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ज्ञानरंजन
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प्रकाशक
पुस्तक सस्थान
१०९/५० ए, नेहरूनगर, कानपुर-२०८०१२
द्वितीय १९७८
सस्करण
मूल्य
मुद्रक
विनीत प्रेस
कानपुर-२०८०१२
लेनिनपार्क,
मां के लिए
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कहानी क्रम
९
२८
दिवास्वप्नी
कलह
खलनायिका और बारूद के फूल
आत्महत्या
सीमाएँ
फेन्स के इधर और उधर
४५
शेप होते हुए
७१
८७
९७
पिता
एक नमूना सार्थक दिन
दिलचस्पी
छलांग
सम्बन्ध
१२०
१२९
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दिवास्वप्नी पचमढी आने के बाद वह पहले दिन होटल मे आकर पड़ा रहा। वह मत. लब इन्दो । फिर कुछ दिनो के लिए तीन कमरो वाला एक क्वार्टर किराये पर ले लिया। सोचा, मीरा और उसके पति चाहेगे तो इसी मे रह लेंगे। सबसे पहले उसने घूम घूमकर सारे घर को देख डाला । खिडकी-दरवाजो को एक एक करके खोला और वन्द कर दिया। बस, वाथरूम की खिडकी खोलने मे उसे जोर लगाना पडा । उसके हाथो मे देर सारी घूल चिपफ गई थी, फिर मो वह खिडकी पर पांव रखकर कुछ देर खडा रहा । घर की नीव के साथ ही बडे बडे गढ़े थे। उन गहो म कडेल के गझिन झुड फैले हुए थे। इस गरीब और साधारण सुन्दरता को पी लेने के बाद उसने खिडकी व द कर दी। पाइप पर हाथ धोया और बरामदे मे चला आया । घर सस्ता है, इसलिए उसके पडोस मे कोई छोटी पहाडी या सुन्दर उद्यान नहीं है । बहुत से बूढे पेड हैं, जिनमे खोडर हो गए हैं। उसके ठीक बगल मे एक तरह के बने हुए, एक कतार मे तीन मकान हैं। मकान चाहर से अच्छे दिखाई देते हैं और उनकी टाइल्स भी नई है। उनके बाहर पुती हुई हरी लकड़ियो के बने जालीदार बरामदे खूब चमकते हैं । बीच वाले को छोड़ शेष दोनो खाली हैं, पर उनका किराया उसके लिए बहुत था। इन्दो ताला डालकर बाहर आ गया। बाहर निकलने के बाद ही उसने हलकी, बादलो से छनकर आती, धूप मे अपने को बहुत अकेला पाया । फिर भी घासहीन लॉन मे बैठ गया और घर की बातो और मीरा के पुराने संवन्धो को उपेडने लगा।
१० । फेन्स के इधर और उधर एक भविष्यहीन आशा को खातिर इस पहाडी स्थान पर उसे आना पड़ा। आने के लिए घर में सच बोलकर सफलता पा लेना सम्भव नही था, इसलिए कई तरह मिले-जुले बहानो का सहारा इक्ट्ठा किया। पैसे इकट्ठा करने के लिए उसने गलत ढग भी अपनाये । यह सव करते समय उसने यह विल्कुल न सोचा कि वह क्या कर रहा है या जो कुछ भी कर रहा है वह कहाँ तक उचित है। मीरा के एक साधारण से पत्र से वह बुरी तरह सम्मोहित था। उसने लिखा था कि अक्तूबर के अन्तिम सप्ताह वह यहां पहुंचेगी । उसके पति साथ रेहेगे और अगर इन्दो भी वहाँ मिल सके तो उसे सुख मिलेगा और इन्दो इस अपरिचित पहाडी स्थान पर आ गया। इन्दो यहाँ क्यो आ गया ? मीरा के विवाह से पहले भी उसने उसे प्रमा- वित करने के लिए उसकी कितनी ही छोटी वडी इच्छाएं पूरी की थी। उसने तब इस सम्बन्ध मे कुछ भी नहीं सोचा था। सच बात तो यह है कि उस समय सोच सकने की उसकी अवस्था ही नहीं थी। तब वह मोरा से प्यार करता था, एक पहली बार प्यार करने वाले लडके की तरह और लडकियो में जो साधारण ढग से किसी को भी प्यार कर देने का माद्दा होता है, उसी सुलभ ग्ण के साथ मीरा भी इन्दो को वाहने लगी थी। लेकिन अब वह विवाहिता है और उसके पति से इन्दो परिचित हो चुका है । वे एक शान्ति- प्रिय व्यक्ति हैं और उनका पारिवारिक जीवन सुख से बीत रहा है । यह सब होते हुए भी इन्दो यहां क्यो आ गया। उसके मन मे क्या है ? लॉ मे बैठे बैठे इन्दो ने बहुत सी सिगरेट पी डाली । वह पीता ही ज्यादा है । अमी मी पी रहा है । हाँ, तो यहाँ वह क्यो आ गया ? मन में यह प्रश्न उठाकर इन्दो अदर- ही-अन्दर कसैले ढग से मुस्करा उठा । इमलिए अव शान्ति और अकेलेपन मे वह निश्चित रूप से जान गया है कि कही न कही उसके अन्तर मे विना लाम मीरा के पुराने सम्बन्धो को घसीटने की वेईमानी है। वैसे यह बेईमानी जान- T ।
दिवास्वप्नी । ११ १ चूझकर नहीं, उसकी अपनी जन्मजात कमजोरी के फ्लस्वरूप है, लेकिन इस सबके लिए मीरा का व्यवहार भी बहुत अधिक उत्तरदायी है । उराने विवाह के बाद भी इन्दो से पत्र-व्यवहार जारी रखा है। वीच बीच में मीठे ढग से लिखकर उसे गुमराह करती रहती है। महीने मे एक-दो पत्र जरूर आ जाते हैं । इन पत्रो मे घुमा फिरा के मीरा हमेशा यह लिखती है कि उसका वैवाहिक जीवन सुखी है, फिर भी इन्दो की याद उसे पहले से भी अधिक आती है। कभी कभी अपने पत्र मे मीरा जैसे इन्दो से बहुत निकट होकर बातचीत करती है, घरेलू उग से 1 एक पन में उसने पूछा था कि आजकल वह क्या करता है पहले ही जैसे अभी भी कविताएं और कहानियाँ पढता रहता है या उन्हे छोड बैठा है । वह खुद कुछ भी नहीं पढ़ पाती क्योंकि इनके' मेहमानो की देस- भाल मे ही उसे दिन-भर फैसे रहना पड़ता है। बारिश के बाद का-सा एक ठडा झोका आया तो उसने सिगरेट फेक दी। सर ऊपर उठाया तो बादलो की बढती मे उसने शाम को जल्दी ही घूमते देखा। मतलव शाम असमय ही रात मे बदल रही थी। सामने केटीले तार थी फेंसिग और उसके अन्दर वे ही एक कतार मे बने हुए मकान और उनके चमकते हुए बरामदे दिखाई दे रहे थे । इन्दो उठ खड़ा हुआ और वही लॉन मे टहलने लगा। मगर मीरा उसे ऐसा सब लिखती ही क्यो है ? फिर उसके ऐसा लिखने पर भी वह चुप करके चैठ क्यो नही जाता। ज्यादातर ऐसा हुआ है कि उसके ऐसे पत्रो को पाकर वह भावना मे मर कर दुगुना-चौगुना लिख गया है । लेमिन, जो भी हो, विवाह के बाद मीरा को ऐसी बातें नहीं लिखना चाहिए । इसमे उसकी गलती नहीं। इसके बाद इन्दो कुछ देर चुप रहा। फिर सोचने लगा कि काफी पहले उसने एक बहुत अच्छी असमिया कहानी पढ़ी थी । उसे आज भी याद है, उस पहानी की ऐंग्लोइण्डियन नायिका विवाह के बाद भी अपने पुराने प्रेमी से बड़ी सहूलियत से प्यार करती रहती है। जैनेन्द्र को भी कई नायिकाओ मे १२ । फेन्स के इघर और उघर ऐसा कर लेने का चारित्रिक गुण है । इन्दो अव बुदबुदाने लगा- -पुराने समय मे यह होना मुश्किल बात थी, पर आज ऐसा होना सम्भव और स्वाभाविक सा हो गया है। आदमी ने समाज आधुनिक वातावरण मे अपनी क्षमता से इस नई व्यावहारिकता को एक महत्वपूर्ण गुण के रूप मे अजित किया है । तो-तो, मीरा भी उससे प्यार करती रही होगी, क्योकि वह कर सकती है । वह उसे प्यार कर रही है, इस बात में कोई सराय जोडने की आवश्यकता नही । उसने मीरा से जीवन मे उसी तरह से प्रवेश किया है, जैसे किसी वृक्ष की जडें अन्दर की अँधेरी धरती और पथरीली चट्टानो से लडती जल के कुण्ड मे प्रविष्ट कर जाती हैं । वह उस शीत कुड को कैसे छोड़ दे, जबकि कुड मे उसके प्रति वही अर्पण है । सतोप फैल गया । अन्दर की बातचीत से गलत या सही, एक इच्छित परिणाम इन्दो निकाल चुका था। तभी नीचे से शायद ऊपर जाते हुए कोई ट्रक घूम गई । वत्तियो की दो तेज धाराएं तेजी से टेढी मेढी जालिया बनाती हुई उठी बरामदे के सामने वाली दीवार पर पड़ी, फिर दाहिने फिसलकर दूसरी सडक के ऊपर सीधी पडने लगी। एक सपाटे मे इन्दो ने अपने किराये वाले घर के बरामदे का सब कुछ देख लिया-छोटे से बरामदे की दीवारो पर टॅगी, चौखटो मे जडी दो बारहसिंगो की नुकीली सीग, वाहर ठीक टेरेस के नीचे उखाडकर झूलता हुआ शेडहीन विजली का लटू, खिडकी मे धूमिल पडते रगो से पुते शीशे और चिपके हुए अधकटे अखबारी कागज । इन्दो चल पडा । उसने ताला खोला । कमरे म वत्ती जल उठी। जल्दी- जल्दी पोर्टफोलियो मे से एक अन्तर्देशीय लिफाफा निकालकर मीरा को उसने लिखा कि वह यहां आ चुका है और उन दोनो का इन्तजार कर रहा है । पचमढी म आजकल फलो की बहार है । वह यहाँ जल्दी आ सके तो खूब मजा आए । आने की पूर्व सूचना जरूर दे।-इन्दो ने पत्र को दो मोड देने के वाट चिपका दिया। पता लिखकर बाहर की ठड से बचने के लिए ओवरकोट निकाल रहा था कि बाहर किसी ने वेतकल्लुफी से आवाज दी, "बाबूजी।"
दिवास्वप्नी । १३ इन्दो के बाहर निकलने पर उस व्यक्ति ने बताया, वगल के मकान में आपको बुला रहे हैं। -"मुगे" --"हाँ साव, आपको।" कुछ अजीव महसूस करते हुए भी इन्दो उधर चल पडा । उसे अभी पत्र छोडना था । उसो वाद वाजार मे धूमकर विसी ऐसे घायपर और भोजनालय पी तलाश करनी थी, जहां वह दो चार दिन कम पैसे में अच्छी चाय और खाना खा सके । पैसे उसके पास काफी थे, पर वह उदारता से इसलिए खर्च नहीं परना चाहता था कि तीन चार दिन में ही मीरा आ जाएगी और उसके सामने उसे पूरी तरह से दिल खोल देना था। इन्दो जब अपने पडोसी के यहां पहुंचा, तो डाइग रूम मै मोढे पर एक श्रीमतीजी बैठी अपना पांव उठाये नाखूनो के बाहर लग आने वाली नेल- पालिश को स्टेनलेस की नाइफ से खुरच रही थी । टेवल पर अपकढी एक टिकोजी और रेसम वी रगीन लच्छियां पड़ी थी। कमरे को पता नहीं किस तरह बहुत अच्छा सजा दिया गया था। -"आपको कष्ट तो हुआ होगा, लेकिन बीस-बाईस दिनो के यहाँ के एकान्त से मैं बुरी तरह घबरा गई हूँ। हमारे अगल-बगल के मकान भी खाली हैं । आपकी कॉटेज में रोशनी देखकर आपको बुलाने की धृष्टता कर बैठी। मेरा बुलाना आपको वडा खराब लगा होगा, लेकिन क्या करूं? मुझे पहाडी जगहें बडी मनहूस लगती है।" श्रीमतीजी एक सांस मे इतना बोल गई। -"मैं आज ही यहाँ आया, आपने बुला भेजा, इसमे बुरा मानने की क्या चात है !" -"आप सडे क्यो हैं, वैठिए न?" श्रीमतीजी बडी खुश थी। इन्दो ने मोढ़े पर बैठकर अपना नाम बताया-इन्द्रकुमार । फिर अपना परिचय देने लगा कि वह जबलपुर से आया है । वहीं पढता है। इधर भट्टाचार्याजी को अट्टाइस-तीस की उम्र वाली सावली पत्नी, जैसे + .
१४। फेन्स के इधर और उघर ईश्वर का हैण्डीक्राफ्ट हो, खडी-खडी मुस्करा रही थी, पता नही किसी कारण से या आदत से मजबूर होकर । शुरू मे वह इस तरह मुस्कराई, जैसे ओठो से चमकदार बालू के बहुत-से कण फिसल गए हो और उसके बाद इस तरह जैसे एकाएक दूध उफन कर बदका हो। इन्दो कुछ झेप अनुभव करता हुआ वोला, "अभी तो आप यहां रहेगी न?" -"हम लोगो को आये तो काफी दिन हो रहे हैं । देखिए, जिस दिन चले जाएँ।" -"इतनी जल्दी भी क्या है ?" --"बात यह है कि हम लोग जाडे मे रायपुर रहते है और गर्मियों में कलकत्ते जाना जरूरी होता है। ये तो, मेरे पति को वियना की एक प्रदर्शनी मे कुछ पोस्टर भेजने थे, इसलिए सुविधा और एकान्त के खातिर इधर ही चले आये, वरना मैं तो इधर कभी नहीं आती।" मिसेज भट्टाचार्या बडी सावधानी से अपने शब्दो मे मुलामियत जोड रही थीं।। तभी मिस्टर भट्टाचार्या ने प्रवेश किया। उनसे परिचय हुआ, पर उनकी मुखाकृति भावनाहीन और निरकुरा सी बनी रही। फिर वह विना किसी शिष्टाचार के टल गये । पहली नजर मे इन्दो को वे बिल्कुल ही अच्छे न लगे। उनके निरुत्साही आचरण से उसका मन उखड गया । इसीलिए चाहकर भी मिसेज भट्टाचार्या के कॉफी के भनुरोध को वह स्वीकार न कर सका । उसने अपनी जेब से निकाल कर एक सिगरट सुलगायी। दूसरे कोने से, रेक के पास, मिस्टर भट्टाचार्या अपना सिगरेट जला रहे थे । वातावरण कुछ अजीव सा हो गया। यह सब देख-समझ श्रीमतीजी तनिक विचलित हो उठी। "आप फिर जरूर आइएगा । मैं अवले होने के कारण कहीं भी घूमने नही जाती और मुझे पहाडी जगहे बडी मनहूस लगती हैं।" इन्दो बाहर निकलय सडक पर आ गया। परसो सवेरे ही यह पत्र मीरा को मिल पाएगा। तीसरे-चौये तक तो वह निश्चय ही यहां आ पहुंचेगी।
दिवास्वप्नी। १५ फिर ठीक रहेगा और मिसेज भट्टाचार्या-सांवली, लेकिन बडी कलात्मक हैं। यही भी घूमने नहीं जाती, क्याकि अकेली हैं-उनके हसबैड दिन भर व्यस्त रहते हागे । हुश । वह यह सब वेकार क्या साचने लगा? वल सवर ही उसे घर साफ करके थोडा बहुत तो सजा ही लेना है। अभी इस चिटठी को छोड- कर उसे जल्दी ही किसी एसे भोजनालय की तलाश करनी है, जहां कम पैसे म अच्छा खाना मिल जाये । ठड बढ रही थी। इन्दो न कोट का कॉगर उठा लिया। हाथ जेब में डाल लिय । दो-तीन दिन एकदम से खिसक गये । मिसेज भट्टाचार्या का साथ रहा । इदो सब कुछ मूला सा रहा। पर माज एकाएक वह बहुत अनमना हो गया था । अकेले रहने की इच्छा थी इसलिए चुपचाप इस गोल पहाडी प्वाइट पर चला आया था। इन तीन दिनो के वीच न तो मीरा आई और न कोई सूचना ही दी। पता नहीं क्या बात है। लेकिन-लेकिन वह आएगी जरूर । उसने स्वय ही लिखा था फिर न आने की बात सोचना ठीक नही । वह व्यथ ही परेशान है। पेडो से छनकर पांव के पास पडते हुए रोशनी के गोलो को वह देर तक देखता रहा 11 कई तरफ से हिमानी झोके चल रहे थे। चारो ओर दृष्टि की पहुँच तक हरी भरी धरती थी और वीच बीच म गैरिक रास्ते और पगडडिया दिखाई दे रही थी। बायी तरफ बहुत नीचे पहाडी नदी बह रही थी । इन्दो गुनगुना उठा आइ पास लाइक एन इमोशन ओवर द म्युजिक आफ वाटर मीलो दूर फैली उपत्यका मे छोटे-छोटे गांव और कस्वो की जुडी हुई छतो पर मैदान का घुओं और आकाश की कुहरा मरी भाप मिल रही थी चारो ओर वन श्री बिखरी पड़ी थी। ।
१६ । फेन्स के इधर और उधर एण्ड आई बियर द रिवर आन माई लिप्स एण्ड आई वियर द फारेस्ट इन माई सोल थोडी देर बाद साँझ की लाली आकाश मे फैल गई। तरु-गुल्मों के बीच सीढियो की तरह बनाये गए रास्ते से कुछेक आकृतियां उतर रही थी। पर इन्दो सबके जाने के बाद उतरेगा। अभी तो सूरज भी पूरी तरह से नहीं डूवा। ये मिसेज भट्टाचार्या भी खूब हैं। हमेशा साथ लगी रहना चाहती हैं। इनका पति भी अजीब है। सबेरे-शाम स्टैण्ड पर ब्रुश लिए पोस्टर बनाता रहता है। अपनी पत्नी को नहीं देखता। उस दिन फ्लावर-शो मे कैसे सट- सट के चल रही थी। कितनी बार मेरी कलाई पकडने की कोशिश की । लोगो ने तो यही समझा होगा कि मेरी पत्नी हैं । मैंने जब कहा, मुझे डेहलिया और इग्जोरा सबसे अधिक माये, तो मिसेज मटटाचार्या भी बस इन्ही फूलो की तारीफ करने लगी। जैसे उनकी अपनी कोई स्वतन्त्र पसन्द नहीं। अगर मीरा यहां होती और देख लेती तो गजब हो जाता । उसकी शादी हो गई है तो क्या? मेरे प्रति उसका पूरा विश्वास है कि मैं उसके सिवा अन्य किसी को कभी प्यार नहीं कर सकता। मीरा को कितनी खुशी होती होगी कि उसे जिंदगी भर एकाकी होवर याद करने वाला कोई है। लेकिन मिसेज भट्टाचार्या करें भी क्या ? उनके साथ भी तो परिस्थितियो की मजबूरी है। इस पर उनका व्यवहार कितना रस-सिक्त है । इसलिए उसके मन में उनके प्रति सहानुभूति है। मिसेज भट्टाचार्या की आवाज म जुकाम की-सी पतली घरघराहट है। इन्दो से वोठते समय पता नहीं से वह दाम्दो मे कुछ मघु-सा घोल देती है । -और उस दोपहर को जब डेजी फॉल गए थे-वैसे इस पॉल मा नाम कुछ और है, पर जिस प्वाइट से फॉल सबसे मनोरम दिखता है, यहां कई अच्छे पत्थरों पर "हेजो" नाम सुदा हुआ है, इन्दो ने इसीलिए उसका नाम डेजी फॉल रख दिया था। छ-सात इस पौडी, नालयन-सी पारदर्शी धार जैसे दिवास्वप्नी । १७ बडी गम्भीरता सजोए हुए है । मिसेज भट्टाचार्या का औचल विना हवा के मी उड सकता है, यह इन्दो ने उसी दोपहर को जाना । समतल घमीली जमीन पर भी उनकी चप्पल फिसल रही थी। इन्दो सब कुछ जानकर देफित्री से हंस पड़ा था। मिसेज भट्टाचार्या इतनी जल्दी अपने मन का रहस्य खुलते देख झेंप गई और इन्दो उनकी छोटी के बहुत निकट हो गया । पिछले दिनो की अपनी गतिविधियों स्मरण करते हुए इन्दो थोडी देर और सनोवर के निचले तनो पर से ढलती घूप देखता रहा, जो तेजी से नीचे की ओर सती हुई गायव हो रही थी। पीछे सूरज डूवा तो अंधेरा बढ गया। अब इन्दो उतर रहा था और सोच रहा था कि आजकल सब लडकियां उस असमिया कहानी की एग्लो-इन्डियन युवती की तरह होती हैं, या जैनेन्द्र की नायिकाओ की तरह । पति के अलावा बडे मजे मे अपने पुराने या नये प्रेमियो को भी वे संभाले रहती हैं । मीरा भी ऐसी ही है और मिसेज भट्टाचार्या भी। । पहाडी ढाल पर इन्दो के पांच तेजी से नीचे की ओर लुढ़कने लगे । सडक पर आने तक उसका दम फूल आया । आज भी इन्दो डाक्खाने पहुंचा तो निराश हुआ। थोडा खोझा भी। फिर मन को दिलासा देता हुआ शात हो गया। सोचने लगा, मैं व्यर्थ ही घवरा , गाता हूँ। मीरा ऐसी नहीं है। वह स्वय आने को उत्सुक होगी। वह अमी भी आ सकती है। वह जरूर आएगी। मीरा जानती है कि मैंने उसे कितना । प्यार किया है । विवाह के बाद उसे एक बार भी नही देखा। उसके चले जाने के बाद मैं बहुत दिनो तक गम्भीर रहा। रात जब "एम्पायर" का आखिरी पो छूट जाता, तब मैं भी सदर के सुनसान फुटपाथो पर सिगरेट के धुएं के बीच भटकता और घूमता रहता था। वे दिन जिनकी गिनती नही है-सब जानते हैं कि मैं और मीरा एक-दूसरे पर जान देते थे। यही सब सोचते हुए इन्दो पोस्ट आफिस से क्लब की तरफ निकला । - ।
१८ । फेन्स के इधर और उघर .... उसने सोचा, सीजन का चन्दा जमा करके कुछ दिन विलियर्ड खेला जाए तो कैसा? पर उसने केवल एक सेल का आठ आना ही जमा किया। दो आना ट्रेनर को टिप किया। खूटी पर कोट और दूरबीन टांगने के बाद ट्रेनर ने सम- शाया, क्यू को अंगूठे और उसके बगलवाली उँगली के बीच रखकर काली बिन्दी वाली बॉल पर इस तेजी से फिसलाकर हुक कीजिए कि सफेद बॉल पर वायी तरफ चोट पडे । फिर देखिएगा, वह दाहिनी पाकेट मे सीघी गिर जायगी बगल की दूसरी टेबिल पर कोई लड़की, लाल-सफेद गेंदों के साथ, अकेली ही अभ्यास कर रही थी। दो तीन बार क्यू वॉल के ऊपर से निकल गई, तो इन्दो का चेहरा गीला होने लगा। "धरराइए नहीं, फिर कोशिश कीजिए।" ट्रेनर ने क्यू का अगला भाग थोडा और नीचे झुका किया । इस बार गेंद उछलकर दो इच आगे लुढ़क गई। इन्दो ने निराश होकर नजरें ऊपर उठाई और तन कर खडा हुआ तो देखा वह लड़की क्यू पर अपनी ठुड्डी टिकाए उसे घूर रही थी। उसे देख कर वह हँस दी। वतमीन । चिढा रहा है । इन्दो झेंपकर क्षुब्ध हो उठा। फिर मेंप मिटाने के लिए क्यू के सिर पर मोम रगड़ने लगा और हाथ में पाउडर । स्टैंड से लडको ने दूसरी क्यू निकाल कर टेबिल पर रख दी, "इससे सेलिए, उसकी बेत टेढी है," और चली गई। इन्दो को लगा, उसका अपमान हो गया है। लेकिन पौडी देर बाद ही सतोप से मेलने लगा, क्योंकि उसके खेल को देखने वाला अब कोई नहीं था। जय वह रोल कर जाने लगा तो, ट्रेनर ने बताया कि शुरू मे सब ऐरो ही खेलते हैं, "मैं इन ए वीक आपरो अच्छी तरह सिसा दूंगा।" इन्दो के चेहरे का गीलापन अब पूरी तरह से समाप्त हो गया था। कोट पहनता हुआ अम यह स्माल सूपने लगा, जिसपा सेट पूरी तौर से मर दिवास्वप्नी। १९ . -- चुका था।।। 1। क्लव से निकल कर इन्दो गोल्फ लिंक की तरफ गया। आज वहां बहुत अच्छा खेल था। जब वह ग्राउण्ड पर पहुँचा, खेल चल रहा था। दाहिनी तरफ पेड़ों के किनारे दूर-दूर तक गिने-चुने लोग विखर कर खडे थे । अच्छा । वह लड़की यहां भी आई हुई है। कितनी खूबसूरत है। इन्दो कतराकर अलग जा.खड़ा हुआ और दूरवीन से खेल देखने लगा। किसी ने आयरन क्लव से हुक किया । गेंद उड़ी जा रही थी। --"सुनिए "जरा अपनी दूरवीन दीजिएगा?" -"नही, माफ कीजिए," इन्दो इस तरह वुदबुदाया कि लड़की न सुन सके। . - 4 वह किसी इन्दो देते हुए सोच रहा था कि यह खुली असभ्यता है ! "धन्यवाद, इसका रेंज तो बहुत अच्छा मालूम पड़ता है।" अव वह बगल में थी । और दूरबीन की लेंस पर उसकी पुतलियां चपलता से तैर रही थी। इन्दो धीरे-धीरे उस लड़की को देखने लगा। पूरा देख चुका तो रूमाल से अपना चेहरा पोंछने लगा। चन्देरी की लेमनग्रीन साड़ी और ट्राइवल प्रिंट के ब्लाउज शो-केस के ढंग से सजी हुई थी। इन्दो सोच रहा था कि इसके सर पर जो रेशमी स्कार्फ है, वह बहुत अच्छा है, कहां मिलता होगा? कान में पड़े इतने मोहक प्लेस्टिक क्रॉस उसने पहली बार देखे थे। इतना सब देखकर इन्दो के अन्दर का सारा तनाव ढीला पड़ गया। दूरबीन को धन्यवाद सहित लौटाते हुए उस लड़की ने पूछा, "आपने कमी गोल्फ खेला है ?" -"जी, पहले गुलमर्ग में एक बार सेल चुका हूँ, पर हूँ अनाड़ी ही।" दोनो ठहठहा उठे। खेल अभी खतम भी नहीं हुआ कि वे दोनों साधारण वातें करते हुए सड़क पर आ गये। .
२० । फेन्स के इधर और उधर । -अच्छा, मेरा अपाइन्टमेन्ट है । मुझे जाना होगा । नमस्ते ।" इन्दो धक से रह गया। उसकी इच्छा थी कि वह उस लडकी से और बातें करें । कुछ अपने बारे मे वताए और कुछ उसके बारे में सुने । पर अब तो वह जाने की मुद्रा मे थी। -"सुनिए ।" कुछ नहीं सूझा तो इन्दो ने उसका नाम ही पूछ लिया । -"मेरे बहुत से नाम हैं । आप स्वयं अपनी इच्छा से एक रख लें, अपनी तसल्ली के लिए।" कहकर, इन्दो पर अपनी बात की प्रतिक्रिया भांपती हुई वह मुस्कराई। फिर इन्दो से विपरीत दिशा मे जाने लगी। इन्दो देख रहा था कि ककरीली जमीन पर भी उसकी सैडल पिसल नहीं रही थी। वह सधी चाल से जा रही थी। दोपहर की हवा में भी उसका आंचल उड नही रहा था । अजीब लडकी है। इसके बहुत-से नाम है, पर इन्दो उसे क्या कहे ? आज इन्दो जल्दी ही क्लब पहुँच गया। उसने अपने सबसे अच्छे कपड़े पहने थे और रूमाल मे सेंट लगाया था । पर वहां उसे वह लडकी नही मिली । वह मीरा का पत्र देखने पोस्ट आफिस नही गया था। सोचा था कि शाम को जावर एक साथ दोनो समय की डाक देख लेगा। वरव से निराश होकर वह कॉफी पीने गया। आस-पास के किसी भी रेस्तरां, सडक या दूकान मे वह शापिंग करती नहीं दिखी, तो उखडे मन से वह एक सस्ते होटल मे मटर पनीर और चावल खाने चला गया। वह अब घर को लौट रहा था। मिसेज भट्टाचार्या ने मछली तली थी और कचनार की क्ली की तरकारी वनाई थी । पर बहुत आग्रह के बाद भी सिर्फ एक वाजी रातरज खेलने के लिए इन्दो वहां रुक गया । अन्दर के किसी कमरे मे मिस्टर भट्टाचार्या बार-बार खास रहे थे। मिसेज भट्टाचार्या का मन भी शायद खेलने मे नही लग रहा था । वह द्रवित- सी बह रही थी कि वे लोग दो एक दिन में ही रायपुर वापस लौट जाएंगे। इतनी कोमलता के बावजूद भी इन्दो को मिसेज भट्टाचार्या आज अच्छी नहीं दिवास्वप्नी । २१ लग रही थी । वह वजीर से शह देते हुए सोच रहा था कि क्लब वाली लडकी का नाम डेजी बहुत अच्छा रहेगा । वह उससे कहेगा कि उसने उसका नाम हेलो रखा है। उसके बहुत-से नाम हैं, पर ऐसा कोई न होगा। शतरज की बाजी गोल-मोल हो गई। मिसेज भट्टाचार्या अलसा रही थी। बाहर आकाश एकाएक आ जाने वाले लावारिस पहाडी बादलो से घिर कर सुहाना हो रहा था । अक्टूवर की प्रारम्भिक ठड बडी मली लग रही थी। इन्दो फिर सड़क पर आ गया और जिस ओर सरकारी वगले बने है, उधर घूमता रहा । यहाँ का वातावरण सुहाना और दृश्यावलियां उसे अच्छी लगी फिर वह दूसरी ओर घूम गया । टामस ग्राउण्ड की तरफ भी गया । चादलो से बूदें अब कभी भी चू नही सकती थी। तभी डेजी अचानक उस मामूली से सिनेमा घर से निकलती हुई उसे मिल गई । मिल क्या गई, उसने इन्दो को खुद ही हलकी "शी शी" करके पुकारा । --"नमस्ते । आप गोल्फ लिंक नहीं आयी आज ? मैं आपको देखता रहा ।" -~"मैं बहुत व्यस्त रहती हूँ। रोज नहीं आ सकती।" स्वर मे जैसे सच- मुच कोई मजबूरी हो। -"आपको क्या काम रहता है ?" डेजी झटके से एक बार पीछे मुडी और इस तरह हँस पड़ी कि प्रश्न उड गया फिर ताली बजाकर कहने लगी, 'वडी मजेदार पिक्चर रही, यह- ए बाई वेबी।" -"आप सचमुच क्या बहुत व्यस्त रहती हैं " --"आरए यहाँ क्यो खडे हैं, चलिए, आपको आइसक्रीम खिलाऊँ।" -"इस मौसम में आइसक्रीम ?" "हाँ, हाँ, पानी बरसने से पहले, बादल घिरे मौसम मे मुझे आइसक्रीम साना बहुत अच्छा लगता है।" डेजी ने इन्दो की उंगलियां पकड ली। इन्दो उसके साथ-साथ चल पड़ा। -राक 1 २२ 1 फेन्स के घर और उधर - 'मैंने आपका नाम डेजी रस लिया है।" -"चलिए इसको भी अपनी लिस्ट में जोड लूंगी।" इस वार उनके हर शब्द के उच्चारण मे हलवा मससरा पन था। कई मोड पीछे छूट गये । अब छोटे छोटे युविलि टस के पेड छट रहे थे। उनके तनो पर अभी सिलेटी रग नहीं चढ़ा था । सडक के दोनो ओर घने पेडो के विस्तार को न ता जगल वहा जा सकता था न बाग हो । --"आप हमेशा पचमढी ही रहती है " शायद एक छोटे मौन के बाद इन्दो बोला। --"हां, जगह अच्छी है । फिर भी छोडकर जा सकती हूँ।" -'मिसेज भट्टाचार्या को पहाडी जगहे बडी मनहूस लगती हैं।" -"ये मिसेज भट्टाचार्या कौन हैं ?' -"मेरी पडोसी परिचिता, रायपुर से आई हैं । उनके पति चित्रकार हैं।" इन्दो ने पुरानी सिगरेट फेवर नई सुलगा ली। फिर वाला- आपने आइसक्रीम खिलाने के लिए अच्छी-खासी परेड करा डाली और मेरी समझ मे नहीं आता कि बाजार से इतनी दूर इस स्थान मे आइस्क्रीम करो मिल सकती है।' "आइए, और डेजी दाहिनी ओर एक भव्य इमारत के फाटक मे घुस गई । अन्दर की कच्ची सडक के एक तरफ बहुत पुरानी बालू पडी थी, जिसमे पीले-सूखे पत्ते भी सने हुए थे । चारदीवारी की जगह गुडहल की ठिठुरी बाड लगी हुई थी। इमारत वे खम्भे रोमन शिल्प के नमूने लगते थे । खिडकियाँ जापानी शैली की तरह नुकीली होकर ऊपर उठी थी । गरमियो म शायद इसमे कोई सरकारी कार्यालय रहता हो । पिछले भाग मे दो कमरो मे साफ और सूनी कैंटीन थी। डेजी को देखकर एक मात्र उघता हुआ बेरा खटके से गया । शायद डेजी यहां की नियमित ग्राहक हा । पानी आ गया तो उसने आइसक्कीम के लिए कहा । साधारण-सी आइस क्रीम थी। ठण्डक के अमाव मे क्रीम पिघलकर पतली पड़ गई थी । उस पर तत्पर 1 C१५ बिस्विप्नी । २३ खून तेजी कुछ फ्रेश स्ट्रावरी थी, जिसे चम्मच मे ले चाव से डेजी जल्दी जल्दी खा रही थी । इन्दो खाने में आवश्यक और स्वाभाविक नफासत दिखा रहा था । डेजी के शरीर पर आज लेमनग्रीन साडी और ट्राइवल प्रिंट का ब्लाउज नहीं था। नीली साडी के ऊपर फर का बैजनी जापानी किमोनो सरीखा कोट था । इन्दो चौक गया । डेजी ने उसके बांये हाय को उँगलियो पर ठण्डा कप रख दिया। फिर आप ही वह उन उगलियो पर अपना हाथ रगडने लगी। इन्दो को यह रोमांचक चुहल मा गई। उसे लगा कि उसकी रगो से बहने लगा है। "अच्छा अव मैं जाऊंगी। मुझे शाम से पहले घर पहुंच जाना जरूरी है और फिर मैं लगातार व्यस्त रहेंगी।" डेजी ने घडी देखी, "सामने वाली सडक से दो तीन फर्ला ग वायें चलकर मेरा घर है । तुम्हे कभी ले चल्गी । इसके वाद डेजी उठकर बाहर हो गयी। यह कहते हुए, "तम पैसा मत देना । मेरा हिसाव बाद मे हो जायेगा।" मैनजर की टेबिल की बगल में एक पुराना सा रेफ्रिजिरेटर घरघरा रहा था । वहाँ कुछ भी नया नहीं था । सब पुरानी चीजें थी-शायद जार के अन्दर पडी विस्कुटें और डबल रोटियां भी । इस समय इन्दो का मन बहुत चपल हो रहा था । डेजी के प्रीतिकर व्यवहार के कारण यह मीरा के आने की बात सोचकर बहुत उत्साहित हो रहा था। अपने अन्दर के सुख और आनन्द का यह बँटवारा करने लगा। मीरा का हिस्सा-मिसेज भट्टाचार्या का हिस्सा- वह उठा और सीधे डाकखाने गया। कोई पत्र न पाकर भी इन्दो विच- लित नहीं हुआ और न निराश । वह निश्चित कर रहा था कि वह सीधे अभी मिसेज भट्टाचार्या के पास जाएगा और उनसे बहुत निक्ट होकर बातें करेगा-इतने निकट जितना कि वह सचमुच चाहती हैं । मिसेज भट्टाचार्या के साथ भी उसे रहना चाहिए । उहे पति की व्यस्तता कारण अकलापन अनुभव होता है और इसीलिए पहाडी स्थान उन्हे मस्ट्रा लगते हैं । इन्दो अपने इस आनन्द के क्षण मे बडी से दूसरो केपटीन मासे कर २४ । फेन्स के इधर और उधर रहा था कि मीरा भी कभी-कभी उसे याद करके बडी दुखी होती होगी । वह कल उसे शीघ्र यहाँ आ जाने के लिए तार देगा। इन्दो मिसेज भट्टाचार्या के साथ शतरण खेलता और कॉफी पीता रहा। काफी देर बाद वह अपने घर आया, पर वडी रात तक उसे नीद नही आई। दूसरे दिन शाम तक इन्दो को डेजी नहीं मिली। वह हर असम्भव जगह भी खोज आया । मिलती भी कैसे ? पचमढी कोई मकान तो नहीं कि दो चार दस कमरो म तलाश कर पता लग जाए । मौसम वहत सुहावना था । पर डेजी वेचारी कही व्यस्त होगी। अक्सर इन्दो को वह परियो की तरह रहस्य- मय लगती थी । आज डेजी से बहुत घनिष्ट बातें करने की उसकी इच्छा थी, इसलिए वह सब तरफ मटक्कर कैटीन गया और वहां काफी देर बैठा रहा । फिर चाय पी। फिर भी डेजी नही आयी । रेफ्रिजिरेटर उसी तरह घरपरा रहा था । आज वहाँ कई नौकर थे, फिर भी इन्दो हिम्मत न वाघ सका कि किसी को बुलाकर डेजी वे वारे में पूछे । डेजी का घर तो यहाँ से करीव ही है, इदो बाहर निकलकर सोच रहा था पर क्या वह पागल हो गया है ? उसके घर यो ही कैसे चला जाएगा। उसकी मां होगी और स्त्रियां बडी शक्की होती हैं । उसके पिता होगे और यह बहुत क्रोधी भी हो सकते हैं । सम्भव है, उसके भाई हो, जो उसे बाहर से ही टाल दें। इन्दो मन-ही भन स्थितियो का सामना कर रहा था। इसका मत. लब है कि आज वह डजी से नहीं मिल सकेगा। कुछ देर वह चुप रहा । फिर सोचने लगा, उजी तो बहुत आधुनिक है। किसी सभ्रात परिवार की ही होगी। वह गोल्फ देखने जाती है और विलियड सेलती है । काफ म बंठकर चुहल पर पर सरनी है और अकेले भी यही आने-जान म नहीं डरती। उगवे अन्त करण म जरूर मेरे प्रति लगाव है । अन्न मन के कुतुबनुम ने निर्णय पिया दि उसका डेजी 4 पर जाना गलत नहीं है और इन्दो जस उपर हो अपिल गया। यद वह राम्ता दाता जी ने अपरिचित पर की तरफ जा रहा था।
दिवास्वप्नी । २५ 1 सडक पर लोग घूमते हुए नहीं दिखाई दे रहे थे । पोडी देर पहले वत्तियां जली थी। एक स्याह छाया डामरी जमीन पर चलते हुए शरीर से आगे बढती थी, फिर लघुत्तर होते-होते पीछे चली जाती थी। दो लम्प-पोस्ट के बीच का सूना दृश्य । इन्दो मे किसी से डेजी के घर का पता पूछने की सोची । पर वह किसी से क्या पूछे ? डजी के बहुत मे नाम हैं और वह कोई भी नाम नहीं जानता। डेजी तो उसका निर्मित सम्बोधन है। बिजली के खम्भे के नीचे से गुजरती पैरेम्वुलटर को ढकेलने वाले नौकर से इन्दो ने पूछा । वह नही जानता । अपने साहब के साथ वह वाहर से आया था । लेकिन उसने बताया कि पीछे रामलाल आ रहा है वह यही का वाशिंदा है, वह बता सकेगा। रामलाल आ गया तो इदो ने उससे पूछा । रामलाल ने धूरते हुए कहा, 'बाबू जी लगता है आप बाहर से आए हैं । आप बहुत सीधे-सादे लगते हैं । यहां जरा संभल कर रहिए। उसके चक्कर में आप कही पड़ गए। वह वडी आवारा और जालिम लडकी है। शिकार करना ही उमका बाम है । आप "तुम शायद गलत समझ रहे हो । मैं तो उस लड़की की बात कर रहा हूँ जो गोल्फग्राउण्ड और क्लब ज तो है । वह यही वही रहती है और बड़ी अच्छी खूबसूरत लड़की है । इस बार रामलाल हँसता हुआ बोला, साव, आप मेरी बात नहीं मानेंगे तो जाइए। वो पीले गिराज के बाजू मे आजकल रोज शाम को एक मोटर आती है, काली और खुली हुई। उसके पल्ली तरफ ही एक बडे हाल में वह रहती है । हरामजादी प्राइवेट काम कराती है । तमी एक कनवर्टेविल गाडी इदो के सामने से निकल गई । खेजी को कोई ले जा रहा था या किसी को डजी ले जा रही थी। इन्दो अब सचमुच घबरा गया । उसने सोचा डेजी अगर उसे देखती तो जरूर कती । लेकिन उसे अपने विचार पर भी विश्वास नहीं हो सका। । ।
