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Durgasaptshatee

Khemraj Shreekrishandas · 2009/09

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श्री। दुर्गासप्तशती। (कवचार्गलाकीलकप्रयोगविधिसहिता) लघुजवणायचाग्रामनिवासिश्रीमत्पण्डितबदरीप्रसाद- शास्त्रितनूजनिपण्डितमग्रीरामशास्त्रविरचितया शान्तनवीटीकानुसारिण्या भाषाटीकया समलंकृता । hte SHRI SAN सेय खेमराज श्रीकृष्णदासइत्यनेन मुंबय्यां स्वकीये “ श्रीवेङ्कटेश्वर" मुद्रणालये मुद्रयित्वा प्रकाशिता। संवद् १९५०'शके १८१५ अस्य ग्रंथस्य पुनर्मुद्रणादयोऽधिकाराः १८६७ तमवार्षिकर५ तमराजनियमानुसारेण प्रकाशकाधीनाःसांत ।

-RIBE
अथ भुवनेश्वरी
पुस्तकमिलनेका ठिकाना-
खेमराज श्रीकृष्णदास.
"श्रीवेङ्कटेश्वर" छापखाना-मुंबई.

श्री। पृष्ठ. १ . ..... , दसम्तशतीकवचम् अथ सप्तशतीस्थविषयानुक्रमणिका। विषय प्रयोगविधिः C. आतचंडीविधिः.. अर्गलास्तोत्रम् ... त्र्यंब लकस्तोत्रम् ... १४ कतन्म-:. सत्य शप्तशतीप्रारंभः। पाठाद वाज अध्याय प्रथम-सुरथराजा और समायका सुमात्रंशतं श्रीगणेशाचममें अर्थ मयोंषि और उन्होंड द तहां दे ... रसंकल्पः १ शो ... .. देवीका युद्ध ताणानाम्भाषाटीके- का वर्णन.तिस्में मधुकैटभदैत्यवधवर्णन - आटि अन्तमें जो ॐकार पढे तो १ ॥ और जो भूर्भुवः अध्याय दूसरा-महिषासुरके वधार्थ देवीकी सब देवाने देवीको शस्त्रास्त्रादि देना, महिषासुरके मन्त्रमन्त्रके आदिमें सप्तशतीके शत अध्याय तीसरा-देवीका महिषासुरसें तुमुलयुद्ध.महिष ऋचाको पढे तो ० अध्याय चतुर्थ-इंद्रादिदेवकत देवीस्तोत्र. ये सप्तशती पा- १. अध्याय पांचमा- शुंभनिशुंभसें त्रस्तहुए देवोंकरिकै ००शत १०० देवीस शुंभनिशुंभदैत्यदूतसंवाद... ॥ ४ ॥ और जो २ अध्याय छठमा-देवीकृत धूम्रलोचनवध, को पढे अथवा ३ अध्याय सातमा देवीकत चंडमुंडवध, ०००० अथवा और जो सप्तश - ...

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श्री।
अथ प्रयोगविधिः।
श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ प्रयोगान्तराणि कात्यायनीतन्त्री
तानि ॥ प्रतिश्लोकमाद्यन्तयोःप्रणवंजपेन्मन्त्रसिद्धिः ॥ १॥
अग्रे सर्वत्र श्लोकपदं मन्त्रोपलक्षणं ॥ सप्रणवमनुलोम-
व्याहृतित्रयमादौ अन्तेतुविलोमंतदित्येवं प्रतिश्लोकं कृत्वा
शतावृत्तपाठेऽतिशीघ्र सिद्धिः ॥२॥ प्रतिश्लोकमादौजातवे
दस इत्यूचंपठेत्सर्वकामसिद्धिः ॥३॥ अपमृत्युवारणाय
त्र्यंबकमन्त्रपठेत्।। आदावन्तेचशतमित्यर्थः॥प्रतिश्लोकतन्म-
न्त्रजपइत्यन्यत्र ॥४॥ प्रतिश्लोकंशूलेनपाहिनो देवीतिपाद
पमृत्युनाशः अस्यकेवलस्यापि श्लोकस्यलक्षमयुतंसहस्रशतं
वाजपे अपमृत्युवारणम् ॥५॥
श्रीगणेशायनमः ॥ अथ प्रयोगान्तराणाङ्कात्यायनीतत्रोक्तानाम्भाषाटीके-
यम् ॥ सप्तशतीके पाठ करनेमें मन्त्रमन्त्रक आदि अन्तमें जो ॐकार पढे तो
जिसमन्त्रकी सिद्धिचाहै उसी मन्त्रकी सिद्धिहोय ॥ १ ॥ और जो भूर्भुवः
स्वः इसप्रकार सुलटे क्रमसे ॐकारसहित तीन व्याहृति मन्त्रमन्त्रके आदिमें
पढे और अन्तम स्वः वः इसप्रकार उलटे क्रमसे पढे ऐसे सप्तशतीके शत
१०० पाठ करनेसे तत्काल कार्यकी सिद्धिहोय ॥ २॥ और जो सप्तश-
शतीके पाठ करनेमें मन्त्रमन्त्रके आदिअन्तमें जातवेदसे इस ऋचाको पढे तो
सब काम सिद्धहोय ॥ ३ ॥ और अकाल मृत्यु हटानेके लिये सप्तशती पा-
उके आदि अन्तमें त्र्यम्बकंयजामहे इस मन्त्रको शत १०० शत १०
जप करे अथवा मन्त्रमन्त्रके प्रति पढे तो अकालमृत्यु हटे ॥ ४ ॥ और जो
सप्तशती पाठमें मन्त्रमन्त्रके प्रति शूलेनपाहिनोदेवि इस मन्त्रको पढे अथवा
इस केवल मन्त्रका लक्ष १००००० अथवा दशहजार १०००० अथवा
हजार १००० अथवा शत १०० जपकरे तौभी अकाल मृत्यु हटताहै॥५॥

प्रयोगविधिः।
प्रतिश्लोकं शरणागतदीनातैतिश्लोकंपठेत्सर्वकार्यसिद्धिः॥६
प्रतिश्लोकंकरोतुसानः शुभेत्यईपठेत्सर्वकार्यसिद्धिः॥७॥
स्वाभीष्टवरप्राप्तये एवंदेव्यावरंलब्ध्वेतिश्लोकंपठेत् ॥८॥स-
पत्तिवारणायप्रतिशोकंदु स्मृतेतिपठेत् ॥अस्यकेवलस्या-
पिश्लोकस्यकाऱ्यानुसारेण लक्षमयुतंसहस्त्रंशतंवाजपः ॥९॥
सर्वावाधेत्यस्यलक्षजपेप्रतिश्लोकपाठेवाश्लोकोक्तम्फलम्।।१०
टीका-और जो सप्तशतीके पाठ करनेमें गन्त्रमन्त्रके प्रति शरणाग
दीनान इस मन्त्रको पढे तो सम्पूर्ण कार्य सिद्धिहोय ॥ ६ ॥ और जो कर
तुसानःशुभहेतुरीश्वरीशुभानिभद्राण्यनिहन्तुचापदः इस अर्द्धमन्त्रको सान
तीपाठमें मन्त्रमन्त्रके प्रति पढे तो सम्पूर्ण कार्यकी सिद्धिहोय ॥ ७ ॥
मनोवांछित वरकी प्राप्तिके लिये मन्त्रमन्त्रके प्रति एवं देव्यावरलम्चा
मन्त्रको पढे ॥ ८॥ और सम्पूर्ण आपत्तिनिवारणके लिये मन्त्रमन्त्रके भी
दुर्गेस्मृता इस मन्त्रको पढे अथवा इस केवल मन्त्रका जैसा कार्य है।
तिसके अनुसार लक्ष १००००० अथवा दशहजार १०००० अर
हजार १०.०० अथवा शत १०० जपकरना उचितहै ॥ ९ ॥ और सः
बाधाविनिर्मुक्त इस मन्त्रका लक्ष १००००० जप करनेसे अथवा इसके
सप्तशतीके पाठमें मन्त्रमन्त्रके प्रति पढनेसे धन धान्य पुत्र इनकरिके गुर
मनुष्य होताहै ॥१०॥
इत्थंयदायदाबाधेति प्रतिश्लोकजपेमहामारीशान्तिः ॥११॥
ततोवनेतृपोराज्यमिति मन्त्रस्यजपेपुनःस्वराज्यलाभः॥१२॥
हिनस्तिदैत्यतेजांसि इत्यनेनसदीपबलिदाने घण्टावन्धने
च बालग्रहशान्तिः ॥ १३ ॥ आद्यावृत्तिमनुलोमेनपठित्वा
ततोविपरीतक्रमेण द्वितीयामनुलोमेन ॥ तृतीयामित्येवमा-
वृत्तित्रयेण शीघ्रङ्कार्यसिद्धिः ॥ १४॥ सर्वापत्तिवारणाय
दुर्गेस्मृतेत्यर्द्धततोथदंतियच्च दूरकेइत्यूचं तदन्तेदारिद्रयदुः
खेत्यमेवकार्यानुसारेणलक्षमयुतंसहत्रंशतवाजपः॥ १५ ॥

भाषाटीकासमन्वितः। (३) टीका-और सप्तशतीके पाठमें मन्त्र मन्त्रके प्रति इत्थंयदायदेशबाधादा- नवोत्थानविष्यति इस मन्त्रको पढनेसे महामारी शांत होय ॥ ३१॥ और सप्तशतीके पाठमें जो मन्त्र मन्त्रके प्रति 'ततोववेनृपोराज्यम्" इस मन्त्रको जपे तो गयाहुवा अपना राज्य फिर मिले ॥ १२ ॥ और 'हिनस्तिदैत्यते- जांसि इस मन्त्रकरिके भगवतीके अर्थ दीपक सहित बलिदान देनेसे और भगवतीके मंदिरमें घण्टा बांधनेसे बालयहोंकी शांति होय ॥ १३ ॥ और जो पहिले सप्तशतीका सुलटे क्रमसे पाठ करें और दूसरे उलटी रीतिसे फिर तीसरे सुलटे क्रमसे पाठ करे इस प्रकार तीन पाठ करनेसे तत्काल कार्यकी सिद्धि होय ॥ १४ ॥ सम्पूर्ण आपत्ति निवारणके लिये 'दुर्गेस्मृताहरसिनी- तिमशेषजन्तोः' इस अर्थमन्त्रको पढकर तिसके अन्तमें 'यदन्तियच्चदूरके इस ऋचाको पढे फिर तिसके अन्तमें दारिधदुःख इस अर्द्धमन्त्रको पढे इस प्रकार जैसा कार्य हो तिसके अनुसार लक्ष' १००००० अथवा दशह- जार १००००' अथवा हजार १००० अथवा शत १०० इसका जप करना उचित है ॥ १५ ॥ कांसोस्मीत्यूचं प्रतिश्लोकं पठेल्लक्ष्मीप्राप्तिः ॥ १६ ॥ प्रति- श्लोकमनृणांअस्मिन्नित्यूचं पठेदृणपरिहारः ॥ १७ ॥ मार- णार्थमेवमुक्तासमुत्पत्यतिश्लोकंप्रतिश्लोकंपठेन्मारणोक्तावृत्ति- भिः फलसिद्धिः ॥ १८ ॥ ज्ञानिनामपि चेतांसि इतिश्लो- कजपमात्रेण सद्योमोहनमित्यनुभवसिद्धम् ॥ प्रतिश्लोक तच्छ्रोकपाठेत्ववश्यम् ॥ १९॥ रोगानशेषानिति श्लोकस्य प्रतिश्लोकंपाठेसकलरोगनाशः ॥ तन्मात्रजपेपिसः॥२०॥ टीका और जो सप्तशतीके पाठमें मन्त्र मन्त्रके प्रति कांसोस्मि' इस ऋ- चाकों पढे तो लक्ष्मीकी प्राप्ति होय ॥ १६ ॥ और जो मन्त्र मन्त्रके प्रति 'णाअस्मिन्! इस ऋचाको पढे. तो ऋण उतरे ॥ १.७ ॥ और मारणके, वमुक्त्वासमुत्सत्य' इस मन्त्रको मन्त्र मन्त्रके प्रति पढे और मारणमें ..

(४) प्रयोगविधिः। जितनी कात्यायनी आदि तन्त्रोंमें सप्तशतीकी आवृत्ति वर्णन करी आवृत्तियों के करनेसे मारणरूप फलकी सिद्धि होती है ॥ १८ ॥ निनामपिचेतांसि' इस मन्त्रके जप मात्र करने करके तत्काल वशी यह अनुभव किया हुवा है अथवा मन्त्र मन्त्रके प्रति इस मन्त्रको वशीकरण सिद्ध होय ॥१९॥ और 'रोगानशेपान' इस मन्त्रको मन्त्र प्रति पढनेसे सम्पूर्ण रोगका नाश होय अथवा तिस केवल मन्त्र ज सेमी सम्पूर्ण रोगका नाश होता है ॥ २० ॥ इत्युक्तासातदादेवी गंभीरतिश्लोकस्यप्रतिश्लोकंपाठे पृथग्ज- पेवा विद्याप्राप्तिर्वाग्वैकृतनाशश्च ॥ २१॥ भगवत्याकृतं सर्व मित्यादिद्वादशोत्तरशताक्षरोमन्त्रः सर्वकामदः ॥ सर्वापत्ति वारणश्च ॥ २२॥ देविप्रपन्नातिहरे इतिश्लोकस्ययथाकार लक्षायुतसहस्रशतान्यतमसंख्यजपे प्रतिश्लोक पाठेवासर्वाप- निवृत्तिः सर्वकामाप्तिश्च ॥ एषुप्रयोगेषु प्रतिश्लोकंदीपायेकेद लमेव नमस्करणेऽतिशीघ्रसिद्धिः॥प्रतिश्लोकंकामवीजसम्प टितस्थयैकचत्वारिंशदिनंत्रिरावृत्तौ सर्वकामसिद्धिः।।२३।। एकविंशतिदिनपर्यन्तमुक्तरीत्याप्रत्यहं द्वादशावृत्तौवशीक णम् ॥२४॥ मायावीजसम्पुटितस्य फट्पल्लवसहितस्याद तदिनपर्यन्तं त्रयोदशावृत्तावुच्चाटनसिद्धिः ॥२५॥ टीका-और इत्युक्तासातदेवी इस मन्त्रको मन्त्रमन्त्रकेप्रति पठनकर अथवा अलग केवलको जपकरनेसे विद्याकी प्राप्तिहोय और वाणीमें जो महा- पनाआदि विकार होय तिसको नाशहोय ॥२१॥और भगवत्यारुतं सर्वम् इर. आदिलेकर यह एक सौ १२ बारह अक्षरका मन्त्रहै सो सम्पूर्ण कानना दीनेवाला है और सम्पूर्ण आपत्तिका दूर करनेवालाहै इस केवल मन्त्रको जपे अथवा सप्तशतीपाठमें मन्त्रमन्त्रके प्रतिपढे ॥ २२ ॥ और जैसा का हो तिसमाफिक देविप्रपन्नातिहरेमसीद इसमन्त्रको जप लक्ष १००००० भाषाटीकासमान्वितः। (५) अथवा दशहजार १०००० अथवा हजार १००० अथवाशत १०० .इसमे से एकस्या जपकरनेसें अथवा इसमन्त्रको सप्तशतीपाठमें मन्त्रमन्त्रके प- ढनेसे कण आपत्ति दूरहोय और सम्पूर्ण कामना पूर्णहोय और इन प्रयो- गोमें प्रांतमन्त्र दीपके आगे केवल नमस्कार करनेसे अतिशीघ्र फलकी सिद्धि. होय और प्रतिमन्त्र काम बीजसम्पुटित अर्थात् क्लीं इस करके सम्पुटित सप्तशतीको इकतालीस दिनतक नित्यप्रति तीन आवृत्तिकरनेसे सम्पूर्ण काम- की सिद्धिहोय ॥२३॥ और जो इक्कीसदिनतक उसी कामवीजसम्पुटित स-/ प्रशतीकी बारह आवृत्ति नित्यप्रतिकरनेसे वशीकारण सिद्धहोताहै ॥२४॥ और जो ह्रीं इस मायावीजकरके प्रतिमन्त्र सम्पुटितफट् पल्लव करके सहित सप्तशती पाठकी सप्तदिनतक नित्यप्रति त्रयोदश आवृत्तिकरनेसे उच्चाटन सिद्धहोय ॥ २५ ॥ तादृश्यामेव दिनचतुष्टयमेकादशावृत्तौ सर्वोपद्रवनाशः ॥ ॥२६॥ एकोनपञ्चाशदिनपर्यन्तम्प्रति लोकं श्रीवीजसम्पुटि तस्थपञ्चदशावृत्तौलक्ष्मीप्राप्तिः ॥२७॥ प्रतिश्लोकं वाग्वीज सम्पुटितस्यशतावृत्त्याविद्याप्राप्तिः॥२८॥ इति ॥ टीका-और चार दिनतक नित्यप्रति एकादश आवृत्ति करनेसे सम्पूर्ण उपश्वका नाश होय ॥ २६ ॥ और उणंचास दिनतक प्रति मन्त्र श्रीबीज सम्युटित सप्तशती पाठकी पंदरह आवृत्तिकरनेसे लक्ष्मीकी प्राप्तिहोय ॥२७॥ और प्रतिमन्त्र ऐं इस वाग्वीजसम्पुटित सप्तशतीकी शत १०० आवृत्ति क- रनेसे विद्याकी प्राप्ति होय ॥२८॥ इति तन्त्रोक्तप्रयोगान्तराणि ॥ इति प्रयोगविधिःसमाप्तः।

श्रीः। अथ शतचण्डीविधिः। शङ्करस्य भवान्या वा प्रासादनिकटे शुभम् ॥ मण्डपं द्वारवेद्याव्यं ध्वजतोरणम् ॥ १॥ तत्र कुण्डं प्रकुति प्रतीच्यांमध्यतोपिवा ॥ स्नात्वाल त्यक्रियांकत्वा वृणुयाद्दशवाडवान् ॥ २॥ जितेंद्रियान्सदाचारान कुलीना न्त्सत्यवादिनः ॥ (वाडवा ब्राह्मणाः)॥ व्युत्पन्नांश्चण्डिकापाठरतानलजा दयावतः ॥.३ ॥. मधुपर्कविधानेन स्वर्णवस्वादिदानतः ॥ जपार्थमासनमाला दद्यातायोऽपिभोजनं ॥ ४ ॥ तेहविष्यान्नमभंतो मन्त्रार्थगतमागसाः ॥ नमो शयानाः प्रत्येकं जपेयुश्चंडिकास्तवम् ॥ ५ ॥ मार्कण्डेयपुराणोक्तं दशक: सचेतसः ॥ नवार्णचंडिकामन्त्र जपेयुश्चायुतं पृथक् ॥ ६ ॥ पृथक्संपुर करणादितिशेषः ॥ प्रत्येकं ब्राह्मणैरयुतजपः कार्य्यः ॥ अष्टमी नवमी च देशी पौर्णमासीषु यथा शतावृचिसमाप्तिविति तथारम्भः कर्तव्य इति सां दायिकाः ॥ यजमानः पूजयेच्च कन्यानां नवकंशुभं ॥ द्विवर्षावादशाब्दाना कुमारीः परिपूजयेत् ॥ १ ॥ तासां क्रमेण नामानि ॥ कुमारी १ त्रिमूर्निर कल्याणी ३ रोहिणी ४ कालिका ५ शांभवी ६ दुर्गा ७ चण्डिका ८ सुज- द्रा ९ इति ॥ नाममन्त्रैस्तासां पूजा ॥ तत्र हीनाधिकाङ्गी कुष्ठवणयुता अंधा काणाकुरूपा केकराकुबरी लोमयुग्देहा दासीजा रोगिणीत्येवमाद्यावाः ।। विप्रांसर्वेष्टसंसिद्धयै यशसेक्षत्रियोद्भवाम् ॥ वैश्यजांधनलाबाय पुत्राप्त्यशूद्रजां यजेत् ॥ गन्धपुष्पधूपदीपलक्ष्यभोज्यैर्यथाशक्ति वस्खाजरणैश्च पूजयेत् द्विवर्षा साकुमार्युक्ता त्रिमूर्त्तिगयनत्रिका ॥ चतुरन्दा तु कल्याणी पञ्चवर्ण तु रोहिणी ॥ १॥ षडब्दा कालिका प्रोक्ता चण्डिका सप्तहायना ॥ . वर्षा शांभवीस्यादुर्गा तु नवहायना | मुजदा दशवर्षोक्ता नाममन्त्रैः जयेत् ॥ तासामावाहनेमन्त्रः प्रोच्यते शङ्करोदितः ॥ मन्त्राक्षरमयों मातॄणां रूपधारिणीम् ॥ नवदुर्गात्मिकां साक्षात्कन्यामावाहयाम्यहम् कुमारिकादिकन्यानां. पूजामन्त्रान्बुवेऽधुना ॥ जगत्पूज्ये जगद्वन्दों शतचण्डीविधिः। (७) शक्तिस्वरूपिणि ॥ पूजां गृहाण कौमारि जगन्मातर्नमोऽस्तुते ॥ त्रिपुरां त्रिपु- राधारां त्रिवर्षी ज्ञानरूपिणीम् ।। त्रैलोक्यवन्दितां देवीं त्रिमूर्ति पूजयाम्यहम् ॥ कलात्मिकां कलातीतां कारुण्यहृदयां शिवाम् ॥ कल्याणजननी देवी.क- ल्याणी पूजयाम्यहम् ॥ अणिमादिगुणाधारामकाराधक्षरात्मिकां ॥ अनन्त शक्तिका लक्ष्मी रोहिणी पूजयाम्यहम् ॥ कामचारी शुभां कान्तां कालचक्र स्वरूपिणीम् ॥ कामदां करुणोदारां कालिकां पूजयाम्यहम् ॥ चंडवीरां चंडमा- यांचण्डमुण्डप्रजनीम् ॥ पूजयामि सदादेवींचंडिकांचंडविक्रमाम् ॥ सदानंद- करीशांतासर्वदेवनमस्कताम् ॥ सर्वभूतात्मिकालक्ष्मीशांभवीपूजयाम्यहम् ॥ दुर्गमेदुस्तरेकार्येभवदुःखविनाशिनीम् ॥ पूजयामिसदाभत्यादुर्गादुर्गातिना- शिनीम्॥सुन्दरी स्वर्णवर्णानां सुखसौभाग्यदायिनीम् ॥ सुभद्रजननी देवींसुभ- दोपूजयाम्यहम् ॥ एतैर्मत्रै पुराणोक्तस्तांतांकन्यांसमर्चयेत् ॥ इतिपूजनंकु- मारिकाणाम् ॥ वेद्यांविरचितेरम्येसर्वतोभइमंडले ॥ घटसंस्थाप्यविधिनातत्रा- वाद्यार्चयेच्छिवाम् ॥ तदयेकन्यकाश्चापिपूजयेद्दाह्मणानपि ॥ उपचारैस्तुवि- विधैर्नवार्णावरणान्यपि ॥ ॐकारःप्रथमपीठंपूर्णपीठमतःपरम् ॥ तृतीयकाम- पीठंचपूजयेत्संप्रदायतः ॥ पूर्वादिदिक्षुपीठस्यगणेशादिचतुष्टयम् ॥ गणेशक्षेत्र- पालौचपादुकेवटुकास्त्रयः ॥ आमेव्यादिचतुर्दिक्षुपूज्यदेवीचतुष्टयम् ॥ जया चविजयाचैवजयंतीचापराजिता ॥ पूर्वोक्तयोपूर्वकोणेसरस्वतीसहितोब्रह्मा श्रीसहितोविष्णु३त्यामुमयाशिवोवायव्यांषट्कोणेचक्रमध्यस्थमध्यबीजेश्री- महालक्ष्मीः ॥ हीमहाकालीऍमहासरस्वतीदक्षिणवामयोः ॥ उदक्सिंहोदक्षि- रणेमहिषः ॥ षट्कोणेषुनंदजा रक्तदंतिका शाकंभरीदुर्गानीमानामयंः ॥ सबिंदुनामांयवर्णताराद्याश्वासांनाममंत्राःपूजादौ ॥ तार-प्रणवः ॥ अष्टत्रयेषु ब्रह्माणीमाहेश्वरीकौमारीवैष्णवीवाराहीनारसिंही ऐंद्रीचामुण्डाउक्तरीत्यानाम- मन्त्रैः पूज्याः ततोविष्णुमायादिचतुर्विशतिदेवताः प्रागादिक्रमेणकेसरेषुपूज्याः सतिपत्रंचकेसरत्रयम् ॥ ताश्चविष्णुमायाश्चेतनारबुद्धिनिद्राक्षुधा५छाया शक्ति ७ तृष्णा ८क्षांति ९ जाति १० लज्जा ११.शान्ति १२ श्रद्धा (८) शतचण्डीविधिः। १३ कान्ति १४लक्ष्मी १५धति १६ वृत्ति १७ स्मृति १८ दया १ तुष्टि २०पुष्टि २१ मातृ २२ श्रांति २३ चिति २४ रूपा एतावत्सः सप्त शतीस्तवेपंचमेध्यायेआसांचतुर्विंशतीनांनपाठ इतिनश्चमितव्यम् ॥ कात्याय नीतंत्रविरोधात् ॥ नालमूलेतुसंपूज्यमाधवादिचतुष्टयम् ॥ आधारःकूर्म- षौ च चतुर्थीपृथिवीनृप ॥ गृहकोणेषुगणेश क्षेत्रपालोबटुकोयोगिन्यः ॥ गादिदिक्षुइंद्राद्याश्चेति ॥ एवंचतुर्दिनकुर्यात् ॥ तत्रपथमेन्हिएकावृत्तिद्धिती द्वेतृतीयेतिस्रश्चतुर्थेचतस्रइति ॥ पंचमेहोमः ॥ होमद्रव्याणि ॥ पायसान्नैति मध्वक्तैर्द्राक्षारंभाफलादिभिः ॥ मातुलिंगैरिक्षुखडैालिकेरयुतैस्तिलैः ॥ तीफलैराम्रफलैरन्यैर्मधुरवस्तुभिरिति ॥ सप्तशत्यादशावृत्त्यापतिमन्त्रंहुतंचरे अयुतंचनवार्णेनस्थापितेऽनौविधानतः ॥ कृत्वावरणदेवानांहोमतन्नाममा तः ॥ कृत्वापूर्णाहुतिसम्यग्देवमनिविसूज्यच ॥ अभिषिचेच्चयटारविप्रौ कलशोदकैः ॥ निष्कं सुवर्णमथवाप्रत्येकं दक्षिणांदिशेत् ॥ भोजयेच्चशती प्रान्तक्ष्यभोज्यैः पृथग्विधैः ॥ तेश्योपिदाक्षिणांदत्वागृह्णीयादाशिषस्तथा एवंकतेजगदृश्यंसर्वेनश्यंत्युपद्रवाः ॥इतिशतचण्डीविधिः॥श्रीजगदंबाप्रसादोर अथ संकल्पः। अद्यत्यादि० श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताप्रीत्यर्थ चंडीसप्तशतीपाठाख्यंकर्मकरिष्ये ॥तदंगत्वेनादौकवचार्गलाकील पठनमाद्यतयोरष्टोत्तरशतसंख्यनवार्णजपपूर्वकंक्रमणरात्रिसूक्तदेवी : सूक्तपठनमंतेरहस्यत्रयपठनंचकरिष्ये ॥ ॥ इतिसंकल्प्य ॥ प्रथम नमोदेव्यैमहादेव्यैशिवायैसततनमः॥ नमःप्रकृत्यैभद्रायैनियत : •णताःस्मतां ॥ इतिमंत्रणपंचोपचारैःपुस्तकपूजांकुर्यात्॥ श्रीरस। इतिसंकल्पः। :

