Sanmati Library, Jaipur

Padmala

Balvantrav Bhaiya Sahab · 2009/09

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

श्रीभागवतभक्तिनिधि,
श्रीमन्त सरदार वलवन्तराव भैयासाहेब सिन्दे,
सी. वी. ओ. मदारुल-मुहाम,
Fች ና ቶ ች ቾን
राज ग्वालियार.

No text on this page.

----
SZSAZSAD22525252SA?
गातार ॥श्री॥
654
ATIVE
(2,
पदमाला।
ਬਬਲ ਬਣਦੀ
Sanelenoist
MANY
श्री राधाकृष्ण चरा कमल चञ्चरीक,
श्री भागवत भक्तिनिधि श्रीमंत सरदार
बलवंतराव भैया साहब सिंदे,
सी. वी. ओ., मदारुल-मुहाम,
राज ग्वालियार
SA
कृत।
जिसे पं० लक्ष्मीनारायण ज्योतिषी जनकगंज
AAISA
लश्कर गवालियर ने
आलीजाह दरवार प्रेस गवालियार में
मुद्रित कराकर प्रकाशित किया ।
संवत् १९७२, सन् १९१५ ई०
चतुर्थवार १,००० प्रति।
SEAS
इसका सर्वाधिकार स्वाधीन रखा गया
है
S25277777727577SE

No text on this page.

[[ श्रीराधारमणोजयविना
भजन मूसिका.
इस महाघोर कलिकाल में संत, साथ,
सत्पंथ, सदाचरण, आचार, विचार, ऐसे रहगये हैं।
कि जैसे दुष्काल में किली २ कुंवे पर खेती की
हरियाई दिखाई देती है. तथापि इस भारतवर्ष की
भूमि पर हरिभक्त भी विद्यमान हैं, और
मुमुक्षु
भी
विद्यमान हैं.
जो बड़ा संशय मुमुक्षुओं के चित्तमें धैर्यगलित
करदेनेवाला होता है, वह यह है कि,
"किस मार्ग से संसार निवृत्ति और प्रभु की प्राप्तिहोवे"
हुतसे सज्जन पुरुष इसीके शोध में भटकते
हुए निराश होकर बैठ जाते हैं, और अपने इच्छित
फल प्राप्ति को नहीं पहुंचते हैं.

प्रभुशाप्ति का मार्ग कुछ छिपा हुआ नहीं है, सीधी सड़क पड़ी हुई है, परंतु लोग गली कूचों में भटका करते हैं, और ठोकरें खाया करते हैं, सीधा मार्ग नहीं चलते, क्योंकि लोकस्वभाव ऐसाही हैं, कि जो सरल और सुलभ उपाय है उसपर विश्वास नहीं आता, जो कठिन और दुर्लभ है वह बन नहीं पड़ता. सव वेदों का भेद और संतों के अनुभव का सार यह है कि सदाचरण से प्रभु का नाम लेते रहिये, सेवा करते रहिये, नमस्कार करते रहिये, उनके चरणों में चित्त लगाये रहिये: इसी जीव की निस्संशय कृतार्थता है. जैसाकि श्रीगीता में स्वतः पूर्णपुरुषोत्तम सच्चिदानंद, आनंदकंद, श्रीगो- विंद ने कहा है. श्लोक. मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मासेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ १॥ से मार्गों के गली कूचों में भटक लिये हैं. वातें तो सब करते हैं, परंतु रहनी कठिन है, हम भी (३) और पदार्थ दूर है. सार की बात यह है कि जैसे कूप हुआ डोर को दृढ़ पकड़ लेता है, इसी प्रकार श्रीमन्नाम को दृढ़ पकड़े रहिये, बेडा पार है. में इवता यद्यपि यह बात सत्य है तथापि बहुत कालतक और बड़े दूरतक साधकों के चित्त में नाना प्रकार के संशय और अनेक भांति के विकार उठा करते हैं, जैसे हम पर श्रीगोविंद की कृपा है अथवा नहीं है, होवेगी किंवा नहीं होगी, कब करेंगे, क्या करेंगे, इस मार्ग में अपना कहांतक प्रवेश हुआ, साधन हमारा ठीक है अथवा नहीं है, भजन में मन नहीं लगता, चित्त नहीं ठहरता, लयविक्षेप बहुत होता है, इत्या- दिक संकल्प विकल्प बहुत उठा करते हैं. इस प्रकार के सन की भ्रमना से भजन में शिथिल- ता आजाती है, उत्साह बैठ जाता है, कोई २ इतर साधनों को स्वीकार करलेते हैं, कोई अभागी लोग कुछ काल साधन करके त्याग भी देते हैं, . परंतु साधकों को इन संशयों की ओर किंचित भी लक्ष देना उचित नहीं है, क्योंकि मनुष्य सत्व,

(४)
रज व तम, इन तीन गुणों से बना हुआ है. जब
रज, तम, गुणों की वृद्धि होती है तब यह दोष बढ
जाते हैं, जब सत्व गुण की वृद्धि होती है तब यह
दोष घट जाते हैं. यह सब गुणों का खेल है, जैसे
शरीर में कफ वात बढ़ने से जो मनुष्य रोगी
होजाता है, वह शुद्ध पित्त के जागृति से निरोगी
होता है, इस कारण भजनरूपी मात्रा से सतोगुण
बढाते रहना, और दशांग का काढ़ा जो श्रीमद्भागवत
में लिखा है।
--
( १ निवृत्ति पर शास्त्रों का अवलोकन. २ तीर्थोदक का
सेवन. ३ विरक्तजनों का संग. ४ एकांत निवास.
५ पिछली पांच घड़ी रात की जागृति. ६ निष्काम
कर्म. ७ वैष्णव दीक्षा. ८ श्रीगोविन्द का ध्यान. .
९ सात्विक मंत्र..१० चित्त शोधक संस्कार ) इनका
सेवन करते रहना उचित है, जिससे सत्वगुण की
वृद्धि और पूर्वोक्त दोषों की निवृत्ति होती है.
इसी प्रकार से दोष निवृत्ति के हेत साधक को
शरीर का परिमित अहार, विहार, निद्रा, जागृति से
निरोगी रखना अत्यंत अवश्य है; क्योंकि परमार्थ
के घुड़दौड़ का घोड़ा तोशरीर ही है, जो बाजी.लंगडा
होगया तो बाजी कौन जीतेगा.

( ५ )
यद्यपि पूर्वोक्त दोष बहुत दूरतक पीछा नहीं
छोड़ते, तथापि इन उपद्रवों के भय से भजन में
शिथिल न होना चाहिये, क्योंकि केवल भजन ही
सब दोषों का नाशक है-तत्व की बात यह है:-
॥दोहा॥
कबहु उपेक्षा ना करें, त्यजत न निज जन पक्ष ।
विश्व विदित गोविन्द वृत, यापर राखिय लक्ष ॥
श्रीपूर्णपुरुषोत्तम भक्तकामकल्पद्रुम अपने
पाद पद्म प्राप्ति के उत्सुकों की कभी उपेक्षा नहीं
करते, और अंगीकार करके कभी त्याग नहीं करते, यह
प्रभु का जगविख्यात बाना है, जिस कार्य में
त्रैलोक्यपति की सहायता है, उसके सिद्ध होने में संशय
क्या है, इस कारण किसी भी साधक को निराश
होना अथवा मन मलीन करने का कोई कारण नहीं
है. शुद्ध संकल्प का बाण निशाने पर ही खटकता है
बीच में नहीं अटकता.
मुमुक्षु को केवल ईश कृपा के शुद्ध लक्षण पर ही
लक्ष रखना योग्य है.
1

-
प्रथम लक्षण यह है कि जब मनुष्य के चित्त में
ईश्वर शप्ति की. अभिलाषा उत्पन्न हुई, सोई समझ
लेना कि श्रीजगदीश्वर के उम्मेदवारों में उसका
नामोल्लेख होगया, क्योंकि यह इच्छा तभी होती है
जबकि अनंत जन्मों के पापों की निवृत्ति होकर
प्रभु सन्मुखता का समय समीप आता है,
जब अधिकतर लालसा होकर श्रीवैष्ण दीक्षा
ग्रहण करी, और श्रीमन्नास की चमकीली चपरास
हृदय में पड़ी, तब साधक ने समझ लेना कि वह
जगदीश की साधारण प्रजा संख्या ले पृथक् होकर
उसे श्री हरिदासवर्ग का सौभाग्य प्राप्त हुआ. वह
पदवी चाहे जिस छोटे कोटि की होवे, तथापि है वह
राजघर की नौकरी, कुछ भी हो अब वह सरकारी
नौकर होगया. यदि कोई अपराध भी वनपड़े तो
उसे अब राज्य अधिकारी ही उसके अपराध का
निर्णय करेंगे और शिक्षा देवेंगे. [Departmental inquiry
and punishment] इतर प्रजा के समान पुलिस नहीं
खींचे २ फिरेगी, मिरची का तोबरा नहीं चढावेगी,
न चीरके काठ में लगावेगी; क्योंकि श्रीमन्नाम की

(७) महिमा अपार है, और दीक्षा के संस्कार का प्रभाव अतयं है. दीक्षा संस्कार अर्थात् गुरुद्वारामंत्र ग्रहण करना, यह भगवन् मार्ग में मुख्य है और परमार्थ के सुंदर मन्दिर का पाया यही है, इसके बिना देवालय नहीं खड़ा होगा. मनुष्य जन्म होते ही देह रूपी मिट्टी की मठी तो खडी होही जाती है, परंतु दिव्य देवालय जिसमें जगदीश्वर की मनोहर मूर्ति झलका करे, और नित्य आनंद के नगारे गरज़ा करें, वह सच्चिदा- नंदखरूप देवघर नहीं बनता, इस हेतु से प्राणी- मात्र को अपनी कृतार्थता के निमित्त दीक्षा लेना अत्यंत अवश्य है. इस दीक्षा के संस्कार का प्रभाव कुछ ऐसा विलक्षण है कि नर का संबंध गुरु परंपरा द्वारा श्रीमन्नारायण तक करा देता है, और एक नवीन दिव्य वंशवृक्ष खड़ा करके जो अपने गुरुजनों की . भजन संपत्ति है, उसका विधिपूर्वक दायभागी कर- देता है, नहीं तो एक जन्म में मनुष्य कितना साधन करेगा, और उससे क्या प्राप्ति करलेगा, काम तो जब ही पड़ता है जब गुरुजनों की धरी धराई धरोड़ हाथ .

,
(८)
लगजाती है, जैसे किसी साधारण मनुष्य का पुत्र
किसी बड़े घर में दत्तक होने से दत्तक लेनेवाले के
संपत्ति का दायभागी होता है, इसी प्रकार दीक्षा
संस्कार से मनुष्य अपने गुरुजनों की भजन संपत्ति
का दायविभागी होता है.
वेद शास्त्र में दो प्रकार की संतति है, एक वीर्य
संतति, दूसरी शब्द संतति. वीर्य संतति तो सबको
व्यक्त है, जैसे पिता के रेत से पुत्र उत्पन्न होता है.
शब्द संतति वह है, जिसका श्रीगुरु के द्वारा वीजमंत्र से
शिष्य के हृदयकोश में भगवत्तत्व का प्रवेशरूप गर्भा-
धान होता है, जैसे माता के उदर में गर्भ बढ़ते २ क्रम से
साढ़े तीन हाथ काजवान पट्ठावनजाता है इसी प्रकार से
भजन द्वारा वह गर्भ बढते २ सच्चिदानंद दिव्यदेही
होजाता है, वह यही देह है जिससे श्रीतुकाराम
महाराज वैकुंठ को गये और श्रीविठ्ठल नाथ महाराज
अपने शिष्य सहित नित्य लीला में प्राप्त हुए.
जब जीव प्रभु का भजन करने लगा सोई
मुमुक्षु को समझ लेना चाहिये कि उसे सेवा का
अधिकार नियत होगया, प्रभु की भजनसेवा जो मिली,
,
..

(९)
उसे अपना धर्म जानकर निर्वाध करते रहना. जब
श्रीहरिभजन में मन लगने लगा, वृत्तियां रुकने लगीं,
विषय वासना घटने लगी, स्वामि के रूप में, लीलामें;
नाममें, धाम में आनंद आने लगा तब जानो कि यह
प्रभु प्रसाद का लक्षण है. सरकार में सेवा का स्वीकार
हुआ, इनाम मिलने लगी, प्रतिदिन बुद्धि की शुद्धता,
मन की निर्मलता, ज्ञान का प्रकाश, भ्रम का नाश,
होने लगता है. सग्रंथ, सत्पंथ, सदाचार, सद्-
व्यवहार में रुचि बढने लगती है. श्रीहरि लीला कथा में
प्रीति होने लगती है. सनलची बात को ग्रहण करने
लगता है, देह में दिव्य शक्ति का संचार होता है,
यहां तक कि
तक कि मनुष्य सत्यव्रत,
सत्यव्रत, सत्यसंकल्प
होजाता है. यह स्पष्ट लक्षण हैं इसपर सतत लक्ष
रखना, इतर भ्रमणा में नहीं पडना, यह सीधी बात है.
यह परमारथपंथ सिद्ध शास्त्र है जैसे दो और दो चार
होते हैं. अनुभव गम्य है, इसमें कहने सुनने की बात
नहीं, वाद विवाद का काम नहीं, संशय करने का
प्रयोजन नहीं, क्योंकि यह वस्तुप्रभाव है, जैसे
अग्नि जलाता है और जल शीतल करता है, सच्ची

(१०) बात है, सच्चों ने कही है, और सच्ची है. आप्तवाक्य पर विश्वास रखकर उत्साहसह भजन करते रहना, और सत्यत्व का अनुभव लेते रहना, यह जीवों का कर्तव्य है, और यही धर्म है. यह हमारे साठ बरस के अनुभव की बात है जो मानेगा गुण गावेगा, नहीं तो पछतावेगा, ॥ दोहा ॥ कृष्ण कृष्ण दिन रैन कहि, जे जन समय विताएँ ॥ ते प्राणी वैकुंठ को, रोक टोक विन जाय ॥ १ ॥ बलवंतराव सिंदे, ॥ श्री॥ पदमाला के पदों की अनुक्रमणिका। संख्या. प्रथम चरण. पृष्ठसंख्या. .... .... .... .... .... .... २ २ ३ ३ ५ ८ जैजै १ जै गणनायक जन सुखदायक २ मतिबरदानी शारदरानी ३ जै प्रभु चैतन चंद ४ जै गौरदेव पूरण कृपाल ५ करुणाकर देव गौर चन्द्र चरण ध्याऊं ६ जैजै गौरांग उदारा ७ जग मोहन मन मोहन वृषभानुसुता ९ वंदे नंद कुमार १० जागो मोहन जागो श्याम ११ जय जय जय जगदीश हरे १२ द्रवहु दयानिधि यदुराई .... १३ सुनिये दीन दयाल .... १४ हे श्रीमाधव धाउ मुरारी १५. श्रीहरि परम कृपाला.... १६ कलिमलमूल कठिन जौरा १७ श्रीराधे पदपंकज .... .... .... ur .... .... .... ७ .... .... ८ .... ... ८ ९ .... .... .... १० ११ २ पदमाला के पदों की अनुक्रमणिका । पृष्टसंख्या. प्रथम चरण. संख्या. १२ १३ १३ .... .... .... १३ ४ १४ १५ १५ .... .... .... .... .... .... .... १८ हे हरि अबढरदानी १९ यहि हित आयो शरण तुम्हारी २० कबलों रहौ योगनिद्रा में २१ कैसे ठाडे हो धारि मौन गोपाला २२ हे प्रभु परम सुजान २३ भज मन कृष्ण हरे २४ हरे कृष्ण जय राम कृष्ण २५ जय जय केशव जय नारायण २६ हरे राम हरे राम हरे राम हरे २७ हरये नमः हरये नमः २८ हरि हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः २९ भजु मन गोविंद गोविन्द श्रीगोपाल ३० गोपाल कहो गोविंद कहो ३१ जय कृष्ण कृष्ण गोपाला ३२ जिन कृष्ण का नाम सनेह लिया ३३ श्रीकृष्ण चंद्र कृपालु स्मर नित ३४ भजो मन निसदिन राधे श्याम .... ३५ इक नाथ नाम आधारा ३६ शाम के घर जाये हमदास ३७ हमारो जीवन दंपति पाय ३८ राजत श्याम राधिका जोरी ३९ जुगल छवि निरस्त नैन सिरांय.... .... .... १६ १७ १७ १८ १८ १९ २० २० २१ २१ २२ २२ २२ २३ .... .... .... .... ४० श्रीराधा माधव पद पंकज :

पदमाला के पदों की अनुक्रमणिका । ३ संख्या, प्रथम चरण. पृष्ठसंख्या. २३ .... .... .... २४ २४ .... .... २५ २६ २६ २७ .... २७ .... .... २८ .... २९ २९ ४१ अति सुंदर मनमोहनि मूरति ४२ बांकी छवि वांकन ४३ क्या बनी मनोहर छवी आज बनवारी ४४ अति प्यारी मोहि लागे राम ४५ परम माधुरी हरि मूरति तू देखीरी ४६ वेचैन हुआ दिल मति गति भूली मेरी ४७ पीपी के माधुरी सुरस मगन रहते हैं ४८ रे मन मानु बिहरि वृन्दावन ४९ क्या मोर मुकुट मुरलीवाले की छवि है ५० सांवलिया साहु हमारा ५१ जो भजन भक्ति की रीति संतजन गाई ५२ खुली समाधि लगावे ५३ क्या सोया गफलत में प्यारे ५४ भजन कुछ करले नरहरि का ५५ बन अब तू साहब का बंदा ५६ प्रभु का भजन करो भाई ५७ भजन नहिं खेल तमाशा है ५८ - हम अपने रंग में आप मगन रहते हैं ५९ अब उनको इस दुनिया से काम भी क्या ६० मुख सूख गया दिन रात पुकारा करते ६१ हरिदास नहीं दुनिया की चाह करते हैं ६२ वाणी का छल बडा बिकट है ६३ धन्य धन्य गुरुसाहब (खेचरी मुद्रा) ३० .... .... .... ३२ ३३ ३४ ३५ u .... .... .... ३८ .... ....

पदमाला के पदों की अनुक्रमणिका। पृष्ठसंख्या. प्रथम चरण. संख्या. ... ४० ... ४ .... .... ४१ ४२ .... ४३ . .... ४७ .... .... ६४ पूर रहा है घट घट साहब ६५ सबमें भरा है साहब.... ६६ आपहि जल थल कमल आपही ६७ जो जीव भूलगया तुम्हें ६८ खेल माया का है भारी ६९ अभी तक आँख नहीं खुलती ७० आँख अब खोल देख भाई ७१ यह विषयवासना छोड अरे ७२ सांस श्री गुरुचरणन नाई (ज्ञान दीपक) ७३ किशोरी पुजवहु मोरी आश ७४ श्रीपद रुचि मन मोर ७५ दयानिधि नेक कृपा करि हेरो ७६ किशोरी केवल बल मोहिं तोर ७७ हमारी सुध लेहु गाधिका माई ७८ मात विन कौन सम्हार करें ७९ बालहठ पूरी कोन करै ८० नहिं तीन भुवन में पतीतपावन पायो ८१ जगदंब जगत अवलम्ब भक्त सुखदानी ८२ तुमसम कौन स्वामिनि दानी ८३ सांची तुमाह एक जगदानी ८४ रट लागि रही निस दिन जियकों वृषभानु दुलारी जै वृषभानु दुलारी मात अवढर दानी · .... .... ४८ .... ४९ .... .... .... ५० .... ५१ ... ५१ ५२ ५३ .... i ५४ पदमाला के पदों की अनुक्रमणिका । संस्था, प्रथम चरण. पृष्ठसंख्या. ५५ ५५ .... .... ५६ ५६ ५७ ... .... ५९ .... ५९ .... ८७ स्वामिनि चरण गहों शिर नाई .... ८८ दीनानाथ दयाल दीन प्रतिपाल.... ८९ ऐसो को दयाल दिनदानि ९० तुम्हारे करुणा के बलिहारी ९१ प्रभु तुम कीन्ह अनुग्रह भारी ९२ तात मात पति भ्रात सखा गुरु.... ९३ तुम बिन नाथ कोन पै अब मैं.... ९४ जो तुमसा हो कोई देव बनादो हमको ९५ प्रगटे गौर देव जगाई १६ तुम सम गौर देव को दानी ९७ भक्तन के बंधन तुरतहि दिये निवेरी ९८ शचि नंदन खेलत होरी २९ हे महाप्रभु चतन्य सुधाकर १०० धनवन्य प्रभु चैतन्य गाथ जगतरी १०१ सुनके वडा दरबार तुम्हारा १०२ डंके हैं त्रिभुवन नाथ नाम के तेरे १०३ वृजराज सुनहु महाराज विनंती मेरी १०४ दुर्घट संकट आपडे भयंकर भारी.... १०५ स्वामि बिन ऐसो कौन दयाल १०६ नाथ विन को पति राखन हार ... १०७ दीन हितकारी मोरा नाथ १०८ मैं अस श्रवन सुनी वृजराज १०९ सुनिये अरज हमारी... .... ६० ६० ६१ ६१ ६३ । .... .... ६४ .... ६४ . ६५ Unr .... ६८ .... .... ६८ ६८ .... ६ पदमाला के पदों की अनुक्रमणिका । पृष्ठसंख्या, संख्या. भथम चरण. ६९ .... .... .... .... .... .... .... .... ७२ .... ७२ .... .... .... .... ११० सुनिये दीनदयाल १११ दरश अब दाँजे श्रीनंदलाल ११२ श्याम मुख देखे ही परतीन ११३ सेवक न जियेंगे ११४ रहते हैं व्यथित ११५ दीनानाथ कहां लगाई देर ११६ सोचत मोहिं बहुत दिन बीते ११७ मनकी भीति मोहिं अति भारी ११८ ऐ मन मूढ सुभाव आपनो ११९ जग षट बैरी बलवान १२० प्रभुकी महिमा अगम अपार १२१ कृपानिधान सुजान प्राणपति १२२ दयानिधान सुजान प्राणपति १२३ प्रभु विन को भव विपत हरे १२४ बहुत दिन टारो अब न टरै १२५ नाथ दिन बीत गये बहुतेरे १२६ कृपा गुणगाथ नाथ किम गाऊं .... १२७ कृपा गुणगाथ चहूँ १२८ कृपानिधि चरण शरण अब दीजै १२९ करि साधन हारे १३० अपराध मेरे जिन ध्यान धरो १३१ हमारो जीवन नाम तिहारो १३२ तुम बिन आन उपाय न मोरे ७४ .... .... .... .... .... .... .... दिस छाई .... .... ত .... '.... ... তও .... .... .... .... .... ७९ पदमाला के पदों की अनुक्रमणिका । संख्या. प्रथम चरण. पृष्ठसंख्या. .... ७९ .... .... .... ८१ .... ... ८२ .... ८२ .... .... .... ८३ .... पै .... ८५ ८५ .... १३३ चरण गहों विनवहुं कर जोरी १३४ विनवत बीतो वृजनाथ समय १३५ अब कव कृपा करहु राधेवर १३६ काहु दिन कृपा होयगी स्वामी १३७ जन्म योंही बीतो जात बिहारी १३८ तुम्हीं पे रचो है सुहाग १३९ लगन तोसे लागी रे घनश्याम १४० दिन रैन झरोके नैन लगे रहते हैं १४१ कुर्बान जान सूरत १४२ जबसे देखी झलक तुम्हारी ११३ कमल मुख कवलों दुराये रहोगे १४४ जबसे देखे श्याम सुन्दर १४५ कवन परे ऐसी विपता में १४६ देखी जबसे मोहनि मूरति १४७ वृज वीथिका बजार मोहन १४८ जवते श्याम गये मधुवन को १४९ हेली अबलों हरि नहिं आये १५० घनश्याम तुम्हें हेरत हेरत १५१ कहां गया वह पीतम प्यारा १५२ अरी दई मारी जरो यह होरी १५३ कैसे दूर देस मोहिं डार दई १५४ जाकी व्यथा सोई इक जाने १५५ ऊधौ कौन जतन अब कीजै .... .... .... ८६ ८६ ... ८६ .... .... .... ८७ .... ८८ ८८ .... ८९ .... ८९ .... .... .... ९० ९० .... .... ....

८ पदमाला के पदों की अनुक्रमणिका । संख्या. मधम चरण. पृष्टमया. .... .... ... १२ .... .... .... .... ९४ .... .... ९१ .... .... ९५ १५६ श्याम मुख देखन को वृज तरसे.... १५७ ऊधौ निसदिन धरकत छाती १५८ ऊधो तुम तो परम सयाने १५९ ऊधो मन नहिं पास हमारे १६० ऊधो प्रीत करी पछतानी १६१ उनहीं सों लागे नैन हमारे १६२ मेरो नेह लग्यो हरिसों सजनी १६३ सुरत वृजचंद्र की आवे १६४ श्याम बिन ना खेलोंगी १६५ हमारे भाग परो है नेह १६६ हमारो कछुहु न और उपाय १६७ सुरत मोहिं मोहन की आवे १६८ सुरत नहिं बिसरत पीतम की १६९ मन उरझो श्रीगोविंदसों १७० अँखियाँ वृजकिशोर निरखन को १७१ कहु सजनी प्यारी १७२ कहा कहूं कछुकहि नहिं आवे १७३ चकित चित प्रीतम प्रीति निहार .... .... . ... ९८ ९८ .... .... .... .... १०२ १०३ १०३ .... १७४ सुन आवन की बात.... १७५ सखी को इनमें नंदकुमार १७६ कवन को यह बालक सुकुमार १७७ मन मोहन महलन आज चलो १७८ करपकरिप्रीतयुत बोलत नारि सयानी १०३ .... . १०५ .... पदमाला के पदों की अनुक्रमणिका । संख्या. प्रथम चरण, पृष्ठसंख्या. .... .... १८१ कृपा १०६ .... १०६ .... १०७ १०७ .... १०८ १.८ १०१ १०९ १ .... .... .... .... .... ११० १७९ गनसों मोहन अब न टरो १८० में ढिंगसों जिन जाय सँवलिया.... १८१ में बलि जाऊं बारवार १८२ मगन मन चरण सरोज निहार .... १८३ मोहिं अब और न चाह रही तुम्हरी सब काज कियो १८५ रहत नाथ नित निकट हमारे १८६ नहिं आसक्तों से पीतम होते न्यारे १८७ हमारे को भटके अब भाई १८८ नाहि इच्छा अव शेप रखी १९८ राधिका वल्लभ के बल जैहों १९० आज नंद घर वजत वधाये .... १९१ माई वाके कौन कौन गुण गैये १९२ सकल खल दल दनुज १९३ जव माधव आगमन किया १९४ फूल रही फुलवाई .... .... १९५ आई वसंत ऋतु सुखदाई १९६ मुख मुरली मन मोहनि मूरत १९७ सघन वन कुञ्जन सुखदाई १९८ झुलत लाडिली धनश्याम ३. १९९ झूलत कुंज राधा श्याम २०० झूलें श्यामा श्याम सरस ऋतु २०१ हिंडोरो झूले श्रीवृषभानु कुमारी .... १११ .... .... .... १११ .... .... ११२ ११२ .... ११३ .... ११३ ..:. ११३ .... .... . .....११५ ....

.... पृष्ठ संख्या. .... २०२ प्रिया संग ११७ ११७ .... .... ... ११९ ११९ १२० १२० .... .... .... .... .... .... १० पदमाला के पदों की अनुक्रमणिका । संख्या. प्रथम चरण. झूलत कौन नई २०३ झूलत श्यामा श्याम चलोरी २०४ झूलत श्याम राधिका गोरी २०५ श्रीदंपति पद पंकज शोभा २०६ जा नैयाके जुगल खिवैया २०७ जिन भूलेहु प्रभुकी शरणलही २०८ यदुपति चरण कमल बलिहारी पद मराठी भाषा। २०९ येईबा गुरुराया २१० कुठवरि प्रभु उपकार आपुले २१२ कांवसला रुसोनि कैसा २१३ माझा जिवाचा जीवणा २१४ कृष्ण धदा गोविंद वदा ११५ जयराधा कृष्ण जयराधाकृष्ण २१६ ही दुष्ट वासना सुटे न २१७ काय हरिमायेची लीला २१८.चरणीं देई ठांव .... २१९ देई दर्शन दासा पंढरी २२० वृन्दावन सोडुनी २२१ दुरुनी आलों चरणा पाशी २२२ किती दिवस तरी राहाशिल २२३ कोणते साधन करूं भेटी साटी .... .... .... .... .... .... .... .... १२१ १२१ १२२ १२२ .... १२३ १२३ १२४ १२४ १२५ १२५ १२६ १२६ १२७ .... १२८ १२९ .... .... ... .... .... .... .... .... .

