Hindi Sahataya Samalayan
Suman Sanchay
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सुमन-संचय 28 १३८ प्रा. प्रकाशक- DARS नवलकिशोर भरतिया बी. ए. मंत्री, श्रीमारवाड़ी पुस्तकालय, कानपुर ।
श्रो३म् वक्तव्य। कानपुर में होनेवाले अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ो अग्रवाल महासभा के छठवें अधिवेशन के दिनों में स्थानीय मारवाड़ी पुस्तकालय की ओर से एक वृहत् कवि सम्मेलन हुआ। कवि-सम्मेलन के वृहत् आयोजन में श्रीयुत "सनेही" जी ने जिस प्रकार हमारी सहायता की है, उसके लिये हम उनके हृदय से अनुगृहीत हैं। कवि-सम्मेलन की सर्वोत्तम रचनाओं पर पुरस्कार देने का जो निश्चय किया गया था, उसमें श्रीयुत रामेश्वरप्रसादजी वागला ने १०१) और स्वागत-समिति, छठवीं अखिल भारत- वर्षीय मारवाड़ी अग्रवाल महासभा, ने २५१) तथा इस "जुमन-लञ्चय” के प्रकाशन में सहायता देकर जो पुस्तकालय की सहायता की है, उसके लिये पुस्तकालय उनका अनेक प्रकार से ऋणी है। हम अपने उन उदार कवियों के विशेष आभारी हैं, जिन्होंने स्वयं पधार कर तथा अपनी उत्तमोत्तम रचनाएँ भेजकर हमारे कवि-सम्मेलन की सफलता में योग दिया है। , नवत्तकियोर भरतिया।
(२) प्रस्तावना। कानपुर में मारवाड़ी अग्रवाल महासभा के अवसर पर स्थानीय श्रीमारवाड़ी-पुस्तकालय की ओर से एक वृहत् हिन्दी कवि-सम्मेलन किया गया था, जिसमें स्थानीय कवियों के अतिरिक्त बाहर से भी कई सुकवि पधारे थे और कुछ बाहरी सुकवियों ने भी ( जो किसी कारण से न पधार सके थे) अपनी सुन्दर रचनाएँ भेजने की कृपा की थी । सभापति का आसन प्रसिद्ध देश-भक्त हिन्दो-हितैषी श्रीमान् बाबू पुरुषो- त्तमदासजी टण्डन ने सुशोभित किया था। उक्त कवि-सम्मेलन में जो रचनाएँ सुनाई गईं, उनमें से कुछ चुनी हुई कविताएँ इस 'सुमन-सञ्चय' में संगृहीत हैं। संगृहीत कविताओं में से सात सर्वोत्तम कविताओं पर पुरस्कार दिया गया था। पुरस्कार का निर्णय करने के लिए वाबू पुरुषोत्तमदासजी टण्डन, पण्डित रामनरेशजो त्रिपाठी और इन पंक्तियों का लेखक, इन तीन व्यक्तियों की एक कमेटी बनाई गई थी। कमेटो ने सर्व-सम्मति से जिन सुकवियों को पुरस्कार देना निश्चित किया, उनकी सेवा में पुरस्कार समर्पित किया गया । पुरस्कृत कविताएँ इस संग्रह के प्रथम भाग में संगृहीत हैं । शेष कविताओं में से कुछ चुनी हुई कविताएँ दूसरे भाग में रक्खी गई हैं । आशा है कि यह संग्रह पाठकों को रुचिकर होगा।
( ३ )
इस कवि-सम्मेलन की संयोजना का सम्पूर्ण श्रेय
श्रीमारवाड़ी-पुस्तकालय के मन्त्री श्रीमान् सेठ नवलकिशोरजी
भरतिया बी० ए० को है । आप यदि इतने परिश्रम के साथ
इस कवि-सम्मेलन का प्रबन्ध न करते, तो कदाचित् इसको
इतनी सफलता प्राप्त करना दुर्लभ होता । वास्तव में आपका
प्रयत्न प्रशंसनीय है। श्री मारवाड़ी-पुस्तकालय का अनुकरण
करके यदि अन्यान्य संस्थाएँ भी इसी प्रकार काव्य और
साहित्य की चर्चा से जनता का मनोरञ्जन और कवियों को
उत्साहित किया करें, तो देश और समाज को लाभ पहुँच
सकता है।
कानपुर
कार्तिक शुक्ला २
गयाप्रसाद शुक्ल (सनेही)
सम्बत् १९८१
ओ३म्
सुमन-संचय
प्रथम भाग।
शङ्कर तेरा ही तुझे, समझा शुद्ध विवेक,
नाम रूप तू एक ही, अपना रहा अनेक ।
अज की माया है अजा, समझा विश्व विलास,
राधिकेश राधा रमे, शङ्कर यो रच रास ।
शङ्कर अखण्ड एक अक्षर की एकता ने,
स्वाभाविक साधन अनेकता का साधा है।
तारतम्यता के साथ विश्व की बनावट में,
पोल और ठोस का प्रयोग आधा प्राधा है ॥
नाम रूप ज्ञान से क्रिया की कर्म कल्पना से,
नित्य निरुपाधि चिदानन्द में न बाधा है।
सामाधिक
धारणा
में ऐसा
ध्रुध ध्यान है तो,
पुरुष मुकुन्द है प्रकृति प्यारी राधा है ।।
( २ )
अग्रवालों को उत्तेजना।
ध्यान में सद्धर्म धारो, शुद्ध शङ्कर को भजो,
सत्य सत्ता की महत्ता, मानकर मिथ्या तजो।
जाति मात्रा के सपूतो, पाठ पौरुष का पढ़ो,
मारवाड़ी अग्रवालो, मत गिरो, ऊँचे चढ़ो॥
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जाति अहिल्या तारिये, अटका संकट घोर
देखो रामकुमारजी, नामी नबलकिशोर ॥
समस्या पूर्तियाँ।
आन मरदाने की।
समझी शङ्कर भक्ति, खानि सुख पाने की।
रखती जीवन-शक्ति, श्रान मरदाने को ॥
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एक ही तरीके पर शङ्कर किसी को कभी,
आती है
जुहूर
में न हालत ज़माने की।
कोई किसी रङ्ग का है, कोई किसी ढङ्ग का है,
तर्ज एकसी है, न कमाने की, न खाने की ॥
औरतों में गाता है, मटकता मुख़नसों में,
ज़िन्दगी ख़राब ख्वार ख्रिश्ता है ज़नाने की।
( ३ )
हौसले के ज़ोर से उठाता पस्त हिम्मतों को,
मानेगा कहो न कौन अान मरदाने की ॥
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विधि सीखो गुरु गाँधोजी से, भयका भूत भगाने की ।
जीवन जाति देश पै वारो, मान श्रान मरदाने को ॥
जाति में जीवन ज्योति जगाइये ।
'शङ्कर' वैदिक धर्म, धार मत पन्थ विसारो,
मुख्य मान शुभ कर्म, सुमति महिमा विस्तारो।
पुण्य प्रताप प्रसार, पाप को पटक पछाड़ो,
करिये सर्व सुधार, न विधि की बात विगाड़ो।
गुरु अग्रसेन की ख्याति में, हा लघुता न लगाइये,
कुल बीरोमरती जाति में,जीवन-ज्योति जगाइये ॥
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धर ध्यान, भजो प्रभु शङ्कर को,
गुरु-शान गहो, भ्रम-भूत भगाइये।
शुभ कर्म करो, कुल गौरव की,
गठरी ठग-मण्डल को न ठगाइये ॥
सुविचार समुन्नत
कानन में,
अब अागि अधोगति की न लगाइये।
प्रिय वन्धु, प्रमाद बिसार उठो,
बस जाति में जीवन-ज्योति जगाइये।
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पावक-पुज में पङ्कज फूल्यो।
झूमति आयी नवेली भटू जनु,
जोबन हाथी अनङ्ग ने हूल्यौ ।
ठाढ़ी भई मन-भावन के ढिग,
शङ्कर नेह उमङ्ग सो ऊल्यौ।
लाल दुकूल के चूंघट में धन,
को मुख देखि धनी सुधि भूल्यौ।
बौरे की भाँति पुकार उठ्यौ अरे,
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यौ ॥
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में झूल्यौ॥
जो कर प्यार मनोमुखता पर,
मत्त भयो, कुल पद्धति भूल्यौ।
भेद-भरी अनरीति गही झुकि,
मैंभट झाँखर
झाड़
शङ्कर मानव मण्डल सो उठि,
उन्नति के उर पै चढ़ि ऊल्यौ।
बैठो बिगाड़ के बीच सुधार कि,
पावक-पुज में पङ्कज फूल्यौ ॥
ARTee
( ५ )
मन की।
भद्राभास ढोंगने
( बनावटी अगुओं को उपालम्भ )
ढकेलू ढङ्ग ढाँपने को,
लाद ली है लोला लोक लाड़ली लगन की।
अन्ध अगुवाजी अन्धाधुन्धियों की आँधियों से,
धूलि न उड़ानो पिछलगुओं के धन की ।
भोलों को बिगाड़ के उजाड़ में घसीटते हो,
गैल न गहाते हो सुधार के सदन को ।
'शङ्कर' न देखी करतूति कौड़ी भर की भी,
बातें बकते हो बृथा लाख लाख मन की।
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काम किसी चोखी करतूति से चलाना नहीं,
घोषणा घुमाते रहो केवल कथन की ।
खहर न धारो श्राप, औरों को सुनाते रहो,
छूना नहीं चीर भी वलायती बसन की ।
'शङ्कर' सुकर्म-त्यागी भोंगा जाति मण्डल में,
भावना भरो न भगवान के भजन की ।
हिन्दुओं का हाल हीरा छीलना जो इष्ट है तो,
ठूसो शक्ति साहस में सिरस-सुमन की ॥
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( ६ )
(मन के
लड्डू.)
