Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Sheeldutam
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श्रीनेमि-लावण्य-दक्ष सुशील ग्रन्थमाला रत्न ४६ वा ।। वाचक श्रीचारित्रसुन्दर गणिवर विरचितं शी ल दूत म् 51 - H [समस्या मयं खण्डकाव्यम् ] तस्योपरि शासनसम्राट--मरिचक्रचक्रवत्ति-तपोगच्छाधि- पति-ब्रह्मतेजोमूर्ति-महाप्रभावशालि स्व. प. पू. आ. श्रीमविजयनेमिसूरीश्वरस्य पट्टालङ्कार साहित्य- सम्राट-व्याकरणवाचस्पति-शास्त्रविशारद-कविरत्न स्व. प. पू. आ. श्रीमद्विजयलावण्यसुरीश्वरस्य पट्टधर-व्याकरणरत्न-शास्त्रविशारद-कविदिवाकर-देश- नादक्ष प. पू. आ. श्रीमविजयदक्षसूरीश्वरस्य पइधर-शास्त्रविशारद-साहित्यरत्न-कविभूषण श्रीमद्- विजयसुशीलसूरिणा विरचिता सुशीलाभिधा वृत्तिः । LI सम्पादक वाचक श्रीविनोदविजयो गणि ज प्रकाशकम्-' आचार्य श्रोसुशोलसूरि जैनज्ञानमन्दिरम् शान्तिनगर, सिरोही (मारवाड़) राजस्थान. .
सम्पादक:- -:प्रेरक जनधर्मदिवाकर-शासनरत्न राजस्थानदीपक मरघरदेशी. 卐 तीर्थप्रभावक द्वारक-शास्त्रविशारद प. पू. आ. श्रीमद्विजय- माहित्यरत्न-कविभूपण सुशीलसूरीश्वरजी म. सा. ॐ प.पू. आ. श्रीमद्विजय- सुशीलसूरीश्वरजी म. सा. के पट्टधर-शिध्यरत्न के शिष्य रत्न प. उपाध्याय श्रीविनोद- पू. मुनिराज श्रीशालिभद्र- विजयजी गणिवर्य महाराज. विजयजी महाराज. म 卐 . श्री चीर सं० २५०४ विक्रम सं० २०३४ नेमि सं० २६ 卐 नकल १००० प्रथमावृत्तिः मूल्यम् १०.०० 卐 卐 -: प्रकाशका- मुद्रकः- 卐 छगनलाल जैन 卐 'आचार्य श्रीसुशीलरुरि जैन ज्ञानमन्दिर शान्तिनगर, सिरोही (मारषाड़), राजस्थान गौतम आर्ट प्रिन्टर्स लोहिया बाजार व्यावर (मारवाड़) राजस्थान 卐
दुष्करदुष्कर कारक कामविजेता-श्रुतकेवली
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आर्य धी-
स्थूलभद्रजी महाराज.
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FREE प्रारम्भिक प्रकथन काव्यशास्त्रविनोदेन, कालो गच्छति धीमताम् । व्यसनेन च मूर्खाणां, निद्रया कलहेन वा ॥१॥ बुद्धिमान् पुरुषोनो समय काव्यशास्त्रना विनोद-आनंदपूर्वक पसार थाय छे, अने मूर्ख पुरुपोनो समय निद्रा अथवा क्लेश द्वारा पसार थाय छे ।।१।। काव्यनु स्वरूप- विश्वमा अनेक शस्त्रो वर्ती रह्यां छे । तेमां काव्यशास्त्रनु पण स्थान अति सुन्दर छ। सद्गुणनी प्राप्ति अने सद्गुण प्रत्येनी रुची थवाना अनेक साधनो पैकी काव्य ए सौथी श्रेष्ठ साधन मानवामां आवेल छ । जगतनी जनतानु आकर्षण काव्य प्रत्ये विशेष रहे छ । सुविख्यान काव्यानुशासन, काव्यप्रकाश, साहित्यदर्पण अने दश- रूपक आदि अनेक ग्रन्थोमां काव्य अने तेना भेद-प्रभेद वर्णन विशदरूपे वर्णवेल छ। तेना सार रूपे संक्षेपमा अहीं जणावामां आवे छे के काव्यना बे भेद छ । (१) दृश्यकाव्य अने (२) श्रव्यकाव्य । (१) जे भजवी शकाय अने श्रवण करी शकाय अर्थात् सांभली शकाय ते 'दृश्यकाव्य' कहेवाय छे । आ दृश्यकाव्यना नाटक, नाटिका, प्रकरण, माण अने प्रहसन आदि अनेक भेदो छ । + ४ (३) जे भजवी शकातुनकीय, किन्तु गेयल प्रवण अयान मामलबा अने पांचवाना उपयोगमा आवत होय ते व्यकाव्य' कहेपाय छ। मा श्रव्यकाव्यना पण प्रण प्रकार छ । जुओ~ (२) पद्यात्मक, (२) गद्यात्मक, अने (३) गद्यपद्यमय । ए घणे अव्यकाव्यमा (१) 'पद्यात्मक काव्य' महाकाव्य भने ख० काव्य एम वे विभागमा यहेंचायेल है। (२) गद्यात्मक कायना फा भने आग्न्यायिका आदि भेदो प्रसिद्ध छ। (३) 'गद्य-पद्यमय काव्य' चम्पू शब्दयी सम्बोधाय छ, अर्थात् चम्पू तरीके तेनो व्यवहार कराय छ । कि ए भेद-प्रभेद याला काव्यनु कोष्टक नीचे प्रमागे जणांवाय छे। जुओ- काव्य [१] . (१) दृश्यकाव्य (२) श्रव्यकाव्य (१) नाटक (२) नाटिका (३) प्रकरण (४)भाण अने (५) प्रहसन् आदि (१) पद्यात्मक (२) गद्यात्मक (३) गद्यपद्यमय चम्पू] । T (१) महाकाव्य (२)खण्डकाव्य (२)खण्डकाव्य (२) कथा (२) आख्यायिका आदि.
५. महाकाव्य अने खण्डकाव्य सम्बन्धि विचारणा- उपरोक्त कोष्टकमां काव्यना इश्यकाव्य अने श्रव्यकाव्य एवं भेद जणाववामां आव्या । तेमां श्रव्यकाव्यना पद्यात्मक भेदना महाकाव्य अने खण्टकाव्यं ए वे भेद पण बताववामां आव्या। महाकाव्य एटले- जेमा वीररस शाम्तरस के शृङ्गाररस पत्रणे रसमांथी कोइ पण एक रसनी प्रधानता होय एटलुज नहीं प्रसंगे प्रसंगे विविध रसोर्नु पण पोषण होय, मुख्य तरीके एक नायक होय, देशादिकनु सुन्दर वर्णन होय अने पाठथी बंधारे सर्ग होय । कोई पण एक सर्गमां भिन्न भिन्न छन्दो होय, यमक होय, चक्रवन्ध-खड्गबन्ध. धनुर्वन्ध इत्यादि बन्धो होय, तथा प्रारम्भथी पूर्णाहुति पर्यन्त वांचता वाचक वर्गने विरसपणुन थाय ते रीते जे होय तेने 'महाकाव्य' कहेवामां आवे छे। खण्डकाव्य एटले- जेमा महाकाव्यना एक देशने अवलम्बीने जे रचना करवामा आवे ते. अर्थात महाकाव्यना कोइ पण एक प्रसङ्गाने पृथग करी सुन्दर रीते वर्णन करवामां आवे तेने 'खण्डकाव्य' कहेवामा आवे छे। आज वातन समर्थन करता खण्डकाव्यना लक्षणमा पाए 1 काछ के- 'खण्डकाव्यं भवेत् काव्य-स्यैकदेशानुसारि ।' महाकाव्यना एक देशने अनुसारे जे रचना ते खण्ड- काव्य कहेवाय छ। शीलदूत काव्यनी रचना- खण्डकाव्यमा रचायेला अनेक ग्रन्थो आजे पण विद्यमान छ। तेमां महाकवि कालीदास कृत मेघदूत काव्य अति प्रसिद्ध छ। ए
६
मेघदन काव्य हिन्दुस्नानना प्रत्येक प्रदेशना पण्डिनाने प्रजा पर्यन
युरोप अमेरिकाना विद्वानो अने मजानु पण खूप ज मामयण
फयु ले।
दूत पटले मन्देश लई जनार व्यकि, जैम के मेनन ।
मेघदूननु अनुकरण अनेक विद्वानोए फरेल । जुयो-
(१) वि० सं० ८७१ मां श्रीजिनसेनाचार्य पार्श्वभ्युदय' काव्य
रचेल छ । जेमां श्रीपार्श्वनाथ प्रभुनी स्तुति है।
(२) सांगणना पुत्र विक्रम कविए 'नेमिदत' काव्य रचेल छै । जेमा
श्रीनेमिनाथ मगयाननी स्तुति छ ।
'पवनदूत' काव्य, 'मनोदूत' काव्य तथा 'हंससंदेश' आदि
जुदां जुदा दूत काव्यो पण छ।
प० पू० शासनसम्राट समुदायना ममर्थ विद्वान् सुप्रमिद्ध
आचार्य श्रीमद्विजयधर्मधुरन्धरसूरिजी नु मुनि अवस्थामां वि० सं०
१६६३ नी सालमां रचेलु 'मयूरदूत' खण्डकाव्य पण स्योपज्ञपति-
काटीका
युक्त
विद्यमान छ।
प्रस्तुत 'शीलदूत' काव्य पण वृहत्तपागच्छनायक आचार्य
श्रीरत्नसिंहसूरीश्वरजी महाराजना शिष्य रत्न उपाध्याय श्रीचारित्र
रत्न सुन्दरगणिए वि० स० १४८४ [१४८७] नी सालमा रचेल छे।
महाकवि कालीदास रचित मेघदूत काव्यना प्रत्येक भोकनु
चोथु चरण कायम राखी शीलदूत काव्यना प्रत्येक श्लोकनां त्रण चरण
नूनन वनाव्यां छे। मेघदूतनी जेम मन्दाक्रान्ता छन्दमा १३१
श्लोकमा सुन्दर रचना करेल छ। तेमां चौदपूर्वधर दुष्कर दुष्कर
कारक काम विजेता श्री स्थूलभद्रजी महाराज भने कोशावेश्यानु
वर्णन सुन्दर रोते वर्णवेल छे।
--
शीलदूत काव्य पर सुशीला टीकानु सर्जन- . 卐फ़ 'श्रीयशोविजय जैन ग्रन्थमाला' ना १८मां नंबर तरीके बनारसथी प्रकाशित थयेल 'शीलदूत' काव्यनी पुस्तिका दृष्टिगोचर थई । मन्दाक्रान्ता छन्दनां रचेल १३१ श्लोको श्रीस्थूलभद्रजी महाराजा अने कोशा वेश्याना वर्णन रूपे जोया। सुन्दर लागतां तेना पर नूनन टीका लखवानु मन थयु । तीर्थङ्कर चरित्र कार्य पूर्ण कर्या वाद, प्रस्तुन शीलदूत काव्य पर नूतन टीका लखवानी शरुआत करी । वि० सं० २०२४ ना रामसेनना चातुर्मासमा विजया- दशमी-प्रासो शुद दशमे ए सुशीला नामनी नव्य टीका परमाराध्य देव-गुरुना पसाये पूर्ण करी । जेनो उल्लेख अन्तिम प्रशस्तिमा कयों छे । ए टीका युक्त प्रकाशित थयेल आ शीलदूत काव्य संशोधन पूर्वक छपावेल छ, छता पण प्रेसदोषादि कारणे रही गयेल अशुद्धि सुधारीने बांचकार वांचे अने श्री स्थूलभद्रजी महाराजे कामदेवना घरम प्राकृत भारती, जयपुर रही कामदेवने जीत्यो अने कोशा वेश्या ने द्वादशव्रत- धारिका धर्मनिष्ठा श्राविका बनावी इत्यादि सद्बोध हृदयमा उतारी, जिनशासनना अनुरागी बनी ब्रह्मचर्यरूप शीलवतने धारण करी प्रांते परब्रह्मरूप मोक्ष सुखना भागी बने एज शुभ कामना । - श्री वीर सं०.२५०४ विक्रम सं० २०३४ नेमि सं० २६ महा शुद१० शुक्रवार [ श्रीनमिनाथ जिनमन्दिर अञ्जनशलाका प्रतिष्ठादिवस] दिनाङ्क १७-२-१९७६ विजयसुशीलसूरि जैन उपाश्रय खौड, जिला पाली (मारवाड़) राजस्थान.
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प्राक्कथन 1 विक्रम संवत् शरु थतां पहेलां अने भगवान महावीर- स्वामिना निर्वाण पछीना लगभंग वसो वर्षे एटले आजथी लगभग वीशसो वर्ष पहेलांनी आ सत्य घटना-वृहत्- तपागच्छाधिपति भट्टारकाचार्य श्रीमद् रत्नसिंहसूरिवरना शिष्य उपाध्याय श्रीचारित्रसुन्दर गणिवरे शीलदूत रूपे रची छे। कविओमा जे श्रेष्ठपदथी विभूपित बन्या छे तेवा कवि- श्रेष्ठ कालिदास रचित मेघदूत काव्य के जे काव्य सरस्वती ना प्रसादने पामतां स्वयं स्फुरणारुप बनेल छ । जेमा मेघने दूत बनावी कविए पोताना भावोनी अभिव्यक्ति करी छे अने मुख्यत्वे विप्रलंभ शृंगारनु पोषण कयु छे । “उपमा कालीदासस्य" आ उक्तिनी अत्यन्त सार्थकता आ खंडकाव्यमां भरचक भरी छ। आवा अति श्रेष्ठताने वरेला मेघदूत काव्यना दरेके दरेक पद्य-श्लोकना अन्तिम चरणने समस्यारुपे लइने कविए महाभोगमांथी महात्यागी वनेला श्रीस्थूलभद्रजी महाराज • अने रुप ने कलाना भंडार समी कोशा ( रुपकोशा) नो काव्यरूपे सुन्दर संवाद आप्यो के अने विप्रलंभ शृंगारनी -
१०
नग्याए शील ( सदाचार ) ने श्रेष्ठताने शिखरे पहोंचा-
डेल छे।
कोशा वेश्याए आर्य श्रीस्थूलभद्रजी महाराजने
अनेक प्रकारना हावभावो, अनेक प्रकारनी श्रृंगार रसपोषक
युक्ति-प्रयुक्तिओ-प्रलोभनो, अनेक प्रकारना अतिमिष्ट वचनो
थी गृहस्थाश्रम-मंत्रिपद भोगोनी सानुकूलता अने परिणामे
धर्मप्राप्ति माटेनी विनंतिओ करी । ते बधाना प्रत्युत्तररुपे आर्य
श्रीस्थुलभद्रजी महाराज जणावे छ के-
"निरागं मे समजनि मनो ज्ञाततत्त्वस्वरूपं,
तेनेदानी च विषयरसो बाधते कुत्रचिन्माम् ।
पश्याभ्येनामपि वनसमां चित्रशाला खलूत्त्वै,
मिध्यास्ते दिवस विगमे नीलकराठः सुहृदः।।"
'चित्त जो रागयुक्त होय तो विषयना आस्वाददो
अभिलाष उत्पन्न थाय छे चित्रशाला होय के वन होय चंने
समान दृष्टि जेने आवी गइ होय तेना मनमां विषयनो
अभिलाष ज क्याथी होय ! प्राणी रागी त्यां सुधी ज होय
छ के ज्यां सुधी वस्तु तत्वनो वास्तविक परिचय थयो
न होय ।
चाम्तविक वस्तु तत्त्वने जाण्या पछी रागदशानो
संभव ज नथी।
“यत्तारुण्ये सति वपुरहो ! विभ्रमं भूरि दत्ते,
पुष्टं मुग्धे ! सरसमधुराहार योगेण शश्वत् ।
अन्यादृक् स्यात् तदपि च गते यौवने देहभाना,
सूर्यापाये न खलु कमलं पुष्यति स्वामभिख्याम् ॥"
'अनेक प्रकारनां अनुकूल भोजन विगेरेथी पोपेलु अने
बधारेलु पण आ शरीर योवनवाळु होय त्या सुधीमा जे
विलासादि प्रगट करे छे ते यौवन गया पछी नथी करतु ।
दाखला तरीके कमल सूर्यनी समीपतामा ज पोतानी शोभा
धारण करे छे सूर्य जतां ए पण करमाइ जाय छे एटले आ
शरीर अस्थिर छे जेथी आ शारीरिक भोगोनी मने इच्छाज
नथी ।'
“मत्त्वानित्यं जगदिति मनो मे विलग्नं जिनोक्ते,
धर्मे शमांभिलपति परं
परं शाश्वतं शुद्धचित्ते
मुग्धे स्निग्धां रचयति मुधा मामुदीक्ष्य स्वकीयां,
खद्योताली विलसितनिभां विद्यु दुन्मेषदृष्टिम्
'आटला काल सुधी मारी साथैनी वातचीतथी तारु
पण चित्त शुद्ध थयु होय एम मने लागे छे तेथी धर्ममा
रक्त मारा चित्तमां ताग जोवाथी कोइ विकार थती नथी
जेथी तारे पण बीजा भावथी विलोकन उचित नथी आथी
"
१२ तारी चेष्टा पण फोगट के जेम आगीयानो वधारे पडतो विकास थाय तो पण प्रकाश मलवा रुप का अर्थ सरतो नथी एम हवे तार विलोकन पण फोगट आवा आवा अनेकविध वचनामृतोथी पोताना वैराग्यनी अतिदृढता जणावी छ। आ रीते आ शीलदूत खण्ड काव्य होवा छता महा- काव्यरूप छ। तेमा रहेला गूढार्थनी अभिव्यक्ति करती 'सुशीला' नामनी टीका छे । जेना रचयिता- शासनसम्राट् मरिचक्रचक्रवत्ति तपागच्छाधिपति ब्रह्म- तेजोमूर्ति महाप्रभावशालि अनेकतीर्थोद्धारक सर्वतन्त्रस्वतत्र परमपूज्याचार्यमहाराजाधिराज श्रीमविजयनेमिसूरी- श्वरजी महाराज साहेषना सुप्रसिद्ध पट्टालंकार साहित्य- सम्राट् व्याकरणवाचस्पति शास्त्रविशारद कविरत्न परमपूज्या- चार्यप्रवर श्रीमविजयलावण्यसूरीश्वरजी महाराज साहेबना पट्टधर व्याकरणरत्न शास्त्रविशारद कविदिवाकर देशनादक्ष परमपूज्याचार्य श्रीमदविजयदक्षसूरीश्वरजा महाराज साहेषना पट्टधर अनेक ग्रन्थ प्रणेता अतिसौम्यभाव विभूषित अनेकविधशास्त्ररहस्यविद् परमपूज्याचार्य श्रीमद्- विजयसुशीलसूरीश्वरजी महाराज साहेष छ । पूज्यश्रीए श्लोकनो अन्वय, श्लोकमा रहेली गूढता जणावाती व्याख्या, व्याकरणदृष्टिए प्रयोगसिद्धि रस भाव
१३
अलंकार वगेरे जणावया साथे मेघदूत काव्य साथेनी आ
काव्यनी संगति करी आपी के एटलंज नहीं पण तेमाथी
नीकलतो विशेषार्थ पण काढी आप्यो छे। आवी विशिष्ट
प्रकारनी ते तेओश्रीनी व्याकरण काव्य साहित्य विगेरेनी
विशिष्ट कोटिनी अभ्यासशीलता अने पठन पाठननी विशिष्ट
प्रकारनी शैलिने जणावनारी छ ।
अहीं मने एक अमारो पोतानो ज भूतकालीन प्रसंग
याद आवे छे के-
शेठ श्री वेणीचंद सुरचंद स्थापित श्रीमद् यशोविजयजी
जैन संस्कृत पाठशाला-महेसाणाना मेनेजर पदे विराजमान
प्रखरतत्ववेत्ता पंडितप्रवर श्री प्रभुदासभाइनी संस्थामा
अभ्यास करता विद्यार्थीयोमा उच्च अभ्यास करावधानी
अने ए रीते शासनसेवानी तमन्नाए संस्था तरफथी मने
तथा मारा सहाध्यायी पंडितवर्य श्री शिवलालभाइ
( वर्तमान पं० श्री केसरबाइ ज्ञानमन्दिर-पाटण ) ने व्या-
करणशास्त्रना प्रकाण्डवेत्ता परमपूज्य आचार्यदेवेश श्रीमद्
विजयलावण्यसूरीश्वरजी महाराज साहेब पासे कलि-
कालसर्वज्ञ भगवान् श्रीहेमचन्द्राचार्य महाराज विरचित
श्रीसिद्धहेमव्याकरणनु अध्ययन करवा मादे ते ओश्रीना
वि० सं० १९९५ ना श्रीझगड़ीयाजीतीर्थ ना चातुर्माम
मां मोकलेला।
1
१४
परमपूज्य आचार्य भगवंतनी नादुरस्त तबीयत होवा
छता अने अनेक धनिक-धार्मिक भावुकोनु आवागमन
होवा छतां अध्यापन कराववाना समये अध्यापनमा एवा
तल्लीन बनी जता के ते वखते तेओश्री शारीरिक अस्वस्थताने
भूली जता एटलुंज नहीं गमे तेवा धनिक-क्रोडपति भावुक
आव्या होय तो पण तेओश्री तेमने पूछी लेता के रहेवाना,
छो ने १ कहे के रहेवानुछे तो तेओश्री कहीज दे के-पाठ
थइ गया पछी मलशो अने नथी रहेवानु एम कहे तो पण
एकज सेकेंडमां तेमनी वातने ( असंतोष न थाय तेटला
पूरतु) सांभली अध्यापनमा तल्लीनपणे लागी जाता।
आ जातनो तेओश्रीना शिष्य-प्रशिप्यमा सुन्दर वारसो
प्राप्त थयो होय तेम सुशीला टीका ना रचनार प० पू०
आ० श्रीमद्विजयसुशीलसूरीश्वरजी महाराज साहेब
पण शासनप्रभावनानां अनेकविध कार्यो सामे होवा छतां
अध्यापन अने ग्रन्थ रचनामा एटला बधा ओतप्रोत थइ जाय
छे के जाणे अविरत चिंतन-मनन करता ज जोवामां आवे ते
तेओश्रीनी विद्वत्ता अने तल्लीनता अति अनुमोदनीय छ ।
वीशसो वर्ष पहेलांनी आ एक अद्वितीय सत्य घटना
माटे तो वधारे शुकहीए !
काव्य ज वांचवु रह्य । वली आ घटनाने साक्षरवर्य
श्री मोहनलाल चुनीलाल धामी ए "रुपकोशा"
नामना बे विभागमा सुन्दर ओप आपेल छ ।
१५
आर्य स्थूलभद्रने पूछवामां आवे छे के
'अनेकविध शृङ्गार रसभर चित्र युक्त चित्रशाला,
नित्य आह्वादक पंड्स भोजन, रूपगर्विता अने कला-
गर्विता रुपसुन्दरीना हृदयनी उर्मिओ पूर्वकना हावभाव
अने चित्तने वींधी नाखे तेवु कलापूर्ण नृत्य ।
आ वधु सामे होवा छतां तमने कामनो जरा पण
आवेग केम आवतो नथी ।'
तेना जवाबमा आर्य, स्थूलभद्रजी महाराज जणावे छ के-
'मा गमे तेवी रुपशालिनी होय के कलाशालिनी होय
तेना अंग प्रत्यंगोमां काम भरपूर भयो होय अने नग्न थइने
स्नान करी रहेल होय तेवा समये पण तेना खोलामा बेठेला
बालकने जरा पण कामनो आवेग आरतो नथी तेवीज गुरु-
प्रसादी रूपे मलेला आत्मिक अनुभव अने ज्ञान प्राप्त कर्या
पछीनी मारी स्थिति समजो।' एटलाज माटे आ काव्यनु'
कर्ताए 'शीलदूत' नाम अति सार्थक्य जणावतु आपेलं होय
एवु भासमान थाय छे । आ बधो वास्तविक आस्वाद लेवा
माटे काव्य ज वाचवु रह्यं एटले आ काव्यने संस्कृतना
पठनपाठनमा आवकारवा तेना ज्ञाताओने विनंति करु छु ।
पूज्यश्रीए मने आ विशिष्ट प्रकारका ग्रन्थनु
प्राक्कथन' लखवा आज्ञा करी मारा उपर साहित्य सेवाने
१६ लगतो महान् उपकार कयों छे अने महापुरुषोना हैयामा मारा जेवानो वास मलवा माटे हुँ मारा आत्माने धन्याति धन्य मानुछु। पण मारामा लखवाने लगती विद्वत्तानो अभाव अने सांसारिक अनिवार्य फरजोनी अटवामणने लीधे में पूज्यश्रीने लखवा माटेनी मारी अशक्ति जणाववा छतां तेओश्रीनु' मारा उपर 'प्रेमवाहुन्य दवाण आवतां मारे । संयोगोनी प्रतिकूलतामां पण लखवुज पड्युछे । जेथी वांचको श्रा लखाणमां मारी थयेली अनेक क्षतिओने सुधारी तेमाथी नीकलतो सार-भाव ग्रहण करवानी उदारता करी मारा उपर महेरबानी करशे एवी ज हार्दिक विनंतिपूर्वक विरमुछु। ली० नम्र सेवक- छबीलदास केशरीचंद संघवी विक्रम सं० २०३४ [शेठ श्री केशवलाल बुलाखीदास फागण शुद ३ संचालित शनिवार श्री भट्ठीबाइ स्थाबाद संस्कृत श्रीस्थंभनपार्श्वनाथनो ५० मो प्राकृत पाठशाला मने श्रीललिता सुवर्णजयन्ति महोत्सव.] वेन केशवलाल स्वाध्याय मन्दिर ना प्रधान अध्यापक ११-३-१९७८ दादा साहेब योल, खंभात गुजरात. श्री वीर सं० २५०४ दिनाङ्क :०:- भोजनवमंदियापर-शासनग्न्न-तीर्थप्रभावक-राजस्थानदीपक-मरुधर- देशोदारक-रारित्रिशारद-साहित्यरत्न कविपण-बालाचारी है wammer २ परमपूच्याचार्यदेव श्रीमद्विजय सुशीलसूरीश्वरजी महाराज.
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1
१
कामविजेता
आर्य श्रीस्थूलभद्रजी महाराज का
संक्षिप्त जीवन-परिचय
66
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-
"भूर्ज नभो लेखनिका सुमेरुः,
सिन्धुर्मषी भाजनमेव पूर्णम् ।
चेल्लेखको लेखपति स्तदा स्यात्,
संख्या गुणानां शकटाल सूनोः॥१॥"
अर्थात्-
'यदि आकाश का कागज बनाया जाय, उत्तम मेरु-
पर्वत की लेखनी बनायी जाय, सागर की दवात बनायी
जाय और सुरपति स्वयं लिखने को बैठे तब तो शकटाल
पुत्र श्रीस्थूलभद्रजी के गुणों की गणना हो सकती है,
अन्यथा उनके गुणों की गणना करना असम्भव है ॥१॥'
प्रस्तुत यह 'शीलदूत' काव्य के मुख्य पात्र गौतम
। गोत्रीय आर्य श्रीस्थूलभद्रजी महाराज है.। वे माढर
गोत्रीय स्थवीर आर्य श्रीसम्भूतिविजय महाराज के
शिष्यरत्न थे ! श्रुतकेवली और चौदहपूर्व के ज्ञाता थे ।
१८
.
.
उनका 'संक्षिप्त जीवन-परिचय' इस प्रकार है-
प्राचीनकाल में पाटलीपुत्र (वर्तमान पटना) नामक
एक सुप्रसिद्ध नगर था।' उस नगर के राजा का नाम नंद
और मन्त्री का नाम शकटाल था। शकटाल मन्त्री को
लाछलेदे (लक्ष्मीवती ) नामक पत्नी से स्थूलभद्र और
श्रीयक नामक दो पुत्र तथा यक्षा, यक्षदत्ता, भूता,
भूतदत्ता, सेणा, वेणा और रेणा नाम की सात
पुत्रियाँ थी।
उस नगर में कोशा नामक एक प्रसिद्ध वेश्या रहती
थी। किसी पूर्वजन्म के संस्कारों से शकटाल मन्त्री का बड़ा
पुत्र स्थूल भद्र बाल्यावस्था से ही इस कोशा वेश्या के प्रेम
बाल में फंस गया था । वह रातदिन उसीके यहां रहता था।
इस तरह उसने बारह वर्ष कोशा वेश्या के घर में वितायें ।
वररुचि विप्र के षड्यन्त्र से एक दिन अचानक उसके
पिता शकटाल मन्त्री की मृत्यु हो गयी। नन्दराजा अपने
मन्त्री की इस आकस्मिक मृत्यु से बहुत ही दुःखित हुए।
बाद में उन्होंने श्रीयक को बुलाकर अपने पिता का पद
ग्रहण करने को कहा ! उसने कहा कि-हे राजन् ! इस पद
के वास्तविक अधिकारी मेरे बडील बन्धु श्री स्थूलभद्रजी हैं।
उसी समय कोशा वेश्या के घर से स्थूलभद्र को बुला-
कर-राजाने उससे अपने पिता का पद ग्रहण करने को कहा।
१४
स्थूलभद्रने कहा कि-'हे राजन् ! मैं इस विषय का
विचार करके आपको प्रत्युत्तर दंगा । इसके लिये मुझे कुछ
समय दीजिये।
राजाने कहा- 'मैं तुम्हें विचार करने के लिए एक
घण्टे का समय दे सकता हूं। इतने ही समय में तुम मुझे
अपना निर्णय सूचित कर दो।'
यह सुनकर स्थूलभद्र समीप के एक बगीचे में जाकर
इस विषय पर गम्भीरता पूर्वक विचार करने लगा । अन्त में
यह सोचा कि-जिस मन्त्री पद से पिता की मृत्यु हो गई
है वो पद मेरे को नहीं चाहिये । मैं अपने जीवन का बहुत
ही समय सांसारिक सुखों का रसास्वादन करने में बिता
चुका हूँ। अब मैं आत्मकल्याण करने के लिये संयम के
पूनित पन्थ में प्रयाण करुगा।
इस विचार पर वह अचल और अटल रहकर उसने
उसी समय लोच करके साधुवेश धारण कर लिया। उसी
वेश में राजसभा में उपस्थित होकर उसने 'मया लोचितम्'
( अर्थात् मैं आलोच-विचार कर आया हूँ ) कहते हुए
समस्त सभाको धर्मलाभ रूपी शुभाशीष दी।
यह दृश्य देखकर सब लोग आश्चयं में गरकाव हो
गये । खुद राजा नन्दने भी सोचा कि स्थूलभद्र तो संसार
२० - T 1 को छोड कर साधु बन गया है, अतः यह मन्त्री पद स्यूल- भद्र के छोटे भाई श्रीयक को ही देना उचित है। ऐसा सोचकर उन्होंने श्रीयक को मन्त्री पद पर नियुक्त किया। इधर मुनिवेष में श्रीस्थूलभद्रमुनि विहार द्वारा आर्य श्रीसम्भूतिविजय आचार्य महाराज के पास जा कर विधि- पूर्वक दीक्षा ग्रहण की। नूतन श्रीस्थूलभद्रमुनि आचार्य महाराज के शिष्य बने और संयम की सुन्दर आराधना करते रहे। एक बार वर्षाऋतु का समय निकट आने पर आर्य श्रीसम्भृतिविजयाचार्य महाराज के चार समर्थ शिष्यों ने भिन्न भिन्न स्थानों में जाकर अभिग्रहपूर्वक चातुर्मास करने का विचार किया। इस कार्य के लिये पूज्य गुरुदेव आचार्य महाराज की आज्ञा प्राप्त करना अत्यावश्यक था। इसलिये सर्व प्रथम एक शिष्य ने आकर कहा-भवोदधितारक पूज्य गुरुमहाराज ! मेरी इच्छा है कि मैं सिंह की गुफा के द्वार पर जाकर, उपवासी होकर कायोत्सर्ग करते हुए वर्षा- ऋतु का चातुर्मास व्यतीत करू। इसके लिये आप मुझे आज्ञा प्रदान कर कृतार्थ कीजिये। उसी माफिक दूसरे शिष्यने भी कहा- 'आराध्यपाद पूज्य गुरुभगवन् ! मेरी इच्छा है कि मैं भी चार मास उपवास कर सर्प के बिल के समीप कायोत्सर्ग पूर्वक वर्षाऋतु का चातुर्मास व्यतीत करू।। 3 - 4 1 M २१ - , -- उसी तरह तीसरे शिष्यने भी कहा- पूज्यपाद आचार्यगुरुदेव ! मेरी इच्छा है कि मैं भी चार मास तक उपवास करके कुएँ की पाल पर कायोत्सर्ग करते हुए वर्षाऋतु का चातुर्मास व्यतीत करूं। तीने शिष्यों की यह बातें सुनकर और उनकी योग्यता का विचार कर आर्य श्रीसम्धूतिविजयाचार्य महाराजने सानन्द वैसा करने की आज्ञा दे दी। सुनकर उन शिष्यों को अत्यन्त आनन्द हुआ। इसी समय वहां श्रीस्थूलभद्र मुनिवर भी आ पहुँचे । उन्होंने भी निवेदन करते हुए कहा- 'महाज्ञानी पूज्य गुरुदेव ! मेरी इच्छा है कि मैं कोशा वेश्या के घर जाकर, उसकी चित्रशाला में रहकर पट रस भोजन करते हुए वर्षाऋतु का चातुर्मास व्यतीत करना चाहता हूँ ! कृपा करके मुझे आज्ञा देकर कृतार्थ कीजिये ।। गुरुदेवने कहा- 'महानुभाव ! तुम्हारे उपर मेरा पूर्ण विश्वास है। इसलिये मैं आज्ञा देता हूं कि अपनी इच्छा याने अमिग्रह पूर्ण करने के लिये सहर्ष प्रस्थान करो ।' गुरुदेव के यह उत्साह पूर्ण बचन सुनकर श्री स्थूलभद्र- मुनिने पुनः एक बार पूज्य गुरुदेव को वन्दन किया और T " .
२२ उनकी सानंद आज्ञा प्राप्त कर कोशा वेश्या के निवास- स्थान की ओर प्रस्थान किया। मुनिवेष में रहे हुए श्री स्थूलभद्रजी को अपने घर की 'ओर आते देखकर कोशा वेश्या के आनन्द का पार न रहा। वह उनका स्वागत करने के लिये अपने घर से बाहर खड़ी रही। आर्य श्रीस्थूलभद्र महामुनि ज्योंहि वहां पहुँचे, त्योंही उसने अति प्रेम से उनका स्वागत किया । फिर कोशा वेश्याने कहा- 'पधारिये, पधारिये, महामुनि पधारिये ! मुनिवेष में भी आपने इस दासी को याद किया यह मेरे परम सौभाग्य का विषय है। आपके पदार्पण से इस दासी का निवास स्थान आज पावन हो गया और मैं भी आपके दर्शन से कृतार्थ बनी। यह आपकी पूर्ण कृपा का ही फल है। अब मैं आपकी क्या सेवा करू ? मेरे लिये क्या । । आज्ञा है ? . श्रीस्थूलभद्र मुनिने कहा-'भद्रे ! मैं तुम्हारी चित्रशाला में चातुर्मास व्यतीत करने के लिये आया हूँ । यहाँ निर्विघ्न- रूप से मेरे चारित्र का निर्वाह हो शके ऐसा प्रबन्ध करदो।
कोशा वेश्याने कहा- 'महात्मन् ! मेरी चित्रशाला क्या, यह समस्त भवन ही आपका है इतना ही नहीं, मैं भी आप ही की हूँ। मेरी विनंति है कि आपकी इच्छानुसार चित्रशाला में आनन्द से रहकर चातुर्मास कीजिये। महात्मा श्रीस्थूलभद्रमुनिने कोशा वेश्या की चित्रशाला में ही अपना डेरा डाल कर चातुर्मास किया। इधर काशा वेश्या अपने मन में सोचने लगी कि-यह स्थूलभद्रजीने संसार छोड कर दीक्षा तो ले ली, किन्तु वे पालने में असमर्थ हैं । इसी लिये चातुर्मास के बहाने वे यहां भोग- विलास करने को आये हैं। इस प्रकार विचार कर सुन्दर वस्त्रालङ्कार से अलंकृत होकर कोशा वेश्याने एक दिव्य नर्तकी का रूप धारण किया। बाद में साक्षात् ति के, समान हाव-भाव करते हुए उसने अपनी चित्रशाला में प्रवेश कर मुनिवर को संयम से भ्रष्ट करने के लिये विविध प्रकार के प्रयत्न प्रतिदिन करने लगी, लेकिन श्रीस्थूलभद्र मुनि सर्वदा संयम में स्थिर रहे । अनेक प्रकार के अत्यन्त हाव भाव पूर्वक सुन्दर नृत्य और संगीत करनेवाली कोशा वेश्या को भा अन्तमें प्रतिबोधी देश विरति से समलकृत की। चातुर्मास के बाद विहार कर जब गुरु महाराज के पास आये तब गुरुदेवने भी उठकर संघ के समक्ष श्रीस्थूल- - २४ - 1 भद्र महामुनि को "दुष्कर दुष्कर कारक" कह कर सन्मानित किया। सिंह गुफा के पास, सर्प की बील के पास और कुवे की पाल पर चातुर्मास करनेवाले तीनों मुनियों को 'दुष्कर- कारके' कह कर सन्मानित किया । पूज्य गुरुदेव का यह वचन सुनकर वे तीनों मुनियों को अत्यन्त दुःख हुआ। उनमें से दूसरे चातुर्मास में सिंह- गुफा वासी मुनि श्रीस्थूलभद्रजी की ईर्षा से पूज्य गुरुदेव के निषेध करने पर भी वह कोशा वेश्या के घर पर जाकर चातुर्मास रहे। कोशा का दिव्य रूप देखकर उन मुनिका चित्त चलित हो गया। उस कोशा वेश्याने नेपाल देश से यही मुनि द्वारा रनकम्बल मंगवाकर उसे गटर में फेंक कर उस मुनिको प्रतिबोध कर संयम में स्थिर किया । के मुनि पुनः पूज्य गुरुदेव की पास आकर सर्व प्रथम अपने कुविचारो की आलोचना लेने के बाद में कहने लगे कि-'हे पूज्य गुरुदेव ! संचमुच ही सर्व साधुओं में श्रेष्ठ तो स्थूलभद्र एक ही है। उसको आपने दुष्कर दुष्कर कारक कहा है वह युक्त ही है।' एक समय का जिक्र है कि पाटलिपुत्र नगर का नरेश नन्द अपने स्थवान पर अति प्रसन्न हुआ और कुछ मांगने -
'.
को कहा । उसने कोशा वेश्या की मांगणी की, राजाने
स्वीकार किया। हर्षित होकर रथवान कोशा वेश्या की
पास जाकर कोशा को अपनी होशीयारी बताने लगा। एक
गाण के मूल भागमें दूसरा बाण मारकर फिर उस के मूल
भागमें तीसरा वाण छोडा । इस तरह कितनेक बाणों छोड.
कर वहाँ बैठे हुए आम्रवृक्ष में रही हुई आमों की लुम्ब
तोडकर कोशा को दिया और इस कार्य का गर्व करने लगा,
लेकिन कोशा को इस पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। इनका
गर्व उतारने के लिये कोशाने सरसव के दाणों का एक ढेर
करवाकर और उस परसुईयां खडी कर उन पर पुष्प (फूल)
रखकर उस पर स्वयं नृत्य करती हुई और गीतगान गाती
हुई वह बोलने लगी-
न दुकरं अंबयलु बितोडणं,
न दुकरं सरिसवणच्चि याए।
तं दुक्कर जं च महाणुभावं,
जं सो मुणी पमयवर्णमि वुच्छो ॥ १ ॥"
अर्थात्-'आम की लुम्ब को तोडना यह कोई
दुष्कर नहीं, एवं सरसव पर नृत्य करना यह भी कोई
दुष्कर नहीं, किन्तु वही दुष्कर है जो उस भहानुभाव
३ । 7 m.. में [ श्रीस्थूलभद्रजी .मुनिने नारी रूप वनमें मूर्छित ल होकर कर बतलाया है। (१) ..' इस बात की पुष्टि में श्रीस्थूलभद्रजी महाराज की स्तुति करते हुए कविने कहा हुआ है कि- "गिरेः गुहाया विजने वनान्तरे, वासं श्रयन्तो वशिनः सहस्रशः। होतिरम्ये युवती जनान्तिके, ...... "वशी स एकः शकटाल नन्दनः ।। ki, } । अर्थात्-'पर्वत, गुफा और . निर्जन वनमें निवासकर इन्द्रियों को वश करनेवाले हजारों -मुनिओं होंगे, किन्तु अत्यन्त मनोहर महेल [ भवन, गृह ) में सुन्दर स्त्री के पास रहकर इन्द्रियों को वश करने वाला अर्थात् कामदेव को पराजित करनेवाला कोई हो तो वह शकटालनन्दन [ महात्मा श्रीस्थूलभद्र ] ही हैं।' (१.) "योऽग्नौ प्रविष्टोऽपि नैव दग्ध- च्छिन्नो न खड्गेन कृत प्रचारः। कृष्णा हि रन्ध्र प्युषितो न दृष्टो, नाक्तों जनांगार निवास्य हो यः॥२॥ , २७ अर्थात्-'अग्नि में प्रवेश करने पर भी जो जल न सका, सर्प के निवास स्थान में रहने पर भी जो सर्प द्वारा डसा न गया और काजल की कोठरी में रहने पर भी दाग न लगा [ ऐसे श्रीस्थूलभद्रजी महाराज वास्तव में महान आश्चर्य पात्र है ]' (२) "वेश्या रागवती सदा तदनुगा षड्भी रसैर्भोजनं, शुभ्र धाम मनोहरं वपुरहो नव्यो वयः सङ्गमः | कालोऽयं जलदाविल. स्तदपि यः कामं जिगायादरं, तं वन्दे युवति प्रबोध कुशलं श्रीस्थूलभद्रं मुनिम् ॥३॥" अर्थात्-'वेश्या गगवती थी, सदैव उनकी आज्ञा चलनेवाली थी, जिन्हें पस युक्त भोजन मिलता था, सुन्दर भवन [ चित्रशाला ] मनोहर शरीर और यौवन अवस्था थी-नव्यवय का मनोज्ञ समागम था, और समय भी वर्षाकालका था, फिर भी जिन्होंने क्षण मात्र में काम- देवको पराजित कर कोशा वेश्या को प्रबोधित किया, उन स्थूलभद्र मुनि को मैं वन्दन करता हूं ।' (३) • "रे काम वामनयना तव मुख्यमस्त्रां, वीरा वसन्त पिक पंचम चन्द्र मुख्याः। में - + २८ -- . त्वत् सेवका हरि विरंचि महेश्वराद्या, हाहा हताश मुनिनापि कथं हतस्त्वम् ॥ ४॥" अर्थात्-हे कामदेव ! तुम्हारे पास स्त्री रूप प्रधान शस्त्र हैं, वसन्तऋतु, कोयल, पचम सग और चन्द्र ये तेरे मुख्य योद्धा-सुभट हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे सेवक मौजूद होने पर भी तू इस मुनि से । श्रीस्थल- भद्रजी से ] कैसे माग गया। (४) हे कामदेव ! तूने संयम में रहे हुए नंदिषेण, रथ. "नेमि और आर्द्रकुमार के समान ही इस मुनि को भी देखा ? यह तो श्रीनेमिनाथ, जम्बूस्वामी और सुदर्शन शेठ के जैसे जितेन्द्रिय नररत्न हैं, इतना ही नहीं श्रीनेमिनाथ भगवान से भी यह शकटाल 'सुत श्रीस्थूलभद्रजी महाराज अधिक मालूम होते हैं क्योंकि श्रीनेमिनाथ भगवानने तो गिरनार पर्वत पर जाकर मोह को वश किया था लेकिन इस स्थूलभद्रजी महात्माने तो मोह के घर में रहकर मोह का 'मर्दैन किया। इसलिये कहा गया है कि- "श्रीशान्तिनाथाद् परो न दानी, दशार्णभद्राद् परो न मानी। - 8 2 श्रीशालिभद्राद परो न भोगी, श्रीस्थूलभद्राद परो न योगी ॥५॥" अर्थात्-'श्री शान्तिनाथ के समान कोई दानी नहीं हो सकता, श्रीदशाणभद्र के समान कोई मानी नहीं हो सकता, श्रीशालिभद्र के समान कोई भोगी नहीं हो सकता और श्री. स्थूलभद्र के समान कोई योगी नहीं हो सकता। यही भारत देश में एक समय बारह वर्षीय दुष्काल के अन्त में श्रीसंघ की साग्रह विज्ञप्ति से श्रुतकेवली श्रीभद्र- बाहुस्वामी महाराज पाँचसौ मुनियों को द्वादशाङ्गी के दृष्टि- बाद की सात वाचना सदैव देते थे । सात वाचनाओं से भी अतृप्त रहते हुए अन्य सभी.मुनि उद्विग्न होकर विहार- द्वारा अन्यत्र चले गये। शिर्क श्रीस्थूलभद्रजी महाराज ही अकेले रह गये। वे दो वस्तु कम दशपूर्व तक पढे । एक दिन वन्दना करने के लिए आई हुई यक्षा आदि सात साध्विीओं को जो संसारी अवस्था में उनकी सगी बहिने थीं उन्हें कुछ चमत्कार दिखाने के उद्देश्य से श्रीस्थूलभद्रजीने सिंह का रूप धारण कर लिया। सिंह को देखने के साथ साते साध्वीओं भयभित हो गयीं । उन्होंने वहां से वापीम लौटकर इफिते हुए पूज्य गुरुदेव के पास आकर कहा- Pr
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३०
1
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'हे प्रभो ! महा अनर्थ हो गया। वहां तो विकराल
भयंकर एक सिंह बैठा हुआ है। श्रीस्थूलभद्रजी महाराज
का कहीं पता भी नहीं। शायद उन्हें उस सिंहने मारकर
खा डाला होगा।
पूज्य गुरुदेवने अपने ज्ञान से देखा कि स्थूलभद्रने ही
कुछ चमत्कार दिखाने के लिए सिंह, का रूप धारण कर
लिया था। उन्होंने यक्षा आदि, साते साध्वीयों को धैर्य देकर
कहा-'अब जाओ, वहां सिंह नहीं है, स्थूलभद्र वहीं है ।
उन्हें वन्दना कर आओ; ti
यह सुनकर साध्वीयोंने वहाँ जाकर अपने संसारी
अवस्था के बन्धुः श्रीस्थूलभद्रजी महाराज को वन्दना कर
वापिस लोटी।
इसके बाद श्रीस्थूलभद्रजी महाराज वाचना लेने के
लिये श्रुतकेवली पूज्याचार्य श्रीभद्रबाहुस्वामीजी महाराज
के पास गये । सिंह का रूप दिखलाने की बात से नाराज
हुए श्रीभद्रबाहुस्वामीजी महाराजने स्थूलभद्रमुनि से कहा-
"वाचना के लिये तुम अयोग्य हो, इसलिये अब
वाचना न मिलेगी" । अन्त में फिर श्रीसंघ के अत्याग्रह से
तुमने अन्यको यह वाचना न देनी', यों कहकर शेष चार
[११-१२-१३-१४३] पूर्वकी मात्र मूलरात्र की वाचना दी।
--
,
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तब से आर्य श्रीस्थूलभद्रजी महागज चौदह पूर्व के ज्ञाता बने । श्रुतकेवली तरीके चौदह पूर्वी कहे गये । अन्त में अपना अवसान समय..समीप में समजकर अपने दो शिष्य आर्य महागिरि और आर्यसुहस्तिगिरि को अपने पद पर स्थापना की और अनशन की आराधना कर समाधिपूर्वक कालधर्म पाकर श्रमण भगवान महावीर प्रभु के निर्वाण बाद २१९ वर्षे स्वर्ग में सिधाये । कामविजेता आर्य श्रीस्थूलभद्रजी महाराज का नाम जैनशासन के इति- हास में चौराशी चौवीशी तक अमर रहने वाला है। ऐसे सर्वदा मंगल स्वरूप श्रुतकेवली श्रीस्थूल- भद्रजी महाराज को हमारा कोटि कोटिशः वन्दनहो। श्री वीर सं० २५९४ विक्रम स० ००३४ लेखक- फागण शुद १४ विजयसुशीलमूरि शुक्रवार श्रीतपगच्छ का जैन [चौमासी चौदश गुजराती कटला दिनाङ्क पाली (मारवाड़) राजस्थान २३-३-१९७८ ཀར उपाश्रय ॥ शुभं भवतु श्रीसङ्घस्य ।। :०:-
आर्य श्री स्थूलभद्रजी महाराज
(२) पिता
म
(१) जन्मस्थल-पाटलीपुत्र [वर्तमाम-पटणा) नगर
-शकटाल [नवमें नन्दराजा के मन्त्री)
(३) माता -लाछलदे [ लक्ष्मीवती]
(४) बन्धु
-श्रीयक
(५) बहिनें -यक्षा, यक्षदिना, भूता, भूतदिना
सेणा, वेणा और रेणा
(६) ज्ञाति -नागरब्राह्मण
-काश्यप
(८) गृहस्थावास-३० वर्ष
(९) व्रतधर
(१०) युगप्रधान-४० वर्ष
(११) ज्ञान -१४ पूर्व तक
(१२) आयुष्य -88 वर्ष ५ मास और ५ दिन का
(१३) स्वर्गवास-श्रमण भगवान महावीर पीछे २१५ वर्षे
(७) गोत्र
-२४ वर्ष
" प्रकाशकीय निवेदन नव्य सुशीला टीका युक्त-'श्रीशीलदूत काव्य' इस नाम से समलंकृत यह ग्रन्थान को आज प्रकाशित करते हुए हमें अत्यन्त हर्ष हो रहा है । वि० सं० १४८४ या १४८७ वर्ष में वृहदतपागच्छीय विद्वान् पूज्य वाचक श्रीचारित्रसुन्दर गणिवरने यह शीलदूत काव्य की खण्डकाव्यरूपे रम्य रचना की है। इस पर स्वगीर्य शासनसम्राट् परमपूज्याचार्य महाराजाधिराज श्रीमद्विजयनेमिसूरीश्वरजी म. सा. के सुविख्यात पट्टालङ्कार स्वर्गीय साहित्यसम्राट श्रीमद्विजयलावण्यसूरोश्वरजी म. सा. के प्रधान पट्टधर कत्रिदिवाकर परमपूज्याचार्यवर्य श्रीमद्विजदक्ष- सूरीश्वरजी म. सा. के सुप्रसिद्ध पट्टधर जैनधर्मदिवाकर परमपूज्याचार्यदेव श्रीमविजयसुशीलसूरीश्वरजी म. सा० ने सरल संस्कृतभाषा में नव्य 'सुशीला टीका' की सुन्दर रचना की है। परमपूज्याचार्यप्रवर ३४ विश्वविख्यात कामविजेता चौदहपूर्वधरमहर्षि प० पू० आर्य श्रीस्थूलभद्रजी महाराजा और कोशावेश्याका संवादरूपे मन्दाक्रान्ता छन्दमें बनाया हुआ यह शीलदूत काव्य नव्य सुशीला टीका से समलंकृत होने से अत्यन्त सुशोभित बना है। इस ग्रन्थ का 'प्रारम्भिक प्रकथन' और 'काम विजेता आय श्रोस्थूलभद्रजो म० का संक्षिप्त जीवन वृत्तिकार पूज्य आ० म० सा० ने आलेखन सुन्दर किया है। इस ग्रन्थ का सम्पादन कार्य करने वाले पू. उपाध्याय श्री विनोदविजयजी म. सा. हैं तथा प्रेरक पूज्य मुनिराज श्री शालिभद्रविजयजी म. सा० हैं। जैन पंडित छबोलदास केसरीचन्द संघवी ने भी इस ग्रन्थ का प्रस्तावनारूपे 'प्राक् कथन' का आलेखन अच्छी तरह से किया है। इस ग्रन्थ का प्रुफ संशोधन कार्य न्याय-व्याकरण- साहित्याचार्य मैथिल पंडितप्रवर श्री सुरेशझाजी ने ढंग से किया है । तथा मुद्रण कार्य में श्रीमान् छगनलालजी जैन का भी अच्छा सहयोग रहा है । उक्त महानुभावों का हम हार्दिक आभार मानते हैं। जम 1 शीलदूत शुद्धिपत्रम् पृष्ठे पक्तौ | अशुद्धम शुद्धम् पृष्ठे पंक्तो अशुद्धम् शुद्धम् ७८ ८० १२ साध सार्धम् ३ २० परिशष्ट परिशिष्ट ७१ १५ श्रत्वा श्रुत्वा १३ ५ पदेशविशेपे प्रदेशविशेपे ७२ १८ याचजा या १७१५-१६ स्नातयनेनेति नात्यनेनेति ७७ १० मेघदुते मेघदूते २० २ करऽणेनेन करणेऽनेत ७७ १२ हेप्रियतमे प्रियतमे २१ ११ | सङ्गमायतम् सङ्गमितम् ७७ २० नेव २१ १६ : सुरु कर सुखकर ४ बुद्धव बुद्धयैव २४ २ कत कर्तृ इतमाव: इतिभावः २६ विशेष विशेषः ८१ ४ । नितियावम इतियावन् ३६. १२ | एतश्च एपश्च ८१ ५ क्रीडा क्रीडा ४४ १३ सकल्प संकल्प ८४ ५ मेव मेव ६० १० अभधान अभिधान ८२ १ वृक्ष ६० ५४ पतिम पतिम नातपरस्य नातपपरस्य ६० १६ सुरवध्व ६५ १५ दृश्वते दृश्यते ६४ १५ मुक्तागुणं मुक्तागुणं १८ ६ प्रणयरस प्रणयस्य ६४ १७ मरिहर परिहर १०१ ४ विरोधः विरोधः ६४ २० वैरी वारं वैरिवारं दान दीनं ६५ २ त्वम त्वम् १०३ १२ क्षीनं क्षीणं फेने फेन १०४ १२ दौर्वलयम दौर्वल्यम् ६६ ४ | स्वधुनो हेभर्त हेभतः ६७ २ प्रकुर्याद प्रकुर्याद् १०६ ६ नृपति नृपति- शस्वः शस्यः १०६ १६ पिलकः धमं धर्म ११० १ रूपेणेत्यर्थः रूपेणेत्यर्थः ७१ १३ हे मतिमान् हे मतिमन् ११२ १५ वृच्छ ६३ १६ सुरवध्वः १०१ १७ ६५ १४ स्वधुनी १०४ १६ - तिलक: ७० १७ ३६ । अशुद्धम् शुद्धम् पृष्ठे पंक्तौ । अशुद्धम् शुद्धम् पृष्ठे पंक्तो om ८.० १५६ १ वृहदाभ वहद्भि ११६ ३ गुरुपदेश गुरूपदेश १५१ ५ कुरू ११७ ४ भवय भवभय १५१ १२ मदीगृह मदीयगृह ११८ ११ ध्यास्यान्ति ध्यास्यन्ति १५२ २ पर्वतीय पर्वते ११८ १३ / विभति विभ्रति १५३ २ निर्नितः निर्मितः ११८ १४ चेष्यान्ति चेष्यन्ति १५३ १७ दिन्यान्य दिनान्य दिनान्य १२४ १६ मुखास्थितां मुखस्थितां १५५ १३ विधूत निघूत १२७ ११ / बित जित १५५ १७ प्रकशेन प्रकाशेन १२७ १६ त १५५ १८ प्रत साम्प्रतं १२८ ४ स्वरुप स्वरूपं नहतमवं नहते १२६ १० कारणे न कारणेन १५६ १३ माकरं माकारं २३० १ . कास्मिन्नपि कस्मिन्नपि १५६ १४ वद्धा वद्धाः १३२ १६ ज्ञातै तत्त्वे जाते तत्त्वे १५७ ६ वर्णयते वय॑ते १३३ ६ विशेष विशेषः १५८ ६ क्षीणकय क्षीणकट्य १३४ ६ विशेषोन्या. विशेषोप- मुख मुख १३४ १ सेन न्यासेन १५८ १४ विशेष विशेषः १३४ १६ | प्राकारेण प्रकारेण १५६ ११ लगन्तिता लगन्तितानि १३६ १३ विनाशिं विनाशि १५६ ११ अर्धभिक्षिता अर्द्धभक्षिता १३७ १३ तीथेङ्गरैः तीमङ्करैः १५६ १२ संदोग्धि सदेग्धि १४२ ४४ नो चितम् नोचितम् वलम्या वलभ्या १४५ १० नरीषु नारीषु सालिलं सलिलं १४६ ८ शकयते शक्यते सर्वेष्टा सर्वेष्ट १४७ १ तत् १६२ ११ नियंद निय १४६ १४ | मरणरूपस्य x. स्वर्गों १४६ १६ / स्थास्यति स्थास्यति १६३. ६ किमुतेऽयं किमुतेय १५१ ४ कोशा कोशा १६३ १२ १६० ६ १६१ १४ १६१ १७ ता १६२ १८ स्वग अशुद्धम् शुद्धम पृष्ठे पंक्ती अशुद्धम् शुद्धम् पृष्ठे पंक्ती ५ यन्त्यपि १८८ १४ तस्य ७ आन्ताः अस्ताः १६४ १८ भद्वहु मद्वाह १८५ १६ अभिप्रायः अभिप्रायं १६५ ३ विशेष विशेषः १६५ १६ ब्राझ ब्राह्म १६६ ८ न्वितानी नताली १८५ एवास्थान्तरं एवावस्या- सखा सखी १८६११ न्तरं १६६ २० दिन नादं दीन नादं १६७ १ कठिन्यं काठिन्यं १८८६ कम् किम भूयो भूयः १६७ १८ भूय भूयः १८८ १२ लोकयन्यपि लोक- मूर्धान्ते मूर्छान्ते १६७ १६ चित्तस्या- चित्तस्या- नो चित नोचित १८६ नवा नव १६८ १० १८६६ अवयो आवयो १९० तस्था १६६ ६ ततेश्व अन्य अत्यद् ततश्च १६१ १७० है निद निज भुक्तवानिति मुक्तवानिति १६२ ८ १७१ वाक्येन सार्द्ध साद्ध १६३ १३ १७२ १२ न ह्रदयम् नो हृदयम १६४ १३ सद्भाव रुझाव मुपस्यै मुपत्यस्य १७४ ६ उत्कष्टा उत्कण्ठा संम्ध्यनु संमृज्यानु १७५ १ तृणाम् तृणम् १६७ १७ वस्त्राप्रान्तेव वस्त्रप्रान्तेव १७५ १२ हे शुभे स्थलमलिनि स्थलक- समभव सममवत् १६६ १६ मलिनी १७६ ८ प्रावृपो भावनेति २०२ भवनेति राद्रन्त रान्द्रन्ति ०७६ १५ विधानस्य विधानस्य १५८ १ निजमति निजमति २०४ १ जल्पिते न जल्पितेन १७८ १३ ईहित ईहितं २०४ चापन्त्रम् चामम्त्रणम् १७६ ४ पुसाम् पुसाम् विकसितचे विकसितरुचेः १८२ ३ नीचे नीचेंः २०४ सदाः सद्यः अवं २०५ ३ वाक्ये न १७४ २ १६५ १० हे शुम १९ ६८ पावृपो २००१८ २०४८ F Ir १८४ ११ / उर्व
अशुद्धम् शुद्धम्
पृष्ठे पंक्तौ | अशुद्धम्
शुद्धम
पृष्ठे पती
चर्यश्च
यस्य
कलप्तं क्लुप्तं २०५ ११ । सम्भुति
सम्भूति २१६
२१६ ३
उच्चेः उच्चैः २०५ १७ | प्रणताम् प्रणनाम
२१७ १३
वगमे विगमे
२०० १८चर्याश्च
२१८ ?
