Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Dhammpanda (nav Sahinta)

Vinoba · 2011/03

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धम्म पदं
[ नव - संहिता
प्रादेर भेंट
सम्पादक
विनोबा
अनुवादक
कुन्दर दिवाण
सर्व सेवा संघ प्रकाशन
राजघाट, वाराणसी

कांगक : मन्त्री. सर्व सेवा संघ प्रकागन,
राजघाट, वाराणसी-१
मुद्रक
: नरेन्द्र भार्गव,
भार्गव भूपण प्रेस,
त्रिलोचन, वागणती
संस्करण : पहला : फरवरी, १९५९ . १,०००
दूसरा : अप्रैल, १९७२ : २,००० (परिवर्षित)
कुल प्रतियाँ : ३,०००
चार रुपये
Title
: DHIBILAPADAM
Editor : Vinoba
Translator : Kundar Diwan
Subject : Religion
SARVA SEVA SINGH PRAKASHAN
RAJGHAT, VARANASI-1
Rs. 4.00

प्रकाशकीय भूदान के सिलसिले में विनोवा ने बिहार की सवा दो साल की जो यात्रा की, उसमें उन्होंने 'धम्मपद' का गहरा अध्ययन किया । वे मानते हैं कि उनकी वह यात्रा धम्मपद के प्रकाश में ही चली । उस अध्ययन, मनन और चिन्तन का सुपरिणाम है : धम्मपद की यह नव-गंहिता। इस नव-संहिता की केवल मूल गाथाओं का पहला संस्करण १९५९ में प्रकाशित हुआ था। गाथाओं के अन्त में थी कुन्दर दिवाण द्वारा प्रस्तुत सम्पूर्ण पद-सूची भी थी। इस नव-संहिता का जिस समय निर्माण हो रहा था, उस समय श्री कुन्दरजी भी विनोवा के साथ थे। प्रस्तुत हिन्दी अनुवाद उन्होंने ही किया है। वे विनोवा के विद्यार्थी रहे हैं। उन्होंने बुद्ध-दर्शन का सार इस श्लोक में प्रस्तुत किया है : तृष्णामूलं इदं दुःखं निर्वाणं परमं सुखम् । शीलं समाधिः प्रज्ञा च जीवनं, बुद्ध-दर्शनम् ॥ शील, समाधि और प्रजा को ही विनोबा ने नव-संहिता में कर्म- योग, साधना और निष्ठा का नाम दिया है। प्रस्तुत अनुवाद के लिए हम श्री कुन्दरजी के उपकृत हैं। इसकी भूमिका श्री श्रीकृष्णदत्तजी भट्ट ने लिखी है, जिसमें उन्होंने धर्म-समन्वय की भूमिका से बोद्ध धर्म का हार्द खोलकर रख दिया है । श्री भट्टजी ने बड़े मनोयोग से अनेक अनुवादों की छान- बीन करके धम्मपद का अंग्रेजी अनुवाद भी किया है। इसलिए उनकी भूमिका का अपना महत्त्व है। हम उनके आभारी है। हम आशा करते है कि धम्मपद की इस नव-संहिता का सर्वत्र रवागत होगा और इसमें लोगों को भारतीय विचार-परम्परा की ओर देखने की एक अभिनव दृष्टि मिलेगी।

प्रास्ताविक परमार्थ की खोज मे गृह-परित्याग करने की बचपन में ही मुझे धुन लगी हुई थी। इसलिए स्वाभाविक ही गौतम बुद्ध, शंकराचार्य, समर्थ रामदास जैसे महापरिव्राजकों का मुजे एक विशेष आकर्षण था। बड़ौदा मे, जहाँ मेरा अध्ययन हुआ, एक बगीचे में भगवान् बुद्ध की करुणामय प्रसन्न मूर्ति रखी हुई थी। उसका कई बार में दर्शन करता और कभी-कभी उसका व्यान भी करता रता। आखिर ता० २५ मार्च १९१६ के दिन मैं घर छोड़कर निकल ही पड़ा। आगे के यौवन के ३२ साल सेवामय कर्मयोग, ध्यान-साधना और अध्ययन-अध्यापन मे बीते । गाधीजी के प्रयाण के बाद आश्रम छोड़कर अहिसा-भक्ति की खोज में मुझे निकलना पड़ा। यह मेरे जीवन का दूसरा अभिनिष्क्रमण था, जिसमे ने भूदान-गंगा का जन्म हुआ। भदान-यात्रा के सिलसिले मे में लखनऊ पहुँचा था । बुद्ध-जयंती का दिन था। उस दिन सहज ही मेरी वाणी से वाक्य निकल पड़ा कि 'भूदान-यज्ञ के रूप में वही धर्मचक्र प्रवर्तन का कार्य किया जा रहा है, जिसको गौतम बुद्ध ने चलाया था। उस वाक्य से उस दिन एक शक्ति-संचार मैने अपने मे महसूस किया। यात्रा आगे चली, हम सारनाथ पहुंचे। वहाँ के वौद्ध भिक्षुओं ने बहुत प्रेमपूर्वक 'धम्म- पद' की पुस्तक मुझे भेट दी। मानो मेरे दावे पर मुहर लग गयी। फिर पाँच दिन वाद बिहार की यात्रा शुरू हुई। सवा दो साल की वह यात्रा धम्मपद के प्रकाश मे चली। बिहार ने ३ लाख दाताओं के द्वारा २२ लाख एकड़ जमीन भूदान-यन में समर्पित की। वोधगया में समन्वय-आश्रम की स्थापना हुई, जिसके लिए बुद्ध-मंदिर के समीप ही एकमात्र भूमि का टुकडा भी अनायास दान में प्राप्त हुआ। आगे आश्रम मे कुऑ खोदते हुए बुद्ध की छोटी-सी सुंदर मूर्ति भी मिली। यह सब उस करुणामय का प्रसाद न कहा जाय, तो क्या कहा जाय? X X x धम्मपद का मराठी गद्य भापान्तर वचपन में ही मेरे पढ़ने में आया था । कई वर्षों के बाद मूल पालि ग्रंथ भी देखने को मिला । इसके वास्ते पालि का थोड़ा अध्ययन कर लिया था। उन दिनों मेरा मन गीता और उपनिपद् में रमा हुआ था। पर धम्मपद के कुछ वचनों का चित्त पर इतना असर रहा कि अपने प्रथम लेखन 'उप- निषदों का अध्ययन' की समाप्ति धम्मपद के एक वचन से मैंने की। यह वात है १९२३ की, जब मेरी उम्न २८ साल की थी, और मेरे दिल और दिमाग में वेदान्त-रस भरा हुआ था। इसके २२ वर्षो वाद सन् १९४५ में गीता के स्थितप्रज-दर्शन पर मैने व्याख्यान दिये, जिनकी समाप्ति में वेदान्त और बौद्ध-दर्शन के अंतिम ध्येयों की एक- रूपता दिखाने की मैने कोशिश की है। इधर ज्ञानदेव, कबीर, नानक आदि संतों की सिखावन, उधर उपनिपद् और गीता की सिखावन, दोनों के बीच धम्मपद मुझे एक जोड़नेवाली कड़ी-सा मालूम हुआ। और उस दृष्टि से मैने धम्मपद का अधिक सूक्ष्म अध्ययन किया, तो धम्मपद के वचनों का एक व्यव- स्थित क्रम मेरे मन में स्थिर हुआ। आज की धम्मपद की रचना कुछ प्रकीर्ण या सुभापित-संग्रह जैसी है और उसमें उसका समन्वित दर्शन छिप-सा गया है। बहुत दिनों से मेरा विचार था कि धम्मपद का जो क्रम मेरे मन में बैठ गया है, लोगों के सामने रखू । यह एक साहस ही था । लेकिन नम्रतापूर्वक मैने वह साहस किया है । मैं आशा करता हूँ कि उससे पाठकों को भारतीय विचार-परपरा की ओर देखने की नयी दृष्टि मिलेगी। यह धम्मपद की नव-संहिता पढ़कर पाठकों को प्रतीति होगी कि इसमे नये सिरे से समन्वय करने की बात नहीं है, समन्वय पहले से मौजूद ही है । याने गौतम बुद्ध ने स्वयं ही वह कर रखा है । गौतम बुद्ध के पहले ज्ञानी ब्राह्मणों और तपस्वी श्रमणों की एक परंपरा भारत मे चली आ रही थी। उसके बारे में नितांत आदर रखकर गौतम बुद्ध ने अपने विचार पेश किये है । "जो समभाव से वरतता है, जो शांत, दमनशील, संयमी और ब्रह्मचारी है, जिसने दंड-त्याग करके सव भूतों को अभय दिया है, वह ब्राह्मण है, वह श्रमण है, वह भिक्षु है ।" गौतम बुद्ध का यह उद्गार उनकी नम्न और सारग्राही दृष्टि का पर्याप्त निदर्शक माना जायगा । श्लो० १८-१५ । नव-संहिता के साथ उसका अनुवाद और चिन्तनिका मुझे जोड़नी चाहिए थी। पर उसके लिए कुछ समय लग सकता है। तब तक मै इसके प्रकाशन को रोकना नहीं चाहता। मुझे विश्वास है कि इसमें जो दृष्टि खुल जाती है, वह सज्जनों को हृदयंगम होगी और 'विश्व-मानुष' के निर्माण मे उससे कुछ मदद मिलेगी। सौराष्ट्र की भूदान पद-यात्रा ता० ३-१२-१९५८ Anila * यह संस्करण अनुवाद-सहित प्रकागित हो रहा है।

भूमिका यो च गाथासतं भासे अनत्यपदसंहिता । एक धम्मपदं सेथ्यो यं सुत्वा उपसम्मति ।। ( २१२८) विवेक की, धर्म की, ज्ञान की एक वात ही भली, अविवेक की सैकड़ो बाते भी नही। धर्म का एक पद, जान की एक गाथा, मतलव की एक वात, बेमतलव की सैकड़ो बातो से अच्छी। पर यह वात हो कैसी ? बात ऐसी हो जिससे गांति मिले, जिससे चित्त का क्षोभ दूर हो; जिससे मानस का क्लेग मिटे। कितने पते की बात कही है अहिंसा के मूर्तिमत प्रतीक भगवान् बुद्ध ने । 'धम्मपद' मे ऐसी एक-दो ही नही, ४२३ गाथाएँ है । एक-से-एक उत्तम, एक-से-एक बढ़िया, एक-से-एक लाजवाब । X X x .. धम्मपद है भगवान् बुद्ध के सुभापितो का एक मनोरम पुप्पगुच्छ, खुगनुमा गुलदस्ता। उसकी अपनी एक शोभा है, उसकी अपनी एक सुगंध है और है एक अद्भुत प्रतिष्ठा। भगवान् बुद्ध के मुख से समय-समय पर जो गाथाएँ प्रस्फुटित होती रही, उन्हीका उनके शिष्यो ने आगे चलकर यह मुन्दर संग्रह प्रस्तुत किया । इस संग्रह मे २६ अध्याय-वग्ग- है : यमक वग्गो, अप्पमाद वग्गो, चित्त वग्गो, पुप्फ वग्गो, वाल वग्गो, पण्डित वग्गो, अर्हन्त वग्गो, सहस्स वग्गो, पाप वग्गो, दड वग्गो, जरा वग्गो, अत्त वग्गो, लोक वग्गो, बुद्ध वग्गो, सुख वग्गो, पिय वग्गो, कोध वग्गो, मल वग्गो, धम्मट्ठ वग्गो, मग वग्गो, पकिण्णक वग्गो, निरय वग्गो, नाग वग्गो, तण्हा वग्गो, भिक्षु वग्गो और ब्राह्मण वग्गो। वग्गो का यह वर्गीकरण मुख्यत: उस-उस विषय को ध्यान मे रखकर किया गया है, जिस-जिस शब्द या विपय की गाथा उसमें विशेष रूप से आयी है।

صدمه 1 - यमक वग्ग पहला वग्ग है। यमक कहते है युग्म को, जोड़े को । दो-दो पद, दो-दो गाथाएँ जहाँ एक-दूसरे से मिलती है, उनको इन वग्ग में संकलित कर दिया गया। जैसे- अक्कोच्छि मं अवधि में अजिनि मं अहासि मे । ये तं उपनय्हन्ति वेरं तेसं न सम्मति ॥ (१३) और अक्कोच्छि म अवधि में अजिनि मं अहासि मे । ये तं न उपनय्हन्ति वेरं तेसूपसम्मति ॥ (१६४) इसी प्रकार 'अप्पमाद' ( अप्रमाद ) वाले पद अप्पमाद वग्गो में एकत्र है, 'चित्त' गब्दवाले पद चित्त वग्गो मे । 'पुप्फ' ( पुष्प ) गब्दवाले पद पुप्फ वग्गो मे हैं, 'वाल' ( मूर्ख ) पदवाले वाल वग्गो मे । अन्य वग्गो का भी ऐसा ही हाल है। वीच मे २१वां वग्ग है---पकिण्णक ( प्रकीर्णक ) वग्गो । इसमे प्रकीर्णक पद है । भिक्षु वग्गो और ब्राह्मण वग्गो द्वारा इस सकलन की पूर्णाहुति की गयी है। X x वम्मपद मे ये एक-से-एक अनूठे पद रत्नो की भॉति आदि से अन्त तक जग- मगा रहे है । चाहे जिस रत्न को उठा लीजिये, उसकी आभा से चित्त मुग्ध हो उठता है। अद्भुत और विगिप्ट है यह सकलन । X X X सार-सकलनो का महत्त्व किसीसे छिपा नहीं है : शास्त्रं ह्यनन्तं बहुलाश्च विद्या अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च । यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यया क्षीरमिवाम्बुमच्यात् ।। त्रिपिटक का, वौद्ध धर्म का सार-मकलन धम्मपद मे है। इतना ही मनुष्य ग्रहण कर ले तो वहुत । पर विनोबा तो ठहरे गणिती । धम्मपद के पदो में गहरे उतरते-उतरते उन्हें लगा कि यह सकलन तो अमूल्य है, पर इस संकलन का कुछ साधन-क्रम भी होना वाछनीय है। भारतीय साधना पर वैदिक वाडमय की अमिट छाप है। वेद, उपनिपद् और गीता का तत्त्वनान शताब्दियो से भारत को प्रेरणा देता रहा है। भारत के कण-कण मे आज भी यह साधना नाना रूपो में यत्र-तत्र पुष्पित-पल्लवित दृष्टि- गोचर हो रही है।

- विनोवा ने आध्यात्मिक, दार्गनिक और धार्मिक साहित्य का व्यापक अध्ययन किया है। बचपन से ही वे इम रंग में रंगे हैं। धम्मपद का मूक्ष्म और गहन अध्ययन करते-करते वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे : 'इधर जानदेव, कवीर और नानक आदि सतो की मिखावन, उधर उपनिषद् और गीता की सिखावन, दोनों के बीच धम्मपद मुझे एक जोडनेवाली कड़ी-सी मालूम हुआ और उस दृष्टि से मैने धम्मपद का अधिक मूक्ष्म अध्ययन किया, तो धम्मपद के वचनो का एक व्यवस्थित क्रम मेरे मन मे स्थिर हुआ। 'आज की धम्मपद की रचना कुछ प्रकीर्ण या सुभापित-संग्रह जैसी है और उसमे उसका समन्वित दर्शन छिप-सा गया है।" इस शोध और चिन्तन का नवनीत निकला, वम्मपद की यह नव-संहिता । X x नव-सहिता में विनोवा ने धम्मपद को भारतीय साधना की दृष्टि से तीन भागो मे विभाजित किया है : कर्मयोग, साधना और निष्ठा । कर्मयोग के ६ अध्यायों का सार है : निर्वैरता सुशीलत्वं सत्-सङगत्यां समादरः । श्रद्धा कर्म-विपाके च नीति-चर्यमनिन्दनम् ॥ यह है साधक का पाथेय, जिसका श्रीगणेश होता हे निर्वैरता से । निर्वैरता का अर्थ है-वैर न करना। अवर से वर का गमन । निर्वैरी ही सुखी होता है। कोच को जीतने का मार्ग हे--अक्रोध, क्षया । अहिसा ही आर्य का लक्षण है। आत्मीपम्यता ही उसका साधन है। किसीको डराना नही, किसीको मारना नही, किसीको सताना नहीं। किसीको दुखी करना नहीं। यही है अहिंसा । यही है कर्मयोग की पहली सीढ़ी। कर्मयोग की दूसरी सीढी है--शील । साधक को गीलवंत होना ही चाहिए। उसकी सर्वश्रेष्ठ गंध, उसकी खुशबू दिदिगंत को सुरभित करती है । शीलवत के सुख का कहना ही क्या ! वीतराग, बीतद्वेप, वीतमोह, विगतेच्छ को दान देने में ही धन की भी सार्थकता है, जीवन की भी। दानों में भी सर्वश्रेष्ठ दान है, धर्मदान । सत्य का पालन, मृदु वचनो का उच्चारण और जैसा कहना वैसा करना ही तो शील की साधना है। सत्य के पुजारी की ही वाणी तो सफला होती है . 'सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् । * पातंजल-योगमूत्र, सावनपाद-३६ ।

-१० - कर्मयोग की तीसरी सीड़ी है--सत्संगति ! 'सत्सङगतिः कथय किन्न करोति पुंसाम् ?' कान जनभिन हे मत्संगति के गुणो से ? 'पारस परस कुधातु सुहाई। भगवान् बुद्ध ने भी उन पर बहुत जोर दिया हैं। यहाँ तक कह दिया है कि अच्छा साथी न मिले तो अकेला ही विचरण करे । सत्पुरुपो का सहवास करे। उनका अभिवादन करे, उनकी पूजा करे । सज्जन तो दूर से ही हिममडित पर्वत-गिखरो की भांति चमकते है । कर्मयोग की चौथी सोढी है-कर्मविपाक । कर्मविपाक पर श्रद्धा भारत की दार्शनिक परम्परा की मुविकसित कड़ी है। भगवान् बुद्ध ने भी उसे स्वीकार किया। पुण्य का संचय और पाप का परिहार वांछनीय है। पुण्य से सद्गति की प्राप्ति होगी और पाप ने रोना पड़ेगा । पुष मार्ग पर चलने से जन्म-मरण के वधन से छुटकारा हो सकेगा। कर्मयोग की पांचवी सीढी है-नीति । सार को सार समझना, असार को असार, धर्म का आचरण करना, प्रमाद न करना, सतत जाग्रत रहना, सत्कर्मों का पालन करना, क्षमाशील रहना, पसीने की, ईमानदारी की कमाई पर गुजर करना-शुद्धाजीवी होना ही नीति का मार्ग है। मूढ़ सकल्प, निर्दोपो को दोप देना, हिसा, असत्य, चोरी, दुराचार, मद्यपान, असयम आदि निपिद्ध कर्म वजनीय है । पेटूपन, आलस तथा निद्यकम मनुप्य को जन्म-मरण के चक्कर मे डालते है। इन सबसे विरत होना वाछनीय है। कर्मयोग की छठी सीढ़ी है--अनिन्दा। विनोवा कहते ही है कि "हममे कृष्ण-भक्ति का रोग है।" निन्दा मे मनुष्य को रस मिलता है । संसार मे ऐसा कौन है, जिसकी निन्दा नहीं की जाती? शील, समाधि और प्रजा से सम्पन्न व्यक्ति ही सवकी प्रगसा का पात्र बनता है। मनुप्य निदा को सहे और परायी निंदा न करे----तभी वह साधना के मार्ग पर प्रगति कर सकता है, अन्यथा नही । कर्मयोग का तात्पर्य है-हिंसा, क्रोध, द्वेप, पर-पीड़न, परधन, परदारा, असत्य, असयम, मद्य-मास आदि निपिद्ध कमों को त्यागकर शुद्ध एवं पवित्र जीवन का आधार लेना । निवरता, सुशीलता, सत्संगति, कर्म- विपाक मे श्रद्धा, नीति और अनिदा का पालन मनुष्य को कर्मयोग में आगे बढ़ाता है। उससे मानव का वाह्य जीवन, उसका लौकिक आचरण शुद्ध और निर्मल बनता है। x X x - परन्तु बाह्य जीवन ही तो सव-कुछ नहीं है । आन्तरिक जीवन ही है मूल बात । उसके लिए आवश्यकता है मन को शुद्ध करने की। मन की वृत्तियो को शुद्ध और पवित्र बनाने के लिए साधना के पथ पर अग्रसर होना पडेगा। साधना की पडध्यायी है। आत्मनैवात्म-दमनं देहानित्यत्व - दर्शनम् । जानतता शोधनं चैव प्रज्ञायोगो वितृष्णता ॥ धम्मपद मे विनोवा ने इन ६ अध्यायों में साधना का यह मार्ग प्रदर्शित किया है-~-आत्मदमन, देह की अनित्यता, जागरूकता, चित्त-मल आदि का शोधन, प्रज्ञायोग और वितृष्णता। चचल मन को वश मे करना कठिन तो है, परन्तु साधक को तो मन पर विजय प्राप्त करनी ही होगी। आत्मविजय के बिना उसका काम चलनेवाला नहीं । चित्त-संयम, चित्त-शोधन की प्रक्रिया मे शरीर और जगत् की नश्वरता, सतत जागरूकता, अप्रमाद, ब्रह्मचर्य, मल-शोधन आदि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। मल-शोधन से, आस्रवो के क्षय से मानव परिनिर्वाण की स्थिति को प्राप्त कर लेता है। वाणी की चौकीदारी करके, मन को संयत रखकर और काया से कोई अकुशल कर्म न करके, इन तीन कर्म-पथो की शुद्धि द्वारा प्रज्ञा-योग मे प्रवेश होता है। प्रज्ञा और ध्यान से ही मानव निर्वाण के निकट पहुंचता है। साधना का मूल आधार है-तृष्णा-क्षय । तृष्णा के प्रवाह जीवो को बड़े मीठे लगते है । तृष्णा का बन्धन-मणि, कुंडल, पुत्र और स्त्री का वन्धन ही सबसे कडा बन्धन है। तृष्णा-त्यागी ही महाप्राज्ञ है। इस तृष्णा से मुक्त हुए बिना निर्वाण के मार्ग पर बढ़ा ही नहीं जा सकता। मन पर, चित्त पर विजय प्राप्त करके, उसके निरीक्षण, परीक्षण और संशो- धन द्वारा ही साधना फलवती होती है और निर्वाण का मार्ग प्रशस्त होता है। - X X अन्तिम पडध्यायी है--निष्ठा-सम्बन्धी । निष्ठा ही वह मूल आधारशिला है, जिस पर किसी धर्म का प्रासाद खड़ा होता है। विनोबा ने निष्ठा खण्ड का सूत्र दिया है : वीक्षणं बुद्ध-बौद्धानां सद्-धर्मस्य च लक्षणम् । पण्डितस्य च भिक्षोश चाप्यर्हतो जाह्मणस्य च ॥

-१२ - - कितना भव्य है बुद्ध का साक्षात्कार । कहते है वे : 'हे गृहकार, अव तुम दीख गये हो, अव तुम फिर से कारागृह न बना सकोगे । तुम्हारे सभी बांस टूट गये है। नंस्काररहित चित्त से तृष्णा का क्षय हो गया है।' और बुद्धों का गामन ? उनकी गिना ? सवपापस्स अकरणं कुसलस्स उपसंपदा। सचित्तपरियोदपनं एतं एतं बुद्धान सासनं ॥ (१४।१ ) १ सभी पापो का न करना, कायिक, वाचिक, मानमिक पापी मे विरत रहना, कुगल कर्मो का करना, और ३ चित्त का गोधन करते रहना- यही है वुद्धों का गासन। पापो से निवृत्ति, सत्वामों का सेवन और चित्त की शुद्धि-यही है बुद्धो की शिक्षा। अकुशल कर्म-अर्थात् पापकर्म । कुगल कर्म-अर्थात् पुण्यकर्म । ये कर्म १० प्रकार के माने गये है. २. सभी अकुगल कुशल काय-कर्म १. अहिंसा २. अ-चौर्य, अस्तेय ३. ब्रह्मचर्य १. प्राणातिपात--हिंसा २. अदत्तादान--चोरी ३. मिथ्याचार--व्यभिचार वाचिक कर्म १ मृपा वचन--असत्य २. पिशुन वचन-चुगली ३. परुपवचन- कटुवचन ४. सप्रलाप-बकवाद मानस कर्म ? अमृपा वचन--सत्य २. अपिगुन वचन ३. अ-कटु वचन ४ अन्सप्रलाप १ अभिव्या--लोभ २. व्यापाद-प्रतिहिंसा ३. मिश्यादृष्टि---झूटी धारणा १ ब-लोभ २. अ-प्रतिहिंसा ३. अ-मिथ्यादृष्टि स्पष्ट है कि कुगल कर्म के सेवन से और अकुगल कर्म के त्याग से जीवन पवित्र बनेगा। फिर निर्वाण को दूर रह सकता है ? आर्य सत्य, त्रि-गरण और दीक्षा से निष्ठा सांगोपाग बनती है। एसा कर्मयोगी, ऐसा माधक और ऐसा निष्ठावान् ही पण्डित है, भिक्षु है, अर्हत है और ब्राह्मण है। अलंकतो चे पि समं चरेश्य सन्तो दन्तो नियतो ब्रह्मचारी। सब्बेसु भूतेसु निधाय दण्डं सो ब्राह्मणो सो समणो स भिक्खु ।। ( १८१५) 'अलंकृत रहने पर भी जो गम का आचरण करता है, जो शान्त है, दान्त है, नियत है, ब्रह्मचारी है और जिसने प्राणिमात्र के प्रति दण्ड का परित्याग कर दिया है, वही ब्राह्मण है, वही श्रमण है और वही भिक्षु है।' भगवान् बुद्ध चाहते है कि मानव इस प्रकार की साधना द्वारा जीवन के चरमलक्ष्य की प्राप्ति करे। संयम, सदाचार और अहिंसा ही उनकी सर्वश्रेष्ठ कसोटी है। उस पर जो खरा उतरता है, उसीका जीवन सार्थक है। A X । वैदिक विचारधारा से भगवान् बुद्ध ने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, सदाचार, सयम, त्याग, वैराग्य, कर्म-विपाक आदि की अनमोल शिक्षा ग्रहण कर उसे शील, ममाधि और प्रज्ञा की धारा में प्रवाहित किया। मन, वचन, कर्म से अहिंसा का पालन और सदाचारमय जीवन द्वारा निर्वाण के पथ की ओर अग्रसर होने पर उन्होंने जोर दिया । करणा के अवतार भगवान् बुद्ध को यनों का कर्मकाण्ड, पशुवध, त्याग और तपस्या के बाहरी आडम्बर ठीक नहीं लगे। ऊँच-नीच, जाति-पाति के भेद उन्हें व्यर्थ जान पडे । दुखपीडित मानव-ममाज को दुख के दुष्ट-चक्र से मुक्त करने के लिए उन्होंने मव्यम मार्ग का आश्रय लिया। चार आर्य सत्यो का, आर्य अष्टांगिक मार्ग का उन्होने प्रतिपादन किया । चार आर्य सत्य है : १. दुःख-मसार दुखमय है। जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, प्रिय का वियोग, अप्रिय का मिलन दुःखप्रद है। २. दुःखसमुदय-तृप्णा ही दुग्ध का मूल कारण है। ऐहिक उपभोगो की तृष्णा, स्वर्गलोक में जन्म पाने की तृष्णा और यथेच्छ सुखभोग, इस जगत् मे मिट जाने की तृष्णा सारे पापों और अनर्थों की जड है। - -१४- ३. दुःखनिरोध-तृप्णा का निरोध करने से निर्वाण की प्राप्ति होती है। निर्वाण न तो देह-दण्डन में मिलनेवाला है और न भरपूर कामो- पभोग से। ४. दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा--तृप्णा के निरोध का मावन है अप्टा- गिक मार्ग। और अप्टागिक मार्ग मे ८ बाते है . सम्यक् दृष्टि चारो आर्य सत्यों में विश्वास, सम्यक संकल्प अकार्य न करने का मकल्प, असत्य भापण आदि से दूर रहना, सम्यक् कर्मान्त (कर्म) - प्राणि-हिमा और दुराचार आदि से बचना, आजीविका के गुद्ध साधन अपनाना, मानमिक दोपो को वश में करना, जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि का सदैव स्मरण और सम्यक समाधि विवेक, विचार, गांति, एकाग्रता का आश्रय ग्रहण करना। - सम्यक् वाचा सम्यक् आजीव सम्यक् व्यायाम सम्यक् स्मृति ४ x १. सम्यक दृष्टि : सम्यक् दृष्टि का अर्थ है, यथार्थ ज्ञान । चारो आर्य सत्यो को ठीक ढग से जान लेना, उनका यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेना ही सम्यक दृष्टि है । जगत् अनित्य है, सतत परिवर्तनगील है, दुःखमय है। जन्म मे भी दुख है, जरा में भी दुग्व है, मरण मे भी दुख है। शोक, परिवेदना, दौर्मनस्य, उदा- सीनता, उपायास, आयास, हैरानी आदि सब दुख हैं। अप्रिय मे मिलन और प्रिय मे वियोग दुख है । ईप्सित वस्तु का प्राप्त न होना भी दुग्व है अर्थात् राग के द्वारा उत्पन्न पाँचो स्कन्ध-रूप, वेदना, संजा, सस्कार तथा विज्ञान सभी दुख है। दुखो का कारण है तृष्णा और दुख का निरोध या निराकरण है उस तृप्णा से सम्पूर्ण वैराग्य । २. सम्यक् संकल्प : सम्यक् सकल्प का अर्थ है, उचित निर्णय या उचित निश्चय । सम्यक संकल्प के तीन भेद माने गये है : १. नैष्कर्म्य मकल्प-एकान्त- वास की रुचि, २. अव्यापाद सकल्प-~-जगत् के सभी जीवों पर शुद्ध प्रेम और ३. अविहिंसा सकल्प-दूसरो को कोई क्लेग न हो और अपने को भी कोई क्लेश न हो, ऐसा संकल्प । मोटे तौर से कह सकते है कि सम्यक् सकल्प है कुशल कर्मो और सद्वृत्तियो के आचरण का पुनीत संकल्प' ।

