Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Hindi Padhey Rachna

Tripathi,ram Naresh · 2011/01

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हिन्दी-पद्य-र
छन्द-वनाना सीखने वालो के लिए
हिन्दी का पिङ्गल
लेसक
रामनरेश त्रिपाठी
प्रकाशक
हिन्दी-मन्दिर, प्रयाग
आठवाँ संस्करण ] अक्टूबर, १९३३ [ मूल्य आठ आना

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- -- -- भूमिका अाजकल लोग, विशेषकर नवयुवक, एकान्त मे घंटोनिमाग लडाकर, नवीन-प्राचीन भाव जो कुछ हाथ आया, उन्हें पद के हटे-फटे साँचे में ढालकर चाहते हैं कि ससार उसकी मधुर भाव- मरी मृति को अपने हृदय में स्थान देकर उसका गौग्य पढारे। परन्तु जो लोग साहित्य समार में अभी नये नये चले आ रहे हैं, उनके पास ऐमा सांचा कहाँ है जिसमें वे अपने भावी को ढालकर मनोहर रूप और सुन्दर आकार-विशिष्ट मृर्चिससार को दिखा सके ? हमने यह पुस्तक रूपी साँचा उन्हीं के लिए तैयार किया है। वे अपने भाव-अपने विचार इम साँचे में डालकर उमे सुन्दर पद्य-रूप में संसार के सामने रक्खें। फिर देखें, संसार उनके रचना-चातुर्य का कितना सम्मान करता है । यह पुस्तक नौसिस पा रचयिताओं के काम की है। इसमें उन्हीं विपयों का वर्णन किया गया है, जिनकी प्रारम्भ में आवश्यकता पड़ती है। इसे पढ लेने के पश्चात् कोई अलकार- मन्थ पढना चाहिये, तब कवित्व-शक्ति विकसित होगी। इम पुस्तक मे सर बातें सरल भाषा में अच्छी तरह समझाकर लिखी गई है। नये सस्करण में अलंकार और प्रस्तार क भी समाश कर दिया गया है। छदा की संरया भी बढा दी गई

--
है। इससे यह पुस्तक साग-पूर्ण और विद्यार्थियो के लिये वडी
ही उपयोगी हो गई है। आशा है, पढनेवाले इससे पूरा लाभ
,
उठायेगे।
छदों के उदाहरण कुछ तो हमने स्वरचित रस दिये हैं,
जिनके नीचे किसी का नाम नहीं । कुछ अन्य कवियो के ग्रन्थों
से लेकर लिसे हैं, उनके नीचे हमने कवियों के नाम लिख
दिये हैं।
रामनरेश त्रिपाठी
।

सूची . ३५ १ ४० वर्ण और मात्रा ५ गण विपय पृष्ठ | विपय पद्य की परिभाषा अहकार पद्य की विशेषतायें २ शब्दालद्वार। २ अर्थालवार लघु और गुरु ४ उभयालकार ८ ५० गति और यति ५ नौसिस पद्य-रचयिताओं के लिये कुछ सम्मतियाँ ५३ देवता, गणागण और फल मात्रिक छन्द--सम दग्धाक्षर वगहस छन्द और उनके भेद । १५ । सुगति सख्या-सूचक शब्द १६ / छवि वर्णन १७ । हारी दीपक ५८ २२ आभीर ५९ . ९ ५७ तुक ५८ J उपमा नसशिप दोप २४ / तोमर पापा रस, गुण, छन्द / २८ / चन्द्रमणि ३१ ससी -- ( २ ) पृष्ठ पृष्ठ विपय चषय ६० रोला ७० ७० प्रतिभा कलिका सुलक्षण चौवोला चौपई / पद्धरि । 888995 , चौपाई शक्ति पीयूप-वर्ष ६१ मुक्तामणि कामरूप गीतिका गीता शुद्ध गीता सरसी ललित-पद ६३ हरिगीतिका ६४ विधाता ६४ मरहटा ६५ चौपैया/ ताटक ६५ रुचिर ६६ । चीर ६६ विभगी। दडफला ८५ सुमेरु सगुण शास्त्र हसगति अरुण प्लवगम कुडल प्रभाती 1 রা लायनी - पृष्ठ पृष्ठ | विषय ८८८ ८८ ८९ ८१ श्रति चरवा दोहा/ मोरठा । A विपय - मात्रिक-अर्द्धसम ममानिका यापी घरवा चम्पफ्-माला ग्योद्धता शालिनी भुजंगी मात्रिक--विपम इन्द्रवशा 'अ डलिया। चचला 'उल्लाला ८३ प्रमिताक्षरा 'छप्पय ( पट्पदी) ✓ ८४ तारक । वर्ण-वृत्त--सम उपेन्द्र वना माया दोधक ८५ / कनक-मजरी / भुजङ्ग-प्रयात ९१ ९१ ९१ ९२ इन्दवमा - ९३ ९३ ८४ ९३ ९४ ९५ ८६ / तोटक 'तलका स 'पालती नायक शिवदना पलिका माणिका 'बमोहा नीला ८६ मोतियदाम ९५ 3 शृगारिणी ८७ / मोदक ९६ यशस्थ J विषय पृष्ठ । विपय १०४ १०५ १०५ द्रुतविलम्बित. तरल नयन चसततिलका मालिनी मदाक्रान्ता V शिसरिणी चामर पञ्चचामर शार्दूल विक्रीडित। चित्रलेसा स्त्रग्धरा अनुष्टुप सवैया ९६ मकरद लवनलता ९७ चकोर ९८ दंडक ९८ सुधानिधि ९९ । अनग-शेसर ९९ मुक्तक ९९ १०६ मनहरन् कवित्त १०८ १०८ ११ कलाधर १०० रूप घनाक्षरी १०१ जलहरण १०१ देव घनाक्षरी प्रस्तार १०२ प्रस्तार १०२ १ सूची १०३ वर्ण-प्रस्तार १०३ मात्रा-प्रस्तार नष्ट १०४ । उद्दिष्ट . मदिरा मत्तगयन्द किरीट दुर्मिल अरसाa सुन्दरी ११ १९ १ १ १

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२
।
हिन्दी-पद्य-रचना
पद्य की विशेषताएं
गद्य से पद्य में कई विशेषताये हैं। उनमे से कुछ ये हैं-
१--पद्य मे थोडे शब्दो के द्वारा अधिक बाते कही जा
सकती हैं
२-पद्य का सम्बन्ध गान विद्या से है और गान-विद्या
प्राणि-मात्र का हृदय मोह लेती है। इसलिये पद्य मनुष्य को
स्वभाव ही से प्रिय है।
३-~-पद्य की रचना प्राय अक्षरों, मात्राओ और पदो की
गिनती के अनुसार क्रमबद्ध होती है। इसलिये वह पढने में
भी अच्छा मालूम होता है।
४-पद्य को कठस्थ रखने मे सुविधा होती है।
५-पद्य के द्वारा योड़े समय मे अधिक प्रभावोत्पादक
चाते कही जा सकती हैं।
६.-पद्य के द्वारा भाषा मे स्थिरता ओर प्रौढता आती है
भापा के अधिकाश ललित और प्रभावशाली शब्द प्राय पद्य
द्वारा ही समाज में प्रचार पाते हैं।
वर्ण और मात्रा
वर्ण या अक्षर दो प्रकार के होते हैं-दीर्घ वा "गुरु"
और हस्व वा "लधु"।
वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है, उसे मात्रा

हिन्दी-पद्य-रचना , म यह जो समय हस्व वर्ण, जैसे-अ, इ, उ, ऋ, क, कि, कु, क इत्यादि के उच्चारण में लगता है, उसकी एक मात्रा मानी जाती है, और जो समय दीर्घ वर्ण, जैसे-श्रा, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, श्री, अ, अ आदि के उचारण में लगता है, उसकी दो मात्राये मानी जाती हैं, क्योंकि दीर्घ वर्ण के उच्चारण में बस्त्र वर्ण की अपेक्षा दुगुना समय लगता है। उदाहरण-~~-जैसे "राजा" शब्द, इसमें 'रा' और 'जा' दोनों अक्षर दीर्घ हैं। इसलिये इनमें से प्रत्येक में दो-दो मात्राये हैं, और दोनों में मिलकर चार मात्राये हैं। इसी प्रकार 'कला' शब्द में 'क' हस्व और 'ला' दीर्घ है। 'क' की एक माना और 'ला' को दो मात्रायें, दोनों मिलकर इस शब्द मे तीन मानाये हुई। अनुम्वार और विसर्ग की भी दो मात्राये मानी जाती हैं। जैसे-"सग", इस शब्द में "स" दीर्घ और "ग" करव है, और दुस मे "दुः" नी और "य" हस्व है । परन्तु जिम अक्षर के उपर अर्द्ध-विन्दु हो, उसको एक ही मात्रा मानी जाती है। जैसे-"हस", इसमें "" और "म" दोनी की एक-एक मात्रा है। हिन्दी कविता में संयुक्ताक्षर के पहले का अक्षर कही दोर्य * माना जाता है, कहीं नहीं । दोनों प्रकार के उनाहरण मिलते हैं। यह कधि की इच्छा और सुभीते की बात है। चाहे यह संयुक्ताक्षर के पहले अक्षर वो दीर्घ माने या रस हिन्दी-भाग में इसके लिए कोई सास नियम नही है। हो, कुछ शन्दों में - पवह ।

.
,
.
हिन्दी पा-रचना
सयुक्ताक्षर के पहले अक्षर को दीर्घ मानना ही पड़ता है। जैसे-
सत्य, कल्प, रम्य, तत्व, शब्द आदि । इसमे स, क, र, त श्री
श दीर्घ माने जायेंगे और त्य, ल्प, म्य,
त्व,
और
परन्तु किसी शब्द का पहला अक्षर यदि सयुक्त है तो
शब्द से पहले जो शब्द है उसका अन्तिम अक्षर दीर्घ ही प
जायगा, इसके लिये कोई वाध्यता नहीं है। पढने मे जिस तर
सुगमता हो, उसे वैसा ही पढ लेना चाहिये । जैसे, सूर्य-प्रभ
इममे 'प्र' के पहले का 'य' दीर्घ भो पढा जा सकता है और हर
भी। कवि अपनी सुविधा के अनुसार चाहे जैसा प्रयोग क
सकता है
लघु और गुरु
पद्य-साहित्य मे हस्व वर्ण को लघु और दीर्घ वर्ण को गु
कहते हैं। लघु का चिन्ह एक सड़ी पाई "" और गुरु व
चिन्ह "s" है।
सुभीते के अनुसार हिन्दी के कवि कभी-कभी गुरु अक्ष
को लघु कर लिया करते हैं। जैसे-दुस को दुस, सग के
सँग, राजा को राज इत्यादि ।
परन्तु सास-मास शब्द, जो दोनों रूपों में प्रचलित हैं
उन्ही को ऐमा करने का कवि को अधिकार है, सब शब्दों को
नहीं । हिन्दी कविता मे हल् वर्ण की एक मात्रा मानी जाती है ।

हिन्दी-पद्य-रचना
जैसे महान मे न को "न" और सत्र में त् को "त" मान लिया
गया है।
कभी-कभी छन्द की गति के विचार से गुरु वर्ण को लघु
पढना पड़ता है। जैसे-जामवत के वचन मोहाये-इसमे
"सोहाये" शब्द का "मो" वर्ण गुरु होने पर मी लघु पढा
जायगा।
गति और यति
प्रत्येक छन्द में एक प्रकार को गति अर्थात पाठ-प्रवाह भी
पता है। इसका कोई सास नियम नहीं बतलाया जा सकता।
इसका जानना केवल प्रन्यास पर निर्भर है। जैसे-~-"लपन
जब सकोप बचन बोले"-इसमें १६ मात्राएँ तो हैं, परन्तु
चौपाई को गति नहीं है। यहाँ गति-भगदोप माना जायगा।
इसकी गति ठीक करने मे यह "लखन समाप बचन जव
बोले" होगा।
बहुत से छन्दों मे विराम का भी नियम होता है । अर्थात्
पर पिङ्गल के अनुसार शब्द-योजना इस प्रकार में होती है कि पढ़ते-
पढने नियमित स्थान पर थोडामा रुककर तव आगे पढना
पढ़ता है, उसे विराम, विश्राम या यति कहते हैं।
गरण
तीन-तीन वर्णा का एक-क गण होता है। गरगा ८ हैं।
उनके नाम और लक्षण नीचे लिखे जाते है-
-~

w हिन्दी पद्य-रचना सकेत नाम न य ज १ ७ स त सत्या गण रूप उदाहरण १ मगण Sss मायावी २ नगरा नलिन ३ भगण 5।। भारत यगण ISS भवानी ५ जगण ISI जवान ६ रगण S IS रोहिणी सगण । IS सरला ८ तगण 551 ससार इन आठों गणों को इनके रूप-सहित याद रखने की का युक्तियाँ हैं, जैसे- "यमाताराजभानसलगम्" इस सूत्र में पहले के आठ अक्षर आठों गणों के अद्यक्षर हैं इसी सूत्र में गणो के रूप भी हैं। जिस गण को जानना हो उसी अक्षर के साथ आगे के दो अक्षर और मिलाने से वह गण बन जायगा । जैसे—यगण की पहचान के लिये 'य' के थागे के दो अक्षर मिलाये तो "यमाता" हुआ । इसमें आदि में लघु और मध्य और अत मे दो गुरु हैं। इसी प्रकार यदि सगण जानना हुआ तो 'स' के आगे के "लगम" को उसके साथ मिलाया तो "सलगम्” हुआ । 'ग' के आगे अनुस्वार है, इसलिये "ग" गुरु हुआ। अतएव आदि लघु, मध्य लघु और अत गुरु सगण हुआ। इसी प्रकार और गण भी निकल

और
हिन्दी-पद्य रचना
हैं। आठ अक्षरों के बाद 'ल' और 'ग' अक्षर लघु
के संकेत नाम हैं।
दूसरी रीति-
आगे लिखे दोहे से भी गणों और उनके रूपो का पता
ल जाता है-
आदि मध्य अवसान में, य र त सदा लघु मान ।
क्रम मे होते भ ज स गुरु , म न गुरु लगु त्रय जान ॥
अर्थात् यगण के श्रादि में लघु, शेप दोनो गुरु, रगण के
(ध्य मे लघु, शेप श्रादि और अन्त में गुरु, गण के अवसान
(अन्त ) मे लघु, शेप पहले दो गुरु, इसी प्रकार भगण,
जगण और सगण के श्रादि, मध्य और अन्त में क्रमश गुरु
और शेप लघु होते हैं। मगण मे तीनों वर्ण गुरु और नगण
में तीनों लघु होते हैं।
देवता, गणागण और फल
आठों गणो के आठ देवता माने गये हैं, और उनके फन
। भिन्न भिन्न हैं। वे इस प्रकार हैं-
गरण
देवता
पृथ्वी
स्वर्ग
सुस
चन्द्रमा
यश
वृद्धि
फ्ल
श्री
न
जल

८ हिन्दी-पद्य-रचना स त गण देवता फल। सूर्य शोक अग्नि मृत्यु वायु भ्रम प्रकाश शून्य नीचे लिसे श्लोक को याद कर लेने से ग्रहों के देवता और उनके फल सक्षेप ही में मालूम हो जायेंगे- मो भूमि श्रियमातनोति य जल वृद्वि र चाग्निमृति । मो वायु परदेश दूरगमने त व्योम शून्यं फल ।। ज सूर्यो रुज का ददाति विपुल भेन्दुर्यशो निर्मल । नो नाश्च सुखप्रद फलमिट प्राहुर्गणाना वुधा । पाठ गणों मे म, न, भ, य, ये चार शुभ हैं, और शेप ज र, स, त, अशुभ। किसी मनुष्य को प्रशसा में कुछ कविता करन हो तो उसके प्रारम्भ मे अशुभ गण न आने चाहिये । छद के प्रथम चरण के श्रादि के तीन अलगे के लिये ही यह नियम है। शेष चरणों के आदि या मध्य मे तो चाहे जैसा शुभ-अशुभ गण पड़ उससे कुछ हानि नही और ईश्वर विषयक कविता मे ते शुभ-अशुभ गण का कुछ विचार ही न करना चाहिये। किसी किसी का मत है कि गणागण का विचार प्रथम चरण के प्रारम्भ के छ अक्षरो मे करना चाहिये। छ अत्तर के दो गण हुये 1 किन-किन दो गणों के साथ रहने मे क्या क्या फल होता है, यह नीचे लिसा जाता है-- जाय,

हिन्दी-पद्य-रचना
मगण नगण ये मित्र हैं , भगण यगण हैं दाम ।
र स रिपु सम हैं शोकप्रद , त ज हैं निपट उदास ॥
मित्र+मित्र-सिद्धि उदास+मित्र-अल्प फ्ल
मित्र+दास%जय उदास+दाप-दुस
मित्र-+-उदास-हानि उदास-उदाम-अफल
मित्र+शत्रु-मित्र नाश उदास+शत्रु-दुस
दास-+मित्र-सिद्धि
शत्रु+मित्र-शून्य
दास+दास-हानि
शत्रु+दास-प्रियानाश
दास+उदाम-पीडा शत्रु+उदास-शका
दास-+-शनु%
शत्रु+शत्रु नाश
गणागण का दोप मात्रिक छदों ही में माना जाता है,
ण-वृत्तो में नहीं। परन्तु वर्ण-वृत्तो मे भी यह ध्यान रखना
वाहिये कि यदि प्रारम्भ में ज, र, स या त गण पडते हो तो
शन्द मगलनाची होना चाहिये ।
प्रत्येक चरण में गणों की गिनती प्रथम अक्षर से की
जाती है। अन्त में जो दो या एक अक्षर बच जाते हैं, वे लघु
पौर
गुरु हुये ता गुरु मान लिये जाते हैं।
-पराजय
हुये तो लघु
ढग्धाक्षर
पा में अक्षरी के शुभाशुभ पर भी ध्यान रपने का नियम
है। 1 सर सभी शुभ माने गये हैं। व्यजनों में शुभ और अशुभ
इस भाँति माने गये हैं-