रमय
रसमयं
२०६ २. यस्य
०२० १०
प्रादान् प्रादात् २११ २ प्रपाल्यः प्रपाल्य २२१ ७
कायमेव कार्यमेव २११ १ सुखनितातां स्वर्वनितानां २०२ ३
मिति प्रीति २१३ १४ सुखनितानां स्वर्वनिताना २२२६
वैर रूपतां वैरूपता २१४ १२ | सद्गुरू सद्गुरु
२०३ १६
आपि भपि २१५ १६ | कुरुपरिचय गुरुपरिचय २४ ॥
जड़
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१ . अहम् भ । वर्तमानशासनाधिपति-श्रीमहावीरस्वामिने नमः ।। ॥ अनन्तलधिनिधान-श्रीगौतमस्वामिने ॥ दुष्करदुष्करकारक-श्रीस्थूलभद्रस्वामिने नमः ॥ शासनसम्राट्-श्रीमद्विजयनेमिसूरीश्वरपरमगुरवे नमः ।। ॥ साहित्यसम्राट्-श्रीमद्विजयलावण्यसूरीश्वरप्रगुरवे नमः ॥ नमः %3D श्रीबृहत्तपोगच्छनायक-भट्टारकाचार्य श्रीरत्न- सिंहसूरिशिष्योपाध्याय श्रीचारित्र- सुन्दरगणिवर-विरचितं [ समस्यामयं काव्यम् ] म 卐 FORE तदुपरि- शासनसम्राट-मरिचक्रचक्रवर्ति-तपोगच्छाधिपति-ब्रह्मतेजो- मूर्ति-महाप्रभावशालि--श्रीकदम्बगिरिप्रमुखानेक तीर्थोद्धारक- सर्वतन्त्रस्वतन्त्र-स्व० प० पू० आ० श्रीमविजयनेमि- सूरीश्वरस्य पट्टालङ्कार-साहित्यसम्राट्--व्याकरणवाचस्पति- शावविशारद-कविरत्न-स्व० ५० पू० आ० श्रीमदूविजय- - . - , लावण्यसूरीश्वरस्य पट्टधर-व्याकरणरत्न-शास्त्रविशारद- कविदिवाकर-देशनादक्ष प० पू० आ० श्रीमविजयदक्ष- सूरीश्वरस्य पट्टधराचार्यश्रीविजयसुशीलसूरिणा विर- चिता 'सुशीला-वृत्तिः । अथ टीकाकृतो मङ्गलाचरणम् (शिखरिणी-वृत्तम् ] युगादीशं नत्वा ऋषभजिनराजं जगदिनं । सुतं नामेराचं नरपतिमथाद्यश्च यमिनम् ।। तथा शान्तीशानं सकलसुरपूज्यं सुखकरं । ह्यभूच्चक्रीतीर्थकर , इह : सहैवैकजनने ॥१॥ [ मन्दाक्रान्ता-वृत्तम् ] स्तुत्वा देवं यदुकुलमणि नेमिनाथ जिनेन्द्र । शत्रुस्निग्धे कमठधरणेन्द्रे समं पार्श्वनाथम् । भूयो भूयो दशनपरकं कौशिकं चण्डपूर्व । क्षान्त्वा बोधप्रवणमतिक वईमानं नमामि ॥२॥ [ शार्दूलविक्रीडित वृत्तम् ] स्मृत्वा श्रीजिनभारती गणधरं श्रीगौतमेत्यादिक, तीर्थोद्धारधुरन्धरं गुरुवरं श्रीनेमिसूरीश्वरम् । प्रख्यातं प्रगुरुश्च पण्डितवरं, लावण्यसूरीश्वरं, श्रेष्ठं शास्त्रविशारदं कविरविं श्रीदक्षसूरिं गुरुम् ॥३॥ - - - [ वसन्ततिलका-वृत्तम् ] श्रीस्थूलभद्रमुनिवर्यचरित्रयुक्त चारित्रसुन्दरगणिप्रवरेण दृब्धम् । साहित्यसर्वगुणवोधजलेन पूतम् , प्रख्यातमस्ति भुवने प्रियशीलदूतम् ॥४॥ तस्योपरि प्रियतमां सरलां सुशीलां, टीका करोमि विजयादि सुशीलसूरिः । श्रीशालिभद्रनिजशिष्यकृतार्थनातः, जाता प्रवृत्तिरिति मे सफलाऽस्तु लोके ॥५॥ महाकविकालिदाससरस्वतीप्रसादोद्गतमेघदूताभिधान- खण्डकाव्यस्य विप्रलम्भशृङ्गाररसप्रधानस्य निखिलपद्यान्ति- मचरणं समस्यारूपेणाश्रित्य तत् पूरकैविप्रलम्भद्योतकरपि शान्तपर्यवशायिभि स्त्रिभिश्चरणैः स्वनिर्मितैः सङ्गमय्य विर- चयिष्यमाणं शीलदूताभिधानं बुद्धिस्थं खण्डकाव्यं प्रारिप्स- श्रीबृहत्तपोगच्छनायकभट्टारकाचार्यश्रीरत्नसिंह- सूरिशिष्योपाध्याय श्रीचारित्रसुन्दरगणिवरो निर्विघ्नपरि- समाप्तिशिष्यपरम्परा प्रसार कामनया शिष्टपरम्परापरिप्राप्त वस्तु निर्देशरूपं मङ्गलमाचरन्नाह- ...[ मन्दाक्रान्ता-वृत्तम् ] भुक्त्वा भोगान् सुभगतिलकः कोशया सामिद्धान्, धन्यो मान्यो निखिलविदुषां भद्रया स्थूलभद्रः । माणः चक्रे श्रुत्वा जनकनिधनं जातसंवेगरङ्गः, स्निग्धच्छायातरुषु वसति रामगिर्याश्रमेषु ॥१॥ अन्वय:- -- - 'सुभगतिलकः धन्यः निखिलविदुषां मान्यः स्थूलभद्रः भद्रया कोशया सार्धम् इद्धान् भोगान् भुक्त्वा, जनकनिधनं श्रुत्वा जातसंवेगरङ्गः स्निग्धच्छायातरुषु रामगिर्याश्रमेषु वसतिं चक्र' इत्यन्वयः । 7 व्याख्या- सुष्टु शोभना भगः रूपम् अणिमाद्यष्टविधमैश्वर्यं भाग्यं वा यस्य स सुभगः, सुभगानां तिलकं विशेषक इवेति सुभग- तिलकः रूपवतां ऐश्वर्यवतां भाग्यवता वा मध्ये प्राधान्येन विराजमान इत्यर्थः, धन्यः धनमर्हति, धनं लब्धा वा इत्यर्थे "धनगणाल्लब्धरि [७.१.६]" इति या, धनपात्रं, धन- वान् भावी चेत्यर्थः, निखिला अशेपा विद्वांसः निखिल- विद्वांसः तेषां मान्यः मान्यते पूज्यते इति "ऋवर्णव्यञ्जनाद् ध्यण [५-१-१७]" इति ध्यण , पूज्य इत्यर्थः, स्थूलभद्र:- पाटलीपुत्रपुरे नन्दनृपः शकटालमन्त्री लक्ष्मीदेवी पत्नी तयोः पुत्रौ स्थूलभद्र-श्रीयकाभिधानी सप्त च यक्षादि पुत्र्य स्तत्र ज्येष्ठपुत्र: स्थूलभद्रेति नाना प्रसिद्धः भद्रया कल्याण्या है ५ कोशया तमाम्ना प्रख्यातया पाटलिपुत्रपुरवेश्यया, सार्धम् सह, इडान् दीप्तान् भोगान् भुज्यन्ते इति भोगाः, भुजेः कर्मणि घन्, स्रक्चन्दनवनितादयो विषयाः तान् भुक्त्वा यथेच्छमुपयुज्य ‘जनकनिधनं जनकस्य उत्पादकस्य शक- टालमन्त्रिणः निधनंवररुचिविप्रप्रपञ्चरुटगजापराधदण्ड- शङ्कया राज्ञोऽग्रत एव स्वपुत्रेण श्रीयकेण खड्गव्यापारेण मृत्यु, श्रुत्वा-निशम्य जातसंवेगरङ्गः जातः उत्पन्नः संवेगस्य संसारसुखत्यागत्वराया रङ्गः अग्रभूमिः प्रारम्भो वा यस्य तादृशः, स्निग्धच्छायातरुषु स्निग्धाः मनोहरा: छायाप्रधानाः तरवः छायातरवः येषु मनोहरचनच्छायावृक्षेषु रामगिर्याश्रमेछु रमन्ते योगिनो यत्र ते रामा स्तथाभूता गिरयः पर्वताः रामगिरयः तत्रस्थेषु आश्रमेषु मुनिनिवास- स्थानेषु वसतिं निवासं चक्रे कृतवान् इति । कविकालिदासस्य मेघदूते प्रथमपद्यस्य चतुर्थः चरण इहापि चतुर्थत्वेनीपात्तः केवलं रामगिर्याश्रमपदं तत्र चित्र- कूटाभिधपर्वताऽर्थे प्रयुक्तम् इह च तदन्यथा (पूर्वोक्तरूपेण) व्याख्येयं भवतीति । विशेष:-मगधदेशेषु पाटलिपुत्रनगरे नवमस्य नन्द- राजस्य मन्त्री शकटालः बहुमतः आसीत् । तत्रैव च वर- रुचिर्महावैयाकरणः कविश्च राजानं तोषयितु बहुप्रयत्न- वानपि मन्त्रिणा केनापि कारणेन व्यर्थ प्रयत्नः क्रियते स्म ।
w ततश्च रुष्टोऽसौ वररुचिः छिद्रान्वेषणतत्परः कथमपि शकटालं राजविद्रोहिणं प्रमाणयामास । ततो राज्ञा शकटालोऽवमतः । तदपमानं विज्ञाय बुद्धिमता शकटालेन कदाचिदयं राजा रुष्टः कुलविनाशाय प्रयतेतेति मत्वा राजाग्रे एव स्वपुत्रेण स्ववधं कारयामास । तस्य कनिष्ठः पुत्रः श्रीयकस्तत् कारणं राज्ञा पृष्ठ उवाच देवेनायं स्वापराधी विज्ञात इति राज सन्दिग्धस्यास्य मरणमेवोचितमिति ज्ञात्वा मयाऽयं मारितः। इति श्रुत्वा राजा श्रीयकोपरि सन्तुष्ट स्तं सर्वाधिकारसहितं मन्त्रिपदं स्वीकतु माह | स च ज्येष्ठे भ्रातरि स्थूलभद्रे स्थिते मम मन्त्रित्वं नोचितमिति मनसि कृत्वा राजानमाह- "देव ! मम ज्येष्ठो भ्राता स्थूलभद्रो महामतिः सर्वमन्त्रिगुण- सम्पन्नो द्वादशवर्षेभ्यः कोशाया वेश्यायाः प्रेमपाशेन तल्लीन- स्तद्गृहे. एव तिष्ठति । स एवानेन पदेन योजयितु युक्तोऽहं तु देवस्यानुचरः सर्वदेवास्मि" इति । ។ -- ततो राज्ञा दूतद्वारा स्थूलभद्र आहूतो मन्त्रिपदं ग्रहीतु कथितः । तेनोक्तम्-विचार्य श्रीमदुत्तरं दास्यामीति । ततोऽपसृत्य महामतिः स कस्यापि नियोगे स्थितिः महद्- दुःखकारणं भवति. कदाचिन्मम पितुरिवानर्थायापि कल्पेतेति मन्त्रिपदात् प्रव्रज्यैव वरमिति विचार्य लोचादिकं साधुभाव- पूर्वकृत्यं सम्पाद्य राज्ञोऽग्रे गत्वा 'धर्मलाभ उवाच ।
३ राज्ञा चेदमेवोत्तरमिति विज्ञाय स विसृष्टः सद्गुरुश्री- सम्भूतिविजय पार्श्व गत्वा सर्वविरतिसामयिकोच्चारणपुरःसरं पारमेश्वरी प्रव्रज्यामग्रहीत् । इति कलिकालसर्वज्ञ श्रीहेमचन्द्र- सूरीश्वरविरचिता परिशिष्टपरकथाऽत्रानुसन्धेया ॥ भोगान् सुभग इत्यनुप्रासालङ्कारः, धन्यो मान्य इत्यपि। अत्र काव्ये 'मन्दाक्रान्ता च्छन्दः' तल्लक्षणम् - "मो भ्नौ तौ गौ मन्दाक्रान्ता थचैः" (छन्दोनु० अ० २, सूत्र-२९०) इति । 'मगणः ऽऽऽ, भगण: ॥, नगणः ।।।, तगणद्वयम् ss, ssI, गुरुदयम् ऽऽ.' इत्येव मक्षरविन्यासः । अत्र क्रमाद् चतुर्मिः पभिः सप्तभिरक्षयतिरिति लक्षितः पादो यस्या सा मन्दाक्रान्ता वृत्तिरिति सूत्रार्थः । प्रतिपादं लक्षण- समन्वयः स्पष्टमूह्यः ॥ १॥ अथ गुरुसमीपगमनमाह- चित्ते मत्वा विषयनिचयं सत्त्वरं गत्वरं वै, गच्छन्नेषोऽध्वनि घनजिनध्यानसंलीनचित्तः । शान्तं कान्तं रसमिव गिरौ श्रीगुरु भद्रवाहुं, वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श ॥ २ ॥ अन्वय:- 'चित्ते विषयनिचयं सत्वरं गत्वरं मत्वा घनजिनध्यान- संलीनचित्तः एपः अध्वनि गच्छन् गिरौ कान्तं शान्तं रसम् - ८ इह वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं श्रीगुरुं भद्रबाहुं ददर्श वै' इत्यन्वयः। व्याख्या- - - पूर्वपद्ये जातसंवेगरङ्गः इति पदेन वैराग्योत्पत्तिरुक्ता । वैराग्योत्पत्त्या च तत्त्वविविदिषा जायते तत्त्वज्ञानार्थ च गुरुरेव शरणम् 'तद् विज्ञानार्थ स गुरुमेवाभिगच्छेत्' इति- चित्ते हृदये विषयनिचयं विसिन्वन्ति अवबध्नन्ति इति विषयाः स्रगचन्दनवनितादयः सांसारिका . भोगाः तेषां निचयं समूह, सत्वरं त्वरया' सहितं यथा स्यात् तथा गत्वरं गमनशील “गत्वरः (५-२-७८]" इवि निपातनम् । मत्वा विज्ञाय, घनजिन ध्यानसंलीनचित्तः घनं निविडं यत् जिनस्य जयति रागद्वपमोहादीन् शत्रून् इति जिनः "जीणशीदीबुध्यविभीभ्यः कित् [ उणा० २६१]" इति किति न प्रत्यये जिन इति तस्य अर्हतः ध्यानं स्मरणं तत्र संलीनं सम्यग् एकतान तया लीनं मग्नं चित्तम् अन्तःकरणं यस्य तादृशः एषः स्थूलभद्रः मुनिराजः, अध्वनि मार्गे गच्छन् ब्रजन् गिरौ पर्वतप्रदेशे कान्तं मनोहरं शान्तं तन्नाम्ना प्रसिद्धं रसम् रस्यते आस्वाद्यते इति रसः शम- स्थायिभावकः संसारदोषदर्शनादिना विभावेनाभिव्यक्तः आत्मानन्दरूपः तं इव वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं .. वप्रक्रीडा उत्तवातकेलिः [गजादिभिः तटार्श्वभूमिप्रदेशानां - ।
है दन्तादिभिरुत्पाटनाय तदुत्थितधूलेरुपरि क्षेपाय च या क्रीडा क्रियते सा वप्रक्रीडेत्युच्यते] तस्यां परिणतः तिर्यग्दन्ताहारी तिर्यग्दन्तप्रहारी तु गजा परिणतो मतः इति विश्वः] गजः करी तद्वत् प्रेक्षणीयं दर्शनीयं, यथा तादृशो गजः स्वाभावि- कक्रीडायां निरतः किमपि सांसारिकमन्यत् न चिन्तयति तथैव साविकध्यानमग्नोऽसाविति भावः । श्रीगुरु श्रिया शोभया सहितः गुरुः श्रीगुरुः तं, गृणाति धर्मम् इत्यर्थे "क ग त उर्च [उणा० ७३४]" इति उ प्रत्यये ऋकारस्य उरादेशे च गुरुशब्दनिष्पत्तिः धर्मोपदेशक [गुरुर्धर्मोपदेशका इति हैम:) भद्रयाहुं एतन्नामकं श्रुतकेवली स्थविरं आर्यपदोप लक्षितं विद्यागुरुवरं मुनिप्रवरं ददर्श दृष्टवान् इति ॥ विशेषः-परिशिष्टपर्वणि श्रीस्थूलभद्रकथायामस्य गुरु श्रीसम्भूतिविजय उक्तः स दीक्षागुरुः इति पूर्व प्रतिपादितम् इह च अस्य गुरुः भद्रबाहुः उक्तः स विद्यागुरुः । मेघदूतेऽपि द्वितीयश्लोकस्य चतुर्थचरणोऽयं, तत्र वा- क्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयमितिपदं मेघस्य विशेषणतया स्थितं नस्य पर्वतशिखरसम्बद्धतया च साधुसंघटतेऽत्रच कथंचिदा रोपितानन्यध्यानपरतया योजनीयं भवतीति विशेषः ॥२॥ गुरोराभिमुख्यमाह- १० शिक्षाकामं कृतनतिममु ध्वस्तकामं निरीक्ष्या- चख्यावेवं गुरुरुरुगिरा वत्स ! मोहं जयतम् । संयोगेऽपि प्रभवति यतः प्राणिनामत्र दुःखं, कराठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनर संस्थे ?॥३॥ अन्वयः- 'गुरुः शिक्षाकामं कृतनति ध्वस्तकामम् , अमु निरीक्ष्य एवम् उरुगिरा आचख्यौं, वत्स ? एतं मोहं जय, यतः अत्र प्राणिनां संयोगे अपि दुःखं प्रभवति, कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने दूरसंस्थे किं पुनः' इत्यन्वयः । व्याख्या:-आयान्नमेव श्रीस्थूलभद्रमुनिं दृष्ट्वा विशिष्टज्ञानयोगेन गुरुः तदीयं सर्व वृत्तं ज्ञात्वा तं शिक्षयन कथयामासेति कवेराशयः । . तमेवाह-शिक्षाकामं कथमयं सांसारिको मोहो मे यास्यतीति तदुपदेशं शिक्षितुमिच्छन्तं कृतनति' कृता विहिता नतिः शिरोनमनं येन तादृशम् ग्वस्तकामं कामेन स्मरेण ध्वस्तस्ववशमानीय मार्गात च्यावित इति ध्वस्तकाम: पूर्व सम्प्रति तु ध्वस्तः कामो येनेति ध्वस्तकामः तं काम- वासना परिभाविनम्, पूर्वत्रार्थे तृतीयातत्पुरुषसमासः राज- दन्तादिवत् पूर्वप्रयोगार्हस्य परप्रयोगः, परत्रार्थे बहुव्रीहिः ११ समासः अमुस्थूलभद्रं निरीक्ष्य आलोक्य एवं वक्ष्यमाण- प्रकारेण उरुगिरा श्रेष्ठवाचा आचश्यो कथयामास । वत्स ! वात्सन्यपात्र ? एतं ते मनसि स्थितं मया प्रत्यक्ष- तया दृश्यमानं मोहं वैचित्यं जय अधः कुरु, यतः कारणात् अत्र संसारे प्राणिनां मनुष्याणां संयोगे परस्पर सम्पर्के (सति) अपि दुःखं परस्परप्रतिकूलवेदनीयं प्रभवति सम्पद्यते कण्ठाश्लेषप्रणयिनि कण्ठस्य प्रियजनशिरोधरस्य आश्लेपः आलिङ्गनं तस्य प्रणयः गाढं प्रेम अस्य अस्तीति कण्ठाश्लेषप्रणयी तस्मिन् (तादृशे) जने दूरसंस्थे प्रियजनाद् विप्रकृष्ट देशस्थिते सति किं पुनः किं वक्तव्यम्, तादृशा- वस्थायां तु दुःखमवश्यम्भावीति । विशेष:--सांसारिकजीवानां परस्परसंयोगेऽपि किञ्चिदपि प्रतिकूलाचरणेन दुःखं सदैव दृश्यते, सततं कण्ठसम्पर्कस्पृ- हयाली जने परस्पर वियुक्ते तु तद् दुःखं किमाख्यातु शक्यते, परां काष्ठां गच्छति । तथा च संयोगविप्रयोगावुभावपि दुःखकरावेवेति वरं तत् त्याग एव स्वयं कृतेत्यागे च पर सन्तोष उपजायते । तदुक्तं भत हरिणा- "अवश्यं यातारश्चिग्तरमुपित्वाऽपि विपया, वियोगे को भेद स्त्यजति न जनो यत्स्वयममून् । स्वतन्त्रा परमपरिखेदाय . गच्छन्तः मनस, १२ : स्वयं त्यक्ता ह्य ते परशिवमनन्तं विदधति ॥" [ वैराग्यशतके ) एवं च सम्प्रत्यपि कोशाकारणात् अन्यप्रियजनविप्र- योगकारणाच ते मनसि यद् दुःखं विद्यते, तन्मोहादेव, तेषु या तव प्रियत्वभावना सा मिथ्या, यतस्तेषां संयोगावस्थाया मपि त्वया दुःखमेवाऽनुभूतं स्यात् , अत: सर्वथादुःखदाय्ययं मोह स्त्याज्य एव, तदैव सन्तोषसुखमुदेष्यतीति भावः ॥३॥ अथ स गुरुसन्निकर्षादात्मनः कृतकृत्यता दर्शयति-. धन्यं मन्ये मुनिपरिवढात्मानमेनं किलाद्या- निन्द्य सद्यः परमसुखदं यन्नतं वः पदाव्जम् । पीत्वा हृद्यां विशदहृदयो देशनां सोऽपि सूरेः, प्रीतः प्रीतिप्रमुखवचनं स्वागतं व्याजहार ॥४॥ अन्वयः- 'पुरेः हृद्यां देशनां पीत्वा विशदहृदयः प्रीतः सः अपि प्रीतिप्राप्नुखवचनं स्वागतं (एवं) व्याजहार हे मुनिपरिवृढ ! अद्य एनम् आत्मानम् धन्यं मन्ये किल, यंत् अनिन्धं सद्यः परमसुखदं वः पदाब्जम् नतम् इत्यन्वयः । व्याख्या:-सूरे:--माढरगोत्रीयस्थविर श्रीसम्भूति- विजयाभिधगुरोराचार्यस्य हृद्यां हृदयस्य प्रियां "हृद्यपद्य -
१३
(७-२-११]" इति यः, "हृदयस्य हृल्लास लेखाण्ये |३-२-
६४]" इति हृदादेशः, देशनां देशयति प्रापयति निर्मलं
ज्ञानमनया इत्यर्थे "णिवत्त्यास श्रन्थघट्टबन्देरनः [५-३-
१११] इति अन स्त्रियां देशना उपदेशवाक् तां पोत्वा
सोत्कण्ठं श्रुत्वा हृदि संधार्य च, विशदहृदयः विशदं
विमलं हृदयम् अन्तःकरणं यस्य सः, प्रीतः तृप्तः प्रींगशु
तृप्तिकान्त्योः इत्यकर्मकात् प्रीणातेः कर्तरि क्तः, प्रीति-
प्रमुखवचन प्रीतिः स्वतृप्तिरेव प्रमुखम् प्रधानं यत्र तादृश
वचनं वाक्यं स्वागतम् सुष्टु शोभनम् आगतम् आगमनं
यथा स्यात् तथा, आङ् पूर्वकाद् गमे भवे क्लीवे क्तः
क्रियाविशेषणमिदम् (एवं) व्याजहार उवाच । हे
मुनिपरिवढ ! मन्यन्ते आत्मानं जानन्ति इति मुनयः
"मनेरुदेतौचास्य वा [उणा० ६१२]" इति मनेरिः, तेपा
परिश्रृढः परिवृहति परिवर्हति वा इत्यर्थे "क्षुग्धविरिब्ध०
[४-४-७०]" इति निपातनात् साधुः, प्रभुः तत् सम्बोधनम्
हे मुनिपरिवृढ १ अध अस्मिन् दिने एनं प्रत्यक्षस्थितम्
आत्मानं माम् धन्यं धनलब्धारं सौभाग्य युक्तं मन्ये
अवगच्छामि किल निश्चितम्, यत् यस्मात् अनिन्ध
निन्दाऽनह प्रशस्यम् सद्यः परमसुखदं तत्कालमेव परमा-
नन्दाधायकम् वः युष्माकं पदाब्जम् पदं चरण एवं
अम्जम् वारिसमुद्भूतं कमलम् नतम् वन्दितम् (अस्ति)।
१४ विशेषः-यद्यपि यः कापि गच्छति, तदागमनं तत्र स्थितेन प्रशस्यत इति स्वागतव्यवहार, परमयं गुरुसमीप- प्राप्तिमात्मनः स्वयमेव प्रशंसन् स्वस्य गुरुपाद नतिलामेन धन्यत्वं प्रकटयामास । मेघदते चतुर्थपद्यस्य चतुर्थः पादोऽत्र समस्यया पूरितः । तत्र च यक्षो मेघस्य स्वागतमाह । प्रीति- प्रमुखवचन मिति पदं च स्वागतमित्यस्यैव विशेषणम् । किन्त्विह प्रकृतोपयोगितया तदेव पदं विशेष्यतया प्राधान्येन व्याख्यातम् ॥ ४॥ - आत्मनो दैन्यं प्रकटयति- कामान्धोऽहं तदिह बहुधा कर्म मोहादकार्ष, जानात्यन्यो न हि जिनपते यद विपाकं मुनीश !! यावज्जैनी वचनरचनां वा न विन्दन्ति तावत्, कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाऽचेतनेषु ॥५॥ - अन्वयः- N 'हे मुनीश ! कामान्धः अहम् यद् विपाक जिन पतेः अन्यः न हि जानाति तत् कर्म मोहान् बहुधा अकार्षम् , वा कामार्ताः यावत् जैनी वचनरचना न विन्दन्ति तावत् चेतना चेतनेषु प्रकृतिकृपणाः (भवन्ति) हि' इत्यन्वयः ।
१५
व्याख्या:
हे मुनीश ! मुनीनां तत्वबोधशीलानां यतीनाम् ईशः
प्रभुः तत्सम्बोधनम्, कामान्धः कामेन विषयाभिलपेण
अन्धः दृष्टिविकलः कर्तव्याकर्तव्यदर्शनहीनः अहं स्थूलभद्रः,
यदिपाकं यस्य कर्मणः विपाकं परिणामं जिनपतेः जिना-
नाम् इन्द्रियविजयशीलानां पतिः प्रधानं तस्मात् अन्यः भिन्नः
जनः न जानाति वेत्ति, तत् कर्म तादृशं कृत्यं मोहात्
मनसो वैकृतात बहुधा बहुभिः प्रकारैः अकार्षम् कृतवान्
अस्मि । विषयेऽत्र पक्षान्तरमुपन्यस्यन् ममर्थयति वा अथवा
कामार्ताः विषयाभिलाषेण अतिपीडिता जनाः यावत् यत्
कालपर्यन्तं जैनीम जिनस्य भगवतोऽहंतः इयं जैनी तां
वचनरचनां उपदेशवाक् प्रवृत्ति न विन्दन्ति गुरुमुखात् न
लभन्ते तावत् चेतनाचेतनेषु चेतयन्ते स्वज्ञानानुरूपं चेष्टन्ते
इति चेतनाः जङ्गमाः, अचेतनाश्च तद्मिन्ना जडाः तेषु मध्ये
प्रकृतिकृपणाः प्रकृत्या स्वभावत एव कृपणाः दीनाः
भवन्ति इति नायं मदीय एव दोषः जिनोपदेशश्रवण हीनाः
सर्व एव मादृशा एवं कर्तव्याकर्तव्यज्ञानशून्याः सन्तो बहु-
विधानि अज्ञात-विपाकानि कर्माण्याचरन्त्येव । तथा च
गुरुणा तथा जिनोपदेशदानेन कृतार्थनीयोऽस्मि यथा पुनरेवं
विकर्मासक्तो न भवेयमित्याकूतम् ।
-
१६ विशेष:-मोहवशाद् बहुधा विरुद्धाचरणोऽहं तद् विपाकानभिज्ञो भीतश्व त्वच्छरणं प्रपन्नोऽस्मि । कामा नां चेशी स्थिति रुपपन्नैव । जिनोपदेशज्ञानाभावरूप सामा- न्यकारणेन स्वापराधः समर्थित इत्यर्थान्तरन्यासालङ्कारः । मेघदूते पञ्चमपद्यचतुर्थचरणसमस्यापूर्तिरियम् । तत्र च यक्ष- स्याचेतन मेघप्रार्थनायां प्रवृत्तिरनेन चरणेन समर्थिता, अत्रापि स्वपापाचरणं यथा कथंचित् समर्थितमेवेति विज्ञेयम् । 'हि' इति पदं प्रकृते पादपूरणमात्रप्रयोजनम् इति प्रतिभाति ॥ ५ ॥ गुरु स्तुवन् प्रार्थयते- जाने युष्मान् जिनपतिसमान ज्ञानदानप्रवीणान्, रीणोऽमुष्मादनणुभवतो . भावविषिजेतृन् । याचे तस्माचरणशरणं वः शरण्या ! रणनं, याचा मोघा वरमधिगुणे नाऽऽधमे लब्धकामा॥६॥ ३ 4 , अन्वयः 'अमुष्माद् भवतः अनणु रीणा (अहं) युष्मान् जिनपति समान ज्ञानदानप्रवीणान् भावविद्वेपिजेतृन जाने, तस्मात् हे शरणया: ! रणनं वः चरणशरणं याचेः अधिगुणे याचा मोवा वरम् अधमे लब्धकामा न (वरम्) इत्यन्वयः ।
१७ - व्याख्या- अमुष्मात् विप्रकृष्टात् परस्मादिति यावत् भवतः संसारा लोकाद् वा अनणु अत्यन्तं रीणः रीङ्च् स्रवणे, इत्यस्मात् क्तः सूयत्यादित्वात् तस्य नः सुतः च्युत इत्यर्थः अहं युष्मान् भवतः जिनपतिसमान जिनानां पतिः जिनपतिः तेन समान सदृशान् ज्ञानदानप्रवीणान् ज्ञानस्य सम्यक्- त्वस्य दाने वितरणे उपदेशे प्रवीणान् निपुणान् भाववि- विजेतृन भावः अर्हत्सु श्रद्धारूपेऽभिप्रायः तस्य विद्वेषिणः विरुद्धा रागादयः तेषां जेतॄन् जयशीलान जाने अव- गच्छामि, तस्मात् पूर्वोक्तपरिचयात् कारणात् हे शरण्याः ? शरणे रक्षणे साधवः शरणाय हिताः इति वा शरण्याः ! शरणं गृहरक्षित्रोः इति विश्वः, रणघ्नं संसारोरण इव तस्य नाशकम् वः युष्माकं चरणशरणम् चरणयोः पादयोः शरणम् आश्रयं याचे प्रार्थये प्रार्थनाया औचित्यं समर्थयति- अंधिगुणे स्वाधिकगुणवति पुसि याच्जा प्रार्थना मोघा निष्फला वरम् ईपत्प्रियम्, अधमे स्वतो हीने पुसि (याच्जा) लव्धकामा प्राप्तसमीहितफलापि न (वरम्) ईपप्रियमपि न भवति ।। विशेषः-अत्र शरणप्रार्थनाया विशेषरूपायाः सामान्य- रूपेण अधिकगुणे प्रार्थनाया औचित्येन समर्थनमित्यर्था- १६ 8 न्तरन्यासोऽलङ्कारः। मेघदूतेऽप्ययं चरणो यक्षस्य मेघप्रार्थ- नाया औचित्यसमर्थनायोपात्त इति साम्यमेव ॥ ६ ॥ अथास्य दीक्षालाभं गुर्वादेशाद् विहारं चाह- कृत्वा लोचं शिरसि सहसा पञ्चभिमुष्टिभिः स्वै- लात्वा दीक्षां गुरुवचनतः सैष शिक्षामवेत्य ॥ गुर्वा देशादथ : निजपुरीमागमत्तां यति · र्या, बाह्योद्यानस्थितहरशिवश्चन्द्रिकाधौत हा ॥४॥ अन्वयः- 'सः एषः गुरुवचनतः स्वैः पञ्चभिः मुष्टिमिः शिरसि लोचं कृत्वा, दीक्षा लात्वा, शिक्षाम् अवेत्य, अथ यतिः गुर्वादेशात् तां निजपुरीम् आगमत्, या बाह्योद्यानस्थित हरशिरश्चन्द्रिका धौतहा' इत्यन्वयः। - - - - व्याख्या- सः पूर्वप्रकान्तः एषः श्रीस्थूलभद्राभिधो मुनिवरः गुरुवचनतः गुरोः स्थविरश्रीसम्भूतिविजयस्य . वचनतः वाक्यात् गुरूपदेशादित्यर्थः, स्वैः स्वकीयैः पञ्चभिः पञ्च संख्याकैः मुष्टिभिः शिरसि शिरःस्थितकेश विषये लोचं लुञ्चनं दीक्षापूर्वकालविधेयं कृत्वा सम्पाद्य, दीक्षां चारित्रं व्रतसंग्रा 'दीक्षातु व्रतसंग्रहः इति हैम:' लात्वा आदाय शिक्षाम् कर्तव्यज्ञानं अवेत्य - अधिगत्य, अथ तदनन्तरं . -- यतिः यतते मोक्षाय, गच्छत्युपरमति सर्वसङ्ग भ्य इति वा यतिः मुमुक्षुः संयमी वा सः, पूर्वत्र पक्षे यतेः (यत धातोः) "पद पठ० [उणा०६०७]" इति इ., परत्र पक्ष यमेः बाहु- लकात् कर्तरि नाम्नि क्तिः, गुर्वादेशात गुरोराज्ञया (चातु- र्मास्याम्) तां पूर्वज्ञातां निजपुरीम् स्वनगरी पाटलीपुत्रा- भिधां आगमत् पुनरावृत्तः, या पुरी बाह्योद्यानस्थितहर- शिरश्चन्द्रिकाधौतहा बाह्योद्याने पुराद् बहिः स्थिते उपवने, स्थितानि हरशिरश्चन्द्रिकावत् शिवललाटस्थितशशि कौमुदीवत् धौतानि उज्ज्वलानि हाणि धनिकगृहाणि- हरंति मनांसि जनानाम् इति विग्रहे "शिकया स्याटय [उणा० ३६४]" इति ये निपातनम्, 'हयंतु धनिनां गृहम् इति हैम:' यस्यां तादृशी (अस्ति) । विशेषः-दीक्षितः शिक्षितश्च श्रीस्थूलभद्रमुनिवरः कति- चिन् मासान् गुरुसमीप एवातिवाह्य प्रव्रज्यां पालयामास । अथागते कदाचिद् वर्षासमये स्वनिग्रहपरीक्षार्थ गुरुमुपेत्य न त्वैवमुवाच- "हे पूज्य ! गुरुवर्य ! कोशावेश्या गृहे या विचित्रकामशास्त्रोक्तकरणालेख्यवती चित्रशालास्ति, तत्र कृततपः कर्मविशेषः षड्रसान् भुजानश्चतुरी मासानहं स्था- स्यामीत्यभिग्रहो मे" इति । गुरुरपि ज्ञानदृष्टया तं तद् योग्यं मत्वा तत्र गन्तुमादि- देशेति कथा परिशिष्टपर्वणि समायाता । तदनुसारमेव कोशा- 1 २० 1 गृहे स्थित्यर्थमयं श्रीपाटलिपुत्रनगरमागमत् इतीह पद्ये प्रति पादितम् । मेघद्ते पूर्वमेघे सप्तमपद्यस्य चतुर्थचरणस्य समस्यापूर्तिरियम् । तत्र च 'बाघोद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रका- धौतहा' इति पदमलकापुरी विशेषणमिह च पाटलीपुत्र- नगरस्य पुष्पपुर्या वा । अलकापुरी च बाह्योद्याने स्थितस्य हरस्य शिरसि स्थितया चन्द्रिकया सद्य एव धौतहा उज्ज्वली कृत गृहास्ति, अलकाबहिरुपवने, कुबेरप्रार्थनया कञ्चित् कालं शिवनिवासस्य पुराणप्रसिद्धेः । पुष्पपुरीविषये तु बाह्योद्यानस्थितपदं पृथगेव हय॑विशेषणं हरशिरश्चन्द्रि- कापदं च श्रौतविशेषणतामनुभूय तद् द्वारा हर्म्यविशेषण- मिति भेदः ॥ ७॥ अथ श्रीस्थूलभद्रप्रव्रज्यानन्तरं कोशावृत्तान्तं संक्षेपेणाह- कोशा शस्यप्रकृतिरथ सा स्वप्रियं चाऽनुयान्ती, दध्यावेवं विविधवचनैरम्बया संनिषिद्धा । तिष्ठेत् का हा ! स्वगृह इह हि प्रोषिते प्राणनाथे ? न स्यादन्योऽप्यहमिव जनो यः पराधीनवृत्तिः॥८॥ अन्वयः- 'अथ शस्यप्रकृतिः कोशा स्वप्रियम् अनुयान्ती अम्बया विविधवचनैः सन्निषिद्धा एवं दध्यौ, प्राणनाथे ! प्रोषिते इह न - 1 । ।
२१ स्वगृहे का तिप्ठेत, यः अन्य अपि जनः अहम् इव पराधीन- वृत्तिः न स्यात्' इत्यन्वयः । - . व्याख्या- अथ श्रीस्थूलभद्रप्रव्रज्यानन्तरम् , शस्यप्रकृतिः शस्या प्रशंसनीया प्रकृतिः स्वभावमर्यादा यस्याः तादृशी कोशा एतन्नाम्ना प्रसिद्धा पुष्पपुरीवारनारी आसीत्, सा स्वप्रियम स्वस्नेहास्पदम् श्रीस्थूलभद्रम् अनुयान्ती पश्चाद् गन्तु प्रयस्यन्ती अम्बया मात्रा विविधवचनैः बहुविधदोषदर्शन- वेश्याजननीतिविरोधप्रदर्शनादिपरै चोमिः संनिषिद्धा निवारिता एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण दध्यौ अनुशुशोच-प्राण- नाये ? हे प्रियतमे ! प्रोषिते प्रवासं गते सति इह संसारे स्वगृहे स्वीये आगारे का नारी तिष्ठेत् स्थितिं विदध्यात्, यः अन्यः मदतिरिक्तः अपि जन: लोकः अहम् इव मत् सदृशः पराधीनवृत्तिः परस्य मात्रादे गुरुजनस्य अधीना आयत्ता वृत्तिः आचारः यस्य तादृशः नस्यात् न भवेत् । स्वतन्त्रस्तु नैवं कुर्यादिति भावः ।। विशेषः-अत्र मूलपुस्तके तृतीयचरणे 'तिष्ठेत् को हा' इत्येवं पाठः समुपलभ्यते, परन्तु 'प्रोषिते प्राणनाथे' इत्युक्ते- ऽवश्यमिदं स्त्रीवचनमिति निश्चिते स्त्रीलिङ्ग नैव निर्देशो युक्त इति 'तिष्ठेत् का हा' इति पाठः कल्पितः ।।
२२
.
.
4
न
अत्र स्वतन्त्रस्यैवमाचरणं न युक्तमित्ययमों विशेष-
रूपः पराधीनवृत्तेरेव अनभिमताचरणसमर्थनेन समर्थित
इत्यर्थान्तरन्यासालङ्कारः। सल्लक्षणं च-
"कार्यकारणसामान्य-विशेषाणां परस्परम् ।
समर्थनं यत्र सोऽर्था-न्तरन्यास उदाहृतः ।।" इति ।
एवमेव मेघदूतस्याष्टमपद्यचतुर्थचरणस्यापि व्या-
ख्येति सामान्यम् । तत्र च यक्षेण स्वप्रियायाः' प्रावृषि
त्यागोऽनेन चरणेन समर्थितः । अत्र चास्यार्थस्य स्त्रीपुरुष-
साधारण्येन कथनात् जन इति पुलिङ्गन निर्देशेऽपि न
पूर्वचरणविरोध इति विभावनीयम् । यदा श्रीस्थूलभद्रो
वैराग्यात् कोशां त्यक्त्वा प्रवजितस्तदैव साऽपि गृहत्यागाय
प्रस्तुता परन्तु अम्बया निषिद्धा त्यक्तुमनीशा एवं शुशोचेति
१
भावः॥८॥
सम्प्रति पुनरागच्छन्तं श्रीस्थूलभद्रमुनिवरं विलोक्य
तद् व्यवहारमाह
प्राप्त दारि प्रियतममथो वीक्ष्य सोचे प्रमोदा-
देवोत्तुङ्ग भज -निजगृहस्यैनमग्र्यं गवाक्षम् ।
स्निग्धच्छायं घनमिव जनानन्दनं यत्र संस्थं,
सेविष्यन्ते नयनसुभगं खे भवन्तं बलाकाः ॥६॥
२३ - अन्वयः - 'अथो द्वारि प्राप्तं प्रियतमं वीक्ष्य प्रमोदात् ऊचे, देव ! निजगृहस्य उत्तुङ्गम् अग्र्यम् एनम् गवाक्षम् भज, यत्र संस्थं स्निग्धच्छायं जना नन्दनं नयनसुभगं भवन्तं घनमिव खे बलाकाः सेविष्यन्ते' इत्यन्वयः । व्याख्या- • अयो बहुकालप्रवासानन्तरं द्वारि गृहायप्रदेशे प्राप्त समागतं प्रियतमं अतिशयप्रियं (श्री स्थूलभद्रं ) वीक्ष्य विशेषेणावलोक्य प्रमोदात् हर्षात् सा कोशाभिधा वेश्या ऊचे वक्ष्यमाण प्रकारेणावदत्-हे देव ! अनेकविधक्रीडा- कारिन् ? निजगृहस्य स्वावासभूतस्यास्य मम प्रासादस्य उत्तुङ्ग उच्चैरुन्नतं अग्र्यं अग्रतः स्थित एनम् अङ्गुल्या निर्देश्यमानं गवाक्षम् वातायनस्थानं चित्रशालाख्यं भज निर्विशः यत्र गवाक्षे संस्थं सम्यक् वर्तमान (स्थितं ) स्निग्धच्छायं स्निह्यते स्म इति स्निग्धा स्पृहणीया छाया कान्तिः यस्य तादृशं जनानन्दनं जनान् सर्वलोकान् आन- न्दयति" सुखयतीति तं, नयनसुभगं नयनयोः नेत्रयोः कृते सुभगं प्रियम् भवन्तं त्वां घनमिव मेघबुद्धय च ( मेघस्यापि प्रोक्तविशेषण त्रय विशिष्टत्वात् ) रवे आकाशे (स्थिताः इति , शेषः ) बलाकाः चकाङ्गना सेविष्यन्ते सस्पृहमालोकयिष्यन्ति । वलाकाः मेघ दृष्ट्वा खे उड्डीयमाना २४ -- गर्भ दधत इति मेघस्तत् प्रियः इति मेघसदृशं भवन्तं दृष्ट्वा तद् बुद्धयैव भवन्तमपि सेविष्यन्त इति तात्पर्यम् ।। विशेष:-अयं श्रीस्थूलभद्रमुनिवर स्वाभिग्रहपालनार्थ- मेवेहागत इति सा न जानाति स एवायम्पुनर्मद्गुणाकृष्टः समागत इति बुद्धथा व्यवहरति । अत्रत्य चतुर्थश्चरणो मेघदूत नवमपद्ये निविष्ट इति, किश्चिद् वैपरीत्यं दृश्यते । अत्र च बलाकानां तत् सेवाकथनव्याजेन अहमेव त्वां साभिलाषं परिचरिष्यामीति व्यज्यते ॥९॥ तव विरहेऽप्यहं कथं जीवन्ती तिष्ठामीत्याह- अद्य श्वो वा सखि ! तव वरः स्थूलभद्रः समेता, स्वस्थं तस्मात् कुरु निजमनो मुश्च मुग्धे ! विषादम्। दः प्राणानहमिति सखीभाषितैर्नाथ ! वाऽऽशा, सद्यः पाति प्रणयिहृदयं विप्रयोगे रुणद्धिः ॥१०॥ अन्वय-'हे सखि ! तव वरः स्थूलभद्रा अद्यः श्वः वा समेता, तस्मात् निज मनः, स्वस्थं कुरु, हे मुग्धे ! विषादम् मुश्च इति सखी भाषितैः हे नाथ ! अहं प्राणान् दधे, वा आशा विप्रयोगे सद्यः पाति प्रणयिहृदयं रुणद्धि इत्यन्वयः। व्याख्या हे सखि ! समानसुखदुःखे ! तव भवत्या वरः प्रियः स्थूलभद्रः अद्य अस्मिन्नेव दिवसे श्वः अग्रिमेऽव्यवहितदिने २५ . वा समेता समागन्ता तस्मात् ( तावत् ) [ अतः तद् वियोगदुःस्थं ] निज मनः चेतः स्वस्थं स्वस्मिन् स्वीय- प्रकृतौ तिष्ठति इति स्वस्थम्-अव्याकुलं कुरु विधेहि, हे मुग्धे ! सरलहृदये विषादम् खेदं मुञ्च परित्यज इति पूर्वोक्तरूपैः सखीभाषितैः समानवयस्कहितेच्छुजनवचनैः हे नाथ ! स्वामिन् अहं तव प्रिया प्राणान् जीवितम् दधे धृतवती। पक्षान्तरोत्थापनपूर्वकं प्राणधारणं समर्थयति-वा अथवा आशा पुनः सङ्गमसम्भावना विप्रयोगे प्रियजन- विच्छेदे सद्यः पाति विच्छेदसमकालमेव पतनशीलं प्रणयिहृदयं प्रणयिनः प्रियजनविप्रयुक्तस्य स्निग्धजनस्य हृदयं जीवनचिह्नभूतमन्तःकरणं रुणद्धि पतनान्निवारयति । विशेषः-त्वद् विरहे जात एव प्राणत्यागपराहं कथमपि सखीमिः पुनः समागमाशया वारिता, पुनः समागमाशैव प्रणयिजनं विरहेऽपि जीवनाय प्रेरयतीति भावः । अत्रापि अर्थान्तरन्यास एवालङ्कारः, स्वप्राणधारणरूपो विशेषोऽर्थः आशयाऽन्येपि जीवन्तीति सामान्येनार्थेन समर्थितः । अत्रत्य चतुर्थपादः मेघदूते नवमे पद्ये चतुर्थपादत्वेन दृष्टः । अर्था- नुसारमिह दशमे पूरितः ॥ १०॥ अथ स्वाभिप्रायानुसारं कोशावेश्या श्रीस्थूलभद्रमुनिवरं भोगेषु प्रेरयति- + २६ - स्वामिन्नङ्गीकुरु परिचितं स्वाधिकारं पुनस्तं, भोगान भुत्व प्रिय ! सह मया साधुवेषं विहाय। दोलाकेलिं किल कलयतः कौतुकात् काननान्तः, सम्पत्स्यन्ते नभसि भवतो राजहंसाःसहायाः॥११॥ अन्वय- हे स्वामिन् ! परिचितं तं स्वाधिकारं पुनः अङ्गीकुरु, हे प्रिय ! साधुवेषं विहाय मया सह भोगान् भुक्ष्व, कौतुकात् काननान्तः दोलाकेलिं कलयतः भवतः नभसि राजहंसाः सहायाः संपत्स्यन्ते' इत्यन्वयः । व्याख्या- हे स्वामिन् ! स्वम् अस्ति अस्येत्यर्थे "स्वामिन्नीशे [७-२-४६ ]" इति निपातनात् साधुः, नाथ ! परिचितं पूर्वपुरुषानुक्रमादागतत्वेन विज्ञातपूर्वम् तं प्रसिद्धं स्वाधिकार मन्त्रित्वनियोगं पुनः भूयः अङ्गीकुरु स्वीकुरु हे प्रिय ! प्रीणातीति प्रियः, प्रीधातोः “नाम्युपान्त्यप्रीकृगज्ञः कः [५-४-५४ ]" इति के साधुः तत् सम्बोधनम् मनोज्ञ, साधुवेषं यतिस्वरूपं विहाय परित्यज्य मया तब प्रियया सह साकं भोगान् भुज्यन्ते इति भोगाः, भुजेः कर्मणि घञ्, स्रक्चन्दनादिविषयाः तान् भुझ्व उपयुज्यस्व, कौतुकात् उत्कण्ठातः काननान्तः उपवनमध्ये दोलाकेलिं - , २७ . दोलायां प्रेखोलायाम् (उपविश्य) केलि क्रीडा दोलाकेलि: तां कलयतः विदधतः भवतः तव नभसि गगने श्रावण- मासे च (श्रावणे दोलाकेलेरतिप्रसिद्धेः) राजहंसाः हंसानां राजानो राजहंसाः, षष्ठी समासे "राजदन्तादिपु [३-१- १४९ ]" इति पूर्वनिपाताहस्य परप्रयोगात् राजहंसाः इति, 'राजहंसास्त्वमी चञ्चुचरणैरतिलोहितैः' इति श्रीहैमाभिधान- चिन्तामणिकोशवचनात अतिलोहितैश्चञ्चु चरणलक्षिता हंस- जातीयाः पक्षिणो राजहंसा इत्युच्यन्ते, ते सहायाः सह अयंते गच्छन्तीति सहाया अनुगामिनः सेवका वा। 'सहायोऽभिचरोऽनोश्च, जीवी-गामी-चर-प्लवाः ।' सेवकोऽथ सेवा भक्तिः, परिचर्या प्रसादना ॥' [इति श्रीहैमाभिधानचिन्तामणिकोशे मर्त्यकाण्डे 3, श्लो० ४९६] सम्पत्स्यन्ते भविष्यन्ति । विशेष:- अयमनुशयादेव पुनर्मत्समीपमागत इति स्वाशयं निनुवाना; मत्प्ररोचनादेव यतिनियमत्यागः क्रियतामिति प्रकटयन्ती सा मन्त्रिपदस्यीकारपूर्वकं स्वानुकूले सहक्रीडादौ तं प्रेरयति । मेघदूतस्य एकादशे पद्ये चतुर्थ चरणोऽयं मेघ- स्योत्तरी दिशम्प्रति गच्छतो मानससरोक्रमभिलक्ष्योड्डीय- माना राजहंसाः सह यात्रिणो भविष्यन्तीति भावेन प्रयुक्तः । + २८ इहापि दोलया केलि कुर्वाणस्य श्रावणे मासि जलाशयानां पङ्किलत्वात् प्राय आकाशे स्थले च रममाणा राजहंसा अपि दोलाकेलौ सेवका इव भविष्यन्ति भवत इति प्ररोचयति ॥११॥ पुनरपि बहुजनस्नेहप्रकटनेन साधुवेषत्यागाय यतते- पश्य स्वामिन् ! निजपरिजनं त्वद्धियोगार्तिदीनं, हीनं स्थाने जलविरहिते मीनवत्पीनदुःखम् । त्वत्संयोगे मुदितमनसो वीक्षिता यस्य शस्या, स्नेहव्यक्तिश्विरविरहजं मुञ्चतो बाष्पमुष्णम् ॥१२॥ अन्वयः- 'हे स्वामिन् ! त्वद् वियोगार्तिदीनं हीनं निजपरिजन जलविरहिते स्थाने मीनवत् पीनदुःखं पश्य, त्वत् संयोगे मुदितमनसः यस्य चिरविरहजम् उष्णं बाष्पं मुश्चतः शस्या स्नेहव्यक्तिः वीक्षिता' इत्यन्वयः । व्याख्या- हे स्वामिन् ! नाथ ! त्ववियोगार्तिदीनं तव वियोगः विरहः त्वद्वियोगः तस्मिन् सति या आतिः पीडा तया दीनम् दुःखितम् हीनं परित्यक्तं निजपरिजनम् स्वानुचरवर्गम् जलविरहिते पानीयशून्ये स्थाने प्रदेशे मीनवत् मत्स्यतुल्यं पीनदुःखम् पीनम् पृथुलं दुःखं कष्टं यस्य तादृशम् पश्य अवलोकय, त्वत्संयोगे पुनस्त्वया
२६
सह मेलने सति मुदितमनसः प्रलनचेतसः यस्य परि-
जनस्य चिरविरहजं बहुकालवियोगसम्भवम् उष्णं दुःखो-
कात् तप्नम् पाष्पम् अन्तरूष्माणं चक्षुर्जेलं च मुञ्चतः
त्यजतः शस्या प्रशंसनीया स्नेहव्यक्तिः स्निह्यत्यनेनेति
स्नेहः प्रेम, तस्य व्यक्तिः प्राकट्यं चीक्षिता अवलोकिता ।
तथा चायमवश्यं त्वयाऽपि स्निग्धदृष्ट्याऽवलोकनीयः परिजन
इत भावः।
विशेष-
नाहमेव केवलं त्वद्वियोगपीडिता किन्तु सर्वोऽप्ययं
मदीयः परिजनोऽपि त्वदायत्तत्वात् त्वदीय एवेति सोऽपि
तथैव दुःखितः । एवं च त्वयाऽपि स स्नेहदृष्ट्या द्रष्टव्य
स्तदनुरोधेनाऽपि यति भावं विहाय नागरभावः समवलम्ब-
नीय इत्याकूतम् । मेघदूतेऽपि द्वादशश्लोकचतुर्थचरणोऽत्रत्येन
समानार्थ एव ॥ १२॥
यतिभावत्यागेऽकीर्तिसम्भावनां निरस्यति-
मा जानीष्व त्वमिति मतिमन ! संयमं मुञ्चतो मे,
नाशं यास्यत्यवनिविदिता कीतिविस्फूतिरेषा ।
सिद्धिं याता पुनरपि यथा सिन्धुपूरः प्रदानः,
क्षीणः क्षीणः परिलघु पयः स्रोतसां चोपयुज्य॥१३॥
३०
-
,
अन्वय:-
हे मतिमन् !, त्वम् संयमं मुश्चतः मे अवनिविदिता
एपा कीर्तिविस्फूर्तिः नाशं यास्यति इति मा जानीव, (यतः)
प्रदानैः पुनरपि सिद्धिं याता, यथा सिन्धुपूरः (प्रदानैः) क्षीणः
क्षीणः स्रोतसां परिलघु पयः उपयुज्य (सिद्धिं याति )
इत्यन्वयः।
व्याख्या-
हे मतिमन् ! मतिः मननशक्तिः अस्ति. अस्येति
मतिमन् तत् सम्बोधनम् , त्वं स्थूलभद्रः संयमं विषया-
भिलाषनिग्रहं मुञ्चतः परित्यजतः मे
मम
अवनिविदिता
भृतलप्रसिद्धा एषा सर्वतः श्रूयमाणा कोर्तिविस्फूतिः
कीयते जनैः पुनः पुनराख्यायते इति कीर्तिः शुभकर्मा-
नुष्ठानजं यशः, तस्या विस्फुरणं विस्फूर्तिः सर्वतो व्याप्तिः
नाशम् भ्रशं यास्यति गमिष्यति इति मा न जानीष्व
अवेहि. (यतः) प्रदानैः प्रकृष्टैबहुवित्तवितरणैः (सा कीर्ति-
विस्फूर्ति) पुनरपि भूयोऽपि सिद्धिं सम्पत्ति याता
प्राप्स्यति, यथा येन प्रकारेण सिन्धुपूरः समुद्रप्रवाहा
(प्रदानः मेघादिभ्यो जलदानः) क्षीणः क्षोणः वारंवार
हानि गतोऽपि स्रोतसां नदीप्रवाहाणं परिलघु अतितमां
गौरव (भार) हीनं पयः पानीयम् उपयुज्य स्वपूरणाय
विनियुज्य (पुनरपि सिद्धिं पूर्वावस्थासम्पत्तिं याति) यति
ग
२१ भावकीर्तिनाशेऽपि दातृभावकीया॑ वर्धिष्यसे इति भावः । विशेषः-यतिभावत्यागे कृते पूर्व गृहत्यागर्भूतायाः कीर्ते विलोप: स्यादिति त्वया न शङ्कनीयम् , यतो गृहस्थे- नापि त्वया बहुविधवित्तवितरण स्तादृश्येव कीर्तिः समर्ज- यितुं शक्यते । तथा च यथा समुद्रप्रवाहो जलक्षयेण क्षीणोऽपि पुनरपि नदीप्रवाह जलमुपयुज्य पूर्णतां याति तथैव त्वत्कीतिरपि सेत्स्यतीति भावः । उपमालङ्कारः । नदीप्रवाह- जलस्य परिलघुत्वं च वागभटेनेस्थमुक्तम्- "उपलास्फालनक्षेपविच्छेदैः खोदितोदकाः । हिमवन्मलयोद्भूताः, पथ्यानधो भवन्त्यमूः ॥” इति । अस्यार्थ:-नद्यः प्रायो हिमवतो (उत्तरतः) मलयपर्वतात् (दक्षिणतः) च प्रवहन्ति ततश्च पर्वतीयमार्गप्रवहणात् उपलेषु घातप्रतिघातैः खेदितं तासामुदकं भारराहित्यात् पथ्यतां भजत इति। मेघदूतीय त्रयोदशपद्ये च चतुर्थ चरणान्ते 'चोपभुज्य' इति पाठः समुपलभ्यते, परमर्थानुकूल्येनेत्थमपि पाठकल्पना क्षत्यभावः ॥१३॥ उक्तमेवार्थं पुनरपि द्रढयति, दानस्यापि मोक्ष- साधनत्वकथनेन- 1 ।
३२ जग्मुर्मुक्ति कति न भरताद्याः सनाऽऽराध्य दान ? भुञ्जन् भोगान सुभग ? भव तद् दानधर्मोद्यतस्त्वम् । कीर्त्या मूर्तीस्त्वमपि सितयन् स्वःश्रियां सिद्धिमेता, दिङ्नागानां पथि परिहरन् स्थूलहस्तावलेपान् ॥१४॥ अन्वयः- 'दानं सना आराध्य भारताद्याः कति मुक्ति न जग्मुः, तत् हे सुभग ! भोगान् भुञ्जन् त्वम् दानधर्मोद्यतः भव, त्वमपि पथि दिङ्नागानां मूर्तीः कीर्त्या सितयन् , स्वः श्रियां स्थूलहस्तावलेपान् परिहरन् (च) सिद्धिम् एता' इत्यन्वयः । व्याख्या- दानं वित्तवितरणं सना सर्वदा आराध्य अनुष्ठाय भरताद्याः भरतः आदितीर्थङ्कर श्रीऋषभदेवभगवतः सांसा- रिक सुतः (आर्षभि भरतः' इति हैमः) राजविशेषः आधः प्रथमो येषां ते, कति असङ्ख्याताः मुक्तिं मोक्षं न जग्मुः, काका बहवो दानधर्मेणापि मुक्ति गता एवेति भावः । तत् तस्मात् हे सुभग ! चचुष्य-सुन्दरमृर्ते ! (चक्षुष्यः सुभग' इति हैमः) भोगान् भुज्यन्ते इति भोगाः कर्मणि भुजे पञ्, स्रक्चन्दनवनितादयः, तान् भुञ्जन् उपयुञ्जानः त्वम् स्थूलभद्रः, दानधर्मोद्यतः दानं वित्तादिवितरणमेव धर्मः सुकृतम् तस्मिन् उद्यतः तत्परः भव एधि, (तेन) त्वमपि ३३ " भवानपि (भरतादिवत् ) पथि मोक्षमार्गे (गच्छन् ) दिङनागानां दिक्षु स्थिताः नागाः हस्तिनः दिङ्नागाः दिग्गजाः ते च । "ऐरावतः पुण्डरीको वामनः कुमुदोऽञ्जनः । पुष्पदन्तः सार्वभौमः, सुप्रतीकश्च दिग्गजाः ॥" इत्यभिधानचिन्तामणाचुक्तम् । तेषां मूर्तीः शरीराणि का दानधर्मप्रभवयशसा सितयन् उज्ज्वलयन, स्वाश्रिया स्वर्गशोभाभूतानां कामिनीनाम् स्थूलहस्तावलेपान स्थूलान् स्थूलवुद्धिभि रप्युपलक्ष्यान् हस्तयोः अपलेपान् क्षेपणादिप्रयोग-पुण्य जनितगर्वान् परिहरन् विफलयन् सिद्धि मुक्तिप्राप्तिम् एता गन्ता । स्वर्गसुखमपि 'अविगणय्य निर्वाणपदं यास्य- -- - . सीति भावः। 3 विशेष:- न केवलं मुनिमार्ग एव मोक्षमाधनम्, अपि तु गृहस्थोऽपि अनिषिद्धान् भोगान् भुञ्जानोऽपि सत्पात्रेषु वित्तवितरणः कैवल्यं मोक्षसुखञ्च प्राप्नोति । तथा च त्वमपि प्राप्स्यस्येचेति कष्टकरमुनिमार्गसमाश्रयणापेक्षया गृहस्थ- .. मार्गाश्रयणमेव कुरु । अन च चतुर्थश्चरणो. मेघदूतीय चतुर्दशपद्यचतुर्थचरण - ३४ J समानोऽपि अर्थे भेदं भजते । किञ्च यथा तत्र प्रकृते तदर्थः सुश्लिष्टतया घटते तथेह न घटते । तथापि पूर्वोक्त- रीत्या व्याख्यानेन नातितरामसामञ्जस्यं प्रतिभाति ॥ १४ ॥ सम्प्रति कर्तव्यं दर्शयति- स्वामिन् ! सिंहासनमनुपमं त्वं प्रसद्याश्रयेदं, नानारत्ना तिततिकृतस्फारचित्रं पवित्रम् । येन स्निग्धं वपुरुपचितां कान्तिमापत्स्यते ते, बहेणेव स्फुरितरुचिना गोपवेषस्य विष्णोः॥१५॥ अन्वयः- 'हे स्वामिन् ! त्वं प्रसद्य नानारत्नधतिततिकृतस्फार- चित्रम्, पवित्रम् अनुपमम् इदं सिंहासनम् आश्रय, येन स्निग्धं ते वपुः, गोपवेषस्य विष्णोः (वपुः) स्फुरितरुचिना वर्हेण इव उपचिता कान्तिम् आपत्स्यते' इत्यन्वयः । व्याख्या- है स्वामिन् ! मम सर्वस्वाधिपते ? त्वम् प्रसद्य प्रसाद मूरीकृत्य, नानारत्नद्युतिततिकृतस्फारचित्रम् नाना- रत्नानां बहुविधमणीनां द्युतिततिमिः कान्तिसमूहैः कृतं विहितं स्फारम् अत्यन्तं चित्रम् कन्माष, पवित्रं शुद्धम् अनुपमम् नास्ति उपभा सादृश्यं यस्य तादृशम्, इदं प्रत्यक्ष .
