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Usaka Khel
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उसका खेल
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उसका खेल अशोक अग्रवाल
अशोक अग्रवाल
जन्म २ फरवरी १९४८, शिक्षा : एम० ए०
छः माह दिल्ली के एक साप्ताहिक पत्र में नौकरी
करने के बाद त्यागपत्र, फिलहाल संभावना प्रकाशन
की शुरूआत, बहुचर्चित कहानी सकलन '१० कहानीकार' का सपादन,
आगामी कृतियां
वायदा माफ गवाह (उप०), रक्तबीज (कहानी-संग्रह)
मां व पिता को जिन्हें हमेशा निराश किया
आवरण: रामकुमार, रेयाकन : दूवान
उममा रोल (कहानी-गंग्रह), अशोक अप्रवाल
प्रभागक: संभावना प्रभागन, रेवती एज, हापुड़ (उ० प्र०)
प्रपम गंग्करण: जनवरी १९७३, मूल्य : ६ पये
मुस : मारती प्रिंदगं, दिम्नी-३२
महामारी : ९. फिर यह सब : १९. बुझे हुए चेहरे : ३०.
उसका खेल : ३८. मुट्ठीभर फेन : ५४. अवमूल्यन : ६३.
शिकंजा : ६८.
धब्बे : ८२.
गुहावासी : ९४.
सिर्फ एक आकाश : १०३.. तंत्र : ११२. सहभागी : १२३.
दानय
यदि
होने में कोई हर्ज नहीं है,पया है ?
जीवित रहना चाहते हैं।
-ओमामू दवाई
महामारी वे उसी तरह हंस रहे थे-खुल के। हमारी उपस्थिति का उन पर कोई मारक असर नहीं हुआ था। उन्हें आसपास का कोई ख्याल नहीं था। हमें शायद उनकी हँसी को अपेक्षा अपनी अवहेलना का दु:ख अधिक व्याप रहा था। अपने में ही मग्न वे चार मुझे ही नहीं हम सबको बड़े अजीव से लगे, सीकचों में कैद कोई कौतुक-भरा खेल खेलते हुए किसी चिड़ियाघर के जान- वर के समान । उन चारों के हाथों में कोकाकोला की बोतलें थी जिन्हे हँसते हुए वे रह-रहकर मुंह से सटाकर उल्टा लेते। एक चहकने और कोकाकोला पीने के साथ-साथ सिगरेट का धुआं उड़ा रहा था । धुएँ का रुख अपनी ओर न होते हुए भी हमें लग रहा था वह तेजी से हमारे सीनों मे फँसता जा रहा है। उनके वीच रखा हुआ ग्रामोफोन हमे विषधर से कम नहीं लग रहा था। सिगरेट बाला रह-रहकर अजीब ढंग से तालियां बजाता और अपने सामने बैठी औरत को जिस दृष्टि से घूरता उससे हम सभी सिहर उठते । एक उत्तेजना मेरे पोर-पोर में दौड़ जाती। ऐसे वक्त में अपने आसपास खड़े सभी चेहरों को व्यग्रता से देखता । उन्हें देखकर मुझे सान्त्वना मिलती कि इस उत्तेजना का शिकार सिर्फ मैं ही नही हूँ। मेरे आसपास खड़े सभी • चेहरे तन आए थे। यदि मैं आईने के सामने खड़ा होता तो जरूर मेरा चेहरा भी उनमें से एक होता। यदि वे चारों मर्द होते अथवा औरतें, तो शायद हमें यह सव यातना १० : उसका खेल नहीं भुगतनी होती। उनमें मदं और औरतों का समान अनुपात था। हमारे देखते-देखते एक विस्फोट हुआ। सिगरेट वाले ने सामने वाली औरत के हाथ से कोकाकोला की बोतल छीनकर अपने मुंह में तेजी से गटक ली थी। हमे सगा, हमारे ऊपर आसमान टूट पड़ा है और हम सब उसके बोझ से दवे जा रहे हैं। "बेशर्म।" मेरे पास खड़ी जिस आकृति ने तेजी से यह कहा था वह मेरी पत्नी थी। "ऐसे पड़ोसियो से तो नर्क भला।" कहने वाली हमारी वृद्धा माता थी। "हिर-श धीरे से।" मैंने उन्हें डपटा, "वे सुन लेंगे।" "सुन लेंगे तो क्या फांसी चढ़ा देंगे?हम किसीके दवे फिरते हैं।" पत्नी फिर उसी तेजी से भडकी थी। मैं चुप रह गया। "हमारे बच्चो पर कितना बुरा असर पड़ेगा इन लोफरों का !" मो फिर उसी तरह बोली। बहन चुप खडी थी। वह उसी तरह निमग्न उनका खेल देखने में जुटी हुई रस बटोर रही थी। सबसे पहले उनकी इस खतरनाक असहनीय क्रिया को वहन ने पकड़ा था और फिर एक-एक कर सभी ने । यदि हम किसी कम्युनिस्ट देश में होते तो मैं निश्चित रूप से यही सोचता कि बहन जरूर 'सीक्रेट सर्विस' से सम्बन्धित कोई गुप्त एजेण्ट है। जो हम सभी को किसी भी क्षण यन्त्रणा- दायी जेलखानो मे हमेशा के लिए फिकवा सकती है। मेरा यह सोचना अकारण नहीं था। उसको चौकन्नी पीली छोटी-छोटी आंखें विल्ली की माखों से कहीं तेज थीं। इतनी तेज कि घर बैठे ही हमको अपने पड़ोसियों की एक-एक हरकत का इस तरह पता चल जाता जैसे वह हमारे ही घर घटी हों। उसके कदम इतने सधे हुए और गद्देदार थे कि चलते हुए तनिक भी आहट नहीं होती थी। ये गुप्त खबरें और पड़ोसियों की नाजायज और शर्मनाक क्रियाओं का महामारी : ११ दस्तावेज बहन का अनमोल और गुप्त खजाना होता। इस खजाने से यद्यपि उसे अत्यन्त लगाव था। प्रणय की सीमा तक । किन्तु शायद सहानुभूतिवश अक्सर इसमें वह हमे भी अपना साझीदार बना लिया करती। इस गुप्त खजाने का कुछ अंश हमे दान देते हुए उसकी आंखें चीते की तरह चमकती और हम सब उत्तेजना से कांपने लगते। थोड़ी देर बाद वह धीरे से फुस- फुसाती-"किसीसे कहना नहीं है । हमें क्या मतलब।" दूसरे क्षण हम सभी के मुंह पर बडी-बडी जंजीरो से जकडे ताले डाल दिए जाते जिसकी चावियाँ वहन के हाथ में होती। हमे खुशी होती कि हम रिक्त नहीं है, हमारे पास कुछ ऐसी अनमोल चीजे है जो दूसरों के पास नहीं है और जिनकी झलक दिखाकर हम दूसरों को अपना दीवाना बना सकते है और पालतू रीछ की तरह नचा सकते है। आप नहीं सोच सकते, शहर के दूसरे व्यक्तियों मे हमारे इस खजाने के लिए कितनी रुचि और उत्साह होगा। कभी-कभी मुझे यह देखकर आश्चर्य होता कि पूरा शहर हमारे इर्द-गिर्द मक्खियों की तरह भिनभिना रहा है। "तो सचमुच हमारे पास एक विशिष्ट खजाना है जिसका महत्त्व किसी पुराने ऐतिहासिक और भारी-भरकम खजाने से कम नहीं है।" यह विश्वास हम सभी के पोर-पोर मे पारे के समान फिसलता ओर हमारी मुख-मुद्राएँ विचित्र हो आती। कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता, आश्चर्य से अधिक बहन से खतरनाक किस्म की ईर्ष्या । सड़क पर पड़े पत्थर के टुकड़ों की तरह वह महत्त्वपूर्ण और गुप्त घटनाओ को भी बडी सहृदयता के साथ घर के अन्दर उठा लाया करती। छोटी-छोटी बातो को तराशकर वह जिस फुरती के साथ चमकाती वह सब हमारे लिए गौरव का विषय था। उसी ने हमको यह गुप्त खबर दी थी कि मरला बहन जी की कुंवारी लड़की को आठवां लगा हुआ है । उसकी प्रत्येक बात का हिस्सेदार सबसे पहले उसकी भाभी होती और फिर भाई साहव यानी कि मैं। मां इन सब बातों से अपने-आप अन्तरंगता स्थापित कर लेती। बच्चों को ऐसी बातो से दूर ही रखा जाता किन्तु पता नही किस तरकीब से वे सभी एक-दो दिन बाद ही इन सब गुप्त घटनाओं से उसी १२ : उसका खेल तरह परिचित हो जाते जैसे बहन । ऐसे वक्त मुझे लगता उन सभी के बीच बहन के स्थान को हस्तान्तरण करने के लिए होड़ लगी हुई है। वे हमारे फुसफुसाने और धीमे-धीमे बात करने की क्रियाओ को अवहेलना की दृष्टि से देखते। ऐसे वक्त उनकी आंखो मे विजेता को चमक होती जो इस बात की परिचायक होती कि मैदान हमसे पहले उन्होंने हथिया लिया है। हम सभी नियतिवादी और परम्पराओं का पालन करने वाले थे। नई मान्यताएं और तेजी से बदलती जा रही परम्पराएं हम सभी को घोर वितृष्णा देती। बहन मैट्रिक करने के बाद घर बैठ गई थी क्योंकि हम सभी आस्थावादी थे जिन्हे परिवार की परम्पराओं से अन्धा लगाव था। इसके अतिरिक्त मां का विचार था कि अधिक पढ़ाई करवाने पर भी चूल्हा तो उसके हाथ से छूटेगा नही। ऐसे वक्त मेरे अन्दर एक विद्रोह की लहर उत्पन्न हुई थी। मैंने चाहा था कि कुछ परम्पराएँ अब हमे तोड़ देनी चाहिए। एक- दो दिन मैंने शोर-शरावा भी किया और पढाई की आवश्यकता को लेकर विद्रोह; किन्तु बहन का विपरीत रुख देख मैंने भी समझौता कर लिया। बाद में मुझे लगा कि मैं कितना गलत कार्य करने जा रहा था। शायद किसी कलुपित आत्मा ने उन दिनों मुझे अपने चगुल मे जकड़ लिया था। ले चारो अब उठ खड़े हुए। उनको मारी हरकतें मुझे बेहद फूहड़ और अश्लील लग रही थी। पहले मैं उठा और एक उचटती-सी निगाह उन पर डालकर अन्दर प्रवेश कर गया। मेरे पीछे-पीछे बच्चो को उपटती पत्नी। मिर्फ बहन बाहर रह गई थी, उनकी हरकतों का आवश्यक और जरूरी निरीक्षण करती। माताजी पूजा कर रही थी किन्तु वार-बार उनकी खुलती हुई आंखे बाहर ही झांक रही थी। मुझे आश्चर्य हुआ कि वह कौन-सी विवशता है जिसने मां को नियमित रूप से इस प्रकार कई घण्टे तक पूजा करने के लिए विवश कर दिया है। एक हाथ उनका माला के मनकों को गिन रहा था और दूसरा शैतानी करते बच्चों को रोवीला सकेत देते जैसा। पत्नी का अटल विश्वास था कि यह मब दिखावा है और मां सिर्फ ऐसा काम से बचाव के लिए करती हैं। किन्तु मेरा खयाल था कि यह सब महामारी : १३ परम्परा पालन की विकट विवशता थी। थोड़ी देर बाद ही वहन खरगोश के गद्देदार पांवो और जगली बिल्ली को पीली आँखो की तेज चमक लिए भागती हुई सी अन्दर गई थी और अपनी भाभी का हाथ पकड़कर एक ओर को घूम गई थी। मुझे उत्सुकता हुई किन्तु यह बेमानी थी क्योकि कुछ देर बाद ही हर हालत मे पत्नी के माध्यम से इन सारे गुप्त रहस्यों से मुझे परिचित हो जाना था ही। अव उनमें धीमी-धीमी फुसफुसाहटें चल रही थी। रेंगती हुई चीटियो के समान। मैं अपने कमरे में चला आया और खिड़की से सटकर खड़ा हो गया। इस मुद्रा में कि कोई मुझे बाहर से नहीं देख सकता था और मैं सामने के कमरे में घटती हुई एक-एक हरकत को अच्छी तरह पकड़ सकता था। इस कमरे मे कुछ ही दिनों से एक मास्टरनी ने रहना प्रारम्भ कर दिया था। उससे पूर्व कोई आदमी रहता था। वह शरीफ था अथवा हद दर्जे तक पहुँचा हुआ धुन्ना। पहली बार मुझे अपने पर अफसोस हुआ था। वह सिर्फ तीन महीने उसमें रहा और इन पूरे दिनो उसका व्यक्तित्व मेरे लिए उतना ही रहस्य- मय था जितना पहले दिन । मैंने कई घण्टे लगातार खिडकी की सलाखों से चिपककर उसकी प्रतीक्षा की थी। मुझे कही गहरा विश्वास था किसी दिन रात के अंधेरे में जरूर कोई लड़की उसके साथ आएगी और वह नशे में धुत्त होगा। ऐसी कल्पना मेरे लिए कल्पना न रहकर बहुत जल्दी काल्पनिक यथार्थ मे बदल जाती और मुझे भविष्य मे घटने वाली रोमांचक घटनाओं की कल्पना करते हुए बेहद खुशी होती। वहन की तरह एक खजाना खोज लेने के समान। किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। बहुत शीघ्र मेरी आशाएँ, मेरा सारा विश्वास टुकड़े-टुकड़े हो गया था। वह देर गए रात को लौटता, एकदम अकेला । थोड़ी देर के लिए उसके कमरे में रोशनी चक्कर काटती। फिर एकदम धुप्प अँधेरा । सुवह देरी से उठता और सिर्फ दो बार कमरे का दरवाजा खुलता। पहली बार दरवाजे के बाहर पडे अखबार को उठाते समय, दूसरी बार कमरे से बाहर निकलते हुए । बहुत प्रयत्न के बाद पता चल पाया था कि वह कुछ नही करता-धरता। एकदम वेकार। देर तक १४ . उसका खेल रेस्तरां-वार मे बैठा रहता है। सिगरेट खूब पीता है । मुझे इन सारी सूचनाओं से बेहद खुशी हुई थी। मैं काल्पनिक किस्सों का सहारा लेते हुए उसके चरित्न और क्रियाओं के सम्बन्ध मे भ्रामक घटनाएं गढ़ सकता था। बहन इन दिनों बिल्कुल चुप रहने लगी थी। उसके व्यक्तित्व में एक अजीव- सी रहस्यात्मकता धीरे-धीरे उभरने लगी थी। मुझे उसे देख आश्चर्य होता। उसकी निगाहें उस व्यक्ति के लिए नितान्त महानुभूतिपूर्ण थी जो उसके चरित्र के एकदम विरुद्ध था। उस दिन मैंने बहन को उसके कमरे से बाहर निकलते हुए पकड लिया था। वह मुझे देख थोडी देर के लिए अचकचाई थी फिर तुरन्त मुस्करा पडी थी। अभ्यस्त अपराधी की तरह । “समय नहीं कटता। कुछ उपन्यास मांगकर ताई हूँ।" किताबो की एक झलक दिखाकर वह चली गई थी। यद्यपि सब कुछ एकदम नार्मल था किन्तु मुझे लग रहा था जैसे बहन की साड़ी सिलवटों से घिरी थी। वाल अस्य-व्यस्त थे और चेहरे की रंगत स्याह । मुझे कितनी खुशी होती यदि बहन के स्थान पर मोहल्ले को कोई और लड़की होती। वहन कुछ दिन मुसमे कटती रही थी फिर हम एक- दूसरे के माझीदार हो गए थे और वह अपनी सहेली की हरकतो का बयान देर तक मुझसे करती रहती जिससे मैं रस बटोरता। किन्तु यह सब सिर्फ एक समझौता था जिसका पालन मुझे करना था। इस समझौते के मूल में बहुन सम्भव था कि कहीं भय की भावना भी रही हो। यह सब अधिक दिन नहीं रहा था। कुछ दिन बाद वह व्यक्ति शहर से बाहर चला गया था। उस दिन मुझे बहन उदाम प्रतीत हुई थी। उसकी उन्मुक्त हँसी और जोरदार ठहाकों से कुछ दिन हम मुक्त रहे थे। मुझे इमरो काफी खुशी हुई थी। समझौते के बावजूद । मास्टरनी ने खिड़को के आगे गहरे हरे रंग के पर्दे डाल दिए थे। कमरे में कंद गहरी रोगनी याहर निकलते हुए बेहद धुंधली हो गई थी जिमका धुंधला अक्म मेरे हृदय पर भी पड़ रहा था । मुझे निराशा हुई। वेद । काग में किसी भी प्रकार पर्दे के पीछे हो रही प्रियाओं को पकड़ पाता। ।
महामारी : १५ तभी कमरे का दरवाजा खुला और मेरे देखते-देखते एक आदमी उसमे से बाहर निकला। मैं देर तक उसके चेहरे को पढ़ता रहा। मास्टरनी के इस कमरे मे आने के कुछ दिन बाद ही उसका यहाँ आना प्रारम्भ हो गया था। उसके आते ही खिड़कियो के पर्दे फैलने लगते और सब कुछ मेरी नजरों से अदृश्य हो जाता। कई वार मन हुआ था कि इसी समय चुपचाप जाकर अन्दर झांककर देखू ! मेरा पूरा विश्वास था जरूर वे मुझे किन्ही वजित क्रियाओं मे निमग्न मिलेंगे। मैं घटित होने वाले दृश्यों को अपने सामने साकार करता और मुझे लगता इस उत्तेजक नाटक में सिर्फ दो ही पान नहीं तीसरा पान मैं भी सम्मिलित हूँ। किन्तु यह सब बेहद अल्प क्षणो के लिए होता। बहन ने ही हमें यह जानकारी दी थी कि इस शहर में मास्टरनी एक- दम नई है । वह जो उसके यहाँ आता है उसीके स्कूल में पढ़ाता है । आने- वाला विवाहित है और मास्टरनी अविवाहित, जवकि वह पूरे तीस वर्ष की हो चुकी है। इतना कहने के बाद वह अपनी उसी परिचित मुद्रा मे मुस्कराई थो जो ऐसे वक्त उसके होंठो पर आ धमकती है। जब वह मास्टरनी की उम्र बता रही थी मुझे याद आया कि उसकी उम्र भी तेजी से खिंचती जा रही है। शायद मैं इसको लेकर थोड़ी देर के लिए परेशान हो सकता था और ऊल-जलूल कल्पनाओं में उलझ सकता था किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। "कितने बेशर्म हैं हमारे पडोसी।" पत्नी ने जिस मुद्रा में यह बात कही उससे मुझे यकीन हो सकता था कि शादी से पूर्व जरूर वह किसीकी प्रेमिका रही होगी। कभी-कभी वह जिस मुद्रा में बातें करती है वह मादक और उतेजक होते हुए भी मुझे बेहद अश्लील और फूहड़ लगती है और कोई विशेष कारण न होते हुए भी मुझमें घोर वितृष्णा उपजा देती है। मेरी आँखों को और अधिक चौड़ा देने के उद्देश्य से उसने अपनी फुम- फुमाहट को थोडा और धीमा कर दिया था, "सत्ती (बहन) ने खुद अपनी आँखो से देखा है कि लड़की को आदमी ने अपनी बाहों मे बांध रखा था और दोनोखिलखिला रहे थे। बेशर्म और लोफर कही के !लड़की अपने हाथ से १६ । उसका खेल उसको केला खिला रही थी।" पत्नी इतना कहकर आँखें मटकाने लगी थी। आगे की क्रिया और प्रतिक्रिया से मैं एकदम अपरिचित नहीं था। "देखो जी, खूब संभलकर रहना, कही वह तुम पर भी"" यद्यपि पत्नी को मैंने हमते हुए डपट दिया था तो भी उसकी बात और उसका सकेत मुझे गुदगुदा गया। अगले दिन बहन एकदम ताजा विस्फोटक सीक्रेट लाई थी। मेरे कानों मे पली ही फुसफुसाई थी, "आपको पता है सरला वहन जी अपनी लड़की का एवार्शन कराने देहली जा रही है अपनी मौसी के यहाँ । आज शाम को हो।" "तुम्हे कैसे पता?" “सत्ती बता रही थी। उसने खुद अपने कानो से सुना है । उसने सरला बहन जी को सबसे छोटी लड़की को फुसलाकर सारी बातें पूछी थी।" और पल्ली फिर उसी ढंग से मुस्कराई थी, जिसने मुझे यह भ्रम दिया था कि कही वह"। थोड़ी देर बाद ही इन सब वातों को मेरे छोटे भाई से किसीने सुन लिया था । अर्थात् हमारे घर से बाहर यह बात फैल गई थी। हमें इस बात का सबसे पहले पता तीन महीने पूर्व चला था कि सरला वहन जी की बिचली लड़की किसीके प्रेमपाश में बंधी गुलछरें उड़ा रही है। नये-नये फैशन करती है। कीमती-कीमती अनगिनत साड़ियाँ और कपड़े उसे उसके प्रेमी ने लाकर दिए हैं। बहन सरला बहन जी के यहाँ से एक खूबसूरत रूमाल उड़ा लाई थी। जिसके एक कोने पर 'आर' कढ़ा हुआ था और जिसके चारो ओर सुन्दर बेलबूटे खिले थे, बेहद खूबसूरत अन्दाज में। बहुत दिनों से हम सब गहरी ऊब महसूस कर रहे थे। कोई ताजा और उत्तेजक घटना कहीं नहीं घट रही थी। इसने हमे ताजगी दी थी। पतझड के बाद बहुत दिनो की प्रतीक्षा के उपरान्त बारिश की तरह। हम सभी बहन को प्रशंसायुक्त निगाहो से देख रहे थे। वहन की तबीयत आजकल ठीक नहीं चल रही थी। हर समय सिर महामारी : १७ । .. भारी-भारी सा रहता। लगता जैसे अभी चक्कर खाकर गिर पड़ेगी। चेहरे की रगत काफी उड़ चली थी। अक्सर के भी होने लगती। पत्नी ने बताया था कि इन दिनों उसे अचार से अधिक लगाव हो गया है । मैं नहीं समझ पा रहा था कि वहन में इतनी तेजी से घटित हो रहे परिवर्तनों का रहस्य क्या है। इन सबके बावजूद हमारा घर बेहद शान्त और स्थिर था। 'किन्तु मेरे अन्दर सब कुछ गड़वडा गया था। डाक्टर दुवे ने मुझे भयंकर शॉक दिया था । मैं नहीं समझ पा रहा था कि वहन से कहाँ गलती हो गई है ? इतनी विश्वसनीय बातें कैसे झूठी हो सकती है ? डाक्टर ने सरला बहन जी की लड़की के विषय मे पूछा था कि उनके आपरेशन का क्या हुआ? पहले मुझे खुशी हुई थी कि डाक्टर का आशय एवार्शन से होगा। मैंने नासमझ बनने का बहाना किया-ऐसे वक्त इस अमोघ अस्त्र के इस्तेमाल करने का मैं अच्छी तरह अभ्यस्त हो चुका था। "कैसा आपरेशन ?" "अरे तुम्हें पता नहीं। उनकी लड़की को ट्यूमर हो गया है। मैंने ही उन्हे सलाह दी थी देहली जाने की।" शायद मेरे ऊपर कोई आकाश टूटा था । मुझे लगा मेरा अनमोल खजाना एकदम लुट गया है। किन्तु यह सब वेहद थोड़े समय के लिए था। मुझे डाक्टर झूठा और मक्कार लगा। जरूर वह भी इस साजिश में सम्मि- लित होगा। वहन कभी गलत नहीं हो सकती थी। इस बीच मेरे खजाने का एक बहुत बड़ा हिस्सा शहर के नागरिकों के बीच वितरित हो चुका था। मेरे सह-अस्तित्व को इस भावना ने पूरे शहर को बेहद प्रभावित किया था। उनकी दृष्टि में मैं एक विशिष्ट व्यक्ति था। वे मेरे चारों ओर मड- राते और मेरे खजाने मे हाथ डाल देते। मुझे यह देख कई वार आश्चर्य हुआ था कि मेरे खजाने के रल वाहर निकलते ही आकार और परिमाण में दुगने-तिगुने हो जाते है--रक्तबीज की तरह। मेरे लिए यह सुखद वात थी। शहर के उत्साह को देखते हुए मैं पछता रहा था कि मैंने अपने खजाने को इतना संकुचित क्यो कर दिया है ? मुझे सरला बहन जी को बड़ी विवा- १८ : उसका सेल हित लड़की के विवाह-पूर्व एवार्शन की बात क्यो नहीं याद आई ? अगले दिन मैं इस गुप्त खजाने को और अधिक उत्माह के माथ अपने साथियो के बीच लुटा रहा था। खजाने का अंश ग्रहण करते हुए उनके चेहरे चमकते देख मेरा खजाना और अधिक फैलने लगता। सरला वहन जी के लौटने में अभी काफी दिन शेष थे। इस वीच सिर्फ हमारा घर इस उत्तेजनाप्रद आनन्द से ग्रस्त नहीं रहा था, पूरा शहर उसका रस चटखारे भर-भरकर बटोर रहा था।
फिर यह सव भूरी पलकों में छिपी पीली आंखें मुझे घूरने लगी थी-मैं अपने आप को स्वाभाविक मुद्रा में नहीं रख पा रहा था। कुछ-कुछ भय महसूस कर रहा था कि वे पीली आँखें कुछ और आगे बढी। मैं सहम गया । मुझे अपनी जीवन-रेखा छोटी होती दिखाई दी। अंधेरा उसी तरह वरकरार था। थोड़ी देर पहले जब रोशनी उड़ गई थी तब इन आंखों में इतनी चमक नहीं थी। अँधेरा होते ही मेरी चश्मे के पीछे झांकती आँखें उन पीली आँखों में जा अटकी थी और फिर उनसे ही अटकी रही। उनमें कोई सम्मोहन था कि मैं अपने-आपको उनसे छुडा ही नही पा रहा था। कमरे का अंधेरा अब डरावना लगने लगा। मेरी कुरसी के ठीक पीछे एक खिड़की थी जिसको मैंने पहले ही खोल रखा था। बार-बार इच्छा होती इन आँखों से मुक्ति पा खिड़की के बाहर देखू । हिलते-डुलते लम्बे-लम्बे साये इस अँधेरी रात में कैसे लगते होंगे। पीली आँखं कुछ और पास सरक आई थी। सर्द हवा का कोई झोका जैसे पसली को चीरकर निकल गया हो, एक तेज फुरफुरी सारे शरीर मे दौडती चली गई। सहसा दरवाजे पर थाप पड़ी। मैंने भयभीत आँपो से पोती आंखों की ओर देखा। वे अब मुझसे छिप रही थी। उन आँखों ने एक जोर की उछाल ली और मेरे बालों को छूती हुई खिड़की के बाहर हो गई। थाप और तेज ही उठी-मुझे उठना ही होगा। मैंने सोचा। उठते हुए मुड़कर खिड़की के २० : उसका खेल एक । बाहर देखने के मोह को त्याग नही सका। वहां ऐसी कोई बात नहीं थी। पीली आंखें कही छिप गई थी। पपीते के पेडो की लम्बी पांत दूर तक चली गई थी और इस वक्त वे बुरी तरह हिल रहे थे। उनका शोर मुझसे बर्दाश्त नहीं हो पा रहा था । सर्द हवा मेरे शरीर को बुरी तरह हिलाने लगी थी। ऐसे बुरे मौसम मे कौन होगा? मैं उठते हुए बार-बार सोच रहा था। कमरे की रोशनी बहुत धुंधली-सी हो आई थी। दरवाजे पर पहुंच एक बार फिर पीछे मुडकर देखा-खिडकी के बाहर । कोई न था। न पीली आंखें और न ही हिलते-डुलते पपीतो के लम्बे-लम्बे साये । दूर तक पगडण्डी लम्बी काली रेखा की तरह चली गई थी जो धीरे-धीरे और अधिक विस्तृत होती जा रही थी। दरवाजा खोलते समय क्षण-भर को पता नहीं कौन-सा अहसास मुझे अपने मे डुवोता ले गया था--पता ही नही लगा। एक कंपकपी-सी सारे शरीर मे दौड़ गई थी। दरवाजा मैंने इतने धीरे से खोला कि बाहर खडे को तुरन्त पता नही लगे किन्तु वहाँ कोई नहीं था। मुझे अपरिचित नही, बहुत ही जाना-पहचाना । लौटने की हिम्मत नही थी-मुझे अकेला देख फिर पीली आंखें मुझे दबोच लेंगी। ठण्डी हवा के चलते हुए भी लगा कि पसीना पूरे चेहरे पर छा गया है। पूरे चेहरे पर ही नहीं शरीर के एक-एक हिस्से पर । लगा, थोड़ी देर भी खड़ा रह गया तो एकदम जम जाऊँगा, और कोई जान भी नहीं पाएगा कि- कमरे में फिर जाने की हिम्मत मेरे मे नही थी । वे पीली आँखें जरूर कही दुवकी बैठी होंगी और मुझे अकेला वापम आते देख फिर से मेरे सामने आ जाएँगी।-धीरे से मेरी ओर बढ़ेंगी, मुझे घूरती हुई दबोच लेंगी और मैं सिर्फ छटपटाता रह जाऊँगा-सिर्फ छटपटाता हुआ। एक.क्षण के लिए, एक घण्टे के लिए अथवा दिन निकलने तक । कोई नहीं जान पाएगा कि"। सभी की प्रतिक्रियाएँ भिन्न-भिन्न होगी। जिनके बीच मैं कही नहीं होऊँगा। यह सोचते हुए भी अपने-आपको दहशत और आतक से मुक्त नहीं रख पा रहा था। हर वक्त यही लगता कि 'अभी-अभी मेरे पीछे वही परिचित भय लगा, फिर यह सव: २१ हलकी-हलकी आहट होगी । मैं मुडकर देखूगा और फिर सम्मोहित-सा बंधा रह जाऊंगा । बहुत चाहते हुए भी भूरी पलकों में छिपी इन पीली आंखों से अपने को मुक्त नही कर पाऊँगा। सिर्फ जड-सा खड़ा रह जाऊंगा अथवा जमे हुए बर्फ-सा धीरे-धीरे पिघलता हुआ चला जाऊँगा । या अग्नि पर तपते हुए प्लास्टिक-सा पिघलते हुए एक नई और घिनौनी गुड़मुड-सी आकृति ग्रहण कर रहा होऊँगा । कुछ भी हो सकता है किन्तु जो भी होगा इमका मुझे पूरा विश्वास था कि वह जाना-पहचाना होगा। ओवरकोट के कॉलर को ऊपर उठा दिया। मुझे अब यहाँ से हटना होगा। कही भी जा सकता हूँ । जहाँ सिर्फ वर्फ ही वर्फ हो अथवा ऊँचे-ऊँचे पर्वतो की जड़ों मे छिपी खाइयाँ ही खाइयाँ जहाँ एक कदम के फिसलते ही लुढ़कता चला जाऊँ । मेरी हड्डियो का कण-कण विखर जाए अथवा लावे- सी उफनती हुई ऊंची-ऊंची पानी की लाल लहरें जो मुझे अपने मे समेटती ले जाएं किन्तु यहाँ नहीं ठहर सकता । वे पीली आँखें, उनका क्रूर सम्मोहन किसी तरह नही सह सकता जिन्होंने मुझे इतना विवश और असहाय कर दिया है कि मैं कुछ भी तो नहीं कर पाता । कुछ भी तो नहीं । गेट को मैंने पीछे मुडकर बन्द नही किया, मुझे बाहर निकलते हुए पीली आँखे अच्छी तरह याद थी। लगा, कोई धीमी-धीमी आहट मेरा पीछा कर रही है, मेरे करीव और करीब आती जा रही है । हथेलियां ठण्डी होने लगी और गर्म ओवरकोट को लादे हुए भी शरीर बुरी तरह काँप रहा था। यह कपपाहट तेज और सर्द हवा के कारण नहीं है, इसका मुझे पूरा यकीन था। आहट अब और कुछ तेज हो गई थी और मेरी हथेलियो का ठण्डापन और अधिक बढ़ गया था, ठण्डापन और अधिक बढ़ता जा रहा था जैसे उनके दोनों ओर कच्चे बर्फ की ढेर सारी सिल्लियाँ रख दी गई थी। और मैं लडखडाफर गिरा-मुझे एकाएक लगा था कि पीली आँखों ने मुझ पर छलांग लगा दी है किन्तु यह मेरा भ्रम ही था। तभी मुझे किसी ने सहारा दिया था। मैं अनदेखे ही उसके प्रति कृतज्ञता से पूरी तरह भर गया । मुझे उसका यह अप्रत्याशित आगमन बहुत भला लगा क्योंकि इन २२ : उसका रोल पीती आँखो के अहसास से मैं अब फिर कुछ देर के लिए मुक्ति पा सकता हूँ। क्योकि जब कोई मेरे साथ होता है तो पीली आयें कभी मेरा सामना नहीं करती। मैं कुछ नही बोला था। सिर्फ कृतज्ञता-भरी दृष्टि से उसकी ओर एक यार देख फिर दृष्टि को वापस लौटा लिया था। मुझे पहली बार लगा था कि हमारी इस जिन्दगी में बहुत कुछ ऐसा घटित होता है जिसका हमे सिर्फ अहसास भर होता है । जिसके सन्दर्भ में हम कुछ कह नहीं सकते, कुछ लिग्न नही मकते, सिर्फ अनुभव कर सकते हैं । और उन क्षणो को मैंने ऐसे ही भोगा था। मैंने उसकी ओर एक बार फिर उन्ही कृतज्ञता-भरी निगाहों से देखा। वह अधेड उम्न की दुबली-पतली सांवले रंग की ईसाई लगती थी। जबकि वह ईसाई नहीं थी। चेहरे से वह मुझे नसं लगी जबकि ऐसा होना एकदम सम्भव नहीं था। "मैं आपका बहुत आभारी हूँ।" मैं इतनी देर मे पहली बार बोला था। बोलते हुए मुझे स्वय अपनी आवाज बहुत बीमार और कमजोर प्रतीत हुई। बन्द घड़े में बहुत दिनो से कैद कोई घरघराती आवाज । कमरों मे बन्द रोशनी रग-विरगे कांचो से छनती हुई हम तक पहुँच रही थी। मुझे फिर भय लगने लगा था वही परिचित भय । अब मैं फिर अकेला पड़ जाऊँगा। नर्स ने बताया था कि उसे यही तक जाना था और मुझे अभी और आगे जाना था जहां एक बार फिर अकेला पड़ जाऊँगा। मेरे आसपास कोई नहीं होगा, कोई भी नहीं । और फिर मेरे पीछे वही धीमी आहट होगी, मैं कांपता लडखडाता हुआ रह जाऊँगा। मेरी हथेलियां फिर ठण्डी होनी प्रारम्भ हो जाएंगी। कच्चे बर्फ की सिल्लियां उन्हे दबोच लेगी और मैं पीछे मुड़ने को विवश होऊँगा या तेजी से भागता हुआ किसी पत्थर से टकरा बेहोश | जाऊँगा । कुछ भी हो सकता है-~-पीछे मुडकर देखूगा तो पीली आंखो का सम्मोहन फिर मुझे बांध लेगा। मैं जम-सा जाऊँगा। पीली आंखें मेरी ओर बढ़ेगी और मैं"। इससे तो अच्छा यही होगा कि तेजी से भागता हुआ किसी चट्टान से टकराकर लडखड़ाकर गिर गाऊँ और बेहोश हो जा। तब उनकारी देहीसगी नी कुछ होगा मेरे अनजाने में ही होगा। अखि मेरीणत्वापारमा चिपक सकती हैं अथवा"। Ce मुझे पता ही नहीं लगा कि कब मेरा चेहरा फिर उन्हीं नन्ही-नन्ही 5ण्डी बूंदों से भर गया। नर्स शायद वहुत देर से देखती आ रही थी क्योकि उसने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया था। मुझे बड़ी राहत-सी महसूस हुई । लगा वे नन्ही-नन्ही बूंदें फिर मेरे चेहरे पर से सूखती जा रही हैं। एकदम खाली दृष्टि से उसकी ओर देखा था-लगा, इन निगाहों से मैं बहुत अरसे से परिचित हूँ। नर्स ने मेरी ओर मुमकराकर देखा था। और मुझे अपनी मृत मां का सहसा ही स्मरण हो आया था। "आपका इस दशा में अकेले जाना ठीक नही है। कुछ देर मेरे साथ रुकिए। कुछ देर ठहरकर चले जाइएगा।" नर्स मेरा हाथ पकड़कर एक ओर को मुड़ गई थी। मैं चुप रह गया था। नर्स ने धीरे से मेरा हाथ छोड़ दिया था। वह कमरे का ताला खोल रही थी। "अकेली रहती हूँ न । इतनी जगह काफी होती है ।" नर्स फिर उसी परिचित मुसकान मे मुसकराई थी। इस रोशनी में मैंने उसे ऊपर से नीचे तक पहली बार इतनी बेबाक और तेज दृष्टि से देखा था। छरहरे शरीर और आकर्षक मुद्राओ वाली यह नर्स मुझे उम्र में बहुत कम प्रतीत हुई जब कि रात के अंधेरे मे, मैंने एक अधेड़ उम्र की औरत की कल्पना की थी। नर्स हलके पीले रंग का गाऊन पहने जव मेरी ओर मुड़ी तो एक क्षण के लिए मैं उसकी ओर एकटक देखता रह गया था। उसके शरीर का एक- एक उभार बहुत अनजाना, साथ ही वहुत परिचित प्रतीत हुआ। नर्स सहसा दूसरी ओर मुड़ गई थी और हीटर पर पानी रख मेरे समीप आ खड़ी हुई थी। "अरे आप अभी तक खड़े हैं ! वैठिए न।" और उसने मेरे ऊपर एक गर्म कम्बल फेक दिया था। मुझे आश्चर्य हुआ कि मेरी आवश्यकता को वह २४ : उसका सेल कितनी जल्दी समझ जाती है। "आप बेकार कष्ट कर रही है।" मैं नर्स से बहुत ही हिचकिचाहट के बाद अपना सकोच प्रकट कर पाया था। "बेकार क्यो ? कॉफी की तो मुझे भी आवश्यकता है। बहुत थक गई हूँ।" नर्स फिर उसी तरह मुसकराई। मैंने अपने हाथों में कम्बल उठा लिया था। "वे मेरे पति है । जयपुर में एक फर्म मे ऑफिसर हैं।" नर्स जिस सीधे और मपाट लहजे में, मेरे सामने खुले एलबम में लगे फोटो को देखकर बोली, उसमे मैं चौक गया। नर्स ने ही अपनी बात को आगे बढाया। "दो साल से मुझसे अलग हैं। यह सुना है, कोई दूसरी औरत उनके साथ रहने लगी है।" नर्स उठ खडी हुई। शायद पानी उबलने लगा था। कॉफी का प्याला मेरी ओर जब उसने बढाया तब मुझे वह विलकुल सहज और पूर्ववत् लगी थी। मुझे विलकुल नही लगा कि कुछ ही क्षण पहले वह अपने इस जीवन के कुछ पृष्ठो को मुझे पढवा गई थी। मुझे लगा कुछ क्षण पूर्व घटित वे क्षण मैंने सपने मे भोगे थे अथवा नर्स किसी भावुकता-भरी कहानी का कोई अश सुना गई थी। नर्स कॉफी का प्याला थामे पलंग पर बैठ गई थी और घुटनों तक अलवान को सरका लिया था। "हमे यहां इस प्रकार बैठे देख कौन सोच सकता है कि हम अभी तक एक-दूसरे में अपरिचित होगे।" मुझे लगा सदा मुसकराने वाली नर्स सहसा कही भावुक हो आई है। "आपको इतने खराव मौसम में बाहर नही निकलना था। आप वीमार है न ।" नसं की आवाज सहानुभूतिपूर्ण और तरल हो चली थी। मुझे लगा मैं फिर पुराने अह्मास में खो गया हूँ। वे पीली आँखे मुझे फिर अपने समीप दिखाई देने लगी। धीरे-धीरे मेरी ओर बढती हुई । मैं सिहर उठा । ठण्डी बूंदें फिर चेहरे पर इकट्ठी होनी प्रारम्भ हो गई थी। नसं ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया था। ।