,
कह "दरिया" यह मङ्गलमूला थनूप फूलै जहाँ फूलहे ।
१०
हिन्दी-पद्य रचना
शुभ-क, स, ग, घ, च, छ, ज, त, द ध, न, य, श, स, क्ष।
अशुभ-ड, झ, ब, ट, ठ, ड, ढ, ण, थ, प, फ, ब, भ,
म, य, र, ल, व, प, है ।
अशुभ अक्षरों में भी झ, ह, र, भ और प तो अत्यन्त
दूपित हैं। ये दग्धाक्षर कहलाते हैं। पद्य के आदि मे इनका
होना बडा दोष है। हाँ, देवता मम्बन्धी किसी शब्द क
प्रारम्भ इन्हीं अक्षरों से हो तो वह अशुभ नहीं समझा जाता
और दीर्घ अक्षर कोई भी दग्धाक्षर नहीं माना जाता।
तुक
हिन्दी कविता मे तुक की प्रधानता उसके प्रारम्भ काल है
से चली आती है। बहुत ही कम ऐसे उदाहरण मिलते हैं।
जिनमें तुको का कुछ ख्याल न किया गया हो । सत-कवियों
कही-कही नाम मात्र के बेतुके पद भी कहे हैं। उनमे से दरिय
साहब का एक पद नीचे लिखा जाता है-
अबके बार बकस मोरे साहिब तुम लायक सब जोग है ।
गुनह बकसिहौ सब श्रम नसिहौ रसिहौ अपने पास है।
अकै बिरिछ तर लै बैठेही तहाँ धूप न छोह है।
चोद न सुरुज दिवस नहिं तहवाँ नहि निसु होत विहान
अमृत फल मुस चासन
भवसागर दुस दारुन मिटिहै त्रुटि जैहै कुल परिवार है।
देहो इतनी अरज हमार है।

हिन्दी-पद्य-रचना ११ - इस प्रकार के दो-चार जाहरणो के सिवा शेप हिन्दी की सब प्राचीन कविता में तुक का पूरा ध्यान रखा गया है । तुक मनुष्य को स्वभाव ही मे प्रिय है। अशिक्षित और गॅचार लोगों को भी तुक न मिलना सटकता है । अहीर, धोवी, चमार, कहार और नाई आदि के जातीय गानों में भी तुक मिला रहता है। इन सब बातों में जाना जाता है कि पटा के लिये तुफ एक प्रधान यन्तु है। यद्यपि सस्कृत में तुक मिलाने की विल्कुल परवा नहीं की गई है। वाल्मीकि, व्यास, भास, कालिदास, क्षेमेन्द्र श्रादि किमी कवि ने तुक मिलाने का प्रयास नहीं किया। पर उनकी रचना में भी जहाँ अपने आप तुक मिल गया है, यहाँ पद्य अधिक कर्ण-मधुर और प्राकर्षक हो गया है। गान-विद्या का काम बिना तुक के चल ही नहीं सकता। जयदेव ने गीतगोविन्द में तुको के बहुल-प्रयोग ही से अमृत- चर्या की है। एक पद सुनिये- पतति पतत्रे विचलित पत्र शक्ति भरदुपयानम् । रचयति शयन सक्ति नयन पश्यति तव पथानम् ।। उर्दू के शेर भी एक प्रकार से पेतुके हो होते हैं। पूरी गजल में तो प्रत्येक शेर के दूसरे चरण का तुक मिला रहता है। पर पातचीत में जय किसी एक शेर या अलग प्रयोग किया जाता है, तब प्राय वह वेतुफा ही रहता है- "

१२
हिन्दी-पद्य-रचना
मगरिब ने खुर्दयों से कमर उसकी देस ली ।
मरिक को शायरी का मजा किरकिरा हुआ ।
महफिले यार मे उठने को उठे तो लेकिन ।
दर्द की तरह उठे गिर पडे ऑसू को तरह ।।
बार-बार सुनने का अभ्यास पड जाने से उर्दू कविता
के शेर बेतुके ही अच्छे लगने लगे । जैसे हिन्दी मे आल्हा छन्-
बंतुझा ही गाँव वालो के मन को मोह लेता है। इसी प्रकार
सस्कृत-कविता अतुकान्त होने पर भी हृदय को वश मे कर लेती
है । पर यह सव महत्व तो कवितागत भाव का है । तुक कान का
विषय है । कान को प्रिय लगने के लिये तुक मिलाने की
आवश्यकता अस्वीकार करने की बात नहीं। मन को चश
करने के लिये कान की खुशामद करनी ही पडेगो।
सडी बोली की कविता में भी तुक ही की प्रधानता है
इवर कुछ दिनो से अंग्रेजी ओर बङ्गला की नकल करके हिन्दी
में अतुकान्त कविता का भी प्रचार हो चला है। यह प्रवाह भी
किसी सीमा नक जाकर ही रुकेगा। पर यह निश्चय है कि
सर्वसाधारण मे सदैव तुकबन्दी ही की प्रधानता रहेगी, क्योकि
वह मनुष्यमात्र को स्वभाव ही मे प्रिय है।
यहाँ तुक के सम्बन्ध में कुछ जानने योग्य बाते लिसी
जाती हैं--
प्रत्येक छन्द के चरणान्त मे जो ममस्वर अनर होते हैं,
उनका नाम तुक है।

हिन्दी-पद्य-रचना
तुकबन्दी से यही मतलन नहीं कि अन्त के अक्षर मिल
जाय, बल्कि स्वर भी मिलने चाहिये।
तुक उत्तम, मध्यम और निकृष्ट तीन प्रकार के होते हैं।
यदि पत्र के अन्त में दो गुरु श्रा परें, तो वहाँ पाँच
मानाओ का समस्तर होना उत्तम और चार का मध्यम है।
यहाँ सर के अलग अलग उदाहरण दिये जाते हैं-
उत्तम
केहि हूँढन तेरो कहा सोयां क्यों अकुलाति लसाति ठगी सी
हरीचन्द ऐमहि उरमी तो क्यो नहि डोलति सङ्ग लगी मी ।।
हरिश्चन्द्र
मध्यम
प्रभो शकरानन्द आनन्द-दाता ।
मुझे क्यों नहीं आपदा से छुडाता
शहर
यदि पद्य के अन्त में गुरु लघु () या लघु गुरु (5)
श्रा पड़े, तो पाँच मात्राों का तुक उत्तम, चार का मभ्यम,
तीन का निकृष्ट और एक का तो सर्वथा त्याज्य है । जैसे-
उत्तम
जिय पै जु होय अधिकार तो विचार कीजै, लोकलाज
भलो चुरो भले निग्धारिये । नैन न कर पग सबै परपस भये
उते चलि जात इन्हें कैसे के संभारिये । हरीचन्द भई सर भांति
,
क

हिन्दी-पय-रचना
सों पराई हम इन्हें ज्ञान कहि कहो कैसे के निवारिये। मन में
रहै जो ताहि दीजिये विसारि मन श्राप घसै जाम ताहि कैसे के
विसारिये ।।
हरिश्चन्द्र
मध्यम
हमहि तुहि सरवरि कस नाथा ।
कहहु तो कहाँ चरन कहें माथा ।।
तुलसीदास
निकृष्ट
तन ताजी असवार मन , नयन पियादे साथ ।
यौवन चल्यो शिकार को , विरह वाज लै हाथ ।।
सर्वथा त्याज्य
निन्दा अस्तुति उभय सम , ममता मम पद-रञ्ज ।
ते सजन मम प्रान प्रिय , गुन-मन्दिर सुस-पुञ्ज ।
तुलसीदास
मुनि जेहि ध्यान न पावही , नेति नेति फह वेद ।
कृपासिन्धु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक विनोद॥
तुलसीदास
यदि पदा के अन्त मे दो लघु ा पड़े तो चार मात्राओं

हिन्दी-पद्य-रचना
९-भूसएड, रत्र, श्रक, प्रह, निधि, भक्ति।
१०-दोप, दिशा, दशा।
२१-शिव।
२२-राशि, मूर्य ।
१३---किरण, नदी।
१४- भुवन, मनु, रत्न, विद्या ।
१५---तिथि।
१६- कला, सस्कार, यहार ।
१७-कोई खास नाम नहीं है । १०+७ या और कोई दो
सकेत मिलाकर काम निकाला जा सकता है।
१८-पुराण।
१९--कोई खास नाम नहीं है।
पद्य में अकों की गिनती दाहिनी ओर से चाई और को
होती है । जैसे-~१५ कहना हुश्रा वो शर, चन्द्र कहेंगे। यह
क्रम से तो ५१ हुआ, परन्तु कविता में ऐसा मान लिया गया
है कि अतिम अक को पहले कहेंगे।
सरन्या-मकेतों के बदले उनके पर्यायवाची शब्द लिसने में
सदोष नहीं । वेद के लिये श्रुति और चन्द्रमा के लिये
जा सकता है।
-
का
तो उसके किन-किन अगों

हिन्दी-पय-रचना हो, उसे विपम कहते हैं। जैसे प्रार्या मात्रिक छन्द और वर्ण- वृत्त की पहचान के लिए यह दोहा याद कर लेना चाहिये- गुरु लघु चारो चरण में, कम से मिले समान । वर्ण-वृत्त है, अन्यथा , मात्रिक छन्दाप्रमान । अर्थात जिस छन्द के चारों पदों में गुरु और लघु समान क्रम से मिले, वह वर्ण-वृत्त है और जिसके पदों में गुरु-लघु का कोई क्रम न हो, केवल मात्रा ही समान हो, उसे मात्रिक छन्द समझना चाहिए। संख्या-सूचक शब्द पद्य में यदि कही सख्या दिसाने का काम पडता है तो प्राय सरया-सूचक शब्दों ही का प्रयोग किया जाता है। जैसे जहाँ "एक" कहना हुआ वहाँ "चन्द्र" कहने से भी एक का बोध होता है। कुछ सल्या-सूचक शब्द नीचे लिखे जाते हैं- ०-आकाश। --आत्मा, भूमि, चन्द्र, । ---पक्ष, प्रॉस, मुजा, अयन । ३--गुण, ताप, राम, काल, अग्नि । ४-वद, युग, वर्ण, आश्रम, ५-शर, पाडव, गति, प्राण, यज्ञ, कन्या, भूत, गव्य । ६-ऋतु, रस, राग, अलिपद, वेदाग, शास्त्र । ७-मुनि, सागर, स्वर, गिरि, ताल, लोक, वार, अश्व । :-सु, सिद्धि, दिग्गज, योग, याम । पदार्थ , , ,

१७
,
विद्या।
हिन्दी-पद्य रचना
९-भूखण्ड, रत्र, अक, ग्रह, निधि, भक्ति ।
१०-दोप, दिशा, दशा।
११-शिव।
१२-राशि, सूर्य।
१३---किरण, नदो।
१४ भुवन, मनु, रल,
१५--तिथि।
१६- कला, सस्कार, शृङ्गार।
१७-कोई खास नाम नहीं है । १०१७ या और कोई दो
केत मिलाकर काम निकाला जा सकता है।
१८-पुराण।
१९-कोई खास नाम नहीं है।
२०-ख।
पा में श्रको की गिनती दाहिनी ओर से वाई श्रोर को
होती है। जैसे-~-१५ कहना हुश्रा वो शर, चन्द्र कहेंगे। यह
हम से तो ५१ हुआ, परन्तु कविता में ऐसा मान लिया गया
कि अतिम श्रक को पहले कहेंगे।
सख्या-मकेतों के बदले उनके पर्यायवाची शब्द लिसने में
भी कुछ दोप नहीं । वेद के लिये श्रुति और चन्द्रमा के लिये
राशि लिया जा सकता है।
वर्णन
किसी वस्तु का वर्णन करना हो तो उसके किन-किन अगों

१८ हिन्दी-पद्य-रचना , का या किन-किन गुणो का वर्णन करना चाहिये, यह नीर लिसा जाता है । इनको अच्छी तरह समझ लेने पर वर्ण करने की शक्ति बढ जायगी। भूमि-देश, नगर, वन, पहाड, आश्रम, नदी, ताल, म और सूर्य चन्द्र के द्वारा उत्पन्न हुये प्रभाव का वर्णन । देश-रत्नो की सानि, पशु, पक्षी, भापा, भूपण, सुगध और मनुष्यों के ऐश्वर्य, दान-दाक्षिण्य आदि । नगर-साई , किला, महल, ध्वजा, चावडी. कृप, वाला स्त्रियो का सौन्दर्य, बाग, विहार-स्थल, निवासियों के सुस श्री निर्भयता आदि । वन-सिह, हाथी आदि भयानक जन्तु, दावाग्नि, वृक्ष लता और कुञ्जो का भयावना दृश्य, नदी, सोह, राक्षस आ " , का भय । , पहाड-चोटी, गुफा, दरी, पातु, औपध, झरना, सिड समुदाय और वृत्त-श्रेणी। आलम- होम का धूम, वेद का गान, सिंह, मृग, मो और सॉप आदि परम्पर विरोधी जीयो का चैर त्याग और भू का निवास श्रादि । नदी-जलचर,, जलज, प्रवाह, तरग, तट, जल का रूप स्नान आदि। घाग- सुन्दर लता, पुष्प, कोरिल अादि पक्षी, भ्रम सुगधित चायु, लताकुल, पक्षियों और भ्रमरो का मधुरस्वर आदि तालाब-जल यग, ममल, हाथी को केलि, मछली यादि - ,

हिन्दी-पद्य रचना
समुद्र-वडी तरंग, गम्भीरता, रत्न, जल अन्तु, चन्द्रोन्य,
अगमता आदि।
यमत-वृक्षो और लताओं का नये पत्र और पुष्प लस
जाना, कोकिल का कूजना, भौर का गुंजना, सुगन्धित वाय,
वन्यजीवो का प्रानन्द, किशुक आदि पुप्पी की बहुलता प्रादि ।
ग्रीम-घोर गर्मी, लू चलना, जलाशयो का मूब जाना,
जीवधारियों की व्याकुलता, वृक्षो का जल आना, सूर्य की
प्रचण्डता श्रादि ।
वा-पटा, वृष्टि, हम, बगुला, मोर, चातक, विजली,
दम्व, केतकी, गरजना, इन्द्रधनुप, भूमि को हरियाली, पानी
प्रचुरता
आदि।
शरद-निर्मल आकाश, चन्द्र-प्रकाश, काम, पथिक श्रोर
जा का प्रयाण, राजन, निर्मल जल और कमल का वर्णन ।
हेमन्त-शीत, घडी रात्रि, छोटा दिन, श्राग ओर रुई की
उपयोगिता, पुष्टिकारक भोजन आदि ।
शिशिर-~-हिम, ठटी हवा, सूर्य की किरण, पतझड श्रादि ।
सूर्योदय---उदय होते समय को लाली, अ धकार-चोर नारा-
दीप-चन्द्रमा प्रोर कुमुद को हानि आदि ।
प्रभात-चिड़ियो का चहचहाना, भौरी की गूंज, फुला
का खिलना, ठढो हवा का चलना, वेद और शवध्वनि, प्रकाश
-
,
यादि।
चद्रोदय-चकवा-चकई, फमुदिनी का सिलना, चकोर,
समुद्रतरङ्ग, किरनों की स्निग्यता आदि ।

२० - , , , हिन्दी-पद्य-रचना राज्य-राजा, रानी, राजकुमार, मन्त्री, सेना, सेनापति, दूत, प्रजा, प्रजा का सुख, अच्छे राजनियम आदि । राजा-प्रतिज्ञा-पालन, पुण्य, प्रताप, शासन, बल, बुद्धि, विवेक, धैर्य, दड, सत्य, वीरता, दान, कोप, सेना, क्षमा, कृपा आदि। सग्राम-सेना का शब्द, रज, कवच, शस्त्र चलाना, साहस, ललकारना, मारना, कवन्ध उठना, रक्त की नदी बह चलना आदि । उपमा दो वस्तुओ मे जहाँ आकृति, गुण और दशा मे समानता पाई जाती है, वहाँ उपमालङ्कार होता है । जिस वस्तु की किसी अन्य वस्तु से उपमा दी जाय उसे उपमेय और जिससे उपमा दी जाय उसे उपमान कहते हैं । जैसे-"मुस चन्द्र सा सुन्दर है", इसमे 'मुख' उपमेय और 'चन्द्र' उपमान है । "सा" उपमा का वाचक और 'सुन्दर' उसका गुण हैं। किसी स्थान पर कैसी उपमा दी जानी चाहिये ? यह तो कवि की प्रतिभा पर निर्भर है। अच्छे प्रतिभाशाली कवि सदा अनूठी उपमाएँ दिया करते हैं। परन्तु कुछ उपमाये, जो सास- खास अवसरों के लिये निर्धारित सी हो गई हैं, यहाँ लिसी जाती हैं--- श्वेत-कीर्ति, हास्य, शरद-धन-ज्योत्स्ना, शशि, सूर्य, सुधा, कपूर, बगुला हीरा, कास, केचुलो, हिम, कमल, भस्म, कपास, रेत, चन्दन, इस, दूध, दधि, शव आदि । , .