३५ निर्दिश्यमानम् सिंहासनम् सिंहोपलक्षितमासनम् स्वर्ण- निर्मितं नृपयोग्यमासनम् आश्रय जुषस्व येन आसनेन स्निग्धम् स्निघते स्म इति सकलजनप्रेमास्पदीभूतम्, ते तव वपुः शरीरम् गोपवेषस्य गोपालशरीरधारिणः विष्णोः श्रीकृष्णस्य (वपुः) स्फुरितरुचिना विकासिकान्तिना पहेंण मयूरपिच्छेन इव यथा उपचितां समृद्धाम् कान्तिम् कमनीयताम् आपत्स्यते प्राप्स्यति । यथा वहनिमित्तेन चित्रेणापीडेन श्रीकृष्णस्य शोभासीत् तथैव बहुरत्नचित्रितेऽस्मिन् सिंहासने समासीनस्य तवापि स्यादिति भावः। विशेषः--यद्यपि यतिभावापन्नस्य स्वर्णनिर्मिते आसने समुपवेशनमनुचितम्, तथापि यतिभावत्यागस्यैव प्रार्यमान- तया इदमपि वचनं तत्परमेव । तथा च. सिंहासनोपवेशनेन यतिभावत्यागेन सह गृहस्थतायां शोभाऽपिभाविनीति सूच्यते । मेघदूते पञ्चदशपद्ये चतुर्थचरणोऽयं समानार्थ एव तत्रापि । उपमालङ्कारः। यथा श्रीकृष्णस्य स्निग्धं वपु वहेण कान्तिमायातम्, तथा तव वपुः सिंहासनेनेति साम्यस्य विवक्षितत्वात् ॥ १५ ॥ एतावताऽप्यस्नियन्तं भूयोऽपि अभिमुखी करोति- ३६ 4 मन्ये जज्ञे. कुलिशकठिनं तावकीनं हृदेत- यस्मादस्मानपि नहि दृशा स्निग्धया पश्यसि त्वम् । पश्येयं त्वां वदति सरसं सारिका देव ! मा मा, किश्चित् पश्चाद् ब्रज लघुगतिर्भूय एवोत्तरेण ॥१६॥ अन्वंय.- 'तावकीनम् एतत् हृत् कुलिशकठिनं जज्ञे (इति) मन्ये, यस्मात् त्वम् अस्मान् अपि स्निग्धया दृशा नहिं पश्यसि, हे देव ! पश्य, इयं सारिका किश्चित् पश्चात् लघुगतिः (त्वम्) भूयः उत्तरेण एव मा मा व्रज' इति सरसं वदति, इत्यन्वयः । व्याख्या-... तावकोनम् तव इदम् युष्मद् शब्दादिदमर्थे शेष वा युष्मदस्मदो० [३-३-६७] इतीननि तवकादेशे आदि स्वरवृद्धौ च तावकीनमिति, एतत् अनुभूयमानं हृत अन्तः करणम् कुलिशकठिनम् कुलिशवत वज्रवत् कठिनं कठोरं जज्ञे जातम (इति) मन्ये उत्प्रेक्ष, यस्मात् हेतोः त्वं अस्मान पूर्व तव प्राणप्रियतया विख्यातान् तव प्रियदारान् अपि किमुतान्यं परिजनमित्यपिना व्यज्यते, स्निग्धया स्नेहाया दृशा दृष्टया नहि नैनं पश्यसि अवलोकयसि । हे देव ! सर्वविधक्रीडाभिज्ञ ! द्यतिमन् ! इति वा, पश्य अवलोकय इयं प्रत्यक्षदृश्यमाना सारिका शुकवधूः , ३७ "किञ्चित् पश्चात् स्वल्पकालानन्तरमेव लघुगति त्वरित- गमनः सन भूयः पुनः उत्तरेण एव उत्तरां दिशमाश्रित्य मा मा नैव नैव ब्रज गच्छ" (इति) सरसं सस्नेहं वदति कथयति । अस्माकं त्वयि स्नेहस्य का कथा, मदीयेयं सारि- काऽपि त्वय्येवं स्निह्यतीतिं त्वयाऽपि सर्वोऽयं परिजनः स्निग्धया घशाऽवश्यमवलोकनीय इति भावः । विशेषः-मदीया सारिकाऽपि त्वां पुनर्गेहत्यागं नेहते इति मम तु तत्र विषये कोऽभिप्राय इति विनाऽपि कथनं त्वया ज्ञातव्यमेव । एवं च कुतोऽपि कारणात् जातं हृदय- काठिन्यं परिहत्य स्नेहेन वर्तितव्यं भवतीति कोशाया आकूतम् । मेघदूने में प्रति उत्तर दिशैव गमनाय प्रयुक्तस्य पोडश- पद्यस्य चतुर्थचरणस्य समस्या पूर्तिरिय माशब्दयोजनया प्रकृते गमन-निषेधे पर्यवसानम् ॥ १६ ॥ आस्तां चेतनस्नेहकथाऽचेतनस्यापि सैव स्थितिरित्याह- बालापैस्त्वां मृगय मुदितः कोमलैः कोकिलायाः, क्रीडारामो भवदुपचितः स्वागतं पृच्छतीव । नो नीवोऽपि प्रयणनिभृते भाग्यलभ्ये चिराद्धा, प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किं पुनर्य स्तथोच्चैः? ॥१७|| - --
३८
म
-
अन्वयः-
'मुदितः भवदुपचितः क्रीडारामः कोमलैः कोकिलाया:
आलापैः त्वां स्वागतं पृच्छति इव, वा भाग्यलभ्ये प्रणय
निभृते मित्रे चिरात् प्रान्ते नीचः अपि विमुखः नो भवति,
यः तथा उच्चैः (सः) किम् पुनः" इत्यन्वयः ।
व्याख्या-
'मुदितः बहुकालानन्तरं भवदागमनं दृष्ट्वा जातहर्षः,
भवदुपचितः भवता त्वया उपचितः वृद्धि नीतः क्रीडा
रामः क्रीडार्थं निर्मित आरामः 'उपवनम् कोमलैः मृदुलैः
कोकिलायाः पिक्या आलापैः सस्वरवचनैः त्वां भवन्तं
स्वागतम् सुखपूर्वकमागमनम् (अभूनवेति !) आङ् पूर्वकाद्
गमे र्भावे क्लीबे क्तः, पृच्छति ज्ञातुमिच्छति इव इत्यु-
प्रेक्षा । तां समर्थयति-वा अथवा भाग्यलभ्ये भाग्येन
दैवानुकूल्येन लभ्ये प्राप्तव्ये प्रणयनिभृते गाढप्रेम्णा निश्चले
मित्रे सुहृदि हितकारके चिरात् बहुकालानन्तरं प्राप्ते
आगते सति, नीचः प्रकृत्या स्वरूपेण वा हीनः अपि
(जनः) विमुखः सत्कारपराङ्मुखो न भवति यः (क्रीडा
गमः) तथा तेन विज्ञातेन प्रकारेण 'उच्चैः उन्नतः (सः)
किम् पुनः विमुखो भवतीति कथं सम्भाव्यत इति भावः ।
विशेष:-अचेतनोऽपि क्रीडारामः कोकिलवाचा वदन्
तब स्वागतं पृच्छतीवेति सम्भाव्यते इति । स्वाभाविकस्य
.
३६ कोकिलवचनस्य क्रीडारामकर्तृक स्वागत प्रश्नत्वेन सम्भाव- नेति उत्प्रेक्षालङ्कारः पूर्वार्द्ध, “सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य परात्मनेति तल्लक्षणात् । प्रकृतस्य प्रकरणप्राप्तस्य वस्तुनः परात्मना अप्रकृतत्वेन सम्भावनम्-उत्प्रेक्षाऽलङ्कार इति तदर्थः । उत्तरार्द्ध च स्वागत पृच्छायाः विशेषरूपायाः सामान्यरूपेण नीचस्यापि विमुखी- भावाभावरूपेण वैधाण समर्थनमित्यर्थान्तरन्यासालङ्कारः, "सामान्यं विशेषेण विशेषस्ते न वा यदि कार्य च कारणेनेदं कार्येण च समर्थ्यते । यत्सोऽर्थान्तरन्यासः साधर्येणेतरेण वा" इति तल्लक्षणात् । सामान्यं विशेषेण, विशेषः सामान्येन, कार्य कारणेन, कारणं च कार्येण-साधम्र्येण वैधम्र्येण वा समर्थ्यते सोऽर्थान्तरन्यास नितियावत् । मेघदूतीयसप्तदशपद्यस्य चतुर्थचरणस्य समस्यापूर्ति रियम् ॥ १७ ॥ एतावताप्य स्निह्यन्तं मातृभक्त्या वन्धुमाह- दले मासान्नव किल मया मध्यमध्ये सुधीमन् ?, वृद्धिं नीतः सरसमंधुराहारयोगाद् भवान् वा । गेहस्थोऽपि प्रिय ! गुरुगुणां मातरं मानयना, सद्भावाः फलति न चिरेणोपकारो महत्सु ॥१८॥ ॥
४०
अन्वयः-
-
।
.
'हे सुधीमन् ? भवान् यया नव मामान् मध्यमध्ये
दघे, वा सरसमधुराहारयोगात् वृद्धि नीतः, हे प्रिय !
गेहस्थः एना गुरुगुणां मातरम् अपि मानय, सद्भावार्द्रः
उपकारः महत्सु न चिरेण फलति' इत्यन्वयः।
"
व्याख्या-
हे सुधीमन् ? धीरस्ति अस्येति धीमान् शोभन:
धीमान सुधीमान् तदामन्त्रणम्, भवान् स्थूलभद्रः यया
मात्रा नव मासान् मासनवकम् अभिव्याप्य 'कालाध्वनो
याप्तौ [२-२-४२]" इति द्वितीया विभक्तिः मध्यमध्ये
मध्यस्य शरीरमध्यभागस्य उदरस्य मध्ये अन्तः दन्न धृतः
वा किञ्च सरसमधुराहारयोगात रसेन आस्वादेन, अथ
च आहारपरिणामजन्येन धातुविशेषेण सह वर्तत इति सरसः
स चासौ मधुरश्चाहारः भोजनं तस्य योगात् उपयोगात् वृद्धि
शरीरसमृद्धिं नीतः प्रापितः, हे प्रिय ! प्रेमास्पदभूत !
गेहस्थः गृहे तिष्ठन् एनां पूर्वो द्दिष्टां गुरुगुणाम गुरोः ज्ञान
प्रदस्य गुणाः यस्यां ताम् मातरम् जननीम् मानयस्व
सत्कुरुष्व, सद्भावाः सद्भावेन निष्कपटाशयेन आई
सस्नेहः उपकारः महत्सु श्रेष्ठजनेषु न चिरेण शीघ्रम्
फलति प्रत्युपकाररूपेण परिणमते ।
४१ विशेषः-मातुर्महान्तमुपकारं प्रत्युपकतु मपि तव गृहे स्थिति रावश्यकीति मत्वा यावत् माताजीवति तावत् त्वया गृहेऽवश्यं स्थेयम् । अस्यार्थस्य विशेषरूपस्य, सामान्येन महत्सुकृत उपकारः शीघ्रमेव फलतीति कथनेन समर्थन- मित्यर्थान्तरन्यासोऽलङ्कारः । लक्षणन्तस्य प्रागेव प्रतिपादि- तम् । मेघदूतेऽपि समानाशयक एवायं चतुर्थः पादः सम- स्यया पूरितोत्र ॥ १८॥ इह स्थितेन त्वयाऽस्य गृहस्य शोभावृद्धिः स्यादिति प्ररोचयति- स्खय्यायाते धरणिरमणीसारशृङ्गाररूपे, प्रासादोऽयं प्रिय ! निजरुचा जेष्यति स्वर्गलोकम् । विष्वकशुद्धस्फटिकरचितस्त्विन्द्रनीलाग्रभागो, मध्ये श्यामःस्तन इव भुवःशेषविस्तारपाण्डः॥११॥ - अन्वय:- 'हे प्रिय ! धरणिरमणीसारशृङ्गाररूपे त्वयि आयाते, विष्वकशुद्धस्फटिकरचितः इन्द्रनीलाग्रभागः मध्ये श्यामः शेषविस्तारपाण्डः भुवः स्तन इव अयं प्रासादः तु निजरुचा . स्वर्गलोक जेष्यति' इत्यन्वयः । व्याख्या ४२ . . - - हे प्रिय ! प्रीतिदायक ! धरणिरमणोसारशृङ्गाररूपे धरति लोकान् इति धरणिः "ऋ स० [ उणा० ४५१]" इत्यणिः, पृथ्वी, सव रमणी, रमयति पतिम् इति ण्यन्ताद- नंटि रमणी स्त्री, तस्याः सारशृङ्गाररूपे उत्तमालङ्कारतुन्ये त्वयि भवति आयाते स्वस्मिन् प्राप्ते सति विष्वक् सर्वतः शहस्फटिकेन विमलस्फटिकोपलेन रचितः निर्मितः, इन्द्र- नीलाग्रभागः इन्द्रनीलमणिनिर्मितः अग्रभागः शिखरभागो यस्य सः, मध्ये श्यामः कृष्णवर्णः शेषविस्तारपाण्डः शेषे मध्यातिरिक्त विस्तारे परिणाहे पाण्डुः गौरवर्णः भुवः पृथिव्याः स्तनः कुच इव (प्रतीयमानः) अयम् प्रत्यक्षभूतः ) प्रासादः प्रसीदन्ति जनमनांसि अस्मिन् इत्यर्थे पनि उप- सर्गस्य दीर्धे प्रासादः अट्टः भूपगृहाकारं गृहम् , तु इति अन्य व्यवच्छेदार्थः स एवेत्यर्थः निजरुचा स्वशोभया स्वर्गलोकं दिवं जेष्यति अभिभविष्यति । विशेष:- धरणिरेव रमणीति रूपकम् , भुवः स्तन इवेति चोत्प्रेक्षा, तयोश्च परस्पर निरपेक्षत्वेन भिन्नदेशत्वेन च स्वातन्त्र्येण स्थितिरिति । मेघदूते च मेघस्य पर्वतारोहणे तस्य पर्वतस्य शोभैव मुत्प्रेक्ष्यते, अत्र च प्रासादस्य सर्वतः स्वच्छस्येन्द्रनील- शिखरस्य स्वतो भुवः स्तनत्वमुत्प्रेक्ष्यते इति भेदः ॥ 'सम्भा- - ४३ वनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य परात्मना' इति तल्लक्षणम् । प्रकृतस्य प्रासादस्य परात्मना भुवः स्तनत्वेन सम्भावना- दुत्प्रेक्षालङ्कार लक्षणसमन्वयः। धरणि रमणीत्या प्रतीय- मानस्य रूपकालङ्कारस्य लक्षणम्-'रूपकं रूपितारोपो विषये निरपह्नवे' इति । विषय भूतायां धरण्यां अनुपह्नत- रूपायां रमण्या आरोप इति लक्षणसङ्गतिः ॥१९॥ गृहसमीपस्थं विशेपं दर्शयन्ती प्ररोचयति- क्रीडाशैले कलय विपुले निराली किलता, यत्रावाभ्यां श्रमहतिकृते क्रीडितं नाथ ! पूर्वम् । यामालोक्याकलयति कलं चित्रमत्रत्यलोको, भक्तिच्छेदैरिव विरचितां भूतिमङ्गे गजस्य ॥२०॥ अन्वयः .. 'हे नाथ ! यत्र आवाम्यां श्रमहतिकृते पूर्व क्रीडितम् , (तत्र) विपुले क्रीडाशैले एतां निराली कलय किल, अत्र- त्यलोकः याम् गजस्य अङ्के भक्तिच्छेदः विरचितां भूतिम् इव आलोक्य चित्रं आकलयति' इत्यन्वयः। व्याख्या हे नाथ ! स्वामिन् !, यत्र क्रीडाशैले आवाभ्यां मया त्वया च श्रमहतिकृते श्रमस्य रतिक्रीडाजातशैथिल्यस्य ४४ इव आलोक्य हतेः नाशस्य कृते हेतोः पूर्वं त्वत प्रवजनात् प्राइसमये क्रीडितम् वित्रोदः कृतः (नत्र) विपुले विस्तृते क्रीडाशले क्रीडार्थमेव निर्मिते कृत्रिम पर्वते एतां प्रत्यक्षदृश्यमानां निर्झरालीम कृत्रिम जलप्रपातततिम् कलय अवलोकय किल निश्चयेन, अत्यलोक इहस्थजनसमूहः याम निर्भरालीम् गजस्य करिणः अङ्गे शरीरे भक्तिच्छैदेः भक्तीनां रचना रेखाणां ("भक्तिनिषेत्रणे भागे रचनायाम्' इति शब्दार्णवः) छेदैः विभागैः विरचिताम् निर्मिताम् भूतिं शृङ्गारम् ('भूतिर्मातङ्गशृङ्गारे जातौ भस्मनि सम्पदि" इति विश्वा) दृष्ट्वा चित्रं आश्चर्यम् आकलयति प्राप्नोति । विशेषः- यथा गजस्य शरीरे रेखाभिः शृङ्गार रचना भवति तथैव गजोपमस्य क्रीडाशैलस्योपरि श्वेताः पानीयधारा: प्रवहन्तीति लोकश्चित्रीयते इति भावः। अत्र क्रीडाशैलस्यो- पमानं गजः, निराल्या उपमानं भूतिरिति पूर्णोपमालङ्कारः। अत्रत्यश्चतुर्थचरणः समानार्थ एव मेघदूतेऽपि दृश्यते ॥२०॥ अथ धनेनापि प्रलोभयति- मा मुञ्चेदं धनमनिधनं नाथ ! सम्पूरिताशं, सर्वं चैनं निजपरिजनं त्वय्यतिस्नेहयुक्तम् ।
४५ नीतिज्ञोऽपि प्रथितमहिमन ! वेत्सि नैतत्कथं यत् ? रिक्तः सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय ॥२१॥ - 'हे नाथ ! स्वामिन् ! अनिधनम् सम्पूरिताशम् इदं धनम् , त्वयि अतिस्नेहयुक्तं सर्वम् एनं निजपरिजनं च मा मुश्च । हे प्रथित महिमन् ! नीतिज्ञः अपि एतत् कथं न वेत्सि यत्-सर्वः रिक्तः लघुः भवति, हि पूर्णता गौरवाय (भवति), इत्यन्वयः । व्याख्या- हे नाथ ! स्वामिन् ! अनिधनम् नास्ति निधन विनाशः समाप्ति यं यस्य तादृशं कियताऽपि व्ययेन न क्षयणीयम् , सम्पूरिताशम् सम्पूरिताः सम्यक सम्पादिता आशाः अमिलापाः येन तादृशम् इदं प्रत्यक्षवत्तिं धनं वित्तम् , त्वयि भवति अतिस्नेहयुक्तम् अतिशयितेन स्नेहेन प्रेम्णा युक्तम् , सर्वम् अखिलम् एनम् पूर्वमपि चर्चितम् प्रत्यक्षतोऽमितो दृश्यमानम् निजपरिजनं स्व- सेवकपरिवारम् च मा मुञ्च न परित्यज । उक्तमर्थ समर्थ- यितुमाह-हे प्रथितमहिमन ! प्रथितो विख्यातो महिमा माहात्म्यं यस्य सः तदामन्त्रगम् , नोतिज्ञः सर्वविध लोक- नयाभिज्ञः ( सन् ) अपि एतत् अग्रे कथ्यमानम् कथं कुतो हेतोः न वेत्सि न जानासि यत् , रिक्ता धनादिरहितः - 7
४६
सर्वः जनः लघुः जनैरनायासेनोत्तोन्यः अनादरणीय इति
यावत् भवति जायते, हि यतः पूर्णता वित्तादिभावत्वं
गौरवाय अनुत्तोल्यतायै अनभिभवाय वा (भवति) तथा च
धनहीनस्य कस्यापि गौरवं न भवतीति गौरव रक्षणाय
धनत्यागो नोचित इति विशकलिताभिप्रायः ॥
विशेषः
इदं मदीयं त्वदीयं च सर्व त्वदीयमेवेति मिलित्वा सर्व-
मिदमक्षयं धनम् , अतिशयस्नेहभाजनमयं स्वीयः परिजनश्च
कथमपि न त्याज्यः। यतो धनेन सर्वाशापूर्तिः सम्भा-
व्यते, परिजनेन च सर्वविधसाहित्य सम्पत्स्यते । धनहीनो
जनो लोके लाघवं भजत इति विशेषरूपोऽर्थः सामान्येन
रिक्सस्य लघुत्वकथनेन समर्थित इत्यर्थान्तर न्यासोऽलङ्कारः।
लक्षणमुक्तं प्राक् । मेघदूतेऽपि समानार्थ एवायं चतुर्थः पादो
मेघस्य जलानाहरणे वायूद्भूतत्व सम्भावना समर्थना-
योक्तः ॥ २१॥
न केवलं गृहे वास एवावश्यकोऽपि तु मन्त्रित्वाधिकार
स्वीकारोऽपि पिच्य इत्याह-
व्यापार मा परिहर वर ! त्वं नृपश्रीशमं तं,
प्राप्य क्लेशोपममिममहो ! संयम मन्त्रिपुत्र ।।
मुञ्चेचिन्तामणिमिह हि कः काचमादाय यस्मिन् ?
सारङ्गास्ते जललवमुचः सूचयिष्यन्ति मार्गम् ॥२२॥
. - अन्या- 'हे वर ! मन्त्रिपुत्र ! त्वम् इमम् क्लेशोपमं संयम प्राप्य, नृपश्रीशमं तं व्यापार मा परिहर, यस्मिन् जललव- मुचः सारङ्गाः ते मार्गम् सूचयिष्यन्ति, हि इह काचम् आदाय चिन्तामणिम् का मुञ्चेत्' इत्यन्वयः । व्याख्या- हे वर ! सर्व वरणीय ! श्रेष्ठ ! मन्त्रिपुत्र ! मन्त्रिण: नन्दराजसचिवस्य शकटालस्य पुत्रः सुतः तदामन्त्रणम् , त्वम् भवान् इमम् प्रत्यक्षवर्तमानम् क्लेशोपमम् क्लिश्यते दूयते अस्मिन् इति क्लेशः कायमनः खेदः तेन सहोपमा सादृश्यं यस्य तादृशम् संयमम् इन्द्रियनिग्रहं प्राप्य स्वीकृत्य नृपश्रीसम राजलक्ष्मीसदृशं तं पूर्वप्राप्त व्यापार मन्त्रिनियोग मा नैव परिहर त्यज, यस्मिन् व्यापारे स्वीकृते जललवमुचः तोयबिन्दुसेचकाः सारङ्गा सारं सलीलं गच्छन्तीति सारोपपदाद् गमे : मागमश्च, सरन्ति इत्यर्थे वा "मृवृन्दभ्यो णित् [ उणा० ६६ ]" इति णिदङ्गः गजाः ( सारङ्ग श्चातके भृङ्गे कुरङ्गे च मतङ्गने इति विश्वः) ते तव मार्ग गतागतपथं सूचयिष्यन्ति आवेदयिष्यन्ति, हि यस्मात् इह संसारे काचम् सीमकम् आदाय स्वीकृत्य चिन्तामणिम् रत्नविशेष चिन्तितवस्तु- मात्र-सकलवस्तुप्रदायकम् कः जनः मुञ्चेत् त्यजेत् ।
४८ - विशेष:-गृहे तिष्ठता त्वया राजलक्ष्मीसदृशं मन्त्रिपद- मपि स्वीकार्यमेव, यत्र स्थितस्त्वं गजै र्यास्यसि, तदने च क्लेशाधायको संयमिमार्गस्वीकारः चिन्तामणि विहाय काच- स्वीकार सदृश एवेति भावः । अय चतुर्थचरणो मेघदूतेऽर्थतः समानोऽपि तात्पर्यतो भिन्नार्थकः समस्यया पूरितोऽत्र ॥ २२ ॥ स्वर्गार्थ तपस्यतस्ते ततोऽप्यधिक सुखमिहैव सुलभ- मित्याह- तीनं यत्त्वं तपसि सुतपो देवलोकाशयेह, स्त्रीसम्भोगादपरमाररे ! नास्ति तत्रापि सौख्यम् । गेहस्थस्तद्रचय सुचिरं स्वर्गसौख्याधिकानि, सोत्करागनि प्रियसहचरीसंभ्रमालिङ्गितानि ॥२३॥ अन्वयः- 'त्वम् देवलोकाशया इह यत् तीव्र सुतपः तपसि, अरिरे ? तत्रापि स्त्रीसम्भोगाद् अपरम् सौख्यम् न अस्ति, तत् गेहस्थः स्वर्गसौख्याधिकानि सोत्कण्ठानि प्रियसहचरी सम्भ्रमालिङ्गितानि रचय' इत्यन्वयः । - व्याख्या- त्वं भवान् देवलोकाशया देवलोकस्य स्वर्गस्य आशा प्राप्तीच्छा तया इह संसारे यत् तीन कठिनं सुतपः
४३
उत्तमं तपः तपसि आचरसि, अरिरे ! आश्चर्यम् ( आश्चर्य-
द्योतकस्य लौकिकस्यैवमाकारस्य शन्दस्यानुकरणमेतत् )
तत्रापि देवलोकेऽपि त्रीसम्भोगाद् स्त्रिया स्त्रीभिर्वा सह
विलासाद् अपरम् नास्ति परम् उत्कृष्टं यस्मात् तत् अति-
शयितम् सौख्यम् सुखमेव सौख्यम् भेषजादित्वाद् ध्यण ,
नास्ति न विद्यते, तत् तस्मात् गेहस्था गृह एव तिष्ठन्
स्वर्गसौख्याधिकानि स्वर्गस्य देवलोकस्य सौख्येभ्यः
सुखभोगेभ्योऽपि अधिकानि उत्कृष्टानि, सोत्कण्ठानि
उत्कण्ठया औत्सुक्येन सहितानि प्रियसहचरीसम्भ्रमा-
लिङ्गतानि प्रियाणां वल्लमानां सहचरीणां सहतिष्ठन्तीनां
स्त्रीणां सम्भ्रमेण कामपीडाजन्यत्वरया आलिङ्गतानि स्वयं-
ग्रहाश्लेषान रचय विधेहि ।
विशेषः-स्वर्गेऽपि स्त्रीसम्भोग एव सुखसीमा, सच
त्वया गृहस्थेन सता सुप्राप एवेति तदर्थ सपस्तप्त्वाऽलम् ।
मेघदूतेऽपि समानाशयक एवायं चतुर्थश्चरणः ॥ २३ ॥
ननु लौकिक सौख्यमल्पकालिकमिति चेदत्राह-
नीत्वा नोत्या कतिपयदिनं यौवनं गेहवासे,
भुक्त्वा भोगानवनिवलये नाथ ! तत्वा स्वकीर्तिम् ।
वार्द्धक्येऽथ प्रिय ! निजजनैः साश्रुभिताय,
प्रत्युद्यातः कथमपि भवान गन्तुमाशु व्यवस्येत्॥२४॥
अन्वयः-
-
-
'हे नाथ ! नीत्या कतिपयदिन यौवनं गेहवासे नीत्वा,
भोगान् भुक्त्वा, अवनिवलये स्वकीर्तिम् तत्वा, अथ हे
प्रिय ! चार्द्धक्ये साश्रुभिः निजजनैः प्रत्युद्यातः भवान्
व्रताय आशु गन्तुम् कथमपि व्यवस्येत्' इत्यन्वयः।
व्याख्या-
हे नाथ ! स्वामिन् ! नीत्या नयेन कतिपयदिनम् कति-
पयानि परिगणितानि दिनानि दिवसाः यस्मिन् तादृशं
यौवनं तारुण्यं गेहवासे गृहस्थितौ नीत्वा अतिवाह्य,
भोगान् स्त्रक्चन्दनवनिताद्युपयोगान् भुक्त्वा अनुभूय,
अवनिवलये भूमितले स्वकीर्तिम् स्वीयं यशः तत्वा
विस्तार्यः अथ तदनन्तरम् हे प्रिय । वल्लभ ! वाईक्ये
वृद्धस्य भावः वाद्धकम् चोरादित्वादकम् , तदेव वाक्यम्
तस्मिन् स्थाविरे भावे सम्पन्ने सति साश्रुदृभिः अश्रुभि-
नेत्रजलैः सहिता दृशो नेत्राणि येषां तादृशैः निजजन।
स्वीयबन्धुमिः प्रत्युद्यातः कृतानुगमनः भवान् त्वम्
जताय संयमाय आशु शीघ्र' गन्तुम् ब्रजितुम् कथमपि
केनापि प्रकारेण (न तु सुखेन) व्यवस्येत् उद्युञ्जीत ।
विशेषः-लौकिक सुखोपभोगसमयो यौवनं, यद्यपि न
स्थिर तथापि यावत् तदस्ति तावत् भोगान् भुक्त्वा, इह
५१ लोकेऽपि स्वयशो विस्तार्य, समायाते वृद्धत्वे स्थायि परलोक- सुखसाधनस्य व्रतस्यापि विधानं सम्भाव्यत एवेति, यौवने तदर्थ प्रयासो नोचित इति भाव: इह 'वर्द्धके' इत्येव स्थाविरार्थके साधु, तथापि स्वार्थे ध्यणा निर्देश श्छन्दोऽनुरोधेन कविस्वातन्त्र्यं द्योतयति । मेघदूतेऽपि समानार्थ एवात्रत्यश्चतुर्थः पादः । क्रमेणैवाश्रमाणां भोग उचित इति गार्हस्थ्य निर्वाह्य मुनित्वमाश्रयणीयमिति कोशाया आकृतम् । भुक्तभोगस्य हिं तदाकर्षणं श्लथीभव- तीति, तपः सुकरं भवति । अन्यथा कदाचिदारूढ पतितत्व- सम्भावनाऽपीति हृदयम्-॥ २४ ॥ पुनरपि वान्धवत्यागस्यानौचित्यप्रदर्शनद्वारा गृहत्या- गानौचित्यं प्रकटयति- ताते याते त्रिदशभवनं युष्मदाशानिवद्धा, ये जीवन्ति प्रिय ! परिहरस्तान किं लज्जसे त्वम् ?। आयाभावात् खयि सति गते बान्धवास्तेऽस्तवित्ताः, सम्पत्स्यन्ते कतिपयदिनस्थायिहंसा दशार्णाः ॥२५॥ 'अन्वयः हे प्रिय ! ताते त्रिदशभवनं याते, ये युष्मदाशानिबद्धा जीवन्ति, तान् परिहरन् त्वं न लज्जसे किम् ? त्वयि गते ५२ 1 1 " 4 सति अस्तवित्ताः दशाः ते बान्धवाः कतिपयदिनस्थायि- हंसाः सम्पत्स्यन्ते' इत्यन्वयः । व्याख्या- हे प्रिय ! प्रेमास्पदभूत ! ताते पितरि शकटाले त्रिदशभवनम् तिस्रो दशाः (बाल्य-फौमार-यौवनानि ) वयोऽवस्था येषां ते त्रिदशाः त्रिंशद्वर्षा मनुष्ययुवाना, तादृशा इव सदा ये विद्यन्ते ते, देवाः तेषां भवनम् गृह स्वर्गमित्यर्थः, याते गते (सति) ये बान्धवाः युष्मदाशा- निबद्धाः तव भवतः आशया आश्रयेच्छया निबद्धाः कृत जीवनबन्धनाः ( सन्तः) जीवन्ति प्राणान् धारयन्ति, नान् वान्धवान् परिहरन् परित्यजन् त्वं भवान् स्थूलभद्रः न लजसे न पसे किम् इति प्रश्ने, अवश्यमेव लज्जसे इत्यर्थः त्वयि भवति गते प्रव्रजिते सति अस्तवित्ताः क्षीणधनाः, दशार्णाः दशानाम् दशसङ्ख्ययाऽनुमिताना- मुत्तमर्णानाम् ऋणं देयद्रव्यमस्ति येषां तादृशाः सन्तः ते बान्धवाः कतिपयस्थायिहंसाः कतिपयदिनं परिगणित- वासरान् यावत् स्थायिनः स्थितिशीला हंसाः प्राणा येषां तादृशा आसन्नमृत्यव इत्यर्थः, सम्पत्स्यन्ते भविष्यन्ति । . विशेष:-अमात्यवृत्तिरेव तव कुलस्य जीविका, सा च यावत् त्वदीयः पिता जीवनासीत् तावत् , तेन परिपालिता प्र तस्मिश्च स्वर्गते सति, स्वयि च तत्पदं परित्यज्य प्रबजिते सति, तातानन्तरमयमेवास्मान् पालयिष्यतीत्याशया जीवन्त स्ते बान्धवा अद्यावधि कथमपि सन्ति । त्वयि चात्यन्तमेव गते सति मध्ये ऋणं गृहीत्वा कालमविवाद्यान्तः क्षीण- वित्तास्तेऽग्रे ऋणस्याप्यलभ्यत्वेनावश्यं शीघ्रमेव प्राण वियोक्ष्यन्त इति तेषां त्यागस्ते लज्जावहत्वादनुचित इति भावः। मेघद्तेऽत्रत्य श्चतुर्थंचरणो भिन्नार्थकः, तत्र हि दशार्णा नाम जनपदः, तत्र च मेघे प्राप्ते सति हंसानामन्यत्र गमनस्य नैयत्याद , तस्य कतिपयदिनस्थायिहंसत्वमुक्तम् , इस च तदन्यार्थविवक्षया समस्या पूर्तिः कृतेति ज्ञेयम् ॥२५॥ अथ दृष्टान्तप्रदर्शनेन व्रतत्यागपूर्वकं भोगासक्तौ प्रेरयति- भुङ्गे भोगान् किमिह नभवान् नन्दिषेणोऽपि तस्थौ ? वेश्याऽऽवासे चिरविरचितं प्रोन्मय चारित्रमुच्चैः। मुह्यत् को नो शुचि सुललितं वीक्ष्य वा वारनार्याः, सभ्र भगं मुखमिव पयो वेत्रवत्या श्चलोमि ? ॥२६॥ अन्वयः- मवान् इह भोगान् किं न भुक्ते ? नन्दिपेणः अपि चिरविरचितम् उच्चैः चारित्रं प्रोज्झ्य वेश्याऽऽवासे न तस्थौ
५४
किम् ? वा, वेत्रवत्याः चलोमि शुचि सुललितं पयः इव
वारनार्याः सभ्र भङ्गं मुखं वीक्ष्य का नो मुह्यत्' इत्यन्वयः।
व्याख्या-
भवान् भातीत्यर्थे भा धातोः डवतुना प्रत्ययेन
निष्पन्नो भवच्छन्दः युष्मदर्थे प्रयुक्तः, इह संसारे मदीया-
ऽऽवासे वा भोगान् भुज्यन्ते इति भोगा: 'भुजेः कर्मणि
घञ्' स्रकचन्दनवनितादयो विषयाः तान् किं कुतो हेतोः न
भुङ्क्ते उपभुङ्क्ते ? ननु गृहीत चारित्रस्य मम कथं
भोगोपभोगौचित्यमित्यावायां दृष्टान्तेन तदौचित्यं साधयति-
नन्दिषेणः अपि इत्यादिना । नन्दिषणः राजगृहनगर्या
'राज्ञः श्रेणिकस्य पुत्रः अपि चिरविरचितम् अनेकजन्मा-
र्जितम् उच्चैः उत्तमम् चारित्रम् चर्यते अनुष्ठीयते इति
चरित्रम्, चरतेः 'लूधूसखनिचरसहार्ते [५-२-८७] इति
इत्रा, चरित्रमेव चारित्रम् प्रज्ञादित्वात् अण,-शीलम् ,
प्रोज्झ्य परित्यज्य वेश्याऽऽवासे वेश्यायाः गणिकाया
आवासे गृहे ( तया सह रमणार्थम् ) न तस्थौ स्थितः
किम् ? इति काकु प्रश्ने, अपि तु स्थित एवेति भावः ।
अर्थान्तरन्यासालङ्कारेणैतत्' समर्थयति-वा अथवा वेत्रवत्या
एतन्नामकनद्याः चलोमि चलाः चञ्चला ऊर्मयः तरङ्गा यत्र
तथाभूतम् शुचि स्वच्छम् पवित्रं वा सुललितं बहुसुन्दरम्
पयः जलम् इव यथा, वारनार्याः बेश्यायाः सभ्रूभङ्गम्
.
-
---
-- भ्र भङ्गः कटाक्षविक्षेपैः सहितम् मुखम् वदनं वीक्ष्य अवलोक्य कः जनः न मुह्य त् चेतो वैकृतं प्राप्नुयात् इति काकु प्रश्नेन सर्व एव जनः तादृशं गणिकामुखं वीक्ष्य मुह्य देवेति व्यज्यते। विशेषः-पूर्वोक्तरीत्या गृहस्थितिप्रार्थनया भोगप्रवर्त- नेनापि चारित्रे दृढमतिं श्रीनन्दिषेणदृष्टान्तेन प्ररोचयति । नन्दिषेणो हि राजगृहनगर्या राज्ञः श्रेणिकस्य पुत्रः पूर्व- जन्मार्जितपुण्यप्रभावेण वैभारगिरौ भगवतः श्रीमहावीर- स्वामिनः सदुपदेशेन प्राप्तवैराग्यः चारित्रग्रहणे तत्परः शासनदेवेन निषिद्धः- यत् तब बहूनि भोगकर्माणि अवशिष्टानि, अतः सम्प्रति चारित्रग्रहणं न युक्तम् । तथापि तेन दीक्षा गृहीता । पश्चात् भोगकर्मणामुदये सति कामविकाराभिभूत आतपनादिभिर- नुष्ठितैरप्यशान्तचेता गिरिपतनायोद्यतः शासनदेव्या एवमुक्त:- विना भोगैस्त्वं मर्तुं न शक्नोषि इति । ततो भिक्षार्थ परिभ्रमन्नसौ कस्याश्चिद् वेश्याया गृहं प्राप्तः । तया स तथा मोहितो यया तद्गृह एव स्थित्वा भोगान् बुभुजे। पश्चात् तत्र स्थितोऽपि प्रतिदिनं दश प्रतिबोध्याहं भोक्ष्यामीति कृतनियमः । कस्मिश्चिदिने दशमश्रावकालाभे सति वेश्यया ५६ त्वमेव दशमोऽसीत्युक्तः प्रतिबुद्धो दीक्षां गृहीत्वा तपस्यन् मुक्त इति पुरातनी कथा । तथैव त्वमपि भोगान् भुक्त्वा -तदनु चारित्रं गृहीत्वा मोक्षं प्राप्स्येवेति साम्प्रतं भोगत्यागो न युक्त इति कोशाया आशयः । अत्रत्य श्चतुर्थचरणो मेघदूते वेत्रवत्या नद्याः पयसः सभ्र भङ्ग न मुखेन सह साम्यं प्रतिपादयति, अत्र तु मुखस्यैव पयसा सह साम्यमपेक्षितम् । यद्यपि इवादि शब्दा उपमा- वाचका यतः परं प्रयुज्यन्ते तस्यैवौपम्य बोधयन्तीति शब्द- मर्यादया लभ्यते तथापीह समस्यापूर्तये कविना - इव शब्दो भिन्नक्रमतया प्रयुक्त इतीव शब्दः पयः शब्दात् परतो योज- नीयो भवतीति विज्ञेयं विचारकैः॥ २६ ॥ अथोद्दीपनविभावं भोगयोग्यस्थानादि वर्णयति- क्रीडाशैलो वर ! गुरुरयं राजते ते पुरस्ता- चक्र केलिः किल सह मया यत्र चित्रा त्वया प्राक् । स्निग्धच्छायै विमलसलिलैः सत्फलैयों जनाना- - मुद्दामानि प्रथयति शिलावेश्मभियौवनानि ॥२७॥ अन्वयः- 'हे वर ! गुरु:- अयं क्रीडाशैलः ते पुरस्तात् राजते, यत्र प्राक् त्वया मया सह चित्रा केलिः चक्रे किल । - यः स्निग्ध च्छायः विमलसलिलैः सत्फलैः शिलावेश्मभिः जनानाम् उद्दामानि यौवनानि प्रथयति' इत्यन्वयः । 4 P व्याख्या- हे वर! वियते "प्रियत्वेन स्वीक्रियते इति वरः तदामन्त्रणम्, गुरु: विशालः अयं अग्रे दृश्यमानः क्रीडा- शैलः क्रीडार्थ निर्मितः कृत्रिम पर्वता ते भवतः पुरस्तात् समर्श राजते शोभते । अस्य पूर्वोपभुक्तत्वेन परिचय ददाति-यत्र पर्वते प्राक् यतिभावस्वीकारात् पूर्व अर्थात् श्रीसम्भूतिविजयगुरुपायें दीक्षा ग्रहण पूर्वमित्यर्थः त्वया स्थूलभद्रेण मया-कोशया प्रिययासह साधं चित्रा अद्भुता केलिः रतिक्रीडा चक्रे कृता । यः क्रीडाशैलः स्निग्धच्छायः स्निग्धा स्पृहणीया च्छाया अनातप प्रदेशो : यत्र तादृशैः, विमलजलैः विमलानि अतिस्वच्छानि जलानि येषु तैः सत्फलैः सद्भिः स्वादिष्टतरैः फलश्च (युक्तैः) शिलावेइ- मभिः प्रस्तरागारै जनानाम् एतत् प्रदेशवर्तिलोंकानाम्, उद्दामानि उदंगत निः सृतं दामप्रसरणनिवारकबन्धनरज्जुः येभ्यः तादृशानि-अप्रतिबद्धानि यौवनानि तारुण्यानि प्रथयति भोगेच्छामि वृद्धथा प्रख्यापयति । विशेषः-भोगार्थमुपयुक्तस्थानमिदं क्रीडापर्वतरूपंप्राक्त्व- योपभुक्तमेव । अयं न केवलं तवैकस्यापि तु बहूनामत्रंत्यानां ५८ न जनानां यौवनफलविषयोपभोगोपकारकतया यौवनस्य प्रख्या- पकोऽस्ति । अतः पुनस्त्वयायं भोग्य इति भावः । मेघद्ते पर्वतविशेषस्य प्रशंसायाम्-इदं पद्योत्तरार्धं प्रयुक्तम्- "यः पायत्रीरतिपरिमलोद्गारिभि गराणाम्, उद्दामानि प्रथयति शिलावेश्मभि यौवनानि" इति । अत्र शिलावेश्मनां पण्यस्त्रीरतिपरिमलोद्गारित्वेन तत्र- त्य नागराणां, पण्यस्त्रीरतिप्रसक्तत्वानुमापकत्वेन तेषाम- हामयौवनख्यापकत्वं साधु घटते । अत्र तु शिलावेश्मनां सच्छायत्वेन सुलत्वेन सफल- त्वेन च न तथा रतिप्रसक्तयनुमानं सम्भाव्यते; तथापि एतादृशस्य वेश्मनो रत्युपकारकत्व सम्भावनया तत्र स्थिताना जनानां यौवनयापनयोग्यताऽस्तीति यथा कथञ्चितुर्थ- चरणार्थसङ्गति |ध्या ॥ २७ ॥ पूर्वत्र पद्ये जनानामिति क्रीडाशैलस्यास्य सर्वसाधारण- त्वमुक्तमिति नेदृशे स्थाने प्रतिष्ठित पुरुषस्य विहारो युज्यते इति शङ्का सम्भवनाया निराशायात्र त्वदीयं स्वतन्त्रमेवो. द्यानमेकान्तस्थानमस्तीति कथयति- मचयचिते पर्वते वर्तते ते, क्रीडोद्यानं सुरवनसमं नाथ ! सर्व काख्यम् । M 4 " 1 अस्मिन् सान्द्रद्रु
स्वेदं शीतो हरति सुरभिः संमतो यत्र वायु--
श्छायाऽऽदानात् क्षणपरिचितः पुष्पलावीमुखानाम् ।२८
अन्वय:-
'सान्द्रद्रुमचयचिते अस्मिन् पर्वते हे नाथ ! ते सर्वत्र्तु-
काख्यम् सुरवरसमं क्रीडोद्यानं वर्तते, यत्र शीतः सुरभिः
संमतः छाया-दानात् क्षणपरिचितः वायुः, पुष्पलावीमुखानां
स्वेदं हरति' इत्यन्वयः।
व्याख्या-
सान्द्रद्रुमचयचिते सान्द्रेण निविडेन द्रुमाणां वृक्षाणां च
येन समूहेन चिते व्याप्ते ( अनेनास्य प्रच्छन्नत्वं ख्याप्यते )
अस्मिन्, पूर्वनिर्दिष्टे पर्वते क्रीडाशैले, हे नाथ ! स्वामिन्
ते भवतः सर्वतुकाख्यम् सर्वे वसन्तादयः पडपि ऋतवः
यत्र (एककालावच्छेदेनेति शेषः ) तत् 'सर्वतुकम्' इति
आख्या नाम यस्य तत्, सुरवनसमम् देवोद्याननन्दनाख्य
वनसदृशम् (तत्रापि सर्वेपामृतूनां सर्वदा सहावस्थितेः प्रसिद्धेः,
तत्साम्येन पूर्वोक्तार्थे दाढय घोतितम् ) क्रोद्यानम्
लीलारामः वर्तते विद्यते, (इति स्मरणीयमिति भावः) ।
यत्र क्रीडोद्याने शीतः शीतलस्स्पर्शवान् सुरभिः
सुगन्धः संमतः अनुकूल छाया-दानात् छाययाः कान्त्या
६० । - २ दानात् वितरणात् क्षणपरिचितः किञ्चित् कालार्थ जात- परिचयः वायुः पवनः पुष्पलावीमुखानाम् पुष्पाणि लुनन्ति त्रोटयन्तीति पुष्पलाव्यो मालाकारपत्न्यः' तासी मुखानाम् आननानां ( सम्बधिनं ) स्वेदं धर्मजलं, हरति. अपनयति ।। विशेष:--अत्र क्रीडाशैलस्य सान्द्रद्रुमचयचितत्वेनैव क्रीडायोग्य त्वं व्यक्तम् । तत्राऽपि स्वतन्त्रमुद्यानं सर्वतुरम्य- मति महदुद्दीपकम् । तत्र क्रीडाश्रमस्यापनोदको वायुरपि विद्यत एव । अत्र वायोः छाया-दातृत्वं तु श्रमक्लान्तानां पुष्पलावीनां श्रमापनोदनेन मुखकान्तिवर्धकत्वेनो पपत्रमेव । यश्च वायुः कान्तिप्रद इति विज्ञायते स परिचितो भवतीत्यपि युक्तमेव । अत्र मुंद्रिते पुस्तके 'छायाऽऽदानीत' इति पाठो दृश्यते । आदानं च ग्रहणम् । तथा च वायोः छाया- ग्राहकत्वं कथमुपपद्यते इति शङ्का सञ्जायते । यदि च वृच्छ- छाया स्थितानां स्थितानां पुष्पलावीनाम्-वृक्ष-शाखासञ्चालनेन तत्कृतानातपरस्य वायुंना ग्रहणे भवतीति वायोः छायाग्राहक- त्वमुपपाद्यते, भवति चैवमपि परिचयः । अपकारकोऽपि परिचिता भवति । एवञ्च क्षणपरिचित इति पदे 'क्षण'-शब्द प्रयोगोऽपि समुपपद्यते । छायायो हरणेन ताभिरयं चायुरेवा- स्माकं तापक इति बुध्यते । ततश्च छायाहरणेन कृतापकारो वायुः श्रमजल (स्वेद ) हरणेनोपकृत्वाऽऽत्मानं निरपराधं ६P 4 । - करोतीति वर्ण्यते तदा छायाऽऽदानात्' इति पाठोऽपि समी- चीन एव । 'श्रमस्वेदहरः' यथोक्त गणविशिष्टो वायुरप्यत्र वहतीति, स्थानस्य भोगयोग्यतापि व्यज्यते । मेघदूते चात्रत्य श्चतुर्थश्चरणो मेघविशेषणत्वेनोपात्त:- स च स्वभावत एवं यत्र प्रदेशे गच्छति तत्र छाया संजायते इति पुष्पलावीनां मुखानासुपरिछायाप्रदानात् मेघः परिचितो भवतीति स्पष्टम् । इह चायं चरणः पूर्वोक्त रीत्या वायु- विशेषणायोपात्त इति विशेषः ॥ २८ ॥ पुनरपि क्रीडाशैलस्थे क्रीडोद्याने रमणाय प्रेरयति- स्वामिन्नस्मिन् स्मरगृहसमे कानने तावकीने; कामक्रीडां विदधति समं निर्जराः सुन्दरीभिः । स्नेहस्निग्धेस्त्वमिह रतिर्वीक्षितोऽपि प्रियाणां, लोलापागैर्यदि न रमसे लोचनै वञ्चितोऽसि ॥२६॥ अन्वयः- 'हे स्वामिन् ! स्मरगृहसमें तावकीने अस्मिन् कानने निर्जराः सुन्दरीभिः समं कामक्रीडा विदधति । इह त्वम् 7 ས ६२ ہو۔ स्नेहस्निग्धैः रतिदैः लोलापाङ्गः प्रियाणां लोचनैः वीक्षितः अपि यदि न रमसे (तर्हि) वञ्चितः असि' इत्यन्वयः । व्याख्या- हे स्वामिन् ! हे नाथ ! स्मरगृहसमे स्मरस्य काम- देवस्य गृहेण - भवनेन समे तुल्ये तावकीने तव इदं ताव- कीनम् तस्मिन् अस्मिन् प्रत्यक्ष दृष्टे कानने क्रीडोद्याने निर्जराः देवाः (अपि) सुन्दरीभिः स्वप्रियाभिः समं सह कामक्रीडां कन्दर्पसम्बन्धिविहारं विदधति - कुर्वन्ति । देवैरपि कामक्रीडार्थमिदमुपयुज्यत इत्यहोऽस्य रमणीयतेति भावः । इह उद्याने त्वम् भवान् स्नेहस्निग्धैः प्रीति भावाः रतिदैः रतिं शृङ्गाररसस्थायिभावं ददति उद्बोध- यन्ति इति रतिदाः तथाभूतैः लोलापाड्गैः लोलाचाला , अपाङ्गा दृक्कोणा येषु तादृशैः प्रियाणां स्निग्धानां स्त्रीण लोचनैः नेत्रैः वीक्षितः अवलोकित अपि यदि चेत् न रमसे,रतिक्रीडायां प्रवर्तसे (तर्हि) वञ्चितः फलशून्य असि भवसि । प्रियाणां स्निग्धा दृष्टि दुलभा तां प्राप्यापि यदि न. . सार्थयसि तर्हि तव पुंस्त्वमेव निष्फलमिति भावः । विशेषः, एतादृशे स्थाने प्रियाणामभिप्राय ज्ञात्वाऽव- श्यमेव त्वया भोगानुष्ठानमुचितम् । उक्त हि केनचित् 'अनिषिद्धसुखत्यागी पशुरेव न संशय' इति । भोगावलीकर्म- , 1 प्राप्ता भोगा अवश्यमेव भोक्तव्या इति कोशाभिप्रायः ॥२६॥ न केवलं प्रिया एव त्वां प्रवर्तयन्ति, अपि तु जडा वृक्षा वन्यपि त्वां स्वोपभोगाय प्रेरयतित्याह- लोलच्छाखाशयविलसितैस्त्वामिवाकारयन्ती, भृङ्गालापैरिख तव तपः साम्प्रतं वारयन्ती । वृक्षालीयं कुसुमपुलकं दर्शयन्तीवः पश्य, स्त्रीणामाद्य प्रणयि वचनं विभ्रमो हि प्रियेषु ॥३०॥ . - अन्वयः- 'इयं वृक्षाली लोलच्छाखाशयविरुसितैः त्वाम् आका- रयन्ती इव, भृङ्गालापैः साम्प्रतं तव तपः, वारयन्ती इव, कुसुमपुलकं दर्शयन्ती इव (स्थिता इति त्वं) पश्य हि स्त्रीणां विभ्रमः प्रियेषु आद्यं प्रणयवचनं (भवति)' इत्यन्वयः । व्याख्या- वृक्षाली वृक्षाणां तरूणाम्, आली पङ्क्तिः आली- वेत्युप मिति गर्भसमासा, लीलच्छाखाशयविलसितैः लोलन्त्यश्चञ्चलाः शाखा एव शयाः कराः तेपां विलसि तैः विभ्रमैः त्वाम् भवन्तं आकारयन्ती आह्वयन्ती इब, भृङ्गालापैः भृङ्गाणां भ्रमराणाम् आलापैः शब्दः साम्प्र.
६४ तम् अस्मिन् समये तव भवतः तपः तपश्चर्या वारयन्ती प्रतिषेधयन्ती इव, कुसुमपुलकं कुसुमानि पुष्पाण्येव पुलकं सात्विकविकारोत्पन्नरोमोद्गमं दर्शयन्ती त्वाम्प्रतिप्रकटयन्ती इव (स्थिता इति त्व) पश्य अवलोकय । (किमनेनावलो- कितेनेति चेदवाह) हि यतः स्त्रीणां वनितानां विभ्रमः विलासः प्रियेषु इंप्टेषु जनेषु विषये आद्यं प्रथम प्रणय- वचन प्रेमालापः भवतीति, शेषः । विशेषः-अलि (सखी) स्थानीया वृक्षाली हस्तचाल- नेन त्वामाकारयन्ती इव, भृङ्गशब्देन त्वां तपसो वारयन्ती इव कुसुमोद्गमेन सात्त्विकभावजातरोमोद्गमं प्रकटयन्ती इव लक्ष्यते, तथा च त्वों प्रति स्वाभिप्रायं स्वविलासै रेव प्रकटयति । स्त्रीणामेष स्वभाव एवं यत् ताः प्रथम वाचा न स्वाभिप्राय प्रगटयन्ति किन्तु स्वकीयाङ्गविभ्रमैरेक, तदेव च तासों प्रथमं प्रेमवचनं भवति । मुद्रित पुस्तके 'प्रणयि वचनं' इति पाठो दृश्यते । सोऽपि प्रणयेन मुक्तं वचन मितिरीत्या व्याख्यातुशकयत एव तथापि मेघदूते 'प्रणयवचन' मित्येव पाठस्य दृष्टतया. तस्य प्रणयस्स प्रेम्णो वचनं कथन मितिरूपेण सारल्येन समुचितत्वेन, च व्याख्येयतया तदेवात्रास्माभि. स्थापितम् । लेखक प्रमादादपि एवं भेदो भवितु महतीति न कवे विरोधः सम्भावनीयः । अत्र च निधोत्प्रेक्षालङ्कारः प्रयुक्तः ॥ ३०॥ ३ - .. ।
६५ r एवं बाह्यालापं विधाय साम्प्रतं स्वाभिप्रायं प्रकाशयति- हीनं दानं सुभग ! विरहात् ते धुताऽऽहारनीरं, पश्येदं मे वपुरुपचिति याति नान्यः प्रयोगैः। जाने नाहं बहु निगदितु त्ववियोगार्तिजातं, काय येन त्यजति विधिना सत्वयैवोपपाद्यः॥३१॥ अन्वयः- - 'हे सुभग ! ते विरहात् हीनं दीनं धुताऽऽहारनीरं इदं मे वपुः अन्यैः प्रयोगः उपचितिं न यांति (इति) पश्य; अहं बहु निगदितुम् न जाने, (इदं वपुः) त्वद्वियोगार्ति- जातं काश्य येन विधिना त्यति स त्वया एव उपपाया, इत्यन्वयः । व्याख्या- 'हे सुभग ! सौभाग्यशालिन सुन्दर इति वा, ते तब विरहात् वियोगात् हीनं क्षीनं, दीनं परितप्त, धुता- ऽऽहारनीरं धुते परित्यक्ते आहारनीरे भोजनजले येन तादृशम् इदं प्रत्यक्षदृश्यमानं मे मम (कौशायाः) वपुः शरीरम् अन्यः त्वत्संयोगातिरिक्त प्रयोगः उपायैः उपचितिं परिपुष्टिं न याति प्राप्नोति ( इति ) पश्य प्रत्यक्षमवलोकय । अहं त्वद्वियोगाविकला काचिदवली बहु विस्तृतं 'निगदितु ६६ कथयितुन जाने अवगच्छामि, (केवलमेतावदेव प्रार्थयामि यत् इदं मे वपुः । त्ववियोर्तिजातं तव भवतः वियोगेन विरहेण या आर्तिः पीडा तया जातम् उत्पन्न काश्य दौलियम् येन पूर्वोक्त रीत्या स्पष्टेन विधिना उपायेन (तव संयोगरूपेण) त्यजति परिहरति स विधिः त्वया भवता एव उपपाथः सम्पादनीयः । विशेष- त्वयैव स्ववियोगद्वारा जनितमिदं मे वपु:- काय त्वयैवापनेयमिति न्याय्यः पन्थाः । अत्र दशसु काम- दशासु पञ्चमी कामदशा प्रतिपादिता । तदुक्तं रतिरहस्ये- "नयनप्रीतिः प्रथमं चिन्तासङ्ग स्ततोऽथ सङ्कल्पः । निद्राच्छेद स्तनुता विषयनिवृति स्त्रपानाशः ॥ उन्मादो मुर्छा, मृतिरित्येताः स्मरदशा दश ॥इति।।" एवं च तनुता नाम्नी कामदशेयं कामोपभोगेनैव यास्यति, स त्वया मम सम्पादनीय इति कोशाभिप्रायः ॥ ३१ ॥ अथास्य पूर्वाकृतौदार्यादिप्रकटनपूर्वकं प्रवर्तनावाक्यमाइ- गेहं देहं श्रिय इव भवत् कारितं भतरेतद् , भाग्यैर्लभ्यं नय सफलतां स्वोपभोगेन नाथ ? | स्वल्पीभूते स्वकृतसुकृते नाकिनां भूगतानां, शेषः पुरायै हूं तमिव दिवः कान्तिमत् खण्डमेकम् ॥३
६७
अन्वयः-
?
+
'हे भत! श्रियः देहम् इव भवत्कारितम् एतद् गेहम् ,
भाग्यैः लभ्यम्, स्वकृतसुकृते स्वल्पीभूते भूगतानां नाकिना
शेपैः पुण्यैः हृतं कान्तिमत् एकं दिवः खण्डम् इव, हे नाथ !
स्वोपभोगेन सफलतां नय' इत्यन्वयः ।
व्याख्या-
'हे भर्तः ? विभर्ति पोषयति इति भर्ता तदामन्त्रणम्,
धनादिनापरिपोषक ? श्रियः लक्ष्म्याः देहं शरीरम् इव
(सुन्दरमिति भावः ) भवत्कारितम् त्वयैव निर्मापितम्
एतद् प्रत्यक्षम् गेहम् भवनं भाग्यैः सुकृतादृष्टैः लभ्यम्
प्राप्यम् (किञ्च) स्वकृतसुकृते स्वानुष्ठितपुण्ये स्वल्पीभूते
तनुतां प्राप्ते भूगतानां मर्त्यलोकमायातानां नाकिना
न अकं दुःखं यत्र स नाकः स्वर्गम्, स निवासोऽस्त्येषामिति
नाकिनो देवाः तेपाम्, शेषैः भुक्तावशिष्टः पुण्यैः सुकृतेः
हृतं आनीतम् कान्ति मत् शाभायुक्तम् दिवः स्वर्गस्य
एकम् खण्डम् अवयव इव (एतद् गेह) हे नाथ ! स्वामिन् !