श्री। अथसप्तशतीकवचं भाषाटीकासमन्वितम्। ॐनमश्चण्डिकायै ॥ मार्कण्डेयउवाच ॥ ॐयद्गापरमलो- केसर्वरक्षाकरनृणाम् ॥ यन्नकस्यचिदाख्यातंतन्मेबहिपिता- मह॥ १॥ ब्रह्मोवाच ॥अस्तिगुह्यतमविप्रसर्वभूतोपकारकम्।। देव्यास्तुकवचंपुण्यंतच्छृणुष्वमहामुने ॥२॥ प्रथमशै लपुत्रीतिद्वितीयंब्रह्मचारिणी ॥ तृतीयं चन्द्रघण्टेतिकूश्माण्डे- तिचतुर्थकम् ॥ ३॥ पंचमस्कंदमातेतिषष्टकात्यायनीति च ॥ सप्तमंकालरात्रीतिमहागौरीतिचाष्टमम् ॥४॥ नवमं सिद्धिदात्रीचनवदुर्गाप्रकीर्तिताः ॥ उक्तान्येतानिनामानि ब्रह्मणैवमहात्मना ॥६॥ श्रीगणेशायनमः।।नत्वाहमीशं जगदेकनाथं वर्गिलाकीलकसंयु तायाकरोमि भाषामबुधोपकृत्यै विन्मग्निरामःखलु सप्तशत्याः।। टीका-ॐ नमश्चण्डिकायै ॥ एक समय मार्कण्डेय ऋषि ब्रह्मासे इसप्रका प्रश्न कत्र्ने भये कि हे ब्रह्मन् जो लोकके विषे अत्यंत गुप्त है और सब मनुः ध्योंकी रक्षा करनेवाली और किसी अन्यको नहीं उपदेश दईहो सोबत हमको उपदेश करो ॥ १॥ तब ब्रह्माजी बोले कि हे विप्र हे महायुने र मनुष्योंका उपकार करनेवाली और अत्यंत गुप्त ऐसा देवीका कवच है लाहि तुम श्रवण करो ॥२॥ प्रथम तो शैलपुत्री और दूसरे ब्रह्मचारिणी तीसरे चन्द्रघण्टा चौथे कुष्मांडा ॥ ३ ॥ पाचवे स्कंदमाता-छठे कात्यायनी सातवे कालरात्रि आठवे महागौरी ॥ ४ ॥ नवमें सिद्धिदात्री ये नवदुर्गा वर्णन करी येनाम ब्रह्मा मैनेही वर्णन किये है ॥५॥ अग्निनादह्यमानस्तुशत्रुमध्येगतोरणे ॥ विषमेदुर्गमेचैषभया (२) सप्तशतीकवचम् । श्शिरणंगताः॥६॥ नतेषांजायतेकिंचिदशुभरणसंकटे॥ नापदंतस्यपश्यामिशोकदुःखभयंनहि ॥७॥ यैस्तुभत्त्या स्मृतानूनंतेषांसिद्धिःप्रजायते॥येत्वांस्मरन्तिदेवेशिरक्षसेतान: संशयः ॥ ८ ॥ प्रेतसंस्थातुचामुण्डावाराहीमहिषासना ।। ऐन्द्रीगजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ॥ ९ ॥ माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना ॥ लक्ष्मी पद्मासनादेवीपम- हस्ताहरिप्रिया ॥१० टीका-जो मनुष्य अमि करके दग्ध होताहुवा और जो संगा विषे शत्रुओंके मध्यमें रुकाहुवा और जो मनुष्य बिकट दुर्गके रुकाहुवा और जे इन आदि भयार्त मनुष्य इन ब्रह्मोक्तं दुर्गाके नामों उच्चारण कर्ने हैं ॥ ६॥ तिनके रण आदि संकटोंमें कुछगी अ नहीं होता है और शरणागत मनुष्यके मैं आपत्ति और शोक दुःख भय · नहीं देखता हूँ॥ ७॥ और जिनो करके भक्तिसे दुर्गा स्मरण करी जाती तिनके निश्चयकरके धन संतान आदि सब वस्तुकी वृद्धि होती है और देवेशि जे मनुष्य तुझारा स्मरण कर्ने हैं तिनकी तुम रक्षा करोहो इसमें शय नहीं ॥८॥ और प्रेतोंके विषे स्थित ऐसी चामुंडा और महिप है सवः जिसकी ऐसी वाराही और गजसमारूढ ऐंद्री और गरुड है वाहन जिस ऐसी वैष्णवी ॥ ९ ॥ और पाके ऊपर बैठी हुई माहेश्वरी और मयूर वाहन जिसका ऐसी कौमारी और कमल है आसन जिसका और कमल हाथोंमें जिसके हरिकी प्रिया ऐसी लक्ष्मी ॥ १०॥ श्वेतरूपधरादेवीईश्वरीवृषवाहना।ब्राह्मीहंससमारूढा सर्वाभ- रणभूषिता ॥११॥ इत्येतामातर सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः॥ नानाभरणशोभाख्यानानारत्नोपशोभिताः ॥ १२॥ दृश्य न्तेरथमारूढादेव्य क्रोधसमाकुलाः ॥ शंखचक्रगदाशक्तिहलं चमुसलायुधम् ॥ खेटकंतोमरं चैवपरशुंपाशमेवच ॥ १३॥ कुन्तायुधं त्रिशूलंचशाङ्गमायुधमुत्तमम् ॥दैत्यानांदेहनाशा--

भाषाटीकासमन्वितम् ।
यभक्तानामभयायच ॥ १४॥ धारयन्त्यायुधानीत्थंदेवानांच
हितायवै ॥ नमस्तेस्तु महारौद्रेमहाघोरपराक्रमे।। १५॥
टीका-और वृप है वाहन जिसका और श्वेतरूपकों धारण करनेवाली
ऐसी ईश्वरी देवी और हंसके ऊपर बैठीहुई संपूर्ण आभूषणोंकरके
अलंकृत ऐसी वाली ॥११॥ हेदेवि पूर्वोक्त तुमारी ये शक्ति संपूर्ण जगन्माता
संपूर्ण योग करके युक्तहै और नाना प्रकारके रत्नजटित आभूषणोकी शो-
भा करके युक्त हैं ॥ १२ ॥ और क्रोध करके विव्हल रथोंमें बैठीहुई दीख-
तीहैं और शंख चक्र गदा शक्ति हल खेटक तोमर परशु पाश ॥ १३ ॥ कुंत
त्रिशूल शाङ्ग धनुष इन उत्तम आयुधोको दैत्योंके देहके नाशके लिये और
भक्तोंके अभयके लिये ॥ १४ ॥ और देवोंके हित के लिये धारण किये हैं
हेमहारौद्रे हेमहाघोरपराक्रमे ऐसी तुमको नमस्कारहो॥ १५॥
महावलेमहोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥ त्राहिमादेविदुष्प्रेक्ष्ये
शत्रूणांभयवर्दिनि ॥ १६ ॥प्राच्यांरक्षतुमामैन्द्री आग्नेय्यां
भयवर्धिनी । दक्षिणेऽवतुवाराहीनैर्ऋत्यांखड्गधारिणी ॥१७॥
प्रतीच्यांवारुणीरक्षेद्रायव्यांमृगवाहिनी॥उदीच्यांपातुकौमारी
ईशान्यांशूलधारिणी ॥ १८॥ ऊर्ध्वब्रह्माणीमेरक्षेदधस्ताद्वै-
ष्णवीतथा ॥ एवंदशदिशोरक्षेचामुण्डाशववाहना ॥ १९ ॥
जयामेचायतःपातुविजयापातुपृष्ठतः ॥ अजितावामपावें
तुदक्षिणेचापराजिता ॥२०॥
टीका-और हेमहाबले हेमहोत्साहे हेमहाभयविनाशिनि हे दुष्प्रेक्ष्ये हे
शत्रुओंके भय बढानेवाली तुम मेरी रक्षा करो ॥ १६ ॥ पूर्वके विषे ऐंद्री
मेरी रक्षा करो और अमिकोणके विषे भयवर्धिनी रक्षा करो और दक्षिणके
विषे वाराही और नैर्ऋतके विष खड्गधारिणी मेरी रक्षा करो॥ १७॥ और
पश्चिमके विषे वारुणी और वायु कोणके विषे मृगवाहिनी और उत्तरके
विषे कौमारी और 'ईशानी के विषे शूलधारिणी मेरी रक्षा करो ॥ १८॥

(४) सप्तशतीकवचम् । और मेरे उपर ब्रह्माणी रक्षा करो तिसीप्रकार नीचे वैष्णवी रक्षा करो ऐसे राबवाहना चामुंडा दशो दिशामें रक्षाकरो ॥ १९ ॥ और मेरे अगाडी जया रक्षा करो और विजया पीठ पीछेरक्षा करो और अजिता वामपाईके विषे और अपराजिता दक्षिणपार्श्वके विषे रक्षा करो ॥ २० ॥ शिखामुदयोतिनी रक्षेदुमामूर्ध्नि व्यवस्थितामालाधरीलला- टेचचवौरक्षेद्यशस्विनी ॥२१॥ त्रिनेत्राचचवोर्मध्येयमघण्टा चनासिके ॥ शंखिनीचक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोरिवासिनी ॥२२॥ कपोलौकालिकारक्षेत्कर्णमूलेतुशांकरी ॥ नासिकायांसुग- न्धांचउत्तरोष्ठेचचचिका ॥ २३ ॥ अधरेचामृतकलाजिह्वायां च सरस्वती दन्तानक्षतुकौमारीकण्ठदेशेतुचण्डिका॥२४॥ चण्टिकाचित्रघण्टाचमहामायाचतालुके ॥ कामाक्षीचिबुकं रक्षेद्वाचंमेसर्वमंगला ॥२५॥ टीका-और शिखाकी उद्योतिनी रक्षा करो और उमा मूर्द्धके विषे स्थित हुई रक्षा करो और मालाधरी ललाटके विषे रक्षा करो और चकुटिओंकी यशस्विनी रक्षा करो ॥२१॥ और त्रिनेत्रा भुकुटीओके मध्यमें और नासि काकी यमघण्टा रक्षा करो और नेत्रों के मध्यमें शंखिनी और श्रोत्रों के विषे धारवासिनी रक्षा करो ॥ २२॥ और कपोलोंकी कालिका रक्षा करो और कर्णमूलके विषे शांकरी रक्षा करो और नासिकाके विषे सुगंधा और उत्त- रोष्ठके विषे चर्चिका रक्षा करो ॥ २३ ॥ और अधरोष्ठके विषे अमृतकला और जिव्हाके विषे: सरस्वती रक्षा करों और दैतोंकी, कौमारी रक्षा करो और कंठदेशके विषे चंडिका रक्षा करो ॥ २४॥ और घंटिकाकी चित्रघण्टा. रक्षा करो और महामाया तालुके विषे रक्षा करो और कामाक्षी ठोडीकी रक्षा करो और सर्वमङ्गला मेरी वाणीकी रक्षा करो ॥ २५॥ ग्रीवायांभद्रकालीचपृष्टवंशेधनुर्धरी ॥ नीलग्रीवाबहि-कण्ठेन लिकांनलकूबरी ॥२६॥ स्कन्धयोः खजिनीरक्षेद्वाहू मेवज

भाषाटीकासमन्वितम् ।
धारिणीहिस्तयोर्दण्डिनीरक्षेदम्बिकाचांगुलीषुच।।२७ानखा
छूलेश्वरीरक्षेत्कुक्षौरक्षेत्कुलेश्वरी ॥ स्तनौरक्षेन्महादेवी
मनश्शोकविनाशिनी ॥ २८॥ हृदयेललितादेवीउदरेशूल
धारिणी ॥ नाभौचकामिनीरक्षेद्गुह्यंगुह्येश्वरीतथा ॥२९॥
पूतना कामिकामेंद्गुदेमहिषवाहिनी कन्यांभगवतीरक्षेजा
नुनीविन्ध्यवासिनी ॥ ३०॥
टीका-और गलेके विषे भद्रकाली और पृष्ठके वंशके विषे धनुर्धरी रक्षा,
करो और कंठके बहिःप्रदेशके विषे. नीलग्रीवा रक्षा करो और नलिकोंकी
नलकूबरी रक्षा करो ॥ २६ ॥ और कंधूके विषे.खड़िनी रक्षा, करो और
मेरी सुजाकी वज्रधारिणी रक्षा करो और हस्तोंके विषे दंडिनी रक्षा करो
और अंगुलिओंके विपे अंबिका रक्षा करो ॥ २७ ॥ और नखोकी शूले-
श्वरी रक्षा करो और कुक्षिके विषे कुलेश्वरी रक्षा करो और स्तनोंकी मन-
का शोक दूर करनेवाली महादेवी रक्षा करो ॥ २८ ॥ और हृदयके विषे
ललिता देवी और उदरके विषे शूलधारिणी और नाभिके विषे कामिनी रक्षा
करो तिसीप्रकार गुह्यस्थानकी गुह्येश्वरी रक्षा करो ॥ २९ ॥ और पूतना
कामिका शिश्नकी रक्षा करो और गुदस्थानके विषे महिषवाहिनी और क-
टिदेशके विषेभगवती रक्षा करो और गोडोंकी विध्यवासिनी रक्षा करो॥३०॥
जंघेमहाबलारक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥ गुल्फयोनारसिंहीच
पादपृष्ठेतुतेजसी ॥३१॥ पादांगुलीषु श्रीरक्षेत्पादांधःस्थल
वासिनी॥ नखान्दंष्ट्राकरालीच केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी॥ ३२॥
रोमकूपेषुकौमारीत्वचंवागीश्वरीतथा ॥ रक्तमज्जावसामांसा-
न्यस्थिमदासिपार्वती ॥३३॥ अन्त्राणिकालरात्रीचपित्तंच
मुकुटेश्वरी ॥ पद्मावतीपद्मकोशेकफेचूडामणिस्तथा ॥३॥
ज्वालामुखीनसाजालमभेद्यासर्वसंधिषु ॥ शुक्रब्रह्माणीमेरक्षे.
च्छायांछत्रेश्वरीतथा ॥ ३५॥

(६)
सप्तशतीकवचम् ।
टीका-और सर्व मनोरथोकी देनेवाली महाबला जंघाओंकी रक्षा करो
और टॉकनाके विषे नारसिंही और पैरोके पृष्ठके विषे तैजसी रक्षा करो॥३१॥
और पैरोंकी अंगुलिऑके विषे श्री रक्षा करो और पैरेका अधोभागकी
स्थलवासिनी रक्षा करो और नखकी दृष्ट्राकराली और केशोंकी
ऊर्वकेशिनी रक्षा करो ॥ ३२ ॥ और रोमकूपोंके विपे कौमारी रक्षा करो
तिसीप्रकार. त्वचाकी वागीश्वरी रक्षा करो और रक्त मज्जा वसा मांस
अस्थि मेद इनकी पार्वती रक्षाकरो ॥ ३३ ॥ और आतोंकी कालरात्रि
रक्षा करो और पित्तकी मुकुटेश्वरी रक्षाकरो और तिसीप्रकार पद्मावती
पनकोशके विषे और कफके विषे चूडामाण रक्षा करो ॥ ३४॥ और ज्वा-
लामुखी नसाजालकी रक्षा करो और अभेद्या सभ संधिओंके विषे रक्षा
करो और वीर्यकी ब्रह्माणी रक्षा करो तिसीप्रकार छायाकी छत्रेश्वरी
रक्षा करो ॥ ३५ ॥
अहंकारंमनोबुद्धिरक्षेन्मेधर्मधारिणी॥ प्राणापानौतथाव्यानमु
दानंचसमानकम् ॥३६ ॥ वज्रहस्ता चमे रक्षत्प्राणकल्पंच
शोभना ॥ रसेरूपेचगन्धे च शब्देस्पर्शचयोगिनी॥३७॥सत्वं
रजस्तमश्चैवरक्षेन्नारायणीसदा ॥आयूरक्षतुवाराहीधर्मरक्षतुवै-
ष्णवी।३८ायश-कीर्तिचलक्ष्मींचधनं विद्यांचचक्रिणी॥गोत्रामि
न्द्राणीमेरक्षेत्पशून्मेरक्षचण्डिके॥३९॥पुत्रान्रक्षेन्महालक्ष्मी
र्भायौरक्षतुभैरवी।पन्थानंसुपथारक्षेन्मार्गक्षेमकरीतथा॥४०॥
टीका-और मेरा अहंकार मन और बुद्धि इनकी धर्मधारिणी रक्षा क-
रोतिसीप्रकार मेरा प्राण अपान व्यान उदान समान ॥ ३६॥ इन पंच
प्राणोंकी वजहस्ता रक्षा करो और प्राणकल्पकी शोजना रक्षा करो रसके
विषे रूपके विषे गंधके विषे शब्दके विषे स्पर्शके विषे योगिनी करो
॥ ३५ ॥ और सर्वदा सत्वगुण रजोगुण तमोगुण इनकी नारायणी रक्षा
करो और आयुकी वाराही रक्षा करो और धर्मकी वैष्णवी रक्षा करो॥३८॥

भाषाटीकासमन्वितम् । यश कीर्ति लक्ष्मी धन विद्या इनकी चक्रिणी रक्षा करो हेइन्द्राणि तुम मेरे गोत्रकी रक्षाकरो और हेचंडिके तुम मेरे पशुओंकी रक्षाकरो ॥३९॥ पुत्रोंकी महालक्ष्मी रक्षाकरो भार्याकी भैरवी रक्षाकरो और पन्थाकी सुपथा और तिसीमकार मार्गकी क्षेमकरी रक्षाकरो॥४०॥.... राजद्वारेमहालक्ष्मीर्विजयासर्वतःस्थिता।रक्षाहीनंतुयत्स्थान- वर्जितंकवचेनतु॥४१॥तत्सर्वरक्षमेदेविजयन्तीपापनाशिनी।। पदमेकनगच्छेत्तुयदीच्छेच्छुभमात्मनः ॥४२॥ कवचेनावृतो नित्यंयत्रयत्रैवगच्छति ॥ तत्रतंत्रार्थलाभश्वविजय सार्वका मिकः ॥ ४३ ॥ ययचिंतयतेकामंतंतंप्राप्नोतिनिश्चितम् ॥ परमैश्वर्यमतुलंप्राप्स्यतेभूतलेपुमान् ॥४४॥ निर्भयोजाय- तेमर्त्य संग्रामेष्वपराजितः ॥ त्रैलोक्येतुभवेत्पूज्य कवचेनावृ. तःपुमान् ॥ ४६॥ टीका-राजद्वारके विषे महालक्ष्मी रक्षाकरो तिसीप्रकार चौतरफ स्थि- तहुई विजया रक्षाकरो और रक्षा करके रहित और कवच करके वर्जित जो स्थान ॥४१॥ तिस संपूर्ण मेरे स्थानकी पापोंके नाश करनेवाली ऐसी जयंती हेदेवि तुम रक्षाकरो और जो मनुष्य अपना शुन चाहै तो कवचविना एकपैड न चले ॥४२॥ और जो कवच करके युक्तहुवा मनुष्य नित्यप्रति .: जहां जहां जाताहै तहां तहां उसको. लाज होताहै और उसका विजय होताहै ॥४३॥ फिर वह मनुष्य जिस जिसं कामकी इच्छा कताहै तिस तिस कामकों निश्चय करि प्राप्त होताहै और पृथ्वीके विषे अतुल उत्तम ऐश्वर्यकों प्राप्तहोताहै ॥४४॥ फिर वह कवच करके आवृतं पुरुष संग्रामके विषे निर्भय और अपराजित होताहै और त्रिलोकीके विषे पूज्य होवे ॥४५॥ इदंतुदेव्याःकवचं देवानामपिदुर्लभम् ॥ यः पठेत्प्रयतोनित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥ दैवीकलाभवेत्तस्यत्रैलोक्ये ध्वपराजितः॥ जीवेद्वर्षशतंसाग्रमपमृत्युविवर्जितः ॥१७॥ नश्यन्तिव्याधय सर्वैलूताविस्फोटकादयः ॥ स्थावरंजंगमं (८). सप्तशतीकवचम् । चैवकृत्रिमंचापियद्विषम् ॥४८॥ अभिचाराणिसर्वाणिमं त्रयंत्राणिभूतले ॥ भूचराखेचराश्चैवकुलजाश्चोपदेशिकाः ॥ ॥४९॥ सहनाकुलजामालाडाकिनीशाकिनीतथा ॥ अन्त- रिक्षचराधोराडाकिन्यश्चमहावलाः ॥५०॥ टीका-और यह देवीका कवच देवताओंकोजी दुर्लभहै जो पुरुष श्र. द्धाकरके युक्त और एकाग्रचित्तहुवा इस कवचको नित्यप्रति त्रिकालपढे ॥ ४६ ॥ तो उस पुरुषकी देवी के समान कला होवे और वह तीनो लो- कोंके विषे किसी करके पराजित नही होवे और वह अपमृत्युकरके वर्जित- हुवा शतवर्ष जीवे ॥ ४७ ॥ और लूता विस्फोटकासे आदिलेकर जे व्या- धिहै और स्थावर शंखिया आदि जंगम सर्प आदि कृत्रिम बनाहुवा जो तीन प्रकारका विषहै ये संपूर्ण उपद्रव उस पुरुषके नष्ट होजातेहै अर्थात् उस पुरुषको क्लेश नहीं देशंकतेहैं ॥४८॥ और पृथ्वीके विषे मंत्रयंत्ररूपी जे अभिचारहैं अर्थात् मूठ आदि कर्तवहै और भूचर खेचर कुलज उपदेशि- क येशी संपूर्ण उपद्रव उसपुरुषको स्पर्श नहीं कर शकतेहै ॥ १९ ॥ और सहजा कुलजा माला तथा डांकिनी शाकिनी और अंतरिक्षमें विचरनेवाली भयंकर और बलवान में डाकिनी ॥ ५० ॥ ग्रहभूतपिशाचाञ्चयक्षगन्धर्वराक्षसाः ॥ ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूश्माण्डाभैरवादयः॥५१॥ नश्यन्तिदर्शनात्तस्यकवचेह- दिसंस्थिते ॥ मानोन्नतिर्भवेदाज्यंतेजोवृद्धिकरंपरम् ॥५२॥ यशसावर्धतेसोऽपिकीर्तिमण्डितभूतले ॥ जपेत्सप्तशतीचण्डी कृत्वातुकवचंपुरा ॥ ५३॥ यावद्भूमंडलंधत्तेसशैलवनकान- नम् ॥ तावत्तिष्ठतिमेदिन्यांसन्ततिःपुत्रपौत्रिकी ॥ ५४॥ देहान्तेपरमंस्थानंयत्सुरैरपिदुर्लभम् ॥ प्राप्नोतिपुरुषोनित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥ लभतेपरमरूपंशिवेनसहमोदते ॥ ६६ ॥ इतिवाराहपुराणेहरिहरब्रह्मविरचितंदेव्याःकवचं का समाप्तम् ॥ श्रीजगदंबार्पणमस्तुः ।। - भाषाटीकासमन्वितम् । (९) टीका और ग्रह भूत पिशाच यक्ष गन्धर्व राक्षस ब्रह्मराक्षस वेताल कू- मांड भैरव इन आदि जे उपद्रव है ॥५१॥ वे जिसके हृदयके विषे कवच स्थित हुएसते तिसके दर्शनमात्रसे ये संपूर्ण नष्ट होजाते है अर्थात् स्पर्श नहीं कर सकते है और पृथ्वी के ऊपर इस कवचके प्रतापसे उस पुरुषके मानकी उन्नति होवे और तेजको बढानेवालो उस पुरुषको उत्तम राज्य होवे ॥५२॥ और जो पुरुष पहिले कवचकों करके सप्तशती चण्डीको जपे वह पुरुषभी कीर्ति करके शोजित भूमण्डलके विषे यश करके बढताहै ॥५३॥ और जब पर्यंत. शेष मण्डलको धारण कर्ता है तब पर्यन्त पृथ्वीके विषे उस पुरुषकी पुत्रपौत्रकी संतति स्थित रहती है ॥ ५४॥ फिर देहके अंत समयके विषे वह पुरुष महामायाकी कपासे देवताओं करकेभी जो दुर्लभ स्थान है तिसको निश्चयकर प्राप्त होताहै ॥ ५५ ॥ फिर मनोहर रूपको प्राप्त होताहै और शिवजी के साथ आनंद कर्ता है ॥ ५६ ॥ इति वाराहपुराणे हरिहरब्रह्मविरचितं देव्याः कवचं समाप्तम् ॥ ॥ इति देव्याः कवचं समाप्तम् । ॥

अथ अर्गलास्तोत्रम्।
ॐनमश्चण्डिकायै॥जयन्तीमङ्गलाकालीभद्रकालीकपालिनी।
दुर्गाक्षमाशिवाधात्रीस्वाहास्वधानमोस्तुते ॥१॥ जयत्वंदेवि
चामुण्डेजयभूतातिहारिणी॥जयसर्वगतेदेविकालरात्रिनमोस्तु
ते॥२॥ मधुकैटभविद्राविविधातृवरदेनमः ॥ रूपंदेहिजयं
देहियशोदेहिद्विषोजहि ॥३॥ महिषासुरनिर्णाशिभक्तानांसुख-
देनमः ॥ रूपंदेहिजयंदेहियशोदेहिद्विषोजहि॥॥रक्तबीजवधे
देविचंडसुंडविनाशिनि।।रूपं देहिजयंदेहियशोदेहिद्विपोजहि ॥६॥
टीका-ॐ नमश्चण्डिकायै । जयन्ती, मङ्गाला, काली, भद्रकाली, कपा-
लिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा, स्वधा तुझारेको नमस्कार ॥१॥
हे देवि हे चामुण्डे तुझारा जय हो हे भूतानिहारिणि तुलारा जय हो हे सर्व-
गते तुलारा जयहो हे कालरात्रि तुमको नमस्कार ॥ २ ॥ हे मधुकैटभकों
मोह प्राप्त करनेवाली हे ब्रह्माकों वर देनेवाली हमको रूप यो जय यो यश
यो हमारे शत्रुओंको मारो ॥ ३॥ हे महिषासुरको मारनेवाली और हे भ-
कोंको सुख देनेवाली तुमको नमस्कार हमको रूप जय यश यो और हमारे
शत्रुओंको मारो ॥ ४ ॥ हे रक्तबीजको मारनेवाली हे चण्डमुण्डकों विनाश
करनेवाली हमको रूप, जय, यश बो और हमारे शत्रुओंको मारो ॥ ५ ॥
शुभस्यैवनिशुंभस्य धूम्राक्षस्यचमर्दिनि॥रूपंदेहिजयं देहिय-
शोदेहिद्विषोजहि ॥६॥ वन्दितांत्रियुगेदेविसर्वसौभाग्यदायि
निरूपं देहिजयंदेहियशोदेहि द्विषोजहि ॥७॥अचिन्त्यरूपचरि
तेसर्वशत्रुविनाशिनि।।रूपदेहिजयं देहियशोदेहिद्विषोजहि ॥८॥
नतेभ्यःसर्वदाभत्त्यांचण्डिकेदुरितापहे ॥ रूपंदेहिजयंदेहिय
शोदेहिद्विषोजहि ॥९॥स्तुवन्योभक्तिपूर्वत्वांचण्डिकेव्याधिना
कर शिनि ॥ रूपदेहिजयदेहियशोदेहिद्विषोजहि ॥ १० ॥

