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Daulatram Bhajansangrah

Jain, Lala Jainy Lal · 2009/11

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-- श्रीगीतरागायनमः। लाला जैनीलाल जैन मालिक जैनीलाल मेशीन प्रिंटिंगप्रेस के 'श्रीजैनसिद्धान्त प्रकाशक कार्यालयसहारनपुरकेचपेग्रंधोंकासंचित ॥ सूचीपत्र॥ नोट-१ हमारीचपी एक साथकी पांच प्रति मंगानेवालोंको पांच के मूल्य में : और १० में १३ व १५ में २० व २५ मे ३५ और ५० में १५ और २०० ने २००और मिलाकर १०३) में २८०) रुपकी मंजेगे सब खर्च ग्राहक के जिस्म होगा। नोट-२ इनके मिवाय अन्य जगह के छपे हुए ग्रंथ हमारे पास हर समय विकृयार्थ रहते हैं। - . २) (11) ॥ 1 । अपने छपेजेन ग्रंथ होली की कथा श्रीतन्हहीपपूजन पाट विधान श्रीपद्मपुराणजी भाषानचनिका ६). गिरनार और पावागिर पूजा श्रीपांडवपुराण चौपाई चन्द m) भापापूनासंग्रह भादौपाट श्रीपार्श्व पुराण चौपाई व.र सप्तऋषी पूजन श्रीनाराधनासार कथा कोष महान गनु जयगिरि पूजन गुटका संग्रह ३॥) मंगनराय भजनमान नई यशोधरचरित्र ५ २) चामतसिंह भजनमाला शीलस्थामापा भागमल जीकृत ) मभूविलास दर्शनकथा भारामलनी कुन !) भजन पचामा अान् नन्हे- चारद न कथा लाल भजन मंग्रह निशिभोजन त्याग कथा बड़ी बालक भजन मंग्रह निशिभोजन न्याग कथा छोटी ज्यांनी प्रमाद भजनमाला राजाश्रेणक व चलना चन्त्रि त.वनी कत्ताखान का फोटु श्रीकरकुण्डस्वामी का कम भाष उपदेशपचीमी पुकार पचीसी 41 सकट हरण दुखहरण बीनती सेठ सुदर्शनकथा वीवोपी श्राखाडा श्री अकलकदेवी कथा ४) दारह खडो सुरत -- D RRRRAwar - चौपाई बन्द h -) j ॥विषय पत्र ॥ - पदों की मांचली पद संख्या: अपनी शुध भूल अपआप दुख गयो ज्यों शुक नभ चाल विसरि अब म मेरा वे सीवचन सुनिमेरा ( जकड़ी) अरिरनरहसिहननप्रभु अरहन जयवन्तो नगमें २१ अहो नमि जिनप नित नमत शतमुरपकंदर्पगनदर्पनाशन प्रचलपनलपन ४३ अहो नमि प्रभुकी श्यामवरन छवि नयननि छाय रही ०४२ अरेनिया जग धोखेकी टाटी पा ४० में ४६ प्रानगिरराज निहारा धनभाग हमारा গাল परम पदारथ पायो प्रभूचरनन चित में लायो मानमरूप अनूपम अद्भुत याहि लखे भवसिंधुतरो आप भ्रमनिनाश प्रापश्रापजान पायो,करणधृतसुवर्स जिमचितार आपा नहिं जाना तू तो कैसा ज्ञान धारी रे ६७ ६८ . ५८ 90 उरग स्वर्ग नरईश शीस निस मातपत्र त्रिघरे, कुन्दकुशुम समचरमर ऐ ऐसा मोही क्यों न अधोगति जावै नाको जैन बैन न मुहावै ऐसा योगी क्यों न अभयपद पाये सो फेरे न भवमे आवै ग्रो और सवै जगद्वंदमिटानो लो लावो जिन अागम ओरी और अबैन कृदेव सुहावै जिन थाके चरननरति बोरी कवधा मिलमोहि श्रीगुरुमुनिवर करि हैं. भवदधिपारा हो फुथनिकै प्रतिपाल कुंथजगतार सार गुणधारक हैं कुमति कुमारिन है. भलीरे सुमति नारि सुन्दर गुणवाली ७१ १२. १२ ७३ ~ - (ख) 4A पदों की चिली पद मंग्य ग १४ 1 . ७५ । ८२ .. गुरु कहत सीख इम बाम्बार विषसप विपयनको टारटार : थ घड़ी घड़ी पलपल छिन निशिदिन प्रभुनीका समरन कर लेरे च चलि सखि देखन नाभिराय घर नाचत हरि-नटवा ३० चन्द्रानन जिन चन्द्रनाथ के चरन चतुरचित ध्यावन है ११ चितचिंतके घिदेश कच अशोष परचम, दुखदासपारविधिदुचारकी ६३ चिदराय गुण मुनो सुनो प्रशस्त गुरुगिरा, समस्त तन विभाव हो चिन्मरत दृग्धारीकीमोहिं रीवि लगत है अटापटी चेतन कौन अनीति गहीरे, मानै न सुगुर काहीरे चेतन तें योही भ्रम ठान्योज्यो मृग मृगतृष्णाजल जान्यो ७६ चेतन यह बुधि कौन सयानी कही सगुरुहित सीख न मानी चेतनश्रव धरि सहज समाधी जाते यह विनशै भवव्यापी छ. छाड़त क्यों नहींरे है नर-रीत अयानी वारवार सिखा देत सुगुरु यह १०६ छाइदे या या बुध भोरी वृथा तन से रति जोरी ५१ ७६ । •95 99 co ७ - जगदानन्द जिन अभिनन्दन पदअरविंद नमू मैं नेरे जयतें आनन्दजननि दृष्टि परी माई, तबतै संशय बिमोह भर्मता विलाई जमान अचानक दाबेगा जय ज़िन वासुपूज्य शिवरमएर रमन मदन दनुवारन है जय श्रीवीर जिनेन्द्र चन्द्र शत इंद्रबध जगतारं जय श्रीवीर जिन बीर जिन वीर मिनचन्द, कलुषनिकन्द पनि हुद जयशिवकामिनिकंतवीर भगवंत अनन्त सुखांकर हैं जायत क्यो नही रे हे नर आतमज्ञानी. १०५ १२ १६ १९७ १५ an . . 1 । १ । N पद संख्य - -- (गे) पदों को प्रांचली जिन छवि तेरी यह धन जगतारन भिन छवि लसत या युधि भई मिनवानी मान मुजानरें जिन बैनमुनव मोरी मूलभगी निनराग दोष टारा वह शतगुर है दगारा निनवर माननभान निहारत भ्रप तमाम नशाया है जीन नू अनाविहीत भूल्योशिवगैलवा ८४ १०४, २५ - ३ ६५. त १९९५ - 80 तुम मुनियो श्रीजिननाथ अरज इक मेरी जी तू काहेको करत रति तनमें, यह अहितमूल जिमकारासदन त्रिभुवन आनन्दकारी जिनदवि थारी नैननिहारो तोहि समझायो सौ सी यार. ३७ ६०२ थ धारा तो बैनामें सरधान घणो छै म्हारे छवि निरखतहियसरसाव ho ३५ दोठा भागनसै जिनपाला मोह नाशनेवाला देखोजी यादीश्वर स्वामी कैसा ध्यान लगाया है .... २ ध <? ६२ - धन धन साधर्मीजन मिलनकी घरी परसत भ्रमताप हरन ज्ञानधन झरी धन मुनि निज प्रातपहित कीना भव असार तन अशुचि विषय विष Tee धनि मुनि जिनकी लगी लौ शिव ओरने धनि मुनि जिन यह भाव पिछाना ध्यान कृपान पानगहि नांशी सट प्रकृति परीशेप-पचासी. T:': न , नं मानत यह जिय निपट अनारी सीख देत सुगुरु हितकारी नाथ मोहि तारत क्यों ना क्या तकसीर हमारी ३२ २

--------------
(छ)
४६
पदों की भाचली
पद संख्या
है जिन तेरे में शरण आया, तुम हो परम दयाल जगतगुरु में भव भवदुख २२
हे जिन तेरो सुजस उजागर गावत हैं मुनिजन ज्ञानी
हे जिन मेरी एसी बुधि कीजे
हे नर भ्रम नींद क्यों न छाड़त दुखदोई, सोपत चिरकाल सोज आप११३
हेमन तेरी को बटेव यह करनविषय में धावै है
हितांछक मानीरे कर यह रीति सयानी
११२
हो तुम त्रिभुवनतारी हो जिनजी, मो भवजलधि क्यों न तारत हो
हो सुम शठ अविचारी जियग, जिनष पाय-वृथा खोवत हो
४
क
ज्ञ
ज्ञानी जीव निवार भरमतम वस्तुस्वरूप विचारत ऐसे
झानी ऐसी होली मचाई०
नोट-भूलसे नम्बर ८६-८७- भजनों पर लगाना रहगया है।
६३
१२०
o
-
-

भीगीतगायनमः ॥दोलनशल भजनसंग्रह। मालाचा मनुति दोहा मकलज्ञेय ज्ञायक तदपि. निजानंद स्मलीन । मोजिनेन्द्र जयवंतनित, अरिजन्हम विहीन !! परिजन जय वीतराग विज्ञानपूर । जय मोहनिमिरको हरणमुर ।। जय ज्ञान अनंतानंत धार । गमुखबीरज मंडिन गणरा जय परमशांनि मुद्रा ममेन । भदिजनको निन्न अनुभूति हेन । भवि भागनवशजोंगे शाय। तुम धुनिहे मुनिविभ्रम नसाय।।३।। तुम गुणचिनननिजपविवेक । प्रघटें विघटे प्रापद अनेक ॥ तुम जगभूपण दूपणवियुक्त । मुव महिमायुक्त विकल्पमुन्न।।४।। अविरुद्ध, शुद्ध चेतन स्वरूप । परमात्म परमपावन धनृप । शुभअशुभविभावग्रभावकीन । म्यामायिकपरणनिमय अचान।५। अष्टादशदीप विमुक्त धीर । सुचतुष्टयमय भजत गंभीर ।। मुनिगणरादि सेवन महन्त । नव केवल जमिग्मा धान ।। तुम शासन मेय अभेय जीव । शिव गये जाहिज मदीव ।। भवसागरमें दुग्प क्षारवारि । नाग्नको और नथाप टारि ॥ ७॥ यहलखनिजदुबगदाहरणकाजा तुम ही निमित्त कारण इलाज । जाने, नाने में शरण प्राय । उबगें निज दुम्ब जो विग्नहाय में भ्रम्यों अपनपोवियर श्राय अपनाये विधिफल पुण्यपाप ।।

--- २ दौलतरोम भजन संग्रह। निजको परको करता पिछान । परमें अनिष्टता इष्ट ठगेन 18'। पाकुलित भयो अज्ञान धार । ज्यों मृग मृगतृष्णा जानवार ।। तनपरणति में आपो चितार । कबहूंन अनुभयो स्वपद सार १० तुमकोविन जाने जो कलेश । पाये सो तुम जानत जिनेश ॥ पशुनारक नस्सुरगति मझार । भव घर घर मखो अनंतवार ११॥ अब काल लब्धिवलतदयाल । तुमदर्शनपाय भयो खुशाल । मनशांत भयो मिट सकलद्वन्द । चाख्योस्वातमरसदुखनिकंद १९२ तातें अब ऐसी करहु नाथ । विछुरैन कभी तुव चरणसाथ ।। तुम गुणगणको नहि छेव देव । जगतारन को तुम विरद एव ।१३। बातमके अहित विषयकषाय । इनमें मेरी परणति न जाय ॥ मैं रहाँ आपमें आप लीन । सो करो होहु ज्यों निजाधीन १५ मेरे न चाह कछु और ईश । रत्नत्रयनिघि दीजे मुनीश ।। मुझ कारजके कारन सु श्राप । शिव करहु हरहु मम मोहताप १५ शशिशांति करनतपहरन हेत । स्वमेव तथा तुम कुशल पीवत पियूष ज्यों रोग जाय । सोतुमअनुभवतेंभवनसाय।।११॥ त्रिभुवन तिहुंकालमझार कोय। नहिंतुमचिन निजसुखदायहोय ।। मोउर-यह निश्चय भयो आज । दुखजलघिउतारन तुमजहाज १७ दोहा। तुम गुणगणमणि गणपती, गणत न पावहिं पार । 'दौल' स्वल्पमति किम कहै, नमों त्रियोग संभार ॥१८॥ देखोजी आदीश्वर स्वामी, कैसा ध्यान लगायो है। कर ऊपरिकर 'सुभग विराजे, श्रासन थिर ठहराया है, देखो।।टेका देत ॥ २ दोलनगम भजन मंग्रह। ३ है. । जगतविभूति भूतिसम तजकर, निजानन्दपद पाया है । मुरभित श्वामा,भाशावामा. नामादृष्टि मुहाया है, देखोनी || कंचनवग्न चले मन रंच न, मुगिर ज्यों घिर थाया जास पाम अहि मोग्मृगीरिजातिविरोव नशायाहे.दमानी श शुध उपयोग हुनाशनमें जिन. मुविधि समिध जलाया है। श्यामलि अलिकावलि शिग्मोहे.मानों घुबां उड़ाया, देखोजी ।३।। जीवन मरण ग्रलाभ लाभ जिन, तृणमणिको ममभाया है मुग्नग्नागनमहिपद जाक, दौल नाम जम गायाहे,देखोजी १॥ ३ जिनवर श्रानन भान निहारत,ममतमधान नशायाहै,जिन टेका पचनकिरनप्रमरनतें भविजन, मन सगेज मरमाया है। भवदुख कारण मुखविमतारण,कुपथ मुपय टरशाया है. जिन०१॥ विनशाई कॅज जलमरसाई, निशिचर ममर दुराया है। तस्कर प्रबल कपाय पलाये. जिन धनबोध चुगया है, जिन||२|| लसियत उहुन कुभाव कई पत्र, मोह उलक नुजाया है। 2. हंस कोकको शोक नशानिज.परिणति चकवी पायाहै.जिन०||३|| कर्मबंधकजकोपबंधे चिर, भवि अलि मुंचन पाया 'दोल' उजाम निजानम अनुभव, उर जग अंतर छाया है. जिन०॥ ४॥ है 1 ५ n पारस जिन चरन निरख हर्प यो लदायों, चिनवत चंग चकोर ज्यों प्रमोद पायो टेक ॥ ज्यो सुन निघार शोर, मोर हर्षको न मोर, कनिधिसमाजगज पाय मुदिन पायो । पारस -- दौलतराम भजन संग्रह। ॥१॥ ज्यों जन चिर क्षुधित होय, भोजन लखि सखित होय, भेषज गद हरण पाय, सरुज सुहरषायो॥ पारस० ॥ २ ॥ वासर भयो धन्य प्रोज, दुरित दर परे भाज, शांत दशा देख महा, मोहतम पलायो। पारस ॥३॥ जाके गुण जानन जिम, भानन भवकानन इम, जान 'दौल' शरण आय, शिवसखललचायो ।। पारस० ॥४॥ ५ बंदो अदभुत चन्द्र वीर जिन, भविचकोर चित हारी।। बंदों ० ।टेका सिद्धास्थनृपकुलनभ मंडन, खंडन भ्रमतम भाग । परमानंद जलधिविस्तारन, पापतापछयकारी ॥ बंदो० ॥ १ ॥ उदित निरंतर त्रिभुवन-अंतर कीरति किरण प्रसारी। दोषमलक्कलंक अटंकित, मोहराहु निवाग ।। बंदों. ॥ २ ॥ कर्मावरण पयोधि अरोधित, बोधित शिवमगचारी । गणधरादि मुनि उड़गन सेवत, नित पूनमतिथि धारी ।। बंदों ॥३॥ अखिल अलोकाकाशउलंघन, जास ज्ञानउजयारी । 'दौलत, मनसाकुमुदनिमोदन, जयो चम्मजगतारी ॥ वंदों ॥४॥ ६. निरखत जिनचंद्रवदन स्वपरसुरूचि आई, निरखत ०।।टेक॥ प्रगटी निज प्रानकी, पिछान ज्ञान भानकी, कला उद्योत होत काम, यामनी पलाई, निरखतः ॥ १॥ सास्वत आनंद स्वाद, पायोविनस्यो विषाद, प्रानमें अनिष्ट 'इष्ट, कल्पना नशाई, निरखत० ॥ २ ॥ साधी. निज सोध्यकी, समाधि मोहव्याधकी, Prem -- दौलतराम भजन मंग्रह। ५ उपाधिको विराधिकैं, अराधना सुहाई, निरखत० ।। ६ ।। धन दिन छिन अाज सुगुण, चिंते जिनराज अवें, सुघरो सब काज 'दौल, अचल रिद्धि पाई, निरखत० ॥ ४ ॥ ७. जबतें अानंद जननि दृष्टिपरी माई, तबतें संशय विमोह भमता विलाई, ॥जवते ॥ टेक ॥ मैं हूं चित चिन्ह भिन्न, परतें पर जड़ स्वरूप, दोउनकी एकता सु, जानी दुखदाई,जवते॥१॥ रागादिक बंधहेत, बंधन बहु विपति देत, संवरहितजानतस, हेत ज्ञानताई, जबतें० ॥ २ ॥ राब सुखमय शिव है, तसकारन विधिझारन इम, तत्वकी विचारन, जिनवानि सुधि कराइ, जबतें० ॥ ३॥ विपयचालज्वालते, दह्यो अनंल कालतें, शुधाम्बु- स्यात्पदांक गाहते प्रशांति बाई, जबतें ॥ ४ ॥ या विन जग- जालमें, न शरन तीनकालमें, संभाल चितभजो सदीव 'दोल, यह सुहाई, जयते ॥ ५॥ भज ऋषिपति ऋषभेश, ताहि नित नमत अमर असुरो। मनमथ मथ दरसायनशिवपथ, बृपरथचक्रधुरा, भज० ॥ टेक ।। जा प्रभुगर्भ छः मास पूर्व सुर, करी सुवर्णधरा । जन्मत सुरगिरधरसुरगणयुत, हरि पयन्हवन करा, भज० ॥१॥ नटत नृत्यकी विलय देख प्रभु, लहि विराग सु थिरा । तबहि देवऋषि आय नायशिर, जिनपदपुष्प धरा, भज० ॥२॥ केवल समय जास वचरबिने, जग भ्रम तिमिर हरा। सुदृग बोध चारित्र पोत लहि, भवि भवसिंधु तरा, भज०॥.३ ॥ द