स्वोपभोगेन स्वस्य आत्मन उपभोगेन उपयोगेन
सफलतां सार्थक्यं नय प्रापय ।
विशेषत्वयैव परमौदार्येण मदर्थमेतद् गृहं निर्मा-
पितम् । तच स्वर्गस्यै खण्डमिव विद्यत इतीदृशं गृहं भाग्यै-
1
JI रेव लब्धु शक्यते-इति त्वत् सम्बन्धादेव अहमपि भाग्यवती- जाता । तच्च गृहं तबोपभोगशून्य चेद् विफ़ल मेवेति स्वोप- भोगेनैतत्साफल्यं विधेहीति भावः । उपमालङ्कारोऽत्र स्वर्गस्य खण्डमिव गृहमिदमिति विवक्षणात् । 'झीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' इति पुण्यक्षये स्वर्गिणो भूगता भवन्तीति प्रसिद्धम् । पुण्यस्य च स्वल्पा- वशेषतया तस्य स्वर्गसमसुखजनकत्वमावश्यकमिति स्वर्गीय सुखस्योपभोगाय स्वर्गस्यैक खण्डमेव तत्पुण्यशेषेणानात मिदं गृहमित्यांशयः ॥ ३२ ॥ त्यक्त गृहस्य परित्यक्तमन्त्रिव्यापारस्य चास्य धनं दुर्लभम्, धनेन रहितस्य चास्य सेवनेन ममापि लाभो न स्यादिनि धनापार्जनाय व्याजान्तरेण प्रेरयति- अङ्गीकृत्य प्रिय ! गुरुतरां मन्त्रिमुद्रां समुद्रा, दानैरस्यां पुरि हर चिरं लोकदारिद्रयमुद्राम् । यत्रावन्यामिव सुरसरिद्धन्ति तापं च शीतः, सिप्रा वातः प्रियतम इव प्रार्थनाचाटुकारः॥३३॥ - अन्वयः- - 'हे प्रिय ! गुरुतरां समुद्रां मन्त्रिमुद्राम् अङ्गीकृत्य अस्या पुरि दानैः लोकदारिद्रयमुद्रां हर, यत्र अवन्त्यां शिप्रा ६९ - इव सुरसरित्, प्रार्थना चाटुकारः प्रियतम इव शीतः वातः च, तापं हन्ति' इत्यन्वयः । व्याख्या- 'हे प्रिय! अभीष्ट ? गुरुतरां बहुतरगौरवयुक्तां समुद्रा मुद्रा तत्तत्पदस्थजनप्रत्ययकारिणी अङ्किताक्षरा धात्वादिनिर्मिता 'मोहर' इति नाम्ना प्रसिद्धा तया सहिता मन्त्रिमुद्रां मन्त्रि- त्वचिन्हम् अङ्गीकृत्य स्वीकृत्य नन्दराज मन्त्रिपदमधिष्ठा- येत्यर्थः, अस्यां पुरि पाटलिपुत्रनगर्यां दानैः अन्नवस्त्र- हिरण्यादीनां वितरणैः लोकदारिद्रयमुद्रा लोकानां जनानां दारिद्रयस्य मुद्राम् आकारस्य विशेष हर अपनयः, यत्र यस्यां पुरि (पाटलिपुत्रे) शिप्रा विशालानगरीपर्यन्तवाहिनी नदी सा इव सुरसरित देवनदी गङ्गा, प्रार्थना चाटुकारः प्रार्थनायां सुग्तयाजायां चाटु प्रियवचनप्रयोगं करोतीति तादृशः प्रियतमः प्राणवल्लभं इव शीतः शीतलस्पर्शवान् वातः वायुः च तापं रत्यादिजातखेदं हरति नाशयति विशेष-मन्त्रिपदस्वीकारेण बहुधनमर्जेयन् दानः पुण्यमपि सश्चिन्वन् सुरसरिता तत्सम्बन्धिना रतिखेदापना दकेन शीतेन वातेन च सुखितोऽस्यामेव पुरिमया सह रमस्व । यथा रतिश्रान्तामपि कान्तां प्रार्थना चाटुकारः प्रियतमः पुनः पुना रतौ प्रवर्तयति तथा शीतो वातोऽपीति प्रियतमसाम्यन्त- । स्य प्रदर्शितमित्युपमालङ्कारः । - -- मेघदूते च 'शिप्रावात' इति समस्तं पदं पठ्यते स एव च बहुभिर्विशेषणे विशेषितः । अत्र च शिप्रासम्बन्धिनो वातस्य प्रकरणानुपयुक्ततया शिप्रापदं गङ्गोपमानत्वेनोपात्तं वात इति च स्वतन्त्रमेव पदं प्रार्थना चाटुकारादिपदैः विशेष्यते । यद्यप्येवं व्याख्याने इस शब्दस्य दूरान्वयो भवति इति, यत्परः स प्रयुज्यते तस्यैवोपमानत्वं स प्रकटयतीति शब्दमर्यादा च भिद्यते तथापि समस्यापूर्तये तादृशस्य दोषस्याङ्गीकार एव शरणमिति विज्ञेयम् ॥ ३३ ॥ प्ररोचनार्थं पुनरपि पाटलिपुत्रनगरमेव वर्णयति-- पश्य स्वामिन् ! सुविपुलमिदं पाटलीपुत्रद्रङ्ग, गङ्गोत्सङ्ग नृपतितिलकः कोणिकोऽस्थापयद् यत् । यस्याऽग्रेऽहो ! विविधमणिभिः पूरितस्य क्षमायां, संलक्ष्यन्ते सलिलनिधयस्तोयमात्रावशेषाः॥३४॥ अन्वयः- 'हे स्वामिन् ? गङ्गोत्सङ्ग सुविपुलम् इदं पाटलीपुत्र- द्रङ्ग पश्य, यत् नृपतिपिलकः कोणिकः अस्थापयत् । विविध- मणिभिः पूरितस्य यस्य अग्रे सलिलनिधयः तोयमात्रा वशेषाः संलक्ष्यन्ते' इत्यन्वयः ।
व्याख्या-
हे स्वामिन् ? नाथ ! गङ्गोत्सङ्गे गङ्गायाः सुरनद्या
उत्सङ्ग क्रोडे-समीपे सुविपुलम् अतिविस्तृतम् इदं प्रत्य-
क्षम् पाटलीपुत्रद्रङ्ग पाटलीपुत्रं नाम नगरम् ( 'नगरी पू:
पुरी द्रङ्गः, पत्तनं पुटभेदनम्' इति अभिधान चिन्तामणी
तिर्यकाण्डे४ ।९९१, पश्य अवलोकय, यत् नगरम् नृपति-
तिलकः नृपतिषु राजसु तिलक इव, राजश्रेष्ठ इत्यर्थः
कोणिकः तन्नामा नृपतिः अस्थापयत् निर्मापयामास ।
विविधमणिभिः नानाप्रकाररत्नैः पूरितस्य भारितस्य
यस्य पाटलिपुत्रनगरस्य अग्रे समक्षम्, सलिलनिधयः
वारिधया तोयमात्रावशेषाः तोयमानं केवलं जलमेव
अवशेषः शिष्टं येषु तादृशाः, रत्नानि सर्वाणि पाटलिपुत्रे
गतानि समुद्रेषु केवलं तोयमेवावशिष्यते इत्येवं रुपेणेत्यर्थः
संलक्ष्यन्ते प्रतीयन्ते । बहुरत्न पूर्णमिदं नगरमिति भावः ।
विशेषः-परिशष्टपर्वणि वर्णितायां कथायां पष्ठे सर्ग
कोणिकस्य राज्ञः पुत्र उदायीनृपः पाटलिपुत्रमस्थापयदिति
वर्णितमस्ति, इह च कोणिक स्तत् स्थापक उक्त इति किंमत्र
सत्यमिति न निश्चिनुमः।
मेघदूते विशालाया उज्जयिन्या वा वर्णन प्रस्तावे
स्थितस्य पद्यस्य चतुर्थचरणोऽत्रत्येन चतुर्थचरणेन समानार्थ
एव ॥ ३४॥
७२ " 4 पाटलिपुत्रनगरस्य पूर्ववृत्तान्तं पुरीवर्णनक्रमेण कथयति-- श्राद्य नन्दं नृपतिमवधीदत्र वैरोचनः प्रा- गत्रारामः सततफलदोवाभवत् तस्यं राज्ञः । पत्रोदायिप्रभुरपि हतः पापिना तेन दम्भा- दित्यागन्तून् रमयति जनो यत्र बन्धूनभिज्ञः ॥३५॥ अन्वयः-- 'यत्र अभिज्ञः जनः आगन्तून् बन्धून् “अत्र प्राक् वैरोचनः आद्यं नन्दं नृपतिम् अवधीत् , अत्र तस्य राज्ञः सतत फलदः आरामः अभूत, अत्र तेन पापिना दम्मात् उदायि प्रभुः अपि हतः' इत्यन्वयः । व्याख्या- यत्र पाटलीपुत्रे अभिज्ञः पुरातनेतिहासवेत्ता जनः लोकः आगन्तून् आगच्छति इत्यागन्तुः आङ् पूर्वाकाद् "रामेः कृसिकम्य [ उणा० ७७३ " तुन् प्रत्यये सति सिध्यति, अतिथिपर्याय श्चायमित्यतिथीनित्यर्थः, बन्धून सम्बन्धिनः ‘अत्र नगरे प्रदेशे वा प्राक् पूर्व वैरोचनः विरोचनस्य पुत्रः आद्यं प्रथमं नन्दं एतन्नामक नृपतिं राजानम् अवधोत् जघान, अत्र पदेशविशेषे तस्य नन्दस्य राज्ञः नृपस्य सततफलदः सततं सर्वेषु कालेषु फलानि , ददाति इति तादृशः आरामः वृक्षवाटिका अभूत् आसीत्, अत्र प्रदेश विशेष तेन प्रसिद्धेन उदायिनृपोत्सादितराज- पुत्रेण पापिना दुष्कृताचारिणा दम्भात् मुनिवेषधारण- कपटात् उदायिप्रभुः प्रसिद्धः पाटलिपुत्रसंस्थापको राजावि शेषः हतः मारितः इति उक्तप्रकारवचनैः रमयति रञ्जयति । -- , विशेष:-इदं नगरं बहुतर राज परम्परा परिभुक्तमति- प्राचीनमिति ज्ञापनाय अत्र ये आगन्तव आगच्छन्ति तान् तदीया अत्रत्या बन्धवः पूर्ववृत्तान्तं श्रावयति । तस्य चायं प्रकार:। उदायिनृपवृत्तान्तश्च परिशिष्टपर्वणि एवं वर्णितो यत्- "स महाप्रतापी राजा अभवत् । कदाचित् कश्चिदन्यो राजा तेन जितः भयादेव विपन्नः । तत् पुत्रश्च पितृमरणदुः। खितो- ऽपि हृदि वैरं धृत्वा उदायिनृपस्य मारणोपायं चिन्तयन् , 'स राजा सूरीश्वराणामादरं करोति, ते च अवारिता स्तन्निकटं गच्छन्तीति दृष्ट्वा, राजगुरोः सूरीश्वरस्य शिष्यत्वमाप । क्रमेण च तेन साधं राजकुलं गच्छन् विश्वासभाजनं जातः । एकदा रात्रौ सूरिनिकट एव सुप्तस्य राज्ञो मस्तकं छुरिकया छित्वा पलायित इति । .
७४ अत्र पद्ये एकः अत्र शन्दोऽधिकोऽस्ति । किञ्च प्रत्यक्ष स्थिताया नगर्याः चतुर्थचरणस्थेन यत्र शब्देन परामर्शोऽपि न युक्तः प्रतिभाति । समस्यापूर्तिकारणादेव तस्य स्थापन- मगत्या कृतमिति विभाति । मेघदूते पञ्चत्रिंशपद्ये उज्जयिन्या पूर्व--विशेषवर्णनसमये समागत श्चतुर्थचरणोऽयमत्राऽपि पाटलिपुत्रपूर्वविशेषवर्णने योजितः इति युक्तम् ॥ ३५ ॥ अथास्य प्ररोचनार्थं शरीरपरिपुष्ट्यै प्रेरयति- खिन्नोऽसि त्वं चिरविचरणाद् दृश्यतेऽनीदृशस्ते, देहस्तन्नो निजपरिजनेनाऽमुना जल्पसि त्वम् । हम्र्येष्वेषु प्रिय ! निवसनात् सज्जयास्मिंस्तनु स्वां, नीत्वा खेदं ललितवनितापादरागाङ्कितेषु ॥३६॥ . । अन्वयः- हे . 'त्वं चिरविचरणात् खिन्नः असि, ते देहः अनीदृशः दृश्यते, तत् त्वम् अमुना निजपरिजनेन नो जल्पसि, प्रिय ! ललितवनितापादरागाङ्कितेषु एषु हर्येषु निवसनाद खेदं नीत्वा अस्मिन् स्वां तनु सज्जय' इत्यन्वयः । व्याख्या- चिरविचरणात् बहुकालविहारात खिन्नः क्षीणः असि, ते तव देहः शरीरम् अनीदृशः पूर्व त्वं स्थूलभद्रः ७५ सादृश्यरहितः दृश्यते अवलोक्यते, तत् तस्मात् त्वम अमुना साक्षात् स्थितेन निजपरिजनेन अस्मत्प्रभृति सेवकवर्गेण सह नी नैव जल्पसि आलपसि । हे प्रिय ! स्नेहास्पद ! ललितवनितापादरगाङ्कितेषु ललितानां सुन्दरीणां वनितानां स्त्रीणां पादरागैः · चरणालक्तकरसैः अङ्कितेषु चिह्नितेषु एषु पुरतः स्थितेषु हम्र्येषु प्रासादेषु खेद चिरविचरणपरिश्रम नीत्वा दूरीकृत्य अस्मिन् समये स्वां निजां तनु शरीरं सन्जय भोगयोग्यतामापादय । निवसनात स्थिति करणार 4 A विशेपः-चिरविहारसमये प्रतिकूलाहारविहारपादसंचार- खेदादिभिस्ते शरीरं क्षीणं विसदृशमिव दृश्यतेऽत एव च त्वयाऽस्माकं प्रतिवचनमपि न दीयते, अतः सुखकरेऽत्र स्थाने स्थित्वा पूर्वखेदमतिवाह्यशरीरं पोपय येन भोग- योग्यता जायेतेति भावः । मेघदूतस्य षट्त्रिंशे पद्ये “पश्यलक्ष्मी ललितवनितापाद- रागाङ्कितेषु" इत्येवं पाठोऽस्ति, 'नीत्वा खेद' मिति चः तत्रत्यैः- पूर्वचरणैरपि न युज्यते,. यत स्तुतीयचरणस्तस्य ईदृशः-"हhष्वस्याः कुसुमसुरभिष्वध्वखेदं नयेथाः" इति दृश्यते । तत्र हि.अध्वखेदापनयनायैव प्रेरणा इह च खेदा- पनयनपूर्वकं शरीर संवर्धनाय, इति -समस्यापूर्ती त्रुटिरिव- ७६ - लक्ष्यते; तथापि प्रकृतार्थसङ्गतये एतावत् परिवर्तनं कवेरपरि- हार्यमिति सन्तोष्टव्यम् । 'चिरविचरणात्' 'दृश्यतेऽनीदृशः' 'ललितवनिता' इत्येष्वनुप्रासालङ्कारः ॥ ३६ ॥ स्थाने खेदापनयनयोग्यता प्रदर्श्यते- द्रङ्गोत्सङ्गे सगरतनयाऽऽनीतवाहां वहन्ती, गङ्गामेतां सुभग ! मृगयालोलकल्लोलमालाम् । धर्मस्वेदं हरति कुरुते या रति श्राग नराणां, तोयक्रीडानिरतयुवतिस्नानतिक्तमरुद्भिः ॥३७॥ . अन्वयः- 'हे सुभग ! सगरतनयाऽऽनीतवाहाम् आलोलकल्लोल- मालाम् वहन्तीम् एतां गङ्गां मृगय । या तोयक्रीडानिरत- युवतिस्नानतिक्तैः मरुद्भिः नराणां धर्मस्वेदं हरति, श्राक् रति कुरुते' इत्यन्वयः। - व्याख्या- हे सुभग ! सुरूप ! सौभाग्यशालिम् , सगरतनया- ऽऽनीतवाहां सगरचक्रवर्तिन स्तनयैः पुत्रैः आनीतः हिमा- लयात् सागरं प्रति नीतः वाहः वहनं वाहः, प्रवाहः यस्या ताम् , आलोलकल्लोलमालाम् आ समन्तात् लोला चञ्चला 1 कन्लोलानां तरङ्गाणां माला पङ्कितः यस्याःताम् , वहन्तीम् प्रसरन्तीम् एतां प्रत्यक्षदृश्यमानां गङ्गाम् भागीरथीं मगय अवलोकय । या गङ्गा तोयक्रीडानिरतयुवति- स्नानतिक्तः तोयक्रीडायां जलविहारे निरतानां लग्नानां युवतीनां तरुणीनां स्नानेन अवगाहनेन तिक्तैः सुरभितैः मरुभिः वायुभिः नराणाम् मनुष्याणाम् धर्मस्वेद ऊष्मजातजलं हरति अपनयति, श्राक् झटिति रतिम स्त्रीपुसयोरनुरागं च कुरुते जनयति । 'कटुतिक्तकपायास्तुं सौरभेऽपि प्रकीर्तिताः' इति हलायुधकाशानुसारमिह तिक्त- शब्दः सुरभितार्थतया व्याख्यातः। स्नानयनेनेति स्नान- मिति करऽणनेन स्नानपदं स्नानीय चन्दनादिचूर्णपरमपि 'स्नानीयेऽभिपवे स्नानम्' इति यादवकोशात् । तथा च स्त्रीणां स्नानीयद्रव्येग तत्रत्य वातस्य सौरभयुक्तत्वं युक्तमेव । विशेष:-इदं स्थानमीदृशं यत्र रतिक्रमादिजन्यं धर्म- जलमपनयन् गङ्गा सम्पर्कशीतः, तत्र जले विहरन्तीनां वनितानां स्नानीयद्रव्येण सुरभि श्च वायुः रतिं जनयतीति कोशाभिप्रायः। मेघदूते उज्जयिन्यां महाकाल मन्दिरोद्यानस्य गन्धवत्या नद्या ईदृशवायुना कम्पितत्वमनेनं चतुर्थपादेनोक्तमिह चान्यतात्पर्येण तत्सङ्गमयितम् ॥ ३७ ।। , , -- पुनरप्यत्रवासाय प्रेरयति- वासं कुर्वन्नवनिविदिते नित्यरङ्गेऽत्र द्रङ्गे गागैनीरैरनिशममतस्वादमावेत्स्यसि त्वम् । गङ्गाघोषः श्रुतिसुरूकरैरन्वहं चाब्दजाना- मामन्द्राणां फलमविकलं लप्स्यसे गर्जितानाम् ॥३८॥ अन्वयः-- अवनिविदिते नित्यरङ्गे अत्र द्रङ्गे वासं कुर्वन् त्वम् गाङ्गः नीरैः अनिशम् अमृतस्वादम् आवेत्स्यसि, श्रुतिसु रखकरैः गंगाघोषैः अन्वहम् अन्दजानाम् . • आमन्द्राणां गर्जिताम् अविकलं फलं च लप्स्यसे' इत्यन्वयः । व्याख्या- अवनिविदिते पृथिव्यां ख्याते नित्यरङगे नित्यं प्रतिदिनम् रङ गः नाटयोत्सवः यत्र तादृशे [ यद्यपि 'नाट्यस्थानं तु रङ्गः स्यात' [ अभिधान० २, १९६] इत्युक्ततया रङ्ग इत्यस्य नाट्यशाला इत्यर्थः करणीयः तथापि अत्र नित्य विशेषणेन रङ्ग पदस्य तत्रत्य क्रियायामेव प्रयोग इति विज्ञायैवं व्याख्यातम् ] अत्र प्रकृते - द्रङ्ग नगरे पाटलिपुत्रे, वासं स्थितिं कुर्वन् विदधत् त्वं भवान गाङ्गैः गङ्गासम्बन्धिभिः नोरैः जलैः अनिशम् सततम् -- ७६ अमृतस्वादम् अमृतस्य पीयूषस्य स्वादम् रसम् आवे- त्स्यसि ज्ञास्यसि, श्रुतिसुखकरैः कर्णानन्दावहैः गङ्गा- घोषैः भागीरथीप्रवाहशब्दैः अन्वहम् अलि-अहि इति अन्वहम् वीप्सायामव्ययीभावः प्रतिदिनम् अब्दजानाम् अपोददति इति अव्दा मेघाः तेभ्यो नातानाम् , आमन्द्रा- णाम् ईषद् गम्भीराणाम् गर्जितानाम् गर्जनशब्दानाम् , अविकलं सम्पूर्णम् फलम् उपयोगं लप्स्यसे प्राप्स्यसि । यादृश आहलादो मेघगर्जने भवति तादृशो गङ्गाप्रवाहयोपै- रेव तव स्यादिति भावः । विशेषः-धनगर्जितश्रवणेन कामिनां कामोद्रेको भवति, घनगर्जितं च केवलं वर्षास्वेव सम्भवति, इह च गङ्गासान्नि- ध्यात् तदीय प्रवाहघोपाः घनगर्जितानीव भासन्तस्तव कामोद्रेकं वर्धयिष्यन्तीति तात्पर्यम् मेघदूते यक्षेण मेघं प्रति एवमुपदिश्यते यत् सायं समये शिवपूजाकाले पटहशब्दवत् गर्जस्त्वम् स्वकीय गम्भीर मर्जितानां सर्व फलं शिवप्रसादेन प्राप्स्यसीति तच्चेहान्यथा योजितमिति कवेश्चातुरी दृश्यते ॥ ३८ ॥ न केवलमत्र स्थितिरेव. कार्या स्वकीय व्यापारोऽपि करणीय एवेत्याह- -- ८० नो मुञ्चन्ति प्रिय ! निजकुलाचारभारं महान्तो, व्यापार तत् कुरु गुरुममु पूर्वजाचाररूपम् ! स्नेहाद्यस्मिन् सति हि समुदः पौरनार्योऽतिवर्या- नामोक्ष्यन्ते त्वयि मधुकर श्रेणिदीर्घान् कटाक्षान् ॥३१॥ अन्वयः - 'हे प्रिय ! महान्तः निजकुलाचारभारं नो. मुञ्चन्ति तत् पूर्वजाचाररूपम् अमुगुरुं व्यापारं कुरु, हि यस्मिन सति समुदः पौरनार्यः त्वयि स्नेहात् अतिवर्यान् मधुकरश्रेणि- दीर्घान् कटाक्षान् आमोक्ष्यन्ते' इत्यन्वयः । व्याख्या हे प्रिय ! महान्तः मह्यन्ते लोकः पूज्यन्ते इति महान्तः ("हि बृह. [ उणा० ८८४ ]" इति कत प्रत्ययेन महत् शब्दो व्युत्पादितः) निजकुलाचारभारं निजकुलस्य स्वयं शस्य आचारः व्यापारः स एव भारः वहनीयः तं नो व मुञ्चन्ति परित्यजन्ति तत् तस्माद्धेतोः पूर्वजाचाररूपम् पूर्वजस्य पित्रादेः आचाररूपम कर्तव्यरूपं अमुपूर्वनिर्दिष्टं मन्त्रिपदस्वीकाररूपं व्यापार कार्य कुरु विधेहि | हि यतः यस्मिन् व्वापारे सति विद्यमाने समुदः सानन्दाः पौरनार्यः नागरवनिताः त्वयि भवति स्नेहात् प्रेम्ण: कारणात् अतिवर्यान् अत्यादरपूर्णान् मधुकरश्रेणिदीर्घान् - मधुकरश्रेणिवत् (अतिकृष्णवर्णत्वादायतत्वाच्च) भ्रमरपङ्क्ति- वत् दोर्घान् आयतान् कटाक्षान् अपाङ्गान् आमोक्ष्यन्ते पातयिष्यन्ति । विशेष-निर्व्यापारस्य जीवनमेवासम्भवि, अतश्व कोऽपि व्यापारोऽवश्यं करणीयः, एतश्च कुलक्रमागत एव व्यापारो भाररूपोऽपि अवश्यं स्वीकार योग्यः तदनुष्ठान एव परम्परा प्राप्तं महत्त्वं तिष्ठति । स च तव कुले मन्त्रिपद- धारणमेव । सति च मन्त्रिपदेऽधिष्ठिते त्वं नारीणामपि नागरीण बहुमतो भविष्यसि, न केवलं ममैवेति कोशाया अभिप्रायः ॥ ३६॥ अथास्य सुखमाशास्ते- पायं पायं शुचि सुललितं बन्धुवाक्यं पयो वा, स्वादं स्वादं सरसमधुराहारमेयाः प्रमोदम् । स्वामिन् ! नित्यं शिव इव मया सस्पृहं वीक्ष्यमाणः, शान्तोवेगःस्तिमितनयनं दृष्टभक्ति भवान्या॥४०॥ अन्वय:- 'हे स्वामिन् ! शुचि सुललितं बन्धुवाक्यं वा. पयः पायं-पायम् , सरसमधुराहारं स्वाद-स्वादं भवान्या शिवः इव मया सस्पृहं स्तिमितनयनं नित्यं वीक्ष्यमाणः दृष्ट भक्तिः शान्तोद्वेगः प्रमोदम् एया:' इत्यन्वयः ।
६२
१
व्याख्या-
हे स्वामिन् ! शुचि पवित्रमुज्ज्वलं वा सुललितम्
सुन्दरं बन्धुवाक्यं सम्बन्धिजनवचनं वा अथवा पयः दुग्धं
पायं-पायं श्रुत्वा-श्रुत्वा, पीत्वा-पीत्वा वा सरसमधुरा-
हारम् सरसं सस्वादं मधुरं मिष्टं च आहारभोज्यवस्तु
स्वाद-स्वादं रसयित्वा-रसयित्वा, भवान्या पार्वत्या शिवः
शङ्कर इव यथा, मया कोशया सस्पृहं सामिलाषं
स्तिमितनयनं स्तिमिते निश्चले नयने नेत्रे यत्र तादृशं च
यथा स्यात् तथा नित्यं प्रतिदिनं वीक्ष्यमाणं अवलोक्य-
मानः, दृष्टभक्तिः दृष्टा प्रत्यक्षी कृता भक्तिः मम अनुरागो
येन नथाभूतः शान्तोद्वेगः शान्तः अपगत उद्वेगः वैराग्यं
यस्य तथाभूतः सन् प्रमोदम् सुखम् एयाः प्राप्नुयाः ।
-
विशेषः--मन्त्रित्वे स्वीकृते सति बन्धवोऽपि प्रसन्नाः
त्यां मधुरमालपिष्यन्ति भोज्यं च मनोनुकूलं मिलिष्यतीति
सर्वन्तदुपयुञ्जन् , मया च नित्यनूतनभावः स्पृहया भक्त्या
च परिचरित स्त्वं शान्तवैराग्यः सुखित श्च भवेरित्या शास्यते ।
मेघदूते च 'शान्तोद्वेग स्तिमित नयनं दृष्टभक्ति भवान्या'
इत्येवं शान्तोद्वेगपदं स्तिमित नयनत्वस्य कारणत्वेन समस्त-
स्वेन च निर्दिश्यते, इह च स्वाभिप्रायानुरूपेण पृथक्कत विशे-
पणत्वेन गृहीतमिति कवे चातुरी ॥४०॥
८३ . त्वया दीक्षा त्याज्येत्याह-- कार्या शश्वद् भृतिरिह मया वः पुरेत्युक्तिपूर्व, पाणी प्रादात् प्रिय ! किल भवान् यत् पयो मत् सखीनाम् गृह्णन् दीक्षां निजपरिजनं त्वं विमुञ्चन् क्षणात् तत्, तोयोत्सर्गस्तनितमुखरो मा स्म भूविक्लवास्ताः॥४१॥ व्याख्या: + ' हे प्रिय ! पुरा 'इह मया वः भृतिः शश्वत् कार्या' इति उक्तिपूर्व भवान् मत्सखीनां पाणौ यत् पयः प्रादात् , दीक्षां गृह्णन् , निजपरिजनम् विमुश्चन् त्वम् तत् क्षणात् तोयोत्सर्गस्तनितमुखरः मा स्म भूः, तार विक्लवा इत्यन्वय । अन्वयः हे प्रिय ! पुरा पूर्वस्मिन् समये "इह लोकेऽस्मिन् मया स्थूलभद्रेण वः भवतीनां भृतिः परिपुष्टिः शश्वत् सर्वदा कार्य सम्पादनीया' इति एवम् उक्तिपूर्व प्रथममुक्त्वा भवान् त्वं मत्सखीनाम् मम सहचरीणाम् पाणौ करे यत् पयः पानीयम् प्रादात् वितीर्णवानभूत , दीक्षाम् चारित्रं गृह्णन स्वीकुर्वन् , निजपरिजनम् स्योपजीविवर्गम् विमुञ्चन् परित्यजन् (च) त्वम् भवन्तं तत् तस्मात्, . - ८४ क्षणात् स्वल्पकालानन्तरमेव तोयोत्सर्गस्तनितमुखरः तोयस्य पूर्व पाणौ प्रदत्तस्य जलस्य उत्सर्गाय परावर्तनाय परित्यागाय वा यत् स्तनितं शब्दितं तदर्थ मुखरः वाचालः मा स्म भूः न भूयाः, ( यतः ) ताः मत्सहचर्यः विक्लवा: भीरवः सन्तिः , त्वया तज्जलस्य आजीवनं भृतये सकल्प- रूपेण दत्तस्य परावर्तनाय कथिते. सति ताः प्राणांस्त्यक्ष्य- न्तीति भावः । विशेषः-प्रतिज्ञा पालनमेव महतां भूषणम् , पूर्व तासां भरणाय प्रतिज्ञां विधाय पुनस्तस्याः परित्यागो तव मुखरत्वं तासां प्राणसंशयं च कुर्यात् । मेघदूते रात्रौ प्रियगृहं प्रत्यभि- सारिणीनां वनितानां विद्युत्प्रकाशेन मार्गप्रदर्शनाय मेघः प्रेरितः, तस्मिन् काले जलचर्षणकालिकं गर्जितं न कुर्याः यतः ता भीरवो भवन्तीति मेघः प्रायते यक्षेणानेन चतुर्थ- चरणेन सचेहान्यथैव योजित इत्यवगन्तव्यम् ।। ४१ ॥ मन्त्रिव्यापारस्यानेकछलछिद्रान्वितत्वेन तदस्वीकारे वाणिज्यमेव विधेहीत्याह-- व्यापारस्ते यदि न हृदये संमतो ज्ञाततत्त्वे, वाणिज्येनाजेय धनचयं त्यागभोगक्षम तत् ।
८५ श्रङ्के क्षिप्तानव तव पुराऽनेन पित्रा स्वबन्धून् , मन्दायन्ते न खलु सुहृदामभ्युपेतार्थकृत्याः ॥१२॥ अन्वयः - . 'यदि ज्ञाततत्वे ते हृदये व्यापारः न संमतः, तत् वाणिज्येन त्यागभोगक्षम धनचयं अर्जयः अनेन पुरा पित्रा तय अङ्के क्षिप्तान स्ववन्धून् अब सुहृदाम् अभ्युपेतार्थकृत्याः न खलु मन्दायन्ते' इत्यन्वयः। व्याख्या- चेत् ज्ञाततत्त्वे ज्ञातं परिचितं तत्त्वं सांसारिक मिथ्यात्वरहस्यं येन तादृशो ते तव हृदये अन्तःकरणे व्यापारः मन्त्रित्वेन व्यापृतिः न संमतः इष्टः, तत तदा वाणिज्येन क्रयविक्रयकरणेन त्यागभोगक्षम त्यागाय दानाय भोगाय स्व सुखाय च क्षमं योग्यं धनचर्य सम्पत्तिजातम् अर्जय स्वाधीनी कुरु अनेन धनचयेन, पुरा पूर्वसमये पित्रा जनकेन तव भवतः अङ्क आश्रये क्षिप्तान समर्पितान् स्ववन्धून निजज्ञातीन् अव रक्षय । अर्थान्तर न्यासालङ्कारेणैतत् समर्थयति-सुहृदाम शुद्ध- हृदयानां जनानाम्-मित्राणां वा कृते अभ्युपेतार्थकृत्या. अभ्युपेता अङ्गीकृता अर्थस्य प्रयोजनस्य कृत्या क्रिया यैः तादृशाः जनाः न खन नैव मन्दायन्ते विलम्बन्ते विर- मन्ति वा। - ६ विशेषः-मन्त्रिपदे राजनीत्यनुसारं व्यापारस्य करणीय- त्वेन तत्र चेत् तव हृदयं न स्थातुं मन्यते कहि वाणिज्यमेव विधेहि यत्र स्वकीयं स्वातन्त्र्यं तिष्ठति । तेन च वाणिज्येन वहुधनान्पर्जयित्वा पितृसमर्पितवान् स्वबान्धवान् पालय । तेपामपालने तव महान् दोषः स्यादित्याशयः ॥ ४२ ॥ अथ नन्दराजानुरोधनापि त्वया मन्त्रिपदं स्वीकार्य- मित्याह- पूर्वैः पूर्वे मम खलु समे मानिता ह्यस्य पूर्व, तन्मान्योऽसौ सचिवतनयो मे जिघृक्षुस्तपस्याम् । मत्वा नन्दो नृप इति चिरं त्वाऽनुनेतु प्रमोदात्, प्रत्यावत्तस्त्वयि कररुधि स्यादनल्पाभ्यसूयः ॥४३॥ अन्वयः 'हि, पूर्वम् मम पूर्वैः अस्य समे पूर्व मानिताः, तत् असौ सचिवतनयः - तपस्यां -जिघृक्षुः मे. मान्यः इति मत्वा नन्दः नृपः प्रमोदाद त्वा अनुनेतु प्रत्यावृत्तः, त्वयिं कररुधि अनल्पाभ्यसूयः स्याद्' इत्यन्वयः । व्याख्या- हि यतः पूर्वम् पूर्वस्मिन् समये मम नन्दस्य पूर्वैः पूर्व पुरुषैः अस्य स्थूलभद्रस्य समै सर्वे पूर्व पूर्वपुरुषाः पित्रादयः C. तपः मानिताः पूजिताः तत् तस्मात् असौ सम्प्रति विप्रकृष्टः सचिवतनयः मन्त्रिपुत्रः स्थूलभद्रः तपस्याम् जिघृक्षः स्वीकतुमिच्छुः मान्यः अनुनेयः इति पूर्वक्तं मत्वा विचार्य नन्दः एतन्नामा नृपा पाटलिपुत्राधीश्वरः प्रमोदात् त्वामिहागतं श्रुत्वा हर्षात् त्वा त्वाम् अनुनेतुं अनुकूलयितु प्रत्यावृत्तः पुनरपि प्रवृत्तः; त्वयि भवति कररुधि अनुनयार्थ प्रवर्तित करं हस्तं रुणद्धि वारयति इति तादृशे जाते सति अनल्पाभ्यसूयः अनल्पा समधिका अभ्यसूया ईर्ष्या यस्य तादृशः स्यात् भवेत् । विशेष-पूर्व नन्दनपवचनमविगणय्य त्वं दीक्षायै यातः पुन स्वामिहागतं विज्ञाय पूर्वपुरुषमान्यमन्त्रिपुत्रं त्वामनुनेतु स पुनरपि तवानुनयने प्रवृत्तोऽस्ति, तस्या स्वीकारे स पर कुप्येदिति राजकोषवारणायापि त्वया दीक्षां विहाय मन्त्रिपदं स्वीकृत्य गृहे स्थेयमिति भावः । मेघदूते च 'सूर्यः कमलिनीनां मुखात् प्रालेयाश्रु' हतु प्रातः प्रत्यावर्तते इति तस्य त्वया किरणानां रोधनं न कार्य तथा सति स कुप्येदित्याशयेन प्रयुक्तोऽयं, चतुर्थचरणोऽन्यथा योजितः समस्यया ॥ ४३ ।। न केवलं वयमेवैवं कथयामः मान्या गङ्गापि ते दीक्षा वारयतीत्याह- - . .
7 दीक्षामेषा तव सुरनदी वारयत्यूमिरावैः, पश्य स्वामिन् ! बहुपरिचिता प्रेयसीवेयमुच्चैः । अस्याः शस्याशयरयकृतान्यर्हसि त्वं न विद्धन् !, मोघीकतु चढलशफरोदर्तनप्रेक्षितानि ॥४४॥ अन्वय- 'हे स्वामिन् ! एषा सुरनदी बहुपरिचिता इयं प्रेयसी इब तव दीक्षाम् उच्चैः ऊर्मिरावैः वारयति (इति) पश्य, हे शस्याशय ! विद्वन् । त्वम् अस्याः रयकृतानि चटुलशफरों- द्वर्तन प्रेक्षितानि मोघीकतुन अर्हसि' इत्यन्वयः। व्याख्या- . हे स्वामिन् । एषा प्रत्यक्षदृश्यमाना सुरनदी गङ्गा बहुपरिचिता अतिशयानुभूता इयं मद्रूपा प्रेयसी प्रियतमा इव तव भवतः दीक्षाम् प्रव्रज्या उच्चैः दीधैः ऊर्मिरावैः प्रवाहकोलाहलैः वारयति प्रतिषेधति (इति) पश्य अव- लोकय । हे शस्याशय ! शस्यः प्रशस्यः आशयोऽभिप्रायो यस्य तथाभूत ! विदन् ! कर्तव्याकर्तव्यविवेकपटो ! त्वम् भवान् अस्याः गङ्गाया रयकृतानि वेगसमुद्भूतानि, घटुल- शफरोदर्तनप्रेक्षितानि चटुलानां चञ्चलानां शफराणां मत्स्यविशेषाणाम् उद्वर्तनानि उन्लुण्ठनानि एव प्रेक्षितानि F अवलोकनानि मोघीकतु विफलींकतु न अर्हसि न युज्यसे। विशेष:-यथा बहुपरिचिताहं तव प्रेयसी त्वां दीक्षातः वारयामि तथा इयं गङ्गाऽपि प्रवाहसमुद्भूतशब्दैः त्वां बार- यतीवेत्युत्प्रेक्षालङ्कारो व्यङ्गथः यथाऽहं चश्चलनेत्रे त्वां पश्यामि तथा इयमपि जल- वेगवशान्मत्स्योद्वर्तनरूपेण चञ्चलेन चक्षुषा त्वां प्रेक्षत इवेति तदपि न विफलीकरणीयम् । शफरोद्वर्तनान्येव प्रेक्षितानीत्यत्र च रूपकालङ्कारः। अत्र 'शस्याशयरय०' इत्येवं समस्तः पाठो मुद्रित पुस्तके दृश्यते, परन्तुः अर्थ सामञ्जस्यानुरोधेन 'शस्याशय' इति आमन्त्रण- पदत्वेन पृथक्कृत्येह व्याख्यातं तदेव च युक्तं प्रतिभाति । अन्यथा शेश्याशयेन प्रशस्याभिप्रायेण यो श्यो वेग स्तन कृतानि विहितानीति क्लिष्टं व्याख्यानमाश्रयणीयं स्यादिति विचार्यम् ॥ ४४ ॥ पूर्वमपि दीक्षां विहाय भोगानुभवः कृतो दृश्यत इत्युदाहरति- कान्तावाचा चिरकृतमहो ! प्रोमय चारित्ररत्नं, भेजे भोगान सुभग ! वितताना पूर्वः कुमारः।
६० . . सोऽस्थाद् गेहे प्रिय ! जिनमितान् वत्सरान् स्नेहतो वा, ज्ञातास्वादो विपुलजघनां को विहातु समर्थः ॥४५॥ अन्वया 'हे सुभग ! आर्द्रपूर्वः कुमारः कान्ता वाचा, चिरकृतं चारित्ररत्नं प्रोज्झ्य, विततान भोगान् भेजे अहो !, हे प्रिय ! सः जिनमितान् वत्सरान् स्नेहतः गेहे अस्थात् , बा, ज्ञाता- स्वादः कः विपुलजघनां विहातु समर्थः । इत्यन्वयः । व्याख्या- ! हे सुभग ! सुन्दर ! आर्द्रपूर्वः आर्द्रशब्दः पूर्वं यस्य सः कुमारः आर्द्रकुमार नामा प्रसिद्धो राजपुत्रः कान्ता- वाचा कान्तायाः प्रियाया वाचा कथनेन चिरकृतम् वहुकालानुष्ठितं चारित्ररत्नम् चारित्ररूप मणिं प्रोज्झ्य परित्यज्य विततान् बहुविस्तृतान् भोगान् सक्चन्दन- वनितादिविषयान् भेजे उपयुयुजे इति अहो ! आश्चर्यम् । हे प्रिय ! सः आद्रकुमारः जिनमितान् जिनसङ्ख्यकान् चतुर्विशतिं वत्सरान् वर्षाणि यावत् स्नेहतः कान्तादीनां प्रेमतः गेहे गृहस्थाश्रमे अस्थात् स्थितः, (अर्थान्तरा- लङ्कागेपन्यासेनैतत् समर्थयति ) वा अथवा ज्ञातास्वादः अनुभूतरसः कः जनः विपुलजवनां विपुलं विस्तृतं जपनं
११
कटिपश्चाद्भागो यस्याः तादृशीं (नारी) विहातु परित्यक्तु
समर्थः
:क्षमः स्यात् ।
विशेषः-पूर्वमार्द्रकुमारेण प्रवज्यामारूढेनापि प्रिय-
तमायाः कथनेन चिरार्जितमपि चारित्ररत्नं विहाय, चतु-
विंशतिवर्षपर्यन्तं गृहे स्थित्व। भोगा भुक्ताः, परिणते वयसि
पुनः प्रबुद्धः दीक्षां गृहीत्वा सम्यग् आराध्य प्रान्ते मोक्ष-
सुखं लेभे । किं च येन पूर्व स्त्रीसङ्गादिजन्यरसानुभवः कृतः
को जनः विपुलजधनां स्त्रियं परिहतु समर्थ: स्यात् । अपितु
कोऽपि नेति-आर्द्रकुमारोऽपि न प्रियां तत्याजेति यत् तदु-
चितमेवेति भावः । जिनमितान् वत्सरान इत्यत्र, "काला-
ध्वनो व्याप्तौः (२-२-४२)" इति द्वितीया । मेघदूते च
चतुर्थ चरणे 'विपुलजघनाम्' इत्यस्य स्थाने विवृतजघनाम्
इति पाठो दृश्यते, किन्तु अश्लीलतापरिहारार्थ विवृत पदं
विहाय 'विपुल' पदमिह स्थापितमिति प्रतिभाति ॥४५॥
सम्प्रति स्वाभिप्रायं निगमयति-
सूदकं तप्रिय ! मम वचो मानयित्वा गृहे स्वे,
तारुण्यं वं नय विनयतः प्रार्थ्यमानः प्रियाभिः ।
वर्षाकाले तव विहरतः शर्मकर्ता वनान्तः,
शीतो वायुः परिणमयिता काननोदुम्बराणाम् ॥४६॥
१२
-
अन्वयः-
'हे प्रिय ! तत् सूद मम वचः मानयित्वा. विनयतः
प्रियाभिः प्रार्थ्यमानः त्वम् स्वे गेहे तारुण्यं नय । वर्षाकाले
वनान्तः विहरतः तव 'काननोदुम्बराणां परिणमयिता शीतो
वायुः शर्म कर्ता' इत्यन्वयः ।
1
व्याख्या-
हे प्रिय ! तत् तस्मात् पूर्वोक्तकारणसमुदयात् सूदर्क
शोभनः उदकः उत्तरकालफलं यत्र (आयति स्तूत्तरः कालः,
उदर्क स्तद्भवं फलम्' इति . अभिधान० २:७६) तादृशं
मम कोशाया वचः वचनं मानयित्वा स्वीकृत्य,
विनयतः प्रश्रयेण प्रयाभिः कान्ताभिः प्रार्यमानः
याच्यमानः भोगार्थ प्रवर्त्यमानः त्वं स्थूलभद्रः स्वे निजे
गेहे गृहे तारुण्यं यौवनावस्था नय अतिवाहय । वर्षाकाले
प्रावृषि वनान्तः काननमध्ये विहरतः स्वैर विहारं कुर्वतः
तव भवतः काननोदुम्बराणाम् वनान्तःस्थोदुम्बरफलानां
परिणमयिता परिपाचयिता शीतः शीतलः वायु वातः
शर्म सुखं कर्ता विधाता।
विशेष:-तारुण्यं भोगकालः, स च भोगेनैव नेयः
समागते वृद्धत्वे धर्माचरण विधेयमित्येव क्रमिको मार्गः,
. इति मया यत् कथ्यते तत् तवोत्तरकालेऽपि शुभफलप्राप्तय
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१३ 1 - • एव । साम्प्रतं मम वचनेन गृहे स्थित्वा प्रियाभिः सह वनमध्ये विहरन् यौवनसुखमेवानुभूयताम् । पश्चात् , चारित्र- मपि आचरिष्यसि चेत् , तदपि सुलभमेव भविष्यति । तारुण्ये तु भोगैराकृष्टश्चेत्पतनाशङ्काऽपि तिष्ठतीति भावः ॥४६॥ पुनमन्त्रिपदस्वीकारायैव प्रेरयति- अङ्गीकृत्य प्रियतम ! महामात्यमुद्रां सुभद्रां, सान्द्रानन्दं कुरु निजपति नन्दनामानमेनम् । भूर्याद भूयस्तव जनकवत् शत्रुतृण्यावलीना- मत्यादित्यं हुतवह ! मुखे संभृतं तद्धि तेजः ॥४॥ अन्वयः- - हे प्रियतम ! सुभद्रां महामात्यमुद्राम् अङ्गीकृत्य नन्द- नामानम् एनम् निजपतिम् सान्द्रानन्दं कुरु हे शत्रुतण्या- वलीनां हुतवह ! तव मुखे जनकवत् अत्यादित्यं संभृतम् तत् तेजः भूयः भूर्यात्' इत्यन्वयः। व्याख्या- हे प्रियतम ! प्रियेषु मध्येऽत्यन्तं प्रिय ! सुभद्रां सुमङ्गलमयीम् महामात्यमुद्राम् महामात्यस्य प्रधान- मन्त्रिणः मुद्रां चिह्नस्वरूपां मुद्रिकाम् अङ्गीकृत्य स्वीकृत्य नन्दनामानम् नन्दाख्यम् एनम् पूर्वचर्चितं निजपतिम स्वस्याधीश्वरं सान्द्रानन्दं सान्द्रः गाढः आनन्दः प्रमोदो यस्य तादृशं कुरु विधेहि । हे शत्रुतण्यावलीनां हुतवह ! तृणानां समूहः, तृण्या शत्रवः तृण्या इवेति शत्रुतृण्या तासाम् आवलिः समूहः, तासां कृते हुत्यहः वह्निः इव तदामन्त्रणम् , तव भवतः मुखे आनने जनकवत तव पितृवत् अत्यादित्यम् आदित्यमतिक्रान्तम् इति तादृशम् संभृतम् पुजीभूतम् तत् प्रसिद्धं तेजः प्रतापः भूयः पुनरपि भूर्यात धृतं भूयात् । धारणार्थकस्य भृगक सप्तम्या रूपम् भूर्यादिति । विशेष:-मन्त्रित्वे स्वीकृते तव मुखे तादृशं तेजो, भास्यति येन शत्रवो भृशं भीता भविष्यन्तीत्यतो मन्त्रित्व- मवश्यं स्वीकरणीयम् । मेघदूतेऽत्रत्यश्चतुर्थचरणोऽन्यार्थका इह च प्रकृतोपयोगितया तत्रत्यं 'हुतवह मुखे' इति समस्तं पदं विभज्य सङ्गमितम् । 'शत्रुतृण्यावलीनां हुतवहः' इत्यत्र रूपकालङ्कारः ॥४७॥ अथ पूर्व भोजनाय प्रार्थयते-- क्षामं कामं तव वपुरभूत् तत्र तीनै स्तपोभि- भक्त्या क्लृप्तं प्रियतम ! मया भोजनं तत् कुरु प्राक् । दक्षा नाट्ये जितसुरवधूनर्तकीमर्दलानां, पश्चादद्रिग्रहणगुरुभिर्गजितैर्नर्तयेथाः ॥४॥ - अन्वय- हे प्रियतम ! तत्र तीव्र तपोभिः तव वपुः कामम् क्षामम् अभूत् , तत् प्राक् मया भक्त्या क्लृप्तं भोजनं कुरु । पश्चात् मर्दलानाम अद्रिग्रहणगुरुभिः गर्जितैः नाट्ये दक्षा जितसुग्वधः नर्तकीः नर्तयेथाः' इत्यन्वयः । : व्याख्या- हे प्रियतम! तत्र गुरुसमीपे तीन अतिकठोरैः तपोभिः कायक्लेशादिनियमैः तव भवतः वपुः शरीरम् कामम् अत्यन्तम् क्षामम् कृशम् अभूत् , तत् तस्मात् प्राक् पूर्व मया तव प्रियया कोशया भक्त्या श्रद्धया क्लृप्तं सम्पादितम् भोजनम् अशनम् कुरु विधेहि पश्चात मर्दलानाम मृदङ्गानाम् अद्रिग्रहणगुरुभिः अद्रेः क्रीडापर्वतगुहायाः ग्रहणेन स्वान्तः पूरणेन गुरुभिः वृद्धि गतैः गर्जितैः शब्दः, नाट्ये नट-क्रियायाम् दक्षाः पट्वीः जितसुरवधूः जिताः रूपादिभिरधः कृताः सुरवध. देववनिता याभिः ताः नर्तकोः नर्तनशिल्पिकाः नर्तयेथाः नर्तनाय प्रेरयेथाः। भोजनान्तरम् - विशेषः-स्वस्थे चित्ते बुद्धयः संस्फुरन्ति' इति न्यायेन चित्तस्वास्थ्यं पूर्वमपेक्षितम् , क्षीणे च शरीरे चित्तस्वास्थ्य- -मसंमवि, तव वयु श्च तपसा बहुपरिक्षीणमिति वपुपः पोषणाय ६६ - .. पूर्व भोजनमपेक्ष्यते, मया च पूर्वमेव त्वदर्थं श्रद्धया भोजन सम्पादितमिति तदुपयुज्य पश्चान्मनसो रञ्जनाय स्वयमारब्ध- मृदङ्गवाधः तदनुसारिणी दक्षा ततकी नर्तयेथाः। अद्रिग्रहणंगुरुभिरित्यत्र काव्यलिङ्गमलङ्कारः ॥४८॥ पुण्यार्थमेव तपोऽभीष्टं तच्च पुण्यमन्यथापि सम्पाद्य- मित्याह-- पुण्याय त्वं स्पृहयसितरां तत् परं नोपकारात्, स स्यात् प्रायः प्रियंवर ! सरःकूपवापीविधानः ? कुःश्रेयः प्रतिदिनमिदं तद् गृहस्थोऽपि लुम्पन्, स्रोतोमूल् भुवि परिणतां रन्तिदेवस्य कीर्तिम् ।।४।। अन्वयः- 'त्वं पुण्याय स्पृहयसितराम् , उपकारात् परं तत् न, हे प्रियवर ! स प्रायः सर: कूपापीविधानः स्यात् । तद् गृहस्थः अपि इदं श्रेयः प्रतिदिनं कुर्याः, कि भूतः १ स्रोतो- मृा भुवि परिणतां रन्तिदेवस्य कीर्तिम् लुम्पन्' इत्यन्वयः। व्याख्या- त्वं भवान् पुण्याय श्रेयः साधनाय स्पृहयसितराम् अत्यन्तं स्पृहां करोषि, उपकारात् परोपकरणात् परं उत्कृष्टं तत् पुण्यं न नास्ति, हे प्रियवर ! स परोपकारः प्रायः बाहुल्येन सरःकूपवापीविधानैः सरसां कूपानां - वापीनां च सम्पादन स्यात्, तत् तस्मात् गृहस्थः स्वगृहे स्थितः, गाय स्थ्यमनुतिष्ठन् अपि इदं परोपकाररूपं श्रेयः पुण्यं कल्याणं वा प्रतिदिनम् दिने दिने कुर्याः विधेया:, ( किम्भूतः सन् ) स्रोतोमूर्त्या चर्मण्वतीनदीप्रवाहरूपेण भुवि पृथिव्याम् परिणताम् फलिताम् रन्तिदेवस्य एतनाम्नः पौराणिकस्य राज्ञः कीर्तिम् ख्याति लुम्पन् विलोपयन् । विशेषः-तपसा पुण्यमेव स्पृहयसीति निश्चितम् . ! पुण्यस्य च न केवलं तप एव साधनम् , परोपकारः पुण्येषु प्रथितः, उक्तं हि केनचित्- "अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् । परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम् ।।" इति । परोपकारश्च निर्जले प्रदेशे सरः कूपादीनां विधानाद् भवति । तच्च भवता गृहस्थेनापि प्रतिदिन कतु शक्यत इति गृहस्थत्वमेव धर्मकामोभयसाधकमाश्रयणीयम् । सर: कूपादि विधानैश्च चर्मण्वती नदी प्रवर्तकस्य रन्तिदेवस्य राज्ञः कीतिरप्यधिका कीर्ति स्तव भविष्यतीति भावः ॥४६॥ अस्य पित्रा कृतां कीर्ति श्रावयति- यं तातस्ते पुरहितकृतेऽकारयच्छिल्पिसारैः, प्राकारं तं स्फटिकघटितं नाथ ! पश्याभ्रलग्नम् । ।
१८ he - 7 vy 4 यं वीक्षन्ते दिवि दिविषदो नीलवेषायुतं श्रा- गेकं मुक्तागुणमिव भुवः स्थूलमध्येन्द्रनीलम् ॥५०॥ अन्वयः- 'ते तातः यं शिल्पिसार पुरहितकृते अकारयत् , नाथ ! स्फटिकघटितं अभ्रलग्नं तं प्राकारं पश्य, नीलवेषायुतं यं दिविषदः दिवि स्थूलमध्येन्द्रनीलम् भुवः एकं मुक्तागुण इव श्राक् वीक्षन्ते' इत्यन्वयः । व्याख्या- ते तव तातः जनक शकटालो मन्त्री यं प्राकारम् शिल्पिसारैः शिल्पिनां गृहादिनिर्माणकुशलानां सारैः मुख्यैः पुरहितकृते नगररक्षार्थम् अकारयत् निरमापयत् , हे नाथ ! स्फटिकवटितम् स्फटिकेन तन्नामकमणिना घटितं चितम् अभ्रलग्नम् मेघपर्यन्तोन्नतम् तम् उक्त रूपम् प्राकारम् प्राचीरं पश्य अवलोकय; नीलवेषायुतम नीलया वेषया पण्यवीथ्या युतं सहितं यं प्राकारं दिविषदः दिवि स्वर्गे सीदन्ति निवसन्तीति ते देवाः दिवि आकाशे (स्थिताः सन्तः), स्थूलमध्येन्द्रनीलम् स्थूलः मध्यस्थितः इन्द्रनीलः तन्नामको नीलवर्णो मणिः यस्य तादृशम् भुवः पृथिव्याः एकम् मुक्तागुणम् मौक्तिकनिर्मितां मालाम् इव यथा श्राक् झटिति वीक्षन्ते अवलोकयन्ति । .
१६ विशेषः-तब पिता पुररक्षार्थ निपुणतरशिल्पिभिः पुरस्यास्य स्फाटिकं प्राकार मध्ये च नीलवर्णा पण्यवीथी मकारयते । देवा श्राकाशस्थिताः प्राकारं पुरस्य परितः स्थितं मौक्तिकहारं नीलो पण्यवीथीं च तन्मध्यस्थितां, मौक्तिक- हारमध्यस्थित महेन्द्रनीलमणिमिव पश्यन्तीत्यर्थः । उत्प्रेक्षा- लङ्कारः । प्राकारः पुक्तागुणत्वेन तन्मध्यस्थिता नीला. पण्य- वीथिश्च महेन्द्रनीलमणित्वेनोत्प्रेक्ष्यते । एवञ्च त्वत् पितेदृशी कीर्तिमकरोत् त्वयापि मन्त्रित्वं स्वीकृत्य काचिदद्भुतो कीर्तिः करणीयेति कोशाया अभिप्रायः । अत्र 'वेपा' शब्दोऽप्रसिद्धः 'वेषो वैश्यजनालय इति कोशानुसार वैश्य- जनालये पण्यस्थाने प्रसिद्धः स एव कल्पितः स्त्रीत्वेन पाय- विथ्यामिह प्रयुक्त इति प्रकल्प्यैवं व्याख्यातम् ।।५०॥, सम्प्रति तव तपो योग्याऽवस्था नेत्याह- कामो वामं रचयतितरां यौवने नाथ ! चित्तं, योगाभ्यासोद्यतमतिभृतां योगिनामप्यवश्यम् । अङ्गीकुर्या वयसि चरमे पात्री कुर्वन् दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम् ॥५१॥ धर्मभेदानतः स्वं, २०० अन्वयः हे नाथ ! कामः योगाभ्यासोद्यतमतिमृतां योगिनाम् अपि चित्तं यौवने वामं अवश्यं रचयतितराम् , अत: चरमे वयसि स्वं दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम् पात्री कुर्वन धर्म- भेदान् अङ्गीकुर्याः । व्याख्या- हे नाथ ! स्वामिन् ! कामः कन्दर्पः योगाभ्यासो- द्यतमनिभृतां योगाभ्यासाय समाधिसेवनाय उद्यतां तत्परां मतिं विभ्रति इति योगाभ्यासोद्यतमतिभृतः तादृशानाम् योगिनाम् चित्तवृत्तिनिरोधकृताम् अपि चित्तम् अन्तः- करणम् यौवने तारुण्ये वामं योगाभ्यासप्रतिकूलं रचयति- तराम् अत्यन्तं विदधाति, अतः अस्मात् कारणात् चरमे चतुर्थे वयसि वृद्धावस्थायाम् स्वम् आत्मानम् दशपुर- वधूनेत्रकौतूहलानाम् दशानां बह्वीनां पुरवधूनाम् पौर- वनितानां नेत्राणां कौतूहलानाम् कौतुकानां पात्रीकुर्वन् विषयतां प्रापयन , अन्यत्र दशपुरवधूनां जनपदविशेष- वासिवनितानाम् इति व्याख्या धर्मभेदान् सुकृतविशेषान् अङ्गीकुर्याः आचरे॥ विशेषः-यौवने तपसे उद्यतस्य तव चित्ते कामेन वामतां नीते आरूढ पतितत्व योग्यता, अतः भोगस्पृहां .
