Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Sanskar Martand

2012/08

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VIDE INDIAN ....... ॥ श्रीहरिः ॥ 23636 LIBRARY संस्कारमार्तण्डः ॥ पारस्कर, प्राश्वलायनगृह्यसूत्रादि से संग्रह कर, जन्म से मृत्यूपर्यन्त संस्कारों का संस्कृत और शुद्धनागरी भाषा से पण्डित जसवन्तरामात्मज पण्डित टोपणलाल कुलचन्द्र उपनाम हरिवल्लभ शर्मा प्रचारक प्रियतम- धर्मसभा शिकारपुर (सिन्ध) अलङ्कृत किया ॥ JAIAIAIAAJH उक्ल सभा के खास मेम्बर महाशय लक्ष्मीचन्द्र वर्मा हरीराम की धन सम्बन्धी सहायता तथा सत्यव्रतशर्माद्विवेदी के प्रबन्ध से सरस्वतीप्रेस-इटावा में मुद्रित हुआ। प्रियतम सं०६ विक्रम सं० १९५७ प्रथमवार १] [ मूल्य )

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श्री हरिः
सादर समर्पण ।
आपुष्मन् लक्षमीचंद्र वर्मा आपके कर कलम में श्री
नन्दनन्दन के प्रसाद स्वरूप तथा आशीर्वाद को कुसमाञ्जली
स्वरूप यह संस्कार तिण्ड ग्रन्थ अर्पित है जैसा है आप
का है लीजिये।
शान्तिरस्तु ! आरोग्यमस्तु !! आयुष्यमस्तु !!!
तदीयसार्वदिक शुभचिन्तक
मुसाफिर-हरिवल्लभ शर्मा

सीमन्तोषपन मामग्री-१ सोपारी १२ गोलो ३ मेवा ४ घृत ५ पीलापूर ६ तकुवा ७ चयून के कांटे यानू कुशा १० प्रांमको लकरी समिधा ३ १२ चंदनका टुकड़ा १३ चंदनचूर ।। जातकर्म की धाराग्री-१माश्वीर पत ३ मुघर्णशलाका ४ धाधनों की कणि५ मपंप कुमा नामकर्म सामग्री-१ सोका १, २ रोली ३ चीनी ४ चंदनचर ५ चंदन का ६ कपूर ७ यालू ८ पुष्प र कुशा १० सांयकी लकष्टी ११ सेमिधा ३, १ घत ९३ धांधल १४ गुड़ १५ मटी का पर्णपात्रः॥ अन्नप्राशनसामग्री- १ यालू २ कुशा ३ पुष्प ४ प्रांत्र की साफही ५ होने मटी का पूर्णपात्र ७ घृत मदन भोजन ॥ , चड़ाफर्म मामग्री- १ भोपारी २ रोली ३ चंदनं चूर ४ पुष्प ५ घृत ६ चंद ७ घालू ८ कुशार आंद की लकडी १० समिधा ३, ११ मटी का पूर्णपात्र : होने १३ घृत १४ मखन १५ दशी १६ वर्ग के कंटफ.३७ गोधर ।। .... उपनयन मामग्री-१ सोपारी ३, र नारियन ३ रोजी ४ चंदन चूर ५ पंचरंग ६ कपूर ७ गह चीनी चंदन १० होने ११ यज्ञोपवीत १२ मौका १३ घाटा १४ चावल १५ कौपीने १६ मृग काला १७ श्रासन १८-सरावा १८ पलाशदंड २० घृत २१ वाल २२ कुश २३ पुष्प २४ समिधा ३, २५ गोयर मूसे १६ नांयकी लकी २. ध के पत्ते २८ मटी के दो पात्र र मेख्ला ३० मेवा॥३१ फन्न । प्रय विषाद भामग्री-१.चा लाठी २ चंदोषा ३ सूनानी ४ मोली ५ रोली । तीनिसोपारी नारियत ८ पंचरंगरदनचूर १० यज्ञोपवीत दो जोड़े १९खरावा: चंदन १३ आसन १४ लाजा १५ शूर्प १६दी मटी के पात्र १७ डोने १८ मेवा १ सिई, २० वान २१ कदलीस्तम २२ मध पक्षों के पत्ते २३ छरी २४ कुश २५ दूर्वा २६ पुरु २७ शमीपत्र २८ जांच की लकी समिधा तीन ३० दूध ३१ दही ३२ माखी ई शाटा चांवल गुड ३४ घृत ३५ पत्थर ३६ संस३७ चौकिया तीन ३- नवीन वस्त्र संतेष्टि सा०-प्रथम दिन १चंदन २ चंदन चूर ३.पुष्प और पुष्पमाला ४ केसर, जौका पाटा ६कुमा ७तिल ८ कपूर बांसको लकरी १०मट्टी का पान ११ एवं १२ गोषर १३ यज्ञोपवीत १४ भोर सुगंधित औषधी । चतुर्थदिनसार-१ मट्टीफा पहा दूध ३ शमीशाखा ४ पुष्प५चंदनचूर ६ कपूर, वस्त एकादशाहमा०-१ यज्ञोपवीत जोरे पंचगव्य के लिये दूध दही गोमूत्र,गोवर पतं ३ पांच सोपारी ४ रोली ५ केसर ६ चंदन चूर ७ पुष्प - मेवा र कपूर १० वता ११षालू १२कुशा १३ छोने १४ांचको लकरी १५ तोमि समिधा१६ मदी का पात्र तुलमी अध्य-मटोकर कूडा गो के लिये का किरबादी २० फेसू फल के पत्ते द्वादशाह मा- १ सोपारी २ रोली ३ इन्दनचूर ४ चन्दन के टुकरे ५५ लामधी ६ कपूर ७ पुष्प : बालू ए कुश १० प्राय की लकड़ी ११ समिघाती १२ होने १३ मटो का पात्र १४ पत्र का टुकष्टा १५ एक घड़ा का तीन इति अथ संस्कारमार्तण्ड-प्रस्ताव सब महाशयों को विदित हो कि समय के परिवर्तन से बहुत काल से वैदिक संरकारों का लोपसा होगया इस से हम ब्राह्मणादि लोग प्रायः धर्मकर्म हीन मलिन बुद्धि 'वाले होगये । यद्यपि कुछ २ संरकारों के पुस्तक छपते और 'विकते भी थे परन्तु ठीक २ पाररकर गृह्य सूत्रके अनुकूल और नागरी भापा सहित पुस्तक प्रायः नहीं मिलते थे। ऐसे पुस्तक का अभाव देखकर यह सरकारमार्तण्ड पुस्तक छ- पाकर प्रकाशित किया गया । संसार में सब जड़ पदार्थों का भी संस्कार होता है । विपम भूमि को जब सम चौ- रस कर लीप लेसकर स्वच्छ कर लेते हैं तब विशेप कार्य साधक रोचक तथा मनोहर ग्राहय होजाती है जिन घरों का लीपना लेसना आदि वा चूना से पोतन आदि संस्कार नहीं होता वे घृणित अग्राह्य तथा नष्टप्राय हो जाते हैं यदि संस्कार होते रहते है तो वे घर मन के प्रसन्न रखने वाले रमणीय तथा ग्राह्य होजाते हैं। रांधीहुई दाल में लोकना वधारना एक प्रकार का संस्कार है छोकने बघा. रने से उस दाल के भीतर २ सय प्रशों में सुगन्धि के परमाणु व्याप्त होजाते हैं। इस कारण वह संस्कृत दाल सोधी रोचक तथा बुद्धि शोधक होजाती है। वस्त्रों का धोना ही संस्कार है इस प्रकार सभी वस्तु अच्छा संस्कार होने से अपनी ठीक उत्तमदशा में प्राजाता है और ठीक २ काम का होजाता है। इसी के अनुसार ब्राह्मणादि द्विज शरीरों के ग- र्भाधानादि संस्कार होने चाहिये। संस्कार शब्द का अर्थ व्या- करणानुसार शुद्धि है सो वाहयाभ्यन्तर दोनों प्रकार का सं- शोधन गर्भाधानादि कर्मों के यथावत् करने से होता है। वा- ह्य शुद्धि से अन्तःकरण-मनकी प्रसन्नता स्वच्छतारूप शुद्धि होती और उस मनःशुद्धिरुप धर्म के संचित होने से ही म- नुष्य को संसार परमार्थ का सुख मिलता है इस से संस्कार अवश्य करने चाहिये । और सरकार न होने से ब्राह्मणादि तीनोंवर्ण पतित होजाते है इससे संस्कारों को न छोडी। सव संस्कारोंद्वारा दो प्रकार से मनुष्य की शुद्धि होती है। एकतो आयुर्वेद के अनुसार अनेक पदार्थों का सेवन तथा भक्षण करने से जैसे कि सुश्रुत के रसायन प्रकरण में लिखा है- गव्यमाज्यसुवर्णच मधुक्षौद्रंचतत्त्रयम् ॥१॥ मेध्यमायुप्यमारोग्य-पुष्टिसौभाग्यवर्धनम् ॥१॥ गौ का घृत सुवर्ण और शहत इन तीनों को मिलाकर सानेसे बुद्धि प्राय नीरोगतापुष्टि-घल और सौभाग्य बढ़- ता है। कुश स्वभाव से ही शुद्ध है उन के द्वारा मार्जन तथा आचमन से शुद्धि होती अग्नि तथा जल भी स्वभाव से ही शोधक हैं। घृतादि सुगन्ध के होम से भी श्वासद्वारा मनुष्य की शुद्धि होती है । जात कर्म में गोघृत सुवर्ण और शहन मिलाकर बच्चे को चटाया जाता है उससे सुशत के लेखा- नुसार बुद्धि तथा प्रायु बढ़ता है मनुस्मृति में लिसा है कि ज्ञानंतपोऽग्निराहारो मृन्मनोवार्युपाञ्जनम् ! वाय:कार्ककालौच शुद्धेःकर्तृणिदेहिनाम् ॥ ज्ञान, तप, शुद्ध पदार्थों का भोजन, अग्नि, मही, मन, जल, लीपना, वायु, कर्मकाण्ड, सूर्य, और काल ये सय पदा- र्थ मनुष्यादि के शोधक हैं। संस्कारों में मन्त्रों का तत्त्वार्थ शोचना जानना ज्ञान, कर्म में कष्ट सहना तप,सुवर्ण घृत शहत आदि शुद्ध पदार्थों का भोजन, अग्नि, शुद्ध मही की वेदि बनाना लीपना पोतना, होम से वायु का शुद्ध होना तथा सूर्य का उपस्थान पाराधन करना इस प्रकार मनुजी के कहे शोधक ज्ञानादि सभी का संग्रह संस्कारों में प्राजाता है इस प्रकार पदार्थविद्या के अनुसार भी संस्कार करने से म- नुष्य की शुद्धि होना सिद्ध ही है। मनरंम० अ० २१ २६ । २७ । वैदिकःकर्मभिःपुण्यै-निपेकादिद्धिजन्मनाम् । कार्य:शरीरसरकारः पावनःप्रेत्यचेहच ॥ १ ॥ गाहीमैर्जातकर्म-चौडमौजीनिबन्धनैः । घेजिकंगार्भिकंचैनो द्विजानामपमृज्यते ॥२॥ भा०-वेदोक्त पवित्र कमी के द्वारा ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों को इस लोक परलोक में पवित्र करने वाला शरीरों का ग- र्भाधानादि संस्कार करना चाहिये । सीमन्तोन्नयनादि के समय होनेवाले होमों से तथा जातकर्म, चूडाकर्म और उपन- यनादि होमों से तथा उस समय होने वाले कर्म से द्विजों का बीज सम्यन्धी तथा गर्भ सम्बन्धी दोपवा मलिनता शुद्ध हो. जाती है। इसलिये यथाविधि संस्कार अवश्य करने चाहिये।

अमन्त्रिकातुकार्ययं स्त्रीणामावृदशेषतः । संस्कारार्थशरीरस्य यथाकालंयथाक्रमम् ॥ भा०-कन्याओं के संस्कार शद्धि के लिये उसी २ काल में उसी २ क्रम से विना मन्त्र के करने चाहिये। केवल यज्ञो. पवीत संरकार कन्याओं का विवाह ही है। वेदोक्त कमां को स्वयं ठोक २ करना और क्षत्रिय वैश्यों को कराना यह हम ब्राह्मणों का कर्तव्य है । क्षत्रिय वैश्यों का इस में विशेष दोप नहीं है किन्तु हम लोगों ने विधिपूर्वक वेद वेदाङ्गों का प- ठन पाठन त्याग दिया तो जब कर्म वा संरकारों का मर्म हो नहीं जानते फिर संस्कारों को कैसे स्वयं करें? वा अन्यों को करावें?।इस से यह हम ब्राह्मण लोगों का ही दोप आलस्य वामूर्खता है। अब हम को चाहिये कि फिर भी संस्कारोंको जाने वेद वेदाङ्ग पढे कर्म करें करावें तो सव का कल्याण हो। इस ग्रन्ध में शीघुता के कारण वा मनुष्य सर्वज्ञ नहीं इस कारण कहीं न्यूनाधिकता से त्रुटी रहिगई हो तो पाठक क्षमा करंगे दूसरी आवृत्ति में पूर्ति की जायगी। आपका मुमाफिर ग्रन्थकार श्रीहरिः। अथ संस्कारमार्तण्डः॥ सर्वसंस्कारादिशौतस्मातकर्मणामधिष्ठात्रे सर्वकर्मफल दाने सर्वत्रध्यापिने सर्व नियन्त्रे सर्वस्वामिने श्रीकृष्ण परमात्मने नमः ।। . कुर्वन्नेवेहकर्माणि जिजीविपेच्छत/समाः । एवंवयिनान्यथेतोऽस्ति नकर्मलिप्यतेनरे ॥१॥ अथ गर्भाधानम् ॥ . मूलम्-तामुदुह्य यथर्तुप्रवेशनम् ॥ ७॥ यथाकामी वा काममाविजनितोः । सम्भवामेति वचनात् ॥८॥ इत्यादि । पाररकरगृह्यसूत्र १ का० ११ क० ॥ अथ प्रयोगः-ऋतुकाले रजोदर्शने सजाते चतुर्थादिसम- दिने पुण्याहे गर्भाधाननिमित्तं (मातृपूजापूर्वकं रवयमाभ्युद: यिकं कृत्वा ) पोडशरात्रादर्वाक रात्रौ दक्षिणकरेण पति- वध्वाउपरथमभिस्पृश्य जपति । ओम् पूपा भगथं सविता मे ददातु रुद्गः कल्पयतु ललामगुम् । विष्णुर्सेनि कल्पयतु भावार्थ-प्रथम गर्भाधान संस्कार का विचार दिखाते हैं। ऋतुकाल चौथे छठे भादवे दशवे वाचारहवें दिन स्त्री स्नान कर शुद्ध हो और शुभ (चन्द्र बुध वृहस्पति शुक्र) पुण्य दिन में पति गर्भाधानार्थ मातृपूजा और पाभ्युदाधिक करके रात्रि में कपर संस्कृत में लिखे अनुसार किसी पण्डित विद्वान् से एकान्त ३ संस्कारमाएतु ॥ ते॥ त्वष्टा रूपाणि पिथंशतु । आसिञ्चतु प्रजाप- तिर्धाता गर्म दधातु इति मन्त्रेण । अथ प्रामुखउपविष्टउदङ्मुखो वा ए तामभिमन्त्रयेदनेन- ओम् गर्भ धेहि सिनीवालि! गर्भ धेहि पृथु- ण्टु के गर्भ ते अश्विनी देवावाधत्तां पुष्कर- स्रजो॥ ततः-ओम् रेतो मूत्रं विजहाति योनि प्रविशदिन्द्रियम्।गी जरायुणावतउल्वंज- हाति जन्मना । इति मन्त्रेण रेतःस्रावणम् । अथ तस्या हृदयमालभेत- ओम् यत्तेसुसीमे! हृदयं दिवि चन्द्रमसि प्रितम् । वेदाहं तन्मां तद्विद्यात्पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतथं शृणुयाम शरदः शतम् ॥ इति मन्त्रेण । ततः स्वरथो हृष्ठमना हद्देशे प्रसन्नाम- नातुरां कामयमानामभग्नशय्याया प्रदोपादूर्ध्व स्नियाभि- गच्छेत् ॥ इति गर्भाधानम् ॥ पडसम के स्वय गर्भाधान का एत्य फरे । भाषा में इस का विशेष ध्या ख्यान लिखना उचित नही समा गया। इस में परिहत पुरोहित का दु काम नहीं किन्तु षही गर्भाधान करने वाला पुरुष स्त्रयं सब करे। भावपूर भोर मापदयिक सूत्र में नौं है ।। इति गर्भाधान समासम् ॥

अथ पुंसवनम् ॥ भूलम-अथ पुंसवनम् १ पुरास्यन्दतइति मासे द्वितीये तृतीये वा २ इत्यादि पा० का०१० १४ ॥ प्रयोग:-तत्र गर्भाधानप्रभृतिद्वितीये तृतीये वा मासे यस्मिन्दिने पुन्नक्षत्र [पुष्य पुनर्वसु मृगशिरी हस्त मूल श्र- वणा] युक्तश्चन्द्रस्तस्मिन्नहनि गर्भिणीमुपवासं कारयित्वा तां स्नपयित्वाऽहते वाससी परिधाप्य (मातृपूजाभ्युदयिक) कृत्वा वटप्ररोहं वटशुशांश्च प्राचारात कुशकंटकमपि शि; शिरेण जलेन पिष्ट्वा बदक्षिणनासापुटे तद्रसं दद्यात्- ओम्-हिरण्यगर्भः समवर्तताये भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमा कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥१॥ ओं-अस्यः संभृतः पथिव्यै रसाच्च विश्व- कर्मणः समवर्तताग्रो तस्य त्वष्टा विदधद्रूप मेति तन्मय॑स्य देवत्वमाजानमग्रे ॥२॥ इति मंत्राभ्याम् ॥ इति पुंसवनम् ॥ २॥ अप पुंसधनम्-गाँधान से दूसरे का तीसरे महिने में जिस दिन पुष्य पु- गयेसु, मृगशिरा, हस्त, मूल, श्रवण इन में से किसी नक्षत्र से युक्त चन्द्रमा हो उस से पूर्व दिन में गर्भिणी स्त्री को उपवास कराके अगले दिन स्नान कराके नये बिना फटे शुद्ध दो वस्त्र पहिना कर स्नान कर शुद्ध हुआ पुरुप प्राचमन फ- ओर भाभ्युदयिक फरने पश्चात बरारोह (चटकी जटा) बटशुङ्गा और भाचार से कुश के कांटों को ठगढे जल में पीस कर वह के दाहिने नासिका के लिद में उक्त मोवधियों का रस (हिरण्यगर्भः) इत्यादिदो मान्नों से मुंघावे ॥ इति पुंसवनम् ॥ मातपूजा यू । सरकारमापिड ॥ अथसीमन्तप्रयोगः। मूलम्-अथ सीमन्सोनयनम् १ पुसवनवत् २ प्रथमगर्भ मासे'पष्ठेऽष्टमे वा ३ पाररकरगृ० इत्यादि प्रथप्रयोगः तत्र गर्भमासापेक्षया पष्ठेऽप्टमे वा पुन्नामनक्षत्रयुत- चन्द्रे दिने मातृपूजाभ्युदयिके कृत्वा यहि शालाया कुशक- रिडका कुर्यात् । तत्र नम.-कुशत्रयेण हस्तपरिमितचतुरस्त्र- भूमि परिसमुह्य कुशानेशान्या निक्षिप्य गोमयोदकेनोपलिप्य सुवमूलेन स्फ्येन वोत्तरोत्तरतस्त्रिरुल्लिरयोल्लेखनकमे- णानामिकागुष्ठाभ्या मृदमुत्य वारिणा तं देशमभिपिन्य कास्यपात्रेणाग्निमादाय तत्प्रत्यड्मुसं निदध्यात् । ततो ब्रह्मवरणम् ओम्-अद्य कर्तव्यसीमन्तोन्नयनहोमक- मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुममुक- गोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पचन्दन- अथ सीमन्तोन्नयनम्-पुसघन मैं प हे नक्षत्रो से युक्त चन्द्रमा जिस दिन हो उस दिन पहिले गर्भ में छठे वा घाट महिने में सीमन्त करे । मण्डप धनाकर उस में १ हाथ लम्बी चौडी चाकोन वेदि यनावे घेदि में पचभूसस्कार करे-तीन कुशो से वेदि मनि को झाड कर कुशो को ईशान कोण में फेंक कर गोधा और जल से लीपकर स्नुषा के मूल या स्क्य से उत्तर २ घेदि में मागायत तीन रेखा करे । अनामिका और अगुष्ठ से रेखाओं में से मट्टी को उठाकर फेंक बेदि में जल सेचन करे। कासे के बा मट्टी के पात्रमें अग्नि लाकर पश्चिमाभिमुर स्थापन करे । तत्पश्चात-पुष्प चन्दन सारखून और वस्त्रों को लेकर (ोगद्या इत्यादि बाषय पढ के यजमान ब्रह्मा का बरण करे ओर पुष्पादि ब्रह्मा के हा सीमन्तोषयनसंस्कारः॥ ताम्बूलवासोभिर्ब्रह्मत्वेन त्वामहं वणे ओम कृतोऽस्मीति प्रतिवचनम्॥ ओम् यथाविहित कर्म कुर्विति होत्राभिहिते। ओम् करवाणि । इति प्रतिवचनान्तरं-भग्नेदक्षिणतः शुद्धमासनं दत्त्वा तदुपरि मागग्रान्कुशानास्तीर्यास्मिन्सीमन्तोन्नयनहोमकर्म- णि त्वं मे ब्रह्मा भवेत्यभिधाय। प्रोम् भवानीनि तेनोक्ते- अग्निप्रदक्षिणं कारयित्वा ब्रह्माणं तत्रोपवेश्य प्रणीतापात्रं पुरतः कृत्वाजलेनापूर्यकुशराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्या- ग्नेरुत्तरतः कुशोपरि निदध्यात् । ततः परिस्तरणम्-बहि- पश्चतुर्थभागमादायाग्नेयादीशानान्तं ब्रह्मणोऽग्निपर्यन्तं ने. त्याद्वायव्यान्तम् । अग्नितः प्रणीतापर्यन्तम् । ततोऽग्नेरु- तरतः पश्चिमदिशि पवित्रच्छेदनार्थ कुशत्रयं पवित्रकरणार्थ साग्रमनन्तर्गर्भ कशपत्रद्वयं प्रोक्षणीपात्रमाज्यस्थाली चरुरथा- में देये । प्रहमा पुष्पादि को लेकर (यतोगस्मि) कहे। तब (यथाषि०) यजमान कहे और ब्रह्मा (करवाणि) कहे। तम अणि से दक्षिण में शुद्ध शासन चौकी मादि विचाकर उस पर पूर्व को जिनका अग्रभाग हो ऐमे कुश विलाकर ब्रह्मा को अग्नि की प्रदक्षिणा कराके ( अस्मिन् कर्मणि त्यं मे ब्रह्मा भत्र ) छ्भ कर्म मेरे प्रल्ला हो ऐसा कहकर ग्रह्मा के (भवानि) कहने पर उभ सामान पर ब्रह्मा को उत्तराभिमुख घेठाकर प्रणीतापात्र को सामने रस के जाल में भर के कुणों से प्रासादन कर ब्रह्मा का मुख अवलोकन करके अग्नि से उत्तर कुशी पर प्रगीतापान को प्रागन रक्से । तदनन्तर धार मुट्ठी कुश लेकर अग्नि के सय ओर परिस्तरण फरे-एक चौघाई कुश अग्निकोण से ईशानदिशा तक, द्वितीय भाग प्रहला के प्रासन से अग्निपर्यन्त, तृतीयभाग नैऋतकोण से वायुकोण पर्यन्त चीया अनि से प्रणीता पर्यन्त बिछावे । तदनन्तर अग्नि से उत्तर में प्रायस्य पात्रासादन करे। पवित्र छेदनार्थ तीन कुश तथा पवित्रकरणार्थ अग्रभाग सहित ६ । संस्कारमार्समठः ॥ ली संमार्जनकुशाउपयमनकुशाः प्रादेशमितपालाशसमिध- स्तिस्रः सुव प्राज्यं तण्डुलपूर्णपात्रं तिलमुद्गमिश्रास्तंडुलाः। एतानि पवित्रच्छेदनकुशानां पूर्वपूर्वदिशिकमेणासादनीया- नि । तदुत्तरतः वीणागाथिनौ प्रादेशमात्रसाग्राश्वत्थशंकुः, त्रिश्वेतशल्लकोकण्टकं पीतसूत्रपूर्णस्तर्वाः, दर्भपिज्जूलिकात्र- यमुदुम्बरयुग्मफलसुवर्णघटितप्रादेशमितशाखा । एतत्सर्व- मासाद्यपवित्रन्छेदनार्थकुशैः प्रादेशमितपवित्रे छित्त्वा सप- वित्रपाणिना प्रणीतोदकं निःमोक्षणीपात्रे कृत्वा-अनामि- कांडगुष्ठाभ्यामुत्तराग्रे पवित्रे गृहीत्वा त्रिरुदिङ्गनं प्रणीतो. दकेन मोक्षणीप्रोक्षणं ततः प्रोक्षणीजलेन यथासादितद्रव्य- सेचनं ततोऽग्निप्रणीतयोमध्ये प्रोक्षणीपात्रनिधानं तत आ- ज्यस्वाल्यामाज्यनिर्वापः, चरौ तु तिलतगडुलमुद्गानां प्रणी- जिन के भीतर अन्य फुश न हो ऐमे दो कुश, प्रोक्षणीपात्र, प्राज्यस्थाली, 'चरू स्थाली संमार्जनकुश, रुपयमनकुश, ढांक की तीन ममिधा, सुख, प्राज्य, चावल से भरा एक पूर्णपान, तिल मूग मिले चरु के लिये पायल, पवित्र छेदन कुश से पूर्व पूर्व क्रम से उत्तर को अग्रभाग कर २ इन सब का स्थापन करे । टा. मे टनर में दो धीमा पर गाने धाले १ पीपल को सूटी । तीन जगह श्वेत १ सेही का कोटा, पीले भूम से लपेटा १ तकुषा, ३ दाम को पिंजूली, उदुम्बर के दो फलो सहित प्रादेशमात्र उदुम्बर की शाखा हन सय का आसादन करके पवित्रछेदनार्थ तीन कुंशो मे प्रादेशमात्र दो पुशों का छेदन करके पवित्र सहित दहिने हाथ में प्रगीता के जाल को तीन धार प्रोक्षणीपात्र में डाल कर अना. मिका और श्रगुम मे पकड़े हुये पवित्रों ने उस प्रोक्षणोस्य जलका उपवन करे और प्रणीता के जल से प्रीतीरथ जल का पवित्रो द्वारा तीन धार अभिसेचन कर के प्रोक्षणीपात्र के जान से प्रासादन किये भाज्यस्थाली प्रादि का सेवन कर भग्नि श्रोर प्रणीतापात्र के बीच में प्रोक्षणीपात्रको रख देखे । तमश्रा अयस्पाली में पनपात्र से घत गिराधे और चरुपात्र में तिन चावल और भू ७ ममन्तोन्नयनसंस्कारः॥ तोदकेन निःप्रक्षालनं तत्र किंचिज्जलं दत्त्वातगडुलप्रक्षेपः। ततः स्वयं चरुं गृहीत्वा ब्रह्मणाचाज्यं ग्राहयित्वा वनेरुपhत्तरतश्चरुंदक्षिणत भाज्यं युगपन्निध्यात् । ततः सिद्धे चरौ ज्वलत्तणं प्रदक्षिणं भ्रामयित्वा वहनौ तत्प्रक्षेपः। ततः सुव- प्रतपनं त्रिः । ततः संमार्जनकुंशानामग्रैरन्तरतो मलैर्वाह्यतः खुवं संमृज्य प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य पुनस्त्रिःप्रतप्य दक्षिणतो नि. दध्यात्। ततभाज्यमग्नितउवास्यचरोः पूर्वणानीयाग्ने धृत्वा आज्यपश्चिमेन चरुमानीयाज्यरयोत्तरतोनिदध्यात्। ततश्ना- ज्ये मोक्षणीवदुत्पवनम् । अवेक्ष्य सत्यपद्रव्ये तन्निरसनं ततः पूर्ववत्प्रोक्षणयुत्पवनं ततउत्थायोपयमनकुशानादाय प्रजा- पतिं मनसा ध्यात्वा तूष्णीमग्नौ घृताक्ताः समिधः क्षिपेत् डाल के प्रणीता के जल से तीन बार धोकर प्रणीता के थोड़े जल सहित स्वयं घर को ले के और ब्रह्मा भाज्य को लेकर अग्नि के भीतर उत्तर में धरु और दक्षिण में भाग्य को एक साथ अग्नि पर पकने को र सदगन्तर धरु पफ जाने पर सूखे कुश जलाकर घी शोर चरु के कपर प्रदक्षिण भ्रमण कराके अग्नि में जलते कुश फेंक कर युवा को तीन पर अग्नि में तपा के संगार्जन कुशो के अग्रभाग से गीतर को और कुशों के मूलभाग से बाहर की ओर खुवा पोंछ शुद्धकर तथा प्रणीता के जल से सेचन करके और फिर तीन बार तपा के अग्नि से दक्षिण की और स्नुषा को धर देधे । तत्पश्चात् तपते हुए घी अग्नि से उतार के घर से पूर्व की ओर से लाकर सामने धौ और भाग्य के पश्चिम की ओर से चरुको अग्नि उतार भाग्य से उत्तर में घरे । तब तीन घार प्रोक्षणी के तुल्य पवित्रों से धी का उत्पवन करके देखे यदि पत कुछ बस्तु हो तो निकाल कर फेंक देवे और फिर तीन वार मोक्षणीपात्र का वरप- बन करे । तदनन्तर उठ कर उपयगनकुशों को ग्राम हाथ में लेके प्रजापति का मन से ध्यान करके घृत में डधोई तीन समिधानो को तूष्णीं विना मन्त्र पढे एक २ कर अग्नि में चढ़ावे। फिर बैठ कर पवित्र सहित मोक्षणी के जल को.. को भाड़ निरुष्ट 4 - ६ मस्कारमापरः लो संमार्जनकुशाउपयमनकुशाः प्रादेशमितपालाशसमिध. स्तिस्रः सुव प्राज्यं तगडुलपूर्णपात्रं तिलमुद्गमित्रास्तंडुलाः। एतानि पवित्रच्छेदनकुशानां पूर्वपूर्वदिशिकमेणासादनीया- नि । तदुत्तरतः वीणागाधिनौ प्रादेशमात्रसाग्राश्वत्थशंकुः, त्रिरवेतशल्लकीकएटकं पीतसूत्रपूर्णस्तर्वाः, दर्भपिनलिकात्र- यमुटुम्बरयुग्मफलसुवर्णघटितप्रादेशमितशाखा । एतत्सर्व- भासाद्यपवित्रन्छेदनार्थकुशैः प्रादेशमितपवित्रे छित्त्वा सप- वित्रपाणिना प्रणीतोदकं त्रिःप्रोक्षणीपात्रे कृत्वा-अनामि- कांड्गुष्ठाभ्यामुत्तराने पवित्रेगृहीत्वा त्रिरुदिड्गनं प्रणीतो. दकेन प्रोक्षणीप्रोक्षणं ततः प्रोक्षणीजलेन यथासादितद्रव्य- सेचनं ततोऽग्निप्रणीतयोर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रनिधानं तत आ- ज्यस्थाल्यामाज्यनिर्धापः, चरी तु तिलतण्डुलमुद्गानां प्रणी- जिन के भीतर अन्य फुश न दो ऐने दो कुश, मोक्षणीपात्र, भाज्यस्याली, धरू. स्थाली संमार्जनकुश, उपयमनकुश, ढांक की तीन समिधा, सुव, भाज्य, चावलों से भरा एक पूर्णपाल, सिल मूग मिने घर के लिये पावन, पवित्र थेदन कुशों से पूर्व पूर्य क्रम मे उमर को अग्रभाग कर २ इन सब का स्थापन करे । उन मे उत्तर में दो घीणा पर गाने पाले १ पीपल को खूटी । तीन जगह श्वेत १ सेही का फाटा, पीले सूत में लपेटा १ तकुना, ३ दाम को पिंजूली, उदुम्बर हे दो फलो सहित प्रादेशमात्र उदुम्थर की शाखा इन सब का श्रासादन करके पवित्रवेदनार्थ सीन कुशो मे मादेशमात्र दो पुशी का छेदन करके पविन सहित दाहिने हाथ में पसीता के जल को तीन बार प्रोक्षणीपात्र में डाल कर अना. मिका और प्रद्युम्न में पकड़े हुये पवित्रों से उम प्रोक्षणोरथ जलका उत्पवन करे शोर प्रणीता के जल से मोक्षणीस्य जल का पधित्रों द्वारा तीन बार अभिसेवन कर के प्रोक्षणीपात्र के जल से प्रासादन किये भाग्यशाली प्रादि का सेवन का भग्नि प्रोर प्रसीतापान के बीच में प्रोक्षणीपात्र रस देवे । तम मा ज्यस्थाली में एतपात्र से पृत गिराधे और चरुपात्र में तिन धावान और मूब उपग्रभाग से भीतर कोशी कमी । भाग से बाहर की ओर ममन्तीवयनसंस्कार ॥ तोदकेन निःप्रक्षालनं तत्र किंचिज्जलं दत्त्वातगडुलप्रक्षेपः। ततः स्वयं चरुंगृहीत्वा ब्रह्मणाचाज्यं ग्राहयित्वा वनेरुप. र्युत्तरतश्रुं दक्षिणत भाज्यं युगपन्निदध्यात्। ततः सिद्धे चरी ज्वलत्तृणं प्रदक्षिणं भ्रामयित्वा वह्नौ तत्प्रक्षेपः। ततः उव- प्रतपनं त्रिः । ततः संमार्जनकुशानामग्रेरन्तरतो मलैर्वाह्यतः सुवं संमृज्य प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य पुनस्त्रिःप्रतप्य दक्षिणतो नि- दध्यात् । ततश्राज्यमग्नितउद्वास्यचरोः पूर्वणानीयाने धृत्वा भाज्यपश्चिमेन चरुमानीयाज्यरयोत्तरतोनिदध्यात्।तता- ज्ये प्रोक्षगीवदुत्पबनम् । अवेक्ष्य सत्यपद्रव्ये तन्निरसनं ततः पूर्ववत्प्रोक्षण्युत्पवनं तत्तउत्थायोपयमनकुशानादाय प्रजा- पतिं मनसा ध्यात्वा तूष्णीमग्नौ घृताक्ताः समिधः क्षिपेत् हाल के प्रणीता के जल से तीन बार धोकर प्रीता के थोडे जल सहित स्वय घरु को ले के और ब्रह्मा प्राज्य को लेकर अग्नि के भीतर उत्तर में चरु और दक्षिण में शाज्य को एक साथ अग्नि पकने को रखें तदनन्तर धरु पक जाने पर भूखे कुश जलाकर घी और प्रदक्षिण भ्रमण कराके अन्ति में जलते कुश फेंक कर नुवा। में सपा के संगार्जन कुशो के स्तुवा पोद शुद्धफर तपा प्रणीता के जल से सेचन , करके और फिर तीन बार तपा के अग्नि से दक्षिण की ओर स्नुषा को ४ देवे । तत्पश्चात तपते हुए घी को 'अग्नि से उतार के चरु से पूर्व की ओर से लाकर सामने धरे पोर पाउप के पशिम की पोर से चरु को अग्नि उतार माज्य मे उत्तर में घरे । तर तीन वार मोक्षणी के तुरुप पवित्रो से घी का उत्पवन करके देसे यदि घृत में कुछ वस्तु हो तो निकाल कर फेंक देवे और फिर तीन वार प्रोक्षणीपान का उत्प- धन करे । तदनन्तर उठ कर उपयमनकुशो को वाम हाथ में लेके प्रजापति का मन से ध्यान करके घृत में डुबोई तीन समिधानो को तूष्णीं विना मात्र पढे २ कर अग्नि में चढावे । फिर बैठ कर पवित्र सहित प्रोक्षणी के जन को - ताना को झाड है निष्ट - संस्कारमा गष्टः ॥ अथोपविश्य सपवित्रमोक्षणीजलेनाग्निं प्रदक्षिणक्रमेण - युदय प्रणीतापाने पवित्रे धृत्वा ब्रह्मणान्वारब्धः पातित. दक्षिणजानुःरामिद्धतमेऽग्नौ जुहुयात् । तत्राहुतिचतुष्टये प्र- स्याहुत्यनन्तरं हुतशेपस्य घृतस्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः ॥ ओ३म्-प्रजापतयेस्वाहा। इदंप्रजापतयेनमम । इतिमनसा, ओ३म्-इन्द्रायस्वाहा। इदमिन्द्रायः इत्याघारी ओ३म्-अग्नये स्वाहा इदमग्नयेनमम । ओ३म् सोमायस्वाहा । इदं सोमायनमम । इत्याज्यभागीततोब्रह्मणाऽन्वारम्भे कृते स्यालीपाकेन होम:- ओ३म-प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापतये इति मनसा । ततोऽनन्वारब्धो जुहुयात् । तत्तदाहु- त्यनन्तरं खुवावस्थितहुतशेपस्य प्रोक्षण्यां प्रक्षेपः। तत्रैवा- ज्यस्थालीपाकाभ्यां स्विष्टटटोमः- ओम् अग्नये स्विष्टस्तेस्वाहा । इदमग्नये स्विष्टकृते नमम । ओम् भूः स्वाहा। इद- प्रदक्षिणक्रम से ईशानकोण से लेकर सत्तर दिशा तक अग्नि के सब ओर सेचन फरे अर्थात् मोक्षणीपात्र का सब जान पर्युक्षण में गिरा देवे । प्रणीतापात्र में दोनों पवित्र रखके प्रोक्षणीपात्र का विसर्जन करे । तदनन्तर हिने घोंटू की भूमि में टेक कर ब्रह्मा से अवारदध हुआ यजमान प्रज्वलित अग्नि में स्नुषा से भाज्याहुतियों का होम करे । वहां २ उस २ माहुति देने पश्चात् दुवा जो घनविन्दु धचे उन को प्रोक्षणीपात्र में डालता जावे । प्रजापति का ध्यान कर पूर्वापार की तूणी आहुति देवे । त्याग सब यजमान स्वयं बोलतानाय म . भीमन्तोवयनसंस्कारः ॥ मग्नये नमम । ओम् भुवः स्वाहा । इदं वा- यवे नमम । ओम् स्वः स्वाहा । इदं सूर्याय नमम ॥ एता महाव्याहतयः ॥ ओं त्वन्नो अग्नेवरुणस्यविद्वान् देवस्य हेडोअवयासि- सोष्ठाः।यजिष्ठो वहितमः शोशुचानो विश्वां द्वेषार्थसि प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा । इदमग्नी- वरुणाभ्यां नमम । ओं स त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ । अवयव नो वरुणथं रराणो वीहिमृडीकथं सुहवो न एधि स्वाहा । इदमग्नीवरुणाभ्यां नमम । ओं अयाश्चाग्नेऽस्यनभिशस्तिपा. श्च सत्यमित्त्वमयाअसि। अया नो यज्ञं व- हास्यया नो घेहि भेषजथंस्वाहा । इदम- ग्नये नमम । ओं ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः । तेभिन्नी अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्व- कोः स्वाहा । इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भगः स्वभ्यश्च नमम। प्राचार की दो भाज्यभाग की दो और महाध्याहृतियों की तीन सर्वप्रायश्चित्त को पांच तथा प्राजापत्य और विष्टकत दो सब चौदह आहुति त्यागों सहित 1 । jo सरकारमा ओं उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधर्म ध्यमर्थ थाय। अथावयमादित्य व्रतेत. नागसो अदितयेस्याम स्वाहा । इदं य नमम । इति सर्वप्रायश्चित्तम । ओं प्रजापतयेस्वाहा। इदंप्रजापतये नमम। इति प्राजापत्यम् । अथ संस्रक्प्राशनम्। तत आचा" ओं अवैतस्मिन् सीमन्तोन्नयनहोमकर्मणि ताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्ण पात्रं प्रजापतिदैवतममुकगोनायाऽमुकशर्म- णे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं सं- प्रददे। श्री स्वस्तीति प्रतिवचनम् । ततः- ओं सुमिनिया न आप ओषधयः सन्तु । इति पवित्राभ्यां प्रणीताजलेन शिरः संमृज्य- ओं दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः। इत्यैशान्यां प्रणीतान्युजोकर- णम् । ततः-रतरणक्रमण वर्हिरुत्थाप्याज्येनाभिघार्य- देके मस्रषमाशन कर हाय पोसाघमन करके ब्रह्मा को दक्षिणा देवे उस में (पाम वेतस्मिन्) इत्यादि सकल्प पढे । और ब्रह्मा (पोम्-स्वस्तिः) फह पर दक्षिणा लेवे। तदनन्तर पषितो द्वारा प्रणोता दाहाल लेकर (भो भूमित्रि०) मात्र पा के अपने शिर पर जनसेचन करके (श्रो दुर्मित्रिया०) मात्र से प्रणीता के जख को ईशान दिशा में लोट देवे और पवित्रो को विधाये हुए कुशो में मिला दे जिन कम से फुध विराये थे उसी क्रम से पवित्रो सहित उटाकर कुशो में 4 - सीमन्तोनमकार॥ ओं देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित। ‘मनसरपत इमं देवयज्ञ स्वाहा वातेधाः स्वाहा ॥ इदं वाताय नमम ।। इति मन्त्रेण यहिहामः। ततः-पश्चादग्नेयधूमहतवा- ससी परिधाप्य मृद्वासने उपवेशयेत् । ततस्विश्वेतशल्लकी- कण्टकाश्वत्थशपीततन्तुत'दर्भपिंजूलोप्रितयोटुम्बरफल युग्मान्वितमादेशमितशासाभिर्वर्तुलीकृत्य सीमन्तं मूर्धनि विनयति- ओं मुर्भुवः स्वर्विनयामि । इति मन्त्रेण सकृत ओं मूर्विनयामि । ओ भुवर्विनयामि । ओं स्वर्विनयामि। इति मन्त्रारम्रयं तत-उदुम्बरफलयुग्मान्यितालल- कीकराटकादिपंचकं वधूसीमन्तदक्षिणतो वेणीकृत्या-अय: मूर्जेति मन्त्रेण पतिनाति- ओं अयमर्जावतो वक्ष उर्जीव फलिनीभवां पी लगा के दाय से दी फुओं का दोग (ों देवा गापिक)मन्त्र पार से त्याग के साय कर देये । सतर भगि में पधिप में यकी नये गत दो ग पदिमा कर को मामन पर घेटाये । सरपचार तीन स्थानों में येन मेंदी का कांटा. पी. पन की गूंटी, पीने मूस में लपेटा तकुना, कुश को बंधीतीम पिंजली. गर के दो कमों गे गुप्त भारत में मेही के कांटे मादि को सपेट के महास्थान में मांग गरे। (नोभूयः) पत्यादि पार मार्यों में चार पार मोगपरे तदनन्तर पति वधू के मोमन्त के दक्षिणी भोर के बालों को पीट के साप गूलर के दो फालों में युक्त मेदी के कोटे भादि पांगों को (Rs) मायरोमांच मेरकारमाHREER ततउदुम्बरफलादिसमन्वितसूत्रटोरकं वधूग्रीवायाम- नेनैव कमेणं वध्नीयात् । राजान9 संगायतामितिषा- नन्तरं-सोमएव नी राजेमा मानुषीः प्रजाः । अविमुक्तचक प्रासीरंस्तीरे तुभ्यमसौ। श्री अमुक्टेवि!इति गाघा वीणा- गाधिनी गायत्तः । प्रन्यो वा वीरतरः । ततो या ग्रामस- निहितनदो तस्या नाम गृह्णीयात् । तत उत्थाय वधुदक्षि रणकरेण स्वस्पष्टेन फलपुष्पसमन्वितघृतेन- ओं मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वै- श्वानरमृताजातमग्निम् । कविथं सम्मा. जमतिथिं जनानामासन्नापात्रं जनयन्त देवाः स्वाहा। इति मन्त्रण ओं पूर्णा दर्वि परापत सुपूर्णा पुनरापत। व- स्नेवविक्रीणावहा इषमूर्जथं शतक्रतोस्वाहा॥ इत्यनेन च पूर्णाहुतिं दत्वोपविश्य सुवेण भस्मानीय दक्षिणकरानामिकाग्रगृहीतभस्मना- ओं ज्यायुषंजमदग्नेः। इति ललाटे। ओं देवे । तिस पीछे गूलर के फलादि युक्त मून के होरा के पति अधू की ग्रीवा में साधे । सदनन्तर यजमान वीणा पर गाने वालो से कहे कि (राजानं संगाये. ताम् ) तर दो वीणा बजाने वाले (सीमएवनो०) इत्यादि मन्त्रकोणा पर गाः । मात्रान्त से अतीपद को लोड के उस के स्थान में स्त्री का सम्बोधन माम बोले तदनन्तर जो गाव के समीप में नदी हो उस का नाम लेखे । तिस पीले फल पुष्प समन्वित घृतसे भरे सुवाको बधूके दहिभे हायसे स्पर्श कराके (मुनि) मात्र से तपा (पूर्णार्षि०) मात्र से पूर्णाहुति दिलाधे । तदनन्तर दहिने हाथ की अनामिका के अप्रभाग से कुण्ड की भस्म के (न्याएपं०) से ललाट में (क. - सोमन्तोमर्यनमस्कार ।। कश्यपस्य व्यायुषम्। इति ग्रीवायाम् । ओं यद्देवेषु व्यायुषम्। इति दक्षिणबाहुमूले। ओं तन्नो अस्तु व्यायुषम्। इति हृदि । इति व्यायुपं कुर्यात् । अनेनैव कुमेण वध्वा अपि त्र्या- पुपं कुर्यात् । तत्र तत्ते अस्तु व्यायुपम्-इति विशेषः ॥ ततो ब्राह्मणभोजनम् ॥ इति सीमन्तकर्म समाप्तम् ॥३॥ अथ-जातकर्म । तत्र प्रथमं शूलवतीमद्भिः परिपिञ्चेतु- ओम्-एजतु दशमास्यो गर्भो जरायुणा सह। यथायं वायुरेजति यथा समुदएजति। एवायं दशमास्यो अस्रज्जरायुणा सह ।। इति मन्त्रेण । ततो वधूसमीपे पति पति ॥ ओ३म्-अवैतु पृश्निशेवलथं शुने जरा. स्वत्तवे नैव मासेन पीवरी न कस्मिंश्चना- यतनमवजरायु पद्यतामिति ॥ पपस्य०) से ग्रीवा में (यद्देधेपु०) से दाहिने याहु के मून में और (सनो प्रस्तु) । हदय में भस्म लगाये। इमी क्रम में यधू के मी व्यायुप करे परन्तु यधू के स्म लगाने समय ( तनो) के स्थान में (तो) मन्त्र में कहे तदनन्तर प्रा. rगा भोजन कराधे । इति सीमन्तोषपनम् । अथ जातकर्म ~प्रथम जय गर्भवती स्त्री के पेट में मन्तानोत्पत्ति को पीड़ा होने लगे तय पति (एजतु दशमास्पोआ) मात्र पढ के स्त्री के शरीर पर मार्जन, रे। फिर गर्मिणी पत्नी के समीप बैठकर पति (भवेतु) मात्र पढ़े। सदनन्तर १५ . मंस्कारमातंगठ॥ ततः पुत्रे जाते नाभिवर्धनीयात्प्राक् कमार दक्षिण- करस्यानार्मिकया स्वर्णान्तर्हितया मधुघृते एकीकृते घृतमेव वा वक्ष्यमाणमन्त्रः प्राशयति- ओ३म्-भूस्त्वयि दधामि । ओ३म् भु- वस्त्वयि दधामि। ओ३म्-स्वस्त्वयि दधामि। ओ३म्-भूर्भुवःस्वः सर्वं त्वयि दधामि ॥ इति मन्त्रः ॥ एतच्च मेधाजननम् ॥ ततः छुमारस्य दक्षिण कर्ण नाभ्यां वा मुखं दत्वा जपेत्- ओ३म्-अग्निरायुष्मान्त्स वनस्पतिभिरायु- मास्तेन त्वाऽऽयुषाऽऽयुष्मन्तं करोमि ॥१॥ ओ३म्-सोमआयुष्मान्त्स ओपधीभिरायु- मास्तेन त्वाऽऽयुपाऽऽयुष्मन्तं करोमि ॥२॥ ओ३म्-ब्रह्मायुप्मत्तद्वाह्मणैरायुष्मत्तेन त्वा- ऽऽयुषाऽऽयुष्मन्तं करोमि॥३॥ओ३म्-देवा आयुष्मन्तस्तेऽमृतेनायुष्मन्तस्तेन त्वाऽऽयु- पाऽऽयुग्मन्तं करोमि ॥४॥ ओ३म्-ऋषया- पुत्र के उत्पन्न होनेपर नाल काटने से पहिले दहिने हाथ को अनामिका नी के अग्रभाग में मुवर्ण लगा के मुवर्ण सहित मङ्गुली से शहत और घी को मि. ला के (ोम्भस्त्वयि०) प्रत्यादि चार मन्त्री से चालक को घोहार चारपार घटाधे इस को मेघाजनन संस्कार कहते हैं । तदनन्तर बच्चे के दाहिने कान वा नामि के ममीप मुख करके (श्रोम्-अग्निरायुष्मान) इत्यादि पाठ मात्र साप्रधानी मे जातकर्म । १५ युष्मन्तस्ते व्रतैरायुष्मन्तस्तेन त्वाऽऽयुषाs- ऽयुष्मन्तं करोमि ॥५॥ ओ३म्-पितर आयु- मन्तस्ते स्वधाभिरायुष्मन्तस्तेन त्वायुषा- युष्मन्तं करोमि ॥६॥ ओ३म्-यज्ञ अायज्मा- न्यदक्षिणाभिरायुष्मास्तेन त्वायुषायुमन्तं करोमि ॥ ७ ॥ ओ३म्-समुद्रआयुष्मान्त्स- स्त्रवन्तीभिरायुष्मांस्तेन त्वायुषायुष्मन्तं क- रोमि ॥८॥ इति जपित्वा । ओइन् व्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य व्यायु- पम्। यद्देवेषु व्यायुषं तन्नो अस्तुत्र्यायुषम्। इति त्रिजपेत् । अथ तरय दीर्घमायुः कामयमानः पुत्रमभिस्पृशन्वात्सप्रं जपति सचायम्- ओइस-दिवस्परि प्रथमं जज्ञे अग्निर- स्मद्वितीयं परि जातवेदाः ॥ तृतीयमप्सु नृ- मणा अजससिन्धानएनं जरते स्वाधी ओइल्-विना ते अग्ने त्रेधा त्रयाणि दि- दमा ते धाम विमृता पुरुत्रा ॥ विद्मा ते ना- पढके (न्यायुपं०) मात्र को तीन बार पढ़े। तदनन्तर पुत्र की पूर्णशायु होना चा- हत्ताहुपा पिता बच्चे के सब शरीर का स्पर्श करता हुआ (प्रोम्-दिवस्परित) संस्कारमातरः ॥ म परमं गुहा यद्विद्मा तमुत्सं यत आज- गन्थ ॥२॥ ओ३म-समद्रे त्वा नृमणा अ. प्स्वन्तर्नृचक्षाईधे दिवो अग्नऊधन्। तृतीये त्वा रजसि तस्थिवार्थसमपामुपस्थे महिषा अबर्द्धन् ॥३॥ ओ३म्-अक्रन्ददग्निः स्तनय- निवद्यौःक्षामा रेरिहद्वीरुधः समञ्जन्।सद्यो जज्ञानो विहीमिदो अख्यदारोदसी भानुना भात्यन्तः॥४॥ ओ३म्-श्रीणामुदारो धरुणो रयीणां मनीषाणां प्रार्पणः सोमगोपाः॥ वसुः सूनुः सहसो अप्सु राजा विभात्यग्र उषसा. भिधानः ॥५॥ओ३म्-विश्वस्य केतुर्भुवनस्य गर्भ अा रोढसो अपृणाज्जायमानः । वीडु चिदद्रिमभिनत्परायन जना यदग्निमयजन्त पञ्च ॥६॥ ओ३म्-उशिक्पावको अरतिः सु- मेधामर्चेष्वग्निरमृतो निधायि । इयर्ति धूम- मंरुषभरिम्नदुच्छुक्रेण शोचिषाद्यामिनक्षन ओ३म्दूशानोरुक्माद्यौदुर्मर्षमायुः प्रिये रुचानः।अग्निरमृतो अभवद्वयोभिर्यदेनंद्यो- रजनयत्सुरेताः॥८॥ी यस्ते अद्य कृणवद्ग- '. जातकर्म । शोचे पूषन्देव घृतवन्तमग्ने!। प्रतन्त्रय प्रतरं वस्यो अच्छाभिसुम्नं देवभक्तं यविष्ठं!॥६॥ ओम् -आ तं भज सौश्रवसेष्वग्नउक्थउक्थ आभज शस्यमाने। प्रियः सूर्य प्रियो अग्ना भवात्युज्जातेन भिनददुज्जनित्वैः ॥१०॥ श्री त्वामग्ने यजमाना अनुद्यून् विश्वावसुद- धिरे वार्याणित्वयासह द्रविणमिच्छमाना व्रजं गोमन्तमुशिजो विववः ॥ ११ ॥ ततः कुमारं प्रतिदिशमेकैकं वालणं मध्ये पञ्चममूर्ध्व- मवेन्यमाणमवस्थाप्य तमुद्दिश्य-इममनुप्राणितेति पिता ब्रूयात् । ततरतेषु प्राणेति पूर्वी व्यानेति दक्षिणोऽपानेति- अपर उदानेति उत्तर, उपरिष्टादवेक्ष्यमाणः समानेति पञ्चमो ब्रूयात् । एपामभावे पिता स्वयमेव तत्रतत्रोपविश्य तथैव ब्रूयात् । अथ कुमारस्य जन्मभूमिमभिमन्त्रयेत्- ओं वेद ते भूमि हृदयं दिवि चन्द्रमसि नि- इत्यादि ग्यारह मन्त्रों का पाठ करे । तदनन्तर बच्चे के चारो ओर पूर्वादि चार दिशानों में चार ब्राह्मणों को और पांच ब्राह्मण को बीच में बैठा के [धीच वा. ला प्रारंभण कपर को देखता हो तब] पिता व हे (एमगनुप्राणित) तदन्तर पूर्व- वाला ब्राह्मण कहे (प्राण) दक्षिणवाला कहे (ब्यान) पश्निमवाला हे (पान) उत्तरवाला कहे (उदान) और बोचवाला पांचवां ऊपर को देखता हुआ कहे (स. मान) यदि उस समय पांच ब्राह्मण न मिले तो पिता प्रेषवाक्य कहकर स्वयं उ. स२ दिशा में बैठ कर (प्राण) श्रादि शब्द बोललेवे । अब इस पश्चात् जहां बच्चे का जाम हुग्रा हो उस स्थान को देखता हुभा (प्रों वेद ते भूमि०) मन्त्र को ३ संस्कारमातहः । तम्। उदाहं तन्मांतद्विद्यात्पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतथं शृणुयाम शरदः शतम्॥ इति मन्त्रेण । अथाऽश्माभवेति कुमारमभिमृशति । ओम्-अश्माभव परशुर्भवहिरण्यमशु- तंभव। आत्मा वै पुत्रनामासि त्वं जीव श. रदः शतम् ॥ ततः कुमारमातरमिडासीति मन्त्रेणाभिमन्येत् । इडासि मैत्रावरुणी वीरे!वीरमजीजनथाः।सा त्वं वीरवती भव याऽस्मान्वीरवतोऽकरत् ॥ ततः कुमारनाभिवर्द्धने कृते तस्या दक्षिणस्तनं प्रक्षाल्य ओम्-इमथं स्तनमर्जस्वन्तं धयापांप्र- पीनमग्रे शरीरस्य मध्ये। उत्सं जुषस्व भ- धुमन्तमन्त्सिमुद्रियर्थ सदनमाविशस्व ॥ इति मन्त्रेण ततो बामस्तनं प्रक्षाल्य प्रयच्छति- 'योम्-इमर्थस्तनमित्यादि। ओम्-यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूया रत्नधा वसुविद्यः पढे । इस के पश्चात (अश्मा भवः) मात्र से वाधे का म्पर्श करे फिर बच्चे को माता की भोर देरता हुमा (ता) त्यादि मन्त्र पढे । तदनन्तर याच का माल कटलाने पर स्त्री के दहिने मन [दृध] को धोकर (इम स्तन) मात्र से घरघे के मुख में देधे । फिर बाये स्तन [दूध] का प्रक्षालन करके (इमस्तन)त. पा (मस्ते स्तना०) इन दो मन्त्रो से बच्चे के मुख में देवे। तदनन्तर मूतिका स्तो कुमाराय प्रयच्छति- +- जातकर्म । सुदनः। येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्व- ति ! तमिह धातवेऽकः॥ इति मन्त्रांभ्याम्। ततः प्रसवित्रीशिरोदेशे भूमौ वारिपूर्णभाजनं निदध्यात् । ओम्-आपो देवेषु जाग्रथ यथादेवेषु जाग्रथ एवमस्यां सूतिकायां सपुत्रिकायां जाग्रथ ॥ इत्यनेन मन्त्रेण तच्च सूतिकोत्थापनपर्यन्तं तत्रैव धर्तव्यम्। ततः सूतिकागृहद्वारप्रवेशे पञ्चभूसंस्कारान छ- त्याग्नेरुपसमाधानं स चाग्निरुत्थानदिनपर्यन्तं तत्रैव धर्त- व्यः। तत्र चाग्नौ सन्ध्ययोः फलीकरणारतण्डुलांस्तन्मित्रान् सर्पपान दश दिनानि पिता अन्यो वा ब्राह्मणः शराडामर्का इतिमन्त्राभ्यामाहुतिद्वयं नित्यं हस्तेन जुहोति । ओम्-शण्डामर्का उपवीरः शौण्डिकेय उ- लूखलः। मलिन्नुचो द्रोणासश्च्यवनो नश्य- तादितः स्वाहा॥ इदं शण्डामर्काभ्यामुपवी- राय मलिम्लुचाय द्रोणेभ्यश्च्यवनाय न ममा ओम्-आलिखन्ननिमिषः किंवदन्त उपाति- हर्यक्षः कुम्भीशत्रुः पात्रपाणि मणिर्हन्त्रीमु- की सदिया के सिरहाने जल से भरके एक पहा (प्राणे देवेषु०) मात्र से परे । यह पद सूमिका स्त्री के उठने पर्यन्त दश दिन तक वहीं धरा रपयेतदनन्तर सूतिकाघर के द्वार पर पञ्चभूसंस्कार करके किसी कुराह का अंगीठी में प्र. ग्निस्थापन करे । वह अग्नि दश दिन तक बहा रहे युतने न पावे । उस अग्नि में साय प्रातःकाल घाव के कण मोर सरसो को पिता या अन्य ब्राह्मण (ओम्- संस्कारमाविष्ट ॥ रतः कुशोपरि निदध्यात् । ततः परिस्तरणम-बहिषश्रतुर्थ- भागमादाग्नेयादीशानान्तं नैर्ऋत्याद्वायध्यान्तम् । अग्नितः प्रणीतापर्यन्तम् । ततोऽग्नेरुत्तरतः पश्रिमदिशि पवित्रच्छेद- नार्थ साग्रमनन्तर्गर्भ कुशपत्रद्वयं मोक्षणीपात्रमाज्यस्थाली संमार्जनकुशा उपयमनकुशाः ग्राटेशमित पालाशसमिधरित- स्रः नुव भाज्यं तण्डुलपूर्णपात्रमेतानि पवित्रच्छेदनकुशा- नां पूर्वपूर्वदिशिकमेणासादनीयानि । ततः पवित्रछेदना. र्थकुशैः प्रादेशमितपवित्रे छित्त्वा सपवित्रपाणिना प्रणीतो- टकं त्रिः प्रोक्षणीपात्रे कृत्वा-अनामिकाङ्गुष्ठाभ्यामुत्तराग्रे पवित्रे गृहीत्वा त्रिरुदिड्गनं प्रणीतोदकेन प्रोक्षणीप्रोक्षणं ततः प्रोक्षणीजलेन यथासादितद्व्यसेचनं ततोऽग्निप्रणी- तयोर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रनिधानं तत प्राज्यस्थाल्यामाज्यनि- लोकन करके अग्नि से उत्तर कुशों पर प्रणीतापान के प्रागन रक्से । तदनन्तर चार मही कुश लेकर अग्नि के सब ओर परिस्तरण करे-एक घाई कुश न- नियोगा से ईशान दिशा तक, द्वितीय भाग ब्रह्मा के शासन मे अग्निपर्यन्त, तृतीयभाग नैर्ऋतकोण से वायुकोण पर्यन्त चौथा अग्नि से प्रणीता पर्यन्त वि. छाये । तदनन्तर अग्निसे उत्तर में प्राय संस्थ पात्रासादन करे । पवित्र वेदना तीन कुश तथा पवित्ररणार्थ अग्रभाग सहित जिनके भीतर प्राय फुश न हो ऐसे दो फुश, मोक्षणीपान, प्राज्यस्थाली, समानकुश, उपयमनकुश, टाफ की तीन समिधा, सुष, भाक्य, चावलोसे भरा एक पूर्णपान, पवित्र वेदन खुशी से पूर्व पूर्व क्रम से उत्तर को अग्रभाग कर २ इम सघ का स्थापन करे । पवित्रटेद- माय तीन कुशो से प्रादेशमात्र दो फुओं का छेदन करके पवित्र सहित दहि- से प्रणीता के जल को तीन बार मोक्षणीपात्र में हाल पर अनामिका और से पकडे हुये पवित्रों से उस मोक्षणीस्थ ललका स्पषन करे और प्रणीता के जल से प्रीतीस्थ जल का पवित्रो द्वारा तीन बार अभिमुचन कर के प्रोक्षणीपात्रके जल से प्रासादन किये भाग्यश्याली प्रादिका मेधन करते अग्नि और प्रणीतापात्र के बीच में प्रोक्षोपात्रको रस देवे । तब भाजपस्या हाथ नामकर्म ॥ पिः, प्राज्यमधिनित्य ज्वलत्तणं प्रदक्षिणं भ्रामयित्वा व- हुनौ तत्प्रक्षेपः । ततः स्रवप्रतपनं त्रिः । ततः संमार्जनकु- शानामग्रैरन्तरतो मलैर्वाह्यतः खुवं संमृज्य प्रणीतोदकेना- भ्युक्ष्य पुनस्त्रिःप्रतप्य दक्षिणतो निदध्यात् । तत आज्य- मग्नितउद्वास्याग्नेरुत्तरतो निदध्यात् । तत भाज्ये प्रोक्षणी- वदुत्पवनम् । आज्यमवेक्ष्य सत्यपद्ध्ये तन्निरसनं तत: पूर्व- यत्प्रोक्षणयुत्पयनं, ततउत्थायोपयमनकुशानादाय प्रजापति मनसा ध्यात्वा तूप्णीमग्नौ घृताक्ताः समिधः क्षिपेत् । अ- थोपविश्य सपवित्रमोक्षणीजलेनाग्निं प्रदक्षिणक्रमेण प. युंक्ष्य प्रणीतापात्रे पवित्रे धृत्वा ब्रह्मणान्वारब्धः पातित- दक्षिणजानुः समिद्धतमेऽग्नौ जुहुयात्। तत्राहुतिचतुष्टये :- ली में घृतपान से घृत गिरावे घृत को अग्नि पर घरके सूखे कुश जलाकर घी के कपर प्रदक्षिण भ्रमण कराके अग्नि में जलते कुश फेंक कर नुया को तीन धार अग्नि में तपा के संमार्जन कुंशों के अग्रभाग से भीतर को और कुशों के मूलभाग से बाहर की ओर सुपा को झाड़ पोंछ शुद्ध कर तथा प्रणीता के जल से मेचन करके और फिर तीन चार सपा के अग्नि से दक्षिण की ओर सुवा को घरदेवे । तत्पश्चात् तपते हुए घी को अग्निसे उतार के उत्तर में घरे । तव तीन चार प्रोक्षणी के तुल्य पवित्रोंसे घी का उत्पयन करके देसे यदि घृत में कुल निकृष्ट घस्तु हो तो निकाल कर फेंक देवे और फिर तीन बार प्रोक्षणीपान का उत्प. थन करे । तदनन्तर उठ कर उपयमनकुशों को काम हाथ में लेके प्रजापति का मन से ध्यान करके पत में डुबोई तीन समिधानों को तूष्णी विना मन्त्र पढे एक २ कर अग्नि में चढ़ाये । फिर बैठ कर पवित्र सहित प्रोक्षणी के लाल को प्रदक्षिणक्रम से ईशानकोण से लेकर उत्तर दिशा तक अग्नि के सब ओर सेवन फरे अर्थात् प्रोक्षणीपात्र का सम जल पर्युक्षण में गिरा देवे । प्रणीतापात्र में दोनों पवित्र रसके मोक्षणीपात्र का विसर्जन करे । तदनन्तर दहिने घोंटू को भूमि में टेक कर ब्रह्मारसे मन्वारन्या हुमा यजमान प्रज्वलित अग्नि में खुवा से भाज्याहुतियों का होम करे । बहर उस २ माहुति देने पक्षात सुधा में मत्कारमातह॥ त्याहुत्यनन्तरं हुतशेषस्य घृतस्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः । ओ३म्-प्रजापतयेस्वाहा। इदंप्रजापतयेनमम। इति मनसा ओ३म्-इन्द्रायस्वाहा। इदमिन्द्रायः। इत्याघारौ ओ३म्-अग्नये स्वाहा ॥ इदमग्नये नमम । ओ३म्-सोमायस्वाहा ॥ इदं सोमाय नमम। इत्याज्यभागी। ओम्-भूः स्वाहा ॥ इदमग्नये नमम । ओं-भुवः स्वाहा ॥ इदं वायवे नमम । ओं स्वः स्वाहा ॥ इदं सूर्याय नमम । एता महाव्याहृतयः ॥ ओं- त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्-दे- वस्य हेडोऽअवयासिसीप्ठाः। यजिष्ठो व- ह नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषार्थसि प्रमु- मुग्ध्यस्मत्स्वाहा ॥१॥ इदमग्नीवरुणाभ्यां न मम। ओम्-स त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती, नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ । अवयव जो घृतबिन्दु बर्चे उन को प्रोक्षणी पात्र में डालता जावे। प्रजापति का ध्यान कर पूर्वाधार को तूष्ण शाहुति देवे । त्याग सब यजमान स्वयं घोलता जाय । आधार की दो प्राज्य भाग की दो और महाध्याहतियों की तीन समाय- नामको नो वरुणथं रराणो वीहि मृडीकथं सुहवो न- एधि स्वाहा ॥२॥ इदमग्नीवरुणाभ्यां नमम । ओं-अयाश्चाग्नेऽस्यनभिशस्तिपाश्च सत्य. मित्त्वमया असि। अया नो यज्ञं वहास्यया नो धेहि भैषजथं स्वाहा ॥३॥ इदमग्नये नमम । ओं-ये ते शतं वरुण ये सहस्रं य- ज्ञियाः पाशा वितता महान्तः। तेमिनीअद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा ॥४॥ इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे वि- श्वेभ्यो देवेभ्यो मस्यः स्वकैभ्यश्च नराम। ओम्-उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधर्म वि. मध्यम श्रथाय । अथावयमादित्य ! वृते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा ॥५॥ इदं वरुणाय न मम । एताः सर्वप्रायश्चित्ताहु- तयः । ओम्-प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजा- पतये न मम । इति मनसा प्राजापत्यम् ओम्-अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा । इदम- ग्नये स्विष्टकृते न मम ।। ४ संस्कारमार्तण्डः ॥ इति स्विष्टकृद्धोमः । ततः संखवप्राशनमाचमनं च कृत्वा ब्रह्मणे दक्षिणां दद्यात् । प्रोमद्येतस्मिनामकर्महो- मकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपानं प्रजापतिदैवतममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्रह्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रद-इति दक्षिणां दद्यात् । ओं स्व. स्तीति प्रतिवचनम् । ततः- ओं समित्रिया न आप ओषधयः सन्तु । इति पवित्राभ्यां प्रणीताजलमानीय तेन शिरः संमृज्य- ओं दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः ॥ इत्यैशान्यां प्रणीतान्युयूजीकरणम् । ततः स्तरणक- मेण बर्हिरुत्थाप्य घृतेनाभिघार्य हस्तेनैव जुहुयात् । ओं देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित । मनसस्पतइमं देवयज्ञथं स्वाहा : वातेधाः स्वाहा ॥ इदं वाताय न मम । इति वर्हिहीमः । चित्त की पाच तथा प्राजापत्य शोर खिष्टरुन दो सर चौदह माहुति त्यागों सहित देके संस्रव प्राशन का हाथ धो नाचमन कर के ब्रह्मा को दक्षिणा देवे उस में (प्रीमतस्मिन्) इत्यादि सकल्प करे । और मला स्वस्ति का पर दक्षिणा लेवे । तदनन्तर पवित्रो द्वारा प्रणीता का जन्न लेकर (प्रो सुमिनि) मन्त्र पढ के अपने शिर पर जलसेधन करके (ो दुर्मित्रिया) मन से प्रणीता के प जल को ईशान दिशा में लौट देने और पवित्रों को विछाये हुए कुशों में मिला देवे तष जिस कम से कुश विकाये थे उसी क्रम में पवित्रो सहित उठा कर कुशो में घी लगाके हाथ से ही कुशों का होम (ो देखागातुधि) मात्र निष्क्रमणम् । प्राङ्मुखं वालमादाय दक्षिणकर्णे-अमुकशर्मासीति त्रिः श्रावयति। अथ आयुर्वेदान्मन्त्रः॥ ओम्-अङ्गादङ्गात्संभवसि हृदयादधिजायसो आत्मा वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम्॥ नाम दुव्यक्षरं चतुरक्षरं सुखोद्यं शर्मान्तं ब्राह्मणस्य वर्मान्तं क्षत्रियस्य गुप्तान्तं वैश्यस्य दासान्तं शूद्रस्य ॥ इति नामकर्म। अथ निष्क्रमणम् । तत्र चतुर्थ मासि शुभे दिने रनातमलङ्कृतं शिशुं श- हाद्वहिरानीय पिताऽन्यो वा ब्राह्मणः सूर्यमुदीक्षयति । पढ़ के त्याग के साथ कर देवे। तर बच्चे का पूर्व को मुख पर गोद में लेके बस के कान में मुख लगाकर तीन बार कहे (अमुशर्मासि) और ( श्रीम्-अङ्गाद- हासं० ).न्त्र को भी बच्चे के कान में पड़े। नाम दो या चार अक्षर का वो- लाने में सरल ब्राह्मण का शर्मान्त, क्षत्रिय का धर्मान्त, वैश्य का गुप्तान्त, और का दामान्त नाम रक्ो। कन्याओं के तीन वा पांच अक्षर के नाम पर यथा- श्वेदनिधि, विद्यानिधि, सत्यव्रत, धर्मानन्द, सुखदेव, सहदेव, दीनदयाल, श्रीकृष्ण, हरिकृष्ण, हरेराम, श्रीधा, श्रीवल्लभ, हरिवल्लभ, माधव, रामान, राजाराम, रूपाराम, जयराम, लक्ष्मीचन्द्र, लक्षमण, शिवशंकर, महादेव, जयदेव गोविंदराम, मधुमूदन, जयकरण, बलभद्र, याराम, शत्रुघ्न, नारायण, अमानन्द, क्षेमराम, केवलराम, इत्यादि के साथ शर्मा, वर्मा, गुप्त, दास, लगालेना । कन्याओं के नाम ज्ञानदेवी, दमयन्ती, दयावती, बुद्धिमती, सावित्री, मंगलदेवी, यशोदा, हेमवती, सकिरणो, लक्ष्मी, सत्यभामा, ईश्वरी, विष्णुदेवी जयदेवी, श्रीदेवी, पूर्णदेवी, राधादेवी, भाग्ययती, कलावती, लोलावती, पद्मा- बती, रमादेवी, विद्याधरी, सरस्वती, सुखदा, मैत्रेयी, सीतादेवी, इत्यादि । अथ निष्क्रमण-चौथे महिने में शुभ दिन बालक को स्नान करा और शुद्ध वस्त्र भाभूषण पहिना के पिता वा अन्य ब्राह्मण घरसे याहर लाके (तधनुर्दैव०) । 'ची देयः॥ संस्कारमातण्ड ॥ ओम्-तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतथं शू- णुयाम शरदः शतं प्रबवाम शरदः शतमदी- नाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥ इति मन्त्रेण । तत्र फलपुष्पान्धितपयसा भास्कराया इति निष्क्रमणम् ॥ ६॥ अथान्नप्राशनम् ॥ तत्र पप्ठे मासि शुभे दिने स्नातःशुचिराचान्तः शुक्लद्वि- वासाः पिता सूतिकागृहएव कुशकण्डिकां कुर्यात् । तत्र कुशैहरतपरिमितचतुरस्रभूमि परिसमुह्य तानशान्यां निः- 'क्षिप्य गोमयोदकेनोपलिप्य स्फ्येन सुवेण वा प्रादेशमात्र- मुत्तरोत्तरक्रमेण प्रागग्रं निरुल्लिख्य उल्लेखनक्रमेणाना- मिकाढ़गुष्ठाभ्यां मृदं समुधृत्य वारिणा तं देशमभ्युक्ष्य- कारयपात्रस्थं वह्नि प्रत्यमुसमुपसमाधाय- माम पढ के मूर्य का दर्शन कराये तथा फल पुष्प अहित दूध का अर्घ मूर्य को दये। प्रति निष्क्रमणम् ॥ भन्न-गन-ठे महिने में शुभदिन पूर्वाह में बालक का पिता स्नान भासमार कर दो वस्त्र पहिन के मूतिका घर में विधिपूर्वक होम करे। प्रथम येदि में पचभूमस्कार करे-तीन फुगो से घेदिभूमि को फाड़ कर फुशों की ईशाम में कदर गोयर और जल से लोप फर युवा के मूल वा फ्य से उपर • वेदिमें प्रागायत तीन रेसा करे । अनामिका और अंगुष्ठ से रेखाओं में मे मट्ट का उठाकर फेंक के घेदिमें जलसेवन करें। कासे के बा मही के पात्र में शिव नार पहिमाभिमुस स्थापन करे । तरपश्चात-पुष्प चन्दन ताम्बल । .