६
दौलतराम भजन संग्रह।
योगसंहार निवार शेषविधि, निवसे
वसुम
घरा।
'दौलत, जे जाको जस गावें, ते है अज अमरा, भज० ॥ ४ ॥
६
१
.
जगदानंदन जिनअभिनंदन, पदअरनिंदनमू मैं तेरे,जग० टेक।।
अरुन वरन अघपात हरनवर, वितरन कुशल सु शरन बडेरे।
पद्मासदन मदनमदभंजन, रंजनमुनिजनमनअलिकेरे,जग ॥१॥
ये गुन सुन में सरनें प्रायो, मोहि मोह दुख देत घनेर ।
तामदभाननस्वपरपिछानन,तुमविन आनन कारन हरे.जग ॥२॥
तुमपदशरन गही जिन ही ते, जामन जरामरेन निवरे ।
तुमते विमुख भये शठ तिनको, चहुँगतिविपतमहाविधपेरे, जग०॥३
तुमरे अमित सुगुनज्ञानादिक, सतत मुदित गणगज उगरे ।
लहत न मित मैं पतितकहों किम, किनशिशु कनगिरराजउखेरे।४।।
तुम विनरागदोषदर्पन ज्यों, निज २ भाव फलै तिनकरे ।
तुम हो सहज जगत उपकारी, शिवपथसास्थवाह भलेरे, जग०॥५॥
तुम दयाल बेहाल बहत हम, कालकरालव्याल चिर घरे।
भाल नये गुणमाल जपों तुम,हे दयाल दुखटाल सवेरे, जग०॥६॥
तुम बहुपतितसुपावन कीने, क्यों न हरो भवसंकट मेरे ।
भ्रम उपाधि हरशम समाधिकर दाल भये तुमरे अब रे जग॥७॥
२
१०
'पद्मसिद्म पद्मपदपद्मा, मुक्तिसमदरशोवन है।
कलिमल गंजन मन अलिरंजन, मुनिजनशरनसुपावनहे,पद्मा टेक
जाकी जन्मपुरी कुशंबिका, सुरनरनागरेमावन है ।
जास जन्मदिन पूरब घटनवमासरतनवरसावन है, पद्मा० ॥ २ ॥

दौलतराम भजन संग्रह। ११ जा तपथान पपोमा गिरि सो, अात्मज्ञानथिग्थावन है केवलज्योतउद्योत भई मो, मिथ्यानिमानशावन है. पद्मा ॥ २ ॥ जाको शासन पंचानन सो, कुमतिमतंगनशावन है। राग विना सेवकजन तारक, पैंतसुरुपतुष भावन है, पद्मा० ।। ३ ।। जाकी महिमाके वर्णनसों, सुरगुरुबुद्धि थकावन है। 'दोल, अल्पप्रतिकोकहयो जिम,शिशुक गिरिंदढकावनहै, पद्मा०४ चन्द्रानन जिन चन्द्रनाथके, चरन चतुर चितध्यावतु है। कर्मचक्रचकचूरचिदातम, चिन्मरतपदपावतु है, चन्द्रा० ।। टंक ॥ हाहा इह नारदतुचर, जोस अमल यश गावतु है । पद्मासची शिवाश्यामादिक, करवरवीन बजावतु है, चन्द्रा०॥१॥ विन इच्छा प्रदेशमाहिं हित, अहित जगतदरसावतु है। जा पदतट सुरनरमुनिघटचिरु,विकटविमोहनशावतु है, चन्द्रा०||२|| जाकी चन्द्रवरनतनद्युतिसों, कोंटिक सूर छिपावतु है। आतमज्योतउद्योतमाहि सब,ज्ञेय अनंत दिपावतु है,चन्द्रा०॥३॥ नित्य उदय अकलक अछीन सु, मुनिउडुचित्तरमाचतु है । जाकी ज्ञानचन्द्रिका लोकालोकमाहिं न समावतु है, चन्द्रा०॥ ४ ॥ साम्यसिन्धुवर्द्धनजगनंदनको शिरहरिगण नावतु है। संशय विभम मोह 'दौल'कोहर जोजगभरमावतु है, चन्द्रा०॥५॥ जय जिन वासुपूज्य शिवरमणीरमन मदनदनु दारन हैं । बालकाल संजम संभाल रिपुमोहन्यालबलमारन हैं,जयजिन॥१॥ जाक पंचकल्यान भये चंपापुरमें सुखकारन हैं ।। १२

होतराम भजन संग्रह।
।
। वासवबंद अमंद मोद घर किये भवोदधितारन है,जयजिन ||२||
जाके वैनसुधा त्रिभुवनजनको भमगेगविदारन हैं।
जा गुनचिंतनश्रमल अनल मृतजनमजरावनजारन हे, जय ॥३॥
जाकी अरुन शांतिकवि रविभा, दिवसप्रबोधप्रमारन हैं।
जाके चरनशग्न मुस्तश्वांछित शिवफल विस्तारन हैं. जय०॥ ४॥
जाको शासन सेवत मुनि जे, बार ज्ञानके धारन हैं।
इंद्रफणींद्र मुकटमणि द्युतिजल,जापदकलिल परबारनहैं,जय ०॥५॥
जाकी सेव प्रच्छेवर माकर; चहुंगनिविपनि उधारन है।
जा अनुभवधनसार सुत्रांकुलनापकलापनिवारन हैं, जय ॥६॥
बादशमों जिनचंद्र जोस वर, जस उजासको पार न हैं।
भक्तिमारतें दमें दौल' कोचिरविभावदुलटारन हैं, जय० ॥७॥
१३
-
कुंथनके प्रनिपाल कुंथुजग, तार सारगुनधारक ह ।
वर्जितग्रंथ कुपंथवितर्जिन, अर्जितपंथ अमारक हैं, कुथनके ॥टेका
जाकी समवशरनबहिरंगरमा गणधारपारक हैं।
सम्यग्दर्शनवोधचरणमध्यात्मरमाभरसारक हैं , कुथ० ॥ १ ॥
दशधा धर्म पोतकर भव्यनको भवसागरतारक हैं।
वरसमाधिवनघनविभावरजपुंजनिकुंजनिवारक हैं, कुथ० ॥२॥
जासु ज्ञाननममें अलोकजुत, लोऊयथाइक तारक हैं ।
जासुध्यानह स्तावलम्ब दुखकूपविरूपउधारक हैं, कुथ० ॥ ६ ॥
तज छखंडकमलाप्रभुशमला, तपकमला ग्रागारक हैं।
द्वादशसभासरोजसूर भ्रमतरुअंकूरउपाग्क हैं,कुंथनके ० ॥ ४ ॥
गुणअनंत कहि लहत अंत को ? सुरगुरुसे बुध हारक हैं।
'दौल' नमें हे कृपाकंद ! भवद्वंदटार बहुबारक हैं, कुंथन० ॥५॥

दौलतराम भजन संग्रह। १४ पास अनादिअविद्या मेरी हरन पास परमेशा हैं। चिदिलाससुखराशिप्रकाशवितरपत्रिभोनदिनेशा हैं, पास टेक०॥ दुर्निवार कंदर्प सर्पको दर्प विदर्ण खगेशा हैं । दुठ शठ कमठ उपद्रवप्रलय समीर सूवर्णनगेशा है, पास ॥१॥ ज्ञालअनंत अनंत दर्शवल , सुख अनंत पदमेशा हैं। स्वानुभूतिरमनीवर भविभव गिरपवि शिवसदमेशा हैं , पास॥२॥ ऋपि मुनि यति अनगार सदा तिस, सेवत पादकुशेसा हैं। वदनचन्द्रत झरें गिरामृत, नाशन जन्मकलेशा हैं,पास ॥३॥ नाममंत्र जेज भव्य तिन, अघाहिनशत अशसा हैं। सुर अहमिन्द्र खगेन्द्र चन्द्रहै, अनुक्रम होंहिँ जिनेशा हैं,पास०॥४॥ लोक अलोक ज्ञेयज्ञायक , रतिनिजभावचिदेशा है। रागविनो सेवक जनतारक, मारक मोह न द्वेषाहै, पास०॥५॥ भद्रसमुद्रविवर्द्धन अद्भुतपूरन चन्द्र सुवेशा हैं । 'दौल' नमें पदतासजास शिव थल समेद अचलेशा है, पास.१६ । १५ . जयशिव कामिनिकंत वीर, भगवंत अनंतसुखाकर हैं। विधिगिरिगंजन बुधमन रंजन, भ्रमतमभंजनभाकर हैं;जय ॥रा। जिनउपदेश्यो दुविधधर्म जो, सो सुरसिद्धरमाकर हैं। भविउर कुमुदनिमादन भवतप हरन अनूप निशाकर हैं, जय॥१॥ परमविराग रहैं जगते पैं, जगतजंतु रक्षाकर इन्द्र फणीन्द्र खगेन्द्र चन्द्र जगठोकर ताके चोकर हैं, जय० ॥२॥ जास अनंत सुगुणगणिगण नितगणत गणीगण थाकर हैं।

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दौलतराम भजन संग्रह।
जा प्रभुपद नवकेवलि लब्धि सुकमलाको कमलाकर हैं,जय० ॥३॥
जाको ध्यान कृपान रागरुप पोसहरन,समताकर हैं।
'दौल' नमें करजोर हरनभवबाधा शिवराधाकर हैं, जय: ॥टेक॥
१६
जय श्रीवीर जिनेन्द्र चन्द्र शत इन्द्र वंद्य जगतारं, जय० ॥टेक॥
सिद्धारथकुलकमलश्रमलरवि। भवभूधरपविभारं।
गुणमणिकोष प्रदोष मोखपति, विपिनकषाय तु पारं, जय० ॥ १॥
मदनकदन शिवसदन पदनमित, नित अनमित यति सारं ।
रमोअनंत कंत अंतक-कृतअंत जंतु हितकारं, जय० ॥२॥
फंदचंदनाकन्दन दादुरदुरिततुरितनिर्वारं ।
रुद्ररचित अतिरुद्र उपद्रव पवनअद्रिपतिसारं जय० । ॥३॥
अंतातीतअचिंत्य सु गुण तुम, कहत लहत को पारं ।
हे जगमौल दौल' तेरे क्रम, नमें शीसकरवार जय० ॥ ४ ॥
१७
उरगस्वर्गनरईश शीस जिस प्रांतपत्र त्रिघरे ।
कुदकुसमसम चम अमरगण ढोरत मोदभरे; उरग० ॥ टेक ॥
तरुअशोक जाको अवलोकत, शोकथोक उजरे ।
पारजातसतानकादिके, बरसत सुमन वरे, उरग ॥ १ ॥
मणिविचित्र पीठ अंबुजपरराजत जिन सुथिरे ।
वर्णविगत जाकी धुनिको सुनि भवि भवसिंधुतरे। उरग०॥२॥
साढा बारह कोड़ जाति के बाजत तूर्य खरे ।
भामण्डलकी धुतिअखंडने रवि शशिमन्द करे उरग० ॥ ३ ॥

दौलतराम भजन संग्रह। ११ ज्ञान अनन्त अनन्त दर्श बल शर्म अनन्त भरे।। करुणामृत पूरितपद जाके दौलत हृदय धरे उरगः ॥ ४ ॥ १८ युगपत लख जाने भवनसरोरुहसूर भूरगुणपूरित अरहता । दुरित दोष मोप पथ घोपक करनकर्म अनन्ता भवन० ॥ टेक ॥ दर्शवोधत जु भाव अनन्ता। विगताकुल युतसुख अनत विनयंत शक्तिवंता । भवन० ॥१॥ जात न ज्योत उद्यो तथकी रविशशिद्युति लाजंता । तेजथोकअवलोक लगत है फोक सची कन्ता । भवन ॥२॥ जास अनप रूपको निरखत हरपत हैं सन्ता। जाकी धुनिमुनि मुनि निजगुनमुन परगर उगलंता । भवन०॥३॥ दौल तौल विनयश तस वरनेत सुर गुरु अकुलता। नामाक्षग्मुन कान स्वानसे रांक नाक गन्ता। भजन ॥४॥ हमारी वीर हरो भवपीर हमारी० ॥ टेक ।। दुख तपत दयामृत सर तुम लख आयो तुम तीर। तुम परमेश मोत मग दर्शक मोह दवानल नीर हमारी०॥९॥ तुम विनहेत जगतउपकारी शुद्ध चिदानन्द धीर । गणपति ज्ञान समुद्र न लंधै तुम गुणसिंधु गहीर।हमारी० ॥२॥ याद नहीं में विपति सही जो घर घर अमित शरीर । तुम गुण चिंतत नशत तथा भय ज्यों घन चलत समीर हमारी०॥३ कोट वारकी अरज यही है मैं दुखसे हूं अधीर । वेदना फन्द दौलका करत कर्म जंजीर । हमारी० ॥ ४ ॥ १७ मैं 4 + दौलतराम भजन संग्रह। १२ २० , २१ सब मिल देखो हेली म्हारी हे त्रिसलाबाल बदन रसोल टेका। आये जुतसमवसरन कृपाल विचरत अभय व्याल मराल, फलित भई सकल तरुमाल, संब० ॥१॥ नैनन हाल भृकुटी न चाल, बैन विदारै विभ्रमजाल, छविलखि होत संत निहाल, सब० ॥ २ ॥ बंदनकाज सोज समाज संगलिये स्वजन पुरजन बाज, . श्रेणिक चलत है नरपाल, सब० ॥३॥ यों कहि मोदजुत पुरबोल लखन चाली चरम जिनपाल, दौलत' नमत करघरमाल, सब० ॥ ४ ॥ अरि रज रहस्य हनन प्रभु अरहन जैवंतो जगमें। देवं प्रदेव सेवकर जाकी धरहिं मौलि पगमें अरि रज० ॥टेक ॥ जा तनअष्टोत्तरसहस्रलक्खन लखि कलिल समै । जाबच दीपशिखातें मुनि विचरै शिव मारग में।अरि रज०॥ १ ॥ जास पास” शोकहरन गुन प्रगट भयो नगमें । व्याल मराल कुरंगसिंघ को जाति विरोध गमै अरिरज० ॥२॥ जा जसगगनउलंघन कोऊ क्षम न मुनीखग में। 'दौल' नाम तस सुरतरु हैया, भव मरुथलमगमें, अरि ० ॥३॥ हे जिन तेरे मैं शरणे अाया। तुम हो परमदयाल जगतगुरु,मैंभवभव दुख पाया हे जि०॥टेक॥ मोह महादुठ घेर रह्यो मोहि भवकानन भटकाया। - दौलतराम भजन संग्रह। . १ २३ नित निज ज्ञानचरननिधि विसरयोतनधनकर अपनाया।हे. ॥१॥ निजानंदअनुभवपियूषतज विपयहलाहल खाया मेरी भूल मूल दुखदाई निमित मोह विधि थाया ।हेजिन ॥२॥ सो दुठ होत सिथिल तुमरे ठिग, और न हेतु लखाया। शिवस्वरूप शिवमगदर्शक तुम सुयश मुनीगण गाया हेजिन० ३॥ तुमहो सहजनिमित जगहितके मोउर निश्चय भाया ।। भिन्न होहु विधितै सोकीजे दौल तुम्हें शिरनाया हे जिन० ॥ ४॥ हे जिन मेरी ऐसी बुधि कीजे, हे जिन ॥ टेक॥ राग देप दोवानलते बचि. समतो रसमें भीजे, हे जिन ॥२॥ परमें त्याग अपनपो निजमें लाग न कबहु छीजे, हे जिन ॥२॥ कर्म कर्म फलमाहिं न राचे ज्ञान सुधारस पीजे, हे जिन ॥३॥ मुझ कारज के तुम कारन वर अरज दौलकी लीजे, हे जिन: शामरिया के नाम जपे से छूटजाय भवभामरियां, शाम० टेक॥ दुरित दुरत पुन तुरत फुरतगुन अातम की निधि आगरियां । विघटत है परदाह चाह झटामटकत समरस गागरियां । शाम०॥ कटत कलंक कर्म कलसायन, प्रगटत शिवपुरडागरियां । फटत घटाघन मोहछोहहट, प्रगटत भेदज्ञान धरियां, शाम. ॥२॥ कृपाकटाक्ष तुमारीहीसे जुगलनाग विपतहि टरियां । घार भये सो मुक्तिरमावर दौल' नमें तुव पागरियां, शाम०॥३॥ २४ २५ शिवमगदरसावन रावरो दरस शिवमग० ॥ टेक ।।