-१५- ३. सम्यक वाचा : सम्यक् वाचा का अर्थ है, वाणी द्वारा कोई पाप न करना, असत्य न बोलना, चुगली न करना, मुख से कठोर शब्द न निकालना और व्यर्थ की बकवास न करना। ४. सम्यक् कर्मान्त : सम्यक् कर्मान्त का अर्थ है, शारीरिक आचार, गरीर से होनेवाला आचार । हिंसा न करना, चोरी न करना, मिथ्याचार न करना, अकुशल कर्मो का त्याग करना और पंचशील का आचरण करना । पचशील है : १. अहिंसा, २ सत्य, ३. अस्तेय, ४. ब्रह्मचर्य और ५, मद्य-निपेध । भिक्षुओ के लिए इनके अतिरिक्त पाँच शील और है : १. अपराह्न भोजन करना, २. माला धारण न करना, ३ सगीत न सुनना, ४. स्वर्ण का त्याग और ५ अमूल्य गय्या का त्याग। - ५. सम्यक् आजीव : सम्यक् आजीव का अर्थ है, शुद्ध जीविका । भगवान् बुद्ध ने शस्त्रो का व्यापार, प्राणियो का व्यापार, मदिरा आदि का व्यापार, मास का व्यापार और विष का व्यापार निपिद्ध बतलाया है। वनजारी का, कमाई का, कलाल का, जहर बेचने का, गुलामो का धन्धा अनुचित माना है। इसी प्रकार बाँट और तराजू, नाप की ठगी, रिश्वतखोरी, धोखेबाजी, कुटिलता, हत्या, लूट- मार आदि अकुशल कर्मो को न करने का आदेश दिया है। भिक्षुओ के लिए सैनिक आदि का कार्य भी निषिद्ध है। तात्पर्य यह है कि जीविका के लिए, ऐसा कोई भी आचरण न किया जाय, जिससे किसीको दुःख हो और जिसके लिए कोई अकुशल कर्म करना पड़े। ६. सम्यक् व्यायाम : सम्यक् व्यायाम का अर्थ है, उचित उद्योग करना । अशोभन उद्योग को रोकना और शोभन उद्योग को करना । १. मन मे जो कुवि- चार न आये हो, उन्हे न आने देना, २. जो कुविचार मन मे आये हो, उनको नाश करने का प्रयत्न करना, ३. जो सुविचार मन मे न आये हो, उनको लाने का प्रयत्न करना ओर ४. जो सुविचार मन में आये हो, उनका विकास करना और उन्हे पूर्णता तक पहुँचाना। ७. सम्यक् स्मृति : सम्यक् स्मृति का अर्थ है, काया अपवित्र पदार्थो से बनी है, यह विवेक सतत जाग्रत रखना । शरीर के सुख-दुःख आदि का बार-बार चिन्तन करना । अपने चित्त का सतत अवलोकन करना और कार्य-कारण के तात्त्विक विचारो का चिन्तन करते रहना । कायानुपश्यना, वेदनानुपश्यना, चित्तानुपश्यना और धर्मानुपश्यना-इन चार प्रकार की भावनाओ को सतत जाग्रत रखना ही सम्यक् स्मृति है।

८. सम्यक समाधि : मम्यक समाधि का अर्थ है, गील के आचरण में गरी को शुद्धि प्राप्त होती है और उसने प्राप्त होती है ममावि । इसके लिए बार व्यान बताये गये हैं। पहले ध्यान में योगी सभी काम-वामनाओं का निरोध करके वितर्क और विचार से युक्त तथा विवेक ने उत्तन्न नीति और मुख से सम्पन्न होता है। दूसरे ध्यान में वितर्क और विचार मान्न हो जाने मे चित्त में प्रसन्नता और एकाग्रता आती है, साथ ही विनारहित समाधि मे उन्धन प्रीनि ओर मुख भी होते है। तीसरे व्यान मे योगी प्रीति का पनिहार कर केवल उभा, स्मनि और मुन्द का अनुभव करता है। चौथे ध्यान में योगी सुख का भी परिहार कर केवर उपेक्षा और स्मृति का अनुभव करता है। सफल समावि मे चिन की गुद्धि होती है और काया नया वित्त दोनों के शुद्ध हो जाने पर प्रना की उत्पत्ति होती है । वौद्ध धर्म की आधारगिला है-मध्यम मार्ग। इसका अर्थ है, जीवन को किसी भी व्यवहार में अति से बचना । न त्याग-तपस्या में ही अति कन्ना और न भोग-विलास में ही । वीणा के तारो को इना न कसो कि तार ही टूट जायें और न इतना ढीला रखो कि स्वर ही न निकलें। 'अति सर्वत्र वर्जयेत् ।' इसका साधन है अप्ठानिक मार्ग । 'आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग पर चल- कर निर्वाण की उपलब्धि होती है। गोता भगवान् बुद्ध ने कहा है। उन्होंने योगयुक्त जीवन पर, कर्म पर और नाचना पर ही मवने अविम जोर दिया । जीव, जगत्, ईश्वर, आत्मा. बह्म आदि के विषय मे वे मान न्ह गये । उनका निर्वाण' वैदिकों के 'ब्रह्म-निर्वाण' का ही एक रूप है। विनोवा ने "स्थितप्रज-दर्गन' मे उसका विवेचन करते हुए कहा है : "बौद्धो ने निषेवक गब्द पसंद किया है । मनुप्य का मोह उसकी देह के साथ ही नप्ट हो जाय, वह शून्य हो जाय, इसीलिए वौद्धों ने अकेला 'निर्वाण' शब्द ही लिया है। किन्तु वैदिको ने ब्रह्म-निर्वाण' इस विधायक शब्द को पसंद किया । वैदिकों को विधायक भापा अच्छी लगी। क्यों लगी, यह देव तो दोनों पक्षो की भाषा की मधुरता और मर्यादा ध्यान में आ जायगी । भापा का पूर्ण रूप मे निर्दोप होना नंभव नहीं है। भापा का स्वरूप ही ऐसा विलक्षण है कि वह एक तरफ से अर्थ समझाता है, तो दूसरी तरफ गलतफहमी पैदा करता है। अत. विधायक और निपेवक, दोनो तरह की भापा का भाव समझकर जो रचे, उसे स्वीकार करो। वैदिको को लगा कि मोक्ष को अभावल्प कहने की अपेक्षा भावल्प कहना -१७- ? उचित है। वैदिको को लगा कि हम 'नष्ट हो गये', 'शून्य हो गये' कहने की अपेक्षा हम 'व्यापक हो गये', 'ब्रह्म हो गये' कहना अधिक अच्छा है। इसके विपरीत बौद्ध कहते है . "मिट गये' कहने से घबराते क्यो हो हिम्मत करो। गून्य वनो । 'मिट जाने' का डर छोडो । 'मै अनन्त होऊँगा', 'व्यापक होऊँगा', 'सर्वमय होऊँगा', इसमें अरितत्व का जो मोह है, उसे छोड़ दो। इस पर वैदिक कहते है : यहाँ डर और मोह का प्रश्न नहीं है। अनुभूति के विरुद्ध कल्पना कैसे करें ? अव तक नाना प्रकार की साधना करके सब कुछ छोडा और आत्मनिष्ठ वने । जन्म-मृत्यु को पीछे छोडकर अपना वास्तविक स्वरूप प्राप्त किया। धर्म से अधर्म का नाश किया, फलत्याग से धर्म को आत्मसात् किया, ईश्वरार्पण के द्वारा फलत्याग को उडाया, अन्त मे अद्वैतानुभूति से ईश्वर को भी अपने मे समा लिया, अब वह मै ही मिटनेवाला हूँ, यह कैसे मानूं ? सब वस्तुओ का निराकरण करने पर शेप बचनेवाला जो मैं हूँ, वही व्यापक हो गया है, ब्रह्ममय हो गया है, यही कहना अधिक युक्तियुक्त है । लेकिन मोक्ष को भावरूप कहने पर भी उसमे कुछ नवीन जोडना है, यह आशय वैदिको का भी नही है। इसके विपरीत वौद्ध भी आत्मा के अस्तित्व का निषेध करना चाहते है ऐसा ख्याल करना भी, मेरी समझ से, उनके आगय को गलत समझना है । ऐसी गलतफहमी वहुतो को हुई है और बडे-बडो को हुई है। फिर भी वह है तो गलतफहमी ही। बौद्धो को 'मैं' की भापा नहीं चाहिए, चाहे और कुछ भी क्यो न हो ! इसलिए यह भापाभेद मुख्यत. रुचिभेद के कारण हुआ है, यही समझना चाहिए । इसमे अर्थ की दृष्टि से मुझे तो खास कोई भेद दिखाई नहीं देता। अच्छा ही है कि बौद्धो को 'मै' से अरुचि है। अनेक हीन अनुभवो के कीचड़ मे लथपथ 'मैं' की जरूरत ही क्या? सच पूछे तो 'ब्रह्म-निर्वाण' शब्द मे उरो कहाँ जगह दी गयी है ? मूक्ष्म दृष्टि मे देखे तो 'ब्रह्म-निर्वाण' शब्द केवल विधायक नहीं है । वह निषेधक अर्थ को गर्भ मे लिये हुए विधायक है। दोनो अर्थो के संग्राहक के रूप मे ही गीता ने उसकी तजवीज की है। 'ब्रह्म-निर्वाण' कहने पर 'मैं' चला गया, ब्रह्म वाकी बचा। इसमे डरने की कोई बात ही नही । जहाँ शब्द ही समाप्त हो जाते हैं, वहाँ शब्दो के लिए अगडा ही क्यो ? गीता की भाषा में मै तो कहूँगा--'एकं ब्रह्म च शून्यं च यः पश्यति स पश्यति ।' जो ब्रह्म और शून्य को एक देखता है, वही देखता है। इसलिए 'ब्रह्म-निर्वाण' शब्द के द्वारा सारा वाद ही मिटा दिया है।" ? X X - भगवान् वुद्ध का 'मध्यम मार्ग' और भगवान महावीर की 'मध्यम दृष्टि' भारतीय धार्मिक विचारधारा की अनमोल कादियां है । बाँद्ध धर्म तो केवल भारत मे ही नहीं फैला, उसने बर्मा, मुद्रपर्व, चीन, जापान, मिहल तथा विश्व के अन्य अंचलो मे भी अपना विकास किया, परन्तु जन-धर्म विधि-नियों ने गाड़ा होने के कारण भारत के बाहर न जा सका। पर दोनो धर्मो को सुरमितो दो-हाहनार वर्ष बाद भी उनी प्रकार दिगदिगन्त को व्याप्त कर नहीं है। बुद्ध भगवान् की विचारधारा ने ज्ञानदेव नामदेव, कबीर, नानक आदि मध्यकालीन मायु-मंती पर भी अपनी कम छाप नहीं डाली। यह बात दूसरी हैं कि इन संतो की अपनी-अपनी परमता है, परन्तु नीन-चार बातो में उन पर वौद्ध-विचारो का कुछ-न-कुछ प्रभाव है ही। जने : १. धार्मिक रुढ़ियो, आदम्बगें आदि का विरोध, २. जीवन और जगन् की नन्दरता, ३. सदाचारमय मयमपूर्ण जीवन पर जोर और ४. तृष्णा के उन्मूलन पर जोर। X X भगवान् बुद्ध ने कहा है : न गटाहि न गोत्तेन न जच्चा होति ब्राह्मणो। यम्हि सच्वं च धम्मो च सो मुची सो च ब्राह्मणो।। 'न जन्म के कारण, न गोत्र के कारण, न जटावारण के कारण ही कोई बाहाग होता है। जिनमे सत्य है. जिसमें धर्म है वही पवित्र है और वही ब्राह्मण है।' मत्य और धर्म का पालन करनेवाला ही ब्राह्मण है। ब्राह्मण न जन्म मे होता है, न गोत्र से होता है, न जना मे। हो भी व्यक्ति मंचम और नदाचार का पालन करता है, वह ब्राह्मन है, पूज्य है. वरेण्य है। कबीर कहते हैं : न्हाये धोये क्या भया, जो मन का मैल न जाय । मीन सदा जल में रहे, घोये वास न जाय ।। वैष्णव भया तो क्या भया, बझा नहीं विवेक । छप्पा-तिलक वनाय कर, दग्च्या लोक अनेक। मूल बात है व्यर्थ की पार्मिक नड़ियो. आडम्बरों आदि का विरोध और चित्त-शुद्धि पर सबसे अधिक जोर देना।

- १९ - । मध्यकालीन सन्तों पर इन बातों का बहुत प्रभाव पड़ा है। फिर वे चाहे कबीर हो, चाहे नानक, जायसी हो चाहे पलटू । पलटू साहब कहते है : ना काहू से दुष्टता ना काहू से रोच । ना काहू से रोच दोऊ को एक रस जाना ।। वैर भाव सव तजा रूप अपना पहिचाना । जो कंचन सो कॉच दोऊ की आसा त्यागी । हारि जीत कहु नहि प्रीति इक हरि से लागी । दुःख सुख सम्पत्ति विपति भावना यहु से दूजा । जो बाम्हन सो सुपच दृष्टि सम सबकी पूजा । ना जिनने की खुशी है पलटू मुए न सोच ॥ ना काहू से दुष्टता ना काहू सो रोच । X ज्ञानदेव कहते है : उपजोनि संसारों, आपुला आपण वैरी 'मी' 'माझे शरीरों, घेउनि ठेलं देहाते म्हणे 'मी', पुत्र दारा धन 'मामें काळाचें हें खाजे, ऐसे नेणतु गेला काम-क्रोध-मत्सराचेनि गुण वांधिला आपण नेणे, भ्रमितु जैसा मिथ्या मोह-फांसा, शुक नलिके जैसा मुक्त परी आपैसा, पळों नेणे जल-चर आमिप गिळी, लागलासे गळी आपण तळमळी, सुटिका नाहीं तसे आरंभी विषय-सुख, गोड वाटे इंद्रियां फळ-पाकी पापिया, दुःख भोगी -इस संसार में पैदा होकर हम खुद अपने वैरी बन गये। -(क्योंकि हम ) इसी शरीर को लेकर हम 'मैं' और 'मेरा' पकड़ बैठे है । -इस देह को कहता है, मै और पुत्र, दारा, धन मेरे है। यह काल का खाद्य है, इसे जान नहीं पाया। -काम, क्रोध और मत्सर के कारण हम अजान से बँध गये और किसी भ्रान्त-से बन गये। - -३०- -यह मोहपाग गुरु-नलिका-गा मिथ्या है। फिर भी हम अपनी और में मुक्ति की ओर नहीं भागते । -जलचर प्रलोभनस्वल्प मान निगलता है तो वह उसके गले ही लग जाता है। इससे रवयं तडफडाने लगता है, जहाँ से वह छूट नहीं पाना । गी तरह इद्रियो को विपयों का मुन्य आरंभ मे मीठा लगता है, लेकिन परि- णाम मे पाप और दुख भोग का ही जनक बनता है। x चोरांचेनि संगें ऋमितां पं पंथ । ठकूनियां घात करितील ॥ काम क्रोध लोभ घेऊनियां संगे । परमार्थासि रिघे तो चि मूर्ख ॥ बांधोनिया शिळा पोहूं जातां सिंधु । पावे मति-मंदु मृत्यु शीघ्र ॥ देह गेह भ्रांती सोडूनियां द्यावें । सावन करावें शुद्ध मार्गे ॥ ज्ञानदेवो म्हणे तरी चि साधेल । नाही तरी चळेल मध्य भागों ॥ -चोर के साथ मगति करते हुए जो कदम उठाये जायेंगे, निश्चय ही वे अपना घात कर लेते है। -काम, क्रोध, लोभ के साथ लेकर जो परमार्थ-पथ मे प्रवेश करता है, वह मूर्ख है। -जो कमर मे शिला बाँधकर समुद्र पार करने जायगा, वह मतिमद निश्चय ही शीघ्र मृत्यु का शिकार हो जाता है। -इसलिए देहगत भ्रान्ति मिटा देनी चाहिए और फिर गुद्ध मार्ग से साधन . करे। -ज्ञानदेव कहते है कि ऐसा करेगे तभी वह सब पायेगा, अन्यथा बीच रास्ते में ही डूब जायगा। नामदेव कहते है हिन्दू पूजै देहुरा मुसलमाणु मसीति । नामे सोई सेविआ जॅह देहुरा न मसोति ॥

-२१- . कबीर कहते है हाड़ जले ज्यूं लाकड़ी केस जलें ज्यूं घास । सब तन जलता देखि करि भया कबीर उदास ।। X 1. तनधरि सुखिया कोई न देखा, जो देखा सो दुखिया हो। राजा परजा रंक धनी नर, अधमाधम औ मुखिया हो । घाटि बाढ़ि है सब जग दुखिया, क्या गिरही क्या त्यागी हो । सुखिया या जग नहीं कुटुम्बी, सुखिया नहीं वैरागी हो ॥ जोगी दुखिया जंगम दुखिया, तपसी को दुःख दूना हो । आशा तृष्णा सब घट व्यापे, कोई महल नहीं सूना हो । सांच कहूँ तो कोई न माने, झूठ कहा नहीं जावे हो । अवधू दुखिया भूपति दुखिया, रंक दुखी विपरीते हो । कहे 'कबीर' सुनो भाई साधो, मनुष सुखी मन जीते हो । X X मन न रंगाये रंगाये जोगी कपरा । आसन मारि मंदिर में बैठे, नाम शादि पूजन लागे पथरा। कनवा फड़ाय जोगी जटवा बदौल, दाढ़ी बढ़ाय जोगी होई गेले बकरा ॥ जंगल जाय जोगी धुनिया रमौले, काम जराय जोगी पनि गैले हिजरा ॥ मथवा मुड़ाय जोगी कपड़ा रंगोले, गीता वांचिके होई गले लबरा ।। कहत 'कबीर' सुनो भाई साधो, जम दरवजवा बांधल जैबे पकरा॥ X X x X घर तजि वन खंडि जाइये खनि खइये कंदा । विष विकार न छूटई ऐसा मन गंदा। विष विपिया को वासना तजो तजी नहीं जाई । अनेक जतन करि सुरझे, पुनि पुनि उरझाई ।। X गुरु नानक कहते है : जोगु न खिथा जोग न डंडे जोगु न भसम चड़ाईऐ । जोगु न मुदी मुंडि मुड़ाइऐ जोग न सिडी बाईऐ। अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाईऐ।

--२२-
गली जोगु न होई।
एक दृसटि करि समसरि जाणै जोगी कहीऐ सोई॥
जोगु न बाहरि मड़ी मसाणी जोगु न ताड़ी लाईऐ।
जोग न देसि दिसंतरि भविऐ जोगु न तीरथि नाईऐ ।।
अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाईऐ॥
स्पष्ट है कि धम्मपद इधर ज्ञानदेव, कवीर, नानक आदि सतो की सिखावन,
उधर उपनिषद् और गीता की सिखावन को जोड़नेवाली कडी है। जिस नैतिक
और पवित्र आचरण पर भगवान् बुद्ध ने जोर दिया, अति की चरम सीमाओ से
बचकर मध्यम मार्ग का जो प्रशस्त पथ आलोकित किया, तृष्णा का उन्मूलन कर
क्षमा, प्रेम, करुणा जैसे पावन गुणो को जिस प्रकार जीवन का पाथेय बनाकर
आगे बढने का उपदेश दिया, उसमे मानव का परम कल्याण निहित है। धम्मपद
की नव-सहिता मे प्रदर्गित उसका उज्ज्वल दर्शन हमारा पथ आलोकित करे !
भगवान् बुद्ध ने ब्राह्मण, श्रमण और प्रवजित सबके लिए मार्ग बता दिया है :
वाहितपापो ति ब्राह्मणो समचरिया समणो ति वुच्चति ।
पब्बाजयमत्तनो मलं तस्मा पबजितो ति बुच्चति ॥ ( १७६१२)
. जिसने पाप को वहा दिया, वह है ब्राह्मण ।
• जिसने समता का आचरण ग्रहण कर लिया, वह है श्रमण ।
• जिसने चित्त के मैल को हटा दिया, वह है प्रबजित ।
जिसे जो अँचे, उस मार्ग को वह ग्रहण कर ले । सभी मार्ग उसे निर्वाण की
ओर ले जायेगे। कारण,
रस्ते जुदे-जुदे हैं, मकसूद एक है !
काशी
चैत्र पूर्णिमा, सं० २०२९
२९-३-७२
878007त ?

अध्याय-अनुक्रमणिका १. कर्म-योगः अध्याय खण्ड श्लोक पृष्ठ १. निरर्वरता २५ २. गील ३. सत्-संगति ४. कर्म-विपाक १-५ ६-१२ १३-१६ १७-२० २१-२८ २९-३४ २० २६ ३२ ११ २३ ३१ ३९ ५. नीति ६. अनिन्दा २० ४९ २. साधना ५७ ७. आत्म-दमन ८. देहानित्यत्व ९. जागरूकता १०. शोधन ११. प्रज्ञा-योग १२. वितृष्णता ३५-३९ ४०-४३ ४४-४९ ५०-५५ ६५ ७१ २६ १८ २१ २१ १२ २५ ८७ ३. निष्ठा १३. बुद्ध-बौद्ध १४. सद्धर्म १५. पण्डित १६. भिक्षु ६६-७१ ७२-७६ ७७-८१ ८२-८८ ८९-९२ ९३-१०० १९ २४ २१ २१ १८ ४१ १०१ १०७ ११५ १२३ १७. अरहत् १८. ब्राह्मण १३७ -२६- पृष्ठाङ्क ८८. कापाय-मर्यादा १२९ १७ : अरहत ८९. अहल-लक्षणम् १३१ ९०. अर्हतो विहारः १३३ ९१. श्रमणादयः १३३ ९२. उत्तम. पुरुपः १३५ १८ : बाह्मण ९३. ब्राह्मणो नाम अनघः परिशिष्ट : १. गाथानुक्रम २. नव-सहिता में प्राचीन गाथा-क्रम ९४. क्षमावान् ९५. अविरुद्ध ९६. शुचिः ९७. अनादान ९८. अनासक्तः ९९. क्षीण-भवः १०० प्राजः कृतकृत्यश् च पृष्ठा १३७ १३९ १४१ १४१ १४३ १४५ १४७ १५०-१५७ १५८-१६०

॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासंवुद्धस्स ।।
१ : निर्वैरता
१. अ-वैरं वैर-शमनम्
१
१. धर्ममात्र मन.पुर.सर मनःप्रधान, ( किबहुना ) मनोमय होता
है। यदि कोई प्रदुष्ट मन से बोलता या करता है, तो दुःख
उसका ठीक वैसे ही अनुसरण करता है, जैसे गाड़ी का
पहिया खीचनेवाले ( वैल) के पैर का ।
२. धर्ममात्र मन पुरःसर मनःप्रधान, (किवहुना ) मनोमय होता
है। यदि कोई प्रसन्न मन से वोलता या करता है, तो सुख
उसका ठीक वैसे ही अनुसरण करता है, जैसे सदा साथ
रहनेवाली ( अपनी) छाया ।
३. 'मुझे डाँटा, मुझे मारा, मुझे जीता, मुझे लूटा' इस तरह की
गाँठ जो अपने मन में बाँध रखते है, उनका वैर ( कभी)
शान्त नहीं होता।
४. 'मुझे डॉटा, मुझे मारा, मुझे जीता, मुझे लूटा' इस तरह की
गाँठ जो अपने मन मे बाँध नही रखते, उन्हीका वैर शान्त
होता है ।
५. इस संसार मे वैर से वैर कभी शान्त नही होता। अवैर
से ही वैर शान्त होता है। यही सनातन धर्म है।
६. हम सभीको एक दिन यहाँ से जाना है, इस तथ्य को सामान्य
लोग नहीं जानते । जो इस तथ्य को जानते है, उनके सारे
कलह (विकार) शान्त हो जाते है ।

धम्मपदं
२ निर्वैरः सुखी भवेत
७ सुसुखं वत जीवाम वेरिनेसु अवेरिनो
वेरिनेसु मनुस्सेतु विहराम अवैरिनो।
८ सुसुखं वत जीवाम आतुरेसु अनातुरा
आतुरेसु मनुस्सेसु विहराम अनातुरा।
९ सुसुखं वत जीवाम उस्सुकेसु अनुस्सुका
उस्सुकेसु मनुस्सेसु विहराम अनुस्सुका ।
१० सुसुखं वत जीवाम येसं नो नत्यि किंचनं
पोतिभक्खा भविस्साम देवा आभस्सरा यया।
११ जयं वैरं पसवति दुक्खं सेति पराजितो
उपसन्तो सुखं सेति हित्वा जयपराजयं ।
१२ परदुक्खूपधानेन अत्तनो सुखमिच्छति
वेरसंसग्गसंसट्ठो वेरा सो न पमुच्चति ।

१ : निर्वरता
५
२. निरः सुखी भवेत्
७. वैरियों के बीच अवरी वनकर हम कितना सुखपूर्ण जीवन
बिता रहे हैं ! वैरी मनुष्यों के बीच अबरी होकर हम विहार
कर रहे हैं!
८. आतुरों के बीच अनातुर वनकर हम कितना सुखपूर्ण जीवन
विता रहे है । आतुर मनुष्यों के बीच अनातुर होकर हम
बिहार कर रहे हैं।
९. उत्सुकों के बीच अनुत्सुक बनकर हम कितना सुखपूर्ण जीवन
बिता रहे है ! उत्सुक मनुष्यों के बीच अनुत्सुक होकर हम
विहार कर रहे है।
१०. जिन (हम अकिंचन लोगों) के पास कुछ भी ( परिग्रह) नहीं,
अहो वे (हम) कैसा सुख से जीवन विता रहे हैं। जिस तरह
आभास्वर देव प्रीति का ही भोजन करते है, वैसे ही हम भी
प्रीति-पुष्ट होंगे।
११. विजय वैर को जन्म देती है। पराजित दुःख की नींद सोता
है। (परंतु) उपशान्त ( जिसके राग आदि दोप शांत है )
पुरुप जय-पराजय दोनों को छोड़कर सुख की नीद सोता है।
१२. दूसरों को दुःख देकर जो अपने लिए सुख चाहता है, वह एक
वैर से दूसरे वैर को प्राप्त होता हुआ अनन्त वैर-चक्र मे फँसा
पुरुप कभी वैर से मुक्त नहीं होता ।
* स्वर्ग मे देवो का एक वर्ग, जो अत्यंत प्रीति का प्रतीक माना जाता है।

६
चम्मपदं
१३ नत्यि रागसमो अग्गि नत्यि दोससमो कलि
नत्यि खन्वादिसा दुक्खा नत्यि सन्तिपरं मुखं ।
३ अ-क्रोधेन जयेत् क्रोधम्
१४ कोधं जहे विप्पजहेय्य मानं संयोजन सबमतिक्कमय्य
तं नामरूपस्मि असज्जमान अकिंचनं नानुपतन्ति दुक्खा।
१५ यो वे उप्पतितं कोघं रथं भन्तं व धारये
तमहं सारथि ब्रूमि रस्मिग्गाहो इतरो जनो।
१६ अक्कोधेन जिने कोवं असाधू साधुना जिने
जिने कदरियं दानेन सच्चेन अलोकवादिनं ।
१७ सच्चं भणे न कुज्झेय्य दज्जाप्पस्मि पियाचितो
एतेहि तीहि ठानेहि गच्छे देवान सन्तिके।
१८ अहिंसका ये मुनयो निच्चं कायेन संवता
ते यन्ति अच्चुतं ठानं यत्य गन्त्वा न सोचरे।

१: निर्वरता
७
१३. राग (आसक्ति ) के समान अग्नि नही। उप के समान मल
नहीं । स्कंधों के समान दु.ख नहीं । शान्ति से बढ़कर
सुख नहीं।
३. अ-क्रोधेन जयेत् क्रोधम्
१४. क्रोध को छोड़े। अभिमान को त्याग दे। (किबहुना ) संयोजन
( बन्धन) मात्र को पार कर जाय । इस तरह जो नामरूप
(विपयों) मे आसक्त नहीं रहता, उस अकिंचन (निर्वसन
निष्परिग्रही) पुरुप को दुःख संतप्त नहीं करते ।
१५. जो चढ़े हुए क्रोध के आवेग को भ्रान्त रथ के वेग की भॉति
रोक लेता है, उसे मैं सारथी कहता हूँ। और तो केवल लगाम
पकड़नेवाले हैं
१६. अक्रोध से क्रोध को जीते । साधुता ( भलाई ) से असाधु को
जीते। दान से कृपण को जीते। सत्य से झूठ को जीते ।
१७. ( सदा ) सच बोले । कभी क्रोध न करे । और मॉगने पर
थोड़ा ही क्यों न हो कुछ अवश्य दे दे । इन तीन वातों से
( अर्थात् सत्य, संयम, दान से ) मनुष्य देवताओं के पास
पहुँचता है।
१८. जो मुनिजन अहिसक है, शरीर से जो सदा संयत रहते हैं,
वे उस अच्युत पद को प्राप्त होते हैं, जहाँ शोक नही करना
होता।
* रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विनान-ये पाँच स्कंध है ।

८
धम्मपदं
४ अहिंसैव आर्य-लक्षणम्
१९ न तेन अरियो होति येन पाणानि हिंसति
अहिंसा सब्बपाणानं अरियो ति पवुच्चति ।
५ आत्मौपम्यम्
२० सब्बे तसन्ति दण्डस्स सब्बे भायन्ति मच्चुनो
अत्तानं उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये ।
२१ सम्बे तसन्ति दण्डस्स सब्बसं जीवितं पियं
अत्तानं उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये।
२२ सुखकामानि भूतानि यो दण्डेन विहिंसति
अत्तनो सुखमेसानो पेच्च सो न लभते सुखं ।
२३ सुखकामानि भूतानि यो दण्डेन न हिंसति
अत्तनो सुखमेसानो पेच्च सो लभते सुखं
२४ मा 'वोच फरसं कंचि वुत्ता पटिवदेय्यु तं
दुक्खा हि सारम्भकथा पटिदण्डा फुसेय्यु तं ।
२५ स चे नरेसि अत्तानं कंसो उपहतो यथा
एस पत्तो 'सि निब्बानं सारम्भो ते न विज्जति ।

१ : निर्वरता
९
४. अहिसैव आर्य-लक्षणम्
१९. प्राणियों की हिसा करने से कोई आर्य नहीं होता। आर्य तो
प्राणिमात्र की महिमा से ही कहा जाता है।
५. आत्मौपम्यम्
२०. दण्ड से सभी डरते है। मृत्यु से सभी भय खाते है । अत: अपने
समान ही सवका सुख-दुःख जानकर न तो स्वयं ही किसीको
मारें और न अन्य किसीको मारने के लिए प्रेरित करें।
२१. दण्ड से सभी डरते है। सबको अपना जीवन प्रिय है। अत:
अपने समान ही सवका सुख-दुःख जानकर न तो स्वयं ही
किसीको मारें और न अन्य किसीको मारने के लिए प्रेरित करें।
२२. सव जीव अपने लिए सुख की कामना करते है। दण्ड देकर
उनकी जो हिंसा करता है, वह ( केवल ) अपने ही सुख की
कामना करनेवाला मरकर परलोक मे सुख नहीं पाता।
२३. सव जीव अपने लिए सुख की कामना करते है। इसलिए
जो दण्ड देकर उनकी हिंसा नहीं करता, वही अपने सुख की
कामना करनेवाला परलोक में पहुँचकर सुख पाता है।
।
२४. कठोर न बोलो। बदले में वे भी कठोर बोलेगे। क्रोधवचन
( सारम्भकथा ) दुःखदायी है । तुम्हे प्रतिदण्ड मिलेगा।
२५. टूटे हुए काँसे का थाल पीटने पर भी आवाज नहीं करता।
वैसे ही यदि तुमने अपने को निःशब्द ( प्रतिक्रियारहित )
बना लिया तो ऐसा समझो कि तुम निर्वाण पा गये, क्योंकि
तुम्हारे लिए प्रतिक्रिया जाती रही।

