्रदृश्यते ॥
आणवस्यतुसामात्रामात्राचचतुराणवा ॥ ११ ॥
सूर्यको किरणोंके प्रकाशमें जो अणु दिखाई देते हैं वही अणुकी मात्रा है। यह
चार अणुकी एक मात्रा होती है ॥ ११॥
मानसेचाणवविद्यात्कण्ठेविद्याद्विराणवम् ॥
विराणवंतुजिह्वाग्रेनिस्सृतंमात्रिकंविदुः ॥ १२॥
मनमें अणु कण्ठमें आनेतक दो अणु, जिह्वाके अग्रभागमें आनेमें तीन अणु.
और बाहर निकलनेपर मात्रा होती है ॥ १२ ॥
'
याज्ञवल्क्यशिक्षा। (५)
अवग्रहेतुकालःस्यादर्धमात्राप्रकीर्तिता॥
पदयोरंतरेकाल एकमात्राविधीयते ॥ १३॥
"समासविशिष्ट पदके पूर्वभागमें एक मात्रा काल विराम करके अग्रिम पदका
उच्चारण करना चाहिये यह अवग्रह है याज्ञवल्क्यके मतम अर्धमात्रिक कालका
विराम नहीं कहा है जितना समय अवग्रहमें लगे वह अर्धमात्राका समय है,
और पदोंके अन्तरमें एक मात्रा विरामकाल है ॥ १३ ॥
ऋचोर्द्रतुद्विमावास्यात्रिमात्रःस्याहगंतके ||
रिक्तंतुपाणिमुत्क्षिप्यदेमात्रेधारयेवुधः ॥ १४ ॥
आधी ऋचा होनेपर दो मात्राका समय, और ऋक्की पूर्तिम तीन मात्राका
समय है, रीते हाथको दो मात्रा पर्यन्त बुद्धिमान उठावै ॥ १४ ॥
एकमात्रोभवेद्धस्वोद्विमात्रोदीर्घउच्यते ॥
त्रिमात्रस्तुप्लुतोज्ञेयोव्यंजनश्चार्द्धमात्रकम् ॥ १५ ॥
एक मात्राका हस्व, दोका दीर्घ, तीनका प्लुत होता है, और व्यंजन अर्ध
मात्राका होता है ॥ १५ ॥
विवृतौचावसानेचऋचोचतथापरे ॥
पदेचपादसंस्थानेशून्यहस्तविधीयते ॥ १६॥
विवार प्रयत्नमें अवसानमें अर्धऋचामें तथा पर पदम, पदके अन्तमें, शून्य
इस्तका प्रयोग कर ॥ १६ ।।
प्रणवंतुप्लुतंकुर्याद्वयाहृतीर्मातका विदुः ॥
चापस्तुवदतेमात्रांद्विमात्रांवायसोब्रवीत् ॥ १७॥
ॐकारको प्लुत उच्चारण करै व्याहृति मातृकारूप हैं, नीलकण्ठ एक मात्रासे
बोलता है, काक दो मात्रासे बोलता है ॥ १७ ॥
शिखीवदेत्रिमात्रांवैमात्राणामितिसंस्थितिः ॥
वर्णोजातिश्चमात्राचगोत्रंछन्दश्चदैवतम् ॥ १८॥
मोर तीन मात्रासे बोलता है, वर्णों की जाति मात्रा गोत्र छन्द देवता ॥ १८ ॥
एतत्सर्वसमाख्यातंयाज्ञवल्क्येनधीमता ॥
हस्तौतुसंयतौधा?जानुभ्यासुपरिस्थितौ ॥ १९ ॥
यह सव बुद्धिमान् याज्ञवल्क्यजीने वर्णन किया है । अब अध्ययनविधि कहत
हैं नियमित होकर अपने दोनों हाथोंको दोनो जांघोंपर धरै ॥ १९ ॥
, (६) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे- गुरोरनुमतंकुर्यात्पठन्नान्यमतिर्भवेत् ॥ ऊरुभागेतृतीयेतुकरंविन्यस्यदक्षिणम् ॥ २० ॥ और गुरुकी आज्ञासे अनन्यमति होकर पाठ आरंभ करै, ऊरुके तृतीय भागमें दहिना हाथ धरके ॥ २० ॥ प्रसन्नमानसोभूत्वाकिंचिन्निम्नमधोमुखम् ।। प्रणवंप्राक्प्रयुञ्जीतव्याहृतीस्तदनंतरम् ॥ २१ ॥ प्रसन्न मनसे कुछ मुख नीचा किये हुए पहले ॐकार और फिर ब्याहतियोंका उच्चारण करके ।। २१ ॥ सावित्रींचानुपूव्येणततोवेदान्समारभेत् ॥ कूर्मोङ्गानीवसंहत्यचेष्टांदृष्टिंढंमनः ॥ २२ ॥ फिर गायत्रीको पाठकर वेदोंका आरंभ करै, जिस प्रकार कछुआ अपने अंग संकुचित करलेताहै, इसीप्रकार चेष्टा दृष्टि और मनको दृढ करै ॥ २२ ॥ स्वस्थःप्रशांतोनिर्भीकोवर्णानुच्चारयेवुधः॥ नाभ्याहन्याननिहन्यानगायेनैवकंपयेत ॥ २३ ॥ स्वस्थ, शान्त, भौर निर्भय होकर अक्षरोंको बुद्धिमानीसे उच्चारण कर, नं एक वर्णके उच्चारणमें दोदो उच्चारण करै, न तोडकर पढे, न गाता हुआ और न कम्पित होताहुआ पढे ॥ २३ ॥ यथैवोच्चारयेद्वांस्तथैवैतान्समापयन् ॥ निवेश्यदृष्टिहस्ताग्रेशास्त्रार्थमनुचिन्तयेत् ॥ २४ ॥ जिसप्रकार वाँको उच्चारण करै उसीप्रकार समाप्त कर, दृष्टिके अग्रभागमें हाथको रखकर शास्त्रके अर्थको बिचारे ॥ २४ ॥ सममुच्चारयेद्वर्णान्हस्तेनचमुखेनच ॥ स्वरश्चैवतुहस्तश्चद्वावेतौयुगपत्स्थितौ ॥२५॥ हाथसे स्वर और मुखसे वर्णोंको. उच्चारण करै, स्वर और हाथ यह दोनों समान ही स्थित होते हैं ॥ २५ ॥ हस्तभ्रष्टःस्वरभ्रष्टोनवेदफलमश्नुते ॥ नकरालोनलंबोष्टोनाव्यक्तोनानुनासिकः ॥ २६ ॥ हस्त और स्वरसे भ्रष्ट होनेसे वेदपाठका कल नहीं मिलता, तीक्ष्ण बोलना
...
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याज्ञवल्क्यशिक्षा।
(७)
लम्बे होठ करना, जो समझमें न आवे ऐसा अव्यक्त उच्चारण करना ॥ २६ ॥
गद्गदोबद्धजिह्वश्चनवर्णान्वक्तुमर्हति ॥
प्रकृतिर्यस्यकल्याणीदंतोप्टौयस्यशोभनौ ॥२७॥
बोलनेम कंठका गद्गद होना, जिताका वद्ध होना, इनसे वर्ण उच्चारण नहीं हो
सकता जिसकी प्रकृति अच्छी है और जिसके दांत तथा होठ अच्छे हैं ॥ २७ ॥
प्रगल्भश्चविनीतश्चसवर्णान्वक्तुमर्हति ।।
शंकितंभीतमुद्देष्टमव्यक्तमनुनासिकम् ॥२८॥
जो उच्चारणमें प्रगल्भ और गुरुजनोंके सामने नम्रता विनयसे संपन्न है वह वर्ण
उच्चारण अच्छीरीतिसे कर सकता है. शंकित, भीत, ऊंचा बोलना, अस्पष्टता, ना-
सिकामें बोलना ॥ २८॥
काकस्वरंमूर्ध्निगतंतथास्थानविवर्जितम् ॥
विस्वरंविरसंचैवविश्लिष्टंविषमाहतम् ॥२९॥
काककी समान वोलता सब वाँको मूमि उच्चारण करना स्थानरहित
बोलना, कुस्वरसे बोलना, अमिलित वोलना, विषमरूपसे आहत करना ॥२९॥
व्याकुलंतालहीनंचपाठदोषाश्चतुर्दश ॥
संहितास्वारबहुलः पदसंज्ञासमाकुलः ॥ ३० ॥
व्याकुलता, लयरहित होना यह चौदह पाठके दोष हैं। संहिता, स्वरकी अधिकाई
और पद संज्ञासे व्याप्त ॥ ३०॥
क्रमसंधिसमाकीर्णोदुस्तरोमंत्रसागरः ॥
ऋक्संहितांत्रिरभ्यस्ययजुषांवासमाहितः ॥ ३१ ॥
क्रम और संधिसे युक्त मंत्रसागर वडा दुस्तर है ऋक् वा यजु संहिताको
तीनवार सावधानीसे अभ्यास करकै ॥ ३१॥
सानांवासरहस्यांचसर्वपापैःप्रमुच्यते ॥
संहितानयतेसूर्यपदंचशशिनःपदम् ॥ ३२ ।।
वा रहस्यसहित सामका पाठ करके सब पापोंसे छूट जाता है . संहिता सूर्य-
लोकको पद चन्द्र के लोकको ॥ ३२॥. .
क्रमश्चनयतेसूक्ष्मयत्तत्पदमनामयम् ॥
कालिंदीसंहिताञयापदयुक्तासरस्वती ॥ ३३ ॥
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(८) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे-
और क्रम सूक्ष्म अनामय पदको प्राप्त करता है, संहिता कालिन्दी है पदयुक्त
सरस्वती है ॥ ३३ ॥
क्रमेणावर्त्ततेगंगाशंभोर्वाणीतुनान्यथा ॥
यथामहाह्रदंप्राप्यक्षिप्तोलोप्टोविनश्यति ॥ ३४ ॥
: क्रमपाठ गंगा है, यह शिवकी वाणी अन्यथा नहीं है, जैसे महाद्दमें डाला
हुआ ढेला नष्ट हो जाता है ॥ ३४ ॥
एवंदुश्चरितंसर्ववेदेत्रिवृतिमज्जति ॥
आम्रपालाशविल्वानामपामार्गशिरीपयोः ॥
वाग्यतःप्रातरुत्थाय भक्षयेदंतधावनम् ॥ ३५ ॥
इसी प्रकार तीन बार वेदपाठसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं, आम, ढाक, वेल,
चिरचिटा, शिरस इन वृक्षोंकी सवेरेही उठकर मौन हो दतौन करै ।। ३५ ॥
खदिरश्चकदंबश्चकरवीरकरंजकौ ॥
एतेकंटकिनःपुण्याक्षीरिणस्तुयशस्विनः ॥३६॥
खैर, कदम्ब, कनेर, करंज, यह काँटेवाले वृक्ष . पुण्यदायक हैं, क्षीरवाले यश-
दायक है ॥ ३६॥
तेनास्यकरणेसूक्ष्ममाधुर्यचैवजायते ॥
त्रिफलांलवणाक्तांवैभक्षयेच्छिध्यकःसदा ॥
क्षीणमेधाजनन्येपास्वरवर्णकरीतथा ॥ ३७॥
इनकी दतानसे मुखमें सूक्ष्म मधुरता होती है, हर्ड बहेडा आमला यह सैंधा-
नमकके साथ सदा शिष्य खाय, यह क्षीण बुद्धिवालेकी बुद्धि बढाती और
स्वर तथा वर्ण करनेवाली वस्तु है ॥ ३७॥
स्वरहीनंतुयोधीतेमंत्रवेदविदोविदुः॥
यजूपिनोसाधयंतिभुक्तमव्यंजनंयथा ॥ ३८ ॥
जो स्वरके विना मंत्रपाठ करते हैं, यजुप् उनके कार्य सिद्ध नहीं करसकता, ऐसा
वेदज्ञ कहते हैं जैसे अव्यंजनवस्तु खाई कुछ कर्म सिद्ध नहीं करती ॥ ३८ ॥
हस्तहीनंतुयोधीतेस्वरवर्णविवर्जितम् ॥
ऋग्यजुस्सामभिर्दग्धोवियोनिमधिगच्छति ॥३९॥