विष्णु भगवान लोक-नायक बैकुण्ठ ही में,
जाँच करते हैं प्यारे भक्तों के भजन की ।
देते हैं दया का दान, न्याय न विसारते हैं,
बाँटते हैं भोग-भाजी भोजन बसन को ।
एक बार सिन्धु-तनया को मुसकान ही में,
सौंप दी कवित्त्व-कला मेरी भी लगन की ।
दूर की दरिद्रता बनाया धनी 'शङ्करः को,
मान गई बात कमला, पति के मन की।
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( अपनी दशा पर)
फोड़े ने पछाड़ा, चार मास लो न डोला फिरा,
संकट ने व्यग्रता बढ़ा दो बूढ़ेपन को ।
छोड़ा शङ्करा ने साथ, शारदा सिधार गई,
राख भी रही न महाविद्या तेरे तन की ।
एक आँख से तो अब दीखता नहीं है आगे,
दूसरी भी त्याग देगी शक्ति चितवन की।
'शङ्कर' को मोह ने मसोसा इसी कारण से,
इच्छा करता है परलोक के गमन की ॥
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'शङ्कर के साथ जल गई चादर भी कफ़न की,
अब दिल में तमन्ना है, न तन को, न वतन की ।
( ७ )
फ़ितरत कफ़स में देखली सैयाद के फ़न की,
बुलबुल
को आरजू है न गुल की न चमन की ॥
उपसंहार ।
पाय प्रकाश न्याय सविता का।
मान कमल फूले कविता का ॥
उमगे रसिक भृङ्ग गुजारें।
चूस भाव-रस प्रेम पसारे ॥
ऐसी छवि कवि-सम्मेलन की।
शक्ति बने 'शङ्कर' के मनकी ॥
नाथूराम शंकर शर्मा, "शंकर"
मन-दीप
भरिए,
जाति में जीवन-ज्योति जगाइए।
कहौ कौनसी गाह परी तुमको,
रुई कातिबे को चरखा न चलाइए।
में नेह नहीं
कवौं उत्तम देस-दसा न बनाइए ॥
सब जाइगो देखो जो होयगो सो,
इंग्लैण्ड सों मोम की बाती मँगाइए।
अरु माचिस लाइकै स्वीडन की,
निज जाति में जीवन-ज्योति जमाइए॥
(
= )
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो।
आजु सिंगारन लागी अली, हरखी लली जानि पिये अनुकूल्यो।
लालही लाल सजे पट भूषन, कौनहूँ लाल सिंगार न भूल्यो॥
रंग महावर से अँग के सँग बिन्दु सिंदूर लिलार यो तूल्यो।
पंकज-पुंज में पावक है, किधौं पावक-पुंज में पंकज फूल्यो॥
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बान चले, किरपान चले, घमसान मच्यो, गुरु लै रथ हूल्यो।
ता विच पारथ-पुत्र लस्यो, मदमत्त मतंग मनौ झुकि भूल्यो।
रक्त बह्यो, तनु रक्त भयो, बिहँस्यो दिप्यो आनन-अोप अतूल्यो।
रुंड पै मुंड, मनौ लहू कुंड में, पावक पुंज में पंकज फूल्यो ।
आन मरदाने की।
अन्धाधुन्ध चलत कमान घमसान बान,
तीछन महान श्रानबान तीर ताने की।
भूमि डगमगत भगत भारे भूरि भट,
भब्भर मचाई जंग जब्बर जमाने की॥
तूरि तूरि तून डारे चूरि चूरि चाप करि,
भूरि भूरि भनत 'अनूप' शान वाने की।
क्रोध की करंडी मान मर्दन की मंडी,
तहाँ नाचै रणचंडी धरे आन मरदाने की ॥ ।
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( 8 )
विशद बड़ाई विश्व बाहिरौ बगरि उठी,
कर्मवीर गाँधी तेरे ठीक ठान ठाने की।
हाहाकार डायो सरकार गोरी गोरन में,
पहुँची विलाइति लौ बानि बिल्लाने की॥
वैर वाँधि विश्व-व्यापिनी दृटानियाँ सों,
ताल ठोकि लडिगे अकेले शक्ति जाने की।
शान हूँ न देखी ऐसी, वान हूँ न देखी ऐसी,
प्रान हूँ न देखी ऐसी प्रान मरदाने की॥
मन की।
बाणन पै बाण के प्रहारन सो क्रोध आयो,
आई बाँकुरे को सुधि बारिधि लँधन की।
लाल मुख और विशाल लाल लाल भयो,
एक लात बैरी के हिये पैजाय हनकी ॥
तुरत फलाँगि लाँधि तुंग तरु मेरु छायो,
तोयो खंड देखौ शक्ति वायु के सुवनकी ।
दैके चोप डंकात्यागि शंका महा बंका बीर,
डारिदीन्हीं लंका पै शिला हज़ार मनकी।
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महकि रही है मंजु महिमा महातमा को,
चहकि रही है चाह सत्याग्रही जन को ।
( १० )
लहकि रही है इतै लालसा स्वतंत्रता की,
टहकि रही है उतै दासता दुखन की।
डहकि रही है डायरों की डहडही डाह,
उहकि रही है धुनि त्यों मशीनगन की।
बहकि रही है बावरी सी बादशाही देखौ,
दहकि रही है दावा दाहन दमन की ॥
सपूत ।
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न लावै,
तात
पापी बाप पावै, ताहि मुक्ति लौं दिखावै नित,
राम नाम ध्यावै प्रहलाद असुरेस सों ।
बारहू
कारज करावे,
चाहै सिन्धु पार धावै महावीर बीर वेस सो॥
जोग अपनावै, कथा सत्य को सुनावै बोले,
ज्ञानी पनि जावै शुकदेव वाचकेस सो।
अग्रनी कहावै, निज चरन पुजावै, सों;
सपूत कहलावै शम्भु-नन्दन गनेस सो ॥
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माता।
किसने सीखा नहीं है माता से,
प्रेम-पयोधि बीच फँस जाना ।
बोलो, किस लाड़ले ने देखा है,
मायका रूठकर बिहँस जाना ?
?
( ११ )
स्वर्ग में, भूमि में, रसातल में,
कौन ऐसा 'अनूप' नाता है ?
क्यों न फिर दिव्य देवता जनमें,
जबकि जगदम्बिका ही माता है ?
किसने उत्पन्न की मही पर हैं,
शान्ति की वायु, क्रान्ति की आँधी?
लोरियाँ मात की बनाती हैं,
बुद्ध, नेपोलियन, लेनिन, गाँधी।
कैसे माता बिना कहो ऐसी,
सृष्टि सौन्दर्यशालिनी बनती ?
कौन भरता त्रिलोक में प्राभा,
जो न प्राची दिनेश को जनती ?
राम से, कृष्ण से अनेकों को,
प्रेम से पालने मुलाये हैं ।
पुण्यशीलाएँ, माएँ, अबलाएँ,
विश्वकी वीर शासिकाएँ हैं ।
बीर-गर्भा के बीर पुत्रों से,
है निवेदन स्वदेश-भ्राता का।
श्रा करे, मातृ-भूमि की रक्षा,
दूध जिसने पिया हो माता का ।
( १२ )
जीवन-प्रभात ।
हँसी हृदय-सर में खिलखिलाकर कली सुमन बारिजात की है।
स्वजाति-प्राची में ब्रह्म-वेला 'अनूप' जीवन प्रभात की है।
विकास-आशा-लता पै बैठी, विराविणी चाह चातकी है।
लिए तरंगें उठी उमँगे, समीर सीरी न प्रात की है।
छिपा कहीं अन्धकार में जा, उलूक सा हास पातकी है।
भविष्य-आकाश देख भाई, रही नहीं रेख रात की
अनूप शर्मा
॥
प्रान मरदाने की।
पर्वत अड़े रहें हज़ारों विघ्न बाधाओं के,
कुछ परवाह नहीं
शत्रु
के सताने की।
सामना करेंगे हम भावना के बल से ही,
मन में बिकलता हमारे नहीं श्राने की।
गावेंगे सुगीत वीरता के हम हिन्दवासी,
कला हमें प्राती है अचूक ही निशाने की।
प्राण चाहे जाचे पर मान रहे भारत का,
शान यही वीरों की, औ आन मरदाने की ॥
जाति में जीवन-ज्योति जगाओ।
ऐक्य प्रचार करो सब जाति में, वैर विरोध को मार भगायो ।
वस्तु विदेशी न लाओ कमो, सब भाँति स्वदेशो से प्रेम लगा।
( १३ )
एक यही परमारथ-स्वारथ, भारत के हित में चित लाभो।
गाश्रो स्वतंत्रता के शुभ गीत, स्वजाति में जीवन-ज्योति जगाश्रो॥
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो।
(ऐतहासिक घटना)
धन्य सती पद्मावती को, शुभ कीर्ति-धुजा जिहि को जग झूल्यो।
सुन्दरता सुनि कै जिहि की, मदमत्त अलादिनको मन भूल्यो।
पाल्यो पवित्र पतिव्रत को प्रण, पावक हू जल के सम तूल्यो।
पैठि लसी सुमुखी तिहि में, जनु पाधक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
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बल तेज घटयो दिनको हटयो घाम,
प्रभाकर पश्चिम जाय के मूल्यो।
अम्बर-डम्बर घेरि लये, रवि,
रूप भयो अब तो सुख भूल्यो ।
भई अब व्योम-प्रमा,
दिशि पश्चिम को मुख पावक तूल्यो।
वामे विराजे दिवामणि यों,
जनु पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
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* अलाउद्दीन खिलजी चित्तौर की रानी पद्मावती के रूप
की प्रशंसा सुनकर उस पर मोहित हुश्रा था।
( १४ )
श्रायो बसन्त समै सुख साज, समाज सबै सुखकाज मो भूल्यो।
कोकिल कुञ्जन गुञ्जन भृङ्ग, सुकुञ्जन कुञ्जन श्रानँद मूल्यो ।
किंशुक-जाल पलासन में, बन में जनु अागि लगी अस तूल्यो।
एक खिल्यो कचनार तहाँ, मनु पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
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राघव लङ्का को जीति चले, तब शंका भई उनको मन भूल्यो।
सीतासती को कुवाक्य कह्यो, शर-तुल्य मनो उनके हिय हूल्यो॥
पावक पैठि परीक्षा दई, प्रखरानल को जल शीतल तूल्यो ।
कञ्जमुखी विलसी सुठि यो, मनु पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
लक्ष्मीधर बाजपेयी
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माता।
रक्षित रख नौ मास उदर में है जन्माती,
पिला पिला कर दूध
प्रेम से
बड़ा
बनाती।
सहती लाखों कष्ट,नहीं किञ्चित घबराती,
ऐसी कोई और कहाँ-किसकी है छाती ?
यह तन साधन मुक्ति का, माता तनकी मूल है।
फल स्वरूप संसार है, माता सुन्दर फूल है ॥
लेकर नीला वस्त्र कभी है नज़र जलाती,
कभी यंत्र तावीज़ युक्त कठुला पहनाती ।
राई लोन उतार दिठौने कभी लगाती,
करती व्रत उपवास, देव-पूजन करवाती।
( १५ .)
बिना किसी से कुछ कहे, करती सब कुछ मौन है ।
रक्षा में इतना सजग, जग में किसका कौन है?