२ : शीलम्
६ श्रेयो-जीवनम्
१ यो च वस्ससतं जीवे दुस्सीलो असमाहितो
एकाहं जीवितं सेय्यो सीलवन्तस्स झायिनो।
२ यो च वस्ससतं जीवे दुप्पो असमाहितो
एकाहं जीवितं सेट्यो पावन्तस्स झायिनो।
यो च वस्ससतं जीवे कुसोतो हीनवोरियो
एकाहं जीवितं सेथ्यो विरियमारभतो दळ्हं ।
४ यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं उदयव्ययं
एकाहं जीवितं लेय्यो पस्सतो उदयव्ययं ।
यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं अमतं पदं
एकाहं जीवितं सेटयो पस्सतो अमतं पदं।
६ यो च वस्ससतं जीवे अपस्तं धम्ममुत्तम
एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो धम्ममुत्तमं ।

२ : शील ६. श्रेयो-जीवनम् १. दुःशील और ध्यानरहित ( असमाहित ) होकर सौ साल जीने की अपेक्षा शीलवान् और समाधिमान् होकर एक दिन जीना भी श्रेष्ठ है। २. दुप्पन और ध्यानरहित ( असमाहित ) होकर सौ साल जीने की अपेक्षा प्रज्ञावान् और समाधिमान् होकर एक दिन जीना भी श्रेष्ठ ह। ३. आलसी और अनुद्यमी होकर सौ साल जीने की अपेक्षा दृढ़ उद्यमशील होकर एक दिन जीना भी श्रेष्ठ है। ४. विना ( पदार्थमात्र के ) उदय और अस्त का साक्षात्कार किये ही सौ साल जीने की अपेक्षा उनके उदय और अस्त का सम्यक् आलोचन कर एक दिन जीना भी श्रेष्ठ है। ५. विना अमृत पद (निर्वाण ) का साक्षात्कार किये सौ साल जीने की अपेक्षा अमृत पद का दर्शन कर एक दिन जीना भी श्रेष्ठ है। ६. विना उत्तम धर्म का साक्षात्कार किये सौ साल जीने की अपेक्षा उत्तम धर्म का दर्शन कर एक दिन जीना भी श्रेष्ठ है।

१२
धम्मपदं
७ शील-गन्धः
७ न पुप्फगन्धो पटिवातमेति न चन्दनं तगरं महिलका वा
सतं च गन्धो पटिवातमेति सब्बा दिसा सप्पुरिसो पवाति ।
८ चन्दनं तगरं वा पि उप्पलं अथ वस्सिकी
एतेसं गन्धजातानं सीलगन्धो अनुत्तरो।
९ अप्प-मत्तो अयं गन्धो या'यं तगरचन्दनी
यो च सीलवतं गन्धो वाति देवेसु उत्तमो।
१० तेसं संपन्नसीलानं अप्पमादविहारिनं
सम्मदा विमुत्तानं मारो भग्गं न विन्दति ।
८ शीलं सुखम्
११ जिघच्छापरमा रोगा सडखारा परमा दुखा
एतं ञत्वा यथाभूतं निब्बानं परमं सुखं ।
१२ आरोग्यपरमा लाभा सन्तुठिपरमं धनं
विस्सासपरमा जाति निब्बानं परमं सुखं ।

२: गोल
१३
७. शील-गन्ध
७. फूलों की सुगंध वायु की विपरीत दिशा मे नही जा सकती।
न चन्दन की सुगध, न तगर, चमेली, वेला की सुगंध ही जा
सकती है । परन्तु सज्जनों की सुगंध विपरीत दिशा मे भी
फैलती है । अर्थात् सत्पुरुप ( के पुण्याचरण ) की सुगंध सभी
दिशाओं में फैलती रहती है।
८. चन्दन या तगर, कमल या जूही इन सभी की सुगंध से
शील की सुगंध उत्तम होती है।
।
९. तगर या चन्दन की सुगंध की मात्रा थोड़ी ही होती है।
( वह हमारी नाक तक पहुँचती है। ) परन्तु शीलवान् पुरुप
की सुगंध वहुत ऊँची (उत्तम ) होती है । वह [ नाक (स्वर्ग)
तक ] देवों मे वहती है।
१०. ऐसे जो शील-सम्पन्न, समाधि में सदा अप्रमत्त विहार करने-
वाले और प्रजा के कारण ( अविद्या से ) पूर्ण मुक्त होते
है, उनके आड़े मार ( शैतान ) कभी नहीं आता।
८. पापानां अकरणं सुखम्
११. बुभुमा ( भूख ) ही सबसे बड़ा रोग है। संस्कार ही सबसे
बड़ा दु.ख है। यह जो ठीक से जानता है, वही जानता है
कि निर्वाण सबसे बड़ा सुख है।
१२. आरोग्य (स्वास्थ्य ) ही सबसे बड़ा लाभ है। संतोप ही सबसे
बड़ा धन है। विश्वास ही सबसे बड़ा वन्धु है। तथा निवणि
ही सबसे बड़ा सुख है।

१४
धम्मपदं
१३ अत्यम्हि जातम्हि सुखा सहाया तुट्ठी सुखा या इतरीतरेन
पुञ्ज सुखं जीवितसङखयम्हि सम्बस्स दुक्खस्स सुखं पहानं ।
१४ सुखा मत्तेय्यता लोके अथो पेत्तेय्यता सुखा
सुखा सामञ्जता लोके अथो ब्रह्मज्ञता सुखा।
१५ सुखं याव जरा सीलं सुखा सद्धा पतिष्ठिता
सुखो पज्ञाय पटिलाभो पापानं अकरणं सुखं ।
१६ मत्तासुखपरिच्चागा पस्से चे विपुलं सुखं
चजे मत्तासुखं धीरो संपस्सं विपुलं सुखं ।
९ दान-विधानम्
१७ तिणदोसानि खत्तानि रागदोसा अयं पजा
तस्मा हि वीतरागेसु दिन्नं होति महप्फलं ।
१८ तिणदोसानि खेत्तानि दोसदोसा अयं पजा
तस्मा हि वीतदोसेसु दिन्नं होति महप्फलं ।

२: शील
१५
१३. काम पड़ने पर सहायकों का होना सुख है। जो मिले उसीसे
संतोप करना सुख है। जीवन के क्षय अर्थात् मृत्यु के समय
पुण्य ही सुख है । सभी दुःखों का विनाश ( निर्वाण ) ही
मुख है।
१४. संसार मे मातृसेवा-परायणता सुख है तथा पितृसेवा-परायणता
सुख है। श्रमणसेवा-परायणता सुख है तथा ब्राह्मणसेवा-
परायणता सुख है।
१५. वृद्धावस्था तक शील का पालन सुख है। श्रद्धा का स्थिर होना
सुख है। प्रज्ञा को प्राप्त होना सुख है । ( संक्षेप मे ) पापों का
न करना ही सुख है।
१६. मित सुख के परित्याग से यदि अमित सुख का लाभ होता
दिखायी दे तो धीर पुरुप को चाहिए कि वह मित सुख को
त्याग दे।
९. दान-विधानम्
१७. खेतों का दोप है तृण । इस प्रजा ( मनुष्य-समाज ) का दोप है
राग । इसलिए वीतराग ( रागरहित ) पुरुपों को दिया
हुआ दान महान् फलदायी होता है।
१८. खेतो का दोप है तृण । इस प्रजा का दोप है द्वेप। इसलिए
वीतद्वेप ( द्वेपरहित ) पुरुपों को दिया हुआ दान महान्
फलदायी होता है।

-
धम्मपदं
१६
१९ तिणदोसानि खेत्तानि मोहदोसा अयं पजा
तस्मा हि वीतमोहेसु दिन्नं होति महप्फलं ।
२० तिणदोसानि खेत्तानि इच्छादोसा अयं पजा
तस्मा हि विगतिच्छेसु दिन्नं होति महत्फलं ।
२१ न वे कदरिया देवलोकं वजन्ति वाला ह वे न पसंसन्ति दानं
धीरो च दानं अनुमोदमानो तेनेव सो होति सुखी पररथ ।
१० अको धर्मः सत्यम्
२२ एकं धम्मं अतीतस्स मुसावादिस्स जन्तुनो
वितिण्णपरलोकस्स नस्थि पापं अकारियं।
२३ सम्वदानं धरमदान जिनाति सम्बं रसं घमासो जितनाति
सत्वं रति घामरती मिनाति ताहरू यो सदुःखं जिनाति ।

२: शील १९. खेतों का दोप है तृण । इस प्रजा का दोप है मोह । इस- लिए वीतमोह (मोहरहित ) पुरुषों को दिया हुआ दान महान् फलदायी होता है। २०. खेतों का दोप है तृण । इस प्रजा का दोप है इच्छा। इसलिए बिगतेच्छ (इच्छारहित ) पुरुषों को दिया हुआ दान महान् फलदायी होता है। २१. कंजूस कभी देवलोक (स्वर्ग) को नहीं जात। मूर्ख कभी दान की प्रशंसा नही करते । धीर पुरुप ही दान का अनुमोदन करता है और उसके कारण वही परलोक मे सुखी होता है। १०. अको धर्मः सत्यम् २२. एकमात्र अर्थात् प्रथम धर्म जो सत्य है, उसीका उलंघन करके जो असत्य भापण करता है और इस तरह जिसने अपना परलोक अर्थात् स्वर्ग भी नष्ट कर डाला है, उसके लिए कोई पाप ऐसा नहीं रहा जो वह न कर सकता हो। २३. धर्म का दान सब दानों से बढकर है । धम का रस सव रसों से बढ़कर है। धर्म की रति सव रतियों से बढ़कर है। तृष्णा का क्षय अर्थात् निर्वाण सब दुःखों को जीत लेता है। ( अर्थात् किसी दु.ख की छाया तक निर्वाण को नहीं छू सकती।) U

धम्मपदं
११ धर्मपदं संचिनुयात्
२४ को इमं पठवि विचेस्सति यमलोकंच इमं सदेवक
को धम्मपदं सुदेसितं कुसलो पुप्फमिव पचेस्सति ।
२५ सेखो पठवि विचेस्सति यमलोकं च इमं सदेवक
सेखो धम्मपदं सुदेसितं कुसलो पुप्फमिव पचेस्सति ।
२६ सहस्समपि चे वाचा अनत्यपदसंहिता
एक अत्यपदं सेय्यो यं सुत्वा उपसम्मति ।
२७ सहस्समपि चे गाथा अनत्यपदसंहिता
एक गाथापदं सेय्यो यं सुत्वा उपसम्मति ।
२८ यो च गाथासतं भासे अनत्यपदसंहिता
एकं धम्मपदं सेय्यो यं सुत्वा उपसम्मति ।
२९ यो मुखसंयतो भिक्खु मन्तभाणी अनुद्धतो
अत्थं धम्मं च दीपेति मधुरं तस्स भासितं ।

२: शील
१९
११. धर्मपदं संचिनुयात्
२४. कौन इस पृथ्वी को और साथ ही यमलोक और देवलोक
को भी अछूता छोड़कर कुशल मालाकार (सुदर्शित ) पुष्प
की भाँति सुदर्शित धर्म के पद (वचन ) चुन लेगा ?
२५. जिज्ञासु शिप्य ही इस पृथ्वी को और उसके साथ यमलोक
और देवलोक को भी अछूता छोड़कर कुशल मालाकार
(सुदर्शित ) पुष्प की भाँति सुदर्शित धर्म के पद (वचन )
चुन लेगा।
२६. निरर्थक पदों से युक्त सहस्रों वचनों से भी एक सार्थक पद
श्रेयस्कर है, जिसके श्रवण से शांति-लाभ हो ।
२७. निरर्थक पदों से युक्त सहस्रों गाथाओं से भी वह एक गाथा-
पद श्रेयस्कर है, जिसके श्रवण से शाति-लाभ हो।
२८. निरर्थक पदों से भरी सौ गाथाओ के रटने से एक
सार्थक धर्म का पद श्रेयस्कर है, जिसके श्रवण से शाति-
लाभ हो।
२९. जो भिक्षु ( सदा) वाक्संयम रखता है और जव बोलता है
तव सोचकर ही बोलता है तथा जो भी बोलता हे नम्रता
के साथ अर्थ और धर्म को प्रकाशित करता हुआ वोलता
है, उसीका भापण मधुर होता है ।

२०
धम्मपदं
१२ यथा ब्रूयात् तथा कुर्यात्
३० बहुं पि चे सहितं भासमानो न तक्करो होति नरो पमत्तो
गोपो व गावो गणयं परेसं न भागवा सामञ्जस्स होति ।
३१ अप्पं पि चे सहितं भासमानो धम्मस्स होति अनुधम्मचारी
रागं च दोसं च पहाय मोहं सम्मप्पजानो सुविमुत्तचित्तो
अनुपादियानो इध वा हुरं वा स भागवा सामञ्जस्स होति ।
३२ यथापि रुचिरं पुष्फ वण्णवन्तं अगन्धक
एवं सुभासिता वाचा अफला होति अकुब्बतो।
३३ यथापि रुचिरं पुष्पं वणवन्तं सगन्धक
एवं सुभासिता वाचा सफला होति सकुब्बतो।

२: शील
२१
१२. यथा ब्रूयात् तथा कुर्यात्
३०. भले ही कोई वहुत-सी संहिता (धर्म-ग्रंथ की पंक्तियाँ) कंठ
कर ले, परन्तु प्रमादवश उसका आचरण न करे, तो वह
दूसरों की गौएँ गिननेवाले चरवाहे के समान श्रामण्य का
अधिकारी नहीं होता।
३१. भले ही किसीको इनी-गिनी संहिता कंठ हो, परन्तु वह यदि
( उसमें उपदिप्ट ) धर्म का आचरण करता है अर्थात् राग,
द्वेप और मोह को छोड़ सम्यक्ज्ञान से मुक्तचित्त होकर
इहलोक या परलोक की किसी भी वस्तु के प्रति निरभिलाप
हो गया है, तो वह श्रामण्य का अधिकारी होता है।
३२. जैसे कोई सुन्दर फूल ( वाहरी रूप ) रग से चमकदार होकर
सुगंध (आन्तरिक गुण) से रहित होता है, वैसे ही आचरण
न करनेवाले की सुभापित वाणी निष्फल होती है।
३३. जैसे कोई सुन्दर फूल रंग से चमकदार होकर साथ ही सुगन्ध से
भी महकता रहता है, वैसे ही आचरण करनेवाले की सुभापित
वाणी सफल होती है।

धम्मपदं
१४ प्राज-सङगः
५ साहु दस्सनमरियानं सन्-निवासो सदा सुखो
अदस्सनेन वालानं निच्चमेव सुखी सिया ।
६ बालसङ्गतचारी हि दीघमद्धान सोचति
दुक्खो बालेहि संवासो अमित्तेनेव सम्बदा
धीरो च सुखसंवासो जातीनं व समागमो ।
७ तस्मा हि
धोरं च पज्नं च बहुस्सुतं च धोरव्हसील क्तवन्तमरियं
तं तादिसं सप्पुरिसं सुमेधं भजेथ नक्खत्तपथं व चन्दिमा।
८ निधीनं व पवत्तारं यं पस्से वज्जदस्सिनं
निग्गय्हवादि मेधावि तादिसं पण्डितं भजे
तादिसं भजमानस्स सेय्यो होति न पापियो।
९ ओवदेय्यानुसासेय्य असभा च निवारये
सतं हि सो पियो होति असतं होति अप्पियो ।
१० न भजे पापके मित्ते न भजे पुरिसाधमे
भजेथ मित्ते कल्याणे भजेथ पुरिसुत्तमे।

३ : सत्-संगति
२५
१४. प्राज्ञ-सगः
५. आर्यो का दर्शन ( सदा ) हितकर है। सत्-पुरुपों का सहवास
सदा सुखकर है। मूों के अदर्शन से ( उनसे सदा दूर
रहने से) ही मनुष्य सदा सुखी होता है।
६. मूढजनों की संगति करनेवाला दूर तक ( इहलोक से परलोक
तक ) शोक ही करता रहता है । शत्रुओं की संगति के समान
मूढजनों की संगति सदा दु.खदायी ही होती है और बन्धुओं
की संगति के समान धीर पुरुप की संगति सदा ही सुखदायी
होती है
७. इसलिए जैसे चन्द्रमा नक्षत्र-पथ का अनुसरण करता है, वैसे
ही सत्-पुरुप का जो कि धीर, प्राज, बहुश्रुत, नेतृत्वशाली,
व्रती, आर्य तथा बुद्धिमान् है अनुसरण करें।
८. गड़े धन दिखा देनेवाले के समान कोई ( अपने छिपे ) दोष
दिखा देनेवाला दिखायी दे तो उस वाक्ताडन करनेवाले
बुद्धिमान् पण्डित की उपासना करनेवाले का सदा कल्याण
ही होता है, कभी अकल्याण नहीं होता।
९. जो खरी-खरी सुनाता है, सन्मार्ग वताता है तथा असन्मार्ग से
बचाता है, वही सज्जनो को प्रिय होता है और असज्जनो
को अप्रिय।
१०. न दुराचारी मित्रों की संगत करे, न अधम पुरुपों का ही सग
करे। सदाचारी मित्रों की संगति करे और उत्तम पुरुषों का
ही संग करे।

२६
धम्मपदं
१५ साधु-पूजा
११ मासे मासे सहस्सेन यो यजेय सतं समं
एक च भावित'त्तानं मुहत्तमपि पूजये
सा येव पूजना सेय्यो यं चे वस्ससतं हुतं ।
१२ यो च वस्ससतं जन्तु अग्गि परिचरे वने
एकं च भावित'त्तानं मुहुत्तमपि पूजये
सा येव पूजना सेय्यो यं चे वस्ससतं हुतं ।
१३ यं किंचि यिनें व हुतं व लोके संवच्छरं यजेथ पुज्ञपेक्खो
सबं पि तं न चतुभागमेति अभिवादना उज्जुगतेसु सेय्यो।
१४ अभिवादनसीलिस्स निच्चं वद्धापचायिनो
चत्तारो धम्मा वड्ढन्ति आयु वण्णो सुखं बलं ।
१५ यम्हा धम्म विजानेय्य सम्मासंबुद्धदेसितं
सक्कच्चं तं नमस्सेय्य अग्गिहुत्तं व ब्राह्मणो।
१६ पूजारहे पूजयतो बुद्धे यदि व सावके
पपञ्चसमतिक्कन्ते तिण्णसोकपरिवे-

३ : सत्-संगति
२७
१५. साधु-पूजा
११. कोई प्रतिमास सहस्र-सहस्र ( रुपयों) की दक्षिणा देकर सौ वर्प
( अर्थात् जीवनभर ) यन करता है और कोई भावितात्मा
(परिशुद्ध मनवाले ) पुरुप की मुहूर्तभर पूजा करता है,
तो इन दोनों में शतवर्प यन से वह मुहूर्तभर की पूजा ही
श्रेष्ठ है।
१२. कोई जन सौ वर्ष वन मे अग्नि की परिचर्या करता है और
दूसरा कोई भावितात्मा की मुहूर्त भर ही पूजा करता है,
तो इन दोनों मे शतवर्ष हवन से वह मुहूर्तभर की पूजा ही
श्रेष्ठ है।
१३. इस लोक में जो कुछ भजन या हवन किया, पुण्य के
लोभ से वर्पभर यज-सत्र भी चलाया, फिर भी वह सारा
सरल-चरित पुरुपों को किये अभिवादन ( के पुण्य ) के
चौथाई के भी बरावर नहीं होता। उससे तो ( संतों को )
अभिवादन (अपने नामोच्चारणपूर्वक प्रणाम ) ही श्रेष्ठ है।
१४. जो अभिवादनशील है, जो सदा वृद्धों की सेवा करता है,
उसकी चार वाते ( धर्म ) वढती है-आयु, वर्ण याने पुष्टि,
सुख और वल।
१५. जिससे सम्यक् सबुद्ध द्वारा उपदिष्ट धर्म को जाना जाय,
उसको वैसे ही प्रणाम किया जाय, जैसे ब्राह्मण अग्निहोम
को सत्कारपूर्वक प्रणाम करता है।
१६. पूजनीय वुद्ध हों या उनके श्रावक-जो प्रपंच को पार कर
गये हैं, जो शोक और भय को तर गये है,

२८
१७ ते तादिसे पूजयतो निब्बुत्ते अकुत्तोभये
न सक्का पुञ्ज सडखातुं इमेत्तमपि केनचि ।
१६ सन्त: प्रकाशन्ते
१८ दुप्पटवज्जं दुरभिरमं दुरावासा घरा दुखा
दुक्खोऽसमानसंवासो दुक्खानुपतित'द्धगू
तस्मा न चद्धगू सिया न च दुक्खानुपतितो सिया।
१९ सद्धो सीलन संपन्नो यसोभोगसमप्पितो
यं यं पदेसं भजति तत्य तत्येव पूजितो।
२० दूरे सन्तो पकासन्ति हिमवन्तो व पब्बतो
असन्तेत्य न दिस्सन्ति रत्तिखित्ता यथा सरा।

२९
३ : सत्-संगति
१७. जो निवृत्त हुए है और अतएव सर्वथा निर्भय हुए हैं, ऐसे
पुरुपों की पूजा करनेवाले के पुण्य की मात्रा को आँकना
किसीके लिए भी संभव नहीं ।
१६. सन्तः प्रकाशन्ते
१८. यथाविधि ग्रहण न की हुई प्रवज्या दुःखदायी होती है । ठीक से
न रखा हुआ घर दुःखदायी होता है। असमान लोगों का
सहवास दुःखदायी होता है । ( घर से दूर पड़ा) पथिक
दुःखी होता है । इसलिए न (संसार का) पथिक ही बने, न
दुःखी ही हो।
१९. श्रद्धा और शील से सम्पन्न, यन और भोग से पुष्ट ( पुरुप )
जहाँ कही जाता है, सर्वत्र पूजित होता है।
२०. हिममंडित पर्वत-शिखरों के समान सन्त दूर से भी दिखाई
देते है । परंतु असन्त रात्रि में छोड़े वाण की भॉति यही
( पास में पड़े होने पर भी ) नहीं दिखाई देते।
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४ : कर्म-विपाकः
१७ अभित्व रेत कल्याण
१ यथापि पुप्फरासिम्हा कयिरा मालागुणे बहू
एवं जातेन मच्चन कत्तब्बं कुसलं पहुं।
२ अभित्थरेथ कल्याणे पापा चित्तं निवारये
दन्धं हि करोतो पुनं पापस्मि रमती मनो।
३ यो च पुब्बे पमज्जित्वा पच्छा सो न प्पमज्जति
सोमं लोकं पभासेति अभा मुत्तो व चन्दिमा ।
४ यस्स पापं कतं कम्मं कुसलेन पिथीयति
सो'मं लोकं पभासेति अब्भा मुत्तो व चन्दिमा।
५ वाणिजो व भयं मग्गं अप्पसत्थो महद्धनो
विसं जीवितुकामो व पापानि परिवज्जये।
६ पाणिम्हि चे वणो नास्स हरेय्य पाणिना विसं
नाबणं विसमन्वेति नत्थि पापं अकुब्बतो।

४ : कर्म-विपाक
१७. अभित्वरेत कल्याण
१. जैसे कोई फूलों की राशि में से ( एक-एक फूल चुनकर धागे
में पिरोता हुआ अनेक फूलों की एक लम्बी) माला बनाता
है, वैसे ही जन्म लेकर ( इस जन्म के धागे में एक-एक पुण्य
कर्म पिरोते हुए ) मनुष्य को एक पुण्य की लम्बी माला ही
वनानी चाहिए।
२. पुण्य ( कर्म ) करने में शीघ्रता करे। पाप ( कर्म ) से चित्त
को निवृत्त करे। पुण्य ( कर्म ) करने मे आलस्य या शिथि-
लता करनेवाले का मन पाप मे रमने लगता है।
३. पहले प्रमाद हो जाने पर वाद मे जो प्रमाद नहीं करता, वह
मेघ से मुक्त चन्द्रमा की तरह इस लोक को प्रकाशित करता है।
४. जिसका किया हुआ पाप अनन्तर उसीके किये हुए पुण्य से ढंक
जाता है, वह मेघ से मुक्त चन्द्रमा की तरह इस लोक को
प्रकाशित करता है।
५. जिसके साथी थोड़े हैं, लेकिन जिसके पास बहुत धन है ऐसा
वनिया जिस तरह भयकारी ( जंगल का ) मार्ग छोड़ देता है,
या जिस तरह जीने की इच्छा रखनेवाला व्यक्ति विप से दूर ही
रहता है, उसी तरह पापों से दूर रहना चाहिए।
६. हाथ मे घाव न हो तो हाथ मे विप लिया जा सकता है।
क्योंकि घाव न हो तो शरीर मे विप नहीं लगता। इसी
तरह जो करता ही नही, उसे पाप नहीं लगता।

धम्मपदं
७ पापं चे पुरिसो कविरा न तं कयिरा पुनःपुनं
न तम्हि छन्दं कयिराय दुक्खो पापस्स उच्चयो ।
८ पुझं चे पुरिसो कयिरा कयिरायेनं पुनःपुन
तम्हि छन्दं कयिराय सुखो पुनस्स उच्चयो ।
१८ पाप-पुण्ये उभयत्र फलतः
९ इव सोचति पेच्च सोचति पापकारी उभयत्य लोचति
सो सोचति सो विहति दिस्वा कम्म किलिमत्तनो।
१० इघ मोदति पेच्च मोदति कतपुझो उभयत्य मोदति
सो मोदति सो पमोदति विस्वा कम्म विसुद्धिमत्तनो।
११ इव तप्पति पेच्च तप्पति पापकारी उभयत्य तप्पति
पापं मे कतं ति तप्पति भिल्यो तप्पति दुग्गतिं गतो।
१२ इथ नन्दति पेच्च नन्दति कतपुञो उभयत्य नन्दति
पुनं मे कतं ति नन्दति भिय्यो नन्दति सुग्गति गतो।

४ : कर्म-विपाक ७. मनुष्य से यदि पाप हो ही जाय तो उसे बार-बार न दुहराये, उसमें रत न हो क्योंकि पाप पर पाप करना दुःखदायी है । ८. मनुष्य यदि पुण्य करे तो उसे वार-बार दुहराये। उसीकी इच्छा करता रहे क्योंकि पुण्य करना सुखदायी है। १८. पाप-पुण्ये उभयत्र फलतः ९. पापकर्म का कर्ता इस लोक मे शोक करता है और परलोक में ( जाकर भी ) शोक ही करता है। वह दोनों लोकों में शोक करता है । अपना ( क्लेशकर ) अशुभ कर्म देखकर वह शोक करता है, तड़पता है। १०. पुण्यकर्म का कर्ता इस लोक में मुदित होता है और परलोक मे ( जाकर ) भी मुदित ही होता है । वह दोनों लोकों में मुदित होता है । अपना ( सुखकर ) शुभकर्म देखकर वह मुदित होता है, प्रमुदित होता है। ११. पापकर्म का कर्ता इस लोक मे संतप्त होता है और परलोक में ( जाकर ) भी संतप्त ही होता है। वह दोनों लोकों में संतप्त ही होता है। 'मैने पाप किया' कहकर वह ( इस लोक में) संतप्त होता है और ( परलोक मे ) दुर्गति को प्राप्त होकर फिर से संतप्त होता है। १२. पुण्यकर्म का कर्ता इस लोक में आनंदित होता है और पर- लोक में भी आनंदित ही होता है । वह दोनों लोकों में आनं- दित होता है । 'मैने पुण्य किया' कहकर वह ( इस लोक में ) आनंदित होता है और ( परलोक में ) सुगति को पाकर फिर से आनंदित होता है। ३

३४
धम्मपदं
१९ पापपुण्य-फले अपरिहार्य
१३ पापो पि पस्सति भन्नं याव पापं न पच्चति
यदा च पच्चति पापं अथ पापो पापानि पस्सति ।
१४ भद्रो पि पस्सति पापं याव भद्रं न पच्चति
यदा च पच्चति भद्रं अब भद्रो भद्रानि पस्सति ।
१५ माप्प मओय पापस्स न मंतं आगमिस्सति
उदविन्दुनिपातेन उदकुम्भो पि पूरति
पूरति बालो पापस्स थोक्योक पि आचिनं ।
१६ माप्प मोय पुञस्स न मंतं आगमिस्सति
उदविन्दुनिपातेन उदकुम्भो पि पूरति
पूरति धीरो पुञस्स थोकथोक पि आचिनं ।
१७ न अन्तलिक्खे न समुद्दमझे न पचतानं विवरं पविस्स
न विज्जती सो जगति प्पदेसो यत्र ठितो मुञ्चेय्य पापकम्मा।
१८ न अन्तलिखे न समुद्दमझे न पब्बतानं विवरं पविस्त
न विज्जती सो जगति प्पदेसो यत्र ठितं न प्पसहेय मच्चु ।
२० पाप-विपाको रुदनम्
१९ चरन्ति वाला दुम्मेधा अमित्तेनेव अत्तना
करोन्ता पापकं कम्मं यं होति कटुकम्फलं ।

४ : कर्म-विपाक ३५ १९. पापपुण्य-फले अपरिहार्य १३. जब तक पाप पकता नही (उसका फल नहीं मिलता) तव तक पापकर्ता को वह अच्छा ही लगता है। जव वह पक जाता है, तभी पापकर्ता को अपना पाप दिखाई देता है। १४. जब तक पुण्य पकता नही, तव तक पुण्यकर्ता को पुण्य भी पाप-सा लगता है। परन्तु जव पुण्य पक जाता है तभी पुण्य- कर्ता को अपना पुण्य दिखाई देता है। १५. 'पाप मुझसे न वनेगा' यों पाप की अवहेलना न करे । जैसे बूंद-बूंद से घट भरता है, वैसे ही मूर्ख मनुष्य थोड़ा-थोड़ा संचय करते हुए पाप ( का घड़ा) भर लेता है । १६. 'पुण्य मुझसे न बनेगा' यों पुण्य की अवहेलना न करे । जैसे यूँद-बूंद से घट भरता है, वैसे ही मूर्ख मनुष्य थोड़ा-थोड़ा संचय करते हुए पुण्य ( का घड़ा) भर लेता है । १७. संसार में ऐसा कोई स्थान नहीं-न अंतरिक्ष में, न समुद्र के गर्भ मे, न पर्वतों की गुफाओं में-कि जिसमें घुसकर ( छिपने से) मनुष्य पापकर्म से ( उसके कड़वे फल से ) बच सके। १८. संसार मे ऐसा कोई स्थान नहीं-न अंतरिक्ष में, न समुद्र के गर्भ मे, न पर्वतों की गुफाओं मे ही-कि जिसमें घुसकर (छिपने से ) मनुष्य मृत्यु से बच सके । २०. पापमेव मृत्युः १९. दुर्बुद्धि अन जन स्वयं अपने ही साथ शत्रु जैसा व्यवहार करते हैं। वे ऐसा पापकर्म करते हैं जिसका फल कटु होता है ।

धम्मपदं
२० न तं कम्मं कतं साधु यं कत्वा अनुतप्पति
यस्स अस्सुमुखो रोदं विपाकं पटिसेवति ।
२१ तं च कम्मं कतं साधु यं कत्वा नानुतप्पति
यस्स पतीतो सुमनो विपाकं पटिसेवति ।
२२ अकतं दुक्कत सेय्यो पच्छा तपति दुक्कतं
कतं च सुकतं सेथ्यो यं कत्वा नानुतप्पति ।
२३ मधु वा मञ्जती वालो याव पापं न पच्चति
यदा च पच्चती पापं अथ बालो दुक्खं निगच्छति ।
२४ न हि पापं कतं कम्मं सज्जु-खीरं व मुच्चति
उहं तं बालसन्वेति भस्मच्छन्नो व पावको।
२५ अथ पापानि कम्मानि करं बालो न बुज्झति
सेहि कम्मेहि दुम्मेधो अग्गिदड्ढो व तप्पति ।
२६ अयसा व मलं समुद्वितं तदुट्ठाय तमेव खादति
एवं अतिधोनचारिनं सानि कम्मानि नयन्ति दुग्गति ।