. . याज्ञवल्क्यशिक्षा। (९) जो हस्तहीन तथा वरवर्ण विहीन वेद पाठ करते हैं, वह ऋक् यजुष सामसे दग्ध हुए कुयोनिमें गमन करते हैं ॥ ३९ ॥ ऋचोयजू,पिसामानिहस्तहीनानियः पठेत् ॥ अनृचोब्राह्मणस्तावद्यावत्स्वारंनविंदति ॥ ४० ॥ जो विना हाथोंके चलाये ऋक् यजुम् सामको पढते हैं, वह स्वरज्ञानके विना बाह्मण ऋचाहीन कहाता है ॥ ४० ॥ ज्ञातव्यश्चतथैवार्थोवेदानांकमसिद्धये ।। पाठमात्रापपाठातुपंकेगौरिवसीदति ॥११॥ इसी प्रकार क्रम वा कर्मसिद्धिके निमित्त वेदका अर्थ भी जानना चाहिये, केवल पाठ वा अशुद्धपाठसे कीचमें फंसी गौकी समान दुःखी होता है ॥ ४१ ॥ स्वरवर्णप्रयुंजानोहस्तेनाधीतमाचरन् ।। ऋग्यजुस्सामभिःपूतोब्रह्मलोकमवाप्नुयात् ॥ ४२॥ जो स्वर वर्णका प्रयोग करते हस्तयुक्त वेद, पढते हैं, वे ऋक् यजुष सामसे पवित्र होकर ब्रह्मलोकको गमन करते हैं ॥ ४२ ॥ नकुर्वीतपदंदीर्धनकुर्वीतविलंबितम् ॥ पदस्यग्रहमोक्षौचयथाशीघ्रगतिहयः॥ ४३ ॥ पदको दीर्घ न करे, विलम्बमें उच्चारण न करै, पदके ग्रहण और त्यागमें शीव्रगतिवाले अश्वकी समान आचरण करै ॥ ४३ ॥ आदरंकुरुयत्नेनकारणंहितदात्मकम् ॥ आस्येनचशयंकुर्यात्पठनान्यमतिर्भवेत् ॥१४॥ यत्नपूर्वक आदरसे पाठ करे, कारण कि यह कारणही तदात्मक है, मुखपर हाथ न लगाकर अनन्य मनसे पाठ करै ॥४४॥ नचास्यमुष्टिबंधीस्यानचात्युत्तममाचरेत् ।। चुलुéकास्फुटोदंडीस्वस्तिकोमुष्टिराकृतिः ॥ एतेवैहस्तदोषाःस्युःपरशुश्चैवसप्तमः ॥ ४५ ॥ हाथकी बहुत मुट्टी न बांधे, न बहुत हाथ फैलावे चुल्लू नौका दण्डकी समान, स्वस्तिक (सीधी हथेली करना) मुष्टिकी समान आकृति करना, फरसेकी समान आकार करना, यह सात हाथके दोप हैं ॥ ४५ ॥ . - , (१०) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे- यथावाणीतथापाणीरिक्तंतुपरिवर्जयेत् ॥ यत्रयत्रस्थितावाणीपाणिस्तत्रैवतिष्ठति ॥ ४६॥ जैसी वाणी हो वैसाही हाथ होरीता हाथ न चलावे, जहाँ जहाँ वाणी स्थित हो वहीं वहीं पाणि स्थित हो ॥ ४६ ॥ यथाधनुष्याविततेशरेक्षिप्तेपुनर्गुणः ॥ स्वस्थानप्रतिपद्यततद्वद्धस्तगतःस्वरः ।। ४७ ॥ जैसे धनुष बँचकर वाण छोड़नेसे डोरा फिर अपने स्थानको प्राप्त हो जाता है, इसी प्रकार हाथसे स्वर प्रक्षेप होते हैं ॥ ४७ ॥ उत्तानसोन्नतंकिंचित्सुव्यक्तांगुलिरंजितम् ।। स्वरविद्धंकरंकुर्यात्प्रादेशाद्देशगामिनम् ॥ ४८॥ ऊंचा करनेमें कुछ ऊंचा जिसमें अंगुली स्फुट सीधी रहै, इस प्रकार बारह अंगुलके मध्यमेही गति करता हुआ हाथ स्वर वोधन करे ॥ ४८ ॥ अंगुष्ठस्योत्तरेपर्वतर्जन्युपरियद्भवेत् ॥ प्रादेशस्यतुसोदेशस्तन्मात्रंचालयेत्करम् ॥ ४९॥ अँगूठके ऊपरके पौरुएमें तर्जनीके ऊपर पोरुएतक फैलाया हुआ हाथ प्रादेश कहाता है, इतनेही स्थानमें कर चालन करे ।। ४९ ॥ मनुष्यतीर्थोच्चंकृत्वापितृतीर्थोदकंव्रजेत् ॥ नामितंकरपृष्ठेतुसव्यक्तांगुलिमोक्षणम् ॥ ५० ॥ उदात्तको मनुष्यतीर्थसे उच्च करे, पितृतीर्थ [ अंगुष्ठ प्रदेशिनीके मध्यमें जैसे जल जाता है ] करपृष्ठकी समान नीचा करे जिसमें अंगुलिमोक्षण प्रगट दिखाई दे ॥ ५॥ स्वरितेव्यंगुलंविद्यान्निपातेतुषडंगुलम् ॥ उत्थानेतुनवांगुल्यमेतत्स्वारस्यलक्षणम् ॥५१॥ खरितमें तीन अंगुल, अनुदात्तमें छ। अंगुल, उदात्तमें नौ अंगुल कर चालन करे, यह स्वरका लक्षण है ।। ५१ ॥ अभ्यासार्थेद्वतांवृत्तिप्रयोगार्थेतुमध्यमाम् ॥ शिष्याणामुपदेशार्थेकुर्यावृत्तिविलंबिताम् ॥ १२ ॥ अभ्यासके निमित्त शीघ्रवृत्ति, प्रयोगके निमित्त मध्यम वृत्ति, और शिष्यके उपदेशके निमित्त विलम्वित वृत्तिका आश्रय करे ॥ १२ ॥ . --
याज्ञवल्क्यशिक्षा। (११)
ऐंद्रीतुमध्यमावृत्तिःप्राजापत्याविलंबिता ॥
अनिमारुतयोवृत्तिःसर्वशास्त्रेषुनिंदिता ॥५३॥
मध्यमा वृत्तिका इन्द्र देवता, विलम्बित वृत्तिका प्राजापत्य देवता, शीघ्र गतिका
अग्नि और वायु देवता है, यह वृत्ति सब शास्त्रोंमें निन्दित है ॥ ५३ ॥
मुष्टयाकृतिर्मकारेतुनकारेतुनखाग्रतः ॥
अनुस्वारेंगुष्टपातऊष्मांतेंगुलिमोक्षणम् ॥५४॥
मकारके उच्चारणमें मुष्टिकी आकृति, नकारके उच्चारणमें नखाग्रकी आकृति,
अनुस्वारमें अंगुष्ठपात, और ऊष्माण (शषसह) में अंगुलि मोक्षण करे ॥ ५४ ॥
उदात्तंचविपातेनप्रचयंनोग्रएवच ॥
शेषषडंगुलंबिंद्यानिचितंतुविधीयते ।। ५५ ।।
भौंकी ओर हाथ करके उदात्त, नासाके अग्रभागमें हाथ रखकर पचय स्वर
उच्चारण करे, और शेप स्वरमें छ: अंगुल हाथ नीचा करें ॥ ५५ ॥
पडंगुलंनुजात्यस्यहस्तस्यानुपथस्यच ॥
तचतुर्भागमात्रंतुहस्तस्तेनैववर्तयेत् ॥ ५६ ॥
जात्यस्वरमें छः अंगुल हाथ चले, और उसके चतुर्भागमात्र हाथसे अनुपथ
स्वर वर्ते ।। ५६ ॥
ककारांतेटकारांतेडणेचांगुलिनामयेत् ॥
पंचांगुल्यपकारेतुतकारकुंडलाकृतिः ॥.५७ ॥
ककारके अन्तमें टकारान्तमें दणके उच्चारणमें अंगुलि झुकावे, पकारमें पांचों
अंगुलि मिलारे ॥ ५७ ॥
ऊर्ध्वक्षेपाच्चयोष्माचणधःक्षेपाचयोभवेत् ॥
एकैकामुत्सृजेदीरःस्वरितेतूभयंक्षिपेत् ॥ ५८ ॥
तकारके उच्चारणमें कुंडलाकार कर ऊपर हाथसे चय उष्मा स्वर, नीचे हाथके
पातसे अनुदात्त बुद्धिमान् एकर आंगुल उत्सृजन करै स्वरितमें दोनोंको त्यागदे ५८॥
अंगुष्ठाकुंचनलघावनुस्वारेत्वपारसम् ॥
दीघेरंगेचतर्जन्या प्रसार परिकीर्तितः ॥१९॥
लघु अनुस्वारमें अंगुष्ठको आकुंचन करै, यथा । अपा ५ रसम् । ६०९३]दीर्घ
रंग [ अभिगृणन्तु देवा १४।४ ] में तर्जनीका प्रसार कहा है ॥ ५९ ॥
(१२) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे-
तर्जन्यंगुष्टयोःस्पर्शेप्युदात्तंप्रतिविधते ॥
नीचंतुमध्यमंकुर्याच्छेषंनीचतरंक्रमात् ॥ ६० ॥
तर्जनी और अंगुष्ठके स्पर्शमें उदात्त है नीचस्वरको मध्यम और शेषको क्रमसे
नीचतर करै ॥ ६ ॥
स्वरितंयद्भवेत्किचिद्रकारसहसंयुतम् ॥
ऊष्माणंतद्विजानीयानिक्षिपेदुभयोरपि ॥६॥
स्वरित जो किंचिद् वकारसे संयुक्त हो उसको उष्माणसंज्ञक जाने, उनमें
कारको द्वित्व कर दे ॥ ६१ ॥
स्वरितसंज्ञेचनिक्षिप्तेसंयोगोयत्रदृश्यते ॥
द्विमात्रिकेभवेदेकमात्रिकेतूभयंक्षिपेत् ॥ ६२॥
स्वरितसंज्ञक निक्षेपमें जहाँ संयोग दिखाई दे तो वह द्विमात्रिक होजाता है अर्थात्
दिमात्रिकमेंका एक क्षेप द्वित्व होजाता है, त्रिमात्रिकमें दोनोंको द्वित्व करे ।। ६२ ।।
जात्येचस्वरितेचैववकारोयत्रदृश्यते ॥
कर्तव्यस्तूभयो क्षेपो वायव्यइतिदर्शनम् ॥ ६३ ॥
जात्य और स्वरित होनेमें जहां वकार दिखाई दे, वहाँ दोनोंका क्षेप करे, यथा
वायव्ये १९।२६ यह उदाहरण है ॥ ६३ ॥
शृंगवद्वाथवत्सस्यकुमारीकुचयुग्मवत् ।।
उभक्षेपस्वरोयत्रसविसर्गउदाहृतः ॥ ६४॥
बछड़ेके सींगकी समान वा कुमारीके दोनों स्तनोंकी समान दो विन्दु विसर्ग
कहाते हैं ॥ ६४॥
विसर्गातस्वरोयत्रस्वरितोयत्रदृश्यते ॥
दीर्घश्चैवतुकारश्वतत्रोभक्षेपउच्यते ॥ ६ ॥
जहाँ विसर्गान्त स्वर स्वरित दिखाई दे और वकार दीर्घ हो तो दोनोंको द्वित्व
करै ॥६५॥
त्रिविधस्तुभवेदृष्याप्रचिताबलकातरा ॥
स्वरितेप्रचितांविद्यान्निपातेबलकांविदुः ॥ ६६ ॥
उष्मवर्ण तीन प्रकारके होते हैं, प्रचिता, बलका, तरा, स्वरितमें प्रचित और
निपातमें बलका ॥६६॥
