Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Sankhyayanatantram
Front matter
राजस्थान पुरातन पत्थमाला
राजस्थान राज्य द्वारा प्रकाशित
सामान्यत: अखिलभारतीय तथा विशेषतः राजस्थानदेशीय पुरातनकालीन
सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश, हिन्दी, राजस्थानी आदि भाषानिबद्ध
विविधवाङ्मयप्रकाशिनी विशिष्ट-ग्रन्थावली
प्रधान सम्पादक
फतहसिंह, एम ए.,डी.लिट्.
निदेशक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर
ग्रन्थाङ्क ११४
सांख्यायनमुनिप्रणीतं
सांख्यायनतन्त्रम्
प्रकाशक
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
निदेशक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर (राजस्थान)
१९७० ई०
वि, स० २०२६
भारतराष्ट्रीय शकाब्द १८६१
मुद्रक-हरिप्रसाद पारीक, साधना प्रेस, जोधपुर
प्रधानसम्पादकीय वक्तव्य A -- प्रस्तुत ग्रन्थ का सम्पादन श्रीलक्ष्मीनारायण गोस्वामी ने ५ हस्तलेखों के आधार पर किया है और पाठान्तरो को पाद-टिप्पणियो में दे दिया है। विद्वान् सम्पादक ने पुस्तक के पाठ को शुद्धतम रूप में प्रस्तुत करने के अतिरिक्त न केवल विद्वानो के लिए अपि तु साधको के लिए भी उपयोगी एवं आवश्यक सामग्री को भूमिका तथा परिशिष्टो के रूप मे दे दिया है । यह ग्रन्थ यद्यपि आकार मे छोटा है, परन्तु 'वगला' की साधना के लिए यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है । सम्पादक ने मन्त्रोद्धार को स्पष्ट करने का जो प्रयत्न किया है वह स्तुत्य है और इससे प्रकट है कि श्रीगोस्वामीजी को तन्त्र के व्यवहारपक्ष का कितना ज्ञान अपनी पैतृक सम्पत्ति के रूप मे. मिला है। इसीप्रकार पुस्तक की भूमिका के अन्तर्गत सम्पादक ने आगम-निगमादि के विषय मे जो सामग्री प्रस्तुत की है वह भी बड़ी उपयोगी है और में इस सबके लिए, विद्वान् सम्पादक को बधाई देता हू । तन्त्रशास्त्र के अनेक ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं, परन्तु व्यवहार- पक्ष की उपेक्षा करने से वे प्रायः दुर्बोध बन गए हैं। मेरी इच्छा थी कि वह कमी इस ग्रन्थ मे नहीं रहती । श्रीगोस्वामीजी तन्त्र-व्यवहार मे भी पारङ्गत हैं, अतः इस कमी को दूर करना उनके लिए कठिन नहीं था और उन्होंने किसी सीमा तक इसको दूर किया भी है। परन्तु फिर भी ग्रन्थ के आकार के बढ़ने के भय से बहुत सी सामग्री नही दी गई । श्राशा है वह सब दूसरे रूप मे तन्त्र- शास्त्र के व्यवहारपक्ष को उपस्थित करते हुए अन्यत्र दी जा सकेगी। ग्रन्थ का मुद्रण प्रारम्भ हो गया था, परन्तु सम्पादक महोदय की अनेक व्यक्तिगत कठिनाइयो अथवा प्रतिष्ठान या प्रेस मे उपस्थित अनेक विघ्न- बाधाओ के कारण, ग्रन्थ के प्रकाशन मे आशातीत विलम्ब हुआ जिसके लिए मैं प्रतिष्ठान की ओर से क्षमाप्रार्थी हूँ। अन्त मे, में प्रकाशन विभाग के अध्यक्ष म० विनयसागर तथा साधना प्रेस के व्यवस्थापक श्रीहरिप्रसाद पारीक को धन्यवाद अर्पित करता हूँ जिन्होने रुचि एव लगन के साथ इस ग्रन्थ को प्रकाशित करने मे सहयोग दिया है । -फतहसिंह १ जनवरी, १९७० जोधपुर भूमिका भारतवर्ष एक धर्मप्रधान देश है। यहाँ अनादिकाल से निगम एव आगम- सम्मत धर्म की ही स्थिति प्रधान रूप मे प्रचलित रही है । मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदो को निगम अथवा छन्द नाम से वामन, भट्टोजी दीक्षित आदि महापण्डितों ने अभिहित किया है-'नितरामत्यन्त निश्चयेन वा गच्छन्ति अवगच्छन्ति (जानन्ति) धर्ममनेनेति निगमश्छन्द.' अर्थात् िरन्तर अथवा निश्चयपूर्वक जिसके द्वारा धर्म को जानते हैं उसे निगम अर्थात् छन्द कहते हैं। परा और अपरा-नामक विद्याओं' की स्थिति भी इसी में निहित है अतः इसी निगम को धर्मशास्त्र के आचार्य मनु ने विद्या एवं धर्म का स्थान माना है 'वेदप्रणि- हितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः' अर्थात् वेदविहित कार्य ही धर्म एवं तदितर कार्य अधर्म है। याज्ञवल्क्य ने भी पुराण, न्याय, मीमांसा एवं धर्मशास्त्रस्वरूप अङ्गो से युक्त वेद को धर्म एव चौदह विद्याओं का स्थान बतलाया है- 'पुर णन्यायमीमासाधर्मशास्त्रागमिश्रिताः । वेदा. स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ।' त्रिकालदर्शी महर्षियो ने सम्पूर्ण शब्दराशि को प्रागम-निगम-भेद से दो भागो मे विभक्त किया है । क्यों कि प्रकृतिसिद्ध नित्यशब्दब्रह्म इन्ही दो भागों मे विभक्त है । यद्यपि 'अथो वागेवेदं सर्वम्'२ 'वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता" आदि श्रौतसिद्धान्तो के अनुसार वाक्तत्व से प्रादुर्भूत होने वाले शब्दप्रपञ्च से कोई स्थान खाली नही है तथापि स्वर्गनाम से प्रसिद्ध १४ प्रकार के भूतसर्ग के साथ प्रधानरूप से अग्निवाक् और इन्द्रवाक् का ही सम्बन्ध है । पृथिवी अग्नि- मयी है और धुलोकोपलक्षित सूर्य इन्द्रमय है । पार्थिव एव सौर अग्नि अन्नाद (अन्न खानेवाले) हैं और मध्यपतित चान्द्र सोम इन अग्नियो का अन्न बन रहा है । अन्न जब अन्नाद के उदर मे चला जाता है तो केवल अन्नाद-सत्ता ही . । १ 'T विद्ये वेदितव्ये परा चैवापरा च'। (१) परा-उपनिषद्विद्या । (२) अपरा- ऋग्वेदादि. । २. ऐतरेयारण्यक० ३।११६ । ३ तैत्तिरीय ब्राह्मण शा।४ । ४ 'यथाग्निगर्भा पृथिवी तथा द्यौरिन्द्रेण गभिरणी' शतपथब्राह्मण १४।६।७।२० 'एप व सोमो राजा देवानामन्न यच्चन्द्रमा' ११६४१५ ५ [ २ ]. 1 रह जाती है, अन्न की-स्वतन्त्रता हट जाती है । इसीलिये त्रैलोक्य के लिये द्यावापृथिवी' का व्यवहार ही होता है । अत. प्रधानत. पृथिवीलोक एवं सूर्य- लोक ही रह जाते हैं। दोनो अग्निमय हैं । पार्थिवाग्नि गायत्राग्नि है और सौर अग्नि सावित्राग्नि है। ये दोनो अग्नियाँ 'वाक्' कहलाती है । वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार पृथिवी को वाक् अनुष्टुप् और सूर्य की वाक् बृहती कहलाती है । अनुष्टुप् वाक् से कचटतप-अादिरूपा वर्णवाक् का तथा वृहती- वाक् से अ आ इ-आदिरूपा स्वरवाक् का प्रादुर्भाव होता है। 'स्वरोऽक्षरम्' के अनुसार स्वर अक्षर हैं, अविनाशी हैं । वर्ण 'क्षर' हैं, विनाशशील हैं। जिस प्रकार अर्थसृष्टि मे भौतिक क्षरकूट की प्रतिष्ठा अक्षरतत्व है उसी प्रकार 'शाब्दे ब्रह्मणि निप्णातः पर ब्रह्माधिगच्छति' के अनुसार अर्थब्रह्म की समान धारा मे प्रवाहित होने वाले शब्दब्रह्म मे भी क्षररूप वर्ण की प्रतिष्ठा अक्षररूप स्वरतत्व ही है। अर्थब्रह्म मे जैसे अक्षररूप सूर्यसत्ता को छोड़कर क्षररूपा पृथिवी अपने रूप मे प्रतिष्ठित नही रह सकती है इसी प्रकार सूर्यवाड्मूलक स्वरतत्व के विना पृथिवीमूलिका, 'वर्णशाशि भी स्व-स्वरूप मे प्रतिष्ठित नही रह सकती है। स्वरमूलक इस सूर्यविद्या का ही नाम 'त्रयीविद्या' है। सूर्य नही तप रहा है, त्रयीविद्या तप रही है, 'सैषात्रय्येव विद्या तपति' और त्रयीमयाय त्रिगुणात्मने नम.' का भी यही रहस्य है। यह वेदतत्व नित्यतत्व है, स्वय प्रादुर्भूत है, स्वयं ब्रह्म के मुख से उद्गीर्ण है। इसीलिये महर्षियो ने इसे 'निगम' एव श्रुति की सज्ञा दी है । शनि, मङ्गल, शुक्र, बुध, पृथिवी आदि सूर्य के उपग्रह हैं। सूर्य का ही प्रवर्यभाग शनि-पादिरूप मे परिणत हो कर सूर्य के चारो ओर घूम रहा है । सूर्यविद्या का अंशभूत पृथिवीलोक सूर्य के चारो ओर घूम रहा है । पृथिवी- विद्या सूर्यविद्या से आई है। इसी रहस्य को समझाने के लिये महर्षियो ने पृथिवीविद्या का नाम 'आगम' रखा है। सूर्यविद्या की तरह पृथिवीविद्या स्वय निर्गत नही है अपि तु निगम से आई है 'निगमादागत आगम.' । ऊपर कहा जा चुका है कि पृथिवी की वाक् वर्णवाक् स्वर से भिन्न है। अत आगमशास्त्रोक्त प्रयोगो का उदात्तादिस्वरो से विशेष सम्बन्ध नही माना जाता है। वहाँ केवल . . 'द्वय वा इदम् - अत्ता चैवाद्यञ्च । तद्यदोभय समागच्छति-अत्तवास्यायते नाद्यम् । सवै य सोऽत्ताग्निरेव स..' शतपथब्राह्मण १०१६।३।१ 'तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिपत्' । । १०१५।११ ३ पानपथब्राह्मरणम् २०१५।२।२। २ ~ - शब्द की आवृत्ति से ही सिद्धि हो जाती है किन्तु निगमविद्या मे यह बात नहीं है, वहाँ स्वरवाक् की प्रधानता है। विना स्वर के निगमकाण्ड निरर्थक है। अतः यह स्पष्ट है कि सूर्य विद्या निगमविद्या है और पृथिवी विद्या आगमविद्या है। इन दोनों मे सूर्य एवं पृथिवी का ही निरूपण हो, ऐसी बात नहीं है, अपि तु दोनो मे सारे विश्व का निरूपण है । भेद केवल दृष्टि का है। सूर्य पिता है तो पृथिवी माता' । पिता पुरुष है तो माता प्रकृति । पुरुष रेतोधा है तो प्रकृति योनि है। पुरुषशास्त्र निगम है जिसे वेदपुरुष कहा जाता है और प्रकृतिशास्त्र भागम है। इसी को आगमविद्या कहते हैं और इसके विना निगम अप्रतिष्ठित है । प्रागन अथवा पञ्चम वेद श्रीतकाल के अन तर उसके अनुसन्धान मे आगमनथो का आविर्भाव हुआ है जैसा कि छान्दोग्योपनिषद् में वर्णित पञ्चामृतविद्या से ज्ञात होता है। उसमे सूर्यबिम्ब को 'देवमधु' कहा है और वह अपनी पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चार दिशामो की किरणो द्वारा ब्रह्माण्ड मे मधुरस का प्रसारण करता है। पूर्वदिशा की किरणे ऋग्वेदरूपी पुष्प का रस खीचती हैं उसमे से जो मधु उत्पन्न होता है उससे वसुदेवता अग्नि द्वारा तृप्त होते हैं । दक्षिण दिशा की किरणे यजुर्वेद के पुष्परस को चूसती हैं और उससे उत्पन्न अमृत से रुद्रदेवता इन्द्र द्वारा पुष्ट होते हैं । पश्चिम दिशा की किरणे सामवेद के पुष्पो का रस खीचती हैं और उसके अमृत से आदित्यदेवता वरुण द्वारा तृप्त होते हैं और उत्तर दिशा की किरणे अथर्ववेद के पुष्पो के सार को खीचती हैं और उसके अमृत से मरुत् देवता सोम द्वारा पुष्ट होते हैं । विद्यारूपी अमृत अथवा मधु के आधारपुष्प ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद मे अवस्थित हैं और उनके सार को भगवान् सूर्य अपने बिम्ब मे खीच कर उससे बसु, रुद्र, आदित्य और मरुत् इन देवताओ के गण अनुक्रम से अग्नि, इन्द्र, वरुण और सोम इन चार अध्यक्षो द्वारा मधुरस भोगकर तृप्त होते हैं। इन चार मुखो के रूपकवाले ब्रह्मदेव को चारो वेदो का प्रवर्तक माना गया है। इसके अतिरिक्त इसी उपनिषद् मे सूर्य के अर्ध्वमुख का भी वर्णन है। उसकी किरणे परोरजा कहलाती हैं क्योकि उसमे रजस् अर्थात् रजोगुण या राग का स्पर्श नही है । ये किरणे 'गुह्य आदेश' को ब्रह्मतत्व के पुष्प मे से खीचती हैं और उसका जो मधु होता है उसे प्रणव द्वारा साध्य देवता अर्थात् सिद्धजन भोगते हैं। इसी गुह्य . १ 'द्योप्पित पृथिवी मातः' (ऋक्-४।८।११) । २ छान्दोग्योपनिपत्-तृतीयाध्यायात् ।
[ - ४ I आदेश' को 'भागम' कहते हैं जिस प्रकार चारो वेदो में प्रकट आदेश निगम कहा जाता है । अागमवादी इस उध्वमुख को परमेश्वर अर्थात् शिव का पञ्च- ममुख कहते हैं और वह ऊर्ध्वस्रोत द्वारा ब्रह्मविद्या चार वेदो में ही समाप्त नहीं होती परन्तु देश, काल और निमित्तो के परिवर्तन से युगानुसार सिद्धजनो द्वारा प्रकट होती है। इसीलिये माण्डूक्योपनिषद्' को आगमप्रकरण ही कहते हैं । पागम का लक्षण वाचस्पतिमिश्र ने इस प्रकार किया है कि जिससे भोग और मोक्ष दोनो का स्वरूप समझा जा सके वह पागम है। प्राचीन वेद-साहित्य कर्मकाण्ड द्वारा केवल स्वर्गादि योगसाधनो का स्वरूप समझाता है अथवा ज्ञान काण्ड द्वारा केवल मोक्ष का स्वरूप और उसके साधन बतलाता है, परन्तु पञ्चम प्रागम-साहित्य भोग और मोक्ष की एकवाक्यता करके क्रमपूर्वक व्यवहारसुख और परमार्थसुख दोनों दे सकता है। तन्त्र-मागम तन्त्र वह विज्ञान है जो ऐसे साधनो और योगो का निर्देश करता है जिनके द्वारा मनोबल की उन्नति की जा सकती है । इन साधनो एवं प्रयोगों का उद्देश्य निस्सदेह मोक्ष की प्राप्ति है। परन्तु एक जन्म मे सब लोग इस स्थिति पर नही पहुंच सकते, अभ्यास करते-करते उनके अन्दर कुछ विशिष्ट शक्तियाँ जागृत हो जाती हैं जिन्हें सिद्धि कहते हैं। सिद्धियाँ कुछ अलौकिक शक्तियाँ हैं जिन का प्रयोग वे ही कर सकते हैं जिन्होने इन्हें प्राप्त किया है। अन्य कोई भी व्यक्ति इनका उपयोग नहीं कर सकता। पातञ्जल योगसूत्र मे अणिमा, गरिमा, लघिमा आदि पाठ सिद्धियाँ मानी हैं। परन्तु उसके पीछे के ग्रन्थो ने चौतीस सिद्धियाँ मानी हैं । हिन्दू और बौद्ध तन्त्रों के विभिन्न भागमों के द्वारा निर्दिष्ट विधि एवं साधनों का अनुसरण करने से इनमे से कुछ अथवा अधिक सिद्धियो का प्राप्त कर लेना सम्भव है । तन्त्रों का यह उद्घोष है कि जगत् के भौतिक साधनो की उन्नति द्वारा जो कुछ सम्भव हो सकता है, उसे एक ही व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति के विकास द्वारा सिद्ध कर सकता है। तन्त्रो के प्रति सामान्यतया यह भ्रान्ति फैली हुई है कि तन्त्र वेदो से भिन्न हैं मौर इनमे अनार्यों के से आचरण एवं व्यवहारो का दर्शन होता है। वस्तुतः यह भ्रान्तिमात्र है । तन्त्र वेदवाह्य न होकर वेद-सम्मत है। हाँ, इतना अवश्य है कि तन्त्र वेदो की तरह किसी भी वर्ण के लिये अग्राह्य नही है। तन्त्रों मे सर्वसाधारणजनों के लिये साधन का मार्ग प्रस्तुत किया गया है । वेद की क्रियाएँ सामान्यजनो के लिये अधिक परिश्रमसाध्य, व्ययसाध्य एव प्रतिबन्ध- , [ ५ ] . साध्य होने से उन क्रियाओ को यथाविधि सम्पन्न करना सहजसाध्य नही है । इसीलिये परमकारुणिक भगवान् शिव ने सहजसाधनगम्य तन्त्रो का प्रकटी- करण 'आगम' नाम से किया है। तन्त्र की व्युत्पत्ति एवं परिभाषा भारतीय कोशकारी के अनुसार 'तन्त्र' शब्द का प्रयोग आगम, सिद्धान्त, शिवमुखोक्तशास्त्र आदि के अर्थो मे हुआ है, वामन, भट्टोजी दीक्षित आदि महावैयाकरण पण्डितों ने 'तन्त्र' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की है-'तनोति सर्वशास्त्राणां सिद्धान्तान् यत्तत्तन्त्रम्' अर्थात् जो समस्त शास्त्रों के सिद्धान्त अथवा निर्णयो का विस्तार करे उसे 'तन्त्र' कहते हैं। प्राचीन शास्त्रों में यद्यपि तन्त्र-शब्द का प्रयोग अनेक विषयो के शास्त्रो के लिये हुआ है जैसे - 'कपिलतन्त्र, वासिष्ठतन्त्र, जैमिनितन्त्र, पूर्वतन्त्र, उत्तर- तन्त्र आदि' । तथापि इस शब्द का अधिकतर प्रचलन आगमशास्त्र, निगम- शास्त्र अथवा शिवमुखोद्गीर्ण शास्त्र के लिये ही हुआ है- प्रागतं शिववक्त्रेभ्यो गतञ्च गिरिजामुखम् । वासुदेवस्य तस्मादागममुच्यते ।। (सिंहसिद्धान्तसिन्धु पृ०-४२६) x - - मतञ्च x X प्रागतं शिववक्त्राच्च गतश्च गिरिजामुखे । तेनागमानि तन्त्राणि कथितानि वरानने ॥१२७॥ यानि कानि च शास्त्राणि कथितान्यागमस्य च । तानि तानि प्रकथ्यन्ते कोलाचरणहेतवे ॥१२८।। (समयाचारतन्त्र) निर्गतं गिरिजावत्राद् गतं च गिरिजा तो । मत च वासुदेवस्य तस्मानिगम उच्यते ।। आज्ञावस्तु समन्ताच्च गम्यत इत्यागमः स्मृतः । तनुते त्रायते नित्यं तन्त्रमित्थं विदुर्बुधाः ।। [श्रीसत्कारिशर्मालिखित भूमिका (दुर्गासप्तशती चौ० खम्बासस्कृत सीरीजी वाराणसी)] तन्त्र की परिभापा शास्त्रो में इस प्रकार प्राप्त है- Y • [ hand सर्गश्च प्रतिसर्गश्च मन्त्रनिर्णयमेव च। -देवतानां च संस्थान तीर्थानां चैव वर्णनम् ।। तथैवाश्रमधश्चि विप्रसस्थानमेव च । संस्थानं चैव भूतानां यन्त्राणां चैव निर्णय ॥ उत्पत्तिविबुधानाञ्च तरूणां कल्पसजितम् । सस्थानः ज्योतिषां व पुराणाख्यानमेव च।। कोषस्य कथनञ्चैव प्रतानां परिभाषणम् । शौचाशौचस्य चारयान स्त्रीपुसोचव लक्षणम् ।। राजधर्मो दानधर्मों युगधर्मस्तथैव च । व्यवहारः कथ्यते च तथा चाध्यात्मवर्णनम् ।। इत्यादिलक्षणयुक्त तन्त्रमित्यभिधीयते । अर्थात् तन्त्रशास्त्र उसे कहते हैं जिसमे सृष्टि, प्रलय मन्त्रनिर्णय, देवता- सस्थान, तीर्थवर्णन आदि का वर्णन हो। चाराहीतन्त्र के कथनानुसार तो तन्त्र 'करप' के अन्तर्गत है- कल्पश्चतुर्विध, प्रोक्त प्रागमो डामरस्तया । यामलश्च तथा तन्त्र तेषा भेदा पृथक् पृथक् ।। इस परिभाषा से तो वेद के छह अगो का कल्प ही वस्तुत: 'तन्त्र' है । बौद्धो का दीर्घनिकाय इसी कल्प को 'कमुभ' कहता है जिसका अध्ययन-अध्या न भगवान् बुद्ध के समय मे खूब प्रचलित था । तन्त्रों में वाममार्ग और पञ्चमकार तन्त्रो का लक्ष्य आदि से अन्त तक अद्वैत रहा है और तन्त्र वेद का साथी रहा है किन्तु 'कालस्य कुटिला गतिः' के अनुसार, वर्तमान मे तन्त्रतत्त्व से अन- भिज्ञ विद्वानो ने यह भ्रान्त धारणा उत्पन्न कर दी है कि 'तन्त्रो मे वाम मार्ग एवं पञ्चमकार का विशेष रूप से प्रतिपादन होने के कारण अनार्यमार्ग का प्रतिपादक है, अतः हेय है।' अंतः "यहाँ पर वाममार्ग एव पञ्चमकारो के सम्बन्ध में संक्षेपतः विश्लेषण करना भसमीचीन नहीं होगा। तन्त्र-प्रवर्तक भगवान् शंकर ने वाममार्ग को योगियो के लिये भी परमगूढ एव अगम्य बतलाया है। ऐसी अवस्था मे वाममार्ग 'अनार्यों का मार्ग' हो ही कैसे सकता है ? केवल 'वाम' एवं तत्प्रतिपादित 'पचमकार' शब्दमात्र से ही इसे 'अनार्य मार्ग' कहना अनुपयुक्त है क्यो कि वामशब्द का प्रयोग वेदो मे भी प्रशस्यार्थ मे परिलक्षित होता है । ऋग्विर्धान में कहा है- -- [ ७ ] अस्य वामस्य सूक्तं तु जपेच्चान्यत्र वा जले । ब्रह्महत्यादिकं दग्ध्वा विष्णुलोकं स गच्छति ।। अर्थात् इस वामसूक्त के पाठमात्र से ही विष्णुलोक की प्राप्ति अर्थात् 'तद्विष्णोः परम पदम्' के अनुसार विष्णुपदप्राप्तिरूपी मोक्ष की प्राप्ति होती है। निरुक्त (निघण्टु) मे वामशब्द का अर्थ 'प्रशस्य' लिखा है- 'अस्र माः, अनेमाः, अनेद्यः, अनवद्यः, अनभिशस्ताः, उक्थ्यः, सुनीथ., पाक., वामः, वयुनमिति दश प्रशस्यनामानि । यहाँ वामनाम प्रशस्य का द्योतक है और प्रशस्य प्रज्ञावान ही होते हैं- य एव हि प्रज्ञावन्तस्त एवं हि प्रशस्या भवन्ति'। इससे स्पष्ट है कि प्रज्ञावान् प्रगस्य योगी का नाम ही 'वाम' है और उस योगी के मार्ग का ही नाम 'वाम- मार्ग' है । इस मार्ग मे जितेन्द्रिय के लिये ही अधिकार की व्यवस्था है, न कि इन्द्रियलोलुप प्राणियो के लिये जैसा कि भगवान् शङ्कर का कथन है- परद्रव्येषु योऽन्यश्च परस्त्रीषु नपुसक । परापवादे यो मूकः सर्वदा विजितेन्द्रियः । तस्यैव ब्राह्मणस्यात्र वामे स्यादधिकारिता । (मेकतन्त्र) अर्थात् परद्रव्य, परदारा और परापवाद से विमुख, सयमी ब्राह्मण ही वाममार्ग का अधिकारी होता है। अयं सर्वोत्तमो धर्म. शिवोक्त सर्वसिद्धिद.। जितेन्द्रियस्य सुलभो. नान्यस्यानन्तजन्तुभि. । (पुरश्चर्यार्णव) इसी प्रकार मेरुतन्त्र आदि भागमग्रन्थो मे पञ्चमकारो की व्याख्या इस प्रकार की गई है- मद्य मांसच्च मीनञ्च मुद्रा मैथुनमेव च । मकारपञ्चक प्राहुर्योगिनां मुक्तिदायकम् ।। अर्थात्-मद्य, मांस, मीन, मुद्रा और मैथुन ये पांच आध्यात्मिक मकार ही योगियों को मोक्ष देने वाले हैं। व्योमपङ्कजनिष्यन्दसुधापानरतो भवेत् । मद्यपानमिद प्रोक्तमितरे मद्यपायिनः॥ महारन्ध्र-सहस्रदल से जो त्रवित होता है उसे सुधा (अमृत) कहते हैं जिसे 1 कुलकुण्डलिनी द्वारा योगिजन प्राप्त करते हैं इसी का नाम मद्यपान है। इसके अतिरिक्त पीने वाला मद्यप कहलाता है। अर्थात्-ब्रह्मरन्ध्र के, सहस्रारकमलरूपी पात्र से जो ब्रह्माण्ड को तृप्त करने वाली सुवा-धारा बहती है वही पीने योग्य मद्य (मदिरा) है। पुण्यापुण्यपशु हत्वा ज्ञानखड्गन योगवित् । परे लयं नयेच्चित्त मांसाशी स निगद्यते ।। अर्थात्-पुण्य-पापल्पी -पशु को ज्ञानरूपी खड्ग से मार कर जो योगी सन को ब्रह्म मे लीन करता है, वही मासाशी (मांसाहारी) है । और भी.. कामक्रोधी पशू तुल्यौ यलि दस्वा जपं चरेत् । X X X + कामक्रोधसुलोममोहपशुकांश्छित्वा विवेकासिना । मांसं निविषयं परात्मसुखदं भुञ्जन्ति तेषां वुवाः ।। अर्थात्-विवेकी पुरुष काम, क्रोध, लोभ और मोहरूपी पशुप्रो को विवेक रूपो तलवार से काट कर दूसरे प्राणियो को भी सुख देने वाले निविपयरूप मांस का भक्षण करते हैं । मानसादीन्द्रियगणं संयम्यात्मनि योजयेत् । स मीनाशी भवेद्देषि इतरे प्राणिहिंसफा ।। मन आदि सारी इन्द्रियो को वश मे करके आत्मा मे लगाने वालों को ही भोनाशी (मत्स्याहारी) कहते हैं, इससे इतर जीवहिंसक हैं । माशातृष्णाजुगुप्सामयविषयवृणामानलज्जाप्रकोपा ब्रह्माग्नावष्टमुद्राः परसुकृतिजन, पच्यमान ममन्तात् । नित्य सम्भावयेत्तानवहितमनसा दिव्यभावानुरागी , योऽसौ ब्रह्माण्डमाण्डे पशुहतिविमुखो रुद्रतुल्यो महात्मा ।। अर्थात्-आशा-तृष्णादि आठ मुद्राओ को ब्रह्मरूपी अग्नि में अच्छी तरह पकाता हुआ दिव्य भाव का अनुरागी जो योगी पशु-हिंसा से पराड मुख होकर सावधान मन से भक्षण करे; वह महात्मा पुरुप ससार मे रुद्रतुल्य होता है । या नाडी सूक्ष्मरूपो परमपदगता सेवनीया सुषुम्णा , सा कान्ताऽऽलिङ्गना न मनुजरमणी सुन्दरी वारयोपित् ।
[ 8 ] . 1- कुर्याच्चन्द्रार्कयोगे युगपवनगते मथुन नैव योनो , योगीन्द्रो विश्ववन्द्य सुखमयभवने ता परिष्वज्य नित्यम् ।। अर्थात्-परमानन्द को प्राप्त हुई सूक्ष्मरूपवाली सुपुम्णा नाड़ी है, वही आलिङ्गन करने योग्य उपभोग्या कान्ता है, न कि मनुष्यरूपा सुन्दरी वेश्या । सुषुम्णा का सहस्रचक्रान्तर्गत परब्रह्म के साथ सयोग का ही नाम मैथुन है, स्त्री- सम्भोग का नही । और भी- ध्यानं देव्याः पदाम्मोजे पञ्चम परिकीतितम् । अर्थात्-श्रीदेवी के श्रीचरणो का चिन्तन ही पञ्चम अर्थात् मैथुन है । सांख्यायनतन्त्र प्रस्तुत 'सांख्यायनतन्त्र' तन्त्रशास्त्र का ही सांख्यायनमुनिप्रोक्त' एक लघुग्रन्थ है । यद्यपि इसकी परिगणना शिवमुखोद्गीर्ण नानागमो मे वणित ६४ तन्त्रो में तो नही की गई है, फिर भी यह मुनिप्रणीत होने के कारण उपतन्त्रो मे अवश्य ही परिगणनीय है जैसा कि वाराहीतत्र' के निम्न पद्यो से स्पष्ट है- बौद्धोक्तान्युपतन्त्राणि कापिलोक्तानि यानि च । अद्भुतानि च एतानि जैमिन्युक्तानि ,यानि वसिष्ठ कपिलश्चव नारदो गर्ग एव पुल त्यो भार्गवः सिद्धो याज्ञवल्क्यो भृगुस्तथा ।। शुक्रो बृहस्पतिश्चैव अन्ये ये मुनिसत्तमाः । एमि प्रणीतान्यन्यानि उपतन्त्राणि यानि च ।। संख्यातानि तान्यत्र धर्मविद्धिमहात्मभिः । सारात्सारतराण्येव संख्यातानि । निबोधत ॥ जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है कि 'जगत् के भौतिक साधनों की उन्नति के द्वारा जो कुछ सभव हो सकता है उसे एक ही व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति के विकास द्वारा सिद्ध कर सकता है । इस मानसिक शक्ति को बढ़ाने का उत्तम साधन है-वाणी 'द्वारा अथवा मन ही मन मन्त्रो का उच्चारण करना। आगम-ग्रन्थो ऋषि महर्षियो द्वारा सुदीर्घकाल च।। . न - १. पद्मजो नारदो विद्या साख्यायनमुनि प्रति । उपदेशकमेव । उक्तवान्मेरुकन्दरे ॥१५॥ तेन देवीकटाक्षेण कृतवानागमं भुवि । [साख्यायनतन्त्र-प्रथम पटल] २ शब्दकल्पद्र म-द्वितीयकाण्ड, पृष्ठ ५८५ ।
[ १० ] तक अनुभूत एव सुपरीक्षित कुछ ऐसे शब्दों एव शब्दसमूहों का निर्देश किया गया है जिन्हें 'वोजमन्त्र' , 'हृदयमन्त्र' अथवा 'मालामन्त्र' कहा गया है । इन मन्त्रो का निश्चित संख्या मे जप करने से (उच्चारण करने से) निश्चित ही अपने उद्देश्यो (मनोरथो) की प्राप्ति होती है जैसा कि निम्नोक्ति से स्पष्ट है- 'एक. शब्दः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग्भवति । प्रस्तुत ग्रन्थ इसी का एक ज्वलन्त उदाहरण है जिसमें नारदोपासिता श्री- वगलामुखीदेवी की पञ्चाङ्गोपासना-विधि के साथ ऐसे विशिष्ट १५ मन्त्री के प्रयोग-विधान बतलाये गये हैं जिनके द्वारा साधक (उपासक) मनुष्य अत्यन्त विस्मयोत्पादक अलौकिक शक्तियों (सिद्धियों) को अर्जित कर अपनी समस्त अभिलापामो को प्राप्त कर सकता है। श्रीवगलामुखी श्रीवगलामुखी आगमग्रन्थो मे वर्णित दश महाविद्याओ' मे अन्यतम है जिसे इस तन्त्र मे ब्रह्मास्त्रस्तम्भिनीविद्या, स्तब्धमाया, प्रवृत्तिरोधिनी, वगला, मन्त्रजीवनविद्या, प्राणिप्राणापहारिका एव षट्कर्माधारविद्या के नाम से अभि- हित किया गया है- ब्रह्मास्त्रस्तम्मिनी विद्या स्तव्यमायामनुस्तथा । प्रवृत्तिरोधिनी विद्या वगला च कुमारक ॥६ मन्त्रजीवनविद्या च प्राणिप्राणापहारिका। षट्कर्माधारविद्या च ये ते पर्यायवाचकाः ॥१०॥ (प्रथमः पटलः) ऐसा प्रतीत होता है कि निगमशास्त्रोक्त 'वल्गा' ही आगमशास्त्रों की वगलामुखी है क्योकि सस्कृतभाषा मे जैसे 'हिंस' शब्द वर्णव्यत्यय होने के कारण 'सिंह' और लौकिक भाषा मे 'मतलब' मतबल बन जाता है वैसे ही निगम की T १. २. . विशत्यविका मन्त्रा मालामन्त्रा इति स्मृता. । दशाक्षराधिका मन्त्रास्तदग्विीजसज्ञिताः । (सिंहसिद्धान्तसिन्धु-पृष्ठ २६५) काली तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्वरी। भैरवी छिन्नमस्ता च विद्या धूमावती तथा ।। वगला सिद्धविद्या च मातङ्गी कमलात्मिका । एता दश महाविद्या सिद्धविद्या. प्रकीर्तिता ॥ (प्रारणतोषिणी, पृष्ठ-७१७) ३ यदा व कृत्यामुत्खनन्ति अथ सालसा मोघा भवति । तथो एवंप एतद्यद्यस्मा अत्र कश्चिद् द्विषन् भ्रातृव्य कृत्या वला निखनति तानेवैतदुस्किरति । (शतपथब्राह्मण-३१५१४१३) [ ११ ] वल्गा पागम मे वगलारूप मे परिणत हुई है। इसी शक्ति की आराधना के द्वारा पुरातन युगों मे असुरो एव शत्रुओ पर अभिचारादिप्रयोग किये जाते थे जैसा कि प्राचार्य मनु के इस वाक्य से स्पष्ट होता है-- श्रुतीरथर्वाङ्गिरसोः कुर्यादिविचारयन् । माक्शस्त्र वै ब्राह्मणस्य तेन हन्यादरीन् द्विज ॥ (मनु० १११३३) बगलाशन्दनिरुक्ति कुन्जिकातन्त्र मे 'वगला' शब्द का निर्वचन इस प्रकार किया गया है- वकारे वारुणी देवी गकारे सिद्धिदा स्मृता । लकारे पृथिवी चैव चैतन्या या प्रकीत्तिता ॥' अर्थात् -वकार से-वारुणी देवी, गकार से सिद्धिदा, लकार से पृथिवी-रूपा होने से जो शक्ति चैतन्यस्वरूपा है वही वगला है। श्रीवगलामुखी का प्राविर्भाव इस महाविद्या का आविर्भाव का कारण स्पष्ट करते हुए 'स्वतन्त्र तन्त्र' कहता है कि सत्ययुग मे वातक्षोभ के उत्पन्न होने पर चराचर सृष्टि के विनाश को देख कर अत्यन्त चिन्तामग्न विष्णु ने श्रीत्रिपुराम्बा की तपस्या की। तपस्या से सन्तुष्ट श्रीत्रिपुराम्बा ने सौराष्ट्र मे हरिद्राख्य सरोवर मे जलक्रीडा प्रारम्भ की। उस पीत सरोवर से श्रीविद्या से उत्पन्न तेज (प्रकाश) इधर- उधर अर्थात् चारो दिशाओ मे फैलने लगा। उसी तेज से त्रैलोक्यस्तमिनी ब्रह्मास्त्रविद्या का आविर्भाव हुआ । २ १. प्रारणतोपिणी पृष्ठ ७१७ । अथ वक्ष्यामि देवेशि वगलोत्पत्तिकारणम् । पुरा कृतयुगे देवि वातक्षोभ उपस्थिते ।। चराचरविनाशाय विष्णुश्चिन्तापरायणः । तपस्यया च सन्तुष्टा महाश्रीत्रिपुराम्बिका ॥ हरिद्राल्य सरो दृष्ट्वा जलक्रीडापरायणा । महापीतह्रदस्यान्ते सौराष्ट्र वगलाम्बिका ।। श्रीविद्यासम्भव तेजो विजृम्भति इतस्ततः । चतुर्दशी भौमयुता मकारेण समन्विता ।। कुलऋक्षसमायुक्ता वीररात्रि. प्रकीत्तिता। स्यामेवार्द्धरात्री तु पीतहदनिवासिनी ॥ ब्रह्मास्त्र विद्या सजाता प्रैलोक्यम्तभिनी परा। ततेजो विष्णुज तेजो विद्यानुविधयोर्गतम् ।। प्राणतोपिरणी-पृष्ठ ७१७ (कलकत्ता प्रकाशन) [ १२ ] सम्पादन इस ग्रन्थ के सपादन मे ५ हस्तप्रतियो का उपयोग किया गया है। इन प्रतियो में से ४ प्रतियाँ प्रतिष्ठान के सग्रह की है तथा १ प्रति जयपुर-निवासी प० श्रीरामकृपालुजी शर्मा के सग्रह की है। प्रतिष्ठान की प्रतियो को यहां पर क. ख. ग घ संज्ञा से और श्रीशर्माजी की प्रति को रा० सज्ञा से संबो पित किया गया है । इस ग्रथ के २६ वें पटल तक क प्रति का पाठ मूलरूप मे ऊपर उद्धृत कर ख ग घ के पाठान्तरो को पाद-टिप्पणियो के रूप मे नीचे दिया गया है तथा ३०वें पटल से ३३वे पटल तक ख. प्रति का पाठ मूल रूप मे देकर ग घ ० प्रतियो के पाठान्तर नीचे उद्ध त किये गये हैं क्योकि क० और ग० प्रति त्रिंशत्पटलो में ही समाप्त हो जाती है। इसी प्रकार ख प्रति यद्यपि ३५ पटलो मे पूरी होती है किन्तु वस्तुत: बह ३४ पटलात्मक ही है कारण कि लिपिकर्ता के प्रमाद से २६वे पटल का कुछ अंश ३०वे पटल के रूप मे तथा २५ पद्यात्मक ३१वें पटल को १६॥ पद्यो मे ही समाप्त कर एक पृथक् पटल का रूप दे दिया गया है जिसे हमने पुस्तक मे इस ( ) कोष्ठक मे आवद्ध कर दिया है । ३४वे पटल से ३६वें पटल तक घ प्रति का पाठ ऊपर मूलरूप मे और रा० प्रति के पाठान्तर नीचे उद्धत किये हैं इसका कारण यह है कि रा० प्रति इस पुस्तक के २६ पटल तक का मुद्रण कार्य पूरा हो जाने के बाद प्राप्त हुई। इसके अतिरिक्त ख. और घ प्रतियो मे पटलो का व्युत्क्रम एवं भेद भी पाया जाता है जैसे-ख. प्रति मे जो ३१, ३२ एन ३३वे पटल हैं वे घ. प्रति मे क्रमशः ३४, ३५ तथा ३६वे पटल के रूप मे प्राप्त हैं और ख. प्रति का ३५वा पटल जो कि वस्तुतः ३४वा पटल है, किसी अन्य प्रतियो मे प्राप्त नही है। ऐसी स्थिति मे इस पटल को ३६वे पटल के बाद ही यहां पर स्थान दिया गया है। अनुमित पाठ को ( ) चिह्नाङ्कत कोष्ठक मे और अस्पष्ट एवं विलुप्त पाठ को [ ] चिह्नाङ्कित कोष्ठक मे दिया गया है । -- प्रति-परिचय क. ग्रन्थाङ्क-९६००; लिपिकाल-१९वी शताब्दी (विक्रम); माप- २६४१३' से. मी ; पत्रसख्या-३८; पक्ति-११, पक्ति-११, अक्षर-३८; दशा सुन्दर एन सुपाठ्य, अपेक्षाकृत गुद्ध प्रति ।
;
ख. ग्रंथाङ्क-५५८५, लिपिकाल १६वी शताब्दी (विक्रम); पत्र संख्या
५१; माप-३४'५+१३' से. मी.; पक्ति-६; अक्षर ३६;
दशा-सुन्दर, सुवाच्य एव अपेक्षाकृत शुद्ध प्रति ।
ग. ग्रंथाङ्क-१८३६५; लिपिकाल-सं० १७६६ (विक्रम) पत्रसख्या ४२;
माप-२३' x १२५ से मी.; पक्ति-१२, अक्षर ३३,
दशा-कुछ जीर्ण, सुवाच्य किन्तु अगुद्ध ।
घ, ग्रन्थाङ्क-१८३६३ ; लिपिकाल-१६वी गताब्दी (विक्रम) पत्र संख्या-१२४,
पक्ति-8; अक्षर-१६;
दशा-ठीक-ठीक है, सुवाच्य किन्तु अशुद्ध प्रति है ।
रा० श्रीरामकृपालु शर्मासग्रह ग्रन्थाङ्क-माप-३३' x १०', लिपिकाल-स०
१६२६ (विक्रम); पत्रसख्या-४६, पवित-६, अक्षर-४६; दशा-जीर्ण;
सुवाच्य एव अशुद्ध प्रति है।
प्राभार-प्रदर्शन
मैं राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर के निदेशक समादरणीय
डॉ० फतहसिंहजी का विशेष आभारी हूं जिनके सत्परामर्श एव सत्प्रेरणा से
इस अतिविलम्बित नथ का सपादन-कार्य पूर्ण कर सका। जयपुर-निवासी
पं० श्रीरामकृपालुजी शर्मा का भी में विशेष आभार मानता हूँ जिन्होने अपने
संग्रह मे से दूढ कर इस ग्रन्थ की प्रति हमे प्रेषित की। साथ ही में प्रतिष्ठान
के सहयोगी विशेषतः पुस्तकालय सहायक श्रीमती गणेशी प्रात्रेय एवं प्रति-
लिपिकर्ता श्रीब्रजेशकुमार सिंह को भी साधुवादो से सत्कृत करता हूँ जिन्होने
पद्यानुक्रम बना कर मुझे सहयोग दिया। अन्त में में साधक विद्वानो से सनम्र
प्रार्थना करता हूँ कि 'इस ग्रन्थ में दृष्टि दोष एवं वित्तचाञ्चल्यवश कही कोई
त्रुटि रह गई हो उसका वे समाधान करते हुये 'समादधतु सञ्जनाः' के अनुसार
मुझे क्षमा करें।
1
कार्तिक शुक्ल एकादशी
विक्रम सवत् २०२६
विदुषामाश्रवो
गोस्वामी लक्ष्मीनारायणदीक्षितः
विषयानुक्रमः क्रमाङ्क विषय पृष्ठ श्लोक १ प्रथमः पटलः । पृष्ठ १-३ २-६ (१) पीताम्बरादेवीध्यानम् (२) मायावि-राक्षसाञ्जतुकामस्य कात्तिकेयस्य शिवम्प्रति जयोपायजिज्ञासा (३) कात्तिकेयं प्रति जयार्थे शिवनिगदित ब्रह्मास्त्रविद्या- धगलामनुप्रशंसनम् (४) नारदस्य सांख्यायनमुनये ब्रह्मास्त्र विद्योपदेशः, तद्विद्याया भूमौ प्रकाशनमश्च (५) ब्रह्मास्त्रविद्यामन्त्रोपासनाफल, मन्त्रलब्धये कुलगुरुमुखाद् दीक्षाग्रहणावश्यकत्वञ्च ७-१४ २ १५-१५ २-३ १७-१८ २. द्वितीय पटल. पृष्ठ ३- ३ २ ४ (१) द्विभुजापीताम्बराध्यानम् (२) दीक्षाविधिजिज्ञासा (३) पुस्तफलिखितमन्त्रजपे हानिसम्भवात कुलगुरुमुखाद्दीक्षाग्रहणप्रतिपादनम् (४) सद्गुरुलक्षणानि (५) कारणत्रयेण विद्योपलब्धि , विद्याया राजसादिभेदत्रयञ्च (६) शिष्यलक्षणानि क ५ १२-१७ १८-२२ ५ ३ तृतीयः पटल. - पृष्ठ ६-८ ६ ६ २ ६ (१) वाड्मुखस्तम्भिनीवगलामुखीध्यानम् (२) अभिषेविधिजिज्ञासा (३) मन्त्राभिषेचने कालनिर्णयः (४) शिष्यस्नापन, गायत्रीजपस्यावश्यकत्वञ्च (५) कलशनवकस्थापन विधि. (६) ऋत्विग्वरणविधि. कलशमानन विधिश्च (७) विद्यामन्त्रोपदेशविधि ६ ७ ३-६ ६-७ ६-१७ १८-२४ २५-२८ ७-८ २ ] सांस्यायनतन्त्रे क्रमाङ्क विपय पृष्ठ श्लोक ४. चतुर्थः पटलः 8 8 २ (१) प्रेतासनावगलामुखीध्यानम् (२) ब्रह्मास्त्रमन्त्रसन्ध्याजिज्ञासा (३) मन्त्रसन्ध्याविधिः (४) त्रिकालोपस्थानम् (५) मन्त्रसन्ध्योपस्थानयोरनिवार्यत्वम् ९-१० १०-११ ११ ३-१६ १७-२५ २६-२६ ५ पञ्चम पटल: पृष्ठ ११-१३ ११ २ ३-६ - (१) श्रीवगलादेवीध्यानम् (२) एकाक्षरीमहामन्त्रजिज्ञासा (३) एकाक्षरीबीजमन्त्रोद्धारः (४) ऋष्यादिकरषडङ्गन्यासविधि. (५) पजरन्यासविधिः (६) मातृकान्यासविधिः (७) वगलामुखीध्यानं तञ्जपविधिश्च १२ १२ १२-१३ mm ११-१५ १६-१८ १६-२४ ६. षष्ठः पटलः पृष्ठ १४-१६ १४ १ १४ ૨ (१) स्तम्भनकारिणीवगलामुखीध्यानम् (२) एकाक्षरीमहामन्त्रप्रयोगजिज्ञासा (३) होमे कामनाभेवेन कुण्डभेदा. (४) होसे कामनाभेदेन स्थण्डिलभेदा (५) होम संख्याभेदेन कुण्ड-स्थण्डिलमानानि (६) शान्त्यादिषट्कर्माणि तल्लक्षणानि च (७) कर्मभेदेन होमद्रव्याणि तत्सख्याहुतिनिर्धारणं च १४ १४ १५ १५ १६ १०-११ १२-१५ १६-२० २०-२७ ७ सप्तमः पटल: पृष्ठ १६-१८ २ - (१) श्रीवगलाध्यानम् (पीताम्बरधरादेवीघ्यामम्) (२) पनिशदक्षरीवगलाविद्यामन्त्रजिज्ञासा (३) पनिशदक्षरीविद्यामन्त्रोद्धारः (४) न्यासविद्याक्रम (५) वगलामुखीध्यान तदावश्यकत्वञ्च (६) ऋष्यादिकथनम् १६-१७ १७ १७ ३-७ 4-६ १०-१२ १३-१४ १७ न विषयानुक्रमः ३ विषय पृष्ठ दोक 1 (७) सङ्कल्पपूर्वक अपसंख्या निर (८) तर्पण-होमद्रव्याणि ताकारसद (8) पुरस्चरपललयं तदकरपेसिद्विश्व (१०) कर्मभेदेन संख्यायुतहोमद्रव्याणि १५ १६-१७ १५-१६ २०-२६ ८. प्रप्टमः पटलः पृष्ठ १५-२१ ६ २ 5 (१) शिवा (बगलादेवी) घ्यानम् (२) बगलामन्त्र राजप्रयोगजिज्ञासा (३) मनेदेन होमद्रव्ययोगा, नानाद्रव्ययोजन- प्रकारा मन्नयोजनादिविश्व (४) द्रवतप्पंदन परकृतकर्मनिरास: १८-२० २०-२१ है. नवमः पटलः पृष्ठ २१-२३ ११) बगलामुखोप्यानम् (२) वगलाननो प्रयोगमूलयन्त्रजिनाता (३) यन्त्रोद्वारा (४) यन्ने मन्त्रलेसनविधिः {५) कर्मभेदेन नानापुस्यैर्यन्त्रपूजाविधिः २ २१ २१-२२ ૨૨-૨૨ १० दशनः पटलः पृष्ठ २३-२६ (3) पीताबरावालाध्यानम् (२) मन्त्रलेपनप्रयोगजिज्ञासा (e) लेपने मन चन्दनविद्रव्यनियनन् १ २ ११. एकादशः पटलः पृष्ठ २६-२६ १ (१) बगलादेवीच्यानम् (२) पन्द्रराजतपंपप्रयोगनिज्ञासा (३) फर्मभेदेन मुडादिनद्रव्यनिस्मनन् २ १२ हायाः पटलः पृष्ठ २६-३६ (1) चिन्मयोवानाम्यानन् (२) बगलागायत्रीमिजाना २६ १ ४] सांख्यायनतन्त्र क्रमाङ्क विषय पृष्ठ श्लोक ३-५ (३) गायत्रीमन्त्रोद्धारः (४) ऋष्यादिकयनान्ते पुरश्चर्या-न्यास-ध्यानादिनिरूपणम् (५) कर्मभेदेन गायत्रीमन्त्रप्रयोगाः २६ २९ ३०-३१ ६-६ १०-२६ १३. त्रयोदशः पटलः पृष्ठ ३१-३४ १ २ ३१ ३२ (१) वगलाम्बाध्यानम् (२) -यन्त्रपूजाजिज्ञासा (३) यन्त्रपूजाविधिः (४) शालग्रामादौ पूजाविचार (५) पूजा-कारणद्रव्यविचारः (६) मन्त्र सिद्धिफलकथनम् १४-१६ १७-१८ १६-२७ ३३-३४ १४. चतुर्दशः पटलः पृष्ठ ३४-३७ १ २ २-५ (१) वगलाध्यानम् (२) वगला विधिजिज्ञासा ३४ (३) देशभेदात् सृष्टिस्थितिसंहारपूजाकथनम् (४) सृष्टिक्रमेण सौभाग्यार्चन विधि ३५-३६ (५) प्रयोगादौ सविधातां सौभाग्याची विना रौरवादिगमनम् ३६ (६) सौभाग्यार्चने स्वपल्यादिपूजाविषयकानि सांख्यायन- मृकण्डदुर्वासो-मतङ्गमुनिमतानि ३६-३७ १८-२५ २६-३१ १५. पञ्चदशः पटलः पृष्ठ ३७-४० १ २ (१) स्तम्मनास्त्रस्वरूपिणीवगलाध्यानम् (२) पञ्चास्त्रविद्याजिज्ञासा (३) पञ्चास्त्रविद्याकथनम् (४) वगलास्त्रविद्योद्धारस्तत्प्रयोगविधिश्च (५) उल्कामुख्यस्त्रविद्योद्धारस्तत्प्रयोगविधिश्च ३८ ७-१६ २०-३३ ३६-४० १५ षोडशः पटलः पृष्ठ ४०-४३ ४० १ २ (१) स्तम्भनास्त्राधिदेवतावगलाध्यानम् (२) अस्त्र विस्तारजिज्ञासा (३) जातवेदमुख्यस्त्रविद्योद्धारस्तत्प्रयोगविधिश्च (४) ज्वालामुरूपस्त्रविद्योद्धारस्तत्प्रयोगविधिश्च ३-१३ ४०.४१ ४१-४२ १४-२४ 7 + विषयानुक्रमः [५ क्रमाङ्क विषय पृष्ठ श्लोक (५) बृहद्भानुमुख्यस्त्रविद्योद्धारस्तत्प्रयोगविधिश्च (६) प्रयोगान्ते सौभाग्या_ssवश्यकत्वम् ४२-४३ ४३ २५-३७ ३५-४० १७. सप्तदशः पटलः पृष्ठ ४३-४६ १ ४३० ४३ २ ४४-४५ (१) वगलाम्विकाध्यानम्- (२) शताक्षरोमहामन्त्रजिज्ञासा (३) शताक्षरीमन्त्रोद्धारः (४) ऋष्यादि-न्यासविद्या-ध्यानानि (५) नपसंख्या-तर्पणद्रव्यादिकथनम् (६) कर्मभेदाढवनद्रव्याणि तदाहुतिसख्या-समय-कयनञ्च १८. अष्टादशः पटल. एष्ठ ४६-४६ ३-१० ११-१५ १६-१७ १८-२८ ४५ ४५.४६ -- ४६ ४६ २ ४६-४७ (१) जिह्वास्तंभनकारिणीवगलाध्यानम् (२) शताक्षरोहवनप्रयोगजिज्ञासा (३) विषमज्वरादिविविधरोगविनाशनार्थ नानाद्रव्याहुति- प्रयोगाः (४) वशीकरणाद्यभीप्सितकामनाभेदादनेकविधद्रव्याहुति- प्रयोगा. (५) बहुमूत्रादिरोगशमनप्रयोथा. (६) यश्याकर्षणप्रयोगाः (७) शत्रुरोगकृत्प्रयोगाः (८) मारणप्रयोगाः ४७ ४७-४८ ४८ ६-१६ १७-१६ २०-२५ २५-२७ २८-३४ ४ ४३ . १६ एकोनविंशः पटलः पृष्ठ ४६-५३ १ ४६ २ (१) चतुर्भुजावगलाध्यानम् (२) शताक्षरीमन्त्रप्रयोगोपसंहारजिज्ञासा (३) रिपुमारणादिप्रसङ्ग गुलिकादिविविधप्रयोगा- स्तन्निरासविधिश्च (४) पुत्तलिफायभिचारिप्रयोगा. (५) प्रयोगोपसंहारविधि ४६-५० ५१-५३ ५३ १६-३४. ३५-४३ २०. विशः पटलः पृष्ठ ५४-५७ (१) वगलादेवीध्यानम् -- ६ ] सांख्यायनतन्त्र श्रमाङ्क विषय पृष्ठ श्लोक- ५४ २ ५४ . (२) परविद्याभेदनोपायप्रश्न: (३) परविद्याभेदिनीमन्त्रोद्धारस्तदृप्यादिकयनञ्च (४) तन्न्यात-ध्यान-पुरश्चर्याकथनम् (५) परविद्याभेदिनीमन्त्रस्य नानाप्रयोगा. (६) सिद्ध मन्त्र माहात्म्यवर्णनम् ३-११ १२-१८ १६-२६ २६-३४ ५५-५६ ६.५७ २१. एकविंशः पटलः पृष्ठ ५७-५६ - ५७ १ (१) परविद्यामक्षिणीवगलाध्यानम् (२) परविद्याकर्षणादिमहदाश्चर्यफरा नानाप्रयोगा. (३) प्रयोगोपसहाराः ५७-५६ २-२४ २५ २२. द्वाविंशः पटलः पृष्ठ ५६-६१ " ५६ १ ५६ २ - ३-४ (१) बगलामुखीध्यानम् (२) वगलास्त्रविद्याप्रश्न. (३) वगलास्त्रविद्यायाः क्रम. (४) वगलास्त्रविद्यामन्त्रोद्धारः (५) तदृष्यादिन्यास-ध्यान-पुरश्चर्याविधि (६) शत्रुक्षयकृदादिनानाप्रयोगाः ५६.६६ ४-८ ६० ९-१८ १८-३० २३. श्रयोविंशः पटल पृष्ठ ६२-६४ ६२ or २ ६२ ३-४ ५ (१) श्रीवगलादेवीध्यानम् (२) वगलास्त्रमहामन्त्रप्रयोगजिज्ञासा (३) वासिद्धिप्रदप्रयोग (४) व्याधिनाशनप्रयोग. (५) जिह्वा-श्रोत्र-प्राण पाद-जठराग्नि-गात्रस्तम्भन. प्रयोगा. (६) शत्रुमाया गर्मनावप्रयोगः (७) रिपुस्त्रीणा वन्ध्याकरणप्रयोगस्तनाशनप्रयोगश्च (८) रिपुलक्ष्मीविनाशकाधनेके प्रयोगा. ६२ । ६२-६३ ६३ ६-११ १२-१३ १४-१६ १७-२७ -६३-६४ २४. चतुर्विश. पटलः पृष्ठ ६४-६६ ६४. (१) सस्तम्भल्पावगलाम्वाध्यानम् (२) वगलामन्त्रमालिकालक्षणजिज्ञासा ६४ २ विषयानुक्रमः . क्रमाङ्क विपर्य पृष्ठ श्लोक (४) हरिद्रामालानिर्माणविधि. (४) मालासस्कारविधि. (५) मालाया भूमौ पतने पुनस्तत्संस्कारः (६) शान्त्यादिकर्मभेदान् मालालक्षणानि (७) पुत्तलिकानिर्माणविधिः (८) प्राणप्रतिष्ठार्चनजपविधि. १४-६५ १०-१४ १५-१६ ६५-६६ १७-१६ ६६ २०-२३ २४-२७ २५ पञ्चविंशः पटलः पृष्ठ ६६-७१ ६७. A (१) वगलादेवीध्यानम् (२) चतुरक्षरीमहामन्त्रजिज्ञासा ६७ २ (३) चतुरक्षरोमहामन्त्रोद्धारः ३-७ (४). चतुराक्ष रो-न्यासविद्याकथनम् ६७ ७-१० (५) चतुरक्षरी-ऋष्यादिकथनम् १६) वगलाचतुरक्षरीमन्त्रध्यान पुरश्चयोंविधानञ्च ६८-६९ १२-२१ (७) योगिनीलक्षणम् ६८ २२ (८) लौकिक्यादित्रिविधपूजा तल्लक्षणानि च २३-२६ (६) योगिनां मता निर्गुणा चतुर्थी पूजा ६६ २७ (१०) चतुर्विघचर्याया गौडादिदेशभेदात् सृष्टयादिनामसङ्केत- स्तव विधिस्तत्फलानि च -६९-७० २८-४४ (११) नारी निन्दादिकरणे हानिः ७०-७१ ४५ ४५ , २६. षड्विंशः पटलः पृष्ठ ७१-७३ - १ (१) वगलादेवीध्यानम् (२) वगलाचतुरक्षरोमन्त्रप्रयोगजिज्ञासा (३) मानाद्रव्ययोगेन तर्पणप्रयोगविधिः २ ७१-७३ २७. सप्तविश. पटलः पृष्ठ ७३-७६ - । ७३ १), परब्रह्माधिदेवतावगलाध्यानम् (२) वगलाचतुरक्षरीमन्त्रहोमप्रयोगजिज्ञासा (३) कर्मभेदात् कुण्डभेदा, स्थानभेदा होमद्रन्ययोगाश्च , २ ७४-७६ ३-२६ २८. अष्टाविंशः पटलः पृष्ठ ७६-७८ 4 (१) स्तम्मनास्त्रस्वरूपिणीवगलाध्यानम् ७६ ८] LJ सांख्यायनतन्ने कमाङ्क विषय पृष्ठ श्लोक ૨ ७६-७७ ३-१३ (२) स्तम्भविद्याया. प्रयोग जिज्ञासा (३) वगलाहृदयमन्त्रप्रशस्तिवर्णनम् (४) वगलाहृदयमन्त्रोद्धारस्तज्जपेन वन्ध्यादोष- कृत्रिमरोगादिनाशनफलञ्च ७७-७८ १४-२४ M २६. ऊनत्रिशः पटलः पृष्ठ ७९-८० ७८ ७८ २ ७८ ३ (१) वगलाध्यानम् (२) वगलाहृदययन्त्र-प्रयोगजिज्ञासा (३) वगलाहृदय-यन्त्रोद्धार (४) स्वर्णादिनिर्मिते यन्त्रे वगलाहृदयमन्त्रलेखनक्रमः (५) यन्त्रपूजाविधि (६) यन्त्रपूजायाँ कर्मभेदान्नानाकुसुमप्रयोगा ७४ ७६ ८-8 ७६.८० ६-२२ ३०. त्रिश: पटलः पृष्ठ ८१-:३ २ ८१ ३-६ (१) वगलाध्यानम् (२) वगलाष्टाक्षरमन्त्रजिज्ञासा (३) वगलाष्टाक्षरमन्त्रोद्धारस्तदृष्यादिन्यासविद्याकथनञ्च (४) मन्त्रभेदेन वगलाध्यान तन्मत्रपुरश्चर्या च (५) कर्मभेदाद् विल्वादिविविधवृक्ष मूलेषु जपविधानेन नानाकार्यसिद्धयः ८१-८२ ७-१२ ८२-८३ १३-१६ ३१. एकत्रिशः पटलः पृष्ठ ८३-८६ १ २ ८४ ९४ (१) नक्तचिन्तामणिवगलाध्यानम् (२) बगलाष्टाक्षरीमन्त्र प्रयोगजिज्ञासा (३) पुत्तलीप्रयोग (४) नानाद्रव्ययोगेन जिह्वास्तम्मादिकृते भस्मचूर्ण- मक्षणाधनेके प्रयोगाः (५) पशुपक्ष्याद्यगावयवानां स्थानविशेषेषु निक्षेपाद्- रिपुमारणादिप्रयोगाः (६) नानावस्तुसयोगजधूपवासनादिप्रयोगाः ३२ त्रिश पटल पृष्ठ ८७-६० ८४-८५ ८५-८६ १२-१७ १५-३५ (१) प्रेतासनस्थावगलाध्यानम् -- विषयानुक्रमः [6 - L क्रमात विषय पृष्ठ श्लोक -८७ २ ८७ (२) वगलास्त्रोपसहारविद्याजिज्ञासा (३) ब्रह्मास्त्रस्तम्मिदीकाली विद्यामन्त्रोद्धारः (४) विद्यामन्त्रपुरश्चर्याविधि, (५) वगलास्त्रोत्रपसंहारक्रम. (जिह्वास्तम्भनायभिचार- शान्तिप्रयोगा) ८७-८८ १०-१६ ८८-६० १७-४० ३३. त्रयस्त्रिश. पटलः पृष्ठ ६०-६४ or ६० २ ५ ९१ '६२ है १०-१२ ६२ ६२ १३-१७ १८-२१ २२ २३-२८ १३ ९३ ६३-६४ २६-३८ - (१) • श्रीवगलादेवीध्यानम् (२) वगलास्त्रोपमहारयन्त्र जिज्ञासा (३) कपिलानवनीतेनोपलिप्ते कदलीपत्रे समन्त्रयन्त्र- लेखनमः (४) यंत्रस्याण्टदलेषु तायमालामनोर्लेखननिर्देश., (५) तायमालामनोरुद्धारः (६) यन्त्रप्राणप्रतिष्ठा-पूजाविधि (७)- अभिचारशान्तिकरो यन्त्रधारणप्रयोगः (८) विविधव्याधिविनाशनकरस्ताम्बूलचर्वणप्रयोग. (8) मार्जन-तोयपानादभिचारशान्ति: (१०) धारणयन्त्रस्योद्धारस्तत्प्राणप्रतिष्ठापूजाविधीच (११) विविध कृत्रिमरोगादिनाशनायं तद्यन्त्रधारण- मार्जन-प्राशन-पानप्रयोगा ३४. चतुस्त्रिश पटल. पृष्ठ ६४-६८ (१) वगलाध्यानम् (२) समस्तकम-सर्वोपद्रवाविनाशनजिज्ञासायां कृत्यावेश वश्य स्तम्मनप्रयोगकयनम् (३) तत्र ज्वालामुत्यादिपञ्चास्त्रप्रयोगविधिः, त्रैलोक्यविजयास्त्र प्रयोगस्तत्फलकथनञ्च (४) तद्धवन तर्पणप्रयोगा। .३५ पञ्चविंश. पटल: पृष्ठ ६८-१०० (१) बगलाध्यानम् (२)- बीजभेदजिज्ञासा (बगलामन्त्रनिर्णयजिज्ञासा) (३) पत्रिंशदक्षरीविद्याया ऋष्यादिविचारे सांस्यायन-प्रह्लयामल-जयद्रथयामल- हारिद्रसहितामतानि १४ OM १ ६४-६५ २-१० ६५-६७ ११ ३३ . ६७-६८ ३४.३८ 8 १८ २ - ६८ १०] सांस्यायनतन्त्रे क्रमाङ्क विपयः पृष्ठ श्लोक ६८ है BE (४) कलौ सांख्यायनमतस्यैव प्राधान्यम् (५) विद्यामन्त्र जपात्यूव मृत्युञ्जयमन्त्रजप- स्तदकरणेऽसिद्धिश्च (६) सांख्यायनोक्तवीजसंज्ञायां स्थिरमायावीजोद्धार. (७) पीतवासामते स्थिरबीजलक्षण तदुद्धारश्च (८) रेफयुक्ताया स्थिरमायाविद्याया जपेनैव सर्वसिद्धि. (९) लघुषोढा-महाषोढादिन्यासान्त एव विद्याज प प्रतिपादनम् (१०) पीतवासामते वगलाध्याननिरूपणम् (११) सांख्यायनमते पश्चिमाम्नायोत्तराम्नायभेदेन वगलापूजननिर्देश ६६ 88 १०-१२ १३-१५ १६-१७ १५-१६ २०-२१ १०० १०० २२ ३६. षट्त्रिंशः पटलः पृष्ठ १००-१०२ १०० १०० २ १००-१०१ . १०१ ६-१० ११-१२ (१) वगलाध्यानम् (२) साररूपा सर्वकार्मणनाशनोपायजिज्ञासा (३) मन्त्र कवच-मन्त्रात्मक सर्वकार्मणनिर्णाशनो नाम प्रथमो योगः (४) क्षुद्रकामणनिर्णाशनो नाम द्वितीयो योगः (५) कवच-स्तोत्र-मन्त्रात्मक क्रूरकार्मणनिर्णाशो नाम योगः (६) गायत्री-कवच-मन्त्र-स्तोत्रात्मक सर्वकार्मण-. नाशनो नाम योग. (७) तारा-काली-छिन्नमस्तामन्त्रात्मकः सर्वदोष- निवारणो नाम योग (५) कवच-बाणात्मक सर्वदोष निवारणो नाम योगः (६) रणस्तम्भ-प्राणरक्षा-दिव्यरक्षाकारक शताक्षरीमन्त्र-कवच-हृदयात्मको योगः (७) कवच-चतुरक्षरीमन्त्रात्मक कवचचन्द्रवर्णात्मको योगः- (८) नाक्षरी-वेदाक्षरी-पत्रिंशदक्ष री-कवचात्मको- महामह्मास्त्रयोग १०१ १२-१३ १४-१५ १०१ १६-१७ १०२ १६-२५ ३५. पञ्चत्रिश. पटलः पृष्ठ १०२-१०५ (१) पीताम्बराध्यानम् १०२- १
विषयानुक्रमः
[ ११
क्रमाङ्क
विषय
पृष्ठ
श्लोक
२
(२) रहस्य जिज्ञासा
(३) ब्रह्मास्त्रयोगफलप्रशंसनम्
(४) होमयोग-प्रयोगायनम् (प्रयोमोपतहार)
(क) परिशिष्टम् पृष्ठ १०५-११६
१०२
२
१०३ ३-१६
१०४-१०५ १७ ३५
ऋष्यादिन्यासध्यानादियुता.