४ : कर्म-विपाक
२०. उस काम का करना ठीक नहीं जिसके करने पर पश्चात्ताप हो
और फल ऑसू वहाते व विलपते भोगना पड़े।
२१. वही कर्म भला है जिसके करने पर मनुष्य को पश्चात्ताप नही
होता तथा जिसका फल नि.शंक व प्रसन्न चित्त से भोगता है।
२२. दुष्कर्म न करना ही अच्छा, क्योंकि दुष्कर्मी को पश्चात्ताप
करना पड़ता है। सत्कर्म करना ही अच्छा, जिसके करने पर
पश्चात्ताप नही करना पड़ता ।
२३. जब तक पाप पक नही जाता ( उसका फल नही मिलता)
तव तक मूर्ख को वह मधु के समान मीठा लगता है । परन्तु
जब पाप पक जाता है तव ( उसका कड़वा फल चखकर)
दु.ख होता है।
२४. किया
हुआ
पापकर्म
दूध के समान तत्काल नही विगड़ता। वह
राख से ढंके अंगारे के समान धीरे-धीरे सुलगकर मूर्ख का पीछा
करता है। ( और अंत में उसे जला डालता है।)
२५. पापकर्म करते समय मूर्ख नहीं वूझता (कि मैने बुरा किया है
और उसका फल बुरा ही होगा ) परन्तु उन्ही कर्मो से वह
( ढंके ) अगारे से जले की भाँति पश्चात्ताप करता है ।
२६. मोर्चा लोहे से उत्पन्न होकर उसीको खाता जाता है। उसी
तरह सदाचार की मर्यादा लाँघनेवाले के अपने ( दुप् ) कर्म
उसे ही दुर्गति को पहुंचाते है ।

५: नीतिः
२१ उभे दृष्टी
१ अलज्जिताये लज्जन्ति लज्जिताय न लगा
मिच्छादिटिसमादाना सत्ता गच्छन्ति दुग्गति ।
२ अभये भयदस्सिनो भये चाभयदस्तिनो
मिच्छादिठिसमादाना सत्ता गच्छन्ति दुर्गात ।
३ अवज्जे वज्जमतिनो वज्जे चावज्जदस्सिनो
मिच्छादिसिमादाना सत्ता गच्छन्ति दुगति ।
४ वज्जं च वज्जतो गत्वा अवज्जं च अवज्जतो
सम्मादिसिमादाना सत्ता गच्छन्ति सुग्गति ।
५ असारे सारमतिनो सारे चासारदस्सिनो
ते सारं नाधिगच्छन्ति मिच्छासंकप्पगोचरा।
६ सारं च सारतो जत्वा असारं च असारतो
ते सारं अधिगच्छन्ति सम्मासंकप्पगोचरा।

५: नीति
२१. उभे दृष्टी
१. अलज्जा ( के काम ) में जो लज्जा करते हैं और लज्जा ( के
काम ) में अलज्जा, वे लोग मिथ्या-दृष्टि के कारण दुर्गति
को प्राप्त होते है।
२. भयरहित (काम) में जो भय करते है
और भय (के
काम ) में अभय, वे लोग मिथ्यादृष्टि के कारण दुर्गति को
प्राप्त होते हैं।
३. जो अनिन्द्य को निन्द्य तथा निन्द्य को अनिन्ध देखते हैं, वे लोग
मिथ्यादृष्टि के कारण दुर्गति को प्राप्त होते है ।
४. जो निन्ध को निन्ध तथा अनिन्द्य को अनिन्द्य कहकर जानते
है, वे सम्यक् दृष्टि के कारण सुगति को प्राप्त होते है।
५. जो असार को सार मानते है तथा सार को असार, वे मिथ्या-
संकल्प के भाजन (लोग) सार को प्राप्त नहीं होते ।
६. जो सार को सार कहकर जानते हैं और असार को असार,
वे सम्यक्-संकल्प के भाजन (पुरुप ही ) सार को प्राप्त
होते हैं।

४०
धम्मपद
२२ धर्मं सुचरितं चरेत्
७ हीनं धम्मं न सेवेय्य पमादेन न संवसे
मिच्छादिठिं न सेवैय्य न सिया लोकवद्धनो।
८ उत्तिठे न प्पमज्जेय्य धम्मं सुचरितं चरे
धम्मचारी सुखं सेति अस्मि लोके परम्हि च ।
९ धम्म चरे सुचरितं न नं दुच्चरितं चरे
धम्मचारी सुखं सेति अस्मि लोके परम्हि च ।
२३ शुद्धाजीवो दुर्लभः
१० सुजीवं अहिरीकेन काकसूरेन धंसिना
पक्खन्दिना पगभेन संकिलिछैन जीवितं ।
११ हिरीमता च दुज्जीवं निच्चं सुचिगवेसिना
अलीनेन'प्पगभेन सुद्धाजीवेन पस्सता।
१२ सुकरानि असाधूनि अत्तनो अहितानि च
यं वे हितं च साधु च तं वे परमदुक्करं ।

५ नीति ४१ २२. धर्म सुचरितं चरेत् ७. हीन धर्म का सेवन न करे । न प्रमाद से (ही) रहे । मिथ्या- दृष्टि न रखे । न आवागमन को ही बढ़ाये । ८. उठे। प्रमाद न करे। धर्म का उत्तम आचरण करे। धर्मचारी इस लोक में तथा परलोक मे सुख की नीद सोता है । ९. धर्म का आचरण निष्ठा से करे। शिथिलता से न करे। धर्म- चारी इस लोक में तथा परलोक में सुख की नीद सोता है । २३. शुद्धाजीवो दुर्लभः १०. (पापकर्म की ) जिसे लज्जा नहीं, जो कौए जैसा (दूसरों के घावों में ही चोंच डालने में ) शूर है, जो लूटपाट करता है, जो स्वैराचारी है, जो आक्रोश करता है तथा निन्द्य कर्मो से पेट भरता है उसका जीवन सुख से वीतता ( देखा जाता ) है। ११. परन्तु ( पापकर्म की) जिसे लज्जा है, जो शुद्धि के लिए निरंतर यत्न करता है, जो सदा जाग्रत है, जो क्षमाशील है, ( कार्याकार्य ) जाननेवाला है, जो शुद्धाजीव है ( अर्थात् अनिन्द्य उद्योगों से अपना पेट पालता है), उसका जीवन कप्ट मे वीतता ( देखा जाता ) है । १२. ( दूसरों को पीड़ा देनेवाले ) दुराचार तथा अपना ही अहित करनेवाले अनाचार करना सरल है। परन्तु जो ( अपने लिए) हितकर है तथा ( दूसरों के लिए ) सुखकर है, ऐसा सदाचार करना बड़ा कठिन है।

४२ घामादं २४ मूढ-संकल्पः १३ दीघा जागरतो रत्ति दोघं सन्तस्स योजनं दीघो बालानं संसारो सद्धम्म अविजानतं । १४ पुत्ता म'त्यि धनं मस्थि इति वालो विहमति अत्ता हि अत्तनो नत्यि कुतो पुत्ता कुतो धनं । १५ मासे मासे कुसग्गेन बालो भुञ्जय भोजनं न सो सडखतधम्मानं कलं अग्धति सोळसि। १६ यावदेव अनत्याय अत्तं बालस्स जाति हन्ति वालस्स सुक्कंसं मुद्धमस्स विपातयं । १७ असतं भावनमिच्छेय्य पुरेक्खारं च भिक्खुसु आवासेसु च इस्सरियं पूजा परकुलेसु च- १८ ममेव कत मचन्तु गिही पन्नजिता उभो ममेवातिवसा अस्सु किच्चाकिच्चेसु किस्मिचि इति बालस्स संकप्पो इच्छा मानो च वड्ढति । २५ सज्जनं न दूपयेत् १९ यो अप्पदुस्स नरस्स दुस्सति सुद्धस्स पोसस्स अनङ्गणस्स तमेव वालं पच्चेति पापं सुखुमो रजो पटिवातं व खित्तो।

५: नीति ४३ २४. मूढ-संकल्पः १३. जागनेवाले के लिए रात. लम्बी होती है। थके हुए के लिए योजन भी लम्बा होता है । ( वैसे ही ) सद्धर्म को न जानने- वाले अज्ञ लोगों के लिए (जन्म-मृत्यु-परंपरारूप ) संसार ( वड़ा ) लम्बा होता है। १४. 'पुत्र मेरे हैं', 'धन मेरा है', यों मूढ चिन्तातुर होता है। पर जहाँ शरीर भी अपना नही, वहाँ पुत्र और धन कैसे अपना होगा? १५. मूर्ख प्रतिमास कुश की अग्र से भोजन करे, तो भी वह धर्मजों के सोलहवें अंश जितना भी ( धर्म का ) भागी नहीं होता। १६. मूर्ख मनुष्य का सारा ज्ञान अनर्थकर ही होता है। वह उसके ( प्रज्ञारूप ) मस्तक को काटकर उसके ( सदाचाररूप ) शुक्लांश का हनन करता है। १७. ( मुझे ) झूठा वड़प्पन, भिक्षुओं में अगुआपन, मठों मे प्रभुता तथा दूसरे कुलों में पूजा मिले, १८. गृही और भिक्षु दोनों ही मेरे ही किये हुए को प्रमाण मानें और कार्याकार्य के विपय में सभी मेरे ही अधीन चलें, इस तरह मूर्ख का संकल्प, इच्छा और अभिमान वढ़ता रहता है। २५. सज्जनं न दूषयेत् १९. जो शुद्ध है, निर्मल है, ऐसे निर्दोप पुरुप को जो दोप लगाता है, उस मूर्ख को ही वह पाप लगता है, जिस तरह कि वायु के मुँह पर फेकी धूल फेंकनेवाले के मुंह पर लगती है।

४४
धम्मपदं
२० यो दण्डेन अदण्डेसु अप्पदुछे दुस्सति
दसन्नमञ्जतरं ठानं खिय्यमेव निगच्छति-
२१ वेदनं फरुसं जानि सरोरस्म च भेदनं
गरुकं वा पि आवाधं चित्तवपं व पापुणे-
२२ राजतो वा उपस्तग्गं अभवसानं व दारुणं
परिक्खयं व जातीनं भोगानं व पभङ्गुरं-
२३ अयवस्स अगारानि अग्गि उहति पावको
कायस्स भेदा दुप्पञो निरयं सोपपज्जति ।
२६ निपिद्धाचाराः
२४ यो पाणमतिपातेति मुसाबादं च भासति
लोके अदिन्नं आदियति परदारं च गच्छति ।
२५ सुरामेरयपानं च यो नरो अनुयुञ्जति
इघेव मेसो लोकस्मि मूलं खणति अत्तनो ।
२६ एवं भो पुरिस जानाहि पापधम्मा असंयता
मा तं लोभो अचम्मो च चिरं दुक्खाय स्वयं।
२७ सेय्यो अयोगुळो भुत्तो तत्तो अग्गिसिखूपमो
यं चे भुञ्जय्य दुस्सीलो रट्ठपिण्डं असंयतो।
२८ चत्तारि ठानानि नरो पमत्तो आपज्जति परदास्पसेवी
अपुज्ञलाभं न निकामसेव्यं निन्दं ततीयं निरयं चतुत्यं ।

५: नीति ४५ २०. जो अदण्ड को दण्ड देता है, निर्दोप को दोप लगाता है, उसे दस में से कोई न कोई प्रतिफल शीघ्र ही मिलता है। २१. वह दारुण वेदना, हानि, अंग-भंग, भारी वीमारी तथा चित्त- विक्षेप को प्राप्त होता है। २२. वह राजभय, असह्य निन्दा, वान्धवों का विनाश तथा भोगों के क्षय को प्राप्त होता है । २३. अथवा उसका सारा घरवार अग्नि जला डालता है और शरीर छूटने पर वह नरक को प्राप्त होता है। २६. निषिद्धाचाराः २४. जो जीव हिंसा करता है, असत्य वचन बोलता है, चोरी करता है, परस्त्री-गमन करता है तथा २५. मद्यपान करता है, वह इसी लोक मे अपनी ही जड़ खोदता है। २६. हे पुरुप, जान ले कि ऐसे होते हैं असंयत लोग, पापकर्म करने- वाले। लोभ और अधर्म तुझे चिरकाल दु.ख मे न सड़ाये। २७ संयम छोड़ दुराचार कर देश का अन्न खाने की अपेक्षा अग्नि- शिखा के समान ( जलता) लोहे का गोला खाना बेहतर है। २८. परस्त्रीगामी प्रमादी पुरुप को चार फल मिलते है-१. उसे पाप लगता है ; २. उसे अच्छी नींद नहीं आती; ३. उसकी सर्वत्र निन्दा होती है और ४. मरने पर वह नरक मे जाता है ।

४६
धम्मपद
२९ अपुञलाभो च गती च पापिका भीतस्त भीताय रती च थोकिका
राजा च दण्डं गरकं पणेति तस्मा नरो परदारं न सेवे।
२७ निरय-गतिः
३० अभूतवादी निरयं उपेति यो चापि कत्वा न करोमि चाह
उभो पि ते पेच्च समा भवन्ति निहीनकम्मा मनुजा परत्य ।
३१ कासावकण्ठा वहवो पापम्मा असंयता
पापा पापेहि कम्मेहि नित्यं ते उपपज्जरे ।
२८ पुनःपुनर् गर्भवासः
३२ मिद्धी यदा होति महम्घतो च निदायिता संपरिवत्तसायी
महावराहो व निवापपुट्ने पुनप्पुनं गन्भमुपेति मन्दो।

५ :नीति ४७ २९. उसे पाप लगता है। दुर्गति होती है। भयभीत पुरुप की भय- भीत स्त्री से जो रति होती है, वह अत्यल्प होती है, राजा भी भारी दण्ड देता है । इसलिए मनुष्य परस्त्री-सेवन न करे । २७. निरय-गतिः ३०. न करके जो किया बताता है या करके भी जो 'मैने नहीं किया' कहता है, वे दोनों ही ( असत्य भापणरूप) अत्यन्त हीन कर्म करनेवाले मरने पर परलोक मे एक समान वन जाते है। ३१. गले में कापाय वस्त्र पहने कितने ही पापकर्मी असंयमी होते है। वे पापी अपने पापकर्मो से नरक में पड़ते हैं। २८. पुनःपुनर् गर्भवासः ३२. जो मोटा-ताजा होने पर भी बहुत खानेवाला, निद्रालु होते हुए भी करवट वदल-बदलकर सोनेवाला होता है, वह मन्द पुरुष खुराक पर पले मोटे सूअर के समान बार-बार गर्भ को प्राप्त होता है। ।

६ : अ-निन्दा
२९ नास्ति लोके न निन्दितः
१ पोराणमेतं अतुल नेतं अज्जत्तनामिव
निन्दन्ति तुहीमासीनं निन्दन्ति बहुभाणिनं
मितभाणिनं पि निन्दन्ति नत्यि लोके अनिन्दितो।
२ न चाहु न च भविस्पति न चेतरहि विज्जति
एकन्तं निन्दितो पोसो एकन्तं वा पसंसितो।
३० उभयत्र प्रशंसितः
३ यं चे विष पसंसन्ति अनुविच्च सुवे सुवे
अच्छित्ति मेवावि पञ्चासीलसमाहितं ।
४ नेक्खं जम्बोनदस्सेव को तं निन्दितुमरहति
देवा पि नं पसंसन्ति ब्रह्मना पि पसंसितो।
५ सीलदस्सनसंपन्नं धम्मठें सच्चवेदिनं
अत्तनो कम्म कुन्बानं तं जनो कुरुते पियं ।
६ चिरप्पवासिं पुरिसं दूरतो सोत्थिमागतं
जातिमित्ता सुहज्जा च अभिनन्दन्ति आगतं ।
७ तथैव कतपुज पि अस्मा लोका परं गतं
पुज्ञानि पटिगण्हन्ति पियं जाती व आगतं ।

६ : अनिन्दा २९. नास्ति लोके न निन्दितः १. हे अतुल ! यह कोई आज की बात नहीं, पुरानी ही है कि लोग चुप बैठनेवाले की निन्दा करते है और बहुत बोलनेवाले की भी मितभापी की भी लोग निन्दा करते है । संसार में निन्दा से कोई नहीं बचा । २. जिसकी केवल निन्दा ही निन्दा हुई या केवल प्रशंसा ही हुई, ऐसा पुरुप न कभी हुआ, न आगे होगा, न आज है । ३०. उभयत्र प्रशंसितः ३. विचारपूर्वक प्रतिदिन विज्ञ जिसकी प्रशंसा करते हैं, उस शील- समाधि और प्रज्ञा-सम्पन्न बुद्धिमान और निर्दोप ४. सोने के सिक्के जैसे खरे पुरुप की कौन निन्दा कर सकता है ? उसकी प्रशसा देव भी करते है और ब्रह्मा भी करता है। ५. शील और दर्शन से सम्पन्न, धर्म में स्थित, सत्यवादी और स्वकर्तव्य-रत पुरुप को सभी जन प्यार करते है। ६. दीर्घ काल के बाद बहुत दूर विदेश से सकुशल लौटे पुरुप का वन्धु-बान्धव, मित्र, हितपी स्वागत करते है । ७. उसी तरह इस लोक से परलोक सिधारे ( पुण्यशील ) पुरुप का उसके पुण्यकर्म घर आये प्रिय बन्धु के समान स्वागत करते है। ४

५०
धम्मपदं
३१ निन्दोपकारः
८ हिरीनिसेधो पुरिसो कोचि लोकस्मि विज्जति
यो निन्दं अप्पवोधति अस्सो भद्रो कसामिव ।
९ अस्सो यथा भद्रो कसानिविट्ठो आतापिनो संदेगिनो भवाय
सद्धाय सीलेन च वीरियेन च समाधिना धम्मविनिच्छयेन च
संपन्नविज्जाचरणा पटिस्सता पहस्सथ दुक्खमिदं अनप्पकं ।
३२ अतिवाक्यं तितिक्षस्व
१० अहं नागो व सङ्गामे चापतो पतितं सरं
अतिवाक्यं तितिक्खिस्सं दुस्सीलो हि बहुज्जनो।
११ दन्तं नयन्ति समिति दन्तं राजाभिरुहति
दन्तो सेट्ठो मनुस्सेसु योऽतिवाक्यं तितिक्खति ।
३३ आत्मार्थचिन्ता कर्तव्या
१२ अत्तानमेव पठम पटिरूपे निवेसये
अर्थ'चमनुसासेय्य न किलिस्सेय्य पण्डितो।
१३ अत्तानं चे तथा कयिरा यथ'ज्ञमनुसासति
सुदन्तो वत दमेथ अत्ता हि किर दुद्दमो।

६: अनिन्दा ५१ ३१. निन्दोपकारः ८. लज्जा ही जिसे पाप से बचाती है, ऐसा पुरुप संसार मे विरला ही होता है। जिस तरह उत्तम घोड़ा कोड़े की फटकार नही सह सकता, उसी तरह वह निन्दा नही सह सकता। ९. कोड़े से फटकारे गये उत्तम घोड़े की तरह तड़प और झड़प से काम में जुट जाओ। श्रद्धा, शील, वीर्य, समाधि, धर्मावि- निश्चय, विद्या और आचार तथा स्मृति से सम्पन्न होकर इस (संसार-रूप ) अनल्प दुःख को तुम पार कर सकोगे। ३२. अतिवाक्यं तितिक्षस्व १०. युद्ध में हाथी धनुप से छोड़े वाण को सहता है, उसी तरह में वाग्वाणों को सहूँगा। यह सारा समाज दुःशील ही तो है । ११. दान्त ( दमन किये हुए ) को ही युद्ध में ( या समाज में) ले जाया जाता है। दान्त (हाथी-घोड़े) की ही राजा सवारी करता है । दान्त ( सहनशील ) ही मनुष्यों में श्रेष्ठ है जो कि वागवाणों को सहता है। ३३. आत्मार्थचिन्ता कर्तव्या १२. पहले अपने को ही आदर्श में ढाले । अनन्तर ही दूसरे को उपदेश दे। इसी तरह बुद्धिमान् पुरुप क्लेश से वचता है। १३. मनुष्य दूसरे को जैसा उपदेश देता है, वैसा स्वयं करे । अपना ठीक-ठीक दमन करे । अपना दमन ही वास्तव में कठिन है।

५२
धम्मपदं
१४ अत्तना व कतं पापं अत्तना संकिलिस्सति
अत्तना अक्तं पापं अत्तना व विसुज्झति
सुद्धी असुद्धी पच्चत्तं नाझो अनं विसोधये।
१५ न परेसं विलोमानि न परेसं कताकतं
अत्तनो व अवेक्खेय्य कतानि अकतानि च ।
१६ अत्तदत्थं परत्येन बहुना पि न हापये
अत्तदत्थमभिज्ञाय सदत्थपसुतो सिया।
३४ परदोषान् नेक्षेत
१७ सुदस्सं नज्जमशेसं अत्तनो पन दुद्दसं
परेसं हि सो वज्जानि ओपुनाति यथा भुसं
अत्तनो पन छादेति कलि व कितवा सठो।
१८ परवज्जानुपस्सिस्स निच्चं उज्झानसञ्जिनो
आसवा तस्स वड्डन्ति आरा सो आसवक्खया ।
१९ आकासे पदं नत्थि समणो नत्थि बाहिरे
पपञ्चाभिरता पजा निप्पपञ्चा तथागता ।
२० आकासे पदं नथि समणो नत्थि बाहिरे
संखारा सस्सता नत्थि नत्थि बुद्धानमिञ्जितं ।

६: अनिन्दा १४. अपना पाप स्वयं को ही अशुद्ध करता है । अपने से न किया हुआ पाप अपने को ही शुद्ध करता है । शुद्धि या अशुद्धि हरएक की अपनी-अपनी होती है। कोई किसी दूसरे की शुद्धि नहीं कर सकता। १५. दूसरों के छिद्र न देखे, न दूसरों के किये-न किये की आलो- चना करे। अपने ही किये-न किये को देखे । १६. दूसरों के बहुतेरे लाभ के कारण भी अपने हित की हानि न होने दे । अपना हित पहचानकर उमीमें लगा रहे। ३४. परदोषान् नेक्षेत १७. दूसरे का दोप देखना सरल है, अपना दोप देखना कठिन है। दूसरे के दोष मनुष्य भूसे के समान ( हवा मे ) उड़ाता है । परन्तु जिस तरह जुआरी हार के पॉसे को छिपाता है, उसी तरह मनुष्य अपने दोपों को छिपाता है। १८. जो सदा दूमरों के दोप देखा करता है और आत्म-शुद्धि की ओर जिसका ध्यान ही नहीं, उसके आत्रव ( चित्त-मल ) बढ़ते हैं। आस्त्रत्र-क्षय (निर्वाण ) से वह ( कोसों) दूर है। १९. आकाश में कोई पढ (चिह्न) नहीं होता। श्रमण का कोई बाह्यरूप नहीं होता । लोग प्रपंच मे पड़े रहते हैं, परन्तु तथागत निष्प्रपंच (प्रपचरहित ) होते है। २०. आकाग में कोई पद ( चिह्न) नहीं होता। श्रमण का कोई वाह्यरूप नहीं होता । 'संस्कार' शाश्वत नहीं होते। बुद्धों का इंगित (अता-पता) नही होता ।

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७: आत्म-दमन
३५. आत्म-घातः
१. जैसे वज्र पत्थर से पैदा होकर पत्थर को ही काटता है, वैसे ही
दुर्बुद्धि मनुष्य का पाप-जिसको उसीने जन्म दिया है और
उसीने धारण किया है-उसीका नाश करता है।
२. मालुवा लता शाल वृक्ष को जिस तरह ( चारों ओर से ) घेर
लेती है, उसी तरह जिसका दुराचार ( दौश्शील्य ) उसे घेरकर
फैला हुआ है, वह स्वयं अपने प्रति वैसा ही करता है जैसा
शत्रु उसके प्रति चाहते है।
३. पापदृष्टि का आश्रय कर जो दुर्वृद्धि मनुष्य अर्हन्त, आर्य तथा
धर्मजीवी पुरुषों के शासन की निन्दा करता है, वह वाँस के
समान आत्मघात के ही लिए फलता-फूलता है ।
४. जो ( संसार का ) छोर नही खोजता उस दुर्बुद्धि मनुप्य को
भोग पछाड़ते है। भोग-तृष्णा से दुर्बुद्धि मनुष्य शत्रुवत् अपना
ही घात करता है।
३६. आत्मदमन-प्रक्रिया
५. ( पुरुष ) आप ही अपना स्वामी है। अपना स्वामी दूसरा
कौन हो सकता है ? अपना ठीक दमन किया जाय तो वही
( सुदान्त आत्मा) दुर्लभ स्वामी मिल जाता है।
६. आप ही अपने को प्रेरित करे । आप ही अपनी चौकीदारी
करे। इस तरह स्वय अपनी रक्षा कर और स्मृतिमान् होकर
भिक्षु सुख-विहार कर सकेगा।

५८
धम्मपदं
७ अत्ता हि अत्तनो नायो अत्ता हि अत्तनो गति
तस्मा संयमयत्तानं अस्सं भद्रं वाणिजो।
८ उदकं हि नयन्ति नेत्तिका उसुकारा नमयन्ति तेजनं
दारुं नमयन्ति तच्छका अत्तानं दमयन्ति सुबता ।
९ वरमस्सतरा दन्ता आजानीया च सिन्धवा
कुञ्जरा च महानागा अत्तदन्तो ततो वरं।
१० न हि एतेहि याने हि गच्छेय्य अगतं दिसं
ययत्तना सुदन्तेन दन्तो दन्तेन गच्छति ।
३७ आत्म-विजयः
११ यो सहस्सं सहस्सेन सङ्गामे मानुसे जिने
एकं च जेय्यमत्तानं स वे सङ्गामजुत्तमो ।
१२ अत्ता ह वे जितं सेय्यो या चायं इतरा पजा
अत्तदन्तस्स पोसस्स निच्चं संयतचारिनो।
१३ नेव देवो न गन्धब्बो न मारो सह ब्रह्मना
जितं अपजितं कयिरा तथाल्पस्त जन्तुनो।

७:श्रात्म-दमन
५९
७. ( पुरुप ) आप ही अपना स्वामी है। आप ही अपनी गति है।
इसलिए वणिक् जिस तरह उत्तम घोड़े को प्रशिक्षित करता
है, उसी तरह मनुष्य स्वयं अपने को संयम की शिक्षा दे।
८. बागवान अपनी इच्छा के अनुसार डॉड का पानी मोड़ते
है। वाणकार वाण को मोड़ देते है। बढ़ई लकड़ी को आकार
देते है। सदाचार के व्रती अपने को ही दान्त या विनीत
बनाते है ।
९. प्रशिक्षित खच्चर श्रेष्ठ होते है । प्रशिक्षित सिन्धुनद के किनारे
के अच्छी जाति के घोड़े श्रेष्ठ होते है । प्रशिक्षित पहाड़ के जैसे
बड़े हाथी श्रेष्ठ होते है। लेकिन जिसने अपने-आपको ठीक-ठीक
संयम की शिक्षा दी है वह दान्त पुरुप इन सबसे श्रेष्ठ है ।
१०. इन यानों ( खच्चर, घोड़ों, हाथियों आदि) से कोई अगत
दिशा निर्वाण को नहीं जा सकता, जैसा कि सम्यक् रीति से
दमन किये हुए अपनी दान्त आत्मा से दान्त ( संयमी ) मनुष्य
जा सकता है।
३७. आत्म-विजयः
११. युद्ध में सहस्रों मनुष्यों को जीतनेवाले से अपने-आपको
जीतनेवाला आत्म-विजेता बड़ा युद्ध-विजेता है।
१२. इन सब लोगों को जीतने से अपने-आपको जीतना श्रेष्ठ है।
जिसने अपना दमन किया है, जो संयम से चलता है;
१३. उस जैसे पुरुप के जीते ( निर्वाण ) को अजीता करनेवाला न
कोई देव है, न गन्धर्व है और न तो ब्रह्मासहित मार
ही है।

६०
धम्मपदं
३८ चित्त-संयमः
१४ फन्दनं चपलं चित्तं दुरक्खं दुनिवारयं
उजुं करोति मेधावी उसुकारो व तेजनं ।
१५ दुनिग्गहस्स लहुनो यत्यकामनिपातिनो
चित्तस्स दमयो साधु चितं दन्तं सुखावहं ।
१६ सुदुद्दसं सुनिपुणं यत्यकामनिपातिनं
चित्तं रक्खेथ मेधावी चित्तं गुत्तं सुखावहं ।
१७ दूरंगमं एकचरं असरीरं गुहासयं
ये चित्तं संयमेस्सन्ति मोक्खन्ति मारवन्धना।
१८ वारिजो व थले खित्तो ओकमोकत उत्भतो
परिफन्दति'दं चित्तं मारधेय्यं पहातवे।
१९ यथा अगारं दुच्छन्नं वुठि समतिविज्झति
एवं अभावितं चित्तं रागो समतिविज्झति ।
२० यथा अगारं सुच्छन्नं वुठि न समतिविज्झति
एवं सुभावितं चित्तं रागो न समतिविज्झति ।

७:आत्म-दमन ६१ ३८. चित्त-संयम १४. चंचल और चपल वित्त को एक जगह रोक रखना और किसी ओर जाने से रोकना कठिन है। जिस तरह वाणकार वाण को उसी तरह बुद्धिमान् अपने चित्त को ऋजु, सरल, सीधा बनाता है। १५. जिसका निग्रह करना वड़ा कठिन है, जो बहुत तरल है और चाहे जहाँ झट चला जाता है ऐसे चित्त का दमन करना श्रेयस्कर है । दमन किया हुआ चित्त सुखावह होता है । १६. जिसको देख लेना कठिन है, जो वड़ा चालाक है, जो जहाँ चाहे वहाँ झट चला जाता है-ऐसे चित्त का दमन करना श्रेयस्कर है । १७. दूर-दूर जानेवाले, अकेले विचरनेवाले अ-शरीर ( सूक्ष्म ) और गुहाशय (गूढ़ ) चित्त का जो संयम करते हैं, वे मार के वन्धनों से मुक्त होते है। १८. अपने जल-निवास से बाहर निकालकर स्थल पर फेकी मछली जिम प्रकार तड़फड़ाती है, उसी तरह यह चित्त मार ( राग, द्वेप, मोह ) के फन्दे ( विपयों) को छोड़ने के लिए तड़फड़ाता है। १९. ठीक से न छाये हुए छप्पर को वेधकर जिस तरह वृष्टि घर के अन्दर पैठ जाती है, उसी तरह अभावित ( भावनाभ्यास- रहित ) चित्त मे राग पैठ जाता है। २०. ठीक से छाये हुए छप्पर को वेधकर जिस प्रकार वृष्टि घर के अन्दर नहीं पैठ पाती, उसी तरह सुभावित चित्त में राग नहीं पैठ पाता ।