kini याज्ञवल्क्यशिक्षा। (१३) उत्थानेतुतथाताराएताभिस्त्रिभिरूष्मभिः । मात्रामात्रांविदित्वातुततःक्षेपंप्रयोजयेत् ॥ ६७॥ उत्थानमें तारा, इस प्रकार तीन ऊष्माणोंकी मात्रासे मात्राको जानकर द्वित्व करै ॥ ६७॥ अक्षरंभजतेकाचित्काचिद्वित्वेप्रतिष्ठितम् ॥ समानेजातिकाकाचित्काचिदूष्माप्रदायिका ॥ ६८॥ कोई अक्षरको भजते, और कोई द्वित्वमें प्रतिष्ठा मानते हैं, कोई समान जातिका और कोई ऊष्माप्रदायिका है ॥ ६८ ॥ यथाबालस्यसर्पस्यउच्छासोलघुचेतसः ॥ एवमूष्माप्रयोक्तव्याहकार परिवर्जितः ॥ ६९ ॥ जैसे बाल सर्पका लघुचित्तसे उच्छास होता है, इसप्रकारसे हकारको छोड़कर शपस ऊष्माणोंका प्रयोग करै ॥ ६९ ॥ विवृत्तिप्रत्ययादूष्मांप्रवदंतिमनीषिणः ।। तामेवप्रतिषेधंति आई उए निदर्शनम् ॥ ७० ॥ · बुद्धिमान विवारकी प्रतीतिसे ऊष्माको जानते हैं, कहीं नहीं भी होती, यथा आई ऊ ए ॥ ७० ॥ अष्टौस्वरान्प्रवक्ष्यामि तेषामेवतुलक्षणम् ॥ जात्योभिनिहित क्षेत्र प्रश्लिष्टश्चतथापरः ॥७१ ॥ आठ स्वर और उनके लक्षण कहता हूँ, जात्य, अभिनिहित, क्षेत्र,प्रश्लिष्ट|७१॥ तैरोव्यञ्जनसञ्ज्ञश्चतथातैरोविरामकः ॥ पादवृत्तोभवेत्तद्वत्ताथाभाव्यइतिस्वराः॥७२॥ रोव्यंजन, तैरोविरामक, पादवृत्त और ताथाभाव्य, एक पदमें प्रथमका अक्षर अनुदात्त हो उसके अनन्तर यकार वकार हो तो वह जात्य स्वर है अथवा अपूर्वक य, व, जात्य स्वर होते हैं ॥७२॥ एकपदेनीचपूर्वःसयवोजात्यइष्यते ॥ अपूर्वोपिपरस्तद्- धान्यंकन्यास्वरित्यपि ॥ एकपद इत्याह ॥ नीचपूर्वः सयकारवकारौ वा जात्यः स्वरितो भवति ॥ यथाजात्यं मनुष्यानिति । सुप्वेति । चम्वीव । धान्यम् । कन्याइव , (१४) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे- स्वः। वीर्यम् । एवं ह्याह यानिचान्यानीहग्लक्षणानि प- दानि भवंति । एओआभ्यामुदात्ताभ्यामकारोरिफितश्चयः॥ अकारोयत्रलुप्येततंचाभिनिहितंविदुः ॥ ७३ ॥ यथा मनुष्यान् ११३१ पदपाठे । सुप्वेति ।। ३ चम्वीवेति २० । ७० धान्यम श२० कन्या इव १७१७ स्वः १८१ ६४ वीर्यम् १२ । ९४ इसी प्रकारके इन लक्षणोंके औरभी पद जानने, ए ओ इन उदात्त स्वरोंमें जहां अकार रेफके साथ अकारका लोप होजाय उसे अभिनिहित कहते हैं ॥ ७३ ॥ यथा कुक्कुटः असि । कुक्कुटोसि ३ । १६ । वेदः+असि । वेदोसि २।२१ भागः+असि । भागोसि ।६।१६मारुतः+ असि । मारुतोसि । १८१४९ श्वशुत्रः असि । श्वात्रोसि । ५॥३१ । ते+अप्सरसामातेप्सरसाम् २४।३७ ते अतु । तेऽवन्तु १९।१७। कः असि । कोसि ७।२९। सः+अहम् । सोहम् । १८१३५ एवठहियानिचान्यानिईदृग्लक्षणानि- पदानिभवंति । इउवर्णीयदोदात्तावापोतेयवौक्वचित् ॥ अनुदात्तेपदेनित्यंविंद्यात्क्षप्रस्यलक्षणम् ॥ ७४ ॥ जैसे कुक्कुट: असि-कुक्कुटोसि ॥१६॥ व्वेदः असि-वेदोसि २१ इत्यादि । इसी भाँति और भी इन लक्षणोंवाले पद जानने । इ उ वर्ण उदात्त होकर कहीं तो नित्य अनुदास पदमें स्थित होनेसे उन्हें क्षेम द्वित्व जानै ॥ ७४ ॥ यथा त्रि+अंबकम् । त्र्यंबकम् ३ । ६० । द्रु+अन्नः। द्वन्नः११ ७० व्वीड+अंगः । व्वीवङ्गः २९।५१ वाजी+अर्बुन्। वाज्य- वन् १११४४ एवछंह्याह यानि भवंति ॥ इकारोयत्रदृश्येत इकारेणैवसंयुतः॥ उदात्तश्चानुदात्तेन प्रश्लिष्टोभवतिस्वरः॥७॥ १ यह चिह वह है कि, यह उदाहरण यजुसंहिताके अमुकअध्यायके अमुक मंत्रमें है आगे भी - इसी प्रकार माना।
याज्ञवल्क्यशिक्षा। 18315 (१५) यथा त्रि+अम्बकम्-त्र्यम्बकम् ३१६० इत्यादि इसी प्रकार और पद जानने, जहाँ इकार इकारहीसे संयुक्त दीखै वह उदात्त अनुदात्तसे युक्त प्रश्लिष्ट स्वर होता है ॥ ७ ॥ अभि+इन्धताम् । अभीन्धताम् ११३६१। अभि+इमम् । अभीमम् ३८ १७। वि इहि । व्वीहि १२।२७। खुचि+इव । सुचीव । चम्वी+इव । चम्वीवेति । एव ह्याह यानिचान्यानि उदात्तपूर्वयत्किचिच्छंदसिस्वरितंपदम् ॥ एषसर्वबहुस्वारस्तै रोव्यंजनउच्यते ॥ ७६ ॥ यथा अभि+इन्धताम्-अभीन्धताम् इत्यादि इसीप्रकार औरभी पद जानने छन्दमें जो उदात्तपूर्वक कोई पद हो यह सब बहुत स्वरखाला तैरोव्यंजन कहाता है । ७६ ॥ इ. ३।९। रते। हव्य । काम्ये । चंद्रे । ज्योते । अदिति । सरस्वती। महि । विश्श्रुतीतिभवंति । एवछंह्याहयानि भवं ति ॥ अवग्रहात्परोयस्तुस्वरितःस्यादनंतरम् ॥ तैरोविरामंतं विद्यादात्तोयद्यवग्रहः ॥ ७७॥ यथा इडे, रन्ते, इत्यादि इसप्रकार औरभी जाने, उदात्त · अवग्रह स्वरसे परे जो स्वरित हो तो उसको तेरोविराम . जाने और उसके विपरीत तैरोव्यंजन होता है ।। ७७॥ यथा गोमुदिति गो+मत् २०।८१ गोपताविति गो+पती॥१ अप्रेति प्र+प्र १२।३० । विततेति वि+तता २९ । ४० ताते ति ता+ता २५१४०।समिइति सम्+इद्धः।२०।१ पदपाठे एव ह्याहयानि भवंति।। स्वरेति स्वरितेचैवविवृतिर्यत्रहश्य- ते। पादवृत्तोभवेत्स्वारः श्वित्रआदित्येतिनिदर्शनम् ॥ श्वित्रः+ आदित्यानाम् ॥ श्वित्र आदित्यानाम् २४ । ३९ । पुत्रः ईधे । १ तैरोव्यञ्जनमन्यथा इति वा पाठः । २ स्वरयोरन्तरे काले इति वा पाठः ।
(१६) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसहिता-परिशिष्टभागे- पुत्र ईधे ११।३३। दात्रे एधि । दात्रएधि । कः ईम् । कईम् ३३ । ५५ ताः अस्याताअस्या एवछंह्याहयानि भवन्ति। उदात्ताक्षरयोर्मध्येभवेन्नीचस्त्ववग्रहः ॥ तथाभाव्यंभवेत्कंपस्त नूननेतिनिदर्शनम् ॥ ७८॥ यथा तनून इतितलू+नप्त्रेदा५ तनूनपादितितनू+नपात् २१ । १० तनूनपातमिति तनू+नपातम् २८।२ । एवई ह्याहयानिपदानिलक्षणानिभवंति ॥ इत्यष्टपदसमानायवै- शेषिकेयाज्ञवल्क्यवचनानांपदानांपाठःसमाप्तः ।। यथा गोमदिति गो + मत् इत्यादि इसी प्रकार और भी जाने । स्वर और स्वरित इन दोनोंके मध्यमें जहाँ विवृत स्वर दिखाई दे, वह स्वर पादवृत्त होता है, यथा श्वित्रः + आदित्यानाम् श्वित्रऽआदित्यानाम् इत्यादि । जहाँ उदात्त अक्षरके बीचमें अनुदात्त अवग्रह हो वह तथाभाव्यस्वर कहाता है, तनूनने यह दृष्टान्त है ॥ ७॥ यथा तनूनन इति तनु नत्र इत्यादि इसीप्रकार इस लक्षणके औरभी पद जानने । इत्यष्टपदसमानाये वैशेषिके याज्ञवल्क्यवचनानां पदानां पाठः समाप्तः ॥ माध्यंदिनविरोधिःस्यात्तथाभाव्यस्तुयःस्मृतः ॥ स्वरोनैवात्रदृश्येतभित्रोदात्तानुदात्तकौ ॥ १॥ माध्यन्दिन विरोधी तथाभाव्य इसमें नहीं देखा जाता कारण कि इसमें उदात्त अनुदात्तसे रहित स्वर नहीं देखा जाता ॥१॥ स्वराःस्पांतःस्थोष्माणः।। कंठय। जिह्वामूलीय । तालव्य। मूर्धन्य । दंत्य । ओष्ठय । यमा विसर्जनीयनिपातायाश्चकिंव वर्णदेवत्यलिंगाः स्वराः शुक्लाः नानादेवत्याः।स्पर्शाः कृष्णाः। कपिला अंतस्थाः। उष्माणोऽरुणाः। नीला यमाः। हरिता नासिक्याः। पीतोनुस्वारः। रक्तोजिह्वामूलीयः। पीतउपध्मा- नीयः । श्वेतोविसर्जनीयः । शबलो रंगः।अतिनीलोनुनासि- क्यः । इत्यंतर्मध्यमयो सिक्यविद्यात् ॥ द्विरुदात्ताख्याइति , १ इमान्युदाहरणानि संहितापदयो तव्यानीति ।
.
याज्ञवल्क्यशिक्षा।
(१७)
स्मृताः॥ उदमनुदुनिपाते आधेचोपसर्गेनामाख्यातेचोपसर्ग-
निपाताश्चेति। किंदैवत्याः।अक्षराणांचकेपुरुषाः। काःस्त्रियः।
कानि नपुंसकानि इत्यत्रब्रूमः। कंठयाआग्नेयाः अकारादयः॥
जिह्वामूलीया नैर्ऋत्याः ककारादयः। तालव्याः सौम्याः
चकारादयः । वायव्या मूर्धन्याष्टकारादयः । रौद्रा दंत्याः
तकारादयः । औष्टथा आश्विन्याः पकारादयः ॥ शेषा
वैश्वदेवाः अम् इत्येवमादयः । स्वरास्तुब्राह्मणाज्ञेयावर्गाणां
प्रथमाश्चये । द्वितीयाश्चतृतीयाश्चचतुर्थाश्चापिभूमिपाः ॥२॥
स्वर, स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्माण, कण्ठस्थानीय, जिल्लामूलीय, उपध्मानीय,
तालुस्थानीय, मूर्धास्थानीय, दन्तस्थानीय, ओष्ठस्थानीय, यम, विसर्ग, निपात;
कौनकौनसे वर्ण, किसकिस देवता लिंगवाले हैं सो कहते हैं, उनमें स्वर · शुक्लवर्ण
नानादेवतावाले हैं, स्पर्श (कसे म तक) कृष्ण वर्ण हैं, अन्तस्थ ( यरलव) कपि-
लवर्ण,ऊष्माण (शपसह ) अरुण वर्ण हैं,यम (वर्गों के पहले चारके आगे पांचवां
परे होनेपर मध्यमें पूर्वसदृश वर्ण) नीलवर्ण नासिकास्थानीय अनुनासिक (ङ ज
ण नम) हरित वर्ण हैं, अनुस्वार पीतवर्ण जिह्वामूलीय ४ क.: ख रक्तवर्ण,
उपध्मानीय ५ प फ पीतवर्ण विसर्ग श्वेत वर्ण रंग शवल (कबरारंग ) अनुना-
सिक अतिनीलवर्ण इसी प्रकार स्वर और अन्तस्थके मध्यमें वर्णान्तको अनुनासिक
जानै द्वि उदात्त हैं। उत् निपात (एक अक्षरवाले) उपसर्गके आदिके उपसर्ग
और निपात यह किन देवताओंवाले हैं,इन अक्षरों में कौन स्त्री और कौन पुरुष है,
कौन नपुंसक है, सो कहते हैं, कण्ठ्यवर्ण अकारादि अग्नि देवतावाले हैं, तालुस्था-
नवाले चकारादि चन्द्रदेवतावाले हैं, मूर्धास्थानवाले टकरादि वायुदेवतावाले हैं,
दन्तस्थानवाले कारादि रुद्रदेवतावाले हैं, ओष्ठस्थानीय पकारादि अश्विनीदेवता-