मूंद मूंद कर नेत्र, कौर लेकर फुसलाना,
'लेजा' 'लेजा' प्रेम-सहित कह खीर खिलाना।
मग में आँखें बिछा-बिछा चलना सिखलाना,
मुनुवाँ, लाला, लाल, बत्स कह बलि बलि जाना।
लख कर. ऐसा कौन
जो न मातृ-गुण गा उठे।
किसके मन में प्रेम का सिन्धु नहीं लहरा उठे॥
करती सेवा अतुल, स्वार्थ का लेश नहीं है,
सद्य प्रेम की मूर्ति, वैर विद्वेष नहीं है।
निर्मल अन्तःकरण, दम्भ का
वेश नहीं है,
जहाँ न हो यह पूज्य, जगत में देश नहीं है।
धर्म-शास्त्र में पिता से कहा दस गुना मान है।
माता के ऋण से उऋण कब होती सन्तान है।
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निज छाती पर लिया, जगत में जब हम पाए,
जिसके प्यारे प्राण पवन में प्राण दृढ़ाए।
खाते जिस का अन्न और पीते हैं पानी,
जो 'स्वर्गादपि गरीयसी जाती है मानी।
रखती प्यारी गोद में, जीते मरते क्षेम से।
तन धन जीवन वार दें मातृ-भूमि पर प्रेम से ॥
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( १६ )
होते मनके भाव प्रकट हैं जिसके द्वारा,
जो उन्नति में मातृ-भूमि की, बड़ा सहारा ।
जिसमें करते बात, पिता माता, सुत, दारा,
जिसके बल जप सके नाम ईश्वर का प्यारा ।
पुण्य मातृ-भाषा परम, पूज्य और गुण-गेय
श्रद्धा से विश्वास से बन्दनीय है, ध्येय है
सपूत ।
जन्म की, मृत्यु की जगह जग में,
जन्तु कितने न जन्मते मरते।
है सफल जन्म उन सपूतों का,
जो कि उज्ज्वल हैं मातृ-मुख करते ।
कैद है उम्रकी नहीं कुछ भी,
वृद्ध है या युवा कि बच्चा है।
जो कि दिल से है भक्त माता का,
वीर है, वह सपूत सञ्चा है।
मातृ-वेदी पै सर चढ़ाने में,
हो न जिसका कभी मलिन चेहरा।
बाँधता विश्व है उसी के सर,
यश, सपूती, सुकीर्ति का सेहरा।
गैर से मातृ-भूमि का लुटना,
मौन देखे, जिसे न हो ब्रीडा।
( १७ )
व्यर्थ ही उस कपूत को माँ ने,
जन्म देकर
लही प्रसव-पीड़ा।
हक समझ कर, विनम्र मन होकर,
बन्धु की जो विपद बँटाता है।
लोक में वह सपूत कहला कर,
अन्त में दिव्य धाम पाता
है
क्रूर
जाति में जीवन-ज्योति जगाइए।
प्रालसी निकम्मे बने, न उनींद में,
औंधे पड़े अँगड़ाइए।
रात नहीं है प्रभात हुआ अब,
खोलिए आँखें औ होश में आइए।
जान से माल से बुद्धि बिचार से,
सर्व प्रकार से ज़ोर लगाइए ।
भाँति रहे, जिस भाँति बने निज,
जाति में जीवन-ज्योति जगाइए।
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शुद्ध हृदै को बनाय के दीपक,
पावन प्रेम सनेह
भराइए ।
ऐक्य की ऐंठनि ऐठि कसी,
सुविचार कपास की बाती बनाइए।
( १८ )
साहस त्याग की जाजुलि ज्वाल में,
अलौकिक लौ प्रकटाइए
जागृत ह
इस भाँति जगामग,
जाति में जीवन-ज्योति जगाइए
छ्वाय अलौकिक
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सपूत ह
गाइए देश का राग मनोहर,
मेल का मञ्जु मृदङ्ग बजाइए
जाइए भारत माँ पर वारे,
साँची सपूती दिखाइए
खाइए लाख हृदै पर चोट,
न श्रोट में आनन किन्तु छिपाइए
पाइए नाम महान जहान में,
जाति में जीवन-ज्योति जगाइए
मनकी।
कभी हैं कैंपाती दिल रस्सी का बना के साँप,
कभी मोह-पाश में फँसाती परिजन की
कभी हाथ मारती ईमान और धर्म पर,
मचाकर अन्धाधुन्ध धूम धाम धन की
कभी दिखलाती "बन्धु" प्राशा के ये सब्ज़ बाग,
हर लेती ज्ञान ध्यान सुधि बुधि तन की
( १६ )
कल नहीं पाने देतीं कल पातीं प्रति पल,
भ्रमों में भ्रमाती झूठी भावनाएँ मन की ।
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X
गुरुओं की सी चाल,
सिक्ख सकल हैं चल रहे ।
होगी क्यों न बहाल,
गद्दी फिर रिपु-दमन की ।
लाख दई
पावक-पुंज में पंकज फूल्यो।
'साँच को आँच नहीं' कबहूँ, यह बात
हठी हिरनाकुस भूल्यो ।
दई यमयातना, तौहूँ,
न पूत ने सत्य को त्याग कवूल्यो।
झीखि के होरी में झोंकि दयो, पै;
पसीजि हिये अवलौं अनुकूल्यो।
ज्वालन में प्रहलाद हँसे, मनु;
पावक पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो।
राधावल्लभ "बन्धु"
आन मरदाने की।
चाहे जैसे कष्ट घिरें, फिरें न बदन कभी,
छोड़ते न बीर टेक बीरता के बाने की।
( २० )
पूर्वजों की डींगें मार बेशुमार गाये गुण,
आई अब घड़ियाँ हैं शक्ति प्राज़माने की
आर्य-रक्त शेष है तो जाति, देश-क्लेश मेटो,
भेंटो यश कीर्ति, प्रोट छोड़ के बहाने की
प्रात्म-अभिमान, बंश-शान पर जान देना,
रही है सदा से धान प्रान मरदाने की।
जाति में जीवन-ज्योति जगाइए ।
में
जागृत-तान की गूंज उठी,
उसे लाइए ध्यान कान लगाइए।
निन्दित रूढ़ियाँ छोड़िए छोड़िए,
दिव्य सुरीतियों को अपनाइए।
कीजिए काम बको मत व्यर्थ में,
गौरव की गरिमा न गँवाइए ।
आइए जीवित जोश दिखाइए,
जाति में जीवन-ज्योति जगाइए।
पापक-पुञ्ज में पङ्कज फुल्यो ।
टेक विवेक की छोड़ी नहीं,
गुरु राजसी ठाठ न नेक कवूल्यो।
.
( २१ )
ख़ौफ़ न खायो सतायो गयो बहु,
शान्ति-स्वराज्य को मार्ग न भूल्यो।
गान्धी
गुमान गरीवन को,
गुण-गौरव से मन-दोल में भूल्यो ।
ज्यों ज्यो तप्यो निखस्यो त्यो खस्यो,
मनो पावक पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
मनकी।
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बने लोभ के भक्त अशक्त पड़े,
तजके वर नीति महजन की।
नहीं जाति, स्वदेश का ध्यान ज़रा,
अभिमान भरा मन है सनकी ।
तजो सेठजी स्वार्थ, करो पुरुषार्थ,
रहे तब बात बड़प्पन की।
हँस सेठजी बोले कि नीति यही,
"सुनिए सब की करिए मनकी।"
सपूत ।
( १ )
सीख चुका जो साम्यवाद का मंत्र निराला,
पीकर हुआ प्रमत्त एकता का शुचि प्याला ।
.
( २२ )
सबको भाई समझ हृदय में उन्हें बिठाला,
भेद-भाव के रङ्ग-मञ्च पर परदा डाला।
जिसके सच्चे त्याग से, पाता त्राण अछूत है,
भारत माँ का लाड़ला, सच्चा वही सपूत है।
( २ )
छोड़ चुका आराम, काम करके दिखलाता,
जोड़ चुका जो विश्व-प्रेम से निर्मल नाता ।
अमर नाम कर बना भाग्य का स्वयं विधाता,
पाती मोद महान जुड़ाती छाती माता।
जाति देश की भक्ति में, जिसका दिल मज़बूत है,
भारत माँ का लाडला, सच्चा वही सपूत है।
( ३ )
जो गरीब पर दया दृष्टि करता रहता है,
जाति-तारिणी-तरणि तुल्य बनकर बहता है।
समझ ईश आदेश क्लश हँसकर सहता है,
जिसे लीन कर्त्तव्य शील खुलकर कहता है।
चढ़ा न जिसके शीश पर, धन के मद का भूत है,
भारत माँ का लाड़ला, सच्चा वही सपूत है।
( ४ )
जीवन को उत्सर्ग जाति सेवा पर करता,
मातृ-भूमि का कष्ट प्राण प्रण से है हरता।
( २३ )
सम्मुख आयें विघ्न देखकर उन्हें न डरता,
वीरों का सा तेज भव्य भूतल पर भरता।
जिसके नस नस में भरा साहस शौर्य अकूत है।
भारत माँ का लाडला सच्चा वही सपूत है ।
जीवन-प्रभात ।
जगो।
जीवन का हुआ प्रभात, जगो।
लालिमा डटी, कालिमा कटी, है हटी अविद्या रात,
जीवन का हुआ प्रभात, जगो॥
चाँदनी चैत्र की छिटक चली,
चल उठी बसन्ती वायु भली ।
खुल गई पड़ी थी रुकी गली,
खा रहा हार अब काल छली।
जग उठे जङ्गली तक देखो, अब तुम भी तो हे तात, जगो ।
जीवन का हुआ प्रभात, जगो॥
चिड़ियों का जागृत-गान सुनो,
मोहन की मोहक तान सुनो।
बलि-वेदी का आह्वान सुनो,
माता के कष्ट महान सुनो।
रखलो फिर बात पूर्वजों को, करने को दुःख निपात, जगो।
जीवन का हुआ प्रभात जगो॥
( २४ )
विज्ञान, भानु बन कर चमका,
बिजली में भी सोना दमका ।
खुल गया भाग्य यो उद्यम का,
पर, पर-हाथों में जा धमका।
उड़ रही मलाई उधर, इधर है रूखा सूखा भात, जगो।
जीवन का हुआ प्रभात, जगो॥
करके अब ऊँचा माथ उठो,
कमला का पकड़ो हाथ उठो।
छोड़ो न सत्य का साथ उठो,
गाने को गौरव-गाथ उठो।
सच्चे श्रीमान् कहाकर अब, निज नाम करो विख्यात, जगो।
जीवन का हुआ प्रभात, जगो ॥
अव करो न देर, अवेर, उठो;
फिर नींद न पावे घेर, उठो।
दुर्व्यसनों से मुँह फेर, उठो,
बन करके सच्चे शेर, उठो।
कायर अशक्त का काम नहीं, करके स-शक्त निजगात, जगो।
जीवन का हुओ प्रभात,
जगो॥
द्वारिकाप्रसाद गुप्त "रसिकेन्द्र"
( २५ )
,
माता।
माता कैसा मधुर शब्द है मङ्गल-दाता ।
सुनते ही हिय भव्य भावना से भर जाता।
कोई सच्चा खरा धरा पर है यदि नाता ।