भाषाटीकासमन्वितम् ।
(१३)
टीका-हे शुंभ और निशुंभ और धूम्राक्ष इनका नाश करनेवाली हमको
रूप, जय, यश यो और हमारे शत्रुओंको मारो॥६॥हे वन्दितहैं पादयुग्म जिसके
ऐसी हे सर्व सौभाग्यकी देनेवाली हमकों रूप, जय, यश यो और हमारे शत्रुओं-
को मारो॥७॥ नहीं चितवन किये जाय रूप और चरित्र जाके ऐसी हे देवि
और हे सर्व शत्रुओंका विनाश करनेवाली हमको रूप, जय, यश यो और
शत्रुओंको मारो ॥ ८॥ हे चण्डिके हे पापोंको नाश करनेवाली सर्वकाल
भक्ति करके नत जे हम हैं हमकों रूप, जय, यश द्यो- और शत्रुओंको मारो
॥९॥हे चण्डिके हे व्याधिनाशिनी भक्तिपूर्वक स्तुति कर्ने हुएको रूप, जय,
यश यो और शत्रुओंको मारो ॥ १० ॥
चण्डिकेसततयेत्वामर्चयंतीहभक्तितः ॥ रूपंदेहिजयदेहिय-
शोदेहिद्विषोजहि॥११॥देहिसौभाग्यमारोग्यदेहिमेपरमसुखं ।
रूपं देहिजयदेहियशोदेहि द्विषोजहि ॥१२॥ विधेहिद्विषतांनाशं.
विधेहिबलमुच्चकैमरूपं देहिजयदेहियशोदेहिद्विषोजहि ॥१३॥
विधेहिदेविकल्याणविधेहिपरमाश्रियं ॥ रूपदेहिजयंदेहिय-
शोदेहिद्विषोजहि ॥१४॥ सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके
रूपंदेहि जयंदेहियशोदेहिद्विषोजहि ॥ १५ ॥
टीका-हे चण्डिके इस भूलोकके विषे जे कोई भक्तिसे तुमको पूजते हैं
तिनको रूप, जय, यश द्यो और तिनके शत्रुओंको मारो ॥ ११ ॥ हे देवि
हमको सौभाग्य, आरोग्य, उत्तम सुख द्यो और रूप, जय, यश यो और
शत्रुओंको मारो ॥ १२ ॥ हे देवि शत्रुओंको नाश करो हे देवि बडा पराक्रम
करो और रूप, जय, यश यो और शत्रुओंको मारो ॥ १३ ॥ और हे देवि
कल्याण, उत्कृष्ट लक्ष्मी करो और रूप, जय, यश यो और शत्रुओंको
मारो॥१४॥ और सुर और असुर इनके शिरोरत्न करके निघृष्ट है चरण
जाके ऐसी तुम हे अंबिके रूप, जय, यश यो और शत्रुओंको मारो ॥१५॥

(१२) अर्गला स्तोत्रम् । विद्यावन्तयशस्वन्तंलक्ष्मीवंतंजनंकुरु ॥रूपदेहिजयदेहियशो देहिद्विषोजहि ॥१६॥ प्रचण्डदैत्यदर्पनेचण्डिकेप्रणतायमे ॥ रूपंदेहिजयदेहियशोदेहिद्विषोजहि ॥१७॥ चतुर्भुजेचतुर्वसं स्तुतेपरमेश्वरि ॥ रूपदेहिजयदेहियशोदेहिद्विषोजहि ॥१८॥ कृष्णेनसंस्तुतेदेविशश्वद्भक्त्यासदाम्बिके । रूपंदेहिजयदेहि यशोदेहिद्विषोजहि ॥ १९॥ हिमाचलसुतानाथसंस्तुतेपरमे- श्वरि ॥ रूपदेहिजयंदेहियशोदेहिद्विषोजहि ॥२०॥ टीका-और विद्यावान् लक्ष्मीवान् और यशस्वी पुरुष मेरेको करो और रूप जय यश यो और शत्रुओंकों मारो ॥ १६ ॥ और हे प्रचण्ड दै- त्योंका गर्वविध्वंसनकरनेवाली हेचण्डिके भक्तिसे प्रणत जो मेहुँ तिसको रूप जय यश यो और शत्रुओंको मारो ॥ १७ ॥ हे चार भुजावाली हेब्रह्म- संस्तुते हेपरमेश्वरि हमको रूप जय यश यो और शत्रुओंको मारो ॥ १८ ॥ और हे कृष्णकरके निरंतर भक्तिसे सदा स्तुति किईहुई हे अंबिके हमको रूप जय यश यो और शत्रुओंको मारो ॥ १९॥ और हे शिवकरके स्तुति किईहुई हेपरमेश्वरि हमको रूप जय यश यो और शत्रुओंको मारो॥२०॥ इन्द्राणीपतिसद्भावपूजितेपरमेश्वरि ॥ रूपदेहिजयंदेहियशो- देहिद्विषोजहि ॥२१॥ देविप्रचण्डदोर्दडदैत्यदर्पविनाशिनी॥ रूपदेहिजयंदेहियशोदेहिद्विषोजहि ॥२२॥ देविभक्तजनोद्दा मदत्तानन्दोदयेम्बिके । रूपंदेहिजयंदेहियशोदेहिद्विषोजहि॥ ॥२३॥ पत्नींमनोरमांदेहिमनोवृत्तानुसारिणीम् ॥ तारिणी दुर्गसंसारसागरस्यकुलोद्भवाम् ॥२४॥ इदंस्तोत्रंपठित्वातुम हास्तोत्रंपठेन्नरः ॥ सतुसप्तशतीसंख्यावरमाप्नोतिसम्पदाम्॥२६॥ इतिमार्कण्डेयपुराणे अर्गलास्तोत्रं समाप्तम् ॥२॥ टीका-और हेइंद्राणि हे पतिसद्भावपूजिते हेपरमेश्वरि हमकों रूप जय ne- भाषाटीकासमन्वितम् । (१३) यश यो और शत्रुओंकों मारो ॥ २१ ॥ हेदेवि हेप्रचण्डसुजदण्डों करके दैत्योंका गर्वविध्वंस करनेवाली हमकों रूप जय यश दो और शत्रुओंको मारो ॥ २२ ॥ हे देवि हेभक्तजनोंको अत्यन्त दियोहै आनन्दोदय जाने ऐसी तुम हमको रूप जय यश दो और शत्रुओंकों मारो ॥ २३ ॥ और हे देवि मनकों रंजन करनेवाली और हमारे मनके वृत्तान्तके अनुकूल चलनेवाली और दुर्गम संसाररूपी सागरके मध्यमें तरानेवाली ऐसी पत्नी हम को दो ॥ २४ ॥ और जो मनुष्य इसस्तोत्रकों पढके महास्तोत्र पढे वह मनुष्य संपत्तियोंका सप्तशतीसंख्यावरकों प्राप्तहोवे ॥ २५ ॥ इति मार्कण्डेय पुराणे अर्गलास्तोत्रं समाप्तम् ॥ इति अर्गलास्तोत्रम्।

श्रीः। अथ कीलकस्तोत्रम्। ॐ नमश्चण्डिकायै ।। मार्कण्डेय उवाच ॥ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे ॥ श्रेय प्राप्तिनिमित्तायनमःसोमाद्धधारिणे ॥१॥ सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामपिकीलकम्।।सोपिक्षेमम वानोतिसततंजाप्यतत्परः॥ २॥ सिद्धयन्त्युच्चाटनादीनिवस्तू निसकलान्यपि ॥ एतेनस्तुवतादेवीस्तोत्रमात्रेणसिद्ध्यति३॥ नमंत्रनौषधंतत्रनकिञ्चिदपिविद्यते ॥ विनाजाप्येनसिद्धये तसर्वमुच्चाटनादिकम् ॥ ४॥ समग्राण्यपिसिद्धयतिलोकशं कामिमांहरः ॥ कृत्वानिमंत्रयामाससर्वमेवमिदंशुभम् ॥६॥ टीका-ॐनमश्चण्डिकायै। मार्कण्डेयऋषि जैमिनीसे वर्णन करतेभये परंतु प्रथमशिवकों नमस्कार किया कैसै कि विशुद्धज्ञानहै देह जिनका और तीनों वेदहै दिव्यनेत्र जिनके और कल्याणप्राप्तिको कारण और अर्द्धचंद्रको मस्तकमें धारणकरनेवाले ऐसे शिवको नमस्कार ॥ १ ॥ फिर कहनेलगे म- नुष्य मन्त्रोंकाभी यह संपूर्ण कीलक जानों जो निरन्तर इसके जाप्यमें तत्पर रहताहै सो निश्चयकार क्षेमको प्राप्तहोताहै ॥ २ ॥ और इसके जपमात्रसे उच्चाटन आदि कृत्य सिद्धहोतेहै और यावत्संपूर्ण वस्तुभी सिद्धहोतीहै और इसकरके स्तुति करतेहुओंके देवी स्तोत्रमात्रकरके सिद्धहोतीहै ॥ ३॥ और नमन्त्र और न औषध कुछभी तिसके जाप्यके विना सिद्ध नही होवे और तिसी प्रकार संपूर्ण उच्चाटनादिक सिद्ध न होवें ॥४॥ फिरइन मन्त्रोंके प्रभावसे निश्च- यकरि संपूर्णवस्तु सिद्धहोतीहै तो लोकमें परस्पर ईर्ष्याकरके अन्याय होजा- यगा इस लोकशंकाकोजानिके शिवजी सामन्त्रसमुदायकों कीलितकिया॥५॥ स्तोत्रवैचण्डिकायास्तुतच्चगुप्तंचकारसः ॥ समाप्नोतिसपुण्ये- नतांयथावन्नियन्त्रणाम् ॥ ६ ॥ सोपिक्षेममवाप्नोतिसर्वमेवन- भाषाटीकासमन्वितम् । (१५) संशयः ॥ कृष्णायांवाचतुर्दश्यामष्टम्यांवासमाहितः॥७॥ ददातिप्रतिगृह्णातिनान्यथैषाप्रसिद्धयति । इत्थंरूपेणकीलेन महादेवेनकीलितम् ।। ८॥ यो निष्कीलां विधायैनांनित्यंज पतिसंस्फुटं ॥ प्रसिद्धःसगणस्सोपिगन्धर्वोजायतेनरः ॥९॥ नचैवाप्यटतस्तस्यभयंक्वापिहिनायते ॥ नाऽपमृत्युवशंया तिमृतोमोक्षमवाप्नुयात् ॥१०॥ टीका-और चंडिकास्तोत्रको गुप्तकिया और जो पुण्यवान् मनुष्यहै सो पुण्यके प्रभावकरके उस यथावत् नियंत्रणाको प्राप्तहोताहै ॥६ ॥ और जो पुरुष कृष्णपक्षकी अष्टमीके और चतुर्दशीके विषे विधिसे सप्तशतीको उपदेश देताहै अथवा ग्रहणकीहै वह पुरुष निश्चयकरि क्षेमकों प्राप्तहोताहै और प्रकारसे यह भगवती सिद्ध नहीं होतीहै इस प्रकारके कीलककरके शिवजीने मन्त्रसमूहको कीलितकिया ॥ ७ ॥ ८ ॥ और जो पुरुष उत्की- लितकरके सुंदरप्रकारसे सप्तशतीकों जपताहै सो प्रसिद्ध और गणकरके स- हित गन्धर्व होताहै ॥ ९ ॥ और विचरते हुए उस पुरुषको मार्गमें कहूँ भय उत्पन्न नहीं होताहै और वह मनुष्य अपमृत्युके वश नही प्राप्तहोताहै और मरतेही मोक्षको प्राप्तहोताहै ॥ १० ॥ ज्ञात्वाप्रारभ्यकुर्वीतनकुर्वाणोविनश्यति ॥ ततोज्ञात्वैवसम्प त्रमिदम्प्रारभ्यतेबुधैः॥ ११॥ सौभाग्यादिचयत्किञ्चिदृश्यते ललनाजने ॥ तत्सर्वतत्प्रसादेनतेनजाप्यमिदंशुभम् ॥१२॥ शनैस्तुजप्यमानेस्मिन्स्तोत्रेसम्पत्तिरुच्चकैः॥ भवत्येवसमया पिततःप्रारभ्यमेवतत् ॥ १३॥ ऐश्वर्ययत्प्रसादेनसौभाग्या, रोग्यसम्पदः॥ शत्रुहानिःपरोमोक्षास्तूयतेसानकिंजनैः॥१४॥ इति भगवत्याः कीलकस्तोत्रं समाप्तम् ॥३॥शुभंभूयात् ॥ टीका-मनुष्य निश्चयात्मक जानिके और विधिसे प्रारंभ करके सप्तश- कीलकस्तोत्रम् । तीको अनुष्ठानकरे और विधिसे अनुष्ठान नहीक हुवा मनुष्य नाशको प्राप्त होताहै तिसकारणसे इसको विधान सहित जानिकेही विद्वान प्रारंभ कर्तेहै ॥३१॥और जो कुछ सौभाग्य आदि स्त्रीजनमें दीखताहै वह सब तुझारी कपा करके है तिसकारणसे तुलारा यह शुभस्तोत्र जपना चहिए ॥ १२ ॥ और धीरेसे यह सप्तशतीस्तोत्र जपे जाते संते अथवा उच्चस्वरसे जपेजाते सन्ते निश्चयकरि मनुष्यके समय संपत्ति होती है और तबसे लेकरही जिसकी उपासे ऐश्वर्य सौभाग्य आरोग्य संपत्ति ये होतीहै फिर वह भगवती क्या मनुष्यो करके नहीस्तुति किई जाती है किन्तु किईही जातीहै ॥ २४ ॥ इति भगव- त्याः कीलकस्तोत्रं समाप्तम् ॥ ३ ॥ इति कीलकस्तोत्रं समाप्तम् । पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराजश्रीकृष्णदास श्रीवेङ्कटेश्वर" छापखाना (मुंबई.)

श्री।
अथ दुर्गासप्तशती
भाषाटीकासमेता।
मार्कण्डेय उवाच ।
सावणिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः ॥ निशामयतदु-
त्पत्तिविस्तराद्दतोमम ॥१॥ महामायानुभावेनयथामन्वं-
तराधिपः ॥ सबभूवमहाभागः सावर्णिस्तनयोरवेः ॥ २॥
स्वारोचितरपूर्वचैत्रवंशसमुद्भवः ॥ सुरथोनामराजाभूत्सम-
स्तेक्षितिमण्डले ॥३॥ तस्यपालयतःसम्यक्प्रजाः पुत्रानि-
चौरसान् । बभूवुःशत्रवोभूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा ॥ ४ ॥
श्रीगणेशाय नमः । श्रीकृष्णचन्द्रो विजयतेतराम् ॥अथ भाषादीकेयं सप्त-
शत्याः॥ एक समय तपस्या करते हुये महात्मा मुनियोंमें श्रेष्ठ ऐसे जो मार्क.
ण्डेय ऋपि तिनसे बड़े तेजस्वी व्यासजीके शिष्य जैमिनि ऋषि प्रश्न करते भये
हे मार्कण्डेय बुद्धिमानोमें श्रेष्ठ सब शास्त्रमें निपुण सब माहात्म्यनमें बड़ा
उत्तम जो देवीका माहात्म्य है ताहि श्रवण करिवेकी मेरी इच्छा है सो आप
रुपा करि वर्णनकरो तब मार्कण्डेय ऋषि बोले हे जैमिनि तुमसे एक कथा-
प्रसंग ऐसा वर्णन करूंहूँ ताके बीचमें देवीहीको बहुत माहात्म्य है ताहि तुम
श्रवण करो व्यासआदि ऋषियोंनै सूर्यका पुत्र सावर्णि नाम आठवाँ मनु
कहा है ताकी उत्पत्ति विस्तारपूर्वक हमसे श्रवण करो॥१॥ वह सूर्यका पुत्र
सावर्णि मनु महामाया भगवतीकी कपासे जैसे आठवाँ मन्वन्तरका स्वामी
होताया तैसे आप चरित्र श्रवण करो॥२॥ पहिले स्वारोचिष मन्वन्त-
रके मध्यमें चैत्रवंशमें उत: संपूर्ण भूमण्डलमें चक्रवर्ती सुरथ नाम राजा
होता भया ॥ ३ ॥ कैसा है वह राजा कि प्रजावोंकी पालना पुत्रोकौसी तरह
करनेवाला ताकी राजधानी नष्ट करनेके लिये यवन भूप शत्रु बन संग्राम वास्ते
तयार होते भये ॥४॥

(२) सप्तशतीभाषाटीका। तस्यतरभवद्युद्धमतिप्रबलदण्डिनः ॥ न्यूनरपिसतेयुद्धको- लाविध्वसिभिर्जितः॥५॥ ततःस्वपुरमायातोनिजदेशाधि- पोभवत् ।। आक्रान्तः समहाभागस्तैस्तदाप्रवलारिभिः॥६॥ अमात्यैर्वलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्यदुरात्मभिः ॥ कोशोबलंचापह- तंतत्रापिस्वपुरेततः ॥७॥ ततोमृगयाव्याजेनहतस्वाम्यः सभूपतिः॥ एकाकीहयमारुह्यजगामगहनंवनं ॥८॥ टी०- फिर राजाका शत्रुवोंके साथ बड़ा युद्ध हुवा वह राजा महा प्रबल शत्रुवोंको वश करनेवालानी था परन्तु दैवयोगते निर्बलोंनेञी राजाको जीत लिया ॥५॥ पीछे संग्रामभूमिमें शत्रुवोंसे हारकर अपनी नगरीमें आते. • भये अपनो देशहीका स्वामी होताभया ॥ ६ ॥ फिर उस नगरीके विषे दुर्बल वसता हुवा राजा ताका राज्य हरणके लिये दुष्ट मंत्रियोंने फौज खजाना सब अपने वश करलिये ॥ ७ ॥ ऐसे जब राजाका सर्वस्व ले लिया ताके अनन्तर घोड़ापर बैठ शिकारका बहाना लेकर अकेला गंभीर वनको जाता भया ॥८॥ सतत्राश्रममद्राक्षीद्विजवर्यस्यमेधसः ॥ प्रशांतश्वापदाकीर्ण मुनिशिष्योपशोभितं ॥ ९ ॥ तस्थौकंचित्सकालंचमुनिना तेनसत्कृतः॥ इतश्चेतश्चविचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे ॥१०॥ सोचिंतयत्तदातत्रममत्वाकृष्टमानसः ॥ मत्पूर्वैपालितंपूर्वम- याहीनंपुरंहितत् ॥ ममृत्यैस्तैरसदृत्तेधर्मतःपाल्यतेनवा ॥ ॥११॥ नजानेसप्रधानोमेशूरहस्तीसदामदः ॥ ममवैरिवशं यात कान्भोगानुपलप्स्यते ॥ १२॥ टी०- फिर वा वनके विष पशुहिंसासे रहित शान्त स्वभाववाले सिंह वगैरह करिकै युक्त मुनिकी शिष्यमण्डलीसे शोभित ऐसा सुमेधा ऋषिका आश्रम देखताभया ॥ ९ ॥ ताके अनन्तर जहां तहां विचरताहुवा मुनिके अध्याय १ (३) आश्रममें पहुँचता जया मुनिने कोमल वचनोंसे राजाका सत्कार किया पश्चात कुछ काल तो आश्रममें राजा निवासमी करता भया ॥ १० ॥ तब वा आश्रमके विषे ममता करिकै व्याकुल है बुद्धि जिसकी ऐसा जो सुरथ राजा है सो चिन्ता करता भया कि हाय ! जो पुर पहिले मेरे बड़ोंने वसा कर पालन कियाथा सो पुर मेरेसे शत्रुवोंने ले लिया फिर इस प्रकार मनमें विचार करने लगा कि निश्चय करिकै दुष्ट है चरित्र जिनके ऐसे मेरे मंत्रियोंसे आदि लेकर जे नौकर हैं वे मेरे पुरकी धर्मपूर्वक पालना करतेहैं या नहीं॥ ११ ॥ और मेरा शूर हस्ती जो सदा मत्त रहता था वह मेरा शत्रुवोंके वश होकर कौनसे भोग भोगता होगा ॥ १२ ॥ येममानुगतानित्यप्रसादधनभोजनैः ॥ अनुवृत्तिध्रुवतेद्यकुर्व- त्यन्यमहीभृताम् ॥ १३ ॥ असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततंव्ययम्।। सचिंतःसोतिदुःखेनक्षयकोशोगमिष्यति॥१४॥ एतच्चान्यच्चसततंचिंतयामासपार्थिवः ॥ तत्रविप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकंददर्शसः ॥ १५ ॥ सपृष्टस्तेनकस्त्वंभोहेतुश्चागम- नेत्रकः ॥ सशोकइवकस्मात्त्वंदुर्मनाइवलक्ष्यसे ॥ १६ ॥ टीका-और जे मेरे सेवक धन भोजनादिक से संतुष्ट थे वे अनाथ और राजावोंकी निश्चय करिकै सेवा करते होंगे ॥ १३॥ और बडे दुःखसे संचय कियाहुवा जो खजानाहै सो अब बुरीरीतिसें खर्च करनेवाले मंत्रियोंकरिकै नष्ट होजायगा ॥ १४॥ इन बातोंकों तथा अन्य वातोको शोच कारकै रा- जा शोकयुक्त चिन्ता करताभया ता समय वा आश्रमके समीप राजा एक वैश्यको देखताभया॥१५॥और पूछने लगा कि हेमाई! तुम कौनहो? किस- कारणसे इस अश्रममें तुह्मारा आगमन हुवा ? किसकारणसे तुम शोकयुक्तसे दीखतेहो और विमनसे कैसे दीखतेहो ॥ १६ ॥ इत्याकर्ण्यवचस्तस्यभूपतेःप्रणयोदितम् ॥ प्रत्युवाचसतवै- श्य प्रश्रयावनतोनृपं ॥ १७ ॥ वैश्यउवाच ॥ समाधिर्नाम (४) सप्तशतीभाषाटीका। वैश्योहमुत्पन्नोपनिनांकुले ॥ पुत्रदारनिरस्तश्चधनलोभादसा- धुभिः॥ १८॥ विहीनश्चधनदारैःपुत्रैरादायमेधनम् ॥ वनम- भ्यागतोदुःखीनिरस्तश्चाप्तवन्धुभिः॥ १९॥ सोहनवेमिपुत्रा- णांकुशलाकुशलात्मिकाम् ॥ प्रवृत्तिस्वजनानांचदाराणांचा- त्रसंस्थितः॥२०॥ टीका-ऐसे कोमल वचन राजाके श्रवण करिकै वैश्य विनयपूर्वक बो- लताभया॥१७॥वैश्य बोला हे राजन् मैं समाधिनाम वैश्यहूँ और धनवानों के वंशमें उत्पन्न हुवाहूँ धनलोभसे पुत्र स्त्री स्वजनों करिकै तिरस्कृतहूँ ॥१८॥और संपूर्ण स्त्री पुत्र बंधु परिवारने मेरा धन छीनकर तिरस्कार किया सो धनहीन दुःखी होकर दोदिशौँमें नमताहुवा वनमें आयाहूँ और पुत्रादिकनसे वियु- कहूं इसकारणसे मैं शोकयुक्तहूँ ॥ १९ ॥ और मैं या वनके बीचमें स्थित हुवा स्त्री पुत्र मित्रादिकनकी कुशल क्षेमकी वार्ताभी नहीं जानताहूँ॥२०॥ किंनुतेषांगृहेक्षेममक्षेमकिंनुसांप्रतम् ॥ कथतेकिंनुसत्तादु- ताकिंनुमेसुताः॥२१॥ राजोवाच ॥ यनिरस्तोभवाउँब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनातेषुकिंभवतः स्नेहमनुवनातिमानसम्२२ वैश्यउवाच ॥ एवमेतद्यथाप्राहभवानस्मद्वचः ॥ किंकरो मिनबध्नाति ममनिष्ठुरतांमनः॥ २३ ॥ यैःसन्त्यज्यपितृस्ने हंधनलुब्धैनिराकृतः॥पतिस्वजनहादैचहार्दितेष्वेवमेमनः॥२४॥ टीका- और स्त्री पुत्र बंधु जनोंके घरमें कुशलहै या नहीं अब यह वार्चा कैसे निश्चय करूं वे मेरे पुत्र जे हैं ते सुमार्गमै हैं या कुमार्गमैं यह दोनो बार्ता मेरेकों कैसे निश्चय होय ॥ २१ ॥ तब सुरथराजा बोलते भये कि हे वैश्य ! धनके लोभते स्त्री पुत्रादिकोंने तुलारा निरादर किया ऐसे कुटिल स्त्री पुत्रादिकनके विषे तुलारा चिच स्नेह कैसे करताहै ॥ २२॥ वैश्यने कहा कि हे राजन् ! जैसा आपने कहा वह ऐसाही है परंतु मैं क्या करूं मेरा मन कठोर- ताको नहीं धारणकरता ॥ २३ ॥ धनके लोभी जिन दुष्टोंने पिताका स्नेह अध्याय १ (५) और स्त्रीने पतिका स्नेह छोडकर मुझको निकालदिया फिर भी तिनमेंही मेरा •मन स्नेहयुक्तहै ॥२४॥ किमेतन्नाभिजानामिजाननपिमहामते ।। यत्प्रेमप्रवर्णचित्तवि गुणेष्वपिबंधुषु ।।२५ ॥ तेषांकृतेमेनिःश्वासोदौर्मनस्यंचजा- यते ॥ करोमिकियनमनस्तेष्वप्रीतिषुनिष्ठुरम् ॥ २६ ॥ मार्कंडेयउवाच ॥ ततस्तौसहितौविप्रतमुनिसमुपस्थितौ ॥ समाधिर्नामवैश्योसौसचपार्थिवसत्तमः ॥२७ ॥ कृत्वातुतौ यथान्याययहितेनसंविदम् । उपविष्टौकथा-काश्चिचकतुर्दै श्यपार्थिवौ ॥ २८ ॥ टीका-हेराजन् ! गुण करिकै हीन जे मेरे बन्धु हैं तिनके विषेनी मेरा चित्त प्रेमयुक्तहै यह जानताहुवानी मैं चित्तको रोक नहींसकताहूँ ॥ २५ ॥ हे राजन और मेरे विषे जिनकी प्रीति नहीं ऐसे ने मेरे पुत्रादिकहैं तिनके लिये मेरेको शोक और चित्तको ग्लानिहै मैं क्याकरूं मेरा चित्त उनके विषे कठोरता धारण नहीं करताहै ॥ २६ ॥ मार्कण्डेयऋषि बोले हेजैमिनि ता प्रसंगके अनंतर मित्रनावसे समाधिनाम वैश्य और सुरथराजा ये दोनो सुमे धाऋषिके समीप जा पहुँचे ॥ २७ ॥ फिर वे दोनोजनोने यथाशास्त्र और यथायोग्य मुनीश्वरसे संनापणादि किया फिर मुनीने कोमलवाणीसे सत्कार पूर्वक बैठालिये फिर ये मुनीश्वरसे अपने स्वार्थकी वार्ता पूछतेभये ॥२८॥ राजोवाच॥भगवंस्त्वामहंप्रष्टुमिच्छोम्यकंवदस्वतत् ॥ दुःखा- ययन्मेमनसःस्वचित्तायत्ततापिना ॥ २९ ॥ ममत्वंगतराज्य स्यराज्यांगेष्वखिलेष्वपि ॥ जानतोपियथाज्ञस्यकिमेतन्मुनि सत्तम ॥ ३० ॥ अयंचनिकृतःपुत्रैर्दारे त्यैस्तथोज्झितः ॥ स्वजनेनचसंत्यक्तस्तेषुहार्दीतथाप्यति ॥३१॥ एवमेषतथाई चद्वावप्यत्यंतदुःखितौ।।दृष्टदोषेपिविषयेममत्वाकृष्टमानसौ३२॥ टीका-राजा बोले कि हे भगवन् तुलारेसे एक रहस्य पूछनेकी इच्छा 1 (६) सप्तशतीनावाटीका। करूंहूं ताहि तुम कहो मेरे चित्तको अपने निश्चयात्मक स्वरूपके विषे एका- अता विना जो अवस्थाहै सो दुःख देरहीहै ॥ २९ ॥ हे मुनिसत्तम ! राज्य मेरा चलागया यह मैं जानताजीहूँ परंतु स्वामी, अमात्य, सुहृत्, कोश, राष्ट्र बल ये सात राज्यके अंगहै तिनके विषे मेरी. अज्ञानीकीसी तरह ममताहै. सो क्या कारणहै ॥ ३० ॥ और यह जो वैश्यहै सो पुत्र कलनादिकन क- रिकै तथा नानादिकन करिकै त्यक्तहै तौभी उनके विपे अति स्नेहवान है ॥ ३३ ॥ और हेमुनिसत्तम । ऐसे यह तथा मैं दोनो दुःखी तहाँ देखाहै दोष जाके विषे ऐसे राज्यादिकनके विषेनी ममत्व करिकै आधीनहै मन जिनका ऐसे हम, ॥३२॥ तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहोज्ञानिनोरपि ॥ ममास्यचभवत्ये पाविवेकांधस्यमूढता ॥३३॥ऋषिरुवाच ॥ ज्ञानमस्तिस मस्तस्यजतोषियगोचरे ॥ विषयाश्चमहाभागयांतिचैवपृथ- क्पृथक् ॥ ३४॥ दिवांधा-प्राणिन केचिद्रात्रावंधास्तथापरे।। केचिदिवातथारात्रौप्राणिनस्तुल्यदृष्टयः ॥३६॥ ज्ञानिनामनु जाःसत्यंकिंनुतेनहिकेवलायतोहिज्ञानिनःसर्वेपशुपक्षिमृगादयः॥ टीका-सो हेमहानाग हे मुने जिस कारणसे हम दोनो ज्ञानवानोंकोजी मोहहै यह क्या कारणहै जा मोहते यह विवेकरहित मनुष्यके योग्य जो अज्ञानता सो हमको होरहीहै ॥ ३३ ॥ तब ऋषि बोले कि हेराजन्! समस्त प्राणियोंकों इंद्रियके विषयमे ज्ञानहै और मोक्षक विषे ज्ञान नहींहै और हे महाभाग इन्द्रियनकी जे वृत्ति ते पृथक् पृथक् विषयताको प्राप्त होरहीहैं ॥३४॥ हेराजन् ! कितेक उलूकादिक प्राणी दिनमें दृष्टि हीनहैं और कित्तेक काकादिक प्राणी रात्रिके विषे दृष्टिहीनहैं और कित्तेक प्राणी अश्वसे आदि लेकर रात्रि दिनके विषे तुल्य दृष्टिवालेहैं ॥ ३५ ॥ हेराजन् ! तुमने कहा कि मनुष्य ज्ञानीहैं सो सत्यहै परंतु केवल मनुष्यही ज्ञानी नहींहै किन्तु मनुष्योंते अन्य पशु पक्षी मृगादिक ये सब ज्ञानी हैं ॥ ३६ ॥ m