१२१ पूरयित्वा चरमे वयसि तपसे प्रव्रजन्तं भवन्तं पुरवध्वः सादर- मीक्षिष्यन्त इति तात्पर्यम् ॥५२॥ पुनमन्त्रित्वस्वीकारायैव प्ररोचयति-- औदासीन्यं मरिहर ततः साम्प्रतं कातराहें, निश्चिन्तं तं कुरु निजपति रिवारं विजित्य । युद्धे किं न स्मरसि धनवद् वैरिणां ते पिता य- द्धारापात स्त्वमिव कमलान्यभ्यवर्षद मुखानि ?॥५२|| . अन्वयः- 'ततः कातराहम् औदासीन्यं साम्प्रतं परिहर, वैरिवार विजित्य तं निजपतिं निश्चिन्तं कुरु, त्वं किं न स्मरसिं यत् ते पिता युद्ध कमलानि इव वैरिणी मुखानि धारापातैः घनवत् अभ्यवर्पत्' इत्यन्वयः। व्याख्या:- ततः तस्माद् हेतोः कातराह कातरेषु भीरुषु हति औचित्यं भजते इति तादृशम् औदासीन्यम् उदासीनो मध्यस्थः तस्य भावः औदासीन्यम् , उपेक्षां साम्प्रतम् अस्मिन् समये परिहर परित्यज्य, वैरीवारं वैरिणां शत्रणां वारं समूह (सङ्घाते प्रकरौधवारनिकर व्यूहा० ० अभि०६-४७) १०२ । H विजित्य अभिभूय तं पूर्वोक्तं निजपतिं स्वस्वामिनं नन्द निश्चिन्तम् शत्रुसमुद्भूत चिन्तारहितं कुरु विधेहि । त्वं भवान् किं न स्मरसि कुतो न चेतयसे यत् ते तव पिता जनकः युद्ध संग्रामे कमलानि पद्मानि इव यथा वैरिणां शत्रूणां मुखानि आननानि धारापातैः खड्गादिधारा प्रहारैः घनवत् मेघवत् अभ्यवर्षत् असिञ्चत् । विशेषः--यदिदं त्वयि सर्वविषयेषु औदासीन्यं दृश्यते तन्न तव योग्यम् , भीरव एवैवं कुर्वन्ति ये किमषि कतु मनीशाः, त्वं तु शूरः सर्वस्मिन् कर्मणि युज्यसे इति त्वयीद मौदासीन्यं न घटते । ततश्च शत्रुविषयेऽप्युपेक्षां त्यक्त्या शत्रुसमूहं विजित्य नन्दस्य चिन्तां नाशय । तव पिता तादृशो योद्धाऽऽसीत् यत् मेघो यथा कमलानि वारिधारा- पातैः सिञ्चति तथा चैरिणां मुखानि खड्गादिधारापातै- रमिञ्चत् । एवं त्वमपि च नन्दनराजशत्रुषु स्वपौरूपं प्रकटयेति भाव: ।। ५२ ॥ तपोलभ्यानि सुकृतानि गाईस्र्थेऽपि सुभलानि बन्धु- पालन यशश्च तत्राधिकमित्याह- सीदन्तं किं सदयहृदयोपेक्षसे बन्धुवर्ग, वाञ्छन् शुद्धिं त्वमिह विविधैर्दुस्तपै स्तै स्तपोभिः? । L १०३ दत्तैः पात्रे सततममले गेहिधर्मे स्ववित्त- रन्तः शुद्धस्त्वमपि भविता वर्णमात्रेण कृष्णः॥५३॥ H + अन्वयः- 'हे सदयहृदय ! विविधैः दुस्तपैः तैः तपोभिः सिद्धि वाञ्छन् त्वम् इह सीदन्तं बन्धुवर्ग किम् उपेक्षसे, गेहिधर्म (स्थितः) अमले पाने सततं दत्तेः स्ववित्तैः अन्तः शुद्धः अपि त्वं वर्णमात्रेण कृष्णः भविता' इत्यन्वयः । r . व्याख्या हे सदयहृदय ! दयया परदुःखापहरणेच्छया सहित सदयम् तादृशं हृदयम् अन्तःकरणं यस्य तदामन्त्रणम् , विविधै. बहुप्रकारे दुस्तपैः दुःखेन तप्तु योग्यः तपोभिः मनोवाक कायसंयमैः सिडिम् अणिमाद्यैश्वर्यप्राप्तिम् वान्छन् कामयमानः त्वम स्थूलभद्रः इह लोके सीदन्तं त्वद् वियोगेन त्वत् प्रदत्त संरक्षणालाभेन वा कष्टमनुभवन्तम् बन्धु वर्गम् वान्धवसमूहम् किम कुतो हेतोः उपेक्षसे अबधीर- यसि ? गेहिधर्मे गेहमस्य विद्यते इति गेही गृहस्थः तस्य धर्मे कर्तव्ये वन्धुरक्षादिरूपे ( स्थितः ) अमले निष्कल के पात्रे दानोद्देश्ये सततं प्रतिदिनं दत्ता वितीर्णैः स्ववित्तः स्वोपार्जितद्रव्यैः : अन्तः आत्मनि शुद्धा निर्मलः अपि त्वम वर्णमात्रेण शरीररूपमात्रेण कृष्णः मलिनः भविता स्थाता।
१०४ . विशेषः-सुकृतार्जनस्य आत्मशोधनस्य वा द्वो मागौं तपोऽनुष्ठानम् , गृहस्थधर्मपालनपूर्वकं सुकृतानुष्ठानं चेति । तत्र प्रथमो मार्गः कण्टकाकीर्णः कायक्लेशादिजनको बन्धूपेक्षारूपकरतायुक्त श्व, द्वितीयः सकलबन्धुमनोभिलषित- पूरणपूर्वकं सुखानुभवेन साकं सुकृतोत्पादक आत्मशोधक- श्चेति सति:सरले सुखकरे मार्गे किमिति कठिनेन.मार्गेण गन्तव्यमिति गृहे स्थितिरेव श्रेयसीति भावः ॥ ५३॥ स्वकीयं पूर्वभोगानुभवं स्मारयन्ती गणोक्तिब्याजेन स्वाभिप्रायमाह- रन्त्वाऽऽवाभ्यां चिरमुपवने जातगात्रश्रमाभ्यां, सस्ने यत्र प्रिय ! कलजला स्वधु नी भाति सेयम् । मुक्त्वा मां किं भ्रमसि भुवि येतीव फेनेहंसन्ती, शम्भोः केशग्रहणमकरोदिन्दुलग्नोमिहस्ता ॥५४॥ - अन्वयः- . . हे प्रिय ! चिरम् उपवने रन्त्वा जातगात्रश्रमाभ्याम् आवाभ्याम् यत्र सस्ने, कलजला स्वधुनी भाति । या मां मुक्त्वा भुवि किं भ्रमसि इति फेनैः हसन्ती इव इन्दुलग्नो- मिहस्ता शम्भोः केशग्रहणम् अकरोत्' इत्यन्वयः ।
१०५
-
च्याख्या
हे प्रिय ! चिरम् बहुकालपर्यन्तम् उपवने क्रीडोद्याने
रन्त्वा सुरतादिक्रीडामनुभूय जातगांत्रश्रमाभ्याम् जातः
उत्पन्नः गात्राणां श्रमः शैथिल्यं ययो स्तथाभूताभ्याम्
आवाभ्याम् मया त्वया च यत्र यस्यां गङ्गायां सस्ने
म्नानं विहितं, कलजला कलम् अव्यक्तमधुरशब्दयुक्तं
जलं तोयं यस्याः तादृशी सा इयम् प्रत्यक्षदृश्यमाना
स्वधुनी देवनदी गङ्गा भाति शोभते । या गङ्गा "मां
गङ्गां मुक्त्वा विहाय भुवि पृथिव्याम् इतस्ततः कि
भ्रमसि कुतश्चरसि" इति एवम् (सूचनाय) फेनैः प्रसिद्धैः
श्वेतद्रव्यैः (कृत्वा) हसन्ती उपहासं प्रकटयन्ती इव इन्दु-
लग्नोमिहस्ता इन्दुलग्नाः चन्द्रपर्यन्तं प्रसृताः ऊर्मयः
तरङ्गा एव हस्तौ करौ यस्याः तादृशी सती शम्भोः शिवस्य
केशग्रहणम् कचाकर्षणम् अकरोत् पूर्वं कृतवती ।
विशेषः-इयं गङ्गा ते चिरपरिचिता यत आवाभ्याम्
उपवनरतिक्रीडा श्रान्ताभ्यामस्यामेव सदा स्नान विधीयते
स्म । इयमपि च स्वप्रियं शिवमेकाकि विहारिण तादृशकर्मणी
निवारयन्ती स्वाधीन पतिकेव केशेषु धृत्वेव हसन्तो वदतिस्म ।
अत्र शम्भोः शिरसि स्थितायाः फेनधवलाया गङ्गायाः
केशग्रहणमुत्प्रेक्ष्य इत्युत्प्रेक्षालङ्कारः । अनया च योऽभिप्रायः
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१०६ - स्वप्रियं प्रति प्रकटितः स एव ममाभिप्रायोऽपि प्रियेण भवता विज्ञेयः । अस्ति च परम्पराप्राप्तोऽयमधिकारः प्रियवनितानां यतः स्वप्रियमन्यत्र विहारिणं बलादपि निवारयेयुरिति कोशायाः अभिप्रायः ॥ ५४॥ गङ्गाविहारार्थ प्ररोचयति- अस्यां शस्याशय ! यदि भवान् नीरकेलिं प्रकुर्याद, युक्तस्ताभिः प्रिय ! सह मया मदयस्याभिराभिः । धौतैरासां मृगमदभरैः कजलैर्वा तदेषा, स्यादस्थानोपगतयमुनासङ्गमेवाभिरामा ॥५५॥ अन्वय:- हे शस्याशय ! भवान् , ताभिः आभिः मद्वयस्याभिः सह मया युक्तः यदि अस्यां नीरकेलि प्रकुर्यात् , तद् एषा आसां धौतैः मृगमदभरी कज्जले वा अस्थानोपगतयमुना सङ्गमा इव अभिरामा स्यात्' इत्यन्वयः । . व्याख्या- हे शस्याशय ! शस्वः प्रशंसनीय आशयः हृदयाभि- प्रायो यस्य तदामन्त्रणम् भवान् स्थूलभद्रः ताभिः पूर्वा- नुभूतामिः आमिः सम्प्रत्यपि तव समक्षं स्थिताभिः मद्य- १०७ स्याभिः मम सहचरीभिः सह मिलितय मया कोशया युक्तः मिलितः सन् यदि चेत् अस्यां गङ्गायाम् नोरकेलि जलविहारं प्रकुर्यात् विदध्यात् तद् तर्हि एषा गङ्गा आसाम् मत्सहितानां मम सहचरीणाम् धौतैः क्षालितैः मृगमदभरैः स्तनादिस्थितैः कस्तूरिकासमूहैः कज्जलैः नेत्रस्थितैरञ्जनैः वा ( युक्ता) अस्थानोपगतयमुनासङ्गमा इव अस्थाने प्रयागातिरिक्ते देशे उपगतः प्राप्तः यमुनया कालिन्दया मह सङ्गमः सन्निधानं यया सा इव अभिरामा मनोहरा स्यात् भवेत् । विशेषः-प्रयागे गङ्गा-यमुनयोः सङ्गमः प्रसिद्धः, इह पाटलिपुत्रे च मद्वयस्यानां मम च भवता सह जलक्रीडा कुर्वतीनां स्तनादिप्रदेशलिप्ते मृगमदभरे नेत्रस्थिते कज्जले च क्षालिते जलस्य नीलवर्णता सम्पत्तौ अस्थाने एवेयं गङ्गा नीलजलया यमुनया सङ्गता मनोहरा दृश्यते इति प्रतीतिः स्यात् तथा चेदृशशोभासम्पादनाय भवता जलक्रीडा विधेयेति भावः । अत्राप्युत्प्रेक्षालङ्कारः ॥ ५५ ॥ जलक्रीडाकालिकं विशेषमाह- क्रीडां तत्र त्वयि रचयति प्रीतचित्ते नितान्तं, स्वर्णोच्छृङ्गीनिहितसलिलक्षेपणा~विनोदैः । ।
१०८ t रोधः तुराणं तब हयखुरैर्लप्स्यते नाथ ! तस्याः, शोभा शुभ्रत्रिनयनवृषोत्खातपङ्कोपमेयाम् ॥५६॥ अन्वयः- 'तत्र नितान्तं प्रीतचित्ते त्वयि स्वर्णोच्छृङ्गीनिहित- सलिलक्षेपणाद्यैः विनोदैः क्रीडां रचयति (सति) हे नाथ ! तव हयखुरैः क्षुण्णं तस्याः रोधः शुभ्रत्रिनयनवृषोत्खात- पङ्कोपमेयाम् शोभा.लप्स्यते' इत्यन्वयः । . ? व्याख्या- । - तत्र गङ्गायाम् नितान्तम् अत्यन्तम् प्रीतचिते प्रसन्न मनसि त्वयि भवति स्वर्णोच्छृङ्गोनिहितसलिल. क्षेपाणाद्यैः स्वर्णस्य कनकनिर्मिता या उच्छृङ्गी शृङ्गाकारा- तोयक्षेपणी तस्यां निहितस्य स्थापितस्य सलिलस्य जलस्य क्षेपणं स्त्रीणामुपरि प्रक्षेपणम् आद्यं प्रथमं यत्र तादृशैः विनोदैः मनोरजनैः क्रीडां जलकेलिं रचयति विदधति ( सति ) हे नाथ ! तव भवतः यखुरैः अश्वपादाः क्षुण्णं मर्दितं तस्याः गङ्गायाः रोधः तटम् शुभ्रत्रिनयन- वृषोत्खातपङ्कोपमेयाम् शुभ्रण श्वेतेन त्रिनयनस्य शिवस्य वृषेण वृषभेण उत्खातेन उत्पाटितेन पकेन कर्दमेन उपमेयाम् उपमातु योग्याम् शोभाम् कान्ति लप्स्यते प्राप्स्यति ॥
१०६ - विशेषः-यदा त्वं तत्र क्रीडा निरतो भविष्यसि तदा तटस्थित्तै स्तवाश्च गङ्गाया सेधः क्षुण्णं सत् हिमालये शिववृषेण रोधसि विहरता तटस्य उत्वाते सति या शोमा मवति तादृश्येव शोभा स्यादिति ॥५६ ॥ युक्त्यन्तरेण पुनरपि गृहस्थितये प्रेरयति- धर्मेष्वाद्यामिह खलु दयामादिदेवो जगाद, प्रोझन्नेतां निजपरिजने वेत्सि धर्म न सम्यक् । सीदन्तं तन्निजजनममु पालय स्वार्जितैः स्वै- रापन्नार्तिप्रशमनफलाः संपदो छु त्तमानाम् ॥५७|| अन्वयः- 'इह आदिदेवः धर्मेषु आद्यां दयाम् जगाद, निजपरिजने एतां प्रोज्झन् धर्म सम्यक् न वेत्सि, तत् सीदन्तं निजजनं स्वार्जितैः स्यैः पालय, हि उत्तमानां सम्पदः आपन्नार्ति प्रशमनफला:' इत्यन्वयः। - व्याख्या-- । इह संसारे आदिदेवः (अस्यामवसर्पिण्यां ) प्रथम- तीर्थङ्करः श्रीऋषभदेवः धर्मेषु सर्वेषु सुकृतेषु आद्यां प्रथमां प्रधानो वा दयां भृतकरुणां जगाद प्रोवाच । निजपरिजने
११०
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स्वानुजीविवर्गे एतां दया प्रोज्झन् त्यजन् ( त्वम् ) धर्म
सुकृतम् सम्यक् समीचीनरूपेण न ऐत्सि नैव जानासि ।
तत् तस्मात् कारणात् सोदन्तम् दुःस्थितं निजजनं
स्वानुजीविजनं स्वाजितः निजोत्पादितः स्वः वित्तैः पालय
रक्षय, हि यतः उत्तमानां महतां जनानां सम्पदः धनानि
आपन्नार्तिप्रशमनफलाः आपन्नानां आपत्पतिताना आतः
पीडायाः प्रशमनं नाशनमेव फलं यासां तथा भृतः
भवन्तीति शेषः ॥
विशेष:-धर्मार्थी त्वं गृहजनं परित्यज्य प्रव्रजसि चेद्
त्वया विना-सीदन्तस्तव परिजना विनंक्ष्यन्ति, ततो दया
श्रीऋषभजिनादिदेवोक्तं मुख्य धर्ममवेक्ष्यैषु परिजनेषु दयां
कुरु, स्वोपार्जितेन धनेनैतान् पालय, एतदेव च सम्पदः
फलमिति भावः ॥ ५७ ॥
न केवलं निजपरिजनरक्षार्थमेव, अपि तु स्वपितृसुहदा-
मपि हिताय मन्त्रित्वं स्वीकरणीयमेव भवतेत्याह-
श्रासाद्यदं निजपितृपदं पालपियप्यत्यसौ नो,
नूनं चित्ते सचिवसुहृदो ये विचार्येति तस्थुः ।
प्राप्ते दीक्षां भवति बत ! तानाक्रमिष्यन्त्यमित्राः,
के वानस्युः परिभवपदं निष्फलारम्भयत्नाः?॥५॥
अन्नप:- 'ये सचिवसुहृदः "असौ इदं निजपितृपदम् आसाद्य नः नूनं पालयिष्यति" इति चित्ते विचार्य तस्युः, भवति दीक्षा प्राप्ते तान् अमित्राः आक्रमिष्यन्ति बत ! वा निष्फलारम्भ- यत्नाः के परिभवपदं न स्युः' इत्यन्वयः। व्याख्या- ये अनाख्येयनामानः सचिवसुहृदः सचिवस्य मन्त्रिणः ( तव पितुः ) सुहृदः मित्राणि-हितचिन्तकाः 'असौ स्थूल- भद्रः इदं सम्प्रति तस्य पित्रा अधिष्ठीयमानं निजपितृपदं निजस्य पितुः शकटालमन्त्रिणः पदम् स्थानम् आसाद्य प्राप्य नः अस्मान् नूनं निश्चितं पालयिष्यति रक्षिष्यति' इति एवं चित्ते स्वहृदये विचार्य निश्चित्य तस्थुः तव पितुः हितचिन्तने एव स्थिता बभुवः, भवति त्वयि दीक्षां चारित्रं प्राप्ते याते सति तान् सचिवसुहृदः अमित्राः शत्रवः ( तव पितृवैरिणः) आक्रमिष्यन्ति अभिभविष्यन्ति बत ! इति खेद, एतच्चार्थान्तरन्यासालङ्कारेण समर्थयति-वा अथवा निष्फलारम्भयत्नाः निष्फला परि- णामे विपरीतः आरम्भस्य क्रियायाः यत्नः येषां तादृशाः के जनाः परिभवपदं परिभवस्य परकृतानिष्टस्य पदं स्थान न स्युः न भवेयुः, अपि तु भवेयुरेवेति काकुः । - ११२ " विशेष-सम्प्रति अयं प्रधानामात्यः, पश्चादपि अस्य मुयोग्यः पुत्र एवैतत्पदमासाद्यास्मान् पालयिष्यत्येवेति स्वचित्ते स्थिरीकृत्य ये जना स्तवें पितुः सौहार्दमन्वतिष्ठन्, ते साम्प्रतं तव पितरि स्वर्गते त्वया च दीक्षायां स्वीकृताया, पालकविकलाः तव पितुः जनाः शत्रुभिरभिभूता भविष्यन्ति । तेषां रक्षार्थमपि त्वया मन्त्रित्वं स्वीकरणीयमेवेति कोशाया अभिप्रायः॥५८॥ मुक्तये व्रतमेव न कारणं, वतिनोऽपि पतन्ति गृहस्था अपि मुच्यन्ते इत्याह- मा जानीष्व त्वमिति मतिमन् ! यद् व्रतेनैव मुक्ति- लेंभे श्वभ्र व्रतमपि चिरं कण्डरीकः प्रपाल्यं । गार्हस्थ्येऽपि प्रिय ! भरतवद्वीतरागादिदोषाः, संकल्पन्ते स्थिरगुणपदप्राप्तये श्रद्दधानाः ॥५६॥ 2 । अन्वयः- 'हे मतिमान् ! त्वम् इति मा जानीष्व यद् व्रतेन एव मुक्तिः, कण्डरीकः चिरं व्रतं प्रपाल्य अपि श्वभ्र' लेमे, हे प्रिय ! वीतरागादिदोषाः श्रद्दधानाः गार्हस्थ्ये अपि भरतवत् स्थिरगुणपदप्राप्तये सङ्कल्पन्ते' इत्यन्वयः ।
११३ व्याख्या- हे मतिमन् ? बुद्धिमन् ! त्वम् स्थूलभद्रः इति वक्ष्य माणं मा नहि जानीष्व अवधारय यद् व्रतेन मुनिकृत नियमेन एव केवलं मुक्तिः मोक्षः भवति इति शेषः (यतः) कण्डरीकः एतन्नामा मुनिः चिरं बहुकालं व्रतं मुनिनियम प्रपाल्य अनुष्ठाय अपि श्वभ्र नरक लेभे प्राप्तवान्, (तथा) हे प्रिय ! वीतरागादिदोषाः वीता अपगता: रागादयः आदौ येषां ते राग-द्वेष-क्रोध-लोभ-काम- मात्सर्यादयः दोपाः चित्तविकारा येपां तादृशाः श्रद्दधाना श्रद्धावन्तो जनाः गार्हस्थ्ये गृहस्थजीवने सन्तः अपि भरतवत् सुप्रसिद्ध भरतवत् स्थिरगुण पदप्राप्तये स्थिराः निश्चला गुणाः शमादयो यत्र तादृशं यत्पदं कैवल्यं तस्य प्राप्तये लाभाय सङ्कल्पन्ते समर्था भवन्ति । विशेषः--मुक्तिप्राप्तौ गृहत्यागो न कारणम् , किन्तु रागादिदोष परित्याग एव । रागादौ स्थिते त्यक्तगृहा अपि पतन्ति, गगादि रहितश्च गृहस्थः सन्नेव रागादि- परित्यागान् मुक्ति प्राप्तुं शक्नोपि । कण्डरीकस्य आरूढ- पतितत्व भरतस्य च जीवन्मुक्तत्वं सर्वजनप्रसिद्धमेवेति ॥५६॥ . सङ्गीतविनोदाय प्रेरयति- ११४ क्रीडाशैलं प्रिय! भज निजं तं विनोदाय यस्मिन , शब्दायन्ते मधुरमनिशं कीचका वायुयोगात् । नादज्ञस्याऽलमिव तव सत्किन्नरीगीतनृत्यैः, सङ्गीतार्थो ननु पशुपते स्तत्रभावी समग्रः ॥६॥ अन्वयः- 'हे प्रिय ! तं निजं क्रीडाशैलं विनोदाय भज, यस्मिन् कीचकाः वायुयोगात् · अनिश मधुरं शब्दायन्ते । तत्र सत्- किन्नरीगीतनत्यैः पशुपतेः इव नादज्ञस्य तव समग्रः सङ्गीतार्थः अलं भावी ननु' इत्यन्वयः । व्याख्या- हे प्रिय! तं प्रसिद्धं निजं स्वीयं फोडाशैलं क्रीडार्थ निर्मित पर्वतं विनोदाय आनन्दाय भज आश्रय, यस्मिन् पर्वते कीचकाः सच्छिद्रवंशाः वायुयोगात् अनलस्य छिद्रे प्रवेशात् अनिशं सर्वदा मधुरं प्रियं यथा स्यात् तथा शब्दायन्ते शब्दं कुर्वन्ति, तत्र तस्मिन् पर्वते सकिन्नरी- गीतनृत्यैः सतीनां सुन्दरीणां किम्पुरुषः स्त्रीणां गीतनृत्यैः गीतेन सह नर्त्तनैः पशुपतेः शिवस्य इव यथा नादज्ञस्य नादविषयविशेषज्ञस्य तव भवतः समग्रः सर्वाङ्गपूण: सङ्गीतार्थः तौर्यत्रिकप्रयोजनम् अलं कास्न्न भावी भविष्यति ननु निश्चयेन ।
११५ - - विशेष:-त्वं सङ्गीतप्रियः, इह च क्रीडाशैले स्वभावत एव गीत-नृत्य-वाद्यरूपं तौर्यत्रिकं सङ्गीतं भवति, तथा च वायुपूरिताः कीचकाः वाद्यकार्य कुर्वन्ति किन्नर्यश्च गीतनत्ये विधत्तः, एवं च यथा शिवस्य क्रीडाशैले कैलाशे अनायासेन सङ्गीतं सर्वदा भवति तथा तवापि भविष्यति, शिवोऽपि नादविशेषज्ञस्तथा त्वमपि तद्विशेषज्ञ इति विना प्रयत्नेनैव तव मनोविनोदोऽत्र भावीत्याशयः ॥६० ॥ पूर्वोक्तं क्रीडाशैलं पुनर्विशिनष्टिः- हित्वा स्वादिं जिनपतिमहाचैत्यपूते प्रभूते, स्त्रीभिः सार्धं विवुधनिचया यत्र खेलन्ति नाथ ? । तिर्यग्व्याप्यञ्जनगिरिरिवान श्यामः पादो बलिनियमनाऽभ्युद्यतस्येव विष्णोः॥६१॥ गतो भ्राजते यः, अन्वयः- 'हे नाथ ! जिनपतिमहाचैत्यपूते प्रभूते यत्र विबुध निचयाः स्वाद्रिं हित्वा स्त्रीभिः सार्धं खेलन्ति, तिर्यग्व्यापी अभ्रङ्गतः अञ्जनगिरिः इव यः वलिनियमनाभ्युद्यतस्य विष्णोः श्यामः पाद इव भ्राजते' इत्यन्वयः।
११६ व्याख्या- हे नाथ ! स्वामिन् ! जिनपतिमहाचैत्यपूते जिन- पतीनां जिनेश्वराणां तीर्थङ्कराणां महाचैत्यैः बृहदाभमन्दिरैः पूते पवित्रीकृते प्रभूते अतिशयशालिनि यत्र क्रीडाशैले विवुधनिचयाः देववृन्दाः स्वादि स्वावासभूतं पर्वतं सुमेरुं हित्वा परित्यज्य स्त्रीभिः वनिताभिः साई समं खेलन्ति विहरन्ति, तिर्यग्व्यापी तिर्यग् निरश्चीनरूपेण व्याप्नोति अभिव्याप्य तिष्ठति तच्छीलः अभंगतः मेघपर्यन्तं प्राप्तः अञ्जनगिरिः तन्नामकपर्वतइ व यः क्रीडाशैलः थलि- नियमनाऽभ्युद्यतस्य बलेः तन्नाम्नो दानवराजस्य निमय- नाय संयमनाय अभ्युद्यतस्य तत्परस्य विष्णोः वामनावता- रिणो हरेः श्यामः कृष्णवर्णः पादः चरण इव.भ्राजते शोभते ॥ विशेष:-अयं क्रीडाशैलः ‘शोभया सुमेरुमप्यतिशेते । यतो देवाः सुमेरु विहायात्र खेलनाय स्त्रीभिः सह समा- गच्छन्ति । किश्चायं नीलवर्णप्रस्तरघटितत्वेन तिर्यग्रूपेणा- त्युच्चैः स्थित इति बले नियमनाय ऊर्ध्वाधः क्रमेण प्रसारितो विष्णोः श्यामः पाद इव शोभते । यद्यपि पादसाम्यं पर्वतस्य दुरुपपन्नम् , तथापि समस्यापूरणे यथा कथंचित् सादृश्य- मास्थेयमेव । मेघदूते च गङ्गास्रोतसि जलपानायावनतस्य मेघस्यैवमौपम्यं कृतमिति विज्ञेयम् । ६१ ॥
११७ यदि मदीयावास समीपस्थे क्रीडाशैले न रुचिस्तहि पर्वतीये पिव्ये प्रासादे वसेत्यांह- शैले लीलागृहमिह महत् कारितं तेऽस्ति पित्रा, तस्मिन् वासं कुरुंवर ? चिरं चेति! तवाऽत्र। श्वेतज्योतिः स्फटिकमणिभिनिमितं भ्राजते य- द्राशीभूतः प्रतिदिनमिव त्र्यम्बकस्याट्टहासः॥६२|| अन्वय- हे वर ! चेत् अत्र तब रतिः न (तर्हि) इह ते पित्रा शैले महत् लीलागृहम् कारितम् अस्ति, तस्मिन् चिरं वासं कुरु, स्फटिकमणिभिः निर्मितं श्वेतज्योतिः यद् प्रतिदिनं राशीभूतः त्र्यम्बकस्याट्टहास इव भ्राजते' इत्यन्वयः । व्याख्या- हे वर ! वियते प्रियत्वेन स्वीक्रियते इति चरः तदा- मन्त्रणम् . चेत् यदि अत्र मदागारसन्निकटे क्रीडाशैले तव भवतः रतिः रुचिः न नास्ति (तहिं) इह एतत्समीपस्थे ते तव पित्रा जनकेन मन्त्रिणा शकटालेन शैले पर्वतोपरि महत् सुविशालम् लीलागृहम् विनोदभवनम् कारितं निर्मापितम् अस्ति विद्यते तस्मिन् गृहे चिरं बहुकालं च्याप्य वासं स्थितिं कुरु विधेहि । स्फटिकमणिभिः ११८ स्वनामख्यातरत्नैः निर्मितम् रचितं श्वेतज्योतिः शुक्ल- प्रकाशं यद् गृह, प्रतिदिनं दिने दिने राशीभूतः एकत्रितः त्र्यम्बकस्य त्रीणि अम्बकानि नेत्राणि यस्य स त्र्यम्बका शिवः तस्य अट्टहासः अति महान् हासः अट्टहासः (अट्ट- हासो महीयसिः, अभि० २-२११, मृडोऽट्टहासिन इत्यादिः अभि०।२.१११) शिवस्य हासः प्रसिद्धः स इव यथा भ्राजते शोभते । कविसम्प्रदाये हासस्य श्वेतं रूपं प्रसिद्धम् , शिवश्चा ट्टहासी ख्यातः, तदीयाट्टहासस्य राशिरिवेदं भवनं प्रतीयते इत्युत्प्रेक्षालङ्कारः॥ विशेष:-मदीगृहसमीपस्थे मत्सम्बन्धिनि क्रीडाशैले वासे लोकापवाद भीतस्य ते यदि न रुचिः स्यात् तर्हि पित्र्ये एव पर्वतीव लीलागारे वासं कुरु । सोऽभि महाहमणि- निर्नितः शुक्लरूपेण दीप्यमान स्तवविनोदाय स्यादेव । न मया स्वार्थरतया स्वसमीपस्थितये त्वं प्रार्थ्यसे, मदावासा- दन्यत्रापि स्थित्वा त्वं पितृपदमलकुरु एतावानेव ममाभि- लापः इति कोशया वेश्यया प्रकाश्यते ॥ ६२ ॥ तद्भवनगवाक्षसमीपे स्थितस्यास्य भाविनी शोभा वर्णयति- १९३ स्वय्यारूढे रजतरचितं सारमुच्चैर्गवाक्षं, देहच्छायाजितहरिरुचौ चारु कृत्वा विनोदान् । पश्यत्वेष प्रिय ? परिजनः साधु सौधस्य शोभा- मंसन्यस्ते सति हलभृतो मेचके वाससीव ॥६॥ ? अन्वयः 'हे प्रिय ! देहच्छायार्जितहरिरुचौ त्वयि चारु विनोदान कृत्वा रजतरचितं सारम् उच्चैर्गवाक्षम् आरूढे (सति) एप परिजनः मेचके वाससि अंशन्यस्ते सति हलभृत इव सौधस्य साधु शोमां पश्यतु' इत्यन्वयः । व्याख्या- हे प्रिय ! देहच्छायाजितहरिरुचौ देहस्य शरीरस्य छायया कान्त्या जिता हरेः विष्णोः रुचिः कान्तिः येन ताशे त्वयि स्थूलभद्रे चाह सम्यक् विनोदान विहारान कृत्वा विधाय रजतरचितम् रजते चन्द्र द्रव्येण रचि निर्मितम् सारम् दृढम् उच्चैः प्रोन्नतं गवाक्षं वातायनम् आरूढे अधिष्ठिते ( सति) एष त्वत्सन्निहितः परिजनः सेवकवर्ग मेचके नीले वाससि वस्त्रे अंशन्यस्ते स्कन्धो- . परिस्थापिते सति विद्यमाने हलभृतः बालरामस्य इव यथा शोभा कान्ति पश्यतु अवलोकयतु ।।
१२० विशेषः-श्वेतवर्णोऽयं सौधा रादुपरि स्निग्धकृष्णवर्णे त्वयि एकतः स्थिते सति गौरस्य बलदेवस्य स्कन्धोपरि- स्थितेन नीलवस्त्रेण यादृशी शोभा जायते तादृश्येवास्य सौधस्यापि भविष्यतीत्यभिप्रायः। पूर्णोपमालङ्कारः । देह- च्छायाजितहरिरुचाविति कथनेन स्वस्य प्रीतिय॑ञ्जिता ॥६॥ तत्रत्यं कर्तव्यमाह- तस्मिन्नद्रौ भवभयहरं नाभिजन्मानमीशं, नत्वा देवं तदनु सुभगाऽऽलोकयेः कौतुकानि। श्रायान्त्या मे भवदनु पुनर्वर्त्म कुर्वन् सुगम्यं, सोपानत्वं कुरुमणितटारोहणायाग्रयायी ॥६४॥ A अन्वयः- हे सुभग ! तस्मिन् अद्रौ भवभयहरं देवं नाभिजन्मा- नम् ईशम् नत्वा तदनु कौतुकानि आलोकयेः, पुनः भवदनु आयान्त्या मे सुगम्यम् वमकुर्वन् अग्रयायी मणितटारो- हणाय सोपानत्वं कुरु' इत्यन्वयः। - व्याख्या- हे सुभग ! अस्मिन् पूर्वोक्ते अद्री पर्वते भवभय- हर सांसारिकमीतिनिवारकं देवं नाभिजन्मानम् नाभेः विष्णुनाभिकमलाञ्जन्म यस्यासौ नाभिजन्मा ब्रह्मा तम् अथ १२१ च नाभे स्तन्नाम्नो राज्ञो जन्म यस्य तं नाभेयं आयं जिन- विशेषम् ईशम् ऐश्वर्यशालिनं नत्वा प्रणम्य तदनु प्रणा- मानन्तरम् कौतुकानि तत्रत्याभुतानि आलोकयेः पश्येः। पुन तत्पश्चात् भवदनु भयतः पश्चाद् आयान्त्याः आग- छन्न्याः मे मम कोशायाः सुगम्यम् सुखेन गन्तुं योग्य वर्त्म मार्गम् कुर्वन् विदधत् अग्रयायी अग्रे यातु शीलम- स्येति तथाभूतः मणितटारोहणाय तस्यैव पर्वतस्य मणिभि विहिते तटे प्रान्तमागे आरोहणाय उपरिगमनाय सोपानत्वं निःश्रेणिकाभावं कुरु विधेहि । विशेषः-सर्वत्रादौ देववन्दनमाचरणीयमिति शिष्टा- 'चारपरिपालनाय तत्रैव पर्वते स्थापितं नामेयं श्रीऋपभ- जिनेन्द्र प्रणम्य पश्चाद् भवन्तमनुमरन्त्यो मे सुखेन मणिनट प्राप्तये मार्गस्थं निम्नोन्नतादिप्रदेशं समीकारयन्-मामवल- म्याग्रतो गच्छन् असत्यपि सोपाने भवतैव तत्कर्म सम्पा- दनीयमिति । अनेन स्वस्यावलाभावप्रकटनपूर्वकं स्वाधीन- पतिकात्वगर्वः सूचितः ।। ६४ ॥ तत्रत्यमेव विशेष वर्णयति- शृङ्ग तस्मिन् नयनसुभगं चारुरूपा यदि त्वां, विद्याधर्यः स्मरविधुरिताः प्रार्थयेयुनिरीक्ष्य ।
१२२ अक्षोभ्यस्त्वं सुरयुवतिभि नाथ ! धिक्कारवाचा, क्रीडालोलाः श्रवणपरुषैर्जितैर्भाययेस्ताः॥६५॥ अन्वयः- 'हे नाथ ! तस्मिन् शृगे चारूरूपाः स्मरविधुरिताः विद्याधर्यः नयनसुभगं त्वां निरीक्ष्य यदि प्रार्थयेयुः (तर्हि ) सुरयुवतिमिः अक्षोभ्यः त्वम् धिक्कारवाचां श्रवणपरुषैः गर्जितैः क्रीडालोलाः ताः भाययेः' इत्यन्वयः । व्याख्या- हे नाथ ! स्वामिन् ! तस्मिन् मणिनिर्मिते शृङगे पर्वत शिखरे चारुरूपाः चारु मनोहरं रूपं यामां ताः स्मरविधुरिताः स्मरेण कामेन विधुरिताः पीडिताः विद्याधर्यः विद्याधरदेवजातिवनिताः नयनसुभगं नयनयोः नेत्रयोः कृते सुभगं सुन्दरं त्वां स्थूलभद्रं निरीक्ष्य समवलोक्य प्रार्थयेयुः रत्यर्थं प्रेरयेयुः तर्हि मुरयुवतिभिः देवतरुणिभिः (अपि) अक्षोभ्यः चारित्राद- विचालनीयः त्वम् धिक्कारवाचां तिरस्कारवचसा श्रवण- परुषैः कर्णकटुभिः गर्जितैः उच्चै वचनैः क्रीडालोला लीलाव्यग्राः ताः विद्याधराः भाययेः भीताः कुर्याः ।।
१२३ . विशेषः--तत्र पर्वते विद्याधर्योऽपि विहारार्थमागच्छन्ति, ताश्च सुरूपं त्वां दृष्ट्वा सह क्रीडार्थ प्रार्थयेयुरिति सम्भाव्यते, त्यश्च सुरयुवतिभिरपि न चारित्रात् चालनीयोऽसि, का तवाग्रे तासां गणना, (यद्यपि ता अपि देवयोनि विशेपा स्त्रिय एव, परन्तु मुख्यदेवयोने श्च्युता इति तासामधमत्वमेव सुरयुवत्य- पेक्षयेति विज्ञायैव मुच्यते ) इति ता उच्चैः कटुभिर्वचनै म्तर्जयेरित्युपदिश्यते । यद्यपि गर्जितं मेघादिशब्दविषये एव प्रयुज्यते, मेघदुते च प्रकृतश्चरणो मेधायैवोपदिश्यते, तथापि समस्यापूतौं नैतदनौचित्यमुद्भावनीयमिति ॥ ६५ ॥ पुन स्तत्रत्य विहारप्रकारमेव वर्णयति- यारामेषु प्रिय ! विरचयं स्तत्र पुष्पावचाय, श्रान्तो भ्रान्त्या सुभग विदधद दीर्घिकास्वम्बुकेलिम्। वादित्राणां मधुरनिनदैर्तयन् केकिवृन्दं, नानाचेष्टेजलदललितै निर्विशेस्तं नगेन्द्रम् ॥६६॥ अन्वय: 'हे प्रिय ! सुभग ! तत्र आरामेपु पुष्पावचायं विरचयं भ्रान्त्या श्रान्तः दीर्घिकासु अम्बुकेलिं विदधत् , वादित्राणां मधुरनिनदैः केकिवृन्दं नतयन् , नानाचेष्टैः जलदललितैः तं नगेन्द्र निर्विशेः' इत्यन्वयः ।
१२४ व्याख्या- हे: प्रिय ! हे सुभग !तत्र पितुः पर्वतीयावासे आरामेषु उपवनेषु पुष्पावचायम् पुष्पाणां हस्तप्राप्याणां क्षुद्र वृक्ष- कुसुमानाम् अवचायम् अवचनम् (हस्तप्राप्ये चेरस्तेये .[५-३-७८] इति घनि) अवचायः तं संग्रहं विरचयम् विदधत् भ्रान्त्या भ्रमणेन वहुकालं पादविहारेण श्रान्तः श्रमं प्राप्तः दोर्विकासु वापीसु अम्बुकेलिं जलक्रीडा विदधत् कुर्वन् , वादित्राणां मृदङ्गादिवाद्यानाम् मधुर- निनदैः मधुरैः शब्दैः केकिवृन्दं मयूर समृहं नर्तयन् नृत्यं कारयन नानाचेष्टः नानाबहुविधाः चेष्टाः क्रिया यस्मिंस्तथाभूतैः जलदललितैः जलदवत् मेघवत् ललितः क्रीडितः तं पूर्वोक्तम् नगेन्द्रम् , पर्वत श्रेष्ठं निर्विशः उपभुजैः ।। विशेषः-मेघोऽपि पुष्पाणि संगृह्णाति वर्षासु बहु- पुष्पाणां प्रादुर्भावात् , क्वचित जलाशयात् जलग्रहणसमये केलिमपि 'विदधाति गर्जनशब्देन मयूरानपि नर्तयतीति त्वमपि तथा कुर्वन् मेघो यथा पर्वतमुपभुङ्क्ते तथैवोपभुजेरि- त्यांशयः ॥ ६६ ॥ पर्वते कतिचिदिन्यान्यतिवाद्य पुनरपि पाटलिपुत्र- मेवागच्छेरित्याह- * , १२५ आगच्छे स्वां पुनरपि पुरं नाथ ! नीत्वा दिनानि, क्रीडाशैले कतिचिदसमां दर्शयन् स्वश्रियं ताम् । यत्राप्राप्तर्वहति बहुलै धूपधुमैः सदा द्यौ- मुक्ताजालग्रथितमलकं कामिनीवाभ्रवृन्दम् ॥६॥ अन्वयः- हे नाथ ! असमां तां स्वश्रियं दर्शयन् क्रीडाशैले कति- चिद् दिनानि नीत्वा पुनरपि स्वां पुरम् आगच्छेः, द्यौः अभ्राप्तैः बहुलैः धूपधूमैः कामिनी मुक्ता जालग्रथितम् अलकम् इव मेघवृन्दं सदा वहति' इत्यन्वयः । व्याख्या-- हे नाथ ! असमाम् नास्ति समा तुल्या श्री यस्याः ताम् अद्वितीयाम् तां प्रसिद्धाम् स्वश्रियम् स्वसम्पदम् दर्शयन् प्रकटीकुर्वन् , क्रीलाशैले पितृसम्बन्धिनि लीला- पर्वते कतिचित् गणितानि दिनानि दिवसान् नीत्वा अतिवाह्य पुनरपि भूयोऽपि स्वां स्वकीयां पुरम् नगरीम् पाटलिपुत्रम् आगच्छेः परावर्तथाः, यत्र पुरि द्यौः आकाशः अभ्राप्तः मेघपर्यन्तं गतः बहुलैः घनीभूतैः धूपधूमैः धूपार्थ निमित्तै धूमः कामिनी काचिद्वनिता मुक्ता- जालग्रथितम् मौक्तिकसमूहगुम्फितम् अलकं केशपाशम् - .. - १२६ इव यथा अभ्रवृन्दम् मेघसमूहं सदा वर्षातिरिक्तेऽपि सर्वस्मिन् समये वहति धारयति । विशेष:--पुराबहिः सर्वदाऽवस्थाने तु मन्त्रिकृत्यं सम्पादयितुमशक्यमिति केवलं स्वसम्पदोऽतुलनीयतादर्शनाय तदुपभोगाय च कतिचिदेव दिनानि तत्र स्थित्वा पुनरपि पाटलिपुत्रमेवागच्छेः । अत्र धूमधूमैः सर्वदा आकाशस्य व्याप्त तया पूरियं मेघवृन्दं सदा वहतीति प्रतीयते । कामिनी यथा मौक्तिक शोभितमलकं विमति तथैवेयं पुरीति ॥६॥ पुरी विशिनष्टि-- स्निग्धच्छायं बहुलविमलच्छायया शालमाना, नित्यामोदाः प्रविततमुदं भूरिवित्ताः सुवित्तम् । रत्नज्योति विधुततमसो नाथ ! निर्धूतपापं, प्रासादास्त्वां तुलयितुमलं यत्र तैस्तै विशेषैः ॥६॥ अन्वय- 'हे नाथ ! यत्र बहुलविमलच्छायया शालमानाः नित्यामोदाः भूरिवित्ताः रत्नज्योतिर्विधुततमसः प्रासादाः स्निग्धच्छायं प्रविततमुदं सुवित्तम् निधूतपापं त्वा तस्तैः विशेषः तुलयितुम् अलम्' इत्यन्वयः।
१२५ व्याख्या- हे नाथ ! स्वामिन् ! यत्र पाटलिपुत्रनगयाँ बहुल- विमलच्छायया बहुलया प्रभृतया विमलया निर्मलया छायया कान्त्या शालमानाः शोभमानाः, नित्यामोदाः नित्यं प्रतिदिनम् आमोदः उत्सवानन्दः येषु ते, भूरिवित्ताः भूरि बहुतरं वित्तं धनं येषु ते, रत्नज्योतिर्विद्यलतमसः रत्नानां मणीनां ज्योतिर्भिः प्रकाशैः विधुतं दूरीकृतं तमः अन्धकारो यैस्ते, प्रासादाः सौधाः, स्निग्धच्छायं स्निग्धा मनोहरा छाया कान्ति र्यस्य तम् , प्रविततमुदं प्रवितता सुविस्तृता मुद् हर्षो यस्य तम् , सुवित्तम् सुष्टु शोभनं वित्त धनं यस्य तम् , निधूतपापं निर्धत निःशेषेण दूरीभूतं पापं कल्मपं यस्य तं त्वां भवन्तं तैस्तैः पूर्वोक्तः विशेषैः व्यावर्तकगुणः तुलयितु समता कतुम् अलं समर्थाः सन्ति । विशेष:-अत्रत्याः प्रासादा जडा अपि त्वया सह स्पर्धन्ते इतीव प्रतीयते । तथाहि-यथात्वं मनोहरकान्तिः तथा तेऽपि प्रभूतकान्त्या शोभन्ते, : यथा च त्वं हर्ष विस्तारयसि तथा तेऽपि नित्योत्सवाः सन्ति, तेष्वपि प्रतिदिनं हर्षोल्लाम एव तिष्ठति, यथात्वं बहुधनवानसि तथा तेऽपि धनैः पूर्णाः, त्वं निधूतपापरूपतमाः असि, तेऽपि स्वस्थितरत्नप्रकाशेन वितमसः सन्ति, इत्येवं स्वविशेषैस्ते तव तुलनां कर्तुं समर्थाः सन्तीति स्पष्टम् ॥ ६८ ॥ . - ६१२८ - - अत्रत्यानां वधूनां विशेषमाह-- अहंभक्तिर्वसति हृदये तारहारेण साकं, मूतॊ कान्तिः स्फुरति च सदा शीलधर्मेण सार्द्धम् । चित्ते सातं धनसमयजं विद्यते साम्प्रतं सत्, सीमन्ते च त्वदुपगमनं यत्र नीपं वधूनाम् ॥६६॥ अन्वयार यत्र वधूनां हदये तारहारेण साकम् अहंद्भक्तिः वसति, मृतौ च शीलधर्मेण साकं कान्तिः सदा स्फुरति, चित्ते साम्प्रतं सत् सातं विद्यते, सीमन्ते च धनसमय नीपं विद्यते' इत्यन्वयः।- व्याख्या-- यत्र पाटलिपुत्रे वधूनाम् , स्त्रीणां ( स्त्री नारी वनिता वधूः (अभिधान० ३, १६७] हृदय अन्तःकरणे हृदयप्रदेशो- परि च तारहारेण तारेण उज्ज्वलेन हॉरेण मौक्तिक- मालया साकं सह अभिक्तिः अर्हता जिनानां भक्तिः श्रद्धा वसति स्थिति करोति, (वधूनां) मूत्तौ स्वरूपे शील- धर्मेण शीलरूपेण धर्मेण सार्द्ध सह कान्तिः शोभा सदा सर्वदा स्फुरति प्रतिभासते, (वधूनां ) चित्ते मनसि साम्प्रतं सद्यः त्वदुपगमजं भवत्सम्पर्कसम्भूतं सत् सुन्द त्वदुपगमनं . - .
१२१
सातं सुखं विद्यते (वधूनां) सीमन्ते केशपाशे च वनसमयजं
वर्षाकालोत्पन्नं नोपं कदम्बकुसुमं विद्यते ।।
विशेष:--अत्रत्या नार्यों यथा विलासिन्य स्तथा
श्रद्धालवः शीलवत्यः त्वय्यनुरक्ताः च सन्तीत्यनेन श्लोकेन
वर्णितम् । अत्र तृतीयपादस्थितं 'धनसमयजम्' इति पदं
चतुर्थपादस्थितेन नीपेनान्वितम् , चतुर्थपादस्थितं त्वदुपगमज-
मितिपदं च तृतीयपादस्थितेन सातेनान्वितम् इति दूरान्वयः
करणीयो भवति । शक्यते च त्वदुपगमजमिति पदं तृतीये
पादे, धनसमयजमिति पदं चतुर्थे पादे पठितुम् , किन्तु चतुर्थ
पादो मेघदूतीय एव . स्थापनीय इति तस्य परिवर्तनानहतमैवं
दूरान्वयोऽगत्या स्वीकरणीय एव समस्या पूर्तये इत्यदोष
इति बोध्यम् ॥ ६६ ॥
पुनरपि पुरीमेव विशिनष्टि-
गङ्गागौराः सितकरहयाकारचौरास्तुरङ्गा,
शृङ्गोत्तुङ्गा ललितगतयो दानवन्तो गजेन्द्राः ।
लीलावत्योऽखिलयुक्तयो यत्र वीरावतंसाः,
प्रत्यादिष्टाभरणरुचयश्चन्द्रहासत्रणाकैः ॥७॥
१३० . अन्वयः- 'यत्र गङ्गागौराः तुरङ्गाः सितकरयाकारचौराः (सन्ति) शृङ्गोत्तुङ्गा गजेन्द्राः ललितगतयः दानवन्तः (सन्ति) अखिल- युवतयः लीलावत्यः (सन्ति) वीरावतंसाः चन्द्रहासत्रणाकैः प्रत्यादिष्टाभरणरुचयः (सन्ति) इत्यन्वयः। H व्याख्या यत्र पाटलिपुत्रे गङ्गागौराः गङ्गावत् गङ्गाजलप्रवाहवत् गौराः श्वेतवर्णाः तुरङ्गा सितकरहयाकारचौराः सित- करस्य श्वेतकिरणस्य सूर्यस्य हयानाम् अश्वानामाकरं स्वरूपं चोरयन्ति लुम्पन्ति इति तादृशाः (सन्ति) [यद्यपि सूर्यस्य हयाः हरितवर्णाः सन्तीति पुराण प्रसिद्धिः तथापीह तेषां न वर्णेन सादृश्यमपि तु आकार महत्त्वादिनेति विज्ञेयम् ], शृङ्गोतुङ्गा शृङ्गवत् पर्वत शिखरवत् उत्तुङ्गा उन्नताः (शृङ्ग' तु कूटं शिखरम्' अभि०४-९८) गजेन्द्राः महागजाः ललितगतयः सलील. गमनाः दानवन्तः मदशालिनः (सन्ति) अखिलयुवतयः सर्वास्तरुण्यः लीलावत्यः काम- क्रीडाचतुराः (सन्ति) वीरोत्तंसाः वीरा उत्तंसा इव भूषणा- नीव इति वीरोत्तंसाः श्रेष्ठवीरा चन्द्रहासवणाकैः चन्द्र- हासेन खड्गेन ये व्रणाः आधाताः तेषा मकैः चिह्नभूतैः किणः प्रत्यादिष्टाभरणरुचयः प्रत्यादिष्टा प्रत्याख्याता १३१ ~ आभरणानां भूषणानां रुचयः कान्तयो यै स्तथा भूताः (सन्ति)। विशेषः-अत्रत्या हयाः सूर्यहयाकाराः गजाः सर्वे मदशालिनः युवतयो रतिशीलाः वीराश्च सम्मुखप्रहारसहा: सन्ति । चन्द्रहासशब्दो यद्यपि रावणस्य , खड्गविशेषे प्रसिद्धः, मेघदूते च तदाशयेनैव प्रयुक्ता, तथापीह सामान्य- खड्गबोधकतया प्रयुक्तः, खड्गनामस्वपि पठितोऽभिधान- चिन्तामणौ ३-४४६ । वीरा भूपणशोभातोऽधिकं खड्ग- व्रणाङ्कमेव मन्यते इति तात्पर्यम् ॥ ७० ॥ तामेव पुरी पुनरपि विशिनष्टि- स्नेहादन्यद् न भवति परं बन्धनं यत्र किञ्चि- चिन्ता काचिन भवति परा यत्र धर्म विहाय । कश्चिद् यस्मिन् न भवति परो राजहंसात् सरोगो वयो यौवनादन्यदस्ति.॥७१॥ वित्तेशानां न च खलु अन्वयः- 'यत्र स्नेहाद् अन्यत् परं वन्धनं किश्चिद् न भवति, धर्म विहाय परा , काचित चिन्ता न भवति, यस्मिन् राज- हंसात् परः कश्चित् सरोगः न भवति, वित्तेशानां च यौवनाद् अन्यद् वयः न अस्ति' इत्यन्वयः । .
व्याख्या यत्र पाटलिपुत्रे स्नेहाद परस्परं प्रेम्णः अन्य भिन्न परं दृढं बन्धन गतिनिवारकं न भवति नास्ति, (यत्र) धर्म अभ्युदयनिःश्रेयससाधनं सुकृतं विहाय परित्यज्य परा अन्या चिन्ता न भवति, यस्मिन् पाटलिपुत्र राज- हंसात् मरालात् परः अन्यः सरोगः रोगेण सहितः न भवति राजहंस एव सरोग शब्देनोच्यते नान्यः तस्य सरसिं गच्छत्तीत्यर्थक सरोगशब्द वाच्यत्वात् । अन्ये केचन सरोगशन्देन रोगसहितार्थवाचकेन नामि- धीयन्ते । श्लेषोऽलङ्कारः । (यत्र) वित्तेशानाम् धनिकानां जनानां च यौवनादु तारुण्याद् अन्यत् परं वार्द्धक्यम् वयः शरीरावस्था न अस्ति भवति । धनिकाः सर्वे रसा- यनाथुपयोगेन यौवनमेवानुभवन्ति न वार्द्धक्यमिति भावः । विशेष:-यत्र नगरे सुनयेन परिपाल्यमाने रज्जु- शृङ्खलादि बन्धनं कुत्रापि नोपयुज्यते केवलं स्नेहबन्धनेनैव जनाः परस्परं बद्धा सन्ति । धर्मविषये एव कर्तव्याकर्तव्य- चिन्ता जायते न तु दुःखशोकादिकृता । किंच सरसि गच्छत्तीति व्युत्पन्नेन 'सरोग' शब्देन राजहंसादयो जलचरा एवोच्यन्ते न तु रोगयुक्तत्वार्थकेन सरोगशब्देनान्ये जनाः ।
- . यत्र च धनिकाः सर्वदा युवान एव तिष्ठन्ति न तु वृद्धा भवन्ति । परिसंख्यालङ्कारः। मेघदूते चात्रत्यश्चतुर्थः पादो यक्षाणां सर्वदा योवन- शालित्वमेवेति तात्पर्येण प्रयुक्तः त एव वित्तेशपदवाच्याः, अत्र च प्रकरणानुसारं धनिकपरतया वित्तेशपदं व्याख्येयम् । मेघद्तेऽलकापुरी वर्णयते एवमुच्यते ।, अत्रापि पाटलिपुत्रस्य तव साम्यव्यञ्जनायैवमुक्तमिति हृदयम् ।। ७१ ॥ भूयः पुरीमेव वर्णयति- । वेणीदराडो जयति भुजगान मध्यदेशो भृगेन्द्रान यासामास्यं प्रिय ! परिभवत्युच्चकैश्चन्द्रबिम्बम् । चैत्ये नृत्यन्त्यतुलमसकृद् यत्र वाराङ्गनास्ता- स्त्वद्गम्भीर धनिषु शनकैः पुष्करेष्वाहतेषु ॥७२॥ अन्वयः- 'हे प्रिय ! यासाम् वेणीदण्डः भुजगान् जयति, मध्य- देशः मृगेन्द्रान् जयति, आस्यम् चन्द्रविम्बम् उच्चकैः परि- भवति ताः वाराङ्गनाः यत्र, त्वद् गम्भीरध्वनिषु पुष्करेषु शनकै आहतेषु चैत्ये असकृत् अतुलं नृत्यन्ति' इत्यन्वयः ।
- व्याख्या- हे प्रिय ! यासाम् चाराङ्गनानाम् वेणीदण्डः वेणी केशजूटिका एव दण्डः दण्डाकार लम्बायमाना केशजूटिकेति यावत् भुजगान् सर्पान् जयति परिभवति यथा सर्पा जनान् भीषयन्ति तथैव ततोऽप्यधिकं वा वेश्यानां वेणीदण्डं दृष्ट्वा जनाः कामभीता भवन्तीति आकारतोऽपि साम्यात् सर्पजयिन स्ते कथ्यन्ते, मध्यदेश : कटिप्रदेशः मृगेन्द्रान् सिंहान् जयति, सिंहाः कटिप्रदेशे क्षीणा भवन्ति ततोऽप्यधिक क्षीणक हयस्ता इति भावः, आस्यं मुख चन्द्रबिम्बम शशिमण्डलम् उच्चकः अत्यन्तम् परिभवति जयति ताः पूर्वोक्तरूपाः वाराङ्गना वेशयोषितः यत्र पाटलिपुत्रे त्वद्गम्भीरध्वनिषु तवेव गम्भीरः ध्वनिः येषां तादृशेषु पुष्करेषु मृदङगेषु शनकैः मन्दम् आहतेषु ताडितेषु चैत्ये देवमन्दिरे असकृत वारंवारम् अतुलम् अनुपम यथा स्यात् तथा नृत्यन्ति । नर्तनं कुर्वन्ति । . - विशेष-अत्र वेश्यानां, वेणीदण्डेन भुजगानाम् , मध्येन मृगेन्द्राणाम् । आस्येन चन्द्रमण्डलस्य च परिभूत- त्वकथनेन एषां परस्परं सादृश्यं ध्वन्यते इत्युपमालङ्कार ध्वनिः । मृदङ्गानां च नायकध्वनीवद् गम्भीरत्व कथनेन नायक ध्वनौ मृदङ्गध्वनिसाम्यमपि व्यक्तमिति, तेन तस्य, .
१३५ - 1 A नायकस्य सौलक्षण्यं प्रकटितम् गम्भीरध्वनेः- सौभाग्यसूचक- वात् । अत्र नगरे देवमन्दिरेषु सुन्दयों वेश्याः पूजादि- समयेषु नृत्यन्तीति तात्पर्यम् ॥ ७२ ॥ नगर्या अभिसारिका वृत्तान्तं सूचयति- मालास्रस्तै विविधकुसुमैः कुङ्कुमाक्तांहिचिह्न स्ताम्बूलेन क्षितितलगतेनार्द्धजग्धेन यत्र । हेमाम्भोजैः श्रवणपतितै भूषितैर्भूरिवासै- नैंशो मार्गः सवितुरुदये सूच्यते कामिनीनाम् ॥७३॥ अन्वय- 'यत्र कामिनीनां नैशः मार्गः सवितुः उदये सति, मालास्रस्तैः विविधकुसुमैः, कुङ्कुमाक्ताहिचिह्नः क्षितितल- गतेन अर्धजग्धेन ताम्बूलेन श्रवणपतितः हेमाम्भोजैः भूषितैः भूरिखासैः सूच्यते' इत्यन्वयः। व्याख्या- यत्र पाटलिपुत्र कामिनीनां विलासिनीनाम् नैशः निशाया अयं नैशः रात्रि सम्बन्धी मार्गः अभिसारमार्ग इति यावत् , सवितुः सूर्यस्य उदथे सति मालास्त्रस्तैः शिरः प्रदे .
१३६ , : शादिनिहित मान्या परिभ्रष्टः विविधकुसुमैः बहुविधपुष्पैः, कुङ्कुमाक्तांहिचिह्न कुङ्कुमाक्तानाम् कुङ्कुमरञ्जितानाम् अंहीणां चरणानां चिह्नः लाञ्छनैः क्षितितलगतेन भूमि पृष्ठस्थितेन अर्धजग्धेन अर्धभुक्तावशिष्टेन ताम्बूलेन चूर्ण खदिरादिपूरितनागरवल्लीदलवीटिकया ( 'ताम्मूल-पूगपर्णचूर्ण- सयोगः इत्यभिधा० चिन्ता० ४-२२१) श्रवणपतितः कर्णाच्चुतैः हेमाम्भोजः कनककमलैः, भूषितः इत्यर्थ सज्जितैः भूरिवासः बहुतरावास प्रदेशैश्च सूच्यते अनुमीयते । विशेषः-रात्रौ कामिन्यः पुष्पमाल्यादिभूपिता, कुङ्कुमारक्तचरणाः ताम्बूल भक्षणरता बहुभूषणभूषिता- श्चाभिसरन्ति । तत्र तासां मदाधीनत्वात् क्वचित् माल्येभ्यः पुष्पाणि मार्गे पतन्ति, गतिश्रमजलाचरणानि चिह्नानि मार्गे लगन्तिता अभिक्षितान्येव ताम्बुलानि नीरसबुद्ध्या निष्ठीवन्ति, तान्यपि मार्गे पतितानि भवन्ति, कर्णादिषु परिहितानि कनककमलाकाराणि भूषणान्यपि यत्र तत्र पतन्ति, यत्र तत्र मार्ग पार्श्व एव रतियोग्यं वासस्थानमपि भूपयित्वा स्थापितमेतदर्थमुपभुज्य प्रातः परित्यज्यते इति तादृशं वासस्थानमपि च एतेन मार्गेण रात्रौ -अभिसारिका गताः स्युरिति सूचयन्तीति भावः ॥ ७३ ।। पुरीवैभववर्णनाय कामिवृत्तान्तमाह- - । . '१३७ यत्र स्त्रीणां प्रणयिषु हठादाक्षिपत्सु क्षपायां, क्षौमं साक्षाद् मनसिजपराधीनतामागतेषु । नित्योद्योतानपि मणिमयान प्राप्य दीपान प्रदीपान, हीमूढानां भवति विफलप्रेरितश्चूर्णमुष्टिः ॥७॥ - अन्वयः 'यत्र क्षपायाम् मनसिजपराधीनताम् आगतेषु प्रणयिपु साक्षात् क्षौमं हठात् आक्षिपत्सु हामूढानां स्त्रीणां नित्योद्योतान मणिमयान दीप्रान् प्रदीपान् प्राप्य अपि चूर्णमुष्टिः विफल प्रेरितः भवति' इत्यन्वयः । -- व्याख्या- यत्र पाटलिपुत्रे क्षपायाम् रात्रौ मनसिजपरा- धीनताम मनसिजस्य कामस्य पराधीनताम् आयत्तताम् . आगतेषु प्राप्तेषु प्रणयिषु प्रियतमेषु साक्षात् शरीरा- व्यवहितं क्षौमं वस्त्रविशेषम् हठात् बलपूर्वकम् आक्षिपत्सु अपनयत्सु ( सत्सु ) होमूढानाम् लज्जया कर्तव्यविपये विमुग्धानाम् स्त्रोणां कामिनीनाम् नित्योद्योतान् सतत- प्रकाशान् मणिमयान् रत्नरचितान दीपान्. ज्वलतः प्रदोपान प्रकृष्टदीपान प्राप्य गत्वा अपि चूर्णमुष्टिः १३८ 1 सुगन्धिद्रव्यपरागमुष्टिः विफलप्रेरितः विफलं निरर्थकमेव प्रेरितः क्षिप्तः यथास्यात् तथा भवति जायते । विशेषः-रात्रौ सुरतसमये कामिनः क्रियानिवृत्यर्थ स्त्रीणां वस्त्रं यदा क्षिपन्ति तदा दीपसत्त्वे प्रकाशेऽङ्गविशेष- निरीक्षणे लज्जाया आधिक्यात दीपनिर्वापणाय स्त्रियो यत्न विदधति, तत्र च मणिमया एव दीपाः सन्ति, ते च नित्यो- द्योता इति कथमपि निर्वापयितुन शक्या इत्यजानन्त्य इव स्त्रियस्तदुपरि चूर्णमुष्टिं क्षिपन्ति, किन्तु तत्र गताऽपि चूर्णमुष्टिः दीपनिर्वाणरूप फलाभावात् विफल प्रेरित एव भवति कामिन श्च यथेच्छमङ्गानि पश्यन्त्येवेति भावः ||४|| अपरं च विशेषमाह-पाटलिपुत्रस्य- यस्यां लोका विमलमनसः पूर्णकामाभिरामा, रामाः कामं ललितगमनाः कामनारीसमानाः। वृक्षाः साक्षादतुलफलदाः कल्पवृक्षोपमेया, नित्यज्योत्स्नाप्रतिहततमोवृत्तिरम्याः प्रदोषाः ॥७५॥ अन्वय:- 'यस्यां लोकाः विमलमनसः, पूर्णकामाभिरामाः, रामाः कामं ललितगमनाः, कामनारीसमानाः, घृक्षाः अतुलफलदा: .