हिन्दी-पद्य-रचना
२१
पीला-हरड, हल्दी, चंपक, दीप-ज्योति, भूमि, अकुर,
गवक, वानर, किंजल्क, केशर, सोना, चपला, दिवस, पराग
,
आदि।
-
श्याम-श्राकाश, साँप, सजन, नीलकट, मोर,
विश्वासघाती, पाप, राक्षस, अन्धकार, जामुन, यमुना, तिल,
दुष्ट का मन, नीलकमल, हाथी, मील, मसि, काजल, कस्तूरी,
भौरा, रात, अपयश, कलक, आँस के तारे, कोकिल, भैंस, कारु,
कुरूप, कीच, चाल, काम, कलह, छल, राम, कृष्ण, नीलम,
अलसी का फूल आदि।
लाल-महल, वीरवहृटी, लाल फूल, रक्तचन्दन, मदिरा,
रवि, ओंठ, मुरगे की चोटी, माणिक, कुंदरू, कमल, जपा,
अनार का फूल, ढाक का फूल, अग्नि, पल्लव, क्षत्रिय का धर्म,
मॅजीठ, महावर, रुधिर, नस, गेरु, मध्या आदि ।
कुटिल-अलक, ललाट, तोते का मुख, साँप, कटाक्ष, धनुष,
बिजली, पाल चद्रमा, शूकर को दाँत, कपटी आदि।
फोमल-पल्लव, फूल, दया, मासन, प्रेम, कमल आदि ।
कठोरयन, हीरा, कुच वोर का चित्त, सूम का मन,
कछुवे की पीठ, हठ, दुष्टों की दृष्टि श्रादि ।
अचल सत्ती का चित्त, युद्ध में वीर सन्त का मन, धर्म
-
.
,
आदि।
चपल-मृग, धानर, पीपल का पत्ता, सियार, लोमीषा
मन, बालक, मछली, खजन, भौरा, हाथी का कान, बिजली,
यायु बुलटा का कटान आदि।

२२
हिन्दी-पद्य-रचना
श्रादि।
सुखद-विद्वान् पुत्र, पतिव्रता-स्त्री, विद्या, नीरोग शरीर,
धन और मित्र का मिलन आदि ।
दुसद-पाप, पराजय, झूठ, हठ, मूर्स मित्र, कुरूपता,
क्रोवी स्वभाव, व्याधि, अपमान ऋण, बुरा स्वामी, घुरे गाँव में
निवास, कुलटा स्त्री, परतन्त्रता, दरिद्रता, शत्रु
मन्दगति-हस, हाथी, पतिव्रता स्त्री की हँसी ओर
बुद्धिमानो का विनोद आदि ।
शीतल-मलय-मारुत, घनसार, चद्रमा, जल, हिम,
शीत,
कमल, मृदुवाणी आदि।
तप्त-शत्रु का प्रताप, दुर्वचन, विरह, सूर्य, अग्नि, तृष्णा,
पाप आदि ।
सुस्वर-कलरव, कोकिला, मोर, हस, वीणा, बॉसुरी-
मैना आदि।
कुस्वर-उलूक, भैस, वकरा, कोवा, गधा, कुत्ता, सियाय
आदि।
मधुर-चन्द्रमा की किरन, मासन, दास, करि की युक्ति
मिश्री, ऊस, अमृत, चालक की पाते, स्त्री का श्राकार आदि ।
बली-वायु, हनुमान, भीम, वालि, बलदेव, सिह, हाथी.
सती, गरुड, देव, काल श्रादि ।
नखशिख
केश-घटा, गरफत के सूत, सॉप, 'प्रधकार के तार,
सेवार, भ्रमर ।
वेणी-सापिनी।

२३
हिन्दी पना-रचना
"
मांग-कजल के कृट पर दीप-शिसा, श्याम धनमण्डल में
मिनी, कसौटी पर कचन की लीक अधकार के हृदय मे
सकाश का वाण, ढाल पर कामदेव को दुधारी तलवार ।
अलक-सॉपिनी, भ्रमरावली, श्यामघटा ।
मुस-स्मल, दर्पण, चन्द्र।
ललाट-अर्द्धचन्द्र, स्वर्ण की पट्टी ।
भृकुटी-लता, धनुप, सग, पताका, पल्लव ।
नेत्र-चकोर, मीन, मृग, संजन, कमल, भ्रमर, कामशर ।
कपोल-दर्पण, गुलाव।
कपोल का तिल-सुघामर मे नील कमल, चन्द्र पर सिधु-
ट्व, कमल मे अलि दर्पण पर मोरचा
शीतला के दाग -दृष्टि गड जाने के चिन्ह ।
दाँत-मोती, मणि, कुन्दकली, अनार के दाने, हीरा ।
नासिका-तोता, तिल प्रसून, किशुक ।
अधर-विम्बाफल, मूंगा, लाल फूल ।
रसना-पटस की कसौटी।
मुखवास-चन्दन, चमेली, वकुल, कमल की मुगया।
हास्य-कौमुदी, विजली, सुधा, प्रकाश, उपा ।
स्वर-कोकिल, नीणा।
चिबुक-अधसिली क्ली।
कान-मन के मन्त्री और मित्र, सीप, पुष्प ।
ग्रीवा--कपोत, शस, सुराही
भुजा-मृणाल, कचन की टाल ।
.
.

२२ हिन्दी-पद्य-रचना , दरिद्रता, , मुखद-विद्वान पुत्र, पतिव्रता-स्त्री, विद्या, नीरोग शरीर धन और मित्र का मिलन आदि । दु सद-पाप, पराजय, झूठ, हठ, मूर्स मित्र, कुरूपता क्रोधी स्वभाव, व्याधि, अपमान ऋण, बुरा स्वामी, बुरे गाँव निवास, कुलटा स्त्री, परतन्त्रता, शत्रु आदि । मन्दगति-हस, हाथी, पतिव्रता स्त्री की हंसी औ बुद्विमानो का विनोद आदि । शीतल-मलय-मारुत, धनसार, चद्रमा, जल, हिम, शीत कमल, मृदुवाणी यादि । तप्त-शत्रु का प्रताप, दुर्वचन, विरह, सूर्य, अग्नि, तृष्ण पाप प्रादि । सुस्वर-कलरव, कोकिला, मोर, हस, वीणा, घांसुरं मैना आदि। कुम्बर-उलूक, भैंस, बकरा, कौवा, गधा, कुत्ता, सिया आदि। मधुर-चन्द्रमा की किरन, मासन, दान, करि की युति मिश्री, ऊस, अमृत, बालक की बाते, स्त्री का श्राकार श्रादि । चली-वायु, हनुमान, भीम, वालि, बलदेव, मिंह, हार्थ सती, गाह, देव, काल आदि । नखशिख देश-घटा, मरक्त के सूत, साँप, 'प्रधकार के तार मेयार, भ्रमर । वेणी-मॉपिनी। , , , -

हिन्दी पद्य-रचना
.
मांग-कजल के कूट पर दीप-शिसा, श्याम धनमण्डल में
मिनी, कसौटी पर कचन की लीक अधकार के हृदय मे
काश का वाण, ढाल पर कामदेव को दुधारी तलवार ।
अलक-सॉपिनी, भ्रमरावली, श्यामघटा ।
मुस-कमल, दपण, चन्द्र ।
ललाट-अद्धचन्द्र, स्वर्ण की पट्टी।
भृकुटी-लता, चनुप, सङ्ग, पताका, पल्लव ।
नेत्र-चकोर, मीन, मृग, राजन, कमल, भ्रमर, कामशर ।
कपोल-टर्पण, गुलाव ।
कपोल का तिल-सुघामर में नील कमल, चन्द्र पर सिधु-
पद कमल में अलि दर्पण पर मोरचा।
शीतला के दाग -प्टि गड जाने के चिन्ह ।
दात-मोती, मरिण, कुन्दकली, अनार के दाने, हीरा ।
नासिका-तोता, तिल प्रमून, किशुक ।
अवर-विम्याफल, मूंगा, लाल फूल ।
रसना-पटम की कसौटी।
मुसवाम-चन्दन, चमेली, यकुल, कमल की सुगध ।
हास्य-कौमुदी, बिजली, मुपा, प्रकाश, उपा ।
स्वर-कोकिल, वीणा।
चिनुक-अग्गिली क्ली।
कान-मन के मन्त्री और मित्र, सीप, पुष्प ।
मीवा-पोत, शय, सुराही।
मुजा-मृणाल, कचन की डाल ।

हिन्दी-पद्य-रचना
,
-
कर-कमल ।
कुच-चक्रवोक, कमल, कुम्भ, श्रीफल, अनार, हाथी का
मस्तक, उलटे नगाडे, पर्वत, कामदेव के तम्बू, मुनि, नारंगी,
काग के खिलौने, यौवन-रत्न के सम्पुट ।
पीठ-सोने की पट्टी, सोने के केले का पत्ता ।
रोमावली-~लता।
त्रिवली-नदी तरग।
कटि-मिह की कटि, ब्रह्मा के समान निराकार कटि ।
नितम्ब-चक्र, मदन-सरोवर के पुलिन ।
जघा-हाथो की सैंड, केला ।
चरण--कमल, पल्लव ।
एंडो--विद्रुम, बिम्बा, यधूक, जपा, गुललाला, गुलाव ।
अँगुली-पद-पद्म रूपी निपग में कामदेव के शर।
नस-उडगण, चन्द्रमा, हीरा, मोती, पुष्प ।
अंग-दीप्ति- सोना, केसर, चम्पा, कमल, चपला ।
सम्पूर्ण अग-कनकलता, दीपशिखा, चन्द्रकला ।
महापुरुप-वृपभ, दीप, स्तम्भ, गिरि, गज, सिंह, सागर,
,
अग
पुरुष
के -कन्धा वृषभ के समान, स्वर सिह के
समान, पक्ष शिला के समान ।
दोष
कविता को दोपों से मुक्त रसना बडा आवश्यक है। एक
भी दोष सारे गुणों पर पानी फेर देता है। यहाँ हम सक्षेप से

हिन्दी-पद्य-रचना
२५
-
कुछ दोषों का वर्णन करते हैं। कविता में उनसे सदा वचते
रहने का प्रयत्न करना चाहिये।
१---स्वभाव विरुद्ध कोई बात न कहनी चाहिये । जैसे-
"मुस-मयह अवलोकि के, विकसा मानस कक्ष"
यहाँ मुस रूपी चन्द्रमा को देखकर मनरूपी कमल का
विकसना स्वभाव-विरुद्ध बात है। चन्द्रमा को देखकर कमल
सकुचता है, विकसता नहीं।
अथवा-
"दामिनि सी कामिनि सडी, गजगामिनि सुकुमारि"
इसमें गजगामिनी की मन्दगति और दामिनी की चचलता
परस्पर विरुद्ध गुण हैं। एक ही समय में एक ही पान में दो
विरुद्ध गुणों का होना दोष है।
२--किसी चरण में मात्रामा की या वर्णो की कमी था
अधिकता न होनी चाहिये । जिस छन्द का जो नियम है, उसका
अच्छी तरह पालन होना चाहिये। माना या अक्षरों की
न्यूनता या अधिकता जीभ भट यतला देती है। इसलिये किसी
बन्द को बार-बार पदने से उसकी त्रुटि आप से आप मटकने
लगती है।
३-4 में जो बात कही जाय, उसमे कुछ विशेषता या
चमत्कार अवश्य होना चाहिये। चमकार-हीन कविता देवल
तुफयन्दी है । उससे कुछ लाभ नहीं ।
"कमला थिर न रहीम" फहि , यह जानत सब कोय ।
पुरुष पुरातन की मधू , क्यों न चपला होय ॥
4

२६
हिन्दी-पद्य-रचना
देखिये, इस दोहे में लक्ष्मी की अस्थिरता का वर्णन कर
हुए वृद्ध-विवाह की कैसी दिल्लगी उडाई गई है।
४-पदों में निरर्थक शब्दो की भरती नहीं करनी चाहिये
अपने-अपने स्थान पर शब्द पूरे जोरदार होने चाहिये । सु,
आदि उपसर्गों की भरमार मे कवि के शब्द-कोप की कर्म
मालूम होती है।
५--शब्द कर्ण-कटु न हों।
६- वर्णन मे देशाचार की विरुद्धता न पाई जाय । जैसे-
महाराष्ट्र लियो के लिये यह कहना कि वे घुपट काढकर चल
हैं, बिलकुल असत्य बात है।
७-~जो बात एक वार कही जा चुकी हो, उसी को फि
दुहराना पुनरुक्ति दोप है। इससे बचना चाहिये। जैसे-"
है नभ धन-घटा, गरजन करत पयोद" । अथवा-बायस पालि
अति अनुरागा। होय निरामिप कबहुँ कि कागा ॥ यहाँ ।
और पयोद तथा वारस और काग को एक ही अर्थ दोन
चरणो मे आना दोय है।
८-जैसा समय हो वैसी ही उपमा देनी उचित है। को
पुरुप यदि हाथी पर चढकर विवाह करने जा रहा हो तो उस
समय उनके बल का महत्त्व दिसाने के लिये काल की उपम
स्तिनी अनुचित है । परन्तु युद्ध में उसी पुरुप के लिये कहा ज
साता है कि वह शत्रुओं में फाल के समान विचरण कर रहा है
९--किमी चरण के अन्तिम शब्द के कुछ अक्षर यदि

हिन्दी पटा-रचना
२७
उसके आगे वाले चरण में पढ़े जाय तो यह यति-भग लोप
कहलाता है।
पण
"हर हरि केशव मदन मो, हन धनश्याम सुजान"
इसम “मोहन" का "मो" तो पहले चरण मे ओर "हन"
दूसरे चरण में है। यह दोप है। कविता में यति-भग होने में
कभी कभी अर्थ का अनर्थ हो जाता है।
१० अर्थ विरुद्ध शब्दो का प्रयोग न करना चाहिये।
जैसे-
"रिपु मारो सग्राम में, उठो अहिसक वीर"
यहाँ अहिंसा ओर शत्रु का मारना इन दोनो के अर्थ में
विरुद्धता है। अतएव इन दोनों का सयोग ठीक नहीं ।
११. जो कुछ कहा जाय, यह ऐसा हो कि समझ में प्रा
जाय । किसी अन्य प्रसग में कोई दूमरी बात न घुसेड देनी
चाहिये।
१२~-शब्दो और उनके श्रों के क्रम पर भी ध्यान
रसना चाहिये । जैसे-
मद भरे, श्वेत
श्याम रतनार।
जियत मरत मुकिमुकि परत , जेहि चितपत इस वार॥"
हम दोहे में अमृत विप और मदिग का प और गुण
मम से कहा गया है।
१३-लोक रीति और शास्त्रीय नियमों के विरद्ध यदि कुछ
.
-
.
यमी हलाहल
,

३०
-
"
हिन्दी-पय-रचना
ब्रजभाषा के छदों मे बहुधा दीर्घ को हस्व भी पढना पडता
है। जैसे-"कैमे के आवै कहा करै वीर । विचारे बटोहिन बोप
कहा है"। इसमे पिङ्गल के अनुसार "से" "के" "वै"
"" को ह्रस्व होना चाहिए !
इन सब सुविधाओं के द्वारा ब्रजभापा में यह विशेषत
पाई जाती है कि उसके छोटे-छोटे पदो मे भी बडे-बडे भावो में
ममावेश किया जा सकता है। परन्तु उतने ही भावों के प्रम
करने के लिये सडी बोली के कई पद खर्च करने पड़ते है।
ब्रजभापा मे चाहे जितनी विशेषता हो, परन्तु सडीचोल
की कविता का प्रचार दिन-दूना रात-चोगुना बढ रहा है, व
रुक नहीं सकता। ऐसी दशा मे सडीबोलो की कविता हो व
सरस
और
मुगम
बनाने की चेष्टा करनी चाहिये ।
कविता में भाव अच्छा होना चाहिये । भाव अच्छा हो
भापा की त्रुटि सटकती नहीं। उर्दू कवियों ने अपनी कु
कविता सडीगोली मे की है। यद्यपि उनकी भापा विश
सडीबोली नही कही जा सकती, क्योंकि उसमें अनेक स्था
पर हस्व को दी और दीर्घ को इस्व पढना पडता है, परन
उन्होंने सोज मोज कर ऐसे भाव भरे हे कि पढते समय उनक
भापा की त्रुटियो पर ध्यान ही नहीं जाता। प्राजकल =
हिन्दी कविता मे मरस और मनोहर भागो की तो बहुत
कमी होती है। ऐमी दशा में भापा भी विशुद्ध न हो,
पढनेवालो का मनोरञ्जन किस प्रकार में होगा। भाव

हिन्दी-पद्य रचना
तम हो और भाषा भी विशुद्ध हो, तभी कविता का गौरव
। यह गुरए सस्कृत-कविता ही में देखने में आता है । समव
उन्नति होते होते पडीवाली की कविता को भी यही यश
प्त हो जाय ।
रस, गुण, छन्द
रस का साधारण अर्थ है स्वाद । पाठक या श्रोता के हृदय
वामना रूप से स्थित हर्ष, शोक, भय, विस्मय, हास आदि
घि कवि की चमत्कार-युक्त वाणी से जागृत होते हैं, तब उमे
क अपूर्व आनन्द का अनुभव होने लगता है। वह यानन्द
इसा अदभुत होता है कि मन उस समय उसी में लीन हो
आता है । जैसे, योगी ब्रह्मानद-सुवा के पान मे मस्त हो जाता
और अन्य विषय-व्यापार भूल जाता है। वैसा ही अानन्द
व्य मे सहढय मनुष्य के हृदय में उत्पन्न होता है। उसी
अलौकिक आनन्द को रम कहते हैं। जन विभाष, अनुभाव
और मचारी मात्र में स्थायी भार व्यक्त होता है तब रस की
उत्पत्ति होती है।
जिससे भावना स्पष्ट हो, वह विभाव कहलाता है। विभाव
दो प्रकार का होता है, पालम्वन और उद्दीपन | जिसके श्रालय
से रस की स्थिति हो, उसे आलम्बन और जिससे रस का
उद्दीपन होता है, उसे उद्दीपन विभाग कहते हैं। जिन चिह्नों के
द्वारा रम का अनुभव होता है, उन्हें अनुमार कहते हैं
अनुमाव भाव का कार्यरूप है । हाम्य, मधुर सम्भापण और
-

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हिन्दी-पद्य-रचना
३३
Tोजगुण कहा जाता है। और जो शब्द-योजना और
मास मनोहर हो और सुनते ही जिनका अर्थ समझ में आ
य, उनमे प्रसाद गुण कहा जाता है।
। काव्य को भापा सदा अर्थ का अनुसरण करती हुई होनी
दाहिए । शृङ्गार, करुण, हास्य और शातरस के वर्णन में
धुर्य गुण-युक्त भाषा का और अद्भुत, वीर, रौद्र, भयानक
र वीभत्स रस मे ओजगुण-युक्त भाषा का प्रयोग करना
हिये । चन्द और भूपण की कविता में रोजगुण की अच्छी
हार देखने को मिल सकती है। प्रसाद की आवश्यकता तो
व रसों में रहती है । प्रसाद-गुण से रहित काव्य को तो काव्य
इना ही न चाहिये।
काव्य को माधुर्य देखना हो तो जयदेव-रचित गीतगोविन्द
देसिए---
उन्मदमदनमनोरथ पथिकवधूजनजनितविलापे ।
अलिकुनसकुलकुमुमसमूहनिराकुलवकुलकलापे ।
कितनी मधुर शब्द-योजना है | कितना सरस प्रवाह है।
हिन्दी कविता में भी माधुर्य-गुण खूब है। देखिये-
कंकन किकिनि नूपुर धुनि सुनि ।
कहत लसन सन राम हृदय गुनि ॥
कबहुँक हौं इहि रहनि रहोगी।
परहित निरत निरवर मन क्रम बचन नेम निवहौंगो।।
३