अध्याय १
(७)
ज्ञानंचतन्मनुष्याणांयत्तेषांमृगपक्षिणाम्।।मनुष्याणांचयत्तेषां
तुल्यमन्यत्तथोभयोः॥३७॥ज्ञानेपिसतिपश्यैतान्पतङ्गाल्छा-
वचंचुषुकिणमोक्षाहतान्मोहात्पीड्यमानानपिक्षुषा ॥ ३८ ॥
मानुषामनुजव्याघ्रसाभिलाषा:सुतान्प्रति ॥ लोभात्प्रत्युपका
रायनन्वेतान्किनपश्यसि ॥३९॥ तथापिममतावतैमोहगर्ते
निपातिता॥ महामायाप्रभावेणसंसारस्थितिकारिणा ॥४०॥
टी०- हे राजन् ! जो स्वभावोत्पन्न ज्ञान मृग पक्षियोंको है वह मनुष्य-
नको नहीं है और मनुष्यनको जो शास्त्रोक्त ज्ञान है सो मृग पक्षियोंको नहीं
है और आहार निद्रा विषयादि ज्ञान मनुष्य मृग पक्षी इत्यादिकनको समान
है॥३७॥ और हे राजन् क्षुधा करिकै पीडित जे पक्षी हैं तिनको यह ज्ञान-
भी है कि जे कण पुत्रोंके मुखमें गेरिवे योग्य हैं ते कण हम भक्षण करितें
क्षुधा हमें बाधा नहीं करें तौभी मोहते अपने पुत्रोंके चंचुवोंमें कण गेरदेते हैं
इहें तुम देखो ॥ ३८ ॥ और हे मनुजव्या वृद्धावस्थामें ये हमारी सेवा
करेंगे इस प्रयोजनके लोभते पुत्रनके विषे मनुष्य कामनासहित व्है रहैं और
इन्हे पशु पक्षी मृगादिक केवल ममतासेही पुत्रनके विषे आदरयुक्त हैं इन्हे तुम
नहीं देखते हो और पुत्र प्रत्युपकारके लिये नहीं होतेहैं यह क्या तुम नहीं
देखते हो ॥ ३९ ॥ हे राजन् ! तौभी संसारकी पालना करनेवाला ऐसा जो
महामायाका प्रभाव ताने या संसार रूपी समुद्रके ममतारूपी अँवर के
मोहरूपी जो खाडा ताके विपे मनुष्यनको पटकरक्खे है ॥ ४० ॥
तन्नात्रविस्मय कार्योंयोगनिद्राजगत्पतेः ॥ महामायाहरेश्चै
पातयासंमोहतेजगत् ॥४१॥ ज्ञानिनामपिचेतांसिदेवीभग-
वतीहिसा ॥ बलादाकृष्यमोहायमहामायाप्रयच्छति॥४२॥
तयाविसृज्यतेविश्वजगदेतच्चराचरम् ॥ सैषाप्रसन्नावरदानृणां
भवतिमुक्तये ॥४३॥ साविद्यापरमामुक्तेर्हेतुभूतासनातनी॥
संसारबंधहेतुश्चसैवसर्वेश्वरेश्वरी ॥४४॥

(८) सप्तशतीभाषाटीका। टी-सो या वातके विषे आश्चर्य करना योग्य नहीं क्यों कि जगत्के स्वामी विष्णुकी जो योगनिद्रा महामाया है ताने जगत्को मोहित कर रासा है ॥ ४१ ॥ हे राजन् ! कैसी है वह महामाया कि उपनिषदोंके विपे वर्णन किया जो ज्ञान है ताका अनुभव करनेवाले ऐसे जे ज्ञानवान् पुरुप हैं विन केनी चिचनको बलसे बैंच कर ममताके आधीन करती है ॥ ४२ ॥ फिर हे राजन् ! वह भगवती कैसी है कि ता करिकै समस्त चराचर जगत् रचा जाता है सो यह प्रसन्न होनेसे मनुष्यनको वरदान और मोक्ष देतीहै ॥४३॥ परन्तु हे राजन् उस मायाके दो भेद हैं एक तो विद्या और दूसरी अविद्या जो अविद्या रूपा माया है सो संसारके बन्धनमें कारण है और ब्रह्मादिकन कांनी स्वामिनी है और जो सनातनी विद्या रूपा माया है सो मोक्षका कारण है ॥४४॥ राजोवाच ॥ भगवन्काहिसादेवीमहामायेतियांभवान् ॥ ब्र- वीतिकथमुत्पन्नासाकर्मास्याश्चकिंद्विज ॥ ४५ ॥ यत्प्रभावा चसादेवीयत्स्वरूपायदुद्भवा ॥ तत्सर्वश्रोतुमिच्छामित्वत्तो ब्रह्मविदांवर ॥ ४६॥ ऋषिरुवाच ॥ नित्यैवसाजगन्मूर्ति- स्तयासर्वमिदंततम् ॥ तथापितत्समुत्पत्तिर्षहुधाश्रूयतांम म॥ १७ ॥देवानांकार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवतिसायदा॥ उत्प- न्नेतितदालोकसानित्याप्यभिधीयते ॥ १८ ॥ टीका- तब राजा बोले हे भगवन् हे द्विज वह कौनसी देवी है जिसको आप महामाया कहतेहैं और कैसे उत्पन्न भई है इसका क्या कर्म है और क्या पराक्रम है ॥ ४५ ॥ और हे ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ उस देवीका कैसा सामर्थ्य है और कैसा स्वरूप है और कैसा प्रादुर्भाव है ये संपूर्ण वात तुमसे श्रवण करिवेकी मेरी इच्छा है ॥ ४६ ॥ तब ऋषि बोले संपूर्ण जगतकी आशयसूत शक्ति जा करिकै जगत् रचाहुवा हैं वह किसी करिकै रचित नहीं है तौनी वहुधा लोकके उपकारके वास्ते वाकी उत्पत्ति मेरेसे श्रवण

अध्याय १
(९)
करो॥४७॥ हे राजन् ! जब देवतानके कार्यकी सिद्धिके लिये प्रकट होती
है तब वह नित्यनी है परन्तु लोकमें उत्पन्न भई है यह कहा जाता है॥४८॥
योगनिद्रायदाविष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते ॥ आस्तीयशेषमभ-
जत्कल्पांतेभगवान्प्रभुः॥४९॥ तदाद्वावसुरौ घोरौ विख्या-
तोमधुकैटभौ॥विष्णुकर्णमलोद्भूतौहंतुंब्रह्माणमुद्यतौ ॥५०॥
सनाभिकमलेविष्णोःस्थितोब्रह्माप्रजापतिः ॥ दृष्ट्वातावसुरौ
चोग्रोप्रमुप्तचजनार्दनम् ॥५१॥ तुष्टावयोगनिद्रांतामेकाय-
हृदयःस्थितः ॥ विवोधनार्थायहरेहरिनेत्रकृतालयां ॥२॥
टीका-हे राजन् ब्रह्माके दिनके अनन्तर जो प्रलय ताकेविषे जब
सात समुद्र करिके जुदा जुदा स्थापन किया हुवा जगत् एकार्णवताको प्राप्त
हो गया ता समयकेविषे भगवान् ऐश्वर्यादिकनकरिकै सहित शेषशय्या
बिछाय कर योगनिद्राका सेवन करते भये अर्थात् शयन करते भये ॥४९॥
ता शयनसमयकेविपे विष्णुके कानों के मैलसे मधु और कैटभ ये दो दैत्य
उत्पन्न होते भये और ब्रह्माके मारनेको तयारभये ॥ ५० ॥ तब वह ब्रह्मा
विष्णुको नाभिकमलमें स्थित हुवा बड़े भयंकर असुरोंको देखकर और भग-
वान्को योगनिद्रासे शयन करता हुवा देखकर ॥५१॥ एकाग्र चित्त होयकर
विष्णुके जगानेके लिये हरिके नेत्रोंमें कियो है निवास जाने ऐसी जो योग-
निद्रा है ताकी स्तुति करतो भयो । ५२ ॥
विश्वेश्वरीजगद्धात्रीस्थितिसंहारकारिणीम् ॥ निद्राभगवतीवि
ष्णोरतुलांतेजस प्रभुः ॥५३॥ ब्रह्मोवाच ॥ त्वंस्वाहात्वं
स्वधात्वंहिवपट्कारःस्वरात्मिका ॥ सुधात्वमक्षरेनित्यविधा
मात्रात्मिकास्थिता ॥ ५४ ॥ अर्धमात्रास्थितानित्यायानु
चार्याविशेषतःत्वमेवसंध्यासावित्रीत्वदेविजननीपरा॥५६॥
त्वयैतद्धार्यतेविश्वत्वयैतत्सृज्यतेजगत् ॥ त्वयैतत्पाल्यतेदे-
वित्वमत्स्यतेचसर्वदा ॥५६॥

(१०) सप्तशतीमापाटीका। टीका- ब्रह्मा बोले अनंत है तेज जिनका ऐसे जे विष्णु तिनकी योग- निद्रा जो तुम हो तुलारी मैं स्तुति करता हूँ कैसी हो आप संसारकी रचनें- वाली फिर कैसी हो आप जगत्का पोपण करनेवाली फिर कैसी हो आप जगदका पालन और संहार करनेवाली ॥५३॥ फिर कैसी हो आप देव- तावों को हविनिमें स्वाहा मन्त्ररूप हो और पित्रीश्वरोंको अन्नदानमें वैधा मन्त्ररूप हो और वषट्काररूप हो अर्थात् यज्ञरूप हो फिर कैसी हो तुम अकारसे आदि लेकर जे सोलह स्वर हैं तेई हैं स्वरूप जाको ऐसी हो फिर कैसी हो देवतापों के अन्नस्वरूप हो हे वृद्धि हास करिके रहित हे नित्ये ब्राह्मी वैष्णवी माहेश्वरी ये लोकमाता है स्वरूप जाको इस तरह तीन प्रका- रसे विराजमान हो ॥ ५४ ॥ हे भगवती फिर तुम कसी हो जागृत्, स्वम , सुषुप्ति इन तीन अवस्थासे जुदी चौथी अवस्थाको प्राप्त ॐकारकेविपे अर्ध- मात्रारूप विराजमान हो और नित्य हो और आप परमात्मस्वरूप हो याते विशेषकरिकै वर्णन नहीं करी जाती हो फिर कैसी हो संध्यारूप हो और सावित्री रूप हो और वेदोंकी माता गायत्रीरूप तुम हो ॥५५॥ फिर कैसी हो संपूर्ण जगत्को धारण करती हो और ब्राह्मी शक्तिरूपकरिकै जगत रचती हो और वैष्णवी शक्तिरूपसे पालना करती हो और माहेश्वरी शक्ति रूपसे प्रलयविषे जगत्का संहार करती हो फिर भक्तोंको सर्व वस्तु देतीहो५६॥ विसृष्टौसृष्टिरूपात्वंस्थितिरूपाचपालने ॥ तथासंहतिरूपां- तेजगतोस्यजगन्मये ॥ १७ ॥ महाविद्यामहामायामहामे- धामहास्मृतिः॥ महामोहाचभवतीमहादेवीमहेश्वरीप्रकृति- स्त्वंचसर्वस्यगुणत्रयविभाविनी॥५८॥कालरात्रिमहारात्रिर्मों- हरात्रिश्चदारुणा ॥५९ ॥ त्वंश्रीस्त्वमीश्वरीत्वह्रीस्त्वं बुद्धि- बोधलक्षणालज्जापुष्टिस्तथातुष्टिस्त्वंशांतिःक्षांतिरेवच ६०॥ टीका-हे जगन्मये फिर कैसी हो विशेषकरिकै जगत्के रचनेमें सृष्टि- रूप तुम हो और पालनेविषे स्थितिरूप हो और संहारकेविषे संहृतिरूप ."

अध्याय १
(११)
हो ॥ ५७ ॥ और परब्रह्मको जाननेवाला ज्ञानरूप तुम हो और शरीरादि-
कोंके विषे जो आत्मबुद्धि ऐसी महामायारूप तुम हो और ध्यानरूप हो
और महाममतारूप हो ऐश्वर्य युक्त हो और समस्त देवशक्तिरूप हो और
हिरण्याक्षादि शकिरूप हो ॥५८॥ जाके विषे विश्वको लय होय ऐसी
कालरात्रि रूप तुम हो और जाके विषे ब्रह्माको मोक्ष होय ऐसी महारात्रि
रूप तुम हो और संसारको रचनेवाली मोहरात्रिरूप तुम हो ॥५९॥ फिर कैसी
हो श्री लक्ष्मीबीजरूप हो क्लीं कामबीजरूप तुमहोत्वं ह्रीः अर्थाद तुम भुवनेशी
बीजरूपतुम हो निर्णयात्मक है स्वरूप जाको ऐसा अंतःकरणरूपी तुम हो और
लज्जारूप हो पुष्टिरूप हो संतोष रूप हो शांतिरूप हो अर्थात् विषयोंसे इन्द्रि-
योंका त्यागरूपी तुम हो और शांतिरूप हो अर्थात् सामर्थ्य होता सता अप-
राध सहिष्णुतारूपी तुम हो ॥ ६० ॥
खङ्गिनीशूलिनीघोरागदिनीचक्रिणीतथा ॥ शंखिनीचापिनी-
बाणभुशुंडीपरिघायुधा ॥ ६१ ॥ सौम्यासौम्यतराशेषसौ-
म्येभ्यस्त्वतिसुंदरी।।परापराणांपरमात्वमेवपरमेश्वरी ॥१२॥
यचकिंचित्क्वचिद्वस्तुसदसदाखिलात्मिके ॥ तस्यसर्वस्यया
शक्ति सात्वकिस्तूयसेमया॥६॥ययात्वयाजगत्स्रष्टाजगत्पा-
त्यत्तियोजगत्।सोपिनिद्रावर्शनीतःकस्त्वांस्तोतुमिहेश्वरः ६॥
टीका- खड्ड, त्रिशूल, गदा, चक्र, शंख, धनुष, बाण, भुशुंडी, परिव इन
शस्त्रोंको धारण करनेवालीहो और एक शत्रुको मुंड लेराखो याते बडी भयं-
कर रूपहो ॥ ६३ ॥ फिर कैसीहो भक्तोंकोविषे सौम्यरूप अर्थात् शांतरूपहे
और दैत्योंके क्रूररूपहो और संपूर्ण सुन्दर वस्तुवोंसे बडी सुन्दरहो और
पश्यंती मध्यमा वैखरी इनका बीज रूप हो उत्कृष्ट जेहे तिनमें परमप्रधान
तुमही हो याते तुम परमेश्वरीहो ॥६२॥ हे अखिलात्मिके देवि या जगत्के
। विषे जो कुछ कहूँ सत् असद वस्तु प्रतीत होताहै ता संपूर्णकी शक्ति अर्था-
: व सामर्थ्य तुमही हो याते अस्मदादिकरिकै कैसे स्तुति कियेजावो ॥ ६३॥

(१२) सप्तशतीभाषाटीका। और ब्रह्म, विष्णु, रुद्ररूप करिकै जगतका उत्पत्ति पालन संहार करनेवाला जो भगवान है सोभी तुमने निद्राके वशकरदिया याते तुलारी स्तुति करनेको कौन समर्थहै ॥ ६४॥ विष्णु शरीरग्रहणमहमीशानएवच ॥ कारितास्तेयतोतस्त्वां. कास्तोतुं शक्तिमान्भवेत् ॥ ६५ ॥ सात्वमित्थंप्रभावःस्वैरु- दारैदेविसंस्तुता ॥ मोहयैतौदुराधर्षावसुरौमधुकैटभौ ॥६६॥ प्रबोधचजगत्स्वामीनीयतामच्युतोलघु ॥बोधश्चक्रियतामस्य हंतुमेतौमहासुरौ॥६७ ॥ ऋषिरुवाच ॥ एवंस्तुतातदादेवी तामसीतत्रवेधसा॥ विष्णोः प्रबोधनार्थायनिहंतुमधुकैटभौ ॥६८॥ टीका-फिर कैसीहो विष्णु और मै और रुद्र इनकोनी तुमने शरीर धारण करवादिया ऐसी महामाया जो आपहो आपकी स्तुति करनेको कौन समर्थहोय ॥६५॥ ऐसे उदार अपने माहात्म्योंकरिकै स्तुतिकीगई ऐसी जो तुम हो ये बडे भयंकर जे मधुकैटा दैत्य हैं तिनको मोहनकरो ॥ ६६ ॥ हे देवि जगत्का स्वामी जो विष्णुहै ताको शीघ्र जगावो और मधुकैटाको मारनेको भगवतकी बुद्धिको उत्साह करो ॥ ६७ ॥ तब ऋषि बोले हे राज: न या रीतिसे जब ब्रह्माने भगवतीकी स्तुति करो तवं योगनिद्रा भगवती विष्णुको जगानेके लिये और मधुकैटभ दैत्योंको मारनेके लिये ॥६॥ नेवास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः ॥ निर्गम्यदर्शनेत- स्थौब्रह्मणोव्यक्तजन्मनः ॥६९ ॥ उत्तस्थौचजगन्नाथस्तया मुक्तोजनार्दनः॥ एकार्णवेहिशयतात्ततः सदशेचतौ॥७॥ मधुकैटभौं दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ ॥ क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणंजनितोयमौ ॥ ७१॥ समुत्थायततस्ताभ्यांयुयुधेभ- गवान्हरिः॥ पंचवर्षसहस्राणिबाहुप्रहरणोविभुः ॥ ७२ ॥ . टीका-विष्णुका नेत्र मुख नासिका सुजा और हृदय वक्षःस्थल इनसे निकसकर बलाके सन्मुख स्थित होतीमई ॥ ६९ ॥ तब वा समुद्रके अध्याय १ - (१३) विष योगनिद्राकारकै त्यक्त विष्णु शेषशय्यासे उठतेभये और मधुकैटा दै- त्योंको देखतेभये ॥ ७० ॥ फिर मधु कैटभ दैत्य कैसे, बडे पराक्रमी हैं और कोपकारकै लाल, नेत्र जिनोंके ब्रह्माको भक्षण करनेको करराख्योहै उद्यम जिनोंने ॥ ७३ ॥ ऐसे मधुकैटभ दैत्योंसे उठकरिकै भगवान युद्ध करते भये भुजाहीहै शस्त्र जिसके ऐसे भगवान् पांचहजार वर्षे उन दैत्योंके साथ युद्ध करतेभये ॥ ७२ ॥ तावप्यतिबलोन्मत्तौमहामायाविमोहितौ ॥ उक्तवंतौवरोस्म- त्तोवियतामितिकेशवं ॥७३॥ भगवानुवाच ॥ भवेतामच मे तुष्टौ ममवध्यावुभावपि ॥ किमन्येनवरेणात्रएतापछिवृतम- या॥७४ ॥ ऋषिरुवाच ॥ वंचिताभ्यामितितदासर्वमापोम- यंजगत् ॥ विलोक्यताभ्यांगदितोभगवान्कमलेक्षणः ॥७॥ प्रीतौस्वस्तवयुद्धेन श्लाघ्यस्त्वंमृत्युरावयोः ॥ आवांजहिनय- त्रोवीसलिलेनपरिष्टुता ॥ ७६ ॥ टीका- ताके अनन्तर बलकरिके उन्मत्त और महामायाकारकै मोहित वे दैत्य बोले हे विष्णो तुलारे युद्धसे हम बडे प्रसन्नभये तुम हमसे वर- दान मांगो ॥ ७३ ॥ तब श्रीनगवान् बोले जो तुम मेरे ऊपर प्रसन्नहो तो दोनो मेरेहाथ मृत्युको प्राप्त हो और वरदानोंसे मेरेको कुछ प्रयोजन नहीं यह वरदान में मांगा है.॥ ७४ ॥ तब ऋषि बोले कि हे राजन् जब भगवान वर- दान मांगिके दैत्योंको ठगलिया तब संपूर्ण जगत्को जलमयी देखकर भगवा- नसे कहते भये ॥ ७५ ॥ कि हे विष्णो वहां हमको मारो जहां जलसे डुबीहुई पृथ्वी नहींहै ।। ७६ ॥ ऋषिरुवाच ॥ तथेत्युक्त्वाभगवताशंखचक्रगदाभृता । कृत्वा चक्रेणवैछिन्नेजघनशिरसीतयोः॥७७॥ एवमेषासमुत्पन्नाब- झणासंस्तुतास्वयं ॥ प्रभावमस्यादेव्यास्तुभूयः शृणुवदामिते " (१४) सप्तशतीभाषाटीका। ऐंॐ ॥ ७८॥ इतिमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिकेमन्वन्तरेदेवीमा- हात्म्ये मधुकैटभवधोनामप्रथमोध्यायः॥१॥ टीका-तब ऋषि बोले कि हे राजन् शंख चक्र गदाको धारण करने वाले तुम कहो जैसेही सही ऐसा दैत्योसे कहकारकै अपनी जंघापर उनका शिर रखके सुदर्शनचक्रसे काटतेश्ये ॥ ७७ ॥ हे राजन ऐसी रीतिसे भगवती उत्पन्न भईहै जाकी स्तुति करिहै फिर या देवीको माहात्म्य तुलारे अर्थ व- र्णन करूहूं सो श्रवणकरो ॥ ७८ ॥ इति श्रीमार्कंडेयपुराणेदेवीमाहात्म्येमधु- कैटावधोनामप्रथमोध्यायः॥१॥ * ऋषिरुवाच ॥ देवासुरमभूयुद्धंपूर्णमब्दशतंपुरा ॥ महिषे सुराणामधिपेदेवानांचपुरंदरे ॥१॥ तत्रासुरैर्महावीर्यदेवस- न्यपराजितम् ॥ जित्वाचसकलान्देवानिंद्रोभून्महिषासुरः ॥ ॥२॥ ततःपराजितादेवाः पद्मयोनिप्रजापतिम् ॥ पुरस्कृ- त्यगतास्तत्रयोशगरुडध्वजौ ॥३॥ यथावृत्तंतयोस्तद्वन्म- हिषासुरचेष्टितम् ॥ त्रिदशा कथयामासुर्दैवाभिभवविस्तरम्॥४॥ टीका- तब पहिले सुमेधा ऋषि बोले हे सुरथ राजन् असुरोंका राजा महिषासुर होता आया और देवतावोंका स्वामी इंद्र होता भया देवदानवोंका परस्पर पूर्ण सौ वर्षपर्यन्त युद्ध होता भया ॥ १ ॥ ता युद्धकेविषे असुरोंकी फौजने देवतावोंकी फौज हरादई पीछे संपूर्ण देवतानको जीतकर महिषासुर इन्द्र होतो भयो ॥ २॥ ताके अनन्तर देवता हार कर ब्रह्माजीको अगाडी करिकै जहां महादेवजी और भगवान् थे वहाँ जाते गये ॥३॥ जैसा महि- षासुरका करा हुवा देवोंका तिरस्कार रूपी वृत्तान्त था तैसा संपूर्ण वृत्तान्त शिव विष्णुके आगे देवता कहते भये ॥ ४ ॥ सूर्यद्राम्यनिलंदूनांयमस्यवरुणस्यच ॥ अन्येषांचाधिकारा- न्सस्वयमेवाधितिष्ठति ॥५॥ स्वर्गानिराकृताःसर्वेतेनदेव गणाभुवि ॥ विचरंतियथामा महिषेणदुरात्मना. ॥ ६॥ एतद्व कथितंसर्वममरारिविष्टतम् ॥ शरणंवःप्रपन्नास्मोव-

अध्याय २
(१५)
धस्तस्यविचिंत्यतां ॥७॥ऋषिरुवाच ॥ इत्थंनिशम्यदेवा-
नांवचाँसिमधुसूदनः॥ चकारकोपेशंभुश्चभ्रुकुटीकुटिलाननौ॥८॥
टीका- सूर्य इन्द्र अग्नि वायु चंद्र इनका और यमराज और वरुणका
और संपूर्ण देवताका अधिकारकेविषे स्वयं महिषासुर स्थित है ॥५॥
वा महिषासुर दुष्टने संपूर्ण देवोंको स्वर्गसे निकाल दिया अब सब देवतामनु-
प्योंकी तरह पृथ्वीमें विचरते है ॥ ६ ॥ हे महाराज महिषासुरकी जो दुष्ट-
चेष्टा है सो आपके आगे हमने कही हम आपकी शरण प्राप्त हैं सो आप इस
दुष्टको मारनेको उपाय चितवन करो ॥ ७ ॥ या प्रकारसे देवतोंका वचन
श्रवणकरिकै चुकुटी चढाकर टेढा कर लिया है मुख जिनोंने ऐसे जे विष्णु
और शिव ते कोप करते भये ॥ ८॥
ततोतिकोपपूर्णस्यचक्रिणोवदनात्ततः॥ निश्चक्राममहत्तेजो
ब्रह्मणः शंकरस्यच ॥ ९॥ अन्येषांचैवदेवानांशकादीनांश-
रीरतः ॥ निर्गतंसुमहत्तेजस्तच्चैक्यसमगच्छत ॥ १० ॥ अ-
तीवतेजसःकूटंज्वलंतमिवपर्वतं ॥ ददृशुस्तेसुरास्तत्रज्वाला
व्याप्तदिगंतरं ॥ ११ ॥ अतुलंतत्रतत्तेजःसर्वदेवशरीरजं ॥
एकस्य॑तदभूनारीव्याप्तलोकत्रयंत्विषा ॥ १२॥
टीका- ताके अनन्तर अत्यंत कोपकरिकै पूर्ण जो विष्णु और शिव
तिनके मुखसे बड़ा तेज निकलता भया ॥ ९ ॥ फिर इन्द्रादिक देवोंकाक्षी
शरीरसे बड़ा तेज निकला वह सब इकठा होता भया ॥ १० ॥ ताके अनं-
तर उस देव समाके विषे लटाँकरिकै प्रकाशित कियो है दशोंदिशाँको मध्य
जाने ऐसा अत्यंत जो तेजका समुदाय है ताको इन्द्रादिक देव देखते भये
फिर कैसा है वह तेज जानो प्रकाशमान हेमादिपर्वतही विराजमान है ॥११॥
कात्यायन ऋषिके आश्रममें सब देवोंके शरीरसे निकला हुआ जो इकठो
अनंत तेज है सो स्त्रीरूप होतामया फिर कैसा है वह तेज अपनी दीप्ति-
करिकै प्रकाशित किये है तीनों लोक जाने ॥ १२ ॥