सांख्यायनतन्त्रगता मन्त्रा
१०५-११६
(ख) परिशिष्टम्
पृष्ठ
११६-११८
वज्रपञ्जरकवचस्तोत्रम्
११६.११८
(ग) परिशिष्टम् पृष्ठ ११८-१२२
वगलामुखीत्रलोक्यविजय नाम कवचम्
(घ) परिशिष्टम् पृष्ठ १२२-१२८
११५-१२२
श्रीपीताम्बरारत्नावलीस्तोत्रम्
सांख्यायनतन्त्रस्थानास्पद्यानामनुक्रमः
१२२-१२८
शुद्धिपत्रम् - पड क्ति पृष्ठ अशुद्धम् शुद्धम् १६ १८ १२ ११ ७ २१ २४ २९ १३ २८ २७ चान्य तलतैलेन शातोदरी विविखेत् वाक्पतिस्तुवा ऋषिसख्यया सक्ष्मीवान् दाभिघातेन सस्मरेत् १६' लंकारं ह्न गदा चान्ये तिलतलेन शालोदरी विलिखेत् ०वाक्पतिस्तु वा ऋषिसंख्यया लक्ष्मीवान् गदाभिघातेन सस्मरेत्।। लकारं ह गदा २७ २६ १७ .१७ w ७ १६ , ४१ ४३ मनु:४५ मनुः११ २ २० ३ १ ४५ २० ५२ ५ -५२ ७ मन्त्रराज जिह्वाभेदनाथं जिह्वास्तम्भ स दाहः • मूर्द्ध नि ३. घ. पुस्तके जिह्वास्तम्भन० लक्षण विशेपो ५२ २३ ६१ ३ ६४ १५ ६४ ६४ २५ २६ २१ तु तन्त्रराज जिह्वाभेदानार्थ जिह्वास्तम्भ सदाहः ०मूदनि ३ घ पुस्तस्के जिलास्तम्भन० लक्षण विशेशो तु वन्यस्यता छन्दोत्र द्रावर्णदेवताम् ॥२॥ अय्युत ॥६॥ ध्यानपूर्वकम् चतर्पणम् ततत्फल० मण्डलांतद्० ६७ ६७ ६८ २६ १३ ६५ २४ ७२ २ विन्यस्यतो छन्दोऽत्र हरिद्रावर्णदेवताम् ॥२२॥ प्रयुत ॥३॥ ध्यानपूर्वकम् च तर्पणम् तत्तत्फल० मण्डलात्तद् ७४ २ ७५ L १६ १३ २५ २ २]. शुद्धिपत्रम् पृष्ठ पंक्ति प्रशुद्धम् शुद्धम् ८५ २२ ३० ८७ ८८ ...८९ २५ २३ १२ ६२, ६२ १२ ॥२२॥ २२. ०तशाशशं च ॥१७॥ १६ रा तु षण्मास ८. रा. यद्यद्रण परम कृलिम: निश्चतम् विशोषोऽय शवि लिखेद् चयथाक्रमम् नाजयेद् १५ १६. १७ ९३ ६३ २९ १० १० २१ २६-३० १६ शीर्ष ६३ योगो य 1 - त्रयस्त्रिशः 88 8 शीर्ष ॥२३॥ २२. रा० ०तद्दशाश च ॥१८॥ १६. रा. श्लोकादमिदं नास्ति ८. रा. यद्यवरण परम् कृत्तिमः निश्चितम् विशेषोऽय श विलिखेद् च यथाक्रमम् नार्चयेद् १४.१५, १६: योगोऽयं चतुस्त्रिशः पञ्चत्रिंशः षट्त्रिंशः त्रिंशः पञ्चविंशः मध्यभागे ॐवीज ज्वालामुख्यस्त्र० ऋष्यादि० श्रीवृहद्भानुमुख्यस्त्र ग्राह्यारिण लीह्रौंन वगला० हुँ फट् स्वाहा परविद्याभक्षिरणी कीलकाय बगलास्त्रोपसंहार० ॐ . शिखायै विघ्ना मन्यरूपं १०१ १०३ १०४ . १०७ ११० ११० २० १० षट्वशः द्वात्रिंशः चतुरिंशः मध्यमागे ॐबीज ज्वालामुख्यतः ऋष्यादि० श्रीवहद्भानुमुख्यत्र ग्राह्मारिण ह्नीलोल वगला. हुँ फट् स्वाहा परविद्याभक्षिणी कोलकाय बगलास्त्रीपसहार० ॐ शिखाये विघ्नर्ना० . २६ २६ . ११० ११० ११२ ११२ ११३ 8 २६ ६ १८ १६ मन्त्ररूप ११८ २२ शेय ज्ञेय शुद्धिपत्रम् - [३ - पृष्ठ पंक्ति अशुद्धम् शुद्धम् १ १४ फव नगात्मने वीज स्थितिध्वसने ७ २४ ०सस्तम्भन १२० १२२ १२३ १२३ १२४ १२५ १२५ १२५ १२५ १२६ १२६ फव नगात्मजे वीज स्थितिध्वसने सस्तम्भनम् वात सुदुर्लभ मतीन्द्रिय इत्यपि पाठः हृद्य गोप्यतम वान्त सुदुर्लभ मतीन्द्रिय १ त्यपि पाठः हृद्य गोप्यतम १० २५ २६ ७ सांख्यायनतन्त्रम् .
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॥ श्रीः॥ सांख्यायनतन्त्रम ॥अथ प्रथमः पटलः ।। घीशिवाय नमः ॥' पीतांबराय नम ॥ मध्ये सुधाब्धिमणिमण्डपरत्नवेद्यां सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णाम् । पीताम्बराभरणमाल्यविभूषिताङ्गी' देवी भजामि घृतमुद्गरवैरिजिह्वाम् ॥१॥ कौञ्चभेद उवाच-४ कैलाश (स)शिखरासीन गौरीवामाङ्गसस्थितम् । भारतीपतिवाल्मीकि- शेषसयुतमीश्वरम् ।।२।। अष्टदिकपालकोशाष्ट-"विघ्नेशाष्टकसेवितम् । भैरवाष्टवृतं देवं मातृमण्डलवेष्टितम् ।।३।। महापाशुपताक्रान्तं प्रमथरावृत प्रभुम् । नत्वा स्तुत्वा कुमारश्च १० इदं वचनमब्रवीत् ॥४॥ चापचर्यासुनिपुणयुद्धचर्याभयङ्करैः । नानामायाविना चव जेतुमिच्छामि'२ रक्षसाम् ॥१॥ तस्योपायं च तद्विद्यां वद मे करुणाकर । पुत्रोऽहं तव शिष्योऽह कृपापात्रोऽहमेव च ॥६॥ ईश्वर उवाच-.४ साधु साधु महाप्राज्ञ क्रौञ्चभेदन कोविद । ब्रह्मास्त्रेण विना गत्रुसहारो' न भवेत्कली ॥७॥ १ ख ५ श्रीगणेशाय नमः। ग. श्रीशिवो जयत.। २क, पीताबराय नमः; घ. नास्ति । ३ ग. विभुषितागी। ४ सघ. क्रौंचभेदन उवाच : ग, क्रौंचभेदनोवाच । ५५ ०वामासस्थितम् । ६ स. वाल्मीकी०; ग. वाल्मिकी; घ. वाल्मीक । ७. स.ग.घ. अष्टदिक्पालकेशाष्ट० । ८ ख.ग. भैरवाष्टकवृत ; घ. भैरवाष्टयुत। महापसुपदाक्रान्तम् ; घ. महापाशुपत्ताकांत । १० घ कुमारोपि । ११ ख. नानामाया- विनय ; घ. नानामायाविन जेतु । १२ घ. मातुमिच्छामि । १३ ख.घ राक्षसान् । ग राक्षसा। १४ ग इश्वरोवाच । १५ घ. भेदेन । १६ क.ग.प पावूसहारं।
२ ] सांस्यायनतन्त्र 1 3 ६ तद्विद्या च प्रवक्ष्यामि त्रिषु लोकेषु दुर्लभाम् । पुत्रो देयः शिरो देयं न देया यस्य कस्यचित् ।।८।। ब्रह्मास्त्रस्तम्भिनी विद्या स्तब्धमायामनुस्तथा । प्रवृत्तिरोधिनी विद्या बगला च कुमारक !|६|| मन्त्रजीवनविद्या च प्राणिप्राणापहारिका । षट्कर्माधारविद्या' च ये ते पर्यायवाचकाः ।।१०।। षट्प्रयोगास्त्रयो विद्या ये विद्यागमभूषिताः । तिरस्कृताखिला विद्या त्रिशक्तिमयमेव च ॥१२॥ स्तम्भनेन विना शान्तिर्वश्यञ्चैव तु तद्विना । मोहनाकर्षणञ्चैव विद्वषोच्चाटनन्तथा ॥१२॥ मारण भ्रान्तिरद्वेगकारण' च कुमारक । विद्या च बगलानाम्नी मुनिगुह्य सुपावनम् ॥१३॥ विना च स्तम्भिनीविद्यां "न विद्या च प्रभासते। तस्मादेव महाविद्या कमलासनजीवनम् ॥१४॥ पद्मजो नारदो विद्या" सांख्यायनमुनि प्रति । उपदेशक्रमेणव उक्तवान्मेरुकन्दरे ॥१५।। तेन देवीकटाक्षेण कृतवानागम भुवि । मूलमंत्रोपविद्याश्च' ' अङ्गमन्त्राश्च विस्तरात् ।।१६।। प्रयोगं चोपसंहारं'' तदाराधनतद्गुणम्' । विस्तरेणोक्तवानस्मि वक्ष्ये तत्सर्वमादरात् ।।१७।। स्वमन्त्राक्षरणी' विद्या स्वमन्त्रफलदायका'४ । स्वकीतिरक्षिणी विद्या शत्रुसहारकारिका'५ ॥१८॥ परविद्याछेदन। च परयन्त्रविदारणम् परमन्त्रप्रयोगेषु सदा विध्वंसकारकम् ॥१६॥ १८ १. ग. षट्कर्माहार। २. ख.घ एते । ३. ख. षट्प्रयोगाश्रया विद्या षड्विद्योगम- भूषिताः। ४. ग विरात्रिमयमेव । घ त्रिशक्ति खलु मेव । मेव । ५. ग तद्वषोचाटन० । ६. घ. भ्रातिमु० । ".." चिन्हान्तर्गतोऽश: घ पुस्तके नास्ति । ७ ख. तस्मादेता। ख. ०विद्या। ६ ख जीवनी । १० ग घ. ०विद्या च । ११. ग. चोपहारं। १२. घ. •लक्षणम् । , १३ ख स्वमन्त्ररक्षणी १३ ख स्वमन्त्ररक्षणी, घ. स्वविद्यारक्षरणी। १४. ख. दायिक ० दायका । घ. ० दायिनी। १५ ग ०कारक, घ. ०कारिणी। १६ ख. घ. ०छेदनी। १७. ख घ. विदारिणी। १५ ख ०कारिका ; घ. कोरिणी। 5 द्वितीय पटलः [३ । परानुष्ठानहरण' परकीत्तिविनाशनम् । परापजयकृद्ध विद्या परेषां भ्रमकारणम् ॥२०॥ ये वा विजयमिच्छन्ति' ये वा जेतुं क्षयं कलौ । ये वा क्रूरमृगेन्द्राणां क्षयमिच्छन्ति मानवाः ॥२१॥ ये (य इ)च्छन्त्याकर्षशान्त्यादि वश्य सम्मोहनादिकम् । विद्वेषोच्चाटन प्रीति तेनोपास्यस्त्वय मनु ॥२२।। सत्सम्प्रदायविधिना. सद्गुरोर्मुखतस्तथा। उपदेशक्रमेणव गृहीत्वा साधयेन्मनुम् ।।२३।। कुलाचारसमायुक्त.११ कुलमार्गेण पुत्रक । दीक्षा कुलगुरोर्योगात् गृहीतव्या सुबुद्धिना: ॥२४॥ साधयेत्कुलमार्गेण तेन मन्त्र प्रयोजयेत् । उपसहारण१३ तेन कर्त्तव्य कुलयोगिना ॥२५।। सौभाग्यचर्यासमायुक्त १४ सदा तर्पणपूर्वकम् । सदा पूजासमायुक्त १५चिन्तित भवति ध्रुवम् ॥२६॥ ऋषिसिद्धामरैश्चैव विद्याधरमहोरगैः । यक्षगन्धर्वनागेश्च पिशाचब्रह्मराक्षसः१६ ॥२७॥ पञ्चन्द्रियश्च सञ्चार सद्यो नाशकरो'" मनु. पिण्डजाण्डजजीवश्च किम्पुन क्रौञ्चभेदन ||२८|| इति षड्विद्यागमे सांख्यायनतन्त्रे प्रथम पटलम२ ॥११॥ ॥ अथ द्वितीयः पटलः ।। जिह्वाग्रमादाय करेण देवी वामेन शत्रून् परिपीडयन्तीम् । गदाभिघातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढ्या द्विभुजां नमामि ॥१॥ १५ १ स. हारिणी। २ ख. विनाशनी। ३. घ. परापजयिनी । ४. ख. कारणी ग. ०कारकम् । ५ ग विलयः । ६. ख ग. जतुक्षय । ७. घ. फरमृगश्चव। ८ स घ. इच्छन्ति शान्तिकारिण;ग येच्छन्ति शान्तिकर्माणि । ६. क ग. मिद मनु ; घ. मिद मनु । १०.घ तत्संप्रदाय० । ११. के. ख, समायुक्तो। १२. घ सुवुद्धिमान् । १३. ५ उपसहरणं। १४ ग ०समायुक्तो। १५ ग समायुक्तः । १६, ग पीसाचा। १७ क ग. घ. नाशकर । १८ ग मुनिः; घ मनु । १९ ग. भेदन. घ भेदेन । २०. ख ग. प्रथमपटलम् , घ मप्रवर्णन नाम प्रथमः पटलः । २१. ग. परिपीडयति । + ४ ] सांख्यायनतन् . क्रोचमेव उवाच'- नमस्ते पार्वतीनाथ नमः पन्नगकङ्कण । वद दीक्षाविधि तात तत्सर्व स्तम्भनादय. ॥२॥ ईश्वर उवाच:- पुस्तके लिखितान्मन्त्रानवलोक्य जपेत्तु यः । स जीवन्नेव चाण्डालो मृत: श्वानो भविष्यति ॥३॥ दीक्षामार्ग विना मन्त्र शैवं शाक्तञ्च वैष्णवम् । यो जपेत्त दहत्याशु देवता च जुगुप्सति ॥४॥ दीक्षाविधि विना मन्त्र यो जपेत्कोटिकोटयः । न स सिद्धिमवाप्नोति सिन्धुसैकतवर्षवत् ॥५।। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन दीक्षा कुलगुरोमुखात् । उपदेशक्रमेणैव मन्त्रसड ग्रहण चरेत् ॥६।। वेदवेदाङ्गपारज्ञ वेदान्तार्थसुनिश्चितम् । वैदिकाचारसयुक्तं कुर्याद् गुरुमतन्द्रितः ।।७।। गर्भकोलागमासक्त ८ नानाकौलपरायणम् । अष्टपाशविनिर्मुक्तं कुर्याद् गुरुमतन्द्रित: ॥८॥'' पुरश्चरणकृत्सिद्धमन्त्रागमविशारदम् । उद्धत्तुं चैव सहत्त समर्थ सत्यवादिनम् ॥६॥ प्रस्थानज्ञानपारीण'' नीतिशास्त्रार्थकोविदम् । श्रीविद्यामत्रयन्त्रज्ञ कुर्याद् गुरुमतन्द्रितः ॥१०॥ चक्रपूजासमायुक्त (क्तो)न्यासविद्याविशारदम् (द)। गुर्यत्नाच्च कर्तव्य सतत सिद्धिकाक्षिभिः'५ ॥११॥ -- - १. ख. घ. क्रौञ्चभेदन० ग कोचभेदनोवाच । २. ख. स्तभनादिकम् ; घ, स्तमनास्त्रयो.। ३. घ. इश्वरोवाच। ४. ख जपेच्च य; ग. जपन्ति ये; घ जपति ५ ग. घ. मृत ६. घ.वा शाक्त। ८ घ, सिन्धोः०। ८. घ गुरुसेवा- समामक्त। ६ ग मतन्द्रित । १०. श्लोकोऽय ख. पुस्तके नास्ति; घ. पुस्तके विशेषतो. ऽवलोक्यतेऽय श्लोक --'घृणा शका भय लज्जा जुगुप्सा चेति पञ्चकम् । कुल शीलं च मान च अष्टपाशान]विवर्जयेत्" ।। ११.ख.प्रास्थान०, घ. स्वस्थान० । १२. ग..मत- न्द्रितम् । १३. क. घ. गुरु ०; ग. गुरु० । १४. ग. कर्तव्या; क. घ. कत्र्तव्य । १५. घ. सिद्धिकाक्षिण..
हितीयः पटल. [५ - गुरुशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा । अथवा विद्यया विद्या चतुर्थ नोपलभ्यते ॥१२॥ गुश्रूपया गुरु सम्यक् तोपयेच्छिप्य अन्वहम् प्रसन्नचेतसा दत्त मन्त्रमुत्तममभंकर ॥१३॥ स्वल्प वा बहुल चाय शिष्यद्रव्य गुरुः स्वयम् । गृहीत्वा मन्यमादत्ते विक्रीतं तदुदाहृतम् ॥१४॥ राजस चैव तद्विद्याद्' भोगद भुवि पुयक । विद्याप्रतिनिधि विद्याद् यद्दत्त' तामसं मतम् ॥१५॥ मोक्षार्थी च गुरु यत्नात गुभूपेणव तोपयेत् । शुश्रूपेणव यल्लब्ध' तद्विद्यात्' सर्वसिद्धिदम् ।।१६।। नो देय (या) विद्यया विद्या वित्तकाक्षी तथैव च । सच्चियाय प्रदातव्यं धनदेहायवञ्चकः ॥१७॥ दुरालापसमायुक्त दुर्गुणेन समन्वितम् । सर्वया वर्जयेच्छिष्यं स्वगुरोर्वाभिमानिनम्" ||१८|| प्रप्टपाशममायुक्तं भ्रष्टाचारसमन्वितम् । सर्वदा वर्जयेच्छिप्यं गुरुसेवाविवज्जितम्। २ ॥१६॥ निमत्सर निरालम्ब नीतिशास्त्र विशारदम् । नित्यानित्यविवेक च शिष्यत्वेनोपकल्पयेत् ॥२०॥ श्रद्धाभक्तिसमोपेतं धनदेहाद्य वञ्चितम् । अष्टपागविनिमुक्तं गिप्यत्वेनोपकल्पयेत् ।।२१।। गुरुशिष्यावुभौ मोहादपरीक्ष्य ५ परस्परम् । उपदेश ददन् गृह्णन् प्राप्नुयात्तो पिशाचताम् ॥२२॥ इति पविद्यागमे सांस्यायनतन्त्रे द्वितीय पटलम्॥ १. स. तोपर्यच्छ प्ठमन्वहम् । ग तोपयेच्छिप्यमन्वहम् , घ सतोप्याभीष्ट- सिद्धिदम् । २. ख. ममका । ३ क.ख ग, तद्विद्या । ४. घ तद्वत्त । ५ घ स्मृतम् । ७, क. ग. तद्विद्या घ. सा विद्या। सर्वसिदिदा। ह ग नोपदेय । ११. ध गुरसेवाभिमानिनम् । १२. ग घः गुरुसेवाभिमानिनम् । १३ घ पुस्तके विशेषोऽय श्लोक:- 'कामुक काञ्चनासक्त करुणालयवजितम् । सर्वदा वर्जयेच्छिष्य गुरुसेवाभिमानिनम् ॥ १४. ख. घ. ०वञ्चकम् । १५ ख. ०दपरोक्ष्य; १६. ख. घ. द्वितीयः पटल. ६. ग. यल्लम्या ८. घ. घ यलत्वा । १०. घ. प्रदातम्या। ग. ०दपराक्ष।
६] सांख्यायनतन्त्र ॥ अथ तृतीयः पटलः ॥ चलत्कनककुण्डलोल्लसितचारुगण्डस्थला' लसत्कनकचम्पकद्युतिमदिन्दुविम्बाननाम् ।। गदाहतविपक्षका कलितलोलजिह्वाञ्चला स्मरामि बगलामुखी विमुखवाड मुखस्तम्भिनीम् ॥१॥ फोञ्चभेद उवाच-.-.४ पूजाधारणयन्त्रज्ञ सर्वमन्त्रविशारद । अभिषेकविधि तात वद मे करुणाकर ॥२॥ ईश्वर उवाच- आश्विने कात्तिके चैव चैत्रमासे कुमारक । कुर्युस्तमभिषेक' च मानवाः सिद्धिकाक्षिणः'' ॥३॥ रवी गुरौ भृगावजवासरे' च कुमारक । मन्त्राभिषेक कर्तव्य सतत सिद्धिकाक्षिभि. ।।४।। रोहिणीश्रवणे चैव पुष्ये' चैव विशाखयोः । मन्त्राभिषेक कर्तव्य सद्यः १४ सिद्धि कर भुवि ॥५॥ एव शुद्धदिने१५ सम्यक् पूर्वेऽह्नि'६ समुपोषितम् । स्नापयेत्पञ्चगव्येन ततश्चामलकेन तु ॥६॥ तत शिष्य समानीय'" देवतासन्निधौ पुनः ।। अयुत प्रजपेन्मन्त्र गायत्रीजपमाचरेत् १८ देवस्येशानभागे तु गोमयेनोपलेपितम् । रङ्गवल्ल्या लिखेद्यन्त्र रक्तपीतसितासितैः ।।८।। १ ग. पुस्तके 'चलत्कनककुण्डलो' इत्यस्मादनेतनपदाशो नास्ति । कुण्डला लसत्० । २. घ. कलितवैरि० । ३ ख. ध विमुखवाड्मन । कौञ्चभेदन उवाच, ग. क्रौञ्चभेदनोवाच । ५. क. पुस्तके 'पूजा' स्थाने 'पूज्य' एवं च ख पुस्तके 'यन्त्रज्ञ' स्थाने 'यन्त्रज्ञ' इति शब्दो स्तः। ६ ग. पुस्तके 'क्रौञ्चभेदनोवाच' तथा च 'ईश्वरोवाच' इत्येवाय प्रयोग. सर्वत्र दृश्यते । अतोऽने एतच्छन्दयो रेष एव पाठान्तर कहनीयो विद्वद्भिरिति ७. ख. चैत्रे। ८. ख. वैशाखे तु । ६ ख ग. कर्त्तव्यमभिषेक, घ. कर्तव्य चाभिषेक । १०. ख. ग मानवैः। ११ ख. ग. सिद्धि काक्षिभिः। १२. ग भगा वि]दौ०, घ भृगो इदु०। १३ ग. स्वार्सी। घ सार्प । १४ ग. सर्व। १५. ग सिद्धिदिने। १६. ग. पूर्वेवह नि, घ. पूर्वाह्न । १७ ग घ समानीत्वा । १८ घ. गायत्रीं वेदमातरम् । १६. क ग. लेपिताम्, ख. लेपयेत् । 17 ॥७॥ 7 घ चलत्कनक- ४. ख.घ.
तृतीयः पटल [७ +- षोडशाड गुलमान' तु लिखेद् विन्दुमनन्यधी । ततो (तदु)परि लिखेद् वृत्त मष्टपत्रं तु शोभनम् || प्रियड गुशालिगोधूमचरणकाटकमाषक. । कुलत्थमुद्गनीवार. क्रमान्मध्यादि विन्यसेत् ।।१०।। प्रस्थं चैव चतुर्विंश प्रत्येक धान्यमेव च । अन्नण स्थूलकलश मध्ये सस्थाप्य बुद्धिमान् ॥११॥ अप्टपत्रे न्यसेत्पुत्र कलशाष्टकमादरात् । क्षालितं वासित शुद्ध कलश च समर्पयेत् ॥१२॥ षोडशैरुपचारश्च धूपायेनैव विन्यसेत् । आपोवानेन पूर्यंत नदीजलमकल्मषम् ।।१३॥ नि.क्षिपेन्नवभाण्डेषु नवरत्नान् कुमारक । कस्तूरीचन्दनोपेतान् नवभाण्डेषु नि.क्षिपेत् ।।१४॥ मध्ये देवी समावाह्य चिन्मयी बगलामुखीम् । प्राणस्थापनमार्गेण केरलोक्तविधानतः ॥१५॥ वाणी चैव रमा गौरी, शची स्वाहा रतिस्तथा । दुर्गा छाया'" समभ्यर्च्य पूर्वाद्यष्टकपत्रयोः ॥१६॥ अर्चयेत्पूर्ववत्पुत्र केरलोक्तविधानतः । नवीननवसख्याकवस्त्रेणैव तु वेष्टयेत् ।।१७।। सुगन्धपत्रपुष्पादीन् ३ विन्यसेत्कलशान्तरे । तत्र शिष्य'३ समानीत्वा (य)ऋत्विग्वरणमाचरेत् ॥१८॥ वेदवेदागपारीणमष्टौ ब्राह्मणमादरात् । प्रार्थयेद्युग्मसयुक्त "मर्चयेद्वस्त्रभूषण ॥१९॥ शाकुनादिषु मन्त्रेषु प्रथम कलशमार्जनम्। लक्ष्मीसूक्तेन श्रीयुक्त'" द्वितीय कलशन्तथा ॥२०॥ १. स्व. ०माने । २. ख.-०पन। ३ ग घ चरणकाढकमापको। ४. घ नीवारा। ५. ख. अत्र पत्र। ६ क. चासित । ७. ख. ग. घ. समर्चयेत् । ८ घ. धूपाद्यैः परि । ६ घ चन्दनोपेत । १०. घ. पुस्तके वाण्यादिशब्दा द्वितीयान्ता दृश्यन्ते। १६. घ. पूर्वाद्यष्टकसिद्धय । सुगन्धि पुत्र० ; घ. सगध पुत्र पुष्पादि । १३. ग, शिषा। १४ घ. ०पारीणानष्टी। १५. घ. ०दघ्यंसयुक्त० १६. घ. कुम्भ- माजनम् । १७ घ श्रीयुक्तः। १८ घ. कुम्ममार्जनम् ।
८] सौख्यायनतन्द्र ॥२२॥ पौरुषेणव सूक्तेन तृतीय कलश तथा' । नारायणानुवाकेन' चतुर्थं रुद्रसूक्तकः ॥२१॥ पञ्चब्रह्ममयमन्त्रः पञ्चम कलश तथा । षष्ठ चाम्भस्यवारेण ब्रह्मपल्ल्या च सप्तमम् अष्टमं कठवल्ल्या" च मार्जयन्मन्त्रकोविदः । मध्यम पूर्वकलश' मूलमत्रेण' मार्जयेत् ॥२३॥ एवञ्च मार्जनं कृत्वा नवीनैर्वस्त्रभूषणः । अलंकृत्वा तु शिष्य १२ तमानीय १३ मण्डपान्तरे ॥२४॥ वामोरूपरि विन्यस्य मूर्द्ध नि चाघ्राय सादरात् । एकैक च पुरश्चर्यामूलमन्त्रं कुमारक ।।२५।। स हिरण्योदके पूर्व दद्याच्छिष्याय पुत्रक । स्वहृत्कमलमध्यस्था विद्या ज्योतिर्मयो पुनः ।।२६।। शिष्यस्य हृदयं चैव प्रविशन्तीति भावयेत् ।१४ तद्वच्छिष्यस्तु'५ सभाव्य गुरु यत्नेन तोषयेत् ॥२७॥ एव मन्त्राभिषेकञ्च' कुर्याद् ब्रह्मास्त्रविद्यया । सद्यः'" सिद्धिर्भवेत्पुत्र पुरश्चर्यां विना ८ भुवि ॥२८॥ इति षविधागमे सास्यायनतन्त्र तृतीयं पटलम्२० ॥३॥ १. घ कुम्ममार्जनम्। '२. ख. नुवाक्येन; ग. नुजाकेन ; घ पादाशो नास्ति। ३. ग, कलश तथा; घ. कुम्भमार्जनम् । ४. घ. ०ब्रह्यमयी० । ५. ख. चाभंस्य चारेण; घ घामस्य पारेरण। ६. ख. ग. ब्रह्मवल्ल्या च; घ. ब्रह्मवल्ल्या तु। ७. ख. ग कठवल्ल्या; प. भृगुवल्ल्या। ८. घ. अथवा कठकेन च । ह. घ. मध्यस्थ । १० ग घ पूर्णकलशं। ११. घ मुक्तमत्रण। १२. घ. तच्छिष्यं। १३. घ. पानीत्वा । १४, घ, पुस्तकेऽय विशेष पाठ:- "तत्प्रयोग तत्र उक्त्वा तन्मत्राणां पदे पदे । पष्ठक्रमोदक कृत्वा प्रत्येक च विभावयेत् ।। विद्यारूपे भवेत् पुत्र साम्राज्य परिवेष्टयेत् ।" १५. घ. तद्वच्छिष्य । १६. घ मन्त्राभिषिक्तं च । १७. घ. सर्व । १८. घ पुरश्चर्यादिना। १६. ख. गमरहस्ये । २०. घ. ०दीक्षाविधित तीयपटलः । - - चतुर्थः पटलः [१ ।। अथ चतुर्थः पटलः ॥ पीयूषोदधिमध्यचारुविलसद्रनोज्ज्वले मण्डपे, श्रीसिंहासनमौलिपातितरिपुप्रेतासनाध्यासिनीम् । स्वर्णाभां करपीडितारिरसना भ्राम्यद्गदां विभ्रती, स्वप्ने' पश्यति तस्य याति विलय सद्योऽम्बर सर्वापद. ॥१ क्रौञ्चभेद(दन) उवाच- गङ्गाधर नमस्तेऽस्तु गौरोपति नमो नमः । ब्रह्मास्त्रमन्त्रसध्यां.च वद मे करुणाकर ॥२॥ ईश्वर उवाच- मन्त्रमध्यापयेत् सम्यक् शिष्यस्य गुरुरादरात् । तदारब्ध तु तन्मन्त्र मन्त्रसन्ध्या समाचरेत् ॥३॥ तन्मन्त्रसध्या वक्ष्यामि शरजन्मन् समासतः । मन्त्रसन्ध्याविहीनस्य सर्व तनिष्फल भवेत् ॥४॥ पञ्चाङ्गविधिना स्नात्वा मन्त्रस्नानमनन्तरम् । तत. स्नायादङ्गमन्त्रमूलेनैव तु मार्जयेत् ।।५।। धौतवस्त्रं परीधाय स्वगृह्योक्तविधानतः । नित्यकर्म समाप्याथ मन्त्रसध्यां समाचरेत् ॥६॥ अड कुशे व मुद्राया: सूर्यमण्डलग जलम् । आनयेत्तोयमध्ये तु ध्यानयोगेन बुद्धिमान् ||६|| आवाहिनी स्थापनी च सन्निधानमतः परम् । सन्निरोधनमुद्रा च सम्मुखी प्रार्थनी तथा ॥८॥ एता मुद्राश्च ततो'' दर्शयेत्साघकोत्तमः । शोधयेदङ कुशेनादौ१२ चामृतीकरण'3 ततः१४ ।।६।। तज्जल वामचुलुके गृहीत्वा साधकोत्तमः । मूलेनैव त्रिधामन्त्र्य अष्टपत्राम्बुज लिखेत् ।।१०।। १. घ. यस्त्वां । २. ग. सद्योप। ३. ख. ग. घ. गौरीप्रिय । ४. घ. मंत्रसध्यार्पयेत् । ५ ख.प.तदारभ्य। ६ ख. घ. तन्मन्त्र:। ७ ५. समाचर। ८. घ. ०मत ६. ख. मुद्रयाः अकुशेनंव। १०. क. सन्निध्यानमत.। सनिषापनीतः। ११. ख. सतवं घ. तत्तोये । १२. घ. नादा। १३. घ. वामृती० । १४. घ. तपा। परम् । ग. 1 १० ] सांस्यायनतन्त्र . मध्ये एकाक्षरीमन्त्र बगलानाम्नि पुत्रक । वेदसख्यामन्त्रवर्णान्' सप्तपत्रे' क्रमाल्लिखेत् ॥११ अन्त्यपत्रे चाष्टवाँल्लिखेन्मू नमनु तथा । पुनरेकाक्षर मन्त्र त्रिसप्तमभिमन्त्रयेत् ।।१२।। तेन मूलेन सम्मोर्च्य मार्जनक्रमतोर्भक । तन्मार्जनविधि वक्ष्ये ऐहिकामुष्मिकेषु च ॥१३॥ त्रिधा मूर्द्ध नि द्विधा बाह्वोस्त्रिधा हृन्नाभिदेशयो । द्विधा पादेषु सम्माय॑ सौम्यकर्मस्वय' क्रम." ॥१४॥ एवञ्च मार्जन कृत्वा गायत्र्या बगलाह्वया । अर्घ्यत्रयञ्च निष्क्षिप्य हृदि सभाव्य देवताम् ।।१५।। मूलेन मन्त्रित तोय त्रिवारञ्च त्रिधा क्षिपेत एवमेव त्रिकालञ्च मन्त्रसन्ध्या समाचरेत् ।।१६।। उपस्थान त्रिकालस्य वक्ष्ये ह क्रौञ्चभेदन । उपस्थान विना सन्ध्या निष्फला नात्र सशयः ।।१७।। गम्भीरा च मदोन्मत्ता स्वर्णकान्तिसमप्रभाम् । चतुर्भुजा त्रिनयना कमलासनसस्थिताम् ।।१८।। मुद्गर दक्षिणे पाश वामे जिह्वा च बिभ्रतीम्' । पीताम्बरधरा सौम्या दृढपीनपयोधराम् ।।१९।। हेमकुण्डलभूषागी पीतचन्द्रार्द्धशेखराम् । पीतभूषणभूषाङ्गी स्वर्ण सिंहासने स्थिताम् ॥२०॥ एव ध्यात्वा तु देवेशी'३ प्रातः सन्ध्या समाचरेत् । उपस्थान प्रवक्ष्यामि मध्याह्नस्य कुमारक ॥२१॥ दुष्टस्तम्भनमुनविघ्नशमन दारिद्रयविद्रावणम्, भूभृत्स्तभनकारण मृगदृशा चेत.समाकर्षणम् । १. घ. देवसस्या। २ क घ सप्तपत्र. ३. घ अन्त्यपत्रे अष्टाणं । ४. ख. त्रि. सप्त०। ५ ख. वा। ६ ख ग . ०कर्मेष्वय । घ मार्गेष्वय। ७. घ. क्रमात् । ८. घ पुस्तके विशेष पाठः "पादादिमूर्छ निपर्यन्त क्रूरकर्मेषु मार्जयेत्” । ६. ख. घ पिवेत् । ग. पुन.। १० घ निष्फलं। ११. क. विभ्रकम् । घ. वज्रकम् । १२. घ. पुस्तकेऽयमशो विशेषः- "रत्नसिंहासना वन्दे देवी त्रैलोक्यसुन्दरीम्"। १३. ग. देवेशि। घ देवेश । १४ घ. मध्याहने च ।
पंचमः पटले. [११ सौभाग्यकनिकेतनं मम दृशो. कारुण्यपूर्णेक्षण' विघ्नोपं बगले हर प्रतिदिनं कल्याणि तुभ्यं नमः ।।२२।। एव मध्यदिनोपास्थि कुरु कर्म सुपुत्रक' । 'उपस्थान प्रवक्ष्यामि" सायाह्नस्य कुमारक ।।२३।। मातभञ्जय मद्विपक्षनदनं जिह्वाञ्चलां कीलय ब्राह्मी मुद्रय मुद्रयाशु घिषणामघ्रयोर्गति स्तम्भय । शत्रूश्चूर्णय चूर्णयाशु गदया गौराङ्गि पीताम्बरे", विघ्नौघ बगले हर प्रतिदिन कल्यारिग तुभ्य नम ॥२४॥ सायमौपास्थि कर्तव्यमेवमेव कुमारक । विघ्नग्रहविनाशाय एव ध्यायेज्जगन्मयीम्११ ॥२५॥ मन्त्रसन्ध्यां विना मन्त्र कोटिकोटि जपन्ति ये 1 न भवेन्मौनसिद्धाद्य मन्त्रसिद्धि कुमारक ।॥२६॥ त्रिकालमाचरेत्सन्ध्यामुपस्थान तथैव च । सहस्र च जपेन्नित्यं सिद्धि. षण्मासतो भवेत् ॥२७॥ पूर्वोक्तविधिवत्संध्यां कृत्वा चाष्टोत्तर जपेत् । यं यं वापि स्मरन् ४ पुत्र त त प्राप्नोति निश्चितम् ॥२८॥ सन्ध्यामन्त्रेषु सर्वेषु५ अङ्गमेव कुमारक । न प्रसिद्धचत्यङ्गहीनं ६ तस्मात्सन्ध्या समाचरेत् ॥२६॥ इति षविद्यागमे सांख्यायनतत्रे चतुर्थ पटलम् ॥४॥ M ॥ अथ पञ्चम. पटलः।। पीतवर्णां मदाघूर्णा समपीनपयोधराम् । चिन्तयेद् बगला देवी स्तभनास्त्राधिदेवताम् ॥११॥ क्रौंचभेवन उवाच- नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ भस्मोद्धूलितविग्रह । एकाक्षरीमहामन्त्रं बगलाख्यं महाप्रभो'८ ||२|| १. ख. कारुण्यपूर्वेक्षण। २. घ. ०पास्ति। ३. घ. क्रूर। ४. घ. पुस्तके विशेष. पाठ- "उपस्थान चैवमेतत्कर्तव्यं विधिवतर"। । ५. '' चिह नगतोऽशो नवास्ति घ. पुस्तके । ६ ग. पुस्तके नास्ति । ७. घ. पीताम्बरी। ८ घ. मोपास्ति । ६. घ. ०मन्ही मेव। १० घ' विनाशे च । ११ घ व्यायं० । १२ घ. जपेन तु । 'मौनिसिद्धाा। १४. घ. स्मरेत्। १५. घ. पूर्वेषु। १६. स. न च सिद्घ त्यंग- होना। १७. घ. सन्ध्यादिधिर्नाम चतुर्थः पटलः । १८ घ वद प्रभो। } १३ ] सांस्यायनतन्त्र ईश्वर उवाच- तत्तदेकाक्षरीबीज तत्तन्मन्त्रेषु जीवनम् । उत्तम बीजमुक्त'च मन्त्रसर्वार्थसाधनम् ॥३॥ नानामन्त्रषु मन्त्र वा बीजाढय सर्वसिद्धिदम् । निर्बीजमेव निर्वीयं शिवस्य वचन यथा ॥४॥५ तद्वीजोद्धारमनघ' सर्वसिद्धिप्रदायकम् । पूजन' च प्रयोग च वक्ष्ये ह तव पुत्रक ॥५॥ सान्तं रान्तसमायुक्तं चतुर्थस्वरसयुतम् । रेफाक्रान्तं बिन्दुयुक्तं ब्रह्मास्त्रकाक्षर(रो) मनुः ॥६॥ ब्रह्मा ऋषिश्च छन्दोय (न्दोऽस्य)गायत्री समुदाहृतम् । देवता बगला नाम शक्तिश्चिन्मयरूपिणी ॥७॥ ल बीज ह्री च शक्तिश्च ई कोलकमुदाहृतम् । न्यासविद्या प्रवक्ष्यामि मन्त्रसिद्धिकरं नृणाम् ।।८।। भूशुद्धि भूतशुद्धिञ्च मातृका द्वितयं न्यसेत् । पञ्चाक्षरेण १ विन्यस्य तद्विधिं शृणु पुत्रक ॥६॥ नेत्रवाण पुनः पञ्च नव पञ्चदशाक्षरम् । विन्यसेदगुलोभिश्च षडङ्गेषु तथैव च ॥१०॥ वक्ष्येह पञ्जर न्यासं मन्त्रसिद्धिकर नृणाम् । बगला पूर्वतो रक्षेदाग्नेय्या च गदाधरी ॥११॥ पीताम्बरा'' दक्षिणे च स्तम्भिनी वैव नैऋते ३ जिह्वाकोलिन्यतो रक्षेत्' १४ पश्चिमे सर्वतोमयी ५ ॥१२॥ वायव्ये च मदोन्मत्ता कौवेरे१६ च त्रिशूलिनी । ब्रह्मास्त्रदेवतैशान्ये'" पाताले स्तभमातरः ॥१३॥ १६ १. घ. वीजयुक्त। २. घ मत्र सर्वार्थसाधकम् । ३. घ. बीजाज्य। ४. घ. तवा ५. प. अयमशो विशेष.-'एकाक्षरी वगला उद्धार'। ६. स. ०मनघ । ७. ग. योजन। क. स. मनम्। ६. ख घ. नाम्नी । १०. ख, ०सिद्धिकरौं। ११.ख. घ. मन्त्रा- धरण। १२. घ, पीताम्बरी। १३. घ. नैऋतौ। १४. घ. जिह्वां कीनयतो रक्षो। १५.स. सर्वचिन्मयो । ग. सवंतामयि । घ. सर्वतोमयि । १६. घ. कोबर्या। म. घ. देवतेशान्ये। १५. य. पावालस्तब्धमातृका। .
पंचमः पटलः [ १३ ऊद्धवं रक्षेन्महादेवी जिह्वास्तम्भनकारिणी। एव दश दिशो रक्षेद् बगला सर्वसिद्धिदा ॥१४॥ एवं न्यासविधि कृत्वा यत्किञ्चिज्जपमाचरेत् । तस्य सस्मरणादेव' शत्रूणां स्तम्भनं भवेत् ॥१५॥ सर्व न्यासविवि कृत्वा बगलामातृकां न्यसेत् । तन्मातृकाविधिं वक्ष्ये सारासारतरं तथा ।।१६।। तारञ्च मातृकावर्णं बगलावीजमेव च । नमोऽन्तेन च विन्यस्य मातृकास्थानतोऽनघ ॥१७॥ घ्यानेन मन्त्रसिद्धि. स्याद् ध्यान सर्वार्थसाधनम् । ध्यानं विना भवेन्मूक. सिद्धमन्त्राऽपि पुत्रक ॥१८॥ वादी मूकति रङ्कति क्षितिपतिर्वैश्वानर. शीति, क्रोधो शांतति दुर्जनः सुजनति क्षिप्रानुगः खजति ॥ गर्वी खर्वति सर्वविच्च जडति त्वद्यत्रिणा यन्त्रित." श्रीनित्ये वगलामुखि प्रतिदिनं कल्याणि तुभ्यं नम. ।।१६।। एव ध्यात्वा जपेन्मन्त्र तत्वलक्ष सुबुद्धिमान् । गुडोदकेन सन्तर्प्य तद्दशांशं कुमारक ॥२०॥ त्रिकोणकुण्डे जुहुयाद्धस्तनिम्नोन्नते शुभे । हयारिकुसुमेनैव सरक्तनाज्यसयुतम् ॥२१॥ ब्राह्मणान् भोजयेत्पश्चात् तत्वसख्या तु युग्मकम् । मन्त्रसिद्धिर्भवेत्पुत्र नान्यथा शिवभाषितम् ॥२२॥ वाममार्गक्रमेणव वामामभ्यर्च्य पुष्पिणीम् । मन्त्रसिद्धिकरं चैतत्' सर्वदा रिपुनाशनम् ।।२३।। परमन्त्रप्रयोगेषु नानाकृत्रिमचेटकः । सद्य. स्तम्भनविद्या च'२ वगला च न सशयः ॥२४॥ इति पषिद्यागमे सांस्यायनतन्त्र पंचम पटलम् : २ ॥४॥ १. घ ०व। २. ग. घ. सर्व। ३. ख मातृकावर्ण.। ग. मातृकावणं । ४ घ. पासेन। ५. घ. साधकम् । ६ ग. स्वत्रिणा। घ. त्वद्यात्रियो। ७. ध यत्रितो। ८. प. जपेन्मूलम् । ६. स. सरक्तन्याज्य० । १०. घ. शिव- भाषणम्। ११. घ. चैव । १२. ख. स्तभनकृद्विद्या। घ. स्तंभन विद्यादि । .एकाक्षरमत्रकथनं नाम पञ्चमः पटलः । ग. सरक्त नाम) १३. म. ।
१४ ] सांस्यायनतन्य ॥ प्रथ षष्ठः पटलः॥ पाठीननेत्रां' परिपूर्णवक्त्रां पञ्चेन्द्रियस्तम्भनचित्तरूपाम् । पीताम्बराढ्यां पिशितासना सदा भजामि संस्तम्भनकारिणी सदा ॥१॥ क्रौञ्चभेदन उघाच- नमस्ते योगिससेव्य नम. कारुणिकोत्तम । एकाक्षरीमहामन्त्रप्रयोग वद सदर ।।२।। ईश्वर उपाच- उत्तम कुण्डहोमञ्च स्थण्डिलञ्चैव मध्यमम् । स्थण्डिलेन विना होम निष्फल भवति ध्रुवम् ॥३॥ पट्कोण चाष्टकोणञ्च चतुष्कोणं कुमारक । त्रिविध स्थण्डिलं चैव वक्ष्येऽह कुरु श्रादरात् ।।४।। लक्ष्मी (:) शान्तिस्तथा पुष्टिविघ्नाविघ्ननिवारणः' । चतुरस्र हुनेत्कुण्डे तन्त्रवित परिशोधिते ॥५॥ वशीकरणसम्मोहे वाणिज्ये द्रव्यसग्रहे । कीत्ति कामस्तु जुहुयाद्भगाकारे च कुण्डके" ॥६॥ दशेन्द्रियस्तभने तु दिव्यर्गन्धस्तथैव च । त्रिकोणकुण्डे जुहुयाद् गुरुमार्गेण बुद्धिमान् ॥७॥ विद्वेपणे तु जुहुयाद्वर्तुले कुण्डमध्यमे । उच्चाटने तु जुहुयात् पट्कोणाख्ये तु कुण्डके ।।८।। मारणे चाष्टकोणे तु कतत्तत्कर्मानुसारत" । तत्तद्रव्येण जुहुयात्तत्तद्ग्रन्थोक्तमेव च ॥६॥ वक्ष्येऽह स्थण्डिलोम'' षट्कर्मसु कुमारक । जुहुयाच्छान्तिवश्येषु स्थण्डिले चतुरस्रके ।।१०।। विद्वेषणे स्तम्भने च जुहुयादष्टकोणके । मारणोच्चाटने पुत्र पट्कोणेषु विधीयते ॥११॥ १ ग. पाटिन नेत्रा। घ. भालेन नेत्रां। २ घ. गानो। ३. ख.ग. पिशिताशनो। घ पिशिनी। ४. ग. घ. ०महामत्र. ५ घ. स्थडिलं मध्यमं तथा । ६. ग.घ. विद्या विघ्न । ७. क कुण्डले । ८. घ कुण्डमध्यगे । ६ घ. च । ६.गतित्तरकामा० ११ ख. घ. स्थडिले होम । १२. ख ग. षट्कर्मेषु । 4 षष्ठ पटलः [ १५ प्रादेशं शतहोमे च' अरनिश्च सहस्रके। हस्तं चायुतहोमेषु द्विहस्त लक्षहोमके ॥१२॥ गुणहस्त कोटिहोमे कुण्ड निम्नोन्नत सुत । स्थण्डिलस्य च वक्ष्यामि तान्त्रिकोक्तस्य लक्षणम् ।।१३।। अरलिहस्तमात्र च द्विरलिश्च द्विहस्तयो. । शतं सहस्रमयुतं लक्षहोमेष्वय क्रमः ॥१४॥ सर्वत्रैवोन्नतं पुत्र प्रादेश स्थण्डिलक्रमम् । लक्षण स्थण्डिलैः कुण्ड' न ज्ञात्वा निष्फलं हुतम् ॥१५॥ शान्तिवश्यस्तम्भनानि विद्वेषोच्चाटन तथा। मारणान्तानि शसन्ति पटकर्माणि मनीषिणः ।।१६।। नानारोगः कृत्रिमैश्च नानाचेटकमेव च । विषभूतप्रयोगेपु निरासः'' शान्तिरुच्यते'२ ॥१७॥ वश्य जनानां सर्वेषा वात्सल्य हृद्गत स्मृतम् । स्तम्भन रोधन पुत्र सर्वकर्मसु निष्फलम् ॥१८॥ मंत्रस्य१४ कलहोत्पत्तिविद्वेषणमुदाहृतम् । चलबुद्धिभ्रमेणोक्तमुच्चाटनमिदम्भुवि ॥१६॥ प्राणिनां प्राणहरणं मारणं समुदाहृतम् । प्रत्येकमेषां वक्ष्यामि होमयोग सुनिश्चितम् ॥२०॥ दूर्वाहोमं त्रिमध्वक्त जुहुयादयुतत्रयम् । रोगहन्ता'' ग्रहादिभ्यः सद्य. शान्तिकर भवेत् ।२१।। सुमन्त-'" कुसुमैराज्य'८ कृत वाणायुतं तथा । जुहुयानिशि काले च वश्यं सम्मोहन ६ भवेत् ।।२२।। बिभीतकसमिद्भिर्वा करजर्बीजमेव च । नेत्रायुत हुनेत्पुत्र स्तम्भन परम मतम् ॥२३॥ १. घ. तु। २. घ. चायुतहोमे तु । ३ घ. कोटिहोमं । प्र। ६. ख. द्विहस्तकम् । ७. घ. स्थण्डिल क्रमात् । ८. ख. लक्षण । स्थडिल। घ. स्थंडिले। १० ख. ११. क, प. निराशः । १२. क. मुच्यते । १३. घ.निश्चितम् । १४. ख. मित्रस्य । १५. ख. ०विद्वप च मुदा० । १६.स. रोगकृत्वा । १७. ख स्यमन्त । घ. शामंत । १९. घ. राज्य.. १६. घ. मोहनकंन घ. परम् । ४. घ.तथा। ५. ग. ६. स. कुण्ड ।
१६ सांस्यायनतन्त्र निम्बार्कपत्रहोमेन निम्बतैलेन मिथितम् । नेत्रायुतेन विद्वेष भवेत्णपाणयोरपि ॥२४॥ उलूककाकयो: पर्वाणायनमखण्डिभिः । जुहुयाच्च ततो रात्री भवेदुच्चाटन सुत ।।२।। तिलतलसमायुक्त' शाल्मलीकुसम तथा । लक्षमेकं हुनेद्रात्री प्रेताग्नी प्रेतकानने ॥२६॥ नग्न. प्रेतमुखे भौमे प्रेतकाप्ठेन वुद्धिमान् । मृकण्डुसदृश चैव मारणं भवति ध्रुवम् ॥२७॥ इति षड्विद्यागमे सांस्यायनतन्त्रे पष्ठ पटलम् ॥६॥ ॥ अथ सप्तमः पटलः ॥ पीताम्बरधरां देवी पूर्णचन्द्रनिभाननाम् । वामे जिह्वा गदां चान्य धारयन्तीं भजाम्यहम् ॥१॥ क्रौञ्चभेदन उवाच- महापाशुपताक्रान्त नम. पन्नगभूषण । पत्रिंशदक्षरी विद्या बगलापाशमेव च ॥२॥ ईश्वर उवाच- मन्त्रोद्धार प्रवक्ष्यामि पुरश्चरणलक्षणम् । प्रयोग चोपसहारं शान्ति तच्छ णु पुत्रक'' ॥३॥ तारं च वगलाबीज बगलापदमुच्चरेत् । मुखीति पदमुच्चार्य सर्वशब्द ततोच्चरेत् ॥४॥ दुप्टानां पदमुच्चार्य वाच २ मुखं पद वदेत् । स्तम्भयेति पद चोक्त्वा जिह्वा कोलय उच्चरेत् ॥१५॥ बुद्धिशब्दं ततोच्चार्य विनागय स्थिरमाया ततोच्चार्य प्रणवं च ततोच्चरेत् ।।६।। १. घ. तिलतलेन सयुक्त । २. ग. शाल्मिली० । ३. घ प्रेतमुख । ४. क ग्नी मे घ. मोमेः। ५. घ. प्रेतकाष्ठे च। ६ ख. मकण्ड० । घ. मृकुण्डसदृशे । •एकाक्षरीषट्प्रयोगकधन नाम पष्ठः पटलः ॥ ८ ख. भूपणम् । ६.ख, ग. षशिक्षदरी- विद्या। १० व वगला तां च मे वद । ग. वगलायाश्च मे वद । घ. वगलायारच देवता । ११. घ साम्प्रत शृणु पुत्रक। १२. स्व वाचे। १३. ग. १४. घ. कीलयमुच्चरेत् । १५ ग विनाशयति । घ. विनाशाय। १६. घ. पदं। १७. घ स्तधमायां। १५ ततो वदेत् । पदे।
सप्तमः पटलः [ १७ वह्निजायां समुच्चार्य एवं मन्त्र समुद्धरेत् । पत्रिंशदक्षर मन्त्र मन्त्रराजमिदं भुवि ॥७॥ न्यासविद्यां प्रवक्ष्यामि सदा सिद्धिकरी पराम् । बगलामातृकां चादौ कामतार्तीयवाग्भवम् ।।८॥ श्रीमायामातृकां चैव बगलापञ्जरं न्यसेत् । लघुषोढा च विन्यस्य सर्वमन्त्रेष्वयं क्रमः ॥६॥ ध्यान यत्नात्प्रवक्ष्यामि ध्यानं सर्वार्थसिद्धिदम्। प्रादौ मध्ये तथा चान्ते ध्यान सर्वार्थसिद्धिदम् ॥१०॥ चतुर्भुजां त्रिनयनां कमलासनसस्थिताम् । त्रिशूलं पानपात्र च गदां जिह्वां च बिभ्रतीम् ॥११॥ बिम्बोष्ठी कम्बुकण्ठी च समपीनपयोधराम् । पीताम्बरां मदाघूर्णी ध्यायेद् ब्रह्मास्त्रदेवताम् ॥१२॥ नारदो ऋषिरेवान वृहतीच्छन्द एव च । देवता बगला नाम स्तम्भनास्तभचिन्मयोम् ।।१३।। ल वीज चव है शक्तिः ई. कीलकमुदाहृतम् । शत्रूणां स्तम्भनार्थञ्च जपेऽह विधिपूर्वकम् ॥१४॥ सङ्कल्पपूर्वकं मन्त्रं कोलचक्रक्रमेण च । पृथ्वीलक्षं जपेन्मन्त्र न्यासध्यानसमन्वितम् ।।१।। तर्पयेत्तद्दशांशंच हेतुमिश्रेण वारिणा। जुहुयाद्विल्वकुसुमं तद्दशाश च बुद्धिमान् ॥१६॥ ब्राह्मणान् भोजयेस्पश्चात्तद्दशांश घृतप्लुतम् । तर्पयेत् तर्पयामीति स्वाहान्त होममाचरेत् ॥१७॥ पूजा कालिको नित्य जपस्तर्पणमेव च । होमो' ब्राह्मणभुक्तिश्च पुरश्चरणमुच्यते ॥१८॥ पुरश्चयाँ' -विना-मत्र न प्रसिद्धयति" भूतले । एवं स्वाधीनमन्त्रेण षट्प्रयोगान् समाचरेत् ॥६॥ १ ख..सर्वकामार्थसिद्धिदम् । २. स. स्तभनास्त्रे च चिन्मयी। ग. घ. स्तभनास्त्र च चिन्मयीं 1 , ३. ग. । ४. घ. जपेये । ५ घ हेतुसमिश्र। ६. ग. विल्वकसुमैः । ७, घ. तपंणे। ८. ग. घ. जपतपं०। ६. घ. होम। १०. ध पुरश्चर्यो । ११. प सा सिद्धपति। १२. घ साधितमन्त्रणा १८ ] सात्यायनताने शान्त्याद्य (न्त्यर्थं) जुहुयाच्छालिसक्तुराज्यसमन्वितम् । गुणायुत हुते' घीमान् कुण्डे पूर्वोक्तमादरात् ॥२०॥ वशीकरणकार्येषु विल्वपत्र घृतप्लुतम् । गुणायुत चामलकप्रमाण क्रौञ्चभेदन ॥२१॥ स्तम्भनेपु हुनेद्धीमान् तालक घृतसम्प्लुतम् । बदरीफलमात्रं तु गुणायुतमनन्यधीः ।।२२।। विद्वेषणे च जुहुयात्पनिम्बार्कसयुतः । रात्री वेदायुत धीमान् सद्यो विद्वेषण परम् ॥२३॥ राजीलवणसयुक्त बाणायुतमनन्यधीः । तस्य चोच्चाटन शीघ्र ध्रुवकूर्मादयोरपि ॥२४॥ तलतैलेन सयुक्त मापहोम गुणायुतम् । प्रेताग्नी प्रेतकाष्ठ'' च जुहुयात्प्रेतकानने ॥२५॥ भौमवारे निशा'२ नग्नो जुहुयात्प्रेत उल्मुके' । सद्यो मारणमाप्नोति मृकण्डुसदृशोऽपि च ॥२६॥ ॥ इति षड्विद्यागमे सांस्यायनतन्त्रे सप्तम पटलम्'५ ॥ ॥ अथाष्टमः पटलः ।। - - बिम्बोष्ठी चारुवदना समपीनपयोधराम् । पानपात्र वैरिजिह्वां धारयन्ती शिवा भजे ॥१॥ कौञ्चभेदन उवाच- नमः कौलागमाचार्य वेदवेदाङ्गपारग । बगलामन्त्रराजस्य प्रयोगं वद शङ्कर ॥२॥ ईश्वर उवाच- राजीलवणमादाय मूलमन्त्रेण पुत्रक । ग्रस्त कृत्वा साध्यनाम जुहुयादयुत निशि ॥३॥ १. ख ०शक्तुमाज्य० । २. ख ग. घ. हुनेद् । ३. ख. घृतप्लुते। पुस्तके पद्यमिद नास्ति । ५. ख. स्तंभने सु। घ. स्तभने तु। ६. ख. घ ०निम्बार्क सभव.। ७ ख. ग. घ. भवेत् । - ८. घ. सद्य । ८. घ. सद्य। . ग, उच्चाटन । घ. मुच्चाटन। १०. ख. ध्रुव कूर्मा० । घ ध्रुवकर्मा०। ११ खः प्रेतकाष्ठे। १२. ख. निशी। ग. घ निशा । १३. ख. गोल्मुके। घ. दिड्मुखे । १४. घ. वा। १५. घ. मंत्र- राजकथन नाम सप्तम. पटलः । ४. घ.