दौलतराम भजन संग्रह।
परपदचाह दाहगदनाशन तुमबंचभेषज पानसरस, रावरा. ॥१॥
गुणचितवत निज अनुभव प्रगटै विघटैविधिठगदुविध तरस, रा०,२
'दौल' अवाची संपति सांची पाय रहै थिरराच सरस, राव० ॥ ३॥
२६
मेरी सुधलीजे रिषभस्वाम मोहि कीजे शिवपथ गाम ।। टेक ॥
मैं अनादिभवभूमतदुखी अब तुम दुखमेटत कपाधाम । ।
मोहि मोहघेरा कर चेरा पेरा चहुगतिविपत ठाम, मेरी०॥ १ ॥
विषयन मन ललचाय हरी मुझ शुद्ध ज्ञानसंपन ललाम ।
अथवा था जड़ कौनदोष मम दुखसुखतापरनत सुकाम, मेरी० ॥२॥
भाग जगे अंब चरनजपे तुम बच सुनके गहे सुगुणग्राम ।
परमविराग ज्ञानमय मुनिजन जपततुम्हारी सुगुणदाम,मेरी०॥३॥
निर्विकार संपतिकृति तेरी, छविपरवारों कोट काम ।
भव्यनकेभवहारन कारन, सहज यथा तम हरनधाम, मेरी० ॥ ४ ॥
तुम गुणमहिमा कथनकरनको, गिनत गणी निजबुद्धि खोम ।
'दौलतणीअज्ञान परनतिकी, हे जगत्रांतोकर विराम, मेरी ।।५।।
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मोहि तारोजी क्यों ना ? तुम तारक त्रिजग त्रिकालमें,मोहि० ॥टेका।
मैं भवउदधिपड़यो दुखभोग्यो, सो दुख जाय कह्यो ना।
जामनमरन अनंत तनोतुम, जाननमाहिं छिप्योना, मोहि०॥१॥
विषयविरस रस विषम भख्यो मैं, चख्यो न ज्ञान सलोनो।
मेरी भूल मोहिदुख देवै, कर्मनिमित्त भलो नो, मोहि० ॥ २ ॥
तुम पदकंज धरे हिरदै जिन, सो भवताप तप्यो ना ।
सुरगुरुह के वचन करनकर, तुम जस गगन नप्यो ना, मोहि० ॥३॥

दौलतराम भजन संग्रह। ५ कुंगुरु कुदेव कुश्रुत सेये में, तुम मत हृदय धरयो ना। परमविराग ज्ञानमय तुमजाने विन काज सस्यो ना, मोहि०॥ ४॥ मो सम पतित न और दयानिधि, पतिततार तुम सो ना। 'दौल,तणी अरदास यही है फिर भववास वसोना। मोहि० ॥ ५ ॥ मैं आयो जिन शरन तिहारी ! मैं चिरदुखीविभाव भावने स्वाभाविक निधि पाप विसोरी में ॥१॥ रूप निहार धोर तुम गुनसुन वैन होत भविशिवमगचारी । यों ममकारजके कारन तुम तुमरी सेव एव उरधारी मैं ० ॥ २ ॥ मिल्यो अनंत जन्म में अवसर अब विनऊ हे भवमरतारी। परमें इष्ट अनिष्ट कल्पना 'दौल' कहै झट मेट हमारी में ॥३॥ २६ मैं हरख्यो निरख्यो मुख तेरो । नासान्यस्त नयन भ्रूहलय न वयन निवारनमोहअंधेरो। मैं ॥१॥ परमें कर में निजबद्धि अवलों भवसरमें दुख नह्यो घनरो। सो दुखभानन स्वपरपिछानन तुमविन ग्रानन कोरन हेरो में ० ॥२॥ चाह भई शिवराह लाहकी गयो उछोह असंजम करो। 'दौलत' हित विराग चितान्यो, जान्यो रूपज्ञानदृग मरो,मैं॥३॥ ३० झझोटी में प्यारी लागे म्हाने जिन छवि थारी हो, ॥ टेक ।। परमनिराकुल पद दरसावत, वर विरागताकारी । पटभूपन विन पैं सुंदरतो, सुर नर मुनिमनहारी, प्यारी० ॥ १ ॥ जाहि विलोकत भविनिज निधिलहि, चिर विभावता टारी।

दौलतराम भजन संग्रह। निरनिमषतें देख सचीपति,सुरता सफल विचारी । प्यारा० ॥२॥ महिमा अकथ होत लख ताको,, पशुसम समकित धारी । दौलत रहो ताहि निरखनकी भव भव टेव हमारी। प्यारी०॥ ३ ॥ ३१ निरख सुख पायो जिन मुखचंद नि० ॥ टेक ।। मोह महातम नाश भयो है उरअंबुज प्रफुलायो। ताप नस्यो तब बढ्यो उदधि आनन्द । निरख० ॥ १ ॥ चकवी कुमति विछुर अतिविलखै प्रातमसुधा सवायो । सिथल भयो सब विधिगणफंद । निरख० ॥२॥ विकट भवोदधिको तट निकट्यो अघ तरुमल नसायो । 'दौल' लयौ अब सुपद स्वछंद । निरख० ॥ ३ ॥ ३२ , नाथ मोहि तारत क्यों ना ? क्या तकसीर हमारी? नाथ ॥ टेक ॥ अंजन चोर महा अधकरता, सप्तविसनको धारी। वोही मर सुरलोक गयो है, वाकी कछु न विचारी, नाथ ।। १।। शूकर सिंह नकुल वानरसे, कौन कौन व्रतधारी ? | तिनके करनी कछु न विचारी, वै भी भये सुरे भारी, नाथ० ॥२॥ अष्टकर्म वैरी पूरबके, इन मो करी खुवारी । दर्शनज्ञानरतन हरलीने, दीने महादुख भारी, नाथ ॥ ३ ॥ अवगुण मोफ करे प्रभु सबके, सबकी सुध न विसारी । 'दौलत' दास खड़ा करजोरे, तुम दाता में भिखारी, नाथ ॥४॥ निरख सखी ऋषिनको ईश यह,ऋषभजिन परखिकें स्वपर . १ ३३ -- दोलनगम भजन संग्रह। -- - ३४ पासौंज छाग। नैननाशाम घरि मेनविनसायका. मौनयुत स्वास- दिशि सुभिकारी, निरख० ॥ १ ॥ धरासम क्षतियुत नरामरख- परनुन, वियुतगगादिमद दुरितहारी । जाम क्रमपास भ्रमनाश पंच.। मृग वास करिणीतिकी रीति धारी. निरख० ॥ २ ॥ या दयमाहिं विधिदास्पनरोहिं सिर, केशशुभ जिमि, धूवां विधागाने जगपंक जन रंक तिने काढ्ने किया, जगनाह यह बांह साग.निमा० ॥ ३ । तप्त हाटकवरण, वमनविन प्राभरण, पर थिर ज्यां शिया मरुकाग। दोलको' दनशिवपाल जगमौल जे, निन्हीं काजोर बंदना हमारी, निरखा ॥ ४ ॥ ध्यानपानपान गहि नाशी,त्रेसठ प्रकृतिअग। शेष पचासी लागाही हेज्या जेवरी जग।।ध्यान-टेको टुठअनंगमातगभंगकर है पलंगा । जापदभक्ति भक्तजन दुख दावानल मेघ झरी, धानः ।। १ ॥ नाल धवल पल सोहे कल में, क्षुध तृप व्याधि ग। हलतन पलक अलक नख बढन न, गति नभ माहि करी, ध्यानागाजा विन सरनमरन जर घर घर, महा असात भरी। दोन नाम पद दाम होत है, वास मुक्ति नगरी, ध्यान० ॥३॥ दीठा भागनते जिनपोला, मोह नाशने वाला, दी० ॥ टेक ॥ सुभग निशंक रागविन यातें, वसन ने आयुधवाला, मोह० ॥१॥ जाम ज्ञानमें युगपत भासत, सकल पदारथ माला, मोह० ॥२|| निजमें लीन हीन इच्छापर हितमितवचन रसाला, मोह० ॥३॥ लखि जाकी छविप्रातमनिधिनिज, पावत होत निहाला,मोह।। 'दौल' जासगुण चिंतत रत है, निकट विकट भवनाला, मोह० १५॥ a- -orha-

१८
दौलतराम भजन संग्रह
।
३७
धारा तो बैनामें सरधान घणोछ, म्हारै छविनिरखत हियसरसावै ।।
तुमधुनिघन पर चहन दहने हर, वर समता रसझर वरसावै, थारा १॥
रूपनिहारत ही बुधि है सो, निज पर चिन्ह जुदे दरसोवै ।
मैं चिदंक अकलंक अमल थिर,इन्द्रियसुख दुख जड़ फरसावै.थोरा २
ज्ञानविराग सुगुण तुम तिनकी, प्रापति हित सुरपति तरसावै
मुनिबड़भाग लीन तिनमें नित 'दौल' धवल उपयोगर सावै, थारा३
त्रिभुवनानंदकारी जिन छबि थारी नैन निहारी, त्रिभु० टेक।।
ज्ञान अपूस्ख उदय भयो अब, या दिनकी बलिहारी ।
मो उरमोद बड़ो नाथ सो, जु कथा न जात उचारी ॥त्रिभु० ॥१॥
सुन घनघोर मोरे मुदौरन ज्योंनिधि पाय भिखारी ॥
जाहि लखत झटझरत मोह रज, होय सो भव अविकारी त्रिभु०२
जाकी सुन्दरतासों पुरंदर शोभ लजावन हारी ।
निज अनुभूति सुधाछविपुलकित बदन मदन रिपु हारी, त्रिभु•३॥
शूल दुकूल न वालमाला मुनिमन मोद प्रसांग ।
अरुणन नैनन सैनभामैनन वक नलंक सम्हारी ॥ त्रिभु० ॥३॥
तातें विधि विभाव क्रोधादि न लखियत हे जगतारी।
पूजत् पातिक पुंज पलावत ध्यावत शिवविस्तारी । त्रिभु०॥ ४ ॥
कामधेनु सुरतरु चिंता मणि इकभव सुख करतारी ।
तुमछवि लखत मोदतें जो सुर सोतुम पद दातारी ।। त्रिभुः ॥ ५॥
महिमा कहत न लहत पार सुर-गुरुहूकी बुधिहोरी।
और कहै किम ‘दौल' चहै इम देहु दशा तुमधारी॥ त्रिभु० ॥६॥

दौलतराम भजन संग्रह। जिन छवि तेरी यह धन जगतारन जिनछवि० ॥ टेक ।। मूल न फूल दुकूल त्रिशूल न समदमकारन भ्रमतमवारन । जिन ॥१॥ जाकी प्रभुतोकी महिमाते सुरनधीशता लागत सारन ॥ अवलोकत भविथोक मोख मग चस्त वरत निज निधि उरधारन जिन ॥ २॥ जजत भजत अघतो को अचरज समकित पावन भावन कारन । तीस सेवफल एव चहत नित दौल' जाके सुगुन उचारल ॥ जिन छ०॥ ३ ॥ , चलि सखि देखन नाभिरायघर नाचत हरिनटवा, चलः ॥ टेरे। अद्भुत तालमान शुभ लययुत चवत रोग षटवा।। चलसखि० ॥१॥ मणिमय नपुरादिभूपणदुति, युत सुरंग पटवा । हरिकर नखन नखनपैं सुरतिय, पगफेरत कटवा, चल० ॥ २ ॥ किन्नर करधर बीन बजावत, लावत लय झटवा । 'दौलत' ताहि लखे चख तृपते, सूझत शिवबटवा, चल० ॥३॥ अाज गिसाज निहारा, धनभाग हमारा । श्रीसम्मेद नाम है जाको, भूपर तीरथ भारा, अाज गिर० ॥टेर। तहां बीसजिन मुक्ति पधारे, अवर मुनीश अपारा । प्रारज भूमि शिखामणि सोहै, सुर नरमुनि मन प्यारा,अाज गिर० १ तही थिर योगधार योगीसुर, निज पर तत्व विचारी । निज स्वभावमें लीन होयकर,सकल विभाव निवारा, प्राजगिर०२ जाहि जजत भवि भावन” जब, वभवपातिक टारा । .