(१६) सप्तशतीजापाटीका। यदभूच्छांभवतेजस्तेनाजायततन्मुखं ॥ याम्येनचाभवन्के- शाबाहवोविष्णुतेजसा ॥ १३ ॥ सौम्येनस्तनयोर्युग्मंमध्यं चैद्रेणचाभवत्।।वारुणेनचजंघोरूनिवस्तेजसाभुवः ॥१४॥ ब्रह्मणस्तेजसापादौतदंगुल्योर्कतेजसा ॥ वसूनांचकरांगुल्यः कौवेरेणचनासिका ॥ १५ ॥ तस्यास्तुदंता-संभूताप्राजाप- त्येनतेजसा ॥ नयनत्रितयंजज्ञेतथापावकतेजसा ॥ १६ ॥ टीका-फिर जो शंशुका तेज था वाते उस स्त्रीका मुख होता भया और यमके तेजसे केश होते भये विष्णुके तेजसे भुजा होती भई ॥ १३ ॥ सोमके तेजसे दोनो स्तन होते भये इन्द्रके तेजसे उदर होता आया वरुणके तेजसे जंघा और पीडी ये होती भई पृथ्वी तेजसे कटिके पीछेका भाग होता भया ॥ १४ ॥ ब्रह्माके तेजसे पैर होते भये सूर्यके तेजसे पैरोंकी अंगुलियां होती भई वसु देवताके तेजसे हाथोंकी अंगुलीयां होती गई कुवेरके तेजसे नासिका होती गई ॥ १५ ॥ प्रजापतियों के तेजसे उसके दाँत होते भये अनिके तेजसे तीन नेत्र उत्पन्न होते भये ॥ १६ ॥ भुवौचसंध्ययोस्तेजःश्रवणावनिलस्यच ॥ अन्येषांचैवदेवानां संभवस्तेजसांशिवा ॥ १७ ॥ ततस्समस्तदेवानांतेजोरा- शिसमुद्भवाम् ॥ तांविलोक्यमुदंप्रापुरमरामहिषार्दिताः॥१८॥ ततोदेवाददुस्तस्यैस्वानिस्वान्यायुधानिच ॥ ऊचुर्जयजये- त्युच्चैर्जयन्तीतेजयैषिणः ॥१९॥ शूलंशूलाद्विनिष्कृष्यददौ तस्यैपिनाकधूक्॥चक्रंचदत्तवान्कृष्ण समुत्पाट्यस्वचक्रतः२०॥ टीका-संध्याके तेजसे चुकुटी होती भई वायुके तेजसे दोनो कान होते भये इन देवतोंका और अन्य देवतोंके तेजका एकाकी भाव है सो शिवा नामकरिकै प्रसिद्ध भई ॥ १७॥ फिर समस्त देवताके तेजसे उत्पन्न भई ऐसी भगवतीको देखकरिकै महिषासुरकारकै पीडित जे देवता है वे आन- दको प्राप्त होतेजये ॥ १८॥ ताके अनन्तर भगवतीको देवता अपना अपना अध्याय २ (१७) शस्त्र देते भये और उच्च स्वरसे जयजयकार शब्द करते भये ॥ १९ ॥ महा देवजी भगवतीको त्रिशूलसे त्रिशूल उत्पन्न कर देतेभये कृष्ण सुदर्शन चक्रसे चक्र बैंचकर देते भये ॥ २० ॥ शंखंचवरुण शक्तिददौतस्यैहुताशनः ॥ मारुतोदत्तवांश्चापं बाणपूणॆतथेषुधी ॥२१॥ वज्रमिंद्र समुत्पाद्यकुलिशादमरा- धिपः॥ ददौतस्यैसहस्राक्षोघंटामैरावताद्जात् ॥२२॥ काल दंडाघमोदंडंपाशंचांबुपतिर्ददौ ॥ प्रजापतिश्चाक्षमालांददौ ब्रह्माकमंडलुम्॥२३॥समस्तरोमकूपेषुनिजरश्मीन्दिवाकरः। कालश्चदत्तवान्खड्गतस्यैचर्मचनिर्मलम् ॥२४॥ टीका.- वरुण शंख देते भये अनि शक्ति शस्त्र देते भये वायु धनुष और दो बाँणोंके भरे तूणीर देता भया ॥२१॥ अपने वज्रसे वज्र उत्पाटन करिके इन्द्र वज्र देतो भयो और ऐरावत हाथीसे बंटा लेकर देतो भयो ॥ २२ ॥ यम कालदण्डसे दण्ड उत्पन्न करिकै देतो भयो वरुण अपने पाशसे पाश उत्पन्न करिकै देतो भयो और प्रजापति ब्रह्मा जयमाला और कमण्डलु देतो भयो ॥ २३ ॥ वा देवीके संपूर्ण रोम कूप जे हैं तिनके विषे सूर्य अपनी किरण देते भये उस भगवतीको काल खड्गा देतो भयो और श्रेष्ठ ढाल देतो भयो ॥ २४ ॥ क्षीरोदश्चामलंहारमजरेचतथांबरे ॥चूडामणितथादिव्यंकुंडले कटकानिच॥२५॥अर्धचंद्रतथाशुभ्रंकेयूरान्सर्ववाहुषु॥ नूपुरौ विमलौतद्वनैवेयकमनुत्तमम् ॥ अंगुलीयकरत्नानिसमस्ता- स्वंगुलीषुच ॥२६॥ विश्वकर्माददौतस्यैपरशुंचातिनिर्मलं॥ अस्त्राण्यनेकरूपाणितथाभेचंचदंशनम्॥२७॥अम्लानपंकजां मालांशिरस्युरसिचापरां॥अददजलधिस्तस्यैपकजंचातिशोभना टीका- क्षीरोद समुद्र निर्मल हार देतोभयो और नेवीनवस्त्र देतोजयो ॥ २५॥ दिव्य चूडामणि रत्न तथा कुण्डल और कहा और अर्द्धचंद्र सं- (१८) सप्तशतीभाषाटीका। पूर्ण भुजामें बालू और निर्मल बिछिया और गलेमें पहरनेकी रत्नजडित माला और समस्त अंगुलियोंके विषे छल्ला अंगूठी ये सब आभूषण जगव- तीको विश्वकर्मा देतोभयो और निर्मल परशी देतो भयो और अनेक तरहके अब और कवच ये देतोजयो ॥२६॥२७॥ फिर उसदेवीको समुद्र सदा प्रफु- ल्लित रहै ऐसे कमलोंकी माला शिरके विषे धारण करनेकी और कंठमें धारण करनेकी देतोभयो और मनोहर कमल देतोभयो ॥ २८ ॥ हिमवान्वाहनसिंहरत्नानिविविधानिच ॥ ददाक्शून्यसुर यापानपात्रंधनाधिपः ॥ २९ ॥ शेषश्चसर्वनागेशोमहामणि विभूषितं ॥ नागहारंददौतस्यैधत्तेयःपृथिवीमिमाम् ॥३०॥ अन्यैरपिसुरैर्देवीभूषणैरायुधैस्तथा ॥ संमानिताननादोच्चैः साट्टहासंमुहुर्मुहुः॥ ३१ ॥तस्यानादेनघोरेणकृत्स्नमापूरितं नभः ॥ अमायतातिमहताप्रतिशब्दोमहानभूत् ॥ ३२ ॥ टीका-और हिमवान् पर्वतराज देवीको सिंहवाहन देतोभयो और अनेक तरहके रत्न देतोभयो और कुबेर मदिराकरिकै पूर्णपात्र देतोभयो ॥ २९ ॥ फिर उसदेवीको संपूर्ण नागोंका राजा जो शेषहै सो महामणि क- रिकै शोभित नागरूप हार देतोमयो फिर वह शेष कौनसाहै जो या पृथ्वी को धारण करताह ॥ ३० ॥ फिर और देवोंनेशी आभूषण और शखों करि- के देवीका सन्मान किया तब देवी आदरयुक्त होकर वारंवार उच्चस्वर करि- के अट्टहासपूर्वक नाद करतीभई ॥ ३३ ॥ उस भगवतीके भयंकर शब्द करिके संपूर्ण आकाश शब्दायमान होतामया समीप आताहुवा जो बडा शब्द है ता करिकै बडा प्रतिध्वनिशब्द होतामया ॥ ३२॥. चुक्षुभुसकलालोकास्समुद्राश्चचकपिरे ॥ चचालवसुधाचेलुः सकलाश्चमहीधराः ॥ ३३ ॥ जयतिदेवाश्चमुदातामूचुःसिंह- वाहिनीं ॥ तुष्टुवुर्मुनयश्चैनांभक्तिनम्रात्ममूर्तयः ॥ ३४ ॥ दृष्ट्वासमस्तंसंक्षुब्धत्रैलोक्यममारयः ॥ सन्नदाखिलसैन्यास्ते अध्याय २ समुत्तस्थुरुदायुधाः॥३६आकिमेतदितिक्रोधादाभाष्यम- हिषासुरः ॥ अभ्यधावततंशब्दमशेषैरसुरैर्वृतः ॥३६ ॥ टीका-ता प्रतिध्वनि शब्द करिकै सब लोक चलायमान होगये और समुद्र कांपने लगगये और पृथ्वी पर्वत ये तिससमय सब चलायमान होजाते भये ॥ ३३ ॥ तासमय देवता आनंदपूर्वक जय जय शब्द करतेभये भक्ति कारकै नम्र है स्वकाय जिनोंका ऐसे मुनि सिंहवाहिनी भगवतीकी स्तु- ति करतेभये ॥ ३४ ॥ फिर उस भगवतीका भयंकर शब्द करिके त्रिलोकी- को चलायमान देखकर युद्धके लिये करी है सेना तयार जिनोंने और उठा- ये हैं शस्त्र जिनोंने ऐसे जे दैत्यहै ते युद्ध करनेको उठतेभये ॥ ३५ ॥ यह क्या है ऐसे क्रोधसे कहकर महिषासुर समस्त असुरोंकरिकै सहित उ- स देवीके शब्दके सन्मुख जातोभयो । ३६ ॥ सददर्शततोदेवींव्याप्तलोकत्रयांत्विषा ॥ पादाक्रांत्यानतभुवं किरीटोल्लिखितांवराम्॥३७॥क्षोभिताशेषपातालांधना- निःस्वनेनतांदिशोभुजसहस्त्रेणसमंताव्याप्यसंस्थितां ३८॥ ततःप्रववृतेयुद्धतयादेव्यासुरद्विषां ॥ शस्त्रास्त्रैर्बहुधामुक्तरादी- पितदिगंतरं ॥३९॥ महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्योमहा- सुरः॥ युयुधेचामरश्चान्यैश्चतुरंगबलान्वितः॥ ४०॥ टीका-पीछे वहां जाके अपनी कांतिकारकै प्रकाशित कियेहै तीनो लोक जानें पैरके आक्रमणसे नम्र करीहै पृथ्वी जाने मुकुट करिकै स्पर्शित है आकाश जाने धनुषकी प्रत्यंचाका शब्द करिकै चलायमान कियोहै संपूर्ण रसातल जाने हजार भुजासे दशदिशाको व्याप्त करिकै सम्यकारसे स्थित ऐसी जो भगवती है ताको महिषासुर देखतोभयो ॥ ३७॥३८॥ ताके अनंतर देवी के साथ असुरोंका युद्ध होताभया फिर कैसा युद्ध भयाकि बहुत प्रकारसे शस्त्र और अन चलाने करिकै प्रकाशित भयोहै दशोंदिशाको मध्यभाग जामें॥३९॥ महिषासुरकी सेनाका स्वामी चिक्षुरनामा असुर युद्ध करतोजयो और हाथि (२) सप्तशतीजापाटीका। योंके सवार घोडोंके सवार रथोंके सवार पियादे ये है चार अंग जामें ऐसी जो चतुरंगिणी सेना तिसकरिके सहित दूसरा चामरनामा असुर देवीके साथ युद्ध करताजया ॥४०॥ स्थानामयुतैः षभिरुग्राख्योमहासुरः॥ अयुध्यतायुतानां चसहस्रेणमहाहनुः ॥ ४१ ॥ पंचाशद्भिश्चनियुतैरसिलोमा महासुरः ॥ अयुतानांशतैःषानिष्किलोयुयुधेरणे ॥ ४२ ॥ गजवाजिसहस्रौधैरनेकैरुप्रदर्शनः ॥ वृतोरथानांकोट्याचयुद्धे तस्मिन्नयुद्भयत ॥ ४३ ॥ विडालाख्योमहादैत्यः पंचाशद्भि स्थायुतैः ॥ युयुधेसंयुगेतत्ररथानांपरिवारितः ॥ ४४ ॥ टीका-और साठिहजार रथोंके सवारों करिकै सहित उदघनामा अ सुर देवीके साथ युद्ध करतानया और महाहनुनामा असुर कोटि रथोंके सवारों कारकै सहित देवी के साथ युद्ध करतानया ॥४३॥ और असिलो- मा नामा असुर पांचकोटि रथोंके सवारों करिकै सहित देवी के साथ युद्ध : करताभया और वाकलनामा असुर रणके विपे साठिलाख रथो सवारों करिकै सहित देवी के साथ युद्ध करता या॥४२॥और उग्रदर्शन नामा असुर हजारों हाथी घोडोंके सवारों करिकै सहित और एक कोटि रथोंके सवारों करिकै सहित रणमें देवीके साथ युद्ध करता भया ॥ ४३ ॥ और बिडालनामा असुर पांचलाख रथोंके सवारों करिकै सहित संग्राममें युद्ध करता भया॥४४॥ वृत्तः कालोस्थानांचरणेपंचाशत्तायुतैः ॥युयुधेसंयुगेतत्रताव- द्भिःपरिवारितः॥४५॥ अन्येचतत्रायुतझोरथनागहयैर्वृताः॥ युयुधुस्संयुगेदेव्यासहतत्रमहासुराः॥ ४६॥कोटिकोटिसहौ- स्तुरथानांदन्तिनांतथा ॥ हयानांचवृतोयुद्धतत्रांभून्महिषासु- रः॥४७॥ तोमरैर्भिदिपालैश्चशक्तिभिर्मुसलैस्तथा ॥ युयु धु संयुगेदेव्याखङ्गैःपरशुपदिशैः॥ १८॥ टीका- और काल नामा असुर पांचलाख रथोंके सवारों करिकै वेष्टित अध्याय २ (२१) रणके विषे देवी के साथ युद्ध करता भया फिर वही असुर पाँचलाख हाथि- योंके सवारों करिकै सहित संग्राममें देवीके साथ युद्ध करताभया ताके. अनन्तर वही पाँचलाख घोडोंके सवारों करिकै युक्त युद्ध करता भया फिर ताके अनन्तर वही पांचलाख पयादों करिकै परिवारित देवीके साथ युद्ध करतांभया ॥ ४५ ॥ तिस रणके विषे दशहजार रथ हाथी घोडोंके सवारों करिक सहित और जे असुर हैं वे देवीके साथ युद्ध करतेभये ॥४६॥ फिर एक शंख संख्या परिमित रथोंके सवार और एक शंख संख्या परिमित हाथि- योंके सवार और एक शंख संख्या परिमितही घोडोंके सवार इस प्रकारसे तीन शंख सेना करिकै सहित महिषासुर देवी के साथ युद्ध करनेको रणा- मिमें सावधान होतो भयो ॥४७॥ तिस समय संग्रामके विषे ते संपूर्ण असुर तोमर जे भाला हैं और जिंदिपाल जे गोफिया हैं और शक्ति जे शांग हैं और मुशल जे हैं और खड्ग जे हैं और फरशी जे हैं और पट्टिश जे हैं इन शत्रों कारकै देवीके साथ युद्ध कतै भये ॥ १८ ॥ केचिच्चचिक्षिपुःशक्ती केचित्पाशांस्तथापरे । देवींखङ्गप्रहारै स्तुतेताहंतुंप्रचक्रमुः॥४९॥ सापिदेवीततस्तानिशस्त्राण्य- स्त्राणिचण्डिकालीलयैवप्रचिच्छेदनिजशस्त्रास्त्रवर्षिणी ५०॥ अनायस्ताननादेवीस्तूयमानासुरर्षिभिः ॥ मुमोचासुरदेहे घुशस्त्राण्यत्राणिचेश्वरी ॥ ५१ ॥ सोपिद्धोधुतसटोदेव्या वाहनकेसरी ।। चचारासुरसैन्येषुवनेष्विवहुताशनः।। ५२॥ टीका- उस युद्धमें कितनेही देवीको मारनेकों शांग फेंकते भये और कितनेही नागपाश आदि पाश फेंकते भये और कितनेही खड्गके प्रहारों करिकै देवीको मारनेको उद्योग क भये ॥ १९ ॥ ताके अनन्तर अपने शस्त्र और अत्रोंकी वर्षा करती हुई भगवती उन दैत्योंके शस्त्र और अत्र लीला करिकै सब खंडित करती भई॥५०॥फिर ग्लानि करिके रहित है मुख जिसका और देव और ऋषि इन करिकै स्तुति करीगई ऐसी ईश्वरी असुरोंके शरीरोंके विपे शस्त्र और अब छोडतीबई ॥५१॥ फिर देवीका वाहन

(२२)
सप्तशतीभाषाटीका।
सिंहमी काँधेके केश पाताहुवा और क्रोधयुक्त गर्जताहुवा असुरोंकी
सेनामें चारों तरफ चमता भया कैसे कि जैसे वाँशके वनोंमें चारों तरफ अवि
नमे ताकी तुल्य ॥ ५२॥
निःश्वासान्मुमुचेयांश्चयुध्यमानारणेम्बिका ॥ तएवसद्यःसं
भूतागणा शतसहस्रशः॥५३॥ युयुधुस्तेपरशुभिभिदिपा-
लासिपट्टिशैः।।नाशयंतोसुरगणान्देवीशत्त्युपहिताः॥५४॥
अवादयतपटहान्गणा शंखांस्तथापरे ॥ मृदंगांश्चतथैवान्ये
तस्मिन्युद्धमहोत्सवे ॥५६॥ ततोदेवीत्रिशूलेनगदयाशरवृष्टि-
भिः॥ खड्गादिभिश्चशतशोनिजधानमहासुरान् ॥५६॥
टोका-फिर असुरोंके साथ संग्रामके विषे जितने क्रोधका निःश्वार
अंबिका छोडती भई फिर वे निःश्वासही उतने लाख भगवतीके गण होजाते.
भये ॥ ५३ ॥ फिर वे गण तुम असुरोंके साथ युद्धको युद्धको ऐसे देवी
करिकै उत्साह प्राप्त कियेहुवे फरशी और गोफिया और खड्ग और पट्टिश
इन शस्त्रोंकरिकै असुरगणोंका नाश कर्तेहुवे महाअसुरोंके साथ युद्ध कर्ते-
भये ॥ ५४ ॥ फिर उस युद्ध महोत्सवके विषे देवीके निःश्वाससे उत्पन्नहुवे
पूर्वोक्त गण उनमेंसे कितनेंहीं तो नगारा बजाते भये और कितनेही शंख
बजाते गये और कितनेही मृदंग बजातेभये ॥५५॥ ताके अनंतर त्रिशूल
गदा और खड्ग और भाला और मुद्र और मुशल इन आदिले शखोंके
प्रहार करिकै और बाणोंकी वर्षा करिकै भगवती एक एक वा शत शत महा
असुर मारती गई ॥५६॥
पातयामासचैवान्यान्वंटास्वनविमोहितान् ॥असुरान् विपा-
शेनबद्धाचान्यानकर्षयत् ॥ ५७॥ ॥ केचिद्विधाकृतास्ती .
क्ष्णैः खड्गपातैस्तथापरे ॥ विपोथितानिपातेनगदयाभुविशे
रते ॥५८॥ वेमुश्चकेचिद्रुधिरंमुसलेनभृशंहताकेचिन्त्रिप-
तिताभूमौभिन्ना शूलेनवक्षसि ॥ ५९॥ निरंतरशरोघेणकृताः
केचिद्रणाजिरे सिनानुकारिणः प्राणान्मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः॥६॥

अध्याय २ (२३) टीका-फिर देवीके घंटाके शब्दसे मूर्छित जे असुर हैं तिनको देवी पाशसे बाँधकर पृथ्वीमें पटकती भई और कितनेही असुरोंको पाशसे बाँध कर चतीमई ॥ ५७ ॥ फिर देवी और कितनेही असुरोंका तीखे खड्के प्रहारों करिके दो टुकड़ा की भई और कितनेही असुर देवीकी गदाके प्रहार करिकै मृत्युको प्राप्त हुवे पृथ्वीमें सोते भये ॥५८ ॥ और कितनेही असुर देवीके मुशलके प्रहार करिकै मुखसे रुधिर वमन कर्तेभये फिर और कितनेही असुर देवीके त्रिशूलकरिकै छातीमें विदारित हुवे पृथ्वीमें पडते भये ॥ ५९ ॥ फिर पर्वतके समान है शरीर जिनोंका और देवताको पीडा करनेवाले ऐसे जे असुर ते देवीके निरंतर बाणों के समुदायके प्रहारसे रणमें विधेहुवे प्राणोंको त्यागतये ॥ ६० ॥ केषांचिद्वाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे॥शिरांसिपेतुरंन्ये- षामन्येमध्येविदारिताः॥६॥विच्छिन्नजंघास्त्वपरेपेतुरु- महासुराः॥ एकबाह्वक्षिचरणा केचिद्देव्याद्विधाकृताः ॥१२॥ छिन्नपिचान्यशिरसिपतिताःपुनरुत्थिताः ॥ कबंधायुयुधुर्दै व्यागृहीतपरमायुधाः॥ ६३॥ ननृतुश्चापरतत्रयुद्धेतूर्यलया- श्रिताः॥ कबंधाश्छिन्नशिरस खड्गशत्त्यष्टिपाणयः ॥ ६॥ तिष्ठतिष्ठेतिभाषतोदेवीमन्येमहासुराः ॥ रुधिरौषविलुप्तां- गा-संग्रामेलोमहर्षणे ॥६५॥ टीका- और कितनेही असुरोंकी देवीके शस्त्र प्रहारोंसे खंडितहुई भुजा पृथ्वीमें पडतीमई और कितनेही असुर देवीके शस्त्रप्रहारोंसे कटी हैं नाडी जिनोंकी पैसे पृथ्वीमें पडतेभये और कितनेही असुरोंका देवीके खड्ग आदि शस्त्र प्रहारसे शिर कटके गिरतेभये और कितनेही देवीके शस्त्रप्रहारोंकरिक शरीरके विषे हाथ पैरोंसे खंडितहुवे पृथ्वीमें पड़तेभये ॥६१ ॥ और कित- नेही. असुर कटी, जंघा जिनोंकी ऐसे पृथ्वीमें पडतेभये और कितनेही अ. सुर देवीके शस्त्रप्रहार करिके खंडित कियेहुये एक भुजावाले और (२४) सप्तशतीमापाटीका। एक नेत्रवाले और एक चरणवाले होतेहुवे पृथ्वीमें पडते जये। ६२ ॥ और कितनेही असुर शिर कटनेसे पृथ्वीमें पढेनी फिर शिर धारण कर्तेहुवे उठतेभये ताके अनंतर शस्त्र ग्रहण कारकै देवीके साथ युद्ध के- भये ॥ ६३ ॥ फिर उस युद्धकेविषे कटेहैं शिर जिनोंके ऐसे जे दैत्यहै ते वीणा मृदंग आदि वादिनोंकै वीरशब्दके आश्रितहुवे अर्थात् वीररसके आ- वेशते चेत कर्तेहुवे फिर शिर धारण कर्च संते कितनेही तो नृत्य कनये और उनमेंसे कितनेही खड़ शांग पौलंडी लाठी ये शस्त्रह हाथमें जिनोके ऐसे भगवती के साथ युद्ध कर्तेभये ॥ ६४ ॥ फिर उस भयंकर संग्रामके विपे रु- धिर करिके सन्योहै अंग जिनोंका ऐसे और तुम हमारे आगे खडीरहो ख- डीरहो ऐसे कहतेहुवे जेकितनेही और महाअसुर, ते देवी के साथ युद्ध कर- नेकों आतेभये ॥६५॥ पातितैरथनागाश्वैरसुरैश्चवसुंधरा ॥ अगम्यासाभवत्तत्रय- त्राभूत्समहारणः ॥ ६६ ॥ शोणितोषामहानद्यस्सद्यस्तत्र विसुनुवुः ॥ मध्येचासुरसैन्यस्यवारणासुरवाजिनाम् ॥ ६७॥ क्षणेनतन्महासैन्यमसुराणांतथाम्बिका ॥निन्येक्षयंयथावह्नि स्तृणदारुमहाचयम् ॥६८॥सचसिंहोमहानादमुत्सृजन्धुत्तके- सरः। सोपिद्धोधुतसटोदेव्यावाहनकेसरी॥६९॥शरीरेभ्यो- मरारीणामसूनिवविचिन्वति देव्यागणैश्चतैस्तत्रकृतयुद्धंतथा सुरैः।यथैनांतुष्टुवुर्दैवाः पुष्पवृष्टिसुचोदिवि ।।७०॥ श्रीमार्कण्डे यपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरेदेवीमाहात्म्येद्वितीयोऽध्यायः॥२॥ टीका-फिर जहाँ देवी के साथ महिषासुरकी सेनाका बडा भयंकर' युद्ध हुवा तहां देवीने बाण आदि शस्त्रोंके प्रहारसे पटके जे रथ हाथी घोडे और असुर तिन करिकै आकीर्णभूमि अगम्य होतीभई ॥ ६६ ॥ फिर उस युइके विषे जब देवीके साथ असुरोंका संयाम प्रारंभ हुवा उसी क्षणमैंही. असुरोंकी सेनाके मध्यमें हाथी असुर और घोडे इनके रुधिरके समूहकी म अध्याय-३ (२५) हानदियाँ बहती ई ॥६७॥ फिर जैसे तृण काष्ठके संचयको अभि क्षण- मात्रकरिकै नाशको प्राप्त करदेता है तिसीप्रकारसे देवी क्षणमात्रकरिकै अ- सुरोंकी महासेनाको नाशको प्राप्त करतीबई॥६८॥फिर तिसी प्रकारसे वह जो भगवतीवाहन सिंह है सोभी कंठ गर्जना कर्ताहुवा कंपायेहै कंधाके केश ज्या- ने कोषयुक्त हुवा नखप्रहारोंकरिकै असुरोंकी सेनाको नाश कनिया ॥६९॥ फिर उस संग्रामकेविषे देवीका क्रोधके निवासते उत्पन्नाये ऐसे जेगण जि- नाने तिस प्रकारसे असुरोंकी साथ युद्धकिया और जैसे स्वर्गमें पुष्पोंकी व- पी कर्तेहुए देवता भगवतीकी स्तुति कर्तेभये तिसप्रकारसे श्रवणकरो ॥७॥ इति श्रीमाकंडेयपुराणे सावर्णिके मन्वंतरे देवीमाहात्म्ये द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ ॥ऋषिरुवाच॥ निहन्यमानंतत्सैन्यमवलोक्यमहासुरः ॥ से- नानीश्चिक्षुरः कोपाद्ययौयोद्धमाविकाम् ॥ १॥ सदेवीशरव- .:. पेणववर्षसमरेसुरः।यथामेरुगिरेः शृंगंतोयवर्षेणतोयदः ॥२॥ तस्यच्छित्त्वाततोदेवी लीलयैवशरोत्करान् ॥ जवानतुरगा- वाणैर्यतारचैववाजिनाम् ॥३॥ चिच्छेदचधनु-सयोध्वजं. चातिसमुच्छ्रितम्॥विव्याधचैवगात्रेषुच्छिन्नधन्वानमाशुगैः।४ सच्छिन्नधन्वाविरथोहताश्वोहतसारथिः॥ अभ्यधावततादेवी खड्गचर्मधरोसुरः ॥ ५॥ टीका-ऋपि बोले फिर ताके अनंतर संपूर्ण महिषासुरकी सेनाको देवी करिकै हती हुई देखकर महिषासुरका सेनापति चिक्षुर नामा दैत्य क्रोधसे दौडके युद्ध करनेको देवीके सन्मुख जानोगयो ॥१॥ ताके अनं- तर चिक्षुर नामा दैत्य संग्राममें बाणोंकी वर्षाकरिकै भगवतीको आच्छा- दित कोंभयो कैसेके जैसे मेघ जलकी वर्षाकरिकै सुमेरु पर्वतकी शिखरको आच्छादित कर देता हैं ॥ २ ॥ ताके अनंतर उस संग्रा- ममें विना परिश्रमके साथ देवी अपने बाणोंकरिकै चिक्षुर नामा दैत्यके बाणोंको काटकर घोडोकों मारती गई और पीछे सारथियोंकोनी