पदमाला के पदों की अनुक्रमणिका । ११ संख्या. प्रथम चरण. पृष्ठसंख्या. ... .... ... .... .... .... १३० .... १३० १३१ १३१ १३२ १३२ १३३ १३३ .... .... . .... .... .... .... .... .... २२४ कोणाच्या मुखाकडे पाहूँ २२५ यदुपती कधी मी पाहिन २२६ किंचित् इंदुवदन दाउनियां २२७ थकलें साधन झिजली काया २२८ कुठवरी दयाळा अंत पाहसी २२९ रूप पाहतां डोळे भरी २३० मन जडलें तव स्त्ररूपी पाहुनि.... २३१ स्वरूप अनुपम तुमचे पाहुनि २३२ जोडले नातें गोविंदासी २३३ नाम निकट सम्बंध गुरूनि २३४ नव्हता कांही सम्बन्ध २३५ येतानां जातानां पाहतां २३६ जरि तान्हें बाळ .... २३७ वत्स धेनुसी जरी २३८ चरणीं शरण आलों तुला २३९ चरणी शरण आलों देवा २४० अमुचे जीवन देवा तुमचे पाय २४१ आम्ही करावी कामना २४२ श्याम सुंदरी, सुखकरणी आत्मलाभ. २४३ माव भूमिका २१४ दोहा २४५ कुंडलिया १३४ १३५ १३५ .... १३७ .... १३८ .... .... १४० .... ... १४३ २१६ कवित्त - ॥ इति ॥

No text on this page.

॥ श्री॥ शुद्धाशुद्ध पत्र. पाठकजन कृपा करके इसके अनुसार पुस्तक शुद्ध करलें. पद संख्या. पद की पंक्ती सं. अशुद्ध. शुद्ध. ३ ५ जबत. जवते. नँद नद. m' नद नंद. घर जायो. १ ८ -८ ८ ८ १३ १४ १८ घर जा. पंथ. विनासै. भया. जावै. दुख दायक. विनासे. भये. नोवै. सुखदायक. ६ ४ २५ ८ वृज पाल. वृज बाल, २९ ४७ है. । २ सार, ५७ २१ छाई. छाई.

(२) ৩৩ पद संख्या. पद की पंक्ती सं. अशुद्ध. शुद्ध. ६४ ३ धर. घरे. ६५ ६ दंपति दंपती. ६८ १३ शक्ति. शक्ती. ५. सिरवर पानी. सिर पर पानी. तोड. तोडे. ६ तरतिल. तरलित. ८२ २ जिन. जिम. ८४ कृपासी कृपेश्वरी. ५ लावण. लावण्य. ८५ ललता ललता. ललता लालता. ८५ १८ ताप. तप. २ दानि. दान. १०१ देस से. दूर देस से, १०३ १३ सार. सारे. १०९ सकट, संकट. २ कलप. १२६ ८ छांऊं. १३५ गुण सार. गुण सागर. ११ बोरी. बौरी. पतिम. पीतम. १६९ ८ अली. आली. १७५ ५ धरी, १७७ वलवल. १ १ छाऊ. OM १ धरी सुधार बलवंत.

(३) पद संख्या. पद की पंक्ती स. अशुद्ध. १ १८२ २०२ २०६ २११ ३ ४ २११ ur ४ ६ २२३ २२३ २२३ २२१ २२५ २२५ २३५ moc रागन. मगन. मुसक्य. मुसक्यन. जक्त. जगत. याळिये ले तुम्ही टाळिये तुम्ही. के. वारंवार तुम्हा. तुम्हा वारं- वार. की. किंवा. मज. आता. माणनाथा. प्राणपति. काकन. कानन. श्रीपती. श्रीपदी. तद्विरहाने. त्वद्विरहाने. नसे दूजी माय बळवंता माय बलवंता दीनाची. होति ची. धरिली. सनाथ केले तुम्ही सनाथ केले. दशा. तीदशा. सुखाची ही. ४ दूजी न से. २४० २४० तुम्ही. २१० २१० ८ सुखाची. -- -

No text on this page.

॥ श्री ॥ 1 ॥ श्रीराधारमणो जयति अथ पदमाला प्रारम्भ पढ़ १, जै गणनायक जनसुखदायक, सबलायक जैसिद्धि- पती ॥ श्रीशंकरसुत मूरति अद्भुत, प्रथमपूज्य जै विमलमती ॥१॥ सिंदुरचंदन मुनिगणवंदन, विघ्न- निकंदन जनत्राता। करिवरआनन बंधु षडानन, संकट भानन सुखदाता ॥२॥ एक रदन ऐश्वर्यसदन जै, मदनकदनप्रिय धूम्रध्वजा ॥ मोदकग्रासन मूषक आसन, पालक दासन सुत गिरिजा॥३॥ जै चंद्र- भाल भुजबल विशाल, गल मणिन माल छविजाल भरी ॥ बलवंत भक्त पर वरद हस्त धर, करिय कृपा उर बसें हरी॥४॥ पद २. मतिवरदानी शारदरानी, गुणगणखानी जगजानी॥ हंसवाहिनी दास दाहिनी, प्रणत पाहिनी मुनि मानी ॥

पदमाला। २ ॥ १॥ शुभ्र सरूपा परम अनूपा, लखि सुर भूपा मोहि रहे ॥ जय जगव्यापक सुनिजनजापक, गुण- गणथापक विरद कहे ॥२॥ कर वीण विराजे पुस्तक भ्राजे, मतिनम माजे ध्यान किये ॥ मुकुट सीस पर तर, फटिक साल कर सुभव वलवंत विनय अस प्रभु उज्ज्वल यश, गावत जग निशिदिवस रहौं । करुणा कीजै अस बर दीजै, हरि रस भीजे गीत कहाँ ॥४॥ लिय ॥ ३॥ शुभ्र शोभ प्रद ३. जे प्रभु चैतन चंद, जै जै नित्यानंद ॥धृ॥ काम कल्प तरु दया वारि निधि, भक्ति दानि सुख- कंद ॥१॥ प्रेमपंथ जिन अवनि प्रचारो, हरे सकल दुख बंद ॥ २॥ नाम प्रताप प्रवल प्रगटाई, काटे साधन फंद ॥३॥ जवत प्रगट भये करुणाकर; किये द्वार जम बंद ॥ ४॥ जिहिं प्रभाव वलवंत बढ़तभे, जड चैतन नदनद ॥५॥ पद ४. जय गौर देव पूरण कृपाल, प्रभु भक्ति भरित मूरत रसाल ॥धृ०॥ अनुरक्त मत्त लोचन विशाल, , ३ 4 , पदमाला। जतु प्रगट प्रेम की दीप माल, उर्ध्व पुंड्र छबि शशि- रश्मिजाल ॥१॥ कंदर्प जाल कच कुटिल भाल, सोहत विशाल उर कमल माल, कुंडल कपोल जिम भानु लाल ॥२॥ भुजदंड सुमंडित बाजुवंद, मणि जटित कटककर अंधचंद, मंजीर ध्वनि पद मंद मंद ॥३॥ हग पात सित जन किय निहाल, घर जाय दास वलंबूत वाल, अब करिये कृपा मोपे दयाल ॥ ४॥ पद ५.. करुणाकर देव गौर चंद्र चरण ध्याऊं ॥धृ०॥ जड़ जीवन दिय उधार, कृरि केहरि कहि पुकार, कृष्ण कृष्ण वार वार, कहलौं झूण गाऊं ॥१॥ एक वेर कृष्ण नाम, लेते देत परमधाम, पूरण सब करत कामः चरण सीस नाऊं ॥२॥ घर जायो तोर दास, दीज पद तल निवास, धरम को प्रकाश पुनि, जगत में जगाऊं ॥३॥ तुमही बलवंत नाथ, धरिये कर कमल माथ, करिये अब मुहि. सनाथ, और कहां जाऊं ॥४॥ पद६. जै जै गौरांग उदारा ॥ बंदौं पद बारंवारा ॥धृ० ।

पदमाला। शचि सुवन अजव छवि धारी ॥ क्या मोहिनि मूरति- प्यारी ॥ चरणोंपे तन मन वारा ॥ वंदो० ॥ १ ॥ गौरेन्दु वदन युति न्यारी ॥ उपमा शोधत मतिहारी ॥ वह रूप अनूपम न्यारा ॥ वंदौ० ॥ २ ॥ लोचन भ्रभाल विशाला ॥ कर दंड कमंडलु साला ॥ वैराग्य भक्ति वपुधारा ॥ वंदौ० ॥३॥ श्रीकृष्ण नाम सुख राजे ।। मोहिनि मूरति उर भ्राजे ॥ झुमत आवे मतवारा ॥ ॥ वंदौं० ॥ ४ ॥ प्रभु पतितपाल करुणाकर ॥ महि- मंडल धर्म दिवाकर ॥ जीवोद्धारण व्रतधारा ॥वंदौ०॥ ॥५॥ नहिं शरणागत कोई छोडा॥ भव बंधन सवका तोडा ॥ करदिया वन्द जम द्वारा ॥ बंदो० ॥ ६॥ जो गौड़ देश वंगाला ॥ जहँ मोहनि मंत्र उजाला ॥ उसका परचारन वारा ॥ वंदौं० ॥ ७ ॥ जिस ओर दृष्टि प्रभु डारी ॥ नर नारी सुरत विसारी॥ श्रीकृष्ण नाम उच्चारा ॥ वंदौं० ॥ ८॥ जिन स्पर्श किया चरणों का ॥ मिटगया द्वंद दुख धोका ॥ पाया रस. भक्ति अपारा॥ वंदौ० ॥ ९॥ गुरुदेव दया अव कीजै ।। अस भक्तिदान मोहिं दीजै ॥ लख चकित होय जग सारा ॥ वंदौं०॥ १०॥ तुम प्रमुख पूर्वज सांई ॥ क्षमिये अपराध गुसांई ॥ मैं मूरख वाल तुम्हारा ॥ ॥ वंदो० ॥ ११ ॥ नहिं कुपुत्र को पितु माता॥ तज पढ़माला। ५ देते हैं सुखदाता ॥ वैसा है हाल हमारा ॥ बंदौं०॥ ॥ १२ ॥ करनीकर यदि कुछ पाया ॥ तन मन को नित्य तपाया ॥ फिर क्या अवलंव तुम्हारा ॥वंदौं०॥ ॥ १३॥ नहीं किया न कुछ करता हूँ॥ दिन रात पड़ा सोता हूं ॥ तुमपै है भरोसा सारा ॥ बंदौं०॥ ॥ १४ ॥ गुरुजनकी बडी कमाई ॥ वलवंत मुफ्त में पाई ॥ क्या अद्भुत भाग्य हमारा ॥ वंदौं० ॥१५॥ पढ़ ७. जग मोहन मन मोहन मोहिनि, अखिल विश्व जो मेरै ॥ सोद संगल दासन कह करै ॥१॥ परा शक्ति अव्यक्ति चराचर के अंतर संचरै ॥ बुद्धि तम- तोस तरणि लस हरै ॥२॥ भक्त जनन की जीवनि सोई दयाभाव उर धेरै ॥ दुःख दारुण दासन के हरै ॥३॥ बार वार वलवंत विनय करि सील कमल- पद धेरै ॥ मात रसनालों सुधारल झरै ॥ ४॥ पद ८. जै जै वृषभानुसुता, भक्त त्रातु मातु तुहीं, त्रिभुवन विख्यात जक्त, पापतापहारी ॥धृ०॥ धेनुद्विजन दुःख-

पदमाला।
-
६.
हरण, अखिल विश्व श्रेयकरण, तरुणतरणितजवरण, .
किरणबर पसारी॥१॥ ब्रह्मादिक वंद्य चरण,
विश्व पोषकरनि, हरनि अघ अनंत संत, सुनि वरन
विचारी ॥२॥ मांगत बलवंतराव, कृष्ण कमलचरण
चाव, वाढे नव नित प्रभाव, कीर्ति कुवरि प्यारी ॥३॥
पद ९.
॥
वंदे नंदकुमारं,श्रुतिसारम् ॥धृ०॥ नवनीरदसरस-
द्युतिसुन्दर वर पीताम्वरधारम् ॥ मत्तमयूरपिच्छमुकु-
टच्छवि परिरंभितकचभारम् ॥१॥ चंचल लोचन
युगलांचलजित पंचबाणशर जालम् ॥ मृदुल कपोल
चलन्मणिकुण्डल कुंकुमरंजितभालम् ॥ २॥ परम
कृपालु मनोहर मंगल सकलकलैकनिधानं ॥श्रीराधा-
भिधनिजसर्वस्वं वामांके विधानम् ॥ ३॥ मुरलीम-
जुलरवतरलीकृतगोपवधूनिकुरंबम्॥अमित प्रेमरसवर्ष
हर्षभरपुलकितभक्त कदंबम् ॥ ४॥ सुनिमानसचात-
कसंतर्पण चारु चरित्रमपारम् ॥ शरणागतकरुणावरु-
णालयमगणितगुणैरुदारस् ॥५॥ मामपि दिव्यनित्य-
दंपतिपदसेवाधृताभिलाषम् ॥ दीनमत्रबलवंतमेकदा
पश्य दृशा निजदासम् ॥६॥

पदमाला। ७ जागो मोहन जागो श्याम, जागो माधव हे सुख- धाम ॥ १ ॥ जागो कृष्ण दनुजदलघालक, जागोधर्म- विश्वप्रतिपालक ॥ २॥ जागो वाल पूतनाहारी, जागो सकटासुरसंहारी ॥३॥ जागो देव तृणासुरत्रासक, जागो गुपाल बकासुरनाशक ।। ४ ।। जागो केशव केशि- निकंदन, जागु गुविंद अघासुरखंडन ॥ ५॥ जागो चाणुरखलबलगंजन. जागो कंसअसुरमदभंजन ॥ ६ ॥ धर्मको नाश होत गिरधारी, आवो वेगि सुदर्शन- धारी ॥ ७॥ धर्म के एक तुम्हीं रखवारे, कर विनती बलवंत पुकारे ॥ ८ ॥ अष्टपदी ११. जय जय जय जगदीश हरे ॥ धृ०॥ हे जगवंदन कंसनिकंदन, दुखदलगंजन मोद करे ॥ १॥ धर्म उधारक संतनपालक, भवभयहारक विश्वभरे ॥२॥ सुमिरत जान अजान नाम तब, संकट कठिन कलेश, टरे ॥३॥ सुनहु विनय बलवंत दासकर, कहत नाथ पद सीस धरे ॥ ४ ॥ यह कराल कलिकाल जाल में, धर्म धेनु द्विज आनि परे॥५॥तुम्हरी ओर निहारि ८ पदमाला। कृपानिधि, व्याकुल विलपत हैं सगरे ॥ ६॥ धर्महेतु नरदेह धारि हरि, जुग जुग प्रति सव कष्ट हरे ॥ ७ ॥ अति विकराल काल जग छायो प्रगटौ प्रभु कर चक्र धरे ॥ ८॥ । अष्टपदी १२. द्रवहु दयानिधि यदुराई ॥ दनुजदलन खलमलन कलुषकुलदहन धर्महित चितलाई ॥धृ०॥ कलिमल- जलधिकलोल अमंगल प्रवलवढी बहु दुखदाई ॥ १ ॥ शुचि श्रुतिसेतु ससंकित कंपित व्यथित संतगण अकु- लाई ॥२॥सुरकुलमंडन असुरनिखंडन, पाखंडिन दंडन राई॥३॥ तव कीरति जगतारक तरणी, भवसरितातट लरखाई॥ ४॥लोभसुरामदअंधमंद जन, नहीं नीति- पंथ दिखराई॥५॥दारिद दलित दशादेशन की, धरा- धान्य नहिं उपजाई॥६॥विन जीवन जिमि सीन दीन तस, हीन दशा जन समुदाई ॥ ७ ॥ हे अनंत भगवंत करो वलवंत कृपा जग सुखदाई ॥८॥ अष्टपदी १३. सुनिये दीनदयाल धर्मप्रतिपाल, धर्महित तनु धारी ॥ १॥ संकट विकट कठोर घोर चहुँ ओर परोअव

पदमाला।
९
गिरधारी ॥ २॥ धर्म दिवाकर बदन दुरायो, छाई दश
दिशि अँधियारी ॥३॥ श्रीगोपाल गोपकुलमंडन धर्म
धेनु कह उद्वारी ॥ ४ ॥ अज्ञान-कंटकवन घन बाढ़ो,
सत पथ दुरे मोन्कारी ॥५॥ अनाचारआचारविचारन,
करे न कोऊ मतिधारी ॥६॥ श्रुति पुराण इतिहास
बिनाले, लुत भये आश्रम चारी ॥ ७॥ काल मान
बलवंत बिलोकत, रहे संतजन हियहारी ॥ ८ ॥
,
अष्टपदी १४.
हे श्री माधव धाउ सुरारी, कंसारी संकटहारी ॥
॥ धृ०॥ सहत तिमिर किलिमप घन छायो, दुरी शास्त्र
शशि उजियारी ॥ १॥ चतुर्वरण वर धर्म विनाले,
भया वर्णनकर भारी ॥२॥ सबके अंग अनंग प्रचारो,
भये नारि नर व्यभिचारी ॥३॥ लुप्त भये सब धर्म
सनातन, कुल मर्याद मिटी सारी ॥४॥ जिन
जलपर आधार धर्मको, तिनहिं अधर्मध्वजा धारी ।।
॥ ५॥ लागी वाड खेतको. खावन, कौन करै फिर
रखवारी ॥६॥ देखि विलक्षण गती कालकी, सुमती
रहे मौन धारी ॥७॥ वाट तकत वलवंत एकटक,
होत अवर गदाधारी ॥८॥

पदमाला। अष्टपदी १५. श्रीहरि परमकृपाला, मंगलमूल असंगलनासन अखिल विश्व प्रतिपाला ॥धृ०॥ सुठि शुचि सरस सरूप सुखद अति, विदितविश्व तिहुं काला ॥ १ ॥ अविरलअसल सरलगुणगाथा,गावत संत रसाला॥ २॥ अघवन दहनकृशानु धर्म कर, भानु ईश अविनाशी ॥ . ॥ ३ ॥ प्रणतपाल प्रणपाल कृपानिधि, सकलकला- वलरासी ॥ ४॥ सञ्चितघन आनंदकंद, वृजचंद करौ मत हांसी ॥ ५ ॥ कह कौतुक निरखतही लागत, धर्मधेनु गलफांसी ॥ ६॥ सतसंगति जो मूरि सजी- वनि, सहितमूल सो नासी ॥७॥ कहत विनय बलवंत जोर कर, कृपा करो अविनासी ॥ ८॥ ॥ अष्टपदी १६. कलिमलमूल कठिन जारौ, दीनबंधु दुखदुरित- विदारन, धर्महेतु हरि अवतारौ॥धृ०॥कलित ललित अति मृदुल मीनवपु, कृत चरित्र अद्भुत भारौ।। श्रुति- निधि मणिगुण ज्ञान अलौकिक, प्रलय उदधि मधि उद्धारौ॥१॥कमठकठिनपृष्टोपर सुंदर, मंदरगिरि हरि परिचारौ ॥ रत्न चतुर्दश कर्ष हर्षयुत, विबुधसमाज पदमाला। काजसारी ॥२॥ करिवरवेश वराह भयावन, शृंगनि भार धरा धारौ॥ भूरि भयंकर नरहरि तनुधारे, नखन उदर दानव फारौ ॥३॥ वामन विमल विप्र वनि श्री- पति, बाले छलि सुरसंकट टारौ ॥ वार त्रिसप्त निक्षत्रि महाकरि, सूर समूह गर्व गारौ ॥४॥ रघुकुलमंडल मंडन धृत वपु, कृत खंडन खल दलसारौ ॥ एकवचन इकवाण वामइक, दुरधर दशकंधर मारौ ॥५॥ उदरे यदुकुल कमलकलानिधि, प्रेमपंथ प्रभु संचारौ ॥ खलदल खंडि धर्ममंडन करि, कंस कुटिल भट संघारौ ॥६॥ परम दयालु विशुद्ध बौद्ध वपु, करि स्वीकृत जस विस्तारौ ॥ कल्कि कलेवर धारि सकल, भूभार टारि सव जग तारौ ॥७॥ धर्महानि लखि देह धरों दुखहरों यह श्री मुख उच्चारौ।। सो बलवंत वचन करि पूरण, धर्मधेनु दुख निरवारौ ॥८॥ अष्टपदी १७. श्रीराधे पदपंकज सिरधरि विनय विनीत सुनाऊं ॥धृ०॥ दास दौर देवी तुमही लौं, और कहां अव जाऊं ॥ १ ॥ जो कछु धर्मऽरु देशदशा भइ, तुम जानत कह गाऊं ॥२॥ होय भाग्य बस जो कछु

पदमाला।
१२
जग में, सो दुख चित नहिं लाऊं ॥३॥ पे न भलो
लागे लोगन यह, पुनि पुनि कहत लजाऊं ॥ ४॥
दीनदशा असहाय होय जहँ, तुम रानी वे राऊं ॥ ५॥
जो जन विपति न कहहुँ स्वामि सों, तो अव अंत
न ठाऊं ॥ ६॥ सब संतन की इती विनंती, कहि पद
सीस नवाऊं ॥७॥ करौ कृपा वलवंत स्वामिनी, यह
अभिमत फल पाऊं ॥८॥
अष्टपदी १८.
हे हरि अबढर दानी ॥धृ०॥ देव दयाकर भयहर
शुभकर सक उर अंतरज्ञानी ॥१॥ सत्य होय यदि
मम अभिलाषा, तौ करुणा उर आनी ॥ २॥ कृष्ण
कृपाचन पूरण कीजै, आतुरता पहिचानी ॥ ३॥ दुःसह
भयो स्वदेशधर्म दुख, अब नहिं जाय वखानी ॥ ५ ॥
ज्यों शिशु क्षुधित मात मग जावे, सांझ लमय जिय
जानी ॥५॥ तस अब नाथ तकत तब मारग, संत
ऋषी मुनि ज्ञानी ॥६॥ विमल नलिन लोचन दुख
मोचन, त्रिभुवन पति बल खानी ॥७॥ अव वलवंत
विलंब न कीजै, होत धर्म जग हानी ॥ ८ ॥

पदमाला। १३ पढ़ १६. चहि हित आयो शरण तुम्हारी ॥ धृ० ॥ विन मध्यस्थ स्वामिनी तुम्हरे, सुनिहै कौन हमारी ॥ जहं निसदिवस नोवतं वाजें, तृती कहा विचारी ॥१॥ अति कोमल चित परम कृपाला, श्रीवृषभानुकुमारी ।। कोउ विधि विनय स्वामिसों हमरी, कहिये राज- दुलारी ॥२॥ नहिं आधार धरा संतन को, छई दिसन दश अंधियारी ॥ अव वलवंत विलंब न कीजै, द्वारे कहत पुकारी ॥३॥ > पद २०. कबलों रही योगनिद्रा में, जागो धर्मध्वजाधारी ।। धृ०॥ करत पुकार सन्तमंडल सव, वार बार पद सिरधारी ॥ १॥ शंभु स्वयंभु स्वभू मुनि गणवर, कहत धर्म हित चितधारी ॥२॥ अवकी वेर अबेर भई, बलवंत मौन धारी भारी ॥३॥ पद २१. कसे ठाड़े हो धारि मौन गोपाला॥ विन कहे वनै नहिं काज आज नंदलाला ॥धृ०॥ है नाम तुम्हारा पदमाला। धर्मपाल श्रुतिलेखो ॥ क्या हुई धर्मकी दशा जरा तो देखो ॥ द्विज धेनु संतजन विकल रहत दिनराती। लखि देशदशा अरु धर्म धड़कती छाती॥ आया है धर्मपर संकट कठिन कराला ॥ १॥ त्यागो अब मोहन मौन काम है भारौ॥ इवत नय्या मझधार धर्मकी तारौ ॥ धरि जुग जुगमें अवतार धर्म उद्धारो। दुष्टनको करि संहार भार भू टारो ॥ कसि फेंद गाई तजि धावहु दीनदयाला ॥२॥ आ पड़ी धर्मपै चोट बड़ी अटपटकी ॥ सटकी सबकी मति लखिगति, समय विकटकी ॥ सब रहे देखते लोग, सके नहिं हटकी ॥ घटगे सब पुण्य प्रताप, आपसों अटकी । भइ प्रगट नाथ अव जग, अधर्मकी ज्वाला ॥३॥ भटकी सब जगहों तुम जानत घट घटकी॥ रख लीजो लाज महाराज, धर्म संकटकी ॥ प्रणपूरण अपनो करौ, सवन जिय खटकी॥ बलवन्त शरण अत्र लीन्ही, नागरनटकी ॥ अव धर्म धेतु आ फँसी, भयंकर जाला ॥४॥ पद २२. हे प्रभु परम सुजान कान्ह भगवान कृपा गुण- खानी॥धृ०॥ तुमसों कहा दुराव दयानिधि, अन्तर- पदमाला। १५ , गतिविज्ञानी॥१॥ नहिं धनधरनीधाभकामना, प्रभुता बल जग जानी ॥२॥ केवल धराधर्मवृद्धीहित, हिय अभिलाष समानी ॥ ३॥ सो बलवंत आस अव पूरण, करिये अवढर दानी ॥४॥ पद २३. भज मन कृष्णहरे, कृष्णहरे, कृष्णहरे ॥ रामहरे, रामहरे, रामहरे, श्यामहरे ॥धृ०॥तिहुंपुर मध्य नाम इकसाधन, सब भव व्याध अगाध हरे ॥१॥ अष्टसिद्धि नवनिद्धि सुखप्रद, किल्मिष कोटिन जन्म टरे ॥ २॥ जान अजान भजत हरि नामहिं, संकट कठिन कलेश जरे ॥३॥ मंगल मोद मई जग सारो, जिन लुमिरन हरि नाम धरे ॥ ४॥ निराखि निरखि पद पद्म दंपतिहि, रहत मोद बलवंत भरे ॥५॥ , पद २४. हरे कृष्ण जय राम कृष्ण, भज पुरुषोत्तम नरसिंह हरी ॥धृ०॥ मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, मुरलि मनोहर अधर धरी ॥१॥प्रणतपाल भक्तनके हित हरि, लीला जगमें विविध करी॥२॥व्याध गधि गज आदि उधारे,

पदमाला।
गणिका सुमिरत नाम तरी ॥ ३ ॥ भये मुचित बलवन्त
नाथके, चरणकमलपै ससि धरी ॥४॥
पद २५.
जय जय केशव जय नारायण, जय माधव गोविंद
हरी ॥धृ०॥ देवाकिनंदन दनुजनिकंदन, त्रिभुवनवंदन
कुशलकरी ।। १ ।। गोपिनरंजन खलमदगंजन, भयभ्रम-
भंजन मोदकरी॥२॥ सव जगनायक सब दुखदायक,
भववाधा वलवंत हरी ॥३॥
,
पद २६.
हरे राम हरे राम हरे राम हरे, भज मन निस
दिन प्यारे ॥ धृ०॥ नाम लेत मंगल दस दिसहूं,
पापसमूह हरे ॥ १॥ सुमिरत जान अजान जाहि
जन, संकट कठिन टरे ॥२॥ सुख अनंत बलवंत
ऊपजे, चातक रटन धरे ॥३॥
पद २७.
हरये नमः हरये नमः हरये नमः॥ कृष्ण यादवाय
नमः॥धृ०॥ गोपाल, गोविन्द,श्रीराम, मधुसूदन ॥१॥

पदमाला। १७ - - वृजपाल, जनपाल, नतपाल, जगवंदन ॥ २ ॥ नंदलाल, सुरपाल, प्रणपाल, खल गंजन ॥ ३ ॥ श्रीराम, सुखधाम, घनश्याम, मन मोहन ॥ ४ ॥ पद २८. हरी हरये नमः, कृष्ण यादवाय नमः॥ हरी हरये- नमः ॥ धृ० ॥ गोपीनाथ, गोपी वल्लभ, गोपी जन मन हरणा ॥ यादवनाथ, अद्भुत गाथ, गोपी जन जीवना ॥ हरी हरये नमः ॥ १॥ कृष्णाय', रामाय, गोविंदायनमः॥ यादवाय, माधवाय, गोपालायनमः॥ हरी हरये नमः ॥ २॥ , पद २९. भजु मन गोविंद गोविंद श्री गोपाल ॥धृ०॥ वासुदेव दामोदर माधव, श्रीमुकुंद नंदलाल ॥१॥ वदन इंदु कंदर्प दर्प दलि, मृगमद चरचित भाल ॥ २॥ सीस मुकुट कर लकुट भेष नट, अधरन वेणु रसाल ||३॥ कटि तटि पीत पाट पट सुंदर, उर विशाल वनमाल ॥४॥ वाम भाग वृषभानु नन्दिनी, रूप रासि जनपाल ॥५॥ सुराभ समूह गोप १८ पदयाला। गोपी गण, लिये संग बृजपाल ॥६॥ छवि अनूप बलवंत विलोकत, अंखियां भई निहाल ॥ ७ ॥ . पद ३०. गोपाल कहो, गोविंद कहो, नंदलाल कहो, जग- पाल कहो, अखंड आनँद सुःख लहो ॥धृ०॥ श्री- गोपीनाथ गदाधर गोवर्द्धन धारी ॥ मन मोहन मदन गोपाल श्याम जनसुखकारी ॥ जो मुक्ति चहो, कृष्ण कृष्ण दिन रैन कहो ॥१॥ घनश्याम सदा सुखधाम ब्रह्म बृज बन चारी ॥ केशव हरि कमला- कांत राधावर बनवारी ॥ बलवंत भजो, हरि परमा- नंद निमग्न रहो ॥२॥ पद ३१. जै कृष्ण कृष्ण गोपाला, गोवर्धन धर नंदलाला। ॥ धृ०॥ गोविन्द मुकुन्द मुरारी, बनवारी कुंजविहारी ॥ मनमोहन वंसीवाला ॥ जै कृष्ण कृष्ण गोपाला ॥१॥ माधव मोहन घनश्यामा, मुनिजन मानस विश्रामा ॥ करुणाकर दीनदयाला॥जै कृष्ण०॥२॥ सञ्चित आनंद गुणग्रामा, संकर्षण हरि सुख धामा॥ परमेश्वर परमकृपाला ॥ जै कृष्ण० ॥३॥ यदुवंस , ....