अन्नप्राशनसंस्कार ओम्-अद्यकर्तव्यान्नप्राशनहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोत्र- मनुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पचन्दनताम्बू- लवासोभिब्रह्मत्वेन त्वामहं वणे । इति ब्रह्माणं वृणुयात् । ओम्-वृतोऽस्मीति प्रतिवचनम् । ओम्-यथाविहितं कर्म कर्वति यजमानेनोक्ते-प्रोम-करवाणीति तेनोक्ते - ग्नेर्दक्षिणतः शुद्धमासनं निधाय तदुपरिप्रागग्रान् कुशाना. स्तीर्य अग्निप्रदक्षिणं कारयित्वा ब्रह्माणमुदङ्मुखं तत्रोपवे. श्यास्मिन्नन्नप्राशनहोमकर्मणि त्वम्मे ब्रह्माभवेत्यभिधाय- प्रोम-भवानीति तेनोक्ते प्रणीतापात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा परिपूर्य कुशैराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्याग्नेस्त्तरतो नि- दध्यात्। ततः परिस्तरणं वर्हि पश्चतुर्थभागमादायाग्नेयादी- शानान्तं ब्रह्मणोऽग्निपर्यन्तं नैर्ऋत्याद्वायव्यान्तमग्नितः मोर यत्रो को लेकर (ोगद्या) इत्यादि वाश्य पढ़ के यजमान ग्रस्ना का यरण करे और पुष्पादि ग्रला के हाथ में देथे । ब्रह्मा पुष्पादि को लेकर (यती. ऽस्मि) कहे। तब (ययायि०) यजमान हे पोर ब्रह्मा (करवाणि) कदि । तय अग्नि से दक्षिण में शुद्ध शासन चौकी भादि विधाकर उस पर पूर्व को गिनफा अग्रभाग हो ऐमे कुश पिछाकर ना को अग्नि की प्रदक्षिणा कराके (अस्मिन् कर्मणि त्यं मे ब्रमा भय) इस कर्म में तुम मेरे ब्रह्मा हो ऐसा कहकर ब्रह्मा के (भवानि) कानेपर उस प्रासन पर ब्रह्मा को उत्तराभिमुख बैठाकर प्रणीतापात्र को सामने रस के जल से भर के कुशों से प्रापशादन फर ब्रह्मा का मुरा अय- लोकन करके अग्नि से उत्तर कुशों पर प्रणीतापान को प्रागय रक्ने । तदनन्तर • चार मुट्ठी पुश लेकर अग्नि के सब ओर परिस्तरण करे-एक चौथाई फुग • निकाश से ईशान दिशा तक, द्वितीय भाग ब्रह्मा के सामन से अग्निपर्यन्त, संस्कारमातंह ॥ प्रणीतापर्यन्तं ततोऽग्नेरुत्तरतः पत्रिमदिशि पवित्रच्छेदनार्थं कुशत्रयम्:पवित्रकरणार्थ साग्रमनन्तर्गर्मितकुशपत्रद्वयं प्रो- क्षणीपात्रं भाज्यस्थाली चरुस्थाली सम्मार्जनकुशा उपयम- नकुशाः प्रादेशमितपलाशसमिधस्तिखः सुव प्राज्यं पूर्ण पात्रं चर्वर्धास्तण्डुला एतानि पवित्रच्छेदनकुशानां पर्वपूर्वदिशि- क्रमेणासादनीयानि। ततः पवित्रन्छेदनकुशैर्यजमानप्रादेश- मितपवित्रच्छेदनं सपवित्रकरण प्रणीतोदकं त्रिः प्रोक्षणी- पात्रे निधाय द्वाभ्यामनामिकाङ्गुष्ठाभ्यामुत्तराने पवित्रे गृ- होत्या त्रिरुत्पवनं तत्तः प्रोक्षणीपात्रं सव्यहस्तेन गृहीत्वा दक्षिणानामिकाङ्गुष्ठाभ्यां पवित्रे गृहीत्वा त्रिरुदिनं ततः प्रणीतोदकेन प्रोक्षणीपात्रमभ्युक्ष्य प्रोक्षणीजलेनासादितव- स्तुसेचनं कृत्वाऽग्निप्रणीतयोर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रं निदध्यात्। ततम्राज्यस्थाल्यामाज्य निरुप्य प्रणीतोदकेन तगडुलान्प्रक्षा- तनीयभाग नेतकोण से घायुकोण पर्यत चौपा अग्नि से प्रणीता पर्यन्त बि- काये । तदनन्तर अग्निसे उत्तर में प्रासंस्थ पात्रासादन करे । पवित्र छेदनार्थ सीन कुश तथा पवित्रकरणार्थ अग्रभाग सहित जिनके भीतर अन्य कुश न हो ऐसे दो कुरा, प्रोक्षणी पात्र, भाज्यस्थानी, संमार्जनकुश, उपयमनकुश, ढाक की तीन भमिधा, सुघ, भाज्य, चायलोंसे भरा एक पूर्णपान, पवित्र छेदन कुशो से पूर्व पूर्य क्रम से उत्तर को अग्रभाग कर २ इन सय का स्थापन करे । पषिद- नार्थ तीन कुशी से प्रादेशमात्र दो कुशो का छेदन करके पवित्र महित दहि- ने हाथ में प्रगीता के जल को तीन बार मोक्षणीपात्र में डाल कर अनामिका मोर से पकडे हुये पवित्रो मे ठप्त प्रोक्षणीय ललका उत्पषन करे और प्रणीता के जल से प्रोक्षणीस्थ जल का पवित्रो द्वारा तीन बार अभिसेवन कर के प्रोक्षणीपात्र के जल से भासादन किये प्रायस्पाली प्रादिका सेवन कर अग्नि और प्रसीतापात्र के बीच में प्रोतशीपात्र को रस देवे । तच प्राध्यस्था- ली में प्रतपात्र मे एन गिरावे घृत को अग्नि पर घाफे मखे कुश जलाकर घी ।

HARIशनसंस्कार । ल्य चरुपाने प्रणीतोदकं दत्वा तत्र तण्डुलान् प्रक्षिप्य स्वयं चरूंगृहीत्वा ब्रह्मणाचाज्यं ग्राहयित्वावन्हावुत्तरतश्चरुं दक्षि- णत भाज्यं निदध्यात्। ततः सिद्धे चरौ तृणादि प्रज्वाल्य उ. भयोरुपरि प्रदक्षिणं भ्रामयित्वा वही तत्प्रक्षेपः । ततस्निः खु. वप्रतपनं सम्मार्जनकुशानामग्रैरन्तरतो मूलैर्वाह्यतः खुर्व संमज्य प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य पुनस्त्रिः प्रतप्य दक्षिणतो नि- , दध्यात् । नत भाज्यमग्नितश्वरोः पूर्वणानीयाने धृत्वा आज्यपश्चिमेन चरुमानीयाज्यस्योत्तरतो निदध्यात् । तत भाज्यस्य प्रोक्षणीवन्त्रिरुत्पवनम् । अवेक्ष्य सत्यपद्न्ये त- निरसनं ततः प्रोक्षण्युत्पवनम् । तत उत्थाय उपयमनक- शान्यामहस्ते कृत्वा प्रजापति मनसा ध्यात्वा तप्णीमग्नी घृताक्ताः समिधस्तिसः प्रक्षिपेत् । तत उपविश्य सपवि- 1 के ऊपर प्रदक्षिण भ्रमण कराके अग्नि में जलते फुश फेंक कर युवा का तीन घार अग्नि में तपा के संमार्जन कुशो के अग्रभाग से भीतर केो और कुशो के मूलभाग से बाहर की ओर सुवा को झाड पोछ शुद्धका तथा प्रणीता के जल से सेधन करके और फिर तीन बार तपा के अग्नि से दक्षिण की ओर स्नुषा को घरदेवे । तत्पश्चात तपते हुए घी को अग्निसे दतार के उत्तर में घरे । तय तीन चार प्रोक्षणी के तुल्य पविभोसे घी का उत्पवन कर के देखें यदि घृतमें कुछ निकृष्ट वस्तु हो तो निकाल कर फेंक देवे और फिर तीन यार प्रोक्षणीपात्र का उप- धन करे । तदनन्तर उठ कर दपयमनकुशी को वाम हाथ में लेके प्रजापति का मन से ध्यान करके पृत में डुबोई सीन समिधानों को तूष्णी विना मात्र पढे एक २ कर अग्नि में चढ़ा। फिर बैठ कर पवित्र सहित प्रोक्षणी के जल को प्रदक्षिणाका से ईशानकोण से लेकर उत्तर दिशा तक अग्नि के सब ओर सेवन . करे अर्थात् प्रोक्षणीपात्र का सब जन पर्युक्षण में गिरा देवे । प्रणीतापात्र में दोनो पवित्र रसके मोक्षणीपान का विसर्जन करे । तदनन्तर दहिने घोट को जा संस्कारमार्तण्डः ॥ त्रप्रोक्षण्यदकेन प्रदक्षिणक्रमेणाग्निं पर्युक्ष्य प्रणीतापाने पवित्रे निधाय ब्रह्मणान्वारब्धः पातितदक्षिणजानः समि- इतमेऽग्नौ जुहुयात् । तत्र प्रथमाहुतिचतुष्टये तत्तदाहुत्य- नन्तरं स वावस्थितहुतशेपस्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः । ओ३म्-प्रजापतये स्वाहा।इदंप्रजापतयेनमम। इति मनसा ओ३म्-इन्द्रायस्वाहा। इदमिन्द्राय।इत्याघारौ ओ३म्-अग्नये स्वाहा ॥ इदमग्नये नमम । ओ३म्-सोमायस्वाहा ॥ इदं सोमाय नमम। इत्याज्यभागौ ततोऽनन्वारब्धेन साधारणासाधारणा- हुतिद्वयं कार्यम् । तत्र प्रथमाहुतिमन्त्रः- ओम्-देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां वि- श्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्ज दुहाना धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुतैतु स्वाहा ॥ इदं वाचे न मम । द्वितीयाहुतिस्तु ॥ ओम्-देवीं वाचमित्यादिमन्त्रं पठित्वा ओम्-वाजो नो अद्य प्रसुवाति दानं वाजो प्राशनकारः देवां ऋतुभिः कल्पयाति ॥ वाजो हिमा सर्ववीरं जजान विश्वा आशा वाजपतिर्जये- य/स्वाहा ॥ इदं वाचे वाजाय नमम । इति मन्त्राभ्याम् ॥ ततः स्थालीपाकेना तिचतुष्टयम् । ओम्-प्राणेनान्नमशीय स्वाहा ॥ इदं प्रा- णाय नमम । ओम्-अपानेन गन्धमशीय स्वाहा ॥ इदमपानाय नमम । अोम्-चक्षुपा रुपाण्यशीय स्वाहा ॥ इदं चक्षुपे नमम । ओम्-श्रोत्रेण यशोऽशीय स्वाहा ॥ इदं नो. त्राय नमम । ततो ब्रह्मणान्यारम्धकर्तृको होमः-तप्र तत्तदात्यन- न्तरं सुआयस्थितहुतशेपद्रव्यरय प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः । तयाज्यस्यालीपाकाभ्यां स्विष्टतम् । ओम्-अग्नये स्विष्टरुते स्वाहा । इद- मग्नये स्विफ्टकते नमम । तत प्राज्येन । ओम्-भूः स्वाहा॥ इदमग्नये नमम । मापार कोही नाम की दो माहुति का (दयों ma) इत्यादि कापारण समापदोघाति मामा के साथ बिना देकर रवानीपा मे (AITRE) सत्यादिमी द्वारा पार घाटुति देये। सदना मात्रा के भावार करने पर दोमरे तथा मुबा का शेष पोमोजोपात्र में कोरता - संस्कारमार्तण्डः ॥ ओं-भुवः स्वाहा ॥ इदं वायवे नमम । ओं स्वः स्वाहा ॥ इदं सूर्याय नमम । एता महाव्याहृतयः ।। ओं- त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वान दे- वस्य हेडोऽवयासिसीप्ठाः । यजिष्ठो व- हितमः शोशुचानो विश्वा द्वेपार्थसि प्रमुमु. ध्यस्मत्त्वाहा ॥१॥ इदमग्नीवरूणास्यां न मम । ओम्-स त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युप्टौ। अवयव नो वरणथं रराणो वीहि मृडोकथं सुहा नएधि स्वाहा ॥ इदमग्नीवरुणाभ्यां नमम । ओं-बायाश्चाग्नेऽस्यनमिशस्तिपाश्च सत्य- भित्त्वमया असि । अया नो यशं वहास्यया नो धेहि भेषजथं स्वाहा ॥३॥ इदमग्नये नमम । ओं-ये ते शतं वरुण ये सहस्रं य- शियाः पाशा वितता महान्तः । तेमिनी अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे सुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा ॥४॥ इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे वि- जाये। और पृत और चरु (मात) दोनो से एक सिटका भाति देकर फेवन पी से महाय्याहतियों को तीन प्राहुति सामचित्त की पाच माहुति रुधा .

अनशनसंस्कार श्वेभ्यो देवेभ्यो मरुभ्यः स्वभ्यश्च नमम । ओम्-उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदबाधमं वि- मध्यमथं प्रथाय । अथावयमादित्य ! वते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा ॥५॥ इदं वरणाय न मम । इति सर्वप्रायश्चित्तम् । ओम्-प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम । इति मनसा प्राजापत्यम् । अथ संस्रवप्राशनम् । तत आचम्य-श्रीमद्यकृतैतद- नप्राशनहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थ मिदं पर्णपात्रं प्रजापतिदेयतममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्रह्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तभ्यमहं संप्रदे-इति दक्षिणां दद्यात् । ओं स्वस्तीति प्रतिवचनम् । ततः प्रणीताविमोकः- 'ओं लुभित्रिया न आप ओषधयः सन्तु । इति पठित्वा पवित्राभ्यां प्रणीताजलमानीय तेन शिरः संमृज्य- ओं दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः ॥ एक प्राजापत्य माहुति त्यागो महित इन साहुतियो को देके संस्त्रयप्राशन कर हाथ धो प्राचमन कर के ब्रह्मा को दक्षिणा देवे उस में (मोमीतस्मिन्) - त्यादि संकल्प करे। और ब्रह्मा स्वस्ति कह र दक्षिणा लेवे। तदनन्तर पवित्रों द्वारा सीता का जल लेकर (मों सुमिति) मान्न पद छपने शिर पर जल मेचन करके ( ओ दुर्मित्रिया० ) मात्र से णता ये शेष ल यो ईशानदिशा में - -- संस्कारमार्तण्डः॥ कुशकण्डिकामारभेत । तत्र कुमः-कुशैहरतमितां भूमि परि- समह्य तानशान्या परित्यज्य गोमयोदकेनोपलिप्य सुधमू- लेन प्रोटेशमानन्त्रिरुल्लिरय उल्लेखनकमेणानामिकाड्- गुष्ठाभ्यामृदमुत्य वारिणा तं देशमभ्युदय कारयपात्रेणा- ग्निमानीय प्रत्यहमुखमग्नेरुपसमाधानं कुर्यात् । ततोऽग्नेः पश्चिमतो यजमानाद दक्षिण दिशि रनापितमहतवासः परि- धाप्य कुमारमड्के निधाय माता उपविशति। ततः पुष्पच- न्दनताम्बूलवासारयादाय- ओम्-अद्येतस्मिन् कर्तव्यचडाकर्महोमक- मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुमम- कगोत्रममकशर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पच- न्दनताम्बूलवासोभिब्रह्मत्वेन त्वामह वणे। इत्ति ब्रह्माणं वृणुयात् । ओम्-वृतोऽस्म ति प्रतिवचनम् । ओम् यथाविहितं कर्म कुर्विति यजमानेनोक्त। ओ- म्-करवाणि । शुद्ध भूमि में मण्डप बनाके विधिपूर्वक हो परे । प्रघमदि में पंचभूमकार करे-तीत कुशो से येदिभूमि को मार खुशो को ईशानकोटा में कारगर और तल मे लीप कर सुबा मूल पा रफ्य से उत्तर २ वेदि मैं गायत तीन रेखा परे। नापिका और अंत में सालो में से मट्टी को टठा कर फेक के बेदि में जालमेचन करे । कासे के बा मट्टी के पात्र में शनि काकर पश्चिमा. भिमुख स्थापन करें । तस्मात् पुष्प इन्दन साम्धून और वस्त्रों को लेकर (प्रो. मद्य ) इत्यादि वाक्य पढ के यजमान ब्रहा का घरण करे और पुष्पादि. ला के हाथ में देवे। ब्रह्मा पुष्पादि को लेकर (प्रोमोस्मि) को । तम (य चटाकर्मसंस्कार इतिप्रतिवचनम् । ततो यज्ञमानोऽग्नेर्दक्षिणतः शुद्धमासनं द- त्वातदुपरि प्रागग्रान्कुशानास्तोर्याग्निं प्रदक्षिणं कारयित्वाऽ- स्मिन्क्मणि त्वं मेब्रह्मा भवेत्यभिधाय । ओम्-भवानीति ते. नोक्ते ब्रह्माणमुदड्मुखं तत्रोपवेश्य-प्रणीतापात्रं पुरतः हत्त्वा वारिणा परिपूर्य कुशेराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्याग्नेरुत्त- रतः कुशोपरि निदध्यात् । ततः परिस्तरणं वर्हिपश्चतुर्थभा. गमादाय-आग्नेयादीशानान्तं ब्रह्मणोऽग्निपर्यन्तं नेत्या- द्वायत्यान्तमग्नितः प्रगीतापर्यन्तम्। ततोऽरनेरुत्तरतः पशि- मदिशि पवित्रच्छेदनार्थ कुशत्रयम् । पवित्रकरणार्ध साग्र- मनन्तर्मितकशपत्रद्वयम् । प्रोक्षणीपात्रं, भाज्यस्थाली सं. मार्जनकुशाः, समिधस्तिस्रः, खुव, भाज्यं, तगडलपर्णपात्रं, पवित्रच्छेदनशानां पूर्वपूर्वदिशिकमेणासादनीयम् । अमी- थाषि०) यजमान बहे ओर ब्रह्मा (करवाणि०) कहे । तव पग्नि से दक्षिण में शुद्ध शासन धोकी नादि विद्याकर उस पर पूर्व को जिनका अग्रभाग हो ऐसे पुश विखाकर ब्रह्मा को अग्नि की प्रदक्षिणा कराके (मस्मिन् कर्मणि त्य मे प्रला भव) EN कर्म में तुम मेरे ब्रह्मा हो ऐमा कहकर ब्रह्मा के ( भवानि ) कहनपर नम सामन पर बल्ला को उत्तराभिमुख बैटरफर तापान को सामने रस्त्र के जल से भर के फुणों से पालादन कर ब्रह्मा का मुस भयतोकन करके पग्नि में उत्तर में पुशो पर गीतापानको मागय रकरे। तदन्तर चार मुट्ठी फुश लेकर अग्नि फे सब शोर परिस्तरण करे-एक प्रौपाई कुश अग्निकोण से ईशान दिशा तक, द्वितीय भाग ब्रह्मा के शासन से अग्निपर्यन्त, तृतीयमागतकोण में पाय- कोण पर्यन्त चौथा अग्नि से मणीमा पन्त विकावे । तदार अग्नि से उतर में प्रायस्थ पात्रामादन करे । पधिन छेदना तीन बुश तथा पवित्रका णार्थ अग्रभाग सहित जिन के भीतर अन्य कुश न हो ऐसे दो कुश, प्रोक्षणी पात्र, प्राज्यस्याली, समानकुश, उपयमनकुश, ढाक को तीन समिधा, नुव, प्राज्य, चायलोसे भरा एक पूर्णपात्र, पषित्र छेदन कुशो से पूर्व पूर्व कम से उत्तर को ४. संस्कारमार्तण्ड.॥ पामुत्तरोत्तरतः साधारणवस्तन्युपकल्पनीयानि तत्र शीतोद- कमुष्णोदकं घृतदधिनवनीतान्यतमस्य पिण्डः, त्रिःश्वेतश- ल्लकीकण्टकं साग्रसप्तविंशतिकुशपत्राणि, लोहारः, नापि- तः, वृपभगोमयपिण्डः। ततः पवित्रच्छेदनकुशः पवित्रेछि. त्वासपवित्रकरण प्रणीतोदकं निः प्रोक्षणीपात्रेनिपिच्य द्वा- भ्यामनामिकाढ्गुष्ठाभ्यामुत्तराने पवित्रे गृहीत्वा त्रिरुत्पवन ततः प्रोक्षणीपात्रं वामहस्ते कृत्वाऽनामिकाद्गुष्ठगृहीतप- वित्राभ्यां नोक्षणीजलं त्रिरुरिक्षप्य प्रणीतोदकेन प्रोक्षणी- पात्रमभ्युक्ष्य प्रोक्षणीजलेनासादितवस्तून्यभिपिच्याग्निम- गीतयोर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रं निदध्यात् । प्राज्यस्थाल्यामाज्यं कृत्वाऽधिनित्य ज्वलत्तृणादिकमादायाज्यस्योपरि प्रदक्षिणं भ्रामयित्वा वह्रौ तत्क्षिपेत् । ततस्त्रिः सुवप्रतपनं संमार्ज- नकुशानामग्रेरन्तरतो मूलर्याह्यतः सुर्व संमृज्य प्रणीतो- अग्रभाग कर २ इन सघ का स्थापन करे । उक्त वस्तुत्रो से उत्तर २ की ओर माधारण बस्तु रक्से-शीतजरा, गर्भजल, घी दही वा वसग इन में से कोई एक, तीन जगह में देत सेठी का एक काटा, अग्रभाग सहित सत्ताईश पुण, लोह का छुरा, नाई, पेल का गौवर इन सब को स्थापित करके पवित्रदनार्थ तीन पुों से प्रादेशमात्र दो फुशो का छेदन करके पवित्र सहित दहिने हाथ से प्र- रणीता के पाल को तीन बार प्रोक्षणीपात्र में हाल पर अनामिका और पकटे हुये पवित्रो से इस प्रोक्षणीस्थ जल का उपवन करे और मसीता के जल से मोक्षसीस्थान का पवित्रो द्वारा तीन बार प्रमिसेचन करके प्रोक्षणीपात्र के साल से प्रासादन किये प्राजस्थानी आदि का प्रोक्षण करके अग्नि और मणी. ताणाम के बीच में मोक्षणीपात्र को रख देवे । तव साज्यस्थाली में प्रतपात्र से पृत गिरा एप्त को अग्नि पर घरके सूखे कुश जलाकर घी के ऊपर प्रदक्षिण भ्रमण का अग्नि में जानते कुश फेंक कर सुधा पो तीन बार अग्नि में त. पा के समान कुशी के अग्रभाग से भीतर को ओर कुशो के मूलभाग से बाह- ४१ चूडाकर्मसंस्कारः । दकेनाभ्युक्ष्य पूर्ववत् त्रिः प्रताप्य दक्षिणतो निदध्यात्। तत:- प्रदक्षिणक्रमेणाग्नित माज्यमवतार्याग्रतो निश्श्यात्। ततः प्रोक्षणीवत्रिराज्यमुत्पूयावेक्ष्य सत्यपद्रव्ये तन्निरसनं पूर्व- वत्प्रोक्षणयुत्पवनं ततउत्थाय उपयमनकुशानादाय वामह- स्ते कृत्वा प्रजापति मनसा ध्यात्वा तूप्णीमग्नौ घृतात्ताः समिधरितसः प्रक्षिपेत् । तत उपविश्य सवित्राप्रोक्षणयुद- केन प्रदक्षिणक्रमेणाग्निं पर्युक्ष्य प्रणीतापात्रे पवित्रे कृत्वा ब्रह्मणान्वारब्धः पातितदक्षिणजानः समितमेऽग्नौ जुहुया- त् । तत्र प्रत्याहुत्यन्तरं सुवावस्थितहुतशेपघृतस्य प्रोक्ष. रणीपात्रे प्रक्षेपः । ततो वक्ष्यमाण क्रमेणाघाराज्यभागमहा. ध्याहृत्ति सर्वप्रायश्चित्तहोमान् कुर्यात् । र की भोर सुवा को माउ पोठ शुद्धफर तथा प्रणीता के जमा से सेचन करके और फिर तीन बार सपा के अग्नि से दक्षिण की ओर सुवा को धर देवे । तत्पश्चात् तपते हुए घी को अग्नि से उतार के उत्तर में घरे । तीन चार प्रोक्षणी के तुल्य पक्षित्रों में घी का उपवन करके देखें यदि तमें कुछ, निकृष्ट वस्तु हो तो निकाल कर फेंक देवे ओर फिर तीन बार मोक्षणी पात्र का प. वन करे । तदनन्तर उठ कर उपयमनकुशी को वाम हाथ में लेके प्रजापति का मान से ध्यान करके चूत में डुबोई तीन समिधामो को तूरणों विना मन्त्र पढे एक २ कर अग्नि में घढावे । फिर बैठ कर पवित्र सहित प्रोक्षणी के जल को प्रदक्षिणक्रम से ईशानकोण से लेकर उत्तर दिशा तक अग्नि के मध और सेवन करे अर्थात् प्रोक्षणी पात्र का भय जल पर्युक्षण में गिरा देवे । प्रणीतापान में दोगो पवित्र रखके प्रोक्षणी पान का विसर्जन करे । तदनन्तर दहिने घोंटू को भूमि में टेक कर बला से अन्याय हुभा यजमान प्रज्वलित अग्नि में सुवा से भाज्याहुसियों का होम करे। वहा २ उस २ आहुति देने पहात सुवा में जो प्रतविन्दु यचे उन को प्रोक्षणीपात्र में डालता जावे। प्रजापति का श्याम संस्कारमातंयड ॥ ओं-प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम ॥१॥ इति मनसा। ओं-इन्द्राय स्वाहा। इतमिन्द्राय नमम । ओं-अग्नये स्वाहा । इदमग्नये नमम। ओं-सोमाय स्वाहा । इदं सोमाय नमम। ओं-भूः स्वाहा । इदमग्नये नमम ॥५॥ ओं-भुवः स्वाहा । इदं वायवे नमम ॥६॥ ओं-स्वः स्वाहा । इदं सूर्याय नमम ॥७॥ ओं-त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडोऽअवयासिसीष्ठाः। यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषार्थसि प्रमुमुग्ध्यस्म- त्स्वाहा । इदमग्नीवरुणाभ्यां नमम ॥ओं- स त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ। अवयव नो वरुणर्थरराणो वीहि मृडीकथं सुहवी न राधि स्वाहा । इदमग्नीवरुणाभ्यां नमम ॥६॥ अो-अया- प्रचाग्नेऽस्यनभिशस्तिपापच सत्यमित्त्वमया- कर पूर्वाधार की सूक्ष्णों प्राहुति देवे । माग सय यजमान स्वयं बोलता जाय। माघार की दो भाग्यभाग की दो भोर महाय्यादतियो की तीन सप्राय.

धूडाकर्मसंस्कार असि । अया नो यज्ञं वहास्यया नो धेहि भेषजथं स्वाहा। इदमग्नये नमम ॥१०॥ओं ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वि- तता महान्तः । तेभिनी अद्य सवितोत वि. ष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा। इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भवः स्वभ्यश्च नमम ॥११॥ ओं-उदु- त्तमं वरुण पाशमस्मदबाधम विमध्यमर्थ श्र- थाय । अथावयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा । इदं वरुणाय नमम। ओ-प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापतये नमम ॥१३॥ इति मनसा प्राजापत्यम् । ओं-अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा । इदम- ग्नये स्विष्टकृते नमम ॥१४॥ इति स्विष्टकृत् । अध संस्त्रवप्राशनम् । तत आचम्य- ओं-अद्यामुष्य कुमारस्य कृतैतच्चूडाक- रणहोमकर्मणि कृताकतावेक्षणारूपब्रह्मकर्म- वित्त की पांघ तथा प्राजापत्य और विष्टकत दो सब चौदह प्राहुति त्यागों सहित देके संस्त्रप्राशन कर हाथ धो प्राधमन करके ब्रह्मा को दक्षिणा देवे सरकारमा प्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदैवतममुक- गोत्रायाऽमुकशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रददे। इति ब्रह्मणे दक्षिणां दद्यात् । ओं-स्वस्तीति प्रतिवचनम् । ततः- ओं-सुमित्रिया न आप ओषधयः सन्तु ॥ इत्ति पवित्राभ्यां प्रणीताजलमानीय तेन शिरः संमृज्य- ओं-दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तुयोऽस्मान् द्वे. ष्टि यं च वयं द्विष्मः ॥ इत्यैशान्यां प्रणीतान्युटजीकरणं ततःस्तरणकुमेण ब- हिरुत्थाप्याज्येनाभिघार्य- ओम्-देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गा- तुमितामनसस्पतइमं देवयज्ञथं स्वाहा वाते- धाः स्वाहा ॥ इदं वाताय नमम ॥ ., इति मन्त्रेण बहिहीमः । अथ शीतोदकमुष्णोदकेन- सोम-उष्णेन वाय उदकेनेह्यदितेकेशान्वप। उस में (जोमयस्मिन्) इत्यादि संकल्प करे । और ब्रह्मा भी स्वस्ति कह कर दक्षिणा लवे । तदनन्तर पवित्रो द्वारा प्रणीता का जल लेकर (ो सुमिति) मान पढ़ के अपने शिर पर जलमेधा करके (ो दुर्मित्रिया०) मात्र से प्रणीता के शेष लालको ईशान दिशा में लौट देवे और पवित्रो को षिकाये हुए कुशो में मिला दधे तब जिस क्रम से कुश षिकाये थे उसी क्रम से पविओं सहित छठा कार कुशा में घी लगा के हाथ से ही कुणों का होम (ों देषागातुषि मन्त्र प्रह के साग के साथ कर देवे । सत्र शीतल जल को गर्म जल के साथ (:.