२६ । फेस के इधर और उधर वह बहुत तेज चल रहा था। इस समय वह शाति चाहता था । इसलिए सबसे पहले चलकर मीरा को उसे तार देना था, ताकि वह तुरत आ जाए। उसके बाद मिसेज भट्टाचार्या के पास बैठकर वह बात करना चाहता था। फौजी अस्पताल मे बडी शाति थी । दूर कही से विगुल की गण उड़ती आ रही थी। इन्दो थकने के वावजूद तेजी से पांच बढ़ाता जा रहा था । कल से लगने वाले किसी अग्रेजी पिक्चर के पोस्टर लिए हुए लड़के घूम रहे थे। गैस के हडे पीछे छूट गए। चौमुहानियां, मील और फर्ला ग के पत्थर, विजली और टेलीफोन के खम्भे, डामर बजरी को सहीं छोडता हुआ इन्दो तार देकर भट्टाचार्या जी के यहाँ जा पहुंचा। मिसज मटटाचार्या कह रही थी, "आजकल आप दिन भर कहाँ गायब रहते हैं ? ये लीजिए आपका पन आया है। आप नहीं थे, मैंने डाकिये से ले लिया। इदो ने मीरा ने पत्र को बडी हावड़ी मे फाह रहा था। पठानकोट । पठानकोट से लिखा है मीरा ने नहीं आ रागी। इनके कुछ दोस्तो का आग्रह कश्मीर चलने का था, इसलिए इधर ही आ गई। मिरोज मटटाचार्या पहती जा रही थी, 'हम लोग कल सवरे पहली बस से जा रहे हैं। यहाँ पुछ दिन आपके साथ पित्तने अच्छे बीते । मैं रायपुर में आप का लिसा वहँगी । आप उधर आइएगान ?" "हो हो-जावर माऊँगा" पत्र में भाग मीरा ने शिप्सा निमापी थी। दुरा न मानना । तुम्हारी याद बहुत आती है । पश्मीर म और आएगी इरावे आगे इन्दो पर नहीं सका । हुरश-याद आएगी । पत्र को चुरमुड़ा परके उसने एप ओर फेर दिया। मिमा महानार्या पूछ रही थी, 'विगरा पर है ?-सवेरे यग स्टैण्ड पर सा पगंगेन? जहर चलना । म गमय जाओ आराम करो। मुझे सारा मामान पंक परना है।" वह उटी साजापर आसिरी बार उनका आभार व्हापा। दो वाहर आ गया। उगे राहगा लगा कि यह किसी पंसनेम औरत दिवास्वप्नी । २७ के कमरे से निकाल दिया गया एक फूहड सामान है । मीरा नहीं आ सकेगी। दोस्तो का आग्रह था, इसलिए वह कश्मीर गई है। डेजी इस समय किसी के साथ अपाइटमेट पर होगी। वह प्राइवेट गर्ल है। मिसेज मटटाचार्या कल सबेरे की पहली बस से रायपुर जा रही हैं । उन्हे शान्ति से बातचीत करने की फुरसत नही, क्योकि सारा सामान पैक करना है। अपने को किसी संयुक्ताक्षर का उपेक्षित हलन्त या लहरो द्वारा फेंका हुआ मरता फेन अनुभव कर इन्दो रो दिया । सामने किराये के घर को अंधेरे का चक्रव्यूह लपेटे हुए था । इन्दो को उसी में रात गुजारनी है -- २ कलह धुंधलका हो गया । स्वाति के पिता रोज की तरह आखिरी बार 'ट्रेसिंग मिरर' में अपनी छवि देख बाहर आ गये। घर के वातावरण में तनाव मा गया क्योकि रसोईघर मे थोड़ी देर बाद ही बीच-बीच मे यरतनो वो पटक चलती रही और सारे बंगले मे एक ती आवाज बिखरती रही। छोटे छोटे दो. तीन बच्चे कुछ नहीं समझते। उनकी आंखो मे एक सहमा हुआ कुतूहल प्राय ही छलक आता है। नौकर की तरफ वे टुकर-टुकर ताकते हैं। यह काम में ध्यस्त है । मो रसोई से बाहर आती है तो वे उघर दवे-दबे निहारते है और वह झल्लाकर बरस पडती है 'पढो-लिखो नालायको, इधर उवर क्या देख रहे हो । क्या पिटने को तवियत है ? ' स्वाति बहुत गम्भीर है । छोटे भाई बहनो और उसकी वय वे वीच वर्षों का अन्तर है । सोचने-विचारने की जिम्मेदारी जैसे सब उसको है। वह कमरे लांघती हुई तेजी से बाहर चली जाती है, बरामदे में। परिवार में वह पहला जन्म था। यही युद्धिमत्ता स्वाति के नामकरण के पोछे है। बरामदे मे पिलर स दिको वह यही सोच रही है कि पिताजी ऐसा पयो कर बैठे ? क्या यह सब अनचीते उनसे हुआ है । कितने अबूझ हैं वे और पान्ति कितनी अप्राप्य में। अब उजाला बिल्कुल ही फंस चुका है। वाग के तर नीरव हो आये हैं क्योकि शाम होते ही शाखों से पक्षी उड लिये। स्वाति के दिमाग म विचारो का गम्भीर दोल है । शुरू शुरू में जब घर की दुश्चिाता ने उसके अन्दर प्रवेश क्लह । २९ लिया तो उसे इस बात को उत्तेजना थी साथ ही जिम्मेदारी का सुख भी कि वह दर्शन की छात्रा है तथा परिवार के व्यक्तियो तथा घरेलू उलझनो का हल उसे ही ढूंढना है । लेकिन इस मिथ्या और दुर्वल विचार का विपरीत परिणाम उसे शीघ्र ही मिल गया जबकि घर का तनाव समय की गति के साथ कम नहीं हुआ-वहा । इस समय स्वाति के दिमाग मे विचारो का जो दोल था वह धीरे धीरे हृदय म प्रविष्ट हो भावुक्ता मे तबदील हो गया। वह अँधेरे मे खभा से लिपटी रही, मूल से मुक्त होती रही और उसे पता नहीं चला कि कब एकाएक राजे के बारे में सोच गई। पिताजी आज भी वही गए होंगे। अभी तक नहीं आये। थोड़ी देर बाद तक भी नहीं पायेंगे। हम सब के सो जाने पर ही वे आते हैं। जान-बूझकर शायद । घर मे कोई हलचल नही है । राधू और गुड्डी टयूटर से पढ रहे हैं । स्वाति पढने की टेबल पर पड़ी अस्त-व्यस्त है । शॉपेनहावर के शब्द उसके अन्दर चक्राकार घूम रहे हैं । उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा है । आँखो मे जैसे तुहिन उमड आया है। टेबल-लैम्म मे से घुओं निकलता दीख रहा है। उसका पढना लिखना, उसका प्रेम और उसका गुलजार घर धुंधुआ रहा है । जल जायेगा अजीव बला है। वह क्या सोचे और क्या नहीं ? आँखो को कुछ सूझता नही और मन कुछ समझता नहीं। आजकल मां बहुत उचटी रहती है । प्राण जैसे उसके कठ तक लग आया है। स्वाति सम्भवत स्थिति का नाजुकपन पूरा नहीं समझ पाती, इसी से शर- माती, सकोच करती है और मां से कुछ बोलचाल नही कर पाती । जहाँ तक हो उसके सामने से वचती है। वह हमेशा यह सोचती है कि काश मैं अपने प्रेमल व्यवहारो की अन्तर्मुखी उत्कण्ठा पो सकोच के चक्रव्यूह से बचा पाती। घर मे जो कुछ चल रहा है उसकी वह तटस्थ दर्शिका न बनी रहे वरन् हिम्मत करके बीच में कूद पडे । या तो मध्यस्थता ही करा दे या साफ विद्रोह ही ३० । फैन्स के इधर और उघर जनम जाय । लेकिन ऐसा मौका उसे मिल ही नहीं पाता। क्योकि रत्ती भर स देह की स्थिति स्वाति के मन म पैदा होने की कोई गुजाइश नहीं चाहती। वह सावधान है। स्वाति के जीवन का उसे आगाह रखता है। इन्हीं जटिल परिस्थितियो के सोच-विचार ने स्वाति को बहुत अधिक सवेदित कर डाला। कमरे की रोशनी को उसने खामोश कर दिया। दरवाजे की दराज मे से मां के कमरे मे झांकती रही। मां की आंखें डुब्विया की तरह पानी मे डूबी हैं । बाल रूखे और छितर आये हैं। रक्त मांस की कमी से कॉलरबोन असमय उभर आयी है और उसके वक्ष पर आंचल बेहद सिकुडा हुआ है । मा म सजने का उछाह तो विल्कुल ही नहीं दीख पडता। स्वाति ने बत्ती जलाकर अपना पल्लू देखा, फरा पर वह हौले-हौले चली, शीशे मे सांस फुलाकर छाती के उठने गिरने पर गौर किया और फिर राजे को एक क्षण सोच गयी । जल्दी से वती बुझा दी और उसकी आंखें फिर दरार पर लग गयी। मां उसकी जैसी नही है । उसकी पेशानी पर घनी सरवटें हैं । उसका दुख दहुत बड़ा है, उसकी परशानी यहुत खतरनाक है। उसका सौंदर्य और यौवन कोई झपट रहा है। पिताजी उसे झांसे दे रहे है। वह जैसे अनवरत जेठ के कड घूप दिन के बीच खडी कर दी गई है। पता नही मां को जी मे कैसा लगता . होगा? स्वाति को घर का जीवन नागवार लगता है। वह शान्ति और अशाति के वीच किसी प्रकार की सधि या सहयोग नही चाह पाती। एक ही चीज कोई रहे। अक्सर गई रात तक घर में कलह होती है लेकिन सुबह होते ही जैसे सारी अवांछनाएं किसी जादुई तहखाने म ढाँप दी जाती हैं। घर को साफ-सुथरा रखा जाता है । अतिथियो का भरपूर स्वागत होता है। समय से सब खाना खाते हैं और लोग हमारे परिवार के बारे म उम्दा रायें भी कायम किए हुए है । आखिर ऐसा क्यो है ? ऐसा नहीं होना चाहिए। किसी गलती को सहारा दिया जा रहा है । अनीति को दिन के प्रकाश मे भले मौन रखकर अप्रत्यक्ष तौर पर बचा लिया जाय लेकिन किसी मिथ्या तहजीव को इस तरह कलह । ३१ से कायम रखना भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है। इसके लिए मां अधिक जिम्मेदार है। उसे अनीति तोडनी चाहिए। यह व्यक्तिगत नही परिवारगत प्ररा है। यह केवल मौन मर्यादाओ का सीमोलधन नही एक पवित्र सामाजिक समझौते को टूक करना भी है। सूरज उगता है और मां सेवा चाकरी की लम्बी चर्चाओ मे जुट जाती है। इसका साफ अथ यह है कि उसके अदर कोई सत्याग्रह नही बल्कि गठत को प्रश्रय है । स्वाति ने सोचा कि ऐसी परिस्थिति म क्या हर मां ऐसा ही करती है अथवा उसकी मां ही स्वाभाविक प्रतिक्रियाओ से शूय है ? परिवार को पाप की बुनियाद पर कर देना कहां का कर्तव्य है। स्वाति की चाहना यह है कि मां उस पोशीदा औरत को दिन के उजाले म हम सबके सामने खोर दे जिसने परिवार को मथ दिया है। फिर देखें हमारे भोले और दीप्त चेहरो को पिताजी कैसे सहते है ? वे सुघर क्यो नही जायेंगे? उहे सच का वोध होगा ही स्वाति की समझ से इतना हो लेने पर ही समयत अनीति झुक जाएगी। परिवार की सफलता का हल हो जायेगा । लेकिन परिवार वैसा ही यथावत्त वीत रहा है। स्वाति की बौद्धिक जाग रूपता और निष्कप लाख सही हा तो भी मसला वही का-वही रह जाता है जहाँ से वह गोचना शुरू करती है। उपोदघात तो मां ही कर सकती है स्वाति नहीं। आज गेस्ट हाउस में सफाई लगी है । फूटी खपरैलें बदली जा रही हैं और दीवारों पर पत्थई वारा हो रहा । पिताजी सबको बाजार ले गए तथा अनगल खरीद-फरोख्त भी हुई। राधू और गुड डी ने चुस्त कपडे पहने तथा आज उनम वरी फूर्ती है । स्वाति को उन्होंने वितायें खरीदने के लि। पूरे पचास रुपये दिए । मो जरा भी खुश नहीं है। वस चल भर रही है। दुख और निराशा यी छाया में उनका चेहरा पुवा हुआ है। लकिन वो तो हमेशा ही ३२ । फेन्स के इधर और उधर ऐसी बनी रहती है। पता नही कैसा कुढना है। वडा बुरा लगा स्वाति को । यह । वो तो अकेली ही 'एस्प्लेनेड' से कॉलेज स्ट्रीट तक कितावें लेने चली गयो । लौटकर उसने राजे को एक छोटा तपता हुआ प्रेम-पत्र लिखा। उसमे प्रेम से इतर केवल एक ही बात थी कि उसकी परीक्षाएं कब से शुरू होकर कब समाप्त हो रही है। खाना उससे खाया नही गया। जल्दी ही एक रूमानी उपन्यास लेकर एक विस्तरे पर लोट गई। उसके मन मे बडी चचलता थी आज । चाचल्य की जो वेचनी होती है वह स्वाति के अन्दरूनी जिस्म मे थी। कितने छोटे सुखो से वह छलकने लगी। थोड़ी देर बाद ही वह नीद मे अस्त हो गई लेकिन वह कुछ घटे के बाद ही छोटे-छोटे अन्तराल से बेबस हो कई बार उठी। ठडा पानी पिया उसने, सोई और पुन जागी। इस वार उसने रुआंसी बुदबुदाहट से अंधेरे मे कुछ कहा । पता नहीं क्या कहा । लेट कर वह जोरो के साथ निद्रा का परम करती रही। स्वाति की सोती आँखें धीरे-धीरे अंधेरे को भेद गयी। अंधेरा अंधेरे को देख सकता है। उसकी आँखो को दीखने वाला सारा कुछ अज्ञात द्वारा परि- चालित था । घने दृश्य उवल रहे हैं। जवान होने के बावजूद भी स्वाति को उनसे रोमाच नहीं हो पाया। गेस्ट हाउस मे एक पुरुष है । वह उसका बाप है । एक औरत है। लेकिन मां नहीं है वह । और वहां कोई नही । स्वाति को भय लग रह रहा है कि आसपास वह अकेली है । अनचीता देखकर जोर-जोर से उसका कलेजा धडकने लगा। उसकी कनपटियो पर जोर से कई चुम्बन टकराए। कुछ पल टक-टक खामोश वीते और एकाएक स्वाति की घिग्घी वैध गई। उनीदी आक्रात वह वमुश्किल बडबडाने लगी, "गेस्ट हाउस मे मां को कोई मार रहा है।" -उसके बालो की जडो में से बेहद पसीना था। तेज सांस मे वह हाफ-सी रही थी। जब वह चेतना मे लौटी तो उसे बेहद पीडा हुई कि इन तमाम दृश्यो पी मुक्ता वह क्यो है ? दवे-दवे उसने गेस्ट हाउस को झांका । वहाँ तेज बरव चौंधिया रहा था। यही कोई आवृति नही पी? कहीं कोई अनाचार मही कलह । ३३ था। फिर भी उमे सपने की इस दुर्घटना के बाद अपने शरीर के प्रति खतरा दोडता लगा। जैसे उसके शरीर के ऊपर भी बलात मिथुन के लिए कोई शपट जाएगा। जियर देखती कमरे में उसे कामातुर आँखें जलती हुई दीख पड़ी। कमरे की सारी खिडकियां, रोशनदान उसने बन्द कर लिए। साए और साडी के निवले हिस्सो से उसने पांव बांध लिए और लिहाफ को जकडकर जागती रही। सपना भी उसने देखा और यथार्थ भी उसने सुना था। एक धेबस खौफ के गिरफ्त में स्वाति का आकुल मन पसा रहा । रात भर कसा रहा। बहुत-सी रातो को झेल लिया गया। स्वाति म एक स्थायी बेचैनी उपज चुकी है। वह कोई भी हल नहीं निकाल सकती। आज की रात के कांटे बिल्कुल ठिठक गए है। उसी पुराने अवसर के बहस मुवाहिसे तथा झाँच झाव को, जिसे पुराना जानकर ही छोडा नहीं जा सकता, सारा घर सह रहा है । निष्फलता और स्वाति की सीमाएँ परत दर परत ऊपर आती अनुभव होती है। कई करवटें लेने से भी कुछ नहीं होता। पता नही उसके कमरे म ये वहशी आवाजें क्यो आ रही है ? तकिए को उसने भीचकर रोने का प्रयास किया ताकि फूट-फूटकर सारी एकत्रित घुटन वह जाय । थर कर ही वह सो सके लेकिन रोना उसे तनिक भी नहीं आया। 'नही, नही। ऐसा नहीं होगा, तुम चाहे मेरा गला टीप दो। स्वाति सयानी हो गई है। उसकी जिंदगी मैं नही वरवाद होने दूंगी। तुम उसका विवाह कर दो।' स्वाति सोचने लगी कि अगर उन बातो को जान लेना ही किसी युवा लडकी की बरवादी है जिन्हे उसके मां बाप चुराना चाहे तो मैं तो कभी की बरवाद हो गई । चहलकदमी करते हुए उसने दांत पीसे । तुम सब एक पड्यन्त्र हमारे विरुद्ध कर रहे हो। लेकिन मुझे क्या? मुझे इस ३४ । फेन्स के इघर और उधर घर से क्या लेना देना? "मेरा राजे" वह बुदबुदायी फिर बुरी तरह फफक पडी। "फूहड औरत, स्वाति कौन इस घर मे अधिक दिन रहने वाली है । कान खोल कर सुनो, मैं उसे गेस्ट हाउस मे ही लाऊँगा । वो वहाँ नही रह सकती- असभ्य वेपढी।" मां ने बदहवासी झेलते हुए आंसुओ से तर चेहरे को अपनी गदेलियो से खूब पीटा और पति के पांव से लिपट जाने के अपराध मे एक शक्तिमान धक्का खाया। स्वाति की अब तक दरारो के बीच अपनी आँखें गड चुकी थी। उसका मन खोल गया । दरार को ही चीर देने का उन्माद उसमे जन्मा । पर यह उन्माद क्षणिक था, झूठ था। न दरवाजा उसने खोला और न तोडा ही। बहुत वीला आवेश था उसका। स्वाति की जव समझ मे आया कि गेस्ट हाउस क्यो साफ हो रहा था। वह बेईमान, मां की सौत होकर उसके सामने बैठेगी। वह राधू और गुड्डी वो सब कुछ बता देगी, उन्हे उभारेगी और घर मे घुणा फैला देगी। लेकिन मा भी कितनी अपाहिज और मूसं है, स्वाति झुंझला गयी। राजे ऐसा परता तो मैं उसको मार डालती। कोई मेरे स्वगिक सुखा की सीढी तोडे और मैं उसस चुपचाप सह लू' समझ में नहीं आता, रात मे लडते हैं ये लोग और दिन में सारी दिनचर्याएं ऐसी हाती हैं कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं। किसी पौफ का साया जैसे छाया हुआ है। ये लोग मेरा खयाल करते हैं, मुझसे छुपात हैं। अरे, मैं तो सब जानती हूँ। मैं क्या कोई अघी या तटस्थ दसिया हूँ? सण भर को अगहा पमा है । लेकिन स्वाति निश्चित है कि मां पोड़ा देर बाद पु1 प्रतिवाद करगी। वैस यह प्रतिवाद पर बोस की मार की सह बहुत ममत्रार एगा। यह याहर परामदे म आ गयो, यहाँ उसनी भावाता मा अपार न गिरती है, जहाँ पचीसगियारा यह जवरन द्वार देती है क्लह । ३५ और वह अक्सर अपने व्यक्तिगत प्यार के झिलमिल झील सरीखे तरल सुखो को परिवार की बीहड समस्याओ पर हावी कर देती है। ऊपर विराट आकाश है । घर की उलझनें भी उतनी ही विराट हैं । स्वाति के दिल दिमाग में इतना सारा समा नही पाता। उसके लिए कोई कोना एकान्त नही छोडा गया है । गरम लावे के सैलाब मे वह डूब उतरा रही है क्योकि दुर्भाग्य से वह प्रबुद्ध और सयानी है । एक कलहचत्र उसमे दीर्घमान है। उस विवर्त मे माँ का पतला अवश चेहरा झिझुड रहा है। कई काल्पनिक सोच विचार मां मे मा जा रहे हैं। मां गेस्ट हाउस वाली औरत से झपट झपट लड रही है । पिताजी टहलने वाली बेंतो से दोनो को मार रहे हैं। दोनो पागल वी तरह गुंथ गयी। नौकर-चाकर और फेन्स के पार मुहल्ले वाले देख रहे हैं। स्वाति लज्जा से पीडित कमरे मे छुपी है। स्वाति बरामदे मे है। गेस्ट हाउस मूक और स्तब्ध है । बहुत झीनी बड- बड़ाहटें कमरो से छन छन कर आ रही हैं। स्वाति ने ठण्डे और नम मोजैक के पिलर से अपने को बांध लिया। उसने पूरी शक्ति से अपने कानो तक अवाछनीय कलह लाने वाले शब्दो के सेतु पर हमला किया। उसने केवल अपने भविष्य के बारे मे सोचा । उत्फुल्लता ममेटने की जिद उसकी नस-नस मे व्यापती रही। अब वह अपने को परिवार से काट कर राजे से जोडती रही। अव वह भी राणे के लिए साफ साफ प्रस्ताव कर देगी। देखें उसके माता-पिता के चोर मा कैसे उससे लडेंगे? राजे आ जाय तो सम्भवत उसो मन मे उसके परिवार म जो कलह है उसका भागीदार राजे भी तो है-राजे को विना जोडे वह कुछ भी कैसे साचे स्वाति बुदबुदायी, "राजे तुम आ जाओ-मेरे पास पास कितनी कलह है। मैं उसम कस रह पाऊँ ?" इसके बाद उसने दमघोट वातावरण से त्रास देने के लिए अपने हृदय पर दोना हलियां रख ली । भावुकता ने बांध पाया, ज्वार यम रहा था । जैसे राजे सचमुच आ गया हो । स्वाति विलल सामोश हा गयी पायद राजे को पदचाप सुन पडे । उसका अकुलाया मन धीर पा
३६ । फेन्स के इघर और उधर
रहा था । वडे सन्तोप के साथ सो जाने के लिए वह अपने कमरे मे घुस
आई
लेकिन दूसरे कमरे मे एक चीखते पुरुप स्वर वा गालियो भरा प्रवाह पुन'
जारी हो गया था। मारपीट नही थी क्योकि स्वाति की मां का स्वर बेदम हो
चुका है और सम्भवत इस पराजय को ही राजेश्वर ने अपने कुकृत्य के
औचित्य का सन्तोष समझ लिया।
-
३ खलनायिका और बारूद के मेरे एक मित्र, जिन्होमे हाल मे प्रेम विवाह किया था, मुझसे कहने लगे कि मैं उनके प्रेम पर एक कहानी लिखू। उन्हे विश्वास था कि उनका प्रम बहुत अद्भुत और रोमाचकारी है। जब उसने सारे प्रेम पत्र मुझे सौंपने को कहा तो उनकी पत्नी को लाज आ गई । हल्के फुल्के वातावरण मे बात आयो- गयी हो गयी। मुझे उनसे कहने की जरूरत नहीं पडी कि प्रेम कहानी लिखने के लिए प्रेम पत्रो की जरूरत नहीं पड़ती। एक दूसरे मित्र अत्यधिक हताश थे। जीवन को वे एक कठिन अभ्यास और त्रास मानने लगे थे। चूंकि वे अपने प्रेम मे बुरी तौर पर असफल हो गये थे, इसलिए उहे सहानुभूति की जरूरत थी। वे हँसते कम थे, प्राय उदास रहा करते थे और उनकी सूक्तियो मे दर्द का गहरा आभास रहा करता था। एक दिन कॉफी-हाउस मे हम दोनो न बीत पाने वाली एक गर्म दोपहर फा भार अनुभव करते हुए बोने की टेबल पर चुपचाप बैठे थे। मेरे दोस्त के ओठो पर एक फीली दाशनिक मुस्कराहट आ गई । शायद वह चुप नहीं था। उसके अदर बातचीत और चिन्ता की एक प्रक्रिया चल रही थी। मैं बोला नही, लेकिन थोड़ी देर बाद वह अत्यधिक बुझे, ठण्डे स्वर मे बोला, "दोस्त मरी जिन्दगी एक दर्दीली कहानी बन गई है । तुम कहानियां रिखते हो, पता नही किस संसार की। अगर नजदीक देखो तो तुम्हारे सामने मेरी जिंदगी ही एक प्लाट है ।' उनकी वात का मैंने प्रतिवाद नहीं पिया, क्योकि वात बढ़ने का सतरा उठाने और मूर्खताओ को बर्दास्त करने के लिए मैं तैयार नहीं था।
३८ । फेन्स के इघर और उधर 1 वे मेरे बचपन के मित्र थे, लेकिन मैंने उन्हे धीरे-धीरे खो देने मे तव दुख नही माना बल्कि प्रतीक्षा की। आज अत्यधिक अनमने क्षणो मे मेरा जी अकुला गया। पता नही मन क्यो उस बिछुरे दोस्त के प्रति चडी कमजोरी अनुभव कर रहा है । मैं निराश तो नही हूं, क्योकि मैंने यह जान लिया है कि वन्द दरवाजो के आगे मी दुनिया है, जैसे चाँद सितारो से परे मी अनेक संसार हैं । जीवन पई स्तरो पर जीना पडता है और मैं, एक अपराधो व्यक्ति उस खो गये दोस्त के प्रति पसीज रहा हूँ। उन दिनो मैं कहानी नही लिखता और न कहानियां पढ़ने के प्रति मुझमे पोई खास रुचि थी। विश्वविद्यालय में आने के बाद ही भरे-भरे उत्फुल्ल पातावरण मे मैं अवेलापन और धवराहट अनुभव करने लगा । सूचित होने के चाद सबसे पहला साहस मुझमे यह आया कि मैं सोचने लगा कि कोई लडकी मुझसे प्रेम परे। मैं किसी भी लड़की से प्रेम करने को तैयार हो जाना और मुझे हर सडनी में अपने प्रेम यी सम्भावनाएँ दीय पत्ती मन पर वय या मादक भार था, इसलिए मुझे ऐमा लगता पि मेरे अलावा हर व्यक्ति किसी न किसी प्रकार प्रेम म लगा है। दो वप के भीतर ही मैं निराशा की पविताएं लिमणी शुरू कर दी। अनुप्ति ने भागाभों को एक दिशा दी। मैंने अनुभव पिया fr मुमम एक गरम गाहिरियर महामायाना सर उठा रही है। मुझे कापी रालोप था । मी पीच गुगा ने मेरी कविताओ म चिरेगा गुरू पर दिया। यह आगर ओरिपटल स्टडीज दिमाग पे पास वाले पर ये पारा रप लगी, पापर गुहल मी या म मेरो मविनाएं गदनी और पूछती कि पिछलो रात मैंने गया किना। उसमे नय-नये सपनां में आगर एपी यात मातानि पिमित्र उरान और येती नी यह मे इयर पुछ भी नि पान म बड़ी गपिल पा रहा है। Prim पर आकार में हन्दी का रंग पा आया था, मतांनी पर एप पागरी पर गुमार की सरद गम रही पी और हर गांग में पेना खलनायिया और वारूद के फूल । ३९ और द्वन्द्व या अनन्तकात सा झेल रहा था, तो मैंने कविता न लिखकर सुमन को देने के लिए कागज का एक टुकडा लिखा । तीसरी सुवह यह क्लास में अपनी सीट पर थोडा चचल थी। मुझे अपनी भाषा पर नाज हुआ। वह पत्र ही ऐसा शालीन और हृदयग्राही था। लेपिन पॉमनरूम के सामने वाले लॉन मे जब हम लोग बैठे तो सुमन ने पत्र का जिक्र नहीं किया । सामने अनन्त शाखाओ वाले विशाल वट वृक्ष की सघन शाखाओ मे लुके-छिपे काग समवेत चीख रहे थे । वह बताने लगी कि रोज जब मैं डto वर्मा के पहले ही पीरियड में हाजिरी देने के तुरत बाद 'लवलेन' वाली खिडकी से बाहर कूद जाता हूँ तो लडरियां मुंह मे आँचल ईस कर बडी मुश्किल से हँसी दया पाती हैं । "पता नही, तुम्हारी यह हरक्त मुझे हमेशा क्यो याद माती रहती है । कल रात तो बिल्कुल सो ही नही पाई ।" मैं थोडा विचलित हुआ। मेरे सौन्दर्य वोध को, जिसका एहसास इधर मुझे तीवता से होने लगा था, धक्का लगा। अरे यह भी प्यार करने का कोई कारण हुआ, लेकिन मन को दिलासा देते हुए कि सभी लडकियां इस माने मे पिछडी होती हैं, मैं अपने पक्के को तुरत भूल गया । 'आखिर ऐसा क्यों करते हो? क्या पढने मे मन नहीं लगता?" मैंने कहा, 'नही, घण्टा समाप्त होने की प्रतीक्षा मे मन लगता है।" वह मुस्करायो, "तुम क्तिने वेफिक्र हो । हिम्मती।" इसके बाद मैकफर्मन की उजडी तनहाई, पोनप्पा रोड की तडपती सामोशी, अल्फ्रेड पार्क की ताजगी से मरी चामो, होस्टल मे घोडे से ऑफ टाइम की बदहवास वातो और सिनेमाघरो यी बाल्कनी से हम लोग जल्दी ही ऊब गए। मैंने इस विस्तार से भागकर कमरो की घर जिन्दगी के बारे में सोचना शुरू कर दिया था लेकिन सुमन को एम० ए० कर लेने के बाद अपने घर आगरा वापस जाना ही था। मुझे लगा कि मेरे मरने के दिन मा गए हैं । सुमन मी रो-रोकर कहती, "तुम्हारे बगैर मैं जिन्दा नही रह सकती। मेरे पिता पता नही शादी करने ४० । फेन्स के इधर और उधर को तैयार हो या न हो, लेकिन मैं वही दूसरी जगह विवाह नहीं कर सकती। अगर मैं मर गयी तो मेरे दफन मे जरूर शामिल होना।" गाडी के जाने के पहले हम दोनो ने एक दूसरे को इस तरह दिलासा दिया, गोया हमारा प्यार मरने के करीब है। जब गाडी चलने को हुई तो उसने मुझसे कहा कि मैं उसे रोज रात के आठ बजे जरूर याद किया करूं, वह भी याद किया करेगी। उसके प्रेमल आग्रह पर मैंने उसे आश्वासन दिया कि हर बुधवार को "बिनाका गीतमाला' मे जो गाना सबसे अच्छा लगेगा, उनके सम्बन्ध मे भी लिखूगा और गाडी चली गई । मन का धुआँ शरीर को विकल कर गया । मुझे अन्दर से किसी ने टोका कि तुम कितना सतही प्रेम कर रहे हो। वह तुम्हे सोहता नही । तुम्हारी प्रेमिका बहुत पिछडी हुई है, लेकिन मैंने अच्छी तरह जान लिया कि प्रेम की दुनिया चूंकि किताबो से अलग होती है, इसलिए मैं सुमन से प्रेम करना नहीं छोड सकता। उसकी चिट्ठियां बराबर आती और हमारा प्रेम, मुझे लगा कि दूरी के वावजूद प्रौढ हो रहा है । मुझमे अब उमग हो आई थी। अक्सर मुझे मससूस होता कि मैं कहानियां लिख सकता हूँ। मैं धीरे-धीरे विस्तृत हो रहा था। पहली ही कहानी रेडियो पर आने वाली थी। सुमन को भी सुनने के लिए लिखा। उसकी प्रसनता फूट पड़ी थी। उसने लिखा, "सहेलियो को भी कहानी अच्छी लगी। सिंहल ने तो मुझे चिपटा ही लिया। और तमने यह बहुत अच्छा किया। जो कहानी में कम से कम मेरा नाम न देकर शकुन का झूठा नाम दिया । मुझे पुन धक्का लगा, लेकिन बाद मे जव सुमन ने मेरी उन दिनो प्रका- शित अन्य सभी कहानियो की नायिकाओ में अपने को ही पाया और लिखा, लगता है तुम साहित्य मे मुझे अमर करने में तुल ही गए हो, "तो मैं इस भयंकर गलतफहमी और अपनी प्रेमिका को मूर्खता पर रो दिया । मुझे लगा कि मेरे अन्दर का कहानीकार बेइज्जत हो गया है। मुमन को लिमने की गुजाइश खलनायिका और बारूद फूल । ४१ तो नहीं थी, क्योकि वह इस नाजुक स्थिति को न समझ पाती और दुख मानती । और फिर मैं अपने प्रेम के प्रति मोहासक्त था, सो चुपचाप चूंट पीता रहा। मुझ लगा वर्ष भर आगे दिल्ली से लौटते आगरा रुका । सुमन के पिता वर्मा जी नेक आदमी थे । ठेकेदारी का पेशा, झुकमा जाते थे । खूब आवभगत की । पहने लगे, 'सुमन ने मुझ बताया कि तुम हिन्दी ये बहुत बडे लेखक हो । लेखक होना बड़ी खुशी की बात है। अगर चोरबजारी और भ्रष्टाचार पर खूब कवितायें लिखी तो हिदुस्तान जल्दी तरक्की कर लेगा । तुम तो कॉलेज-वालेज के उचक्के लडको की समस्याओ पर कुछ जरूर ध्यान दो। अरे माई, साहित्य बडी जोरदार चीज होती है।" मेरा खून खौल गया । अगर सुमन से मैं प्रेम न करता होता तो शायद उनको कुछ बक भी देता । फिर सोचा, कहाँ पढी लिखी समझदार सुमन और वहां उसका वाप कि जो भी हो यह आदमी मुझे अपना दामाद बना सकता है, क्योकि इसकी नजर मे वडा हूँ, लेकिन खाना खाते समय उहोने मुझसे कहा कि मैं सुमन के लिए कोई लडका बताऊँ। दस पन्द्रह हजार दे सकते हैं, गमिया मे ही शादी फरनी है । मुझसे खाना खाया नहीं गया । कैसे खाया जा सकता था। शाम समाप्त थी। हल्की चांदनी में रात की शुरुआत मे मुझे सुमन के साथ थोडे एकान्त पल मिले । मैं अधीर था। नीचे गली म चमार लोग चमडा कूट रहे थे। मेरे मुंह से सिगरेट निकालकर फेंकते हुए वह बोली, "क्यो बेकार अपने को जलाते हो । मैं तो हमेशा भगवान से मनाती रहती हैं कि तुम्हे वह महान बनाए, हमेशा ऊँचा उठाए।" 'लेविन तुम्हारे पिता तो जल्दी ही तुम्हारी शादी की बात कर रहे हैं।" वह लगभग चीख-सी पडी, 'नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता। मैं तुम्हे समय पर लखूगो। हम लोग सिविल भैरेज कर लेंगे, नही तो साथ-साथ ४२ । फेन्स के इधर और उधर भआत्महत्या कर लेंगे । तुम्हारे विना मेरी दुनिया क्या ?" । इस प्रस्ताव से विकल मन धीर हो आया। हम लोगो ने हाथ मे हाथ ले लिया और छत की खुली ठण्डी गच पर बैठ गये । सुमन ने मेरी एक मनोवैज्ञानिक प्रेम-कथा के अन्त पर बहुत दुख प्रकट किया, "तुम बड़े वो हो । पता नही कैसी कहानी लिसी है। अगर मिन्नो और करन को अन्त मे मिला देते तो नुम्हारा क्या विगट जाता । लगता है तुम्हे हमारे मिलने की उम्मीद नही।" मैंने समझाया, "ऐसा नही सुमन, हम लोग तो मिलेंगे ही, लेगिन करन और मिमो का मिल सकना कदापि सम्भव नहीं था।" "लेकिन अभी नयी वाली कहानी में कैसी गन्दी-गन्दी लडक्यिा तुमने बतायी है । तुमको लडकियो की ये सब बातें कैसे पता चली ? सुनो, बताओं न वे सब कौन हैं, जिन्हें हमे छोडकर प्यार किया जा रहा है।" इस वार तो मैं हतप्रभ हुआ और न खीमा ही, बल्कि सुमन की धारणा को मैंने अपनी सफलता मान लिया । नीचे से कई आवाजे आई । तब हम लोग उतर आये। मैंने सोच लिया था कि मैं सुमन से ही विवाह करूँगा । एक विद्रोही की सरह समस्त अवरोधो को ध्वस्त कर देने का मेरा निश्चय था। इसी बीच सुमन की चिट्ठी आयी कि उसका जीना दूभर हो गया है। घर में सब लोग उमे फूटी आँख नही देखते । उसकी छोटी बहन सरोज भी उससे नहीं बोलती। पिताजी भीतर-ही-भीतर दुखी रहते हैं । फिर उसकी एक चिट आयी जिसमे, "मुझे कुछ सूझ नही पड रहा है, पर ममी तुम चुपचाप रहना" के अलावा लिखा था-"मेरे देवता, मुझे देना सहारा, कही घट जाये न दामन तुम्हारा।" फिर मेरे बार-बार लिखने पर भी महीने भर उसका कोई सत्त नहीं आया। अन्तिम पत्र उसका उस दिन आया, जिम दिन मो'ने सीर और वरी के लड्ड बनाये थे। उसने पार पक्तियो में लिखा था, "मैं जीवन से हार गयी हूँ। शादी अगले महीने के लिए तम हो गयी है । तुम तुरन दो दिन के लिए भागरा था जाओ । अस्थिर है, कहो कुछ कर न बैठें।" 1 खलनायिका और बारद के फूल । ४३ जब मैं उससे मिला तो लगा कि कुछ ही दिनो मे वह दुबली हो गयी है। चह पायद अन्दर-अन्दर रो-रोकर धुटी जा रही थी। वह मेरा हाथ पकडकर ठेठ ऊपर छत तक खीचती सी ले गयी । मेरे कन्धे पर मोठा को भीचकर वह बुदवुदायी, "मुझे गलत मत समझना, मेरा प्रेम आत्मा का है । वह मरते दम तक क्या, जन्म जन्मातर तब' जीवित रहेगा।' उसने कहा कि वह मेरे अलावा किसी और को अपना हृदय नहीं दे सकती, भले ही तन देना पडे । मैं गुमसुम बैठा रहा । सुमन ने बताया कि यहाँ योई नहीं आयेगा । उसने वेझिझक मुझे कई तप्त चुम्बन दिये और मेरे पांव पकडकर मुझसे कहा कि मैं उसके सभी प्रेम-पत्र वापस कर दूं या जला दूं। "तुम मुझे इतना गिरा समझती हो सुमन । क्या मैं तुम्हे ब्लैकमेल करूँगा?" मैंने कहा। "तुम नहीं जानते । हिन्दुस्तान के समाज मे लडकियो की जिन्दगी बड़ी विचित्र होती है । तुम जरूर वापस कर दो।" उसने बताया, "छोटी बहन सरोज भी आजकल एक लडके से प्रेम करने लगी है, जो राजपूत कालेज में पढता है । बाबू जी उसकी वजह से बड़े परेशान और चिन्तित हैं । इन्ही विषम परिस्थितियो से मजबूर होकर मैंने उनकी मर्जी का विवाह स्वीकार कर लिया है और जिन्दगी भर भुगतगी । लेकिन यह सरोज पता नहीं क्यो, प्यार का सडकपन कर बैठी है । तुम्ही बताओ, सच्चा प्रेम हो आत्मा का, हमारा तुम्हारा जैसा तो कोई वात्त भी है। मैं तो उस मरी को जरूर सवक दूंगी। मुझे लडक्पन पसन्द नहीं है।" मैंने मुझये स्वर मे उसे समझाया, "नही, तुम्हे ऐसा नही सोचना चाहिए।" वह बोलती ही चली जा रही थी और मेरी वात उसकी वाचालता मे डूब गयी। "मैं तुम्हारा एहसान जिन्दगी भर नही मूलूंगी, अगर तुम खूब रुला देने वाली एक ऐसी कहानी लिखो, जिसमे क्सिी विलंन ने एक अच्छी लडकी की जिन्दगी झूठा दिलासा दे देकर बरवाद कर दी । सरोज उस कहानी को ४४ । फेन्स के इधर और उधर पढ़कर बिल्कुल बदल जाये । उसे तुम्हारी कहानियां अच्छी लगती है ।" तल्खी के बावजूद मुझे हंसी आ गयी । सुमन ने मुझे झकझोर दिया, "तुम बहुत बडे कहानीकार हो । ऐसा कर सबसे हो । प्लीज बाबू के दुख का रयाल करके एक कहानी लिख दो। इसे शादी पर तुम्हारा कीमती तोहफा मान लूंगी।' झुटपुटे पर चांदनी तर आयी थी। गली मे चमार सस्ता फिल्मी गीत चीख रहे थे । एक सचमुच की खलनायिका के सामने मैं सरोज के लिए लिखी जाने वाली कहानी के काल्पनिक खलनायक बावत सोच रहा था, तभी एक आतिशवाजी आसमान पर फूटी और बारुद के खूबसूरत फूल विखर गये। "आओ चलो, ताजमहल देख आयें, कैसी फषय चांदनी है, वह पुन खीचती सी मुझे नीचे ले जा रही थी। सीढियो के धुंधलके मे वह एक क्षण को थमी और मेरे बाये पजे को अपने कोमल हाथो दवाती हुई वोली' और देखो, मुझे किसी कहानी-वहानी मे अब चित्रित मत करना । मेरी शादी होने वाली है, नाहक क्यो किसी को शक हो।"