अष्टमः पटलः [ १६ !.. नानारोगहरं चैव नानाभूतनिकृन्तनम् । नानाकृत्रिमनाशञ्च भवेत्सत्य न संशयः ॥४॥ हरिद्राखण्डहोमेन अयुतेन कुमारक । वशीकरणसम्मोह भवेच्छङ्करभाषणम् ।।५।। तालकेन हुनेद्रात्री नेत्रायुतमनन्यधी। नानास्तम्भनमार्गेषु सत्यमेतन्न सशयः ॥६॥ खरस्य' रक्तमादाय जातिकर्मविरोधिनाम् । निम्बार्कपत्रमादाय प्रत्येक नाम चालिखेत् ॥७॥ प्रताग्नी प्रेतकाष्ठे च नग्ने च प्रेतदिड मुखे । हुनेत्प्रेतवने धीमानयुतं द्वेषकारकम् ।।८।। अनाथस्य चितौ रात्री शत्रुप्रकृति लिखेत् । हृदये नाम आलिख्य मारयेति ललाटके ।।६।। दहयुग्मं लिखेद् बाहो ऊर्वोस्तस्य कुरुद्वयम् । एव च विलिखेत्सम्यक् सशत्रोर्वर्णमादरात् ॥१०॥ ताडयेद् हृदये मन्त्री शतमष्टोत्तरं जपेत् । तद्भस्म संग्रहे धीमान् गोपयेन्नगराद्वहिः ॥११॥ पुनी मनिशाकाले मन्त्रयेन्मूलमन्त्रतः। अष्टोत्तरसहस्र च शत्रुमूर्द्ध-नि' विनि.क्षिपेत् ।।१२।। स शत्र : सप्तरात्रण म्रियते नात्र सशय. । उष्ट्रास्ट रिपुध्यात्वानस्य दण्डेन' मन्त्रयेत् ॥१३॥ नि.क्षिपेत्सप्तरात्रं तु सप्तघा मन्त्रित तथा । उच्चाटनं भवेत्सत्यं शिवस्य वचन यथा ॥१४॥ प्रेतभस्म रवौ ६ ग्राह्य बगलामत्रराजतः । सहस्र मन्त्रयेच्छत्रो१० रात्री ८ नग्नो नई भौमके ॥१५॥ १. ग. घ. वाराह । घ. नग्नो वा। ३. ख. घ. प्रेत- दिङ्मुख । ४. ग घ. मालिख्य । ५. ख को स्म। घ. कर्वोभस्म । ६. ख. स्वशत्रो० ॥ घ. शत्रोवर्णसमादरात् । ८. ख ग. घ. सग्रहे । ६. घ रोपर्यन्न । १० घ. शनोन्मूर्धनि । ११. घ. निक्षिपेत् । १२. ख. ग्रस्थ. घ. ग्रस्तं कृत्वा तु! १३. घ. मत्रवित् । १४. ख. मंत्रिते १५. घ. १६. क. वशी। १७. ख. भस्म । , घ. रात्री। १८. घ. मत्री। १६. ख. नग्नोऽथ। ग. ध नग्नेन । 1 २. ख.नग्नश्च । ७. ग.घ. गदया। दण्डेन । 1 तथा।
२० ] सांस्यायनतन्त्र खाने पाने च तद्भस्म दातव्य शत्र मण्डले । वाक्पाणिपादपायुश्च' . नेत्रश्रोत्रमतिस्तथा ॥१६॥ स्तंभनं च भवेच्छीन वृहस्पतिसमोऽपि च । किम्पुनर्मानवादीनां स्तभन 3 क्रौञ्चभेदन ॥१७॥ क्षुद्रप्रयोजनैः पुत्र न कर्त्तव्य कदाचन । अज्ञानात्कुरुते यस्तु देवताशापमाप्नुयात् ।।१८।। ग्रस्त कृत्वा वैरिनाम विलिखेत्तालपत्रके । निशाकाले चार्कवारे निर्दहेद्दीपवह्निना ॥१६॥ कुवेरसदृश. श्रीमान् मासमात्रेण पुत्रक । मन्दबुद्धिर्दरिद्रोऽपि जायते भुवि पुत्रक ॥२०॥ चितिवस्त्रं रवी ग्राह्य तदङ्गार रवी पुनः । चितिकाष्ठ रवो ग्राह्यं रवी कुर्यात्स लेखिनीम् ।।२१।। रवी रात्रौ च सलिख्य शत्रुनाम" च तत्पटे । वेष्टयेद् वगलावीज मूलमत्र ततो लिखेत् ।।२२।। वह्निवीजेन सवेष्टय वेष्टयेज्जीवनीमनु. ! तद्वस्त्रगुलिका कृत्वा वेष्टयेत् श्वेतरज्जुना ॥२३॥ स्थापयेच्च कपाले तू निशि भौमे च चिते प्रादेशगत कृत्वाथ श्मशाने' च सुवुद्धिमान् ।॥२४॥ रवी रात्री च नि.क्षिप्य पूरयेद्भस्म सादरात्। जप कुर्यादयुत मूलविद्यया ।।२।। मन्दाग्निर्मन्दबुद्धिश्च १५ नेत्रश्रोत्रेषु मन्दताम् । पाणिपादौ ८ च मन्दत्व निर्वीर्यो भवति ध्रुवम् ।।२६।। एव रोगसमायुक्तो मण्डलाद्रिपुनाशनम् । चन्द्रप्रस्तारमंत्रण द्रव्यतर्पणमाचरेत् ।।२७।। - तत्र नग्नो'४ ५. १ घ. पायूएच । २. घ वा। ३. ग. सुगम । ४. ०ख. घ.०प्रयोजने । घ, रिपोर्नाम। ६ ख. ०जीवनो० । ७. घ. तद्वस्त्र गुटिका। ८. ख. प्रेतरज्जुना। है. ख घ. भौमेन । १० घ. चार्चयेत् । ११. ग. स्मशाने तु। १२. ख. पि । १३ घ मादरात् । १४ घ. नग्ने। १५. ग. मंत्राग्नि । १६. घ. नेत्रत्रोत्रे च । १७ घ मन्दता। १८. ख. 'पाणी पादे ।
नवमः पटलः [ २१ शत सहस्रमयुतं कार्यलाघवगौरवात् । तत्तर्पणासवं' पीत्वा प्रयोग शान्तिमाप्नुयात् ।।२८।। न कर्तव्यं मुमुक्षश्च' परपीडां कदाचन । प्राणः कण्ठगतै, कुर्यात् पश्चात् सस्कारमाचरेत् ॥२६ इति षविद्यागमे सांस्यायनतन्ने मष्टम पटलम् ॥८॥ ॥ अथ नवम. पटलः ।। पीताम्बरालकृतपीतवर्णी शातोदरी शर्वमुखामृतार्चिताम् । पोनस्तनालड कृतपीतपुष्पा सदा स्मरेय बगलामुखी हृदि ।।१।। कोचभेदन उवाच-- नमोऽस्तु मत्रागमकोविदाय श्रीनीलकण्ठाय नमो नमस्ते । एतन्मनोर्यन्त्रमखण्डतेजसे प्रयोगमूल वद चन्द्रचूह ॥२॥ ईश्वर उवाच- यन्त्रप्रयोगं यमगासने कलो यन्त्रप्रयोगं यमिनां च दुर्लभम् । यन्त्रप्रयोगं यतयस्तु कुर्वता यज्ञादि' गोविप्रयतेश्च 'रक्षणे ।।३।। विन्दु २ त्रिकोणं वृत्तं च अष्टकोण ततोपरि । ततोपरि लिखेत्सुत्र षट्कोणं वृत्तमादरात् ॥४॥ ततोपरि लिखेत्सम्यक् भूपुरद्वयमादरात् विन्दुमध्ये लिखे कोणत्रितये ५ त्रितयं त्रिधा ॥५॥ अष्टकोणेषु विलिखेद् गायत्री बगलाह्वयाम् । षट्कोणेषु८ सुसंलिख्य विद्यां पत्रिंशदक्षरीम् ॥६॥ वृत्तेषु विलिखेत्पुत्र पञ्चाशद्वर्णमादरात् । भूपुरेषु च सलिख्य प्राणस्थापनक मनुम् १ |७|| Y ०अष्टमः पटलः। तेक्ष। १ ख. तत्तपंणाम्भः। २. ख संपीत्वा । ३. ख. मुमुक्षेश्च ५ ख. शान्तोदरी। ६ स. प. शवमुखामरा० । ७, क, ख. ग. येतन्मनोर्यत्रमखण्ड- ८ घ. यमशासनं। ६. घ कुर्वन् । १०. ध यज्ञादि । १२. घ. ०यतश्च । १२ ख. घ. यिन्दु । ग. विन्दुः । १३. ख. ग. घ पुस्तकेण्वयमशो विशेष.- "बिन्दुमध्ये लिखेद्वीजं वगलायाश्च पुत्रक। साध्यं तद्वीनगर्भ (मध्य. घ.) स्थ कुर्यात् सम्यक् सुवुद्धिमान् ।। १४. क. स. ग. तद्वीज विविखेत् । १५. घ त्रितयेषु। १६. घ. विधा। १७. घ. अष्ट. पत्रषु। १५. पट्कोणके । १६ ख. घ. च सलिख्य । २०. प. वृत्ते तु । २१. घ. मनु. । ।
२२ ] सांस्यायनतात्रे रजते स्वर्णपट्टे वा प्रादेशं चतुरस्रके । लेखिन्या स्वर्णमय्या' च लिखेद्भार्गववासरे ॥८॥ पूजायत्रमिद पुत्र पूजनात् सर्वसिद्धिदम् । पूजाविधि प्रवक्ष्यामि मुनिगुह्यं सुपावनम् ॥६॥ मूलमन्त्रेण सम्पूज्य उपचारैश्च षोडशैः । शुद्धप्रदेशजा दूर्वा निर्मला च सुकोमलाम् ॥१०॥ सग्रहेक्षालयेत् सम्यक् मंत्रराजेन पुत्रक । मन्त्रान्ते च नम.२ पूर्व नि.क्षिपेद् दूर्वमादरात् ॥११॥ एव भूतसहस्र च पूजयेच्च दिने दिने । मण्डलाद्वयाधयः सर्वे मुच्यन्ते कृत्रिमादयः ।।१२।। भूतप्रेतपिशाचाद्या. क्रूराः खेचरभूचरा. । पूजनान्नाशमाप्नोति शिवस्य वचन यथा ।।१३।। अर्चयेत्पूर्ववद्यन्त्रमुपचारैश्च षोडश. । सग्रहेद्रक्तकुसुम हयारिं च सुनिर्मलम् ।।१४॥ तेन पूजा प्रकर्त्तव्या पूर्ववन्मण्डल सुधीः । सम्मोहन च वश्यञ्च द्रव्यलाभ भवेध्रुवम् ।।१५।। बिभीतकोद्भवं पुष्पमाहरेद्भौमवासरे। पूजयेत्पूर्ववत्पुत्र नानास्तम्भनकर्मणि ।।१६।। निम्बार्ककुसुमेनाथ यन्त्र वापि कुमारक । पूर्ववत्पूजयेन्मन्त्री११ सद्यो विद्वेषण भवेत् ।।१७।। धत्तूरकुसुमेनैव पूर्ववत्पूजयेत्सुत । उच्चाटन भवेत्सत्य नान्यथा शिवभाषणम् ॥१८॥ विषतिन्दुकपुष्पेण पूर्ववत्सम्यगर्चयेत् । सद्यो विनाशमाप्नोति'२ मृकण्डुसदृशो' रिपुः ।।१९।। - १. ख स्वर्णमष्याः । २. ग. पुनः । ३. ख. पूर्वा । ४. घ क्षिपेई व समादः रात् । ५ घ. ०दामया. । ६. स्व. सर्वा । ७. क. सग्रहे प्रकुसुमं । प्रकर्तव्य । ९. घ ०चाथ । १०. घ. पुत्रेणाथ। ११.९. पूजयन् । १२. ख. विनाशमायाति । घ. नाशमवाप्नोति १३. घ मकुण्ड० ।
दशमः पटल. [ २३ शमन्तकुसुमेनैव' पूर्ववत्पूजयेन्नरः । पूर्ववज्जायते २ लोके वेदशास्त्रार्थकोविदः ।।२०॥ पलाशकुसुमेनैव पूर्ववत्पूजयेन्नरः । सद्यो मन्दो भवेद्वाग्मी लभेत्सर्वज्ञतां सुत ।।२।। पूर्ववत्पूजयेत् पुत्र अशोककुसुमेन च । ईप्सिता' लभते कन्या सा तु पुत्रवती भवेत् ।।२२।। तुलसीमञ्जरीभिश्च पूर्ववत्पूजयेन्नरः । ज्ञानभक्तिश्च वैराग्यं लभते तरलैरपि ॥२३॥ नन्दावर्तेन सम्पूज्य वातरोग व्यपोहति । मल्लिकाकुसुमेनैव पूजयेज्ज्वरशान्तये ॥२४॥ कुसुमंश्चम्पकैरर्च्य शीतज्वरनिवारणम् । प्रर्चयेज्जातिकुमुमैर्मेहरोग विनश्यति ॥२५॥ वन्यश्च मल्लिकापुष्पैनि.क्षेप' लभते ध्रुवम् । केतकीकुसुमेनाय॑ द्रव्यवान् जायते ध्रुवम् ॥२६॥ एव च पूजयेद्यन्त्र न जपैर्न च होमतः । प्रयोगसिद्धिर्भवति बगलायाः प्रसादतः ॥२७॥ इति षविद्यागमे सांस्यायनतन्त्रे नवम पटलम्'' ॥६॥ ।। अथ दशमः पटलः ।। कम्बुकण्ठीसुताम्रोष्ठी'३ मदविह्वललोचनाम् । भजेऽह बगलां देवी पीताम्बरधरां शुभाम् ।।११ क्रौञ्चभेदन उवाच- अष्टमूर्त महामूर्ते नमस्ते चन्द्रशेखर । वद प्रयोग मंत्रस्य 3 लेपनक्रममादरात् ॥२॥ ईश्वर उवाच- पूर्वोक्त यन्त्रमालिख्य'५ प्राणस्थापनपूर्वकम् । अर्चयेदुपचारेण चन्दनेन विलेपयेत् ।।३।। १. घ स्युमन्त । २. ग. पुत्रवान घ पुत्र वा० । ३. घ. ईप्सिता च । ४. घ. लभेत् । ५. ग. लम्यते । ६. घ. च परंरपि। ७. ख. नन्दावर्तेव । नन्द्यावत्तश्च । घ नद्यावर्तेन । ८. घ. ०रर्चेत् । १ ग. महारोग। १०. 'घ, निक्षिप्त। ११. घ. ० ययप्रयोग नाम नवम पटलः । १२. स.ग. कम्बुकण्ठी । १३. घ. यन्मस्य । १४. घ. सेपन०। १५. घ. ०मालिख्यं । १६. घ. दुपचारश्च । - १४ -- "- F २४ ] सांख्यायनतन्त्र वाणायुतं जपेद्धीमान् नित्यपूजासमन्वितम् । राज्यसिद्धिर्भवेत्सत्यमयत्नेन' कुमारक ।।४॥ कस्तूरीलेपनं कुर्यात्सम्यगचितयन्त्रके । नित्य वाणसहस्र च न्यासंध्यानसमन्वितम् ॥५॥ मण्डलद्वययोगेन रोगकृत्याग्रहादयः । तत्क्षणान्नाशमायान्ति तमः सूर्योदये यथा ॥६॥ पूर्ति चार्द्धपल नित्यं लेपयेद्यन्त्रमादरात् जप कुर्यात्पूर्ववच्च मासं वा मण्डल तु वा ॥७॥ वशीकर तु सम्मोह द्रव्यसंग्रहमेव च । भवत्येव न संन्देहो ना कार्या विचारणा ॥८॥ हरिद्रातालक चैव अर्कक्षीरेण महितम् । त्रिकाल लेपयेन्नित्यं त्रिसहस्र जपेद्दिने ||६|| महास्तभनमाप्नोति' कर्णाक्षिवाक्पतिस्तुवा । मण्डलानगर • ग्रामं रणसम्मोहमेव च ॥१०॥ सर्षपास्त्रिकदुर्वेश्च'२ दुग्धर्वजार्कसम्भवः । क्षारेण" मर्दयेत्सम्यक् यन्त्रलेपनमाचरेत् ॥११॥ कृत्वार्धमण्डल चैव षट्सहस्र दिने दिने । विद्वेषण भवेत्सिद्ध शिवस्य वचन यथा ।।१२।। धत्तूर तिन्दुक ४ बीज तालकेन समन्वितम् । निम्बपत्रद्रवेनैव मर्दयेल्लेपयेत्रिधा ॥१३॥ एव मासप्रयोगेण नगरं ग्राममेव च । रणे ५ वा राजगेहे वा शीघ्रमुच्चाटन भवेत् ||१४|| प्रेतान्नं प्रेतभस्मं च प्रेतागारं सम समम् । अर्कवज्रीमय'८ क्षीर खल्वेनैव तु मर्दयेत् ।।१।। १. क. ०मयनेन । २. घ. तु। ३. घ.०माप्नोति । ४. घ. सूर्योदयः। घ तथा। ६ ख. भूचिन्तार्थ फलं। ७. घ. मईयेत्। ८. घ. पक्ष्यात्। ६. स. कर्णाक्षिवाक्युतिस्तु । घ. कर्णाक्षी वाङ्मतिस्तु। १० घ. नगरे । ११. घ. वा। १२. ख. सर्षेपास्त्रिकट्वच । ग. सर्षपास्त्रिकडुवैर्वा । घ. सर्षपां त्रिकटुश्चंव। १३. ग. क्षीरेण । घ. खल्वेन । १४. घ नितिंदुवकं । १५ घ, रणं । १६. घ. राजगेह। १६. घ. रानगेह। १७. ख. प्रेत- भूति । १८. ग. मर्कवचमयी। घ. अवज्रमयं । १६. क. बलेनैव । १ ।
दशमः पटलः त्रिकालं लेपनं कुर्यात् प्रीतये होमयुक्तिना' । नित्यं ऋतुसहस्र तु-मन्त्रराजमिमं जपेत् ।।१६।। पक्षान्मारणमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा । अथवा निम्वतलेन तद्वत्कृत्वा तु मारणम् ॥१७॥ तिलतैलेन संयुक्तं मर्दयेद् गरमादरात् । यन्त्रस्य लेपन कुर्यात् त्रिकाल मूलविद्यया.॥१८॥ सन्तपेद्दीपशिखया पक्षमेकं कुमारक । मारणं च भवेन्नित्यं नात्र कार्या विचारणा ॥१६॥ वज्रीक्षीरं त्रिकालं तु पूर्ववल्लेखनेषु च । तापज्वरस्य पीडाया षण्मासाद्रिपुमारणम् ॥२०॥ पूर्ववल्लेपनं चैव जपसन्तर्पण तथा,। त्रिसप्तदिनमात्रेण मारण चोरगौरंगः ॥२१॥ धत्तूरद्रवसंयुक्त मर्दयेत्सर्षपं तथा । जपलेपनयोः पुत्र गुल्मरोगी-भवेद्रिपुः ।।२२।। निम्बपत्रद्रव चव विषकण्टकजं" तथा । विषतिन्दुकजं चैव विविध च सम.समम् ॥२३॥ त्रिकाललेपन' कुर्यात् षट्सहस्र मर्नु जपेत् । पक्षण द्वादशाहेन'५ मारण च समं समम् ॥२४॥ त्रिकालं लेपनं कुर्यात् षट्सहस्रं मनुं जपेत् ।' मईयेदारनालेन मारिच त्रिफलां तथा ॥२५॥ त्रिकालं लेपनं कुर्यात्' त्रिकालं जपमाचरेत् । करपादादिदोहेन ६ मण्डलाच्छत्रुमारणम् ॥२६॥ १. घ. सन्तपेद्दीपवहि ना। २. घ. निसं। ३. घ. तु०॥ ४. घ. ०मिद । ६. घ. वनक्षीर। ७. घ. लेपनेन च। घ. वैरिकाहः । ग. चोरगोरज १०.ख. यत्रलेपनयोः घ. जपलेपनया। ११. ग. कण्टककं। १२. स. घ. त्रिकालं०। १३. क. सहस्र। १४. घ.पक्षाद्वा। १५. घ. द्वादशाहं वा। १६. स.ग.घ न सशयः। १७. पादद्वर्य पुस्तकान्तरेषु नास्ति । १६. क. करपाद्यपि० । ग. करपादावि। घ. करपाददहेनैव । तारयम्। ५. घ. ०रलवमा० । ८. ग. जप:०। ६. घ. कृत्वा। २०. क.
२६ ] सांस्यायनतन्त्र -- -- गोमयर्लेपनं' दत्वा गुल्मरोगी भवेद्रिपुः । गोमूत्रं छागमूत्र च मिश्रित पूर्ववत्तथा ॥२७॥ पित्तरोगी भवेच्छत्रुरर्द्धमण्डलमात्रतः ।। लेपन छागरक्तेन भ्रान्तान्पत्ति भवेद् ध्रुवम् ॥२८॥ मत्कुणस्य च रक्तेन उन्मादी जायते रिपुः ॥ ॥ इतिषविद्यागमे सांख्यायनतन्त्रे दशम पटलम् ॥१०॥ ॥ अथकादशः पटलः ।। नमस्ते वगलादेवीमासवप्रियभामिनीम् । भे (भ) जेह स्तम्भनार्थं च गदां जिह्वां च बिभ्रतीम् ॥१॥ कौञ्चभेवन उवाच- नमस्ते मौलिससेव्य नमः पन्नगभूषण । तर्पणेन प्रयोग च वद मे करुणाकर ॥२॥ ईश्वर उवाच- पूजयेद्यन्त्रराज च उपचारैश्च षोडशः । तद्यत्रोपरि सन्तर्प्य तर्पणस्य विधि शृणु ।।३।। गुडोदकैस्तर्पणं च कुर्यात्पचायुत तथा । शान्तिकृत्य भवेच्छीघ्र नात्र कार्या विचारणा ॥४॥ द्रवेण'' तर्पणं कुर्यात् पूर्वसंख्यासु पुत्रक । वश्यं सम्मोहन चैव भवेत्तर्पणयोगतः ॥५॥ मोहिनीद्रवसमिश्र'' जलेनैव तु तर्पणम् । नेत्रायुतप्रमाणेन जिह्वास्तम्भनमाप्नुयात् ।।६।। गतिगर्भ' च वाक्यानि ३ गात्र श्रोत्र तथाक्षिकम् । क्षुधा तृष्णा च निद्रा ४ च स्तभनं च भवेद् ध्रुवम् ।।७।। निम्बार्कपत्रजद्रावमिश्रितं कूपवारिणा । पञ्चायुत तर्पणेन सद्यो विद्वेषणं भवेत् ॥८॥ १. ग गोमये। २. घ. पैत्यरोगी। ३. ख. भ्रान्तचित्तो। ग. म्रान्तान्पत्ति । घ म्रान्तिरोगी। ४. घ. त्रि (वि)लेपन नाम दसम. पटलः । ५. ग. वगला०। घ.। वगलादेवी वासवप्रियमोदिनी । ६. घ. विनती। ७. घ. मोनि०। ८. घ. भूषणे। ९. घ. तर्पणस्य । १०. ख. ग. घ. द्रव्येण । ११. घ. मोहनीद्रवसयुक्त। १२. ग. गतिस्तंभ। घ, गति गर्भ। १३. ग. घ. वाक्पाणि । १४. घ. तुष्णा क्षुधा च निद्रां । 1 . । 1 एकादशः पटलः [२७ E वज़ार्कक्षीरमिश्रच 'कान्ता च" तर्पणेन च । उच्चाटनं. - भवेच्छनोरयुतत्रयमादरात् ।।६।। प्रेतान्नं प्रेतभस्मं च प्रेताङ्गारं च पुत्रक । समं समं गरं. ग्राह्य जीवेनैव- तु मिश्रितम् ॥१०॥ नेत्रायुतं तर्पणेन साक्षाद् रिपुविनाशनम् । हयारिपत्रजद्रावमिश्रितं' मारणं भवेत् ।।१।। कर्पू रमिश्रितं तोय" पंचाशच्छतमादरात् । नित्य च तर्पयेद् धीमान् मासमेकमतन्द्रितः ॥१२॥ पुराणज्वरमत्युग्रं ८ पित्तरोग विनश्यति । चन्दनाम्भस्तर्पणेन तापं कृत्रिम हरेत् ॥१३॥ कस्तूरीमिश्रितं तोय राज्यलाभो भवेद् ध्रुवम् । यस्तु" तर्पणमत्रेषु'' अयुत - रविसख्यया'२ ॥१४॥ कुवेरसद्दशः श्रीमान् जायते नात्र संशयः । माध्वीद्रव्येण सम्मिश्र' पूजितं' १४ शुद्धवारिणा ॥१५॥ रलायुतं तर्पणेन लक्ष्मीर्वा"जायते ध्रुवम् । गोक्षीरतपणेनैव ईप्सितां सिद्धिमाप्नुयात् ।।१६।। तक्रेण तर्पणं चैव पित्तरोगं व्यपोहति । पारनालेन संतl जलदोषं च ८ शाम्यति ॥१७॥ हरिद्राम्भस्तर्पणेन स्त्रीणामाकर्षण भवेत् । शमतकुसुमेनैव'६ मिश्रितं जलतर्पणम् ॥१८॥ पुत्रवान् जायते मर्यो२. अयुतेन न संशयः । कदलीफलगोक्षीरं शर्करा च समं समम् ॥१६॥ १. '-'स, करांमः । घ. कोशांमः। २. क. उच्चाटनो। ३. ख. प्रेतभूमि। ४. घः च स० ।-- ५. ख. मानेनव । ६ घ. मयूरपत्रज द्वारः । ७. क. तोये। ग घ. ० मृत्युग्रं। ६. घ. पुस्तकेऽय विशेषः पाठः- "गोडीद्रव्यस्तपणेन द्रव्यलामो भवेद् ध्रुवम् ।" १०. स. ग पैष्टया । घ. पैष्टो। ११. स. तर्पणमत्रेण । ग. तर्पणमात्रेषु । घ. तपंग- मात्रण। १२. प. ऋषिसंख्यया। १३. घ संमिश्रा १४. घ. पूरितं । तत्रायुतं । घ. तत्वायुतं । १६. ख ग. घ. सक्ष्मीवान् । १७. स. घ. तपगनेव । १८. १६.घ. स्यमन्त० । २०. घ. मृत्यो। - ख.प्रा २] सांस्यायनतन्त्रे पलाष्टकं च प्रत्येक मिश्रितं जलतर्पणम्। मत्रसिद्धिविना' सिद्धिर्भक्तिवैराग्यमेव च ॥२०॥ भ्रमज्ञानं व्यपोहंति नान्यथा शिवभाषणम् ।। छागरक्तेन समिश्र चाचितं तैलतर्पणात् ॥२॥ मूकारच कुरुते प्राज्ञान् रिपुसंघाननेकशः। जलेन मिश्रितं पुत्र शोणित विड्वराहजम् ॥२२॥ वेदायुत तर्पणेन उन्मादी जायते रिपुः । काकरक्तेन सम्मिश्र तर्पणं शुद्धवारिणा ॥२३॥ जातिभ्रष्टो भवेच्छत्रुः स भवेन्निन्दको भुवि । उलूकरक्तस मिश्रं वारिणा तर्पणं तथा ॥२४॥ व्रणेन म्रियते शत्रुरयुतद्वयसमंततः ।'' श्वानरक्तेन समिश्र वारिणा तर्पणं तथा ।।२।। श्वानवज्ज्वलते'' शत्रुम्रियते नात्र संशयः । मार्जाररक्तसम्मिश्र'२ तर्पणं वारिणा तथा ॥२६॥ क्षयरोगी भवेच्छत्रु. षण्मासम्रियते रिपुः । उष्टरीशोणित मिश्रा तोये ५ सन्तर्पयेत् सह ॥२७॥ १. घ. ०ज्ञान। २. घ. तेन तर्पणम् । ३. घ. यत्नाद् । ४. घ. ०सघानमेकशः। ५. घ. विड्वराहकम् । ६. घ. मिष्टवारिणा। ७. घ. सन्ततिनिन्दिता। ८. ग.घ. पुस्तकद्वये विशेषोऽयं पाठः- 'नेत्रायुत' भवेच्छत्रु नेत्ररोगी न संशयः। खररक्तेन संमिश्र वारिणा तपरणं तथा ॥ ६ ख. ०द्वयमन्ततः । ग. द्वययोगत: १०. क. पुस्तके पावद्वयस्थानेऽयमशो दृश्यते- तृणवज्ज्वलते शत्र रयुतं ज्वरयोगतः।" ११. ख. जायते । ग. घ. जल्पते । १२. घ. सयुक्त । १३. ख. पुस्तकेऽस्मात्परमंशो विशेप:- "भुजगशोणितेनैव तयेदर्द्धरायके । निशि सहस्रमानेन सिरिपुविनाशनम्" ।। १४. घ. उष्ट्रस्य शोरिंगतं । १३. ख. तोयैः। घ. तोयं । १६. घ. संतप्यं बुद्धिमान् । १. घ. नेमायुताद् । २. घ. नेत्रनाशो ।
द्वादशः पटलः [२९ मासेन शत्रुमरणं मृकंडुसदृशोऽपि वा। जपसख्या यत्र नोक्ता लक्षमेक कुमारक ॥२८॥ दिनसख्या यत्र नोक्ता पक्षमेव' न संशय. ।। इति षविद्यागमे सांख्यायनतन्त्र एकादश पटलम् ॥११॥ - ॥अथ द्वादशः पटलः॥ कोलागर्म कसवेद्यां सदा कोलागमाम्बिकाम् । भजेऽह सर्वसिद्धयर्थ-बगलां, चिन्मयी हृदि ॥१॥ क्रौचभवन उवाच- नमस्ते सर्वसर्वेश गर्वितासुरभञ्जन । गायत्री वगलाख्यां च वद मे करुणाकर ॥२॥ ईश्वर उवाच- मन्त्रोद्धारं प्रवक्ष्यामि मन्त्रमाहात्म्यमेव च। पुरश्चर्याप्रयोगं च वक्ष्येऽहं तव पुत्रक ॥३॥ ब्रह्मास्त्रायपदं चोक्त्वा 'विद्महेति पदं ततः'५ स्तम्भनेति पदं चोक्त्वा बाणाय तदनन्तरम् ॥४॥ धीमहीति पदं चोक्त्वा तन्नः शब्दं ततो(दो)च्यते । वगलापदमुच्चार्य उद्धरेच्च प्रचोदयात् ॥५॥ गायत्री बगलानाम्नी सर्वसिद्धिप्रदा भुवि । ब्रह्मा ऋषिश्च छन्दोय(स्य) गायत्री समुदाहृतम् ॥६॥ देवता बगलानाम्नी चिन्मयी शक्तिरूपिणी । वीज 'चैव शक्तिही कीलक विद्महे पदम् ॥७॥ चतुर्लक्ष पुरश्चर्या तद्दशांशं च तर्पणम् । तद्दशांशं हुनेदाज्यं तावद्ब्राह्मणभोजनम् ॥८॥ न्यासध्यानादिक सर्वं कुर्यात् 'तन्मन्त्रतो जपेत्' प्रयोगानय वक्ष्यामि गायत्रीबगलाह्वये'२ ॥६॥ १. प. पक्षसंख्या । २. घ ०एकादशः पटलः। ३. ग. वगलोख्य करुणाकरम् । ४. क. पुन । ५. ''ख. विग्रहेति पदं तथा । घ. विद्महेति ततः पदम् । ६. ग. तत । घ. तन्नो। ७. ग. प. सतीच्चरेत् । ८. सं. यमुदाहृतम् । ख. वगला। १०. -'घ. शक्तिह ली ११. '--'घ. सन्मन्त्र राजवत् । १२. स. वगलाह्वया । घ. गायश्या वगलाह्वया। चंव।
३०. सांख्यायनतन्त्र . तारादि प्रजपेन्मन्त्र मोक्षार्थी' च, कुमारक । शान्त्यर्थं च जपेत्पुत्र शारदाबीजपूर्वकम् ॥१०॥ सम्मोहनार्थ प्रजपेत् कामराजपुरस्सरम् । स्तम्भनार्थ प्रजपेच्छक्तिदाहकपूर्वकम् ॥११॥ वाराह शक्तिवाराहं स्तब्धमायापुरस्सरम् । प्रजपेन्मन्त्रमेतद्धि मारणं भवति ध्रुवम् ।।१२।। वाग्भवादि जपेन्मत्रं विद्यासिद्धिर्भविष्यति । बालादि प्रजपेन्मन्त्र 'कन्यकां क्षिप्रमाप्नुयात् ॥१३॥ वाराहीबीजमध्यस्थां' गायत्री लक्षजापनात् । भूलाभ (भो) जायते तस्य अनायासेन पुत्रक ॥१४॥ श्रीबीजादि जपेत् पुत्र गायत्री बगलायाम् । कुबेरसदृशः श्रीमान् जायते नात्र संशयः ॥१५॥ तायबीजादि मत्रं प्रजपेद् ध्यानपूर्वकम् । नानाविषप्रयोगांश्च नहरोगादिनाशनम् ॥१६॥ भैरवी'१ बीजमाद्य च प्रजपेच्च कुमारक । भूतप्रेतपिशाचाद्यास्तत्प्रयोगाद् व्यपोहति ॥१७॥ जपेदमृतबीजानि' गायत्री बगलाह्वयाम् । तापज्वरमहातापं१३ शमयेत् १४ क्रौञ्चभेदन ॥१८॥ जपेच्च वायुबोजादि गायत्री बगलायाम् । क्षिप्रमुच्चाटन चैव भवेच्छङ्करभाषणम् ।।१९।। अग्निबीजादिगायत्री प्रजपेद् बगलाह्वयाम् । महता(दा)तापसयुक्तः५ पक्षाच्छत्रुम॒तो भवेत् ॥२०॥ १. घ. मोक्षार्थ। ३. घ. तारावाराहपूर्वकम् । पुस्तकेष्वय पाठ'- स्तम्भनार्थ जपेत्पुत्र बगलाबीजपूर्वकम् ॥ विद्वेषणार्थ प्रजपेद्धकारद्वयपूर्वकम् । उच्चाटनार्थ (घ. उच्चाटने) जपेत्पुत्र शक्तिवाराहपूर्वकम् । ५. घ. कन्याकांक्षी मवाप्नुयात् । ६. घ. वाराहीमध्यवीजस्यां। ७. ग. अत्यायासेन । ८. क. ग. घ. गायत्री। ६. ख. बगलाह्वया ।। १०. घ. गलरोगादि०) ११.ख. घ. भैरव । १२. ख. घ. वीजादि। १३. ख तापज्वर महातापं । घ. महावात। १४. घ. नाशयेत् । १५. घ. संयुक्तं । 4 . २. घ.प्र। ४. स.ग घ. 2 त्रयोदशः पटलः [ ३१ ३ मायादि प्रजपेत् पुत्र गायत्री बगलाह्वयाम् ।' इष्टसिद्धिर्भवेत् क्षिप्रं शिवस्य वचन यथा ॥२१॥ मन्त्रराजस्य गायत्री पादाधवयवं तथा ।" गायत्री च विना मन्त्रं न सिद्धयति कलौ युगे ।।२२।। पुरश्चरणकाले तु गायत्री प्रजपेन।। मूलविद्या दशांशं च मन्त्रसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ॥२३॥ त्यक्त्वा तन्मन्त्रगायत्री यो जपेन्मन्त्रमादरात् । कोटिकोटिजपेनैव तस्य सिद्धिर्न जायते ॥२४॥ जपसंख्या यत्र नोक्ता लक्षमेक कुमारक । दिनसंख्या यत्र नोक्ता पक्षमेक न संशयः ॥२५॥ गायत्री वगलानाम्नी वगलायाश्च जीवनम् । मंत्रादौ चाथ मन्त्रान्ते जपेद् ध्यानपुरस्सरम् ।।२६।। इति षविद्यागमे सांस्यायनतन्त्र द्वादश पटलम् ।।१२।। ॥ अथ त्रयोदशः पटलः ।। निधाय पादं हृदि वामपाणिना, जिह्वां समुत्पाटनकोपसयुताम् । दाभिघातेन च - फालदेशे', अम्बां भजेऽहं बगलां हृदब्जे ।। क्रौञ्चभेवन उवाच- श्रीकण्ठ श्रीगराधार शार्दू लाम्बरभूषण'। शान्तवद् वद मे पूजां बगलायाश्च शङ्कर ।।२।। १. प्रत..पर ख.ग. घ. पुस्तकेषु विशेषः पाठः- "राजा वा राजपुत्रो वा मरणान्तं वशीभवेत् । महामाया(ग. मायामाया)दिगायत्री प्रजपेद् बगलाह्वयाम् ।" २. घ.तथा। ३. घ.पादाब्यावयव । ४. घ. पुस्तकेऽयं विशेष:- मत्रसिद्धिर्भवेत् क्षिप्र शिवस्य वचनं यथा ५. ख. घ. मूलविद्या । ६. '-'घ. न च सिद्धिर्भवेद् ध्र वम् । ७. स. ग. जपे । घ. जप । ६. घ.०द्वादशः पटलः। ६. स. वालदेशे। घ. फालदेशं । १०. घ. बीधराधार । ११. घ ०भूपणम्। १२. घ. सान्तव।
३२ ] सांस्यायनता ईश्वर उवाच- बिन्दुमध्ये च सम्पूज्य स्वर्णसिंहासनोपरि । चिन्मयी बगलादेवी सर्वसिद्धिप्रदायिकाम् ।।३।। चतुर्भुजां च द्विभुजां गदां जिह्वां च बिभ्रतीम् । पीतवर्णा महापूर्णामर्चयेन्मूलविद्यया ॥४॥ त्रिकोणे पूजयेत् पुत्र 'वाणी गोरी रमा'२ ऋमात् । तत्तद्बीजेन सम्पूज्य तदा दावाहनपूर्वकम् ॥५॥ पञ्चास्त्र पञ्चकोणेषु वक्ष्ये तत्पूजनं क्रमात् । पूर्वकोणे तु सम्पूज्य अस्त्रं च बगलामुखीम् ।।६।। द्वितीयकोणे संपूज्य अस्त्रराज कुमारक । उल्कामुखीति विख्यातं तन्मत्रेणव पूजयेत् ॥७॥ तृतीयकोणे सम्पूज्य अस्त्रराज कुमारक । 'नाम्नी ज्वालामुखी चैव तन्मन्त्रेणैव पूजयेत् ॥८॥ 'चतुर्थकोणे सम्पूज्य अस्त्रराज कुमारक' । जातवेदमुखीनाम्नी तन्मन्त्रणव पूजयेत् ।। पञ्चमेषु च कोणेषु अस्त्रराज कुमारक । बृहद्भानुमुखी ख्याता त्रिषु लोकेषु दुर्लभा ।।१०॥" पञ्चकोणेष्वेवमेतत्पञ्चास्त्र ८ सम्यगर्चयेत् । मूलमन्त्रण तेनैव पूजायन्त्र कुमारंक ॥११॥ तदुपरि समभ्यर्च्य दिक्पालाष्टकमादरात् । तद्वाहन च तच्छक्तिदशायुतपुरस्सरम् ॥१२॥ तदुपरि समभ्यर्च्य मातृकाष्टकमेव च ।" तदुपरि समभ्यर्च्य विघ्नेशाष्टकमेव च ॥१.३।। । १. ख. घ. मदाघूर्णा०। ग. महाघूर्णा । २. घ. वाणीगौरीरमाः । ३. घ. तत्त- द्वाहनपूर्वकम् । ४. घ. पन्चास्त्रान् । ५. -' चिह नगोंऽशो घ. पुस्तके नास्ति । ६. '-' चिह नान्तर्गतोऽशों नावलोक्यते घ. पुस्तके । ७. पं.पमिद नास्ति । ८. घ. पञ्च- मेषु च कोणेष्वेवमेव पञ्चास्त्रं । ६. ख. तच्छक्तिदायुच०। घ. तच्छक्तिस्तदायुधः । १०. घ. पुस्तके विशेष:- "तदुपरि समभ्ययं भैरवाष्टकमेव च ।" *- - .
श्योरशः पटलः [ ३३ . 'पूजायंत्र क्रमेणैव" एवमेव कुमारक। शालग्रामशिलायां वा वह्निमण्डलमध्यमे ॥१४ कन्यका चाथवा पुत्र पूजयेद् बगलाम्बिकाम् । उत्तम युवतीपूजा मध्यम वह्निमण्डले ॥१॥ अधमं च शिलापूजा क्रम ऐष शिवोदिता नमोऽतेनैव नाम्ना चे पूजयेच्च कुमारक ॥१६॥ एवं च पूजयेत् सम्यक् पुरश्चरणके विधौ । द्रव्यं यत्त्रिविधं प्रोक्त पूजायां च विशेषतः ॥१७॥ गौडी माध्वी च पैष्टी च गोडी चैवोत्तमोत्तमा'। छागकुक्कुटमत्स्य'२ च बगलाप्रीतिकारकम् ॥१८॥ त्रिकालं पूजयेद्देवी त्रिकालं च' जपेन्मनुम् । यस्य दर्शनमात्रेण पण्डितर्वाग्विदों वरः ॥१६॥ प्रज्ञा पलानीय'५ तमः सूर्योदये यथा । तेजोभेदमनेकं च सर्वशत्रौ ८ कुमारक ॥२०॥ वह्नो यद्वत् प्रविशंति तद्वद्वादय. चातुरी'। बगला मत्रसिद्धस्यय 'हृदये च प्रविश्यति' 3 ॥२१॥ प्रतिवादि२४ भवेत्स्तम्भो२५ वृहस्पतिसमोऽपि चे। प्रज्ञाकर्षणशक्तिश्च बगला भूतले स्मरेत्२६ ॥२२॥ विद्यामाकर्षणार्थ च स एव च न संशयः ब्रह्मचारी गृही वापि वानप्रस्थोऽथवा यतिः ॥२३॥ १४ तस्य २०. ख. । १. '-' पूजायन्त्रक्रमे चैव। २. स्व. कन्योयां । ३. प. बगलामुखीम् । उत्तमा। ५. घ. मध्यमा । ६. घ. वह्निमण्डलम् । ७. घ. प्रघमा। ८. स. एष। ग. एव । घ. प्रय। ६. क. ग. शिवोदिता । १०. च त्रिविध। ११. क. ग ०त्तमा । १२. मासं। १३.घ. प्र। १४. घ तस्य। १५. घ. पलायते। १६. घ सूर्योदयः। १७. घ. तथा। १८. घ. शत्रो। १६, प. प्रशस्यति । तंद्वद्वाक्पद २१. घ. चातुरम् । २२. घ. ०मत्रसिद्धिः स्याद् । २३. '' घ. दूरादेव प्रदर्शनात् । २४. घ. प्रतिवादी। २५. ख. घ. भवेत् स्तब्धी। २६. ख. स्मृता। वज्ञानामपंणार्थ । २८. घ. तु । २९. ख घ. पुस्तकद्वयेऽधिकोऽयमशो दृश्यते- "उल्लध्य बगलामंत्रमुपवास (घ. मुपासक)मनन्यधीः"। यत्किचित् कुरुते (घ. क्रियते) कम पृथ्वी (घ. शिला)वीजमिाकुरै (घ. वाकुर.) २७. घ. - ३४ ] सांख्यायनतन्त्र बगलामन्त्रसिद्धस्तु' सैव पूज्यो यतीश्वरः । बगलामंत्रसिद्धश्च यत्र तिष्ठति भूतले ।।२४।। पञ्चक्रोशप्रमाणेन विद्वानेव च भासते । न भासते चान्यविद्या न स्मरन्न परामुखी ' ॥२५॥ प्रयोगं चैव न भवेद् बगला परैः पुरा । असने सर्वविद्यानां बगला यैव भूतले ॥२६॥ बगलाया विना मन्त्र त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् । तत्सम्प्रदायविधिना साधयेद् बगलामुखीम् ॥२७॥ एव च बगलामन्त्र मन्त्र राजमिद भुवि ॥ इति षविद्यागमे सांख्यायनतन्त्रे त्रयोदश पटलम् ॥१३॥ ॥ अथः चतुर्दशः पटलः ॥ सुधाब्धो रत्नपर्यङ्के मूले कल्पतरोस्तथा । ब्रह्मादिभिः परिवृता बगलां भावयेद्' हृदि ।।१॥ क्रौञ्चभवन उवाच- वीर विद्रूप विश्वेश चिदानन्दस्वरूपिणे बगलार्चाविधिं चैव वद मे करुणाकर ॥२॥ ईश्वर उवाच- 'सृष्टि स्थितिं च संहारं"४ पूजा च त्रिविधा कलौ । केरले सृष्टिरूपा च गर्भकोलागमक्रमात् ।।३।। अर्चनं गौडदेशे ५ च'६ स्थितिमार्ग" कुमारक । सारूपा अर्हदेशे तु सहारार्चनमेव च ॥४॥ गुप्तं कोलागमं नाम गौडदेशार्चनादिभिः । कामरूपागम नाम सहारक्रमपूजनम् ।।५।। १. घ. सिद्धिस्तु । २. '' घ सर्वैः पूज्यो मुनीश्वरः । ३. घ. सिद्धिश्च । ४. घ. तस्य वक्त्रात् पराङ्मुखी । ५ घ. . पर। ६. घ. परा। ७. घ ग्रस्ते । एव । ९. ख घ. तत्सम्प्रदाय० । १०. घ. ०त्रयोदशः पटलः। ११. घ. चिन्तयेद् । १२ घ. चिद । १३. घ. स्वरूपक । १४. '' घ. सृष्टिस्थितिश्च सहार । १५. घ. गौरदेश। १६. घ. स्य । १७. ख. स्थितिमागें। १८. '-'ख. घ. कामरूपाख्यदेशे तु । १९. घ. संहारक्रममेव । २०. घ. नाम्ना। २१ घ. गोडदेशेऽर्चन विधि.। ८. घ.
चतुर्दशः पटलः [.३५ लाटार्चन' चावलम्व्य सांख्यायनमुनिस्तथा । उक्तवानागमं चैव सृष्टयर्थं शृणु पुत्रक ॥६॥ सर्वाङ्गसुन्दरी श्यामां सर्वावयवशोभिनीम् । नवोढां पुष्पिणी चैव प्रार्थयेद्विप्रकन्यकाम् ।।७।। कृष्णाष्टम्यां चतुर्दश्यां पौर्णमास्यां कुमारक । अथवा भौमवारे च निशा भृगुजवासरे ||८|| 'सुवासिनी च' तैलेन कुर्यादभ्यगन" तथा । तूलिकातल्पमानीत्वा प्रास्तीर्योदङ मुखेषु च ॥६॥ . तस्योपरि ततस्तीयं. शमन्तर्जातिचम्पकः। कर्पूर चैव कस्तूरीमिश्रित चन्दनं तथा ॥१०॥ सर्वाङ्गे लेपनं कुल्लिक्ष्मीसूक्तेन बुद्धिमान् । पर्यवोपरि तत्कन्यां चन्दनेन विलेपिताम् ॥११॥ ध्रुवाचैरिति'' मत्रेण कुर्याद्दक्षिणतोमुखीम् । उन्मुखेत्यर्चन १५ कुर्यात् श्रीसूक्तन कुमारक ॥१२॥ पादो प्रसार्य तत्कन्या ४ गुप्तेनार्चनमाचरेत् । न्यस्त्वा षोढाद्वय चादी बगलापञ्जरं न्यसेत् ॥१३॥ कन्यां चैव न्यसेदेव तत्तदङ्गानि'५ सस्मरेत् १९१७ गन्धद्वारेति ८ मत्रेण कुर्यात् कस्तूरिलेपनम् ॥१४॥ मूलमन्त्रेण चाभ्यर्च्य पुष्पमालां समर्चयेत्। निवेदयेद् द्रव्यशुद्धि तत्रैव जपमाचरेत् ।।१५।। शतं वाऽथ सहस्र वा मत्रराजमिदं सुत । पुरश्चरणमध्ये तु प्रतिभार्गववासरे ॥१६॥ . १. ग. लाजाचंन । घ. गौडागम। २. घ. उक्तमार्गक्रमे । ३. घ. सुधरी। ४. ख. ग.प. निशाया। ५. सु. ग. घ. भृगुवासरे। ६. घ. सुवासितेन । ७. ग. ०दभ्यंगना। ०दम्यगका ८. घ. ०मानीय। ९. घ. मुखेन। १०.व. घ. समास्तीर्य। ११. घ. घंवा धोरिति । १२. घ. तन्मुखे छयनं । १३. घ. प्रस्तार्य। १४. ख. तो कन्यां । १५. घ. तत्र चांगानि । १६. ख. घ. संस्पृशेत् । १७. स. प. पुस्तकद्वये विशेषः पाल- धनंजयपुरं चैव भयेन् (घ. मायेन्) मूलविद्यया। १८. घ. गन्धदारेण । १६. घ. तस्य । २०. ख. घ. समर्पयेत् । - ३६ ] ] सांख्यायनतन्त्र अथवा पौर्णमास्यां वा सौभाग्यार्चनमाचरेत् । प्रयोगसिद्धिदं शस्तं' मंत्रसिद्धिकरं परम् ।।१७।। एतत्पूजां विना पुत्र प्रयोगं न भवेत् कलो। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रयोगादि च भूतले ॥१८॥ सौभाग्याची विना पुत्र न भवेज्जपकोटिभिः । अभिमानाष्टकं त्यक्त्वा त्यक्त्वा चैवेषणाश्रयम् ॥१६॥ त्यक्त्वा पञ्चेन्द्रियासक्ति सोभाग्यार्चनमाचरेत् । सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयो ॥२०॥ शीतोष्णे समतां कृत्वा सौभाग्यार्चनमाचरेत् । षोढाद्वय च न ज्ञात्वा यः करोत्यर्चनं भुवि ।।२।। स पतितो भवेत् पुंसां रौरवं नरकं व्रजेत् । बाह्याभ्यंतरतः पुत्र अभेदज्ञानयोविना ।।२२।। सौभाग्यार्चनकर्त्त । णामनन्त शापमाप्नुयात् । संकल्पं च विकल्पं च त्यक्त्वा विश्रान्तमानसः ॥२३॥ कुर्यात् सौभाग्यसम्पूजां च नो चेद् भ्रष्टो भवेन्नरः । जितेन्द्रियः सुखं त्यक्त्वा कुर्यात् सौभाग्यपूजनम् ॥२४॥ सुखापेक्षेण यत् कुर्याद् देवताशापमाप्नुयात् । स्वस्थादेशविधि चैव न ज्ञात्वा क्रौञ्चभेदन ।।२५।। यः करोत्यर्चनं चैव स विप्रा पतितो भवेत् । स्वपत्नी भ्रातृपत्नी वा गुरुभार्यामथापि वा ।।२६।। अर्चयेत् षड्रसोपेतां सांख्यायनमतं त्विदम् । दीक्षालयस्थां रजकी कुलालगृहकन्यकाम् ॥२७॥ १. घ. पुस । २. घ. समो। ३. घ. शीतोष्ण। ४. ग. ब्रह्माभ्यन्तरतः । घ वाह्याभ्यन्तरयोः ५. घ. ०कतं..णां देवता । ६. घ. विनान्तमानस: । ७. घ. जिह्वन्द्रिय । ८. घ. स्वस्थदेशाविधि । ६. अतः पर ख. घ, पुस्तकद्वये विशेष:- "कल्पते (करोति घ.) चित्तसंक्षोभ तत् (घ. त्वत् कन्याया कुमारक । नान्तचित्तो भवेत् सद्यो (घ. सोपि) वाचस्पतिसमोऽपि वा" । घ. पुस्तकेऽस्मादप्यधिकोऽयमशो दृश्यते- "नोत्पादयेत् कामनया वेदन च शरीरयोः । वेदना जनयेद्यस्तु स नरः पतितो भवेत्" । १०. घ यौवनोपेतां। ६ -- + r पञ्चदशः पटलः [३७ पुलिन्दकन्यकां चैन मकण्डमतमादिशेत् । अर्चयेद् ऋषिपत्नी'च पूर्वोक्तां लक्षणान्विताम् ।।२।। अर्चयेद् विधिमार्गेण पूजा दुर्वाससम्मता । सर्वलक्षणसम्पन्नां पुष्पिणीमर्चयेत्ततः २६।। मतङ्गमुनिनोक्त च' सद्यः सिद्धिकरं भुवि । इति' मार्गमतं पुत्र नास्ति सिद्धिगुरोविना ॥३०॥ तस्मात् सर्वप्रयत्नेनार्चयेद् गुर्वनुशया ॥३१॥ ।। इति षविद्यागमे सांख्यायनतन्त्र चतुवंश. पटलः ॥१४॥ - ॥ अथ पञ्चदशः पटलः ।। पीतवर्णा मदाघूर्णां दृढपीनपयोधराम् । वन्देऽह वगला देवी स्तम्भनास्त्रस्वरूपिणीम् । कौञ्चभेदन उवाच- राजराज स वै श्रीमान् रजताद्रिनिकेतन । पञ्चास्त्रविद्यां वद मे स्तंभनाख्यान्सपावनान्' ।।२।। ईश्वर उवाच- आद्यास्त्र वगलानाम्नी रणस्तम्भनकारणम् उल्कामुखी द्वितीय१२ च स्तम्भनं भुवनत्रये ॥३॥ ज्वालामुखी तृतीयास्त्रं स्तम्भन त्रिषु देवतः । जातवेदमुखी चैव चतुर्थास्त्रं कुमारक ||४|| ब्रह्मविष्णुमहेशानां स्तंभनं नात्र संशयः । वृहद्भानुमुखी चास्त्रं पञ्चमं तु कुमारक ||५|| षट्पञ्चकोटिचामुण्डा कालिकादिशत ४ सपादकोटि त्रिपुरा-स्तंभनास्त्रं च उत्तमम् ॥६॥ १ सुत। १. घ. वैश्यपली। २. घ. प्रचंनं। ३. घ. दुर्वाससमता ४. घ. पुष्पिता० । ५. घ. मातंगमुनिना चोक्तं । ६. स्व. ग. घ. सिद्धि । ७. घ. मागंगत। ८. ख. ०प्रयत्लेन वा। ग. प्रयत्लेन अर्चयेद् । ६. ख. सुख । ग. सचे। घ. सख। १०, ख. स्तमनाख्यः सुपावनी । घ. स्तभनाख्या सुपावनीं । ११०. घ. कारणीम् । १२. घ. द्वितीया। १३. घ. ऋषि । १४. घ. कालिकोटिशतं । १५. घ. पञ्चमम्।
३८] सांख्यायनतन्त्र । पञ्चास्त्रोद्धारमतुलं तत्प्रयोगविधि तथा । वक्ष्ये तस्योपसहारं साम्प्रत तव'. पुत्रक ||७|| तार च विलिखेत् पूर्व स्तब्धमायामतः परम् । वाराह शक्तिवाराह वगलामुखि चोच्चरेत् ।।८।। ह्ना ही हूँच ततोच्चार्य सर्वदुष्टपद वदेत् । लंकार दीर्घसंयुक्त बिन्दुनादविभूषितम् ।।६।। है ही लश्च ततश्चैव 'वाचं मुख पद" वदेत् । स्तम्भयद्वितय प्रोक्त्वा लः ह्रौं ढेच ततो वदेत् ।।१०।। जिह्वा कीलय उच्चार्य ह्लह्ली ला" च ततः परम् । बुद्धि विनाशयोच्चार्य शक्तिवाराहमुच्चरेत् ।।११॥ वाराह बगलाबीज तारवर्मास्त्रसयुतम् । रणस्तम्भनबाणं च दुर्लभं भुवि पुत्रक ॥१२॥ पञ्चाशदुत्तर पञ्चबीजबद्ध सुपावनम् । ऋषिरेवास्य मत्रस्य वसिष्ठः छन्दसां पुनः ।।१३।। पञ्चास्यदेवतामन्त्र-१° रणस्तम्भनकारिणी'' न्यासविद्यां च कर्त्तव्य पूर्वोक्त मन्त्रराजवत् ।।१४॥ ध्यान यत्नात् प्रवक्ष्यामि वगलामुखिदेवता । पीताम्बरधरा देवी द्विसहस्रभुजान्विताम् ॥१५॥ अर्द्धजिह्वां गदा चाद्धं धारयन्ती शिवां भजे । एव ध्यात्वा जपेन्मंत्रमर्कलक्षं सुबुद्धिमान् ॥१६॥ तालकेन हुनेल्लक्ष ब्राह्मणान् भोजयेत्ततः । गजाश्वरथसामन्तकोटिकोटिबल तथा ॥१७। निवीर्यो जायते सद्यो मृतशेषः१३ पलायते । प्रयोगान्ते समभ्यर्च्य मन्त्रसस्कारमाचरेत् ॥१८॥ - 1 शृणु। १. घ. २. घ. हलां ह ली हल। ३. घ.नकारं। ४. हाल ह.लों ह.लश्च । ५. घ. वाचा मुखपदं। ६. घ. ह.लः ह लो हल। ७. घ. हलहली हालां। ८. घ. तारं वर्मा० । ६. क. ख. ग. वशिष्ठः । १०. ख. पञ्चाख्यं देवतामत्र । घ. पक्त्याख्यो देवता चान। ११. स. ग. घ. रूपिणी । १२. व. कर्तव्यां। घ. कर्तव्या। १३. क. ग. घ. मृतः शेषा. ।
पञ्चदशः पटलः [ ३६ ५ संस्कारेण विना मन्त्रं साधकस्य प्रमादकृत् । लोकालोकस्तंभनं च नाम्ना उल्कामुखी' तथा ॥१६॥ मन्त्रोद्धारं प्रवक्ष्यामि शरजन्मन् समासतः । तार च स्तब्धमायां च शक्तिवाराहमेव च ॥२०॥ वगलामुखीपदं चोक्त्वा बीजत्रयं तु सर्व च । दुष्टानां पदमुच्चार्य पूर्वबीजत्रयं वदेत् ।।२।। वाचं मुखं पदं चोक्त्वा पूर्वबीजत्रयं वदेत् । स्तम्भयद्वितय चोक्त्वा 'बीजत्रयं ततो' वदेत् ।।२२।। जिह्वां कीलय उच्चार्य पुनर्बीजत्रयं वदेत् । बुद्धि विनाशयोच्चार्य पूर्वबीजत्रय वदेत् ॥२३॥ प्रणवं वह्निजायां च उल्कामुख्या अयं मनुः पञ्चाशदुवं चैवाष्टबीजबद्ध सुपावनम् ॥२४॥ ऋषिश्चाप्यग्निवाराहश्छन्दः ककुभमेव च । उल्कामुखी देवता च जगत्स्तम्भनकारिणी ॥२५॥ बीजं च वगलाबीज शक्तिः स्वाहासमन्वितम् कोलकं शक्तिवाराहं न्यास पूर्ववदाचरेत् ॥२६॥ ध्यानं यत्नात् प्रवक्ष्यामि मन्त्रभेदे कुमारक । पिलयानलसकाशां'• वीरवेषेण संस्थिताम् ।।२७।। वीराम्नायमहादेवी स्तम्भनाथं भजाम्यहम् । एव ध्यात्वा जपेन्मन्त्रं मनुलक्षं कुमारक ।।२।। प्रपञ्चस्तम्भनं कृत्वा स्वविद्यां च प्रकाशयेत् । तालकेन हुनेत् पुत्र लक्षमेकं हुताशने ॥२६॥ मत्रसिद्धिर्भवेत् पुत्र त्रैलोक्ये कीर्तिमान् भवेत् । तस्याज्ञया जगत्सवं स्थावरं जङ्गमात्मकम् ॥३०॥ कुमारक प्रवर्तन्ते१४ सर्वाश्चर्यकरं भुवि । 'सिद्धि चतुर्विधा'५ चैव एतन्मन्त्रस्य जापके ॥३१॥ १. घ. चोल्का मुखी। २. घ. पुनर्वीजनय । ३. प. पुनर्बीजप्रय । ४ घ. पुनर्वीज। ५. घ. स्तव्धमायां ध्रुवं वह निजायातोल्कामुखीमनः। ६. घ. ०वीजयुक्त । ७. घ. ऋषिश्च । यज्ञवाराहश्छन्दः। ८.घ. शक्ति। ६. घ. मन्त्रभेदं। १०, घ विनया०। ११.ख. वीरवेशेन । घ. वीरावेशेन । १२. घ. विरापमयी महादेवी। १४. घ. प्रवर्तत। १५. स. घ. सिद्धिश्चतुर्विधा । . १३. क.स.ग. क्षपाशन।
४० ] सांख्यायनतन्त्रे इच्छया वर्तते सर्वमाश्चर्यकरमादरात् । नदी नंदश्च' रतिमान् नानापादपसंकुलम् ॥३२॥ आगच्छेत्याज्ञयाः तस्य पुनर्गच्छन्ति चादरात् । किन्न स्यात् पद्ययुक्तानि माहात्म्यं पदगं मनो। ॥३३॥ कामयेन्मन्त्रमेतद्धि' क्रौंचभेदनकोविद ॥ इति षड्विधार्गमे सौख्योयनतन्त्रे पऊनंदपिटलः ॥१५॥ | अथ षोडशः पटलः ।। बन्धूककुसुमाभासा बुद्धिनाशनतत्पराम् । वन्देऽहं वगलां देवी स्तम्भनास्त्राधिदेवताम् ।।१।। क्रौञ्चभेवन उवाच- नमस्ते गिरिजानाथ मन्त्रविद्यागमप्रभो। अधुना चास्त्रविस्तार वद मे करुणाकर ॥२॥ ईश्वर उवाच- तार च स्तब्धमायां च प्रासादं च ततः परम् । पुलिख्य स्तब्धमायां प्रणवं च ततः परम् ॥३॥ वगलामुखिपंद चोक्त्वा सर्वदुष्टपद वदेत् । न(ल?) कारं दीर्घसंयुक्त बिन्दुना भूषित तथा ॥४॥ बीजपञ्चकमुच्चार्य वाचं मुखं पदं वदेत् । स्तभयद्वयमुच्चार्य पञ्चबीजानि चोच्चरेत् ॥५॥ जिह्वां कीलय उच्चार्य पञ्चबीजानि चोच्चरेत् । बुद्धि विनाशययुग'' पञ्चबीजानि चीच्चरेत् ।।६।। वह्निजायासमायुक्त५२ षष्टिवर्गोत्मक' 3 मेनुम् १४५५ जातवेदमुखीमन्त्र जगदाश्चर्यकारकम् ॥७॥ अर्कपञ्चकवर्णेन बद्धोऽयं मन्त्रनायकः । ऋषिः कालाग्निरुद्रस्तु पंक्तिश्छन्द उदाहृतम् ॥il १. घ. नदाश्च । २. घ. गिरयो। ३. घ. 'आगच्छन्त्याज्ञया । ३. घ. सादरात् । ५. ग. किन तस्यात्पद्ययुक्तानि० 1 घ. पुस्तके विशेष:- कि तस्य जपयुक्ताना माहात्म्य चेदृश मनोः । यद्गोपयति पुण्यात्मा त्रैलोक्याकर्षणक्षमः॥ ६. घ. गोपयन्मनः। ७. घ. अस्त्रप्रयोग पञ्चदशपटलः। -.. घ. भाषां। १०. घ. पुनलिखेत् । ११ घ. नाशययुग्म च । १२. स्व. ०समायुक्तः । १३. स. ०त्मको। १४. ख. मनुः। १५. पादद्वयं घ. पुस्तके नास्ति । , ग. प्रसाद घोरशः पटलः [४५ जातवेदमुखी मत्रदेवता' समुदाहृता। ॐ बीज ही' च शक्तिश्च ह कीलकमुदाहृतम् ।।६।। पूर्ववन्यासविद्यां च ध्यानं वक्ष्यामि पुत्रक । जातवेदमुखी देवी देवता प्राणरूपिणी ॥१०॥ भजेऽहं स्तम्भनाथं च स्तम्भनी विश्वरूपिणीम् । एव ध्यात्वा जपेन्मन्त्र शिल्लक्षं सुपावनम् ।।११।। चर्मधृग्वसनो भूत्वा चिन्तितार्थप्रदं ध्रुवम् । गन्धर्वाश्चंव यक्षांश्च गरुडोरगपन्नगान् ।।१२।। वेतालडाकिनीप्रेतशाकिनीब्रह्मराक्षसान् । ऋषिदेवगणांश्चैव सिद्धानन्यांश्च पुत्रक ॥१३॥ अधुना स्तम्भयत्येतत् सत्य शङ्करभाषणम् । तारं च स्तब्धमायां च वह्निवीजं च पंचकम् ।।१४।। प्रस्फुरद्वितयं चैव वीजं चैव त्रयोदश । ज्वालामुखी 'पदं चोक्त्वा' वदेबीज त्रयोदश ॥१५॥ सर्वशब्द ततोच्चार्य दुष्टानां पदमुच्चरेत् । वीज: त्रयोदशं चोक्त्वा वाच मुखं पदं वदेत् ।।१६।। स्तम्भयद्वितयं चोक्त्वा पुनर्बीज' योदश । जिह्वां कीलय चोच्चार्य'२ पुनर्वीज त्रयोदश ॥१७॥ वुद्धि विनाशयं चोक्त्वा'१३ पुनर्वीजं त्रयोदश । वह्निजायासमायुक्त ज्वालामुख्यमयं मनुः५५ ।।१८!! शतोत्तरं भवेद्विशद्वीजबद्धो मनुस्त्वयम् । अनिश्च ऋषिरेवान गायत्रीछन्द उच्यते ॥१९॥ ज्वालामुखी देवता च स्तम्भनाय त्रिमूतिभिः । ध्यानं यत्नात् प्रवक्ष्यामि न्यास पूर्ववदाचरेत् ॥२०॥ १. घ. देवी देवता। २. ख. घ. ह्रीं। ३. घ. ०विद्याः । ४. घ. स्तम्भनी। ५. घ. विश्वरूपिणी । ३. घ. मनूनां संभवेत्येतत् । ७. घ. न्योत । ८. प. च उच्चार्य । 8. क वोज। १०. घ. बीजों। ११. ०वीजी। १२. घ. युग्म च। १३. घ. नाशययग्म च। १४. ख. ज्वालामुख्यास्त्वयं । १.५ .. स्तब्धमामात्रितन्हिजाया ज्वालामुखीमनुः । १६. घ. रेवास्व । १७. घ. एव च।
४२ ] सात्यायनतन्त्र ध्यानं विना भवेन् मूकः सिद्धमन्त्रोऽपि पुत्रक । ज्वालापुञ्जसटोन्मुक्ता' कालानलसमप्रभाम् ॥२१॥ चिन्मयी स्तंभनी देवी भजेऽह विधिपूर्वकम् । एव ध्यात्वा जपेन्मन्त्रमर्कलक्षं सुबुद्धिमान् ॥२२॥ तर्पण च गवां क्षीरस्तालकेन हुनेत् सदा । तर्पणं च चतुर्लक्षं लक्षमेक हुनेत्सदा ॥२३॥ सहस्रद्वितयं चैव 'ब्राह्मणाना सुभोजयेत्' । त्रिमूत्ति स्तम्भयेन्मंत्री पञ्चतत्वान्यपि क्षणात् ।।२४।। आश्चर्यद महामन्त्र नराणां दुर्लभं भुवि । इदानी मन्त्रराजं च वृहद्भानुमुखाह्वयम् ।।२।। 'मारणं स्तंभबाण' च आश्चयं च कलौ युगे । तारं ह ला ह लो च उच्चार्य ह ल ह ल ह लौं च ततः परम् ॥२६।। हालस्तथाप्युच्चरेत् पुत्र ह ला ह ली हलच ततः परम् । हल" ह लौं ह लश्च ततश्चोक्त्वा वगलामुखिपद वदेत् ॥२७॥ सर्वशब्द तंतोच्चार्य दुष्टानां पदमुच्चरेत् । वाचं मुखं पद चोक्त्वा स्तम्भयद्वयमुच्चरेत् ॥२८॥ आद्यबीज पुनश्चोक्त्वा' उद्धरेत् पुनराधवत् । जिह्वां कीलय उच्चार्य पूर्ववद् बीजमुद्धरेत् ।।२६॥ बुद्धि विनाशयोच्चार्य पूर्वबोजानि'' चोच्चरेत् । वह्निजायासमायुक्तो बृहद्भानुमुखीमनुः ॥३०॥१२ सविता च ऋषिः ख्यातो33 गायत्रीछन्द एव च । देवता स्तम्भनाथं च बृहद्भानुमुखी तथा ।।३१।। AN १. घ. ज्वलपुसजटामुक्त। २..घ. ०सुत । ३. ख. ब्राह्मणान् सुत भोजयेत् । ४. घ. रणस्तम्भनवाणं । ५. घ. ततस्तार । ६. अतः परमयमशो दृश्यते घ. पुस्तके- "प्राद्यवीजं मनोः सख्या उद्धरेत् पुनरादरोत्" ७. घ. मनोः संख्या। ८. घ. पुनरादरात् । ६. घ. नाशय उच्चाय्यं । १०. घ. पूर्वधीजं । ११. घ. समुच्चरेत् । १२. घ. पुस्तके त्वयमशो विशेष स्तब्धमाया तारकं च वह्निजायान्तक सुत । वृहद्भानुमुखीमंत्र षडुत्तरशतावे" ॥ १३. घ. ऋषिश्चात्र । . M [ ४३ सप्तदशः पटलः वीजं च बगलावीजं शक्तिर्माया कुमारक । कीलक प्रगवं चात्र विनियोगस्तत:' परम् ॥३२॥ पूर्ववन्न्यासविद्यां च तन्त्रराजवदाचरेत् । ध्यानं यत्नात् प्रवक्ष्यामि मन्त्रभेदेन पुत्रक ॥३३॥ कालानलनिभा देवी ज्वलत्पुञ्जशिरोरुहाम् कोटिबाहुसमायुक्तां वैरिजिह्वासमन्विताम् ॥३४॥ स्तम्भनास्त्रमयो देवीं दृढपीनपयोधराम् । मदिरामदसंयुक्तां वृहद्भानुमुखी भने ॥३५॥ एव ध्यात्वा जपेन्मंत्रमर्कलक्ष कुमारक । तर्पयेत्तद्दशांशं च गुडोदकसमन्वितम् ॥३६।। तालकेन हुनेत्तस्य दशांशं संस्कृताग्निना। ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चात् तद्दशांशं कुमारक ॥३७॥ मन्त्रान्ते च प्रकर्त्तव्य सोभाग्यार्चनमादरात् । सौभाग्यार्चा विना पुत्र मन्त्रसिद्धिर्न जायते ॥३८॥ पञ्चास्त्रमन्त्रसिद्धिहि दिवि देवेषु दुर्लभा । गोपयेत् सर्वदा पुत्र' 'गुप्ता वीर्यवती'८ भवेत् ।।३६॥ 'न कर्त्तव्यः प्रयोगोऽस्य शपथादि'• कदाचन । यः करोति प्रयोगं च देवताशापमाप्नुयात् ॥४०॥ इति षविद्यागमे सांख्यायनतन्त्रे घोरश. पटलः ।।१६।। ॥ अथ सप्तदशः पटलः ।। "जिह्वाग्रमादाय 'करेण देवी"३ 'वामेन शत्रून् परिपीडयन्तीम्'१३ पीताम्बरां पीनपयोधराढयां सदा 'स्मरेऽह बगलाम्बिका"" हृदि ॥१॥ कौञ्चभेदन उवाच- चन्द्रचूड नमस्तेऽस्तु इन्दिरापतिपूजित । शताक्षरीमहामंत्रं वगलायाश्च मे वद ।।२।। १. घ. विनियोग च। २. घ. संस्मृतम् । ३. घ. ललज्जिह्वासमन्विताम् । ४. घ. मदिरामोदसंयुक्तां। ५. घ. मजेत् । ६. घ दुर्लभम् । ७. घ. पुत्रा। गोप्ता वीर्यापति । ६. घ. न कर्त्तव्य प्रयोगांश्च । १०. तु घ. प्रापद्यपि। ११. इतः पूर्वमयमंशोध पुस्तके-'हरीहरेश्च समर्या' । १२. घ. करद्वयेन । १३. घ. मुत्पाटयन्तिमरिशक्तियुक्ताम् । १४. घ, पीत। १५. घ. स्मरेयं बगलामुखीं। ८. घ.