४५ चहार्मसंस्कारः। इति मन्त्रेणाभिषिच्य तक्रमिश्रितोदके नवनीताद्यन्य- तमपिण्डं तूपणी प्रक्षिप्य दक्षिणपश्चिमोत्तरक्रमेण पूर्वनि- शाबद्धकुमारकेशजूटिकात्रये दक्षिणजूटिकाम्- ओम-सवित्रा प्रसता दैव्या आपउन्द- न्तु ते तनुं दीर्घायुत्वाय वर्चसे ॥ इति मन्त्रं पठित्वा तेनैव मिश्रितवारिणा प्रक्षाल्य ततो दक्षिणभागस्थितजूटिकामागत्रयं कुर्यात्। तत्र-एका- मेकां जूटिकां प्रति कुशपनत्रयसंयोजनं कुर्यात् । शल्लकी कण्टकेन तूपी विवरणं कृत्वा भागनयं कुर्यात् । ततः स- सविंशतिकुशपत्रतः पत्रनयमानीय तत्केशमूलसंलग्नान- जूटिकाप्रथमभागमध्यान्तरितं कुर्यात् । ओम्-ओषधे त्रायस्व स्वधितेमैन हि सीः। शिवो नामासि स्वधितिस्ते पिता-न- मस्ते अस्तु मा माहिथं सीः॥ प्लेग घाय) मन्त्र से मिलाके थोड़ा महा भी जल में मिलाद उस मट्ठा मिने पान में नानीत--जैन-मक्खन का वा दही का थोडा अंश हाले सय पूर्वा- भिमुप वैठे यानक के शिर के दक्षिण पश्चिम तथा उत्तर में तीनों ओर पहिले से वालों के तीन जूहा बांध रक्खे हों उनमें से दहिने जूटा को ( प्रों पित्रा०) मन्त्र पढ के उस पृतादि मिलाये जल से भिगोये। तदनन्तर दहिने भाग के ना या केशो के तीन भाग करे उन एक एक भाग में तीन २ कुश लगावे । अर्थात् तीन स्थानों में श्वेत सेही के काटे से प्रथम वालो को अलग २ करके तीन भाग करे तदनन्तर सत्ताईश कुशो में से तीन कुश लेकर उन कुशो के अग्रभाग को दाहिने केशों के तीन भागों में से पहिले भाग के मूल में (ोपधे०) मात्र पद के लगावे । तदनन्तर (शिवो नामासि०) मन्त्र पढ़ लोह का कुरा मंस्कारमार्तड ॥ इति मन्त्रेण लोहारं गृहीत्वा- ओम्-निवर्तयाम्यायुषेऽन्नाधाय प्रज- ननाय रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय। इति मन्त्रेण जूटिकासंलग्नं कुर्यात् । ततः कुशपत्र- यसहितां जूटिकां छिनत्ति- ओम्-येनावपत्सविता क्षुरेण सोमस्य रा- ज्ञो वरणस्य विद्वान् । तेन ब्रह्माणो वपत- दमस्यायुष्यं जरदष्टिर्यथासत् ॥ इति मन्त्रण पश्चिमजूटिकाछेदनं कुर्यात् । ततस्तांल्लून- कुशपत्रत्रयसहितान् अनुडगोमयपिण्डोपरि उत्तरस्यां दिशि निदध्यात् । अत्रैव पूर्वप्रक्षालितपरभागद्वये कुशपत्रत्रित- यान्तर्निधानादिच्छेदनवज सर्व पर्ववदेव कृत्वा छेदनंतपणी ततः पश्चिमजूठिकायां पूर्ववत्तेनैव मन्त्रेण प्रक्षालनं तूष्णीं शल्लकीकराटकेन भागत्रयकरणं केशमलसंलग्नकेशान्तरि- तमध्पकुरापत्र प्रयधारणक्षुरग्रहणतत्संयोजनानि तत्तन्मन्त्र- गौव कुर्यात् । तत्र प्रथमजूटिकाछेदने मन्त्र:- हाथ में लेकर ( निवर्तया० ) मात्र मे वालोमें कुरा लगाके ( येनावपरमपिता) मात्र पदके दाहिने शोके तीन भागों में से पश्चिम भाग का कुशी सहित काटे । सन सीन फुशों महित काटे केशो को घेरल के गोवर पर उत्तर की ओर से तष पहिले भिगोये दहिने दो भागो में तीन २ कुरा रखना आदि केशच्छेदन छोड कर पूर्व के तुरुप सब कामकरे और फेथोका छेदन विना मात्र पहे तूर्णी करे । तदनन्तर शिर के पश्चिम भाग के जष्टा में पूर्ववत् उमी मान में बालों का भिगोना तथा धिना मात्र पढे सेहो के काटे से केशो के तीन भाग करना देशों मूल में लगे वालो से ढपे तीन शो को रखना छुरा का हाथ में लेना और थालो में लगाना उन २ सक्त मन्त्रो मे करे । उस में पश्चिम की प्रथम शूटिका के 4 चट्टाकर्मसंस्कार॥ ओम्-त्र्यायुषंजमदग्नेः कश्यपस्य व्यायु- षम्। यद्देवेषुत्र्यायुषं तन्नो अस्तुत्र्यायुषम्॥ इति मन्त्रेण च्छित्त्वा पूर्ववद्गोमयपिण्डोपरि निद- ध्यात् । तत्रावशिष्टभागद्वये कुशपत्रत्रयं केशान्तर्निधा ना. दिन्छेदनवर्ज सर्व पूर्ववदेवच्छेदनं तूप्णीमेव कुशपत्रत्रयस- हितलूनकेशानां गोमर्यापण्डोपरि धारणं च तत उत्तरभाग जूटिकायां प्रक्षालनादिक्षुरसंयोजनान्तेषु पूर्ववत्तत्तन्मन्त्रम योगः प्रथमभागजूटिकायां छेदने मन्त्रः- ओं-येन मूरिश्चरा दिवं ज्योक्च पश्चा- द्धि सूर्यम्। तेन ते वपामि ब्रह्मणा जीवातवे जीवनाय सुश्लोक्याय स्वस्तये ॥ ततः केशान् गोमयपिण्डोपरि निदध्यात् । ततोऽव- शिष्ठभागद्वये कुशपत्रत्रये केशान्तर्निधानादिच्छेदनवज सर्वं पूर्ववच्छेदनं तूप्णी गोमयपिण्डोपरि धारणमपि ततः के काटने का माय (व्यायु) है। दम करके पहिले के नुरुप फेगी को येन के गौघर पर रक्से । और पश्चिम के शेष दो भागो में तीन २ कुशो को पेशों के भीतर रसना प्रादि केशछेदन को छोड़ सय काम पूर्ववत् दो करे । और हूणी फेशों का छेदन करके कुश महित केगों को गोवर पर परे । तदनन्तर शिर के उत्तरंभाग के जूडा में भिगोना आदि केशों में कुरा लगाने पर्यन्त पूर्व- यत् टस मन्त्र का प्रयोग करना चाहिये। उत्तर के तीन भागों में से प्रथम भाग के केश (येनभूरिख) मात्र से काटे। तब उन कुश सहित केशो को भी गोवर पर घरे । तदनन्तर शेष रहे उत्तर के दो भागो में तीन २ कुणों को केशो के ५० संस्कारमार्तण्ड ॥ श्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गगैस्तुष्टुवार्थ सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः ॥ इति मन्त्रेण दक्षिणकर्णमभिमन्न्य- ओं वक्ष्यन्ती वेदागनीगन्ति कर्ण प्रिय सखायं परिषस्वजाना। योषेव शिङ्क्त वित- ताधिधन्वज्ज्याइयथं समने पारयन्ती ॥ इति मन्त्रेण वामकर्णमभिमन्त्रयेत् । ततो मध्यं वीक्ष्य नापितद्वारा वेधयेत् । तस्मिन् समये मधुरादिदानं समाचा- रात् । ततो ब्राह्मणभोजनम् । इति कर्णवेधः ॥६॥ मन्त्रण करके (वक्ष्यन्ती०) मन्त्र से वार्ये कान का अभिमात्रण करे अर्थात् दहिने वायें कान की ओर देखता हुआ उस २ मन्न को पढे। तब कान का मध्यभाग देख कर नाई के द्वारा कान का वेधन [ छेदन ] करावे। तदनन्तर ब्राह्मणों को भोजन करावे या शक्त्यनुसार सीधा देदेवे ॥ इति कर्णवेध समात ॥ - अथोपनयनसंस्कारप्रस्तावः ॥ प्राचार्यस्य धर्मण वेदवेदाङ्गाध्यापनपरस्य धार्मिकस्य विदुपः समीपे येन विधिना येन लिड्न कृत्येन च सह वालो नोयते सउपनयनविधिः। तस्य च वर्णभेदेन कालभेद उच्यते- गर्भाप्टमेऽब्दकुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम् । गर्भादेकादशेराज्ञो गर्भात्तुद्वादशेविशः ॥ अष्टव ब्राह्मणमुपनयेद्गर्माप्टमे वा । एकादशवर्ष राजन्यम् ॥ द्वादशवर्ष वैश्यम् ॥ इति पारस्करः । ब्रहावर्चसकामस्य कार्यविप्रस्यपञ्चमे । राज्ञोवलार्थिनःपप्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽप्टमे ॥ कार्पासमुपधीतस्याद् विग्रस्योर्ध्ववृतंत्रिवत् । शणसूत्रमयंराज्ञो वैश्यस्यायिकसौत्रिकम् ।। भावार्थ:-उपनयन या योपयोत संस्कार का प्रथम प्ररताय लिखते हैं। धर्म के साथ घेद घेदार पदाने में तत्पर धारमा विद्वान् प्राचार्य के समीप में लिए विधि, जिस बिष्ट को पारण या क्रिया को फराके चालक विधिपूर्वक वेदाध्ययनार्थ लाया जाय म विधि पा कर्मका नाम सपनयास या योपवीत कारणादि के वर्णभेद से समम कालभेद या वस्तुभेद दिखाते हैं । गर्भ में था जन्म से ग्राम का साठवणे, गर्भ से वा जाम से क्षत्रिय का ग्यारह वर्ष और गर्भ मे या जाम मे पैश्य का याराहये वर्ष उपनयन संस्कार करे । मनु सपा पारस्करादि सम हे मत में विफाप है। ग्रालयमतेज चाहने वाले मानण का पांच, याचाहने वाले सत्रिय का रटे मोर मी शरीर में पनादि ऐश्यम् चाहने वाले प्रश्न का भाट वर्ष यजोपयोप्त करे । कपामय मृत का प्रारूप के लिये, शगका विष को और भेड़ की कन का वैश्य को धारण करना धा. दिये । घामपायोमास दो दसी मय पार करें।

प्रस्ताव.॥ - तत्र यज्ञसूत्रनिर्माणधारणविपये किचल्लिख्यते । त्रिवटूर्ववृत्तंकार्य तन्तुप्रयमधोवृतम् । त्रिवृतंचोपवीतंस्या-त्तस्यकोग्रन्धिरिप्यते ॥ वामावर्त्त त्रिगुणं कृत्वा प्रदक्षिणावृत्तं नवगुणं तदेव त्रिदोरकं कृत्वा ग्रन्थिमेकं विदध्यात् ॥ पृष्ठवंशेचनाभ्यांच घृतंयद्विन्दतेकठिम् । तद्धार्यमुपवीतस्या-वातिलम्बनचोच्छुितम् ॥ वामरकन्धेधृतेनाभि-हृत्पृष्ठवंशयोधूतम् । यथाकटिपर्यन्तं प्राप्नोति तावत्परिमाणं कर्तव्यमित्यर्थः । कार्पासक्षौमगोवाल-शाणवल्कतृणादिनाम् । सदासम्भवतोधार्य-मुपवीतंद्विजातिभिः ॥ शुचौदेशेशुचिःसूत्रं संहताङ्गुलिमूलके । प्रावध्यपरणवत्यातत् निगुणीकृत्ययत्नतः ॥ पीपपीत बनाने तथा पहर मे के विषय में कुछ लिखते हैं। तीन छोरा इकट्ठे कर ऊपर को बाई भोर को प्रथम ऐठे पक्षात उसको लिगुना कर नीचे को दहिना ऐंठ कर नौ तार का एक होरा बनाकर ठस को तिगुना कर एक जगह गांठ लगाये ऐसी नौहार वाली तीन लडी का यज्ञोपवीत होना चाहिये। पायें कन्धे से पीछे पीट के बीच से, प्रागे नाभिस्थान में धारण किया जो कटि भाग तक पहुचे ऐमा यहीपीस पहरना चाहिये किन्तु इस मे अधिक लम्बा पाऊंचा न हो । कपाम, मतसी, गौके वाल, शण, अवकान और तृणादि इन में से जिस देश काल में जिस का मिलना सम्भव हो उसी का यसोपीत माह- बादि लोग बनाकर पहनें। सब मिलतो कपात का ब्राह्मण शणका क्षत्रिय और जनका वैश्य पहने। शुद्ध स्थान में स्वय शुद्ध हुशा पुरुष सब अंगुलियों के मूलोंको मिलाकर छानवे धार मूतको लपेटकर तिगुना करके (भापोहिष्ठा) इत्यादि तीन .

अपनयन--
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अलिङ्गकैस्त्रिभिःसम्यक् प्रक्षाल्योर्ध्ववृत्तंचतत् !
अग्रदक्षिणमावृत्तं सावित्र्यात्रिगुणीकृतम्।
अधःप्रदक्षिणावृत्तं समरयान्नवसूत्रकम् ।
त्रिरावेष्ट्यहढंबद्ध्वा ब्रह्मविष्णुशिवान्नमेत् ॥
यज्ञोपवीतंपरम-मितिमन्त्रेणधारयेत् ।
सूत्रंसलोमकंचेत्स्या-त्तताकृत्वाविलोमकम् ।।
सावित्र्यादशकृत्वोऽद्धि-मन्त्रिताभिस्तदक्षयेत् ।
विच्छिन्नवाप्यधोयातं भुक्त्वानिर्मितमुत्सृजेत् ॥
स्तनादूर्वमधोनाभे नवार्यतत्कथंचन ।
ब्रह्मचारिणएकस्या-त्स्नात्तस्यवेबहूनिवा ॥
तृतीयमुत्तरीयार्थे वस्त्राभावेतदिष्यते ।
ब्रह्मसूत्रेतुसन्येऽसे स्थितयज्ञोपवीतिता ।
मन्त्रो से उस त्रिगुण सूत का सम्यक् प्रक्षालन करवायी श्रीर से ऊपर को ऐंठे
फिर नौतार करके सावित्रीगन में प्रदक्षिण ऐंठे । ऐसे नौ सूत
को तिगुना कर गाठ लगाफे उत्पत्ति स्थिति प्रलयका ईश्वर को नमस्कार फरे
तदनन्तर (यज्ञोपवीतं परमं०) मात्र से धारण करे । योपवीत सूत्र में किसीके
चाल लग गयेहो तो उन बालो को निकाल के गायत्री मन्त्र से जल को पद३
दशयार उस का सेवन कर पवित्र करे। दूट गया हो का नाम से नीचे के भाग
में भागया हो तो ऐसे यज्ञोपवीत को त्याग के नया बनाया विधिपूर्वक पहिने
रतनो से ऊपर कराठमात्र में या नाभि से नीचे यज्ञोपवीत को पदापि धारण न
करे । ब्रह्मधारी एक यज्ञोपवीत पहने स्नातक गृहस्थ दो या तीन चार आदि
यज्ञोपवीत पहने । यदि शरीर पर अंगोला न हो तो अवश्य ही तीसरायची.
पीत पंगोळा के स्थान में धारण करे। पाये कन्धे पर से पहने तो पुरुष
उपचीती वा यजोपयोती महाता ऐसा पहनकर देष कर्म करे। दहिने कन्ये
एक होरा

प्रस्तावः ॥ प्राचीनावी तिताऽसव्ये कण्ठस्थेतुनिवीतिता। यदि नियतेऽष्टमवर्षादिकाले वालरय शक्तिः कर्मा- नुष्ठातुं न स्याद्यद्वा केनापि कारणेन पिता नियतकाले संस्कारं कत्तुं न शक्नुयात्तदा । आपोडशाब्राह्मणस्य-सावित्रीनातिवर्तते । प्राद्वाविंशारक्षत्रवन्धो-राचतुर्विशतेर्विशः । प्रतऊर्वत्रचोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः । सावित्रीपतितानात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः ॥ व्रात्यसंस्कारश्वशास्त्रोक्मप्रायश्त्तिानुष्ठान पूर्वको यथा सम्भ- वति तथाऽग्र एतत्संस्कारान्ते वक्ष्यामः । मेसनामजिनं दण्ड-मुपवीतं क्मण्डलुम् । अप्सुप्रास्यविनष्टानि गृहीतान्यानिमन्त्रवत् ॥ अवशिटा चेतिकर्तव्यता संस्कारान्ते द्रष्टव्या ॥ इति प्रस्तावः। में पहिने तो प्राचीनापीती अपसव्य कहाला ऐसा पहन कर पितकर्म करे और कगठ में माला के समान पहरमा निधोती पहाता है ऐसा पहन के नापिफर्म करे । यदि प्राठ आदि नियत वर्ष में चालक को कम करने की शक्ति न हो तो अथवा किसी कारण नियत समय पिता संस्कार न करसके तो १६ वर्ष तक ब्राह्मण का २ तक क्षत्रिय का और २४ वर्ष तक वैश्य का सरकार हो सकता है। हम से आगे तीनों पतित हो जाते हैं उन का संरकार शास्त्रोक्त प्रायनित होकर जैसा हो सकता है भी आगे कहेंगे। मैरला, मृगधर्म, दण्ड, यशोपर्षात और कमरहम ये नष्ट हो जाय तो ब्रह्मचारी इन को जल में छाल के गान पूर्वक नये शारे। इस विषय का शेप विचार सरकार के अन्त में देखो प्रारम्भ घा जयघोष में योपवीत धारण की सावश्यकता हो तब २ इसी त मकार यज्ञोपवीत को बनाये तथा पहने ।।

अथोपनयनविधिः॥ तत्रोत्तरायणे शक्लपक्षे पुण्येऽहनि [चन्द्रे, बुध, बृहए, शुक्र स्वस्तिपुण्याहवाचनादिपूर्वकमेतत्कारभेत ॥ • ब्राह्मणान् कुमारं च भोजयित्वा वहिःशालायां पञ्चभूसं- रकारपूर्वकं लौकिकाग्निं स्थापयित्वा पर्युप्तशिरसं रत्नसुव- दिभिर्यथाशक्त्यलकृतमुपनेयं कुमारमांचार्थपुरुपामा- चार्यसमीपं [सत्यवाग्धृतिमान्दक्षः सर्वभूतदयापरः। आस्ति- कोवेदनिरतः शुचिराचार्यउच्यते ] संस्कारार्थमानीयाग्नेः पश्चात्पूर्वाभिमुखमुपवेशयेयुः । प्राचार्यः स्वस्माद्दक्षिणस्यां उत्तरायण शुक्लपक्ष और चन्द्र, बुध, बृहस्पति शुक्र इन पुण्यदिनों में तथा अच्छे पुण्य नक्षत्र में स्वस्तिवाचनादि मङ्गलकृत्य करके इस फर्म का प्रारम्भ करे। अब यहां यज्ञोपवीत संस्कार का विधान लिखते हैं । ब्राह्मणो और बालक केर भोजन कराके अग्न्याधान की शाला से भिन्न अन्य थाह्य शाना [जो मण्डप उसी संस्कार के लिये पृथक्वनाया हो ] में जहां भूमी केश का कंकहादि न हो ऐसी शुद्ध भूमि में एक हाथ धतुष्कोण वेदि बनावे उस वेदि फा कुशों से परिसमूहन ३-गोवर और जलसे लीपना, ३-स्वा के मूल से मा. गन उदक्संस्य प्रादेशमान तीन रेखा करना, ४-उल्लेखन क्रम से अनामिका और अंगुष्ठद्वारा मट्टी को उठा २ कर फेंकना, ५-जल से चेदि का प्रभ्युक्षण करना । इस प्रकार पंघभूसंस्कार करके प्राचार्य पूर्वाभिमुख हो वेदि में अग्नि को स्या- पित करे । पञ्चभूमंस्कार तथा अग्निस्थापन प्राचार्य ही करे । तब घालक के अघ बाल मुहाके स्नान करा यथाशक्ति सुवर्णादि के आभूपण जिस को पहनाये हो ऐसे बालक को आचार्य अपने अन्य शिष्य द्वारा बुलवाके अग्नि से पश्चिम में अपने से दाहिनी ओर खडाकरे वा बैठावे-[ सत्यवादी, धीरज बाला चतुर, मय प्राणियो पर दयालु भास्तिक वेद के पढने पढाने में तत्पर पवित्र रहने वाला विद्वान् प्राचार्य कहाता है । वह भाचार्य अपने से दक्षिण दिशा में बैठे उपनयनविधि: दिश्यवस्थित बालम-ग्रह्मचर्यमागामिति शहिावालस्तथा वदेत् । ततो ब्रह्मचार्यसानीति ब्रूहि-इत्याचार्यः। बालस्तथा वदेत् । ततो येनेन्द्रायेत्याचार्यःकुमारं वासः परिधापयेत् । ओं-येनेन्द्राय वृहस्पतिर्वासः पर्यदधा- दमृतम् । तेन त्वा परिदधाम्यायुषे दीर्घा- युत्वाय बलाय वर्चसे॥ [भत्र वासइति जातावेकवचनम् । तेन यावत्प्रयोजन तावन्ति ब्रह्मचर्याश्रमस्य शाणादीन्यधोलवस्त्राणि कौपी- नादीन्यनेनैव मन्त्रेण परिधापयेत् ततो माणधकस्य द्वि- राचमनम् । तत प्राचार्य इयंदुरुक्तमिति मन्त्रेण युवासु- वासा इति मन्त्रेण वा तूपणी वा ब्रह्मचारिणः कटिप्रदेशे प्रवरसंख्याग्रन्थिथुतांत्रिवृतां मौउज्यादिकां मेखलां वनी- यात् मादक्षिण्येन परिवेष्टयेत् ॥ ओम्-इयं दुरुक्तं परिबाधमाना वर्ण पवित्रं पुनतीमागात् । प्राणापानाभ्यां ब- चालक से (ब्रह्मचर्य) पाक्य कहे ओर बालक भी उस का वैसा ही उत्तर मी वाक्य से देखें । सब प्राचार्य (ब्रह्मचार्यशानि) इस वाक्य को बालक मे कहलाये थोर बालक वैमा ही कहे। तदनन्तर माघार्य (नेन्द्रायः) मान पतके वस्त्र पहनाये। बम्त्र कहने से कौपीन, उसके ऊपर लपेटने का वस्त्र और पर से श्रीहने सादि का जो २ वस्त्र ब्रह्मचारी को धावश्यक हो वह २ सव इसी मात्र से भी समय पहना देवे।यहोवस्त ब्रह्मचर्याश्रम में रहेंगे। ब्राहाल प्रशारी को शण क्षत्रिय को अतसी है और वैश्व को कन के वस्त्र देखे । तब बालक हो दोधार प्राशमन करावे। तदनन्तर भाषा (इयं दुरु) मात्रसेवा (वासु) - संस्कारमार्तगहः। ‘लमादधाना स्वसा देवी सुभगा मेखलेयम्॥ युवा सुवासाः परिवीत आगात्स उ श्रेयान् भवति जायमानः । तं धीरासः कवय उन्न- यन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः ॥ तत प्राचार्या ब्रह्मचारिणे यज्ञसूत्रं दद्यात् । स च य- ज्ञोपवीतमिति मन्त्रं पठित्वा दक्षिणबाहुमुदधृत्य वामस्कन्धे यज्ञोपवीतं परिदधीत- ओम्-यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्स- हजं पुरस्तात् । आयुष्यमय्यं प्रतिमुञ्च शुम्नं यज्ञोपवीतं बलमस्त तेजः । यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि ॥ तत प्राचार्या ब्रह्मचारिण उत्तरीयार्थमजिनं प्रयच्छेत् । सच मित्रस्य चक्षुरिति मन्त्रेण तूष्णीं वा कृष्णाजिनं रौ- रवं वारतं वा चर्म परिदधीत । ओम्-मित्रस्यचक्षुर्धरुणं बलीयस्तेजो यश- मात्र अथवा तूषणों बिना मन्त्रके ब्रह्मचारी के जितने प्रवाही इतनी गाठो वाली भूज.अादि की मेखलाको ब्रह्मचारी के कटिभाग में प्रदक्षिण क्रमसे लपेटकर वाधे फिर भाचार्य अपने हाथ से ब्रह्मचारी को यचोपषीत देवे और बालक यो- पोत को अपने हाथ में लेकर ( यज्ञोपवीत.) मन्त्र पढके दाहिने बाहु को 3. ठाकर वायें कन्धे से यज्ञोपवीत यहने । तदनन्तर पाचार्य ब्रह्मचारी को ऊपर से श्रोढने के लिये मृग धर्म देवे । ओर ( मित्रस्य चर) मन्त्र से ना तूणी प्रा. लणादि के धानक कायल आदिफे धर्म को धारण करे ।

..उपनयनविधि: स्विस्थविर/समिद्धमनाहनस्यं वसनं :जरि- ष्णु परीदं वाज्यज़िनं दधेऽहम् ॥; तत प्राचार्यो ब्रह्मचारिणे तूष्णीं दण्डं प्रयच्छेत्-स ब्रह्मचारी च यो मे दण्डइति पठित्वा दण्डं प्रतिगृह्णीयात् । ओम्-यो मे दण्डः परापतद्वैहायसोऽधिभू- म्याम् । तमहं पुनरादद: आयुषेब्रह्मणे ब्र- ह्मवर्चसाय ॥ केचिदाचार्याः सोमयागदीक्षावदन दण्डविधिमिच्छन्ति । तद्यथा-अध्वर्युर्यजमानमुखसंमितमौदुम्बरं दण्डं यजमा- नाय समर्पयेत् । स दीक्षितो यजमान उच्छ्यस्वेति मन्त्रेणोज़ कुर्यात् । एवं ब्रह्मचार्यपि दण्डमुच्छ्रयेत् । ततो दण्डप्रदा- नानन्तरमाचार्योऽस्य वटोरञ्जलिं स्वकीयाञ्जलिस्थाभिर- द्विरापोहिष्ठति टचेन पूरयेत्- ओमापोहिष्ठामयोभुव-स्तानऊजैदधातन । तदनन्तर भाचार्य तूष्णों ग्रह्मचारी को विरुष वा. पलाशादि का दण्ड देवे और यह ग्राघारी (यो मे दगड ) मात्र पढ़के दण्ड को प्राचार्य के है । कोई प्राचार्य लोग समयाग की दीक्षा के समान यहां भी दण्ठ ग्रहण का विधान कहते हैं। वहां सेामयाग में गैति यह है कि स्वयं यजमान के मुख तक ऊंचा गूलर का दण्ह यजमान को देता और दीक्षित यजमान उस दएष्ट को (तस्पखे० ) मन्त्र पढ़के ऊपर फो ऊंचा उठाता है। यहाँ प्रस्थानी प्राचार्य और दीक्षित यशमान ब्रह्मधारी माना जायगा । तम दण्ड देने पश्चात प्राचार्य अपनी अञ्जलि को जान से भरमें ब्रह्मचारी की अञ्जलि को अपनी आज लोके जल से ( आपो दिया) इत्यादि तीन मन्त्रों से भरे [प्राचार्य और ब्रह्म- हाध संस्कारमार्तण्डः ॥ 'महेरणायचक्षषे॥१॥ ओम्-योवःशिवतमोर- स-स्तस्यभाजयतेहनः उशतीरिवमांतरः॥२॥ ओम्-तस्माअरंगमामवो यस्यक्षयायजिन्वथ। आपोजनयाचनः । [भाचार्यवटुको तूष्णीं स्वस्वाजली जलेन पूरयित्वा- ऽऽचार्यः स्वाञ्जलिना वटुकाञ्जलिमवक्षारयेत्तत्सवितुर्वणी महइति मन्त्रेण- ओम्-तत्सवितुर्वणीमहे वयंदेवस्य भोजनम्। श्रेष्ठं सर्वधातमं तुरं भगस्य धीमहि ॥ इत्याश्वलायनगृहये बिशेपः] तत प्राचार्यः-सूर्यमुदीक्ष- स्व-इति वाक्येन ब्रह्मचारिणं प्रेपयेत-वटुरच तच्चक्षुरिति मन्त्रं पठन् सूर्यमुदीक्षेत- ओम्-तच्चक्षुर्दैवहितं पुरस्ताच्छुकमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत, श- णुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ॥ घासी दोनो अपनी २ प्रचलियो को विना मन्त्र पढ़े जल से भरके माधार्य अप- भी प्रति के जान को (तत्सवितुर्य गो०) मन्त्र से ग्रह्मचारी के अञ्जलिस्य जल में गिराधे । यह भावनायनगृह्यसूत्रानुमार मेद है] तदनन्तर (सूर्यमुदीलस्त्र ) इम वाश्य से प्राचार्य ग्रह्मधारी से प्रैप कहे और ग्रलपारी (ताचक्षुध ) मन्त्र पढ़के मूर्य को देखे [प्राचार्य स्वयं (देय सवित उपनयनविधि- स्विस्थविर/समिद्धमनाहनस्यं वसनं जरि- ष्णु परीदं वाज्यजिनं दधेऽहम् ॥ तत भाचार्यों ब्रह्मचारिणे तूष्णीं दण्डं प्रयच्छत्-स ब्रह्मचारी च यो मे दण्डइति पठित्वा दण्डं प्रतिगृह्णीयात् । ओम्-यो मे दण्डः परापतद्वैहायसोऽधिभू- म्याम् । तमहं पुनरादद आयुषेब्रह्मणे ब्र- ह्मवर्चसाय ॥ "केचिदाचार्याः सोमयागदीक्षावदत्र दण्डविधिमिच्छन्ति । तद्यथा-मध्वर्युर्यजमानमुखसंमितमौदुम्बरं दण्डं यजमा- नाय समर्पयेत् । स दीक्षितो यजमान उच्छ्यस्वेति मन्त्रेणोर्ध्व कुर्यात् । एवं ब्रह्मचार्यपि दण्डमुच्छ्येत् । ततो दण्डप्रदा- नानन्तरमाचार्याऽस्य वटोरज्जलिं स्वकीयाञ्जलिस्थाभिर- निरापोहिष्ठति चेन पूरयेत-- ओमापोहिष्ठामयोभुव-स्तानऊर्जेदधातन । तदनन्तर प्राचार्य तूष्णों ब्रह्मचारी को विषय वा पानाशादि का दगउ देवे और वह ब्रह्मचारी (यो मे दण्ड ) मात्र पढके दण्ड के प्राचार्य के हाथ से रुधे कोई प्राचार्य लोग सोमयाग की दीक्षा के समान यहा भी दरष्ठ ग्रहण का विधान कहते हैं। वहा सोमयाग में गति यह है कि प्रत्यर्य यजमान के मुख तक कंधा गूलर का दगड यजमान को देता और दीक्षित यजमान उस दण्ड को ( उच्यता ) मात्र पढके ऊपर को कंधा उठाता है। यहा प्रश्वयुस्थानी प्राचार्य और दीक्षित यजमान ब्रह्मचारी माना जायगा । सष दण्ड देने पचात् प्राचार्य अपनी अञ्जलि को जल से भरके ब्रह्मचारी की मजलि को अपनी प्रज लोके जल से ( प्रापो हिटा०) इत्यादि तीन मानो से भरे [भाचार्य और ब्रह्म संस्कारमार्तण्डः। महेरणायचक्षषे॥१॥ ओम्-योवःशिवतमोर- स-स्तस्यभाजयतेहनः उशतीरिवमांतरः॥२॥ ओम्-तस्माअरंगमामवो यस्यक्षयायजिन्वथ। आपोजनयाचनः ।। '.. [प्राचार्यवठुको तूष्णीं स्वस्वाजली.जलेन पूरयित्वा- ऽऽचार्यः स्वाजलिना वटुकालिमवंक्षारयेत्तत्सवितुर्वणी- महइति मन्त्रेण- ओम्-तत्सवितुर्वृणीमहे वयंदेवस्य भोजनम्। श्रेष्ठं सर्वधातमं तुरं भगस्य धीमहि ॥ इत्यारवलायनगृये विशेषः] तत आचार्यः-सूर्यमुदीक्ष- स्व- इति वाक्येन ब्रह्मचारिणं प्रेपयेत-बटुश्च तच्चक्षुरिति मन्त्रं पठन सूर्यमुदीक्षेत- ओम्-तच्चक्षुर्दैवहितं पुरस्ताच्छुकमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतथं श- णुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥ चाय दोनो अपनी २ आलियों को विनर मन्त्र पढ़े जल से भरके प्राचार्य अप- नी अञ्जलि के लाग्य फेा (नरसवितुर्व गो०) मन्त्र से ब्रह्मचारी के प्रचलिस्य जल्ल में गिराधे । यह श्राश्यमापनगृह्यसूत्रानुसार मेद है] तदनन्तर (मूर्यमुदीक्षख } इस वाक्य से प्राचार्य ग्रह्मचारी से मैप कहें और वालपारी (तच देव ) मन्त्र पढ़के सूर्य को देखें [प्राचार्य स्वयं (देव मषित . - उपनयनविधिः। [ओम्-देव सवितरेप ते ब्रह्मचारी तं गोपाय स मा मृत .. इतिमन्त्रेण सूर्यावलोकनम् । मन्त्रश्चाचार्यपठनीय इत्याश्व. लायने विशेषः ] तत प्राचार्या माणवकदक्षिणांसस्योपरि हस्तं नीत्वा ममव्रत्तेतइति मन्त्रेण माणयकस्य हृदयमालभेत- ओम्-मम वते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु । मम वाचमेकमना जुषस्व बृहस्पतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम् ॥ तत प्राचार्योऽस्य कुमारस्य दक्षिणं हस्तं सागुष्ठं गृही- त्विा कोनामासीति वदेत् । [श्रीम-देवस्य त्वा सवितुः प्र. सवेऽश्विनो हुभ्यां पूष्णो हरताभ्यां हस्तं गृह्णाम्यसौ ॥ इ- ति स्वपाणिना साड्गुप्ठं वटुपाणिं गृह्णीयादित्याश्वला- यनगृहये विशेषः] एष्टो ब्रह्मचारी च-अमुकशर्माऽहं भोः । इत्येवं प्रतिवदेत् । पुनराचार्य:-कस्यब्रह्मचार्यसीति कुमार एच्छेत् । भवतइति कुमारेणोक्ते-नाचार्य:- ओम्-इन्द्रस्य ब्रह्मचार्यस्यग्निराचार्य- स्तवाहमाचार्यस्तवासौ ॥ रेप) इस मात्र को पढके शिष्य को सूर्यावलोकन करावे यह विशेषता तय प्राचार्य बालक के दाहिने कन्धे के ऊपर से हाथ जाके (ममद्रते) मात्र से हृदय का स्पर्श करे। फिर प्राचार्य इस बालक के दहिने हापको प्रहुध सहित एकरके कहे कि (कोनामामि)[तथा (देवस्य रया सवि०) म मात्र को पढके अपने हाथ से अंगूठा माहिस ब्रह्मचारी के हाथ को पकष्टे यह अाश्यलाय ना ह्या में विशेषता है ] और प्राचार्य से पूछा हुप्रा ब्रह्मचारी (अमुक शोधहम्मो३: ) ऐसा प्रत्युत्तर देवे । फिर ब्रह्मचारी से भाचार्य कहे (क्य ब्रह्मचासि ) सस पर { भवतः । ऐसा उत्तर बालक कहे तव प्राचार्य { इन्द्रस्य प्रम) इत्यादि TAw संस्कारमातगः ॥ असावित्यस्य स्थाने सर्वत्र शर्माद्यन्तं ब्रह्मचारिनामोच्चा- रणं कार्यम् । अथाचार्यः प्रजापतयइत्यादिमन्त्रान् स्वयं प- ठन् कुमारं बद्धाजलिं पूर्वादिदिड्मुखमुपस्थानं कारयेत्- ओं-प्रजापतये त्वा परिददामि। ओं-देवाय त्वा सवित्रे परिददामि ॥ ओं-अभ्यस्त्वौषधीभ्यः परिददामि ॥ ओं-द्यावापृथिवीभ्यां त्वा परिददामि। ओं-विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः परिददामि ॥. ओं-सर्वेभ्यस्त्वा भूतेभ्यः परिददाम्यरिष्ट्यै। प्रजापतयइति पूर्वस्यां देवायेति दक्षिणस्यामदभ्य इति पश्चिमायां द्यावेत्युत्तररयां विश्वेभ्यइत्यधः सर्वेभ्यइति चोवं मुखं कृत्वा माणवकउपरथानं कुयात् । ततः कुमा- रोऽग्निं प्रदक्षिणीकृत्याचार्यस्योत्तरत उपविशेत् । ततः पुष्प- चन्दनताम्बूलवासांस्यादाय-प्रोमद्यकर्त्तव्योपनयनहोमक- मन्त्र पढे मन्त्र के अन्त में (प्राचार्यस्तवदेवशर्मन् ! ) इत्यादि प्रकार असौपद के स्थान में शर्माद्यन्त ब्रह्मचारी का नाम वाले। तदनन्तर आचार्य (प्रजापतये) इत्यादि मन्त्रीसे हाथ जो हुए वारक को पूर्धादि दिशामों में वपस्यान करावे मन्त्रीको प्राचार्य स्वयंपळे (मापतये त्या) मात्र को पढता हुमा पूर्वाभिमुख बालक को उपस्थान करावे (देवाय त्या०) से दक्षिणाभिमुख ( अभ्यस्त्यौ० ) से पश्चिमाभिमुख ( द्यावापृथि०) से उत्तराभि- मुख (विश्वेभ्यस्त्या०) से नीचे की दिशा को देखता हुआ और (सर्वेभ्यरस्था) से ऊपर की दिशामें उपस्थान करावे । तदनन्तर कुमार पालक अग्नि की :- दक्षिणा करके प्राचार्य से उत्तर में बैठ के पुष्प चन्दन ताम्बूल और वस्त्रों को हाथ में लेकर (ोमद्य) इत्यादिवाश्य पढ़ ब्रह्मचारी ब्रह्माका वारे और उपनयनविधिः मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मकर्त्तममुकगोत्रममुकशमी- रणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पचन्दनताम्बूलवासोभिर्ब्रह्मत्वेन रखा महं वृणे । इति ब्रह्माणं वृणुयात् । ओम-वृत्तोऽस्मीति प्रतिवचनम् । सतोऽग्नेर्दक्षिणतः शुद्धमासनं निधाय तदु- परि प्रागग्रान्कुशानास्तीर्य ब्रह्माणमग्निप्रदक्षिणं कारयि- स्वाऽस्मिन् कर्मणि त्वं मे ब्रह्मा भवेत्यभिधाय भवानीति तेनोक्ते तदुपरि ब्रह्माणमुदडूमुखमुपवेशयेत् । ततः प्रणी- तापात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा, परिपूर्य कुशराच्छाद्य ब्रह्म- णो मुखमवलोक्याग्नेरुत्तरतः कुशोपरि निदध्यात् । ततः परिस्तरणम-वहिपश्चतुर्थभोगमादायाग्नेयादीशानान्तं, प्र- ह्मणोऽग्निपर्यन्तम् । नैर्ऋत्याद्वायव्यन्तमग्नितः प्रणीता- पर्यन्तम् । ततोऽग्नेरुत्तरतः पश्चिमदिशि पवित्रच्छेदनार्थ क्रुशत्रय पवित्रकरणार्थ साग्रमनन्तर्गर्भ कुशपत्रद्वयम् । प्रोक्षणीपात्रमाज्यस्याली संमार्जनकुशाः । उपयमनकुशाः । पुष्पादि ब्रह्मा के हाथ में देवे । ब्रह्मा पुष्पादि को लेकर (क्तोऽस्मि) कहे। सब अग्निसे दक्षिण में शुद्ध प्रासन चौको भादि बिछाकर उमपर पूर्व को जिनका अग्रभाग हो ऐसे कुश विकाकर ब्रह्मा को अग्नि की प्रदक्षिणा कराके (अस्मन् पवित्व में ग्रहा भव) इस कर्म में तुम मेरे ब्रह्मा हो ऐसा कहकर ब्रह्मा के (मवानि) कहने पर उस प्रामन पर ब्रह्मा को उत्तराभिमुख बैठाकर पीतापात्र को सामने रखके जलमे भरके कुगोंसे मारवादन कर ब्रह्मा का मुख अवलोकन फरके अग्नि से उत्तर कुशो पर प्रणोतापात्र को प्रागन रक्ते । तदनन्तर चार मुही कुरा लेकर अग्नि सय घोर परस्तरण करे-एक चौचाई कुण अग्निकोण से इंशान दिशा तक, द्वितीय माग ब्रह्मा के शासन में अग्निपर्यन्त हतीय भाग नैर्ऋत्य कोण से वाय कोण पर्यन्त था अग्नि से प्रणोता पर्यन्त विखे । तदनन्तर अग्नि में उत्तर में प्रायसंस्य पात्रासादन करे । पवित्र छेदना तीन कुश तथा पवित्रकरहार्य अग्रभाग सहित जिन के भीतर अन्य कुरा न हों ऐसे दो कुश, मोक्षणीपात्र नापस्थाली, समाजनकुग, उपयमनकुम, ताक संस्कारमार्तड ।। समिधरितस्रः। सुव प्राज्यम् । पर्णपात्रम्, पवित्रच्छेदनकु- शानां पूर्वपूर्वदिशि क्रमेणासादनीयम् । इति पात्रांसादनम् । ततः पवित्रच्छेदनकुशैः पवित्रे छित्वा सपवित्रकरण प्रणी- तोदकं त्रिः प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षिप्यानामिकाङ्गुष्ठाभ्यां गृही- तपवित्राभ्यां तज्जलं किञ्चित् त्रिरुत्क्षिप्य प्रणीतोदकेन प्रों- क्षणीपात्रं त्रिरभिपियं प्रोक्षणीजलेनासादितवरतुसेचनं कृत्वाऽग्निप्रणीतापात्रयोर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रं निदध्यात् । आज्यस्याल्यामाज्यनिर्वापोऽधिश्रयणं ततः कुशान् प्रज्वा- ल्याज्योपरि प्रदक्षिणं भ्रामयित्वा वन्ही तत्प्रक्षिप्य सुवं त्रिः प्रतप्य साजनकुशानामग्रेरन्तरतो मूलैर्वाह्यतः सुवं सं. मृज्य प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य पुनस्त्रिः प्रतप्याग्नेर्दक्षिणतो नि- कोतीन समिधा, सुव, भाउय, पूर्णपात्र, पवित्रछेदन कुचो से पूर्षपूर्व दिशा में प्रम से सब का स्थापन उत्तर को अग्रभाग कर २ करे । तदनन्तर पवित्रध्छेदनार्थ तीन फुधों से प्रादेशमात्र दो कुशो का छेदन करके पवित्र सहित दाहिने हाथ से प्र. रणीता के जल को तीन बार प्रोक्षणीपात्र में डाल कर अनामिका और बहुष्ट से पकहे हुए पवित्रो से उस प्रोक्षणीस्य जाल का उत्पवन [ अर्थात् पवित्रो द्वारा प्रोक्षणीपात्र के जलकी कपर को उछालना ] कर और प्रणीता के जल से मोक्षणी- स्थ जल का पवित्रो द्वारा तीन बार अभिषन करके प्रोक्षणीपान के जल से स्थापित किये भाज्यस्थाली भादि सब पदार्थों का सेवन करके अग्नि और म. णीतापान के बीच में प्रोक्षणीपात्र को रख देवे । तब भाज्यस्थाली में घृतपात्र घृत गिरा के अग्नि पर तपने को रक्खे तदनन्तर मूसे कुश जला कर घी यो पर प्रदक्षिणा भ्रमण कराके अग्नि में जलते कुश फेंक कर त्रुचा को तीन बार पग्नि में तपा के समार्जन कुशो के अग्रभाग से भीतर को और कुशो के मूल भाग से बाहर की भोर सुया फेर फाड़ पौंक शुद्ध कर तथा प्रणीता के जल से सेचन करके और फिर तीन बार तपाके अग्निसे दक्षिण की ओर सुवाको घर देवे । तत्पश्चात तपते हुए घी को अग्नि से उतार के तीनवार प्रोक्षणी के तुल्य से सपनयनविधिः॥ दध्यात् । ततभाज्यमग्नेरवतार्य त्रिः प्रोक्षणीवदुत्पयाक्ष्य सत्यपद्रव्ये तन्निरस्य पुनः प्रोक्षण्युत्पवनम् । ततउत्थायो- पयमनकुशान् वामहस्ते कृत्वा प्रजापतिं मनसा ध्यात्वा त- प्णों घृताक्तारितस्त्र' समिधोऽनौ प्रक्षिपेत।पुनरुपविश्य सप. वित्रप्रोक्षणयुदकेन प्रदक्षिणक्रमेणाग्निमुदक्संस्थं पर्युक्ष्य प्र. णीतापात्रे पवित्रे निधाय मोक्षणीपात्रं विसर्जयेत् । ततः पातितदक्षिणजानर्ब्रह्मणान्वारब्धः समिद्धतमेऽग्नी खुणा- ज्याहुतीर्जुहुयात् । तत्र तत्तदाहुत्यनन्तरं सुवावस्थितहुतशे- परय मोक्षणीपात्रे प्रक्षेप:- ओप्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापतये नमम । इति मनसा । ओम्-इन्द्राय स्वाहा। इदमिन्द्राय नमम । इत्याघारौ । ओमग्नये पवित्रो से घी का स्पषन करके देखें यदि घृत में पुरु निकृष्ट वस्तु ही ती निकाल कर क देथे पार फिर तीन बार प्रोगीपान का पचन करे। सदनन्तर उठकर उपयमनकुशी को वाम हाथ में प्रजापति का मान से ध्यान घृत में धोई तीन समिधानी की तूग्णी धिना मन्त्र पढे एफ ३ कर अग्नि में बढाये।पिर बैट कर पवित्रसहित मोक्षणी के जल को प्रदक्षिरा कम से ईशान कोण से लेकर उत्तर दिशा तक अग्नि के सघ ओर सेचन पर्थात प्रोक्षणीपात्रका सय जल पर्युक्षण में गिरा देये । प्रणीतापात्र में दोनो पवित्र रख के मोक्षशीपान का विसर्जन करे । तदनन्तर घोंट पो भूमि में टेक कर ब्राहा से प्रयास हुला ब्रह्मचारी प्रज्वलित भग्नि में सुखा से भाज्याहुति. में का होम को । वहा २ प २ शाहुति देने पशात स्सुका में जो घृतबिन्दु च, उनको मोक्षणी पात्र में डालता जाये । प्रजापति का मनसे ध्यान कर पूर्धा. पार की लगा शाहुति देधे । त्याग सब का प्रलधारी स्वय बोलता जाय । प्राधार की दो प्राश्य भाग की दो और महाव्याहसियो को भाय- करके 4 संस्कारमार्तण्ड.॥ स्वाहा । इदमग्नये नमम । ओम्-सोमाय स्वाहा । इदं सोमाय नमम । इत्याज्यभागौ। ओं भूः स्वाहा। इदमग्नये नमम । ओं भुवः स्वाहा । इदं वायवे नमम।ओं स्वः स्वाहा। इदं सूर्याय नमम । एता महाव्याहृतयः । ओं त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडोऽअवयासिसीष्ठाः । यजिष्ठो वह्नित- मः शोशुचानो विश्वा द्वेषार्थसि प्रमुमुग्ध्य- स्मत्स्वाहा ॥ १॥ इदमग्नीवरुणाभ्यां न- मम । ओं स त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती ने- दिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ । अवयव नो वरुणथं रराणो वीहि मृडीकथं सुहवो नराधि स्वाहा ॥२॥ इदमग्नीवरणाभ्यां न मम । ओम्-अयाश्चाग्नेऽस्यनभिशास्तिपाश्च स- त्यमित्त्वमयाअसि । अया नो यज्ञं वहास्य- या नो धेहि भेषज/स्वाहा ॥३॥इदमग्नये नमम ॥ ओम्-ये ते शतं वरुण ये सहस्रं श्चित्त की पाच तथा प्राजापत्य और बिष्टकर दो सम्र चौदह पाहुति त्याग सहित देके मनव प्राशन कर हाथ धो पाचमन कर के ब्रह्मा को दक्षिणा देवे ६६ पनयनविधि ॥ यज्ञियाःपाशा वितता महान्तः। तेभिनीअद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा ॥४॥ इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वभ्यश्च न- मम ॥ ओम्-उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदबा- धमं विमध्यम प्रथाय । अथावयमादित्य वृते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा ॥३॥ इदं वरुणाय न मम । एताः सर्वप्रायश्चित्ता- हुतयः । ओम्-प्रजापतये स्वाहा । इदं प्र- जापतये न मम। इति मनसा प्राजापत्यम्। ओम्-अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा । इदमग्नये स्विष्टकृते न मम । इति स्विष्टद्धोमः । ततः संस्रवप्राशनमाचमनं च कृत्वा ब्रह्मणे दक्षिणां दद्यात् । श्रीमद्येतस्मिन्नुपनमनहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठामिदं पूर्ण पात्रं प्रजाप- तिदैवतममुकगोनायामुकशर्मणे ब्रह्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रददे इति दक्षिणा दद्यात् । ओस्वस्तीति प्रति- वचनम् । त्तत्त:- उस में ( मोमबै तस्मिन्) इत्यादि रुपएप करे। और मना सरित यह कर दक्षिणा लेवे । तदनन्ता पवित्रों द्वारा प्रणीता का जन लेवर (भोमुमिनिक) । - .