आत्महत्या वह तत्पर हो गया कि आज वह तत्काल आत्महत्या कर लेगा । आज का दिन उसके लिए असह्य दुसदायी समाचारो का दिन था। उसे अनुभव हुआ कि उसका दुख भयकर है और घनीभूत होता जा रहा है । इस ससार मे उसका कोई नहीं और उसे मर जाना चाहिए । पिछले दिनो भी वह अक्सर महसूम करता रहा है कि वह बुरी तरह असफल हो गया है, झुका और टूट गया है । इसलिए उसने मृत्यु प्राप्त करने के अपने निश्चय को अन्दर पूरे बल से व्यवस्थित कर लिया । वह मृत्यु को बहुत कठिन मानता था लेकिन अपने दुख को उसने उससे भी दुष्कर समझा । वस्तुत्त ऐसा था कि उससे जिन्दगी जी नही जा रही थी और इस क्षण उसमे एक घातक वृति सर्वोपरि हो आयो । आज वह अपने दुख से मुक्ति को अन्तिम प्रेरणा ले रहा था। यह मुक्ति को छटपटाहट में डूब गया। अन्धकार गाढा हो गया है । सन्नाटा एक मारिल वातावरण बना रहा हैं। वारजे से उसके नीचे देखा, सडक ठडी हो रही थी। इधर-उधर नीली चत्तियों थी। घनी बस्ती के बीच का पार्क खामोश था 1 उसके हृदय मे हाहा- कार है । ढूंढ कर उसने एक बची-खुची सिगरेट दूसरी बार जला ली। वह तवरीवन अट्ठाईस का होगा । जब वह सिगरेट का पर लगाता तो बूढापन उसकी मुखाकृति पर गडने लगता । लापरवाही से पहलकदमी करता हुआ दृढ हो रहा था हडल रेस की तरह जीवन की लम्बी यात्रा दौड का अव कुछ मतलब नहीं है। घिसट घिसट कर जीने में असाधारण बल पाहिए और ४६। फैन्स के इधर और उधर उसे पेट में शायद कैन्सर हो रहा है, तभी तो जब कमी दर्द का असहनीय ममूका उठता है। फिर उसका मर जाना ही ठीक है, क्योकि कोई उसे इस संसार का एक अत्यधिक पीडित व्यक्ति मानने को तैयार नहीं होता । सब उसकी उपेक्षा करते हैं। उसकी आँखो में आंसू थे। वह काफी देर तक सुदुयता रहा। हिचकी लेता हुआ वह युदबुदाया, "व्यक्ति को समाज हमेशा ठुकराता है । मैंने अपने भ्यार को लोगो के लिए"औ"और" फिर कुछ पता नही चला कि वह क्या बडवडा रहा है, सिवाय इसके कि दीवार पर वह अपने सिर को थकी गति से रगड़ रहा था। पीछे के वडे क्रासिंग से तीव्र वाहनो से गुजरने की आवाज कम हो गयी है । इधर आम तौर पर कुत्ते नही मूंकते लेकिन, रात, अब पूरी रात थी। वह उठा । उसके बाल रूखे और अस्त-व्यस्त थे । चाल मे फर्ट हाली । पीडा, हार, थकन, उदासी और व्यथा को न सह पाने के कारण उसकी दयनीयता और हताशा चेहरे पर साफ थी । यंत्रणा मे उसकी आकृति डूवी हुयी थी, क्योकि इस वडे ससार से अधिक उसे अपनी एक छोटी-सी दुनियों से भी विछुडने का गम था। उसनें सूटकेस से चिट्ठियो का एक छोटा-सा पैकेट निकाला, जिसकी मीनी सुगन्ध अर्मा हुआ मर चुकी थी। वह खौफनाक-सा हो उठा । बिना विराम के एक झपाटे के साथ उसने पत्रो को पलश मे ले जाकर बिखेर दिया और जजीर खींच दी। सूटकेस की दूसरी तरफ उसकी कुछ तुवन्दियां थी जिन्हे उसने नही छुआ। घडी को उसमे डालकर एक पुरानी. घोती उसने खोज ली। पलश से पानी गुजरने की आवाज अव बन्द हो चुकी इस हरकत के बाद वह आत्महत्या का और अधिक मजबूत भाव अपने मन्दर महसूस करने लगा। इन प्रेम-पनो में उसकी पांच वर्षों तक लगातार मिलने वाली अथाह स्त्रियोचित तरलता शब्दावित थी जिसने उसे जीवन के संघर्ष का कमी अनुभव ही नहीं होने दिया। - आत्महत्या । ४७ वह समझ नहीं पा रहा था कि वह घोती म गांठ कैसे लगाये । उसके चेहरे पर मावो के परिवतन की गति अपेक्षाकृत तेज हो गयी । लेकिन शरीर से वह काफी शान्त था। उसकी आँखें चर जरूर रही थी मगर पुतलियो मे नूर कायम नही रह सका था। इस समय उसके मुख पर किंचित् म ढता और हल्वी-सी खिसियाहट छप आयी लेकिन फदा बनाने में उसे खास विलम्ब नहीं हुआ। उसे याद आया कि एक बहुत वड हस्त रेखा विशेपज्ञ ने मैग्नीफाइग ग्लास से उसकी दाहिनी वायी हथेली को देखा-परखा और पूछा था कि क्यूं साहब, आप अकसर आत्महत्या की बात क्यो सोचा करते हैं ? आप बहुत निराधा- चादी है। "आप वैसा न सोचा करें, क्यापि आपको कोई दुरा नहीं हैं । सोचने सोचने म ही आप अनायास हताश हो जाते हैं । आपकी आगे जिदगी अच्छी है । 'और साहब मेरी साफ बालने की आदत है कि आपका आत्महत्या फरना मुश्किल है।' तब ज्योतिषी के प्रिडिक्शन से उसमे एक अजीय मिश्रित सी प्रतिक्रिया हुई थी। इस समय उसके मोठो म मौत का व्यग्य जिन्दगी को शिकजा दे रहा था । उसने न तो अपने को भींचा ही और न उसमे तनाव ही उत्पन्न हुआ । वह कमरे की वायी दीवार की तरफ बढ गया। स्विचबोर्ड के पास अडोल खडा हो गया और कुछ पलो के बाद विजली का लटूटू बुझा दिया । इस समय अंधियारे की रोशनी कमरे मे है । थोडा प्रयाश गली के बल्ब पा, कांच से आया होगा। को कडी से एक अजगर स्टक आया है जो चहुत शीघ्र उसको निगल लेगा। जब वह फदे मे गर्दन डालने लगा तो उसके हाथ कांपते हुए रुक गये। यह सिहर उठा। कुछ लम्हे तक वह कुर्सी पर ज्यो का त्यो खडा ही रह गया। उसके मस्तिप्त मे से एक पिता धारा प्रवाहित होने लगी। दिमाग में एक दरवाजा-सा खुल आया । चौवन्ना होता हुआ, अपने को प्राय चेतावनी-मा ४८ । फेन्स के इधर और उधर देता हुआ वह हल्के-से चीखा । "नही-नही, मैं साधारण आदमी नहीं हूँ। मेरे मरने का अर्थ है।" एक कमजोर सी प्रतिध्वनि ने भी उसे यही सुनाया कि वह साधारण आदमी नहीं है । उसके मरने का अर्थ है। उसने प्रेम की असफलता भोगी है, वह असाधारण है । वह अपनी आत्महत्या से क्षोभ और विद्रोह को जन्म देगा। उसने विश्वास किया कि उसके मन में मृत्यु का अत्यधिक स्वागत है और वह इस दूपित जालिम समाज की भर्त्सना करने वाले, एक मर्मस्पर्शी तथा चुनौती से भरे वक्तव्य को लिखने के बाद आत्महत्या कर लेगा। वह कुर्सी पर फदा छोड उक' हो गया । उसके मन ने उससे कहा वह आलोचना की तरह प्रखर और तीक्ष्ण लिखे। पढने वाले उसमे से गहरी रूमानी हताशा का अनुभव करके नम हो जायें । वह कुर्सी से उतर गया । उसके मन ने उसे निर्देश दिया कि वह मानव मुक्ति के विराट भाव को अवश्यमेव अपनी आत्महत्या से सम्बन्धित करे । उसके शरीर मे गौरव की फुरफुरी फैल गयी। वह कुर्सी पर बैठ गया । मन ने उससे कहा कि उसका वक्तव्य ऐति- हासिक हो, उसमे आत्मा की तलफलाहट को स्पष्ट अभिव्यक्ति हो ताकि भविष्य म उसे अनिवार्य रूप से विभिन्न स्थानो मे सकलित किया जाय । तदोपरान्त वह कमरे में घूमता रहा और अपने विचारो को तरतीब से सजाता रहा। वह टेवल पर झुक गया। कुछ समय तक कागज पर सिर दिये लिसता रहा । कमरा स्तब्ध था। लिखकर उसने लिखे को दोहराया । दोहराते समय अपने अन्दर एक बृहत् खालीपन का असर बढता अनुभव करने लगा। उसे लगा कि जिस अस्तिव को उसने अभी थोडी देर पूर्व रौंद देना चाहा था, वह सामने के वक्तव्य म खिलखिला रहा है। उसे पराजय का क्षाम हुआ और इस बार उसने अत्यधिक पातर होकर अपने मन से ही पूछा कि क्या उसका आत्महत्या का यह प्रयल भी
आत्महत्या । ४९
असफल हो गया। जो बुद्धि उसे अब तक आदेश देती आ रही थी, वह चुप्पी
साघ गयी।
थोड़ी देर बाद जब उसे उमस बहुत सताने लगी और उसके भीतरी बदन
में पसीना काटने लगा तो उसने सामने की विण्डो के खानो में ठूसे अखबार
और परदे निकाल दिए।
५ सीमाएँ जहाँ तक स्मरण है, पहली बार वह मुझे एक पुस्तक प्रदर्शनी में दिखाई दिया था। दूसरी बार वह मेरी उपस्थिति मे एक पुस्तक विक्रेता से पुछ ऐसी पुस्तको की मांग करता रहा जो उसके पास नही थी लेकिन जिनके नाम और लेखक मुझे भी आर्पित करने वाले थे । तीसरी बार वह थियेटर रोड पर मेरे सामने से एक सजी लेकिन सकुचाती और किंचित चौकन्नी लडकी को लिए हुए गुजरा था । चौथी दफे एक भीड भरे मध्यम श्रेणी के होटल मे, चाय पीते हुए हमारी दृष्टियां एक दूसरे से बराबर टकराती रही। वह मुझसे मिन होने के पूर्व यूं ही आकस्मिक ढंग से और कभी-कभी उम्मीद करते हुए भी जिन स्थानो पर मिल जाया करता करता था, ऐसा लगता कि ये सयोग, हमे एक दूसरे के प्रति कही, काफी मजबूर कर रहे हैं । पांचवी बार, एक रात सडक से, एकदम यारिश आ जाने पर, मैं जिस चन्द दुकान के शेड की ओर भाग कर पहुंचा वहां उसने सम्मवतः कुछ ही क्षण पहले से आश्रय ले रखा था। मुझे थोडी झिझक हुई फिर बारिश से एक सुखद विवशता का अनुभव देता हुआ मैं उसकी बगल में खड़ा हो गया । शेड फे नीचे अभी तक हम दो ही थे। हमारे पतलून की मोहरियां भीगने लगी जुरावे पानी से लथपथ हो गई थी और शायद जूतो के अन्दर भी पानी घुसने लगा था। "बहुत तूफान चारिश है", वह बोला और मेरी तरफ देखने लगा। मुझे उसका वात करना अच्छा लगा । "जी हाँ, इस मौसम की यह पहली सबसे तेज बारिश है।" हया से छिनरता हुआ पानी का फुहारा हमे यापी भिगो रहा था। -"आप क्या बाजार में ही रहते हैं," थोड़ी देर चप रह, ठण्डी बरसाती - सीमाएँ । ५१ - हवा की मार सहते हुए उसने मुझसे प्रश्न किया । मैं समझता हूँ कि वह उत्सुव था पि वातचीत करते हुए हम समय का अच्छे ढग से उपयोग करें जो हम बारिश की वजह से अकस्मात् मिल गया है । मैं भी यही चाहता था। जी नहीं, मैं तो फोय विज के पास हूँ, मैंने तुरत उत्तर दिया । वह खुश था, 'चलिए साव, साथ रहेगा, मैं भी उधर ही हूँ।" हम दानो एक दूसरे के बारे में बहुत-सी जानरारियाँ प्राप्त करते रहे। पानी वन्द हाने के आसार दिखाई देने पर मैंने उससे इस तरह से जल्दी जल्दी घात करने की काशिरा की गोया यह हमारी आखिरी भेट है। मैं उससे शीघ्रना स आश्वस्त होता चला गया । जैसा कि मैं चाहता था, वह भी मेरे साली समय, पढने ये शोक और घूमने पिरन की आदत के प्रति काफी दिल- चस्पी प्रकट करता रहा । हम आपस म इतना मशगूल हो गये जितना मौसम को सहज रूप स भूल जाने के लिए काफी हो सकता है । इस पहली मुलाकात म वातचीत की प्रारम्भिक हद समाप्त कर लेने के याद खाली साठी सा अनुभव करते समय हमे ध्यान आ सका कि वारिश थम गई है और सडर पर सवारियां वाहनो के लिए भागने सी लगी है । हम लोगो ये घनिष्ठ होने म लम्या समय नहीं लगा। जैसे हम अदर ही अन्दर पहले से तैयार होते रहे थे। हमने बहुत सी सीढियां दौडते हुए पार कर ली उसने (विवेव), उसके डंडी ममी ने और सविताजी ने कुछ ही दिनों म मेरे अकलेपन का चुटकी म चवा डाला । शहर की भर्त्सना करना मैं भूल गया और सडक पर चठने वाले हर मामूली आदमी के प्रति मुझ म छोटी- छोटी विमिन किस्म की दिलचस्पियां जागने लगी। अब समय प्राय' कुछ तेजी से गुजर जाता और रात को सोते समय आने वाले दिन की विकरालता का अवसर महसूस होने वाला दवाव भी लुप्त हो गया । वह मुझे घर ले जाता रहा । उसने मुझे अपने घर वालो से घुला मिला दिया है। मैं अब स्वयं भी जा सकता हूँ। जाता भी हूँ । उसके डैडी को आँखो मै तेज सकुओ सी दृष्टि है लेविन वे बहुत समयदार आदमी हैं । उहे अपने घर के अधिकाश अन्दरूनी मामला अथवा रोजमर्रा की सामान्य गतिविधियों ।
५ सीमाएँ जहाँ तक स्मरण है पहली गर वह मुझे एक पुस्तक प्रदर्शनी में दिखाई दिया था। दूसरी बार वह मेरी उपस्थिति म एक पुस्तक विक्रेता से पुछ ऐसी पुस्तको की माग करता रहा जो उसके पास नही थी लेकिन जिनके नाम और लेखक मुझे भी आरपित करने वाले थे। तीसरी बार वह थियेटर रोड पर मेरे सामने से एर सजी लेकिन सकुचाती और किचित चौकनी लडकी को लिए हुए गुजरा था । चौथी दफ एक भीड भरे मध्यम श्रेणी के होटल म चाय पाते हुए हमारी दृष्टियां एक दूसरे से वरावर टकराती रहीं। वह मुझस मिन होने के पूर्व यूं ही आकस्मिक ढग से और कभी कमी उम्मीद करते हुए भी जिन स्थाना पर मिल जाया करता करता था, एसा लगता कि ये सयोग, हमे एक दूसरे के प्रति कही काफी मजबूर कर रहे हैं । पांचवी बार एक रात सडक से एकदम बारिश आ जाने पर, मैं जिस चद दुकान के शेड की ओर भाग कर पहुंचा वहां उसने सम्भवत कुछ ही क्षण पहले से आश्रय ले रखा था। मुझे योडी झिझक हुई फिर बारिश से एक सुखद विवशता का अनुभव लेता हुआ मैं उसकी बगल मे खडा हो गया । शेड पे नीचे अभी तय हम दो ही थे। हमारे पतलून की मोहरियां भीगने रगी जुरावें पानी से लथपथ हो गई थी और शायद जूता के अदर भी पानी घुसने लगा था। "यहुत तूपानी वारिश है', वह वाला और मेरी तरफ देखने लगा। मुझे उसका बात करना अच्छा उगा । 'जी हाँ, इस मौसम की यह पहली सवसे तज बारिश है।' हवा से छितरता हुआ पानी का फुहारा हम वापी भिगा रहा था। --'आप क्या बाजार म ही रहते हैं ' चाही दर चुप रह ठण्डी वरसाती सीमाएँ। ५३ ममी डैडी मे नये 'स्विरल' आदमी का सुख अनुभव करने लगा है । वह मेरे कमरे पर प्राय रोज आता है । समय का एक अनिश्चित टुकडा उसके प्रेम के लिए हमारे वीच अपने आप तय हो गया है। उसके प्रेम की चर्चा मे बहलाव है और तैयारी का अवसर भी । वह आयेगा और अपने आप बताने लगेगा। फिर हम गमीर हो जायेगे। किसी मसले को सुलझाने का प्रयत्न हमारी भवो मे भरने लगेगा। वह अपनी प्रेमिका (प्रमिला) के माता- पिता की तारीफ जरूर करेगा । 'वे लोग ग्रेट हैं । रूढिग्रस्त, पुराणपथी किस्म की कोई गडबडी उनकी तरफ से नहीं होनी है। बात तो डैडी ममी की है। उनके बारे मे बडा सदेह है।" फिर वह, कभी अपने आप उत्तेजित भी हो जाता है, शायद इस भाशका का शिकार होता हुआ कि प्रमिला के साथ उसमें रास्ते कोई बन्द कर रहा है । "मैं कहता हूँ ऐसे मामलो मे किसी को बाधा नही डालनी चाहिए । प्रेम जीवन का पुण्य है यह मेरे उस जीवन का सवाल है जो केवल एक ही बार के लिए मिला है, बस एक बार के लिए।' वह बैठा होगा तो खड़ा हो जाएगा। और उसकी मुद्रा, शारीरिक हरकतो और शब्दो से इसी प्रकार की आदर्शवादी पविनता स्फुरित होने लगेगी। ऐसे क्षणो मे उमे बहुत प्यार करने लगता हूँ। मध्य अप्रैल की शाम, हम लोग सदर के उन हिस्सो मे घूमते रहे जो घूमने फिरने वालो द्वारा काफी उपेक्षित हैं । सविता जो हैं । पतझड ने पेडों को नंगा कर दिया है जिनकी वजह बंगलो के 'मट' वेपदं हो गये हैं। मुझे एकदम से स्याल आया कि विवेक चुप ही नही गुमसुम भी है । सविता जी घोर हो रही हैं । वे कभी हमारे मुखडो की तरफ देखती, कमी आकारा नाकने लगती और कभी "बहुत गर्मी है आज" कहकर हमारी चुप्पी को छेडने की कोशिश करती। आखिरवार मैंगे उससे दो मिनट अलग बात की और घण्टे भर वाद एक निश्चित स्थान पर मिलना तय करने उस चले जाने को राजी कर लिया। सविता जी को इन चुप्पी और बचा पर की जाने वाली गतिविधियों से विस्मय हो रहा था और वे उपेक्षित अनुभव कर रही थी लेकिन विवेक के ५२ । फेस के इधर और उधर से कोई मतलब नहीं रहता । उन्हे विश्वास है कि उनका घर सुविधा से चल रहा है और उसमे ममी के रहते कोई गडवडी नही है। मैं समझता हूँ कि वे इतमीनान से जीवित रहने वाले दुनिया के थोड़े से लोगो में शुमार किए जा सकते हैं। प्रारम्भ मे सविता जी ने मुझे बहुत निराश किया। आज उनके सम्बन्ध मे मुझे कोई अनुभव नही है । एक लोम है। उनके व्यक्तित्व में एक सुप्त क्षमता है जो बहुत धीमे शायद गतिहीन जाग रही है । वे जो साफ बोलती हैं और 'फ्रो' रहती हैं, उनकी सुन्दरता है । यह भी सम्भव है सविता जी ऐसी न हो और मैंने मन में उन्हें इस रूप में पैदा कर लिया है। सविता जी के साथ फिल्म देखना अटपटा लगता। विवेक और मुझे, उनके अगरक्षको की तरह बैठना पडता है । तीन घण्टे लगातार सविता जी के शरीर और कपडो से अपने को बचाने-बचाने मै तबियत थक जाती। फिल्म के कुछ टुकडे ही याद रह पाते । उत्तेजक दृश्यो के समय में अपनी आँखें मंद लिया करता और सोचता, सविता जी भी इसे देख रही होगी और उन्हें भी शरम लग रही होगी। मुझे कोफ्त होती कि सविता जी किसी दूसरे आदमी के बगल क्यो नही बैठ सकती। अपनी इस कोफ्त में जो कि दिखावटी या 'प्योरिटिकल' अधिक थी, कोई घाटा नहीं था क्योंकि सविता जी को बैठना हमारे बीच ही होता । धीरे-धीरे स्थिति भी बदल गई है। अब मैं जानता हूँ कि मेरी हैसियत केवल विवेक के मिन की ही नही सविता जी की सुरक्षा का ध्यान रखने वाले एक रिस्तेदार जैसी भी है । हाल के अंधेरे मे, सविता जी के साथ किसी प्रकार की वत्तमीजी न हो, इस बात के लिए मैं बहुत चौकन्ना रहने लगा हूँ। भीड के 'बत्तमीज' धक्को से वचने के लिए सविता जी अपने शरीर को मुझसे लगा लेती हैं । पास आ जाती हैं, तो कहती हैं, "देखो न पिसने जगली हैं लोग।" विवेक लापरवाह बना आगे बढा जाता है। मन उन लोगो के अंकुठपन पर रीझ गया है। पानी का गिलास देते समय अपनी उंगलियो को बुरी तरह बचाती हुई टुच्ची लडकियो से खीझा मन विवेक, सविता जी और सीमाएँ। ५३ ममी डडी मे नये 'लिवरल' आदमी का सुख अनुभव करने लगा है । वह मेरे कमरे पर प्रायः रोज माता है । समय का एक अनिश्चित टुकडा उसके प्रेम के लिए हमारे बीच अपने आप तय हो गया है। उसके प्रेम की चर्चा मे बहलाव है और तैयारी का अवसर भी । वह आयेगा और अपने आप बताने लगेगा। फिर हम गभीर हो जायेंगे। किसी मसले को सुलझाने का प्रयत्न हमारी भवो मे भरने लगेगा। वह अपनी प्रेमिका (प्रमिला) के माता- पिता की तारीफ जरूर करेगा। वे लोग ग्रेट हैं। रूढिग्रस्त, पुराणपथी किस्म की कोई गडबडी उनकी तरफ से नहीं होनी है। बात तो डैडी ममी की है। उनके बारे मे बडा सदेह है।" फिर वह, कभी अपने आप उत्तेजित भी हो जाता है, शायद इस आशका का शिकार होता हुआ कि प्रमिला के साथ उसके रास्ते कोई बन्द कर रहा है । "मैं कहता हूँ ऐसे मामलो मे किसी को बाधा नही डालनी चाहिए। प्रेम जीवन का पुण्य है यह मेरे उस जीवन का सवाल है जो केवल एक ही बार के लिए मिला है, बस एक बार के लिए।" वह बैठा होगा तो खडा हो जाएगा। और उसकी मुद्रा, शारीरिक हरकतो और शब्दो से इसी प्रकार की आदर्शवादी पवित्रता स्फुरित होने लगेगी। ऐसे क्षणो मे उसे बहुत प्यार करने लगता हूँ। मध्य अप्रैल की शाम, हम लोग सदर के उन हिस्सो मे घूमते रहे जो घूमने फिरने वालो द्वारा काफी उपेक्षित है। सविता जी हैं। पतझड ने पेडो को नंगा कर दिया है जिनकी वजह बँगलो के 'फन्ट' बेपर्द हो गये हैं। मुझे एकदम से ख्याल आया कि विवेक चुप ही नहीं गुमसुम भी है । सविता जी घोर हो रही हैं । वे कमी हमारे मुखडो की तरफ देखती, कमी आकाश नाकने लगती और कभी "बहुत गर्मी है आज" कहकर हमारी चुप्पी को छेड़ने की कोशिश करती। आखिरकार मैंने उससे दो मिनट अलग बात की और घण्टे भर बाद एक निश्चित स्थान पर मिलना तय करने उसे पले जाने को राजी कर लिया। सविता जी को इन चुप्पी और बचा कर की जाने वाली गतिविधियो से विस्मय हो रहा था और वे उपेक्षित अनुभर कर रही थी लेकिन विवेक के ५२ । फेस के इधर और उधर से कोई मतलब नही रहता । उन्हे विश्वास है कि उनका घर सुविधा से चल रहा है और उसम ममी के रहते कोई गडवडी नहीं है। मैं समझता हूँ कि वे इतमीनान से जीवित रहने वाले इनिया के थोड़े से लोगो में शुमार किए जा सकते हैं। प्रारम्भ मे सविता जी ने मुझे बहुत निराश किया । आज उनके सम्बध में मुझे कोई अनुभव नहीं है। एक लोम है। उनके व्यक्तित्व में एक सुप्त क्षमता है जो बहुत धीमे शायद गतिहीन जाग रही है । वे जो साफ बोलती है और 'फ्री' रहती हैं, उनकी सुन्दरता है । यह भी सम्भव है सविता जी ऐसी न हो और मैंने मन में उन्हे इस रूप में पैदा कर लिया है। सविता जी के साथ फिल्म देखना अटपटा लगता। विवेक और मुझे। उनके अगरक्षको की तरह वैठना पडता है । तीन घण्टे लगातार सविता जी के शरीर और कपडो से अपने को बचाने बचाने में तवियत थक जाती। फिल्म के कुछ टुकडे ही याद रह पाते । उत्तेजक दृश्यो के समय में अपनी आँखें मद लिया करता और सोचता, सविता जी भी इसे देख रही हागी और उहे भी शरम लग रही होगी। मुझे कोफ्त होती कि सविता जी किसी दूसरे आदमी के बगल क्यो नही बैठ सकती। अपनी इस कोफ्त में जो कि दिखावटी या 'थ्योरिटिक्ल' अधिक थी, कोई घाटा नही था क्योंकि सविता जी को बैठना हमारे बीच ही होता । धीरे धीरे स्थिति भी बदल गई है। अब मैं जानता हूँ पि मेरी हैसियत केवल विवेक के मित्र की ही नही सविता जी की सुरक्षा ध्यान रखने वाले एर रिस्तेदार जैसी भी है । हाल के अंधेरे मे, सविता जी के साथ किसी प्रकार की बत्तमीजी न हो, इस बात के लिए मैं यहुत चौकन्ना रहने लगा है। भोड के 'यतमीज' पक्को से बचने के लिए सविता जी अपने शरीर को मुझसे लगा लेती हैं । पास आ जाती हैं, तो कहती हैं, "देखो न सिने जगती हैं लोग।" विवेक लापरवाह बना आगे बढा जाता है। मन उन लागों के अंकुटपन पर रीझ गया है। पानी का गिलास देते समय अपनी उँगलियो को दुरी तरह वचाती हुई टुच्ची लडवियो स सीमा मन विवेक, सविता जी और सीमाएँ । ५५ को उन लोगो के जिम्मे सौप दिया है । पट गए कपडो पर रफू करवाने टटै चटनी की बदली, स्माला की सफाई और कपडो पर लोहा करवाने के लिए उन लोगो पर निर्भर रहना मुझे अच्छा लगने लगा है। मेरी बहुत सी कितावे और पत्रिकाएँ उनके घर कभी न लौटने के लिए चली जाती है । वे लोग मेरी किताबो को अपना समझ कर वेझिझक दूसर को दे देते है । मै बिल्कुल नहीं चाहता कि वे मेरी कितावे मूले से ही लौटाएं। अपनी चीजे उनके यहां पड़ी देखने से मुझे उस घर में अपने अस्तित्व के हमेशा बने रहने का एक तृप्ति कर आभास मिलता है। मेरे लाए हुए वस्त्र ममी, डैडी बडी बहन, बाबा और विवेक सब पहनते हैं। सविता जी नहीं पहनती। साडियां सहेज कर रख लेती है। कहती है, "पहनने से खराब हो जाएंगी।" इसका मतलब पता नहीं कोई भी पयो नहीं समझता । उल्टे सब सबिता जी को इस लड़कपन के लिए चिढ़ाया करत हैं। आम तौर पर अधिकांश दूसरे घर वालो के लिए यह 'लडकपन' का विषय मही किसी खतरनार सम्बन्ध की शुरुआत का संकेत हो सकता है। लेरिन विवक और उमक घर वाले अत्यधिक उदार लोग हैं। उनके हृदय विशाल हैं और इस प्रकार वे मामूली स्वच्छन्दताओ से परेशान नहीं होते । मैं विवेक की इस सूक्ति को अकसर दोहरा लेता हूँ कि "आदसी को यहत उदार होना चाहिए। उदारताओ से ही संस्कृति की प्रगति होती है।" मुझे उमकी भावनाओं से बहुत तसल्ली होती है और लगता है कि मेरा भविष्य कहीं सम्पूर्ण रूप से सुरक्षित है। मुझे यह लगता है कि मैं विवेक और उसके घर मे बहुत अंतरग हो गया हूँ। डंडी मपी के आपसी झगडे मेरे सामने भी हो लेते हैं। ये पति पत्नी टालमटोल करने के स्थान पर मुझे अपने क्षगडो मे खीचा करते हैं । सविता जी मेरे सामने अब सराव साडी पहनकर भी आ जाती हैं, वैशिमक काम करती हैं जबकि पहरे साडी वदल वर और हल्ला प्रसाधन करखे ही नाती थी । अब पे मुझसे निश्चिन्त रहती हैं। उनकी निश्चितता कभी-कभी मेरी उपस्थिति में रात सोने से पहले गालो की त्वचा पर गाई रगड वर चेहरा चिक्ना ५४ । फेन्स के इधर और उधर जाते ही मैंने उन्हें सभाल लिया और सजीदा माहौल मे हल्के रूमानी लहजे में विवेक के प्रेम की सारी कहानी बयान कर दी । सविता जी अत्यधिक उत्सुक रही । शायद उनका दिल खुश था, उछल रहा था । एक प्यारी-सी जिद मे वे बोली, "यह विवाह नहीं हुआ तो विवेक मइया फा दिल टूट जाएगा।" "जी हाँ, यह ठीक नहीं है कि उसका दिल टूटे।" सविता जी ने मेरी बोर सन्देह मे देखा, कही मैं मजाक तो नहीं कर रहा हूँ। मुझे गम्भीर पा उन्हे इतमीनान हो गया और कहने लगी, "हम आप मिल कर विवेक भैया को सहायता करेंगे । क्यो ठीक है न भाई साहब ?" "जरूर करेंगे नही तो उसका दिल टूट जायेगा।" इस बार मुझे खुद हंसी आ गई और सविता जी इठला गई, "हटिये आप मजाक करते हैं।" फिर "मैया को कितनी तकलीफ है, आप पर बीतती तो पता चलता।" शाम समाप्त हो चुकी थी। सुनसान रास्तो से हम बचना चाहते थे। हुतात्माओ के स्मारक से होते हुए हम सदर बाजार की सड़क पर आ गये हैं जहाँ सडक बहुत रोशन है और परछाइयाँ कम वनती है, सविता जी प्रमिला के बारे में पूछ रही हैं । मै जितना बता सकता हूँ उसी को बार-बार शब्दो मे बदल रहा हूँ। विवेक जब 'कैनवरी' मे आया तो वह सामान्य था। सविता जी जैसे प्रतीक्षा मे थी, "विवेक भइया, तुम रत्ती भर भी चिन्ता मत करो, हम मिल. कर डंडी-ममी को तैयार कर लेंगे।" विवेक झेंप रहा था। फिर भी मुझे मय हुआ, सविता जी का मुझे अपने साथ जोडना विवेक के मन में व्यर्थ कुछ गुवहा न पैदा कर दे । मगर विवेक कहीं और सोया था। वह क्षुद्र भी नहीं है । उसके पास एक प्रेम करने वाला हृदय है। वह ऐसी चीनो का बुरा नहीं मान सकता। मैंने सोचा। तय हुआ था कि 'हम लोग' विवेक के लिए कुछ करेंगे। इधर देखता हूँ कि सपिना जो मेरा अधिक पान रसने लगी हैं। वैसे उन पर सभी लोग मेरी छोटी-मोटी तक्लीपो वा सयाल रसते हैं । मैंने भी काफी हद तब अपने सीमाएँ । ५५ - को उन लागो के जिम्मे सौप दिया है । पट गए पिडो पर रप परवाने टटै चटगो की बदली, मात्रा को सफाई और कपडो पर लोहा परवाने के लिए उन लागा पर निमर रहना मुये अच्छा लगने लगा है। मरी बहुत मी किताब और पणिकाएँ उनके घर कभी न औरने के लिए चली जाती है। वे रोग मेरी कितावो को अपना समझ कर वेझियक दूसर को दे देते हैं। मैं बिल्कुल नही पाहता कि वे मेरी क्त्तिावें मूले सही लौनाएँ। अपनी चीजे उनके यहाँ पड़ी देखने से मुझे उस घर म अपने अस्तित्व में हमेशा बने रहने वा एक तृप्ति कर मामाम मिलता है। मेरे लाए हुए वस्त्र ममी डैडी वरी पहा वाया और विवेक सब पहनते हैं। सविता जी नहीं पहनतीं । साडियां सहेज कर रख लेती है। कहती है पहनने स खराब हो जाएँगी। इसका मतच पता नहीं कोई मो पया नहीं समयता । उटे सव सविता जी को इस उडवपन के लिए चिढ़ाया करत' हैं । आम तौर पर अधिकाश दूसरे घर वालों के लिए यह लडवपन का विषय मही किसी सतरनाय' सम्ब व बी शुरुआत का संकेत हो सकता है। लेकिन विवेक और उसके घर वाले अत्यधिक उदार लोग हैं । उनके हृदय विशाल है भोर इस प्रकार वे मामूली स्वच्छ दताओ से परेशान नहीं होते । मैं वियेय को इस सूक्ति को अकसर दोहरा लेता हूँ कि 'आदसी को बहत 'उदार होना चाहिए। उदारताओ से ही संस्कृति की प्रगति होती है। मुझे उसकी भावनाओ से बहुत तसल्ली होती है और लगता है कि मेरा भविष्य कहीं सम्पूर्ण रूप से सुरक्षित है। मुझे यह लगता है कि मैं विवेक और उसके घर म बहुत अंतरंग हो गया हूँ। डैडी ममी के आपसी झगड मेरे सामने भी हो लेते है। ये पति पत्नी टालमटोल करने के स्थान पर मुझे अपने झगडो मे खीचा करते हैं । सविता जी मेरे सामो अव खराव साडी पहनकर भी आ जाती है यिझक काम करती हैं जबकि पहर साडी बदल कर और हत्या प्रसाधन करके ही आती थी । अब थे मुझसे निश्चिन्त रहती हैं। उनको निश्चितता कमी कमी मेरो उपस्थिति म रात सोने से पहले गातो की त्वचा पर मगई गड वर चेहरा चिकना ५६ । फेन्स के इघर और उधर करते हुए और गुसलखाने मे गोली हो जाने पर तौलिए के लिए 'मम्मी मम्मी' चीखते समय अधिक जाहिर होती है। वही वहन अपने शिशु को स्तनपान कराती रहती है, मेरे आ जाने पर उठकर चली नहीं जाती। उनका वावा मुझसे बहुत हिला हुआ है । उनका कहना कि "इतना तो अपने पापा के पास नहीं जाता। छोटे शिशु को लेने मे उनका परीर स्पर्श होता है, वे बचाने की चेष्टा नहीं करती।" विवेक के सम्बन्ध मे तो कुछ कहना ही नही। उसे प्रमिला के साथ अपने 'प्रोग्राम' ( हम लोगो वे वीच प्रयोग होने वाला एक साकेतिक अर्थवाला शब्द) का विवरण दिए बिना चैन नहीं पड़ती। इस मामले मे हम आपस मे काफी शरारती हो चले हैं । मुझे उन लोगो के जायदाद के झगडे और बैंक खाते के बारे मे मालूम रहने लगा है। ममी ने खुद बताया है। डैडी मुझसे सविता जी को पढ़ने- लिखने के लिए समझाने का अनुरोध करते हैं और 'मूड' मे आने पर अपने 'ब्रिज' वाले दोस्तो के लिए ह्विस्को' लाने के लिए भी वह देते हैं । भले ही बाद मे वच्चो से गन्दा काम कराने के लिए' उन्हें ममी की झिडक सुननी पड़े। इसके बावजूद कभी कभी मैं भयभीत भी हो जाता हूँ। विवेक और सविता जी के साथ मुझे अपना अक्सर का घूमना फिरना कभी-कभी स्वतत्रता का नाजायज लाभ उठाने जैसी हरकत लगने लगती है। अपने इस सकोच से बचने के लिए कभी ममी और बडी वहन के साथ चलने की जिद भी करता हूँ। इस जिद के पीछे मन म ईमानदारी दिखाने और सुरक्षित रहने की आतुः रता रहती है। ऐसे मौको पर विवेक मुझसे "इन लोगो के झझट मे न पडने' की सलाह देता है। ममी भी निर्विकार भाव से कह देती हैं, 'जाओ बेटो तुम लोग घूम फिर आओ। तुम लोग होटल वोटल म जाओगे, अपने से यह सव नहीं चलता । मैं घर म ही अच्छी।" ममी अधिक से अधिक सविता से अपनी जीजी को भी ले जाने के लिए कहेंगी। सविता जी ता ले जाने को तैयार हो जाती हैं। पता नहीं दिल से या ऊपरी दिखावा मात्र ही होता है उनकी तैयारी म लेकिन वही वहन नही जाती। नन्हा-सा गोदी का शिशु । बस, सीमाएँ । ५७ चापा को सजा पर साथ कर देंगी पभी-कभी। मन पुरच जाता है, कित्ती अच्छी है ममी और बड़ी बहन, कितना प्यारा है वी आई वी ई के, विवेक । इसी तरह मेरा भय पट जाता है। ये सब बहुत बड़े और ऊँचे हो जाते हैं । अच्छे और साफ लोग । उदार और आधुनिक लोग । कमी-कभी हम सबको एक दूसरे को प्रतीक्षा भी करनी पड़ती है । लेकिन हमारी प्रतीक्षाओ मे न कोई ट्रेजडी है ना सामयिक नैराश्य । हमारी प्रतीक्षाएँ निहायत छोटी होती हैं और हम जब भी उम्मीद ररते हैं या चाहते हैं एक दूमरे के लिए उपलब्ध हो जाते हैं। जय हमे उलाहनो, पितायत और मोठी तक्रारी का स्वाद लेने की तबीयत होती है तो दो एक दिन की डुबकी लगा लेते हैं। सलिए प्रतीक्षा हमारे लिए खेल की एक प्रक्रिया है या सेल ही है जिसने आपसी सम्बन्धी पो परिचप और दोस्ती से भी ऊपर कर दिया है। ऐसा लगता है। इधर कई दिनों से वियेक के घर नहीं गया हूँ | हिम्मत नहीं हो रही है और इस न जा पाने से तकलीफ भी है। विवेक बहुत नाराज है । चलने की जिद करता है पर मेरे पास बहाने हैं । हिम्मत नहीं है इसलिए जिद्दी हो उस दिन सविता भी बार-बार मुझे चुटकी काट रही थी। मैंने भी जरा- सा खीच लिया तो सीये तन पर गिर आई। तभी उघर से बड़ी बहन आ गई। तुरत मुंह फेर कर लौट गई। सविता जी को काठ मार गया, "अव क्या होगा " मैं लौट आया। तभी से नहीं गया हूँ। आज विवेक, ममी और वडी वहन को लेकर घमक गया है । ममी पूछती हैं, 'क्यो रे कहाँ गायब रहता है, आजकल, सविता से कुछ कहा सुनी हो गई है क्या?" वे कमरा देखती रहती हैं। पहली दफ आने वाला जैसे देख सकता है उसी तरह देख रही है । "नही ममी आप भी क्या वह रही हैं," मैं तपाफ से जवाब देता है। बड़ी बहन मेरे प्रतिरोध के बावजूद झाड लेकर कमरा साफ करने लगती है। ममी किसी पत्रिका को उलट रही हैं। विवेक की ५८ । फेस के इघर और उधर - । आँखो मे शैतानी है, "क्यो बच्चू अब घर चलोगे कि नही?" मैं छोटे बाबा के साथ खेलने लगता हूँ। बडी वहन विनोद कहती है, "माई साहब आपको बच्चे अच्छे लगते हैं, अब आप शादी कर लीजिए।" मैं झेंपता हुआ हँसता हूँ। ममी कहती हैं, "चलो चलो, देर न करो छोटा वच्चा सविता से नहीं समलने का। कही रोता न हो।" अव जम्हाई लेती हुई कैलेण्डरो के चित्र ऊँची गर्दन करके देख रही है। बडबडाती हैं, 'चलते क्यो नही सब लोग और फिर जैसे ध्यान आ गया कि कुछ बात चीत मे छूट गई है। तो बड़ी बहन की तरफ मुखातिब हो वोलती है, "शादी! शादी तो सभी को करनी है सरो।" अव चलने को उठ गई हैं। मैं बहुत खुश हूँ कि उस दिन की घटना का कुछ भी बुरा नहीं हुआ । बडी बहन के प्रति मन नत है। विसी रूमानी सफलता का रेशमी ज्वार सरीखा आनन्द मन म भर रहा है। चार दिन बाद विवेक के घर आया हूँ । सविता जी रोते हुए बच्चे का चुपकार रही है । हलाकान हैं, अब खुश हो गई लगती हैं । ममी कह रही हैं, ' मैं जानती हूँ इस सविता से कुछ नहीं समलता।' सुख से वीतते दिन एक अन्तराल में समाप्त हो जाने वाले हैं। मन अब ह्या परेगा। गर्मी की लम्बी छुट्टियाँ सर पर आ गई है। जिन छुट्टियो की भ्याकुल प्रतीक्षा होती थी, सोचता हूँ वे कम से-कम थोडा विम्य तो और करती आने म । पहली बार लगा बि संसार में अपने घर से अधिय प्यारा कोई दूसरा पर भी है। यह जानता हूँ कि छुट्टियो में घर जाने की चर्चा कर मैं अपनी गाम सराव करने पर तुम हूँ। छुट्टिया म प नही पपता पर ज दी जा पडेगा। यह रामसत हुए वि आने जाने, बिछुड़ने की बात परी जबरदस्त होती है, उनसे अपलोम हाता है और वे अमानी ग मन पर हावी हो जाती है, मैं वैसी ही यातें करन लगा है। अभी मैं समोअप हर की विसपनाएँ यता रहा हूँ। ममी, वही वहन, विवेर और सविता जो म पापी बोतहर है। पीर पोरे उदामी को गिरफ्त वा आमव होने लगता है। शायद हम सब इस सागो मा अनुभव करना भी चाहते हैं क्यापि हम इग आमा म यही अपनी - सीमाएं। ५९ घनिष्टता प्रमाणित होने लगती है। ममी रह रही हैं, "तुम चले जाभोगे, इधर विवेक के जीजा भी आने वाले हैं । वे सरो को ले जाएंगे, फिर घर साने लगेगा।" इसका उत्तर हममे से विसी के पास नहीं है, इसलिए सामोशी रहती है । सामोशी वे इन क्षणो में शायद ममी ने मेरे जाने को मजबूरी का अनुभव कर लिया है । उहोने अपने इतने लम्बे जीवन मे कापी कठिन समय वो झेला होगा इसलिए उनकी भावुक्ता का सक्षिप्त होना स्वाभाविक है। वे स्टोव जलाने लगी हैं । अभी दूसरे काम भी करने लगेंगी। चाय का पानी रखते हुए उन्होंने मुझसे कहा, "बेटे चिटठी लिखते रहना और अपने घर में सबसे हमारी नमस्ते कहना।" सविता जी से तो पिछले दस दिनो से मैं छुट्टियो की बात की पुनरावृत्ति फरता रहा हूँ। छुट्टियो के प्रसग मे सविता जी का उदास हो जाना मुझे एक विल्कुल दूसरे किस्म का सुख देता है। यह सुप 'एकमात्र' है । यद्यपि फिर मैं भी उदासी का शिकार हो जाया करता हूँ। अभी जब मैं ममी से बात कर रहा था तो काफी देर चुपचाप बैठी रहने के बाद सविता जी एकाएक झपट कर वगल के कमरे में चली गई हैं। उन्होने बिस्तर पर लेटकर अपनी आँखो के सामने एक पनिका सोल ली है। वीच बीच मे उन्होने मुझे बात करते हुए देखा और मैं यह समझता रहा विषम कम वे पधिका तो कतई नही पढ रही हैं । आँख मिलने से मौको पर शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि हमारी आँखो से कोई मजाक एक-दूसरे की तरफ नही लपका है। डेडो बैठक म दोस्तो के साथ 'निज' खेल रहे है । स्टोव जलने की आवाज आ रही है । विवेक कपडे पहनने गया होगा। फिलहाल कमरे मे अकेला हूँ । मुझे खयाल आ गया है कि अभी मेरी छुट्टियो को चार-पांच दिन बाकी हैं। शायद मैंने अपने ज ने के दिन को पाँच दिन पूर्व, आज ही आशिक रूप से भुगत लिया है । जाने की कितनी दहशत है । ऐसा लगता है कि सबको एक भ्रम हो गया है । मैं अभी बताऊँगा कि मुझे अभी पांच दिन बाद जाना है तो लोगो को सचमुच लगेगा कि वे सब एक भ्रम के शिकार हो गए थे। भ्रम का 1 टूटना लोगों को सुखी कर पायया । .