, - २० दौलतराम भजन संग्रह। ----- -MARA ४९ ४२ जिनगुणधार धर्मधन संचो, भव दारिदहरं तारा, श्रीज गिर ॥३॥ इक नभ नव इक वर्ष माधवदि, चोदशौं वासर सान। माथनाय जुतसाथ दौल' ने जय जय शब्द उचारा, भाजगर०? आज मैं परम पदारथ पायो, प्रभु चरनन चितमें लायो, श्रीज टेर।। अशुभ गये शुभ प्रगट भये हैं, सहज कल्पतरु छायो,अाज १॥ ज्ञान शक्ति तप ऐसी जाकी, चेतनपद दरशायो आज ॥२॥ अष्टकर रिपु जोधा जीते, शिव अंकूर जमायो, आज० ॥ ३॥ नेमिप्रभुकी श्यामवरण छवि नैनन छाय रही, टेक ॥ मणिमय तीनपीठपर अंबुज, तापर अधर ठही, नेम० ॥१॥ मारमार तपधार जारविधि केवल ऋद्धि लही। चारतीस अतिशयदुति मंडित, नवदुग दोष नही, नेम० ॥२॥ जाहि सुरासुरनमत सतत मस्तकतै पग्स मही । सुरगुरु वर अम्बुज प्रफुलावन, अद्भुत भान सही, नेम० ॥ ३॥ घर अनुरोग विलोकत जाको, दुरित नशै सब ही। 'दौलत महिमाअतुल जासकी, कापै जात कही, नेम०॥४॥ अहो नमि जिनप नित नमत शत सुरप, कंदर्प गज दर्प नाशन प्रबल पनलपन, अहो० ॥ टेक | नाथ, तुमवानि पय पान जे करत भवि, नशै तिनकी जरीमरनजामनतपन,अहो नमि० ॥१॥ अहो शिवभौन तुम चरणचिंतोन जे, करत तिन जरत जे भावी दुखद भवविपन, ॥ हे भुवनपाल तुम विशद गुनमाल, उरधेरै दौलतराम भजन संग्रह। २१ ४४ ते लहें टुक कालमें श्रेयपन, अहो नमि० ॥ २.|| अहो गुणतूप तुम रूप चख सहम करि, लखत सन्तोष प्रापति भयो नाकपन। अज, अकल तज सकल दुखदपरिगह कुगह, दुसहपरीसह सही धार व्रत सार पन, अहो०॥३॥पाय केवल सकल लोक करवत लख्यो, अख्यो वृप द्विधा सुनि नशत भ्रमतमझपन । नीच कीचक कियो मीचतें रहित जिम; दासको पास ले नाश भववास पन । अहो नमि०॥ ४ ॥ प्रभु, मोरी ऐसी बुधि कीजिये, राग दोष दावानलसे वच समता रसमें भीजिये, प्रभु० ॥ टेक ॥ परमें त्याग अपनपोनिजमें, लागन कबहुं छीजिये । कर्म कर्म फल माहि न, राचत, ज्ञान सुधारस पीजिये, प्रभुमोरी ॥१॥ सम्यग्दर्शन ज्ञान चरणनिधि, ताकी प्राप्ति करीजिये ॥ मुझ कारजके तुम बडकारण अरज 'दौल' की लीजिये, प्रभु मो०॥ २॥ वारी हो बधाई या शुभ साजै, विश्वसैन ऐरादेवीगृह जिन भव मंगल बाजे, वाग०॥टेक॥ सब अमरेश अशेम विभवजुत, जगर नागपुर आये। नागदत्त सुर इन्द्र बचनतें, ऐरावत सजधाये। लख जोजन शत बदन वदन वसु रद प्रति सर ठहराये । सरसरसौपन वीस नलिन प्रति,पदम पचीस विराज, वारी हो॥१॥ पदमपदमप्रति अष्टोतर शत ठने सुदल मनहारी। ते सब कोटि सताईसपै मुदजुन नावत सुर नारी । नवरस गान गन काननको, उपजावत सुखभाग । ४५ ----- N ૨૨ दौलतराम भजन संग्रह। बकलोलावत लंकलचावत, दुतिलखि दामनिलाजै, वारी हो०॥२॥ गोपि गोपतिय जाय मायटिंग, करी तोसथुति सोरी । सुखनिन्द्रो जननीको कर नमि, अंकलियो जगतारी । ले बसु मंगल द्रव्य दिशसुरी, चलीं अग्रशुभकारी। हरखि हरी, चख सहसकरी तब जिनवर निरेख नकाजे वारी हो ॥ ३॥ ता गजेन्द्र प्रथम इन्द्रने श्रीजिनेन्द्रपधरोये। द्वितिय छत्रदिय तृतिय तुरीय हरि मुदधरि चमर दुराये । शेषशक जयशब्द करत नभ लंघ सुराचल छाये। पांडुशिला जिनथाप नची सचि, दुंदुभि कोटिक बाजे, वारी०॥४॥ पुन सुरेशने श्रीजिनेशको, जन्मन्हौन शुभ ठानो। हेम कुभ सुर होथहिं हाथन, क्षीरोदधि जल आनो। बदन उदर अवगाह एक चौ, बसुयोजन परमानो। सहस पाठ कर करि हरि जिन शिरढा रत जयधुनि गाज, वारी. ५ फिर हरिनारि सिंगार स्वामि तन, जजे सुरा जस गाये । पूरबली विधिकर पयाना सुदान पिताघर लाये । मणिमय प्रांगनमें कनकासन श्रीजिन पधराये तांडव नृत्य कियो सुरनायक, शोभा सकल समाजै, वारी० ॥६॥ फिर हरि जगगुरुपितर तोष, शान्तेश घोष जिन नामा । पुत्रजन्म उत्साह नगरमें, कियो भूफ अभिरामा । साध सकल निजनिज नियोग सुर, असुर गये निज धामा । त्रिपद धोरिजिन चारुचरनकी, दौलत करत सदा जै, वारी०॥७॥ - हेजिन ! तेरो सुजस उजागर गावत है मुनिजन ज्ञानी, हेजिन टेक दुर्जयमोह महा भट जाने, निज वश कीने जगमानी।

दौलतराम भजन संग्रह। २३ सोतुम ध्यान कृपानपानिगहि,ततछिन ताकी थितिभानी,हेजिन०१ सुप्तअनादि अविद्यानिद्रा, जिन जननिज सुध विसरानी । हैमचेत तिन निज निधि पायी,श्रवन सुनो जब तुमवानी, होज मंगलमय तू जगमें उत्तम तुही शरन शिवमग दांनी । तुवपदसेवा परम प्रौपधी, जन्म जरामृत गद हानी, हे जिन० ॥ तुमरे पंच कल्यानक मांही त्रिभुवन मोद दशा ठानी। विष्णु विदंवर जिस्नु दिगम्बर, बुध शिव कह ध्यावत ध्यानी,हो । सर्व दर्वगुणपरजयपरणति, तुम सुबोधमें नहिं छानी। ताते 'दौलदास उराशा, प्रगट करो निजरस सानी,हेजिना॥ हे मन! तेरी को कुटे व यह कारन विषयमें घाव है, हेमन०॥ टेक ।। इनहीके वश त अनादित, निजस्वरूप न लखांव है। पराधीन छिन छीन समाकुल दुरगतिविपतिचखावै है, हेमन० ॥१॥ फरस विषयक कारण वारण, गस्त परत दुख पाव है। रसना इंद्रीवश झप जलमें कटक कंठछिदावै है, हे मन०॥ २ ॥ गंध लोलपङ्कज मुद्रितमें, अलि निजपान खपावै है। लयनविषयवश दीपशिखामें,अंग पतंग जग है, हे मन० ॥३॥ करन विषय वश हिरन अरनिमें खलकर प्रान लुनावै है । 'दौलत'तज इनको जिनको भज यह गुरु शीख सुनावै है, हे० ॥४॥ होतुम शठ अविवारी जिय, जिनवृषपाय बृथा खोयत हो, हो तुम० ॥टेक॥ पी अनादि मदमोह स्वगुणनिधि भूल ४८ कममा --- २४ दौलतराम भजन संग्रह। . ४ अचेत नींद सोवत हो, हो तुम ॥ १ ॥ स्वहिन सोख वच सुगूरूं पुकारत क्यौंन खोल उरदृग जोवत हो । ज्ञानविसार विषय विष चाखत सुरतरु जार कनक बोचत हो; हो तुम ॥२॥ स्वारथ सगे सकल जग कारन क्यों निज पाप भारद्वावत हो। नरभव सुकुल जैनवृष नौका, लह निज क्यों भव जल डोवत हो, हो तुम० ॥ ३ ॥ पुण्य पोप फल बात व्याधि वश, छिनमें हँसत छिनकरोवत हो। संयम सलिल लेयनिज उरके कलिमल क्यान 'दौल' धोवत हो, हो तुम० ॥ ४ ॥ हो तुम त्रिभुवन तारी हो जिनजी मो भव जलधि क्यों न तारतहो, टेक अंजन कियो निरंजन तातें अधम उधार विरद धारतहो । हरि बगहम र्कट झट तारे मेरी बेर ढील पान्त हो हो तुम ॥ १ ॥ यों बहु अधम उधारे तुम तो; मैं कहा अधम न मुहि टारत हो । तुमको करनो परत न कछु शिवपथ लगाय भव्यनितान्तहो, हो २ । तुम छविनिरखत सहज टरै अघ गणचिंतत विधि रजझारल हो। 'दौल' न और चहै मोदीजे जैसी आप भावनारत हो,हों तुग।। २ ।। मान लेया सिख मोरी,झ कैमत भोगन प्रोग, मानले उ टेक ॥ भोग भुजंग भोग सम जानो जिन इनसे रत जोरी । ते अनंत भव भीम भरे दुख, परे अधोगति पोरी; बँधे दृढ पातक डोरी; मान० ॥१॥ इनको त्याग विरागी जे जन भये ज्ञान वृष धोग; तिनसुख लह्यो अचल अविनाशी भवफांसी दई तोरी, स्मैतिन संग शिवगौरी; मान० ॥ २ ॥ भोगनकी अभिलाष हरनको ५० दौलतराम भजन संग्रह। २५ त्रिजग संपदा थोरी ॥ यातै ज्ञानानंद दौल' अव पिवो पियूष कटोरी, मिटै भवव्याधि कठोरी ॥ मोन॥ ३॥ ५१ चांडिदे या बुधि भोरी, वृथा तनसे रति जोरी बांडि० ॥ टेक ॥ यह पर है न रहै थिर पोषत, सकल कुमलकी झोरी । यासेममता कर अनादित बन्धो कर्मकी डोरी, सहै दुख जलधि हिलोरी || बाँडिदे या बुधि भोरी, वृथाः ॥ १ ॥ यह जड़ है तू, चेतन यों ही, अपनावत बाजोरी । सम्यकदर्शन ज्ञान चरण निधि, ये हैं संपत तोरी, सदा विलसौ शिवगोरी, छाडिदे. या बुधि भोरी; बृथा०॥ २ ॥ सुखिया भये सदीव जीव जिनं, यासों ममता तोरी ।.... 'दौल' सीख यह लीजे पीजे; ज्ञानपियूष कटोरी, मिटै परचाह कठोरी ॥ छोडिदे या बुधि भोरी; वृथाः ॥ ३ ॥ भाखू हित तेरा, सुनि हो मन मेरा, भा० ॥टेक ।। नर नरकादिक चारों गतिमें भटक्यो तूं अधिकानी। परंपरणतिमें प्रीति करी निजपरणति नाहिं पिछानी सहैं दुख क्यों न घनेरा ।। भाः ॥ १ ॥ कुगुरु कुदेव कुपंथ पंक फसि, तें बहु खेद लहायों। शिवमुखदैन जैन जगदीपक, सो त कबहु न पायो, मिव्यों न अज्ञान अँधेरी ।। भा० ॥ २॥ दर्शन ज्ञान चरन तेरी निधि, सो विधिठगन ठगी है.। पांचों इन्द्रिनके विषयन में, तेरी बुद्धि लगी है, भया इनका तू चेरा.।। भा०॥३॥ तू. जगजाल विष बहु उरभन्यो ५२

२६
दौलतराम भजन संग्रह।
अब करले सुरझरा । 'दौलतः नेम चरन पंकजका, हो तू भ्रमर
सवेरा नशै ज्यों दुख भवकरा भा० ॥ ४ ॥
५३
मत कीज्योजी यारी, ये भोग भुजग समजानके मत कीज्यो
॥ टेक ॥ भुजग डसत इकबार नसत है, ये अनंत मृतुकारी
तिसना तृषा बढै इन सेये, ज्यों पीये, जल खारी ॥ मत कीज्यो
जी० ॥१॥ रोग वियोगशोक वनको घन; समतालता कुठारी ।
केहरि करी अरी न देत ज्यों, त्यो ये दे दुख भारी मत कीज्यो.
॥२॥ इनमें रचे देव तर थाय, पाये
शुभ्र मुरारी। जे विरचे
ते सुरपति अरचे, परचे सुख अविकारी । मत कीज्यो० ॥ ३ ॥
पराधीन छिनमाहि छीन है पापबंध करतारी । इन्है गिनें
श्राकमाहिं तिन, आमतनी बुधि धारी मत कीज्यो० ॥ ४ ॥
मीन मतंग पतंग भंग मृग, इनवश भये दुखारी । सेवत ज्यों
किंपाक ललित, परिपाक समय दुखकारी॥मत कीज्यो जी॥ ५॥
सुरपति नरपति खगपति हूकी, भोग न पास निवारी। 'दौल'
त्योग अब भज विरोग सुख,ज्यों पावै शिवनारी । मत कीज्यो० ॥६॥
॥
.
५४
सुधि लीज्योजीम्हारी,मोहि भवदुख दुखिया जानके,सुधि ।।टेक॥
तीनलोक स्वामी नामी तुम, त्रिभुनके दुखहारी।
गणघरादितुव शरण लयी लख,लीनीसरन तिहारी, सुघ० ॥१॥
जो विधिअरी करी हमरी गति, सो तुम जानत सारी।
याद किये दुख होत हिये ज्यों, लागत कोट कटारी ।। सुध० ॥ २॥

दौलतराम भजन संग्रह। २७ - लब्धिअपर्यापतनिगोदमें, एक उसास मझारी। जन्म मरन नवदुगुन विथोकी, बोतन जात उचारो ॥सुधलाग॥३॥ भू जले ज्वलन पवन प्रत्येक तरु, विकलत्रय तनधारी । पंचेंद्री पशु नारक नर सुर, विपति भरी! भयकारी ।। सुधली० ॥ ४ ॥ मोह महारिपु नेक न सुखमय, होन दई सुधि थारी । सो दुठ मंद भयो भागनतें, पाये तुमाजगतारी॥ सुधली० ॥ ५॥ यदपि विराग तदपि तुम शिवमग, सहज प्रगट करतारी । ज्यों रविकिरन सहज मग दर्शक, यह निमित्त अनिवारी ॥सुघलीना नाग छागगज बाघ भील दुठ,तारे अधम उधारी । सीसनवायोपुकारत श्रवके, दौल' अंधमकी बारी॥ सुधली० ॥७॥ ५५ । मताराचो धीधारी, भवरंभथंभसम जानके, मत रोचो ॥टेक॥ इंद्रजालको ख्याल मोह ठग,"विभ्रमपास पसारी। चहुंगति विपतिमयी जामें जन, भ्रमत भरत दुखभारी॥मत० ॥१॥ रामा मो, मा वामा, सुत पितु, सुतो श्वसा, अवतारी । कोअचंभ जहाँ आपआपके, पुत्र दशा विस्तारी ।मतराचो ॥२॥ घोर नरक दुख ओर न, छोर न लेश न सुख विस्तारी । सुरनर प्रचुर विषयजुर जारे, को सुखिया संसारी ॥ मत० ॥३॥ मंडल है पाखंडल छिनमें,नृपं कृमि, सधन भिखारी। जा सुत विरह मरी है वोधिनि, तो सुतदेह विदारी॥ मतराचो०॥४ शिशु न हिताहितज्ञान तरुण उर, मदनदहन परंजारी । वृद्ध भये विकलांगा थाये, कौन दशा सुख कारी। मतराचो०॥५॥ -- २८ दौलतराम भजन संग्रह। . यो असारेलख छार भव्य झट, भये मोखमगचारी। यात होऊ उदास दौल' अब, भज ज़िनपति जगतारी ॥मत ॥६॥ ६५ C नित पीज्यो घोघारी,जिनवानी.सुधासम जानके,नित पी॥टेक। वीरमुखारविंदतै प्रगटी, जन्मज़रा गद टारी। गौतमादिगुरु उरघट व्यापी, परम सुरुचि करतारी ॥ नित०॥१॥ सलिलसमान कलिलमलगंजन बुधमनरंजनहारी। भंजन विभूमधूलि प्रभंजन,मिथ्या जलधि निवारी, नित,पी०॥२॥ कल्याणकतर उपवन, परिणी, तरणीभवजलतारी । बंध विदारन पैनी छैनी, मुक्ति नसैनी सरी ॥ नितपी०॥३॥ स्वपरस्वरूप प्रकाशनको यह, भानुकला अविकारी । मुनिमन कुमुदिनि भादन शशिभा, शम सुख सुमन सुवारी। नित ४।। जाको सेवत बेवत निजपद, नशत अविद्या सारी। तीन लोकपति पूजत जाको ज़ान त्रिज़ग हितकारी ॥ नित०॥५॥ कोटि जीभसों महिमा जाकी, कहिन सके पविधारी । 'दौल' अल्पमति केम कहै यह अधम उधारनहारी॥नित ।।६।। . ॥ मत कीज़्योजी यारी, घिनगेह देह जड़ जानके, मतकी ॥ टेक।। गत तात रज वीरजसों यह; उपजी मलं फुलवारी । अस्थिमाल पलनसाजालंकी,लाल लाल जलक्यारी मतकी॥१॥ कर्पकुरंगथलीपुतली यह, मत्रपुरीष भंडारी । चर्ममँडी रिपुकर्मघड़ी, धनधर्मचुरोवनहारी ।। मनकी० ॥ २ ॥ 7 २४ दौलतराम भजन संग्रह। ॥ जेजेपावन वस्तु जगतमें, ते इनसर्व चिगारी। स्वेद मेद कफ क्लेद मई वह मदगद व्याल पिटारी, मतकी० ॥३॥ जा संयोग रोग भव तोलों ,जा बियोग शिवकारी । बुधता सॉन ममत्व कर यह मुढ़मतिनको प्यारी ॥ मतकी॥ ४॥ जिनपोषी ते भय सदोषी, तिनपाये दुख भारी । जिन तपठान ध्यान कर शोषी,तिन परनी शिवनारी॥ मतकी ॥५॥ सुर धनु शरदज़लद जल बुद बुद, त्यों झट विनशन हारी। यातें भिन्नजान निज चेतन, दोल' होहु शमधारी ।। मतकी॥६॥ ऐसा मोही क्यों न अघोगति जोवे, जाको जिनवानी न सहावै, ऐसा०॥ टेक ॥ वीतरागसे देव छो कर,भैरव यक्ष मनावै। कल्पलता दयालुता तजि हिंसा इन्द्रायणि वावै, ॥ ऐसा० ॥१॥ गुरू निर्ग्रन्थ भेप न रूचे बहु, परिग्रही गुरू भावै । परधन परतियको अभिला, अशन अशोधित खावै ॥ ऐमो० ॥ २॥ परकी विभव देख है सोगी, परदुख हर्ष लहावै। धर्महेतु इक दाम न खरच, उपवन लक्ष बहावै ॥ऐसा ॥३॥जो गृहमें संचय बहु अब त्यों, बनहूमें उप जावै । अम्बर त्याग कहोय दिगम्बर, बाघम्बर तन छावै॥ऐसा ॥१॥ धारंभतज़ शव यंत्रमंत्र करि,जनपै पूज्यं मनांव । घामबाम तज दासी राखे, बाहिर मढ़ी बनावै । ॥ ५॥ नाम घराय युती तपसी मन, विषयन में ललचावै । 'दौलत' सो अनंत भव भटके, औरनको भटकाव। ऐसा० ॥ ६॥ ऐसा योगी क्यों न अभयपद पावै, सो फेरन भवमें पावै।ऐसापटेका संशय विभ्रम मोह विवर्जित, स्वपर स्वरूप लखावै । ऐसा ५६ M .