वाले हैं, अं इत्यादि शेषवर्ण विश्वेदेवादेवतावाले हैं, स्वर वर्ण ब्राह्मण हैं, तथा वर्गों के
प्रथम द्वितीय तृतीय चतुर्थ अक्षर क्षत्रियवर्ण हैं ॥२॥
वर्गाणांपंचमावैश्याअंतस्थाश्चतथैवच ।
ऊष्माणश्चहकारश्चशूद्राएवप्रकीर्तिताः॥३॥
वर्गौके पांचवें अक्षर और अन्तस्थ शूद्र वर्ण हैं, उष्माण और हकार यह शूद्र
कहाते हैं ॥३॥
शुक्वर्णानिनामानिआख्यातारोहितामताः ॥
कपिंजलास्तूपसर्गाःकृष्णाश्चैवनिपातकाः ॥३॥
, . (१८) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे- 'नामिक शुक्ल वर्ण है, आख्यात (क्रिया) रक्तवर्ण उपसर्ग कपिजल वर्ण, और निपात कृष्णवर्ण हैं ॥ ४॥ भार्गवगोत्राणिनामानि भारद्वाजा आख्याताः। वासिष्ठाउपसर्गास्तु निपाताःकाश्यूपाःस्मृताः॥ पीतवर्णश्चोपसर्गो निपातःकृष्णवर्णकः ॥ सर्वतुसौम्यमाख्यातं नामवायव्यंश्यते ।। अग्नियस्तूपसर्गःस्यान्निपातोवारुणःस्मृतः ॥६॥ नामिक भार्गवगोत्र, आख्यात भारद्वाज गोत्र हैं, उपसर्ग वासिष्ठ गोत्र, और निपात कश्यपगोत्रवाले हैं, उपसर्ग पीत और निपात कृष्ण वर्ण हैं, सब आख्यात चन्द्र देवतावाले, सब नामिक वायुदेवता वाले हैं, उपसर्गोका अग्नि निपातका वरुण देवता है ॥ ५॥ प्रथमाश्चतथांतस्थाः स्त्रीलिंगाःपरिकीर्तिताः ।। शेषाक्षराणिपंढानिप्रार्लिंगविवेचकाः ॥६॥ प्रथम स्वर और अन्तस्थवर्ण स्त्रीलिंग है, शेष अक्षर नपुंसक हैं ऐसा लिंग- ज्ञाता कहते हैं ॥ ६॥ नानामिंद्रोदेवतावरुण उपसर्गाणामादित्यःसर्वस्याक्षरंगणस्य स्वरा विसर्जनीयोयमाश्चपुंलिंगाः। ङञणनमायरलवाःस्त्री- लिंगाः। शेषाण्यक्षराणिनपुंसकलिंगानीति ॥ संधिश्चतुर्वि- धोमवतीति ॥ लोपागमौ वर्णविकारः प्रकृतिभावश्चेति । तद्यथा तत्रलोपोभवति अयक्ष्मा+मा अयक्ष्मामा 11 शतजा वायुरेशततेजाव्वायु १ । २४ । तिग्मतेजा द्वि- घुतः । तिग्मतेजाद्विषत १॥२४ इतिलोपः॥ आगमोभवति यथा प्रत्यङ्सोमःप्रत्यक्सोमः १० । ३९ प्राक्सोमः प्राङ्क- सोमः १९१२ अस्मान् सीते अस्मान्त्सीते १२।६१ त्रीन सुमुद्रान त्रीन्समुद्रान १३॥३० इतिआगमः ॥ विकारोभवति आ+इदम् एदम् ।। १ आ इमे एमे ९।१८ आ+इष्ट्रयः एष्ट्रय: १८॥४१ प्राइषितत्प्रेषितः २१. १६७ इतिविकारः।। १ आदित्यो मुनिभिः प्रोक्तः सर्वाक्षरगणस्य च । स्वराविसर्जनीयाश्च यंमा:पुल्लिङ्गका स्मृताः इति वा पाठः।
। - याज्ञवल्क्यशिक्षा। (१९) प्रकृतिभावो यथा,आशुरे शिशानः । युञ्जान प्रथुमम्। अदि- तिस्पोर्डशाक्षरेण ९।३४ | देवोवःसविता १ । १ इतिप्रकृति भावः ॥ आकाशस्थायथाविद्युत्स्फुटितामणिसूत्रवत् ॥ एष च्छेदोविवृत्तीनांयथावालेषुकतरी ॥ ७ ॥ नामिकका इन्द्र, उपसर्गोका वरुण और सब अक्षरोंका सूर्य है, स्वर विसर्ग और यम पुंलिंग हैं, ङ, ञ, ण, न, म, य, र, ल, व, यह स्त्रीलिंग हैं शेप अक्षर नपुंसकलिंग हैं, संधि चार प्रकारकी होती है लोप, आगम, वर्णविकार, और प्रकृतिभाव, उनमें लोप जैसे · अयक्ष्मा मा अयक्ष्मामा इसमें विसर्गोंका लोप हुआ है इत्यादि । आगम जैसे प्रत्यङ्सोमा प्रत्यक्सोमः यहां ककारका आगम हुआ इत्यादि, विकार जैसे आ+इदम् एदम् इत्यादि यहां आ+ इ के स्थानमें ए विकार हुआ, प्रकृतिभाव जैसे आशुःशिशानः इत्यादिमें ज्योंका त्यों रहगया आकाशमै जैसे विजली मणिसूत्रवत् स्फुरायमाण होती है, इसीप्रकारसे विवृत्तिका छेद होना चाहिये जैसे वालोंम केची ॥ ७ ॥ द्वयोस्तुस्वरयोर्मध्येसंधिर्यत्रनहश्यते ॥ विवृत्तिस्तत्रविज्ञेयायऽईशेतिनिदर्शनम् २२॥२॥८॥ दो स्वरोंके मध्यमें जहां संधि न दीखे वहां विवृत्ति जाननी, जैसे य ईशः॥८॥ पिपीलिकापाकवतीतथावत्सानुसारिणी॥ वत्सानुसंसृताचैवचतस्रस्तुविवृत्तयः ॥ ९॥ विवृत्ति चार प्रकारकी होती है पिपीलिका, पाकवती, वत्सानुसारिणी, वत्सा- नुसंसृता ॥९॥ पंचरंगाः प्रवर्ततेपातनिर्घातवत्रिणः॥ अहरप्रहरोज्ञेयअइउऋओइतिनिदर्शनम् ॥ १० ॥ घात, निर्घात, वनी, अहर, प्रहर यह पांच रंग हैं जैसे अ इ उ ऋ ओ. यह निदर्शन है ॥ १०॥ पिपीलिकाआयंतदीर्घानाभ्याऽआसीदितिनिदर्शनम्३।१११३ पाकवत्युभयो स्वाविनऽइन्द्रेतिनिदर्शनम् ॥ ११ ॥ आदि और अन्तमें दीर्घवाली पिपीलिका विवृत्ति कहाती है,यथा नाभ्याऽआसी- दन्तरिक्षम इत्यादि। आदि अन्तमें हस्वपाकवती विवृत्ति होती है,यथा विनइन्द्र इत्यादि ॥ ११॥ १ (२०) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे- अंतेचवत्सानुसृजितातानऽआवोढमश्चिनेतिनि० २० । ७४ वत्सानुसारिणीचादौदीर्घाताऽअस्येतिनि०॥ १२॥ अन्तमें दीर्घ वत्सानुसृजिता होती है,तानाआवोढमश्विना यह उदाहरण और आदिमें दीर्घ होवे वत्सानुसारिणी होती है ताऽअस्य यह उदाहरण है ॥ १२ ॥ करिणीकुर्विणीचैवहारिणीहारिणीतिच ॥ तथाहंसपदानामपंचताःस्वरभक्तयः ॥ १३ ॥ करिणी, कुर्विणी, हरिणी, हारिणी और हंसपदा यह पांच स्वरभक्ति हैं ॥ १३॥. करिणीरहयोोगेकुर्विणीलहकारयोः॥ हरिणीरषयोोंगेहारितालऋपकारयोः ॥१४॥ रह के योगमें करिणी,लकार हकारके योगमै कुर्विणी,र, प के योगमें हरिणी ऋधकारके योगमें व ल, षकारके योगमें हारिता ॥ १४॥ . यातुहंसपदानामसातुरेफपकारयोः ॥ १५ ॥ र, प के योग हंसपदा भक्ति होती है ॥ १५ ॥ दुवंबुर्हि २११४४ रितिकरिणीउपवल्हेतिकुर्विणी २३ । ४६ हरिणी ११३३६ मरेषसइत्याहुारिणीशतवल्शेतिच॥१६॥ देवंबहिँ यह करिणी, उपवल्हेतिं यह कुर्विणी, दर्शतमिति यह हरिणी, शतव- ल्शेति यह हारिणी ॥ १६ ॥ वर्षोवर्षीयसीत्याहस्तथाहंसपदेतिच ६।११॥रलाभ्यांपरऊ ष्माणोयत्रस्युः स्वरितोदयाः ॥ स्वरभक्तिरसौज्ञेयापूर्वमाक्रस्य पठ्यते ॥ स्वरभक्तिंप्रयुंजानस्त्रीन्दोषान्परिवर्जयेत् ॥ १७ ॥ वर्षोवर्षीयसि यह हंसपदा भाक्तिका उदाहरण है । र, ल से परे जहां उष्माण स्वरितोदय हो इसको स्वरभक्ति जान्ना,यह पूर्वको आक्रमण कर पढ़ी जातीहै,भक्ति प्रयोगके तीन दोषोंको त्याग करै ॥ १७ ॥ इकारंचाप्युकारंचप्रस्तदोषंतथैवच ॥ एतल्लक्षणमाख्यातंयाज्ञवल्क्येनधीमता ।। १८॥ इकार उकार और प्रस्तदोष इनका लक्षण बुद्धिमान याज्ञवल्क्यने कथन किया ॥ १८॥.. सम्यक्पाठस्यसिद्ध्यर्थशिष्याणांहितकाम्यया ॥ १ हरिणी दर्शतमिति ११ । १६ शतकल्मोत हरिता ५॥ ४५ - याज्ञवल्क्यशिक्षा अर्धमात्रास्वरंकिंचित्पृथङ्न्यूनमिवोच्चरन् । ऋकारेहकारहत्कंठमनसानि । अमर भलीप्रकार पाठकी सिद्धि और शिष्योंके हितकी कामनासें कहा है, अर्धमा- त्राका स्वर कुछ पृथक् न्यून उचारण कर, ऋकार हकारको हृदय कंठ और मनसे उच्चारणकरै ॥ १९॥ नैतत्स्वरितपूर्वांगेनापरांगेकथंचन ॥ नस्वरेनचमात्रायांकथंस्वारोविधीयते ॥२०॥ यदि कहो कि यह स्वरित पूर्वांग परांग स्वर और मात्रामें जव नहीं तो कैसे स्वरका विधान किया जाय ॥२०॥ परांगस्यतुयत्पूर्वपूर्वागस्यतुयत्परम् ॥ उभयोरर्द्धसंयोगेस्वारंकुर्याद्विचक्षणः ॥२१॥ संयोगंतुपरंस्वाऱ्यापरंसंयोगनायकम् ॥ संयुक्तस्यत्तुवर्णस्यनस्वायंपूर्वमक्षरम् ॥ २२ ॥ संयोगमें यह स्वर पर और परसंयोगमें नायक कहाता है ऐसा जाना. संयुक्त वर्णका पूर्व अक्षर स्वर नहीं होता ॥ २१ ॥ २२ ॥ उदात्तादनुदात्तेतुवामाया वआरभेत् ॥ उदात्तात्स्वारतोदात्तौक्रमाद्दक्षिणतोन्यसेत् ॥२३॥ अनुदात्तमें उदात्त इसको वामभूसे आरंभ करे उदात्तसे स्वरित उदात्तको क्रमसे दक्षिणको लारे ॥ २३ ॥ स्वरितादनुदात्तायेप्रचयस्तान्प्रचक्षते ॥ एकस्वरानपिचतानाहुस्तत्त्वार्थचिन्तकाः ॥२४॥ स्वरितसे उत्तरम अनुदात्त हो तो उसको तत्त्वज्ञाता प्रचय स्वर कहते हैं, अथवा 'एकस्वर भी कहते हैं ॥ २४ ॥ प्रचयोयत्रदृश्येततत्रहन्यात्स्वखुधः ॥ स्वरित केवलोयत्रमृदुस्तत्रनिपातयेत् ॥ २५ ॥ जहां प्रचय दिखाई दे बुद्धिमान वहां स्वरभंग करै और जहां केवल स्वरित हो वहां मृदु निपातन करे -॥ २५ ॥ दुर्बलस्ययथाराष्ट्रहरतेबलवान्नृपः ॥ एवंव्यंजनमासाथ अकारोहरतेस्वरम् ॥ २६॥ .