६० ! फैन्स के इधर और उधर मैं कुछ खुश हूँ, थोडी देर पहले निराश और उदास था । मेरी इच्छा हो रही है कि कमरे मे बत्ती जल जाय क्योकि अधेरा व्याप आया है । चाहता है कि सविता जी रोशनी करने आएँ तो उन्हे वता कि मुझे अमी पांच दिन और रहना है । मैं खुद रोशनी के वजाय इंतजार करता हूँ। लगता है चाय वन गई है । अब ममी आएँगी । वे आकर वती जलाये उससे अच्छा है खुद ही उठू, मैं तय करता हूँ। तब तक सविता जी अपने कमरे से चार लम्बे चाप देते कदम चलार आती हैं और बत्ती जलाकर लगभग डॉट सी देती हैं, "अघरे मे क्या माला जप रहे हैं, कहीं घूमने-फिरने नहीं जाना है क्या ?" में दाहिने पजे की पांचो उँगलियो को फैलाकर उन्हें बताता हूँ, "पांच दिन की छुट्टी वाकी हैं यमी, मुह मत लटकाओ।" सविता जी मेरे सामने खुश नहीं हुई। वे वापस अपने कमरे मे खुश होने चली गई हैं। जाने के पहले, बचे कुछ दिनो विवेक मेरे साथ काफी रहा है । यद्यपि मैं उसे, उसके प्रेम के सम्बन्ध मे कुछ सहायता नही पहुँचा सका हूँ फिर भी जज- वान मे वहाकर उसे काफी भावुक रखने की चेष्टा मैंने अवश्य की है । ऐसा मैं वातावरण के लिए करता रहा हूँ। मैं साहस करके किसी मौके पर अपने और सविता जी के सम्बन्ध की बात उसे बता देना चाहता हूँ जवकि वह खुद इसे नही समझ रहा है । मैं यह भी जानता है कि यह केवल विसी तरह प्रकट भर कर देने की बात है। फिर भी विवेक, निश्चित ही एक सेतु बन जाएगा। अभी तक मौका नही आ पाया है और मैं समझता हूँ कि अय लखनऊ से एक चिट्ठी मे ही लिखकर व्यक्त कर देना ज्यादा आसान और अच्छा होगा । अब मैंने यही तय कर लिया है। विवेक को आना चाहिए । समय हो गया है। मैं अपना कुछ जरूरी सामान विवेक के घर में सुरक्षित रखने के लिए पैक कर रहा है। सामान रखार, जीजाजी को ले आज की आखिरी शाम गुपचुप बीयर पीने का कार्यक्रम हमस पहले ही बना लिया है। जीजाजी बडे मस्त हैं । वडी वहन को लेने आए हैं । मैं अब तत्परता से दोव पर लूगा। आज समय बहुत मजे में गुजरेगा। हम अपने पार्यक्रम में सीमाएँ । ६१ मचिता को नहीं रख सकते लेकिन यह स्थिति एक हल्की-सी अस्थायी चिलकन के अलावा मुझे विशेष नही खल रही है । हमने छुट्टियो मे अपनी भावनाओ के आदान प्रदान की व्यवस्था कर ली है । हमे आत्मतोष हो गया है। समय सात के करीब है । गर्मियो मे सात खट से बज जाते हैं । विवेक ने वहुत बिलम्ब किया। दो मिनट मे वह नही आयेगा तो मैं ही उधर चला जाऊँगा । शायद वह आया । जते वज रहे है । नही, कुछ लोग "ग्राउण्ड फ्लोर" मे गए हैं । आखिर सामान तो मुझे विवेक के घर पहुंचाना ही है । सविता जी से भी मेंट हो जायेगी-शाम की भेंट और ममी से भी। मैं कमरे से उतरने को हूँ, तभी कुछ कदमो के ऊपर चढने की आवाज होती है । मैं समझ गया है कि इस वार विवेक ही है । मैं दौडकर कमरे में रोशनी कर देता है। फिर कुर्सी पर बैठ जाता हूँ, यह दिखाने के लिए कि इतजार कर रहा हूँ और इतजार की भी हद होती है। मन मे, शिकायत करने, विवेक से झूठ लडने की चुहुल भर जाती है । विवेक हमेशा की तरह तेजी से घुसता हुआ नहीं आया है । जीजा जी थोडा ही पीछे हैं । मैं विवेक से विलम्ब को शिकायत नहीं कर पा रहा हूँ। उसका चेहरा विचित्र रूप से खीझा तथा दुष्ट नजर आ रहा है । मैं खडा हो गया । उसकी दृष्टि मे एक विचित्र रहस्यामास था । वह मुझे अविश्वास से घूरता रहा। वह गुस्से मे था और धाराप्रवाह अपने गुस्से को प्रकट करने के लिए कही चुरी तरह अटका था । जाहिर होता था कि वह अभी चोलेगा । पोलेगा क्या पट पडेगा । मुझे यह सब कुछ समझ नहीं आ रहा है । यह बोला नहीं, उन्मत उसके मुह से कुछ साधारण गालियां निकली १ टूटती-फूटती । उसने जेब से निकाल कर कागज का एक मुडा टुण्डा पर फैया । मुझे उस कागज यो देखने की आवश्यकता नहीं है । मैं समझ गया हैं। विवेक ऐसे और भी कागज सविता जी से निकलवा सकता है। इसलिए मैं चुप है। उसका चेहरा पसीने से नहा गया है और नाव की ऊपरी गोलाई अलप साफ लाल दिम्बाई दे रही है। वह लगमय ये उठा, मैं तुम्हे अपना टेबल पर ६२ । फेन्स के इधर और उघर " - सच्चा दोस्त मानता था। तुमने सवी (सविता) पर डोरे डालने शुरू कर दिए। मेरे ही घर में आग लगाने की कोशिश की । तुझे दुनिया मे कोई मिला ही नही जीजाजी मुझे बडी दयनीयता से देख रहे हैं । उनकी मुखाकृति पर विवेक के प्रति भरपूर समर्थन उतर आया है। शायद उनमे, विवेक के लगभग रो उठने के कारण, मेरे प्रति क्रोध भी पैदा हो रहा होगा । या खीझ । मैं कुछ कह नही पाता हूँ। मुझमे ताकत नहीं रही है । मुझे केवल जाशी, विवेक के दोस्त और प्रमिला की याद आती है । मैं यह भी नहीं चाहता कि ये लोग चले जाएँ । पर वे दोनो जा चुके है । इधर शहर की भत्सना करने और लोगो से चिढ़ते रहने की प्रवृत्ति पुन बलिप्ठ होती जा रही है । छुट्टियां भारिल हो गई है। कुछेक दिन पहले सविता जी का एक छोट-सा पत्र आया था । उसमे उहोंने सब कुछ के लिए खुद अपने को जिम्मेदार मानने की कोशिश की थी। ' मुझे एक बार जरूर माफ कर दीजिएगा । विवेक भया ने हम अलग करने के लिए जो कुछ किया वह मैं भूल नहीं सकूँगी। आखिर ईश्वर ने भी इस पाप का उन्हे खूब कठार दण्ड दिया। प्रमिला ने उन्हे ठेगा बता दिया है। उसकी शादी आपके लखनऊ के ही किसी इन्जीनियर से तय हुई है। आजकल दिन भर उनका मुह बना रहता है।" इस सूचना से मुझे एक निरथक किस्म की हलकी सी तसल्ली हुई थी। - ६ फेन्स के इधर और उधर हमारे पडोस में अब मुखर्जी नही रहता । उसका तबादला हो गया है । अब जो नये आये हैं, हमसे कोई वास्ता नही रखते । वे लोग पजाबी लगते हैं या शायद पजाबी न भी हो। कुछ समझ नही आता उनके बारे मे । जव से वे आये हैं उनके बारे में जानने की अजीब झुझलाहट हो गयी है । पता नहीं क्यो मुझसे अनासक्त नही रहा जाता । यात्राओ मे सहयात्रिया से अपरिचित नही रहता । शायद यह स्वभाव है । लेकिन हमारे घर में कोई भी उन लोगो से अनासक्त नहीं है ! हम लोग इज्जतदार हैं । बेटी बहू का मामला, सब कुछ समझना पडता है । इसलिए हम लोग हमेशा समझते रहते है । उत्सुक रहते हैं ओर नए पडोसी की गतिविधियो का इम्प्रेशन बनाते रहते है । मैं उहे सप- रिवार अपने घर बुलाना चाहता हूँ, उनके घर आना जाना चाहता है, पर उन लोगो को मेरी भावनाओ की सम्भावना भी महसूस नही होती शायद । उनका जीवन सामान्य किस्म का नहीं है । वे अपने वरामदे के बाहर वाली कठोर भूमि के हिस्से पर कुसियां डाले दिन के काफी समय वैठे रहते हैं । उनकी ये पुसियां हमेशा वही पड़ी रहती हैं। रात को भी। वे लापरवाह लोग हैं, लेकिन उनकी कुसियों कभी चोरी नही गई। हमारे मकान के एक तरफ सरका दफ्तर है और ऊँची ईटो की दीवार भी, पीछे दोमजिले इमारत के फ्लैट्स का पिछवाडा है और सामने मुख्य सत्र । इस प्रकार हमारे परिवार को किसी दूसरे परिवार की प्रतिक्षण निक- टता अव उपलब्ध नहीं है। बड़े शहरो म एक-दूसरे से ताल्लुक न रस, अपने मे ही जीने की जो विशेषता देखने को मिलती है, कुछ उन्ही विशेषतामओ और रास्तारो वे लोग हमारे नए पडोसी लगते हैं । यह शहर और मुहल्ला दोनो ६४ । फेन्स के इधर और उधर शान्त है । लोग मथर गति से आते-जाते और अपेक्षाकृत बेतकल्लुफी से चहल. कदमी करते है, क्योंकि जीवन में तीव्रता नही है । इसीलिए हमें अपने पड़ोसी विचित्र लगते हैं। मै बाहर निकलता हूँ। वे लोग सुबह की चाय ले रहे हैं । नौ बजे हैं । पति-पत्नी के अलावा एक लड़की है । लड़की उनकी पुत्री होगी। ये तीन लोग ही हमेशा दिखाई पड़ते है । चौथा कोई नहीं है । यो तो लड़की सुन्दर नही, पर सलीके वाली युवती है । शायद ठीक से मेकअप करें, तो सुन्दर-सी लगे । मैं देखता हूँ कि वह अक्सर और खूब हँसती है । उसके मां-बाप भी हंसते हैं । वे सव हमेशा खुश ही नजर आते है। उनके पास कसी वाते है और वे क्यों हमेशा हंसते हैं ? क्या उनके जीवन में हंसते रहने के लिए देर-सी सुखद परिस्थितियां हैं ? क्या वे जिन्दगी की कठिन और वास्तविक परिस्थितियों से गाफिल है ? मुझे आश्चर्य होता है । मैं अपने घर और पड़ोसी परिवार की तुलना करने लगता हूँ। अभी-अभी वे लोग मुझे चौकाते हुए बेहतर हँसी में फूट पड़े हैं । मेरा ध्यान गुलाब की क्यारियों की तरफ था। मेरी खुरपी रुक गयी । उनकी हंसी रुक नहीं पा रही है। लड़की कुर्सी छोड़कर उठ गई है। उसने छलकने के डर से चाय का प्याला अपनी मां को थमा दिया है। वह सीधे नही खड़ी है, दोहरी हुई जा रही है। कोई चुटकले सरीखी बात होगी या चुटकुला ही, जिसने उनमें हँसी का विस्फोट कर दिया है । लड़की हंसने से विवश हो गई है । उसे सुध नहीं है कि उसका दुपट्टा केवल एक कन्धे पर रह गया है । उसकी छातियों में मुक्त और अवोध हरकत दीखती है। बहुत हो गया। उसकी मा को अव उसे इस वेमुधी पर झिड़कना चाहिए। पता नहीं वह कैसी है कि उसे बुरा नहीं लगता । शायद मेरे अलावा उनमे से किसी का भी ध्यान उस तरफ नहीं है। मैं प्रतिदिन किंचित मजबूर हो जाता हूँ। मुझे यपने नये पड़ोसी के प्रति में विवश खिंचाव बढ़ता महसूस होता है । मैं ही क्यों, पप्पी मी तो अक्मर कोहल से भरी, उस लड़की के करते के मरड़े की तारीफ करती रहती मन फैन्स के इधर और उधर । ६५ है। रसोई में से भाभी भी जवतव उनके पर की तरफ झोरती रहती है, और दादी को तो ना तक पता रहता है विनय पटोसी के यहां सिंघाडा और लौकी खरीदी गई और यब उनके यहां चूल्हा मुलगा है। इसके बावजूद व लोग हम लोगो में रत्तीभर भी रुचि नहीं लेते । वह लडयो हमारी तरफ कभी नही देसती उसके माँ बाप भी नही देखते । एसा भी नहीं रगता कि उसका हमारी तरफ न देखना सप्रयास हो । बातचीत करने की स्थिति तो सुदूर और अकल्पनीय है । शायद उह अपने ससार में हमारे प्रवेश की दरार नही है। मुमति है कि वे हमे नीचा समझते हो । या उन्हें हमारी निकटता से मिसी अशान्ति का सन्देह और भय हो । पता नहीं, इसम कहाँ तक सचाई है लेकिन उस लडपी के मां बाप की आँखो में अपने पर की छाती पर एक जवान लडवा देखकर, अपनी लडकी के प्रति वैसा भय नही रहता जैसा मेरे दोस्ता को देखकर मेरे पिता के मन म पप्पी के प्रति भर जाता है। उनके यहाँ रेडियो नही बजता, हमारे घर अवसर नोर से बजता है। उनके घर के सामने छूछी जमीन है । यही एक भी दूर नहीं है । हमारे घर के सामने लॉन है वगल मे तरकारी की वाडी और तेज गंध वाले फूलो की क्यारियाँ भी। वह रहकी क्यो नही मेरी बहिन और भाभी को अपनी सहेली बना रेती ? उसके माता पिता क्यो मेरे माता पिता से घुल मिल नही जाते ? वे हम अपने प्याला से अधिक सुदर प्यालो मे चाय पीते हुए क्या नहीं देखते ? उनको चाहिए कि वे हमे अपने सम्पर्कों की सूची मे जोड लें उन्ह हमारी तमाम पीजो से ताल्लुक रखना चाहिए । फेस पर ही हमारी तरफ घना ऊंचा इमली का पेड है । उसम छह-व्ह इच लम्बी पलियां लटकती है। लडकियो को इमली दखकर उमाद हो जाता है, पर पडोस की यह लडकी फलियां देखकर कभी नहीं ललचती। उसने कभी हमारे पेड से इमलियां तोडकर मुझे खुश नहीं किया। मैं प्रतीक्षा करता हूँ। हमारे पडोसी की ऐसी वोई दिक्कत नही जिसके लिए उहोने कभी
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फेस के इधर और उधर । ६७ से खिलवाड करते हुए इधर उधर चले जा सकते हैं । पहले जाते भी थे, अव नहीं जाते, क्योकि हमारे पडासी के लिए फेस कमी न लांघने वाला अथ ही देती है। उन्हें आए तीन महीने हो गए है । अक्सर पढने के लिए मैं अपना डेस्क बाहर निकालता रहता हूँ । वाहर हवा आजकल बडी सुखद लगती है, उसी तरह जैसे गर्मी की तेज प्यास मे वर्फ जल । लेकिन बाहर पढना दुश्वार हो झाता है। आँखें फस लांघ जाती है । मन पडोसी घर मे मडराने लगता है। युवा और असम्पृक्त लडकी । खुश मिजाज और वेखौफ माता पिता । काश मैं उनके घर म ही पैदा हुआ होता ! मन यूं उडता है। कभी कभी यह पडासी गडवी अवेली ही वैठी रहती है । कोई काम करती हुई अथवा बेकाम ! घूमते घूमते अपने मवान के परले तरफ वाली चारदीवारी तक चली जाती है । कुहनियां टेक्कर सडक देखती है । लौट आती है । हमारे मुहल्ले मे दूसरे महल्लो के आवारा लहये भी खूबे आते है । वैसे हमारे महल्ले मे भी कम नहीं हैं लेकिन वह हमेशा अवोध और मुक्त रहती है । उसके डग छाटे और मस्त है। इसके विपरीत हमारे यहाँ तो भाभी पूजा के फूल भी पप्पी के साथ लेन निकलती है । वे बाहर भी डरती है और घर मे भी । उहे डरा कर रखा जाता है। पप्पी पर भी तेज निगाह है । एक बार पडोसिन लडकी का पिता अपनी पत्नी के वधे पर हाथ रखकर बात करने लगा तो तुरन्त पप्पी पो पिसी बहाने अदर बुला लिया गया । फिर तो उस दृश्य ने हमारे घर म एवं खलबली सी मचा दी। कैसी निर्लज्जता है । धीरे-धीरे हमारे घर वे लोग पडोसी को काफी खतरनाक समझने लगे हैं। दिन तो बीतते ही हैं । अब हमारे यहां जवरन पडोसी के प्रति रुचि लेपर अरुचि उगली जाने लगी, जबकि हमारे लिए उनका होना बिलकुल न होने के वरावर है । धीरे धीरे हमारे घर में पडोसी का दुनिया की तमाम बुराइयो का सदम बना लिया गया है। हम लोगा की आंखें हजारोबार फेस वे पार जाती हैं। जरूरी गैरजरूरी रोजमर्रा के सभी कामा क बाच यह भी एक क्रम वन ६६ । फेन्स के इधर और उधर हमारा सहयोग पाने की जरूरत समझी हो । जैसे हमारे घर और दूसरे घरी मे बहुत-सी अन्दानी और छोटी-मोटी परेशानियां होती हैं, वैसी शायद इनके यहाँ नही है । नहीं होना एक अचम्भा है । तीनो मे से कभी किसी को चिन्ता. तुर नही पाता। एडकी के पिता के ललाट पर शायद बल पडते हो और उसकी मां कभी कभार अपने पर उबल भी पडती हो, लेकिन यहाँ से कुछ दिखाई-सुनाई नही पड़ता । सम्भव है कि लडी के मन में उसका अपना कोई सर्वथा निजी कोना हो । कोई उलझन या जज्वाती कशमकश हो । हो या कतई न हो । निश्चित कुछ नही समझा जा सकता। रात को अधिवतर उनके बीच वाले कमरे की रोशनी जलती है, जिसमे मुखर्जी अपने पूरे घर को लेकर सोता है । लगता है वे अन्दर भी एक साथ बैठते और बातचीत करते है । उनके पास इतिहीन गाथायें होगी और वार्ता- लाप वे अक्षय तृप्ति वाले विषय । स्वयमेव एक लम्बी और ठडी सांस छूट जाती है । हमारे घर मे तो मौसम, मच्छर, बच्चो की पैदाइश, रिश्तेदारी की बहुओ, 'चूल्हा-चौका तथा वर्तमान का मजूमर निकाल देने वाले भव्य अतीत के दिव्य पुरुषो का ही बोलवाला है । उनके और हमारे मकान के बीच की फेस एक नाममात्र का निषेध है । फेन्स मिट्टी की एक फुट ऊँची मेड-मर है। कडुवा वरौदा और एक लम्चे हिस्से तक सूखी ऐंठी जगली नागफ्नी का सिलसिला । अज्ञात नामो वाली कुछ झाडियां, जिनकी जडो मे हमेशा दीमक लगी रहती है । इन झाडियो को पत्तियां कडे हरे रंग की हो गई हैं । मेड वीच बीच मे कई स्थानो से कट चुकी है। रास्ते बन गए है। इन रास्तो से सब्जी और फ्लवाला आ जाता है, जमादारिन और अखबार का हॉकर आता है । पोस्टमैन और दूधवाला वरसो से इन्ही रास्तो का उपयोग कर रहे हैं । कुत्तो विल्लियो के वेधडक आने जाने तथा घास और फल पौवे चरने वाले पशुओ से नुकसान सहने के याद भी फेन्स वैसी ही बनी हुई है । कुछ दिन पहले तक मुखर्जी की वच्ची शैला मेरे पास 'बोईद' (पुस्तक) लेने इन्ही रास्तो से आती रही है । यह इतनी मुविधा- जनक और आसान फेस है कि हम साइक्लि से विना उतरे, बटे हुए हिस्सो फेन्स के इधर और उधर । ६७ से खिलवाड़ करते हुए इधर-उधर चले जा सकते हैं । पहले जाते भी थे, अब नही जाते, क्योकि हमारे पड़ोसी के लिए फेन्स कमी न लांघने वाला अर्थ ही देती है। - उन्हें आए तीन महीने हो गए हैं । असर पढ़ने के लिए मैं अपना डेस्क वाहर निकालता रहता हूँ। बाहर हवा आजकल बड़ी सुखद लगती है, उसी तरह जैसे गर्मी की तेज प्यास में वर्फ जल । लेकिन वाहर पढ़ना दुश्वार हो झाता है। आँखें फेन्स लांध जाती है । मन पड़ोसी घर में मंडराने लगता है। युवा और असम्पृक्त लड़की। खुश मिजाज और बेखौफ माता-पिता । काश मै उनके घर में ही पैदा हुआ होता! मन यूं उड़ता है। कमी-कभी यह पड़ोसी लड़की अकेली ही वैठी रहती है । कोई काम करती हुई अथवा वेकाम । घूमते-घूमते अपने मकान के परले तरफ वाली चारदीवारी तक चली जाती है । कुहनियाँ टेककर सड़क देखती है । लौट आती है । हमारे मुहल्ले में दूसरे मुहल्लों के आवारा लड़के भी खूब आते हैं । वैसे हमारे मुहल्ले में भी कम नहीं हैं, लेकिन वह हमेशा अबोध और मुक्त रहती है । उसके डग छोटे और मस्त है। इसके विपरीत हमारे यहाँ तो भाभी पूजा के फूल भी पप्पी के साथ लेने निकलती हैं । वे बाहर भी डरती हैं और घर में भी। उन्हें डरा कर रखा जाता है। पप्पी पर भी तेज निगाह है । एक बार पड़ोसिन लड़की का पिता अपनी पत्नी के कन्धे पर हाथ रखकर वात करने लगा, तो तुरन्त पप्पी को किसी बहाने अन्दर बुला लिया गया। फिर तो उस दृश्य ने हमारे घर में एक खलबली सी मचा दी। कैसी निलंज्जता है। धीरे-धीरे हमारे घर के लोग पड़ोसी को काफी सतरनाक समझने लगे हैं। दिन तो वीतते ही हैं । अब हमारे यहाँ जबरन पड़ोसी के प्रति रुचि लेकर अरुचि उगली जाने लगी, जबकि हमारे लिए उनका होना विलकुल न होने के बरावर है । धीरे-धीरे हमारे घर में पड़ोसी को दुनिया की तमाम बुराइयो का संदर्भ बना लिया गया है। हम लोगों की आंखें हजारों बार फेन्स के पार जाती है । जरूरी-गैरजरूरी रोजमर्रा के सभी कामों के बीच यह भी एक क्रम वन ६८ फैन्स के इधर और उधर गया है । वहुत-सी दूसरी चिन्ताओ के स थ मन मे एक नई उद्विग्नता सामने लगी है मैं खुद भी अपना बहुत-सा समय जाया करता हूँ लेकिन उधर से कोई नजर कमी इधर नही आती। पास कही 'आउटर' न पाकर खड़ा डीजल इजन चीख रहा है । उसकी आवाज का नयापन चौंकाने वाला है । हम सब अभी थोड़ी देर तक डीजल इजन के बारे में बात करेंगे। आज वे पडोसी दोपहर से घर मे नही हैं । उनके यहां दो-तीन मेहमान सरीसे लोग आकर ठहरे हैं । कोई हवड-धवड़ नही है । रोज की-सी ही निश्चि- न्तता । मैं उठफर अन्दर गया। भाभी वाल सुखा रही हैं । फिर पता नहीं क्यो उन्होंने पडोसी लडकी से मेरा सम्बन्ध जोडकर एक गुपचुप ठिठोली की। मैं मन मे हंसता वाहर आ गया । तभी वह लडकी और उनकी मां भी पैक किया हुआ सामान लिये शायद बाजार से लौटी हैं । पिता पीछे रह गया होगा। शाम मोर दूसरी सुबह मी उनके यहां लोग आते जाते रहे । पर उन्हे ज्यादा नहीं कहा जा सकता । उनके घर एक साधारण पर्व सरीसा वातावरण उभर आया था। फीका-फीका । लेकिन यह हम सबको चक्ति करने वाला समाचार लगा, जव दूधवाले ने बताया कि उस लडकी का व्याह पिछली रात को ही हुआ है । यही परेड या कोई वायू है । आर्यसमाज मे शादी हुई है । भाभी ने मेरी और मजाकिया सेद से देखा और मुझे हंसी आ गई । बड़ी पुलकर हंसी आई । यह सोचकर कि हम सब लोग कितने हवाई हैं। उनके पर दो-चार लोग बीच-बीच मे मा रहे हैं। ये लोग घर के अन्दर जाते हैं और थोड़ी देर बाद बाहर निकल पर चले जाते हैं । ज्यादातर गम्भीर और आशासनप्रिय लोग है । कभी-कभी पुछ बच्चे इपट्टे होपर पिलवारत और दोट लेत है और कोई घूम नहीं है । राव युछ आसानी और गुविधा से होता हुआ अंगा। पा नहीं पा यौर शिस तर होता हुआ ? हमारे घर में पर बड़ी येनी या नि है । घण्टो याद यह लपी वाहर आई। गायर पाली बार उसने सारी पहनी थी। गाड़ी मम्मालो और हाय में नारियल लिया फेन्स के इधर और उधर । ६९ बरामदे मे चली । वह चैतन्य है, लेकिन उसके मस्त डग साडी मे लिपट कर बहुत सक्षिप्त हो गये है । वह अपनी दृष्टि म अगले कदम के दृश्य को धरकर चलती रही। उसने न कोई आड ली और न पति के सटकर चलने के बावजूद उसम परम्परागत नववधू का सा सकुचित वाकपन और लाज ही उत्पन हुई। उसके पति की सूरत मुझ अपने किसी दोस्त सी लग रही है । कोई भी रो- पीट नहीं रहा है । लड़की की मां उसके दोनो गालो को कई बार गहराई से चूम चुकी है । पिता उसके सर पर हाथ फेर रहे है । अव लडकी को आँखा मे हल्के पानी की चमक और नये जीवन का उत्साह छिप नही पा रहा है । पेन्स के एक कोने से दूसरी तरफ गिलहरियां दौड रही है । अम्मा मुझसे लडकी के न रोने पर आश्चर्य प्रकट कर रही है । उनके अनुसार यह पढ़ लिख जान के कारण एक कठोर लडकी है जिसे अपने माँ बाप से सच्ची मोह ममता नहीं है। "आजकल सभी ऐसे होते हैं । पेट पाटकर जिह पालो पोसो उन्ही के भांखो में दो बूंद आंसू नही । मेरे कानो को ऐसा कुछ सुनने की रचि नहीं है । मैं यह देख रहा हूँ कि अम्मा को धूप अच्छी लग रही है । धूप का टुकडा जिधर खिसकता है उसी तरफ मां भी हट जाती है। लेकिन तभी पिता एक प्रशस्ति उपस्थित करते है, 'पहले जमान मे लडकियो गांव की हद रोती थीं । जो नही रोती, उन्हें मार• फर रुलाया जाता था, नही तो उनका जीवन ससुराल मे कभी सुखी नहीं रह सकता था।' पिता को वडा दर्द हुआ कि आज वैसा नहीं रह गया है । पुराना जमाना जा रहा है और "आदमी का दिल मशीन हो गया है, मशीन ! ऐस समय हमेशा पिता का स्वर तेज हो जाता है और आँखो म कलयुग के सम्डहर नाचने लगते हैं। हमारे घर के आकाश पर वादलो के कुछ छोटे और अकेले टुकडे आकर भाग निकल गए हैं । पडोसी लडकी को उसके माता-पिता और रिश्तेदार अव पूरी तरह विदा करने के लिए पाटक तक पहुंच कर खडे है। लड़के वाले पपू के लिए हाल्ड' लाए हैं । हेराल्ड एक रगीत कमरा लगता है । वह रगीन ७० । फेस के इधर और उधर कमरा धीरे धीरे सिसवने लगा । अव चला गया है। सबसे अधिक तोगा दादी को है। व अपने अकेले में ही बडवडा रही हैं । उन्हे यह ब्याह शादी बिलकुल समझ नहीं आई। "न रोशन चौकी, न घूम घडाका न तर पकवान । ऐसी कजूगी विस काम की ! और फिर एसे मौके पर पडासी को न पूछना, वाह रे इन्सानियत । राम राम।" चे लोग लडकी को विदा करके लौट आये है। उन लोगो ने अपने अपने लिए कुसियां ले ली हैं और बाहर ही वैठ गए हैं । लडकी के चले जाने के बाद उसकी मां कुछ सुस्त और सजीदा हो गई है। कई लोग मिल-जुलकर उसके मन को गुदगुदाने की शायद चेप्टा कर रहे हैं। मेरा दोस्त राधू यह दावे के साथ सावित करने की कोशिश करता है कि वह लडकी दुनिया देखी हुई थी। एक गहरी कमी से उत्पन्न उदासी के अलावा मुझे कुछ और अनुभव नहीं होता। अजीव सा खालीपन | पीछे हटे रहने का खालीपन अथवा उस लडकी के सम्बन्ध मे राघ की लापरवाही धारणाओ से उत्पन खालीपन । विलकुर अज्ञात्त । लडवी के बदचलन होने वी वात कमी पभी एक पतित इतमीनान भी देने लगती है। शायद मैं भी मन के किसी कोने म अपने घरवालो की ही तरह पडोसी को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा हूँ । रात शाम का वंचुल उतार रही है । फेन्म पार टेवल के इद गिद बैठ लोग उठ उठकर विखर गए है। रोज की तरह पडोसी विचले कमरे में विजली का लटटू जल गया है । दरवाजो के कांचो के खुरचे हुए हिस्सो पर मटमैली रोशनी धव्वा की तरह चिपकी है । उनको रात शात और नियमा- नुसार हो चली है । पता नही उहे घर म एक व्यक्ति या कम हो जाना कसा लग रहा होगा? हमारे घर तो पड़ोसी निन्दा का बाजार बहुत गरम है ।
७ शेष होते हुए अपना हैण्डबैग और पूरयेस रिक्शे से उतार कर मझला घर से सामने खडा हो गया है। रिक्शा जाते हुए झनझना रहा है, फिर भी सनाटे म कोई फर्क नहीं है । मपला शीघ्रता से घर में नहीं घुस जाना चाहता । वह रुका है। मकान की सदर दीवाल, जब वह पिछली बार आया था तब को बनस्पति और ज्यादा कानी हो गयी हैं । कुछ वर्षों में उनकी गीली पुताई बिल्कुल भूमिल पड जायेगी। पिछवाडे के ऊँचे पीपल की अलग बाहर निकली डगाल पर आधे में कम चांद है । मझले को अपना घर एक कृत्रिम सेट सरीखा लग रहा है । जैसे वह किसी नकली जगह के सामने व्यर्थ खडा हुआ है । इसलिए कि सेट' का काम पूरा हो चुका, अब वह केवल नष्ट हो जाने के लिए ही बचा है। कुछ ही पलो मे यह आभास गुम हो जाता है और मझला सडक की पटरी से घर पी हद म घुस आता है । लोहे का, जमीन पर लटका, फाटक खुलने के लिए मुश्किल से धमका है। मामले की आंतो में पिछले वर्ष घर आने के अपने उत्साह और उमग की तस- वीर नाचने नाचने लगती है। वह एफ सास ढग से कॉलवेल वमाता, जिसमे संगीत पैदा करने की हल्वी चंचल कोशिश भी शुमार होती । रात साढे नो या दस के आसपास का समय, किसी पूर्व सूचना का न होता, शनिवार या किसी दूसरी छुट्टी से लगा दिन, महीने का पहला पखवारा, लोग मझले की उम्मीद किया करते थे । मक्षला आता था। नौकरी के पहले-दूसरे वर्ष तक । फिर दुनिया के सभी लोगो की तरह घरवालो मे भी मझले के आने पर अक्सर को जाने वाली उम्मीद चुक गई । इधर एक मामूली मुरिस के लिए भी हर उम्मीद को सुग्नद सयोग मे बदल देना सम्भव नहीं रहा ।
७२ । फेस वे इधर और उधर मझला सोचने लगा वि आसिर अपने घर जल्दी जल्दी अनावश्यक क्यो आता था 7 क्या इसलिए कि विघटन ने उसे अपने घर के प्रति बहुत मोहासक्त कर लिया था ? समय की व्यापक शक्ति सम्पन धारा उसे हमेशा निरीह करती रही, वह थक कर लौट जाता रहा । लेकिन मझला अव भी आता है । उसम उतना उत्साह नही रहा, परिस्थितियो ने उसे पाट दिया है, पर भावुकता और मोह का चेहरा पडा येहया होता है, उसमे स्मानी हैसियत वा छलावा हमेशा चमकता रहता है। ध्यापक अन्धकार पर केवल नक्षनो का अलग प्रकार है । मझला साच रहा है कि यह घटी बजायेगा तो किसी सयोग की आशका म मां लपर कर दरवाजा खोलने आ जायेगी। "आ गए बेटा" उसकी आँखे चमक उठेगी। उसकी दोनो वाहे उठेगी और नीचे चली जाएँगी । अव मझला बहुत बडा हो गया है। उसके मध्यमवर्गीय सस्कार जवान पेटे को छाती पर भीच कर प्यार नहीं करने देंगे। यह सव होता रहेगा । वह सामान रखेगा। इसी बीच पिता अपने कमरे मे थके थके खाँसगे । इस वृद्धावस्था मे उनका किसी के आगे न झुपने वाला मन और किस तरह से अपने गैरजिम्मेदार बेटे को आकर्षित करे ? ऊपर के कमरे मे फर्श पर कुर्सी के पांव पोछे खिसकेंगे । लगती और सीमट के फर्श के घर्षण से उत्पन एक निहायत सक्षिप्त और निरथक शोर फैल कर समाप्त हो जायेगा। टीनू दोम जिले से धम-धम उतरेगा। वह मझले के आगे-पीछे दो एक चक्कर लगायेगा, अपनी सुशी जाहिर करने के लिए मुस्करायेगा और वापस चला जायेगा । भैया भाभी तो पडे हैं, इसलिए उन्हे फमरे स निकलने म देर होती है या फिर वे सुबह ही मिलते हैं । तारा मायद ही जागती मिले। मझले ने जैसा सोचा, वैसा हो यन्त्रवत हुआ। वह वरामदे मे कपडे बदल रहा है उघर अन्दर मा पुसफुफा रही है, "माले को देखो, पोई खवर नहीं दी। इस बार बिल्कुल अचानक आ गया।" एष अस्तव्यस्तता से भरी घुप्पी और फिर वुदबुदाता हुआ आदेश, "चादर मव चीक्ट हो गई है । तारा दौड. फर दो एक चादर तो बदल दे पम पम कम ।" फिर लपक कर सुद झल्ली शेष होते हुए । ७३ खटियो का उनचन क्सने लगती है। मझला एक कमरे से दूसरे कमरे मे, उनचन क्सती हुई मां, तकियो पर खुली खोलियां चढाती वेहाल तारा, छाटे सफेद वालो वाली खोपडी से फूसी झडाते पिता, निदित भैया-भाभी और अणु अणु पर जमी धूल की पर्तों पर 'ग्रिम तुक' डालते हुए गुजर गया । पातावरण एक खास निरुत्साह को "विस्पर' कर रहा है । यह कितना वचगा। आंगन मे अवेरा है । गुसलखाने वा स्विच सराव हा गया है । कई वार खट- पट करने के बाद मझले को कुछ नही सूझा । वह लौटवर माँ के पास बैठ गया। क्सिी को कुछ सूझ नही रहा है जैसे । क्या बोले फिर पिता ही वोले । जम्हाई लेते हुए, 'लगता है आज तो गाडी समय पर आयी।" उनके बोलने मे नीद भरी है । अम्मा उनचन कस चुकी है । वह मझले को घूरती हुई कहत्ती हैं, "क्तिने वाले होते जा रहे हो तुम ? शीतल से भी ज्यादा । जव पैदा हुए थे तो गेहुआ रग था तेरा।" मझले को उठना पड गया । उसका विस्तर विछ जाये, तब तक के लिए मझला बाहर आ गया है । वह जानता है कि बाहर कुछ नही है, फिर भी आ गया है। इस वार मशला बहुत दिनो पर आ सका। अन्दर बाहर दोनो तरफ बहुत सी चीजें जो आसानी से बदल सकती है, बदल गयी हैं । परिवर्तित स्थितियो ने मझले को बोझिल कर दिया है । उसे फठोर दृश्यो को स्वीकार करना पड़ रहा है । वावा की कोठरी मे लोहा-लगड, कोयला लकडी और गोईठा आदि भर दिया गया है । बहुत पुराना एव टुटला हारमोनियम भी वही डला है । वड- खाना । यही बावा रामायण पदा करते थे। उनकी रामायण गुलाय गन्ध से भरी रहा करती। वे पन्नो के बीच पूजा के गुलाव दवा दिया करते । यही "कै खस खस का एक चावल" वाया गणित का अभ्यास कराते । परशियन गल्प के न्यायप्रिय बादशाहो घी रोमाचक कहानियां चलती । तव जीवन शात था । कोई घबराहट नहीं थी । कभी कभी मझले से वावा बुरी तरह सुनसा ७४ । फेन्स के इधर और उधर जाते और न बोलते । कोठरी म बडे बडे मूस हो गए है । मझला दरवाजा ओढ़का देता है। जिधर सहजन केला और कटहल थे उस पिछ्वाई की जमीन भैया ने अपना मकान बनवाने के लिए ले ली है। पेडो को कटवा के उन्होने अपने नये और पृथक् जीवन की नीव डालनी शुरू कर दी है। वे पसीने से लथपय दिनभर मजदूरो की कामचोरी बचाते रहते है । दफ्तर से उन्होने सिव लीव ले ली है । भाभी उनका चाय-नाश्ता भी वही पहुंचा देती हैं। भैया ने मझले से पुकार कर पूछा, "क्यो कब आये ?" "कल रात" । मझले की छोटी सी सूचना । "अरे मुझे पता नही चला । चलो अच्छा हुआ । सब ठीक ठाक चल रहा है ।" मझले ने जवाब दिया और बात समाप्त हो गई । मझला घूम गया । बगीचे में कुछ नहीं बचा । कुछ सूखे, अघहरे उठल और पत्तियो वाले टूटे फूटे गमले एक पेड के नीचे इकट्ठे रख दिये गये हैं । इसके अलावा वही पुराने मादा पी पीते और मीठे नीबू के नाटे झाड । कुछ क्यारियो मे पोदीना खोसकर जमीन को तर कर दिया गया। मझले ने देखा, एक ही घर में कई घर हो गए हैं । हर व्यक्ति थे कमरे दूसरे से अलग । एक स्वतन्त्र और पृथकता ज्ञापित करने वाला स्वभाव है । निजी व्यवस्था की प्रवृत्ति कुछ लोगो मे छोटे पैमाने पर अन्दर ही अन्दर प्रयत्नशील है । ऊपर वाले अपने कमरे मे टीनू ने एक अलमारी में शीशे की रकाबियाँ गिलास, प्याले और स्टोव भी छोड रखा है । उसके दोस्त वही चाय पीते है । वहाँ कुसियां हैं, वोतलो मे मनीप्लाण्ट, कटमाउण्ट पर मढे चित्र और सुन्दर बारह पेजी कलेडर। टोनू अपने कमरे, केवल अपने कमरे को अच्छा से अच्छा रखता है । दूसरे कमरो को अच्छी चीज ला लाकर अच्छा कर लेता है। भाभी का कमरा गुदडी बाजार है, लेकिन दैनिक उपयोग में आने वाली सबसे नयी, सुन्दर और फैशनेवुल चीजें उन्हीं के कमरे में हैं । प्रसाधन सामग्रियो की जैसी सुगन्ध भाभी के कमरे में व्याप्त रहती है वैसी यही नहीं होती।