सरकारमार्तण्ड.॥ श्री सुभित्रिया न आप ओषधयः सन्तु । इति पवित्राभ्यां प्रणीताजलमानीय तेन शिरः संमृज्य- औदुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः ॥ इत्यैशान्यां प्रणीतान्युब्जीकरणम् । ततः स्तरणनमेण वहिरुत्थाप्य घृतेनाभिधार्य हस्तेनैव जुहुयात् । ओं देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित । म- 'नसस्पतइमं देवयज्ञथं स्वाहा वातेधाः स्वा हा ॥ इदं वाताय नमम । इति बर्हिामः । पञ्चभूसंस्कारा ब्रह्मवरणादिबर्हि- होमान्तं च सर्व कर्म सामान्यतया सर्वस्मार्तहोमेपु कर्त्त- व्यम् ॥तत आचार्य एव ब्रह्मचारिणं संशास्यात् । तद्यथा-व्र- हाचार्यसि-इत्याचार्यः । भवानीति ब्रह्मचारी । अपोऽशान अपने शिर पर जलसेचन करके (प्रो टुर्मित्रिया०) मात्र से प्रणीता के शेप जल को ईशान दिशा में लौट देवे मोर पवित्रों को विखाये हुए कुों में मिना देधे तय जिश कम से कुश पिकाये थे उभी कम से पत्रिी सहित उठा फर कुशो में घी लगा के हाथ में ही फुर्गो का होम (ों देवा गातुधि) मन्त्र पढ़ के त्याग के साथ कर देधे । पंचभूमंस्कार भीर मामा के घाण से लेकर यहा तक कदा पनि पर्यन्त मध कर्म मामान्य फर सय स्मार्त होमो में करना चाहिये। सदगार प्राचार्य ही वालधारी को शिक्षा करे-भाचार्य-तुम प्रलधारी हो । तुम ग्रह नामवेदोक्त कर्म भरने के अधिकारी हुए हो । बालप-मैं प्र. मधारी होऊ । नाचार्य-तुम भोजन से पहिले सदा एकघार पाचमन किया क- रो। वाला नाचमन कर गा। प्राचार्य-तुम स्नान सम्योपासन, वेदाध्ययन मि. मन्त्र पढ़ प्रय से उपनयन षिधिः ॥ इत्या० । अशानि-इति । कर्म कुरु-इत्या०। करवाणि इति नामा दिया सुपुष्या-इत्याचार्यः। नस्वपानीति ७०। वाचं यच्छ-इत्या०। यच्छानि-इति अ०। समिधमाधेहि- इत्या० आदधानि-इति। अपोऽशान-इत्याचार्यः। प्र- शानि-इति ब्रह्मचारी वदेत् । एवं शासितायाग्नेरुत्तरतः प्र- त्यमुसोपविष्टायाचार्यपादोपरग्रहणपूर्वकमुपसन्नायाचार्य समीक्षमाणायाचार्यणापि समीक्षितायास्मै ब्रह्मचारिणे नि- -वारितशड्खतूर्यादिशब्देविघ्ने आचार्यः सावित्रीमनव्यात्। अग्नेर्दक्षिणतस्तिष्ठत पासीनाय वा ब्रूयादिति केचित् । प्रणवव्याहृतिपूर्वकं प्रथममेकैकं पादम् । तथा द्वितीयमर्द्धर्च- शस्तथैव तृतीयं सर्वीच शिष्येण सह पठन्नुपदिशेत् । यथा- ओम्-भूर्भुवःस्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् । साचरणादि अपनाशास्त्रोक्त कर्म नियमसेफरी । बालक-में कई करूंगा। प्राचार्य तुम दिन में मत सोया करो। वालक-महो मोऊंगा। भाचार्य धर्मशास्त्र में कोहे 'समय तुम मोन रक्षा करो। धानक-मौन धारण करू'गा। पापाय-पागे लिरो- नुमार नित्य समिदापान किया करो। घालक-में नित्य समिदापान करूंगा। प्राचार्य भोजन के पानात् नित्य आचमन किया फरी । घानक-भोजन किये प. यात् नित्य आचमन किया करूंगा। उस प्रकार भाचार्य शिक्षा कर चुके तय न. मचारी यायें हाथ से भाचार्य के घायें पग फानऔर दहिने हाथ से दाहिने पग का स्पर्श करके अग्नि से उत्तर पश्चिमाभिमुख प्राचार्य के निकट ही येठे भाचार्य शनि से उत्तर में पूर्वाभिमुख मासन पर बैठा हो भाषा की ओर पालक देवता हो और पालक का मुख प्राचार्य देसता हो ऐमो दशा में शव बाजे भादि के शदन होते हो ऐसे समय में प्राचार्य ग्रह्मचारीको सावित्री मात्र का उपदेश करे । अग्नि से दक्षिण में खड़े हुए मापारी को सावित्री मन्त्र at उपदेश पर यह किष्टों भाचार्यों का मत है। प्रथमाधुत्ति में प्रणव मोर ध्या- पुतियो सहित एक पाद का उपदेश करे (प्रोभूर्भुष स्वा-तासपिक) (ओं संस्कारमातंगडः ॥ ओम्-भूर्भुवःस्वः-भगो देवस्य धीमहि । ओम्-भूर्भुवःस्वः-धियोयोनःप्रचोदयात् ॥ इयमेकावृत्तिः ओम्-भूर्भुवःस्वः-तत्सवितुर्वरेण्यम्भ- गादेवस्यधीमहि । ओम्-भूर्भुवःस्वः-धियो योनःप्रचोदयात्॥ इति द्वितीयावृत्तिः अोमू-भूर्भुवःस्वः-तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गादेव- स्यधीमहि । धियोयोनःप्रचोदयात्॥ इति तृतीयावृत्तिः। संवत्सरे वा पण्मासे वा चतु- विशत्यहे वा द्वादशाहे वा पडहे वा व्यहे वा काले क्षत्रिय- वैश्ययोर्ब्रह्मचारिणोराचार्यः सावित्रीमनुब्रूयात् । अधिका- रितारतम्यपरीक्षार्थी: कालविकल्पाः । अत्रावसरे ब्रह्मचा- रिणःसमिदाधानम् । तद्यथा-प्राचार्यदक्षिणदिश्यग्नितः पश्चिमोपविष्टो ब्रह्मचारी दक्षिणहस्तेन शुष्कगोमयकाष्ठं प्रक्षिप्याग्नेसुश्रवइति पञ्चभिर्मन्त्रैरग्निं प्रदीपयेत् । भृयावा- भ० ) ( नो भूमधास्थ:-धियो०) द्वितीपाति में ऊपर लिसे अनुमार प्रथम प्राधी प्राधा के माय प्रणवध्याहृति लगा के कहलाये द्वितीय यार ऐसे ही तृतीय पाद का उच्चारण फराधे श्रीर तृतीपायत्ति में राय व्या हतियों सहित पूरे गायत्री गात्र का उचारण साचार्य कराने शिष्य भाप २ कहता लाये। एक वर्ष में या खः मास में या चौघीस दिन में या बारह दिन में चार दिन में भयया तीन दिन में क्षत्रिय वैश्य ब्राह्मचारियों को प्राचार्घ मायित्री मन्त्र का उपदेश फरे । अधिकारी को न्यूनाधिकता परीक्षा द्वारा जानने के लिये समय के कई विकल्प किये हैं। सी भर में ग्रामधारी समिदाधान करे । जैसे-प्राचार्य से दक्षिण दिशा में श्री भग्नि से पश्चिम घेठा ब्रह्मचारी दहिने हाथ से भूखे ७. उपनयनविधि ॥ ओम्-अग्ने सुश्रवः सुश्रवसं मा कुरु ॥१॥ ओम्-यथा त्वमग्ने सुश्रवः सुश्रवा असि ॥२॥ ओम्-एवं माथं सुश्रवः सौभवसं कुरु ॥३॥ ओम्-यथा त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य निधिपा असि ॥४॥ ओम्-एवमहं मनुष्यणां वेदस्य निधिपो भूयासम् ॥ ५॥ हस्तद्वयेन वा संधुक्षणं कुर्यात् । ततो दक्षिणहस्तेन प्रद- क्षिणमग्निमदिः पर्युक्ष्योत्थाय तिष्ठन्स्वप्रादेशमिता घृता. तास्तिस्त्रः पलाशसमिधादाय तास्वकैकामग्नये समिधमि. त्येपातइति वोभाभ्या वाऽऽरत्त्या तिस्त्रासमिधादध्यात् ॥ ओम्-अग्नये समिधमाहार्षं बृहतेजा- तवेदसे यथा त्वमग्ने समिधा समिध्यस ए- वमहमायुषा मेधया वर्चसा प्रजया पशुभि- ब्रह्मवर्चसेन समिन्धे जीवपुत्रो ममाचार्यों मेधाव्यहमसान्यनिराकरिष्णुर्यशस्वी तेज- के माने कपडे भग्नि में हालता हुमा(अग्नेसुश्रयः) प्रत्यादि पाप मन्त्रों से आणि को प्रदीस को प्रथषा अग्नि में कराठे षा समिधा न छोहता हुभा दोनो हाथ से ही मन्त्र पढता हुमा प्राग्नि को धोंके । तदनन्तर दहिने हाथ से किसी छोटे पात्र में बा हाथ में जल लेकर ईशानकोण से उत्तर पर्यन्त प्रदक्षिणु क्रम से अग्नि के सब ओर जल सेचन करे फिर उठ कर सष्ठा हुआ ब्रह्मचारी अपने मादेशमात्र प्रत में धोई ढाक की तीन समिधानो को हाथ में लेकर उनमें से एक २ को (अग्नये समिधः) मात्र से बा (एपाते) मात्र से वा इन दोनो ७१ संस्कारमार्तण्डः। स्त्री ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भूयासम् । ओम्- एषाते अग्नेसमित्तयावर्द्धस्वचाचप्यायस्व । वर्द्धिपीमहिच वयमा च प्यासिषीमहिस्वाहा। तत उपविश्य पूर्ववदग्ने सुश्रवइत्यादि पञ्चमन्त्रैरग्निं संदीप्य प्रदक्षिणं पर्युक्ष्य तूष्णी. पाणी प्रतप्य प्रतप्य त. नूपाइति प्रतिमन्त्रं मुखं विमृज्यात् । ओम्-तनूपाअग्नेऽसि तन्वं में पाहि ॥१॥ ओमायुर्दाग्नेऽस्यायुमै देहि ॥२॥ ओम्- वर्चीदा अग्नेऽसि वी मे देहि ॥३॥ ओम्- अग्ने यन्मे तन्वा अनन्तन्म.आपृण ॥ ४ ॥ ओम्-मेधां मे देवः सविता आदधातु ॥५॥ ओम-मेधां मे देवी सरस्वती आदधातु ॥६॥ ओम्-मेधां मेऽश्विनौ देवावाधत्तां पुष्क- रस्त्रजौ ॥७॥ ततोऽङ्गानि च म इति शिरः प्रभृति पादान्तं दक्षिण- पाणिना सर्वाङ्गमालभेत- मन्त्रों से तीन बार करके तीनों समिधा अग्नि में चढ़ावे तीनों धार मन्त्र भी पढ़े । तदनन्तर यैठ कर पहिले कहे अनुमार ( भग्ने सुनयः) इत्यादि पांघ मानों से अग्नि कोलित प्रदीप्त कर और पर्युषण [ अग्नि के सम प्रोर यात जलसेचन] करके बिना मन्त्र पड़े दोनों हाथ तपा२ कर (सनूपा०) इत्यादि 'प्रत्येक मन्त्र से मुख का स्पर्श करे । तदनन्तर (अङ्गानि च०) मात्र पढ़ में शिर ४पयनविधि रायस्तितः पड द्वादशापरिमिता वा स्त्रियो ब्रह्मचारी मिक्षां याचेत । केचिन्मातरं तदभावे स्वसारं तस्या मायभावे मा- तुर्निजां भगिनीं प्रथमं भिक्षा याचेतेति मन्यन्ते । मिक्षा मानीयाचार्याय निवेदयेत् । ततो भैक्षं मुड्वेति गुरुग्णानु- ज्ञातो भोजनं कुर्यात् । इत प्रारभ्य सूर्यास्तमयावधि वा. ग्यतस्तिष्ठेदिति विकल्पितम्। ततो ब्रह्मचारी सायंसन्ध्या- भुपास्य-अग्नेसुश्रवइत्यादि मन्त्रैः पाणिना परिसमूहनादा- भ्याभिवादनपर्यन्तं सर्व कृत्यं हत्वा वाचं विसृजेत । - योपनयनकालादारभ्य समावर्तनावधि ब्रह्मचारिणः . त्यम्-भूमौ शयनम् । अक्षारालवणाशनम् । दगडधारण- नकार [इनकार] न करें ऐसी तीम, छ घार वा अनियत ख्यावाली स्त्रियों से ब्रह्मचारी भिक्षा मागे । किन्हीं प्राचार्यों का मत है कि माता से मिक्षा मागे माता न हो तो अपनी सगी बहन और भगिनी भी न हो तो माता की सगी वहन मातृश्वपा (मौसी) से भिक्षा मागे । भिक्षा को लाकर प्राचार्य के सामने घरे [मिक्षा बहने से यहा पकाया हुमा प्रम जानो । चाहे रोटी दाल, भात पूरी नादि हो या फल मादि हो विन्तु दानेरूप काचा अन, भाटापा रूपया पैसादि का नाम यहा मिक्षा नहीं है। जब साधार्य मात्रा करें कि (मक्ष , भुदय) तब ब्रह्मचारी भोजन करे इस समय से लेकर मर्यास्त होने समय तक ग्रह्मवारी मौन होकर सहा रहे किन्तु बैठे लेटे नहीं। चाहे और शक्ति भी होतो ऐसा अवश्य करे । खडा रहना असम्भव हो तो न करे । तदनन्तर ब्रह्मचारी साय काल की सभ्या कर (भाने ! मुना) इत्यादि मन्त्री को पता हुशा दोनों हाथ से अग्नि को धोकने से लेकर प्राचार्य सधा वृद्धादि यो अभिवादन करने पर्यात कृत्य करवाशी का विसर्जन करे अर्थात् बोलने लगे। अध उपनयम . कार समय से लेकर समावन पर्दात ब्रह्मचर्याश्रम के विशेष नियम कहते हैं। भूमि पर सोधे विकी खार या किसी लवण की न खावे, नित्यदएष्ट पा धारण शनिका परिवरख जेसा पूर्व धोकने से घर भभिवादन पर्यन्त कहके है। इसी - संस्कारमार्तण्डः ।। ७५ मग्निपरिचरिणं गुरुशुश्रूषा भिक्षाचर्या सायंप्रातभोजनार्थं भोजनसांनिध्ये वारद्वयं वाऽनिन्द्ये कर्मनिष्ठवेदाध्यायिना- हाणगृहे गुर्वाज्ञया भक्षं याचित्वा भोजनविधिना भुजीत ।। मधु क्षौद्रं मांसं च कदापिनाश्नीयात् । नद्यादिजलाशये प्रविश्य स्नानं नाचरेत् । किन्तूद्वतोदकेन स्नायात् । ख- ट्वादावुपर्यासनं वर्जयेन् । स्त्रीगमनम् । स्त्रीणां मध्येऽव- स्थानं च वर्जयेत् । तथा च मनु:- वर्जयेन्मधुमांसंच गन्धंमाल्यरसानस्त्रियः । शक्तानियानिसर्वाणि प्राणिनांचैवहिंसनम् । अभ्यङ्गमज्जनंचाक्ष्णो-रुपानच्छत्रधारणम् । कामक्रोधंचलोभंच नर्तनंगीतवादनम् ॥ चूतंचजनवादंच परिवादतथाऽनृतम् । स्त्रीणांचप्रेक्षणालम्भ-मुपधातंपरस्यच ॥ विधान से नित्य सायमात काल समिदाधान करता रहे,गुरु की सेवा, शुश्रूषा फर- ना, धर्म वा नियम विषय में प्राचार्य की लो भाचाहो अवश्य पालन करे। सायं- प्रात काल भोजमाथे प्रनिन्दित, धर्म कर्म निष्ठ, वेद का पठन पाठन करने वाले ग्रामणों के घर से भिक्षा मागकर भोजनविधि से नित्य सायास काल भोजन किया करे । ब्रह्मचारी शहत और मास को कभी न खाये। नदीमादि के जल घुसकर स्नान न करे किन्तु जलाशय से लोटा वा पहा मर २वाहर स्नान करे। खटिया आदि कच्चे पर न सोधे। स्त्री गमन का सर्वथा ही परित्याग रक्खें। स्त्रियों के बीच का पाम में निवास न करे। मनुजी ने कहा है कि शहत, मास, इतर भादि भुगन्ध, पुष्पादिमाला, लवणादिरस, स्त्रियों का सङ्ग, वासी धरा अन्नादि, प्राणियों या जीवजन्तुशो का मारना, शरीर में तेल मर्दन, माखों में अ- जन वा सुरमा लगाना, जूमा तथा छाता का धारण करना, काम, क्रोध, लोभ, नाना, गाना, वजाना, जुपा चौपट श्रादि खेलना, किसी की निन्दा स्तुति करना, बहुत यकना, मिथ्या भाषण, स्त्रियो का दर्शन करना, स्पर्श करना, किसी m

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उपनयमविधिः
एकाशयीतसर्वप्र-नरेतःस्कन्दयेक्वचित् ।
कामाद्विस्कन्दयद्रतो हिनस्तिव्रतमात्मनः ।
स्मृत्यन्तरेतु-मधुमासाजनोच्छिष्ट-मुक्तस्त्रीप्राणिहिंसनम्
भास्करालोकनाश्लील-परिवादादिवर्जयेत् ॥
अत्रादिशब्देन पर्युषितताम्बूलदन्तधावनावसयिका.
दिवास्वापछत्रपाटुकागन्धमाल्योद्वर्तनानुलेपनजलक्रीडाचू-
तनत्यगीतवाद्यालापादीन्यन्यान्यपि वर्जनीयानि । तथा-
कार्याभिक्षासदाधार्य कौपीनंकटिसूत्रकम् ।
कौपीनमहतंधार्य दण्डवावस्त्रपार्श्वयुक् ॥
यज्ञोपवीतमजिनं मौज्जीदण्डंचधारयेत् ।
नप्टेभ्रष्टेनवंमन्त्राट् धृत्वाभ्रप्टंजलेक्षिपेत् ॥
एवमष्टाचत्वारिंशद्वार्पिकं वेदब्रह्मचर्य पत्रिंशद्वर्ष
यावदग्रहणं वा कुर्यात् ॥ . .. .
को पीटता इन सब कोकोडदे ये काम कभी न करे । सदा सर्वत्र अधेलासोवे कभी
वीर्यपात न होने दे। यदि कामवेग से वीर्यपात करता है तो अपने प्रतको नष्ट
करदेता है। स्मृत्यन्तरो में इतना अधिक लिखा है कि वरिष्ट भोजन, सूर्यको
देखना, विषयो की वर्धा, दातीन करना, पान खाना, दिन में सोना, खहाम्
पहरना स्नान के पश्चात् चन्दनादि गन्ध शरीर में लगाना, जलक्रीडा, भण
नादि को तान भर २ गाना खो देवे । तथा सदा भिक्षा माग कर खाये कटि-
वस्त सहित कौपीन को सदा धारण करे, कौपीन और दण्ड फटे टूटे नहीं
ये यशोपवीतादि चिन्ह टूट पूट जायें तो उनको जाल में डालकर मात्र पूर्वक
नये धारण करें। इस प्रकार बेदाध्ययन के लिये भडतालीश, छत्तीश अठारह
वा नौ वर्ष का ब्रह्मचर्य नियम से धारण करे । अथवा एक दो तीन या चारी
वेद शुत्रों मङ्गों सहित तथा प्राण गम्पो सहित जितने दिन में पूरे पढ सके
"पत्तने दिन ब्रह्मचर्य के नियमों का धारण करे।
इत्युपनयमसरकार धमाप्त ॥

अथवेदारस्भः। h देशकालौ स्मृत्वाऋग्वेदवतांदेश यजुवेदवतीदेश वा करिष्यइति यथावेदं संकल्प्य पञ्चभूसंस्कारपूर्वक लौकि- काग्निं स्थापयेता तंत्र ब्रह्मचारिणमायाग्ने पश्वात स्वस्यो- त्तरत उपवेश्य ब्रह्मोपवेशनाद्याज्यभागान्तं कर्म कृत्वा यदि ऋग्वेदमारभेत तदा-पृथिव्यै स्वाहा। इदं एयित्य न मम। अग्नये रवाहा। इदमग्नये न मम इति वाज्याहुती हुत्या प्रोम-ब्रह्मणे स्वाहा। इदं ब्रह्मणे न ममत्रों छन्दोभ्यः स्वा- हा। इदं छदोभ्यो न ममाओं प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापत- ये न मम ।ओं देवेभ्यः स्वाहा। इदं देवेभ्यो न मेमा प्रोम-ऋ- पिभ्यः स्वाहा। इदमुविभ्यो नाममा ओ,श्रद्धाय स्वाहा । इदं श्रद्धायै न मम। ओं मेधायै स्वाहा । इदं मेधायै न मम। ओं सदसंस्पतये स्वाहा। इदं सदसस्पतये न ममाओं अनुमतये. स्वाहा । इदममतये न मम । इति नवाहुतिहोमं कृत्वा शे समापयेत् । यदि यजुर्वेदारम्भस्तदाऽऽज्यभागानन्तरम्-प्रो भा-अब वेदारम्भ संस्कार लिखते हैं। यज्ञोपवीत में ही दिन या उससे तीन दिन पश्चात प्राचार्य देशकाल के स्मरणरूप संकल्प के साथ ऋग्वेदधायद के अध्ययननत की मात्रा मैं माज शिष्यको करूंगा। ऐसा संकल्प कर के - चभूसंस्कार (पूर्व यज्ञोपवीत में कहे अनुसार) कर के लौकिक अग्नि को सन्मुख स्थापित करे । तर ग्रह्मचारी को बुलाक अग्नि से पश्चिम और अपनेसे उत्तर पूर्वाभिमुख बैठाके ६१-६५ पृष्ठ में लिखे अनुसार ब्रह्मवरणादिशाज्यभागान्त कर्म का रफे यदि ऋग्वेद का प्रारम्भ करना हो तो प्रथिवी और अग्नि के लिये दो आहुति -देके ब्रह्मादि के नाम से ना माहुति देवे । यदि यजुर्वेद का प्रारम्भ करना हो - । संस्कारमा अन्तरिक्षाय स्वाहा। इदमन्तरिक्षाय न ममाओं वायवे स्था. हा।इदं वायवे न ममाइस्याहुविद्यानन्तरं ब्रह्मणे स्वाहेत्या. दिनवाहुतयः। यदि सामवेदारम्भस्तदाज्यभागान्ते-ओ दिवे स्वाहा।इदं दिवे न मम । ओ सूर्याय स्वाहा । इदं सूर्याय न म- म। इति हुत्वा ब्रह्मण इत्यादिपूर्ववत्। यद्यथर्ववेदारम्भस्त- दाऽऽज्यभागान्ते-नों दिग्भ्यः स्वाहा । इदं दिभ्यो न मम। नों चन्द्रमसे स्वाहा। इदं चन्द्रमसे न ममा इत्याहुतिद्वयानन्तरं - ह्मणइत्यादिपूर्ववत् । यद्येकदा सर्ववेदारम्भस्तदाज्यभागान- न्तरं क्रमेण प्रतिवेदमुक्ताहुतिद्वयं हुत्या ब्रह्मणे छन्दोभ्यइत्या- हुतिद्वयं च हुत्या प्रजापतयइत्यादिसप्तमन्त्रैर्जहुयात् । अन- . न्तरं महाव्याहृत्यादिविष्टकृदन्ता दशाहुतीर्जुहुयात्। यथा- ओंभूः स्वाहा । इदमग्नये नमम । ओं भुवः स्वाहा। इद वायवे नममाओं स्व स्वाहा। इदं सूर्याय नमम । एता.महाव्याहृतयः । तो अन्तरिक्ष और धायके लिये दो माहुति देके नलादि को नव प्राति देवे । यदि सामवेदका भाम करना होतोमाश्यभागों के अन्त में दिव और सूर्य के लिये दो पाहुति दे ब्रह्मादि की नमाति देवे । यदि अथवेद का प्रारम्म करना हो तो माज्यभागों के अन्तम दिशा और चन्द्रमा के नाम से दो पाहुति देकर सब ब्रह्मादि के नाम से भव शान्ति देवे । यदिशाम ही सब वेदों के पहले का प्रारम्भ करना अभीष्ट हो तो प्राण्यभागों के पक्षात् कम से प्रत्येक गादि वेद कोदो र माहुति देकर और प्रत्येक वेदो दो बाहुतियों के अन्तमें ब्रह्म और इन्दकी दो शाहुति देकर प्रजापति सादिको लात माहुति देवे। इसके महायातियों से लेकर खिटकत चना जातियों का होम करे। बिर संख- অঘ वेदारमसंस्कार ओं-त्वंनो अग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडोऽअवयासिसीष्ठाः । यजिष्ठो वनित- मः शोशुचानो विश्वा द्वेषासि प्रमुमुग्ध्य- स्मत्स्वाहा ॥१॥ इदमग्नीवरुणाभ्यां न- मम । ओं स त्वन्नो अग्नेऽवमो भयोती ने- दिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ अवयव नो वरुणथंरराणो वीहि मृडीक/सुहवो नराधि स्वाहा ॥२॥ इदमग्नीवरुणाभ्यां न मम । ओम्-अयाश्चाग्नेऽस्यनभिशस्तिपाश्च स- त्यमित्त्वमयाअसि। अया नो यज्ञं वहास्य- या नो धेहि भेषजथस्वाहा ॥ ३ इदमग्नये नमम ॥ बोम्-ये ते शतं वरुण ये सहस्र यज्ञियाः पाशा विततामहान्तः। तेभिनीअद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा ॥ ४ इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुभ्यः स्वभ्यश्च न मम। ओम्-उदुत्तमं वरगा पाशमस्मदवा- धर्म विमध्यम प्रथाय । अथावयमादित्य ८० संस्कारमाविष्ट । व्रतेतवानाग्रसों अदितये स्याम स्वाहा ॥५॥ इदं वरंणाय न मम। एताः सर्वप्रायश्चित्ता- हुतयः । अोम-प्रजापतये स्वाहा । इदं प्र. जापतये न ममा इति मनसा प्राजापत्यम् । अोम-अग्नये स्विष्टकृतेस्वाहा । इदमग्नये स्विष्टकते न मम ।. ततः संसवं प्राश्य पर्णपात्रवरयोरन्यतरं ब्रह्मणे दद्यात् । प्रोमद्य कृततद्वेदारम्भहीमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरुपब्रह्मक- मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदैवतममुकगोत्रायामुक- शर्मणे ब्रह्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे-इति -सकलाय दद्यात् । श्री स्वस्तीति प्रविवचनम् । ततः-भोम् सुमित्रिया न आप प्रोषधयः सन्तु-इति पवित्राभ्या प्रणी- ताजलमानीय तेन शिरः संमृज्य-प्रोम् दुर्मित्रियास्तरमै सन्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः । इति मन्त्रेणशान्यां प्रणीतान्युबजीकरणम् । ततः स्तरणक्रमेण बर्हिरुत्याप्य घु- तेनाभिधार्य हस्तेनैव जुहुयात् । प्रोम-देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित। मनसस्पत इमं टेवयज्ञय स्वाहा वातेधाः वाशन करके पूर्णपात्र वा धन दक्षिणा में से एक सकल्प पूर्वक प्रहा को देखें। ब्रह्मा (प्रोम्-स्वस्ति ) कहकर स्वीकार करे। तब (मुमिनिया न०) मन्त्र से पवित्रों द्वारा प्रीता के जल को अपने शिर मैं छिडक के (दुर्मित्रियाः) मन्त्र से गीताशेष जल को ईशानकोण में दरका देवे । तदनन्तर वेदि के सब ओर जिस क्रम में कुश विवायेथे वसो कम से उठाकर घीसे अभिधारण करके (जोम् देवामातुः ) मात्रद्वारा हाम से हो त्यागान्त में होग करवे । तब मा.

८१ वेदारम्भसंस्कार ॥ स्वाहा ॥८॥ इदं वाताय नमम । इति वर्हिामः । तत प्राचा- या वेदारम्भं कारयेत् । तत्र क्रमा-भोइम्-भूर्भुवःस्त्र:-त- त्सवितुर्वरेण्यं, भगीदवस्यधीमहि । धियोयोनः प्रचोदयात्- प्रो३म् ॥ इति प्रणवान्तं पठित्वा यथेष्टमेकं द्वौ त्रीन् चतुरो या वेदान् पाठयितुमारभेत । ततः सप्रणवं स्वस्तिवाचयि- त्वोत्थाय फलपुष्पसमन्वितब्रह्मचारिदक्षिणकरस्पृष्ठेन घु. तपूर्णन सुवेण पूर्णाहुतिं दद्यात् । ओं मूढीनं दियो अरति एथिव्या वैश्वानरमृतमाजातमग्निम् । कविसमाजमति- थिं जनानामासन्नापात्रं जनयन्त देवाः स्वाहा ॥ इदमग्नये वैश्वानराय न मम । तत उपविश्य सुवेण भस्मानीय दक्षि- णानामिकाग्रगृहीतभस्मना ललाटादि स्पशेत् । श्रीम- व्यायुपं जमदग्नेः। इति ललाटे। ओम-कश्यपस्य व्यायुपम्। इति ग्रीवायाम् । श्रीम्-यद्देवेषु व्यायुपमिति दक्षिणवाहु- मूले । भोम्-तन्नोअस्त व्यायुपमिति हृदि । अनेनैव क- मेण ब्रह्मचारिललाटादावपि भस्म योजयेत् । तत्र तनोइ. त्यस्य स्थाने तत्ते इत्यूहः कार्यः ॥ इति वेदारम्भः समाप्तः ।। चार्य शिक्ष्य को येदारम कराधे । प्रथम मादि में प्रयव तदनन्तर साहति तथा अन्त में केवल प्रणय ऐमे गायत्री मात्र काचारण करके पश्चात एक दो तीनधा धारो घेदो को पढ़ाने का प्रारम्भ करे । तर प्राचार्य कहे (मो स्वस्ति-इति भूहि) ब्रह्मचारी (ो स्वस्ति) काहे । तदनन्तर जाचार्य तह पहा होके से भरे फल फूलो सहित सुधा को प्रस्नगारी के दाहिने हाथ से पहधाके ( मूर्धानं० ) मात्र में पूर्णाहुति दिलावे। तदनन्तर बैठकर सुधा के मूलद्वारा मस्म के दाहिने हाथ की अनामिका अहगुली के प्रयभाग से अपने लमाटादि भइगो में भस्म आवे । (यायुपम् ) से ललाट में ( श्यपस्य) से कराठ में (मधे ) से दक्षिण याहु मूल में और ( तन्नो प्रस्तु०) मे इदय में भस्म लगाधे । इसी क्रम से प्रहार चारी के लग्नाटादि में भी मस्म लगाये । ब्रह्मचारी के मस्म लगाते समय (तो) के स्थान में (A) घोले। प्रति वेदारम्मा समाप्त ११ अथ समावत्तेनम् ॥ ब्रह्मचारी साइमेकंद्वी सर्वान् वा वेदान् नियमेनाधीत्य समा- वर्त्तनं चिकीर्षुर्गुरुमाचार्यमर्थदानेन सम्पूज्याचार्यणानुज्ञातः शुभदिने समावर्त्तनं कुर्यात् । ब्रह्मचारी कृलनित्यकियः कृ- तप्रातरग्निकार्यश्शाचार्यसविधावासीत तदा कृतस्नानादि- क्रियआचार्यः प्राणानायम्य देशकाली स्मृत्वाऽस्य ब्रह्मचा- रिणो गृहस्थाद्याश्रमान्तरप्राप्तिद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं समावर्तनास्यं कर्माहं करिष्यइति संकल्पं कुर्यात् । ततो ब्रह्मचारी प्रहीभूयाहं स्नास्यामीत्याचार्य वदेत् । स्नाहीत्या- चार्येणोक्ते ब्रह्मचारी गुरोः पादौस्पृशेत् । ततो ब्रह्मचारिणि, प्राचार्यसन्निहितदक्षिणदिश्युपविष्टे आचार्यः कुशैहस्तमा- त्रां भूमि परिसमुह्य कुशानशान्यां परित्यज्य गोमयोदके- नोपलिप्य सुवमूलेनोत्तरोत्तर-मेण त्रिरुल्लिर-य-उल्ले- भा०-अब समावर्तन संस्कार का विधान दिसाते है-ग्रह्मचारी अगो सहित एक दो पा सब वेदों को नियमो के साथ पढ के समावर्तन करना चाहता हुमा प्रथम धन वस्त्रादि पदार्थ दे के प्राचार्य का पूजन करके प्राचार्य की प्रास ले के शुभ दिनमें समावर्तन करे । समावर्तन के दिन प्रात काल प्रलचारी शौच खान समिदाधानादि नित्यकर्म करके प्राचार्य के समीप नाफर बैठे । तच स्ना- नादि जिस ने प्रथम ही कर लिये हो ऐसा प्राचार्य प्राणायाम कर देश काल के स्मरण पूर्वक समावर्तन का संकल्प करे। तदनन्तर प्रलपारी प्राचार्य से झुक कर कहे कि (बह स्नास्यामि ) वार्य कहे (स्नाहि) तब ब्रह्मचारी गुरु के चरणस्पर्श करे। तदनन्तर प्राचार्य से दक्षिण अग्नि से पभिम पूर्वाभिमुख ग्रह्मचारी बैठे और प्राचार्य कुशी से होमार्थ भूमि का परिसमूहन कर कुशो को ईशान दिशा में फेंक कर गोबर और जल से लीप कर स्व के मूल से मागायत नरकारमार्तण्डः ॥ ८३ खेनक्रमेणोद्धृत्य जलेनाभ्युक्ष्याग्निमानीयाभिमुखंस्थापये- त्। ततः पुष्पचन्दनताम्बूलवासांस्यादाय-नोमद्यामुकशर्मणः कर्तव्यसमावर्तनहोमकर्मणि कृताहतावेक्षणरूपब्रह्मकर्म क- तुममुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पचन्दनताम्बूल वासोभिव्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे । इति ब्रह्माणं वृणुयात् । प्रोम-वृतोस्मीति प्रतिवचनम् । ततोऽग्नेर्दक्षिणतः शुद्ध- मासनं निधाय तदुपरि मागग्रान्कुशानास्तीर्य ब्रह्माणमग्नि प्रदक्षिणं कारयित्वाऽस्मिन् कर्मणि त्वं मे ब्रह्मा भवेत्यभि- धाय भवानीति तेनोक्ते तदुपरि ब्रह्माणमुदमुखमुपवेश- येत् । ततः प्रणीतापात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा ' परिपूर्य कुशैराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्याग्नेरुत्तरतः कुशोपरि निदध्यात् । ततः परिरतरणम्-वर्हिपश्चतुर्थभागमादाया- ग्नेयादीशानान्तं, ब्रह्मणोऽग्निपर्यन्तम् । नैर्ऋत्याद्वायव्या- उदफर्मस्य तीन रेसा फरे, उरन्नेसनाम से मट्टी का उद्धरण कर जलसे अभ्युक्षण करे ऐसे पंचभूसंस्कार करके लौकिक अग्नि को लाकर स्थापित करे फिर पुष्प चन्दन साम्यूल घस्त्रादि हाथ में ले के (सोमद्या) इत्यादि संकल्प पापय पढ़ के कि अमुक ब्रह्मचारी के समाधर्तन होम फर्म में में तुम को प्रामा करके धरण करता है। ऐसे संकल्प पूर्यफ ब्रह्मा का वरण फरे । श्रीर पुष्पादि प्रहला के हाथ में देये । प्रना पुष्पादि को लेकर ( वृतोऽस्मि ) कहे । तर अग्नि से दक्षिण में शुद्ध प्रासन चौकी प्रादि विक्षाफर उस पर पूर्व को जिन का अग्र- भाग दो ऐमे कुश विद्याफर ब्रह्मा को अग्नि की प्रदक्षिणा कराके ( अस्मिन् फर्मशिश स्वं मे ग्रहला भव ) इस फर्म में तुम मेरे ब्रह्मा हो ऐसा कह कर प्रसा के (भवानि) कहने पर उस आसन पर मताको उत्तराभिमुख धैठाकर मणीता- पात्र को मामने रस के जन के भा के फुधों से प्राध्यादन कर ब्रह्मा का मुख प्रयोक्न करके अग्नि से उत्तर में फुशों पर प्रणीतापात्र को प्रागन रक्से । तद- • गन्तर धार मुट्ठी कुश लेकर अग्निके सय भोर परिस्तरण करे-एक चौपाई कुश द समापनसंस्कार • न्तमग्नितः प्रणीतापर्यन्तम् । ततोऽग्नरुत्तरतः पत्रिमदिगि पवित्रच्छेदनार्थ कुशवयं पवित्रकरणाय साग्रमनन्तर्गम कुशपत्रद्वयम् । प्रोक्षणीपात्रमाज्यस्थाली संमार्जनकुशाः । उपयमनकुशाः । समिस्तिसः । सुत्र प्राज्यम् । समिन्धन- काष्ठानि, समिधः। पर्युक्षणार्थमुदकम् । हरितकुशाः। अप्टा- बुदकुम्भाः। औदुम्बरं द्वादशाङ्गुलं दन्तधावनकाष्ठं ब्राह्मण- स्य, दशाङ्गलं क्षत्रियस्याष्टाडगुलं वैश्यस्य । दधि। नापितः। रनानार्थमुदकम् । उद्वर्तनद्रव्यं चन्दनमहते वाससी । यज्ञो- पवीते । पुष्पाणि । उप्णीपं कर्णालङ्कारो । प्रजनमादर्शः, नूतनं छत्रमुपानही च नव्ये । वैणवो दण्डः । पूर्णपात्रम्, पवित्रच्छेदनकुशानां पूर्वपूर्वदिशि मेणासादनीयम् । इति पात्रासादनम् । ततः पवित्रच्छेदनक्शः पवित्रे छित्वा स- पवित्रकरण प्रणीतोदकं त्रिः मोक्षणीपात्रे प्रक्षिप्यानामि- अग्निकोण से ईशान दिशा तक, द्वितीय भाग व्रता के शासन में अग्निपर्यन्त तृतीय भाग नैत्यकोण से घायुकोण पर्यन्त चौथा अग्नि से प्रणीतापर्यन्त वि. लाघे । तदनन्तर अग्निसे उत्तर में प्रायस्थ पात्रासादन करे । पवित्र छेदनार्थ तीन कुश तथा पवित्रकरणार्थ अग्रभाग सहित जिन के भीसा अन्य कुश न हो ऐसे दो कुश, मोक्षणीपात्र, श्रयस्थाली, संमार्जनकुश, उपयमनकुश झाक की तीन समिधा, सुध, प्राज्य, अग्नि के परिसमूहना शुष्क गोमय समिधा । पर्युक्षणार्ध हरे कुश, पाठ जल भरे पहा वा सकोरा, १२ छगुल गूलर की स्करी की दातोन ब्राह्मण को दश प्रहुल को क्षत्रिय थे और पाठ अङ्गुल की वैश्य को रखें । दही, माई, मानार्थ जल, उबटने का वस्तु, चन्दन, नये मजे दो वस्त्र, दो यजीपवीत, पुष्प, पगडी, कुपटल, अञ्जन, दर्पण, नया छाता, नयेते, एक बांस की सी, पूर्णपात्र, पवित्रच्छेदन कुशो से पूर्वपूर्व क्रम से मय का स्थापन हर को अग्रभाग कर करे । तदनन्तर पवित्रच्छेदनार्थ तीन कुशी से मादेशमात्र दो कुशों का छेदन करके पवित्र सहित दाहिने हाथ से प्रशीताजलको तीन संस्कारमारः। काङ्गुष्ठाभ्यां गृहीतपवित्राभ्यां तज्जलं किञ्चित् त्रिरुक्षिप्य प्रणीतोदकेन प्रोक्षणीपात्रं त्रिरभिषिच्य प्रोक्षणीजलेनासा- दितवस्तुसेचनं कृत्वाऽग्निप्रेणीतापात्रयोर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रं निदध्यात् । प्राज्यस्थाल्यामाज्यनिर्वापोऽधित्रयणं ततः कु. शान् प्रज्वाल्याज्योपरि प्रदक्षिणं भ्रामयित्वा वही तत्प्र- क्षिप्य खुवं त्रिः प्रतप्य सम्मार्जनकुशानामग्रैरन्तरतो मू- लैर्याह्यतः खुर्व संमृज्य प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य पुनस्त्रिः प्रत- प्याग्नेर्दक्षिणतो निदध्यात् । ततप्राज्यमग्नेरवतार्य त्रिः प्रोक्षणीवदुत्पूयावेक्ष्य सत्यपद्रव्ये 'ततिररय पुनः प्रोक्षण्यु- त्पवनम् । ततउत्थायोपयमनकुशान् वामहरते कृत्वा प्रजा- पति मनसा ध्यात्वा तूपणी घृताक्तास्तिस्रः समिधोऽग्नी वार प्रोक्षणी पात्र में डालकर अनामिका और अद्गुष्ठ से पकडे हुये पवित्रो से उस प्रोक्षणीस्थ जल का उपचन कर और प्रणीता के जल से प्रोक्षणीस्य जल का प्रधित्री द्वारा तीन बार अभिपेचन करके प्रोक्षणी पात्र के जल से प्रासादन किये प्राध्यस्थानी भादि का सेवन करके अग्नि और प्रणीतापात्र के बीच में प्रोक्ष- सीपात्र को रख देवे । तब भाज्यस्थानी में घृतपान से न गिराक अग्नि पर तपने को रक्तदनन्तर सूरो कुश जलाफर घी के ऊपर दक्षिण क्रम से भ्रमण कराके अग्नि में जलते कुश चेक कर स्तुवा को तीन बार अग्नि में तपा के संमार्जन कुशो के अग्रभाग मे भीतर को और कुशो के पूल भाग से बाहर की ओर नुवा को झाड़ रोड शहफर तथा प्रणीता के जल से सेवन करके और फिर तीनधार तपा के अग्नि में दक्षिण की प्रोर स्तुमा को धरदेवे। तत्पश्चात तपते हुए पी को अग्नि से वतार के तीनधार मोक्षणी के तुल्य पवित्रों से घी का उत्पवन करके देरो यदि घृत में कुछ निकट वस्तु हो तो निकाल कर फेंक देवे और फिर तीन बार मोक्षणीपात्र का उत्पवन करे। तदनन्तर उठ कर उपयमनकुशी को बाम हाथ में लेके प्रजापति का मन से ध्यान करके पृत में डुबोई तीन अमि- धानों को सूर्णी बिना मात्र पढ़े एक २ कर अग्नि में चहावे । फिर बैठ कर m समाधनमस्कारा॥ प्रक्षिपेत् । पुनरुपविश्य सपवित्रमोक्षणयुदकेन प्रदक्षिणक- मेणाग्निमुंदक्संस्थं पर्युक्ष्य प्रणीतापाने पवित्रे निधाय प्रो- क्षणीपात्रं विसर्जयेत् । तत: पातितदक्षिण जानुब्रह्मणान्या- रब्धः समिद्धतमेऽग्नो खुवेणाज्याहुतीर्जुहुयात् । तत्र तत्त- दाहुत्यानन्तरं खुवावस्थितघृतशेपस्य मोक्षणीपात्रे प्रक्षेप:- अओं प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापतये न मम । इति मनसा। ओम्-इन्द्राय स्वाहा। इदमिन्द्राय न मम । इत्याघारौ । ओमग्नये स्वाहा । इदमग्नये न मम। ओम्-सोमाय स्वाहा । इदं सोमाय नमम ॥ इत्याज्यभागौ । तत प्राज्यभागानन्तरम् । यदि ऋग्वेदमधीत्य स्नायात् तदा-ओम्-पृथिव्यै स्वाहा । इंदं पृथिव्य नममा श्रीमग्नये स्वाहा । इदमग्नये न मम । इत्याहुत्तिद्वयानन्तरम्-प्रोम्- पवित्रक्षित प्रोक्षणी के जल को प्रदक्षिणकम से ईशान कोण से लेकर उत्तर दिशा तफ अग्नि के सब शोर सेवन करे अर्थात मोक्षणीपात्र का सब जल प. 'यक्षण में मिरा देवे । प्रयोतापात्र में दोनो पवित्र रसके मोक्षणी पात्र का विस. जैन करे । तदनन्तर ६दिने घोटू को भूमि में टेक कर प्रहा मे अन्यारब्ध हुमा ब्रह्मचारी प्रज्वलित अग्नि में सुधा से माश्याहुतियो का होम करे । बा ३ असर माहुति के देने पद्यात सुधा में जो वृत्तविन्दु धर्षे वन को मोक्षणीपात्र में हालता माघे । मजाति का मन से श्याम का पूर्वाधार की तशी भाति देवे । त्याग सव का ग्रह्मचारी स्थय घोलता मायानन्तर भाधार को दो और जायभाग की दो माहुति देवे। म का भाग्यभागो के पवाद यदि ऋग्वेद को पढ समरस करके स्नान करे तो पाया और अनिके लिये दो आहुति देकर ब्रह्मादिकी नी माहुति करें। - co संस्कारमाः ।। ब्रह्मणे स्वाहा । इदं ब्रह्मणे न मम। श्रीम-छन्दोभ्यः स्वा- हा । इदं छन्दोम्यो न मम । प्रोम्-प्रजापतये,स्वाहा । इदं प्रजापतये न मम । इति मनसा प्राजापत्यम् । ओम्- देवेभ्यः स्वाहा । इदं देवेभ्यो न मम। ओम्-ऋपिभ्यः स्वा- हा । इदमृपिभ्यो न मम । प्रो श्रद्धायै स्वाहा । इदं श्रद्धाय न मम। प्रों मेधायै स्वाहा। इदं मेधायै न मम। नों सदस- स्पत्तये रवाहा। इदं सदसस्पतये न मम । ओमनुमतये रवा- हा। इदमनुमतये न मम । यदि यजुर्वेद समाप्य स्नायात्त- हि-प्रोमन्तरिक्षाय स्वाहा । इदमन्तरिक्षाय न मम । ओं- वायवे स्वाहा । इदं वायवे न मम । इत्याहुतिद्वयानन्तरं द्र ह्मणइत्यादिनवाहुतीर्जुहुयात् । यदि सामवेदं समाप्य स्ना- यात् तदा-प्रों दिवे स्वाहा । इदं दिवे न.ममा प्रोम्-सूर्याय स्वाहा । इदं सूर्याय न मम । इत्याहुतिद्वयं हत्वा ब्रह्मण इत्यादिनबाहुती हुयात् । यद्यथर्ववेदं समाप्य स्नायात्त- दा-प्रों दिग्भ्यः स्वाहा । इदं दिग्भ्यो न मम । श्री चन्द्रमसे ग्वाहा । इदं चन्द्रमसे न मम । इत्याहुतिद्वयं हत्वा ब्रह्मण इत्यादिनवाहुतीजुहुयात् । यदि सर्वान् वेदानधीत्य समाप्य स्नायात्तदाऽऽज्यभागानन्तरं प्रतिवेदं कमेण वेदाहुतिद्वयं यदि यजुर्धेद को ममात करफे स्नान करे तो अन्तरिक्ष और वायु के नाम से दो. साहुति देकर अनादि की नी पाहुति देये । यदि सामवेद को समाप्त करके स्तान करे तो दिव श्री सूर्य के लिये दो आहुति देकर ग्रहादि को नी भा. हुति करे । यदि प्रयेद को समाप्त करके स्नान करे तो दिग् प्रौर चन्द्रमा नाम से दो माहुति देकर प्रमादि को नौ माहुति देधे । यदि सय बेटे को पद समाप्त करके स्नान करे तो भाउपभागो के पन्नात् प्रत्येक वेद की क्रम सेदोर संस्कारमा ॥ त्यमित्वमयाअसि । अया नो यज्ञं वहास्य- या नो धेहि भेषजथं स्वाहा ॥३॥ इदमग्नये न मम ॥ अोम्-ये ते शतं वरुणं ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः।तेभिनीअद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा ॥ ४ ॥ इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वभ्यश्च न- मम ॥ ओम्-उदुत्तम वरुणपाशमस्मदवा. धर्म विमध्यमर्थप्रथाय । अथावयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा ॥ इदं वरुणाय न मम। एताः सर्वप्रायश्चित्ता- हुतयः । ओम्-प्रजापतये स्वाहा । इदं प्र- जापतयेन मम । इति मनसा माजापत्यम्। ओम्-अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा। इद मग्नये स्विष्टकृते न मम । इति स्विष्टकृद्धोमः ।। ततः संसृवप्राशनम् । ततनाचम्य-प्रोमद्यकृततत्समा- वर्तनहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापति दैवतममुकगोत्रीयामुकशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे । इति दक्षिणां दद्यात् । संस्त्रवप्राशन कर आचमन करके ( ओमद्या) इत्यादि संकल्प पूर्वक ब्रह्मा को ७ গাধা ओस्वस्तीति प्रतिवचनम् । ततः पवित्राभ्यां प्रणीताजलेन- ओसुमित्रिया न श्राप श्रोषधयः सन्तु । इति मन्त्रेण स्वशिरः संमृज्य-दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान द्वेष्टि यं च वय द्विष्मः । इति मन्त्रेणैशान्यां प्रणीतान्युबजीकुर्यात् । ततः रतरणक्रमेण यहिरुत्थाप्य घृतेनाभिघार्य हस्तेनैव जुहुयात् । : ओम्-देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गा- तुमित। मेनसस्पत इमं देवयज्ञ/स्वाहा वा तेधाः स्वाहा ॥ इदं वाताय न मम । इति बर्हिहीमः। ततो ब्रह्मचारी पादोपसंग्रहणपूर्वकं गुरु नमस्कृत्य परिसमूहनादि व्यायु- पकरणान्तं समिदाधानमग्निमपरेणोपविष्टस्तस्मिन्नेवाग्नी ब्रह्मणान्वारब्धः कुर्यात् । तत्र घृताक्तशुप्कनिषिदेतरेन्ध- नेन पञ्चाहतीहस्तेनैव जुहुयात्- ओमग्ने सुश्रवःसुश्रवसंमा कुरु स्वाहा। ओं यथात्वमग्ने सुश्रवःसुश्रवा असि स्वाहा दक्षिणा देव (ो स्वस्तिक)कह कर ब्रह्मा दक्षिणा का स्वीकार करे। तय पवित्री द्वारा प्रगीता का जल लेके ( भुमिनिया०) मात्र से अपने शिर पर मान करे और मीता के शेष जल को (दुर्मित्रिया०) मात्र द्वारा ईशान कोण में गिरा देखे तदनन्तर जिस क्रम से विधाये घे उसी क्रम से मय कुशों को उठा कर पत से अभिधारण करके ( देवा गातु मन्त्र द्वारा हाथ से ही अग्नि में होम कर देखें । तदनन्ता ब्रह्मचारी प्राचार्य को चरणस्पर्श पूर्वक नमस्कार कर के अग्नि से पश्चिम में बैठा हुमा उसी अग्नि में ब्रह्मा के अन्धारभ्भ करने पर अग्नि परिसमूहनादिश्वायुष करण पर्यन्त समिदाधान करे। वहा मधम यत्र में निमिट ईधन से मिल बस ईधन को जो में शो २ कर (भग्मेनुअच) भादि A ९१ संस्कारमा - ओमेवं माथं सुश्रवः सौअवसं कुरु स्वा- हा। ओं-यथा त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य नि- धिपा असि स्वाहा । ओमेवमहं मनुष्याणां. वेदस्य निधिपो भूयासथं स्वाहा ॥ यदि हस्तेन परिसमूहन-संधुक्षणं कुर्यात्तदा स्वाहापदं नोच्चारयेत् । ततः प्रदक्षिणमग्निमीशानकोणादारभ्योत्तर- पर्यन्तं वारिणा पर्युक्ष्योत्स्थायं घृताक्तां प्रादेशमितां समि- धमादायाग्नये समिधमिति जुहुयात्- ओं-अग्नये समिधमाहार्ष बृहते जात- वेदसे। यथा त्वमग्ने समिधा समिध्यसएव- महमायुषा मेधया वर्चसा प्रजया पशुभिर्ब- ह्मवर्चसेन समिन्धे जीवपुत्रो ममाचार्यों मे. धाव्यहमसान्यनिराकरिष्णुर्यशस्वी तेजस्वी ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भूयासम्॥ एषा ते अग्ने स- मित्तया वर्चस्व चाचप्यायस्व वर्द्धिषीमहि चं वयमा च प्यासिषीमहि स्वाहा ।। मन्मो से पाच आहुति हाय से ही देवे । यदि हाथ से धोके तो उक्त पांची मन्त्रों में स्वाहा पद नहीं बोलना चाहिये। तदनन्तर अग्नि के प्रदक्षिणम से ( ईशान कोण से प्रारम्भ कर उत्तर पर्यन्त ) सब ओर जलसेवन करफे चट कर घृत में डोई दशपद्गुन की एक समिधा को हाथ में लेकर ( भग्नये स- मिधमू०) मात्र से होम परे। तदनन्तर अन्य भी दो सगिधामी का इसी to .. समावनसंस्कारः ओ स्वस्तीति प्रतिवचनम्। ततः पवित्राभ्यां प्रणीताजलेन- भोंसुमित्रिया न श्राप ओषधयः सन्तु । इति मन्त्रेण स्वशिरः संमृज्य:-प्रोदुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वय द्विष्मः । इति मात्रेणैशान्यां प्रणोतान्युजोकुर्यात् । ततः रतरंणक्रमेण बर्हिरुत्थाप्य घृतेनाभिधार्य हस्तेनैव जुहुयात् । ओम्-देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गा. तुमित। मनसस्पत इमं देवयज्ञर्थस्वाहा वा तेधाः स्वाहा ॥ इदं वाताय न मम । इति यहिहीमः। ततो ब्रह्मचारी पादोपसंग्रहणपूर्वकं गुरु नमरकृत्य परिसमूहनादि न्यायु- पकरणान्तं समिदरधानमग्निमपरेणोपविष्टस्तस्मिन्नेवाग्नी ब्रह्मणान्वारब्धः कुर्यात् । तत्र घृताक्तशुष्कनिषिद्धतरेन्ध नेन पञ्चाहुतीर्हस्तेनैव जहुयात्- ' ओमग्ने सुप्रवःसुश्रवसंमा कुरु स्वाहा। ओं यथात्वमग्ने सुश्रवः सुवा असि स्वाहा दक्षिणा देव (ों स्वस्तिक)कह कर प्रल्ला दक्षिणा का स्वीकार करे। तव पवित्रों द्वारा प्रणीता का जल लेके ( मुमिश्रिया) मात्र में अपने शिर पर मान को धौर प्रणीता के शेप पल को (दुर्मित्रिया० ) मात्र द्वारा ईशान कोण में गिरा देवे तदनन्तर जिस कम से विधाये घे उसी कम से मम कुशी को उठा कर पत से अभिधारण करके ( देवा गातु) मात्र द्वारा हाय से ही अग्नि में होम कर देवे । तदनन्तर ब्रह्मचारी प्राचार्य को चरणस्पर्श पूर्वक नमस्कार कर के अग्नि से पश्चिम में बैंदा हुमा उसी अग्नि में ब्रह्मा के अन्यारम्भ करने पर अग्नि परिणाहनादिश्यायुष करण पर्यन्त समिदाधान करे। वहा प्रथम यत्र में निषिद्ध ईधन से मिण मस धन को घी में शोर कर (भन्नेमप्रका) मावि ९९ संस्कारमातगड ओमेवं माथं सुश्रवः सौश्रवसं कुरु स्वा- हा। ओं-यथा त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य नि- धिपा असि स्वाहा। ओमेवमहं मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासर्थ स्वाहा ॥ यदि हस्तेन परिसमूहन-संधुक्षणं कुर्यात्तदा स्वाहापदं नोच्चारयेत् । ततः प्रदक्षिणमग्निमीशानकोणादारभ्योत्तर- पर्यन्तं वारिणा पर्युक्ष्योत्स्थाय घृताक्तां प्रादेशमिता समि- धमादायाग्नये समिधमिति जुहुयात- ओं-अग्नये समिधमाहाष बृहते जात- वेदसे। यथा त्वमग्ने समिधा समिध्यसएव- महमायुषा मेधया वर्चसा प्रजया पशभिन्न- ह्मवर्चसेन समिन्धे जीवपुत्रो ममाचायों में- धाव्यहमसान्यनिराकरिष्णुर्यशस्वी तेजस्वी ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भूयासम्॥एषा ते अग्ने स- मित्तया वर्द्धस्व चाचप्यायस्व वर्द्धिषीमहि च वयमा च प्यासिषीमहि स्वाहा ॥ मन्त्री से पाच पाहुति हाथ से ही देवे । यदि हायसे धोके तो उक्त पांची मात्रों में स्वाहा पद नहीं बोलना चाहिये । तदनन्तर अग्नि के प्रदक्षिणक्रम से ( ईशान कोण से प्रारम्भ कर उत्तर पर्यन्त ) सब शोर जलसेचन करके कठ कर घृत में डोई दशपद्गुन की एक समिधा को हाथ में लेकर ( अग्नये स- मिध०) मात्र से होम करे। तदनन्तर अन्य भी दो मणिधामो का इसी समावसंमसंस्कार ततः समिदन्तरद्वयमनेनैव मन्त्रेशका विश्य-अग्नसुश्रवइति पजुमन्त्रैः पूर्यवदग्निपरिसमूहनं कू- र्यात् । ततोऽग्निं प्रदक्षिणं वारिणा पर्युक्ष्य तूष्णी पाणी प्रतप्य तनूपाइति प्रतिमन्त्रान्ते मुंखमवमृशेत् ॥ ओं-तनूपाअग्नेऽसि तन्वं मे पाहिीि- आयुर्दा अग्नेऽस्यायुर्मे देहि । ओ-वचौदा अग्नेऽसि वों मे देहि । ओं-अग्ने यन्मे तन्वी जनं तन्म आपण । ओं-मेधां मे देवः सविता आदधात। ओं-मेधां में देवी सर- स्वती आदधातु। ओं-मेधां मे अश्विनी देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥ ततोऽङ्गानि च मइति दक्षिणपाणिना सर्वगात्राणि स्पृशेत् । ओं-अङ्गानि च माध्यायन्ताम् ॥ ततः प्रतिमन्त्रान्ते तत्तता स्पृशेत् । श्री-वाक्चमाधीयताम् । इति मुखम्। ओं-प्राणश्चममाप्योयताम् । इति नासिकाछिद्रे प्रकार इसी मस्त्रको दोधार पढके अन्यदोमविधाका होम फिर बैठ (म ने मु प्रधा)इत्यादि पाप मात्रो मे पूर्ववत् प्रविन को परिमन करे अथवा पोंके । फिर पूर्ववत् अग्नि का पर्युक्षण कर अर्थात् मन प्रोर जलसेवन करके विना मन्त्र पढे हाथ सपा २ कर (तनपा० ) इत्यादि प्रत्येक मन्त्र के अन्त में मुख का स्पर्श करता नावे । तदनन्तर (अङ्गानि मा) इत्यादि मन्त्रसे दक्षिण हाथ में सब गानो का स्पर्श करे। तिम पीछे प्रत्येक मात्र के अन्त में हम २ का स्पर्श करे। (वा.) से मुरुका (मास) से नासिका के दोनों विद्रो का (चक्षुष०) प्र भंस्कारमा गडः ॥ ओं-चक्षुश्चमाप्यायताम् । इति सहैव चक्षुर्द्वयम् ओम्-श्रोत्रं च म आप्यायताम् । इति दक्षिणकरेगव श्रोत्रद्वयमादौ दक्षिणं ततो वामम् । भेटे मन्त्रावृत्तिः सानिपात्यात् । ओं यशोवलंचममाप्यायताम् । इति मन्त्रपाठमानं कार्यम् । ततो दक्षिणकरानामिकाग्रगृहीतभस्मना ललाटादिकं स्पृशेत्। ओं व्यायुपंजमदग्नः । इति ललाटे । ओंकश्यपस्य व्यायुपम् । इति कण्ठे । ओम्-यद्देवेषु व्यायुपम् । इति दक्षिणबाहुमूले। ओम्-तन्नोअस्तुव्यायुपम् । इतिहृदि । ततो निमीलितचक्षुर्मनसा पूर्व सर्वत्र व्या- पिन वैश्वानरमेवं वरुणंचाभियाद्याचार्यमभिवादयेत्। तत- में एक गाप दोनों प्रारों का और (प्रोबंध म०) से ददिने को हाथ से दोनों कानो पा प्रथम दिने तदनन्तर थांये का स्पर्श करे और दोनों कान के पृ. घ २ प में दो बार मात्र पढना चाहिये । तदनन्तर ( यशो० ) मन्त्र का घाट मात्र करे। तिष पीछे दिने पाय फी अनामिका लि के अग्रभाग से पदापि भम्म में सनाटादि भट्टों का पर्ण करे (व्यायुपं० ) से मस्तक में (यपस) मे फरठ में ( यद्देधेपु०) में दिने पाहु के मूल में और (तम्रो०) भस्म लगाये। तय सन यन्द करके प्रथम सर्वत्र व्यापफ वैश्वानर मोर यमरण नामक परमात्मा को हाप जोष्ट अभिवादन करके प्राचार्य को अभि- पादन करे । अभिवादन में (अमुकगोत्रोग्मुकप्रबरो मुशर्माष्टं भारत्त्रामभिवा- समावसंस्कार पायुप्मान् भव सौम्यइत्याचार्यो ब्रूयात् । ततोऽग्नेरुत्तरसः मागग्रान कुंशानारतीर्य तदुपरि दक्षिणोत्तरकमेणासादिता. मल्नवारिपूर्णकलशाष्टतये कलशानां पुरस्तात्मागग्रेषु कुशेष स्थित्वा एकस्मादामपल्लवेन- ओं येअप्स्वन्तरग्नयः प्रविष्टा गोह्यउप- गोह्यो मयूषो मनोहास्खलो विरुजस्तनूदूषु- रिन्द्रियहा तान्विजहामि यो रोचनस्तमिह गृणामि ॥ इति मन्त्रेणापो गृहीत्वा- ओं तेन मामभिषिञ्चामि प्रिय यशसे ब्रह्मवर्चसाय ॥ इत्यात्मानमभिपिञ्चेत् । ततो द्वितीयघटस्यमुदकं ये अपस्वन्तग्नयइति मन्त्रेणाम्रपल्लवेन गृहीत्या- ओं येन नियमणुतां येनावमृशतार्थसुराम्। येनाक्ष्यावभ्यषिञ्चतां यद्वा तदग्विना यशः। इति मन्त्रेणामिपिञ्चेत् । ततस्तेनैव कमेण ये प्रास्व. न्तरग्नय० इत्यनेन तृतीयकलशस्य जलमादाय- दये) ऐसा बाप घोले और शााय इसके उत्तर में (प्रायमान् भव सोग्य) ऐसा काय हे । तदनन्तर अग्नि से उत्तर में प्रशविलाके उन कुशों पर दक्षिणा से सदस्थ निर्मल जास्त से भरे प्राठ घडे पा सकोरे धरे और घहो से पूर्व में प्रागण विधाये कुशों पर ब्रह्मचारी उदह मुख खड़ा होके प्रथम कलशमे आम के पत्ते द्वारा (ये अप्स्वन्तर०) मात्र से जन ग्रहण करके (सन मा०) मन्त्र में अपने कपर अभिषेक करे । तदनन्तर द्वितीय कलशस्थ जन को (ये प्रास्वन्तः) मी मात्र में श्राम के पत्ते द्वारा लेके (येन प्रिप०) मात्र से अपने शरोपर अभिषेक करें ।