(२२) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे-
जैसे बली राजा दुर्बल के राज्यको हरते हैं इसी प्रकार व्यंजनको प्राप्त होकर
अकार स्वरको हरणकरता है. ॥ २६ ॥
उच्चादुच्चतरंनास्तिनीचान्नीचतरंतथा ॥
अक्षरातुल्ययोगाच्चनीचेनीचगतानिच ॥२७॥
उच्चसे उच्च और नीचसे नीच नहीं होता, अक्षर तुल्य योगवाले हैं नीच स्वरको
प्राप्त होकर नीचे हो जाते हैं ॥ २७ ॥
स्वरउच्चःस्वरोनीचःस्वरःस्वरितएवच ॥
स्वरप्रधानैस्तैःस्वार्यव्यंजनंतेनसस्वरम् ॥ २८ ॥
स्वरही उच्च स्वर अनुदात्त और स्वरही सरित होता है, स्वरही स्वर में प्रधान
है उसीसे व्यंजन स्वरखाला कहाता है ॥ २८ ॥
व्यंजनान्यनुवर्ततेयत्रतिष्ठतिसस्वरः ॥
स्वरप्रधानत्रैस्वर्यमाचार्या प्रवदंतिहि ॥२९॥
खरकी ओरही व्यंजन अपनी अनुवृत्ति करते हैं, इन तीनोंमें स्वरही प्रधान है
यह आचार्य कहते हैं ॥ २९ ॥
मणिवद्वयंजनंविद्यात्सूत्रवञ्चस्वरंविदुः ॥
आचार्या सममिच्छतिपदच्छेदंतुपंडिताः ॥३०॥
'मणिकी समान व्यंजन और सूत्रकी ससान स्वर है,आचार्य समकी और पंडित
पदच्छेदकी इच्छा करते हैं ॥ ३० ॥
स्त्रियोमधुरमिच्छंतिविकृष्टमितरेजनाः॥
उदात्तंनानुवर्ततेनीचंनस्वरितंतथा ॥३१॥
स्त्री मधुर पदार्थकी और दूसरे जन अव्यक्त शब्दकी इच्छा करते हैं, जो उदात्त'
अनुदात्त और स्वरितका अनुवर्तन नहीं करते ॥ ३१ ॥
विस्वरतविजानीयादीर्घह्रस्वविवर्जितम् ॥ हरिवरुणवरेण्येषुधारा
हिपुरुषेषुच ॥ वैश्वानरोनकारे १८७२ चशेषास्तुस्वरितानराः ।
(स्वारतोरेफवैश्वानरोनकारः शेषाकार स्वरितानराः)॥३२॥
हस्व दीर्घसे वर्जित उसको विस्वर जाने, हरि, वरुण, वरेण्य, धारा, पुरुष इनमें
रेफ स्वरितत्वके समान आचरण करता है, वैश्वानर शब्दमें नकार सरितत्वकी समान
आचरण करता है और नर शब्दमें रेफकोही स्वरितत्व होता है ॥ ३२ ॥
द्वौवरुणौचस्वरितौ उदुत्तमं १२ । २. त्वंव्वरुण ३३ ॥ ३२॥
- याज्ञवल्क्यशिक्षा। ( २३.) धारेचैवोरुधारेतु पुरुधारेच दोहनमात्रिकंवाद्विमावास्वरितं यदिहाक्षरम् ॥ तस्यादितोड़मात्रावैशेषंचपरतोभवेत् ॥३३॥ उदुत्तमं त्वं वरुण इनमें वरुण शब्दके दो वकारोंमें का एक वकारही स्वरितवद् होता है रेफ नहीं, उरुधारा इत्यादिमें धा शब्दही स्वरितवत होता है, एक मात्रा वा दो मात्राका जो अक्षर खरित हो तो द्विमात्रिकमें आंधी मात्रा उदात्त आधी अनुदात्त शेप स्वरित होता है “यह पाणिनिसे विलक्षण है" ॥ ३३ ॥ नकारांतेपदेपूर्वेश्मश्रुभिः २६११ परतः स्थिते ॥ छकारंनंप्रयुंजीताशसंधिसमुच्चरेत् ॥ ३४ ॥ नकारान्त पदके आगे यदि श्मश्रु शब्द हो तो शकारको छकारका प्रयोग न करे न और शकी सन्धि करै ॥ ३४ ॥ ओकारः २ । १३ प्लुतविज्ञेयः प्लुतमन्नाद्वितीयकम् ८1१०॥ लाजीज्छाची २३।८ तृतीयंचविवेशेति २३।४९ चतुर्थकम् ३९ ओकार प्लुत जानना यथा अग्ना द्वितीयकम् लाजीञ्छाची तीसरा और विवे- शेति यह चौथा प्रयोग है ॥ ३५ ॥ अधस्विदासी २३ । ७४ पंचमंचोपरिस्विदासीच्चषष्टकम् ॥ सप्तमंतुलिबेस्मारअष्टमनैवविद्यते ॥ लकारस्यतुदीर्घत्वंनास्ति वाजसनेयिनः ॥३६॥ अधःस्विदासीत् पांचवां और उपरि स्विदासीत् छठा प्रयोग है, सातवाँक्लिवे स्मार और आठवां प्रयोग नहीं है वाजसनेयी शाखावालोंके मतमें लकारका दीर्व नहीं है ॥ ३६॥ उच्चस्तानागतेहस्तेस्वरितंनोपपद्यते ॥ अधस्थायदागच्छेत्स्वरितंनतदाभवेत् ॥ ३७॥ -हाथके उदात्त मार्गमें प्राप्त होनेसे स्वरित प्रगट नहीं होता, और जब अनु- दात्तपनको प्राप्त होतो स्वरित नहीं होता ॥ ३७॥ कचटतपादृश्यतेसंधिस्थानेषुनित्यशः॥ स्ववर्गेणैवसंयुक्तामोक्षंकुर्वीततत्रवै ॥ ३८ ॥ क च ट त प यह संधिस्थानमें नित्य दिखाई देते हैं, अपने वर्णवालोंसे - संयुक्त होकर फिर पृथक नहीं होते:॥ ३८॥ 41 (२४) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे- तकारांतेपदेपूर्वेसकारेपरतःस्थिते ॥ प्रत्यारंभनकुर्वीतपापावितिनिदर्शनम् ॥ ३९ ॥ जब पूर्वमें तकारान्त पद आगे सकार स्थित हो तो प्रत्यारंभ न करै यथा पापाविति ॥ ३९॥ ककारांतेपदेपूर्वेसकारेपरतःस्थिते ।। खसवर्णविजानीयाद्भिखक्सेतिनिदर्शनम् २१।२६ ॥४०॥ ककारान्त पद पूर्वमें और आगे सकार हो तो खसवर्ण जानै यथा भिखक्सेन इति ॥ ४०॥ तकारांतेपदेपूर्वेचवर्गपरतःस्थिते ॥ मोसंतत्रापिकुर्वीत यच्चशेपेनिदर्शनम् ६। १७॥४१॥ नकारान्त पद पूर्वमें आगे चवर्ग स्थित हो तो वहां वर्ण मोक्ष करै यथा यच्च शेपे यह दृष्टान्त है ॥ ४१॥ ङकारांतेपदेपूर्वे सकारेपरतःस्थिते ॥ कसवर्णविजानीयात्प्राक्सोमेतिनिदर्शनम् १८॥३॥४२॥ पूर्वमें डकारान्त पद हो आगे सकार स्थित हो तो उसका सवर्णी 'क' जाना, प्राक्सोमः यह उदाहरण है ॥ ४२ ॥ टकारांतेपदेपूर्वेसकारेपरतः स्थिते ॥ टसवर्णविजानीयात्सम्राट्संभृतेतिनिदर्शनम्३९।४॥४३॥ जो पूर्वमें टकारान्त पद हो आगे सकार स्थित हो तो टकार सवर्णी हो यथा सम्राट् संभृत इति ॥ १३ ॥ तकारांतेपदेपूर्वेसकारेपरतःस्थिते ॥ ..थसवर्णविजानीयात्तत्सवितुनिदर्शनम् ३ ॥ ३५ ॥४४॥ 'तकारान्त पद पूर्वमें हो आगे सकार हो तो 'थ'का सवर्णी हो तत्सवितु० यह उदाहरण है ।। ४४ ॥ नकारातेपदेपूर्वेसकारेपरतःस्थिते ॥ तसवर्णविजानीयात्रीन्समुद्रेतिनिदर्शनम् १३३३२१४५ १ नैतन्माध्यन्दिनीयानां संस्थानत्वात्तयोयोः। सहभानेपि द्वितीय स्यादापस्तम्बस्य यन्मतम् ॥ इत्यधिकः पाठः । .
N याज्ञवल्क्यशिक्षा। (२५) नकारान्त पद पूर्वमें हो सकार आगे हो तो त सवर्णी हो, यथा त्रीन्समुद्रान् यह उदाहरण है ॥ ४५ ॥ पकारांतेपदेपूर्वे शकारेपरतःस्थिते ॥ फसवर्णविजानीयादनुष्टुप्छारदीतिनिदर्शनम् १३१५७॥४६॥ पकारान्त पद पूर्व में हो आगे शकार हो तो फ सवर्णी जाने अनुष्टुप् शारदी यह उदाहरण है ॥ ४६॥ मकारांतेपदेपूर्वेसवणेपरतःस्थिते ॥ मसवर्णविजानीयादिमम्मेतिनिदर्शनम् २१११ ॥४७॥ मकारान्त पदके आगे सकार हो तो सवर्णी मकार हो 'इमम्मे' यह उदा-. हरण है ॥ ४७॥ वर्णेतुमात्रिकपूर्वेअनुस्वारोद्विमात्रिकः॥ द्विमात्रेमात्रिकोज्ञेयः संयोगायश्चयोभवेत् ॥४८॥ एक मात्रावाले वर्णके आगे द्विमात्रिक अनुस्वार हो तो द्विमात्रिक द्विमात्रा- वाला जानो, जिसका जो संयोग हो ॥४८॥ अनुस्वारोद्विमात्र स्याहवर्णव्यंजनादिगः ॥ ह्रस्वाद्वायदिवादीर्घाद्देवानाठहृदयेभ्यइतिनि० ॥१६४६४९ अनुस्वार दो मात्रावाला हो ऋवर्ण व्यंजनके पूर्व में प्राप्त हुआ हो तो द्विमात्रिक होता है, हस्व वा दीर्घ चाहै किसीसे परे हो देवानां हृदयेभ्यः यह उदाहरणहै ॥४९॥ अनुस्वारस्योपरिष्टात्संवृतंयत्रदृश्यते । दीर्घतंतुविजानीयाच्छ्रोताग्रावाणेतिनिदर्शनम् ॥२६॥५०॥ अनुस्वारके आगे यदि संवृत प्रयत्नवाला वर्ण दीखे तो उसे दीर्घ जाने, श्रोता ग्रावाणः यह उदाहरण हैं ॥ ५० ॥ अमुस्वारस्योपरिष्टात्संयोगोयत्रहश्यते ॥ बस्वंतंतुविजानीयात्सठस्थेतिनिदर्शनम् ॥ २९।२९॥५१॥ अनुस्वारके ऊपर जहां संयोग दीखै उसे हस्ख जानै सस्था यह दृष्टान्त है।५१॥ अनुस्वारश्चयोदी_दक्षरायोभवेत्परः।। सतुह्रस्वइतिज्ञेयोमंत्रेष्वेव विभाषया ॥५२॥ .
D - (२६) वाजसनेयित्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे- दीर्घ अक्षरसे परे जो अनुस्वार हो, वह विकल्प करके मंत्रोंमें हस्व होता है॥५२॥ ओभावश्चविवृत्तिश्चशपसारेफएवच ॥ जिह्वामूलमुपध्माचगतिरष्टविधोष्मणः ॥५३॥ ओभाव, विवृत्ति, श, ष, स, रेफ, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय, यह आठ प्रका. रकी ऊष्माकी गति है ॥ ५३ ॥ यद्याभावप्रसंधानमुकारादिपरंपदम् ॥ स्वरांतंतादृशंविद्याद्यदन्यद्वयक्तमूष्मणः ॥५४॥ ओभावके आगे यदि उकारादि पद हो तो उसे स्वरान्त जाने और इस्से अन्यत्र उमाका ओभाव जानै ॥ ५४॥ उभावादुत्थितश्चोष्मातांतुकेलिविनिर्दिशेत् ॥ विवृत्तंप्रतियाऊष्माविज्ञेयाविकटानना ॥ ५५ ॥ ओभावको प्राप्त हुई ऊष्माकेलि कहाती है, और विवृत्तिके आगे जो अष्मा हो उसे विकटानना कहते हैं ॥ ५५ ॥ लीढातिलीढविधुच्चशषसेषुप्रकीर्तिताः॥ जिह्वांमूलेचरेफेचविज्ञेयाविठकाशंठा ॥५६॥ लीढ अतिलीढ और विद्युत् यह क्रमसे श ष स में कही है, अर्थात नाम है जिह्वामूलीय और रेफ यह विठक और शठ नामवाले हैं ॥५६ ॥ उपध्मानीयसहितांपुष्पिणींतांविनिर्दिशेत् ॥ अन्यत्रयाभवेदूष्मासुलभांतांविनिर्दिशेत् ॥ ७ ॥ उपध्मानीयके सहित ऊष्माको पुष्पिणी कहते हैं, इसके शिवाय अन्य ऊष्मा सुलभा कहाती है । ६७॥ पादाद्यपदायंतंतथावग्रहकालिकम् ॥ ईषत्स्पृष्टंविजानीयात्तस्मिन्कालेतुकारयेत् ॥५८ ॥ पादके वा पदके अन्तके अक्षर वा अवग्रह स्वरके अक्षरको ईपस्पृष्ट प्रयत्न जानै, यह उस उच्चारण कालमें ही जानै ॥१८॥ पादादौचपदादौचसंयोगावग्रहेषुच ॥ जःशब्दइतिविज्ञेयोयोन्यासयइतिस्मृतः॥ उपसर्गपरोयस्तुपदादिरपिदृश्यते ॥ १९ ॥ १ ओभावमागता इति वा पाठः। २ चपला तथा वा पाठः।
याज्ञवल्क्यशिक्षा। (२७)
पादकी आदिमें वा पदकी आदिम वा संयोग और अवग्रहमें 'या का 'ज'
उच्चारण करे, इससे अन्यको यकारही उच्चारण करना चाहिये जो उपसर्गसे परे
और पदकी आदिमें दीदै ॥ ५९ ॥
ईषत्पृष्टंयथाविद्युत्पदच्छेदात्परंभवेत् ॥
त्वदर्थवाचिनौवोवांवावेयदिनिपातजौ ॥ ६ ॥
वह अक्षर ईपत्स्पृष्ट प्रयत्ल हैं, यथा विवत् परन्तु पद और छन्द करनेपर ही,
त्वदर्थ (तुम्हारे ) अर्थ वाची वो वां वा वे यदि निपातसे हुए हैं ॥ ६ ॥
आदेशश्चविकल्पार्थाईपत्स्पृष्टाइतिस्मृताः॥
विभाषयायकारःस्यात्तथानेतिपदात्परः॥ ६१ ॥
तो इनको ईपस्पृष्ट प्रयत्न जान और निपातन किये विकल्प अर्थवाले आदेश
हैं.क्योंकि पाणिनिशास्त्रमें भी आदेश, विकल्पार्थ कहे हैं, नकारके आगे यदि
यकार हो तो उसके स्थानमें अकारका उचारण विकल्पसे होता है ॥ ६१॥
भवतीत्यपिपूर्वैवतथाचसपदादपि ॥
यदेवलक्षणंयस्यवकारस्यापितद्भवेत् ॥ ६२॥
यत्रयत्रविशेषःस्यादिदानीससकथ्यते ॥
वकारस्त्रिविधःप्रोक्तोगुरुर्लधुर्लघूतरः ॥ ६३ ॥
और पूर्वमें तथा सपदके आगे भी जाना जो यकारका है वही वकारका जानो,
जो जहां विशेप है सो अवश्य कहते हैं वकारके तीन भेद हैं गुरु लघु लघुत्तर॥६२॥६३॥
आदौगुरुर्लधुर्मध्येपदांतेचलघूतरः ॥ ६ ॥
आदिमें गुरु मध्यमें लघु और पदान्तमें हो तो लघुतर कहाता है ॥ ६४ ॥
यवर्णस्त्रिविधःप्रोक्तोगुरु घुर्लघूतरः ॥
आदौगुरुर्लधुर्मध्येपदान्तेतुलघूतरः ॥ ६५ ॥
यकारके भी तीन भेद हैं गुरु लघु लघुतर आदिमें गुरु मध्यमें लघु और पदा-
न्तमें लघुतर कहाताहै ॥६५॥ .