३४
हिन्दी-पद्य-रचना
परुप बचन अति दुसह स्रवन सुनि नेहि पावक न दहौर
विगत मान सम सीतल मन परगुन अवगुन न कहाँ
परिहरि देह-जनित चिता दुस सुस समवुद्धि सहौंग
तुलसिदाम प्रभु इहि पथ रहि अविचल हरिभक्ति लहौंग
यह तो गुणो की बात हुई। काव्य में दोप का भी वि.
बहुत अावश्यक है। शब्द-दोप, अर्थ-दोप, रस-दोप, आदि
प्रकार के दोप हैं । श्रुति-कटुत्व, अश्लीलता, ग्राम्यता, अप्रसि
सदिग्धता, लिष्टता, पुनरुक्ति, छन्दाभग, यतिभग आदि दोप
बचना चाहिए।
रस के सहायक छन्द भी है। मदाक्रान्ता, दुतविलनि
शिसरिणी और मालिनी छन्द मे शृगार, शान्त और
रस अधिक मनोहर होजाते हैं । भुजगप्रयात, वशस्थ
शार्दूलविक्रीडित में वीर, रौद्र और भयानक रस f
प्रभावोत्पादक होजाते हैं। हिन्दो-छन्दों मे सवैया और घर
शृङ्गार, करुण और शान्त रस, छप्पै मे वीर, रौद्र और भय
रस, घनाक्षरी, दोहा, चौपाई और मोरठा में प्राय सर्भ
उद्दीप्त होते हैं। सवैया और वरव मे वीररस का काव्य :
हो जायगा । काव्य मे विरोधी और सहायक रसो का भी
रखना चाहिए। वीर या रौद्ररस के वर्णन मे शृङ्गार,
और करुण रस की उपस्थिति से रस की सिद्धि ना
सक्ती । हास्यरस से शृङ्गार रस वृद्वि पाता है। पर वी
भयानक और करुण रस से उसकी सिद्धि मे धावा पढे
है। हास्यरस करुणरस का घातक है । कति ही नहीं, अच्छे
,

हिन्दी-पद्य-रचना भी रसों के शत्रुओं और मित्रों की जानकारी से अपने विषय को बहुत प्रभावोत्पादक बना लेते हैं। आगे यह विपय अधिक स्पष्ट कर दिया जाता है- रस के मित्र रम के शनु गार हास्य, अद्भुत । करुण, वीभत्स, रौद्र, वीर, भयानक । शृगार, अद्भुत । भयानक, करुण, . १ वीर। रौद्र। ३ ६ 1 अद्भुत भयानका शात करुण। वीर, शृङ्गार, रौद्र, हास्य, भयानका रौद्र भयानक। हास्य,शृङ्गार, अद्भुत । वीर शान्त, शृङ्गार। करुण शात हास्य, गार। भयानक अदभुन,रौद्र,वीर । शृङ्गार, हास्य, शात । वीमत्स (कविता-कौमुदी से) अलङ्कार काव्य में अलकार की भी प्रावश्यक्ता है। केशवदामने ८ ९ -- . - -- *- -- भूपन ' विना न मोहई , कविता, वनिता, मित्र । गुण और अलकार में भेद है। गुण रस के विना नहीं रहते, पर अलकार रम के पिना भी रह सकते हैं। अलकार

हिन्दी-पदा-रचना
रस के सहायक होते हैं। शब्द और अर्थ में उत्कर्ष प्रद
फरके वे रस की वृद्धि करते हैं। पर जहाँ रस नहीं, वहाँ के
अलकार भी उक्ति मे वैचिच उत्पन्न कर देते हैं।
गग और पद्य में जहाँ विशिष्ट शब्दों के प्रयोग से श
और अर्थ मे कोई चमत्कार उत्पन्न होता है, उसे अलकार का
हैं। अलंकार सचमुच कविता के अलकार (भूपण) हैं। यद्य
अलंकार के बिना भी रस और गुण की सहायता से कवि
प्रभावोत्पादक हो सकती है, पर रम के साथ अलकार भो ।
तो कविता की आकर्पण-शक्ति बहुत अधिक होजाती है।
अलङ्कार के मुख्यत तीन भेद माने गये हैं-शब्दालङ्का
अर्थालङ्कार, और उभयालट्कार । इन तीनों के बहुत से उपर
हैं, जिनको सख्या मौ से भी अधिक है । हिन्दी में अलङ्कारों
परम्परा सस्कृत-साहित्य से चलती है । इसलिये इनके नाम
वही हैं, जो सस्कृत में हैं।
सव अलकारों की जानकारी के लिये अलङ्कार का के
बडा ग्रन्थ देखना चाहिये । फिर भी यहाँ थोडे मे बहुत प्रसि
अलङ्कारो का साधारण परिचय दे दिया जाता है। इनके ज्ञा
से पद्यो में बहुत कुछ सरसता लाई जा सकती है।
शब्दालङ्कार
शब्दालङ्कार के मुख्य भेद ये हैं अनुप्रास, यमक, पुनरुत्त
वदाभास, श्लेप, चित्र, प्रहेलिका इत्यादि । इनमे से हरएक व
'उदाहरण आगे दिये जाते हैं-
--

हिन्दी-पद्य-रचना
अनुप्रास-भिन्न-भिन्न पदो मे जहाँ एक ही प्रकार के स्तर
गाले अक्षर या पद बार-बार आयें, वहाँ अनुप्रास कहलाता
-
--
-
,
.
.
-
कफन किंकिन नूपुर धुनि सुनि ।
कहत लसन सन राम हृदय गुनि ।।
इसमें नकार बार-बार आया है । इसलिये यह बहुत
श्रुति-मधुर होगया है। और धुनि, सुनि, गुनि और ककन,
लसन, मन में भी स्वर और अक्षर में समानता पाई जाती
है। यह अनुप्रास है। अनुप्रास को तुक भी कहते हैं।
यमक-जहाँ एक ही शब्द बार-बार आने, परन्तु अर्थ
भिन्न भिन्न हों, वहाँ यमक कहलाता है। जैसे-
सुमन में न सुगन्ध समायगी,
पवन में वन में भर जायगी।
इसमे 'पवन में और 'वन में यमक है।
या
वर जीते मरमन,के,
ऐसे देखे मैं न ।
हरिनी के नैनान ते,
हरिनो के ये नैन ।
इसमें 'मैन' और 'हरिनी के में यमक है।
पुनरुक्तवटाभासदेखने में जहाँ एक ही श्रर्यवाले, पर
वास्तव में भिन्न अर्थवाले पट वा शब्द बार-बार पायें, यहाँ
पुनरुकवदामाम-अलङ्कार होता है । जैमे--

३८
हिन्दी-पद्य-रचना
-
भव भव विभव पगभव कारिनि ।
विस्व विमोहनि स्वबस बिहारिनि ।।
इसमें 'भव' शब्द के दो अर्थ हैं, पर देखने में एक
शब्द बार-बार आया हुआ जान पडता है । इससे
पुनरुक्तवदाभास-अलङ्कार कहा जायगा ।
श्लेप-जहाँ एक शब्द, पद या पद-समूह के कई
निकलते हो, वहाँ श्लेष-अलङ्कार होता है । जैसे-
बल प्रताप वोरता बडाई ।
नाक पिनाकहि सग सिधाई ।।
यहाँ नाक के दो अथ हैं-नाक और लज्जा ।
या
घहुरि सक सम बिनवउँ तेही ।
सतत सुरानीक प्रिय जेही ।।
इसमे सुरानीक शब्द मे श्लेप है--सुर+अनीक:
की सेना और सुरा+नीक सुरा जिसको अच्छी ल.
'या
दई दई क्यों करत है,
ढई दई सु कबूल ।
इसमें 'दई दई मे श्लेप है। 'दई दई'
और दई का अर्थ दैव (ईश्वर) तथा 'दिया' भी
चित्र
जहाँ पदों में ऐसे समान स्वर वाले
,

३९ हिन्दी पद्य रचना की योजना की जाय कि उनसे अनेक चित्र और मनोरजक कवितायें बन जायँ, वहाँ चित्रालङ्कार कहलाता है। चित्रालङ्कार कई प्रकार के होते हैं। जैसे-कमलबन्ध, धनुषबन्ध, चामरवन्ध, सर्वतोभद्रगति, कामधेनु, अन्तर्जापिका, बहिर्लापिका, दृष्टिकूटक, एकाक्षर, निरोष्ठ इत्यादि । एक उदाहरण श्रान मान लिन मान जिन , ठान मान अनजान । मीन हीन बन दीन तन , छोन प्रान मन जान ।। a आ मा वि मा जि ठा श्र जा न न न 14 न मी ही दी त छी जा - इस दोहे से कमलवध आदि कई चित्र बन सकते हैं। प्रहेलिका ( पहेली) वीसों का सिर काट लिया। ना मारा ना सून किया। इसमें प्रहेलिका और अन्तलापिका दोनों का रूप 'नासून' प्रकट है। इसी प्रकार एकाक्षर छट में एक ही अक्षर आदि से सक रहता है । सस्कृत काव्यों में इसके बहुत से ७. हैं पर हिन्दी में देशवदास की कविप्रिया में भी हैं। में - -- । हिन्दी-पद्य रचना निरोष्ट में ऐसे शब्दों का व्यवहार किया जाता है, जिसमे पवर्ग नही आता । अर्थात् जिमं पढते समय ओंठ आपस में नहीं मिलते । जैसे- चचल सजन झसन से, दोह जलज-दल ऐन । अनिवारे यसरीर के, तीर तिहारे नैन । इस प्रकार शब्दानुप्रास से कविता मे तरह-तरह के चमत्कार दिसाये जा सकते हैं। उनसे श्रोताओं का मनोरजन तो होता ही है, फवि के शब्द-भाडार का महत्व भी प्रकट होता है। अर्थालंकार जिसके द्वारा अर्थ में चमत्कार आता है उसे अर्थालकार कहते हैं। इसके सैकडो भेद हैं, जिनमें से मुख्य ये है- उपमा, रूपक, अनन्वय, उपमेयोपमा, प्रतीप, परिणाम, उल्लेस, स्मरण, भ्रान्ति, सन्देह, अपन्हुति, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, तुल्ययोगिता, दीपक, दृष्टात, प्रतिवस्तूपमा, निदर्शना, व्यतिरेक, सहोक्ति, विनोक्ति, परिकर, अर्थश्लेप, अप्रस्तुतप्रशसा, पर्यायोक्ति, व्याजस्तुति, आक्षेप, विरोध, विभावना, विशेपोक्ति, असभव, असगत, विपम, सम, विचित्र, अधिक, अल्प, विशेप, व्याघात, कारणमाला, एकावली, सार, यथासख्य, पर्याय, परिवृत्ति, परि- सरया, विकल्प, समुच्चय, समाधि, प्रत्यनीक, काव्यार्थापत्ति, काव्यलिंग, अर्थान्तर यास, विकस्वर, प्रौढोक्ति, सभावना, मिथ्याध्यवसित, ललित, प्रहपण, विपादन, उल्लास, अवज्ञा, , - , , , .

हिन्दी-पद्य रचना
४१
अनुज्ञा, तिरस्कार, लेश, मुद्रा, रनावली, तद्गुण, पूर्वरूप,
अतद्गुण, अनुगुण, मीलित, सामान्य, उन्मीलित, विशेषक,
उत्तर, सूक्ष्म, पिहित, व्याजोक्ति, गूढोक्ति, युक्ति, लोकोक्ति,
चक्रोक्ति, स्वभावोक्ति, भाविक, उदात्त, अत्युक्ति, निरुक्ति, प्रति-
शोध, विधि, हेतु, प्रमाण इत्यादि ।
स्थानाभाव से उपर्युक्त सभी अलकारो के लक्षणं और
उदाहरण यहाँ नहीं दिये जा सकते और न यह इस पुस्तक
का प्रधान विषय ही है। केवल थोडे से अलकारों के लक्षण
और उदाहरण यहाँ दे दिये जाते हैं जो आसानी से समझ में
आ जाते हैं और कविता में जिनका प्रयोग भी साधारणत.
अधिक होता रहता है।
उपमा
.
दो वस्तुओ में जहाँ श्राकृति, गुण और दशा में समानता
पाई जाती है वहाँ उपमालकार होता है। इसको सष्ट करने के
लिये तुल्य, समान, सम, सदृश, यथा, ज्यों, इव, सी, से,
सों, लों आदि समानार्थवाची शब्द आते हैं। जैसे-
साधु चरित सुभ सरिस कपासू ।
निरस विसद गुनमय फल जासू॥
सल सन इव पर बन्धन करई।
खाल बढाइ विपति सहि मरई ।।
इसमे पहली चौपाई में सन्त की उपमा कपास से दी गई
है । दूमरी चौपाई मे सल की उपमा सन से दी गई है। दोनों
में सरिस और इव शब्द उपमा-बोधक पाये हैं।
--

४२ हिन्दी पय-रचना । उपमा के पूर्णोपमा, लुप्तोपमा, मालोपमा, लक्ष्योपमा, ललितोपमा, रसनोपमा, समुञ्चयोपमा, उपमेयोपमा आदि कई . " पूर्णोपमा जिसमे उपमेय, उपमान, उपमा-वाचक शब्द और गुण ये चारों अग स्पष्ट हों, उसे पूर्णोपमा कहते हैं। जैसे- फूलि उठे कमल से अमल हितू के नैन, कहै रघुनाथ भरे वैन रस सियरे। दौरि आये भौर से गुनीजन करत गान, सिद्व से सुजान सुससागर मों नियरे । सुरभी-सी खुलन सुकवि को सुमति लागी, चिरिया-सी जागी चिन्ता जनक के जियरे। घनुप पै ठाढे राम रवि से लसत् आज, भोर के से नसत नरिन्द भये पियरे ।। इसमे नैन, राम, गुनीजन आदि उपमेय, कमल, रवि, भौंर आदि उपमान, फुलि उठे, लसत और दौरि श्राये साधारण धर्म, से, मे, से उपमा वाचक शब्द हैं । अतएव यह पूपमा है। लुमोपमा उपमा के चारो श्रगो मे से जहां एक वा दो या तीन अंग लुम हों, वहाँ लुप्रोपमा अलकार कहलाता है । इसके पाठ अग हैं। जैसे-वर्मलुमा, वाचक लुमा, उपमान लुप्ता, धर्मवाचक लुमा, वाचकापमेय लुमा, धर्मोपमेय वाचको - - , , तुप्ता, +

हिन्दी-पद्य-रचना
-
पमान लुप्रा और धर्मापमानवाचक लुमा । यहाँ केवल एक का
उदाहरण दिया जाता है-
यदपि सरित ससार मे,
परिमान।
पतितन पाथोधि कह,
मुरसरि सरिस न धान ॥
इममे सुरमरि उपमेय और सरिस वाचक तो है, पर दूसरे
नदी-नद उपमान और उद्वारकर्ता अादि धर्म का लोप है।
मालोपमा
जहाँ एक उपमेय के बहुत से उपमान हो, वहाँ मालोपमालकार
होता है। इसक दो भेद हैं-भिन्नधर्मा, अभिन्नधर्मा। यहाँ
दोनों के उदाहरण दिये जाते हैं-
भिन्नधी
वैनतेय बलि जिमि वह कागू।
जिमि शश चहै नाग अरि भागू ॥
जिमि चह कुसल अकारन कोही ।
सुर सम्पदा चहै सिव-द्रोही ।।
हरिपट विमुस परमगति चाहा ।
तिमि तुम्हार लालच नर नाहा ।।
इसमें कई असभव बातों से लालच की तुलना की गई है।
श्रभिन्नधी
कीरति निहारी राम कहा कहै हनुमान,
दसो दिसि दिव्य दीह दीपति अकेली सी।

हिन्दी-पद्य-रचना
भोडर सी भूपन सी भानु सी भगीरथी सी,
भारती सी भव सी भवा सी मुज वेली सी।
कुद सी कविन्द सी कुमुद सी कपूरिका सी,
कजन की कलिका कलपतरु केली सी।
चपला सी चक्र सी चमर सी औ चन्दन सी,
चन्द्रमा सी चॉदनी सी चाँदी सी चमेली सो॥
हनुमान
यहाँ राम की कीर्ति की तुलना कई सफेद रंग की
वस्तुओ से की गई है।
ललितोपमा
जहाँ उपमेय और उपमान को स्पष्ट करने के लिये 'चुराता
है, निन्दा करता है, हँसता है, होड करता है तथा शत्रु,
आदि शब्द आते हैं, वहाँ ललितोपमा अलकार होता है ।
जैसे-
करि की चुराई चाल सिह की चुराई लक,
ससि को चुरायो मुस नासा चोरी कीर की ।
पिक के चुराये बैन मृग के चुराये नैन,
दसन अनार हाँसी बीजरी गंभीर की।
कहैं कवि घेनी बेनी व्याल की चुराई लीन्हौं,
रती रती शोभा सव रति के सरीर को।
अव तो कन्हैयाजू को चित हू चुराइ लोन्हौं,
चोरटी है, गोरटी वा छोरटी अहोर की।
सुहृद्,
बेनी
-

हिन्दी-पद्य-रचना
-
उल्लेस
एक हो वस्तु को जहाँ भिन्न भिन्न लोग अनेक प्रकार से
देसे वहाँ उरलेसालकार होता है। जैसे-
जनक जाति अवलोकहिं कैसे।
सजन सगे प्रिय लागहिं जैसे ॥
सहित विदेह विलोकहिं रानी ।
मिमु सम प्रीति न जाइ वसानी॥
तुलसीदास
उत्प्रेक्षा
जहाँ दूसरी वस्तु मे किसी अन्य वस्तु की सभावना की
करपना की जाय, वहाँ उत्प्रेक्षालदार होता है। इसके वाचक
शब्द मानो, जानो, मेरे, जान, जनु, मनु आदि हैं।
इसके मुख्य तीन भेद हैं-वस्तूत्प्रेक्षा, हेतूत्प्रेक्षा, फलोत्प्रेक्षा।
उदाहरणा-
लता भवन ते प्रगट भै,
तेहि अवसर दोउ भाइ।
निकसे जनु जुग विमल विधु,
जलद पटल विलगाइ॥ तुलसीदाम
इसमें दोनों भाइयों और लता-भवन के लिये दो चन्द्रमा
- 'जलद-पटल' की सभावना की कल्पना की गई है। 'जनु'
-
A
अतिशयोक्ति
को अत्यन्त प्रशसा के लिये कोई बात