१३९ साक्षात् कल्पवृक्षोपमेयाः, प्रदोषाः नित्यज्योत्स्नाप्रतिहततमो- वृत्तिरम्याः भवन्ति' इत्यन्वयः । व्याख्या- यस्यां पाटलिपुत्रनगर्या लोकाः पुरुषाः सर्वे विमल- मनसः निर्मलहृदया: पूर्णकामाभिरामाः पूर्णकामाः प्राप्तसकलमनोरथाः अभिरामाः सुरूपाश्च (सन्ति) रामाः ग्मयन्तीति रामाः स्त्रियः कामम् अत्यन्तं ललितगमनाः सलीलगतिशालिन्यः कामनारीसमानाः कामस्य कन्दर्पस्य नार्याः स्त्रियानत्या समाना: मदृश्यः (सन्ति) वक्षाः तरव: अतुलफलदाः अनुपमफलप्रदायिनः (अत एव) साक्षात् अव्यवहितरूपेण कल्पवृक्षोपमेया कल्पवृक्षैः मनः सङ्क- ल्पितफलदानसमथैः देवतरुभिः ,उपमेयाः उपमातु योग्याः (सन्ति) प्रदोषाः रजनीमुखानि नित्यज्योत्स्ना प्रतिहत- तमोवृत्तिरम्याः नित्यज्योत्स्नाभिः सततप्रकाशैः मणि- रत्नादिकृतैः प्रतिहतया निवारितया तमोवृत्त्या 'अन्धकार- व्यापारेण हेतुना रम्या: मनोहराः भवन्ति । विशेषः-पाटलिपुत्रे सर्व एव जनाः प्राप्ताभिलाषा: सौन्दर्यशालिनः सन्ति । स्त्रियोऽपि रतिसदृश्यो मत्तगामिन्यः, फलवृक्षाश्च परिपूर्णफलाढयाः सन्ति । मण्यादिप्रकाशस्य सर्वदा वर्तमानत्वेन राज्यारम्भसमयेऽपि तमोऽभावेन स १४० 15 समयोऽन्यत्र भयप्रदोऽपि पाटलिपुत्रे रम्य एव प्रतिमातीति भावः ॥ ७५ ॥ पुनः पुरीमेव विशेषयति- यस्यामन्तः सुकृतरसिकाः पात्रदानप्रवीणा, एनोहोना विततविलसत् कीर्तयः सन्ति सन्तः। वारस्त्रीभिः सह सुमुदिताः काममग्नाश्च कामं, बवा यानं बहिरुपवनं कामिनो निर्विशन्ति ॥७६।। अन्वय यस्याम् । अन्तःसुकृतरसिकाः पात्रदानप्रवीणाः, एनो हीनाः विततविलसत्कीर्तयः सन्तः सन्ति । समुदिताः काम- मग्नाः कामिनः च यानं बद्ध्वा वारस्त्रीभिः सह घिहिरुपवन निर्विशन्ति' इत्यन्वयः। न " . -- व्याख्या- 1 यस्यां पुरि अन्तःसुकृतरसिकाः अन्तःसुकृतस्य आध्यात्मिक पुण्यस्य अथवा प्रकटधर्मस्य रसिकाः अनु- रागिणः पात्रदानप्रवीणाः पात्रेषु सत्पात्रेषु यद् दानं वितरणं तत्र प्रवीणाः निपुणाः, एनोहीनाः एनोभिः पापैः हीनाः रहिता विततविलसत्कीर्तयः वितता. विस्तृता १४१ - सन्तः विलसन्ती शोममाना च कीर्तिर्येषां तादृशाः सज्जनाः सन्ति । सुमुदिताः सुप्रसन्नाः काममग्नाः मदनव्यापार एव मततासक्ताः कामिनः कामरसिकाः यानं वाहनं स्थादि बघ्या. उपवनाद् बहिरेवावरोध्य, वारस्त्रीभिः वाराङ्गनाभिः सह साकं पहिरुपवनम् पुराद् बाह्यमुद्यानम् निर्विशन्ति कामक्रीडादिमिरुपयुञ्जन्ति । विशेषः-पाटलिपुत्रे तादृशाः- सज्जना अपि सन्ति ये प्रच्छन्नरूपेणैव न तु लोके स्वख्यातये बाह्यरूपेण-सत्पात्रेषु दानमाचरन्ता निष्पापाः अनेकदेवागारारामादिकीतियुक्ताश्च सन्ति । कामिनोऽपि तादृशाः सन्ति ये सब व्यापारविरताः यानेन बहिरुपवने गत्वा, यानं च बहिरेवावरुध्य, वारस्त्रीभिः सह विलासे मग्ना स्तष्ठन्ति ॥ ७६ ॥ पुरीमेव वर्णयति- गच्छस्तूर्णं नभसि तरणिः शङ्कते नित्यमेवं, सौधेष्वेव स्खलतु मम मा स्यन्दनोऽभ्रालिहेषु । मेघा यस्यामतिगुरुगृहैः प्राप्य संघट्टमाराद्, धूमोद्गारानुकृतिनिपुणा जर्जरा निष्पतन्ति ॥७७ १४२ अन्वयः-- 'यस्याम्, नभसि गच्छन् तरणिः नित्यम् एषु अभ्र- लिहेषु सौधेषु मम स्यन्दनः मा स्खलतु एवम् शङ्कते, मेधाः अतिगुरुगृहैः आरात् संघटं प्राप्य जर्जराः (सन्तः) धूमोद्- गारानुकृतिनिपुणाः निष्पतन्ति' इत्यन्वयः । व्याख्या यस्यां पुरि नभसि आकाशे गच्छन् रथेनसंचरन् तरणिः सूर्यः नित्यम् प्रतिदिनम् , एषु अग्रतो दृश्य मानेषु अभ्रंलिंहेष्ठ अभ्राणि मेघान् लिहन्ति स्पृशन्ति इत्यभ्रालिहाः "वहाभ्राल्लिहः (५-१-१२३)" इति खश, खित्यनव्यया- रुषो० ( ३-२-१११)" इति मोऽन्तादेशः, तेषु सौधेठ सुधया निर्मिताः सौधाः प्रासादाः तेषु मम मे स्यन्दन रथः मा नैव स्खलतु संघदृताम्-एवम् पूर्वोक्तरूपेण शकते संदोग्धि । मेघाः घनाः अतिगुरुगृहैः बहुविशाल- प्रासादः आराद् दूरतः एव संघ संघर्ष प्राप्य लब्ध्वा जर्जराः शकलिताः सन्तः धूमोद्गारानुकृतिनिपुणाः धृमोद्गाराणाम् वाष्पनिर्गमानाम् अनुकृतौ अनुकरणे निपुणाः चतुराः निष्पतन्ति निर्गच्छन्ति ।
- विशेषः-पाटलिपुत्रस्य प्रासादा अत्युच्चा येन सूय. स्यापि शङ्का जायते यन् मम रथः गृहेष्वेषु संघट्ट मा गच्छेदिति, मेघाश्च संघट्टमाप्यैव तद्गृहगवाक्षादि मार्गेण धूमा इच बहि भवन्ति । अतिशयोक्तघलङ्कारः ॥ ७७ ॥ अन्यमपि विशेषमाह-- यान्त्यो व्योम्नि त्रिदशललना वीक्ष्य यासांस्वरूपं, सर्व गर्व मनसि रचितं चारुतायास्त्यजन्ति मुग्धा दुग्धोपचितवपुषः कुट्टिमेष्वस्तखेदं, संक्रीडन्ते मणिभिरमरप्रार्थिता यत्र कन्याः ॥७॥ अन्वय:- यत्र व्योम्नि यान्त्यः त्रिदशललनाः यासां स्वरूपं वीक्ष्य मनसि निहितं चारुताया गर्व त्यजन्ति (ता.) दुग्धोप- चितवपुषः अमरप्रार्थिताः मुग्धाः कन्याः कुहिमेपु मणिभिः अस्तखेदं संक्रीडन्ते ॥ व्याख्या-- यत्र पाटलिपुत्रे व्योम्नि आकाशमार्गे यान्त्यः गच्छन्त्यः त्रिदशललनाः “त्रिर्दशेत्यर्थे बहुव्रीही प्रमाणी सङ्ख्याहुः (s-३-१२८)" इति डे त्रिदश शब्दो निष्पद्यते ।
१४४ 7 अस्य चार्थोऽनेकप्रकारेणानेकत्र वर्णितः अभिधानचिन्ता- मणिटीकायां च तिस्रों.. दशावयोऽवस्था येषां ते त्रिदशाः त्रिंशद्वर्षा मनुष्ययुवानः, त्रिदशा इव त्रिदशा इत्यपि व्युत्पत्तिर्दर्शिता । तथा च सर्वदा यौवनशालिनः इति फलति ते त्रिदशा देवाः तेषां ललनाः स्त्रियः यासां पाटलीपुत्र- नगरी कन्यानां स्वरूप वीक्ष्य अवलोक्य मनसि स्वचित्ते निहितं स्थितं चारुतायाः सौन्दर्यस्य गर्वम अभिमानं त्यजन्ति परिहरन्ति, (ताः) दुग्धोऽपचितवपुषः दुग्धेन क्षीरेण उपचितं वृद्धि प्राप्तं वपुः शरीरे यासां ताः अमर- प्रार्थिताः अमरैः देवैरपि प्रार्थिता अभिलषिताः मुग्धाः ऋजवः कन्याः वालिकाः कुटिमेषु प्रासादपृष्ठेषु मणिभिः रत्न, (गुटिकादि स्थानीयैः) अस्तखेदं अखिन्नं यथा स्यात् तथा संक्रीडन्ते खेलन्ति । विशेषः--देवाङ्गनानामपि रूपगर्वनाशिकाः, देवैरपि प्राप्तुमभिलषिता एतन्नगरपालिकाः प्रासादाग्रकुट्टिमेष नियंग्राः सततं क्रीडन्ति । 'अन्नानुरूपं शरीरम्' इति प्रसिद्धेः दुग्धो- पचितत्वेनासां वपुरपि दुग्धोज्ज्वलमिति सूचितम् ।। ५८ ॥ पुरीमेव प्रकारान्तरेण वर्णयति-- धर्मस्वेदं सुरतजनितं योषितां यत्र रात्रौ, जालायातैः स्वगृहवलभीमध्यबस्थितीनाम् । 1 '१४॥ सारैस्ताराधिपतिकिरणश्च्योतिता द्योतिताशे- व्लुम्पन्ति स्फुटजललवस्यन्दिनश्चन्द्रकान्ताः ॥७॥ " . अन्वयः 'यत्र रात्री स्वगृहवलभीमध्यबद्धस्थितीनां योपिता सुरतजनितं धर्मस्वेदं सारैः द्योतिताशैः ताराधिपतिकिरणैः जालायातैः च्योतिताः स्फुटजललवस्यन्दिनः चन्द्रकान्ताः व्यालुम्पन्ति' इत्यन्वयः। व्याख्या- यत्र पाटलिपुत्रे रात्रौ निशि स्वगृहवलभीमध्य- षडस्थितीनां स्वगृहस्य निजागारस्य वलम्या अट्टालिकाया मध्ये बद्धा स्थिरीकृताः स्थितिः वासो याभिः तासाम् योषितां स्त्रीणाम् .सुरतजनितं कामक्रीडासमुद्भूतम् धर्मस्वेदं ऊष्मजनितदेहजलं सारैः सारभूतैः द्योतिताशैः प्रकाशित दिभिः ताराधिपतिकिरणैः तारांधिपतेः चन्द्रस्य किरणैः रश्मिभिः जालायातैः गवाक्षमार्गप्रविष्टै च्योतिताः क्षरिताः स्फुटजललवस्यन्दिनः स्फुटं प्रकटं यथा स्यात् तथा जललवान तोयकिरणान् स्यन्दन्ते. क्षरन्ति इति , तच्छीलाः चन्द्रकान्ताः. , चन्द्रकान्तनामकमणयः व्यालुम्पन्ति नाशयन्ति ।
१४६ । -- विशेष:--यत्र गृहेषु घटिताः चन्द्रकान्तमणयः वलभी- स्थित गवाक्षमार्गायातैः चन्द्रमरीचिमिर्जलं..सावयन्ति, तेन जलेन च शीतलेन रात्रौ रतिक्रीडाजनितं योषितां धर्मजलं नश्यतीति भावः। एतेन तत्रत्य गृहाणां महाहमणियुक्तत्वं योतितमिति पुरस्य समृद्धिर्णिता भवति ॥ ७६ ॥ तत्रत्य घनिना त्यागस्य फलं दर्शयति- काले वर्षनवनिवलयं सस्यपूर्णं वितन्वन् , वाञ्छातुल्यं दिशति सालिलं यत्र धाराधरोऽपि । त्यागो यस्यां धनिभिरनिशं दीयमानोर्थनांद्रा- गेकं सूते सकलमबलाऽऽमराडनं कल्पवृक्षः।।८०॥ " अन्वयः- '. 'यत्र काले वर्षन् अवनिवलयं. सस्यपूर्ण वितन्वन् धाराधरः अपि वाञ्छातुल्यं -सलिलं दिशति । यस्याम् , धनिमिा अनिशं दीयमानः अर्थिनां कल्पवृक्षः त्यागः एक सकलम् अबला आमण्डनम् द्राक् सूते' इत्यन्वयः । " व्याख्या- यत्र पाटलिपुत्रे काले कृष्युपयुक्तसमये वर्षन वर्षणं कुर्वन् अवनिवलयं भूमण्डलम् सस्थपूर्ण धान्यसमृद्धं
१४७
अनिशम्
P
1
--
वितन्वन् रचयन् धाराधरः मेघः अपि वाञ्छातुल्यम्
इच्छानुकूलं सलिलं जलम् दिशति ददाति । धनिभिः
आट्यः
सततं दीयमानः क्रियमाणः अर्थिनां
याचकानां (कृते) कल्पवृक्षः सङ्कल्पितफलप्रददेवतरुरूपः
त्यागः दानम् एकम् अद्वितीयम् सकलं सम्पूर्णम् अबला.
ऽऽमण्डनं अबलानां दुर्गतानां जनानां आमण्डनं समन्तात्
परिपोषकम् द्राक् झटिति सूते सम्पादयति ।
विशेषः-यत्र समये वृष्टया सस्यपूर्तिर्भवति । धनिनश्च
सतत त्यागशीलाः सन्ति, येन याचकानां सर्वेष्टासिद्धिः
भवति । अत्र ,मेघदूते 'एकः सूते सकलमवलामण्डनं
कल्पवृक्षः' इत्थं पाठोऽस्ति । एका कल्पवृक्षः सकलम्
अबलानां स्त्रीणां मण्डनं शोभाधायकं वस्तु सूते इत्यर्थकः
सः । अत्र च प्रकरणवशादर्थान्तरं कल्पितमिति वरम् । किन्तु
'एकः' इति प्रथमान्तस्य स्थाने द्वितीयान्तः पाठोऽवला-
मण्डनस्य विशेषणतया प्रयुक्त इति न युक्तं प्रतिभाति ।
एक इति प्रथमान्तमेव यदि 'त्यागः' इत्यस्य विशेषणतया
स्थाप्येत तर्हि अर्थावबोधेऽपि सौकर्य, मेघदूतीय पाठ रक्षाऽपि
च कृता भवेदिति विचारणीयं सूरिभिः । प्रायो लेखकप्रमादा-
देवायं भेद इति प्रतीयते । टिप्पणीकर्ताऽपि 'एकम्' इति
पाठं स्वीकृत्यैवं व्याख्यातमित्यस्माभिरपि तथैवं पाठः
स्थापितो व्याख्यात श्चेति ज्ञेयम् ।। ८० ॥
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-
।
. १४८ अथ कर्तव्यं निरूपयन्ती प्रकृतपुरीवर्णनादिक समापयति- तिष्ठन्नस्यां पुरि विजयजं नाथ ! सौख्यं भज त्वं, कुर्वन् धर्म भवति सफलं येन जन्मद्वयं ते । हित्वा चापं युवतिषु चिरं यत्र कामोऽपि तस्थौ, तस्यारम्भश्चतुरवनितालोचनैरेव सिद्धः ॥ ८१ ॥ अन्वयः- हे नाथ ! अस्यां पुरि तिष्ठन , धर्म कुर्वन् त्वं विजयज सौख्यं भज येन ते जन्मद्वयं सफलं भवति । यत्र चापं हित्वा कामः अपि युवतिषु तस्थौ, तस्य आरम्मः चतुरवनिता- लोचनैः एव सिद्धा' इत्यन्वयः । व्याख्या- हे नाथ ! स्वामिन् ! अस्यां पूर्ववर्णितरूपायां पाटलि- पुत्रनाम्नि पुरि नगर्याम् तिष्ठन् स्थिति कुर्वन् , धर्मम सुकृतम् कुर्वन् आचरन् विजयजं लौकिक वाघशत्रुपराजयोद्- भूतम् रागद्वेषाधभ्यन्तरशत्रुपराजयोद्भूतं च सौख्यम् ऐहिक सकचन्दनवनिताद्युपमोगं पारलौकिकं स्वर्गोपभोगं च भज प्राप्नुहि, येन प्राप्तेन ते तव जन्मद्वयं ऐहिकं जन्म, अग्रिमं च जन्म सफलं सार्थकं भवति । यन्त्र पाटलिपुत्रे - + " + -
१४६
चापं धनुः हित्वा परित्यज्य कामः मदनः अपि किन्तु
युवतिषु तरुणीषु तस्थों आश्रितः (यतः तस्य कामस्य
आरम्भ कामिजनवशीकरणोद्योगः: चतुरवनितालोचनैः
चतुराणां कामकलानिपुणानां वनितानां कामिनीनां लोचनैः
नेत्रः एव सिखः सम्पन्नः ।
विशेषः-अर्थधर्मकामेति पुरुषार्थत्रयोपेतायां पाटलिपुत्र
नगयां निवसता भवता धर्माचरणपरेण जन्मद्वयमपि संफली-
करणीयम् , प्रत्रता च केवलं परं जन्मैव सफलता प्रापणीय-
मिति ततोऽत्रैव स्थितियुक्ता । अस्यां च नगयां स्वायुध
विहाय कामोऽपि : स्त्रीष्वेव स्वकीयां स्थिति कुरुते । तस्य च
कार्य युवजनमोहनादिकं स्त्रीणां कटाक्षेरेव सिध्यतीति
सोऽप्यत्र स्त्रसाफल्यमनायासेनैव मजत इति भावः ॥१॥
३
M
अथ श्रीस्थूलभद्रः प्रत्युत्तरयति-
निर्यदवाष्पं वच इति चिरं प्रोच्य तस्यां स्थितायां,
सोऽवोचत् तामभजममलं तन्व्यहं जैनधर्मम् ।
स्वर्गोऽप्यस्माद् मम स न मतश्चिन्तितं यत्र दत्ते,
हस्तप्राप्यस्तबक नामितो बालमन्दारवृक्षः॥८२॥
१५० - 7 अन्वय- 'नियंद्वाष्पं इति व चिरं. प्रोच्य तस्यां स्थितायाम् स अवोचत् , हे तन्विं ! अहम् अमलं जैनधर्मम् आश्रितः, मम स स्वर्गः अपि अस्मात् न मतः यत्राहम्त प्राप्य स्तवक नमितः बालमन्दारवृक्षः चिन्तितं दत्ते' इत्यन्वयः । : " व्याख्या 1 निर्यद्वाष्पं निर्यत् निर्गच्छद् वाष्पं, नेत्रसलिलं यत्र तत् यथा स्यात् तथा इति • उक्तप्रकारेण वचः वचनं प्रोच्य प्रकर्षणोक्त्वा स्थितायाम् तूष्णौ भूतायां तस्यां कोशायाम् सः श्री स्थूलभद्रः अवोचत् अकथयत् , किं तद् इत्याह हे तन्वि ! 'दुले । कृशे ! वा अहम् स्थूलभद्रः अमलम् निर्मलम् जैनधर्म जयन्ति रागद्वेषादीन इति जिनाः तीर्थङ्कराः तेषाम् धर्मम् आचारम् अभजम् आश्रयम्-मम; सः प्रसिद्धः स्वर्गः देवलोकः अपि अस्मात् जैनधर्मापेक्षया न मतः नेष्टः, यत्र स्वर्गे हस्तप्राप्यस्तबकनमितः हस्त- प्राप्यैः करणैव लभ्यः स्तवकैः पुष्पफलवृन्तैः नमितः नम्रीभूतः बालमन्दारवृक्षः बालोऽल्पवया मन्दारंवृक्षः कल्पवृक्षः चिन्तितम् अभिलषितं सकलं वस्तु दत्ते समर्पयति विशेषः-तस्या' वचः सर्वं श्रुत्वा स्वनिश्चय सारंभृतं वाक्यं श्रीस्थूलभद्र उवाच । तन्वीति विशेषणेन आमन्त्रणेन M - '.
१५१ । वा यथात्वं दुर्बला कृशा वा तथा तव मति रपि तथैवेति ध्वनितम् । अहं तु तादृशं जैनधर्म श्रितोऽस्मि यदपेक्षया सर्वाभिष्टप्रदकल्पवृक्ष शोभितः स्वर्गोऽपि मह्य न रोचते किमुतेऽयं पाटलिपुत्रनगरी तदुपभोगो वेति तात्पर्यम् ॥१२॥ गुरुपदेशस्मरणादपि नाहं तव वचोऽनुसरिष्यामीत्याह (युग्मेन)-- कृत्याकृत्यं गणयति भवान हन्त ! येषां कृते नो, दृष्ट्वा हृष्यत्यनुदिनमलं खिद्यते यानऽदृष्ट्वा । प्रान्तं प्राप्तं स्वजननिचयास्तेऽप्यहो! सत्सरोवद्, न ध्यास्यन्ति व्यपगतशुचस्त्वामपि प्रेक्ष्य हंसाः ॥८३॥ निःसङ्गानां गुणफणभृतां यो मया श्रीगुरूणा- मेवं मुग्धे ! भवयहरोऽश्राविपुण्योपदेशः। हारेणेव द्यु तिततिभृताऽप्यत्र शश्वद् मनोऽन्तः, प्रेक्ष्योपान्तस्फुरिततडितं त्वां तमेव स्मरामि ॥४॥ (युग्मम्) अन्वयः 'भवान् येषां कृते कृत्य कृत्यं नो गणयति हन्त ! यान दृष्ट्वा अनुदिनं दृष्यति, (यान्) अदृष्ट्वा अलं खिद्यते, व्यपगत- १५२ -- शुचः ते स्वजननिचया अपि हंसा सत्सरोवत् प्रान्तं प्राप्त प्रेक्ष्य अपि न ध्यास्यान्ति' इत्यन्वयः । । हे मुग्धे ! एवं गुणफणभृतां नि:सङ्गानां श्रीगुरुणी भवभयहरं यः पुण्योपदेशः मया अश्रावि, अत्र द्युतितः तिभृता हारेण उपान्तस्फुरिततडितम् इव त्वां प्रेक्ष्यं अपि मनोऽन्तः तम् एवं स्मरामि' इत्यन्वय श्च । . 4 व्याख्या भवान् स्थूलभद्रः येषां स्वजननिचयानां कृते कृत्याकृत्य कर्तव्याकर्तव्यं नो नैव गणयति, विचारयति हन्त ! इति खेदः, यान - स्वजननिचयान दृष्टवा अव- लोक्य अनुदिनं सर्वदो दृष्यति प्रसीदति, यान् अदृष्ट्वा अनवलोक्य अलम् अत्यर्थं खिद्यते द्यते, व्यपगतशुचः विच्छेदात् स्वार्थसाधकत्वाभावाच्च व्यपगता नष्टा शुक् भवद्- विषयकं दुःखं येषां ते, ते.पूर्ववर्णिताः स्वजननिचयाः स्वबन्धुवः अपि किमुतान्ये सुहृदादयः हंसाः पक्षि- विशेषाः (व्यपगतशुचः, अतिवाहित ग्रीष्मकालाः) सत्सरो- वत् स्वच्छहदवत् , प्रान्तं समीपं प्राप्तम् आयातम् त्यों भवन्तम् प्रेक्ष्य अवलोक्य अपि न ध्यास्यन्ति न स्मरिष्यन्ति ।
। १५३ हे मुग्धे ! सरले ! एवम् उक्तरूपः गुणफणभृताम् गुणा एव फणाः सर्पमस्तकानि बिभ्रति धारयन्ति इति तेषां (अत्र 'गुणगणभृताम् इति पाठः समीचीनः प्रतिभाति गुणानां फणैः सह साम्याभावात् तादृशरूपकस्यायोग्यत्वात् ) नि: सङ्गानां सांसारिकसम्पर्कशून्यानां श्रीगुरूणां श्रिया युक्तानां धर्मोपदेशकानाम् भवभयहरः सांसारिकभीति- निवारकः यः पूर्वोक्तरूपः पुण्योपदेशः पुण्यजनकः उपदेशः मया स्थूलभद्रेण अश्रावि श्रुतः अत्र ततो दूरं तव समीपे स्थितः अपि, द्युतितति भृता कान्तिसमूहधारिणा हारेण मुक्कामालया उपान्तस्फुरिततडितं उपान्ते समीपे स्फुरिता चञ्चला ' तडित् विद्युत् यस्याः तामिव त्वां भक्ती प्रेक्ष्य अवलोकय अपि, मनोऽन्तः हृदयमध्ये तम् उक्तमुप देशम् एव केवलं स्मरामि ध्यायामि । विशेषः-~श्रीगुरुभिरुपदिष्टं यत्-'येषां स्वजनानां कृते . कर्तव्यमकर्तव्यं वा सर्व त्वया कृतम्, याननुदिनं पश्यन्नेव , दृष्टोऽभूः, अपरयंश्च दुःखितोऽभूः एतादृशा अपि बन्धवः स्वार्थसिद्धिमदृष्ट्वा त्वां समीपस्थितमपि न परिचेप्यान्ति, दूरे .स्नेहप्रदर्शनम्, स्वागत सत्कारौ वेति ।' - . - १५४ . अयं चोपदेशः सांसारिक दुःखनिवारकः, यतोऽनेन सर्वेषां स्वार्थमूलका स्नेह इति प्रमाणितं , भवति, ततस्तेभ्यो मनो विरज्यति, शुक्लध्याने चानुरज्यति । अत्र तब समीपे स्थितोऽपि, हारादिभिरलङ्कृतां त्वां दृष्ट्वापि च तमेवोपदेशं स्मरामि, इति न तवोक्तौ मम श्रद्धा । अतः पुनः संसारे न सक्तो भविष्यामि । 'व्यपगतशुचः हंसाः सत्सरोवत्' यथा ग्रीष्मऋतु सर सेवनेन सुखमतिबाह्य-ग्रीष्मे' गते हंसा: तं त्यजन्ति, तथैव बन्धवोऽपि स्वार्थसिद्धरन्तरे प्रियतया झातमपि जनं त्यजन्ति इतिः तात्पर्यम् । उपमाऽलङ्कारः- द्युतिततिभृता हारेण-उपान्तस्फुरिततड़ितमिवेत्यत्र । 'हंसाः सत्सरोवत्' इत्यत्र दृष्टान्तालङ्कारः ॥ ८३-८४ ॥ स्वकृतं कामविजयमुद्घोषयति- जिग्ये कामः सुतनु । स मया शीलमासाद्य यस्मात्, संज्ञाहीनौ रसकुरुवकावप्यहो ! स्तः सरागौ । नार्या एकोऽभिलपति भृश दर्शनं मण्डिताया, वाञ्छत्यन्यो वदनमदिरां दोहदच्छद्मनाऽस्याः ॥५॥ - अन्वयः- हे सुतनु ! मया शीलम् आसाद्य स कामः जिग्ये यस्मात् संज्ञाहीनौ रसकुरुषको अपि सरागौ स्तः अहो !, १५५ एका मण्डिताया नार्या दर्शनम् भृशम् इच्छति, अन्यः - दोह दच्छमना अस्याः वदनमदिरा वाञ्छति' इत्यन्वयः । - हे सुतनु ! सुदेहे ! सुकृशशरीरे ! वा मया स्थूल- भद्रेण शीलम् ब्रह्मचर्य आसाद्य प्राप्य स वक्ष्यमाण गुणविशिष्ट कामः कन्दर्पः जिग्ये जितः यस्माद् कन्दर्पाद् हेतोः संज्ञाहीनौ अचेतनौ रसकुरुवको रसः पारदा कुरुषकः पीतझिण्टी समाख्यः वृक्षविशेष श्च अपि किमुत- सचेतनः सरागी साभिलाषौ स्तः भवतः अहो! इत्याश्च- र्यम् , एकः रसः मण्डितायाः भूपितायाः नार्याः स्त्रियाः दर्शनम् अवलोकनम् इच्छति कामयते, अन्यः कुरुबका दोहदच्छद्मना गर्भिण्यभिलापल्याजेन अस्याः नार्या वदनमदिरां मुखास्थितां सुराम् वान्छति इच्छति विशेष:-कामो यद्यपि अचेतनमपि वशीकरोति, तस्मा- देव पारदो भूषितां नारी दृष्ट्वा उच्छलति, कुरुबक स्तस्या मुखमदिरागण्डपं प्राप्य पुष्यति । किन्तु मया ,शीलप्राप्त्या स कामो जित इति न मे मनसि त्वदवलोकन त्वत्कथाश्रवणादि त कामप्रादुर्भाव इति भावः ॥ ८५ ॥ पुनरपि स्वस्य नीरागतामेव प्रकटयति । 7 १५६ नीरागं' मे समजनि मनो ज्ञाततत्त्वस्वरुपं, तेनेदानी च विषयरसो बाधते कुत्रचिन्माम् । पश्याम्येनामपि वनसमां चित्रशाला .खलूच्चै. यांमध्यास्ते दिवसदिगमे नीलकराठः सुहृद् वः॥८६॥ अन्वयः , . 'ज्ञाततत्त्वस्वरूप में मनः नीरागं समजनि, तेन इदानीम् कुत्रचित् विषयरसः मां न बाधते, एनां चित्रशालाम् अपि वनसमां पश्यामि खलु, याम् दिवसविगमे वः सुहृद् नील- कण्ठः उच्चैः अध्यास्ते ! इत्यन्वयः। व्याख्या- ज्ञाततत्त्वस्वरूपम् ज्ञातं विदितम् तत्त्वस्य तत् तद्- विषययाथार्थ्यस्य स्वरूपं येन तादृशम् मे मम मनः चित्तं समजनि सम्पन्नम्, तेन कारणे न इदानीम् सम्प्रति कुत्रचिद् कास्मिन्नपि विषये विषयरसः विषयेषु रागः मां स्थूलभद्रं न बाधते नाकर्षति । एनाम् अग्रे स्थिताम् चित्र- शालाम् चित्राम आश्चर्यजनिकां नानाविधचित्रादिभिरलकृतां वा शाला गृहम् धनसमाम् अरण्यसदृशीं पश्यामि दृष्ट्वाऽवधारयामि, यां चित्रशालाम् वः युष्माकं सुहृद
१५७
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-
प्रियः नीलकण्ठः मयूरः दिवसविगमे दिनान्ते सायङ्काले
उच्चैः उपरिभागे अध्यास्ते अधितिष्ठति ।
विशेष:--सरागे हि चित्ते विषयास्वादाभिलापा जायते
चित्रशालायां वने वा समदर्शिनो मनसि का विषया भिलाषा
स्यादिति तात्पर्यम् । रागी च तावदेव तिष्ठति यावत् वस्तु-
तत्त्वं न परिचीयते ज्ञातैतत्त्वे च का संसारः ॥ ८६ ।।
शरीरस्य यौवना पगमे निःश्रीकताकथनेनानित्यतां प्रकटयति-
यत्तारुपये सति वपुरहो ! विभ्रमं भूरि - दत्ते,
पुष्टं मुग्धे ! सरसमधुराहारयोगेण शश्वत् ।
अन्यादृक् स्यात् तदपि च गते यौवने देहभाजा,
सूर्यापाये न खलु कमलं पुष्यति स्वामभिख्याम ।।७।।
अन्वयः
'हे मुग्धे ! सरसमधुराहारयोगेण शश्वत् पुष्टं यद् वपुः
तारुण्ये सति भूरि विभ्रमं दत्ते अहो! तद् अपि देहभाजां
यौवने गते अन्यादृक् स्यात्; सूर्यापाये कमलं स्वाम्
अमिख्याम् न खलु पुष्यति' इत्यन्वयः।
व्याख्या-
हे मुग्धे ! सरले ! सरसमधुराहारयोगेण सरसा-
नाम् आस्वादवताम् रसयुक्तानां वा मधुराणां मिष्टानाम
-
C
.
१५८ आहाराणा भोजनानां योगेन उपयोगेन शश्वत् सर्वदा पुष्टं वृद्धि नीतम् यद् वपुः शरीरं, तारुण्ये यौवने सति विद्यमाने भूरि बहुतमं विभ्रमं विलासं दत्ने अर्पयति, तद् अपि शरीरम् देहभाजां प्राणिनां यौवने तारुण्ये गते अतिक्रान्ते (सति) अन्यादृक् विसदृशं स्यात् (एतदर्थान्तर- न्यासोपन्यासेन समर्थयति ) सूर्यापाये भास्करेऽस्तं- गते सति कमलं पद्म स्वाम् निजाम् अभिख्याम् शोभाम् न खलु नैव पुष्यति धारयति । विशेष-बहुतरानुकूलभोजनादिपरिवर्धितमपीदं - शरीरं यौवनं यादृशं विलासादिकं प्रकटयति तादृशं यौवनापगमे न प्रकटयति, कमलं हि सूर्यसन्निधाने एव स्वीयां शोभा धारयति, सूर्यास्ते सति च म्लायत एव । तथा चास्थिरावस्थं शरीरमेतदिति विचिन्त्य मे भोगेच्छा न जायत इति भावः । अत्र कमलरूप विशेपोन्यासेन कारणवशाज्जातं वस्तु कारणाप गमे नश्यतीति सामान्योऽर्थः समर्थित इत्यर्थान्तर न्यासो- ऽलङ्कारः ।। ८७ ॥ एवं च संसारानित्यतां जानतो मे मोहनाय तव चेष्टा वृथैवेत्याह- मत्वाऽनित्यं जगदिति मनो मे विलग्नं जिनोक्त, धर्मे शर्माभिलपति पर शाश्वतं शुद्धचित्ते !। A
१५१ .
मुग्धे ! स्निग्धां रचयसि मुधा मामुदोक्ष्य स्वकीयां,
खद्योतालीविलसितनिभां विद्यु दुन्मेषदृष्टिम् ।।८८||
अन्वया
'हे शुद्धचित्ते ! इति जगत् अनित्यं मत्वा जिनोक्ते
धर्मे विलग्नं मे मनः शाश्वतं परं शर्म अभिलपति । हे मुग्धे !
माम् उदीक्ष्य स्वकीयां स्निग्धा : खद्योतालीविलसितनिर्मा
विद्युदुन्मेषदृष्टिम् मुधा रचयसि' इत्यन्वयः ।
व्याख्या-
हे शुद्धचिते ! शुद्धं मया निर्विकारेण पुंसा मह
संभाषणात् पवित्रं चित्तं मनो यस्याः तदामन्त्रणम् , इति
पूर्वोक्तप्राकारेण जगत् संसारम् अनित्यं विनाशि मत्त्वा
ज्ञात्वा जिनोक्ते जिनैः तीर्थङ्गरैः उक्ते कथिते धर्म
श्रेयः साधनोपाये विलग्नं निरतं मे मम मनः चित्तम्
शाश्वतम् नित्यं परम् उत्कृष्टं शर्म कल्याणम् अभि-
लपति वाग्छति [न तु क्षणभङ्गुरं लौकिक सुखमिति भावः]
(अतः) हे मुग्धे ! सरले ! माम् स्थूलभद्रम् उदोक्ष्य
उच्चैरवलोक्य, स्वकीयां निजां खद्योतालोविलसित.
निभां खद्योतालीनाम् ज्योतिरिङ्गणसमूहानाम् 'विलसितेन
निभा तुल्या ताम् विद्युहुन्मेष दृष्टिम् विद्युताम् तडिताम्
१६० उन्मेषवत् स्फुरणवत् उन्मेषः उन्मीलनं यत्र तादृशी दृष्टिं विलोकनम् मुधा वृथा रचयसि करोपि । विशेषः-एतावत् कालं मया सह सम्भाषणात् क्यापि चित्तं शुद्धं भवेदिति सम्भाव्यते ततश्च धर्मनिरतस्य मे चेतसि तव विलोकनादिभिः कोऽपि विकारो न स्यादिति तवैवं भावान्तरेण विलोकनं नो चितम्, अंतो घृथैव ते चेष्टेति हृदयम् । अत्र यथा खद्योतानां विलासेन न काश्चिदर्थः प्रकाशादिः सिध्यति अतः स वथैव भवति तथैव तव विलो- कनमपी त्युपमायाः विवक्षितत्वेनोपमाऽलङ्कारः। एतत् पद्य- चतुर्थचरण मेघदूते मेघस्य विद्युदुन्मेप एव दृष्टिरिति रूपक विवक्षितम्, इह च तत् सदृशी दृष्टिरिति दृष्टेश्वाञ्चल्यं विद्युदुन्मेपवदिति विवक्षितमिति तत्राप्युपमैवालङ्कारः ॥८॥ पुनरपि स्वस्य वीतरागत्वं द्रढयति- नारी यस्मिन्नमृतसदृशी मे वभूवाद्य यावद्, रागग्रस्ते. मनसि मदनव्यालविध्वस्तसंज्ञे । ध्वस्ते रागे गुरुभिरभवत् क्ष्वेडवत् साऽप्यनिष्टा या तत्र स्याद् युवतिविषये सृष्टिराद्यव धातुः ॥८॥ - अन्वयः 'मदनव्यालविध्वस्त संज्ञे.रागग्रस्ते यस्मिन् मे मनसि अद्य यावत् नारी अमृत सदृशी बभूव, गुरुभिः रागे ध्वस्ते १६१ . (सति) या तत्र युवति विषये धातुः आद्या सृष्टिः इव स्यात् सा अपि वेडवत अनिष्टा अभवत्' इत्यन्वयः । व्याख्या-- मदनव्यालविध्वस्तसंज्ञे मदनः काम एव व्यालः सर्पः तेन विश्वस्ता नष्टा संज्ञा हिताहितज्ञानशक्तिः यस्य तस्मिन्, रागग्रस्ते रागेण विषयाभिलापेण अस्तेऽभिभूते यस्मिन् मे मम मनसि चित्ते अद्य यावत इत: कालात नारी स्त्री अमृतसदृशी पीयूषतुल्या बभूव , आसीत्, गुरुभिः ज्ञानोपदेशकः रागे विषयासक्तौ ध्वस्ते दूरीकृते (सति) या स्त्री तत्र युवतिविषये तस्मिन् तरुणी समाजे धातुः ब्रह्मणः आद्या प्रथमा सर्वश्रेष्ठेति यावत् इव स्यात् मवेत् सा अपि क्ष्वेडवत् विषवत् अनिष्टा अहितकारी अभवत् जाता। विशेषः-पूर्वमहमतिरागवान् नरीषु परमासक्त आसम् । किन्तु गुरुकृपया. ज्ञानोपदेशेन राग एव विनष्टः इति रुच्या- सक्तिकारणाभावात् सर्वश्रेष्ठाऽपि नारी विपतुल्यं परिहार्या जातेति न त्वदीयोऽमिलापो मया पूरयितु शकयंत इति ज्ञात्वा स्वीयां मायां परिहरेति भावः ॥ ८९ ॥ पुनरपि स्वशील मेवाह- 3 १६२ अज्ञानं मे सपदि गलितं मोहमूर्छाऽप्यनेश- जातं चित्तं सुतनु ! मम तन्निर्विकारं क्षणेन । स्वस्रा मृत्योरिव हि जरसा ग्रस्यमानां तनु स्वां, मन्ये जातो ताहनमथितां पद्मिनीं वाऽन्वरूपाम् ॥१०॥ अन्वयः-- 'मे अज्ञानं सपदि गलितं, मोहमूर्छा अपि अनेशन हे सुतनु ! मम तत् चित्तं क्षणेन निर्विकारं जातम् । हि मृत्योः स्वस्रा इत्र जरसा ग्रस्यमानां स्वां तनु तुहिन- मथितां पद्मिनी वा अन्य रूपां जातां मन्ये' इत्यन्धयः । व्याख्या- मे मम स्थूलभद्रस्य अज्ञानं वस्तुतत्त्वाच्छादकं तमः सपदि शीघ्र गलितं विशीर्णम् , मोहनिद्रा मोहः तत्वातत्त्वविवेकाक्षमत्वम् एव निद्रा सुप्तिः सा अपि अनेशत् नाशं गता, हे सुतनु ? सुदेहे कोशे ! मम स्थूलभद्रस्य तत् पूर्वोक्तम् अज्ञानशून्यं विगलितमोहं च चित्तं मनः क्षणेन झटित्येव निर्विकारं कामादिविकार रहितं जातम् अभूत् । तत्र कारणमाह-हि यतः मृत्योः यमस्य मरणरूपस्य मरणरूपस्य वा भावस्य स्वस्त्रा भगिन्या इव जरसा वृद्धत्वेन जीर्णतया वा ग्रस्यमानां कवली- १६३ क्रियमाणां स्वां निजी तनु शरीरं तुहिनमथितां हिम मर्दिता पद्मिनी कमलिनी वा इव ('व वा यथा तथैवैवं साम्ये' इत्यमरः) अन्यरूपां विसदृशीं जातां भूतो मन्ये अवगच्छामि । विशेषः-यावदज्ञानमासीत् तावत् मे शरीरं सर्वदेव- मेव स्यास्यति न किमपि भयमिति यथेच्छ विषयोपभोगः क्रियते स्म । अज्ञाने नष्टे विकारशून्ये च मनसि जाते शरीरं साक्षात् मृत्यो भगिन्येव जरया ग्रस्यमानं प्रतिदिनं दीयमा- णमिव पश्यामीति कुतो मे विषयामिलाप: स्यादिति भावः । अत्र जरामृत्यो भगिनीवेत्युत्प्रेक्षा, तदेव शरीरमन्यदिवाव- गम्यते इति चोत्प्रेक्षेत्युत्प्रेक्षालङ्कार एव ॥ ९० ॥ अथैवं प्रत्याख्यातां निजसखी कोशा वीक्ष्य तत् सखी काचिदाह- तस्मिन्नेवं वदति चतुरोवाच तस्या वयस्या, जातं किं ते सुभग ! हृदयं निर्दयं वाढमेतत् ? । पश्याऽस्यास्त्वं तव विरहतो वक्त्रमभ्रास्तदीप्ते- रिन्दोर्दैन्यं त्वदनुसरणक्लिष्टकान्ते बिभर्ति ॥१॥ ५ VA १६४ अन्वयः- है तस्मिन् एवं वदति (सति).चतुरा तस्याः वयस्या उवाच. हे सुभग ! एतत् ते हृदयं वाढं निर्दयं कि जातम् , तब विर- हतः अस्याः वक्त्रं अभ्रास्तदीप्तेः त्वदनुसरणल्फिटकान्तेः इन्दोः दैन्यं विभर्ति (इति) त्वं पश्य' इत्यन्वयः । व्याख्या- तस्मन् स्थूलभद्रे एवं पूर्वोक्तरूपेण वदति कथयति (सति) चतुरा अभिप्रायज्ञाननिपुणा वयस्या वयसा तुल्य वयस्या [हृद्यपद्य (७१-११) इति य.] समानवयाः सखी उवाच वक्ष्यमाणां वचनं जगाद, हे सुमग ? सुन्दर ! सौभाग्यशालिन् वा एतत् बचसाऽनुमीयमानं ते तव हृदयम् अन्तःकरणं बाढम् चाह्यते स्म इत्यर्थे "चुन्धावरिया (४-४-९१)" इति निपातनात् बाढम् दृढं तीव्र वा ('अत्यर्थे गाढमुद्गाढं वाढं तीव्र भृशं दृढम्' अभि०६-१४१) निर्दयं परदुःखप्रहाणेच्छारूपदयाशून्यं किं कुतः कारणात् जातं सम्पन्नम्, तव भवतः विरहतः वियोगाद्धेतोः अस्याः मम सख्याः कोशायाः वक्त्रम् मुखम् , अभ्रास्तदीप्तः अभ्रण मेघेन आस्ता क्षिप्ता दीप्तिः कान्तिर्यस्य तादृशस्य त्वदनु: सरणक्लिष्टकान्तः त्वदनुसरणेन त्वन्मुखतुल्यताप्राप्ति हेतोस्तवानुनमनक्लेशे क्लिष्टा दृक्षिता कान्तिः शोभा यस्य - " ताशस्य च इन्दोः चन्द्रस्य दैन्यम आतिम् विभर्ति धारयति (इति) त्वं स्थूलभद्रः पश्य अवलोकय । विशेषः-पूर्वोक्तरूपेण कोशाया अभिप्राय निराकुर्वत- स्तव हृदयं निर्दयं कठोरं जातमित्यवधारयामि । त्वया स्वविर- हेण परिम्लायमानं कोशाया वदनं निरीक्षणीयम् , तथा च यथाऽस्या मुखं विकसेत् तथा त्वयाऽऽचरणीयम् ,, परंदुःख- प्रहाणेच्छारूपर्दया हि सर्वेभ्यो धर्मेभ्यो गरीयसीति सा न हेयेति भावः । त्वदनुसरणक्लिष्टकान्तः' इति पदेनैतन्मुखस्य चन्द्रातिरेको घनित इति प्रकृते व्यतिरेकालङ्कारध्वनि ॥११॥ कोशाया एव विरहावस्था वर्णयंति- एषाऽनैपीत् सुभग ! दिवसान कल्पतुल्यानियन्त, कालं वाला वहुलसलिलं लोचनाभ्यां स्रवन्ती । अस्थाद् दुस्था तब हि विरहे माभियं वार्तयन्ती, कच्चित्भतु:स्मरसि रसिक! त्वं हि तस्य प्रियेति ॥१२॥ अन्वयः- 'हे सुभग ! एपा वाला लोचनाभ्यां बहुनसलिलं स्रवन्ती इयन्तं कालं कल्पतुल्यान् दिवसान् अनैपीत् । हि तव विरहे दुःस्था इयम् , हे रसिके ! भर्तुः स्मरसि कच्चित, हि त्वं तस्य प्रिया इति मां वार्तयन्ती अस्थात्' इत्यन्वयः ।
१६६ - व्याख्या- + हे सुभग ! एषा दृश्यमाना याला अल्पोपयात यौवनोद्मदा कौशा लोचनाभ्यां नेत्राभ्यां यहुलसलिलं अधिकाधिकं जलम्-अश्रु सवन्तो क्षरन्ती इयन्तं तव विरहदिनादारभ्याद्यपर्यन्तं काल समयं यावत् “कालावनो- प्तिौ (२-२-४२)" इति द्वितीया, कल्पतुल्यान् कल्पेन दैवयुगसहस्त्रेण तुल्यान् समान् ('देवे युगसहस्त्रे द्वे ब्राम (वर्षम् ) कल्पौ तु ते नृणाम्' अभि० २-७४ ) दिव- सान् वासरान् अनैषीत् अत्यवाहयत् हि यतः तव भवतः विरहे वियोगे दुःस्था दुःखेन स्थितिमती इयम् कोशा हे रसिके ! सरसे ! भतु: स्थूलभद्रस्य स्मरसि निध्या- यसि कच्चित किम् , हि यतः त्व तस्य स्थूलभद्रस्य प्रिया प्रीतिपात्रम् ( आसी: ) इति पूर्वोक्तरूपेण मां सदयस्या वार्तयन्तो आलपन्ती अस्थात् सर्वदेवमालायलग्नवासीत् । विशेषः-तब विरहे अस्याः कोशाया एक दिनं दैवयुग- सहस्रवत् कथं-कथमपि अतिक्रान्तम् । तत्रापि सर्वदा लोचना- भ्यामश्रु क्षरन्ती त्वद् विषयां वातां कुर्वाणैवाऽऽसीत् । एव- ञ्चेशानन्यपरायणहृदयाया अस्या स्त्यागः त्वया न विधेय इति तात्पर्यम् ।। १२॥ पुनरपि कोशाया एवास्थान्तरं वर्णयति- .
१६७ मूर्ध्वान्ते सा सुभग ! रदती वारिता दिननाद, प्रातः सातं सखि ! वद कदाऽसौ समेतेत्यवग् माम्। लातु वेलां तव सुललितं गीतमुद्गातुकामा, भूयो भूयः स्वयमपि कृतां मूर्च्छनां विस्मरन्ती ॥१॥ - अन्वय:- . 'हे सुभग ! वेला लातु तव सुललितं गीतम् उद्गातु कामा स्वयमपि कृतां मृर्छनां भूयः भूयः विस्मरन्ती, मृन्तेि दीननादं रुदती वारिता सा हे सखि ! असौ कदा समेता (इति) प्रातःसातं वद, इति माम् अवक्' इत्यन्वयः । व्याख्या- हे सुभग ! वेलां समयं लातु कथमपि अतिवाहयि तुम्, तव भवतः सुललितं सुमधुर गीतम् गानविषयम् उद्गातुकामा उद्गातुम् उच्चैः परसणगोचररूपेण गातु कामोऽभिलापो यस्याः सा, ("तुमश्च मनकामे (३-२-१४०)" इति तुमो मस्य लुक् ) स्वयमपि स्वेनैव कृतां विहिता मूर्च्छनाम स्वराणामारोहावरोक्रमविशेष । “स्वरः संमूच्छितो यत्र, रागता प्रतिपद्यते । मूर्च्छनामिति तां प्राहुः, कवयो ग्राम संभवाम् ॥” इति सङ्गीतशास्त्रोक्तरूपाम् भूय भूयः वा-बारं विस्मरन्ती अनवदधाता, मूर्खान्ते स्मरकृतासु १६८ नयन-प्रीत्यादिपु दशसु स्मर दशासु नवमी मोहरूपा दर्शा मृर्छा तस्या अन्ते विगमे दीननादम् दीनवत् नदनं यथा स्यात् तथा रुदती रोदनं विदधती वारिता प्रतिरुद्धा सा कोशा 'हे सखि ! समानहृदये ! असौ दूरं गतः स्थूल- भद्रः कदा कस्मिन् दिवसे काले वा समता समागन्ता (इति) प्रातःसातं प्रातः कालिकं माङ्गलिकं वस्तु वद कथय' इति इत्थं माम् तत्सखीं अवक अकथयत् (वचेर- नघतन्यां प्रथम पुरुपैकवचने रूपम्) । विशेषः-कथमपि समयमतिवराहयितुं तवैव गीतं गातु मिच्छन्त्यपि चित्तस्यानवास्थिततया कियत्पर्यन्तं के मार्ग- मवलम्व्य मया गीतमित्यपि विस्मरन्ती मूञ्छिता भवति मन्तेि च किमिदं भवतीति निश्चेतुमशक्नुवाना दीनेव रोदिति । रोदनाद् वार्यमाणा च पृच्छति यत् हे सखि ! असौ कदा समेतेति प्रातःकालिकं सुखकरं वाक्यं कथय । मृ मसौ निद्रां मन्यते, निद्रान्ते च प्रातरेव प्रबुद्धाऽस्मीति जानती प्रातःकालिकं माङ्गल्यं तवागमन सूचनामेव मन्वाना तत्कथनाय प्रेरयति । एतेन "नयनप्रीतिः प्रथमं चिन्तासङ्ग- स्ततोऽथ सङ्कल्पः । निद्राच्छेदस्तनुता विषय निवृत्तिस्त्र- पानाशः ॥ उन्मादो मूर्छा मृतिरित्येताः स्मरदशदशैव स्युः।" इति रनिरहस्योक्तासु कामकृतदशासु नवमीं दशां प्राप्ताया अस्याः उपेक्षायां कृतायां कदाचिद् दशमी (मृतिः) दशाऽपि १६४ सम्भाव्यत इति विचार्य त्वयाऽनुकम्पा कार्येति सख्या हृदयम् ।। ६३ ॥ पुनरस्या एव विरहदशां वर्णयति-- पृष्ट्वा पृष्ट्वा गणकनिचयं जीवितं धारयन्ती, नीत्वा नीत्वा कथमपि दिनान्यगुलीभिलिखन्ती। गत्वा गत्वा पुनरपि पुनरि तस्थां च गेहे, प्रायेणेते रमणविरहेष्वङ्गनानां विनोदाः॥ १४ ॥ अन्वयः- '(एपा) गणकनिचयं पृष्ट्वा पृष्ट्वा जीवितं धारयन्ती, अङ्गुलीभिः लिखन्ती दिनानि कथम् अपि नीत्वा-नीत्वा, पुनः पुनः अपि द्वारि गत्वा-गत्वा च गेहे तस्थौ, रमण- विरहेषु एते प्रायेण अङ्गनानां विनोदा: (भवन्ति) इत्यन्वयः। व्याख्या- ( एपा कोशा) गणकनिचयं ज्योतिर्विदां समूह पृष्ट्वा-पृष्ट्वा कदा मे प्रियः समागन्ता इति भूयो भूयः प्रश्नं कृत्वा कृत्वा (तदुत्तरानुसारं ) जीवितं प्राणान् धारयन्ती न परित्यजन्ती, अङगुलीभिः करावयवैः लिम्वन्ती गणयन्ती दिनानि वासरान कथमपि केनापि १७० प्रकारेण नीत्वा-नीत्वा अतिवाह्यातिवाद्य, पुनः पुनः अपि भूयो भूयोऽपि द्वारि गृहानभूमौ गत्वा-गत्वा पौनः पुन्येन गमनमाधाय, गेहे स्वावासे तस्थौ स्थिरा बभूव । एतच्चार्थान्तरन्यासेन समर्थयति-रमणविरहेषु प्रणयि- वियोगेषु सत्सु एते पूर्वोक्ताः पौनः पुन्येनैक क्रियानुष्ठान- रूपाः प्रायेण बाहुन्येन अङ्गानानां स्त्रीणां विनोदाः मनोऽपनोदनसाधनानि (भवन्ति)। विशेषः--कदा मे प्रिय आगमिष्यतीति ज्ञातु गणकान् पृच्छति स्म, ततैश्च कालविशेषे तदागमनस्य कथिते तत् प्रत्याशया जीवितं घारयति स्म, कदा तद् दिन प्राप्स्यतीति संख्यातु प्रतिदिनमङ्गुलीभिः लेखारूढं-गणनायुक्तं करोति स्म, तेनैव च प्रकारेण दिनानि गमयति स्म, आगतः किमिति जिज्ञासया भूयो भूयो द्वारि गत्वा प्रति निवृत्त्य च गृहे स्थितिं करोति स्म । किमर्थमेतत्सर्वमाचरितमिति चेद् नैतत्समर्थनायोक्तम्-प्रायेण पतिविरहसमये अङ्गना एवमेव मनोविनोदयन्तीत्युक्तम् , एव ञ्च सामान्येन सकलविरहिणी- स्वभावकथनेन अस्यादशा-विशेषस्य समर्थनं कृतमित्यर्था- न्तरन्यासोऽलङ्कारः ॥१४॥ पुनस्तदवस्थमेव वर्णयति- १७१ शृङ्गारं स्वं सुभग ! विरहेऽङ्गारवत् संत्यजन्ती, दुःखेनाऽनं निजपरिजनं दुःखदिग्धं सृजन्ती । प्रेम्णा बद्धां निपुण ! भवता तां मुहुः संस्पृशन्ती, गण्डाभोगात् कठिनविषमामेकवेणी करेण ॥१५॥ अन्वयः- 'हे सुभग ! विरहे स्वं शृङ्गारम् अङ्गारवत् संत्यजन्ती, दुःखेन निदपरिजनं अलं दुःखदिग्धं सृजन्ती, हे निपुण ! भवता प्रेम्णा बद्धो कठिनविषमाम् ता एकवेणी गण्डाभोगात मुहुः संस्पृशन्ती (नस्थो)' इत्यन्वयः । - - व्याख्या- हे सुभग ! विरहे सव वियोगस्य समये स्वं निज शृङ्गारं भूषणम् अङ्गारवत् वह्निकणवत् सन्त्य जन्ती परिहरन्ती, दुःखेन स्वीयेन कष्टेन निजपरिजनं स्व- सेवकवर्गम् अलम् अत्यन्तं दुःखदिग्धं कष्टलिप्नं सृजन्तो रचयन्ती हे निपुण ! चतुर ! भवता त्वया प्रेम्णाः स्नेहेन बद्धां रचितां कठिनविषमाम् कठोरां निम्नोन्नतां च तां परिचिताम् एकवेणीम् एकीभूतां केशजूटिका गण्डा- भोगात्, गण्डस्थलमारभ्य मुहुः वारं वारं (यन्लोपे पञ्चमी) संस्पृशन्ती आभृशन्ती तस्थौ-इति पूर्वोक्ता क्रियाऽत्राप्यनु सन्धेया ॥
१७२ विशेषः-एकपत्नीनां पति विरहे शृङ्गारत्यागः दुःखित्वम्, एकवेणीधारणं चेति, सम्प्रदायः तथाचेयं त्वदेकपत्नीति त्वयाऽस्यास्त्यागोनोचितः । शृङ्गाराङ्गागदि पदेषु अनु- प्रासोऽलङ्कारः ।। १५॥ तव संयोगस्यावस्थायां यदभूत् तद्विपरीतं वियोगे भवतीत्याह- नीता रात्रिः क्षण इव पुरा या त्वयेद्धाऽपि साझे, क्रीडायोगैः सुरतजनित श्वारुभोगोपभोगैः। निःश्वासौधैर्निजतनुगतं चन्दनं शोषयन्ती, तामेवोष्ण विरहजनितैरश्रुभिर्व्यापयन्ती ॥ १६ ॥ अन्वयः- 'पुरा या रात्रिः इद्धा अपि त्वया सार्द्ध क्रीडायोगैः सुरतजनितैः चारुभोगोपभोगैः : क्षण इव नीता, निश्वासौधे निजतनुगतं चन्दनं शोषयन्ती, विरहज़नितैः उष्णैः अश्रुभिः तामेव व्यापयन्ती (तस्थौ)' इत्यन्वयः । व्याख्या- पुरा पूर्व (तव संयोगे सति) या यत्परिमाणा रात्रिः निशा इडा दीप्ता अपि त्वया भवता साई सह क्रीडा- १७३ योगैः लालाविलासः सुरतजनितः मैथुनादिसमयोत्पन्नैः चारुभोगोपभोगैः चारुभिः सुन्दरै भोगोपभोगैः भोगाना- मुपभोगैः सेवनैः क्षण इव क्षणतुल्यं नीता अतिवाहिता, निःश्वासौधः विरहजनितदीर्घश्वाससमूहैः निजतनुगतं स्वदेहस्थितं चन्दनं श्रीखण्डचन्दनं शोषयन्ती शुष्क कुर्वती विरहजनितैः वियोगकालोत्पन्नः उष्णैः तप्तः अश्रुभिः नेत्रजलैः तामेव रात्रि व्यापयन्ती व्यापिका- दी(भूतां कुर्वती, (तस्थौ)। विशेप:-तव संयोगेऽस्वा वा रात्रिः क्षण इव रति- सुखाद्युपभोगैर्व्यतीता सैव सम्प्रति दी(भूता नातिवाहयितु शक्यत इति भावः ॥ १६ ॥ अपि च न दत्त्वा दुःखं मम किमु सुर्ख हा ! विधातस्त्वयाऽऽन्तं ? जानात्यन्यो न हि परगतां वेदनां वाऽत्र कश्चित् । निन्दित्वाऽलं विविधवचनैर्दैवमेवं प्रमीला- माकाङ्क्षन्ती नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम् ॥१७॥ अन्वया- '(एपा) हा ! विधातः मम दुःखं दत्वा त्वया किम सुखम् आप्तम वा अन कश्चित् अन्य: परगतां वेदना न १७४ जानाति । एवं विविधवचनैः देवम् अलं रिन्दित्वा नयन- सलिलोत्पीडसद्धावकाशाम् प्रमीलाम् आकाङ्क्षन्ती (तस्थौ) इत्यन्वयः। व्याख्या- (एपा) हा विधातः ! दैव ! 'मेम कोशाया दुःख कष्टं दत्त्वा वितीर्य त्वया भवताकिमु किं रूपं सुखम् आनन्दः आप्तम् प्राप्तम् , पक्षान्तररूपेणार्थान्तरमुपस्यैतत्समर्थयति वा अथवा अन लोके कश्चित् कोऽपि अन्यः दुःखभाजो भिन्नः परगताम् परस्मिन् दुःखभाजि जने स्थिता वेदनां पीडां न जानाति नैवानुभवति । एवम् उक्तप्रकारेण विविध- वचनैः नानावाक्यैः दैवं विधातारम् अलम् अत्यन्तम् निन्दित्वा तिरस्कुर्वता नयनसलिलोत्पीडरुहावकाशाम् नयनसलिलानां नेत्रजलानाम् उत्पीडेन प्रवाधेन रुद्धः प्रति- बद्धः अवकाशः स्वरूपमाप्स्यवसरः यस्याः तां प्रमीलाम मूर्छाम् आकाङ्क्षन्ती अभिलष्यन्ती (तस्थौ) ॥ विशेष:-"परगतं हि दुःखं शीतलं भवति" इति लोको- क्तथनुसारं मां दुःखयता त्वया कि सुखमाप्तम्" इत्यादिरूपेण विधातारं बहु निन्दन्ती मूर्छामिच्छन्त्यपि नयनजलप्रवाह- स्यातिप्रसरात् तामपि न प्राप्नोतीत्याशयः। परगतदुःखाऽज्ञान- रूपेण सामान्येन, मदीय दुःखेन त्वं दुःखी न भवसीति व्यङ्गयोऽर्थः समर्थित इति अर्थान्तरन्यासोऽलङ्कारः ॥७॥ .