(२६). सप्तशतीभाषाटीका।
मारती भई ॥३॥ फिर उसी क्षणमें बाणों करिकै देवी उस दैत्यका
धनुष काटती गई और बड़ी ऊंची जो तिसके रथकी ध्वजा है ताको का-
टती गई फिर टूट गयो है धनुष जाको ऐसो जो चिक्षुर नामा दैत्य है ताके
समय शरीरके अवयवोंमें बड़े तीखे बाणाकारकै छेद कत्र्ती भई ॥४॥
ताके अनंतर दूटो है धनुष और स्थ जाको मरे हैं घोडा और सारथी जि-
सके ऐसा जो चिक्षुर नामा दैत्य सो तरवार ढाल लेके देवीके उपर
दाडताया ॥५॥
सिंहमाहत्यखङ्गेनतीक्ष्णधारेणमूर्धान ॥ आजधानभुजेसव्ये-
देवीमप्यतिवेगवान् ॥६॥ तस्याः खगोभुजंप्राप्यपफालन-
पनन्दन ॥ ततोजग्राहशूलसकोपादरुणलोचनः॥७॥चि-
क्षेपचततस्तत्तुभद्रकाल्यांमहासुरः ॥ जाज्वल्यमानंतेजोभी.
रविविवमिवांवरात् ॥८॥ दृष्ट्वातदापतच्छूलदेवीशूलममुञ्चत॥
तेनतच्छतधानीतशूलंसचमहासुरः॥९॥हतेतस्मिन्महावीर्य
महिषस्यच पतौ॥ आजगामगजारूढश्चामरस्त्रिदशार्दनः ॥१०
टीका- ताके अनंतर तीखी धारवाले खडको सिंहके मामे प्रहारक-
रिकै बड़ा वेगवाला दैत्य देवीकी वाँई भुजामें प्रहार कजिया ॥६॥
हे सुरथ वह खड़ भगवतीके भुजाको प्राप्त होकर उसी समय चूर्णीभूत होता
: भया ताके अनंतर क्रोधसे लाल नेत्र कर्चा हुवा त्रिशूल ग्रहणकर्ता भया ।
॥ ७ ॥ फिर वह त्रिशूल भद्रकालीको मारनेकेलिये फेकता भया कैसा है
वह त्रिशूल कि जानू आकाशमें चलनेवाला तेजोकरिकै प्रकाशमान सूर्यका
बिंब ॥ ८ ॥ ताके अनंतर उस त्रिशूलको आता हुवा भगवती देखकर अ-
पना त्रिशूल छोडती भई फिर भगवतीके त्रिशूलने असुरके त्रिशूलका चूर्ण
करदिया और उस असुरकानी चूर्ण कर दिया ॥ ९ ॥ फिर जब महिषा-
सुरका सेनापति चिक्षुर नामा दैत्य संग्राममें मारा गया तब हाथीपर बैठा
हुवा देवतानको पीडा करनेवाला चामर नामा दैत्य आता भया ॥ १०॥

अध्याय ३ (२७) सोपिशक्तिंमुमोचाथदेव्यास्तामंबिकाद्रुतम् ॥ हुंकाराभिहतां भूमौपातयामासनिष्प्रभां ॥ ११॥ भग्नांशक्तिनिपतितांदृष्ट्या क्रोधसमन्वितः ॥ चिक्षेपचामरः शूलंबाणैस्तदपिसाच्छिन- त् ॥ १२॥ ततःसिंहासमुत्पत्यगजकुंभांतरेस्थितः। बाहयु- देनयुयुधेतेनोबैस्त्रिदशारिणा ॥ १३॥ युध्यमानौततस्तोतुत स्मानागान्महींगतोयुयुधातेतिसंरब्धौप्रहारैरतिदारुणैः॥१४ ततोवेगात्समुत्पत्यनिपत्यचमृगारिणा ॥ करप्रहारेणशिर वामरस्यपृथक्कृतं ॥१६॥ टीका-फिर वहनी देवीको मारनेके लिये शांग शस्त्र फेकता या फिर भषिका अपना हुँकारकरिकै मलिन हुई शांगको शीघही पृथ्वीमें गिरानी भई ॥ ११ ॥ ताके अनंतर देवीकरिकै खंडित हुई और पृथ्वीमें पडी हुई अपनी शांगको देखकर कोषयुक्त हुवा चामर नामा दत्य देवीके सन्मुख त्रि- शूल फेकता भया उस त्रिशूलकोभी भगवती बाणोंकरिके काटती भई ॥ १२ ॥ फिर ता समय सिंह उछलकै हाथ के माथेके मध्यमें बैठा हुवा अत्यंत बाहुयुद्धकरिकै देवतोंका शत्रु चामर नामा दैत्यके साथ युद्ध कों भयो ॥ १३ ॥ ताके अनंतर सिंह और चामर नामा दैत्य ये दोनों युद्ध कर्वे हुवे हाथीपरसे पृथ्वीमें गिरते भये फिरभी बड़े कठोर प्रहारोंकरिकै अत्यंत कोप युक्त हुवे युद्ध कर्ने भये ॥१४॥ ताके अनंतर सिंहने आकाशमें उछ- लके और पृथ्वीपर पडके नखप्रहारोंकरिकै चामर दैत्यका शिर काट दिया१५ उग्रश्चरणेदेव्याशिलावृक्षादिभिर्हतगादतमुष्टितलैश्चैवकराल शनिपातितः॥१६॥देवीक्रुद्धागदापातैश्चूर्णयामासचोद्धतम्।। बाष्कलंभिदिपालेनवाणैस्तानंतथाधकम् ॥ १७॥ उपास्य- मुग्रवीर्यचतथैवचमहाहनुं । त्रिनेत्राचत्रिशूलेनजधानपरमेश्व- री॥ १८॥ विडालस्यासिनाकायात्पातयामासवैशिरः ॥ दुर्धरंदुमुखंचोभौशरैनिन्येयमक्षयं ॥कालंचकालदण्डनकाल- (२८) सप्तशतीभापाटीका। रात्रिरपातयत् ॥ १९ ॥ उपदर्शनमत्युग्रैःखड्गपातैरताड- यत् ॥ असिनवासिलोमानमच्छिदत्सारणोत्सवे॥गणैःसिंहेनदे व्याचजयक्ष्वेडाकृतोत्सवैः॥२०॥ टीका-फिर उस रणकेविषे पापाण और वृक्ष इनके प्रहार करिकै और धनुष आदि शस्त्रोंके प्रहारकरिकै देवीने. उग्रनामदैत्यको मारा और हाथ के दांतकी बनी जो मुष्टिका तिनके प्रहारकरिकै चनपटोकरिकै करालनामा दैत्य को पृथ्वीमें गिरादिया ॥१६॥ फिर उस संग्राममें क्रोधयुक्त होतीहुई भगवती उद्धतनाम दैत्यको गदाके प्रहारोंकरिके चूर्ण कतीभई और गोफियाशस्त्रके प्रहारकरिके त्रिनेत्रापरमेश्वरी बाष्कलंदैत्यको मारतीभई तिसीप्रकार बाणों- के प्रहारकारकै ताम्रदैत्यको मारतीभई और तैसेही अंधक दैत्यको मारतीमई और तिसीप्रकार उपास्य और उग्रवीर्य और महाहनु इन दैत्योंकोजी मारती भई और त्रिशूलके प्रहार करिकै समग्रसेनाकों मारतीजई ॥ १८॥ और तलवार करिकै बिडालासुरके शिरको शरिसे अलग गिरातीभई और बाणों के प्रहारकरिकै दुर्धर और दुर्मुख इन दोनो दैत्योंको यमराजके लोकमें प्रानकी भई और कालरात्रि देवी कालदंडकरिकै कालनामदैत्यको पृथ्वीमें गिराती भई ॥ १९॥ और बडेकठोर खड़के प्रहारकरिकै भगवती उग्रदर्शन दैत्यको पृथ्वीमें गिरातीभई और खड़के प्रहारकरिकेही असिलोमा दैत्यको मारतील- ई फिर उस रणरूपी उत्सवकेविष भगवतीके गण और सिंह और भगवती इनोंने जयसंबंधी सिंहनाद किया ॥ २० ॥ एवंसंक्षीयमाणेतुस्वसैन्येमहिषासुरः ॥ माहिषेणस्वरूपेणत्रा- सयामासतानगणान् ॥२१॥ कांश्चित्तुंडप्रहारेणक्षुरक्षेपैस्त- थापरान् ॥ लांगूलताडितांश्चान्यान् शृंगाभ्यांचविदारिता न् ॥२२॥वेगेनकांश्चिदपरान्नादेनभ्रमणेनच ॥ निःश्वासप वनेनान्यान्पातयामासभूतले ॥ २३ ॥ निपात्यप्रमथानी कमभ्यधावतसोऽसुरः ॥ सिंहहंतुमहादेव्याःकोपंचक्रेततो- अध्याय ३ (२९) म्बिका ॥ २४ ॥ सोपिकोपान्महावीर्यक्षुरक्षुण्णमहीत- लः॥ शृंगाभ्यांपर्वतानुच्चांश्चिक्षेपचनादच ॥ २६ ॥ टोका- इसप्रकारसे देवीके गणोंकरिकै अपनी सेना नाशमान होतेहुवे 'देखकर इसवातको नहीं सहवाहुवा महिषासुर महिषाकार स्वरूपकरिके भगवतीके गणोंको कंपायमान कहॊभयो॥ २१॥ ताके अनंतर कितनेही गण तो मुखके प्रहारसे पृथ्वीमें गिरातोभयो और कितनेही गण खुरोंके प्रहारों करिकै पृथ्वीमें गिरातोभयो और कितनेही पुच्छकरिकै ताडित तिनको पृथ्वीमें गिरातो भयो और कितनेही गणोको शृगोंसे वींधकर पृथ्वी में गिरातो भयो । २२ ॥ और कितनेही गणोको वेगकरिकै पृथ्वीमें गिरातोभयो और कितनेही गणोको गर्जनाकरिकै पृथ्वीमें गिरातोभयो और कितनेही गणोको शरीरकी फेटकरिकै पृथ्वीमें गिरातोभयो और कितनेही गणोको अपने श्वासकी पवनकरिकै पृथ्वीमें गिरातोगयो ॥ २३ ।। फिर वह असुर भगवतीकी पार्षदसेनाको ऐसे गिराकर पीछे भगवतीके सिंहके मारनेको सन्मुख दौडतो भयो ता समय भगवती महिषासुरकेविषे अत्यंत क्रोध कर्तीभई ॥ २४ ॥ फिर वहभी बडा पराक्रमी दैत्य क्रोधसे खैरू खूदत हुवा पर्वतोंको शंगोंसे उठाकर भगवतीके मस्तकपर फेकतामया और ऊंचे स्वरसे गर्जना क!भयो ।॥ २५ ॥ वेगभ्रमणविक्षुण्णामहीतस्यव्यशीर्यत॥लांगूलेनाहतश्चाब्धिः- पावयामाससर्वतः॥२६॥धुतभंगविभिन्नाश्चखंडखंडंययुर्वनाः। श्वासानिलास्ता शतशोनिपेतुर्नभसोचलाः॥२७॥ इतिक्रोध समाध्मातमापतंतमहासुसीदृष्ट्वासाचंडिकाकोपंतद्वधायतदा- करोत्॥२८॥साक्षित्वातस्यवैपाशंतंबबंधमहासुरंतत्याजमा हिषंरूपंसोपिबद्धोमहामृधे॥२९॥ ततःसिंहोभवत्सद्योयाव- त्तस्याम्बिकाशिरमाछिनत्तितावत्पुरुषःखङ्गपाणिरदृश्यत॥३०॥ टीका-फिर तिस महिषासुरका जो वेगकरिकै भमण ताकरिकै पिसी- (३०) सप्तशतीभापाटीका। हुई पृथ्वी आपही नम्र होतीमई और उस महिषासुरकी पुच्छकारकै ताडि- तहुवा समुद्र सर्वत्र पृथ्वीकेविष मनुष्योंको डुवातामया ॥ २६ ॥ फिर कंपित श्रृंगोंकरिकै विदीर्ण किये ऐसे जे मेघ ते खंडखंड होयकर जातेभये और तिस महिषासुरका क्रोधका सेंकडों श्वासके पवनसे फेकेहुवे जे पर्वत वे चूर्णीभूत हुवे आकाशसे पडतेभये ॥ २७ ॥ इस प्रकारसे क्रोधरूपी अमि करिकै संयुक्त और युद्धकेलिये आताहुवा महिषासुरको देखकर चंडिका उसके मारनेकेलिये क्रोध कौभई ॥ २८ ॥ फिर उस महासंग्राममें महिषासुरके मारनकेलिये भगवती पाश फेकके महिषासुरको बांधतीनई सोनी पाशके बंधसे घबराताहुवा महिषाकार स्वरूपको त्यागतामया ॥ २९ ॥ फिर महिषाकार स्वरूप त्यागके अनंतर भगवतीसे युद्ध करनेको उसीसमय सिंहरूप होतोयो फिर जितने कालकारकै भगवती उसको शिर काटेगी उत- ने कालकेविषे खड़ है हाथमें जिसके ऐसा पुरुष प्रकट होताहुवा भगवतीको दीखताभया ॥ ३०॥ ततएवाशुपुरुषदेवीचिच्छेदसायकैः॥ तंखॉचर्मणासार्धेततः सोभून्महागजः॥३१॥ करेणचमहासिंहंतंचकर्षजगर्जच ॥ कर्षतस्तुकरदेवीखङ्गेननिरकृतत ॥३२॥ ततोमहासुरोभूयो माहिषवयुराश्रितः।तथैवक्षोभयामासत्रैलोक्यंसचराचरं३३॥ ततक्रुद्धाजगन्माताचण्डिकापानमुत्तमम् ॥ पपौपुनःपुनश्चैव जहासारुणलोचना॥३४॥ननर्दचासुरःसोपिबलवीर्यमदोद्धतः॥ विषाणाभ्यांचचिक्षेपचंडिकांप्रतिभूधरान् ॥३५॥ टीका-फिर पुरुष देखनेके अनंतरही बाणोंकरिकै भगवती पुरुपका कंठ काटती गई और उसकी तलवार ढालभी काटती भई फिर पुरुषरूपके सकाशते गजरूप होतो भयो ॥ ३१॥ फिर शृंड करिकै वह असुर देवीवाहन सिंहको बँचतो भयो और गर्जतो भयो फिर सिंहको बैंचते हुवेकी शृंड देवी खड्न करिकै कारती भई ॥ ३२ ॥ ताके अनंतर वह असुर फिर अपने निज अध्याय ३ (३१) महिषाकार स्वरूप बनाता भया और तिसीप्रकार चराचर त्रिलोकीको दुःख देता मया ॥ ३३ ॥ ताके अनंतर क्रोधयुक्त होती हुई जगतकी मावा चंडि- का और लाल हैं नेत्र जाके ऐसी भगवती रणकेविषे मद्य पीती भई फिर वारंवार हँसतीही भई और युद्धको कुछ नहीं गिनती भई ॥ ३४ ॥ फिर सामर्थ्य और तेज और गर्व इनकरिकै छोडी है मर्यादा जाने ऐसो जो महि- पासुर सोनी रणभूमिकेविषे गर्जतो भयो और भंगोंसे भगवतीपर पर्वत फेकतो भयो ।॥ ३५ ॥ साचतान्प्रहितांस्तेनचूर्णयंतीशरोत्करैः॥ उवाचतमदोद्भूतसु- खरागाकुलाक्षरम् ॥३६॥ देव्युवाच।। गर्जगर्जक्षणमूढमधुयाव पिवाम्यहं । मयात्वयिहतत्रैवर्जिष्यंत्याशुदेवताः ॥३७॥ ॥ऋपिरुवाच ॥ एवमुक्त्वासमुत्पत्यसारूढातमहासुरं ॥ पादेनाक्रम्यकंठेचशूलेनैनमताडयत् ॥ ३८॥ ततः सोपि- पदाक्रांतस्तयानिजमुखात्ततः ॥ अर्धनिष्क्रान्तएवासीदेव्या- वीर्येणसंवृतः ॥३९॥ अर्धनिष्क्रांतएवासीयुध्यमानोमहा- सुरः॥ तयामहासिनादेव्याशिरश्छित्त्वानिपातितः॥१०॥ टीका-फिर उस दैत्यके फेंके हुवे पर्वतोंको बाणोंकी वर्षाकरिक चूर्ण कर्ती हुई भगवती मद्यपानके मदकरिकै उत्पन्न भयो जो मुखकेविषे राग ताकारकै अच्छी तरह नहीं समझेन अक्षर जाकेविषे जैसा होय तैसा बो- लती भई ॥ ३६ ॥ देवी बोलती भई कि हे मूढ जितने मैं मधु पीती हूं उतने क्षणभर तू गर्न गर्न ताके अनंतर मेरेसे तेरे मरनेके वाद इस संग्रामकेविषे शीघही देवता गजेंगे ॥ ३७॥ वाके अनंतर ऋषि बोले कि हे राजन् ऐसे भगवतीकहकर और उछलकर असुरके ऊपर बैठती हुई एक पैरसे असु- रको बांधकर पीछे उसके कंठमें त्रिशूल मारती भई ॥ ३८ ॥ ताके अनंतर एक पैरसे बंधा हुवा महिषासुर अपने मुखसे पुरुषरूप होकर निकसता हुवा तिम समय देवीने अपनी सामर्थ्यकरिकै रोक दिया याते आधा निकसता (३२) सप्तशतीभापाटीका। हुवाही रहता भया ॥ ३९ ॥ फिर वह जो आधा निकसा हुवाही देवीके साथ युद्ध कर्ता हुवा महिषासुर दैत्य है सो उसे भगवतीने महा खड़से शिर काटकरिकै पृथ्वीमें गिरा दिया ॥ ४० ॥ एवंसमहिषोनामससैन्यःससुहृद्गणः ॥ त्रैलोक्यमोहयित्वातु- तयादेव्याविनाशितः ॥ ४१॥ त्रैलोक्यस्थैस्तदाभूतैमहि- विनिपातिते ॥जयेत्युक्तंततःसर्वैःसदेवासुरमानवैः॥४२॥ ततोहाहाकृतंसर्वदैत्यसैन्यंननाशयत् ॥ प्रहर्षचपरजग्मुः सकलादेवतागणाः॥४३॥ तुष्टुवुस्तांसुरादेवींसहदिव्यैर्मह- र्षिभिः ॥ जगुगंधर्वपतयोननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ४४ ॥ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरे देवीमाहात्म्ये तृती- योध्यायः॥३॥ टीका- इस प्रकारसे अपनी सेनाकरिकै सहित और अपने मित्रादिकन करिकै सहित त्रिलोकीको दुःख देकर युद्ध कर्ता हुवा ऐसा जो महिपासुर उसे संग्रामकेविषे अगवतीने मारा ॥४१॥ तिस समयकेविषे त्रिलोकीमें रहनेवाले देव और असुर और मनुष्य अर्थात् स्वर्गमें रहनेवाले इंद्रादिक दे- वता और पातालमें रहनेवाले बलि आदि असुर और पृथ्वी में रहनेवाले ब्रा- ह्मण आदि मनुष्य ये सब जयजयशब्द कर्ने भये ॥ ४२ ॥ ताके अनंतर जो कुछ बाकी रही दैत्योंकी सेना सो हाहाकार कर्ती हुई अदृष्ट होती भई और संपूर्ण देवता आनंदको प्राप्त होते भये ॥४३॥ फिर स्वर्गमें रहनेवाले महर्षियोंकरिकै सहित देवता भगवतीकी स्तुति कःभये और हाहा हूहू आदि गंधर्व गाते भये और उर्वशीसे आदिले अप्सरा नाचती भई॥४४॥ इति मार्क डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरेदेवीमाहात्म्ये महिषासुरवधोनाम तृतीयो० ॥३॥ ऋषिरुवाच॥ततःसुरगणाःसदेव्याइन्द्रपुरोगमाः॥स्तुतिमा- रेभिरेकर्गनिहतेमहिषासुरे ॥ १॥ शक्रादयःसुरगणानिहते तिवीर्येतस्मिन्दुरात्मनिसुरारिबलेचदेव्या ॥ तांतुष्टुवुःप्रणति अध्याय ४ नम्रशिरोधरांसावाग्भि प्रहर्षपुलकोद्मचारुदेहाः ॥२॥देवा ऊचुः॥ देव्याययाततमिदंजगदात्मशक्त्यानिश्शेषदेवगणश- क्तिसमूहमूर्त्या।।तामविकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्यानताः स्मविदधातुशुभानिसानः॥३॥ यस्याःप्रभावमतुलंभगवाननं तोब्रह्माहरश्चनहिवमलंबलंच ॥ साचण्डिकाखिलजगत्परि- पालनाय नाशायचाशुभभयस्यमतिंकरोतु ॥ ४॥ याश्रीः. स्वयंसुकृतिनांभवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनांकृतधियांहृदयेषु बुद्धिः। श्रद्धासतांकुलजनप्रभवस्यलज्जा तांत्वांनतास्यपरि पालयदेविविश्वम् ॥५॥ टीका-ऋषि बोले कि हे राजन् महिषासुरके मरनेके अनंतर इंद्रादिक देवता भगवर्त की स्तुति करनेको आरंभ कर्तेधये ॥ १ ॥ और जब देवीने उस संग्रामके विपे बडा पराक्रमी और दुरात्मा ऐसे महिषासुरको मारा और दैत्योंकी सेनाको मारी ता समयकेविषे स्नेहकारकै नम्र है नाडि और कंधे जि- नोके और आदिकेविषे जे रोमांच तिनका जो ऊठना ताकरिकै मनोहर है देह जिनोंके ऐसे जे इंद्रादिक देवता भगवतीकी स्तुति काये॥२॥ देवता बो- लतेभये कि संपूर्ण देव और उनकी शक्ति इनके जे समूह तेही है मूर्ति जिसकी ऐसी जो भगवती ताने अपनी शक्ति करिकै जगत् रच्यो है और संपूर्ण देव और महा इन करिकै पूज्य ऐसी जो अंबिका देवी ताको हम भक्ति कार- कै नमस्कार करतेहैं हे भगवती हमारा कल्याण करो ॥ ३॥ और नहींहै उपमा जाकी ऐसा जो भगवतीका प्रभाव और बल ताको वर्णन कर्नेको विष्णु और ब्रह्मा और शिव येनी समर्थ नहीं वह चंडिका जगत्को पालनेके अर्थ और अशुभनसे जो भय ताके नाशके अर्थ बुद्धि करो ॥ ४ ॥ हेदेवी पुण्यवानोंके घरोंके विषे जो तुम लक्ष्मीरूपहो और पापियोंके घरोंके विषे अलक्ष्मी रूपहो और ज्ञानियोंके हृदयकेविषे बुद्धिरूपहो और सज्जनोंके हृदयके विषे श्रद्धारूपहो और श्रेष्ठकुलकेविषे उत्पन्न जो मनुष्य वाके हृद- . .. (३४) सप्तशतीभापाटीका। यके विषे लज्जारूपहो ऐसी जो तुमहो सो तुमको हम नमस्कार करतेहं तुम या जगत्को पालनकरो ॥ ५ ॥ किंवर्णयामतवरूपमचिंत्यमेतत्किचातिवीर्यमसुरक्षयकारिभू- रि॥ किंचाहवेषुचरितानितवातियानिसपुदेव्यसुरदेवगणा- दिकेषु ॥ ६॥ हेतु समस्तजगतांत्रिगुणापिदेवैज्ञायसहरि- हरादिभिरप्यपारा सर्वाश्रयाखिलमिदंजगदंशभूतमव्याकृता हिपरमाप्रकृतिस्त्वमाया॥७॥ यस्याः समस्तसुरताससुदी- रणेनतृप्तिप्रयातिसकलेपुमलेषुदेवि। स्वाहासिवैपितृगणस्य चतृप्तिहेतुरुच्चार्यसेत्वमतएवजनैः वधाच ।। ८ ।। यामुक्ति हेतुरविचित्यमहानतात्वमभ्यस्यसेसुनियतेंद्रियतत्त्वसारैः ॥ मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोपैविद्याऽसिसाभगवतीपरमा हिदेवि ॥ ९ ॥ शब्दात्मिकासुविमलय॑जुषांनिधानमुद्गी- थरम्यपदपाठवतांचसाम्नाम् ॥ देवीथीसगवतीभवभावनाय वार्तास्त्रिसर्वजगतापरमार्तिहंत्री ॥ १०॥. टीका-हेदेवि! संपूर्ण असुर और देवगण इत्यादिकोंके विपे अत्यंत असुरोंका क्षय करनेवाला और बडा पराक्रमी मन करिकेशी चितवन कर- नेको दुर्लभ ऐसा जो तुमारा यह मनोहररूप ताको हम वाणी करिक कैसे वर्णन करें और संग्रामोंके विषे मन करिकभी स्मरण करनेको दुर्लभ ऐसे जे तुमारे दीर कर्महै तिनकेशी हम बाणीकरिकै कैसे वर्णन करें॥६॥ हे भगवती! स्वर्ग और पृथ्वी और पाताल इनका कारण त्रिगुणगी तूहे तौमी हरिहरादिक देवों करित नहीं जानीजातीहै फिर कैसीहै अनंतहैं और सबका आ- श्रयहै और यह जगत्संपूर्ण तेरा अंशतहै फिर तू कैसीहैं किसी करिकै प्र- काशित नहींहै फिर कैसीह उत्कृष्ट लक्ष्मीरूपहै फिर कैनीहै जगत्का मूल सूतहै फिर कैसीहै प्रकृतिरूपहै ॥७॥ हे भगवती! फिर तू कैसी है स्वाहारूपहै जाका उच्चार करिकै संपूर्ण यज्ञोंके विषे संपूर्ण देवता तृप्तिको प्राप्त होते हैं