धम्मपदं
२१ इदं पुरे चित्तमचारि चारिकं येनिच्छकं यत्थकामं यथासुखं
तदज्जह निग्गहेस्तामि योनिसोहत्थिप्पभिन्नं विय अडकुसग्गहो।
३९ चित्त-प्रणिधानम्
२२ अनवहितचित्तस्स सद्धम्म अविजानतो
परिप्लवपसादस्स पञ्जा न परिपूरति ।
२३ अनवस्सुतचित्तस्स अनन्वाहतचेतसो
पुज्ञपापपहीनस्स नत्थि जागरतो भयं।
२४ कुम्भूपमं कायमिमं विदित्वा नगरूपमं चित्तमिदं पेत्वा
योधेथ मारं पञ्जायुधेन जितं च रक्खे अनिवेसनो सिया।
२५ दिसो दिसं यं तं कयिरा वरी वा पन वेरिनं
मिच्छापणिहितं चित्तं पापियो नं ततो करे।
२६ न तं माता पिता कयिरा अञ वा पि च जातका
सम्मापणिहितं चित्तं सेय्यसो नं ततो करे।

७: आत्म-दमन
२१. यह चित्त पहले यथेच्छ यथाकाम यथासुख चर्या करता रहा ।
मतवाले हाथी को जिस तरह महावत काबू मे लाता है, उसी
तरह मैं अपने चित्त को उपाय से अपने वश में लाऊँगा।
३९. चित्त-प्रणिधानम्
२२. जिसका चित्त ( समाधि में) स्थिर नहीं, जो सद्धर्म को नहीं
जानता और जिसकी श्रद्धा डॉवाडोल है, उसकी प्रजा परिपूर्ण
नहीं हो सकती।
२३. जिसके चित्त में (किसी विषय के प्रति ) राग नहीं, और
इसलिए (किसी विपय के लाभालाभ के कारण) जिसके
चित्त में क्षोभ भी नही, उस पाप-पुण्य-विमुक्त जाग्रत
(नानी) पुरुप को किसी भी तरह का भय नहीं होता।
२४. इस शरीर को ( कच्चे ) घड़े के समान (अनित्य, भंगुर )
समझकर और चित्त को (प्राचीरवेष्टित) नगर के समान
मुदृढ़ करके प्रचारूप शस्त्र से मार के साथ लड़े। जीत के
लाभ को सुरक्षित रखे और किसी (प्रापंचिक वस्तु) मे
आसक्त न रहे।
२५. द्वेपी द्वेपी की या वैरी वैरी की जितनी बुराई करता है,
उससे भी बढ़कर अपना मिथ्या-प्रणिहित (भूला-भटका)
चित्त अपनी बुराई करता है ।
२६. माता-पिता या अन्य वन्धु-वान्धव जितनी भलाई करते है, उससे
भी बढ़कर अपना सम्यक् प्रणिहित ( सन्मार्गगामी) चित्त
अपनी भलाई करता है।

८ : देहानित्यत्वम्
४० सर्वं मृत्युवशम्
१ फेणूपमं काय मिमं विदित्वा मरीचिधम्म अभिसंधानो
छेत्वान मारस्स पपुप्फकानि अदस्सनं मच्चुराजस्स गच्छे ।
२ पुप्फानि हेव पचिनन्तं व्यासत्तमनसं नरं
सुत्तं गामं महोघो व मच्चु आदाय गच्छति ।
३ पुप्फानि हेव पचिनन्तं व्यासत्तमनसं नरं
अतित्तं येव कामेसु अन्तको कुरते वसं ।
४१ जरसं पश्य आगताम्
४ पण्डुपलासो व दानि'सि यमपुरिसा पि च तं उपठिता
उय्योगमुखे च तिट्ठसि पाथेय्यं पि च ते न विज्जति ।
५ सो करोहि दीपमत्तनो खिप्पं वायम पण्डितो भव
निद्धन्तमलो अनङ्गणो दिव्वं अरियभूमिमेहिसि ।
६ उपनीतवयो च दानि'सि संपयातो सि यमस्स सन्तिके
वासो पिच ते नंत्थि अन्तरा पाथेय्यं पि च ते न विज्जति।

८: देहानित्यत्व
४०. सर्वं मृत्युवशम्
१. इस गरीर को फेन के समान (निःसार) जान तथा मृगजल
की तरह (आभासिक ) पहचान, मार के प्रलोभनों को
काटकर मृत्युराज की दृष्टि से बचो ।
२. इस संसार के फूलों-जैसे आकर्षक विपयों को चुनने में भूले
( वेखवर ) पुरुष को मृत्यु वैसे ही उठा ले जाती है जैसे सोये
हुए गाँव को बाढ़।
है
३. इस संसार के फूलों-जैसे आकर्षक विपयों को चुनने में भूले
( वेखवर ) पुरुप को, काम-भोगों मे उसे तृप्ति होने के पहले
ही, मृत्यु वश में कर लेती है, ग्रस लेती है ।
४१. जरसं पश्य आगताम्
४. तू पीले पत्ते जैसा है और तेरे पास यम के दूत भी आकर
खड़े है। तू प्रयाण के लिए तैयार बैठा है, लेकिन तेरे पास
पाथेय तो कुछ भी नहीं।
५. अत: तू अपने लिए द्वीप (आश्रय-स्थान ) बना । तुरंत काम मे
जुट जा। प्रज्ञावान् हो । मल को प्रक्षालित कर निष्कलंक वन ।
तभी तू दिव्य आर्यभूमि को प्राप्त होगा।
६. तेरी आयु हो चुकी है । तू यम के पास पहुंच चुका है। वीच
में कोई आश्रय भी नही है और न तेरे पास पाथेय ही है।

धम्मपदं
७ सो करोहि दीपमत्तनो खिप्पं वायम पण्डितो भव
निद्धन्तमलो अनङ्गणो न पुन जातिजरं उपेहिसि ।
४२ को नु हासः, क आनन्द:
८ को नु हासो किमानन्दो निच्चं पज्जलिते सति
अन्धकारेन ओनद्धा पदीपं न गवसथ।
९ यथा बुन्बुलकं पस्से यथा पस्से मरीचिक
एवं लोकं अवेक्खन्तं मच्चुराजा न पस्सति ।
१० एथ पस्सथिमं लोकं चित्तं राजरथूपमं
यत्थ वाला विसीदन्ति नत्यि सङ्गो विजानतं ।
४३ अस्थि-नगरम्
११ पस्स चित्तकतं विम्वं अरुकायं समुस्सितं
आतुरं बहुसंकप्पं यस्स नत्थि धुवं ठिति ।
१२ परिजिण्णमिदं रूपं रोगनिड्डं पभडगुरं
भिज्जति पूतिसंदेहो मरणन्तं हि जीवितं ।
१३ यानिमानि अपत्यानि अलापूनेव सारदे
कापोतकानि अठ्ठीनि तानि दिस्वान का रति ।

८: देहानित्यत्व
६७
७. सो तू अपने लिए द्वीप वना। तुरंत काम में जुट जा। प्रज्ञावान्
हो । मल को प्रक्षालित कर निष्कलंक वन । फिर तू न
जन्म और न जरा को ही प्राप्त होगा।
४२. को नु हासः, क आनन्दः
८. जब सब कुछ निरंतर जल रहा है तो हँसी कैसी, खुशी कैसी ?
अन्धकार मे डूवे हो और दीपक की खोज नही करते !
९. जो इस संसार को पानी के बुलबुले जैसा या मृगजल जैसा
देखता है, उसे यमराज नहीं देखता।
१०. आओ, राजरथ के समान रंग-विरंगे इस संसार को देखो-
जिसमें मूढ़ आसक्त होते हैं, ज्ञानी आसक्त नहीं होते।
४३. अस्थि-नगरम्
११. इस सजाये देहाकार को देखो। यह व्रणों से युक्त तथा अंगो-
पागों को जोड़कर बनाया हुआ है। यह अनेक सकल्प-विकल्पों
से भरा है। और इसके बने रहने का कोई भरोसा भी नहीं है।
१२. यह देहाकार जरा-ग्रस्त है, रोगों का घर है और अत्यंत भंगुर
है । यह सड़न का भण्डार ( एक दिन ) फूटता है। और
निश्चय ही जीवन का अन्त मृत्यु मे होता है ।
१३. शरद् ऋतु की वेकार लौकी के समान ( शुष्क ) और
कबूतरों की तरह भूरे रंग की ये हड्डियाँ देखकर ( इस
शरीर के प्रति ) किसको मोह होगा?

धम्मपद
१४ अट्ठीनं नगरं कतं मंसलोहितलेपनं
यत्य जरा च मच्चु च मानो मक्खो च ओहितो।
१५ यथा दण्डेन गोपालो गावो पाचेति गोचरं
एवं जरा च मच्चु च आयुं पाचेन्ति पाणिनं ।
१६ अचिरं वत 'यं कायो पवि अविसेस्सति
छुद्धो अपेतविज्ञाणो निरत्यं व कलिङ्गरं।
१७ जीरन्ति वे राजरथा सुचित्ता अयो सरीरं पि जरं उपेति
सतं च धम्मो न जरं उपेति सन्तो ह वे सभि पवेदयन्ति ।
१८ अप्पस्सुतायं पुरिसो बलिवद्दो व जीरति
मंसानि तस्स वड्ढन्ति पञ्जा तस्स न वड्ढति ।

८: देहानित्यत्व
६९
१४. ( यह शरीर मानो ईट-पत्थर जैसे ) हड्डियों का बना
नगर है । मांस और रक्त से लिपा-पुता है-जिसके अन्दर जरा
व मृत्यु, मान व असूया वसे है ।
१५. ग्वाला जैसे गायों को डंडे से हॉककर (घर से) चरा-
गाह ले जाता है, वैसे ही जरा और मृत्यु प्राणियों की आयु
को ले जाती है।
१६. अहो ! यह शरीर शीघ्र ही ( जलाने के ही योग्य ) बेकार
काठ की भाँति क्षुद्र और अचेतन, पृथ्वी पर पड़ा रहेगा।
१७ राजरथ बड़े सुशोभित होते है सही, परन्तु आखिर वे भी
पुराने हो ( टूट ) जाते है । वैसे ही यह ( सुन्दर ) शरीर
भी जराजीर्ण ( व मृत्युग्रस्त ) हो जाता है । परन्तु
संतों का धर्म कभी जीर्ण ( और कालग्रस्त ) नहीं होता।
सत ही यह ( तत्त्व ) संतों को बताते है ।
१८. यह अल्पश्रुत मनुष्य वैल जैसा ( केवल आयु मे ) बढ़ता
है। उसका मास तो वढता है, परन्तु उसकी प्रज्ञा नही
वढ़ती।

९ जागरूकता
४४ अप्रमाद: अमृत-पदम्
१ अप्पमादो अमतपदं पमादो मच्चुनो पद
अप्पमत्तान सीयन्ति ये पमत्ता यया मता।
२ एतं विसेसतो जत्वा अप्पमादम्हि पण्डिता
अप्पमादे पमोदन्ति अरियानं गोचरे रता।
ते झायिनो साततिका निच्चं वळपरक्कमा
फुसन्ति धीरा निन्बानं योगक्खेमं अनुत्तरं ।
४ अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सिवा
संयोजनं अणुं थूलं डहं अग्गी व गच्छति ।
५ अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सिवा
अभव्बो परिहानाय निन्बानस्सेव सन्ति ।
४५ अप्रमादेन मघवा
६ पमादं अप्पमादेन यदा नुदति पण्डितो
पज्ञापासादमाल्य्ह असोको सोकिनि पजं
पन्वतट्ठो व भुम्मट्ठे धीरो वाले अवेक्खति।

९ जागरूकता ४४. अप्रमादोऽमृतपदम् १. अप्रमाद अमृत का पद (पथ) ह और प्रमाद है मृत्यु का पद । अप्रमत्त नही मरते। और प्रमत्त तो मृत-तुल्य ही है । २. यह अच्छी तरह जानकर अप्रमाद के विशेषज्ञ आर्यों के आचार में रत रहते हुए अप्रमाद मे ही प्रमोद पाते हैं। ३. वे ध्यान का निरंतर अभ्यास करनेवाले और सदा (प्रमाद को भगाने का) दृढ पराक्रम करनेवाले धीर पुरुप सर्वोत्तम योगक्षेमरूप निर्वाण को प्राप्त होते है। ४. प्रमाद में भय देखनेवाला भिक्षु अप्रमाद में रत रहकर अग्नि के समान अणु-स्थूल मयोजनों (बंधनों) को ( निर्वाण तक ) जलाता जाता है। ५. प्रमाद में भय देखनेवाला भिक्षु जो सदा अप्रमाद मे रत रहा, निर्वाण को पहुँचा ही समझो। उसका पतन नही हो सकता। ४५. अप्रमादेन मघवा ६. जब पंडित प्रमाद को अप्रमाद से दूर कर देता है तव जैसे कोई पर्वत पर चढ़कर नीचे भूमि पर खड़े लोगों को (क्षुद्र ) देखे वैसे प्रनारूपी प्रासाद पर चढ़कर वह स्वयं अशोक और धीर संसार में पड़ी जनता को शोक और मोह करती हुई देखता है।

७२
धम्मपदं
७ अप्पमत्तो पमत्तेसु सुत्तेसु बहुजागरो
अवलस्सं व सीघस्सो हित्वा याति सुमेधसो।
८ अप्पमादेन मघवा देवानं सेटतं गतो
अप्पमादं पसंसन्ति पमादो गरहितो सदा।
९ पमादमनुयुञ्जन्ति बाला दुम्मेधिनो जना
अप्पमादं च मेधावी धनं लेळे व रक्खति ।
४६ अप्रमाद-विवरणम्
१० उडानवतो सतिमतो सुचिकम्मरस निसम्मकारिनो
संयतस्स च धम्मजीविनो अप्पमत्तस्स यसोऽभिवड्ढ ति ।
११ उठानेन'प्पमादेन संयमेन दमेन च
दीपं कयिराथ मेधावी यं ओघो नाभिकीरति ।
१२ मा पमादमनुयुञ्जथ मा कामरतिसन्यवं
अप्पमत्तो हि झायन्तो पप्पोति विपुलं सुखं ।
१३ अप्पमादरता होथ सचित्तमनुरक्खय
दुग्गा उद्धरथ'त्तानं पके सन्नो व कुञ्जरो ।

९:जागरूकता ७३ ७. जैसे तेज घोड़ा मन्द घोड़े को पीछे छोड़ आगे निकल जाता है, वैसे प्रमत्त जनों में अप्रमत्त और सुप्तजनों में अत्यन्त जाग्रत पुरुष (प्रमत्त और सुप्तजनों को पीछे छोड़कर ) आगे निकल जाता है। ८. अप्रमाद के ही बल से मघवा देवों का इन्द्र बना । सभी अप्रमाद की प्रशसा करते है । प्रमाद की सदा निन्दा ही हुई है। ९. दुर्बुद्धि मूढ़ लोग प्रमाद मे लगे रहते हैं। परन्तु बुद्धिमान् पुरुप महाधन के समान अप्रमाद की रक्षा करता है। ४६. अप्रमाद-विवरणम् १०. जो उत्थानशील, स्मृतिमान्, शुचिकर्मा तथा निशम्यकारी ( विचारपूर्वक काम करनेवाला ) है, उस संयमी व धर्मजीवी अप्रमत्त पुरुप का यश बढता रहता है। ११. उत्थान, अप्रमाद, संयम और दम से मेधावान् पुरुष को अपने लिए एक द्वीप ( आथय-स्थान ) बना लेना चाहिए, जिसे कोई ! ( भव-) प्रवाह नष्ट न कर दे । १२. न प्रमाद मे लगे रहो, न कामासक्ति का ही गुणगान करो। प्रमादरहित ध्यान मे लगा पुरुप (निर्वाण का ) विपुल सुख पाता है। १३. अप्रमाद में रत होकर अपने चित्त की रक्षा करो। दलदल में फंसा हाथी जिस तरह अपने को स्वयं ही छुड़ाता है उसी तरह संकट में से अपने को स्वय ही उवार लो।

७४
धम्मपदं
४७ विविक्त-सेवित्वम्
१४ कण्हं धम्मं विप्पहाय सुक्कं भावेथ पण्डितो
ओका अनोकं आगम्म विवेके यत्य दूरमं ।
१५ तत्राभिरतिमिच्छेय्य हित्वा कामे अकिंचनो
परियोदपेय्य अत्तानं चित्तक्लेसेहि पण्डितो।
१६ पविवेकरसं पीत्वा रसं उपसमस्स च
निहरो होति निप्पापो धम्मपीतिरसं पिवं ।
१७ अज्ञा हि लाभूपनिसा अञ्जा निन्बानगामिनी
एवमेतं अभिज्ञाय भिक्खु बुद्धस्स सावको
सक्कारं नाभिनन्देय्य विवेकमनुहये।
१८ एकासनं एकसेव्यं एको चरमतन्दितो
एको दमयमत्तानं वनन्ते रमितो सिया ।
१९ धनपालको नाम कुञ्जरो कटुकप्पभेदनो दुन्निवारयो
बद्धो कवलं न भुञ्जति सुमरति नागवनस्स कुञ्जरो।

९: जागरूकता
७५
४७. विविक्त-सेवित्वम्
१४. पडित जहाँ ( सामान्य जनो का ) जी लगना कठिन है उस
एकान्त मे घर से बेघर होकर आये और मलिन कर्मो का
त्यागकर शुभकर्मो का ध्यान धरे ।
१५. पंडित भोगों को छोड़ और उनका अभिलाप भी छोड़ केवल
अकिचन वनकर उस ( एकान्त ) मे लवलीन रहे और चित्त के
मलों से अपने को परिशुद्ध करे ।
१६. (प्रथम) एकान्त का रस पीकर और ( अनन्तर) उपशम
का भी रस पीकर ( मनुष्य अन्त मे ) धर्म-प्रीति का रस पीता
हुआ निर्भय और निष्पाप हो जाता है।
१७. ( भौतिक भोगरूप) लाभ का रास्ता दूसरा है और
( आध्यात्मिक शान्तिरूप ) निर्वाण का रास्ता दूसरा है। बुद्ध
का श्रावक भिक्षु इसे ठीक से पहचानकर लोगों मे सत्कार
का कभी अभिनन्दन न करे बल्कि एकान्तवास को ही बढ़ाता
जाय ।
१८. अकेला वैठे, अकेला सोये, अकेला ही अतन्द्रित चले।
अकेला ही अपना दमन करे। ( इस तरह अकेला ही भिक्षु)
वनान्त में रमा करे।
१९. धनपालक नाम का हाथी जिसके गण्डस्थल से मदस्राव हो रहा
है और जो किसीके वश में नही आ सकता ऐसा जवरदस्त है,
बन्धन में पड़ा ग्रास नहीं खा रहा है और निरन्तर हाथियों के
वन का ही ( अपने घर का ही ) स्मरण कर रहा है ।

७६
धम्मपदं
४८ क्षणं साधयेत्
२० नगरं यथा पच्चन्तं गुत्तं सन्तरवाहिरं
एवं गोपेथ अत्तानं खणो वे मा उपच्चगा
खणातीता हि सोचन्ति निरयम्हि समप्पिता।
४९ द्वियामा साधकस्य
२१ अत्तानं चे पियं जञा रक्खेय्य नं सुरक्खितं
तिण्णमञ्जतरं यामं पटिजग्गेय्य पण्डितो।

९:जागरूकता
७७
४८. क्षणं साधयेत्
२०. सीमान्त का नगर जिस प्रकार अन्दर से और बाहर से पूर्ण
सुरक्षित रहता है, उसी प्रकार अपनी ( अन्दर और बाहर
कड़ी) चौकी रख्ने । कोई क्षण वगैर चौकी का न जाने दे।
क्योंकि जो एक क्षण भी चौकी करने से चूकते है वे नरक मे
पड़े शोक किया करते है।
४९. द्वियामा साधकस्य
२१. यदि अपने पर प्रेम है तो अपने को ( सदा ) सुरक्षित रखे ।
और उसके लिए रात्रि के तीन प्रहरों में से एक प्रहर बुद्धि-
मान् पुरुप को अवश्य जागना चाहिए । ध्यान में लगाना
चाहिए ।

१०:शोधनम्
५० यौवने ब्रह्मचर्यम्
१ अचरित्वा ब्रह्मचरियं अलद्धा योन्बने धनं
जिण्णकोञ्चा व झायन्ति खोणमच्छे व पल्लले।
।
२ अचरित्वा ब्रह्मचरियं अलद्धा योन्बने धनं
सेन्ति चापातिखीणा व पुराणानि अनुत्युनं ।
५१ मल-शोधनम्
३ अनुपुब्बेन मेधावी थोकं थोकं खणे खणे
कम्मारो रजतस्सेव निद्धमे मलमत्ततो।
४ असज्झायमला मन्ता अनुठानमला घरा
मलं वण्णस्स कोसज्जं पमादो रक्खतो मल।
५ मलित्थिया दुच्चरितं मच्छेरं ददतो मलं
मला वे पापका धम्मा अस्मि लोके परम्हि च ।
६ ततो मला मलतरं अविज्जा परमं मलं
एतं मलं पहत्वान निम्मला होथ भिक्खयो।

१०: शोधन ५०. यौवने ब्रह्मचर्यम् १. जो ( बाल्यावस्था मे ) ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करते, युवा- वस्था में धन नहीं कमाते, वे ( वृद्धावस्था मे ) तालाव के किनारे बैठे बूढ़े क्रौंच ( बगुले) के समान चिन्तामग्न होते है। २. जो ( वाल्यावस्था मे ) ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करते, युवा- वस्था मे धन नही कमाते, वे ( वृद्धावस्था मे ) अपनी वीती वातों को दोहराते हुए जीर्ण धनुष के समान पड़े रहते है। ५१. मल-शोधनम् ३. सुनार जसे चॉदी के मैल को क्रमशः थोड़ा-थोड़ा प्रतिक्षण शुद्ध करता है, वैसे ही बुद्धिमान् पुरुप को आत्मशुद्धि करनी चाहिए। ४. स्वाध्याय ( पाठ ) न करना मन्त्रों का मल है । ( प्रातः उठकर ) उद्यम ( झाड़-बुहार ) न करना घरों का मल है। सुस्ती शरीर का मल है। और प्रमाद ( असावधानता ) रक्षकों का ( पहरेदारों का ) मल है। ५. दुश्चरित्र (व्यभिचार ) स्त्रियों का मल है। कंजूसी दाता का मल है। पापकर्म इस लोक और परलोक दोनों के मल है। ६. इन सव मलों से बड़ा मल है अविद्या । इस मल का परि- त्याग कर हे भिक्षुओ! निर्मल बन जाओ।

धम्मपदं
१
.
५२ कायादि-संवरः
७ कायप्पकोपं रक्खेय्य कायेन संवुतो सिया
कायदुच्चरितं हित्वा कायेन सुचरितं चरे।
८ वचीपकोपं रक्खेय्य वाचाय संवुतो सिया
वचीदुच्चरितं हित्वा वाचाय सुचरितं चरे।
९ मनोपकोपं रक्खेय्य मनसा संवुतो सिया
मनोदुच्चरितं हित्वा मनसा सुचरितं चरे।
१० कायेन संवुता धीरा अथो वाचाय संवुता
मनसा संवुता धीरा ते वे सुपरिसंवुता।
११ चक्खुना संवरो साधु साधु सोतेन संवरो
घानेन संवरो साधु साधु जिव्हाय संवरो।
१२ कायेन संवरो साधु साधु वाचाय संवरो
मनसा संवरो साधु साधु सम्बत्य संवरो
सब्बत्थ संवुतो भिक्खु सब्बदुक्खा पमुच्चति ।
५३ मार-मोचनम्
१३ सुभानुपस्सि बिहरन्तं इन्द्रियेसु असंवतं
भोजनम्हि अमत्त कुसीतं हीनवीरियं
तं वे पसहति मारो वातो रक्खं व दुब्बलं ।

१० :शोधन ८१ ५२. कायादि-संवरः ७. शरीर को प्रकुपित न होने दे। शरीर से संयत रहे । शरीर से दुराचरण छोड़कर शरीर से सदाचरण करे। ८. वाणी को प्रकुपित न होने दे। वाणी से संयत रहे । वाणी से दुराचरण छोड़कर वाणी से सदाचरण करे । ९. मन को प्रकुपित न होने दे। मन से सयत रहे । मन से दुरा- चरण छोड़कर मन से सदाचरण करे। १०. जो धीर पुरुष शरीर से संयत होते है, वाणी से संयत होते है तथा मन से संयत होते है, वे ही परिसयत होते है, सुसंयत होते हैं । ११. नेत्र का संवर ( संयम ) श्रेयस्कर है। श्रोत्र का संवर श्रेय- स्कर है। ब्राण का संवर श्रेयस्कर है । जिह्वा का सवर श्रेय- स्कर है। १२. शरीर का संवर ( सयम ) श्रेयस्कर है। वाणी का संवर श्रेयस्कर है। मन का संवर श्रेयस्कर है। सर्वेन्द्रियों का संवर श्रेयस्कर है। सर्वत्र सयम किया हुआ भिक्षु सर्व दुःखों से मुक्त होता है। ५३. मार-मोचनम् १३. जिस तरह दुर्वल वृक्ष को ऑधी गिरा देती है, उसी तरह विषय-रस को शुभ मानकर चलनेवाले, इन्द्रियों में असंयत, भोजन में मात्रा न जाननेवाले, सुस्त और अनुद्यमी पुरुष को मार (पाप) मार गिराता है । or

८२
धम्मपदं
--
१४ असुभानुपस्सि विहरन्तं इन्द्रियेसु सुसंवृतं
भोजनम्हि च मत्तञ्जनद्धं आरद्धवीरियं
तं वे न प्पसहति मारो वातो सेलं व पबतं ।
५४ आस्रव-क्षयः
१५ यं हि किच्चं अपविद्धं अकिच्चं पन कपिरति
उन्नलानं पमत्तानं तेसं वदन्ति आसवा।
१६ येसं च सुसमारद्धा निच्चं कायगता सति
अकिच्चं ते न सेवन्ति किच्चे सातच्चकारिनो
सतानं संपजानानं अत्यं गच्छन्ति आसवा ।
१७ सदा जागरमानानं अहोरत्तानुसिदिखनं
निब्वानं अधिनुत्तानं अत्यं गच्छन्ति आसवा ।
१८ गभसके उप्पज्जन्ति निरयं पापकम्मिनो
सगं सुगतिनो यन्ति परिनिन्बन्ति अनासवा ।

१० :शोधन १४. जिस तरह शिलामय पर्वत को आँधी नहीं गिरा सकती, उसी तरह विपय-रस को अशुभ मानकर चलनेवाले, इन्द्रियों में संयत, भोजन में मात्रा जाननेवाले, उत्साही और उद्यमी पुरुष को मार (पाप) मारकर गिरा नहीं सकता। ५४. आस्त्रव-क्षयः १५. जो करने योग्य है उसको तो छोड़ देता है, लेकिन जो न करने योग्य है उसे करता है, ऐसे उमड़ते मलोंवाले और प्रमत्त पुरुपों के आस्रव ( चित्त-मल ) बढ़ते है । १६. जो अपनी कायगता (क्षणभगुरता, मलिनता आदि दोप- संबंधी ) स्मृति नित्य उपस्थित रखते है, वे अकरणीय कभी नहीं करते और करणीय करने से कभी नही चूकते ; उसमें सदा लगे ही रहते हैं। उन स्मृतिमान् और संप्रज्ञावान् पुरुषों आस्रव अस्त हो जाते हैं। १७. जो सदा जागरूक रहते है और रात-दिन शिक्षा ग्रहण करते रहते है ( अपने दोपों का क्षय और गुणों की वृद्धि करने में लगे रहते है ) और एक निर्वाण ही जिनका परायण है-अन्तिम उद्दिष्ट है-उन्हीके आस्रव अस्त होते हैं। १८. ( मरने पर) कोई पुनः ( इस लोक में) गर्भ में आते है । कोई दुराचारी होते हैं वे नरक मे जाते है। कोई सदा- चारी होते हैं वे स्वर्ग को जाते हैं और कोई अनास्रव ( चित्त के मलों से रहित ) पुरुप निर्वाण को प्राप्त होते है।

८४
घम्मपदं
१९ येसं संबोधियङ्गसु सम्मा चित्तं सुभावितं
आदानपटिनिस्सग्गे अनुपादाय ये रता
खीणासवा जुतीमन्तो ते लोके परिनिब्बुता ।
५५ नैष्कर्म्य-सुखम्
२० न सीलब्बतमत्तेन बाहुसच्चेन वा पुन
अथवा समाधिलाभेन विवित्तसयनेन वा।
२१ फुसामि नेक्खम्मसुखं अपुथुज्जनसेवितं
भिक्खु विस्सासमापादि अप्पत्तो आसवक्खयं ।

१०: शोधन ८५ १९. जिन्होंने अपने चित्त को संबोधि-अंगों* में सम्यक् अभ्यस्त कराया है, जो अनासक्त होकर परिग्रह के त्याग में सदा निरत है, जिनके आस्रव परिक्षीण हुए है और जो ( तप और ज्ञान से ) द्योतमान हैं वे ही ससार में परिनिर्वाण को प्राप्त हुए है। ५५. नैष्कर्म-सुखम् २०. न केवल शील और व्रत के आचरण से, न बहुश्रुत होने से, न समाधि-लाभ से और न ही एकान्तवास करने से २१. मैं सामान्य जनों के पहुँच से परे ( उनके असेवित) निर्वाण का सुख भोगता हूँ । भिक्षुओ! जब तक आस्रवों का (पूर्ण) क्षय न हो जाय, तव तक ( अपने निर्वाण-लाभ में) कदापि विश्वास न करो। * संबोधि, ( परम ज्ञान ) के सात अग है : १. सति ( स्मृति ), २. धम्म-विचय (धर्म-परीक्षा ), ३. विरिय ( वीर्य, उद्योग ), ४. पीति ( आनन्द ), ५. पस्सधि ( प्रश्रब्धि, शान्ति ), ६. समाधि, ७. उपेखा ( उपेक्षा, तितिक्षा )।

११ : प्रज्ञायोगः
५६ प्रियाप्रिय-वियोगो योगः
१ अयोगे युञ्जमत्तानं योगस्मि च अयोजयं
अत्थं हित्वा पियग्गाही पिहेत'त्तानुयोगिनं ।
२ मा पियेहि समागञ्छि अप्पियेहि कुदाचनं
पियानं अदस्सनं दुक्खं अप्पियानं च दस्सनं ।
३ तस्मा पियं न कयिराथ पियापायो हि पापको
गन्था तेसं न विज्जन्ति येसं नत्थि पियाप्पियं ।
५७ योगेन प्रज्ञा-लाभ:
४ उट्ठानकालम्हि अनुठ्ठहानो युवा बली आलसियं उपेतो
संसन्नसंकप्पमनो कुसीतो पज्ञाय मग्गं अलसो न विन्दति ।
५ वाचानुरक्खी मनसा सुसंवुतो कायेन च अकुसलं न कयिरा
एते तयो कम्मपथे विसोधये आराधये मग्गमिसिप्पवेदितं ।