१७५ , किश्च-- संमृज्य श्रुप्लुतमथ निजं दिक्षु चक्षुः क्षिपन्ती, क्षौमान्तेन स्वमनसि जगजानती शून्यमेतत् । स्मृत्वा स्मृत्वा तव गुणगणं भूमिपीठे लुठन्ती, साभ्रे ऽह्रीव स्थलकमलिनी न प्रबुद्धा न सुप्ता ॥१८॥ अन्वयः- 'अथ प्लुतम् अश्रु क्षौमान्तेन संमृज्य निजं चक्षुः दिनु क्षिपन्ती स्वमनसिं एतत् जगत् शून्यं जानती तव गुणगणं स्मृत्वा स्मृत्वा भूमिपीठे लुठन्ती साभ्रे अहि स्थलकमलिनी इव न प्रवुद्धा नः सुप्ता' इत्यन्वयः । . । - व्याख्या-- अथ पूर्वोक्तरोदनान्तरं प्लुतम् चक्षुषिव्याप्तम् अश्रु नेत्रजलम् क्षौमान्तेन वस्त्राप्रान्तेन संमृज्य प्रोञ्छ्य, निजं स्वीयं चक्षुः नेत्रं दिक्षु सर्वतः क्षिपन्ती प्रेरयन्ती स्वमनसि स्वचित्ते एतत् दृश्यमानं जगत् संसारं शून्यं जनरहितं जानती निश्चिन्वाना तव भवतः गुणगणं दया- दाक्षिण्यादिगुणसमूहं . स्मृत्वा-स्मत्वा 'भूमिपीठे महीतले लुठन्ती परिवर्तमाना साधे मेघसहिते ध्यात्वा-ध्यात्वा १०६ , अहि दिने स्थलकमलिनी भूपमिनी इव न प्रघुडा न जागरिता प्रफुल्ला वा, न सुप्ता निद्रिता मुकुलिता वा ।। विशेषः-रोदनान्तेऽश्रु प्रमार्ण्य कमपि एतस्मादुद्धारक जनमन्विष्यन्ती चक्षुः प्रतिदिशं क्षिपति, कमपि तादृशं त्वादृशं वा जनमपश्यन्ती जगदिदं शून्यमिति स्वमनसि निश्चिन्वती तव गुणान् स्मृत्वा भूमौ पतति । तदानीमियं जागर्ति वा स्वपिति वेति न किमपि निश्चितु शक्यते । यथा मेघाच्छादिते दिने सूर्यातपाभावात् स्थलमलिनी न विकसति, राज्यभावाच्च न मुकुलिता भवतीति दोलायमाना तिष्ठति तथैवेयमपीति दृष्टान्तालङ्कारः ॥ १८ ॥ आत्मनो दुःखं प्रकटयन्ती सख्याः कोशाया उपरि दयां प्रार्थयते- पालोक्याऽस्यास्तव विरहजं चेष्टितं यन्न भिन्नं, तजानीमो वयमिति निजं वज्रसारं हृदेतत् । कारुण्यं तत्सदयहृदयाघ्रोचितं ते विधातु, प्रायः सर्वो भवति करुणावृत्तिरान्तरात्मा ॥ ११ ॥ अन्वयः- अस्याः तव विरहजं चेष्टितम् आलोक्य यत् न भिन्नम् ., तत् एतत् हृत् वज्रसारम् इति वयं जानीमः, तत् हे सदय
हृदय अत्र ते कारुण्यं विधातुम् उचितम् प्राय सर्वः आना-
न्तरात्मा करुणा वृत्तिः भवति इत्यन्वयः ।
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व्याख्यो-
अस्याः मम सख्याः कोशाया तव भवतः विरहज
वियोगावस्थाकृतं चेष्टितम् व्यापारम् आलोक्य निरीक्ष्य
यत् यस्मात् न भिन्नम् विदीर्णम्, तत् तस्मात्, एतत
मदीयं हृत् हृदयं वज्रसारम् वज्रस्य कुलिशस्येव सारो बल
दृढत्वं वा यस्य तादृशम्, इति वयं कोशा सख्यः जानीम:
अवधारयामः, तत् तस्मात् हे सदय हृदय ! सदयं दयया
महितं हृदयं यस्य तदामन्त्रणम्, अन्न अस्यां मम 'सख्या
कोशायां ते तव कारुण्यं करुणोपयुक्तं कर्म विधातु
कतुम् उचितम् योग्यम्, अत्र अर्थान्तरन्यासेन 'कृतमर्थ
समर्थयति प्रायः बाहुल्येन सर्वः सकलः आर्टान्तरात्मा
स्निग्धान्तः करणो जनः करुणावृत्तिः करुणया सहितावृत्तिः
आचरणं यस्य तादृशः भवति जायते ॥
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विशेपः-अस्या मम प्राणसमायाः सख्याः तव विरहा-
वस्थायां तानि तानि दुःसहानि चेष्टितानि दृष्ट्वाऽपि यदहं
जीवन्त्येवास्मि तदवधार्यते - यत् वज्रहृदयाऽस्मि भवास्तु
सदयहृदयोऽतः -करुणावताऽवश्यमेव भाव्यं भवतेति मम
सख्यां स्वकारुण्य प्रयोजनीयमिति भावः । अस्या कारण्य
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१७८ विधानरुपो विशेषः सर्वस्यान्तरात्मनः करुणया सहितत्वं प्रसिद्धमिवेति सामान्येन समर्थित इत्यर्थान्तरन्यासोऽ- लङ्कारः॥ ९९॥ ....यदि भवानधापि नैनां संभावयिष्यति नूनमियं प्राणां स्त्यजेत् इत्याह--- अस्मद्वाक्य यदि न हि भवान् मानयिष्यत्यदोऽपि, प्राणत्यागं तदियमचिरात् सा विधास्यत्यवश्यम् । भूयो भूयः किमिह बहुना जल्पितेनाऽत्र भावि, प्रत्यक्षं ते निखिलमचिराद् भ्रातरुक्तं मया यत् ॥१०८ 'अन्वय:- 'भवान् अदः अस्मद्वाक्यं यदि न मानयिष्यति अपि, तत् इयम् सा अचिरात् प्राणत्यागम् अवश्यं विधास्यति, हे भ्रातः इह भूयः भूयः बहुना जंल्पिते न किम् अत्र ते निखिलम् अचिरात् प्रत्यक्षं भावि मया यत् उक्तम्' इत्यन्वयः। व्याख्या- भवान् ! श्रीस्थूलभद्रः अदः अनुपदमुक्तम् अस्मद्- वाक्यम् मदीयं वचनम् यदि चेत् न मानयिष्यति स्वीकरिष्यति अपि इति संभावनायाम्, तत् तर्हि इयं सा . प्रत्यक्षदृश्यमाना कोशा सखी अचिरात् शीघ्रम् प्राण- त्यागम जीवित्परिहारम् अवश्यं निश्चितं विधास्यति करिष्यति । हे भ्रातः! इति स्वजनतारव्यापनाय अवश्च- नीयताप्रतीत्यर्थ चामन्त्रम् , इह अस्मिन् विषये भूयः-भूयः वारं-वारं बहुना अधिकेन जल्पितेन कथितेन किम् किमपि प्रयोजनं नास्ति, अत्र अस्मिन्नेव काले स्थाने वा ते तव निखिलम् सर्वं प्रत्यक्षम् साक्षात्कृतम् भावि भविष्यति, किं तत् सर्वम् ? यत् सर्व मया कोशा सख्या उक्तम् कथितम् ॥ विशेषः-इयं तत्पक्षपातिनी गणिका चेटी मिथ्यैव सर्वमभिदधातीति विज्ञाय यदि मदीयं वाक्यं भवान् न विश्वसिष्यति, स्वाग्रहेणैव संयमे-मुनिधर्मे एवं व्यवस्थितो भविष्यति तर्हि, मम न काऽपि हानिः, परमियं मरिष्यत्येव । अत्र विषयेऽधिककथनेनालम्-स्वयमेव भवान् अत्रैव सर्व मदुक्तं प्रत्यक्षेणैव द्रक्ष्यतीति भावः । प्रत्यक्षं च सर्वप्रमाणतो बलवत् । अतोऽस्या अवस्थां भवान् स्वयमेव पश्यत्विति भावः ॥ १० ॥ अहनि कथश्चिदाश्वसित्यपि रात्रौ तु कष्टा स्थिति रित्याह- , -7 -- - १८० , । वार्ताव्यग्रां तुदति न तथा त्वद्रियोगोऽहनीमा, यवदात्रौ कृतबहुशुचं चन्द्ररोचिश्चितायाम् । पश्यत्वेना स्वयमपि भवानद्य भूमीशयाना, तामुन्निद्रामवनिशयनासन्नवातायनस्थः ।। १०१ ॥ अन्वयः- 'अहंनि वार्ताव्यग्राम् इमाम् त्वद्वियोगः तथा. न तुदति यद्धत् रात्री चन्द्ररोचिश्चितायां कृतबहुशुचम् (तुदति) अद्य. भवान् स्वयमपि अवनि शयनासन्नवातायनस्थः भूमीशया- नाम् उनिद्रां ताम् एनाम् पश्यतु इत्यन्वयः । व्याख्या अहनि दिवसे वार्ताव्यग्रां त्वत्सम्बन्धि समालाय- व्यस्ताम् इमाम कोशाम् त्वद्वियोगः तव विरहः तया तद्वत् न तुदति व्यथयति, यत् यथा रात्रौ निशि चन्द्र रोचिश्चितायाम् चन्द्रस्य.रोचिः ज्योत्स्नैव, चिता शवदाह- चुल्ली तस्यां कृतबहुशुचम् विहिताधिकशो काम्, (तुदति) अद्य अस्या रात्री भवान् स्थूलभद्रः स्वयमपि आत्म- नाऽपि अवनिशयना सन्नवातायनस्थः अवनी भूमौ यत् शयनम् शय्या स्तरणम् तदासन्ने तत्समीपस्थिते वातायने गवाक्षे स्थितः आश्रितः सन् भूमीशयानाम् पृथ्वीतत्व- .
१८१ -- . . - परिवृत्ताम् उन्निद्राम्. उच्छिन्न निद्राम् ताम् एनाम् पूर्वोः क्तरूपां कोशाम् पश्यतु प्रत्यदी करोतु ।। विशेषः--दिवा वह्वया सख्योऽन्ये च जनाः कुशला- दिवाग्रिहणाय तिष्ठन्ति तैः सह भवद्विषयालापेन कथञ्चिद् दिनमतिवाह्यतीति न वियोगव्यथा तथाऽनुभूयते, यथा रात्रावकाकिनी चन्द्रज्योत्स्ना स्थितया । (तस्वाश्थातिशय- कामोद्दीपकत्रया तत्र चितायामिव दुःखेनावस्थितिरिति हृदयम्) एतच्च भवानद्यापि रात्रौ वातायनाश्रितो भूत्वा प्रच्छन्न एव द्रष्टुं शक्ष्यतीति भावः । चन्द्ररोचि चितायामिन्यत्र रूप- कमलङ्कारः॥.१०१॥ , ,म्बाभिप्रायं निगमयति- विज्ञप्ति मे सफलय कुरु स्वं मनः सुप्रपन्नं, सख्या साकं मम भज पुनर्देव ! भोगान् विचित्रान् । वामाक्ष्यस्यास्त्वयि सति मुहुः स्पन्दमेत्य प्रसन्ने, मीनक्षोभाञ्चलकुवलयश्रीतुलामेष्यतीव ॥ १०२ ॥ १ . अन्वयः-- 'हे देव ! मे विज्ञप्ति सफलय, स्वं मनः सुप्रसन्नम् कुरु, मम सख्या साकम् विचित्रान् भोगान पुनः भज, त्वयि १८२ प्रसन्ने सति अस्याः वामाक्षि मुहुः स्पन्दम् एत्य मीन- क्षोमात्-चलकुवलयश्रीतुलाम एष्यति इव' इत्यन्वयः । - . व्याख्या- हे देव ! क्रीडाविशारद ! मे मम विज्ञप्ति प्रार्थना सफलय सार्थिका कुरु स्वं स्वकीयं मनः चित्तं सुप्रसन्नम् अतिशयप्रमुदितं कुरु प्रकटय, मम सख्या कोशया साकं सह विचित्रान आश्चर्यजनकान् भोगान् स्रक्चन्दनायुप- योगपूर्वकान् विहारान् पुनः भूयः पूर्ववत् भज सेवय । स्वपि भवति प्रसन्ने मुदिते सति अस्याः कोशाया वामाक्षि वामनयनं मुहुः वारंवार स्पन्दम् चञ्चलताम् एत्य प्राप्य मीनक्षोभात् मत्स्यसंघट्टात् चलकुवलय- श्रीतुलाम चलस्य चञ्चलस्य कुवलयस्य नीलकमलस्य श्रिया सह तुला सादृश्यम् एष्यति प्राप्स्यति इव इत्युत्प्रेक्ष्यत इति भावः॥ विशेषः-इत्थं पूर्वकथितानुसारं तदवस्थायां विज्ञातायां सम्प्रति एतदेव कर्तव्यम् यन्मे प्रार्थनां स्वीकृत्य सुप्रसन्नेन मनसा कोशया सह भोगान् भुयः। त्वयि च प्रसन्ने मति स्त्रीणां सौख्यसूचकं वामाक्षि अस्याः स्पन्दमेत्य चल-. कुवलयेन साम्यं दधात्विति तात्पर्यम् । उत्प्रेक्षाऽलङ्कारः ॥ १०२॥ . 1
१८३
त्वयि सुप्रसन्ने किं किं भावीत्येव दर्शयति-
जेष्यत्याऽऽस्यं प्रमुदितमलं मेघमुक्तस्य शस्या,
शोभामिन्दोविकसितरुचेश्चारुरोचिश्चितं साक् ।
प्राप्ते प्रीतिं भवति सुभगाऽऽनन्दितायाः किलाऽस्या,
यास्यत्यूरुः सरसकदलीस्तम्भगौर श्चलत्वम् ।।१०३॥
.
अन्वयः-
'हे सुभग ! भवति प्रीति प्राप्ते सति, आनन्दिताया
अस्याः चारुरोचिश्चितम्-अलं प्रमुदितम् आस्यम् मेघमुक्तस्य
विकसित रुचेः इन्दो शस्यां शोभा साक् जेष्यति, 'सरसक
दलीस्तम्भगौर ऊरुः चलत्वम् यास्यति किल' इत्यन्वयः ।
.
.
व्याख्या-
हे सुभग ! भवति त्वयि प्रीतिं प्रसन्नता प्राप्ते सति
आनन्दितायाः प्रसन्नाया अस्या: मम प्रियसख्याः
कोशायाः चारुरोचिश्चितम् चारुण सुन्दरेण रोचिषा
कान्त्या चितम् व्याप्तम् अलम् अत्यर्थम् प्रमुदितम् प्रसन्नम्
आस्यम् मुखम् मेघमुक्तस्य जलदनिर्गतस्य विकसितरुचः
विकीर्णकान्तः इन्दोः चन्द्रस्य शस्यां प्रशंसनीयां शोभा
छवि साक् झटिति जेयति अमिभविष्यति, (तथा)
सरसकदलीस्तम्भगौरः सरसः आर्द्रः यः कदली स्तम्मः
१८४ 1 रम्भाकाण्डम् तद्वत्. गौरः शुभः ऊरु: जघनोपरिभागः चलत्वम् कम्पम् यास्यति प्राप्स्यति किल निश्चयेन ।। विशेषः-भवति प्रसन्नमात्र एवास्या वदनं सुप्रसन्नम्, पतिसमागमसूचकमुरुस्पदनं च भविष्येत्येव । सरसकदत्ती- स्तम्भगौर इत्यत्रोपमालङ्कारः, इन्द्रोः शोभा जेष्यतीत्यत्र च व्यतिरेकालङ्कार ध्वनिः ॥ १०३ ।। " . किञ्च-उपभोगक्रममप्युपदिशति- दुःखक्षामा न खलु सहते बाढमाश्लेषमेषा, मबाहुभ्यां सदय ! मनसीदं स्वकीये विचार्य । कापीदस्याः प्रथममलिने मा भवान् स्नेहवत्याः; सदाः कराठच्युतभुजलताग्रन्थि गाढोपगूढम् ॥ १०४॥ L अन्वय " - हे सदयो ! दुःखशामा ',एपा मद्वाहुभ्याम् । बाढम् 'आश्लेषम् न खलु सहते इंदं स्वकीये मनसि विचार्य भवान स्नेहवत्याः अस्याः प्रथममिलने सद्यः कण्ठच्युतभुजलता- ग्रन्थि गाढोपगूढम् मा कार्षीत्' इत्यन्वयः । .
१८५ 7 व्याख्या-- हे सदय ! 'दयया प्रियायाः क्लेशपरिजिहीरूपया सहितः सदयः तदामन्त्रणम् “दुःखक्षामा दुःखेन प्रिय- वियोगजनितेन पूर्वोक्तकष्टेन क्षमा कृषा एषा.कोशा भदाहु- भ्याम् मम स्थूलभद्रस्य वाहुभ्यां हस्ताभ्यां बाढम् दृढम् आश्लेषम् आलिङ्गनम् न खलु सहते नैव सोढुं शक्ष्यति" इदं पूर्वकयितरूपं वस्तु स्वकीये निजे मनसि चित्ते विचार्य अवधार्य भवान् स्थूलभद्रः स्नेहवत्या त्वयि परमस्निग्धायाः त्वत्परितोषाय स्वीयं दुःखमपि उपेक्ष- माणाया अस्याः कोशायाः प्रथममिलने प्राथमिक समा- गमकाले सद्यः कष्टच्युतभुजलताग्रन्थि सद्यः तत्कालमेव कण्ठात् गलप्रदेशात् च्युता पृष्ठदेशं प्राप्ता या भुजलता 'बाहुवल्लीतया' ग्रन्थिः परस्परस्य ग्रन्थनं यत्र तथाभूतम् गाढोपगूढम् गाढं दृढं यथा स्यात्तथा उपगूढम् आलिङ्गनम् माकार्षीत् नैव कुर्याः ॥ विशेप-बहोः कालात् पश्चात् समागमे जाते हो- द्रेकात् त्वं दृढमालिङ्गनं विधास्यसीति सम्भाव्यतेऽतः सूचयामि यदेपा बहुकालवियोगदुःखेन कृशा जातास्तीति अस्याः क्षमतामवधायैवालिङ्गने मृदुता विधेयेति भावः । । - , 7 १८६ - अत्र आदर्शपुस्तके 'प्रथममलिने' इति पाठः समब लोक्यते किन्तु तदर्थो नावधारित इति 'प्रथममिलने इत्येवं कल्पिता, मुद्रणदोषेण सम्भाव्यते चेयं त्रुटिः ॥ १०४ ।। अत्र प्रथममिलने तस्या लज्जया संभावितां त्रुटिमाह त्वामायातं शयनसदने वीक्ष्य लज्जाऽन्विताङ्गी, नो कुर्याच्चेत् तब सुहृदय ! स्वागतं सा सखी नः। स्नेहस्निग्धैर्मधुरवचनैराधिमुग्भिस्तदानी, वक्तु धीरः स्तनितवचनैर्मानिनी प्रक्रमेथाः॥१०॥ अन्वय- 'हे सहृदय ! शयनसदने त्वाम् आयातं वीक्ष्य लज्जान ताङ्गी सा नः सखो तव स्वागतं चेत् नो कुर्यात्, तदानीम् धीरः स्नेहस्निग्धैः मधुरवचनैः, आधि मुग्भिः स्तनितवचनैः (च) मानिनी वक्तु प्रक्रमेथाः, इत्यन्वयः । . व्याख्या- हे सहृदय ! सभानं हृदयं यस्य स सहृदयस्तत्सम्बो धनम्, शयनसदने शय्यागृहे त्वाम् भवन्तं आयातम् समागतं वीक्ष्य अवलोक्य लज्जानताड़ी लज्जया बहुदिना- नन्तरं प्रथमसमागमवीडया आनतं नम्रम् अङ्ग यस्याः सा १८७ सा पूर्वोक्ता नः अस्माकं सखी आलिः कोशा, तव भवतः स्वागतं आगमनाभिनन्दनं चेत यदि नो नैव कुर्यात् विदधीत, तदानीम् तस्मिन् समये धीरः धैर्यशाली (त्व) स्नेहस्निग्धैः स्नेहेन प्रीत्या स्निग्धैः आः कोमलैः मधुरवचनैः मिष्टभाषणैः, आधिमुग्भिः मनोव्यथापहारकैः स्तनितवचनैः गर्जितवत् स्पष्टैर्वाक्यैश्च मानिनी प्रणयको- पशीलां कोशां प्रति वक्तुम् आलपितु प्रक्रमेथाः उपक्रम कुर्याः ॥ . विशेष-यहुदिनानन्तरं समागमोऽपि प्रथम समागम सदृश एवेति तत्र लज्जायाः संभावनास्ति, तया लज्जया प्रणयकोपेन वा सा यदि शयनसदनागतस्य तव स्वागतं न विदधीत, तर्हि तस्या इदमनौचित्यमविगणय्य भवता प्रीत्या, स्पष्टेन च वचनेन संभाषणमुपक्रमणीयम् । प्रीत्या लज्जा हानिर्मानिहानि श्च, स्तनितवद् स्पष्टै क्यैि श्च 'अहमिदं सत्यं प्रतिजाने सर्वे शृण्वन्तु, नातः परमहं क्वाऽप्यन्यत्र गन्तास्मि' इत्यादिरूपैः मानसी व्यथा विनश्यति । तथाचानादरग पनया कोणो न कार्योऽपि तु सैव सान्त्वनीया येन प्रकृतिस्था भवेदिति भावः । स्तनितवचनैरित्यत्रोपमालङ्कारः ॥ १०५॥ एवमुक्तेऽपि किमपि प्रत्युत्तरमलभमाना पृच्छति- 7 १८८ किं काठिन्यं त्यजति न भवानागतोऽपि स्वगेहे, स्वीयां जायां न हि निजदृशास्नेहतो वीक्षतेऽपि !! प्रावटकालो रचयति मनांस्यध्वगानामयं द्राग, मन्द्रस्निग्धैर्वनिभिरबलावेणिमोक्षोत्सुकानि ॥१०६॥ अन्धयः- 'स्वगेहे आगतः अपि भवान कटिन्यं किं न त्यजति ? हि स्वीयां जायां निजशा स्नेहतः वाक्षतेऽपि न ? अयं प्रावृट्कालः अध्वगानां मनांसि मन्द्रस्निग्धैः ध्वनिभिः अवलावेणिमोक्षोत्सुकानि द्राक् रचयति' इत्यन्वयः । व्याख्या स्वगेहे स्वीये गृहे आगतः पुनः प्राप्तः अपि भवान काठिन्यं कठोरतां किम कुतो न त्यजति न परिहरति ? हि यतः स्वीयां स्वाधीनां जायां पत्नी निजदृशा स्वदृष्टया स्नेहतः प्रेम्णा वोक्षतेऽपि अवलोकयन्यपि न ? अयं समुपस्थितः प्रावटकालः वर्षासमयः अध्वगानां पथिकानां मनांसि चेतांसि मन्दस्निग्धैः मन्द्रः धीर: स्निग्धैः आद्रैः कोमलै वा ध्वनिभिः मेघशब्दैः अबलावेणि- मोक्षोत्सुकानि अबलानां स्वस्वनारीणां वेण्याः केशप्रथ- नस्य मोक्षाय मोचनाय उत्सुकानि उत्कण्ठितानि द्राक् झटिति रचयति विदधाति ।। :
१८६ विशेषः--यावद् भवान् बहिर्गत आसीत् तावत् शील- संरक्षणाय काठिन्यमये क्षितमेव, सम्प्रति तु स्वगृहमागत इति अत्र कोमलता प्रदर्शनमेव युक्तमिति स्वीयामिमां स्नि- ग्धया दृष्टयाऽवलोकयतु । वर्षाकाले हि पथिकानामपि मनामि दयिता सम्पर्कायोत्सुकानि भवन्ति, भवाँश्च समीपस्थ एव कुतो नो चितमाचरतीति पृच्छति । पतिविरहप्रारम्भ बद्धावेणी पतिभिरेवागत्य, मोचनीयेति कुलावलासम्प्रदायः स- इह सूचितः॥ १०६॥ पूर्वमियं कोशासखी श्रीस्थूलभद्रेण संमानिताऽऽसीदिति तत्स्मारणपूर्वकं स्ववचनस्य कर्तव्यतामाह मान्या तेऽहं सुभग ! सततं वच्मि तेनैव बाद, वाक्य मे तत् परिणतिशुभं मानयेदं वदान्य !! मत्तो ज्ञात्वा व्यतिकरम, लप्स्यते निर्वृति सा, कान्तोदन्तः सुहृदुपहृतः संगमात् किञ्चिदूनः ॥१०७॥ अन्वय:- 'हे सुभग ! अहं ते सततं मान्या, तेन एव बाढ़ वच्मि, तत् हे वदान्य ! परिणति शुभं मे इदं वाक्यं मानय । मत्तः अमु व्यतिकरं ज्ञात्वा सा निवृति लप्स्यते, सुहृदुपहृतः कान्तोदन्तः सङ्गमात् किञ्चित् ऊनः (भवति)' इत्यन्वया । - 7
१६०
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व्याख्या-
हे सुभग ! अहं कोशा सखी ते भवतः सततं सर्व
स्मिन् काले मान्या प्रतीक्ष्या (आसम्) तेन कारणेन एव
केवलं, पाढम् अत्यर्थं वच्मि कथयामि, तत् तस्माद्धेतोः हे
वदान्य ! परमोदार ! परिणतिशभम् परिणतो परिणाम-
काले शुभम् कल्याणकरम् मे मम इदं पूर्वोक्तं वाक्यं वचनं
मानय अङ्गीकुरु । मत्तः सम मुखात् अमु अवयोमध्येवृत्तं
व्यतिकरम् वार्तालापादिवृत्तान्तं ज्ञात्वा अवगत्य सा कोशा
निवृति सन्तोपं लप्स्यते प्राप्स्यति, अर्थान्तरोपन्यासेन
समर्थयति सुहृदुपहृतः सुहृदा मित्रेण सख्या वा उपहृतः
आनीतः कान्तोदन्तः कान्तस्य कान्ताया वा उदन्तः
वृत्तान्तः सङ्गमात् साक्षामिलनात् कश्चित् स्वल्पमेव ऊनः
हीन: भवति ॥
..
-
विशेषः-पूर्व मे वचनं त्वं न निराकार्षीः, अतस्तेऽहं
मान्या आसम्, तेनैव विश्वासेन मया सम्प्रति बहु कथितम्,
तच्च त्वया स्वीकरणीयमेव, तव च स्वीकृति मन्मुखादवगत्य
सा त्वत्सङ्गमसुखमेव प्राप्यतीति भावः । सामान्येन
कान्तोदन्तस्य सखीमुखाच्छु तस्य सङ्गमसादृश्यप्रतिपादनेन
मदुक्त स्तव वृत्तान्तः सङ्गमसुखं दास्यतीति विशेषोऽर्थः
ममर्थित इत्यर्थान्तरन्यासालङ्कारः ॥१०७॥
१६१ J पूर्वमावश्यक कर्तव्यं कुशलपृच्छारूपमपि भवान्न कृत- वानित्युपालभते- स्वामिन् ! जानन्नपि नयविधि प्रोक्तवानन्यदन्यत्, क्षेमप्रश्न किमिति न भवानेकवारं चकार । विश्वेऽप्यस्मिन् खलु सुखभृतामण्यहो देवघश्ये, पूर्वाभाष्यं सुलभविपदा प्राणिनामेतदेव ॥१०॥ अवन्य:- 'हे स्वामिन् ! नयविधिं जानन अपि भवान्, अन्यत् अत्यत् उक्तवान्, क्षेमप्रश्न एकवारं किमिति न चकार अहो ! दैववश्ये अस्मिन् विश्वेऽपि सुखभृतामपि सुलभ विपदा प्राणिनाम्, एतद् एव पूर्वाभाष्यम् खलु' इत्यन्वयः । व्याख्या- हे स्वामिन ! नयविधिं लोकनीतिं जानन विदन अपि भवान् श्रीस्थूलभद्रः अन्यत्-अन्यत् कुशल प्रश्ना- दितरदितरद् वस्तु उक्तवान् कथितवान्, क्षेमप्रश्नं कुशल- पृच्छाम् एकवारम् सकृदपि किमिति कम्यादेतोः न चकार न कृतवान् अहो! आश्चर्यम् । दैववश्ये भाग्याधीने अस्मिन् दृश्यमाने विश्वेऽपि सर्वस्मिन्नपि १६२ जगति सुखभृताम् सुखैयुक्तानामपि सुलभविपदां सुलभा अप्रत्याशिता एव प्राप्यमाणा विपदः दुःखानि यः तथा भूतानां प्राणिनां जीवानां कृते एतद् एव केवलं कुशल- प्रश्नः पूर्वाभाष्यम् पूर्व कथनीयं खलु निश्चयेन ॥ विशेषः-केनापि सह विशेषतो वान्धवैः सह . प्रथम- मिलने सर्वालापतः पूर्व कुशलमेव प्रष्टव्यम्, इति लौकिकं नयं (नीति) जानन्नपि भवान् पूर्व कुशलम् पृष्दैव अन्यदन्यदेव बहुतरभुक्तवानिति नीति परित्यागः कुतः कृतः । अस्य नयस्य औचित्यं काव्यलिङ्गालङ्कारेण समर्थयति-सर्वसुखसमृद्धा अपि प्राणिनोऽतार्कितमेव विपदभिभूता भवन्तीति सर्वत्र संसारे दृश्यते, अतः सर्वतः पूर्व सः कुशलमेव प्रष्टव्यमिति भावः । उत्तर वाक्याओं हेतुत्वेन पूर्ववाक्यार्थ समर्थयतीतिकाव्य- लिङ्गसेवालङ्कारः ।। १०८॥ पुनरपि गेहादिप्रवेशायानुद्यतं प्रेरयति- गेहस्यान्त जति न भवान् भाषते नाऽपि पत्नी, सौधेऽपि स्वे वसति परवद् नो भजत्युग्रभोगान् । लप्स्ये स्वर्गे सुखमिति वृथा चिन्तितैस्तीव्रकृच्छ, संकल्पै स्तै विशति विधिना वैरिणा रुद्धमार्गः॥१०१ 5 - ११३ अन्वयः- - : 'भवान् गेहस्य अन्तः न व्रजति पत्नीम् नैव भाषते, स्वेअपि सौधे परवत् वसति, उग्रभोगान् नो भजति, वैरिणा विधिना रुद्धमार्गः चिन्तितैः तीव्रकृच्छ : तैः सङ्कल्पैः स्वर्गे सुखं लप्स्ये इति वृथा विशति' इत्यन्वयः । व्याख्या-- भवान् ! श्रीस्थूलभद्रः गेहस्य आवास गृहस्य अन्तः मध्ये न ब्रजति नैव गच्छति पत्नी दयिताम् कोशां नैव भापते आलपति, स्वे अपि निजेऽपि सौधे प्रासादे परवत् अपरिचितोऽन्य इव वसति तिष्ठति, उपभोगान् उग्रान् दीप्तान् भोगान विषयान् अशनपानादीन् वा न भजति न सेवते । वैरिणा शत्रुणा सुखंविरोधिना विधिना देवेन अथ च यम-नियमादिविधायकेनागमवाक्ये न रुद्धमार्गः प्रतिबद्धमार्गः (त्वम्) चिन्तितः ध्यानैः तीव्रकृच्छ्रः तीव्र कठोरैः कृच्छः व्रतैः, तैः सङ्कल्पैः तद्विषयकसङ्कल्पैः अनेन व्रतेनाहममुकं सुखं प्रार्थये इत्यादिभि व्रतपूर्वामिलाप सूचक- वाक्यैः स्वर्गे देवलोके-सुखं वनितादिभोग लप्स्ये प्राप्स्ये इति इत्थं वृथा व्यर्थमेव विशति उपविष्ट स्तिष्ठति ॥ ..
१९४ विशेषः-भवान् उपस्थितं सर्वमिदं सुखं परित्यज्य स्वर्गे सुख प्राप्ति प्रत्याशया यत् ध्यानादिकमाचरन् गृहप्रवेशा दिकं वर्जयति तन्न युक्तम् 'उपस्थितं परित्यज्य अनुपस्थि- तस्य सुखस्य कल्पनाया अनौचित्यात् । ततश्च निःसन्देहं विषयोपभोगे प्रवर्ततां भवानिति हृदयम् ।। १०६ ।। एवमपि तूप्णीमेव तिष्ठन्तं. कोशावाक्यान्येव श्रावयति- त्राता नस्त्वं सुभग ! शरणं जीवितव्यं त्वमेव, वं नः प्राणा हृदयमसि नस्त्वं पतिस्त्वं गतिर्नः। ज्ञात्वाऽपीत्थं प्रिय! परिहरन् नो न किं लजसे सा?, त्वामुत्कराठातरलितपदं मन्मुखेनेदमाह ॥ ११० ॥ अन्वयः- 'हे सुभग ! "त्वं नः त्राता, (त्वं) (न:) शरणम् (नः) जीवितव्यं त्वम् एव, त्वंना प्राणाः, त्वं न हृदयम् असि, त्वं नः गतिः असि, हे प्रियतम ! इत्थं ज्ञात्वा अपि नः परिहरन् कि न लज्जसे" सा इदं त्वाम् मन्मुखेन उत्कण्ठातरलितपदं आह' इत्यन्वयः। .
१६५ व्याख्या- हे सुभग ! "त्वं भवान् नः अस्माकं त्राता रक्षकः, (त्वं नः) शरणम् आश्रयः, (न:) जीवितव्यम् जीवनो- देश्यम् त्वम् भवान् एव कंवलः, त्वं नः अस्माकं प्राणाः प्राणवायुभूतः, त्वं नः हृदयम् अन्तःकरणम् असि भवसि त्वं नः पतिः स्वामी असिः, त्वं नः गतिः परायणम् असि, हे प्रियतम ! प्रियेषु अतिशयित ? इत्थं पूर्वरूपेण ज्ञात्वा अवगत्य अपि नः अस्मान् परिहरन् परित्यजन् किं कुतः न लज्जसे न अपसे" सा कोशा इदं पूर्वोक्तम् त्वाम् श्रीस्थूल- भद्रम मन्मुखेन मद्वदनद्वारा उत्कष्ठातरलितपदम् उत्कण्ठया औत्सुक्य न तरलितानि चञ्चलानि पदानि यस्मिन् तद्यथा स्यात् तथा आह कथयति ॥ विशेष:--सा स्वयं किमपि तवाग्रे वक्तुमशक्नुवती "त्वमेव मदीयं सर्वस्वमिति बहुशोऽपि परीक्ष्य दृष्टमेव त्वयेति, तथाऽपि मम परिहार स्तव लज्जाया एव कारणं स्यादिति" मन्मुखेन त्वामाहेति ज्ञात्वा त्वया साऽवश्यं सम्भावनीयेति भावः ॥ ११०॥ अथाऽसौ स्थूलभद्रः स्वयमेव कोशा जैनधर्मे प्रेरयति-
१६६
-
श्रुत्वा साधुस्तदुदितमथोवाच कोशां च भूयो,
धर्मं श्रीमजिननिगदितं चेद् भजेथास्त्वमार्ये ।।
चातुर्येणाऽखिलयुवतिषु क्ष्मातले तद्विशाले,
हन्तैकस्थं क्वचिदपि न ते सुभ्रु ! सादृश्यमिति ॥११११
अन्वयः-
'स साधुः तदुदितम् श्रुत्वा, अथ भृयः कोशाम् उवाच,
हे आयें ! त्वं चेत् श्रीमज्जिननिगदितं धर्म भजेथाः, तत् हे
सुभ्र ! विशाले क्षमातले अखिलयुवतिषु क्वचिदपि एकस्थं
चातुर्येण ते सादृश्यं न अस्ति' इत्यन्वयः ।
व्याख्या-
स पूर्वोक्तः साधुः मुनिः श्रीस्थूलभद्रः तदुदितम्
तस्याः सख्याः कोशायाश्च उदितम् कथनं श्रुत्वा निशम्य
अथ अनन्तरम् भूयः पुनरपि उवाच जगाद है आयें!
श्रेष्ठे त्वं भवती चेतु यदि श्रीमजिननिगदितं श्रीमता
जिनेन सर्वज्ञेन निगदितं प्रतिपादितं धर्म सुकृतं भजेथाः
सेवेथाः तत् तर्हि हेसुभ्र ! शोभन कुटिसहिते विशाले
विस्तृते मातले पृथिव्याम् सकलयुवतिष्ठ सर्वत्र तरुणी-
वृन्दे कचिदपि कुत्रापि एकस्थं एकस्मिञ्जने स्थितं
चातुर्येण पाटवेन ते तव सादृश्यं साम्यं न अस्ति न
विद्यते॥
२७ विशेषः-त्वं शरीरसौन्दर्यादिगुणैः सर्वश्रेष्ठास्येव, यदि सर्वज्ञश्रीमज्जनेन्द्रभापितजैनधर्ममपि स्वीकुर्याः तर्हि त्वत्सदृशी काऽपि युवतिरिह लोके चतुरा दक्षा नास्तीति विज्ञायतेति भावः । एष चतुर्थचरणो मेघदुते यक्षप्रियां प्रति यक्षेण संदिश्यते यत् त्वदीयाङ्गानां प्रत्येकं सादृश्यं यत्र तत्रावलो- क्यतेऽपि किन्तु एकत्र त्वदीयं सर्वावयवसादृश्यं नोपलभ्यते । इहापि किश्चिद्रूपभेदेनायमेवार्थः प्रकृतोपयोगी सम्पादित इति ॥ १११ ।। अथात्मनः शीलसम्पत्तिमथ' च स्त्रीसंपृक्तवस्तुनामपि- वर्जनीयतामाह- तुल्यं स्त्रैणं तृणमपि च मे शुद्धशीलप्रभावात्, प्रागासीना भवति भवती येषु येष्वासनेषु । नेहे ब्रह्मव्रतकृतरतिस्तन्धि ! तंत्राऽऽसितु तत् । पूर्व स्पृष्टं यदि किल भवेदङ्गमेभिस्तवेति ॥११२॥ अन्वयः- - - - शुद्धशीलप्रभावात् मे स्त्रैणं तृणाम् अपि च तुल्यम्, तत् भवती प्राक् येषु आसनेषु आसीना भवति, हे तन्धि !
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ब्रह्मव्रतकृतरतिः पूर्वम् एभिः तव अङ्ग स्पृष्टं भवेत् किल
इति तत्र आसितुन ईहे' इत्यन्वयः।
व्याख्या-
शुद्धशीलप्रभावात् शुद्धस्य निर्मलस्य शीलस्य
ब्रह्मचर्यस्य प्रभावात् सामाात् मे मम कृते स्त्रैणम्
स्त्रीणां समूहः, तृणम् अपि घासाद्यपि च तुल्यम् समा
नोपयोगम्, न क्वचिदपि अनयो मूल्ये उपयोगे वा मे
मनसि तारतम्यमस्ति । तत् तस्मात् भवती कोशा प्राक्
इतः पूर्वम् येषु आसनेषु आस्तरेषु आसीना उपविष्टा
भवति उपविशतीति यावत्, हे तन्धि ! कृशे ? ब्रह्मव्रत-
कृतरतिःब्रह्मार्थ विशुद्धज्ञानार्थं यत् व्रतं स्त्रीसम्पर्कपरिवर्जना-
दिकं तत्र कृता रतिः अनुरागो येन तथाभूतोऽहं, 'पूर्वम् इतः
पूर्वकाले एभिः आसनैः तव भवत्या अङ्ग शरीरं स्पृष्टं
संपृक्तं भवेत् स्यात् किल निश्चयेन" इति हेतोः तत्र
आसनेषु तेषु आसितुम् न ईहे नेच्छामि ॥
विशेषः-तपः सेवनात मे चारित्रं निर्मलं जातमिति तणे
स्त्रणे च समदृष्टिः ब्रह्मचर्यव्रते कृतरतिश्चाहम् भवत्सम्पर्कगतेषु
आसनेष्वपि नोपवेष्टुमिच्छामि भवत्या सहासनं तु दूरे क्षिप्तम् ।
अतश्च पूर्वोक्तं सर्वं प्रत्याख्यातं ज्ञेयमिति ॥ ११२ ॥
१४ अथैवं प्रत्याख्याय तद्गेह एवाखण्डचारित्रश्चातुर्मासी- मतिवाटाह- चातुर्मास्यं समजनि शुभे! पूर्णमेतत्सुखेन, त्वद्गेहे मे समभवदहो ! शीलहानिर्न काचित् । यायां पादानथ निजगुरोर्वन्दितु कर्मनाशे, क्रूरस्तस्मिन्नपि न सहते संगमं नौ कृतान्तः ॥११॥ अन्वयः- 'हे शुम ! त्वद्रोहे मे एतत् चातुर्मास्यं सुखेन पूर्ण समजनि; काचित् शीलहानिः न समभवत् अहो ! कर्मनाशे निजगुरोः पादान वन्दितुम् यायाम, क्रूरः कृतान्तः तस्मिन् अपि नौ संगम न सहते' इत्यन्वयः । व्याख्या- हे शुभे ! कन्याणशीने त्वद्गेहे त्वदीयेऽस्मिन् गृहे मे मम एतत् प्रवर्तमानं चातुर्मास्यं चतुणां वार्षिक- मासानां समाहारः चतुर्मासी तस्याः कर्म चातुर्मास्यम् 'पतिराजान्त० [७-१-७६ ]" इति टयण, चतुषु वार्षिक- मासेषु विहितं कर्मेत्यर्थः सुखेन अनायासेन पूर्णम् सकलम् समजनि संजातम्, काचित् अज्ञाताऽपि शीलहानिः ब्रह्मचर्यभ्रंशः न समभ व, संजातः इति अहो ! आश्च- यम् । अथ अतः परम् कर्मनाशे कर्मक्षये निजगुरोः
।
२००
स्वगुरोः पादान चरणान् वन्दितु प्रणन्तु यायाम् गच्छे- ,
यम् । (यदि च तवापि मया सह गुरुवन्दनार्थमीहाभवेत्
तन्न युक्तम् इत्याह)-फरः कठोरः कृतान्तः साधुसिद्धान्तः
तस्मिन् अपि गुरुपादवन्दनकर्मण्यपि नौ आवयोः संग-
मम् सहगमनम् न सहते न मृष्यति ।।
विशेषः-सुखेनात्र चातुर्मास्यं मया समापितम्,
शीलहानेः सर्वथा संभावनायां सत्यामपि सा न जात
त्याश्चर्यम् । चातुर्माससमाप्तौ च गुरोः बन्दनाय तत्समीपे
गमनमावश्यकम् । साधुसिद्धान्तनियमतीव्रतया च तत्र
गमनेऽपि त्वया न सहगन्तुं शक्यते इति त्वमव तिष्ठति
भावः । मेवदूते च यक्षः स्वप्नेऽपि आवयोः सङ्गमं विधिर्न
सहते, संगमावस्थातः पूर्वमेव निद्राभङ्ग कारयतीत्याशयेना-
त्रत्यं चतुर्थ चरणं प्रायुक्तः इह च प्रकरणवशादन्यार्थकता-
मापादित इति कवेश्चातुरी ॥ ११३ ॥
गमनकाले धर्मोपदेशं करोति-
धर्मं तावद् भजतु भवती वीतरागप्रणीतं,
दान शीलं तप इइ शुभो भान एवंप्रकारम् ।
गन्तव्यं वै सुतनु ? मयका पावृषोऽहानि नीत्वा,
दिकसंप्सतप्रविरलघनव्यस्तसूर्यातपानि ॥ ११४॥
२०१ अन्वय:- 'भवती तावत् वीतरागप्रणीत दानं शीलं तपः शुभः भावः एवं प्रकारम् धर्मम् इह भजतु । हे सुतनु ! मयका दिसंसक्तप्रविरलघनव्यस्तसूर्यातपानि प्रावृपः अहानि नीत्वा गन्तव्यम्' इत्यन्वयः। व्याख्या- : भवती कोशा तावत् दीक्षायाः पूर्व वीतराग- प्रणीतम् वीतः अपगतः रागो विषयासक्तिः यस्य से वीतरागः जिनेश्वरः तीर्थङ्करः तेन प्रणीतम् समुपदिष्टम् दानं सत्पात्रे अशन-पान-खादिम-स्वादिम-वस्त्र-पात्रादेः अथवा सत्कार्ये द्रव्यादेः वितरणं, पञ्चप्रकारकमभयादिदानं, शीलं. ब्रह्मचर्य अष्टादशसहस्रभेदवत् मैथुनत्यागरूपं तपः द्वादश-, भेदरूपं पचाशभेदरूपं वा तपः कायिक-वाचिक-मानसिक क्लेशसाध्यमिति यावत् शुभः भावः उत्तमः कन्याणवान् भावः आशय श्च एवं प्रकारकम् इत्थं रूपं धर्म सुकृतम् इह अत्रैव स्थिता भजतु शीलयतु । हे सुतनु ! सुन्दर- शरीरे । सुकशे ! वा मयका स्थूलभद्रेण दिक्संसक्त- प्रविरलघनव्यस्तसूर्यातपानि दिक्षु संसक्ताः पर्यस्ता ये प्रविरला विकीर्णा घनाः मेघाः तैः व्यस्तः दूरं क्षिप्तः सूर्यातपः दिवाकरप्रतापः येषु तानि प्रावृषः वर्षोंः अहानि . - २०२ दिनानि नीत्वा अतिवाद्य गन्तव्यम् त्वद्गृहं परित्यज्य विहारः कार्य इत्यर्थः ॥ विशेषः-पूर्व शरीरमनसोः संशोधनार्थ दानादिरूपं जिनेन्द्रोक्तं धर्म भवती भजतु अहं तु समाप्तेषु चातुर्मासिक- दिनेषु विहारार्थ गमिष्यामि । पश्चात् स्थिरीभूते चेतसि त्वयाऽपि धर्मोपदेशो ग्राह्य इति हृदयम् ।।११४॥ त्वविरहे दु:खितया मम कुतो धर्माचरणं संभ वनेति चेदत्राह- ज्ञाते धर्मे जिननिगदिते तेऽपि नो भावि दुःखं, मुग्धे ! तस्मादिह परभवे लप्स्यसे त्वं च सौख्यम् । अस्मच्चेतो जिनमतगतं नाऽभजत् कापि दुःखं, गाढोष्माभिः कृतमशरणं त्वदवियोगव्यथाभिः ॥११५॥ - अन्वयः- 'हे मुग्धे ! जिननिगदिते धर्म ज्ञाते ते अपि इह दुःखं नो भावि, तस्मात् परभवे च त्वं सौख्यं लप्स्यसे । गाढो- प्माभिः त्वद्वियोगव्यथाभिः अशरणं कृतम् अस्मच्चेतः जिनमतगतम् क्वापि दुःखम् न अभजत्' इत्यन्वयः । .
૨૦૩ व्याख्या हे मुग्धे सरले ! जिननिगदिते जिनेन सर्वज्ञेन प्रोक्ते धर्म जैनधर्म ज्ञाते परिचिते अभ्यस्ते च सति ते भवत्या अपि इह संसारे दुःखम् कामादि पीडा नो भावि नैव भविष्यति, तस्मात् धर्मात् कारणात् परभवे च उत्तर- स्मिन् जन्मनि च त्वं भवती सौख्यं स्वर्गादिसुखमेव लप्स्यसे प्राप्स्यसि । गाढोष्माभिः गाढः घनीभूतः उष्मा तापः यासु ताभिः त्वद्वियोगव्यथाभिः तव भवत्या वियोगस्य विरहस्य व्यथाभिः पीडाभिः अशरणं आश्रयहीनं कृतं विहितम् अस्मच्चेतः मदीयं मनः कापि कस्मिन्नपि काले देशे वा दुःखम् कष्टं न अभजत् नान्वभवत् ।। विशेषः-ऊष्मन् शब्दो यद्यपि नान्तः क्लीव लिङ्गा, तथापीह "ताभ्यां वाऽऽप् डित् [२-४-१५]" इति डिदापि गाढोष्माभिरिति साधु । यावत्वया धर्माचरणं ना कारि ताव देव ते चेतसि कामादिकृतं दुःखं भवति, कृते च धर्माचरणे यथा तब विरहस्य तापेन तप्तमपि मे मनो न दुःखमन्वभूत् तथा तवापि मनसि दुःखं न स्यादिति भावः ॥११५॥ ।' पुनरपि धमोपदेशमेव विदधाति- ခွင့်ပွဲ . जैने धर्मे कुरु निजमति निश्चलां तन्धि ! नित्यं, शीलं घेहीहितसुखकरं देहि दानं गुणिभ्यः । पोपव्यापव्यतिकरजुषां धर्मभाजां च पुंसां, नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चंक्रनेमिक्रमेगा ॥११६॥ 1 अन्वयः- 'हे तन्वि ! जैने धर्मे नित्यं निजमति निश्चला कुरु, ईहित सुखकर शीलं धेही, गुणिभ्यः दानं देहिः पापव्याप- व्यतिकरजुषा.धर्ममाजां च पु साम् दशाचक्रनेमिक्रमेण नीचेः उपरि च गच्छति' इत्यन्वयः । । व्याख्या- हे तन्वि ! कृशे ! जैने जिनोक्ते धर्मे सुकृते नित्वं प्रतिदिनं निजमति सावुद्धिम् निश्चलां स्थिरां कुरु विधेहि, ईहितसुखकरं करोतीति करः, ईहितस्य सुखस्य करः ईहितसुखकरः तं शीलं ब्रह्मचर्य शीलव्रतं घेहि धारय, गुणिभ्यः विद्वद्भ्यः दानं दीयते यद् तद् दानम् दातव्यं धनानि देहि वितरः कुत एतदनुष्ठेयमितिचेद् अत्राह- पापव्यापव्यतिकरजुषां पापानां व्यापन्नं पापव्यापः भावे घन् , तस्य व्यतिकरः सम्बन्धो व्यशनं वा तं जुषन्ति सेवन्त इति तेषा, धर्मभाजां धार्मिकाणां च पुसां नराणाम् दशा २०५ तत्फलभोगावस्था चक्रनेमिक्रमेण चक्रस्य या नेमिः प्रान्तमागः तस्य क्रमेण परिपाट्या नीचैः अधः उपरि उर्वच गच्छति ।। , - विभोपः--धर्मे बुद्धि स्थिरीकृत्य शीलादिसम्पादनेन धर्मवृद्धा ऊर्ध्वगतिस्ते भविष्यति यतः पापिनामधोगतिः धार्मिकाणामूर्ध्वगतिः चक्रनेमिक्रमेण भवति । यस्य नीवस्य यदा पापकर्मणामुदयस्तदा तदनुकूलाऽधोगतिः, धर्मस्योदये च तदनुकूलोधगतिरिति क्रमशः चलतीति भावः ॥११६॥ तपोऽनुष्ठातुमुपदिशन् तस्य प्रशंसामपि प्रस्तौति- शुद्धिं भद्रे ! रचय तपसा स्वस्य तेनात्मनस्त्वं, दृष्ट्वा क्लप्तं मुनिभिरतुलं यद् वनस्थैस्त्रिशुद्धया! हर्षेणोच्चैर्दिवि दिविषदां पुष्पवृष्टया समं साग, मुक्तास्थूलास्तरुकिशलयेष्वश्रुलेशाः पतन्ति ॥११७॥ अन्वयः- 'हे, भद्रे ! तेन त्वम् तपसा आत्मनः शुद्धिं रचय, वनस्थैः मुनिभिः त्रिशुद्धया फ्लुप्तम् अतुलं यद् दृष्ट्वा, हर्पण दिवि दिविषदां उच्चैः पुष्पवृष्टया समं मुक्तास्थूलाः अश्रुलेशाः तरुकिसलयेषु साक् पतन्ति' इत्यन्वयः ।
२०६ तपसा व्याख्या- हे भद्रे ! कल्याणि ! तेन पूर्वोक्तेन धर्मभाजामूल- गतिरितिज्ञातेन, अशन-पान-खादिम-स्खादिम त्यागरूपोपवासादिविविधतपश्चर्यानुष्ठानैः आत्मनः स्वस्य शरीरस्य मनसः वाचश्च शुद्धिं निर्मला रचय विधेहि, वनस्थैः पुरं विहाय वने तिष्ठद्भिः मुनिभिः त्रिशुद्धयां त्रयाणां कायमनोवचसां शुद्धया पवित्रीकरणेन क्लुप्त विहितं यत् तपः दृष्ट्वा समवलोक्य हर्षेण आनन्दा- तिरेकेण दिवि स्वर्गे दिविषदां देवानां उच्चैः उन्नतया- उत्कृष्टया वा पुष्पवृष्टया कुसुमवर्षणेन समं सह, मुक्ता- स्थूलाः मुक्तावत् मौक्तिकवत् स्थूलाः बृहन्तः अश्रुलेशाः अश्रुविन्दवः तरुकिसलयेषु वृक्षाणां नूतनपत्रेषु साक् झटिति पतन्ति क्षरन्ति ॥ विशेष:--तपसा प्रथमं कायादिशुद्धिः कार्या, तदनन्तरं विहितं तपोऽभीष्टार्थसाधकं भवति, यदृष्ट्वा च देवा अपि दृष्यन्ति विस्मयन्ते च, तथाहि मुनिभिः त्रिशुद्धि पूर्वक कृतमतुलं तपो दृष्ट्वा देवाः पुष्पवृष्टिमानन्दाणि च वन्ति । तथा च तपसः- साफल्याय पूर्व तपोऽनुष्ठानेनात्मशुद्धिरेव विधेयेति तात्पर्यम् ॥ ११७ ॥ अथ प्रवुद्धा कोशोवाच-- ।
२०७
कोशा प्रोचे प्रिय! विगलिता साऽद्य मे भोगतृष्णा,
वाक्यैरेभिस्तव हृदि निजे या. मयेत्थं धृताऽभूत् ।
श्रावां भूयो विरहविगमे भोगभङ्गी विचित्रां,
निर्वेक्ष्यावः परिणतशरचन्द्रिकासु क्षपासु ।।११८॥
अन्वयः--
'कोशा प्रोचे-हे प्रिय ! या मया निजे हृदि धृताऽभूत्
सा मे भोगतृष्णा अद्य इत्यम्-एभिः तव वाक्यैः विगलिता,
आवां विरह विगमे परिणतशरच्चन्द्रिकासु क्षपासु विचित्र
भोगभङ्गी भूयः निर्वेक्ष्यावः' इत्यन्वयः ।
.
.
व्याख्या-
कोशा नायिका प्रोचे प्रत्युत्तररूपेणोक्तवती किमि-
त्याह-हे प्रिय! स्वामिन ! या भोगतृष्णा मया कोशया
निजे स्वीये हृदि अन्तःकरणे घता स्थापिता अभूत
आसीत् सा मे मम भोगतृष्णा भोगेषु आहार विहागदि
विशेषोपयोगेषु या तृष्णा तीवोऽभिलाष: अद्य अस्मिन्
दिवसे इत्थं पूर्वप्रकारोक्तैः एभिः सम्प्रत्येव श्रुतैः सव
भवतः छाक्यैः उपदेशवचनैः विगलिता नष्टा । आवाम
अहं च त्वच विरह वगमे वियोगकाले व्यतीते परि-
णतशरश्चन्द्रिकासु परिणता परिणामं पूर्ति प्राप्ता शरदः
२०६ प ऋतोः चन्द्रिका कौमुदी यासु तासु क्षपासु रात्रिपु विचित्रां अद्भुतां भोगभङ्ग” भोगानों सक्चन्दनाथुपयोगाना भङ्गी परिपाटी निर्धक्ष्याव: अनुभविष्यावः ।। विशेषः-भवद् वाक्य में भोगतृष्णा ममाप्ता, तथापि अयमस्त्येवामिलापो यदिह जन्मनि आवाभ्यां तपस्तप्त्वा तथा सुकृतमर्जनीयं येनापरस्मिन् भवे पुनः संयुक्तावावां नानाविधान भोगान भोक्ष्याव इति ॥११८ ॥ कोशाकामविकारशान्त्यर्थ धर्मोपदेशं प्रार्थयते स्वामिन् ! धर्माऽमृतरसमयं देहि दिव्यौषधं तद्, येनायं मे तुदति न मनो मन्मथाख्यो विकारः। त्वद् वाक्ये नोज्झितविषयया यवशादद्य रात्री, दृष्टः स्वप्नेऽकितव।, रमयन कामपि त्वं मयेति ॥११॥ . अन्वयः- 'हे स्वामिन् ! धर्मामृतरसमयं तद् दिव्यौषधं देहि, येन अयं मन्मथाख्यः' विकारः मे मनः न तुदति, हे अकि- तब ! यद् वशात् अद्य रात्रौ - त्वद् वाक्येनोज्झितविषयया मया त्वम् स्वप्ने कामपि रमयन् दृष्टः' इत्यन्वयः ।
२०६ 1. --- - व्याख्या- हे स्वामिन् ! धर्मामृतरमयं धर्म एवामृतरसः अमृतस्यापि सारभूतः . पदार्थः तन्मयम् तद्प्रचुरम् तद् प्रसिद्धं दिव्यौषधं दिवि भवम् दिव्यं तदौषधम् अगदं देहि वितर ! येन औषधेन अयं प्रत्यक्षमनुभूयमानः मन्मथाख्यः मन्मथ नामा विकारः शरीरस्य विकृति रूपः मे मम.मनः चित्तं न तुदति न व्यथयति, हे अकितच ! अवञ्चक ! यद् वशात् यस्य मन्मथाख्य विकारस्य वशात् कारणात् अद्य रात्रौ अस्यामव्यहित व्यतीतायां निशि त्वद्वाक्ये- नोज्झितविषयया त्वदीयेन धर्मोपदेशमयेन वाक्येन परित्यक्तकामोपभोगयाऽपि मया कोशया त्वम् भवान् स्वप्ने स्वप्नावस्थायाम् कामपि ‘मदतिरिक्ता' रमणी रमयन् रति कारयन् दृष्टः अवलोकितः ॥ 1 , । . विशेषा--त्वद् वाक्येन मया विषयपरित्यागस्तु कृतः, परं कामो मे मनोन त्यजति, यत् प्रमाणं चैतद् यदद्यापि रात्रौ स्वप्ने मया तवान्यवनितया सह सङ्गमोऽवलोकितः । यादृशी वासना हृदि भवति तादृशमेव स्वप्नं पश्यति जन इति प्रसिद्धम् । तथा चैषा कामवासनाऽपि मम हृदये न तिष्ठेत तदुपायभूतं धर्मोपदेशं कुरु पश्चाद् गन्तव्यं भवतेति भावः ॥ ११८ ॥ ।
२१० अथासौ कोशाया भक्तिभावमवलोक्य प्रसनो नमस्कार- मन्त्रं प्रादादित्याइ- इत्युक्तोऽसौ चरणनतया कोशया भक्तिपूर्व, त्वद् वृत्तेन प्रमुदितमनाः सादरं साधुराजः । प्रादादस्य भवभयहरं स्वं नमस्कारमन्त्रं, प्रत्युक्त हि प्रणयिषु सतामीप्सितार्थक्रियेव ॥१२०॥ अन्वयः- 'चरणनतया - कोशया भक्तिपूर्वम्-इति उक्तः असो, तद् वृत्तेन प्रमुदितमनाः साधुराजः अस्य भवभयहरं स्व नमस्कारमन्त्रं सादरं प्रादात् , हि ईप्सितार्थक्रिया एव सतां प्रणयिषु प्रत्युक्तम् भवति' इत्यन्वयः। व्याख्या- चरणनतया स्वपादपर्यन्तं नम्रीभूतया कोशया वेश्यया भक्तिपूर्वम् श्रद्धासहितम् इति पूर्वोक्तप्रकारेण उक्तः प्रार्थितः असौ पूर्वानुसृतवृत्तः, तदवृत्तेन तस्याः कोशाया वृत्तेन आचरणेन प्रमुदितमनाः प्रसन्नचेताः साधुराजा साधूनां राजेव मुख्य इवेति साधुराजः श्रीस्थूल- मद्रमुनिवरः अस्यै कोशाय भवभयहरं संसारभीतिनिवारक स्वं स्वेनपरिशीलितं नमस्कारमन्त्रं नमस्काराख्यं सुप्रसिद्ध महामन्त्रं सादरम् आदरसहितं पादान् उपदिदेश, हि यतः ईप्सितार्थक्रिया ईप्सितस्य प्राप्तुमभिलषितस्य अर्थस्य प्रयोजनस्य क्रिया सम्पादनम् एव केवलम् , संतां सज्जना- नाम् प्रणयिषु स्निग्धजनेषु प्रत्युक्तम् प्रतिवचनम् भवति । विशेष एवं निश्छलहृदयेन श्रद्धापूर्वक प्रार्थितः श्री- स्थूलभद्रो मुनिप्रवरः किश्चिदन्यत् प्रतिवचनमनुक्त्वा केवलं श्रीनमस्कारमहामन्त्रमेव सद्य उपदिदेश । प्रत्युत्तरमनुक्त्वा प्रार्थितार्थपूर्तिरेव या कृता तामर्थान्तरन्यासेन समर्थयति । यत् सज्जनाः प्रणयिभिः प्रार्थितं कायमेव कुर्वन्ति न तु वचनरूपेण प्रत्युत्तरयन्तीति । अर्थान्तरन्यासोऽलङ्कारः सामान्येन सज्जनव्यवहारप्रदर्शनेन श्रीनमस्कारमहामन्त्र दानकार्यस्य विशेषरूपस्य समर्थनात् ।। १२० ।। अथापरमप्युपदेष्टव्यमुपदिशति- तामूचेऽसौ मनसि सततं मन्त्रमेनं स्मर वं, नित्यं भक्त्या त्रिभुवनगुरोर्जन्म सार्थं सृज स्वम् । शीलेनाऽले विमलममले ! जैनधर्मं भजेथाः, प्रातः कुन्दप्रसवशिथिलं जीवितं धारयेथाः ॥१२॥ - . .