माँ बच्चे का मुझे एक बस है दिखलाता ।
जहाँ न भय है स्वार्थ का, नहीं क्षुद्र छल का उदय ।
करुणालय, शुचि स्नेहमय, वह है माता का हृदय ॥
सुखी देख सन्तान दुःख निज भूल, फूलती।
सुत-पीड़ा में बिकल विश्व की याद भूलती ।
यही मनाती
मातु
व्यथित तनु हो, तो माँ का।
पर हो हे परमेश, लाल का बाल न बाँका ।
स्नान, भजन, पूजन, यजन, दान पुण्य कल्याण-हित ।
करती है सामर्थ सम, पूरे निज अरमान नित ॥
जननी की है गोद अलौकिक मोद-कारिणी ।
जननी की है दृष्टि जाह्नवी-तुल्य तारिणी ।
जननी का है प्यार स्वर्ग-सुख-सार समझलो ।
जननी का उपकार अतुल ऋण-भार समझलो।
माँ के उत्कट त्याग का; साम्य नहीं है सामने ।
माँ के कष्टों का भला बदला कब किससे बने ॥
कैसा भी अपराध वन पड़ा हो सन्तति से।
कितनी भी वह गिरी हुई हो नैतिक गति से।
-
( २६ )
बिरादरी ने उसे भलेही छोड़ दिया हो ।
पिता आदि ने पतित समझ मुख मोड़ लिया हो।
राजा, पंच सभी रहें घोर घृणा चाहे किये ।
फिर भी माँ के अङ्क में, आश्रय है उसके लिये ॥
,
आन मरदाने की।
प्रान-प्रिय देश-काज भयो कुरबान फिरै,
तेरे मन चाह है न वाह वाह पाने की।
प्रेम में दिवाने, तोहिं प्रेमी ही परख जाने,
तोसे ही दिवाने तो हैं जान या ज़माने की।
ठान लीन्हों ठान जो न तासो हट जानो जान्यो,
जानी जीत जातना ज़रूर जेलखाने की।
कौम के सिपाही ! तूने मुक्ति हू न चाही, सब,
छोड़ के निबाही एक श्रान मरदाने की॥
x
X
X
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चारों ओर ज्योंही चक्र चरखा को जोर चल्यो,
धूम मची खद्दर की खपत बढ़ाने की।
काँप उठे कठिन करेजे अँगरेजन के,
देख देख कमी कारबार के खज़ाने की।
कूट राजनीति हू की कलई करारी खुली,
आत्म-तेज आँच लगे साँच में सयाने को।
जान रही जाति की, स्वदेश हू की शान रही,
बान रही बीरता की, पान मरदाने की ॥
( २७ ) जाति में जीवन-ज्योति जगाइये। गाइये गीत अनीत के तो, विपरीत दशा यह भी न भुलाइये। लाइये चित्त उदार विचार, स्वदेश-सुधार में खून खपाइये ॥ पाइयेगा फल मानव जन्म का,मान की आन पै जो मिट जाइये । जाइये जागृति के जुग में जग, जाति में जीवन-ज्योति जगाइये ॥ - पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो । फाग की रैनि रमे कहुँ रौन, रह्यो मन हास विलासनि भूल्यो । प्रात सकात चले घर को, मृदु गातहु नींद झकोरनि झूल्यो॥ लाल के अङ्ग रँगे रचि लाल लखे हिय वाल के शूल सो हूल्यो । गाढ़े गुलाल सो लेस्यो लस्यो मुख, पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो॥ मन की। मनमें थी प्रतीत निबाहेंगे प्रीति, सुनी यही रीति है सजन की । हम जानती थीं तनही तक है, यह श्यामता मोहन के तन की॥ अब कालिमा कृष्ण हृदै की खुली, पहिचानी कला कपटीपन की। हम प्यारी मरै मन से उन पै, वे बिहारी करें अपने मन की ॥ . x x X फिरै वे इनही की फिराक में त्यौही इन्हें न छमा है कहूँ छन की। चरचा वे करें इनके गुन रूप की, ये अरचा जिय के धन की ॥
( २८ )
दोउ दोऊ की चाह के चेरे भये, बलिहारी है मोहनी मोहन की
मिले वे इनको इनके मन के, उनको ये मिली उनके मन को ।
व्रजभूषणलाल त्रिपाठी 'निश्चल'
में
पावक-पुञ्ज
पङ्कज फूल्यो ।
सप्तरथी बहु वीरन ले लियमण्डि गुन्यो समयो अनुकूल्यो।
लाली भरे मुख रोख-मई, झुकी दृष्टि की सृष्टि मनोरथ हूल्यो।
श्रोणित सिक्त रणाङ्गन बीच, रँग्यो रण रङ्ग उमङ्ग अतूल्यो।
'रङ्गजूपाल' लस्यो अभिमन्यु, ज्यों पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो।
x
x
x
x
X
कै रस रुद्र समुद्र के मध्य, विलोकिय उद्ध प्रशुद्ध बबूल्यो,
प्राची दिशाअनुरागिणि भामिनि,भाल सुहाग किधौं अनुकूल्यो।
कैधों प्रभाव रजोगुण के मधि, 'रङ्गजूपाल' प्रतापसु तूल्यो,
भोरको लालिमा मैं लस्यो सूर, कि “पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो।'
माता।
ऊख मैं नाहिं मधूक मैं नाहि, पियूष मैं नाहिं अँगूर मैं नाहीं,
'रङ्गजूपाल' न छोर अँजीर मैं, त्यो मिसिरीहु के चूर मैं नाहीं।
माखन में नहिं दाखन मैं, नहिं दाडिम और खजूर मैं नाही,
जो रस मातु के तू मधि है, वह लाख हजार हुजूर में नाहीं।
बाबू रङ्गनारायणपाल वर्मा ।
द्वितीय भाग।
आन मरदाने की।
पैठे सत्य बल के सहारे स्वत्व संगर में,
जानि राखी जुक्ति जोश जाति में जगाने की।
ध्यान राखी झाँकी जन्म-भूमि मानि प्रान राखी,
बाँको बान राखी है असहयोग बाने को ॥
कर्मवीर गाँधी हद्द बाँधी कुल कान राखी,
तान राखी एकता की चरखा चलाने की ।
जान राखी हिन्द में समान राखी प्रीति-नीति,
शान राखी शूरता की प्रान मरदाने की ॥
x
X
x
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डाखो भारि गरब गनीम को पछायो ऐलो,
बाँधी नई धाक वर वीरता के बाने की ।
रोके जम-नाके जमना के लाल बाँके वीर,
शंका नाहिं कीन्हीं है तनिक जान जाने की ॥
वास्यो है स्वदेश श्री स्वजाति पर घर-बार,
स्वर्ण-धाम कोठरी समुझि जेलखाने की ।
जैसी मरदानगी निबाही है बजाज वीर,
ऐसी मरदानगी न आन मरदाने की ॥
( ३० )
जाति में जीवन-जोति जगाइये।
अबलौं जो ठगे सो ठगे गये श्राप,
कृपा करके अब तो न ठगाइये।
जान को होत जवाल यहै,
मत श्राप विदेश से माल मँगाइये ॥
देश-कलेश बिनाशिबे को,
अब तो भ्रम को तम दूरि भगाइये।
हे कुल-दीपक है जो सनेह तौ,
जाति में जीवन-जोति जगाइये ॥
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो।
कूदि पस्यो दह मो सहमो,
नहीं कालियाफे शिर कालसों मूल्यो।
ठाढ़ो भयो फन पै पग एक सों,
पै हिय माहि त्रिशूल सो हूल्यो।
भारन सौ फुफकारन की,
बड़वानल
सों
जनुना-जल तूल्यो।
यो विष ज्वाल में कान्ह लस्यो मनो,
पावक-पुज
पङ्कज फुल्यो ।
में
x
मुकता निकसे कहूँ घोधन ते,
कहूँ सूम कवीन्द्र कमाल कबूल्यो।
( ३१ )
छिछली जल हीन तलैयन पै,
कही मानल हंस कहूँ अनुकूल्यो ।
रस श्रास पलासन सो करिके,
रंग देखि कहूँ भला भौर है भूल्यो।
कुतिया कहूँ सिंह सपूत जनै,
कहूँ पावक-पुञ्ज
में
पङ्कज फूल्यो॥
मन की।
उरमें बसे पै घरी आई नहीं, उनके उर सो उर लावन की।
भुज भेंटिबे की भरी साधे रहीं, बनी बाधै रही है गुरूजन की।
मन-मोहन पाये नहीं अवलौं, सुधि भूलि गये मनो श्रावन की।
मग हेरती हाय ये आँखें रहीं, मनसे अभिलाखें रहीं मन की ॥
माता।
पोछे तन-धूरि औ अंगौछे अंग अंगन को,
गोद में बिठाय लाय छाती-सुधा दे रही ।
चन्द्र-मुख चूमि चाव चौगुनो चढ़ावै चित्त,
प्रेम बरसावै प्राप्त स्वर्ग सुख कै रही ॥
राज राज होय याको सुयश दराज होय,
शूर सिरताज होय श्राश बीज बैं रही।
भैया कहै, छैया कहै, कुँवर कन्हैया कहै,
घारै लौन रैया औ बलैया मैया ले रही ॥
सनेही।
,
( ३२ )
आन मरदाने की।
त्यागे सुख भोग धन धाम अभिराम त्यागे,
रखली प्रताप ने है शान हिन्दुवाने की।
याद कर पान-बान राम और अर्जुन की,
शिवा ने भुला दी सब तान तुरकाने की।
बाँध के लँगोटी एक गाँधी ने जगत बीच,
साँसत में डाल दी है जान फिरंगाने की।
मेरु टल जाँय पर वीर को टले न पद,
प्रान जाय पै न जाय पान मरदाने की ॥
श्री रामनरेश त्रिपाठी।
(श्री सनेहीजी और रामनरेशजी त्रिपाठी इस सम्मेलन की कविताओं
के निर्णायक थे; अतः इन सज्जनों की रचनायें पुरस्कार के लिये सम्मिलित
नहीं की गई। प्रकाशक)।
प्रान मरदाने की।
बिगड़ी बनाय भाईचारा फैलाइये,
सुरीति परचारिये सुखद सनमाने की।
बाल-व्याह करके न घोटिये गला यो भाई,
उत्तम सगाई अपनाइये सयाने की।
बूढ़न को सादो बरबादी सुकुमारिन की,
छोड़िये निकृष्टि नीति मन-बहलाने की।
कीजिए प्रतिज्ञा, जाति जारही रसातल को,
लाजिए निचाहिये सु-भान मरदाने की।
( ३३ )
जाति में जीवन-ज्योति जगाइये ।
दुख-बाहन पाहन सो बिधवान की,
पाहन में मत प्राग
आग लगाइये।
काल के गाल में पैर दिये इन,
बूढ़न की मत सादी रचाइये।
बाल-विवाह को ताखे धरौ अब,
छोकरियाँ परियाँ न नचाइये।
नाम निसान जु राखे चहौ,
सुतौ जाति में जीवन-ज्योति जगाइये।
पावक-पुंज में पंकज फूल्यो।
१ डोरे न हैं लगी आग है बावरि !