. संस्कारमार्तण्ड ॥ ओमापो हिष्ठा मयोभुवस्तानऊर्जेदधा- तन । महे रणाय चक्षसे ॥ इति मन्त्रेणाभिषिञ्चेत् । पुनस्तेनैव कमेण ये अप्स्व- न्त० इति मन्त्रेण चतुर्थकलशस्थं जलमादाय- ओं-यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजय. तेह नः । उशतीरिव मातरः॥ इति मन्त्रेणाभिपिउचेत् । पुनः पञ्चमकलशस्थं जलं येनपस्वन्तरग्नयइति मन्त्रेण तथैवादाय- ओं-तस्मा अरंगमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च नः ॥ इति मन्त्रेणाभिपिच्यावशिष्टकलशन्त्रितयजलं तथैव येन- प्स्वन्तरग्नयइति मन्त्रेण प्रत्येकमादायादाय तणी प्रत्येक- मभिपिञ्चेत्।तत उत्तममिति शिरोभागेन मेसला मोचयेत्- ओमुदुत्तमं वरुणपाशमस्मदवाधम वि- मध्यमर्थ प्रथाय। अथावयमादित्य व्रते त वानागसो अदितये स्याम ॥ फिर उसी प्रकार उसी मन्य मे तृतीय फलश में से जल लेके ( आपोहिष्ठा०) मात्र में अपने ऊपर सेचन करे । फिर उसी प्रकार उमी मन्त्र से चौथे राह में मे जल लेके (यो व शिव) मात्रसे अपने ऊपर सेचन करे। फिर पाच फरश से भी उसी प्रकार उसी मन्त्र से जल लेकर (तस्मामरग) गात्र से अपने ऊपर सेधन करे। तदनन्तर शेप रहे तीन कलशोमें से प्रत्येक के जलको (येनस्वन्तर०) मन्त्र से ही सीन धार ले २ कर प्रत्येक से तूष्णीं विना मन्त्र पढे अपने कपर सेधन करे । तब (उदुत्तमं०) मात्र पढ के शिर के द्वारा मेसला को निकाल के समावर्तनसंस्कार। ततो ब्रह्मचारी दण्डकृष्णाजिने तूणी भूमी निधा- यान्यद्वस्त्र परिधायोत्तरीयं च कृत्वाऽऽदित्यमुपतिष्ठेत- ओं-उद्यन्भाजभूष्णुरिन्द्रो मरुद्भिरस्था- त्पातर्यावभिरस्थाद्दशसनिरसि दशसनिं मा कुर्वाविदन्मागमय। उद्यन्भाजभूष्णुरिन्द्रो म- रुभिरस्थाद् दिवायावभिरस्थाच्छतसनिर- सि शतसनि मा कुर्वाविदन्मागमय । उद्य- न्माजमृष्णुरिन्द्रो मरुद्भिरस्थात्सायंयावभि- रस्थात्सहस्रसनिरसि सहस्रसनिं मा कुर्वा- विदन्मागमय। ततो दधि तिलान्वा प्राश्याचम्य जटा लोमनखादी- पछेदयित्वा स्नात्वाचम्य प्रादेशमितोदुम्बरकाप्टेनान्ना द्या. येति मन्त्रेण दन्तधावनं कुर्यात् । ओमन्नाधाय व्यहध्वथं सोमो राजाऽयमाग. मत्। स मे मुखं प्रमाय॑ते यशसा च भगेनच॥ सलग घरे । तदनन्तर ब्रह्मचारी दण्ड और कृष्णाजिन को बिना मात्र भूमिपर परफे अन्य वस्त्र पहन के और एक अंगोछा पन्यापर हारकर (ोमुद्य भाजद) मात्र पढ के सूर्य का उपस्थान करे । तदनन्तर घोहे दही वा हिलो को साकर लटा लोम और नसोंका नाई से वेदन बराक लयर्याश्रम में सब बाल ओर गव न कटाने का नियम म्हा] स्नान कर श्राधमन काफे प्रादेशमान १२ अमुन्न ममा गनर की दातीन (अनायाय मान्न पद के परे । क्षत्रिय स्नातक rina ९७ संस्कारमातंगडः ॥ - इति दन्तधावनमन्त्रः । ततो दन्तकाष्ठं परित्यज्या- चम्य सुगन्धिद्रव्येणोद्वर्तनं कृत्वा स्नात्वा च द्विराचम्य चन्दनकुड्कुमादिना नासिकाया मुखरय चालम्भनं कार्यम्। ओं प्राणापानी मे तर्पय ।ओं चक्षुमै त- पयाओं श्रोत्रं मे तर्पय॥ इति मन्त्रेणत्रिवनुलिम्पेत् । ततो हस्तौ प्रक्षाल्य पाति- सघामजानुः कृतापसव्यो दक्षिणामुखो द्विगुणभुग्नकुशवय- तिलजलान्यादाय-भास्तृतकुशत्रयोपरि पितृस्तर्पयेत् । ओम् पितरः शुल्धध्वम् ॥ ततः सव्यं कृत्वाऽपउपस्पृश्याचम्यसुगन्धिमनुलिप्य जपेत् । ओं सुचक्षा अहमक्षीभ्यां भूयासथं सुवर्चा मुखेन सुश्रुत्कर्णाभ्यां भूयासम् ॥ . ततोऽहतं वासोऽमौनधीतं वा परिधास्याइति परिदधीत । ओम्-परिधास्यै यशो धास्यै दीर्घायुत्वाय हो तो दश अगुला फी और वैश्य हो तो पाठ अडगुल को दातोन करे । तब दातीन को छोड कुल्ला तथा प्राधमन फरके सुगन्धित द्रश्य से दयटग करे । फिर स्नान कर दो बार आचमन करके मिना कर घिसे चन्दन और केशर को (प्राणापानौ०) प्रादि तीन मन्त्रो से नासिका चहु और कानों में लगावे । तय हाथ धो वाये घोटू को पृथिवी में टेक कर अपसव्य हो दक्षिण को मुख कर के तीन कुशों को ले द्विगुण कर पृथिवी पर विवादे फिर सिण और प्राका लेकर उन खुशों पर पितरों का तर्पण ( प्रो पितर'०) मन्त्र से करे । फिर सव्य हो, दहिने हाथ मे जल स्पर्श करके धाचमन कर सारा मुसनौर फानों में पिसे हुए चन्दन केशर को लगाके (ओं सुचक्षा०) इत्यादि तीन मन्त्रो का जप करे। तदनन्ता.

समावर्तमसंस्कार जरदष्टिरस्मि शतं च जीवामि शरदःपुरु- चीरायस्पोषमभिसंव्ययिष्ये ॥ सतो यज्ञोपवीतमिति द्वितीयं यज्ञसूत्रद्वयं धारयेत्- ओम्-यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापते- र्यत्सहज पुरस्तात् । आयुष्यमयं प्रतिमुञ्च शुमं यज्ञोपवीतं वलमस्तु तेजः ॥ यज्ञोपवीतमिति प्रजापतिपिर्यजुरुपवीतदेवता। यज्ञो- पवीतपरिधाने विनियोगः । ओम्। यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोप- वीतेनोपनह्यामि॥ तत प्राचम्योत्तरीयं वासः परिदधीत- ओम्-यशसा मा द्यावापृथिवी यशसे- न्द्राबृहस्पती। यशोभगश्च मा विद्यशो मा प्रतिपद्यताम् ॥ एकमेव वासश्चेत्पूर्वस्यैवोत्तरभागेनोत्तरीयधारणम् । ततः- ओम्-या आहरज्जमदग्निः श्रद्धायै मे- कारे वस्त्र को कालो धीवी का धीया हो ऐसे शुद्ध देत वस्तके (परिधा स्वैः) मन्त्र से धारण करे । तदनन्तर ( यज्ञोपवीतं पाम) इत्यादि दो मात्रों से अन्य दो यचोपनीत शरण करे। फिर प्राचमन करके द्वितीय वस्त्र गोसावा सुपट्टा को ( यशसा मा० ) मान से नोहे । यदि एक ही वस्त्र हो तो उसी एक धोतीका आधा भाग ऊपरी शरीर भाग में मोढ़ थे। तदनन्तर (या सादर०) . H

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मस्कारमार्तण्डः ॥
धायै कामायेन्द्रियायाताअहं प्रतिगृहणामि
यशसा च भगेन च॥
इति मन्त्रेण पुष्पमालांगृहीत्वा यद्यशइति तां कराठे धारयेत्।
ओम्-यद्यशोऽप्सरसामिन्द्रश्चकार विपुलं पृथु।
तेनसंग्रथिताःसुमनस आबध्नामि यशो मयि॥
अथ युवासवासाइत्युप्पीपेण शिरो वेष्टयेत् । .
ओम्-युवा सुवासाः परिवीत आगा-
त्सउ श्रेयान्भवति जायमानः । तं धीरासः
कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः ॥
ततोऽलकरणमिति मन्त्रावृत्त्या दक्षिणे वामे च कर्णे
कुण्डले परिदधीत।
अोमलङ्करणमसि भूयोऽलङ्करणं भूयात्॥
ततो वृत्रस्यासीति मन्त्रावृत्त्या प्रथमं वामंततो दक्षिणं
चक्षरज्यात् ।
ओम्-वत्रस्यामि कनीनकश्चक्षुर्दाअसि
चक्षुर्मे देहि । ततः-ओं रोचिष्णुरसि ।
इतिमन्त्रेणादर्शात्मानं पश्येत्। ततो बृहस्पतइति छत्रग्रहणम्
मात्र से पुष्पों की माला को हाथ में लेकर ( यद्यशोगमर०) मात्र से कपट
में धारण करे। फिर (युवा मुवामा०) मान्न से पगड़ी बांधे तय ( अलङ्करण)
मन्त्र को दो बार पढ़के प्रथम दहिने तदनन्तर बांये कान में सुपर्ण के कुराहल
पहिले । तदनन्तर ( त्रस्यासि०) मन्त्र को दो बार पढ़के प्रजन बासुरमा
दोनों प्रांखों में लगाये प्रथम वाम पक्ष में तदनन्तर दहिने में लगाये । तदनन्तर

13.26 समावर्तमसंस्कारः॥ ओं वृहस्पतेश्छदिरसि पाप्मनो मामन्त- धहि । ततः पटुभ्यामुपान है। प्रतिगृहणीयात्- ओं प्रतिष्ठे स्थो विश्वतो मा पातम् । ततो वणवदण्डधारणम्- ओं विश्वाभ्यो मानाष्ट्राभ्यस्परिपाहि सर्वतः॥ दन्धधावनादिकांण्यग्रेऽपि नित्यं मन्त्रः स्नातकेना- नुष्ठेयानि । वासरछनोपानहं दण्डश्व यदाऽपूर्व नूतनं धारये- तदा मन्त्रेण । अथ स्नातकस्य नियमाः कामादितरस्यापि गानवादित्रनृत्यत्यागः । न तत्र गमनम् । क्षेमे सति न रात्री ग्रामान्तरं गच्छेत् । न धावेत् । न कूपेऽवेक्षेत । वृ. क्षारोहणं फलत्रोटनं च न कुर्यात् । प्रमार्गण न गच्छन् । नग्नो न स्नायात् । न सन्धिवेलायां शयीत। न विपमभूमि लघयेत् । नश्लीलं वाक्यं नोपवदेत् । उदितास्तमयकोले सूर्य न पश्येत् ' जलमध्ये सूर्यछायां न पश्येत् । देवे वर्षति (रोधि) मन्त्र पढ दर्पण में अपनी प्राकृति देखे । पिर (हरपतेश्वदिक मन्त्र पढके नये छाता को हाथ में रुवे पर (प्रतिष्टे सी.) मात्र को दो चार पट रके दोनो पो में जूते पहिने प्रथम दहिने में फिर घार्य में तदनन्तर ( विश्वाभ्यो०) मात्र से वास की रही धारण परे । स्नातक पुरुप दन्तधाव- नादि कामों धागे भी नित्य २ मन्त्र से किया फरे । परन्तु स्त्र छाता सूसा और छड़ी एन को जय २ नए २ धारण करे तभी मात्र पढे । अब संक्षेप से स्वा. तक के नियम दिखाते है-स्वयं कभी न मावे न यजाये न नाये और न अन्य के गाने बजाने को देखने जाधे । कोई हानि न होती हो तो रात्रि में कभी ग्रामान्तर को न जाधे । न कभी दौडे। न पुमा, शाके न वृक्ष पर चढे न फल सोडे । यिना मार्ग न चले । नङ्गा होके स्नान न करे । मायप्रातः सन्धि काल में म सोवे । विषय भूमिका लड्न न करे । निर्मजना के यमन कभी न बोले। उदयास्त ममय मूर्य को न देखे । मेघ पर्वते में न गिप ले जाल में अपनी छाया संस्कारमातहः ॥ 1०१ म गच्छेत् । उदके नात्मानं पश्येत् । प्रजातलोम्नी प्रमत्तां पुरुपाकृतिं पण्ढां च स्त्रियं न गच्छेत् । इत्यादि तत्त ओ-: चार्याय वरां दक्षिणां दद्यात् । तत उत्थायाचार्या मर्दानमिति मन्त्रेण फलपुष्पसमन्वितघृतपूर्ण नु वेण स्नातकदक्षिणकर स्पृष्टेन पूर्णाहुतिं कुर्यात् । ओं मूर्धनं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वान- रमृताजातमग्निम् । कविथं सम्राजमतिथिं जनानामासन्नापात्रंजनयन्त देवाः स्वाहा ॥ तत उपविश्य लुकेण भस्मानीय दक्षिणंकरानामिकाग्रगृहीत भरमना ललाटादि रपृशेत- ओम्-त्र्यायुषं जमदग्नः । इति ललाटे। ओं कश्यपस्य व्यायुषम्। इति कण्ठे । ओम्-यद्देवेषु व्यायुषम् । इति दक्षिणवाहुमूले। ओं तन्नो अस्तु व्यायुषम् ॥ म देसे । जिस के लोम वरपन्न न हुए हों जो पागला हो जिम की बनावट पुरुष के तुल्य हो जो हिजही हो ऐसी स्त्री से गमन न करे इत्यादि । तदनन्तर शाचार्य को घनरूप अधिक दक्षिणा देवे । फिर प्राचार्य सहा होके फल पुष्पों सहित घृत भरे स्नातक के दाहिने हाथ से स्पर्शकराये सवा से (मुनि) मात्र पढके पूर्णाहुति देवे । फिर बैठ कर स्वामे भस्म लादर दहिने हाथ की अनामिका अङ्गुलि के अग्रभाग से ग्रहण की भस्म से रूसादादि का स्पर्श करे । (व्यायुपं० ) से लानाट में ( कश्यपस्स० ) से करट में ( यद्देयेप) से दक्षिण घाहुरे मूल में ( तन्नोर ) से हृदय में भस्म लगाये । इसी क्रम से प्राचार्य स्नातक १५२ 1 पुनःसंस्कार इति हृदि । अनेनैव क्रमेण स्नातकललाटादावपित्र्या- युपं कुर्यात् । तत्र तन्नो इत्यस्य स्थाने तत्ते इत्यूहः कार्यः॥ इति समावर्तनं कर्म समाप्तम् ॥ अथ यस्य गर्भाधानादयः संस्काराः पित्रादिना प्रमा- दादिना न कृतास्तदर्थं विशेपउच्यते- शौनक:-प्रारभ्याधानमाचौलात्कालेऽतीतेतुकर्मणाम् । व्याहृत्याज्यंसुसंस्कृत्य हुत्वाकर्मयथाक्रमम् ॥ एतेष्वेककलोपेतु पादच्छं समाचरेत् । चूडायाअईकच्छ स्या-दापदीत्येवमीरितम् ।। अनापदितुसर्वत्र द्विगुणंद्विगुराचरेत् । कात्यायन:-लुप्तकर्मणि सर्वत्र प्रायश्चित्तंविधीयते । के लानासादि में भी भस्म लगाये । स्नातक के भस्म लगाने में मन्त्रस्य (तनो०) के स्थान में (तत्ते) कह करे। इति समावर्तनविधि समाप्तः ॥ भाल-जिम के गर्भाधानादि संस्कार पितादि ने प्रमादादि से नहीं किये उस के लिये विशेषता दिखाते हैं। शोनक ने कहा है कि गर्भाधान से लेकर हा. कर्म संस्कार से पूर्व २ जिस का कोई संस्कार न हुआ हो तो पासायादित फरके परदे संस्कार फिये घीसे ध्याहृतियों द्वारा प्रायश्चित्त को मासिधालक का पिता देकर उस २ संस्कार को करे। और एक ही एक संस्कार कोई छूटा हो तो पालक का पिता पदकृष्णनत करे अर्थात् एक दिन मात.काल एक दि. नसायंकाण और विनमागे पिम्मे तो तीसरे दिन एक बार थोहा विषय मो. जन करे तथा एक दिन निराहार उपवास करे इस प्रकार चार दिन का व्रत कर के इस २ छूटे सरकार को करे । यदि बहाकर्म संस्कार छूटा हो तो दो दिन प्रातः काल दो दिन सायंकाल दो दिन विममांगे मोर दो दिन पक्षस करे इस का नाम अई रुरलवत है। इतना प्रायश्चित्त शापरकाल में संस्कार छूट ने पर यदि भापरकाल न हो तो इसे दूना २ प्रायश्चित्त की । कात्यायन संस्कारमा प्रायश्चित्तेकृतेपश्चा-हलुप्तंकर्मसमाचरेत् ॥ मण्डन:-कालातीतेपुसर्वेषु-प्राप्तवत्स्वपरेपुच । कालातीतानिकृत्वैव विदध्यादुत्तराणितु ॥ चौलातिरिक्तरययस्ययरय गर्भाधानादिसंरकारस्य का- लोऽतीयात्तस्यतस्य लोपे पादकृच्छ्र प्रायश्चित्तं कृत्वाऽकाले- ऽपि स स संस्कार कार्यः । अनेकेपुलुप्तेपु प्रत्येकमेकैकं पा- दछच्छ विधाय यथाविधि लुप्नसंरकाराः कार्याः । चौल- लोपे त्वईकन्छ कृत्वा चूडाकर्म कार्यम् । यद्यपनयनात्प्राक् सर्वे संस्कारा लुप्तास्तदा प्रत्येकं पादकृच्छ चूडाकर्मार्थम- ईकच्छ कार्यम् ॥ अथ पुनरुपनयनम्। अज्ञानात्माश्यविण्मत्रं सुरासंसृष्टमेवच । पुनःसंस्कारमर्हन्ति त्रयोवर्णाद्विजातयः ॥ मनुः ने कहा है कि धर्म का लोप होने पर सर्वत्र प्रायश्चित्त का विधान है और मा. यश्चित्त की समाप्ति में छूटे हुए कर्म को फिर से करे । मण्डन ने कहा है कि जिन संस्कारों का समय निकल गया और अगले का समय भागया हो तो प्रा- यश्चित्त पूर्वक पिछले संस्कारो को कर के ही अगले फरे । डार्म से भिन्न जिसर संस्कार का समय निकल जाचे उस २ संस्कार को पूर्वोक्त पादरुवात करके अन्य काल में भी करे । कई संस्कार लुप्त हुए हो तो प्रत्येक के लिये एक २ पादरूव्रत करके विधिपूर्वक बूटे हुए संस्कारो को करे । यदि घडाफर्म छूटा होतो पर्खकनत करके चूहापर्म फिर से करे । यदि उपनयन से पहिले सब सरकार छूट गये हों तो प्रत्येक लूटे संरफार के लिये पाका और चूडाकर्म के लिये अर्द्धकाच्नत पूर्वोक्त प्रकार करे । अब यह दिखाते है कि किस २ दशामें पुनरूपनयन करना चाहिये । श्र. र्थात् पहिले हुए उपनयन संस्कार को नष्ट हुभा माम पर फिर से अपमयम -

१-४
पुन. सरकारः ॥
अनाशकनिवृत्तश्व गार्हस्थ्यंचेच्चिकीर्षति ।
सचरेस्त्रीणिकृच्छाणि त्रीणिचान्द्रायणानिच.!
जातकर्मादिभिःसर्वैः संस्कृतःशुद्धिमानुयात् ॥ पसारः
इति पुनरुपनयनम् ॥
संस्कार करना चाहिये ? | मनु जी ने कहा है कि-जान से विष्ठा मूत्र को
खा लेवा महा जिकमें मिला हो ऐम पिसी पदार्थ को सारतोद्विजाति
तीनो धणे प्रायशिश घर फिर से उयनयन संस्कार करें। राशरस्मृति में पहा
है कि-घर से निकल कर संन्यामी हुमा ब्राह्मण संन्यासाश्रम से लौट आये
और अभय से निवृत्त रहा हो या फिर रहस्य होना चाहता हो तो
वह तीन माजापत्य १ दिन के प्रप्त या तीन चान्द्रायण व्रत परे रदनन्तर फिर से
जातवमोदि सब मस्कार करके शुद्ध हुअा गृहस्यमों पर अधिकारी हो सकता है।
यह पुनरूपनयन का विचार समाप्त हुना॥
T

'अथ वाग्दानम् तावत्पूगीफलोपवीतदानं तत्र कन्याधाता पुरोधाभ- न्यो ब्राह्मणो वा कश्चिदुदड्मुखः प्रत्यड्मुखो वा उपविश्य प्रा. इमुखस्य वरस्य गन्धाक्षतैरर्चितस्य मुखदत्तखार्जरादिफ- लस्य स्वयंपूगीफ़लयज्ञोपवीतमादाय-तस्मिन्कालेऽग्निसां- निध्ये स्नातः रनातेह्यरोगिणि । अव्यङ्गेऽपतितेऽक्लीवे पि- तातुभ्यं प्रदास्यति । इति पठित्वा हस्ते दद्यात् । यजु० अध्याय १७ मंत्र ३ ओं ऋतवस्थऋतावृध ऋतुष्ठास्थ - तावृधः। घृतश्च्युतो मधुश्च्युतो विराजो नाम कामदुधाऽअक्षीयमाणाः ॥ श्रय विषाहपद्धति । यारह वर्ष की कन्या भोर १८ वर्ष का घर हो या दोनो इस से अधिक २ प्रायु के हो । १६ वर्ष की फाया हो तो २४ वर्ष का पु. रुप होवे । किन्तु १२ वर्ष से कम कन्या न हो और १८ वर्ष से कम पर न हो तर सम्बन्ध फरें। उस में प्रथम वाग्दान करे-उस का विधानकम यह है कि- प्रथम मुपारी और यज्ञोपवीत का घर को दान करे । कन्या का माई, पुरोहित घा अन्य कोई ब्राह्मण घर के घर पर जाकर उत्तर या पश्चिम को मुख कर बैठ कर बर को पूर्वाभिमुख प्रासन पर बैठावे वर के मुख में सुहारादि फल साने को देवे और फेशर तथा सुगन्ध द्वारा और पक्षतो द्वारा वर का पूजन करके अपने हाय में सुपारी और यज्ञोपवीत लेकर (तस्मिन् काले) इत्यादि लोक पढ के पर के हाथ में देधे । लोकार्थ-विवाह के समय अग्नि के समीप, नीरोग, ठीक २ पूर्ण महो याले निष्पाप, शुद्ध, क्लीयतादि दीप रहित स्नानकर शुद्ध हुए भाप हो स्नान कर शुद्ध हुए मेरे पिता जी कन्या दान देंगे । यदि पुरोहित जावे तो कहे कि काया का पिता कन्या को देगा। प्रशाद (प्रतक्षस्प०) मात्र पद के अपना १०६ संस्कारमार्तण्ड' इति पठित्वा शिरस्यक्षतादिकं दद्यादरः । भ्रातृव्यति- रिक्तपक्षे पितेत्यत्र दातेत्युच्चारयेत् ॥ इति वाग्दानम् । वाहः ॥ उदगयनापूर्यमाणपक्षे पुण्याहे कुमार्याः पाणिं गृहीयात्। -पारस्वरसू०। सार्यकालमेके विवाहम् ॥२॥ आश्वका त्रिपुत्रि- पूत्तरादिपु ॥३॥ स्वाती मृगशिरसि रोहिण्यां वा ॥४॥ पार०। तत्र कन्याहस्तेन षोडशहस्तपरिमितं मण्डपं विधाय तद्द- क्षिणस्यां दिशि पश्चिमां दिशमानित्य मण्डपसंलग्नमुत्तरा- भिमुसं कौतुकागारं च मण्डपावहिरैशान्यां जामाच- तुर्हस्तपरिमिता सिफतादिपरिरकृत्तां वेदीज्च कारयेत् । पूजन करने वाले के शिर में वर चन्दन मतादि लगावे । मत्र का अर्थ-वर बहसा है कि हे कन्या के देने वाले लोगो ! श्राप लोग कन्यादान को सत्य प्रतिमा में रहने वानेही सत्य यज्ञादि कर्म के प्रचार तथा ऋतुयाग करने वाले पृप्त गिटादि भक्ष्य भोग्य सामान रखने वाले विशेष कर शोभित वामनानी के पूर्ण करने वाले मसिद्ध हो और धनादि पदार्थ जिन के विद्यमान है ऐसे प्राप ऐसा घर कति धान्दानम् । सघ विवाहविधिः॥ उत्तरायण शुरूपक्ष चं० युः युःश पुरय दिन में कुमारी कन्या का पा- जिनहरा फरे । उत्तरा फल्गुनी, हस्त, चित्रा, उत्तरापाटा अयण, पनिष्ठा, उत्तरा भाद्रपदा, रेवतो, अश्विनी, स्वाति, मृगशिरा, रोहिणी। इन में से किसी न. सत्र में विधाए वर्ग करे। यह पारस्कर गृह्य मूत्र कार का धन है । तथा शाश्वनायन गृह्य में लिखा कि कोई धार्य सय काल में विवाह का दोना मानते हैं । विवाह के लिये प्रथम पन्या हाप से कोल हाय लग्या चोडा धादिशा में भारत हा मटप दनाव दस से ईशान कोख में कौतुकार बनाये सौर मटर के ईशान कोण में जामाता हाथ से पार हाथ चारो ओर से

विवाह मण्डप चित्र ॥
घेदी
मण्डप
आग्नेय
ईशान
पूर्व
"दक्षिण
उत्तर
फाया हस्त पोरश १६
कौतुकागार
पश्चिम
वायव्य

विवाहसंस्कारः ॥ ७ विवाहदिने कृतनित्यक्रियेण जामातृपित्रा मातृपूजापूर्वक आभ्युदयिक कर्तव्यम् । कन्यापिता रनातः शुचिः शुक्ला- म्बरधरः कृतनित्यक्रियो मातपूजाभ्युदयिके कृत्वा मण्डपे प्रत्यङ्मुखः प्राङ्मुखं वरमजानुमासीनंसंयोध्य- अथ स्वस्तिवाचनम् ॥ यजु० अध्याय २५ कं० १८ ॥ ओम्-स्वस्तिन इन्द्रोवद्धवाःस्वस्तिनः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्तिनस्ताक्क्ष्योऽरि- प्टनेमिःस्वस्तिनोबृहस्पतिर्दधातु ॥१॥ यजु० अध्याय १८ कं० ३६ ॥ ओम्-पयःपृथिव्यास्पयऽओषधीषु प- यो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः। पयस्वतीः प्रदि- धाः सन्तु मह्यम् ॥२॥ यजु० अध्याय ५ कं० २१ ॥ ओम्-विवषण्णोरराटमसि विषष्णोः नप्त्रे स्त्थो विष्णोःस्थरसि विष्णो - अर्थात एक २ हाथ मघ दिशा में हो ऐसी घेदी बनावे उस वेदि में कपट भूमी या बाल न पडे हो । वियाह के दिन वर का पिता शौच स्नान नित्य कर्म करने पश्चात् मातृपूजा पूर्वक प्राभ्युदयिफ धर्म करे । इधर कन्या का पिता भी विवाह के दिन स्नान कर शुद्ध हुन्ना शुद्ध वस्त्र पहन नित्य कर्म करके मातृ पूजापूर्वक प्राभ्युदयिक फर्म करके घर पूजन के समय मण्डप में पश्चिमको मुस फर बैठे ऊपर को घोटू कर पूर्वाभिमुख बैठे वर को सम्बोधित कर के खस्ति- १८ २० ॥ संस्कारमार्सगडः ॥ वोऽसि। वैष्णवमसि विवष्ष्णवेत्वा ॥३॥ यजु० अध्याय १४ कं० ओम्-अग्निवताव्वातोदेवतासू-दे- वताचन्द्रमादेवताव्वसवोदेवतारुद्रादेवतादि- त्यादेवतामरुतोदेवताविश्वेदेवादेवतावृह- स्पतिवतेन्द्रो देवताव्वरुणोदेवता ॥४॥ यजु० अध्याय ३६ कं० १७ ॥ ओ३म्-द्यौःशान्तिरन्तरिक्षर्थशान्तिःपृथिवी शान्तिरापःशान्तिरोषधयःशान्तिवनस्पत- यःशान्तिर्विश्वेदेवाःशान्तिर्ब्रह्मशान्तिःसर्व- थंशान्तिःशान्तिरवशान्तिःसामाशान्तिरेधि ५ यजु० अध्याय ३० अनु० १ मं०३ ॥ ओम्-विवश्वानि देवसवितर्दुरितानिपरा सुव। यद्भदन्तन्नऽसुव ॥६॥ यजु० अध्याय १६ अनु ७ म०४८ ॥ ओम्-इमारुद्रायतवसेकपर्दिने क्षयद्वीराय प्रभरामहेमतीः। यथाशमसद्विपदेचतुष्ष्प- देविश्वम्पुष्टङ्ग्रामेऽअस्म्मिन्ननातुरम् ॥ यजु० अध्याय २ मंत्र १२ ॥ ओं-एतन्तेदेवसवितर्यज्ञम्प्पाहुर्वृहस्प्पतये १०९ विसंस्कारः॥ ब्रह्मणे। तेनयज्ञमवतेनयज्ञपतिन्तेनमामवर सुप्रतिष्ठितावरदाभयन्तुदेवाः ॥१०॥ इति स्वतिवाचनम् ॥ अथ प्रतिज्ञासंकल्पः ॥ ओतत्सदद्य ब्रह्मणो द्वितीयपरा? श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे, आर्यावर्त वर्तमानकलियुगप्रथमचरणे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतिमे युगेऽमुकऋतौ अमुकमासे ऽमुकपक्षेऽमुकलियौअमुकवासरान्वितायां अमुककरणनक्ष- प्रयोगयुक्तायां श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलावाप्तिकामः धमार्थ- काममोक्षार्थ मनोभिलपित्तप्राप्तये अमुकगोत्रोऽमुकशर्माऽह- ममुककर्मनिमित्तककात्यायनीशान्तिमहं करिष्ये । तन्निर्वि- नपरिसमाप्तये गणपतिपूजनं च करिष्ये इति ॥ • अथ-गणपतिपूजनम् ॥ओं गणानां त्वागणपतिह- वामहेइतिमन्त्रेण । ओ भूर्भुवःस्वः भगवन्गणिपतिदैवत इ- हागच्छ इहतिष्ठसुप्रतिष्ठवरदीभवममपूजागृहाण ॥ पाद्या- दिभिरर्चयेत् । भगवन्गणपतिदेवएतत्पागादिभिर्गन्धाक्षता- दिभिश्व पूजितःप्रसन्नो,भव॥ पुनः। वक्रत्तण्डमहाकायकोटि- सूर्यसमप्रभ । अविघ्नं कुरुमेदेव सर्वकार्येपुसर्वदा।इति। अध पञ्चोपकारपूजनम् । आवाहयाम्यहंदेवमोंकारंपरमेश्वरम् । त्रिमात्रंयक्षरंदिव्यंत्रिपदंचत्रिदेवकम् ॥ त्र्यक्षरंत्रिगुणाकार सर्वाक्षरमपंशुभम्। व्यणप्रणवंसंस्रष्टारंपरमेश्वरम् ॥ अ- नादिनिधनदेवमप्रमेयंसनातनम् । परंपरतरंबोजनिर्मलंनि- प्कलंशुभम् ॥ बाधन का पाठ करे । तत्पश्चात प्रतिज्ञा संकल्प करके गणेशजी, नवग्रह पोश . १२० संस्कारमान। 'यजुर्वेद० अध्याय २३ ॥ मन्त्र १६ ॥ सोम्--गणानान्त्वा गणपतिथंहवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियपतिथंहवामहे निधीना- न्वा निधिपतिथंहवामहे व्वसो मम। आह- मजानि गर्भधमात्वमजासिगर्भधम् ।। शुक्लयजु० अध्याय १६ मन्त्र २५ ।। ओम्-नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नमो बातेभ्यो व्वातपतिभ्यश्च वो नमो नमो गृत्सेभ्यो गृत्सपतिभ्यश्च वो नमो नमो विरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्च वो नमः ॥ अथ-मातृकापूजनम् ॥ गौरी १ पदना २शची ३ मेधा १ सावित्री ५ विजया ६ जया ७ । देवसेना ८ स्वधा र स्वाहा १० मातरो ११ लोक: मातरः १२ ॥ हृप्टिः ७३ पुष्टि १४.स्तथा तुष्टि १५ स्तधात्म- कुलदेवता १६ । श्रीकुलदेव्यन्तर्गतगौर्यादिपोडशमातृभ्यो नमः ॥ अथ ऋत्विजा वरणम् ॥ यथा चतुर्मुखो ब्रह्मा स- वंवेदधरः प्रभुः । तथा त्वं भव यज्ञेऽस्मिन्ब्रह्माभवद्विजोत्तम । गृहीत्वा तु करानुष्ठं यजमानः पठेदिदम् । अस्य कर्मणः प्रतिष्ठापनार्थ त्वं मे ब्रह्माभय(अहंभवामि इति ब्रह्माब्रूयात्) मातृका मोर क्लय का पूजन करे । गणेशादि का पूजन सूत्र में नहीं है । तर विवाहसंस्कार अथ कलशपूजनम् ॥ शुक्लयजु० अध्याय १ मन्त्र० ३६ ओम्-व्वरुणस्योत्तम्भनमसि व्वरुणस्य स्वकम्भसर्जनीस्त्थो वरुणस्य ऋतसदन्य- सि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्यत- सदनमासीद ॥ • अथ नवग्रहपूजा ॥ शु० यजु० अध्याय ३४ मं० ३१ ओं-आकृपणेन रजसा वर्तमानी निवेशय- न्नमृतम्मर्त्यञ्च । हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यनाओं सूर्याय नमः। इति सूर्य पूजयेत् ॥ शुक्ल यजु० अध्याय १० मन्त्र १८ ओम्-इमंदेवाऽअंसपत्नथंसुवqम्महतेक्ष- त्रायसहतेज्येष्ठ्यायमहतेजानराज्यायेन्द्रस्ये- न्द्रियाय। इमममुष्यपुत्रममुष्यैपुनमस्यैदिव; पाइएपवोमीराजासोमोऽस्माकम्ब्राह्मणानार्थ- राजा ॥ओं सोमाय नमः। इति पूजयेत् ॥ शुक्रयजु० अध्याय ३ मन्त्र १२ ओम्-अग्निदिवाककुत-पतिः पृ- १२ संस्कारमातरः॥ थिव्याऽअयम् । अपाथरेतासि जिन्वति ॥ ओं अङ्गारकाय नमः। इति पूजयेत् ॥ यजु० अध्याय १५ मन्त्र ३ ओम्-उद्वध्यस्वाग्नेप्प्रतिजागहि,त्वमि- ष्टापूतसर्थसृजथाभयञ्च। अस्मिन्सधस्थेऽ- ध्युत्तरस्मि,न्विश्वेदेवायजमानश्चसीदत॥ ओबुधायनमः। इति पूजयेत् । यजु० अध्याय २६ मन्त्र ३ ओम्-बृहस्पतेऽअतियदय्यौऽअर्हादद्युमद्वि- भातिक्रतुमज्जनेषुायद्दीदयच्छवसऽऋतप्रजात तदस्मासुद्रविणधेहिचित्रम्॥ ओ बृहस्पतये नमः । इति पूजयेत्। यजु० अध्याय १६ मन्त्र ७५ ओं-अन्नात्परिखुतोरसम्ब्रह्मणाव्यपिवत्क्ष- त्रम्पयः सोमम्प्रजापतिः। ऋतेन सत्यमिन्द्रि यविपान शुक्रमन्धसइन्द्रिस्येन्द्रियमिद- म्पयोऽमृतम्मधु ॥ ६॥ ओं शुक्राय नमः । -इति पूजयेत् । यजु० अध्याय ३६ मंत्र १२ ओम्-शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भव- न्तु पीतये। शंय्योरभिस्रवन्तु नः ॥ ओं श- नैश्चराय नमः। इंति पूजयेत् ॥ - ११३ विवाहसंस्कारः ॥ यज० अध्याय २७ मंत्र ३६ ॥ ओम्-कया नश्चित्र आभुवदूती स- दावृधः सखा । कयां शचिष्ठया वता॥ ओं राहवे नमः ॥ इति पूजयेत् ॥ यजु० अध्याय १५ मंत्र ३ ॥ ओम्-केतुङ्कण्वनकेतवे, पेशो मर्याs अपेशसे।समुषद्भिरजायथाः॥ओं केतवे नमः॥ इति पूजयेत् ॥ ततः साधुभवानास्तामिति प्रजापतिपिला देवता यजुश्छन्दो वरार्चने विनियोगःो ओ साधुभवानास्तामर्चयि- प्यामो भवन्तम् । इति ब्रूयात् ।ओं पर्चयेति वरेणोक्ते वरो- पवेशनार्थं शुद्धमासनं दत्त्वा कन्यादाता विष्टरमादाय भी विष्टरोविष्टरोविप्टरइत्यन्येनोक्ते ओं विष्टरः प्रतिगृह्यता- मिति दाता वदेत् । प्रों विष्टरं प्रतिगृह्णामीत्यभिधाय बरो विष्टरं गृहीत्वा-वमोऽस्मीत्याथर्वणऋपिर्विष्टरो देवता- ऽनुष्टुप्छन्दः । उपवेशने विनियोगः ।। ओं वमोऽस्मि समानानामुद्यतामिवसूर्यः । इमं तमभिमिष्ठामियोमा कश्चाभिदासति॥ दनन्तर कन्या दाता (माधुभवानास्ता) इत्यादि वाक्य पढे । घर कहे (अर्चय) तथ घर को बैठने के लिये शुद्ध भासन देवे । यजमान हाथ में बिष्टर वे तथा अन्य कोई पुरुष (विष्टरो विष्टरो विष्टरः) कहे तय कन्या दाता कहे (ओं विष्टरः प्रतिगृह्यताम् ) तय (ो विष्टरं गृहामि ) वाक्य कह कर घर विष्टर को सेता हूं ऐसा कह विष्टर को लेकर (बोस्मि) मात्र से शासन के ऊपर ।

. संस्कारमार्तण्ड । र इत्यनेन प्रासने उत्तराग्रविष्टरोपरि वर उपशति । प्रओं पाद्यं पायं पाद्यमित्यन्येनोक्ते श्री पाद्यं प्रतिगृह्यतामिति दाता वदेत् । श्री पाद्यं प्रतिगृह्णामीत्यभिधाय वरः- ओं विराजो दोहोऽसि विराजो दोहमशीय मयि पाद्यायै विराजो दोहः ॥ : इति दक्षिणं चरणं प्रक्षाल्यानेवैव क्रमेण मन्त्रेण च वामचरणप्रक्षालनम् । ततः पूर्ववद्विष्टरान्तरंगृहीत्वा चरण- योरधस्तात् उत्तराग्रं वरः कुर्यात्। ततो दूर्वाक्षतफलपुष्पचः न्दनयुतार्घपात्रं गृहीत्वा यजमान:-ओं अर्घइत्यादिविष्णु पिस्त्रिष्टुप्छन्दी विष्णुदेवता अर्घदाने विनियोगः । भो अर्धाऽऽर्घइत्युक्तेऽन्येन, ओमर्घः प्रतिगृह्यतामिति दाता वदेन् । प्रो अर्घ प्रतिगृह्णामीत्यभिधाय वरो यजमानहस्ताद- पत्रं गृहीत्वा । आपःस्थइत्यादिमंत्ररय सिन्धुद्वीपऋपिरनु- उत्तरान बिष्टर को घर के उस पर वर बैठे । तदनन्तर अन्य कोई यजमान का पुरुप (पाद्यं० ३) ऐमा तीन बार कहे तत्र कन्या दाता कहे ( पाद्यं प्रतिगृह्य- ताम् ) तप वर (पाद्यं प्रतिगृहामि ) वाक्यं को कह कर (प्रोम्-विराजो) मात्र पद के पाद्यजल से [ब्राह्मण हो तो ] प्रथम दहिने पग का प्रक्षालन कर के पश्चात् द्वितीय बार इसी उक्त मन्त्र को पढ़ के घाम पाह का प्रक्षालन करे। यदि क्षत्रिय या वैश्यादि हो तो,प्रथम वामपाद को धोकर पक्षात् दाहिना पग धोये । सदनन्तर पूर्व के तुल्य हितीय बिटर को लेकर र दोनों पगो के नीचे विष्टर को उत्तराप दक्षा लेधे । तदनन्तर देश, अक्षत-रहेगी, फल, पुष्प और चन्दन सहित अर्घपात्र को फम्यादाता स्वर्ग हाथ में लेकर (जोम-प्र@ोः) ऐमा प्राय किसी के कहने पर (अर्ध प्रतिगृह्यताम् ) ऐसा कहे श्रोर वर (श्रोम् अर्घ प्रतिगृहामि) ऐसा कह का यजगात के हाथ से अर्घपात्र को दहिने हाय विवाहसंस्कारः॥ टुप्छन्दोऽर्धाक्षतादिधारणे विनियोगः। ओं प्रापः स्थ युप्मा- भिः सन्किामानवाप्नवानि।इति शिरसि किञ्चिंदक्षतादिक धृत्वा समुद्रंवइत्यादिमंत्रस्याथर्वणऋपिवृहतीछन्दो वरुणो देवताऽर्धजलप्रवाहे विनियोगः । ओ समुद्रं बः प्रहिणोमि स्वां योनिमभिगच्छत । अरिष्टाऽस्माकं वीरा मापरासेचि- मत्पयः ॥४॥ इत्यपात्रस्य जलमैशान्यांत्यजन् पठेत् । ततो यजमानाचमनीयमादाय आचमनीयमाचमनीयमाचमनी- यमित्यन्येनोक्त-ओम्-पाचमनीयं प्रतिगृह्यतामिति दाता वदेत् । प्रोम-प्राचमनीयं प्रतिगृह्णांमीत्यभिधाय वरो यजमा- नहस्तादाचमनीयं गृहीत्वा-प्रामागन्निति परमेष्ठीपिव- हतीछन्द आपो देवता अपामपस्पर्शने विनियोगः ॥ प्रोम- प्रीमोगेन्यशसा सर्थसृज वर्चसा । तम्मा कुरु प्रियं प्रजा- नामधिपतिं पशूनामरिष्टिं तनूनाम् ॥ इत्यनेन सकटाचा- भेत् । द्वितप्णीमाचामेत् । ततो यजमानः कांस्यपात्रस्थ- दधिमधुघृतानि समादायान्येन कांस्यपात्रेणापिधाय करा- भ्यामादाय। मधुपर्कति मधुच्छन्दऋपिवृहतीछन्दो मधुभग से लेकर (मोम्-प्रापस्था) मन्त्र से अर्घयात्र में से अपने शिर में थोड़ा अक्षत पुष्पादि घर के अर्धपानस्य जल को ईशान दिशा में छोड़ता हुना (ओं समुद्रं यः०) मन्त्र पढ़े। तदनन्तर यजमान अपने हाथ में प्राचमनीय जल लेकर (प्राचमनीयं ३) ऐसा तीन बार अन्य के कहने पर (भाचमनीयं प्रतिगृह्यताम्) ऐसा कहे । और वर (प्राचमनीयं प्रतिगृह्नामि ) ऐसा कह कर यज्ञमान के शाप से प्राचमनीय पान लेके ( भोमामागन्या) मन्त्र पढ़ के एक वार नाच. मन कर दो बार विना मन्त्र पढ़े आचमन करे । तदनन्तर कन्या दाता यज- गान कांसे के कटोरा में दही शहत और घृत को लेकर भन्य द्वितीय कटोरा ..