पदमाला। १९ ॥ बनज बन भानू, खल कानन दहन कृशानू ॥ श्रुति धर्म शत्रु उर शाला ।। जै कृष्ण० ॥ ४ ॥ राधे मुख चन्द्रचकोरा, श्रीगोपीजन चितचोरा ॥ राधे मन सगसि मराना । जे कृष्ण० ॥५॥ राधेवर रासविलासी, वृजचंद्र द्वारिकावासी ॥ जगदीश जक्त प्रतिपाला॥जै कृष्ण०॥६॥कर नकुट मुकुट सिरधारी, कांधे वर कामरि कारी ॥ संग सुरभिवृंद वृजवाला॥जै कृष्ण० ॥ ७ ॥ कटि तट पीताम्बर भ्राजे, मणि कौस्तुभ कंठ विराजै ॥ क्या अनुपम रूप निराला । जे कृष्ण ॥ ८ ॥ खग गज गणिका उद्धारी, वीनोद्धारन व्रत धारी ॥ तिहुं लोक सुयश उजियाला ॥ जे कृष्ण० ॥ ९ ॥ भवसिन्धु भयंकर भारी, विन श्रम उतरे नरनारी ॥ चढि नाम नाव तत्काला ॥ जे कृष्णः ॥ १०॥पीपी के रूप रस प्याला, बलवंत हुआ मतवाला ॥ गावत गोविन्द गुण माला । जै कृष्ण० ॥ ११ ॥ ॥ पद ३२. जिन कृष्ण का नाम सनेह लिया, तिन साधन और किया न किया ॥धृ०॥ जिन पिया सदा सुर- सरित नीर, तिन कूप का नीर पिया न पिया ।। १॥

२० पदमाला ! जिन ने प्रभु भक्ति धरी न हिये, सो नर तनु धारि जिया न जिया ॥ २ ॥ जिनके उर मांझ दया न बसी, तिन दान अनेक दिया न दिया ॥ ३॥ वल- वंत भये प्रभु के जन जे, तिन और का शरण लिया न लिया ॥ ४ ॥ --- ॥ पद ३३. श्रीकृष्णचंद्र कृपालु स्मर नित, घोर भवभय- भंजनम् ॥ धृ०॥ मुखइंदु मृगमद बिंदु गुण, गण- सिंधु राजिवलोचनम् ।। वर मुकुट मस्तक पीत पट कटि, तड़ित युति मदमोचनम् ॥ १॥ वामांग विल- सत शक्ति सुख, सौभाग्यप्रद जगजीवनम् ॥ द्युति देह दंपति जोति प्रजुलित, कोटि स्मरमदमर्दनम् ।। ॥ २॥ पदकंज सब सुखपुंज मुनि मन, मधुप निस- दिन गुंजनम् ॥ बलवंत हृदय निवास कृत भ्रम, भूरि भव भय भंजनम् ॥ ३ ॥ पद ३४. भजो मन निस दिन राधे श्याम, सच्चित धन मख धाम ॥ धृ०॥ आभिमतफल बरदायक सबको,

पदमाला।
मुनिजन मनविश्राम ॥ १॥ कृतआदिक में तप मख
पूजन, कलियुग तारक नाम ॥ २॥ धन्यधन्य बल-
वंत जगतजन, र₹ जे आठहु जाम ॥३॥
पढ़ ३५.
इक नाथ नाम आधारा ॥ भव बंधन भंजन
हारा ।। धृ०॥ चातक सी रटना धारी ॥ लग गई
सहज में तारी ॥ वरसे अमृत की धारा ॥ १ ॥ संबंध
जीव का सारा ॥ हरि नामहिसों निरधारा ॥ नहिं
कोई प्रभुहि निहारा ॥२॥ जिन नाम कवच तन
धारा । फिर जम है कौन विचारा ॥ बलवन्त यही
है सारा ॥३॥
पद ३६.
शामके घर जाये हमदास ॥धृ०॥ हमको कौन
काम की चिन्ता, कल्प तरू तलवास ॥१॥ निरखत
रहत जुगल पद पंकज, मगन सदा सुखरास ॥२॥
राखेंगी वृषभानु नंदिनी, सब विधि दृढ़ विश्वास ॥३॥
औरन सों अब काम कहा है, श्रीपद नातो खास ॥४॥
अब बलवंत आसरो पायो, भय भ्रम रह्यो न पास॥५॥

२२.
पदमाळा।
...
पद ३७.
हमारो जीवन दंपति पायें ॥धृ०॥ विठुरत विकल
होत जिय भारी, सुख होवत उर आयें ॥ १ ॥ पादपद्म
मधु चिन्मय निस दिन, चाखत नाहिं अघायँ ।। २ ।।
मगन रहत बलवन्त निरखि छवि, वार वार वलि
जायें ॥३॥
पद ३८.
राजत श्याम राधिका जोरी ॥ धृ०॥ नवल छवी
अद्भुत त्रिभुवंनते, लखि दृग सफल करोरी ॥ १ ॥
नीरद नील स्वामि युति सोहत, निपट स्वामिनी
गोरी ॥२॥ दंपति जस बलवन्त बखानत, वार चार
कर जोरी ॥३॥
पद ३९.
जुगल छबि निरखत नैन सिरांय ॥ धृ०॥ कोटि
मदन छबि छटा मनोहर, सो कस बरनी जाय ॥१॥
बाल वचन बलवन्त श्रवण करि, स्वामिन मन
मुसक्याय ॥२॥

पदमाला।
२३
पद१०.
श्रीराधा माधव पढ़ पंकज, भज मन त्यज जग
दुखदाई ॥धृ०॥ तिहिं पराग मकरन्द अनूपम, भवके
भ्रमरन नहिं पाई ॥१॥ जाने कहा पंक को कीटक,
चिन्मकरंद मधुरताई ॥२॥ जव लग रहे न मन
जग बाहिर, पालँद स्वाद न दरसाई ॥३॥ लागो
रहे चरण चित जब लग, जग की सुधि न सकत
आई ।। ज्ञान तत्व बलवन्त यही है, किये प्रतीत
हाय भाई ॥४॥
पद ४१.
अति सुन्दर मनमोहनि मूरति, आज श्यामछबि
भली वनी ॥ धृ०॥ रूपसिंधुकरुणामय स्वामी, तीन
लोक के एक धनी ॥१॥ कुटिल लटा लटकें मुख
ऊपर, भवें कमानसमान तनी ॥ २॥ भाल विशाल
कमलदल लोचन, तापर कजरा रेख अनी ॥३॥
अब बलवन्त विमल प्रभुके यश, वरणत बानी प्रेम
सनी ॥४॥

पदमाला।
पद ४२.
वांकी छवि बांके बैन, अदा वांकी प्यारी । बलि-
हारी श्याम, कोटि काम नखपै वारी ।। धृ०॥ वांकी
मुख लटके लटा, मुकुट छवि सनहारी ॥१॥ वांकी
वर वेणु रसाल, अधर वरपै धारी ॥२॥ बलवन्त
सदा यह वांकी, छबिपै बलिहारी ॥ ३ ॥
पद ४३.
सों
क्या वनी मनोहर छवी आज वनवारी ॥ तिहुँपुर
सुन्दर परी अमल उजियारी ॥धृ०॥ शिर लसत
जटित मणि मुकुट लकुट कर धारी ॥ श्रुति कुंडल
मणिमय लोल कपोल विहारी ॥१॥ कच कुंचित
रति पति जनु गुहि फंदे डारे॥ जिहिं मधि विहंगमन
उरझि न सुरझन हारे ॥ २॥ वर विथुरी अलक
रसाल लटें धुंधरारी ॥ आनन मयंक विन अंक देह
द्युति न्यारी ॥३॥ सुठि सघन वंक भ्रकुटी विशाल
अनियारी ॥ युग मध्य विमल तिलविन्दु मदन मन-
हारी ॥ ४॥ नवरसके सागर नैनन माँझ दुराये ।।
पलकन पट सों कछु दुरे कछुक दरसाये ॥ ५ ॥

पदमाला। २५ नासिका सरल सुन्दरतासीम दिखाई ॥ जहं विहरत निसदिन विश्वप्राण हरषाई॥६॥ द्युतिदशन लसन मुक्तापंक्ती छबि छीनी ॥ तन पै योवनको भार मसें कछु भीनी ॥७॥ रद पुट संपुट मधि शोभा सकल दुरानी॥मुसक्यान माधुरी द्वार कछुक दरसानी ॥८॥ गुहि सुंदरताकी गैंद चिबुक शुचि खानी॥ जहं तिल छल वैठा मार मती सकुचानी ॥ ९॥ कल कंठ महा छवि भवन मनोहर राजे ॥ बनमाल गरे उर श्री वत्सांक विराजे ॥ १० ॥ सोहत शुचि नाभि गंभीर मनहु मन्मथ सर॥लिपटो पट पाट सुपीतकेहरिकटि सुन्दर ॥११॥ कर चरण चारु शोभा रश्मी प्रगटानी॥ लावण्य दिवाकर उदित भयो जग जानी ॥१२॥ वलवत जहां सब उपमालागत झूटी ॥ सोई रूप- सांवरो है टूटी की बूंटी ॥ १३॥ पद ४४. अति प्यारी मोहि लागे राम, मूर्ति श्री गिरधारी ॥धृ०॥ मोर मुकुट सिर लकुट ललितकर, धुनि वेणू सुखकारी ॥भ्रकुटी कुटिल कटीले लोचन, नासा शुक छवि हारी ॥ १॥ दशन पंक्ति मुक्तावलि सुन्दर पदमाला। अधर छटा अरुणारी॥चिबुक चारु मन्मथ मदं मर्दन कंठ कम्बु द्युति भारी ॥ २ ॥ उर विशाल वनमाल विराजे, कांधे कामरि कारी ॥ कटि पट पीत हरत द्युति दामिनि, कोर टकी जरतारी॥३॥ गो गोपाल बाल संग सोहैं, वृंदा विपिन विहारी ॥ निरखत छवि बलवन्त मगन मन, वार बार चलिहारी ॥४॥ पद ४५. परम माधुरी हरि मूरति, तू देखी री ॥धृ०॥ सुन्दर तनु आभा घनश्याम, शरद इंदु मुख सव सुखधाम ॥ लोचन कंज चारु अभिराम, मेरो मन विश्राम श्याम, तू देखीरी ॥ १॥ मौक्तिक नासा अग्र सुहाय, अधर विम्ब फल छबि दरसाय ॥ पीत पाट पट कटि मन भाय, बनसी विपिन वजाय गाय, तू देखी री ॥ २॥ सकल कला विद्या गुण खान, नेह निवाहक सूर सुजान ॥ रसिक शिरोमणि रूप निधान वलवत जीवन प्राण कान्ह, तू देखी री ॥३॥ पद ४६. वैचैन हुआ दिल भूली मति गति मेरी ॥ जबसे देखी है झलक सांवरे तेरी ॥धृ०॥ वह चांदसा , ॥

पदमाळा। २७ मुखड़ा खिले कमलसे लोचन ॥ दुखद्वंद निवारण पूर्ण प्रीति रस पोषण ॥ १॥ नासिका अग्र लोलक अनमोल सुहावे ॥ दिल देखि मदन का सौ सौ झोके खावे ॥२॥ कटि सोहे पीत पट जनु दामिनि उजि- यारी ॥ हीरा करधोनी लटक रही मन हारी ॥३॥ बलवन्त प्रीति की छटा है सब से न्यारी ॥ सूरत पर तेरे बार बार वलिहारी ॥४॥ पढ़४७. पीपी के माधुरी सुरस मगन रहते हैं ॥ नहिं स्वर्ग और अपवर्ग चाह करते हैं ॥ धृ०॥ हे नाम सुधा से मधुर चखा करते हैं । इक तेरे भरोसे निडर रहा करते हैं।।१।। कभी विरह ताप की तपन विकल रोते हैं ॥ कभि पाद पद्म जुग निरखि मुदित होते हैं ॥ २॥ वलवन्त सन्त इस ढंग जिया करते हैं । सब आयु समर्पण श्रीहरि को करते हैं ॥३॥ पद ४८. रे मन मानु विहरि वृन्दावन ॥धृ०॥ सर्व काल सौभाग्य सुखद लखि, लोगन लघु लागत बासव २८ पदमाला। वन ॥१॥ धरणि धन्य गिरधर पद चिन्हित, तहं सुरभी नित चरत हरित तृन ॥२॥ वलित वेलि कुसुमित तरु पुंजन, कुंजन मंजु तमाल कदंवन ॥३॥ कूल कलिंद नंदिनी के वर, पुलिन पवन वहि सनित सुगन्धन ॥ ४ ॥ परम पुरुष वलवंत निरन्तर करत केलि जंह धारि मनुज तन ॥ ५ ॥ पद ४६. क्या मोर मुकट मुरली वाले की छवि है। जो चाहे देखलो इस मूरत में सव है ॥ १॥ नापा तो साढे तीन हाथ का कद है ॥ देखा तो भुवन समूह भरा वेहद है ॥ २ ॥ सर्गुण निर्गुण दोनों की साफ झलक है ॥ लखते हैं इसी को औ फिर यह ही अलख है ॥३॥ माता को मुख में विश्व देखि अचरज है ।। वही वाल बंधा ऊखल से खिलाड़ी धज है ॥४॥ नैनों में गोपियों के वही वसा मदन है। वही कंस कुटिल को दरसा काल कठिन है ॥५॥ यह चिदा- नंद ज्ञानी के चिंतन में है। जो परम लोक बासी परमेश्वर है ॥६॥ आशिक को क्या इन झगड़ों से मत- लव है |वलवंत तुम्हें यह सूरत भाई बस है ॥७॥ -- पदमाला २९ ॥ पद ५०. सांवलिया साहु हमारा ॥ सुख संपत लही अपारा ॥धृ०॥ मन माना सुख लेते हैं, जो जी चाहा देते हैं। क्या राज काज सुतदारा, सांवलिया साहु हमारा ॥ १ ॥ जो नहीं भाग्य में लेखा, लिखते हैं वहही रेखा ॥ ऐसे हैं संत उदारा, सांवलिया० ॥ ।। २ ।। जो हुंडी संत करी है, नहिं अबलों कभी फिरी है। ऐसा है साहूकारा, सांवलिया० ॥३॥जब मन का कांटा तोला, अन्दर का खजाना खोला ॥ फिर नहीं देन का पारा ॥ सांवलिया०॥४॥बलवंत भरो- साभारी, नहिं और सिवा गिरधारी ॥ होवे जो निश्चय धारा {सांवलिया ॥५॥ ॥ ॥ पद ५१. जो भजन भक्ति की रीति संत जन गाई, मैं निज मति के अनुसार कहों समुझाई ॥धृ०॥ सीधी है वात पर नहीं समझ में आवे, बिन शुद्ध हुये मन नहीं तत्व को पावे ॥१॥ रज तम को घटादे सत्- गुण हिये वढाकर। एकांत बैठि निशि दिन हरि- नाम जपाकर ॥२॥ सत्गुण है चित का शोधक पदमाला जैसे दिवाकर ॥ कफ वात वैद्य ज्यों घटाय पित्त बढ़ाकर ॥ ३॥ ज्वरदोष घटे बिन स्वाद अन्न नहिं आवे ॥ बिन शुद्ध हुये मन नहीं भजन सुख पावे ॥४॥ बिन समय परे के नहीं वीज जमता है। निःशांति इकांत में भजन खूब बनता है ।। ५ ।। है कृपादेश करनी का क्या चलता है। स्वामिनी कृपा से रंक राव होता है ॥६॥ नहीं कर्ज किसी का श्रीहरि पर आता है । है स्वतंत्र जिसप्ते खुश हो उसे देता है ॥ ७॥ विश्वास प्रेम नहिं बाहर से आता है॥ धोने से रातदिन मन का अब खुलता है ।। ८ ।। सुनते हैं रोज पर निश्चय नहिं आता है ॥ वलवंत इसी का बहुत बड़ा घाटा है ॥ ९ ॥ ॥ पद ५२. खुली समाधि लगावे, देखो खुली समाधि लगावे ॥धृ०॥ चिन्मय बिंदु इंदु की आभा, तत्व रंग दरसावे ॥ १॥ बिंदू बीच मोहनी मूरति, निरखि . निरखि हरषावे ॥२॥ चमके विजुली गरजें बादल, नाद श्रवण में आवे ॥ ३॥ भीतर बाहर एक उजेला, - , पदमाला। ३१ तनकी सुध विसरावे ॥ ४॥ धन वलवंत गुरू की, महिमा, निसदिन चरणन ध्यावे ॥५॥ पद ५३. क्या सोया गफलत में प्यारे, चैत सवेरा होता है ॥ धृ०॥ ताने काल कमान खडासिर, कल क्या जाने होता है ॥ १॥ यह बल छल अरु घमंड तेरा, विचार करल थोता है ॥२॥ करता कृति बलवंत न ज्ञानी, तो फिर आगे गोता है ॥३॥ पद ५४. भजन कुछ करले नरहरि का ॥ मज़ा फिर आवे नरतनु का ॥ धृ०॥ विना प्रताप भजन के तेरे, दिल में वल नहिं आवे | Fाका फिकर रोग दुख डर सब, निसदिन तुझे सतावे ।। १ ।। जैसे सांप कांचुली तजिके, रूप रंग वतलावे ॥ तैसे जोवन भन्यो दिव्य तनु, हरीभजन सों पावे ॥२॥ फिकर काहे की डर है किसका, शंका मन नहिं आवे॥ सदा मस्त साहब के रंग में, जम को खड़ा डरावे ॥ ३॥ कुबेर, कैसर भूपति नरवर, और बड़े अधिकारी ॥ तुझको ॥ , ३२ पदमाला। ऐसे दीख पड़ेंगे, जैसे बड़े भिखारी ॥ ४ ॥ चिंतानल से व्याकुल वे सब, चैन नहीं है छिन भर ॥ कोट कमाई करी हुवा क्या, जैसे जोड़े पत्थरं ॥ ५ ॥ जिसने हरिसेवा फल चाखा, उसको कुछ नहिं भावे॥ भाग्यवंत बलवंत कोई इक, जग में यह सुख पावे ॥६॥ पद् ५५. उसका वन अव तू साहब का बंदा ॥ छोड़दे झूटा जग धंदा ॥धृ०॥ कृष्ण नाम की जिसके छाती, पै चप- रास सुहावे ॥ तीन लोक में जहं कहिं जावे, सबसे आदर पावे ॥ पहनले सिका साहब का ॥ हुक्म बाला सबपर ॥१॥ अग्नी जल गज भुजंग केहरि, सब कोइ सील नमावे ॥ जम का दूत भूतसा भागे, स्वप्नेहू नहिं आवे॥ हुकूमत का है जो चसका। मजाले प्यारे फिर उसका ॥२॥ बन के नरका दास अरेतू, यों नरदेह लजावे ॥ जिसका पंट आप नहिं भरता, वह क्या हमे खिलावे ॥ दुखी जे तन मन के मारे॥ हरैं क्या कष्ट तेरे प्यारे ॥३॥ जिसके आगे सीस नमाते, ऊंचा सब से होवे ॥ ले वलवंत पदमाला। शरण ऐसे की, वृथा काल जिन खोवे । वन अब तू साहब का बंदा ।। छोड्दे झूठा जग धंदा ॥ ४ ॥ पद ५६. है , प्रभु का भजन करो भाई, होय जिहिं मन की शुचिताई ॥धृ०॥ वहां दया की नहीं कमी है, सब तेरी गलनी ॥ मनपे स्याही मनों चढ़ी है, नहीं रनी भर धुलती ॥ १॥ इसको धोकर साफ वनाना, यही काम है तेरा ॥ स्वस्वरूप बलवंत दिखे तब, मान बचन सन् मेरा ॥ २ ॥ पढ़५७. भजन नहिं खेल तमाशा है | कठिन फांसी से फांसा है ॥धृ०॥ सूली पर दुख पलभर का है, रन में दुःख घड़ीका । विष खाये दुख चार घड़ी का, खड्ग सरे दुख छिन का ॥ यहां दिन रात काम दुख से, नहीं मिलती है नींद सुख से ॥१॥ खड़ा रहै भाले की अनी पर, मन को नहीं डिगावे ॥ एक सुई के नाके में से, गज की फौज चलावे ॥ विकट इससे भी भजन प्रभु का, खेल नहीं घर है साहब ॥

पदमाला। का ॥२॥ मन की मूरी मैल भरी है, छीलो रोज छुरी से ॥ जव देखो तब मैली ही देखो, शोधो अव अग्नी से ॥ नहीं है दुख यह दो दिन का ॥ काम है अनंत जन्मों का ॥ ३ ॥ मन की लड़ाई बड़ी विकट है, सूर छोड़ रन भागे ॥ भाग्यवंत कोई लाल साई- का, रुपै है इसके आगे ॥ जो लड़ते आये जन्मों से, लड़ेंगे वही यार मनसे ॥ ४ ॥ धन धरनी सुत दारा छोड़ें, छोड़ें आशा तन की ॥ सब से तोड़ें हरि से जोड़ें, यह रहनी संतन की॥ न कोरी बातों को माने, रहै रहनी तो हम जानें ॥ ५॥ मंजिल दूर समय थोड़ा है, फिर कहिये क्या कीजै ॥ आंख मूंद के श्रीगोविंद के, धाय चरण गहि लीजे ॥ उसी दम होवे निस्तारा, यही बलवंत सर सारा ॥ ६ ॥ पद ५८. हम अपने रंग में आप मगन रहते हैं। अपने जोबन के आप मजे लेते हैं ॥धृ०॥ पाई कंचन की काया क्या छबि धारी ॥ निर्गुण में सर्गुण खिली अजव फुलवारी ॥१॥ नहिं देह देहि का भेद पदमाला। my जरा भी पाया ॥ सचितआनंदघन स्वरूप निज प्रगटाया ॥ २ ॥ सुंदर सनेह रस रोम रोम में छाया ॥ अद्भुत विलास बलवंत दृगन दरसाया ॥३॥ ॥ पद ५९. अब उनको इस दुनिया से काम भी क्या है ॥ अपना घर जिनने श्रीगोलोक किया है । धृ. सोहत कल कुंज निकुंज पुंज सुखदाई॥ जहां अष्ट सिद्धि नवनिद्धि रैन दिन छोई ॥१॥ सच्चित- आनन्द मय पंच तत्व जहं राजे॥ मरकतमय भूमी- मणिमय धाम बिराजे ॥ २॥ तरु लता कल्पद्रम सम जहं तहं सुखदाई ॥ फल फूल गंध मकरंद चहुं- दिस छाई ॥३॥ जहं पशु पक्षी बहु रंग अनंग लजावें ॥ मीठी वाणीसों कृष्ण कृष्ण गुन गावें ॥ ४ ॥ जहं होत न पात निपात न सुम कुम्हलावें ॥ जहां जरा मरण दुरगंध कबहुं नहिं आवें ॥ ५॥ है लोक अलौकिक सब लोकोंसे न्यारा॥ बलवंतजहां स्वामी कृत नित्य विहारा ॥६॥ - पदमाला। पद ६०. मुख सूख गया दिन रात पुकारा करते ॥ पथग गईं अखियां बाट निहारा करते ॥धृ०॥ यी सूख गया करुणाका सागर सारा ॥ क्या कामधेनु ने देना दूध बिसारा ॥१॥ वर्षा में करुणाघन वर्षा करते हैं ॥ पै हरिजन चातक सदा रटा करते हैं ॥ २ ॥ नहिं आंख चाह की कभी तृप्त होती है ॥ नित नया रूप रंग प्यारे में पाती है ॥३॥ ये रोग बुरा है लगा नहीं फिर जाता ॥ पद तीन लोक का नहीं आंख में आता ॥ ४ ॥ पाते हैं मन भर तोभी तृप्ति नहीं आती ॥ बलवंत प्रीत की प्यास कभी नहि ॥ जाती॥ ५ ॥ पद ६१. हरिदास नहीं दुनिया की चाह करते हैं । जिनके हैं हौसले बड़े बलँद उड़ते हैं ॥१॥ दिन रात लगे जो प्रभु सेवा करते हैं ॥ अंगुश्त दिखा सूरज को खड़ा करते हैं ॥२॥ नहिं छोटी इच्छा बड़े लोग पदमाला। ३७ करते हैं। वंदे से खुदा होने की चाह करते हैं ॥३॥ जे तन मन अपना मार खाक करते हैं। जो रखें रंक सिर हाथ राव करते हैं ॥ ४ ॥ नुक्ते कि बात है जिसे बयां करते हैं ॥ बलवंत कामना सोच समझ करते हैं ॥५॥ पद ६२. वाणी का छल बड़ा विकट है, भूले पण्डित ज्ञानी ॥ इसका सारा झगड़ाजग में, डूवे लाखों पानी ॥१॥ स्वर्गऽस्नर्क लाभ हानी, इसीसे होवे जग जानी ॥ बीमारी काया को नासे, वाणी जीवहि नासे ॥ महा- मरी से रोग विकट है, उड़के लगे हवा से ॥२॥ बचे रहना इससे प्राणी ॥ जहर की फूंक दुष्ट वाणी॥ वेद पुरान कुरान सभी में, इसने डाला चक्कर ॥ सीधा खाते फिरते टकर ॥३॥ न बातों के झगड़े पड़ना ॥ सार हरि नाम सदा रटना ॥ भाव कुभाव भनख आलस से, कृष्ण नाम जो गावे ॥ पूंछा ताछी कहीं न होवे, सूधा स्वर्ग सिधावे ॥४॥ राजपथ येही पहिचानो, शास्त्र श्रुतिसार यही जानो ॥ रस्ता भूल गये सब, ३८ पदमाला। जिसके आगे सीस नमाये, ऊंचा सब से होवे ॥ ले बलवंत शरण ऐसे की, वृथा काल जिन खोवे ॥५॥ . पद ६३. धन्य धन्य गुरु साहब जिनकी, महिमा जग जानी ॥ हृदयकपाट खुले धरतेही, सीस वरद पानी ॥ ॥धृ०॥ खिला गगन में बाग बिरंगी, शोभा मन भाई ॥ छिटकि रही चंद्रिका मनोहर, चहुं दिस सुख- दाई ॥ जगमगात जित उत मनु हीरा--कनकी समु- दाई ॥ बरस रहे चहुं ओर गगन से, उड़ गण सुख- दानी॥१॥ शिव ब्रह्मा विष्णू के सुंदर, रूप अलख छाये ॥ सोम सूरके बिंदु दोउदृग, खेलत दरसाये ॥ दीपमालिका लगी गगन में, देखत हरषाये ॥ दमक रही चहुं ओर दामिनी, सुंदर मन मानी ॥२॥ नैनों का यहि फल है देखो, आंखों से प्यारे ॥ चिदा- नंद भण्डार भरा है, खाली में सारे ॥ जरा नजर के एर फेर में, खुलें भुवन तारे ॥ क्यों प्रत्यक्ष छोड़के हो तुम, बनते अनुमानी ॥३॥ जो साहव आँखों नहिं देखा, तो फिर क्या देखा ॥ जीते जी जो मिला नहीं तो, मरे कौन लेखा ॥ नगद पटावें सौदा यह . , ॥

