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Budhsashansubhasit
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बुद्धशासनसुमामिल
मबरसं धम्मरसो जिनाति -.१३२
अत्थो अत्थस्स नक्खत्तं किं करिस्सन्ति तारका १६७
ហវព
600
WAT THAN
BUDDHA GATE
संग्रह-कर्ता
महास्थविर वजिरजाण बरोरस
अनुवादक
भिक्ष नागसेन
प्रथम संस्करण]
बुद्धाब्द २५०६
प्रकाशक:
थाई विहार बुद्धगया। गया )
पूज्य
गुरुबर
के
श्री चरणों
में
मुद्रक :
स्टैण्डर्ड प्रिन्टर्म
शहीद रोड, गया
(भारत)
प्राकथन पुस्तिका के मुख-पृष्ठ पर आप बुद्धशासन सुभाषित शरद देखते हैं क्योंकि ५०० सुभाषितों मे ३२ थाई महारथविरों के सुभाषित भी सम्मलित है। इन ५०० सुभाषितों का संग्रह त्रिपिटक से महारथविर वजिर बारण घरोरस (थाई लैड के दशवें संघराज ने किया था। थाई लैड में जो ३ वर्ष का "परियत्तिधर्म' का पाठ्य-कम है उसमें प्रथम वर्ष में इन ५०० सुभाषितों मे से एक निवन्ध सम्बन्धी प्रश्न-पत्र होता है । थाई लोग अपने दैनिक जीवन की बोल चाल मे ऐसे सुभाषितो का व्यवहार उसी प्रकार करते है जैसे भारत में कबीर आदि के दोहारों का भारतीय । हम भारतीयो को भी इस प्रकार की सरल परन्तु सार-गर्भित वाणी का अपने दैनिक जीवन का बोल-चाल मे व्यवहार करना चाहिए वैसे तो धर्मपद की गाथाएँ सर्वोत्तम है ही और इन ५००) सुभाषितों मे भी १४३ धम्मपद से लिए गए है; परन्तु संग्रह की यह विशेषता है कि सुभाषित एक-एक पक्ति के है फल स्वरुप इनका कण्टस्थ करना सरलतर है। मैने हुए अर्थ को स्पष्ट करने की दृष्टि से शब्दाथ की अपेक्षा भावार्थ पर अधिक जोर दिया है जिससे कि भाषा क्लिष्ट न बन जाय । अनुवाद करते भिक्षु महाजविन्द्र ने मुझसे आग्रह किया कि आप हिन्दी में बौद्ध धर्म विषयक कोई एक छोटी सी पुस्तिका लिखें। उन्होने कहा की प्रकाशन का प्रबन्ध थाई बिहार बुद्ध गया की ओर से किया जायगा। पिछले वर्ष भिक्षु महाजविन्द्र ने बौद्ध महासभा थाई लैड तथा नवयुवक बौद्ध महासभा थाई लैड के तत्वावधान में "भारत मे बौद्ध धर्म" पर भाषण करते हुए भारत में भारतीय भाषाओं में नि:शुल्क वितरण के लिए बौद्ध धर्म-सम्बन्धी छोटी-छोटी पुस्तिकामो के अभाव पर प्रकाश डालते हुए थाई लोगो को इस ओर धर्म-प्रचारार्थ ध्यान दिलाया। भाषण समाप्ति पर लोगो ने बड़ी तत्परता दिखाई और लगभग २००० टिक्कन एक लघु पुस्तिका के प्रकाशनार्थ दिया : यह धन पूर्वेक्त सभागों के पास था। इसके अतिरिक्त सभाओ के कार्य कर्ताओं ने कहा कि पुस्तक छपने पर जो अधित व्यय होगा हम देगे । अनुवाद पूर्ण हो जाने के पश्चात् मैने पाण्डुलिपि भिक्षु महाजविन्द्र के पास थाई-बिहार बुद्ध गया भेज दी; परन्तु भिक्षु महाजविन्द्र की अस्थाई- वास की दो वर्ष की अवधि लगभग समाप्त हो चुकी थी इसलिए थाई लैड आने की तैयारी मे वे इस पुस्तिका के प्रकाशन का प्रबन्ध न कर सके। अभी पिछले दिनो श्री आनन्द भट्टाचार्य थाई-लैंड अपने किसी कार्य-वश पाए और उन्होने अपने बुद्ध श्रद्धा को किसी ठोस कार्य रुप मे परिणित करने के संकल्प को प्रकट किया। मैने उन्हे इन ५०० सुभाषितो के अनुवाद के बारे मे बताया है उन्होने इस और अपनी रुची प्रकट की और प्रकाशन में सहायक बनने का भार अ.ने उपर लिए। निस्सन्देह यदि भट्टाचार्य जी इसमें सहायक न होते तो पता नहीं इस पुस्तिका का प्रकाशन कब होता। श्री भट्टाचार्य जी ने केवल आर्थिक सहायता ही नहीं अपितु अनुवाद को सुधार कर भाषा को मधुर बनवाने में तथा प्रफ देखने में उनका पूरा हाथ रहा है। थाई लागो ने ७००) रुपया तथा श्री भट्टाचार्य जी ने २००) रुपया दिया इसके लिए थाई लोगों, बौद्ध महासभा, नव युवक बौद्ध महासभा थाई लैंड तथा श्री भट्टाचार्य जी धन्यवाद के पात्र हैं।
त्रिपिटक में ने जिस-जिस ग्रन्थ से ये सुभाषित चुने गए है उनका नाम अन्त में दे दिया गया है : घ धम्मपद संयुक्तनिकाय अगुत्तर निकाय मज्झिम निकाय दीघ निकाय सं० अं० दी विमान वि विमान वत्यु सुं० सुत निपात विनय जा जातक इ इतिवृत्तक उ उदान जैसा ऊपर कहा गया ३२ थाई महस्थविरों के सुभाषित भी सम्मिलित है उनके नाम इस प्रकार है । व० व स० छ० महारथविर वजीरत्राण वरोरस ( संघराज) महारथविर मा 'संघराज' सोमडेट बुद्धघोषाचार्य छिम Rama IV रत्लकोपेन्द्र-राज्य के चतुर्थ राजा सुबट मोन छबबं लुबङ ( परित्राण सम्बन्धि एक एक पुस्तक ) र० र. स० मा बैंकॉक भिक्षु नागसेन ति० ८-८-२५०६ PREFACE I am very happy to see this Hindi translation of the Buddhist Proverbs When I went to India to stay for -two years at Thai Temple, Buddhagaya, as one of the first group of five mouks, I observed Buddhist activities there and felt a need for Buddist literature for free distribution. This is why when I was asked by the young Buddhist Association and the Buddhist Association of Thailand to lecture about "Buddhism in India" I appealed the audience to contribute ior publication of booklets on Buddhism in Hindi language My appeal was promptly responded and a sum of 1800 Tcs. was collected. After having got this sum I asked Bhikkhu Nagasena to write -some booklet in Hindi; and he bas trinslated 500 Buddhist Proverbs selected by His Holiness Vajiranana Varorase, the tenth Supreme Patriarch of Thailand. I am very thankful to Mr. Anand Bhattacharya for his contribution of Rs. 200/- for this purpose. Last but not the least. Ven'able Dhammapanda's interest is very praise-worthy in that he encouraged us to publish this book saying that in case of shortage of money he would arrange, and he did accordingly. He arranged for 2000 Tcs. but for his ready help the publication should have been delayed.
) I hope that such useful and easy-to-understand booklets and pamphlets will be published in Hindi through 'Thai Temple, Buddhagaya. Since the propagation of the Lord Buddha's teaching is one of the aims of Thai Temple, I sincerely hope that Thai Buddhists will pay their atten. tion to propagation work in India and make Thai Temple there an important centre for radiation of Buddha's philanthropic Teaching, Bangkok Phra Udornganadhikar ( Chavin Saragam) 15-8-64 संघराज वजिराणवरोरम इनका जन्म १२ अप्रैल बुद्धाब्द २४०२ में हुआ। इनके जन्म का नाम मनुस्सनागमाणब था। ये वर्तमान रतनकोसिन्द्र ( रत्नकोशेन्द्र ) राज्य के चौथे राजा के सुपुत्र तथा पाँचवे राजा के अनुज थे १४ वर्ष की आयु होने पर दो और राजकुमारों के साथ संघराज पवरेसवरियालङ्करण (आठवें संघराज ) के पास प्रव्रज्या ले श्रामणेर बने; परन्तु प्रव्रज्या के ७८ दिन बाद ही काषाय वस्त्र छोड़ दिया। एक दिन उपज्झाय, संघराज पवरेसवरियालङ्करण, स्वप्न में दिखाई दिए और स्वप्न में ही कुछ वार्तालाप हुआ। दूसरे दिन प्रातः काल उठ उनके दर्शन के लिए गए। वहाँ जाने पर उन्हें यह जान कर बहुत ही आश्चर्य हुआ कि जो वार्तालाप स्वप्न में हुआ था वही वार्तालाप हुआ । काषाय वस्त्र छोड़ने के पश्चात् विहार में आना ग लगे। २० वर्ष जाना मानो वे भूल गए थे । परन्तु इस दिन से लेकर वे अपने उपाञ्झाय संघराज पवरेसवरियालङ्करण के पास धर्म-चर्चा के लिए बराबर आने जाने कालाम-सुत्तान्त मे ये सबसे अधिक अभिरुचि रखते थे। की अायु होने पर संघ-राज एवरेसवरियालङ्करण के पास उपसम्पदा ले भिक्षु हो गए। और जब राजा को "पञ्चाङ्ग प्रतिष्ठ'' हो अपने को नमस्कार करते देखा तो सवेग प्राप्त हो यह निश्चय किया कि आयुपर्यन्त भिक्षु रहेगे ! थाईलैन्ड मे वत्त मान धार्मिक शिक्षा-प्रणाली के ये जन्म-दाता थे। इन्ही द्वारा लिखी पुस्तकें ग्राज पालि तथा थाई भाषा में परियत्ति-धम्म” शिक्षा के लिए पाठ्य-पुस्तको का काम देती है । महामकुटराज विद्यालय का बीज भी इन्ही द्वारा गेपा गया था। आज इस विद्यालय में भिक्षुप्रो को नवीन-शिक्षा-पद्धति के अनुसार पालि भाषा के अतिरिक्त अन्य अनेक विषयों की शिक्षा दी जाती है । धार्मिक शिक्षा के अतिरिक्त थाईलैन्ड में पाश्चात्य ढग की शिक्षा के प्रसार मे भी इनका बहुत हाथ रहा है। ये पालि के प्रकाण्ड विद्वान थे। इन्होने कई दर्जन थाई भाषा में पुस्तके लिखी जिनमें कुछ के नाम यहाँ दिए जाते है (१) कम्मकिलेस कथा (२) दुक्ख [कविता] (३) पवरनिवेस- विहार-इतिहास (४) सुभासित कविता (५) उभय वाक्य [कविता] (६) विनय मुख (७) देवधम्म-कथा (८) पह-धम्म-विनिच्चय (8) रट्टपसासननय (१०) सतिपट्टानसुत्त तथा कम्मकिलेस कथा (११) समथ- कम्मट्ठान-हृदय (१२) पालि-व्याकरण (१३) कथामग्गसंवेजोपाय (१४) कथा पट्ठपन तथा अक्खर-विधान (१५) धम्म विचारण ( घ) इनमें तीन पुस्तके अर्थात् विनय मुख, पालि-व्याकरण तथा धम्म- विचारण सुप्रसिद्ध है। धर्म-विचारण का अनुवाद अग्रेजी में हो चुका है। विनय-मुख थाई में “परियत्ति-धर्म के ३ वर्ष के पाठ्य-क्रम में पाठ्य-पुस्तक का काम देती है । जब तक थाईलैन्ड में वौद्ध-धर्म रहेगा इनका नाम सदैव बड़े आदर से लिया जाता रहेगा। बुद्ध के ये सेवक तथागत के को सुनाते हुए ६२ वर्ष की आयु मे इस लोक से चले गए। अमृत वचनों ভজি জিলহজ