११ : प्रज्ञा-योग
५६. प्रियाप्रिय-वियोगो योगः
१. अयोग्य कर्म में लगा हुआ और योग्य कर्म मे न लगा हुआ,
हित छोड़ प्रिय को ग्रहण करनेवाला मनुष्य आत्मानुयोगी
( अयोग्य कर्म छोड़ योग्य कर्म में लगे हुए अर्थात् प्रिय छोड़
हित को ग्रहण करनेवाले ) पुरुष की स्पृहा ( अभिलाषा)
करता है।
२. प्रियों का संग न करे, न कभी अप्रियों का ही करे। प्रियों
का अदर्शन ( वियोग) दुःखद होता है और अप्रियों का
दर्शन ( योग ) भी ( वैसा ही दुःखद ) होता है ।
३. इसलिए किसीको अपना प्रिय न बनाये। प्रिय का वियोग
दुःखद होता है । जिनके प्रियाप्रिय नहीं होते, उनमे नन्थि नहीं
होती ( वे ही निर्ग्रन्थ होते है )।
५७. योगेन प्रज्ञा-लाभः
४. तरुण और बली होते हुए भी आलसी बनकर जो उठने के समय
उठता नहीं, वह हतसंकल्प-निरुत्साह और आलसी पुरुप प्रज्ञा के
मार्ग को नही पाता।
५. वाणी की चौकीदारी करे, मन को संयत रखे और काया से
कोई अकुशल कर्म न करे। इन तीन कर्मपथों की ठीक शुद्धि
करे और फिर ऋषियों के बताये मार्ग का अनुसरण करे ।

८८
धम्मपदं
६ योगा वे जायती भूरि अयोगा भूरिसंखयो
एतं धापयं गत्वा भवाय विभवाय च
तथ'त्तानं निवेसेय्य यथा भूरि पवड्दति ।
५८ योग-प्रने अन्योन्याश्रिते
७ नत्यि झानं अपञ्चस्स पञ्जा नत्यि अझायतो
यम्हि झानं च पञा च स वे निव्वानसन्तिके ।
८ यदा येसु धम्मेसु पारगू होति ब्राह्मणो
अयस्स सन्वे संयोगा अत्थं गच्छन्ति जानतो।
५९ समाधौ अन्तरायः
९ ददाति वे यथासद्धं यथापसादनं जनो
तत्य यो मडकु भवति परेसं पानभोजने
न सो दिवा वा रत्ति वा समाधिमधिगच्छति।
१० यस्स चेतं समुच्छिन्नं मूलघच्चं समूहतं
स वे दिवा वा रत्ति वा समाधिमधिगच्छति ।
११ सलाभं नातिमओय्य ना सं पिहयं चरे
अनेसं पिहयं भिक्खु समाधि नाधिगच्छति ।
१२ अप्पलाभो पि चे भिक्खु सलाभं नातिमाति
तं वे देवा पसंसन्ति सुद्धाजीवि अतन्दितं ।

११: प्रज्ञा-योग
६. योग से प्रजा की वृद्धि होती है, अ-योग से प्रजा का भय होता
है। उत्कर्ष और अपकर्ष का यह द्विविध पथ जानकर जिस
तरह प्रजा वढ़े उस तरह अपने को लगाना चाहिए।
५८. योग-प्रने अन्योन्याश्रिते
७. जिसे प्रजा नहीं होती, उसे ध्यान नहीं होता। जिसे ध्यान नहीं
होता, उसे प्रजा नहीं होती। जिसमें जान और ध्यान दोनों होते
है, वही निर्वाण के समीप होता है।
८. जव दोनों धर्मो में ब्राह्मण पारंगत होता है, तभी उसके सव
बन्धन अस्त होते हैं।
५९. समाधौ अन्तरायः
९. लोग अपनी श्रद्धा और भक्ति के अनुसार दान देते हैं। ऐसी
हालत में दूसरों के खान-पान के विषय में जो अनुदार बनता
है, उसका दिन या रात कभी ( चित्त-) समाधान नहीं होता।
१०. जिसकी यह ( अनुदारता ) मूलसमेत उखड़ गयी और हमेशा के
लिए कट गयी, उसीका दिन और रात सभी समय (चित्त-)
समाधान होता है।
११. अपने लाभ की अवहेलना न करे। न दूसरे के लाभ की स्पृहा
करे । दूसरे के लाभ की स्पृहा करनेवाले भिक्षु का ( कभी
चित्त-) समाधान नहीं होता।
१२. भिक्षु अपना लाभ अल्प होने पर भी यदि अपने लाभ
की अवहेलना न करे, तभी उस अतन्द्रित और शुद्धाजीव
( शुद्ध जीविकावाले ) की देवता प्रशंसा करते हैं।

१२ : वितृष्णता
६० तृष्णा-थेणी
१ पियतो जायती सोको पियतो जायती भयं
पियतो विप्पमुत्तस्स नत्यि सोको कुत्तो भयं ।
२ पेमतो जायती सोको पेमतो जायती भयं
पेमतो विप्पमुत्तस्स नत्यि सोको कुतो भयं ।
३ रतिया जायती सोको रतिया जायती भयं
रतिया विप्पमुत्तस्स नत्यि सोको कुतो भयं ।
४ कामतो जायती सोको कामतो जायती भयं
कामतो विप्पमुत्तस्स नत्यि सोको कुतो भयं ।
५ तण्हाय जायती सोको तोहाय जायती भयं
तोहाय विप्पमुत्तस्स नत्यि सोको कुतो भयं ।
६१ तृष्णा-वाधा
६ तसिणाय पुरक्खता पजा परिसप्पन्ति सतो व बाधितो
संयोजनसङ्गसत्ता दुक्खमुन्ति पुनप्पुनं चिराय ।

१२ : वितृष्णता - ६०. तृष्णा-श्रेणी के १. प्रिय वस्तु के कारण शोक उत्पन्न होता है । प्रिय वस्तु कारण भय उत्पन्न होता है । प्रिय (के मोह-वंधन ) से जो सर्वथा मुक्त है, उसे शोक नहीं होता, फिर भय कहाँ से हो ? म N । २. प्रेम ( अहंता-ममता ) के कारण शोक उत्पन्न होता है। प्रेम के कारण भय उत्पन्न होता है। प्रेम ( के जाल) से जो मर्वथा मुक्त है उसे शोक नहीं होता। फिर भय कहाँ से हो ? ३. रति (विषय-संग) के कारण शोक उत्पन्न होता है। रति के कारण भय उत्पन्न होता है। रति से जो सर्वथा मुक्त है, उसे गोक नहीं होता, फिर भय कहाँ से हो ? ४. काम ( राग ) के कारण शोक उत्पन्न होता है। काम कारण भय उत्पन्न होता है। काम से जो सर्वथा मुक्त है, उसे शोक नहीं होता, फिर भय कहाँ से हो ? ५. तृष्णा ( भोग-तृष्णा) के कारण शोक उत्पन्न होता है। तृष्णा के कारण भय उत्पन्न होता है। तृष्णा से जो सर्वथा मुक्त है, उसे गोक नहीं होता, फिर भय कहाँ से हो? ६१. तृष्णा-बाधा ६. तृष्णा के पीछे पड़े प्राणी बँधे खरगोश की भॉति चक्कर काटतं रहते है । संयोजनों में ( आन्तरिक बन्धनों में) फंसे लोग बार-बार ( जन्म-मरणरूप ) चिरकाल तक दुःख पाते हैं। -

९२
धम्मपदं
७ तसिणाय पुरक्खता पजा परिसप्पन्ति ससो व बाधितो
तस्मा तसिणं विनोदये भिक्खु आकङखी विरागमत्तनो।
६२ तृष्णा-वल्ली
८ मनुजस्स पमत्तचारिनो तण्हा वड्ढति मालुवा विय
सो प्लवति हुराहुरं फलमिच्छं व वनस्मि वानरो।
९ यं एसा सहती जम्मी तण्हा लोके विसत्तिका
सोका तस्स पवड्ढन्ति अभिवठं व बीरणं ।
१० यो चेतं सहती जम्मि तण्हं लोके दुरच्चयं
सोका तम्हा पपतन्ति उदविन्दू व पोक्खरा।
११ तं वो वदामि भई वो यावन्तत्थ समागता
तोहाय मूलं खणथ उसीरत्थो व बीरणं
मा वो नळं व सोतो व मारो भजि पुनप्पुनं ।
१२ यथापि मूले अनुपड्वे दळहे छिन्नो पि रुक्खो पुनरेव रूहति
एवं पि तहानुसये अनूहते निब्बत्तती दुक्ख मिदं पुनप्पुनं ।

१२ : वितृष्णता
९३
७. तृष्णा के पीछे पड़े प्राणी बॅधे खरगोश की भाँति चक्कर काटते
रहते है । इसलिए वैराग्य की आकांक्षा रखनेवाला भिक्षु
तृष्णा को समूल काट डाले।
६२. तृष्णा-वल्ली
मनुष्य की
८. प्रमादशील
तृप्णा मालुवा लता की भॉति
( उसे चारों ओर से जकड़ती हुई ) बढती ही जाती है ।
फल के लोभ से वन्दर जिस तरह वन मे ( एक वृक्ष से दूसरे
वृक्ष पर ) कूदता चला जाता है, उसी तरह वह ( तृष्णा-
वश जीव ) ( जन्म-जन्मान्तर मे ) भटकता रहता है ।
९ यह प्रसक्तिरूप प्रवल तृष्णा जिसे जीत लेती है, उसका
शोक वर्षा होने पर ( दिन दूनी रात चौगुनी ) पनपनेवाले
खस ( वीरण ) तृण की भॉति वढ़ता ही जाता है।
१०. जो पुरुप इस दुप्पार और प्रवल तृष्णा को जीत लेता है उससे
शोक कमल-पत्र से जल-विन्दु की भॉति ( उसे न छूते हुए)
ढरक पड़ता है।
११ इसलिए यहाँ जितने भी इकट्ठा हुए है उन सबसे मैं
कहता हूँ-तुम्हारा भला हो । खस का इच्छुक उसके तृण
को जिस तरह समूल खोदता है, उसी तरह ( इस ) तृष्णा
को जड़ से उखाड़ फेको । प्रवाह जिस तरह देवनल ( सरकडे )
को ( उसका मूल कायम रखकर ऊपर-ऊपर से ) वार-बार
तोड़ता है उस तरह मार तुम्हे न तोड़े।
१२. जड़मूल दृढ़ और अक्षत छोड़ने पर ऊपर-ऊपर से काटा वृक्ष फिर
से बढ़ता है, उसी तरह तृष्णा का कंद वैसे ही अनुच्छिन्न छोड़ने
पर यह ( जन्म-मरणरूप ) दुःख फिर-फिर वापस आता है।

धम्मपदं
९४
६३ तृष्णा नदी
१३ यस्य छत्तिसती सोता मनाप-स्तवना भुसा
वाहा वहन्ति दुद्दि संकप्पा रागनिस्तिता।
१४ सवन्ति सम्बधी सोता लता उभिज्जतिद्वति
तं च दिस्वा लतं जातं मूलं पञ्चाय छिन्दय ।
१५ सरितानि सिनेहितानि च सोमनस्सानि भवन्ति जन्तुनो
ते सातसिता सुखेसिनो ते वे जातिजरूपगा नरा।
१६ मुञ्च पुरे मुञ्च पच्छलो मज्ने मुञ्च भवस्त पारगू
सम्बत्य विमुत्तमानसो न पुन जातिजरं उपेहिसि ।
१७ नत्यि रागसमो अन्गि नत्यि दोससमो गहो
नत्यि मोहसमं जालं नत्यि ताहासमा नदी।
६४ तृष्णा-वन्धनम्
१८ यो निबनयो वनाधिमुत्तो बननुत्तो वनमेव घावति
तं पुग्गलमेथ पस्सथ मुत्तो बन्धनमेव धावति ।
१९ न तं वळ्हं बन्धनमाहु धीरा यदायसं दारजं वन्यजं च
सारत्तरत्ता मणिकुण्डलेस पुत्तेसु दारेसु च या अपेक्खा ।

१२: वितृष्णता ६३. तृष्णा-नदी १३. जिसके छत्तीसों स्रोत ( १८ धातु, वाह्य और अभ्यंतर भेद से ३६) मनपसंद पदार्थो की ओर वहते रहते हैं, उसके वे राग- जनित संकल्प-प्रवाह उसे दुर्दृष्टि की ओर ले जाते है। १४. सभी ओर स्रोत वहते हैं। लता ( सर्वत्र ) फूट निकलती है । लता फूटी देख प्रज्ञा से उसकी जड़ काट डालो। १५. तृष्णा के प्रवाह जीवों को बड़े स्नेहमय और मीठे लगते है। वे सुख के लोभी लोग ही जन्म-जरा के फेर में पड़ते हैं। १६. (कर्म के ) आरम्भ में, मध्य मे और अन्त में ( सर्वत्र तृष्णा को ) छोड़ भव के पार हो जा । सर्वत्र ( तृष्णा- ) मुक्त मानस होने पर तू फिर से जन्म-जरा को प्राप्त नहीं होगा। १७. राग के समान (दूसरी) आग नही। द्वेष के समान (दूसरा) ग्रह ( पिशाच ) नही। मोह के समान (दूसरा ) जाल नही । और तृष्णा के समान ( डुवा देनेवाली ) नदी नहीं। ६४. तृष्णा-बन्धनम् १८. जो छोटे-बड़े सांसारिक बन्धनों से छूट, एक वार वासना के जंगल से मुक्त होकर दुवारा वासना के ( घोर ) जंगल की ओर दौड़ता है, आओ उस मनुष्य को तो जरा देखो-मुक्त होकर फिर वन्धन की ओर ही दौड़ रहा है ! १९. लोहा, लकड़ी या रस्सी के वन्धन को वुद्धिमान् पुरुप कड़ा बन्धन नहीं समझते। (उनके विचार में तो कड़ा वधन है) मणि-कुण्डल, पुत्र और स्त्री के प्रति इच्छा का होना ।

९६
धम्मपदं
२० एतं दळहं बन्धनमा धीरा ओहारिन सिथिलं दुप्पमुञ्च
एतं पि छेत्वान परिवजन्ति अनपेक्खिनो कामसुखं पहाय ।
२१ ये रागरत्तानुपतन्ति सोतं सयं कतं मयकटको व जालं
एतं पि छेत्वान बजन्ति धीरा अनपेक्खिनो सबदुक्रवं पहाय।
२२ वितरकपमथितस्स जन्तुनो तिब्बरागस्स सुभानुपस्सिनो
भिय्यो तण्हा पवड्ढति एस खो दळ्हं करोति बन्धनं ।
२३ वितक्कूपसमे च यो रतो असुभं भावयति सदा सतो
एस खो व्यन्तिकाहिति एस छेच्छति मारवन्धनं ।
६५ वीत-तृप्ण:
२४ निळंगतो असन्तासी वीततण्हो अनङ्गणो
अच्छिन्दि भवसल्लानि अन्तिमोऽयं समुस्सयो।
२५ वीततण्हो अनादानो निरुत्तिपदकोविदो
अक्खरानं संनिपातं जञा पुब्बापरानि च
स वे अन्तिमसारीरो महापञो ति वुच्चति ।

१२ : वितृष्णता ९७ २०. धीर पुरुष इसी मनोहर और शिथिल परन्तु दुष्प्रमोच बन्धन को ही दृढ़ वन्धन कहते हैं। निरिच्छ पुरुष इसको तोड़ व काम-सुख को छोड़कर प्रवजित होते है। २१. विषयानुरक्त लोग ( भव-) प्रवाह में फंस जाते है-जैसे मकड़ी अपने ही जाल मे । निरिच्छ पुरुप इसको तोड़कर और सव दुःखों को छोड़कर प्रवजित होते है। २२. जो संदेह में पड़ा हुआ है, तीव्र रागयुक्त है और शुभानुदर्शी है, उसकी तृष्णा उत्तरोत्तर बढ़ती है और वह अपना बन्धन दृढ़ ही करता जाता है। २३. वितर्क के शान्त करने मे ही जो निरत है, जो स्मृतिमान् होकर सदा ( देह और देहानुगत विषयों मे ) अशुभ भावना करता है, वही इसका अन्त लायेगा, वही मार के वन्धन को तोड़ पायेगा। ६५. वीत-तृष्णः २४. जो निष्ठा प्राप्त कर चुका है, जो किसीको बास भय नही पहुँचाता, जो तृप्णा-त्यागी है, जो निष्कलंक है, जिसने भव- शल्यों ( ससार के बंधनों) को उखाड़ा है, उसीका यह देह अन्तिम है। २५ जिसने तृप्णा त्याग दी है, जो केवल अपरिग्रही है, जो निरुक्ति और पद-अर्थ और शब्द-दोनों का जानकार है, जो अक्षरों का सन्निपात और पौर्वापर्य-शब्दों का मूल धातु, प्रत्यय और उप- सर्ग आदि अर्थात् व्युत्पत्ति व पदसिद्धि-जानता है उसीका यह देह अन्तिम है और वही महाप्राज कहलाता है।

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१३ : बुद्ध-बौद्ध
६६. बुद्धस्य साक्षात्कारः
१. ( देहरूप कारा- ) गृह बनानेवाले को खोजता हुआ मैं अनेक
जन्मों ( और मरणों) की परंपरा में अविश्रात दौड़ता रहा
हूँ। ( सचमुच ) वार-वार जन्म पाना दुःखरूप है।
२. हे गृहकार, (अव) तुम दीख गये हो। अब फिर से
( कारा-) गृह न बना सकोगे। तुम्हारे सभी बाँस टूट
गये है और तुम्हारा गृह-कूट-घर का शीर्ष-भी बिखर
गया है। संस्काररहित चित्त से तृष्णा का क्षय हो गया है।
६७. बुद्धोद्गारः
३. मै सबको मात देनेवाला सर्वज्ञ हूँ। मै सब कुछ करके उन
( के कर्म-फलों से, उनके पाप-पुण्य ) से, अलिप्त हूँ। सब
परिग्रह त्यागकर और उनकी तृष्णा का क्षय करके मै सर्वथा
मुक्त हुआ हूँ । इस सबका कारण मैं ही हूँ यह जानते-
पहचानते हुए, मै किसकी ओर अंगुलि-निर्देश करूँ ?
he
६८. बुद्धो विनायकः
४. जिसका जीता ( बुद्धपद) दूसरा कोई नही जीत सकता और
जिसके जीते ( बुद्धपद) को दूसरा कोई नहीं पहुंच सकता,
उस अनन्त-गोचर (परम ज्ञानी) और अपद ( सर्वव्यापक
और सार्वकालिक ) बुद्ध को आप किस पन्थ से ले जा
सकोगे?

१०२
धम्मपदं
५ यस्स जालिनी विसत्तिका तण्हा नत्यि कुहिचि नेतवे
तं बुद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन नेस्सय ।
६ दिवा तपति आदिच्चो रत्ति आभाति चन्दिमा
संनद्धो खत्तियो तपति झायो तपति ब्राह्मणो
अथ सब्बमहोरत्तं बुद्धो तपति तेजसा ।
६९ बुद्ध-जन्म सुदूर्लभम्
७ ये झानपसुता धीरा नेक्खम्मूपसमे रता
देवा पि तेसं पियन्ति संवुद्धानं सतीमतं ।
८ किच्छो मनुस्सपटिलाभो किच्छं मच्चान जीवितं
किच्छं सद्धम्मसवणं किच्छो बुद्धानमुप्पादो।
९ दुल्लभो पुरिसाजो न सो सम्वत्य जायति
यत्य सो जायति धीरो तं कुलं सुखमेधति ।
७० संबुद्ध-थावक:
१० न कहापणवस्सेन तित्ति कामेसु विज्जति
अप्पस्सादा दुक्खा कामा इति विज्ञाय पण्डितो-
-

१३ : वुद्ध-बौद्ध ५. अपने जाल में सव जीवों को फंसानेवाली तृष्णा जिसे कहीं भी नहीं डिगा सकती, उस अनंत-गोचर ( सर्वज्ञ ) और अपद ( सर्वव्यापक ) वुद्ध को आप किस पन्थ से ले जा सकोगे? ६. सूर्य ( केवल ) दिन में तपता है, चन्द्रमा ( केवल) रात मे चमकता है । क्षत्रिय कवच बाँधकर ( केवल युद्ध में) तपता है, ध्यानस्थ होकर ब्राह्मण ( केवल वन में ) तपता है। परन्तु बुद्ध अपने ( जान-) तेज से दिन-रात तपता है। ६९. बुद्ध जन्म सुदुर्लभम् ७. जो पुरुष ध्यान में निरत है और निष्काम कर्म द्वारा शांति प्राप्त करने में लगे हैं, उन स्मृतिमान् ( सचेत) और सम्यक् बुद्धों की स्पृहा देवता भी करते हैं। ८. मनुष्य-योनि मे जन्म पाना दुर्लभ है । मनुष्य-जीवन दुर्लभ है । और ( उसमें) सद्धर्म का श्रवण तो और दुर्लभ है। बुद्धों (परमज्ञानियों) का जन्म ( उनकी संगति का लाभ तो नितान्त ) दुर्लभ है। ९. ( कुलीन ) पुरुष-श्रेष्ठ दुर्लभ है । वह सर्वत्र उत्पन्न नही होता। जहाँ होता है, उस कुल में सुख बढ़ता है। ७०. संबुद्ध-श्रावक १०. कापण ( रुपये) की वृष्टि होने पर भी मनुष्य के काम- भोगों की तृप्ति कभी नही होती। ( इस तरह अतर्प्य ही नही ) काम-भोग अल्पस्वाद और बहुदु.ख भी है।

१०४
धम्मपदं
११ अपि दिव्वेसु कामेसु रति सो नाधिगच्छति
तण्हक्खयरतो होति सम्मा-संयुद्ध-सावको ।
१२ यथा संकारधान स्नि उज्मितस्मि महापये
पदुमं तत्य जायेय सुचिगन्धं मनोरमं ।
१३ एवं संकारभूतसु अन्धभूते पुथुज्जने
अतिरोचति पञाय सम्मा-संवुद्ध-सावको।
७१ गौतम-थावकाः
१४ सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति सदा गोतमसावका
येसं दिवा च रत्तो च निच्चं बुद्धगता सति ।
१५ सुप्पबुद्धं पवुज्झन्ति सदा गोतमसावका
येसं दिवा च रत्तोच निच्चं धम्मगता सति ।
१६ सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति सदा गोतमसावका
येसं दिवा च रत्तो च निच्चं संघगता सति ।
१७ सुप्पबुद्धं पवुज्झन्ति सदा गोतमसावका
येसं दिवा च रत्तो च निच्चं कायगता सति ।
१८ सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति सदा गोतमसावका
येसं दिवा च रत्तो च अहिंसाय रतो मनो।
१९ सुप्पबुद्धं पवुज्झन्ति सदा गोतमसावका
येसं दिवा च रत्तो च भावनाय रतो मनो।

१३ : बुद्ध-बौद्ध १०५ ११. यह खूब समझता हुआ प्रज्ञावान् पुरुप दिव्य काम-भोगों में भी रस नहीं लेता; बल्कि सम्यक् संवुद्ध (बुद्ध) का श्रावक ( अनुयायी) तृष्णा का क्षय करने में ही लगा रहता है । १२. ( जैसे ) राज-पथ के किनारे फेंके गये कूड़े-करकट के ढेर पर पुण्यगंध और मनोरम पद्म खिलता है। १३. ( वैसे ही ) सामान्य जनों के बीच ( कूड़े-करकट के ढेर पर) सम्यक् संबुद्ध का श्रावक अपनी प्रज्ञा से प्रकाशमान होता है। ७१. गौतम-श्रावकाः १४. दिन और रात जिनकी स्मृति सदा वुद्ध में होती है, वे गौतम- श्रावक सदा सुप्रबोध से प्रबोधित होते रहते हैं। १५. दिन और रात जिनकी स्मृति सदा धर्म में होती है, वे गौतम- श्रावक सदा सुप्रवोध से प्रवोधित होते रहते हैं। १६. दिन और रात जिनकी स्मृति सदा संघ मे होती है, वे गौतम- श्रावक सदा सुप्रवोध से प्रबोधित होते रहते है। Khel १७. दिन और रात जिनकी स्मृति सदा काय ( देह ) मे रहती वे गौतम-श्रावक सदा सुप्रवोध से प्रबोधित होते रहते हैं। १८. दिन और रात जिनका मन सदा अहिंसा में लीन रहता है, वे गौतम-श्रावक सदा सुप्रवोध से प्रबोधित होते रहते है। १९. दिन और रात जिनका मन सदा भावना में लगा है, वे गौतम के श्रावक सदा सुप्रवोध से प्रबोधित होते रहते हैं।

१४ : सद्धर्मः
७२ बुद्धानां शासनम्
१ सबपापस्न अकरणं मुसलस उपसंपदा
सचित्तपरियोदपनं एतं बुद्धान मासनं ।
२ सन्ती परमं तपो तितियमा निम्यानं परमं वदन्ति बद्धा
न हि पयजिनो पर पघाती समणो होति परं विठयन्तो ।
३ अनूपवादो अनूपधातो पानिमोपये च संवरो
मत्ताता च भत्तम्मि पन्नं च सरनामनं
अधिचित्ते च आयोगो एतं वृद्धान सातनं ।
७३ आर्य-सत्यानि, शरण-त्रयं च
४ वहुं वे सरणं यन्ति पचतानि वनानि च
आरामरक्सचेत्यानि मनुस्सा भयतज्जिता।
५ नेतं खो सरणं खेमं नेतं सरणमुत्तमं
नेतं सरणमागम्म सव्यदुक्ता पमुच्चति ।

१४ : सद्धर्म
७२. बुद्धानां शासनम्
१. ( कायिक वाचिक मानसिक ) सभी पाप ( -कर्मो) का न
करना, सभी कुशल ( -कर्मो) का करना और अपने चित्त का
शोधन करते रहना-यही है बद्धों की शिक्षा।
२. तितिक्षा ( शीतोष्णादि द्वन्द्वों को सहना ) परम तप है, क्षान्ति
( दुर्वचन, निन्दा, अपमान सहना ) परम तप है। बुद्ध
( ज्ञानी ) कहते हैं कि निर्वाण ही परमपद है। प्रवजित
होने मात्र से कोई जीव-हिसक या परपीड़क श्रमण नही
होता।
३. परनिन्दा न करना, परघात न करना, ( भिक्षुओं के लिए बने)
प्रातिमोक्ष नियमों का परिपालन करना, परिमित भोजन
करना, एकान्त सेवन ( अर्थात् एकान्त मे ही उठना-बैठना,
सोना) और अधिचित्त ( चित्त को योग मे लगाना) का
अभ्यास करना-यही बुद्धों का शासन है ।
७३. आर्य-सत्यानि, शरण-त्रयं च
४. भयभीत मनुष्य पर्वत, वन, उद्यान, वृक्ष और चैत्य (वेदी)
आदि का आश्रय लेता है।
५. परन्तु यह आश्रय न तो सुरक्षित है, न उत्तम है, क्योंकि
इसकी शरण से मनुष्य दुःखों से मुक्त नहीं होता।

१०८
धम्मपदं
६ यो च बुद्धं च धम्मं च संघं च सरणं गतो
चत्तारि अरियसच्चानि सम्मप्पज्ञाय पस्सति
७ दुक्खं दुक्खसमुप्पादं दुक्खस्स च अतिक्कम
अरियं चट्ठनिक मग्गं दुक्खूपसमगामिनं ।
८ एतं खो सरणं खेमं एतं सरणमुत्तमं
एतं सरणमागम्म सबदुक्खा पमुच्चति ।
९ सुखो बुद्धानमुप्पादो सुखा सद्धम्मदेसना
सुखा संघस्स सामग्गी समग्गानं तपो सुखो।
७४ दीक्षा
१० मग्गान'ङ्गिको सेट्ठो सच्चानं चतुरो पदा
विरागो सेट्ठो धम्मानं द्विपदानं च चक्खुमा
११ एसो व मग्गो नत्थो दस्सनस्स विसुद्धिया
एतम्हि तुम्हे पटिपज्जथ मारस्सेतं पमोहनं ।
१२ एतम्हि तुम्हे पटिपन्ना दुक्खस्स'न्तं करिस्सथ
अक्खातो ते मया मगो अजाय सल्लकन्तनं ।

१४ : सद्धर्म १०९ ६. बुद्ध, धर्म और संघ की शरण में जाकर सम्यक् प्रज्ञा से जिसने चार आर्यसत्यों को देख लिया ७ दुव, दुःख का मूल, दुःख का अंत और दुःखान्त ( निर्वाण) को पहुंचानेवाला आर्य अष्टांगिक मार्ग:-देख लिया ( उसीको सच्चा गरण प्राप्त हुआ)। ८. यही शरण सुरक्षित है, यही शरण उत्तम है। क्योंकि इसीके गरण मे आकर मनुष्य सब दु.खों से मुक्त होता है । ९. बुद्रों का जन्म लेना मुखकर है। सच्चे धर्म का उपदेश सुखकर है। संघ की समग्रता मुखकर है। समग्रतायुक्त पुरुषों का तप सुखकर है। ७४. श्रेष्ठो मार्गः १०. सव मार्गों में अप्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ है । सत्यों में चार ( आर्य सत्यरूप) पद श्रेष्ठ हैं। सब धर्मो मे, आचारों में वैराग्य श्रेष्ठ है। मनुष्यों मे चक्षुष्मान् ( जान - चक्षु वुद्ध ) श्रेष्ठ है । ११. यह दर्शन की विशुद्धि का मार्ग है। इसके अलावा दूसरा मार्ग नही । (भिक्षुओ ! ) तुम इस पर चलो । यह मार को मूच्छित करता है। १२. इस पर चलकर तुम दु.ख का अन्त लाओगे। इसको शल्य- निकृन्तन-दुःखरूप शल्य को उखाड़नेवाला-जान मैने यह मार्ग बतलाया है। ३८ आर्य-अप्टागिक मार्ग है . सम्यक् धारणा, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वचन, सम्यक् कर्म, सम्यक् जीविका, सम्यक् उद्योग, सम्यक् स्मृति और सम्यक् ध्यान ।

१३ तुम्हेहि किच्चं आतप्पं अक्खातारो तथागता
पटिपन्ना पमोक्खन्ति झायिनो मारबन्चना।
१४ पथव्या एकरज्जेन सग्गस्स गमनेन वा
सव्वलोकाधिपच्चेन सोतापत्तिफलं वरं।
७५ भावना
१५ सब्बे संखारा अनिच्चा ति यदा पज्ञाय पस्सति
अर्थ निन्विन्दती दुक्खे एस मग्गो विसुद्धिया।
१६ सब्बे संखारा दुक्खा ति यदा पज्ञाय पस्सति
अथ निम्विन्दती दुक्खे एस मग्गो विसुद्धिया।
१७ सब्बे धम्मा अनत्ता ति यदा पञ्चाय पस्सति
अथ निबिन्दती दुक्खे एस मग्गो विसुद्धिया।
७६ निर्वाण-गमनो मार्ग:
१८ वनं छिन्दथ मा रुक्खं वनतो जायते भयं
छत्वा वनं च वनथं च निब्बना होथ भिक्खवो।