.
है
हिन्दी-पद्य-रचना
यहाँ सिंह के चार धर्मों से उपमेय की समता की गई है।
अनन्वय
जहाँ एक ही वस्तु उपमान और उपमेय दोनों का काम रे,
वहाँ अनन्वयालङ्कार होता है। जैसे-
राम के समान राम ही हैं।
प्रतीप
जहाँ उपमान का वर्णन उपमेय के समान किया जाता
वहाँ प्रतीप अलङ्कार होता है। जैसे-
पाहन जिय जनि गर्व करि,
हो ही कठिन अपार ।
चित दुर्जन के देखिये,
तोसे लास हजार
॥
प्रतीप के पाँच भेद हैं।
रूपक
जहाँ उपमेय और उपमान में कुछ भेद न वर्णन, किर
जाय, वहाँ रूपकालङ्कार होता है । जैसे-
नव विधु विमल तात जस तोरा ।
रघुवर किंकर कुमुद चकोरा ।। तुलसीदास
रूपक के दो भेद हैं-अभेद और तद्रूप ।
परिणाम
जहाँ उपमान ही उपमेय हो, वही परिणाम अलंकार हो
है। जैसे-
हैं ब्रजचद पै तेरो चकोर हैं
अलङ्कार-प्रकार

४७ हिन्दी-पद्य-रचना उल्लेस एक ही वस्तु को जहाँ भिन्न-भिन्न लोग अनेक प्रकार से देखें वहाँ उल्लेग्पालकार होता है। जैसे---- जनक जाति अवलोकहिं कैसे। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसे ।। सहित विदेह विलोकहिं रानी । सिमु सम प्रीति न जाइ बसानी ।। तुलसीदास उत्प्रेक्षा - जहाँ दूसरी वस्तु में किसी अन्य वस्तु की संभावना को कल्पना की जाय, वहाँ उत्प्रेक्षालक्कार होता है। इसके वाचक शब्द मानो, जानो, मेरे, जान, जनु, मनु आदि हैं। इसके मुरय तीन भेद है-यस्तूत्प्रेक्षा, हेतृत्प्रेक्षा, फलोत्प्रेक्षा। उदाहरण- लता भवन ते प्रगट भै, तेहि अवसर दोउ माइ। निकसे जनु जुग विमल विधु, जलद पटल विलगाइ। तुलसीदास इसमें दोनों भाइयों और लता-भवन के लिये दो चन्द्रमा और 'जलल पटल' की सभावना की कल्पना की गई है । 'जनु' उत्प्रेक्षामोधक है। अतिशयोक्ति जहां किसी वस्तु को अत्यन्त प्रशमा के लिये कोई बात

४८
हिन्दी-पदा-रचना
लोक-सीमा का उल्लघन करके कही जाय, वहाँ अतिशयोक्ति
अलङ्कार होता है। जैसे-
अब जीवन के हे कपि आस न कोय ।
कनगुरिया के मुंदरी कगन होय !!
तुलसीदास
इसमे कलाई की ऐसी दुर्बलता बताई गई है कि उसमें
कनिष्ठिका अँगुली की अंगूठी कंगन की तरह पहनी जा सकती
है। यह अतिशयोक्ति है।
तथा
क्या नजाकत है कि आरिज़ उनके नाले पड गये।
मैंने तो वोसा लिया था ख्वाब में तसवीर का ॥
इसमे ऐसी सुकुमारता का वर्णन है, जिस पर स्वप्न में
किसी प्रेमी के चित्र के ओंठ का चु बन करने से आघात पहुँच
सकता है।
इसके रूपकातिशयोक्ति, भेदकातिशयोक्ति, अक्रमातिशयोक्ति,
चञ्चलातिशयोक्ति, अत्यताविशयोक्ति आदि फई भेद हैं।
विरोधाभासालकार
जहाँ विरोध न होने पर विरोध दिसाई दे, वहाँ विरोवा-
भासालङ्कार होता है । जैसे-
श्रोसरजा शिव तो जस सेत सों,
होत हैं चैरिन के मुँह कारे।
अरुन्न प्रताप,
सफेद लसे
भूपन ते वे
नप सारे

४
९
हिन्दी-पद्य-रचना
साहि तनै तव कोप कृशानु ते,
वैरि गरे सब पानिप वारे ।
एक, अचभव होत बडो,
तिन ओंठ गहे नृप जात नजारे।।
इसमें सफेद से काला होना, लाल से सफेद होना, अग्नि से
शनिपवालों का गलना और श्रोठों पर तृण लेने पर भी न
बलना आदि विरोधी बातें हैं, पर वास्तव में विरोध नहीं है।
यथासंरय
जहाँ वस्तुओं का वर्णन क्रम से किया जाय, वहाँ यथा-
सरयालकार होता है । जैसे-
अमिय हलाहल मद भरे,
सत
रतनार।
जियत मरत मुकि कि परत,
जेहि चितवत इक बार।
इसमें अमृत, पिप और मदिग के रंगों और उनके गुणों
का क्रमश वर्णन है।
लोकोक्ति
लोक में जो कहावते प्रचलित हैं, उसका नाम लोकोक्ति है।
स्याम
.
,
दुस सुग्न सब कहँ होत है,
पौरुप तजहु न मीत ।
'मन के हारे हार है,
मन के जीते जीत।'
४

५०
हिन्दी-पद्य-रचना
T
और न
दृष्टात
जहाँ उपमेय और उपमा दोनों वाक्यों का अर्थ विम्द,
प्रतिबिम्ब भाव से कहा जाता है, वहां बटात अलकार होता है।
जैसे-
सिव औरंगहि जिति सके,
राव ।
हत्थि मत्थ पै सिंह विन,
न न घालै
घाव ॥
वक्रोक्ति
जहाँ कहने का ढग कुछ और हो और अर्थ उसका कुछ
और हो, वहाँ वक्रोक्ति अलकार होता है । जैसे-
मैं
सुकुमार नाथ बन जोगू ।
तुमहिं उचित तप मो कह भोगू।।
इसमें एक तरह का ताना है, इसे वक्रोक्ति कहते हैं ।
व्याज-स्तुति
जहाँ निन्दा के शब्दो में स्तुति और स्तुति के शब्दों मे निन्द
प्रकट हो, वहाँ व्याज-स्तुति अलकार होता है । जैसे--
एक दिये जहँ कोटिक होत हैं सो कुरुसेत में
तीरथराज प्रयाग पडे मन वाछित के फल पाइ अघाइय
श्री मथुरा घसि केशवदासजू द्वै भुजते भुज चार है जाइय
कासीपुरी की कुरीति दुरी जहँ देह दिये पुनि देह न पाइय
।
जाइ अन्हाइय
केशवदाय

हिन्दी-पद्य-रचना
यहाँ 'काशी की कुरीति' कहकर निन्दा के शब्दो में मोक्ष
की बात बताकर स्तुति की गई है।
विभावना
जहां किसी हेतु के बिना ही कार्य होने का वर्णन हो, वहाँ
विभावना अलकार होता है। जैसे-
सहितनै सिवराज को , सहज टेव यह ऐन ।
अनरीमे दारिद हरै, अनसीमे अरि सैन ।
यहाँ रीझने और सीमने के बिना ही दरिद्रता और शत्रु
सेन्य के नाश को पात कही गई है।
अर्थान्तरन्यास
कहे गये एक अर्थ के साथ जहाँ दूसरे प्रकार के अर्थ का
लाय माना जाय, वहाँ अर्थान्तरन्याम अलकार होता है। जैसे-
बिना चतुरङ्ग सड़
बाँधि बारिधि को लक रघुनन्दन जराई है।
पारथ अकेले द्रोन भीपम से लास भट
जीति लीन्ही नगरी विराट में घडाई है।
भूपन भनत है गुसुलखाने मे खुमान
अपरङ्ग साहियी हथ्याय हरि लाई है।
तो कहा अचंभो महाराज शिवराज सदा
वीरन के हिम्मतै हध्यार होत आई है।
।
जानरन लैके

हिन्दी पद्य-रचना
7
और न
"
दृष्टात
जहाँ उपमेय और उपमा दोनो वाक्यो का अर्थ विश्व
प्रतिविम्य भाव से कहा जाता है, वहां दृष्टात अलकार होता है।
जैसे-
सिव औरंगहि जिति सके,
राजा
राव ।'
हत्थि मत्थ पै सिंह बिन,
आन न घालै
घाव ॥
वक्रोक्ति
जहाँ कहने का ढग कुछ और हो और अर्थ उसका कुछ
और हो, वहाँ वक्रोक्ति अलकार होता है। जैसे-
मैं
सुकुमार नाथ बन जोगू ।
तुमहिं उचित तप मो कहें भोगू ॥
इसमें एक तरह का ताना है, इसे वक्रोक्ति कहते हैं ।
व्याज-स्तुति
जहाँ निन्दा के शब्दों में सुति और स्तुति के शब्दों में निन
प्रकट हो, वहाँ व्याज-स्तुति अलकार होता है । जैसे-
एक दिये जहँ कोटिफ होत हैं सो कुरुखेत में जाइ अन्हाइय
तीरथराज प्रयाग बडे मन वाछित के फल पाइ अघाइय
श्री मथुरा पसि केशवदासजू द्वै भुजते भुज चार है जाइय
कासीपुरी की कुरीति बुरी जहँ देह दिये पुनि देह न पाइय
केशवदा
-

हिन्दी-पद्य-रचना
,
2
यहाँ 'काशी की कुरीति' कहकर निन्दा के शब्दों में मोन
की बात बताकर स्तुति की गई है।
विभावना
जहाँ किसी हेतु के बिना ही कार्य होने का वर्णन हो, वहाँ
विभावना अलकार होता है। जैसे-
सहित सिवराज को , सहज टेव यह ऐन ।
अनरीझे दारिद हरै, अनसीमे अरि सैन ।।
यहाँ रीझने और सीझने के बिना ही दरिद्रता और शत्रु-
सेन्य के नाश को बात कही गई है।
अर्थान्तरन्यास
कहे गये एक अर्थ के साथ जहाँ दुसरे प्रकार के अर्थ का
लन र माना जाय, वहाँ अर्थान्तरन्यास अलकार होता है। जैसे-
सङ्ग
बाँधि बारिधि को लक रघुनन्दन जराई है।
पारथ अकेले द्रोन भीषम से लास भट
जीति लीन्हीं नगरी बिराद में बड़ाई है।
भूपन भनत है गुसुलगाने मे खुमान
अवरङ्ग साहिबी हव्याय हरि लाई है
तो कहा अचंभो महाराज शिवराज सदा
बीरन के हिम्मत हध्यार होत आई है।
बिना चतुरङ्ग
बानरन लेके
भूषण

हिन्दी-पय-रचना
*
-
।
उभयालङ्कार
जहाँ शब्दालझार और अर्थालद्वार मिले रहते हैं, वहाँ
उभयालझार होता है । इसके तो भेट हैं- ससृष्टि और संकर ।
ससृष्टि
'तिल-तंडुल-न्याय' से तिल और चावल की तरह कई
अलकार मिले हों, पर भिन्न भिन्न भान होते हों, वहाँ सष्टि
अलकार होता है। जैसे
समर मरन, पुनि सुरसरि तीग ।
राम काज छन भगु सरीरा ।।
भरत भाइ नृप में जन नीचू ।
बडे भाग अस 'पाइय मीचू ॥
इसमें 'रकार' की अधिकता से वृत्यानुप्रास है। समर में
मरना धर्म, युद्ध के लिये यह एक भाव पर्याप्त होने पर भी
सुरसरि का किनारा, और रामकाज श्यादि कई कारण मिलकर
भाव को और प्रभावित कर रहे हैं, इसलिये यह समाधि है।
रामकाज के लिये मृत्यु की चाहना अनुज्ञा है। इसी प्रकार कई
अलकार अलग-अलग लक्षित होने पर भी एक में मिल गये हैं,
इससे यह ससृष्टि अलंकार है।
or
.
सकर
'नीर-क्षीर-न्याय' से दूध और पानी की तरह जहाँ कई
अलङ्कार मिलकर एकाकार हो जाते हैं, वहाँ सङ्कर अलङ्कार
होता है। जैसे-
-

हिन्दी-पद्य-रचना
1
श्री वृन्दावन वसि; वटै , उर अनन्य अनुराग ।
करिय कृपा मोपर मिले , प्रभु पद पदम परोग !!
इसमें 'पद' का यमक, तथा अर्थालङ्कार और वृत्ति अनुप्रास'
आदि एक में मिल गये हैं !
अलङ्कार के और भी कई भेद हैं । भोपा जैसे-जैसे परिमा
र्जित होती जाती है वैसे वैसे अलङ्कारों की संख्या घटती-बढती
रहती है और रूप भी बदलते रहते हैं ।
नौसिख पद्य-रचयिताओं के लिये कुछ सम्मतियाँ
कविता करना बहुत कठिन काम है। कवि को तर्फ,व्याकरण,
राजनीति, आत्मज्ञान, वैद्यक, ज्योतिष, वेद, इतिहास आदि लौकिक,
पारलौकिक मय विषयों का ज्ञान सम्पादन करना चाहिये । कवियों
को पद-पद पर इनसे काम पडता है। इनसे परिचय न रसने से
कवि होना असाध्य है। किसी किसी मे कविता-शक्ति स्वाभाविक
होती है। ऐसे उन थोडे ही अभ्यास से अच्छे कवि हो मकने
हैं। जिनमे कवित्व-शक्ति वीज-रूप से नहीं रहती, उनके फरि
बनने में परे परिश्रम की आवश्यकता होती है। यहाँ पर कुछ
माधनों फा, जिनके जान लेने से कविता पनाने में बहुत
सहायता मिल सकती है, उल्लेख किया जाता है।
कवि बनने की इच्छा रमोवाले पुरुषों को किसी अच्छे
साहित्य मावा कवि से, जो मरस हदय, व्याकरण जाननेवाला
तथा इन्द्रोप्रथों का पूर्ण पारगामी हो, काव्य-शास्त्र का अध्ययन
फरना चाहिये । उनसे 'प्रच्छे अच्छे कवियों को चमत्यारपूर्ण
।
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करे, इतिहास पढे, वीरों का युद्ध देखे, श्मशान और अरण्य में ५४ हिन्दी-पद्य-रचना उक्तियों के विपय में चर्चा करनी चाहिए। प्रत्येक रस के आस्वादन से आनन्दित होना चाहिये। भले बुरे काव्यों के पहचानने की योग्यता प्राप्त करनी चाहिये । इतिहास का अध्ययन करना चाहिये । अभ्यास के लिये महाकवियों की शैली के अनुसार नये पद्य को रचना करनी चाहिये । पुराने कवियों के श्लोकों के पाद, पद, वाक्य आदि की जगह अपने बनाये पाद, पद, वाक्य रसकर अभ्यास बढाना चाहिये । तथा उनकी रचना मे कुछ फेरफार करके कुछ अपना कुछ उनका रसकर नवोन अर्थ के समावेश करने की चेष्टा करनी चाहिये । कुछ कविता-शक्ति प्राप्त होजाने पर कवि को उचित है कि वह काव्य के और अगों का ज्ञान प्राप्त करे, सत्कवियों की संगति करे, समस्यापूर्ति करे, अन्य कवियो की कविताओं का पाठ किया करे, समालोचना की शक्ति उपार्जन करे, दूसरे को कविता के दोष और गुण को ध्यानपूर्वक विचार करे, अच्छे वेश मे रहा करे, नाटको का अभिनय देखा करे, गाना सुनने का शौक रस्से, लोकाचार का ज्ञान प्राप्त करे, चित्रकारों और शिल्पियों के अच्छे-अच्छे चित्रों और शिल्पकार्यों का अवलोकन घूमे, प्रसन्नचित्त रहे तथा पार्तजनो के हर्ष-शोक-पूर्ण वचनो को सुने, प्राकृतिक दृश्य देने, कल्पना-शक्ति को स्फुरित करने का प्रतिक्षण उद्योग करे । मतलब यह कि कविता में जो नवरस है- उनमें प्रत्येक का पूरा, नहीं तो थोडा-बहुत तो अवश्य ही ज्ञान प्राप्त करे । जिससे कविता करते समय जहाँ जिस रस के वर्णन

हिन्दी-पद्य रचना
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आवश्यकता हो, उसे वहाँ सरलता पूर्वक उत्तमता से स्थान
सके । इनके अतिरिक्त कवि के लिये कुछ और भी जानने
ग्य बातें हैं। जैसे प्राणियों के स्वभाव को परीक्षा करना,
भी शोक न करना, सूर्य, चन्द्रमा और तारागण के स्थान
मोर उनकी गति आदि का ज्ञान प्राप्त करना, सब ऋतुओं की
वशेषता और उनका भेद समझना, मभाओं में सम्मलित होना,
देन मे कुछ सो लेना, फिर कुछ रात रहे उठकर कुछ कविता
करना इत्यादि । एक धार लिसी हुई कविता को दो-तीन बार
सशोधन करके उसे परिमार्जित कर लेना चाहिये ।
' सुकवि होने की इच्छा रखने वाले के लिये उचित है कि
वह पराधीनता मे न रहे, अपने उत्कर्ष पर गर्व करने और
पराये उत्कर्प के न सहने की आदत न डाले, दूमरे की श्लाघा
सुनकर प्रसन्नता प्रकट करे और अपनी श्लाघा सुनकर सोच
करे, किसी उपयोगी बात के सीसने में, किसी की शिष्यता
स्वीकार करने में सङ्कोच न करे, सन्तुष्ट और सदाचार से रहे,
अश्लील बात मुँह से न निकाले, गम्भीरता धारण करे, दूसरे
के द्वारा किये गये आक्षेपों को सुनकर क्रोध न करे और न
किसी के सामने दीनता प्रकट करे।
कवि की कोई बात चमत्कार से साली नहीं होनी चाहिये ।
चमत्कार या विलक्षणताहीन कविता से सुननेवाले को कुछ श्रानन्द
प्राप्त नहीं हो सकता। कवि में चमत्कारोत्पादन शक्ति का
अभाव कदापि न होना चाहिये ।
कवि के लिये कविता विषयक गुण-टोपों का ज्ञान प्राप्त
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7 - , हिन्दी-पद्य-रचना फरनी भी अत्यन्त आवश्यक है। विना इसके जाने किसी कति की कविता निर्दिष्ट दोपों से रहित नही हो सकती। कवि के लिए एकान्त स्थान बहुत उपयुक्त है । जहाँ किसा प्रकार का शोरगुल न हो, आसपास कोई ऐसे पदार्थ न हो कि पार-बार ध्यान भग हो जाय, उसी शान्तिमय स्थान में सुख पूर्वक वैठकर कविता लिसनी चाहिये । जिस विषय पर कविता लिग्गनी हो, उसी विपय की कल्पना वार-बार मन में उठानी चाहिये । जो कल्पना को जाय, उसके यौचित्य 'या अनौचित्य पर पूरा ध्यान रसना चाहिये । ऐसा न हो कि स्वभाव-विरुद्ध, लोकाचार विरुद्ध अथवा प्रकरण-विरुद्ध लिस मारा जाय । कवि के पास शब्दो का एक वृहद् भाण्डार होना चाहिये जिससे आन्तरिक भावों के प्रकट करने में किसी प्रकार की बाधा न पडे । जिस कवि के पास नाना प्रकार के शब्दों के प्रचुरता होती है, वह अत्यन्त शीघ्रता और सुगमता विचारों को तत्काल प्रक्ट कर सकेगा। इसलिये शब्दों में बहुजता महोपयोगी है। एक ही अर्थ के द्योतक बहुत से शम्भ को तथा अनेकार्थवाची शब्दों को कठस्थ रखने से बडी मिलती है और उनके उचित प्रयोग से कविता में रोच बढती है। हरएक शब्द के आतरिक भावो को समझना कि इसमें क्या विशेषता है। एक ही अर्थ के द्योतक शब्दो में से जहाँ जिस शब्द की, अधिक पडे और जहाँ जिसके होने से, कविता मे हो वहाँ उसी शब्द को स्थान देने की चेष्टा ५ से अपने . सहायत भावर