नमो बुद्धाय
अत्तवग्गो -आत्मवर्ग
घ
घ
ध
ध
१ अत्ता हि अत्तनो नाथो।
मनुष्य अपना स्वामी आप है।
२ अत्ता हि अत्तनो गति |
दुर्गति अथवा सुगति की प्राप्ति अपने पर ही निर्भर करती है।
३ अत्ता हवे जितं सेय्यो।
अपने पर विजय पाना ही सर्व श्रेष्ठ है ।
४ अत्ता हि किर दुदमो।
अपने को दमन करना ही कठिन है ।
(२)
५ अत्ता सुदन्तो पुरिस्स जोति ।
सुभावित चित्त प्रकाश के समान है।
६ अत्ता हि परम पियो।
अपना आत्म ही सबसे अधिक प्रिय है ।
७ नत्थि अत्तसमं पेमं ।
अपने समान प्रिय कोई नहीं।
८ अत्तना व कत पापं अत्तना संकिलिस्सति ।
अपना किया हुआ पाप अपने को ही मलिन करता है।
सं०
अं०
अं०
ध
२ घ सु ध ६ अत्तना अकतं पापं अत्तना व विसुज्झति । मनुष्य स्वयं पाप नही करता इसलिए अपने आप शुद्ध हो जाता है। १० अत्तात्थपञ्जा असुची मनुस्सा। स्वार्थी मनुष्य अशुद्ध होते हैं । ( ३ ) ११ अत्ताने दमयन्ति पण्डिता । पण्डित लोग अपने को दमन करते है । १२ अत्तानं दमयन्ति सुव्वता । शुभकार्य-रत मनुष्य ( सुब्रर्ता ) अपने को दमन करते है। (४) १३ अत्तना हि सुदन्तेन नाथ लभति दुल्लभं । अपने ही को भली भाँति दमन कर लेने से मनुष्य दुर्लभ शरण अर्थात् अर्हत्व (निर्वाण) की प्राप्ति करता है। १४ यो च रक्खति अत्तान रक्खितो तस्ल बाहिरो। जो अपने मन को वश में रखता है, उसकी वाणी तथा शरीर भी स्वमेव वश में रहते है । ध घ अं० . ध १५ अत्तान्चे पियं जञा रक्खेय्य नं सुरक्खित । अपने को यदि प्रिय समझे तो अपने को सुरक्षित रखे । ( ६ ) १६ परियोदपेय्य अत्तानं चित्तक्लेसेहि पण्डितो! पण्डित अपने को चित्त-मलो से शुद्ध १७ अत्तान्चे तथा कयिरा यथबमनुसासति । जो शिक्षा दूसरों को दे उस पर स्वयं आचरण करे । ध करे। ध
३
घ
१८ अत्तना चोदयत्तानं ।
अपने को स्वयं प्रेरित करें।
१६ पटिमासे अत्तमत्तना।
अपने को स्वयं कार्य में सलग्न करें।
ध
२. दुग्गा उद्धरथत्तानं पङ्क सन्नोव कुञ्जरो।
कीचड़ में फंसे हाथी की तरह अपने को क्लेश रुपी दुर्गति
से निकालो।
२१ अत्तानुरक्खी भव मा अढय्हि ।
अपनी रक्षा करें, अपने को शोकाकुल न करें।
२२ अत्तानञ्च न घातलि।
अपनी मृत्यु स्वयं न करें।
(८)
२३ अत्तानं न ददे पोसो ।
परमार्थ की कामना रखने वाला को अपने को नहीं दे डालना
चाहिए अर्थात् किसी को दासत्व स्वीकार न करे।
जा
सं
सं०
जा
(६)
२४ अत्तान न परिचजे ।
मनुष्य अपने को परित्याग न करे ।
२५ अत्तानं नातिवत्तेय्य ।
अपने को अधिक श्रेष्ठ) न ऑके (गर्व न करें)
(१०)
२६ अत्तदत्थ परत्थेन बहुनापि न हापये ।
दूसरे के बहुत हित के लिए अपने हित की हानी न करे ।
स० सु ध ध ध २७ अत्तानञ्चे पियं जञा न न पापेन संयुजे । यदि अपने को प्रिय समझे तो पाप में न लगे । २८ यथत्तगरही तदकुब्बमानो । जिस कार्य से अपने को दोष लगता हो, उस कार्य को न करें। २ अप्पमादु वग्गो-अप्रमाद वर्ग (११) २६ अप्पमादो अमतं पदं अप्रमाद अमृत-पद का साधक है । ३० अप्पमादञ्च मेधावी धन सेटुव रक्खति । बुद्धिमान अप्रमाद की रक्षा श्रेष्ट धन की भाँति करता है। ३१ अप्पमादं पसंसन्ति । पण्डित जन अप्रमाद की प्रशंसा करते हैं। ३२ अप्पमादे पमोदन्ति । पण्डित जन अप्रमाद में प्रमुदित होते है । ३३ अप्पमत्ता न मीयन्ति । अप्रमादी नहीं मरते। ३४ अप्पमतो हि भायन्तो पप्पोति विपूल सुखं । अप्रमादी ध्यान करते हुए महान सुख को पाता है । (१२) ३५ अप्पमत्ते उभो अत्थे अधिगण्हाति पण्डितो । प्रमाद-रहित पण्डित दोनों अनर्थो को प्राप्त करता है। (१३) ३६ अप्पमादेन सम्पादेथ । अप्रमाद द्वारा (निर्वाण का) सम्पादन करो। ध घ ध ध घ म० स. ध ३७ अप्पमादरता होथ अप्रमाद में रत होओ। ३ कम्म वग्गो--कर्म वर्ग ३८ कम्मं सत्ते विभजति यदिद हीनप्पणीतताय । कर्म सत्वों को हीन तथा प्रेणीत में विभाजित करता है। ३६ यङ्किञ्चि सिथिलं कम्मं न तं होति महप्फलं शिथिलता से किया गया कार्य महाफलदायक नहीं होता। ४० सानि कम्मानि नयन्ति दुग्गतिं । अपने ही (बुरे) कर्म दुर्गति तक पहुंचाते है । ४१ सुकरं साधुना साधु । अच्छे मनुष्य के लिए निर्दोष कर्म करना सरल है । ४२ साधुपापेण दुक्कर। पापी के लिए निर्दोष कर्म करना कठिन है । ४३ अकतं दुकटं सेय्यो। दोष-युक्त कर्म न करना ही अच्छा है । ४४ पच्छा तप्पति दुक्कर । दुष्कृत करने वाला पीछे अनुताप करता है । ४५ कतञ्च सुकत सेय्यो। दोष रहित ( सुकृत) कर्म करना श्रेष्ठ है । ४६ न तं कम्मं कतं साधु यं कत्वा अनुतप्पति । वह कर्म करना ठीक नहीं जिसे करके पीछे पछताना पड़े। ४७ नश्च कम्मं कतं साधु य कत्वा नानुतप्पति । उसी कर्म को करना ठीक है जिसे करके पीछे पछताना न पड़े। उ ध ध ध ध ६ ध घ जा ४८ सुकरानि असाधूनि अत्तनो अहितानि च । दोषयुक्त कर्म करना तथा अपना अहित करना बहुत सरल है । ४६ यं वे हितञ्च साधुन्च तं वे परम दुक्कर उस कर्म को करना दुस्कर है। जो दोष रहित तथा हितकर है । ५० न हि त सुलभं होती सुखं दुस्कटकारिना । पाप करने वाले को सुख सुलभ नही । ५१ कल्याणकारी कल्याणं पापकारी च पापकं । अच्छा करने वाला अच्छा फल, बुरा करने वाला वुरा फल पाता है। (जैसी करनी वैसी भरनी ) (१४) ५२ कम्मुना बत्तती लोको । कर्मानुसार प्राणियों की गति होती है । ५३ निसम्म करण सेय्यो। भली भांति पहले विचार कर पीछे कार्य करना श्रेष्ठ है । ५४ कतस्स नत्थि पटिकार। जो कार्य कर दिया उसका प्रतिकार नहीं किया जा सकता। ५५ पटिकच्चेव त कयिरा य जञा हितमत्तनो । जिस कार्य में अपना हित समझे उसे तुरन्त करना चाहिए । ५६ कायरा चे कयिस्थेन । यदि करना ही है तो उसे (दत्तचित्त होकर) करे । ५७ करेय्य वाक्यं अनुकम्पकानं । अपने पर अनुकम्पा करने वाले की शिक्षानुसार कार्य करे । ५८ कालानुरुप व धुर नियुजे । उचित समय देख अपने कार्य में लगना चाहिए । व०व० स०स० स० ध - व०व ७ ५६ रखेय्य अत्तनो सार्धं लवण लोणतं यथा । स० स० मनुष्य अपनी अच्छाइयों की रक्षा उसी प्रकार करे जैसे नमक लमकीनपन की। ६० किच्चानुकुब्बस्स करेय्य किच्च। जा कार्य में सहायक का कार्य करना चाहिए। ६१ नानत्थकामस्स करेय्य अत्थं । जा उसकी सहायता न करे जो अनर्थ करने पर तुले हुए है । ६२ मा च सावज्जमागमा। स० छ० दोष युक्त कार्य मत करो। ४ किलेम वग्गो-क्लेश वर्ग स० स० म० ६३ सङ्कप्परागो पुरिसस्स कामो। राग-युक्त मन हो जाना ही पुरुष का काम है । ६४ न सन्ति कामा मनुजेसु निच्चा। मनुष्य में काम नित्य नहीं है ( काम क्षण-भंगुर है)। ६५ कामेहि लोकम्हि न हत्थि तित्ति । संसार में काम से तृप्ति नहीं हो सकती। ६६ न कहापणवस्सेन तित्ति कामेसु विज्जति । यदि कार्षापरणो ( रुपयों) की वर्षा हो, तो भी मनुष्य की कामों ( भोर्गों) की तृप्ति नहीं हो सकती। ६७ नत्थि कामा पर दुक्ख । काम ( से उत्पन्न दुःख के ) समान कोई दुःख नहीं । ( १६ ) ६८ नत्थि तण्हा समा नदी । तृष्णा के समान नदी नहीं । ध जा स० ध स० जा ६६ इच्छा लोकस्मि दुज्जहा । लोक में इच्छा छोड़ना बहुत कठिन है । ( १७ ) ७० इच्छा हि अनन्त गोचरा। इच्छा अनन्त आलम्बन बाली है ( इच्छाएँ अनन्त है)। ७१ इच्छा नरं परिकस्सति । इच्छा मनुष्य को (एक भव से दूसरे भव में खींचती है। ७२ नत्थि रागसमो अग्गि । राग के समान अग्नि नहीं। ७३ लोभो धम्मान परिपन्यो। लोभ (कुशल) धर्मो का घातक है । ७४ अतिलोभो हि पापको । कृपणता निश्चय ही पाप है । (१८) ७५ नत्थि मोहसमं जालं। मोह के समान जाल नहीं । ७६ भिय्यो च कामे अभिपत्थयन्ति । काम भोगी कामों में (भोगों में) अधिकाधिक चाह करते हैं। ७७ ऊना व हुत्वा जहन्ति देह । काम भोगी अतृप्त ही देह का त्याग करते हैं। ७८ भोगतण्हाय दुम्मेधी हन्ति अबेव अत्तन । दुर्बुद्धि भोग तृष्णा के कारण दूसरे के भांति अपना ही हनन करता है। ७६ अविज्जानिवुता पोसा । मनुष्य अविद्या से ढके हुए हैं । म० हैं हैं म० घ है जा अं० अ० अं ५ क्रोधवग्गो-क्रोध वर्ग ८० न हि साधु कोधो। क्रोध करना अच्छा नहीं। ८१ कोधो सत्यमलं लोके । क्रोध शस्त्रमल (जङ्ग ) के समान है। ८२ अनत्थजन नो कोधो क्रोध विनाश का कारण है। ८३ कोधो चित्तप्पकोपनो। क्रोध मन को बेचैन करने वाला है। २४ अन्धतम तदा होति य कोधो सहते नरं जब मनुष्य क्रोधित होता है तब तब उसके सामने अन्धेरा होता है। ८५ अप्पो हुत्वा बहु होति बढ़ते सो अखन्तिजो। अल्प क्रोध अक्षांति के कारण बहुत हो जाता है । ८६ कोधो दुम्मेध गोचरो। दुर्बुद्धि मनुष्य में ही क्रोध होता है ( क्रोध अज्ञता का लक्षण है)। ८७ दोसो कोधसमुट्ठानो। क्रोध ही द्वेष-भाव का कारण है । ( १६ ) ५८ नत्थि दोससमो गहो। द्वेष के समान ग्रह नही। ८६ कोधं घत्वा सुख सेति । मनुष्य क्रोध को मार कर प्रसन्न-चित रहता है । ६० नथि दोष समो कलि । द्वेष के समान पाप नही । जा ध ध स० १० स० जा ११ कोधं घत्वा न सोचति । क्रोध को मार कर मनुष्य चिन्तित नही होता । ६२ कोधाभिभूतो कुसल जहाति । क्रोध से अभिभूत मनुष्य कुशल (धर्मो ) को छोड़ देता है । ६३ कोधनो दुब्बण्णो होति । क्रोधित दुर्वर्ण ( कान्ति-रहित ) होता है । ६४ दुक्खं सयति कोधनो। क्रोधी दुःख का जीवन बिताता हैं। ६५ अथो अत्थं गहेत्वा अनत्थ पटिपज्जति । क्रोधी अपने हित को सोचता हुआ भी अपना अहित करता है। ६६ कोधाभिभूतो पुरिसो धन जानि निगच्छति । क्रोधी अपने धन के नाश को प्राप्त होता है । ६७ कोध सम्मदसम्मत्तो आयसक्य निगच्छति । क्रोध से प्रमत मनुष्य अपने यश को नष्ट करता है । ६८ बातिमित्ता सुहज्जा च परिवज्जजेन्ति कोधनं । सम्बन्धी-मित्र-सहार्या क्रोधी मनुष्य का साथ नही देते अ० अ० अ० ६६ कुद्धो अत्थ न जानाति । क्रोधी अर्थ-भलाई (अथवा कार्य कारण) को नहीं जानता । ( २१ । १.