१४: सद्धर्म
१११
१३. ( मार्ग ) वतानेवाला तथागत है, लेकिन खटना तो तुम्हे ही
है। इस मार्ग पर चलनेवाले ध्यान-परायण पुरुप मार के
बन्धनों से मुक्त हो जाते है।
१४. पृथ्वी के एकच्छत्र राज्य से, स्वर्ग की प्राप्ति से, वल्कि सभी
लोकों का अधिपति बनने से भी स्रोतापत्ति का फल श्रेष्ठ है।
७५. विशोधनः
१५. सब 'संस्कार' ( पदार्थ ) अनित्य है, यह ( तथ्य ) जब मनुष्य
प्रज्ञा से देख लेता है, तव दुःखों से निर्वेद ( वैराग्य ) पाता
है। यही विशुद्धि का मार्ग है।
१६. सब 'संस्कार' ( पदार्थ ) दु.खरूप है, यह ( तथ्य ) जब मनुष्य
प्रजा से देख लता है, तव दु.खों से निर्वेद पाता है। यही
विशुद्धि का मार्ग है।
१७. सव धर्म अनात्म है, यह ( तथ्य ) जव मनुष्य प्रजा से देख लेता
है, तव दु:खों से निर्वेद पाता है। यही विशुद्धि का मार्ग है।
७६. निर्वाण-गमनः
१८. वन (कामना ) को काटो, वृक्ष को नहीं । वन ( कामना )
से भय उत्पन्न होता है। वन और झाड़ी को-छोटी-
बड़ी सभी कामनाओं को-काटकर हे भिक्षुओ, निर्वन
( निष्काम ) हो जाओ।
५. निर्वाणगामी मार्ग पर आरूढ होनेवाला व्यक्ति फिर उससे भ्रष्ट
नही हो सकता। उसे स्रोत-आपन्न ( धार में पड़ा हुआ ) कहते है।
इसी पद की प्राप्ति को स्रोतापत्ति-फल कहा जाता है ।

१९ यावं हि वनथो न छिज्जति अणु-मत्तो पि नरस्स नारिसु
पटिवद्धमनो व ताव सो वच्छो खीरपको व मातरि।
२० उच्छिन्द सिनेहमत्तनो कुमुदं सारदिकं व पाणिना
सन्तिमग्गमेव
हय निव्बानं सुगतेन देसितं।
२१ इध वस्सं वसिस्सामि इध हेमन्तगिम्हिसु
इति बालो विचिन्तेति अन्तरायं न वुज्झति ।
२२ तं पुत्तपसुसंमत्तं व्यासत्तमनसं नरं
सुत्तं गामं महोघो व मच्चु आदाय गच्छति ।
२३ न सन्ति पुत्ता ताणाय न पिता नापि बन्धवा
अन्तकेनाधिपन्नस्स नत्थि आतिसु ताणता।
२४ एतमत्थवसं अत्वा पण्डितो सीलसंवुतो
निबानगमनं मग्गं खिप्पमेव विसोघये।

११३ १४ : सद्धर्म , १९. जब तक नर की नारी के प्रति कामना पूरी-की-पूरी नही कट जाती, अल्प भी शेष रह जाती है, तब तक स्तन- पायी शिशु जिस तरह माता मे बँधा हुआ रहता है, उसी तरह पुरुप का मन (स्त्री मे ) बँधा रहता है। २०. गरद् ऋतु में खिले कुमुद को मनुष्य जिस तरह हाथ से सहज काट डालता है, उसी तरह अपने विषय में जो रनेह है उसे काट डाल । ( निष्काम जीवन के ) शान्ति-मार्ग को बढाता जा । सुगत ( बुद्ध ) ने निर्वाण ही ( लक्ष्य ) बताया है। २१. यहाँ वर्षा ऋतु में वसूगा, यहाँ हेमन्त में और यहाँ ग्रीष्म में ( वसूंगा )। इस तरह मूर्ख सोचता रहता है। अन्तराय ( विघ्न को ) नही बूझता। २२. सोये गाँव को जिस तरह ( अचानक ) पानी की वाढ़ वहा ले जाती है, उसी तरह मन से पुत्र और पशुओं में पूरी तरह उलझे प्रमत्त मनुष्य की मृत्यु ले जाती है। २३. मनुष्य को जब मृत्यु दवोचती है तब उसकी रक्षा न पुत्र कर सकता है, न पिता, न बन्धु-बान्धव । ( वास्तव मे किसी भी) वन्धु मे रक्षा की क्षमता नहीं होती। २४. यह सव समझकर प्रजावान् और शीलसम्पन्न पुरुप को निर्वाण को पहुँचानेवाले मार्ग की खोज मे तुरन्त चल देना चाहिए। ८

१५: पण्डितः
७७ पण्डित-लक्षणम्
१ धम्मपीति सुखं सेति विप्पसत्नेन चेतसा
अरियप्पवेदित धम्म सदा रमति पण्डितो।
२ उदकं हि नयन्ति नेत्तिका उसुकारा नमयन्ति तेजनं
दारुं नमयन्ति तच्छका अत्तानं दमयन्ति पण्डिता।
३ सेलो यथा एकघनो वातेन न समीरति
एवं निन्दापसंसासु न समिञ्जन्ति पण्डिता।
४ यथापि रहदो गम्भीरो विप्पसन्नो अनाविलो
एवं धम्मानि सुत्वान विप्पसीदन्ति पण्डिता।
५ सम्बत्थ वे सप्पुरिसा चजन्ति न कामकामा लपयन्ति सन्तो
सुखेन फुट्ठा अथवा दुखेन न उच्चावचं पण्डिता दस्सयन्ति ।
६ न अत्तहेतु न परस्स हेतु
न पुत्तमिच्छे न धनं न रखें
न इच्छेय्य अधम्मन समिद्धिमत्तनो
स सीलवा पञ्जवा धम्मिको सिया।

१५: पण्डित ७७. पण्डित-लक्षणम् १. धर्म मे आनन्द माननेवाला पुरुप अत्यन्त प्रसन्नचित्त से सुख- पूर्वक सोता है ( निश्चिन्त जीवन जीता है )। पण्डितजन सदा आर्योपदिष्ट धर्म में रत रहते हैं। २. बागवान जल को (इच्छानुरूप ) मोड़ते है। वाणकार वाण को मोड़ते है । बढ़ई लकड़ी को आकार देते है । पण्डितजन अपने को ही मोड़ते हैं-सन्मार्ग मे लगाते है। ३. ठोस पहाड़ जिस तरह वायु से नहीं डिगता, उसी तरह पण्डित- जन निन्दा और प्रशंसा से नहीं डिगते । ४. गहरा जलाशय जिस प्रकार स्वच्छ निर्मल होता है, उसी प्रकार धर्मश्रवण कर पण्डितजन सुप्रसन्न होते है। ५. सत्पुरुष सर्वत्र जाते है, परन्तु वे सांसारिक वाते नही करते । [सुख हो या दुःख, पण्डितजन हर्प-विपाद नहीं दरशाते। ६. जो न अपने लिए और न दूसरे के ही लिए पुत्र की, धन की या राज्य की इच्छा करे। अधर्म के द्वारा अपनी उन्नति न चाहे । वही शीलवान्, प्रजावान् और धार्मिक है।

११८
धम्मपदं
१३ असाहसेन धम्मेन समेन नयती परे
धम्मस्स गुत्तो मेधावी धम्मट्ठो ति पवुच्चति ।
१४ न तेन थेरो सो होति येन'स्स फलितं सिरो
परिपक्को वयो तस्स मोघजिण्णो ति वुच्चति ।
१५ यम्हि सच्चं च धम्मो च अहिंसा संयमो दमो
स वे वन्तमलो धीरो सो थेरो ति पवुच्चति ।
१६ न वाक्करणमत्तेन वण्णपोक्खरताय वा
साधुरूपो नरो होति इस्सुको मच्छरी सठो।
१७ यस्स चेतं समुच्छिन्नं मूलघच्चं समूहतं
स वन्तदोसो मेधावी साधुरूपो ति वुच्चति ।
८१ पारगामिनः
१८ अप्पका ते मनुस्सेसु ये जना पारगामिनो
अथायं इतरा पजा तीरमेवानुधावति ।
१९ ये च खो सम्मदक्खाते धम्मे धम्मानुवत्तिनो
ते जना पारमेस्सन्ति मच्चुधेय्यं सुदुत्तरं ।

१५: पण्डित ११९ १३. जो मनुष्य विचार, धर्म और समत्व से लोगों का नेतृत्व करता है, वही धर्म से सुगुप्त मेधावी पुरुष धर्मस्थ ( अर्थात् न्याया- धीश) कहलाता है। १४. सिर के बाल सफेद होने से कोई स्थविर ( वृद्ध ) नहीं होता। उसकी आयु मात्र पक गयी है, वह वृथाजीण कहलाता है । १५. जिसमे सत्य, धर्म, अहिंसा, संयम और दम है वही वान्तमल (विगतमल ) धीर पुरुप स्थविर कहा जाता है । १६. ईर्ष्या और मत्सर से युक्त शठ पुरुप केवल वचन-चातुरी के या देह-सौष्ठव के कारण साधु नहीं होता। १७. जिसने यह ( ईर्ष्या, मत्सर आदि अन्तर का सारा मल ) काट डाला है, मूलसमेत उखाड़ डाला है, वही वान्त-दोप (विगत- दोप) मेधावी पुरुप साधु कहलाता है । ८१. पार-गामिनः १८. ( भवसागर के ) उस पार (निर्वाण को) जानेवाले व्यक्ति मनुष्यों में कम ही मिलते है । गेप बची यह सारी जनता ( संसार-सागर के) किनारे ही किनारे दौड़नेवाली है। १९. ( सम्यग्दृष्टि, सम्यक्कर्म, सम्यक्प्रज्ञा आदि ) सम्यविशिष्ट आर्य-अष्टांगिक मार्गरूप धर्म का जो आचरण करते हैं, वे ही पुमप दुस्तर मृत्यु को पार कर ( अमृत को ) जाते हैं।

१२०
धम्मपदं
२० अन्धभूतो अयं लोको तनुकत्य विपस्सति
सकुन्तो जालमुत्तो व अप्पो सग्गाय गच्छति।
२१ हंसादिच्चपये यन्ति आकासे यन्ति इद्धिया
नीयन्ति धीरा लोकम्हा जेत्वा मारं सवाहनं ।

१५: पण्डित
१२१
२०. यह सारा लोक अन्धा वना है । देखनेवाला विरला ही है ।
जाल से मुक्त हुए पक्षी की तरह स्वर्ग जानेवाला विरला
ही है।
२१. हंस आदित्यपथ से जाते है । ऋद्धिवान् ( योगी) आकाश से
जाते है । ( पर ये दोनों भी खटते रहते है इसी लोक मे।)
परन्तु सदल मार को जीतकर धीर पुरुष इसी लोक से परे
निर्वाण को ससम्मान पालकी मे बैठाकर पहुँचाये जाते है । .
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१६ : भिक्षुः
८२ भिक्षो: साधना-क्रमः
१ यतो यतो सम्मसति खन्धानं उदयव्ययं
लभती पोतिपामोज्जं अमतं तं विजानतं ।
२ तत्रायमादि भवति इध पञस्स भिक्खुनो
इन्द्रियगुत्ति संतुठि पातिमोक्खे च संवरो।
३ मित्ते भजस्सु कल्याणे सुद्धाजीवे अतन्दिते
पटिसन्थारवुत्त्य'स्स आचारकुसलो सिया
ततो पामोज्जबहुलो दुक्खस्सन्तं करिस्सति ।
८३ भिक्षु-लक्षणम्
४ हत्यसंयतो पादसंयतो वाचाय संयतो संयतुत्तमो
अज्झत्तरतो समाहितो एको संतुसितो तमाहु भिक्खू ।
५ सन्तकायो सन्तवाचो सन्तमनो सुसमाहितो
वन्तलोकामिसो भिक्खु उपसन्तो ति वुच्चति ।

१६ : भिक्षु ८२. भिक्षोः साधना-क्रमः १. ( भिक्षु ) जैसे-जैसे स्कन्धों के उदय और अस्त पर विचार करता है, वैसे ही वैसे विज्ञानी पुरुषों का अमृत जो ( धर्म मे) प्रीति-प्रमोद है, वह उसे मिलता रहता है । २. जानकार भिक्षु का उपक्रम इस प्रकार होता है-इंद्रिय-निग्रह, संतोप और प्रातिमोक्ष नियमों का परिपालन । कल्याणकारी पवित्र आजीविकावाले और अतन्द्रित मित्रो की सगति करे। ३. आतिथ्यशील और सदाचारी बने । हे भिक्षो, इसी तरह तुम प्रमोद से ओतप्रोत होकर दु.ख का अन्त (निर्वाण) पाओगे। ८३. भिक्षु-लक्षणम् ४. जिसके हाथ-पैर और वाणी मे सयम है-जिसके उठने-बैठने में, बोलने-चालने में और सभी क्रिया-कलापों मे सयम है-अर्थात् जो वाह्यतः पूर्ण संयमी है तथा अध्यात्म-रत, समाहित और सतुष्ट है-अर्थात् जो उतना ही आभ्यन्तर सयमी है-उसी एकाकी को भिक्षु कहते है। ५. जिसकी काया, वाणी और मन शान्त है, अर्थात् जो पूर्ण समा- धानयुक्त है तथा जिसने सभी लौकिक भोगों का ( अन्तर से ) त्याग कर दिया है, उसे उपशान्त भिक्षु कहते है ।

१२४
धम्मपदं
६ सवसो नामरूपस्मि यस्स नत्यि ममायितं
असता च न सोचति स वे भिक्खू ति वुच्चति ।
७ पञ्च छिन्दे पञ्च जहे पञ्च चुत्तरि भावये
पञ्चसङ्गातिगो भिवखु ओघतिण्णो ति वुच्चति ।
८४ मैत्री-विहारी
८ मेत्ताविहारी यो भिक्खु पसन्नो बुद्धसासने
अधिगच्छे पदं सन्तं संखारूपसमं सुखं ।
९ पामोज्जबहुलो भिक्खु पसन्नो बुद्धसासने
अधिगच्छे पदं सन्तं संखारूपसमं सुखं ।
१० यो ह वे दहरो भिक्खु युञ्जति बुद्धसासने
सोमं लोकं पभासेति अभा मुत्तो व चन्दिमा।

१६ : भिक्षु
१२५
६. जिसे किसी नाम-रूप में तनिक भी ममता-मोह नही है तथा
उसके न होने पर जो शोक नहीं करता, वही भिक्षु कहा
जाता है।
७. जो पाँच को छेदे, पाँच को छोडे, पाँच की भावना करे
और पाँच के संग को लॉघ जाय, उसी भिक्षु को कहते हैं
ओघ-तीर्ण ( जो वाढ को पार कर गया है )।
(१) छेद्य-पंचक : सत्काय दृष्टि, विचिकित्सा, शीलवत परा-
मर्श, कामराग, रूपराग ।
(२) हेय-पंचक : अरूपराग, प्रतिघ, मान, औद्धत्य, अविद्या।
(३) भाव्य-पचक : श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि, प्रज्ञा ।
(४) उल्लंध्य-पचक : राग, द्वेष, मोह, मान, मिथ्यादृष्टि ।
८४. मैत्री-विहारी
८. मैत्री-भावना से विहार करता हुआ जो भिक्षु बुद्ध के
उपदेश में प्रसन्न (श्रद्धावान् ) रहता है, वह सभी सस्कारों
का शमन करनेवाले और सुखरूप (निर्वाण- ) शान्ति के
पद को प्राप्त होता है।
९. (धर्मचर्या मे ) प्रमोद पाता हुआ जो भिक्षु बुद्ध के उपदेश
मे प्रसन्न रहता है, वह सभी सस्कारों का शमन करनेवाले
और सुखरूप (निर्वाण-) शान्ति के पद को प्राप्त होता है।
१०. जो भिक्षु तरुण अवस्था से ही निज को वुद्ध-शासन में
लगा देता है, वह मेघमुक्त चन्द्रमा की भाँति इस लोक
को प्रकाशित करता है।

१२६
धम्मपदं
८५ भिक्षु-प्रबोधः
११ वस्सिका विय पुप्फानि मद्दवानि पमुञ्चति
एवं रागं च दोसं च विप्पमुञ्चय भिक्सवो।
१२ सिञ्च भिक्खु इमं नावं सित्ता ते लहुमेस्सति
छत्वा रागं च दोसं च ततो निब्बानमेहिसि ।
१३ झाय भिक्खु मा च पमादो मा ते कामगुणे भमस्तु चित्तं
मा लोहगुळं गिळी पमत्तो मा कन्दि दुक्खमिदं ति डरहमानो।
१४ सुझागारं पविठ्ठस्स सन्तचित्तस्स भिक्खुनो
अमानुसी रती होति सम्मा धम्मं विपस्सतो।
१५ धम्मारामो धम्मरतो धम्मं अनुविचिन्तयं
धम्म अनुस्सरं भिवखु सद्धम्मा न परिहायति ।
८६ भिक्षोर् भय-स्थानम्
१६ कुसो यथा दुग्गहितो हत्थमेवानुकन्तति
सामनं दुष्परामठें निरयायुपकड्ढति ।

१६ : भिक्षु १२७ ८५. भिक्षु-प्रबोधः ११. जैसे जूही अपने कुम्हलाये फूलों को छोड़ देती है वैसे ही भिक्षुओ! तुम राग और द्वेप को छोड़ दो। १२. हे भिक्षु ! इस अपनी ( जीवन- ) नौका में से ( मल-जल को) उलीचो । उलीचने पर वह तुम्हारे लिए हलकी हो जायगी। ( अशेप ) राग और द्वेप को उलीच देने पर तुम निर्वाण को प्राप्त हो जाओगे। १३. हे भिक्षु ! ध्यान में लग जाओ, प्रमाद न करो। काम- भोग में तुम्हारा चित्त न भटके । प्रमादवश तपे लोहे की गोली को न निगलो और न ही अन्दर से जलते हुए रो उठो कि 'हाय रे, यह दुःख ( आ पड़ा ) है।' १४. शून्यागार में जाकर और चित्त शान्त कर समाधिस्थ वैठे भिक्षु को सम्यक्धर्म का साक्षात्कार करते हुए अलौकिक रति ( दिव्य आनन्द ) प्राप्त होती है। १५. ( श्रद्धा से ) धर्म की शरण आया भिक्षु ( भावना से) धर्म मे रमता और ( बुद्धि से ) धर्म का निरतर चिन्तन करता अर्थात् ( सर्वात्मना ) धर्म का अनुसरण करता हुआ सद्धर्म से ( कभी ) अलग नहीं पड़ता, च्युत नहीं होता। ८६. भिक्षोः भय-स्थानम् १६. जैसे ठीक ढंग से न पकडने से कुश हाथ को ही काट देता है, वैसे श्रामण्य भी यदि सम्यक् ग्रहण न किया जाय तो वह ( उस अव्यवस्थित श्रमण को ) नरक में खीच ले जाता है।

१७ : अर्हन
८९ अहल-लक्षणम्
१ गतद्धिनो विसोकस्स विप्पमुत्तस्स सबधि
सब्बगन्थप्पहीनस्स परिळाहो न विज्जति ।
२ उय्युञ्जन्ति सतीमन्तो न निकेते रमन्ति ते
हंसा व पल्ललं हित्वा ओकमोकं जहन्ति ते ।
३ येसं संनिचयो नत्यि ये परिचातभोजना
सुञतो अनिमित्तो च विमोक्खो यस्स गोचरो
आकासे व सकुन्तानं गति तेसं दुरन्नया ।
४ यस्सासवा परिक्खीणा आहारे च अनिस्सितो
सुझतो अनिमित्तो च विमोक्खो यस्स गोचरो
आकासे व सकुन्तानं पदं तस्स दुरन्नयं ।
५ यस्सिन्द्रियानि समथं गतानि अस्सा यथा सारथिना सुदन्ता
पहीनमानस्स अनासवस्स देवा पित पिहयन्ति तादिनो।

१७ : अर्हत् ८९. अहल-लक्षणम् १. जिसने मार्ग समाप्त कर लिया है, जो शोक-रहित तथा सर्वथा विमुक्त है, जिसकी सारी ग्रन्थियाँ ( संशयं ) छूट गयी है, उसे कोई सताप नहीं होता। २. स्मृतिमान् पुरुप ( निर्वाण के लिए ) उद्योग करते है। वे गृह मे नही रमते। हंस जिस तरह डवरे छोड़ ( मानसरोवर के लिए चल ) देते है, उसी तरह वे सभी घर छोड़ (निर्वाण की ओर चल ) देते है। ३. जिनका कोई सग्रह नहीं, जिनका भोजन परिमित है, जिन्होंने शून्यरूप और अनिमित्तस्वरूप मोक्ष का साक्षात्कार कर लिया है, उनकी गति आकाश मे पक्षियों के मार्ग के समान ( अचिह्नित और अतएव ) दुरनुगम्य है, दुरनुर. गोय है। ४. जिसके आस्रव परिक्षीण हो गये है, आहार में जिसे आसक्ति नही, जिसने शून्यरूप और अनिमित्तस्वरूप मोक्ष का साक्षा- त्कार कर लिया है, उसका मार्ग आकाश में पक्षियों के मार्ग के समान ( अचिह्नित और अतएव ) दुरनुगम्य है, दुरनुसर- णीय है। ५. सारथि के घोड़े जैसे बहुत दान्त (विनीत ) होते है, वैसे ही जिसकी इद्रियाँ शान्त है, जिसके मान नहीं और न ही आस्रव है-ऐसे पुरुष की स्पृहा देवता भी करते है।

१३२
धम्मपद
६ पठदीसमो नो विरुज्झति इन्दखोलूपमो तादि सुब्बतो
रहदो व अपेतकद्दमो संसारा न भवन्ति तादिनो।
७ सन्तं तस्स मनं होति सन्ता वाचा च कम्मच
सम्मदचा विमुत्तस्स उपसन्तस्स तादिनो।
९० अर्हतो विहारः
८ गामे वा यदि वारा निन्ने वा यदि वा थले
यत्थारहन्तो विहरन्ति तं भूमि रामणेय्यकं ।
९ रमणीयानि अरञानि यत्य न रमती जनो
वीतरागा रमिस्सन्ति न ते कामगवेसिनो।
९१ श्रमणादयः
१० न मुण्डकेन समणो अवतो अलिक भणं
इच्छालोभसमापन्नो समणो कि भविस्सति ।
११ यो च समेति पापानि अणुं थूलानि सन्बसो
समितत्ता हि पापानं समणो ति पवुच्चति ।
१२ वाहितपापो ति ब्राह्मणो समचरिया समणो ति वुच्चति
पन्बाजयमत्तनो मलं तस्मा पब्बजितो ति वुच्चति ।

१७: अरहत १३३ ६. जो पृथिवी के समान किसीका विरोध नहीं करता, जो इन्द्र- कील के समान अपने व्रतों मे ( निप्कंप दृढ ) है, जो अगाध जलागय के समान प्रसन्न ( कीचड़ से शून्य ) है-ऐसे पुरुष को ससार नही होता ( जन्म-मरण के फेरे नही होते ) । ७. सम्यग्ज्ञान से विमुक्त ( पुरुष का ) उपशान्त मन शान्त होता है, उसकी वाणी शान्त होती है और उसका कर्म भी शान्त होता है। ९०. अर्हतो विहारः ८. ग्राम हो या अरण्य, नीची भूमि हो या ऊँची (पहाड़ी), जहाँ कहीं अर्हन्त विहार करते है, वही भूमि रमणीय है। ९. ( कितने ही ) रमणीय अरण्य है, लेकिन ( कामकामी ) सामान्य लोग वहाँ नहीं रमते । वीतराग पुरुप ही वहाँ रमते है, क्योंकि उन्हे कामभोगों की तलाश नही होती। ९१. श्रमणादयः १०. व्रत और सत्यवाद से रहित कोई केवल मुण्डन करने मात्र से श्रमण नहीं होता। इच्छा और लाभ से पूर्ण- आन्तरिक आसक्ति और बाह्य परिग्रह से ग्रस्त-पुरुष कैसा श्रमण ? ११. जो छोटे-बड़े पापों का सर्वथा शमन कर देता है, वह उन पापों के गमन के कारण ही श्रमण कहलाता है। १२. अपने पापों को बहा देता है, इसलिए वह ब्राह्मण है । समचर्या के कारण श्रमण कहलाता है। अपने मलों को देश-निकाला दे देने के कारण वह प्रवजित कहलाता है।

१३४
घम्मपद
१३ न तेन भिक्खु सो होति यावता भिक्खते परे
विस्सं धम्म समादाय भिक्खु होति न तावता।
१४ यो'ध पुनच पापं च बाहेत्वा ब्रह्मचरियवा
संखाय लोके चरति स वे भिक्खू ति वुच्चति ।
१५ न मोनेन मुनी होति मूळ्हरूपो अविद्दसु
यो च तुलं व पग्गय्ह वरमादाय पण्डितो-
१६ पापानि परिवज्जेति स मुनी तेन सो मुनी
यो मुनाति उभो लोके मुनी तेन पवुच्चति ।
१७ छन्दजातो अनक्खाते मनसा च फुटो सिया
कामेसु च अप्पटिवद्धचित्तो उद्धंसोतो ति वुच्चति ।
९२ उत्तमः पुरुपः
१८ अस्सद्धो अकतनं च सन्धिच्छेदो च यो नरो
हतावकासो वन्तासो स वे उत्तमपोरिसो।

१३५ १७ : अर्हत १३. दूसरों से भिक्षा माँगता है, केवल इतने से ही कोई भिक्षु नहीं होता । ( किसी वस्तु के प्रति ) अपना स्वामित्व न रखने का व्रत लेने मात्र से कोई भिक्षु नही होता । १४. जो पाप और पुण्य दोनों को वहाकर केवल ब्रह्मचर्य से रहता है ( अर्थात् केवल ज्ञान प्राप्त कर विहरण करता है ) वही भिक्षु कहलाता है। १५ मौन धारण करने मात्र से कोई जडमूढ़ पुरुप मुनि नहीं होता। जो प्रज्ञावान् मानो प्रज्ञा की तुला लेकर पाप-पुण्य को तौलता है और भारी पुण्य को ग्रहण कर १६. हलके पाप को छोड़ देता है, वह इसी तौलने (मुनिता ) के कारण मुनि होता है। दोनों लोगों को तौलता है, इसी कारण वह मुनि कहलाता है । १७. अनाख्यात (निर्वाण ) के विपय मे जिसे छन्द (चसका ) लगा है, जिसके मन ने उसे छू लिया है, काम-भोगों में जिसका चित्त अटका नही है, उसे कहते है ऊर्ध्वस्रोता। ९२. उत्तमः पुरुषः १८. जो अश्रद्ध ( साक्षात्कार के कारण जिसे कोई श्रद्धाविषय ही न रहा ) है, जो अकृतज्ञ ( अकृत जिसने जान लिया ) है, जो सन्धिच्छेदक ( बन्धनो को तोडनेवाला) है, जो हताव- काश ( जिसका पुनर्जन्म का अवसर समाप्त हुआ ) है और जो वान्ताश ( सभी आगाएं जिसने वमन करके छोड़ दी ) है वही उत्तम पुरुष है ।* * ( इसमे अघद्ध आदि सभी विशेपण शिलप्ट है। उनका वाच्य अर्थ दोप- सूचक है, लेकिन लक्ष्य अर्थ गुणसूचक है । अधम के विशेपण उत्तम को लगाये है। )

१८:ब्राह्मणः
९३ ब्राह्मणो नाम अनघः
१ मातरं पितरं हत्वा राजानो द्वे च खत्तिये
रळं सानुचरं हन्त्वा अनीघो याति ब्राह्मणो ।
२ मातरं पितरं हन्त्वा राजानो द्वे च सोत्थिये
वेय्यग्घपञ्चमं हन्त्वा अनीघो याति ब्राह्मणो।
९४ क्षमावान्
३ न ब्राह्मणस्स पहरेय्य नास्स मुञ्चेथ ब्राह्मणो
धी ब्राह्मणस्स हन्तारं ततो धी यस्स मुञ्चति ।
+

१८ ब्राह्मण ९३. ब्राह्मणो नाम अनघः १. माता, पिता, दो क्षत्रिय राजा तथा अनुचरों समेत समूचे राष्ट्र को मारकर ब्राह्मण निप्पाप हो जाता है। [तृप्णा, अहंकार, शाश्वत दृष्टि और उच्छेद दृष्टि, आसक्तियों समेत समस्त संसार ( रागसमेत पाँच उपादान स्कंध ) पर माता आदि पदों का रूपक किया गया है। ] २. माता, पिता, दो क्षत्रिय राजा और व्याघ्रपंचम को मारकर ब्राह्मण निप्पाप हो जाता है । [ रूपक पूर्वलोकवत् ; व्याघ्र- पंचम जिसमें व्याघ्र अर्थात् सशय पाँचवाँ है वे ( १ ) काम- छंद, (२) व्यापाद, (३) स्त्यानमृद्ध, ( ४ ) औद्धत्य- कोकृत्य और ( ५ ) विचिकित्सा, ये पाँच 'नीवरण' । सशय को पाली में वेश्यग्ध भी कहते है। इसलिए इन पाँचों जानावरणों को वेय्यग्ध-पचम कहा जाता है। 'मारकर भी निष्पाप' यह चमत्कृति है। वास्तव में कहा गया है कि मनुप्य वाह्य लोगों को नही, आभ्यंतर विकारों को मारकर ही निप्पाप होता है ।] ९४. क्षमावान् ३. ब्राह्मण पर प्रहार नहीं करना चाहिए। और ब्राह्मण को उस ( प्रहारकर्ता ) पर कोप नही करना चाहिए। ब्राह्मण पर प्रहार करनेवाले को धिक्कार है । जो ( ब्राह्मण ) उस ( प्रहारकर्ता ) पर कोप करे उसे भी उससे भी ( अधिक ) धिक्कार है।

*
१३८
धम्मपदं
४ न ब्राह्मणस्सेतदकिंचि सेय्यो यदा निसेधो मनसो पियेहि
यतो यतो हिंसमनो निवत्तति ततो ततो सम्मति मेव दुक्खं ।
५ यस्स कायेन वाचाय मनसा नत्थि दुक्कतं
संदुतं तीहि ठानेहि तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
९५ अविरुद्धः
.६ अक्कोसं वधवन्धं च अदुट्ठो यो तितिक्खति
खन्तीवलं बलानीकं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
७ अक्कोधनं वतवन्तं सीलवन्तं अनुस्सदं
दन्तं अन्तिमसारीरं तमहं भूमि ब्राह्मणं ।
८ अकक्कसं विज्ञापन गिरं सच्चं उदीरये
याय नाभिसजे किचि तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
९ निधाय दण्डं भूतेसु तसेसु थावरेसु च
यो न हन्ति न घातेति तमहं दूमि ब्राह्मणं ।
१० अविरुद्धं विरुद्धेसु अत्तदण्डेसु निन्बुतं