सन्धिजौतुपदान्तीयावुपसर्गपरौलघू ॥
अथमासनशब्देभ्योविभाषाडितेयवौ ॥ ६६ ॥
(२८) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे- सन्धि करनेसे हुआ पदान्तका, उपसर्गसे आगे हो तो लघु मा स-न शब्दोंसे परे वा द्विरुक्तिमें विकल्प करके य लघुतर जाना ॥ ६६ ॥ पञ्चमादुत्तरोयोवोयदिचैकपदेभवेत् ॥ संहितायांलघुःसोपिपदकालेगुरुभवेत् ॥ ६७ ॥ पांचवें अक्षरसे आगे य, व, यदि एक पदमें हों तो संहितासे यह लघु हुएभी पदके समय गुरु हो जाते हैं ॥ ६७ ॥ हकारेरेफसंयुक्तसवर्णोदयएक्वा ॥ सुस्पृष्टतंविजानीयायकारोनान्ययुग्यदि ॥ ६८॥ (जात्य स्वरितमें जहां वकार हो तो दोनोंकोही निक्षेप करै यथा वायव्यै और जात्य स्वरितमें यकार हो तो दोनोंका क्षेप करै यया सदस्यै ७।४५ यह उदाहरण है पहले कह चुके हैं ) रेफसंयुक्त हकार और ऋवर्णमें सुस्पृष्ट प्रयत्न जाने यदि यकार दूसरेमें संयुक्त न हो तो ।। ६८ ।। उपांशुस्वरितंचैवयोधीतेवित्रसन्नपि ॥ अपरूपसहस्राणांसंदेहेषुप्रवर्तते ॥ ६९ ।। जो अप्रकाशित तथा बहुत सहजमें तथा शीघ्रतासे व्याकुलतापूर्वक पढता है, वह सहस्रों भ्रष्टरूपोंके सन्देहोंमें पड़ता है ॥ ६९ ॥ पंचविद्यानगृहंतिजडास्तब्धाश्चयेनराः ।। आलसाश्चातिरोगाश्चयेषांचविस्मृतमनः ।। ७० ॥ जड, स्तब्ध, आलसी, रोगी, और भूलनेवाले यह पांच विद्याको नहीं प्राप्त करते ॥७०॥ अहेरिवगणागीतःसंमानान्नरकादिव ॥ राक्षसीभ्यइवस्त्रीभ्यासविद्यामधिगच्छति ॥ ७१ ॥ जो संघसे सर्पकी समान सन्मानसे नरककी समान स्त्रियोंसे राक्षसियोंकी समान डरता है, वही विद्याको प्राप्त होता है ॥ ७१ ॥ नभोजनविलंबीस्यानचनारीनिबंधनः॥ सुदूरमपिविद्यार्थीव्रजेद्गुरुडहंसवत् ।। ७२ ॥
याज्ञवल्क्यशिक्षा।
(२९)
भोजन करनेमें देर न करे, स्त्रियों के बंधन में न रहे. और गुरुस्थान दूर होवे तो
भी गरुड हंसकी समान अतिशीघ्र वहां जापहुँचे ॥ ७२ ॥
यथाखनन्खनित्रेणनरोवार्यधिगच्छति ॥
तथागुरुगतांविद्यांशुश्रूषुरधिगच्छति ॥ ७३ ॥
जैसे कुदालसे खोदता हुआ मनुष्य जलको प्राप्त करता है, इसी प्रकार शुरुषा
करनेवाला गुरुकी विद्याको प्राप्त करलेता है ॥७३॥
सुखार्थीचेत्त्यजेद्रियांविद्यार्थीचेत्त्यजेत्सुखम् ।।
सुखिनश्चकुतोविद्यासुखंविद्यार्थिनःकुतः ॥ ७४ ॥
जो सुखकी इच्छा करे वह विद्या नहीं पढ सकता, जो विद्यार्थी होना चाहै वह
सुखकी अभिलाषा न करै, सुखियोंको विद्या कहां और विद्यार्थियोंको सुख कहां७४॥
गुणिताशतशोविद्यासहस्रावर्तितापुनः ।।
आगमिष्यतिजिह्वाग्रेस्थलानिम्नमिवोदकम् ॥ ७६ ॥
सैकड़ोंवार गुनी हुई सहस्रोंबार आवृत्ति की हुई विद्या जिह्वाके अग्रभागमें उप-
स्थित होती हैं, जैसे नीचे स्थानसे जल ॥ ७५ ॥
शतेनगुणिताविद्यासहस्रेणचतिष्ठतिः॥
शतानांचसहस्रणप्रत्यंचमवतिष्ठति ॥ ७६॥
सौ आवृत्तिसे गुणित होती, और सहस्रबार आवृत्तिसे स्थित रहती है और
लक्ष आवृत्ति से पूजित रहती है ॥७६ ॥
जलमभ्यासयोगेनशिलायांकुरुतेक्षयम् ॥
कर्कशानांमृदुस्पर्शकिमभ्यासानसाध्यते ॥ ७७ ॥
जैसे जलके अभ्याससे शिलाओंमें मार्ग पडनाते हैं, कठिन वस्तुओंके स्पर्शमें
मृदुता होती है ऐसेही अभ्याससे क्या २ सिह नहीं होता ॥ ७७॥
गुरुशुश्रूषयाविद्यापुष्कलेनधनेनवा ॥
अथवाविद्ययाविद्याचतुर्थनोपलभ्यते ॥ ७८ ॥
गुरुकी महती सेवासे वा अधिक धनसे अथवा विद्याके बदलनेसे विद्या प्राप्त
होती है ॥ ७ ॥
शुश्रूषारहिताविद्याह्यल्पमेधागुणैः सह ।
वंध्याचयौवनीतस्यानविद्याफलिनीभवेत् ॥ ७९ ॥
(३० ) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे- जो विद्या गुरुकी शुश्रूषासे रहित हैं, तथा अल्पबुद्धि और अल्प गुणसे ग्रहण की हुई यौवनवती बन्ध्याकी समान वह विद्या फलवती नहीं होती ॥ ७९ ॥ हयानामिवजात्यानामर्धमात्रार्द्धशायिनाम् ।। नहिविद्यार्थिनांनिद्राचिरंनेत्रेषुतिष्ठति ।। ८० ॥ जैसे जात्य संज्ञक घोडे अर्धमात्रापर्यन्त शयन करते हैं, इसी प्रकार विद्यार्थियोंके नेत्रोंमें चिरकालतक निद्रा स्थित नहीं रहती ।। ८० ॥ यथापिपीलिकैःपांसुर्वल्मीकंक्रियतेमहान् ॥ नतत्रबलसामर्थ्यमुघमस्तत्रकारणम् ॥ ८१ ॥ जैसे पिपीलिका धूरिके कणोंसे बड़ी वल्मीक बनालेती है उसमें बलकी बात नहीं है, केवल इसमें उद्योगही कारण है, ऐसेही उद्योगसे विद्या आती है। ८१ ॥ अंजनस्यक्षयंदृष्ट्वावल्मीकस्यतुसंचयम् ॥ अवंध्यंदिवसंकुर्यादानाध्ययनकर्मसु ॥ ८२ ॥ सुरभेका क्षय और बमईका संचय देखकर दान अध्ययनके काम निरन्तर समय व्यतीत करे ॥ ८२ ॥ अन्नव्यंजनयोर्भागस्तृतीयमुदकस्यच ।। वायोःसंचारणायचतुर्थमुपकल्पयेत् ॥ ८३ ॥ उदरके चार भाग कल्पना करके दोभाग अन्न व्यंजनके तीसरा जलका और चौथा वायु संचरणका रक्खै ॥ ८३ ॥ हकारंपंचमैर्युक्तमंतस्थैश्वापिसंयुतम् ॥ औरसंतविजानीयात्कंठयमाहुरसंयुतम् ॥ ८४ ॥ हकार पांचमें अक्षर तथा अन्तस्थ अक्षरसे संयुक्त हो, तो उसको उरस्य जाने, और असंयुक्त हकारका स्थान कंठ है ॥ ८४ ॥ हकारोयत्रपूर्वस्थोअन्तस्थाद्योभवेत्परः॥ पदकालेवियुज्येतसंहितार्यासऔरसः ॥ ८५ ॥ जहां हकार पूर्व में स्थित हो और अन्तस्थसे परे हो जो पदके समय पृथक् हो जाय, वह संहितामें हृदयस्थानी कहा है ।। ८५ ॥ मेघदुंदुभिनिर्घोषोज्ञायतेपयसोह्रदात् ॥ एवंनादप्रयोक्तव्यंसिंहस्यरुदितंयथा ॥८६॥ --
याज्ञवल्क्यशिक्षा। (३१)
जैसे हद (कुंड ) से जलका मेघ दुन्दुभीकी समान शब्द होता है, अथवा जैसे
सिंह गरजता है, इस प्रकार नाद करना चाहिये ॥ ८६ ॥
मासेभाद्रपदेमेघाः शब्दकुर्वतियादृशम् ॥
एवंगह्वरमासायशुक्रं ३। १६ दुदुह्रतिनिदर्शनम् ॥८॥
भादों मासमें मेघ जैसा शब्द करते हैं, इसी प्रकार एकान्तमें शब्दोच्चारण करे
'शुक्र दुदुहे' यह जैसे उदाहरण है ॥ ८७ ।।
शेषाणांवानरायुद्धमुत्पतंतिपतंतिच ॥
एवंवर्णाःप्रयोक्तव्याइहेहैपानिदर्शनम् ॥८८॥
और शेष अक्षरोंको जैसे वानर युद्धमें उछलते कूदते हैं इस प्रकारसे प्रयोग
करे यथा 'इहेहेपा' ॥ ८८॥
यथापुत्रवतीस्नेहाच्चुंबतेनिजमौरसम् ॥
एवंवर्णाःप्रयोक्तव्यायुञ्जानेतिनिदर्शनम् १० । ३२ ॥८॥
जैसे पुत्रवती स्त्री प्रेमसे अपने पुत्रका मुख चूमती है, इस प्रकारसे वर्णीका
प्रयोग करै जैसे 'युञ्जानः' १० । ३२ ॥ ८९ ॥
दर्दुरोदरदेशौतुप्रफुल्लेतेपुनर्यथा ॥
एवंवर्णाःप्रयोक्तव्याअपांफेनेतिनिदर्शनम् १९७१॥९॥
जैसे मेडकका पेट वारंवार फूलता है इसी प्रकार वाँका प्रयोग करै 'अपांफेने
न' यह उदाहरण है ।। ९०॥
यथाभाराभरकांतानिश्वसंतिनराभुवि ॥
एवंवर्णाःप्रयोक्तव्या अन्यःसंभृतइत्यपि ३१ ॥ १७ ॥११॥
जैसे भारवाले पुरुष वारंवार श्वास लेते हैं, इसी प्रकार वाँका प्रयोग करै, यथा
'अद्भयः सम्भृतः' इति ॥ ९१ ॥
कुक्कुटःकामलुब्धश्चककारद्वयमुच्चरेत् ॥
एवंवर्णाःप्रयोक्तव्याकुक्कुटोसीतिनिदर्शनम् ॥१६॥१२॥
जैसे कामसे लुब्ध हुआ कुक्कुट दो ककारका उच्चारण करता है इसी प्रकार
वर्णों का प्रयोग करे 'कुक्कुटोऽसि' यह उदाहरण है:॥ ९२ ॥
वडवाचहयंदृष्ट्वायोनिविकुरुतेयथा ॥
एवंवर्णाःप्रयोक्तव्या सदुंदुभेतिनिदर्शनम् २८१५५॥९॥
.
(३२) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे-
जैसे घोड़ी घोड़ेको देखकर अपनी योनिको चालन करती है, इसी प्रकार
धाँका प्रयोग कर, 'सुदुन्दुभे यह उदाहरण है ॥ ९३ ॥ .