४४ ] सांख्यायन ईश्वर उवाच- मन्त्रोद्धार प्रवक्ष्यामि पुरश्चर्याविधि तथा । प्रयोग चोपसंहार वक्ष्येऽहं तव पुत्रंक ||३|| स्तब्धमायां च वाग्वीजें माया मन्मथमेव च । श्रीवीज' शक्तिवाराहं 'वगलामुखि चोच्चरेत् ॥४॥ स्फुरद्वय तथा चोक्त्वा सर्वशब्दं ततोच्चरेत् । दुष्टानां पदमुच्चार्य वाच मुखं पदं वदेत् ॥५॥ स्तम्भयद्वयमुच्चार्य प्रस्फुरद्वयमुच्चरेत् । विकटाङ्गीपद चोक्त्वा घोररूपीपदं वदेत् ।।६।। जिह्वा कीलय उच्चार्य महाशब्दं ततोच्चरेत् । पश्चाद्धूमकरी चैव बुद्धि नाशय उच्चरेत् ॥७॥ विरामयपदं चोक्त्वा 'सर्वप्रज्ञामयोति च। प्रज्ञां नाशय उच्चार्य उन्मादीकुरु युग्मकम् ॥८॥ मनोपहारिणी चोक्त्वा स्तभमायां समुच्चरेत् । शक्तिवाराहबीज च लक्ष्मीबीज' ततः परम् ।। कामराज च हृल्लेखां वाग्भव तदनन्तरम् । स्तब्धमायां ततोच्चार्य वह्निजायासमन्वितम् ॥१०॥ शताक्षरीमहामन्त्र वगलानाम पावनम् । ब्रह्मा ऋषिश्च छन्दोऽस्य गायत्री समुदाहृता ॥११॥ देवता वगलानाम्नी जगत्स्तम्भनकारिणी। ह लो बीज शक्तिरित्येव वाग्भवं कीलक तथा ॥१२॥ पूर्वोक्ता न्यासविद्यां च वगलापञ्जरादयः । 'जपाद्या पच एव च" ।।१३।। पीताम्बरधरां सौम्यां पीतभूषणभूषिताम् । स्वर्णसिंहासनस्थां च मूले कल्पतरोरघः३ ॥१४॥ . न्यासानुक्तक्रमेणव१ घोररूप पद। १. घरमा च। २ ह.लीकारं बगलामुखी। ३. घ. सर्व शन्द। ४. घ. ५ घ. मुच्चार्य। ६. घ. विराण्मयीपदं । ७. घ. सप्रज्ञामयीत्यरे । ८. घ. उन्माद कुरु । १०. घ. रमाबीज । ११. घ. न्यास- मुक्तकमेव । १२. ख जपादावाचरेत् सुधीः । घ जपादावन्त्यमेव च । १३. घ. स्तथा। 8. घ. स्तब्घमाया।
सप्तरशः पटलः प्ता [ १५ + वैरिजिह्वाभेदानार्थ' छरिकां विभ्रती शिवाम् । पानपात्रं गदां पाशं धारयन्ती भजाम्यहम् ॥१५॥ एवं ध्यात्वा जपेन्मन्त्रमर्कलक्ष क्षपाशनः । तर्पये तुमिश्रेण वारिणा वाथ पुत्रक ॥१६॥ 'जातिपंचकसंमिश्रजलेन' च कुमारक । पूजायुतं च सन्त चितेन जलेन च ॥१७॥ त्रिमध्वक्त पायसेन अथवा पायसाज्ययोः । चरुणा वा हुनेत् पुत्र' सहस्र तत्त्वसंख्यया ॥१८॥ नानादेहजरोगांश्च कृत्रिमग्रहसंभवान् । यावकांश्च प्रयोगांश्च 'तुल्यघातुसमुद्भवान्" ||१६॥ सद्योनाशनमायान्ति मन्त्रहोमेन साधकः । 'साज्यसक्तुघताक्त च शमन्तकुसुमेन वा ॥२०॥ षट्सहन हुनेत् पुत्र स्थण्डिले वाथ कुण्डके । वशीकरं च संमोह कोत्तिः प्रज्ञा भवेद् ध्रुवम् ॥२१॥ तालकेन हुनेत् पुत्र सहस्र वसुसंख्यया । कुण्डे चैव भगोकारे राजताग्नौ'' कलौ निशा ।।२२।। स्तम्भनं च भवेत् पुत्र नात्र कार्या विचारणा ! अक्कैश्च पिचुमद्देश्च' समिघ.: सग्रहेनर. ॥२३॥ प्रत्येकं त्रिसहस्र च-प्रादेशसमिधा क्रमः४ मन्त्रं सर्व समुच्चार्य समिघाद्वयमेव च ॥२४॥ हुनेद् ध्यानसमायुक्तः सद्यो विद्वेषणं भवेत् । विभीतकस्य समिधो ग्राह्यास्तु५ त्रिसहस्रकम् ॥२५॥ षट्कोणकुण्डे जुहुयाग्निशायां कृष्णपक्षके । स्थावरांश्च गिरीश्चैव नदीपादपसंकुलान् ॥२६।। १. घ. छेदनाएं। २. घ. क्षरिकां। ३. ख. ग. ध जाती(ति) चंपक०। ४, घ, बारपायुत। ५. घ. पायस च । ६. घ..पुस्तकेऽस्मात्परमधिकोऽशो दृश्यते- 'पर्यायफलदायक । तपणेन हुनेत्पुत्र' । ७.-८. घ. यावकाश्च प्रयोगाश्च , ६. स्व. ग. घ. शल्प(ल्य)घातु० । १०.ख. शाली. सक्त ० । ग. साज्यसक्तु । घ. शालिशक्तुघृताफ्ता च । ११ घ. रजकाग्नो। १२. स. पिचुमद्दश्च । १३. घ. समिधा। १४. स. ग. प्रादेशसमिधः क्रमः । घ. प्रादेश- समिधाक्रमात् । १५. क. ग्रहास्तु । ग. प्रहाशु । १६ घ. नदीपादप्रसकुसुमं तथा। . - ४६ ] सांस्यायनतन्त्रे क्षणादुच्चाटनं कुर्याद् होमस्यास्य प्रभावतः । निम्बतलेन सयुक्त शाल्मलीकुसुम तथा ॥२७॥' जुहुयाद्देवतां ध्यात्वा मारणं भवति ध्रुवम् । षट्कर्मनिर्माणमिद सुसिद्ध शताक्षरीमन्त्रमशेषदुःखहम् । होमेन संस्तम्भनमाचरेद् बुधो- विद्यासुसिद्ध मुनिगुह्यमादरात् ॥२८॥ ॥ इति विद्यागमे तात्यायनतन्त्रे सप्तदश पटलम् ॥१७॥ ॥अथ अष्टादशः पटलः ।। नमस्ते जगतां देवी जिह्वास्तभनकारिणीम् । भजेऽह शत्रुनाशार्थ साधकासक्तमानसाम् ॥१॥ कोच्चभेवन उवाच- सम्यग्ज्ञान' महेशान नित्यनित्यस्वरूपक' चन्द्रचूड नमस्तेऽस्तु प्रयोगं वद मे प्रभो ॥२॥ ईश्वर उवाच- षट्सहस्र हुनेत् पुत्र दूर्वाहोममतन्द्रितः । 'सम्यग् विषज्वर' हन्ति वगलायाः प्रसादतः ॥३॥ कुशेन जुहुयात्तस्य तापज्वरहर'२ परम् । हुनेत् तावत् श्वेतदूर्वा ज्वरं चातुर्थिकं हरेत् ।।४।। त्रिमध्वक्त'४ श्वेतदूर्वा षट्सहस्र हुनेत् क्रमात् । नानाविध गर हन्ति नात्र कार्या विचारणा ॥५॥ दघिमिश्र गुडूचीभिः शर्करागुडसम्मितम् । जुहुयात् षट्सहस्र तु नानामेहनिवारणम् ॥६॥ . । -- ७. १. घ. पुस्तके श्लोकोऽय नास्ति । २. घ. जुहुयादयुत । ३. घ. व्यायन्। ४. घ. षट्ककर्माणि मिदं। ५. ग. सप्तदशम। घ. सप्तदशः। ६. घ. पटल:। घ बगला। ८ घ शत्रुनाशाय। ६. घ. मदिरासक्तः । १०. घ. सत्यशान । ११. घ. नित्यानित्य० । १२ घ. सद्यस्तापज्वर।। १३. घ. शीतज्वर । १४. घ. त्रिमघुक्ता। १५. ख. मिश्रितम् ।
प्रष्टादशः पटलः [ ४७ - सर्षपं लवणोपेतं पूर्ववज्जुहुयानरः । नाशयेद् गुल्मरोग' च औषधेन विना महत् ।।७।। षट्सहस्र हुनेत् पुत्र शर्कराज्यसमन्वितम् । 'पित्तोद्रेकादिसर्वाश्च' रोगान्नाशयति ध्रुवम् ।।८।। शालिसक्तुं घृतोपेतं वशीकरणमुत्तमम् । लाजाहोम' षट्सहत्र लभेद्वाञ्छितकन्यकाम् ॥६॥ हरिद्राखडहोम' तु पट्सहस्र सुवुद्धिमान् । गर्भस्तभो भवेन्नारी सापि वश्या भवेद् ध्रुवम् ॥१०॥ केतकीदलहोमेन गणिका वश्यमाप्नुयात्' हुनेत् पद्मदलेनैव नेत्ररोग विनश्यति ।।११।। मल्लिकाकुसुमेनैव अधिका च मतिर्भवेत् । जातीफलेन जुहुयादुन्मत्तो जायते रिपुः ।।१२।। षट्सहस्र देवकुसुमं १२ शर्कराज्यसमन्वितम् । बुद्धिगं३चैव चाञ्चल्यं सज्ञानमुन्मतिस्तथा ॥१३॥ अलोकेन'५ क्षुद्रमतिदुर्बुद्धि सिद्धबुद्धिता' । तत्क्षणान्नाशमाप्नोति तम. सूर्योदये यथा ।।१४।। मांसं संपुटसयुक्तं ८ 'द्रव्येण सममेव च । अयुतं जुहुयाद्रात्री सद्यो धनपतिर्भवेत् ॥१५॥ मध्वाक्तं 'छागमांसं च त्रिसहस्र हुनेत् सुत । 'भूलाभ जायते'' शीघ्र ग्रामादिपतिरेव च ॥१६॥ गौडीद्रव्येण जुहुयात् सहस्र बाणसंख्यया । बहुमूत्रादिरोगांश्च नाशयेत्तान्२३ न संशय ॥१७॥ . ४. ख.ग १. ग. रुग्मरोग। २. घ. पत्त्योद्भवांश्च शतशो। ३. ०नाशयेद् । घ. शालिशक्तु । ५. घ. सितोपेतं। ६. घ. लाजहोमात् । ७. घ. होमस्तु । ८. क. सहन । ६. ख. वश्या। १०. घ. ०मादरात् । ११. ख. वाधिका शुभमतिर्भवेत् । १२. ध देवपुष्प। १३. ख. उदग। १४. उच्चाटकमतिस्तथा। १५. ख. अविवेक घ. अविवेको। १६. ख. मन्दबुद्धिता। घ. सिदिबुदिता । १७. घ. सूर्योदयो। १८. ख. तु कुक्कुटस्येव । घ. कुक्कुटसभूत । १६. घ. विमघुः सहितेन । २०. घ. छागपि. २१. घ सुलभ च भवेच् । २२, घ. प्रामाषिः । २३. क. ग. घ. नाशयति । शितं ।
४८ ] सांख्यायनतन्ने माध्वीद्रव्येण जुहुयात् षट्सहस्र क्रमेण च । ज्वरपेक्ष्यादिरोगाश्च' सद्यो नाशनमाप्नुयात् ॥१८॥ पैष्टीद्रव्येण जुहुयानिशास्वष्टसहस्रकम् । सग्रहग्रहणीरोग सद्यो नाशनमाप्नुयात् ॥१६॥ अन्नेन 'अन्वहो हुत्वा' अन्नदानपतिर्भवेत् । घृतेन कान्तिमान भूत्वा नारीणामात्मदो भवेत् ॥२०॥ क्षीरेण भ्रमनाशश्च दध्ना तापननाशनम्। पञ्चगव्येन जुहुयात् पूर्ववत् पाप नाशयेत् ॥२१॥ गोमूत्रण हुनेन्मन्त्री षट्सहस्र क्रमेण च । तालीमद्येन' जुहुयात् स्त्रीणामाकर्षणं भवेत् ॥२२॥ खजू रजेन द्रव्येण पुसामाकर्षणं भवेत् । तिलतैलेन जुहुयात् सर्वाकर्षणमाप्नुयात् ॥२३॥ एरण्डतलेन जुहुयाद्११ वाचाकर्षणमाप्नुयात् । कुसुभतेलहोमेन 3 काकगृध्राननेकशः१४ ॥२४॥ आकर्षण भवैच्छीघ्र खेचराः पक्षिजातयः१५ । यवना'६ पानहोमेन अग्निमध्याद्रिपुः" स्वेयम् ।।२।। रोगी च जायते मासाच्छिवस्य वचन यथा । जुहुयादारनालेन पित्तरोगी भवेद्रिपुः ॥२६॥ निम्बपत्रद्रवेणैव वातरोगी भवेद्रिपुः । मोहिनीपत्रजद्रावै: १८ श्लेष्मरोगी भवेद्रिपुः ॥२७॥ - १ ग घ. ज्वरपैत्यादि। २. घ. हुत्वान्नकामी। ३. प. ०दोनपरो० । ४.घ. हुत्वा । ५. नारीणां मन्मयो। ६ घ. तापनिवारणम् । ७. घ. पापशान्तये । ८. प. हुनेग्रीमान् । ६. घ. पुस्तके विशेषः- 'विदार विवशो भावाद्रिपुर्धान्तो भविष्यति' । १०. ख तालीमयेन । घ. तालमधेन। ११. घ एरण्डतलहोमेन । १२. प. गवाकर्षण। १३. खे. ग. घ. पुस्तकेष्यतः परमयमंशो दृश्यते विशेषः- 'पूर्ववतोममात्रतः । जलजानां च होमेन[घ. जलजाश्चैव यो भेदाभवेदाकर्षणं सुत । करजतलहोमेन'। १४. घ. कोकगंध्राण्यनेकशः। १५. घ. पक्षिजा यत' १६. ख. यवना । घ. यवितालान्त। १७. घ. अग्निमांद्यं रिपो । १८ ख. मोहिपत्रजतेंद्रावः। - एकोनविंशः पटलः [ ४६ १ अर्कपद्रवेणैव क्षयरोगी भवेद्रिपुः । 'वज्रीक्षीरेण संयुक्तमारनालेन पुत्रक ॥२८॥ जुहुयात् षट्सहस्रं तु वगलाध्यानपूर्वकम् । नाडीव्रणसमायुक्तो' (:) षण्मासान्म्रियते रिपुः ॥२६॥ गरं च तिलतलं च पारनालयुतेन च । 'ग्रामे वा नगरे वाथ वगलाध्यानपूर्वकम् ॥३०॥ 'स्फोटवणाश्च जायन्ते रिपोर्योजनमात्रत: ।' तिलतलेन सयोज्य यावनालान्नमेव च ॥३१।। जुहुयात् पूर्ववच्छत्रु"मण्डलाच्छिन्न्शीर्षक:"। कर्पू रमिलितं चैव तिलतलं हुनेत् सुधीः ॥३२॥ मारणं' मण्डलाच्छत्रोत्र कार्या विचारणा ॥३४॥ इति षविद्यागमे सांख्यायनतन्ने प्रष्टादशःपटलः ॥१८॥ ॥ अथकोनविंशः पटलः ।। चतुर्भुजो त्रिनयना पीतवस्त्रधरां शुभाम् । वन्देऽहं वगलां देवीं शत्रुस्तंभनकारिणीम् ।।१।। १. सप्तविंशतिपद्योत्तराद्ध'स्याटाविंशतिपद्यपूर्वाद्धस्य च स्थानेऽयमशो लभ्यते घ. पुस्तके- 'पत्र विभीतकोद्भूतं तस्य स्वरसहोमतः जातिभ्रष्टो भवेच्छ नन्यिथा शिवभाषितम् ।। तत्कारिपत्रजद्रावः कर्मभ्रष्टो भवेद्रिपुः। निगुण्डीपत्रजद्रावैवररोगी मवेद्रिपुः ।। कसपत्रजद्रावहमिन कुमारक। बद्धकोष्ठाश्च रोगस्य स्वभावेनवसिद्धयति ॥ हरीतकोश्च होमेन व्रणरोगी भवेद्रिपुः । २. घ. वनक्षीरेण संमिश्र। ३. घ. नारीवणपरो भूत्वा । ४. घ. अगरं। ५. घ. पुस्तके विशेष:- नगरे वाय ग्रामे वा अर्कक्षीरं चारनाल पूर्ववज्जुहुयात् क्रमात् । भगदरबगो भूत्वा षण्मासान् नियते रिपुः ।। ६. घ. फोटकवहा रोगेन । ७ घ. रिपुर्यो० । ८. अता परमश. ख. घ. पुस्तके विशेष 'म्रियते नात्र सन्देहः शिवस्य वचनं यथा । क. स.पावनालासमेव १०. प. पूर्ववत्पुष । ११. ख. ग. छिन्नसंशय.। ०शत्र मारणम् । १२. घ. मिश्रितं । १३. घ. सुत। १४. घ. म्रियते। १६. घ. शिवाम् । । - घ. १५. घ. च्छत्रु ।
५० ] सांस्यायनतन्त्र स्कन्द उपाच- शल्य नमस्ते योगिससेव्य नमः कारुणिकोत्तम । प्रयोगं चोपसंहारं वद मे सर्वमङ्गल ।।२।। ईश्वर उपाच- प्रेताङ्गारमषी कृत्वा सितवस्त्रेण बुद्धिमान् । ५ तदन्तरे भस्म वैरिनाम' च सलिखेत् ।।३।। 'एकार्णा बगलां देवी' ' वेष्टयेत् सम्यगादरात् । 'शताक्षरी च सवेष्टय ईशानादिषु' वेष्टयेत् ।।४।। तद्वस्त्रं गुलिकीकृत्य' वेष्टयेत् प्रेतरज्जुना। भौमवारे समानीय स्थापयेद् वृक्षकोटरे ||५|| वृक्षमूल जपेन्मन्त्रममुताध्यानपूर्वकम् । पुत्रदारादिसंयुक्तः पक्षाच्छत्रुर्मू तो भवेत् ।।६।। वगलाबीजमध्यमम् । कोटरे स्थापयेत् पुत्र विभीतकतरोस्तथा ॥७॥ जिह्वास्तम्भं भवेच्छत्रोः पक्षमात्रेण पुत्रक । बृहस्पतिसमो वापि वाचस्पतिसमोऽपि वा ।। तालमध्ये लिखेनाम वगलाबीजमध्यमम् । प्राणप्रतिष्ठां कृत्वाऽथ निर्दहेद् १५ दीपवह्निना ॥६॥ जपत्तत्र सहस्र कं शताक्षरमनुं तथा । जिह्वांस्तंभं भवेच्छीघ्रं शेषभाषापतिः स्वयम् ॥१०॥ प्रेतभाण्डे लिखेनाम प्रेताङ्गारेण'८ साधकः । प्राणस्थापनकं कृत्वा रवी रात्री सुबुद्धिमान् ॥११॥ प्रेताग्नी प्रेतकाष्ठे तु निईहेत् प्रेतकामने । नग्नः श्मशानमध्ये तु जपेद् दक्षिणदिड मुखः ।।१२।। भूर्जपत्रे'' लिखेन्नाम' - १. घ. क्रौञ्चभेदन । २. घ. महा। ३. ख. ०मयो । घ. मशि। ४. घ. प्रत- यस्त्र च। ५.ख. ग.प. शल्पं । ६. घ. अरि० । ७. घ. एकाक्षरी च वगला । ८. घ. मत्रशताक्षरीभिश्च ईशान्ये दिक्ष । 8. क. घ. तद्वस्त्र । १०. घ. गुटिकीकृत्य । ११. ग घ भूर्यपत्रे। १२. घ. रिपु म । १३. ख. ग घ. ०मध्यगम्। १४. घ.. तु। १५. ग. निर्देही। १६. घ. शताक्षरिमनु। १७. ०च्छत्रोः। १८, प्रतांमारणे १६.५ षु।
एकोनविंशः पटलः [ ५१ 1 सहस्र ध्यानपूर्व तु प्रातर्यामे समासत:' । एवं कृत्वा तु सप्ताहं ज्वरस्थो जायते भुवि ।।१३।। मासान्मृत्युवशो भूत्वा विनश्यति न संशयः । श्रीसूक्तमार्जनेनैव तन्मन्त्रेणाभिमन्त्रितम् ।।१४।। शतमप्टोत्तरं चैव सहस्र वा कुमारक । मंत्रितोदकपानेन पुण्यं सुखमवाप्नुयात् ।।१५।। चिताभस्म चिताङ्गार चितान्न' च कुमारक । मोहिनीपत्रजद्रावैर्मईयेत् सूक्ष्मतोऽनघ ॥१६॥ समं समं रिपूच्छिष्ट मईयेत् कल्पयेत् पुन. । 'चतुरङ्ग लां पुत्तली' कुर्यात सर्वाङ्गसयुताम् ॥ ७॥ हृदि तन्नाम चालिख्य ललाटे वगलां लिखेत् सर्वाङ्गे चाग्निवीजं च लिखेद् विन्दु च निईहेत् ।।१८।। प्रेतवह्नी प्रेतकाष्ठे प्रेतमांसं सुपुत्रक । जपेत्तत्रायुतं पुत्र रिपुर्गच्छेद्यमालये ॥१९॥ स्नुह्या' क्षीरेण सयुक्त 'मईयेत् श्वेतसर्षपै.'' चनुरङ्ग लपुत्तल्या लिखेत् पूर्ववदाचरेत् ।।२०।। 'स्थापयेच्चुह्नयघोभागे"२ यमघटकयोगतः । तत्रोपरि दिवारात्री अग्नि सस्थाप्य बुद्धिमान् ॥२१॥ वगलाबीजमध्यस्थं साध्यनाम च संलिखेत् । वेष्टयेद्वगलामन्त्रं ईशानादिशताक्षरम् ४ ।।२२।। प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा तु सहारक्रमतोऽर्चयेत् । शताक्षर्यकक्षीरस्तु स्नुहीक्षीरेण लेपयेत् ।।२३।।'५ १. घ. समापयेत् । २ घ. नु। ३. क.ख.ग. ०वशे ! ४ घ. वाथ । ५. घ. चितिमस्म । ६. घ. प्रताप्न। ७ घ. चतुर पुत्तली चव । ८. घ. च पुत्रका ० यमालयम् । १०. घ स्नुही। ११. घ. श्वेतसर्पप मईयेत् । १२. घ. ०चुल्ल्य० । १३. ख घ पुस्तकस्थोऽयमशो विशेष अयुत च दिवारात्री एकाक्षरमनु जपेत् मसूरिकाज्वराच्छत्रुः पक्षान्मरणमाप्नुयात् ।। अर्कपत्र' लिखेनाम अकक्षीरेण वुद्धिमान् । १४. घ. ईशान्यादि० । १५ ख. ग. घ पुस्तकेपु निम्नांशो विशेष:- संतपेद्दीपशिखया पुत्तली तां विशेषतः। मष्टोत्तरशतं कृत्वा शताक्षर्यादि कल्पयेत् ॥ 13 8 ख.ग.घ. ।
५२ ] साक्ष्यायनतन्ये ५ । एवं कृते सप्तरात्रं स शत्रुश्च मृतो भवेत् । मसूरिकाजरासक्तः पक्षाद् गच्छेद् यमालयम् ।।२४।। मन्त्रयेनिम्बपत्रेण एकमेकं क्रम क्रमम् । चन्द्रप्रसादमन्त्रेण शीतलाविद्यया तथा ॥२५॥ ॥ सपर्णा क्षालयेत् क्षीरैः सदाहः शान्तिमाप्नुयात् ।' तिक्तकोशातकीजातिः तापिच्छी सादरं तथा ॥२६॥ धत्तूरकं च तन्मूनि 'कारवेल्या फलाकृतिम्'५ 'षट्मनःशिलाबीजैश्च'' कुर्यात् पादद्वयं तथा ।।२७।। बदरीमूलतो गत्वा प्राणस्थापनक चरेत् । मन्त्रमुच्चारयेत्पुत्र तदन्तः शत्रुमुच्चरेत् ॥२८॥ श्रोत्रालीगण्डभ्रू मध्ये जिह्वानासास्यशेफसो । 'दक्षिणाभिमुखो भूत्वा' वगलासम्पुटद्वयम्" ।।२।। ब्रह्मस्थाने तालुदेशे कण्टकानर्कसंख्यया । 'दक्षिणाभिमुखो भूत्वा'' रोपयेन्नग्नतस्तथा ॥३०॥ पञ्च पञ्च करे रोप्य पार्वे कुक्षौ च पृष्ठके । कण्टकान् सप्तसंख्याकान् 'मन्त्रयेत् पूर्ववत् क्रमात् ॥३१॥ रोपयेत् पादयुरमे तु प्रत्येक १४ द्वादशं तथा । 'मन्त्रपूर्वं च सरोप्य'५ वदरीकण्टकांस्तथा ॥३२॥ पुत्तली प्रेतवस्त्रेण बद्ध वा प्रादेशगर्भके ६ श्मशानाग्नौ' क्षिपेद्१८ रात्री बलि दद्याच्च कुक्कुटम् ॥३३।। १ अतः परमयमंशोऽवलोक्यते घ. पुस्तके- "एकाक्षरीविद्यया च शताक्षर्या च विद्यया" २ सुपणान्। ३. घ. पुस्तस्के निम्नांशो दृश्यते मंत्रित जुहुयान्मंत्री क्षीरे वापि तथैव च । सप्ताहाच्छान्तिमाप्नोति तमः सूर्योदय तथा ॥ ४. ध जाती। ५. ख. फारवेल्य० । घ. कारवल्या० । ६. ख. ग. षशिला निंबबीजैश्च । घ. षदछिता निम्बपत्रश्च । ७. घ. पुस्तके विशेषः पाठः--- कटकान्तो (न्ता)पयेदकनेत्राद्यगेषु पुत्रक । ८. घ ०शेफसोः । ६. क. ग. घ. पुस्तकेषु नास्ति । १०. घ. पुस्तके नास्ति । ११. घ. दक्षिणाभिमुखं स्थित्वा । १२. घ, नग्नतो रवी। १३. घ. रोपयेन्मन्त्रपूर्वकम् । १४. घ. द्वादश । १५. ध. मंत्रपूर्वान् समारोप्यं । १६. घ. गर्तके। १७. ष, श्मशाने । १८. घ. निक्षिपेत् । १६. घ. कुक्कुटम् ।
एकोनविंशः पटलः 1 ५६ अश्मर्यद' रिपोरङ्गे नाडीशूलं भवेद् ध्रुवम् । तेनैव दुःखितः शत्रु: पक्षाद् गच्छेद् यमालयम् ॥३४॥ वक्ष्येऽहं चोपसंहारं जीवस्थोऽपि रिपुं (पुर) यथा। रवी रात्री वलिं दत्वा चानीत्वा साधकोत्तमः ॥३५॥ उत्पाट्य कण्टकान्यादो' क्षीरेण क्षालयेत् सुत । तच्छलाका" च संक्षाल्य निःक्षिपेत् कूपमध्यगे ॥३६॥ नि.क्षिपेन् मन्त्रपूर्व च एकक चोत्तरामुखः । शल्वकेनैव' मन्त्रेण मन्त्रयेत् कलशोदकम् ॥३७|| सहस्रवारं विधिवन्' मत्रेण'२ वारिभिः क्रमात् । १३ पीडित तेन मायेच्छाम्भवेन" तु ॥३८॥ स्थापयेत् तेन मत्रेण मन्त्रसिद्धिस्तु पुत्रक । ताम्रपा नदीतोये नदीवेगानवेष्टित..८ ॥३६॥ 'तस्मिश्च मन्त्रयेत् साध्य मन्त्रणव शतं तथा । त्रिकालं प्राशयेत्तोयं मध्याह्ने मार्जन तथा ॥४०॥ त्रिदिनं चाथवा पञ्च ऋषिसंख्योदिनेषु च'. २' एवं कृते पीडितस्य३ 'पीडां सूर्योदये यथा' २३ ॥४१॥ 'संहरेच्छान्तिमाप्नोति तमः सूर्योदये यथा १४ ॥ न ज्ञात्वा चोपसंहार यः करोति नराधमः ।।४२॥ स जीवन्नेव चाण्डालो मतः श्वानो भविष्यति । प्रयोग चोपसंहारमभ्यसेच्च कुमारक ॥४३॥ इति पवियागमे सांख्यायनतन्त्र एकोनविंश. ६ पटलः ।।६ -- . घ. १. ख. अश्मर्षदं। घ. अर्चयेत्त । २. घ. रिपु। ३. घ. यदा । ४. घ. दद्या। ५. स. नीत्वा सा। घ. दोनीत। ६. घ. कण्टकान् सर्वा । ७-८. घ. लालटं तु । ४. चोत्तरं मुखम् । १०. ख. ग. शाभवेनैव । घ. शालुवेशेन। ११. विधिना । १२. घ. मत्रित। १३. स.घ. प्रयोग। १४. घ. 'मुदितं । १५. प. शालुवेन । घ. तर्पयेत्। १७. घ. तोय। १८. ध नदीवेगान्निवेशितम् । १९. प. मंत्रयेत् शल्य. मंत्रेण शतवारं सहस्रकम् । २०. घ. वा. २१. घ. पुस्तके विशेषः पाठः- देवता शान्तिमाप्नोति तमः सूर्योदये यथा २२. 'घ. तस्य पीडा । २३. प. शान्तिमाप्नोति निश्चितम् । २४. घ. पुस्तके नास्ति ! २६. घ. भिषायते। २६. घ. एकोनविंशतिमं । - १४ 1 सांस्यायनतन्ने ។ ॥ प्रथः विशः पटलः ।। सर्वावयवशोभाया' समपीनपयोधराम् । हृदि संभावये देवी वगलां सर्वसिद्धिदाम् ॥१॥ स्कन्द उवाच- नमस्ते पार्वतीनाथ नमः पन्नगभूषण । परविद्याभेदनं च वगलायाश्च मे वद ॥२॥ ईश्वर उवाच मन्त्रोद्धारं प्रवक्ष्यामि मन्त्रसभेदनाविधिम् । प्रयोगं चोपसंहारं शृणु सर्वं कुमारक ||३।। उद्धरेत्तारमादौ तु स्तब्धमायां ततः परम् । श्रीर्माया शक्तिवाराह 'वाग्भवं मन्मथं तथा ॥४॥ विलिखेत्तायवीज' च वगलामुखी समुच्चरेत् । परप्रयोगमुच्चार्य ग्रसयुग्मं 'तत: परम्' ।।५।। पूर्ववन्नवबीज च ब्रह्मास्त्रपदमुच्चरेत् । रूपिणीपदमुच्चार्य परविद्यापद वदेत् ॥६॥ ग्रसनीति'' पद चोक्त्वा भक्षद्वितयमुच्चरेत् । पूर्ववन्न वबीज च परप्रज्ञापदं वदेत् ।।७।। हारिणीति पदं चोक्त्वा 'प्रज्ञाख्यातियुगं वदेत्' पूर्ववन्नवबीजं च स्तम्भनास्त्रपदं वदेत् ।।८।। रूपिणीपदमुच्चार्य बुद्धि 'वाचायुग वदेत् । पञ्चेन्द्रियपदं चोक्त्वा ज्ञानं भक्षद्वय वदेत् ।।६।। पूर्ववन्नवबीज च बगलामुखि उच्चरेत् । हुँ फट् स्वाहा'समायुक्त वगलामत्रमुत्तमम्'१४ ॥१०॥ शतोत्तरं मत्रबीजमष्टाविंशतिरेव च ।१५ ब्रह्मा ऋषिश्च छन्दोऽस्य गायत्री समुदाहृता ॥११॥ १. घ ०शोभाख्या। २. क सभावयवे। ३ घ क्रौञ्चभेदन । ४. घ. वाराह वाग्भवं स्मर। सलिखे० ६ ०मुखि । घ. वोच्चरेत् । ततोच्चरेत् । ६. घ. ० परं। १०. घ गसतीति । ११. घ. भक्षयद्वय० । १२. घ. प्रज्ञां भ्रंशययुग्मकम् । १३. घ. विनाशययुग्मकम् । १४. घ. श्वाक्षिचद्रवर्णाढयं मंत्रमुत्तमम् । १५ पदद्वयमिद नास्ति घ. पुस्तके । । १३ । ५. घ. .
विशः पटलः [ ५५ परविद्याभक्षणी च वगला देवता स्वयम् । अत्र प्रयोग वक्ष्यामि मत्रस्यास्य कुमारक ॥१२॥ पाशाङ्क शेनान्तरित: शक्तिबीजेन' विन्यसेत् । 'तत्तद्वागीश्वरोवीजस्तद्वच्छीबीजतो न्यसेत्२ ।।१३।। लघुषोढां च विन्यस्य क्रमादेव कुलेश्वरी। ध्यानं यत्नात् प्रवक्ष्यामि क्रौञ्चभेदनकोविद ।।१४।। सर्वमन्त्रमयी देवी सर्वाकर्षणकारिणीम् । सर्वविद्याभक्षणी' च भजेऽहं विधिपूर्वकम् ।।१।। एवं ध्यात्वा जपेन्मंत्र लक्षमेक क्षपाशनः । तर्पयेदासवेनैव तद्दशांशं कुमारक ॥१६॥ छागमांसेन जुहुयान् मध्वाज्येन समन्वितम् । खण्डमामलकप्रत्यमयुतं च कुमारक ॥१७॥ योगिनी वीरपूजां च ह्याचरेच्च समादरात् । मंत्रसिद्धिर्भवेत्तत्र नात्र कार्या विचारणा ॥१८॥ परप्रयोगकालेषु' मन्त्रमेतं कुमारक । 'सहस्रत्रितयं जप्त्वा स शत्रुरवशिष्यते ।।१९।। शत्रवश्च पुरश्चर्या यत्र कुर्वन्ति पुत्रक । तत्रायुतं जप कुर्यात् तत्र विघ्नं प्रजायते ॥२०॥ यत्र कुत्रापि रिपवस्तपः कुर्वन्ति निश्चलात् । तत्रायुतं जपेन्मत्रं ग्रसते" परविद्यया" ॥२१॥ अयुतं तस्य मन्त्रन्तु'' अभिमन्त्र्य' फलं भवेत् । द्रव्याभिमानिनो ये च ये च विद्याभिमानिनः ॥२२॥ रूपाभिमानिनो ये च 'ये च१४ यौवनमानिनः । यत्र कुत्रापि तिष्ठति मंत्रमेतं कुमारक ॥२३॥ १. घ. शक्तिबीजं च । २.घ. ततो नागीश्वरी तद्वच्छीवीज च ततो न्यसेत् । १. ख. घ. भक्षिरणी। ४. घ. मावाज्येन । ५. घ. ०प्रस्थमयुतं । ६, घ. तु। ७. घ. मेन। ८. घ सहस्रत्रितयान् पुत्र । ६. क. ग. निपुत्रक। १०. घ. ग्रस्ते। ११. प. रिपुविद्यया। १२. प. मंत्रस्य । १३. घ. अग्तिमत्य। १४. घ. नास्ति।
५६ ] सांस्यायनतन्त्र परविद्याभक्षणाख्यं' मंत्रं चैवायुतं जपेत् । श्वेतकेशान्' समायाति दन्तशून्यो भवेद्रिपुः ॥२४॥ सद्यो यौवनहीनं तु 'तमः सूर्योदयं यथा । रूपवान् व्रणयोगी च भवत्येव न संशयः ॥२५॥ जात्याभिमानिनो ये च 'निन्दको भवति ध्रुवम् । 'तपोऽभिमानिनो ये च" अङ्गहीनो विजायते ॥२६॥ वैदिकं च परित्यज्य विपरीतकृत भवेत् । विद्याभिमानिनः सर्वेऽप्ययुत जपमाचरेत् ॥२७॥ भवेद्विद्याविहीनोऽपि मुष्करो' भवति ध्रुवम् । देहाभिमानी पुरुषो नष्टदेहो भवेद् ध्रुवम् ॥२८॥3 दौर्भाग्येन समायुक्तः १४ सर्व सम्मोहन भवेत् । एतन्मंत्रस्य माहात्म्य न जानन्ति ऋषीश्वराः ॥२६॥ 'सर्वे स्व'५५ देहजं मह्यं स्वप्रभावात् प्रकाशिनी। योगाभ्यासो८ योगसिद्धो'६ तपस्वी सत्यवादिनः ॥३०॥ मत्रेण सिद्धोऽसिद्धोऽपि यत्र प्रत्येति १ पुत्रक । परविद्याभेदनं च मंत्रोपासनतत्परः ॥३१॥ यत्र गत्वा समासीन एतन्मन्त्रायुतं जपेत् । 'योगसिद्धो मत्रसिद्धस्तपस्वी शतजीविनः (तः) २२ ॥३२॥ महाक्रान्तो 3 भवेन्नो चेन्निन्दकोऽपि भवेद् ध्रुवम् । ये ये२४ तन्मन्त्रराज च नित्यमष्टोत्तरं जपेत् ॥३३॥ 'एतद्राज्यं स मासेन' १२५ अम्बासेवापरो२६ भवेत् । न तत्समधिको भूयान्नैव द्वेषकरो भवेत् ।।३४|| १. घ. ०भक्षरणार्थ । २. घ. श्वेतकेशाः। ३. घ. ०हीनः। ५. घ भवत्येव न संशयः। ६. घ. पुस्तके नास्ति । ७. घ. नास्ति । ८. घ.पि जायते । ९. घ. विपरीतक्रमो। १०. घ. सर्व प्ययता । ११. घ. जपमासुत । १२. ख. घ. सूकरो। १३. ख. घ. पुस्तकस्थः पाठोऽय विशेष. द्रव्याभिमानी पुरुषो नष्टद्रव्यो भवेद् ध्रुवम् । १४. घ. समायुक्त। १५. ख. सर्वस्व । १६. घ. मोहं। १७. घ. स्वप्रकाशात् । २९. घ. योगाभ्यासे। १६. घ. योगसिद्धिः । २०. घ. यत्रण। २१. घ तिष्ठति। २२. घ. योगसिद्धस्तपस्वी च मंसिदा समीपतः। २३ ख. ग मदाक्रान्तो। घ. पापा- क्रान्तो। २४. घ. ए. २५. घ. सोज्यं च जना: सर्वे। २६. घ. वश्याः सेवा। २७. घ ०समाधिको। ४. घ. च ।
एकविंशः पटसः . [ ५७, नव निन्दाकरो भूयाद् 'यदीच्छेद्ये च (च्चेत्स्व)जीवितम् ॥ ॥ इति षविद्यागमै सास्यायनतन्त्र विशतिः२ पटलः ॥२॥ वाड ॥ अथकविंशः पटलः ।। परप्रज्ञोपसंहारी परगर्वप्रभेदिनीम्।' परविद्याकर्षण' च प्रयोगं वद शङ्कर ॥१॥ ईश्वर उवाच- विश्वमेतद्भक्तिमय' 'सा भक्तिर्वगलामया८ । 'एतच्च भासमानां तां वगलां च कुमारक ॥२॥ इमय चैव वैचित्र्य त्रिषु लोकेषु वर्तते । तद्गर्वहरणार्थं च विद्यामेतां कुमारक ।।३।। मनसा 'तं जपन्मन्त्रं मुखं तस्यावलोकयेत् । भयं च विस्मृतिमन्तिस्तत्क्षणाद् भवति ध्रुवम् ॥४॥ पानपात्रं वैरिजिह्वां गदां शूलेन सयुताम् । पीतवर्णी मदाघूर्णा चिन्तयेदाननं रिपोः ॥५॥ स तु भाषापतिः साक्षाद् वृहस्पतिरिव स्वयम् । 'स तु जात्यंतरो,' भूत्वा निन्दितो भवति ध्रुवम् ॥६॥ अस्त्रशस्त्रमयं मन्त्रं यो जानाति कुमारक। तत्र गत्वा महामन्त्र जपेद्देवीमनन्यधी:१३ त्रिसहस्र ध्यानयुक्तं तस्य विद्या कुमारक । विस्मृतिश्च भवेच्छीघ्र नात्र कार्या विचारणा ॥1 अत्यन्तैश्वर्यसंयुक्तो द्विषता'४ वर्तते ५ यदि । तस्य गेहे६ भौमवारे निशि नग्नेन बुद्धिमान् ।। १. घ. यदीच्छेज्जीवनं भुवि । २. घ. परविद्याप्रयोगन्नाम विंशति.। ३. घ. प्रज्ञापहरणी। ४. घ. ०प्रभेदनी। ५. स. ग. घ. पुस्तकेषु निम्नांशो विशेष:- परविद्यामक्षिणी तां वगला हृदि भावयेत् । स्कद (घ. क्रोञ्चभेदन) उवाच ।। नमस्ते योगिसंसेव्य योगिराज नमो नमः । ६. घ. ०कपणीं च । ७. घ. ०च्छक्तिमयं। ८. घ. तच्छक्तिवंगलाया। एतत्प्रभासमाना। घ. एका भासमानां। १० घ. च जपेन्मत्र । ११. घ. सद्यो जाउयतमो। १२. घ. जपे वि० । १३. घ. संयुक्त। १४. ख. विषितों। घ. द्विषतो। १५. घ. वर्तये। १६. घ. गेहं । ॥७॥ -- ५८ ] साल्यापनतन्त्र - प्रदक्षिणत्रयं कृत्वा दिशि कोवेरदिड मुखः । सहस्रं सप्तरात्री' च नष्टद्रव्यो भवेद् ध्रुवम् ॥१०॥ ग्राम वा नगरं वाथ नित्य कृत्वा प्रदक्षिणम् । जपेदयुतसंख्या तु* तद्ग्राम तु कुमारक ॥१।।. सस्यादिभिविनश्यन्ति द्रव्य चौरेण नश्यति । पशुभिम्रियते पुत्र मासाद्दौर्भाग्यमाप्नुयात् ।।१२।। फलित पुष्पित चैव शत्रोराराममाश्रितः । रवी रात्री निशाकाले नग्नो भूत्वा सुनिश्चयः ॥१३॥ प्रदक्षिणत्रयं कृत्वाप्ययुत जपमाचरेत् । वृक्षो निर्मूलमाप्नोति शिवस्य वचन यथा ॥१४॥ एकाक्षरी च बगलां साध्याख्य' मध्यदेशतः । चिन्तयेज्जाप्यकालेषु सहस्र जपमाप्नुयात् ।।१५।। लक्षं जप्त्वा मनोरेव मृत्तिकां च कुमारक । प्रवाहोपरि निःक्षिप्य नद्या उपरि बुद्धिमान् ॥१६॥ स्तम्भयेत्तं नदीवेगं महदाश्चर्यकारणम् । महानद्यामेवमेव कुर्यात्त'° गुरुलाघवान्' ।।१७।। व्यालव्याघ्रादयश्चैव ये ये व रमृगादयः । त्रिसप्तमन्त्रित भस्म मूर्द्ध नि क्षेपणमात्रतः ॥१८॥ वाक्पाणिवदनाक्ष्णां च तत्क्षणात् स्तम्भनं भवेत् । मन्त्रयेत् संस्कृत भस्म मन्त्रेणानेन पुत्रक ।।१९।। अष्टोत्तरशत सम्यक् ध्यानमात्रेण'3 बुद्धिमान् । सर्वाङ्गोभूलन कुर्यात् तद्भस्मना" कुमारक ।।२०।। वनेचरास्तामसजन्तवश्च चौराग्निदुष्कर्मकृदल्पहानपि । प्रेताश्च भूताश्च "पिशाचभूचरा: "सिंहाश्च सस्तंभयति ध्रुव च ॥२१॥ १. घ. सप्तरात्र । ग सदा रात्री। २. ख. घ. क । ३. घ. च। ४. घ, धनें । ५. घ. ०चापि । शु निश्चितम् । ७. ख ससाध्व । घ. साध्यास्व । ० काल तु। ६. ख. जपमाचरेत् । १०. घ. कुर्यातद् । ११. घ. ० लाघवात् । १२. घ. त्रि। १३ घ ध्यानपूर्व सु। १४. ख. तद्भस्मेन १५. घ. चौरादि- दुष्कर्मकरा नराश्च । १६ घ प्रेतांश्च । १७. भूतानपि । १८. भूचराश्च । क. स. ग च ध्रुवम् । ६ घ. ८. घ. -- १६.
द्वाविशः पटलः [-५६ 1 एतन्मन्त्रवरं पुत्र मनसा जपमाचरेत् । वादार्थ चाथ वाणिज्यं सभायां राजसन्निधौ ॥२२॥ गत्वा तु रिपवः सर्वे जिह्वास्तंभनमाप्नुयात् । 'शत्रुमुद्दिश्य मन्त्रं च अयुतं प्रजपेत्ततः ॥२३॥ पक्षमात्राद् भवेच्छरोजिह्वास्तभनमाप्नुयात् । तेनैव म्रियते शत्रुर्मण्डलार्धन मानवः ॥२४॥ दक्षिणामूर्तिमन्त्रेण मन्त्रितं जलमादरात् । त्रिकालं चैव पीत्वा तु मण्डलाच्छान्तिमाप्नुयात् ।।२।। इति षविद्यागमे सांस्यायनतन्ने एकविंशति.३ पटलः ॥२१॥ - ॥अथ द्वाविंशः पटलः ॥ T - - - नमस्ते देवदेवेशी जिह्वास्तम्भनकारिणीम् । पानपात्रगदायुक्तां भजेऽह वगलामुखीम् ॥१॥ स्कन्द उवाच-- त्रिपुरारे त्रिलोकज्ञस्त्रिकालात्म स्त्रियंवक । वगलास्त्रं वदास्माकं 'मयि वात्सल्यगौरवात् ॥२॥ शिव उवाच- वगलास्त्रमिदं पुत्र सुरासुरसुपूजितम् । अगस्त्यः प्रोक्तवान् पूर्व राम दाशरथि प्रति ॥३॥ तेनोक्तमाञ्जनेयाय तेनोक्त चार्जुन प्रति । तद्विद्यां च प्रवक्ष्यामि वगलाहृदय' मनुम् ॥४॥ प्रथम वगलावीजं वाराह तदनन्तरम् 'मम शत्रू स्ततः शक्ति'' वगलावीजमुद्धरेत् ।।५।। वगलामुखिपद चोक्त्वा 'वांच मुख'४ पदं वदेत् । च उच्चार्य खाफीयुग्म तत. परम् ॥६॥ १. घ.-'प्राप्नुयाच्छत्रु मुद्दिश्य तन्मंत्र प्रजपेत्ततः' । २. क. ०मडलान । ३. घ. परविद्याकर्षण नाम एकविंशतिः । म्बिकाम् । ५. घ. क्रौंचभेदन। ६. घ. ०कालज्ञ । ७. घ. मानवात्सल्यगौरवान् । ८. घ ईश्वर । ६. घ. मंत्र। १०. घ. वगलास्त्रमिद । ११. घ. मनु। १२. घ. च ततः परम् । १३. घ. ततश्च शक्तिवाराह । १४. घ. मम शत्रु । प्रहयुग्मं । १६. घ. खाहियुग्म । । ८ १ ग्रसद्वय ५ ४. घ बगला. १५.ख.