पदमाला। ३९ नहि, उधार की रेखा ॥ जिसका जी चाहे देखे, बलवंत यही ठानी ॥ ४ ॥ पढ़ ६४. पूर रहा है घट घट साहब, पै तेरा क्या काम सरे ॥ सब लकड़ी में आग भरी है, नेक नहीं तन शीत हरे ॥ धृ०॥ बड़े बड़े भंडार धान्य के, भरे धरै यदि भवन तरै । खावे जो न पका के रोटी, कैसे तेरा पेट भरे ॥१॥ गुप्त वात बलवंत तत्व की, गुरु विन सो नहिं समझ परै ॥ विना हरी हिये जागृत कीन्हें, नहीं कामना तरू करै ॥ २ ॥ पद ६५. सवमें भरा है साहव जिसने जाना जीवन सफल किया ॥ धृ० ॥ भवन गढा भंडार न जाना भीख मांगि अति कष्ट जिया ॥१॥ परके धोके में मूरख परि, अखंड आनँद नसादिया ॥२॥ परमानन्द सुस्वाद सुधा तजि, विषय वारुणी कींच पिया ॥३॥ अब बलवंत दंपति पद बल, को जीत लिया ॥४॥ तीन भुवन पदमाला। पद ६६. आपहि जल थल कमल आप ही, केसर अरु मक- रन्द भरा ॥रस विलास के हेत आपही, सुन्दर मधुकर रूप धरा ॥ १॥ अपने रस को आप चाख के, मगन हुआ वनवाग फिरा ॥ अपने सुख के हेत आपही. भोग्य भोगता स्वांग करा ॥ २ ॥ है स्वतंत्र अपने घर आपहि, नहिं दूजा कोइ दृष्टि परा ॥ शोधहु अव वलवत कहां हौ, माया भ्रमपट दृगन टरा ॥३॥ पद ६७. जो जीव भूल गया तुम्हें तो अचरज क्या है ।। माया का गले में पड़ा बिकट फंदा है ॥१॥ यह पराधीन अज्ञानी तेरा बंदा है॥ सर्वज्ञ आप सर्वेश्वर जग गाता है ॥ २ ॥ तुमको तो विसरना नाथ नहीं फबता है ॥ बलवत भूलना अपना तो वाना है ॥ ३ ॥ पद ६८. खेल माया का है भारी ॥ दोखि भूले सुर नर री ॥ धृ० ॥ सब भेदों का भेद बात सुन, नहिं . पदमाला। ४१ वेदों से न्यारी ॥ काया यही वड़ी माया है, सोच समझ मतिधारी ॥ १ ॥ यह संसार इंद्रियों के बल, नजर तुझे आता है ॥ तन में तेरे भरी है दुनिया, बाहर का धोका है ॥२॥ जो दिखता है झूठा है सब, सच्चा नजर न आवे ॥ रवि निज छाया मांझ छिपा है, कौन खाज के लावे ॥ ३ ॥ (चाल) नैनों की पुतली ने सब रंग रचा है ॥ संसार इसी ने गढ़के खड़ा किया है ॥ क्या अचल ठाट कानों के परदों का है । दुनिया का सारा राग यहीं बजता है ॥ रस खान चान सब है रसना के भीतर ॥ सर्दी गर्मी का बोध स्पर्शशक्ति पर ॥ हम हैं जहां वहीं दुनिया है, होय न हमसे न्यारी ॥ नाम होश का हुवा है आलम, कहि बलवत विचारी ॥४॥ पद ६९. अभीतक आंख नहीं खुलती, रात दिन करते हो गलती ।। धृ०॥ प्रभुता औरों को दे बैठे, फिर कैसा सुख सोना ॥जोरू अपनी खलम बनाई, फिर काहेका रोना ॥१॥ वासनाओं ने तेरे मनकी, तुझपै करी सवारी । अखंड पदसे गिरा दिया है, करके दीन , पदमाला। ४२ भिकारी ॥ २॥ नौकर चाकर मालिक होगये, घर में धूम मचाई ॥ तुझे पकड़ के कैद किया है, जरा समझले भाई ॥३॥ ( चाल यह शरीर तेरा, या तू इसका चेग ॥ तू मालिक सन का, या मन मालिक तेरा ॥ करि बलवन विचार समझले, तुही स्वामि सुखरासी ॥ जो अपना अब सरूप भूले, परै फन्द चौरासी ॥४॥ पद ७०. है आंख अब खोल देखभाई ॥ यह कैसी गफलत चित छाई ॥धृ.॥ पल पल आयू घटती तेरी, तू बढ़ती है जाने ॥ काल अमोल खेल में खोते, गोते खाते स्याने ॥ १॥ छिन में रोना छिन में हंसना, यह दशा तुम्हारी ॥ नहीं चैन चित को है पलभर, देखो जरा विचारी ॥२॥ सगे सनेही नहीं हैं तेरे, हैं मतलब के गरजी॥गाल फुला के यह बैठेगे, जब तोड़ोगे मरजी ॥३॥ दुख सुख अपने कर्मों के बस, जीव यहां पाता है ॥ और नहीं कोउ देता लेता, झूठी सब बाता है ॥ ४॥ निशि दिन साहब की कर --- पदमाला। *n-ramme सेवा, नास मती कर अपना ॥ खवरदार बलवन्त रहो अब, है सब जग यह सपना ॥ ५॥ पद ७१, यह विषयवासना छोड़ अरे, क्यों द्वार द्वार फिरता सारा ॥ एक पेटके पीछे तूने, श्वान सरूप वृथा धाग ॥ १॥ चाह कोट की या कौड़ी की, दोनों देख बरावर हैं। रावरंक तृष्णा के मारे, व्याकुल दीन सरासर हैं ॥ २ ॥ जिसको इच्छा नहीं किसीकी, सबमें बड़ा वही नर है ।। इंद्र चंद्र क्या कुबेर कैसर, कौन करे उसकी सर है ।। ३।। तीन लोक की अचल सम्पदा, एक उसी के तो घर है। नहिं इच्छा बलवंत रखी फिर, सच कहने में क्या डर है ॥४॥ पद ७२. सीस श्री गुरु चरणन नाई॥ ज्ञान गुणसार कहाँ भाई ॥ सथिके सव उपनिषद पयोनिधि, गुरु. नव- नीत निकाला ॥ चाखतही रसना रस जाको, होय हिये उजियाला ॥१॥ गुरु की महिमा जग जानी, धन्य जिन के सिरवर पानी ॥ उसी सार का सार पदमाला। निकाला, जो कोई भरके प्याला ॥ पीवेगा अभ्यास- रूप से, होय मुक्ति तत्काला ॥२॥ बात यह गुप्त सत्य जानो ॥ मुक्तहो जीवन सुख मानो ॥ जीव- ईश का भेद न जबतक, पूरा मन में लावे॥ तबतक जीव अविद्या तजिके, नहीं मोक्षपद पावे ॥ ३ ॥ ब्रह्म माया को अब जानो ॥ इन्हीं का स्वरूप पहिचानो ॥ आदि शक्ति को अंगिकार करि, जिसने जग विस्तारा ॥ सच्चित आनंद वहीं ब्रह्म है, निर्गुण अरु अविकारा ॥ ४॥ ज्ञान धन पूर रहा भाई ।। सोइ जग दृष्टा श्रुति गाई ॥ चार देह अरु चार आत्मा, चार अवस्था सुंदर ॥ इनका जो साक्षी है सोई, परब्रह्म परमेश्वर ॥ ५॥ वही जग व्यापक आनंद रूप ॥ ज्ञान घन साखी अमल अनूप ॥ दो नैनों कर एकहि दर्शन, एक शब्द दो कानन ॥ एक लक्षकर दुई मिटादे, प्रगटे जोती तत्छन ॥६॥ भेद जो मेटे बलिहारी । लक्ष की बात बड़ी भारी॥ औरत औरत एक सरीसी, क्या माता क्या नारी ॥ एक नजर के बल ने दोनों, करदी न्यारी न्यारी ॥७॥ लक्ष ने द्वैत बनाया है ॥ जगत को भ्रम में डाला है ॥ माया क्या है अब तुम इसको, खूब तरह m ---.- ४५ पदमाला। पहिचानो ॥ विन पहिचाने वचा न कोई, यही सत्य करि मानो ॥ ८॥ कल्पना माया है भाई ॥ बात नुक्ते की वतलाई ॥ जो जो मन में फरें कल्पना, उसपर ध्यान लगाओ ॥ दृष्टा होकर देखो उसके, चक्कर में मत आओ ॥ ९॥ परै जो इसकी धारा में ।। वही ड्वे भव भारा में ॥ सुचित बैठ के हृदय कमल पर, देखो लन लगाकर ॥ उठती मन की मौज जहां है. वह क्या हैगा अंदर ॥१०॥ लखो चैतन्य चंद भारी, जगत में फैली उजियारी ॥ सावधान मन करके अपना, उसी जगह ठहरादो॥ कोई ख्याल मत करो जो आवे, उसको वहीं दबादो ॥ ११ ॥ फेरदे धारा गंगा की ॥ मौज ले फिर मन चंगा की ॥ वायू के वल उठते, तरंग जल में भारी ॥ तैसें माया के बस चलती, मन की मौजें न्यारी ॥ १२ ॥ माया मूल मेट भाई ॥ कल्पना तोड़ चतुराई । यही वीज संसार तरू का, तीन लोक में छाया॥ रंग रंग खिले छै, सुख दुख फलन सुहाया ॥ १३ ॥ कल्पना बीज एक तिल भर ॥ बढ़े तो चदै गगन ऊपर ॥ मन मौजों का कटक बिकट है, बीर बड़े वलकारी ॥ खेत छोड़कर इसके आगे, भागे सुर नर के पदमाला नारी ॥१४॥ लड़ाई खेल नहीं मन की ॥ बात यह बड़ी है मुश्किल की ॥ मनके मारे सव फिरते हैं, जिनने मनको मारा ॥ सोई सच्चा सूर जगत में हुआ गगन का तारा ॥ १५ ॥ चढा रह मन के घोड़े पर ॥ डिगे मत आसन से तिल सर ॥ जव उपाधि माया की मिटके, मन निश्चल होवेगा । तब सरूप अपना आनंद घन, अनुभव कर पावेगा ॥ १६ ॥ वृथा जप तप व्रत हैं भाई ॥ सुलभ यह रस्ता दिखलाई ॥ जब मन में मन लीन हुआ फिर तूही तू है प्यारे ।। सकल जगत का कर्ता भी फिरे विश्व को धारे ॥१७॥ बात यह बड़ी गुरु घर की ॥ वताई खोल गिरह दिल की । इसी तरह अभ्यास करो तो, मजा देखलो भाई ॥ बिना कृपा बलवन्त स्वामिनी, नहीं हाथ कल आई ॥१८॥ पद ७३. किशोरी पुजवहु मोरी आस ॥धृ०॥ इनहीं नैनन सों यह देखों, दंपति विविध विलास ॥१॥ वेई पदमाला। बन कुंज कूल कालिंद्री, वेइ प्रगटें रंग रास ॥ २॥ अपनो जान कृपा करि दीजै, सेवा मन्दिर खास ॥ ३ ॥ पद ७४. श्रीपद रुचि मन मोर, बसौ सदा सस्नेह मोर उर, मांगत यही निहोर ॥धृ०॥ पाद पद्म मधि रहै निरंतर, मति गति रति सन मोर ॥ जिमि सरोज मकरंद पायके, मधुकर तजें न ठोर ॥ १॥ तापत्रय- संतप्त सनत चित, कलिमल क्लेश कठोर ॥ काल मान संधान विलोकत, छायो कलियुग घोर ॥२॥ अव न अबेर करहु स्वामिनि छिन, लखो कृपा दृग कोर ॥ देहु देवि बलवंत भक्ति वर, विनय करत कर जोर ॥३॥ पद ७५. दयानिधि नेक कृपाकरि हेरो, मोहिं महा मोह तम धेरो॥धृ०॥ पुनि पुनि चित्त विषय को धावत, फिरत न मेरे फेरो.॥ करि उपाय थाको करुणाकर, संकट कठिन निबेरो ॥१॥ महा मूढ स्वारथ नहिं चन्हित, भो माया को चेरो॥पादपद्मसों विमुख रहत

पदमाला।
नित, ऐसो कुटिल धनेरो ॥२॥ भव भय विकल
शरण मधि आयो, प्रणतपाल प्रण तेरो ॥ अव वल-
वन्त दास तन स्वामिनि, कृपा कोरग हेरो ॥ ३ ॥
पद ७६.
किशोरी, केवल बल मोहि तोर ॥धृ०॥ नहीं स्वर्ग
अपवर्गहि लेखों, पद नख जोति निरंतर देखों,
जैसे चन्द्र चकोर ॥१॥ प्रणतपाल पणपाल दया-
धन, आरतहरन द्वंद दुख भंजन, करत शास्त्र श्रुति
शोर ॥ २ ॥ तुम्हरो चित्त कमल से कोमल, दीन
देखि नहिं धरत नेक कल, करिय न हाहा कठोर ॥३॥
थाको करत पुकार द्वार पर, अव न विलम्ब कीजये
पलभर, लखहु दया हगकोर ॥४॥ मैं यदि कूर
कुटिल अभिमानी, पै तव दास सकल जग जानी,
त्यागत हँसी न मोर ॥ ५ ॥ जुगने जतन कीन्हें जग-
माहीं, बिना कृपा तव मिलिहैं नाहीं, दासन नन्द
किशोर ॥ ६ ॥ काहु न अब बलवंत बदत है, जी
चाहै सो करत फिरत है, केवल तुम्हरे जोर ॥७॥

पदमाला। ४९ पद 19७. हमारी सुध लेहु राधिका माई ॥धृ०॥जीरण तराण विकट भव वारिधि, कोउ न संग सहाई ॥ महा मोह तम दशदिश छायो, घाट न बाट लखाई ॥१॥ चंड काम झकझोर पवन गयो, तराण करण विनसाई ॥ क्रोध मकर सुख फारि फिरत है, लोभ भंवर भयदाई ॥२॥ मदमय तुंगतरंगनि तरतिल, मत्सर झप दुखदाई ॥ काल संकट अति, देखत धीर पराई ॥ ३॥ दास दौर देवी चरणन लों, और न ठौर दिखाई ॥ शरणागत बलवंत दीन जन दाजै पार लगाई ॥ ४ ॥ कराल कठिन पद ७८. मात विन कौन सम्हार करै ॥धृ०॥ दीन मलीन हीन सद्गुणसों, कोउ न कर पकरै ॥ १॥ पिता पुत्र भ्राता अरु दुहिता, गुणसों प्रीति करै ॥ २ ॥ अब अवलंब अंब इक तेरो, काहे विलंब करै ॥ ३ ॥ भव वारिधि वलवंत बाल कर, को प्रतिपाल करै ॥ ४ ॥ ,

पदमाला।
-
-
पद ७६.
बाल हठ पूरी कौन करै ॥ धृ० ॥ जो जगदंव
राधिका रानी, नेक न ध्यान धरै ॥ व्याकुल बाल
विलोकत जननी, निजसुख सब बिसरै ॥१॥ऐसो को
उदार जगमाहीं, जासों सुत झगरै ॥ स्वारथ के सब
सखा संघाती, को पर पीर परै ॥२॥ भक्तपाल नत-
पाल कृपाला,
जो ब्रह्मांड भरै ॥ अब बलवन्त दास
आशा तरु, सत्वर सुफल फरै ॥ ३॥
पद ८०.
नहिं तीन भुवनमें पतीतपावन पायो ॥ वृषभानु-
किशोरी शरण तिहारी आयो ॥धृ०॥ कीरति का डंका
तीन लोक में गाजै ॥ विधि कर्मरेख पर मेख तुम्हारी
वाजै ॥ जग जोतिवंत तनु तेज तुम्हारो भ्राजै ॥ नव
खंड मही पर प्रचंड राज विराजै ॥ लखि खुले विपुल
भंडार दीनगण धायो ॥१॥ भूखे भूमी के भूप असुर
सुर पद के ॥श्रीमान् आस के श्वान भये घर घर के ॥
हम कन के भूखे वह भूखे सौमन के ॥ भूखे भूखन सों
कह लें याचन कर के ॥ बलवंत अन्त नहिं तुम सम
दानी पायो ॥२॥

पदमाला। पद ८१, जगदम्ब जगत अवलंब भक्त सुखदानी ॥ अब द्रवहु दया कर श्रीराधे महरानी ॥ धृ०॥ हे आदि- शक्ति अव्यक्त चराचर चारी ॥ दश चारि भुवन परिपालन पोषण हारी॥१॥ होते के होते तात भ्रात हितकारी ॥ अन होते की जग केवल मात निहारी ॥२॥ चहुंओर निहारों श्रीवृषभानु दुलारी ॥ घर घर में यही नीति रीति संसारी ॥ ३ ॥ वलवंत बाल बुधिहीन दीन जिय जानी ॥ अव द्रवहु दयाकर श्रीराधे महारानी ॥ ४ ॥ पद ८२. तुम सम कौन स्वामिनी दानी ॥ धृ०॥ बिन सेवा विन विनय याचना, देत दीन हितमानी। जिन पियूष धाराधर धारा, कृपादृष्टि सरसानी ॥ १॥ सरल सुशील सुभाव सुमति अति, कृपावन्त जग जानी। पालन पोषण सकल विश्व को करत सदा मुदमानी॥२॥ सबविधि समरथ सबसुखदायक सकलकलागुणखानी बलवन्त दीनजन कहे विना पहिचानी ॥३॥ कथा व्यथा पदमाला। पद ८३.. सांची तुमहिं एक जगदानी ॥धृ०॥ दीन दुखी सन्मुख देखत ही, द्रवत दया गुणखानी ॥१॥ फिरौ न अबलों कोउ द्वार ते, कूर कुटिल अघ- खानी॥२॥ देत लोक परलोक सकल सुख, जो भक्तन उर आनी ॥ ३ ॥ यह बलवन्त औदार्य बखा- नत, नाग गिरा सकुचानी ॥ ४ ॥ पद ८४. रट लागिरही निस दिन जियकों राधे राधे जग आराधे ॥धृ०॥ त्रैलोक्य राज्ञी कीर्ति सुता ॥ गोविंद- प्रिया गुण आगाधे ॥ १॥ गोलोक स्वामिनी गुणागरी गोपीजन वल्लभं मोद करी ॥ २ ॥ लावण्य निलय ललिता चारा ॥ लालित्य तत्व ललिताकारा ॥३॥ गोपीजन गोप शिवं करणी ॥ वृषभानु नंदिनी जग भरणी ॥ ४ ॥ श्रीश्यामा श्याम मोददाई ॥ वृज जीवनी संजीवनि राई ॥ ५॥ सौभाग्य प्रदातृ मोक्ष दानी ॥ आराध्य तत्व सिद्धिन खानी ॥ ६ ॥ जग जीवनि औषधि वृजेश्वरी ॥ सौन्दर्य आत्मा कृपा पदमाला। सरी ॥ ७ ॥ देवी वसुदेव सुवन सुखदा ॥ बलवंत सौख्य शुचि सिद्धिप्रदा ॥ ८ ॥ पद ८५. ॥ जैजै वृषभानु दुलारी, कृष्णाश्री कीर्तिकुमारी ॥धृ०॥ श्रीराधे जग आराधे, गोपीश्वरि गुण आगाधे॥ वृज. संजीविनि सुखकारी ॥ जैजै वृषभानु दुलारी ॥ १ ॥ जगदंव जक्तप्रतिपाला, गुणवती प्रिया गोपाला ॥ भक्तन भय संकट हारी। जैजै० ॥२॥ लावणनिलय सुखदानी, भक्तन जोवनि जगजानी ॥ कीरति त्रिभु- वन विस्तारी ॥जैजै० ॥३॥ प्रणपालप्रणत जनपाला, मुदमंगल करनि कृपाला ॥ ईश्वरी चराचर चारी ॥ जैजै० ०॥४॥ सुन्दरी सुंदराकारा, श्री ललता ललता चारा॥सुंदरानंद जगधारी॥जैजै०॥५॥ जीवन औषधि । अभिरामा, गोलोक राज्ञि गुणग्रामा । जगतारन हित अवतारी ॥ जैजै० ॥६॥ वृषभानु कमल कुलतरणी, श्रीकृष्णचन्द्र मनहरणी ॥ योगेश्वरि योगप्रचारी ॥ जैजै० ॥ ७ ॥ कामदा कीर्ति कुलकेतू, दशचार भुवन की हेतू ॥ प्रेमास्पद प्रेमा कारी ॥ जैजै०॥८॥ पावनीपुण्य गुणशीला, जगधात्रि अपरमित लीला ॥ . .

पदमाला। श्रीमाया माया हारी ।। जैजै० ॥९॥ तपरूप तपोनिधि माता, तापसिद्धि प्रदा सुखदाता ॥ मुक्तिदा मुक्त वृतधारी॥ जैजै० ॥ १० ॥ कल्याण मूर्ति कलगानी, गुणरूप सकल गुणखानी ॥ बलवन्त वालसुखकारी॥ वृषभानु दुलारी ॥ ११ ॥ पद ८६. जय जय वृषभानु दुलारि मात अवढर दानी ॥ करुणाकर बेग, धरौ सीस पै वर पानी ॥ धृ०॥ यह काल घोर चहुं ओर छायरही अंधियारी ॥ १ ॥ डूवे. सत ग्रंथ न पंथ दिखें ढूंढत हारी ॥ २॥ नहिं और हमें कहुं ठौर जगत में तुम जानी ॥ ३॥ हम बुरे भले पर तोर दास राधे रानी ॥४॥ दृढ गहे चरण बलवन्त कृपा गुणगण खानी ॥ ५ ॥ पद ८७. स्वामिनि, चरण गहों सिर नाई ॥धृ०॥ इक द्वै वचन दास के हितकर, कहो स्वामिहि समुझाई ॥१॥ थाको लखचौरासी भटकत, गरी जीव गरुआई ॥२॥ परम अधीर पीर भव भ्रम बस, सूझत कछु न पदमाला। ५५ उपाई ॥३॥ अब की बेर कृपा करि सुनिये, विनय दीन चितलाई ॥ ४ ॥ एक वचन सों कृपासिंधु कों, नहिं आवे लघुताई ॥ ५ ॥ जनम मरन दुख अमिट हमारौ, सहज कहे बिनसाई ॥ ६ ॥ अब बलवंत लाज स्वामिनि कहं, तुम्हरे नाम बिकाई ॥ ७ ॥ पद ८८. दीनानाथ दयाल दीन प्रतिपालु विनय कर जोर कहौं ॥धृ०॥ भव भय भ्रम वस भयो बावरो, नेक नहीं कहुं थाह गहौं ॥१॥ तुम सम समरथ स्वामि शीस पर, तदपि त्रिविध दुख दाह दहौं ॥२॥ सोचत यह निशि बासर बीते, कबलों जिय चुप साधि रहौं ॥३॥ यही बान बलवन्त स्वामि अब, तुम बिन आन न शरण लहौं ॥ ४ ॥ पद ८६. - ऐसो को दयाल दिन दानि ॥धृ०॥ बिन सेवा' प्रतिपालहिं रीझहिं, अवगुण को गुण मानि ॥१॥ आलसि अधम अनाथ निवाहन, कीरति जग सर. सानि ॥२॥ बिना दिये मन मुदित रहत नहि, -- पदमाळा। यह जिनके चित बानि ॥३॥ तजो न अस वलवंत नाथ पद, जो सब सुखकी खानि ॥ ४ ॥ पद६०. तुम्हारे करुणा के बलिहारी ॥धृ०॥ थाकत जहां उपाय सुरासुर, तहां करत रखवारी ॥ १॥ कवहु न मुख मोरो जव टेरे, सदा भक्त भयहारी ॥ २ ॥ चीर अपार सभा में दीन्हे, जव द्रोपदी पुकारी ॥ ३ ॥अस बलवंत कृपानिधि पद पर, दीजे तन मन वारी ॥४॥ पद ९१. प्रभु तुम कीन्ह अनुग्रह भारी ॥ धृ०॥ सर्वशक्ति सुखधाम नाम निज, दीन्हों दया विचारी ॥ तदपि जीव हत भाग्य लेत नहि, सह अनुराग सुधारी ॥१॥ जन मन मुकुर मलिनता मंजन, जगरंजन सुखकारी॥ प्रफुलित कर कल्याण कुमुद जिम, शरद चन्द्र उजियारी ॥ २॥ विद्यावधू प्राणपति पूरण, सहित प्रेम अविकारी ॥ श्रेष्ठ सुधा सों अमर अजर कर, जग त्रय ताप निवारी ॥३॥ आतम अमल करन अघ ओघन, भंजन विपति विदारी। अधम उधारन

पदमाला।
५७
भवनिधि तारन, निगमागम निर्धारी ॥ ४॥ दारा
धरणि धाम धन सब तजि, मांगत गोद पसारी ॥
हेतु रहिन प्रनिजन्म भक्ति निज, दीजै भव भय
हारी ।। ५॥ कब वह सुदिन दिखावहु स्वामी, नाम
लेत इकवारी ।। गद्गद गिरा प्रेम पुलकित तनु, बहै
विलोचन वारी ॥ ६॥ पलभर कल न परत तुम्हरे
बिन, बीतत जुग अनुहारी ॥ हेरत पथ हग थकित
भये अति. जगत शून्य अनुसारी ॥७॥ लेहु लगाय
हृदय मोहिं चाहे, पायन दलो विहारी ॥ केवल
तुमहि प्राणपति मोरे, अपर न विश्व मझारी ॥८॥
पद ६२.
तात मात पति भ्रात सखा गुरु, प्रभु पदसों सब
नाते मोर ।। धृ०॥ करिय उपाय बेगि अस कछु प्रभु,
परों न पुनि भव बंधन घोर ॥ १ ॥ मो प्रण चरण
कमल अवलम्बन, प्रणतपाल प्रण स्वामी तोर ॥२॥
अब वलवन्त विलम्ब कवन विधि, देहु दृष्टि निज ,
वृद की ओर ॥३॥

५८
पदमाला।
पद ९३.
तुम बिन नाथ कौन पै अब मैं, जाय कहौं निज
जियकी बात ॥धृ०॥ कल न परत लव ही प्रपंचमें,
पै निशि वालर तलफत जात ॥१॥ केवल इक
तुम्हरी सुधि स्वामी, जब आवत तब हियो सिरात।
॥ २॥ तव पद पन पुनीत प्रीति यदि, तो सुधि
पुनि पुनि किहिं बिसरात ॥३॥मो सन जो प्रपंच
रुचि सांची, तो जियरा काहे अकुलात ॥ ४॥ कब
बलवंत कृपानिधि मोरी, सुमिरनमें बीते दिन
रात ॥५॥
पद ९४.
जो तुमसा हो कोई देव बतादो हमको, दिन
रात नहीं फिर आके सतावें तुमको ॥१॥ जब नहीं
आपसा और कोई मिलता है। फिर रोने में अप-
राध हमारा क्या है ॥ २ ॥ जहां एक वैद्य हो और
पीर तन भारी॥ वह सुने न दुख फिर रोना है
लाचारी ॥३॥ मर्जी हो इक तदबीर अर्ज करता
है।नितका यह झगड़ाजिससे सहज मिटता है॥४॥

पदमाका। ५९ नहिं कौड़ी का भी खर्च नाम हो तेरा ॥ हंस के कह दो वलवंत दास है मेरा ॥५॥ पद ९५. प्रगटे गौर देव जगमाई ॥धृ०॥ पूरण कला शशी पूनों को, जैले त्रिभुवन कहं सुखदाई ॥१॥ नवद्वीप मधि आनंद छायो, घर घर मंगल बजत वधाई ॥२॥ भक्ति भानु भूमी प्रगटो अब, प्रेम प्रकाश भयो सब ठाई ॥३॥ अब बलवंत करो किभि चिंता, जव माथे पर ऐसे सांई ॥४॥ पद ९६. तुम सम गौर देव को दानी ॥धृ०॥ बिन सेवा विन याचन जनको, दान देत मुद मानी ॥१॥ आचाँ डाल पतित किय पावन, कीरति जग सर- सानी ॥ २ ॥ दया समुद्र दीन मुख देखत, सद्य द्रवत गुण खानी ॥ ३ ॥ सदा दास बलवंत नाथ के, गावत गुण सुख मानी ॥ ४ ॥ ॥