फिर यह सब : २५ "मुझे ऐसी कोई बीमारी नहीं है। अकसर मेरी मनःस्थिति ऐसी ही हो जाती है। कुछ पता नहीं लगता। लगता है शरीर मे कंपकपाहट वढती जा रही है। उँगलियां सुन्न होती जा रही हैं। और चेहरे पर ठण्डी बूंदें इकट्ठी होती जा रही है।" मैं इतना ही कह पाया। लगा मैं अपने असली भय को किसीसे भी नहीं कह सकता-किसीसे भी नही । यह सिर्फ मेरे साथ ही दफन हो जाएगा। ठीक उन हजारों-लाखों सपनों की तरह जो किसीसे नहीं कहे जाते । अपने तक से नही। "ऐसा कब से है ?" नर्स मेरे और पास सरक आई थी । इस प्रश्न का कोई उत्तर मेरे पास नहीं था। "अब मैं चलूंगा वरना रात और गहरी हो जाएगी। मुझे अपने मित्र से मिलना बहुत जरूरी है। अन्यथा रातभर फिर मैं सो नही पाऊँगा।" मैं उठ खड़ा हुआ था। "ऐसी स्थिति में, मैं आपको जाने के लिए नहीं कह सकती। आपकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। आपको स्लीपिंग पिल्स की जरूरत है न । नहीं-नही मैं गलत नही हूँ। आपकी आंखें साफ बता रही है। आप यकीन रखिए यहाँ आपको कोई परेशानी महसूस नहीं होने दूंगी।" नर्स ने मेरा हाथ पकड़कर उसी पलंग पर बैठा लिया था। मैं असहाय और विवशता के टुकड़ों से घिरा सिर्फ उसे देखता रह गया था। "लगता है आप अधिक सोचते है अथवा अपने विषय में विभिन्न गलतफहमियां पाले हुए हैं। दोनों ही अवस्थाएं साधारण व्यक्ति के लिए खतरनाक हैं। क्यों ठीक हूँ न ?" नर्स फिर वही परिचित मुसकान मुसकराई। "आप अकेले तो नहीं हैं !" नर्स ने मेरे पैरो पर आधा अलवान डाल दिया था। "आपका सोचना गलत नहीं है । अकेलेपन का अच्छा-खासा अभ्यस्त हो चुका हूँ।" लगा, मेरी आवाज कही दूर से आ रही है। "अभ्यस्त नही विवशता महिएगा। अकेलापन कम दुखदायी भाव नही - २६ : उसका खेल - है। उसको सहना बहुत ही साहस की बात है।" नसं फिर कही खो गई थी अथवा मुझे ऐसा लग रहा था। "आप इसे कुछ भी संज्ञा दे सकती है । कभी-कभी मुझे स्वयं अकेलापन विवशता नजर आती है। और यही विवशता हमे उनका अभ्यस्त बना डालती है।" तुम्हे एक लड़की की आवश्यकता है। वही तुम्हे इस एकाकीपन से छुटकारा दिला सकती है।" और नर्म खुलकर हँस पड़ी। उसने बातचीत को धारा को बहुत ही सहज ढंग से वदल दिया था। नर्स की बात मुझे कही टीस गई। मैंने बड़ी ही कातर दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए कहा, "मैं यह अनुभव भी ले चुका हूँ। किन्तु अपने-आपको इस स्थिति से छुटकारा नहीं दिला पाया और मैं जिस चीज का अभ्यस्त था अथवा जो मेरी विवशता बन चुकी थी उससे पत्नी शीघ्र ही कब गई । और एक दिन मुझे सदैव के लिए छोडकर चली गई। सदा-सदा के लिए। और उस दिन मुझे दूसरी बार लगा था कि रिश्तो को कितनी आसानी से तोड़ा जा सकता है । पिघलते हुए प्लास्टिक की तरह किस तरह नई और घिनौनी आकृतियाँ दी जा सकती है। लगभग दो महीने वाद मेरी पत्नी ने एक छोटा-सा पत्र भेजा था कि प्रत्येक औरत मां बनने से पहले पत्नी बनना चाहती है। और मैं तुम्हारे लिए पत्नी नहीं मां थी-मैं ही नहीं, कोई भी औरत इसको स्वीकार नहीं कर सकती।" मैं उठने का प्रयास करने लगा था। "आप रातभर यहाँ ठहर सकते है। इस वक्त कहाँ जाएँगे।" नर्स की बात सुन मैं चौंक गया । मुझे ऐसी आशा बिलकुल नही थी। "किन्तु आप मेरी वजह से क्यो परेशान होती हैं? आपको दूसरा अरेंज करना होगा।" "दूसरा क्यों ? हम दोनी इसी पर सो सकते है ।" और नर्स अपनी उसी परिचित मुसकान से एक बार फिर मुसकराई। "किन्तु फिर यह सब : २७ "किन्तु क्या? शरीर धर्म मेरे लिए इतना पवित्र नहीं है कि एक रात के लिए तुम्हारे साथ सोने में अपने-आपको कुलटा और तुम्हें दुराचारी समझने लगे।" और मैंने एक बार फिर कृतज्ञता-भरी, भरी-पूरी निगाहो मे नर्स की ओर देखा था। मैं शायद तीन वर्ष बाद अपने-आपको इतना आश्वस्त पहली बार पा रहा था। पीली आँखें मुझसे दूर हो गई थी-बहुत दूर। मुझे आज उनसे बचने के लिए स्लीपिंग पिल्स लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। नर्स मेरे पाम उसी परिचित मुसकान के साथ लेटी थी। मुझे वह मुसकान बिलकुल प्राकृतिक लग रही थी-मायावी किंतु कृत्रिम नहीं। मुझे एक बार भी यह तीक्ष्ण अनुभूति नहीं हुई कि नर्स मेरे लिए बिलकुल अपरिचित है । हम दोनो का माथ सिर्फ कुछ समय पूर्व का है । और सिर्फ सात घण्टे बाद हम फिर एक-दूसरे के लिए अजनबी हो जाएंगे। "तुम्हे आश्चर्य होगा। मैं एक लम्बे समय तक मां के पास सोया था। मुझे कभी नहीं लगा कि मेरी उम्र इतनी बढ़ गई है कि दूसरों के लिए यह बहुत ही हास्यास्पद है । मां के हाथ अपनी बाहों मे लिए मुझे कभी महसूस नहीं हुआ कि मेरी उम्र तीन वर्ष के शिशु से अधिक है। मां भी मेरे कारण सामाजिक दायरों से एकदम कट गई थी। कही हम दोनों ही असामाजिक हो आए थे। सिर्फ एक बार ऐसा हुआ था जब मैं मां के पास नहीं सो पाया था। सच कहता हूँ नर्म, उस रात मुझे रातभर नीद नही आई थी। तीखी गरमी होते हुए भी पूरा शरीर एकदम ठण्डा पड़ गया था -चेहरा नन्ही- नन्ही बूंदों से भर गया था। हर वक्त यही लगता कि पीली आँखें अभी- अभी मेरी ओर बढ़ेगी। आज मैं अकेला हूँ, विवश हूँ। कोई मेरी रक्षा नही कर पाएगा और वे मुझे दबोच लेंगी। मैं सिर्फ ठण्डा होता हुआ रह जाऊँगा। चीख भी नही सकूँगा । उस रात बार-बार मुझे यही लगता था। और अगले दिन जब मा आई पी तो उसका कहना था कि एक ही रात में, मैं पूरी तरह पीला पड़ गया था। जैसे सारा खून हल्दी में बदल गया था। और २८ : उसका खेल " . फिर उसने मुझे कभी अकेला नही छोड़ा--कभी नहीं। सिर्फ मौत ही उसे मेरे से अलग कर सकी। तुम खुद अनुमान लगा मकती हो नर्स, मैं कितना टूटा हूँगा उस रात-जब मुझे लगा होगा कि अब कभी वह तुम्हारे साथ नही सोयेगी। अव कभी तुम अपने आपको तीन वर्ष का शिशु महसूस नहीं कर सकोगे । अब कभी पीली आंखें तुमसे नहीं बचेंगी। मौका पाते ही तुम्हें दबोच लेंगी और नर्स उस रात एक बार फिर मेरी वही स्थिति हुई थी। रात होते ही जैसे अंधेरा मेरे कमरे मे घुसता। मुझे लगता पीली आँने मेरे कमरे मे कही छिन गई हैं--मेरे पीछे वही धीमी-धीमी परिचित आहट होती और फिर वही रोज के सोचे हुए विचारो का यथार्थ रूप । और फिर मेरे सामने सिर्फ एक यही चारा रह गया था। तुम्हे आश्चर्य होगा नर्स जब कभी मुझे नींद नहीं आती तो मैंने एक रात मे दम-दस गोलियां एक साथ ली हैं, और मुझे कुछ नहीं हुआ। किन्तु नर्स वे पीली आँखें । उफ् जब भी उनकी याद आती है लगता है कि 'बस लगता है कि " उस वक्त शायद मैं सिर्फ तीन वर्ष का था। कमरे में मेरे एक ओर पांच महीने के भाई के कोई नहीं था। मां कही बाहर गई थी तब ये पीली आँखें प्रकट हुई थी। मैं उनकी ओर सम्मोहित-सा देखता रह गया। मुझे वह मोहक लगी थी। वह धीरे-धीरे पहले भाई की ओर वढी थी और मैं सिर्फ सम्मोहित-सा देखता रहा था। भाई की चीखे सुन मेरा सम्मोहन भग हुआ था और मैंने देखा कि वे पीली आँखें भाई को गरदन से चिपटी हुई सहम गया और फिर मुझे पता नही लगा। जव तन्द्रा से जागा तो पता लगा कि पूरे आठ घण्टे बाद मेरी वेहोशी टूटी थी। मेरी गरदन पर दो लम्बी-लम्बी खरोचें थीं जो एक-दूसरे को काटती एक निमुज का निर्माण करती चली गई थी। अपने छोटे भाई का विल बिलाना और रोना फिर मुझे कभी सुनाई नहीं दिया । तभी से लगता है कि अभी-अभी एक आहट होगी। वे पीली आंखें धीरे-धीरे मेरी ओर वो गी-~मैं सम्मोहित-सा उनकी ओर देखता रह जाऊंगा, और फिर पिघलता हुआ वेहोश हो जाऊँगा, वे और मैं फिर यह सब : २९ आगे बढ़ेंगी, उन खरोंचो पर चिपक जाएंगी। सच कहता हूँ, इस दुखद अहसास से कभी मुक्ति नही पा सका-बहुत चाहने पर भी।" मैं आश्चर्य- चकित रह गया था । नर्स की उदासी सहसा मुसकराहट में बदल गई थी- "मैं पता नही क्या कुछ समझी थी । यह कुछ भी नहीं है। मान तुम्हारी भ्रम है।" "मैं आपको विश्वाम दिलाती हूँ आप विलकुल सही हैं। आपको एक बार फिर नये सिरे से शुरूआत करनी चाहिए।" नर्स सहसा उदास हो आई थी और उनकी बाँह मेरे वक्ष से आ टिकी थी। सुवह होने पर जब आंखें खुली तो मुझे गहरा आश्चर्य हुआ कि मैंने यह रात बिना स्लीपिंग पिल्स के ही विता दी है। विश्वास नहीं हुआ कि पिछली रात मुझे उन पीली आंखों के कदमों की धीमी आहट सुनाई नही दी। एक बार भी नहीं। मेरी उम्र सहसा घटकर तीन वर्ष हो गई थी।
वुझे हुए चेहरे वह एक पिता... अभी-अभी सीढियो पर आहट होगी। कभी तेज कभी धीमी । आवाज का कोई क्रम नहीं होगा। खट-खट् की कर्कश ध्वनि के बीच खांसी के तीन- चार, कभी रुक-रुककर कभी एक साथ, जोरदार ठहाके । ठहाकों के बीच जोरदार हांफने की आवाज और फिर गले से सड़े हुए थूक को उगलने को घृणित क्रिया का मन ही मन अहसास । होगा यही सब कुछ, मुझे पूरा विश्वास था, सिर्फ क्रम बदल सकता है। हालांकि ऐसी कम ही सम्भावना थो, पूरे पिछले पांच वर्षों से मैं ऐसे ही देखता आ रहा हूँ। उठे हुए ऊपरी होंठ की ऊपरी सतह पर घने और तने हुए बेतरतीब सफेद बालों का बर्गर तराशा हुआ झुण्ड और उसके बीच वार-बार उछल पडता हुआ गहरे काले रंग का एक मस्सा। मस्से को खुजलाने के लिए वार-चार बढता हुआ दायां हाथ और वांये हाथ मे गन्दगी-भरी सतह से लिपटा हुआ खाकी थैला, जिसके रंग और पिता की धोती के रंग में अन्तर कर पाना सचमुच मेरे लिए एक कठिन और पीड़ादायक स्थिति होगी। ऊपर से नीचे तक ऐकदम अजूवा बनी यह आकृति पहले धीरे से मेरे पास आ खड़ी होती है और मेरा चेहरा अपने आप ही पीले दांतो से भरे उबकाई लेते मुंह से दूसरी ओर धूम जाता है। "वर्मा जी आज बडी जिद कर रहे थे। रास्ता निकलना भारी कर युझे हुए चेहरे : ३१ या है। कहते हैं सतीश को उनके बच्चे को पढाना ही होगा। अन्यथा निका बच्चा जरूर फेल हो जाएगा।" अपनी बात पूरी होने के साथ-साथ तुशामदाना हॅसी जिसकी तहो से लिपटी एक अजीव-सी वू मुझे घेर लेती "मैंने उनसे साफ-साफ कह दिया कि अपने सतीश का रेट अव बढ़ या है। एक घटे के पूरे तीस रुपये लेगा और मेरे कान में घुसती हुई धीमी फुसफुसाहट, "किसी से कहना नहीं कि तुम रावजी के यहां से सिर्फ पीस लेते हो। मैंने सबसे तीस ही कहा है।" "किन्तु मेरे इम्तहानों को सिर्फ एक महीना रह गया है । अगर अपनी पढाई नहीं करूंगा तो स्वयं फेल हो जाऊँगा।" खुली किताब में अपनी आँखें गड़ाने का प्रयास करता हूँ किन्तु निष्फल, इस जानी पहचानी और अजनबी आकृति को अपने पास उपस्थित होने के भ्रम को किसी भी प्रकार निकाल नहीं पाता। "एक घण्टे में कुछ विगडता नहीं है। पूरे तीस मिल रहे हैं । एक घण्टा तो इधर-उधर से बचाकर ही निकाल सकता है। और तू जानता ही है कि कितनी तगी रहती है।" और फिर एकपक्षीय उखड़ी-उखड़ी बातों का लम्बा सिलसिला । बीच- बीच मे खाँसी की जोरदार कर्कश ध्वनि और गले मे जमे हुए बलगम के थक्को की जोर की आवाज के साथ <खारते हुए वही मेरे पास उगल देना। और फिर एक लम्बी खीझ के साथ दाएं हाथ से मस्से को खुजलाते हुए और बाएँ हाथ से थैले को ऊपर-नीचे करते हुए जिनमें लोटती बार तीन-चार चितकबरे-से रंग के बैंगन और छोटी कंकड़ियो के आकार के ढेर सारे आलू होंगे, आगे बढ़ जाना। मैं काफी देर तक आगे जाती इस आकृति को पीछे से देखता रहता हूँ। इतना आत्मीय और परिचित होते हुए भी हर बार एक मीटर लम्बी दूरी क्यों बढ़ जाती है। चाहते हुए भी उनकी बातों में रस और आत्मीयता क्यों नहीं जुटा पाता?
३२ : उसका खेल मुझे लगता है कि मैं पिता के ठीक आगे जा खड़ा हुआ हूँ और पिता के झुरियो-भरे चेहरे पर कुछ तलाश रहा हूँ-जिस पर राख के रंग की एक भुरभुरी तह और चढ गई। और फिर आँखें किताबो पर टिक ही नहीं पाती। साथ में अजनबी मा... पिचके हुए गालों और धंसी हुई हड्डियो वाला चेहरा धीरे से मेरे पास आएगा। उभरी हुई नाक से टिका प्लास्टिक के फेम वाला गोल चश्मा और चश्मे की टेक और नाक के बीच फंसा हुआ चिक्कट रूअड़ का छोटा- सा टुकड़ा धीरे-धीरे मेरी ओर बढेगा और हल्दी के रंग की यह जीवत गठरी मुझे बहुत दयनीय प्रतीत होगी जिसको चाहते हुए भी मैं सहला नही पाऊँगा--सिर्फ दो क्षण के लिए एकटक देखूगा और फिर कोई अजीब-सी क्रिया बार-बार दोहराने लगूंगा। स्याही की दवात में पैन डुबोकर उसे वार-वार भरना और फिर खाली कर देना । एक खाली कागज को लेकर विना किसी तात्पर्य के काटती हुई रेखाओं का जाल निर्मित करना और उनके बीच एक चेहरा खीच देना और फिर उस चेहरे को लेकर देर तक परेशान रहना और कुछ नही तो.." वह कुछ बोलेगी नही और बोल भी सकती है। किन्तु उमके बोलने अथवा न बोलने का परिणाम सिर्फ एक ही होगा-अर्थात् मेरा उसे जोर- जोर में उपटना। (डपटना किसी भी बात को लेकर हो सकता है। ममनन यही कि सबने मुझे परेशान कर रखा है कोई पढ़ने ही नहीं देता। पता नहीं कौनगे कर्म लेकर इस घर में पैदा हुआ था।) यह मा ही थी। उनके हाप में एक मुड़ा-नुहा-सा कागज था, जिस पर पीले रंग के तीन-चार निशान साफ चमा रहे थे। "दादरी पाली की चिट्ठी आई है।" मा मुगराई अपरा उमका अन्दाज रोने का पा~मैं कुछ सोच नहीं पाया रिन्नुमा के कुछ बताने में पहले ही सय सुध गमा गया। दारी निकरी की मगुराल है। नदी में गिफंदी अवगरी पर ही बिट्टी बुझे हुए चेहरे : ३३ आती है। एक तब जब किसी नये प्राणी को घर में वृद्धि होती है और दूसरी उस समय जब निक्की को अपने पीछे-पीछे पूरे पांच खोखले पेट और लटके हुए चेहरे वाली भीड़ इस घर में लानी होती है निक्की के लड़की हुई है। अब मैं पहचानता हूँ कि मां की आवाज में थरथराती हुई प्रसन्नता थी। मां के चेहरे पर इस थरथराती प्रसन्नता के पीछे कुछ और भी तलाशने का प्रयास करता हूँ किन्तु असफल रहता हूँ। यानी कि एक और नंगा-भूखा घर में आ गया। लंगता है शरीर कही उबाल लेने लगा है और मां पर बिना अर्थ ही फटने वाला है। किन्तु उवाल अपने आप ही बैठ जाता है। शीशा देखने की इच्छा होती है कि वह खोखलापन जो इस समय मेरे चेहरे पर छा गया है उसका आकार कैसा है ? "अब तो तुझे ही कुछ इंतजाम करना होगा। लड़की हुई है। पचास-सी का कुछ भेजना ही होगा। घर की हालत तुझसे छिपी नहीं है..." मां की थरथराती प्रसन्नता अब कुछ शान्त पड़ गई है। उसमें दरारें उत्पन्न होनी प्रारम्भ हो गई हैं। मुझे प्रसन्नता होती है कि काफी समय से इसी की तो प्रतीक्षा कर रहा था। जब कभी मां बहुत व्याकुल, परेशान और टूटी हुई होती है तो मुझे काफी सन्तुष्टि प्राप्त होती और उसे और अधिक व्यथित करने के लिए और अधिक क्रूर हो उठता हूँ। "मैं अब कुछ नहीं कर सकता। मेरे इम्तहान सिर पर आ गए हैं और कोई मुझे चैन से पढ्ने भी नहीं देता। अकेला घर में मैं ही तो बचा हूँ और तो सब मर गए। मैं कहाँ तक और कब तक माँ-खपूं।" इतना सब कुछ कहने के बाद अपने-आपको काफी हल्का पाने लगा और मां एकदम गुमसुम हो आई थी। नाक की टेक के नीचे दबा चिक्कट रूअड़ एकदम स्थिर हो आमा था और माखों की ओर देखने का साहस खुद मुझमें नहीं था। मुझे पता है कि अब मो इसी तरह बैठी रहेगी-काफी समय तक एकदम गुमसुम । कुछ भी नहीं बोलेगी किन्तु उसके अस्तित्व को मैं कैसे नकार पाऊँगा, न लिखाई न पढाई। इसलिए यहाँ से मुझे ही हटना होगा। बाहर निकलते हुए गिफं बही गुमसुम बहती नाक को बार-बार कार ३४ : उसका खेल की ओर खीचती हुई आकृति मेरे सामने थी। जिसके झुर्रियों-भरे चेहरे पर राख की कई तहे जमी हुई थी। पीछे-पीछे एक मरियल-सी लड़की.. थोडा झुकाव लिए सूखी खरपचियों से बनी देह के ऊपर ढेर सारे पैवन्दों का कुर्ता और धूल मे लिपटा-सा गरारा सलवार तेजी से लपकता हुआ मेरी और आएगा और चेचक के असख्य चकत्तो (कलौसी लिए हुए गहरे लाल और सफेद रंग के) से घिरा लम्बूतरा चेहरा ठीक सामने खड़ा हो जाएगा और मैं पीछे मुड़ने को विवश हो जाऊँगा। एक मरियल-सी लडकी मेरी ठीक बगल में खड़ी हो गई। जब भी माँ से झगड़ बाहर जाने को होता हूँ ऐसा ही होता है। यह मेरी बहन के रूप में परिचय कराते हुए बाहर शायद मुझे कई वार नहीं तो एक बार तो अवश्य ही सोचना होगा। मेरे से वह सिर्फ चार वर्ष छोटी किन्तु कन्धे तक मुश्किल से पहुँच पा रही थी। आँखे एकदम पथराई हुईं जिनको देख कोई भी कह सकता था कि इन्होने जागते हुए सपना नहीं देखा है। जब कभी स्कर्ट (जो तीन वर्ष पुराना हो चुका है) पहनती है तो अपनी उम्र से बहुत छोटी नजर आती है—मुश्किल से वारह-तेरह वर्ष की नाममझ प्रौढ लडकी। मुझे तब गुस्सा आता है कई बार डॉट भी देता हूँ कि उसका स्कर्ट पहनना मुझे अच्छा नहीं लगता। वह कुछ नहीं समझती किन्तु सब-कुछ ममझ जाती है और फौरन स्कर्ट उतार वही धूलभरा गरारा अथवा सलवार पहन लेती है और मैं आँखें चुराने लगता हूँ। "भैया खाना खाकर जाना।" वह कम बोलती है और मैं उमके कम बोलने से बहुत-मी उलझनों से बच जाता हूँ। अत. उसका बोलना अच्छा हो लगता है। मैं उमे बडी गौर से देखता हूँ और उममें कुछ तलाशना चाहता हूँ। कुछ ऐमा जिमसे मैं अनुमान लगा सकू कि इमका विवाह करना अब बहुत आवश्यक हो गया है। जिसके लिए मां पिछले दो वर्षों से मेरी बुझे हुए.चेहरे :१३५ जान को पड़ी है कि मैं किसी लडवो को निगाहो मैं खू। लेकिन अपने को असफल पाता हूँ-मूखी खरपंचियों से वैनी मुश्किल से साढ़े चारफुट देह- बदरंग चकत्तो से घिरा लम्बूतरा चेहरा, पथराई हुई मां और मुश्किल से तेरह-चौदह वर्ष की नजर आनेवाली यह मरियल-सी लड़की-मेरी बहिन.. सहसा मेरे आगे निक्की घूम जाती है। ठीक इसी की तरह, और मस्तिष्क चकराने लगता है। निक्की सिर्फ पच्चीम वर्ष की, उससे तीन वर्ष छोटा मैं और मुझसे चार साल छोटी माला। सात साल में पांच बच्चे- नंगे और भूखे। तो माला भी और फिर एक साल बाद एक, फिर दो, फिर तीन और फिर लगा चकराकर गिर जाऊँगा। एक फिरकनी-सी मेरे आगे दौड़ने लगी थी। "भैया, आज इतिहास की किताब जरूर ला देना। इम्तहान बहुत । पास आ गए हैं।" वह मुझे निर्विकार-सी लगती है जैसे उसके कहने और न कहने का कोई अर्थ नहीं है। न कहती तो तब भी कोई विशेष बात नहीं थी। इस साल मां और पिता के बहुत मना करने पर भी हाईस्कूल का प्राइवेट फार्म भरवा दिया था । अतः सारी जिम्मेदारी मेरे पर ही आ गई। सब कुछ मुझे ही करना होगा । फार्म की फीस से लेकर किताबो की खरी- दारी तक। "तेरी पढाई तो ठीक चल रही है न ?" लगता है मान इतना सब कुछ कहने में कितने ही रेगिस्तानों की यात्रा कर आया हूँ। वह स्वीकारात्मक सिर हिलाती है और उमको सिर हिलाता देख मुझे सहसा ही अंजीर के कीड़े खाए लम्बे-लम्बे पतो को याद हो आती है। पिता भी अभी बाजार से नहीं लौटे हैं अर्थात् अभी वैगन और आलू नहीं उबले है अर्थात् अभी खाना बनने में थोड़ी देर है और मैं थोड़ी देर इस तनाव से मुक्त हो सकता हूँ और थोड़ी देर के लिए इन आकृतियों को पीछे छोड सकता हूँ।
३६ : उसका खेल बहिन के एक बार रोकने पर भी नहीं रुक पाता। और बहुत चाहने पर भी वहिन के लम्बूतरे-भरभराती राख-से चेहरे को अपने ऊपर से उतार- कर नहीं फेंक पाता। सबके शवो को ढोता हुआ मैं" यह चौराहा है। इसकी बगल मे 'राज रेस्तरां', इसकी बगल मे एक छोटी-सी गली और उस गली मे एक पक्का मकान और उसमे दो छोटे-छोटे बच्चे जिन्हे मुझे घण्टे भर तक पढाना है-पढ़ाना क्या रिकार्ड की तरह बकना है क्योकि मुझे पता है कि कितना ही क्यों न पढाने में मन लगाऊँ, यह कभी नही पढ सकते सिर्फ खिलवाड कर सकते है। इसके बाद फिर दूसरा मकान, फिर तीसरा और फिर चौथा और फिर थककर चूर-चूर हो जाना। घर लौटते हुए मस्तिष्क के गुबार को बाहर फेक देने का निष्फल प्रयास करना और फिर एक लोटा पानी पी ऐसे ही खाट पर पसर जाना। थोड़ी देर बाद उठना-चार सख्त रोटियो को चवाना और फिर किताबें ले अपनी आँखें फोडना। फिर एक परिचित आहट होगी। खांसी के बिना किसी क्रम के और कभी एक साथ लम्बे ठहाके और बलगम के जमे थपको को बाहर उगलने का प्रयास करता हुआ वही परिचित बूढा शरीर। वह कुछ कहता जाएगा और मैं सुनता जाऊंगा। थोड़ी देर बाद झुरियो वाला चेहरा उठेगा और मेरी ओर देखेगा और फिर बाहर हो जाएगा और मैं कुछ भी न ग्रहण कर पाने के खेद को अपने ऊपर लाद रहा हूँगा। योडी देर बाद नाक को टेक के नीचे दवा चिक्कट रूअड़ मेरी ओर बढ़ेगा और अपनी गाथा कहता जाएगा, मैं सुनता जाऊंगा और ऊंघता जाऊँगा और फिर प्लास्टिक के फ्रेम वाला चश्मा भी मुझसे दूर हो जाएगा। इस बार हल्की-सी आहट होगी। एक लम्बूतरा चेहरा पहले मेरी और देखेगा और फिर चुपचाप एक कोने में किताव खोलकर बैठ जाएगा। मैं पहले चुपचाप थोड़ी देर उसको और देगा और फिर मुझ पर बुझे हुए चेहरे : ३७ नींद छानी प्रारम्भ हो जाएगी और नीद लेते हुए थोड़ी देर को मुझको एक भ्रम होगा-कि यह कमरा नही पूरा मकान एक अर्थी मे बदल गया है। अर्थी में लिपटेमा, पिता, निक्की और माला और"। और उस अर्थी को मैंने अपने कन्धों पर उठा रखा है। मेरे चार प्रतिरूप हो गए हैं-अर्थी के चार कोनों को उठाए हुए मेरे चार प्रतिरूप।
उसका खेल "और अव हमारे ठीक सामने एक झील थी। मीठी-मीठी और धीमी आवाज मे शोर रचती हुई । मैंने पानी को चुल्लू में भरा । एकदम सफेद जगमगाता पानी। चांदी की झील। मैंने उसकी ओर देखा। वह एकदम निलिप्त था । अनासक्त । मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने मुट्ठी खोल दी। मुट्ठी मैं कैद चाँदी तार-तार हो नीचे पिघलने लगी। वह होटो ही होठों मे कुछ बुदबुदा रहा था । कोई प्रार्थना । मुझे आश्चर्य हुआ कि यहां भी यह संक्रा- मक बीमारी फैली हुई है । यह मेरी पूर्व धारणाओ के एकदम विपरीत था। उसका सुनहरा शरीर जगमगा रहा था । पीली धूप उसके शरीर पर फिमल रही थी। मेरी आंखो मे एक चमक थी। शायद यह चमक वासना होती यदि वह मादा होता। वह उसी तरह बुदबुदा रहा था। फुसफुसाती आवाज में । मैं लगातार झील की ओर देख रहा था। झील की ओर देखना मेरा निरा भावुकता-भरा और अकारण नहीं था। सांसारिक ऐश्वर्य की लहरे मेरे अन्दर हिलोरें मार रही थी। मैं उस प्रक्रिया के विषय मे सोच रहा था जिससे पानी जमकर चांदी की बड़ी-बडी सिल्लियो मे बदल सकता है। मैं अपने इस भेद को किसी को बताना चाहता था। किसी को भी । बड़ी देर से उसका नाम याद कर रहा था। विलकुल स्मरण नहीं आ रहा था। वह पूरी तरह मस्तिष्क से कही और फिसल गया था। कितनी अजीब बात
उसका खल:३९
है। मुझे अपने पर झुंझलाहट हुई। ऐसा कभी नही होता था।
"तुम शायद कुछ सोच रहे हो।" वह मेरे सामने आ गया था।
"हाँ।" मैंने कहा।
"मुझे बताओगे ?"