६०] सांस्यायनता , भक्षयुग्मं ततोच्चार्य शोणितं पिब-युग्मकम् । वगलामुखि' उच्चार्य* बगलाबीजमुच्चरेत् ॥७॥ 'शक्ति वाराहमुच्चार्य वर्मास्त्रं च समुद्धरेत्। 'त्रिचत्वारिंशद्वर्णयुक्त" वगलाया: सुपावनम् ।।८।। दुर्वासा ऋषिरेवात्र छन्दोऽनुष्टुप् भवेच्छुभम् । देवता बगलानाम्नी • जगद्व्यापकरूपिणी ।।६।। ग्लौं' बीज ही च शक्तिश्च फटकारं कीलकं तथा । 'मंत्रराजेन देव्याश्च'१२ न्यासविद्यां समाचरेत् ॥१०॥ ध्यानभेदं प्रवक्ष्यामि मन्त्रभेदेन पुत्रक । चतुर्भुजां त्रिनयनां पीनोन्नतपयोधराम् ।।११।। जिह्वा खङ्ग पानपात्र गदा धारयन्ती पराम् पीताम्बरधरां देवी पीतपुष्पैरलकृताम् ॥१२।। बिम्बोष्ठी चारुवदनां मदापूणितलोचनाम् । सर्वविद्याकर्षिणी च सर्वप्रज्ञापहारिणीम् ।।१३।। भजेम्ह चास्त्रवगला सर्वाकर्षणकर्मसु । एव ध्यात्वा जपेन्मन्त्र बाणलदं कुमारक ||१४|| तर्पयेत्तद्दशांश च जपासंमिश्रवारिणा' ५। तद्दशांश हुनेत् पुत्र तालकं चाज्यसंयुतम् ॥१५॥ भगाकारे सुकुण्डेऽस्मिन् मुद्रया हस' बुद्धिमान् । वदरीफलमात्र च आहुतीश्च कुमारक ।।१६।। ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चात् सहस्र शतमेव च : योगिनी पूजयेत् पुत्र द्रव्यशुद्धिसमन्विताम् ।।१७।। मन्त्रसिद्धिर्भवेत् सद्यो देवता च प्रसीदति । शिवालये जपेन्मंत्रमयुतं च सुबुद्धिमान् ।।१८।। 1 - - स्या १. घ. बगलामुखी। २. घ. समुच्चार्य। ३. घ. तबीज च पुनर्वदेत् । ४. 'ततश्च शक्तिवाराह वाराह च समुच्चरेत्। ५. घ. त्रयश्चत्वारिंशदएं । ६. घ.वगला- ७. घ, दूर्वासो ८ प. ०रेवास्य। ६. घ. एव च। १०. घ. नास्त्रवगला ११. घ. ह्रौं। १२. मत्रराजवदेवात्र। १३. घ. ध्यानं यत्नात् । १४. घ. शिवाम् । १५ घ. हेतु संमिश्र० । १६. घ. चाल्पसंयुतम् । १७. घ. तु कुण्डे.. २९. ख. हसीमुद्रण। घ. हंसमुद्रण। १६. घ. सत्यं । -- द्वाविनः पटलः -- *- शत्रुक्षयं भवेत् सद्यो नान्यथा शिवभाषितम् । षट्सहस्र जपेन्मन्त्रं निशायां चण्डिकालये ॥१६॥ जिलास्तम्भनमाप्नोति वृहस्पतिसमोऽपि वा। 'जपित्वा च" सहस्र तु भैरवस्य च सन्निघो ।२०॥. बुद्धिभ्रंशो भवेत् सद्यो वाणोपतिसमोऽपि वा। वीरभद्रालये पुत्र अयुतं जपमाचरेत् ॥२१॥ सिद्धिदो जायते वत्स नान्यथा शिवभाषणम् ।' मातृकासन्निधौ मंत्री नपेद्- दशसहस्रकम् ॥२२॥ सद्यः स्तम्भनमाप्नोति वाल्मीकिसदृशोऽपि वा। ध्यानपूर्व जपेन्मन्त्री अयुतं च कुमारक ।।२३।। रूपयौवनवाञ्छत्रुाधिमान् भवति ध्रुवम् । त्रिसहस्र जपेन्मन्त्रं त्रिसहस्र दिने दिने ॥२४॥ मण्डलाच्छत्रुसम्मोहं कुवेरसदृशोऽपि च । ऐश्वर्य नाशमाप्नोति कुवेरसदृशोऽपि वा ॥२५॥ त्रिकालमयुतं जप्त्वा ध्यानपूर्व सुबुद्धिमान् । वगलाध्यानतो मन्त्रमयुतं जपमाचरेत् ।।२६।। सर्वाङ्ग' वायुना शत्रुः शीघ्र गच्छेद् यमालयम्'। पार्वतीसन्निधौ मंत्री जपेदयुतमादिशन् ॥२७॥ रात्री पूजासमायुक्तो नरनो दक्षिणदिड मुखः । अन्धो भवति तच्छत्रुरवश्यं 3 क्रौञ्चभेदनः ।।२।। विघ्नराज समभ्यर्च्य रवी ४ तु जपमाचरेत् । त्रिसहस्र जपेन्मन्त्रं कुक्षिरोगी भवेद्रिपुः ॥२६॥ मण्डलानाशमायाति नात्र कार्या विचारणा। प्रयोगान्ते च संस्कार पूजाकाले समाचरेत् ।।३। इति श्रोषविधागमे सांख्यायनतंत्र द्वाविंशतिः पटल ।। १. ख जपित्वाष्ट घ. जपेत्पच । २. घे निर्वीयों जायते शत्रु न्यथा शिव. भाषितम् । ३ घ. अण्टसहस्रकम् । ४ घे. 'ध्यानात् पूर्व । ४ घ. 'ध्यानात् पूर्व । ५. प. जपेन्मंत्र। घ. ाषितो ७. स्व. त्रिसध्य । घ त्रिसंध्य च । ८. ख. जपते मंत्र . ९. क. ग. शत्र समूहः। १०. स. घ. सर्वाङ्ग। ११. घः यमालये । १२. प. ज्दयुतसख्यया । १३. घ तच्छत्रोमण्डला त १४. घ. रात्रो। 1 ६. , ६२ ] सांख्यायनतन्ने ॥ अथ त्रयोविंशः पटलः ।। स्त्रर्णसिंहासनासीनां सुन्दराङ्गी शुचिस्मिताम् । बिम्बोष्ठी चारुनयनां ध्यायेत् पीनपयोधराम् ॥१॥ स्कन्द उवाच- . . - तु नमस्ताण्डवरुद्राय तापत्रयहराय च। वगलास्त्रमहामन्त्रः प्रयोगान् वद शङ्कर ॥२॥ शिव उवाच- त्रिकालं तु समासीनो ध्यानपूर्व तु साधकः । त्रिसप्त मन्त्रयित्वा तु जप पश्चात समाचरेत् ।।३।। नित्यं च त्रिसहस्र तु षण्मासं विजितेन्द्रियः । वाचासिद्धिर्भवेत्तस्य शापानुग्रहकारका ॥४॥ अश्वत्थमूले प्रजपेदयुतं ध्यानपूर्वकम् । भक्षणाद् व्याधिनाशं च भवेदेवं न संशयः ।।५।। विभीतकतरोद्ले अयुत जपमाचरेत् । जिह्वास्तम्भनमाप्नोति साक्षाद्वागीश्वरोऽपिवा ।।६।। कपित्थवृक्षमूले प्रजपेदयुत तथा। श्रोत्रस्तम्भनमाप्नोति सद्यो बधिरता ब्रजेत् ॥७॥ पिचुमदतरोमू लेऽप्ययुतं जपमाचरेत् । प्राणस्तम्भनमाप्नोति रोगी पीनसवान् भवेत् ।।८।। कदलीमूलमाश्रित्य अयुत जपमाचरेत् । पादस्तम्भो भवेत् सद्यो वातरोगी भवेद् रिपुः ||६|| करञ्जमूलमाश्रित्याप्ययुत जपमाचरेत् । स्तम्भयेज्जठराग्निस्तु अन्नद्वेषो भवेद् ध्रुवम् ॥१०॥ विषतिन्दुकमूल च समाश्रित्य मनु जपेत् । अयुताच्च भवेत् पुत्र गात्रस्तम्भनमाप्नुयात् ॥११॥ नद्यां समुद्रगामिन्यां नाभिदघ्नजले स्थितः ।, -तर्ययेद् वगलास्त्रेण ग्रस्तं कृत्वारिनाम'२. च ।।१२।। १. घ. कोन्चभेदन। २. घ. ईश्वर। ३. घ. सु। ४. घ. त्रिसहस्र । क.ख. ग. ०कारकम् । ६. घ. कपिस्थतरु०॥ है. घ. नामिमात्रे जले। १०. घ. नरः। ११. घ. 'तह रिनाम । * - ७. घ. ध्रागस्त० । प.घ. नरः।
प्रयोविशः पटलः [.६३ . 1 - । - N दिने दिने सहस्र के बगलाध्यानपूर्वकम् । गर्भन्नावं भवेत्तस्य भार्यावाः' शिवभाषितम् ।।१३।। वल्लीपलाशमूले तु जपेदयुतसंख्यया । मन्त्रमध्ये रिपोर्भायर्या ग्रस्तं कृत्वा कुमारक ॥१४॥ तर्पणं च दिवा कृत्वा रात्री रात्री जपेन्मनुम् । सापि वन्ध्या भवेत् सत्य नात्र कार्या विचारणा १|| श्मशाने प्रजपेन्मन्त्रं ग्रस्तं कृत्वा तु पूर्ववत् । सद्यस्तद्भार्यानाशं च भवेदेव न संशयः ।।१६।। शून्यागारे जपेदेवमयुत ध्यानपूर्वकम् । लक्ष्मी शयते नूनं स शत्रुरवशिष्यते ॥१७॥ जंबी रतरुमूले तु अयुतं जपमाचरेत् । 'भ्रमाकुलकुलं सर्व मण्डलानाशमाप्नुयात् ।।१८।। शतवार मन्त्रित च शर्करोदकमेव च । रिपूणां चैव दातव्यं जिह्वास्तम्भनमाप्नुयात् ॥१९॥ तं मन्त्रित चैव नारिकेलफलोदकैः । पाययेद्रात्रि-रिपुभिज्जिह्वास्तभनमाप्नुयात् ॥२०॥ नागवल्लीदलं चैव क्रमुकं चूर्णमेव च । सहस्र मन्त्रित पुत्र दातव्यं शत्रु(यू)णां निशि ॥२१॥ ताम्वूलचर्वणाच्छत्रुजिह्वास्तभनमाप्नुयात् । चन्दन चैव कस्तूरीधषितं मन्त्रयेत् सुत ।।२२।। पुनश्च मन्त्रयेत्ताम्रपात्रे गुणसहस्रकम् । तच्चन्दनलेपनेन रिपुर्धान्तो" भविष्यति ॥२३॥ दन्तधावनकाष्ठ च मन्त्रयेत् त्रिसहस्रकम् । तत्काष्ठेन रिपो,' पुत्र दन्तधावनमात्रतः ॥२४॥ - - । १. क ग. घ. नार्याया. । २. ध पुस्तफेऽय पाठो विशेष:- ततो (तः) पलाशमूले तु प्रजपेच्च परे दयम् । ३. ध रात्री तु प्र। ४. घ. जपेन्मत्र० । ५. घ. शीघ्र। ६. ७. प. पुस्तके नास्ति । ८. घ. प्राशयद्वारि। ६. घ. विलेपेन । १०..घ. परिनान्तो।। ११. घ. रिपुः । 1 ६४ ]. साक्ष्यायनतर ? २ । t - P जिह्वां वाणी च बुद्धि च 'मनः पादादिकं तथा । स्तम्भनं च भवेच्छीघ्रं शिवस्य वचनं यथा ॥२५॥ प्रेतवस्त्रं रवी ग्राह्यं चितिकाष्ठं च वेष्टयेत् । श्मशाने निखनेद् रात्री त्रिसहस्र जपेत्तदा ॥२६॥ शेषभाषापतिः साक्षाद् बृहस्पतिरपि स्वयम् । जिह्वास्तम्भनमाप्नोति सद्यो मूकत्वमाप्नुयात् ।।२७।। इति षड्पिद्यागमे सांस्यायनेतन्ये त्रयोविशतिः पटलः ॥२३॥ ॥ अथ चतुर्विशः पटलः ।। अम्बां पीताम्बराढयामरुणकुसुमगन्धानुलेपा त्रिनेत्रां, गम्भीरां कम्बुकण्ठी कठिनकुचयुगा चारुबिम्बाधरोष्ठीम् । शत्रोज्जिह्वासिपत्र शरधनुसहिता व्यक्तगर्वाधिरूढा', देवी सस्तम्भरूपा सुविरलरसनामम्बिकां' तां भजामि ||१|| स्कन्द६ उवाच नमस्ते वृषभारूढ नमः पन्नगकङ्कण लक्षण वद में देव वगलामन्त्रमालिका ५ ॥२॥ ईश्वर उवाच भृगुवारे च सगृह्य 'आरामस्थनिशां तथा'१३ 'ता शुष्का'१४ सप्तरात्र. तु 'कृत्वा मेतामनन्तरम्' ॥३॥ भूताविपरितं चैव कपिलागोमय तथा । पुनरेकान्तराद्ग्राह्य भाण्डमध्ये तु नि:क्षिपेत ॥४॥ सविष जलसंयुक्त कुन्मेिलनमेव च । हरिद्रां तत्र नि क्षिप्य पूजयेदाशु तत्क्रमात् ।।५।। चुह्लयोपरि च तद्भाण्डं रवी रात्री च निःक्षिपेत् । द्विगुणं जलसयुक्त १८ कुर्यान्मेलनमेव च ।।६।। १ घ. क्षुत्पिपासामल । २. घ. पुस्तकस्थोऽयं पाठो विशेशो दृश्यते- प्राणप्रतिष्ठा कृत्वा तु पूजा चैव तु कारयेत् । ३ घ. जपेन्मनुम् । ४. घं बगलास्त्र विवरणं नाम त्रयोविंशतिः । ५. घ. ०सिपत्रा। ६. घ. शुक्लगरवादिरूढा । ७. घ सुविरलवसना० । ८. घ. नमामि। क्रौञ्चभेदन। १०. भूषण। ११. जपमालिकाम् ॥ १.२. घ. सग्राह्य । १३. घ. प्रारामस्वासिशां निशि १४. ख. छायाशुष्को। घ.. छायाभुक । १५. घ. कृत्वा तु तदनन्तरम्। १६ ख. भूमावपतित । घ. भूमा(मौ) तु पतित । १७. ख. पुनरेका कराद् ग्राह्य। घ. पुनरेकातशाग्राह्य । १८. घ. जपसयुक्तं । -- 1 ... 8. घ. - चतुर्विशः पटलः । ६५ अश्वत्वरिन्धनरेव ज्वाला 'कृत्वा सुवुद्धिमान्" । तस्यां मृदु भवेत्तावत्पचनं सम्यगाचरेत् ॥७॥ गोमयस्थां हरिद्रा च क्षालयेद्वारिणा' ततः । छायाशुष्कं च कर्त्तव्यं हरिद्रामणिमादरात् [IEl तेन कुर्यान्मालिकां च अष्टोत्तरशतं तथा । पुण्यस्त्रीनिर्मितं सूर्य मंत्र: संच्छेदयेत् पुनः ॥६॥ तन्मालिकां रवी 'वारेऽप्यमृतेनैव" मार्जयेत् । अर्चयेन्मूलमन्त्रेण पोडशरुपचारकैः ॥१०॥ निवेदयेत् पायसं च शर्कराज्यसमन्वितम् । सहन प्रजपेदादो" पञ्चाशद्वर्णमादरात् ॥१शा 'एकाक्षरीमहामन्त्रर्वगलानाम्नि' पावनः । अयुतं प्रजपेत् पुत्रं मालिका सिद्धिमाप्नुयात् ।।१२।। एवं च मालिकां कुर्यान् मंत्रसिद्धिमपेक्षता' । हरिद्रावस्त्रमाच्छाद्य सिद्धयर्थ जपमाचरेत् ॥१३॥ हरिद्रामयपुष्पं च हरिद्रामयचन्दनम्। समर्पयेदलड कृत्य १५ जपं रात्री समाचरेत् ॥१४॥ वी भूत्वा जपेद्देवीमर्चयेद्विधिवद्यथा' प्रमादान् मालिका भूमौ पतिता चेत् कुमारक ॥१शा पुनः पूजा प्रकर्तव्या पूर्ववज्जपमाचरेत् । अथ वक्ष्ये प्रयोगांश्च मालिकालक्षण तथा ॥१६॥ पञ्चविंशतिभिर्मोक्ष. 'सगं त्रिशतिरेव च वशीकरणसमोहे कला'सख्या सुमालिका'२॥१७॥२१ । १ ६ . १. घ. कुर्यात् प्रयत्नतः। २. घ. यावन् । ३. घ. गोमवय । ४. घ. लक्षोयता० । ५. घ. पुनः। ६. ख. पण्यस्त्री। घ. स्त्रीनिमिते। ७. घ. सूत्र। एककं ग्रंथयेत् । ९. घ. रात्री मूलेनैव तु । १०. घ. च जपेच्चादौ । ११. घ. एकाक्षर महामंत्र वंगलायाश्च । १२. घ. ०मपेक्षिता। १३. घ. हरिद्रावणंपुष्पं। १४. घ हरिद्रावणं चन्दनम् । १५. घ. समर्प्य पूजन कृत्वा । १६. घ. ०था। १७. घ. मोक्षार्थी। १८. घ. धनार्थी विशदेव च । १६. घ. संमोहं । २०.क. पुस्तके ऽभमंशो नास्ति । २१. अतः परं निम्नांशो विशेषः ग. घ. पुस्तकटये- 'विशद्भिः स्तम्मनं विद्याद् विनाशे पञ्चमासिका।
सांस्यायनतन्त्र ६ द्विपञ्चसप्तविंशद्धि रुच्चाटे चार्कसख्यया । ज्वरे रोगादिपीडार्थ पच चैव चतुर्दश ।।१८। पञ्चाशच्छान्तिकर्माख्ये बुद्धिं च चतुरुत्तरे । पञ्चदशाभिचारे च मालिकाक्रममी(ई)दृशः ॥१९॥ भृगुवारे च सगृह्य द्रव्याण्येतानि पुत्रक । 'हरिद्रापङ्कज वस्तु कर्पूर मृगनाभि च" ॥२०॥ श्रीखण्डरोचनागरु-केसरं च समं समम् । मईयेन्मु (दुषसि प्रज्ञः खल्वेनैव कुमारक ॥२१॥ तेन कुर्यात् पुत्तली च चतुरङ्ग लमानतः । सर्वाङ्गसुन्दरी'' देवी द्विभुजां वगलामुखीम् ।।२२।। चित्रपीताम्बरधरां'' पीनोन्नतपयोधराम् । पीतवर्णा मदाघूर्णामर्द्धचन्द्रा च पुत्तलीम् ।।२३।। प्राणप्रतिष्ठा कृत्वा तु सस्नाप्य' विधिनाऽर्भकम् । अखण्डतण्डुलेनैव हरिद्राक्षतमेव च ॥२४॥ कृत्वा एकाक्षरीमन्त्ररक्षतान् ३ मूर्द्ध नि नि.क्षिपेत् । नित्यं चायुतपूजा च कुर्याच्चैव च पुत्रक ॥२५॥ देवी सम्पूजयेत्सम्यक् जपं कुर्यात् सुबुद्धिमान् ।'४ एवं कृत्वा तत्त्वलक्षं देवी प्रत्यक्षतामियात्५ ॥२६॥ न वक्तव्य न वक्तव्य कदाचन । एवं पूजाविधिं कृत्वा पुरा 'दुर्वाससेन च'१७ ॥२७॥ तत्त्वलक्षप्रमाणेन प्राप्तं 'ग्रन्थोदित फलम्' इति षड्विद्यागमे सांख्यायनतंत्रे चतुर्विंशतिः '६ पटलः॥२४॥ १. क. पुस्तके 'द्विपञ्च' हीनः 'सप्तर्विद्भिः' शब्द एव दृश्यते । घ. विद्वषे सप्त- विद्भिः। २. घ. ज्वर । ३. घ. ०कर्मषु । ४. घ. पञ्चदश्याभि० । ०मीदृशम् । ६. घ. संग्राह्य । ७. ख. घ. पुस्तके निम्नोऽय पाठो विशेष:- हरिद्रापङ्कज वस्तु चन्दन कुसुमानि च । कस्तूरी चैव कपूर 'कर्पूर: मृगनाभि व ॥ ८. घ गोरोचनमुशीर च केशरं । ६. ख. ० तुपसि प्रज्ञ । घ. मर्दयेन्मदिरायुक्त । १०. प. सुधा च सुन्दरी। ११. ध वगला वज्रधरा चैव। १२. घ. सस्थाप्य । १३. घ. एकाक्षरमंत्र। १४. घ. पादद्वय नास्नि । १५. घ. प्रत्यक्षमाप्नुयात् । १६. घ. यस्म कस्म । १७. घ. दुर्वासमोनिराट् । १८.प. ग्रयोक्त फलमाप्नुयात् । १६.घ. मालाप्रकरणं नाम चतुर्विशति । 1. घ. रक्तं । 2. घ. श्रीखण्ड चागर तथा । यत् परस्मै पञ्चविंशः पटलः [ ६७ 1 ॥अथ पञ्चविंशः पटलः ।। नमामि वगलां देवी शत्रुवाक्स्तम्भरूपिणीम् । भजेऽह विधिपूर्व च जय देहि रिपून दह ॥१॥ स्कन्द उवाच- नमः कैलाशनाथाय नमस्ते मुनिसेवित । चतुरक्षरीमहामन्त्रं वगलायाश्च मे वद ॥२॥ ईश्वर उवाच- सप्तकोटिमहामन्त्र मन्त्र राजमिमं शृणु । षट्प्रयोगैः स्तभनं च सर्वकर्मोत्तमोत्तमम् ।।३।। यदा शत्रुभयोत्पन्न' तदानीमेव पुत्रक । अयुतं च जपेन्मन्त्र वगलाचतुरक्षरम् ||४|| मन्त्रोद्धार प्रवक्ष्यामि न्यासध्यानादिकं तथा । प्रयोगं चोपसंहारं वक्ष्येऽहं तव पुत्रक ॥५॥ वेदादि विलिखेत् पूर्व पाशवीजं ततः परम् । स्तब्धमाया त्ततोच्चार्य अंकुश बीजमेव च ॥६॥ चतुरक्षरी च बगलां सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमाम् । न्यासविद्यां प्रवक्ष्यामि मन्त्रभेदेन पुत्रक ||७|| पाशाह कुशान्तरितशक्तिरमा च तद्व- तद्वन्यसेन्मदनबीजमथो वराहम् । वागोश्वरी च बगलाख्यसुबीजराज, विन्यस्यता करयुगे हृदयादिकेषु ॥८॥ चतुर्वणात्मिके मन्त्र मातृकावीजपूर्वकम् । प्रत्येकं च न्यसेत् पुत्र मन्त्रसिद्धिमवाप्नुयात् ।।६ अथवा वगलामन्त्रं सर्वरङ्ग लिभियंसेत् । ततो जपेन्मन्त्ररान वगलाचतुरक्षरम्" ॥१०॥ ब्रह्मा ऋषिश्च छन्दो त्र गायत्री समुदाहृतम् । देवता वगलानाम्नी ध्यानं वक्ष्ये कुमारक ॥११॥ १. घ. कोचमेदन । २. घ. कैलासवासाय। ३. घ. मौनिसेवित । चतुरक्षरीमहामत्र । ५. घ. ०मिद। ६. घ. मयं प्राप्त। ७. घ. वगलां चतुरक्षरी। म. ख. घ. चतुर्वर्णात्मक। ६. स. घ. मंत्र। १०. घ. मगुलीषु न्यसेत्तथा । ११. प. ०चतुरक्षरीम् । ४. घ.
६८ ] सांस्यायनतन्त्र कुटिलालकसंयुक्तां मदापूर्णितलोचनाम् । मदिरामोदवदनां प्रवालसदृशाधराम् ।।१२।। सुवर्णशैलसुप्रख्यकठिनस्तनमण्डलाम् । दक्षिणावर्त्तसन्नाभिसूक्ष्ममध्यमसंयुताम् ॥१३॥ रम्भोरुपादपद्मां तां पीतवस्त्रसमावृताम् । एव ध्यात्वा महादेवी कुर्याज्जपमतन्द्रितः ॥१४॥ वेदलक्षं जपं कुर्यात् पर्वताने कुमारक । 'भिक्षाशिनः फलाशीनो' मौनी भूत्वा समाहितः ॥१५॥ तर्पणं च दिवा कुर्याद् रात्री वा प्रजपेन्मनुम् । एव कुर्यात् पुरश्चर्यां देवी प्रत्यक्षमाप्नुयात् ।।१६।। रात्री होमं च कर्त्तव्यं दिवा ब्राह्मणभोजनम् । हरिद्रावस्त्रसयुक्त हरिद्रावर्णचन्दनम् ॥१७॥ 'हरिद्रां चाक्षमालां च हरिद्रावर्णदेवताम् । स्मरेच्च जपकाले तु सर्वसिद्धिकर नृणाम् ॥१८॥ मधूकपुष्पसंमिश्रचितेन जलेन वा। तर्पणं तद्दशाशं च देवतामूर्द्ध नि निःक्षिपेत् ॥१९॥ प्राज्येन मिश्रितं चैव शर्करापायस हुनेत् । पूर्णाहुत्यन्तमनघ' ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः ॥२०॥ योगिनी पूजयेत् पश्चाद् द्रव्यशुद्धिसमन्वितः। मन्त्रसिद्धिर्भवेत्तस्य नात्र कार्या विचारणा ॥२१॥ आदौ भास्वररूपिणी कुरुं तदा सद्वंशजां योगिनी, नानालक्षणसयुता कुचभरां प्रौढां नवोढां तथा । स्ता (स्ना)ताभ्यजनभूषणश्च सहिता सच्चन्दन लैपिता, पूजागारमुपानयेद्रहसि सा'द्रव्यश्च शुद्धया रहः ॥२ T १. घ. कटिलोलकसयुक्ता । २ घ. ०पराम् । ३. घ. सुवर्णकलश। ४. घ. मिक्षाशी च फलाशी च । ५. घ. हरिद्राया क्षमा माला। ६. ख. मनष। घ. मनना। ७. स. भास्कर० । घ. भाषर०। ८. घ. सज्जातिजा। ६. स्रक्चन्दन। १०. स. तां । घ. सद् । ११. ख.घ. सह। , पंञ्चविंशः पटलः [ ६६ लौकिके' चैव गुप्तात्र सोभाग्यार्चा कुमारक ।' 'मन्त्रसिद्धिकरं वक्ष्ये गोपनं कुरु सर्वदा ॥२३॥ अङ्गत्रयेण संयुक्त लौकिकार्चनमेव च । चतुरंगुलसंयुक्ता गुप्तपूजा कुमारक ॥२४॥ सौभाग्या विधिश्चैव पञ्चाङ्गोपासन भुवि । योषिद्भुक्तिद्रव्ययुक्त लौकिकार्चनमेव च ॥२५॥ योषिच्छुद्धिद्रव्यपूजा पञ्चमीयुतमादरात् । एतत्सौभाग्यपूजा च मुनिगुह्यमुपासनम् ॥२६॥ विन्दुपात्रयुता पूजा निर्गुणा योगिनां मतम् । एतच्चतुर्विधा चर्या' देशनामार्चनाविधिः ॥२७॥ वक्ष्येहं' विधिवत्पुत्र न देयं यस्य कस्यचित् । सृष्टि: स्थितिश्च संहारं जीवन्मुक्तिपदं ४ तथा ॥२८।। एतदर्चाविधिर्नामसंकेत मुनिभिः सह । सृष्टिश्च गोडदेशेषु१६ स्थितिः केरलदेशके ॥२६॥ संहारार्चा कामरूपे 'कुरुपाञ्चालयोः परम्"। पीठोपरि समावेश्य गर्भकोलागमकमात्' 1॥३०॥ अर्चन'६ गौडदेशीयं सृष्टिपूजाक्रमस्त्वयम् । पूर्वोक्तलक्षणोपेतो मृदुपर्य्यङ्कके' तथा ।।३१।। शयनीकृत्य कन्या च स्थित्यर्चाक्रममादरात् । केरले तु स्थितिश्चैव सिद्धयसिद्धिकरी४ तथा ॥३२॥ कोलसारं च तन्नाम सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमम् । पूर्वोक्तलक्षणोपेतास्तिष्ठन्ति कन्यका मुवि ॥३३॥ १. घ. लोकिकी। २. अत पर निम्नाशोऽय घ. पुस्तक एव दृश्यते- एव त्रिविधपूजा च मुनिगुह्य सुपावनं । एकैकस्य च पूजाया लक्षण कथ्यते सुत ।। ३. पादयुगं ग. पुस्तके नास्ति । ४. घ. चतुरङ्गसमायुक्तां। ५. श्लोकोऽयं ग. पुस्तके नास्ति । ६. स्व. घ. विधि चैव । ७. घ. योपित्शुद्धि। ८. अंत. परं निम्नांशो घ. पुस्तक एवाऽवलोक्यते- योषिच्छ द्विद्रव्यपूजा सुगुप्तार्चनमादरात् । ६. घ. मुनिगुप्त सुपावनम् । १०. ध मता। ११. घ. चार्चा । १२. घ नामार्चन । १३. ग. हे।' १४. मुक्तं पदं । १४. ध मुक्तं पदं । १५. घ. योगिभिः। १६. घ. देशे तु । १७. घ. कोलिकारवो (र्चा, चार) तत्पराम । १८. घ भर्गकोलागमः । १९. क, प्रोचनं । प. मचंना। २०. घ. गोडदेशीय। २१. क. मृत्यु। २२. ग. घ. शयनीकृतकन्या। २३. घ. स्थिस्य मयं० २४. स्व. प. सद्यः सिद्धिकरी। - - ७० ] सांख्यायनतन्त्रे - - कामरूपाख्यदेशे तु सहाराह्वयपूजनम् । पूर्वोक्तलक्षणोपेता कृत्वाभ्यञ्जनमादरात् ।।३४॥ बिन्दुमात्रं गृहीत्वा तु कृत्वा मुक्त्यर्चन भुवि । कुरुपाञ्चालदेशीयमनिशं पूजन तथा ।।३।। कोलसारपर' नाम चागमं भुवि दुर्लभम् । सम्यक् पूजाविधिश्चैव उपसंहृतमानस: ।।३६।। पञ्चमी चैव कर्तव्या सौख्यायं तस्य पुत्रक । 'पात्रं चैव समासेन जपध्यानसमन्वितः ।।३७।। देवो भूत्वा स्वयं पुत्र पञ्चमी च समाचरेत् । सहारार्चनयोरेवमुपसंहृत्य पूजनम् ।।३।। सम्पूजयेत् पञ्चमी चैव सौख्यायं तस्य साधकः । आदी मध्ये तथा चान्ते विन्दुपात्रार्थमेव च ॥३६॥ अर्चयेत् पञ्चमी कुर्याद ग्रह्ण चन्द्रसूर्यायो । कुरुपाञ्च.लदेशेऽथ'' निर्गुणा विधिस्तथा ॥४०॥ एतदर्चाविधिश्चैव दुर्लभो विधिशङ्करः । गोडदेशार्चनं पुंसां शान्तिपुष्टिकर'४ सदा ।।४।। एवमेव विधिः पुत्र सर्वेश्वर्यप्रदायकः । कामरूपार्चनं पु सां मारणविप्रयोगदा'५ ॥४२॥ कुरुपाञ्चालदेशार्चा सर्वसिद्धिप्रदा सदा ।' एतदर्चाविधि चैव य. करोति सुवुद्धिमान् ।।४३।। जीवन्मुक्तः स एवात्र स सिद्धो नात्र संशयः । नारी निन्दा न कर्त्तव्या स्वपादस्तां न ७ संस्पृशेत् ॥४४॥ नारी दृष्ट्वा मानसेन वन्दन च समाचरेत् । स्वप्रियामर्चयेत् पुत्र प्रिया पञ्चमिकां चरेत् ।।४।।" १. घ. विन्दुपान। २. गुप्ताचंन । ३. घ. देशे तु अनिश । ४. घ. सारतर । ५. घ. शुचि। ६. स. जपसहृत० । घ. उपसपेद्वत्यसाधकः । ७. घ. न्यासं न्यस्त्वोभयोर्देशे। ८. घ. संहाराचंनयोग च उप० । ६. पूजयेत् । १०. घ. विन्दुप्रात्यर्थः। ११. घ. तु। १२. घ. दुर्लभम् । १३. घ. मुवि षण्मुख । १४. घ. पुष्टिकरि तपा। १५. स. मारणादिप्रयोगदम्। घ. मारणादिप्रयागकृत् । १६. पदयुग्मं घ. पुस्तके नास्ति। १७. घ. स्वपादीतांच। १८. घ. स्पृशेत् । १६. श्लोकोय नास्ति घ. पुस्तके । ।
षड्विंश: पटल. स्वप्रियाबिन्दुपात्र' च गृहीत्वा साधकोत्तमः । प्रसोनार्चन कृत्वा विन्दुपात्रं तथैव च ॥४६।। उन्मादी च भवेत् पुत्र मृतः श्वानो भविष्यति । ।। इति षड्विद्यागमे सांस्यायनतन्त्रे पञ्चविंशतिः पटलः।। २५॥ ।। अथ षड्विंशः पटलः ।। जातवेदमये देवि जगज्जननकारिणि' जय पीताम्बरधरे 'बगलायै नमो नमः८ ॥१॥ स्कन्द उवाच- नमस्ते सिद्धससेव्य सिद्धविद्याधराचित । वगलाचतुरक्षर्याः प्रयोगं वद. शङ्कर ।।२।। शिव'° उवाच- 'प्रयोगं तर्पणं चैव'' वक्ष्येऽहं तव पुत्रक । तर्पणं देवतावासं तर्पणं यंत्रसिद्धिदम् १२ ॥३॥ तर्पणं मन्त्रसस्कारं सर्व तत्तपंणाद भवेत् तर्पणं द्रव्ययोगं च ततः 3 सिद्धिर्न संशयः ॥४।। अर्चनं कलशे चैव काशमण्डलवजितम् । गृहीत्वा क्षालयेत् सम्यक् पूजयेन्मूलमन्त्रतः१५ ॥५॥ तज्जल च समानीय पूजयेत् सुसमाहितः । श्रापो वा इति मन्त्रेण मन्त्रयेत्तज्जलं पुनः ॥६॥ उपचारः षोडशभिः पूजयेत् कुम्भमादरात् । तत्पवित्रेण सयुक्त तर्पणस्यायुतेन च ।।७।। तेनोक्तविधिना सम्यक् पूजनं तदुदाहृतम् । काकोलूकच्छदेनेव' १६ पवित्रं ग्रन्थिमादरात् ।।८।। तत्पवित्रेण संयुक्त तर्पणस्यायुतेन च । नेत्ररोगी भवेच्छत्रुर्दिवान्धो जायते ध्रुवम् ॥६॥ । - १. घ. स्वस्त्रिया०। २. ख. साधकोत्तम.। ३. . पूजाप्रकरणं नाम०। ४.१. ६.७. घ. पुस्तके द्वितीयान्तः पाठः । ८. घ. वगलाम्यां नमाम्यहम् । ६. क्रौचभेदन १०. घ. ईश्वर। ११. ध तर्पणाख्यं प्रयोग च। १२. घ. मत्रसिद्धिदं। १३. प. तच्च। १४. ध कालमण्डल०। १५. घ. मूलविद्यया । १६. ५. काकोलूकछदाभ्या १७ घ. तपणेनायुतेन च । - . " ७२ ] सांस्यायनतन्त्र - काकपत्रेण संयुक्त' पवित्रग्रन्थिमादरात् । तेनैव सह सन्तर्प्य अय्युत साधकोत्तमः ॥१०॥ काकवद् भ्रमते शत्रुर्महीमामरणान्तिकम् । काकोलूकस्य पक्षाभ्यामेकीकृत्वा सुबुद्धिमान् ॥११॥ कृत्वा पवित्रग्रन्थि च तेन सन्तl चादरात् । अयुतं वगलामन्त्रैः शत्रुविद्वेषणं भवेत् ॥१२॥ विड्वराहमजारोमैः पवित्रग्रन्थिमादरात् । तर्पयेदयुतं तेन बगलाचतुरक्षरैः ॥१३॥ अन्नद्वेषो जायते च स शत्रुरवशिष्यते । 'केशं च कलशस्थ च पवित्रग्रन्थिमादरात् ॥१४॥ अयुतं तर्पणेनैव ‘स शत्रोशिन'' भवेत् । उप्ट्रोमेण कृत्वा तु पवित्रंग्रन्थिरेव च ॥१५॥ तेनायुतं तर्पणेन मूको भवति पण्डितः । पूर्ववद्वाजिरोमेण तर्पणं च कुमारक ।।१६।। हिक्वारोगो भवेत्तस्य'' शीघ्र भ्रान्तो भविष्यति । खररक्तेन समिश्रचित जलतर्पणात् ॥१७॥ जिह्वास्तभो भवत्येव वाणीपतिसमोऽपि वा। श्वानरक्तेन संमिश्रमर्चित शुभवारिणा ॥१८॥ अयुतं१४ तर्पणात्पुत्र'५ उन्मादी जायते रिपुः । काकरक्तेन सम्मिश्रचित शुद्धवारिणा ॥१९॥ अयुतं तर्पणात्पुत्र काकवद् भ्रमते महीम् । उलूकरक्तसंमिश्रचितं शुभवारिणा ॥२०॥ रिपुरन्धो भवेत् पुत्र अयुताच्च न संशयः । मार्जारवालरक्तेन मिश्रिताज्जलतर्पणात्'६ ॥२शा 1 4 १. घ. कृत्वा तु । २. घ. ०मातपंणान्तिकम् । ३. घ. एकीकृत्य तु। ४. घ. बुद्धिमान् । ५. घ. गृध्रवाराहर्लोमैः। ६. घ. चंदा ७. ख. अत्यद्वयो। घ. अन्तद्वेपो। ८. घ. ०माचरेत् । ६. घ. स्वशक्त्या० । १०, . भवेच्छीन। ११. घ. रिपुर । १२. घ. शुद्धवारिणा । १३. घ. पुस्तकेऽयं श्लोको नास्ति । १४. घ. १५. घ. तर्पयेत् पुत्र । १६. घ. मिश्रित जलतर्पणम् । प्रयुतात् ।
सप्ततिः पटलः [ ७३ . / भ्रान्तचित्तो भवेच्छत्रुरयुताच्च न संशयः । विड्वराहस्य' रक्तेन मिश्रितं जलतर्पणम् ॥२२॥ उन्मादी च भवेच्छत्रुरयुतादेव पुत्रक ! लुलायरक्तसम्मिश्रजलेनैव तु तर्पणम् ।।२३।। 'अयुतादरिगवं तु मूकत्व कुरुते नृणाम् । भुजङ्गरक्तसंमिश्रजलेनैव तु तर्पणम् ॥२४॥ शत्रूणां मारण पुत्र अयुताच्च न संशयः। छागरक्तेन संमिश्रचितेन जलेन च ॥२५॥ तर्पणेनायुतेनैव व्रणरोगी भवेद्रिपुः । शशकस्य तु रक्तन 'मिश्रितेन जलेन च ॥२६॥ क्षयरोगो भवेन्मयोऽप्ययुताच्च" न संशयः। मत्कुणस्य च 'रक्त-न मिश्रितेन जलेन च ॥२७॥ अयुतात्तस्य शत्राश्च भवेन्मरणमुत्तमम् । मेषस्य पुच्छरक्त न 'मिश्रितेन जलेन च ॥२८॥ अयुताज्ज्वररोगी 'च जायते तत्क्षणाद्रिपु. । द्रव्येणैव च समिश्रमवितं जलतर्पणम् ॥२६॥ अयुताच्चिन्तित कार्य भवत्येव न संशयः । एतत्तर्पणयोगं च सिद्धात् सिद्धतरं सुत ॥३०॥ न वक्तव्यं न वक्तव्यं न-वक्तव्यं कदाचन ॥ इति षड्विद्यागमे सांख्यायनतंत्रे षडविंशः पटलः ॥२६॥ ॥ अथ -सप्तविंशः पटलः॥ नानालङ्कारशोभाढयां नरनारायणप्रियाम् । वन्देऽहं बगला-देवीं परब्रह्माधिदेवताम् ॥१॥ स्कन्द '२ उवाच- वन्दे पाशुपताध्यक्ष-परमानन्दविग्रह । वद होमप्रयोग घ वगलाचतुरक्षरः ।।२।। १. घ. विड्वराहेण । २. घ.:०अयुताच्चव। ३. घ. अयुदक्षिणा पञ्च । ४. घ तर्पणात् । ५ ५ मिश्रित जलतर्पणम् । ६. घ. भवेच्छश्ररयुतात् । ७. प. मिश्रित जलतपणम् । ८.५ मिश्रितं जलतपणम् । ६. घ. अयुताच्चर्मरोगी। १०. घ. पुस्तके पाठोऽय विशेष:- नररक्तेन समिश्रचितं जलतपरणम् । ११. घ. चतुरक्षरीतपण प्रयोगं नाम षड्विंशति। १२. घ. क्रौञ्चभेदन । । -- ७४ ] सात्यायनतन्त्र । शिव उवाच'- वक्ष्ये होमविधि सम्यक् सावधानेन श्रूयताम् । अयुत पुत्र होम' च पिचुमंदफलैर्डनेत् ।।६।। अयुताच्छत्रुसहारो भ्रान्तभीतो' भवेद् ध्रुवम् । 'करवीराणि रक्तानि" अयुत चाज्यसंयुतम् ।।४।। हुनेत् त्रिकोणकुण्डे तु अयुताद्' रिपुमारणम् । विषतिन्दुकबीज च सौवीरद्रवसयुतम् ॥।॥' ग्राममध्ये हुनेन् मन्त्री भगाकारे च कुण्डके । तद्ग्रामे वेदशास्त्राणि सर्व विस्मृतिमाप्नुयात् ।।६।। शेषभाषापतिप्रख्यः स एव जडतामियात्' । वटमूलं समाश्रित्य कृत्वा कुण्ड त्रिकोणकम् ।।७।। तत्फलेन हुनेद् रात्री प्रयुत चाज्यमिश्रित । भाषापतिसमो विद्वांस्तत्क्षणाद् भ्रान्तिमाप्नुयात् ।।८।। अश्वत्थमूलमाश्रित्य षट्कोणाकृतिकुण्डके । तत्फल च हुनेद् रात्रौ अयुतं चाज्यमिश्रितम् ।।६।। स्फोटकवणसंयुक्तो 'म्रियते यमशासनात्'१. उदुम्बरस्य'' मूले तु षट्कोणाकृतिकुण्डके ॥१०॥ कोमलं तत्फलं सम्यगयुत चाज्यमिश्रितम् । जुहुयाद्रजकस्याग्नौ जुहुयाद्दक्षिणामुख. ॥११॥ ग्राम वा नगर वाथ रणं राजकुल 'तु वा । नाडीव्रणसमायुक्तो नानादुःखेन पुत्रक ॥१२॥ म्रियते 'न च'१४ सन्देहो नात्र कार्या विचारणा । राजवृक्षं समाश्रित्य तन्मूले च कुमारक ।।१३।। १. घ. ईश्वर। २. घ होमाच् । ३. घ. भ्रान्तचित्तो। ४. घ. हयारिरक्त- कुसमः। ५ घ. तत्क्षणाद् । ६. ख. घ. पुस्तकद्वये विशेषोऽय पाठः- अयुतं जुहुयान्मत्री तत्क्षणाद्रिपुमारणम् । पलाशबीजमयुतं तिलतलेन सयुतम् ।। ७. घ ०प्रख्या। ८. घ सर्व विस्मृतिमाप्नुयात् । ६ घ. पुत्र । १०. घ. मारक भवति घ्र वम् । ११. ध प्रौदुम्बरस्य । १२ घ. नग्नो दक्षिणदिङ्मुखः । १४. घ. नाना . तथा।
सप्तविंशः पटलः [ ७५ । हस्तमात्र भगाकारं कुण्ड कुर्याद् विचक्षणः । तत्फल निम्बतलेन मिश्रितं निशि बुद्धिमान् ।।१४।। नेत्रायुतं हुनेद् धीमान् ग्रामं वा नगरं तथा । स्फोटकवणसंयुक्तो हस्तपादादिभग्नतः ।।१५।। पर्यायान् म्रियते चैव' नात्र कार्या विचारणा। सर्षप लवणं चैव तिलतलेन मिश्रितम् ॥१६॥ अयुतं जुहुयान्मन्त्री ज्वररोगी भवेद्रिपुः । पिचुमदस्य तैलेन मिश्रितं लवण तथा ॥१७॥'' हुनेञ्च' पूर्ववत् कुण्डे अयुत प्रेतपावके । कुष्ठरोगी भवेच्छत्रुम्रियते तेन निश्चितम् ॥१८॥ शमीमूले हुनेत्पुत्र 'शृणु वक्ष्यामि तत्फलम् । तिलतलेन सम्मिश्र' तत्फलं निशि पुत्रक ॥१६॥ जुहुयात्तत्क्षणात् पुत्र 'शृणु वक्ष्यामि'' तत्फलम् । वातरोगी भवेच्छत्रुम्रियते नात्र संशयः ॥२०॥ अपामार्गस्य बीजं तु तिलतलेन मिश्रितम् । शमीमूले हुनेत्पुत्र अयुत ध्यानपूर्वकम् ॥२१॥ तत्रस्थाः शत्रुभार्याश्च तद्गृहे तत्र योषितः। वन्ध्याः स्त्रियो भवेयुश्च सत्यमेव* शिवोदितम् ॥२२॥ शमीमूलं समाश्रित्य 'शलाएं च समासतः'८ । तिलतलेन संमिश्र जुहुयादयुत तथा ॥२३॥ प्रेताग्नी रजकाग्नो वा पूर्वोक्त चैव कुण्डके । वैरिस्त्रीणां भवेत् सद्यः स्रवद्रक्त'' निरन्तरम्' ||२४|| तिलतैलेन समिश्र शलाटु २ शाल्मलीभवम् । पूर्ववच्च हुनेत् पुत्र मेहरोगी' भवेद्रिपु. ।।२।। १. प. शत्रः। २. घ. पिचुमंदेन । ३. घ. हुनेत्तु। ४. स.'ग घ. भगाकाये तु कुण्डके। ५. प. सयुक्त। ६. ध वक्ष्यामि शृणु। '७. 'घ. 'सत्यमेतच् । ८.घ. शाह, लस्य च मांसतः। है, घ.सद्यो। १०. घ. वा यद्रक्त । ११. घ. सुनिश्चितम् । १२. प. शंलूप। १३. घ. मवेत् । १४. घ. महदोगी।
७६ ] सांस्यायनतन्त्र २ एवं होमप्रयोगं च रात्री कुर्यात् कुमारक । 'प्रयोगं चोपसहारं सत्पुत्रायापि नो वदेत् ॥२६॥ इति षड्विद्यागमे साख्यायनतत्रे सप्तविंशतिः पटलः ॥२७॥ ॥ अथाष्टाविंशतिः पटलः ।। बालभानुप्रतीकाशां नीलकोमलकुन्तलाम् । वन्देऽह वगला देवी स्तम्भनास्त्रस्वरूपिणीम् ॥१२॥ स्कन्द उवाच- विश्वनाथ नमस्तेऽस्तु विरूपाक्ष नमो नमः । सुगम स्तम्भविद्याया. प्रयोगं वद शङ्कर ।।२।। 4 शिव उबाच- - वगलाहृदय मंत्रं गुप्तगुप्ततरं तथा । एतच्छ्रवणमात्रेण मत्रसिद्धिमवाप्नुयात् ॥३॥ न ध्यान नं च होम च न जप न चतर्पणम् । सकृदुच्चारणान् मत्राच्चिन्तितं१० 'भवति ध्रुवम् ॥४॥ न चाभिषेकं न च मंत्रदीक्षा, न चात्र'' दिक्काल ऋतुश्च'२ देवता । न चापि पञ्चेन्द्रियनिग्रह च, सकृत् स्मरन्वै वगलाख्यहृन्मनुम् ।।५।। वगलाहृदयं मंत्र ब्रह्मादीनां च दुर्लभम् । सकृत् स्मरणमात्रेण वाञ्छितं फलमाप्नुयात् ॥६।।१५ - १. घ. पुस्तकेऽयमंशो विशेषः-प्रयोगादी प्रयोगान्ते पूजां कुर्यात् । प्रयत्नतः । २. ध पुस्तके श्लोकोऽयं विशेषो लभ्यते- एव य. कुरुते पुत्र प्रयोग सिद्धिमाप्नुयात् । पूजा विना कृत कर्म प्रयोग निष्फलं भवेत् ॥२७॥ ३. घ. चतुरक्षरीहोमकपन नाम सप्तविंशति । ४ घ. बालभावः । ५. घ. ०कुण्डलाम् । ६. घ. क्रौञ्चभेदन। ७. घ. सुभगं । ८. घ. ईश्वर। ६. घ. गुप्तात। १०. घ. तस्य चिन्तितं । ११. घ. न चापि । १२. ख दिक्कालक्रमश्च । १३. घ.-देवताश्च । १४. घ ०हृन्मनुः। १५ पद्यार्द्धमिद ख ग. पुस्त- फद्वयधिक दृश्यते- सचारवान् भवेत् पङ्ग दी मूकत्वमाप्नुयात् । घ. दिक्पा- लक।
अष्टाविंशः पटसः [ ७७ दरिद्रोऽपि भवेच्छीमान् स्तब्धीभवति' पण्डितः । चतुरो मुष्करश्चैव' कीत्तिमान् निन्दको भवेत् ।।७।। कवीश्वरोऽपि चोन्मादी' भोगासक्तोऽपि रोगवान् । रोगवान् क्षयरोगी स्यात् कुलजो' निन्दको भवेत् ॥८॥ मानी लघुतरश्चैव नैष्ठिको भ्रष्टतां व्रजेत् । एतद्विना कलो पुत्र मुकृतकोत्तिकारणम् ॥ गुणश्च वर्तते पुंसां तस्योत्पन्न कारणम् । वगलाहृदयं मंत्र सकृदावर्तयेत्तु यः ॥१०॥ तस्योल्लंघनमाण नष्टः स्यात्पनजोऽपि वा। वगलाहृदयं मनमुपासनपरस्य च ॥११॥ करोति यस्य सन्तोषं तस्य सिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् । येन केनाप्युपायेन हृन्मंत्रं येन'' जायते ।।१२।। सन्तोष जनयेत् तस्य १३ चिन्तितं फलमाप्नुयात् । तन्मन्त्रोद्धारमतुलं 'तत्वत. स्वविधानतः१३ ॥१३॥ वक्ष्येहं तव सर्वञ्च क्रौञ्चभेदन तच्छृणु । पाशवीज ततोच्चार्य'५ स्तव्धमायां ततोच्चरेत् ॥१४॥ अकुश बीजमुच्चार्य भूव (वा) राह तथोच्चरेत् । वाराह वाग्भव चैव कामराजं तत. परम् ॥१५॥ श्रोवीज भुवनेशी च 'वगलामुखिपद वदेत् । आवेशयद्वयं चोक्त्वा पाशबीजमतोच्चरेत् ॥१६॥ स्तब्धमायां ततोच्चार्य ८ मङ्क श बीजमुच्चरेत् । ब्रह्मास्त्ररूपिणी चोक्त्वा एहियुग्मं ततोच्चरेत् ॥१७॥ पाशवीजमतोच्चार्य" स्तब्धमायां ततोच्चरेत् । अडकुश बीजमुच्चार्य मम शब्दं ततोच्चरेत् ॥१८॥ १. क. स्तल्ली। ख घ स्तब्धो भवति । २ घ. पुष्कर० । ३. घ. उन्मादी। ४. ग. रगवान् । घ. सत्ववान् । ५ घ. च। ६. घ. कुलवान् । ७. घ. लज्जा- विहीनस्तु । ८. ख घ. सुकृत कीति। ६. स. ग. तस्योपासनः । घ.तस्य नाशन. १०. घ. तस्य। ११. घ. यस्य ।। १२ घ. सद्यः । १३. तदाराधनलक्षणम्। १४ घ. सर्वत्र। १५. घ. समुच्चार्य । १६ घ, समुच्चरेत् । १७. घ. वगलामुखि उच्चरेत् । १८. घ. समुज्वार्य। १६. घ. पाशचीज समुच्चार्य। .
७] सांख्यायनता -- हृदये 'तु समुच्चार्य'' आवाहययुग वदेत् । सान्निध्य कुरुयुग्मं च पुनर्बीजत्रयं वदेत् ।।१६।। ममैव हृदयेत्युक्त्वा चिरं तिष्ठद्वयं वदेत् ।' 'पुनर्बीजत्रयं चोक्त्वा हु फट् स्वाहासमन्वितः ॥२०॥ अशीतिवर्णसयुक्तो 'वगलाहृदय मनुः" ।' वन्ध्यामुन्मार्जयेदङ्ग वगलाहृदयेन च ।।२।। वन्ध्या पुत्रवती चैव षण्मासाद् भवति ध्रुवम् । वगलाहृदयेनैव त्रिसप्तमभिमन्त्रितम् ।।२२।। 'पयः पिबति वा सा स्त्री'६ वन्ध्या पुत्रवती भवेत् । कृत्रिमेषु च रोगेषु नानाभयसमुद्भवे ॥२३॥ त्रिसप्तमन्त्रितं-तोय सद्यो नैर्मल्यमातनोत् । नित्यमष्टोत्तरशतं वगलाहृदयं मनुम् ।।२४॥ चिन्तितं च भवेत् पुत्र नात्र कार्या विचारणा। इति षड्विद्यागमे सांख्यायनतंत्र अष्टाविंशतिः१३ पटलः ॥२८॥ ॥ अथोत्रिंशः पटलः ।। नमस्ते देवदेवेशि नमः स्वर्णविभूषणे । पानपात्रयुते देवि वगले त्वा नतोऽस्म्यहम् ॥१॥ स्कन्द१४ उवाच- अष्टमूर्ते नमस्तुभ्यं आनन्दगणसागर । वगलाहृदय यन्त्र प्रयोगं वद शङ्कर ॥२॥" ईश्वर उवाच- बिन्दुत्रिकोणषट्कोणवृत्तत्रयविभूषितम् । षट्कोणं चैव वृत्त च भूपुरद्वयसयुतम् ॥३॥ १. पदमुच्चार्य। २. निम्नांशोऽयं घ पुस्तक एव दृश्यते विशेष:- पाशवीज ततोच्चार्य स्तव्धमायां ततोच्चरेत् । १. घ अङ्क शवीजमुच्चार्य। ४. घ. स्वाहेति उच्चरेत् । ५. घ. ०मंत्रोऽय। ६. घ. मुनिगुह्य सुपावनम् । ७. घ. पुस्तक एवायमंशो विशेष:- पुत्र देय शिरो देय न देय हृदय मनु । ८. घ. वन्ध्यायो माजयदेव । ६. घ. पिवेदुदयकाले तु । १०. घ. सापि। ११ घ. समुच्चये। १२. घ. अष्टोत्तरं जप्त्वा । १३. घ. हृदयप्रयोग नाम माविंशतिः । १४. घ. क्रौञ्चभेदन । १५. मानन्दगुणसागर । १६. ५ मन्त्रा - - - 1 - - एकोनविंश. पटल. [७६ मध्ये लिखेन्महामन्त्र वगलाहृदयं तथा । त्रिकोणेषु लिखेद् वीज वगलाख्य सुपावनम् ॥४॥ षट्कोणे वा लिखेन्मन्त्रं षट्त्रिंशद्वर्णकारकम् । शताक्षरीमहामन्त्रमाद्यवृत्ते लिखेत् क्रमात् ॥५॥ 'तस्योपरि च सवेष्टय वगलाबीजमादरात्" । तस्योपरि विलिखेद्यन्त्र 'स्वर्णे वा रोप्यपत्रके ॥६॥-- लिखित्वा शुभलग्ने तु स्पष्टरेखाश्च संलिखेत् । स्पष्टबोजानि सलिख्य पूजयेदर्कवासरे ॥७॥ 'सहस्र प्रजपेन्मन्त्र दुर्गाहृदयमादरात्" । योगिनीः पूजयेत्तत्र धूपदीपाचनादिभिः ।।८।। कौलार्चनविधानेन मन्त्रसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् । सुरक्तं . पूजयेद्यन्त्र 'हयारिकुसुमैः शुभै.'८ 18|| इष्टसिद्धिर्भवेत्तस्य अयुत जपमादरात् । मल्लिकाकुसुमेनैव' ह्यष्टोत्तरशतं जपेत् ॥१०॥ वगलाहृदयेनैव ह्यर्चयेज्ज्वरशान्तये । 'मल्लिकाकुसुमेनैव ह्यष्टोत्तरशत नपेत्" ।।११।। वगलाहृदयेनैव अष्टादशशतं तथा । अभ्रान्तं । वेदशास्त्राणां व्याख्याता भवति ध्रुवम् ॥१२॥ १. ख घ. पुस्तकद्वये पादद्वयस्थाने निम्नांशो लभ्यते - तदुपरि च..संवेष्ट्य पञ्चाशद्वर्णमादरात् । तस्योपरि च संवेष्टय वगलावीजमादरात् ।। तस्योपरि च षट्कोणे वगला चतुरक्षरी । कोणे कोणे लिखेन्मन्त्र प्रत्येक च कुमारक.॥ २ स. घ. एवं च। ३. घ. स्वर्णरोप्यादिताम्रके। ४, अस्याग्ने निम्नांशो दृश्यते- ऽधिक: ख. घ. पुस्तकयुग्मे- 'अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्या भौमवासरे। उत्तराभिमुखो भूत्वा लेखिन्या स्वर्णजातया ।। ५. घ. स्पष्परेखासु। ६ घ.--- प्रजपेद् वगलायाश्च सहन हृदयं मनु । ७. घ. सिवमन्त्रो भवेद् । . ८. घ. हयारैश्च सुबुद्धिमान् । ६. स. कुसमैश्चैव । ०कुममैदिव्यः। १०. ख घ स्यमन्तकुसमेनैव ह्यर्चयेच्छतमादरात् । ११. घ.मश्रुतान् । - 1.घ. कृष्णाष्टम्यां। 2. घ. मपवा पौणिमादिने । 3. हेमतारयो ।
८०] सांख्यायनतन्त्र - वकुलः पूजयेद्यत्रं पुत्रवान् जायते नरः । 'पलाशकुसुमैरर्चेद्यत्र राज'' कुमारक ॥१३॥ विद्यासिद्धिर्भवेत् पुत्र पूर्वसंख्याक्रमात्सुत । पद्मपत्रेण सम्पूज्य पूर्ववयंत्रमादरात् ।।१४।। कुबेरसदृशो भूत्वा 'लभते भुवि संपद.४ नन्द्यावतर्यन्त्र राज पूजयेत् पूर्ववत् सुत ॥१५॥ त्रैलोक्यं 'वशमाप्नोति पूजायाश्च प्रभावतः५ । चम्पकेनैव सम्पूज्य पूर्ववद्विजितेन्द्रियः ।।१६।। तस्य दर्शनमात्रेण वादिनां स्तम्भन भवेत् । विल्वपत्रेण सम्पूज्य पूर्वसंख्यासु 'बुद्धिमान् ।।१७।। द्रव्यलाभं भवेत्तस्य-तत्क्षणादेव पुत्रक । अशोकपुष्पैः सम्पूज्य पूर्ववद्विजितेन्द्रियः ।।१।। श्रेष्ठराज्य भवेत्पुत्र अनायासेन साधकः । केतकीकुसुमेनैव पूर्ववत्पूजयेत्सुत ।।१६।। निधान लभते तस्य शिवस्य वचन यथा । पीतवर्णेन पुप्पेण 'निर्गन्धेन सुगन्धिना'६ ॥२०॥ अर्चयेदयुतं मत्री षोडशैरुपचारकैः । वाचा' सिद्धिर्भवेत्तस्य देवीरूपो न संशय. ॥२१॥ तस्य दर्शनमात्रेण सर्वसिद्धिमवाप्नुयात् । यजेत्तद्वगलायन्त्र'' मुनिगुह्यं सुपावनम् ॥२२॥ प्रकाशयेन्न'३ कस्यापि देवताशापमाप्नुयात् । इति षड्विद्यागमे सांस्यायनतंत्रे एकोनत्रिंशः पटलः ।।२६॥ - -- - १. घ. पालाशपुष्पसंपूष्यः मत्रराजं । २. पूर्वसंख्या-पुत्रक । ३ घ. पूर्ववत् क्रौंच- भेदन । ४. घ. मोदितो मुवि सपदैः । ५. घ. वशमायाति. यावज्जीव न संशयः । ६. घ. द्रव्यलाभो। ७. घ. पुस्तक एव निम्नः श्लोको दृश्यते विशेष:-- तुलसीमंजरीभिस्तु पूर्ववत्पूजयेन्नरः । राजलाभो भवेत् सद्य प्रयत्नादेव पुत्रक ॥ ८. स. विधान। ६. घ. निर्गन्धर्वा सुगन्धिभिः । १०. घ. वाञ्छा। ११. घ. य. एतदगलामंत्र। १२. घ. न देयं यस्य । १३ घ, बगलायंत्रप्रकाशन नाम एकोनत्रिशः।