दूरहिं ते जियरा यह हूल्यो ।
हैं बरुनीन न
२ चीकन ये,
चहुँ धूम है ३गाढ़ो उठयो हिय शूल्यो।
४मलमल हाथ रहीं लखि लाखन,
नैनन-पूतरि कंजन तूल्यो ।
प्रनैनन को सुख पाय कहैं सब,
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
१ डोरिया, २ चिकन, ३ गाढ़ा, ४ मलमल, ५ नैनसुख ।
( ३४ )
मन की।
जाति-लतिका की कलियाँन झकझोर तोर,
कीजिये न दूर यो बड़ाई बूढ़ेपन की।
छैल छरकीली परियाँन संग तरिये न,
ध्यान रहे उधर छबीली हू सदन की।
भूल, बात-वीरो! छम छम में न जाइये यों,
निज मरजाद, लाज, बात, तन, धन की।
घोटिये गला न छोकरों के, बाल-व्याह कर,
तनक पसीजिये भी, कीजिये न मनकी ॥
श्री रामनाथलाल 'सुमन' ।
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फुल्यो।
पालनो प्रेम पतिव्रत चाय के साज्यो सिंगार सबै दुख भूल्यो,
गोद में शीश लियो पतिको रच्यो चन्दन चारु चिता अनुकूल्यो।
चाव सो धाय चढ़ी सत पै त्यो बढ्यो तन तेज कृशानु अतूल्यो;
पेखि प्रतापं सती बिहँसी मनो पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
पाल्यो पति-व्रत प्रेम सदा पद पङ्कज को छिनौ ध्यान न भूल्यो,
ताहू पै मोहिं सरोष लख्यो प्रभु जान पखो कछु दोष अतूल्यो।
दिव्य पदाम्बुज राखि हृदै तनु साँच की जाँच को आँच में हूल्यो;
अग्नि की अङ्क में सोहत सीय कि पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
स्वामी नारायणानन्द ।
X
x
X
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जाति में जीवन-ज्योति जगाइये ।
न, अछूत ये छूत कभी भ्रम भूत भरो यह भाव भगाइये।
कै अरज़ी अपनावन की चलि गाँवन गाँवन गाय सुनाइये ॥
लाय लगाय हिये हँसिकै गसिके वर प्रीति की रीति निभाइये।
जो जग अाजु चहौ जस तौ इस जाति में जीवन-ज्योति जगाइये।
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो।
राम खरानन कानन गति, दशानन-अानन बानन हूल्यो।
लै सँग सैन तरे वर-सेतु परे, भ्रम पावनता तिय भूल्यो ।
अग्नि परीक्षहिं में परतै झट, आगि भई मलयागिरि तूल्यो।
प्रोतम प्रेम पगी सुलगी सिप, पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
मन की।
छलि छाँव सी छी लरिकाईं गई, सो भई गति और नई तन की।
अँग अङ्ग अनङ्ग तरङ्ग उठी, भलक लगी ज्योति जुवापन की ॥
चलु छोरु कसे कुच कंचुकि से, तनु जोरु हिये सो हियो हनकी
झनकी झनकी सनकी क्यों फिरौ,न भिरौपरहों करिहौंमनको ॥
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x
x
x
भाई भिरे भाइन सो भूमि एक आँगुर पै,
पागुर सी करे जात बातही मिलन की।
बाप लरिका पैतनौ जोर हू जनावै लौटि,
आँख हो दिखावे पूत गाथै नीच पन की।
( ३६ ) अानहिं भिरावै भान श्रापनि दिखावै सान, होति है अमान ही सलाह चार जन की। हारि में न हारि मानें औरहि अजान जाने, धींग सी मचाई है चढ़ाई मुदमन की ॥ X + X X दीन देश भारत पै दम्भिन मचायो दुन्द, देश-प्रेमिन पै दीठि लागि है दलन की। मय से न भागे मिरे भुज ठोकि आगे पाय, सीनो को अडाय सहि लीन्हीं मारु गनकी। छेदि छेदि छाती को चलनी समान कीन्हीं, दीन्हीं है बताय चाल आपने चलन की। दुष्ट दुराचारिन की नीचताहु गाजै लगो, बाजै लगी द्वार द्वार दुन्दुभी मन की ॥ X x X X भारी मक्कारी सरकारी करमचारी करें, आरी भये नारो नर खूबी देखि फन की। छल से छिनाय छोटि छरीहू न राखी हाथ, कौन कहै बात तोप तलवार गन की॥ ज़ार से जहर से ज़ोर कीन्हें जमाये रङ्ग, ज़्यादती मिटावै कौन जी के जलन की। दुष्ट दुराचारिन की नीचताहु गाजै लगी, बाजै लगी द्वार द्वार दुन्दुभी दमन की ॥ x x x X
( ३७ )
एक ओर दीनता बिचारी कर हाय हाय,
दूजी अोर सैनिकन गोली सनसन की।
कोऊ करै अाह कोऊ कठिन कराह कोऊ,
नेह निरबा के सलामैं साहबन की।
कोऊ रहे जेल भेल कोऊ जान हँसी खेल,
कोऊ बैठे तेल दै दुहाई दासपन की।
दुष्ट दुराचारिन की नीचताहु गाजै लगी,
बाजै लगी द्वार द्वार दुन्दुभी दमन की ॥
X
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x
ज़ाहिर जहान में जवान जौन ज़ोरदार,
जाय जाय जेतू मारु सही ज़ालिमन की।
सीधे सुभाय शान्ति धारे सिक्ख सत्याग्रही
टेक से न टसके न नेक शक्ति सनकी॥
दीन, दरबार पै दिवान पै दिवाने बने,
दाँय दाँय दगी देह गोलियाँ सहन की।
दुष्ट दुराचारिन की नीचताहु गाजै लगी,
बाजै लगी द्वार द्वार दुन्हुभी दमन की ॥
सत्यनारायण 'सत्येन्द्र।
मन की।
कबहूँ मृदुता मकरन्द पिथै, अलिसों रमणी जल जानन की।
कबहूँ बर बीर बन्यो असिलै, बिहरै मुद् सो अब नीरन की ॥
,
( ३८ ) कवहूँ यह राग विराग भरो, भलि भक्त करै चतुरानन की। छिनही छिन में नव रंग रचै गति जानि न जाय छली मन की॥ x x x मंडित अमन्द मणि जटित किरीट शीश, 'सेवक' सुहावै श्रौन शोभा कुंडलन की। झलकै कपोलन पै अलकै प्रकाशमान, आभा तन श्याम हेम भूषण बसन की॥ कोटिन अनङ्ग अङ्ग अङ्ग दुति देख लाऊँ, मन्द मुसक्यान मनोहारिणी सबन की। परम प्रभा की बाँकी दूसरी न ताकी ऐसी, जैसी हम झाँकी झाँकी राधिका रमन की। पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो। राम को भक्त बनो प्रहलाद, निदेश पिता न कयौं अनुकूल्यो। देखि निशाचर क्रोध कियो, न तबौं बिन राम के और कवूल्यो॥ बहु यत्न हताश भयो पुनि, दाहन हेतु दियो हठ तूल्यो। सोहत होलिका अङ्क में यों, मनो पावक-पुज में पङ्कज फूल्यो। X X x x मारि निशाचर रावण को. सुर वृन्द स्वतंत्र कियो दुख भूल्यो। सौपि विभीषण लङ्कपुरी जब गौन बिचार कियो मुद भूल्यो। अङ्क लिये सिय रामहि देनः चल्यो जव अग्नि अनन्द अतूल्यो। छाय-गई सुषमा तव यो, मनो पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो । x x x x
नव यौवन अङ्ग उमङ्ग भरी, मुखचन्द बिलोकि सबै दुख भूल्यो।
वर भूषण अम्बर राजि रहे नखते शिख रूप अनूप अतूल्यो।
उर माणिक-हार विराजरह्यो,तरे मोतिन गुच्छ लग्यो मुद मूल्यो।
लखि'सेवक' भाई मनै उपमा मनो पावक-पुज में पङ्कज फूल्यो ।
.
X
X
X
X
x
मुख-मंजु प्रकाश विलोकि नयो, रजनीश मनोहरता मद भूल्यो।
अंग अंग विभूषण वस्त्र-प्रभा निरखे सरसात मनो भव हूल्यो।
वरवंदन विंदु लिलार लस्यो त्यहि बीच सिताराजड़यो मुदमूल्यो
लखि 'सेवक' भाई मनै उपमा मनो पावक-युद्ध में पङ्कज फूल्यो।
जाति में जीवन-ज्योति जगाइये।
पारस्परिक विरोध दम्भ बाहुल्य हटाओ।
पर-निन्दा, ईरषा, फूट, दुर्मति बिनसांत्रो
प्रेम, ऐक्य, सद्भाव-स्त्रोत चहुँओर बहानो।
सुख-युतसेवाकर स्वदेश 'सेवक' कहलानो॥
उद्योग-अम्बु से सींच नित आशा-लता बढ़ाइये।
जगमग जगत यश जाति में जीवन-ज्योति जगाइये ॥
X
X
खोकर अपना मान, ज्ञान, धन सब कुछ खोकर।
सदियों से खा रही हाय ठोकर पर ठोकर॥
किससे करे पुकार रात दिन रहती रोकर।
नहीं सहारा और रहे फिर किसकी होकर ॥
( ४० )
बढ़कर कारज क्षेत्र में करके कुछ दिखलाइये।
अधःपतित निज जाति में जीवन-ज्योति जगाइये ॥
आन मरदाने की।
जिससे जहाँ पै मिलै बोलै सदा साफ़ बात,
आदत न होवे वृथा जटल उड़ाने की।
'सेवक' समय पाय शत्रु को हटावै पीछे,
स्वप्न में न भूलै याद वीरता के बाने की ॥
देश, जाति, धर्म, दीन-हीन की सुरक्षा कर,
देवे शुभ शिक्षा कर काम दिखलाने की।
शंका मर जाने-मिटजाने की न होय कभी,
शेखी शान मान तभी श्रान मरदाने की।
कविरत्न अयोध्याप्रसाद 'सेवक'।
तुम को।
रो रो कर तेरे चरणों का आँखों से अभिषेक किया।
रुदन किसी का, हृदय किसी का, दोनोंका व्यतिरेक किया।
द्रवित प्रणय के कम्पित स्वर में अपना तेरा एक किया।
तुम रो पड़े हृदय के भूले जादू ने अविवेक किया।
अंचल से आँखें मत पोछो, हृदय बुझा यह लेने दो।
दुखिया के रोते आँसू से, अपने चरण भिगोने दो ॥
( ४१ )
1
आँसू !
हाय ! देखते तुम्हें बताओ, क्या से क्या होजाता है।
दर्शनकर हँसना था, सो यह रोना क्यों आजाता है ?
बहुत
रोकता हूँ पर ज्वार भला क्या रोका जाता है ?
तुम्हें देखने हृदय चीरकर दिखलाने आ जाता है।
आह ! व्यर्थ तुम रोते हो मैं मिट्टी में मिल जाऊँगा।
चरण चूमने को ये मोती, हाय! कहाँ फिर पाऊँगा ॥
श्री रामनाथलाल 'सुमनः ।
,
माता।
है वसुधा की सिद्धि, अष्ट नव निधि की खानी।
सत्य-शक्ति, प्रत्यक्ष ज्योति, लक्ष्मी, वरदानी ॥
देवी, शान्ति-स्वरूप, वत्स-वत्सल, सुखदानी।
सरल, सत्य, सन्तोषशील, शालिनि, कल्यानी ॥
यो 'दिनेश' अखिलेश सों, श्रेष्ठ मातु सन्मान है।
सर्वोपरि संसार में, जननी जन्मस्थान है ॥१
गर्भ राखि नव मास, तासु गति क्या होती है ?
पाती कष्ट अपार, नहीं फिर भी रोती है !
सूखे सुतन सुलाय, स्वयं गीले सोती है।
नाक, थूक, मल, मूत्र, हाथ अपने धोती है।
लालन-पालन, स्वास्थ्य-हित, करती बहु उपचार है।
सन्तति-सख लखि, भूलि दुख, होजाती बलिहार है ॥२
( ४२ )
करती कुल गृह काज, बना भोजन देती है।
प्राती यदि आपत्ति, उसे निज शिर लेती है।
सदाचार, व्यवहार, नीति, शिक्षा जेती है।
सिखलाती कर प्रेम, यही उसकी खेती है
सन्तति अच्छी या बुरी, सब पर प्रीति समान है।
ऐसी माता से कभी, नहीं उऋण सन्तान है ॥३
१
मन की।
चित चाट चढ़ी अँगरेज़ी पढ़ी,
कुल-कानि कढ़ी गुरु लोगन की।
नहिं काबू में बाबू रहे अपने,
सपने में लगी लव लन्दन की ॥
नव फैशन नित्य 'दिनेश' रचें,
बरबादी करें धन की, जन की ।
धिक ! मूंछ श्रौ यूँछ बिहाय,
भले बनिजात हैं मानुस ते मनकी।
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नहिं विश्व-विधान कौं पलट,
परमान रहै सब बातन की।
पर, शायर होत सपूत बड़े,
परवा न करें बिधि-बधन की।
दरसावे 'दिनेश' नए रंग ये,
जिमि 'पावक पङ्कज फूलन की।
(४३ )
भगवानहुँ भूलि रहे भ्रम में,
लखि चाल कविन्दन के मनकी ।।
जाति में जीवन-ज्योति जगाइये।
गाइये गीत सदा हरि के,
उर प्रेम दया, समता उपजाइये।
जाइये भूलि कुपंथ कबौं नहिं,
कामऽरु क्रोध न चित्तहिं लाइये ॥
लाइये दम्भ न द्वेष, दिनेश',
न मोह बृथा मन में तम छाइये ।
छाइये शान्ति सु-शिक्षा कला,
मनु-जाति में जीवन-ज्योति जगाइये।
X
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x
बकवाद वृथा दल बाँधि,
दलीलन सो नहिं द्वन्द मचाइये।
चाहौ न नाम करौ बस काम,
गुलाम कहाय कलङ्क न लाइये ॥
मेटौ 'दिनेश' स्वदेश कलेश,
ये वेष विभीषण को न बनाइये ।
आपस में करि प्रेम सखे !