० कोधो धम्म पस्सति । क्रोधी धर्म (अथवा कार्य-फल) को नहीं देखता (समझता)। १०१ यं कुद्वो उपरोधेति सुकरं बिय दुक्करं । क्रोध में आकर मनुष्य जितनी सरलता से किसी बस्तु को अ० ११ को नष्ट पतित है। प्र० नष्ट करता है अक्रोध की अवस्था में उस वस्तु करना उतना ही कठिन है । १०२ पच्छा सो बिगते कोधो अग्गि दड्ढोब तप्पति । क्रोध उतर जाने के बाद मनुष्य आग से जलने के समान तपता है। १७३ कोधेन अभिभूतस्स न दीप होति किञ्चिन ! क्रोधाभिभूत के लिये कोई रक्ष-स्थान { द्वीप ) नहीं । १०४ हन्ति कुद्रो समातर। क्रोधी मनुष्य अपनी माता को भी मार सकता है। १०५ कधजातो पराभावो। क्रोधित मनुष्य १०६ कोधं दमेन उच्छिन्दे । क्रोध को दम । रुपी चाकू ) से काटे । १०७ कोधं दमेन उच्छिन्दे । क्रोध की प्रज्ञा ( रुपी चाकू) से काटे । १०८ मा कोयरस वसंगम । क्रोध के वश में नहीं होना चाहिए। (२२) खन्ति गग्गों -शांति वर्ग १०६ खन्ति परम तपो तितिक्खा। सहन-शीलता, क्षमा-शीलता परम तप है। ११० सन्ति साहसवारणा। तांति अविहित (अनुचित) कार्य करने की उत्सुकता को रोकती है। १११ खन्ति हित सुखावहा । शान्ति हित और सुखदायक है। ६ व०ब० स०म०
१२
११२ खन्ति धीरस्सलङ्कारो ।
चान्ति ज्ञानी पुरुष का अलंकार है ।
११३ खन्ति तपो तपस्सिनी।
शान्ति ही तपस्वियो का तप है ।
११४ खन्ति बलं व यतीनं ।
तान्ति ही तपस्वियों का बल है ।
११५ खन्ति बला समरण ब्राह्मणा।
क्षांति श्रमण तथा ब्राह्मण (वाहित पापो जिसने अपने पाप
को धोकर
बहा
दिया है) का बल है।
११६ मनापो होति खन्तिको ।
सहन-शील मनुष्य सबका प्रिय होता है ।
७ चित्त वग्गो-चित्त वर्ग
११७ चित्ते सङ्किलिट्ठ दुग्गति पाटिकखा।
चित्त के मलिन होने पर दुर्गति आवश्यक है।
११८ चित्ते असङ्किलिट्ट सुगति पाटिकखा ।
चित्त के मलिन न होने पर सुगति आवश्यक है ।
(२३)
११६ चित्तेन नीयति लोको।
चित्त के अनुसार प्राणियों की गति होती है।
१२० चित्तस्य दमयो साधु ।
चित्त का दमन करना उत्तम है।
(२४ )
१२१ चित्तं दन्तं सुखावह ।
सुरक्षित चित्त सुखदायक होता है।
१३ ha जा दी अ० ध । २५ ) १२२ चित्तं मुत्तं सुखावह सुरक्षित चित्त सुखदायक होता है । १२३ विहति चित्तबसानुबत्ती । चित्त के अनुसार कार्य करने वाला परेशान होता है । १२४ चित्तं अत्तना उजकमकंसु । पण्डित पुरुष अपने चित्त को सीधा मल-रहित) करते है । १२५ सचित्तपरियाय कुसला भवेय्यं । अपने चित्त को संयमित करने मे चतुर होना चाहिए । १२६ तेलपत्तं यथा परिहरेय्य एवं सचित्तमनुरक्खे । तेल से नरे पात्र को ले जाने वाले की तरह चित्त की रक्षा करे। १२७ सचित्तमनुरक्खथ । अपने चित्त की रक्षा करे । १२८ चित्तं रक्खेथ मेधावी । बुद्धिमान पुरुष चित्त की रक्षा करे। १२६ यतो यतो च पापकं ततो ततो मना निवारये । जिस-जिस पालम्बन से पाप पैदा होता है उस-उस आलम्बन से चित्त को हटाएँ। ८ जय वग्गो-जय वर्ग १३० जयं वेर पसवति । जय वैर को पैदा करती है। १३१ सम्बदान धम्मदानं जिनाति । धर्मदान सब दानों से बढ़कर है। १३२ सब्बरसं धम्मरसो जिनाति । धर्म-रस सब रसों में बढ़कर है। ध स० ध ध ध
१४
१३३ सब्बरतिं धम्मरति जिनाति ।
धर्म में रति सब रतियों से बढकर है।
१३४ तरहक्खयो सब्बदुक्खा जिनाति ।
तृष्णा-क्षय सब दुखों को जीत लेता है।
१३५ न तं जितं साधु जितं य जितं अवजिथ्यक्ति ।
वह विजय उत्तम नहीं जो भविष्य मे पराजय में बदल जाय ।
१३६ तं खो जित साधु जितं यं जित नावजिय्यति ।
वही विजय उत्तम है जो बाद में पराजय में नहीं बदलती।
१३७ अक्कोधेन जिले को।
अक्रोध से क्रोध को जीते।
१३८ असाधु साधुना जिने ।
अच्छाई से बुराई को जीते ।
१३६ जिने कदरियं दानेन ।
लालची को दान से जीते ।
१४० सच्चेनालिकवादिनं ।
सत्य से असत्यवादी को जीते।
६ दानवग्गो-दान वर्ग
( २६ )
१४१ दानञ्च युद्वञ्च समानमाहु।
युद्ध समान होते हैं ।
१४२ नत्थि चित्ते पसन्नम्हि अप्पका नाम दक्खिणा विमान ।
श्रद्धा से प्रसन्न चित्त से दिया दान अल्प नहीं कहा जाता ।
१४३ विचेभ्य दान सुततप्पसत्थं ।
विवेक करके दान देना बुद्ध द्वारा प्रशंसित है । (बुद्ध विवेक
कर दान देने की प्रशंसा करते हैं)
दान और
१ स० अ० य० अ० १४४ बाला हवे नप्पसंसन्ति दान । वे मूखं ही है जो दान के प्रशंग नही करते १४५ दद मिनि गन्थति । देने से सभी मित्र हो जाते है । १४६ ददं पियो होति भजन्ति न बहू । देने वाला प्रिय होता है, बहुत लोग उसके साथी हो जाते है। १४७ ददमानो पियो होनि । देने वाला प्रिय होता है। १४८ सुखस्स दाता मेधावी सुख सो अधिगच्छति । बुद्धिमान् दूसरों को सुख देने वाला स्वयं सुखलाभी होता है । १४६ सेट्टन्ददो सेटमुपेति ठान। श्रेष्ठ वस्तु का दान देने वाला श्रेष्ठ अवस्था को प्राप्त करता है। १५० अगस्स दादा लभने पुनग्ग । अग्र ( उत्तम बस्तु ) को देने वाला अग्रावस्था को पाता है। १५१ ददतो पुञ्ज पढति । देने वाले का पुण्य पढ़ता है। १५.२ ददेश्य पुरिसो दान। मनुष्य को दान देना चाहिए। १० दुक्खबग्गा--दुःख वर्ग १५३ नत्थि खन्धसमा दुक्खा । पंच स्कन्ध के समान दुःख नही । अ० ( २७ ) ध १५४ संखारा परमा दुक्खा। संस्कार परम दुःख हैं।
दुख है।
१५५ दुरावासा घरा दुक्खा।
अव्यवस्थित घर दुःखद है।
१५६ दद्विदिय दुक्खं लोके ।
लोक में दरिद्रता (गरीबी) दुःख हैं ।
१५७ इणादानं दुक्खं लोके ।
ऋणि होना लोक मे
१५८ दुक्खं अनाथो विहरति ।
अनाथ (शरण रहित दुःखी होता है ।
१५६ दुक्खं सेति पराजितो
पराजित
दुःख
से सोता (रहता) है।
१६० अकिञ्चन नानुपतन्ति दुक्खा ।
अकिंचन (चिन्ता-रहित) को दुख: नहीं ।
११ धम्मवग्गो--धर्म वर्ग
१६१ धम्मो रहदो अकदमो ।
धर्म स्वच्छ सरोवर की भाति है ।
(२८)
१६२ मनोपुठबङ्गमा धम्मा।
मन सभी धर्मो का अगुवा हैं ।
१६३ धम्मो हि इसिनं धजो।
धर्म ही ऋषियों का ध्वजा हैं ।
१६४ सत धम्मो दुरन्वयो।
सत्पुरुष के धर्म को जानना कठिन है
.
घ दी जा अं० सति । ( २६ ) १६६ सतं च घम्मो न जरं उपेति । सन्तों का धर्म जरा को प्राप्त नहीं होता। १६७ सद्धम्मो सब्धि रक्खितो; सत्पुरुष सद्धर्म की रक्षा करते ही है। १६८ धम्मो सुचिएरमो सुखमावहाति । धर्मानुसार चलने पर धर्म सुखद होता है । १६६ सव्वेसं सहितो होति सद्धम्मे सुपतिट्टितो। धर्म मे सुप्रतिष्ठित मनुष्य सब मनुष्यो का हितकारी होता है । १७० धम्मपोती सुब धर्म-रस का पान करने वाला सुखी जीवन व्यतीत करता है । १७१ धम्मचारी सुखं सेति । धर्म पर आचरण करने वाला सुख पूर्वक रहता है । १७२ धम्मो हवे रक्खति धम्मचारी । धर्मचारी की रक्षा धर्म करता है । १७३ न दुग्गतिं गच्छति धम्मचारी। धर्मचारी दुर्गति को प्राप्त नही होता । १७४ धम्मे ठितं न विजहाति कित्ति । यश-कीति धर्म में सुप्ततिष्ठित का त्याग नहीं करती। १७५ धम्मे ठिता ये न करोन्ति पापकं । धर्म पर चलने वाले पापाचरण नहीं करते । १७६ सब्बे धम्मा नालं अभिनिवेसाय । सभी धर्मों में अभिनिवेश (आसक्ति) नहीं करनी चाहिए । जा जा अं० म०
( ३० )
१७७ योनिसो विचिने धम्म
भली भाँति विचार कर धर्म को चुनना चाहिए।
अं०
अं०
१७८ धम्म चरे सुचरितं ।
धर्म पर आचरण सुचरित्रता को ध्यान में रखते हुए करे ।
(धर्म के लिए ही धर्म का आचरण करे।)
१७६ सद्धम्मो गरु कातब्बो ।
सद्धर्म का सत्कार करना चाहिए।
१८० कण्हं धम्म विप्पहाय ।
पण्डित कृष्ण-धर्म (पाप को छोड़े।
१८१ सुक्कं भावय पण्डित्तो।
पण्डित शुक्ल-धर्म ( कुशल धर्म) का अभ्यास करे ।
ध
ध
१२ पशिरान-प्रकीर्ण वर्ण
( ३२ )
१८२ अटुङ्गिको च मग्गानं खेमं अमतगालिन ।
सब मार्गों में केवल आर्याष्टांग ही ऐसा एक मार्ग है जो
क्षेम तथा अमृत-पद पहुंचाने वाला है।
१८३ विसुद्धि मव्वकिलेसेहि होति दुक्खेहि निव्वुति ।
सब क्लेशों से शुद्ध होने पर दुःख दूर हो जाता है।
१८४ यं किश्चि समुदयधम्म सव्यं तं निरोध धम्म ।
जो
कुछ पैदा होने वाला है वह सब निरोध होने वाला है
( पैदा है सो नपैद है )
र०र०
सं०