अध्याय४
(३५)
इसकारणसे निश्चयकरिके पितृगणकी तृप्तिका हेतु स्वधारूप मनुष्यों करिकै
उच्चारण करीजातीहै ॥ ८॥ हेजगवती! जो तुम मुक्तिका हेतु चितवन करने-
में नहींआवो और बड़े कठिन व्रत जाकेविषे और संपूर्ण ऐश्वर्य करिकै सु-
और वेदांतके त्यास करिकै उत्पत्ति जाकी ऐसी ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति
रूप जो विद्या सो तुमहो. फिर तुम कैसी हो अच्छीतरह विषयोंसे हटाईहै
इद्रियोंकी वृत्ति जिनोंने और तत्वज्ञानहै सार जिनोंके और नष्ट होगयेहैं स-
मस्त कामादि रूप दोष जिनोंके एसे मोक्षकी इच्छा करनेवाले जे मुनि, तिन
करिकै वारंवार अन्यासकरीजातीहो ॥ ९॥ हेभगवति ! फिर तुम कैसीहो
संपूर्ण ऐश्वर्य करिकै युक्तहो और नादरूपहो सुंदर और दोष करिके रहित
ऐसे जे ऋग्वेद तिन करिके सहित जे यजुर्वेद और उच्चस्वरसे गाने करिक
रंमणीकंपदपाठवाले ऐसे जे सामवेद इनकी शिवजीका ध्यानकेअर्थ प्रवृत्त
वयीरूप तुमहो फिर कैसीहो कपि गोरक्षादि वृत्तिरूप तुमहो फिर कैसीहो
संवजगत्का आधारहो और सब जगत्का दुःख हरनेवालीहो ॥ १० ॥
मेधासिदेविविदिताखिलशास्त्रसारादुर्गाऽसिदुर्गभवसागरनौर-
संगा | श्री कैटभारिहृदयैककृताधिवासागौरीत्वमेवशशिमौ-
लिकृतप्रतिष्ठा ॥ ११॥ ईपत्सहासममलंपरिपूर्णचंद्रविम्बा-
नुकारिकंनकोत्तमकांतिकांतम् । अत्यद्भुतंप्रतमात्तरुषात
थापिवक्रविलोक्यसहसामहिषासुरेण ॥ १२ ॥ दृष्ट्वातुदेवि
कुपितंभ्रुकुटीकरालमुघच्छशांकसदृशच्छवियन्नसयः ॥ प्रा-
णान्मुमोचमहिषस्तंदतीवचित्रकै व्यतेहिकुपितांतकदर्शने-
न ॥ १३॥ देविप्रसोदपरमाभवतीसवाय सबोविनाशयसि
कोपवतीकुलानि ॥ विज्ञातमेतदधुनैवयदन्तमेतत्रीतंवलंसु-
विपुलंमहिषासुरल्या॥१॥ तेसंमताजनपदेषुधनानितेषांतेषां
यशांसिनचसीदतिबंधुवर्गधन्यास्तएवनिभृतात्मजभृत्यदा-
रायेषांसदाभ्युदयदाभवतीप्रसन्ना ॥ १५ ॥

(३६)
सप्तशतीमापारीका।
टीका- हे भगवती! फिर तुम कैसी हो कि जानेजाय संपूर्ण शास्त्र जा
करिकै ऐसी बुद्धिरूप हो फिर कैसी हो दुःख करिकै प्राप्त होसकतीहो
फिर कैसी हो अगम्य जो संसार रूपी समुद्र ताके विषे नौका रूप हो फिर
कैसी हो कि संसारके विषय वासना करिकै रहित हो फिर कैसी हो विष्णुके
वक्षस्थल में निवास करनेवाली लक्ष्मीरूप हो फिर कैसी हो शिवजीने कियो
है सत्कार जाको ऐसी गौरीरूप तुम हो ॥ ११ ॥ हे जगवती! मंदहास्य क-
रिकै सहित और निर्मल और पूर्णिमाके चंद्रमाके विवके सहश और सुवर्णके
बीच जो उत्तम सुवर्ण ताकी शोचाके सदृश है शोजा जाकी याते बडाही
मनोहर ऐसा जो तुझारा मुख ताको देखकर तोनी क्रोधयुक्त महिपासुरने
बलात्कारसे प्रहार किया यह बड़ा अचरज है क्यों कि जगत्को मोहन कर-
नेवाला ऐसा जो तुलारा मुख ताको देखकर महिषासुरको मोहन नहीं हुवा
याते यह अत्यंत भेद भयो ॥ १२ ॥ हे देवी उस रणके विपे क्रोध करिकै
युक्त और मुकुटीकरिकै भयंकर और पूर्णिमाके विषे उदयहोताहुवा चं-
द्रमाकी तुल्य है शोजा जाकी ऐसा तुलारे मुखको देखकर ता समय महिषा-
सुर प्राण नहीं त्यागता भया यह बड़ा अचरज है क्यों कि क्रोधयुक्त कालके
दर्शन करिकै कौन प्राणी जीवे अर्थाद कोई नहीं जीवे ॥ १३ ॥ हे भगवती
तुम प्रसन्न हो फिर कैसी हो उत्कृष्ट लक्ष्मीरूप हो तुलारेसे युद्ध करनेको
आई ऐसी जो महिषासुरकी सेना है ताको तुमने नाशको प्राप्त करदई यह
क्या बात है इसको अवही हम जानें है कि हे जगवती जब तुम प्रसन्न होती
हो तब शीवही जगत्का पालन कर्ती हो और जब क्रोधयुक्त होती हो तव
शीघही असुरोंके वंशका नाश कर्ती हो ॥ १४ ॥ हे जगवती ! तुम भनोरथ
पूर्ण करनेवाली जिनके ऊपर प्रसन्न हों वेही मनुष्य संपूर्ण देशों में प्रतिष्ठा
वाले है और उनके धन है और उनकेही यश है और उनके भाईबंध जे हैं.
तेनी दुःख नहीं पाते है और वेही पुण्यवाले हैं फिर वे पुरुष कैसे हैं कि
शिक्षा दियेगयेहैं कुलको आचरणके विष पुत्र और नौकर और
स्त्रियां जिनोंके ॥ १५॥

अध्याय ४ (३७) धाणिदेविसकलानिसदैवकर्माण्यत्याहत प्रतिदिनसुकृती करोति । स्वर्गप्रयातिचततोभवतीप्रसादालोकत्रयेपिफलदा- ननुदेवितेन ॥१६॥ दुर्गेस्मृताहरसिभीतिमशेषजतोःस्वस्थैः स्मृतामतिमतीवशुभांददासि ॥ दारिबदुःखभयहारिणिका त्वदन्यासर्वोपकारकरणायसदाचित्ता ॥ १७॥ एभिहेतर्ज- गदुपैतिसुखंतथैतेकुवैतुनामनरकायचिरायपापासंग्राममृत्यु- मधिगम्यदिवंप्रयांतुमत्वेतिनूनमहितान्विनिहंसिदेवि।॥१८॥ दृष्ट्वैवार्किनभवतीप्रकरोतिभस्मसर्वासुरानरिषुयत्प्राहिणोषिश- स्त्रं ॥ लोकान्प्रयान्तुरिपवोपिहिशस्त्रपूता इत्थंमतिर्भवतिते- वहितेषुसाध्वी ॥ १९ ॥ खड्गप्रमानिकरविस्फुरणैस्तथोग्रैः शूलाग्रकांतिनिवहेनदृशोसुराणां ॥ यन्नागताविलयमंशुमदि दुखंडयोग्याननं तवविलोकयतांतदेतत् ॥२०॥ टीका-हे भगवती! तुमारी कपासे नित्यप्रति सदाही आदरयुक्त होता हुवा जो सुकृति मनुष्य है सो तुलारी प्रसन्नताके अर्थ ज्योतिष्टोमादिक जे कर्म हैं तिनको कर्ता है फिर ताके अनंतर तुझारी प्रसन्नतासे स्वर्गमें जाता है फिर ताके अनंतर मोक्षको प्राप्त होता है हे देवी! तिस कारण करिकै तीनों लोकोंमें तुमही फल देनेवाली हो ॥ १६ ॥ हे दुर्गे! तुम मन करिकै स्मरण करी हुई सब प्राणीयोंका भय दूर कर्ती हो और स्थिर चित्तवालों करिकै स्मरण करी हुई तुम उनको धर्म अर्थ काम मोक्ष इनका साधनस्त अत्यंत श्रेष्ठ बुद्धि देती हो हे दारिश और दुःख और भय इनको दूर करनेवाली! सबका उपकार करनेको सदैव आई है हृदय जाको ऐसी तुझारेसे और दू- सरी कौन है अर्थाद कोई नहीं है ॥ १७ ॥ तुमनें मारे जे ये महिषासुरसे आदि ले करकै दैत्य तिन करिकै जगव सुखको प्राप्त हो और तिस प्रकार ये असुर बहुत काल पर्यंत नरकके विषे प्राप्त होवेको पाप मत करो किंतु ये असुर संग्रामके विषे मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गमें जावो ये निश्चय करिकै तीन (३८) सप्तशतीभाषाटीका। कारण मनमें विचार करिकै हे देवी! इन असुरोको तुम मारती हो ।। १८॥ हे भगवती! दृष्टि करिकेही क्या सव असुरोंको भस्म नहीं करयो अर्थात् करिही यो तौभी शत्रुवोंके विषे जो तुम शत्र छोडती हो सो हमारो शत्रुनी शस्त्रोंसे पवित्र होता हुवा यथेच्छ स्वर्गादिक लोकोंके विषे जावो इस प्रका- से दुष्ट दैत्योंके विषे तुलारी श्रेष्ठ बुद्धि है ॥ १९ ॥ और संग्रायके विपे तु- सारे खड़की ने प्रभा ताके रामूहके चौतरफ फैलने करिकै और त्रिशुलकी प्रनाले समूह करिकै असुरोंकी जे दृष्टि ते नाशको प्राप्त न भई सो यह और ही कारण है क्यों कि कैसे हैं वे असुर है अमृतमयी किरण जाकी ऐसा अर्द्धचंद्र करिकै युक्त जो तुलारा मुख ताको देखते हुवे ॥ २० ॥ दुर्वृत्तवृत्तशमनंतवदेविशीलरूपत्तथैतदविचित्यमतुल्यमन्यैः! वीर्यचहंतृहृतदेवपराक्रमाणांवरिष्वपिप्रकटितवदयात्वयेत्य म् ॥२१॥ केनोपमाभवतुतेस्यपराक्रमस्य रूपंचशत्रुभय कार्यतिहारिकुत्र । चित्तेकृपासमरनिष्ठुरताचदृष्टात्वय्येव देवि वरदेसुवनत्रयपि॥ २२ ॥ त्रैलोक्यमेतदखिलंरिपुनाशनेनत्रात त्वयासमरसूर्धनितेपिहत्वा ॥ नीतादिवरिपुगणाभयमप्यपा स्तमस्माकमुन्मदसुशरिभवनमस्ते ॥ २३ ॥ शूलेनपाहि नोदेविपाहिखड्नेनचाम्बिके ॥ घण्टास्वनेननः पाहिचापज्या- निःस्वनेनच॥२४॥प्राच्यांरक्षप्रतीच्यांच चण्डिकरक्षदक्षिणे।। भ्रामणेनात्मशूलस्यउत्तरल्यांतथेश्वरि ॥ २५ ॥ टीका-फिर हेदेवि! तुम कैसीहो पापियोंके पाप दूर करनेवाला यह तु. हमारा स्वाभाविक गुणहै और तिसीप्रकार मन करिकेभी चितवन करनेको दुर्ली और अद्वितीय होनेसे और कोई मनोहर रूपों करिकै समान नहीं ऐसा तुमारा रूपहै और तिसीप्रकार अपने आधीन कियेहैं देव जानें ऐसा है पराक्रम जिनोंका ऐसे दैत्यों को मारनेवाला तुलारा पराक्रमहै फिर हेदेवि! वै- रियोंकेविषेभी तुमने ऐसे दयाही प्रगट करी ॥ २१ ॥ हेवरदान देनेवाली.!

अध्याय ४ तुमारा इस पराक्रमकी तीन लोकभी किसीके साथ उपमा होय अर्थात किसीके साथ नहीं ऐसा तुलारा पराक्रमहै और शत्रुवोंकों भय करनेवाला औरनको मनोहारी ऐसा रूप कहां ऐसा तुमाराही रूपहै और तुलारा चित्तके विषे कृपा और रणके विषे कठोरता यह तुम्हारे विषेही दे- सीहै ॥ २२ ॥ हेदेवि! संग्राम के विपे दैत्योंको मारि करिके तुमनें संपूर्ण त्रि- लोकीकी रक्षा करी फिर उन अपने दैत्योंकोजी संग्रामके विषे मारि करिके तुमने स्वर्गमें पहुँचादिये और दैत्योंसे उत्पन्न जो हमको भय था सो हमारा भयनी तुमने दूरकिया ऐसी जो तुमहो तुलारे अर्थ नमस्कारहै ॥ २३ ॥ हे अधिक! त्रिशूल करिके हमारी शत्रुवोंसे रक्षाकरो और खड्न कारकै रक्षाकरो और हे देवि ! घंटाके शब्द करिकै और धनुषकी टंकार करिके तुम हमारी शत्रुवोंसे और पापोंसे रक्षाबरो ॥ २४॥ हेचंडिके त्रिशूलको चारों और घुमाने करिकै पूर्वमें और पश्चिममें और दक्षिणमें हमारी रक्षाकरो और तिसीप्रकार हेईश्वरी उत्तरके विपे रक्षाकरो ॥ २५ ॥ सौम्यानियानिरूपाणित्रैलोक्येविचरतिते ॥ यानिचात्यंतघो- राणितैरक्षात्मांस्तथाभुवम्॥ २६॥ खड्गशूलगदादीनियानि चास्त्राणितेम्बिककरपल्लवसंगीनितैरस्मानक्षसर्वतः॥ २७॥ ऋषिरुवाच ।। एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैनंदनोद्भवैः आर्चि- ताजगतां धात्रीतत्रगंधानुलेपनैः ॥२८॥ भक्त्यासमस्तौस्त्रि- दशैदिव्यधूपैःसुधूपिता ॥ प्राहप्रसादसुमुखीसमस्तान्प्रण- तान्मुरान् ॥२९॥ देव्युवाच ॥ त्रियतांत्रिदशाः सर्वेयदस्म- तोभिवांछितम्।।ददाम्यहमतिप्रीत्यास्तवैरोभासुपूजिता॥३०॥ टीका-और हेगवती ! संसारको रचनवाले और पालना करनेवाले जे तुम्हारे सौम्यरूपहैं और संसारके संहार करनेवाले ऐसे जे तुम्हारे भयंकर रूप हैं ते दोनो प्रकारके रूप त्रिलोकीके विषे विचरतेहैं तिन दोनों प्रकार के रूपों करिकै हमारी रक्षाकरो और या पृथ्वीकी रक्षा करो और पातालकी राक्ष- (४०) सप्तशतीभाषाटीका। करो ॥ २६ ॥ और हेजगवती ! हामें धारण किये ऐसे जे खड़ और त्रिशूल और गदा इन आदिलेकर शन तिनकरिके और धनुपआदि ने अस्वहैं दिन करिके चारों तरफ शत्रुवोंसे और दुःखसे हमारी रक्षाकरो॥२७॥ तब अपि बोले कि हे राजन् ! जब इसप्रकारसे जगत्के पोपण करनेवाली अगव- वती देवता करिकै स्तुति करीहुई और दिव्य नंदन वनमें उत्पन्न होनेवाले पुष्पों कारकै और चंदन श्रीराग इत्यादिकांकरिके पूजितहुई ॥ २८ ॥ और देवतावों करिकै भक्तिपूर्वक दिव्य धूपसे पूजितहुई ऐसी भगवती प्रसन्न होतीहुई देवतोंके प्रति बोलतीभई ॥ २९ ॥ देवी बोली कि हे देवो! सब तुम मेरेसे मनोवांछित वरदान मांगो तुमने स्तुतिकरी जिसकरिकै मैं बडी प्रसन्न हूं सो जो मांगोगे वही दूंगी ॥३०॥ कर्त्तव्यमपरंयच्चदुष्करंतन्नविद्महे ॥ इत्याकर्ण्यवचोदेव्याःप्र- त्यूचुस्तेदिवौकसः॥३१॥देवाऊचुः॥ भगवत्या कृतं सर्वनकि- चिदवशिष्यते ॥ यदयनिहत शत्रुरस्माकंमहिपासुरः॥३२॥ यदिचापिवरोदेयस्त्वयास्माकंमहेश्वरि ।। संस्मृतासंस्मृतात्वं नो हिंसेथाः परमापदः ॥३३॥ यश्चमर्त्य स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने।। तस्यवित्तद्धिविभवर्धनदारादिसंपदाम् ।। वृद्धयेस्मत्प्रसन्नात्वंभवेथाः सर्वदाम्बिके ॥३४॥ऋषिरुवाच॥ ॥ इतिप्रसादितादेवैर्जगतार्थे तथात्मनः ॥ तथेत्युक्त्वाभद्र- कालीबभूवांतहितानृप ।। ३५ ॥ टीका-फिर हेदेवो! और जो तुमको कार्य करणाहोय सो कहो उसको कुछ मुश्किल नहीं जानतीहूं ऐसे भगवतीके कोमल वचन सुन करिकै देवता बोलतेभये ॥३१॥ देव बोले हेदेवि ! जिस कारणसे तुमने यह हमारा महिषासुर नाम शत्रु मारा याते तुमने सब हमारा प्रयोजन करिही दिया और कुछ काम बाकी न रहा ॥ ३२॥ हेमहेश्वरी ! जो तुमनें हमारेको वरदेना योग्यहीहै तो वही आपत्तियों के विपे तुमे वारंवार स्मरण करीहुई हमारी अध्याय ४ (४१) आपत्ति दूरकरो ॥ ३३ ॥ और हे भगवती हे अमलानने जिन श्लोकोंकरिकै तुल्लारी हमने स्तुति कही उनश्लोकोंकरिके जो कोई मनुष्य तुलारी स्तुति करेगा याते हमारेपर प्रसन्नहुई उस मनुष्यकी अश्वसे आदि लेकर जो धन और ऋद्धि और ऐश्वर्य इन करिके सहित जे धन और स्त्री पुत्रादिकनकी संपत्तिहै तिनकी तुम सदा वृद्धिके अर्थ हो ॥३४॥ तब ऋषि बोले हेसुरथ राजन् इस प्रकारसे जगत्के अर्थ और अपने अर्थ देवोंने प्रसन्नकरी ऐसी जो भद्रकाली सो तैसेही हो ऐसे कहकर अंतर्धान होतीभई ॥ ३५ ॥ इत्येतत्कथितंभूपसंभूतासायथापुरा॥देवीदेवशरीरेभ्योजगत्र यहितैपिणी ॥३६॥ पुनश्चगौरीदेहात्सासमुद्भूतायथाभवत्।। वधायदुष्टदैत्यानांतथाशुंभनिशुंभयोः ॥ ३७॥ रक्षणायचलो- कानांदेवानामुपकारिणी॥तच्छृणुष्वमयाख्यातंयथावत्कथया मिते ॥ ३८ ॥ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरेदे- वीमाहात्म्ये शक्रादिस्तुति मचतुर्थोध्यायः ॥ ४ ॥ टीका-हे राजन् तीनों लोकका हित चाहनेवाली भगवती महिषासुर आदि दैत्योंके वधकेवास्ते पहिले जैसे सब देवोंके शरीरोंसे तेजरूप उत्पन्न होती गई यह वृत्तांत मैंने तुझारेको कहा ॥३६ ॥ फिर दुष्ट दैत्योंके मारनेके वास्ते और शुंभ निशुंभके मारनेकेवास्ते और तीनों लोकोंकी रक्षाकेवास्ते गौरीका देहसे जैसे भगवती उत्पन्न भई सो तुमसे यथार्थ कहता हूं मेरा कहा सुनो ॥३७॥ ३८ ॥ इति मार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे शक्रादिक्कत देव्याःस्तुति मचतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ ऋषिरुवाच ॥ पुरा शुंभनिशुंभाभ्यामसुराभ्यांशचीपतेः॥त्रै- लोक्यंयज्ञभागाश्चहृतामदवलाश्रयात् ॥१॥ तावेवसूर्यतांतर दधिकारंत/ दवम् ।। कौवेरमथयाम्यंचचनातेवरुणस्यचा॥२॥ तावेवपवनदिचचक्रतुर्वह्निकर्मच ॥अन्येषांचाधिकारान्सस्व- यमेवाधितिष्ठति।ततोदेवाविनिर्धूताभ्रष्टराज्या:पराजिताः॥३ (४२) सप्तशतीभाषादीका। हताधिकारात्रिदशास्ताभ्यांसपेंनिराकृताः। महासुराभ्यांतां देवीसंम्परंत्यपराजिताम् ॥४॥ तयास्माकंबरोदत्तो यथापत्सु स्कृताखिला अवतानाशयिष्यामितत्क्षणात्परमापदः ॥९॥ टीका-ऋषि बोले पहिले तामसमन्वन्तरकेविषे कश्यपजीके सकाश ते दनु स्त्रीके विषे तीन असुर उत्पन्न होते भये जिनोंमें बड़ा तो नमुचि नामा और छोटे शुंग और निशुंन तिनमें शुंभ और निशुंज ए दो बडे पराक्रमी नये इन शुंग निशुंज दोनों असुरोंने मद और गर्व और सामर्थ्य इनके शरीरमें हो- नेसे इंद्रका त्रैलोक्य खोस लिया ॥ १ ॥ और वे दोनों शुंग निशुंगही सूर्य- पनाका काम कर्ताये और तिसी प्रकार चंद्रपनाका काम कर्ते गये और तिसी प्रकार कुबेरपनाका और यमराजपनाका और वरुणपनाका काम कर्त भये ॥ २॥ और वेही पवनके निरंतर गविरूपी जो ऐश्वर्य है सो कर्ने और वेही अनिका काम कर्तेभये इसी प्रकार और सब देवतोंकासी अधिकार आपही लैते गये और तिल शुंभ निशुंग असुरोसे हारे हुवे यातेही धष्ट हो गयो है राज्य जिनोका ऐसे जे देव ताते शुंभ निशुंभ असुरोंने स्वर्ग निकास दिये ॥ ३ ॥ फिर खुसगया है राज्य जिनोका ऐसे जे तिन दानवोंकरिक स्वर्गसे निकासे हुवे संपूर्ण देवता ते नहीं किसी करिकभी पराजित ऐसी जो भगवती ताको स्मरण कर्त भये ॥ ४॥ मैं आपत्तिकालदेविपे स्मरण करी हुई उसी समय तुलारी संपूर्ण आपत्ति जे हैं तिनको नष्ट करूंगी इस प्रकारसे भगवतीने हमारेको वर दिया है ॥ ५॥ इतिकृत्वामतिदेवाहिमवंतनगेश्वरम् ॥ जग्मुस्तत्रततोदेवी विष्णुमायांप्रतुष्टुवुः ॥६॥ देवाऊचुः ॥ नमोदेव्यैमहादेव्यै शिवायै सततंनमः ॥ नमःप्रकृत्यैभन्द्रायैनियता प्रणताःस्म ताम् ॥ ७॥ रौद्रायैनमोनित्यायैगौय्यधात्र्यैनमोनमः॥ नमो जगत्प्रतिष्ठायैदेव्यैकृत्यैनमोनमः ॥८॥ज्योत्स्नायैचंद्ररूपि- ण्यसुखायैसततंनमः॥ कल्याण्यप्रणतामृद्ध्यै सिद्धयकूम्य

अध्याय ५
(४३)
नमोनमः ।। नैत्यभूभृतालक्ष्म्यैशर्वाण्यैतेनमोनमः ॥ ९ ॥
दुर्गायैदुर्गपारायसारायैसर्वकारिणि ॥ ख्यात्यैतथैवकृष्णायै
धूम्रायैतत्ततनमः ॥१०॥
टीका- इस प्रकार मनमें विचार करकै पर्वतराज हिमालय पर्वत जो
है वहां जाते गये फिर विष्णुमाया भगवतीकी स्तुति कर्ते आये ॥ ६ ॥ देव
बोले कि देवीके अर्थ नमस्कार है और महादेवीके अर्थ और कल्याणरूपा
भगवतीके अर्थ निरंतर नमस्कार है और प्रकृतिके अर्थ नमस्कार है और
मंगलरूपाके अर्थ नमस्कार है एकाग्र चित्त हुवे निस भगवतीको हम प्रणाम
क हैं ॥ ७ ॥ और संहारशक्तिके अर्थ नमस्कार है और कालत्रयकारकै
अबाधित ऐसी नित्यरूपा भगवतीके अर्थ नमस्कार हो गौरीके अर्थ और
धरणीरूपाके अर्थ नमस्कार ३ और जगदका धारण करनेवालीके अर्थ नम-
स्कार देवी और कतीके अर्थ नमस्कार है ॥ ८॥ और चांदिनीरूपाके अर्थ
और चंद्ररूपिणीके अर्थ परमानंदरूपाक अर्थ निरंतर नमस्कार और कल्या-
णीके अर्थ और प्रणाम करनेवाले तिनकी ऋद्धिके अर्थ और सिद्धिके अर्थ
और कूर्मसंबंधिनी शक्तिके अर्थ नमस्कार और अलक्ष्मीके अर्थ और राजा-
वोंकी लक्ष्मीके अर्थ और शर्वाणीके अर्थ नमस्कार२॥९॥और दुःख करिकै
जानी जाय ऐसी दुर्गाके अर्थ और संसारसे दूरके अर्थ और सर्व कारिणीके
अर्थ और विख्यातिरूपाके अर्थ और तिसी प्रकार कृष्णशक्तिके अर्थ और
धूम्रवर्णाके अर्थ निरंतर नमस्कार हो ॥ १० ॥
अतिसौम्यातिरौद्रायैनमस्तस्यैनमोनमः ॥ नमोजगत्प्रति-
ष्ठायैदेव्यैकृत्यैनमोनमः ॥११॥ यादेवीसर्वभूतेषुविष्णुमाये-
तिशब्दिता नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः॥१२॥
यादेवीसर्वभूतेषुचेतनेत्यभिधीयते ॥ नमस्तस्यैनमस्तस्यै
नमस्तस्यैनमोनमः ॥ १३ ॥ यादेवीसर्वभूतेषुबुद्धिरूपेणसं-
स्थिता ॥ नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ॥१४॥

(४४) सप्तशतीभाषाटीका। यादेवीसर्वभूतेषुनिद्रारूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः ॥१५॥ टी०और अतिसौम्याके अर्थ अर्थात् अतिसुंदराके अर्थ और अत्यंत भ- यंकराके अर्थ नमस्कार नमस्कार नमस्कार और जगत्के उपादान कारणरूपाके अर्थ नमस्कार और देवशक्तिके अर्थ और क्रियारूपाके अर्थ नमस्कार नमस्कार नमस्कार ॥३१॥ और जो भगवती सब भूतोंकेविषे विष्णुमाया नामकारकै कही है ताके अर्थ काय वाणी और मन इन करिके प्रत्येक नमस्कार नम- स्कार नमस्कार ॥ १२॥ और जो सब प्राणियोंकेविर्षे चैतन्यशक्ति कही- जातीहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥ १३॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियों के विषे बुद्धिरूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥ १४ ॥और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंके विषे निद्रारूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥१५॥ यादेवी सर्वभूतेषुक्षुधारूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः ॥१६॥ यादेवीसर्वभूतेषुच्छायारूपेणसं स्थिता ॥ नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ॥१७॥ यादेवीसर्वभूतेषुशक्तिरूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः ॥ १८॥ यादेवीसर्वभूतेषुतृष्णारूपे. णसंस्थिता ॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ॥ १९॥ यादेवीसर्वभूतेषुक्षांतिरूपेपसंस्थिता ॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः ॥२०॥ टीका-और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविषे क्षुधारूप करिकै स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥ १६ ॥ और जो देवी संपूर्णप्राणीयोंकेविषे छाया- रूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥ १७॥ और. जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविषे शक्तिरूप करिके स्थितहैं ताके अर्थ नमस्कार ३॥ १८॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविषे ष्णारूप करिके स्थितहै ताके अर्थ