संस्कारमाहा।। देवता मधुपर्कदाने विनियोगः ॥ श्रीम-मधप मधपी मधुपर्क इत्यन्येनोक्ते-श्रीम-मधुपर्कः प्रतिगृह्यतामिति दा- तावदेव। ओम्-मधुपर्क प्रतिगृह्णामीत्यभिधायैव वरः। श्रो. म्-मित्रस्येति प्रजापतिर्ऋपिः पक्तिश्छन्दो मित्रो देवता मधुपर्कदर्शने विनियोगः। प्रोम-मित्रस्य त्वा चक्षुपा प्रती- क्षे। इति दातृकररथमेव मधुपर्क निरीक्ष्य देवस्यत्वेति ब्रह्मा- पिर्गायत्रीछन्दः सविता देवता मधुपर्कग्रहणे विनियोगः ॥ ' यजुर्वे० भ० ६ मं १ ओम्-देवस्य॑ त्वा सवितः प्रेसवेंऽश्विनो र्वाहुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्यां प्रतिगृहामि ॥ इत्यभिधाय वरो मधुपर्क गृहीत्वा वामहस्ते कृत्वा- श्रीम-नमः श्यावेति प्रजापति,पिर्गायत्री छन्दः स- विता देवता मधुपर्कालोडने विनियोगः ॥ओम् नमः श्या- वास्यायान्नशने यत्त आबिटुं तत्ते निकृन्तामि । इत्यना- मिकया नि:प्रदिक्षणमालोड्य अनामिकाङ्गुष्ठाभ्यां भूमी किञ्जिन्निक्षिप्य पुनस्तथैष द्विःप्रत्येकं निक्षिपेत् । तत प्रा से ढांप के दोनों हाथ में लेकर (प्रोमधुपर्कोमधुपर्कोमधुपको) ऐमा अन्य के कहने पर (मधुपर्कः प्रतिगृह्यताम् ) कहे । और घर (ओं मधुपर्क पतिगृहामि) ऐसा कह कर (ओमित्रस्य) मन्त्र पढ़ के यजमाग के हाथ में ही मधुपर्क को देख कर (भो देवस्य स्था०) मन्त्र पढ़ के यजमान के हाथ से मधुपकंपात्र को लेकर धाम पकट के (ओं नमः श्याषा) मात्र पढ़ के दाहिने हाथ की प्रमामिका अगुलि से तीन बार प्रदक्षिण कम से मधुपर्क को मिलाये। तदनन्तर मधुपर्क में में अनामिका और महुए द्वारा घोटा अंश लेकर भूमि में लिटक कर फिर भी दो बार इसी प्रकार घोड़ा २ लिटकावे। सदनम्तर व्यवहारानुसार पोहा विधाहसंस्कार ॥ चारान्मधुपर्क किञ्चित्कन्यायै द्रष्टुं दद्यात् ॥ प्रोम-यम- धुनइत्यस्य कौत्स ऋपिर्जगती छन्दो मधुपर्को टेवत्ता मधु. पर्कप्राशने विनियोगः। प्रोम-यन्मधुनो मधव्यं परमरुप- मन्नाद्यम् ॥ तेनाऽहं मधुनो मघव्येन परमेण रूपेणान्नाद्येन परमो मघत्योऽन्नादोऽसानि ॥२॥ इत्यनेन वारत्रय मधु- पर्कप्राशनं प्रतिप्राशनान्ते चैतन्मन्त्रपाठ. ततो मधुपर्कशे- पमसंचरे देशे धारयेत् ॥ ततस्विराचामेद्वरः । वाड्मप्रास्ये प्रस्तु। नसोम प्राणोऽस्तु । अक्ष्णोम चक्षुरस्तु । कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु । बाव्होम बलम- रतु । ऊर्वोम प्रोजोऽस्तु । अरिष्टानि मेऽङ्गानि तनूरतन्वा मे सह सन्तु । इति प्रत्येकं सर्वगात्राणि संस्पृशेत् । ततो वेदिकायां तुपकेशशर्कराभस्मादिरहितां चतुरस्रभूमि कुशैः परिसमुह्य तानशान्यां परित्यज्य गोमयोदकेनोपलि- प्य स्फ्येन सुवेण वा प्रागग्रप्रादेशमितमुत्तरोत्तरक्रमेण मधुपर्फ कन्या को देखने के लिये देवे । तदनन्तर (ो यन्मधुनो०) मन्त्र को तीन । धार पढ २ कर तीन बार थोडा २ मधुपर्क सावे । और शेष बचे मधुपर्फ को जहा किमी की निकल पैठ न हो ऐसे स्थान में छोड देवे। तदनन्तर पर तीन चार प्राधमन करके (बाम) मे मुख का (नसोम० ) से दोनो नासिका के विद्रो का (अक्षणाम) से दोनो शाखो का (कर्णयोः) से दोनो कानो का प्रथम दहिने तदनन्तर वाम का ( याहोमः) से दोनो मुजा का ( कोंक) से दोनो जापो का धौर (भरिटानि मे०) से सब अहो का शिव से पग तक स्पर्श करे। तदनन्तर भूमी फेश के और भस्मादि रहित वेदी में चतुष्कोण भूमि का कुशी से परिसमूहन कर कुशो को ईशान कोण में कोर कर गावर भोर जल से घेदि भूमि का लेपन कर स्स्य वा सुधा से प्राण प्रादेशपरिमिति ह. तर २ कम से तीन रेखा करके रेखामओ के कम से अनामिका मोर प्रष्ट द्वारा ४८ संस्कारमापडः ॥ त्रिरुल्लिख्योल्लेखनक्रमेणाऽनामिकड्गुष्टाभ्यां मृदमुत्य ज- लेनाभ्युक्ष्य तत्र तणी कांस्यपात्रस्थं मृत्तिकापात्रस्थं न विहितं वन्हिं प्राड्मुखः प्रत्यङमुखमुपसमाधाय तक्षार्थ कञ्चिन्नियुज्य कौतुकागारावरः कन्यामानीय मण्डपउपवेश्य अथैनां वासः परिधापयति ॥ भोजरांगच्छेति मंत्ररय प्रजापतिपिस्त्रिष्टुपछन्दस्त- न्तवी देवता वस्त्रपरिधाने विनियोगः॥ों जरांगच्छ परि- धत्स्व वासो भवा कृष्टीनामभिशरित पावा। शतं च जीव शरदः सुपर्चा रयिञ्च पुत्राननुसंव्ययस्वायुप्मतीदं परिधत्स्व वासः॥ इनिमंत्रेण परिधानवरत्रंपरिधापयेद्वरः ॥ अधोत्तरीयं वासः समादाय वरोऽग्निममंत्रण परिधापयेत् । याऽमकृन्त- नित्यादि मन्त्रस्य प्रजापतिपिर्जगती छन्दो विधाऽयो टे. वता वस्त्रधारणे विनियोगः ॥ भोयामकन्तन्नवयं या- अतन्वत याश्च देवीस्तन्तूनभितरततन्थ। तात्वादेवीर्जरसे संव्ययस्वायप्मतीदं परिधत्स्व वासः ॥ इति मन्त्रण प्रह- तवासो धीतं वा सौत्रेणाच्छादयीतेति श्रुत्यनुसारेण वरो- प्येतादृशवाससी पत्र परिधत्ते परिधास्यैइत्यादिमन्त्राभ्याम्॥ मट्टी को रेखाम्रो से उठा कर फेंक दे पश्चात् जान से वेदि का प्रयुक्षण कर वि. धान किये अग्नि की कामे घामट्टी के पात्र में लाके पूर्वाभिमुख हो कर अग्नि को सामने रख कर उसके न चुनने के लिये घोही समिधा अग्नि पर घर के कौतुका. गार से घर कन्या को लाकर मण्डप में बैठाकर फाया को वस्त्र पहनाये (प्रो जरा गप०) मन्त्र को पढकर अधोवस्त्र पहरने के लिये कन्या को देधे तदनन्तर कपर श्रोढने का वस्त्र नोदनी वा घट्टर बर हाय में लेकर (छो याप्रकन्तन०) मन्त्र पढ कर कन्या को प्रोढने के लिये देवे। ये घस्त्र नये स्वयं घोये हो कि . विवाहसंस्कार परिधास्य इत्यादिमन्त्रस्याथर्वणऋपिस्त्रिष्टुपचन्दः । तन्तवो देवता वासापरिधाने विनियोगः । प्रोम्-परिधारयै यशो धास्यै दीर्घायुष्ट्वाय जरदष्टिरस्मि । शतञ्च जीवामि शरदः पुरुचीरायस्पोपमभिसंव्ययिष्ये ॥ इति पठित्वा वरः परिधत्ते (अथीत्तरीयमाच्छादयतीति सत्रम) ओम्-यशसे - त्यादिमन्त्रस्य प्रजापति पिर्जगतीछन्दो विधाभ्यो देवता वासोधारणे विनियोगः ॥ प्रोम-यशसा मा द्यावापृथिवी यशसेन्द्रावृहस्पती । यशो भगश्च मां विदद्यशो मा प्रति- पद्यताम्। इति पठित्वोत्तरीयं परिधत्ते । ततः कन्याया परस्य च द्विराचमनम् । ततः कन्याप्रदेन परस्परं समजेथामिति प्रेपितयोः परस्परं सम्मखीकरणम् ॥ समञ्जन्त्विति मन्त्रस्य धर्वणऋपिरनुष्टुप्छन्दो विश्वेदेवा देवत्ता मैत्रीकरणे वि. नियोगः ॥ श्रीम-समजन्तु विश्वेदेवाः समापो हृदयानि नौ ।। सम्मातरिश्वा संधाता समुदेष्ट्री दधातु नौ ॥ इति वरः प- ठेत् ॥ ततः कन्याप्रदकर्तृकग्रन्थिवन्धनम ॥ हरतलेपनं शा- खोच्चारणम ॥ अथ कन्यादानम् । कन्यादाता शंखस्थट्टाक्षतफलपुष्पचन्दनजलान्यादाय । नु पीयों के धौर्य न होवें। तदनन्तर (परिधास्य ) मात्र पढ के नयों स्वयं धोयी शुद्ध धोती घर पहिने ओर (प्रोम्-पशसा० ) मन्त्र पढ़के शुद्ध छुपट्टा पर कपरके भाग में प्रोढ़े वा अंगरखा पहने तदनन्तर फाया घर दोनों दो २ मा• धमन करें । तदनन्तर कन्या दाता कहे कि (परस्परं समजेथाम् ) ऐसा कहकर फन्या घर को सम्मुख करे और उस समय (ों समचतुः) मन्त्र को घर पढे । इसी समय कन्यादाता दोनों का ग्रन्यिचयन कराया के हाथों में हल्दी लगाये और इसी समय शाखोचारण करे । अथ कन्यादान-काया दान करने संस्कारमातहः ॥ अथ कन्याप्रदः-जामातृदक्षिणकरोपरि कन्यादक्षिणकरं नि- धाय। दाताऽहं वरुणो राजाद्रव्यमादित्यदैवतम्। विप्रोऽसौ विष्णुरूपेण प्रतिगृह्णात्वयं विधिः। इति दाता पठेत् । ततो गोत्रोच्चारणं च कुर्यात् । ओ श्रीमत्पंकजविटरो हरिहरौ वायुर्महेन्द्रो नलश्न. न्द्रोभास्करवित्तपालवरुणाः प्रेताधिपाद्याग्रहाः । प्रद्युम्नो नलकूवरी सुरगजचिंतामणिः कौन्तुभः स्वामीशक्तिधर- श्व लागलधरःकुर्वन्तु वो मङ्गलम् ॥१॥ अमुकगोत्रस्यं प्रमकप्रवरस्यनमुकवेदिनोऽमुकशाखिनोऽम- कसूत्रिणोऽमुझेशमणःप्रपौत्राय । अमुकगोत्रस्य यथोक्तप्र. वरस्याऽमुकवेदिनोऽमुकशाखिनोऽमुकसूत्रिणोऽमुकशर्मणः पौत्राय २ अमुकगोत्रस्य यथोक्तप्रवरारयाऽमुकवेदिनोऽमु- कशाखिनोऽमुकसूत्रिणोऽमुकशर्मणः पुत्राय ॥ ३॥ अमुक- गोत्रस्य यथोक्तप्रवरम्याऽमुकवेदिनोऽमुकशाखिनोऽमुकसू- त्रिणोऽमकशर्मणः प्रपौत्री १अमुकगोत्ररय यथोक्तमवरस्य अमुकवेदिनोऽमुकशाखिनोऽमकसूत्रिणोऽमुकशर्मणः पौत्रों अमुकगोत्रस्यामकप्रधरस्याऽमुकवेदिनोऽमुकशासिनोऽमुकसू- त्रिणोऽमुशर्मणः पुत्री ३ गौरीश्री कुलदेवताचसुभगाभू- मि: प्रपूर्णाशुभा सावित्री च सरस्वती च सुरभिःसत्यव्रतारु- न्धती । स्वाहा जाम्बुवती च रुक्मभगिनी दुःस्वप्नविध्वं. सिनो वेलाचांवनिधे:समीनमकराः कुर्वन्तुवोमङ्गलम् ॥२॥ बाला पुरुप शंख में दून असत फन पुष्प चन्दन और जल को लेकर घर के द- हिने हाय पर कन्या का दाहिना हाथ परके ( दाताह) शोक पढे। ऊपर लिखे अनुसार यहा गोत्रोचारण करे। यदि पर मामण न हो फिन्तु क्षत्रियादि १२१ विवाहसंस्कार' || अमुकगोत्रस्यामकमवरस्यामुकवेदिनोऽमुकगाखिनोऽमुकसू- त्रिणोऽमुकशर्मणः प्रपौत्राय । अमुकगोत्ररय युधोक्तप्रवर- स्याऽमुकवेदिनोऽमुकशाखिनोऽमुकसूत्रिणोऽमुकशर्मणः पौ नायर अमुकगोत्रस्य यथोक्तप्रवरस्याऽमुकवेदिनोऽमुकशा- खिनोऽमुकसूत्रिणोऽमुकशर्मणः पुत्राय ॥३॥ अमुकगोत्रस्य यथोक्तप्रवरस्याऽमुकवेदिनोऽमुकशाखिनोऽमुकसूत्रिणोऽमु- कशर्मणः प्रपौत्रीम् १ अमुगोत्ररय यथोक्तप्रवरस्य अमुक- वेदिनाऽमुकशाखिनोऽभुकसूत्रिणोऽमुकशर्मणः पौत्रीम २ मुकगोत्ररयामुकप्रवरस्याऽसुकवेदिनोऽमुकशासिनोऽमुकसूत्रि- रणोऽमुकशर्मणः पुत्रीम् ॥३॥ गंगा सिंधु सरस्वती च यमुना गोदावरी नर्मदा, कावेरी सरयू महेन्द्रतनया चर्मरावती वेदि- का । क्षिप्रा वेत्रवती महासुरनदी ख्याता च या गंडिकी, पु- रया:पुण्यजलैःसमुद्रसहिताःकुर्वन्तुवोमङ्गलम् ॥ ३॥ अमु- कगोत्रस्य युथोक्तप्रवरस्यामुकवेदिनोऽमुकशाखिनोऽमुकसू- त्रिणोऽमुकशर्मणः प्रपौत्राय । अमुकगोत्रस्य यथोक्नप्रवर- स्याऽनुकवेदिनोऽमुकशाखिनोऽमुकसत्रिणोऽमकशर्मणः पौ- त्रायर अमुकगोत्रस्य यथोक्तप्रवरस्याऽमुकवेदिनोऽमुकशाखि- नोऽमुकसूत्रिणोऽमुकशर्मणः पुत्राय ॥ ३॥ अमुफगोत्रस्य य- थोक्तप्रवरस्याऽमुकवेदिनोऽमुकशाखिनोऽमुकसूत्रिणोऽमुकश- मणः प्रपौत्रीम् १ अमुकगोत्रस्य यथोक्तप्रवरस्य अमुकवे- दिनोऽमुकशाखिनोऽमुकसूत्रिणोऽमुकेशर्मणः पौत्रीम् ॥ २॥ अमुकगोत्रस्य यथोक्तप्रवरस्याऽमुकवेदिनोऽमुकशाखिनोऽमु- कसूत्रियोऽमुकशर्मणः पुत्रीम् ॥ ३॥ लक्ष्मीः कौस्तुभपारि- १२२ संस्कारमातंगडः। जातकसुराधन्वन्तरिश्चन्द्रमा,धेनुःकामदुधा सुरेश्वरगजो रंमा च देवाग़ना ॥ अश्वः सप्तमुखो विपं हरिधनुः भट्खीविषं चा. म्बुधेरत्नानीति चतुर्दश प्रतिदिनं कुर्वन्तु वो मङ्गलम् ॥४॥ ब्रह्मा वेदपतिः शिवः पशुपति: सूर्याग्रहाणांपतिः शक्रोदेवप- तिहविर्हतपतिःस्कन्दश्वसेनापतिः। विष्णुर्यज्ञपतिर्बलीरधःप. तिःशक्तिःपतीनांपतिः सर्वतेपतयः सुमेरुसहिताः कुर्वन्तु वो मङ्गलम् ॥ ५॥ इति सर्वोपयोगिगोत्रोच्चारणम् ॥ अथ कन्यासंकल्पविधिः ॥ हरिः-प्रोम ॥ विष्णुर्वि- प्णुर्विष्णःपुनातु अद्यतत्सब्रह्मप्रथानन्तवीर्यस्य श्रीमदादि- नारायणस्याऽचिन्त्यापरिमिताऽनन्तशक्तिसमन्वितस्य स्व- कीयमलप्रकृतिपरमशक्त्या कीडमानस्य सच्चिदानन्दसन्दी- हस्वरुपे स्वात्मनि सर्वाधिष्ठाने स्वाज्ञानकल्पितानां महाज- लोधमध्ये परिभुभ्यमाणानाममेककोटिब्रह्माण्डानामेकत- मेऽस्मिन्ब्रह्माण्डेऽव्यक्तमहदहजारपृथिव्यम्जोवाय्वाकाशा. दिभिर्दशगुणोत्तरैरावरणैरावृते प्राधारशक्तित्रीकूर्मवराह- धर्मानन्ताष्टदिग्गजादिप्रतिष्ठिते ऐरावतपुण्डरीकयामन- कुमुदाञ्जनपुप्पदन्तसार्वभौमसुप्रतीकाख्याप्टदिग्दन्तिशुण्डा- दण्डोत्तरिडतैतद्ब्रह्माण्डखण्डयोरन्तर्गतभूलीकभुवलोक- स्वलोकमहल कजनलोकतपोलोकसत्यलोकाख्याना सर्वज्ञ सर्वशक्तिसमन्वितसर्वोत्तमसर्वाधिपश्रीचतुर्मुखप्रभृतिस्व- रवलोकाधिष्ठितानामधीमागे फणिराजन्य शेपस्य सह- स्रफणामण्डलैकफयोपरि सर्पपैक्कणायमानमहीमण्डला- न्तर्गतातलवितलसुतल तलातलरसातलमहातलपातालानां विधाहसंस्कारः ।। स्वस्वाधिष्ठात्रधिष्ठित्तानामुपरितने सुमेरुमन्दिरमन्दराच- लनिपधहिमगिरिशृङ्गबढेमकूटदुर्द्धरपारियात्रशैलमहाशैलम- हेन्द्रसह्याद्रिमलयाचलविन्ध्यर्यमूकचित्रकूटमैनाकमानसो. त्तरत्रिकूटीदयाचलास्ताचलपर्यन्तानेकाभिधानादिगणन- तिष्ठितायां जम्वूप्लक्षशाल्मलीकुशक्रौञ्चशाकपुष्कराख्यस- प्तद्वीपवत्यां लवणेक्षुसुरासर्पिदधिक्षीरशुद्धोदकाख्यसप्तसा- गरसमन्वितायां समस्तभूरेखायां कमलकदम्बगोलकाकारा- यां वर्तमाने कुवलयकोशान्तर्गतदलवद्विराजमाने उत्तरकुरु- हिरण्मयरम्यकभद्गारवकेतुमालेलावृतहरिवर्पकिम्पुरुपभार- ताख्यनवखण्डवति जम्बुद्वीपे सर्वेभ्योऽप्यतिरिक्तसारवति देवादिभिरप्यभीष्टसुकृतक्षेत्रभूतहेतुनाभिलपिततमे अनब- इकलिङ्गकालिङ्गकाम्बोजसौवीरसौराष्ट्रमहाराष्ट्रबङ्गालोत्क- लमगधमालवनेपालकेरलचोरलगौडमलपाजालसिंहलम- त्स्यद्रविडद्राविडकर्णाटराटवशूरसेनकौड्चणटौडकणपागड्य- पुलिन्ध्यान्ध्यद्रौणदशार्णविदेहविदर्भमैथिलकेकयकोशलकु- न्तलमैन्ध्रुवजावलसार्वसिन्धुशालभद्रमध्यदेशपर्वतकाश्मी- रपुष्टाहारसिन्धुपारसीकगान्धारवाहूलीक (हूण) प्रभृतिबहु- विधदेशविशेषसंपन्ने दण्डकारण्यमहारण्याद्वैतारण्यप्रभृत्य- नेकाररायवति श्रीगड्गायमुनासरस्वतीगोदावरीनन्दालक- नन्दामन्दाकिनीकौशिकीनर्मदासरयूकर्मनाशाचर्मण्वतीक्षि- प्रावेत्रवतीकावेरीफल्गुनार्कण्डेयरामगद्गाशतद्रुविपाशैराव- तीचन्द्रभागावितस्तासिन्धुपद्वतीप्रभुत्यनेकनदनदीवति कु.

संस्कारमातंगडः। स्यां दिशि वारिपूर्णदृढकलशमादाय ऊर्ध्व तिष्ठतो मौनिनः पुरुपस्य स्कन्धे अभिपेकपर्यन्तं धारयेत् । ततः परस्परं समीक्षेथाम् । इति कन्याप्रदप्रेपानन्तरम- ओम्-अघोरचक्षुरपतिज्यधि शिवा पशु- भ्यः सुमनाः सुवर्चाः। वीरसूर्दैवकामा स्योना शन्नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे । सोमः प्रथमो विविद गनधी विविद उत्त- रः । तृतीयो अग्निष्ट पतिस्तुरीयस्ते मनु- ष्यजाः । सोमो ददद्गन्धर्वाय गन्धर्वी दद- दग्नये। रयिं च पुत्रांश्चादादग्निर्मामयो इमाम् ॥सा नः पूषा शिवतमामेरय सा न ऊस उशती विहर । यस्यासुशन्तः प्रहराम शेपं यस्यामु कामा बहवो निविष्ट्यै ॥ इति वरपठितमन्त्रान्ते परस्परं निरीक्षणम् । क्षेपक ऋग्वेद मण्डल १० सू०८५ मं० २५ ॥ इभांत्वमिन्द्रमीढ़ःसुपुत्रांसुभगांकृणु। द- शास्यांपुत्रानाधेहिपतिमेकादशंकृधि ।। पुरुष काधे पर घर के भागे होने वाले काया के अभिषेक पर्यन्त मौन सहारहे। क्षा रक्षा करे। [दृढ पुरुष कहने का फुस्म की रक्षा में तात्पर्य है ] तदनन्तर कन्या दाता कहे कि ( परस्पर समीक्षेथाम् ) तथ (श्रीम-अधोरच०) इत्यादि मन्त्रो कोपर पढ़े मात्रो के अन्त में हत्या पर एक दूसरे को देखें। तम अग्नि की ।

१२७ विवाहसंस्कारः॥ ततोऽग्निं प्रदक्षिणीकृत्य - पश्चादग्नेरहतवस्त्रवप्टितं तृणपूलकं कटं वा निवेश्य तदुपरि दक्षिणचरणं दत्त्वा वधू दक्षिणतः कृत्वा तामुपवेश्य पुष्पचन्दनताम्बूलवस्त्राण्यादाय- ओं तत्सदद्यकर्तव्यविवाहहोमकर्मणि कृताऽकृतावेक्षणरूप ब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पच- न्दनताम्बूलवासोभिर्ब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे इति ब्रह्माणं वृणुयात् ॥ वृतोऽस्मीति प्रतिवचनम् ॥ यथाविहितं कर्म कुर्विति वरेणोक्ते करवाणीति ब्रह्मा ब्रूयात् । ततो वरोऽग्ने दक्षिणतो ब्रह्माणमग्निप्रदक्षिणक्रमेणानीय अन्न त्वं मे ब्रह्मा भवेत्यभिधाय कल्पितासने समुपवेशयेत् ॥ ततः प्रणीतापात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा परिपूर्य कुशै- राच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्य अग्नेरुत्तरतः कुशोपरि नि. दध्यात् । ततः परिस्तरणं वर्हिपश्चतुर्थभागमादाय आग्नेया- प्रदक्षिणा करके अग्नि से पश्चिम प्रोर सजे नये वस्त्र से लपेटे तृणों के पूजा या घटाई को रपके उसके ऊपर दहिना पग धरके कन्या को अपने से दाहिनी ओर करके बैठा देवे और यर स्वयं बैठ जावे । तब ब्रह्मवरणादि काम करे। पुष्प चन्दन ताम्बूल भोर वस्त्रों को लेकर (श्रीमद्य०) इत्यादि वाक्य पढके य- जमान वर ब्रह्मा का वरण करे और पुष्पादि ब्रह्मा के हाथ में देवे। ब्रह्मा पुष्पादि को लेकर (वृतोऽस्मि) कहे । तव (यथावि०) यजमान कहे पोर ब्रल्ला (करवाणि०) कहे । तब अग्नि में दक्षिण में शुद्ध प्रासन चौकी प्रादि विलाफर उस पर पूर्व को जिन का अग्रभाग हो ऐसे कुश घिल्लाकर ब्रह्माको अग्नि की प्रदक्षिणा क- राके (अस्मिन् कर्मणि वं मे ब्रह्मा भव ) इस कर्म में तुम मेरे ब्रह्मा हो ऐमा पहकर ब्रह्मा के (भधानि) वहने पर उस आसन पर ब्रह्मा को उत्तराभिमुख ठाकर प्रणीतापात्र को मामने रसके जलसे भरके कुशों से आच्छादन फर ब्रह्मा का मुख अवलोकन करके अग्निसे उत्तर कुशोपर प्रणीतापात्र को मागन रक्खें । ।

१२८ संस्कारमा दीशानान्तं ब्रह्मणोऽग्निपर्यन्तं नैर्ऋत्याद्वायव्यान्तमग्नितः प्रणीतापर्यन्तं ततोऽग्नेरुत्तरतः पश्चिमदिशि पवित्रच्छेदनार्धं कुशत्रयं पवित्रकरणार्थ साग्रमनन्तर्गर्भ कुशपत्रद्वयं प्रोक्षणी पात्रं प्राज्यस्थाली संमार्जनाय कशत्रयं समिधस्तिस्रः खुव प्राज्यं पूर्णपात्रं पूर्वपूर्वदिशि क्रमेणासादनीयम् ॥ अथ तस्यामेव दिशि असाधारणवस्तून्युपकल्पनो- यानि तत्र शमीपलाशमित्रा लाजाः, हपदुपलं कुमारीभ्रा- ता हढपुरुषः, अन्यदपि तदुपयुक्तमाले पनादि द्रव्यम् ॥ ततः पवित्रच्छेदनकुशैः पवित्रे छित्वा ततः सपवित्रकरण प्रणी- तोदकं त्रिःप्रोक्षणी पाने निधाय अनामिकाङ्गुष्ठाभ्यामुत्तरा- ग्रे पवित्रे गृहीत्वा त्रिरुदिगनं प्रणीतोदकेन प्रोक्षणीज- तदनन्तर चार मुही कुप लेकर अग्नि के मय भार परिस्तरण करे-एक चौथाई कुरा भग्निकोण से ईशामदिशा तक, द्वितीयमाग प्रमाके प्रासन से अग्निपर्यन्त, तृतीयभागनैऋतकोण से घायुकोण पर्यन्त और चौघामाग अग्नि से प्रणीता पर्यन्त विद्धाचे । तदनन्तर अग्नि से उत्तर में प्रामस्थ पात्रामादन करे। पवित्र दनार्थ तीन फुग तथा पवित्रारणार्थ अग्रभाग सहित जिन के भीतर अन्य कुश न हों ऐमे दो कुश, मोक्षणीपात्र, भाग्यस्थाली, संमार्जनकुश, उपयमनकुश, ढांक की तीन समिधा, ध, नारय, चावलों से भरा एक पर्लपात्र, पवित्र छेदन कुषों से पूर्व पूर्व कम से उत्तर को अग्रभाग कर ३ इन मथ का स्थापन करे । सदनन्तर उसी पूर्व दिशा में विवाह सम्बन्धी विशेष पदार्थों का स्थापन करे । शमी- दयोंकर के पत्तामभिनितान की सीन, शिल, कन्या का भाई, एक पटा स- हित दृढ पुरुष तथा अन्य भी प्रापनादि उपयोगी पदार्थ घरे । पवित्र दनार्थ तीन कुणों से प्रादेशमात्र दो कुणों का छेदन करके पवित्र सहित दहि. से प्रणीता के जल को तीन बार प्रोक्षणीपात्र में हाल कर अनामिका और अटुष्ट से पकड़े हुये पत्रिों से उस प्रोक्षणोस्य जन का उत्पषग करे और प्रणीता के जल से मौतलीस्थ जल का पवित्रों द्वारा तीन बार अभिलपन कर १९ विवाहसंस्कार लेन यथासादितवस्तुसेचनम् ॥ ततोऽग्निप्रणीतयोर्मध्ये मो- क्षणीपात्रनिधानम् ॥ आज्यस्थाल्यामाज्यनिर्वापा । ततो- ऽधिनयणम् । ततो ज्वलत्तृणादिना हविर्वेष्टयित्वा-प्रद- क्षिणक्रमेण बही तत्प्रक्षेपः पर्यग्निकरणम्। ततः सुवप्रतपनं कृत्वा सम्मार्जनकुशानामग्रेरन्तरतो मूलैर्वाह्यतः सुवं सम- ज्य प्रणीतोदकेनाभ्युदय पुनः प्रतप्य खुवं दक्षिणतो निद- ध्यात् । तत-प्राज्यस्याग्नेरवतारणं तत प्राज्ये प्रोक्षणी- वदुत्पवनम् ॥ अवेक्ष्य सत्यपद्रव्ये तन्निरसनम् ॥ पुनः प्रोक्षणयुत्पवनम् ॥ ततः उपयमनशानादाय उत्तिष्ठन्प्रजापति मनसा ध्यात्या तप्णीमग्नौ घृताक्तास्तिसः समिधः क्षिपेत् ॥ त- उपविश्य सपवित्रमोक्षणीजलेन प्रदक्षिणकुमेणाग्निप- के प्रोक्षणीपात्र फेजा से भामाइन किये भाज्यस्थाली शादि का सेवन करके अग्नि और गीतापात्र के बीच में प्रोक्षणीपान को रस देवे । तब भाज्यस्था; ली में घृतपान से घृत गिरावे घृत को अग्नि पर घरके सूखे कुश जलाकर घी के ऊपर प्रदक्षिण घमा कराके अग्नि में जलते कुश में कर सुधा को तीन बार अग्नि में सपा के संमार्जन कुशो के अग्रभाग से भीतर को भोर फुयों के मूलभाग से बाहर की ओर जुषा को झाड पोछ राडकर तथा प्रणीता के जल से मेधन काफै शौर फिर तीन चार तपा के अग्नि से दक्षिण की भोर सुवा को घर देधे । तत्पश्चात् तपते हुए घी को अणि वे उतार के उत्तर में घरे । तब तीन धार मोक्षयों के नुरुप प्रचित्रों से घी का उत्पयन करके देखें यदि घृत कुछ निकट वस्तु हो तो निकाल कर फेंक देवे और फिर तीन बार मोक्षीमात्र . का उत्पयन करे। तदनन्तर उठ कर उपयमनाशी को वाम हाथ में लेके प्रमा- पति का मन से ध्यान करके घृत में हुबोई तीन समिधानों को तूष्णीं विनर मन्त्र पढ़े एक २ कर अग्नि में चढ़ाये। फिर बैठ कर पवित्र सहित प्रीक्षाशी के जल को प्रदक्षिणक्रम से ईशानकोण से लेकर उत्तर दिशा तक अग्नि के सब शोर' .

- सरकारमार्सएडः॥ र्युक्षणं कृत्वा प्रणीतापात्रे पवित्रे निधाय पातितदक्षिण- जानुः कुशेन ब्रह्मणान्यारब्धः समिद्धतमेऽग्नी खुवेणाज्या- हुतीर्जुहोति ॥ तत्राधारादारभ्य चतुर्दशाहुतिपु तत्तदाहुत्यः नन्तरं खुवावस्थितहुतशेपघृतरय प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः ॥ ओं प्रजापतये स्वाहा । इति मनसा-इटंप्रजापतये नमम ॥ोमि- न्द्रायस्वाहा-इदमिन्द्राय नमम॥ इत्याघारौ-ओं अग्नयेस्वा- हा-इदमग्नये नमम । औं सोमायस्वाहा-इदं सोमाय नमम्। इत्याज्यभागौ ॥ओं भूः स्वाहा । इदमग्नये नमम । नोभुवः स्वाहा।इदं वायवे नमम ॥ोस्वः स्वाहा । इदं सूर्याय नमम। एता महाव्याहृतयः ॥ शुक्लयजु० अध्याय० २१ मन्त्र ३॥ ओं-त्वन्नोऽअग्ने वरणस्य विद्वान् देव- स्य- हेडो अवयासिसीष्ठाः ॥ यजिण्ठो वह्नि तमः शोशुचानो विश्वा द्वेषार्थसि प्रमुमुग्ध्य- स्मत्स्वाहा॥ इदमग्नीवरुणाभ्यां नमम॥ शुक्लयजु० अध्याय २१ । मन्त्र ॥ ४ ॥ ओं स त्वन्नोऽअग्नेऽवमोभवोतीनेदिष्ठो ऽअस्याउषसोव्युष्टौ। अवयवनोव्वरूण सेवन करे अर्थात मोक्षणी पान का सब जल पर्युक्षण में गिरा देवे 1 महीतापात्र में दोनों पवित्र रसके प्रोक्षणी पात्र का विसर्जन परे । तदनन्तर दहिने घोंटू को भूमि में टेक कर. याहा मेWPIRAU शुपा पर यमुनान प्राप्ति सम में तुम से भाग्याहुतियों का होम करे ।' बा.२ उस २ पाहुति देने पश्चात जुवा में जो घृतविन्दु बर्षे उन को मोक्षणी पात्र में डालता जावे । प्रजापति का ध्यान कर पूर्वाधार की सूष्णी पाहुति देवे । त्याग सब यजमान स्वयं घोलता जाय । आधार-की दो भाग्य भाग की दो और महाव्यादतियों को तीन सर्वमायश्चित - . विवाहसंस्कारः॥ रराणो देवीहि मृडीकथं सुहवो नराधि स्वा- हा । इदमग्नीवरणाभ्यां नमम ॥ ओं-अयाश्याग्नेऽस्यनभिशस्तिपाश्चासत्यमित्वमयाअसि। अयानीयवहास्ययानोधेहिभेपजस्वाहा ॥ इदमग्नये नमम ॥ भो येतेशतंवरुणयेसहलंयज्ञियाःपाशाविततामहा- न्तः । तेभिताऽमद्यसवितोतविष्णुर्विश्वेमुञ्चन्तुमरुतःस्व- ःिस्वाहा ॥ इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वभ्यो नमम ॥ शुक्लयजु० १० १२ (मल ) मन्त्र १२ ।। उदुत्तमं व्वरण पाशमम्मदवाधर्मवि मध्यम/प्रथाय । अथाब्वयमादित्यवते- तवानागसोऽअदितयेस्यामस्वाहा । इदं व रुणाय नमम । एताः सर्वप्रायश्चित्तसंज्ञकाः ॥ ५ ॥ ततोऽन्चारधं विना-ओं प्रजापतये स्वाहा । इदं प्र. जापतये नमम ॥ों अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा । इदमग्नवे- स्विष्टकृते नमम ॥ उदकोपस्पर्शनम् ॥ अथ राष्ट्रभृतः । तत्र द्वादश मन्त्रा यथा शुक्लयजु० अध्याय १८ मन्त्र ३८ ओं-ऋतापाइतधामाग्निर्गन्धर्वःसन की पाच तथा प्राजापत्य और स्विष्टकत दो सघ चौदह पाहुति त्यागो सहित देशक विष्टकत पर्यन्त होम करने पवात (भोम्-ऋताया ) इत्यादि माह मन्नों सरकारमा ऽइदम्ब्रह्मक्षत्रम्पातुतस्म्मै स्वाहा वाट् ॥ इ- दमृतासाहेऋतधाम्नेऽग्नयेगन्धर्वायनमम॥ ओं-ऋतापाडतधामाग्निरर्गन्धर्वस्तस्योप- थयोऽप्सरसोनुदोनामताभ्यःस्वाहा । इद- मोपधिभ्योऽप्सरोभ्योमुभ्यो नमम ॥ '( यजु० अध्याय १८ मंत्र ३६ ॥ ओं-सर्थहितीविश्वसामासू-गन्धर्वसन- ऽइदम्ब्रह्मक्षत्रम्पातुतस्मैस्वाहावाट्॥इद/स- हितायविश्वसाम्नेसूर्यायगन्धर्वायनमम ॥ ( यजु० अध्याय १८ मन्त्र ३६ ) सथंहितोन्विश्वसामासोगन्धवस्तस्यम- रीचयोऽप्सरसऽआयुवोनामताभ्यः स्वाहा। इदंमरीचिम्योऽप्सरोभ्यायुभ्यो नमम ॥ ओं-सुषुम्णःसूर्य्यरश्म्मिश्श्चन्द्रमागन्ध- वःसन इदंब्रह्मक्षत्रपातुतस्मैस्वाहा बाट् ॥ इदं सुपुम्णाय सूर्यरश्मये चन्द्रमसे गन्धर्वा- यजु० अध्याय १८ मन्त्र०४० यनमम॥ यजु० अध्याय १८ मन्त्र १० ओं-सुपुम्म्णःसूर्यरश्म्मिश्चन्द्रमाग- विवाहसंस्कारः ॥ न्धर्वस्तस्य नक्षत्राण्यप्सरसोभेकुरयोनाम- ताभ्यःस्वाहा ॥ इदंनक्षत्रेभ्योऽप्सरोभ्योभे- कुरिभ्यो नमम ॥ यजु० अध्याय १८ मन्त्र ४१ ओं-इषिरोविश्वव्यचाव्वातोगन्धवः सनऽइदम्ब्रह्मक्षत्रम्पातुतस्मैस्वाहा वाट्॥इ- दमिषिराय विश्वव्यचसे वाताय नमम ॥ यजु० अध्याय १८ मन्त्र ११ ओं-इपिरोन्विश्वव्यचाव्वातोगन्धर्व- स्तस्यापोऽप्सरसऊजीनामताभ्यःस्वाहा ॥ इदमदस्योऽप्सरोभ्यऊर्गभ्यो नमम ॥ यजु० अध्याय १८ मन्त्र ४१ ओं-भुज्युःसुपर्णायज्ञोगन्धर्वःसनइद- म्ब्रह्मक्षत्रंपातुतस्मैस्वाहावाट् ॥ इदंभुज्यवे सुपर्णाययज्ञायगन्धर्वाय नमम ॥ ओं-भुज्युःसुपर्णी यज्ञोगन्धर्वस्तस्यद- क्षिणाअप्सरसस्तावानामताभ्यःस्वाहा ॥ इ. दंदक्षिणाभ्योऽासरोग्यस्तावाभ्यो नमम ॥ यजु० अध्याय १८ मन्त्र ४१ संस्कारमासंगहः ॥ यजु० अध्याय १८ मन्त्र ४२ ओं-प्रजापतिर्विश्वकर्मामनोगन्धर्वः सनइदंब्रह्मक्षत्रपातुतस्मैस्वाहावाट्। इदं प्र- जापतये विश्वकर्मणे मनसे गन्धर्वाय नमम॥ ओं-प्रजापतिविश्वकर्मा मनोगन्धर्वस्त- स्यऽनक्सामान्यप्सरस एप्टयो नामताभ्यः- स्वाहा।इदमुक्सामभ्योऽप्सरोभ्यराष्टिभ्यो नमम । इतिराष्ट्रभृतः ॥ अथ जयाहोम: -चित्तंचस्वाहा ॥ इदंचित्ताय नमम ॥१॥ो चित्तिश्व स्वाहा। इदं चित्त्यै नमम ॥ भी आकृतं च स्वाहा । इदमाकूताय नमम ॥३॥ओं प्राकृतिश्च स्वाहा । इदमावत्यै नमम ॥६॥ ओ विज्ञातच स्वाहा । इदंविज्ञाताय नमम ॥ श्री विज्ञात्तिश्च स्वाहा । इदंविज्ञात्यै नमम ॥६॥ ओं मनश्च रवाहा।इदंमनसे नम्माओं शकर्यश्च स्वाहा । इदंशकरीभ्यो नमम ॥८॥ो दर्शश्च स्वाहा । इदंदर्शाय नमम ॥ओं पौर्णमासश्च स्वाहा । इदंपौर्णमासाय नमम ॥१०॥ ओं वृहच स्वाहा । इदं बृहते नमम ॥११॥ ओं रघ- न्तरं च स्वाहा। इदरवन्तरायनमम ओप्रजापतिज- यानिन्द्रायवृष्यो मायच्छटुनःपृतनाजयेषु। तरमैविश:समनम- न्तसर्वाःसउनसहइहव्योरभवस्वाहा ॥१॥ इति जयाहोमः। से राष्ट्रमतसंचक १२ शाहुति देकर (ओं विनंच. ) त्यादि तेरह मात्रों से - विवाहसंस्कारः॥ अथाभ्याताननामहोमः ॥ भो अग्निभूतानामधिपतिः समावत्तस्मिन्ब्रह्मण्यरिमनक्षत्रेऽस्यामाशिप्यस्यांपुरोधायाम- स्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्यार्थ स्वाहा ।। १॥ इदमग्नये भूतानाम- धिपतये नमम ॥१॥ ओं इन्द्रोज्येष्ठानामधिपतिःसमाधत्व- रिमन्ब्रह्मण्यरिमनक्षत्रेऽरयामाशिष्यस्यांपुरोधायामरिमन्क- मण्यस्यांदेवहूत्याथै स्वाहा । इदमिन्द्रायज्येष्ठानामधिप- तये नमम ॥२॥ अरे यमापृथिव्याऽधिपतिःसमावत्वरिमन्त्र- ह्मण्यस्मिन्क्षत्रेऽरयामाशिप्यस्यांपुगेधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां- देवहूत्याच स्वाहा । इदंयमायपृथिव्याअधिपतये नमम ॥३॥ अत्र प्रणीतोदकरुपर्शः॥ओं वायुरन्तरिक्षस्याधिपतिःसमाव- त्वरिमन्ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यांपरोधायामस्मिन्क- मण्यस्यांटेवहूत्या/ स्वाहा । इदंवायवेऽन्तरिक्षस्याधिपतये नमम॥॥ों सूर्यादिवोऽधिपतिःसमावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यरिम. नक्षत्रेऽस्यामाशिप्यस्यांपुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्या स्वाहा । इदंसूर्यायदिवोऽधिपतये नमम ॥५॥ ओं चन्द्रमा- - नक्षत्राणामधिपतिःसमावत्वरिमन्ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेऽरयामा- शिप्यरयां पुराधायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्यार्थ रवाहा । इदंचन्द्रमसेनक्षत्राणामधिपतये नमम ॥६॥ श्री वृहस्पतिव्र- ह्मणोऽधिपतिःसमावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यरिमन्क्षत्रेऽस्यामाशिप्य- स्यांपुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्यार्थ स्वाहा । इदंबृह- रपतयेब्रह्मणोऽधिपतये नमम ॥ ७ ॥ों मित्र सत्यानाम- धिपतिःसमावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रेऽस्यामाशिप्यस्यां" जया होम फरफे ( मोमू-भग्निभूताना ) इत्यादि मठारद मनो।