"यही कि तुम्हारा क्या नाम है ?"
वह हँस पड़ा। हंसते हुए मुझे लगा कि उसका सुनहरा शरीर महीन
तारों मे पिघलने लगा है। मेरे मन मे एक क्रूर इच्छा धीमे-धीमे करवटें ले
रही थी-यदि इसको मैं दहकती हुई भट्टी में झोक दूं तो मुझे कितना सोना
प्राप्त हो सकता है। मैं आराम से बैठकर गणित हल करना चाहता था।
"मेरा नाम कुछ भी नहीं है।" उसकी हंसी शान्त हो चुकी थी। मुझे
याद हो आया सचमुच उसका कोई भी नाम नहीं है । मुझे उलझन हुई यदि
मुझे कभी आवश्यकता हुई तो मैं उसे किम नाम से पुकारूँगा। मैं उससे
पूछना चाहता था किन्तु पहली समस्या अधिक महत्त्वपूर्ण थी।
"तुम्हारे यहाँ ऐसी कितनी झीलें हैं ?"
"असख्य।"
"कमीना।" मैंने उसे मन ही मन गाली दी। ऊपर से मैं मुस्कराया।
"इतनी चांदी तो हमारे पूरे ग्रह पर नहीं होगी।"
"अच्छा।" उसकी आवाज में कोई उत्साह नही था ।
"इतनी चांदी का तुम क्या करते हो?"
"कुछ भी नहीं।"
"क्या? कुछ भी नहीं ?"
"हम इसे पीते हैं।"
"तुम बेवकूफ हो। इसे नष्ट कर रहे हो। इतनी चांदी से देश के देश
खरीदे जा सकते हैं।"
"देश क्या होता है ?" उसकी आवाज में उत्सुकता थी।
मेरा मन हुआ, मैं उसके अज्ञान पर ठहाका मारकर हसू-इतनी जोर
से कि वह इस झील मे गिर पड़े। मैं अपने-आपको काफी गम्भीर रसे
.
४० : उसका खेल हुए था। "देश का एक राजा होता है। जिसकी सब आज्ञा मानते हैं । तुम्हारे राजा का क्या नाम है ?" "हमारे यहां कोई राजा नहीं है।" "तुम्हारी शासन-व्यवस्था फिर कैसे चलती है ? कौन नियम और कानून बनाता है ? अपराधियो को कोन दण्ड देता है ? जनता से कौन कर वसूल करता है ?" मैं आवेश मे तेजी से बोलने लगा था। "हमारे यहां अपराध ही नहीं होते। हम आपस में कभी नहीं लड़े- झगड़ें।" "तुम कायर हो। विना परस्पर लडे सभ्य कसे बन सकते हो? कैसे प्रगति के शिखर पर चढ सकते हो ? तुम अभी भी दो हजार वर्ष पहले की जिन्दगी जी रहे हो।" "हम इस पचड़े मे नही पड़ते।" "तुम सतुप्ट सुअर हो।" "हम ऐसे शब्दो का उच्चारण नहीं कर सकते।" "तुमने कभी किसी मादा के साथ बलात्कार नहीं किया ?" "हमे ऐसी आवश्यकता ही नहीं महसूस हुई। हम सब बेहद खुले दिल के है । स्त्री-पुरप के सम्बन्ध हमारे यहाँ जटिल नहीं हैं।" "तुम पुरुष नहीं हो।" मैं क्रोध और आवेश में कांपने और हाँपने लगा था। "हमे कभी क्रोध नहीं आता।" उसकी आवाज में जमा देने वाती ठंडक थी। वह आकाश मे कुछ देखने लगा था। थोड़ी देर बाद उसने आसपास के चमकते हुए छोटे पत्थरों को उठाकर झील में फेंकना प्रारम्भ कर दिया। वह उसी तरह मुस्करा रहा था। उसका चेहरा बेहद मासूम लग रहा था। नहीं मुझे धोखा हुआ है-~यह मासूमियत नही भयंकर कमीनापन है । स्साला बहुत बनता है। मेरे अन्दर-अन्दर उसके लिए गालियो का ज्वार उसका खेल : ४१ । फूट रहा था। सहसा मैं चौंका । वे टुकड़े जो वह झील में फेंक रहा था पत्थर के टुकडे नहीं थे। वे धूप में बुरी तरह चमक रहे थे। रंग-बिरंगी किरणे छिटका रहे थे। मुझे लगा कोई तेज आरी से मुझे ऊपर से नीचे तक चीरता चला जा रहा है। वह पत्थर उसी तरह फेंक रहा था। यह उसका खेल था। उसके होंठों पर यह खेल खेलते हुए मुस्कराहट थी-एक शीतलता थी, एक अज्ञात सुख था। मैं सिहर गया। मुझे लगा मैं कंगाल होता जा रहा हूँ। वे टुकड़े, टुकड़े नही मेरे शरीर की कीमती अस्थियाँ है । मैं और अधिक देर तक यह सब सहन नहीं कर सकता था। मेरा चेहरा पीडा से थरथरा उठा । मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। "तुम पागल तो नहीं हो गए हो?" मैं जोर से चीखा । "तुम्हें पता है ये पत्थर कितने कीमती हैं ? एक-एक पत्थर हजारों- लाखों रुपये का है।" वह डर गया था, क्योंकि उसकी आवाज मे भय था, "रुपये क्या होता है ?" "यह बहुत बड़ी चीज होती है।" "आकाश के बराबर?" "उससे भी अधिक विस्तृत । उसकी लम्बाई-चौडाई नहीं नापी जा सकती। वह असीम है, निराकार है। सारी पृथ्वी उसके इर्द-गिर्द घूमती "सच !" उसकी आँखो मे आश्चर्य था, "तुम मुझे उसे दिखाओगे ?" "हो."वह बहुत महान चीज है । उससे सब कुछ खरीदा जा सकता है । देश भी, उसका राजा भी। कानून भी और कानून के निर्माता भी, सब कुछ।" उसकी आँखों में चौंकने का भाव था। शायद वह आश्चर्यचकित था। उसके बैहरे की रंगत धीरे-धीरे फिर लौटने लगी थी झील उसी प्रकार शोर कर रही थी। - ४२ . उसका खेल "उसका रग कैसा होता है ?" "उसका कोई रंग नहीं होता। उसके सब रंग होते हैं।" "उसका आकार, रूप,..." "तुम सनकी हो। मैंने तुम्हें बताया नहीं कि वह वर्णनातीत है।" मैं कुछ-कुछ झुंझला आया था। तभी उसने अपने हाथ का एक पत्थर झील को ओर उछाल दिया। मुझे लगा जैसे उसने पत्थर को नही मुझे झील में फेंक दिया है। "वया" मैं जोर से चीखा, "इस प्रकार तुम उसे नही देख सकते । उसे देखने के लिए इन पत्थरों का होना बेहद आवश्यक है।" 'वह आश्चर्यचकित था। "हाँ. 'इनका होना बेहद आवश्यक है। विना इनके उसका कोई अस्तित्व नहीं है।" मैंने अपना हाथ उसकी ओर बढ़ा दिया। "नही ।" उसे विश्वास नहीं हुआ और उसने एक साथ सारे पत्थरों को झील मे लुढका - "यह तुमने क्या किया। मेरे सारे सपनो को भंग कर दिया। मेरी हत्या कर दी।" "वह देखो। अपने पैरों की तरफ।" उसने कहा। उसके चेहरे पर मेरी बात का कोई प्रभाव नहीं था। मैने अपने पैरो की तरफ देखा । मैं चकित रह गया। मैं चारो ओर से इन्ही पत्थरों से घिरा था। मैंने गिनती करनी चाही। अनगिन । रंग-विरगे, कई रगो में चमकते हुए। मैंने उनका मूल्यांकन करना चाहा । मेरा सारा गणित गड़बडाने लगा था। मैं तेजी से उसकी ओर झपटा । उसने मुझे पीछे खीच लिया। "तुम इन्हे नहीं उठा सकते।" "मैं उठा सकता हूँ। तुम मुझे नहीं रोक सकते।" "यह यहाँ को समदा है । यह यहाँ को श्री है। यह इस झील को अमा. नत है।"
उसका खेल : ४३ "मैं कुछ नही जानता..मैं इन्हें अपने साथ ले जाऊंगा। यह मेरे लिए अमूल्य हैं । तुम नही जानते इनसे मैं पूरी पृथ्वी खरीद सकता हूँ।" "तुम्हारा प्रयास व्यर्थ है। तुम इन्हें छू भी नहीं सकते। इन्हें हमारे अतिरिक्त कोई नहीं छू सकता। हमारे अतिरिक्त इन्हे जो भी छूता है उसके लिए मात्र यह हवा है।" "तुम झूठ कहते हो । मुझे धोखा दे रहे हो। मैं तुम्हारी वातो में नहीं आऊँगा।" मेरी आवाज कांपने लगी थी। मेरे हाथ कांपने लगे थे। मेरा सारा शरीर कांपने लगा था। मैं तेजी से झुक गया था। मैं उन पत्थरो पर टूट पड़ा था। उनकी चमक मुझसे सहन नहीं हो रहीथी। उसने मेरे मस्तिष्क पर पूर्णतया आधि- पत्य स्थापित कर लिया था। मैं पागल हो चुका था। मैंने तेजी से मुट्ठी बन्द कर ली। मुझे लगा, मैंने सारी पृथ्वी को कैद कर लिया है। यह झूठ बोलता है, कहता था कि मैं इन्हे छू भी नहीं सकता। मैंने इन्हे मुट्ठी में जकड़ लिया है। मेरी मुट्ठी में बेशकीमती पत्थर कंद है, उनका मूल्यांकन नही हो सकता। धीरे-धीरे मेरी मुट्ठी खुल रही थी। मैं चकित था। मेरा मस्तिष्क मेरे काबू में नहीं रहा था। मुझे लग रहा था कि जो मैं देख रहा हूँ वह सब झूठ है, सिर्फ एक मायाजाल है । सत्य सिर्फ यह है जो मेरी मुट्ठी में कैद है। नहीं नहीं, यह सत्य नही हो सकता । किन्तु यह मेरा भ्रम था। सत्य यही था जो अव घट रहा था। मेरी मुट्ठी में पत्थर नही ह्वा कैद थी। मेरी मुट्ठी खुल चुकी थी। हवा धीरे-धीरे उसमें से निकल आकाश मे फैल थी। मैं जोर से चीखा। मैं अब हवा का पीछा कर रहा था। मैंने जोरो से अपने हाथ आकाश में उछाले । मै हवा को कैद करना चाहता था।- मैंने बार-बार हाथ उछाले, मुट्ठियाँ बन्द की किन्तु मेरी मुट्ठी बिलकुल खाली थी। मैं हताश हो आया था। मैं वहीं सिर पकड़कर बैठ गया। वह सामने खड़ा मुस्करा रहा था। - ४४ : उसका खेल मेरे सामने झील थी। चांदी की झील । मैं धीरे से उठा। मैंने उसकी ओर देखा। वह खडाखडा कुछ बजा रहा था। उसमे से संगीत जैसा कुछ फूट रहा था। वह मुझे पूर्णतया मस्त लगा-वेपरवाह । मुझे लगा थकान मेरे पोर-पोर में बसती जा रही है। सांस तेजी से चलने लगी है। हम धीरे-धीरे चल रहे थे। वह बीच-बीच में बच्चो की तरह किलकने लगता, कभी नाचने लगता। वह सगीत मे खो गया था। मैं उसे देख जला-भुना जा रहा था। मेरे अन्दर बार-बार ईर्ष्या करवटें ले रही थी। मैं अभी भी अपने उस पुराने गणित को नहीं छोड़ पा रहा था। मेरा मस्तिष्क पूर्णतया उसी मे उलझा था। दो टन-सी टन-हजार टन-- लाख टन चाँदी-सोना-हीरे, मैं गणित हल करने में असमर्थ चकराने लगा था। हम जहाँ पहुँचे थे वहाँ बडे-बड़े पेड थे। पेड असख्य रग-बिरंगे फल- फूलों से घिरे थे। हम उनके नीचे ठहर गए। "तुम्हे भूख लगी होगी," उसने कहा । उसने वह वाद्ययन्त्र बजाना छोड दिया था। "नही..।" मैं रुखाई से वोला। सत्यता यह थी मेरा पेट खाने के लिए बार-बार आग्रह कर रहा था । वही मैंने यह भी सोचा था कि वह मुझसे पुन आग्रह करेगा। किन्तु मेरी इच्छा के अनुकूल उसने कुछ नही कहा । कुछ नहीं करा । वह फिर उसी तरह खड़ा राग अलापने लगा था। मैं क्रोध से भर उठा । स्वार्थी-मैं मन ही मन बुदबुदाया। "मुझे भूख लगी है," मैं धीरे से वोला। मुझे अपनी आवाज अपरिचित लगी। वह कुछ नहीं बोला । धीरे से उठा । अपना बाजा एक स्थान पर रख- कर एक ओर को मुड गया। उसके अदृश्य होते ही मैंने उसका बाजा उठा लिया। एकदम अजीत्र चीज थी वह । नक्काशीदार, बेहद खूबसूरत, अमूल्य । पृथ्वी पर सब इसे आश्चर्य से देखेंगे-उनकी दृष्टि में मेरे प्रति उसका खेल : ४५ से झपट - 1 आश्चर्य और सम्मान होगा। मैं इसे अपने पास रख सकता हूँ। मुझे थोड़ी उलझन हुई–यदि उसने इन्कार कर दिया तो ? उलझन अधिक देर के लिए नही थी। दूसरे ही क्षण वह कपड़ो के अन्दर मेरे पेट से चिपका था। जब वह लौटा, मैं सामान्य हो चुका था। उसके हाथों मे ढेर सारे फल थे। ऐसे फत मैंने कभी नहीं देखे थे। मैंने सारे फल उसके हाथ लिए। तेजी से उन्हे मुंह मे दवा लिया । अनोखा स्वाद था उनका। वह एक ओर घूमकर खड़ा हो गया था। वह कुछ तलाश रहा था, शायद, अपना वही वाजा । वह मुझे परेशान नजर आया। उसकी परेशानी मुझे मजा दे रही थी। "तुमने तो उसे नही देखा?" "किसको ?" मैं उसी तरह खाते-खाते बोला। "वह हमारे लिए अमूल्य है । उसके बिना हम जिन्दा नहीं रह सकते।" वह परेशान हो आया था। पहली बार वह मुझे इतना व्याकुल, भयभीत और उतावला प्रतीत हुआ। "तुम किसके विषय में कह रहे हो ?" मैं अपने को बिलकुल सामान्य रखे हुए था। मन ही मन मैं अब डर गया था। वह इतनी महत्त्वपूर्ण वस्तु होगी इसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। "वही जो मैं अभी-अभी बजा रहा था। वह कहां जा सकती है, समझ में नहीं आता," वह बुरी तरह भयभीत था। पसीने से उसका पूरा चेहरा । भर गया था। "वह हमारी जिन्दगी का आधार है । उससे हमें प्राण वायु मिलती उसका पूरा गरीर बदरंग होता जा रहा था। "तुम उसे कही और से प्राप्त कर सकते हो। इतना चितित होने की क्या जरूरत है ?" "नहीं, यह हमारे लिए अमूल्य है। तुम नही समझ सकते। जैसे ४६ : उसका खेल । तुम्हारे शरीर मे एक हदय होता है जिसके बिना तुम जीवित नहीं रह सकते। जिसका हर समय स्पंदित होते रहना अनिवार्य है, उसी तरह वह हमारा हृदय है । उसके विना हम अधिक से अधिक सिर्फ चार घण्टे तक जीवित रह सकते हैं।" "मिर्फ चार घण्टे तक।" "हाँ...।" उसकी आँखें बुझने लगी थी। उनमे एक स्याह अंधेरा छाने लगा था। आँखो की पुतलियां धीरे-धीरे ढीली पड़ती जा रही थी। मैं गणित हल करने में व्यस्त था कि उसके मृत शरीर से मैं कितना सोना प्राप्त कर सकता हूँ। उसका अधिकाश शरीर सिर्फ सोने का बना है-शुद्ध सोने का। उसकी मांसपेशियां, भारी-भरकम और चमकदार है। उसकी आँखें, उसके कान, उसका मुंह सभी अंग सोने के। इतना सोना... "मुझे क्या सचमुच मरना होगा ?" वह धीरे से बुदबुदाया। मैंने उसकी ओर देखा । इसकी आँखो मे और उसके सम्पूर्ण हाव-भावो मे एक अविश्वास था, एक अज्ञात घृणा थी-अपनी मृत्यु के प्रति । शायद मेरे प्रति। "सव मेरी प्रतीक्षा कर रहे होगे।" वह तेजी से इधर-उधर ढूंढ रहा था। उसकी आवाज कांप रही थी। उसका मारा शरीर लड़खड़ा रहा था। "इतनी महत्त्वपूर्ण चीज तुम इतनी आसानी से छोड़ देते हो। शरीर का सबमे बहुमूल्य अंग अपने शरीर से इस प्रकार अलग कर देते हो ?" कोई उमै नष्ट कर सकता है। कितना सम्भव है, तुम्हारा कोई दुश्मन ही उसे उठा ले।" "हमारे यहां कोई चोरी नहीं करता। हम नहीं जानते दुश्मनी क्या होती है। दूसरे के लिए वह एकदम व्ययं होता है। हमारे ग्रह पर ऐमी घटना पहली बार घटी है, आश्चर्य है !" उगने तेजी से अपना माया पकड लिया था। उसकी गिर की नमें उसका खेल : ४७ - तेजी से फूलती जा रही थीं। "मैं अब जिन्दा नहीं रह सकता । मुझे कितना अफसोस होगा कि मैं तुम्हारी कुछ भी सहायता नहीं कर सका।" उसका पूरा शरीर काला पड़ता जा रहा था। मैंने ध्यान से देखा- अग्नि पर तपता हुआ विशुद्ध सोना, ठीक उसी तरह। एक घण्टा गुजर चुका था। मुझे अभी तीन घण्टे और प्रतीक्षा करनी थी। एक मारक प्रतीक्षा । एक उबाऊ प्रतीक्षा । एक मरते हुए व्यक्ति को प्रतीक्षा । मेरा मन गणित में गोते लगाने लगा। इसके लिए मैं नये सिरे से सम्पदा के समीकरणों को हल करने लगा। यहां से कितना कुछ अपने साथ ले जा पाऊँगा । शून्य से शून्य जुड़ता चला गया और संख्याएँ विराटसर होती चली । सहसा इस विचार के अन्तर् मे से एक प्रश्न जहरखुझो तीर की तरह छूटा--"यहाँ मैं कैसे आया ?" मुझे याद नहीं था कि मै इस अज्ञात ग्रह पर कैसे आ गया। किरा प्रकार और क्योकर पहुंच गया? यह सव मेरे लिए अशात था। एक अज्ञात और भयावह ससार-इसके बावजूद बेहद आनन्दप्रद और तृप्ति- दायक। इतना निश्चित था कि यह सब स्वप्न नहीं था। यह एक कटु और क्रूर यथार्थ था जो मेरे सामने घट रहा था। कटु और क्रूर किन्तु कितना उत्तेजनात्मक ! यह ग्रह कितना समृद्ध और हरा-भरा है। मैं दंग रह गया था। इसकी तुलना मे हमारी पृथ्वी एकदम कंगाल । किन्तु रह- रहकर मुझे अपने लोग याद आ रहे थे। मैं कोई सत्कार्य करना चाहता था । मेरी नसो मे रह-रहकर एक उवाल उठ खड़ा होता । तपता हुआ लहू मेरी कनपटियों मे एकानित होना प्रारम्भ हो गया था। पूरे शरीर में एक सिहरन-भरी अकड़न छाने लगी थी। ये क्षण मेरे लिए बेहद यातनादायका थे जिससे मुक्ति पाने के लिए मैं छटपटा उठा । बार-बार इच्छा होती भय साथ चलते इस ग्रहवासी पर टूट पड़े। किन्तु यह सब दूसरे ही धाण मे ठंडा और व्यर्थ प्रतीत होता। उसका पूरा शरीर एकदम सपाटा। गले से ऊपर के अंग मेरी तरह थे। शेप एक दम सपाट और पूर्णतया ४८ : उसका खेल . उसकी नग्नता का मेरे लिए कोई अर्थ नही था।''मैं अपने लोगों को याद कर रहा था और एक आकुलता मेरी नस-नस मे व्यापने लगी थी। "तुम मुझे बता सकते हो मैं यहां कैसे आया ?" मैं उसके चेहरे पर झुकता हुआ बोला। "क्या मुझे सचमुच मरना होगा ?" उसके चेहरे पर आन्तरिक पीडा के चिह्न उभरने लगे थे। "तुमने मुझे कहाँ देखा ? मुझे यहाँ तुम लाए थे क्या ? मैं यहाँ आखिर कैसे पहुंच गया ?" उसकी आँखें मुंदने लगी थी। मैं उसके चेहरे को अपनी ओर तेजी से करता हुआ तेज आवाज मे बोला, "तुम्हे बताना होगा, तुम मुझे यहाँ क्यों लाए थे ? मैं यहाँ से वापस अपनी पृथ्वी पर कैसे जा सकता हूँ?" उसने धीरे से आँखे खोली। उसकी आवाज में बेहद ठंडापन था, "वे तुम्हे मारकर फेंक गए थे। तुम्हारा प्रत्येक अग टुकडं-टुकड़े कर उन्होंने फेंक दिया था। तुम बिलकुल मर चुके थे। तुम्हारे शरीर मे कोई सांस नही रही थी। हम कुछ लोग वहां थे । हमे तुम पर दया आ गई। हम तुम्हें अपने यहां ले आए। हमने तुम्हें नया जीवन दिया ताकि तुम और अधिक सुख उठा सको।" "मैं वापस कैसे जा सकता हूँ?" "तुम वापस जाना चाहते हो?" "हाँ..., •, मै किस प्रकार जा सकता हूँ ?" "तुम वापस नहीं लौट सकते।" "मै यहाँ नहीं रह सकता। मैं यहां मर जाऊंगा"मैं वापस जाना" वापस जाना "" मेरी साँस फूलने लगी थी। मैं बस यही वाक्य वार-बार दोहराए जा रहा था। "वे तुम्हें फिर मारकर फेंक देंगे। तुम्हारे टुकडे-टुकड़े कर देंगे।" "नही"। वे मेरा कुछ नहीं कर सकते। मैं उनके बीच लोटना चाहता हूँ। मैं उनके बीच.." । - उसका खेल : ४९ सहसा उसने अपनी आंखें तेजी से खोल दी थी। मैं डर गया। वह तेजी से उठ खड़ा हुआ। "तुमने तो मेरा हृदय नहीं चुराया है ?" वह तेजी से मेरी ओर झपटा था। "नही -भला मैं उसे क्यों लूंगा। तुम पागल हो गए हो।" मैं पीछे हट गया था। "हमारे यहां कोई पागल नहीं होता।" वह हताश हो आपा था। वह फिर उसी तरह लेट गया था। मैं डर गया था, यदि उसने मेरी तलाशी लेना प्रारम्भ कर दिया तो मैं पकडा जाऊँगा । मेरा सारा झूठ उसके सामने खुल जाएगा। किन्तु उसने मेरा विश्वास कर लिया था। वह उसी तरह थरथराने लगा था। "तुमने मुझ पर सदेह क्यों किया? तुम्हारे यहां एक-दूसरे पर संदेह किया जाता है ?" उसकी आवाज मे तेजी नहीं रही थी, "हम नहीं जानते संदेह क्या होता है । मुझं स्वय आश्चर्य है कि ऐसी बात आज तक मेरे मन में नहीं उठी थी। मुझे नहीं पता मेरे अन्दर तेजी से क्या घटित होता जा रहा है । मैं टूट रहा हूँ-टूटता जा रहा हूं-मैं मर रहा हूँ।" उसका एक अग पूर्णतया अशक्त हो चुका था। उसका रंग तेजी से काला पड़ता जा रहा था। भट्टी पर तपता हुआ सोना ! सिर्फ दो घण्टे और ! दो घण्टे की प्रतीक्षा-क्या यह प्रतीक्षा और जल्दी समाप्त नहीं हो सकती?-सहसा मुझे वह दृश्य याद हो आया था, अपने पुराने जीवन का आखिरी दृश्य जव मैं अपने आत्मीय मित्रों के बीच घिरा बैठा था और सहसा सव मुझ पर टूट पड़े थे, मेरे मांस को खाने के लिए, मेरे खून को पीने के लिए। मेरी सारी पेशियो थरथराने लगी थी। मैं दहशत से जड हो गया था। मुझे लगा मेरा सारा शरीर पत्थर होता जा रहा है। सिर्फ पांच मिनट और उसके पश्चात् ! इस महाद्वीप ५० : उसका खेल पर अकेला मैं-मान मैं । भटकता हुआ, ठोकरें खाता हुआ। क्या सचमुच मैं अपनी पृथ्वी पर वापस नहीं लौट सकता? नही लौट सकूँगा ? ढेर सारे प्रश्न मेरे इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगे थे। नहीं-मैं इसे तब तक नहीं मरने दूंगा जब तक यह मुझे पृथ्वी पर लौटने का रास्ता नहीं बताएगा। उसका पूरा शरीर काला पड़ चुका था। उसमें कही हलचल नहीं थी। मैं उसके चेहरे पर झुका । "मैं तुम्हें जिन्दा कर सकता हूँ।" उसके मुर्दा शरीर में एक हलचल-सी हुई थी। उसका शरीर थोड़ा उठा। उसकी आँखो में एक चमक उत्पन्न हुई, "तुम सच कहते हो !" "हां-मैं अहसान फरामोश नही हूँ। एक वार तुमने मुझे जिन्दगी दी थी, इस बार मैं तुम्हे जिन्दगी दूंगा।" मैंने तेजी से उसका छिपा हुआ हृदय निकालकर हाथ में ले लिया। उसकी आँखों की चमक तेजी से लौटने लगी थी। ".."तो यह तुम्हारे पास था ?" "हाँ !" मेरा चेहरा तनने लगा था। "तुमने मुझे काफी परेशान किया। इसे जल्दी से मुझे दे दो। मैं मर ।" "मैं खेल खेल रहा था।" "यह कैसा खेल था?" "हमारी पृथ्वी का सबसे अधिक रोचक खेल । तुम्हें मुझे बताना होगा, मैं यहां से कैसे वापस लौट सकता हूँ?" "तुम्हारे यहां इसी प्रकार के खेल खेले जाते हैं ?.. मैं मर रहा हूँ। जल्दी से मेरा हृदय मुझे दे दो "जल्दी से।" उसने उठने का असफल प्रयत्न किया। उसकी आँखों में करुणा, याचना और न जाने क्या-क्या एकसाथ नाचने लगे थे। "मैं इसे तुम्हे नहीं दूंगा।" "मुझ पर दया करो-में इसके बिना मर जाऊंगा। मैंने तुम्हे जिदगी
उसका खेल : ५१
दी थी, मुझे तुम जिन्दगी दो।"
"अभी मेरा खेल खत्म नहीं हुआ है।"
"खेल बाद में खत्म हो जाएगा । मुझे पहले मेरा हृदय दे दो मैं मर
"मैं खेल को अधूरा नहीं छोड़ सकता। हम खेल को अधूरा नहीं
छोड़ते।"
"उफ .." उसकी आँखो की चमक फिर तेजी से बुझने लगी थी।
विशुद्ध, तपा हुआ सोना । मेरा मस्तिष्क फिर गणित हल करने मे।
"अच्छा लो. 'मैंने उसका हृदय उसकी ओर बढ़ा दिया।
उसने तेजी से उसे लपकने के लिए अपना हाथ फेंका। मैंने उससे
अधिक तेजी से अपना हाथ पीछे कर लिया।
"मेरा खेल अभी समाप्त नहीं हुआ-पहले मुझे बताओ, मैं वापस
कैसे लौट सकता हूँ? तुम्हारे इतना बताते ही मेरा खेल समाप्त हो
जाएगा । मैं तुम्हारा हृदय तुम्हें लौटा दूंगा।"
"सच-तुम सच कहते हो।"
"हां, मेरा विवशस करो। मैं वायदा करता हूँ तुम्हारे इतना-सा
बताते ही मैं तुम्हारा हृदय तुम्हे वापस कर दूंगा।"
उसके शरीर मे हलचल हुई। तपे हुए सोने का पत्थर । भारी-भरकम
सोने का पत्थर । मैं गणित हल करने में...!
"तुम्हारे ठीक पीछे तुम्हारी पृथ्वी है। तुम्हारे ठीक पीछे, किन्तु तुम
क्यों लौटना चाहते हो? तुम्हें वे लोग फिर मार डालेंगे। तुम यही रहो
मेरे साथ ? तुम्हे कोई कष्ट न होगा, कोई कष्ट..!"
मैं प्रसन्नता के आवेग मे भूमने लगा था। मुझे विश्वास नही हुआ कि
सचमुच पृथ्वी मेरे इतने नजदीक है। मैं एकदम पीछे घूम गया। सचमुच
पृथ्वी मेरे एकदम पीछे थी। मेरा पूरा शरीर उत्साह और प्रसन्नता के
अतिरेक से थरथराने लगा था।
. मैं चौका। कोई धीमी फुसफुसाहट मेरा पीछा कर रही थी।
-
५२ : उसका खेल "." अब मेरा हृदय मुझे लौटा दो। मैं मर रहा हूँ। मैं मर रहा मैं तेजी से हंसा, "मेरा खेल तो अब प्रारम्भ हुआ है।" "मैं मर रहा हूँ. मुझ पर दया करो अपना खेल तुम जल्दी समाप्त कर दो। मुझे मेरा हृदय..।" "तुमने शैतान देखे हैं ?" "शैतान क्या होता है ?" "तुम्हारे ग्रह पर शैतान नहीं होते ?" "नही ''मुझे मेरा यन''मैं मर रहा हूँ।" "मैं तुम्हे शैतान दिखाऊँगा।" "मैं नहीं देखना चाहता ''मुझे मेरा।" "पहले मैं तुम्हे शैतान दिखाऊँगा। हमारी धरती पर शैतानो की फसल उगती है। चारों तरफ शैतानो की खेती होती है।" मैं उसके हृदय को आकाश में, हवा में उछाल रहा था। "शैतानों में मेरी कोई रुचि नहीं है। मुझे मेरा हृदय "मुझे मेरा हृदय'!" उसकी आवाज डूबने और टूटने लगी थी। "पहले मैं तुम्हे शैतान दिखाऊँगा। उसके बाद मैं तुम्हारा हृदय तुम्हे वापस कर दूंगा। मैं वायदा करता हूँ।" उसने कोई उत्तर नहीं दिया। उसके शरीर में कही कोई स्पन्दन नही था। मुझे भय हुआ कही यह मर तो नहीं गया, तब मेरा खेल अधूरा रह जाएगा। अभी आधा मिनिट शेप था। "मैं बिना शैतान दिखाए तुम्हे मरने नहीं दे सकता।" मैं पोड़ी देर को रुका। उसकी ओर देखा, उसका शरीर एकदम स्थिर था। मुझे अब उसकी परवाह नही थी। मैं उसके चेहरे पर झुक गया था- "मेरा रोल अब समाप्त हो रहा है । मरते हुए मैं तुम्हे शैतान के दर्शन कर- वाना चाहता हूं।" उसकी पलकें बन्द थी। मैंने अपनी उंगलियां उसकी आंघों में घुसा उसका खेल: ५३ दी थी । उसको पुतलियो थोड़ी कॉपी और स्थिर हो गईं। "लो देखो । लो शैतान देखो।" कहते हुए मैंने उसके उस यंन को दबाना शुरू किया। उसने अन्तिम बार आँखें खोली और अस्फुट स्वर में देर तक बुदबुदाता रहा। वह खत्म हो चुका था। उसे मैंने अपनी बाँहों में उठा लिया । वह मृत शरीर नही सोने की भारी-भरकम चट्टान थी। मेरा दिमाग फिर गणित में व्यस्त हो गया। शून्य की लड़ियां पिरोने वाला गणित । यह सब, वह सब अब मेरा है। मैं इसे अपने साथ पृथ्वी पर ले जाऊँगा और सारी पृथ्वी को उन लड़ियों में बांधकर अपने कदमों तले दवा दूंगा। और सहसा मैंने पाया कि पृथ्वी मेरे सामने नहीं थी। मैं इधर-उधर मुड़ा, धूमा-भागा, लेकिन पृथ्वी कही भी नहीं थी। और मैंने पाया कि मेरा वह दिशाभ्रम उसका खेल था। शून्यो की लडियां पिरोते हुए मैं अब शून्य ही रह जाने के लिए अभिशप्त था। ।
मुट्ठीभर फेन रोशनी हल्की पड़ गई थी और आमने-सामने बैठे हमारे शरीर थोड़ा धुंधला गए थे। हम दोनो ही शायद सकुचित हो आए थे अथवा रोशनी के हल्के होने ने ही हमे पहली बार यह अहसास दिलाया था कि हम बड़ी देर से कुछ सतही बातो को रवड़ की तरह खोच रहे थे। उसका काले लम्बे बालो से लदा भारी-भरकम हाथ हिलने लगा था। हिलते हुए मुझे लगा था कि उसे काटकर मेज से टिका दिया गया है और उस पर पड़ा हुआ वह फड़क रहा है। थोडी देर स्तिम्भित-सी रह गई थी-शायद इसी घिनोनी कल्पना के कारण। हवा बिलकुल नही थी और हमारे सिर के ऊपर चलता हुआ पखा बड़ी आवाज करता लग रहा था। उसकी और वाला मेजपोश का कोना बार-बार ऊपर की ओर लपकता और फिर नीचे दह जाता। अब मैं नोद महमूस करने लगी थी। शायद वह भी। "क्या वे इसी तरह बाहर चले जाते हैं ?"शायद वात को फिर चलाने का उपप्रम उसने नीद को भगाने के लिए किया था। नही तो इस तरह उसके पूछने का कोई भी अयं नहीं था। "यह तो तुम देखते ही हो।" मुझे लगा था कि मेरे होठ आवश्यस्ता से अधिक फैल थे "तुम्हे डर नहीं लगता?" -
मुट्ठीभर फेन : ५५
"वहुत।"
"
"तो क्या ?" और मैं खिलखिलाकर हंस पड़ी थी। उसके प्रश्न का
उत्तर ही क्या हो सकता था?