शेप होते हुए । ७५ बरामदे वे पार्टीशन मे तारा पा स्लीपिंग यम स्टडी रूम बन गया है। साफसुथरा । उसका अपना पुरानी अलमारी को बदल कर बनाया गया वार- सोय है । अपना आयरन, अपनी सुराही, यहां तक कि अपने कमरे को साफ करने के लिए एक अलग झाडू । उसका कमरा पर का हिस्सा कम, छात्रावास अधिक मालूम होता है । यूनिवर्सिटी जाते समय वह पार्टीशन डोर पर एक छोटा सा ताला दवा दना नहीं भूलती। दरवाजे के दो। तरफ उसने पता नही वहाँ से लाकर दो ब्रोचिया ये पेड गमलो म लगा रहे हैं । उसमे पानी देना तारा को रोज याद रहता है । मा-पिता के कमरे मे कुछ नहीं है। उनके लिए विसी यो फुरसत नही । स्वय उन लोगो को भी अपने लिए कुछ आवश्यक लगता है पता नहीं । पिता द्वारा लापी जाने वाली या उनके नाम पर आने वाली चीजे भैया भाभी, टीनू और तारा के बीच बैट जाती हैं। उनके कमरे मे सबसे पुराना टूटे हैण्डलो घाला मोटा गद्देदार सोफा है, बस जिसकी टेस्ट्री फाडकर बहुत सी स्प्रिंग बाहर सायने लगी हैं। लटक आयी टाट की सीलिंग से दिन भर मिट्टी झाडती है । घास के तिनवे छिपकलियो, गौरयो के अण्डे और कभी कभी पूरा मा पूरा घोसला ही रोशनदान से गुजरने वाली तेज हवा गिरा जाती है । दो हमेशा विछी रहने वाली झिलगी चारपाया हैं, जिन पर ज्यो त्यो दीवार की बेतर- तीव खूटियो के सहारे सुतलियो से मच्छरदानियाँ टांग दी गयी हैं । दिन भर इन सुतलियो पर मक्खियो की कतारें आराम करती होती है । तारा जिस दिन यूनिवसिटी या किसी सहेली के घर से विदेशी फूलो का वीचा देखकर आती है उस दिन अम्मा को सुनाने की गरज से सुनक्ती रहती हैं, "पोदीना यो रखा है। इतनी जमीन पडी है, यह नही कि एक मारी रखकर चगीचा तैयार करवाएं, कुछ अच्छा लगे । पता नहीं शुद्ध घी खाकर क्या करेंगे, उसस तो लाग और वीमार रहते हैं ।" टीनू से पिता के टेबल-लैम्प का बल्ब न जाने कैसे फ्यूज हो गया । घुघलका बढने पर पिता को उसके खराब होने का पता चला । मां ने सचाई जानते हुए भी भयवश छुपाए रखने की कोशिश की। पिता बिगडे । कोई नहीं ७६ । पं.स के इधर और उधर चोला । "सव घोर घप्प हो गये हैं", वे उत्तरोत्तर गरम होकर चीखने लगे। फिर अम्मा ने साहस किया, "अब जाने दो, टीनू से सराव हो गया, शाम के वक्त इतना चिल्लाने से क्या फायदा?" पिता अशान्त ही रहे, "हाँ मैं चिल्लाता हूँ, सून पसीना एक-यरपे में जो कुछ जिन्दगी भर जोडता रहा उस सब मे भाग लगा दो।" वे अनरूक अपना दुपडा रो रहे हैं, "मैं घर छाकर ही चला जाता हूँ, फिर जो चाहे करो।' सवमा मन कड वा गया है ऐसा लगता है जैसे खुले दरवाजे से पिता सच. मुच वाहर दूर चले गये हैं। घर मे स्तब्धता छा गई। मझला निरारा सा विना चाय पिये चला गया है। बाहर भी वहुत देर नहीं रह सका जल्दी ही लौट आया । वातावरण ऐसा है कि खाना खाने की इच्छा उसे वैशर्मी लगती है । वह सो गया। नीद सुरने पर उसे लगा कि वह बहुत देर से सो रहा है, लेकिन घडी मे दस ही वजे थे। एक सोयी वेवनी लिए वह उठा । इस घर का क्या होगा, और मझला ओसार मे चूल्हे के पास रखे खाने के टेवल पर टिक गया। मोदा की कोठी मे ताड वृक्ष के पत्ते खडखडा रहे हैं। जब हवा रुकी होती है तो ताड नहीं खडखडाता, चमगादड वोलते हैं। टीनू राच. मुच बहुत क्रोधी और उद्दण्ड हो गया है। पिता से कैसी कैसी उग्र वहमे करने लगा है । पहले मसला भी ऐसी ही वहीं किया करता था । फिर वह बिल्कुल ही चुप रहने लगा। क्ल टीनू मी चुप हो जायेगा। सतत खीय और क्रोध की स्थिति में नहीं रहा जा सकता। लेकिन मामी और तारा दोनो को पर से विशेष सरोकार नहीं रहता । अम्मा अकेले गृहस्थी म धुनी जा रही है। चूरहे की राख की तरफ मझले का ध्यान चला गया। तपी हुई रास वसा रही है। गर्म राख संघने रहने से यक्ष्मा हो जाने का भय बना रहता है । मझले को पता नही क्सिन बताया था। कही मां को भी मझला मान नहीं सका। लेकिन अन्धविश्वास की प्रबलता और मय उस पर छाया रहा । वह हट गया । जसने चूल्ह की राख पौने से बाहर सोच एवं जगह एकत्र की और उसे तवे से ढाप दिया। माला भयमीत होकर ऐसा कर रहा था। उसके कलेजे म घबडाहट घडक्ने लगी। अगर याठ जूठे बरतनो की । टेवल पर से शेप होते हए । ७७ मझला बिखराहट के बीच अन्दाज से मर कर चलने के वावजूद भी दाहिने पांव से एक गिलास लडी और लुढकने लगी । अम्मा ने अपने विस्तर पर रह कर ही विल्ली "धत घ555 त भगा दिया । मझले को चैन हुई । मझला अपनी खाट की तरफ लौटा। उसे सुनाई पडा, अम्मा पिता से वह रही थी, 'वल्व की वात लेकर टीनू पर तुम बेकार ही नाराज हुए। इतना गुस्सा नुकसान करता है । तुम्हारा स्वास्थ्य भी ठीक नही । ठिठक गया। पिता कहने लगे, तुम क्या जानो मेरी छाती म हमेशा हाहाकार मचा रहता है । घर की हालत तुम देखती ही हो। जब भी बाहर निकलता है ऐसा सोचता हूँ कि क्सिी शराबखाने म घुस जाऊँ । पैर अग्दर जाते जाते रह जाते हैं ।' फिर चुप्पी छा गयी-किसी ट्रेजडी के वाद की सी चुप्पी । भयला रुका नही, विस्तर पर आ गया। वह सोचता रहा कि अम्मा शराव खाने वाली पिता की बात से बिल्कुल भयभीत हो गयी होगी। उन्हाने पिता के हाहाकार को सचमुच बडा दईनाव समया होगा तारा की सहेलियाँ आयी है। वे खिलखिला उठती हैं और लडकियो की तरह पिल्मो पर झौव झांच कर रही हैं । तारा उधर ही यूमी हुई है । पिता को यह हद से गुजरा हुआ लग रहा है । पहले वे मोठे पर बैठे-बैठे सहते रहे। अब उठ गये हैं। इस कमरे से उस कमरे, उस कमरे से बरामदे बरामदे से आंगन और आंगन से वापस मोटे पर । जव भी मां देखते हैं, उनकी आंखें अगार हो जाती हैं और ये साफ-साफ चिल्लाने लगती हैं वि तारा की लापर- वाह और ढीठ प्रवृत्तियो की समस्त जिम्मेदारी अम्मा के ऊपर है । यहाँ पर मयले के पिता हर दूसरे मध्यवर्गीय पिता सरीखे ही लगते हैं । तारा के रूम से अनियत्रित शोर शरावा मारे घर म विखर रहा है। पिता के बूढे मन वे लिए उल्लास बडा वटु है । उहे यह सव अनुशासन को चार पर रख दने जैसा लगता होगा । लकडी का पार्टीशन साउण्डप्रूफ दीवाल नहीं है, इयलिए आवाजें ठहामें और बातचीत का जनाना हल्ला अभी भी ३ ७८ । फेन्स के इधर और उधर उठता है। पिता घूमते रहते हैं । धूप आंगन जेड रही है । अम्मा पिता के क्षोम को समझ रही हैं। फिर भी तरकारी काटने के अपने काम मे ही सलग्न रहने की कोशिश करती है। हालांकि वे तरकारों काटने में पूरी तरह शामिल नहीं है, पिता की वजह से डिस्टर्व हैं । पिता अपनी चिडचिडाहट को उगलने का मौका ढूंढ रहे है । वे इस मतलव से मन- भुना रहे है कि मां उनको तवज्जो दे। फिर एक-दो जुमला बडवडाकर चले गये, “खूब है भई, चार घण्टे हो गये गुलछरें उडते हुए किसी घर मे ऐसा नहीं देखा," गोया सचमुच उन्होने बहुत से घर देसे ही हो । दोवारा आपर काफी कुडमुडाते और तने-तने बोलते रहे, अकेले । अम्मां चूडियो से भरी अपनी कलाइयो को बार-बार झटक्ने, चिमटा, फुकनी और काम में आते दूसरे बर्तनो को पटक्ने तथा जवडो को भीचकर गालो मे गुस्से के गढे भरने के अलावा मौन है। वह जानती है कि मझला घर मे ही है। यही उसने यह सब सुन लिया तो साइकिल लेकर चला जाएगा। कम से कम, मझला घर रहे तब तक मां, पिता का यह भुनभुनाना कतई पसन्द नहीं करती। उपर तारा के कान मे कुछ पड गया तो वह अलग खउव्याने लगेगी। ऐसे ही उसे अपनी सहेलियो को घर लाने मे शरम लगती है। तारा यी सहेलियां गयी और वह मां की डांट तथा खासतौर पर पिता के भमकने से बच रही है । उसके चलने-फिरने मे चाप नही उत्पन्न हो रही है और वह मां से दवे स्वरो मे प्यार से बोल रही है। अभी-अभी उसने डारो पर से सूखे कपड़े तह करने के लिए उठाए हैं। साधारणतया तारा यह काम कमी नही करती । मझला उठ आया है। भाभी अपने कमरे से निकल चाय तैयार करने के लिए लकडी को चलियां तोड रही हैं। टीन स्कूल से लौट बाथरूम मे फिल्मी गाने की पत्तियां चीख रहा है। तारा अब काफी सुरक्षा का अनुभव करती है शायद अव पिता नहीं भभकेंगे, लेकिन गाल उनके जरूर फूले रहेगे, तारा की आवाज अब गाकर कुछ स्वाभाविक हुई है।
शेप होते हुए । ७९ एक अजीव नकली ढग से सब व्यतीत हो रहे हैं । टीनू को जब जूता खरीदना, सूर बनवाना, फीस दना या सिनेमा जाना होता है तो वह पिता से प्रेमप्र्वक वात भी करता है, और घर का काम भी कर देता है । तारा को ऊन या साडी लेनी होती है अथवा पिकनिक पर जाना होता है तो मां से लिपट लिपट कर मधु पोलती है । पिता खुश नहीं है फिर भी टीनू की आव. श्यकताएँ हद से बाहर पूरी कर रहे है। अम्मा निराश है फिर भी तारा के लिए पिता से सिफारिशें किया करती है, लडती है । बिना किसी घर वातावरण और मिले-जुले सुखद कार्यक्रमो के ही मझले की अधिकाश छुटिटयां बीत गयी। उसके चाय पीते-पीते शाम हो गयी। इस समय मझला किंचित् तरल है। सुबह से ही जिस शाम का इतजार रहता है, उस शाम का आना उसके लिए सुखद है । इसलिए नहीं कि उसकी शामे भव्य होती हैं, वरन् इसलिए कि शाम के बाद दिन के बीच चुकने का एहसास करना बहुत सरल हो जाता है। दिन जो कि काफी कठिन है और शाम के पहले इतिहीन स लगते हैं । पुरातन शिलालेखो के ममक्ष, उसकी लिपि से अज्ञात दर्शक की जो स्थिति होती है वैसी ही मझले की अपने घर के लोगा मे हो गयी है। मझला घर से निकलने की तैयारी कर रहा है । और मझले के शरीर तथा शरीर की गतिविधिया को घर के लाग नाटक की दप्टि म देखने लगे हैं । उहें नाटक को भुगतना भी है, और तटस्थ भी रहना है। यह तटस्थ रहने की विवशता बडी दमघोट है। मां गुमसुम रहती है और पिता चिडचिडे । उमग गुम गयी है। पिता से टीनू तक सब अज्ञात परिणाम बाले भविष्य के लिए वर्तमान की स्थितियां झेल रहे हैं। मझले का क्या, वह अभी कपडे पहनकर निकल जायेगा । लेकिन मन तो दूसगे का भी होता है । वे मसोस पर रह जाते हैं । घर की शाम कलेजे को दवाती है। बाहर जीवन भन्द नहीं है। वह ८० । फेस के घर और उधर विविध और उत्तेजित करने वाला है। इसी उत्तेजना के लिए मझले ने पर की शाम को त्याग रसा है। छुट्टियो मे इधर आने पर घर की शाम या एक घमिल एहसास उसे उन सडको पर होता है, जिन पर तेजी से दफ्तर के बाबू घर के लिए लौटते होते हैं। उधर मसला किसी रेस्तरा या बार म जादुई लफ्फाजी करते, झूठी दुनिया को अनिवार्यता को सिर पर गम्भीर अमिनय पे के साये लादे, अन्दरूनी तौर पर भागे, घबराये और बीमार लोगा वे ससार म शामिल हो जाता है। दिन पूरा हो गया। अमी-अमो अर्थ रात्रि की सूचा देने वाले, प्रेस के घण्टे बजे हैं। बारह घण्टे काफी देर तक बजे । मझला सोचता है, अच्छा होता ये घण्टे बिल्कुल न बनते अथवा जल्दी बज जाते। शायद वजाने वाला अर्द्ध सुप्तावस्था में है। मझला अमो बाहर से हडवडी के साथ खाना खत्म परने में लगा है। उसे डर लग रहा है, मां कुछ बोलने न लगे। मां का बोलना साधारण बोलना मात्र नही हाता। धीमे से बोला गया उसका हर पाप पख कटे परिन्दे की येजान उडान चेप्टा या दर्दीली चीख सा होता है-- इस चीख से मझला वचता है। पता नहीं चात ही बात में कब मन का बांध टूट जाये । मां का क्या, उसकी शादी की बात या भानो को दूसरा घर बसाने पी प्रवृत्ति की पर्चा ही छेड दे। दस बारह दिन को को छुट्टी, इस पर यह इतनी देर-देर तक घर क्यो लौटता है, अथवा पिता के बहुत गिरे स्वास्थ्य के बारे मे ही। मां के पास बहुत-सी खतरनाक बात है। भंझला सर झुका यत्रवत खाना खा रहा है । सोचता भी है । पहले दिन उसके आने पर मां सीर, सलाद या और दूसरी अच्छी चीजें बनाती है। फिर रोज की ही तरह साना बनने लगता है। मां के अन्दर बस इतना ही उत्साह वच गया है। पचास वर्ष की मां अपने वीस वर्ष के मां स्वरूप को समय-ज्वाल मे जला चुकी है। तीस वर्ष पहले जब मझला पैदा हुआ था। पैदा करने, पोपण करने बाद अपनी सतानी के लिए उसके पास कोई कार्यक्रम नहीं शेप होते हए।११ है । सिवाय इसो वि वर सुद को तिल तिल मारे और मझले, टीनू की बहू रा एक कठोर स्वप्न उसम कभी नही मरे । मझले को एक्दम खयाल थाता है कि जब भी वह रात को देर स लौटा है, केवल मां ही उस जागती मिली है। वावी लाग अपने अपने बिस्तरा पर क्षण मर नमना बर पुन वसवर सो जाते है । टेवल पर खाना मुंदा रहता है । मो लाचारी म उस यफ हो गये खाने पर निगाह डालब र सुस्त हो जाती है । मपला चुटकी म खाना निगर लेता है या खाता ही नही, टाल जाता है। रोज तकरीवन यही होता है । विस्तर पर जाने के बाद मझले को तरस खाने की फुरसत मिलती है। यह सोचने और गम करने लगता है कि उस मां भी आँखा म कमी भी नीद नहीं क्या भरी मिलती। आंखो म मानो दद की एक गिला उसे अदर ही अन्दर भेदती रहती है । मझले को भी मातृत्व पर महज यही सौफनार ढर्रा नसीब है । ये नाम वाहर सडक पर मुहल्ले में गश्त लगाने वाले चौकीदार जमा होकर जोर- जार हंसी-ठट्ठा करने लगे हैं । उनकी चोरी से पी गयी चिलम का गाँजा बू मार रहा है । जा लोग सो रहे है उनके लिए चौकीदारो की सीटियाँ रात का पूरा मतलव देती हैं । जागती हुई मां और मझले के लिए रात एक भासद शुरूआत वाली कहानी है। मझला देवर पर पानी का गिलास दंढने लगता है। यद्यपि यह निश्चित रूप से जानता है कि टेबल पर गिलास नहीं है। मां उठती है। पानी ला देती है। फिर बैठ जाती है । उसके लिए मझले से बुछ बोलना जरूरी है । 'बेटा। टीनू के बारे में क्या सोचते हो ? उसका दिमाग खराव होता जा रहा है । दखत नही क्तिना गुस्सा और बदतमीजी करन लगा है," मां आखिर । चाली हो। मझग गिलास का पानी समाप्त हो जाने के बाद भी गिलास के कोर को मोठो से नहीं हटा रहा है । वह झूठमूठ पानी पीने का अभिनय करता हुआ माँ १२ । फेस के घर और उधर के प्रश्न का अज्ञात उत्तर खोज रहा है या प्रश्न को भूर रहा है । आखिर उसे कुछ सूझा नही इसलिए गिलास रखते -ए कहता है ता मैं क्या करूँ? मझला जानता है कि वह ऐसा नही कहेगा तो उसे बहुत सी उलझन हो जायेंगी। इस तरह से बात को समाप्त कर देना मां को अच्छा नहीं लगा होगा। लेकिन उसने कहा कुछ नहीं। वस यही सोचने लगी कि देखते देखते मझा कितना निर्मोही हो गया है । पहले सवका खयाल करता था अब अपना मी नहीं करता। मझले को माँ जिदगी से देखती आ रही है पर आजकल सचमुच बहुत वडा हो गया है । मझले का कडापन उसे कातर करता है । कभी कभी माँ के नेनो मे एक बदनसीब गिडगिडाहट भी भर आती है। मझले ब्याह कर लो। किसी लडकी से कर लो। किसी तरह कर लो । जेठ बहू ने तुम्हारे बडके भैया को छीन लिया फिर भी कर लो । दुनिया म सभी करते है । तू अपने साथियो में अकेला पड जायेगा । तुम्हारे पिता बिल्कुल लट गये है। अगर हमसे कुछ गलती हो गयी हो तो बेटा माफ कर दो। मां को आँखें इसी तरह वोलती रहती है । लेकिन मझल ने मा की कभी नहीं मानी है। बचपन से जिद्दी रहा है । बाप ता बुढापे तक है। माँ अपने सभी बच्चो से डरी रहती है। इन दिनो मझले से और डरने ग्गी है । पिछली बार जाड के दिनो से वह और सहम गयी है जब एक दिन साने के तुरत वाद मझले ने भल भल शराव की ढर सारी वदवूदार उलटी टेबल पर ही कर दी थी। उही दिनो बड मैया ने भी अपने हिसाव स्तिाब का फैसला कर लिया था। मां के मन मे मझले के भविष्य के बारे में काफी डर है । स्त्री के बिना कोई कैसे रह सकता है ? भयग्रस्तता उसके स्वभाव म शुमार हो गयी है । अगर मझला शादी का तैयार हो जाय तो भी वह विही बुरे परिणामा की पल्पना से डरी रहेगी। दर से हाने वाली सुबह की खटर पटर से मझा जाग गया है। पिता मा शेष होते हुए । ९३ । - पर आरोप लगा रहे है कि वह लडको को प्रोटेक्ट करती है, नही तो क्या मजाल कि लोग आठ बजे तक सोते रहे । मझला अपनी तरफ किये जाने वाले इस सवेत को समझता है। वह विम्तर पर लेटा हआ पिता को अप्रत्यक्षता और कायरता सोचने लगता है । वे अपना हर असन्तोप आसानी से मां पर थोप देते हैं । सभी कायर है, क्योकि मां दुर्बल है । -वह खुद जय कभी अपने प्रति माँ की प्रेम उत्कटता का लाभ उठाता है । पिता उसे अपनी योग्यता और 'हाहाकार' के भावुक शब्दो से दवोचते है । तारा मां को जनरल नॉलेज से आक्रान्त करती है । उसके अनुसार 'मां को नये मैनर का नहीं पता ।" टीनू अपनी उच्छ खल आवाज म बात बात पर मां को दलकार जाता है । वडके मैया की उंगली पर सम्पत्ति का एक छोटा सा पहाड है, जिसके नीचे मां को घौस के वावजूद भी शरण लेनी पडती है । क्योकि उसकी आँखो के सामने एक अघर है, जिस पर से उसे अपने अव्यवस्थित बच्चो को उतारना है, एक मृत्युक्षण तक की दूरी है, जिसे पार करना है । हालांकि इस पहाड पर स मी उम्मीद की किरणे डूब रही हैं । मां वाहर नारियल की झाड़ से पीपल के सूखे पत्ते बटोरने चली गयी है । भाभी सुनाने वी गरज से भुनभुना रही हैं "चाय बनायी जाय या खाना । दस बजे महारानी यूनिवर्सिटी जायेंगी, उन्हे नौ बजे खाना चाहिए । यहां अभी तीसरी बार चूल्हे पर चाय का अदहन चढा है।" गलगल मौसी चिडिया का एक झुण्ड तैरता हुआ आया और पुदीने की क्यारी के पास बैठ चिचिया रहा है। मां झाडू से उन्ह होकने लगती है। चिड़ियां थोडा फासला छोड उडकर आगे बैठ जाती है । ये भूरी विडियो पोख और खूब चार करने वाली हैं । मां उन्हे उडाने को बेताव और परेशान है। मझले को खूब याद है, मां पिसी शिशु को खिलाते लाड परते हुए जो बहुत सी याव्य पक्तियाँ गाया करती थी, उनमें से एक "गल गल मौसी आयी है, पत्ते में गुड लायी है," उन्ह बहुत प्रिय थी। फिर भी मां मानती है कि "गल गल बहुत बुरी और मनहूस चिडिया है।" "गौरया घर बसाऊ है तो गलगल घर उजाडू।" मा हाफ गयी है, लेकिन उसने चिडियो के झुण्ड का ८४ । फेन्स के इधर और उधर 1 मकान की हद से बाहर कर दिया । क्योकि गलगल घर उजाट चिडिया है । मझला खिन्न और अवसादग्रस्त हो गया है । भाभी रसोई मे हलाकान है। माँ उधर नहीं जा पायेगी । तारा पढकू है । भाभी भी अकेली कैसे करे ? मझला सोचता है कि वह कहीं बाहर चाय पी लेगा । उसको तो बाहर चाय पीने की आदत सी ही पड गयी है । लेकिन उसे उसी घर मे व्यतीत होना है। यह व्यतीत होना भी कितनी मुश्किल बात हो गयी है । मझले को कुछ रुपयो की जरूरत पड़ गयी। उसने मां से मांगे । माँ ने भैया से कहा । भैया का वडप्पन दहाडने लगा, "क्या करेगा वह इतने रुपये ? इसी तरह लोगा की आदतें खराव होती जा रही है। साला ठेकेदार की लडकी से इश्क परमाता है और घर म दाशनिकता छाँटता है । मेरे पास रुपये-चुपये नही है । उसी लडकी से क्यो नही लेता?" माँ अपना सा मुंह लेकर वापस आ गयी । मझला सोचने लगा कि उसने नाहक कहा । शायद लोगो को अपने ससार पर इतना अधिक खतरा नजर आने लगा है । ग्लानि मे डूबा रहा मझला । हर बार की तरह इस दफे मी मझले की छुटिटयां बडी कठिनाई से रेगी हैं । अम्मा को दिल की तमाम खलवलियो के लिए मझले से फिर अवसर नही मिला । मझले से उसे उम्मीद रहती है। शायद वह समझती है कि मझले के पास घर की स्थिति को बदल देने वाला कोई नुस्खा है । मां अपनी गलतफह मियो से बदनसीव और दयनीय हो गयी है । गिरती हुई दीवाल को मसला या भाई भी अपनी पीठ से रोकने की चेप्टा करेगा तो उसकी पीठ खूनाखच्च हो जायेगी । हर चीज के साथ एक उम्र भी है। मझला बुरी तरह से आतुर हो उठा है कि छुट्टी समाप्त न होने पर भी वह एक्दम से वापस चला जाये । इधर वह यूंही आकस्मिक ढग से आने-जाने लगा है । वह आज ही चला जायगा । छुट्टियो का मोह वडा महँगा है । पर के जीवन मे विवशता भरी है । मनहूसी ने उसे आता से भर गिया है । यहाँ कोई सघर्ष नही दिया जा सकता, सिर्फ ध्वस को निज के टूटने तक किसी तरह राहा जा सकता है। वह ऊब गया। जीवन मे व्यर्थता का प्रतिशत पर हो रहा है। आज मझला दिन भर घर से बाहर रहा । अपराह्न में लौटकर आया ।
शेष होते हुए । ५ खाना पीना कुछ पता नहीं ! जल्दी जन्दी अपना विखरा सामान सहेजने लगता है । उसमे बहुत कुछ जल्दवाजी मे छूट भी जायेगा । मझले को छूटने का काई विचार नहीं होता। कमीजे उतार लेने के बाद खूटियां नगी हो गयी है । मझले ने सिगरेट का पेमेंट बचाते हुए टावेल के नीचे छिपा लिया है। मां आश्चर्यचकित पूछती है, "क्या बात है मझले ? अभी तो तुम्हारी छुट्टियाँ परसो तक हैं।" मसला उसकी तरफ देले विना, थोडी देर टालमटोल करने के ब द शाम की गाडी से जाने की बात कहता है । विसी जरूरी काम से पहले पहुँचने की सूठी सफाई भी उसने दे दी। आग्रह, मसुरोध या पुनर्विचार की भव कोई गुंजाइश नहीं है । मां ताकने लगती है। मझला मुंह बनाने लगता है। पाँच वजन तक घर के लोग इधर उधर मंडराने लगेंगे। पिता दफार से आवर चकित से तैयार सूटकेस की तरफ देखेंगे और समझ जायेंगे । पिर उनम भावुकता का अस्थायी विचलन वढने लगेगा । टीनू छत से उतरकर आ जायेगा, और तारा पार्टीशन से बाहर । भाभी भैया को पीछे से बुला लायेगी और वे दोनो शान्त मझले के चले जाने की प्रतीक्षा में खडे रहेगे । मझले को जाहिर होगा कि ये सब लोग किसी एक स्थान से नहीं, अलग-अलग जगहों से आये हैं । उसे घर के लोग एक स्थान पर उसी दिन एकत्र नजर आते हैं, जब वह वापस नौकरी पर लौटता होता है । घर के लोगो के इक्ट्ठे होने का दृश्य इसीलिए मझले वो वडा अटपटा और झूठा-सा लगता है। मझले की छुट्टियां अगर बहुत लम्बी हो जाये तो भी घर में ऐसा अवसर पायद आ सके जब सब लोग एक स्थान पर एव न हो। घर में सात लोग है और सात बार टेबल पर साना रखा जाता है। मझला भी इस व्यवस्था मे आसानी से शामिल हो जाता है, क्योकि किसी को भी एक दूसरे का सामना परना सरल नहीं लगता। कोई गम्भीर दुर्घटना ही शायद लोगो का एक स्थान पर एकत्र पर सस्ती है । रिक्शा आ जाने पर मां कुछ मुम्त है। मझले ने इतरा भी समय नही ८६ । फेन्स के इघर और उधर दिया कि रास्ते के लिए वह पूडी-तरकारी ही तैयार पर देती। "अव क्या होगा' सरीखी असहायता उसे डुवोने लगी है । लडके का फठोर लगने वाला व्यवहार पिता को पराजित करता है । इससे उनका शरीर कुछ कमजोर होता है। मझले ने रिक्शे पर अपना मामूली-सा लगने वाला सामान रप लिया है। माँ तारा को "अव कब आओगे" पूछने के लिए ढवेल-सी रही है । पता नही क्यो तारा के मुंह से कुछ निकल नहीं पा रहा है । शायद वह प्रयत्न पर रही है। रिपशा सबकी दृष्टि से ओझल हो गया। घर अन्दर-अन्दर खण्डित हो रहा है। मझले के पिता-मां को कुछ समझ नही आ रहा होगा। उनकी आंखो के सामने इतिहास की अनिच्छुक स्थितियाँ येरहमी से गुजर रही हैं । अपने खचाखच कम्पार्टमेट मे मझला भी समय की क्रूरता और निरकुशता को तीव्रता से महसूस कर रहा है। अगली बार जब मझला घर आएगा तव काल उसके सामने कुछ और विगडे हुए तथा कठोर दृश्य उपस्थित करेगा । क्योकि अभी लोग पूरी तरह टूटे और विखरे नहीं हैं । अभी सक्रान्ति अपने अन्जाम की तरफ केवल शुरू हुई है।
पिता उसने अपने बिस्तरे वा अन्दाज लेने के लिये मात्र आध पल को बिजली जलाई । विस्तरे फश पर विछे हुये थे । उसकी स्त्री ने सोते सोते ही बडव- हाया "आ गए और बच्चे की तरफ करवट लेकर चुप हो गई । लेट जाने पर उसे एफ बडी उकार आती मालूम पडी, लेकिन उसने डकार ली नही । उसे लगा कि एसा करने से उस कुप्पी मे खलल पड जायेगा, जो चारो तरफ भरी है, और काफी रात गये ऐसा होना उचित नहीं है । अभी धनश्यामनगर के मकानो के लम्बे सिलसिलो के किनारे किनारे सवारी गाडी घघडाती हुई गुजरी। थोडी देर तक एक बहुत साफ मागता हुआ शार हाता रहा । सदियो म जब यह गाडी गुजरती है तब तक लोग एक प्रहर की सासी गीद ले चुके होते हैं । गमियो मे साद ग्यारह का कोई विशष मतलब नहीं होता । यो उसके घर में सभी जल्दी सोया करते, जल्दी खाया और जल्दी उठा करते है। आज बेहद गर्मी है। रास्ते मर उसे जितने लोग मिले, उन सबने उसमे गरम और बेचैन कर देन वाले मौसम की ही बात की । कपडो की फजीहत हो गई। बदहवासी चिपचिपाहट और थकान है । अमी जव सवारी गाडी शोर करती हुई गुजरी, तो उसे ऐसा नहीं लगा कि नीद लगते-लगते टूट गई हो जैसा जाडो में प्राय लगता है। बल्कि यो लगा कि अब अगर सोने की चेष्टा शुरू नही की गई तो सचमुच देर हो जाएगी। उसने जम्हाई ली पखे की हवा बहुत गरम थी और वह पुराता होने की वजह से चिढ़ाती-सी आवाज भी कर रहा है । उसको लगा, दूसरे कमरो मे भी लोग शायद उसकी ही तरह जम्हाइयाँ ले रहे होगे । लेकिन दूसरे कमरो के पखे पुराने नही हैं । उसने ८८ 1 फेन्स के इधर और उधर सोचना बन्द करके अन्य कमरो की आट लेनी चाही। उसे कोई बहुत मासूम• सी ध्वनि भी एक-डेढ मिन्ट तक नहीं सुनाई दी, जो सनाटे में काफी तेज होकर आ सकती हो । तभी पिता की चारपाई वाहर चरमराई । वह किसी आहट से उठे होंगे। उन्होने डॉटकर उस बिली का रोना चुप कराया जो शुरू हो गया था। बिल्ली थाडी देर चप रह वर फिर रोने लगी । अब पिता ने डण्डे को गच पर कई यार पटका और उस दिशा की तरफ खदेडने वाले ढग से दौडे जिधर से रोता आ रहा था और "हट्ट-हह" चिल्लाये । वह जव धूम-फिरकर लौट रहा था तो पिता अपना विस्तरा बाहर लगा- कर बैठे थे । कनखी से उसने उन्हे अपनी गजी पीठ का पसीना रगडते हुये देखा और वचता हुआ वह घर के अन्दर दाखिल हो गया। उसे लगा कि पिता को गर्मी की वजह से नीद नहीं आ रही है। लेकिन उसे इस स्थिति रो रोप हुआ । सव लोग, पिता से अन्दर पखे के नीचे साने के लिये कहा करते है, पर वह जरा भी नहीं सुनते । हमे क्या, भोो कप्ट 'कुछ देर पडे रहने के बाद वह उठा और उसने उत्सुक्तावश सिटकी से बाहर झांका । सडक की बत्ती जती पर है। गर्मियो म यह वेहद भरार जाता है। पिता ने कई बार करवटें बदली। फिर शायद चैन वी उम्मीद मे पाटी पर बैठ पखा झलने लगे हैं । पखे की उण्डी से पीठ का वह हिस्सा खुजाते हैं जहाँ हाथ की उँगलियाँ दिक्क्त से पहुँचती हैं । आकाश और दरख्ती की तरफ देखते हैं । रिलीफ पाने की पिसी बहुत हत्की उम्मीद मे शिकायत उगलते है- "बडी भयकर गर्मी है, एक पता भी नहीं डोलता।" उनका यह वाक्य, जो नितान्न व्यर्थ है, अभी-अभी चीते क्षण मे डूब गया । गर्मी वरपरार है और रहेगी, क्योकि यह जाडे यरमात का मौसम नहीं है । पिता उठकर घूमने लगते हैं । एक या दो बार पर का चक्कर चौकीदारो पी तरह हाड हो करते हुये लगाते हैं, ताकि कोई सँघघ न लग सके । लौटकर पके स्पर मे 'हे ईश्चर' पहते हुये उंगली से मापे का पसीना पाटकर जमीर पर चुवाने लगते हैं। बडा गजव है, कमरे की एव दीवार रो टिपर बैठ जाने पर वह यासी 1 पिता । ८९ तनाव में सोचने लगा । अन्दर कमरो मे पंखो के नीचे घर के सभी दूसरे लोग आराम से पसरे हैं । इस साल जो नया पैडस्टल खरीदा गया है वह आंगन मे दादी अम्मा के लिये लगता है । विजली का मीटर तेज चल रहा होगा । पैसे खर्च हो रह हैं, लेकिन पिता की रात कप्ट मे ही है । लेकिन गजब यह नहीं है । गजव तो पिता की जिद है, वह दूसरे का आग्रह अनुरोध मान सव न ! पता नहीं क्या, पिता जीवन की अनिवाय मुविधाओ से भी चिढते हैं । वह हल्लाने लगा। चौक से आते वक्त चार आने की जगह तीन आने और तीन अ मे म तैयार होने पर, दो आने में चलने वाले रिक्शे के लिये पिता घण्टे घण्टे खडे रहगे । धीरे-धीरे सबके लिये सुविधाएँ जुटाते रहगे, लेकिन खुद उसम नहीं या कम स-बम शामिल होंगे। पहले लोग उनकी काफी चिरौरी किया करते थे, अब लोग हार गये हैं। जानने लगे है वि पिता के आगे किसी की चलगी नहीं। आज तक किसी ने पिता को वारा वेसिन म मुंह हाथ घोते नही देखा । बाहर जाकर बगिया वाले नल पर ही कुल्ला-दातुन करते हैं । दादा माई ने अपनी पहली तनख्वाह से गुसलखाने मे बड़े उत्साह के साथ एक खूबसूरत शावर लगवाया, रेक्नि पिता को असे से हम आंगन म धोती को लंगोट की तरह बांध कर तेल चुपडे बदन पर बाल्टी-बाल्टी पानी डालते देखते आ रहे हैं। खुले में स्नान करेंगे, जनेऊ से छाती और पीठ का मैल काटगे । शुरू मे दादा भाई ने सोचा, पिता उसके द्वारा शावर लगवाने से बहुत खुश होंगे और उन्हे नई चीज का उत्साह होगा। पिता ने जव कोई उत्साह प्रकट न किया, तो दादा माई मन ही मन कापी निराश हो गये । एक दो बार उन्होंने हिम्मत करते कहा भी, "आप अन्दर आराम से क्यो नही नहाते ?" तब भी पिता आसानी से उसे टाल गए । लड़को द्वारा बाजार से लाई विस्किटें, मंहगे फल पिता कुछ भी नहीं लेते । कभी लेते भी हैं तो बहुत नाक भौं सिकोड कर उसके बेस्वाद होने को बात पर शुरू म ही जोर दे देते हुये । अपनी अमावट, गजक और दाल- ९० । फेन्स के इधर और उघर ! रोटी के अलावा दूसरो द्वारा लाई चीजो की श्रेष्ठना से वह कभी प्रभावित नहीं होते । वह अपना हाथ पांव जानते हैं, अपना अर्जन, और उसी में उन्हें सन्तोष है। वे पुन जो पिता के लिए बुलू का सेव मंगाने और दिल्ली एम्पोरियम से वढ़िया घोतियाँ मँगाकर उन्ह पहनाने का उत्साह रखते थे, अव तेजी से पिता विरोधो होते जा रहे है । सुखी बच्चे भी अव गाहे वगाहे मुंखे खोलते हैं और मोध उगल देते हैं। लद्द लह, वाहर आम के दो सीकरो के लगभग एक साथ गिरने की आवाज आई । वह जानता है, पिता आवाज से स्थान साधने की कोशिश करेंगे । टटोलते-टटोलते अँधेरे में आम खोजेगे और एक खाली गमल मे इकट्ठा फरते जाएँगे । शायद ही रात मे एक-दो बाम उनसे चूक जाते हैं, ढूंढने पर नही मिलते, जिनको सुवह पा जाने के सम्बन्ध में उन्हें रात-भर सन्देह होता रहेगा। दीवार से काफी देर एक ही तरह टिके रहने से उसकी पीठ दुखने लगी थी। नीचे रीढ के कमर वाले हिस्से में रक्त की चेतना बहुत कम हो गई। उसने मुद्रा बदली । बाहर पिता ने फाटक खोलकर सड़क पर लडते चिचियाते कुतो वो हडकाया । उसे यहां बहुत खीझ हुई । कई बार कहा, मुहल्ले मे हम लोगो का सम्मान है, घार मले लाग जाया-जाया करते है, आपको अन्दर सोना चाहिये, ढग के कपड़े पहनने चाहिये और चौकीदारो की तरह रात को पहरा देना बहुत ही मद्दा लगता है । लेकिन पिता की मड मे कभी कोई झाल नही आता । उलटा सीधा, पता नहीं कहां किस दर्जी से कुरता कमीज सिलवा लेते हैं। टेढी जेव, सररी के बटन ऊपर-नीचे लगा, सभा सोसायटी मे चले जायेंगे । घर मर को बुरा लगता है । लोगो के बोलने पर पिता यह देते हैं, 'आप लोग जाइये न भाई, कॉपी हाउस मे वैठिये, झूठी वैनिटी के लिये वेयरा को टिप दीजिय, रहमान के यहाँ हेढ रुपये यात्रा वाल कटाइये, मुझे क्यो घसीटते है।" लोगा का पारना चुटकी भर मे धरा रह जाता है। पिता से तो चुप रहते हैं लेकिन जब यात. वहस म उन्हे सीना जाता है, तो काफी परारी और हिसात्मक बात कह जाते - पिता । ९१ हैं । उलटे उहे घेरने वाले हम भाई-वहन अपराधी बन जाते है । कमरे से पहले एक भाई खिसकेगा, फिर दूसरा, फिर वहन और फिर तीसरा चुपचाप सब खीझे हारे विसकते रहेंगे । अदर फिर माँ जायेगी और पिता, विजी पिता कमरे में गीता पढने रगगे या झोला लकर बाजार सौदा लने चले जायेंगे। होता हमेशा यही है। सव मन मे तय करते आगे स पिता को नहीं घरेंगे । लकिन थोडा समय गुजरन क बाद फिर लोगो का मन पिता के लिये उमड़ने लगता है। लोग मौकर ददने लगते पिता को किसी प्रकार अपने साथ की सुविधाओ म थोडा बहुत शामिल कर सके। पर एसा नहीं हो पाता । वह साचने लगा, भूसे के सामने खाते समय हाने वाली व्यपा सरीसी किसी स्थिति में हम रहा करते हैं । यद्यपि अपना खाना हम कमी स्थगित नहीं करते, फिर भी पिता की असम्पृक्ति के कारण व्याकुर और अधीर तो हैं ही। पिता अमृत और विचित्र है, वह सोचते हुए उठा। कमरे में घूमने या सिगरेट पी सकने की सुविधा नही, अन्यथा वह वैसा ही करता। उसने सो जाने की इच्छा की और अपने को असहाय पाया। शायद नीर नहीं आ सकेगी, यह खयाल उसे घबराने वाला लगा। पिता अदभुत और विचित्र है, यह बात यह भूल नहीं रहा था। पिछले जाडो में वह अपने लोम को पुचलकर बमुशियल एव बाट पा बेहतरीन कपड़ा पिता के लिय लाया। पहा तो वह उसे लेने को तैयार नहीं हुए, लेकिन मां के काफी घुउक्ने. फुडकने से राजी हो गये और उसी सुल्दाबाद के किसी स्पर्टी मुल्ला दरणी से यहाँ सिलाने चल दिये । सुधीर ने कहा, ' कपडा कीमती है, पलिए एक अच्छी जगह में आपका नाप दिलवा दूं। यह ठीक सियेगा, मेरा परिचित . इस बात पर पिता ने काफी हिकारत उगली । वह चिढ उठे, "मैं सबको जानता हूँ, वही म्यूनिसिपल मार्केट के छोटे मोटे दजियो से काम परात और अपना लेबल लगा लेते हैं । साहब लोग, मैंने क्लर वे "हाल एण्डरमन" के ९२। फेन्स के इधर और उधर सिले कोट पहने हैं अपने जमाने में, जिनके यहाँ अच्छे-पासे यूरोपियन लोग कपडे सिलवाते थे। ये फैशन वैशन, जिसके आगे आप लोग चक्कर लगाया करते हैं, उसके आगे पांव को धूल है । मुझे व्यथं पैसा सचं नही करना है।" कितना परस्पर विरोधी तकं दिया है पिता ने ? ऐसा वह अपनी जिद को सर्वोपरि रखने से किया करते हैं । फिर सुधीर ने कपडा छोड दिया । “जहाँ चाहिए सिलवाइये या भाड मे झोप आइए, हमे क्या ।" वह धीमे धीमे बुद- बुदाया। ",", पिता वाहर अकवकाकर उठ पडे शायद । थोडी देर पहले जो आम बगीचे मे गिरा था, उसकी आवाज से उन्हें अब सुनाई पडी हो । वह खिडकी के बाहर देखने लगा, किंचित टिका-टिका सा । पीठ के पसीने से बनियाइन चिपक गई थी । वेद घुटती हुई गरमी । मन उसका मथा जाता था। बीवी पडी आराम से सो रही है । इसे कुछ पता नही । शायद पिता की खाट खाली थी। वह गिरा आम टटोलने के लिए बगिया मे घुसे होगे । पिता कितने विचित्र हैं। लम्बे समय से वह केवल दो ही प्रथ पढते आ रहे हैं-- यन्त्रवत, नियमवत, रामायण और गीता । लम्बे पैतीस वर्षों तक अखण्ड वेवल रामायण और गीता । उसके पहले युवाकाल में जो-कुछ जितना कुछ पढा हो उन्होने । उसे कभी भयावह, कभी सम्मानजनक और कभी झूठ लगता, यह देख सोच कर दि कोई व्यक्ति केवल दो ही पुस्तको मे जिन्दगी के पैतीस वर्ष काट सकता है । और कैसे काट लेता है ? तभी उसका बच्चा कुनमुनावर राने लगा । उसने तपाक से सिडमी छोडी और अपने बिस्तरे पर झूठ-मूठ सो गया । ऐसा न हो कि देवा बच्चे के रोने से उठ पडे और उसे सन्दिग्धावस्था मे देख बहुत से वेकार प्रश्नो द्वारा हलकान करना शुरू कर दे। देवा बच्चे के मुह म स्तन दे पहले ही-सी बेखबर हो गई । वह खुद विस्तरे पर सोता मालम पडवर भी जागता रहा । स्तन चूसने की चप-चप् आवाज आती रही और थोडी देर बाद वन्द हो गई। उसने तय किया कि वह देवा के बारे मे ही कुछ सोचे अथवा उसके शरीर को छूता रहे । उसने देवा के कूल्हे पर हाथ रख दिया, लेकिन उसे तनिक भी