संस्कारमा रोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्याचं स्वाहा । इटमित्रायस- त्यामामधिपतये नमम ॥८॥ प्रो वरुणोऽपामधिपतिःसमा- वत्वरिमन्ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेऽस्यामाशिप्यस्यांपुरोधायामरिम- कर्मण्यस्यांदेवहूत्यार्थ रवाहा । इदंवरुणायापामधिपत- ये नमम ।।। ओं समुद्रःखोत्यानामधिपतिःसमावत्वस्मिन्त्र- हाण्यस्मिनक्षत्रेऽस्यामाशिष्यरयांपुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां- देवहूत्यार्थ स्वाहा । इदंसमुद्रायसोत्यानामधिपतये नमम ॥१०॥ भो अन्नसामाज्यानामधिपतिःसमावन्वस्मिन्ब्रह्म- रायस्मिनक्षत्रेऽस्यामाशिष्यरयांपुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदे- वहूत्या स्वाहा । इदमन्त्रायसामाज्यानामधिपतये नमम ॥१९॥ ओं सोमनोपधीनामधिपतिःसमावस्वस्मिन्ब्रह्मण्य- स्मिन्क्षत्रेऽस्यामाशिप्यस्यांपुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देव. हत्याचे स्वाहा। इदंसोमायोपधीनामधिपतयेनमम ॥१२॥ ओं सविताप्रसवानामधिपतिःसमावस्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन्- क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यांपुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्या, स्वाहा । इदंतवित्रेप्रसवानामधिपतयेनमम१३ प्रों रुद्रपशना- मधिपतिःसमावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रेऽरयामाशिप्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्याई स्वाहा । इदंरुद्राय पशूनामधिपतयेनमम ॥११॥ अंत्र प्रणीतोदकस्पर्शः॥ भो त्व- प्टारूपाणामधिपतिःसमावत्वरिमन्ब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रेऽस्यामा शिष्यस्यांपुरोधायामरिमनकर्मण्यस्यादेवहूत्याचं स्वाहा । इदंत्वष्ट्ररूपाणामधिपतयेनमम॥१५॥ओं विष्णुःपर्वतानाम- धिपतिःसमावत्वस्मिनुब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रेऽस्यामाशिप्यस्यांपु- विवाहसंस्कारः॥ रोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्या, स्वाहा । इदंविष्णवे प्रजानामधिपतये नमम ॥१६॥ प्रओं मरुतोगणानामधिपत- यस्तेमावन्त्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यांपुरोधा- यामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्यार्थ स्वाहा।इदंमरुदभ्योगणाना- • मधिपतिभ्यो नमम ॥१॥ प्रों पितर:पितामहाःपरेवरेतता- 'स्ततामहाइहमावंत्वस्मिनब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रेऽस्यामाशिप्यस्यां पुरोधायामस्मिकर्मण्यस्यांदेवहूत्या, स्वाहा । इदंपितृभ्यः पितामहेभ्यःपरेभ्योऽवरेभ्यस्ततेभ्यस्ततामहेभ्यो नमम ॥१८॥ अत्र प्रणीतोदकस्पर्शः॥ इत्यभ्याताननामहोमः ॥ अथाज्यहोमः-प्रोअग्निरैतप्रथमोदेवताना सोस्यप्र- जांमुञ्चतमृत्युपाशात् । तदयर्थराजावरुणोऽनुमन्यतां यथेय- "ॐस्त्रीपौत्रमधन्नरोदात्स्वाहा। इदमग्नयेनमम ॥१॥ ओइमा मग्निरंत्रायतांगार्हपत्यःप्रजामस्यनयनुदीर्घमायुः॥ अशून्यो- पस्थाजीवतामरतमातापौत्रमानन्दमभिरिबुध्यतामियर्थ स्वा- हा।इदमग्नयेनमम ॥२॥ों-स्वस्तिनोऽग्नेदिवापृथिव्यावि- श्वानिधेह्यऽयथायजत्र ॥ यदस्यांमहिदिविजातंप्रशस्तंतद- स्मासुद्रविणंधेहिचित्रछस्वाहा। इदमग्नयेनमम॥३॥ओं सुगन्नु- पन्यांप्रदिशाएहिज्योतिष्मदेह्यजरन्नप्रायुः। अपैतुमृत्युरम- तंनभागाद्वैवरवतीनोऽभयंटयोतुरवाहा ॥धमग्नयेनमम ? ओम-परंमृत्योऽनुपरेहिपन्थांयरतेऽन्यइतरोदेवयानात् । च- न होम करे । तीमरी घौदहवीं और ठारहवी शाहति के अगत में दाहिने हाथ में प्रगीता के जल का स्पर्श करथे । तदनन्तर (ओम्-अग्निीतु ) इत्यादि पाँच मन्त्रों से पाच माहुति घृत को देवे। दौथी और पांचों प्राहुति के अन्त में । . सरकारमा क्षुष्मतेशृण्वतेतेन्द्रवीमिमानःप्रजाथरीरिपोमोतवीरान् स्वाहा इटवैवस्वताय नमम ॥५॥ अत्रप्रणीतोदकस्पर्शः॥ ततो वधू- मग्रतः कृत्वा वधूवरौ प्रामुखौ स्थिती भवतः ॥ ततो बरा- ज्जलिपुटोपरिसंलग्नवध्वजलिपुटोपरिघृताभिधारितवधू- भातृदूत्तशमीपलाशमिश्नलाजैर्वधूकर्तृकोहोमः ॥ ओ-अर्यमणंनुदेवकन्याअग्निमयक्षत। सनोमर्यमादे- वाप्रेतोमुञ्चतुमापतेः स्वाहा ॥१॥ इयंनार्युपतेलाजानव- पन्तिका। आयुष्मानस्तुमेपतिरेधन्तांज्ञातयोममरवाहा ॥२॥ इमाट्लाजानावपाम्यग्नी समृद्धिकरणं तव । ममतुभ्यचसंवन- नंतदग्निरनुमन्यतामियर्थ स्वाहा ॥३॥ अथारयदक्षिणहरतं गृह्णाति वरः साड्गुष्ठम्। ओं गृभ्णामितेसौभगत्वायहरतं मया पत्याजरदष्टियथासः। भगोऽर्यमासवितापुरन्धिर्मांत्वा दुर्गार्हपत्यायदेवाः ॥४॥ प्रोम-अमोहमस्मिसात्वछ सात्वम- स्यमोऽहम् । सामाहमस्मिक्त्वंद्यौरहपृथीवीत्वम् ॥५॥ तावे. वविवहावसहरेतोदधावहै प्रजांप्रजनयावहै पुत्रान्विन्द्याव- हैयन् ॥६॥सन्तुजरदष्टयःसंप्रियौरोचिष्ण सुमनस्यमानी॥ पश्येमशरदःशतंजीवेमशरदः शतशृणुयामशरद.शतम् ॥७॥ प्रीता के जल का स्पर्श करे । तदनन्तर कन्या को नागे करके काया बर दो- नो पूर्वाभिमुरा खडे हो। तदनन्तर घर फी अजलि पर मम्मिलित कन्या की अजति धरै सस काया की अवनी में घी रिलाये शमी [ करिके पत्तों अदित RIVE न की सीमा का भाई मनो अधुरती से भरे। न पुती भर लाजाओं से कन्या तीन शाहुति (श्रीम् अर्यमणं) इत्यादि तीन मन्त्रो से देवे । तदनन्तर ( गृणामिते०) इत्यादि मन्त्र पटता हुशा घर कन्या के दहिने हाथ को अंगठे सहित पकडे । तश्पश्चात् पूर्वाभिमुख खड़ा हुआ और पहिले से अग्नि के समर में रक्ती हुई पत्या की शिला पर कन्या के दहिने K विवाहसंस्कारः॥ श्रो पारोहेममश्मानमरमेव स्वयं स्थिरा भव ॥ अभितिष्ठ- 'पृतन्यतोऽववाधस्त्र पृतनायतः ॥ पथ गाथां गायति । स- रस्वतीप्रेदमवसुभगे वाजिनीयति ॥ यांत्वाविश्वस्यभूतरय प्रजायामस्याग्रतः । यरयांभूतसमभवद्यस्यांविश्वमिदंजग- । तामद्यगाथांगास्यामियास्त्रीणामुत्तमंयशइति ॥ अथ- वधूवरौ अग्निपरिकामतस्तुभ्यमग्नेइंतिमन्त्रेण ॥ ऋ० मं० १० १० ७ सू० ८५ मंत्र ३८ । तुभ्यमग्नेपर्य्यवहनसयावहतुनासह। पुनः पतिभ्योजायांदाअग्नेप्रजयासह। इतिपठन् परिकामेत् ॥ १०॥ एवं पश्चादग्नेः स्थित्वा-लाजाहोमसाङ्गुष्ठहस्तग्रह- णाशमारोहणगाथागानाग्निप्रदक्षिणानि पुनरपि द्विस्तथैव कर्तव्यानीति ॥ एतेन नवलाजाहुतयः सागुष्ठहस्तग्रहण- 3TAKERY 'त्रयं च संपद्यते तथाऽत्रासनविपर्ययः । ततोऽवशिष्टलाजैः पग को ( भारोहे.) मन्त्र को पढता हुमा घरवावे । माया पत्थर पर पा धरें ही इमी बीच में वर (ों सरस्वती) इत्यादि गाया गावे । तदनन्तर प्रागे कन्या चले और पीछे घर चले प्रणीता और ब्रह्मा सहित अग्निको दोनों परिक्रमा करें। परिक्रमा करते समय (ओं तुभ्यमग्ने०) मन्त्र को घर पढता घले । तत्पश्चात् अग्नि से पश्चिम में पूर्वाभिमुख दोनों धधू वर सष्ठे हों और पूर्ववत तीन मन्त्रों से ताजा होम अङ्गुष्ठ सहित पाणिग्रहण, अश्मारोहण गावागान और अग्नि को प्रदक्षिणा सब पूर्ववत् करके इसी प्रकार लाजा होमादि परिक्रमा पर्यन्त सब काम मन्त्रों सहित तीसरीवार भी करें। इस प्रकार नव लाजाहुति और तीन चार अङ्गुष्ट सहित पाणिग्रहण हो जाता है। इसी समय कन्या का सामन पर से उत्तर में कर देना चाहिये । तदनन्तर शमी के पत्तों सहित शेष १ २ संस्कारमासंग। कन्याभातृदत्तैरजलिस्थशूर्पकोणेन वधूर्जुहोति ॥ प्रो भ- गायस्वाहा-इदं भगाय नमम । प्रथाग्रे वरः पश्चात्कन्या तbणीमेव चतुर्थपरिक्रमणं कुरुतः ।। तत्तोवरउपविश्य ब्रह्म- णान्वारब्धमाज्येन प्राजापत्यं जहुयात् । ओ प्रजापतये स्वाहा । इदं मजापतये नमम । इति मनसा॥अत्र प्रोक्षणी- पात्रे माहुतिशेषाज्यस्य प्रक्षेपः ॥ ततभालेपनेनोत्तरोत्तरक- तसप्तमण्डलेपु वधू सप्तपदाक्रमणं वरः कारयेद् वक्ष्यमा- णमन्त्रः। ओ एकमिपेचिप्णुस्त्वा नयतु ॥ कन्या-धनधान्य- ) चमिष्टान्नं व्यञ्जनाद्यंचयद्गहे। मदधीनंच कर्त्तव्यं वधरादो- पदेवदेत् ॥१॥ वर:-द्वज्जैविष्णुस्त्वानयतु॥०-कुटुम्बंप्र- थयिष्यामि सदातेमजुभापिणी । दुःखेधीरासुखेहृष्टा द्विती- बचे लामा कन्या का भाई मप सहित कन्या को देदेवे और कन्या ( भगाया) सूप के कोणे से होम कर देवे । इस के पश्चात् मागे घर भोर पीछे बंधू चले तूष्णी चौथी परिक्रमा करें । तरपक्षात् अग्नि से पश्चिम दाहिनी और वर या बाई और कन्या बैठे तय ब्रह्मा के अधारम्भ करने पर घर मन्त्र का मन से उच्चारण करके घृत से प्राजापत्याहुति करे। यहा सुवा के शेप एत को मी. क्षणीपात्र में हाले । तदनन्तर अग्नि से उत्तर में मात गोलाकार लेपन किये मण्डली में कन्याको वर मात वार गन्ने (प्रोमेकमि०) इत्यादि मन्त्री से पग परावे। अर्थात् पहिली पा घराने में घर कहता है कि (एफमि०) भन्नादि प्राप्ति के लिये विष्णु तुम केो एक पद चलावे अर्थात् अन्नादि की रक्षा पुष्टि बनाना खिलाना प्रादि तुम्हारा काम होगा। इस पर कन्या घर से कहे कि (धन धान्यं च०) हे मान्यवर 'धन, धान्य-प्रम मिठाई, दुध दही प्रादि जी कुछ घर में रहने झाले वस्तु हो वे सब मेरे प्राधीन माप को करने चाहिये । यह पहिला पग परने में बधू कहे । तदनन्तर पर (क) बल बा रस के लिये विष्णु तुम को द्वितीय पद'चलावे। बधू (पुदम्य ) में श्राप के कुटुम्ब को बदाऊंगी और सदा कोमन्न भाषण रगी। दुख छा विपत्ति में धीरज 'रक्चूगी और मुख सम्पत्ति के समय प्रसन्न रहगी यह प्रतिक्षा वधू द्वितीय पग CREATE विवाहकारः ॥ १४१ येसाऽब्रवीद्वरम् ॥ २॥ वर:-त्रीणिरायस्पोपाय विष्णुस्त्वा- नयतु । क०-ऋतौकालेशुचिःस्नाता क्रीडयामित्वयासह । नाहंपरपतिं यायां तृतीयेसाऽब्रवीद्वरम् ॥ ३॥ वर:-चत्वा- रिमायोभवायविष्णुस्त्वानयंतु । क०-लालयामिचकेशान्तं गन्धमाल्यानुलेपनः । काजनैर्भूपणैरतुभ्यं तुरीयेसाऽब्रवीद्व- रम् ॥१॥ वरः-पञ्चपशुभ्यो विष्णुस्त्वानयतु । क०-सखी परिवृतानित्यं गृह्यकर्मणितत्परा त्यविभाजनाभविष्यामिप- चमेसाऽब्रवीद्वरम् ॥५॥ वर:-पऋतुभ्यो विष्णुस्त्वांनयतु॥ क०-यज्ञेहीमेचदानादौ भवेयंतववामतः यत्रत्वंतत्रतिष्ठामि पदेपष्ठेब्रवीद्वरम् ॥६॥ वरः-सखेसप्तपदाभवसामामनुव्रता- धरने में करे । घर-(रायस्पोपायः) धनकी पुष्टि के लिये प्रर्थात् लक्ष्मी शोभा शृगार बढ़ाने के लिये विष्णु तुम फे। तीसरा पग चलावें । वधू-(ऋतौकाले०) ऋतुफाल में स्नान कर शुद्ध हुई शुद्ध वस्त्र पहिने कर आप के साथ क्रीडा के- रूगी में कभी परपति का ध्यान भी न करूंगी यह प्रतिज्ञा तीसरा पग ध. रने में वधू करे । घर-( चत्वारिमायो० ) मुख होने के लिये चौथा पग विष्णु - तुम को चलावे । वधू-(लालयामि च०) सुगन्ध इतर फुलेल आदि देशों पर्यत सब शरीर में लगाने, केशर चन्दनादि मुगन्ध का स्नान के पश्चात अनुलेपन का रने और सुवर्ण के आभूषण पहन कर माप को प्रसन्न करूंगी यह चौथा, पग घ. रने में कन्या प्रतिज्ञा करे । वर-( पञ्च०.) गौ भैस आदि के दूध आदि से सुस होने के लिये घोड़ा प्रादि से होने वाले मुख के लिये तुम को विष्णु पांचवां पग चलावे । कन्या-( सखीपरि) मैं सदा अपनी सखी सहेलियों सहित गु- • हस्थी के काम में तत्पर रहती हुई प्रापं की भक्ति करूगी यह प्रतिमा पां- चयां पग धरने में न्या करे । यर-( पहनुः ) छः ऋतुओं सम्बन्धी मुख प्राप्त कराने के लिये विष्णु तुम को छठा पग चलावे । कन्या-(पने होमे च०) या होम और दानादि पुगय फर्म करने में मैं नापसे वायी भोर बैटूगी और जहां भाप रहेगे यहीं रहूंगी साथ नहीं छोड़ेगी यह प्रतिज्ञा छठा पग धरने में कन्या करे । बर (ससे सप्तपदा०) मेरे साथ मित्रता और सदा दृढ़ मीति रखने के लिये संस्कारमा भवविष्णुस्त्वानयतु ॥ कन्या-सर्वदेवार्चनहित्वाभजेयं त्वाः ढव्रता। भवानेवगुरुमैऽस्तिसप्तमेसाऽब्रवीद्वरम् ॥७॥ ततोऽग्नेः पश्चादुपविश्य पुरुषस्कन्धे रिचतात्कुम्भादामपल्लवेन ज. लमानीय तेन वरी वधूमभिषिञ्चति ॥ ओं प्रापः शिवाः शिवतमाः शान्ता:शान्ततमास्तास्तेसवन्तुभेषजमिति । अनेन मन्त्रेण,पुनस्तथैव तस्मादेव कुम्भात्तथैवानीतजलेन- य० अ०११ मन्त्र ५ ओम्-आपोहिष्ठामयोभुवस्तानऊज्जै- दधातन ॥ महरणायचक्षसे ॥ भोम्-योवः शिवतमोरसस्तस्यभाजयतेहनः । उशतीरिव- मातरः॥ ओम्-तस्माऽअरङ्गमानवीयस्स्य- क्षयायजिन्न्वथ॥ आपोजनयथाचनः ॥ इति तिसभिर्वधूमात्मानं चाभिषिञ्चति ॥ इति ॥ ततःसूर्यमुदीक्षस्वति वधू सम्बोधयति वरः॥ तच्चक्षुरित्युचं पठित्वा वधः सूर्य पश्येत् ॥ पतित्रता धर्म का ठीक २ पालन करने वाली मातो घामो में तुम प्रस्यात हो जाम्रो और इसके लिये विष्णु तुम को सातवा पग चलाधे । कन्या-(सर्वदेवा. ०) मैं दूढ नियम के साथ सर्व देवताओ का पूजन छोड़ के केवल एक भाप का ही भजन पूजन सेवा शुभूपा करगी लापही एक मेरे गुरु है में खासी वै. रागी सदासी सह मुसंडे किसी के दर्शन को भी कभी न जाऊंगी और किसी अन्य पुरुष का कभी मन से ध्यान भी नहीं करूंगा। तदनन्तर अग्नि से पश्चिम में बैठकर किसी पुरुष के काधेपर परे हुए पा रक्षित घडे से ग्राम के पत्तेदारा जन्न लेकर वर वधू के शिर प (ओ-श्राप पिक) से अभिषेक करे तया (भापोहिया) इत्यादि तीन भावों से बधूके और अपने दोनो के अपर अभिषेक करे । तब . .. विवाहसंस्कार यजु०प्र० ३६ मंत्र तच्चक्षुदैवहितम्पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतञ्जीवेम शरदः शतथं शणु- याम शरदः शतम्प्रनवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतम्भूयश्च शरदः शतात् ।। इति पठित्वा सूर्य पश्यति ॥ अस्तंगते सूर्य ध्रुवमुदीक्षस्व इति प्रेपानन्तरं कन्या ध्रुवं पश्येत् । यदि ध्रुवतारा. न हश्येत तथापि कन्या पश्यामीति यात्। तत्र वरपठनीयो मन्त्रः ॥ . ओं-ध्रुवमतिध्रुवत्वापश्यामि ध्रुवैधि- पोप्ये लमि। मात्वादाबृहस्पतिर्मयाप- त्याप्रजावतीसञ्जीवशरदःशतम् ॥ird. अथ वरो वदक्षिणांसस्योपरि हस्तं नीत्वा तस्या हृदयमालभेत । मन्त्री यथा.. ममत्रतेतेहृदयंदधानिममचित्तमनुचित्तं- तेऽस्तु ॥ ममवाचमेकमनाजुषस्वप्रजाप- तिष्ट्रानियुनक्तुमह्यम् ॥ वर हे (भूर्यमुदीक्षस्व०) कि तुम सूर्य को देखो और वधू (तचक्षुर्देव० ) मन्न पढ़ के सूर्य का दर्शन करे। यदि सूर्य के अस्त होजाने पर रात्रि में विवाद हो तो घर कहे ( ध्रुषमुदीक्षख) फि तुम ध्रुव के देखो और ( भुवमतिः) इत्यादि मन्त्र को वरं पढ़े । यदि कन्या को ध्रुव न दोखता हो तो भी कहदे कि (प. श्यामि) देसती हूं ! सत्पश्चात् बा बधू के दहिने कन्धे के ऊपर से दहिना हाथ लाकर बध के हृदय का स्पर्श (ममत्रते) मात्र पढ़ के करें । तदनन्तर बरपू की । - संस्कारमामहा। इति मन्त्रेण ।' प्रथ वधूमभिमन्त्रयति वरः । सुमङ्गलीरियंवधूरिमार्थसमेत पश्यत । सौभाग्यमस्यै दत्वा याथास्तं विपरतन ॥ अथ स्विष्टकृद्धोमः॥ ओं अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा। इदमग्नये स्विष्टकृते नमम ॥ अन सुवावशिष्ठाज्यरय प्रो- क्षणोपात्रे प्रक्षेपः । अयज होमो ब्रह्मणान्वारस्धकर्तृकः ॥ अथ संसूधप्राशनम् । ततप्राचम्य पर्ण पात्रं दक्षिणां ब्रह्मणे दद्यात् ।। ओं प्रद्यकृतद्विवाहहोमकर्मणि ब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थ मिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदैवतममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्रह्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणा तुभ्यमहं सम्प्रददे। ओ रवस्तीत्युक्त्वा त्र- हा प्रतिगृह्णीयात् । तत-प्रोमद्य कृतद्वियाहहोमकर्मण्या- चार्यकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं हिरण्यमग्निदेवतं द्रव्यं यथानाम गोत्रायाऽमुकशर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रददे ॥ अत्र ग्रामवचनं च कुर्युः ॥ओं समिनिया न मापनोपधयः सन्तु । इति पवित्रद्वारा प्रणीताजलं गृहीत्वा शिरः समृज्य । ओर देखता हुमा (कुमङ्गनीरिया), मन्त्र पढे । पश्चात द्रमा के भावारम्भ करने पर (अग्नयेबिष्ट) मन्त्र से स्विकृत भाति करे और सुधा मंचचे शेष पृतबिन्दुनों को प्रोक्षणी पात्र में गिरावे । सम भस्रव प्राशन कर भापमान काके (ोमद्य ते) इत्यादि सरूप याश्य पढ के प्रथम प्रस्मा को पूर्ण पात्र दक्षिणा देवे ब्रह्मा स्वस्ति फार कर स्वीकार करे । तदनन्तर साधार्य को भी वक्त प्रकार दक्षिणा देवे । इसी समय घद्ध स्त्री पुरुषों के कंधानानुसार पुलाचार देशाधार की रीति करे तदनतर (प्रोममित्रियान) मात्र पढके प्र. होता के जल से पवित्र द्वारा शिपा मार्जन करे और ( श्रोदुर्मित्रिक) मात्र विवाहसंस्कारः ॥ १४५ ओं-दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यच वयं द्विष्मः ।। इत्यैशान्यां सपवित्रां सजला प्रणीतां न्यब्जीकुर्यात् ॥ ततः स्तरणक्रमेण बर्हिरुत्थाप्य प्राज्येनाभिघार्य वक्ष्यमाणम- न्त्रेण हस्तेनैव जुहुयात् ॥ य० प्र०८ मं०२१ । ओम्-देवा गातुविदो गातुं विवत्त्वा गा- तुमित । मनसस्पतऽइमं देवयज्ञथं स्वाहा व्वातेधाः स्वाहा ॥ इति बहिहीमः ।। ततउत्थाय वध्वा दक्षिणहरतेन स्पृष्टः सुवस्थघृतपु- उपफलैः पूर्णाहुतिं कुर्यात् ॥ मूर्द्वानमिति मन्त्रस्य भरद्वाज ऋषिर्वैश्वानरो देवता त्रिष्टुप्छन्दः पूर्णाहुतिहोमे विनियोगः। यजु प्र०७ मं०२४ ओम्-मुनिं दिवोऽअरतिस्पृथिव्यावैश्वान- रमृतऽआजातमग्निम् । कवि/समाजमतिथिं जनानामासन्नापात्रंजनयन्त देवाः स्वाहा ॥ इदमग्नये नमम ॥ ततउपविश्य स्रवेण भस्मानीय दक्षिणानामिकाग्रगृहीतभस्मना । प्रणीता के शेप जलको ईशान दिशा में लौटा दे। तब स्तरण क्रम से कुशों को उठाकर घृत से अभिधारण करके (ो देवागातु ) मन्त्र पढ़ के हाथ से ही कुशो का होम कर देवे । तदनन्ता पर खड़ा होके बधू के दाहिने हाथ से स्पर्श कराये घृत पुष्प मोर फलो से भरे चुवाद्वारा (प्रोमूनिं) मन्त्र पढ़के पूर्णाहुति देये । तय नुवाद्वारा भस्म लेकर दाहिने हाथ की अनामिका से (व्यायुपं०) से संस्कारमातर ग य० प्र० ३ मं० ६२ ओं-ज्यायुषंजमदग्नेः । इतिललादे। ओं-कश्यपस्य व्यायुषम् । इति ग्रीवायाम् । ओं-यद्देवेषुत्र्यायुषम्। इति दक्षिणबाहुमूले॥ ओं-तन्नोऽअस्तुत्र्यायुषम् । इति हृदये ॥ अनेनैव क्रमेण वध्वापि व्यायुपं कुर्यात् । तत्र त- नोइत्यत्र तत्ते इति विशेषः ॥ तताचारात्शणशदखश- मीपुष्पाक्षतारोपणसिंट्टरकरणं वरः कुर्यात् ॥ अथ वेदितो मण्डपमागत्य दूर्वाक्षतादिग्रहणम् ॥ ततरित्ररात्रमक्षाराल- वणाशिनौ अधःशायिनी निवृत्तमधनी भवतः । माडमुसी वधूवरी स्थिती भवतः ॥ इति विवाहपतिः समाला ॥ अथ चतुर्धीकर्म प्रारभ्यते ॥ तत्र चतुर्यागपररात्रे ध. तु(कर्म तच्च गृहाभ्यन्तरएव कार्यम् । ततउद्वर्तनादि है. त्वा युगकाप्ठउपविश्य वधूवरौ प्रामुखी भवतः ॥ ततः ललाट में ( कश्यपस्या) से पराठ में ( यद्देयेपुर) से दक्षिण याह के मूल में और (तो) से अपने हृदय में भस्म लगाये । इसी प्रकार वधू के भी पा. टाल में भस्म लगावे बधू के भस्म लगाते समय (तनो०) के स्थान में (तत) ऐसा पाठ मन्त्र में कहे । तदनन्तर प्राधार के अनुसार शण, शंड्स शमीपत्र पुष्प और गीले प्रक्षतो से घर कन्या के मिन्दर परे । तम वेदि में मरहप में भाकर दृक्षितादि ग्रहण करें। भागे तीन दिन शोना भोजन यरें पृथिवी पर सोचे प्रलचर्य से रहें । इति विषाहपति समाता ॥ प्रथ-चतर्थी कर्म विवाद से चौधे दिन रात्रि के १२ बजे पलात यह विषाद का शेप षर्म घर के भीतर करना चाहिये। उपदना भोर स्नानादि का मधु दोनो काष्ठ 'चतुर्थीकर्मसंस्कारः ॥ १४७ कुशकण्डिकाप्रारम्भक्रमः-जामावहस्तपरिमितां वेदी कुशैः परिसमुह्य तान्कुशानेशान्यां दिशि निक्षिप्य गोमयीदकेनोप- लिप्य स्फ्येन सुवेण वा प्रागग्रमादेशमात्रनिरुत्तरोत्तरक्रमे णोल्लिख्यउल्लेखनक्रमेणानामिकाङ्गुष्ठाभ्यामूदमुद्धृत्य जले- नाभ्युक्ष्य तत्र तूष्णीं कांस्यपात्रेणाग्निमानीय स्वाभिमुखं निदध्यात् ॥ ततः पुष्पचन्दनताम्बूलबस्त्राण्यादाय । ओं अस्यां रात्रौ कर्तव्यचतुर्थीकर्महोमकर्मणि कृताऽकृतावेक्षण- रूपब्रह्मकर्मकर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पच- न्दनताम्बलवासोभिर्ब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे । इति ब्रह्माणं वृणुयात् । ओं वृतोऽस्मीति प्रतिवचनम् । यथाविहितं के- म कुर्बिति वरेणोक्ते । करवाणोति ब्राह्मणो वदेत् ॥ ततो- ऽग्नेर्दक्षिणतः शुद्धमासनं दत्त्वा तदुपरि प्रागग्राकुंशाना- स्तीयं ब्रह्माणमग्निप्रदक्षिणक्रमेणानीय, प्रओं अत्र त्वं मे की चौकियों पर पूर्वाभिमुस बैठें और वेदिपरिममहनादि होम यथा विधि करें। प्रथम वेदि में पञ्चभूमंस्कार करे-तीन कुशों से वेदि को फोड़ कर कुशों को ईशान कोण में फेंक कर गोवर और जल से लीप कर सुवा के मूल या स्क्य से घेदि में उत्तर २ मागायत तीन रेसा करे अनामिका और अडगुष्ठ से रेखाओं में से मट्टी को इटा फर फेंक के वेदि में जलसेचन करे । फिर कांसे वा मट्टी के पात्र में अग्नि लाकर पश्चिमाभिमुख स्थापन करे। तरपश्चात्-पुष्प चन्दन ताम्बूल और वस्त्रों को लेकर (ोमद्य) इत्यादि वाक्य पढ़के यजमान वर ब्रह्मा का घरण करे और पुष्पादि ब्रह्मा के हाथ में देवे । ब्रह्मा पुष्पादि को लेकर (वृतोऽस्मि ) कहे । तय ( यथावि० ) यजमानकहे और ब्रह्मा (करवाणित) कहे । तब अग्नि से दक्षिण में शुद्ध प्रासन चौकी शादि विछाकर उस पर पूर्व को जिन का अग्रमाग हो ऐसे कुश विछाकर ब्रह्माको अग्नि को प्रदक्षिणा क: राके ( अस्मिन् कर्मणि त्वं मे ब्रह्मा भव ) इस कर्म में तुम मेरे ब्रह्मा हो ऐसा पुरतः कृत्वा वारिणा संस्कारमा पह ब्रह्माभवइत्यभिधाय ।ओं भवानीति ब्राह्मणेनोक्ते। कल्पि- तासने उदङ्मुखं ब्रह्माणमुपवेशयेत् ॥ ततः एथूदकपात्रम- ग्नेरुत्तरतः प्रतिष्ठाप्य प्रणीतापात्रं परिपूर्य कुशैराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्याग्नेरुत्तरत: कुशोपरि निदध्यात् ॥ ततः परिस्तरणम् । बर्हि पश्चतुर्थ- भागमादायभाग्नेयादीशानान्तं ब्रह्मणोऽग्निपर्यन्तम् नैर्ऋ- त्याद्वायत्यान्तं अग्नित: प्रणीतापर्यन्तम् । ततोऽग्नरुत्तर- त: पश्चिमदिशि पवित्रच्छेदनार्थं कुशत्रयं पवित्र करणार्थ खानमनन्तर्गम कुशपत्रद्वयं प्रोक्षणीपात्रमांज्यस्थाली सम्मा- जनार्थ कुशत्रयं उपयमनार्थं वेणीरूपं कुशत्रयं समिधस्तित्रः खुधः आज्यं । तगडुलपूर्णपात्रम् । एतानि पवित्रच्छेदन- कुशानांपूर्वपूर्वदिशि कमेणासादनीयानि ॥ ततः पवित्रच्छे- दनकुशैः पवित्रे छित्त्वा प्रादेशमितपवित्रकरणम् ॥ ततः • कहकर ब्रह्मा के ( भवानि) कहने पर उस आसन पर ब्रह्मा को उत्तराभिमुख धैठा कर किमी बढे नानपात्र को अग्नि से उत्तर में स्थापित कर प्रणीतापान को सामने रसके जल से भरके फुशों से भापवादन कर ग्रा का भुगम अवलोकन करके सग्निसे उत्तर में कुशौंपर प्रणीतापात्र को प्रागन रक्से । तदनन्तर धार मुट्ठी फुश लेकर अग्नि के सप और परिश्तरण फरे-एक चौथाई कुश अग्नि- कोण से ईशान दिशा तक, द्वितीयभाग ब्रह्मा के प्रागन से अग्निपर्यन्त, तृतीय. भाग नेतकोण से घायुको पर्यन्त और चोधाभाग अगि से पीता पर्यन्त विठाधे । तदनन्तर अग्नि से उत्तर में प्रायसंस्य पात्रासादन करे । पवित्र छेदनार्थ मोन कुश तथा पविकरणार्थ अग्रभाग सहित जिन के भीतर प्रन्य कुश न हों ऐसे दो कुश, प्रोक्षणीपात्र, भाग्यस्याली, संभागनकुश, उपपम नकुश, दाक फी तीन समिधा, सुप, प्राज्य, पापों से भरा एक पूर्णपात्र, पवित्र पोदन कुशों से पूर्व पूर्व दिशा में कम से घर को जयभाग का २४न सय का स्थापन करे। . वित्राटेदना तीन कुों से प्रदेशमात्र दो कुशों का छेदन फरक पवित्र सहित - - चतुर्थीकसंस्कारः॥ १४९ सपवित्रकरण प्रणीतोदकं त्रिःप्रोक्षणीपात्रेनिधाय अनामि- काङ्गुष्ठाभ्यामुत्तराने पवित्रे गृहीत्वा निरुत्पवनं ततः प्रोक्ष- णीपात्रस्य सव्यहस्तकरणम् । पवित्रे गृहीत्वा त्रिरुदिननम् । प्रणीतोदकेन प्रोक्षणीप्रोक्षणम् । ततः प्रोक्षणीजलेन यथा- सादितवस्तुसेचनम् ॥ ततोऽग्निप्रणीतयोमध्ये प्रीक्षणीपात्रं निधाय, भाज्यस्थाल्यामाज्यनिर्वापः । ततोऽधित्रयणं त. तो ज्वलत्तृणादिना हविर्वैप्टयित्वा प्रदक्षिणक्रमेण पर्य- ग्निकरणम् । ततः सुवं प्रतप्य सम्मार्जनकुशानामग्रैरन्त- रतो भूलैाह्यतः वसंमार्जनम् ॥ प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य पु. नः प्रतप्य सुवं दक्षिणतो निदध्यात् ॥ तताज्यस्याग्नेरव- तारणम् । तत प्राज्ये प्रोक्षणीवदुत्पवनम् । आज्यमवेक्ष्य सत्यपद्व्ये तन्निरसनं पुनः पूर्ववत्प्रोक्षण्युत्पवनम् । उप- दहिने हाथ से प्रणीता के जल को तीन चार प्रोक्षणीपात्र में डाल कर अनामिका शोर अगुष्ठ से पकडे हुए पवित्रो से उस प्रोक्षणीस्य जल का उरपवन करे और प्रणीता के जन्म से प्रोक्षणीस्थ जल का पवित्रों द्वारा तीन वार अभिसेचन कर के प्रोक्षणीपात्र के जल से प्रासादन किये प्राज्यस्थाली मादि का सेवन करके अग्नि और प्रणीतापात्र के बीच में प्रोक्षणीपात्र को रख देवे । तय पाउयस्था- घृतपान से घृत गिरावे और घृत को अग्नि पर घरके सूखे कुश जलाकर घो के कपर प्रदक्षिण भ्रमण करके शाग्नि में जलते कुथ फेंक कर नुया का तीन पार अग्नि में तपा के संमार्जन कुशों के अग्रभाग से भीतर की ओर पुणे के मनभाग से बाहर की ओर जुवा को झाड़ पोंछ शुद्धफर तथा प्रणीता के जल से सेचन करके और फिर तीन बार तपा के अग्नि से दक्षिण की और युवा को घर देवे । तत्पश्चात तपते हुए घो को अग्निसे उतार के उत्तर में घरे । तब तीन चार प्रोक्षणी के तुरुय पवित्रो से घी का उत्पवन करके देखे यदि घृत कुछ निकृष्ट वस्तु हो तो निकालकर फेंक देवे और फिर तीनबार मोक्षणीपात्र संस्कारमातगड यमनकुशान्यामहस्तेनांदाय उत्तिष्ठन् प्रजापतिं मनसाध्या- स्वा तपणीमग्नी धृताक्ताः समिधस्तिसः क्षिपेत् । तत उप- विश्य मोक्षणीजलेनाग्निं प्रदक्षिणं पर्युक्ष्य पवित्रे प्रणीता- पाने धृत्वा ब्रह्मणान्वारब्धः पातितदक्षिणजानुर्जुहुयात् । तत्रापारादारभ्याहुतिचतुष्टये तत्तदाहुत्यनन्तरं खुवावस्थि- ताज्यं मोक्षायां क्षिपेत् । श्री प्रजापतये स्वाहा । इदं म- जापतये नमम । इति मनसा । ओं इन्द्राय स्वाहा । इद- मिन्द्राय नमम । इत्याघारौ। प्रोम-अग्नये स्वाहा । इदम- ग्नये नमम । ओं सोमाय स्वाहा । इदं सोमाय नमम ॥ इ. त्याज्यभागौ ॥ ततम्राज्याहुतिपञ्चत्तये स्थालीपाकाहुती च प्रत्याहुत्यनन्तरं सुवावस्थितहुतशेपघृतस्य चरोश्च मो- क्षणीपात्रे प्रक्षेपः । ब्रह्मणान्वारब्धं विना जहुयात् । ओं-अग्ने प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रा- का उपवन करे । तदनन्तर उठकर एयमनकुश्शों को काम हाथ में लेके मजा- पति का मन से ध्यान करफे घृत में छुशोई तीन समिधानी को तूष्णी विना मन्त्र पहे एक २ कर अग्नि में पढाये। फिर बैठ कर पवित्र सहित मोक्षणोके जल को प्रदक्षिणकम से ईशानकोण से लेकर उत्तर दिशा तफ अग्निफे सब ओर सेवन करे अर्थात् प्रोक्षणीयात्र का सब जल प्युक्षण में गिरा देवे । प्रणीतापात्र में दोनों पवित्र रखके प्रोक्षणीपात्र का विमलेन रे। तदनन्तर ददिने घोटू को भूमि में टेककर ब्रह्मा से अन्याय हुमा यर यममान प्रज्वलित अग्निमें सुधा से धाग्याहुतियों का होम को पहर २३२ प्राप्ति के देने पक्षात् सुधा में जो पृतविन्दु बर्वे उन को प्रोक्षणीपात्र में हालता नावे । प्रजापति का मन से पान फर पूांधार को तूला प्राप्ति देवे और यजमान स्वय सब त्याग यो. लता जाय । प्राधार की दो आज्यमाग को दी इन चार माहुतियों को देकर पाच भाग्याहुतियो घोर स्थानीपाकाहुति में प्रत्येक माहुति के पश्चात् स्नुषा में वधे शेष घत ओर १ को प्रोक्षणीपात्र में हालता जाधे ( भने मायश्चि०) चतुर्थी कर्म संस्कारः ॥ यश्चित्तिरसि। ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उप- धावामि याऽस्यै पतिघ्नी तनूस्तामस्यै ना- शय स्वाहा । इदमग्नये नमम॥ ओं वायो प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्रा- ह्मणस्त्वा नाथकामउपधावामि याऽस्यै प्रजाघ्नी तनूस्तामस्यै नाशय स्वाहा ॥२॥ इदं वायवे नमम । ओं सूर्य प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथ- कामऽउपधावामि यास्यै पशुघ्नी तनूस्ता- मस्यै नाशय स्वाहा॥३॥इदं सूर्याय नमम। ओं चन्द्र प्रायश्चित्ते त्वं.देवानां प्रायश्चि त्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकामऽउपधावामि याऽस्यै गृहपनी तनूस्तामस्य नाशय स्वाहा ॥४॥ इदं चन्द्रमसे नमम । ओं गन्धर्व प्राय- शिचत्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मण- रत्वा नाथकामउपधाबामि याऽस्य यशो- घ्नी तनूस्तामस्य नाशय स्वाहा ॥५॥ इदं. गन्धर्वाय नमः। .

संस्कारमा ततश्चरुमभिघार्य स्थालीपाकेन जुहुयात् । श्रओं प्रजा- पतये. स्वाहा । इदं प्रजापतये नमम । इति मनसा ॥ तत्त आज्याहुतिनवके हुतशेपघृतस्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः । अयं च होमो ब्रह्मणान्वारब्धकर्त कोतत प्राज्यरथालीपाकाभ्यां स्विष्टकृद्धीमः ॥ों अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा । इदमग्नये स्विष्टकते नमम। ततऽऽआज्येन । श्री भूः स्वाहा । इदम- ग्नये नमम। ओं भुवः स्वाहा । इदं वायवे नमम । ओं स्व: स्वाहा । इदं सूर्याय नमम । एता महाव्याहृतयः ॥ (शुक्लयजुर्वेद अध्याय २१ मंत्र ३) श्री त्वन्नोऽअग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडोऽअवयासिसीष्ठाः ॥ यजिष्ठो वहित- भः शोशुचानी विश्वा द्वेषार्थसि प्रमुमुग्ध्य- स्मत्स्वाहा ॥ इदमग्नीवरुणाभ्यां नमम ॥१॥ (शुक्लयजु० अध्याय २१ मन्त्र ४॥) ओं स त्वन्नोऽअग्नेऽवमी भवोती नेदि- ष्ठोऽअस्याऽउषसो व्युष्टौ ॥ अवयव नो वरुणथं रराणो वीहि मडीकथंसहवो नराधि इत्यादि पांच मन्त्रों में पांध पाहुति घृत को देकर चरू का अभिधारण करके स्वा. लोपाक से एक प्राजापत्य माहुति का होम तूष्णी फरे। तदनन्तर प्रगली नोक्षा- ज्याहुतियों में प्रत्येक माहुति के पश्चात् स्नुषा में शेष वधे घृत बिन्दुओं को प्रोक्षणी- पात्र में गिराता जाधे और माला प्राधारसमकरने पर इन नष प्रातियों का होम करे। पृत और स्थालीपाक दोनों से स्विष्टकत माहुति देकर महाव्यातियों की - । -- नुकमै संस्कार स्वाहा ॥ इदमग्नये नमम॥२॥ओम्-अया- श्चाग्नेऽस्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्वम- याऽअसि। अयानो यज्ञं वहास्ययानो धेहि भेपजथं स्वाहा ॥ इदमग्नये नमम ॥३॥ ओं ये ते शतं वरुण ये सहस्र यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः। तेभिन्नोऽअद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वाः स्वाहा ॥ इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो दे- वेभ्यो मरुद्भ्यः स्वभ्यो नमम ॥४॥ शुकृयजुर्वेद अध्याय २१ मन्त्र १२ ।। श्रीम्-उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधम वि: मध्यम प्रथाय । अथा क्यमादित्य व्रते तवानागसोऽअदितये स्याम स्वाहा॥इदंव- रुणाय नममाशारताःसर्वप्रायश्चित्तसंज्ञकाः। प्रजापतये स्वाहा।इदं प्रजापतये नमन। इति मनसा।इदंप्राजापत्यं ततः संघप्राशनम्। प्राचम्य- सोमस्या रात्री कृततचतुर्थीहीमकर्मणि कृताऽटतायेक्षगार- पनकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदेवतममुकगी- सीन मप्रायशिको पनि तपा गम से भाजापत्य एक ग म माहुतियों को त्यागों सहित देश संखबमायन पा धाक्षमन र पाप पत्र प्रहलाको । संस्कारमातंगड ॥ त्रायामुकशर्मणे ब्रह्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तभ्यमहं संप्रददे। इति दक्षिणा दद्यात् ॥श्री स्वस्तोति प्रतिवचनम् ॥ ततः- ओ-सुमिनिया नऽआपोपधयः सन्तु । इति पवित्राभ्यां शिरः संमृज्य । औदुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्द्वेष्टि यञ्च वयं द्विष्मः॥ इत्यैशान्या दिशि प्रणीता न्युटजी कुर्यात् । तत. रत- रणक्रमेण वर्हिरुत्थाप्य घृताक्तं कृत्वा हस्तेनैव जुहुयात् ॥ शुक्ल यजुर्वेद अध्याय ८ मंत्र २१ ओ देवा गातुविदो गातुं विवत्वा गातुमि- त। मनसस्पतऽइमन्देवयज्ञथं स्वाहा व्वा: तेधाः स्वाहा॥ तत प्रामपल्लवेन जलमादाय वरो मूर्ध्नि वधूमभिपिञ्चति- ओं या ते पतिघ्नी प्रजाघ्नी पशुध्नी गृ- हनी यशोघ्नी निन्दिता तनूर्जारघ्नी तत दक्षिणा देवे तथा ब्रह्मा (मो स्वस्ति) कह कर दक्षिणा का स्वीकार करे । त पान्तर ( मुमित्रि०) मात्र पढ के पवित्रो द्वारा प्रणीता का जल लेकर शिर में सम्मान करे तथा (दुर्मित्रि०) मन्त्र पढ़ के प्रणीता के शेष जल को ईशान दिशा में लौट देवे पन्नात् जिस क्रम से विधाये थे उसी क्रम से भय कुश ठा पर कुगो में घी लगाके (भो देवागातु) मन्त्र पट हाथ मे ही होम कर दे पवार घर नाम के पत्ते से जल लेकर वधू के मर्दापर (को पाते पतिानी ) H चतुकर्मसंस्कार एनां करोमि सा जीर्य त्वं मया सह, श्री अ. मुकदेवी। इति मन्त्रेण।। ततो वधू स्थालीपाकं प्राशयति वरः । ओं-प्राणैस्ते प्राणान्संदधामि । ओं- अस्थिभिस्तेऽस्थीनि संदधामि ॥ ओं-मार्थ सैस्ते माथंसानि संदधामि । ओं-त्वचा ते त्वचं संदधामि ॥ इति मन्त्रचतुष्टयेन प्रतिमन्त्रान्ते अन्नप्राशयेत् ॥ ततो वधू हृदयं स्पृशन वरः पठेत् । ओं-यत्ते सुसीमे हृदयं दिवि चन्द्रम- सि शितम् । वेदाहं तन्मां तद्विद्यात्पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतथं शृणुयाम शरदः शतमिति ॥ तत उत्थाय वधूदक्षिणहस्तस्पृष्टसुत्रेण घृतफलपुष्प पूर्णन पूर्णाहुतिं जुहुयात् ॥ ( यजु० अध्याय ७ मन्त्र २४ ) ओं सूर्धानं दिवोऽरतिस्पृथिव्या वैश्वा- मन्त्र से अभिषेक करे। तदनन्तर घर वधु को (पोप्राणैस्ते०) इत्यादि चार मन्त्री से प्रत्येक मन्त्र के अन्त में अपने हाथ से भात ले २ कर चार ग्रास खवावे । तदनन्तर ( शो यत्तेमु०) मन्त्र पढके घर वधू के हदय का स्पर्श करे । तत्पश्चात- उठ रडा होके वधू के दाहिने हाथ से स्पर्श कराये घृत फल और पुष्पो से भरे हुए सुवा से (ो भून ) मन्त्र पढ़ के पूर्णाहुति करे और सुधा के मूल . १५६ सकारमा नरमृतऽाजातमग्निम् । कवि/सम्माजम- तिथिजनानामासन्ना पात्रञ्चनयन्त देवाः स्वाहा ॥ इदमग्नये नमम ॥ ततः सुवेण भस्मानीय दक्षिणानामिकया ध्यायुपं कुर्यात् । यजु० अध्याय ३ मन्त्र ६२- ओं व्यायुषं जमदग्नः॥ इतिललाटे । श्री कश्यपस्यव्यायुषम्। इति ग्रीवायाम् । श्री यदेवेषु व्यायुषम् । इतिदक्षिणवाहुमूले ॥ ओं तन्नो अस्तु व्यायुषम् ॥ इति हृदये। ... एवं वध्वापि व्यायुपकुर्यात् । तत्र तत्रोइत्यरय. स्थाने तत्तइति विशेषः । ततभाचार्याय दक्षिणां दद्यात् ॥ भूयसी दद्यात् ॥ इति चतुर्थाकर्म समाप्तम् ॥ द्वारा लाये भस्म को दहिने हाथ की अनामिका फै. अग्रभाग से (व्या पं० ) से ललाट में ( कश्पपरयः) से कण्ठ में ( यद्देवेषु०), दहिने वाहू के मूल में और (तन्नोभरतु०.) से हृदय में मरम लगाये। इसी प्रकार वधू के भी न्यायुप करे तस में (तन्नोः) के स्थान में (तचे ) कहे तदनन्तर प्राचार्य को दक्षिणा देवे शत्य भुपाओं को भी यथाशक्ति यथायोग्य देवे . इति च कर्म समाप्तम् ॥

अथान्त्येष्टि कर्म निरग्निकानाम् ॥ यदि नियमाणसंवन्धिनो दानं चिकीयुस्तर्हि मनु- प्याणां मरणकालात्प्राक् तस्य स्वस्थदशायामेव कुर्युनच मरणकालेऽतिसंनिहिते कुर्युः । करणकाले सन्निहिते मिय- माणरय सम्बन्धिनईश्वरभक्त्यर्थमुपदिशेयुः संसाराद्वैराग्यं च दर्शयेयुः। भगवद्गीतादिस्य शान्तिजनक सदुपदेशं च श्रा- वयेयुः। संप्रगवां गायत्री च स्मारयेयुः। तथा च-भगवद्गीता- यामुक्तम्-प्रोमित्येकाक्षरब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यःप्र- यातित्यजन्देहं सयातिपरमांगतिम् ॥ ततः प्राणोपत्कान्तेषु कर्ता पुत्रादिः स्वस्य केशश्मयुवापनानन्तरं स्नात्वाऽहते वाससी परिधाय मृतसमीपे गत्वा शवं स्नपयित्वाऽहतवस्त्रं परिधाप्योत्तरीयं च परिधापयेत् । शवस्य सर्वाङ्गेषु चन्दना- नुलेपनं कुर्यात्पुप्पमालाश्च परिधापयेत् । पुरुपश्चेनवं यज्ञो- भावार्थ:-मनुष्य के मरने के समय पुत्रादि लोग यदि दान करना चाहे तो मनुष्य के मरने से पहिलो उम को स्वस्य दशा में ही करें। किन्तु माण निकलने का समय अतिममीप आजाये तव न करें । मरया समय के समीप प्राजाने पर मरते के सम्बन्धी लोग ईश्वर भक्ति के लिये उपदेश करें संसार से वैराग्य दिखार्वे और भगवद्गीतादि में लिखा सदुपदेश मुना तथा प्रोंकार सहित nr. मंत्री मन्त्र का स्मरण कराये। और भगवद्गीता में भी कहा है कि जो पुरुप मरण समप में प्रोम् इस एकाक्षरवेद मात्र का उपचार करता और मुहाईवर का स्मरण फरता हुमा शरीर को छोडता है वह परमोत्तमगति को पास होता है तदनन्तर प्राणान्त हो जाने पर क्रिया करने वाला पुत्रादि अपने बाल साढ़ी' मॉल मुहवाके स्नान कर शुद्ध कोरे दो वस्न पहन कर मृतक के समीप जा. कर मृतक को स्नान करा और कोरा नया पोत वस्त्र पहना कर कपर से हु- पट्टा उढा। मृतक के सब अगों में चन्दन का अनुलेपन करे और पुष्पों की माला पहिनाये । यदि पुरुप मृतक होता नया योपवीत भी पहनाये । तदा - .

मस्कारमार्तण्डः । - पत्रीतं च धारयेत् । ततः कर्ता पुत्रादिरपसव्येन देशकाली संकीर्त्य-अमुकगोत्रस्य पितुरमुकप्रेतस्य प्रेतत्वनिवृन्या उ- त्तमलोकप्राप्त्यर्धमौर्ध्वदेहिकं करिष्यति संकल्प्यैकोद्दिष्ट- निमित्तकं मरणस्थाने शवनाम्नां पिण्ड दद्यात्-तत्रायं प्र. कार:-प्राचम्य प्राणानायम्यापसव्येन कुशानादाय शवस- मीपे दक्षिणामुख उपविश्यं-प्रोत्यादि संकल्प्य-अमुकगो- भामुकप्रेतःब्रह्मदैवतक एपं ते पिण्डो मया दीयते तवोप- तिष्ठताम्-इति ब्रह्मपिण्डं दत्त्वा द्वारदेशे विष्णुपिण्डं दद्यात् । अमुकगोत्रामुकप्रेत विष्णुदेवतक एप ते पिण्डो मया दीयते तवोपतिष्ठताम्। इति । ततो वस्त्रेण प्रच्छादि- तमुखं प्रेतं प्रारशिरसमूर्ध्वमुखं गृहानिष्काम्य दाहदेशे प्रति नयेयुः । गमनकाले यमगाथां गायन्तो यमसूक्तं वा जप- न्तो वृद्धवयसोऽग्ने कृत्वाऽल्पाल्पवयसः पश्चात्कृत्वा गच्छेयुः। अहरहर्नयमानो गामस्वपुरुपंगजम् । वैवस्वतोनतृप्यति सुरयाईवदुर्मतिः ॥ इति यमगाथा ॥... नन्तर पुत्रादि क्रिया काने वाला अपसव्य हो देशकाल को कह कर (अमुकगो०) इत्यादि सकरुप करे । एकोद्दिष्ट के लिये मरण स्थान में मृतक के नाम से एक पिण्ड देवे । उस की गति यह है कि-प्राधमम प्राणायाम कर सासव्य हो कुशों को हाथ में ले के मृतक के समीप दक्षिणाभिमुख बैठ कर ( प्रद्यर ) इत्यादि संकल्प कह के अपनेजन पूर्वक महादेवतक महिला पिण्ड धरे कपर गे यथोक्त • प्रत्ययमेजन करे। तदनन्तर द्वार देश में विष्णदेवतक पिण्ड नयनेजन प्रत्यक्ष जन सहित देवे । तदनन्ता वस्त्र से मृतक का मुख ढोपकर पूर्व को शिर ऊपर को मुख किये मृतक को घर से निकाल के श्मशान स्थान को ले चलें । धनते समय अधिक २ प्रायु पाल्ने भागे पर्ने तथा कमर नायु पाले पीले चले तथा चलते हुए ( महरहर्नय०) इत्यादि यमगाधा का गान घायाभूल कर अप करते जायें।

. अन्त्येष्टिसंस्कारः॥ १५८ अथ यमसूक्तप्रारम्भः,... ी-तदेव । तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्त- दुचन्द्रमाः। तदेवशुक्रन्तद्ब्रह्मताऽआपःस- प्रजापतिः॥१॥ओं-सर्वनिमेषाः। सर्वेनिमेषा- जजिरेविद्युतःपुरुषादधि । नैनमूर्ध्वनतिर्य जन्नमध्यपरिजग्ग्रभत्॥२॥ओं-न तस्य प्प्र- तिमाऽअस्ति यस्यनाममहद्यशः।हिरण्यगर्भ- ऽइत्येपमामाहिथंसोदित्येपायस्मान्नजात इ- त्येषः ॥३॥ओं एषोह देवःप्रदिशोऽनुसर्वाःपू. वाहजातःसऽउगर्भऽअन्तः। सऽएवजातःसज- निण्यमाणःप्रत्यङ्जैनास्तिष्ठतिसर्वतोमुखः४ ओं-यस्लाउजातन्नपुराकिञ्चनैव यऽआबभूव सुवनानि विश्वा। प्रजापतिःप्रजया सरराण- स्त्रीणिज्योतीर्थ पिसचतेतपोडशी॥५॥ओं- येनद्यौरुग्रापृथिवीचढ्ढा येनस्वःस्तभितंये- ननाकः । योऽअन्तरिक्षेरजसोविमानः -क- स्मैदेवायहविषाविधेम ॥६॥ ओं-यक्रन्दसी. ऽअवसातस्तभानेऽअस्यैक्षेताम्मनसारेजमा--

संस्कारमाह।
ने । यत्राधिसरऽउदितोधिभाति कस्मैदेवा-
यहविषाविधेम। आपोहयबृहतीर्यश्चिदा-
पः ॥ ७n ओं-वेनस्तत्पश्यन्निहितगुहास-
द्यत्रविश्वम्भवत्येकनीडम् । तस्मिन्निदथ्सच्च-
विचैतिसर्व सत्रोतःप्प्रोतश्च विभू.प्रजासु ॥८॥
ओं-प्रतद्वोचेदमृतन्नुविद्वान्गन्धर्वाधामविभू-
तमुहासत् ॥ त्रीणिपदानिनिहितागुहास्य
यस्तानिवेदसपितुःपितासत् ॥६॥ो-स-
नोबन्धुर्जनितासविधाता धामानिवेदभुवना
निविश्वा । यत्रदेवाऽअमृतमानशानास्तृती-
येधामनद्ध्यैरयन्त ॥ १० ॥ ओ-परीत्यभू-
तानिपरीत्यलोकानपरीत्यसर्वाःप्रदिशोदिश-
पूचा उपस्थायप्रथमजामृतस्या-त्मनात्मा-
नमभिसंविवेश ॥ ११॥ ओं-परिद्यावापृथिवी
सद्यऽइत्त्वापरि लोकान्परिदिशःपरिस्वः-
तस्यतन्तुविततं विवृत्त्य तदपश्यत्तदभवत्तदा-
सीत्॥१२॥ ओं-सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य
काम्यम् । सनिम्मेधामयासिष/स्वाहा ॥१३॥