त्रिशः पटलः [८१ -- प्रथ त्रिशः पटलः ।। नमस्ते देवदेवेशि पुत्रपौत्रप्रवद्धिनी (नि)। स्तम्भनायं भजेऽहं त्वां पीतमाल्यानुलेपनाम्' ॥१॥ स्कन्द उवाच- नमस्ते सर्वसर्वेश पुराणपुरुपोत्तम । वगलाष्टाक्षरमंत्र वद मे करुणाकर ॥२॥ - उवाच- - शिव वेदादि 'विलिखेत् पूर्व'५ पाशवीजमनन्तरम् । स्तम्भमाया' ततोच्चार्य अङ्क श वोजमेव च ||३|| 'हुं फट् स्वाहा -समायुक्त मन्त्रमष्टाक्षर तथा । ब्रह्मा ऋपिश्च छन्दोऽस्य'' गायत्री समुदाहृता ।।४।। 'देवता वगलानाम्नी चिन्मयो विश्वरूपिणी ॐ बीज ह ली शक्तिश्च को कीलकमुदाहृतम् ॥५॥ न्यासविद्यां च वगलामन्त्रराजवदाचरेत् १२ । च्यान चैव प्रवक्ष्यामि मन्त्रभेदेन पुत्रक ॥६॥ युवती च मदोदितां पीताम्बरधरां शिवाम् । पीतभूषणभूषागी समपीनपयोधराम् ॥७॥ मदिरामोदवदनां प्रवालसहशाघराम् । 'पानपात्र च शुद्धिं च'१४ निभ्रती वगलां स्मरेत् ।।८ 1 एव ध्यात्वा जपेत् पुत्र वगलाष्टाक्षरीमनुम् । ध्यानेनैव' जप कुर्याद् ध्यायेदाधन्तयोस्तथा१७ 'अशोकमूले निवसन् मधुरारससंयुतम् । हरिद्रामालिकाभिश्च वर्णलक्ष जपेन्मनुम् ।।१०।। १ ग, पीतमाल्यावुलेपनाम् । २ प रा क्रौञ्चभेदन । ३ ख. घ रा. वगलामाक्षरी- मत्र । ४. ख. घ रा. ईश्वर। ५ ख. शक्तिरादौ तु । ६. ख. घ. रा. स्तब्घमायां । ७. रा. वीजमुण्चरेत् । ६. घ. मश्रमष्टाक्षरी। १०. रा छन्दोऽत्र। ११. ''अयमश ख. पुस्तके नास्ति । रा. ०वीजरूपिणी । १२. ख घ, बगला० । १३. ख. घ. ०मयोन्मत्तां । रा योधा च मदोन्मत्तां । १४. घ. रा वैरिजिह्वा पानपात्र । १५. घ. रा. मनं । १६ रा, ध्यायन । १७. ख ०पराम् । १८. घ. रा अशोकमूलमाश्रित्य हरिद्राम्बरसंयुताम् । 181 . ८ व. वगलाच । . 1 '- १२] सांख्यायनतन्त्र अष्टायुतं तर्पणं च हेतुसम्मिश्रवारिणा । तद्दशाश हुनेत् पुत्र अन्नेन' 'च सम मधु ॥११॥ १ योगिनी पूजयेत् पश्चाद् गर्भकोलागमक्रमात (मः)। ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चाच्छतं 'वाष्टशतं तु वा ॥१२॥५ एतत्मत्रस्य माहात्म्यं शिवो जानाति नान्यथा । विल्वमूले जपेन्मंत्रमयुतं ध्यानपूर्वकम् ॥१३॥ लक्ष्मीवान् जायते पुत्र दरिद्रस्तु” न संशयः । अश्वत्थमूले प्रजपेदयुत पूर्ववन्नर.' ॥१४॥ अश्रुतानां च शास्त्राणां व्याख्याता भवति ध्रुवम् । शमीमूले जपेन्मंत्रमयुतं पूर्ववन्नरः ॥१५॥ भ्रष्टराज्यं लभेत्पुत्र'' अनायासेन निश्चितम्'२ । वदरीमूलमाश्रित्य अयुत पूर्ववज्जपेत् ॥१६॥ वशीकरणसम्मोही 'जाय (ये)ते नात्र संशयः१५ उदम्बरतरोमूले ६ पूर्ववज्जपमाचरेत् ।।१७॥१७ कुबेरसदृशः श्रीमान् जायते नात्र संशयः । कदलीमूलमाश्रित्य पूर्ववज्जपमाचरेत्१८ ॥१८॥ -- 18 तदद्धकम् । - १. ख. आज्येन । रा. तत्फलं । २ रा. कुसुमं मधु । ३. घ. रा. पुत्र शतं । ४. रा. वा तु ५. ख घ. रा पुस्तकेपु विशेषः पाठो दृश्यते- घ. रा. ध्यानोक्ता बगला देवी चमंदग्दर्शनीमवेत् । ख. ईमदर्शने भवे देवि नान्यथा शिवभाषितम् । ६. स. घ. दरिद्रोऽपि । ७. घ. ध्यानपूर्वकम् । ८. ख घ. अश्रुतानि । रा. अश्रुतं । ६. स्व. घ. शास्त्रारिण। रा वेदशास्त्रारणां। १०. ख. प्रजपेन्नर । ११. ख. भवेत् १२. स. रा. पुरक । १३. रा. ०भर । १४. श्लोकोऽयं नास्ति घ पुस्तके । १५ रा. स्वभावेनव जायते । १६. घ. प्रोदुम्बर० । १७ घ. पुस्तके श्लोकोऽय नास्ति १८ घरा. अयुत पूर्ववत् जपेत् । १६. घ. पुस्तके पद्यमदो नास्ति । उद्यो।
एकत्रिश पटल ३ 'प्रयोगादीनि सर्वाणि सर्वसिद्धिर्भवेत्सुत" ।।१९।। ।। इति पविद्यागमे सास्यायनतन्ने त्रिंशत्पटलः२ ॥३०॥ ॥ अथ एकत्रिशः पटलः ।। विराटस्वरूपिणी देवी विविधानन्ददायिनीम् । भजेऽहं बगलां देवी भक्तचिन्तामणि शुभाम् ||१|| फोन्चभेदन उवाच- चन्द्रोपेन्द्रमहेन्द्रादिसनुतः सर्वमङ्गला(ल) । व गलाष्टाक्षरीमन्त्र(न्त्र) प्रयोगान्" वद शङ्कर ।।२।। १. ख. पुस्तके एतदशस्थानेऽयमशः समुपलभ्यते- 'प्रयोगादौनि सर्वाणि पूर्ववत्कारयेत् सुधी. । एतत्क्रमेणव पुत्र , बगलाप्टाक्षरोविधि. । सक्षेपेन मया प्रोक्त किमन्यच्छोतुमिच्छसि ।। प्रस्याने निम्नांशो घ पुस्तक एव दृश्यते- प्रयुताल्लभते भोग वाञ्छितं शिवता इव । पूगीवन समाश्रित्य अयुत पूर्ववज्जपेत् ॥१६॥ निक्षेपं लभते पुत्र प्रयुतान्मासमाग्रतः । जवीरतरुमाश्रित्य अयुतं पूर्ववज्जपेत् ॥२०॥ राजा चैव यथो भूत्वा सर्वस्वं दीयते ध्रुवम् । उद्यानवनमाश्रित्य प्रयतं पूर्ववरजपेत ॥२१॥ यं य वापि स्मरेत् पुत्र त तं प्राप्नोति निश्चितम् । पुष्पवाटया जपेन्मत्रमयुत पूर्ववत् सुत ॥२२॥ राजलामो भवेत्तस्य नात्र कार्या विचारणा। नदीतीरे जपेन्मंत्रमयुतं पूर्ववन्नरः ॥२३॥ पुत्रवान् जायते लोके धनधान्यादिसंयुतः । एतन्मत्री जपेन्मत्र ततत्फलमवाप्नुयात् ॥२४॥ एतदद्वाक्षरीमत्रं सर्वमंत्रोत्तमोत्तमम् । प्रयोगादीनि सर्वारिण सर्वसिद्धिर्भवेत्सुत ।।२।। २. अष्टाक्षरीप्रयोग नाम त्रिशत्पटल.। ३: रा० नमस्ते लोकजननी(नि) व्यासवाल्मीकिवन्दिते । स्तम्ब (म्म नास्त्रस्वरूपिण्यै वगले ता नमाम्यहम् ।। ४. रा० इन्द्रोपेन्द्र महेन्द्रादिसन्तुष्ट । ५ रा. प्रयोग। - ८४ ] सांस्यायनतन्त्र wwwww ईश्वर उवाच- सर्षपं लवण चैव चिताभस्म सम समम् । अर्कक्षीरेण खल्वेन मईयेत्' सूक्ष्मतोऽनघ ।।३।। अङ्ग,ष्ठमात्रां कृत्वा तु पुत्तली पूर्ववत् सुत । बदरीकण्टक चैव सर्वाङ्गे तस्य लेपयेत् ॥४॥ आरनालस्य भाण्डे तु अघोमुखी विनिक्षिपेत् । 'अङ्गारवासरे पूज्या पुनस्तत्रैव निक्षिपेत् ।।५।। एवं मासत्रयं कृत्वा 'जिह्वास्तभं भवेद् रिपोः८ । रवी रात्री च सगृह्य चिताभस्म समादरात् ॥६॥ बगलाष्टाक्षरीमत्रं 'अयुतं मत्रयेत्"° सुत । खाने पाने च तद्भस्म दातव्यं वैरिणस्तथा ॥७॥ जिह्वा मुखं च कर्णाक्षिपादादिस्तभन' 3 भवेत् । तेनैव म्रियते शत्रुर्मासान्मण्डलमात्रतः'४ ॥८॥ पारनालेन'५ तद्भस्म रहस्येन विनिक्षिपेत् । तदन्न भक्षणेनैव बुद्धिभ्रंशोऽपि ७ जायते ॥६॥ तद्भस्म तिलतलेन शिरोभ्यङ्ग समाचरेत् । तेनैव तत्क्षणात् पुत्र' चित्तचाञ्चल्यवान् भवेत् ||१०॥ तद्भस्म चूर्णमिश्र 'कृत्वां चूल च वर्णकम् २१ । 'तेन शत्रुस्तत्क्षणाच्च१२ बुद्धिजाड्यो भवेद् ध्रुवम् ।।११।। विप्रचाण्डालयोः शत्यं ३ (सत्य) प्रेतवस्त्रेण वेप्टयेत् । बगलाष्टाक्षरीमत्र २४ मंत्रयित्वा सहस्रकम् २५ ॥१२॥ - रा. १. रा. मदयं । २ रा. सूक्ष्मतो मुखम् । ३.७. मात्र ४ रा. ०कण्टकान् । ५. रा. निक्षिपेत् । ६. रा अधोभागे। अङ्गारवारे सम्पूज्य । ८. रा शत्र स्वम्भो भवेद् ध्र वम् । ६ रा सग्राह्य। १०. रा मन्त्रयेनयुत । ११ वैरिणा तथा। १२. रा. मतिः। १३. रा. कर्णादि०। १४ रा. शत्र मण्डल नात्र संशयः । १५. रा. पारनाले च । १६. रा. च निक्षिपेत् । १७. रा. वुद्धिभ्रष्टोऽभि । १८ रा. शत्र १६ रा. चित्तं चाञ्चल्यवान् । २०. रा. मिश्र तु । २१. रा. कृत्वा ताम्बूल- चर्वणम् । २२. रा कृत्वा तत्क्षणाच्यत्रु । २३. रा. शल्य । २४. रा, बगलाष्टाक्षर २५. रा मयस्नकम् । मन्त्रः। -- एकत्रिशः पटलः [ ८५ रवी रात्रौ शत्रुगेहे' ईशान्ये नव(चैव) निक्षिपेत् । मण्डलांतद्ग(तगृहस्थोऽपि म्रियते नात्र संशयः ॥१३॥ कटकं पुरपक्षस्य त्रिसहस्र तु मन्त्रयेत् । निक्षिपेच्छत्रुसदने नित्य कलि]हमाप्नुयात् ।।१४।। काकोलूकदलं चैव 'भौमे वा रविवासरे'५ । संग्रहेत् प्रेतवस्त्रेण वेष्ट्येद् रविवासरे ॥१५॥ निक्षिपेद् रविवारे तु रिपु(पो)र्गेहे तु बुद्धिमान् । न (गृहविद्वेषणं सद्यो जायते नात्र संशयः ॥१६॥ सर्प(4) मण्डूकयोः शल्यं प्रेतरज्वा तु वेष्टयेत् । निक्षिपेच्छत्रुसदने स शत्रुारवशिष्यति ॥१७॥ मार्जारवालरोमाञ्च (णि)८ रवी रात्री च सग्रहेत् । प्रेतवस्त्रं रवौ ग्राह्यं शिवनिर्माल्यमेव च ॥१८॥ रवी रात्रौ च संग्राह्य नरास्थि च समं समम् । चूर्ण (९) कृतं तु तत्सर्वं मन्त्रयेदयुतं तथा ॥१९॥ धूपयेच्छत्रुसदने तस्य संचारयो(ण)-स्थले । 'त पर्वासने शत्रु को१० ॥२०॥ तच्चूर्ण देवतागारे भृगुवारे च धूपयेत् । 'पलायते च तन्मंत्री शिवस्य वचन यथा ॥२१॥ गजाश्ववृषभोलूकमहिपोरगकुक्कुटम् १२ । तच्चूणं धूपयोगेन सर्व तृणजलादिकम् ।।२२।। म्रियते सप्तरात्रेण स्वेदजाण्डपिंज(ड) जा. एतच्चूर्णं वृक्षमूले घूपयेच्च कुमारक ॥२२॥ फलितं पुष्पित वाथ स्थूलवृक्षमथापि वा। 'सप्ताहात् शुष्कता'१५ याति सिद्धियोगः कुमारकः ॥२४॥ भवति तत्क्षणात् ५३ १. रा. गृहे। २. रा मण्डलं तु ग्रहस्तोपि । ३. रा कठक। पुष्टिश्च । ५. रा. भोमवारस्य वासरे। ६ रा सु । ७ रा. गृहे । ८ रा मार्जारी- रोमवालं च । ६. रा. चूर्ण कृत्वा । १०. रा. धूपवासने शत्रुश्च मूको । ११. रा पलायंती वनं मूत्ति। १२. रा. ०कुटाः। १३. रा श्वेताश्चांडजापि च । १४. २. •त्तु। १५. रा. समाहाच्छुष्कांतं ।
८६ ] सात्यायनतन्त्र . मृगाणा' १ चैव शत्रूणां खाने पाने प्रयत्नतः । बुद्धिनाशो भवेश्छत्रु (त्रो) स्त्रिदिन भक्षणात् सुत ।।२।। प्रजा' बुद्धि श्रिय चैव ऐश्वयं हरते नृणाम् । एतच्चूर्णप्रयोगं च ऋषीणामपि दुर्लभम् ॥२६।। चिताभस्म रवी रात्री संग्रहेच्च तदर्भक । अयुत मन्त्रयित्वा तु रिपुमूनि विनिक्षिपेत् ॥२७॥ काकवद् भ्रमते शत्रुमहि (ही)मामरणान्तिकम् । 'शिलामामलकं प्रस्थ'८ सहस्र साहेद् बुधः ॥२८॥ 'पर्कवारे तु सध्याया' मत्रेणकेन मन्त्रये त्] मत्रित 'निक्षिपेद् दूरे (द्वारे)११ दक्षिणाभिमुखेन च ॥२६॥ नित्यं चैव सहस्र तु निक्षिपेद् दशवासरे १२ उच्चाटन भवेच्छत्रो न्यथा शिवभाषणम् ॥३०॥ धत्तूरपत्रमादाय सहस्र मन्त्रयेन्निशि । प्रेतवस्त्रण सवेष्टय भौमे शत्रुनिकेतने ॥३१॥ निक्षिपेद् द्वारदेशे तु मूको भवति तद्रिपुः । तन्मार्गे सचरेद् यस्तु तत्सर्वेऽप्यरिमन्दिरे ॥३२॥ 'खरबालं च रोम च'१४ प्रेतरज्जुस्तथैव च । मन्त्रयेदयुत मंत्र'६ निक्षिपेच्छत्रुमन्दिरे ॥३३॥ पक्षाद् वा मासयोगेन् ‘स शत्रुर्बान्धवैः सदा१७ म्रियते नात्र ८ सन्देहो नात्र कार्या विचारणा ॥३४॥ एतच्च बगलामन्त्रप्रयोगं ६ भुवि दुर्लभम् । गुरुपुत्राय दातव्य' न दद्याद्२२ यस्य कस्यचित् ॥३५॥ इति बी२ ३ सात्यायनतन्त्रे 'अष्टाक्षरीप्रयोगं नाम'२४ एकत्रिशत्पटलः । १. रा. पितृणां । २. रा. भक्षयेत् । ३. रा. प्रज्ञां। ४, रा हनते । ५. रा. प्रयोगः। ६. दुर्लभः। ७ रा. सग्रहेत। ८, रा. शटालूमूलकेनस्थ । 8. रा.अव- काशपिसंख्यायां। १० रा तं वदेत् । ११. रा. विनिक्षिपे । १२. रा. ०वासरम् । १३. रा प्यतिमन्दधी। १४. रा. खरबालकरोमाणि। १५ १६. रा ०दयुतमन्त्र । १७ रा. बुद्धिनाशनपूर्वकम् । १८. रा, न च । १६. रा. ०प्रयोगो। २०. रा. दुर्लभः। २१. रा. दातव्यो । २२. रा. देयो। २३. रा. श्रीषड्विद्यागमे । २४. रा. नास्ति।
द्वात्रिंशः पटलः [८७ - ।। अथ द्वात्रिंशत्पटलः ।। मन्त्रादी तव बीजपूर्वकमथ क्ली ब्लू म्लू' सौ ग्लो जपान्]', तावद्]िध्यानपराय[ण:) प्रतिदिनं पीत्ता (ता)क्षमालाधरः। साध्याकर्षणवश्यमाशु बगले साध्यस्य शीघ्र भवेत्, प्रेतात्यासनपूविके' विवसने तत्प्रेमभूमौ निशि ॥१॥ मौञ्चभेदन उवाच- नमः पापविदूराय नमस्ते चन्द्रशेखर । बगला चोपसहारविद्यां वद सुपावनी[म् ।।२।। ईश्वर उवाच- ब्रह्मास्त्रस्तम्भिनी काली विद्या चास्त्रसुपावनी । तस्यास्तत्स्मरणादेव बगला शान्तिमाप्नुयात् ॥३॥ तद्विद्यां च प्रवक्ष्यामि शान्तौ तच्छृणु' षण्मुख । उच्चरेच्छतिवाराहं वाराह" तदनन्तरम् ।।४।। वाग्वीजं च ततो(थो)च्चार्य भुवनेशी'२ ततः परम् । महामायां' ततो (थो)च्चार्य श्रीबीजं तदनन्तरम् ।।५।। कालीशन्दद्वयं ४ चोक्ता (स्त्वा) महाकालीपद'५ वदेत् । एहि शब्दद्वयं चोक्त्वा कालरात्री (त्रिपद वदेत् ।।६।। स्फुरदय समुच्चाय्यं प्रस्फुरद्वितयं लिखेत् ||७|| स्तंभनास्त्रपद चोक्त्वा शमनीपदमुच्चरेत् । हुँ फट् स्वाहा-समायुक्तं मन्त्रमेवं समुद्धरेत्'८ ||८|| पंचाशद्ध्वं मंत्रस्य ६ वर्णत्रयविभूषितम् २० । ब्रह्मास्त्रस्तभिनीकालीमन्त्रमेतन संशयः ॥९॥ पलाशमूलमाश्रित्य लक्षमेकं जपेत्]स्मयः । तप्पयेत्तद्दशांशेन' कर्पू रमिश्रित जलै:२३ ॥१०॥ १. रा. नास्ति। २ रा सौ। ३. रा जपे। ४. रा. ०परायण। प्रताध्यासन०। ६. रा. वगला। ७. रा चास्ने सु। ८. तस्य स्मरणमात्रेण । ६ क सान्त। १०. रा. च शृणु। ११. रा हङ्कार। १२. रा. भुवनेश । १३. १४, रा. कालि०। १५. रा. महाकालि । १६. रा महामोहद्वय । १७. रा. वदेत् । १८. रा. समुच्चरेत् । १६. रा मन्मस्तु । २०. रा. नवकेन विभूषितः। २१. रा जपेन्नर । २२. ०४६शाशश च । २३. रा. जलम् । . २२ ५ रा. रा.मम माया ।
६६ ] सारयायनतन्त्र 1. 7 पलाशपुष्पैर्जुहुयाच्चतुरस्र च कुण्डले (के)। ब्राह्मणान् भोजयेत् पुत्र' सहस्र शतमेव वा ।११।। मन्त्रसिद्धिमवाप्नोति देवता च प्रसीदति । ब्रह्मा ऋषिश्च छन्दोऽय (स्य) गायत्री समुदाहृतम् ॥१२॥ देवता कालिका नाम स्तंभनास्त्रविभेदिनी । ध्यान यत्नात् प्रवक्ष्यामि मन्त्रभेदेन पुत्रक ।।१३।। काली करालवदनां कलाधरधरां शिवाम् । स्तम्भनास्त्रकसहारी ज्ञानमुद्रासमन्विताम् ||१४।। वीणापुस्तकसंयुक्ता कालरात्रि नमाम्यहम् । बगलास्त्रोपसहारीदेवता विश्वतोमुखीम् ॥१५॥ भजेऽह कालिका देवी जगद्वशकरा शिवाम् । एव ध्यात्वा तु मन्त्रज्ञः प्रजपेच्छुद्धि (ख) मानसः ॥१६॥ वक्ष्येऽह चोपसहारक्रम लोकोपकारकम्''। जम्बीरफलमादाय मन्त्रयच्छतमादरात् ।।१७।। भक्षयेत् प्रातरुत्थाय निद्रान्ते च कुमारक । एव. चार्कदिन कृत्वा जिह्वस्तिम्भादिकृत्तिमम् ।।१७।। सद्यो नर्मा(म)ल्यमाप्नोति तमः सूर्योदये यथा । रवी श्वेतवचा' २ ग्राह्य मन्त्रयेच्छतमादरात् ।।१६।। प्रातःकाले भक्षयित्वा त्रिसहस्र मनुं जपेत् । वाच मुख पद चैव 'जिह्वा बुद्धीन्द्रियाणि च'१४ ॥२०॥ स्तम्भित मन्त्रयोगेन तत्सर्वं शान्तिमाप्नुयात् । ताम्रपाने समादाय नदीजलमकल्मषम् ॥२१॥ शतवार मन्त्रयित्वा प्राशयेच्छान्तिमाप्नुयात् गोमूत्र चैव संगृह्य मन्त्रयेच्छतमादरात् ।।२२।। १. रा. पश्चात् । २ रा समुदाहृत.। ३. रा. नाम्नी। स्त्रकमेदिनी। ५ रा. कलाधारवरी। ६. रा. स्तभनास्त्र फसहारि वंदेह भद्रकालिकाम् ॥१४॥ स्तभनास्त्रोपसहारि ज्ञानमुद्रासमन्वितम् (ताम्) । ७, रा. बगलास्मोपमहारि विश्वतो। ८. रा. देवतामुखी। ६. रा. जाड्यवश्यकरी । १०. रा. सिद्धि । ११. रा. कोलोपकारकम् । १२. रा. श्वेतवला । १३. रा वाचा। १४. रा. जिह्वायुद्धचादिकान्यपि । १५. रा. श्लोकादमिदं नास्ति । १६. रा. तु षण्मास । -- 1 १५ ६ ४. रा. स्तम्भना- द्वात्रिंशः पटलः [ ८६ एवं कृत्वा जपेन्मन्त्र' उन्माद' शान्तिमाप्नुयात् । मन्त्रयेदारनालं च प्रातः प्रात: पिवेन्नरः ॥२३॥ मण्डलज्वररोगं च नाशमाप्नोति निश्चितम् । 'अष्टोत्तरं मन्त्रयित्वा धारोलव' पिवेन्नरः ।।२४|| यक्षवूप समानीता. गर्भस्तभनदोषं च मण्डलाच्छान्तिमाप्नुयात् । भस्म च मन्त्रयेत् प्रात: त्रिसप्त त्रिंशतेन वा ॥२५॥ तक्रेण" सहितं पीत्वा त्रिसहन दिने दिने । वगलामंत्रयोगेन एतत्प्राणसमुद्भवः ॥२६।। नाशयेदाशु तत्सर्वं तुलराशिमिवानलः । मत्रयेच्छतमादरात् ॥२७॥ धूपयेत्तेन सर्वाङ्गं दशरात्र कुमारक । यक्षघूपोद्भव' चैव प्रयोगं चैव कृत्तिमम् ।।२।। तरक्षणान्नाशमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा। रवी ब्राह्मी समादाय छायाशुष्क समाचरेत् ॥२६॥ मन्त्रयेत् त्रिसहल तु भक्षयेत् प्रातरेव च । एतद्विद्या जपेनित्य त्रिसहस्रं कुमारक |॥३०॥ वगलास्त्रकृत'४ यद्यत् प्रयोगं दुर्लभम् भुवि । तत्सर्व नाशमाप्नोति मासं मण्डलमात्रतः ।।३।। ब्राह्मीरस समादाय मन्त्रयेच्छतघा पुन. । शर्करासहितं पीत्वा सहस्र जपमाचरेत् ॥३२॥ नानाकृत्तिमदोषं च बगलामन्त्रत:१५ अमङ्गल्यो [द्] भवं नाथ भूतले यदि दुर्लभम् ।।३३।। कृतम् । १. रा. तु षण्मासं । २. रा. उन्मादः। ३. रा मष्टोत्तरशत मन्त्र धारोष्णं च । ४. रा. मण्डलान्नाशमा० । ५. रा मत्रयन् । ६. रा सप्तमेव । ७. रा. मन्त्रणा ८. रा. यद्यद्रणसमुद्भवम् । ६ रा वृक्षधूपं । १०. रा समानीय । ११. रा. वृक्षधूः पोद्भव । १२. रा नाश । १३. रा. समाहरेत् । १४ रा. बगलाधिकृत । रा. गर्ने वा यन्त्रित । १६. रा.वाघं। १७. रा. यत्तु।
६० ] सांख्यायनतन्त्रे मण्डलानाशमाप्नोति तमः सूर्योदये यथा । एतद्विद्या साम्प्रदाय' गुरूक्तान् लब्धमन्त्रवान् ॥३४॥ लक्षमेकं जपेन्मन्त्री प्रयोग नाशमाप्नुयात् । अशक्तश्च स्वयं पुत्र 'कुर्वते ब्राह्मणामपि ॥३५॥ द्विगुणां जपमाप्नोति तमा सूर्योदये यथा । एतद्विद्या सम्प्रदाय वद्वये ब्राह्मणानपि ॥३६॥ द्विगुण जपमात्रेण सर्वशान्तिमवाप्नुयात् । एतद्विद्यां विना पुत्र की च बगलामुखि (खीं) ॥३७॥ प्रयोगशान्ति भवेन्]ि मंत्रयन्त्रौषधादिभिः । सप्तकोटिमहामत्रप्रयोगेषु च पुत्रक ॥३॥ एतद्विद्यापुरश्चर्या नाशयेदाशु निश्चयम् ॥ नमः श्रीकालिकादेव्यै कालरात्र्यै नमो नमः ॥३६॥ उपसंहाररूपिण्यै देव्यै नित्य नमो नम.'' ॥४०॥ इति भीषविद्यागमे साख्यायनतत्र 'प्रयोगसंहार नाम'' द्वात्रिंशत्पटलः ॥ . ॥ अथ त्रयस्त्रिशत्पटलः ।। पीनोत्तुङ्गजटाकलापविलसद्भालेन्दुसच्छेखराम,१२ बिभ्राणा शितशान्तकुम्भमुकुटां' (ट)नेत्रत्रयालड कृताम् । शब्दब्रह्ममयी त्रिलोकजननी शक्ति परा शाम्भवीम्, देवीश्रीबगलां सुरासुरवरैरभ्यर्चिता भावयेत् ॥१॥ कोच्चभेदन उवाच- नमः शिवाय साम्बाय ब्रह्मणेऽनन्तमूर्तये । वद मे चोपसहार यत्र लोकोपकारकम् ।।२।। १. रा. समादाय । २. रा. गुरुतो । ३. रा. ०मन्त्र । ४. रा. प्रार्थयेबा- ह्मणानपि । ५. रा. पद्यमिद नास्ति। ६. घशान्ति न। ७. घ. नाशयेरुण। ८. घ. निश्चय.। ६. रा. पद्यादमिदं नास्ति। १०. रा, पद्यामिदं नास्ति। ११. रा नास्त्त्ययमंशः। १२. रा. ०बालेन्दु०। १३. रा. सित। १४. घ.श्रीबगला ब्रह्मास्त्रयीसुरनशैरभ्यचितामाश्रये ।
M प्रयस्त्रिंश. पटला -- ईश्वर उवाच- कपिलानवनीत चे कंदलीपत्रमध्यतः' । लिप्त्वा' मत्र' लिखेत्तत्र 'कृत्वा पूजा" च साधकः ।।३।। Aषट्कोणं चाष्टकोणं च वृत्तं भूपुरमेव च । षट्कोणकर्णिकायां व (च)षट् बीजानि मनोलि खे]त् ॥४॥ शिष्टाक्षराणि कोणेषु ब्रह्मास्त्रस्तम्भिनीमनुः । अष्टपत्रे लिखेन्मत्र तायमालामनुस्तथा ॥५॥A कोऽयस्ताक्ष्यमनुश्चेति वक्ष्येऽह मन्त्रनायकम् । B प्राद्यवर्ण समुच्चार्य ताक्ष्यबीजं ततः परम् ॥६॥ ॐ नमो पदमुच्चार्य पश्चाद् भगवते पदम् । ताlबीजं पक्षिराजायोक्त्वा ताक्ष्य ततः परम् ॥७॥ सर्वशब्दं तती (थो) च्चार्य अभिचारपद वदेत् । ध्वसकाय पदं क्षीमो हुँ फट् स्वाहा-समन्वितम् ।।८॥ B ताक्ष्यस्य मालामन्त्रश्च द्वात्रिंशद्वर्णसंयुतम् । अष्टपत्रे वेदवेदवर्णान् पूर्वादितो लिखेत् ।।६।। 4 । ५ " 10 १. रा. कदलीपण तथा । । २-३. घ.लिप्य यंत्र। ४. रा. यन्त्रमध्ये। A-Aचिह नान्तर्गताशस्थाने रा० पुस्तके निम्नांश एवोपलभ्यते- षट्कोणमध्ये विलिखेद्ब्रह्मास्त्रस्तभिनीमनुः । प्रष्टपत्रे लिखेन्मन्त्रं ताक्ष्यमालामनुस्तथा ।। B-B चिहनान्तर्गताशस्थाने रा० पुस्तके निम्नाङ्कित. पाठभेदो दृश्यते अन्त्यवर्ण समुच्चार्य चतुर्थस्वरपूर्वकम् ॥४॥ बिन्दुना भूषित 'पुत्रं ताक्ष्यं एकाक्षरी तथा ।। ॐकारबीनमुच्चार्य तायवीज ततः परम ॥ ॐ नमो, पदमुच्चार्य ततो भगवते पदम् । पक्षिराजा उच्चायं अभिचारपद वदेत् ।। ध्वंसकाय पंद चोक्त्वा हु फट् स्वाहासमन्वितम् ॥६॥ पत्रः-ॐ क्षीं नमो भगवते पक्षिराजाय अभिचारादिसकलकृत्रिमध्वंसकाय फट् स्वाहा । ५. श्लोकस्थास्य रा० पुस्तके निम्नोऽयं पाठभेदः- मालामत्र साक्ष्यविद्या पविशद्वर्णसंयुता ॥ प्रष्टपत्र लिखेंत्तत्र प्रादक्षिणक्रमेणं तु ॥७॥ L 1 ।
१२] सांत्यायनताले : - - है ६ - 1 . L प्राणप्रतिष्ठा यंत्रस्य' पाद्यवृत्ते लिखेत् सुत । तदुपरि लिखेद् वर्णान् पञ्चाशल्लिपिसयुतान् ॥१०॥ पाशाङ्क शं च विलिखेद् भूपुरेषु यथाक्रमम् । अष्टकोणे लिखेद वर्णान् वज्रान्ते वर्म फट तथा ॥११॥ एवं लिखित्वा यत्रं च पूजयेन्मानसेन तु । एव कृत्वा तु तत्सर्वं नवनीत कुमारकं ।।१२।। भक्षयेद् बदरीमानं सायं प्रातस्तु बुद्धिमान् । देवतावेशमतुलं. मन्त्रयन्त्रादिकृत्रिम.' ॥१३॥ शल्यदारुमय 'तत्र प्रयोगं बगलाश्च यत् । नाशयेन्मण्डलादेव शि [व] स्य वचन यथा ॥१४॥ एतद्यन्त्र हृदि ध्यायेद् दु.खकाले सुबुद्धिमान् । दशरात्राद् व्यपोहंतु(ति) दारुणपि कृलिम.६ ॥१५॥ रौप्य वा स्वर्णपट्टे वा लिखेद् यत्रमिमं बुधः । पूजयेद् रक्तपुष्पेण, षोडशरुपचारकः ॥१६॥ कण्ठे वा बाहुमूले वा शिखाया वा कुमारक ! -. बंधयित्वा वाभिचार नाशमाप्नोति निश्चतम् ॥१७॥ नागवल्लीदलेनैव 3 एतद्यत्र कुमारक । चूर्णेन विलिखेत् सम्यक् पूर्व ताम्बूलचर्वणम् ॥१८॥ एव कुर्यात् प्रातरेव तद्वत् सायं समाचरेत् । मासत्रयं ४ चरेदेवं कृत्रिम हरते नृणाम् ।।१६॥' कुर्यात कृत्रिमरोगेण पीडिताय कुमारक। .. तत्कार्य गौरव चैव लाघव चावलोकयेत ॥२०॥ पक्ष वाथ त्रिसप्ताह मास वा मण्डलं तथा.! यथा योषित्रियुक्त १८.च तावत्कालं कुमारक ॥२१॥ १. रा, मन्त्र तु। २. रा. ०वणं । ३. रा. रणसंयुतम् । श्लोकोयं रा पुस्तके नास्ति । कत्रिमः। रा. पाच बगलायोग. ८. रा. दारुणानपि। ६. रा. कृत्रिमान् । १०. रा. बुधः। ११. रा रक्तपुष्पैस्तु । १२. रा. निश्चयात् । १३:रा. चैवा १३.रा. चैवा' १४. रा. मासमान। १५. रा पुस्तकेऽतः परं विशोषोऽय श्लोको दृश्यते- स्तम्भनास्त्रोपसहार मन्त्रेण प कुमारक । मार्जनं बिल्वपत्रण प्रारोहादवरोहकम् ॥१७॥ १६. रा.. लोकयन् । १७. रा. त्रिसप्ताथ। १5, रा. व्याधिविमुक्त। ६ . ४. रा.वन. ५. ६. रा. ७. मात्रतः। ग .h.au स्त्रिंशः पटलः । - - - अनेन (नया) विद्यया पुत्र मार्जनं मुनिसमतम् । अथवा मन्त्रितं तोयं , सद्यः कृत्रिमनाशनम् ।।२२।। भूपुर वृत्तयुग्म च तन्मध्ये च कुमारक । पञ्चकोण लिखेत् सम्यक् तन्मध्ये चन्द्रमण्डलम् ।।२३।। इन्द्रमध्ये लिखेद् विद्यां कृत्रिमध्नी' च कालिकाम् । मनुरेव लिखेत् सम्यक् स्यष्टवणेन सयुतम् ॥२४॥ पञ्चकोणे लिखेन्मन्त्र 'पञ्च ब्रह्मास्यमेव च । आद्यपत्रे लिखेमन्त्र प्राणस्थापनक तथा ॥२५॥ । द्वितीये -विलिखेत् सम्यक् पञ्चाशद्वर्णमादरात् । पाशाङ्क शंवि लिखेद् भूपुरेषु चयथाक्रमम् ।।२६।। एतद्यन्त्र लिखेद् भूर्ये कसूर्या (स्तूर्या) क्रौञ्चभेदन । यन्त्रे प्राणान्' प्रतिष्ठाप्य पञ्च ब्रह्ममन जपेत् ॥२७॥ निसहन सहस्र वा त्रिशतं शतमेव च । ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चाद् वित्तशाठ्य न कारयेत् ।।२।। तद्यत्रधारणादेव कृत्रिमादिरनेकशः तत्क्षणान्नाशमाप्नोति जीवेद्'२ वर्षशतं तथा ॥२६॥ एतद्यन्त्र' हृदि ध्यात्वा मानसेनैव पूजयेत् । त्रिसप्तदिनमात्रेण नानाकृतित्रमनाशनम् ॥३०॥ ताम्रपान जल ग्राह्य श्रीसूक्तेनैव मन्त्रयेत् । शतं वार्द्धशत वाथ त्रिसप्तमथ पुत्रक ।।२१।। तुलसीमजरीभिश्च नार्जयेद् रोगपीडित:१४ ॥ प्रारोहादवरोहेण ऋचान्ते मार्चनं तथा ॥३२॥ त्रिकालमेककाल वा मायेद् ध्यानपूर्वकम् । त्रिमोथं च यद्रोग नाशमाप्नोति निश्चितम् ॥३३॥ श्रीसूक्तेनैव जिह्वायां मार्जयेत् तुलसीदलः । त्रिसप्तप्रातरुत्थाय जिह्वास्त [भ]नशान्तिकृत्. ॥३४॥ १. रा मुनिसतम् ।। २. रा तोयः । ३ रा चन्द्रमध्ये। ४. रा. कृत्तिमम्ने। ५. रा मष्टवर्गेण ।'६. रा. पञ्चवर्गेण । ७.८. रा.म:। ९. रा यंत्रणा १६: प्राण ।' ११. रनेकतः। १२. घ. जपेद् । १३. रा. एवं यंत्र । पोस्नेि। १६. कृत्तिमोघ (य)। १७. रा. शिसहस्र । । -- + M १५ रा. रोग, -- १४ ] सांख्यायनतन्ये गोक्षीर प्रातरुत्थाय श्रीसूक्तेनैव मंत्रयेत् । दशवार' ध्यानपूर्व तत्क्षीरं प्राशयेन्नरः ॥३५॥ कौटिल्यस्थापन चैध मार्जयेन्मूलविद्यया । पुत्तल्यादिप्रयोग च नाशमाप्नोति निश्चितम् ॥३६।। ताम्रपाने जल शुद्ध मंत्रयेदर्कसख्यया । तज्जलप्राशनादेव बुद्धिभ्रंशो' विनश्यति ॥३७॥ उष्णोदक ताम्रपाने त्रिसप्तमभिमंत्रयेत् । नानाशूलं च हृद्रोग नाशमाप्नोति पुत्रक ॥३८॥ इति श्रीषविद्यागमे स्तंभनास्त्रोपसहार' नाम त्रयस्त्रिशत्पटलः । ॥ अथ चतुस्त्रिशः पटलः ॥ विश्वेश्वरी विश्ववन्द्या विश्वानन्द स्वरूपिणी । पीतवस्त्रादिसन्तुष्टा पोतद्रुमनिवासिनी ॥३॥' कोचभेदन उवाच विश्वाराध्य भवानीश विश्वोत्पत्तिविधायक' । 'भ्रूहि मे कृपया तात सकलागमकोविद ॥२॥ ईश्वर उवाच- समस्तकम्र्मणां ध्वंसे सर्वोपद्रवनाशने । जातिस्तम्भे मनःस्तम्भे क्रूरकर्मनिवारणे" ॥३॥- अष्टदेतालशमने सर्वभैरवनाशने' मातृ णा शान्तिजनकं स्तम्भनं जलरक्षसाम् ॥४॥ . 'देवदानवदैत्यारीन् (रि)शमने भ्रमनाशने' समस्तोपद्रवध्वंसे पूतनादिविताशने ॥५॥ 1 . -- १. रा. पूर्ववत्सीरं प्राशयेनर तत्परः । २. रा. खिम्रान्तो। ३. रा. पुस्तके 'सांख्यायनतन्त्रे' इत्यधिकः पाठः ४. रा. उपसहारप्रयोग । ५. रा. पीतवस्त्राथ० । ६. ख पुस्तके- ईश्वरी विश्ववंद्या च विश्वानन्तररूपिणी । पीतवस्तुदय तुष्टा पीत हृदयनिवाशिनीम् ।। ७. ख. ०गुणाकर । रा. ०कुमारक । . ८. ख. रा. पद्यार्ट मिद नास्ति। ..ख.,समस्ते । १०. ख परकृत्यानिवारणे। ११: रा. सर्वमयविनाशिनी। १२. ख. देवदानवदैत्या- दिशमनोऽन्न विनाशने । १३. ख. पूजनादिविचारणे । - - T + चस्त्रिशः पटलः [ ६५ कपटादिविनाशार्थे प्राप्ते प्राणस्य सङ्कटे । विशन्मनुविनाशार्थे पत्रिंशद्रोगनाशने ॥६॥ सूचिप्रयोगविध्वसे महाशस्त्रास्त्रपातने । गतिस्तम्भे मतिस्तम्भे सूर्याग्निस्तम्भनेषु च ॥७॥ नानारोगविनाशार्थ नानाक्लेशनिवारणे । रणे राजकुले शान्तो प्रयोगनाशतेऽपि च ||८|| परप्रयोगविध्व से परकृत्यातिवारणे । कृत्यावेशस्तम्भनोऽय प्रयोग षण्मुखाचर ॥६॥ अनेन योगवय्येण सर्वदोषनिवारणम् । शृणु षण्मुख तद्योग सर्वयोगोत्तमोत्तमम् ।।१०।। 'पीतावरणभूषी च पीतवस्त्रद्वयान्वितः" । पीतयज्ञोपवीतस्तु महापीताश (स)ने' स्थितः २ ॥११॥ 'ज्वालामुख्यभिध वाण त्रिशतं प्रजपेत् सुत3 'हरिद्राक्षमरिंग पीत'१४ सर्वकार्य जपादिकम् ॥१२॥ वडवानल नामानं बारणमादी जपेच्छतम् । उल्कामुख्यभिध'५ बाणं द्विशतं प्रजपेत् सुत ॥१३॥ ज्वालामुख्यभिध बारणं त्रिशत प्रजपेत् नर. । जातवेदमुखीवाण 'वेदसख्याशत१७ सुत ।।१४॥ चहद्भानुमुखीवाण जपेत् पञ्चशतं सुत । 'य एकादि'८ महाविद्या कुल्लुकादिसमन्विताम् १६ ॥१शा नेत्र लक्ष जपेन्मन्त्रं क्रूरकर्मादिनाशने । हरिद्रायां चरेद्भौ (डो) में काम्य गौरवमिच्छति ।।१६।। १. ख. क्रूरग्रहविनाशाये। २. ख. विशनष्टि विनाशार्थे । ३ ख. पत्रिंशद्वाण । ४. स. मणिस्तम्भ। ५ ख, रतिस्तम्भे। १. स्व. ०स्तम्भनेऽपि। ७. स. शनी। ८ ख. कृत्याविप ८. ख. परमुखापरः । रा. पपमुखाचरेत् । '-' ख पीताभरणभूषाच्या पीतवस्ययान्वितः । ११. स. महापीतासुनि । १२. ख. सुत। १३. '' अयमशो घ. रा पुस्तकयो नास्ति । १४ स. हरिद्राक्षेण मरिगता। १५ घ. उल्कामुखाभिष। १६ स सुत । १७. ख. तदन्ते सस्मरेत् । १८ ख एकाक्षरी। १६. घ कुमार्केदि०। २०. ल. क्रूरकर्मण । रा. कुकर्मादि० । २१ स. हरिद्या! 1 - - 8. - रा.ततः।
६६ सांख्यायनतन्त्रे. शतं त्रिशतकं पुत्र हुनेद्दशसहस्रकम् । 'हरिद्राघृतसमित्रैः क्रूरकर्मविनाशनम् २ ।।१७।। 'हरिद्राहोममात्रेण क्रूरकर्मण (वि)नाशनम्' । 'तर्पणात्तालनी रेण हेतुना" मार्जयेत् सुत ।।१८।। 'सुवासिनी ब्राह्मणाश्च'५ 'वगलार्चा कुमारक' ६ । सौभाग्या क्रमेणैव' 'ब्राह्मीमुद्रां च धारणात् ।।१६।। 'बन्धन त्रिपुरश्चैव दीपिका तस योजनात् । 'कृत्यावश्यस्तम्भनाख्यो (ख्य) 'योग सर्वं भयापहम् ॥२०॥ त्रैलोक्यविजयं नाम विजयं १० मण्डलं तथा ! पञ्चास्त्रमूलपठनाद् गारुडो जायते सुत ॥२१॥ पीताशी पीतत्राणी च पीतशय्यासमन्वितः । पीताम्बरादिसयुक्तः पीतपूजापरायणः ।।२२।।'' पञ्चक्रमसमायुक्तां' (क्तः) सिद्धयोगी' 3 नरः सुत । ग्रसिनी सर्व विद्यानां रक्षणी सकलापदाम् ॥२३॥ मदिनी'४ सर्वशत्रूणा नाशिनी सर्वरक्षसाम् । उपसहारयोगेषु योगो यं भवति ध्रुवम् ॥२४॥ 'अन्ययोगसमारम्भ कृत सिद्ध यति वा न वा 'योगमेव समासाध्य सिद्ध भोगी'५७ नरः कलौ ॥२५॥ 'अघोराश्च पाशुपती सहारो मोहिनोपि(ति) च'१८ । षट्त्रिंशदस्त्रसस्तम्भः पञ्चास्त्रेण प्रजायते ।।२६।। पञ्चास्त्रशस्त्रविज्ञानी पाञ्च भौतिकसिद्धियुक् । प्राधस्तु रणबाणास्त्र ६ रणादिस्तम्भने जपेत् ॥२७॥ १. रा. ०सहनवान् । ख सहस्र त्रिसहस्रकम् । २. ख. हुनेद्दशसहन वा हरिद्रा घृतमिश्रितः ।। ३. '-'अयमशो नास्ति घ. रा. पुस्तकयो। ४. '-'ख. तपनाल्लनिरर्णय- चहेतु । ५. ख. ब्राह्मणान् सुवासीनां । ६. '-' ख भक्ता बाला वा च कुमारिकाम् । ७. ख. ब्राह्मीमुद्राभि । रा. ब्राह्मीमुद्रादि । ८. '-' ख. बन्धनानिष्ठुरश्चैव दीपकास्त्रस्य । 8. -स.रा कृत्याविपस्तम्भनाख्यो योगः सर्वविषापहः ।। १०. स्व. कवच। ११. श्लोकोऽयें व पुस्तके नास्ति । १२. ख. ० समासक्त । १३. स. सिदिमागी । रा ० भोगी। १४. ख मथिनी । १५. ख. रा चलति । १६ प्रन्ययोगः शरभवत् कृते सिद्धमानमः । १७. स रा '-' योगमेनं समासाद्य सिद्धिभागी। रा. मघोरास्त्र पाशुपते- सहारे मोहनेऽपिच। १६ ख. वढवाबायो। ''ख -- प्रयस्त्रिशः पटलः [ ६७ - J उल्कामुखी द्वितीयास्त्रं स्तम्भन भुवनत्रये' । ज्वालामुखीतृतीयास्त्रं स्तम्भन ऋषिदेवतः ॥२८॥ जातवेदमुखीबाणो ब्रह्मविष्ण्वादिरक्षणे । 'सर्वकर्मस्तम्भने च'3 चतुर्थ प्रजपेत् सुत ॥२६॥ बृहद्भानुमुखीवाणं पञ्चम परिकीर्तितम् । षट्पञ्चकोटिचामुण्डा कालीकोटिशतं सुत ॥३०॥ सपादकोटिनिपुरा पञ्चाशत्कोटिभैरवाः । नारसिंहा-यातुधानाः पूतनाः कोटिचेटकाः ॥३॥ समस्तस्तम्भन पुत्र पञ्चमेन प्रजायते । हस्ते सम्पाद्य 'पञ्चास्त्रं शासनास्त्र' स्मरेन्मुखे ॥३२॥ स कल्पमुखभागी'' स्यान्नात्र कार्या विचारणा । त्रैलोक्यविजयाख्य च स्मरेदस्वेन्द्रमुत्तमम् ॥३३।। यथोक्तकुण्डेषु हुनेद् वेदिकायां विशेषतः । चुल्ल्या शकटयां प्रेताग्नौ पञ्चस्थाने हुनेदपि ॥३४॥ चत्वरे सर्वकार्यार्थ होमयेदुक्तमार्गतः । 'सकूचं नु कुनुवो चैव-तद्धश्वि (वि)श्च इति क्रमात्" ॥३॥ प्रणि (णी)ता प्रोक्षणीपात्रमाज्यस्थाली च षण्मुख सकलं ३ पूर्णपात्र च 'ब्रह्मचर्येण योगत.१४ ॥३६॥ क्रमात् सर्व तु सम्पाद्य होमं कुर्यात् प्रयत्नतः 'क्रूरकर्माणि नश्यन्ति'" तालकेन हुनेत् सुत ।।३७।। पीतपुष्पश्च जुहुयात् क्रूरकर्मविनाशने'। 'ऋरतर्पणयोगेन क्रूरविघ्ननिवारणम्" ॥३८॥ १. - ख. निलेकीस्तम्भने जपेत् । २. ब्रह्मविद्या०। ३. ख. सर्वकर्मणसंस्तम्भे । रा सर्वकर्माणि स्तम्भे च । ४ ख. ०बाणः । ६ ख परि- कोत्तित.। ७ ख कटपूतनाः । रा ०पूतना.। ८. स्व. सधाय। है -'ख चापास्त्रं ग्रसितास्त्र । १०. ख कल्पसुखे भागी। रा. संकल्पमुखिभोग । ११. '-'ख. समित्कुशा न कसुचौ च विष्मावहीति च क्रमात् । १२. ख, सन्मुखाः। १३ ख कलश। १४. ख. ब्रह्मचयों तु जापकः । रा. ब्रह्माचार्येण योगकः । १५. ख प्रयोगवित् । १६. स रा. फरफरिणनिर्माशे। १७. ख. कूटकृत्रिमनाशने । १८. '-' ख. -पीतेन तपंवेदेव क्रूर- ग्रहनिवारणम् । रा. करे तपणया देवी० । ५२ - S ५ ख. पञ्चमः। . - १८ 1 सास्यायनतन्न ॥४॥ इति संक्षेपतः पूर्व' किमन्यं श्रोतुमिच्छसि । इति श्रीविद्यागमे सांस्यायनतन्त्र चतुस्त्रिशत्पटलः ॥३४॥ ॥अथ पञ्चत्रिशः पटलः।। योषिदाकर्षणासक्ता फुल्लचम्पकसन्निशाम् । दुष्टस्तम्भनमासक्तां' वगला स्तम्मिनी भजे ॥१॥ क्रोञ्चभेदन उवाच-- नमस्ते सर्वसर्वेश कपूरचूतिसन्निभ । योगिन् सर्वादिसर्वज्ञ बीजभेद वद प्रभो ॥२॥ ईश्वर उवाच- अथात' सम्प्रवक्ष्यामि वगलामन्त्रनिर्णयम् । षट्त्रिशदक्षरी विद्या 'त्रिपुरे चंव तिष्ठति ॥३॥ साख्यायनमते देव्या नारायण'' ऋषिः स्मृतः१२ 'गायत्रीछन्द उद्दिष्ट देवता वगलाह्वया' १३ सांख्यायनमते देवि वामाचारविधिर्मतः। ब्रह्म यामलसम्मत्या ब्रह्मा चास्य ऋषिः स्मृतः ॥५॥१४ 'गायत्री छन्द प्रादिष्ट देवता सैव कीत्तिता'१५ 'जयद्रथाख्ययामले तु'१६ ऋषि रद एव हि ।।६।। छन्दादिक पूर्ववत् स्यादिति सक्षेपतो मतम् । हारिद्रसहितायां तु ऋषिर्नारायणो मतः ।।७।। अनुष्टुप्छन्द प्राख्यात'७ देवता वगलामुखी । साख्यायनमत देवी (वि)कलौ जागत्ति'८ केवलम् ॥८॥ मृत्युजयजप कृत्वा ततो विद्यां जपेत् सुत मृत्युञ्जय विना देवो 'वगला नहि सिद्धयति'२० ॥६॥ १. स. प्रोक्त । २. ख. किमन्यच् । ३. ख. द्वात्रिंशति (एकत्रिंशत्) पटलः ।।३२ । ४. घ. ०सक्त्यां । ५. ख. लसच्चम्पक० । ६. ख. ०स्तम्भनासक्ता । ७ रा कपूर- ८. ख योगी। ६. ''ख त्रिधा च परितिष्ठिता। रा ०चैव निष्ठिः । १०. स. देवी। ११. ख नारदोऽस्य । १३. ख -अनुष्टुप्छन्द- प्राख्यातं देवता वगलाह्वया । रा. ०देवता सैव कीर्तिता । १४. पद्यमिद घ पुस्तके नास्ति । १५ घ पुस्तके नास्ति पद्यामिदम् । १६ ख. जयद्रथाख्ययामले । रा. जयद्रथयामले तु। १७ ख त्रिष्टुप छ द. समाख्यात । १८. ख जाग्रति । १६ ख सुधी। २०. -'घ पुस्तके नास्ति। - । . धवल ०. १२. ख. मतः। - त्रयस्त्रिंशः पटलः [ER 'ऋषिच्छन्दत्रितयक मतभेदात् प्रदर्शितम् । बीजसंज्ञा प्रवक्ष्यामि'' सांख्यायनमुखोद्भवाम् ॥१०॥ शिवबीज' वह्नियुक्त रतिबिन्दुसमन्वितम् । 'वह्निशिवान्तराले तु* भूबीज योजयेत् (पेत्) सुत ।।११।। स्थिरमाया इति' प्रोक्ता विद्या त्वेकाक्षरी शुभा। अनया विद्यया देवि किन्न सिद्धयति भूतले ॥१२॥ पीतवासामते पुत्र स्थिरमायां शृणु प्रिये । 'स्थिरमायासमायुक्त स्थिरं बीजमितीरितम् ॥१३॥ तदुद्धारं शृणु प्राज्ञ गगनाद्धं समुद्धरेत् । स्थिरबीज समुद्धृत्य रतिबिन्दुसमन्वितम् ॥१४॥ स्थिरमाया द्वितीयां तु इन्द्रस्तं चन्द्रभूषितम्१२ । 'इयं शप्ता'१३ महाविद्या कीलिता'४ स्तम्भिता शिवे ॥१५॥ रेफयोगान्महेशानि१६ निश्शप्ता' ७ फलदायिनी। रेफयुक्तां जपेद्विद्या ‘फलसिद्धिर्न सशयः'१८ ॥१६॥ रेफहीना जपेद्विद्यां कोटिजाप्य' ६ न सिद्धयति । १२० स्थिरदा२० परमेश्वरि ॥१७॥ सजपेच् ‘च ततः पुत्र' २२ तस्य सिद्धिर्भविष्यति । लघुषोढां महाषोढा पञ्जर न्यासमेव हि ॥१८॥ वगलामातृकान्यास 'कुल्लुका च विचिन्त्य वै'२४ । सेत्वादिकामराजान्त २५ न्यासमृत्युञ्जय जपेत् ॥१६॥ १. '-' चिन्हस्थोऽशो घ. पुस्तके नास्ति । २. घ. रा. समुद्भवात् । ३. ख. जीवा वीजं । ४. ख. वहि नशेवा० । रा. वहि नः शि० । ५. ख. शिवे। ६. ख. त्विय। ७. ख. देवि। ६. ख.-स्थिररूपा तु या माया स्थिरमाया तु सा मता। रा. स्थिररूपा तु मामाया स्थिरमाया समायतु । ९ ख. प्राज्ञ। १०. ख. रा गगनाणं। ११. स. विभूषितम् । १२. ख. त्वियं देवि विन्द्वद्ध चन्द्रभूषिता । १३. घ. रा.इम समा। १४. घ. रा. कलिता । १५ घ. रा. सुत । १६. घ. रा महा सैव । १७. घ. रा. नित्यभाक् । १८. ख. रेफहीनां न सजपेत् । १६. ख जाये। २०. ख. तस्माद फ तु सयोज्य । रा उस्माद्र फस्तु संयुक्त । २१. ख. स्थिराघः। २२. ख, प्रयतो देवि। रा स जपे शतद. पुत्र। २३. ख. मातृकां न्यस्य । २४. घ. रा. सकृदाचरित तदा । २५. घ. सत्वादि। २६. 'तस्माद्रेफेण सयुक्त घ.रा त्यस्य ।
१०० ] साख्यायनताने । 1 . । ततो वे प्रबपेद्विद्या सदा जाग्रत्स्वरूपिणीम् । पीतवासामते देवि पञ्चप्रेतगता' स्मरेत् ॥२०॥ चतुर्भुजां वा द्विभुजा पीतार्णवनिवासिनीम् । सुधार्णवसमासीनां मणिमण्डपमध्यगाम् । २१॥ सांख्यायनमते देवि संम्मरेद् यत्नतः शिवे। सुन्दर्याः पश्चिमाम्नाये वगला परितिष्ठति ॥२२॥ श्रीकाल्यामु (उत्तराम्नाये वगला पूज्यतां सुत । इति षविद्यागमे सांख्यायनतन्त्र पञ्चत्रिशत्पटल. ॥३५ ॥ अथ षट् अशः पटलः । योगिनीकोटिसहितां पीताहारोपचञ्चलाम् । वगला परमां वन्दे परब्रह्मस्वरूपिणीम् ॥१॥ क्रौचभेदन उवाच- चिदानन्दघनावास', 'वरमन्यं च मां वद"" सर्वातीत परेशान 'सर्वभूतहिते रत'' ॥२॥ ईश्वर उघाच- अथ 'स्कन्द प्रवक्ष्यामि' १७ 'सर्वकर्माणि नाशनम्'१४ । कि केन तामसं प्राप्त'१५ किं केन शान्तिकारणम् ॥३॥ कारणं तत्र केन स्यात् तत्सर्वं कथ्यते शृणु । श्रादौ मन्त्र जपेत् पुत्र त्रिसहस्रमतन्द्रितः ॥४॥ ततः कवचमालम्व्य'" पुनमन्त्र जपेत् तथा षट्त्रिंशद्वारमावर्त्य पुरश्चरणमुच्यते ॥१॥ सर्वकर्माणि नि शे२° योगोऽयं परिकीत्तितः । अनुलोमविलोमेन द्वितीयो योग ईरितः ॥६: १.- घ. रा.पुत्र । २ घ.मती। ३. घ. रा. श्चरेत् । ४. घ. रा. पुत्र। ५. घ. रा. सुत । ६. ख. परिनिष्ठिता। रा परितिष्ठताम् । ७ ख. त्रित्रिंश (द्वात्रिंश) ८. ध, पीताहारोपि० । रा. पीतहारो। ९. घ. रा. देवी। १०. ख. •धनस्वामिन् । ११. ख. सारमन्यन्महेश्वर । रा. सारमन्य च मां वद । १२. ख. सर्व- भूतहिताध्वर। १३ ख पण्मुख-मध्यामि । १४. ख. सर्वकर्माणनाशनम् । स. रा. नाम सम्प्राप्तं । १६. ख. ०कारकम् । १७. घ. रा. ०मारभ्य। १८. घ. १६. घ, रा. पड्विंशद्वर्णमावृत्या। २० ख, सर्वकर्मणनि । F , १ .. r पटलः। -- रा. तत ।
द्वात्रिंशः पटलः [१०१ । त्रिशतं च शतं चापि अष्टोत्तरसहस्रकम् । अष्टोत्तरशतं वापि कवच पूर्ववद् भजेत्' ॥७॥ क्षुद्र कर्मणि' निर्माशे योगोऽयं परिकीर्तितः। अनुलोमविलोमेन योगो वसुविधः स्मृतः ।।८।। षत्रिंशद्वारमावर्त्य 'भवेदेवं विधिः सुत' । कवचं प्रपठेदादी मध्ये स्तोत्रं 'तु उच्चरेत् ॥ell शतावर्त्तनमात्रेण 'क्रूरकर्मणनाशनम् । अनुलोमविलोमेन द्वितीयो योग ईरितः ॥१०॥ गायत्री कवचं पुत्र मन्त्र स्तोत्र पुनश्च सा'। पड्विंशद्वारमावर्त्य षट्त्रिंशावर्त्तनं चरेत् ।।११।। अनेन क्रमयोगेन सर्वकर्मविनाशनम् । तारायां कालिकायां च 'छिन्नायामेवमेव तु ॥१२॥ अनुक्रमेण सर्वत्र कुर्यादावर्त्तनं बुधः। मन्त्रमात्रकार्यमेतत् सर्वदोषनिवारणम् ॥१३॥ कवचं प्रथम'' बाणः कवचं च द्वितीयकम् । कवचं च तृतीय' स्यात् कवच च चतुर्थकम् ॥१४॥ कवचं पञ्चम बाणः कवचं प्रपठेत् कृती'६। अनुलोमविलोमेन द्वितीयो योग ईरितः ॥१५॥ रणस्तम्भे 'सर्वकर्मान्नाशने मृत्युस्तम्भने । 'प्राणरक्षादिव्यरक्षादेव्यो रक्षणकर्मणि'१८ ॥१६॥ योगोऽयं कथितः पुत्र वगलामन्त्र ईरित:१६ शताक्षरी जपेदादी कवचं हृदयं तथा ॥१७॥ । म + + 1 ७. 1 १. घ. रा. भवेत् । २. घ. रा.क्षुद्रकर्माणि । ३. ख. भवेदेक पुनस्तथा । रा. भवेदेकं० ४. ख पुनश्च तत् । ५. घ. रा. क्रूरकर्मारिण। ६. ख. सर्वकर्मणनाशनम् । घ. रा. चिन्मयामेव एव च । ८ ख. मनुक्रमेण। ६. ख मन्त्रयाप्ने । १०. स. विनाशनम् । ११ ख. पञ्चमो। १२. ख. द्वितीयक: १३. ख. तृतीय । १४. ख. चतुर्थकः । १५. २ रा. पञ्चमो। १६. घ. रा. ततः। १७. स. मन:स्तम्भ सर्वकर्मणनाशने । १८ '-'ख.- मत्युस्तम्भ प्राणरक्षादिव्यरक्षणकर्मरिण । १६ स. कात्यादी मन्त्रयोगतः । रा. कल्पादी। - १०२] साख्यायनतन्त्र 1 + १ । कवचं वेदवणं च कवचं चन्द्रवर्णकम्' । अनेन क्रमयोगेन 'योगः कर्मणनाशनः२ ॥१८॥ 'एकाक्षरी जपेदादो'3 कवच प्रपठेद् यतः । वेदाक्षरी जपेदादौ कवच प्रपठेत्तथा ।।१९।। वेदाक्षरी' ततो जाप्य कवचं तदनन्तरम् । षट्त्रिंशदक्षरी जाप्यः कवच तदनन्तरम् ॥२०॥ वेदाक्षरीमनुपुरं' कवच प्रथम तथा । 'कवचं च द्वितीयः स्यात् कवचं च तृतीयक.७ ॥२१॥ 'कवच च चतुर्थः स्यात् कवचं पञ्चमस्तथा । कवच हृदयं वाच कवच शतवर्णकम् ॥२२॥ 'कवचात् कीलन योगः त्रैलोक्यरक्षणाकरः अनेन क्रमयोगेन त्रैलोक्यस्तम्भनं भवेत् ॥२३॥ इन्द्रादिपदसस्तम्भे समुद्रस्तम्भनेऽपि च । 'महाविद्यास्तम्भनं च सत्य ब्रह्मास्त्रस्तम्भनम्' 13 :॥२४॥ 'महापाशुपतादोना स्तम्भने १४ मृत्युपातने । महाब्रह्मास्त्रयोगो हि'५ गोपनीय प्रयत्नतः ॥२५॥ इति षड्विद्यागमे साख्यायनतन्त्र 'ईश्वरषण्मुखसवादे महादिव्यप्रयोग- कथन नाम'१६ पत्रिंशत्पटल.१७ ॥ अथ पञ्चत्रिंशः पटलः ॥ पीतवर्णसमासीना पोतगन्धानुलेपनाम् । पीतोपहाररसिका भजे पीताम्बरा पराम् ।।१।। क्रौञ्चभेदन उवाच- स्वामिन् सिद्धगु(ग)गाध्यक्ष समस्तगणपारग । रहस्य सूचितं पूर्व किन्न मह्य प्रदर्शितम् ।।२।। १. स. पटवर्णक.। २. घ. रा. योगकर्माणि नाशनः । ३ घ. जपेदादी कवच ५ घ. वेदाक्षरी। ६. ख. पञ्चचत्वारिंशन्मनु । रा. चत्वारिंशन्मनुपुर ७. ८. '-' चिहानस्थाद्वयी घ. पुस्तके नास्ति । ६. ख. हृदया। १०. ख.. कवचात्कोलयन मनु प्राण लोक्यरक्षणः। ११. ख. क्षणात १२. घ. ०स्तम्भनेति । १३. अयमशो नास्ति ख. पुस्तके । व महापाशुपतास्मादिपातने । १५. घ. रा. पि। प. चतुस्चिात् (त्रित्रिगुत्) पटल:: 1 - ४. ख, तथा। १६. घ. रा नास्त्ययमशः। १७.