१६ ध १८५ यथा पच्चयं पवत्तन्ति । र०र० संस्कृत वस्तुएँ अपने हेतु-प्रत्यय पर आश्रित हैं। १८६ आरोग्य परमा लाभ। प्रारोग्य परम लाभ है। १८७ जिघच्छा परमा रोगा। ध भूख एक बड़ा भारी रोग है । १८८ संखारा सस्सता नत्यि । संस्कार शाश्वत नहीं। १८६ अनिच्चा वत संखारा। सं० संस्कार अनित्य है। १६० दुल्लमा खणसम्पत्ति । स० स० उचित अवसर (समय) प्राप्त होना दुर्लभ है । १६१ दुल्लम दस्सनं होति सम्बद्धानं अभिण्हसो। म सदैव बुद्धों का दर्शन दुर्लभ है । ११२ खरणो वो उपन्चगा। अवसर को नष्ट मत करो। ( अवसर पर मत चूको) १६३ अतिपतति क्यो खयो तथेव । जा एक क्षण के समान आयु-क्षय होता है । १६४ कालो घसति भूतानि सब्यानेव सहत्तना। जा काल ( समय) प्राणियों तथा स्वयं को खा जाता है । १६५ इति विस्सट्रकम्मन्ते अत्था अच्चेति माणवे। दी अपने कर्त्तव्य में प्रमाद करने वाला युवक अपने हित को नष्ट कर देता है। १६६ नक्खत्तं पटिमानेन्तं अत्थो बालं उपच्चगा। मूर्ख नक्षत्र पर विश्वास कर अवसर को खो बैठता है।
२० जा सं० सं० १६७ अत्थो अत्थस्स नक्खत्त किं करिस्सन्ति तारका। अवसर की प्राप्ति ही शुभ-शकुन है, तारे क्या करेंगे। १६८ वसो इस्सरियं लोके । लोक में प्रभुता एक बड़ी चीज है । १६६ सिरि भोगाननमासयो। यश-कीर्ति से भोग-सम्पत्ति प्राप्त होती है । २०० किच्छा वुत्ति असिप्पस्स । शिल्प न जानने वाले का जीविका कठिन होती है । २०१ साधु खो सिप्पकं नाम अपि यादिसकीदिसं। शिल्प चाहे किसी भी तरह का हो अच्छा ही होता है । जा व०व० व० व० २०२ मत्तञ्जता सदा साधु । मात्रज्ञ होना सदा अच्छा है ( मध्यम मार्ग पर चलना सदैव श्रेष्ठ है ) ( ३३ ) २०३ हिरि ओत्ताप्पयचेव लोकं पालेति साधुकं । ह्नी तथा अपत्रपा (संकोच) लोक-रक्षक हैं। २०४ लोकोपत्थ म्भिका मेत्ता। मैत्री लोक को सभालने वाली है। २०५ अरति लोकनासिका। ईर्षा लोक को नष्ट करने वाली है। २०६ महापुरिसभावस्स लक्खणं करुणासहो । करुणा के कारण (दूसरे के दुःख को ) सहन न कर सकना महापुरुष का लक्षण है। व०व० व०व० व० व० २१ घ २०७ निमित्तं साधुरुपानं कतकतवेदिता। स० स० कृतज्ञता तथा अपने प्रति किए के बदले में दूसरे का कार्य करना सतपुरुष का लक्षण है। २०८ सम्बञ्चे पठविं दज्जा नाकतब्बुमभिराधमे । सारी पृथ्वी को भी देकर अकृतज्ञ को सन्तुष्ट नही किया जा सकता। २०६ हनन्ति भोगा दुम्मेधं । भोग-सामग्री दुबुद्धि का हनन करते है । २१० सक्कारो कापुरिसं हन्ति । सं० सत्कार का पुरुषता को नष्ट कर देता है । २११ किच्छो मनुष्य पटिलाभो । ध मनुष्य का जन्म पाना कठिन है । २१२ किच्छं मच्चानं जीवितं । मनुष्यों को बड़ी कठिनता के साथ जीवन चलाना पड़ता है । २१३ किच्छं सद्धम्मसवणं । ध सद्धर्म का श्रवण करना कठिन है । २१४ किच्छो बुद्धानमुप्पादो। बुद्धों का उत्पन्न होना कठिन है । २१५ असञ्झायमला मन्ता। ध पाठ न करते रहना मन्त्रों का मैल है । २१६ अनट्ठानमला धरा। झाड़-बहार न करना घर का मैल है। २१७ मलं वएणस्स कोसर्ज। आलस्य वर्ण ( सौन्दर्य) का मैल है । ध ध व ध २२ ध ध ध २१८ मलित्थिया दुचरितं । दुराचार स्त्री का मैल है। २१६ सुद्धि असुद्धि पच्चत्तं । शुद्धि और अशुद्धि अपने ही से होती है । २२० नाबो अचं विसोधये दूसरा मनुष्य दूसरे को शुद्ध नहीं कर सकता। २२१ सुद्धस्स सुचिकमस्स सदा सम्पज्जते वतं । म० शुद्ध, शुचिकर्म करने वाले के संकल्प (वत सदैव पूरे होते है। २२२ सुदस्सं वज्जमबेसं अत्तनो पन दुहसं । ध दूसरे के दोष देखना सरल है परन्तु अपने दोष देखना कठिन है। २२३ नत्थि लोके रहो नाम पापक मं पकुब्बता । जा पाप कर्म करने वाले के लिए लोक में कोई गुप स्थान नहीं ( आज नहीं तो कल पाप प्रकट हो जाता है ) २२४ नेसा सभा यत्थ न सन्ति सन्तो। जा जिस सभा में सत्पुरुष नहीं वह सभा नहीं। २२५ नत्थेतं लोकास्मिं य उपादियमानं अनवज्जं अस्स । र०र० लोक में किसी भी वस्तु के प्रति आसक्ति दोष-रहित नहीं । २२६ भोगा सन्निचयं यन्ति वम्मिकोवूपर्चायति । दी० घर को अच्छी तरह चलाने वाले की भोग-सम्पत्ति वल्मीक की तरह बढ़ती हैं। २२७ अलं बालस्स मोहाय न च पारगवोसिनो। म सुन्दर रुप मूर्ख को मोह लेता है, निर्वाण-गवेषी को नहीं । २२८ रूपं जरिति मच्चानं नामगोत्तं न जरिति । सं. मनुष्यों के शरीर जीर्ण हो जाते है, नाम-गोत्र जीणं नहीं होते।
२३ २२६ शीनं भावो दुराजनो। जा स्त्री का स्वभाव जानना कठिन है । २३० उक्कटु सूरमिच्छन्ति । अवसर पाने पर वीर पुरुष की आवश्यकता होती है ! २३१ प्रियञ्च अन्नपानम्हि । जा समृद्धि) अन्नपान होने पर प्रिय जनों की चाह होती है। २३२ मन्तीसु अकुतूह । जा मंत्रणा के लिए असंगत बात न करने वाले की आवश्यकता है । २३३ अत्थे जाते च पण्डित । जा समस्या उपस्थित होने पर विद्वान् की आवश्यकता है । २३४ मापदासु शामो वेदितव्बो। संकट पड़ने पर है मानसिक-शक्ति जानना चाहिए। २३५ यसो लद्वा न सज्जेच्य। जा २३६ चागमनु ब्र हेय्य । म सदैव त्गाग-भावना की वृद्धि करनी चाहिए । २३७ सन्तिमेव सिक्खेय्य । शान्त-धर्म की प्राप्ति के लिए ही शिक्षा लेनी चाहिए। २३८ लोकामिस पजहे सन्ति पेक्खो। शान्ति चाहने वाले को लोकामिष (भोग) छोड़ने चाहिए । २३६ त गएहेय्य यदपण्णकं । जा जो धर्म दोष-रहित है उसको ग्रहण करे। २४० सम्मुखा यादिसंचिएणं परम्मुखापि तादिसं । स०स० जैसा सम्मुख आचरण करे वैसा ही पीछे करो। उ २४ स०स० २४१ अप्पत्तो नो च उल्लपे। जिस वस्तु को अभी आप ने प्राप्त नहीं किया उसके बारे में शेखी न मारे । ( ३४ ) २४२ सनाथा विहरथ मा अनाथा । सनाथ होकर विचरण करो अनाथ होकर नहीं । २४३ नाझं निस्साय जीवेच्य । दूसरों के आश्रय पर नहीं रहना चाहिए । २४४ आरोग्यमिच्छे परमञ्च लाभं । आरोग्य, जो कि परम लाभ है, की इच्छा करे ! २४५ अतीतंनान्वागमेय्य । अतीत के पीछे न जाए (अतीत का चिन्तन न करे ) २४६ नप्पटिकङ्क अनागतं । भविष्य में ( किसी भी वस्तु की ) चाह न करे । ( भविष्य के लिए मनसूबे न बाँधे ) १३ प वग्गो-प्रज्ञा-वर्ग जा सं० सं० २४७ नात्थ पञ्जासमा आभा। प्रज्ञा के समान प्रकाश नही । २४८ पञ्ज्ञा लोकस्मिं पज्जोतो। प्रज्ञा लोक में प्रकाश है। २४६ योगा व जायती भूरि। (ध्यान) योगाभ्यास से प्रज्ञा उत्पन्न होती है । २५० अयोगा भूरिसङ्घयो । योगाभ्यास (ध्यान-भावना) न करने से प्रज्ञा क्षय को प्राप्त हो जाती है। घ ध २५ ध सं० ध २५१ सुखो पापटिलाभो । प्रज्ञा की प्राप्ति सुखद है। २५२ पञ्जा नरानं रतनं । प्रज्ञा मनुष्यों के लिए रत्न के समान है २५३ पञ्जा वे धनेन सेय्यो। प्रज्ञा धन दौलत से भी अच्छी है । २५४ नत्थि झानं श्रपञ्चस्स। अप्रज्ञ मन को एकाग्र नहीं कर सकता। २५५ पञ्ञा नत्थि अभायतो। ध्यान नकरने वाले को प्रज्ञा उत्पन्न नहीं हो सकती। २५६ पञ्जा चेनं पसासति । मनुष्य प्रज्ञा से प्रशासित होते है। २५७ पाय मग्गं अलसो न विन्दति ! आलसी केवल प्रज्ञा द्वारा प्राप्त करने योग्य मार्ग को प्राप्त नहीं कर सकता। २५८ सुस्सूसं लभते पञ्जे। दत्त-चित्त हो सुनने से प्रज्ञा की प्राप्ति होती है। २५६ पयायत्यं विपस्सति । प्रज्ञा द्वारा मनुष्य (धर्म के) अर्थ को स्पष्ट देखता है। २६० पब्बाय परिसुज्झति । मनुष्य प्रज्ञा द्वारा ही शुद्ध होता है। २६१ पञ्चा हि सेठ्ठा कुसला वदन्ति । चतुर पुरुष प्रज्ञ को ही श्रेष्ठ बतलाते है । २६२ पञ्बाजीवी जीवितमाहु सेट। प्रज्ञा पूर्वक जीवन को श्रेष्ठ कहा जाता है । ध सं० अं० सु जा सु २६ २ जा अं० २६३ एको व सेय्यो पुरिसो सपो यो भासितस्स विजानाति अत्थं। जो प्रज्ञावान् है सुभाषित के सार को समझता है वह अकेला ही ( न समझने वालो की अपेक्षा ) श्रेष्ठ है। २६४ बहूनं वत अत्थाय सप्पयो धरमावस । प्रज्ञावान् बहुतों के हित के लिए घर चलाता है । २६५ साकच्छाय पञ्जा वेदितव्बा। बात-चीत करने से ही प्रज्ञा जाननी चाहिए। २६६ तथात्तानं निवेसेव्य यथा भूरि पवड्ढति । जिस प्रकार से प्रज्ञा बृद्धि को प्राप्त हो वैसा ही करे । २६७ पञ्चनप्पमज्जेय्य । ज्ञान प्राप्ति से प्रमाद न करे। ध उ भ अं० १४ पमाद वग्गी-प्रमाद-वर्ग २६८ पमादो मच्चुनो पदं । प्रमाद मृत्युपद का मार्ग है। २६६ पमादो रक्खतो मलं । चित-रक्षा करने वालों का मल प्रमाद है। ( प्रमाद के कारण मनुष्य चित्त को संयमित नहीं कर सकते ) १७० पमादो गरहितो सदा । पण्डित सदा प्रमाद की निन्दा करते हैं। २७१ पमादमनुञ्जन्ति बाला दुम्मेधिमो जना। बाल दुबुद्धि लोग प्रमाद में लगते हैं । १७२ ते दीघरत्तं सोचन्ति ये पमञ्जन्ति मारणवा । जो युवक प्रमाद करते हैं वे दीर्घ काल तक चिन्तित होते हैं। ध ध म २७ ध ध २७३ ये पमत्ता यथा मता। प्रमादी मरे हुओं के समान है । २७४ मा पमादमनुयुन्जेथ । प्रमाद में मत लगो। २७५ एमादेन न संबसे। आलसी व्यक्ति का संग न करें। १५ पाप वग्गो-पाप वर्ग ध ध ध २७६ मला वे पापका धम्मा अस्मिं लोके परम्हि च । पाप इस लोक तथा परलोक में भी मल ही है । २७७ दुक्खो पापस्स उच्चयो । पाप का संचय दुःखद है। २७८ पापानं अकरण सुखं । पाप का न करन सुख है। २७६ पाप पापेन सुकरं। पापी के लिए पाप करना बड़ा आसान है । २८० पापे न रमती सुचि । शुद्ध मनुष्य पाप करने में रत नहीं होते। २८१ सकामुना हबति पापधम्मो। पापी अपने ही कर्म से नष्ट हो जाता है । २८२ तपसा