३० दौलतराम भजन संग्रह। , लख परमातम चेतनको पुनि,कर्म कलंक मिटावै ॥ ऐसा योगी॥१॥ भवतन भोग विरक्त होय तन, नग्न सूभेष बनावैः । मोहविकार निवार निजातम,अनुभवमें चित लावै ।। ऐसा०॥ २ ॥ त्रस थावर बघ त्योग सदा परमाद दशा छिटकावै। रागादिक वश झूठन भाष, तृणहुंन अदत गहावै ॥ ऐसा०॥३॥ बाहिर नारि त्योग अंतर चिदब्रह्म सुलीन रहावे । परमाकिंचिन धर्मधारसा द्विविध प्रसंग बहावै ॥ ऐसा०॥४॥ पंचसमिति त्रयमूप्ति पाल व्यवहार चरण मग घावै । निश्चय सकल कषाय रहित है शुद्धातम थिर थावे ॥ ऐसा ॥५॥ कुंकुम पंक दास रिप पू तृण मणि व्याल माल सम भावै । भारतरौद्र कुध्यान बिडारे धर्मशुकलको ध्यावे ।। ऐसा० ॥ ६ ॥ जाके सुखसमाजकी महिमा, कहत इन्द्र अकुलावै । 'दौल' तासपद होय दास सो,विचलऋद्धि लहावै ॥ऐस ॥७॥ ६० लखोजी या जिय भोरेकी बातें, नित करत अहितहितघात । लखोजी०॥टेका।जिन गणघर मुनि देशवृती समकिती सुखी नीत जात । सो पय ज्ञान न पान करत न, अघात विषय विष खाते ॥ लखो०॥१॥ दुखस्वरुप दुखफलद जलदसम, टिकत न छिनक विलाते।तजत नजगत भजतं पतित नित रजत न फिरत तहांतें। लखो० ॥२॥ देह गेह घन गेह ठीन अति, अघसंचत दिनराते । कुगति विपतिफल कीन भीत निश्चित प्रमाददशाते।लखो॥३॥ कबहुं न होय 'ओपनो परद्रव्यादि पृथक चतुघारौं पै अपनाय दौलतराम भजन संग्रह। ३१ ॥ लहत दुख शठ नभ हतन चलावत लाते ॥ लखो० ॥४॥ शिव गृहद्वार सार नरभव यह, लहिदश दुर्लभताते ॥ खोवत ज्यों मणि काग उडावत, रोवत रंक, पनाते ॥ लखो० ॥ ५ ॥ चिदानंद निर्दै स्वपदतज, अपद विपद पद रातें। कहत सुशिख गुर गहत नहीं उर, चहत न सुख समता॥ लखो० ॥ ६ ॥ जैनवैन सुन भवि बहुभव हर, छुटे द्वंद दशातें॥ तिनकी सुथका सुनत न मुनत.न श्रोतम बोध कलाते। लखोग॥ ७॥ जे जन समुझि ज्ञानदृगचारित, पावन पयवर्षा तैं। ताप विमोह हरो तिनको जश 'दौल' त्रिभोन विख्यातें । लखो० ॥८॥ ६१ सुनो जियो ये सतगुरूकी बातें, हित कहत दयाल दयातें सुनो' ।। टेक ।। यह तन श्रान अचेतन है तू चेतन मिलत न यात। तदपि पिछान एक आतमको तजत न हट शठताते सुनो० ॥१॥ चहुंगति फिरत भरत ममताको विषय महा विष खातें । तदपि न तजत न रजत अभागे हगव्रतबुद्धिसुधाः ॥ सुनो० ॥२॥ मात तात सुत भ्रात स्वजन तुझ, साथी स्वास्थ नाते । तू इनकाज साज गृहको सब, ज्ञानादिक मत घात । सुनो० ॥३॥ तन, घन भोग संयोग सुपनसम, विलतै । ममत न कर भ्रमतज तू भ्रातो । अनुभव ज्ञान कलाते सुनो ॥ ४ ॥ दुर्लभ नरभव सुथल सुकुल है जिन उपदेश लहा । 'दौल' तजो मनसों ममता ज्यों निवडोदंद दशातोसुनो ॥५॥ 'बार न लगन दौलतराम भजन संग्रह। मोही जीवं भरमतमतै नहिं, वस्तुस्वरूप लखैहै जैसैं । मो० ठेक ॥ जे जे जड़ चेतनकी परनति, ते अनिवार परनवै वसैं । वृथा दुखी शर्ट कर विकलेंप यौं, नहिं परिनवें परिन ऐसे मोही० ॥ १ ॥ अशुचि सरोग समल जडमरत, लेखत बिलोत गंगनघन जैसैंसो तन ताहि निहार अपनपो चहत अवाधर है थिर कैसैं ।। मोही. ॥ २ ॥ सुत तियं बंधु वियोगयोग यौं, ज्यौं सराय जन निकस पैसैं ॥ बिलखत हरखत शठ अपने लखि, रोवत हँसत मैत्तजन जैसैं मोही ॥३॥जिन रवि वैन किरन लहि जिन निज, रूप सुभिन्न कियौ परमैसै सोजगमौल 'दौल' को चिरथित,मोहविलास निकास हदैसें ॥ मोही ॥४॥ ६३ ज्ञानी जीव निवीर मरमतम, वस्तुस्वरूप विचारत ऐसे ज्ञानी० ॥ टेक ॥ सुतं तियबंधु धनौदि प्रगट पर, ये मुझते हैं भिन्न प्रदेशैं । इनकी परनति है इनाश्रित, जो इन भावपरनवै वैसे ज्ञानी ॥१॥ देह अचेतन चेतन मैं इन, परिनति होय एकसी कैसैं । पूरनगलन स्वभावधरै तन, मैं अज अवल अमल नभ जैसे, ज्ञानी० ॥२॥ पर परिनमन न इष्ट अनिष्ट न, वृथा रागरुष बंद भयेसैं ।नसै ज्ञान निज फसै बंधमें, मुक्त होय समभावलयेसैं; ज्ञनी॥ ३ ॥ विषय चाहदवदाह नशै नहिं, बिन निज सुधा सिंधुमें पैसैं । अब निजदैन सुने श्रवनन , मिटै विभाव करू विधि तैसे, ज्ञानी॥ ४॥ ऐसो अवसर कठिन पाय.अब, निज

दौलतराम भजन संग्रह।
३३.
हितहेत विलंब करेसै । पछतावो बहु होय सयाने, चेतत 'दौल'
छुटै भवभयसे, ज्ञानी०॥५॥
.
६४
-
।
।
अपनी सुधि भूल अपि अाप दुख उपायो, ज्यों शुक नभ
चालविसरि नलिनी लटकायो, अपनी०॥टेक॥ चेतन अविरुद्ध
शुद्ध, दरशबोधमय विशुद्ध, तजिजडरसफरेसरूप, पुद्गल अपना
यो। अपनी०॥१।। इन्द्रियसुखदुखमें नित, पागरागरुख में चित
दायक भविविपतिबंद, बंधको बढायो, अपनी० २ चाहदाह दाहै,
त्यागौनताह चाहै, समतासुधांन गाहै, जिन, निकंटजो बतायो
अपनी० ॥ ४ ॥ मानुषभव सुकुलपाय, जिनवर शासन लहाय,
'दौल' निजस्वभावभज, अनादि जोन ध्यायो॥ अपनी ॥४॥
६५
जीव तू अनादिहीत भूल्यो. शिवगैलवा, जीव एक ॥ मोह
मद बार पियो स्वपद विसार दियो, पर अपनाय लियो, इंद्रीसुख
में रचियो, भवर्तन भयोगतजियो मन मैलवा। जीवन॥१॥मिथ्या
ज्ञान आवरण, परिकर कुमरणं; तीन लोककी धरण, तामें कियो
है फिरण पायो न शरण न लहायो सुख शैलवा ॥ जीव ॥२॥
अब नरभवपायो, सुथलसुकुलोयो, जिन उपदेश भायो। दौल.
झट छिट कायो परपरणतिदुखदोयिनी चुरैलवा ॥ जीव ०॥३॥

३४ दौलतराम भजन संग्रह। ६६ श्रापा नहिं जाना तूने कैसा ज्ञानधारी रे ॥ टेक॥ देहाश्रित करी क्रिया आपको मानत शिवमगचारी रे ।। आपा॥१॥ निजनिवेदविन घोर परीषह, विफल कही जिन सारी रे।। आपा० ।। शिवचाहे तो दिविषकर्म,कर निजपरणति न्यारी रे आपा०॥३॥ "दौलत" जिननिजभाव पिछोन्योतिन भवविपतिविदारीर श्रिा ६७ आतमरूप अनूपम अद्भुत याहि लखें भवसिंधुतरो ॥ टेक॥ अल्पकाल में भरत चक्रधर निज प्रातमको ध्याय खरो। केवलज्ञान पाय भवि बोधं ततछिन पायों लोकशिरो ॥श्रा०॥१॥ या विनसमझे द्रव्यलिङ्गो मुनि उग्र तपनकर भारभरो । नवनीवकपर्यन्त जाय चिर फेर भवार्णव माहिं परो प्रातः ||२|| सम्यदर्शन ज्ञान चरण तप येहि जगतमें सार नरो । पूख शीवको गये जाहिं अब फिर जे हैं यह नियतकरो॥श्रा०॥३॥ कोटिग्रन्थको सास्यही है येही जिनवानी उचरो ! "दौल"ध्याय अपने आतमको मुक्तिरमा तव बेग बरो प्रा०॥४॥ 4 ६८ - श्राप भ्रमविनाशश्राप आप जान पायो कर्णध्रत सुवर्णजिम चिता रचैन थायो । आप० ॥ टेक।। मेरो तन तनमय तन, मेरो में तनको, त्रिकाल योकुबोधनश सुबोध भानु जायौ। आप० ॥१॥ यह सुजैनवैन ऐन चिंतत पुन पुन सुनैन, प्रगटो अब भेद निज, निवेदगुण बढ़ायो॥ आप० ॥ २ ॥ योंही चित प्रचित मिश्र. - दौलतराम भजन संग्रह। ३५ ज्ञेय नअिहेय हेय, इंधन धनंज जैसे, स्वामियोग गायो, ॥ श्राप०॥ ६ ॥ भँवर पोत छुटत झटति वांछित तट निकटत जिमि; मोह राग रुख हर जिय शिवतट निकटायो । प्राप० ॥ ४ ॥ विमलासौख्यमय सदीव में हूं में नहिं अजीव; जोत होत रज्जुमय भुजंग भय भगायो ।प्राप० ॥५॥ यों ही जिनचंद सुगुन चिंतत परमार्थ चुन, “दौल भागजागोजब अल्पपूर्वप्रायो, ॥आप०॥६॥ विषयोंदा मद भान, ऐसा है कोई वे॥ वि०॥टेक॥ विषय दुःख पर दुखफल तिनको, यों नित चित्त न ठानै ॥ विष० ।। १।। अनुपयोग छपयोग स्वरूपी, तन चेतनको मानें ॥ विष० ॥२॥ वरणादिक रागादि भावतें, भिन्न रूप तिन जानैं । विष. ॥ ३॥ स्वपरजान रूपरागहान, निजमें निज परणति साने, विषयोंदा०॥ ॥ अंतर बोहरको परिग्रह तजि, 'दौल' बसै शिवथान ॥ विषयोंदो० ॥ ५ ॥ और सबै जगबन्द मिटावो, लौ लावो जिन ागम पोरीं। और० ॥ टेक ॥ है असार जगदन्द बंधकर, ये कुछ गरज न सारत तोरी । कमला चपला यौवन मुरधनु, स्वजन पथिकजन क्यों रति जोरी ॥और० ॥ १॥ विषयकषाय दुखद दोनों भव, इनतें तोर नेहकी डोरी। परद्रव्यनको तू अपनावत, क्यों न तजै ऐसी बुधि भोरी ॥ और० ॥ २॥ बीतजाय सागरथिति सुरकी, नर परजाय तनी अति थोरी । अवसरपाय 'दौल' अब चूको, फिर नै मिलै मणि सागर बोरी । और ॥ ३ ॥ ॥