"कल आगरा चल रही हो ?" उसकी आवाज में मुझे थोड़ा भारीपन
लगा। शायद उसे भी नीद आने लगी थी।
"आगरा?"
"हाँ। कार से चलेंगे। सिर्फ एक घण्टे का रास्ता है। आधी रात तक
वापस लौट आएँगे!
"हो सकता है कल वे लौट आएँ।"
"तो क्या हो गया ?"
"शायद उन्हें अच्छा नहीं लगे।"
"तो तुम अब भी उनसे डरती हो?"
उसने आवाज को थोड़ा तेज कर दिया था और वह मुझे पहली बार
अजनवी पुरुष लगा।
"अव नीद आने लगी है ।" मैने कहा।
"कल चल रही हो फिर !"
"अभी तो सुबह पड़ी है।" मैंने उठने के लिए पैरों को सिकोड़ा। पैरो
को बेहद ठड लगी।क्षणभर को लगा कि काले वालो वाले हाथ ने मेरी हथेली
को जकड़ लिमा है-किन्तु ऐसा मिर्फ खयाल ही था, दूर पहाडों पर पड़
रही बर्फ की कल्पना की तरह ।
मैंने उठकर रेडियोग्राम चालू कर दिया। हल्का-हल्का सगीत हमारे
बीच थरथराने लगा। उसको थर्राहट से मुझे समुद्र की लहरो की याद
आने लगी। समुद्र से मुझे बचपन से ही डर लगता है ।
सहसा मैंने कुछ अनुभव किया। मैं चौंक गई। ऐसी मुझे बिलकुल
आशा नहीं थी। उसके चेहरे का परिवर्तन मुझे बेहद दयनीय लगा। उठते
हुए कदम थोड़ा स्थिर हो गए।
.
५६ : उसका खेल
"सब फिजूल बातें हैं।" मेरे पैर हरकत करने लगे थे।
"ठीक कहती हो तुम।" वह एकदम स्थिर हो आया। पहले उसमें यह
बात नहीं थी। पहले वह मेरी जरा-सी उपेक्षा से ही बुरी तरह चिढ जाता
और घण्टो नाराज रहता । आखिरकार मुझे रुलाकर ही छोड़ता। मुझे एक
पुरानी बात याद हो आई। कॉलेज के दिनों की। किन्तु वह सब पुनः
स्मरण करने का कोई अर्थ नहीं था।
शायद हम दोनो के ही बीच कुछ धुंधली परछाइयो कांपने लगी थी
जिनका कोई ओर-छोर नहीं था। नींद का दवाव भी हल्का पड़ने लगा
था। काले धने बालो से ढका उसका हाथ अब एकदभ स्थिर था-मुझे वह
मेज के एक कोने से टिका हुआ वेहद मोहक लगा।
"अतीत बहुत दुःखदाई होता है ।" उसने पलकें थोड़ी ऊपर की ओर
की थीं।
"नही तो।"
"मैं भी यही सोचता था।" किन्तु उसकी आवाज से यह एकदम स्पष्ट
या कि उसे कही गहरी ठेस लगी थी। शायद उत्तर 'उसकी आकांक्षा के
अनुकूल नहीं था।
"आजकल कहाँ हो ?" निश्चय ही यह कहते हुए उसकी कार से
आगरा चलने वाली बात मेरे सामने थी।
"कुछ पता नही मेरा।" उसने वाक्य ऐसे स्थान पर अधूरा छोड़ा जहाँ
से उत्सुकता प्रारम्भ होती थी।
"फिर भी ?"
"हाँ तुमने क्या सोचा? चल रही हो न कल?" उसने मेरे प्रश्न को
उड़ा दिया था।
"कल शायद अंशु भी आए। उसके स्कूल की छुट्टी है कल।" अंशु का
विचार आते ही मुझे लगा कि मेरी दोनों मुट्ठियो में ढेर सारी कच्ची बर्फ
दबी है जो धीरे-धीरे पिघलनी चालू हो गई है।
"उसे देखे बहुत दिन हो गए।"
.
मुठीभर फेन : ५७ "करीबन चार-पांच वर्ष।" "अब तो बहुत बड़ी लगने लगी होगी।" उसकी आँखों में निश्चय ही कोई उत्सुकता का टुकड़ा कांपने लगा था। किन्तु वेहद धुंधला था वह, इसमें कोई शक नहीं। "शायद वह मुझे पहचान ले।" "कहाँ ? पहली बार जब तुम्हें देखा था तो वह चार वर्ष की ही तो थी। वैसे भी उसकी स्मरण शक्ति बहुत अच्छी नहीं है।" "तुम फिर कभी नैनीताल गई हो?" "नही।" मैं अनमनी हो आई थी । बात ही कुछ ऐसी थी। उसने मुझ पर बेहद फूर चोट की थी। उन दिनों हमारा टूर गया था नैनीताल । सदियो मे। मैंने घर वालो से वेहद बहाने गढे थे-तोप का साथ पाने के लिए। उन दिनों तोष मुझे कुछ अधिक ही अच्छा लगने लगा था। हम अपनी कम्पनी से अलग हो गए थे जान-बूझकर। सर्दी बेहद थी। ओवरकोट के अन्दर दवा शरीर, लगता था जैसे बर्फ की सिल्ली पर लिटा दिया गया हो। हम ऊंचाई की ओर बढ़ने लगे थे। चीना पीक की ओर। तोप और मेरे ठण्डे शरीरो के बीच कुछ रेंगने लगा था। शायद एक समुद्र और उठते हुए ढेर सारे फेन । सहसा तोप ने मेरा हाथ जोर से भीच दिया था--कुछ-कुछ मेरी भी यही इच्छा थी। उसने अपना मुंह मेरी ओर बढ़ाया था-पहली बार। मैने भी कोई प्रतिवाद नहीं किया। फिर हम थकान का बहाना लिए एक-दूसरे से सटे देर तक वही एकान्त में बैठे रहे थे-नुकीली धुध का पान करते हुए । "अशु आजकल बहुत जिद्दी हो गई है। बिलकुल अपने डैडी पर गई है। डैडी शब्द का उच्चारण मैंने जान-बूझकर अधिक जोर से किया था। शायद उसे यह अहसास.दिलाने के लिए कि अब मेरे साथ एक परछाई और चिपटी हुई है किन्तु उसने यह सब महसूस नहीं किया था। "उस दिन मुझे पहली बार लगा था कि तुम सिर्फ मेरी हो । क्या तुमने
५८ : उसका सेल
भी ऐसा ही कुछ नहीं सोचा था ?"
"कुछ ध्यान नहीं।" मैं फिर उठने का उपक्रम करने लगी थी।
"अशु को तुम्हे देख बेहद गुशी होगी। अक्सर वह शिकायत करती है
कि हमारे यहां मेहमान आते ही नहीं।"
"आगरा तो तुम बहुत बार गई होगी। ताजमहल मुझे तो वास अच्छा
नहीं लगा।"
"कहाँ, सिर्फ एक बार। दो वर्ष पहले।"
"मुझे भी बहुत दिन हो गए। पहली बार मैं बाहर से ही लौट आया
या। अन्दर जाने की इच्छा ही नहीं हुई।"
"उन्हे आगरा वेहद पसन्द है।"--शायद अगली बार ट्रान्सफर वहीं
करवाएं।"
"तुम कुछ दुवली हो गई हो।"
"नही तो। चरबी दिन पर दिन फैलती जा रही है।"
"नही, पहले से काफी दुवला गई हो।"
"समय के साथ परिवर्तन आ ही जाता है।" उसके विश्वास को तोड़ना
मुझे अच्छा नहीं लगा।
"मैं भी पहले से बहुत मुटा गया हूँ
वह शायद चाहता था, मैं उसकी बात का प्रतिवाद करूं क्योकि उसकी
दृष्टि वेहद उत्सुक हो आई थी। मैंने इसकी कोई आवश्यकता नही समझी।
"सारे दिन आराम हो तो करता हूँ।"
"तुम्हे मेरा तार पा पहले तो बेहद आश्चर्य हुआ होगा। जरूर हुआ
होगा क्योकि तुमने बिलकूल नहीं सोचा होगा कि मैं इस तरह तुम्हारे यहां
आ धमक सकता हूं।"
"नही तो--ऐसी कोई बात नहीं थी।" शायद मैंने ठीक ही कहा था।
और मुझे बेहद तुष्टि हुई। सच वात भी यही थी।
"तुम्हारे उनको देखने की बेहद लालसा थी। पिछली बार जब आया
था तव भी मुलाकात नहीं हो सकी थी।" ऐसा कहते हुए निश्चय ही उसके
।"
मुठ्ठीभर फेन : ५९
स्वर में थोड़ी व्यंग्य-भावना दृष्टिगोचर हुई थी।
"वे तुम्हारे पति ही है न।" उमने ड्राइंग रूम की एक दीवार पर लटके
एक फोटोग्राफ को ओर इंगित किया था। वह हमारा संयुक्त फोटोग्राफ
था। नीवे अंशु भी बैठी थी।
"काफी अच्छा आया है।" उसकी आवाज में सतुष्टि थी। शायद उसने
अपने को अधिक मुपीरियर पाया था।
"कहाँ-चेहद रद्दी फोटोग्राफ आया है। उनकी इससे बिलकुल शक्ल
नहीं मिलती। वेहद विगाड़ दी है।" मुझे लगा था कि जैसे उसके चेहरे ने
कई रंग बदल दिए हैं। शायद उसे ऐसी आशा नहीं थी।
"आनन्द का तुम्हे कुछ पता है ?"
"हा-सुना था वह मिलिटरी मे चला गया था। आजकल मेजर हो
गया है।"
"कुसुम का?"
"पता नहीं । दो साल पहले थोडी देर को मिली थी। उसकी शादी
तभी हुई थी।" कुसुम का नाम लेते ही मेरे सामने एक अजीब-मी आकृति
आ खड़ी हुई थी। कुसुम कभी मुझसे पूर्व उसकी प्रेमिका रही थी।
"तुम्हे पता है, नीना के साथ क्या हुआ?" उसकी आवाज बदल गई
थी और साथ ही उसने बैठने की मुद्रा भी बदल दी थी।
"नही तो।" वैसे उसके विषय मे जानने की मुझे कोई विशेष उत्सुकता
भी नहीं थी।
"उसने अपने पति को तलाक दे दिया था। और अब सुना है अपने ही
आफिस के किसी आदमी के साथ ऐसे ही रहती है।" उसकी आवाज में
बेहद ललक थी जैसे वह मुझे कोई राह सुझा रहा था।
"अपनी जिन्दगी बेकार कर ली।"
"पहले तुम बहुत आधुनिका थी।" शायद उसे ठेस लगी थी।
"अंशु गाती बहुत अच्छा है। उसे कई इंगलिश सोग आते है।
कल सुनवाएंगे।" मैंने उसे दिलासा दिया।
६०
.
उसका खेल
"अच्छा।" उसकी आवाज से लगा जैसे नींद उस पर टूटने लगी है
जवकि ऐसी बात नहीं थी।
"तुम्हारे भाई ने लव मैरिज की थी न । कसी निभा रही है उनकी ?
बहुत दिन हो गए उनसे भी मिले।"
"पिछले दिनो ही वे अमरीका गए है।"
"घर वाले आजकल बहुत पीछे पड़ रहे है। उनका खपाल है, अब मुझे
शादी कर ही लेनी चाहिए।" मैं चुप रही।
"अपने जैसी कोई लडकी ढूंढ़ दो।" उसकी बात सुन मुझे जोर की
हँसी आ गई थी। साथ देने के लिए शायद उसे भी।
"कल वे वापस आ जाएंगे । जब भी बाहर जाते हैं, मुझे एक पत जरूर
डालते हैं ।" मुझे लगा कि उसके मुंह का स्वाद जैसे कुछ बिगड़ने लगा है
क्योकि उसने एक उवासी ली थी।
मैंने थर्मस की कॉफी निकालकर उसकी ओर बढा दी।
"तुम्हें याद है, जब हम पढ़ते थे, तुम मुझे एक पत्र रोज लिखती थी,
जव कि हम रोज ही आपस में मिल लेते थे।"
"उनके पन बेहद रोमाटिक होते है।"
"तुम्हे याद है, एक बार हमारा पत्न आनन्द के हाथ पड गया था तो
वापस लाने के लिए उसकी पार्टी करनी पड़ी थी।"
"मैं तो बेहद लापरवाह हूँ। किन्तु वे मेरे पनो को बहुत सम्हालकर
रखते हैं।" झूठ बोलते हुए मुझे तनिक भी अस्वाभाविक नहीं लग रहा
था।
"लगता है, तुम उन्हें बेहद चाहती हो।"
"अंशु अपने डंडी को वेहद प्यार करती है। उनके बिना वह बड़ी
मुश्किल से रह पाती है।"
"पिछले दिनो कभी तुम्हें मेरी याद आई यो?"
मैंने देखा आधी पी हुई कॉफी के प्याले के ऊपर काले रग को काई की
तरह एक पतली टेडी-मेड़ी-सी पर्त उभर आई थी। इसका उत्तर सिर्फ मौन
मुट्ठीभर फेन : ६१
ही हो सकता था।
"तुम्हारा वह फोटो अभी भी मेरे पास है।"
"तुम्हें नीद नहीं आ रही ?"
"कभी-कभी सोचता हूँ कि आखिर यह सव कैसे हो गया ?"
"मुझे नीद आ रही है।"
खिड़की के बाहर मव कुछ स्थिर था। मोरपखी की चोटी बिलकुल
नहीं हिल रही थी।
"आज उमस कुछ अधिक है । हवा बिलकुल नहीं चल रही।"
"कपिल आजकल मेरे पास बम्बई रह रहा है । एक दिन पूछ रहा था
कि आखिर क्या बात हो गई जिमसे अनुराधा तुम्हें छोडकर दूसरे से शादी
कर बैठी?"
मैंने उसकी आँखो मे झांका । उनमें कोई भाव नहीं था।
"बेकार बातें है । नीद नही आ रही तो आओ थोड़ा लॉन मे टहल
लें।"
दरअसल पहली बार मुझे कमरे का वातावरण इतना बोझिल प्रतीत
हुआ कि मुझे लगा, यदि थोड़ी देर और ठहर गई तो जरूर सांस घुटने
लगेगी।
वह कुछ नहीं बोला। हम दोनो बाहर निकल आए। लॉन मे एकदम
अँधेरा था। गहरी चुप्पी और शान्ति । हम दोनों घास पर बैठ गए थे । धास
का ठण्डा स्पर्श बेहद अच्छा लगा।
वह अचानक ही मेरे करीव खिसक आया था।
"तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता ?"
"भला क्यो ?" मुझे अँधेरे में उसका चेहरा नहीं दिखाई दिया था तो
भी मेरा विश्वास था कि निश्चय ही उसने अपना रंग बदल दिया था।
"यहाँ कितना अंधेरा है।"
"यहां इतनी गर्मी नही है ।" मैंने अपने को उसी तरह सहज रखने का
प्रयल किया तो भी लग रहा था कि अंधेरे पल मेरे नजदीक
क
21
६२ : उसका खेल "अगर अचानक तुम्हारे पति यहां आ जाएं तो वे गलत सोच सकते "नही, वे इतने सकुचित नहीं हैं।" यद्यपि सोचा मैंने भी वैसा ही था, किन्तु इतना खुलकर नहीं। कमरे के पर्दे हिलने लगे थे। "इस बार वे आएँगे तो साथ जाकर कमरे के पर्दे लाएंगे। जरा नये ढंग के।" मुझे लगा कि मैंने बेहद गलत बात की चर्चा की है। फिर भी मुझे प्रसन्नता हुई। "एक बात बताओ अनु, तुम मेरे विषय में क्या सोचती हो?" "फिजूल बातें हैं अब ये सब ।" "मुझे तो गहरी नीद आ रही है। अंशु भी सुबह ही आ जाएगी। अब सोना चाहिए।" मैं उठ खड़ी हुई थी। अन्दर जाते हुए मुझे सिर्फ अपने कदमो की आहट सुनाई दी। वह शायद अभी भी उसी तरह लॉन में बैठा था। मैंने पीछे मुड़कर देखा । लॉन मे बैठा वह वेहद अजनबी लग रहा था। नीद फिर मुझ पर हावी होने लगी थी। विस्तर पर लेटते हुए मुझे लॉन की घास का ठण्डा स्पर्श याद हो आया। पहली बार मुझे लगा कि बिस्तर बेहद ठण्डा है । पति को याद मुझे अनायास ही सताने लगी थी। ।
अवमूल्यन महाशय, आपका सुझाव है कि मुझे अब अपने-आपको बेच देना चाहिए। अपने आपको ही नहीं, पूरे परिवार को। यानी अपनी पत्नी, लड़के और लड़की को। अगर लड़का स्कूल न गया होता और आपके सामने होता तो आपके इस सुझाव पर बेहद जोर से किलकारी भरता और कूदकर आपकी गोद में सवार हो जाता। दरअसल उसने कुछ पौराणिक कथाएँ सुन रखी हैं। जिनमें अपने आपको सत्य और धर्म के नाम पर बेच दिया जाता है और खरीदने वाला अपना रूप बदले हुए कोई देवता होता है, जो बाद में उसे स्वर्ग प्रवेश का अधिकार प्रदान कर देता है। मेरे लड़के की स्वर्ग देखने को बेहद तीव्र लालसा है। उसके सपनो मे रोज नन्दन, वन आता है, जिसके नीचे बैठकर वह अपनी इच्छाएँ जोर-जोर से उच्चारित करता है, किन्तु आँखें खुलने पर सब कुछ गायब हो जाता है। वह बेहद जोर-जोर से रोना प्रारम्भ कर देता है। रोते हुए उसकी हिचकियां बंध जाती हैं। सफेद चेहरा लाल सुर्ख हो जाता है । आँखों में रंगीन कटे-फटे इन्द्रधनुप लहराने लगते हैं, उसका विश्वास तब उन पौराणिक कथाओं से कुछ हट जाता है। उनके मन में सन्देह के बीज अकुरित होने लगते हैं। किन्तु मैं फिर उसके मस्तिष्क मे विश्वास का द्राक्षासव उडेलता हूँ, देवता कभी अपने भक्त को भूलते नही, वे अपने भक्त को तरह-तरह से परी लिया करते हैं। वे अपना रूप बदलकर उमको सरीदा करते है । जी र ६४ : उसका खेल बातें उसके मस्तिष्क मे जड़ें जमा चुकी हैं। वह आपको खरीदने वाली बात सुनकर गद्गद् हो उठता निश्चित रूप आप उसके लिए वे देवता होते जिनकी वह निरन्तर पिछले चार वर्षों से, जब से उसने इस पृथ्वी पर आँखें खोली हैं, प्रतीक्षा कर रहा है। आपके सिर के पीछे सूर्य भी चमक रहा है। उसके वृत्ताकार प्रभा मण्डल में कैद आपका चेहरा दमक रहा है। एक न सहा जाने वाला तेज आपके पूरे चेहरे पर व्याप्त है, इन सब लक्षणों को मेरा लड़का अच्छी तरह पहचानता है। पिछले चार वर्ष से मैं लगातार उसे इन पौराणिक कथाओ की दुनिया की सैर करवाता रहा हूँ। मैंने उसे सत्य- वादी हरिश्चन्द्र की कथा सुनाई थी। जब मैं उसे कथा सुना रहा था, तो उसके रोते-रोते हिचकियां बंध गई थी। जब मैं उस स्थल पर पहुंचा जब हरिश्चन्द्र ने अपनी पत्नी और बच्चे को एक ब्राह्मण के हाथ और स्वयं को एक डोम के हाथ नीलाम कर दिया था, तो उसने एक जोर की चीख भरी थी और उसका सिर पीछे को लटक गया था। मुझे लगा था कि वह इस सदमे को सह नहीं सका है और बेहोश हो गया है, किन्तु यह मेरा भ्रम था। कथा के अन्तिम अध्याय तक पहुँचते-पहुंचते सब कुछ बदल चुका था और वह खिलखिलाकर हंस रहा था, ब्राह्मण और डोम सभी देवता थे, जिन्होंने हरिश्चन्द्र पर फूल बरसाए थे और उसे स्वर्ग का अधिकार प्रदान किया था. तब से मेरा लडका अपने आपको बेचने के लिए बेहद उत्सुक और ध्याकुल है । वह आपको एकदम पहचान जाएगा। आप समझते हैं, कि वह अपने वेचे जाने की बात से रोना प्रारम्भ कर देगा । नहीं महाशय, यह आपका भ्रम है । वह तो इस पवित्र दिन की निरन्तर चार वर्षों में प्रतीक्षा कर रहा है। ""हाँ, मेरी लड़की जरूर कुछ नाममा है। वह आपको देखकर पुश नहीं होगी, बावजूद इसके कि आप उसे भरपेट खाना खिलाएंगे, रगोन माड़ियां और यूयगुरत आभूपण पहनने को देंगे, जिन्हें वह जिंदगी में पहली बार देखेगी। हो सकता है उसकी आपो में आपको देगते ही अवमूल्यन : ६५ एक नफरत का उवाल भी उत्पन्न हो । किंतु यह सिर्फ कुछ क्षणों के लिए होगा, यह मेरा विश्वास है। थोड़ी देर बाद ही वह आपके इस मायावी तिनिस्म मे खो जाएगी और सब कुछ भूल जाएगी-अपनी नफरत, अपनी घृणा, अपना अस्तित्व, हमारा अस्तित्व-सभी कुछ । उसे लगेगा कि हमने उसे बेचकर उस पर उपकार ही किया है वह नहीं जानती कि पुलाव और मिठाइयां क्या होती हैं। वह नहीं जानती कि एक मुट्ठी उबले हुए चावल अथवा सत्तू के अतिरिक्त कोई चीज ऐसी भी है, जिसे खाया जाता है। कई अवसर ऐसे भी आए हैं, जब उसे यह भी प्राप्त नहीं हुआ है। पिछले सोलह वर्ष से निरन्तर वह इसी तरह अपनी पेट-साधना करती आ रही है। सचमुच मैं कितना गलत सोच रहा था कि वह आपको देखकर खुश नहीं होगी। वह तो आपके चरणों में गिर पड़ेगी, सिर्फ इतने पर ही कि आप उसे रोज एक समय भरपेट सत्तू ही देते रहें। मात्र सत्तू और पहनने को पुरानी उतरनें-जी हाँ, उसने जो अपने शरीर पर यह धोती बांध रखी है, आप ठीक कह रहे हैं यह धोती नही कही जा सकती, सिर्फ तीन गज का कपड़े का एक टुकड़ा है, जिसने उसके अगो को किसी प्रकार ढक रखा है। पिछले दो वर्षों से निरन्तर वह उसे बांधती आ रही है। हाँ, अब वह इतना घिस और फट चुका है कि उसमें अपने उन अगो को छिपाना भी असभव-सा हो रहा है, जिन्हें आप इतनी लोलुप निगाहो से एकटक घूरते जा रहे है। माफ करें! आप मेरे लिए पूज्य हैं, मेरी मंशा किसी भी प्रकार आपका अपमान करने की नहीं है। मैं ऐसा कर भी कैसे सकता हूँ? ऐसा करने का अर्थ होगा अपनी जवान के टुकड़े-टुकड़े कर देना। "सचमुच मेरी लड़की अब धीरे-धीरे समझदार होती जा रही है। जब आप उसे छह गज की रंगीन धोती देंगे, तो वह तुरन्त आपकी गोद में लुढक जाएगी और उस साडी को पहनने से पहले अपनी उस पुरानी तीन गज की धोती को उतारकर खिड़की के बाहर फेंक देगी और अपने-आपको पूरीतरह समर्पित कर देगी"उफ ! मैं फिर बहक गया। आनन्द वह नहीं, आप उसे प्रदान करेंगे । आप दिव्य पुरुप हैं, महान ६६ : उसका खेल हैं, पूज्य हैं । आप स्वयं देखिए कि अपने बेचे जाने की खबर सुनते ही उसके चेहरे की रगत कितनी बढ़ गई है, उसके शरीर का मांस कितना प्रफुल्त नजर आने लगा है। वह आपको एकटक देख रही है। उसके सारे शरीर में थरथराहट है । महाशय आप गलत मत सोचिए। यह थरथराहट, उसका यह मोन, आपके प्रति किसी भी प्रकार का विद्रोह नहीं है, वह आपके प्रति इस प्रकार कृतज्ञता प्रदर्शित कर रही है। पिछले सोलह वर्ष से वह निरन्तर स्थय को ही खाती आ रही थी। अपने पैट को चबा-चबाकर उसने स्वयं को जर्जर बना डाला था। अब उसके दुर्भाग्य का राक्षस मर चुका है, उसका भाग्य-मूर्य चमका है । अव उसको आप जैसा संरक्षक प्राप्त हुआ है जिसकी छत्रछाया में वह फल-फूल सकेगी, खेल-कूद सकेगी। जी हां ! आपने ठीक सुना था, किन्तु तव वह बेवकूफ थी, नासमझ थी। और आप जैसे महान् पुरुष की छत्रछाया से वचित थी, हां वह पिछले ही वर्ष की बात है तब उन्होंने विकने से मना कर दिया था और चीख भर-भरकर पूरे शहर को एकत्र कर दिया था और अपने खरीददार को धक्के मार-मारकर बाहर निकाल दिया था, उसके चेहरे को अपने नाखूनो से नोच लिया था. अरे आप तो उठ खडे हुए ! आप घबराइए नहीं, मैंने आपको बताया नहीं कि तब वह नाममझ थी, वेवकूफ थी। अब वह ममझदार हो चुकी है। अपनी उस गलती पर वह सिर धुन-धुनकर रोई है । बार-बार पछताई है। अब वह ऐमी गलती नहीं कर सकती। वह अपनी नियति पहचान चुकी है. देखिए आप, वह हम रही है। आपको देख मुस्करा रही है महाशय मैंने गलत नहीं कहा था। देखिए आपकी दी हुई माड़ी को पहनने के लिए वह कितनी उताक्ली हो उठी है, उसने अपने शरीर को तीन गज की धोती उतारनी प्रारभ कर दी है हम मबके मामने ही। जी हां, मेरी पत्नी तो कई वर्ष पहले ही गमझ चुकी थी कि हमें अपने आपको बेच देना चाहिए, किन्तु उन दिनो मेरे मिर पर एक भूत सवार पाजो बार-बार मुझे अपने निर्णय में कमजोर बना डालता था।
अवमूल्यन : ६७ अब उस भूत को मैंने अपने सिर से उतार फेंका है-जी हाँ आप ठीक कहते हैं। मैं हत्यारा हूँ। मैंने अपने उस भूत का कत्ल कर दिया है और मैं उसके शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर कब्रिस्तान में दफना आया हूँ। अव आप उसकी लाश को भी नही पा सकते। मैं उससे पूर्णतया छूटकारा पा चुका हूँ--मेरी पत्नी से आपको भयभीत होने की जरूरत नहीं है। वह अभी बुढ़ाई नहीं है । अभी भी उसके चेहरे पर आकर्षित करने वाली लुनाई है । आप आश्चर्य कर रहे है कि कई दिन तक भूखी रहने के बावजूद उसके चेहरे पर इतना आकर्षण क्यो है ? आप ठीक कह रहे है। आपको पता होना चाहिए, यही तो एक चीज हमे वरदान रूप मे मिली है, जिसके सहारे हम कभी भी अपने-आपको आप जैसे महान और सत्य पुरुष के हाथ विक्रय कर सकते हैं। पहले यह भूत मेरी पत्नी के सिर पर भी सवार हुआ था। उसने तब ईंटें ढोई थी। पत्नी का भूत उससे तरह-तरह का काम करवाता रहा । वह पिसती रही, अपने को नष्ट करती रही, किन्तु आप जैसे सभ्य पुरपों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा था.. अरे आप तो नाराज होने लगे ! महाशय, मैं तो अपनी बेवकूफी का रोना रो रहा हूँ। मेरे कहने का अर्थ मिर्फ इतना था कि तब भी हमे आप जैसे परोपकारी महापुरुप मिले थे, किन्तु हम उनको नही पहचान सके थे और मेरी पत्नी का भूत अपने-आप उतरता चला गया था। जी हां हम सब तैयार हैं। मेरा संपूर्ण परिवार आपके हाथों विकने को तैयार है"मेरी पत्नी और बेटी दोनो आपकी साड़ियो और मिठाइयों को बेहद लोलुप निगाहों से ताक रही हैं । ये ही नहीं, मैं भी। मेरा लड़का अभी लोटा नहीं है। शायद वह कही सेलने में व्यस्त हो गया है। किन्तु मेरा पूरा विश्वाम है कि वह आपको देखते ही उछलकर आपको गोद में मवार हो जाएगा। किन्तु यह मेरा कितना बड़ा दुर्भाग्य है, जो मैं यह जानता हूँ कि आप एम मुद्रा धारण किए हुए उन पौराणिक कहानियों वाले देवपुरुष नहीं हैं। काश मैं भी अपने सड़के की तरह कम-उन और ममक्षदार होता 1...
शिकंजा चपरासी जिस काइयाँपन के साथ मेरे सिर पर सवार हुआ, वह मुझे यह जतलाने के लिए पर्याप्त था कि मेरे विरुद्ध युद्ध प्रारम्भ हो चुका है। उसकी हंसी ने मुझे दहला दिया। आज उसका मुंह पान को पीक से भरा था और कान में बीड़ी फंसी थी. "बच्चू तुम्हारे वाप को तो अब पता चलेगा, वडे तीसमारखां बनते थे। सब कुछ धरा रह जाएगा, जब सड़को पर खाली जूतियां चटकाओगे। बड़े स्वाभिमानी बनते थे। अपने आगे किसीको गिनते ही नहीं थे। अब देखो...' मुझे लगा, चपरासी के आगे मैं नंगा होता जा रहा हूँ। चपरासी मेरे अंदर घुसा है और मेरे अंदर उमड़ते एक-एक शब्द को दबोच रहा है । मुझे यह स्थिति बड़ी शर्मनाक प्रतीत हुई। मुझे चपरामी के आगे इस प्रकार अपनी दीनता प्रकट नही करनी चाहिए। नहीं तो मेरी कमजोरी से दे सब वाकिफ होजाएंगे और मेरे ऊपर हावी हो 'जाएंगे। तब मैं कुछ नही कर सकूँगा । मैं सिर्फ सिर झुकाए खड़ा रहूंगा और वे सभी चेहरे मुझे धेरकर अट्टहास लगाएंगे। मैंने अपने अंदर साहस बटोरा। मुझे अपने पैरों पर बेतर गुस्मा आने लगा। वे इस तरह क्यों लड़यड़ाने लगे हैं, कोई उन्हें काटकर तो फेंक नहीं रहा । गला जैसे कोई शिकजे में कमने लगा था। मुझे अपनी कमजोरी पर, अपनी कायरता पर मुंलाहट होने लगी, मैं क्यों बकरी की तरह रिरियाने सगा है. कोई मुझे फॉमी तो चड़ा नहीं रहा !