यथाकामातुरानारीशब्दकुर्यादिनेदिने ।
तच्छब्दंकुरुतेप्राज्ञःसिथंासिनिदर्शनम् ५। १२॥ ९॥
जैसे
कामातुरा स्वी दिन दिन शब्द करती है इसी प्रकार शब्द करै, यथा
'सिध्यसि ॥ ९४ ॥
पक्षौवितत्यखेगृध्रोभ्रान्त्यासंकुच्यतिष्ठति ।।
एवंवर्णा प्रयोक्तव्यावार्थीनसोनिदर्शनम् २४॥३९ ॥९॥
जिस प्रकार गृध्र आकाशमें पक्ष विस्तृत करके भ्रमण करता स्थित होता है
इसी प्रकार वर्गों का प्रयोग करै, यथा 'वार्धीनसः' यह उदाहरण है ॥ ९५ ॥
रंगेचैवसमुत्पन्नेनोग्रसेत्पूर्वमक्षरम् ॥
स्वरंदीर्घप्रयुञ्जीतपश्चान्नासिक्यमाचरेत् ॥ ९६ ॥
रंगके उत्पन्न होनेसे पहले अक्षरको पास न कर, दीर्घ स्वरका प्रयोग करके पीछे
अनुनासिक उच्चारण करै ॥ ९६ ॥
यथासौराष्ट्रिकानारीअराँइत्यभिभाषते ॥
एवंरंगःप्रवक्तव्योङकार परिवर्जितः ॥ ९७॥
जैसे सौराष्ट्र देशकी स्त्री अराँ इस प्रकारका भाषण करनी है, इस प्रकारसे
रंगका प्रयोग करै उकारको छोड़कर ॥ ९७ ।।
द्विमात्रिकोमात्रिकोवानासामूलंसमाश्रितः॥
अंतेप्रयुंजतेरंगःपंचमैःसानुनासिकः ॥ ९८॥
दिमात्रिक वा एकमात्रिक नासिकामूलमें आश्रित होनेसे अन्तमें रंगका प्रयोग
होता है, और पांचवें वर्णको अनुनासिक होता है ॥ ९८ ॥
अनंतरंमकारस्ययोरंगस्तत्ररंज्यते ॥
सर्वानुनासिकंविंद्यादेषावध्योपधानिका ॥ ९९ ॥
मकारके अनन्तर जो रंग अक्षर हो वह सर्वानुनासिक जाने यह वध्योपधानिक
संज्ञा है ॥ ९९ ॥
यरलवशषसहरज्यतेचोपधानिका ॥
वर्गातेरंगतेयस्तुसः सर्वानुनासिका ॥ १०० ॥
याज्ञवल्क्यशिक्षा। (३३) 'य र ल व श ष स ह यह रंग अक्षरके संग वोलेजायँ उसको वध्योपधानिका कहते हैं, वर्गान्तमें जो रंग है वह सबके द्वारा सर्वानुनासिक कहा जाता है ॥१०॥ नासादुत्पद्यतेरंगःकांस्येनसमनिःस्वनः ॥ मृदुश्चैवद्विमात्रःस्यावृष्टिमान्स्यानिदर्शनम् ७ ॥४०॥३॥ कांसीकी समान शब्दवाला रंग नासिकासे उत्पन्न होता है, जो मृदु हो वह दिमात्रिक होता है 'वृष्टिमान् इवेति' यह उदाहरण है ॥ १॥ यथाव्यात्रीहरेत्पुत्रान्दंष्ट्राभिर्नचपीडयेत् ॥ भीतापतनभेदाभ्यांतवर्णान्प्रयोजयेत् ॥२॥ जैसे व्याघी डादोंसे पुत्रोंको पीड़ा न देती हुई हरण करती है, इस प्रकार स्खलित न करता हुआ वर्गोंको उच्चारण करै ॥ २ ॥ मधुरंचनचाव्यक्तंव्यक्तंचापिनपीडितम् ॥ सनाथस्यैकदेशस्यनवर्णाःसंकरंगताः ॥३॥ वाक्य मधुर हो पर अस्फुटन.हो स्फुट हो परन्तु दूसरे वर्गों से पीडित न हो सव पूरे उच्चारण कियेजायँ संकर न होजायँ ॥ ३॥ यथासुमत्तनागेंद्रपदात्पदंनिधापयेत् ॥ एवंपदंपदामंतंदर्शनीयंपृथक्पृथक् ॥ ४॥ जैसे मत्त हाथी पदके उपरान्त पद रखता है, इस प्रकारसे पदपदान्त पृथक पृथक् दिखाने चाहिये ॥४॥ गीतीशीघ्रीशिरःकंपीयथालिखितपाठकः॥ अनर्थज्ञोल्पकंठश्चषडेतेपाठकाधमाः॥५॥ गीतसा पढ़ना, शीघ्रतासे पढ़ना, शिर कंपितकरके पढ़ना, जैसा शुद्धाशुद्ध लिखा वैसा पढ़ना, अर्थका न जाना, अल्पकंठ होना यह छ प्रकारके अधम पढ़नेवाले हैं ॥५॥ माधुर्यमक्षरव्यक्तिःपदच्छेदस्तुसुस्वरः ॥ धैर्यलयसमत्वंचषडेतेपाठकागुणाः ॥ ६॥ मधुरता, अक्षरोंकी स्फुटता, पदच्छेद करना, स्वरसे पढ़ना, धीरता लय होना यह छः पढ़नेवालोंके गुण हैं ॥ ६ ॥ चतुरक्षरषदकंचनिवतेतपुनःपुनः॥ आवर्ततेपदंयच्चद्विस्त्रिरानेडितहितत् ॥७॥ . 1 , ७ (३४) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे- चार छः अक्षरोंको वारंवार आवर्तित करे जो पद दो तीन बार आवृत्ति किया. जाय वह आमेडित कहाता है ॥७॥ यथाधाम्नेधाम्नेतियजुषेयजुषेतिनिदर्शनम् १॥३०॥ हीयतेवर्धतेचापिपदंयत्रकृशोदरम् ॥ उपचार सविज्ञेयउभेसु १४१४३ श्चंद्रेतिनिदर्शनम् ॥ ८॥ यथा धाम्ने धाम्ने । यजुषे यजुपे यह उदाहरण हैं जिस प्रकार उदर कृश होकर बढता सुकडता है ऐसा जो पद उच्चारण हो वह उपचार कहाता है, 'उभेसुश्चन्द्र' यह उदाहरण है ।। ८॥ अथसप्तविधाःसंयोगपिंडाः। अव सात प्रकारके संयोगपिण्ड कहते हैं। अयस्पिडोदारुपिंडऊर्णापिंडोज्वालापिंडोमृत्पिडोवायुपिंडोव- ब्रपिंडश्चेति ॥ . यमान्विद्यादयःपिंडान्सांतस्थंदारुपिंडवत् ॥ अंतस्थयमवर्जंतुऊर्णापिंडंविनिर्दिशेत् ॥ १॥ अयस्पिण्ड, दारुपिण्ड, अर्णापिण्ड, मृत्पिण्ड, ज्यालापिण्ड, वायुपिण्ड और वज्रपिण्ड यह सात पिण्ड हैं । यमोंको अयापिण्ड, साल्तस्थोंको दारुपिण्ड, यमरहित अन्तस्थोंको ऊर्णापिण्ड जानै ॥१॥ अंतस्थंयमसंयोगविशेषोनोपलभ्यते ॥ अशरीरंयमविद्यादंतस्थंपिंडनायकम् ॥ २ ॥ अन्तस्थ और यमके संयोगोंमें विशेष नहीं जाना जाता, यमको अशरीर और अन्तस्थको पिण्डनायक जाने ॥२॥ ज्वालापिंडान्सनासिक्यान्सानुस्वारांस्तुमृन्मयान्.॥ सोपध्मावायुपिंडाश्चजिह्वामूलेतुवत्रिणः ॥३॥ नासिक्य वर्णोंको ज्वालापिण्ड, स्वरोंको मृन्मयपिण्ड जाने, उपमानियोंको वायुपिण्ड और जिह्वामूलियोंको वज्रपिण्ड जाने ॥३॥ अयःपिंडोनामयथा । अग्निः २३ । १७ पंक्तीः २७। २० । तनच्मि ११४ दारुपिंडोनामयथा । अश्व-२४। १ सूर्य:३९ विश्वाजनस्यइतिभवति ५।२८ । तत्रऊर्णापिंडोनामयथा ॥ अस्मिन् ३। १ यस्मिन् २०१७८ अमुष्मिन् १७ । २ इति . । ----- - याज्ञवल्क्यशिक्षा। (३५) भवति ।। तत्रज्वालापिंडोनामयथा । ब्रह्म १३ १३ वह्नितमम् १।२ गृहामीतिभवति। तत्रमृत्पिडोनामयथा।स७१९।२९ स्थाम्।सस्कारःोस स्वर्तइति । तत्रवायुपिंडोनामयथा। देवसवित६९।१युञ्जानःप्रथुमम्११।१ प्रादिवःककुत्सुप्तमितिभ वति ॥ तत्रवत्रपिंडोनामयथा । इष्कृतिह१२।८३ निष्कृतिक ऋक्सामयोः ४।९। इतिभवति॥ प्रथमेनपकारेण सकारेणैव संयुतम्।।एतत्स्वरंसमासाद्यअग्निप्वात्तानिदर्शनम्।१९।६१॥४॥ अयापिण्ड जैसे अनोः इत्यादि, दारुपिण्ड जैसे अश्वः इत्यादि, ऊर्णापिण्ड जैसे पस्मिन् इत्यादि, ज्वालापिण्ड जैसे ब्रह्मा इत्यादि, मृत्पिण्ड जैसे सस्थाम् इत्यादि, वायुपिण्ड यथा देवसवितः इत्यादि, वज्रपिण्ड जैसे इष्कृतिः इत्यादि । यदि प्रथम पकारका सकारसे संयोग हो तो इस स्वरसे 'अग्निष्पाता यह प्रयोग होता है॥४॥ प्रथमेनठकारेणथकारेणैवसंयुतम् ।। एतत्स्वरंसमासाद्यअधिष्ठाननिदर्शनम् १७११८॥५॥ प्रथम ठकार और थकारके संयोगसे अधिष्ठान' उदाहरण होता है, कहीं पकार ठकारका संयोग ऐसा लिखा है ॥५॥ प्रथमेनणकारेणनकारेणैवसंयुतम् ।। एतत्स्वरंसमासायत्रिणवत्रयस्त्रिठशावितिनिदर्शनम् १०१६ पहले णकारका नकारसेही संयोग होय तो इस स्वरसे त्रिणवत्रयखि ५ श, यह स्वर होता है ॥६॥ प्रथमेनैवरंगेणनकारेणैवसंयुतम् ।। एतद्रञ्जितमासाद्यवृष्टिमांनितिनिदर्शनम् ७॥ ४६॥७॥ पहले रंगका नकारसे संयोग हो तो इस रंगको प्राप्त होकर 'वृष्टिमाँ २॥' उदाहरण होता है ७॥४०॥७॥ एतेककारादयोमकारपर्यवसानाः कृष्णाव्याख्याताः शनैश्चरदै वत्या चत्वार्यंतस्थायरलवा कपिलवर्णाः अग्निदेवत्याः चत्वा यूष्माणःशषसहा अरुणवर्णा आदित्यदैवत्याःत्रियस्त्रिठश- वजनानिस्पर्शाअंतस्थाऊष्माणश्चेति चतुर्विधकरण (३६) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता-परिशिष्टभागे- मस्पृष्टंसंवृतेविवृतंचेति।। संवृतोघोपाविवृताअघोपाः।विठशति घोषास्तेगजडदबाघझढधमाङञणनमान्यरलवाश्चेतिात्रयोद- शअघोपास्तेकचटतपाः खछठथफाशपसाश्चेतिापद्धिधमास्य, प्रयत्नम् ।। संवृतं विवृतमस्पृष्टंस्पृष्टमीपत्स्पृष्टंचाईस्पृष्टंचेति । तत्र।अकारः संवृतोज्ञेयइतरेविवृताःस्वराः॥सर्वेचतेस्युरस्पृष्टाः स्पर्शास्पृष्टा भवन्तिहि ॥ ८॥ यह ककारसे लेकर मकारपर्यन्त २५ स्पर्श वर्ण कृष्णवर्ण शनैश्चर देवतावाले हैं, चार अन्तस्थ यरलय कपिलवर्ण अग्नि देवतावाले हैं,चार उष्माण शपसह अरु णवर्ण आदित्य देवतावाले हैं. इस प्रकार स्पर्श ऊष्म अन्तस्थ यह ३३ व्यंजन हैं। चार प्रकारका करण है स्पृष्ट अस्पृष्ट संवृत विवृत, संवृत घोष और विवृत अघोष है वीस वर्ण घोष प्रयत्नवाले हैं वे-गै ज ड द वं, घश द ध भ, ऊ जण न म, य र ल व तेरह अघोष कचटतप, ख छ उथ फ,शप स, आस्यप्रयत्न छ: प्रकारका है संवृत, विवृत अस्पृष्ट, स्पृष्ट, ईपत्स्पृष्ट और अर्धस्पृष्ट । अकारका संवृत प्रयत्न और सव स्वर विवृत प्रयत्नवाले हैं, और यह सवही अस्पृष्ट हैं स्पर्श वर्ण स्पृष्ट प्रयत्नवाले हैं ॥ ८॥ ईपत्स्पृष्टास्तथान्तस्थाऊष्माणोद्धस्पृशःस्वराः ।। सामान्यभजतेवर्णः संस्थानकरणस्यहि ॥ ९ ॥ अन्तस्थ ईपत्पृष्ट और ऊष्माण अर्धस्पृष्ट हैं, यह वर्ण सामान्यतासे अपने करण, स्थानको प्राप्त होते हैं ॥ ९॥ ऋलोमध्ये भवत्यर्धमात्रारफलकारयोः॥ तस्मादस्पृष्टतानस्याहलकारनिरूपणे ॥१०॥ ऋलके मध्यमें रेफ लकारकी आधी मात्रा है, इससे ऋ लके निरूपणमें अस्पृष्टता नहीं होती ॥ १०॥ वर्गाणांप्रथमाद्वितीयाःशषसहाश्चाघोंषाघोषास्त्वन्येदशधावर्णा भवन्ति।अष्टौवर्णस्थानानि भवन्ति औरस्यकंठयमूर्धन्यतालुदं त्योष्टयदन्तमूलजिह्वामूलयमानुनासिक्याश्चेति॥ द्वौऔरस्यौ बाइतिअआआ३ अवर्णहकारविसर्जनीया इति। त्रयःकंठ्याः।