पदमाला। पद ९७. भक्तन के बंधन तुरतहि दिये निवेरी ॥ क्यों गौर देव मेरे हित इतनी देरी ।। धृ०॥ भक्ती की भागी- रथी बहाई जग में ॥ करुणारस की भी कीच मचादी मग में। कीन्हे चांडाल निहाल आपने पल में । डंका हरिनाम प्रताप बजा खल दल में ॥ वलवंत दास है पडा हुवा घर घेरी । क्यों गौरदेव मेरे हित इतनी देरी ॥१॥ पद ९८. शचिनंदन खेलत होरी होरी ॥धृ०॥ नित्यानंद सखन सह सोहत, सूर सोम सम जोरी ॥ भक्ति रंग भर भर पिचकारी, भिंजवत है बरजोरी ॥१॥ भाव अबीर और रुचिरोरी, फेंकत भरसर झोरी ॥ महाभाव के भरे कुमकुमा, मारत तकि चहुं ओरी ॥ २॥ श्रीमन्नाम राग को गायन, गूंज रह्यो सब ठोरी ॥ छकि मृदंग वीणा रस आसव भक्तन मति भई भोरी ॥३॥ सरिता प्रीति प्रतीत वहाई, पीवत जीव करोरी ॥ ऐसे प्रभु बलवंत मिक पद, लागी सुरत सुडोरी ॥ ४ ॥ ॥ ।

पदमाला । ६१ पद६६. . हे महाप्रभू चैतन्य सुधाकर, हे प्रभु नित्यानन्द दयाकर ॥ धृ०॥ भक्ति दानि भगवंत दीजिये, जानि मोहिं चरणनको किंकर ॥१॥ मिले मुक्ति पै भक्ति न पावे, बिन तव कृपा कोउ जग में नर ॥२॥ लई शरण बलवंत तुम्हारी, धरहु माथ पर नाथ वरद कर ॥३॥ पद १००. ॥ धन धन्य प्रभू चैतन्य गाथ जग तेरी ॥ महि भक्ति प्रचारन आप रूप प्रगटेरी ॥धृ० ॥ जब भारत खंड प्रचंड जैन मत छाया ॥ श्रुति कर्म धर्म आचार सकल विनसाथा ॥ तब शंभू ने तनु धरि पाखंड मिटाया ॥ रहि भक्ति गुप्त यद्यपी ज्ञान जग छाया ॥ भगवंत तबै शिव कर्म न्यूनता हेरी ॥ महि भक्ति प्रचारण आप रूपप्रगटेरी ॥धनधन्य प्रभू०॥१॥ बंगाल देश नव द्वीप नगर सुखदाई ॥ गौरांगरूप श्री जुगल दिये दरसाई ॥ घनघोर भक्ति रस घटा घुमडि नभ छाई ॥ भय ताप मिटाये सुधा बुंद

६२
पदमाला।
वरसाई ॥ तुम जग जीवनके फंद दिये निरवेरी ॥
धनधन्य प्रभू० ॥ २ ॥ खेलत आंगन चांडाल चोर
उद्धारे, कैसे अति अधम जघाइ मघाई तारे ॥ करि
केहरि वन में कृष्ण नाम उच्चारे ।। पद पारस परसत
बंध अमित जन टारे ॥ गौरांग प्रभू क्यों करी मेरे
हित देरी ॥ धनधन्य प्रभू० ॥ ३॥ इकवेर रजक से
श्रीहरि नाम लिवाया ॥ कहते ही भक्तिरस रोम
रोम में छाया ॥ फिर जिसने उसके तनको हाथ
लगाया ॥ होगया संस्त तत्काल प्रेम पद पाया ।।
चैतन्य चन्द काटिये वेगि भव वेरी । धनधन्य
प्रसू० ॥ ४॥ सब काशी के सन्यासी ज्ञान अभिमानी॥
आचरण प्रभू का देखि लाये मन ग्लानी ॥ जब चली
नाथ से वेद बाद की बानी ॥सुनि द्वैत अर्थ उपनिषद
मती वौरानी ॥ नव खंड मही प्रभु की कीरति ने
घेरी ॥ धनधन्य प्रभू० ॥ ५॥ जव नवद्वीप नव्वाब
यवन दुखदाई ।। करी नगर कीरतन की सब ठौर
मनाई ॥ तव स्वप्ने में धरि सिंह रूप डरपाई ॥
हरि नाम कीरतन प्रगट कियो सव ठाई .॥ तिहिं
उद्धारा बलवंत वजी नभ भेरी ॥ धनधन्य प्रभ
चैतन्य गाथ जग तेरी ॥६॥

पदमाला। पद १०१. (चाल लावनी.) ॥ सुनके बड़ा दरवार तुम्हारा देस से आये हैं । पतीत पावन नाम आपका, वेद शास्त्र यश गाये हैं । ॥१॥ नहीं फिरा है निराश कोई, जो इस दर पै आया है। दौलत हश्मत दीनऽरुदुनिया, जो चाहा सो पाया है ॥ २॥ जिलका नहीं कोई वाली वारिस, है उसका दरवार यही ॥ लावारिस जो माल हुआ, उसकी सालिक सरकार सही ॥३॥ तू मालिक मैं वन्दा तेरा, अब इसमें क्या झगड़ा है ॥ पापों के क्या देख अटम्बर, प्यारे दिल में बिगड़ा है ॥४॥ करनी को क्या देखते हो, अपनी तरफ कुछ नजर करो ॥ करो कुछ ऐसा जैसे तुम हो, खता हमारी माफ करो ॥५॥ औरों ने जब टेर करी, फिर देर नहीं की एक घड़ी॥ मेरी खातिर देर लगी क्या, ऐसी मुश्किल आन पड़ी ॥६॥ जलवा कुछ दिख- लाव नाथ जी, तौ अब हिन्दू धर्म बचै ॥ हटाव पर्दा दिखाव मुंह को, तो आलम में धूम मचै ॥ ७ ॥ पुरानों की तौ पुरानी बातें, होगई अब कुछ और पदमाला। चलै ॥ नाम जहां में होवे तेरा, और हमारा काम चलै ॥८॥ देरदार मत करो नाथ अव, अर्जी तुम पर लाये हैं ॥ दरपै खड़ा बलवंत पुकारे, शरण तुम्हारे आये हैं ॥९॥ ॥ पद १०२. डंके हैं त्रिभुवन नाथ नाम के तेरे ॥वैठे हैं आज बृजराज तेरा घर घेरे ॥१॥ तुम लछमीपति भग- वान कृपा आगारे ॥ क्या भूख हमारी जरा विचारो प्यारे ॥२॥ घनघोर मेघ मंडल बरसें महि सारे ॥ तहां प्यासा चातक जैसे चोंच पसारे ॥३॥ जहँ सदा भरा भरपूर पयोनिधि भारा॥ वह क्या हैगा इक अंजुलि नीर उदारा ॥ ४ ॥ नहिं तुम सम कोउ बलवंत दान व्रतधारी ॥ अब पूरण कीजै इच्छा नाथ हमारी ॥ ५॥ पद १०३. वृजराज सुनहु महाराज विनन्ती मेरी ॥ अब कृपा करो दुःख हरो शरण मैं तेरी ॥धृ०॥ दारिद्र दुःख दल दलन परम उपकारी ॥ प्रभु चरण आपके पदमाला। ६५ शरण सुरासुर झारी । तुम भक्तन के हित अनेक नर तनु धारी ।। नहिं टेक भेष की नाथ कबहुं तुम टारी ॥ दीनन प्रतिपालनहार दया दृग हेरी ॥१॥ उद्धारे अधम अनेक वेद गुण गाई ॥ अस अमल अनूपम गाथ तिहूंपुर छाई ॥ पावक न जरो प्रल्हाद मयासुर सोई ॥ तुम राखौ ताको मार सकै नहिं कोई ॥ श्री कृपावन्त भगवन्त विपत निर्वेरी ॥२॥ तुम तात मात गुरु बंधु द्वारकाबासी ॥ अस जतन करो जदुनाथ कटे भवफांसी । बहुनात तोहि मोहि कृपा- सिंधु गुणरासी॥सन्मुख सार संसार करो मत हांसी । करुणाकर दीनदयाल करो मत देरी ॥३॥ हे दीन बंधु सुखसिंधु देवकीनंदन ॥ जगदीश जक्त प्रति- पाल देव जगबंदन ॥ गोपीजनवल्लभ श्याम गोपकुल- मंडन ॥ दीनन के दारिददहन दीन दुख खंडन ॥ भगवंत जानि बलवंत चित्त निज चेरी ॥४॥ अब कृपा करो०॥ पद १०४. दुर्घट संकट आपड़े भयंकर भारी ॥ निरौ कृपा निधान कष्ट भयहारी ॥धृ०॥ तुम पति राखी द्रौपदी

पदमाला।
सती दुख टारौ ॥ हो पार्थ सारथी कौरवदल संहारौ॥
तुम पूरण कियो जो हट ध्रुव वालक धारौ ॥ पद
अटल दियो जो टरै न काहू टारौ ॥ दुखि दीनन
देखि न सकत दया व्रत धारी ॥१॥ तुम टेर सुनी
गज की खग पति तजि धाय ॥ गहि चक्र नक शिर
काटि नाग अपनाये॥ कर पकरि कंस के केस प्रभाव
दिखाये ॥ भूतल पछारि निज बल खल प्राण नसाये ।।
सुर असुर पशू पक्षी तारे नर नारी ॥२॥ तव कीरति
अमल अनूप वेद विस्तारी॥ गोविन्द त्रिविक्रम
विष्णु चतुर्भुज धारी ॥ मधुसूदन वामन श्रीधर पर
उपकारी ॥ प्रद्युम्न अधोक्षज नरहरि हरि सुखकारी॥
हे हृषीकेश संकर्षण कृष्ण मुरारी ॥३॥ अनिरुद्ध
जनार्दन वासुदेव अविनाली ॥ हे पद्मनाभ दामोदर
जन मन बासी॥ हे उपेंद्र उत्कट असुर प्रवल दल
त्रासी ॥ जो पठन करे पद कटिहैं संकट रासी ॥
वलवंत सदा भगवन्त चरण बलिहारी ॥४॥
पद १०५.
स्वामि बिन ऐसो कौन दयाल ॥धृ०॥ सुमिरन
करत विकल उठि धावें, करै भक्तप्रतिपाल ॥१॥

पदमाला।
गखत निज जन निस वासर, जिम कच्छप प्रिय-
वाल, ॥ २ ॥ टेरत कृदि खंभ को फारौ, विपत हरी
तत्काल ॥ ३ ॥ अन्य भजे जग छांडि स्वामि अस,
फसें ने माया जाल ॥ ४॥ सुरत संग लागे रहैं निस
दिन, धन बलवंत कृपाल ॥ ५ ॥
पढ़ १०६.
नाथ विन को पत राखन हार ॥ ऐसो कौन
उदार ।। धृ० ॥ ग्रस्यो ग्राह गजराज जब, व्याकुल करी
पुकार ॥ चक्र नक शिर काटिके, लीन्हों त्वरित
उबार ॥१॥ जब दुःशासन द्रौपदी, सन्मुख राज
समाज ॥ विना वसन लागो करन, तब राखी प्रभु
लाज ॥२॥ जिनकों या संसार में, नहीं. कहूं
आधार ।। तिनक दीन दयाल प्रभु, तुमहिं एक रख-
वार ॥३॥ व्याध गीध गणिका जिन्हें, तज्यो सकल
संसार ॥ ऐसे अधम अनाथ ते, त्वरित किये भव-
पार ॥ ४॥ प्रणतपाल प्रणपाल हरि, त्रिभुवन सुयश
तुम्हार ॥ देखि मगन बलवन्त छबि, बार बार
बलिहार ॥ ५॥

१८ पदमाला पद १०७. दीन हितकारी मोरा नाथ ॥धृ०॥ अजामील से अधम उधारे, विश्वविदित गुण गाथ ॥ १ ॥ जवं जल मांझ ग्राह गज खींच्यो, डूबत पकयो हाथ ॥ २ ॥ विनय करत बलवंत जोर कीजै कर, आज सनाथ ॥ ३ ॥ पद १०८. मैं अस श्रवण सुनी बृजराज ॥ दीन दयाल पतित पावन प्रभु, राखत जन की लाज ॥धृ०॥ गज अति दीन हीनबल भो जब, अस्यो आय झषराज ॥ आरत गिरा उचारत पहुंचे, त्वरित त्यागि खगराज ।। ॥ १॥ केवट कीश असुर किय पावन, दे धन राज समाज ॥ भनि बलवंत कान्त कमला के, लीजिये नाथ निवाज ॥२॥ पद १०९. सुनिये अरज हमारी, गिरधारी संकट हारी, डूबत लेहु उबारी ॥धृ०॥ मैं पतित तुम पतित

पदमाला।
६९
उधारन, अपनी ओर निहारी॥ जन बलवंत आस
चरणन की, आयो शरण तुम्हारी ॥ २॥
पद ११०.
सुनिये दीनदयाल देव दीनन दुखहारी ॥ दीन-
बन्धु सुखसिन्धु दयानिधि जन हितकारी ॥१॥
विना पंख के बाल विहंग व्याकुल जस भारी॥ पीड़ित
क्षुधा महान वत्स जिम धेनु निहारी ॥२॥ तृषित
चातकी स्वातिबूंद हित बदन पसारी॥ प्रिया पिया-
की बात तकत नैनन जल ढारी ॥३॥ तैसे अब
बलवंत विलोकत वाट तुम्हारी ॥ बेग दरस अब
देहु कृपानिधि कुंजविहारी ॥४॥
पद १११.
।
दरस अव दीजे श्रीनंदलाल ॥धृ०॥ अब नहिं
सह्यो जाय मोपे दुख, करुणा करिय कृपाल ॥१॥
बीते जुग अनंत पद बिछुरे, धीरज अब न गुपाल ॥२॥
मैं यदि कूर कुटिल अघ खानी, तुमहो पतितनपाल ॥३॥
। कृपापंथ बलवंत निहारत, कीजै बेगि निहाल ॥ ४॥

७० पदमाला। पद ११२. श्याम मुख देखे ही परतीत ॥धृ०॥ ऊधो कहा सिखावत हमको, ज्ञान ध्यान की रीत ॥१॥ हम अबला नहिं जानी ऐसी, लावत कटु फल प्रीत ॥ २॥ यह बलवंत विरह रसके बस, लेहैं तिहुंपुर जीत ॥३॥ पद ११३. सेवक न जियेंगे बिना दरस पद पाये ॥ नहिं आप रहोगे बिना कृपा दिखलाये ॥१॥ हैं सुभाव अपने अपने बने बनाये॥ यह अखंड नाते कैसे मिटें मिटाये ॥२॥ फिर क्यों रखते हो वृथा जिया तर- साये ॥ इक दिन तो देउगे मुझे मेरे मनभाये ॥३॥ कभी उदारता में विचार नहिं आता है ॥ जब देना है फिर उसमें आज कल क्या है ॥४॥ दाता तो दीन मुख देखे ही देता है ॥ बलवंत करे मत देरी दिल दुखता है ॥ ५॥ पद ११४. रहते हैं व्यथित नित विरह विपत के घेरे ॥ मुख दिखा दियाकर कभी तो सांझ सवेरे ॥१॥ तुमहीं

पदमाला।
७१
हो केन्द्र मेरे सुख संपति केरे ॥ तेरे ही नाम से फिरे
हैं मेरे फेरे ॥ २॥ नहिं रही जरा भी सकत श्याम
तन मेरे॥ दम निकल जायगा हाय बिछुरते तेरे ॥३॥
जावंगे योहिं क्या बिना कमल मुख हेरे ॥ बलवंत
तुम्हारे जनम जनस के चेरे ॥४॥
पद ११५.
दीनानाथ कहां लगाई देर ॥ धृ० ॥ बाट तकत
अँखियां पथराई, थाको मग मग हेर ॥ १॥ करत
पुकार कंठ कुंठित भो, सुनी न अबलौं टेर ॥२॥
जन बलवन्त आस दरशन की, परोद्वार तव घेर॥३॥
पढ़ ११६.
1
सोचत मोहिं बहुत दिन बीते ॥धृ०॥ चाहत बहुत
स्वामिपद सेवन, होत नहीं चित चीते ॥१॥ यह
परचण्ड प्रवल माया से, जीव कवन विधि जीते॥२॥
व्याकुल रहत सतत जिय मेरो, कृपासिन्धु याहीते ॥३॥
कौन दशा बलवन्त होय अब, रहत सदा भय
भीते ॥४॥

७२ पदमाला। पद ११७. मन की भीति मोहिं अति भारी ॥धृ०॥ पलटत जाहि कलप नहिं लागे, जिमि भुजंग विषधारी॥१॥ जोगी जती साधु सन्यासी, रहे सकल हियहारी॥२॥ नहिं विश्वास यदपि सतसंवत, रहै सुमारग चारी ॥३॥ पीपी पयहिं गरल खल उगले, दुष्ट भयंकर भारी ।। ४ ॥ रुकै न अब बलवंत कृपा बिन, काली दमन मुरारी॥५॥ पद ११८. ये मन मूढ सुभाव आपनो, नाथ काहुबिध नाहिं तजै ॥ धृ०॥ जिहि कारण दारुण दुख पावत, करत सोइ शठ नाहिं लजै ॥१॥ किये अमिय उपदेश अनेकन, तिनहिं निदरि विष विषय भजे ॥ २॥ नेक न शठ हठ तजै आपनी, कहौ खलहिं कहं लौं बरजै ॥३॥ मन मतंग बलवंत न माने, हरिपद अंकुश धरो निजै ॥ ४॥ पद ११६ जग षट वैरी बलवान, करै मतिहान, सुर ईश, गिरीश, मुनीश, सबनके करें गलित अभिमान ॥धृ०॥

पदमाला।
७३
ये क्रोध अनल जग जारा, नीती पथ लोभ बिगारा॥
कामिनी कामना नैन बान, बस कीनो सकल
जहान ॥१॥ यह मोह पाश अति भारी॥जीते गल
फांसी डारी ॥ मद मदन मौज की फौज चढे, तब
को ठेरै बलवान ॥२॥ उर मत्सर भुजंग भारा ॥
विष सुखपुर सकल उजारा ॥ जब धारि प्रखर
तरवार चढ़े छैउ कौन बचावे प्रान ॥३॥ जग जीव
वाल इक जानो ॥ तिहि
पुरानो ॥
वलवन्त बिकट जब जुद्ध जुरै, तब पत राखे
भगवान ॥४॥
साथी ज्ञान
पद १२०.
प्रभु की महिमा अगम अपार ॥धृ०॥ नेति नेति
निगमागम गायो, रहे मौन मुनि धार ॥१॥ थाके
शेष महेश सुरेशकु, कोउ न पायो पार ॥२॥ दीन
दयाल विश्व उद्धारण, धारो वृज अवतार ॥३॥
सेए न सहित सनेह चरण जिन, ते डूबे मजधार ॥४॥
जे बलवंत शरण तकि आये, भयो सहज उद्धार ॥५॥

पदमाला। पद १२१. कृपानिधान सुजान प्राणपति, तुम्हरी सुध कैसे बिसरावै ॥ संकटहरण भरण पोषणता, इनकी जव उर में सुध आवै ॥ पल पल प्रीति जिया में उमगत, नैनन में माधुरि छबि छावै ॥१॥ जिनको जीवन चरण तुम्हारे, किहि विधि वे निज समय वितावें॥ वत्सलता, ममता. सुशीलता, सुन्दरता प्रति पल सुध लावे ॥२॥ निसदिन गुण बलवंत नाथ के, जाके श्रवण मनन में आवे ॥ ताहि बिसरवो कैसे होवे, सोवतहू कर पकरि जगावै ॥३॥ पद १२२. दयानिधान सुजान प्राणपति, दूर देस किमकर मोहि डारो॥ मेरोही भार भयो कह भारी, भुवन चतुर्दश को रखवारो ॥धृ०॥ यदि अपराधी तदपि किते दिन, सहिहों शिक्षाभार दुखारो॥ नीति रीति विपरीत होय सब, जो जुग जुग मोहिं योंही टारो ॥१॥ दुःख वियोग दुसह भो अब तो, देगि उपाय दयाल बिचारो, रोय रोय अँखियां लाल भई, अरु कंठ रुद्ध भो करत पुकारो ॥२॥ जल बिन मीन ,

पदमाला।
माता,
सुता
बिन जिम धेनू बिन बत्स विचारो, तैसी
है हरि दशा हमारी, अब बलवंत दया उर
धारो ॥३॥
पद १२३.
प्रभु विन को भव विपत हरै ॥धृ०॥ संसृत
व्याध अगाध जीव की, टारे नाहिं टरै ॥१॥ ज्यों
ज्यों याहि विचारो त्यों त्यों, दुर्घट दृष्टि परै ॥२॥
गलित होत आयुध साधन सब, यह मग चरण
धरै ॥३॥ बाल ख्याल नहिं मुक्ति पदारथ, योगिन
धीर गरै ॥ ४॥ निज भुजबल बलवन्त नहीं कोउ,
दुस्तर सिन्धु तरै ॥ ५॥
पद १२४.
वहुत दिन टारो अब न टरै ॥धृ०॥ जनम जनम
के दास आपके, कैसे पद बिसरै ॥१॥ समरथ नाथ
बिना निज दुख कर, कालों विनय करें ॥ २॥ आस
और विश्वास कहांलों, व्याकुल जीव धरै ॥३॥
अब बलवंत होय सो हौवे, द्वारो घेर परें ॥४॥

पदमाला।
ક
पद १२५.
नाथ दिन बीत गये बहुतेरे ॥धृ०॥ श्रवण परी
न पुकार आजलौं, परे द्वार नित घेरे ॥१॥ वेड़ी
ममता तन को स्वामी, तुम बिन कौन निवरे ॥ २॥
कवन हेतु तट लगत न तरणी, करण धार तुम
सेरे ॥३॥ काल मान लखि विकल होत चित,
लखि निज घर के चेरे ॥४॥ शरण गये की लाज
निबाहत, यह दृढ़ निश्चय मेरे ॥५॥ चरण वियोग
रोग तनलागो, पल पल जुग सम हेरे ॥६॥ दृढ़
विश्वास बलवंत राखिये, आये दिन सुख केरे ॥७॥
पद १२६.
कृपा गुणगांथ नाथ किम गाऊं ॥धृ०॥ जप तप
जोग जतन नहि एकहु, तुम्हरो कहत लजाऊं ॥
तापर बहुविधि कृपा करी हरि, तोउ न हिये
'अघाऊं ॥१॥ दानिहिं दया देखि याचक जस,
पुनि पुनि मांगन धाऊं। अबकि बेर मुहिं और एक
बर, दीजे पुनि न सताऊं ॥२॥ जिन तब सकृत
दरस हित त्यागे, उभय लोक सुख ठाऊं ॥ नित-
बलवंत राखिये तिनके, चरणाम्बुज की छाऊ ॥३॥

पदमाला।
७७
पद १२७.
कृपा गुणगाथ चहूं दिस छाई, सुनि जन आये
धाई ॥धृ०॥ कहा कथा गज गीध व्याध की, जिहि
जन पुनि पुनि गाई ॥ कोटि कोटि नित पतित
उधारत. साम्बी जिन गति पाई ॥१॥ जो चित
चढ़ी कामना जाके, पूरण की यदुराई ॥ सदा
खुले भंडार स्वामि के, कर सके को लमताई ॥२॥
सकुचत हों निज दीन दशा लखि, अरु तुम्हरी
प्रभुताई ॥ समझ परै नहिं नेक कवन विधि, लियो
दीन अपनाई ॥३॥ तदपि सतत भय भीत रहत हौं,
लखि निज चित चपलाई ॥ यह वलवन्त कुशील
कुमति अति, करै न पुनि कुटिलाई ॥४॥
पद १२८.
कृपानिधि चरण शरण अब दीजै ॥धृ०॥ जन्म
अनेक भ्रम्यो भवसागर, अब जिन नाथ तजीजै ॥१॥
शरणागत प्रतिपाल नाथ प्रण, तापर छिन चित
दीजै ॥२॥ दयासिन्धु दीनन प्रतिपालक, जन
अपनो करलीजै ॥३॥ भववाधा बलवन्त व्यथित
अति, करुणा सत्वर काजै ॥४॥

पदमाला। ने पद १२६. करि साधन हारे, मिटा न भव का फेरा ॥ अब आपहि करो उपाय, नाथ कुछ मेरा ।। १॥ माया ऐसा हाथ, सील पर फेरा॥ जितना सुलझाया जाल पड़ा उलझेरा ॥ २॥ जुग बीते नाथ अनंत, विपत ने घेरा ॥ दुखद्वंद काटि ब्रज चंद्र करो, निरवेरा ॥३॥ है अधम उधारन नाथ, विदित ब्रद तेरा ॥ अब कृपा करो बलवन्त चरण का चरा ॥४॥ ॥ पद १३०, अपराध मेरे जिन ध्यान धरो, हे दयासिंधु अब क्षमा करौ ॥धृ०॥ मैं अतिदीन मलीन हीन मति, माया जाल परौ ॥१॥ समरथ नाथ उदार सुमति शुचि, सुमिरत को न तरो ॥२॥ श्रीयदुनाथ गाथ यह सुनि सुनि, उर अनुराग भरो ॥ जुगलचरण बलवंत शरण अब, भव दुख द्वंद हरो ॥३॥ पद १३१. हमारो जीवन नाम तिहारो॥धृ०॥ विसरत सुरत स्वांम इक जाकी, बिकल होत जिय भारो॥ याद्रि पदमाला। - आसरे सुख सों जीवत, आन न पोषण हारो ॥१॥ चाखत रस रसना रस बाढत, अमृत कहा बिचारो॥ हारे को हरि नामहिं जग में, केवल तारनवारो॥२॥ जीवन मूरि यही विरहिन को, जहंलगि दृष्टि पसारो॥ सो बलवंत नाम यह मुखसों, नाथ न कीजै न्यारो ॥३॥ , , पद १३२. तुम विन आन उपाय न मोरे, शरण भयो करुणाकर तोरे ॥धृ०॥ अजित अजा जग व्यापक जाने, ब्रह्मादिक छिन में झकझोरे ॥१॥ तहं कह कथा होय नर पामर, जुद्ध अजागज जैसे जोरे ॥२॥ ऐसे प्रवल फंद माया मधि, बंध्यो आय कर्मन के डोरे ॥३॥ कोउ विधि बँध बलवन्त द्वंद को, छूटै ना विन तुम्हरे छोरे ॥४॥ . पद १३३. चरण गहों बिनवहुं करजोरी, देहु नाथ भव- बंधन तोरी ॥धृ०॥ अधम उधारन नाम तिहारो, कीरति पसरि रही चहुंओरी ॥ कृपा पंथ निरखत

८०
पदमाला।
,
निस बासर, बैठो चरण कमल दृग जोरी ॥१॥
जन्म अनेक भ्रमत भये स्वामी, विपता सही नहीं
कछु थोरी ॥ अब बलवंत विलंब न कीजै, जानि
दास वृषभानु किशोरी ॥ २ ॥
पद १३४.
--
बिनवत बीतो वृजनाथ समय नहिं थोरा ॥ मुख
से बोलो दो बोल, विकल जिय मोरा ॥ धृ०॥ मोतन
हरि हेरो नेक, कृपा दृगकोरा ॥ तव चारुवदन
निरखत जिम चंद्र चकोरा ॥ १ ॥ जुग बीते अट्ठाईस,
विहंगपति गामी ॥ नहिं आसा पूरण भई, आजलौं
स्वामी ॥ २॥ तुम दीनानाथ दयानिधि, जस चहुं-
ओरा ॥ कैसो कीन्हों हमरोहित, हृदय कठोरा ॥३॥
कन्या जैसे निज श्वसुर, सदन को जावे ॥ लखि
जननी आनन, बारबार बिलखावे ॥ ४ ॥ जिम मीन
दीन जीवन, बिन कल नहिं पावे ॥ ५॥ मृगी भूलि
शिशुहिं बन, जैसे शोधत धावे ॥ तैसी भइ हमरी
दशा, गोपीचित चोरा ॥ बलवंत आस पुजवहु,
श्री नंदकिशोरा ॥ ६॥