निज जाति में जीवन-ज्योति जगाइये ॥
admnatakomala
( ४४ ) पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो । दीन्यो सिखापन लाखन भाँति, तऊ प्रहलाद न रामहिं भूल्यो। कोप्यो तबै हिरनाकुश यो, हठि ताहि जलावन को जिय ऊल्यो॥ जानत ना बिधना गति मूढ़ 'दिनेश' परे भ्रम फंकन झूल्यो। किञ्चित गात न तात भयो, मनो पावक-पुज पङ्कज फूल्यो॥ आयो बसन्त खिले किंशुक, कुंजन भो जनु भाग बबूल्यो। मोहन गोपिन को सँग लै तहँ, खेलि रहे लुकि आँख मिचूल्यो। राधे दुरी तेहि बीच 'दिनेश' मुखाकृति हेरि हियो हरि भूल्यो। ताछिन वा छवि छाजति यो मनो पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो । में X X x X x आन मरदाने की। वैभव बढ़ाने की न चाह वित्त पाने की न, मौज ही उड़ाने की न भ्रान्ति मरजाने की। कामना कहाने की न झूठ बतराने की न, खाने -कण्ठ कामिनी लगाने की ॥ दासता नशाने की 'दिनेश' नेति राखै सदा, श्राने की न मानै गैर बात निगराने की। दीनन बचाने की अछूतन उठाने की सो, टेक एक राखै जाति आन मरदाने की ॥ माल लूट X X x x X गर्हित गुलामी की निशानी ठीक जानो इसे, विषयीपने की बुरी बात बबुझाने की। +
( ४५ )
सभ्यता नशानी जाति दोग़ली बनाती देश,
गौरव गँवातो पूँकि सम्पति खज़ाने की ॥
नकली 'दिनेश' नाहिं असली समान होत,
रहती सदा ही उच्च शान सच बाने की।
वक से सयाने पै न जाने बुद्धि खोई कहाँ,
बनते ज़नाने बोरि श्रान मरदाने की ॥
श्री सूर्यप्रसाद पाण्डेय ।
प्रान मरदाने की।
शान रहे, ध्यान रहे मान के बचाइबे को,
बिसरि न जाय तात बात हठ ठाने की,
ताने की न तान किसी भाँति परै कान-बीच,
वान परै चाहे रन वीच मर जाने की।
बड़ी बड़ी बातें सिखलाने की न घड़ी रही,
घड़ी सामने है खड़ी काम दिखलाने की,
शान रहे बाने की कमान बान ताने बिना,
जान दीजै जान पैन श्रान मरदाने की ॥
में
पङ्कज फूल्यो।
पावक-पुञ्ज
कहिये कुल कण्टक की न कथा,
लहिये न व्यथा यदि है वह भूल्यो।
निज देश को वेश को भूलि कलेश,
उठाइ विदेशिन के कर झूल्यो।
( ४६ )
यहिते शुभ प्रास न कीजै कळू,
जिसने निज हाथ छुरी हिय हूल्यो।
कहुँ ऊल्यो सियार न सागर को,
नहिं पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
जाति में जीवन-ज्योति जगाइये।
प्रीति प्रतीति परस्पर रीति सों,
कीजै, अनीति की भीति भगाइये।
गोरे के कोरे प्रलोभन में मत,
आइये, नाहक नाहिं ठगाइये।
देश के क्लश में क्लेश अशेष,
उठाइये प्रान की बाजी लगाइये।
गौरव गीत के गाइये माति के,
जाति में जीवन-ज्योति जगाइये ॥
मन की।
रन में यश पावतो लोहा नहीं,
सहत्यो जुन चोट घनी धन की।
विजयी बनिबो है जिसे उसको,
रहती कुछ श्राश नहीं तन की ॥
नहिं रञ्चक चित्त में चिन्ता रहे,
धमकी न कळू गुनिये गन की।
ननि दुर्जन के फन में फसिये,
कहिये करिये अपने मन की ॥
श्री रामचरित उपाध्याय ।
( ४७ )
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो।
लाई चितेरिन लाड़ली की छबि,
साँवरो देखत ही छबि भूल्यो।
त्यो लट में लटु है लटक्यो मन,
झूम झुमार झवान में मूल्यो।
कै तिल की तुलना "अभिराम"
तिल्यौनतिलोतमा को तिल तूल्यो।
इन्दु से प्रानन बिन्दु लस्यो,
मनो पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो॥
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कान की दुति छीन भई,
दरस्यो जब अंग अनंग अतूल्यो।
इंगुर रंग भरे सब, गात लखे-
जल-जात लजात समूल्यो।
लाल सुरङ्गरँगी चुनरी "अभिराम,"
धरी तन पै इमि तूल्यो ।
पङ्कज-पुज में पावक है किधौं,
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
( ४ )
मन की।
बातन सकात, सकुचात, अनखात बीर,
मुरि मुसकात दुति जगत बदनकी ।
चौकि चौंकि परत मुरैलिन के बैन सुनि,
नैन मतवारे सुरा घटके हैं मदन की।
हँसि हँसि हेरत उरोजन को भोज निज,
छबि छहरात छिति छोरन बसन की।
पौढ़त सकात फूल-सेज पै सलोनी बाल,
गड़ि जनि जाँय गात पाखुरी सुमनकी ॥
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X
X
x
x
x
श्राजु चलौ किन वा बन में, जहँ बाजत बाँसुरी मोहनको ।
कूजत कीर कपोत अली, वर बेलि छई जहाँ कुंजनकी ॥
गुंजत मोदभरी अबली सर सोहत बीच मलिन्दन की।
मानिन मानहि छोड़ तहाँ चलु पूर्ण है पास सबै मन की ॥
जाति में जीवन ज्योति जगाइये।
भव सिन्धु अगाध परो तरनी,
करनी हमरी हे हरी बिसहराइये।
गरुए गर ए बड़े वोझ लदे,
हाए हरुए हरि हाथ लगाइये ॥
(४६ )
अब जीरन जन्म सिरानोई जात,
हिरानोईधीरज जातधराइये।
मन मोहन आइये आइये प्राश्ये,
जाति में जीवन-ज्योति जगाइये ॥
x
x
X
x
हो धनिको के कुमार सभी,
अपने कर्तव्य में ध्यान तो लाइये।
हो कुचले जो कुरीतियों से,
तो सुरीतियों से उसे दूर भगाइये।
धारये चित्त स्वदेश की भक्ति,
सदा यो विदेसिन सोन ठगाइये।
जागिये जागिये जीवण प्राण औ,
जाति में जीवन-ज्योति जगाइये ॥
आन मरदाने की।
कोऊ मन चाव चित्त चोपि के उमंग चढ्यो,
मनि लाल माल, भाल कुटुंब खज़ाने की।
कोऊ नित अमित अनन्द अनुराग रोयो,
त्योंही 'अभिराम' धुनि कविता बनाने की।
खाने औ कमाने में दिवाने रहें कोऊ कोऊ,
ताने तलवार तेज तीर बरसाने की।
( ५० )
ताने फिरै भृकुटी कमाने इतराने फिरें,
फिरत जनाने धरे प्रान मरदाने की।
जीवन प्रभात
लखिये खग-नेता सभी चहके,
कुछ और ही भाव सा व्यक्त हुश्रा ।
जन-प्रेमी हुए हैं-स्वतंत्रता के,
तम-दासता है असमर्थ हुआ ।
निज स्वत्व सरोरुह पै "अभिराम"
है भारत भौरसा भक्त हुआ।
इस जीवन-प्रात में व्योम-भविष्य,
बहे बिना रक्त के रक्त हुआ ॥
माता।
नभ में, महि में औ रसातल में,
कहौ कौन है ऐसा अलौकिक नाता।
सब हैं इसके ही प्रताप सो पूजित,
विश्व में शम्भु, रमेश, विधाता।
यदि होती नहीं जननी जगमें,
हमें प्रेम को पाठ कहो को पढ़ाता।
मुक्ति से भी है महीयसी जो,
स्वर्गादपि पूज्य गरीयसी माता ॥
( ५१ ).
सपूत ।
है जिसने चला धर्म का मारग,
सार उसी ने है विश्व में पाया।
जो कर्तव्य विचारि चला,
छल-छन्द के बन्धन में नहीं आया।
परमेश्वर को,
उसने अपना परमार्थ बनाया।
मात, पिता पद जो अनुरक्त,
सोई प्रभु-भक सपूत कहाया ॥
अभिराम।
भाया वही
जीवन-प्रभात ।
सूरों की सुन्दर छबि में भी, छिपा हुआ है मेरा भास ।
कवि-कुल-कमल-कली खिलती है, पाकर मेरा ही निश्वास ।
नेतागण को हृदय-लता है, लहराती मेरे आधार ।
"लेनिन" "गोखले' की मेघा में, मेरा ही रग रग संचार ।
"तिलक" तिलक जो हुए देशके, यह सब मेरा ही उपकार ।
"कर्मचन्द' के वीर कर्म हैं, सुरभित मेरी ही जलधार ।
अर्जुन, कर्ण, भीम के मनमें, मैंने ही उपजाया ज्ञान ।
शङ्कर, वुद्ध शिष्य थे मेरे, मैं ही हूँ सब जीवन-जान ।
सुखी जीव को भी जब आती, सुखमय मेरो याद-बहार ।
"
( ५२ )
नेत्र सजल हो जाते आँसू, सहसा बह जाते दो चार ।
स्वेत स्याम दृग वारिद घनमें, छिपा हुआ है मेरा चन्द ।
रंजित करता निखिल विश्व को, आभा-मय मेरा आनन्द ।
ललित लता लौं ललनाओं की, लहराती सुषमामय लाज ।
रसिक जनों के हग चकोर का, मैं ही बिन्दुहीन द्विजराज ।
बालक की भोली बोली में छिपा हुआ है मेरा गान ।
बिन कारन की हरित हँसी में, मेरी ही सुन्दर मुस्कान ।
मेरी सलिल दिव्य सुरसरि में, जिसने किया सुधा-रस पान ।
मेरे तट पर पाकर जिसने, ब्रह्मचर्य का गाया गान ।
जिसने सुख-सीमा में रहकर, मेरा किया भला सन्मान ।
निश्चय करके जानो इसको, वेही हुए जगत-विद्वान ।
मृतप्राय भारत में मैंही, करके मलयानिल संचार।
ऐसे निष्ठुर शिशिर-कालमें, कर दूंगा ऋतु-राज-बहार ।
मेरे बचनं सुनोनव युवको, मुझसे करो सदा तुम प्यार।
मैं कृतज्ञ हूँ जगमें सबका, करता रहा सत्य उपकार ॥
आन मरदाने की।
* शान्ति-शोर मरु बाजै, सैनिक हैं मोतीलाल,
श्रान पै अड़े हैं, नहीं भीति जान जाने की।
* "शान्ति शान्ति" यह शब्द जो उठ रहा है, यही मरु
बाजा है, लड़ाई का प्रोजस्वी वाद्य है।
( ५३ )
न्याय औ अन्याय जग, जारी है महान जुद्ध,
निर्भर है भाग यापै हिन्द-हिन्दुभाने की।
जालिम जुलुम के जराये, जुरि जान देंगे,
जायेगी तो जाये जान, जैसे परवाने की ।
लावेगी जवानी रंग भारत के ज्वानन की,
जावेगी न जङ्ग बीच, श्रान मरदाने की ॥
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+
+
x
भारत के भैया हरि, ताप के हरैया सुनो,
वूड़त कन्हैया देखो, नैया हिन्दुश्राने की।
केवट खेवैया कोऊ, चतुर चपैल नाहीं,
राखो बल धैया नीति, प्रीति दरसाने की ॥
है के चकचूर टूटि "रोडिंग'-चट्टान तट,
चूडिवे को लाज-नाव, भारत घराने की।
भारत के बीर सव, गैया यदुरैया भये,
बाँसुरी बजैया राखो, आन मरदाने को ॥
मनकी।
देखि के चिबुक-बिन्दु, इन्दु-बिन्दु लाजमाने,
नीलम जड़ी है मानो, प्रान-मूल-धन को । *
धावै चंचरीक बार बार चंचरीको जानि,
मैन की अनोखी गढ़ी, खान बाँकपनको॥
* यह नीलम इतने धनकी है कि इसका मूल्य प्राण है
( ५४ ) गरल की गोली यह, गोली सम प्रान लेत, चेतना चुराय के, चलावे चाह वनको । मौ पै कहि नेकु नहिं, आवे ए "दिगम्बर' जू, विन्दु की निकाई हर, लेत जान मन की। X X X X स्वेत श्याम मंजुल, मजेजदार मीनकेत-मीत सोहैं, सुन्दर, सुघर छवि घनकी प्रेम-मतवाली प्राली झूले ये निराली झूल, भूमि भूमि रीम, नहिं चित्त चाह धनकी॥ चञ्चल ये नेन जो चुरावें चित्त-वित्त चुप्प, खेले खेल भूले हमें, भूखी नहीं कनकी । रिद्धि-सिद्ध-पूरी, सुख-सान मगरूरी रूरी, * भूखी हैं "दिगम्बर" तो भूखी तेरे मनकी ॥ x X X X देखि के कुरंग रंगहीन श्री कुरंग नैन, तेरे हैं सुरंग, ताते राह लीन बनको । देखि द्विजराजि बीजरक्तबीज-राजि खीझी, नासा लखि कीर, गति लीन्हीं तरु-तन की ॥ विद्रुम ललाई देखि, बास पारावार कीन्हों, देखि दुति इन्दु भाग्यो, सौध पैगगन की। * रूरी-अच्छी -बीजरक्त-अनार
( ५५ )
धन्य है तिहारो मुख राधिके सुजान प्यारी,