१६ अन्त्येष्टिमस्कार ओं-याम्मेधान्देवगणाः पितरश्चोपासते ॥ तयामामद्यमेधयाऽग्ने मेधाविनङ्कुरुस्वाहा ॥.१४॥ ओम्-मेधाम्मेवरुणोददातु मेधा- मग्निःप्रजापतिः॥ मेधामिन्द्रश्चवायुश्च मे धान्धाताददातुमेस्वाहा॥१५॥ ओम्-इद: म्मेब्रह्मचक्षत्र-चोभेनियमानुताम् । मयिढे- वादधतु श्रियमुत्तमान्तस्यैतेस्वाहा॥ १६ ॥ इति संहितापाठेद्वात्रिंशोऽध्यायः। इति यम सूक्तं समाप्तम्॥ मार्गमध्ये विनामपिण्डं दद्यात् । यथा-अमुकगोत्रा- मुकमेत रुद्रदैवतक एप ते पिण्डो मया दीयते तवोपतिष्ठ- ताम् । ततः श्मशाने नीत्वा भमौ शनैः शव दक्षिणशिरसं स्थापयेयुः । श्मशानदेशस्तु ग्रामादाग्नेच्या नैर्ऋते वा कोणे सर्वतो निम्न अनावरणे बहुलौपधिको मध्योन्नतः कार्यः । तत्र दाहाय वेदिं कुर्यात्-तथा चाश्वलायनगृह्यसूत्राणि- दक्षिणाप्रवणं प्रारदक्षिणाप्रवणं वा प्रत्यग्दक्षिणाप्रवणमि- धीच मार्ग में पहुचे तय विनाम पिण्ड अवजन प्रत्यवने जन सहित देवें । तद- गन्तर श्मशान में पहुचकर मृतक को धीरे से भूमि में दक्षिण को शिरकर के धरें। श्मशान का स्थान ग्राम से पाग्नेय या नैऋत कोण में सब ओर से नोवा बीच कंचे पर चारों ओर से खुला घस प्रकार की घाभादि जहा हो वहा फरे। यहा पूर्व मे निश्चित किये कपर व हे श्मशान में वेदि वनाचे। पाश्वलापा गृह्यसूत्रों में मृतक की वेदि (चिता) यनाने का प्रकार यो लिसा है कि-वेदि दक्षिण को नीधी उत्तर को कुछ ऊंची रहेका भाग्नेय क्षण की ओर नीची रहे प्रथया 1 २१ संस्कारमारहा त्येके ॥ ७ ॥ यावानुद्वाहुकः पुरुपरतावदायामम् ॥ व्या- ममात्रं तिर्यक् ॥६॥ वितरत्यर्वाक् ॥१०॥ प्रा० १ । १। तदा फर्ता प्राचीनाबीती भूत्वा भूरसीति चिताभूमिमभिमन्त्रयेत्- ओम् -भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्व धाया विश्वस्य भुवनस्य धी । पृथिवीं यच्छ पृथिवीं इथंह पृथिवीं माहिथंसीः ॥१॥ तत्तइदमापइतिमन्त्रेण चितास्थाने मोक्षयेत- मोमिदमापः प्रवहतावद्यं च मलं च यत् । तच्चाभिदुद्रोहानृतं यच्चशेपेऽअभीरणम् आपोमातस्मादेनस.पवमानश्चमुञ्चतु" ततश्चितास्थाने यमपिगडं दद्यात् । अमुक्गोत्रामुक प्रेत यमदैवतक एप ते पिण्डो मया दीयते तवोपतिष्ठताम्। ततः समिद्धो अजनिति मन्त्रेण यज्ञियकाप्ठैरेव दहनस मर्था चितिं कारयेत- ओ-समिद्धोऽअञ्जन्कदरंमतीनाघृतमाने- किटी मत में नैतकोण की ओर नीची रहे । रूपा को याहू स्टाने में मनुष्य की जितनी लम्बाई होती है इतनी लम्बी वेदिरे और एक वैमा-सा तीन हाथ तिहीं धीही को एक विलासी गहरी खोदे।तक्रिया करनेवाला अपसव्य होकर (धोग्भूरसि०) मन्त्र से पिता को भूमिका भभिमायण रे चिता की भूमि को देखता हुशाम एढे।तष (इदमाप) इस मन से चिता की भूमिका प्रोक्षण करे । तदनन्तर चिता स्थान में यमदेवतक पिएह प्रबने. जनमत्यवमेजन पूर्वक देवे । तत्पश्चात (मिट्ठोमजन ) मान पट वैदिम अन्त्येष्टिसंस्कारः॥ १६३ मधुमत्पिवमानः । वाजीवहन्वाजिनजात- वेदोदेवानांवक्षिप्रियमासधस्थम् ॥ ततः-अपेतोजन्त्वितिमन्त्रेण चिति प्रोक्षयेद- ओम्-अपेतोयन्तुपणयोऽसुम्नादेवपीयवः । अस्यलोकःसुतावतः । द्युभिरहीभिरक्तुभि- Wक्तयमोददात्ववसानमस्मै । इति प्रोदय तदुपरि कुशतिलानास्तीर्य तत्र चितौ द- क्षिणशिरसं शवं निदध्यात् । ततः कर्ता प्रेतरय मुखे ना- सिकाद्वये चक्षुर्द्धये श्रोनद्वये च हिरण्यशकलानि निक्षिपे- दाज्यविन्टून्वा । ततः प्रेतकुक्षौ पिण्डदानम्-अमुकगोत्रा मुकप्रेत प्रेतदैवतक एप ते पिगडो मया दीयते तवोपत्तिष्ट- ताम् । अत्र सर्ववव ब्रह्मपिण्डादिपचपिण्डेपु-अवनेजन प्रत्यवनेजने यथोक्तरीत्या कार्यएव। ततः शवोपरिकाठच- यनम् । ततः शिरःप्रदेशे भूमौ-क्रव्यादसंज्ञकमग्निं प्रज्वा- ल्य कव्यादाय नमइति प्रदक्षिणां कृत्वा- यससम्बन्धी नकवी ईधन का ऐमा चयन करे जिस में शीघ्र ही मृतक भस्म हो सके । जो कोई पुरुप सारदा चिन मयता हो यही काटो का चयन करे । तद. नन्तर चयन किये इंधन पर (Rो यन्तु ) RR MEANI RE शिता फे काठो पर कुश विधाये और पुओं पर सिल फैलाये । पितास्थ पकरियों पर विधाये कुश तिलो पर दक्षिण शिर फरफे मृतफ को मिटाये । तदनन्तर किया करने वाला मृतक के मुख, नासिका के दोनो छिद्रों, दोनों घतु शौर दोनो कानो में इन सातो लिट्रो में छोटे २ सुवर्णके टुकठे रक्ये घा घृप्त के बिन्दु लोहे । तरपश्चात मृतक की कुति में अपनेजन प्रत्ययमेलन पूर्वक सकरप करके पिगष्ट देवे । पश्चात् मृतक के अपर लकडी चिने शिर की और लकहियों से लगता हुश्री भूमि पर क्रव्याद माग्नि को स्थापन करके मधलित करे (मो. ।

- संस्कारमाया। ओं त्वं भूतभृज्जगद्योनिस्त्वं भूतपरिपालकः। मृतः संसारिकस्तस्मादेनं त्वं स्वर्गतिं नय ॥ इति-प्राय तत-प्राज्यहोमं कुर्यात्- ओ.लोमभ्यः स्वाहा।।ओं त्वचे स्वाहा।। लोहिताय स्वाहा ।२। मेदोभ्यः स्वाहा ।२। मांसेभ्यः स्वाहा ।२। स्नावस्यः स्वाहा ॥२॥ अस्थभ्यः स्वाहा ।२। मज्जभ्यः स्वाहा ॥२॥ रेतसे स्वाहा पायवेस्वाहा।शायासाय स्वाहा । प्रयासाय स्वाहा । संयासाय स्वाहा ।श वियासाय स्वाहा ।। उद्यासाय स्वाहारा शुचे स्वाहा।। शोचते स्वाहा ।। शोचमानाय स्वाहा ।। शोकाय स्वाहा ।। तपते स्वाहा । २। तप्यते रवाहा ।२।त- प्यमानाय स्वाहा । २ । तप्ताय स्वाहा।। घर्माय स्वाहा । २ । निष्कृत्यै स्वाहा ।। प्रायश्चित्यै स्वाहा ।। भेषजायस्वाहा यमाय स्वाहा ।२। अन्तकाय स्वाहा।। व्यादाय गम) कह पर अग्नि की प्रदक्षिणा कर (ओं व.) इत्यादि पचन पर के अग्नि की मार्थना काके (ोलोम) इत्यादि मन्त्रों से जलती हुई चिता में है

अन्त्येप्रिसंस्कार
मृत्यवे स्वाहा । २ । ब्रह्मणे स्वाहा । २ ।
ब्रह्महत्यायै स्वाहा ।२। विश्वेभ्यो देवेभ्यः
स्वाहा।राओं द्यावापृथिवीभ्याथं सवाहा।
एताप्राहुत्तीर्दत्त्वा वामं जान्वाच्य चत्तस्राज्याहुतीर्जु-
हुयात-यथा-
ओम्-अग्नये स्वाहा। ओं-सोमाय स्वाहा ।
ओ-लोकाय स्वाहा। ओं-अनमतये स्वाहा।
ततः प्रेतस्य हृदये पञ्चमीमाहुतिं दद्यात्-
ओं-अस्माद्वै त्वमजायथा अयं त्वदधिजा-
यतामसी स्वर्गाय लोकाय स्वाहा ॥
अत्र-असावित्यस्य स्याने प्रेतस्य संबुद्ध्यन्तं नामो-
चारणीयम् । एताः पञ्चाहुतय प्राश्वलायनगृह्यउक्ताः ।
ततः पूर्णे दग्धे वार्धे दग्धे सति शवमस्तकं काप्ठेन भित्त्वा
तत्रैकामाज्याहुतिं दद्यात्-
ओम्-भूर्भुवःस्वः स्वाहा ॥
घी की प्राति देवे । एक मात्र से दो २ माहुति देनी चाहिये । इन अष्टमट
पाहुनियो को देकर पायें चोद को भूमि में टेक कर (ो-अग्नये०) इत्यादि
अगली चार माहुति घी से करे । तदनन्तर मृतक के हृदय पर (अस्मावि०) मात्र
की पाचौं शाहुति दे। मात्र में पढे असौ शब्द के स्थान में मृतक
का नाम संयोधनान्त साचारण करे । पूर्वोक्त पाच माहुत्तिया पायवनायनगृह्य
में लिखी है। वरपश्चात् पूरा वा प्राधा जलजाने पर मृतक के मस्तक को किसी
दृढ लग्णी लकड़ी से फोड़ कर उस फोड़े हुए मस्तक पर (ो भूर्भुव ०) मन्त्र
से
घृत

संस्कारमात्मा ततः प्रेतदाहानन्तरं सर्व शवस्पृशः शबानुगन्ताराच चितां वामावृत्या परावृत्त्य प्रेतमनवलोकमानाः-प्रहरह- नयमानी गामश्वंपुरुपान्पशून् । वैवस्वतो न तृप्यति सुर• याइवदुर्मतिः ॥ इति यमगाथां गायन्तः कनिष्ठपूर्वा जला- शयं गच्छेयुः। नद्यादिसमीपस्थितं कंचिद्वयोनिसम्बटुं श्यालक वा सपिण्डादयः सर्वे (उदकं करिष्यामहे) इति पठित्वो- दकं याचेरन् । एवं याचिते यदि शतवादविप्रेतो मवे- त्तदा (कुरुवं मा चैवं पुनः ) इत्येवमुत्तरं दद्यात् । यदि शतवादूर्व प्रेतो भवेत्तदा कुरुध्यमित्येवोत्तरं वदेत् । तत: सप्तमपरुषसम्वन्धिनः सपिण्डा वा दशमपरुपस- म्बन्धाः समानोदकाः समानग्रामनिवासे यावत्सापिगड्यं सगोत्रत्वं वाऽनुस्मरेयुः । तावन्तः सर्व प्राचीनावीतिन एकवस्त्रा जलं प्रविश्य वामहस्तस्यानामिकाहगुल्या तू- घृत की एक माहुति देवे । तव मृतक का दाह हो जाने पर मृतक का स्पर्श करने वाले शोर साथ आये हुए सय लोग बायी ओर से चिता को परिष्मा करके मृतक की और न देखते हुए और ( अहरहर्नया) इत्यादि यमगाधा के गाते हुए तथा कम २ प्रायुधाले भागे २ और अधिक २ श्रायु वाले पोलेर चलते हुए जलाशय को लौटें। किसी नदी प्रादि जलाशय के निकट भाकर समीप में उपस्थित किसी मृतक के सम्यन्धी वा साले से कुटुम्बी थादि सब लोग पूः फि ( उदकं करिष्यामहे ) हम लोग रदक्यिा करेंगे ऐमी प्राधा म गने पर यदि को वर्ष से कम आयु का पुरुष मरा हो तो वह सम्बन्धी वा साला है कि (कुरुष्य मा पुनः ) उदककिया करो पर फिर भागे ऐसा न करना ऐसा उत्तर देवे । और यदि सो वर्ष से कपर का मनुष्य मरा हो तो (कुरुवम् ) को इतना ही उत्तर देवे तय सात पीढी बाले वा दश पीढी सक के जहा तक सपियठता और मृतक का अपना एक गोत्र जाम हो वे उतने भय समाना- दक पुरुष अपसव्य हो एक वस्त्र पहने हुए जल में घुस कर वायें हाथ , अन्त्येष्टिकारा णीमुदकमपनोद्य-प्रोम-अप नः शोशुचदधम् । इति दक्षि- णाभिमुखा जले निमज्जेयुः। तत उदका बहिरागृत्य प्रेतमु, द्दिश्यामकसगोत्रामुकशर्मन् प्रेत एतत्त उदकमित्युच्चार्य ए- कैकमजलिं सकृद्धभूमौ प्रक्षिपेयुः । ततः शाड्वलवति शु- इदेशे उपविष्टान्सपिण्डादीनन्ये सुहृदः शोकनिवारकभग- वद्गीतोपनिपदादिकथाभिः संसारानित्यतां दर्शयन्तापदि- शेयुः । ततः पश्चादनवलोकयन्तः कनिष्ठानग्रतः कृत्वा पङ्क्तीभूता ग्राममायान्ति । भागम्य च गृहद्वारे स्थित्वा निम्नपत्राणि दन्तैरवखण्ड्योदकमाचम्याग्निं गोमयं गौर- सर्पपस्तैिलं चेति क्रमेणालभ्य पादेनारमानमाक्रम्य गृहं प्रविशेयुः । ततः परं सर्वे ज्ञातयो यावदाशीचं ब्रह्मचर्यम- धःशयन लौकिककर्माकरणमन्येषां च कुर्वित्यप्रेरणं क्रीत्वा नामिका प्रति से तूष्णीं विना मात्र पढ़े जान को धरउवा हटाकर (ओं-प. न०) मन्त्र पढ दक्षिण को मुख करके जाल में एक साथ एक ही युद्धको लगा सरप- थात् मय लोग जान मे थाहर जाकर एक २ अजलि भर मा मृतक के उद्देश से भूमि में छोड़ें। इसी का नाम दकिया है । तदनन्तर पास वाले शुद्धस्थान में बैठे हुए कुटुम्चियों की अन्य इष्ट मित्र लोग शोफनिवारक भगवद्गीता और उपनिषदादि सग्रन्थो की कथा सुनाफे संधार की अनित्यता दिखार्थे । त- स्पश्चात पीछे को न देखते हुए थोडे पाय घालों को आगे कर वृद्ध २ पीछे हो पति लगाके घर को प्रा । मृतक के द्वार पर माके रहे हो वहां नौंध के uri को सब लोग दांतों से काट २ कर थूक दें और जल फा माघमन फर अग्नि, गावर, देत सरसो और तैल इन पदार्थों का प्रम से स्पर्श करके और परथर को लांच कर घर में प्रवेश करें। पक्षात् उघ दुग्धी लोग शुद्धि के दिन तक लचर्य से रहें सी के निकट होई न जाये, प्रथिधी पर साये, ध्य. वहार का कोई काम न करें और अन्य नौका आदि का काम करने की प्रा. जा भी न देखें, मोल लेकर का विन मागे कोई दे देवे तो भोजन करें पकाये मस्कारमातगई। लब्ध्वा वा दिवैव मांसवर्ज भोजनमिति नियमासेवेरन् । भोजनकाले प्रथमदिने कर्मकर्ता पुत्रादिः कृतापसव्यो दः क्षिणामुखः पातितवामजानुरुपलिप्तपिण्डस्थानोपरि द. क्षिणाग्रं कशत्रयमास्तीर्य-श्रीम-अद्यामुकगोत्रामुकताप्रा- बनेनिवेति कुशत्रयोपरि-अवनेजनं दद्यात् ततो भोज- नार्थादन्नादनमादाय पिण्डं कृत्वा-ओमद्यामुकगोत्रामुक- प्रेत-एप ते पिण्डो मया दीयते तवोपतिप्ठताम् । इति सं कल्प्यकं पिराडं दद्यात्। ततः प्रत्यवनेजनदानम्-प्रोम-प्र- द्यामुकगोत्राभुकमेत प्रत्यवनिक्ष्य-इति पिण्डोपरि जलं दद्यात् । यस्मिन्दिने स मियेत तस्यामेव रात्री मृन्मये पात्रे क्षीरोदके कृत्वा यष्ट्यादिकमवलम्ब्याकाशे प्रेतात्रेति मन्ने.. ण धारयेत् । नो-प्रेतात्र स्नाहि पिव चेदम्। ततो द्वितीय- दिवसमारम्याशौचावंधि भगवद्गीतोपनिषदादिकं शोकनि- वारकं संसारानित्यत्वदर्शकं शारत्रं प्रेतकुटम्बिनः शृणुयुः। कोई नहीं और मांस रहित दिन में ही एक कार भोजन करें रानि को नहीं। इन नियमों का सेवन शुद्धि के दिन तक करें। भोजन के समय पहिले दिन कर्म करने वाला पुत्रादि प्रपलव्य हो दक्षिण को मुस कर बाम घोंटू को प. थिवी में टेक कर पिण्ड देने योग्य लोपी हुई शुद्ध भूमि पर तीन विला कर उन पर अमेजन जन लोहे। तदनन्तर भोजगार्थ अन्न में से एक पिराष्ट्र बनाकर संकल्प पूर्वक कुशों पर धरे। पुनः प्रत्यवने जन देकर जिम दिन यह पुरुष मरा हो उसी दिन रात्रि में मट्टी के पात्र में दूध और जल मिला कर किसी लकड़ी में बाध कर ( तायक) मात्र द्वारा विसो वृक्ष में लटकाये। तदनन्तर दूसरे दिन से लेकर शुद्धि के दिन तक भगवद्गीता और उपनिषदादि मायन्धी शोक निवारक तथा प्रसार की अनित्यता दिखाने बानी कथा मृतक के कुटुमी मोग मुना करें । और चौथे दिन अस्थि संधयन कर्म करें-तीन अथ चतुर्थदिनेऽस्थिसंचयनम् ॥ Fa अयुजो वृद्धाः पुरुपा अस्थिसंचयनाय श्मशानं गच्छेयुः। तत्रालक्षणे कुम्भे पुरुपमलक्षणायां कुम्भ्यां च स्त्रियं संक्षि- नुयुः क्षीरोदकेन शमीशाखया त्रिः प्रसव्यमायतनं परिन्नजन ओ-शीतिकेशीतिकावतीति चिता प्रोक्षेत् । ततोगष्टॉप- कनिष्ठिकाभ्यामेकैकमस्थि शब्दमकुर्वन् कुम्भेऽवदध्युः पादौ पूर्व शिरउत्तरम्। शिरःपर्यन्तं कुम्भेऽवधाय शूर्पण चितास्थ भरम संशोध्य सूक्ष्माण्यस्थीनि शिरसउपरि संचित्य यन्त्र सर्वतभापो नाभिण्यन्देन्नन्या वर्षाभ्यस्तत्र गत्तै खाता- स्थिकुम्भमवदध्युः ( उपसर्पमातरं० ) इति मन्त्रेण- ओम्-उपसर्पमातरं भूमिमता-सुरुव्यचसं पृथिवीं सुशेवाम् । ऊर्णनदा युवत्तिर्दक्षिणा वत एषा त्वा पातु नि तेरुपस्थात् ॥ ऋ० १०॥ १८॥ १८॥ च आदि विषम संख्या वाले बद्ध पुरुष मस्थि संघयन के लिये श्मशान भूमि में मार्वे यहां जा कर पिना रिह किये घट में पुरुष के और गिह रहित घटिका में स्त्री के प्रस्थियों का संचय करें। दूध और जल मिला य र शंमी-रोकर की धारसा द्वारा सेचन करते हुए वामावृत्ति मे पिता के सब नो"(ो शी. ति) मन्त्र पढ़ते हुए तीन चार धूमे । तदनन्तर अहगुप्र और अनामि.. ग एक २ हड्डी को जीरे २ उठा २ कर [ जिस से ,पर हडियो का शब्द । दो घड़े में परे पगों की ओर से भिर, तक की हड्डी, जम रखें जिस में शिर के अस्थि घड़े में ऊपर रहैं । शिर 5 को होघ में ग्य के भूप मे पिता की भस्म को पाटक का मूक्ष्म अस्थि घड़े में कपर मे परे । फिर जहां सब ओर से पसे भिन्न जल न भर जाता हो वहा गढ़ा सोदएर उसमें उपसर्प) मा १५० संस्कारमाण्ड तत उच्छंचस्वेत्येतया गर्ते पांसनवकिरेत्- ओं-उच्छ्चस्वपृथिवीमानिबाधथाः, सूपा- यनास्मैभवसूपवञ्चना । मातापुत्रंयथासिचा. भ्येनंभूमऊणुहि ॥ ऋ० १० । १८ । ११ । कुम्भमुखावधि गर्स पूर्ण उच्छुचमानेत्येतां जपेत्- ओं-उच्छंचमानापृथिवीसुतिष्ठतु, सहस्रं मितउपहिश्रयन्ताम्। तेगृहासोघृतश्चुतोभ- वन्तु विश्वाहास्मैशरणाःसन्त्वत्र ॥१॥ तत उत्तेस्तभ्नामीति कपालेनापिधायाऽथानवेक्ष प्रत्या- व्रज्यापउपस्पृशेयुः। ओं-उत्तेस्तम्नामिपृथिवीत्वत्परीमं लो- गंनिदधन्मोअहरिषम्। एतास्थूणांपितरो धारयन्तु तेऽत्रायमःसादनातेमिनोतु ॥ ऋ० १० । १८ । १३॥ अथवाऽस्थिकुम्भं जलाशये निक्षिपेयुः। ततो-गृहप्रा- गत्य-भूमिमुपलिप्य कुशत्रयमास्तीर्य-एकोहिष्टविधिना को पढ के पटाधरे और (उपचस्व.) मात्रमे गढेमें माटी मरे जव पडे के करठ सक गढा भरजावे तय (हरबंधमाम) म.प्रका जपकरे । पश्चात (उत्तेस्तम्मामिल) मात्र से घडे के मुख पर सम्पर घर के पीछे को न देरते हुए लौट भाकर जाना स्पर्श करें। अपमा अस्थिमरे पहा को न दे किन्तु नदी आदि किमी. लाशय में छोड़ देके । सय घर में भाकर भूमि को लीप का बहा तीन कुश विका के एकोदिष्ट विधि से अवनेशात मत्यवनेन पूर्वक समरूप वाषय पढ 1 . अन्त्येष्टिसंस्कार पिण्डदानम् । यथा-अमुकगोत्रामुकशर्मन्प्रेत-एतदवनेजनं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् । इति कुशोपरि जलं निपि- च्य । अमुकगोत्रामुकशर्मन्प्रेत-एप ते पिण्डो मया दीयते तवोपतिष्ठताम्। ततः-अमुकगोत्रामुकशर्मन्प्रेत एतत्प्रत्य- वनेजनं मया दीयते तवोपतिष्ठताम् । इति पिण्डोपरि जलं निपिञ्चेत् । ततएकादशे दिने सर्व सपिण्डा गृहशुद्धि शरीरशुद्धिं च कृत्वा पञ्चगव्यं च पीत्वा नूतनं यज्ञसूत्रं यज्ञोपवीतमिति मन्त्रेण धारयेयुः । ततः कर्ता स्नात्वा च- न्दनपुष्पधूपदीपादिभिरिदविष्णुर्विचनमइति मन्त्रेण वि- ष्णुपजनं कुर्यात् । ओम्-इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधानिदधेप; दम् । समूढमस्यपार्थसुरे॥ एवमेव श्रीश्वत० इति मन्त्रेण लक्ष्मीपूजनम् । ओं-श्रीश्चतेलक्ष्मीश्चपत्न्यावहोरात्रेपा- नक्षत्राणिरूपमश्विनौव्यात्तम् । इष्णन्नि- षाणामुम्मइषाणसर्वलोकम्मइपाण ॥ ततो ब्राह्मणद्वारा ब्रह्मगायत्रीजपं वेदपाठं च कारयेयुः। ततो वृपोत्सर्गविचार:-पारस्करगृह्यसूत्रे वृपोत्सर्गः पिण्ड देवे । तदनन्तरग्यारहवें दिन सब कुटुम्बी घर और शरीर को शुद्धि कर पञ्च गव्य पीकर नया जमेक (यज्ञोपवीतं०) मात्र से धारण करें तदनन्तर फर्म करने वाला पुरुष स्नान कर धन्दन पुष्प धूप दीपादि से (इदं विष्णुर्विः) मन्त्र पढ़ के विष्णु का पूजन करे । इसी प्रकार ( श्रोचते.) मन में लक्ष्मी का पूजन करे। तदनन्तर ब्राह्मणो द्वारा ब्रह्म गायत्रो का जप और बेद का पाठ . संस्कारमातपहर तत उच्छंचस्वेत्येतया गर्त पासूनवकिरेत्- ओं-उच्छ्चस्वपृथिवीमानिबाधथाः, सूपा- यनास्मैभवसूपवञ्चना। मातापुत्रंयथासिचा. भ्येनंभूमऊणुहि ॥ ऋ० १० । १८ । ११ । कुम्भमुखावधि गर्ते पूर्ण उच्चचमानेत्येतां जपेत्- ओं-उच्छंचमानापृथिवीसुतिष्ठतु, सहस्रं मितउपहिश्रयन्ताम्। तेगृहासोघृतश्चुतोभ- वन्तु विश्वाहास्मैशरणाःसन्त्वत्र ॥१॥ तत उत्तेस्तम्नामीति कपालेनापिधायाऽथानवेक्षं प्रत्या- व्रज्यापउपस्पृशेयुः । ओं-उत्तेस्तम्नामिपृथिवीत्वत्परीमं लो- गंनिदधन्मोअहंरिषम् । एतास्थूणांपितरो धारयन्तु तेऽत्रायमःसादनातेमिनोतु ॥ ऋ० १० । १८ । १३॥ अथवाऽस्थिकुम्भं जलाशये निक्षिपेयुः। ततो-गृहला- गत्य-भूमिमुपलिप्य कुशनयमास्तीर्य-एफोहिष्टविधिना को पढ के पहाधरे और (saree) ग.नसे गढ़ेमें मादामरे जच घडे के करट तक गढा भाजाधे तर (व्यंधमान०) म.प्रका जपकरे। पश्चात (उतनामि) भान से घड़े के मुख पर खप्पर घर के पीछे को न देरते हुए लौट भाकर जन का स्पर्श करें । अथवा अस्थिगरे पहा को नपढे किन्तु नदी आदि किसी ज- लाशय में छोड़ देवे । सय घर में प्राकर भूमि को लीप कर बहा तीन दुध विका एकोदिष्ट विधि से अवनेशन प्रत्यवनेजन पूर्वक सवरूप बाय पढ के अन्त्येष्टिमस्कार पिण्डदानम् । यथा-अमुकगोत्रामुकशर्मन्प्रेत-एतदवनेजन ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् । इति कुशोपरि जरनं निपि- च्य । अमुकगोत्रामुकशर्मन्प्रेत-एष ते पिण्डो मया दीयते तवोपतिष्ठताम्। ततः-अमुकगोत्रामुकशर्मन्प्रेत एतत्प्रत्य- बनेजनं मया दीयते तंवोपतिष्ठताम् । इति पिण्डोपरि जलं निपिञ्चेत् । ततएकादशे दिने सर्व सपिण्डा गृहशुद्धि शरीरशुद्धिं च कृत्वा पञ्चगव्यं च पीत्वा नूतनं यज्ञसूत्रं यज्ञोपवीतमिति मन्त्रेण धारयेयुः। ततः कर्त्ता स्नात्वा च- न्दनपुष्पधूपदीपादिभिरिदविष्णुर्विचक्रमइति मन्त्रेण वि- पणुपूजनं कुर्यात् । ओम्-इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधानिदधेप- दम्। समूढमस्यपार्थसुरे॥ एवमेव श्रीश्चत० इति मन्त्रेण लक्ष्मीपूजनम् । ओं-श्रीपचतेलक्ष्मीपचपत्न्यावहोरात्रेपा- नक्षत्राणिरूपमश्विनौव्यात्तम् । इष्णन्नि- पाणामुम्मइषाणसर्वलोकम्मइषाण ॥ ततो ब्राह्मणद्वारा ब्रह्मगायत्रीजपं वेदपाठं च कारयेयुः । ततो बृपोत्सर्गविचार:-पारस्करगृह्यसूत्रे वृपोत्सर्गः पिण्ड देवे। तदनन्तरग्यारहवें दिन सब कुटुम्बी घर और शरीर को शुद्धि कर पश्च गव्य पीकर नपा जमेक (यज्ञोपवीतं०) मन्त्र से धारण करें तदनन्तर फर्म करने पाला पुरुष स्नान कर चन्दन पुष्प धूप दीपादि से (इदं विष्णुर्विक) मात्र पर के विष्णु का पूजन करे । इसी प्रकार ( श्रीवसे.) मन्त्र से लक्ष्मी का पूजन करे । तदनन्तर मामलों द्वारा ब्रह्म गायत्री का जप और वेद का पाठ संस्कारमीतग' । स्वातन्त्र्ये गा व्यरियातो न तु मरणानन्तरं कार्यइति सार्च- नधी प्रदर्शितः । अन्यप्रमाणन मन्तव्यश्चेत्तरकरणसमयो नारित । एक वृपं चतस्रो वत्सतरीरुर सृजेदिति लिखितम् । एव च कर्तु कालो नास्ति तस्माद्धोमं सामान्यविधिना कृ. स्वा वृपस्य गोश्च साद्यादिना पूजन कुर्यु । बेदि निर्माय प ञ्चभूसंस्कारान्कृत्त्वा-सामान्यहोमं कुर्यात्- तत्रादौ कुशकण्डिकाप्रारम्भन म -यजमानहरतपरिमित्ता बेटी कुशै परिसमुह्य तान्कुशानशान्या दिशि निक्षिप्य गोम- योदकेनोपलिप्य रपयेन सवेण वा प्रागग्रमादेशमात्रनिरु- त्तरोत्तरक्रमेणोल्लिख्यउल्लेखनम् मेणानामिकाङ्गाठाभ्यामृ. मुद्धृत्य जलेनाभ्युक्ष्य तत्र तूणी कास्यपात्रेणाग्निमानीय स्वाभिमुख निदध्यात् ॥ तत. पुष्पचन्दनताम्बूलवस्ताण्या. दाय । प्रो-प्रद्य शोकान्त्यदिने कर्तव्यान्त्येष्टिहोममणि फरावे । तरपनात पोत्सर्ग का विचार यह है कि पारस्व र वस्त्र में पोत्सर्ग का स्वतन्त्र व्यारयान लिया है किन्तु यह नहीं लिया कि मरणानन्दर पो- सर्ग करे अन्य प्रमाण से गटप कहा जाय तो उस के करने का समय नहीं है क्योकि एक घेल और चार पोमर गौ माथ में छापा लिखा है सो ऐसा करने का समय नहीं इस कारण पोरम के स्थान में समय विधि से हम रके एक छैन पोरगे का साद्य दाना घासादि देकर पूजन करे और किसी सुपात्र ब्राह्मण को काग दानो का दान कर देवे । हाम का विधान- प्रथम घेदि में पञ्चभूसस्काए को-तीन फुशो से वेदि को झाड कर पुशों को "ईशान कोण में फेंक कर गोवर और जल से लीप कर के स्नुषा के मूल का फ्य से बेदि में उत्तर २ मागायत तीन रेसा करे प्रमामिका और प्रहर ঔ ইভাঙ্কা 'मैं में मट्टी को हटा कर फेंक के वेदि में जनसेवन करे। फिर फासे वा भट्टी के पात्र में अग्नि लाकर पश्चिमाभिमुरा स्थापन करे । सपश्चात-पुष्प चन्दन तान और वस्त्रों को लेकर (प्रोमद्य) इत्यादि सकलर वाक्य पढके यजमान .

भात्यधिसरकार 1101 कृताऽहतीवेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकशाणं ना- ह्मणमेभिः पुष्पचन्दनताम्बूलवासाभिर्ब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे। इति ब्रह्माणं वृणुयात् । नों-वृतोऽस्मीति प्रतिवचनम् ।य- थाविहितं कम कुर्विति यजमानेनोक्ते.! करवाणीति नमा वदेत् । ततोऽग्नेर्दक्षिणतः शुद्धमासनं दत्त्वा तदुपरि मांग- ग्रान्कुशांनास्तीर्य ब्रह्मागमग्निप्रदक्षिणक्रमेणानीय, प्रो- अत्र त्वं मे ब्रह्मामवइत्यभिधाया प्रो-भवानीति माहाणे- नोक्ते कल्पितासने उदङ्मुखं ब्रह्माणमुपवेशयेत्। ततः प्रणी- तापानं पुरतः कृत्वा वारिणी परिपूर्य कुशराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्याग्नेरुत्तरतः कुशोपरि निदध्यात् ।। ततः परि- स्तरणम् । बर्हि पश्यतर्थभागमादायआग्नेयादीशानान्तं द्र- मणोऽग्निपर्यन्तम् । नैर्ऋत्याद्वायव्यान्तं अग्नितः प्रणोता. पर्यन्तम् । ततोऽग्नरुत्तरतः पश्चिमदिशि पविच्छेदनार्थ कु- प्रास्ता का धारण करे और पुप्पादि ग्राना के हाथ में देथे । ग्राना पुष्पादि को लेकर (एतोगस्मि) कहे । तय (यथायि०) यजमान कहे और ग्रमा (फरमाणित) पाहे । तय अग्नि से दक्षिण में शुद्ध अासन चौको सादि विहार उस पर पूर्व को जिम का अग्रभाग दो ऐसे कुश विजाकर ब्रह्माको अग्नि को प्रदक्षिणा क फे (-अस्मिन् प्रमणि यं मे ब्रह्मा भव) इस फर्म में तुम मेरे ब्रह्मा हो ऐसा कहकर मामा के ( भयानि ) पदने पर तम शामत पर ब्रह्मा को उत्तराभिस येठा कर प्रणीतापाय को सामने रसके जल से भरके कुगो से मारवादन कर ग्रता का मुख अवलोकन करके अग्नि से उत्तर में कुशोपर प्रशीतापात्र को प्रा. गया रपये। तदनन्तर चार मुट्ठी मुश लेकर अग्नि के सय भोर परिस्तरण करे- एक चौथाई फुश अग्निकोण से ईशान दिशा तक, द्वितीयभाग मामा के सामन से अग्निपर्यन्त, सृतीयभाग न सकोण से वायुकोण पर्यन्त और चीयामाग प्र. ग्नि से प्रगीता पर्यन्त विज्ञान तदनन्तर अग्नि से उत्तर में प्रायसंस्थापानामा.

संस्कारमा सहा निओ इन्द्राय स्वाहा। इटमिन्द्राय नमम । इत्याघारौ। ओं-अग्नये स्वाहा। इदमग्नये नमम 1ों-सोमाय स्वाहा। इदं सोमाया नमम । इत्याज्यभामो, -ततऽऽआज्येनैव । प्रो भूः स्वाहा । इदमग्नये नमम । ओं भुवः स्वाहा । इदं वायवे नमम ।.ओं स्वः स्वाहा । इदं सूर्याय नमम । एता महाव्याहृतयः ॥ --- (शुक्लयजुर्वेद, अध्याय २१ मन्त्र ३) ओं त्वन्नोऽअग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडोडअवयासितीष्ठाः। यजिष्ठो चहित्तमः शोशुचानो विश्वा द्वेषार्थसि प्रमुमध्यस्म- स्वाहा ॥ इदमग्नीवरुणाभ्यां नमम ॥१॥ (शुक्लयजु० अध्याय २१ मंत्र॥) १ अओं स त्वन्नोऽग्नेऽवमो भवोती नेदिप्ठो अस्याऽउषसो व्युष्टी॥ अवयव नो वरु- रणथं रराणो वीहि मृडीकथं सुहवो न एधि स्वाहा ॥ इदमग्नये नमम ॥२॥ ओम्-अया- प्रचाग्नेऽस्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्वम- याऽअसि । अयानो यज्ञवहास्यया नो धेहि घार. की तूशी आहुति देवे और यजमान वय भव त्याग बोलता जामा: घार की दो भाग्यभाग की दो इन चार पाहुतियो को देकर महाग्राहतियो की तीन पर्यायश्चित्त की पाच तथा मन ले माजापत्य एक इन सब बाहुतियो को नम्त्येष्टिसंस्कारःr भेषजथं स्वाहा ॥ इदमग्नये नमम ॥३॥ ओं ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः । तेभिन्नोऽअद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा ॥ इदं वरुणाय सवित्रे विष्गावे विश्वेभ्यो दे. वेभ्यो मरुद्भ्यः स्वभ्यो नमम ॥४॥ शुक्लयजुर्वेद अध्याय २१ मन्त्र १८ ॥ ओम्-उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधर्म वि. मध्यम प्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसोऽअदितये स्याम स्वाहा ।। इदं व- रुणाय नमम॥शाएताःसर्वप्रायश्चित्तसंज्ञकाः॥ ओप्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये नमम । इदं प्राजापत्यम् । इति मनसा मोमग्नयो स्विष्टकृते स्वाहा ॥ इदमग्नये रिवष्टकृते नमम । ततः संरवाराशनम् । आचम्य-प्रोमा शोकान्त्यदिने कृतैतदन्त्येप्टिहोमकर्मणि कृताऽकृतावेक्षणरुपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदंपूर्णपात्रं प्रजापति दैवतममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्रह्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्य- त्यागों सहित देके संस्रषमाशन तथा प्राचमन वरके संकल्पवाक्य पढ ग्राहको' . । संस्कारमा मह॥ नो इन्द्राय स्वाहा । इदमिन्द्राय नममः। इत्याघारौ। ओं-अग्नये स्वाहा।इंदमग्नये नममाओं-सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय नमम । इत्याज्यभागौ ।। -तताऽभाज्येनैव । भूः स्वाहा । इदमानये नमम । ओं भुवः स्वाहा, । इदं वायवे नमम ।, ओं स्वः स्वाहा । इदं सूर्याय नमम । एता महाव्याहृतयः ॥ : '... (,शुक्लयजुर्वेद, अध्याय २९ मन्त्र ३).. : ., ओं त्वन्नोऽअग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडोऽअवयासिसीष्ठाः। यजिष्ठो वहितमा शोशुंचानो विश्वा द्वेषार्थसि प्रमुमुग्ध्यस्म- त्स्वाहा ॥ इदमग्नीवरुणाभ्यां नमम ॥१॥ (शुक्लयजु० अध्याय २१ मंत्र ४ ॥) ओं स त्वन्नोऽग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्याऽउषसो व्युष्टौ॥ अवयव नो वर- णथं रराणो वीहि मृडीकथं सुहवो न एधि' स्वाहा ॥ इदमग्नये नसम॥ोम-अया- श्चाग्नेऽस्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्वम- -याऽअसि । अयानो यज्ञं वहास्यया नो धेहि घार को तूपों प्राहुति देवे और यजमान भ्वय सब त्याग योलता जाय । प्रा: घार फी दो भाज्यभाग की दो इन चार पाहुतियो को देकर गहरयाहतियो पने तीन पूर्वप्रायशित की पाच तत्रा मन से प्राजापत्य एक, इन सघ माहुतियो को नम्त्येष्टिसरकार भेषजथं स्वाहा ॥ इदमग्नये नमम ॥३॥ ओं ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः । तेमिन्नोऽअद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा ॥ । इदं वरुणाय सवित्रे विष्गावे विश्वेभ्यो दे- वेभ्यो मरुद्भ्यः स्वभ्यो नमम ॥४॥ शुक्रयजुर्वेद अध्याय २१ मन्त्र १८ ॥ ओम्-उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधम वि- मध्यमर्थ श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागमोऽअदितये स्याम स्वाहा॥ इदं व- रुणाय नमम॥ाएताःसर्वप्रायश्चित्तसंज्ञकाः॥ ओप्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये नमम। इदं प्राजापत्यम् । इति मनसा । मोमग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ॥ इदमग्नये रिवष्टकृते नमम । ततः संस्रवणाशनम् । प्राचम्य-प्रोमद्य शोकान्त्यदिने कृतैतदन्त्येष्टिहोमकर्मणि कृताऽकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापति दैवतममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्रह्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्य- -- - त्यागों सहित देफे संस्त्रयप्राशन तथा प्राचमन परके सपरुपयाक्य ट महाको २५८ संस्कारमार्तण्डः । महं, संप्रददे । इति दक्षिणां दद्यात् ॥ श्री स्वस्तीति प्रति- वचनम् ॥ ततः- ओं-समित्रिया नऽआप ओषधयः सन्तु । इति पवित्राभ्यां शिरः संमृज्य । ओं दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्द्वेष्टि यञ्च वयं द्विमः ॥ इत्यैशान्यां दिशि प्रणीतां न्युटजी कुर्यात् । ततः स्त- रणक्रमेण बहिरुत्थाप्य घृताक्तं कृत्वा हस्तेनैव जुहुयात् ॥ शुक यजुर्वेद'अध्याय ८ मन्त्र २१ ओं देवा गातुविदो गातुं स्वित्वा गातुमि- त। मनसस्पतऽइमन्देवयज्ञर्थ स्वाहा व्वा- तेधाः स्वाहा । इदं वाताय नमम ॥ तत उत्थाय घृतफलपुष्पपूर्णेन सुवेण पूर्णाहुति जुहुयात् ॥ ( यजुः अध्याय ७ मन्त्र २४ ). ओं मूर्धानं दिवोऽअरतिस्पृथिव्या वैश्व- नरमृतऽयाजातमग्निम् । कवि/सम्माजम- दक्षिणा देवे तथा ब्रह्मा (श्रा स्वस्ति) कह कर दक्षिणा को स्वीकार करे । स- दनन्तर (मुमिनि) मात्र पढ के पवित्री द्वारा प्रणीता का जल कर शिर में सम्मार्जन करे तथा (दुर्मित्रि०) मन्त्र पढ के प्रणीता के शेप जल को गान दिशा में लौटा देवे पश्चात् जिस कम से विधाये घे ठमी प्रम मे भव कुश उठा कर कुशो में घी लगाके (प्रो देखागातु) मन्त्र पद हाय से ही होम कर देखें। पन्दर छठ सहा हो के पृत फल और पुष्पो से भरे हुए बुवा से (क) मूमिक) अन्त्येष्टिमस्कारः॥ १७॥ तिथिञ्जनानामासन्ना पात्रञ्जनयन्तं देवाः स्वाहा ॥ इदमग्नये नमम ॥ ततः सुत्रेण भस्मानीय दक्षिणानामिकया.व्यायुपं कुर्यात् । यज० अध्याय ३ मन्त्र ६२ ओंव्यायुषं जमदग्नेः॥ इति ललाटे।ओं कश्यपस्य व्यायुषम् ॥ इति ग्रीवायाम्। ओं यद्देवेषु व्यायुषम्। इति दक्षिणबाहुमूले॥ ओं तन्नो अस्तु त्र्यायुषम् । इति हृदये। ततो द्वादशे दिने एकादशाहवत्सामान्यहोमं विधाय' गवादिवलीनकृत्वा-एकं त्रीन्वा वेदपाठिनः सुपात्रान् ब्राह्म- णान्भोजयेत् । यद्यस्मिन्नेव दिने सपिण्डीकरणमिच्छेयुस्त- दा पारस्करगृह्यसूत्रे दृष्ट्वा कार्यम् ॥ तत्तोऽहरहः सुपात्रताह्मणाय भोजनं जलं च दद्यात् । संवत्सरान्ते क्षयाहे-एकोद्दिष्टं श्राद्धं कुर्यात् । इति । मन्त्र पढ़ के पूर्णाहुति करे और नुवा के मूल द्वारा लाये भरम को दाहिने हाथ की अनामिका के अग्रभाग से (व्यायुप०) से एलाट में (कश्यपस्य०) से फराठ में (पहेवेप) से दहिने याहू के मूल में और (तन्नो प्रस्तु०) से हृदय में भस्म लगावे । फिर बारह दिन ग्यारह दिन के कृत्य में कहे भामाय विधि से होम कर गौ प्रादि की धली देकर एकवासीन ब्राह्मणो को भोजन कराधे। यदि सी दिन सपि रही करण करना चाहें तो पारस्करगृह्यसूत्र के परिशिष्ट भागमें देस कर करें। प्रागे नित्य प्रति दिन मुपात्र ब्राह्मण को भोजन शोर जल दिया करें। वर्ष की समाप्ति, में जिस दिन मृत्यु हुमा हो उसी दिन एकोहिय श्राद्ध परे।मनुस्मृति में लिखा -

संस्कारमाह ।
Tौदेवेपितृकार्यत्री-नेकैकमुभयप्रवा।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि नमसज्येतविस्तरे ॥
सत्कियादेशकालौच शौचंब्राह्मणसंपदम् ।
पंचतान्विस्तरोहन्ति तस्मान्नेहेतविरतरम् ।
अथ पिंडप्रमाणम्-एकोद्दिष्टेसपिंडेच कपित्थंतुवि.
धीयते ।। इत्यन्त्येष्टिविधिः समायः॥
है कि देवकर्म के लिये दो और पितृ कार्य में टीम का दोनों में एक प्रा.
मण को श्रीमान् पुरुष होतो भी भोजन करावे किन्तु बडो पात बाg के नि.
मित्त कदापि न करे। सरकार, देश, काल, शुहि और ब्राह्मल की सुपात्रता
छुन पाधों को बहुतों को भोजन कराना नष्ट करता है। इस से बहुतो को
भोजन कराने की चेष्टा न करे । एकोद्दिष्ट और सपिण्डीकरण में कपिरपरे
प्रमाण खोटा विएड बमाना पाहिये ॥ इति सरकारमा पहनन्ध समास ॥

अथ केशान्तसंस्कारे विशेषः ॥ - केशान्तःपोडशेव ब्राह्मणस्यविधीयते । राजन्यवन्धोविंशे वैश्यस्यव्यधिकेततः ॥ मनुः ॥ लौकिकऽग्नौ होमविधिः। देशकालौ स्मृत्वा केशान्त- कर्माहं करिष्यइति संकल्पः । ब्राह्मणप्रयभोजनादेः सर्व- स्य कर्मणश्चूडाकर्मणि यो विधिरुक्तः स सर्वएवात्र तथैव कार्यः । इयास्तु भेदः-उदकासेकमन्त्रे-केशान्वपेत्यत्र-के- शश्मयू वप-इत्यूहः। यथा-उप्णोन वाय उदकेनेह्यदिते केशरम वप । ततो यत्क्षुरेणेति क्षरपरिग्रहणमन्त्रे-य. क्षुरेणo-प्रमोपीर्मुसम् । इति मुखशब्दोऽधिकः पठनीयः । भा०-प्रय केशान्त संस्कार की विशेषता लिरते हैं। मनुस्मृति में लिखा है किमायण का सोराये क्षत्रिय कर २२ और पैश्य का पीवीस वर्ष में है- शान्तसस्कार फरे केशान्तसंस्कार में हाही मुळ पीर बगलें तथा शिर के सथ धारा मथम हो यनयाये जाते हैं। हाली गर जोर वालों के थारा घमथाने के प्रारम पी को शान्तसरकार कहते है । चूडाकर्म के गुरुय लौकिका अग्नि में भी पार भी होम देता है। देशकाल का स्मरण करके केशान्तर में का संपरप करे। भागे तीन ब्राह्मणी को भीजा पराने से रोकर केशाना के सय पर्म का विधान पूसामर्म में कहे अनुसार दो करना चाहिये । इसी से या फिर नदी तिराते। भेद या विशेषता यह कि-गर्म और ठगहा जरा गिलाने के (सोम पाय०) मन्त्र में (केशान्यप) के स्थान में (केशरमभूषय ) ऐसा कद परे । सपना ( यत्तुरेण ) इम सुरा लेने के मन्त्र में ( यरतुरेण-प्रगोपीमुरम् ) ऐसा धोरो प्रयांत मुस शब्द को अधिक पोले । और मुरा सहित शिर के चारो शोर प्र.

श्रीहरिः
प्रियतम धर्म सभा के नियम ।
१ राम नाम का भजन करना ॥
२ विद्या पदना ॥
३ सत्य बोलना,॥
१ देश को सुधारना, ॥
५विधि पूर्वक पिंडं सर्पणमात्र से मृत पितरों का श्राद्ध करना।
६ मद्य मांसादि अशुद्ध पदार्थ न खाना, ॥
७ श्रद्धा से मूर्ति पूजन करना, ॥
ईश्वरकृत तथा ऋपिकृत ग्रन्थों को मानना ।।
६ बाल विवाह न करना,
१० गुण जाति संपन्न योग्य ब्राह्मण को मानना ।
१ चौर्यादि न करना,॥
१२ विधवा को ब्रह्मचर्य में रखना, ॥
१३ अपने जैसा सुख दुःख सव का जानना
१४ अच्छेगुण को संसार में फैलाना।
१५ ईश्वराकार वृत्ति से मोक्ष को पाना ।
१६ उक्ति युक्ति सृष्टिक्रम के विरुद्ध काम न करना।
मि० ध० स० शिकारपुर (सिंध)

4 L मूल्य घटाये हुए पुस्तकों का सचीवर भार्यसिद्धान्त पूर्व का पादश भाग १० पट्ठा से सब होगा पृथक प्रति भाग ) अपमिपक्षाग्य-रंश) ) 3 ) मुएIS) भापडूक्य ) तत्तिरीय ॥-) ऐतरेय 1-) तातर 1-) बन उपनिषदों पर सरकत भीर मागीभाषा में अब तक का भाग्य हो चुका उपनिषद भाष्य को लेने वालों को ३५) मनुस्मृति का संस्कृत तथा नागरी भाषा में प्रत्युत्तम भाष्य का अलभ्य शानन्द पु० देखने से होगा,३ अध्याय की प्रथम जिल्द मूल्य २५) द्वितीय जिल्द ६ अध्याय भगवद्गीता का ठीक पद्धरसस्कृत नागरी भाषा में भाष्य दूमधार का गीतासंग्रहा.) व्याकरण की पुस्तके-बायाची मूल भाषाटोका १०) मूल ( मोटा अक्षर)) गणरतमहोदधि गणपाठ की सस्कृत व्याख्या और लोक तथा प्रकारादिशब्द भूची महित) धातुपाठ [शष्टसिद्धि के पुत्र भी वैदिककर्मकारह-पुण्याहवाचन-दर्श पौर्णमासेष्टिपटुति [ौत कमी दुर्लभ पुस्तक] 1) स्मातर्मपद्धति ।) पञ्चमहाया - इष्टिसंग्रह। ) पसिन्नतामाहारस्य FO) सद्विचार निर्णय -) पुत्रका मेष्टिपति (पुत्रहीने विषि):-)। प्रायुर्वेदशब्दार्गव कोप ।) मनहरिनीतिशतक भाषार्टीका.), वैराग्यशतकभाषाटीका) यमयमीमूक्त का असा ठीक २ वयवस्यायुक्त संस्कृत भाषाभाष्य - सत्यभास्कर (छन्दो में पाषाणपूजा खगहन)-) विदुरनीति मूल टिप्पणी सहित ) सदुपदेश भजन श्राधा पैसा 1) कहा भारती नित्य का समय पर गाने के लिये में दो भार्यसमाज के नियम सकडा । व्याख्यान का सामान्य विज्ञापन) प्रति सैकहा । बलाविनय (सी शिक्षा) In धर्मवलिदान शाहला-लेखरामवध ) यज्ञोपवीतहासमाधि गङ्गादितीर्थत्वविचार.) कन्यामुधार -) संगीतसुधासागर (भजन)-) वेश्या लीला १ भाग ) धार्यसमाज के नियमोपनियम )। धर्मलक्षणवर्णन ) पुनजंग [पुन जन्महोता है यह सिद्ध किया गया है] - स्थावरमजीव विधार-) देवम गरीवर्णमाला)। * संगीतरनाकर )*भजनामृतसोश) गाणीमिया की पूर) समाप्रसन) शास्त्रार्थपुर्जा-) सत्यसंगीत ) स्वर्गमसमजेक्ट कमेटी -) ऐति मिकनिरीक्षण ) मुमतिभुधाकर ) नीतिसार) पाखणहमतकुठार) अनित विनोद) नलीयाख्यान-) गसारग्म -) चालुक्य भाषाटीका-)*शान्ति घर) *सुमतिमुधाकर -) संस्कृतप्रवेशिका बारहमासा (भारतविलाप) महर्षिवियोगशोक -) बनिविसूचिका )॥ दशनियमशिखरिणी में ) सत्यार्थी काश २) मादिखामी जी कृत सब पुस्तक यहा मिलते हैं बड़ासची मंगाकर देखिये पसा--सत्यवतशर्मा रखतीह-इटावा ( पशिमोत्तरदेश) A.

Sanskar Martand

Author
Not Available
Title
Sanskar Martand
File name
Sanskar Martand
Text
OCR done
Citation
1957
Published
2012/08
Publisher
Itava.,saraswati Press
Language
Sanskrit
Pages
188
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Classification
Devotional
DLI number
405307
Barcode
99999990292391.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
1vkD5B3bxcn
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