शिकजा : ६९ "प्रिंसिपल साहब ने यह कागज आपको देने को कहा है।" चपरामी ने जिस लहजे में कहा, वह मुझे धूर्ततापूर्ण लगा। मुझे विश्वास होने लगा, जरूर पह भी हमारे बीच चल रहे युद्ध से वाकिफ हो चुका है। वह अपने-आपमें विश्वस्त है कि अंत मे पराजित मुझे होना है। मेरी पराजय देख पाने का सुख जैसे उसके सारे शरीर मे थरथराने लगा था। भीड़ हमारे चारों ओर घिरी थी। लडाई दो मुर्गों की थी, एकतरफा । मैं सिर्फ चोट सह सकता था, वार नहीं कर सकता था। वह खूखार मुर्गा अपनी कलगी ताने बार-बार मुझ पर चोट कर रहा था। मेरे पंख नुच चुके थे, सारा शरीर खून से लथियाने लगा था। मेरा बहता हुआ खून हमारे इर्द-गिर्द खड़ी भीड़ को उत्तेजना प्रदान कर रहा था । ये उनके मनोरंजन के क्षण थे पराजित व्यक्ति का रुदन, उसकी कराह, उसका रिरियाना सचमुच कितना आनंदप्रद होता है। चपरासी जा चुका था। मैं अभी उस कागज को पढ़ पाने की मामध्ये नही बटोर पा रहा था । चपरासी के आगे जिस साहस को में अपने विजेता की तरह टिकाए हुए था, धीरे-धीरे शेष होने लगा। मैं कृमी पीठ से टिककर बैठ गया। मेरा पूरा माथा पसीने की बूंदीग zिrer था। माथे पर रूमाल फेरते हुए धीरे-धीरे उस कागज की ही होनी लगा। तह खोलते हुए मुझे लग रहा था, इमके भीतर जरा मोट का विषधर कुंडली मारे बैठा है। मेरे खोलते ही Ter लेगा।
७० : उसका खेल उनके लिए बिल्कुल मुमकिन नहीं था। उनके जिस सभ्रान्त व्यवहार और आचरण का मैं पूरी तरह कायल हो चुका था, उसका अभी अंत नहीं हुआ था। विश्वस्त होने के बावजूद मेरे मन मे सदेह उत्पन्न हुआ-यह भी तो संभव है, सचमुच उन्हे मुझसे कोई आवश्यक कार्य ही हो अथवा उनके यहां कोई छोटी-मोटी गोष्ठी की रूप- रेखा ही तैयार करनी हो। यहां आने के बाद बहुत जल्द ही मुझे उनके विषय मे काफी जानकारी प्राप्त हो गई थी। वे संगीत और काव्य के घोर रमिक है। इससे भी मैं बहुत कम अरसे मे ही बाकिफ हो गया था। उनके अदर इसके अतिरिक्त और भी बहुत-सी विशेषताएं थी जिनका पता मुझे धीरे-धीरे चल रहा था। एक रहस्य की तरह उनके ऊपर से आवरण की कोई केंचुल उतरती और मुझे दग कर देती। इस छोटे कस्बे में आने से पहले मैं बेहद भयभीत और उखडा हुआ था। मुझे यहाँ इटर कॉलेज के विषय मे पहले मे ही काफी जानकारियां इटरव्यू के दौरान दे दी गई थी। इस कॉलेज की राजनीति प्रातीय राज- नीति से भी अधिक जुझारू और डरावनी थी। कॉलेज में पूरी तरह से राजपूतों का आधिपत्य था, प्रधान से लेकर प्रिंसिपल तक यूं मेरे हक में यह काफी अच्छी बात थी कि मैं स्वय राजपूत था और मेरे लिए, जैमारि इंटरव्यू दौरान ही प्रधान और प्रिंसिपल महोदय ने मुझे आभाम दे दिया था-डरने की कोई बात नहीं थी। इस मुरदा के वावजूद हर वक्त मुझे यही लगता कि यहाँ किमी भी वक्त कच्चे पौधे की तरह उपाड़कर मुझे फेंका जा सकता है। संवइंचार्ज ने पहले ही दिन अपने गुफिया अंदाज में गुमफुमाते हुए पिछले पांच वर्षों में अवतरित हुए मेरे जैसे युदबुदो या रोचक इतिहास मुझे मटम्प करा दिया था। पहले ही दिन में आने वाले सगो को रूपंगामा निर्णय परने में जुट गया । मुम रिमीने दुध मो सेना-देना नहीं है, गि अपने को अपने एक ही मीमित रखना है। यह मेरी योजना पा गयमे प्रमुग अंग था।
शिकंजा ७१ कॉलेज जाते हुए अपनी लापरवाही पर गहरी झुंझलाहट आई। पहले ही दिन मैं पूरे दस मिनट लेट हो चुका था। प्रिंसिपल साहब के कमरे में घुसते हुए मैं पूरी तरह आतंक से घिर चुका था। निश्चित रूप से गलती मेरी है, जिसकी सजा मुझे भुगतनी ही होगी। सिग्नेचर बुक उन्ही की टेवुल पर विराजमान रहती है, यह भी मुझे पहले से ही बता दिया गया था। मेरे नमस्कार के प्रत्युत्तर में उन्होंने घडी की ओर देखा था। मुझे डर हुआ, निश्चित रूप से आले ही क्षण मेरी डाँट-फटकार के होगे । किन्तु सब कुछ मेरी अपेक्षा और प्रत्याशा के विरुद्ध घटित होता जा रहा था। प्रिंसिपल साहब बड़ी मीठी हँसी हंस रहे थे। उन्होंने धीरे से 'पधारिए' कह- कर अपने सामने पड़ी कुर्सी की ओर इशारा किया। बैठते हुए मैंने उनका भरपूर जायजा लिया। सफेद धोती के ऊपर सिल्क का कुर्ता उनके गठीले कसरती शरीर पर बेहद फब रहा था। सामने रखे कागज पर लकीरें खीचते हुए वे एक बार फिर मुस्कराए-"आपको कोई परेशानी तो नहीं है ? नये शहर में कुछ परेशानी तो उठानी ही पडती है। अगर कोई विशेष बात हो, तो बिना किसी सकोच के मुझसे कह दीजिएगा।" "जीकृपा है आपकी । आपके होते हुए मुझे किसी चीज की फिक करने की क्या आवश्यकता है ?" मैंने अपने दोनो हाथ जोड़ दिए। वे धीरे से मुस्करा-भर दिए। "आज शाम को चाय आप हमारे यहां लीजिए। आपके कमरे से हमारा घर अधिक दूर नहीं है।" "जी धन्यवाद ! आपको बेकार में तकलीफ होगी।" मैंने धीरे से । . कहा। "आप भी क्या बातें करते हैं! तकलीफ-वकलीफ किस बात की? शाम को छह बजे पहुंच जाना । रामधनी आपके माथ चला आएगा।" उठते हुए मुझे लग रहा था, मेरे कदम धरती पर नही हवा में पड़ रहे हैं। मेरे सारे भय, सारे सदेह और दुःस्वप्न एकदम हवा हो गए। मैं विश्वस्त हो आया, मेरे से पूर्व आने वाले मेरे साथियों की अपनी स्वयं को कम- ७२ : उसका खेल जोरियां रही होगी, जिसके कारण वे यही जम नहीं सके। उनके घर ले जाने के लिए रामधनी ठीक पांच बजे ही मेरे कमरे पर हाजिर हो गया। जितना समय मैंने मुंह धोने और कपड़े बदलने में खर्च किया उतनी देर वह बहुत-सी कथाओं-उप-कथाओं के सुनाने मे लगा रहा, जिनका केन्द्र वे और उनका परिवार था। जव तक हम दोनो उनके बंगले तक पहुंच नही गए, वह यही बार-बार विभिन्न कोणो से दोहराता रहा । । उनका बँगला शहर की हलचल से एकदम मुक्त था। उसके चारों ओर लवा-चौड़ा मैदान खाली पडा था। बंगले का गेट काठ का बना हुआ था, जिस पर वैगन-बेलियाँ फैली थी। गेट मे घुसते ही पूरा शरीर मस्त हो उठा। चारो तरफ कई रग के गुलाब खिले थे। उनकी सुरुचिपूर्ण दृष्टि और भावुक कल्पना के प्रति मैं श्रद्धानत हो उठा। रामधनी अदर चला गया था। मैं इधर मे उधर घूमता हुआ गुलाबों की भीनी गध अपने अंदर बटोरता रहा । थोड़ी देर बाद ही वे हाथ में एक पत्रिका लिए हुए बाहर निकले। "कहिए पसद आया आपको ?" कहते हुए वे मेरे पास आ खडे "जी. 'बहुत । मैंने तो सोचा तक भी नहीं था कि आपने अपने बंगले को इतना खूबसूरत बना रखा होगा।" प्रत्युत्तर में वे सिर्फ मुस्करा दिए । "आइए !" कहते हुए वे आगे-आगे चल दिए। मैं भी उनके पीछे-पीछे मुड़ लिया। उनका ड्राइंगस्म काफी सजा हुआ था। मेज पर रखे हुए गुलदस्ते मे ताजे फूल लगे थे। दीवारों पर दो-तीन पेंटिंग लगी हुई थी। एक अल्मारी में सिर्फ कितावे कतारो में सजी थी। में देर तक मुग्ध भाव में उन्हें देखता रहा। एक पेंटिंग में पड़ा मिरहाने रसे पेड़ के नीचे लेटी हुई औरत, दूमरी में एक जलती हुई मोम- बत्ती के महारे आंसू विसरती कोई विरहिणी और तोमरे पटिंग में वांमुरी शिकंजा : ७३ बजाते कृष्ण के कंधे पर झुकी राधा का अंकन हुआ था। "यह सब रश्मि की बनाई हुई है । वह रात-दिन सिर्फ रगों से खेलती रहती है।" वे देर तक रश्मि और उसकी कलागत प्रतिभा की विशिष्टताओ में उलझे रहे। रश्मि यानी उनकी सबसे बडी लड़की। उठते हुए उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पर रख दिया था और उसे हल्के से दबाते हुए बोले, "चार दिन बाद ही एक्जीक्यूटिव कमेटी की मीटिंग हो रही है। मेरा प्रयास रहेगा, आपको दो इक्रीमेट शुरू में ही मिल जाएँ।" गद्गद् हो उठा। उनके प्रति आभार प्रकट करना अब मात्र मेरा फर्ज ही नहीं रह गया था। गेट के बाहर विदा करते हुए एक बार उन्होने मुझे फिर स्मरण दिलाया-अगर कभी मुझे कोई परेशानी हो तो उनसे बेझिझक कह लौटते हुए मैं पूर्णतया भावविभोर और मस्त था। उनकी सज्जनता मेरे अन्दर तक घर कर गई थी। मुझे पूरा विश्वास हो गया, जो उनके विरोध में बोलते है, वे सिर्फ ईर्ष्यावश ही ऐसा करते है, ऐसे व्यक्तियों को हमेशा विरोध सहना ही पड़ता है, जिसकी उन्हें स्वयं कोई चिंता नहीं है । अगले दिन कालेज पहुंचने पर मुझे बेहद आश्चर्य हुआ। सभी मुझे गुप्त रूप से देखते हुए हँस रहे थे। मैं कोई भी कारण खोजने में असमर्थ सिर्फ सकवका और झुंझला रहा था। 'कहिए कैसी लगी?' लैब इचार्ज के इतना पूछते ही सारा रहस्य एकदम खुल गया तो यह सब इनकी ईर्ष्या रंग दिखा रही है, मैं बेहद इत्मीनान से मुस्करा दिया। मैंने धीरे से हँसते हुए उन्हें एकदम स्पष्ट कह दिया कि मैं उनकी बिल्कुल परवाह नहीं करता। वे कहते रहे और मैं दूसरी दिशा में देखने मे उसी प्रकार व्यस्त रहा। "जनाव, एक बात आप अच्छी प्रकार समझ लीजिए । उनके यहाँ प्रेम- उसका खेल व्यापार बिल्कुल संभव नहीं है। आप सिर्फ शादी रचा सकते हैं ।" कहते हुए वे जोर-जोर से हंस दिए। "आप भी कितनी ओछी बातें करते हैं।" कहते हुए मैं वहाँ से उठ लिया। सचमुच कमीनगी की भी हद होती है। उस दिन देर तक मैं गहरे तनाव से घिरा रहा। रामधनी ने मुझे बताया था कि मेरे विरुद्ध गहरी साजिश चल रही है। उपप्रधान मुझसे बेहद नाराज है, "आपको पता है, इन सवकी जड़ में मल्होत्रा साहब काम कर रहे हैं ?" रामधनी ने फुसफुसाते हुए मुझे आगाह किया। मिस्टर मल्होत्रा यानी लव इचार्ज। मुझे देर तक उसकी बात पर विश्वास नही हुआ। वह ऐसा क्यों करेगा? यह प्रश्न देर तक मुझे परेशान करता रहा। वे सब कुछ सुनकर सिर्फ मुस्करा दिये, "आपको कोई फिक्र करने की जरूरत नहीं है। मैं सब कुछ देख लूंगा। मेरी इच्छा के विरुद्ध मीटिंग मे कोई प्रस्ताव पास नहीं हो सकता।" उठते हुए उन्होंने धीरे से कहा, "आप- को हमारे यहां आए काफी दिन हो गए। शाम की चाय आज हमारे यहाँ लीजिए।" "जी"धन्यवाद ! फिर कभी आपके यहाँ आऊँगा। तीन दिन की छुट्टियों पड़ रही हैं। सोचता हूं पर हो आऊँ।" "बहुत अच्छा ! चाहो तो शनिवार को छुट्टी भी ले लो। भई, जय पर जा रहे हो, तो लौटने की इतनी क्या जल्दी है ?" वे मुस्कराए, "कभी आपने अपने परिवार के विषय में नही बतलाया ?" "जी"ऐगा विशेष कुछ भी तो नहीं हैं।" मुझे लगा, मेरा चेहरा जमे एकदम मुरक्षा गया है । मुझे लगा, यह सब बताते बहुत अधिक दयनीय हो उठूगा । दयनीय के गाप-गाय मातर भी। शायद मेरे चेहरे का रग काफी धुंघसा और उदाम पड गया था । उमे पकड़ते हुए उन्होंने मांत्वना दी, "हिम्मत हारने से दुध नहीं होता। इमान पो मतत प्रयत्नशील रहना पाहिए।" हुए शायद मैं शिकंजा : ७५ लौटने में मुझे एक दिन का विलय हो गया था। मैं भयभीत और डरा हुआ था। कोई सूचना भी मैं नही भेज सका था इस मामले में वह सख्त थे। मुझे याद था, मल्होत्रा को इसी कारण काफी डाटपाटकार सहनी पड़ी थी। "छुट्टियाँ ठीक बीती ?” उन्होने सिर्फ इतना कहा और मुस्करा दिए । मुझे बेहद आश्चर्य हुआ। खोया हुआ साहस वापस लौटता हुआ महसूस हुआ, "मैं एप्लीकेशन नहीं भेज सका। दरअसल..." "ओह.."उसकी कोई बात नहीं। पिछली डेट मे ही अपने मिग्नेचर कर दीजिए।" वे मुस्कराए, "आज शाम को तो आप खाली होंगे।" "जी""जैसी आप आज्ञा करें।" मैं भावविभोर हो उठा। कागज उनके ही पैड का था । उस पर साफ चमकदार अक्षरों मे लिखा था-आज रात ८ बजे हमारे यहां एक काव्य गोष्ठी का आयोजन है । आपकी उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है । मूक्ष्म जलपान का भी प्रबंध है। इस सूचना के नीचे १०-११ नाम क्रमानुसार तिखे थे। रामधनी ने मुस्कराते हुए कहा, "आपके लिए प्रिंसिपल साहब ने विशेष रूप से आग्रह किया है । आप अपने नाम के आगे अपने सिग्नेचर कर दीजिए। रामधनी का इस तरह मुस्कराना मुझे काफी भद्दा प्रतीत हुआ, कमी- नगी और नीचता से परिपूर्ण । इस बातो के सिवाय तो जैसे किमीको कोई काम ही नहीं रह गया है । सहमा रामधनी के चेहरे के पीछे मुझे हंसते हुए मल्होत्रा का करतापूर्ण चेहरा दिखाई दिया। उनका ड्राइंगरूम आज विशेष रंग में लकदक कर रहा या । कमरे से सारा फरनीचर निकालकर उसके स्थान पर एक दरी बिछा दी गई थी। वे मुझे देखते ही खिल उठे,"आओ, भई आओ। बहुत देर कर दी। तुम्हारी ही प्रतीक्षा हो रही थी। मैंने ध्यान से देया, वहाँ बैठी सभी आकृतियां मेरे लिए एकदम अजनवी और कौतुक-भरी यो। यह देव एक अजीव-मी ७६ : उसका खेल घवराहट और अस्वस्थता पारे की तरह पूरे शरीर में इधर से उधर दौड़ने लगी। बार-बार मेरे आगे काईयांपन और घृणित अन्दाज में मेरे ऊपर लप- कती मल्होत्रा और उसके साथियों आकृतियां प्रकट होने लगी। मुझे लगा, मेरा गला मूखने लगा है। मैं पीछे की तरफ जा बैठा था, किंतु उन्होने 'हे' हे...' करते हुए अपने पास बैठने के लिए विवश कर दिया। सभी गोलाई में बैठे हुए थे। सभी के बैठने के अन्दाज और हाव-भाव पूर्णतया मौलिक थे। बीच में एक तश्तरी में पान और इलायची तथा दूसरी तश्तरी मे सिगरेटें रखी थी। पानी के आठ-दस गिलास भी वही रखे थे। मैंने धीरे से पानी का गिलास उठा लिया। पीते हुए मुझे लगा, वह खुश्की, जो थोड़ी देर पहले मेरे गले मे बैठ गई थी, धीरे-धीरे तरल होने लगी है। गोलाई मे बैठे हुए सभी व्यक्ति शायद कविता के रसिक नही, कवि भी थे। सभी क्रमानुसार लय मे कविता-पाठ कर रहे थे। वे मुस्कराते हुए निवेदन करते और कवि महोदय थोडी हू-हुज्जत के बाद खंखारते हुए अभि- नय के साथ कविता-पाठ प्रारंभ कर देते । इस बीच उनका पूरा परिवार भी धीरे से आकर एक कोने में बैठ गया था । उनके चरित्र की विशेषताओं के परिच्छेद मेरे आगे धीरे-धीरे धुल रहे थे। मुझे पता नहीं था कि वै काव्य के रसिक ही नहीं, एक अच्छे कवि "भई, आप मुझे क्यों मजदूर करते है ? मैं कविता रचना कहीं जानता हूँ, वस कभी-कभी तुकबंदी कर लेता हूँ।" वे अपने उसी चिर-परिचित अन्दाज में मुस्कराए। वहाँ बैठे हुए सभी व्यक्तियों द्वारा बेहद मजबूर करने पर उन्होंने अपना आसन बदला और कुछ क्षण उसी मुद्रा मे स्थिर रहने के बाद उन्होंने धीरे-धीरे गुनगुनाना प्रारंभ कर दिया। उनकी कविता सुनते हुए एक क्षण को मुझे लगा शायद इन पक्तियो को मैंने पहले भी कही पहा अथवा सुना है, किंतु इस विचारमात को मैंने बेहद निममतापूर्वक दबोच लिया। ऐसे व्यक्ति के विषय मे यह मब सोचना शिकजा : ७७ नीचतापूर्ण है। अपने कलुपित विचारो के परिमार्जन के लिए मैं तुरंत उसमें रस लेने लगा था। उनके कविता समाप्त होते ही ड्राइगरूम हल्की तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था। गोष्ठी विसर्जित होते ही उन्होंने मुझे रोक लिया था। मुझे एक कोने में ले जाते हुए फुसफुसाए, "आप अभी ठहरिए । जल्दी क्या है ? रात काफी हो गई है। आपको परेशानी होगी। खाना यही खाकर जाइए।" मेरे कुछ प्रतिवाद करने से पूर्व ही वे शेष मेहमानों को विदा करने मे जुट गए। सिर्फ चार दिन व्यतीत हुए थे। रामधनी फिर वही चिरपरिचित पैड का कागज लेकर हाजिर हो गया था। 'शाम को चाय पर आइए। कुछ आवश्यक बातें करनी है।' वह फिर उसी गोपनीयता के साथ मुस्कराया। मैंने उत्सुकता से उसकी ओर देखा । मुझे लगा, कोई जाल जिससे सिर्फ मैं अपरिचित हूँ, धीरे-धीरे मुझ पर तनता जा रहा है। एक तिलस्मी रहस्य, जिसको मैं भेद नही पा थोड़ी-सी आत्मीयता उसके साथ स्थापित करते ही मैं उन सारे रहस्यो से परिचित हो गया, जिन्होंने मुझे व्याकुल बना रखा था। रहस्य की परत दर-परत वह उधेड़ता चला गया। किस प्रकार पेट फूलने पर देह तोड़ते हुए उसने पूरी गर्मियां किसी अज्ञात शहर में विताई थी । लौटने पर पूरा चेहरा चूसी हुई गुठली की तरह निकल आया था। सारे रहस्य का पर्दाफाश करते हुए उसने कहा, "जो भी नया आता है, उसीको आपकी तरह शाम की चाय पर बुलाया जाता है।" मुझे अकस्मात् ऊँची चट्टान से नीचे फेंक दिया गया था। मैं देर तक थरथराहट से घिरा रहा। अगले दिन मैंने सिर-दर्द का बहाना करते हुए उनसे क्षमा मांग ली थी। उन्होंने बेहद शालीन ढंग से अफसोस प्रकट करते हुए दो-तीन गोलियों के नाम सुझाए, "आपकी रिपोर्ट में कमेटी को काफी अच्छी भेज रहा हूँ। N ७८ : उसका खेल आशा है, आपको परमानेंट कर दिया जाएगा," वे मुस्कराए, "यहां यह सब बेहद झंझट का काम है । प्रधान और उपप्रधान में ठनी रहती है। आप नहीं जानते, यह सब कितनी मुश्किल का काम है। .."आप फिक्र मत कीजिए मैं सब कुछ देख लूंगा।" कहते हुए वे पेंसिल से शीशे पर रेखाएं खीचने लगे थे। सिर-दर्द और तबियत खराब का बहाना अधिक दिनों तक कामयाब नहीं हो सकता था। मेरे शब्दों को कृत्रिमता और बनावट का एहसास उन्हे भी होने लगा था। इस बार उनका लिखित सदेश रामधनी लेकर नहीं आया था। उन्होंने स्वय ही अपने उसी चिर-परिचित लहजे में मुस्कराते हुए मुझे आमद्रण दिया~काफी गम्भीरता के साथ, जिसकी अवहेलना मेरे लिए सम्भव नही थी। मैं उनके सामने बैठा था। काफी देर से एकदम स्थिर । वे काफी देर तक मेरे और मेरे परिवार के विषय में जानकारी ग्रहण करते रहे। आखिरकार बातचीत का वह चरम विन्दु आ ही पहुंचा था, जिमकी मम्भवतः हम दोनो प्रतीक्षा कर रहे थे। "रश्मि के विषय में आपका क्या विचार है ?"वे धीरे से मुस्कराए। यद्यपि उनका यह पूछना मेरी प्रत्याशा के प्रतिकूल नहीं रहा था, किन्तु जिस एकदम सीधे ढंग से उन्होंने प्रश्न किया था, उससे मैं बुरी तरह अचकचा उठा। "मेरा विचार है, तुम दोनों की जोडी काफी जमेगी।" उन्होंने वेहद संक्षेप में अपना सम्पूर्ण मतव्य स्पष्ट कर दिया था। देर तक मैं उसी तरह अवाक् और स्तब्ध बैठा रहा, एक ही स्थिति और मनःस्थिति में उनकी बात का प्रतिवाद और उनके प्रेम का निवारण मैं किम प्रकार कर सकता हूँ, समझ ही नहीं पा रहा था। ये चाय पीते हुए एकदम मुझ पर दृष्टिपात करते रहे, मुम्कराते हुए। "अभी तो मैं अपने को इम योग्य नहीं ममझता। मेरी परिस्थितियों शिकंजा : ७९ . भी ऐसी नहीं हैं।"मैं सिर्फ इतना कह सका । मानसिक रूप से इस सब के लिए मैं अपने आपको विलकुल तैयार नहीं कर पा रहा था। मेरा दृढ विचार था, मेरे इस नितान्त व्यक्तिगत क्षेत्र में अपना आरोपण करने का किसीको भी कोई अधिकार नही है । यात शायद मान इतनी ही नहीं थी। "वह सव आप हम पर छोड दीजिए।" "मेरा विचार है, रश्मि के लिए आपको मेरे से कहीं अधिक उपयुक्त लड़के उपलब्ध हो जाएंगे। मैं और मेरा परिवार दोनों ही उनके उपयुक्त नहीं हैं।" मैं उठते हुए बोला। "लड़को की तो खैर हमें कोई कमी नहीं है, किन्तु..." उन्होंने अपनी बात को बीच में ही छोड़ दिया। मुझे लगा, उनकी स्वाभाविक मुस्कान कही खो गई है। आवेश से उनका चेहरा तमतमाने लगा था। इस मवके बावजूद वे मेरे विरुद्ध इतने शीघ्र आक्रामक रुख अख्यिार कर लेंगे, इसका मुझे विश्वास नहीं था। धीरे-धीरे काफी कुछ परिवर्तित होता चला गया -बेहद स्वाभाविक ढंग से। उनके हाव-भाव, उनका हर समय मुस्कराते रहना सभी कुछ मेरे विरोध मे इस्तेमाल होने लगा था। शुरुआत मेरे पांच मिनट विलंब से आने के फलस्वरूप जोरदार चेतावनी से हुई, "सेकेंड इयर के लड़के शिकायत कर रहे थे, अभी तक आपने उनका कोर्स समाप्त नही किया है । सारा कोर्स होली की छुट्टियों से पहले समाप्त हो जाना चाहिए।" "आपका रजिस्टर अभी तक कम्पलीट नही हुआ है।" "लगता है इस वर्ष आपको परमानेंट नहीं किया जा सकेगा। मीटिंग में मैंने तो आपके लिए काफी प्रयास किया, किन्तु प्रधान और उपप्रधान दोनो ही आपके विरुद्ध थे। उन्हें आपके खिलाफ शिकायतें मिली है।" कहते हुए इस बार वे अपने उसी चिर-परिचित अंदाज मे मुस्कराए छह बजे चुके थे। मुझे याद आया, इसी वक्त मुझे उन्होंने ८० : उसका खेल बुलाया था , किंतु इस बार निमंत्रण चाय के लिए नहीं था। यह सब और अधिक दिन तक नहीं खिंच सकता था। मेरे दरवाजा थपथपाने पर उन्होंने दरवाजा खोला था, "आप लॉन मे बैठिए, मैं अभी खाली हुआ जाता हूं।" कहकर वे फिर अन्दर की तरफ मुड़ गए थे। मैं वार-बार आकुलता के साथ घड़ी की तरफ देखता हुआ बैठने का आसन बदल रहा था । पूरा आधा घण्टा बीत चुका था, किन्तु उनका कोई सदेशा नही आया था। इस बीच सिर्फ एक बार रश्मि बाहर आई थी और काफी तिरस्कारपूर्ण ढंग से नमस्ते का प्रत्युत्तर देकर तुरन्त वापस लौट गई थी। पूरा एक घण्टा वीत गया। मैं ऊब और घुटन से बुरी तरह से घिर चुका था। बीच-बीच में खड़ा होकर इधर-उधर घूमने लगता और फिर उसी तरह बैठ जाता। "आपको अन्दर बुला रहे हैं।" यह उनका सबसे छोटा लडका था। मुझे देखकर आज वे पहले की तरह नहीं मुस्कराए थे। मुझे उनका गम्भीर चेहरा नितान्त अजनबी लगा । धीरे-से उन्होंने कुर्सी की तरफ इशारा किया और फिर उसी तरह डूब गए । रश्मि ठीक उनके पीछे आकर खडी हो गई थी। मैं नीचे की तरफ देख रहा था, बावजूद इसके कि उन दोनों की आँखे घातक अन्दाज में मेरे ऊपर तनी थी। "आपकी ईयर बुक बिलकुल अच्छी नहीं रही। आज ही मीटिंग में यह निर्णय लिया गया है कि आपकी सेवाएं समाप्त कर दी जाएँ।" मैं एकदम स्तब्ध रह गया। उनका आक्रमण इतना घातक होगा, यह मेरी कल्पना से भी परे की बात थी। मैं अचकचा उठा, "मेरे विषय का रिजल्ट तो सबसे अच्छा रहा है और सभी मुझसे खुश भी हैं।" "इममें मैं कुछ भी नहीं कर सकता। मैंने तो काफी प्रयास किया कि आपको अभी जवाब नहीं दिया जाना चाहिए, किन्तु आपको तो पता ही है कि कॉलेज कितनी बड़ी राजनीति का शिकार है। मुझे भी फिर चुप रह शिकजा: जाना पड़ा। मई-जून दो माह के वेतन के विषय मे वे अभी विचार कर रहे है । जुलाई में आप फिर एप्लाई कीजिएगा, मै आपके लिए भरसक कोशिश करूँगा। शायद तब तक आप कोई निर्णय लेने की स्थिति में भी पहुच सकें।" एक क्षण को मेरे आगे बहुत-से हताश परिचित और पारिवारिक चेहरे घूम गए। "शायद इसकी आवश्यकता नही पडेगी।" कहकर उठते हुए मैं पूर्ण विश्वस्त हो चुका था कि इस लम्वे युद्ध को और अधिक दिनों तक खीचते ले जाना मेरी सामर्थ्य से बाहर की चीज थी।
धन्वे इस वक्त धूप विल्कुल नहीं रही थी। वह उठा और खिडकी के नीले परदों को एक तरफ सरका दिया। धूप काफी देर से खेल खेल रही थी। एकाएक धूप फिर चमक उठी। धूप के साथ-माय उमका चेहरा भी। उसने अपने स्कार्फ को ढीला कर दिया। "यहां मौसम काफी अच्छा है। आने से पहले मे काफी डर रहा था।" उसकी उँगलियाँ उसने अपने हाथों में भर ली थी। उसकी दृष्टि नीचे सडक पर से गुजरते स्त्री-पुरुषों के हुजूम मे अटकी थी । उमग से लकदक करते बेपरवाह चेहरों का सामाना कर सकना उसके लिए काफी मुश्किल था। इस बीच धूप फिर कमरे से बाहर सरक गई थी। एक पीला मटमैला- पन उनके बीच थर्राने लगा: "उस तरफ देखो।" उसने इशारा किया और हथेली को दबाते हुए शरारत से हंस दिया। वहाँ कुछ नही था। सिर्फ एक जोडा कुछ आवश्यकता से अधिक परस्पर सटा हुआ और एक-दूसरे के ऊपर झुका हुआ गुजर रहा था। "रिज पर नहीं चलोगे ?" "वहाँ जाकर क्या करना है ? यही ठीक है।" उसने धीरे से कहने के साथ-साथ उसकी हथेली को मुक्त कर दिया।
धब्बे : ८३ "जो पहाडों पर रहते हैं वे कितने खुशनसीब होते है।" "वारिश के दिनो में पहाड नरक बन जाते हैं," उसके भावुक होने की शुरुआत होने लगी है। वह समझ गई थी। "अगर तुम साथ हो तो मैं जिन्दगी-भर उस नरक में रहना चाहूँगा। वह तेजी से हमा। "मैं ऐसा नहीं समझती।" वह धीरे से फुसफुसाई। कमरे का रंग हल्का नीला था। लगता था आसमान का कोई टुकड़ा कटकर छत से चिपक गया हो। बहती हुई हवा ने उसके बाल उडाने प्रारंभ कर दिए थे। "खिड़की बन्द कर दूं। तुम कॉप रही हो।" "नहीं, ऐसे ही ठीक है।" उसने सिर के ऊपर स्कार्फ को कसते हुए कहा। "उन दिनो की याद है ?" "किन दिनो की ?" उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से उमके स्कार्फ को एक- टक घूरते हुए पूछा। "किन्ही की नहीं।" उसने अपने पैर फैला दिए थे। "रिज पर घूमने नही चलोगे ? कही बैठकर गरम कॉफी पीएंगे।" "यही ठीक है । थोड़ी देर में वेयरा आएगा।" उसने उठकर परदों को खिड़की के ऊपर फैला दिया। धूप का खेल खत्म हो चुका था। एक भटमैलापन खिड़की के बाहर और कमरे के अन्दर लपलपाने लगा था। "यहाँ काफी उमस महसूस हो रही है।" "मुझे तो ऐसा नहीं लग रहा।" "दर असल तुम्हें हर वक्त सिर्फ अपनापन चाहिए।" "और तुम्हें भीड़।" (एक लम्बा अन्तराल । वे एक-दूसरे को विपरीत दिशाओं में देखते हुए एक-दूसरे की उपस्थिति को भोगते हैं । देर तक उनके बीच एक मान उसका खेल आवाज सरसराती है। पुरुप पान सिगरेट सुलगाता है और स्त्री पान का चेहरा धीरे-धीरे उसकी तरफ घूमता है।) "तुम एक क्षण के लिए भी गम्भीर नहीं हो सकते ?" (वह सिर्फ चुप रहता है । सिगरेट के कश अधिक तेजी से खीचता हुआ धुंआ छत की तरफ उगलता है।) "पहाड़ धुध मे पूरी तरह डूब गए हैं।" "यहाँ पिछले पन्द्रह दिन से ऐसा ही खेल चल रहा है।" "चलते हुए चमकती हुई धूप मे हिमालय की शृंखलाओ को देखने का उत्साह बहुत अधिक था।" "हिमालय सिर्फ बहुत तेज धूप मे दिखाई देता है।" (वह उठती है और कमरे से बाहर रेलिंग से चिपककर ठहर जाती है। वह दूर अंधेरे में आँखें दौड़ाती है । बार-बार गर्दन ऊपर-नीचे करती हुई एक विशेष कोण पर स्थिर कर लेती है। यहां से वह उसे और नीचे सड़क पर चहलकदमियां करती भीड दोनों को एक साथ देख सकती है।) (धीरे से चलते हुए वह भी ठीक उसके पीछे आकर खड़ा हो गया है । अब दोनो एक साथ देखते है।) लम्बी-लम्वी शृखलाएँ। विभिन्न शेड्स का आभास देते पहाड़। पहाड़ों पर विछी हुई चांदनी बर्फ की तरह चांदी की तरह । ऊँची-नीची पहाड़ियां । चीड और देवदार के वृक्ष लम्वे विशालकाय एकदम ठीक सीध मे आसमान की ऊंचाई तक पहुँचे हुए। दूर-दूर तक विखरी हुई काटेज। अकेली, दुकेली अथवा ममूह में । खपरैल और खिडकियां-उनके सूराखो से बाहर छिटकती हुई फोकी,. बीमार रोशनी । टिमटिमाते वल्वो के बीच आभास देते हुए चेहरे । रात । मर्द और ठडी हवा। उड़ती हुई एकाध चोलें, ग्रिड़की के वाहर । ठीक उनके नीचे सडक पर इधर-उधर चक्कर लगाता एक हुजूम । "सर्दी बढ़ गई है।" "यहाँ बहुत अच्छा लग रहा है।"
धब्बे : ८५
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"अन्दर चलते हैं। मुझे कंपकपी चढने लगी है।"
"सड़क पर अभी भी काफी भीड है।"
"अन्दर चलकर बैठते हैं।"
(वह टेदी नजर मे उसे देखती है । उमका हाथ धीरे-धीरे उसकी तरफ
वढ रहा है। उसे लगता है उसका चेहरा उसका नहीं रह गया है। कोई
भयानक चेहरा उमके स्थान पर आ चिपका है।)
वह धीरे से अपना हाथ उसकी ठंडी हथेली पर रखता है।
"तुम्हारा हाथ बहुत ठंडा है।"
"मुझे बहुत डर लगता है।"
वह सिर्फ हंसता है । उसे लगता है भेडियो के एक समूह ने उस पर
छलांग लगा दी है । ढेर सारी लपलपाती जीभे, जलती हुई लाल आँखें...