एजहन्ति पाप कम्म । मनुष्य कठोर प्रयत्न द्वारा पाप कर्म को त्याग देते हैं । २८३ पापानि कम्मानि करोन्ति मोहा । अज्ञ पुरुष ही पापों को करते हैं। aa म जा म २८ ध जा २८४ नत्थि पापं अकुब्बतो। (पाप) न करने वाले को पाप नहीं लगता। २८५ धन्म मे भणमाखस्स न पापमुलिपति । जब मैं धर्म का कथन करता हूँ तो उस समय पापमुझे मलिन नहीं करता। २८६ नत्थि अकारियं पापं मुसावादिस्स जन्तुनो। असत्यवादी पाप न करे यह सम्भव नहीं। २८७ पापानि परिवज्जये। सभी पापों को छोड़ दो। २८८ न घासहेतूपि करेय्य पाप । भोजन के लिए भी पाप न करे । ध ध दी १६ पुग्गल वग्गो-पुद्गल वर्ग २८६ साधु खो पण्डितो नाम । पण्डित पुरुष सभी कार्यों में काम आते हैं। २६० पण्डितो जो सलिसम्पन्ना जलं अग्गवि भासति । पण्डित जो शीलसम्पन्न है वह प्रज्वलित अग्नि के समान चमकता है। २६१ अनत्थं परिवज्जेति उत्थं गगहाति पण्डितो। पण्डित वही है जो अनर्थ की बात को छोड़कर अर्थ की बात को ग्रहण करता है। २६२ इन्द्रियानि रक्खन्ति पण्डित । चतुर मनुष्य अपनी इन्द्रियों की रक्षा करता है। २६३ न उच्चावचं परिता दस्सयन्ति । पण्डित जन विकार प्रदर्शन नहीं करते । अंक दी ध २६ अं० घ जा ध स० म० २६४ निज्झत्तिबला पण्डिता । पण्डित दूसरों के दोषों पर ध्यान नहीं देते । २६५ दुल्लभो पुरिसाज-जो। महापुरुष दुर्लभ है। २६६ दुल्लभो अगसम्पन्नो। गुणवान् पुरुष दुर्लभ है। २६७ दन्तो सेट्रो मनुस्सेसु । मनुष्यो मे दान्त ( जिसने इन्द्रियों का दमन कर लिया है ) श्रेष्ठ है। २६८ महाकारुणिको नाथो। नाथ, भगवान् बुद्ध, महाकारुणिक है। २६६ कुसलो च जहाति पापकं । चतुर पुरुष पाप करना छोड़ देता है । ३०० नय नयति मेधावी। मेधावी ठीक पथ-प्रदर्शन करता है। ३०१ अधुरायं न युञ्जति । प्रज्ञावान् अकरणीय कार्य में नहीं लगते । ३०२ धीरो भोगे अधिगम्म सङ्गहाति च बातके । धीर पुरुष भोग सम्पत्ति प्राप्त कर बान्धवों का संग्रह करता है । ३०३ धीरो च बलवा साधु यूथस्स परिहारको । पण्डित पुरुष ही समाज का नेतृत्व करने में समर्थ है। ३०४ न कामकामा लपयन्ति सन्तो। सत्यपुरुष इन्द्रि-सुख संबंधी बातें नहीं करते । ३८५ सन्तो न ते ये न वदन्ति धम्म । वे सत्पुरुष नहीं जो धर्म की बात नहीं बोलते । जा जा जा ध सं ३ जा ध सं० ध सं. ध ३०६ सन्तो सत्तहिते रता । सत्पुरुष पर हित में लगे रहते हैं। ३०७ दूरे सन्तो पकासेन्ति । सत्पुरुष दूर होने पर भी प्रकाशते हैं। ( सत्यपुरुष का यश दूर-दूर तक फैल जाता है ) ३०८ सन्तो सग्गपरायना। सत्पुरुष स्वर्ग-गामी है। ३०६ सव्वा दिसा सप्पुरिसो पवायति । सत्पुरुष सभी दिशाओं में सुगन्ध बहाता है । ३१० उपसन्तो सुखं सेति । उपशान्त मनुष्य सुख से रहता है । सोता है । ३११ सतञ्च गन्धो पटिवातमेति । सत्पुरुष की सुगन्ध उल्टी-हवा भी जाती है । ३१२ अनुपादा विमुवन्ति । किसी भी धर्म को 'अपना' करके व ग्रहण करने से मनुष्य विमुक्त हो जाते हैं। ३१३ यो बालो मजति बाल्यं पण्डितो वापि तेन सो। जो मूर्ख अपनी मूर्खता का समझता है, इसी कारण वह पण्डित है। ३१४ न साधु बलवा वालो यूथस्स परिहारको। मूर्ख समाज का नेतृत्व करने में असमर्थ । ३१५. बालो अपरिणायको । मूर्ख नेता बनने के योग्य नहीं । ३१६ उज्झत्तिबला बाला । मूर्ख छिद्रान्वेषी होते है। अं० - जा अं० ध जा जा जा ३१७ असन्तत्थ न दिस्सन्ति । असत्पुरुष पास में भी होने पर दिखाई नहीं देते। ( असत्पुरुष का यश नहीं फैलता) ३१८ असन्तो निरयं यन्ति । असत्पुरुष नरक गामी है। ३१६ अनयं नयति दुम्मेधो। दुर्बुद्धि अनुचित मार्ग पर ले जाता है । ३२० अधुरायं नियु-जति । मूर्ख प्रकरणीय कार्य को करता है । ३२१ हापेति अत्थं दुम्मेधो। दुबँद्धि अपने हित को भी नष्ट कर देता है । ३२२ दुन्भिं करोति दुम्मेधो । दुर्बुद्धि हानिकारक कर्म करता है । ३२३ चोरा लोकस्मि मब्बुदा । चोर लोक के लिए हानिकारक है ! ३२४ सुविजानो भवं होति । सुशिक्षित उन्नति शील होता है ! ३२५. दुविजानो पराभयो । अशिक्षित नाश को प्राप्त होता है । ३२६ धमकामो भवं होति । धर्म की कामना करने वाले की बृद्धि होती है । ३२७ धम्म देस्सी पराभवो। धर्म से घृणा करने वाले का विनाश होता है । ३२८ सक्कत्वा सक्कतो होति । दूसरे का सत्कार करने वाला सत्कार पाता है। सं० सु सु सु जा ३२ जा जा जा अं० जा ध ३२६ गरु होति सगारवो । दूसरे का गौरव करने वाला गौरव पाता है । ३३० पूजको लभते पूज। पूजा करने वाला स्वयं पूजित होता है । ३३१ वन्दको पटिवन्दनं । दूसरो की वन्दना करने वाला स्वयं वन्दित होता है। ३३२ पटिसंखानबला बहुस्तुता। बहुश्रु त विचार शील होते हैं। ३३३ साधु सम्बहुला ञाती। बहुत सम्बन्धियों को होना सुखदायक है । ३३४ विस्सासपरमा आति । विश्वास सबसे बड़ा बन्धु है । ३३५ नेकासी लभते अकेले खाने वाला सुख प्राप्त नहीं करता। ३३६ नत्थि लोके अनिन्दितो। लोक में ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसकी निन्दा कभी न कभी न हुई हो । ३३७ परिभूतो मुदु होती। अयोग्य मनुष्य तिरस्कार पाता है। ३३८ अतितिक्खो च वेरवा । कठोर मनुष्य वैर उत्पन्न करता है। ३३६ वहुम्पि रत्तो भासेय्य । प्रेम में फंसा मनुष्य बहुत बढ़ कर बोलता है । ३४० दुटोपि बहु भास यि । क्रोधित मनुष्य बहुत बोलता है । सुख । जा ध जा जा जा ३ ३ जा जा सं० ३४१ अनुपायेन यो अत्थं इच्छति सो विहति । अनुचित रीति से जो अपना उल्लू सीधा करना चाहता है उसे परेशानी उठानी पड़ती है। ३४२ न उजुभूता वितथं भसन्ति । सम्वरित कभी भी असत्य नहीं बोलते । ३४३ यथावादी तथाकारी। जैसा बोले वैसा ही करे। ३४४ हिरिनिसेधो पुरिसो कोचि लोकास्मि विज्जति । लोक में कोई ही मनुष्य ऐसा होता है जो अपने ही प्राप लज्जा करके अकुशल कर्म नहीं करता। ३४५ कवि गाथानमासयो। कवि गाथानों का प्राश्रय है । ३४६ ब्रह्माति मातापितरो। माता-पिता ही ब्रह्म है। ३४७ पुब्बाचरियाति वुच्चरे । माता-पिता ही प्रथम आचार्य हैं। ३४८ आहुनेय्या च पुत्तानं । माता-पिता पुत्रों के लिए पूजा के पात्र हैं । ३४६ इत्थी मलं ब्रह्मचरियस्स । ब्रह्मचर्य के लिए स्त्री मल है। ३५० इत्थी भण्डानमुत्तमं । मनुष्य की सभी सम्पत्तियों में स्त्री का स्थान ऊँचा है । ३५.१ भत्तञ्च गरुनो सब्वे पटिपूजेन्ति पण्डिता । चतुर स्त्री पति तथा पुजनीय व्यक्तियों की पूजा करती अं० अं० अं० सं० स० ३४ सं० सं० स० ३५२ भत्ता पञ्बासमित्थिया। पति से ही स्त्री की प्रतिष्ठा है ! ३५३ सुस्सूसा सेट्रा भरियानं ! पत्नियों में आज्ञा कारणी श्रेष्ठ है। ३५४ यो च पुत्तानमस्सको। पुत्रों में आज्ञाकारी पुत्र श्रेष्ठ है । ३५५ पुत्ता वत्थु मनुस्सानं । पुत्र सभी लोगो की इप्ट वस्तु है (सभी लोग पुत्र चाहते है) ३५६ फातिं कृयिरा अविहेठयं परं । दूसरों की भलाई करे, दूसरों को दुःख न दे : ३५७ गुणवा चात्तनो गुणं । गुणवान् अपने गुणों की रक्षा करे ! ३५८ रक्खेय्यानागतं भयं । संभाव्य दुःख को जा , स० स० ना करे। १७ पुञवग्गो-गपुण्य व सं० ध ३५६ पुजे चोरेहि दूहर। चोर पुण्य को चुरा नहीं सकते। ३६० पुखं सुख जीवितसंखयम्हि । मरते समय पुण्य सुखदायक होता है । ३६१ सुखों पुञस्स उच्चयो । पुण्य का संग्रह सुखदायक है । ३६२ पुञानि परलोकस्मिं पतिद्वा होन्ति पाणिनं । पुण्य परलोक में प्राणियों के लिए आश्रय होता है । ध जा
३६३ पुयानि कार्यराथ सुखावहानि ।
पुण्य जोकि सदैव सुखदायक है करना चाहिए।
सं०
जा
जा
१८ मञ्चुवग्गो-मृत्युवर्ग
३६४ सव्वं भेदपरियन्त एवं मच्चानं जीवितं ।
मिट्ठी के पात्र की भाति प्राणियों के जीवन का अन्त
हो जाता है।
३६५ अप्पकञ्चिदं जीवितमाहु धोरा।
पण्डित जीवन काल को अत्यल्प बताते हैं।
३६६ न हि नो संगरन्तेन महासेनेन मच्चुना ।
महासेन मृत्यु राज को वाला नहीं जा सकता।
३६७ जरूपनीतस्स न सन्ति तारा।
जरा कीओर जाते मनुष्यों का कोई त्राण नही ।
३६८ न मिय्यमानस्स भवन्ति ताणा।
मरते को कोई बचा नहीं सकता।
३६६ न मिय्यमान धनमन्जेलि किञ्च ।
मरते के पीछे धन नही जाता।
३७० न चापि वित्तेन जरं विहन्ति ।
धन द्वारा बृद्धावस्था को रोका नही जा सकता।
३७१ न दीघायुं लभन्ते धनेन ।
धन से कोई दीर्घायु नही हो सकता ।
३७२ सब्बे व निक्खिपिस्सन्ति भूता लोके समुस्सयं ।
सभी प्राणियों को अपना शरीर लोक में छोड़ना
ही पड़ता है।
म०
म
सं०