२१२ अन्वयः- . 'असौ ताम् ऊचे-त्वं त्रिभुवन गुरोः एनं मन्त्रं भक्त्या नित्यं सततं स्मर, स्वं जन्म सार्थ सृज, हे अमले ! विमलं जैनधर्म शीलेन अलं भजेथाः, प्रातः कुन्दप्रसवशिथिलं जीवितं धारयेथाः' इत्यन्वयः । व्याख्या असौ श्रीस्थूलभद्रो मुनिप्रवरः ताम् कोशाम् ऊचे जगाद, किमित्याह-त्वं कोशा त्रिभुवनगुरोः त्रयाणां भुवनानां लोकानां समाहारः त्रिभुवनं तस्य गुरोः धर्मोपदेश- कस्य एनं पूर्वोपदिष्टम् मन्त्र श्रीनमस्कारमहामन्त्रं भक्त्या 'श्रद्धया नित्यं प्रतिदिनं सततं सर्वस्मिन् काले स्मर ध्यायस्वः स्वं निजं जन्म शरीर धारणं सार्थं सफलं सूज विधेहि । हे अमल ! निर्मले विमल सर्वदोपशून्यं जैनधर्म जिनोपदिष्टं धर्म शीलेन चारित्रानुशीलेनेन सह अलं अत्यन्तं भजेथाः सेवेथाः, प्रातःकुन्दप्रसवशिथिलं प्रातः प्राभातिकः कुन्दप्रसवः कुन्दा ख्यपुष्पं तद्वत् शिथिलं सद्यः पतन धर्मि जीवितं जीवनं धार येथाः विभृयाः॥ विशेषः-प्रतिदिनमिमं मन्त्रं स्मरन्ती, तेन च जन्म सार्थयन्ती शीलरक्षापूर्वकं धर्ममनुतिष्ठन्ती सततं संभावितनाशं जीवनं यावच्छक्यं धारयेथाः इत्येष एव उपदेशः पर्याप्त २१३ - इति भावः । मेघदते च यक्षेण प्रियायै स्वा गमनकालं यावज्जीवितधारणाय सन्दिष्टोऽयं चतुर्थश्चरणोऽत्रापि तदर्थ एव योजित इत्यनवद्यम् । अत्रापि श्रीस्थूलभद्रमुनिप्रवरस्यायं सन्देह आसीत् । यदियं कदाचिन्मद्विरहे नीवितमेव परि- त्यजेदिति जीवितधारणोपदेशः कृतः । बहुकालं जीवन्त्या च धर्मानुष्ठानेन पुण्यवाहुल्यार्जनसम्भावनेति तस्याभिप्रायः प्रकाशितो भवति ॥ १२१ ॥ , अथ तस्याः कृतकृत्यतामाह- 1 धन्यं मन्या मुनिवचनतोऽङ्गीचकाराखिलं तत् , प्रीति भेजे मनसि परमां साऽऽप्तसम्यकत्वलाभा । दुष्टे द्वेषं गुरुनिगदिता यान्ति धर्मोपदेशा, इष्टे वस्तुन्युपचितरसाः प्रेमराशीभवन्ति ॥१२२॥ अन्रय:- 'आप्त सम्यक्त्वलाभा सा धन्यंमन्या मुनिवचनतः अखिलं तत् अङ्गीचकार, मनसि परमां प्रिति भेजे। गुरु निगदिता धर्मोपदेशाः दुष्टे द्वेपं यान्ति, इष्टे वस्तुनि उपचितरसाः प्रेमराशी भवन्ति' इत्यन्वयः ।
२१४ व्याख्या- आप्तसम्यक्त्वलाभाः सम्यक्त्वस्य सम्यग्दर्शनस्य- लाभः प्राप्तिः सम्यक्त्वलामः आप्तः अधिगतः सम्यक्त्व- लाभो यया सा आप्त सम्यक्त्वलाभा सा कोशा धन्यंमन्या आत्मानं धन्यां मन्यते इति धन्यं मन्या "क: खश [५-१-११७]" इति खशि "खित्यनव्ययास्पो मोन्तो ह्रस्वश्च |३-२-१११]" इति मान्तत्वे ह्रस्वे च धन्यं मन्येति । मुनिवचनतः मुनिवाक्यात् अखिलं सर्व तत् साधृपदिष्टम् अङ्गीचकार स्वीचकार । धन्यं मन्यत्वपूर्वक स्वाकारमर्या- न्तरन्यासेन समर्थयति-गुरुनिगदिताः गुरुभिरुक्ता: धर्मोपदेशाः धर्मस्य सुकृताचरणस्य उपदेशाः आद्योच्चार- णानि दुष्टे दुःशीले जने वेषं वैररुपता यान्ति प्राप्नुवन्ति, इष्टे समुचिते प्रीतिपात्रे वा वस्तुनि पदार्थे शिष्यरूपे उपचितरसाः उपचितः वृद्धिंगतः रस आस्वाद परिणामो वा येषां तथाभूनाः प्रेमराशीभवन्ति स्नेहसंघातता यान्ति ॥ विशेषः-उपदेशानन्तरं श्रीस्थूलभद्रमुनिप्रवर समोपे तम्याः सम्यक्त्वपूर्वकं द्वादशव्रतपालनार्थ प्रतिज्ञा कृता । मम्यक्त्वञ्चेत्थं परिभाषितम्- "देवत्वधीर्जिनेष्वेव, मुमुक्षुषु गुरुत्वधीः । धर्मधारहता धर्मे, तत्स्यात् सम्यक्त्वदर्शनम् ॥" इति । - २१५ - तत च गुरूक्तं सर्वमङ्गी चकार । गुरूपदेशेन कृत- कृत्यता ज्ञानपूर्वकं तत्स्व काररूपं विशेषमर्थ सामान्येन दुष्ट- जनेषु गुरूपदेशस्य द्वेषरूपतायाः, सुहृत्सु च स्नेहरूपतायाः कथनेन समर्थितमित्यर्थान्तरन्यासोऽलङ्कारः । इयं चात्मनः सुहृदं मन्यते श्रीस्थूभद्रमुनिप्रवरमिति तद्वचनं स्नेहवत्स्वीच- कारेति ॥ १२२॥ अथ गन्तुकामोऽसौ शुभाशिषा तां समा जयति- भद्रे ! भद्रं भवतु सततं ते जिनेन्द्रप्रसादाद नन्तु पादानथ निजगुरोरेष यास्यामि शस्यान । ध्यायन्यै श्रीजिनपरिवृढं शीलरत्नेन शश्वद् मा भूदेवं क्षणमपि च ते विद्यु ता विप्रयोगः॥१२३ ॥ अन्वयः-- 'हे भद्रे ! ते जिनेन्द्रप्रसादात् सततं भद्रं भवतु । अथ एषा शस्थान् निजगुरोः पादान् नन्तु यास्यामि । एवं श्रीजिनपरिवृढं शश्वत् ध्यायन्त्यै ते विद्युता शीलरत्नेन क्षणम् आपि विप्रयोगः' इत्यन्वयः । व्याख्या हे भद्रे ! कल्याणि ! ने भवत्याः जिनेन्ग्रप्रसादात् जिनेन्द्रस्य जिनश्रेष्ठस्य तीर्थङ्करस्य प्रसादात् प्रीतेः कारणात
२१६
भद्रं कल्याणं भवतु जायताम् । अथ एतदनन्तरम् एषः
अहम् शस्थान प्रशंसनीयान् निजगुरोः स्वगुरोः दीक्षा-
दायकश्रीसम्भुतिविजय नाम्नः सद्गुरोः पादान चरणान
नन्तु वन्दितु' यास्यामि गमिष्यामि । एवं पूर्वोक्तरूपं
श्रीजिनपरिवृढं श्रियायुक्तं जिनपरिवृढं जिनश्रेष्ठ शश्वत्
सर्वदा ध्यायन्त्यै स्मरन्त्यै ते तुभ्यं विद्युता विद्योतते
सुप्रकाशते इति विद्युत् तथाभूतेन शीलरत्नेन ब्रह्मचर्यरूपेण
रत्नेन मणिना विप्रयोगः विरहितत्वं माभूत न स्यात् ॥
,
विशेषा-तवापि धर्माचरणशीलायाः कल्याणं भवतु
अहमपि गुरुपादवन्दनाथ गमिष्यामि । एवम्प्रकारेण श्री-
जिनेन्द्रदेवध्यानपराया स्तव शीलं सुरक्षितं भूया-
दित्याशी.॥ १२३ ॥
-
अथ श्रीस्थूलभद्रस्य प्रस्थानमाह-
नीत्वा मासानर्थः स चतुरस्तत्र शच्छीलशाली
गत्या सूरीन समयचतुरो भूरिभक्त्या ववन्दे ।
तस्थौ गेहे मनसि दधती सा सुरवं जैनधर्म,
केषां न स्यादभिमतफला प्राथना ह्यु तमेषु ?॥१२४॥
२१७ अन्वय:- 'अथ सच्छीलशाली समयचतुरः स तत्र चतुरः मासान् नीत्वा सूरीन् गत्वा भूरि भक्त्या ववन्दे । मनसि जैनधर्म दधती सा गेहे सुखं तस्थौ, हि केषाम् उत्तमेषु प्रार्थना अभिमतफला न स्यात्' इत्यन्वयः । व्याख्या- अथ एतावदालापनन्तरम् सच्छीलशाली सता शोभ- मानेन शीलेन ब्रह्मचर्येण शालते शोमते, तच्छील इति सच्छील- शाली, समयचतुरः समये स्वसाम्प्रदायिकाचारे चतुर निपुणः सः स्थूलभद्रः तत्र कोशागृहे चतुरः चतुःसंख्या- कान् मासान् नीत्वा अतिवाद्य, सूरीन् आचार्यान् गत्वा प्राप्य भूरिभक्त्या बहुतर श्रद्धया ववन्दे प्रणताम् । मनसि चेतसि जैनधर्म आहेतं धर्म दधती धारयन्ती सा कोशा गेहे स्वगृह एव सुखं कामपीडादिरहितं यथा स्यात् तथा तस्थौ न्यवसत् , हि यतः केषां जनानाम् उत्तमेषु श्रेष्ठजनेषु (कृता) प्रार्थना याचना अभिमतफला अभि- मतमिष्टं फलं परिणामो यस्याः तादृशी न स्यात् न भवेत् , अपि तु स्यादेवेति भावः ॥ विशेषः–वेश्या गेहेऽपि स्थितः शीलं रक्षयिष्यामि- त्यभिप्रहमुपादायैव गुरोः सकाशादायं चतुर्मासी कोशागृहे - २१८ - याययितुमागतः । दृढब्रह्मचर्या च तया बहुधा याचितोऽपि शीलं न जहौ, प्रत्युततामेव शीलवती चकार । इत्थं स शीलेन शोभमान एव गुरून् वन्दितु गतः। साऽपि शील- शालिनी जाता, तत्र च श्रीस्थूलभद्रमुनिप्रवरे कृता प्रार्थनैव कारणमिति विशेषोऽयमर्थः सामान्येन उत्तमेषु प्रार्थनायाः साफल्यकथनेन समर्थित इत्यर्थान्तर न्यासालङ्कारः ॥१२४॥ अथोभयोरग्रिम जीवनवृत्तमाह- यात्वा पारं समयजलधेः स्थूलभद्रः स भेजे, सूरीशत्वं भुवि जनमनो रञ्जयामास कामम् । हित्वा तत्त्वामृततररसैः साऽपि चित्तं स्वमिद्धा- निष्टान् भोगानविरतसुखं भोजयामास शश्वत् ॥१२५॥ अन्वयः- 'सः स्थूलभद्रः समयजलधेः पारं यात्वा सूरीशत्वं भेजे, कामं जनमनः रञ्जयामास, साऽपि इद्धान् इप्टान् भोगान् हित्वा स्वं चित्तं तत्त्वामृततररसैः अविरतसुखं शश्वत् भोजया- मास' इत्यन्वयः । व्याख्या-- सः पूर्वोक्तः स्थूलभद्रः तन्नाम्नः सुप्रसिद्धः श्रीस्थूल- भद्रो मुनिप्रवरः समयजलधेः आचारसमुद्रस्य पारम् T २१९ आचारान् सम्यक् १ - : अमृतादप्यधिकै रसैः ។ पर्यन्तं यात्वा प्राप्य, परिसमाप्येति यावत् सूरीशत्वं आचार्यपदवीं भेजे प्राप्तवान् , कामम् अत्यन्तं जनमनः लोकचेतांसि रज्जयामास प्रीणयामास । सापि कोशापि इहान् समृद्धान् इप्टान् पूर्वमभिमतान् भोगान् स्रक्चन्दनोत्तमशर्यनाशनादिकोपयोगान् हित्वा परित्यज्य स्वं निजं चित्तं हृदयं तत्वामृततरसैः तत्त्वस्य धार्मिकतत्त्वज्ञानरहस्यस्य अमृततः आस्वादानुभवैः अविरतसुखम् अविच्छिन्नमानन्दं शश्वत् सर्वदा भोजयामास अनुभावयां चकार ।। विशेष:-स स्थूलभद्रः साधुपरिपालनीयाचारसमुद्रस्य पारं प्राप्य क्रमशः मूरिपदं प्राप्य धर्मोपदेशादिभिः सकल- लोकमनो रञ्जने प्रवृत्तः। कोशाऽपि स्वचित्तं सांसारिक सुखेभ्योऽपवाय तात्त्विकसुखानुभवे योजयामास । सांसारिक- सुखानुभवजन्या च चेतसः क्षणिका तृप्तिः तत्त्वामृतरसोप- भोगजन्या च तृप्तिरनपायिनीतिभावः । समाप्ता चात्र मेघदूतीय चतुर्थचरणसमस्यापूर्तिः ॥ १२५॥ अथ श्रीस्थूलभद्रमुनिप्रवरकृतं धर्मप्रचारमाह- कुर्वन्नुर्वीवलयमखिलं जैनधर्माऽनुरक्तं, व्यक्त चित्रं विदधदतुलं शीलशक्त्या त्रिलोक्याम् ।
२२० भूमीपीठे स्मरहठहरो दीर्घकालं विहारं, चक्रे वक्रेतरमतिरसौ स्थूलभद्रो मुनीन्द्रः॥१२६॥ अन्वयः- 'वक्रेतरमतिः स्मरहठहरः असौ स्थूलभद्रः मुनीन्द्रः अखिलम् उ-वलयम् जैनधर्मानुरक्तम् कुर्वन् , शीलशक्त्या त्रिलोक्याम् अतुलं चित्रं व्यक्तं विदधत् भूमीपीठे दीर्घकालं विहारं चक्रे इत्यन्वयः। व्याख्या- वक्रेतरमतिः वक्रात् कुटिलात् इतरा भिन्ना-सरला मतिः बुद्धि यस्य सः, स्मरहठहरः स्मरस्य कामस्य हठं दुराग्रहं हरति नाशयतीति सः, असौ पूर्वोक्त चरितः स्थूलभद्रः तन्नामा मुनीन्द्रः मुनिपु इन्द्रः मुनीन्द्रः साधु- श्रेष्ठः अखिलम् सम्पूर्णम् उर्वीवलम् भूमण्डलम् जैन- धर्मानुरक्तम् आर्हतधर्मानुरागि कुवन् विदधत् , शील- शक्त्या ब्रह्मचर्यप्रभावेण त्रिलोक्याम् त्रयाणां लोकानां समाहारः त्रिलोकी तस्याम् , अतुलम् अनुपमम् चित्रम् अद्भुतम् व्यक्तं प्रकटं यथा स्यात् तथा विदधत कुर्वन् भूमीपीठे पृथ्वीतले दीर्घकाल बहुसमयं यावत् विहारं भ्रमणं चक्र कृतवान् । - २२१ विशेष:-चतुर्दशपूर्वी महाज्ञानी कामजयी आर्य श्री- स्थूलभद्रमुनिः पृथ्वीतले सर्वज्ञभाषितश्री जैनधर्मप्रचारं विदधत् शीलबलेन लोके आश्चर्य वितन्वन् बहुकालं यावद् विजहार॥१२६ ॥ अथास्य स्वर्गप्राप्तिमाह- सच्चारित्रं यतिपतिरसौ कर्मवल्लीलवित्रं, दीर्घ कालं कलितविमलज्ञानदानः प्रपाल्यः । भेजे स्वर्ग त्रिदशललनालोचनाब्जाऽर्कतुल्यो, निःशल्यान्तनिरुपमसुखं वीतनिःशेषदुःखम् ।।१२७॥ , - ~ अन्वयः- 'कलितविमलज्ञानदानः असौ यतिपतिः कर्मवल्लील- वित्रम् सच्चारित्रं दीर्घ कालं प्रपाल्य, त्रिदशललनालोचना- ब्नाऽर्कतुल्यः निःशल्यान्तनिरुपमसुखम् वीतनिःशेषदुःखं स्वर्ग भेजे' इत्यत्वयः। व्याख्या- कलितविमलज्ञानदान: कलितं विहितं विमलज्ञानस्य दानं येन सः असौ पूर्वोक्तः यतिपतिः मुनीन्द्रः कर्म- वल्लोलवित्रम् कर्माण्येव वल्ल्या लता तस्य लवित्रम्
૨૨૨
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भेदकम् सच्चारित्रम् शुभसंयमं दीर्घ कालं बहुसमयं यावत्
प्रपाल्य पालयित्वा, त्रिदशललनालोचनाब्जार्कतुल्यः
त्रिदशललनानां सुखनितानां लोचनान्येव नेत्राण्येव अब्जानि
कमलानि तेषां कृते अर्कतुल्यः सूर्यसदृशः यथाऽन्जानि सूर्यो-
दयेऽतिविकसानि भवन्ति तथैव श्रीस्थूलभद्रमुनीन्द्रं स्वर्ग-
मागच्छन्तं दृष्टा सुखनितानां लोचनानि विकसितानीति
भावः निःशल्यान्तर्निरुपमसुखम् निःशल्यम् निरुप-
द्रव्यम् अन्तः अन्तःकरगस्य निरुपमम् अतुलं सुखं यत्र तम् ,
वीतनिःशेषदुःखम् वीतम् अपगतम् निःशेष सकलं दुःखं
यत्र तम् स्वर्ग देवलोकं भेजे प्राय ॥
विशेषः-यावज्जीवं विमलज्ञानं वितरन् विशुद्धसंयम-
मनुपाल्य प्रान्ते समाधिपूर्वकं मृत्वा श्रीस्थूलभद्रो मुनिप्रवरः
स्वर्ग जगाम ।। १२७॥
अथ कोशायाः स्वर्गप्राप्तिमाह-
कोशाऽपि श्रीजिनमतरता शीलमाराध्य सम्यक,
पत्युः स्नेहादिव दिविषदां धाम सा लाग् जगाम ।
आपद् व्यापद्रहितमतुलं तत्र सातं विशेषा-
दत्राऽमुत्र प्रदिशति सुखं प्राणिनां जैनधर्मः॥१२८॥
२२३ c अवन्य: 'श्रीजिनमतरता सा कोशा अपि सम्यक् शीलम् आराध्य, पत्युः स्नेहात् इव स्वाक् दिविपदां धाम जगाम । तत्र व्याप- द्रहितम् अतुलं सातं विशेषात् आपत्, जैनधर्मः प्राणिनाम् अत्र अमुत्र सुखं प्रदिशति' इत्यन्वयः । व्याख्या- श्रीजिनमतरता श्रियायुतं जिनमतं श्रीजिनमतं विश्वविख्यातः श्रीजैनधर्मः तत्र रता अनुरागिणी सा पूर्वोक्ता कोशा अपि गणिका वेश्या अपि सम्यक् यथो- चितम् शीलम् शीलगुणोपेतद्वादशवतं देशविरतिं आराध्य संसेव्य पत्युः स्वामिनः श्रीस्थूलभद्रस्य स्नेहात् प्रेम्ण इव इत्युत्प्रेक्षायाम् साक् झटिति दिविषदां देवानां धाम स्वर्ग जगाम ययौ । तत्र स्वर्गे देवलोके व्यापद्रहितम व्यापद्-दुःखं तेन रहितं शून्यम् अतुलं निरुपम सातम सुखम् विशेषात् साधारण स्वर्गिभ्यो विशिष्टतया भापत् प्राप्नोत्, जैनधर्मः आर्हतधर्म प्राणिनाम् जीवानाम् अत्र इहलोके अमुत्र परलाके परस्मिन् भवे च सुख कल्याणं प्रदिशति ददाति ॥ विशेषः-दुष्करदुष्करकारक-आर्यश्रीस्थूलभद्रसद्गुरू सदुपदेशानुसारं सर्वज्ञश्रीतीर्थङ्करभगवत्भाषित जैनधर्मानुराग- २२४ पूर्वकं शीलगुणोपेतद्वादशवतं विधिवत् पालयिता कोशा वेश्याऽपि प्रान्ते स्वर्ययो, तत्रानुपम दिव्यसुखं च लेमे । स्वर्गगमने हेतुरुत्प्रेक्ष्यते पत्युः स्नेहादिवेति । आर्यश्रीस्थूलभद्रमुनीन्द्रः पूर्वमेव स्वर्ग गतः, स चास्म- त्पतिरिति तत्परिचर्यार्थ मयाऽपि तत्र गन्तव्यमिति प्रेमभावा- दिवेति । उत्प्रेक्षाऽलङ्कारः । अस्याः स्वर्गप्राप्तौ च हेतुमाह- सर्वज्ञकथित स्याद्वादरूपश्रीजैनधर्म उभयलोकसुखद इति । वाक्यस्यास्य हेतुरूपत्वेन काव्यलिङ्गमलङ्कारः ॥ १२८ ॥ अथ ग्रन्थकत्ता स्वपरिचयार्थं कुरुपरिचयमाह- तारायन्ते ततमतिभृतोऽप्यन्यतीर्थ्या इदानीं, विश्वे विश्वे खलु यदमलज्ञानभानुप्रभायाम् । सोऽयं श्रीमानवनिविदितो रत्नसिंहाख्यसूरि- जर्जीयाद्, नित्यं नृपतिमहितः सत्तपोगच्छनेता ॥१२॥ . अन्वयः- .. . 'यदमलज्ञानभानुप्रभायाम् इदानीं विश्वे ततमतिभृतः अपि विश्वे अन्यतीर्थ्याः तारायन्ते खलु, सा अयम् श्रीमान् अवनि विदितः नृपतिमहिंतः सत्तपोगच्छनेता रत्नसिंहाख्य- सूरिः नित्यं जीयात्' इत्यन्वयः ।
२२५
व्याख्या
यदमलज्ञानभानुप्रभायाम् यस्य रत्नसिंहसरेः
अमलं निर्मलं ज्ञानमेव भानुः सूर्यः तस्य प्रभायांम् प्रकाशे
इदानी सम्प्रति विश्वे संसारे ततमतिभृतः तता विस्तृता
मतीः बुद्धीः विभ्रति इति तथा भूता अपि विश्वे सर्वे
अन्यतीर्थ्याः अन्यसम्प्रदायलोकाः तारायन्ते नक्षत्राणीव
प्रतीयन्ते खलु निश्चयेन सः अयम् प्रसिद्धः श्रीमान्
श्रियायुतः अवनिविदितः भूतलप्रसिद्धः नृपतिमहितः
नृपतिभिः नरेन्द्रैः महितः पूजितः सत्तपोगच्छनेता सता
प्रवर्तमानस्य तपोगच्छस्य श्रीजैनश्वेताम्बरमूर्तिपूजकसाधु-
सम्प्रदाय विशेषस्य नेता नायकः रत्नसिंहाख्यसूरिः
रत्नसिंह नामा आचार्यः नित्यं प्रतिदिन जीयात सर्वाभि-
भावको भूयात् ॥
विशेषः-यथा भानोः प्रभायाम् तारा न प्रकाशन्ते
तथा यदीय ज्ञानज्योतिषि दीप्ते सम्प्रदायान्तरलोकाः मन्द-
तेजसो भवन्ति । सुप्रसिद्धो राजपूजित श्च तपोगच्छसम्प्रदाय-
नायकःआचार्यश्रीरत्नसिंहमूरिः। विजयतात् । तस्य सर्वो-
स्कृष्टत्वख्यापनेन तं प्रति प्रणतोऽस्मीति नमस्कारो
व्यज्यते । तारायन्त इत्यत्र लुप्तोपमा । 'ज्ञानभानु' पदे च
रूपकम् ॥ १२६ ॥
२२६ 4 अथात्मानमपि प्रकाशयन् ग्रन्थस्य प्रचारं कामयते-- शिष्योऽमुष्याऽखिलवुधमुदे दक्षमुख्यस्य सूरे- श्चारित्रादिर्धरणिवलये सुन्दराख्याप्रसिद्धः । चक्रे काव्यं सुललितमहो ! शीलंदूताभिधानं, नन्द्यात् साध जगति तदिदं स्थूलभद्रस्य कीर्त्या॥१३०॥ - -.-. अन्वयः- दक्षमुख्यस्य अमुष्य सूरेः शिष्यः धरणिवलये चारित्रादिः सुन्दराख्या प्रसिद्धः सुललितं शीलदूताभिधानं काव्यं बुध- जनमुदे चक्रे अहो; तत् इदं स्थूलभद्रस्य कीर्त्या साध नन्द्यात्' इत्यन्वयः। व्याख्या- दक्षमुख्यस्य दक्षेषु चतुरेषु मुख्यस्य प्रधानस्य अमुष्य पूर्वकथितस्य श्रीरत्नसिंहस्य सुरेः आचार्यस्य शिष्यः अन्तेवासी दीक्षितो वा.धरणियलये पृथ्वीमण्डले चारित्रादिः चारित्रशब्द आदौ यस्य सः सुन्दराख्या प्रसिद्धः 'सुन्दर' इति नाम्ना ख्यातः 'चारित्रसुन्दर' इति यावत् सुललितं सुमनोहरम् शीलदूताभिधानम् [शील- दूतम् (इति) अमिधानं नाम यस्य तत् काव्यं खण्डकाव्यं २२७ 3. बुधजनमुदे बुधजनानां विदुषां मुदे होय चक्र कृतवान् अहो ! अद्भुतम्। तदिदं काव्यम् स्थूलभद्रस्य काव्ये कीर्तितस्य मुनेः कोर्त्या यशसा साई. सह नन्द्यात् समृद्धि-प्रसिद्धिं वा गच्छेद ।। विशेषः-श्रीवृहनपोगच्छनायकभट्टारकाचार्यश्रीरत्नसिंह- सुरिशिष्यः वाचकश्रीचारित्रसुन्दरगणिवरः काव्यमिदं केवलं बुधजनपरितोपाय कृतवान, न तु निजपाण्डिल्य ख्यापनाय, अत्र च कीर्तितः दुष्करदुष्करकारक-श्रीस्थूलभद्रमुनीन्द्रः इति तस्यैव पुण्येन तत्कीर्तिः समृद्धिं गमिष्यतीति तया सह सम्बद्धमिद मपि काव्यं प्रसिद्धि गच्छेदित्यहं सम्भावये इति तात्पर्यम् ।। १३० ॥ काव्यनिर्माणस्थानं समयं च निर्दिशति-- द्रङ्ग रङ्ग रतिकलतरे स्तम्भतीर्थाऽभिधाने, वर्षे हर्षाजलधिभुजगाऽम्भोधिचन्द्रे प्रमाणे । चक्रे काव्यं वरमिह मया स्तम्भनेशप्रसादात्, सद्भिः शोध्यं परहितपरैरस्तदोषैरसादात् ॥१३१॥ इति श्रीवृहत्तपोगच्छनायकभट्टारक श्रीरत्नसिंहमूरिशिष्यो. श्रीचारित्रसुन्दरगणिविरचितं शीलदूताभिधानं समस्यामयं काव्यं समाप्तम् । पाध्याय २०८ अन्वयः- 'रङ्ग अतिकलतरे स्तम्भतीर्थामिधाने इहे द्रा जल- धिभुजगाम्भोधिचन्द्र प्रमाणे वर्षे स्तम्भनेशप्रसादात् हात वरं काव्यं मया चक्र, (तत्) परहितपरैः अस्त दोपैः सद्भिः असादात् शोध्यम्' इत्यन्वयः । व्याख्या- रङ्गः नाटयशालागृहैः अतिकलतरे अतिशयमधुरे स्तम्भतीर्थाभिधाने स्तम्भतीर्थम् [सम्प्रति 'खम्भात'] इत्यभि धानमस्य तस्मिन् इह अत्र द्रङ्ग नगरे जलधिभुज- गाम्भोधिचन्द्र जलधयः सागराः (चत्वारः ४ सप्त ७ वा) भुजगा नागाः (अष्टौ ८) अम्भोधयः समुद्राः (चत्वारः ४) चन्द्रः शशी (एक: १) अङ्कानां वामतो गतिरिति नयात् १४८४ चतुरशीत्यधिक चतुर्दशशतानि, १४८७ सप्ताशी- त्यधिकचतुर्दश शतानि वा यस्मिन् तादृशे प्रमाणे कालमाने वर्षे विक्रमवत्सरे स्तम्भनेशप्रसादात् स्तम्भ- नेशस्य श्रीस्तम्भनपार्श्वनाथभगवतः प्रसादात् कृपातः हर्षात आनन्दातिरेकात् वरं श्रेष्ठं काव्यं शीलदूतम् मया वाचक- श्रीचारित्र सुन्दरगणिना चक्र कृतम् (तत्) परिहितपरैः परोपकारनिरतः अस्तदोषैः ईमित्सरादिदोषशून्यैः सद्भिः सज्जनैः असादात् अखेदात् 'शोध्यम् परिशो- धनीयम् ।। १३१॥
- इति श्रीतपोगच्छाधिपति-मूग्चिक्र चक्रवत्ति-ब्रह्मतेजी- मूर्ति-भारतीयभव्यविभूति-महाप्रतिमाशालि-चिरंतन- युगप्रधान केल्प-सर्वतन्त्रस्वतन्त्र-श्रीकदम्बगिरिप्रमुखानेक- प्राचीनतीथोंद्धारक-श्रीवलभीपुरनरेशाधनकभूपालप्रति- बोधक-पश्चप्रस्थानमयसूरिमन्त्रसमाराधक-शासन- सम्राट्-जगद्गुरु---भट्टारकाचार्यमहाराजाधिराज- श्रीमद्विजयनेमिसूरीश्वरस्य सुप्रसिद्ध पट्टालङ्कार- साहित्यसम्राट्-व्याकरणरवाचस्पति-शास्त्रविशारद-कवि- रत्न-साधिकसप्तलक्ष श्लोकप्रमाणनूतनसंस्कृत साहित्य- सर्जक-परमशासन प्रभावक-निरुपमप्रवचनामृतवर्षि-बाल- ब्रह्मचारि-आचार्यप्रवर श्रीमविजयलावण्यसूरी- श्वरस्य प्रधानपट्टधर-- व्याकरणरत्न--शास्त्रविशारद- कविदिवाकर-देशनादक्ष-शासनप्रभावक-बालब्रह्मचारि- आचार्यवर्य श्रीमद्विजयदक्षेसूरीश्वरस्य पट्टधर- साहित्यरत्न-शास्त्रविशारद-कविभूषण-पञ्चप्रस्थानमय- सूरिमन्त्रसमाराधक--शासनप्रभावक-बालब्रह्मचारि- आचार्यश्रीमविजयसुशीलसूरिणा विरचिता शीलदूताभिधानसमस्यामयकाव्यस्य सुशीला- भिधा वृत्तिा [टीका] समाप्ता ।।
7 - - - -- . क प्रशस्तिः - 1 - - .. - - 1 1 [उपजाति-वृत्तम् ] श्रीआदिनाथं जिनशान्तिनाथं, श्रीनेमिनाथं प्रभुपार्श्वनाथम् । देवाधिदेवं विभुवर्द्धमानं, स्तुवे सदाऽहं जिनपञ्चकं वे ॥१॥ [ अनुष्टुब्-वृत्तम् ] श्रीवीरस्य जिनेन्द्रस्य, शासनाधिपतेः प्रभोः । विजयते सदा विश्वे, पट्ट धर्मधुरन्धरम् ॥२॥ तत्र स्वामी सुधर्माख्यो, गणीन्द्रः श्रुतकेवली । निर्ग्रन्थ नामक गच्छ-मतनोद् भुवि निर्मलम् ॥३॥ कोटिशः सूरिमन्त्रस्य, जपात् सुस्थितसूरिभिः । कोटिगच्छमतिस्वच्छं, स्थापितं तन्महीतले ॥४॥ चन्द्रं चन्द्रोज्ज्वलं भूयः सद्यशोरश्मि शोभितः । अनुचकार मच्छ-श्री,-चन्द्रसूरीश्वरो, महान् ॥५॥ समन्ताद् वनवासीति, सामन्तभद्रसूरिपः । स्वच्छं मच्छं वितेने सः, तदनु भद्रकृद् भुवि ॥६॥ + -
२३१
1
म
--
।
.
सर्वदेवाख्यसूरीशः, सर्वश्रेयस्करं कलम् ।
वटगच्छं पवित्रं च, विशालं तदनु व्यधात् ॥ ७॥
श्रीमेदपाटभूपाप्त-महातपापदै, 'भुवि ।
श्रीजगच्चन्द्रसूरोशै स्तपागच्छः प्रवर्तितः
परम्परागते स्वच्छ, तपागच्छेत्र भूतले ।
यवनाकारे लेश-प्रतिबोधकराः वरा:
धीर-धीरत्व-हीरत्व-गभीरत्वादि भूषिताः।
जगद्गुरुवराः विज्ञाः, सञ्जाता होरसूरयः ॥ १० ॥
प्रतापि सेनसूरीशै-दक्षैः श्रीदेवसूरिभिः ।
वादीभैः सिंहकल्पैः श्री-सिंहसूरीश्वरैः क्रमात् ॥११॥
उल्लासिते तपोगच्छे, वृद्धिविजयकारकाः ।
श्रीवृद्धिविजया जाता, वृद्धिचन्द्रादयः परे ॥१२॥
तेषा श्च शान्तमूर्तीना, पादाब्जमधुपोपमाः ।
सर्वशासनसम्राजो, विभ्राजो ज्ञानरश्मिभिः ॥१३॥
सतीर्थोद्धारकाः प्रौढाः, सर्वतन्त्रस्वतन्त्रकाः ।
सूरिमन्त्रैकप्रस्थान-पञ्चकाराधकाः किल ॥१४॥
सद्ब्रह्मचारिणः श्रीमन्नेमिसूरीश्वरा वराः ।
क्षमाधरार्चिता जाता स्तत् पट्टाम्बरभास्कराः ॥ १५ ॥
सप्तलक्षाधिकश्लोक-मितस्य संस्कृतस्य च ।
साहित्यस्य सुकमि, कृतीशा ब्रह्मचारिणः
॥ १६ ॥
२३२ शान्ताः साहित्यसम्राजो, विभ्राजो ज्ञानज्योतिपा। ख्याता व्याकरणे वाच-स्पतयः कविरत्नकाः ।। १७॥ शास्त्रविशारदा जाता, लावण्यसूरिशेखराः । तेषां पट्टधरा मुख्याः, ख्याता शास्त्रविशारदाः ॥ १८ ॥ कविदिवाकरा दक्षाः, सद्व्याकरणरत्नकाः । दक्षसूरीश्वरा जाताः, सरला ब्रह्मचारिणः ॥ १९ ॥ तेषां पट्टधरेणाथ, सहोदरेण साधुना । देवगुरुप्रसादात् श्री-सुशीलसूरिणा मया ॥ २० ॥ जम्बूद्वीपे प्रसिद्धेऽस्मिन्, रम्ये भरतक्षेत्रके। भरते दक्षिणा. श्री-मध्यखण्डे विराजते ॥ २१ ॥ राजस्थाने हि विख्याते, मरुधर प्रदेशके । नगरे रामसेने हि, वस्थितिं प्रकुर्वता ॥२२॥ वेदनेत्रनभोनेत्र [२०२४] मितें चैक्रमवत्सरे । आश्विने शुक्ल पक्षे वै, दशम्यां सुतिथौ खलु ॥ २३ ॥ काव्यस्य शोलदूतस्य, टोका श्रीसुशीलाभिधा। कृतेयं स्वहितार्थ च, बाल चोधाय सर्वदा ॥ २४ ॥ यावन्मेरुस्वयम्भू श्री-पुष्पदन्तग्रहाः स्थिताः । भूयात् तावदियं टीका, सुशीलाख्या महीतले ॥ २५॥ -- ॐ शुभं भवतु ॥ इति सुशीलाभिधाटीकायाः प्रशस्तिः समाप्ता ॥
॥ जैनाचार्य श्रीसुशीलसूरीश्वराष्टकम् ।।
卐
रचयिता-पण्डित श्रीजयदेवशास्त्री, बीकानेर
[१]
सूरिः सुशीलः महनीयकीर्तिः,
श्रीनेमिसूरेः किल सम्प्रदाये ।
लावण्यसूरेः किल प्राप्तदीक्षः,
श्रीसूरिदक्षस्य प्रधान शिष्यः॥१॥
[२]
महात्मनामग्रसरः
सुशीला
महोदयो धर्मवतां . वरिष्ठः ।
कुशाग्रबुद्धिः कविता प्रगल्भः,
विराजते साधुसभाप्रवीणः ॥ २ ॥
[३]
वैदृष्यपूर्ण: सुगुणैः सुपूर्णः,
साहित्यरत्नः कविभूषणश्च ।
श्रीजैनधर्मस्य दिवाकरोऽयं,
सुलेखका शास्त्रविशारदश्च ॥ ३ ॥
२३४
प्राप्य,
[४]
गुणैर्गरिष्ठः यमिनां वरिष्ठः
महोपदेष्टा कृतिनां वरेण्यः ।
रत्नत्रये लब्धमहाप्रतिष्ठः,
सुशोभते साधुसमाविशिष्टः ॥ ४ ॥
[५]
आचार्यस्य पदं
दीप्यतेऽयं दयाकर।
वर्षाण्यष्टौ व्यतीतानि,
प्राप्ताचार्यपदस्य च
[६]
वृहद्दीक्षा
दिनश्चाद्य,
वर्तते सुमनोहरः
पूर्णः,
क्रियते
सुमहात्मनः ॥ ६ ॥
[७]
दीक्षितस्य
-
महामहोत्सवैः
लोकस्य,
शीलरक्षणमन्वहम्
सुकरं येन,
मुनिना सम्प्रदर्शितम्
॥ ७॥
२३५ [८॥ युग्मविंशतिवर्षाणां, पालयन रुचिरां शिवाम् । दीक्षा मेव सतां मध्ये, सदा विजयतेतराम ॥ ८॥ [ सुशीलय मुनेः शील, सर्वतः सुमनोहरः व्याख्यान श्वातिरम्पश्च, प्रशस्तं च विशेषतः 118॥ [१०] विदुपा जयदेवेन, निर्मित चैतदष्टकम् प्रीत्यै भूयात् सुबोधस्य, सुशीलस्य मुनेः सदा ॥१०॥ -
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३३ [१] # श्रीस्थूलभद्रजी महाराज की सज्झाय ॥ श्रीस्थूलभद्र मुनिगणमा शिरदार जो, चोमासु आव्या कोश्या आगार जो। चित्रामण शालाए तप जप आदयां जो ॥१॥ आदरीयां व्रत आव्या छो अम गेह जो, सुन्दरी सुन्दर चंपक वरणी देह जो। अम तुम सरीखो मेलो आ संसारमा जो ॥ २ संसारे में,जोयु सकल स्वरूप जो, दर्पणनी छायामां जेवु रुप जो । सुपनानी सुखलडी भूख भांगे नहि जो ॥ ३ ॥ ना कहेशो तो नाटक करशु आज जो, चार वरसनी माया छे मुनिराज जो। ते छोडी केम जाउं हुं आशा भरी जो ॥ ४ ॥ आशा भरीयो चेतनकाल अनादि जो, भम्यो धरमने हीण थयो परमादी जो.। न जाणी में सुखनी करणी योगनी जो ॥ ५ ॥ योगी तो जंगलमा वासो वसिया जो, वेश्याने मंदिरीये भोजन रसियां जों। तुमने दीठा एवा संयय साधतां जो.. . .
साधशु संयम इच्छारोध विचारी जो,
कुर्मापुत्र थया नाणी घरबारी जो।
पाणीमाहे पंकज कोरु जाणीये जो ॥ ७ ॥
जाणीए तो सघली तुमारी वात जो,
मेवा मीठा रसवंता बहु जात जो ।
अंबर भूषण नवनवली भाते लावता जो ॥ ८ ॥
लावता तो देती आदरमान जो,
काया जाणु रंग पतंग समान जो।
ठाली ने शी करवी एवी प्रीतडी जो ॥ ९ ॥
प्रीतलडी करता ते रंगभर सेज जो,
रमताने देखाडता घणु हेज जो।
रीसाणी मनावी मुजने सांभरे जो । १०॥
सांभरे तो मुनिवर मनडु वाले जो,
ढांकयो अग्नि उघाडयो परजाले जो,
संयममाहे ए छे. दूषण मोटक जो ॥ ११ ॥
मोटा आव्युतु राजा नंदनु तेडुजो,
जातां न वहे काइ तमारु' मनडुजो,
में तुमने तिहा कोल करीने मोकन्या जो ॥ १२ ॥
३५ -- मोकन्या तो मारग मांहि मलिया नो, संभूति आचारज ज्ञाने बलिया जो । संयम दीधु समकित तेणे शीखव्यु जो ॥ १३ ॥ शीखव्यु तो कही देखाडो अमने जो, धर्म कहता पुण्य घणेरु' तमने जो। समताने घेर आवी कोश्या इम वदे जो ॥ १४ ॥ वदे मुनिवर शंकाने परिहार जो, समकित मूले श्रावकना व्रत बार जो । प्राणातिपातादिक स्थूलथी उच्चरे जो ॥१५॥ उच्चरे तो चीत्यु छ चोमासु जो, आणा लइने आव्या गुरुनी पासे जो। श्रुतनाणी कहेवाया चौदे पूरवी जो ॥ १६ ॥ पूरवी थइने तार्या प्राणी थोक जो, उज्ज्वल ध्याने तेह गया देवलोक जो, ऋषभ कहे नित्य करीए तेहने वंदना जो. ॥ १७ ॥ 卐 ३६ . , 1 [२] श्रीस्थूलभद्र-कोशा संवाद की सज्झाय कोशा-वेश जोई स्वामी आपनो, लागे तनडामा लायजी। अणधायु स्वामी आ शु कयु,लाजे सुन्दर कायजी ॥ कोण धृतारे तमने भोलव्या ॥२॥ आवी खबर त्यारे होत तो, जवा देत नहीं नाथजी । छतरीने छेह दीधो मने, पण नहीं छोडू हुँ साथजी ॥२॥ स्थूलभद्र-बोध सुणी सुगुरुतणो, लीधो संयम भारजी । मात पिता परिवार - सहुँ, जूठो आल पंपालजा ।। नथी रे धृतारे मने भोलव्यो ॥३॥ एह जाणीने कोशा सुन्दरी, धर्यो साधुजीनो देषजी। आव्यो गुरुनी आज्ञा लई, देवा तमने उपदेशजी ॥४॥ कोशा-काल संवारे भेगा रही, लीधा सुख अपारजी । ते मने बोध देवा आवीया, जोग धरीने आवारजी ।। जोग' स्वामी अहीं नही रहे ॥५॥ कपट करी मने छोड़वा, आत्या तमे निरधारजी। पण हुँ छोड नहीं नाथजी, नथी नारी गमारजी । जोग स्वामी अहीं नही रहे ॥६॥ स्थूलभद्र-छोडया मात पिता वली छोड्यो सहु परिवारजी। रिद्धि सिद्धि मे तजी देई, मानी सधलु असारजी ।। छेटी रही कर वात तू ॥७॥ - " . जोग धर्यो अमे साधुनो, छोड्यो सधला.नो प्यारजी ! माता समान गणु तने, सत्य... हूँ. निरघारजी ।। छेटी रहीं कर वात तू ॥८॥ कोशा-चार बरसनी प्रीतडी, पलमा तोड़ी न जायज़ी । पस्तायो पालथी. थशे, कुहुँ छु लागी पायज़ी ।। जोग स्वामी अहीं नही रहे 18 नारी चरित्र जोई नाथजी, तुरत छोडशो जोगजी ।। माटे चेतो प्रथम तमे, पछी हसशे सह लोकनी ॥१०॥ स्थूलभद्र-चाला जोई तारा सुन्दरी, डगु हुँ नही लगारजी। काम शत्रु कबजे कयों, जाणी पाप अपारजी। छैटी रही कर वात तू ॥११॥ छेटी रही गमे ते करे, मारा माटे उपायजी । पण तारा सामु जोउं नहीं, शाने करे हाय हायजी ।। छेटी रही कर वातं तू ॥१२॥ कोशा-माछी पकड़े छे जालमां, जलमाथी जिम मीनजी । तेम मारा नयनना बाणथी, करीश तमने आधीनजी ॥ जोग स्वामी अहीं नही रहे ॥१३॥ ढोंग करवा सजी दई, प्रीते ग्रहो मुझ हाथजी । कालजु कपाय छे माहरु', वचनो सुणीने नाथजा।। जोग स्वामी अहीं नहीं रहे ॥१४॥ -
३८
स्थूलभद्र-बार वरस सुधी कामिनी, रह्यो तुझ आवासजी ।
विध विध सुख मे भोगन्या, कीधा भोग विलासजी ।।
आशा तजो हवे माहरी ॥१५॥
त्यारे हतो हुँ अज्ञानमा, हतो काममा अंधजी ।
पण हवे ते रस में तज्यो, सुणी शास्त्रनां बोधजी ।।
आशा तजो हवे महारी ॥१६॥
कोशा-ज्ञानी मुनि ने ऋषीसरो, मोटा विद्वान् भूपजी ।
ते पण दास बनी गया, जोई नारीनुरूपजी ।।
जोग स्वामी अहीं नही रहे ॥१७॥
साधुपणु स्वामी नही रहे, मिथ्या वदु नहीं लेशजी।
देखी नाटारंभ महारो, तजशो साधुनो वेशजी ।।
जोग स्वामी अहीं नही रहे ॥१८॥
स्थूलभद्र-विध विध भूषणो धारीने, सजी रूडा शणगारजी ।
प्राण काढी नाखे ताहरो, कुदी कुदी अहोरातजी ।।
आशा तजो हवे महारो ॥१९॥
तो पण सामुजोउ नही, गणु हुँ विष समानजी ।
सूर्य पश्चिम उगे कदी, तो पण छोडुन मानजी ।।
आशा तजो हवे महारी ॥२०॥
कोशा-भिन्न भिन्न नाटक में कर्या, स्वामी आपनी पासजी।
तो पण सामु जोई तमे, पूरी नहीं मन आशजी ॥
हाथ ग्रहो हवे माहरो ॥२१॥
૨૭
-
हाथ जोडी हवे विन', प्यारा प्राण सपानजी!
चार वरसनी प्रीतडी, याद करो तमे मनजी ।।
हाथ ग्रहो हवे माहरो ||२२||
स्थूलभद्र-चेत चेत कोशा सुन्दरी, शुकहुँ वारंवारजी।
आ संसार असार छ, नथी सार लगारजी ।।
सार्थक करो हवे देहनु ॥२३॥
जन्म धरी संसारमां, नवि ओलख्यो जिनधर्मजी!
विध विध वैभव भोगव्या, कीधा घणेरा कर्मजी ।।
सार्थक करो हवे देहनु ॥२४॥
ते सहु भोगववा पडे, मुआं पछी तमामजी ।
अधर्मी प्राणीने मले, नही शर्म कोई ठामजी ।।
सार्थक करो हवे देहनु ॥२५॥
सिन्धु रूपी संसारमां, मानव मीन ते धारजी।
जंजाल जाल रूपीगणो, कालरूपी माछी मारजी ॥२६॥
कोशा-विषय रस वालो गणी, कीधा.भोग विलासजी।
धर्मना कार्य कर्या नही, राखी भोगनी आशाजी ।।
उद्धार करो मनिवर माहरो ॥२७॥
व्रत चूकावया आपनु, कीधा नाच न गानजी ।
छेड़ करी मुनिवर आपनी, बनी छुहुँ अज्ञानजी ।।
उद्धार करो मुनिवर माहरो ॥२८॥
- - बार वरस सुख भोगव्या, खरच्या खुब दीनारजी। ' तो हुँ तृप्त थई नथी, धिक् 'मुझने धिकारजी ॥२६॥ श्रेय करो मुनिवर माहवू, बतावीने शुभ ज्ञानजी । धन्य छे धन्य आपने, दीठा मेरु समानजी ।। उद्धार करो मुनिवर माहरो ॥३०॥ स्थूलभद्र-छोडी मोह संसारनो, शीलवत सारजी । तो सुख शान्ति सदा मले, पामोतमे भवजल पारजी। सार्थक करो हवे देहनु ।३१॥ कोशा-धन्य मुनिवर आपने, धन्य शकटाल तातजी । धन्य संमृतिविजय गुरु, धन्य लाछलदे मातजी ॥ मुक्ति करो मोह जालथी ॥३२॥ स्थूलभद्र--आज्ञा दियो हवे मुझ भणी, जाऊं गुरुनी पासजी। चौमासुपुरुथया पछी, साधु छंडे आवासजी ।। रुडी रीते शीलवत पालजो ॥३३॥ कोश्या--दर्शन आपजो मुझ भणी, कंगवा अमृत पानजी । सुर इन्दु कहे स्थूलभद्रजी, थया सिंह समानजी ।। धन्य छे मुनिवर आपने ॥३४॥ [. :
" [३] ॐ श्री स्थूलभद्रजीकी सज्झाय , बोली गयो मुख बोल, चार घडीनो कोल, आच्छे लाल, हजीय न आव्यो वाल हो । देई गयो दुःख दाह, पाछो नाव्यो नाह, आच्छे लाल के सही कोणे भोलव्योजी ॥ १॥ रहेतो नही क्षण एक, रे दासी सुविवेक, आच्छे लाल, जाई जुओ दिशा दशेजी। एम बोलंती बाल, एनी उत्तम चाल, आच्छे लाल, छेल गये मुझ छेतरीजी ॥२॥ उलस . बालस थाय, अंग उघाम थाय, आच्छे लाल, नयणे . नावे निन्दडीजी । चोखा चपक शरीर, नणदलना हो वीर, आच्छे लाल, नयणे नयणे दीठा नवीजी ॥ ३ ॥ जेम बपैया मेह, मच्छ ने जल सुनेह, आच्छे लाल, ' भमराने मन केतकीजी । चकवो चाहे चन्द्र, इन्द्राणी मन इन्द्र, आच्छे लाल, अहनिशि तमने श्रोलगुजी ॥१से तुम विण' घडिये छ मास, ते मुज नाखी पास, आच्छे लाल, निष्ठूर पणु नर ते कयुजी। 1 ४२ भागो कोईक दोष, मुकी मननो रोप, आच्छे लाल, काईक तो.करुणा करोजी ।। ५ ।। हुँ निराधार नार, मेली गयो भरथार, आच्छे लाल, उभी करूं आलोचनाजी। एम विल वलती कोस, देती करमनो दोष, आच्छे लाल, दासी आवी दोडतीजी ॥६॥ सांभल स्वामिनी वात, लाछलदेनो जात, आच्छे लाल, स्थूलभद्र आव्यो आंगणेजी। वनिता सांभली वात, हियडे हरख न मात, आच्छे लाल, प्रीति पाचन प्रभु ते करीजी ॥७॥ पधारो घर मुझ, मुनि भाख्यो सवि गुज, आच्छे लाल उठ हाथ अलगी रहेजी। माता आगे मुसाल, तिम मुझ आगल ख्याल, आच्छे लाल, एह प्रपंच किहां मण्याजी ।। ८ । चित्रशाली चौमास, निहाली मुख तास, आच्छे लाल, वनिता विधिसु आलोचवेजी, मादल ताल कंसाल, भंगल भेरी रसाल । आच्छे लाल, गावे नव नव गगशुजी ।। ९ ॥ वाले विधिसु अंग, फरती फुदडी चंग, आच्छे लाल, हाव भाव बहु हेजशुजी ।
४३
सांभल स्वामिनी वात, सिंहने धाले घात,
आच्छे लाल, राईनो पाड़ राते गयोनी ॥१०॥
सो बालके साथे रोई, पावईयाने पानो न होय,
आच्छे लाल, पत्थर फाट्यो ते किम मलेजी।
समुद्र मीठो न थाय, पृथ्वी रसातल जाय,
आच्छे लाल, सूर्य उगे पश्चिम दिशेजी ॥१९॥
प्रतियोघी एम कोश, छोडी राग न रोप,
आच्छे लाल,
द्वादशव्रत
उच्चरेजी।
पूरण कीधो चौमास, आव्या श्री गुरुपास,
आच्छे लाल, दुक्कर दुक्कर तू सहीजी ॥१२॥
त्रीस वरण घरवास, पूरी सहुनी आश,
आच्छे लाल, पंच महाव्रत पालतांजी ।
धन्य मात धन्य तात, नगर न्याति कहात,
आच्छे लाल, वारु वंश दिपावियोजी ।।१३।।
जे नरनारी गाय, तस घर लच्छी सवाय ।
आच्छे लाल, पभणे शान्ति मयाथकीजी ॥१४॥
०४ . . . [४] भी स्थूलिभद्रजीकी सज्झाय ॐ पिन कोश्या चित रंगे, बैठी छे मनने उमंगे, पांच सात साहेली संगे रे, स्थूलिभद्र मुनि घर आवे । आवे आवे लाछलदेनो नंदन रे ॥ स्थूलिभद्र मुनि० १ ॥ आज मारे मोतीडे मेह वुठया, देव देवी सर्वे मुझ तुठया । मैं तो जीवन नयणे दीठा रे ।। स्थूलिभद्र मुनि० २ ॥ आवी उतर्या चित्रशाली, रूडी रतने जडित रढियाली । माहे मगीया मोतीनी जाली रे ॥ स्थूलिभद्र मुनि० ३ ।। पकवान जम्या बहु भात, उपर चौसठ शाकनो जात । तोय न गमे विषयनी वात रे ।। स्थूलिभद्र मुनि० ४ ॥ कोशा सजति सोल सणगार, कागज कंकुहिगुलं हार । पगवट अंगूठी बिछुवा सार रे ।। स्थलिभद्र मुनि० ५ ।। द्वादश धपमप मादल बाजे, भेरी भंगल वीणा गाजे । तेम रूपे अपच्छरा साजे रे । स्थूलिभद्र मुनि० ६ ।। कोशाए विषयनी वात वखाणी, स्थूलिभद्रे हृदय नवि आणी । हुँ तो परण्यो संयम पटराणी रे ॥ स्थलिभद्र मुनि० ७॥ एम बहुविध नाटक करिया, स्थूलिभद्रे हृदय नवि धग्यिा । साधु समता रसना दरिया रे ।। स्थूलिभद्र मुनि० ८ ॥
सुख एणे जोवे अनुभव्यो, काल अनन्तो गमाव्यो । तो ये तृप्ति जीव न पाम्यो रे ॥ स्थूलिभद्र मुनि० ९ ।। वेश्याने कीधी समकित धारी, विषय सुखरसने निवारी । एहवा साधुनी जाउं बलिहारी रे ।। स्थलिभद्र मुनि० १० ।। एहवे पुरु थयु चौमास, स्थूलभद्र आव्या गुरुं पास । दुक्कर दुक्कर व्रत उल्लास रे ।। स्थूलभद्र मुनि० ११ ॥ नाम राख्यु के जगमाही, चौराशी चौवीशी जांही । साधु पहोत्यां छे देवलोक मांही रे। स्थूलभद्र मुनि० १२ ।। पण्डित हस्तिविजय कविराय, अहवा सुगुरुतणे सुपसाय । शिष्य खुशालविजय गुण गाय रे ।। स्थलिभद्र मुनि० १३॥ .
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# श्रीस्थूलभद्रजी महाराज की सज्झाय
आंघो मोयों हे आंगणे, परिमल पुहवी न माय ।
पासे फूली हे केतकी, भ्रमर रह्यो हे लोभाय ॥ आंबो० १॥
आवो स्थूलिभद्र वालहा, लालदेना नंद ।
तुमशुमुज मन मोहियु, जिम सायरने हो चन्द ।। बो०२॥
सुगणा साथे हो प्रीतडी, दिन दिन अधिकी हो थाय ।
बेठो रंग मजीठनो, कदीये चटकी न जाय ॥ आंबो० ३ ॥
नेह विहुणां रे माणसां, जेहवा आवल फूल ।
दीसंता रलीयामां, पण नवि पामे हो मूल ॥ आंबो० ४ ॥
कोयलडी टहुका करे, आंवे लहेके रे लु।
स्थूलिभद्र सुरतरु सारिखा, कोश्या कणयर कंब ॥ आंबो० ५ ॥
स्थूलिभद्रे कोश्याने बूझवी, दीधु समकित सार ।
रूपविजय कहे शीलथी, लहिये सुख अपार ।। आंबो० ६ ॥
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श्रीस्थूलिभद्रजी की सज्झाय
(दुहा)
सरस्वतीने चरणे नमी, मनमथ मारण टोल ।
स्यूलिभद्र ऋषि आवीया, कोशा मन्दिर मोल ॥१॥
४७ उठ हाथ अलगी रही,' कोशा बदजे बोल | चार मास चित्रशालीये. मुनिवर रह्या अडोल ॥२॥ (ढाल) [ दुःख दोहग दूरे टल्यां रे-ए देशी ) कोशा कहे स्थूलिभद्रजी रे, कूडा करो चकडोल । सारी पासा सोगठा रे, अम घर ए रंगरोल, स्थूलिभद्र ! अम घर ए रंगरोल ॥३॥ स्थूलिभद्र वलतुइम कहे रे, सुण कोशा अम वोल । अरिहंत नाम हैये धरु रे, अम घर ए रंगरोल रे ॥ कोशा अम० ॥४॥ शाल दाल शुभ सालणां रे, पोली धीशु झबोल । भोजन कीजे भावतां रे, अम घर ए रंगरोल ॥ स्थूलिभद्र० ० ॥५॥ सरस नीरस करी एकठां रे, भोजन कीजे घोल । स्वाद लंपटपणु परिहरी रे, अम घर ए रंगरोल रे ॥ कोशा० ० ॥६॥ आँखडीयुदोय आंजीये रे, झबके झाल कपोल । पट पीताम्बर पहेरीये रे, अम घर ए रंगरोल रे ॥ स्थूलिभद्र० ॥७॥ लोच करा केशनो रे माथे न बांधु मोल । जीरण वस्त्र पहेरु सदा रे, अम घर ए रंगरोल रे॥ कोशा० ॥८॥ .. -- । .
४८ -- वारु विलेपन कीजिए रे, कीजीए अंग अघोल । शरीर सुन्दरं सोहावीए रे, अम घर ए रंगरोल ॥ स्थूलिभद्र० ॥ वारु चीलेपन वरजिये रे, वरजिये अंग अंघोल । शीले शरीर सोहावीए रे, अम घर ए रंगरोल ॥ कोशा० ॥१० कपूरे कीजे कोगला रे मुखे दीजे तंबोल। नवलखो। हार हैडे धरूं रे, अम घर ए रंगरोल ।। स्थूलिभद्र० ॥११ सुकृत करणी कोगला रे, मुखे ठवीये सत्य चोल | अरिहंत नाम हैडे धरु, रे,' अम घेर ए रंगरोल रे ॥ कोशा० • ॥१२॥ सुख शय्याए पोढीये रे, हिंचिये हरष हिंडोल । धृपघटी अति ; महमहे रे, अम- घर ए रंगरोल ।। स्थूलिभद्र० ॥१३॥ संयम सुन्दर सुन्दरी रे, पासे करती कल्लोल । ज्ञान दीपक दीपे.. सदा रे, अम घर ए रंगरोल ॥ कोशा० ॥१४॥ सोमविमल पंडित तणो रे, कोशा स्थूलिभद्र वोल । भणे गणे ने सांभले रे, तस. घर नित्य रंगरोल ॥ भविका तस घर नित्य रंगरोल ॥१५॥ ॥ समाप्तम् ॥ 1