विद्रुम, कुरंग, कीर हार दीन्हीं मन की।
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
विरहागि कि ताप तपी अबला,
मन ख्याल नयो यक आयके मूल्यो ।
बिन धूम पलास-अँगार लगे,
किन जाय उतै नहिं प्रान को भूल्यो॥
सुख-व्याकुल धाय चढ़ी तरु पै,
कहि हा विधिना हम पै अनुकूल्यो।
हम बाल पलासन बीच लखो,
मनु पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
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X
x
x
जव भेंट धरी सरजा करमैं,
कहि व्यंग दिलीपति त्यौ मद मुल्यो ।
"बटमार फँसे तुम आज भले,
अव दच्छिन दच्छिन है अनकूल्यो॥"
सुनि साह को बैन जत्यो सरजा,
मुख मंगलरूप भयो, सुधि भूल्यो।
अँखियाँ दरसी तेहि औसर पै,
मनु पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
X
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x
x
दई,
( ५६ )
जु लाल गुलालन मूठि
अंगिया रँग मैं मिलि कै रंग हूल्यो।
चली चहुँधा पिचकारिन धार,
भयो सब लालहि लाल दुकूल्यो ।
दुकूलन लाल अबीरन सो,
तव ज्वालन-जाल महा अनुकूल्यो।
गुलालन लाल लसैं प्रिय गाल,
सु-पावक-पुञ्ज
पङ्कज फूल्यो ।
गुरुप्रसाद पाण्डेय "दिगम्बर"
में
मनकी।
सुधा-धारा धारा सतत सुख सारा भुवन
की
रमा रामा दामा परम प्रतिमा श्याम-घन की।
जगजाला-माला विन-हित ज्वाला जलन को।
हरो बाधा राधा जननि, जन आराध्य मनकी ॥
x
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x
x
x
प्राणनाथ आयो हरषायो मन मोर आली,
साली सुख सेज पै वियोग ज्वाल तनकी ।
कहत कहानी आधी रैन यो सिरानी जानी,
ठानी मान लीला नाह नेह-रति-रनकी॥
भूल भई मोसो मुख मोरि रंग रावटी में,
पिय समझायो अंक लायो मैं न सनकी ।
( ५७ )
प्राय परी बीच ही सवति-मुख लाल किये प्राची,
मन में ही रही मेरे हाय मनकी॥
प्रान मरदाने की।
हिन्द-बीर सीरे ना परहु रण-खेत माहिं,
बीरता निवाहो पुण्य पूरब ज़माने की।
ईश को पुकारो हिय खोलि के विचारो, प्राज,
कैसी है फ़ज़ीहत ये हिन्दु हिन्दुनाने की॥
डील निज हेरि हेरि, पौरुष प्रबल टेरि,
विधन बिदारिये न बात घबराने की।
एहो शूर, नाम पै पड़ी जो धूर धोश्रो आज,
राखो नय संगर में श्रान मरदाने की ।
जाति में जीवन-ज्योति जगाइये।
सोचि सुधार करो अब बालक बूढ़ेन को न बिवाह कराइये।
शुद्ध सुभाइन भाइन को भटक पटक निज राह लगाइये ॥
बालक वीर-व्रती निकसैं पढ़िकै चटशाल स्वतंत्र बनाइये।
वालन हूँपढ़वाय चलो निज जाति में जीवन-ज्योति जगाइये ॥
पावक-पुञ्ज
में पङ्कज फूल्यो ।
नीच नारधम की दमनागिनि दाहन हिन्द-हित अनुकूल्यो ।
हा ! सहयोगिन की समिधैं लखिकै लपटें लपक लट खोल्यो॥
( ५८ )
जारि सकी नजरें जरिही जरि चौगुन चाव चढ़यो चित मूल्यो।
मोहन-मारग के मधु सो मिलि पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
जीवन-प्रभात ।
हिन्द भव्य भाग्य-भानु विपद-निशा को नाशि,
ऊगे भुज-बल की उद्घाटी रंग राची में।
चिरिया सी चिन्ता जागे जग को जगावन में,
फूले हित-कंज-पुज
मजु मन याची में॥
दौरि दौरि भक्त-भीर-भृङ्ग गुन गान करें,
सुयश-सुसौरभ उड़ाय महि-माची में।
देखो स्वर्ण-रङ्ग सो लिखी है पढ़ लीजे, इस;
जीवन-प्रभात की प्रभाती श्राश-प्राची में।
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फल्यो।
मोहन के विरहा-दुख राधहिं,
नेक सुहाय न, है सब भूल्यो ।
देखत फूल पलास निकुंजन,
चौगुन शोक हिये बिच शूल्यो ।
सोचि हुतासन श्रासन देन की,
जाय धंसी तिन ज्वालन तूल्यो।
सोहत है मुख लाल लतानन,
पावक-पुज
में
पङ्कज फूल्यो॥
( ५६ )
होतहि भोर गये बन कुँजन में,
श्याम श्री श्यामा समै अनुकूल्यो।
थो अरुणोदय काल,
सरोबर को-
जल लाल ह आगि से तूल्यो ।
ताहि समै यक अंबुज पुष्प,
गयो गह गाह चितै मन भूल्यो।
मोहन राधे अनोखो लखावत,
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
"
जाति में जीवन-ज्योति जगाइये ।
कायर, कूर, कपूत कुनाम,
न कोही कहाय कलंक कमाइये ।
सीध सुभायन साँच सनेहन,
शिक्षित के सु-समाज सजाइये ॥
बीर-व्रती ब्रह्मचारि विवेकी है,
बुद्धि को वीर्य बलिष्ठ बनाइये ।
जाहिर है जगमें जस जीति के,
जाति में जीवन-ज्योति जगाइये ॥
x
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X
x
x
जाहिर राउर को जस है जग.
कालम कागद के न रंगाइये।
लेक्चर भारि भराभर मंच पै,
कोरी गपाशप नाहिं सुनाइये ॥
( ६० )
छोड़ि अडम्बर श्री दल बंदिन
कर्म की राह पै प्रा डट जाइये।
जीवन को बलिदान के देश पै,
जाति में जीवन ज्योति जगाइये ॥
मन की।
आड़ स्वदेशी विदेशो को कामकै थैली है
खूब
भरी धनकी,
जेलन जाय सड़े हैं सुपूत पै, नाक पै माछी नहीं भनकी।
लोलुप स्वारथि नीच बने अति खींची है खाल गरीबन की,
घातक देश के गीदड़ नेतन खूब करी अपने मनकी ॥
.
आन मरदाने की।
वीर धन्य गाँधी तुम धन्य मातृ सेवक हो,
लाज हाथ तेरे हिन्दुवाने हिन्दुभाने की ।
धीर वीन पाई उच्च पदवी जहान में है.
भागि अब ऐसी काहु प्रानकी न आने की ॥
मातु भई आपकी लीडरी में स्वतंत्र जो न,
आगेहू स्वतंत्रता न पाने की न पाने की।
भोग कष्ट बार बार त्यागी बनि देश-भक्त,
श्राप राख लीन्ही शान प्रान मरदाने की॥
कालीचरण अग्निहोत्री "तरंगी'।
पान मरदाने की। दुःख में न श्राह लेश, सुख में न वाह वाह, उर में न चाह, उच्च पदवी के पाने की। जीवन है रौरव-सा जिसे आत्म-गौरव बिनु, कामना है केवल शौर्य सौरभ सरसाने की॥ अन्याय परन माथ, जिसका कादीनताके साथ, लाज है उसी के हाथ, बीरता के बाने की। जावे भले ही जान, शान हो सुरक्षित पै, मान पर मरजाना ही, है प्रान मरदाने की ॥ उसका जाति में जीवन-ज्योति जगाइये। जिस जननी ने जन्म दिया है, मान बढ़ाइये। हो सपूत तुम माँ को, गौरव- गिरि श्रासीन बनाइये ॥ तन, मन, धन सर्वस्व समर्पण, जननी पर कर जाइये। सम्प्रति है म्रियमाण जाति में, जीवन-ज्योति जगाइये॥
( ६२ )
में
पावक-पुञ्ज
पङ्कज फूल्यो।
देख प्रचण्ड प्रदीप्त कृशानु,
हिये हरषान्यो अति भय भूल्यो।
आसन मार के बैठ हुताशन,
माँहि गयो हरि ध्यान में झूल्यो ।
दाहक तेज भयो श्रीखण्ड,
समान सुशीतल भक्त न शूल्यो ।
इमि राजत भे प्रहलाद तहाँ,
जनु पावक-पुज में पङ्कज फूल्यो ।
मन की।
समर्पण देश पर है तो,
सफलता जान-जीवन की।
मिटाता दुःख दुखियों के,
हैमहिमा धन्य उसधनकी॥
जो करता तृप्त तृषकों को,
प्रशंसा है उसी धन की ।
जो आई चित्त में समता,
तो ममता सार्थक मन की ॥
( ६३ )
सपूत।
कहिये उसे सपूत, मातृ-हित जो करता है।
जीता माँ के लिये, मातृ-हित जो मरता है ।
जो जननी हित लगे, शीश सन्मुख धरता है।
वही वंश को तार, स्वयं सुख से तरता है ।
ऐसे वीर सपूत का, माता को अभिमान है।
उस का ही जग सदा, होता गौरव-गान है॥
में
माता।
जिसने देकर जन्म, मुझे जगमाँहि जिलाया।
जिसने पय के साथ, मुझे प्रभु-प्रेम पिलाया ॥
जिसने लेकर मुझे, मोद से गोद खिलाया ।
जिसने देकर शक्ति, शक्ति से मुझे मिलाया ॥
जो मेरे शिशुकाल में, प्राणों की त्राता रही।
सुख दुख की झाती रही, जीवन की दाता रही।
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x
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जो मम दुख से दुखित, सुखी सुख से रहती है।
मेरे सुख के लिये, स्वयं जो दुख सहती है ॥
हीरा मुझको अहा, हृदय का जो कहती है।
जो नित मेरे प्रेम, प्रबाहों में बहती है॥
जिप्तको मुझसा लाड़ला, क्या धरणी में अन्य है।
जननी जग में धन्य है, जननी-जीवन धन्य है।
( ६४ )
मृदु पलना में सदा, झुलाती थी जो मुझको।
गाकर मीठे गीत, सुलाती थी जो मुझको ॥
लल्ला कहकर निकट बुलाती थी जो मुझको।
कभी निमिष भर नहीं भुलाती थी जो मुझको ॥
वह माता का प्यार क्या, भूला जा सकता कभी।
स्वर्ग और अपवर्ग-सुख, जहाँ निछावर हैं सभी॥
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मिल सकता क्या मूल्य, कहीं माँ की ममता का।
देखोगे तुम कहाँ, प्यार माँ की समता का॥
जो है सुत के लिये, स्त्रोत सम्पति क्षमता का।
जो विघ्नों के लिये, दुर्ग है. दुर्गमता का ॥
भावी जीवन के लिये, जो उन्नति का द्वार है।
माँ की शिक्षा के बिना, मानव जीवन भार है॥
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जितने गौरव पात्र, बिचारोगे तुम भू पर।
जननी का सन्मान लखोगे सब के ऊपर ॥
सर्वेश्वर भी मुग्ध हुआ जिसकी करणी पर ।
माता सा है कौन मान-भाजन धरणी पर ॥
करती जो सन्तान को, कीरति-पथ में अग्रणी ।
कौन नहीं है विश्व में माता के ऋण का ऋणी ॥
X
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( ६५ )
धराधाम में धन्य पुत्र, जो पय माता का,
नहीं लजाता कभी, भगाता भय माता का ॥
रखता जो सन्मान सदा अक्षय माता का।
वही वीर सत्पुत्र है अमृत-मय माता का ॥
ऐसेही घर
माता का उद्धार है।
उसका ही संसार में, स्वागत सौ सौ बार है ॥
पुत्र से,
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X
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है शतशः धिकार, जगत में उसका जीना।
शूकर, श्वान समान बिचरना
खाना-पीना ॥
बहा न शोणित, जहाँ मातृ का गिरा पसीना ।
हुश्रा पुत्र क्यों, अगर पुत्र का धर्म न चीन्हा ॥
बन्ध्या रहना है भला, ऐसे बंश कुठार से।
तड़प न पड़ता जो हृदय, माता के अपकार से ॥
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X
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पाया जिससे जन्म, निरन्तर मान उसी का।
बर्द्धित करना और धारना ध्यान उसी का ॥
गाना तुम अभिमान-सहित गुण-गान उसी का।
जिससे ऊँचे उठे, करो उत्थान उसी का ॥
तन, मन, धन से मातृ का, जो दुख हरना जानते ।
वही विश्व में वास्तविक, जीना-मरना जानते ॥
( ६६ )
जीवन-प्रभात।
जीवन प्रभात तेरा, स्वागत है आश्रो ! श्राश्रो !