५७
हिन्दी पद्य-रचना
रात्पर्य यह कि शब्दों के उपयोग का अच्छा ज्ञान प्राप्त
'रना चाहिये।
अब हम आगे कुछ प्रचलित छन्दों के भेद और उनके
लिखते हैं। इनको ध्यानपूर्वक समझ

हिन्दी-पद्य-रचना
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करना भी अत्यन्त आवश्यक है। विना इसके जाने किसी कवि
की कविता निर्दिष्ट दोपों से रहित नही हो सकती।
कवि के लिए एकान्त स्थान बहुत उपयुक्त है। जहाँ किसी
प्रकार का शोर-गुल न हो, आसपास कोई ऐसे पदार्थ न हो कि
बार-बार ध्यान भङ्ग हो जाय, उसी शान्तिमय स्थान में सुस
पूर्वक बैठकर कविता लिसनी चाहिये । जिस विषय पर कविता
लिखनी हो, उमी विपय की कल्पना वार-बार मन में उठानी
चाहिये । जो कल्पना को जाय, उसके औचित्य या अनौचित्य
पर पूरा ध्यान रखना चाहिये । ऐसा न हो कि स्वभाव-विरुद्ध,
लोकाचार विरुद्ध अथवा प्रकरण विरुद्व लिस मारा जाय।
कवि के पास शब्दों का एक वृहद् भाण्डार होना चाहिये।
जिससे आन्तरिक भावो के प्रकट करने में किसी प्रकार की
वाधा न पडे । जिस कवि के पास नाना प्रकार के शब्दों की
प्रचुरता होती है, वह अत्यन्त शीघ्रता और सुगमता से अपने
विचारो को तत्काल प्रक्ट कर सकेगा। इसलिये शब्दो की
वहुज्ञता महोपयोगी है। एक ही अर्थ के द्योतक बहुत से शब्दों
को तथा अनेकार्थवाची शब्दो को कठस्थ रसने से बडी सहायता
मिलती है और उनके उचित प्रयोग से कविता में रोचकता
चढती है। हरएक शब्द के आतरिक भावो को समझना चाहिये
कि इसमे क्या विशेषता है। एक ही अर्थ के द्योतक बहुत
से
शब्दों में से जहाँ जिस शब्द की अधिक आवश्यकता समझ
पडे और जहा जिसके होने से, कविता मे अनूठापन आ जाता
हो वहाँ उसी शब्द को स्थान देने की चेष्टा करनी चाहिये।

हिन्दी-पद्य-रचना (६) आभीर ग्यारह मात्राश्रो का आभीर छद होता है। अत में नगण +4 उदाहरण- सब का कर उपकार । दुसियों को कर प्यार ॥ है यह राह पवित्र । सुस पाने की मित्र ।। ( ७ ) तोमर वारह मात्राओं का तोमर छन्द होता है। अन्त मे गुरु और लघु होते हैं। उदाहरण- मुस में मधुर उच्चार । कर में सदा उपकार ।। रसते हृदय में प्रीति । है सुजन की यह गति॥ (८) चद्रमणि तेरह मात्राओं का चन्द्रमणि छन्द होता है। अन्त में एक नगण होता है। उदाहरण- कर सद्गति से प्यार अय । छोड़ कपटव्यवहार सय ॥

हिन्दी-पद्य रचना ( ३. ) छवि आठ मात्राओं का छवि छद होता है। अत में जगण होता है। उदाहरण- जीवन-चरित्र । निज रस पवित्र ॥ यह जगत जान । दर्पण समान ॥ ( ४ ) 'हारी नौ मात्राओं का हारी छद होता है। अंत में दो गुरु - उदाहरण- आलस्य त्यागो। श्रम से न भागो॥ यदि कीर्ति चाहो । प्रण को निबाहो । दीपक दश मात्राओं का दीपक छद होता है। अंत मे गुरु लघु होता है। उदाहरण-- वह मनुज है धन्य । पैसा नही अन्य ।। दे देश को दान । जो देह धन प्राण ।।

५९ हिन्दी-पद्य-रचना आभीर ग्यारह मात्राओं का आभीर छद होता है। अत मे नगण होता है। उदाहरण- - सव का कर उपकार । दुसियो को कर प्यार ॥ है यह राह पवित्र । सुस पाने की मित्र । ॥ ( ७ ) तोमर वारह मात्राओं का तोमर छन्द होता है। अन्त में गुरु और लघु होते हैं। उदाहरण- मुस में मधुर उधार । कर में सदा उपकार ।। रसते हृदय में प्रीति । है सुजन की यह गति॥ - चद्रमणि तेरह मात्राओं का चन्द्रमणि छन्द होता है। अन्त नगण होता है। उदाहरण- कर सद्गति से प्यार अय । छोड कपट-व्यवहार सब ॥ ।

हिन्दी-पद्य-रचना निज सुकर्म के अह जप। पर सेवा है परम तप ॥ सखी चौदह मात्राओं का ससी छद होता है। अन्त में चगण होता है। उदाहरण- सब घर घर की ब्रजनारी । दधि गोरस वेचनहारी ॥ मिलि जुत्य सवै मत कीन्हा । जमुना-तट मारग लीन्हा॥ ब्रजवासीदास ( १० ) प्रतिभा चौदह मात्राओं का प्रतिभा छन्द होता है। आदि में लघु होता है । इसका दूना गजल होता है । उदाहरण- चरित है मूल्य जीवन का । वचन प्रतिविम्ब है मन का । मुयश है आयु संज्जन की । सुजनता है प्रभा धन की ।।

हिन्दी-पद्य-रचना ३ यह दोन दास अव है हताश । प्रभु शीघ्र काटिये मोह पाश ।। चौपाई सोलह मात्राओं का चौपाई छन्द होता है। अन्त में जगण र तगण न पडने चाहिये। उदाहरण- नव फलधर तरुवर नय जाते । नव जलघर क्षिति पर नियराते ।। यहि विवि सुजन लोक-हितकारी। होहि विनम्र विभव पल धारी ॥ शक्ति अठारह मात्राओं का शक्ति छद होता है। श्रादि में लघु और अत में सगण, रगण या नगण होता है। यह भुजगी छद के ढग का है, पर वर्ण-वृत्त नहीं है। उर्दू के 'फऊलुन कालुन फउलुन फअल' बहर से मिलता-जुलता है। उदाहरण- अरे, उठ कि अब तो सबेरा हुआ। नहीं दूर तेरा अँधेरा हुआ। बहुत दूर करना तुझे है मकर । नहीं शात है राह घर को किधर।।

६२ हिन्दी-पदा-रचना उदाहरण- मित्र सफल निज जीवन करो। हृदय वीच शुभ गुण गण धरो ।। गैल सदा उन्नति को गहो । नेता घन समाज में रहो।। । - ( १४ ) चौपई पन्द्रह मात्राओ का चौपई छन्द होता है। अन्त में गुरु और लघु होता है। उदाहरण- उपवन में अति भरी उमङ्ग । कलियाँ सिलती हैं बहुरङ्ग ।। पर मिलता है उनको मान । जो हैं सुखद सुगन्ध-निधान ।। ( १५ ) पहरि सोलह मात्राओ का पद्धरि छन्द होता है। अन्त में जगर होता है। उदाहरण-- भानन्द कद करुणा-निधान । हे विश्वकोष ! सब शक्तिमान ।।

हिन्दी-पद्य रचना ( २० सगुण उन्नीस मानाओं का सगुण छद होता है । 'प्रत में जगण वा है। आदि में लघु होता है । यह उर्दू के 'फऊलुन फऊलुन का लुन फऊल' से मिलता-जुलता है। उदाहरण- जिसे रात दिन फाम से है लगाव । जरा भी नहीं काहिली का सिंचाव ।। जिसे है सदा एक धुन एक चाव । वही डालता दूसरों पर प्रभाव ।। ( २१ ) शास्त्र योस मानाओं का शास्त्र छंद होता है। अंत में गुरु लघु होता है। उर्दू का 'मफाईलुन मफाईलुन मफाईल' यही है । उदाहरण- किसी के काम को सीसो भली पात । नहीं बेकार सोप्रो बैठ दिनरात ॥ हृदय से मधुर लगता है जिन्हें काम । उन्हें कव सुवह वीती और कर शाम ।। हसगति वीस मात्राओं का हसगति छद होता है । ग्यारह और नौ मात्रा पर यति होती है। अंत में दो लघु पडते हैं। ( २२ ) ५ ६४ श्रत मे नगण हो तो इसी छद का नाम आनन्द पद्धक हो जाता है। फारसी की बहर 'फायलातुन फायलातुन फायलुन' हिन्दी-पद्य-रचना ( १८ ) पीयूष-वर्ष उन्नीस मात्राओं का पीयूप-वर्प छद होता है। अत में लयु गुरु होता है । दसवी और नवी मात्रा पर विराम होता है। से यह मिलता-जुलता है। उदाहरण- जो सुयश जग में कमाया कुछ नहीं । के हाथ प्राया कुछ नहीं । ज्ञान विद्या-चल कमाओ और यश । जीत अपने को करो सव लोक वश ।। ( १९ ) सुमेरु उन्नोस मात्राओं का सुमेरु छद्र होता है। वारयी श्री सातयों मात्रा पर विराम होता है। अंत में दो गुरु होते हैं उर्दू का 'मफाईलुन मफाईलुन फउलुन' यही है। उदाहरण यहाँ हो ऐ हमारे राम प्यारे । मुझे तुम छोड़कर पन को सिधारे । कही प्यारी जनक की यह लली है। जिमें देगे बिना अति चेकली है। हरिश्चन्द्र उस अवुध ६७ हिन्दी-पद्य-रचना पृथ्वी का गुण सरस, गन्ध मन भा गया। खग-कुल का फल-विकल करुण रव छा गया। मैथिलीशरण गुप्त ( २५ ) कुडल और . वाईस मात्राओं का कुण्डल छद होता है । वारद दस मात्रा पर यति होती है। अत में दो गुरु होते हैं। उर्दू में यह 'मफऊल मफाईल मफाईल फऊलुन' से मिलता है। उदाहरण- तू दयाल दीन हौं, तु दानि हौ भिखारी । हौं प्रसिद्ध पातकी, तु पाप-पुज-हारी ॥ तू गरीब को नेवाज, हौं गरीन तेरो । पारक कहिये कृपाल, तुलसिदास मेरो॥ तुलसीदास ( २६ ) प्रभाती कुण्डल में यदि एक ही गुरु हो, तो उसे प्रभाती छन्द कहते हैं। उदाहरण- ठुमुकि चलत रामचन्द्र याजत पैजनियाँ । धाय मानु गोद लेत दसरब की रनियाँ।। के अन्त ६६ हिन्दी-पद्य-रचना । उदाहरण- होते हैं छवि देस विलोचन विकसित । होता है गुण देस हृदय आनन्दित ।। पर प्रिय लगता नहीं रूप से दुर्गुण । कुरूपता को ढंक देता है सद्गुण ॥ ( २३ ) अरुण बीस मात्राओं का अरुण छद होता है। पांच-पांच और दस मात्रा पर यति होती है । अत में रगण होता है। उर्दू का 'फायलुन फायलुन फायलुन फायलुन' यही है । उदाहरण- आजकल रात-दिन एकही भाव है। लोक के चित्त में एकही चाव है। देश-हित में जिओ देश-हित में मरो। देशहित-हेतु सर्वस्व अर्पण करो। ( २४ ) प्लवंगम इक्कीस मात्राओ का सवगम छद होता है । ग्यारह दस मात्रा पर विराम होता है । अंत में जगण पडता है । उदाहरण- आया झोका एक वायु का सामने । समर्पित और पाया मिर पर सुमन राम ६७ हिन्दी-पद्य-रचना और पृथ्वी का गुण सरस, गन्ध मन भा गया। सग-कुल का फल-विकल करुण व छा गया। मैथिलीशरण गुप्त ( २५ ) कुंडल वाईस मात्राओं का कुण्डल छद होता है। बारह दस मात्रा पर यति होती है । अत में दो गुरु होते हैं। उर्दू में यह 'मफरल मफाईल मफाईल फऊलुन' से मिलता है। उदाहरण- तू दयाल दीन हौं, तु दानि हौ भिसारी । ही प्रसिद्ध पातकी, तु पाप-पु ज-हारी ।। तू गरीव को नेवाज, हौं गरीय तेरो । यारक कहिये कपाल, तुलसिदास मेरो ।। तुलसीदास ( २६ ) प्रभाती कुएटल के अन्त में यदि एक ही गुरु हो, तो उसे प्रभाती छन्द कहते हैं। उदाहरण- मुफि चलत रामचन्द्र याजत पैजनिया । धाय मातु गोद लेत दसरथ की रनियाँ ।

६६ हिन्दी-पद्य-रचना - उदाहरण- होते हैं छवि देस विलोचन विकसित । होता है गुण देस हृदय आनन्दित ।। पर प्रिय लगता नही रूप से दुर्गुण । कुरूपता को ढंक देता है सद्गुण ॥ ( २३ ) अरुण वीस मात्राओं का अरुण छद होता है। पांच-पांच और दस मात्रा पर यति होती है । अत में रगण होता है। उर्दू का 'फायलुन फायलुन फायलुन फायलुन' यही है। उदाहरण- आजकल रात-दिन एकही भाव है। लोक के चित्त मे एकही चाव है। देश-हित में जिओ देश-हित में मरो। देशहित-हेतु सर्वस्व अर्पण करो ।। ( २४ ) प्लवगम इक्कीस मानाओ का सवगम छद होता है। ग्यारह दस मात्रा पर विराम होता है । अत मे जगण पडता है। उदाहरण- श्राया झोंका एक वायु का सामने । पाया सिर पर सुमन समर्पित राम ने ॥ और ६७ हिन्दी-पद्य-रचना पृथ्वी का गुण सरस, गन्ध मन भा गया । सग-कुल का कल-विकल करुण रव छा गया। मैथिलीशरण गुप्त ( २५ ) कुडल वाईस मात्राओं का कुण्डल छद होता है। बारह और दस मात्रा पर यति होती है । श्रत में दो गुरु होते हैं। उर्दू में यह 'मफरल मफाईल मफाईल फऊलुन' से मिलता है। उदाहरण- तू दयाल दीन हौं, तु दानि हौं भिसारी । हौ प्रसिद्ध पातकी, तु पाप-पु ज-हारी ।। तू गरीय को नेवाज, हौं गरीम तेरो । पारक कहिये कृपाल, तुलसिदास मेरो । तुलसीदास . प्रभाती के अन्त में यदि एक ही गुरु हो, तो उमे प्रभावी दन्द कहते हैं। उदाहरण- टुमुफि चलन रामचन्द्र याजत पैरिया । धाप मानु गोद लेत दमरम पी रतियां ॥

६८ हिन्दी-पद्य-रचना तन मन धन वारि मजु बोलती वचनियाँ । कमल वदन घोल मधुर मद सी हसनियाँ ॥ तुलसीदास तट पर हैं। ( २७ ) लावनी वाईस मात्राओं का लावनी छद होता है। तेरह और नौ मात्रा पर विराम होता है। अन्त में दो गुरु या लघु गुरु या दो लघु भी हो सकते हैं। लावनी में छ चरण होते हैं। उदाहरण- सम्राट स्वय प्राणेश सचिव देवर हैं। देते श्राफर आशीप हमें मुनिवर हैं । धन तुच्छ यहाँ यद्यपि असरय आकर हैं । पानी पीते मृग-सिंह एक सीता रानी को यहाँ लाभ ही लाया ।" मेरी कुटिया में राजभवन मन भाया ।। मैथिलीशरण गुप्त ( २८ ) उपमान तेईस मात्राओ का उपमान छन्द होता है। अन्त मे गुरु और तेरह और दस मात्रा पर विराम होता है। उदाहरण- कभी सुयश पाता नही, है अत्याचारी । निरुद्यमी होता नहीं, सुस का अधिकारी ।।

"
हिन्दी-पद्य रचना
उसकी मजिल का नहीं, अन्त कमी होता।
जो अन्धा है एक तो, तिस पर है सोता ।।
( २९ )
मदन
चौथीस मात्राओं का मदन छद होता है। चौदह और
दस माना पर यति होती है। अत में गुरु लघु होता है । इसे
रूपमाला भी कहते हैं।
उदाहरण--
यौवन श्री से विभासित कान्ति अति कमनीय ।
वदन सुन्दर, ग मनोहर, हास्य अनुकरणोय ॥
उच्च फुल, धन, मान, विक्रम, अन्य विभव अनेक ।
लोकप्रिय होते नही ये बिना विनय विरेक ।।
दिग्पाल
चौवीस मानाओं का दिग्पाल छद होता है। पारह, वारह
माना पर यति होती है। अन्त में दो गुरु पडते हैं। उर्दू में
यह 'माऊल कायलातुन माऊल फायलातुन' में मिलता है ।
उदाहरण
पीछे पदम खरा भी हा से नदालते हैं
रण-भूमि में खुशी से निज रफ डालते हैं।
दीपक स्वतंत्रता का सप घोर पालते हैं।
तय ये पही अँधेरा पर से निकालते हैं।