पदमाया ८१ पद १३५. अब कव कृपा करहु राधेवर ॥ दीन छीन मति हीन जानकर ॥ धृ० ॥ जोवन गयो जरा अंग आई, झलकन लगी स्वेत लट मुख पर ॥ १॥ तौउ न प्राणनाथ सुध लीन्ही, अस कस कठिन भये करुणा- कर ॥ २ ॥ दीनबंधु प्रभु नाम तिहारो, छाय रह्यो जस अवनि मनोहर ॥ ३ ॥ अव वलवंत अवेर कवन विधि, वेगि बहु करुणा गुणसार ॥ ४ ॥ पद १३६. ॥ काहु दिन कृपा होयगी स्वामी, यह निश्चय मो मन सब भांत ॥ धृ०॥ तव लग यह दुरदशा हमारी, कारन कवन विलोकत तात ॥ १ ॥ काल करहु सो आजहि कीजै, तुम्हें नहीं कछु दुरघट बात ॥ पीर सहत हैं धीर धरत हैं, रेन दिना मन को समु- झात ॥ २ ॥ जन्म अनंत याही विधि बीते, दुसह कोउ नहिं हमें दिखात ॥ पै तुम्हरे सन्मुख प्रभु आवत, धीर बीरता सकल परात ॥ ३ ॥ जिम बलवंत मात. मुख देखे, ताड़ित बाल व्यथा अधिकात ॥४॥ ॥

८२ पदमाला। पद १३७. जन्म योहीं बीतो जात विहारी ॥ जयतें भो संबंध आपते, मिले न एकहु वारी ॥ कवलों धीरज धरों प्राणपति, देखहु हृदय विचारी ॥ १ ॥ बालापन योवन सब बीतो, स्वेत भई लट कारी ॥ तोउ न नाथ नेक सुध लीन्ही, अस कठोर भये भारी ॥ २॥ इक आधार नाम धरि तुम्हरो, बैठी सवन विसारी ॥ ३ ॥ अब जिन अंत कंथ कछु देखो, होवे हंसी तुम्हारी ॥ ४ ॥ तुम बिन आन गती नहिं राखो, चाहे देहु विडारी ॥ ५ ॥ गोपीनाथ गाथ करुणा तव, निगमागम विस्तारी ॥६॥ करिये वेगि विचार स्वामि चित, अपनो नाम निहारी ॥ ७ ॥ अब बलवंत विलंब न कीजै, देहु दरस बनवारी ॥ ८॥ पद १३८. तुम्ही पै रचो है सुहाग बिहारी, नाथ कवन विधि सुरत विसारी ॥धृ० ॥ कृपानिधान सुजान प्राणपति क्षमिये भूल चूक बनवारी ॥ १॥ जो अपराध अगाध किये मैं, समरथ नाथ उदार बिचारी ॥२॥ बांह

पदमाला।
८३
गहे की लाज तुम्ही को, प्रीतरीत प्रतिपाल मुरारी ॥३॥
दया निधान कान दे सुनिये, करत विनय श्रीपद
सिरधारी ॥४॥ बहुत अबेर भई करुणाकर,
अवलों सूनी सेज हमारी ॥ ५॥ अति व्याकुल बल-
वंत विरहवस, दरस देहु श्रीकुंजबिहारी ॥ ६ ॥
पद १३९.
लगन तोसे लागी रे घनश्याम ॥ धृ०॥
दोहा ।
प्रीतम परम सुजान पुनि, कृपासिंधु गुणधाम ।
रूप शील गुण सीव शुचि, लाजत कोटिन काम ॥१॥धृ०॥
(चाल)
कुटिल लटा लटके मुख ऊपर, बदन इंदु छबि
छटा मनोहर । भृकुटी कुटिल नैन मन्मथसर,
सोहत सुन्दर वेणु अधर पर ॥
दोहा ।
ऐसे रूप अनूप को, देखि गई बौराय ॥ ढूंढत वृज
बलवंत सब, घर अँगना न सुहाय ॥ १ ॥

८४
पदमाला।
पद १४०.
दिन रैन झरोके नैन लगे रहते हैं। विन लखे
तेरे नंदलाल बिकल होते हैं ॥ धृ० ॥ इक नजर
देखने में क्या हम लेते हैं ।। है खेल तुम्हारा सुख
से हम जीते हैं ॥ १ ॥ जीवन है हमारा सूरत श्याम
तुम्हारी ॥ इक बेर दिखादे हमे वह मूरति प्यारी ॥२॥
बलवंत तजे मत धीर पड़ा रह दर पर ॥ आवेगा
कभी नंदलाल खेलता बाहर ॥ ३ ॥
पद १४१.
.
कुर्बान जान सूरत पै किया करते हैं ॥ हम तुम्हें
देख वृजराज जिया करते हैं ॥१॥ गजराज मस्त
जिस तरह चुआ करते हैं। दिन रैन हमारे नेन
वहा करते हैं ॥२॥ यो प्रीति बेल को पानि दिया
करते हैं ॥ कब फूलेगी यह बाट तका करते हैं ॥३॥
कोई पूछे क्या बलवंत किया करते हैं। आगे की
मंजिल सफा किया करते हैं ॥४॥

पदमाला।
॥
पद १४२.
जवस देखी झलक तुम्हारी, हुवा है यह दिल
दीवाना ॥ तर कारण, नाथजी, लिया फकीरी का
वाना ॥ धृ०॥ विनने जनम बीत गये योंहीं, कब
नक दिलको बहिलाना ॥ १॥ तन में खाक रमाई
मनको. किया है सबसे वेगाना ॥ २॥ वालापन की
प्रीति सांबरे, हाय भूल कहिं मत जाना ॥ ३॥ जबसे
तुझसे हुई मुहब्बत, और किसीको नहिं जाना ॥४॥
मरत है हम तरी सरतपै, शमापै जैसे परवाना॥ ५॥
सब रोनक हे तर जात की, वर्ना है जग वीराना ॥६॥
इस क्लवंत इश्क का तरे, रहेगा जग में अफसाना॥७॥
पद १४३.
कमल सुख कवलौं दुराये रहोगे ॥धृ०॥ निशि
दिन दरस लुब्ध हग मधुकर, कब सुख देन चहौगे
॥ १ ॥ प्राणनाथ यदुनाथ कवन दिन, हँसि हँसि बैन
कहोगे ॥ २॥ कव करि पूरण आस हमारी, तिहुं-
पुर सुयश लहोंगे ॥३॥ दृढ़ भरोस बलवंत विरह
लखि, हरि कर धाय गहोगे ॥४॥

८६
पदमाला।
पद १४४.
जबसे देख श्याम सुंदर सखि, पलभर पलक न
लागी ।। धृ०॥ निशि दिन विकल विलोकत चहुंदिशि,
श्याम रूप अनुरागी ॥१॥ वीतत युगसम निभिष
विरहवस, काम अनल उर जागी ॥ २ ॥ भूषण वसन
भार विषसम भये, खान पान दिय त्यागी ॥३॥
आन मिलैं बलवंत श्याम जब, तवहिं होउं बड़-
भागी ॥४॥
पद १४५.
कवन परे ऐसी विपता में, प्रीति किये को फल
पायो । धृ०॥ तन मन धन अपनो सव बारो, तोउ
न उनके मन भायो ॥१॥ प्रीति किये ते दुख उप-
जत है, वोयो कहा कहा फल आयो ॥२॥ नेह पंथ
वलवंत कठिन है, धरत तुरत पग उरझायो ॥ ३ ॥
पद १४६.
देखी जवसे मोहिनि मूरति,रूपरंगी अँखियां मेरी॥
हाय कहूं क्या, जागता जादू है सूरत तेरी ॥१॥

पदमाला।
तेरा
अमृत
से मीठा, स्वाद बढ़ा
रसना घेरी ॥ सुनके गुणगण, सदा मैं बिना मोल-
की हुइ चरी ॥२॥ विरह विकल बलवंत हार पर,
निसदिन करता है फेरी । मिलजा प्यारे, बहुत दिन
हुये करै मत अव देरी ॥३॥
पढ़ १४७.
वृज वीथिका वजार मोहन, ढूंढिआई रे ॥धृ०॥
गोकुल ढूंढि वृन्दावन ढूंढो, हारे यसुमति माई॥१॥
पल पल मोहिं जुगन सम बीतत, रो रो रैन बिताई
॥ २॥ बढ़ी व्यथा बलवंत विरह की, दीजै दरश
कन्हाई ॥३॥
पद १४८.
से
जव
गये मधुबन
.
श्याम
को ॥धृ०॥ धरत न
धीर एक पल आली, कहा करिय या मन को ॥१॥
सूल से फूलभये विष बीरी, सिंगार अंगार से तनको ॥२॥
किहि विधि प्राण राखिये सजनी, गताधार जीवन
को ॥३॥ वृजवनिता बलवंत श्याम बिन, करें कहा
गृहधन को ॥४॥

पदमाला।
८८ .
पद १४९.
हे ली अवलौं हरि नहिं आये ॥धृ०॥ धेनु धाय
बत्सन सन लागी, खगगण नीड बसाये ॥ १॥ भूले
पथिक प्रातके पंथन, भरमत सदन सिधाये ॥२॥
विरहकथा बलवंत कथनवर, अधिक अधिक रस
छाये ॥३॥
पद १५०.
घनश्याम तुम्हें हेरत हेरत, चहुंओर सकल वृज-
भूमि फिरी ॥ धृ०॥ नहिं नाथ पंथ को पतो लगो,
गृह ग्राम विपिन कंदरी गिरी ॥ १॥ करि मोह भंग
रचि भस्म अंग, सेली सिंगी कफनी डारी ॥ लट
कुटिल गूंथि सजि जटाजूट, लियो जोग भार माथे
भारी ॥२॥ तुमसे जो हित अनहेतु कियो, ताके
फल पाय भले बनवारी ॥ यह नेह निवाहन नाथ
कियो, तुम भोग करो हम जोग धरी ॥३॥ जहं
रही तहां सुख रहौ लला, रचना तो विरंची योहि
करी ॥ श्रीगोपी पदरज रचि बलवन्त, मन मस्त
भये डोलें लहरी ॥४॥

पदमाला। ८९ पद १५१. -- मैं कहां गया वह पीतम प्यारा श्याम हमारा, ढूंढि फिरी वन वरसाना नंद द्वारा ॥धृ०॥ कहं बैठे बदन दुराय जाय मनहारी॥देखन को अँखियां तरसें श्याम हमारी ॥१॥ कैसे जगनायक जल थल में संचारी॥ कहुं ओट उजागर दिखी न सूरत प्यारी ॥२॥ मुख दिखलाना भी हुआ तुम्हें तो भारी ॥ फिर होय हमारी कौन गती गिरधारी ॥ इक तेरे नामपर वैटि जनम सब काटा ॥ परतीत प्रेमकों नहीं किसी संग बांटा ॥ ४॥ वलवंत अंत नहिं चरणकमल बिन थारा ॥ कहां गया०॥ पद १५२. अरी दई मारी जरो यह होरी ॥धृ०॥ श्रीधन- श्याम वियोग व्यथा वस, कारी भई सब गोरी ॥१॥ रंग गुलाल लाल संग गो अब, धूरि उड़त चहुंओरी ॥२॥ लखि ज्वाला ज्वाला तन भड़के, अंग अंग होरी जोरी ॥३॥ बिरह बहि सों विपिन जरत है, होरी लगी सब ठोरी ॥ ४॥ बिरहानल सों सिन्धु पदमाला। दहत है, नहिं बड़वानल भोरी ॥५॥ तड़ित नहीं तलफन तिय जिय की, नभलों अनल बढ़ो री ॥६॥ प्रभु बलवन्त वेगि चल मिलिये, जवलों पावक थोरी॥७॥ होरी करैं ननरु तिहुंपुर की; वाला बिरहन बोरी ॥८॥ पद १५३. कैसे दूर देस मोहिं डार दई, पुनि नैहर सों कोउ सुध ना लई ॥धृ०॥ वैरिन सास ननँद दुख- दाई, पीतमसो पहिचान नई ॥जैसे वत्स विकल विन धेनू , तैसी गति निस दिवस भई ॥२॥ भूषण डारों, बसनन जारों, खाय रहों विष हाय दई ॥३॥ बिन बलवंत मात के हेरे, दशा मिटे नहिं दुःख मई ॥४॥ पद १५४. जाकी व्यथा सोई इक जाने, कृष्णप्रीति जिहिं लागी बलाय ॥ धृ०॥ नासो सुख संसार यहां सब, पीतमपंथ अगम दरसाय ॥१॥ बौरी कहै कुटुंब परवासी, गलिन बालगण धूर उड़ाय ॥२॥ खान .

पदमाला।
९१
पान उपभोग रोगसम, उन बिन आन न कछू
सुहाय ॥३॥ गुरुजन स्वजन नित्य मोहिं पूंछे, कैसे
पर्दो फारि बताय ॥ ४॥ कबहूं गावत कबहूं नाचत,
कवहूं जल लोचन भरलाय ॥ ५॥ जंत्र मंत्र अरु तंत्र
फुरे नहिं, करत उपाय व्यथा अधिकाय॥६॥व्याकुल
रहत सतत चित अपनो, उरझें स्वांस जिया घब-
राय ॥७॥ दूरदेश पीतमकी नगरी, कृशतन मग
पग धरो न जाय ॥ ८॥ लोक और परलोक तजे
दोउ, तोऊ नेक नहिं उनके भाय ॥ ९॥ जनम जनम
सजनी योंहि वीते, कबलों जिय को धीर बंधाय ॥१०॥
हाहा पंथ प्रीति को दुर्घट, लोगन को तो खेल
दिखाय ॥ ११ ॥ इत बलवंत दशा यह अपनी, उत
पीतम रहे बदन दुराय ॥ १२॥ परबस प्राण भये
अंब सजनी, करे जो वाको भली लखाय ॥ १३ ॥
पद १५५.
ऊधो कौन जतन अब कीजे ॥धृ०॥ यह बिरहा
कटु कूट कहांलों, चूंट बूंट कर पीजे ॥१॥ तुम्हरो
कपट भयो जग जाहिर, अब नहिं कोउ पतीजे ॥२॥
कान्ह सुजानप्राणपति बिछुरे, कवन आसरे जीजे ॥३॥

९२ पदमाला। भारी होय भाव की कामरि, ज्यों ज्यों रतिरस भीजे ॥ ४॥ इतो संदेश चरण गहि हरिके, उधो कहि जस लीजे ॥ ५॥ वृजवाला बलवंत विकल अति, वेगि दरस प्रभु दीजे ॥६॥ पद १५६. श्याम मुख देखन को वृज तरसे ॥धृ०॥ नैनन नीर प्रवाह निरंतर, तन विरहानल सरसे ॥१॥ ऊधो अहो प्रीति की महिमा, आगि लगी जल वरसे ॥ २॥ शीस नमाय चरण गहि कहियो, व्यथा कथा नटवर से ॥ ३॥ अव वलवंत विलंब न कीजे, पलपल युग सम दरसे ॥४॥ पद १५७. ऊधो निसिदिन धरकत छाती ॥धृ०॥ वनिताहग सरिता सम धारा, वहत रहत दिन राती ॥ १॥ आठो जाम रहत तन ताती, मनहु दीपि दुइ वाती ॥२॥ करो निदान कवन गद है यह, जासु. जियत जर जाती ॥३॥ विपति बड़ी ओछे तिय हिय में, अव नहिं नेक समाती ॥ ४॥ यह वड़

पदमाला।
९३
ब्रह्मज्ञान पढ़वेको, जोग न अवला जाती ॥५॥
काटत हैं हम काल आपनो, को जाने किहिं भांती
॥६॥ अव बलवंत प्रेमरस तजिके, और न बात
सुहाती ॥ ७॥
पद १५८.
तुम तो
॥
ऊधो
परम सयाने ॥ धृ०॥ वृजबालन
को
जोग पहावत, आप भोग लिपटाने ॥१॥ औरन
ज्ञान पढ़ावन पंडित, कोरे आप दिखाने ॥ २॥ यह
तुम्हरे पाखंड ज्ञान को, नहीं कोउ जग माने ॥३॥
यह वलवंत नेह के झगरे, प्रेम परे पहिचाने ॥४॥
पद १५९.
ऊधो मन नहिं पास हमारे ॥धृ०॥ भोह बंक
वन्सी वेधन करि, लैगये नंद दुलारे ॥ १॥ समझ सुनै
ताहि कछु कहिये, वौरन कह सिर मारे ॥२॥ कहत
कौनसों कहा न जाने, बोलत बिना बिचारे ३॥
अब न कथौ बलवंत ज्ञान कछु तुम जीते हम
३
हारे ॥ ४॥

पदमाला।
00
पद १६०.
ऊधो प्रीत करी पछतानी ॥ धृ०॥ हम जानी
कछु काल निभेगी, उन कछु औरहि ठानी ॥ १ ॥
आप जाय परदेश विलम रहे, पठवत तुमसे ज्ञानी.
॥२॥ मधुपुरि के राजा भये मोहन, करी कुवरी
रानी ॥३॥ यह झगरे वलवंत नेह के, वरनत सकु-
चत पानी ॥४॥
पद १६१.
उनहीं सों लागे नैन हमारे ॥धृ०॥ जाके सीस
मुकुट
पियरो पट, गल वनमाल विमल डारे ॥१॥
इंदु वदन तिल विंदु मदन जनु, बैठो सकुचि
लाज मारे ॥ २॥ भृकुटी कुटिल कटीले लोचन,
मनहु विशिख वर अनियारे ॥ ३ ॥ कुंचित केश
सुवेश सीस पर, माइक मदन फंद कारे ॥ ४ ॥
जमी जाल रंग एक दिखानों, प्राण पखेरु फंसे
प्यारे ॥ ५॥ ग्वालबाल संग धेनु चरावत, अंग छल
वल सबसों न्यारे ॥ ६ ॥ मगन रहत वलवंत
दिवस निशि, सो छवि अद्भुत उर धारे ॥ ७ ॥

पदमाला। पद १६२. मेरो नेह लग्यो हरिसों सजनी, कल न पड़े उन विन जिय को छिन, वैरिनसी कारी रजनी ॥ धृ०॥ हाहा कोउ मधुपुरी जावो, श्याम बुझाय चरण गहि लायो । हमरे जिय की जरन बुझावो, कोउ मिलावो प्राणधनी ॥१॥ खान पान मोहि कछु नहि भावे, भूपण वसन द नेक सुहावे । धवल धाम बन सदृश दिखावे, लागी जिय दृग कोर अनी ॥२॥ अंखियां हरि दर्शन की प्यासी, कब मिलिहे मोहन सुख- रासी । जन वलवंत सदा अभिलाषी, दृगन लालसा लगीधनी ॥३॥ पद १६३. सुरत वृजचंद्र की आवे, लखि फागुन को चंद॥धृ०॥ वह कलंकि निष्कलंक हमरो, बिछुरे सब सुख कंद ॥१॥ कहां वे भोग राग रंग गे सखि, कहां वे दिन आनंद ॥२॥ अबतो फागु लगत है ऐसी, - कुसुम बिना मकरंद ॥ ३॥ लाखि कालिंदी कूल कदंवन, होवत मति गति मंद ॥ ४॥ विरह व्यथा वलवंत हरन हित, चलिय वेगि नदनंद ॥५॥ -

पदमाला।
पद १६४.
।
श्याम बिन ना खलोंगी मैं होरी । तुम कैसोही
फाग रचोरी ॥धृ०॥ छियों न रंग गुलाल न परसों,
लखों न आंखन रोरी । देहों अबीर बुहार द्वारते,
गीत न गारी सुनोरी, करौ जिन तुम बरजोरी॥१॥
बाला हट और बाल विकट हट, देखि दोउ इकठोरी।
वृज बामा सब कृष्णपे आई, कहि बिन्ती करजोरी,
परी हट भानुकिशोरी ॥ २ ॥ सुनत वचन मोहन
मुसक्याने, हिये अनुराग भरोरी । आये भवन
राधिका माधव, अनुपम फाग मचोरी, रंग बलवंत
,
बटोरी ॥३॥
.
पद १६५.
हमारे भाग परोहै नेह, बालापनसों रूप अरा-
धन परी याहि करटेह ॥१॥ विरह व्याप नित मान
मनावन, झगरो और सनेह ।। सुखशाली सूखे नहिं
संतत, परत नेह को मेह ॥ २॥ सींचि सींचि बलवंत
यही रस, रची विरंची देह ॥३॥

पदगाना।
पद १६६.
दमाग
कहन न और उपाय ॥धृला अपनी अँखियाँ
लान कागेंगी. निदिन नीर बहाय ॥ १॥ चुरियां
नांगे मांग विगागं. बमनन देहुँ जराय ॥२॥
मागगीति कटिन कटारी. नाय रहां विष खाय ॥ ३॥
विदः व्यथा वनवन हरहु हरि. नतर बसों वन
.
पद १६७.
नग्न माह मोहन की आये, सखारी जियरा
अकुलाय ॥धृ.॥ वन घुमंड नभ मंडल छाये, दामिनि
दमक कार ॥ परत फुवार पवन पुरवाई, मोरशोर
च? और ॥ १ ॥ कुलन पूरि कलिंद नंदनी, बहती
करन कलोन ॥ हरित लता नरु कुसुमित कानन,
देबि दृश्य अनमोल ॥ २ ॥ सर सरितन सरसीरुह
पुंजन गूजन अंबरन भीर ॥ शाम तमाल रसाल
कुंज लग्वि, हावन हियों अधीर ॥ ३ ॥

पदमाला।
पद १६८.
सुरत नहिं बिसरत पतिम की, हाय कह भई दशा
मन की ॥धृ०॥धन्य धन्य सौजन्य शीलता, दयालुता
उनकी ॥१॥हियो हिलोरे लेत जव आवत, सुधि
उर गुणगण की ॥ २॥ मुख मयंक भ्रूबंक माधुरी,
छबि उन अधरन की ॥३॥ उर में उरझ रही सजनी,
अनि सायक लोचन की ॥४॥
पद १६९.
मन उरझो श्रीगोविंद सों, अव सुरमै ना ॥धृ०॥
हों तो सहज झरोके झांकी, प्रीति रीति समुझे ना ॥
हँसि हेरो हरि मोतन जवते, पलसर चैन परै
ना ॥ १॥ मन मूरख को कितो पढ़ाऊं, अपनी हठे
तजै ना ॥ वह मूरति माधुरी दृगनसों, टारे तनक
टरै ना ॥ २ ॥ खान अरु पान कछू नहिं भावे, मन
छिन धीर धरैना॥ नंदकुमार मिले विन सजनी, तन में
प्राण रहेंना ॥ ३ ॥ बेगि उपाय करहु अल अली,
जिहि विध व्यथा बट्टै नाबिन बलवंत रूप आराधन,
अंकुर प्रीति जगैना ॥ ४ ॥

पदमाला। पद १७०. अग्नियाँ वृजकिशोर निरखन को ॥ अति अकुलाति सतत घर वाहिर, धरत धीर नहिं छिन को ॥ धृ०॥ तरलति रहति निरंतर जैसे, तृषित चातकी घन को॥१॥ श्रीवृपभानु लली पढ़ पंकज, रहत लगाये मन को ॥२॥ करें कृपा बलबंन स्वामिनी, तबहिं मिले मोहन को॥३॥ पद १७१. कहु सजनी प्यारी, गोविंद कब अयह गोकुल ग्राम में ॥ धृ०॥ सावन मास आस बहु लागी, बीतत भय निगस ॥ भादों में माधो आवन की, लागिरही पुनि आस ॥ १॥ कहुस सजनी प्यारी॥धृ०॥ (उत्तर सखी का.) सावन भादों छाय रहै धन, निसदिन वर्षा त्रास ॥ गमन निपेध कियो निगमागम, जासों तजो प्रवास ॥ १ ॥ सुन राज दुलारी, आवत अब गोपाल लाल, लघुकाल में ॥ धृ०॥

१००
पदमाला।
प्रश्न-सुआ हाथ पाती लिख भेजी, बीत गये दिन
वीस ॥ पलटि नहिं आयो आलि अबलों,
कहा भई जगदीस ॥२॥ कहु सजनी
प्यारी ॥ धृ०॥
उत्तर-बनवासी वन फल दल खानो, वाकी कहा
प्रतीत ॥ बदलत नैन उड़त पिंजरासों, नहिं
काहू को मीत ॥ २ ॥ सुन राज दुलारी॥धृ०॥
प्रश्न-पिहु पिहु चातक रटत है, दृढ़ धरि धन
विश्वास ॥ मिले न स्वाती बूंद जो, जीवन
की किम आस॥३॥ कहु सजनी प्यारी ॥धृ०॥
उत्तर-चित्रा हस्त लगत गत मेघा, प्रगट जगत
यह रीत ॥ वरसे तो बरसे भलो, नाही कछुक
प्रतीत ॥३॥ सुन राजदुलारी ॥धृ०॥
प्रश्न-निर्मल जल नभ शशि विमल, लगत शरद
सुखधाम ॥ वालम पलटि विदेश सों, सबके
आये ग्राम ॥ ४ ॥ कहु सजनी प्यारी॥धृ०॥
उत्तर-राज काज के जाल में, उरझि रहे कई बीर॥
बहुत अबेर भई याहीसों, तजो न प्यारी
धीर ॥ ४॥ सुन राज दुलारी ॥ धृ०॥

पद्माला
प्रश्न-सुगुणवंत हेमंत में, घर घरंभोगविलास ।
सब नर नारी करत हैं, मो पीतम नहिं
पास ॥ ५ ॥ कहु सजनी प्यारी ॥धृ०॥
उत्तर-जमिके सर सरितन सलिल, भये शैल अनु-
मान ॥ कुहर दुरे भू स्वर्ग कस, पग मग धरें
सुजान ॥ ५ ॥ सुन राज दुलारी ॥ धृ०॥
इन-त्रिविध पवन कुसुमित गहन, भ्रमर सरस
गुंजार ॥ कल कोकिल की कूक सुनि, होत
करेजो छार॥ ६ ॥ कहु सजनी प्यारी ॥ धृ०॥
उत्तर-लखि वसंत विरहा व्यथित, चले भवन सुध
लाय ॥ सुमन फूलि शर बन रहे, कंथ पंथ
विसराय ॥६॥ सुन राजदुलारी ॥ धृ० ॥
प्रश्न-खस खाने खासे खड़े, हौदन नीर गुलाब ॥
जल केली रत नारि नर, नहीं जिया को
ताच ॥ ७॥ कहु सजनी प्यारी ॥ धृ०॥
उत्तर-घोर घाम वायू तरल, जल थल अनल समान ॥
तरवर ठाढ़े जरत हैं, किहि विधि आयें.
कान्ह ॥ ७ ॥ सुन राजदुलारी॥ धृ०॥

पदगाला।
- -
.
--
प्रश्न-विरह व्यथा बस रैन दिन, बीते द्वादश
मास ॥ अब कहु पीतम मिलन की, रहें छोड़
जिय आस ॥ ८॥ कहु सजनी प्यारी ॥धृ०॥
उत्तर-बीर धीर जिन त्यागिये, और एक है मास ॥
अधिक मास बलवंत में, पूरण Qहै आस ॥८॥
सुन राज दुलारी ॥धृ०॥
पद १७२.
कहा कहूं कछु कहि नहिं आवे, विसरगई सत्र
मति गति मोरी ॥धृ०॥ हम जानी हम चाहत
उनको, सोतो केवल भास भयोरी॥ अव यह जान-
परी है सजनी, वे सांचेहु चाहत हमकोरी ॥ १ ॥
जवते भनक परी यह कानन, सूझत नहिं कछु कहा
करोरी ॥ मैं अतिकूर कुशील कुजातिन, मोतन इतनो
लक्ष कियोरी ॥२॥ को जानै कबते वे चाहत, मैं-
रहि हाय सदा मुखमोरी ॥ जांउ कवन मुखसों अव
सन्मुख, रहत रैनदिन लाज मरोरी ॥३॥ लखि
दयालुता प्राण नाथ की, सजनी मोजिय जात
गरोरी ॥ अस बलवंत कृपानिधि पद पर, निस बासर
धरि सीस रहोरी ॥४॥