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९। पराय घर और उपर का दवा पर यह रह गया। मौगम की गर्मी स यही अघिर प्रवर पिता है। उगम गामने एक पटना मजबूती स टॅग गई । उरा। घटना का मन म दाह राया। वायु-रामा म नौरी करन वाग उरारा पप्तान भाई वहाय शिवसिटी य सचें वरिए दा वप तापस म्पय भजता रहा था । एर बार अपस्मात् वप्तान माई हाला-अवकाश मनान घर आ गया था। पिता न उसव हाया म उसने नाम यी बारह सौ रुपया याती एव पारा चुप थमा दी। सवसे यह बडा आर स्मिय लगा। पप्तान भाई वा हैरत हुई और हल्दी सुशी भी वि एकाएक वापी रुपय मिल गए । लक्नि इरा वात स उस दुस और पराजय या भान भी हुआ। उसन अपने यो छोटा महमूस रिया । दो यप तर वहन के लिए उसने जो थोडा बहुत क्यिा वह राव एव पर म घटरर नगण्य हा गया । पिर मी वह अनुभव कर रहा था पप्तान माई ज्यादा मोचते नहीं। पिगडी तबियत व हैं । यान की तरह चुटको म घरती छाड दत हैं । रितने मस्त हैं कप्तान माई । उस लगा पिता एक युरद भीमकाय दरवाज की तरह खड हैं जिससे टपरा टकरापर हम सब निहायत पिही और दयनीय होते जा रह हैं । इस घटना को याद करसे और पिता में प्रति खिन्न हो जाने पर भी उसने चाहा कि यह खिडकी से पिता को अदर भाकर सो रहने के लिए आग्रहपूर्वर कहे लेकिन वह एसा नही कर सा । वह असन्तोप और सहानुभूति दोनो के बीच अस तुलित भटकता रहा। नकोड से उठती इजनो की शटिंग ध्वनि न मानीट की ग्रडटक पर स हाकर आती धूमनगज की ओर इको दुक्के लौटते प्क्वा के घोडो की टाप न झगडत कुत्ता की माक मार । यस वही उल्लू एकगति एकवजन और वीभत्सता म बोल रहा है । रात्रि म शहर का आभास कुछ पला के लिए मर सा गया है । उसको उम्मीद हुई कि किसी भी समय दूर या पारा से कोई आवाज आकस्मात उठ आएगी घडो टनटना जाएगी या क्सिी दौडती हुई ट्रक का तेज लम्बा हान वज उठगा और शहर का मरा हुआ आभास पुन जीवित हा जाएगा । पूरा शहर वही कभी नही सोता या मरता । बहुत स सोते हुए पिता । ९५ जान पड़ने वाले भी सक्षिप्त ध्वनियो के साथ या लगभग ध्वनिहीनता के बीच जगे होते है । रात काफी बीत चुकी है और इस समय यह सब (सोचना) सिवाय सोने के कितना निरर्थक है। शायद पिता औव गए है । करबट बदलने से उत्पन्न होने वाली खाट की चरमराहट, आम टटोलते समय सूखी असूखी पत्तियो के कुचलने की आवाज, लाठी की पटक, मकान के फरे के वक्त की खास बँखार, कुत्ते बिल्लिया को हड- काना-कुछ सुन नही पड रहा है । इस विचार से कि पिता सो गए होगे, उसे परम शान्ति मिली और लगा कि अब वह भी सो सकेगा। शीघ्र नीद के लिए उसने टक्टको बाँधकर पखे की तरफ देखना शुरू किया । गरम हवा के बावजूद दिन भर की व्यय थकान और सोच विचार से पस्त हो जाने की वजह से वह नीद म चित हो गया। थोडे समय उपरात वह एकाएक उचककर उठ बैठा । उसने चारो तरफ कुछ देख पाने के लिए कुछ क्षणो तक गडे हुए अंबरे को घूरा । हुआ यह कि उसे शरीर म एकाएक बहुत गर्मी सी लगी थी और अजीब सी सरसराहट हुई । शायद पसीने से भीगी टांग पत्नी के बदन से छ गई थी । मुह म बुरा सा स्वाद भर आया था । किसी चुरी बीमारी के कारण अक्सर ऐसा हो जाया करता है । उठकर उसने दा-तीन कुल्ले किए और ढेर सारा ठण्डा पानी पिया । इतना सब-कुछ वह अपनीद मे ही करता रहा। आँगन से पानी पीकर रोटते समय उसने इतमीनान के लिए खिड़की के वाहर देखा । अब तक नीद जो थाडी वहुत थी, माफूर हो गई। पिता सो नही गए है, अथवा कुछ सोकर पुन जगे हुए हैं । पता नहीं । अभी ही उन्होंने, 'हे राम तू ही सहारा है,' कहर जम्हाई ली है । ऐसा उन्होन कोई दवकर नहीं किया । रात के लिहाज से काफी शार उठाते कहा है । शायद उन्हें इत. मीनान है वि घर म सभी लोग निश्चित रूप से सो रहे हैं। पिता ने अपना विस्तरा गोठ मोडवर साट के एव सिरे पर कर लिया है और वह सुराही रो प्याले म पानी ले लेकर अपनी खटिया की वाघ तर पर रहे हैं । सुराही से साट तम और साट से सुराही तक पार-बार आते जात है।
९६ । फैन्स के इधर और उधर - वहुत वार ऐसा करने पर खाट का बाध तर हुआ है । इसके बाद उन्होंने पानी पिया और पुन एक बडी आवाजदार जम्हाई के साथ लिपटे हुए विस्तरे का सिरहाना बना निखरी खटिया पर लेट गए । तडका होने मे पता नहीं कितनी देर थी। थोड़ी देर बाद पखा जमीन पर गिराकर उनका दायाँ हाथ खटिया की पाटी से झूलने लगा। चारो तरफ घूमिल चाँदनी फैलने लगी है । सुवह, जो दूर है, के भ्रम में पश्चिम से पूर्व की ओर कौवे कांव काव करते उडे । वह खिडकी से हटकर विस्तरे पर आया । अन्दर हवा वैसी ही टू की तरह गरम है । दूसरे कमरे स्तब्ध है । पिता नही वाहर मी उमस और बेचनी होगी । वह जागते लगा, अब पिता निश्चित रूप से सो गए हैं शायद ! सोचने एक नमूना सार्थक दिन छटटी का दिन था । वह सुबह का खाना और दोहर की चाय लेकर सुखद ग स समय गुजारने के बाद बटन हाउस नाम की इमारत के एक हिस्से से निकला जहां उसके एक नये से मित्र ने उसे निर्मा नत किया था। उसका यह मिन एक युवा अग्रणी प्राध्यापक था और शहर म तेज उमरते हुए बुद्धिजीवी के रूप में जाना जाता था । आज पहली दफ वह उसके घर कई जोग खरोश की बुलाहटो के बाद गया था। उसने अधिकाश समय विवादास्पद साहित्यिक राजनैतिक विषयो पर चर्चा में व्यतीत किया और खाने की मेज पर दोस्त की बीवी से बड पुरअसर गुद गुदाने वाले मजार भी दिये । उसका एक लतीफा बहुत जानदार था जिस पर उसके मेजबाा दम्पति विभोर रहे । उस समय उसके नये दोस्त ने तुरत अपनी पत्नी की तरफ देखा । पली ने भी त काल पति से औख मिलायौं। जान-बूझवर ' या यह कहना अधिक ठीक होगा उसके स्तीफ को कुछ देर और जावित बनाये रखने की गठसा से देखा । उसने पाया दोस्त की आँखो म एक योएता गव छव आया है देखा मेरे दोस्त की जोरदारी, वैसा मजाक करता है ? वीची ये नेत्रो म भी झलमलाहट थी मस्त मस्त और सरुण हा प्राणेश्वर मानी तुम्हारे दोस्त की जोरदारी । जिस इमारत डक्टन हाऊस में एक हिस्से से वह निकला था वह बहुत साधारण और पुरानी है । एक छोटा पटा संगमरमर का टुकडा सूली काई से काले पड गये द्वार स्तम्भ के ऊपर इमारत का नाम किसी तरह जीवित किये हुए अटवा है । याहर बेहद साफ सुथरा चमकता हुआ अपराह सुनसान सडक और उसकी चाटती वीथिकाएँ हैं। यह सतुष्ट मुखाकृति लेकर बाहर आया ९८ । फेस के इधर और उघर और सदर की दिशा म जान से पूर्व एक वार उसने पल-भर को, कलात्मक ढंग स ठिठवपर, यह सोचा कि वह विधर चले ? वह साचने लगा, मित्र ने उसे काफी अच्छी और महंगी चीजे नाश्त में खिलायी, जा वह निश्चित रूप स सभी दूसरो को नही खिलाता होगा । उसने पाया, परिचिता और मिनो द्वारा उसे वाफी गम्भीरता से लिया जाता है। उसकी जिद पर लोग तुनकते नही और अकसर की जाने वाली बौद्धिक हेक- डियां भी बर्दाश्त हा जाती है। यह इस निर्णय पर पहुंचा उसके अधिकाश दास्त मूर्ख, पिछ्ड और निहायत मामूली है । उसे उनसे ज्यादा रगना नहीं चाहिए। रास्ते म सदर बाजार की एक दुकान से उसने 'मत्रोनी' का एक डिब्बा खरीदा जो सम्भवत दुकानदार के पास एक ही था। उसे मन मे हलका तेश हुआ कि यह वस्तु यहाँ क्यो मिल रही है। अगर दुकानदार 'सॉरी कह देता तो वह अपने को विजयी सरीखा पाता । डिब्बे के निक्ल आने और लापरवाही से दस का नोट काउण्टर पर फेंकने के बीच वह एक सरसराती उपेक्षा, वस्तुत जिसमे खासी दिलचस्पी गोपन था, पूरी दूकान पर फेकता रहा। यह भी ढंढता रहा, 'मॅक्रोनी' मांगने पर दुकानदार उसके प्रति कही रत्ती भर भी चौकन्ना हुआ है अथवा नहीं। सिगरेट सुलगाकर जब वह सडक पर चला तो, उसे वे ही लोग थोडा बहुत दीखते रहे जो उससे बेहतर कपडो मे थे, जिनकी आँखो मे सम्मोहन था या जिन्हे मजार की वॉटनिवल' भाषा मे कालेज के लडवे गाइनॉशियम' कहा करते हैं। वह थोडा तेज चला । यह ध्यान रखते हुए कि उसका तेज चलना पीछे वालो को फूहड न मालूम पड़ने लगे । वल्कि वह शाही मचक भी अधिकाधिक बनी रह सके, जिसे अपनी चाल से अमित बनाने म उसे काफी दिन लगे थे। घूप उतरती हुई थी और सड़क पर उस मौसम अपरिचित और विदेशी सा लग रहा था। शाम को उसके यहां लोग आते हैं । विशेष रूप से छुट्टिया के दिन अधिक । वह नहीं चाहता कि लाग आकर लौटें। इसलिए वह थोडा तेज एक नमना सार्थक दिन । ९९ चला। घर जाकर उसने 'मनोनी' का टिन वैठक मे खाने की मुख्य मेज पर रख दिया । योई आ जाये इसका पूर्व जल्दी से अपने को ताजा कर उसने शनील का गाउन पहना और इतमीनान से सिगरेट बनानी शुरू की । अव कमरे में तम्बाकू की सुसवू थी । 'मद्रोनी' या डिव्वा वैठक की टेबल पर रखते समय उसने अपने को झुठलाया था कि एसा वह जानबूझकर नही, बस ऐस ही कर रहा है। जब उससे कुछ परिचित कमरे म आये तो उनका ध्यान नाकर्षित मरने की गरज से उसने नौकर को गावाज दी और झिडक से पूछा, "क्यो जी, यहाँ क्सिने यह टिन रख दिया है उसने मित्रो को चाय पिलायी और उन्ह दुनिया के महान् लेकिा अल्प- ज्ञात ऐसे कलाकारा की जिन्दगी की रोमाचक घटनाओ की जानकारी दने के अवसर निकाल लिये जिनके भम्बन्ध मे उसने हाल में कुछ पढा था। वह निश्चित था, उसवे दास्त उसकी सूचनाओ और बातचीत के ढव पर मन ही- मन मुग्य चमत्कृत हो रहे हैं। बाद में उसने कुछ रूमानी आकाशवाली कवि- ताओ चे टुपडे और बेतुके चुटपुले भी सुताये । मित्रो के जाने पर उसने सन्तोष किया, यह असफल नहीं है और आज-या दिन तो बहुत ठीक है । बाहर वक्त निर्जन और उजड नही गया था। अभी छ ही बजे हैं । उसको लगा जैसे अव कुछ भी धरने को उसके पास बचा नहीं है । उसने चाहा, अक- स्मात् कुछ ग्वारा घट जाये पर वैसा हाने की वाई उम्मीद नहीं लगती। इस समय यह कुछ भी कर सकता है । मसलन तेज रेडिया सुनना, पिसी भी पिल्म का तीसरा शो देख लेना, तनस्वाह ये चचे पूरे पैसा को होटल में खर्च कर देना, बात इसी समय दत्तपाव से पोई दोस्त या परिचित आ टपके । वह किसी ऐसे व्यक्ति ने उपर भी थोडे पैसे खर्च कसा स्वीकार कर समता है, जिसे उसने अभी तक पसन्द न किया हा। लेकिन उसने यह सब कुछ नहीं किया । उराने लगातार दो-तीन सिंगरट पीते हुए येवल चेन स्मोकिंग सरीखी हरवत की। कमर म इधर उपर उसी अस्थिरता मे वैवनी नहीं निठलापन और १००। फेन्स के इधर और उबर चचलता थी। कुछ ही पलो मे उसन कई गीतो को वमुश्विल एक डेढ पक्ति मात्र गुनगुनाकर छोड दिया । वह कहीं टिक नही पा रहा रहा है दूसरे कमरे मे जाकर उसने अपना चेहरा शीशे मे देखना चाहा । और देखने के बाद उस लगा, इन दिना वह अधिक स्वस्थ, सुन्दर और सुस्त हा गया है । जव कुछ सूझ नही पडता तो विवश होकर उसने एक विदेशी अग्रेजी पत्रिका मे छपा वह लेख पढना शुरू किया जिसमे उसने पहले से ही एक चिट लगा रखी थी। लेख नैतिकता और यौन-स्वच्छन्दता विषय से सम्बन्धित था। पढते समय उसे शीघ्र ही ऐसे वाक्य मिले जिन्हे उसका मन रखाक्ति करने को हुआ। एक क्षण पढना रोनकर वह पसापेश मे रहा, भाभी कितने तीखे स्वर म महाराज को डांट रही है और हल्ला हो रहा है । अन्दर जाकर उसने अपनी भाभी से कम से कम "जब कोई पढता-लिखता रहे तब न मौकने' के लिए कहा । वाक्यो को रेखाक्ति करते समय वह हल्का सजीदा हो गया । इस लेख के वाक्य हमारे समाज के लिए कितने सच है लेकिन कोई कुछ नहीं समझ रहा है, न समझना चाहता है । उँगली पर गिने जा सकने वाले लोग हैं जो थोडा अनुभव परते हैं, वापी ता भेट हैं । अभी जब उसने ऐसा सोचा तय उमे तैश था और अब हल्की हल्की निश्चिन्तता और सुसद सिहरन, इम बात पी कि वह भी वही उँगली पर ही है । वह खिड़की पर खडा होकर अड सा गया। और एक काल्पनिक झटके मे अपने का एक ऐसे समुद्र-तट पर अनुभव करता रहा जहाँ यह अवेला है । खिष्टकी के सीक्चो के पार थोडी-सी जमीन के तुरन्त याद सडर थी। समुद्र- तट पर अधिक समय यह नहीं रह सका । सडर पर एक देहाती-सरीखा व्यक्ति सूना चेहरा लेकर आया जो उसम थोडी देर बना रहा लेकिन जिसने उसके समुद्र को पी लिया । मा म उसने सडक वाले व्यक्ति के लिए बस इतना सोचा कि वह बेचारा विल्युल हिन्दुस्तान का आदमी लगता है । आदमी सडय के सामने वाले हिस्से से विरकुर गुजर चुका था और अब तक रिजवी तिमुहानी तर पहुँच गया होगा। यह उस आदमी ये प्रति दयनीय भाव समर्पित करने लगा । यह रछ नहीं जानता । ससार यी हजारो नयी-नयी चीजें यह वेचारा एक नमूना सार्थक दिन । १०१ । पया जाने ? इसी बीच कुछ लोग निपट अकेले और कुछ दो दो, तीन तीन के समूहो मे गुजरे। ये सब लाश से ज्यादा कुछ नहीं है । वह बुदबुदाता रहा । एक महिला, सडर के घंधलेपन म अच्छे शरीर-सोप्ठववाली लग रही है, (जो महण भगात्मक भी हो सकता है।) 'प्रेम' म एक शिशु को टहलाती हुई गुजरी । धीरे धीरे यह अपने से ही पूछने लगा, क्या यह सुन्दर औरत मॉडल बन सकती है ? 'बभी नहीं', काफी तन्मय होकर उसने धीमा उच्चा- रण किया, "इन सब चीजो को वह असभ्यता मानती होगी । वेहूदा समाज इस औरत के सामने किमी दूसरी औरत का 'न्यूड' रख दो, यह भय से चीख पडेगी और फिर ऐसी सुन्दर, शरीर-सोप्ठववाली नहीं लगेगी जैसी अभी लगी है । उसे याद गाया, मीना ने बहुत झिझकते गिडगिडाते हुए कहा था, 'देसो मान जाओ, मैं कभी वाथरूम में भी अपने को निर्वस्त्र नहीं करती।" चरागाही से मैसे, सडर होकर, गोधूलि के कापी बाद लौट रही हैं । सिडको पर एक भैस आयो और फिर सिलसिलेवार बहुत-सी भैसे थुलथल निकलने लगी। गडा पा वह हिस्सा जो सिडनी से नहीं दीख पा रहा था, शुरू में उसे वह किसी नाट्यमच के 'विग्स' की तरह कल्लित करता रहा । अब यह उसपे सम्बन्ध में कुछ भी ध्यान न करके अपनी विडयो को एक बड़ा मम सरीसा मान रहा है जिस पर चित्रपट बदलता रहता है । यह भी पतम हो गया और वह मैसो की तरफ लौटा । अडा वह खिड़की के ऊपर ही है। हो, कितनी दिलचस्प बात यह है, उसने सोचा, सहक से गुजरने न गुजरने याले सभी लाग इन्ही भैगो-सरीसे हैं । इरा ढग से लोगो के बारे में सोचने पर यह वापई बहुत आनन्दित और गौरवान्वित हुआ । इसलिए अब खिडमी याले मच पर यवनिका पता परते हुए यह हट गया । उराने यौन-स्वच्छन्दता वाले निबन्ध यो पाने जहाँ छोडा था, वहाँ रो पुन शुरू करने का इरादा किया। यह खुदा जरर है मगर उसे इस बात का आश्चर्य हुआ कि मामान्य दिनो की तरह आप उसे पढ़ने में आराम और पंप को नहीं है। दरअसल यह नगर था और उसरे मन में इस समय वे लोग आते हैं जिनसे तुलना परके यह अगों को आसानी से भिग पाना है। अपने ए गायो १०२ । फेस के इधर और उधर - के ऊपर उसे हंसी आयो, अन्दरूनी और गमक मरी, देर तक घुमडने वाली रतरियादार हँसी। किसी यात्रा के दौरान एम छोटे स्टेशन के प्लेटफार्म पर डो० के० ने एक युवा लडकी को 'पेण्टी पहने देखा था, जिसकी निन्दा, प्रसंग अब आने पर वह काफी अरसे तक करता रहा। एक बार ता वह काफी मद्दी वाते करने लगा था । और उस पैण्टी' वाली लडकी के मुकाविले मे सुद बहुत अश्लील और गन्दा हो गया था । अभी भी वह अपने साथी पर हँस रहा है, एक सहज हिकारत के साथ यह अनुभव करते हुए कि ससार सबका नही कुछ ही लोगो का होता है । साथी की निम्नस्तरीय दृष्टि को दुरदुराते हुए अपनी हँसी उसे जायकेदार लग रही है । डी० के० ही क्या, दूसरे दोस्त और सहयोगी भी उसे एक बारगी याद आये । किसी ने उसकी विशिष्टता को छोटी माटी चुनौती भी नही दी । उसको मषा आया यह सोचने म दि उसके साथ के कमचारियो का ध्यान केवल अपनी फूहड और बच्चा उगलने वाली बीवियो पर ही रहता है । इसी समय उसकी एक मात्र छोटी भतीजी ने आमर उसे आकर्षित किया- मम्मी पूछ रही है अकेले पड पड़ें क्या कर रहे हैं बाहर क्यो नहीं निकलते ' फिर तकरीवा दोहराकर, क्या कर रहे हैं, अ कल' बाहर निकलिए न " इस समय अपने मन के सोच विचार के आगे भतीजी को बातो की नाट कोयता और मधु म उसे मजा नहीं आया । उसे लगा, यह शोर और सलल है । उसन विल्कुल गिडगिडाते हुए वच्ची से लौट जाने वो पहा, 'वटा, प्लीज, अभी हम काम कर रहे हैं फिर आना । वच्ची किंचित् अविश्वास का भाव लेकर भुनभुनाती लौट गयी- चुपचाप बैठे हैं, कोई काम नहीं कर रहे है कह रहे हैं, काम कर रह हैं। कोई दूसरी मुसीयत न आ जाये, जो आ सकती है, डरते हुए उसने बाहर एक हलकी सैर करना ज्यादा मला समझा । वह बाहर आया । सामने के दस- फुटे खुले हिस्म म जो कुछ सब्जी के पौधे लगे थे, उन्हे देखते हए उसने अपनी निगाह वो तत्काल वहां स भगाया। हमारे घर वाले भी कोई कम वैकवर्ड 7 7
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१०४ । फेस के घर और उधर घर या सत्परता से उसने अपने अधूरे कागजो, डायरीज, फुटवर नोट्स और कविताएं सभी को सहजना और फाइल करना शुरू कर दिया जो यहाँ- वहीं लापरवाही से पड़ा रहा करती थी। यह तय करते हुए कि डायरी वह ! जरुर लिखा परेगा उसने अपनी नयी डायरी ऐसी जगह रखी जहां उसकी आँख और हाथ अक्सर जाया करते हैं । कागजो को संवारने म वह काफी डूबा और मशगूल रहा । उसने अपनी पुरानी चीजो को पढ़ा और यह नहीं महसूस किया कि उनकी जरूरत नहीं रही या वे मुग्ध नहीं करती या वे वाकई पुरानी पड गयी है। जब वह अपने कागजो मे खोया हुआ था उसकी 'वही भतीजी उसे खाने पर बुलाने आयी और साथ ही चले चलने के लिए लडियाने लगी। बच्ची के चेहरे पर छपी यार की माग आत्मीयता उत्पन करती थी। अपनी व्यरतता मे वह सुवी था और उसकी भूख स्वयमेव अल्प या अज्ञात सी हो गयी थी। उसने प्राय झझलाते हुए बच्ची को झिडक दिया, "क्या हमशा पीछे पड़ी रहती है, बस खाना खाना । वह दो अपनी मम्मी जाकर मुझे भूख नहीं है।' डांट खापर बच्ची, जिसरे वह खूबसूरत वाल कटाता रहता है, जिसके लिए उसने आयात किये हुए कपडा की फॉक सिलवायी थी, जिसके स्वास्थ्य का वह मम्मी पापा से ज्यादा ध्यान रखता है, सहमती वेसहारा भीतर लोट गयी। काफी देर उसे ठीक ठाक करने म लगी। उसने एक एक कागज को साव घानी से विलप किया, यह सोचते हुए कि आने वाले जमाने मे उसबका मूल्य महत्त्व हो सकता है । कई महान् वायग्राफीज उसके दिमाग म झलकी और उसकी कुछ घटनाएँ उसे आश्वस्त करती हुई उडनछू गयी। अपनी कुछ कविताएँ जो पुरानी होने के बावजूद उसे अभिभूत करती रही थी, मेज पर, वार-चार पढ़ने के लिए उसने रख ली। इतनी मेहनत के बाद उतरी हुई थकान-सरीखी हलकापन उसमे उमग आया । मन उडता हुआ। वाहर ओस है और जन सून्यता खास तौर पर लम्बी वल साती सडक के हिस्से की लापरवाही-सी वीरानी उरो प्रफुल्लित एक नमूना सार्थक दिन । १०५ । कर रही है । उसने पाया कि वह अपने गीत “लौटे हुए बादलो की हवा" की पक्तियां गुनगुनाते हुए सड़क पर कई मील "एकमात्र" की तरह टहलने की बाबत सोच रहा है। लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है, उसने अधिक साफ ढग से तय किया, इघर तो नौ साढे नौ के बाद ही आने जाने वाली पर कुत्ते लप- फने लगते हैं । साले देशी कुत्ते ! खंखारकर उसने धरती पर बे वजह थूक दिया। विया उसने यह कि अन्दर आवर पौन-स्वच्छन्दता वाले अधूरे पडे निबन्ध को बहुत आसानी से एक बैठक मे समाप्त कर लिया। इस समय वह एक वंडी घन्य अंगडाई ले रहा है और अपने अन्दर शोमा. सम्पन्नता का अनुभव करते हुए धीमे-धीमे कुछ गुनगुना रहा है । शायद वही "लौटे हुए बादलो की ह्वा" की कुछ पक्तियां ।
१० दिलचस्पी । विल्कुल तडका है । बगीचे की तरफ सुल्ने वाली विडकी के शीशी की रात को ठण्डक ओस बनकर घुधला कर चुकी है। धुंधला नहीं, अग्या । यह वहुत जल्दी जाग गया है जब कि सब अमी सोये है। उसने एक बार फिर सोचा और इस सच्चाई को अन्दर ताजा किया कि वह हमेशा देर से सोहर उठने वाला होकर भी कम से कम उस पहले दिन, केवल पहले दिन, जरूर ताके उठ जाया करता है, जब कमी किसी विलकुल नये शहर में जाता है अथवा लम्बा समय गुजर जाने के बाद छुटियो मे पर वाले शहर मे आना "होता है। दरवाजा खोल' सर्दी से अपने को सिकोडती और शरीर से अधिक दोनो भुजाओ को आपस मे वक्ष पर दबोचती हुई जीजी आयी और आश्चर्य प्रकट फरने लगी--"ओहो, भैया जी हैं। इतनी जल्दी कब से उठने लगे हैं आप जनाब ?" वह मुसवराने लगा । उसने पाया, जीजी विवाह के बाद तुला हुआ और दौलीयुक्त योलने लगी हैं। वर्षों इस घर में रहो, कोई सास लहना नहीं था उनम, साधारण थी। इधर थोड़े-स अरसे म ही अकेले पति मे उह कितनी स्टाइल दे दी। तब तक मौ, नमिता, प्रकाश सब आ गये । सामने एक साफ सुथरी पगडण्डी है, जैसी अवमर बरसाती मे बन जाया परती है और फिर जाडा-मर बनी रहती है । बंगले ये अन्दर पगडण्डी मिमी पहुत बढे घहर में सरित गति से चलने वाले लागो से भरी सड़क पर एक पोमा विसातसाने वा ठेला देखकर जो रग राक्सा है, वैसा उस लगा 1 दोनो सरफ मोटी हरी घास थी और विभिन्न किस्म पे उटो हुए पेट ।
दिलचस्पी । १०७ उसने सामवहादुर और क्वार्टर में जो नये लोग आ गये है उनकी दावत उत्सुक्ता प्रकट की। माँ की उम्र बहुत है फिर भी वही पहले बोल पड़ी- "सामवहादुर फौज में चला गया है मुकुल, और अब घर में काम-काज की बहुत दिक्कत हो गयी है । और हाँ, तुम नहीं होगे, सामने के घोप वाचू बेचारे गुजर गये । बड़े भले आदमी थे, राम-राम ।" थोडा-सा अफसोस प्रकट करता हुआ अन्तराल, फिर-"काली वावू का मकान सिन्धियो ने खरीद लिया और सामबहादुर का क्वार्टर भी थोडी मरम्मत के वाद मकान-मालिक ने उठा दिया है। ये नये किरायेदार बड़े अच्छे लोग हैं वेटे ! बस, प्याज-लहसुन वहुत खाते हैं ।" इस बात पर सव बुरी तरह हंस पड़े। मां ने बताया, ये लोग उसे देखने को बहुत उत्सुक हैं । श्रीमती जोशी कहती थी, आपके सव बच्चे देख लिये वस मुकुल को नही देखा । इसके बाद मां ने अपने सामने के बच्चों को फिर से देखा। एक आवश्यकत्ता भरी दृष्टि मे-"कई बार पूछ चुकी है, छुट्टियां कर से हैं ? वन्दना तो दिन-भर यही पड़ी रहती है ! इस समय चाय तुम्हारी उन्ही के घर पर है ।" वह चाय के लिए हिचकता-हिचकता पहुंचा । अव यह सामवहादुर का क्वार्टर नहीं है । वह खिड़की की तरफ आईने में चेहरा देख रही थी। एकदम घवरा-सी गयी। उसने आईना तुरन्त पास के विस्तरे पर फेंक दिया। घबराहट के स्थान पर पर अब झेंप उसके मुराड़े पर थी। उसने उसे घले आने के लिए कहते हुए अन्दर-ही-अन्दर हिम्मत्त यांधी होगी। बैठते हुए वह सोचने लगा, वन्दना तो शीशा देखते हुए पकड़ी जाने पर सकुच, धवरा गयी-यह बहुत कॉमन है । अकसर लोगों को शीशा देखते हुए पकड़े जाने पर, एक अपराध का-सा अनु- भव होता है। उसके ही घर में शृंगारदान केवल शो-पीस है। घर के लोग रालकर सजते हुए कभी नही मिलते । सजते हुए मुक्त लोग उसने केवल ग्रीन- रूम में देरी हैं। अन्दर कांच के बरतनों के पजने से घाय की तैयारी का आभास मिलता है । अकेले बैठा दिये गये अतिथि को ये भावाज प्रमुख होकर सुनाई पड़ती है। वह कमरे को देखने लगा। अन्दर शायद किसी ने कमाते हुए दयेला तो १०८। फैन्स के इधर और उधर 1 श्रीयुत जोशी कमरे मे आकर उनके सामने बैठ गये और महज परस्पर अभि- वादन के बाद अन्दर से साथ लाये अखवार में मशगूल हो गये । वह सोचने लगा, सुबह वच्चो और औरतो के सूम्वते कपड़े देख, इस क्वार्टर को एक आसान-सा परिस्तान कल्पित करके मजाकिया तौर पर ही वह जो खुश हुआ था उस पर अय हँसा जा सकता है। अन्दर को व्यर्थ और समाप्त कर देती हुई चाय आयी और उसके साथ पूरे घर की एक छोटी-सी दवी भीड । अभी वह अकेला था और अब बेपनाह घिर गया है । मधुर-मधुर गृहिणी, आग्रहयुक्त । शुरू मे जरा परेशान-सा हुआ। अव सोचने लगा, कभी वह गुजरात जरूर जायेगा, वहाँ भी लोग ऐसे ही होते हैं क्या ? यद्यपि यह निश्चित है, गुजरात-बुजरात क्या जायेगा और कभी गया भी तो उस समय इस तरह नहीं सोच सकेगा। श्रीमती जोशी की छोटी-सी प्यारी बच्ची जो सम्भवत. उनकी आखिरी सन्तान लगती थी और जिसके बारे में उसने पता नहीं क्यो सोचा कि ईश्वर, यह उनकी आखिरी सन्तान ही रहे-उसके ऊपर लगभग चढ़ सी आयी । बोली, "आप पहाड़ पर रहते हैं न अकल ? आपको वर्फ मे सर्दी नही लगती ?" उसे लगा, यहां सब उसके बारे मे जानते है । और शायद नही भी जानते । जैसा उत्साहपूर्ण आदर-सत्कार उसका है, उससे यही पता चलता है । श्रीयुत जोशी का चेहरा गुमसुम है। और साफ पता लगता है, उनका यह गुमसुमपन स्थायी और स्वाभाविक है। वे केवल इतना कहकर चुप हो रहे कि "इस वार वरफ जल्दी पडेगी, अखवार मे आया है।" लगता था, उनके सब बच्चे चाहते है कि वे और वोले ताकि वातावरण में उनके कम बोलने से जो वुजुर्गी अधिक छा गयी है वह कम हो सके । उन लोगो को भी बोलने की ताकत मिल सके । अधिक मजा तब रहे जब वे मुकुल भाई से पहाड-की ही बात करें जिसमे किस्से का-सा मजा आये। "तो मैं क्या कर सकता हूँ, बर्फ जल्दी गिरने का ताल्लुक मौसम से है, मुझसे नही," वह कहना चाहता था । लेकिन उसने कहा इसके बिलकुल विप- रीत, "जी हां, पहाड पर भी लोग ऐसा ही कह रहे थे।" क्या दिलचस्पी । १०९ चाय पीते समय इसके बाद और कुछ बातचीत नही हो रही है । सिवाय ठेस ठूस कर सिलाने वे आग्रह के । लोग उसे घेरे हुए हुए हैं, घर लेते है, और चुप रहने के कारण अन्दर अन्दर, लगता है, टंगे हैं । वह बुरी तरह फैसा मह- सूस करता रहा और खीझता रहा, पहाड पर क्या गोया जन्नत में रहता हूँ। जाते वक्त श्रीमती जोशी की छोटी बच्ची एक हलकी गरिमा मरी मच- ला में बोली, "अक्ल, आपने पहाडो पर वर्फ म रहने वाली परियो की कहानी हमे नही सुनायी ? वर सुनायेंगे ?" प्रश्न या उत्तर टालने के लिये उसने पूछा, "अच्छा बताओ, तुम्हारा नाम कपा है " - "नही नहीं, आप पहाड की परियो की कहानी सुना तभी हम नाम बतायेंगे 1" इस बार उसकी मचलन में थोडी जिद भी शामिल थी। लौटवर उसने छुपवे अपने को शीशे मे देखा कि वह वन्दना को, श्रीमती जोशी और सवको थोडी देर पहले पैसा लगता रहा होगा । उसने कई बार कई जगह विभिन्न कोण से अपने चेहरे का प्रतिविम्ब औका । वह थोडा अस- न्तुष्ट रहा । उसे लगा, वह चेहरा जो थोडी देर पहले वह श्रीयुत जोशी के घर लेकर गया था फिलहाल गुम गया है । "आप क्तिने भाग्यशाली हैं मुकुल माई, पहाडो पर रहने को मिला है।" चन्दना अपने-आपको निराश करती हुई चुप हो गई । यह मुकुल के प्रति उसका पहला सीधा और नजदीकी वाक्य है । साफ पता लगता है, वह मुकुल माई के उच्चारण मे जरा भी हिली नही । इसके बाद और भी वाक्य थे, लगभग इसी प्रकृति के । अभी उसने खुद को सुनाते हुए-सा कहा, "हम लोग तो सिविल लाइन जानते है और चौत्र, वस । एक बार जव छोटे-से थे तो सुना करते है, कानपुर गये थे।" नवम्बर जो प्राय बहुत स्फूर्तिदायक और चटख होता है, काफी गीला और टण्डा है। सिहरन पैदा करने वाले सफेद डवडवाये बादल आकाश पर जमने लगे हैं। दरअसल, नवम्बर दिसम्बर सरीखा तेज हो गया है। उसने पिली लूलपट मरी कठोर और गरम दुपहरो-को सरपट ढंग से अनुभव किया ११० । फैन्स के घर और उधर और अभी-अभी पहाडो के सम्बन्ध में अन्दर पंदा हो गये चिडचिडेपन को उचित माना । वन्दना ने किसी फिल्म का नाम लिया और बताया, जहां वह रहता है उसके चारो तरफ के पहाडो म ही वही उसरे अनेक दृश्यो की शूटिंग की गई है-"आपने वह सव देसा होगा, कुछ भी छोडा नही होगा । आप तो मजे हैं और फिर आप शौपीन भी तो है," वह साथ वोलती और मुस्कराती रही। वह उसे इस तरह देखती रही ज्यो वह एक सामान्य भादमी नही दृश्य है--ऐसा पहाडी दृश्य जिसकी पृष्ठ-ममि मे फिल्म की शूटिंग हो रही है । उसे वन्दना के देखने के इस तरीके मे हलकी व्यर्थता महसूस हुई । कई दिन वन्दना ने उसे देखा लेकिन उसकी दृष्टि का अभिनन्दनपूर्ण उत्साह चुका नही । बडा भयानक है यह ! उसके दिमाग में आतकित करने वाले शोर को उगलते प्रपात, निर्जन भयावह अरण्य और हू हू करता सनाटा और शाम यक-व यक ताजा हो गयी। पत्थर केवल पत्थर और चारो ओर एक क्रूर सूनापन । लेकिन उसने पहली बार पहाड जाकर लौटे, अपने बढे हुए ज्ञान पर गप करने वाले लोगो की तरह वन्दना, जीजी, नमिता, सवको सेव के बगीचो, झील जल की छातियो को चीरते यॉटो, धूप छाँह मे बदलते पहाडी रगो, घाटी से धू धर घूधर उठते कुहरे, ढलानो पर फूल और बर्फ और असख्य पर्वतीय ध्वनियो की ही बढी चढी बातें सुनायी। बातचीत, ठीक अर्थों में बातचीत क्या वल्कि वे सूचनाएँ जो अभी देता रहा था, खतम सी लगती हैं । लोग चुप है लेकिन उदास नहीं । धूप ने बादलों को फाड कर दुबला कर दिया है । घर वाले उसको विशिष्ट या चार लागा के वीच घर की प्रतिष्ठा बढाने वाला लडका समझकर अपने अन्दर अभिमान की फुरहरी महसूस कर रहे हैं । विशिष्ट इसलिए कि उनका मुकुल एक प्रमिद्ध पहाडी स्थान पर नौकरी कर रहा है जबकि दूसरे परिचिता और मुहल्ले वाला के लडके इसी टुटपुंजिया शहर म बरसो से बने हुए है या ज्यादा हुआ तो चालीस पचास मील इधर-उधर छाटे कस्वो म नोकरी करके मामुली माने जाते - दिरचस्पी । १११ है । यही कारण है, उनको अभी की चुप्पी भी स्वादिष्ट लगी ! जीजी युवा और अर्थ शिक्षित लडकियो की तरह वन्दना और उसकी मां की तरफ रूमानी लहजे मे देखती रही । 'देख लिया वाला लहजा । इत्तफाक कि कुछ बोल नही पड़ी। नीजी अब बहुत अधिक ऐसी हो गयी है । जीजा उनके लिए अब भी बत्तीस वत्तीस रुपयो तक की लिपिस्टक लाते है जो इलाहाबाद-सरीखे शहरो में भी नहीं मिल सकती। ऐसी चीजो का आयात बन्द है। इस बात की उह खुशी है, राष्ट्रीय खुशी नहीं कि जीजा ने उनके लिए और भी अनेक तस्कर यस्तुएं इवट्ठी की हैं । जीजी यह सब बताते हुए मुग्ध हो उठती है । इठलाती है, लोग सामने बैठे हुए होते है नहीं तो उनकी तमना तो उस वक्त यह होती है कि वे पणो के बल खडी होकर पति को तत्परता से कुछ चुम्वन दे दें और आँखो आंखो मे कह, तुम कित्ते अच्छे हो । लेकिन एसा मन म ही खिलवे रह जाता है और फिर जीजी अधिक से अधिक कोशिश से पैदा हुई विसलिंग के साथ, लस्त-लस्त चाल मे दूसरे कमरे या किचन म चली जाती है । वन्दा की मा श्रीमती जोशी सुन्दर है, दवकर वोलती है और तमी बोलना शुरू करती है जब आश्वस्त हो जाती है कि उनका बोलना, दूसरे, विशेषत किसी पुरुष के साथ, अकस्मात नही लड़ जायगा । शायद अपनी सात्विक्ता के लिए उन्हें यह जरूरी हो । अकसर पुरुष-औरत की बात या लड जाना लगभग शरीर के लड जाने की तरह बुरा समझा जाता है । पर वे युरी नहीं है । यदना के लिए वोली, "मैं तो इनके पिता से हमेशा कहा करती हूँ, इसकी शादी पहाड पर ही मरेंगे।" चूकि वे माफी देर बाद, पहाड के प्रसग के लगभग समाप्त हो जाने के बाद वोली, इसलिए लगता है श्रीमती जोशी छोटी-छोटी काल्पनिक और स्वप्निल बातो मे जीती रहकर खुश रहती हैं। 'पहाड पर ही करेंगे," वन्दना अपनी माँ के जुमले की पुनरावृत्ति वर्तुल ढग से करये उठ नहीं गयी जैसा कि आम तौर पर क्यिो के लिए जरूरी हाता है। उसने पहले तो यह साचा, वन्दना पच्ची है इसलिए शरमायो नहीं । .