चस्त्रिशः पटलः [ १०३ . - ईश्वर उवाच- तत्त्वं वद महादेव यदि पुत्रोऽस्मि ते वर्द। ।' रहस्यातिरहस्यं च कथ्यते शृणु पुत्रक ॥३॥ अमात्यानां च दुष्टानां दूषकानां दुरात्मनाम् । क्षुद्रग्रहादिजातीना सैन्यानामपि पुत्रक ||४|| क्रूरग्रहविनाशाय सर्वशान्त्यर्थमेव च । पराभिचारशान्त्यर्थं रक्षार्थे च विशेषत: ॥१॥ अपमृत्युविनाशार्थ रोगशान्त्यर्थमेव च । परसेनाविनाशाय स्वसेनारक्षणाय च ।।६।। आत्मार्थ च परार्थ च विजयाथं च षण्मुख । वेतालाश्च विनाशार्थ भैरवादिप्रशान्तये ॥७॥ ससस्तविषनिर्वाशे मुष्टिकुक्षिविधावपि । शस्त्रास्त्रवाणसघाने संहारास्त्रादिनाशने ||८|| शस्त्रास्त्रस्तम्भने पुत्र तद्वच्छवि (व)विधावपि । स्तब्धीकरणनि शे(शे) मृतकोत्थापनेऽपि च ॥९॥ देशोपद्रवनाशार्थे राष्ट्रभङ्गे समागते । कोटिकृत्याविनाशार्थे स्वेण्टरक्षणकर्मणि ॥१०॥ हुतनष्टप्रणष्टादिवारुणाग्नेयजातिषु । पत्रपुष्पफलं शाखाजटावक्क्षीरनीरके ॥१शा महाविपे तैजसे तु विण्मूत्रविजरकृते । उद्भ्रान्त लिनाशाथै घटकृत्याविनाशने ॥१२॥ जलकृत्याविनाशार्थे स्यलकृत्याविनाशने । वृक्षकृत्यानाशनार्थे गन्धकृत्याविधावपी (पि) ॥१३॥ महेन्द्रपदनि शे विरूडानाशनेऽपि च भेरूडनाशनार्थे च रिक्तधावेशभैरवे ।।१४।। सस्यस्तभे दारुनाशे मन्त्रमण्डलरोगहृत् । सप्तब्रह्मास्त्रयोगोऽयं सर्वथा चलति ध्रुवम् ॥१५॥ अमोघमृत्युनाशाय समाश्चर्यकमाय (प)दि । त प्रयोगमहायोग शृणु सावहितो भव ।।१६।।
१०४ सांस्पायनतन्त्र शुभऋक्षादियोगे तु कुण्डे वा स्थण्डिले वेद्यां चत्वरे पितृकानने । चुल्यां सकटया(शकटयां)वा देवि होतव्यं सर्वकर्मणि ॥१७॥ प्रयोगमादरेत सुत । स्वस्तिवाचनमासाद्य द्विजानां वरणं चरेत् ॥१८॥ वगलास्त्र मध्यमागे करे निष्ठुरवंधनम् । पञ्चास्त्रं दक्ष (क्षि) णांशे च मूलास्त्र होमकर्मणि ||१९|| त्रैलोक्यविजयास्त्रं च स्मरेदस्त्रन्द्रमुत्तमम् । निष्ठुरांश्चालयेदेव दीपकास्त्र प्रयोजयेत्॥२०॥ पूर्वभागे तु पञ्चास्त्रमुत्तरे मुण्डमुत्तमम् । महोग्रविजय दक्षे विजयास्त्रं प्रयोजितम् ॥२१॥ हेलाळ चदला तूर्या तथा पञ्चाङ्ग ली प्रिया । पश्चिमे कीत्तिता विद्या बंधद्वयपुरस्सरम् ॥ २२॥ प्रादी गणपति पूज्य द्वारपूजादिसंयुतम् । विप्राणा वरणं कृत्वा वगलादीपमाचरेत् ॥२३॥ मण्डले वगलादीपो (प:) कवचे मूलदीपकः । पीताशा (शी) पीतवस्त्राढ्या (ढयः) पीतयज्ञोपवीतवान् ॥२४॥ पीताशनी पीतभक्षी पीतशय्यापरायणः । हरिद्राक्षेण मणिना सर्व कार्य जपादिकम् ।।२।। हरिद्राभिः सुरक्ताभि. रोचनाघृतमिश्रितः । बिल्वप्रसून हुयात् सर्वोत्पातनिवारणम् ।।२६।। अथवा पीतपुष्पैस्तु हरिद्रामधुयोजनम् । हरिद्रया दरिद्राणि नश्यन्त्येव न सशयः ॥२७॥ अनेन योगच (व)र्येण सर्वोत्पातनिवारणम् । पीताभरणभूषाढ्ये (ढय.) पीतशालानिवासकृत् ॥२८॥ शतमष्टोत्तरशतं त्रिशत च सहस्रकम् । त्रिसहस्र पञ्च तथा दिग्विशत्यादिरेव च ॥२६॥ पञ्चविंशच्च पञ्चाशत् सहस्र लक्षमानकम् । लक्षोपरि महेशानि न होमोऽस्ति महीतले ॥३०॥ सुन्दयाँ कालिकाया च वैदिके कोटिमात्रकम् । होमस्य तु दशाशेन तर्पण मार्जनं तथा ॥३१॥ -- पञ्चनिशत्पटलः naar सुरया तर्पण पुत्र तेन माजनमाचरेत् । अभिषेको विप्रभोज्यं साङ्गयोग प्रसिद्धयति ॥३२॥ नातः परतरो योगो विद्यते भुवि मण्डले । सर्वकर्मविनाशार्थ विषनाशार्थमद्भुतम् ।।३३।। गोपनीय गोपनीय गोपनीय प्रयत्नतः । रहस्यातिरहस्य च रहस्यातिरहस्यकम् ॥३४॥ इति सक्षेपतः प्रोक्त तोपयेद्दक्षिणादिना । प्रयोगस्योपसहार (र:) कर्तव्य. सिद्धिमिच्छता ॥३५।। इति षट्विद्यागमे सांख्यायनतन्त्रे पञ्चत्रिंशत् (चतुस्त्रिंशत्) पटल. ॥३५॥ . ३ १०६ सास्यायनतन्ने परिशिष्टम्-(क) ऋष्यादिन्यासध्यानादियुताः । सांख्यायनतन्त्रगता मन्त्रा: । - १. एकाक्षरीबगलामन्त्रः-- ह्री। ॐ अस्य श्रीबगलामुख्येकाक्षरीमहामन्त्रस्य ब्रह्मा ऋपिर्गायत्रीछन्द. श्रीबगलामुखी देवता लँ बीज, ह्रीं शक्ति, ई' कीलक श्रीबगलामुग्वीदेवताम्बा- प्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोग । ऋप्यादिन्यास: ब्रह्मर्पये नम शिरसि, गायत्रीछन्दसे नमो मुखे, श्रीबगलामुखीदेवतायै नमो हृदि, लँ वीजाय नमो गुह्ये, ही शक्तये नम पादयोः, ₹ कीलकाय नम सर्वाङ्गे। करन्यास.--ॐ ह्रीँ अडगुष्ठाभ्या नम , ॐ ह्ली तर्जनीभ्या स्वाहा, ॐ हळू मध्यमाभ्या वषट्, ॐ ह्ल अनामिकाभ्या हुम्, ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्, ॐ लः करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । हृदयादिन्यास.--ॐ ह्रां हृदयाय नमः, ॐ ह्ली शिरसे स्वाहा, ॐ हलू शिखायै वषट्, ॐ ह्ले कवचाय हुम्, ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ ह्रः अस्त्राय फट् । ध्यानम्-वादी मूकति रति क्षितिपतिवैश्वानरः शीतति, क्रोधी शान्तति दुर्जन सुजनति क्षिप्रानुगः खजति । गर्वी खर्वति सर्वविच्च जडति त्वद्यन्त्रिणा यन्त्रितः, श्रीनित्ये बगलामुखि प्रतिदिन कल्याणि तुभ्य नमः ।। [पञ्चम. पटल पृष्ठ-१२, १३] २. श्रीवगलाषत्रिंशदक्षरीविद्यामन्त्रः--ॐ ह्री बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाच मुख पद स्तम्भय जिह्वा कीलय बुद्धि विनाशय लो ॐ स्वाहा । ॐ अस्य श्रीबगलामुखीषट्त्रिंशदक्षरीविद्यामहामन्त्रस्य -श्रीनारदऋषिः, बृहतीछन्द ,२ श्रीवगलामुखीदेवता, लैं बीज, हैं शक्ति , ई3 कीलक, श्रीबगला- मुखीदेवताप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोग. । १ 'र' इत्यन्यत्र । २. 'अनुष्टुप्छन्द.' इत्यन्यत्र दृश्यते । ३. '' इत्यन्यत्र परिशिष्टम् (क) करन्यास ऋष्यादिन्यास:-श्रीनारदर्षये नम. गिरसि, वृहतीछन्दसे नमो मुखे, श्रीबगलामुखीदेवतायै नमो हृदये, ल बीजाय नमो गुह्ये, हँ शक्तये नमः पादयोः, ई कीलकाय नम. सर्वाङ्गे । ॐ ह्री अड्गुष्ठाभ्यां नमः, ॐ ह्ली बगलामुखि तर्जनीभ्यो स्वाहा, ॐ ह्ली सर्वदुष्टाना मध्यमाभ्या वपद्, ॐ ह्री वाच मुख पदं स्तम्भय अनामिकाभ्यों हुँ, ॐ ह्ली जिह्वा कीलय कनिष्ठिकाभ्या वौषट्, ॐ ह्ली चुद्धि विनाशय ह्ली ॐ स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । हृदयादिन्यासः-ॐ ह्री हृदयाय नम , ॐ ह्ली वगलामुखि शिरसे स्वाहा, ॐ ह्लो सर्वदुष्टाना शिखायै वषट्, ॐ ह्ली वाच मुख पदं स्तम्भय कवचाय हुँ, ॐ ह्ली जिह्वां कीलय नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ ह्ली बुद्धि विनाशय ह्री ॐ स्वाहा अस्त्राय फट् । ध्यानम्-चतुर्भुजा त्रिनयना कमलासनसस्थिताम् । त्रिशूल पानपात्र च गदा जिह्वां च विभ्रतीम् ।। बिम्बोष्ठी कम्वुकण्ठी च समपीनपयोधराम् । पीताम्बर मदाघूर्णां ध्यायेद् ब्रह्मास्त्रदेवताम् ।। [सप्तम. पटलः-पृष्ठ-१६-१७] श्रीबगलामुखीगायत्रीमन्त्रः-ॐ ह्री ब्रह्माखाय विद्महे स्तम्भन- चारणाय धीमहि तन्नो वगलर प्रचोदयात् । ॐ अस्य श्रीवगलागायत्रीमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषि., गायत्रीछन्द., ब्रह्मास्त्र- बगलादेवता, ॐ वीज, ह्रीं शक्ति., विद्महे कीलक, श्रीवगलामुखीदेवताप्रसाद- सिद्धये जपे विनियोग । ऋष्यादिन्यास -श्रीब्रह्मर्षये नम. शिरसि, गायत्रीछन्दसे नमो मुखे, श्रीब्रह्मास्त्रबगलामुखीदेवतायै नमो हृदये, ॐ वीजाय नमो गुह्ये, ही शक्तये नमः पादयोः, विद्महे कीलकाय नमः सर्वाङ्गे। -ॐ ह्री ब्रह्मास्त्राय विद्महे अडगुष्ठाभ्यो नमः, स्तम्भनवारणाय धीमहि तर्जनीभ्या स्वाहा, तन्नो बगला प्रचोदयात् मध्यमाभ्या वषट्, ॐ ह्ली ब्रह्मास्त्राय विद्महे अनामिकाभ्या हुम्, स्तम्भनवारणाय धीमहि कनिष्ठिकाभ्यां वौपद, तन्नो चगला प्रचोदयात् करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । - करन्यासः २. 'ही' इत्यपि पाठः।
सात्यायनतन्त्र . । हृदयादिन्यास:-ॐ ह्री ब्रह्मास्त्राय विद्महे हृदयाय नमः, स्तम्भनवारणाय धीमहि शिरसे स्वाहा, तन्नो बगला प्रचोदयात् शिखायै वषट्, ॐ ह्री ब्रह्मास्त्राय विद्महे कवचाय हुम्, स्तम्भनवारणाय धीमहि नेत्रत्रयाय वीपट्, तन्नो वगला प्रचोदयात् अस्त्राय फट् । ध्यान पूर्ववत् । द्वादशः पटल.~-पृष्ठ-२६] ४ पञ्चपञ्चाशदक्षरो बगलामुखीपञ्चाखमन्त्र -ॐ ह्लीहू ग्लो वगला. मुखि हाँ ही हलं सर्वदुष्टाना हँ ह्रौं ह्र वाचं मुख पदं स्तम्भय स्तम्भय ह्नः ह्रौ हलै जिह्वा कीलय हलू ही हाँ बुद्धि विनाशय ग्लौं हूँ ह्री ॐ स्वाहा। ॐ अस्य श्रीबगलामुखीपञ्चास्त्रमहामन्त्रस्य वसिष्ठऋषिः, पक्तिश्छन्द, रणस्तम्भनकारिणी बगलामुखी देवता, लॅ वीज, ह्री शक्तिः, र कीलक श्रीबगला- मुखीदेवताम्बाप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोग । ऋष्यादिन्यासः-श्रीनारदऋषये नमः शिरसि, श्रीवगलामुखीदेवतायै नमो हृदये, ल बीजाय नमो गुह्ये, हँ शक्तये नम. पादयो ई कीलकाय नमः सर्वाङ्गे। करन्यासः-ॐ ह्ली अडगुष्ठाभ्यां नम , ॐ ह्ली बगलामुखि तर्जनीभ्या स्वाहा, ॐ ह्ली सर्वदुष्टाना मध्यमाभ्यां वषट्, ॐ ह्ली वाच मुख पद स्तम्भय अनामिकाभ्या हुम्, ॐ ह्री जिह्वा कीलय कनिष्ठिकाभ्या वौषट्, ॐ ह्ली बुद्धि विनाशय ह्ली ॐ स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । एव हृदयादिन्यासः । ध्यानम्-पीताम्बरधरा देवी द्विसहस्रमुजाविताम् । सान्द्रजिह्वा गदा चास्त्र धारयन्ती शिवा भजेत् ॥ [पञ्चदा पटल -पृष्ठ ३८-३६] ५. अष्टपञ्चाशदक्षर उरुकामुख्यखमन्त्र-ॐ ह्री ग्लौं बगलामुखि ॐ ह्ली ग्लौं सर्वदुष्टाना ॐ ह्रीं ग्लौं वाच मुख पद ॐ ह्ली ग्लौं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्री ग्लौं जिह्वा कीलय ॐ ह्ली ग्लौं बुद्धि विनाशय ॐ ह्नी ग्लौ ह्ली ॐ स्वाहा । २. "ॐ ह्रीं हूँ ग्लो बगलामुखि ह्रां ह्रीं ह्न: सर्वदुष्टानां लं ह्रीं ह्नः वाच मुखं पदं स्तम्भय हू हूं हूं जिह्वां कीलय ह्रां ह्रीं ह्रां बुद्धि विनाशय ह्रां ह्रीं ह्र ग्लौ हूँ ह्रीं ॐ स्वाहा" इत्येवंविधो मन्त्रोऽप्यन्यत्र दृश्यते । २ "ॐ ह्रीं ग्लौं बगलामुखि सर्वदुष्टानां ॐ ह्लीं ग्लौं वाच मुखं पद ॐ ह्रीं ग्लौँ स्तम्मय स्तम्भय ॐ ह्रीं ग्ला जिह्वा कीलय कीलय ॐ ह्नीं ग्लौ बुद्धि नाशय नाशय ह्लीं ग्लो स्वाहा" इत्यपि मन्त्रभेदो दृश्यतेऽन्यत्र ।
परिशिष्टम् (क) १०१ ॐ अस्य श्रीउल्कामुख्यत्रमन्त्रस्य श्रीअग्निवराह' ऋषि , ककुप् छन्दः, श्रीउल्कामुखी देवता, ली वीज, स्वाहा शक्तिः, ग्लौं कीलकं, जगत्स्तम्भनकारिणी श्रीउल्कामुखीदेवताम्बाप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यासः-श्रीवराहर्षये नम शिरसि, अनुष्टुप्छन्दसे नमो मुखे, श्रीउल्कामुखीदेवतायै नमो हृदि, ही बीजाय नमो गुह्ये, स्वाहाशक्तये नमः पादयोः, ग्लौं कीलकाय नम सर्वाङ्गे। मूलमन्त्रवत्करपडङ्गन्यासाः । ध्यानम्-विलयानलसकागा वीरा वेदसमन्विताम् । विराण्मयी महादेवी स्तम्भनार्थं भजाम्यहम् ।। [पञ्चदश. पटलः-पृष्ठ-३६] ६. षष्टिवरात्मक श्रीजातवेदमुख्यत्रमन्त्र.-ॐ ली हसौं ल्ली ॐ बगला- मुखि मर्वदुष्टानां ॐ ह्री हसौं ह्रीं ॐ वाच मुख पद स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्ली सौ ली ॐ जिह्वां कीलय ॐ ह्ली सौं ह्ली ॐ बुद्धि नागय नाशय ॐ ह्री हसों ॐ स्वाहा । ॐ अस्य श्रीजातवेदमुख्यत्रमन्त्रस्य श्रीकालाग्निरुद्र ऋषिः, पक्तिश्छन्दः, श्रीजातवेदमुखी देवता, ॐ वीज, ह्ली शक्तिः, हैं कीलकम्, मम श्रीजातवेद- मुखीदेवताम्वाप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यास.-श्रीकालाग्निरुद्रर्षये नमः शिरसि, पक्तिच्छन्दसे नमो मुखे, श्रीजातवेदमुखीदेवतायै नमो हृदये, ॐ वीजाय नमो गुह्ये, ह्रीं शक्तये नमः पादयोः, है कीलकाय नम. सर्वाङ्गे। मूलमन्त्रवत्करपडङ्गन्यासा:- ध्यानम्-जातवेदमुखी देवी देवता प्राणरूपिणीम् । भजेऽह स्तम्भनाथं च स्तभिनी विश्वरूपिणीम् ।। [षोडश पटलः-पृष्ठ-४०-४१] 3 १. 'यज्ञवाराह इत्यपि पाठ । २. 'अनुष्टुप्' इत्यम्यत्र । १. मन्त्रोऽय सूत्रानुसारेण तु द्वाषष्टिवर्णात्मको जायते किन्त्वन्यत्र निम्नोतरीत्या दृश्यते पष्टिवर्ण "ॐ ह्रीं हौं ह्नी बगलामुखि सर्वदुष्टानां ॐ ह्रीं हो ह्रीं ॐ वाचं मुखं पदं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्रीं हौं ह्रीं ॐ जिह्वा फोलय. ॐ ह्रीं हों ॐ बुद्धि नाशय नाशय-ॐझी हो ह्रीं ॐ स्वाहा ॥ ४ 'ही' इत्यपि पाठः। ५, चिन्मयोमिति पाठः क्वचित् ।
११० सांस्पायनतन्ने -१ ७. विंशोत्तरशतवरत्मिको ज्वालामुख्यत्रमन्त्रः-ॐ ह्रो रां री में रे रौं प्रस्फुर प्रस्फुर बगलामुखि ॐ ह्ली रां री रु रे रो प्रस्फुर प्ररफुर सर्वदुष्टाना ॐ ह्रो रां री रू रै रौ प्रस्फुर प्रस्फुर वाच मुत्र पदं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्ली राँ री रूं रै रौ प्रस्फुर प्रस्फुर जिह्वा कीलय कीलय ॐ ह्री रा री रूरै रौ प्रस्फुर प्रस्फुर बुद्धि विनाशय विनागय ॐ ह्री रा री से ₹ रौं प्रस्फुर प्रस्फुर स्वाहा । ॐ अस्य श्रीज्वालामुख्यत्रमन्त्रस्य श्रीअत्रि ऋपिर्गायत्रो छन्द., श्रीज्वाला- मुखी देवता, ॐ वीज, ह्री शक्तिः, हूँ कोलक श्रीज्वालामृवीदेवताम्बाप्रसाद- सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यास:-श्री अत्रिऋपये नम: गिरमि, गायत्रीछन्दसे नमो मुखे, श्रीज्वालामुखीदेवतायै नमो हृदि, ॐ बीजाय नमो गुह्ये, ह्री शक्तये नमः पादयोः, हैं कीलकाय नमः सर्वाङ्गे। मूलमन्त्रवत्फरषडङ्गन्यासा ध्यानम्-ज्वलत्पद्मासनायुक्ता कालानलसमप्रभाम् । चिन्मयी स्तम्भिनी देवी भजेऽह विधिपूर्वकम् ।। [षोडश. पटल -पृष्ठ-४१] ८. षडुत्तरशताधिकवरात्मका श्रीबृहद्भानुमुख्यत्रमन्त्र.--ॐ ह्रा ही ल ल ली . ह्ला ह्ली हलू ल लौ ह्ल ॐ बगलामुखि ॐ ह्रां ह्नी हलू लै ह्रौ ह्रः ह्रां ह्री लू लै ह्रीं ह्ल ॐ सर्वदुष्टाना वाच मृख पद स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्रां ह्री हलू लै ह्रौ ह ह्रां ह्ली हलू हूं लौ ह्रः ॐ जिह्वा कीलय ॐ ह्रां ह्नी हलू लै ह्रौ ह्रां ह्री ल लै ह्री ह्र ॐ बुद्धि नागय ॐ ह्रां ह्ली लू लै लौ न ह्रां ह्री हलू लै ह्ली ल ॐ ह्रीं ॐ स्वाहा । एतत्पदस्थाने 'ज्वालामुखि' पद सूत्रे वर्तते कित्वस्य ग्रहणान्मत्रे एकाक्षरन्यूनता स्याद- तस्तत्पवमेवात्र सगृहीतम् । २ सूत्रे तु 'वह्निबीज च पश्चक' इति वर्शनात्वत्र परररररे' इति बीजानि ग्राह्माणि किन्तूपयुक्तबोजानामन्यत्रापि व्यवहारादत्रापि स्वीकृता नीत्यूह्यानि ३ अन्यत्रैष मन्त्रश्चतुरुत्तरशतवरात्मकोऽपि दृश्यने यथा-ॐ ह्रां ह्नीं हू हूँ ह्रीं ह्न. ह्नः ह्रां ह्रीं ह्रीं ह्नों ह्र बगलामुखि ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ह्रीं ह्न ह्रां ह्रीं ह्न हूँ ह्रीं ह्न मदुष्टानां वाच मुख पद स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्रां ह्रीं ह्रह ह्रीं ह्न ह्न ह्रां ह्लह्लीं ह्रौं ह जिह्वा कोलय ॐ ह्रां ह्रीं ह्लहूं ह्रौं ह ह ह्नां ह्रीं ह्रौँ ह्रौं ह्र बुद्धि नाशय ॐ ह्रां ह्रीं ह्लह्न ह्रौं ह्ल ल ह्रां ह्रीं ह्र झं ही हू स्वाहा ।।
परिशिष्टम् (क) - ॐ अस्य श्रीवृहद्भानुमुख्यस्त्रमन्त्रस्य श्रीसविता ऋषिः, गायत्री छन्दः, श्रोबृहद्भानुमुखी देवता, ह्ली बीज, ह्रो शक्ति , ॐ कीलक, श्रीवृहद्भानुमुखी- देवताम्बाप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोग. । ऋष्यादिन्यास.-श्री सवित्यृपये नम शिरसि, गायत्रीछन्दसे नमो मुखे, श्रीवृहद्भानुमुखीदेवताय नमो हृदये, ही वीजाय नमो गुह्ये, ह्री शक्तये नम पादयो, ॐ कीलकाय नम. सर्वाङ्गे। मूलमन्त्र वत्करपडङ्गन्यासाः। ध्यानन्-कालानल निभा देवी ज्वलत्पुतशिरोरुहाम् । कोटिवाहुनमायुक्ता वैरिजिह्वासमन्विताम् ॥११॥ स्तम्भनास्त्रमयी देवी दृढपीनपयोधराम् । मदिरामदसयुक्तां वृहद्भानुमुखी भजे ।।२।। [सप्तदशः पटल.- पृष्ठ-४२--४३] ६ श्रीबगलामुखीशताक्षरीमहामन्त्रः-ह्री ऐं ह्री वली श्री ग्लौं ह्री वगलामुखि स्फुर रफुर सर्वदुष्टाना वाच मुख पद स्तम्भय स्तम्भय प्रस्फुर प्रस्फुर विकटाङ्गि घोररूपि जिह्वा कीलय महाभ्रमकरि बुद्धि नाशय विरामयि' सर्वप्रजामयि प्रज्ञां नागय उन्मादीकुरु कुरु मनोपहारिणि ह्ली ग्लौं श्री क्ली ह्री ऐ ह्ली स्वाहा ।। ॐ अस्य श्रीबगलामुखीशताक्षर महामन्त्रस्य श्रीब्रह्मा ऋषि., गायत्रीछन्दः, जगत्स्तम्भनकारिणी श्रीवगलामुखी देवता, ही वीजं, ह्री शक्तिः, ऐ.कीलक, जगत्स्तम्भनकारिणी श्रीवगलामुखीदेवताम्बाप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः । मूलमन्त्रवत्करपडङ्गन्यासा. । ध्यानम्-पीताम्बरधरा सौम्यां पीतभूषणभूषिताम् । स्वर्णसिंहासनस्था च मूले कल्पतरोरधः ।।१।। वैरिजिह्वाभेदनाथं छुरिकां' विभ्रती शिवाम् । पानपात्र गदा पाश धारयन्ती भजाम्यहम् ॥२॥ (सप्तदशः पटलः- पृष्ठ-४४-४५) १. 'विरामय' इत्यपि पाठः इति पाठोऽन्यत्र । 'तम्मा कुर' इति पाठोऽपि दृश्यते । .. 'क्षरिका- ११२ सांस्यायनतन्त्र १०, अष्टाविंशत्युत्तरकशताक्षर श्रीवगलामुखीपरविद्याभेदनमन्त्रः-ॐ ह्री श्री ही 'ग्लो ऐं क्ली हुँ भी'२ बगलामुखि परप्रयोग ग्रस ग्रस ॐ ह्री श्री ह्री ग्लौं ऐ क्ली हुँ क्षी ब्रह्मास्त्ररूपिरिण परविद्याग्रसिनि भक्षय भक्षय ॐ ह्री श्री ह्री ग्लौं ऐं क्ली हुँ क्षी परप्रज्ञाहारिणि प्रज्ञा भ्रशय भ्रशय ॐ ह्री श्री ह्री ग्लौं ऐं क्लीं हुँ क्षी स्तम्भनास्त्ररूपिणि बुद्धि नाशय नाशय पञ्चन्द्रियज्ञान भक्ष भक्ष ॐ ह्री श्री ह्री ग्लो ऐ क्ली हुँ क्षी बगलामुखि हुँ ,फट् स्वाहा ।' ॐ अस्य श्रीपरविद्याभेदिनीबगलामन्त्रस्य श्रीब्रह्मा ऋषि , गायत्रीछन्द, परविद्माभक्षिणी श्रीबगलामुखी देवता, आँ बीज, ह्री शक्तिः क्रो कीलकं, श्रीवगलादेवीप्रसादसिद्विद्वारा परविद्याभेदनार्थे जपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यास -श्रीबह्मर्षये नम शिरसि, गायत्रीछन्दसे नमो मुखे, परविद्याभक्षिणीश्रीवगलामुखीदेवतायै नमो हृदये, या बीजाय नमो गुह्ये, ह्री शक्तये नम पादयो, क्रो कीलकाय नम. सर्वाङ्गे। करन्यासः-आँ ह्री को अड्गुष्ठाभ्या नमः, वद वद तर्जनीभ्या स्वाहा, वाग्वादिनि मध्यमाभ्यां वपट, स्वाहा अनामिकाभ्या-हुँ, ऐ वली सौ कनिष्ठिकाभ्या वौषट्, लौ करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । हृदयादिन्यास.- ऑ ही क्रो हृदयाय नमः, वद वद शिरसे स्वाहा, वाग्वादिनि शिखायै वषट्, स्वाहा कवचाय हुँ, ऐ क्ली सौ नेत्रत्रयाय वौषट्, ही अस्त्राय फट् । .ध्यान--सर्वमन्त्रमयी देवी सर्वाकर्षणकारिणीम् । सर्वविद्याभक्षिणी च भजेऽह विधिपूर्वकम् ।। [विंश पटलः--पृष्ठ-५४-५५] ११. त्रिचत्वारिशदक्षरो ॐ ह्रीं हु ग्लौं ह्नीं बगलामुखि मम शत्रून् ग्रस ग्रस खाहि खाहि भक्ष भक्ष शोणित पिब पिब बगलामुखि ही ग्लौं हुँ 'फट् स्वाहा' । वगलास्त्रमन्त्रः १. सूत्रानुसारेण वर्णोद्धारादयं मत्रः सप्तविंशोत्तरशताक्षर एव भवति । २. 'ग्लो हुँ ऐं क्लीं क्षी' तथा 'यु ए क्ली हुँ क्ष्मी' इति पाठभेदी क्वचिदृश्येते । ३. यद्यपि पुस्तके तु 'ॐ' शब्दस्योपयोगो नावलोक्यते, न चैतादृश एव'स्वाहा'शब्दव्यवहारस्त- थापि शब्दद्वयी अत्यावश्यको सभाव्या वर्णसख्यानुपूरकत्वात् ४. रा.कृ. पुस्तके 'फट्- स्वाहा' स्थाने 'ह्नीं स्वाही' इति दृश्यते । अंत्र पुस्तकेऽप्यय मन्त्री द्विचत्वारिंशदक्षरात्म- क एवं गृहीत: किन्त्वसौ ऋप्यादिन्यासे 'फट कोलक' मिति ग्रहणादसाधुरेव प्रतीयते ।
परिशिष्ट (क) १ ॐ अस्य श्रीवगलास्त्रमन्त्रस्य श्रीदुर्वासा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्द , अस्त्र- रूपिणीश्रीवगलामुखी देवता, ग्लो वीज, ह्री शक्तिः, फट् कीलक श्रीअस्त्र- रूपिणीवगलाम्बाप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोग । ऋष्यादिन्यास:-श्रीदुर्वाससे ऋपये नमः शिरसि, अनुष्टुप्छन्दसे नमो मुखे, अस्त्ररूपिण्यै श्रीबगलादेवतायै नमो हृदये, ग्ली वीजाय नमो गुह्ये, ह्री शक्तये नमः पादयोः, फट् कोलकाय नम. सर्वाङ्गे। ॐ ह्ली अड्गुठाभ्या नम , वगलामुखि तर्जनीभ्यां स्वाहा, सर्वदुष्टाना मध्यमाभ्या वपट्, वाचं मुख पद स्तम्भय अनामिकाभ्यां हैं, जिह्वा कीलय कनिष्ठिकाभ्या वौषट्, बुद्धि विनाशय ह्री ॐ स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां करन्यास. फड़। हृदयादिन्यास--ॐ ह्ली हृदयाय नम , बगलामुखि गिरसे स्वाहा, सर्वदुष्टाना शिखायै वषट्, वाच मुखं पद स्तम्भय कवचाय हुँ, जिह्वां कोलय नेत्रत्रयाय वौषट्, बुद्धि विनागय ली ॐ स्वाहा अस्त्राय फट् । ध्यानम् --चतुर्भुजां त्रिनयना पीनोन्नतपयोधराम् । जिह्वा खङ्ग पानपात्र 'गदां धारयन्ती पराम् ॥१॥ पीताम्बरधरां देवी पीतपुष्परलड कृताम् । विम्वोष्ठी चारुवदना मदारिणतलोचनाम् ।।२।। सर्व विद्यापिणी च सर्वप्रज्ञापहारिणीम् । भजेऽहं चास्त्रवगला सर्वाकर्षणकर्मसु ॥३॥ [द्वाविंश. पटल.-पृष्ठ-५६-६०] १२. श्रीबगलाचतुरक्षरीमन्त्र.-ॐ आँ ही क्रो । ॐ अस्य श्रीवगला- चतुरक्षरीमन्त्रस्य श्रीब्रह्मा ऋपि., गायत्रीछन्द., श्रीवगला देवता, ह्ली वीज, याँ शक्तिः, क्रो कीलक श्रीबगलामुखीदेवताम्बाप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोग. । ऋष्यादिन्यासः--श्रीब्रह्मर्षये नमः शिरसि, गायत्रीछन्दसे नमो मुखे, श्रीवगलादेवतायै नमो हृदये, ही वीजाय नमो गुह्ये, प्रां शक्तये नम. पादयो, क्रो कीलकाय नमः सर्वाने -ॐ ह्ला अङ्गुष्ठाभ्या नमः, ॐ ह्ली तर्जनीभ्या स्वाहा, ॐ हलू मध्यमाभ्या वपट, ॐ ल अनामिकाभ्या हुँ ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्या वौषट्, ॐ ल अस्त्राय फट् । करन्यास 4 १. 'गदामस्त्र च विनती तया च 'गदां धारयन्ती शिवान' इति पाठभेदो क्वचित् ।
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परिशिष्टम् (क) ११५ ध्यानम्-युवती' च मदोद्रिक्ता पीताम्बरधरां शिवाम् । पीतभूपणभूपाङ्गी समपोनपयोधराम् ।।१।। मदिरामोदवदनां प्रवालसदृशावराम् । 'पानपात्र च गुद्धि च' विभ्रती वगला स्मरेत् ॥२॥ [त्रिंशः पटल -पृष्ठ-८ १५. एकोनषष्टिवरणात्मकः श्रीबगलोपसहारविद्यामन्त्रः-ग्लौं हैं ह्री श्री कालि कालि महाकालि एहि एहि कालरात्रि ग्रावेगय आवेशय महामोहे महामोहे स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर स्तभनास्त्रशमनि हुँ फट् स्वाहा ।" ॐ अस्य श्रीवगलास्त्रोपसहारविद्यामन्त्रस्य श्रीब्रह्मा ऋषि., गायत्रीछन्द , स्तभनास्त्रविभेदिनी श्रीकालिका देवता, क्री वीज, फट् शक्ति, स्वाहा कीलक श्रीवगलाप्रसादमिद्विद्वारा ब्रह्मास्त्रोपसहारार्थे जपे विनियोग । ऋष्यादिन्यास:-श्रीब्रह्मर्पये नम शिरसि, गायत्रीछन्दसे नमो मुखे, स्तम्भनास्त्रविभेदिनीश्रीकालिकादेवतायै नमो हृदये, क्री वीजाय नमो गुह्ये, फटशक्तये नम पादयोः, स्वाहा कीलकाय नम. सर्वाङ्गे। करन्यासः-ॐ का अड्गुष्टाभ्या नम , ॐ क्री तर्जनीभ्या स्वाहा, फू मध्यमाभ्यां वषट्, ॐ कै अनामिकाभ्या हूँ, ॐ क्रौं कनिष्ठिकाभ्या वौषट्, ॐ क. करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । हृदयादिन्यास.-ॐ क्राँ हृदयाय नम , ॐ क्री शिरसे स्वाहा, ॐ क्रू शिखायै वषट्, ॐ ऊ कवचाय हूँ, ॐ क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ क्रः अस्त्राय फट् । ध्यानम्--काली करालवदना कलाधरधरा शिवाम् । स्तम्भनास्त्रकसहारी ज्ञानमुद्रासमन्विताम् ॥१॥ वीणापुस्तकसयुक्ता कालरात्रि नमाम्यहम् । बगलासोपसहारीदेवता विश्वतोमुखीम् ।।२।। भजेऽह कालिका देवी जगद्वशकरा शिवाम् । [द्वात्रिंगः पटल.-पृष्ठ-८७-८८] १. यौवना' मित्यन्यत्र । २. 'मदोन्मत्ता' मित्यपि पाठः । ३. 'वैरिजिह्वा पानपात्र' इति पाटोपि दृश्यते । ४. 'कों' इत्यन्यत्र । ५. एष मन्त्रस्नु रा० पुस्तकधृतसूत्रोद्धार- स्वरूप । पुस्तकस्यसूत्रातु विपश्चाशद्वर्यात्मक एष मत्रो जायते 'कालरात्रि' पदान्ते 'प्रावेशय आवेशय' इति पदद्वयविरहात् ।
ध्यायनमन्त्र १ १६. द्वात्रिगट्टत्मिस्ताक्ष्यमालामन्य. * क्षी नमो भगवते दी पक्षिराजाय सर्वाभिचारध्वनकाय नीमों फट् स्वाहा । [वगलोत्कीलनविधि.] - प्रणवं पूर्वमुच्चार्य कयुग्म नमुच्चरेत् । कामय वाग्भवं च लज्जापट्क नमृच्चरेत् ||१|| हीकाराष्टकमुच्चार्य वगलागापमुच्चयेन् । उत्कीलनपदद्वन्द्व अग्निजाया ममुरेत् ॥२॥ गापोद्धारकारोऽयं तन्त्रराजे प्रकीत्तितः । उत्तोलिता ब्रह्मविद्या मन्नानन सिद्धति ॥३॥ स्पष्टार्थ:--ॐ हूँ हूँ क्ली क्ली क्लीं ऐं ह्रीं ह्रीं ही ही ह्रीं ह्रीं श्रीं की की क्री की क्री की की बगलाशापमुत्कीलय उत्कीलय स्वाहा ।। E mec परिशिष्टम् (ख) ॥ अथ वज्रपञ्जरकवचस्तोत्रम् ॥ - ध्यात्वा मनसा सम्पूज्य मुद्राः प्रदर्दी पचरं न्यसेत्- शिव उवाच- पस्चरं तत्प्रवक्ष्यामि देव्याः पापप्रणाशनम् । यं प्रविश्य न वायन्ते वागरपि नरा मुवि || ॐ ऐं ह श्री श्रीमत्पीताम्बरा देवी बगला बुद्धिवादनी । पातु मामनिश साक्षात् सहन्नार्कयुतवृतिः ।।२।। निखादिपादपर्यन्तं वज्रपस्वरवारिणी। श्रीब्रह्मास्त्रविद्या या पीताम्बरविभूपिता ॥३॥ वगला मामवत्वत्र मूर्द्धभागं महेश्वरी। कामाक.गा कला पातु वगला गालबोधिनी ॥४॥ १. अयं मन्त्रः पुस्तके द्वात्रिंगांसर एबोहोषित: किन्तूद्धारानिशाक्षर एव सनवति स चोपरि प्रशित एव । रा० पुस्तके चेष एव मैत्रः पविशालर एव स्वीकृतोऽस्ति गया- 'क्षी ॐ नमो भगवते पक्षिरानाय अभिचारध्वंसफाय फट् स्वाहा' परिशिष्टम् (ख) ११७ पीताम्बरा सहस्राक्षी ललाटे कामितार्थदा । ॐ ऐं ह्री श्री श्रोः [मे पातु पीताम्बरसुवारिणी ॥५॥ कर्णयोश्च व युगपदतिरत्नप्रपूजिता । ॐ ऐ ह्री श्री पातु वगला नासिका मे गुणाकरा ॥६॥ पीतपुष्प पीतववं पूजिता वेददायिनी । ॐ ऐ ह्री श्री पातु वगला ब्रह्मविष्ण्वादिसे दिता ॥७॥ पीताम्बरा प्रसन्नास्या नेत्रयोयुगपद्धृवोः । ॐ ऐ ह्री श्री पातु वगला बलदा पीतवस्त्रवृक् ||८|| अधरोष्ठी तथा दन्तान् जिह्वा च मुखगा मम । ॐ ऐं ह्री श्री पातु बगला पीताम्वरसुधारिणी ।।६।। गले हस्ते तथा बाहौ युगपट्ट द्धिदा सताम् । ॐ ऐं ह्री श्री पातु बगला पीतवस्त्रावृता घना ।।१०॥ जवाया च तथा चोरौ गुल्फयोश्चातिवेगिनी ।। अनुक्तमपि यत्स्थानं त्वक्केशनखलोम मे ॥११॥ असृग्मास तथास्थीनि सन्धयश्चाति मे परा। श्रीशिव उचाव- इत्येतद्वरद गोप्यं कलावपि विशेषतः ।।१२।। पञ्जर वगलादेव्या दीर्घदारिद्रयनाशनम् । पञ्जर य पठेद्भक्त्या स विघ्न र्नाभिभूयते ॥१३॥ अव्याहतगतिश्चापि ब्रह्मविष्ण्वादिसत्पुरे । स्वर्गे म] च पाताले नारयस्तं कदाचन ।।१४।। प्रवाधन्ते नर व्याघ्राः पञ्जरस्थं कदाचन । अतो भक्तः कौलिकैश्च स्वरक्षार्थ सदैव हि ॥१५॥ पठनीयं प्रयत्लेन सर्वानर्थविनाशनम् 1 महादारिद्रयशमन सर्वमाङ्गल्यवर्द्धनम् ॥१६॥ विद्याविनयसत्सौख्य महासिद्धिकरं परम् । इद ब्रह्मास्त्रविद्यायाः पञ्जर साधु गोपितम् ।।१७।। पठेत् स्मरेद् ध्यानसंस्थ: स जीयान्मरण नरः । य पञ्जरं प्रविश्यैव मन्त्र जपति चै भुवि ।।१८॥
११८ सस्थायननन् कौलिको वा कौगिको वा व्यासवद विचरेद् मुवि । चन्द्रसूर्यप्रमुर्भूत्वा वसेत् कल्पापुत दिवि ॥१६॥ सूत उवाच इति कथितमगेप श्रेयसामादिवीज, भवशतदुरितन्न ध्वस्तमोहान्धकारम् । स्मरणमतिशयेन प्रातरेवात्र मत्यो, यदि विशति सदा यः पञ्जर पण्डित. स्यात् ॥२०॥ इति श्रीपरमरहस्यातिरहस्ये श्रीपीताम्बराया. पञ्जरं सम्पूर्णम् ॥ श्रीप्रसन्नास्तु ।। श्रीवगलामुखी प्रीयता मिति पोष सुदि १३, सवत् १९२२ लिखित काश्यां दुर्गावाई इदं पुस्तकम् ।। परिशिष्टम् (ग) ॥ अथ बगलामुखीत्रैलोक्यविजयं नाम कवचम् ।। श्रीभैरव उवाच- शृणु देवि प्रवक्ष्यामि स्वरहस्य च कामदम् । श्रुत्वा गुप्ततम गोप्य कुरु गुप्त सुरेश्वरि ॥१॥ कवच वगलामुख्या सकलेष्टप्रद कली। यत्सर्वं च पर गुह्य गुप्त च शरजन्मनः ।।२।। त्रैलोक्यविजय नाम कवचेश मनोरमम् । मन्त्रगर्भ मन्त्ररूप सर्वसिद्धिविनायकम् ॥३॥ रहस्य परम ज्ञेय साक्षादमृतरूपिणम् । ब्रह्मविद्यामय वर्म दुर्लभ प्राणिना कलौ ॥४॥ पूर्णमेकोनपञ्चाशद्वर्णमन्त्रमयैर्युतम् । त्वद्भक्त्या वच्मि देवेगि गोपनीय स्वयोनिवत् ।।५।। श्रीदेव्युवाच- भगवन् करुणासागर विश्वनाथ सुरेश्वर । कर्मणा मनसा वाच्यं न वच्म्यग्निभुवोऽपि च ॥६॥ .
परिशिष्टम् (ग)
११६
भैरव उवाच-
चलोक्यविजयाल्यस्य कवचस्यास्य पार्वति ।
मन्त्रगर्भस्य मु(सू?) क्तस्य ऋपिर्देवस्तु भैरवः ||
पिणक् छन्दः समात्यात देवी क्ली (च?) बगलामुखी ।
वीज प्ली ओ च शक्ति. स्यात् स्वाहा कीलकमुच्यते ।।८13
विनियोगः समाख्यातस्त्रिवर्गफलसाधने ।
देवी ध्यात्वा पठेद्धर्म मन्त्रगर्भ सुरेश्वरि III
विना ध्यानेन नो सिद्धि. सत्य जानीहि पार्वति ।
चन्द्रोद्भासितमूर्द्धजा रिपुरसा मुण्डाक्षमालाकरी,
वाला पीतत्रगुज्वलां मधुमदारक्तां जटाजूटिनीम् ।
शत्रुस्तम्भनकारिणी शशिमुखी पीताम्बरोद्भासितां,
प्रेतस्था बगलामुखी भगवती कारुण्यरूपां भजे ॥१०॥
ॐ क्लीं मम गिरसि पातु देवी ली वगलामुखी।
ॐ क्ली पातु मे भाले देवी स्तम्भनकारिणी ॥११॥
ॐ अं ई ह ध्रुवौ पातु वगला क्लेशहारिणी।
ॐ ह क्ष पातु मे ने नारसिंही शुभङ्करी ॥१२॥
ॐ ह्री श्री पातु मे जो अं श्रां इं भुवनेश्वरी ।
ॐ क्ली सः मे श्रुती पातु ई उ ऊ ऋ मुखेश्वरी ॥१३॥
ॐ ह्री की ही सदाव्यान्मे नासां ऋ ल सरस्वती ।
ॐ ह्रीं हाँ मे मुख पातु ल ए ऐं छिन्नमस्तका ॥१४॥
ॐ श्री मे अवरौ पातु ओं नौ दक्षिणकालिका 1
ॐ ह्री हमे दन्तान् पातु न मे भद्रकालिका ॥१॥
ॐ श्री श्री रसना पातु क ख ग घ चरात्मिका ।
ॐ ऐ सौः मे हनौ पातु ड च छ ज च जानकी ॥१६॥
ॐ श्री श्री (वली) मे गल पातु क स ट ठ गणेश्वरी ।
ॐ ह्री स्कन्धी सदाव्यान्मे ड ढ ण चैव तोतला ॥१७॥
ॐ ह्रीं मे भुजौ पातु तं थ दं वरवणिनी ।
ॐ क्लीं सौ. मे स्तनौ पातु ध न प परमेश्वरी ॥१८॥
१२० सांख्यायनतन्त्र ॐ जू को मे रक्ष वक्ष. फ ब भ भगवासिनी। ॐ क्रॉ हाँ पातु मे कुक्षि म य र चनि.वल्लभा ॥१६॥ ॐ श्रीं ह्र पातु मे पाश्वा ल व लम्बोदरप्रसू । ॐ को ह्र पातु मे नाभि श प पण्मुखपालिनी ॥२०॥ ॐ ऐं सौ पातु मे पृष्ठ स ह हाटकरूपिणी । ॐ क्ली ऐ पातु मे शिश्न ळ क्ष ह तत्वरूपिणी ॥२१॥ ॐ चली ह्र. मे कटिं पातु पञ्चाशद्वर्णमातृका । ॐ ऐ वली पातु मे गुह्य अ ा क गुह्यकेश्वरी ।।२२।। ॐ श्री ऊरू सदाव्यान्मे इ ई ख रगगामिनी । ॐ जू सः पातु में जानू उ ऊ ग गणवल्लभा ॥२३॥ ॐ श्रीं ह्रीं पातु मे जङ्घ ऋ ऋ. घ च महारिणी। ॐ श्री स. पातु मे गुल्फो लु लङ च च कालिका ॥२४॥ ॐ ऐं ह्री पातु मे सन्धी ए ऐ छ ज जगत्प्रिया । ॐ श्री क्लीं पातु मे पादी ओ औ झ ञ भगादरी ।।२५।। ॐ ह्री मे सर्ववपु पातु अ अः ह्रीं त्रिपुरेश्वरी । ॐ श्री पूर्वे सदाव्यान्मा अ ऑ ट ठ शिखामुखी ॥२६॥ ॐ ह्रीं याम्या सदाव्यान्मा इ ड ढ ण च तारिणी। ॐ ह्रीं मा पातु वारुण्या ई त थ द च खेश्वरी ॥२७॥ ॐ य मां पातु कौवेर्यां उ ध न प पिलपिला । ॐ श्री पातु शान्यां ऊ फ ब वैन्दवेश्वरी ॥२८॥ ॐ श्री मा पातु चाग्नेय्या ऋ भ म य च योगिनी । ॐ ऐं मा पातु नैऋत्या ऋ र राजेश्वरी सदा ॥२६॥ ॐ श्री मां पातु वायव्यां ल ल लम्बितकेशिनी । ॐ प्रभाते च मा पातु ल व वागीश्वरी सदा ॥३०॥ ॐ मध्याह्न च मां पातु ए श शङ्करवल्लभा । ॐ ह्री क्ली श्री पातु मा साय ऐ ष शावरी सदा ॥३१॥ ह्री निशादौ च मां पातु ओं स सागरशायिनी। क्ली निशीथे च मा पातु औं ह हरिहरेश्वरी ॥३२॥ - परिशिष्टम् (ग) 3 वली वाटे मां मुहूर्तेऽव्यादं ळ त्रिपुरसुन्दरी। विस्मारितं च यत्स्थानं वजितं कवचेन तु ।।३३।। ह्री तन्मे सकल पातु अ. क्ष. क्ली वगलामुखी। इतीदं कवच गुह्य मन्त्राक्षरमय परम् ।।३४॥ त्रैलोक्यविजय नाम सर्ववर्णमयं स्मृतम् । अप्रकाश्यमदातव्य न श्रोतव्यमवाचकम् ।।३।। दुर्जनायाकुलीनाय दीक्षाहीनाय. पार्वति । न दातव्य न, दातव्यमित्याज्ञा परमेश्वरि ॥३६।। प्रदीक्षित उपाध्यायविहीनः शक्तिभक्तिमान् । कवचस्यास्य पठनात् साधको दीक्षितो भवेत् ॥३७॥ कवचेशमिद गोप्य सिद्धविद्यामय परम् । ब्रह्मविद्यामयमिद यथाभीष्टफलप्रदम् ॥३॥ न कस्य कथित चैतत् त्रैलोक्यविजयेश्वरी । यस्य स्मरणमात्रेण देवी सद्यो वशीभवेत् ।।३६॥ पठनाद्धारणाच्चास्य कवचेशस्य साधकः । कली विचरते वीरो यथा ही बगलामुखी ॥४०॥ { इम मन्त्रं स्मरन्मन्त्री संग्राम प्रविगद् यथा । त्रिः पठेत् कवचेशन्तु युयुत्सु साधकोत्तम. ॥४१॥ शत्रून् कालसमानान् तु जित्वा स्वगृहमेष्यति । मूनि धृत्वा तु कवच मन्त्रगर्भ तु साधक ॥४२॥ ब्रह्माद्यानमरान् सर्वान् सहसा वशमानयेत् । गले तु कवच साधकस्य महेश्वरि ।।४३॥ । वशमायांन्ति सहसा रम्भाद्यप्सरसा गणाः । उत्पातेषु च घोरेपू भयेषु विविषेषु च ॥४४॥ रोगेषु कवचेश च मन्त्रगभं पठेन्नर. । कर्मणा मनसा वाचा तद्भय शान्तिमेष्यति-||४|| श्रीदेव्या वगलामुख्याः कवचेश मया स्मृतम् । प्रैलोक्यविजय नाम पुत्रपौत्रधनप्रदम् ।।४६।। , ऋणहरिमेतत्स्याल्लक्ष्मीभोगविवर्द्धनम् । वन्ध्या धारयते कुक्षौ पुत्रं पश्यति नान्यथा ॥४७॥ वृत्वा गले सांख्यायनतन्त्र मृतवत्सा च विभृत्याथ कवच वगले सदा । दीर्घायुर्व्याधिहीनस्तु तत्पुत्रस्तु भविष्यति ॥४८॥ इतीद वगलामुख्या. कवचेश सुदुर्लभम् । त्रैलोक्यविजय नाम न देय यस्य कस्यचित् ।।४६।। अकुलीनाय मूढाय भक्तिहीनाय देहिने । लोभयुक्ताय देवेशि न दातव्य कदाचन ॥५०॥ शिष्याय भक्तियुक्ताय गुरुभक्तिपराय च । लोभदन्तविहीनाय कवचेश प्रदीयताम् ।।५१।। अभक्तेभ्यो विपुत्रेभ्यो दत्वा कुष्ठी भवेन्नरः । फल गृह न चाप्नोति पर च नरक व्रजेत् ॥५२॥ दीपमुज्ज्वाल्य मूलेन पठेद्वमैदमुत्तमम् । प्राप्ते कन्यार्कवारे च राजा तद्गृहमेष्यति ॥५३॥ मण्डलेशो महेशानि सत्य सत्यं न संशयः । इद तु कवचेश तु मया दिव्य नगात्मने ॥५४॥ पूजनात् पठनाच्चास्य चतुर्वर्गफलप्रदम् । गोप्यं गुप्ततर देवि गोपनीय स्वयोनिवत् ।।५।। L इति रुद्रयामले उमामहेश्वरसवादे बगलामुखोत्रलोक्यविजयं नाम कदई सम्पूर्ण श्रीजगदम्बार्पणमस्तु । मिति माघकृष्ण ५ सवत् १९२२ ईदं दुर्गायाः । परिशिष्टम् (घ) ॥ अथ, धीपीताम्बरारत्नावलीस्तोत्रम् ।। ॥ श्रीगणेशाय नमः । श्रीपीताम्बरांय. नमः प्रोङ्कारद्वयसम्पुटान्तरपुटं मायास्थिराद्वन्द्वितं, तन्मध्ये वगलामुखीति विमल सम्बोधन सर्व' च । दुष्टानामथ वाचमाश च मुख' संस्तम्भयेत्यक्षरं, जिह्वां कीलय कीलयेति च लिखेद् बुद्धि तथा नाशय ॥१॥ ब्रह्मास्त्रं सकलार्थसिद्धिजनक पत्रिंशदात्मक- म्प्रोक्तं पद्मभुवा हिताय जगतां यन्नारदाग्ने पुरा । १.५० पदं। १. वि.
परिशिष्टम् (घ) १२३ जीवन्मुक्तपदे विभान्ति सुधियो येषा मुखे भासते, निर्द्वन्द्वामृतसागरेग्दुकिरणाहाराश्चकोरास्तु ते ॥२॥ प्रोमित्यादिस्वरूप जपति तव गिवे शब्दतन्मात्रगर्भा-२ वाचो यस्मात् परार्थप्रकटितपटवो वर्णरूपा निरीयु. । ब्रह्माद्यैः पञ्चतत्वैः परिवृतमनघं चित्प्रबोधाधिगम्य, दुर्जेय योगयुक्तं कथमपि मनसा योगिभि ह्यमाणम् ॥३॥ ही वीज 'हृदि यस्य'" भाति विमल लक्ष्मी स्थिग तद्गृहे, धर्य तस्य कलेवरेऽपि विगते दीर्घायुपो भूतले । कल्पान्तेष्वपि वृद्धिमेति विमला तद्वशवल्ली परा, शौर्य स्थैर्यमुपैति तस्य पुरतस्त्रस्यन्ति वादीश्वरा. ॥४॥ बद्ध वारिधिमुद्यतो जनकजानाथोऽपि पीताम्बरे ! त्वा ध्यात्वार्णवशोषणे कृतमति. सेतु प्रचक्र द्रुतम् । जित्वा रावणमुग्रगत्रुमवलान् वन्दीन् विमुच्याऽमरान्, कीत्ति लोकसुखोदया व्यरचयत् कल्पस्थिरामम्बिके ।।शा गर्वी सर्वति रङ्कति क्षितिपतिमू कायते वाक्पति- वह्निः शीतति दुर्जनः सुजनते पुप्पायते वासुकि । श्रीनित्ये बगले तवाक्षरपदैर्यन्त्रीकृता' यन्त्रिताः, के के नो निपतन्ति सस्तमुकुटाश्चन्द्रार्कतुल्या अपि ।।६।। लावण्यामृतपूरिते तव कृपापाङ्गे निमग्ना नरा 'ब्रह्मेगादिदिगीशंवृन्दमपि ते जानन्ति गुजोपमम् । येषा चेतसि संस्थिताऽसि वगले ! ते विश्वरक्षाक्षमा., प्रारब्ध द्रढयन्ति सत्वरतरं विप्नं रविन्तीकृताः ॥७॥ मुख्यत्व समुपैति ससदि तवाऽपाङ्गावलोके नरः, किं तञ्चित्रमहो स्वय प्रभवत्ते सृष्टिस्थितिध्वसने । यश्चित्ते तव 'भाति मामक इति'' त्वद्दर्शन यस्य वा, त सर्वा ह्यरिणमादयोऽप्यतितरामाराधयन्ते ध्रुवम् ।।८।। क्षीणानां वलदायिनी जलनिधौ ‘पोतस्थितौ नाविका,१३ तत्वाण घनकुञ्जगह्वरगिरिच्याघ्रादिभीतेष्वपि१५ १० १. स. मोमित्याचं । २. गर्भ । ३. तपसा । ४. भू। ५. हृदये वि । ६. भजते । ७. ततिः। ८. ० ये नित्यतो। ६. भ्रष्ट मु०॥ १०. ब्रह्मन्द्रादिदिगोश मूतमपि । ११. भक्तिमाशु कुरुते । १२. खिम्नाना। १३. पोतस्थिताना गति.। १४. स्व प्राण। १५. ० सत्वेष्वपि।
सांस्पायनतन्त्र -- । - A 1 स्वां पीताम्बरधारिणी 'परशिवा चन्द्रार्द्धचूडा गदा-१ हस्ता वामकरे प्रतीपरसनामुन्मीलयन्ती भजे ॥६॥ स्वेच्छ ये प्रणमन्ति पादयुगल पीताम्बरे | तावक, ते वाञ्छाधिकमर्थमाप्य सकला सिद्धि भजन्ते पुनः । यद्यत्कत्तुं मुरीकरोति बगले ! त्वत्साधकोऽत्राधुना, तत्सत्रातमिवेक्षते तव कृपाऽपाङ्गावलोके क्षणात् ।।१०।। वाणी' सूक्तिसुधारसद्रवमयो सालकृतिम्तन्मुखे, शापानुग्रहकारिणी कविजनानन्दकसद्धिनी। व्याक क्षमते विशालमतिमास्त्वत्सेवको वाड्मय, कि चित्र यदि सृष्टिमाशु रचते ब्रह्माण्डकोट्यायते ॥११॥ देवि ! त्वद्भक्तदृष्टया तुहिनगिरिमुखाः पर्वता. पासुतुल्या ज्वालामालाश्च चन्द्रामृतकरसंगा. पुष्पता यान्ति नागाः । मूकत्व वाक्पतीन्द्रा सरसि समतुलामाश्रयन्ते समुद्रा राजानो रङ्कभाव रणभुवि रिपवो विद्रवन्ते विशस्त्राः ।।१२।। लेख्य तावकमन्त्रवीजममल दुष्टौघसस्तम्भन, वश्याकर्षणमारणप्रमथनप्रक्षोभणोच्चाटने । व्यक्त वज्रसिवापर यदि मुखे जागत्ति तस्याग्रतः, पादान्त. परिसञ्चरन्ति रिपवो ये सप्तद्वीपेश्वरा. ॥१३॥ नानारत्नविभूषितामलमणिद्वीपे सुधासागरे, । कल्पानोकहकाननान्तरगता या रत्नवेदी परा। तत्राकारितपञ्चप्रेतकमये सिंहासने सस्थिता, ध्यायेऽह करुणाकरां हरिहराराध्यामशेषार्थदाम् ॥१४॥ वाग्देवी वदने वसत्यविरतं नेत्रे च लक्ष्मी करे, दानं दीनकृपालुता च हृदये वीरत्वमाजी , सदा । त्वद्भक्तस्य भवाब्धिपारतरणे तत्त्वोदयो जायते, तेनेद नलिनीदलोपरि जलाकारं जगद् भासते ।।१५।। चञ्चत्काश्चनतुल्यपीतवसनां चन्द्रावतसोज्ज्वला, केयूराङ्गदहारकुण्डलधरा भक्तोदयायोद्यताम् ।। ܝܐ -- -- - । . - . . ४. १. परचमूविद्रावरपोद्यगदा । २. वामकरण । ३ शत्रुरसना। ५. मुक्ति । ६. वाघुना । ७ ०फोटघालये । २. दृष्ट्वा । स्पृष्ट ।
परिशिष्टम् (घ) १२५ त्वा ध्यायामि चतुर्भुजा त्रिनयनामुग्रारिजिह्वा करे, कर्पन्तीमहमम्ब पाहि वगले । त्राणं त्वमेवासि मे ॥१६॥ मातस्ते महिमानमुग्रमधिक प्रोक्त स्वय मानवै- वक्यि सन्द्रियते' श्रमेण यदि वा शक्त्या गुणाम्भोनिवेः । नो निश्शेषतया मुरैरविदितप्रान्तस्य पद्मालये, तस्मात् सर्वगता त्वमेव सदसद्रूपा सदा गीयते ॥१७॥ खज ताऱ्यासमोद्यम प्रकुरुते तादयं च खलाधिकं, वान्त स्तम्भयते जलाग्निशमने याऽव्यक्तशक्ति. शिवे । तद्वीज वगलेति मेऽस्तु रसनालग्न सदैवापल, यद्ब्रह्मादिसुदुर्लभ भुवि नरैः सत्प्राक्तनैर्लभ्यते ॥१८॥ स्तम्भत्व पवनोऽपि याति भवती भक्तस्य पीताम्बरे । कि चित्र यदि वारिधि स्थलपद मेरुस्तु माषोपमाम् । कल्पानोकहकामधेनुप्रमुख रत्नरलिन्दस्थित - ञ्छिार्थाधिकदानमाशु कुरुते दीनेष्वदीनेष्वपि ॥१६॥ भाग्याद्यस्य मुखे विभाति विमला विद्या विशेषाधिका, पट्त्रिंशद्भिरथोदिता बहुगुणीजस्तु सर्वार्थदा। त सर्वे प्रणमन्ति मानवममी' सेन्द्राः सुरा भूसुराः, 'क्रान्ताशेपमहोदय स्वकलनाक्रान्तत्रिलोकालयम्'° ॥२०॥ यत्किविद्भुवने विभाति विमल रत्न महानन्दनं,' या या वृत्तिरुदारतां जनयते यद्यत्पर सुन्दरम् । यत्किञ्चिद्भुवनेऽथवा नु१२ महता शब्देन वा कीर्त्यते,१३ तत्सर्व तव रूपमेव बगले । ससारपारप्रदे ॥२१॥ जाग्रत्पूर्णकृपामृतौषभरिते श्रीमत्कटाक्षेक्षणे, सर्वार्थप्रतिपादकव्रतधरे ये ये निमग्ना नरा । तेषा भाग्यमतीन्द्रिय निगदितु ब्रह्मादयो न क्षमा ये सङ्कल्पविकल्पमात्ररचना. प्रारणात्यये हेतव ।२२।। हस्ते सगृह्य चाप १शरधरनिकरर्यकिरात महाजौ, पार्थो ब्रह्मास्त्रविद्याभ्यसनपटुमतिर्द्वन्द्वयुद्धे तुतोष । १ ख 'सहियते' इत्यपि पाठ । २ 'ताय॑जयोद्यत' इति पाठ । ३ 'वासु' क्वचित् । ४. 'सत्प्राकृतलभ्यते' इति पाठः । ५ परमोऽपि । ६ पवनो ६ पवनो। ७ रनरनेक स्थिते । ८ ०मम् ६. कान्ताशेष० । १. स्वकलनाकान्त्याल ११. महानन्ददम् । । १२ । १३ कोत्तिते । १४. शितशर० ।
१२६ साख्यायनतन्त्र तत्सर्वं देववृन्दैरथ रिपुनिवहर्वीक्षितं सिद्धलोकै- धैर्य शौयं च सर्व तव वरजनित भाति पीताम्बरेऽत्र ॥२३॥ पीतां पीतजटाधरा त्रिनयना पीतांशुकोल्लासिनी, हेमाभाङ्गरुचि शशाङ्कमुकुटा सच्चम्पकस्रग्युताम् । हस्तैर्मुद्गरवववैरिरसना स विभ्रतीमादरात्, दीप्ताङ्गी वगलामुखी त्रिजगता सस्तम्भिनी चिन्तये ।।२४॥ कर्णालम्बितलोलकुण्डलयुगा श्वेतेन्दुमौलि करैः, केयूरागदपाशमुद्गरगदाववादिकान् विभ्रतीम् । देवी पीतविभूषणामरिकुलध्वसोद्यतां ये नरा ध्यायन्त्याशु लभन्ति सिद्धिमतुला ते वालिशा स्यु. कथम् ।।२५।। लब्ध्वा मातरशेषकान्तिभरितानन्द कृपावीक्षण, वर्षीयानपि मोहितु प्रभवति स्त्रीवृन्दमुन्मीलितुम् । किं तच्चित्रमनेकधा भ्रमयते दृष्ट्या त्रिलोकीमिमां, सूर्येन्दुस्तनधारिणीमपि वलात् कन्दर्पदाधिक ५ ॥२६।। यन्त्र जैत्रमनेकदु खशमन पीताम्बरे ! तावक- मोङ्कारद्वयसम्पुटेन पुटित शिष्टैस्तथावेष्टितम् । तद्वाह्ये स्थिरमाययाष्टपुटित पाशाङकुशाद्यावृत, येषा चेतसि 'भाग्यतो निवसते ते विश्वसर्गक्षमा.'६ ॥२७॥ कर्पूरागुरुचन्दनैभृगमदैर्गोरोचनाकेशरै- स्त्वत्पादाम्बुजमर्चयन्ति वगले। ये प्रत्यह मानवा. । ते लब्ध्वा श्रियमभुतामपि चिर भोगाश्च मुक्त्वाऽवनौ, सायुज्यालयमाविशन्ति परमानन्दोऽस्ति यत्राधिक. ॥२८॥ लब्ध्वा पादयुगे रतिं तव शिवे क्षुद्रोऽपि देवेन्द्रता- मासाद्यामरसुन्दरीभिरमल गैदिवि क्रीडति । ये हित्वा तव भक्तिमन्यभजनानन्दाश्चिर ते नरा भ्रष्टा धर्मपराइमुखा भ्रमधियो भार वहन्ते भुवि ॥२६॥ यामाराध्य हरो हरत्वमभजद विष्णुस्तु विश्वात्मता, चक्रे सृष्टिमजोऽप्यवोचदखिल वेदादिसद्वाड्मयम् । ध्यात्वा ध्वान्तमशेषमाशु हरते सूर्योऽपि पीताम्बरे । तीव्र तापमपाकरोति रजनीनाथोऽपि चूडाश्रितः ॥३०॥ १. ख स्वयं । २. सनस्त । ३. पीतेन्दु० । ६.'' सस्थिताऽसि बगले ते विश्वरक्षाक्षमा. । ४ ०भरितं दिव्य । ५. वर्षाधिकाम् । ७. सतत परिशिष्टम् (घ) १२७ वुद्ध नागय कीलयाशुरसनामघ्र योर्गति स्तम्भय, दुष्टान् द्रावय मारयारिनिवहान् दासाश्विर पालय । इत्थ ये बगलामुखी पद गति लब्ध्वा पठिष्यन्ति ते, यन्त्रारूढमिवारिवृन्दमखिल कर्तुं समर्था. सदा ।।३१।। ध्यात्वा त्वां वगले ! पुरा गिरिसुता चक्रे शिवं स्व वर, प्रोक्त नार्पयितु शिवेन गदिता सकल्पनाग्नी तदा । रत्यक्ताग्निर्गलितावलि गिरिसुतात् त्यक्त वा गलस्तन्मुखात्, तस्मात् त्व बगलामुखी निगदिता नित्या परा योगिनी ॥३२॥ नागेन्द्रर्देवसिद्धर्मुनिवरनिवहदानवै राक्षसेन्द्र- दिक्पालदिक्करीन्द्र दिनकरप्रमुखैः सद्ग्रहैस्तारकाद्यः । ब्रह्माचे स्थूलसूक्ष्मरविदितमुदिता त्व परा चोन्मनी त्व, नित्या पीताम्बेरा त्व रिपुभयशमनी भक्तिचित्तासनस्था ॥३३॥ 'शम्भुर्यद्गुणगाननोद्यतमतिर्नाट्योत्सवस्ताण्डवे, चक्रे चन्द्रमयूखकम्पनकरा नीराजता पादयो । हेमाम्भोजदलेर्जटाजलभरैरानन्दितमौलिभि६, पूजां प्रत्यहमातनोति नटयन स्वहस्ततालादिभि ॥३४॥ या दने चतुराननोऽपि वदने चित्तारविन्दस्थिता, या वक्ष स्थलसस्थिता हरिरजामालिङ्गथ् पीताम्बराम् । यद्देहार्धमुरीचकार पुरजित्' सौन्दर्यसाराधिका, पट्चक्राक्षररूपिणी भज सखे ! देवी जगत्पालिकाम्१११॥३५॥ हस्ते भाति गदा सदात्तिगमनी रत्नावली त्वद्भ जे, पादे नूपुरमीगमौलिमरिणभिर्नीराजित राजते । ताटङ्घ श्रवणे कुचोपरि सदा कस्तूरिकालेपर्ने, काश्मीरद्रवमङ्गरागमधिका पीतच्छवि तन्वते ॥३६।। कारद्वयसम्पुटेन पुटिता 'विद्यागमे सस्थिता,१५ षट्चक्राक्षरवीजसाररचितां पत्रिंशदात्मिकाम्१६ । २. त्यक्त्वा० । १. स.कोलयारि । ३. नागेन्द्रदेवसंघ वि० । ४. भक्त० । ५. गुणगानतत्परमतिनित्योत्सवे। ६. ०कम्पनमिवा। नीराजनं । ८. हेमाम्मोजजले। ६. नन्दिता मौलिभि। १० पुरभित् । ११. जगद्वयापिकाम् । १२. नीराजनं १३ लसतु। १४. पीता छवि -। १५. विद्यामजास्ये स्थितां । १६. सनत्ववर्णात्मिकाम् ।
१२८ . सांस्यायनतने ww 'ये जानन्ति जपन्ति सन्ततमभिध्यायन्ति गायन्ति वा, ते वन्द्या विबुधैश्चरन्ति भुवने सिद्धाचिता. सिद्धये ॥३७।। स्वाहाशक्तिस्पासने तव ऋषिः श्रीनारदो देवता, नित्या श्रीवगलामुखी निगदिता छन्दो भवेत् त्रिप्टुभम् । बीज तु स्थिरमायया विरचित नानाविवस्तम्भने, प्रोक्त पद्ममुवाऽखिलाप्तिविनियोगोऽप्यच्युताकारता' ।।८।। हृद्य सर्वसुरेश्वरैश्च ऋपिभिर्दुष्प्राप्यमेवाद्भुत, स्तोत्र गोप्यतम स्वभाग्यवशत. प्राप्त पठिष्यन्ति ये । सूक्त्या देवगुरु 'धनेन धनद'६ जित्वा चिरञ्जीवितां, षण्मासात् सुखसागरे शिवसमाक्रीडा करिष्यन्ति ते ॥३६।। देवी स्वप्नगता स्वयैव लिखित मह्य ददावद्भुत, दिव्यास्त्र पुरतः पठस्व विमल सिन्दूरवर्णं. करै । रोमाञ्चाङ्कितहर्षमाप्य लुलितैरङ्गै पठन्त नर- प्राप्तोऽह परमोदयप्रदमिद ज्ञानं कवीन्द्रादिदम् ॥४०॥ प्राप्ता श्रीबगलामुखीवदनत स्वप्ने सुविद्या मया, ट्त्रिंशद्भिरिमः सुवर्ण निचर्य. सद्वीजरत्नावली । येपा कण्ठगता विभाति जगतीपीठे प्रयोगक्षमा, वश्याकर्पणमोहमारावधौ स्तम्भे तथोच्चाटने ॥४॥ चलत्कनककुण्डलोल्लसितचारुगण्डस्थलाम्, लसत्कनकचम्पकथतिविराजिचन्द्राननाम् । गदाहतविपक्षका कलितलोलजिह्वाञ्चला, समरामि वगलामुखी विमुखवाड् मुखस्तम्भिनीम् ॥४२॥ . ।। श्रीपीताम्बरारत्नावलीस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥ प्रवत् १८६० शाके १७५५ प्राषाढमासे शुक्लपक्षे ५ मदवासरे लिखितं ब्रह्मचारि- काशिनाथेन ।। श्रीगङ्गाविश्वेश्वरान्या नम. ।। . - . १. ख पादद्वय एकचत्वारिंशच्छ्लोकादनन्तर विद्यते । २. नानाविधि०। ३.०प्यसत्कारकः । ४. नित्यं । ५. शेत्या। ६. धनधनपति। ७. ललित०। ८. कवीन्द्राचितम् । २. स श्लोकोऽय नास्ति। १०. इति श्रीनारदोतं पीताम्बरादेवीस्तवराजस्स्तोत्रम् ।
. - सांख्यायनतन्त्रस्थानाम् ₹ पद्यानामनुक्रमः पृष्ठाङ्क पद्याङ्क 5 , अग्निबीजादिगायत्री ३०-२० प्रङ्कुशेनैव मुद्राया. ६-७ अङ्क श बोजमुच्चायं ७७-१५ अङ्गत्रयेण सयुपत ६९-२४ अझ ठमानां कृत्वा ८४-४ अघोराश्च पाशुपती ६६-२६ अत्यन्तश्वयंसंयुक्तो ५७-६ अथवा पीतपुष्पैस्तु १०४-२७ अथवा पोर्णमास्यां वा ३६-१७ अथवा वगलामन्त्रं ६७-१० अथ स्कन्द प्रवक्ष्यामि १००-३ अथातः सम्प्रवक्ष्यामि ९८-३ अधमं च शिलापूजा ३३-१६ अधुना स्तम्भयत्येतत् ४१-१४ मनाथस्य चितो रात्रौ १६- अनुक्रमेण सर्वत्र १०१-१३ अनुष्टुप्छन्द प्राख्यातं ९८-८ मनेन अमयोगेन १०१-१२ अनेन (नया) विद्यया पुत्र ६३-२२ अनेन योगवर्येण १०४-२८ अनेन योगवर्येण ९५-१० अन्त्यपत्र चाप्टवान् १०-१२ अन्त्यवणं समुच्चार्य ६१-टि. मन्न पो जायते च ७२-१४ प्रन्नेन अन्वहो हृत्वा ४८-२० अन्ययोगसमारम्भ १६-२५ अपमृत्युविनाशायं १०३-६ अपामार्गस्य वीज तु ७५-२१, प्रमात्यानां च दुष्टाना १०३-४ प्रमोघमृत्यनाशाय १०३-१६ सम्व पीताम्बराउचो वरुण० ६४-१ अयुताच्चिन्तित कायं ७३-३० अस्ताच्छत्र संहारो ७४-४ अयुताज्ज्वररोगी च ७३-२६ अयुतात्तस्य शत्रोश्च ७३-२८ अयुतादरिगवं तु ७३-२४ अयुताल्लभते भोग ५३-१६ अयुत च दिवारात्री ५१-टि. प्रयुत जुहयान्मत्री ७४-टि० अयुत जुहुयान्मन्त्री ७५-१७ अयुत तर्पणात्पुत्र ७२-१६, २० प्रयुत तपणेनैव ७२-१५ अयुतं तस्य मन्वन्तु ५५-२२ प्रयुत मन्त्रयित्वा तु ८६-२७ अरनिहस्तमात्र च १५-१४ अर्कपञ्चकवर्णेन ४०-८ प्रकपत्रद्रवेणव ४६-२८ भर्कपत्रे लिखेन्नाम ५१-टि० प्रकवारे तु सध्यायो ८६-२६ अर्चनं कलशे चव ७१-५ प्रचंनं गोडदेशीयं ६६-३१ अर्चनं गौडदेशे च ३४-४ अर्चयेत् पञ्चमी कुर्याद् ७०-४० अर्चयेत्पूर्ववत्पुत्र ७-१७ अर्चयेत्पूर्ववद्यन्त्र २२-१४ अचंयेत् पसोपेता ३६-२७ अचंयेदयुत मन्त्री ८०-२१ अचंयेद् विधिमार्गेण ३५-२६ प्रद जिह्वां गदा चार्ट ३५-१६ अलीकैन क्षुद्रमति ४७-१४ अशीतिवर्णसयुक्तो ७८-२१ अशोकमूले निवसन् ८१-१० अश्मयंद रिपोरङ्गे ५२-३४ + S २ सास्यायनतन्त्र इन्द्रादिपदसस्तम्भ १०२-२४ इप्रसिद्धिर्भवेत्तस्य ७६-१० उ अधुतानां च शास्त्राणां ८२-१५ अश्वत्थमूलमाश्रित्य ७४-६ अश्वत्थमूले प्रजपेद् ६२-५ अश्वत्थरिन्धनरेव ६५-७ अष्टकोणेषु विलिखेद २१-६ अष्टदिक्पालकोशाष्ट० १-३, अष्टपत्र न्यसेत्पुत्र ७-१२ अकृपाशसमायुक्त ५-१६ अष्टमूर्ते नमस्तुभ्य ७८-२ अष्टमूत महामूर्ते २३-२ अष्टमं कठवल्ल्या च ८-२३ अधम्या च चतुर्दश्यो ७६-टि. अथवेतालशमने ६४-४ अष्टायुतं तर्पण च ८२-११ मष्टोतरशत सम्यक् ५५-२० अस्त्रशास्त्रमय मन्त्र ५७-७ उच्चाटनार्थं जपेत्पुत्र ३०-टि. उत्तम कुण्डहोमन च १४-३ उत्पाटय कण्टकान्यादी ५३-३६ उद्धरेत्तारमादी त ५४--४ उन्मादी च भवेच्छा ७३-२३ उपचारः पोडशभि ७१-७ उपस्थान चैवमेतत् ११-टि० उपस्थान त्रिकालस्य १०-१७ उलूककाकयोः पत्र १६-२५ उल्कामुखी द्वितीयास्त्र ६ -२८ उल्लध्य बगलामत्र ३३-टि. उष्णोदक ताम्रपाने ६४-३८ ऊ ऊवं रक्षेन्महादेवी १३-१४ ऋ ऋषिच्छन्दत्रितयक ६६-१० ऋषिश्चाप्यग्निवाराहः ३६-२५ ऋषिसिद्धामरैश्चैव ३-२७ आकर्षणं भवेच्छीघ्र ४८-२५ आगच्छेत्याज्ञया तस्य ४०-३३ प्राज्येन मिश्रितं चैव ६८-२० प्रात्माथं च पराथं च १०३-७ आदी गणपति पूज्य १०४-२३ प्रादी भास्वररूपिणी कुरु तदा ६८-२२ प्राध बीज पुनश्चोक्त्वा ४२-२६ प्राद्यवीज मनोः सख्या ४२-८८ प्राद्यास्त्र वगलानाम्नी ३७-३ आरनालस्य भाण्डे तु ८४-५ आरनालेन तद्भस्म ८४-६ आवाहिनी स्थापनी च ६-८ प्रापचयंद महामन्त्र४२-२५ आश्विने कात्तिके चैव ६-३ ए एकाक्षरीमहामन्त्रै ६५-१२ एकाक्षरीविद्यया च ५२-टि. एकाक्षरी च बगला ५८-१५ एकाक्षरी जपेदादो १०२-१६ एका बगला देवी ५०-४ एतच्चूर्णप्रयोग च ८६-२६ एतत्पूर्जा विना पुत्र ३६-१८ एतदर्चाविधिर्नाम ६९-२६ । एतदर्चाविधिश्चैव ७०-४१ एतदष्टाक्षरी मंत्र ८३ टि०-२५ एतद्यन्त्र लिखेद् भूर्ये ६३-२७ इ इच्छया वर्तते सर्व ४०-३२ इति सक्षेपतः प्रोक्त १०५-३५ इन्द्रमध्ये लिखेद् विद्या ६३-२४ पधानुक्रमः ३ २ श्री ॐ नमो पदमुच्चायं ६१-७,टि. क एतद्यन्त्र हृदि ध्यात्वा ६३-३० एतद्यन्त्र हृदि ध्यायेद् ६२-१५ एतद्राज्य स मासेन ५६-३४ एतद्विद्यापुरश्चर्या ६०-३६ एतन्मन्त्रवर पुत्र ५६-२२ एतन्मत्रस्य माहात्म्यं ८२-३ एता मुद्राश्च ततो 8-8 एरण्डतलेन जुहुयाद् ४८-२४ एवमेव विधि -पुत्र ७०-४२ एव कुर्यात् प्रातरेव ६२-१६ एवं कृत्वा जपेन्मन्त्र ८९-२३ एव कृते सप्तरात्र ५२-२४ एवं च पूजयेद्यन्त्र २३-२७ एव च पूजयेत् सम्यक् ३३-१७ एव च मार्जनं कृत्वा १०-१५ एवं च मार्जन कृत्वा ६-२४ एव च मालिकां कुर्यान् ६५-१३ एवं त्रिविधपूजा च ६९-टि. एव घ्यात्वा जपेते पुत्र ८१-६ एवं ध्यात्वा जपेन्मत्र ५५-१६ एव ध्यात्वा जपेन्मन्त्र १३-२० एव ध्यात्वा जपेन्मन्त्र ४३-३६ एवं ध्यात्वा जपेन्मन्त्र ४५-१६ एव पात्वा तु देवशी १०-२१ एवं न्यासविधि कृत्वा १३-१५ एव भूतसहन च २२-१२ एवं मध्यदिनोपास्थि ११-२३ एव मन्त्राभिपेकञ्च -२० एवं मासत्रय कृत्वा ८४-६ एव मासप्रयोगेण २४-१४ एव य: कुरुते पुत्र ७६-टि० एवं रोगसमायुक्तो २०-२७ एव लिखित्वा यत्रं च ६२-१२ एवं शुभदिने सम्यक ६-६ एवं होमप्रयोग च ७६-२६ एहि-गदद्वयं चोक्त्वा ५७-६ कण्टक पुरपक्षस्य ८५-१४ कण्टकान्तोपयेदर्क ५२-टि० कण्ठे वा बाहुमूले वा ६२-१७ कदलोमूलमाश्रित्य ६२-६ कन्यका चाथवा पुत्र ३३-१५ काया चंव न्यसेदेव ३५-१४ कपटादिविनाशार्थे ६५-६ कपित्थवृक्षमूले तु ६२-७ कपिलानवनीतं च ६१-३ कर्परमिश्रित तोयं २७-१२ कम्बुकण्ठी सुताम्रोष्ठी २३-१ करजमूलमाश्रित्या० ६२-१० करोति यस्य सन्तोपं ७७-१२ कसपत्रजद्रावैः ४६.टि. कल्पते चित्तसंक्षोम ३६-टि० कवचात कोलनं योगः १०२-२३ कवच च चतुर्थः स्यात् १०२-२२ कवच पञ्चम वारणः १०१-१५ कवच प्रथम बारग१०१-१४ कवच वेदवणं च १०२-१८ कवीश्वरोऽपि चोन्मादी ७६-८ कस्तूरी मिश्रित तोय २७-१४ कस्तूरीलेपन कुर्यात् २४-५ साकपत्रेण सयुक्त ७२-१० काकवद्भमते शत्रुः ७२-११ काफवन्रमते श० २६-२८ काकोलूकदल चव ८५-१५ कामराज च हल्लेखो ४४-१० कामरूपास्य देशे तु ७०-३४ कामुक काञ्चनासक्तं ५-टि. कारण तत्र केन स्यात् १००-४ कालानलनिर्भा देवी ४३-३४ ४ साख्यायनतन्त्र क्षद्रप्रयोजनः पुत्र २०-१८ ख खरस्य रक्तमादाय १६-७ खरवालं च रोम च ८६-३३ खजूरजेन द्रव्येण ४८-२३ खाने पाने च तद्भस्म १६-१६ ग . कालीशन्दद्वयं चोक्त्वा ८७-६ काली करालवदनो ८८-१४ किं तस्य जपयुक्तानी ४०-टि. कुटिलालकसंयुक्ता ६५-१२ कुण्डे घा स्थण्डिले वेद्यो १०४-१७ कुवेरसदृशः श्रीमान् २०-२० फुवेरसदृशः श्रीमान् ८२-१८ कुवेरसदृशः श्रीमान २७-१५ कुवेरसदृशो भूत्वा ८०-१५ कुमारक प्रवर्त्तन्ते ३६-३१ कुरुपाञ्चालदेशाचर्चा ७०-४३ कुर्यात् कृत्रिमरोगेण ६२-२० कुर्यात् सोभाग्यसम्पूजा ३६-२४ कुलाचारसमायुक्तः ३-२४ मुशेन जुहुयात्तस्य '४६-४ कुसुमैश्चम्पकरय॑ २३-२५ क्रूरग्रहविनाशाय १०३-५ कृत्वा एकाक्षरीमन्त्र ६६-२५ कृत्वाघमण्डलं चैव २४-१२ कृत्वा पवित्रग्रन्थि च ७२-१२ कृष्णाष्टम्या चतुर्दश्या ३५-८ केतकीदलहोमेन ४७-११ कैलाशशिखरासीनं १-२ कोऽयस्तार्क्ष्यमनुश्चेति ६१-६ कोमलं तत्फल सम्यक् ७४-११ कौटिल्यस्थापन चव ६४-३६ कोलसारपर नाम ७०-३६ कोलसार च तन्नाम ६९-३३ क्रमात् सवं तु सम्पाद्य ६७-३७ कौलागमफसवेद्या २६-१ कोलार्चन विधानेन ७६-६ क्षणादुच्चाटन कुर्याद् ४ -२७ क्षयरोगी भवेच्छत्र. २८-२७ क्षयरोगी भवेन्मयों ७३-२७ क्षीरेण भ्रमनाशश्च ४०-२१ क्षुद्रकमरिण निर्वाशे १०१-८ गङ्गाधर नमस्तेऽस्तु ६-२ गजाश्ववृषभोलूक ८५-२२ गतिगमं च वाक्यानि २६-७ गत्वा तु रिपव. सर्वे ५६-२३ गम्भीरा च मदोन्मत्ता १०-१८ गर च तिलतलं च ४६-३० गर्भकोलागमासयत ४-८ गर्भस्तभनदोष च ८६-२५ गायत्री छन्द प्रादिष्टं ९८-६ गायत्री वगलानाम्नी २६-६ गायत्री बगलानाम्नी ३१-२६ गायत्री कवचं पुत्र १०१-११ गुडोदकस्तपण च २६-४ गुणश्च वर्तते पुंसा ७७-१० गुणहस्तं कोटिहोमे १५-१३ गुप्त कौलागम नाम ३४-५ गुरुशिष्यावुभौ मोहाद० ५-२२ गुरुशुश्रूषया विद्या ५-१२ अस्त कृत्वा वैरिनाम २०-१६ गोक्षीर प्रातरुत्थाय ६४-३५ गोपनीय गोपनीय १०५-३४ गोपयेत् सर्वदा पुत्र ४३-४० गोमयस्था हरिद्रां च ६५-८ गोमयलेपन दत्वा २६-२७ गोमूत्रेण हुनेन्मन्त्री ४८-२२ गोडीद्रव्यस्तपणेन २७.टि. गोडीद्रव्येण जुहुयात् ४७-१७ है .