३६ दौलतराम भजन संग्रह। ७१ ७२ और अबै न कुदेव सहावें, जिन थांके चरनन रेत जोगे। और० ॥ टेक ॥ काम कोहवश गहै अशन अमि, अंक निशंक धरैतियगोरी। औरनके किम भाव सुधारें,आप कुभावभारंधर घोरी। और० ॥ १॥ तुम विनमोह अकोह छोहविन, छके शांतरस पीय कटारी । तुम तज सेय अमेय भरी जो, जानत हो विपदी सब मोरी । और०॥ २॥ तुम तज तिनैं भजै शठ जोसो, दाख न चाखत खोत निमोरी । हे जगतार ? उधार दौल' को, निकट विकट भवजलधि हिलोरी ॥ और० ॥ ३ ॥ कवधों मिलें मोहि श्रीगुरु मुनिवर, करि हैं भवदधि पारा हो । कबधों ॥ टेक ॥ भोग उदास जोग जिन लीनो, छांड परिग्रह- भारा हो। इंद्रिय दमन वमन मद कीनो, विषय कषाय निवारो हो॥ कबंधों ॥१॥ कंचन काच बराबर जाके, निंदक वंदक सारा हो। दुर्धरतपतपि सम्यक निजघर,मन वच तनकर धारा हो। कबधों ॥२॥ ग्रीषमगिरि हिमसरितातीरें, पावसंतरूतर ठारा हो । करुणा- भान चीन त्रसथावर, इर्यापंथ समारा हो। कबधों ॥३॥ मार मार व्रतधार शोल दृढ़, मोहू महामल टारा हो । मास छमास उपास वासवन, प्राशुक करत अहारो हो। कबधों०॥४॥धारत- रौद्रे लेश नहिं जिनके, धर्म शुकल चित धारी हो । ध्यानारूढ़ गूढ निज उपयोग विचारा हो॥ कबधों० ॥ ५ ॥ ओप तरहिं औरनको तारहिं, भवजलमिन्धु अपारा हो । 'दौलत' ऐसे जैनजतिन को, नितप्रतिधोक हमारा हो । कवों ॥ ६ ॥ श्रातम, शुध दौलतराम भजन संग्रह। ७३ कुमति कुनारि नहीं है भलीरे, सुमति नारि सुन्दर गुणवाली। कुमतिः ॥ टेक ॥ वासों विरचि रचौ नित यासों, जो पावो शिव- धाम गलीरे । वह कुवजा दुखदा यह राधा, बाधा टारन करन रलीरे । कुमतिः ॥ १॥ वह कारी परसों रतिठानत, मानत नाहि नसीख भलीरे। यह गोरी चिदगुणसहचारिन, रमत सदा स्वसमा- घि थलीरे ॥ कुमति० ॥६॥ वासंग कुथल कुयोनि बस्यो नित, तहां महादुख बेल फलीरे। यासंग रसिक भविनकी निजमें, परि- पति 'दौल' भई न चलीरे ॥ कुमति ॥ ३ ॥ J । ७४ गुरु कहत सीख ईमवारवार, विषसम विषयनको टार टार। विष० ॥ टेक ॥ इन सेवत अनादि दुख पायो, जनम मरण बहु धारधार। विप० ॥ १॥ कर्माश्रित बांधा जुत फांसी, बंधवदावन बंदकार ॥ विष० ॥ २ ॥ ये न इन्द्रिके तृप्तिहेतु जिम, तिस न बुझावत क्षारखार ।। विष० ॥ ३॥ इनमें सुख कल्पना अबुधके, बुधजन मानत दुख प्रचार, विष० ॥ ४ ॥'इन तजि ज्ञानपियूष चख्यो तिन, 'दौल' लही भववार पार, विष० ॥ ५ ॥ घड़ि घड़ि पल पल छिन छिन निशदिन,प्रभुजीका. सुमरण करले रे॥ घड़ी० ॥ टेक ।। प्रभु सुमरेत पाप कटत हैं, जन्म मरण दुख हरले रे॥ घडि घड़ि०॥ १ ॥ मन वचकाय लगाय चरणचित,ज्ञान हिये विच धरले रे ॥ घड़ि घड़ि॥२॥ दौलतराम,धर्मनौकाचदि, भवसागरतें तिरले रे । घड़ि घड़ि० ॥ ३ ॥ १५

३८
दौलतराम भजन संग्रह।
७६
ते
चिन्मूरत दृग्धारीकी मोहि रीति लगत है अटापटी । चिन्मू० पाटेका
बाहिर नारकिकृतदुख भोगें, अंतर सुख रस गटा गटी ।
स्मत अनेकसुरनसंग तिस, परणतितें नित हटाहटी। चिन्मू० ॥१॥
ज्ञान विराग शक्तितें विधिफल, भोगत 4 विधि घटाघटी।
सदननिवासी तदपि उदासी,तातें श्रोस्रव छटाछटी॥ चिन्मू० ॥२॥
जे भवहेतु अबुधके ते तस, करत बन्धकी झटाझटी।
नारक पशू तिय षण्ट विकलत्रय, प्रकृतिनकी है कटाकटी॥चि०॥३॥
संयमघरन सकै मैं संयम-धारनकी उर चटो चटी।
तास सुयशगुणकी 'दौलत'के, लगी रहे नित स्टारटी । चि० ॥ ४ ॥
चेतन यह बुधि कौन सयानी, कही सुगुरुहित सीख न मानी,
टेक ॥ कठिन काकताली ज्यों पायो, नर भव सुंकुल श्रवण-
जिनवानी ॥ चेतन० ॥१॥ भूमि न होत चांदनी की ज्यों, त्यों
नहिं धनी ज्ञेयको ज्ञानी । वस्तुरूप यों तू यों ही शठ, हटकर
पकरत सोंज विरोनी।। चेतन. २॥ ज्ञानी होय अज्ञान राग:
रुष, कर निन सहज स्वच्छता हानी । इन्द्रिय जड़ तिनविषय
अचेतन, तहां अनिष्ट इष्टता ठानी। चेतन० ॥३॥ चाहे सुख
दुख ही अवगाहै, अब सुनि विधि जो है सुखदानी । 'दौल'
आपकरिश्राप आपमें,ध्यायल्याय लय समरस सानी॥चेतन ॥४॥
99
95
चेतन कौन अनीति गहीरे, न मानै सुगुरु कहीरे । चेतन० ॥
जिन विषयनवश बहुदुख पायो, तिनसों प्रीति उहीरे, चेतन० ॥१॥

दौलतराम भजन संग्रह। ३६ चिन्मय है देहादि जड़नसों, तो मति पागिरही रे । सम्यग्दर्श- नज्ञानभाव निज, तिनको गहत नहींरे। चेतन ॥२॥ जिनवृष पाय विहाय रागरुष, निजहितहत यही रे। 'दौलत' जिन यह सीख धरी उर, तिन शिव सहज लही रे॥ चेतन० ॥३॥ ७8 चेतन तें योंहीभ्रम ठान्यों,ज्यों मृग मृगतृष्णाजल जान्यो। ॥ टेक ॥ज्यों निशितम में निरख जेवरी, भुजग मान नर भय उर अान्यो॥ चेतन ॥ १ ॥ ज्यों कुध्यान वशि महिष मान निज, फसि नर उरणही अकुलान्यो । त्यों चिर मोह अविद्या परयो, तेरो ते ही रूप भूलोन्यो । चतन० ॥ २॥ तोय तेल ज्यों मेल न तनको, उपज खपजमें सुखदुख मान्यो। पुनि परभावनको करता है, ते तिनको निज कर्म पिछान्यो।। चेतन० ॥ ३॥ नरभव सुथल सुकल जिनवानी, काललब्धिबल योग मिलान्यो। 'दौल' सहज भज उदासीनतो,तोष रोषदुखकोष जुभान्यो॥चेतन ॥४॥ CO चेतन अब धरि सहजसमाधी, जातेंयह विनशै भवव्याधी, चेतनः ॥ टेक ॥ मोह ठग्योरी खायके रे परको आपा जान । भूल निजातम ऋद्धकोते, पाये दुःख महान, चतन० ॥१॥ सादि अनादि निगोद दोयमें, परयो कर्मवंश- जाय । श्वासउ- श्वासमझार तहां भव, मरन अठारह थाय॥ चेतनः ॥२॥काल- अनंत तहां यों वीत्यो, जब भई मंद कषाय । भू जल अनिल अनल पुन तरु है, काल असंख्य गमाय चतनशा क्रमक्रम - ४० दौलतराम भजन संग्रह। ॥ निकसि कठिन तैं पाई, शंखादिक पर जाय। जल थल खचर होय अघ ठगने, तसवश शुभ्र लहाय ॥ चेतनः ॥४॥तित सागर लों बहु दुख पाये, निकस कबहु नर थाय। गर्भ जन्मशिशुनरुणवृद्ध दुख, सहे कहे नहिं जाय। चेतन० ॥५।। कबहूं किंचित पुण्य- पाकतें, चउविधि देव कहाय । विषय श्राश मनत्रासलही तह, मरण समय विललाय ॥ चेतन०॥६॥ यों अपार भवखारवार में, भ्रम्यो अनंते काल । 'दौलत' अब निजभाव नावचढ़ि, लै भवाब्धिकी पाल ॥ चतन०॥७॥ ८१ जिन गगदोषत्यागा वह सतगुरू हमारा॥जिनराग० ॥ टेक ॥ तज राज रिद्ध तृणवत निज कार्य संभारा।जिनराग० ॥ १॥ रहता है वह वनखंडमें, घर ध्यान कुठोरा । जिन मोह महा तरुको, जढमूल उखारा॥ जिनराग० ॥ २ ॥ सर्वाङ्गतज परिग्रह, दिग अंबरधारा । अनंतज्ञानगुणसमुद्र, चारितभंडारा ॥ जिनराग० ॥ ३ ॥ शुक्लाअग्निको प्रजाल के वसुकानन जारी। ऐसे गुरुको 'दौल' है नमोऽस्तु हमारी ॥ जिनराग० ॥ ४ ॥ चिदरायगुण मुनो सुनो,प्रशस्त गुरु गिरा। समस्त तज विभाव हो स्वकीयमें थिरा ॥ चिदः ॥ टेक ।। निजभावके लखोवविन, भवाब्धि में परो । जामन मरण जरा त्रिदोष, अग्निमें जरी ॥ चिदः॥१॥ फिरसादि ओ अनादि दो, निगोद में परा। ८२ दौलतराम भजन संग्रह। . ८३ तहँ अंकके असंख्य भाग, ज्ञान उवरा ॥ चिद ॥२॥ तहां भव अंतर मुहतके, कह गणेश्वरा । छयासठसहस त्रिशत, छत्तीस जन्म घर मरा, चिद०॥३॥ यों वशि अनंत काल फिर, तहांतें नीसरा भूजल अनिल अनल प्रत्येक तरु में तनुधरा, चिद० ॥ ४ ॥ अनुधरीसु कुंथ कान मच्छ अवतरा । जल थल खचर कुनर नरक, असुर उपज मरा, चिद ॥५॥ अबके सुथल सुकुल सुसंग बोध लहि खरा । दौलत' त्रिरत्नसाध लाध, पद. अनुत्तरा, चिद० ॥६॥ चताचतक चिदेश कव अशेष पर वमू । दुखदा अपार विधिदुचारकी चमूदमू, चितचिं० ॥ टेक ॥ तजि पुण्यपाप थाप श्राप आप में रम । कब राग आग शर्मबागदागनी शम', चितचिंतकै ॥१॥ गज्ञानभानतें मिथ्या अज्ञान तम दमू। कव सर्वजीव प्राणि भूत सत्वसों क्षमू॥चितचिंतकै ॥ २॥जल- मल्ललिप्त कल सुकल सुबल्लपरिणम । दलकें त्रिशल्लमल्ल कब अटल्लपदमू॥चितचिंतक॥ ३॥ कव ध्याय अज अमरको फिर न भवविपिनभमू। जिनपूर कौल 'दौल'को यह हेतु. है नम, चितचिंतके० ॥ ४ ॥ जिन छाव लखत यह बाध भयी ॥ जिन० ॥ टेक ॥ मैं न देह चिदंकमह तन, जड़, फरसरसमयी, जिनचवि०॥ १॥ प्रशभ शुभ फल कर्म दुखसुख, पृथकता सब गयी।

૨૨
दौलतराम भजन संग्रह।
रागदोषविभाव चालित, ज्ञानता थिर थयी ।। जिनछवि० ॥२॥
परिगह न पाकुलतादहन, विनसि शमता लयी।
'दौल' पूषअलभ श्रानंद, लह्यो भवथित जयी। जिन० ॥३॥
८५
जिनवैन सुनत
मोरी
भूल
भगी। जिनवैन० ॥टेक॥
कर्मस्वभाव भावचेतनको भिन्न पिछानन सुमति जगी।जिन० ॥१॥
निजअनुभूति सहज ज्ञायकता सो चिर रुषतुषमैल पगी ॥
स्यादवाद घुनि निर्मल जलते विमल भयी समभाव लगी।जि०॥२॥
संशयमोह भरमंता विघटी प्रगटी बातमसोज सगी ।
'दौल' अपूरब मंगलपायो शिवसुख लेनहोंस उमगी॥जि० ॥ ३ ॥
8
.
C
.
'राचि रहयो परमहिं तु अपनो रूप न जानै रे
राचि रहयो० ॥ टेक ॥ अविचल चिन्मूरत विनमरत सुखी होत
तस ठानै रे॥ रोचि रह्यो० ॥१॥ तनघन भ्रात तात सुत जननी
तू इनको निज जानै रे । ये पर इनहिं वियोग योग में योही सुख
दख मानै रे राचि०॥२॥ चाह न पाये पाये तृष्णा सेवत ज्ञान
जघानै रे। विपति खेत विधिबंध हेत-4 जोन विषय रेस खानै
रे॥ राबि० ॥ ३ ॥ नरभव जिनश्रुत श्रवणपाय अब कर निज
सुहित सयानै रे। दौलत आतम ज्ञान सुधारम पीवो सुगुरू बखानै
रे।राचि रह्यो ॥४॥

दौलतराम भजन संग्रह।
४३
।
तु काहेको करत रति तनमें यह अहितमल जिम कारीसदन,
त काहेको० ॥ टैक ।। चरमपिहित पल रुधिरलिप्तमल द्वारस्रवै
छिनछिनमें ॥ तू काहेको० ॥१॥ आयुनिगड फसि विपति भरै सो
क्यों न चितारत मनमें । त काहेको ॥२॥ सुचरण लाग साग
अव याको जो न भ्रमें भववनमें ॥ तू काहेको० ॥३ 'दौल; देहसों
नेह देहको हेतु कह्यो ग्रंथनमें । तू काहेको० ॥ ४ ॥
धन घन साधर्मी जनमिलनकी घरी, बरसत भ्रमताप हरन
ज्ञानघनझरी ॥ टेक ॥ जाके विन पाये भवविपति अति भरी
निजपरहित अहितकी कछ न सुध परो॥ घन० ॥ १ ॥ जाके
परभाव चितसुथिरता करी संशय भ्रम मोहकी सुवासना टरी। घन
।। २ ॥ मिथ्या गुरुदेवसेव टेव परिहरी वीतरागदेव सुगुरुसेव उर-
धरी धनः ॥ ३॥ चारों अनुयोग सुहित देश दिटपरी शिवमग
के लाहकी सुचाह विस्तरी घन० ॥ ४ ॥ सम्यक तरुपरनि येह
करन करि हरी । भवजलको तरनि समरें भुजगविषजरी धन
॥ ५ ॥ पूरवभव या प्रसाद. रमनि शिववरी, सेवोअव दौल याहि
बात यह खरी । घन ॥ ६ ॥
९२
पनि मुनि जिनकी लगी लौ शिवऔरन पनि ॥ टेके ।।
सम्यग्दर्शनज्ञानचरननिधि घरत हरत भ्रमचोरन ॥ धनि०॥ १||
यथाजातमुद्राजुत सुंदर सदन विजन गिरिकोरने, तृण कंचन
अरि स्वजनगिनत सम निंदन और निहारने ॥ धनिः ॥ २ ॥

दौलतराम भजन संग्रह। भवसुखचाह सकल तजि बल सजि करत दिविध तप घोरने । परमविरागभाव पवितें नित चरत करम कठोरनै॥ धनि० ॥३॥ छीन शरीर न हीन चिदानन मोहत मोह झकारनै । जगतपहर भविकुमुदनिशाकर मोदन दौल चकोरने ॥ घनि० ॥ ४ ॥ धुनि मुनि जिन यह भाव पिछाना, धनि मुनि० ॥ टेक ।। तनव्यय बांछित प्रापति मोनी, पण्यउदय दुख जानौ ॥धनि ।। एकविहार सकल ईश्वरता, त्याग महोत्सव माना। सब सुम्वको परिहार सारसुख, जानि रागरुषभाना ॥ पनि० ॥२॥ चितस्वभावको चिंत्य प्राणनिज विमलज्ञान हगसाना । 'दौल' कौन सुख जान लह्यो तिन करो शांतिरसपानो॥धनि०३। धन मुनि निजातमहित कीना, भव असार तन अशुचि विषय विष जान महाव्रत लीना । घन मुनि जिन अतिमहित कीनी ।। टेक ॥ एकाविहारी परिगहकारी, परीसहसहत अरीना पूरखतन तप साधन मान न, लाज गनी परवीना ॥ धनमुनि १॥ शून्य सदन गिर गहन गुफामें, पदमासन आसीना। परभावन त भिन्नाप पद, ध्यावत मोहविहीना॥ धनमुनि स्वपरभेद जिनकी बुधि निजमें, पागी बाहयलगीना | 'दौल' तास पदवारिजरजने, किस अघ करे न छीना ॥ धनमुनि० ३ निपट अयानात पापा नहि जानो, नाहक भरम भुलाना बे, निपटः ॥ टेक॥ प्रीय अनादि मोहमद मोह्या, परपद में निज