११२ । फेस के इधर और उधर फिर सोचने लगा, मला लगता है कि लडकियां आजकल उठकर कम जाती हैं, अव तो वगाली फिल्मो में भी अपनी शादी की बात सुनकर वे भाग नहीं जाती। वन्दना की मां ने नाक की सुनहली कील घुमाकर छोटे-से छिद्र को शायद बेवजह खुनाया और हंसती रही । मुकुल को, जो लॉन से सूखी पत्तियां बीनने लगा था, आकर्षित करती हुई वोली, "आपके यहां की पनिकाओ मे से काट- वाट कर न मालून कितने पहाडी चित्र इसने अलबम मे इक्ट्ठे कर रखे हैं ।" वाद में एक दिन अपनी किताव की अलमारियो मे बमुश्किल इकट्ठा किये गये नेशनल ज्याग्रफिक के पुराने अको मे अनेक पृष्ठो को ब्लेड से कटा पा उसे बड़ी कोफ्त हुई । मन मे उवलवर भी उसने अपने नुक्सान और वन्दना तथा नमिता की हरक्त को चुपचाप पी लिया। खास तौर पर आज, यूनिवर्सिटी मे लोगो से मिल-जुलकर वह घर लौटने के सम्बन्ध मे काफी जल्दवाज हो गया है । वन्दना घर से जो कपडे पहनकर गयी थी वे साधारण और ढीले थे । हमेशा ही वह ऐसे कपड़े पहनती है । शायद पहनना पड़ता है । आज उसके कपडे विलकुल भिन्न थे, वे आकर्षक, बेहद चुस्त और आश्चर्यपूर्ण लगते थे । सुवह घर से युनिवर्सिटी नाते समय पहने हुए कपडो का वहां कोई परिचय नहीं था। रास्ते मे दोस्त लोग कुछ और बातें कर रहे है । छूटे समय की वे बातें जिन्हे मुकुल को बताने के लिए उन्होने भुलाया नही है । छोटी-छोटी बातो को जिन्दा रखने के लिए, स्कण्डल्स मे तबदील करवे उन्होने पाल-पोस रखा है। सडक पर सव साइकिल एक कतार मे नही चल सकती । ट्रक और कार उन्हे आगे-पीछे कर जाती है । सब फिर जुड जाने की कोशिश करते हुए एक दूसरे की साइकिलो के समानान्तर होने लगते है और शहर की लोकप्रिय महिलाओं की शादियो, वरवादियो के टूटे क्रम को जोहने से शामिल होकर मना लेने लगते हैं। ।
दिलचस्पी । ११३ वह चलते हुए मित्रो में भी है और वन्दना के साथ भी । उसे दोनो जगह रहने के लिए नाटक करना पड़ रहा है और एक साधारण मेहनत । वन्दना का क्या होगा, यह ध्यर्थ की बातें साचने वाला एक मूर्ख मनुष्य है। वह अपनी मूर्खता को नष्ट करने को फिलहाल तैयार हो गया । सोचने लगा, अघि स- अधिक यह होगा कि कुछ समय बाद वह एक नयी और सरल भाषा बोलने रगेगी, आयनिकाओ की भाषा देखिए जी, आप कुछ नही देखते, वेदी ने वाथरूम पर दिया है । बताइए, भै क्या वरूं, आया भी तो नहीं है।" 'वेवी ने वायरूम कर दिया है !" कितना मजेदार मुहावरा है इस तरह वह पूरा मित्रो म शामिल हो गया। अभी आधा ही था। मित्रा ने अभी. सभी कोई रिक्शा देखा है और ध्यान आकर्षित करते हुए वे एगभग चिल्ला से रहे हैं कि "उसमे बैठा हुआ कोई विरकुल चक्कू-सा गया है । घर पर उसे जीजी ने बताया, 'हां, वह ऐसा करती है । कूछ कपडे बनवाकर उसने सहेलियो के साथ हॉस्टल मे रख छोडे हैं, वही बदल लेती है, पर मे किसी को पता नहीं। पता लग जाये ता ईश्वर जाने क्या हो। तुम किसी से पहना मत।" वह पुन मानवीय हो गया। जीजी उसको पहचानती हुई वोली, 'क्या करे वेचारी वन्दना भी, बडे आल्ड फैशण्ड लोग है इसके घर वाले ।" उसे याद आया, जब वह युनिवर्सिटी मे पढता था दो एक तांगे मे आने वाली सभी मुसलमान लडकियां अपने बुरके यम्पनी गार्डेन की क्सिी हेज मे छुपा दिया वरती या कोचवान को सुपुर्द कर दती थी, जिसे उन्होने मिला लिया होगा। फिर वेपद होकर युनिवसिटी आती थी। लौटते समय बाजारो से बुखा पहनकर गुजरती और अपने घर वालो की पवित्र लडक्यिा हो जाती थी। उनका निश्चित रूप से कभी कुछ नही होगा। हाँ, दुखी रहने वाले और अफसोसग्रस्त लोग वैसे वे वैसे ही रह गये होगे। यह सोचकर वह और गम्भीर हो गया । उसे लगा वह एक दु खो व्यक्ति है और यह प्री तरह प्रक्ट हो चुका है । भय की बात थी। जीजी उसकी कोई बुजुर्ग नहीं हैं ने प्यार भरी हथेलियां उसके गालो पर माई, उसर सर के छोटे छोटे वालो को उँगलियो से पल भर मसाज सा ११४ । फेन्स ने इधर और उधर ? किया, पिर सर्वथा लडियाते हुए पूछने लगी, "मुकुल, तू हमेशा सैड सैड-सा क्यो रहता है इस उम्र म तो लडो खूब स्मार्ट होत हैं । तू गापाल से कभी नही मिला, उसकी और तेरी उम्न लगभग एक ही होगी लेकिन वेहद यग और स्माट है। सुवह स रात उसके जूते हमेशा खट खट बालते रहते हैं।" वह चुप रह गया और चेहरे पर पोका होता हुआ हँसने लगा। जव जीजी उसे उदास मान ही चुकी हैं और दायित्व का निर्वाह कर लेने वाले व्यक्ति की तरह सन्तुष्ट और सुखी हो गयी हैं तो वह कसे उनकी बात को अस्वीकार कर दे। सोचा, अपनी बहन के आगे वह अच्छा-खासा पिड गया है। जाडा मे शाम जल्दी जानी चाहिए लेकिन वह देर से आयी । इचर अॅधि यारा छुप जाने से ही काम नहीं हो जाती। यहा तो आकाशवाणी टाइम सिंग- मत्स पास के सगीत विद्यालय से रम्भाती हुई गायिका लडकियो के स्वरो और स्टोव मे मिटटी का तेल भरते समय उड आने और परेशान करने वाली बास शाम का अधिक स्पष्ट पता बताती हैं । हरमुनियम पाला सगीत रास्तो, छतो, चारदीवारिया को लांघ घर मे घुसने लगता है और ढूढना पड़ता है कि घर मे अब किस वजह से रका जाये जवकि सगीत वाकायदा खदेड और हडवा रहा है। वह डाइग रूम म घुसा। वदना और नमिता दोनो रेकेंड सुनने की तयारी कर रही है। मुकुल भाई इस समय यहां भी आ सकते हैं-यह वात उन दोनो को किंचित आश्चयजनक लगी लेकिन कुल मिलाकर यह हुआ कि वे सक्षिप्त तौर पर खुश होकर पगला सी गयी। उसो अप्रभावित रहने की कोशिश करते हए वदना की तरफ देखा लेकिन उसे अप्रभावित रहने की कोशिश करत ए वन्दना की तरफ देखा लेकिन उसे उसकी आकृति में कोई पफ नहीं मिला। सामान्य, उसका अपना वाला प्रफुल्ल और शुद्ध जनामापन जिसम सुवह युनिवर्सिटी वाली चतुर वदना आमासहीन थी। नमिता ने मुकुल से जो अभी तक खडा था बैठने को कहा- 'माई डियर भाई साहव तशरीफ रखिए, देखिए हम अपनी फ्रेंड के यहां से वेस्टन म्यूजिक दिलचस्पी । ११५ का एक रेकर्ड लाये है, कृपया इसको सुनिए और हमारी तारोफ करिए।" कोलम्बिया का तवा रेकर्ड प्लेट पर चकराने लगा। जीजी, वन्दना, नमिता सबने इस नये रेकर्ड को सुाने के लिए मकुल से अलग हो वाजे को घर रखा है। गोया वे जितना पास होगी उतना ज्यादा रेकर्ड का मजा उठा सकेंगी। ऐसा लगता था, वे सब कोई फिल्म देखकर आयी है जिसम नायक ने नायिका के साथ किसी हिल स्टेशन पर महव्वत-भरे माहौल म काई वणप्रिय गीत गाया होगा और घर आते ही एक वर्फीला गाना सुनने की जरूरत इन्होंने महसूस की हो--यह सोचता हुआ वह अपने अन्दर की मुसकुराहट को ओठो पर काट रहा है । यह मुसकुराहट प्रकट करने लायक नहीं है । संगीत उन्हे पहाडो पर हाने वाले विण्टर फेस्टिवल के चारो तरफ हितकर और सुखद वहशियाने तरीके से घुमा रहा है । इस सम्बन्ध मे वह, पता नही क्या, वडा ही रूढिग्रस्त और कट्टर होकर महसूस करता रहा है कि वर्फ का सम्बन्ध कही न कही मौत से है । लेकिन वस्तत यह ससार वे खुश और चालार लोगी यो गैर जिम्मेदार मानता -आ पिर से दुखी हो गया है । हियर इज स्नो, देयर इज सो, हेयर टज सो? वही रकेर्ड, दोबारा था, तियारा लगा दिया गया है । वन्दना अव टापेटा ये नीले और उस भद्दे से लगने वाले टुपडे पर कुछ काढन का काम करती हुई पूछती है, “मुवुल भाई, नापने स्पेटिंग सीसी है कि नहीं पहाड "नहीं।" "और ट्विस्ट" नलिनी पोहनार पितना उम्दा ट्विस्ट वरती थी," वन्दना ने नमिता की तरफ मुडपर उसके समर्थन की उम्मीद मे तापा, फिर विना परवाह किए उसन टाफेटा मा नीला पडा परम पर लापरवाही से फेंक दिया और उत्साह ११६ । फेन्स के इधर और उधर " मे खडी हो गयी-"मुचुल भाई, आपको से बतायें, क्तिनी गजव की उसकी ट्विस्टिग थी। उसने उटी मे कही मीखी यो । उसरे फादर "हट, उसने माउण्ट आबू मे सीखी थी, स्टी में नहीं मैंना (वन्दना का परू नाम) " नमिता ने तत्परता से उसे काटा। मेरा मतलब है, वहीं पहाड से ही वह सीख से यहाँ आयी थी, कोई इधर थोडे ही उसने सोपी है," वन्दना में अपने को काटे जाने का एक बहुत ही बमनीय और सक्षिप्त तैश था। नमिता, लगता है इधर उधर होना चाहती है। वन्दना मे किसी दूसरे घाम की तैयारी नही है, इसलिए वह सुविधा से बैठी है । उसके अन्दर कोई हिचक नहीं है-"मुकुल भाई, हमे तो ट्विस्ट वडा मुस्किल लगता है, हमारा तो शेष सीखने का मन है।" 'शेक मे क्या है, उसे सीखने की जरूरत नही पडती," उसने मजाक्यिा तरह से पहा । 'आप शेक जानते हैं ? ' वह अपनी जगह पर खडी खडी ही ज्छली। मैंने कहा न, उसमे सीखने को कुछ नही है ।" "हय, आप तो कितनी चीजे जानते हैं, कितने इण्टेलिजेण्ट हैं ।" फिर-- "हम लोग कितने अमागे हैं, यहां कुछ भी नही है ।" एक्दम खुश होने के बाद उस पर ज्यो उदासी का झोका लद गया हो, हिल्स पर तो सीपने का मौरा भी मिलता है, यहाँ क्या मुरदा मुरदा जिन्दगी है।" "नही, तुम इधर भी सीख सकती हो । नाच के लिए पहाड जरूरी नहीं है।" अब के बावजूद और वार्तालाप चला रहा था । शायद यह उसकी भूख रही हो या उम्मीद । "अपना सर सीधेगे 1" उसका दूसरा जुमला वन्दना ने सुनने की जरूरत गही समझी-"दो एक साल मे शादी-वादी हो जाएगी, फिर सब फिनिश्ड । मुकुल भाई, रियली यू आर व्हेरी लकी, आपने पूर्व जन्म मे खूब पुण्य किए होंगे, तभी पहाड पर नौकरी मिली है।" यह खुश हो गयी, ज्यो अभी सब कुछ फिनिश नही हुआ है या जैसे उसे भी पहाड पर नौकरी मिल गयी हो। . - दिलचस्पी । ११७ रेकर्ड मे रिंगरस म्यूजिक का अन्तिम हिस्सा बजकर अभी-अभी ही खतम हुआ है और स्नो को कमरे मे भरी हुई चीख धीरे धीरे गुम हो गयी है । केवल परेण्ट की हलकी आवाज है जो कभी भी वन्द की जा सकती है। मन तो उसका यह हुआ कि लडकियो से कहे, वह ताण्डव भी काफी अच्छी तरह जानता है लेकिन वह चुप रहा । अपने बारे मे निर्मित होती सजीदगी को तोड. कर विनोद करने का खेल उसने नही किया । उसने अखबार उठाकर खोल लिया। चेहरा छिप जाने पर सोचने लगा, अब क्या करना चाहिए ? जरा-सी कलाई घुमापर, घडी देखी । वहृत दर नही हुई है, अभी वह बाहर निकल सकता है और गायद खुश भी हा सवता है। चित्त की प्रसन्नता अभी उसके पास बची है। अग्ववार के दूसरी तरफ वन्दना और नमिता वात किये जा रही है । स्लैक्स और जीस, पहाहा पर सैर- सपाटे के रोमाच, कुछ नाम अनाम सहेलियां, फिल्म आदि । कभी कानाफूसी और कभी उत्साहप्रद स्वर-तेजी । पहाडो पर स्लक्स से बहुत सुविधा होती है, इस सम्बन्ध मे दोनो के बीच कोई विवाद नहीं है। लेकिन वन्दना के घर वाला को स्लैक्स असह्य है । उसने आवाज को निहायत धीमा करके एक छोटा सा पडयन्त्रपूर्ण भाग्रह नमिता स किया, 'तू एक स्लयस वनवा न ले । तेरे यहाँ तो कोई कुछ कहेगा भी नहीं, उसे ही हम लोग बदल-बदल पर पहन लिया करेगे, जय वमी भी हित्स जायेंगे बीच मे छाये अखवार की परवाह न करते हुए अब वह उससे कह रही है, "अव की अप्रैल मे हम लोगो को उघर जरूर बुलाइए, मुकुल भाई । तव तक हमार 'एक्जाम्स भी खतम हो जायेंगे। आपके पास तो मकान भी है, आपको क्या दिक्कत है ?" "हाँ मइया," नमिता ने जोहा, "वहां राइडिंग परेंगे, जीजी के गितार पर तुम्हारी पोयम्स पढेंगे और सन्ध्या मुखर्जी के गाने गायेंगे। फूलो के गुलदस्ते बनाना सीखेगे, फोटो खीचेंगे और डान्स पारी से टाटा-टी-टर-टाटाटी करती हुई चुटक्यिो के वजन पर दो तीन बार उसने अपनी टोगे आगे पीछे फेवी और नितम्ब हिलाने लगी। वन्दना ने भी रंगो मे एक उघाल अनुभव को और मुकुल भाई तथा सहेली को गहरी नरम " " लय- ११८ । फेन्स के इधर और उघर नजर से देखने लगी। उसने कुछ जवाब नही दिया । सिर्फ अखबार के दो छोर, जो अभी तक उगलियो में हल्के से लटके थे, मुट्ठियो मे भिच गये । शाम को अखबार कूडा हो जाता है यह समझ उसने उसे फर्श पर हाथ के धक्के से उड़ा दिया । लड- कियो के व्रज पर उसे कुठन हुई। उसने चाहा कि वह कोशिश करके इन स्थितियो को मौज मे ले सके लेकिन तत्काल यह मुमकिन नहीं हुआ। वह चिढा रहा । उसे वन्दना के चेहरे पर वोरियत दिखाई पड़ने लगी और नमिता, अपनी बहन के चेहरे पर भी । जीजी नही थी अन्यथा उनका चेहरा भी वैसा ही लगता । उसने पाया, वह इन लोगो से काफी ऊब रहा है । उसका भविष्य विगडता जा रहा है और अगर वह कोई दिलचस्पी इन लोगो मे नहीं ढंढ सकता तो कम से कम फिलहाल उसे बाहर ही निकल जाना चाहिए। एक बार उसने वन्दना और नमिता के चेहरे की तरफ पुन देखा, इस लापरवाह उम्मीद म कि थोडा समय बीतने पर शायद वे अच्छे लगे । वे बैंस ही हलके फुलके और बोर थे। उसने एक मजेदार वात सोची। उसके सामने प्रमपान वे चुनाव का प्रश्न आये अथवा मन मे प्रेम की घाख घडी की बात, तो वन्दना के स्थान पर उसकी मां से प्रेम करने की कल्पना निश्चित रूप से उसे अधिक उत्साहित करेगी। ऐसा सोच उसने अपनी ऊव के साथ एक खिलाडी व्यक्ति की तरह व्यवहार किया। * अच्छा माई हम चलते हैं ।' यह उठ पडा। "कहाँ ? वही ?" एकाएक वह समझा नही। भाइयो का जबरदस्ती रही मुहब्बत मे गिर- फ्तार मानकर चलने वाली फैशनेबुल और दास्त वहतो की तरह वे दोगो मुस- वराने रगी, जिसम मध्यमवर्गीय सवारो वाली मुसकराहट भी थोडा बहुत चिथडा होकर अटकी मालूम होती है । स्खे ढग से एक कड वा और झूठा हाँ कहते-कहते, रकार उमने व्यग्या- त्मक मुसरराहट की एक बहुत छोटी सहर अपने अन्दर महास की। वह नामालूम-सी प्रदगित हुई। मुकुल वाहर आ गया। वे दानो उसे 'सी ऑर' दिलचस्पी। ११९ पारने सरोसी मुद्रा में पीछे पीछे आयी । चाहा होगा, लेकिन 'गुड लक' कहने की हिम्मत उनकी नही हुई । अभी वे कच्ची बनती हुई आधुनिकाएँ है । बहुत से शब्दो म उन्हें झिझय होती होगी। फिर मुकुल माई का कोई मामला वामला है, इमया उह परका पता नहीं इसलिए गुड लक नही हुआ । बाहर म्यूजिक स्कूल म हरमुनियम वाला सगीत जोरो पर है । लगा, पहलवान लड़- कियां सरगम पर अरोह अवरोह वाली पोई पसरत अपगी त दरुस्ती के लिए पर रही हैं। वन्दना और नमिता अभी भी पहले सी थम-थम ये मुसपरा रही है और दरवाजे पर सडी उराको भाप रही है वह बाहर आ गया। इन लडकियो की मुसकराहट बहुत चालाप और समझौता करने के उद्देश्य से भरी हुई है । उसे लगा, दोना कही प्रेम करना शुरू कर चुकी है ।
११ छलॉग श्रीमती ज्वेर जब यहां आकर वगी तो लगा कि मैं, एक्वारगी और एक तरफा, उनस फंस गया और उन्हे छाड नहीं सकता। एक गभीर शुरुआत लाती थी और यह वात यं सच मालूम पडी यि दूसरे साथियो की तरह मैं लडकिया को, आमतौर पर ताक्ने, मानाज दने और दूसरे तरीको द्वारा छेडन से बचा रह गया। मैं कोशिश करता रहा और उसकी तरफ जाता रहा । यह जल्दी ही सर्च हो गया कि वे मेरी माँ से कुछ ही छोटी है। लेकिन इसस कोई फर्क नहीं पडा । मैं कह चुका हूँ, पता नही मुझे कैसे तीर की तरह महसूम हो गया कि दुनिया म यही एक औरत बनी है, वाकी सब केवल पैदा हुई हैं। मुझे उसकी सुदरता का कुछ सयाल नही रह सका। सबसे सामयिक यात मरी उम्र थी और मुये श्रीमती ज्वेल पी वाकई बहुत जरूरत थी। श्रीमती ज्वेल कापी देशी महिला थी। पानपुर के पास वही दी। इस तथ्य का कोई मजाक मेरे दिमाग म नहीं बनता था कि वे 'प्यार' नहीं हैं । मैं याद करता हूँ, वह मौसम गर्मियो का था। क्या किया जाय, यह न समझ मे आने वाला मौसम। उन दिनो अन्धड दरवाजे को वार वार पीटता था। जामुन वे पेड की एक अलग आवाज छत म मर जाया करती फिर देर तक पमरो मे छनती रहती। आगन से गर्म और सूखी भाप निकलती हुई ऊपर की सरत घूप म शामिल होती दीख पडती और नल से बहुत देर बाद, सी तक जल्दी जल्दी गिन लेने पर, एक बूंद टपक कर वाशबेसिन म फिसल जाती थी। मैंने हिसाव लगाया और मुझे इसकी जानकारी है कि वह मौसम अकेले. पन को अदर उतार दिया करता था। मरे लिए इसका सम्बध पूरी तरह छलांग । १२१ श्रीमती ज्वेल से था। उहोने मुये अननास के टुकडे दिए यह यात मैं कैसे भूल सक्ता हूँ। वाद म सुमन स मरे प्रम की शुरुआत जिस पुरजे से हुई और उसे समाल कर रखते समय मैंने जैसा महसूस किया था हूबहू वैसा ही आनद और महत्त्व मुस अन तास के टुकडो मे मिग । मैं उह खाना नहीं चाहता था। पर उनका रखा जाना भी मुमकिन नही था । श्रीमती ज्वेल ने सामने बैठ कर खिलाया। वाद में उनके खा लिए जाने पर मुझे अपने से काई शिकायत नहीं हुई। न पश्चाताप । - अननास के बाद जो मरे लिए एक घटना की तरह सुखद था मैंने चाहा अद वावी चीज भी पटाफट हो जाएँ । ये पाकी चीजें क्या-क्या हैं बुद्धिमानी सेबी हुई कोई सूची मरे दिमाग म नहीं थी। जव सिलसिग हुना तो जरूरी था कि श्रीयुत ज्वैल पर खास ध्यान दिया जाय । वह बूढा था केवल काला नहीं लेकिन फिर भी वह उस तडकती हुई आपक औरत का पति था। उसके ओठ सिके हए काला जाम की तरह लगते और उनमे उथले मूराख थे। उसका एक बाल काला था और दूसरा सफद तीसरा फिर काला और चौथा सफद । इसी तरह अ खिर तक । वह हमशा एक बटटर लकिन स्वाभाविक तरीके से चुप रहत्ता और डूबा हुआ दीखने की वजह से बदसूरत नहीं लगता था। मुझे उसस डरने के बहुत से कारण समय म आते थे और मैंने उसपे अदर आविरकार कुछ बदसूरत चीजें खोज ही ली। वैसे मुझ श्रीयुत् ज्वे की तरफ से कोई अडचन नहीं हुई। उनके पास एक छोटा सा आगन था और घडियों की मरम्मत करने वाले औजार । फौजी के टीन से लौट कर अगर उहे कही जाना न होता (यह पता नही था कि वह कहां जाते हैं अथवा जा सकते हैं ) तो वे बजाते या कारीगरी करते होते थे । अपनी बीवी म उह दिलचस्पी नहीं होती थी। सच्चाई से आश्वस्त होने के बजाय मुझ भय लगता । मुमकिन है वे कभी एकदम से भड़क जाएँ। दिमाम म यह एक तकलीफ चिपकी हुई थी।
१२२ । फेन्स के इधर और उधर 7 । दरअसल मैं दब्बू था और मुझे बहुत अधिक आसानी की टोह और इतजार था। उन दिनो, ह सिए मत मैं सोचा करता, हे भगवान ! ऐसा हो कि सारी दुनिया मर जाय (घरवाले भी), बस मैं और श्रीमती ज्वेल ही बचें। फिर कोई दिक्कत नहीं होगी। और जब दुनिया नही मरी जैसा कि वह हमेशा जीवित रही तो खिजलाहट हुई कि ज्वेल, यह बूढा आखिर क्यों है ? इसकी कोई जरूरत नहीं । उसका पति होना थोडा बहुत उचित तमी लगता जब वह घर से बाहर चला जाया करता। मुझे अपने दयालु हाने पर गर्व होता और मैं उन्हे माफ कर देता था। मैंने अक्सर सोचा, अगर वे ऐसा कर सके कि हमेशा के लिए न दिखाई दे तो मैं ईश्वर से उनके लिए यह प्रार्थना कर सकता हूँ कि वह उहे अच्छी, सुखी और आराम से भरी जिंदगी नसीव करे । वे जहाँ भी रहे वहाँ। श्रीमनी ज्वेल का कमरा मुझे पसन्द था । वह घिरा हुआ, कम रोशनी वाला और निरापद था। उसका फ्श ठडा था और वहाँ जब मैं पहली बार वुला लिया गया तभी लगा अव हमेशा जा सकता है। एक बात और, वहाँ एक बहुत वासी वू थी और उसमे मुझ सुरसुराहट होती। मुझे लगता मैं धोगामस्ती या उठकपटक करने के मूड मे आ रहा हूँ लेकिन वाकई मैं इतना असावधान नहीं था। उन दिनो, जव श्रीमती ज्वेल नहीं आई हुई थी, छावनी से हमारी सडक होकर अक्सर, एक छोटी सी फौजी टुकड़ी कवायद करती गुजरती। मैं उसे हमेशा देखता । वगाली आदमी, दोस्तो से मैं समझ चुका था, डरपोक होते हैं। इसलिए वर्दी म उन्हे देखने म मजा आता । श्रीमती ज्वेल जव आ गई तो उनके प्रति अपने प्यार की वजह से मैंने यह और इसके अलावा कितनी और बहुत सी दिलचस्प चीज स्थगित कर दी थी, याद नहीं। शायद मुझमे बहुत कम वजन रह गया था और एक रस्सी खीचकर मुझे आगे ले आई। अच्छा समय वह होता जब श्रीयुत् ज्वेल के टीन या चच चले जाते थे, ऊँघते होत या सगीत म मस्त हो जाते ( वे अभ्यास नहीं करते थे, आसानी स सा जाने की कला शायद उहे पता थी)। यह बिना विगी प्रयत ये छग । १२३ मालूम हो जाता था कि वे बाहर जा रह हैं । हाते मे सम्याए । मीठा, सुश- चूदार और भारी भारी घुओं परने लगता ता मैं समझ जाता (सब जान जाते रह होंगे लेकिन ये लाग धुएँ पो परपान पे लिए वेवरार नही हाते थे ) कि वे बाहर जा रहे हैं. अब फाटक खोला होगा, उस वापस वद पिया होगा और सडक पर पहुंच गये होगे। ढलती हुई दोपहर का वक्त सबसे ठीक था। घर म स्त्रियों बहुत मेहनती थी और इस समय तक थर जाती थी। शुबहा बनाए रमने म उनपी पावन्दी और चोरनापन इसी समय उह दगा दे सकता था। श्रीमती ज्वेल ने कभी मरा बुरा नहीं माना। लेकि। याद म मुझे देख व तुरत हँस पड़ती थी। जरूर हमती थी फिर पास बुला लेती थी। मैं अपन आने के जो बहाने बनाने की चप्टा करता उन्हे वे ठीक तरह से नहीं सुनती थी। या टाल जाती। उनके छोटे स घर म में अब खुले आम था। कभी एसा भी हुआ कि मौका मुझे भरपूर रगता और में सोचता, फलो की चोरी के लिए जैसे चारदीवारियां कूद जाता है, उसी तरह श्रीमती जवेल पर कूद पडूं। एसा में कमी नहीं कर सकता था। मुझे कुछ काल्पनिक डर होते थे। कही ज्वेल अपनी स्त्री की हत्या न कर दें या कैन्टीन से हमारे घर के लिए लाई जाने बाली खाने पीने की चीजो म पि न मिला दें । वगैरह । श्रीमती ज्वेल मुझे सपने में दिखाई दी। कई वार । और सपना टूट जाने में बाद जब मैं उठ बैठता तब भी दिखाई देती । वे ज्वेल के सूबे और ठिठुरे पारीर के विपरीत भरी हुई थी। क्या भरा हुआ था उनमे, यह बात उस उम्र में, मै कई अश्लील और तनावपूर्ण उच्चारण वाले शब्दो के माध्यम से जानता था। उनके दीख पड़ने वाले शरीर अवयर वट्ठा पारे की तरह ढोले थे। इन अवयवो का में रास्ता खोजते हुए सोचता। उन पर वैसी सूजन होती जैसी आजकल मुझे बाजारू औरतो की आँखो के इर्द-गिर्द या शरीर के जोडो पर दिखाई देती है। दापहर को या काम-काज के समय वे पेटीकोट और चोली पहने रहती। और कुछ नहीं। नीच का पहनावा, यानी पेटीकोट बहुत अच्छा लगता था।
१२४ । फेन्स के इधर और उधर - सिन्धी विलकुल नहीं लगता था। चारो तरफ लाल रेशम के कढे, उभरे और थक्का-थक्का गुलाव होते । यह अजीव था कि श्रीमती ज्वेल को केवल पेटी- कोट से कोई अडचन नहीं होती थी। अडचन होती, पानी-वानी ढोने मे तो दूसरे हाथ की उँगलियो से उसे उठा लेती ! अपना क्या जाता था। अच्छा ही लगता और अपनी हिम्मत का अभ्यास भी हो रहा था। अभ्यास' की वात इसलिए कि इतना कम वस्त्र पहने, इसके पहले पुरुपो को छोडकर स्त्रियाँ मैंने कभी नहीं देखी थी। वे मेरे लिए पहली सबसे ज्यादा नगी महिला थी तब मै यही जानता था कि औरत खूब सारे कपडो मे लिपटी हुई चीज होनी है और इसीलिए पवित्र चीज होती है। हमारे दोमजिले वारजे पर जो कपडे सुखाये जाते उनमे लम्वी उडती साडियो के आगे हमारे निकर बहुत छोटे होते थे। श्रीमती ज्वेल से मुझे हल्का आतव होता था, इसमे पाक नहीं लेकिन उसे मै दवोच लिया करता था । श्रीमती ज्वेल, उस दिन वाल तिराये हए थी। निठल्लापन उन्हे था । और टेढा-मेढा मुस्कराये जा रही थी। उन्होने मुझे कबूतर की तरह समझा। जव कि मै कबूतर की तरह सहमा हुमा नहीं था । इसलिए कि उस समय इच्छा हुई थी, थोडे फासले से कहू', 'मार कटारी मर जाना' और भाग जाऊँ । क्या करूं, इसके दो तीन साल बाद ही मुझे कुछ अच्छे, ऊँचे रतर के दोर याद हो सके। श्रीमती ज्वेल ने मुझे नजदीक करये गोद मे विठा लिया। इसके लिए उन्ह थोडी मेहनत करनी पडी और मुझे सहूलियत देने की कोशिश, क्योकि गोद में बैठने वाली उम्र में पार कर चुका था। विक्टर और आशा दाना कमरे मे ही हैं । लेकिन कुछ नही, उन्हे श्रीमती ज्वेल ने शायद कुत्ते का पिल्ला समझा। मैंने अपने को पिल्ला नही सनशा । विक्टर और आशा देखते रहे, दाल-मात खाते रहे, फिर हाय घोो चले गये, फिर खेलन शायद । यह सप झटकेदार लगा। मेरा सर, मैने देसा श्रीमती ज्वल के सर से काफी ऊार या गया है। इस पोज में फोटो खींच लिया जाय तो सदेह नहीं पि वह मन वाले बदर हीन्दी' पंदा करे। इम सयाल से मुझे अपने छलाँग । १२५ ऊपर गुस्सा आया और दूसरे-तीसरे सेकण्ड मे खयाल समाप्त हो गया। फिर भी उम्मीद के बाद अडचन हुई । बडी सोपड़ी मे, वही एक छोटी सी जगह, स्नायु टपकती मालूम पड रही थी। इन्द्रियो मे हरकत थी और दिल मे घड- कन। भय हुआ, कही मेरी अपवित्रता का पता श्रीमती ज्वेल को न लग जाय। मेरे एक दोस्त ने बताया था, ऐसे मौको पर राम कृष्ण का नाम लेने से तवियत ठडी होती है। ऐसा करना मैने शुरू किया लेकिन तब तक पलग के तकिए पर नजर पड गयी । वहाँ पुराना सूखा तेल और टूटे वाल थे। समझा नहीं आया उसे देख मुझे क्यो और गर्म लगता रहा । इस समय मुझे गोद आवश्यकता से अधिक महसूस हुई। घर मे मां मुझे गोद मे नहीं बिठाया करती थी। कब तक विठाती रही या कव से छोड दिया यह याद नही रहा । मुझे वे चूमना भी बन्द कर चुकी थी और उनमे मेरे प्रति मानसिक स्पर्श ही था। वैसे तब तक मै, अपनी बहनो द्वारा, उनकी सहेलियो के घर ले जाया जाता था। वहां वे आपसी बात करती और मेरा चेहरा अधिक भोदू हो जाता था। वाते, "रमेश क्तिना प्यारा है," "आज मिला था", "चिट्ठी मैने छत पर ही फेंक दी है', और "जी धडकता है," सरीखी। मुझे डर तो लगता, मेरी बहनें बरबाद हो रही है लेकिन पापा नही सका कि 'दीदी रमेश से फंसी है ।' आप समझ गए होगे, इसका खास कारण श्रीमती ज्वेल के प्रति मेरी तमन्ना के अलावा अगर और कुछ या, तो वह मेरी जानकारी मे नही है । मैने दीवार की तरफ देखना शुरू किया। जल्दवाजी में गडवड न हो जाय और खुशी जाहिर न हो। श्रीमती ज्वेल बडी तडियल है । लगता है, वे सब कुछ जान गई हैं। दीवार पर फिल्मो में काम करने वाली औरतो के फोटो काट-काटकर चिपकाये हुए थे । मुझे उनमे से कुछ तस्वीरें जिन्दा लगी। सुरैय्या का एक कैलेण्डर था। सुरैय्या को तव तक हमलोग अच्छी तरह जानने कभी कह लगे थे। श्रीमती ज्वेल खिलसिलाने लगी। और बैलेण्डर की वरफ बहुत देर से १२६ । फेन्स के इधर और उधर देख रहा था। खिलखिलाहट का ही कोई समय था जब मै गोद से उतार दिया गया । मेरे किसी पाँव मे झुनझुनी थी, लेकिन उन्होने मुझे चिपका लिया । वे पलग पर बैठी और पैर लटकाए रही। उनकी देह के वे हिस्से जो पलग पर थे, चौडे दिखाई दिए। चिपकाने पर मेरा मुंह उनकी नाभी तक आया। नाभी मुझे बहुत खराब चीज लगती थी। श्रीमती ज्वेल पूछने लगी, "शादी करोगे?" मैं झेप गया। शादी के बाद ही तो सब कुछ होता है। "तुम्हारी शादी सुरैय्या से करवा देंगे।" मैंने पाया, इसके बाद मेरे मुंह नाक उनके मुलायम पेट मे फँस गए है । खूब अच्छा लगा। पेटीकोट से आती पेशाव की एक मरती वदवू अच्छी नहीं लगी। मुझे पता था, सुरैय्या से मेरी शादी नहीं हो सकती। उन दिनो सब जानते थे कि वह देवआनन्द से प्यार करती है । तभी देखा, मुझे छोडकर वे बाहर जा रही है और सुना कुंजडे को आवाज दे रही है । लगा, ऐन मौके के वेवकूफी कर गई । प्याज तो वाद मे भी आ सकती थी, या मैं ही ला देता । मैं अदर ही खडा रह गया। एक बार कमरे की सब चीजें देखी ! बिना पहचाने हुए देखा। और फिर खीझने लगा। श्रीमती ज्वेल छाती पर प्याज की गांठें कुछ हथेलियो से दवाए आई और मुस्क- राती रही । पैसे लेकर जाने लगी और मुस्कराती रही । वैसे मुझे सन्देह हुआ लेकिन दिमाग लडा कर तय नहीं कर पाया कि श्रीमती ज्वेल चरका देने के लिए मुस्करा रही है या इस तरह और लिफ्ट दे रही है। मेरे ज्ञानकोप से यह परिभाषा समाप्त नहीं हुई थी कि लड़की हंस दे तो समझो लिफ्ट है । हमारा एक खूब प्रचलित मुहवरा था, 'हंसी तो फंसी।' ऐसा हमेशा हो जाता। जरूर, जीसस श्रीमती ज्वेल की मदद कर रहा था। जव कुछ न याद आना चाहिए तब उन्हें कभी कपडा धोने की याद आ जाती और कभी पानी भरने की। कभी कुछ उवालना बनाना एकदम से ह. वडा जाता, कभी भाजी वाले को आवाज देनी होती । कमी ज्वेल आते, कमी घोवी और कभी औरतें। मुझे कभी विश्वास नहीं हुआ कि यह सब स्वामा विक हो सकता है।