जा ३७३ अड्ढा चेव दद्विधा च सब्बे मच्चपरायना धनी और निर्धन सभी मृत्यु के प्राधीन है। १६ मित्त-वग्गो-मित्र वर्ग सं० स०स० सं० जा ३७४ सत्थो पबसतो मित्त । काफिला यात्री का मित्र है। ३७५ माता मित्तं सके घरे। अपने घर में माता मित्र है । ३७६ सहायो अत्यजातस्स होति मित्तं पुनप्पुनं । सच्चा मित्र वही है जो बार-बार अवश्यकता पड़ने पर भी सहायता करता है। ३७७ सब्बत्थ पूजितो होति यो मित्तानं न दुब्भति । जो मित्रों को हानि नहीं पहुंचाता (धोका नहीं देता) वह सर्वत्र पूजित होता है । ३७८ सब्बे अमित्ते तरति यो मित्तानं न दुभति । जो मित्रों को धोका नहीं देता वह सभी दुश्मनों से बच जाता है। ३७६ मित्त दुब्भो हि पापको । मित्र को धोका देने वाला निश्चय ही पापी है। ३८. पापमित्तो पापसखो पापाचारगोचरो। बुरे मित्र बुरे सखा वाले का आचार तथा गोचर स्थान बुरा ही होता है। ३८१ भरिया परमा सखा । पत्नी परम मित्र है। जा दी सं० ३७ ध ध ३८२ नत्थि बाले सहायता। मूर्ख से मित्रता अच्छी नहीं। ३८३ अत्थम्हि जातम्हि सुखा सहाया । काम पड़ने पर मित्र सुखदायक होते है । ३८४ सचे लभेथ निपक सहायं चरेय्य तेनत्तमनो सतिमा । म यदि चतुर मित्र मिले तो उसके साथ स्मृति के साथ रहे । ३८५ नोचे लभेथ निपकं सहाय एकोचरे नचपापानि कायिरा । म यदि चतुर मित्र न मिले तो अकेला रहे और पाप न करे । २० याचना वग्गों-याचना वर्ग ३८६ न वे याचन्ति सप्पया। जा प्रज्ञावान् माँगते नहीं। ३८७ याचको अप्पियो होति । माँगने वाला अप्रिय होता है । ३८८ याचं अददमप्पियो । जा माँगने पर न देने वाला अप्रिय होता है । ३८६ देस्सो च होति अतियाचनाय । जा अधिक मांगने वाला घृणा का पात्र होता है। ३६० न तं याचे यस्स पियं जिगिसे । जा किसी की प्रिय वस्तु को न माँगे। २१ राजवग्गो-राज वर्ग ३६१ राजा रटुस्स पचाणं । (राष्ट्रनायक) राजा के होने पर ही राष्ट्र कहा जाता है । सं० ३८ म जा GT ध स स०स० ३६२ राजा मुखं मनुस्सानं । राजा राष्ट्र के प्रमुख हैं। ३६३ सुब्बं रसुख होति राजा चे होति धम्सिको। राष्ट्र-नायक के धार्मिक होने पर सारा राष्ट्र सुखी होता है। ३६४ कुटुं अप्पटिकुज्मन्तो राजा रतुस्स पूजितो । क्राधित पर, क्रोध न करने वाला राजा राष्ट्र में पूजित होता है। ३६५ मन्नद्धो खत्तियो तपति । शस्त्रास्य से सुसज्जित राजा प्रकाशमान होता है । ३६६ खत्तियो सेट्ठो जनेतस्मिं ये गोत्तपटि सारिनो । गोत्र जातपात मानने वालों में राजा श्रेष्ठ है। ३६७ पुत्त कं विय राजानो पजं रक्खन्तु सब्बदा । राजा अपनी प्रजा का पुत्रवत् पालन करे । २२ वाचावग्गो-बाचावर्ग ३६८ हृदयस्स सदिसी वाचा (सद्दश्य) सत्पुरुष के मन और वाणी समान होते है । ३६६ मोक्खो कल्याणिया साधु । कल्याणकारी वचन बोलना अच्छा है। ४०० मुत्वा तपति पापिक। अनुचित बोल कर मनुष्य शोक को प्राप्त होता है। ४०१ दुटुस्स फरूसा वाचा । क्रोधित की वाणी कठोर होती है ४०२ अभूतवादी निरयं उपेति । असत्यवादी नरक में जाता है। जा जा जा ज ३ ho . सं० ४०३ संबोहारेन सोचेय्यं वेदितव्बं । वाणी से (मानसिक ) शुद्धता जाननी चाहिए । ४०४ वाचं मुञ्चेश्य कल्याणिं । मुन्दर वाणी बोलें। ४०५ सण्हं गिर अत्यवति पमुञ्चे। कोमल तथा अर्थयुक्त वचन बोले । ४०६ तमेव वाच भासेय्य यायत्तानं न तापये। वही वचन बोले जिससे शोक को प्राप्त न हो। ४०७ मनुझमेव भासेय्य । मधुर वचन वोले। ४०८ नामनुधं कुदाचनं । कभी भी कठोर वचन न बोले । ४.६ वाच पमुञ्चे कुसल नातिवेल । सुन्दर वचन भी अनावश्यक रूप से नही बोलना चाहिए । ४१० न हि मुञ्चेय्य पापिकं । बुरे शब्द नहीं बोलने चाहिए। जा जा जा जा २३ विरि-वग्गो-धीय वर्ग जा ४११ कालागतच न हापति अत्थं । परिश्रमी अवसर आने पर अपने हित को नष्ट नहीं करता । ४१२ विरियेन दुक्खमच्चेति । परिश्रम द्वारा दुख का अन्त किया जाता है । सु सु जा 웩 픽 जा जा ४१३ पटिरूपकारी धुरवा उट्ठाता विन्दते धन । कार्य व्यस्त उचित कार्य करने वाला धन प्राप्त करता है। ४१४ अकिलासु विन्दे हृदयस्स सन्तिं । उद्योगी मनुष्य मन की शान्ति को पाता है । ४१५ न निब्बिन्दियकारिस्स सम्मदत्थो विपञ्चति । जो अनिच्छा पूर्वक काम करता है उसे सफलता नहीं मिलती। ४१६ अनिब्बिन्दियकारिस्स सम्मदत्थी विपञ्चति उत्साह पूर्वक काम करने वाले को सफलता मिलती है। ४१७ अथ पच्छा कुरुते योगं किच्चे आवासु सदिति । जो प्रयत्न करने में पीछे रह जाता है वह विपत्ति में पड़ता है। ४१८ हिय्योति हिय्यति पोसो परोति परिहायति । जो आज का काम कल पर छोडता है वह विनाश को प्राप्त होता है और परसो पर छोड़ने से और भी अधिक विनाश को प्राप्त होता। ४१६ अज्जेव किच्चमातप्पं । माज ही कार्य करना चाहिए। ४२० वायमेथेव पुरिसो याव अत्थस्स निप्पदा ! सफलता मिलने तक प्रयत्न करते रहो। ४२१ करेय्य योग्गं धुवमप्पमत्तो। अप्रमादी सतत प्रयत्नशील रहे। ४२२ यथा यथा यत्थ लभेथ अत्थं तथा तथा तत्थ- परक्कमेय्य । जिस प्रकार से कार्य सिद्ध हो उसी प्रकार प्रयत्न करना चाहिए। जा सं० जा
२४ वैरवग्गो-वैर वर्ग
ध
--
ध
४२३ ये वेरं उपनऽहन्ति वेरं तेसं न सम्मति ।
जो वैर बाँधते है उनका वैर शान्त नहीं होता।
४२४ ये वेरं नूपनऽहन्ति वेरं तेसूपसम्मति ।
जो वैर नहीं बाँधते उनका वैर शान्त हो जाता है।
४२५ अवेरेन च सम्मन्ति ।
वैर अवैर से ही शान्त होता है ।
४२६ न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीधि कुदाचनं । ।
लोक में वैर से वैर कभी शान्त नही हो सकता ।
ध
ध
२५ सच्च वग्गो -सत्य वर्ग
सु
सं०
सु
४२७ सच्चं हवे साधुतर रसानं ।
सभी रसो में सत्य का रस सबसे अच्छा है ।
४२८ सच्च वे अमता वाचा ।
सत्य वचन अमृत-बचन होता है।
४२६ सच्चेन कित्तिं पप्पोति ।
सत्य द्वारा कीति-यश प्राप्त होता है।
४३. सच्चेन अत्थे च धम्मे च बहुसन्तो पतिद्विता ।
सत्पुरुष सत्यता में प्रतिष्ठित होता है जो कि धर्म तथा
हितकारी है।
४३१ सच्चमनुरक्खेय्य ।
मनुष्य सत्य की रक्षा करे ।
सु
सं० व०व० सं० २६ सति वग्गो--स्मृति वर्ग ( ३६ ) ४३२ सति लोकस्मि जागरो। लोक में स्मृति जागृत करने वाली है। ४३३ सति सब्बत्थ पत्थिया। स्मृति सर्वत्र इष्ट धर्म है। ४३४ सतिमतो सदा भई । स्मृतिमान् सदैव उन्नतिशील होता है । ४३५ सतिमा सुखमेधति । स्मृतिमान् सुख पाता है। ४३६ सति मतो सुवे सेय्यो । स्मृतिमान् सदैव अच्छा रहता है । ४३७ रक्खमानो सतो रक्खे। रक्षा करने वाला स्मृति पूर्वक रक्षा करे । Go स. स०स० २७ सद्धा बग्गोश्रद्धा वर्ग सं० सं० ४३८ सद्धा बन्धति पाथेय्यं । श्रद्धा होने पर सभी दूसरे गुण आ जाते है । ४३६ सद्धा साधु पतिद्विता। सुप्रतिष्ठित श्रद्धा कल्याणकारी है । ४४० सुखा सद्धा पतिट्टता। सुदृढ़ श्रद्धा सुखदायक है। ४४१ सद्धीध वित्तं पुरिस्स सेट्ठ। श्रद्धा ही लोक मे मनुष्यों का श्रेष्ठ धन है । ध सं० ४३. सं० ४४२ सद्धा दुतिया पुरिस्स होति । श्रद्धा मनुष्य का मित्र हैं। २८ सन्तुट्ठी वग्गो -सन्तुष्टी (मन्तोष) वर्ग -- घ घ ४४३ सन्तुट्ठी परमं धनं। सन्तोष परम धन है। ४४४ तुट्ठी सुखा या इतरीतरेन । जो मिले उसी में सन्तुष्ट रहना सुखद है । ४४५ सुखो विवेको तुझुस्स सुतधम्मस्स पस्सतो। सन्तुष्ट श्रुतधर्म को जाननेवाला एकान्त में सुख का अनुभव करता है। ४४६ यं लद्धं तेन तुटुब्बं । जो कुछ मिले उसी से सन्तोष करना चाहिए। ४४७ सलाभ नातिमवेय्य । अपने लाभ की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। जा ध २६ समण वग्गो-श्रमण वर्ग सु ४४८ समणधि अरणा लोके। बुद्ध शासन में श्रमण लोक के लिये हानि कारक नहीं होते । ४४६ नहि पबजिता परूपधाती समणो होतिपरं विहेठयन्तो । ध दूसरो का घात करने वाला तथा सताने वाला श्रमण ही होता। ४५० अस तो पव्वजितो न साधु । जा संयम-रहित प्रब्रजित अच्छा नही ।
ध
जा
४५१ अपेतो दमसच्चेन न सो कासावमरहति ।
संयम और सत्य से रहित काषाय वस्त्र पहिनने योग्य नहीं।
४५२ उपेतो दम सच्चेन स वे कासावमरहति ।
जो संयम और सत्य से युक्त है वह काषाय वस्त्र
का अधिकारी है।
४५३ सुभासितद्धजा इसयो ।
ऋषियों की ध्वजा सुभाषित हैं।
४५४ समणो अस्स सुस्समयो ।
श्रमण होना है तो अच्छी तरह श्रमरा भाव की रक्षा
करनी चाहिए।
४५५ सामओ समणी ति? ।
श्रमन-भाव में श्रमण को प्रतिष्ठित रहना चाहिए ।
३० सामग्गी बग्गी--एकता वर्ग
बि
स०स०
ध
ध
४५६ सुखा संघस्ल सामग्गी ।
सघ में एकता सुखद है।
४५७ समग्गानं तपो सुखो।
एकीभूत हो प्रयत्न करना सुखदायक है।
४५८ सब्बेसं संवभूतानं सामग्गी वुड्ढो साधिका ।
एक हुओं की एकता बृद्धि का कारण है।
३१ सील बग्गो--शील वर्ग
४५६ सीलं याव जरा साधु ।
वृद्धावस्था तक शील का पालन लाभदायक है।
ध.
४५ ध ४६० सुखं याव जरा सील । शील का पालन बृद्धावस्था तक सुखदायक है। ४६१ सीलं लोके अनुत्तरं । शील के समान लोक में कुछ नहीं। ४६२ सीलं किरव कल्याणं । शील ही का नाम अच्छाई ( कुशल धर्म) है । ४६३ संवासेन सीलं वेदितब्बं । संवास से ही शील जाना जा सकता है। १४६४ सम्बमतो सब्बत्थ संवरो। संयम सभी जगह अच्छा है। ४६५ सबमतो वेरं न चीयति । संयम करने से वैर उत्पन्न नहीं होता। ४६६ सीलं रक्खेय्य मेधावी। बुद्धिमान् शील की रक्षा करें। ध इति ३२ सुख वग्गो--सुख वर्ग घ उ ४६७ सम्बत्थ दुक्खस्स सुखं पहानं । दुःख समुदय का सर्वत्र प्रहारण सुखदायक है । ४६८ अव्यापज्झ सुखं लोके । लोक में व्यापद का न होना सुख का कारण है । ४६६ तेसं वूपसमो सुखो। संस्कारो का शान्त हो जाना सुख है । ७० नत्थि सन्ति परमं सुख । शान्ति ( निर्वाण) के समान सुख नहीं । जा । ध
ध
ध
घ
४७१ निव्यानं परमं सुख
घ
निर्वाण परम सुख है।
४७२ सुखो बुद्धान उत्पादो।
बुद्धों का जन्म सुखदायक है।
४७३ सुखा सद्धम्मदेसना ।
सद्धर्म का उपदेश सुखदायक है ।
४७४ अदस्सनेन बालानं निच्चमेव सुखी सिया !