दो पच्चीस मात्राओं का मुक्तामणि छन्द होता है। तेरह और रखो हृदय में भाव नित उन्नत करने वाला। छयोस मात्राओ का कामरूप छन्द होता है। नौ, सात हिन्दी-पद्य रचना रोला चौबीस मात्राओं का रोला छन्द होता है। ग्यारह और तेरह मात्राओ पर यति होती है। अन्त में दो गुरु या लघु पडते हैं। उदाहरण- ससि विन सुनी रैन , ज्ञान बिन हिरदै सूनी । कुल सूनो बिन पुत्र , पत्र बिनु तरुवर सूनो । गज सूनो इक दन्त , और बिनु पुहुप विहूनो । विप्र सून बिन वेद , ललित बिन सायर सूनो ॥ वैताल ( ३२ ) मुक्तामणि बारह मात्रा पर यति होती है । अन्त में दो गुरु होते हैं । उदाहरण- उन्नतिशील सुजान के जीवन की सव लीला । समझ उसी विधि से करो अपना चरित सजीला॥ यथा कृपण के कण्ठ मे मुक्तामणि की माला ॥ ( ३३ कामरूपः ) हिन्दी-पद्य-रचना उदाहरण- है प्रिय युवकगण । क्यों न बनते, लोक-विश्रुत शूर । शृगार रसमय, चरित - नाशक, वृत्ति से रह दूर ।। श्रादर्श हैं शकर परशुधर भीष्म श्री हनुमान । क्यों सो रहे हो, विमल शोभा, कामरूप समान ॥ ( ३४ ) गीतिका छपीस मात्राओं का गीतिका छन्द होता है। चौदह और बारह पर यति होती है। अन्त में लघु, गुरु होता है। उदाहरण--- धर्म के मग में अधर्मी से कभी डरना नहीं । चेतकर चलना कुमारग में कदम धरना नहीं । शुद्ध भावो में भयानक भावना भरना नहीं। वोध-वर्द्धक लेस लिसने में कमी करना नहीं। नाथूरामशकर शर्मा ( ३५ ) गीता च-बीस मानाप्रो फा गीता छंद होता है। पौदह और यारह मात्रा पर यति होती है। अन्त में गुरु, लघु होता है। उदाहरण- भय दिस जा भय रहित गरना उशित मित्र । भय सहिरा जीया गरण योगों महा अपविन। Hind - ७२ हिन्दी-पद्य-रचना निर्भय रहो, दृढ हो गहो पर चोध-वर्धक पंथ । यह दे रहा उपदेश है हरि-कथित गीता ग्रन्थ ।। ( ३६ ) शुद्ध गीता सत्ताईस मात्राओं का शुद्ध गीता छन्द होता है। चौदह और तेरह मात्रा पर यति होती है। अन्त मे गुरु, लघु होता है। उर्दू का 'फायलातुन फायलातुन फायलातुन फायलात' इसी से मिलता-जुलता है। उदाहरण- नित्य ही रक्खो हृदय में गुरुजनो की सीस याद । चाहिये साफल्य तो तुम छोड दो प्यारे । प्रमाद ।। झूठ या कपटाचरण का अन्त है केवल विपाद । सत्य ही की जीत होती है समझ लो निर्विवाद । ( ३७ ) सरसी सत्ताईस मात्राओं का सरसी छन्द होता है। सोलह और ग्यारह पर यति होती है। अन्त मे गुरु, लघु होता है । उदाहरण- अंशुमालि के शुभागमन की, वेला समझ समीप । नभ में वुझा चुके थे सुर भी, निज-निज घर के दीप ।। कलरव सुमन-विकास सङ्ग ले, निकली रवि की कोर । क्षण भर पहले ही दो प्रेमी, कहाँ गए किस ओर ॥

हिन्दी-पद्य-रचना ( ३८ ) ललित पद या सोलह और धारह मानाओं पर विश्राम देकर अट्ठाईस मानाश्री का ललित पद छन्द होता है। अन्त में दो गुरु लघु एक गुरु भी होते हैं। उदोहरण- तुम अपने सुख के प्रबन्ध के, हो न पूर्ण अधिकारी । यह मनुष्यता पर फ्लंक है, हे प्रियवन्धु । तुम्हारी ॥ पराधीन रहकर अपना सुस, शोक न कह सकता है । यह अपमान जगत मे केवल, पशु ही सह सकता है । पथिक ( ३९ ) हरिगीतिका अट्ठाईस मात्राओं का हरिगीतिका छन्द होता है। सोलह और बारह मात्रा पर यति होती है। अन्त में लघु, गुरु होता है। उदाहरण- करि विनय सिय रामहि समी, जोरि फर पुनि-पुनि पहै। चलि जाउँ तात सुजान तुम कहें, विदित गति सबकी अहै ॥ - ७६ हिन्दी-पद्य-रचना पर मैं पुस्तक विना न इनको किसी भांति स्वीकार करूँ । पुस्तक पढ़ते पर्ण-कुटी मे दीन वना सानन्द मरूँ ॥ ( ४४ ) रुचिर तीस मात्राओं का रुचिर छन्द होता है। सोलह और चौदह मात्रा पर यति होती है। अन्त में दो गुरु या दो लघु या लघु गुरु पडते हैं। उदाहरण- इस किंकर ने उतर अद्रि से दया-दष्टि प्रभु की पाई । सहज सहानुभूति-वश उस पर प्रीति उन्होंने दिसलाई ॥ लिये जा रहा था रावण वक जव शफरी-सी सीता को । देसा हमने स्वय वडपते उन पद्मिनी पुनीता को । मैथिलीशरण गुप्त ( ४५ ) वीर इकतीस मात्राओं का वोर छन्द होता है। चौपाई और चौपई मिला देने से चीर छन्द बन जाता है । पाल्हा यही छन्द है । उदाहरण- राजा हमारे भये फलजुगहा जयचॅद और पिथौरा राय । लरि लरि पापुस में चापर भये मरिंगे हमें गुलाम बनाय ॥ धन बल धरम करम हिन्दुन के घटाढार भये एक साथ । राज टुटा अपने हाथे से 'भारतमाता' भई अनाथ ।।

हिन्दी-पद्य-रचना त्रिभंगी बत्तीस मात्राओं का विभगी छन्द होता है । १०, ८,८ और ६माना पर यति होती है । अत में गुरु होता है । जगण वर्जित है। उदाहरण- करि बदन विमडित, ओज अखंडित, पूरण पडित, ज्ञानपर । गिरिनन्दिनि नन्दन, असुरनिकन्दन, सुर उर चंदन, कीर्तिकर ।। भूपण मृग लक्षण, वीर विचक्षण, जन प्रण रक्षण, पाशधर । जय जय गणनायक, सलगणघायक, दास सहायक, विघ्नहर ।। दास ( ४७ ) दडकला बत्तीस मात्राओं का दडकला छद होता है। दस, पाठ और चौदह मात्रा पर यति होती है । अन्त में समण होता है। उदाहरण- शिव विष्णु ईश बहु रूप तुई नभ तारा चन्द्र सुधाकर है। अम्या धारानल शक्ति स्वधा स्वाहा जल पौन दिवाकर है ।। हम प्रशाभंश समझते हैं सब साफ जाल से पाक रहैं । सुन बालविहारी ललित ललन हम तो तेरे ही चाफर हैं। सीतल ५८ हिन्दी-पद्य-रचना ( ४८ ) करखा सैतीस मात्राओं का करसा छन्द होता है। पाठ, वारह, आठ और नौ मात्रा पर विराम होता है। अन्त मे मगणं होता है। उदाहरण- भयो नरसिंह बलवान नरसिंह प्रभु सन्त हितकाज अवतार धारो । सभ ते निकसि भू हिरनकस्यप पटक मटक नसन मन्ट उर विदारो॥ ब्रहारुद्रादि सिर नाय जय जय कहत भक्त प्रहलाद निज गोद लीनो । प्रीति सो चारि दै राजसुस साज सघ नरायनदास वर अभय दोनो । नारायणदास ( ४९ ) हसाल सैंतीस मात्राओं का हसाल छन्द होता है । अन्त मे यगण होता है । बीस और सत्रह मात्रा पर यति होती है । उदाहरण- तो सही चतुर तूं जान परवीन अति परै जनि पीजरे मोह कूा।

हिन्दी-पद्य रचना पाइ उत्तम जनम लाइ लै चपल मन गाइ गोविन्द गुन जीत जूवा ॥ आप ही आप अज्ञान नलिनी बँध्यो बिना प्रभु विमुस के बेर मूवा । दास सुन्दर कहैं परम पद तो लहैं राम हरि राम हरि बोल सूवा ।। ( ५० ) मदनहर चालीस मात्राओं का मदनहर छन्द होता है । दस, आठ, बौदह और आठ मात्रा पर विराम होता है। उदाहरण- सग सीता लछिमन, श्रीरघुनन्दन, मातन के शुभ पाइ परे, सब दुस हरे । अँसुवन अन्हवाये, भागनि आये, जीवन पाये अंक भरे, अरु अंक घरे ।। वर बदन निहारें, सरबसु यारे, देहि सनै सवहीन धनो बरु लेहि धनो। तन मन न संभारें, यह विचार, भाग षड़ो यह है अपनो, किधों है सपनो। ( ५१ ) विजया चालीस मानाओं का विजया एन्द होता है। स इस हिन्दी-पद्य-रचना मात्रा पर विराम होता है। अन्त में रगण रखने से पढ़ने में मनोहर लगता है। उदाहरण- सित कमल बस सी सीतकर अस सी विमल विधि इस सी हीर वर हार सी। सत्य गुन सत्व सी सात रस तत्व सी ज्ञान गौरव सी सिद्धि विसतार सी ॥ कुन्द सी कास सी भारती वास सी सुरतरु निहार सी सुधारस सार सी। गगजल धार सी रजत के तोर मी कीर्ति तव विजय की सम्भु भागारसी ॥ छन्दोऽर्णव , ( ५२ ) हरिप्रिया छियालीस मात्राओं का हरिप्रिया छन्द होता है। वारह, वारह, बारह और दस मात्रा पर विराम होता है। अन्त में दो गुरु होते हैं। इसका नाम चचरी भी है। उदाहरण-~- चंद किरन सीतल भई चकई पिय मिलन गई त्रिविध मद चलत पचन पल्लव द्रुम डोले । प्रात भानु प्रकट भयो, रजनी कौ तिमिर गयो भृग करत गुजगान कमलन दल सोले ॥

हिन्दी-पद्य-रचना
८१
ब्रह्मादिक धरत ध्यान सुर नर मुनि करत गान
जागन की चेर भई नयन पलक सोले।
तुलसिदास अति अनन्द, निरसि के मुखारविद
दीनन को देत दान भूपन बहुमोले ।
तुलसीदास
मात्रिक-अर्द्ध सम
बरवा
पहला और तीमरा पद विपम और दूसरा और चौथा पद
सम कहलाता है। ३८ मात्रा का परवा छद होता है। विषम
चरण में बारह और सम में सात मानाये होती हैं। अन्त में
जगण रमना रोचक होता है। अन्त में लघु अवश्य होना
चाहिये।
उदाहरण
सब से मिलकर रह मन, वैर यिसार ।
दुर्लम नर तन पाकर, कर उपकार ।।
जीवन का कर प्रतिछन. शुभ उपयोग।
यह न मिले फिर नदिया, नाव सँयोग ।।
श्रतिवरवा
घयालीस मानाओ का प्रति परवा छंद होता है। पारद
और नी माना पर विराम होता है।

हिन्दी पद्य रचना उदाहरण- प्रेम प्रीति रस बिरवा पिय चलेहु लगाय । सीचन की सुधि लीजो कहुँ मुरभि न जाय ।। दोहा विषम पदा में तेरह और सम मे ग्यारह मात्रा का दोहा छन्द होता है। आदि मे जगण न रखना चाहिये । अंत में लघु होता है। उदाहरण- बनना चाहो वीर जो , करना गौरव-त्राण । या कर धागे लेसनी , या विकराल कृपाण ॥ सोरठा सम चरणों में १३ और विपम चरणो में ११ मात्राओं का सोरठा छन्द होता है । यह दोहे का उल्टा होता है। सोरठ (सौराष्ट्र) देश में इसका प्रचार अधिक होने से इसका नाम सोरठा पडा। उदाहरण- "रहिमन" मोहि न सुहाय , अमो पियावत मान विन । धरु विष देय चुलाय , मान सहित मरियो भलो !! रहीम हिन्दी-पद्य रचना मात्रिक-विषम कुडलिया दोहा और रोला मिलाकर छ पद और प्रत्येक पद मे चौबीस मात्राओं का कुलिया छन्द होता है। कुण्डलिया के प्रारम्भ का शब्द और अन्त का शब्द एक ही होता है। दोहे का चौथा चरण रोला का आरम होता है। कुल मात्रायें १४४ होती हैं। उदाहरण- रहिये लटपट काटि दिन, बरु घामे माँ सोय । चौह न वाकी वैठिये, जो वरु पतरो होय ।।.. जो तरु परो होय एक दिन धोसा दैहै । मा दिन बहै बयारि टूटि तर जर से जैहै ।। कह गिरिधर' कविराय छहि मोटे की गदिये। पत्ता सव मार जाय त छह माँ रहिये । गिरिधर कविराय ( २ ) उल्लाला यह अट्ठाईस मात्राओं का छद है । पहले और तीसरे चरण में १५ और दूसरे तथा चौथे चरण में १३ मात्राएँ होती हैं। १५ ओर १३ पर यति होती है । कोई-कोई इसे २६ मात्रामा ही कालिगते हैं । उनमें तेरह-तेरह मानाओं पर यति होती है।

४ हिन्दी-पद्य-रचना दोनो नियम ठीक हैं । कवि अपने इच्छानुसार चाहे अट्ठाईस मात्राओ का लिसे, चाहे छब्बीस का। मेरी राय मे अट्ठाईस मात्रायो वाला अधिक सरस होता है। उदाहरण- हे शरणदायिनी देवि ! तू, करती सव का त्राण है। हे मातृभूमि । सतान हम, तू जननी, तू प्राण है ।। मैथिलीशरण गुप्त छप्पय (षट्पदी) छ पद और १४८ मात्राओं का छप्पय छन्द होता है । प्रथम चार पद रोला के होते हैं, शेप दो पद उल्लाला के उदाहरण- जहाँ स्वतन्त्र विचार न बदले मन में मुस मे। जहाँ न बाधक बने सबल नियलों के सुस में । सब को जहाँ समान निजोन्नति का अवसर हो । शान्ति-दायिनी निशा हर्प-सूचक वासर हो । सब भाँति सुशासित हो जहाँ, समता के सुसकर नियम । बस, उसी स्वतत्र स्वदेश मे, जागे हे जगदीश । हम ॥ वर्ण-वृत्त- -सम तिलका दो सगण का तिलका वृत्त होता है।

हिन्दी-पदा-रचना
हो गया मुगन्ध पात।
मल्लिका सिलीप्रभात ॥
प्रमारिएका
एक जगण, रगण और लघु गुरु का प्रमाणिका वृत्त
होता है।
प्रमाद मोह त्याग मे
विवेक मे विरसा से।
मिले अवश्व मुखि है
प्रमाणिका सुयुक्ति है।
८
दो रगस का विमोदा घृत
ब्रहा को
वेद को
धर्म को
मोह को
ल
होता है।
।

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हिन्दी-पद्य रचना सत्कीर्ति का स्वाद लिया करो सदा । आदर्श को मान दिया करो सदा ।। चंचला रजरजर ल का चवला वृत्त होता है। उदाहरण- त्याग शुभ्र सौध प्रा किया अरण्य में निवास । हो गया अनन्त शक्तिमान का अनन्य दास ॥ सोन मैं रहा, न इन्द्रियाँ न वे रहे विकार । चचला करे कटाक्ष क्यों निरर्थ धार बार || ( १८ ) प्रमिताक्षरा स ज स स का प्रमितासरा वृत्त होता है। उदाहरण जिससे प्रसन्न सब लोग रहे। जिसको सुविज्ञ सब ठीक पहें ।। वह शीलवंत गुण-मडित है । सुप्रवीण लोक-प्रिय पडित है ।। तारक चार सगा एक गुरु का नारक वृत्त होता है।

हिन्दी-पद्य-रचना उदाहरण- फलहीन हुये सब यन्त्र हमारे । मिट हाय गये सुख-साधन सारे । अव हे प्रभु ज्ञान-प्रकाश दिखाओ । करुणा करके तम दूर हटायो । ( २० ) इन्द्रवज्रा त त ज ग ग का इन्द्रवज्रा वृत्न होता है। कुल ग्यारह अक्षर होते हैं। उदाहरण- जागो, उठो भारत-देश-वासी। आलस्य त्यागो, न बनो विलासी ॥ ऊँचे उठो दिव्य कला दिसाओ। ससार में पूज्य पुन कहाओ । ( २१ ) उपेन्द्रवज्रा ज त ज ग ग का उपेन्द्रवना वृत्त होता है। पांच और छ अक्षरों पर विराम होता है। उदाहरण- यडा कि छोटा कुछ काम कीजै । परन्तु पूर्वा पर सोच लीने ॥ यिना विचारे यदि काम होगा। फभी न अच्छा परिणाम होगा। मैथिलीशरण गुप्त

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हिन्दी-पद्य-रचना ९६ . ( २९ ) मोदक चार भगण का मोदक वृत्त होता है। उदाहरण- हो निज देश सुधार सखा तब। उन्नति के कुछ काम करो जव ।। केवल हैं उपदेश वृथा सब । भुस मिटे मनमादक से कब ? ( ३० ) वंशस्थ ज त ज र का वशस्थ वृत्त होता है । उदाहरण- प्रवाह होते तक शेप श्वास के । सरक्त होते तक एक भी शिरा ॥ सशक्त होते तक एक लोम के । लगा रहूँगा हित-सर्व-भूत मे ॥ अयोध्यासिंह उपाध्याय ( ३१ ) V द्रुतविलम्बित न भ भ र का द्रुतविलम्बित वृत्त होता है । उदाहरण- विपद संकुल विश्व प्रपच है । वहु छिपा भवितव्य रहस्य है ।। .