१८:ब्राह्मण
१३९
४. ब्राह्मण के लिए यह कम श्रेयस्कर नहीं कि वह प्रिय पदार्थो से
अपने मन को रोक ले। जैसे-जैसे मनुष्य हिंसा से निवृत्त होता
है, वैसे-वैसे दुख का शमन होता जाता है।
५. जिसने काया, वाणी और मन से ( कभी कोई ) दुप्कृत्य
नही किया है, ( अर्थात् ) जो इन तीनों ( कर्मपथों ) मे
संवृत (सुरक्षित ) है, उमे मै ब्राह्मण कहता हूँ।
९५. अविरुद्ध
६. जो मन मे विकार लाये विना आक्रोश, वन्धन तथा वध तक
( चुपचाप ) सह लेता है, उस भान्तिवल के सेनानी को मैं
ब्राह्मण कहता हूँ।
७. जो क्रोधरहित है, व्रती है, शीलवान् है, वितृप्ण है और
दान्त है तथा जिसका यह देह अन्तिम है, उसे मै ब्राह्मण
कहता हूँ।
८. जिससे कोई न सहमे इस तरह जो अकर्कश, सार्थक तथा
सत्यवाणी बोलता है, उसे में ब्राह्मण कहता हूँ।
.
९. जो चर तथा अचर प्राणियों के प्रति दण्ड का परित्याग
कर किसीको न ( स्वयं) मारता है, न मारने की प्रेरणा
करता है, उसे में ब्राह्मण कहता
१०. विरोधियों के बीच अविरोधी, दण्डधारियों के बीच
( दण्ड ) रहित तथा परिग्रहियो के बीच जो अपरिग्रही
है, उसे में ब्राह्मण कहता हूँ।

१४०
घम्मपद
९६ शुचिः
११ न जटाहि न गोत्तेन न जच्चा होति ब्राह्मणो।
यम्हि सच्चं च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो।
१२ कि ले जटाहि दुम्मेध कि ते अजिनसाटिया
अन्भन्तरं ते गहनं वाहिरं परिमज्जसि ।
१३ पंसुकूलधरं जन्तुं किसं धमनिसन्यतं
एक वनस्मि झायन्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
१४ न नग्गचरिया न जटा न पडा नानासका थण्डिलसायिका वा
रजोवजल्लं उपकुटिकप्पधानं सोधेन्ति मच्चं अवितिण्णकझं।
१५ अलंकतो चे पि समं चरेय्य सन्तो दन्तो नियतो ब्रह्मचारी
सब्बेसु भूतेसु निधाय दण्डं सो ब्राह्मणो सो समणो स भिक्खु ।
९७ अनादानः
१६ यो'ध दीर्घ वा रस्सं वा अणुं थलं सुभानुभं

१८: ब्राह्मण
१४१
--
९६. शुचिः
११. न जन्म के कारण, न गोत्र के कारण, न जटाधारण के
कारण ही कोई ब्राह्मण होता है। जिसमें सत्य है, जिसमे
धर्म है, वही पवित्र है, और वही ब्राह्मण है।
हे दुर्बुद्धि ! तुम्हारी जटाओं से क्या लाभ ? तुम्हारे मृगचर्म
पहनने से भी क्या लाभ ? तुम्हारा अन्तर तो ( विकारों
से ) भरा है और बाहर को ही तुम धो रहे हो।
?
१३. जो फटे चीथड़ों को धारण करता है, दुबला-पतला है,
जिसके सारे शरीर पर नसों का जाल फैला है, अकेला वन में
ध्यान-मग्न है, ऐसे प्राणी को में ब्राह्मण कहता हूँ।
१४ जिमकी आकांक्षाएं समाप्त नहीं हुई है, उस मनुष्य की शुद्धि न
उसके नग्न रहने से, न जटाधारण से, न पकलेप से, न अनशन
से, न भूमिशयन मे, न धूलिस्नान से और न ही उकडूं बैठने से
हो सकती है।
१५ ( सभ्य वेगभूपा से ) अलकृत रहने पर भी यदि कोई गम
(धर्म ) का आचरण करता है. अर्थात् जो गान्त, दान्त, नियत
ओर ब्रह्मचारी है तथा प्राणिमात्र के प्रति दण्ड का जिसने
परित्याग कर रखा है, वही ब्राह्मण है, वही श्रमण है और
वही भिक्षु ।
९७. अनादान
१६. जो इस लोक में छोटी या बड़ी, हलकी या भारी, भली या बुरी
वस्तु, जो न दी गयी हो, लेता नहीं, अर्थात् जो अनादान है,
उसे मै ब्राह्मण कहता हूँ।

१४२
धम्मपदं
१७ न चाहं ब्राह्मणं दूमि योनिज मत्तिसंभवं
भोवादी नाम सो होति स चे होति सकिंचनो
अकिंचनं अनादानं तमहं यूमि ब्राह्मणं ।
१८ यस्स पुरे च पच्छा च मज्झे च नत्थि किंचन
अकिंचनं अनादानं तमहं ब्रूमि व्राह्मणं ।
१९ यस्सालया न विज्जन्ति अज्ञाय अकथंकथी
अमतोगधं अनुप्पत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
२० यो'मं पळिपथं दुग्गं संसारं मोहमच्चगा
तिण्णो पारगतो झायी अनेजो अकथंकयी
अनुपादाय निबुतो तमहं दूमि ब्राह्मणं ।
९८ अनासक्तः
२१ आसा यस्स न विज्जन्ति अस्मि लोके परम्हि च
निरासयं विसंयुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
२२ यस्स पारं अपारं वा पारापारं न विज्जति
वीतद्दरं विसंयुक्तं तमहं चूमि ब्राह्मणं ।
२३ सम्बसंयोजनं छत्वा यो वे न परितस्सति
सङ्गातिगं विसंयुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।

१८:ब्राह्मण
१४३
१७. केवल ब्राह्मण माता-पिता से जनमे को मै ब्राह्मण नही कहता ।
वह सग्रही है। लोग उसे 'भो' (जी) कहकर पुकारेगे।
( परन्तु वस्तुतः ) जो अकिचन (पूर्व सग्रहरहित ) है और
अनादान ( नवसंग्रह का अकर्ता) है. उसे ही मै ब्राह्मण
कहता हूँ।
१८. न पूर्व, न पश्चात्, न मध्य में भी जिसका कोई परिग्रह है, उस
अकिचन और अनादान पुरुप को मैं ब्राह्मण कहता
१९. जिसे कही तृप्णारूप आलय नहीं है, जो ( तत्त्व ) जानकर
नि.सन्देह हुआ है और जिसने अमृत मे डुबकी लगायी है,
उसे मै ब्राह्मण कहता हूँ।
२०. यह जो ससारका रण मोहरूप दुर्गम विमार्ग है उसे जो पार कर
( परम गन्तव्य को ) पहुँचा है, उस उत्तीर्ण, ध्यानपरायण,
निष्कप, निःसशय और तृष्णा का उपादान छोड़कर निर्वृत
अर्थात् आत्मसतुष्ट हुए पुरुप को मै ब्राह्मण कहता हूँ।
९८. अनासक्तः
२१. जिसे न इस लोक की और न परलोक की ही अभिलापा है,
उस विरक्त और अनासक्त पुरुप को मै ब्राह्मण कहता
2016
२२. जिसे न तो पार है, न अपार है, न पारापार ही है, उस निर्भय
और अनासक्त पुरुप को मै ब्राह्मण कहता हूँ।
( पार = परलोक, अपार = इहलोक, पारापार = लोकपणा)
-
२३. जो सभी बन्धनों को काटकर अकुतोभय ( भयरहित ) हो
जाता है, उस नि.संग और अनासक्त पुरुप को में ब्राह्मण
कहता हूँ।

१४४
धम्मपदं
२४ छत्वा नन्धि वरत्तं च सन्दानं सहनुक्कम
उक्खित्तपळिघं बुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
२५ यो'ध पुञ्जच पापं च उभो सङ्गं उपच्चगा
असोकं विरजं सुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
२६ हित्वा मानुसकं योग दिव्वं योग उपच्चगा
सब्बयोगविसंयुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
२७ यो दुक्खस्स पजानाति इधेव खयमत्तनो
पन्नभारं विसंयुत्तं तमहं दूमि ब्राह्मणं ।
९९ क्षीण-भव:
२८ चन्दं व विमलं सुद्धं विप्पसन्नमनाविलं
नन्दीभवपरिक्खीणं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
२९ यो'ध कामे पहत्वान अनागारो परिव्बजे
कामभवपरिक्खीणं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
३० यो'ध तण्हं पहत्वान अनागारो परिव्बजे
तण्हाभवपरिक्खीणं तमहं यूमि ब्राह्मणं ।

१४५ १८ व्राह्मण २४. जिसने क्रमशः रस्सी, वरत्रा ( चमड़े की रस्सी) और शृंखला ( लोहे की साँकल ) को काटकर खूटे को भी उखाड़ फेका है, उस वुद्ध ( प्रवुद्ध गोतम = जाग्रत् वृषभ ) को मैं ब्राह्मण कहता हूँ। ( रस्सी, वरत्रा, शृखला = अणु-स्थूलवन्धन, खूटा = अविद्या) २५. जो इस जन्म में ही पाप और पुण्य तथा उनकी आसक्ति को पार कर गया, उस विगतशोक, विगतरज और शुद्ध पुरुष को मै ब्राह्मण कहता हूँ। २६. जो मर्त्य-बन्धनों को छोड़ दिव्य बन्धनों को भी छोड़ गया, उस सभी वन्धनो से विमुक्त पुरुप को मैं ब्राह्मण कहता हूँ २७. जो इसी जन्म मे अपने दुःखमात्र का क्षय जान लेता है, उस दुःखभार को उतार फेंक ( सब बन्धनों से ) विमुक्त हुए पुरुष को मैं ब्राह्मण कहता हूँ। ९९. क्षीण-भवः २८. जो चन्द्रमा के समान निर्मल और शुद्ध है, जो अकर्दम ( जलाशय के समान ) प्रसन्न है, उस प्रक्षीण-नन्दीभव ( जिसका नन्दी- भव समाप्त हुआ है ऐसे ) को मै ब्राह्मण कहता हूँ। २९. जो इस जन्म में (सव ) काम-भोगों को छोड़ अनिकेत हो परिव्राजक बन जाता है उस प्रक्षीण-कामभव (जिसका काम- भव समाप्त हो गया है ) को में ब्राह्मण कहता हूँ। ३०. जो इस जन्म मे तृष्णा को छोड़ अनिकेत हो परिव्राजक बन जाता है, उस प्रक्षीण-तृप्णाभव ( जिसका तृष्णाभव समाप्त हो गया है) को मैं ब्राह्मण कहता 2018 १०

१४६
धम्मपदं
३१ असंसठं गहठेहि अनागारहि चूभयं
अनोकसारि अप्पिच्छं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
३२ वारि पोक्खरपत्ते व आरग्गे रिव सासपो
यो न लिम्पति कामेसु तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
३३ यस्स रागो च दोसो च मानो मक्खो च पातितो
सासपोरिव आरग्गा तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
३४ छिन्द सोतं परक्कम्म कामे पनुद ब्राह्मण
संखारानं खयं गत्वा अकता सि ब्राह्मण ।
१०० प्राज. कृतकृत्यग् च
३५ गम्भीरप मेधावि मग्गामग्गस्त कोविदं
उत्तमत्थमनुप्पत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं।
३६ झायि विरजमासीनं कतकिच्चं अनासवं
उत्तमत्थमनुप्पत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
३७ हित्वा रति च अरति च सीतिभूतं निरूपधि
सब्वलोकाभिभं वीरं तमहं वृमि ब्राह्मणं ।

१८:ब्राह्मण १४७ ३१. जिसका गृहस्थों और अगृहस्थों दोनों ही से संसर्ग नही, जो अनिकेत घूमता है तथा जो अल्पेच्छ है ( जिसकी आवश्यकताएं बहुत ही कम है ) उसे में ब्राह्मण कहता हूँ। ३२. कमल-पत्र पर जल और मूई की नोक पर सरसों की भाँति जो भोगों में लिप्त नहीं होता, उसे में ब्राह्मण कहता हूँ। ३३. मूई की नोक पर से सरसों की भाँति जिससे राग-द्वेप, मान और डाह आदि ( अछूते ) छूट गये है, उसे में ब्राह्मण कहता हूँ। ३४. हे ब्राह्मण पराक्रम कर तृप्णा के प्रवाह को काट दो और कामनाओं को खदेड़ दी । हे ब्राह्मण ( कृत ) 'सस्कारों के क्षय को जानकर तुम अकृत-ज हो जाओगे- अकृत निर्वाण का साक्षात्कार पा जाओगे। १००. प्राज्ञः कृतकृत्यश च ३५. जो गम्भीर प्रजावान्, मेधावी, मार्ग-अमार्ग का जाता है तथा उत्तम अर्थ ( =निर्वाण ) को पहुंचा है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। ३६. जो व्यानी, विगत-रज, अनारम्भ ( आसनवद्ध), कृतकृत्य और अनास्रव ( चित्तमलरहित ) है तथा उत्तम अर्थ ( निर्वाण ) को पहुँचा हे, उमे मै ब्राह्मण कहता हूँ। ३७. जो रति-अरति ( उत्माह-अनुत्साह ) को छोड़ शीतल हो चुका है तथा जिसे किसी प्रकार उपाधि-परिग्रह नही है, उस सभी ( स्वर्गादि ) लोकों को पदाक्रान्त करनेवाले वीर को मैं ब्राह्मण कहता हूँ।

१४८
धम्मपदं
३८ चुति यो वेदि सत्तानं उपपत्ति च सब्बसो
असत्तं सुगतं बुद्धं तमहं बृमि ब्राह्मणं ।
३९ यस्स गति न जानन्ति देवा गन्धब्बमानुसा
खीणासवं अरहन्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।
४० उसमें पवरं वीरं महेसि विजिताविनं
अनेजं नहातक बुद्धं तमहं दूमि ब्राह्मणं ।
४१ पुन्बेनिवासं यो वेदि सग्गापायं च पस्सति
अथो जातिक्खयं पत्तो अभिज्ञावोसितो मुनि
सम्बवोसितवोसानं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।

१८: ब्राह्मण
१४९
३८. जो प्राणियों की गति तथा अगति को सम्पूर्ण जानता है, जो
अनासक्त है, जो सुगति को प्राप्त है, उस बुद्ध (जानी )
को मं ब्राह्मण कहता हूँ।
३९. जिसकी गति ( देहपात के अनन्तर की स्थिति ) को न देव,
न गन्धर्व न मनुप्य ही जानते है, उस क्षीणास्रव अर्हत्
( राग आदि रहित ) को मै ब्राह्मण कहता हूँ।
४०. जो ऋपभ, प्रवर, वीर, महपि, अकम्प्य, निष्णात और वुद्ध है,
उसे मै ब्राह्मण कहता हूँ।
४१. जो अपने पूर्वजन्म जानता है, जिसने स्वर्ग और नरक दोनों
गतियाँ देख ली है, जिसका यह ( प्रारब्ध ) जन्म क्षीण हो
चुका है, जो अभिनानिष्ठ है तथा जिसके सारे व्यवसाय
समाप्त हो चुके है, उस ( मौनपरायण ) मुनि को मैं
ब्राह्मण कहता हूँ।
૫૮

" गाथानुक्रम [अंक अध्याय और श्लोक के है । तारा का चिह्न पाठान्तर के लिए दिया है।] अनटिनचिनम्न अकक्कन विभापनि अनवस्गुतचित्तम्म अनिकमावो कानाव अकत मेच्यो दुक्कत ४.२२ १६ २० अक्कोच्छि म अवधि में अनुपुत्रन मेवावी अनूपवादो जनृपघाती अक्कोधन वतवन्त अनेकजानिनमार १३. ? १८.७ अकोधन जिन कोच १५२० अपि दिनु कामेनु अवकोम वधवन्य च १३ ११ अचरित्वा ब्रह्मचनियं अयुजलामो च गनी अप्प पि ने महिन भानमानो अचिर वत 'य कायो अप्पका ते मनुस्मेमु १५.१८ ८.१६ अप्प-मनो अयं गन्यो अञ्ज्ञा हि लाभूपनिमा अट्ठीन नगर कन अपमनो पमनेनु ८१४ अपमादरता होय ९१३ अत्तदत्य पत्थन ६.१६ अप्पमादन्तो भिक्ग्यु अत्तना चोदयत्तान १.१६ अन्धभूनो अय दोको ९ १ " ० ११ १२ ८.१८ अत्तनाव कन पाप अप्पमादेन मववा ६.१८ अप्पमादो अमनपदं अत्तान चे तथा कयिग १३ अप्पलाभो पि चे भिक्षु अत्तान चे पिय जञ्जा ९२१ अय्यम्मुताय पुरिमो अत्तानमेव पठम ६१२ अभये भयदस्मिनो अत्ताह वे जित सेय्यो ७१२ अभिन्यरेथ कल्याणे अत्ता हि अत्तनो नाथो अभिवादनमीलिम्स अभूतवादी निरयं उपेति अत्याम्हि जातम्हि मुखा सहाया २१३ अयसा व मल समुठित अथ पापानि कम्मानि अथव'स्म अगारानि अलकतो चे पि सम चरेय्य ४ २ ७ ५३० ४२५ अयोगे युञ्जमत्तान ४.२६ ११. १ १८१५ गाथानुक्रम १५३ दुन्निग्गहस्स लहुनो दुप्पव्वज्ज दुरभिरम दुल्लभो पुरिसाजो दरगम एकचरं दूरे मन्तो पकासन्ति १८ ४ ध धनपालको नाम कुञ्जरो धम्म चरे मुचरित धम्मपीति सुख सेति धम्मारामो धम्मरतो वीर च पञच बहुस्सुत च न न अत्तहेतु न परस्स हेतु न अन्तलिक्खे न समुदृमज्झे ४१७ ४१८ न ७१५ नत्थि रागसमो अग्गि १२.१७ ३.१८ न नग्गचरिया न जटा १८.१४ न परेस विलोमानि ६१५ ७१७ न पुप्फगन्धो पटिवातमेति २. ७ ३२० न ब्राह्मणस्स पहरेय्य १८. ३ न ब्राह्मणस्सेतदकिंचि न भजे पापके मित्ते ३.१० ९१९ न मुण्डकेन समणो १७१० न मोनेन मुनी होति १७१५ न वाक्करणमत्तेन १५.१६ १६ १५ न वे कदरिया देवलोक वजन्ति २२१ ३ ७ न सन्ति पुत्ता ताणाय १४.२३ न सीलब्बतमत्तेन १०२० न हि एतेहि यानेहि ७.१० हि पाप कत कम्म ४२४ न हि वेरेन वेरानि १. ५ १३ १० निट्ठगतो असन्तासी १२.२४ ९.२० निधाय दण्ड भूतेसु १८. ९ १८.१७ निधीन व पवत्तार ३. ८ ६. २ नेक्ख जम्बोनदस्सेव १८.११ नेत खो सरण खेम १४. ५ ४.२० नेव देवो न गन्धवो ७१३ १२.१९ नो चे लभेथ निपकं सहाय ३. २ ७.२६ प १५.११ पसुकूलधर जन्तुं १८१३ १५१४ पञ्च छिन्दे पञ्च जहे १६ ७ १५१० पटिसन्थारवुत्त्य'स्स १७१३ पठवीसमो नो विरुज्झति १७. ६ १५.१२ पण्डुपलासो व दानि'सि ८. ४ ११ ७ पथव्या एकरज्जन १४.१४ ११३ पमादं अप्पमादेन ६. ४ न कहापणवस्सेन नगर यथा पच्चन्त न चाह ब्राह्मण ब्रूमि न चाहु न च भविस्सति न जटाहि न गोत्तेन न त कम्म कत साधु न त दळह वन्धनमाहु धीरा न त माता पिता कयिरा न तावता धम्मधरो न तेन अरियो होति न तेन थेरो सो होति न तेन पण्डितो होति न तेन भिक्खु सो होति न तेन होति धम्मट्ठो नत्थि झानं अपञस्स नत्थि रागसमो अग्गि ६ १५४ धम्मपदं भद्री पिपमति पापं ११२ ६१८ म ८१२ ९१६ ८११ पमादमनुयुञ्जन्ति परदुक्यपधानेन परवज्जानुपम्मिरस परिजिण्णमिद कप परे च न विजानन्नि पविवेकरम पीत्वा पम्म वित्तकत विस्त्र पाणिम्हि चे वणो नाम पाप । पुग्मिो कविन पापानि परिवति पापो पि पस्तति भद्रं पामोज्जबहुलो निक्यु पियतो जायती मोको पुञ्ज चे पुरिनो कयिंग पुत्ता मत्यि घन म'त्थि पुप्फानि हेव पत्रिनन्तं १७१६ ४.१३ १६.९ १२ २ ५१४ ८. २ मग्गानाङ्गको गेटो मत्तागुमपरिचागा मनु वा माती वालो ८.२३ मनुगन्म पमत्तनाग्निो १२ ८ मनोगकोप ग्यच्य मनोपुचनमा धम्मा १.२ ममेव गत मान्नु मलिलिया दुचरित १० । मातर पिनरं हत्वा १८. १ १८ २ मा पमादमनुयुञ्जय ९.१२ मा पियेहि ममागञ्छि ११.२ माप्प मञ्जेय पापन्न ४.१५ माप्प मञ्जय पुञ्जम्म 6.१६ मा 'वीच फल्स कचि १.२४ मामे मामे कुसन्गेन ५.१५ मासे माम सहस्पेन मित्ने भजम्नु कल्याणे मिद्धी यन होति महग्घसो च ५.३२ मुञ्च पुरे मुञ्च पच्छतो १२१६ मुहुत्तमपि चे विज्ञ मत्ताविहारी यो भिक्षु १६ ८ १८८१ पुबेनिवामं यो वेदि पूजारहे पूजयतो पेमतो जायती मोको १२. २ पोगणमेत अतुल फ फन्दन चपल चित्त फुमामि नेक्सम्ममुख फेणूपम कायमिम विदित्वा ७१४ १०.२१ ८ १ २३० १४. ४ बहु पि चे महित भासमानो बहु वे सरण यन्ति वालसङ्गतचारी हि “वाहितपापो ति ब्राह्मणो य एसा सहती जम्मी १२ ९ य किचि यिट्ठ व हुत व लोके ६.१३ य किचि सिथिल कम्म १७१२ गायानुक्रम १५५ य चे विज्ञ पसंसन्ति य हि किच्च अपविद्ध यतो यतो मम्मसति यथा अगार दुच्छन्न यथा अगार मुच्छन्न यथा दण्डेन गोयालो यथापि पुप्फरासिम्हा यथापि भमरो पुप्फ यथापि मूल अनुपद्दवे दळ्हे यथापि रहदो गम्भीरो यथापि रुचिर पुप्फ १०१५ १६ १ ७१९ ७.२० ८१५ ४. १ १६ १९ १२१२ १५ ४ २३२ २३३ यस्सिन्द्रियानि समथं गतानि १७ ५ यानिमानि अपत्यानि ८.१३ याव हि वनथो न छिज्जति १४ १९ यावजीव पि चे वालो १५. ८ यावदेव अनत्थाय ५१६ ये च खो सम्मदक्खाते १५१९ ये झानपमुता धीरा १३ ७ ये रागरत्तानुपतन्ति सोतं १२२१ येसं च सुसमारता १०१६ येस सनिचयो नत्थि १७ ३ येस सवोधियङ्गमु १०.१९ यो अप्पदुट्ठस्म नरस्म दुस्सति ५ १९ यो इम पळिपथ दुग्ग १८.२० योगा वे जायती भूरि यो च गाथासत भासे २.२८ यो च पुव्वे पमज्जित्वा ४. ३ यो च वुद्ध च धम्म च यो च वन्तकसाव'स्स १६.२१ यो च वस्ससत जन्तु ३१२ यो च वस्ससत जीवे २. १ २ २ ८ ९ यथा बुब्बुलकं परसे यथा सकारवानस्मि यदा द्वयेमु धम्मे यम्हा धम्म विजानेय्य यम्हि सच्च च धम्मो च यस्स अच्चन्तदुम्सील्यं यस कायेन वाचाय यस्स गति न जानन्ति यम्म चेत समुच्छिन्न १३.१२ ११ ८ ३१५ १५१५ १८ ५ १८३९ १११ १५ १७ १२ १३ 0 २. ४ यस्म छत्तिसती सोता यस्स जालिनी विसत्तिका यम्स जित नावजीयति " २५ २ ६ यस्म पापकत कम्म यम्म पार अपार वा यस्य पुरे च पच्छा च यस्म रागो च दोसोच यस्सालया न विज्जन्ति यस्सासवा परिक्खीणा ८. ४ यो च समेति पापानि १८२२ यो चेत सहती म्मि १८.१८ यो दण्डेन अदण्डेसु १८.३३ यो दुवखस्स पजानाति १८१९ १७ ४ यो'ध तण्ह पहत्वान १७११ १२१० ५.२० १८.२७ १८.२९ १८.३० यो'ध कामे पहत्वान १५६ धम्मपदं क . १६. यो'पदीय वा रन्म वा यो ध पुञ्जच पापत्र १३.१८ मन नेगेगि अनाग १२५ १८.२० सचेलभय निपक महाय यो नियनथो वनाधिमत्तो १२.१८ मच्च भने न कुजव्य यो पागमनिपानि मदा जागग्मानानं यो वाली मजति वाग्य १५, गद्धो नालन मपनी ज्यो'म पळिपथं दुग्ग १८०० नन्तनम्न मनं होति यो मुत्रमयतो भिक्षु सन्तकाया गन्तवान्त्री यो वे उपतितं को १.१५ गव्यत्य वे मप्पुग्मिा नजन्ति १५. ', यो महन्म महम्सेन मच्चदानं धम्मदान जिनाति यो मानन अन्हत गव्यपापम्म अकरणं यो ह वे दहरी भिक्षु १६१० मन्यनयोजन छेन्या १८२३ मयमो नामन्पम्मि रनिया जायनी माको सब्बाभिभू मन्दूि 'हमम्मि १३. ३ रमणीयानि अरञानि १७. ९ मच्चे नमन्नि दाटल्म १.२० राजती वा उपन्यगं ५.२२ १.२१ सर्व धम्मा अनत्ता ति १४.१७ वचीपकोपं रखवय्य १०, ८ नब्ध नवाग अनिच्चा ति १४.१५ वजं च बज्जतो जत्वा सच्चे सवारा दुक्खा ति १४१६ वन छिन्दय मा रुकन्य १८.१८ मन्तिानि निहितानित्र १२.१५ वरमम्मतरा दन्ता ७.९ सलामं नातिमनेय्य ११.११ वस्सिका बिय पुप्फानि १६.११ सन्ति मबधी सोता १२.१४ वाचानुग्क्वी मनमा मुमवुतो ११ ५ महन्समपि चे गाथा २.२७ वाणिजो व भय मन्ग ४. ५ सहस्समपि चे वाचा वारिजो व घले खित्तो ७१८ मारं च सारतो जत्वा वारि पोक्वरपत्ते व १८३२ साहु दस्मनमरियान वाहित पापोति ब्राह्मणो १७.१२ मिञ्च भिक्खु इमं नाव १६१२ वितक्कपमथितम्स जन्नुनो १२.२२ सीलदसनसपन्न विनक्कूपसमे च यो रतो १२.२३ मुकरानि अमावूनि ५१२ वीततण्हो अनादानो १२.२५ सुखं याव जरा सील २.१५ वेदनं फम्म जानि सुखकामानि भूतानि १२२ .. to ३ नव-संहिता में प्राचीन गाथा-क्रम १५९ नवमंहिता- नवसहिता- मूल गाथा-क्रम नवमंहिता- कम मृल गाया-क्रम गाधा-क्रम अध्याय ७ ९ २६ ११-१२ ३६५-३६६ अध्याय १२ १-२ १६१-१६२ १६४ - ४ २१२-२१६ ३४२-३४३ ३३४-३४१ ३४८ ६-७ ८-१५ १६ ५ ६-७ ८ १६० ३७९-३८० १४५ ३२२-३२३ १०३-१०५ १०-११ २४-२५ १२ ३२७ १४-१५ ८७-८८ १६ २०५ १७ १८ ३०५ १९ ३२४ २० ३१५ २१ १५७ अध्याय १० १७ १८-२१ २२-२५ २५१ ३४४-३४७ ३४९-३५२ ३५-३७ ९-१० ११-१३ १४ १५-१७ १८ १९-२० २१ २२-२४ २५-२६ अध्याय १३ १-२ १५३-१५४ m- ३ १-२ ८-५ १३-१४ ३२६ ३८-४० ४२-४३ ३ ८-६ १५५-१५६ २३२ २४१-२४३ २३१-२३४ ३६०-३६१ अध्याय ८ ११-१२ १३-१४ १५-१६ १७९-१८० ६ ३८७ ७-८ १८१-१८२ ९ १९३ १०-११ १८६-१८७ १२-१३ ५८-५९ १४ २९६ १५-१९ २९७-३०१ ७-८ २९२-२९३ २२६ १८ ४६-४८ ४-७ २३५-२३८ ८ १४६ ९-१० १७०-१७१ ११-१४ १४७-१५० १५ १३५ १६ ४२ १७-१८ १५१-१५२ ८९ अध्याय १४ २०-२१ २७१-२७२ अध्याय ११ १-३ २०९-२११ २८०-२८२ अध्याय ९ २१-२३ १-३ १८३-१८५ ८-८ १८८-१९२ ९ १९४ १०-१३ २७३-२७६ १८ १७८ १५-१७ २७७-२८९ १८-२४ २८३-२८९ ८ ८-५ ६-८ ३१-३२ २८-३० ३८४ २८९-२५० ९-१० १६० धम्मपदं नवसंहिता- नवमाधिना- नवसंहिता- मूल गाया-त्रम मूल गाथा-मन roma गाथा-क्रम अध्याय १५ ४०१ १७ १६-१८ ३११-३१३ १०. १८ १-६ ७९-८८ ६३-६५ १०-११ २५८-२५९ १२-१३ २५६.२५७ १४-१७ २६०-२६३ १८-१९ ८५-८६ २०-२१ १७४-१७५ ८२१ ४१? ४१४ ४१० अध्याय १७ १-७ १०-११ १२ १३-१६ २६८-२६५ ३८८ अध्याय १६ ३९७-३२८ ८१२ ४१७ ४०२ ४१३ ४१५-४१६ २३ १-३ २६६-२६९ २१८ २८ ८ ३६२ १८ २०-३० ५ ३७८ ६ अध्याय १८ ૨૨ ४०१ ३७० ८ १-२ ३-५ ६-७ २९८-२९५ ३८९-३९१ ३९०-४०० ८०८ ३८१-३८२ ८ ९-१० ११ १२ १३ १४ ३६ ३७-३८ ३८३ ४०३ ३८६ ४१८-४१२ ४२० ४२२-४२३ ३७१ ८०५-४०६ ३९३-३१५ १८१-१४२ ११-१३ १४-१५ ३९ ३७३ ४०.४१

Dhammpanda (nav Sahinta)

Author
Vinoba
Title
Dhammpanda (nav Sahinta)
File name
Dhammpanda (nav Sahinta)
Text
OCR done
Citation
1951
Published
2011/03
Publisher
Varanasi, Sarva Seva Sangh Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
169
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
550712
Barcode
4990010031525.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
2BJLmWEQyOZ
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Dhammpanda (nav Sahinta)