धीरे-धीरे उसकी तरफ आगे बढ़ रही हैं।
सहसा वह पाती है कि वहां कुछ नहीं है भेड़िये लुप्त हो चुके हैं।
उनके स्थान पर सिर्फ कुछ धब्ने शेष रह गए हैं-सुर्ख, मटमैले और काले
रंग के धब्बे।
उसे यहां आए हुए आज तीसरा दिन था। तीसरे दिन में उसकी उससे
यह तीसरी मुलाकात थी। उसने गिनती को-पहली, दूसरी और तीसरी।
तीसरी अभी अपूर्ण है। उसे लगा सख्या गिनते हुए वह कोई भूल कर रहा
है। हर मुलाकात एक-सी ही है-एक-सी ही क्रियाएँ और प्रतिक्रियाएँ ।
"यहाँ खड़े-खडे बोरियत होने लगी है।"
"अंदर चलकर बैठते हैं।"
"अंदर नही रिज पर ।"
"रिज पर आज क्या कोई खास बात है ?"
"कुछ भी नहीं।"
(स्त्री पात्र लापरवाही में गर्दन पर रूमाल फेरती हुई अंदर की तरफ
मुड लेती है।)
८६ : उसका खेल
वह शिमला आज ही पहुंचा था। वह सीधा 'विज-व्यू' पहुंचा था।
कुछ देर टव में घुसा रहा । धीमे-धीमे गुनगुनाता रहा और हल्के-हल्के अपने
पूरे जिस्म पर उँगलियां उकेरता रहा।
तरोताजा होते ही वह तुरन्त 'जाखू की तरफ चल दिया। 'जाखू'
उसे सबसे अधिक पसन्द रहा है। एकात के साथ-साथ एक तरल आत्मीयता
का अहसास भी वह वहाँ अपने अदर बटोर लेता है।
फिसलनदार रास्ते पर लौटते हुए वह घोड़े की पीठ पर जमकर बैठा
हुआ काजू खा रहा था और तेज आवाज मे घोडे वाले के साथ गा रहा था।
ऐसे ही वक्त एक मोड पर उसका उससे एकदम अप्रत्याशित टकराव हुआ।
"हलो !" वह उसे देखते ही तेज आवाज मे चीखा।
वह 'हलो' के प्रत्युत्तर में उसके करीव चली आई। उसकी पुतलियाँ
थोड़ी फैली और उँगलियां स्कार्फ को ढीला करने में लग गईं।
वह घोड़े से कूदकर जमीन पर आ टिका था और मजे से उसकी
हथेली हाथ में लेकर उस पर कुछ काजू टिका दिए।
“यहाँ कैसे?"
"वस ऐसे ही, तुमसे मिलने।"
घोडेवाले को इस बीच वे विदा कर चुके थे और एक पेड के नीचे
पत्थर के ऊपर रूमाल विछाकर बैठ गए थे।
वह देर तक उगी हुई घास के तिनके तोड़ती रही।
"आजकल क्या कर रही हो?"
"कुछ नहीं।"
"रिसर्च अभी पूरी नही हुई ?"
"कुछ दिन अभी और लगेगे।"
दोनो के बीच अब फिर एक लवा अतराल था। ऊवाने वाला, ठहरा हुआ
और मृत समय।
“यहाँ अभी कितने दिन हो ?"
"कुछ पता नहीं।"
धब्बे : ८७
"अब कब मुलाकात होगी?"
"अभी उठने की जल्दी क्या है !"
"कुछ भी नहीं !"
इस बार उनके बीच ऊबाक मौन नही था। शब्द नहीं थे। किंतु पुतलियां,
होठ और हथेलियां कांपने और थरथराने लगी थी। उसे लगा वह अपना
संतुलन खोने लगी है किंतु अपने-आप को बहुत सँभालने के बावजूद
उसके पास, उसके इर्द-गिर्द और उससे परे सिर्फ कुछ धब्बे शेप रह गए
थे। सुर्स, मटमैले और काले रग के धब्ये !
. इस बीच वह फिर रेलिंग से सटकर खड़ी हो गई थी। वह वही कमरे
के अंदर सोफे पर टिका हुआ उसे वीच-बीच में देख लेता था। रॉड बुझा
दिया था और एक हल्की और धुंधली नीली रोशनी कमरे में फैल गई थी।
उनसे धीरे से पैरो को हरकत दी और सिगरेट के कश खीचता हुआ
रेलिंग की तरफ एकटक देखने लगा। एक लम्बी परछाईं।
हल्की-हल्की बौछारो ने उसके चेहरे को भिगो दिया था। स्कार्फ को
खोलते हुए अपने चेहरे को उसने और आगे की तरफ झुका लिया । बूंदों
का स्पर्श उसे गुदगुदा गया।
"आओ बाहर खड़े होते है ।" उसने पीछे मुडकर कहा।
एक गहरी चुप्पी, तेज होती बूंदों का शोर, एक गहरी और थकी हुई
उच्छ्वास।
"अंधेरे में क्या कर रहे हो?"
(वह घूमती है और रेलिंग को पीछे छोड़ देती है।)
"भीग जाओगी, अंदर आ जाओ।"
"बहुत अच्छा लग रहा है।"
"सर्दी खा जाओगी।"
...तो क्या हुआ ?"
(वह फिर पीछे घूमती है और रेलिंग से सटकर खड़ी हो जाती है।
वह सोफे पर से उठता है ! सिगरेट के अंतिम कश खीचकर उसे
८८ : उमका गेल
दूर फेंक देता है। धीरे-धीरे चलता हुआ ठीक उसके पाम आ पड़ा होता
है । हल्की नरमाई के साथ अपना हाथ उमके कंधे मे टिका देता है।)
यह कुछ देर उमी तरह स्थित पड़ी रहती है। परमती हुई बौछारो
के बीच कुछ तलाशती हुई, कुछ क्षण वाद धीरे मे उसका हाय अपने से
अलग कर देती है।
"अदर चलते हैं।"
वह सामोश रहती है। धीरे से कुछ फुसफुसाती है, जिसे वह मुन नही
पाता।
"तुमने कुछ कहा ?"
"पहले तुम बिना कुछ कहे ही समझ जाते थे।"
"यहाँ सर्दी बहुत कम है, कमरे मे हीटर लगा.है।"
"मुझे यहाँ अच्छा लग रहा है ।"
"कॉफी पियोगी?"
"मैं तुममे कुछ पूछना चाहती थी।"
"अदर चलकर बैठते हैं।"
"अंदर तुम मौका नहीं दोगे।"
(दोनो कुछ देर खामोश रहते हैं। बूंदों के टपकने की आवाज धीरे-
धीरे दबने लगी है।)
"क्या तुम पिछले सब कुछ भूल चुके हो ?"
"ऐसे वक्त तुम हमेशा ही खामोश हो जाते हो।" उमकी आवाज मे
कुछ तीखापन उभरता है।
"मैं अभी भी तुम्हारी प्रतीक्षा करती थी।"
(आवाज से स्पष्ट जाहिर है, लडकी धीरे-धीरे भावुक होने लगी है।
वह और आगे बढ़ती है और और लगभग उससे सट-सी जाती है। उसे
भावावेश मे चूमती और एक दम निढाल हो जाती है।)
(पुरुष पात्र आगे बढकर उसे सहारा देता है)
धब्वे : ८९
"दरअसल तुम मुझे समझ ही नहीं सकती।"
"ऐसा तुमने हमेशा कहा है । इसमे कोई नई बात नहीं है।"
"तुम मेरी परिस्थितयो को नहीं समझ सकती।"
"यह क्यों नहीं कहते तुम कायर हो अथवा ऊब चुके हो।"
(एक लवा अतराल । दोनो एक साथ चलते हुए कमरे के अदर प्रवेश
करते हैं और हताश आवाज में अलग-अलग सोफों पर पसर जाते हैं ।)
"तुम्हे भूख नही लग रही"
"नहीं"
मुझे लग रही है।"
(वह हीटर की तरफ मुड़ता है और वह उठकर ट्राजिस्टर का स्विच
ऑन कर देती है।)
कुछ देर बाद एक मोटी आवाज घरघराती है और नये किस्म के व्यंजन
बनाने की विधियों का उल्लेख शुरू होता है।
(वह झल्लाकर स्विच ऑफ कर देती है। कमरे मे पानी के खोलने
की आवाज ऊंची होने लगती है।)
यह उसकी दूसरी मुलाकात थी। पहली मुलाकात के ठीक बीम घंटे
वाद । वे दोनों इतनी जल्दी एक-दूसरे के सामने इस प्रकार भरपूर पड़
जाएँगे इसकी किसी को भी उम्मीद नहीं थी। रिज पर टहलते हुए वह
चिप्स खा रहा था और यह तली हुई जायकेदार मूंगफली चबा रही थी।
स्लैक्स पहने हुए वह कम उम्र और ताजा प्रतीत हुई । एकाएक उसे
विश्वास नहीं हुआ कि इसी शरीर को वह अपनी पूर्ण सपूर्णता के साथ कई
बार उपलब्ध कर चुका है।
वह उसे एकटक अपनी ओर देखता पाकर और उसकी आँखों में
अपने प्रति लोभ का भाव देखकर एकाएक शर्मा उठी।
"उधर की तरफ चलते हैं ।" उसने इशारा किया।
हम बहुत थक चुके हैं। कहते हुए उसे लगा, उसकी आवाज की शोखी
९० : उसका खेत मे काफी बड़ी मात्रा मे बनावट तिर आई है। "यही बैठ जाते है।" कहते हुए वह उसका हाथ पकड़कर वही एक बेच पर बैठ गया। उन्हें पता नही लगा कि कितनी देर वे इधर-उधर की बतियाते रहे। वह बातचीत के बीच अपने को दुविधा मे पा रही थी। उसे लगता वे शब्द जो उसके अदर से बाहर निकल रहे है उनका निर्माण उसके अंदर से नही हो रहा है । वे बाहर हवा मे ही वन-बिगड़ रहे है। उसके अदर जो बाहर आने के लिए बार-बार छटपटा रहा है, सिर्फ छटपटाता रह जा रहा है। एकाएक वह चौंक उठी। उसने उसकी कान में अपनी छोटी उंगली घुसा दी थी। वह उसको दिखाता हुआ एक तरफ इशारा कर रहा था। उसने देखा कि जिस बेच पर वे बैठे है ठीक उसके दाएँ एक रास्ता नीचे की तरफ गया है। उस पर काफी चौड़ी सीढियां बनी हुई है। एक मोड पर एक पेड़ के नीचे एक वेंच पड़ी हुई है जिस पर एक जोडा काफी सटा हुआ बैठा है । उसके देखते-देखते लडकी ने लड़के की कमर के पीछे अपना हाथ डाल लिया था और धीरे-धीरे उसके होठो की तरफ झुकने लगी थी। किंतु लाडका बेहद घबराया हुआ, वदहवाम-सा बार-बार अपने-आपको बचाने का प्रयास कर रहा था। लडको की साहसिकता और लड़के को बदहवासी देख एकाएक वह हंसते हुए शरमा गई। "उस तरफ इस तरह क्यों देखते हो?" वह बेहद मादक दृष्टि से उसे एक टक देखता रहा । उसे लग रहा था कि उसकी पीठ से ढेर सारी रग-बिरगी तितलियो चिपक गई हैं जो वार- वार उसकी पीठ पर बैठ रही है और उड़ रही हैं। "होटल वापस चलते है ?" "कहां ठहरे हो।" "विज न्यू में," कहता हुआ वह पड़ा उठ हुआ। "आज नहीं।" पहने के माय-माय उसे सगा वह भी उसके माय कम-
धब्वे : ९१
जोर पड़ने लगी है और उसके चारों तरफ फिर पहले की तरह सुर्ख, काले
और मटमैले रंग के धब्बे नाचने लगे हैं !
वे काफी देर से सिर्फ कॉफी पी रहे हैं। वह उसे कनखियों से देखती
है । वह उदास और गभीर मुद्रा गनाए तेज आवाज में मुड़कता हुआ कॉफी
पी रहा है । उसका उसे इस तरह असभ्यतापूर्ण कॉफी पीना भद्दा प्रतीत
होता है। पहले भी होता था किंतु तव उसमे उसकी भावुकता और उसकी
इस लापरवाही के लिए कोमल सवेदनाएं जागृत होनी प्रारभ हो जाती
थी। जिसका अत एक-दूसरे के प्यार-भरे चुंबनों और आलिंगनो में होता।
उठते हुए उसने पूछा था अब कव मिलेगा? उसने धीरे से सिर हिला
कर कह दिया था-अब कभी नहीं।
"मैं आज शाम को तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा।"
"एकदम बेकार है। मैंने कहा नही कि मैं अब विल्कुल तुमसे नहीं
मिलूंगी।"
वह तेज आवाज मे हँस पड़ा था।
"शाम तक तुम्हारा सारा क्रोध शात हो जाएगा।"
"इस बार ऐसा नहीं होगा, मैं तुम्हारे लिए मात्र एक वस्तु नहीं बन
सकती।"
"तुम्हे गलतफहमी हुई है।"
"हां, मुझे हमेशा ही गलतफहमी होती है।"
कॉफी को समाप्त करते हुए वह सोच रही थी वह यहाँ क्यों आई ?
क्या उसका यहाँ पाना और इस प्रकार अपना उपयोग होते देखना उसकी
आंतरिक अनिवार्यता बन चुकी है ? क्यों "क्यों...?
"अब मैं चलना चाहती हूँ।"
(वह उसी तरह बैठी रहती है)
"अभी इतनी जल्दी क्या है ?'
(उसने भी अभी-अभी कॉफी समाप्त की है)
९२ : उसका सेल "रुकने का भी क्या उपयोग है ?" 'तुम आजकल हर वस्तु और हर क्षण का उपयोग देखना और सम- झना बहुत समझ गई हो।" "यह सब भी हमे ही देखना होता है ।" वह एक तेज सांम भरने की कृत्रिममा का अहसाम बड़ी शिद्दत के साथ करती है । उनके बीच एक बार फिर लम्बा मौन, एक सन्नाटा, सांय-सांय करती हवा और अपरिचम का जंगल है जो उनके बीच अभी-अभी उग आया है। वे उसमे से बार-बार निकलना चाहते हैं किन्तु भटक जाते हैं । वह उठती है और ट्रांजिस्टर की सूई को दूसरे स्टेशन पर घुमा देती है। (एक सुरीली और बारीक आवाज धीरे से कमरे में रेंगती है, बेहद धीमी और ठंडी आवाज । 'अभी-अभी आप श्री चिदाम्बरन् से वायलिन पर सगीत सुन रहे थे ! इस समय रानि के ठीक दस बजकर दस मिनट हुए है। अव आप रवीन्द्र संगीत के स्थान पर विचित्र वीणा पर गायन सुनिए..) देर तक सिर्फ एक धरधरातो आवाज गूंजती रहती है। वह उठता है और ट्राजिस्टर के स्विच की तरफ हाथ बढ़ाता है । वह उसके हाथ को अलग हटा देती है । "यही रहने दो।' "किस मनहूसियत को उभारने में लगी हुई हो?" "मुझे यह बहुत अच्छा लगता है।" "लगता है आजकल ऐसी ही फालतू चीजो में तुम्हारा मन रमने-खपने लगा है।" उसकी आवाज मे झल्लाहट है । ."" वह सिर्फ मुस्कराती है और मन ही मन उसकी झल्लाहट से आनदित होती है। धीरे से टांगें हिलाती हुई जीभ होंठो पर फेरती है उसे पता है इतना ही सब कुछ उसे कमजोर और उत्तेजित बना देने के लिए पर्याप्त है । उसके अन्दर उसके प्रति क्रूर और घातक भाव जन्म लेने लगता धब्वे : ९३ वह उसकी तरफ आकर्षक ढंग से मुस्करााती रहती है । सीने मे हवा भरती है, उंगलियोकोसोफे को पीठ से धीमी-धीमी आवाज में षपथपाती है। वह अपने अन्दर एक उत्तेजना भरती हुई महसूस करता है। उसे बार- बार उसके चेहरे पर रंग-बिरंगी तितलियां मंडराती महसूस होती हैं, जो बार-बार आती हैं, चेहरे पर बैठती है और फिर उड़ते हुए मंडराती हैं। वह तेजी से उसकी पीठ की तरफ अपना दायां हाथ आगे बढाता है और उसकी तरफ झुकता है। वह बेहद सस्ती के साथ उसका हाथ झटक देती है। "यह सब अब नही.."।" वह क्रूरता के साथ कहती है । वह बौखलाता हुआ सा देर तक उसकी तरफ देखता रहता है। धीरे से मुस्कराता है और सोफे पर जमकर बैठ जाता है। कुछ देर बाद एक सिगरेट सुलगाता है। वह उसकी इस वक्त की स्थिति और मनःस्थिति दोनों से अच्छी तरह वाकिफ है। वह अपने-आपको इस वक्त चाहे कितना भी संयमित और संतुलित करने का प्रयत्न कर रहा हो वह जानती है कि वह इस वक्त किन पीली यात्राओं के बीच से गुजर रहा है। "अब मुझे चलना चाहिए," वह स्कार्फ को कसती हुई उठ खड़ी होती "अव कहाँ जाओगी? इतनी सर्दी में ? आज यही ठहर जाओ।" वह सरसराती आवाज मे कहता है । "नहीं. "अब बिल्कुल संभव नहीं है।" यह उनकी तीसरी मुलाकात है, शायद अन्तिम भी । वह सोचती है और धीरे से उसकी तरफ विदाई का हाथ हिलाते हुए कमरे से बाहर हो जाती है। हवा काफी तेज और ठडी है, वह महसूस करती है और इस महसूस करने के बीच काले, पीले और मटमैले धब्बे, जो उसे इस वक्त काफी आत्भीय और परिचित लगते हैं ।
गुहावासी केन्द्रीय सरकार के प्रशासन विभाग में, काफी महत्त्वपूर्ण पद पर कार्यरत था। एकाएक मुझे लगा कि जिन्दगी नष्ट होती जा रही है । आगे- पीछे घूमती कारों, हाथ जोड़कर खड़ी रहने वाली लम्बी-चौड़ी भीड़, हर वक्त कानी मे दनदनाते रहने वाले शोर ने मुझे वितृष्णा और कब से भर दिया। मेरी जिन्दगी का क्या महत्त्व है ? क्या मैं ऐसे ही अनाम और अप- रिचित रहकर तपती हुई रेत पर पानी की बूंद-सा टपक पड़गा? आखिर यह सब मैं किसलिए"? धन का तो पहले ही कोई अभाव नहीं था । उन पहाडी और शरण्य स्थलो पर मेरे पुरखे खूबसूरत काटेजो का निर्माण कर गए थे। ये कि दोनों हाथ से उलोचते रहने के बाद भी, पैतृक सम्पत्ति का कोप रीत नहीं सकता था। फिर भी। एकाएक मुझे लगा कि ऐसी अमहत्त्वपूर्ण स्थितियों के बीच में सिर्फ लेखक ही बन सकता हूँ (मुझे अभी भी यही लगता है कि सिवाय लेखक बनने के मैं और कुछ भी महत्त्वपूर्ण, हो सकता था।) वह वसन्त ऋतु थी और मेरे लेखन की शुरूआत तराई मे स्थित, एक रमणीक झील के तट पर हो गई थी। वहां हरहराती दिशाएँ, बादलो की पैजनियाँ और उतरते हुए संगीत की तरह थिरकते हुए पात-सभी उप- करण मौजूद थे।
गुहावासी : ९५ उस खुशनुमा सुबह मैंने लेखक बनने को, निर्णय की तरह लिया। बल्कि सुबह अभी पूरी तरह फूटी भी नही थी। धुंधलके की एक भीनी पर्त नीले-निथरे आकाश पर अभी थी। घाट की सीढियो के ऊपर मेरा अकेला- पन पैर लटकाए बार-बार सूने आकाश की तरफ देखता था तो पिछले कुछ दिनों से मन के अन्दर घुमडता हुआ निनाद अपने अन्दर एक दुःख, एक व्याकुलता और हिलोरें देखते हुए अकेलेपन को समेटता हुआ धनीभूत हो उठता। यह निर्णय लेते ही यह भ्रम हुआ कि सब कुछ तेजी से बदल रहा है और मेरे अन्दर कही, उन दिनो घुलते रहने वाली वह नारकीय विरक्ति हिलोरें लेते-लेते घनीभूत हो उठी है। एक क्षण के अन्दर ही मनुष्य कितना आह्लादकारी और उल्लासमयी आन्तरिक यात्राएँ कर डालता है, यह एह- सास मुझे पहली बार हुआ था। एक क्षण पहले ही जो आकाश सूना और रंगहीन प्रतीत होता था, वहीं अब नीला निथरा हुआ, वेहद पवित्न और मन के अन्दर सुकोमल भावनाएँ जगाने वाला हो चुका था। वह प्रकृति जो मेरे लिए मान विलास, लालसा और दृश्य का पर्याय थी, सहसा ही महत्त्वा- काक्षा के क्षीतिज में परिवर्तित हो गई। ये बात और है कि साफ-सुथरी सतह की अन्दरूनी परत से ढेरों घनीभूत यातना के रवे चिपके हुए थे। और मैं उस अन्तहीन अंधेरी गुफा से बाहर चला आया था, जहाँ असंख्य नारकीय कीड़े कुलबुला रहे थे। अब मैं मुक्त था। गुफा की छत और फर्श पर सीलन के रवेदार खड़िया या जमे हुए समुद्रफेन जैसे आरोही-अवरोही शंकू बहुत पीछे छूट चुके थे। उसके बाद मैं अब अकेला नहीं रहा। मेरे अन्दर एक भीड़ भरा संसार धीरे-धीरे निर्मित होने लगा। तराई मे मेरा एक बेहद सुन्दर बँगला था। और शायद मेरे अन्दर जन्मता सुकोमल संसार सिर्फ ऐसे ही सौन्दर्य- पूर्ण और एकान्त स्थली मे पल्लवित-पुष्पित हो सकता था। वहाँ क्या नहीं था ? वेल को नरम दांतों से कुतरती गिलहरियां, सरोवर में खिले हुए लाल कमल, पीले फूलों पर मंडराती मधुमक्खियां, थरथराते हुए मदहोश पत्तों ९६ : उसका खेल का सगीत । 'सभी कुछ था वहाँ के कण-कण में रचा-बसा । आज सोचता हूँ, मैं कितना सौभाग्यशाली रहा। वह उन्मुक्त सौन्दर्य जिसके लिए कवि और लेखक तरसते है, मुझे पैतृक रूप से उपलब्ध था। यहां बाहर कोहरा झरता था, जो निकलते ही शरीर पर फिरफिरी बर्फानी तह आसानी से जमा देता। वे सभी अंधेरी की लम्बी-लम्बी अपारदर्शी दीवारें, जिनसे टकराकर मेरी चीखमयी आवाजें स्वयं मुझ तक पहुँचनी थी, एकाएक लुप्त हो जाती। घोर अकेलेपन के बावजूद भीतर कही आहटें रेंगती महसूस होती । ऐसे वक्त एक दार्शनिक भाव मुझे अपने पोर-पोर में रमता-बसता प्रतीत होता। महानगरो के काले धुएँ को लगातार पीते हुए और उसकी तेज गति के शोर को निरन्तर अपने शरीर के अन्दर पारे की तरह दौडाते-फिसलाते हुई, मैं पिछले कई वर्षों को निरन्तर एक दुःस्वप्न की तरह जी रहा था। ऐसा महानगर सिवाय कुठा और विप के क्या प्रदान कर सकता था? मुझे खुशी हुई, मैं इन सबसे कितनी सहजता और उदारतापूर्वक मुक्ति पा सकता हूं, जिन्होने जहाजी सिन्दवाद के कंधो पर चढ़े हुए बूढे दानव की तरह, सभी साहित्यकारो को एकदम पंगु और स्वरहीन बना डाला है। मुझे लगा-आज साहित्य में कही भी, कोई भी ताजगी नही रह गई है । सभी की मौलिकता को तुषार ने खा डाला है। यदि उनके अन्दर कुछ शेप बचा भी है तो उसे गहरी धुध और कालिमा ने आवृत्त कर डाला है। जब भी इन संदर्भो को लेकर मैं गम्भीरता से चिन्तन करता, मेरा मन उदास हो जाता। ऐसी अराजक स्थिति में मैं सिवाय लेखक वनने के और कर भी क्या सकता था? ऐसा नही था कि लेखक बनने से पहले मेरी कोई और महत्त्वाकाक्षा नहीं रही हो। मेरे सम्पर्क मे जो भी महानुभाव आए हैं, उनका स्पष्ट मत है कि मेरे जैसा दुर्लभ आकर्षक व्यक्तित्व जिस किसीको प्राप्त होता है, वह अपने ऊपर इतरा सकता है। इतना निश्चित है कि चालीम वर्ष की उन पार करने के बाद भी, युवा लड़कियो का आकर्षण मेरे प्रति रंचमान
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९८ : उसका खेल होता था किन्तु साहित्य मे, मैं उस अनाचार को बर्दाश्त नहीं कर सकता था। मैंने उन्हें अपने पूर्ण आतरिक मन से सर्वथा अस्वीकार कर दिया । ऐसे व्यक्ति कभी लेखक हो ही नहीं सकते । क्या वह मेरे वर्ग का हो सकता था? समय के साथ लेखकीय चिन्तन और विचारधाराएं कितनी तेजी से वदल जाती हैं, यह देखकर पहले कभी आश्चर्य होता था, अब नहीं । कैशौर्य भावनाओ को मैं बहुत पीछे छोड चुका हूँ। प्रेम-प्रसग और व्यक्तिगत दुःख-दर्द का साहित्य मे चित्रण कितना पिछड़ चुका है ? क्या मैं उस किस्म की भावुकता मे डूव और उलझ सकता था, जिसने सम्पूर्ण साहित्य जगत् को मोथरा बना रखा है ? कितना दुख होता है जब पाता हूँ, हममे से किसी के भी पास कोई मौलिकता नहीं रह गई है। अभी भी रामायण, महाभारत और गीता के संस्कार उनके तन के रेशे-रेशे पर हावी हैं । उन्हें नहीं पता विश्व साहित्य ऊँचाई के किस बिन्दु को छू रहा है । पूरे साहित्य संसार मे अनपढ़ और गवार लोगो की भयकर वाढ आ गई है। इनमें क्या कोई सम्भावनाएँ शेष रह गई है ? इनसे क्या आशाएँ रखी जा सकती है ? मेरे पात्र इन सबसे अलग है। वे रोते-रिरियाते और ढेर सारे आंसू वहाते हुए पान नहीं हैं । वे निरन्तर जूझ रहे हैं और सभी संस्थानों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। मेरा हर पान सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। वे पददलित, भूखे और शोपण के बीच सांस भरते, जीते और कलपते हैं। मैं सिर्फ ऐसे ही पानी का चित्रण कर सकता हूँ क्योंकि यही आज की अनिवार्यता है । कितना दुःख होता है जब सुनता हूँ कि एक कुण्ठित वर्ग मुझे और मेरे लेखन को सिर्फ इसलिए हेय दृष्टि से देखता है क्योकि उनकी दृष्टि में मुझे उस वर्ग के किसी भी पान का स्पर्श तक करने का अधिकार नहीं है। कितनी विचित्र दलील है उनकी ! वे कहते हैं, जब तक मैं स्वय उस मानसिक प्रक्रिया के बीच से न गुजर रहा होऊ, मुझे ऐसा कोई अधिकार नहीं है। ऐसे मूड लोगो पर सिवाय तरस खाने के और किया गुहावासी: भी क्या जा सकता है ? क्या लेखक का मैच भामहीसा और संवेदशामि होना पर्याप्त नहीं होता? क्या एक भूखा व्यक्ति ही ना और मोटा महसूस कर सकता है ? ऐसे व्यक्ति सिवाय टर्र-टर्र टनेि के और कर भी क्या सकते है ? वे एक आम आदमी के दर्द की बात कहते है जबकि उनके चेहरे से एक भी व्यक्ति परिचित नहीं होता। उन्होने लिखा ही क्या है ? माहित्य के लिए उनका क्या योगदान है ? कितना हास्यास्पद लगता है जब वे कहते हैं कि लिखने का उनके निकट कोई महत्व नहीं है। कोका- कोला पीना और कागज काले करना उनके लिए एक समान है । जिनका सोच ही इतना विकृत हो चुका है, उनसे आणाएं भी क्या की जा सकती हैं ?.."इन्हें आप साहित्यकार कह सकते है ? चेहरे मे देखने पर एक रिक्शे वाला भी इनसे काही अधिक बेहतर प्रतीत होगा। वर्ष में एक-दो टटपूंजिया रचना लिपते ही अपने-आपको महान मान बैठते है । "उन्हे कौन जानता है ? लेखन के प्रति जो सम्पूर्ण तन-मन से समर्पित नहीं है उसे लेखक कहा भी कैसे जा सकता है ? क्या ऐसे लोग मान चलताऊ परनूनिया साहित्यपार नहीं हैं ? आरचयं से घिर उठता हूँ, जय पिछले दशक के साहित्य पर दृष्टिपात फरता हूँ। उन लैपकों ने जो अपने को साहित्य के मसीहा से कम स्वीकार नहीं करते, क्या लिया है ? क्या मात्र फुटकर प्रकाशित रचनाओं अथवा एकाध पहानी संकलनों के बल पर उन्हें साहित्यकार कहा जा सकता है ? जन-जीवन का व्यापक चित्रण करने वाली कौन-मी वृहद् कृति उनके पास है ? उनकी किम रचना को शाश्वत साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता. मुझे अपने विषय में कोई पम नहीं है और न ही उनके समान खुद सम्ब-नये दापे ही करता हूँ। मेरा माहित्य ही मेरा मूत्याग्न करने में पूर्ण रामर्थ है । उनकी महत्ता के गमा यौन प्रश्नचिह लगा सकता है ? मेरे महत्य पो विगने नही स्वीकारा है ? आए दिन मेरे सम्मान में विभिन्न मंस्पानी द्वारा गमारोहों का आयोजन होता रहता है। बादर और श्रा, १०० : उसका खेल प्रेम और भक्ति से लकदक करती मेरे पाठको की विशाल संख्या मेरे चारो ओर घिरी रहती है। क्या यह सम्मान और श्रद्धा, नकली, झूठी और स्वयं मेरे द्वारा निर्मित है ? मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता। मेरी कृतियों की विशाल पाठक सख्या कभी गलत नहीं हो सकती। और क्या इस सम्मान को पाने का अधिकार मेरा नही है ? ईर्ष्यालु लोगो के विषय मे मैं क्या कह सकता हूँ? उनकी छिद्रान्वेषी दृष्टि का क्या कोई मूल्य है ? एकादमी पुरस्कार मिलने का अर्थ उनकी दृष्टि मे चापलूसी और पिठू होना है। शासन मेरे महत्त्व को स्वीकार कर, यदि मुझे अलकृत करता है और मैं उसे स्वीकार करता हूँ, तो कौन-सा पहाड़ टूटकर गिर रहा है ? राज्य हमेशा से ही साहित्यकार का सम्मान करते आए हैं। मुझे कभी-कभी उन दार्शनिक महानुभावो पर गहरा आश्चर्य होता है जो कहते है कि लेखक की सन्तुष्टि, समृद्धि और प्रसिद्धि उसका अन्त होती है। मैं समझ नहीं पाता जिस बात का यथार्थ से दूर तक भी कोई सम्बन्ध नही होता, उसको लेकर वे हवा मे घोड़े क्यो दौड़ाते हैं ? ऐसे ही व्यक्तियों ने तो साहित्यकार की मर्यादा और प्रतिष्ठा को पाताल में पहुँचा दिया है। क्या साहित्यकार व्यक्ति नहीं है ? क्या उसे सुख और समृद्धि भोगने का कोई अधिकार नही है ? क्या उसे हमेशा के लिए चोरघर और यातनाघर मे स्थायी निवास प्रदान कर दिया जाए? कैसी गलत और भ्रामक स्थितियां है, जिनसे कोई भी सही स्तर पर नहीं जूझ रहा है। मेरा विश्वास है कि लेखक को कभी भी अपने लिए रूढ़ियों का निर्माण नहीं कर लेना चाहिए । ऐसा करने से उसके लेखन की तागजी क्षार-क्षार होने लगती है। अभिव्यक्ति के माध्यम बदलते रहना काफी सुखकर होता है। प्रतिभा को आप क्या छिपा सकते हैं ? वह तो चाहे किसी भी क्षेत्र और किसी भी विद्या मे कार्य करें, अपना महत्त्व उजागर कर ही डालती है।
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१०२ उसका खेल हुए जो अलकरण प्रदान किया है, क्या उसका महत्त्व इन कुछ तुच्छ लोगो के नकारने से कम हो जाता है ? जब मंच पर खड़े होकर ये गर्जना करते हैं तो इनकी मुद्राओं और सस्कृत नाटको के विदूपको की मुद्राओं में कितना अधिक साम्य होता है। आजकल यह चर्चा वहुत जोरों पर है कि प्रधान मन्त्री शीघ्र ही मुझे संसद का सदस्य नामजद करने जा रही हैं। ऐसी स्थिति में क्या मेरा उनके श्री चरणों में आभार प्रकट करना अनुचित कृत्य कहा जाएगा? मैं विदेशी सरकारी और सस्थानों द्वारा निमन्त्रण पा-पाकर थक चुका हूँ। अब इन यानाओ के प्रति कोई उत्साह और आकर्पण शेप नही रह गया है। देश की सभी भाषाओ मे मेरी प्रायः सभी रचनाओं का अनुवाद हो चुका है और कुछ की महत्ता को प्रान्तीय सरकार भी काफी विनम्र भाव से स्वीकार कर चुकी है। कुछ विदेशी भाषाओ मे भी शीघ्र अनुवाद होने जा रहे हैं। टी० वी० और रेडियो वाले हर वक्त पीछा करते रहते हैं । मैं उन्हे वार-धार समझाता हूँ, भई हम तो पुराने हो चले, अब तो आपको युवा प्रतिभाओं को सामने लाने की दिशा में अग्रसर होना चाहिए, किन्तु उन्हे निराश और दु.खी करना भी तो अमानवीय प्रतीत होता है।
सिर्फ एक आकाश . घास नरम थी और गरम भी। जरूर उसके बैठने से पूर्व कोई भारी- भरकम शरीर वाली गर्भवती स्त्री वहाँ बैठी होगी। मेरे जैसी दो बातें होंगी-उसने सोचा क्योकि घास का एक बड़ा टुकड़ा गरम था। वह वह अकेली होगी और काफी परेशान भी, क्योकि आस-पास की घास काफी बड़ी मात्रा मै उखड़ी पड़ी थी जिसको उसने अवश्य ही मुठ्ठी मे भर-भरकर उखाड़ा होगा। उसके विचार से ऐसी बेहूदा हरकत अकेला आदमी कर सकता है, क्योकि कोई भी खाली मस्तिष्क उत्पादन की मशीन वनना नही चाहता। उनसे थोड़ी दूर पर ही एक बूढ़ा आदमी बैठा था। कोई मटमैला सफेद टुकड़ा उसने दोनों टांगों के बीच फंसा रखा था। जरूर वह सर्फद मटमैला टुकड़ा गन्दगी भरा रूमात होगा और ऐसे वक्त उसे अनायास ही रेंट से भरा बूढे पिता का रूमाल याद हो आता है जिसको न चाहते हुए भी उसको सायुन से रगड-रगडकर साफ करना पड़ता है, क्योकि उसकी पत्नी अपनी निगाह में कोई परम्पराबद्ध ग्रामीण औरत नही वरन् रीता फारिया है जिसको अपने दुर्भाग्य का यही रोना रहता है कि उस जैसा गधार उसके पल्ले पट गया जो कि पिता के हर आदेश के सामने मिमियाती हुई बकरी की तरह मिर झुका देता है और पत्नी अपने इम अह को स्थायी रपने के लिए रोज रात को गोदी के बच्चे को उसकी बाहों में डालती हुई.