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हिन्दी-पद्य-रचना । उदाहरण- उसी उदार की कथा सरस्वती बसानती। उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती ।। उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती । तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती ।। अरसण्ड आत्मभाव जो असीम विश्व में भरे । वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिये मरे । मैथिलीशरण गुप्त ( ३९ ) शार्दूल विक्रीडित म स ज स त त ग का शाईलविक्रीडित वृत्त होता है । १२ और ७ अक्षरो पर विराम होता है । उदाहरण- जाती प्रेम न जाति-पॉति तुझसे, पूछी किसी को कहीं। तेरे सम्मुस रक और नृप में, है भेद होता नहीं ।। दोनो ही, बन और गेह, जग में, हैं तुल्य तेरे लिये । ऊँचे मन्दिर से कुटो तक सभी, हैं चाह तेरी किये ॥ मैथिलीशरण गुप्त ( ४० ) चित्रलेखा म भ न य य य का चित्रलेखा वृत्त होता

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हिन्दी-पद्य-रचना उदाहरण- स्वस्तिवाद विरक्तों का , और हो कुछ वस्तु है । वाग्यो मे उनके होता, ईश का एवमस्तु है । मैथिलीशरण गुप्त सवैया २२ वर्ण से लेकर २६ वर्ण तक के कई एक वर्ण वृत्त सवैया नाम से प्रत्यात हो गये हैं। उनके कई भेद हैं। नीचे कुछ सवैयो के लक्षण और उदाहरण लिये जाते हैं- मदिरा सात भगण और अन्त में एक गुरु का मदिरा सवैया होता है। उदाहरण- दीन अधीन हो पाय परी हो अरी उपकार को धावहि तू । मेरी दशा लपि होहि प्रसन्न दया उर अन्तर लावहि तू ।। नैनन के हिय की विरहागिनि एकहि घार घुमावहि तू । श्री मनमोहन-रूपसुधा "मदिरा" मद मोहि छकावहि तू ॥ अज्ञात ( २ ) मत्तगयद सात भगण और अन्त में दो गुरु का मत्तगयद सवैया होता है । इसे मालती भी कहते हैं

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१०२
हिन्दी-पद्य-रचना
उदाहरण--
स्वस्तिवाद विरक्तों का, और ही कुछ वस्तु है ।
वाम्यो में उनके होता, ईश का एवमस्तु
मैथिलीशरण गुप्त
है
॥
सवैया
२२ वर्ण से लेकर २६ वर्ण तक के कई एक वर्ण वृत्त
सवैया नाम से प्रख्यात हो गये हैं। उनके कई भेट हैं। नीचे
कुछ सवैया के लक्षण और उदाहरण लिसे जाते हैं-
मदिरा
सात भगण और अन्त में एक गुरु का मदिरा सवैया
होता है।
उदाहरण--
दीन अधीन हो पाय परी हों अरी उपकार को धावहि तू ।
मेरी दशा लसि होहि प्रसन्न दया उर अन्तर लापहि तू ॥
नैनन के हिय की विरहागिनि एकहि घार वुझावहि तू ।
श्री मनमोहन-रूपसुधा "मदिरा" मद मॉहि छकावहि तू ।।
अज्ञात
मत्तगयद
सात भगण और अन्त में दो गुरु का मत्तगयद सवैया
होता है । इमे मालती भी कहते हैं।

हिन्दी पारगना
या लाटी हार पारिया पर राज तिपुरको मजि मागे।
बाटा मिनि नया निधि पोमुपद की गाग गय पिमारी ।।
नैनन सो मन मा पा पाग सदाग निहागे।
पोटिस जाम करील गुन आर पागें ।।
किरीट
"पाठ भगण पारिरीट माता।
है परवा सुनी दाम को लोकर पा प्रतार करयो जनि ।
नोरन याप्रयतार करया तो मनुष्यन वालो मेंयार करती लनि ।।
मातुप पोबार परषा तो सिन विच प्रेम पमार फरयो जनि ।
प्रेम पमार फरलो तो दयानिधि के थियोग विचार करयों जनि ।।
दुर्मिल
'पाठ मग का दुर्मिल सा होता है।
कर ममि माँगत गरि करें , कय, प्रतिविम्य निहारि डरै।
पना करताल बनाइ के नाचन , मातु सबै मा मोद भरै ।।
का? रिसिप्राइ कहें, शठि के , पुनि तेत माई जेहि लागि अरें।
अवधेम से बालक चारि सता, तुलसी मन मन्दिर में रिहरें ।।
तुलसीदास

१०४ हिन्दी पद्य-रचना प्ररसात सात भगण और अन्त मे एक रगण का श्ररसात सवैया होता है। उदाहरण- जा यल कोन्हे विहार अनेकन ता थल कॉकरी बैठि चुन्यो करै । जा रसना ते करी बहु वातन ता रसना सों चरित्र गुन्यो करें ।। श्रालम, जौन से कुजन में करी केलि तहाँ अब सीस धुन्यो करें। नैननि में ले पदा रहते तिनकी अब कान कहानी सुन्यो करै ।। आलम सुन्दरी श्राठ सगण और अन्त मे एक गुरु का सुन्दरी सवैया होता है। उदाहरण- सुस शान्ति रहे सब ओर सदा, अविवेक तथा अघ पास न आयें। गुण शील तथा बल बुद्वि बढ़े, हठ वैर विरोध घटे मिट जावे ।। मव उन्नति के पथ मे विचरै, रति पूर्ण परस्पर पुण्य कमाये । दृढ निश्चय और निरामय होकर, निर्भय जीवन मे जय पावे ॥ मैथिलीशरण गुप्त मकरंद सात जगण और एक यगण का मकरद सवैया होता है। इसका नाम वाम भी है।

पिजरकता
फॅप डर यानि दायर डट Tust गुन मनि येली।
नई नवपीय धर गति संगम घालते मगही मैंग ली ।।
लिये सय प्राधिन धिन मग जगजय प्रारमयपी माली।
भी सपने दमानिय गाय से दुरि और दुराम अली ।।
ইয়াৰ
-
लवंगलता
पाठ गण और लघु का लवंगलना मवैया होता है।
गहरा-
पनी प्रति मगि मोम प्रती तकनी अवलोकन गो रसुगन्न ।
ममो गृहदीपति धरै मु किया गृय निमोहति ई मनु ।
पियों कुन शिल्पिं अनि यसर के पुरविन फो हलम्यो गनु ।
ही मुना या माति लोनिगिन को म पालत में मनु ।
হাধম
चकोर
मान भगण और गुरु लघु मा चकोर मया होता है।
प्रिय बन्धु । विरोध मिटाकर प्रोति प्रचार करो मर श्रोर ।
मयमशील बनो मतिमान सुधार करो प्रण ठान कठोर ।।
चेत परो, कि जीवन है यान नाम मिला जग में फुल-जोर ।।

१०६ हिन्दी-पद्य-रचना छोड घनो चकवाद वनो बस, भारत-उन्नति चन्द्र-चकोर ।। सवैया छद्रों के और भी कई भेद हैं । परन्तु मदिरा, मत्त- गयद, किरोट, दुर्मिल, अरसात, सुन्दरो, मकरन्द, लवगलता और चकोर नामक मवैया हिन्दी साहित्य में बहुत प्रचलित हैं। उनके लक्षण और उदाहरण ऊपर लिसे जा चुके हैं । उनके सिवा सात जगण और अत मे लघु गुरु का "सुमुखी", सगण और एक लघु का "अरविद", आठ मगण ओर दो लघु का "सुस' और 'पाठ जगण का "मुक्तहरा" मवैया भी होते हैं। आठ . दण्डक दडक वे छन्द कहलाते हैं, जिनके प्रत्येक पद मे २६ से अधिक अक्षर हो । दंडक के दो भेद हैं-साधारण दडक और मुक्तक। साधारण दण्डक के अाठ भेद हैं, उनमें से दो के लक्षण और उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं- सुधानिधि इसमे एक गुरु और एक लघु के क्रम से ३२ वर्ण होते है । उदाहरण- का करै समावि सावि का करै विराग जाग का करै अनेक योग भोगहू करै सु काह । का करै समस्त वेद श्री पुराण शास्त्र देखि कोटि जन्म लों पढे मिलै तऊ कळू न थाह ॥ राज्य ले कहा करे सुरेश यौ नरेश कै -

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१०८ हिन्दी-पद्य-रचना इनमें बहुत प्रसिद्ध मुक्तको के लक्षण और उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं- । मनहर कबित्त यह छन्द एकतीस अक्षर का होता है। १६ ओर १५ अक्षरों पर विराम होता है। इसे घनाक्षरो और कवित्त भी कहते हैं । अन्त का अक्षर गुरु अवश्य होता है । शेप का कोई नियम नही है। उदाहरण- सुनिये विटप प्रभु पुहुप तिहारे हम, रासिहौ हमैं तो शोभा रावरी वढावैगे। तजिही हरपि के तो विलग न मार्ने कळू, जहाँ-जहाँ जैहैं तहाँ दूनो जस गावैगे ॥ सुरन चढ़ेंगे नर सिरन चढेगे फेरि, सुकति "अनीस" हाथ हाथन विकावेंगे। देस मे रहेगे, परदेस में रहेगे, काह भेस में रहेंगे नऊ रावरे कहावैगे ॥ अनीस कलाधर क्रमश ३० गुरु-लघु और अंत में एक गुरु, कुल ३१ वर्णा का कलावर दडक होता है । उदाहरण- जाय के भरस्थ चित्रकूट राम पाम बेगि हाथ जोरि दीन में सुप्रेम ते विनै करी।

हिन्दी-पद्य-रचना
सोय तात मात कौमिला यसिष्ट आदि पूज्य
लोक वेद प्रीति नीति की मुरीतिही धगे।
जान भूप वैन धर्मपाल राम है सकोच
धीर दे गंभीर वधु की गलानि को हरी।
पादुका दई पठाय और को समाज माज
दय नेह राम सोय के लिये कृपा भरी ॥
काव्य-सुधाकर
रूप घनाक्षरी
लक्षण और उपदणकदी प्रन्द में-
रूपक पनातगहुँ गुरु लघु नियम न,
पत्तिम यश फर गये परत पारि।
पोज विमगम पाठ पाठ पाठ 'प्राट परि,
अन्त एक लघु धरि त्यों नियम र भारि ॥
या मिति सम्म भाग एन गुरु शेष गाग,
पी पथिरान पं भाजयुक्षि में गिरि।
पनि सरि पो म के हर को,
मिल पनापी भेट परि गुग
Tirir
भान , सदमें गुलगु मा पानी।
गोगह मोर rafम मे inv Krrerly
राता है। गुरु ला (1) Amiri
-

( ४ ) जलहरण बत्तीस अक्षरों का जलहरण छद होता है। अन्त में दो लघु होते हैं। कुछ कवियो ने अन्त मे एक गुरु रखकर भी इसकी रचना की है। उदाहरण-- भरत सदा ही पूजे पादुका उते मनेम इते राम सीय वधु सहित पधारे बन । सूपनखा के कुरूप मारे सल झुड घने हरी दुसमोस सोता राघव विकल मन । मिले हनुमान त्यों सुकठ सो मिताई ठानि वाली हति दीनौ राज सुग्रीवहिं जानि जन । रसिकविहारी केसरीकुमार सिंधु लॉघि लक-जारिसीय सुधि लायो मोद बाढो मन ।। रसिकविहारी देव घनाक्षरी आठ, आठ, पाठ और नौ अक्षरो के यति से ३३ प्रक्षर का देव घनाक्षरी छद होता है । अत के तीन वर्ण लघु होते हैं। उदाहरण- झिल्ली झनकार पिक-चातक पुकाएँ बन मोरनि गुहारै उठे जुगन् चमक्-िचमकि । घोर धन कारे भारे धुरवा धुरारे धाय, धूमनि मचावै नाचें दामिनि दकि-दकि ॥ मूनि बहार वहे

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११२ हिन्दी-पद्य-रचना वर्ण-वृत्त सूची में प्रत्येक सस्या को दूना करता हुआ वढाता जाय । अत मे अभीष्ट अंक प्राप्त होगा। जैसे, यह जानना हो कि दस मात्रा और दस वर्णा के कितने छट हो सकते हैं, तो ऐसी सूची बनानी चाहिये- मात्रा यो मात्रिक वर्ण-वृत्त- वर्ण-सख्या छद-सूची मची 3 १ १ २ २ ४ ३ ३ ४ ८ ६ १३ ६४ १२८ २५६ ९ १० १०२४

हिन्दो-पद्य-रचना
११३
+
इसी प्रकार आगे भी गणित किया जा सकता है।
इमसे यह पता चला कि दस मात्रामा के ८९ मानिक
पन्न हो सकते हैं और दस पणों के १०२४ वर्ण वृत्त । इसी
तरह और भागे भी यदाया जा सकता है।
वर्ण-प्रस्तार
घर्ण प्रस्तार से यह पात जानी जाती है कि अमुक संग्या
फे पणों से कितने प्रकार के छन्द पन सकते हैं। इसके लिये
नियम यह है कि जितने वर्षों के छन्द जानने हो, उतने गुरु
चिन्द एक पफि में लियो। फिर दूसरी पक्ति में पहले गुरु
में
नीचे लघु लियो और घाफी गुरु । तीसरी पक्ति में दूमरी पति
पं. सबसे पाय याने गुरु के गोरे लघु लियो, आगे का पा
धमा ही उतार ला और पाई और सय गुरु लिग्नो। जय दम
प्रकार करने वाले सघ लगु हो जायें, उप प्रस्तार पो पुगएमा
मामी । जैसे, यदि तीन पणे का प्रस्तार करना है तो यह
इस प्रकार दोगा-
पालाप
दूसरा रूप
सासरा रूप
S55
पोलार
उसी प्रकार पार पाणी प्रकार -

हिन्दी-पद्य-रचना S155 1155 SSIS 1515 तीसरा रूप चौथा रूप पाँचवों रूप छठा रूप सातवाँ रूप आठवाँ रूप नवाँ रूप दसवाँ रूप ग्यारहवाँ रूप वारहवाँ रूप तेरहवा रूप चौदहवाँ रूप पन्द्रहवाँ रूप सोलहवाँ रूप इसी तरह आगे भी समझो । SIS 115 SSS I I55 SISI । ISI Ss।। IS 1 s।।। मात्रा-प्रस्तार "वर्ण-प्रस्तार से मात्रा-प्रस्तार में कुछ भिन्नता है । वर्ण-प्रस्तार मे अक्षरों की संख्या निश्चित होती है, पर मात्रा-प्रस्तार मे अक्षर चाहे जितने कम या अधिक हों, मात्रा समान होनी चाहिये। मात्रा-प्रस्तार की यह रीति है कि यदि मात्राओं की सरया सम है तो पहली पक्ति मे उतने ही गुरु लिसो, जितनी मात्रामो

हिन्दी पचना
का प्रस्तार करना हो। पौर यदि माया विषम है तो पहली
पशि की गाई और मर से पहले लघु लिसो और यात्री गुरु ।
दमर्ग पक्ति में चाई 'पोर के मय से पहले गुरु चिन्ह के
नीचे लघु लिपकर याकी मय जैमा फातमा उत्तार लो। मा
परने से यह निश्चय ही है कि नियम मानामी में फगी पर
जायगी। इसके लिये यह नियम है कि पाई और उननी ही
मानानी के लयुचा गुरु चिन्द्र पटा लो।
अमे, ६ मात्राओं का प्रसार । छ
मम मंगया है।
इसलिय पाली पति में तीन गुन लिने गरे--555
दूसरी पक्ति में पाई और पे पड़ी गुरु के नीर लघु
और गेप गनी गुग मा ही उतार लिया तो यह रूप ध्या-
155
पर गमा परने में माता की पमीन IT
पी पाई और गफ राघु और पता दिया। अब यह पता-
1155
मी प्रसार मात्रा में मेरा मेरोग, निकम
-

हिन्दी-पद्य-रचना
S150
151
ss
151
।5।।
SI।।1
विपम सख्यावाले मात्रा के प्रस्तार में पहली पत्ति मे बाई
ओर पहले लघु लिसा जायगा । उसके बाद शेष गुरु । जैसे,
पाँच मात्रा का प्रस्तार करना हो, तो पहली पक्ति में सर
से पहले एक लघु लिसोगे तो यह रूप होगा--155
शेष रूप इसप्रकार होंगे-
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चार मात्राओं का प्रस्तार इस प्रकार होगा---
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दिन्टो-पय-रचना नष्ट नष्ट एम रोति को पाते हैं, जिसमे मस्तार किये यि हो बताया जाता है कि इतने वर्ष के प्रस्तार में अनुक रूपमा होगा। नियम यह है कि पृटी हुई मगर समतोपाल लघु लिया और या विषम है तो गुरु । उमरे याद उस अफ यो आधा रिया! यनि विपम देनो उसमें आप जोहपर भाग पिया। आधा ने पर विपम आपको और मम बारे रायु लिग्गे । इमी प्रसार माधा पुग्नेगरते और विपर धौर मारे गम में गुरु और लघु लिमने- गिने या गर जाना चाहिये, हा या पूरी हो जाय । चरम लहो रोगा। सम- गिगी ने माफि पार पण कर पा ग्याप पगार प्रणा ग्यारमा विषम । इममे पागा forty पार मेला प्रा शिक्षा पगम -arrfanimirrr In बयान पर विमरे। हममे efirreat Trirrareerfare! TEEL HTTATREntrimmer for free ११८ हिन्दी-पद्य रचना इम का आधा किया तो एक प्राया। एफ वियम है। इसलिये गुरु लिखो । अव यह रूप हुआ-5 ISIS इस प्रकार चार वरणों के प्रस्तार का छठा रूप यह हुआ- 1515 और सात वर्गों के प्रस्तार का पॉचवॉ रूप---Sss उद्दिष्ट उद्दिष्ट उस रोति को कहते हैं, जिससे यह बताया जाता है कि अमुक रूप का इतने वर्गों के प्रस्तार में कौन-सा भेट है। रीति यह है कि जितने वर्ण हो, उतने के नीचे एक से लेकर दूने अक लिसता चला जाय, फिर जितने अक लघु के नीचे पड, उनको जोडकर उनमे एक मिला दे, वही उत्तर होगा। जैसे, चार वर्ण का । ऽ ऽ । रूप कौन-सा भेद है ? यह जानना है, तो उसे इस प्रकार लिसो- ISSI १२४८ एक और आठ लघु के नीचे पडे हैं, उन्हे जोडा तो नौ हुये । उसमें एक मिलाया तो त्स दृये, यही उत्तर है। ,

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Hindi Padhey Rachna

Author
Tripathi,ram Naresh
Title
Hindi Padhey Rachna
File name
Hindi Padhey Rachna
Text
OCR done
Citation
1933
Published
2011/01
Publisher
Hindi Mandir Prayag
Language
Sanskrit
Pages
126
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546495
Barcode
4990010024965.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
1pjczboR924
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