दौलतराम भजन संग्रह।
४५
९६
माना व ॥ निपट० ॥ १॥ चतन चिन्ह भिन्न जड़तासों, ज्ञान
दरंशरससाना वेतनमें छिप्यो लिप्यो न तदाप ज्यों, जलमें
कजदल मानावे,॥ निपट० ॥२॥ सकलंभावनिज निजपरणतिमय,
कोइ न होय विरानोवे । तू दुखिया परकृत्यमोन ज्यों, नभताड़न
श्रम ठाना चे ॥ निपट० ॥ ३ ।। अजगण में हरि भूल अपनपो
भयो दीन हैराना वे । 'दौल' सुगुरुधुनि सुनि निजमें निज, पाय
लहयो सुखथाना बे ॥ निपट• ॥ ४ ॥
निजहितकारज करना रे भाई ॥ टेक ॥
जन्ममरण दुखपावत यातें, सो विधि बंध करतनारेभाई ० ॥१॥
ज्ञानदरस अरु रागफरसरम, निजपरचिन्ह भ्रमरना।
संधि भेद बुधिछैनीत कर, निजगहि परपरिहरना ।। रेभाई० २
परिग्रही अपराधी संके, सागी अभय विचरना ।
त्यों परचाह बंधदुखदायक, त्यागत सब सुखभरना ॥ रे भाई.३
जो भवभ्रमण न चाहे तो, अत्र सुगुरुशीख उर घरना ।
'दौलत' स्वरस सुधारसवालो, जो विनसै भवमरना।। रेभाई.
९७
मनवचतनकर शुद्ध-भजी जिन, दाव भला पाया । अवसर
फेर मिले नहिं ऐसा, यों सतगुरगाया ॥ मनश्च० ॥ टेक ॥
वस्यो अनादि निगोद निकशि फिर, थायर देह धरी ।
काल असंख्य काजगायो, नेक न समझ परी।।मनवच० १||
चिंतामणि दुर्लभ लहिये ज्यों, उसपरजायलही । लटपिपील
अलिबादि जन्ममें, लह्यो न ज्ञान कहीं ॥ मनवच० ॥ २ ॥

४६ ६ दौलतराम भजन संग्रह। पंचेंद्रिय पशु भयो कष्टते, तहांबोधन लयो। स्वपरविवेकरहित विन संयम, निशदिन भार बह्यो । मनवचः ॥३॥चौपथ चलतरतन लहिये ज्यों, मनुषदेह पाई । सुकुल जैनबृष सतसंगत यह,, अति दुर्लभ भाई ॥ मनवच ॥ ४॥यों दुर्लभ नरदेह कुधीं जो विषयन संग खोवै । ते नर मूढ़ अनान सुधारस पाय पांव धोवें, मनवच० ॥ ५॥ दुलैभनरभवपाय सुधी जे, जैनधर्म सेवें, दौलत ते अनंत अविनाशी, सुख शिवका बेचें ॥ मनवच० ॥ ६ ॥ मोहिडारे जिय हितकारी न सीख सम्हारे । भवानभ्रमत दुस्ली लखि याको, सुगुरु, दयाल उचारै ॥ टेक ॥ विषय भुजंगमसंग न छोडत, जो अनंतभव मार। ज्ञान विराग पियूष न पीवत, जो भवव्याधिविडारै ।। मोहि० ॥१॥ जाके संग दुरे अपने गुण, शिवपद अंतर पारे । ता तनको अपनाय आपचिन, मूरतको ननिहारै ॥ मोहि० ॥२॥ सुत दोरा धन काजीज अघ, अोपनकाज विगारै । करत आपको अहित प्रापकर, लय कृपाण जलदारै ।। मोहि० ॥३॥ सही निगोद नरेक की वेदन, वे दिन नाहि चितारै । 'दौल' गई सो गईअब हू तर, घर हग चरण सम्हार रे॥ मोहि०॥४॥ मेरे कब है वा दिनकी सुघरी, मेरो० ॥ टेक ॥ तन बिनवसन असनविन वन में, निवसों नासादृष्टिधरी, मेरे०१।। पुण्यपापपरसों कब विरंचों, परचों निजनिधि चिरुविसरी । तज उपाध सजि सहजसमाधी, सहों घामहिममेघझरी, मेरे०।२।। बह -

दौलतराम भजन संग्रह।
४७
कर थिरजोग घरों ऐसों मोहि, उपल जान मृग खाज हरी ।
ध्यानकमानतान अनुभवसर, छेदों किहि दिन मोह अरी। मेरे०३
कब तृणकंचन एक गनों अरु, मणिजड़ितालय शैलदरी।
'दौलत' सतगुरुचरनसेव जो, पुरखो श्राश यह हमरी ॥ मेरे० ३
१००
लाल कैसे जावोगे, असरनसरन कृपाल । लाल० ॥ टेक ॥
इक दिन सरस वसंतसमयमें, केसवकी सब नारी । प्रभुप्रदक्षणा
रूप खरी है, कहत नेम परवारी || लाल. ॥१॥ कुकुमलै
मुखमलत रुकमनी, रङ्गछिरकत गांधारी । सतभामा प्रभुओर जोर
कर, छोरत है पिचकारी । लाल० ॥ २ ॥ व्याह कबूल करो
लौ छूटो, इतनी अरज हमारी । ओंकार कहकर प्रभु मुलके, छाड़-
दिये जगतारी ॥ लाल० ॥ ३ ॥ पुलकित बदन मदन पितु
भामिनि, निज निज सदनसिधारी । 'दौलत' जादववंश व्योम
शशि, जयो जगत, हितकारी | लाल॥ ४ ॥
,
१०१
शिवपुरकी डगर समरससों भरी, सो विषयविरसरचि चिरवि
सरी । शिव० ॥टेक ॥सम्पकदरशबोधव्रतमय भव, दुखदावानल
मेघझरी ॥ शिवपुर० ॥ १॥ ताहि न पाय तपाय देह बहु, जनम
मरन कर विपति भरी । कालपाय जिनघुनिसुनि मैं जव, ताहि
लहूं सोई धन्य घरी ।। शिव० ॥ २ ॥ तेजन धनिया माहिं चरत
मित, तिन कीरतिसुरपति उचरी ॥ विषयचाह भवराह साग अव
'दौल' हरो रजरहसिअरी । शिवपुर० ॥ ३ ॥

दौलतराम भजन संग्रह। १०२ १०३ तोहि समझायो सौ सौ बार, जिया ताहि समझायो रे सौ सौ बार० ॥ टेक ॥ देख सुगुरुकी परहितमें रति, हितउपदेश सुनायो रे ॥ सौ सौ बार० ॥ १ ॥ विषयभुजंगसेय सुखपायो, फुनि तिनसों लपटायो रे । स्वपदविसार रच्यो परपद में, मदरत ज्यों बोरायो रे ॥ सौ सौ वार० ॥ २॥ तन धन स्वजन नहीं हैं तेरे, नाहक नेह लगायो रे। क्यों ने तजै भ्रम चाख समामृत, जो नित संतसुहायो रे ॥ सौ सौ बार० ॥३॥'अब हूं समझ कठिन यह नरभव, जिनवृष विना गमायो रे । ते विलखें मणिडार उद- घि में, "दौलत” को पछतायो रे ॥ सौ सौ० ॥ ४ ॥ न मानत यह जिय निपट अनारी, सीखदेत सुगुरु हितकारी न मानत. ॥ टेक ॥ कुमतिकुनारिसंग रतिमानत, सुमतिसुनारि विसारी॥न मानत. ॥ १॥ नरपरजायसुरेश चहैं सो, चख विषविषय विगारी । त्याग अनाकुल ज्ञान चाहपर, अोकुलतो विस्तारी ॥ न मानतः ॥२॥ अपनी भूल भोप समतानिधि भव दुख भरत भिखारी॥ परद्रव्यनकी परणतिकोशठ; बृथा बनत करतोरी ॥न मानत. ॥३॥ जिस कषायदवजरत तहाँ अभि- लोष छटाघृतडारी। दुखसों डरै करै दुखकारंनत, नितप्रीति करारी । न मानत०॥ ४॥ अतिदुलम जिनबैन श्रवणकर, संशय मोह निवारी । “दौल स्वपरहित अहितजानके हो वहूशिवमगचारी । नमानतः ॥ ५ ॥ UP . - दौलतराम भजन संग्रह। ४६ १०४ 4 १०५ जिनवानी जान सुजान रे जिनवानी० ॥ टेक ॥ लागरही चिरतें विभावता ताको कर अवसानरे। जिनवा ||१|| द्रव्यक्षेत्र अरकालभावकी कथनीको पहचान रे । जाहि पिछानेस्वपरभेद सब जाने परत निदानरे। जिनवानीगा। पूरब जिन जानी तिनहीने भानी संसृतवान रे। अब जाने अरु जानेंगेजेते पावशिवथान रे।। जिनवानी॥३॥ कह 'तुपमाष' मुनि शिवभूती पायो केवल ज्ञान रे। यो लखि 'दौलत' सतत करो भवि चिदचनामृतपान जिणा॥ जम भान अचानक दागा जम भा०॥ टेक। छिनछिन कटत घटत थित ज्यों जल अंजुलिको झरजावेगा। जम अान. ॥ १॥ जन्म तालतरुते पर जियफल कोलग बीच रहावेगा। क्यों न विचार करें नर आखिर मरणमही में आवैगाजम पान. ॥ २॥ सोवत मृत जागत जीवत ही श्वासा जो थिर थावेगा। जैसे कोऊ छिपे सदासौं कबहूं अवशि पलावैगा। जम आन० ॥३॥ कहूं कबहुं कैसें ह कोऊ अंतकसे न वचावेगा। सम्यगज्ञान पियूषपियेसों दौल' अमरेपद पावैगा । जम आन० ॥ ४ ॥ छाड़त क्यों नहींरे हेनररीति अयोनी,वास्वार सिखदेत सुगुरु यह तू दे आनाकानी ॥ छाड़त० ॥टेक ॥ विषय न तजत न भजत वाघ ब्रत दुखसुखजाति न जानी । शर्म चहै न लहै शट ज्यों घृत,-हेत विलोक्त पानी ।। छाड़त० ॥१॥ तन धन सदन १०६ - - - - - ५० १०७ दौलतराम भजन संग्रह। स्वजन जन तुझसों, यह परजाय विरानी । इन परनमन विनस उपजनसों, तें दुख सुखकर मानी, छाड़त०॥ २॥ इस अज्ञानतें चिरदुख पाये, तिनकी अकथ कहानी। ताको तज दृग ज्ञानचरन भज, निजपरणति शिवदानी, छाड़त० ॥३॥यह दुर्लभ नरभव सुसंगलहि, तत्वलेखावनबानी । 'दौल' न कर अब परमें ममता, घर समता सुखदानी, छाड़त० ॥ ४ ॥ हम तो कवहूं न हित उपजाये, सुकुलसुदेवसुगुरूसुसंगहित कारनपाय गमाये, हमतो० ॥टेका। ज्यों शिशु नाचत आप न माचत, लखनहार बौराये। त्यो श्रुतबांचत श्राप न रोचत औरन को समुझाये, हम तो०॥१॥ सुजसलाहकी चाह न तज निज प्र भुतालखि हरखाये॥ विषय तजे न रजे निजपदमें, परपदअपद लुभाये । हम तो० ॥२॥ पापत्याग जिन जाप न कीन्हों, सुमन चापतपताये । चेतन तनुको कहत भिन्न पर, देह सनेही थाये। हम तोगा३॥ यह चिर भूल भई हमरी अब, कहा होत पछताये 'दौल, अजों भवभोगरचौ मति, यों गुरूबचन सुनाये,हम तो ॥४ हम तोकबहूँ न निजगुनभाये, तननिज मान जोन तनदुख- सुखमें विलखे हरखाये, हम तो गाटेक।। तनको गरन मरन लखि तनको, घरनमान हम जाये। या भ्रमभौर पर भवजल चिर, चहुंगसिविपत लहाये, हम तो। १।। दरशबोधव्रत सुधा न चाख्यो विविध विषयविषखायो सुगुरुदयाल सीखदई पुन पुन, सुन सुन उरनहिं लाये । हम तो ॥२॥बहिरातमता तजी, न अन्तरदष्टि १०८

५१
२०
4
दौलतराम भजन संग्रह।
न है निजध्यायो घामकामधनरामाकी नित, मासहुतासजलाये।
हम तो ॥३॥अचल अनूप शुद्धचिद्रूपी, सवसुखमय मुनि गाये।
'दौल' चिदानंद स्वगुण मगन जे,तेजीय सुखिया थाये,हम तो।।
हम तोकबहूं न निज घर आये परघर फिरत बहुत दिन बीते
नाम अनेक घराये । हम तो० ॥टेका। परपदनिजपद मान मगन
है, परपरणतिलपटाये । शुद्धबुद्ध सुखकंद मनोहर, चेतनभाव न
'भाये. हमे तो ॥१॥नरपशुदेव नरक निजजान्यो परजयबुद्धि ल-
हायो।अमल अखंड अतुल अविनाशी श्रातमगुण नहिं गायो
हम तो० ॥२॥ यह बहु भूल भई हमरी फिर कहाँ कान पछतायो
'दोल' तजो अजहूं विषयन को सतगुरूवचनसुनायो। हम तो।३।।
११०
मानत क्यों नहिं रे हे नर सीख सयानी।
भयो अचेत मोहमदपीके, अपनी सुधविसरानी, ॥ टेक ।।
दुखी अनादि कुबोध अवततें, फिर तिनसों रति गनी।
ज्ञानसुधा निजभाव न चाख्यो, परपरणतिमतिसानी, मा० ॥१॥
भव असारता लखै न क्यों जहँ, नृप है कृमिविट थानी ।
सधन निधन नृपदोस स्वजन रिए, दखिया हरिसे पानी, मा ०॥२॥
देह येह गदगेह नेह इस है, वह विपतिनिसानी।
जड़ मलीन छिनछीन करमकृत बंधन शिवसुखहानी, मान ||३
चाहज्वलन ईंधनविधिवनघन , अाकुलता कुलखानी ।
ज्ञानसुघोसरशोषन रवि ये, विषय अमितमतदानी, मानत०॥४॥

दौलतराम भजन संग्रह।
५२
यो लखि भवतनभोगविरचिकरि, निजहितसुन जिनवानी ।
तज रुषराग 'दौल' अब अवसर, यह जिनचंद्रवखानी॥०॥५॥
.
१९९
जानत क्यों नहीं रे, हे नर आतमज्ञानी, जानत० ॥ टेक ॥
रागदोषपुद्गलकी संपति, निहचै शुद्धनिसानी, जानतः ॥ १ ॥
जाय नरकपशुं नर सुरगतिमें, यह परजाय विरानी ।
सिद्धसरूप सदा अविनाशी,मानत विरले पानी, जान० ॥२॥
कियो न काह हरे न कोई, गुरुशिख कौन कहानी।
जनममरनमलरहित विमल है, कीचविना जिम पानी,जा०॥३॥
सारपदास्थ है तिहुजगमें, नहिं क्रोधी नहिं मानी।
'दौलत' सो घटमाहिं विराजे, लखि हजै शिवथानी, जान०॥४॥
--
११२
।
हे हितबांछक पानी रे कर यह रीति सयानी, हे हित० ॥ टेक ॥
श्री जिनचरनचितार घार गुण, परम विराग विज्ञानी, हेहित०॥१॥
हरनभयामय स्वपरदयामय, सरधो वृष सुखदानी।
दुविध उपाधि बाघ शिवसाधक,
सुगुरु भजो गुणथानी, हे० ॥२॥
मोहतिमर हर मिहर भजो श्रुत, स्यात्पद जास निशानी ।
सप्ततत्व नव अर्थ विचारहु, जो बरने जिनबानी, हेहितः॥ ३ ॥
निजपर भिन्न पिछान मान पुनि, होहु आप सरधोनी ।
जो इनको विशेष जानन सो, ज्ञायकता मुनि मानी,हे हित०॥४॥
फिर बत समिति गुपत सजि, अरु तज प्रवृत्ति शुभास्रवदानी ।
शुद्ध स्वरूपाचरन लीन है, 'दौल'वरो शिवरानी, हे हित ॥५॥