१०४ : उसका खेल उसे पेशाव करा लाने का आग्रहपूर्ण आदेश देती है। यदि वह इस कार्य से बचना चाहता है तो वह यह कहकर कि अंधेरी रात को आत्माएँ भटका करती है और यदि किसी खूबसूरत औरत को अकेली पाती हैं तो उस पर सवार हो जाती है उसे बच्चे के साथ वॉथरूम जाने के लिए विवश कर देती हैं। । बूढे आदमी ने अपने सामने मूंगफलियां रखी हुई थी, जिनके छिलकों को वह इधर-उधर आकाश में उछाल रहा था। उसे उसकी इम रित्या मे घृणा हो आई, उसीसे नही वरन् सभी बूढ़े व्यक्तियों से। उन्हें हर समय चवाने के लिए कुछ-न-कुछ अवश्य चाहिए, चाहे वे घास के तिनके ही क्यों न हों। सहसा उसे मुखर्जी की याद हो आती है। स्साला. उसके होंठ अजीव-सी मुद्रा मे सिकुड़ते हैं. 'जरूर सठिया गया होगा। तभी तो हर समय धोती का कोना मुंह मे दवाए रखता है । मुखर्जी की किसी को भी वीच सड़क में ही पकड़कर बातें करने की आदत है और जब भी मुखर्जी उसको पकड़ता है सदा अपनी खुराक का ही रोना आता है और दुर्बल होते हुए अपने शरीर की ओर बार-बार दृष्टिपात भी। स्साले 'सभी बूढे एक से होते हैं जिनको याते करते समय वहू-बेटों को बुराई के अतिरिक्त कोई विषय ही नहीं मिलता। ऐसे वक्त उसका जी चाहता है कि वह जोर से हसे इत्ती जोर से हसे कि बूढा मुखर्जी भौंचक्का रह जाय और फिर धवडाकर यहां से भाग खड़ा हो। उसे पता है कि बूढे आदमियों को डर बहुत लगता है । और हर बात में और हर घटना और हर वातावरण में ये भय या कोई न कोई कारण पोज हो सेते हैं। उसे अन्छी तरह याद है कि एक हाइंग रूम का दरवाजा भूल से रात को बन्द हो जाने से रह गया था तो उसके पिता तीन दिन तक बुरी तरह परेशान रहे पे और बाद में भी यह परेशानी अरमर उनके चेहरे पर उभर ही आती। जो भी उनके पर आता उमीसे ये दम पटना की चर्चा करने। पिता को मन्दह था कि अगर रात में रिगी पदमाश-उचकर आरपी ने यह हरसत पीपी । सेरिन रिमी पजह गे उसरा दाद न मग पापा और भगवान पीया में पर में पोरी सिर्फ एक आकाश : १०५ होने से बच गई। वैमे चोरी न होने के बारे मे भी वे पूरी तरह विश्वस्त नहीं थे। और उन्होंने रामी (उसकी पत्नी) से कम-से-कम मात बार सारी चीजों को एक बार देखने को कहा था और रामी के बार-बार आश्वस्त करने पर भी उनका सन्देह पूरी तरह मिट नहीं पाया था। पिता के विचार से चोर खाली कभी नहीं जा सकता, वह कुछ-न-कुछ अवश्य ही चोरी करके ले गया होगा जिसका हमको पता नहीं। केवल यह परेशानी तीन दिन की ही नही रह गई थी वरन् हमेशा की हो गई थी और पिता का लम्बा-चौड़ा पलंग स्लीपिंग रूम से निकलकर बाहर के कमरे मे आ गया था और अब रोज सोने से पहले वे कम-से-कम दो बार जरूर ही सारे कमरों के दरवाजों को टटोल-टटोलकर देख जाते थे। उसे याद आता है कि पिता सदा ही अपने कम देखने और कम सुनने का रोना रोते हैं। यद्यपि कोई भी बात चाहे कितने ही धीमे स्वरो से की जाए उनके चौकन्ने कान उसको सुन ही लेते है। देखने के साथ भी यही वात है । उस दिन उसका और रामी का मूड पिक्चर जाने का हो आया था। 'ओरियन्ट बाई नाईट' देखने का दोनों का ही मन था। उन्होंने कितना गुपचुप प्रोग्राम बनाया था। लेकिन पिता के तेज कानों में भनक पड़ ही गई थी, "वेटा मैं तुम्हें पिक्चर जाने से रोकता थोड़े ही हूँ, बहू का मन है तो जरूर जाओ। लेकिन इसमे छिपाने की क्या बात थी?" और पिता पूजा करने चले गए थे। ऐसे वक्त उसे अपने कानों के विषय मे सन्देह होने लगता है । पिता के एक घण्टा पहले ही माला फेरने का, पूजा के कमरे में चले जाने का तात्पर्य था उनकी नाराजगी, और फिर रामो के बहुत कहने पर भी वह पिक्चर देखने का साहस नहीं कर पाया। रामी उसके इस डर- पोकपन से नाराज होकर विशेष रूप से पहनी हुई धानी साडी को उतारकर पुरानी धोती पहनने लगी थी। वह वस विवश-सा खडा रह गया था, क्योकि यह उसकी मजबूरी थी कि वह पिता को नाराज नहीं देख पाता। सामने बैठे बूढे व्यक्ति की मूंगफलियां शायद समाप्त हो चुकी थी, क्योकि अब वह काफी देर से मुंह को एक ही स्थिति में चला रहा था। -
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सिर्फ एक आकाश : १०७ हो तरह लगा। उठने का अन्दाजा ही नहीं बल्कि उसकी चाल भी। सभी बूड़ों की चाल एक-सी होती है अथया बुनियादी तौर पर बूढो में फर्क उत्पन्न करना कम से कम उसके लिए बहुत कठिन कार्य होगा--उसने सोचा । यह बूढा जरूर परिवार वालों से लड़कर यहां आया होगा क्योंकि वह पार्क का एक पूरा चक्कर काटकर फिर उसी स्थान पर बैठ गया था। उसे बूढ़े की यह हरकत भी पिता की ही तरह लगी। उसे पता है कि पिता जव भी नाराज होते हैं घर से बाहर हो जाते हैं अथवा हरिद्वार जाने के लिए विस्तर बांधना प्रारम्भ कर देते हैं और जब तक वह उनकी अच्छी तरह सुशामद नहीं कर लेता और आगे कोई गलती (यद्यपि उसे अपनी उस गलती का पता तक नहीं चलता, जिससे नाराज होकर पिता ने यह कदम उठाया था) न करने का वायदा लेता तब कही पिता जाकर मानते। वैसे पिता जवाब में कभी कुछ नही कहते और न ही नाराज होने का दिखावा ही प्रकट करते हैं । बस उनकी नाराजगी का परिचय वह उनकी दिनचर्या के परिवर्तन से होकर पाता है। पिता ने तीसरे पहर चाय नही ली · पिता ने शाम को सिर्फ दो रोटियां ही खाई। पिता की खुराक भी निश्चित है । जिस दिन उन्हें खाना अच्छा लगता है उस दिन भी सिर्फ तीन रोटियां लेते है और जिस दिन खाना उनके मन माफिक नही बनता तव भी सिर्फ तीन ही अलवत्ता वे नाराज न हों, नाराज होने की स्थिति मे वे अपनी नाराजगी अपनी खुराक पर ही निकालते हैं। बूढा व्यक्ति अब घास पर ही दोनों हाथो का सहारा लेकर लेट गया था और सूनी आँखो से आकाश को ताकने लगा था। वह काफी देर तक उसकी स्थिति का जायजा लेता रहा। उसे कुछ-कुछ उत्सुकता-सी हो चली थी, क्योकि बूढे व्यक्ति की यह हरकत उसे पिता से मिलती महसूम हुई । क्या सभी बूढे अपनी उम्र में एक से हो जाते है अथवा एकरूपता का ढोंग रचते हैं ? बूढा कुछ गुनगुना भी रहा था 'हरे राम "जय सीता राम की धीमी आवाज कभी-कभी उस तक आ पहुँचती थी। बूढा जैसे उसकी उपस्थिति को नजर- अन्दाज कर रहा था, क्योकि इस बीच उसने एक बार भी उसकी ओर नही १०८ : उसका खेल देखा था, अन्यथा उसको सिगरेट पीता देखकर अवश्य ही उसे उपदेश की कुनैन जबरदस्ती पिलाता । उसका जी चाहा, वह जाए और चुपचाप बगैर आहट किए उसके ठीक पीछे जा खड़ा हो। जरूर यह कुछ बड़बड़ा रहा होगा बगैर यह सोचे-समझे कि कोई उसकी बात को सुन रहा है अथवा नहीं । न जाने बड़बड़ाना ये बूढे लोग किस विद्यालय मे जाकर सीखते हैं। जरूर 'स्साला बहू-वेटो को गाली सुना रहा होगा। पिता भी तो हर समय बडबडाया करते हैं। बड़बडाना ही जैसे उनकी इस उम्र में एकमात्र पूंजी रह गई है। उसने कई वार पिता को समझाना चाहा था। लेकिन "क्या तू अब मेरे बोलने पर भी रोक लगाएगा ?" सुनकर उसे चुपचाप रह जाना पड़ता था। उसे पता था कि अव यदि उसने पिता को तनिक टोका भी तो फिर वही पुरानी स्थिति हरिद्वार के लिए पिता का विस्तरा तैयार अथवा घण्टा-भर पहले ही माला का हाथ मे आ जाना। बूढ़ा व्यक्ति अब शान्त था । सम्भवतः वह सो गया था, क्योकि उसकी जोरदार खुर्राटे उस तक पहुंच रही थी। वैसे खुर्राटों के बीच भी बूढे के मोने के विषय में वह सदा सन्देहात्मक रहता है । उसे बूढे के इतनी गर्मी मे और वीच पार्क में मोने पर गहरा आश्चर्य हुआ। जरूर स्साला मक्कड़ बनाए पड़ा होगा। जैसे ही थोडी-सी आहट होगी उठ बैठेगा। उठने के उपरान्त काफी देर तक पहले अपनी जेवें टटोलेगा और वहमी दृष्टि से कुछ क्षण अवश्य ही इधर-उधर ताकेगा। उसने कोई ऐसी हरकत करनी चाही जिससे वह बूढे की परेशानी का कुछ क्षण मजा ले सके। उसने पास पड़ी एक मोटी कंकड़ी उठाई और चाहा कि उसे तेजी से निशाना ताककर यूढे की नाक पर दे मारे-पिता की नाक कितनी तेज है । जब वह अपनी रीता फारिया (रामी) के लिए जलेबी का भरा दोना लाता है तो पिता उसके बहुत द्विपाने पर भी ताड़ जाते है..."वाह वेटा, कितने अच्छे हो तुम। अपने बूढे बाप की पमन्द की परवाह अभी तक करते हो।" और दूसरे क्षण गर्म जलेबियों का दौना पिता के हाथ में होता। वह रातभर पत्नी के चेहरे पर लटकी हुई खोज और गुस्से की लकीर की तुलना जलेबी सिर्फ एक आकाश : १०९ के रस से करता। उसने निशाना लगाना चाहा लेकिन ठहर गया। बूढे की झुकी हुई मूंछों को देखते ही उसे पिता को याद हो आई और उसने ककडी को दूसरी ओर फेंक दिया। पिता की इन मूंछो से वह कितना भय खाता है । इस भय के परिणामस्वरूप ही उसने 'क्लीनशेव्ड' रहना चालू कर दिया था कि उसके होने वाले बेटे उसकी तरह अपने पिता का भय न खाएँ । उसकी दृष्टि पुनः सोए हुए बूढे से अटक गई थी। इतनी जल्दी उन्हें क्रोध आखिर कैसे आ जाता है ? अपने पिता की सबसे बुरी बात उसे उनकी हर समय की सन्देहात्मक दृष्टि लगती है। पिता को पता नही क्यों हर समय यह शक रहता है कि वह और रामी अवश्य ही उनसे कुछ छिपाते है और हर चीज में उनको हिस्सेदार नहीं बनाते और न ही हर समस्या में उनकी राय जानने की ही कोशिश करते है । सबसे अधिक खीज तो उसे तब होती है जब पिता हर आने वाले के 'डिटेल्स' जानना चाहते है। चाहे वह कोई भी क्यों न हो। वह ऐसी स्थिति में कई बार पिता की इच्छा को टालने का प्रयत्न करता है, क्योकि वे आने वाले व्यक्ति के सामने ही अपनी सारी जिज्ञासाओं का समाधान चाहते हैं । लेकिन पिता जब पीछे पड़ जाते है तो वह धीमे से आने वाले की बात पिता को बता देता है। वैसे यह बात वह अभी तक नहीं समझ पाया कि मुखर्जी के साथ बातें करते हुए जिस पिता सुन पाने की शिकायत नही होती आखिर वहीं शिकायत ऐसे समय उसके साथ वातें करते हुए अपना सिर क्यों उठा लेती है। पिता के और अधिक आग्रह करने पर जब यह खीज के साथ तनिक जोर से आने वाले के विषय में बताता है तो पिता नाराज हो जाते हैं। "पूछा ही तो था, नहीं बताना तो न बताते, डोटता क्यों है ?" और फिर वही पुरानी प्रतिक्रिया नाराज होकर ऊपर के कमरे मे गर्मी मै तपने को चले जाना अथवा एक घण्टा पहले हो माला को हाथ में ले रामी को शाम का बाना उनके लिए न बनाने का आदेश दे पूजा के कमरे मे चले जाना। बूढ़ा व्यक्ति जाग चुका था। उसने घड़ी देवी, वह सिर्फ पच्चीस
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तंत्र कितनी अजीव वात थी, मैं आदमी था और केस मुझे जानवरों का सोपा गया था। मुझे पहली बार भ्रम हुआ कि मैं आदमी नही हूँ, मेरे चार टाँगे हैं और दो सींग। मैं खुफिया विभाग का कोई जिम्मेदार अफसर नहीं एक पालतू जानवर हूँ जो सिर्फ सिर हिला सकता है, सीग नहीं । संसद सट्टा बाजार बना था। सरकार चुप थी। विरोधी चीख रहे थे। हाथ और पैर हवा में उछलते थे। उनकी आंखें उबल रही थी। जनतन्त्र की सुरक्षा और प्रतिष्ठा का प्रश्न था। विरोधी चुप नही रह सकते थे। 'मन्त्री जी को जवाब देना होगा।' विरोधियों की नसों में लावा वह रहा था। सरकार सीधी थी, शरीफ काली गाय की तरह । वह बांझ थी और सींग मारना भूल चुकी थी। विरोधी उसके सीगों को पकड़ लटक रहे थे। बेवारी गाय। उसकी आँखों में आंसू थे। "आप धैर्य रखे । मैं इसकी पूरी जांच करवाऊँगा । पन्द्रह दिन बाद सदन को वक्तव्य दूंगा।" विरोधी शान्त हो गए थे, उन्होंने गाय को दुह लिया था। गाय शान्त थी। वह सीधी थी। यह सोंग मारना भूत चुकी थी। वह मक्कार नहीं थी । उसकी वाणी । में मैं मंत्री महोदय के सामने खड़ा था। वे फाईल में डूबे थे। उनकी आंखों में एक चमक थो। बेहद पवित्र । मुझे लगा थोड़ी देर यही स्थिति रहो तो मैं उनके चरणों मे लोटने लगूंगा।
११० : उसका सेल मिनट ही सोया था। इतनी वेफिक्री की नीद सोने पर भी उनकी आंखें इतनी जल्दी कैसे खुल जाती हैं 'जैसे अलार्म को कान पर लगाए सोए हो। वह चौंका, क्योकि बूढा उसी की ओर को चला आ रहा था। बूढा उसको देख मुसकराया। उसने भी मुस्कराने की निष्फल घेष्टा की। बूढे की झुरियां और गहरी हो गई थी..."साहबजादे क्या घर से लड़कर यहां तशरीफ लाए हो जो इतनी गर्मी में अकेले पार्क में बैठे हो ? वेटा खाली दिमाग शैतान का घर होता है।" और बूढा उपदेश देता हुआ उसकी वगल में आ बैठा था। उपदेश देता हुआ बूढा उसे ठीक पिता की ही तरह लगा जो एक बार प्रारम्भ करने के पश्चात् सहज ही उसका पीछा नहीं छोडते। वह तेजी से उठ खड़ा हुआ। इसलिए नहीं कि बूढे में अपने पिता का प्रतिरूप देखने लगा था बल्कि इसलिए क्योंकि घास अब ठंडी होने लगी थी अथवा उसे ऐमी महसूस होने लगी थी और उस स्थान पर गभिणी एवं भारी-भरकम शरीर वाली औरत के बैठने की कल्पना धमिल होने लगी थी। बूढा उसी तरह निर्विकार बैठा था-ठीक पिता की तरह।
तंत्र कितनी अजीब बात थी, मैं आदमी था और केस मुझे जानवरो का मौंपा गया था। मुझे पहली बार भ्रम हुआ कि मैं आदमी नही हूँ, मेरे चार टाँगें हैं और दो सीग। मैं खुफिया विभाग का कोई जिम्मेदार अफसर नही एक पालतू जानवर हूं जो सिर्फ सिर हिला सकता है, सीग नहीं। संमद सट्टा बाजार बना था। सरकार चुप थी। विरोधी चीख रहे थे। उनके हाथ और पर हवा में उछलते थे। उनकी आँखें उबल रही थी। जनतंत्र की सुरक्षा और प्रतिष्ठा का प्रश्न था। विरोधी चुप नहीं रह सकते थे। 'मन्त्री जी को जवाब देना होगा। विरोधियों की नसों में लावा बह रहा था। सरकार सीधी थी, शरीफ काली गाय की तरह । वह बांझ थी और सीग मारना भूल चुकी थी। विरोधी उसके सीगों को पकड़ लटक रहे थे। बेचारी गाय। उसकी आँखों में आंसू थे। "आप धैर्य रखें। मैं इसकी पूरी जांच करवाऊँगा। पन्द्रह दिन बाद सदन को वक्तव्य दूंगा।" विरोधी शान्त हो गए थे, उन्होंने गाय को दुह लिया था। गाय शान्त थी। वह मीधी थी। वह सोग मारना भूल चुकी थी। वह मक्कार नही थी। उसकी वाणी में शहद था। मैं मंत्री महोदय के सामने खड़ा था। वे फाईल में डूबे थे। उनकी मांखों में एक चमक घो। बेहद पविन । मुझे लगा थोड़ी देर यही स्थिति रही तो मैं उनके चरणों में लोटने लगूंगा। - ११२ : उसका खेल उन्होंने निगाहें सीधी को। मुसकराए, "वेठो भई । राजनीति बहुत बुरी चीज है।" "जी..." "जनता समझती है हम ऐश करते हैं। उन्हें नहीं पता कि हम हर समय अजगर के मुंह में लटके होते हैं।" उनकी आंखें और तेजी से चमकने लगी थी और आवाज आवेश मे थरथराने लगी थी। "जी. जनता बेवकूफ है।" मैंने कहा। "एकदम सीधी बात है। सबको पता है राजा साहब के लडके ने आत्म- हत्या की है किन्तु विरोधी दल इसे हत्या कहता है । मैं अच्छी तरह जनता हूँ यह सब सता हथियाने की माजिश है।" "जी "जनता ने इस बार कोई निर्णय नही दिया। निर्णय हमे करना है। विरोधी लाख सिर पटके, सरकार हमारी वनकर रहेगी। खैर छोड़ो। तुम्हे अपनी रिपोर्ट एक हफते मे देनी है। केस एक दम साफ है। राजा साहब के लडके ने आत्महत्या की है किन्तु राजा साहब हमारी पार्टी के हैं इसलिए विरोधी दल उनके खिलाफ अफवाहें फैला रहा है ताकि हमारी सरकार वदनाम हो जाए। राज्य मे दंगे फैल जाएं। गोलियां चलें, लाठियां पटके, कपy लगे और।" वे बोलते जा रहे थे। मैं चुपचाप सुन रहा था। उनका चेहरा आवेश में तमतमा रहा था। "समझ गए सब ? रिपोर्ट गुप्त रहनी चाहिए।" "जी" मैंने कहा। वे फिर उसी तरह फाइलों मे डूब गए थे। मैं खुफिया विभाग का एजेण्ट हूँ। राजनीति नहीं समझता । राजनीति बड़े लोगो की चीज है। मुझ जैसे माधारण ऐजेण्ट की नहीं। मुझे राजा साहब के लड़के की मृत्यु की जांच करनी पी। बस इतना ही । मुझे विश्वास था मन्त्री महोदय मच कहते हैं । उन जैसा दिव्य व्यक्ति कभी झूठ नहीं बोत
तंत्र : ११३
सकता। कभी नहीं।
मुझे आश्चर्य हुआ कि इतने शानदार, आलिशान ड्राइंग रूम के इस
गिद्ध को किसने आने दिया? गिद्ध सोफे के बीचोंबीच बैठा था। उसके
आगे शंभेन रखी थी जिसे वह चोंच डालकर डकार रहा था। उसकी आंखें
लाल नही थी, उनमे आग दहक रही थी।
मुझे देखते ही उसने पंख फड़फडाए । मैं कांप गया। मुझे लगा, अभी
इमकी चोंच मेरे पेट मे उतर जाएगी।
"तो तुम हो।" गिद्ध को चोंच फिर शम्पेन में डूब गई थी।
"जी..."
"पीयो।" चोंच उसी तरह डूबी थी।
"जी...। मैं नहीं पिया करता।"
मैं बड़ी पवित्र भावना से गिद्ध का मुआयना कर रहा था। बेहद आश्चर्य
हुआ इस वेडोल आकृति को पंखों ने किस तरह ढक रखा है। गिद्ध का पेट
भारी-भरकम था। पंख उसे ढक पाने असमर्थ थे।
"तुम आदमी नही हो।"
"जी..."
"अच्छा बैठ जाओ।"
गिद्ध मुसकराया था। उसने तेजी से पख फड़फडाए । गले से एक
महीन आवाज निकाली-मुझे लगा वह धीमी-धीमी आवाज में सीटी
बजा रहा है।
"केस एकदम साफ है।"
"जी""
"कुछ ममझे?"
......."
"बिलकुल साफ। राजा साहब ने खुद अपने लड़के को गोली से मारकर
फिकवा दिया है।" गिद्ध ने होठ सिकोडे । मैं सोच रहा था और चकित था
११४ : उसका खेल कि वह आदमी की आवाज कैसे बोल रहा है। "वह प्रजातन्त्र का सच्चा सेवक था। हमारा साथी था। राजा यह नहीं सह सकते थे। वह पक्का झूठा है । मक्कार । कमीना कही का । वेटे तक को नहीं छोड़ा।" "......" "समझे?" "जी..." "तुम्हें रिपोर्ट में साफ-साफ लिखना है कि राजनीति ने बाप के हाथों बेटे का वध करवा दिया। राजा साहब भ्रष्ट हैं। उनकी पार्टी भ्रष्ट है।" गिद्ध हांफने लगा था। उसकी चोंच फिर शैम्पेन मे डूब गई थी। में कुछ कहना चाहता था किन्तु लगा गले मे अकाल पड़ गया है। बड़ी- बड़ी दरारें, उसमे फंसे हुए नागफनी के जहरीले काटे । गिद्ध की आँखें लाल होने लगी थी। मुझे उनसे दहशत हुई थी। "सब स्माले अहसान-फरामोश हैं। मैंने जनता के लिए कितने बड़े-बड़े बलिदान किए, कितनी बार जेल गया, कितना कुछ किया किन्तु एक- एक को भुगत लूंगा। राजा साहब लाख सिर पटके, उनको सरकार नहीं बनने दूंगा। वे क्या समझते हैं ? सारा प्रान्त मेरे पीछे है।" गिद्ध ने एक तेजी से सिसकारी भरी थी। शायद उसके होठ सूखने लगे थे। उसकी चोंच पर खून चिपका था। मैं आश्चर्यचकित था कि यह पून यहाँ कैसे आ गया? "तुम्हें पता है स्वतन्त्रता की लड़ाई में मैंने कितने बडे-बड़े वलिदान किए हैं ? अपने बलिदानों और महान त्यागो के विरुद्ध मैंने सिर्फ दो बार प्रान्त मे अपनी मरकार बनाई है।" "......" "अब तुम जा सकते हो।" "जी. "मैं कुछ पूछना!" मुझे लगा मेरा खून तेजी से ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर दौड़ने लगा है। "तुम्हें वही रिपोर्ट तैयार करनी है जो मैंने कहा है।" .
तंत्र : ११५ ......." "समझे?" गिद्ध की चोच फिर शैम्पेन में डूब गई थी। मैंने अपनी आँखों को वार-वार मला । मुझे लगा कि मैं पागल हो गया हूँ अथवा मृत्युपरान्त किसी अजनवी लोक मे जा फैमा हूँ। मुझे देर तक अपने अस्तित्व पर विश्वास नहीं हुआ। सचमुच मैं मृत्यु को प्राप्त हो चुका हूँ। मैं आदमी की योनि में नहीं रहा हूँ। मैं जानवर बन गया हूँ। मैंने अपने को पह्वानने की कोशिश की। देर तक अपना नामकरण नहीं कर पाया। मैंने अपनी आंखों को एक बार फिर मला । क्या मैं उसी स्थान पर हूँ? किन्तु वहाँ में तो मैं चला आया था फिर यह गिद्ध। मैं देर तक अपने सामने बैठे गिद्ध को देखता रहा। वह मुसकरा रहा था, उसकी गरदन हिल रही थी। शायद वह कोई गाना गा रहा था अथवा मुझे ऐसा लग रहा था। "तो राजधानी से मन्त्रीजी ने तुम्हे भेजा है।" मैं आश्चर्यचकित रह गया। आवाज भी बिलकुल वही थी। किन्तु नही यह वह नही हो सकता। वहां से तो मैं चला आया था कोई और धोखा हुआ है । मैं देर तक उसे देखता रहा, कोई सूत्र तलाशता रहा था जिसमे मैं कुछ भेद उत्पन्न कर सकू। "यह सब विरोधी पक्ष की साजिश है और कुछ नही। मुझे बदनाम करना चाहते हैं । जनता की नजरों से गिराना चाहते हैं किन्तु उन्हे भी छटी का दूध याद दिला दूंगा। उन्हें पता नही वास्तविक सत्ता हमारे ही हाथ में है। एक-एक को पानी पिला दूंगा।" बिलकुल वही आवाज । वही क्रियाएँ । उलझन में पड़ा रहा। मुझे लगा, में तेजी से अन्धा होता जा रहा हूँ। वह गिद्ध यहीं नहीं आ मकता। वह वही पंख फडफड़ा रहा होगा। चोंच से सीटियां निकाल रहा होगा यह वह कदापि नहीं हो सकता, कभी नही । -
११६ : उसका खेल
"अपने लड़के को मैं नही जानूंगा तो और कौन जानेगा? वह किसी
लड़की को चाहता था । लडकी की शादी दूसरी जगह हो गई। बेचारा
सहन नहीं कर सका । गोली चलाकर अपना खात्मा कर लिया । वह सच्चा
क्षत्रिय नही था।"
ओह ! तो मेरा सन्देह विलकुल ठीक था। यह वह गिद्ध नहीं था।
इसका रग उससे थोड़ा मटमैला था। इसके पख उससे थोड़े बड़े हैं । चोच
पहले से कही बड़ी और तेज है। वह सीटियां बजाता था यह हारमोनियम
बजाता है।
"मामला एकदम साफ है । तुम्हे अपनी रिपोर्ट में सच्ची बात दिखानी
है। मेरे लड़के ने प्रेम में निराश होकर आत्महत्या की है।"
हारमोनियम तेजी से बजने लगा था।
"कुछ समझे?"
"जी"
"तुम सरकार के सेवक हो।"
"जी..."
"सरकार हमारी है।"
"जी..."
"तो तुम हमारे सेवक हुए।"
"जी..."
"तो ठीक है। तुम समझदार हो। रिपोर्ट मन्त्रीजी को एकदम भेज
दो।"
"जी"। जी'.", मैं कुछ"।"
"क्यो अपना समय खराव करते हो। कल ही वापस लौट जाओ।
जैसा मैंने कहा है वैसा करना है।"
"जी..."
"तुम ईमानदार हो। मैं मन्त्रीजी को तुम्हारे विषय में लियूंगा।"
"जी "मैं...।" मुझे लगा मेरे गले में रेगिस्तान के बडे-बड़े पहाड़
.
तंत्र : ११७
उगने लगे हैं।
"अब तुम जा सकते हो। मैं वेहद उलझन में फंसा हूँ । सरकार निर्माण
का महत्त्वपूर्ण मामला है। रात को नीद तक नहीं आती।"
"जी.."
"अब तुम जाओ। मैं मन्त्रीजी को एक खत लिख दूंगा।"
मैं तेजी से भाग रहा था। पहले मेरे दो टांगें थी अब चार थी। मेरी
गति तेज हो रही थी। मैं हांफ रहा था। मुझे लग रहा था कि प्रेतों का एक
विशाल समूह मेरा पीछा कर रहा है ।
"तुम आदमी नहीं हो।"
मैं दहशत से खड़ा हो गया।
"तुम कुत्ते हो।"
कोई आवाज तेजी से चीखी। मैंने अपने पीछे हाथ फेरा । मैं सचमुच
कुत्ता था। मेरी दुम दहशत से पीठ से चिपक गई थी।
"तुम जलील हो। तुम देशद्रोही हो।"
मैं चकित था। मेरे चारों ओर गहरा सन्नाटा था, किन्तु आवाज गूंज
रही थी। मैं तेजी मे चारो ओर घूमनै लगा किन्तु कहीं कोई नहीं था।
"तुम्हे पता है राजा साहब ने अपने लड़के को स्वयं गोली से उड़ाया
है क्योंकि वह उनके कुछ भेद जान गया था। इसके तुम्हारे पास पूरे प्रमाण
भी हैं।"
मैं चकित था। तेजी से चारों ओर घूम रहा था । आवाज कहाँ से आ
रही है । कही कोई नहीं था। एकदम घोर सन्नाटा।
"तुम मर चुके हो, तुम"।"
"हाँ मैं मर गया हूँ। मैं आदमी नही हूँ। मैं जानवर हूँ। मैं कुत्ता
हूँ।" मैं तेजी से चीखने लगा था।
मैंने आवाज को पकड़ लिया था। आवाज मेरे पेट से निकल रही थी।
११८
उसका खेल
।
मैंने अपने पजे पेट में गड़ा दिए। मैं पेट को चीर देना चाहता था । आवाज
का गला घोट देना चाहता था किन्तु आवाज कि चुप नहीं हो रही थी।
मैं थक चुका था। मेरे पजे शिथिल पड़ गए थे। मेरी कमर चिपक गई
थी किन्तु मैं जीवित था। पेट चिरा नही था। आवाज उसी तरह चीख
रही थी।
...मैं फिर तेजी से भाग रहा था। मेरे भागने का रुख अव विरुद्ध
दिशा मे था । मेरी आँखें उबल रही थी।
"तुम हत्यारे हो।" मैं तेजी से चोखा। मुझे अपनी आवाज पर खुद
विश्वास नहीं हुआ। क्या मैं फिर बदलने लगा हूँ ?