अाशा-प्रकाश : लाओ, नैराश्य तम नशाम्रो ॥
बन्धन में दासता के, जकड़ा हुआ ये भारत ।
सदियों से सो रहा है, अबतो इसे जगाओ॥
काली निशा पतन की, कहदो सिरा चुकी है।
प्राची दिशा में लाली, उत्थान की दिखाओ ॥
फैला था तम जहाँ अब, आलोक दिख रहा है।
भारत से हे उलूको, अन्यत्र भाग जात्रो॥
कोकिल के इस चमन में, कौए बसे हुए थे ।
कमनीय कूक इस में, कल कण्ठ को सुनायो॥
प्यारे प्रभात तुझ बिन, पङ्कज मुँदे हुए थे।
सत्वर स्वराज्य सर में, मानस कमल खिलायो॥
दुर्गन्ध दासता की, है व्याप्त हिन्दभर में।
सुरभित स्वतन्त्र सुख-कर, पावन पवन बहाश्रो ॥
तेरे शुभागमन से, मिल जा नवीन जीवन ।
संदेश सम्य युग का, देकर हमें उठाओ ॥
शोभाराम 'धेनु-सेवक
( ६७ )
आन मरदाने की।
राना श्री प्रतापसिंह
उदैपुर भूप भए,
बादशाह की न मानी राखी हिन्दुवाने की।
साऊँ के समीप जाय 'भूषण' प्रकाश कियो,
भाई की न भाई बात औरँग जनाने की,
"तिलक" तिलक राखी "लाजपत" पत राखी,
"अलीबंधु" राख लई शौकत ज़माने की ॥
गांधी कर्मचन्द की सुगंधि 'शारदा' महान,
प्रान की न राखी राखी आन मरदाने की ॥
जाति में जीवन-ज्योति जगाइये ।
दुर्लभ मानुष का तन पाय वृथा जनि 'शारद' वैस गमाइये।
दीनन ते नित नेह करो जगदीश्वर पाहिं सनेह लगाइये ॥
कान करो अपने कुल की कहुँ भूलेहु दुष्टन संग न जाइये
देश-भलाई सदाई रहै जिय जाति में जीवन-ज्योति जगाइये ॥
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
नैनन में, मन में, तन में निस-बासर राम को नामहि मूल्यो।
त्रास दई हिरनाकुश ने प्रभु को सपनेहु न 'शारद' भूल्यो॥
( ६८ )
बारि बहायो गिरायो गिरेन्द्र से अस्त्रहु शस्त्रहु तात न गूल्यो।
होलिका लै प्रहलाद जरी पर पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो।
मन की।
जानत हो कछु प्राण कढ़े फिर क्या गति हो अपने तन की।
तेल फुलेल में बूड़े रहौ पर बात न पूछत हौ जन की ॥
जो भल चाही करौ उपकार जनावहु ना धमकी धन की।
मानहु सीख गुरू-गण की न करौ नितही अपने मन की॥
माता-सपूत।
अज्ञा जानि पितु की सहर्ष बनबासी बने,
प्रोण-प्यारी जानकी को संग लिये धीर सों।
राज को न मोह कौनौ साज कान छोह चित्त,
सत्य धर्मधारी जुटो कौनहू न तीर सो ॥
साथ में लखनलाल कीन्ह्यो सेवकाई हेत,
गाय बच्छ को बिलग कीन्ह्यो नैन-नीर सो।
'शारद' सुमित्रा सी न होनी माता शातादाता,
होनो ना सपूत रामचन्द्र रघुबीर सो ॥
शारद "रसेन्द्र"
( ६६ )
उद्बोधन।
उठो जागो भारत सन्तान ।
फैला दो इस अखिल विश्व में, सत्य सँदेश महान् ॥
हिंसा अत्याचार मिटा दो दो अपना बलिदान ।
सत्य-प्रेम को विजय-पताका फहरादो मतिमान ॥
पर न हरो स्वातन्त्र्य किसी का करो नहीं अपमान ।
हरो जगत की तमोवृत्तियाँ करो प्रेम का दान ॥
माङ्गल-मार्ग तुम्हारे में हाँ जो डाले चट्टान ।
बरसावें पत्थर मस्तक पर सहो न होश्रो म्लान ॥
बाधक का पर बुरा न चाहो रोग ग्रस्त पहचान ।
यही मनायो भूतमात्र का भला करें भगवान् ॥
बढ़ते चलो सदा सत्पथ पर रुको न पलक प्रमान ।
करो बाधाएँ पकड़ो सत्य सरल बलवान ॥
जड़ से खोदो पाप-राज्य को मेटो नाम-निशान ।
मनुज मात्र मिल करो एक सँग राम-राज्य अाह्वान ॥
विश्व-व्यापिनी शान्ति बिराजे सुखमय सकल जहान् ।
प्रेम-सूत्र से बाँध विश्व नित करे प्रेम का गान ॥
हनुमानप्रसाद पोद्दार
जाति में जीवन-ज्योति जगाइए।
तन, मन, धन सब लगा, जाति का मान बढ़ावें।
हिल मिल कर दिल खोल, सभी अनरीति घटावें ॥
( ७० )
छल बल खल-दल. त्यागि, स्वार्थमय भाव भगावें।
क्रोध लोभ मद् छोड़, किसी को नहीं सतावें ॥
पूर्व-प्रेम-रवि किरण से, फूट फसाद हटाइये।
'हरमुख' अब तो जाति में, जीवन-ज्योति जगाइये ॥
आन मरदाने की।
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कठोरता नसाने में, कायरता भगाने में,
है प्रेम के ख़ज़ाने में, प्राश यश पाने की।
रोक ढंग जमाने में, सुजनपन जताने में,
ज़रूरत ज़माने में, दया दिखलाने की ॥
कुरीतियाँ हटाने में, नियमों के निभाने में,
है फूट के मिटाने में, बात हरखाने की।
आत्म-बल बढ़ाने में, स्वदेश के उठाने में,
है जाति के जगाने में, श्रान मरदाने की ॥
मन की
मुख
के सब दाँत गये यमलोक कहा यमसे सुनिये जनकी
तजके हमको बधु की धुनमें धुनते सरको हैं वृद्ध ज्यों सनकी ।
रमणी वसुधा पर सार हुई सुध भूल रहे तनको धनकी ।
अब शासन ठीक करो जग में नर वे करते अपने मनकी॥
(७१ )
निवेदन।
जाति-हित हो जाओ बलिदान ।
तन मन धन न्योछ वर कर कर, त्याग लोभ अभिमान ॥ जाति.
अग्रसेन के बंशज मिल सब, करो जाति-उत्थान ।
अपनी मर्यादा मत तोड़ो. अग्रवाल सन्तान ॥ जाति०
बाल वृद्ध बेजोड़ व्याह से, होता है अपमान ।
दूर करो दुख कन्याओं का, गो-सम उनको जान ॥ जाति०
गन्दे गावे गीत नारियाँ, तज कुल की प्रिय आन ।
ललनात्रों को शिक्षित करदो, करतब को पहचान ॥ जाति०
नये नये नित नियम बना फिर, बन जाते अनजान ।
जनता छीः छीः करती तो भी, अपनी धुनका ध्यान ॥ जाति०
अब तो चेत करो प्रिय भाई ! छोड़ फूट अज्ञान ।
'हरमुख' सदाचार पालन से, बढ़े देश में मान ॥ जाति०
कला-कुशल व्यापार निपुण बन, सीखो हितकर शान ।
जिससे हो उपकार जाति का, भारत हो धनवान ॥ जाति०
सोना भी जब सुन्दर लगता, सहता ताप महान ।
क्लेश सहो पर प्रेम-भाव से, बढ़ो शीघ्र श्रीमान् ॥ जाति.
मातृभूमि के बनो उपासक, सेवा सुख की खान ॥
करो न कुछ परवाह किसी की, राखें टेक भगवान् । जाति०
हरमुखराय छावरिया
( ७२ )
मनकी।
हृदयेश अर्जी अभिलाख रही,
सुनिबे तुम्हरे मृदुबैनन की।
कुल-कान तजी, कुल-शन तजी,
अरु आन तजी गुरु लोगन की।
प्रिय चातकी प्यासी हूँराउरानन,
पानिय पीयुष पीवन की।
हमरीहु सुनौ तजि जीवननाथ,
करौ जनि यो अपने मनकी ॥
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो ।
प्रेमिन के मन रंजन कंजन,
खंजन मान जिन्हें लखि भूल्यो।
कानन लौ बिहरॆ ।मृगनैन,
कटीले हृदेश लगे हिय हूल्यो ।
सार सुधा बसुधा को समेटि,
रच्यो विधिने मुखहू अनुकूल्यो।
सौहै गुलाबी से बूंघट के बिच,
पावक-पुञ्ज में पङ्कज फूल्यो॥
पाण्डेय हृदयनारायण शर्मा "हृद