- पदमाला। १०३ , पद १७३. चकित चित पीतम प्रीति निहार ॥धृ०॥ जो इक- वेर उन्हें कोर सुमरे, वे सुमरत सौ बार ॥ १॥ भूलेहुं आलि हेरियत उन तन, रोकत वाट बजार ॥२॥ झूटेहुं नेह करे जो सजनी, होत गले के हार ॥ ३ ॥ अस वलवंत कृपानिधि पदपर, डारों प्राणन वार ॥४॥ पद १७४. सुन आवन की बात तुम्हारी, सजे सिंगार सहेलिन प्यारी ॥ धृ०॥ विविध सुगंध अंगरच केसर, पहिरी सरस सुरंग रंग सारी ॥१॥ वेदी भाल आंज हग अंजन चुनि चुनि मुतियन मांग सम्हारी ॥२॥ बेला चमेली चक्री चंपक, कुसुमन सेज सजी सुखकारी ॥३॥ मंदिर मंजु दीप मणि राजत, धूप तरंग उड़त मन- हारी ॥ ४॥ निजकर हार गूथि रचि बीरी, धरी साजि शीतल जल झारी ॥ ५॥ कहे बलवंत विलम्ब न कीजे, वाट तकत वृषभानदुलारी ॥ ६ ॥ पद १७५. सखी को इनमें नंदकुमार ॥ धृ०॥ सीस मुकुट माण पीत पाट कटि, टकी कोर जरतार ॥१॥ उर , पदमाला। विशाल वनमाल मनोहर, तापर गुंजाहार ॥२॥ मृग दृग भोहकमान कटाक्षन, विष बोरी तरवार ॥३॥ मुख मयंक बिन अंक केश जनु, रजनी धरी ॥४॥ वय किशोर चित चोर देहाति, तापर यौवन भार ॥ ५॥ धन बलवंत श्री कीरति नंदिन, पूछहिं बारंबार ॥ ६॥ पद १७६. कवन को यह बालक सुकुमार ॥ धृ०॥ जागृत मंत्र कलासी डोले, बन में मुकुट सम्हार ॥१॥ अलि कुल नवल नलिन जिहिं जानी, भरमत सौरभ भार ॥२॥ नव नीरद दल अतुल जानकें, केकी करत पुकार ॥ ३॥ सो सूरत बलवंत लखन कों, बैठे दृगन पसार ॥ ४॥ पद १७७. .. मन मोहन मेहलन आज चलो; बनके श्रम सकल निवारौंगी ॥धृ०॥ विथुरी यह कुटिल लटैं तुम्हरी, निज करसों साज समारौंगी ॥ १॥ सब विधिः शृंगार · कराय तुम्हें, लोचन भरि बदन

पदमाला।
१०५
निहारौंगी ॥ २ ॥ बलवंल युगल रस रीत अनूप,
निरखि नित तन मन वारौंगी ॥ ३ ॥
पद १७८.
कर पकर प्रीतयुत बोलत नारि सयानी ॥ घर
चलो आज नंदलाल करौं मिजवानी ॥ धृ०॥ तुम
बहुत दिनन में मिले श्याम सुखरासी ॥ हंस बोल
गये गल डार प्रीतिकी फांसी ॥ दिन रैन रही बेचैन
बिना तुम दासी॥ भई आज सफल अँखियां दर्शन की
प्यासी ॥ नहिं छोड़ोंगी वृजराज आज यह ठानी ॥१॥
निज करसों षट् रस भोजन सरस बनाये ।। दस-
तीन गुनन के सुन्दर पान लगाये ॥ कितने तुम्हरे हित
देवी देव मनाये । कोमल कलियन के चुनि चुनि
हार सजाये ॥ पूजत बड़ पीपल छनेमोर जुग
पानी॥२॥लाखि प्रीति प्रीति प्रतिपाल लाल जसुदा के ।
गे भवन भामिनी छैल छबीले बांके ॥ बैठे मंचक पर
उभय सार सुखमा के ॥ बलवंत निरखि पदकमल
मोद. मद छाके ॥ करि पूरन आसा हरि अभिमत
फल दानी ॥३॥

१०६ पदमाला। पद १.98. दृगन सौ मोहन अब न टरो ॥धृ०॥ वदन विलोकि जियत हो मानों, खोटे चाहे खरो ॥ १ ॥ होतहि पलकन ओट नाथ के, जियरा जात जरो ॥२॥ तुम भगवन्त भक्त प्रतिपालक, आज सनाथ करो ॥३॥ जो बलवंत नेह के सांचे, पाछे पग न धरो॥४॥ पद १८०. मो ढिंग सों जिन जाय सँवलिया, सोडिंग सों जिन जाय ॥ मेरो बारो, बारो जियरवा, तुम विन अति दुख पाय ॥ धृ० ॥ खान पान गुण गान न सूझे, भूषण भार दिखाय ॥ १ नीर उसीरन देह दहत है, सजी लेज डरपाय ॥ २ ॥ प्राणनाथ तुम जीवन मोरे, विरहा सहो न जाय ॥३॥ करिये अस बलवंत कृपा प्रभु, रहों रैन दिन आनन्द पाय ॥४॥ पद १८१. मैं बलि जाऊं बारबार, तुम्हरे मन मोहन, एक बेर धुनि.वेणु सुनावहु, मोहि रसभीनी॥धृ०॥तुम्हरी

-
पदमाला।
१०७
कही हम करत रैन दिन, हमरी कही तुम एक
न कीनी ॥१॥
पद १८२.
रागन मन चरण सरोज निहार ॥धृ०॥ निधि
लावण्य कमललों कोमल, धारे त्रिभुवन भार ॥
चिन्मय मणि गण भूषण भूषित, भक्तन प्राण अधार॥
तृण सम तिन्हें तीन पुर सम्पति, जिन देखे इक-
वार ॥ सो सुख साधु लमाधि न पावें, कीन्हे कष्ट
अपार ॥ यह रस है बलवंत नियारो, चखो मौन
मन धार॥
पद १८३.
॥
मोहिं अब और न चाह रही ॥धृ०॥ श्यामा
श्याम माधुरी सूरति, रसिकन ग्रंथ कही ॥ जोगी
जाहि जतन करि थाके, नेक न थाह लही ॥ १ ॥
सो
विचरत कुंज
इन
नैनन निसि दिन निरखौं,
मही ॥ करौ कृपा बलवंत किशोरी, इक अभिलाश
यही ॥६॥

१०८
पदमाका।
पद. १८४.
कृपा तुम्हरी सब काज कियो ॥धृ०॥ कर्म धर्म व्रत
जप तप संयम, सपनेहु नाहिं छियो ॥१॥ सेये न
साधु संत संगति नहि, मुखभर नाम लियो ॥ २ ॥
तदपि जगत दुर्लभ सुर नर कहं, सो सुख नाथ
दियो ॥ ३ ॥ अस बलवंत कृपानिधि पद पर, वारों .
नित्त जियो ॥४॥
पद १८५.
रहत नाथ नित निकट हमारे. होत न क्षणहु
दृगनसों न्यारे ॥धृ०॥ यदि चकोर विधु विन दुखियारे,
शोधत शशिहुं चकोर दुआरे ॥ १॥ चातक तृषित
तृषा के मारे, घनहु लिये जल ताहि पुकारे ॥ २ ॥
आसक्तन उर उरझे पीतम, उरझे फंद न सुरझन
हारे ॥ ३ ॥ नेह नात बलवंत जुरै जव, परजन
स्वजन छुड़ावत हारे ॥४॥ यही प्रीति की रीति
प्रगट है, जीत होत है मन के हारे ॥ ५॥

पदमाला। पद १८६. --- नहिं आसक्तों से पीतम होते न्यारे ॥ रहते हैं रात दिन साथ हमारे प्यारे ॥१॥ यह पंच प्राण उनके चरणोंपें वारे ॥ पीपी के रूप रस सदा रहें मतवारे ॥२॥ जव लगी लगन दृढ़ फिर क्या बस अपना हे ॥ जो होनी होय सो होय वृथा डरना है ॥३॥ अव जग जाहर होचुके छुपाना क्या है ॥ हरिनाम विकाने कहिये जो जी चाहे ॥ ४॥कुल कान तजी फिर जग में डर किसका है। बलवन्त प्रीति का बहुत बुरा चसका है ॥ ५॥ श्रुति कही तजे दोउ लोक कृष्ण मिलता है ॥ कुछ भाव बढ़ाओ और अभी सस्ता है ॥६॥ पद १८७. हमारे को भटके अब भाई ॥धृ०॥ एकहि देव देवकी नन्दन, एक शास्त्र प्रभुगीता पाई ॥१॥ एक मंत्र श्रीकृष्ण नामबर, सेवत सदा एक यदुराई ॥२॥ हृदय अधार एक गिरधर को, एक छत्र श्रीपति पद पदमाका। छाई ॥३॥ एकहि बल बलवन्त भये जग, गये दुरित दुख द्वंद पराई ॥४॥ पद १८८. नहिं इच्छा अब शेष रखी प्रभु, पूरा मनभर तौल दिया ॥धृ०॥ सिंधुपान करि भरे न जो मन, एक वचन में तृप्त किया ॥ १ ॥ अजब खेल करुणा का तेरे रखूब तमाशा देखलिया ॥ २॥ हरि तेरी बलवंत कृपा से, नया नया रस नित्त पिया ॥३॥ पद १८९. , राधिका वल्लभ के बलि जैहों ॥धृ०॥ कृष्ण चरण नखचन्द्र विना नहिं, हगन चकोर लखैहों ॥१॥ केकी करणन नाथ गाथघन, तजि नहिं शब्द सुनैहों ॥ २ ॥ स्वाति बूंद हरिनाम विना नहिं; चात्रकि रसनहिं प्यैहों ॥ ३ ॥ अब बलवंत उदार द्वार तजि, और ठौर नहिं जैहों ॥ ४ ॥ पद १९०. आज नन्द घर बजत बधाये ॥ धन्य जसोमत पुण्य तुम्हारे, भवन भुवन पति आये ॥धृ०॥ मंगल पदमाला। गान करें वृजवनिता, पुर प्रमोद अति भारे ॥ सुर सुन्दरी सुमन बरसावत, विबुध बजाय नगारे ॥१॥ अस्तुति करत लोकपति मिलि सब, वेदन विरद उचारे ॥ अव बलवन्त मनोरथ सब विधि, हैहैं सफल हमारे ॥२॥ पद १९१. माई वाके कौन कौन गुन गइये ॥धृ०॥ सहिये सवहि सीस धरि सादर, जबलों गोकुल रहिये ॥१॥ बूंद न वचे पानि पय माखन, किमि गृह चरित चलइये ॥२॥ सुलभ नहीं बसिबो अब यहि पुर, पवन पानि निरवाहिये ॥३॥ बाल चरित बलवंत नाथ पै, बार बार बलि जइये ॥४॥ पद १९२. सकल खल दल दनुज तबहि हिय हारा॥ धृ०॥ यदुकुल कमल दिवाकर जबही, मखमण्डप पग धारा ॥१॥ श्रीहत कंस समाज सहित जिम, प्रात्व काल शशि तारा ॥२॥ मुष्टिक अरु चाणूर बिगत

११२
पदमाला।
बल, भये मनहुं हिम मारा ॥३॥ प्रभु प्रताप बल-
वंत कृशानू, दानव बन सब जारा ॥४॥
पद १९३.
जब माधव आगमन कियो ॥धृ०॥ कुंडिनपुर
नरनारि परस्पर, कहत नयन फल आज लियो॥१॥
कोटि मदन मन हरन रूप रस, सुधापान करि
छको हियो ॥३॥ चैद्यादिक नृप खल कोकन को,
श्याम सुधाकर शोक दियो ॥३॥ सदा रहत बल-
वंत मगन मन, प्रभु चरित्र पीयूष पियो ॥४॥
पद १९४.
फूल रही फुलवाई, मदन महीप साजि निज
सैना जनु चले निशान बजाई ॥धृ०॥ मंद सुगंध
पवन वृजवन में, बहत परम सुखदाई ॥ युगल
सरूप सिंहासन राजें, संग सखी समुदाई ॥ १ ॥
भूषण बसन पियरे तन धारे, शोभा वरनि न जाई ॥
छिरकत केसर रंग परस्पर, लखि अनुपम सुख-
पाई ॥ २ ॥

पदमाला। ११३ पद १६५. आई वंसत ऋतु सुखदाई ॥ वृज जन के अतिही मन भाई ॥ धृ० ॥ उमॅग बढ़ी होली खेलन की, वृज वामन के हिये समाई ॥ सो वलवंत अभिलाष देखि मधु, वाढी जिमि आहुति घृत पाई ॥ १ ॥ ॥ %D ॥ पद १९६. मुख मुरली मन मोहनि मूरत, देखत नैन सिरा- बत है ॥ ग्वाल वाल सँग वृन्दावनते, बेनु बजावत आवत है ॥ नटवर भेष अलौकिक शोभा, कोटिन मदन लजावत है ॥ निरखि निरखि बलवंत श्याम छवि, रैन दिना सुख पावत है ॥ १ ॥ पद १६७. सघन वन कुंजन सुखदाई ॥ प्रिया पिय झूलें हरपाई ॥ श्याम घन घुमडि घटा छाई ॥ जहां तह चपला. चपलाई ॥ दोहा. फूले चहुं दिस विपिन मधि, सुमन समूह अनूप ॥ सर सरितन सरसिज खिले, मानहु शोभा भूप ॥१॥ ॥

पदमाळा।
॥
११४
सुगंधनि सानी पुरवाई ॥ घटा मुद बुंदन झर
लाई ॥ मनोहर श्री वन हरियाई ॥ लहर जमुना-
जल मन भाई॥
दोहा.
रुचिर खंभ मनि जटित की, अद्भुत छबि दरसाय ॥
प्रगटे द्रुम लावण्यता, जनु पावस ऋतु पाय ॥ २॥
ललित गुण वरणत मति हारी, गूंथि मनु शोभा
लट डारी ॥ मुनिन मन पटली छबि धारी ॥ रचन
झूला अति मनहारी॥
दोहा.
राधा माधव रसिक वर, जो सुखमा के सार ।
झूले तामें मुदित मन, अलि बोलें बलिहार ॥३॥
भीर बिधु बदनिन की भारी ॥ गीत गावें दै दै
तारी ॥ मनोहर बंशी धुनि न्यारी ॥ सुमन सुर
वरष सुखकारी॥
दोहा.
निरखत झूलन छबिछटा, आँनद उरन समाय ।
गीत बाल बलवंत सुनि, स्वामिनि मन मुसक्याय ॥४॥

पदमाला।
११५
पद १६८.
झूलत लाडिली घनश्याम ॥ धृ०॥ ललित लता
द्रुम मंजु मनोहर, मनहुं मीन ध्वजधाम ॥ १॥ धीर
समीर कीर कल चातक, बोलत बैन ललाम ॥ २ ॥
मंद मंद गरजत वरसत घन, गान करत वृजबाम ॥३॥
त्रिभुवन सुन्दरता पर छबि लखि, लजित कोटिन
काम ॥ ४ ॥ सो छविलाख वलवंत माधुरी, भे परि-
पूरण काम ॥ ५॥
॥
पद १९९.
झूलत कुंज राधा श्याम ॥टेक ॥ रत्न जटित
हिंडोरना सखि, सरित तट सुखधाम ॥ द्रुम पुंज
सघन निकुंज मंद, समीर मन अभिराम ॥१॥
ललित नभ झुकि झूमि छाई, नील नीरद दाम ।।
दामिनी दमकत दुरत द्रुत, मंद वृष्टि ललाम ॥२॥
मोर सुनि घन घोर बोलत, पिकन लहत विराम ॥
राग भरि मल्हार गावत, नवल वय की बाम ॥ ३॥
बलवंत मन दृग युगल पदतल, वसत आठो याम ।।
हटत नहिं क्षण एक संतत, जानि जिय विश्राम ॥ ४ ॥

पदमाला।
पद २००.
झूले श्यामा श्याम सरस ऋतु पावस छाई ॥धृ०॥
पुष्प पराग भई महि धूरी, महक विपिन सरसाई ॥
॥१॥ मधुकर गुंजारव वन मानहु, नारद वीन
बजाई ॥२॥ गीत मनोहर गोप वधुन के, कोकिल
सुनत लजाई ॥३॥ श्री दंपति झूलन छवि निशि
दिन, दृग बलवंत समाई ॥४॥
पद २०१.
हिंडोरो झूलें श्रीवृषभानु कुमारि ॥धृ०॥ चंद्रा-
वलि ललितादि सहेली, संग सकल सुकुमारि ॥
श्याम सनेह सनी मृदु स्वर सव, गावत राग
मल्हार ॥ १॥ पँचरँग रेशम डोर हिंडोरो, विरचो
निज कर मार ॥ मंद मंद झूलन पर बरसत, रति
रस भरी फुआर ॥२॥ मन मोहन आगम अवलो-
कत, चहुंदिशि दृष्टि पसार ॥ गोपिन गीत सरस
सुनि केकी, कूक उठे इकबार ॥३॥ श्री गोविंद
गोप गण मंडित, निराख नवल वृजनारि ॥ हुलसि
उठी बलवंत चातकी, जनु घन घटा निहारि ॥४॥

पदगाला। ११७ पद २०२. प्रिया संग झलत कौन नई ॥धृ०॥ ललित लता दुम मिलित सघन वन, घटा सजल उमई ॥ चपला चमक फुवारन भीजत, चूनरि रंगमई ॥१॥ सजनी सुघर सांवरे रंग की, हौ दृग देखि लई ॥ बोलन हंसन मंद मृदु मुसक्य, चित चोरन चित ठई ॥२॥ नख शिखांत शृंगार सुभगतर, गल भुज कमल दई॥ नव नागरि दोउगुणन आगरी, रमकन झूल रई ॥३॥ सो छवि बरणि सकै किमि कोविद, कविवर दिग- विजई । कुमरिकृपा वलवंत रैन दिन, कुंजकेलि हग छई ॥ ४॥ पद २०३० झूलत श्यामा श्याम चलो री ॥धृ०॥ सघन वारिधर सहित तड़ित जनु, लसत ललित वरजोरी। कनक खंभ मणि जटित मनोहर, वेलि वलित चहुँ ओरी ॥१॥ नीलम डार परण पन्नन के, कनियन बन जड़ो री॥ मानिक सुम पर श्यामराग मनु, मधुहित मधुप अरोरी ॥२॥ फल पुखराज प्रेम रस पदमाला। पूरण, बिधि निजकरन भरो री॥ विलमे विहंग समुझ सांचे चित, नटत लेत चित चोरी ॥३॥ जगमग जाल जरकसी झलकत, पंचरंग रेशम डोरी ॥ विद्रुम पाट परम सुन्दर पहं, आसन अमल बिछोरी ॥४॥ तिहिं आसन आसीन जुगल जनु, प्रीति रूप इक ठौरी ॥ झोकन मंद झुलावत सखि गण, गान करत मधुबोरी ॥५॥ हंसि हेरत हरि ओर राधिका, सो सुख कहि न सकों री ॥ गोपी गात मल्हार मंजु मनु, मुद निधि उमंग परो री ॥६॥ अबलन युत चढि यानन अम्बर, सुरन समूह जुरो री ॥ अति आनंद मानि वरसावत, सुमनन भरि भरि झोरी ॥७॥ निरखि निरखि वलवंत विशद युति, उर आनंद बढ़ो री॥ झूलें नित नय. नन नँदनंदन, श्री वृषभानु किशोरी ॥८॥ पद २०४. झूलत श्याम राधिका गोरी ॥धृ०॥ लता वितान तने मनहारी, हरित भूमि सब ठौरी ॥ कुंज जाल रंध्रन तनु आभा, फैलि रही चहुं ओरी ॥ १॥ घन घुमंड घहरात चहूं दिश, दामिनि दमक न थोरी ॥ ॥

पदमाला। ११९ , परत फुधार सरस मन भावन, केकी शोर घनोरी॥२॥ पिय प्यारी पर करत छांहरो, निज पीताम्बर कोरी॥ धीर समीर भीर वनितन की, गायन गति चित चोरी ॥३॥ चूनरि चारु चमक चटकीली, चुवत चित्र रंग बोरी ॥ छवि बलवंत विलोकि अलौकिक, नवल नेह उंमगोरी ॥४॥ . पद २०५. श्रीदम्पति पद पंकज शोभा, देखत सखि मैं ठगिहि गई ॥धृ०॥ तृप्ति होय कहु किहिं विधि आली, जब देखों तब नई नई ॥१॥ हग बिन वाणि वाणि बिन लोचन, कैसे वरनी जाय दई ॥२॥ यह बलवंत रहस की बतियां, जिन जानी चुप साधि लई ॥३॥ सुख सागर प्रतिपल हिय बादौ, ज्यों ज्यों शुचिता अधिक भई ॥४॥ पद २०६. जा नैया के जुगल खिवैया ताहि कहा भवसागर डर है ॥धृ०॥ समरथ स्वामि स्वामिनी राधा माधव पद पर अब सब भर है । बूड़त जक्त जहाज तहींते

१२०.
पदमाला।
टूटी नाव हमारि उतरहै ॥ १॥ जाके शिर पर अटल
छत्रदै ताकहं त्रिविध ताप कह करहै ॥ भव गद
कहा कहो तिहि व्यापे जाको दो दो धन्वन्तर है ।।२।।
वाको भाग्य कहा कोउ भाखे युग कर एक सीस
ऊपर है । कत काहुहि बलवंत वदत अव एक नहीं
दोके बल पर है ॥३॥
पद २०७.
जिन भूलेहु, प्रभु की शरण लही ॥ बंधन टूट गये
तब ही ॥धृ०॥ जो आवत प्रभु तारत ताको ॥
पात्रापात्र विचार नहीं ॥१॥ विश्व विदित ब्रद दीन
उधारन ॥ निगमागम वहु कथा कही ॥ ॥२ ऐसे
प्रभु बलवंत नाथ के॥ रहो रैन दिन चरण गही ॥३॥
पद २०८०
यदुपति चरण कमल बलिहारी ॥धृ०॥ विषय
विराग विभंजन अति मन रंजन अघ चयहारी ॥१॥
भव संताप शमन सठ मन मद दमन विश्व उप-
कारी ॥२॥ पूरण काम धाम सिद्धिन के तन त्रयताप
निवारी ॥३॥ महिमा अमित अलौकिक वरणत
कवि कोविद मति हारी ॥ ४॥ वसो सदा वलवन्त
मनस्सर सो पदकंज मुरारी ॥५॥

पदमाला।
१२१
(पद मराठी भाषा).
,
पद २०९.
येई बा गुरुराया, गुरुराया, पड़तों तुमच्या पाया
॥ धृ०॥ गौर इन्दुद्युतिसुंदर, धरणीधर्मधुरंधर॥ येई.॥
श्रीकृष्णनाम आननी, मूर्ती मनोहर मनीं ॥ येई॥
दंड कमंडलु हाती, पदी नूपुर वाजती ॥ येई. ॥
मत्त छची अलबेली, झळकते वेळो वेळीं ॥ येई० ॥
वरदहस्त प्रभु धरी, बलवंताचे शिरीं ॥ येई०॥
पद २१०.
कुठवरि प्रभु उपकार आपुले वाणीने गावे ॥ नसे
कृपेचा पार पदीं मस्तक ठेवुनी रहावें ॥१॥ मातेवत
पाळिलें पित्यापरि सांभाळण केलें ॥ दुर्घट संकट
पडतां देवा सर्वोपरि रक्षिलें ॥२॥ धन धरणी आणि
धाम विविध सुख दासा प्रति देशी ॥ ज्ञान भक्ति
वैराग्य देउनी निज सेवा घेसी ॥३॥ क्षमा कसनि

१२२ पदमाला। अपराध जनाचे तारिस यदुनाथा ॥ असो सदोदित बलवंताचा तव चरणीं माथा ॥४॥ पद २११. अभंग। धरणे देऊनी उभा तुझे द्वारी ॥ आता कांहिं तरी सोय करा ॥ किती जन्म माझे याचिपरि गेले ॥ टाळियेले तुम्ही वेळो वेळां ॥ आतातरि करा जीवाचा उद्धार ॥ वारंवार तुम्हा प्रार्थियेलें ॥ कलियुगी तुमची होईल सुकीर्ती ॥ पसरेल सन्मति जनामाजी ॥ बलवंताचे मनी धीर नाहि आतां ॥ देवा कृपावंता त्वरा करा ।। पद २१२. का बसला रुसोनि कैसा धरोनि अबोला ॥ कृष्णा काहींतरि आज मुखाने बोला ॥ १ ॥ का इतुके निष्ठुर जाहला दीन दयाळा ॥ कृष्णा काही• ॥२॥ तुम्ही पदमाका। १२३ अमुचे जीवनप्राण अहो गोपाळा ॥ कृष्णा काही० ॥३॥ सोड़ी न कदापि स्वामी तव चरणाला ॥ कृष्णा काही०॥ ४ ॥वलवंतविनविता कंठी हा जिव आला ॥ कृष्णा काही० ॥ ५॥ पद २१३. माझ्या जिवाच्या जीवना, कृष्णा येई बा लवकरी ॥धृ०॥ माझ्या प्रणाच्या पोषणा ॥ कृष्णा ॥१॥ माझ्या नयनाच्यारंजना॥ कृष्णा. ॥ २॥ माझ्या मनाच्या मोहना ॥ कृष्णा मज अनाथाच्या नाथा ॥कृष्णा ॥४॥ माझ्या सुखाच्या साधना॥ कृष्णा माझ्या सौभाग्याचाराणा ।। कृष्णा दीन बलवंताच्या प्राणा॥कृष्णा " " ॥३॥ " " पद २१४. कृष्ण वदा गोविंद वदा, हरि हरि वदा, मुख भरुनि सदा ॥धृ०॥ श्रीहरिनाम सततं मुखिं घोका, तुम्हा न धोका होई कदा ॥ १ ॥ शमन करी भवदा- वानल हा, देई सुधारस पदा पदा ॥२॥ मन १२४ पदमाली। , मुकराचे हेची मार्जन, हरी सर्व अंतर विपदा ॥३॥ ज्ञानमुक्तिकल्याण विरतिची, सहज वाढवी सुसंपदा ॥ ४॥अनुभवसिंधु सहज साधन हे, ग्रहण करा मनिं त्यजुनि मदा ॥ ५॥ राजयोग हा परमसुलभ परि, दुर्लभ होय कुतर्कविदा ॥६॥ कृष्ण कृष्ण श्रीकृष्ण, म्हणा, बलवंत दानि हे मुक्तिपदा ॥७॥ पद २१५. जय राधा कृष्ण जय राधा कृष्ण जय राधा ॥ मणतांचि दूर होती सर्वहि भवबाधा॥धृ०॥ नामाच्या योगें सगुण रूप अनुभवलें।घेतांचि नाम धांउनियां जन उद्धरले ॥१॥ भक्तांचा रक्षक तूंचि एक या काळी ॥ दुःखद्वंद दुरित सत्वरी हरी वनमाळी ॥२॥ दंपतीपदी बलवंत मिठी दृढ़ घाली ॥ पण शरणागत पालन अपुला सांभाळी ॥६॥ पद २१६. ही दुष्ट वासना सुटे न केले उपाय मी किति तरी ॥ मन मर्कट विषयासव पिउनी बसले अमुचे शिरी॥ बंड करी किती तरी आवरतांनावरे क्षणोक्षाणं पदमाला। १२५ नाना छन्द धरी ॥ वोध बोधितां वाणी थकली उमजे ना तिळभरी ॥ अतां हरी कृपा करी निजमाया आवरी दयाळा कळवंता धरि करी ॥ पद २१७. काय हरिमायेची लीला, शंभु स्वयंभू स्वभू पाहुनी भ्रमले मनिं इजला ॥धृ०॥ वीजकल्पना मनीं स्फुरतां शाखा पल्लव पुष्पफलां सह विश्वविटप उठला ॥१॥ वाग बहुरंगी वधुनि फसला, विषयछंद लागला जिवाला निजानंद भुलला ॥ २ ॥ चाल ॥ या चक्षुबाहुल्या मी विश्व वळते ॥ लावितां उघड़ता लय उत्पत्ती होते || एकत्र ठेवितां द्वैत सकळ नासतें ॥ जे स्वरूप तुमचे तुह्मां प्रगट भासतें ॥ पहावा ब्रह्मीचा सोहळा, सचित घन बलवंत श्रीहरी सर्वठाई भरला ॥ ३ ॥ ॥ पद २१८ चरणी देई ठाँव विठोबा हो ॥ धृ०॥प्रपंचता बहुत तापलों ॥ अति व्याकुळ तव पदी पातलों॥ धरुनि एकविध भाव ॥१॥ प्रणतपाल भवजाल- विमोचन ॥ पतितपावन तूं करुणाघन ॥ जगि गाजे ॥ 1 १२६, पदमाला। तव नांव ॥ २॥ क्षणिक कनक संपदा नको मज अविनाशी निज दावि पदांबुज ॥ बलवंता झणिं पाव ॥३॥ पद २१९. देई दर्शन दासा पंढरी ईशा हो॥धृ०॥दूर देशहुनि आलों येथे पुरवी माझी आशा हो ॥ १॥ भवसिंधूमधिं भ्रमतां थकलों, मुक्ति करी भवपाशा हो ॥ २ ॥ प्रणत- पाल पण स्वामि आपुले भरले चारी आशा हो ॥३॥ बलवंताची हीच प्रार्थना, न करी स्वामि निराशा हो ॥ ४॥ -- पद २२०. वृन्दावन सोडुनी कशास्तव आला तुम्ही पंढरी, सांगा मज लागी श्रीहरी ॥ धृ०॥ कुठे ठेवला मुकुट मनोहर वंशवेणु त्यापरी, गुंजमाला.न च हृदयावरी . ॥१॥ वेश पालटुनि उभे ठाकलां ठेवुनि कर कटिवरी, विटेवर का मूर्ति साजिरी ॥२॥ कोश- चतुःशत चालुनि आलों ध्याया दर्शन परी, दिसेना कृष्णमूर्ति कां तरी ॥ चाल ॥ तुझी कृपावंत भगवंत पदमाला। १२७ . जगी मणवितां ॥ निजदास मनोरथ पदोपदी पुरवितां॥ मज निराश करुनि कशास हो फिरवितां ॥ दावुनि इच्छा बलवंताची पूर्ण करा झडकरी ॥ मनोहर छबि सांवलि गोजिरी ॥ पद २२१. दुरुनी आलो चरणा पाशीं ॥ कांहीं बोला या दासासी अगा विठोबा ॥ धृ०॥कृपा दृष्टिचा भुकेलो, सन्मुख येवुनि ठाकलो ॥ १ ॥ नाम तुमचें करुणा- कर, गाजे कीर्तीचा गजर ॥ २॥ परिसावी विज्ञापना, देवा रुक्मिणी रमणा ॥ ३ ॥ मौन करोनि धारण, स्वस्थ बैसलां आपण ॥ ४ ॥ परी अतां विश्वंभरा, कृपा दृष्टि फेकुनि जरा ॥ ५ ॥पहा दशा धर्म देशाची, होय सीमा हो क्लेशाची ॥ ६॥ पहा सांप्रत भूमंडळी, झाली धर्माची रांगोळी ॥ ७॥ दुष्ट कली हा मातला, '. धर्म समूळ बुडविला ॥ ८॥ हिज धेनु संत जन, विकल असती रात्रंदिन ॥ ९॥ दुःखें वरणिली न जाती, विलोकुनी फाटे छाती ॥ १० ॥ आतां काहीं दया माया, यावी आपणा पंढरीराया ॥ ११ ॥ कृपा वचन आपुले, आता आठवावें भले ॥ १२ ॥ अग पार्था जेव्हा जेव्हां, धर्म ग्लानी होई तेव्हां ॥ १३ ॥ ॥ || १२८ पदमाला। कराया मी धर्मोद्धार, युगायुगी धरि अवतार ॥ १४ ॥ करुनि दुष्टांचा संव्हार, हरी सजनाचा भार ॥ १५ ॥ पूर्ण करोनी ते आतां, ब्रीद राखी पंढरीनाथा ॥ १६ ॥ मान्य करोनी विनंती, अभय ठेवावें वळवंती ॥१७॥ पद २२२. किती दिवस तरी राहाशिल डोळे झाकुनि वा यापरी ॥ कांहिं तरी विचार मूढा करी ॥धृ०॥ वाल्य आणि तारुण्य हि गेलें देह जाहला जरजरी ॥ तदपि विषयाची मनि तरतरी ॥ १॥ धना पाहुनी धावसि मागें क्षुधित श्वानापरी ॥ असुनि संपदा बहुत निज- घरीं ॥२॥ पाहुनि नारी तोषित भारी नाना चेष्टा करीं ॥ इंद्रिय शिथिल जाहली जरी ॥३॥ अधिका- राची पिशाच्चबाधा बाधे स्वप्नांतरी ॥ येइना निद्रा का क्षणभरी ॥ ४॥ धाम धरणि सुत दारा यांची चिंता निशिदिन करी ॥ जाहला मरणोन्मुख बाजरी ॥५॥ (चाल). नव विवाह व्हावा असे मनी घोळते, मद- नाने ह्मणतो शरीर हे फाटतें, सुंदरा अप्सरा मिळो असे वाटते, दश सहस्र मुद्रा दिधल्या नच फार ते॥ जाये विण वाया धनधरणीचे सुख हे मिळे न उपवर पदमाला। १२९ जरी पहा कोणि पुनर्विवाहित बरी॥ कांहीं तरा०॥ शूल मस्तकी उठतो घेतां कृष्णनाम आननी ॥ थकेना बडबडतां निशिदिनी ॥ दानास्तव पैसा देण्याला ह्मणसी मी बहुऋणी ॥ रांड पाहातां घरी परवणी॥ वेद विहित धर्मा प्रति सोडुनि पाखंडाचा धनी ॥ वहुत देई लोका शिकवणी॥ सुरा पिउनियां असुरवृत्तिमाधि अंध धुंद होउनी॥ काहिं विधिनिषेध नाहीं मनीं ॥ आतां तरी काही उमज बारे काळ खेळतो शिरीं ॥ काही तरी विचार मूढा करी ॥ ॥ ॥ पद २२३. ( अभंग) कोणते साधन करूं भेटी साटीं । सांगा जगजेठी काही तरी ॥धृ०॥ जप तप ध्यान किंवा आत्मज्ञान ।। की वनसेवन करूं सांगा ॥१॥ ज्याच्या योगेंतुम्हीं होतांहो संतुष्ट ॥ तेच मज इष्ट दावी मजः ॥ २ ॥ जीव कासाविस होतो किती तरी॥