गिद्ध की निगाहे आश्चर्यचकित थी। उसकी चोच का हिलना, पंखों
का फड़फड़ाना एकदम एक गया था।
"तुमने भांग पी है।"
"तुमने अपने लडके की हत्या की है।"
"तुम नशे मे हो।"
"तुम हत्यारे हो।"
"तुम गधे हो।"
"मैं अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ लिख दूंगा।"
"तुम भूखे मर जाओगे। तुम्हे शमशान में फिकवा दिया जाएगा।
तुम्हारी लाश गीदड खाएँगे । तुम्हारा पूरा परिवार अँधेरी खाइयों मे फेंक
दिया जाएगा।"
मुझे लगा मेरी आवाज एकदम बन्द हो गई है। पेट में कोई आवाज
नहीं रेंग रही थी। गिद्ध उसी तरह मुस्करा रहा था । उसकी चोच में खून
के कतरे चिपके थे।
"मैं झूठ नहीं बोलूंगा।"
"मत बोलो। तुम पागल हो।"
"मैं मन्त्री 'बी' को अपनी रिपोर्ट दूंगा।"
तंत्र : ११९
"मन्त्रीजी तुम्हें जेलों में फिकवा देंगे।"
"ऐसा नहीं हो सकता। मैं सत्य पर खड़ा हूँ। सच्चाई माननी ही
होगी।"
"सच्चाई कभी की मर चुकी है।"
"लोकतन्त्र अभी जिन्दा है।"
"सच । मुझे उसके दर्शन करवाओगे?" गिद्ध तेजी से उठकर मेरी
बगल में आ गया था।
"मैं क्या करूं?"
"जो मैं कहता हूँ।" गिद्ध मुस्कराया।
"जी...।"
"मेरे लड़के ने आत्महत्या की है।"
"जी..."
"तुम समझदार हो।"
"जी..."
"इधर देखो..."
मैंने दृष्टि घुमाई। गिद्ध के पंजों में एक थैली लटकी थी। जिसमें
नीले नोट चमक रहे थे । मेरी आँखों की चमक तेजी से बुझने लगी।
"ये तुम्हारे हैं।"
"मुझे इनकी आवश्यकता नहीं है।"
"तुम्हारे बच्चो को है।"
"नहीं"। वे खून नहीं पी सकते।"
"तुम फिर बहकने लगे हो।"
"मुझे बहकने की आदत है।"
मैं तेजी से फिर भागने लगा था। मैं चारों ओर से गिर गया था।
शायद एलिस की तरह मैं किसी आश्चर्य लोक में जा फैसा था। मेरे सामने
गिद्ध ही गिद्ध थे । इस बार मटमैला नहीं सफेद गिर मिराको पोम .
१२० : उसका खेल
में डूबी थी। जिसके पंख फड़फडा रहे थे। जो धीमी-धीमी सीटियों निकाल
रहा था।
"आपकी बात ठीक है।"
गिद्ध मुसकराया, "नही 'मेरी बात गलत है।"
"राजा साहब ने अपने लड़के की हत्या की है।"
"नही. 'तुम्हें भ्रम हुआ है। बाप लड़के को नहीं मार सकता।"
"आप ही ने तो बताया था कि राजा साहब!"
"वह राजनीति थी।"
"किन्तु मेरे पास प्रमाण हैं।"
"वे झूठे है।"
"नही उनमे सच्चाई है।"
"उन्हें फूंक दो।"
"मैं ऐसा नहीं कर सकता।"
मैं डर गया था। मेरे चारों ओर प्रेतों का विशाल समूह मंडराने लगा
या। गिद्ध का फड फडाना रुक गया था। उसके हाथ मे एक गिलास था।
उसने मेरी ओर उसे बढ़ा दिया।
"इसे पी जाओ!"
"यह क्या है ?"
"मलाईदार दूध है ।"
"मैं नही पीता।"
"तुम्हे पीना होगा।"
"मैं नही पी सकता।"
"तुम्हे पीना होगा क्योकि तुम्हें जीवित नही रहना है। तुम हमारे
लिए खतरनाक हो।" मेरी आँखें दहशत से सिकुड़ने लगी थी। दुम एकदम
पीठ से सट गई थी। टांगें लडखड़ाने लगी थी। गिद्ध ने अपना हाथ थोड़ा
और आगे बढ़ा दिया।
"इसे पी जाओ। वड़ा जायकेदार है।"
तंत्र: १२१
।
"इसमें क्या है ?"
"जहर । तुम्हे एकदम मुक्ति मिल जाएगी।"
"मैं जहर नहीं पी सकता।"
"तुम्हें पीना होगा।"
"मैं मरना नहीं चाहता।"
"तुम जिन्दा नहीं रह सकते हो।"
"मैंने आपकी बात मानी है। मैं रिपोर्ट दूंगा कि राजा साहब ने अपने
लड़के की हत्या की है।"
"मैं ऐसा नही चाहता।"
"आप ही ने तो ऐसी इच्छा प्रकट की थी।"
"तुम नादान हो । राजनीति नही जानते।"
"राजनीति ?"
"राजनीति बच्चों का खेल नहीं है।"
"इसे पी जाओ।"
गिद्ध की आवाज कठोर हो गई थी।
मैं इसे नही पी सकता था क्योकि मैं अभी मरना नही चाहता था।
तेजी से भाग चला था। मेरी जीभ बाहर निकल गई थी और आँखें बाहर
निकलने लगी थी। मुंह से तेजी से खून बह रहा था। चारों तरफ खून के
बड़े-बड़े कतरे।
मैं चारों दिशाओ में भाग रहा था। मेरे लिए कोई सुरक्षित स्थान नही
था। मैं ठिठक गया था। मेरे सामने दो गिद्ध एक साथ बैठे थे । मेरे से
पहचानने में कोई भूल नहीं हुई । एक का रंग सफेद था, दूसरे का मटमला।
एक को चोंच शैम्पेन मे डूबी थी और सीटियां बजा रही थी । दूसरा
हारमोनियम के स्वर निकाल रहा था।
वे मुझे देख मुस्कराए।
"तुम अभी जिन्दा हो।" एक ने कहा।
"तुम्हें मर जाना चाहिए था।" दूसरे ने कहा ।
१२२ : उसका गेस
मैं चुप रहा। आरगपं में दुनिया सगा रहा पाकि राहु-बेतु एक
साप से बैठे है ?
"आपग परस्पर दुग्मनी है।"
"यह राजनीति है।"
"राजनीति मया होती है ?"
"तुम रो नहीं समा सकते।"
"मैं इसे सोयना पाहता हूं।"
वे दोनों मुस्कराए।
"जानते हो, राज्य में इससे पहले रिमकी सरकार पी?"
"राजा माहब की।"
"उससे पहले।"
"आपकी।"
"कुन्दकपुर में एक सहकारी मिल योला गया है दस करोड़ की लागत
से । पता है ?"
"जी..."
"उसके आधे-आधे साझेदार हम दोनों हैं।"
दोनो गिद्ध एक-दूसरे को देख मुस्कराए।
"सरकार किसी की भी बने-हमारी या राजा साहब की। लाभ हम
दोनों की जेब में आएगा । आएगा कि नही ।" सफेद गिद्ध बोला।
"जी...।" मैं थोड़ा-थोड़ा अपने ज्ञान का विस्तार पा रहा था।
"सरकार किसीकी भी हो । वात एक ही है । है कि नहीं ?"
"जी..."
मैं अभी उलझन मे था, "फिर परस्पर यह विरोध क्यो?"
"तुम नही समझोगे । यही तो राजनीति है।"
उन्होने एक-दूसरे की चोच मे चोंच डाल दी। उन पर मस्ती छा रही
थी।
"कुछ समझे ?"
तन्न : १२३
"जी..."
"अव भी रिपोर्ट उसी तरह नही दोगे जैसा हम कहते हैं ?"
"नही..."
"तुम पागल हो।" सफेद गिद्ध वोला।
"तुम्हें मर जाना चाहिए।" यह मटमला गिद्ध था।
राजनीति का भूत मेरे मस्तिष्क में छाता जा रहा था।
मैं मंत्री महोदय के सामने खड़ा था।
वे फाइलों मे डूबे थे। उनके चेहरे पर वही पवित्न मुस्कान थी। मैंने
उनके सामने अपनी रिपोर्ट रख दी।
मैं दहशत से भर गया। उनके चेहरे की पवित्र मुस्कान राख में बदल
चुकी थी। बुझी हुई राख नहीं दहकते हुए अगारों भरी।
"हमने तुमसे कुछ कहा था।"
"जी"
"यह रिपोर्ट गलत है।"
"जी... मेरे पास प्रमाण है।"
"उनमे आग लगा दो।"
"यह हत्या होगी।"
"वह पहले से मरा पड़ा है।"
"शायद तुम काम करते-करते थक चुके हो। तुम्हें अब आराम की
आवश्यकता है।"
“जी । जी''नही । मै एकदम ठीक हूं।"
"नही तुम थक चुके हो। तुम पागल हो । तुम्हे आराम करना
चाहिए।"
"जी..."
"मैं ठीक कह रहा हूँ ?"
"जी..."
१२४ : उसका खेल "तुम अभी त्यागपत्र लिख दो।" "जी.. मैं..." "तुम थक चुके हो। तुम अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर सकते। तुम कार्यभार से मुक्त होना चाहते हो।" "जी..।" "तुम जा सकते हो।" मैं एकदम पत्थर हो गया था। मंत्रीजी फिर फाइलों में डूब गए थे। मंत्री महोदय ससद मे वक्तव्य दे रहे हैं-"हमारी जांच पूरी हो चुकी है । राजा साहब एकदम दोषमुक्त हैं...' विरोधी शोर मचा रहे हैं। "जनहित में हम रिपोर्ट प्रकाशित नही कर सकते। यह राष्ट्र का प्रश्न है।" मत्रीजी कह रहे हैं। "विरोधी चुप हैं क्योंकि यह राष्ट्र का प्रश्न है और वे सभी राष्ट्र- भक्त और प्रजापालक है।" मैं दर्शकदीर्घा मे बैठा सिर्फ ऊँघ रहा हूँ।
सहभागी मौसम के एक रस होने के साथ-साथ हम सभी वैसी ही क्रियाएँ कर रहे थे जैसे कि वे। पहले हम पाइथागोरस की शक्ल में वहां उपस्थित थे, किन्तु उनके आते ही उन्हें व्यास मानकर तुरंत अर्द्धवृत्ताकार मे स्थानान्तरित हो गए। हमारे और उनके कपड़ी का रंग और उनका शेप सभी कुछ समानधर्मा था। फर्क सिर्फ इतना था उनकी उँगलियों की झिरियों मे सिगार फंसा था जबकि हम सभी सिगरेट का धुआं उडा रहे थे। सिगरेटें हमारी नहीं थी। उनके यहाँ आते वक्त हमे अपने साथ सस्ती सिगरेटें लाना काफी अशोभनीय और उनकी शान के विरुद्ध लगता था। हमारे बैठते ही वे हमारे सामने 'रोथसन' के तीन-चार पैकेट लाकर रख देते। इन्हें हम पूर्ण आधिपत्य और लापरवाही के साथ फूंक सकते थे। वे सिर्फ मुस्कराते थे खुलकर नही, बेहद शालीनतापूर्वक । हमने उन्हें इस लम्बे अरसे में एक बार भी खुलकर कमरे को गुंजाते हुए अट्टाहास लगाते नहीं देखा था। हममें से कुछ फूहड किस्म के थे । यह उनका दोप नही था। दरअसल पिछले दिनो के सस्कार उन पर हावी थे जिनसे वे एकदम मुक्ति नही पा सकते थे। उन्हे मुस्कराने, हँसने और अट्टाहास लगाने का भेद नहीं मालूम था । और अकसर उनसे गलती हो जाती। उनकी इस असभ्य त्रुटि और अशोभनीय आचरण को हममें से ही कोई पकड़ता और उनकी तरफ सकेत करते हुए उसे सावधान किया जाता। यद्यपि उनका चेहरा इन १२६ : उसका खेल स्थितियो के बीच भी विलकुल भावहीन और असम्पृक्त रहता, किन्तु हम एक अपराध भावना से घिर उठते । यह उनकी महानता थी, नहीं तो हम उनके सामने किस खेत की मूली थे। हमारी बड़ी से बड़ी गलती भी उनके चेहरे पर एक शिकन तक नही डालती थी। सचमुच वे अकाल पुरुप थे। वे शहर के सबसे अधिक नामी-गिरामी आदमी थे। उनके पूर्वजों के विषय मे बहुत-सी दंतकथाएँ प्रचलित थी। इन दतकथाओं का केन्द्रबिंदु चाहे उनको विलासिता, दानशीलता, वीरता, ऐश्वयं अथवा क्रूरतापूर्ण कारनामे रहे हो किन्तु उनको कहने और सुनाने का ढंग काफी महिमापूर्ण और गौरवमय होता। उनके पूर्वजों का सबंध राजवंश से रहा था और उनके पितामह राजदरबार में दीवान रहे थे जिनकी विशाल हवेली के बाहर दो हाथी झूमा करते थे-उनका वैभवशाली चरित्र अकसर हमारे बीच चर्चा का विषय बना रहता। किस प्रकार दूर-दूर के गांवो से वे अपने लठतो के बल पर कुंआरी कन्याओं को उठा मंगवा लेते थे और अपने रास्ते मे वाधक बनने वालो को मौत के घाट उतार डालते थे। किस प्रकार एक अहीर की विवाहिता लड़की को पाने के लिए उन्होने पूरी की पूरी बस्ती को आग लगवा दी थी। तवायफ लालबाई के एक मुजरे पर खुश होकर किस प्रकार नहर वाली कोठी उसके नाम कर दी थी-ऐसे वक्त हमारे चेहरे गर्व से तमतमा उठते, खून का प्रवाह अधिक तेजी पकड़ लेता और शरीर के पोर-पोर मे पारे-सा कुछ फिसलने लगता । हमारी आंखों में उनके लिए अबूझ श्रद्धा के भाव उतराने लगते । हमे अफोस होता -काश! हम भी उन्हें देख पाते। वे हमारे प्रेरणा पुरुष बन चुके थे। उनकी आकृति अपने सम्पूर्ण पौरुष के साथ हमारे लिए नितांत अपरिचित होते हुए भी हमारे सामने आत्मीय बन चुकी थी। इन्ही दंतकथाओ से प्रेरित और उत्साहित होकर उनके सम्पर्क में आने की हमारी उत्कट लालसा विकसित हुई थी। उनके अन्तिम दायरे में हमारा प्रवेश यकायक नहीं हुआ था। धीरे-धीरे कई वृत्ताकार दायरों को पार करते हुए हम उनके उस निकटतम विदु तक जा पहुंचे थे जहाँ सहभागी : १२७ उनका कुछ भी अपना नहीं रह गया था। उनका रोम-रोम तक हमारा अपना बन चुका था। हम उनके गुप्तांगों तक के निशानो को पहचान सकते थे। हमें अच्छी तरह स्मरण है, पहले दिन उन्होने गेट के पास से ही हमे सिर्फ एक मुस्काहट प्रदान कर वापस कर दिया था। उस दिन हम उन्हें गालियां देते हुए लौटे थे, बावजूद इसके कि एक ज्वाला हमे प्रज्वलित किये हुए थी। उनके निकट पहुँचने की हमारी लालसा और अधिक प्रबल हो उठी थी। दूसरी बार हमारे कदम उनके लॉन तक पहुँच गए थे और तीसरी वार उनके बरामदे तक, जहां उन्होंने पहली बार हमे कीमती सिगरेट दी थी और शानदार टी सैट में चाय पिलाई थी । हमारी जुबान पर अब सिर्फ उनका ही नाम था। उनकी उदारता, महानता और ऐश्वर्य के चर्चे हम सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रख सकते थे। बहुत शीघ्र ही उनके तिलस्मी रहस्यों से उनके महल, उनके खानपान और उनकी क्रीड़ाओ से परिचित हो गए थे। हम सभी उनकी निगाहों मे यकायक बेहद महत्त्वपूर्ण हो गए थे। उनका संसर्ग जो अन्यो के लिए दुर्लभ था हमारे लिए सहजप्राय था। वे शहर की अनेक महत्त्वपूर्ण संस्थाओं के प्रधान थे । अकसर अब हम एक लम्बी-चौड़ी भीड से घिरे रहते। हम उन्हें समझाते कि हमारी 'एप्रोच' उन तक सभव नहीं है किन्तु वे समझने को तैयार नहीं थे। 'नही साहब'', आपकी बात को भला वे कैसे टाल सकते हैं। हमारा काम तो आपको करना ही होगा। शुरूआत में हमे काफी परेशानी हुई और हमें लगा जसे हमें किसी अश्लील स्थिति में डाल दिया गया है । लेकिन बहुत शीघ्र ही हम इसके अच्छे-खासे अभ्यस्त हो गए। हमें अपने महत्त्वपूर्ण होने का अहसास होने लगा था। छानो की फीस माफी से लेकर स्कूल अथवा धर्मशाला में चपरासी की नियुक्ति तक के अभिलापी हमारे इर्द-गिर्द चक्कर काटते रहते । अचानक हमारे इतने महत्त्वपूर्ण हो जाने से कुछ लोगों की निद्रा भंग हुई। ये वे लोग थे जिन्हें हमारी जडों पर कुल्हाड़ी चलाने के सिवाय और कुछ काम नहीं था। ये रात-दिन मिर्फ हमारी निंदा १२८ : उसका खेल में लीन रहते । ये कुंठित लोग थे और हमारी उन्नति से डाह रखते थे। इनकी हमें कोई परवाह नही थी। इनका काम सिर्फ भौंकते रहना था। भौंकने वालों की कौन परवाह करता है ? उन्होंने चारों तरफ हमारे लिए 'उनके खरीदे हुए टटू' का स्लोगन उगल दिया था। हमारी जितने भी प्रकार से निदा वे कर सकते थे करने में मशगूल हो गए। सिवाय हवा खराव करने के वे हमारा क्या बिगाड़ सकते थे? वे हारे हुए कुंठित लोग थे जिन्हें इसके अतिरिक्त कुछ सूझ भी नहीं सकता था। वे भला हमारा. क्या बिगाड़ सकते थे, वे हारे-थके लोग थे, जिन्हे इसके अतिरिक्त कुछ मूझ भी नहीं सकता था । वे भला हमारे सिवाय मानसिक रूप से थोड़ा चिन्तित करने के, क्या नष्ट कर सकते थे। उन्हें क्या पता था जिसे वे हमारा 'चरण दंबाना' कहते थे उसे हम अपने वीच 'ऊँगली करना' कहते थे। क्या हम चापलूस थे ? क्या हमने कभी उनकी झूठी प्रशंसा की थी? क्या हमने कभी उनसे अपमान के वोल सहे थे ? क्या हमने उनसे अपने लिए किसी चीज की मांग की थी? हम उनसे किन बातो मे कम थे ?... किन्तु इन सबके विषय मे इन ईर्ष्यालु लोगों की भीड़ को बतलाने का कोई अर्थ नहीं था। इससे हमें और उन्हें किसीको कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था। धीरे- धीरे हमने उनकी उपेक्षा प्रारम्भ कर दी और बहुत शीघ्र ही उनकी गलीच हरकतों, वातो और क्रियाओं से अपने-आपको मुक्त कर लिया। वे भी यक- हफिकर चुपचाप अपनी-अपनी खोह में सिमट गए। उनके सम्पर्क में आने वाले प्राय: सभी पुरुष और महिलाओं का उनके विषय में दृढ मत था कि वे बेहद सुसंस्कृत, सभ्य और शालीन हैं। इसकी चर्चा अंकसर हम उनके सामने करते। हमारी इस धारणा का निर्माण उनके प्रति हमारे अटूट विश्वास के कारण हुआ था। हम उनके सच्चे हितैषी और अंतरंग मित्र थे, अत. उनके चरित्न की विशिष्टताओ और उनके व्यक्तित्व की मौलिकता से स्वयं उन्हें परिचित न कराना हमारी दृष्टि में उनके प्रति विश्वामयात होता। हम विश्वासघाती नहीं थे। ऐसे यक्त जबकि हम उनको घर्षा मे लीन होते और वे हमारे सामने बैठे होते सहभागी : १२९ हम हवा में हाथ फैलाते हुए अपनी आवाज एक दूसरे की आवाज को दवाने की कोशिश करते। पूरा शहर हमारी मंडली को 'विभिन्न शरीर एक प्राण' के नाम से पुकारता था, किन्तु ऐसे वक्त हममें प्रतिद्वद्विता का भाव जागृत हो उठता। हम एक-दूसरे की वात का प्रतिवाद करते हुए, उनकी तरफ लगातार देखते हुए अपने प्रतिद्वद्वी को हेय दृष्टि की दुधारू तलवार से.चीरते-फाडते ।" यह सब बेहद अल्पकालीन होता । उनके सामने से हटते ही अथवा अपने कदमों को उनके कमरे से बाहर निकालते ही हम फिर 'विभिन्न शाखाओं वाला एक वृक्ष' मे परिवर्तित हो जाते। अचानक हमे लगा सब कुछ बेहद फीका-फीका-सा चल रहा है। हमारे और उनके मम्बन्धों के बीच भी जैसे एक जड़ता और ठडापन गहराता जा रहा है । कई वार उनके सामने बैठे हुए हमें लगता कि वे मिर्फ हाँ."हूँ कहते चले जा रहे हैं । उन्हे हमारी बातो मे कोई दिलचस्पी नहीं है। हम सिर्फ रबड़ की तरह फालतू बातो को खीचते ले जा रहे हैं जिनके प्रति वे पूर्णतया उदासीन हैं। हमें इसका बहुत शीघ्र अहसास हो गया और कुछ नहीं उन पर ऊब, उकताहट और बोरियत ने आक्रमण कर दिया है। वे हमसे इसी कारण खिचे-खिचे से रहने लगे हैं। हमारे आने पर अब उनके चेहरे पर पहले की तरह ताजगो, मुलामीयत और मुस्कराहट नही थिरकती, जैसे वे सिर्फ मान एक औपचारिकता का निर्वाह कर रहे हैं। यह एक खतरनाक और चिंतित कर देने वाली स्थिति श्री जिसने हमें तुरन्त सजग और जागरूक बना दिया। कहीं भी कुछ भी विशेष उत्तेजका नही घट रहा था। उनकी चापलूसी का रंग भी फीका पड़ने लगा था। हमारे पास रोमांचकारी और दिलचस्प घटनाओं के कोप रीतने लगे थे। अकसर वे अब बीच महफिल में ही जमुहाई लेने लगते । हम उनके स्वास्थ्यः के प्रति चिता प्रकट करते और उनके सामने वैद्य और हकीमों के अचूक नुस्खे बयान करते किन्तु वे 'नहीं. ऐसा कुछ भी नहीं है' कहकर हमारे सारे हथियारों को निष्फल कर देते ।
१३० : उसका खेल इन सब बदली हुई परिस्थितियों से हम अन्दर तक दल गए । हम उनके शुभचिंतक और सहभागी थे और अपनी सम्पूर्ण आस्था और हृदय की आंतरिक श्रद्धा के साथ हमने हर बीहड़, दुर्गम, पथरीले जंजाल-भरे मार्गों पर उनका साथ देने का वचन लिया था। इतना होते हुए फिर क्या हम उन्हें दुखी और उदास देख सकते थे ? हमने बहुत शीघ्र ही इस विकट पहेली का समाधान ढूंढ निकाला। हममे से यह श्रेय किसको प्राप्त होना चाहिए, इसके विषय मे मतभेद हो सकता है, क्योकि ऐसे वक्त हम सभी महत्त्वपूर्ण हो उठते थे। किन्तु यह सुझाव हममे से ही किसी एक का था, इतना निश्चित था। विधान सभा के चुनाव बेहद शीघ्र होने जा रहे थे। हमे पूर्ण विश्वास था कि हमे उनसे अच्छा उम्मीदवार नहीं मिल सकता था। पूरे शहर में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण और चर्चित के साथ-साथ हमारे प्रति उनका फिर दिलचस्पी लेने का इससे बढिया कोई हल नही हो सकता था। हमने धीरे-धीरे राजनीति में उनकी रुचि जाग्नत करनी प्रारम्भ कर दी। "आप निश्चित रूप से इस क्षेत्र से विजयी होगे । आपको हराने वाला कोई नही है। सिर्फ आपके निर्णय लेने की देर है।" "आप सब कुछ हम पर छोड़ दीजिए, देखिए कुछ ही दिनो मे हवा में भी सिर्फ आपका नाम गूंजेगा।" "पूरा शहर आपके पीछे है । यह अवसर फिर कभी हाथ नही आएगा। सिर्फ विधायक ही नहीं, संविद मंत्रिमंडल मे भी आपका लिया जाना एकदम निश्चित है।" हममे से कोई एक विरोध करता, "सविद क्यों ?.."इंदिरा गांधी की हवा चारों तरफ है, टिकट नई काग्रेस का ही लेना होगा।" वे चुपचाप धीरे से सिर्फ इतना कहते, "यह सब वाद की बात है। सबसे पहले चुनाव में खड़े होने का निर्णय लेना है।" हम सब बेहद प्रसन्न । इतना निश्चित था कि उनकी उस उदासीनता की चट्टान में, जिसमें पिछले कुछ दिनो से उनके बन्दर हलचल करनी सहभागी : १३१ प्रारम्भ कर दी थी, दरारें पड़ने लगी थी। उन्होंने शहर की गतिविधियां, चुनाव में खड़े होने वाले सम्भावित नामो और जनता के रुख में दिलचस्पी लेना प्रारम्भ कर दिया था। राजनीति का तक्षक अपने मूक्ष्माकार में उनके मस्तिष्क में प्रवेश कर गया था। वे अब हर वक्त उसके दश से ग्रस्त रहते। "आप सब जब इतना दवाव डाल ही रहे हैं तो सोचता हूँ, आपके निर्देशों की अवहेलना मुझसे नहीं होगी। मैंने सब कुछ आपके ऊपर छोड दिया है।" उन्होंने एक दिन धमाका कर ही दिया जिसकी हम प्रतीक्षा कर रहे थे और जिसकी भूमिका का निर्माण हम बहुत पहले कर चुके थे । हमने बड़े जोर-शोर से अपने दोनों हाथों में उनका झडा ग्रहण कर लिया । आपसी मतभेदो के वावजूद हमने उनका निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे ही चुनाव लड़ना उचित और जरूरी समझा । चुनाव के बाद हम किसी भी पार्टी में सम्मिलित होने के लिए नैतिक रूप से पूर्णतमा स्वतन्त्र थे । ५ चुनाव के बाद भी हम दल बदल सकते थे और ऐसा करने से कुछ भी हमारी नैतिकता और सिद्धान्तों के विरुद्ध नहीं जाता था। दरअमल हमें अपने आगे सारी पार्टियां बड़ी ओछी और पौगी प्रतीत हुई । एक भय यह भी था ऐसा करने से पार्टी के चौधरियों का प्रभाव उन पर हमारी अपेक्षा अधिक प्रवल सिद्ध होगा। हम उनके ऊपर से अपना आधिपत्य एक प्रतिशत भी घटाने को तैयार नहीं थे। बहुत शीघ्र उनका नाम और उनका चुनाव निशान हर मोहल्ले, हर टोले और हर गली में छा गया। चमार टोला में रोज देशी शराब की बोतलें, अहीर और लुहार टोले में कपड़ा और नकदी पहुँचने लगा। उन्हें इन सबकी अनिवार्यता समझाने में हमे थोड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता। उनकी पेशानी पर शिकनें पडती किन्तु हम तुरन्त उस पर गर्भ लोहा कर देते । उनके बाग का चालीस हजार मे बिक जाना और कोठी का गिरवी रखा जाना यह सब इस साधारण प्रक्रिया के बीच घटित होने वाली बेहद छोटी-छोटी घटनाएँ थी । हमारे विरोधियों ने अपने-अपने फन एक बार फिर उठाने प्रारम्भ कर दिए। दरअसल जब भी हमारे महत्त्वपूर्ण हो १३२ : उगमा मेल मकने का कोई मौका आता तो उनको रह एकदम चौकन्नी हो जाती और उनके गुप्तागों में मि बिलबिलाने लगती । उन्होंने मारे गहर में यह जबरदस्त प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया कि हम उन्हें चुनाव में खड़ा कर अपना उल्लू मीधा कर रहे हैं। उन्होंने उन तक के कानो मे कानाफूमी प्रारम्भ कर दी थी कि उनका अधिकांश पैमा हम चुनाव कार्य में व्यय करने के बजाय अपने-अपने घरों में भर रहे हैं। यह उनकी नीचता थी जिस पर हम कभी श्रोध कर सकते थे और फभी हंस सकते थे। वे भूल गए थे कि हमारे काटे का आदमी पानी भी नही. मांग सकता । अगर हम ऐमा करते भी थे तो क्या अनुचित करते थे और उससे उन हरामियों का क्या बिगड़ता था उनके पैसो का उपयोग हम उन्ही के कार्यों मे तो कर रहे थे। उन्हें क्या पता था कि चुनाव लड़ना कोई बच्चो का खेल है। उसमे ऐसे असमय गुप्त यचे होते हैं जिनका हिसाय न तो रखा जा सकता है और न दिया जा सकता है। अगर उस धन का कुछ प्रतिशत हम अपने ऊपर भी खर्च करते थे तो क्या हमें इतना भी अधिकार नहीं था? हम इतना मव कुछ निस्वार्थ भाव से करने में जुटे थे और वे थे कि सिर्फ जंग लगे दरवाजों और खिडकियो की तरह हचमचाते रहते। वे अपनी गुंजल हमारे चारों ओर लपटते रहते और चोट खाए सर्प की तरह फुफकारते रहते । फिलहाल हमारे लिए यह इतनी महत्त्वपूर्ण वात नहीं थी जितनी उनके लिए तकलीफ देह और दयनीय स्थिति, जिन्होने उनकी इस जिन्दगी को नर्क बना रखा था। हमे विश्वास था रात को मोते वक्त भी उनकी आंखों के सामने किसी भयावह दानव की तरह सिर्फ हमारी शक्लें रहती होंगी और टूटे हुए दु.स्वप्न के बाद होंठो पर बडवडाते हुए सिर्फ हमारे नामो की फेहरिस्त । हमने बहुत शीघ्र ही उन्हे शिकस्त दे दी। दरअसल उनमे इतना साहस तथा धर्य था ही नहीं कि वे हमारे सामने दृढतापूर्वक ठहर भी पाते खुज्जल कुत्तों की तरह जीभ निकालते हुए हांपते हुए नाली और कीचड में अपना मुंह छिपाने के अतिरिक्त उनकी नियति और क्या हो सकती थी? 'दरअसल अपने इन विरोधियों से भी अधिक चितित कर देने वाली
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१३४ : उसका खेल । धराशायी कर देना था। बिना किसी दुविधा के सिर्फ हमारे कारण मोदी सेठ ने वह दुर्ग विजय कर लिया था। विजयी सिपहसालारों की भांति उनके खेमे मे हमारा स्वागत किया गया । हमने तुरन्त अपने-अपने जिम्मे मोदी सेठ से महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां ले ली थी । मोदी सेठ की उदारता, उनके कोमल हृदय और अपने प्रति सम्मान की भावना से हम भावविभोर हो उठे। सचमुच मोदी सेठ का जवाव नहीं था। बहुत दिनों तक हम गहरे अंधकार से घिरे रहे थे, अचानक मोदी सेठ ने वह जाल छिन्न-भिन्न कर हमे रोशनी की किरन दिखाई थी। हम कृतघ्न नही थे । हम तुरन्त दूने- चौगुने जोर-शोर के साथ उनका झण्डा हाथ मे पकड़कर हर चौराहे, हर गली और घर-घर मे निकल पडे । हमारी जुवान पर सिर्फ मोदी सेठ का नारा था। चुनाव परिणाम भला हमारे विरुद्ध जा सकता था? मोदी सेठ भारी बहुमत से विजयी हुए थे। वे बडी मुश्किल से अपनी जमानत बचा पाए थे। हमें अपनी सूंघने की शक्ति पर नाज हुआ। अगर हम उनके चक्कर मे फैसे रहते तो हमारी मिट्टी पलीद होने में कोई कसर शेप नहीं रह गई थी। काफी मानसिक ऊहापोह के बाद हम अपने-आपको उनके मोह से मुक्त कर पाए थे। मोदी सेठ की विजय हमारी विजय थी। आलीशान भव्य विजयी जुलूस में उनके आगे-पीछे सिर्फ हमारी छायाएं थी। हमने उन्हे फूलो की मालाओं से लाद दिया था। उनके गले में माला पहनाते हुए हमे लग रहा था हम क्षीर सागर की फैनिल शैया पर विराज रहे है । स्वागत भाषण में जब मोदी सेठ ने हमारा उल्लेख प्रारम्भ किया तो हमारी गर्दनें उनकी महानता के बोझ से शाखाओं-सी लचकने लगी। स्वागत समारोह और जुलूस की समाप्ति के बाद हमें उनका स्मरण आया। कुछ क्षण को हमे लगा हमारा वह हृदय जो करुण रस से आप्लावित सदैव छलछलाता रहता था, कही रितता जा रहा है। आखिर सैद्धातिक मतभेद कितने ही क्यों न हो, वे हमारे मित्र हैं। उन्हें सात्वना देना हमारा । फर्ज है।
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१३६ : उसका खेल नाम पर ठोकर मारने का क्या परिणाम होता है ? उन्हें अपनी गलती का अहसास करना होगा। क्या शहर उनके विषय मे हमारी यथार्थ वातें नहीं सुनेगा ? उनकी प्रतिष्ठा अव रह ही कहाँ गई है ? अब सिर्फ हमारे साथ- साथ मोदी सेठ का जमाना है। उन्हें अपनी इस गलीज कार्यवाही का पता सिर्फ तभी चलेगा जब पूरा शहर उन्हे थू-यू करेगा । चारों तरफ हमारा रंग है। शहर हमें मानता, ही नहीं, पूजता भी है। हम सभी शहर के प्रतिष्ठित नागरिक हैं । क्या कोई हमारे विरुद्ध जा सकता है ?
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