. याज्ञवल्क्यशिक्षा । - (३७) ऋपटमूर्धन्याः । टठडढणष ३ इति । दशतालव्याः । चछज झजयशइईई ३ इति । अष्टौदंत्याः।तथदधनललसाः अष्टावो ष्ठयाः। पफबभमाउऊऊ ३ वउपध्माचेत्यादयः । एकोदंतमूली योरेफः । जिह्वामूलीया-पंच । कुंखुगंधुंडुइति । मख्मग्मध्मकुं गुंघुइतियमाश्चत्वारः॥रुक्मतिप्रथमोज्ञेयःसक्नाइत्यपरोभवेत २३।२९ तृतीयः विद्मइत्याहुः१२।१९ उपध्मेतिचतुर्थकः॥११॥ वोंका पहला दूसरा अक्षर श ष स ह यह अघोष हैं, इससे शेष घोष हैं वर्ण दशस्थान भेदवाले हैं । हृदय, कंठ, मूर्धा, तालु, दन्त, ओष्ठ,दन्तमूलीय, जि- हामूलीय, यम अनुनासिक । दो उरस्थानी हैं, हह ह्य, तीन कंठस्थानी, अवर्ण, है और विसर्ग, छ: मूर्धन्य हैं,ट ठ ड ढ ण ष,दश तालुस्थानीय हैं च छ ज झ ज य श इ ईई ३ । आठ दन्तस्थानीय हैं त थ द ध न ल ल य, आठ ओष्ठस्थानीय हैं प फ व भ म व उ उपध्मानीय एक रेफ दन्तमूलीय है पांच जिह्वामूलीय हैं ऋ कवर्ग कुंटुंगुं धुं हुं इति । चार यम हैं क्म, रुम,ग्म, ध्म, वा कुंखु गु धुं यह रुक्म यह प्रथमका सक्थ २३ । २९ दूसरा विद्मा १२ । १९ उपध्मेति वा जम्भेद- ध्मेति १६ । ६४ चौथा ॥ ११ ॥ प्रथमौचौष्ठनासिक्यौ द्वितीयः कंठयदंत्यश्चनासामूलमुपा श्रितः॥तृतीय कंठ्यजिह्वाग्रेनासायामेवनिर्दिशेत्।।चतुर्थों हदिनासिक्यःकंठेचाभिहितायमाः॥ १२ ॥ पहला ओष्ठ और नासिकास्थानीय,दूसरा कण्ठ और दन्तस्थानीय,नासामूलमें स्थित तीसरा कंठ और जिह्वाके अग्रभागमें नासिकामें निर्देश किया है, चौथा हृदय और नासिकास्थानीय, और कण्ठस्थानीय यम कहा है ।। १२ ॥ आपंचमैश्चैकपादःसंयुक्तपंचमाक्षरम् ।। उत्पद्यतेयमस्तत्रसोगपूर्वाक्षरस्यहि ॥ १३ ॥ पंचम वर्णतक एक पदमें वा पांचवें अक्षरके आगे संयोगमें यम प्रगट होता है, वह पूर्व अक्षरका अङ्ग है ॥ १३ ॥ पंचमाःशषसैर्युक्ताअन्तस्थैर्वापिसंयुताः ॥ यमास्तत्रनिवर्ततेश्मशानादिवबांधवाः॥ १४ ॥ १ जम्भेदध्मोतं चतुर्थकमिति वा पाठः ।
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(३८) वाजसनेयिश्रीशुक्लयजुर्वेदसंहिता परिशिष्टभागे-
पांचवाँ अक्षर स श ष से युक्त हो वा अन्तस्थ वर्णसे संयुक्त हो तो वहाँ यम
निवृत्त होजाते हैं, जैसे श्मशानसे बंधुक्षन ॥ १४ ॥
ऋवर्णेतिपरेसादावनुस्वारोद्विमात्रकः ।।
संयोगेपरभूतेषुह्रस्वएवोच्यतेबुधैः ॥ १५ ॥
ऋवर्णसे परे सकारकी आदिमें अनुस्वार द्विमात्रिक होता है. और संयोगमें पाभूत
होनेसे पंडितोंद्वारा हस्व कहाजाता है ।। १५ ।।
आधामात्रातुकण्ठ्यस्य एकारौकारयोर्भवेत् ॥
तालव्यस्यतथोष्टयस्यद्वितीयाचयथाक्रमम् ॥ १६ ॥
एकार ओकारकी पहली मात्रा कंठस्थानीय जानी, दूसरी तालु ओष्ठस्थानीय
यथा क्रमसे जान्नी ॥ १६ ॥
याहशीरत्नवर्णाभाजपायाःकुसुमेथवा ॥
तादृशेरलयद्वर्णप्रान्तेनासिक्यमाचरेत् ॥ १७ ॥
जिसप्रकार रत्नोंकी कान्ति वा जपाके फूलोंकी कान्ति होती है, इसप्रकार वर्णों
को रंजित कर प्रान्तभागमें अनुनासिक उच्चारण करै ॥ १७ ॥
लाक्षारक्तंयथातोयंनकारान्तंपदंतथा ॥
सर्वरंगविजानीयाच्छनितिनिदर्शनम् ॥ १८ ॥
जैसे लाखके रंगका जल होता है इसीप्रकार नकारान्त पद रंजित हैं, इन सवको .
रंग जानै यथा'शत्रूनिति' ७ । ३७ यह उदाहरण है ॥ १८ ॥
लुप्तेनकारयत्स्वाररान्तिशौनकादयः॥
आदिरङ्गविजानीयानचासीदिवविन्दति ॥ १९॥
नकारके लुप्त होनेमें जो शौनकादि स्वरको रंजित करते हैं, उसको आदि रंग
जानै उसे स्थितिकी समान नहीं जाना जाता ॥ १९॥
प्रथमस्थषकारेणतकारेणचसंयुतम् ॥
एतदक्षरमासायत्रिष्टुभेतिनिदर्शनम् ॥ २० ॥
पहले षकार तकारसे संयुक्त यह स्वर 'त्रिष्टुभेति' २८ १४० इस प्रकारका
होता है ॥२०॥
प्रथमस्थषकारेणथकारणचसंयुतम् ॥
पतत्स्वरंसमासायाधिष्ठानसितिनिदर्शनम् ॥ २१॥
(३९) याज्ञवल्क्यशिक्षा। पहले पकार थकारसे संयुक्त होनेसे अधिष्ठान यह उदाहरण १७११६होताहै॥२१॥ चतुर्थंचतृतीयेन द्वितीयंप्रथमेनच ॥ आयमध्यन्तथान्त्यञ्चस्वरूपेणाभिपीडयेत् ॥ २२ ॥ चौथे वर्णको तीसरेसे, दूसरेको पहलेसे इस प्रकार आदि मध्य और अन्त्य पञ्चम अक्षरको स्वरूपसे पीडित करे ॥ २२ ॥ अवग्रहपदच्छेद उदात्तंदृश्यतेयदि ॥ स्वरन्तस्वरितंप्राहुःसन्धौतुस्वार्यतेपरम् ॥ २३ ।। अवग्रह और पदच्छेदमें यदि उदात्त दिखाई दे उस स्वरको स्वरित कहेंगे,और सन्धिमें वह परवर्णसे स्वार संज्ञावाला होता है ॥ २३ ॥ स्वरसन्धिविधानेननीचोच्चंतुविधीयते ॥ . व्यञ्जनादास्वरादापितत्सन्धौस्वरउच्यते ॥ २४॥ स्वरसन्धिके विधानसे अनुदात्त उदात्त होजाता है, व्यञ्जनसे वा स्वरसे उस सन्धिमें स्वर कहाजाता है ।। २४ ।। उदात्तान्निहितःस्वारःस्वरितात्पचयोभवेत् ॥ उदात्तात्स्वरितात्पूर्वोनान्यआपयतेस्वरः ॥२६॥ उदात्तसे निहित हुआ स्वार, स्वरितसे प्रचय होता है उदात्त और स्वरितसे पूर्व अन्य स्वर नहीं होता ॥ २५ ॥ पदकालेयःस्वरितः संहितायांतथैवच ॥ स्वारिताच्चद्भवेत्पश्चात्सएवनिचितःस्वरः ॥ २६ ॥ जो पद कालमें स्वरित है, संहितामें भी स्वरित है स्वरितसे पीछे होनेवालाही निश्चित स्वर है ।। २६ ॥ प्रथमाश्चतृतीयाःस्युःपरेघोषवतिस्थिते ।। पञ्चमा पंचमेपाठेद्वितीयाःशषसेषुच ॥ २७ ॥ आगे घोषवान वाँको स्थित होनेमें पहलोंको तीसरे होजाते है, पाठमें पांचवें वर्णको पांचवां और शपस परे होनेसे दूसरे वर्ण होते हैं ॥ २७ ॥ उदात्तान्निहितःस्वार्य स्वारोदात्तौनतत्परौ ॥ स्वरितोयस्तथाभूतोज्ञेयःसप्रचयःसदा ॥२८॥ उदात्तसे निहित स्वार होता है उससे परे स्वारोदात्त नहीं होते, जो इस प्रका- : ' रको स्वरित है उसको मचय जानना चाहिये ॥२८॥ .
. (४०) वाजसनायनाशुक्लयजुवदसाहता-परिशिष्टभागे-- उच्चानुदात्तयोोंगेस्वरितःस्वारउच्यते ॥ ऐक्यंतत्प्रचय प्रोक्तःसन्धिरेषांमिथोद्भुतः ॥ २९ ॥ उदात्त अनुदात्तके योगमें स्वारतही स्वार कहाता है, इनकी एकता होनेसे प्रचय होता है, इनकी सन्धि (संयोग ) अद्भुत है ॥ २९ ॥ बहीजिह्वायथाग्रहात्यहोवह्निस्तथैवच ॥ ब्रह्मरूपविजानीयाद्गुरुसेवात्मनःसदा ॥३०॥ वही जिला जैसे ग्रहण किया जाता है इसी प्रकार अहः बहीः उचरित होता है, अपने गुरुको सदा ब्रह्मरूप जाने ॥ ३० ॥ यत्किञ्चिद्वाङ्मयंलोकेसर्वमत्रप्रतिष्ठितम् ॥ करोतितत्पदानंयत्तस्माद्ब्रह्ममयोगुरुः ॥३१॥ जो कुछ लोकमें वाणी (शास्त्र) है वह सब इसमें प्रतिष्ठित है उसके दाने करने- सेही गुरु ब्रह्ममय कहाता है ॥३१॥ विधिनाप्यविधिज्ञानमविधानान्नलभ्यते ॥ अविधानपरोलित्यंप्रायश्चित्तीभवेन्नरः ॥३२॥ ज्ञान विधिसेही प्राप्त होता है, अविधिसे नहीं, असावधानी करनेसे मनुष्य प्रायश्चित्ती होता है ।। ३२॥ युक्तियुक्तंवचोग्राानग्राह्यगुरुगौरवात् ॥ सर्वशास्त्ररहस्यंतद्याज्ञवल्क्येनभाषितम् ॥ ३३ ॥ इति श्रीयोगिप्रवरयाज्ञवल्क्यप्रोक्ताशिक्षासमाप्ता. युक्तियुक्त वचनकोही ग्रहण करना चाहिये, केवल गुरुके गौरवसेही ग्रहण करना यह नहीं, यह सब शास्त्रका रहस्य याज्ञवल्क्यने वर्णन किया है ॥ ३३ ॥ इति श्रीमहर्षियोगिवरयाज्ञवल्क्यप्रोक्ता; पण्डितम्मागप्रसादमिश्रकृत- भाषाटीकासहिता शिक्षा समाप्ता. ॥ शुभमस्तु॥ पुरतक मिलनेका ठिकाना-- खेमराज श्रीकृष्णदास, " श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस-बम्बई.
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গুপ্ত, अस्माकं शुद्रणालये वेद-वेदान्त-धर्मशास-प्रयोग-योग যা-বিন-লবিজ্ঞা-- হাতাহা-কাল- E-ক্ষোঙ্কা-গীব-বি-আখা নং: সা স্বীগুনা হঞ্জোবিদগণ। বিভিন্ন ঘুষ: হ্যা, লিজা- নাথাব্রাক্ষা, দ্বিান্দ্রি, হুগৗথী- ণিী আত্মহত্যা, হজকিত্তাহীঘলিঙ্গি- चित्रितालिखितपत्रवत्पुस्तकानि , सुमित्या प्रकाशन्ते ভুল বুল বিশ্ব। অরিবেশক্ষা- छुपलब्धये एवं नव्यतया स्वरत्वपुस्तकानि मुद्रयिषुभिः দুতলীল :বা: ফাদাদামগঞ্জ প্রদি নবক্ষালা-আঁষাইগা স্ব ঘঙ্কিা- বিসহ। শিক্ষাজী-কালা, শিল্প- ল্লিষ্মিাল গান “ গাছ” বভিাষা- থাঃ ২ ইলিনিহা। KHEMRAJ SKRIKRISHNADAS, USHRI VENKATESHWAR STEAM PRESS SOMBAY হাল ফঁাঙ্গা, ন” (রা) যায়-৪
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