पदमाला। दयावंता हरी शिणवू नका ॥ ३ ॥ बलवंताची स्थिती जाणता यदुपती॥ आतां प्राणनाथा भेट द्यावी ॥ ४ ॥ . -- पद २२४. कोणाच्या मुखाकडे पाहूं-हरि विण कैसे राहूं ॥ प्राणनाथ मथुरापुरि गेले-कोणा हृदया लाऊं ॥ १ ॥ दिसे सकल संसार शत्रुवत्-तात मात पति भाऊ ॥ ॥२॥ निर्जन नगर भवन जणु काकन-कोठे जाउनि राहूं ॥३॥ बलवंताचें केवळ जीवन- -कृष्ण प्रलंबित बाहू॥४॥ पद २२५. यदुपती कधी मी पाहिन या नयनाने । श्रीपती कधी ठेविन डोई प्रेमानें ॥ धृ०॥ झुरते मनि निशि- दिनि विरहवन्हितापाने ॥ क्षण युगसम जाई मजसी तद्विरहाने ॥ चाल ॥ हे वेड लागले जिवास देवा कुठून ॥ सुखसम्पत्ती मम सर्वहि गेली लुटून ॥ सुत तात मात प्रिय नातें गेलें सुटून ॥ जिव श्याम सुन्दरा स्मरतां पडतो तुटून ॥ मन मोहित झालें पदमाला। त्या अनुपम स्वरूपाने ॥ होईल शान्ति बलवंत रूप रस पाने । पद २२६. किंचित इंदुवदन दाउनियां वेड लावलें आम्हां- प्रति ॥ काय सांवळया केली स्थिति ॥ धृ०॥ पुत्र कलत्र सुमित्र बंधु गण तुटली ममता सम्पत्ती ॥ नष्ट जाहली कुल रीती ॥ वेश वृत्ति पाहुनी आमुची जगी हांसती लोक किती ॥ वोल बोलती तीक्ष्ण अति ॥ सुखसंसार बुडाला सर्वचि नसे राहिली देहस्मृती ॥ विरह दाहची नसे मिति ॥ वनि अन- वाणी शोधित थकले व्यथित जाहले सांगु किति ॥ भ्रमिष्ट जाहली माझि मती ॥ योग्य नसे बलवंत दयाळा तापविणे लाउनि प्रीती ॥ भेट एकदा प्राणपती॥ पद २२७. थकले साधन भिजली काया ॥ तूंचि उपाय आतां यदुराया ।। धृ०॥ भ्रमता भवनिधि मधिं बहु थकलों॥ मनिं येऊं दे दीनाची माया ॥१॥ जन्म अनेक १३२ पदमालां। याचि परि गेले ॥ पुनरपि आयु चालली वाया ॥२॥ आतां विलंब न करी बलवंता ॥ दाविं त्वरित आपुले पाया ॥३॥ पद २२८. कुठवरी दयाळा अंत पाहसी कंठीं जिव आला ॥ धृ० ॥ बुड़तों मी संसारसागरी उपाय तो थकला ॥ अतां हरी, क्षमा करी, धरी करी सत्वरी दयानिधि शरण पातलों तुला ॥ पतितपावन नाम आपुलें जगतीं स्तव भरला ॥ लक्ष करी, बिदावरी, दृष्टि भरी अंतरी उद्धरीं बळवंता बाळा ॥ पद २२६. रूप पाहतां डोळे भरी ॥ मन स्थिरावलें अंतरी ॥ प्रेम पाशी पडले मन ॥ गेलें प्रापंचिक व्यवधान ॥ काय करावे साधन नाहीं अपुल्या हाती मन ॥ ज्याची ठेव त्याने नेली सर्व पीडा माझी गेली ।। वरद हस्त तुमचा हरी ॥ राहो बळवंताचे शिरी ॥

पदमाला।
पद २३०.
मन जडलें तब स्वरूपी पाहुनि छवि सावळी
गोजिरी, पंचप्राण विव्हळती मन हे क्षणभर धीर न
धरी ॥ पळ पळ युगलम जाती वाटे विषाद मज
वहु परी ॥ नको नको हा वियोग दुःख हे भोगू मी
कुठवरी ॥ किती दुराग्रह धरिसी माझ्या इतक्या
विनंती वरी ॥ वदन चंद्र पाहुं या आपुला आम्हांस
डोळेभरी ॥ प्रभुतापद संपदा कदापी नच वागे
अंतरीं। सुपला सार स्वरूप बसो बलवंतमनी श्रीहरी॥
पद २३१-
॥
स्वरूप अनुपम तुमचे पाहुनि मोहित झाली
मती ॥ सुचे ना कांहीं एक भजप्रती ॥१॥ विरहानल
चेतला शरीरी काय जाहली स्थिती ॥ वेदना असती
मजप्रति किती॥ (चाल) मी प्राण अर्पिलें तुम्हांस
हो श्रीहरी ॥ हा भेद भाव सग कशास आहे तरी ।।
मी पतीत तुम्ही पावन जोड़ी खरी ॥ प्राणप्रिया मी
प्राणा मुकते अशी जाहली स्थिति ॥ धांव लौकरी
आतां श्रीपती॥

पदमाला।
पद २३२.
जोडले नातें गोविंदासी, अनि सस्तक पद
कमलासी ॥धृ०॥ रूपवंत गुणवन्त कृपालू, लोडीना
दासासी ॥ १ ॥ मुकुट मयूर सकराकृतकुंडल, द्विभुज
वेणु वदनासी ॥२॥चिन्मय लोक अलौकिक लीला,
नित्य विहार विलासी ॥ ३ ॥ सकल विश्व परिवार
हरीचे, जाणे जो सुख त्याली ॥ ४ ॥ शंका व्यथा
शोक भय भ्रम है, गेले सर्व लयाली ॥ ५ ॥ पालन
पोषण रक्षण याची, चिंता नाहीं अरहांसी ॥६॥ तो
आमुचा प्रिय अम्ही त्याच्या, पदाम्बुजाच्या दासी ॥७॥
माय बाप पति बंधु सोयरा, धन धरणी सीराली॥८॥
खाणे खेळणें चरणिं लोळणे, सेवा सुख अम्हांसी ॥९॥
हे माहेर बळवंत असें तव, घाल मिठीचरणासी॥१०॥
,
पद २३३.
नाम निकट संबंध गुरूनि, लाउनि अगुचे शिरीं।
आणुनियां घातले कृपानिधि, तुमच्या चरणावरी ॥१॥
माय बाप पति बंधु एक पद, तुमचे मज श्रीहरी ॥
पदरी पडले अतां मी ठेवा, उचित दिले त्यापरी ॥२॥

पदमाला । १३५ , तुम्हां वाचुनि नसे आतां, मज कांहीं गति दूसरी ॥ डाग तुझा बलवंत लागतां, सुटेना सर्वोपरी ॥ ३ ॥ पद २३४. नव्हता काही संबंध जोवरी, तुम्हासी श्रीहरी ॥ सर्वप्रकारे करुनि विपत्ती, होती माझे घरीं ॥ १ ॥ तुम्हां बरूनि श्रीवरा सुखी जहालों मी सर्वोपरी अतां अव्हेर न करा, अर्पिलें मस्तक चरणावरी ॥२॥ (चाल). ॥ १ ॥ ॥ तुम्ही माझें प्रिय सोयरे अहां श्रीहरी ॥ ध्या काही तरी काळजी माझी अंतरीं ॥ कां दूर ठेविले मला आजवरि तरी॥ पहा मीन जळाविण व्याकुल मी त्यापरी ॥ केल्याचा अभिमान जरी न च, धराल तुम्ही अंतरी ॥ तुज वाचुनियां बलवन्ताला, कोण दुजा आवरी पद २३५. येतानां जातानां पाहतो तुम्हाकडे ॥ दुःखाचे पंवाडे गाऊं किती ॥ १॥ एक दिन तुम्हां येईल पदमाला। कंटाळा ॥ हेंचि भय दयाळा वाटे जज ॥ २ ॥ याला काय तरी करूं मी उपाय ॥ नसे दूजी माय वळवंता दीनाची॥ ३ ॥ पद २३६. जरि तान्हें बाळ, गुंतले खेळाया ॥ माय वा तया, काय विसरावें ॥ १॥ साया जाळी जीव, गुंतला अज्ञानी ॥ तुम्ही ज्ञान खाणी, त्यजिलें कैसें ॥२॥ नवल येवढे वाटतले मना, कैसा पितृवाण भुलला हो ॥३॥ अतां तरी देवा, संभाळी वळवंता ।। त्वरित कृपावंता, तारी दीना ॥ ४ ॥ पद २३७. वत्स धेनुसी जरी मुकलोनी जाय ॥ परि तीन माय विसरे वाळा ॥ १ ॥ तैसी कृष्णाबाई आमुची माउली ॥ भक्कासी संभाळी भूल पडतां ॥२॥ होती अपराध पदोपदी किती॥परि दयावंत देव सदा॥३॥ वायु अनुकूल ठेवुनियां सदा ॥ सेवकाची नौका लावी थडी ॥ ४॥ भुलोनी स्वधर्मा घडतां व्यभिचार ॥ परि तो दातार सोडी ना हो ॥५॥ बलवंताचे एक श्रीपदी माहेर ॥ तेथे नसे अव्हेर कोणा वेळीं ॥ ६ ॥ , ॥

पदमाला । १३७ पद २३८. चरणी शरण आलों तुला त्रिविधतापे जिव संतापला ॥ सोडवी या दुखांतुनि मला ॥ दीनदयाळा श्रीहरी ॥ धृ० ॥ नाम तुमचे करुणाकर, चहुदिशिं कीर्तिचा गजर ॥ दया करि हरि या दीनावर, याद- वनाथा रे सत्वरी ॥ १॥ लज्जा द्रोपदीची राखली अंबरें सभे माजि पुरविली ॥ नाम घेतां गणिका तारली, विलंब न केला क्षणभरी ॥ २॥ करुणा करुनि मज करि धरी, किंवा काढी घरा बाहेरी॥ बैसेन तुझ्या दारावरी, निश्चय हाचि अंतरीं ॥३॥ माझी याचना तरि किति, उदार दाता, लक्ष्मीपति ।। कृपणता सोडि अतां श्रीहरी, लक्ष ठेवूनि विरुदा- वरी ।। ४ ॥ तुज वाचुनियां उर्वीवरी, न च मजला आश्रय तिळभरी ॥ बुडतों आतां भवसागरी, दयाला बलवंता उद्धरी ॥५॥ पद २३६. चरणीं शरण आलों देवा, सत्वर करी करुणा ॥धृ०॥ पालो सरी सहित परिवार, केला जलक्रीडा विस्तार । नक्रइक धाउनि बल आगार, बळकट फार पदि धरले ॥ १ ॥ थकलों करिता युद्ध अपार, , जरजर

१३८
पदमाला।
झाली गांडे फार ॥ बुड़तों अतां नसे आधार, ठेविले
भार तव चरणीं ॥ २ ॥ पाहुनि संकट अति भयदाय,
गेला त्यजुनि स्वजन समुदाय ॥ ज्यास्तव घालविले
वय काय, हाय हाय व्यर्थचि हें ॥ ३ ॥ त्रिद तव
शरणागत प्रतिपाल, करुणाकर तूं दीनदयाल ||
रचिले व्रजी धेनु गोपाल, कीर्ति विशाल जगिं गाजे
॥ ४ ॥ होउनि पार्थाचा कैवारी, केली निष्कौरव महि
सारी ॥ उद्धरियेली गौतम नारी, त्रिभुवन धनी
वासुदेवा ।। ५ ॥ श्रवणीं पडता करुणारव, स्वर्गी
गहिवरला माधव ॥ गरुडा त्यजुनि आत बांधव,
धांवुनि गजोद्धार केला ॥ ६ ॥ गुणगण हरिचे जगी
अपार, गाती प्रेमें वारंवार ॥ म्हणे बळवंत त्यासि
संसार, शुद्ध असारसा भासे ॥ ७ ॥
पद २४०.
(अभंग)
आमुचे जीवन देवा तुमचे पाय ॥ सकळ उपाय
हेची माझे ॥धृ० ॥ पूर्वीचे सुकृत उदयासी आले ॥
म्हणोनी सांपडले संतकृपे ॥ १ ॥ दरिद्रयाच्या घरी
कामधेनु आली ॥ पाउले हो तिची सोडवेना ॥ २ ॥

पदमाला।
१३९
॥
सौभाग्याचा टिळक लागला कपाली॥ पाउले आपुली।
रुचतां मनी ॥ ३ ॥ अनंत जन्मीचे वैधव्य गेले ॥
सनाथ केले तुम्ही मजदेवा ॥ ४ ॥ दुखाची दशा
वाटतसे गेली ॥ सुखाची पाळी आली अतां ॥ ५ ॥
निश्चयाचासिंव्ह गर्जतां अंतरीं ॥ संशयाचे करी नष्ट
जाहले ॥६॥ कृपावंत स्वामी आम्ही दीनदास ॥
सेवा सुख विलास नित्य नवे ॥ ७ ॥ अतां दुजी नसे
बलवंताची आशा ॥ देई जगदीशा नित्य प्रेम ॥ ८ ॥
पद २४१.
( अभंग)
आम्ही करावी कामना ॥ तुम्ही पुरवावी श्री
रमणा ॥ १ ॥ स्वामी सेवकाची रिती ॥ ऐसी आहे
बोले स्मृती ॥ २ ॥ जैसी बालका दआवड ॥ माय
लावी त्याची तोड ॥ ३ ॥ तैसे तुम्हीं दीन दयाळा ॥
पुरविता सुख सोहळा ॥ ४॥ ऐसे प्रतिपालन
करिसी ॥ दासाप्रति पोटी धरिसी ॥ ५॥ कधी
नाही नाही केले ॥ मनोगत भक्तांचे पुरविले ॥ ६ ॥
ऐसी दयावंत माउली॥ राखी बलवंत साउली ॥ ७ ॥

१४७
पदमाला।
पद २४२.
श्याम सुन्दरी सुख करणी भवतरणी वृषभानु
किशोरी॥ माते वरदे वरदे वरदे ॥धृ०॥ प्रेममयझरी
सुखकन्दे, जगवन्दे मक्त भयहारी॥ वळवंतं निदि-
ध्यास धरली तव चरणी आस ॥ श्याम न करी
निराश यास करि धरी ॥ माते वरदे वरदे वरदे ॥
--

पदमाला । भाव भूमिका. (छप्पय ) जगव्यापक जगदीश, ईशके स्वरूप सारे ॥ पंचभूत सुर नर अरु, खग मृग कीट अपार ॥ १ ॥ सवको प्रेरक ईश, विना अनुशासन पाई ॥ पवन चले ना पत्रहिले तिहुँ लोकन माई ॥ २ ॥ कर्मदैव अदृष्ट, नाम याके सब जानो ॥ सुख दुःख जो सिर आय, ताहि प्रभु आज्ञा मानो ॥३॥ जगमें कर्म प्रधान, नेम येही प्रभु राचा ॥ जो जस करनी करे, पाय फल तैसो साचा ॥४॥ काल कर्मअरु स्वभाव बंधन वस जग सारा ॥ पै प्रभु इच्छा यापेहू बलवत्तर भारा ॥ ५॥ वदले काल स्वभाव होय, विपरीत कर्म फल ॥ पलट जाय सब सूत्र एक प्रभु इच्छा के वल ॥६॥ जिन लीन्ही प्रभु शरण कर्म तिनके सब नासे ॥ केवल प्रभु इच्छा बस, सुख दुःख आवत खासे ॥ ७॥ पै दुख में दुख नहीं, तत्वजिन हृदय विचारा ॥ भलो होय परिणाम, संत श्रुति यह निरधारा ॥८॥ जैसे कटु औषधि, गदी के मन नहिं भावे ॥ पै कंचन की देह, होत ऐसे चित लावे ॥ ९ ॥ जो निर्दोष स्वरूप, दोष तहं कह से आवे ॥ नहीं ॥

पदमाला।
१४२
सुधासन, कबहुं हलाहल गुण दरसावे ॥ १० ॥ सवही
स्वामि स्वरूप, सबहि प्रियपूज्य हमारे ॥. भली होय
सोइ, करें प्रभू करुणा आगारे ॥ ११ ॥ कालन ठाने
वैर, कोप अब कापर काजै ॥ काके कटुक वचन सों,
चितको व्याकुल कीजै ॥ १२ ॥ मत्सर कासों करे,
दोष कहुं काको दीजै ॥ करे कोउ कछु कहे, बुराई
मन नहिं लीजै ॥ १३॥ ईसा मूसा और, पयंवर सब
मतवारे ॥ यही सिद्ध सिद्धांत एक सुर कहत
पुकारे ॥ १४ ॥ नाम रूप लीला निज, सुख विन जो
उर आवे ॥ ताहे माया जानि, कल्पना बेगि मिटावे
॥ १५ ॥ यह जबलों सिद्धांत नहीं उर में दृढतावे ॥
जन्मन भटकत फिरे नहीं सुख छिनभर पावे ॥१६॥
दास्य सख्य वात्सल्य, और उज्वल यह चारो॥सबकी
भूमिका, यही एक निश्चय उरधारो ॥ १७॥ जबलों
भेदाभेद नहीं, सब मनसों त्यागे ॥ तबलों एकहि
भाव, नहीं साचो उर जागे ॥१८॥ प्रेम पंथ अति-
कठिन जान जिय असि की धारा॥कटते सीस हटाय,
धर्मपद बिगडे सारा ॥ १६ ॥ यह विधि जो बलवंत,
धारणा चित नहिं लावे ॥ होय प्रेम पद भ्रष्ट भक्ति
शरणागति जावे ॥२०॥

पदमाला। दोहा २४४. , प्रभु सेवा है जानिये, जबलों मुख में नाम । जिती बने कर लीजिये, प्रभु सेवा सुखधाम ॥ १॥ उद्धारे जिन शत्रुगण, दया भाव उर लाय । सो करुणाकर कवन बिध, निज भक्तन विसराय ॥२॥ जिन देखो निज दोष दुख, अघ अरु संकटभार । लखिये समरथ नाथ को, जो सब भंजनहार ॥३॥ कबहुं उपेक्षा ना करे, तजे न निज जनपक्ष । विश्व विदित गोविंद वृद, राखो यापै लक्ष ॥४॥ प्रभुसन जो प्रीतीकरत, तासुं रखत हरि हेत । जाको चाहत हैं प्रभू, ताकहं दर्शन देत ॥५॥ गुरु द्वारा संबंध जो, प्रभुसों भयो सुजान । ताकहं दृढ उर धारि नित, रखिये अनुसंधान ॥६॥ परमाणुन समुदाय है, जानो यह संसार । नाम, रूप, गुण, जगतके, हैं कल्पित निःस्सार ॥॥ जो है सो दीसे नहीं, दीसे है सो नाय । अन दीसत को दीसवो, यही तत्व उर लाय ॥८॥ ,

पदमाला।
जग रहस्य को.. खेल है, नहिं पाखंड सुजान ।
साधो चुपसाधे लखो, करो न नेक बखान ॥९॥
प्रभुमनमें तबलग नहीं, जबलग जग मनमाय ।
विष अमृत इक पात्र में, कैसेहु नाहिं समाय ॥१०॥
आसत है हरि भक्त को, यूं जम फंद कराल ।
मनहुं स्वयंवर मधिपरी, नृपसुत के गल माल ॥११॥
भोगनको शुभ अशुभ फल, पायो मनुज शरीर ।
अब काहे दुख देखके, होवत स्वमति अधीर ॥१२॥
संतत स्वामी स्मरणमधि, दीजे निजहि भुलाय ।
तत्व यही है मुक्ति को, यह ही साध्य उपाय ॥१३॥
सच्चित् आनंदमय सकल, पूर रह्यो गो लोक ।
करिये नित्य निवास तह, त्यागि सकल भव शोक ॥१४॥
वृज देविन को भाव जो, ताको अनुसंधान ।
गाढ़ लालसा सों सदा, राखो हिये सुजान ॥१५॥
अंतर लीला बहिर जग, जो चितवत यह भांत ।
तिन जानी बलवंत जिय, परम तत्व की बात ॥१६॥

पदमाला। १४५ कुंडलिया २४५. सांचो नातो नाथ सों, और जानिये झूट ॥ कच्चो सूत कपास जिम, खींचत जावे टूट ॥ खींचत जावे टूट, याही ते दृढ कर राखो ॥ प्रभु पदसों संबंध प्रेम रस निस दिन चाखो ॥ स्वारथ के सब लोग, कलह घर घर में माचो ॥ कोई न आवत काम, परत जव संकट सांचो॥१॥ संत श्रुति बहु कहिगये, गुंफे ग्रंथ अपार ॥ पैजगमें कोऊ नासुनत, यह सवको है सार ॥ यह सबको है सार, कह परमारथ काको ॥ जहं शुक्ता की चाह, कौन पूछे मुक्ता को ॥ मौन साधि आनंदसों, पैठ रहो बलवंत ॥ जातपांत व्यौहार नहि, तह कह बोलें संत ॥२॥ सांची कोउ माने नहीं, झूटी कही न जाय ॥माया के बलने सकल, राखो तत्व दुराय ॥ राखो तत्व दुराय, संत श्रुति बहुत बखाना ॥ सुने न कोऊ सांचि, झूट में चित्त प्रमाना ॥ बिना किये सतसंग, मिटे नहिं खींचा खाची ॥ शुद्ध हृदय जब होय, बुद्धि में आवे सांची ॥३॥ -

पदमाला।
कबित्त २४६.
-
मोतिन की झरीसी, झरन लागी आस पास,
कंचन को चूर जिम, पसरो चहुं ओर है ॥ रोम रोम
आनंद के नगारे गर्जन लगे, उमड्यो सुखसिंधु,
जाको ओर है न छोर है ॥ नौसौनवासी नाड़ी, करन
लागी मंगल गान, ऐसो श्रीहरि नाम को, अतुल
जग जोर है ॥ याही ते माया ने, निज नाश भय
दुराय राखो, नातो बलवंत ऐसो साधन कौन और है ।।
॥ दोहा ॥
सदा दास के दाहिने, राधा राधा कंत ।
दंपति पद "पदमाल" यह, अर्पण कृत बलवंत ॥
...

No text on this page.

॥ श्री॥
सूचना-
पढमाला " के अतिरिक्त श्रीमान् की विमल वाणी से प्रया
होकर उच्चशिक्षा सिखानेवाली, प्रेमपथ दिखानेवाली, भक्तिरस पिलाने वाली
स्वर्गसुख दिलानेवाली निम्न लिखित पुस्तकें मुद्रित होचुकी हैं:-
(१) श्रीमद्भागवत् भाषा दशमस्कंध,
(२) मुक्तिद्वार निदर्शन.
(३) धर्मसंदर्प (पुनरावृत्ति होना है).
(४) संगीत हिन्दीभाषा ऊषानाटक.
विनीत,
प्रेमनारायन, मुन्शी,
गवालियार, सी. आई.

No text on this page.

No text on this page.

No text on this page.

Padmala

Author
Balvantrav Bhaiya Sahab
Title
Padmala
File name
Padmala
Text
OCR done
Citation
1915
Published
2009/09
Publisher
Gwaliyar, Aalizah Darbar Press
Language
Sanskrit
Pages
182
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Pad
DLI number
345435
Barcode
99999990233776.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
1ugfrOwakIC
Download PDF

Padmala