मूर्यो को न देखने से मनुष्य सदा सुखी रहता है ।
४७५ सुखं सुपति बुद्धो च येन मेत्ता सुभाविता ! व०व०
जिसने अच्छी तरह से मैत्री भावना की है वह सुख
से सोता तथा उठता है।
४७६ न वे अनत्थ कुसलेन अत्थचरिया सुखावहा । जा
जो अपनी भलाई करने में कुशल नही उसका
आचरण सुखदायक नहीं होता।
३३ सेवन वग्गो---सहबास वर्ग
४७७ विल्मासा भयमन्बेति ।
दूसरो पर अत्यधिक बिश्वास के कारण भय (आपत्ति )
उत्पन्न होता है।
४७८ अतिचिरं निवासेन पियो भवति अप्पियो।
जा
अत्याधिक सवार से प्रिय भी अप्रिय हो जाता है।
४७६ यं वे सेवति तादिसो।
व०व०
जो जैसे पुरुष का संग करता है वह वैसा ही हो जाता है।
४८० एकरत्तं द्विरत्तं वा दुक्खं वसति वेरिसु ।
एक-दो रात भी वैरियो के साथ रहने में दुःख है।
४७ ध ध अंग जा ४८१ दुक्खो बालेहि संवासो अमित्तेनेव सब्बदा । मूर्ख के साथ रहना शत्र के साथ रहने के समान सदा दुःख दायक है। ४८२ धीरो च सुख-संवासो बातीनं व समागमो। पण्डितो का सहवास बन्धुओं की भांति सुखद है ! ४८३ सुखो हवे सप्पुरिसेन संगमों । सत्पुरुष का सहवास सुखद है। ४८४ निहीयति पुरिसो निहीन सेवी। हीन के साथ सहवास से मनुष्य हीन हो जाता है । ४८५ दुकलो बालेहि संगयो । मूखों का सहवास दुःख-दायक है । ४८६ न संगमो पापजनेन सेय्यो। पापी का सहवास अच्छा नही । ४८७ न पापजनसंसेवी अञ्चन्तं सुखमेधति । पापी का सहवास न करने वाला सदा सुखी रहता है । ४८८ बालसंगतचारी हि दीघमद्धान सोचति । मूर्यो की संगति में रहने वाला दीर्धकाल तक शोक करता है । ४८६ यत्थु वेरी निवीसति न वसे तत्थ पण्डितो। जहाँ वैरी रहता हो वहाँ पण्डित न रहे । ४६० संकेथेव अमित्तस्मिं । शत्रू में संदेह करना योग्य है । ४६१ मित्तस्मिम्पि न विस्ससे। मित्र में भी अधिक विश्वास न करें। जा घ जा जा
可可可可
४६२ न विस्ससे अविस्स?।
अपरिचित व्यक्ति में विश्वास न करे।
४६३ विस्सट्टोपि न विस्ससे ।
परिचित व्यक्ति में भी अधिक विश्वास न करे।
४६४ नास्मसे अलिकवादिने ।
झूठ बोलने वाले में विश्वास न करे ।
४६५ नास्मसे कतपापम्हि ।
पापी में विश्वास न करे।
४६६ नास्मसे अत्तत्थपञ्बन्हि ।
स्वार्थी में विश्वास न करे।
४६७ अतिसन्तेपि नास्मसे ।
बनावटी शान्त पुरष में विश्वास न करे ।
४६८ अपेतोचित्तेन न सम्भेजय्य ।
विचार हीन व्यक्ति का सहवास न करे ।
४६६ न सन्यवं कापुरिसेन कयिरा ।
पापी से मेल-जोल न करे ।
५०० नास्स बालेन संगच्छि अभित्तमेव सब्बदा ।
मूर्ख का जो कि सदा शत्रू के समान है संगति न करे।
जा
जा
- इति
-
परिशिष्ट " १. अत्ता-शब्द का अर्थ प्रात्म अथवा पाप है आत्मा नहीं बौद्धधर्मानुसार व्यक्तिव्य पचंस्कन्ध अर्थात् रुप, वेदना, सज्ञा, संस्कार तथा विज्ञान का समूह मात्र हैं रुपादि पाँचो स्कन्ध सतत परिवर्तन- शील है-पात्मा नाम की कोई नित्य अपरिवर्तनशील वस्तु नहीं । २. जोति-प्रकाश, शमथ, विपश्यना की भावना करने पर चित्त प्रकाश स्वरुप हो जाता है क्योकि उस अवस्था मे मनुष्य सभी धमों के विलक्षण अर्थात् अनित्यता, दुःखता या अनात्मा को समझ लेता है। ३. दमन-मनुष्य का सम्यक् व्यायाम की भावना अर्थात् अनुत्पन्न अकुशल धर्मों के अनुत्पाद के लिए, उत्पन्न अकुशल धर्मो के प्रहाण के लिए अनुत्पन्न कुशल धर्मो उत्पाद के लिए तथा उत्पन्न कुशल धर्मों की रक्षा के लिए प्रयत्न करना करना है। इस चार प्रकार के प्रयत्न को क्रमश: संयम-प्रयत, प्रहारग-प्रयत, भावना-प्रयत तथा अनुरक्षण-प्रयत्न कहते है। ४. अर्हत्व-अकुशलमूल-लोभ, दोष, और मोह का अभाव ही अर्हत्व अथवा निर्वाण है। निर्वाण शरण है क्योंकि निर्वाण प्राप्त होने पर मनुष्य अष्टलोक धर्म अर्थात् लाभ-अलाभ यश-अथश, प्रशंसा-निन्दा और सुख-दुख से कम्पित नहीं होता। ५. सुरक्षित-उपासक दान शील भावना के द्वारा सुरक्षित कहा जाता है । भिक्षु व्रत प्रतिब्रत (वत्त, परिवत ) अर्थात् विनय सम्बन्धि नियमों का पालन करने तया परियत्ति धर्म' अर्थात् बुद्ध देशित- धर्म को समझने के लिए रूचि रखने से सुरक्षित कहा जाता है ।
" - ६. चित्त-मल-पाँच नविरण कहे जाते है। पञ्ज नविरण अर्थात् काम-छन्द, व्यापाद, स्त्यान-मृद्ध, प्रौद्धत्य कौकृत्य तथा विचिकित्सा के होने पर चित्त समाधिस्थ नहीं होता और चित्त के समाधिस्थ प्रथथा समाहित न होने पर मनुष्य धर्मो के वास्तविक रूप को नही समझ सकता क्योकि ये पाँच नविरण वास्तविकता को ढक लेते है इसीलिए इनको चित्त मल अथवा नविरण कहा जाता है। ७. क्लेश-स्वयं संक्लिष्ट होने से तथा दूसरे भी धर्मो को सक्लिष्ट करने से १० धर्म अर्थात् लोभ, द्वेष, मोह, मान, दृष्टि, विचिकित्सा, न्त्थान, औद्धत्य अह्नीक तथा अनत्रपा क्लेश रहलाते है। ये ही दश क्लेश दुति के कारण है । ८. अमृत-पद-निर्वाण अमृतपद है। क्योकि निर्वाण असंस्कृत अथवा हेतु-प्रभव अर्थात् हेतु से उत्पन्न नही, इसलिए निर्वाण-धर्म के लिए मृत्यु नहीं होने से अमृतपद कहा जाता है । १. ददेति–अत्तान न ददेति परस्स दास कत्वा अत्तानं - देव्य । अर्थात् अपने को दास के रुप मे दूसरे को नहीं देना चाहिए। १०. न परिचजे-न परिचजेति सोहब्यग्घार्दानं न परिचजेय्य अर्थात् सिह इत्यादि जगंली पशुओं से बचे-अपना त्याग न करे । दूमरा अर्थ यह है मनुष्य को आत्म समर्पण ( मार अर्थात् पाप धर्मो को) न करे। ११ अपना हित-इस सुभाषित का अर्थ स्वार्थता नही लगाना चाहिए। इस वचन को बुद्ध ने शमथ-विपरयना की भावना करते समय दूसरे कार्यों के प्रति उपेक्षित भाव रखने के लिए कहा है। दूसरो के कार्य के लिए भावना में विघ्न डालना उचित नही ही है। .... यह है कि १२. दो अर्थ-इस लोक तथा परलोक में दोनो अर्थो को प्राप्त करता है। १३. अप्रमाद-अप्रमाद से तात्पर्य स्मृति अथवा चार स्मृति-प्रस्थानों से चार स्मृति-प्रस्थान है, कायानुस्मृति, वेदनानुस्मृति, चित्तानुस्मृति तथा धर्मानुस्मृति । स्मृति-प्रस्थान की भावना करने पर आर्य-अष्टागिक मार्ग की भावना पूरी होती है जिससे निर्वाण का साक्षात्कार होता है । १४. गति-~-दुर्गति अथवा सुगति की प्राप्ति प्राणियों के अपने-अपने कर्मों के अनुसार होती है । १५. सङ्कप्परागो-न ते कामा यानि चित्रानि लोके सङ्कप्परागो पुरिसस्य कामो । तिट्ठन्ति चित्रानि तथेव लोके अथेत्थ धीग विनयन्ति छन्द अर्थात् ससार मे सुन्दर पदार्थ ( पाँच काम गुण-रुप, शब्द, ध्राण, रस तथा स्पृष्टव्य ) काम नहीं। रागमुक्त मन हो जाना ही पुरुष का काम है। संसार में सुन्दर पदार्थ वैसे पड़े रहते है, किन्तु पण्डित लोग उनमे इच्छा उत्पन्न नहीं करते । १६ गोचर-अर्थात् आलम्बन रुप, शब्द, ध्राण, रस, स्पृष्टव्य तथा धर्म (मन के विषय ) ये छः पालम्बन है । इच्छा जहाँ-जहाँ प्रिय कान्त रूपादि होते है वहाँ-वहाँ अपना घर बना लेती है । १७. नदि---नदियो का पूरा भर जाना, जल का कम होना तथा सूख जाना समय-समय पर दिखाई देता है परन्तु तृष्णा का पूरा होना तथा सूख जाना अर्थात् न होना दिखाई नही देता केवल कमो दिखाई पड़ती है अर्थात् मानव जीवन मे सदैव अब इस बस्तु की कमी
५२
है अब उस बस्तु की कमी है इस प्रकार तृष्णा की कभी पूर्ति
नहीं होती।
१८. मोह-अर्थात् मिथ्यादृष्टि। मनुष्य मिथ्याष्टियो मे इस प्रकार बंधा
हुआ है कि उसका छुटकारा नही पाता इसीलिये मिथ्यादृष्टियों के
जाल में फंसा मानव, जाल में फंसे पशु, पक्षी अथवा मछली की
भाति दुःख उठाता है।
,
१६. ग्रह-यक्ष, अजगर अथवा मगरमच्छ केवल एक ही अत्त-भाव
(आत्म-भाव) में पकड़ सकते है परन्तु द्वष-भाव मनुष्य को
जन्मजन्मान्तर तक पकड़ कर छोड़ता नही । अर्थकथा से ।
-
२०. अर्थ-धर्म ---अर्थ-धर्म से तात्पर्य प्रतिसम्भिनामो से है। प्रतिसम्भिदा
चार है : अर्थ, धर्म, प्रतिभान तथा निरुक्ति । धर्मों के
कारण को जानना अर्थ-प्रतिसम्भिदा तथा धर्मो के फल
को जानना धर्म-प्रतिसम्भिदा कहा जाता है। जैसे कि
तृष्णा
से
दुःख होता है यहाँ तृष्णा ने ज्ञान अर्थ-प्रति-सम्भिदा तथा दु:ख
में ज्ञान धर्म-प्रति-सम्भिदा है। क्रोधी मनुष्य हेतु-फल को नहीं
समझता-यदि समझे तो वह क्रोध ही नही कर सकता।
२१. क्षान्ति –शत्ति ऊष्णता कटु-वचन तथा प्रिय अप्रिय आलम्बनों (रूप
शब्दादि छः पालम्बन ) के प्रति उपेक्षा भाव रखना क्षन्ति कहा
जाता है।
२२. चित्त-शुद्धाशुद्ध चित्त के अनुसार सुगति-दुर्गति की प्रेप्ति
होती है।
२३. सुशिक्षित-स्त्रोतापन्न, सकृदागामी, अनागामी तथा अर्हत् मार्ग द्वारा
चित्त को क्रमशः शिक्षित किया जाता है ।