५ पद्यानुक्रमः - गौडी माध्वी च पैष्टी च ३३-१८ प्रसनीति पदं चोक्त्वा ५४-७ ग्राममध्ये हुनेन्मन्त्री ८४-६ ग्रामं वा नगरं वाथ ५८-११ ग्रामं वा नगर वाथ ७४-१२ ग्ली बीजं ह्री च शक्तिश्च ६०-१० च । चक्रपूजासमायुक्त (क्तो) ४-११ चतुरक्षरी च बगला ६७-७ चतुर्थकोरणे सम्पूज्य ३२-६ चतुर्भुजा च द्विभुजा ३२-४ चतुर्भुजा त्रिनयनां १७-११ चतुर्भुजा त्रिनयना ४६-१ चतुर्भुजा वा द्विभुजा १००-२१ चतुल्लक्ष पुरश्चर्या २६-८ चतुवर्णात्मिके मन्त्र ६७-६ चत्वरे सर्वकार्याथं ९७-३५ चन्द्रचूड नमस्तेऽस्तु ४३-२ चन्द्रोपेन्द्रमहेन्द्रादि ८३-२ चमंगवसनो भूत्वा ४१-१२ चलत्कनककुण्डलोल्लसित० ६-१ चापचर्यासुनिपुर्ण १-५ चिताभस्म चिताङ्गारं ५१-१६ चिताभस्म रवी रात्री ८६-२७ चिसिवस्त्र रवी ग्राह्य २०-२१ चित्रपीताम्बरधरी ६६-२३ चिदानन्दघनावास १००-२ चिन्मयी स्तभनी देवी ४२-२२ चुह्लयोपरि च तद्भाण्ड ६४-६ जपेच्च वायुबीजादि ३०-१६ जपेत्तत्र सहस्र के ५०-१० जपेदमतवीलानि ३०-१८ जम्बीरतरुमूले तु ६३-१८ जलकृत्याविनाशार्थे १०३-१३ जातवेदमये देवि ७१-१ जातवेदमुखीबाणो ६७-२६ जातवेदमुखी मत्र० ४१-६ जातिपचकसमिश्र० ४५-१७ जातिभ्रष्टो भवेच्छत्रु: २५-२४ जात्याभिमानिनो ये च ५६-२६ जिह्वाग्रमादाय फरेण देवी ३-१ जिह्वाग्रमादाय करेण देवी ४३-१ जिह्वा मुख च कर्णाक्षि ८८-८ जिह्वास्तम्भनमाप्नोति ६१-२० जिह्वास्तभो भवत्येव ७२-१८ नि ह्वास्तम्भ भवेच्छत्रो. ५०-८ जिह्वां कीलय उच्चायं ३८-११ जिह्वा कीलय उच्चायं ३६-२३ जिह्वां कोलय उच्चायं ४०-६ जिह्वां कीलय उच्चार्य ४४-७ जिह्वा खङ्ग पानपात्र ६०-१२ । जिह्वा वाणी च बुद्धिं च ६४-२५ जीवन्मुक्त: स एवात्र ७०-४४ जुहयात्तत्क्षणात् पुत्र ७५-२० जुहुयात् पूर्ववच्छत्रु ४६-३२ जुहुयात् पट्सहस्र तु ४६-२६ जुहुयाद्दवता ध्यात्वा ४६-२८ ज्वालामुखी तृतीयास्त्र ३७-४ ज्वालामुखी देवता च ४१-२० ज्वालामुख्यमिव बाण ६५-१४ + . छ छन्दादिक पूर्ववत् स्याद् ६८-७ छागमांसेन जुहयान् ५५-१७ ज तक्रेण तर्पण चैव २.-१७ तक्रण सहित पीत्वा ८९-२६ तच्चूर्ण देवतागारे ८५-२१ जपसत्या यत्र नोपता ३१-२५ ६ साख्यायनतन्त्र तज्जल च समानीय ७१-६ तज्जल वामचुलुके ६-१० नतो नागीश्वरी तद्वच् ५५-टि० ततोपरि लिखेत्सम्यक् २१-५ ततो पलाशमूलं तु ६३-टि० ततो वै प्रजपेद्विद्या १००-२० ततः कवचमालम्ब्य १००-५ ततः शिष्य समानीय ६-७ तत्कारिपत्रजद्रावं. ४६-टि० तत्क्षणानाशमाप्नोति ८६-२६ तत्तदेकाक्षरीबीज १२-३ तत्पवित्रेण सयुक्त ७१-8 तत्प्रयोग तत्र उक्त्वा ८ टि. तत्फलेन हुनेद् रात्री ७४-८ तत्रस्थाः शत्रुभाश्चि ७५-२२ तत्वलक्षप्रमारणेन ६६-२८ तत्त्व वद महादेव १०३-३ तदुद्धार शृणु प्राज्ञ १६-१४ तदुपरि च सवेष्टय ७६-टि. तदुपरि समम्पच्यं ३२-१२, १३, टि. तद्भस्म चूर्ण मिश्रं ८४-११ तद्भस्म तिलतलेन ८४-१० तद्वोजोद्वारमनघ १२-५ तद्यत्रधाररमादेव ६३-२६ तद्वस्त्र गुलिकीकृत्य ५०-५ तद्विद्यां च प्रवक्ष्यामि २-८ तद्विद्या च प्रवक्ष्यामि तन्मन्त्रसध्या वक्ष्यामि तन्मालिका रवो वारे ६५-१० तर्पणेनायुतेनैव ७३-२६ तर्पण च गवां क्षीर ४२-२३ तर्पणं च दिवा कुर्याद् ६५-१६ सपरणं च दिवा कृत्वा ६३-१५ तपंण मन्यसस्कार ७१-४ तप्पयेतद्दशाश च ६०-१५ तर्पयेत्तद्दशाश च १७-१६ तलतलेन संयुक्त १५-२५ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तस्मात सर्वप्रयत्नेना० ३७-३१ तस्मिाच मन्त्रयेत साध्यं ५३-४० तस्य दर्शनमाण ८०-१७, २२ तस्य प्रज्ञा पलानीय ३३-२० तस्योपरि च षट्कोणे ७६-टि० तस्योपरि च सवेष्टय ७६-६ तस्योपरि ततस्तीर्य ३५-१० तस्योपाय च तद्विद्यां १-६ तस्योल्लंघनमाण ७७-११ ताडयेद् हृदये मन्त्री १६-११ ताम्बूलचर्वणाच्छऋ. .६३-२२ ताम्रपात्र जल ग्राह्य १३-३१ ताम्रपान जल शुद्ध ६४-३७ तार च वगलाबीज १६-४ तारञ्च मातृकावणं १३-१७ तारं च विलिखेत् पूर्व ३८-८ तार च स्तब्धमाया च ४०-३ तारादि प्रजपेन्मन्त्र ३०-१० ताक्ष्यबीजादिमत्र ३०-१६ ताक्ष्यस्य मालामन्त्रश्च तालकेन हुनेत्तस्य ४३-३७ तालकेन हुनेत् पुत्र ४५-२२ तालकेन हुनेद्रात्री १६-६ तालकेन हुनेल्लक्षं ३६-१७ तालमध्ये लिखेन्नाम ५०-६ तिलतलसमायुक्तं १६-२६ तिलतलेन समिश्र ७५-२५ तिलतैलेन सयुक्त २५-१८ तुलसीमञ्जरीभिश्च २३-२३ तुलसीमजरीभिश्च ६३-३२ तुलसीमञ्जरी भिस्तु ८०-टि. तणवज्ज्वलते शत्रु २८-टि० तृतीयकोणे सम्पूज्य ३२-८ तेन कुयति पुत्तली च ६६-२२ ८७-४ १ पधानुक्रमः तेन कुर्यान्मालिकां च तेन देवीकटाक्षेण २-१६ तेन पूजा प्रकर्तव्या २२-१५ तेन मूलेन सम्माज्यं १०-१३ तेन शत्रुस्तत्क्षणाच्च ८४-११ तेनायुत तपणेन ७२-१६ तेनोक्तमाञ्जनेयाय ५६-४ तेनोक्तविधिना सम्यक् ७१-८ त्यक्त्वा पञ्चेन्द्रियासक्ति ३६-२० त्यक्त्वा तन्मन्त्रगायत्री ३१-२४ त्रिकाल तु समोसीनो ६२-३ त्रिकालं पूजयेद्देवों ३३-१६ त्रिकालं लेपन कुर्यात् २५-१६,२४,२५,२६ त्रिकालमयुत जप्त्वा ६१-२६ त्रिकालमाचरेत्सन्ध्या ११-२७ त्रिकालमेककाल वा ६३-३३ त्रिकोणकुण्डे जुहुया० १३-२१ त्रिकोणे पूजयेत् पुत्र ३२-५ त्रिदिन चाथवा पञ्च ५३-४१ त्रिधा मूर्द्ध नि द्विधा बाह्वो १०-१४ त्रिपुरारे त्रिलोकज्ञ ५६-२ त्रिमध्यक्तं पायसेन ४५-१८ त्रिमध्वक्त श्वेतदूर्वा ४६-५ त्रिशत च शत चापि १०१-७ त्रिसप्तमन्त्रित तोयं ७८-२४ विसहन ध्यानयुक्तं ५७-८ त्रिसहन सहन वा १३-२८. लोक्य वशमाप्नोति ८०-१६ लोक्यधिजय नाम ८६-२१ त्रैलोक्यविजयान च १०४-२९ दशेन्द्रियस्तंभने तु १४-७ दयुग्म लिखेद् वाही १६-१० दिने दिने सहस्र कं ६३-१३ दीक्षामार्ग विना मन्त्र ४-४ दीक्षाविधि विना मन्त्र ४-५ दुरालापसमायुक्तं ५-१८ दुर्वासा ऋपिरेवात्र ६०-६ दुष्टस्तम्भन मुग्रविघ्नशमनं ११-२२ दुष्टानां पदमुच्चार्य १६-५ दूर्वाहोम त्रिमध्वक्त १५-२१ देवता कालिका नाम ८८-१३ देवता बगलानाम्नी २६-७ देवता वगलानाम्नी ८१-५ देवता बगलानाम्नी ४४-१२ देवता शान्तिमाप्नोति ५३-टि. देवदानवदैत्यारोन् ६४-५ देवस्येशानभागे तु ६-८ देवी भूत्वा जपेद्देवीं ६५-१५ देवी सम्पूजयेत्सम्यक् ६६-२६ देवो भूत्वा स्वय पुत्र ७०-३८ देशोपद्रवनाशार्थे १०३-१० दौर्भाग्येन समायुक्तः ५६-२६ द्रवेण तर्पण कुर्यात् २६-५ द्रव्याभिमानी पुरुषो ५६-टि. द्रव्यलाभ भवेत्तस्य ८०-१८ द्विगुणां जपमात्रेण ६०-३७ द्विगुण जपमाप्नोति ६०-३६ द्वितीयकोरणे सपूज्य ३२-७ द्वितीये विलिखेत् सम्यक् ६३-२६ द्विपञ्चसप्तविद्धि ६६-१८ द्विशत मन्त्रित चैव ६३-२० ३ द घ . दक्षिणामूर्तिमन्त्रेण ५६-२५ दधिमिश्र गुडूचीमि. ४६-६ दधावनकाप्ठ च ६३-२४ दरिद्रोऽपि भवेच्छीमान् ७६-७ घनजयपुर चैव ३५-टि. धीमहीति पदं चोक्त्वा २६-५ धूपयेच्छत्रुसदने ८५-२० सात्यायनतम्भ धूपयेत्तेन सर्वाङ्ग ८६-२८ धौठवस्त्र परीघाय ६-६ धत्त र कुसुमेनैव २३-१८ धत्तूरक च तन्मूनि ५२-२७ धत्त रद्रवसयुक्त २५-२२ घत रपत्रमादाय ८६-३१ धत्त र तिन्दुकं वीज २४-१३ ध्यानभेद प्रवक्ष्यामि ६०-११ व्यानेन मासिद्धिः स्याद ध्यान यलात्प्रवक्ष्यामि १७-१० ध्यानं यत्नात प्रवक्ष्यामि ३५-१५ ध्यान यत्नात् प्रवक्ष्यामि ३६-२७ ध्यान विना भवेश्मूकः ४३-२१ घ्र वाधरिति मन्त्रण ३५-१२ न न कर्तव्यं मुमुक्षश्च २१-२६ नगरे वाथ ग्रामे वा ४९-टि. नग्नः प्रेतमुखे भौमे १६-२७ न चाभिषेकं न च मन्त्रदीक्षा ७६-५ नद्या समुद्रगामिन्या ६२-१२ न ध्यानं न च होम च नन्द्यावर्तन सम्पूज्य २३-२४ नमः कैलाशनाथाय ६७-२ नमः कौलागमाचार्य १८-२ नम. पापविदूराय ८१-२ नमः शिवाय साम्बाय नमस्ते गिरिजानाथ ४०-२ नमस्ते जगतो देवी ४६-१ नमस्ताण्डवरुद्राय ६२-२ नमस्ते देवदेवेशि ७८-१ नमस्ते देवदेवेशि ८१-१ नमस्ते देवदेवेशी ५६-१ नमस्ते पार्वतीनाथ ५४-२ नमस्ते पार्वतीनाथ ४-२ नमस्ते मोलिनसेव्य २६-२ नमस्ते योगिससेव्य ५७-टि. नमस्ते योगिसंसेव्य १४-२ नमस्ते योगिससेव्य ५०-२ नमस्ते लोकजननी ८३-टि० नमस्ते वगलादेवी २६-१ नमस्ते वृपभारुढ ६४-२ नमस्ते सर्वसर्वेश २६-२ नमस्ते सर्वतर्वेश ८१-२ नमस्ते सर्वसर्वेश ६-२ नमस्ते सिद्धससेव्य ७१-२ नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ ११-२ नमामि वगला देवी ६७-१ नमोऽस्तु मत्रागमकोविदाय २१-२ नागवल्लीदलेनैव ६२-१८ नागवल्लीदल चव ६३-२१ नातः परतरो योगी १०५-३३ नानाकृत्रिमदोषं च ८६-३३ नानांदेहजरोगाश्च ४५-१६ नानामन्त्रेषु मन्त्र वा १२-३ नानारोगविनाशार्थ ६५-८ नानारोगहरं चैव १६-४ नानारोगः कृत्रिमैश्च १५-१७ नानालारशोभाढयां ७३-१ नारदो ऋषिरेवात्र १७-१३ नारी दृष्ट्वा मानसेन ७०-४५ नाशर्यदाशु तत्सर्व ८६-२७ नि क्षिपेत्सप्तरात्र तु १६-१४ नि:क्षिपेन्नवभाण्डेषु ७-१४ निःक्षिपेन्मन्त्रपूर्वं च ५३-३७ निक्षिपेद् द्वारदेशे तु ८६-३२ निक्षिपेद् रविवारे तु ८५-१६ निक्षेपं लभते पुत्र ८३-टि०-२० नित्य च शिसहस्र तु ६२-४ नित्यं चैव सहस्रतु ८६-३० निघानं लमते तस्य ८०-२० निघाय पादं हृदि वामपाणिना ३१-१ .
पद्यानुक्रम 8 प पृष्ठाङ्क पद्याङ्क निम्बार्क कुमुमेनाथ २२ २७ निम्बाकपत्र जद्राव निम्वपद्रव चैव २५ २३ निम्बपद्रवेणव ४८ २७ निम्बार्कपत्रहोमेन १६ ૨૪ निमत्सर निरालम्ब ५ २० निवीर्यो जायते सद्यो ३८. १८ निवेदयेत् पायस च ६५ ११ नेत्रवारण पुनः पञ्च १२ १० नेत्रलक्ष जपेन्मन्त्र १६ नेत्रायुत तर्परोन २७ ११ नेत्रायुत भवेच्छम्भुः नेत्रायुतं हुनेद् घो मान् नोत्पादयेत् कामनया . नो देय (या) विद्यया विद्या ५ १७ न्यासध्यानादिक सव २६ 8 ar २८ टि. ३६ टि. 58 ६ त्यास वद्या च वगला भ्यासविद्या प्रवक्ष्यामि पृष्ठाङ्क पद्याङ्क पञ्चाङ्गविविना स्नात्वा & ५ पञ्चाशच्छान्तिकर्मात्य ६६ १६ पञ्चाशदुत्तरं पञ्च १३ पचाशद्व्वं मत्रस्य ८७ E पञ्चास्त्रमन्त्रसिद्धिहि ४३ ३९ पञ्चास्त्रशस्त्रविज्ञानी २७ पञ्चास्त्रोद्धारमतुल ३८ पञ्चास्त्र पञ्चकोरोपु ३२ ६ पञ्चास्यदेवतामन्त्र ३८ १४ पञ्चेन्द्रियश्च सञ्चार २८ पत्रं विभोतकोद्भूत ४४ टि. पद्मजो नारदो विद्या २ १५ पय पिवति वा सा स्त्री २३ परप्रनोपस हारी १. परप्रयोगकालेपु १६ परप्रयागविध्वसे & परमन्यप्रयोगेपु १३ २४ परविद्याछेदन च २ १३ परविद्याभक्षणास्य ५६ २४ परविद्याभक्षणी च परविद्याभक्षिणी ता ५७ टि. परानुष्ठानहरण २० पर्यायान् म्रियते शत्रु ७५ पलाशकुसुमेनैव २३ पलाशपुष्पैर्जुहुयाच् ११ पलाशमूलमाश्रित्य पलापृकं च प्रत्येक २९ २० पाठीननेत्रा परिपूर्णवक्त्रा १४ पादादिमूर्द्ध निपर्यन्त १० टि. पादी सार्य तत्कन्या ३५ १३ पानपात्र च शुद्धिं च ८१ पानपात्र वैरिजिह वा ५७ ५ पाशवीजं ततोच्चार्य टि० पाशवीजमतोच्चार्य ७७ १८ पाशाह कुश च विलिखेद् ६२ १७ प - १२ २१ ३४ ८६ ३ A १७ ५६ २४ ६१ . टि. ८९ १ १३ २५ يا पक्षे वाथ त्रिसप्ताह पक्षाद वा मासयोगेन पक्षान्मारणमाप्नोति पक्षमात्र द्भवेच्छत्रो पक्षिराजाय चोच्चार्य पञ्चकोणं लिखेन्मन्त्र पञ्चकोरोवेव पेत पञ्चक्रमसमायुक्ता पञ्चक्रोशप्रमाणेन पञ्च पञ्च करे रोप्य पञ्चब्रह्ममयमंन्त्र पञ्चमी चव कत्तंव्या पञ्चमेपु च कोणेपु पञ्चविंशच्च पञ्चाशत् पञ्चविशतिभिर्मोक्षः ३२ ११ ६६ २३ ३४ २५ ५२ ८ - २२ ७० ३७ ३२ १० १०४ ३० ६५ १७ ७५ + १० सांख्यायनतन्त्र पृष्ठा पद्याङ्क ६ २ २ १४ ७ २२ . २४ १०४ - २१ २३ २२ ५४ ६, १० ४३ + १ ३३ २५ २१ २८ ४४ १४ २३ ३ ४४ ४८ २१ ७६ टि. पृष्ठाङ्क पद्या पाशाङ्कुशान्तरितशक्ति ६७ पाशाङ्कुशेनान्तरितः पिचुमदतरोमूले ६२ पित्तरोगी भवेच्छत्र २६ पीतपुष्पश्च जुहुयात् पोतयज्ञोपवीतस्तु ६५ ११ पीतवर्णसमासीनां १०२ पीतवर्ण मदाघूर्णा ३७ पीतवर्णा मदाघूर्ण ११ पीतवासामते पुत्र E8 १३ पीताम्बरधरा देवी पीताम्बरधरा सौम्या पीताम्बरा दक्षिणेच १२ १२ पीताम्बरालकृतपीतवर्णा पीतावरणभूषी च ६५ पीताशनी पीतभक्षी १०४ २५ पीताशी पीतवाणी च १६ २२ पोनोत्तुङ्गजटाकलापविलसद ० ६० पीयूषोदधिमध्यचारुविलसद ० ६ पुत्तली प्रतवस्त्रेण ५२ २७ १६ पुत्रवान् जायते लोके ८३ २४ पुत्रो देय शिरो देयं टी० पुनः पूजा प्रकर्तव्या पुनभो मनिशाका ले १२ पुनश्च मन्त्रयत्ताम्र० २३ पुरश्चरणकाले तू ३१ २३ पुरश्चरणकृत्सिद्ध० 8 पुरश्चर्या विना मत्र १७ १६ पुराणज्वरमत्यून २७ १३ पुलिन्दकन्यका चंव ३७ २८ पुष्पवाट्यां जपेन्मत्र ८३ टि०-२२ पुस्तके लिहितान्मन्त्रान ३ पूजयेद्यन्त्रराज च २६ पूजा कालिकी नित्य १७ ८६ पूजाधारणयन्त्रज्ञ पूजायत्र क्रमेणव पूजायंत्रमिद पुत्र पूर्ति चार्द्ध पल नित्य पूर्वमागे तु पचास्त्र पूर्ववत्पूजयेत्तत्र पूर्ववन्नवबीज च पूर्ववन्न्यासविद्या च पूर्वन्न्यासविद्यां च पूर्ववल्ले पन चैव . पूर्वोक्तविधिवत्सध्या पूर्वोक्तं यन्त्रमालिख्य पूर्वोक्ता न्यासविद्यां च पष्टीद्रव्येण जुहुयान् पौरुषेणव सूक्तेन प्रजपेद् बगलायाश्च प्रजा बुद्धि श्रिय चव प्रणव वह्निजाय च प्रणीता प्रोक्षणीपात्र प्रतिवादि भवेत्स्तम्भो प्रत्येक त्रिसहस्रच प्रथमं वगलाबीज प्रदिक्षणत्रय कृत्वा प्रपञ्चस्तम्भन कृत्वा प्रयोगशान्तिनं भवेन प्रयोगादीनि सर्वाणि प्रयोग चैव न भवेद् प्रयोग चोपसहार प्रयोग तर्पणं चैव प्रस्थ चैव चतुर्विशं प्रस्थानज्ञानपारीणं प्रस्फुरद्वितय चैव प्राणप्रतिष्ठा कृत्वा तु प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा तु - प्राणप्रतिष्ठा कृत्वा तु २६ २४ nr पुत्रवान् जायते मयों ३३* २२ ४५ २४ ५४ ५ ५८ १०,१४ ह २६ ७८ wr - ६० ३८ ८३ १६टि० २६ . २ ३ ४ ४१ ५१ २३ ३ ६४ टि. २४ - पद्यानुक्रमः 4 ७८ ६१ टि० ३ २१- टि. ७ १० पृष्ठाङ्क पद्या प्राणप्रतिष्ठा यंत्रस्य १० प्राणिनां प्रारणहरण १५ २० प्रातःकाले भक्षयित्वा ८G २० प्रादेशं शतहोमे च १५ १२ प्राप्नुयाच्छत्रमुद्दिश्य ५६ टि० प्रियङगुशालिगोधूम प्रेतभस्म रवी ग्राह्य १९ प्रेतभ ण्डे लिखेशाम ५० ११ प्रेतवस्त्र रवी ग्राह्य ६४ २६ प्रतवन्ही प्रेतकाष्ठे १६ प्रेताग्नी प्रेतकाष्ठे तु ५० १२ प्रेताग्नी प्रेतकाष्ठे च १६ प्रेताग्नी रजकाग्नी च ७५ २४ प्रताडारमपी (यी)कृत्वो ५० ३ प्रेतान्न प्रेतभस्म च १० प्रेताम्न प्रेतभस्म च २४ -पृष्ठाङ्क पद्याङ्क विन्दुत्रिकोणषट्कोण ३ विन्दुना भूषित पुत्र बिन्दुपात्रयुता पूजा ६४ २७ बिन्दुमध्ये च सम्पूज्य ३२ विन्दुमध्ये लिखेदबीज बिन्दुमात्रं गृहीत्वा तु ७० ३५ विभीतकसमिद्भिर्वा १५ २३ विभीतकोद्भव पुष्पं २२ १६ बिम्बोष्ठी कम्बुकण्ठी च १७ १२ विम्बोष्ठी चारुवदनां १८ बिम्बोष्ठी चावदना ૬૦ १.३ वीज च बगलाबीज ३९ २६ बीज च बगलाबीज ४३.३२ वीजपञ्चकमुच्चार्य ४० ५ वुद्धिभ्र शो भवेत् सद्यो वुद्धिशब्द ततोच्चार्य १६ ६ बुद्धि विनाशयोच्चार्य ४२ बुद्धि विनाशय चोक्त्वा ४१ १८ बृहद्भानुमुखीबाण वृहद्भानुमुखीवारण ब्रह्मविष्णुमहेशाना ३७ ५ ब्रह्मस्थाने तालुदेशे ५२ ब्रह्मा ऋषिश्च छन्दोय (न्दोऽस्य)१२ ७ ब्रह्मा ऋपिश्च छन्दोय ६७ ब्रह्मास्त्रस्तम्भिनी काली ८७ ब्रह्मास्त्रस्तम्भिनी विद्या २ 8 ब्रह्मास्त्रायपद चोक्त्वा २९ ब्राह्मणान् भोजयेत्पश्चात् ६० १७ ‘ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चात् १३ २२ ब्राह्मणान् भोजयेत्पश्चात् १७ ब्रह्मोरस समादाय ८९ ३२ १५ फ ५८ १३ फलितं पुष्पितं चंव -- फलित पुष्पित वाथ २४ ३० ब - ५१ ૨૨ ३४ २४ ६ ३ ४० ४ २७ बगलाबीजमध्यस्थं बगलामत्रसिद्धिस्त वगलामुखिपद चोक्त्वा बगलामुखिपद चोक्त्वा वगलामुखीपद चोक्त्वा बगलाया विना मन्त्र बदरीकण्टक चव बदरीमूलतो गत्वा बन्धनं त्रिपुरश्चव वन्यूककुसुमाभासा वारणायुत जपेद्धीमान् वालमानुप्रतीकाशा बिन्दु त्रिकोणं वृत्तच ८४ ४ ५२ २८ २० ४० १ भ. २४ भक्षयुग्म ततोच्चार्य ६० ७ - २१ भक्षयेत् प्रातरुत्याय ८६ - १८ - I १२ साख्यायनतन्त्र पृष्ठा पद्याङ्क 1 १२ ४ १३ १६ ६० ८८ १ १४ ११ ४१ B २८ टि० २९ २२ १३ ६४ भक्षयेद् बदरीमात्र भगाकारे सुकुण्डेऽस्मिन् भजेऽह कालिका देवी भजेऽह चास्त्रवगलां भजेऽह स्तम्भनाथं च भवेद्विद्याविहीनोऽपि भुजगशोणितेनैव भूत प्रेत पिशाचाद्याः भूताविपरित चंव भूपुर वृत्तयुग्म च भूर्जपत्रे लिखेन्नाम भूशुद्धि भूनशुद्धिञ्च भृगुवारे च सगृह्य भृगुवारे च संगृह्य भैरवी वीजमाद्य च भोमवारे निशानग्नो भ्रमज्ञान व्यपोहति भ्रष्ट राज्य लभेत्पुत्र भ्रान्तचित्तो भवेच्छत्र ६३ २३ ७ ३१ वि० १२ ६ ६४ ३ १८ १ ६६ ८७ OM ३० २० १७ २६ ५२ टि. - । १८ २८ पृष्ठाङ्क पद्यात मनसा त जपमन्त्र ५७ मनोपहारिणी चोक्त्वा ४४ 8 मन्त्रजीवनविद्या च २ १० मन्त्रान्ते च प्रकर्तव्यं मन्त्रमध्यापयेत् सम्यक ह मन्मरेत् विसहस्त्र तु ह ३० मन्त्रयेन्तिम्बपत्रेण ५२ २५ मन्धराजस्य गायत्री ३१ २२ मन्त्रसन्ध्या विना मन्त्र २६ मन्त्रसिद्धिमवाप्नोति १२ मन्त्रमिद्धिर्भवेत् क्षिप्रं मन्त्रसिद्धर्भवेत् पुत्र मन्त्रसिद्धिर्भवेत् सद्यो ६० मन्त्रादौ तव बीजपूर्वकमथ. मनि त जुहुयान्मत्री मन्त्रेण सिद्धोऽसिद्धोऽपि मन्त्रोद्वार प्रवक्ष्यामि २४ मन्त्रोद्धार प्रवक्ष्यामि ३६ २० मन्त्रोद्धार प्रवक्ष्यामि ३ मन्त्रोद्धार प्रवक्ष्यामि ६७ ५ मन्त्रोद्धारं प्रवक्ष्यामि मन्त्रोद्धार प्रवक्ष्यामि ४४ मन्दाग्निमन्दबुद्धिश्च २० २६ ममंव हृदयेत्युक्त्वा २० मदिनी सर्वशत्रणा ६६ मल्लिकाकुमुमेनंब महाकान्तो भवेन्नो चेन ५६ महापाशुपताक्रान्त २ महापाशुपताक्रान्त महापाशुपतादीनां १०२ २५ महाविषे तैजसे तु १०३ १२ महास्तमनमाप्नोति २४ १० महेन्द्रपदनि शे १०३ १४ मातभञ्जय मद्विपक्षवदनं १८ ३ ८२ १६ ७३ २२ म ३ ३ ८६ २४ २४ ६ ६१ २५ ७८ २४ ३४ ३० ४७ . , ५०४ २४ ३० मण्डलज्वररोग च मण्डलद्वययोगेन मण्डलाच्छत्र मम्मोह मण्डलान्नाशमाप्नोति मण्डलान्नाशमाय ति मण्डले वगलादीपो मतङ्गमुनिनोक्त च मदिरामोदवदना मधू पुष्पसम्मिश्र मध्वाक्त छागमांस च मध्ये एकाक्षरीमन्त्र मध्ये देवी समावाह्य मध्ये लिखेन्महामन्त्र मध्ये सुधाब्धिमरिणमण्डप० . ८ ४७ १० ११ ७ ४ २४ + माध्वीद्रव्येण जुहुयात् ४८ पद्यानुक्रमः १३ ७७ ܘ ܘܕ पृष्ठाडू पद्याङ्क योगिनीकोटि महिती योगिनी पूजयेत् पश्चात् ६८ २१ योगिनी पूजयेत् पश्चाद १२ योगिनी वीरपूजो च योगोऽय कयितः पुत्र १०१ १७ योपिच्छुद्धिद्रव्यपूजा ६६ २६,टि. योपिदार्पणासक्तां ६८ यः करोत्यर्चन चंव ३६ २६ or r ६१ टि. ८ २२ " पृष्ठाक पद्याङ्क मानो लघुतरश्चंव 8 मायादि प्रजपेत् पुत्र ३१ २१ मारणे चाष्टकोणे तु १४ 8 मारण भ्रालिद्वेग २ १३ मारणं मण्डलान्छनो ४६ मारणं स्तमवारणं च ४२ २६ मारिवाल रोमाञ्च ८५ मालामन्त्र ताय विद्या मासान्मृत्यूवशो भूत्वा ५१ १४ मामेन त्रुमरण २६ २८ मांस सपुटमयुवतं. ४७ मुदगर दक्षिणे पाश मकांश्च कुरुते प्रानान् २२ मूलमन्त्रेण चाम्यय ३५ मूलमन्त्रेण सम्पूज्य २२ १० मूलेन मन्त्रित तोय १० मगाणा चंब शत्रूणा ८६ २५ मृत्युञ्जयजपं कृत्वा ६८ है मयस्य कलहोत्पत्ति १५ १६ मोक्षार्थी च गुरु यत्नात् ५ मोहिनीद्रवस मिश्र म्रियते न च मन्देहो ७४ १३ म्रियते नात्र सन्देहः ४६ टि. म्रियते सप्तरात्रेण २३ १०१ टि० २७ १४ ६ ४ २० २५ १६ ८५ २० २२ रजते स्वर्णपट्ट वा रणम्तम्भे सवकर्मा रत्न सिंहासना वन्दे रत्नायुतं तपणेन रम्भोरुपादपद्माता रवी गुरी भृगावज रवो रात्री च नि क्षिप्य रवी रात्री च सग्राह्य रवी रात्रौ च सलिख्य रवी रात्री शवगेहे राजराजः स वै श्रीमान् राजलाभो भवेत्तस्य राजस चंव तद्विद्याद राजा चैव ययो भूत्वा राजा वा राजपुत्रो वा राजीलवरणमादाय राजीलवणसंयुक्त रात्रौ पूजासमायुक्तो रात्रीहोम च कर्तव्य रिपुरन्धो भवेत् पुत्र रूपयौवनवाञ्छत्रु० रूपाभिमानिनो ये च रूपिणीपदमुच्चार्य रेफयोगान्महेशानि रेफहीना जपेद्विद्या १३ २ ८३ टि०२३ ५ १५ ८३ टि०२१ ३१ टि. य ३ un १८ २४ २८ ५ १७ ७२.२१ यत् परस्मै न वक्तव्य २७ यत्र कुत्रापि रिपव ५५ २१ यत्र गत्वा समासीनः ३२ यथोत्त कुण्डेपु हुनेद ३४ यदा शत्रुभयोत्पन्न यात्रप्रयोगं यमशासने कलो २१ ३ युवती च मदौद्रिक्ता ये (य इच्छन्त्याकर्षशान्त्यादि ३ २२ ये वा विजयमिच्छन्ति ७ ६१ २४ ५४, ६ ६६ 88 १७ ।
सांख्यायनतरने पृष्ठाङ्क पद्याङ्क ४८ ३२ रोगी च जायते मासाच् रोपयेत् पादयुग्मे तु रोहिणीश्रवणे चव रौप्य वा स्वर्णपट्ट वा ६ ५ ६२ १६ ल ५८ १६ २४ ६० ३५ w १४ ८२ १४ १४ ५ ५५ १४ लक्षंजप्त्वा मनोरेवं लक्ष मेकं जपेन्मन्त्री लक्ष्मीवान् जायते पुत्र लक्ष्मीः शान्तिस्तथा पुष्टिः लघुषोढा च विन्यस्य लाटार्चनं चावलम्व्य लिखित्वा शुभलग्ने तु लौकिके चंव गुप्तात्र लॅ बीज चंय हं शक्तिः लें बीज ह्री च शक्तिश्च ४० ३५ ६ ७ ७8 २० ६६ २३ १७ १४ १२ पृष्ठाङ्क पद्यात वडवानलनामानं वनेचरास्तामसजन्तवश्च २१ वन्दे पाशुपताध्यक्ष २ वन्ध्या पुत्रवती चैव २२ वन्यश्च मल्लिकापुष्प २३ २६ वल्लीपलाशमूले तु १४ वशीकरं तु सम्मोह वशीकरणकार्यपु १७ २१ वशीकरणसम्मोहे वशीकरणसम्मोहो ८२ १७ वश्यं जनानां सर्वेषां १५ १८ वह्निजायासमायुक्त वह्निजायां समुच्चार्य १७ वह्निबीजेन सवेष्टय २३ वह्नौ यत् प्रविशति २१ वापारिणवदनाक्षणां च ५८ वाग्बीजं च सतो २७ वाग्मवादि जपे मन्त्र ३० १३ वाड्मयं चंव वैचित्र्यं ५७ वाच मुख पदं चोक्त्वा ३६ २२ वाणी चव रमा गौरी वादी मूकति रङ्कति क्षितिपतिः १३ १६ वाममार्गक्रमणव १३ २३ वामोपरि विन्यस्य २५ वायव्ये च मदोन्मत्ता १२ १३ वाराह शक्तिवाराह १२ वाराहं बगलाबीज १२ वाराहीबीजमध्यस्था ३० १४ विड्वराहमजारोमः ७२ १३ विघ्नराज समभ्ययं ६१ २६ विदार विवशो भावाद् टि० विद्यामाकर्पणार्थ च २३ २३ विद्यारूपे भवेत् पुत्र ८ टि० विद्यासिद्धिर्भवेत् पुत्र १४ १८ २३ व ७४ ३ ५३ ७७ १७ १४ ११ १२ १ क १४ २० घकुले पूजयेद्यन्त्रं वक्ष्ये होमविधि सम्यक . वक्ष्येऽहं चोपसहारं 'वक्ष्येऽह चोपसहारं वक्ष्येह तक सर्वञ्च वक्ष्येह पञ्जर न्यास वक्ष्येऽह विधिवत्पुत्र वक्ष्येऽह स्थण्डिलोमं वगलामातृकान्यास वगलाष्टाक्षरीमत्रं वगलास्त्रकृतं यद्यत् वगलास्त्र मध्यमागे वगलास्त्रमिदं पुत्र वगलाहृदयेनेव वगलाहृदय मंत्र घनाकक्षीरमिश्रच वनीक्षोरं त्रिकाल तु && ७ १ ३१ ८६ १०४ ar ७६ ११,१२ ७६ - है ८० २५ २० विद्वे पणे च जुहुया० १ 1 पद्यानुक्रम - . ६ 7 ४ 0 ६५ टि. - ३ पृष्ठाक पद्याङ्क विषणे तु जुहयाद १४ विद्वीपणे स्तम्मने च १४ ११ विना च स्तम्मिनीविद्या २ १४ विप्रचाण्डालयोः शत्य ८४ १२ विभीतकतरोर्मूले ६२ विराटस्वरूपिणी देवी १ विरामय पद चोक्त्वा विलिखेतायवोजं च विशद्भिः स्तम्भनं च . विश्वनाथ नमस्तेऽस्तु ७६ २ विश्वमेतद्भक्तिमय ૨ विश्वाराध्य भवानीश २ विश्वेश्वरी विश्ववन्द्या १४ विषतिन्दुकपुष्पेण २२ १६ विषतिन्दुकमूलं च ६२ वीणापुस्तकसयुक्ता वीर विद्रप विश्वेश ३४ २ वीराम्नायमहादेव ३६ २८ वृक्षमूले जपेन्मन्त्र ६ वृत्तेषु विलिखे पुत्र २१ वेतालडाकिनीप्रेत .४१ दलक्ष जपं कुर्यात् ६८ वेदवेदाङ्गपारज्ञ वेदवेदांगपारीण. १६ वेदाक्षरी ततो जाप्यः १०२ २०- वेदाक्षरीमनुपुरं १०२ २१ वेदादि विलिखेत् पूर्व ८१ वेदादि विलिखेत् पूर्व ६७ ६ वेदायुत तपणेन २९ वैदिकं च परित्यज्य २७ वैरिजिह्व भेदानार्थ ४५ ध्यालध्याघ्रादयश्चैव पणन नियते शत्रु २८ २५ U0 पृष्ठाङ्क पद्याङ्क शतमष्टोत्तर चव ५१ १५ शतमष्टोत्तरशत १०४ २६ शतवार मन्त्रयित्वा २२ शतवार मन्त्रित च ६३ १६ शताक्षरीमहामन्त्र ४४ ११ शतावर्तनमात्रेण १०१ १० शतोत्तर भवेद्विशद् ४१ १६ शतोत्तर मंत्रबीज ५४ शत त्रिशतक पुत्र ६६ १७ शत वाऽय सहस्र वा ३५ १६ शतं सहस्रमयुतं २० २८ शत्रवश्च पुरश्चर्या २० शत्रुक्षय भवेत् सद्यो ६१ १६ शत्रूणां मारण पुत्र ७३ २५ शमन्तकुसुमैनव २३ २० शमीमूले हुनेत्पुत्र -७५ १६ शमीमूल समाश्रित्य ७५ २३ शयनीकृत्य कन्यां च ६६ शल्यदारुमय तत्र ६२ १४ शस्त्रास्त्रस्तभने पुष 8 शाकुनादिपु मन्नेषु ७ २० शामितवश्यस्तम्भनानि १६ शान्ताध (न्त्यथं जुहुयाच्छालि १७ २० शालिसक्तुं घृतोपेत ४७ ह शिवबीज वह नियुक्त ११ शिष्टाक्षराणि कोणेषु शिप्यस्य हृदयं चैव २७ . शीतोष्ण समतां कृत्वा ११ शुभऋनादियोगे तु १०४ गुश्रूषया गुरु सम्यक ५ १३ शून्यागारे जपेदेव शेषभाषापतिप्रस्य. ७४ शेपमापापति साक्षाद ६४ श्मशाने प्रजपेमन्त्र १६ श्रद्धाभक्तिसमोपेत १५ ७ ४ ७ 8. ५ ar २७ रा शावित वाराहमुच्चार्य ६० सास्यायनतन्त्र पृष्ठा पद्याङ्क पृष्ठा पद्यात २ १६ ५६ २५ ७७ २३ ३० २५ १६ श्रीकण्ठ श्रीगराधार श्रीखण्डरोचनागरु श्रीबीज भुवनेशी च श्रीवीजादि जपेत् पुत्र श्रीमायामातृका चैव श्रीसूक्तेनैव जिह्वायां श्रेष्ठराज्य भवेत्पुत्र श्रोत्रालीगण्डभ्रू मध्ये श्वानवउज्वलते शत्रु ह ५१ टि. १ ६३ ७७ १३ १६ २६ ५२ २६ ११ ३६ ५२ २२ २६ २६ ६७ ३१ ष ६७ ३ ४५ १७ २६ टि० m. c ६१ ar ६४ ४ ६१ ६७ ३२ ७६ ५ ७० ३६ ११ १०१ & मद्यो नै ल्यमाप्नोति सद्यो यौवनहीन तु सद्यः स्तम्भनमाप्नोति सन्तपेद्दीपशिखया सतपेद्दे पशिखया मतोप जनयेततस्य सध्यामबेपु सर्वेषु स पतितो भवेत् पुमा सपा क्षालयेत क्षीरः सपादकोटित्रिपुरा सप्तकोटिमहामने सम सम रिपूच्छिष्ट समस्तकर्मणा ध्वसे समस्तविपनिर्वाशे समस्तस्तम्भन पुत्र सम्पूजयेत् पञ्चमी चैव सम्मोहनाथं प्रजपेत् सम्यग्ज्ञान महेशान सर्प मण्डूकयोः शल्य सर्वकर्माणि निर्माशे सर्वनवोन्नत पुत्र सर्व न्यासविधि कृत्वा सर्वमत्रमयी देवी सर्वशब्द ततोच्चार्य सर्वशन्द ततोच्चार्य सर्वशब्द ततोच्चार्य सर्वाङ्गसुन्दरी श्यामा सर्वाङ्ग वायुना शत्रुः सर्वाङ्गे लेपन कुर्यात् सर्वावयवशोभाढया सर्वे स्वं देज मा सर्पपास्त्रिादुर्वेश्च सपंप लवण चव सर्षप लवणोपेतं सविता च ऋषिः ख्यातो ४६ ६ षट्कोणकुण्डे जुहुयान् षट्कोणमध्ये विलिखेद षट्कोणं चाष्टकोणञ्च पटकोण चाप्टकोण च पट्कोरणे वा लिखेलमन्त्र पत्रिंशद्वारमावर्त्य पट्पञ्चकोटिचामुण्डा षट्प्रयोगास्त्रयो विद्या षट्सहन देवकुसुम पट्सहस्र हुनेत् पुत्र पट्सहस्र हुनेत् पुत्र पट्सहस्र हुनेत्पुत्र पोडशाङ्गुलमान तु पोडशरुपचारश्च २ ८५ १७ १०० ६ २ ११ ४७ १३ ४५ २१ ४६ १५ १५ ३ ४७ १५ & ६१ ४१ १३ १६ । ४२ २८ स ३५ ७ ६७ २७ १७ २२ ११ १ ५३ ४३ ३० स मल्पमुखभागी स्यात् सङ्कल्पपूर्वक मन्त्र समेहेत्क्षालयेत् सम्यक स जीवन्नेव चाण्डाल: संचारवान् भवेत पड़: स तु भापापतिः साक्षाद सत्सम्प्रदायविधिना सद्यो नाशनमायान्ति ५६ २४ ७६ टि. ११ ८४ ३ ६ ३ २३ ४५ २० ४७ ४२ - पद्यानुक्रमः १७ - पृष्ठाक पद्याडू पृष्ठाडू पद्याङ्क ५३ ४२- ५ १०३ ४४ ४ - ५८ १२ ७७ १७ १३ ४२ टि. ७४ १०३ 8 ४४ ६ ४२ २४ ३८ २६ १७ ३० टि. हद २२ ३५ ६८ २ १२ ३ २५ २२ १२ ६ १६ २५ सहरेच्छ न्तिमाप्नोति सहारार्चा कामरूपे स्तब्धमायां च वाग्वीज स्तब्धमायां ततोच्चार्य स्तव्यमाया तारक च स्तब्धीकरणनिशि स्तम्भद्वयमुच्चार्य स्तम्भद्वितय चोक्त्वा स्तम्मनाथं जपेत्पुत्र स्तमनास्त्रपद चोक्त्वा स्तम्मनास्त्रमयी दवी स्तम्भनेन विना शान्ति स्तम्मनेषु हुनेदीमान् स्तम्भन च भवेत् पुत्र स्तमन च भवेच्छीघ्र स्तम्मयेतं नदीवेग स्तम्भित मन्त्रयोगेन स्थापयेच्च कपाल स्थापयेच्चुलयषोभागे स्थापयेत् तेन मंत्रण स्थिरमाया इति प्रोक्ता स्थिरमाथा द्वितीया तु स्तुह्या क्षीरेण सयुक्त स्फुरद्वय तथा चोक्त्वा स्फुरद्वय समुच्चार्य स्फोटकवणसयुक्तो स्फोटवणाश्च जायते स्वप्रिया विन्दुपात्र च स्वमन्त्राक्षरणी विद्या स्वर्णसिहासनासीना- स्वल्प वा बहुल चाथ स्वामिन् सिद्धगुणाध्यक्ष ५८ १७ ६१ २२ सविषं जलसंयुक्तं स शत्रुः सप्तरात्रण सस्यस्तमे दानाशे सस्यादिभिविनश्यन्ति सहस्र ध्यानपूर्व तु सहन प्रजपेन्मन्न सहत दिनयं चव सहनवार विधिवन सहिरण्योदके पूर्व सख्यिायनमते देवि सात्यायनमते देवि सांस्यायनमते देव्या सोषयेत्कुलमार्गेर साधु साधु महाप्राज्ञ सान्तं रान्तसमायुक्तं सायमापास्थि कत्तव्यं सिद्धिदो जायते धत्स सुखापेक्षेण यत् कुर्याद् सुगन्धपत्रपुष्पादीन सुपायौ रत्नपय्यं सुग्दर्या कालिकाया च सुमन्तकुसुमराज्यं सुरया तपरणं पुत्र सुवर्णशैलसुप्रख्य सुवासिन च लेन सुवासिनी ब्राह्मणाश्च सूचिप्रयोगविध्वसे सृष्टि स्थिति च सहारं सौभाग्यचर्यासमायुक्त सोमाग्यानकत्ता सौभाग्या विधिश्चैव सौमाग्याची विना पुत्र संक्षेपेन मया प्रोक्तु संजपेच च ततः पुत्र संस्कारेण विना मन्त्रं -८८ तु २० २४ ७ १८ ३४ १ ५१ ५३ 88 ३६ १२ 88 १०४ ३१ १५ २२ १२५ ४२ ६० १३ २० ५ ६ ८७ ६६ १६ १० ९५ ३४ ar ४६ ३१ ७१ ४६ २ ३ ६२ ६६ २५ १६ १४ २ १०२ ८३ टि. ho १८ १६ हरिद्रापङ्कज वस्तु ६६ टि.
सांस्यायनतन्ये पृष्ठाङ्क पद्याङ्क ६५ १४ १८ १ ५ १२ ४७ हरिद्रामयपुष्प च हरिद्रा चाक्षमाला च हरिद्राक्षमणि पीत हरिद्राखडहोम तु हरिद्राखण्डहोमेन हरिद्रातालक चैव हरिद्राभिः सुरक्ताभिः हरिद्राम्भस्तपणेन हरिद्राहोममायण हरीतकीश्च होमेन हस्तमात्र भगाकारं हारिणीति पद चोक्त्वा हिक्वारोगो भवेत्तस्य ७८ पृष्ठात पद्याङ्क हुनेच्च पूर्ववत् कुण्डे ७५ १८ हुनेत् त्रिकोण कुण्डे तु हुने ध्यानसमायुक्तः 'हु फट् स्वाहा'-समायुक्तं हृतनष्टप्रगपादि १०३ ११ हृदये तु समुच्चार्य १६ हृदि नाम चालिख्य ५१ १५ हेमकुण्डलभूप डुगी १० २० हेलाका चदला तूर्या १०४ २२ ह.लस्तथाप्युच्चरेत् पुत्र ४२ २७ हा ली ह्नच ततोच्चायं ३८ 8 लं ह्रौं लश्च ततश्चव ३८ १. १६ ५ २४ 8 १०४ २६ १८ १६ १८ ४९ टि. ७५ १४ ७२ १७
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