छलांग । १२७ तारीख और दिन याद नही । यह अवश्य याद है कि दोपहर थी, श्रीयुत् ज्वेल के चले जाने की याद दिलाने वाला परिचित्त और स्वादिष्ट भारी घुओं आसपास हवा मे भरा नहीं था और कोयल कुछ समय तक लगातार बोली थी। मेरे घर, लोग सामूहिक रूप से बाहर गये थे । श्रीमती ज्वेल ने मुझे अपने पास लिटाया हुआ था। ऐसा लगता था, उनके स्तन मेरे इतने करीब थे कि वे मुझे दूध पिलाना चाहती है । दूध से मुझे उबकाई आती थी लेकिन उनकी मुद्रा का, मुझे बुरा नहीं लगा । यह एक अवसर था और गर्म तीखे ढग से मुझे महसूस होता रहा था कि अब मै बच्चा नही रह गया है। अक्सर जैसी एक प्रवल आशा थी। थोडा नुकसान सरीखी वात यह जरूर लगी कि श्रीमती ज्वेल घोवी का घुला पेटीकोट पहने है । शुरू म खयाल था लेकिन तुरत ही मैं भूल गया कि मेरी देह के नीचे कही चादर पर पांच रगो मे कढा हुआ एक 'स्वीट ड्रीम दबा हुआ है । क्रॉस, जिसे श्रीमती ज्वेल पहने रहती थी, का अधिकाश हिस्सा श्रीमती ज्वेल की मुटल्ली छ तियो के बीच दवा था। केवल उसे बांधने वाली काली लेस और ऊपर का वह बारीक हिस्सा जहाँ ईसामसीह का सर ठोका गया था, दिखता था। मैने चालूपन के साथ क्रॉस देखने की जिज्ञासा लिए उनकी छातियो की तरफ हाथ बढाया । श्रीमती ज्वेल पहले तो विदकी, 'अरे, अरे क्या करते हो', फिर 'अच्छा' कह कर आश्वस्त हो गयी। मैं लेस को उतनी देर हिलाता, खीचता रहा जितनी देर कास को देखना गलत न लगता। ताकि उन्ह गुदगुदी म सफल हो जाने के बाद, इधर जव तक अगली हरकत सोचूं, शुरू करूं श्रीमती ज्वेल पलग स कूद कर भागी । 'ओ गॉड पापी को रोटी देना भूल गई ।' अव वे जाने लगी थी, ऊपर से, पेटीकोट के अन्दर का अंधियारापन मेरी आँखो म मर गया। क्या करता 'स्वीट ड्रीम वाले पलग से सुस्त, पैट की जेब मे हाय हाले हुए मैं उतर गया। शायद यह स्त्री, मैने इसी तैश मे सोचा, अपने को करे- वटर वाला लगाती है। इस प्रसग म कि आखिर मै उसका कैरेक्टर क्यो खराब करने पर लगा हूँ मैंने यह वय किया कि जब दुनिया में सभी स्थियाँ १२८ । फेन्स के इधर और उपर चरित्रवान हैं तो एक के चालू हो जाने से क्या बिगडता है। तभी श्रीमती ज्वेल के आईने मे मुझे अपना कद बहुत छोटा, दुबला और हिलता हुआ दिखाई दिया। मुझे लगा, वे जरूर सोचती होगी, मैं अभी बच्चा हूँ। वे बाहर मोढे पर बैठ गई थी, और कुत्ते के लिए डिस मे रोटी तोड. तोडकर डाल रही थी। 'आओ आओ यही बाहर आकर बैठो,' और जब ये मुस्कराई तो पता नही क्यो मुझे पहली बार लगा यह मुस्कराहट नहीं है । श्रीमती ज्वेल कह रही हैं, 'कहो कैसी रही?' चुपचाप मैं बुदबुदाया था, 'ससुरी पज्जात ।' तवियत हुई, वे खडी हो और ओट पाते ही अपने सर से उनके नितम्बो पर जोर-जोर से सीग मारने सरीखी प्रिया करने ला जिसे मैं मन ही मन कर चुका था। उस दिन आखिरकार हुआ यह कि मुझे घर के उस निरापद हिस्से में जाना पड़ा जिसकी खोज में कर चुका था। अपने स्वास्थ्य के प्रति मुझे डर हुआ। मैंने सोचा, हो न हो श्रीमती ज्वेल साली हिजडी है। लेकिन तुरत निराशा हुई, विक्टर और आशा उनके बच्चो का ध्यान करके, जो बाहर खेल रहे थे।
१२ सम्बन्ध मैं बहुत प्रसन था । आज सुबह उठने के बाद से ही यह प्रसनता शुरू हो गयी थी। मुझे यह समझ नही आया कि आखिर इसका क्या कारण हो सकता है। इस वजह कभी-कभी आश्चर्य और शुवहा होता रहा, वीच-बीच में डर भी लगा और दया भी आई । लेकिन इन तत्वो के अपने काम करते रहने के बाव- जूद मेरी प्रसन्नता पर उनका कोई असर नहीं पडा। मैंने खोज लिया कि यह प्रसन्नता मुझे ऐसी लग रही है ज्यो लम्बे समय तक असमर्थ अनुभव करते रहने बाद कोई तुक मिल गया हो और एक पक्ति बढ गई हो । गीत से मेरा कोई साल्लुक नहीं है पर आप जानते हैं कि गीतकार के लिए यह कितनी वडी बात है। शायद आपको विश्वास नहीं हो रहा है कि मैं दिन-भर प्रसन रहा हूँ। पता नही आप इस तरीके से क्यो सोच रहे हैं कि एक हिन्दुस्तानी युवक का प्रसनता से किसी तरह का सम्पर्क हो भी सकता है । भई आप वेहद निराशा- वादी है । आपको यकीन दिलाने के लिए, इससे अधिक मैं और कुछ नहीं कह सकता कि मैं झूठ नही बोल रहा हूँ। वैसे मैं झूठ बोलता हूँ और उसमे मेरा पक्का विश्वास है। ज्यादातर, यह मेरा स्वभाव है, मैं सडक, भीड, वीचे, चायघर, दुकान, घर या इमारत आदि समी जगहो मे अपनी दृष्टि को एक छोटे से इर्द-गिर्द मे ही रखता हूँ। लेकिन आज मेरी आँख लापरवाह और भटकती हुई थी। मैं दरख्तो की चोटियाँ देखता रहा और घूमती हुई सर्चलाइट के तरीके से आकाश । मुझे अनगिनत फूलो के नाम, संगीत की पदिशो, मशहूर नायिकाओ के चित्रो और न जाने किन-किन चीजो की याद आती रही। स्मृति का स्वचालित १३० । मेरा पेयर और उधर तरीप स परीक्षण हाता पर रहा था और मा पर मारनासतो की रहियाँ छाती जा रही थी। बदर न व्यथता या चिह था न अपव्यय की स्थिति । दा विभिन्न स्मृति सहा ये बीच, गीत म आने वाली टेक की तरह मैं अदा पाद दस रेता था । तब-जब वि शाम हुई । क्या आपारा था। इसपे बाद जा कुछ हुआ मुझं दुप है कि सारा प्रसन्नता स वाई ताल्लक नहीं है । बडी पटिया रूमानी स्थिति म जब रि सूर्यास्त हो चया या और चांद निाल आया था, मेरी प्रसन्नता समाप्त हो गई । बैस मेरी प्रसन्नता के समान्त हो जाने पर आपको तसल्री हो रही होगी लेरिन इसे देखें यह कितनी मजे- दार बात है यि मरी प्रसन्नता जिस तरह मुझे कारण बतायर नहीं आई उसी अकारण लगने वाले तरीस समाप्त भी हो गई। मैं समझता हूं अगर भाग्य के काम परने का यही ढग रहा तो मुमकिन है कि मेरा भी आपकी ही तरह इस दनिया में कोई गम्भीर रिश्ता न रह जाय । हुआ यह कि मैं उस समय भी प्रसन्न या भौर अपने को हिलाता हुना, मूर्खतापूर्ण मुद्राआ म गाना गाता हुआ घर चला आ रहा था। तब मैं कतई यह नही साच रहा था कि गाना ही नही बल्कि प्रसन्नता की सारी अभिव्य क्तियां भूखता और अश्लीलता पा चिह्न बनती जा रही हैं । गाना मैं इसलिए गा रहा था कि कुछ दर पहले ही मैंने कई निश्चय किये थे और उनसे लगता था, चरित्र अभी पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ है । मैं अपने समी निश्चयो के वारे म नहीं बता सकता । उससे आप हंसेगे हालाकि आप बहुत कम हंसते हैं । मैं इतना बता सकता हूं कि मैंने कर से बिछुडा सूर्योदय देखने और दिन शुरू करने, घर वालो तथा स्त्रियो को खुश रखने की हिक्मता पर हमेशा सोचते रहने और नियमित विटमिन वी काम्पलेक्स पीने से तीन महत्वपूर्ण निश्चय किये । जाहिर है कि मैं प्रसन्न था और मुझे इस प्रसन्नता की लालच सता रही थी। यह कितना अविश्वसनीय लगता है कि दिन भर के बाद लौटकर ज्यो- ही मैने अपने घर की इमारत देखो, मैं हताश हो गया। शायद मैं गाफ्लि था और सनक मे मुझे यह अदाज नही हुआ कि चलते हुए मैं अपने घर की सम्बन्ध । १३१ तरफ जा रहा हूँ। मैंने अपने घर की तरफ फिर देवा और कल्पना करिये इस भयानकता की कि मैं सोचता रहा यह एक विल्डिग है और इसके अन्दर मुझे जाना है । प्रसन्नता ठिठक गई और मैं महसूस न कर सका कि कव उसका सर्वनारा हो गया । तुरत महसूस करने लगा कि बहुत अधिक थका हआ हूँ। यह जानते हुए भी कि घर मे मुझे अच्छा खाना, अच्छा विस्तर, आराम और दूसरी बहुत सी सहूलियते मिलता है, मैं थका और भयभीत बना रहा । मैं उन सौभाग्यशील महापुरुषो मे नही हूँ जो घरो मे नही जाते या जिनम न जाने की कूवत है, जिनके घर नहीं हैं अथवा जो अपने म ता पिता और घर की खौफनाक कल्पना की आसानी से हत्या कर चुके है। यह सही है कि मैं दुर्वल और सपाटे से घर मे घुसता । और जरूर घुसता हूँ। वह चेहरा जिससे मेरी एव अल्प और बेजान सी मुठभेड हो गई उससे मैं हमेशा बचता रहना चाहता है। मैं हमेशा बेहया या अपराजित व्यक्ति की तरह उम्मीद करता रहता है कि घर आऊँ और तिलिस्मी ढग से दरवाजा खुल जाय, वद हो जाय, एक लम्बी कूद के साथ मैं कमरे मे पहुँच जाऊँ और यह चेहरा जो अक्सर दरवाजा सोलता है, कमी न मिले । वस सोच के रह जाना है कि जिस तरह आपकी मां बचपन में ही मर गयी थी, मेरी भी मर गयी होती तो बहुन सी बेहूदा स्थितियो से मेरा भी वचाव हो जाता। अपने कमरे म पहुँच कर मुझे लगा, पर म आज हवा भी पूरी तरह से सन्नाई हुई है और इमारत के हिस्से टुक्डो की तरह गड रहे हैं । घरो म कुछ भी हो सकता है । अपने कमरे मे मैं सूंघ कर पता लगाने की कोशिश करता रहा कि कुछ हो तो नहीं गया। लेकिन आजकल घर ऐसा है वि (शायद सभी घर ऐस हो गये है) दुर्घटनाओ का भी स्वत पता नही लग जाता । जब तक दि उनका बयान न क्यिा जाय या सूचना । आखिर यह आरति जिसने दरवाजा खोला था, अपने पैरो से आई और नाक सुडकती हुई दरवाजे पर खड़ी हो गई । नाक सुइकना जुकाम नहीं ध्यान आकर्षण का एक दीन तरीका है । नि सन्देह वह एक मानव मावृति थी। यह अधिवाश घरो मे रहने वाली एप परिचित आवृति है जो दिन ब दिन मान- १३२ । फेस के इचर और उधर वीय होती जा रही है । इस तरह के चेहरो, आकृतियो को देखकर, मैं समझता हूँ आप स्वस्थ नहीं रह सकते। जो भी हो मुझे उसके आने पर ताज्जुव नहीं हुआ। मैं जानता था और मुझे त काल इतजार हो गया था। इतजार, प्रसन हो जाने के लिए नही, बल्कि अन्दर के इस आभास को एक शर्त की तरह जीत लेने के विश्वास में कि वह आज आयेगी । मुझे शर्त जीतने की कोई खुशी या फरहरी नहीं हुई। हाँ, उसके दरवाजे पर आ जाने के बाद मुझे लगता रहा कि मेरे शरीर ने किसी वर्फीली सुरग से गुजरना शुरू कर दिया है। जब कि अभी थोडी देर पहले सभी चीज मेरे हाथ मे थी और मैंने सूर्यो- दय, घरवालो तथा स्त्रिया और विटमिन वी काम्पलेक्स के बारे में तय किया था । अब लगा कि वे फेम थे जिन्हे अपने ऊपर फिट करने की घात मे मैं था और शरीर है कि एक दिमागी धक्का खाकर चौखटे से बाहर छटक गया । मैंने सोचा उधर दरवाजे की तरफ नहीं देखूगा । पिछली बार बहुत परि- श्रम और साहस से मैंने मां (कितना दयनीय यह उच्चारण है) की आँखो को देखा था। वे आँखें इस तरह की थी जैसे खाल को चाकू से चीर दिया गया हो और लहू समाप्त होकर लपलपाती हुई सफेदी मे बदल गया हो । मैं अनभव कर रहा हूँ कि मेरी सजीदगी बहुत हास्यास्पद होती जा रही है ओर कोई तीव्र प्रतिक्रिया ही मेरी रक्षा कर सकती है। मुझे मालूम है कि यह गम्भीरता बहुत घटिया और बर्दाश्त के बाहर की चीज है । मुझे खुद ही इससे एक खूखार घुटन होने लगती है । मैंने सबसे पहले यह किया कि अपने कमरे की रोशनी को समाप्त कर दिया । अँधेरे मे अतिरिक्त रूप से लज्जित होने की जरूरत नहीं रहती। मौ ने मुझे काफी डरे हुए ढग सूचना दी कि मेरा छोटा भाई सारी अगूठियो । वह कई अंगूठियां पहनता है। और कभी न लौटने, आत्म- हत्या कर लेने की बात कह कर निकल गया है । थोडी देर बाद तक उसने मुझसे उसे खोजने देखने के सम्बघ मे कुछ नही महा । शायद वह अभी तक मुझे थोडा-बहुत जिम्मेदार मानती है और उम्मीद । उत्तार कर सम्बन्ध । १३३ भरती है कि मैं बाकी सब कुछ समझ लूंगा । मैं उससे यही कह सका, मैं क्या कर सकता हूँ. जाकर सो जाओ सुबह तव आ जायेगा ! मैंने कल्पना की वि उसे यह बात समझ मे नहीं आई है। मैं अन्दर से इतनी ताक्त या जरूरत महसूम नहीं कर रहा था कि स्टेशन, पुलिस थाने जाऊँ, पटरियो, पुल और पाट देखू । दरअसल में तपाप से, अपने भाई के बारे मे यह सोचने पर मजबूर हो मया कि उस वेचारे को मर ही जाना चाहिए । मैं नहीं जानता कि इस खयाल की मैंने चुपचाप खोज की हो। हो सकता है इसमे कुछ दया भाव हो लेकिन हकीकत यह है कि मैं काफी देर बाद भी यी चाहता रहा कि वह आत्महत्या पर ले और एक बहुत ही घिसटती हुई निर्मम समस्या का समाधान हो जाय । यह वान पि मेरा भाई मर जाय अथवा आत्महत्या कर ले, अव मेरा पीछा करने लगी है । वह मुझे भावक्ता की तरह वीच वीच छोडती नही चली घल्कि विद्युत सरग की तरह लगातार बनी रही । मुझे उसकी मृत्यु के सम्बन्ध में हिचक नहीं हुई और ऐसा भी नहीं कि इसे मैंने अपना कोई कृपापूर्ण ढग सोचा हो। मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा कि मां दरवाजे पर खड़ी हुई है। यह चात दूसरी है कि बचपन मे पिता की बलिष्ठ मुटठी मे पकडे और वैत से वेत- हाशा पीटे जाने के वक्त केवल मां के आने की ही प्रतीक्षा होती थी । उछलते पांवो मे गिडगिडाहट मर जाती और विलबिलाते हुए रोते समय मैं हमेशा जानता था कि कुछ पल मुश्किल से वीतेंगे और मां के हाथो के आगे वलिष्ठ मुट्ठी खुल जायगी । लेकिन अब क्ल और आज ये तरीके से बिलकुल सोचा नहीं जा सकता । तालमेल खत्म हो गया है जैसे या एक बिलकुल बदला हुआ ताल मेल बन गया है। माँ इस समय जब दरवाजे पर है (या चली भी गयी हो) तो मुझे यह पात बहुत जबरदस्ती लग रही है। वह अपने मरने तक सब कुछ बचा और सुरक्षित देखते रहने की तमना लिये खडी है। चाहे वह घी का खाली डिब्बा हो, पुर्सी हो या छोटे भाई का शरीर । कृपया इस पर ध्यान दीजिए यह १३४ । फेस के इधर और उघर । भवसे ज्यादा हत्यारी किस्म की हिंसा है। आप यह भी देखिए कि समय मानवीय सम्बन्धो के सिलसिले में किस तरह से काम करता है। एक लम्बे समय तक जो स्त्री मेरे लिए केवल मो थी अब कभी कभी ही माँ लगती है या मां का भ्रम । बल्कि कभी कभी अव ऐसा हो जाता है, न चाहते हुए भी कि जवडे दब गये है और अन्दर से एक- दो शब्द हिचकिचाती हुई खामोशी के साथ निकल जाते है, यू वूमैन' (ध्वनि गेट आउट फॉम माई लाइफ) । यू वूमैन' के उच्चारण मे तीसा कटा फ्टिा ग्राफ भी बनता होगा। फिर भी मुझे इसका अफसोस नही होता क्योकि यह चात अब बहुत उडी हो गयी हैं। हालांकि मेरा वजन घटता जा रहा है लेकिन जरूर इसके कुछ और कारण होंगे। कमरे की रोशनी गुल किये इतनी देर हो चुकी थी कि मुझे उम्मीद होने लगी कि मैं किसी भी ऐसी आपत्ति से मुक्त हो गया है जो शारीरिक हो सकती है । मैं इत्मीनान से अपने भाई की मृत्यु के सम्बन्ध म, जो अंगूठी उत्तार कर उसके चले जाने के साथ ही शुरू हो गयी थी, सोच सक्ता था । यह मुझे पता था कि पिछले चार दिनो से वह अपने कमर को सील करके पड़ा रहा था । कहा नहीं जा सकता कि अन्दर की जहरीली गैस सि रास्ते से निश्ली थी लेकिन निकलती जरूर रही होगी अ यथा क्या वह कमरे से उतर कर जिस तरह से आज वाहर चला गया, जा सकता था ? यह बात मुझे यूं पता लगी जब आते जाते मैंने मनखी से अक्सर, खाने और नाश्ते के समय मां को उसक कमरे के वन्द द्वार पर खडे देखा । जहाँ तक दरवाजा भडभडाने और उसे खोलने का अनुरोध करने वाली आवाजो की बात है, वे सभी को सुरे आम सुनायी पड़ती थी। यद्यपि मैं उन्हे हमेशा नापसद करता हुआ यह सोचता, काश ऐसा हो जाय, आवाज निकालने वाले सभी परिचित कण्ठ गूंगे हो जाएं। लेकिन इन आवाजो के बीच ईश्वर ने कमी वाधा डालने की कोशिश नहीं की । कई वार मुझे ईश्वर को भद्दी गालियां देने का ताव भी आया लेकिन यह सोचकर रह गया कि ससार के अधिकार लोगों का अब ईश्वर से कोई प्रयो- जन नहीं है।
मैंने थोड़ी देर पहले यह सोचा था माई के भर जाने से एक घिसटती हुई समस्या का समाधान हा जायेगा । कमी कभी सोद्देश्य वाते जैसे मृत्यु स ममा- धान वाली ही बात आदमी को बडी हास्यास्पद स्थिति म पहुँचा देती है। मान लीजिए एक लम्बे अरसे तक गमीरता और गहराई से मैं माई के मरने की बात सोचता चला जाऊं और वह जीता ही चला जाय तो मेरी क्या हालत होगी। मैं अपने भो ही क्यू या जागा । यही कारण है कि कभी-कभी मानवता को अंतिम रूप से पणाम कर लेने की बात मुझे जंचती रहती है और बहुत देर तक यह पता ही नहीं चलता कर फिर गभीरता के साथ, माई के आत्महत्या कर लेने पे वार म नाचने लगा इतना मैं अवश्य जानता हूँ कि भाई की मृत्यु अगर हो गई तो निश्चित- रूपण मरा गणित ठीक उत्तरगा और यह समझा जा सकेगा कि वाकई मृत्यु से सब का फायदा हुआ है। हां यह मानने के लिए तैयार है कि मृत्यु के जायज हाने का माराव जाति और उसके भविष्य से कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है । असल म यह एक घरेलू बात है और इसे आप कोई फ-सफा समझने की गलती न करें। आपने अन्दर हँसी की सबसे बडी बात यही है कि आप नि. राशावादी हैं और हमेशा महान दारा निक सच्चाइयो तथा सर्वोच्च ज्ञानामृत के प्रसग म ही साचा परते है। मेरे माई को आप नहीं जानते । सव कुछ जान लेने पर, वैसे कोई भी किसी के सम्बन्ध म सब कुछ नहीं जानता, लोग इस बात को काफी भयानक मानेंगे कि वह पच्चीस वर्ष का है । वह अबसर, सड़क पर चलते हुए बहुत से अघेड लोगो की तरह बडबड रहता है । मैं समझता हूँ. स्वास्थ्य की किताबो म यह एक अच्छा रक्षण नहीं है। प्रेममाडा के प्रसग मे, मैंने गौर किया है, वह नाक-भौं सिकोड कर काफी उत्तेजना और बुरा वकने के बाद एकदम से धुप हो जाता है। उसकी चुप्पी से यह आभास होता है कि वह अपनी बात की पोल समझ रहा है। आप उसका नाम जान कर क्या करेंगे । बस इतना जान लीजिए कि उसे सतार के रूप में पांचों प्रम मिला है । मुझको लगता है कि हमारे माँ बाप २३६ । फेन्स के घर और उपर चाहते न रहे होंगे कि यह पैदा हो जाय । वे लोग अधिक बच्चे पैदा करने वाले उस साम्प्रदायिक सिद्धात ये मानने वालो में रो नही हैं जो हमारे देश (हिन्दुस्तान) मे बहुत लोगो को मान्य है-इसके बाद भी यह पैदा हो गया । शुE के बच्चो के पैदा होने के पीछे एक जोगीला स्वस्थ सिलवाड और कमी. पभी धानिक निष्ठा भी होती है पर वाद की पैदाइश सुद और माता-पिता सबके लिए एफ अबोध घटना बनकर रह जाती है जैसा कि मैं अपने भाई के वायत भी विश्वास करता हूँ। मुझे खुशी है कि इतनी देर बाद आप मेरे पैदाइशी नम्बर का मजाक उडाते हुए अपने चेहरे को सुरा तो प्रदर्शित कर रहे हैं। लेकिन मेरे माता- पिता विल्कुल भी सुरा नही रहते । मेरे माई के सम्बन्ध में इन दिनो वे लोग इस तरह से चिन्तित रहने लगे हैं ज्यो देखते-देखते कोई व्यय अपचय में तव. दील हो गया हो। उसकी आँखो के चारो ओर गढ़ा बनाती हुई काली पथरियां बन गयी है और वार-बार मैं इस अभ्यास मे हार गया हूँ कि इसे ही उनका सौन्दर्य मान सकुँ । शायद मैं किसी कदर सौन्दर्य बोम से पीडित है। इसका मतलब यह हुआ कि इस संसार मे अभी मेरी काफी दुर्गति शेष है । मुझे इसी समय 'एस्थे- टिक सेस ऑफ हायड्रोजन बम' कविता की याद आयो । उम्मीद है यह स्मरण अकारण नही, प्रसगपूर्ण रहा होगा। उनके दोनो चूतडो पर अव कमी फोडे पैदा हो जाते हैं और उनसे से गाढा खून और मवाद, टयूब से पेस्ट की तरह निकलने लगता है। यह एभ- जोर है और अपने कुसग को भी नहीं चला सका, यह सबसे अफसोस वा विषय है । उसका यकृत खराव होने लगा है, उसके सर पर वालो के कई गुच्छे सफेद है और उसका चेहरा एक पीली शिल्ली मे लिपटा हुआ लगता है। आपको याद होगा, मैंने उसकी उम्र पच्चीस वर्ष बताई थी। पिछले तीन वर्षों से वह नौकरी की तलाश कर रहा है और तभी से लगा. तार वह एफ ताकत से चिडचिडा भी रहा है। इसके बावजूद मुझको ऐसा अन्दाज है कि वह हर मोड़े समय बाद अपनी दिमागी सूची से अपनी इच्छाओं
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१३८ । फेन्स के इधर और उधर मुमकिन है कि मैं आपको मूर्व समझं । माफ करिएगा। घर में भी मैं हमेशा बुरे लोगो के सन्दर्भ मे उपलब्ध रहा करता हूँ और किसी न्यायपूर्ण निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए एक आवश्यक बुरे पक्ष की तरह लोकप्रिय हूँ। मुमकिन हर चीज हो सकती है। पर मुझे आपकी परवाह नहीं क्योकि आप मुझ पर सन्देह करते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मुझे आप नही समझते । इस विचार को कि मेरा भाई अव न रहे, में ठेलकर किसी सुसस्कृत और मानवीय विचार के रूप में बदल देने मे बिलकुल असमर्थ हूँ। आप यह मानते हैं, जो व्यक्ति जिंदा रहना चाहता है, उसके लिए यह आवश्यक है कि वह जीवित रहने का तर्क और अर्थ खोज ले, बना ले या तय कर ले। अपने भाई मे मैंने ऐसे दिलचस्पी या मेहनत को शन हो जाते देखा है। शव कहते समय मैं थोडी वेजा गभीरता और अतिशयोक्ति का इस्तेमाल कर गया हूँ तव भी यह कहना अनुचित नहीं है कि उसका तरीका तकरीबन शव की ही एक दिशा थी। मैं कौन-सा महल खडा कर रहा हूँ या कुआं खोद रहा हूँ, यह गलत प्रश्न नहीं है और आप उसे पूछते हैं। मैं भी पूछता हूँ अपने से । आप भी पूछिए कि अगर मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ तो अपने मरने का इन्तजाम क्यो नहीं करता। और अगर मर नही सक्ता तो इतनी ऊंची आवाज मे क्यो वोलता है। यह बात मैं भूल नहीं गया हूँ। मुझे यह जररी भी लगता है लेविन तात्कालिक दियकत यह है कि मैं प्रेम की एक दिलचस्स घटना में गिरपतार हूँ। कभी कमी मै उस तरह प्रसन्न भी हो जाता हूँ' जैसा आज था। फिर जब आप कही विसी पागलपन मे लगे हुए हैं तो मरना स्थगित रहता है और जीवन मजाकिया तौर पर चाकू । मैंने अपने जीवन में बहुत मी चीजें स्थगित पर रखी है। भी अपनी प्रेमिका से मर जाने की बात यह दी है और इसे वह जानती है। लेकिन आपने क्या सोचा? बताइए याप वया सोच रह हैं ? क्या आप समझते हैं कि उमे मेरे मर रामो पर विश्वास नहीं है और वह मेरा मजाक उठाती है । जी नहीं, यह जानती है मि में मर साना है और यह हंगी यो वा नहीं है । दरअगर यह निरतर मेरी रक्षा परो में सम्बन्ध । १३९ चक्कर मे लगी रहती है और विलम्ब हो रहा है। लेकिन वह महान समय अव अधिक दूर नहीं जब मुझे कायदे से यह जान लेना पड़ेगा कि न तो जीवन के सम्बन्ध में होने वाले अफसोस को दबा कर रखा जा सस्ता है और न मृत्यु को ही उल्लू बनाया जा सकता है । तब तक न मोत हुए काफी रात हो गयी थी। अर्धरात्रि का सायरन कभी भी बज सकता था और दिमाग का नाच थमने को नहीं पा रहा था। इसी समय यकायक क्या हुआ कि मैं किसी नेतृत्व करने वाले या चितक की तरह, जिम्मेदारियो से भरता हुआ गम्भीर हो गया। अगर रह सके ता यह बहुत निजी बात है और इसे मैं केवल आपको बता रहा हूँ क्योकि यह ऐसा विचार है जो नितात सत्य ही मजाक की तरह लग सकता है । मैं सोचने लगा, काई भी व्यक्ति अपने को नहीं मारता । इस तरीके स वह केवल उस मूर्ति का पीछा करता है जो उसने अपने बारे म बना रखी होती है। इसका अर्थ क्या हुआ कि मरने वाला अपने मत के लिए नहीं अपने को चलाने के लिए मरता है ? नादि आदि। पता नहीं इस दाशनिक मुद्रा म मैं क्या सोचने लगा था । क्या मेरा पतन होने लगा है। आपकी आँखो मे चमक है लेकिा इस दाशनिक निप्पत्ति को मैं खुद ही मारने को तैयार नहीं हूँ। ऐसा करने पर मुझे मानना पडेगा कि मेरे भाई के अन्दर कोई मूर्ति है जिसे वह लोगा के सामने प्रतिष्ठित करना चाहता था । मुझे अपन अदर भी कभी किसो मूर्ति के उदघाटन की सम्भावना नहीं अनुभव होती । और लीजिए आप भी कह रहे है कि यह सब बकवास है । यह एक दुखद स्थिति है कि वाहर कुत्ते बेतहाशा और दहला देने वाले तरीके से रो रहे हैं । शायद यह सच हो कि कुत्ते वेवजह नहीं रो। लेकिन अपनी पवित्रता पर मौकता हुआ यह हल्ला मुझे अप्रिय लग रहा है । समझ म नहीं आता कि यमराज को सघ लेने का काम कुत्तो के ही सुपुद क्या किया है। वे यमराज और चोरो म भोई फक्त नहीं करते जब वि यनराज चार नही है। मैं कुछ नही कर सकता। हमारी आस पास की सडको पर कभी कुत्तो की १४० । फेन्स के घर और उधर कमी नही रही । वे जिम्मेदार व्यक्तियो की तरह है और भौक-मोक कर शहर के इस आरामदार और आधुनिक हिस्से को उन्होने किसी कस्वे का चौरस्ता बना दिया है। भाई को गये अव कई घटे हो चुके होगे। घर के दूसरे हिस्सो मे बार-बार अन्दर-बाहर होती आवाजे हैं। मुझे शहर के बहुत से हिस्से एक छोटी-सी प्रदशिनी और कभी एक वेतरतीव जुलस की शक्ल मे दीख रहे हैं । पुल, घाट, कुएं, रेल, ड्रेक, सडके वगैरह। शहर मे समाचारो की एक विशेष गति होती है और आत्महत्या के लिए कोई आदमी दस मील जाना भी पसन्द नही करता। उसमे थर जाने, नीद आ जाने, भूख लगने, पुनर्विचार करने, चेहरो के याद आ जाने या तकं उत्पन्न हो जाने का डर बना रहता है । घर से विरकुल ही नजदीक रेल-पथ है। विद्युत, डीजल और कोयला, तीनो शक्तियो से चलने वाली गाडियां इधर से गुजरती है। फ्लोर मिल की ऊँची चारदीवारी के साथ चला गया निरापद, जहां-तहां खडे मालगाडी के हिन्यो से अडा एक हिस्सा भी है जहां वर्ष में एक-दो वार आत्महत्याएं हो जाती हैं । यह बात एक चालू किम्बदन्ती की तरह फैली हुई है। कुछ दयाल और अच्छे लोग इसे 'मर्डरस प्वाइट' कहते हैं लेकिन मुझे उसे 'सूसाइड प्लेस' पहने मे सुदी होती है। इन आत्महत्याओ के परिणाम मे महज चुटकी भर एक पुरापुसाया दु रा मर होता है-उतना दुख जितना एव समाचार पत्र दे सस्ता है। फिर आप जानते हैं कि दुस क्तिनी लचर पीज है । अपियारात ये 'रोमैंटिय तरीके यो शुद्ध बामहत्याये होती हैं । मुझे याद आता है एक वगाली लडकी सेन, दूसरी पार फिर एक बगाली लडकी गुहा, तीसरी बार एक ठकुरानी अनाम ( हालाकि तीसरी बार भी वगाली लक्ष्मी होती तो झूठ न लगता) ने इसी निक्टस्य रेल-पय की सहायता गे ससार पर पर दिया था। इमरे बाद को आत्महत्यायें मुझे याद नहीं हैं। ऐसी बारम- हत्या जिससे रोमाच, स्वास्थ, प्रसनता, मजबूती और समय का मामर हो स, पमी नहीं होती। अव तर अपर इण्डिया, तपान एक्सप्रेस, असम मेल और पायद येण्टुबर, सम्बन्ध । १४१ रात वे पहले हिस्से की समी गाडियो गुजर चुकी है। घर मे शान्ति है और कोई गाडी नहीं लगा कि रुकी हो। शायद मेरा भाई दस मील या और ज्यादा दूर चला गया है। पता नहीं हल पालने के सम्बध मे मुझे हडबडी और जिम्मेदारी क्यो है। अगर मेरा दिमाग ठीक है तो मुछे जीने और मरने मे कोई फर्क अनुभव नहीं करना चाहिए । बकाया रात्त, यद्यपि मैं सोया भी लेकिन मुझको लगता रहा मैं अपने से कुछ कहना चाहता हूं- और जो कुछ भी कहना चाहता हूँ वह वार वार पुनरावृत्त होने वाल किसी स्वप्न मे वव रहा हूँ कई बार नोद टूट गई, मैं उस भापा को समझन या पकडने के लिए उठा और वह गुम गई । यह काफी खिजला देने वाली प्रक्रिया थी और में तकरीवन बौखला-सा गया । घुटनो मे मुझे पीडा हो रही थी। मै समझता हूँ इसका कारण नीद म व्याघात का पडना ही रहा होगा। आमतौर पर जब मेरी नीद सुल जाती है तो मै बाहर टहलता हूँ और मौसम रहा तो हरसिंगार के पेड के पास जाकर गहरी गहरी सांस लेता हूँ। चिकित्साशास्त्र के अनुसार यह हृदन रोग के लिए उपयोगी कसरत भी है । में चुपचाप खडा रहा। मैंने स्वप्न, स्वप्न म आई भाषा को धोखा देने वी चेष्टा की कि मै सो रहा हूँ और पुन आये। थोडी देर बाद मै मुस्क- राया । मुझ पर वजन जरूर पडा था लेकिन मुझे सुखद हैरत हुई कि स्वप्न मे जो भाषा थी वह और कुछ नही मेरे भाई को मृत्यु के लिए एक तर्कपूर्ण विज्ञप्ति सरीखी कोई चीज थी। यह सब इतनी गम्भीरता से हो रहा था कि मुझ स देह हाने लगा, कही यह फितूर तो नहीं है । सुवह जव मेरी नीद खुली तव में एक सपना देख रहा था। मनुष्य की शक्ल का एक व्यक्ति, लगोट पहने हुए कसरत कर रहा है और सामने सूर्योदय होने को है । यह मेरी याद मे, इधर के जीवन का काफी स्वस्थ सपना था । छत धम्म धम्म बोल रही थी। मुझे पता है कि छत पर किसके कदम १४२ । फैन्स के इघर और उधर आवाज करते हैं । तो क्या यह सचमुच दस मील भी नहीं गया। शायद भोर की बेला में जव मैं सपना देख रहा था, वह लौट आया। मतलव आज अख. बार में कोई स्थानीय समाचार नहीं होगा। मतलय आज भी घर का जीवन पूर्व निश्चित तरीके से ही चलेगा। शायद आज के दिन की शुरुआत फिर प्रसन्नता से हो और मैं शाम हाने तक सूर्योदय तथा विटैमिन के बारे मे तय घरूं। अव मै विलकुल जगा हुआ हूँ। वह छत से सीढियो यो पीटते हुए नीचे उतरा और बाहर बाग मे चला गया। मेरा भाई वाहर टहल रहा है-इधर से उधर, उधर से इधर--उण्डी कीटाणु नीरोधक ताजी वायु का सेवन करता हुआ । रेडियो से शहनाई वजने लगी है । मुझे दिखाई नहीं दे रहा है-पर में जानता हूँ, मां टहलते हुए भाई के पीछे पीछे चापलूसी, दूध और नास्ता लिए चल रही है। मैं अपने को रजाई मे उलट पुलट रहा हूँ ऐसा नहीं कि मैने यह न सोचा हो-आखिर यह सब क्या है । मैं सोच रहा हूँ कि कितनी गभीरता पूरी रात छाई रही-कितनी हँसी की ये वात है-जितना मजाक मै कर सका वह भी कितनी आसानी से उलट गया-कितनी दया में अपने ऊपर करूं? जीवन जीवन जीवन, कोई कविता इस समय नही याद आ रही है, जो इस शब्द से शुरू होती हो और जिसे
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