५३ २४. सुरक्षित-अनुपादान अर्थात् किसी भी धर्म के मै, मेरा अथवा प्रिय- अप्रिय के रुप मै ग्रहण न करने से चित्त सुरक्षित रहता है । २५. दान-एक प्रकार का युद्ध है क्योकि दान तभी दिया जाता है जब कृपणता पर विजय पाई जाती है। एक बार एक व्यक्ति ने भगवान बुद्ध को एक बस्त्र देने की इच्छा की परन्तु कृपणता के कारण तुरन्त न दे सका। एक तरफ बुद्ध के प्रति श्रद्धा और दूसरी ओर कृपणता दोनो के बीच अन्तर्द्वन्द्व हुआ जिसमें दो याम (आठ घन्टे ) लगे। अन्त में श्रद्धा तथा दान-वृत्ति ने कृपणता पर विजय पाई। २६. पच-स्कन्ध-रूप, वेदना, संज्ञा, सस्कार तथा विज्ञारण यही पाँच स्कन्ध है। २७ संस्कार-जो धर्म संस्कृत है अर्थात् हेतु-प्रत्यय से अस्तित्व मे आते है वे दुःख है क्योकि संस्कृत धर्म परिवर्तन शील है । २८. धर्म-धर्म चार प्रकार का होता है [१] गुणधर्म (कुशल कर्म) [२] देशना धर्म [३] परियत्ति-धर्म तथा [४] निःसत्व-धर्म अथवा निर्जीव धर्म। इस सुभाषित मे निःसत्व-धर्म तात्पर्य है । निःसत्व-धर्म विज्ञान के अतिरिक्त ३ नाम धर्म है इन्हे चैतसिक भी कहते है वेदना-न्ध, संज्ञा-स्कन्ध तथा संस्कार स्कन्ध । वास्तव में वेदनादि स्कन्ध चित्त के माथ ही उत्पन्न होते है न पहले न पीछे; फिर भी मन को अगुना कहा गया है इसको इस उपमा से समझना चाहिये जिस प्रकार चोरो का अगुवा ( नेता तथा उसके सहायक दूसरे चोर एक ही साथ मिलकर घर इत्यादि को लूटते है। चोरी का काम सभी एक साथ करते है परन्तु उनमे एक अगुआ होता है।
५४
इसी प्रकार रूप आदि आलम्बन के चक्षु प्रादि द्वार पर
आने पर चित्त के अतिरिक्त वेदनादि सभी धम उत्पन्न होते
है परन्तु चित्त उनका अगुआ होता है । इसके अतिरिक्त
चित्त सदैव उत्पन्न होता है परन्तु किसी अवसर पर कुछ
चैतसिक उत्पन्न नहीं होते । चैतसिक वेदना संज्ञा
को मिलाकर ५२ है। उदाहरणतः जब लोभ चैतसिक
से सम्पयुक्त चित्त उत्पन्न होता है तो द्वेष चैतसिक चित्त के
साथ उत्पन्न नहीं होता परन्तु चित्त हर समय उत्पन्न होता
ही है इस नीयम से भी चित्त धर्मों का अर्थात् चैतसिकों
का अगुना है।
६६. सन्ता का धर्म-६ लोकोत्तर धर्मों से
तात्पर्य है।
नौ
लोकोत्तर धर्म है
[१] श्रोतापत्ती मार्ग [२] श्रोतापत्ति फल [३] सकृदामी-माग
[४] सकृदागामी-फल [५] अनागामी-मार्ग [६] अनागामी-फल
[७] अर्हत्व-मार्ग [८] अर्हत्व-फल [६] निर्वाण
यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि अर्हत्व-फल और निर्वाण
पर्यायवाची शब्द है परन्तु निर्वाल के दो भेद होते है
सानुपादिशेषनिर्वाण तथा अनुपादिशेषनिर्वाण । अर्हत्व-फल से
तय सानुपादिशेषनिर्वाण से तात्पर्य है तथा अनुपादिशेषनिर्वाण
से ही यहाँ 'निर्वाण' शब्द से तात्पर्य । इन नौ जनाकोत्तर धर्मो
को उपाघात के अभाव के कारण जरा को न प्राप्त होने वाले
धर्म कहा जाता है।
३०. धर्म को चुनना-भगवान बुद्ध ने धर्म देशना नाना प्रकार से मनुष्यों
के चरित्र अनुसार की है। सक्षेप मे चरित्र (चर्या) छः
की होती है राग चरित्र, द्वेष चरित्र मोह चरित्र, श्रद्धा चरित्र
बुद्धि चरित्र तथा वितंक चरित्र । उदाहरणतः राग चरित्र
ADMITawamana
. १ वाले को कायगतास्मृति आदि धर्म की भावना तथा द्वेष चरित्र को चार ब्रह्म-बिहार आदि की भावना अनुकूल है । ३१. सुचरित्रता-कुछ लोग दान-पुण्य करते हैं परन्तु साथ में यह अधिष्ठान भी करते है कि इस दान-पुण्य के प्रभाव से लौटरी ( Lottery ) निकल पाए इसको कहा जाता है सुचरित्रता को ध्यान में न रखकर धर्माचर' कहना । ऐसा न कर धर्म के लिए ही धर्म का प्राचरण करना चाहिए यही अर्थ है । ३२. अर्याष्टांग साग-सम्यक् दृष्टि, सम्यक सकल्प, सम्यक् वाणी, सम्पक कन्ति, सम्यक् आजीविका सम्यक् व्यायाम, सम्यक स्मृति तथा सम्यक समाधि यही आर्याष्टगिक मार्ग के आठ अग है। ३३. ही आपत्रपा-ये दोनो धर्म लोकपाल' कहे जाते है क्योंकि यदि लोग इन दो धर्मों के अनुस र ले लो कोई पाप न करें और फलस्वरूप दुख को प्राप्त न हों। ह्री का अर्थ है पाप करने में लजाना तथा अमत्रपा से तात्यय पाप करने में संकोच भय का अनुभव करने से है । ये दोनों धर्म शील के प्राधार है। यदि ये दोनों धर्म मन में न हो तो शीलों का पालन नहीं किया जिस मात्रा में मनुष्य में ये दो धर्म होते है उसी मनुष्य शीलों का पालन करता है। ३४. सनाथ अनाथ-जो मनुष्य धर्म पर आचरण करता है वह सनाथ कहलाता है क्योंकि धर्म उसको रक्षा करता है । आचरण न करने वाला अनाथ होता है । जा सकता। मात्रा में धर्म पर किसी एक पृश्य ३५. पुण्य-पुण्य-क्रिया [-वस्तु १० प्रकार की होती है। क्रिया-वस्तु के करने से भी पुण्य (अच्छाई ) क्रिया जाना सिद्ध होता है। १० पुण्य क्रिया वस्तु इस प्रकार है :- १ दानमय
२ शोलमय ३ भावनामय ४ अपचायनमय विनीत भाव)
५ वेय्यावच्चमय । कुशल कार्य मे हाथ बॉटना ) ६ पत्तिदानमय
(पुण्य को दूसरो मे विभाजित करने की भावना) ७ पत्तानुमो-
दनामय (दूसरे की
पुण्य
चेतना की अनुमोदना) ८ धर्मश्रवागमय
६ धर्मदेशनामय तथा १० दृष्टिऋजु कर्म मय (मिथ्या दृष्टि छोड़
सम्यक् दृष्टि अपनाना ) इस प्रकार दान शील भावना आदि धर्मों
द्वारा मनुष्य पुण्य कमाता है अर्थात् अपने में
कुशल
संग्रह करता है !
३६ स्मृति-स्मृति से तात्पर्य कुशल अकुशल धर्मों का सदैव ध्यान रखना।
स्मृति जागृत करने वाली है क्योकि स्मृति मान पुरुष कुशल
अकुशल धर्मो का ध्यान रखते हुए सदैव सचेत रहता है और
अकुशल कर्म नहीं करता।
धर्मो का
- शुद्धिपत्र सुभाषित नं० ६, १३, ३८, ४७, ५०, ५४, ५५, ५८, ५६, ६०, ६७, ७३, ७७, ७८, ८४, ६२, ६५,६७, ६६, १०३, १०६, १२१, १२२, १३१, १३४, १३६, १४३, १४५, १४६, १४८, १५०, १५२, १६०, १६५, १६१, २३६, २८८, ३००, ३८५, ४०५, ४०६, ४०६ मे क्रमश :--[ परम, नाथ, यदिद, य, त, पटिकार, य-त, कालानुरूप-धुर, साधु, किच्च, दुक्ख, धम्मान, देह, अनन, य, कुमल, अनत्थ, आयसक्य, अत्थ, दीप-किश्चन, परम, सुखावह, सुखावह, सब्बदान, सब्बदुक्ख, जित, दान, दद, न, सुख, पूनग्ग, दान, अकिञ्चन, सत, दुल्जभ, त, पाप, नय, सहाय, गिर, वाच, वाच-कुसल-नातिवेल ] सभी शब्दो के अन्तिम अक्षरो पर अनुस्वार होना चाहिए जैसे परम-परमं, नाथ-नाथं - -- . - . पृष्ठ शुद्ध प्राकथन अगुद्ध शरद, वरोरस, निवन्य उपाञ्झाय, एवरेस, ढग शब्द, वरोरस, निबन्ध उपज्झाय, पवरेस, ढंग ग सुभाषित नं० १२ १५, १७, १७ २३, २३ ३५ . ४६ है ७३, ७७ . सुब्वता, सुबर्ता, अत्ताञ्चे, परियोदपेय्य वाला, अप्पमादू अप्पमत्ते, अनर्थो परम दुक्कर, है। परिपन्यो, बाली, अनत्थजननो कोध सम्मदसम्मत्तो सहार्या पस्सति बिय, दड्ढोब कुधजातो, दमेन कौवस्स, गाम; दमयो सुब्बता, सुव्रती अत्तानञ्च परियोदपेय्य वाले, अप्पमाद अप्पमत्तो, अर्थों परमदुक्करं, परिपन्था, वाली अनत्थजननो क्रोवसभ्मदसम्मत्तो सहायी, न पस्सति दडढोव कोधजातो, पञ्चाय कोथस्स, गमि; दमथो विय, १०१, १०२ १०५, १०७ १०८, १२० ( २ ) पृष्ठ ११७, ११८ १२४ १३५, १४३ १५७ . १७२, १८२ १८२ १८३ १८५, १८८ संस्कृत, संस्कृत, - २०२ १६१, १६२ २००, २०३ ७, २१० अशुद्ध शुद्ध चित्त पाटिकखा चित्ते पाटिंकड़खा अत्तना उजकमंसु अत्तनो उजुकमंसु अवजिय्यत्ति, सुततप्पसत्थं अपजिय्यति, सुगतप्पसत्थं दद्विद्दियदुक्खं दठि ठद्दियं दुक्खं सब्धि, सब्वेसं सब्भि, सब्बेसं धम्मचारी, आर्याष्टांग धम्मचारि, प्रार्याष्टांगिक सम्वकिलेसेहि, निब्वुति सब्बकिलेसेहि, निब्बुति सब्बक्लेिसेहि, निब्बुति सब्बकिलेसेहि, निब्बुति नत्यि नत्थि आरोग्य परमा लाभ आरोग्यपरमा लाभा मत्तञ्जुता मत्तन ता सम्बद्धानं, उपन्चगा सम्बुद्धानं, उपच्चगा का, प्रोत्ताप्पयनव की, प्रोत्तप्पियव सतयुरुप, का पुरुषता सत्पुरुष कुपुरुष असञ्झाय, कोसज असज्झाय, कोस पकुब्बता, अकुतूह पकुब्बतो, अकुतूहलं वम्मिकोवूपर्चायति, शीनं वम्मिकोवूपचीयति, थीनं पारगवोसिनो, जरिति पारगवेसिनो, जीरति शामो, नात्थ पायत्यं थामो, नत्थि, पायत्थं धरमावस, तथात्तानं धरमावसं, तथत्तानं उत्थं वग्गो, अत्थं अग्गवि सीलसम्पन्ना, अग्गीव पण्डित, पुरिसाजञ्जी पण्डिता, परिसाजञ्चो अगसम्पन्नो, विमुञ्चति अंगसम्पन्नो, विमुञ्चति असमर्थ ।, बहुस्तुता असमर्थ है ।, बहुस्सुता होती, ब्रह्मचरिस्स .. होति, ब्रह्मचरियस्स गपुण्य व, पुत्र पुण्य वर्ग, पु २२३, २३२ २२६, २२६ २२७ वर्गा, सलिसम्पन्ना, २३४, २४०, २५६ २६४, २६६ २८८, २६१ २६० २६२, २६५ २६६, ३१२ ३१४, ३३२ ३३७, ३४६ ३५६, ३६० , - पृष्ठ कार्यराथ, ३७३, ३७६ ३६५, ३६८, ४१४ ४११, ४१५ ४१७, ४१८ ४२२, ४२३ ४२३, ४२४ , सच्चेन, सच्चे, ४३६, ४४२ ४४८, ४४६ ४४६ अशुद्ध शुद्ध किञ्च कयिराथ किञ्चि दद्विथा, अत्यजातस्स दठि ठद्दा अत्थजातस्स शास्त्रास्य, हृदयस्स शस्त्रास्त्र, हदयस्स विरि, विपञ्चति विरिय, विपच्चति सदिति, परोति सीदति, परेति परक्कमेय्य, वैरवग्गो परक्कमेय्य, वेरवग्गो उपनऽहन्ति, नूपनऽहन्ति उपनरहन्ति, नूपनरहन्ति असन्तो अहु सन्तो सति मतो का सतिमतो, की समगधि, ही समरणीय, नही नहि परूपघाती होतिपरं न हि परूपघाती हाति पर पब्वजितो, समरणी पब्बजितो, समणी सघ, वुडढी साधिका संघ, बुड्ढो साधिका सञ्चमतो परम परं संगमो, निहीन सेवी संगमो, निहीनसेवी अविस्सट्ट, सन्यवं अविस्सट्ठ, सन्थ नास्सु : परिशिष्ठ: ४५०, ४५५ ४५६, ४५८ ४६४, ४७० ४८३, ४८४ ४९२, ४६६ साधु, नास्स ५ द् १५, २१ १७ प्रतिव्रत, परिवत्त सम्बन्धि प्रतिब्रत, परिवत्त सम्बन्धी नविरण, अथवा नीवरग अथवा पुरिसस्ग, रागसुक्त, शन्ति पुरिसस्स, रागयुक्त क्षान्ति नदि गोचर नयिम, उपघात नियम, उपघात अर्यष्टाग, अग आर्याष्टांगिक, अग तात्पय स्मृति मान तात्पर्य स्मृतिमान १६ नदी १७ गोचर २८, २६ ३२