५३ . दौलतराम भजनसंग्रह। ११३ हे नर भ्रमनींद क्यों न छाड़त दुखदाई, सोवत चिरकाल सोंज आपनी ठगाई, हेनर० ॥ टेक॥ मरख अघ कर्म कहा भैदै नहिं मर्म लहा, लोगै दुखज्वालकी न देहके तताई, हे नर० ॥ १ ॥ जमके व बाजते, सुभैरव अति गाजते, अनेक प्रान सागते सुनै कहा न भाई, हेनर० ॥२॥ परको अपनाय, आप रूपको भुलाय, हायकरनविषय दारु जार चाहदों बढ़ाई, हेनर० ।। ३।। अब सुन जिनबान रागद्वेषको जघान, मोक्षरूप निज पिछान, 'दौल' भज विरागताई, हेनर०॥ ४ ॥ प्रभु थारी आज महिमा जानी, प्रभु थारी ॥ टेक ॥ अबलों मोह महामद पिय मैं, तुमरी सुधि विसरानी। भाग जगे तुमशांति छबीलखि, जड़ता नींद विलानी, प्रभुः ॥१॥ जंग विजयी दुखदाय रोगरुष तुम तिनकी थिति भानी। शान्तिशुधासागर गुणिनागर, परमविराग विज्ञानी, प्रभुः।।२।। समवशरण अतिशय कमलोजुत, पै निर्ग्रन्थ निदानी। क्रोधविना दुठ मोह विदारक, त्रिभुवन पूज्य अमानी, प्रभुः ॥३॥ एक स्वरूप सकलज्ञेयाकृत, जग उदास जग ज्ञानी । शत्रुमित्र सबमें तुम समहो जो दुखसुख फल थांनी ॥४॥ परम ब्रह्मचारी है प्यारी, तुम हेरी शिवरानी। है कृतकृत्य तदपि तुम शिवमग, उपदेशक अगवानी ॥ ५ ॥ है

५४
दौलतराम भजन संग्रह।
भई कृपा तुमरी तुममें तें, भक्ति सु मुक्ति निसानी ।
है दयाल अव देहु 'दौलको', जो तुमने कृत ठानी ॥ ६ ॥
तुम सुनियो श्री जिननाथ अरज इक मेरी जी, तुम० ॥ टेक ॥
तुम
विनहेत जगत उपकारी, बसु कर्मन मोहि कियो दुखारी।
ज्ञानादिक निधि हरी हमारी, द्यावो सो ममरीजी,तुम सुनिः॥१॥
में निज भल तिनहि संग लाग्यो, तिन कृत करणविषयरसपाग्यो।
तातै जन्मजरादवदाग्यो, कर समता सम नेरीजी, तुमसु० ॥ २ ॥
वे अनेक प्रभु मैं जु अकेला, चहुंगति विपतिमाहि मोहिं पेला।
भाग जगे तुमसे भयो भेला, तुम होन्याव निवेरीजी, तुम सु०॥३॥
तुम दयाल बेहाल हमारो, जगतपाल निज विरद समागे।
ढील न कीजे बेग निवारो, दौलनणी भवफेरीजी तुम सु०॥४॥
११६
परे जिय जग धोखेकी दाटी अरें ॥ टेक।।
झूठा उद्यम लोक करत हैं जिसमें निश दिन घाटी अरे० ॥१॥
जान बूझके अन्य बने हैं अांखन बांधी पाटी अरे ॥ २ ॥
निकलि जायगे प्राण छिनकमें पड़ी रहेगी माटी अरे ॥ ३ ॥
दौलतराम समझ मन अपने दिलकी खोल कपाटी अरे ॥ ४॥
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११७
जय वीरजिन वीरजिन जिचंद कलुषनिकंद मुनिहृदसुखकंद
जय श्री० ॥ टेक ॥ सिद्धारथनंद त्रिभुवनको दिनेन्दचन्द जा वच
किरन भ्रम तिमरनिकंद जय श्री ॥ १ ॥ जाके पद अरविन्द
सेवत सुरेन्द्र बंद जाके गुण स्टत कटत भवफन्द जय श्री०॥ २ ॥

दौलतराम भजन संग्रह। ५५ जकडी १९८ A जाकी शांति मृद्रा निरखत हरखत रिखि जाके अनुभवत लहत चिदानन्द जय श्री० ॥ ३ ॥ जाके घोतिकर्म विघटत प्रघटत भये अनन्तदरसबोधवीरज अानन्द जय श्री० ॥ ४ ॥ लोकालो- कज्ञाता मैं स्वभावरत सता प्रभु जगको कुशलदाता त्राता पै अदद जय श्री.॥ ५ ॥ जाकी महिमा अपार गणी न सकै उचार 'दौलत' नमत सुख चहत अमंद, जय श्री० ॥ ६ ॥ अब मन मेरा वे सीखवचन सुन मेरा । भजि जिनवरपद व जो विनशै दुख तेरा !! विनशै दुख तेरा भवबनकेरा मनवच तन जिनचरन भनो । पंचकरन वश राख सुज्ञानी मिथ्या मत मग दौरतजो, मिथ्यामतमगपगि अनादिते है चहुँ गति कीन्हा फेरो अबहू चेत अचेत होहुमत सीखवचनसुनि मन मेरो ॥ १॥इस भव बनमें बे तें साता नहिं पाई । वसुविधिवश है में से निज सुधि विसराई ॥ नैं निज सुघि विसराई भाई, तातै विमल न बोघ लहा। परपरणतिमें मग्न भयो त जन्मजरामृत दाह दहा। जिन मत सार सरोवरकू अब गाहि लागि निज चिंतन में तौ दुख दाह नसै सब बातर फेर बसे इस भव वन में ॥ २ ॥ इमतन में तू वे क्या गुन देख लुभाया । महा अपान वे सतगुरु याहि बतायो । सतगुरु याहि अपावन गाया मलमूत्रादिक का गेहा । क्रमिकुलकलित लखत घिन आवै यासों क्या कीजे नेहा। यह तन पाय लगाय-यापनी परणति शिवमग साधन में । तो दुखद्वंद्वनशै सब तेरा यही सोर है इस तनमें ॥ ३ ॥ भोग भले न सही रोगशोकके दानी ।शुभगति रोकन वे । दुर्गति पथन-

५६.
दौलतराम भजन संग्रह।
अगवानी॥ दुर्गतिपथअगवानी है जे जिनकी लगन लगी इन।
तिन नानाविधि विपति सही है, विमुख भयो निज सुख तिनसों।
कुन्जर झख अलि शलभ हिरन इन एक अक्षवश मृत्युलही ।
यातें देख समझ मनमाहीं भवमें भोग भले न सही ॥ ४ ॥
काज सरै तब वे जब निजपद आराधे। नशे भवावलि निरी-
वाधपद लावै ॥ निरावाधपद ला| तब तोहि केवल दर्शन ज्ञान
जहाँ । सुख अनन्त अति इन्द्रियमंडित बीरज अचल अनंत
तही ॥ ऐसो पदचाहै तो भजि जिन बारबार अब को उचरै।
'दौल' मुख्यउपचार रत्नत्रय जो सेव तो कोज सरै।। ५ ॥
जकटी १९६
वृषभादि जिनेश्वरध्याऊं सारद अंबा चितलाऊ।
दैविधिपरिग्रहपरिहारी, गुरु नमहु स्वपरहितकारी ।।
हितकार तारक देव श्रुत गुरु परख निज उरलाइये।
दुखदाय कुपथ विहाय शिवसुखदाय जिनवृष ध्याइये ।।
चिरते कुमगपगि मोहठगकर ठग्यो भवकानन परयो
व्यालीसद्धिकलख जोनमें जरमरनजामन दौं जस्यो ॥ १॥
जब मोहरिपु दोन्ही घुमरिया, तस वश निगोद में परिया। .
तहां स्वासएक के माही, अष्टादश मरनलहाही ॥
लहि मरनअन्तमुहूर्तमें, छयासठसहस शततीन हीं।
षटतीसकाल अनंत यों दुख, सहे उपमा ही नहीं।
कबहूं लही वर आयु क्षितजलपवन पोवक तरुतणी।
तस भेद किंचित कहूं सो सुन कह्यो जो गौतम गणी ॥२॥

दौलतराम भजनसंग्रह। ५७ पृथिवी हृय भेद बखानी, मृदु माठी कठिन पखाना। मृदुद्वादश सहस वरप की पाहन बाईस सहसकी। पुनि सहस सात कही उदकत्रय सहसवर्ष समीरकी। दिनतीन पावक-दशसहस तरु प्रमित नास सुपीरकी ।। विनघात सूक्षम देहधारी- घातजुत गुरुतन लह्यो। तहं खनन तापन जलन व्यंजन, छेदभेदन दुख सह्यो॥३॥ शखादि दुइन्द्री प्राणी, थिति द्वादश बरस बखानी। यूकादि तेइंद्री हैं में बासर उञ्चास जिये ते ॥ जीवै छमासअलीप्रमुख, व्यालीससहस उरगतनी । खगकी बहत्तरसहम नवपूर्वांग सरिसृपकी भनी ॥ नर मत्स्य पूरवकोट की थिति, करमभूमि बखानिये। जलचर विकल विन भोगभूनरपशुत्रिपल्य प्रमानिये ॥ ४ ॥ अधवशकर नरक बसेरा, भुगते तह, कष्ट घनेरा। छेदे तिलतिल तन सारा, क्षेपै द्रहपूति मंझारा ।। मंझारवज्रानिलपचाई, घरहिं शूली ऊपरें । सींचै जु खारे वारिसों, दुठ कहैं व्रण नीके करें ।। बैतरणि सरिता समल जल अति, दुखद तरु सेंवलतने । अति भीमं वनंअसिक्रांतसम दल, लँगत दुख देवें घने ॥५॥ तिस भूम हिम गरमाई, सुरगिरसम अस गलजाइ । तामें थिति सिंधुतनी है, यो दुखद नरक अवनी है ।। अवनी तहांकीत निकसि कबह जनम पायो नरो। सर्वाङ्ग सकुचित अति अपावन, जठर जननीके परो ।।

पूर दौलतराम भजन संग्रह। तह अधोमुख जननी रसांश थकी जियो नवमास लो। ता पीरों को सीर नाही, सहै प्रोप निकास लों॥ ६ ॥ जनमत जो संकट पायो, रसनात जात न गायो। लहि बोलपनै दुखभारी, तरुनापो लयो दुख कारी ।। दुखकार इष्टवियोग अशुभ, संयोग सोग सरोगता। परसेव ग्रीषम सीत पावस, सहै दुख अति भोगता। काहू कुतिय काहू कुबांधव, काहू सुता व्यभिचारिणी । किसह विसनरत पुत्र दुष्ट, कलत्र कोऊ परऋणी॥७ बृद्धापनके दुख जेते, लग्विये सव नयनन तेते । मुखलाल बहै वन हालै, बिन शक्ति न बसन सँभाले ।। न संभाल जाके देहकी तो, कहो बृषकी का कथा । तबही अचानक पान जम गह मनुज जन्म गयो बृथा ।। काहू जनम शुभठान किचित, लहो पद चहुं देवको अभियोग किल्विष नाम पायो, सह्यो दुख पर सेवको ॥ ८॥ तहँ देख महत सुरऋद्धी, झूरचाविषयन करि गृद्धी । कबहूं परिवार नसानो, शोकाकुल है बिललानो । विललाय अति जब मरन निकटो, सहयो संकट मानसी। सुरविभव दुखद लगी जबै, तब लखी माल मलानसी ॥ तवही जु सुर उपदेश हित, समझाइयो समुझ्यो न त्यों। मिथ्यात्वयुत च्युत कुगति पाई, लहै फिर से स्वपद क्यों ॥ ॥ । चिरभव अटवी गाही, किंचित साता न लहाही। जिनकथित धरन नहिं जान्यो, परमाहिं अपनपो मान्यो ।

दौलतराम भजन संग्रह।
५६
।
मान्यो न सम्यक त्रयातम, आतम अनातममें फस्यो।
मिथ्याचरनहगज्ञानरंज्यो, जाय नवग्रीवक बस्यो ।।
पें लहबो नहिं जिनकथित शिवमग, वृथा भ्रमभूल्यो जिया !
चिदभावके दरसाव चिन सब, गये अहले तप किया ॥ १० ॥
अब अद्भुत पुण्य उपायो, कुल जात विमल तू पायो।
यातें सुन सीख सयाने, विषयनसों रति मति ठाने ।
ठाने कहा ति विषयमें, ये विषम विषघरसम लखो।
यह देह मरत अनंत इनको, त्याग प्रातम रस चखो ॥
या रस रसिक जन वसे शिव अब, बसें पुनि बसि हैं सही।
'दौलत' स्वरचि परविरचि सतगुरुसीख नित उर घर यहीं ॥ ११ ॥
होली १२०
ज्ञानी ऐसी होली मचाई. ॥ टेक ॥ राग कियो विपरीत
विपन घर, कुमति कुमौति सुहाइ । घार दिगंबर कीन्ह सुसंबर,
निजपद भेद लखाई। घात विषयनकी बाई ।। ज्ञानी ऐसी० ॥१॥
कुमति सखा भजि ध्यानभेद सम, तन में तान उड़ाई । कुंभक
तोल मृदंगसौं पूरक, रेचक बीन बजाई। लगन अनुभवसौं
लगाई ॥ ज्ञानी ऐमी० ॥ २ ॥ कर्मवलीता रूप नाम अरि. वेद
सुइन्द्रि गनाई। दे तप अग्नि भस्म करि तिनकों, धूल अवाति
उड़ाई। करी शिव तियकी मिलाई ॥ ज्ञानी ऐसी ॥३॥
ज्ञानको फाग भागवश श्रावै, लाख करो चतुगई । सो गुरु दीन
दयाल कृपाकरि, 'दौलत' तोहि बताई। नहीं चितसे विसगई ।।
ज्ञानी ऐसी होली मचाई ॥ ४ ॥

इ.
दौलतराम भजन संग्रह।
होली १२१
मेरो मन ऐसी खेलत होरी ॥ टेक ॥ मन मिरदंग साजकरि
त्यारी, तनको तमूरा बनोरी । सुमति सुरंग सरंगी वजाई, ताल
दोऊ कर जोरी । रोग पांचौं पद कोरी । मेरो मन० ॥ १ ॥
समकृत रूप नीर भर भारी, करुणा केशर घोरी । ज्ञानमई लेकर
पिचकारी, दोउ करेमाहिं सम्होरी। इन्द्रि पांचौं सखि बारी ।
मेगे मन० ॥ २ ॥ चतुर दानको है गुलाल मो, भरि भरि मूठि
चलोरी । तपमें बांकी भरी निज झोरी ॥ यशको अवीर उद्योग
रंग जिन धाम मचोरी ।। मेग मन० ॥ ३ ॥ 'दौल' बाल खेलें
अस होरो, भव भव दुःख टलोरी । सरनाले इक श्री जिन कोरी ।।
जग में लाज हो तोरी। मिले फगुआ शिवगोरी । मेरो मन, ॥ ४
१२२
निरखत जिनचंद री माई ॥ टेक ॥ प्रमुदुति देख मंद भयौ
निशिपति, पानसु पगलिपटाई । प्रभु सुचंद वह मंद होत है,
जिन लखि सूर छिपाई । सीत अद्भुत सो बताई। निरखत जिन०॥
अंबर शुभ्र निजंतर दीसै, तत्वमित्र सरसाई । फैलि रही जग
धर्म जुन्हाई चोर न चार लखाई। गिरा अमृत जोगनाई ।। निरखत
जिन • ॥ २ ॥ भये प्रफुल्लित भव्य कुमुद मन, मिथ्यातम सो
नेसाई । दूर भये भवताप सबनिके, बुध अंबुध सो बढ़ाई। मदन
चकवेकी जुदाई ॥ निरखत जिन० ॥३॥ श्रीजिनचंद बंद अब
दौलत, चितकर चंद लगाई। कर्मबंध निबंध होत हैं, नागसुद-
मनी लसाई । होत निर्विष सरपाई ॥ निरखत जिन ० ॥ ४ ॥

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Daulatram Bhajansangrah

Author
Jain, Lala Jainy Lal
Title
Daulatram Bhajansangrah
File name
Daulatram Bhajansangrah
Text
OCR done
Published
2009/11
Publisher
Saharanpur, Jainylal Machin Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
66
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Bhajan sangrah
DLI number
344262
Barcode
99999990234137.00
Scanning centre
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Digital publisher
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