अध्याय ५
(४५)
नमस्कार ३॥ १९॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविषे शांतिरूप करिके
स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥ २० ॥
यादेवीसर्वभूतेषुनातिरूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यै
नमस्तस्यैनमोनमः ॥२१॥ यादेवीसर्वभूतेषुलजारूपेणसं
स्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः॥२२॥
यादेवीसर्वभूतेषु शांतिरूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यै न-
मस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमा२३॥ यादेवीसर्वभूतेषुश्रद्धारू-
पेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः
॥२४॥यादेवीसर्वभूतेषुकांतिरूपेणसंस्थिता नमस्तस्यै नम-
स्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः ॥२५॥
टीका-और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंके विषे जातिरूप करिकै स्थितहै
ताके अर्थ नमस्कार ३॥ २१ ॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंके लज्जारूप
करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥२२॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणि-
योकेविषे शांतिरूप करिकै स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥ २३ ॥
और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविषे श्रद्धारूप करिके स्थितहै ताके अर्थ
नमस्कार ३॥ २४ ॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविषे कांतिरूप करिके
स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ॥ ३॥ २५ ॥
यादेवीसर्वभूतेषुलक्ष्मीरूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यै नमस्त-
स्यै नमस्तस्यैनमोनमः ॥२६॥ यादेवीसर्वभूतेषुधृतिरूपे-
संस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः॥२७॥
यादेवीसर्वभूतेषुवृत्तिरूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यैनमस्तस्यै
नमस्तस्यैनमोनमः ॥ २८ ॥ यादेवीसर्वभूतेषुस्मृतिरूपेणसं-
स्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः ॥२९॥
यादेवीसर्वभूतेषुदयारूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यै
नमस्तस्यैनमोनमः ॥३०॥

(४६) सप्तशतीक्षापाटीका। टीका-और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविपे लक्ष्मीरूप कारकै स्थित हैं ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥ २६ ॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविपे धृति- रूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥२७ ॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंके विषे वृत्तिरूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥२८॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंके विये स्मृतिरूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥२९॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंके विपे दयारूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥ ३० ॥ यादेवीसर्वभूतेषुनीतिरूपेणसंस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः॥३१॥ यादेवी सर्वभूतेपुतुष्टिरूपेणसंस्थि- तानिमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमा ३२॥ यादेवी सर्वभूतेषुपुष्टिरूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्त- स्यैनमोनमः ॥ ३३ ॥ यादेवीसर्वसूतेषुमातृरूपेणसंस्थिता।। नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमोनमः ॥३४॥ यादेवीसर्व भूतेषु भ्रांतिरूपेणसंस्थितानमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः ॥३०॥ टीका-और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविषे नीतिरूप करिके स्थितहैं ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥ ३१ ॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविपे तुष्टि: रूप करि स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥ ३२॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविषे पुष्टिरूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥ ३३॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविषे मातृरूपकरिकै स्थितहै ताक अर्थ न- मस्कार ३॥ ३४ ॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविपे भांतिरूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥ ३५॥ इंद्रियाणामधिष्ठात्रीभूतानांचाखिलेघुया ॥ भूतेषुसततंव्या- प्त्यैतत्यदेव्यैनमोनमः ॥ ३६॥ चितिरूपेणाकृत्स्नमेत- व्याप्यस्थिताजगत् ॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै अध्याय ५ (४७) नमोनमः ॥ ३७॥ स्तुतासुरैःपूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथासुरेंद्रे- शदिनेषुसेविता ॥ करोतुसानःशुभहेतुरीश्वरीशुभानिभद्रा- ण्यभिहंतुचापदः॥३८॥ यासांप्रतंचोक्तदैत्यतापितरस्माभि रीशाचसुरैर्नमस्यते ॥ याचस्मृतातत्क्षणमेवहन्तिनःसर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिगो ३९॥ऋषिरुवाच॥एवंस्तवाभियुक्तानां देवानांतत्रपार्वतीस्नातुमल्याययौतोयेजाह्नव्यानृपनंदन॥४०॥ टीका-और जो देवी संपूर्ण पञ्चमहाभूतोंकी आधार शक्ति है और संपूर्ण प्राणियोंकेविप ज्ञानके कारण ऐसीस्थूल सूक्ष्म जे इंद्रिय तिनको प्रेरण करनेवाली ऐसी व्याप्तिरूपतिस देवीके अर्थ निरंतर नमस्कार ३॥३६॥ और जो देवी चैतन्यशक्तिरूपकरिके संपूर्ण जगत्कू व्याप्त करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥ ३७॥ और जो शुभका कारण ईश्वरी अनीष्टवस्तुके कारणसे पहिले ब्रह्मा आदिदेवोंकरिके स्तुतिकरिगई और तिसीप्रकार इंद्र करिके नित्यप्रति सेवितहोतीमई सो भगवती हमारे निर्विघ्नपूर्वक मंगलकरो और आपत्ति ने है तिनको दूर करो ॥ ३८ ॥ और जो देवी निर्मर्याद जे शुभनिशुल असुर तिनकरिके पीडित और भक्तिकारके नम्रहै मूर्नि नि- नोंकी ऐसे जे हम तिनकरके स्तुति करीजातीहै और जो देवी स्मरण करीहुई उसीक्षण हमारी संपूर्ण आपत्तियोंको दूरकरती है सो भगवती हमारे निर्विघ्नपूर्व क मंगल करो और आपति जे है तिनकू दूर करो ॥ ३९ ॥ तब अपि गोले कि हे राजन् फिर उस हिमाद्रिपर्वतले विषे इसप्रकार स्तुतिकेविषे युक्त जे देवता तिपके सन्मुख श्रीगंगाजीके जलमें स्नान करने पार्वती भगवती आतीभई ॥४०॥ सावीत्तान्सुरान्सुनूभवद्भिःस्तूयतेत्रका ॥ शरीरकोशत धारस्याः समुद्भूताब्रवीच्छिया॥४॥ स्तोत्रंयमैतत्क्रियतेशुंभ दैत्यनिराकृतदेिवसमस्तैःसमरेनिशुंभेनपराजितैः॥ ४२ ॥ शरीरकोशायत्तस्याःपार्वत्यानिःसृताम्बिका । कौशिकीतिस (४८) सप्तशतीभाषाटीका। मस्तेषुततो लोकेषु गीयते ॥ ४३ ॥ तस्यांविनिर्गतायांतु कृष्णाभूत्सापिपार्वती ॥ कालिकेतिसमाख्याताहिमाचल कृत ताश्रया ॥ १४ ॥ ततोम्बिकांपररूपंबिभ्राणांसुमनोहरं ॥ ददर्शचण्डोमुण्डश्चभृत्यौशुंभनिशुंभयोः ॥ ४५ ॥ टीका- फिर वह पार्वती देवतासे प्रश्न कर्ती भई के हे देवो तुम मेरेसे अन्य किसकी स्तुति कर्ने हो ताके अनन्तर देवताके उत्तर दीनेके पहिलेही पार्वतीके शरीरकोशसे निकसकर प्रकटहुई शिवा नाम भगवती उत्तर देती भई ॥४१॥निशुंभ करिके संग्रामकेविषे हार हुवे और शुंभ करिकै स्वर्गसे निकांसें हुवे ऐसे जे सब देव तिनकरिके यह मेरी स्तुति करी जाती है ॥ ४२ ॥ जिस कारणसे तिस पार्वतीका शरीरकोशसे निकसी हुई जो अविका तिस कारणसे सब लोकोकेविषे कौशिकी इस नाम करिके कही जाती है॥४३॥ फिर पार्वतीका शरीरकोशसे शिवा निकसाके वाद पार्वती कृष्णवर्ण होती भई हि- माचलकेविषे किया है स्थान जाने ऐसी कालिका नामकरिके विख्यात भई ॥ ४४ ॥ ताके अनंतर अत्यंत मनोहर रूपको धारण कनों हुई भगव- तीको शुंभ और निशुंभ इनके नौकर चंड और मुंड ये देखते भये ॥ ४५ ॥ ताभ्यांशुंभायचाख्याताअतीवसुमनोहरा ॥ काप्यास्ते स्त्री. महाराजभासयंतीहिमाचलम् ॥४६॥ नैवताइक्वाचिद्रूपंदृष्टं केनचिदुत्तमम् ॥ज्ञायतांकाप्यसौदेवीगृह्यतांचासुरेश्वर॥४७॥ स्त्रीरत्नमतिचार्वगीद्योतयंतीदिशस्त्विषासातुतिष्ठतिदैत्येंद्र तांभवान्द्रष्टुमर्हति ॥ १८ ॥यानिरत्नानिमणयोगजाश्चादी- निवैप्रभो ॥ त्रैलोक्येतुसमस्तानिसांप्रतंतानितगृहे ॥१९॥ ऐरावतःसमानीतोगजरत्नंपुरन्दरात् ॥ पारिजाततरुश्चायत थैवोचैःश्रवा हयः॥ ५० ॥ दोका-ताके अनंतर तिनोनें जाकर शुंभसे कहा के हे महाराज हिमाचल पर्वतकू अपनी कांतिकरिके शोभायमान कर्ती हुई एक वहां बडी मनोहर अध्याय ५ . (४९) ही है ॥ ४६ ॥ ऐमा उत्तम रूप किसीने कहू नहीं देखा याते यह कोई ऐसी मी देवी है यह आप निश्चय जाणों हे असुरेश्वर आप उसको ग्रहण करो॥४७॥ और अत्यंत मनोहर अंगवाली और सब त्रियोंकेविषे उत्तम और अपनी कांतिकारके दशो दिशाकों प्रकाशमान कर्ती हुई हिमालय पर्वतकेविषे स्थित है सो हे दैत्येन्द्र तुम उसको देखनेकू योग्य हो ॥ ४८ ॥ और हे प्रभो त्रि- लोकीकेविषे संपूर्ण हाथी और घोडे इनसे आदि लेकर जे रत्नसदृश है और हे प्रभो पद्मरागादिक जे मणी है इस समय ये संपूर्ण वस्तु तुझारा घरकेविषे वर्तमान है ॥ ४९ ॥ और हे प्रभो ऐरावत हाथीरूपी रत्न और कल्पवृक्षरूपी रब और उच्चैःश्रवा अश्वरूपी रत्न ये आप इंद्रके पासते लाये ॥ ५० ॥ विमानहंससंयुक्तमेतत्तिष्ठतितेंगणरत्नभूतमिहानीतंयदासी- द्वेषसोद्भुतम् ॥५१॥ निधिरेषमहापद्मःसमानीतोधनेश्वरात् ॥ किंजल्किनींदीचाब्धिर्मालामम्लानपंकजाम् ॥५२॥ छत्रं तेवारुणंगेहेकांचनस्रावितिष्ठति ॥ तथायंस्यंदनवरोयःपुरासी प्रजापतेः ॥ ५३ ॥ मृत्योरुत्क्रांतिदानामशक्तिरीशत्वया हृता ॥ पाशःसलिलराजस्यभ्रातस्तवपरिग्रहे ॥ १४ ॥ निशुंभस्याब्धिजाताश्चसमस्तारत्नजातयः ॥ वह्निश्चापिददौ तुभ्यमनिशौचेचवाससी ॥ ५५ ॥ टोका-और हंसों करिके युक्त रत्नरूपी जो ब्रह्माका अद्भुत विमान था सो यहाँ ल्याया हुवा तुलारा आँगनके विपे स्थित है ॥५१॥ और कुबेरसे ल्याया ऐसा निधिरूपी रत्न तुलारे घरके विपे वर्तमान है और अयसे समुद्र कमलोकी माला देतो भयो । ५२ ॥ और सुवर्णकी वर्षा करनेवाला ऐसा वरुणका छत्र तुलारे घरके विपे स्थित है और तिसी प्रकार जो पहिले दक्ष प्रजाप- तिक रथ था सो यहां लाया हुवा तुलारे घरके विषे स्थित है ॥ ५३ ॥ और हे ईश अंतकके सकाशते तुमने प्राणोंको बचनेवाली शक्ति लई और वरु- णका जो पाश है सो तुलारा भाई निशुंगका हाथके विषे है ॥ ५४ ॥ और (५०) संप्तशतीभाषाटीका। जितने प्रकारके समुद्रसे उत्पन्न होनेवाले रत्न है वे संपूर्ण तुलारा भाईके घरखे विषे है और हे शुभ अनिमें गेरनेसे पवित्र होय ऐसे सुवर्णमयी दो वस्त्र तुला रेको अग्निदेव देतो भयो ॥ ५५॥ एवंदत्येंद्ररत्नानिसमस्तान्याहृतानिते॥ स्त्रीरत्नमेपाकल्या- णोत्वयाकस्मानगृह्यते ॥५६॥ ऋषिरुवाच॥निशम्येतिवचः शुंभासतदाचंडमुंडयोः ॥ प्रेषयामाससुग्रीवंदूतदेव्यामहासुरः ॥२७॥शुभउवाच॥ इतिचेतिचवक्तव्यासागत्वावचनान्मम ॥ यथाचाभ्येतिसंप्रीत्यातथाकार्यत्वयालघु ॥१८॥ सतत्रगत्वा यत्रास्तेशैलोदेशेतिशोभने ॥ तांचदेवींततःप्राहश्लक्ष्णंमधुर- यागिरा ॥ १९ ॥ दूतउवाच ॥ देविदैत्येश्वर शुभत्रैलोक्येप- रमेश्वरः ॥ दूतोहंप्रेषितस्तेनत्वत्सकाशमिहागतः॥६० ॥ टीका-हे दैत्येंद्र इस प्रकार तुमने पूर्वोक्त सब रन संचय किये फिर शुभ करनेवाली अंबिका स्त्रीरूपी रत्न तुम क्यों ग्रहण नहीं कर्ते हो ॥५६॥ तब ऋषि बोले कि हे सुरथ राजन् इस प्रकार चंड और मुंड इनका वचन सुन करिके शुभ देवी संदेस लानेवाला ऐसा सुधीव नामा दूत ताको देवी पास भेजतामया ॥१७॥ शुंभ बोला हे सुग्रीव तू वहां जा करिके मेरे वचनसे साम और भेद इन उपायों करिकै इस प्रकार कहना के जिस तरह प्रीति करिकै वह शीघ्र हमारे पास आ जाय तिस प्रकार तुझारेको कार्य कर्तव्य है।५८॥ ताके अनंतर जहां हिमालय पर्वतका श्रेष्ठ प्रदेशके विषे देवी विराजमान तहां जा करिके. अत्यंत मधुर वाणी करिकै उस देवीको मनोहर वाक्य बोलता, भया ॥ ५९॥ दूत बोला कि हे देवी त्रिलोकीके विषे शुभ नामा दैत्येश्वर परमेश्वर है ताका भेजाहुवा दूत मैं यहां तुलारे पास आया हूँ ॥६० ॥ अव्याहताज्ञःसर्वासुयःसदादेवयोनिषु॥निर्जिताखिलदैत्यारिः सयदाहशृणुष्वतत् ॥६॥ ममत्रैलोक्यमखिलंममदेवावशा- नुगाः॥ यज्ञभागानहंसर्वानुपानामिपृथक्पृथक् ॥ ६२ ॥ " अध्याय५ (५१) त्रैलोक्येवररत्नानिममवश्यान्यशेषतः ॥ तथैवगजरत्नंचहृतं देवेंद्रवाहनं ॥६३ ॥ क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नममामरैः।उच्चैः श्रवससंज्ञतत्प्रणिपत्यसमर्पितम् ॥६४॥ यानिचान्यानिदेवे- घुगंधर्वेपूरगेषुच ॥ रत्नभूतानिभूतानितानिमय्येवशोभने ॥६६॥ टीका-सदा देव दानवोंविषे नहीं रुकै आज्ञा जाकी और जीतलिये सब देव जाने ऐसा जो शुंनासुर ताने जो कहा सा मेरेसे तुम सुनो ॥६१ ॥ संपूर्ण त्रिलोकी मेरी है और संपूर्ण देव मेरे वशीभूत नौकर है और पृथक् पृथक् इंद्रादि देवोंके निमित्त विधान किये आहुति रूपी जे यज्ञभाग हैं तिन सबको मैंही भोजन का हूँ ॥ ६२॥ और जे त्रिलोकीके विषे सुंदर वस्तु है ते संपूर्ण मेरे वश है और तिसी प्रकार इंद्रका वाहन गजरूपी रत्न हमारे ल्याया हुवा है ॥६३ ॥ और क्षीर समुद्र मंथनसे उत्पन्न भया ऐसा उच्चैः- भवानामा जो अश्व सो देवताओंनें प्रणाम करिकै मेरे भेट किया ॥ ६४ ॥ और हे शोजने देवोंके विषे और गंधर्षों के विषे और नागों के विषे जे अन्य मनोहर स्त्रीरूपी रत्न हैं ते संपूर्ण मेरेही विषे है ॥६५॥ स्त्रीरत्नभूतांत्वांदेविलोकमन्यामहेवयम् ॥ सात्वमस्मानुपाग च्छयतोरत्नभुजोवयम् ॥६६॥मांवाममानुजवापिनिशुंभमु- रुविक्रमम् ॥भजत्वंचंचलापांगिरत्नभूतासिंवैयतः ॥१७॥ परमैश्वर्यमतुलंप्राप्स्यसेमत्परिग्रहात्॥ एतद्दयासमालोच्य मत्परिग्रहतांवन ॥६८॥ऋषिरुवाच ॥ इत्युक्तासातदादेवी गंभीरांतास्मिताजगौ ॥ दुर्गाभगवती भद्राययेदंधार्यतेजग- त्॥६९ ॥ देव्युवाच ॥ सत्यमुक्तत्वयानात्रमिथ्याकिंचित्त्व- योदितम् ॥त्रैलोक्याधिपतिःशुभोनिशुंभश्चापितादृशः॥७०॥ टीका-हे देवी इसकूलोकके विषे तुमारेको हम उत्तम स्त्रीरूपीरन जा- नतेहै सो तुम हमारेको प्राप्तहो याते हम उत्तम रनको भोगनेवाले होवे ॥६६॥ हेचपलकटाक्षावाली तुम उत्तम रत्नरूपीहैं याते मेरेको अथवा मेरा छोटा (५२) सप्तशतीभाषाटीका। आई बडापराक्रमी निशुंभकू पतिभावसे अंगीकार करो ॥ ६७ ॥ और मेरा, आशयसे तुम अत्यंत श्रेष्ठ ऐश्वर्यकी स्वामिनी अर्थात् मालिक होजावोगी हे देवी यह बुद्धिसे विचार करिके मेरे स्त्रीपनाको तुम प्राप्त हो ॥ ६८ ॥ तब ऋषि बोले कि हे सुरथराजन् जब इस प्रकारसे दूतने भगवतीको शुभका संदेश कहा ताको सुनि हसतीलई भगवती उसदूतको बोलतीभई फिर कैसीहै देवी अगाधहै अभिप्राय जाको फिर कैसी है के दुःखकरिके जानीजाय फिर कैसीहै कल्याणरूपीहै वह कौन भगवती के जा करिके यह जगत् धारण कियाजाताहै सो ॥६९॥ देवी बोली के हे दूत त्रैलोक्यका राजा शुंगहै और निशुअनी उसीके समानहै इसमे तुमनें सत्य कहा कुछ मिथ्या नहीं कहा॥७॥ कित्वत्रयत्प्रतिज्ञातंमिथ्यातत्क्रियतेकथम् ॥ श्रूयतामल्पबु- दित्वात्प्रतिज्ञायाकृतापुरा॥७१॥ योमांजयतिसंग्रामेयोमेद पैव्यपोहति ॥ योमेतिबलोलोकेसमेभर्ताभविष्यति॥७२॥ तदागच्छतुशुंभोत्रनिशुंभोवामहासुरः॥ मांजित्वाकिंचिरेणा त्रपाणिगृह्णातुमेलघु ॥७३॥ दूतउवाच ॥ अवलिप्तासिभैवत्वं देविब्रूहिममाग्रतः॥ त्रैलोक्येकःपुमांस्तिष्ठेदग्रेशुंभनिशुंभयोः ॥७४॥अन्येषामपिदैत्यानांसर्वे देवानवैयुधि । तिष्ठतिसंमुखे देविकिपुनःस्त्रीत्वमेकिका ॥ ७५ ॥ टीका-इस शुंभका आश्रयणके विषे मेरा विचारहै परंतु जो मैंने प्रतिज्ञा करी सो मिथ्या कैसे करू जो मैने पहिले बाल्यावस्थाके विषे विगर विचारि करिके प्रतिज्ञा करीहै सो तुम सुनो॥१॥जो मेरेको संग्रामके विषे जीते और जो मेरा गर्व दूरकरे और जो लोकके विष मेरेसे बलवान् सो मेरा भ होगा ॥७२॥ फिर तिसप्रतिज्ञा कारणसे यहां मेरी प्रतिज्ञा पालनके विषेःशुस आवों अथवा महासुर निशुंभ आवो फिर देरकरनेकरिके क्या है संग्रामके विषे मरको जीतकर शीघ्र मेरा पाणिग्रहणकरो ॥७३॥ तब दूत बोला के हे देवी तुम ऐसे गव मतकरो और तुम मेरे आगे यह कहो के त्रिलोकीके विषे ऐस - अध्याय ६ (५३). पुरुष कौन है जो शुंभनिशुनके आगे युद्ध करनेको खडा होवे अर्थात् कोई मही ॥ ५४॥ और हेदेवी संग्रामके विषे अन्य दैत्योकेसी सन्मुख संपूर्ण देव नही खडेरहते है फिर तु इकल्ली स्त्री युद्धके विषे दैत्याके सन्मुख कैसी ख- ही रहसकतीहो अर्थात् सर्वथा नहीं ॥ ७५ ॥ इंद्राद्यास्तकलादेवास्तस्थुर्येषांनसंयुगे ।। शुभादीनांकथतेषां स्त्रीप्रयास्यसिसमुखम् ॥ ७६ ॥ सात्वंगच्छमयैवोक्तापाशुं- भनिशुंभयो। केशाकर्षणनिर्धूतगौरवामागमिष्यसि ॥ ७७॥ देव्युवाच ॥ एवमेतद्वलीशुंभोनिशुंभश्वातिवीर्यवान् ॥ किंक- रोमिप्रतिज्ञामेयदनालोचितापुरा ॥ ७८ ॥ सत्वंगच्छमयो- क्तंतेयदेतत्सर्वमाहतः ॥ तदाचक्ष्वासुरेंद्रायसचयुक्तंकरोतुतत् ॥ ७९ ॥ मार्कडेयपुराणे सावर्णिकेमन्वंतरेदेवीमाहात्म्ये दे- व्यादूतसंवादोनामपंचमोध्यायः ॥५॥ टीका-और संग्रामके विषे जिनके अगाडी युद्धकरनेको इंद्रादिक देव नहीं खडे रहतेनये तिनशुंभनिशुंभके सन्मुख युद्धकरनेको तू स्त्री कसी जाय मी ॥ ६ ॥ सो तुम मेरा कहनासे शुंभनिशुनके पास चलो क्योंके केशोके खैचने करिके दूर होगया बड़पन जाका ऐसी तुम शुंभनिशुंभके पास मत आवों इस दया करिके मै तुमको कहताहू ॥ ७७ ॥ तब देवी बोली हे दूत शुं बडापराक्रमीहै और निशुंन बढा पराक्रमीहै यह तुमने कहा सो असेही है प- रंतु क्या करूं मेरी यह प्रतिज्ञा है मैने पहिले विचार नहींकिया ॥७८॥हे दूत सो तुम जावो और मैने संपूर्ण तुमारेको यह कहा सो जाकर आदरयुक्त हु- चा शुभासुरके अर्थ कहो ताके अनंतर वह शुभासुर उचितहो सो करो॥७९॥ इति मार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वंतरे देवीमाहात्म्ये देव्यादूतसंवादोनामां- चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ ऋषिरुवाच ॥ इत्याकर्ण्यवचोदेव्या सदूतोमर्षपूरितः॥ समा- चष्टसमागम्यदैत्यराजायविस्तरात् ॥ १॥ तस्यदूतस्यत- । (५४) सप्तशतीभाषाटीका। द्वाक्यमाकासुररादततः ॥ सक्रोधःप्राहदैत्यानामधिपंधूम्र- लोचनं ॥ २ ॥ हेधूम्रलोचनाशुत्वस्वसैन्यपरिवारितः ॥ तामानयबलाद्दुष्टांकेशाकर्षणविह्वलां ॥ ३ ॥ तत्परित्राण दःकश्चिद्यदिवोत्तिष्ठतेपरः ॥ सहतव्योमरोवापियक्षोगंधर्वए- ववा॥ ४॥ऋषिरुवाच ॥ तेनाज्ञप्तस्ततःशीघ्रसदैत्योधूम्रलो चनः ॥ वृतः षष्टयासहस्राणामसुराणांद्रुतंययौ ॥ ५॥ टीका-ताके अनंतर ऋषिषोले हे सुरथराजन् इसप्रकार देवीका वचन श्रवणकारके वह दूत क्रोधकरिके भराहुवा देवीका पर्वतके सकाशते आक- रिक विस्तारते शुंभासुरके अर्थ कहताया ॥ १ ॥ तिस दूतका मुखसे देवी का वाक्य श्रवण करिके ताके अनंतर क्रोध युक्तहुवा असुरोका राजा शुं- भासुर दैत्योका मालिक ऐसा जो धूम्रलोचन ताहि कहताच्या ॥ २॥ हे धूम्र लोचन तुम अपणी सेनाकरिके युक्तहुवा केशोंके खैचनेकरिके व्याकुल ऐ सी जो दुष्टिनी देवी है ताहि बलात्कारसें शीघ्र ल्यावो मेरेकू प्राप्तकरो ॥३॥ और ताहि ग्रहण करनेको इच्छाकरे ऐसो ताकी रक्षा करनेवालो जो कोई और शत्रुता करिके खडाहोवे सो मारनेके योग्यहै चहिये देव होवे चहिये यक्ष होवे अथवा गंधर्व होवे ॥ ४ ॥ तब ऋषि बोले हे राजन् ताके अनंतर शुंभकरिके आज्ञादियाहुवा ऐसा वह धूम्रलोचन दैत्य साठिहजार असुरोका समूह करिके युक्तहुवा शीघ्र जातामया ॥५॥ सदृष्ट्वातांततोदेवींतुहिनाचलसंस्थिताम् ॥ जगादोच्चैःप्रयाहीति मूलंशुंभनिशुंभयोः ॥ ६ ॥ नचेत्प्रीत्याद्यभवतीमद्भारमु- पैष्यति ॥ ततोबलान्नयाम्येषकेशाकर्षणविह्वलाम् ॥ ७ ॥ देव्युवाच ॥ दैत्येश्वरेणप्रहितोबलवान्चलसंवृतः ॥ बलान्नयसि मामेवंतताकितेकरोम्यहं ॥८॥ऋषिरुवाच॥इत्युक्त सोभ्यधा- वत्तामसुरोधूम्रलोचनः।। हुंकारेणैवतंभस्मसाचकारांविकाततः अध्याय ६ (५५) ॥ ९॥ अथक्रुद्धमहासैन्यमसुराणांतथाम्बिका ॥ ववर्षसाय कैंस्तीक्ष्णैस्तथाशक्तिपरश्वधैः ॥१०॥ टीका-फिर वह धूम्रलोचन हिमाचलके विषे स्थित ऐसी जो देवी ताहिदे- खकर हे. देवि तुम शुंभनिशुंभके पास चलो इस प्रकारसे ऊचेस्वरकरिके बोलताभया ॥ ६॥ और जो तुम आज अपनी रुची करिके हमारा स्वामी शुंग जो है नाहि नहीं प्राप्त होगी तो तिसकारणते यह धूम्रलोचननामा जो मै असुर है सो अबही केशोंके खंचनेकरिके वेवश ऐसी जो तुम हो ताहि बला- त्कार करिके हमारा स्वामी शुंन जो है तिन्हे प्राप्तकरूगा॥७॥तब देवी बोली के हे धूम्रलोचन तु बलवान है और सेनाकरिके युक्त है और शुभासुरका भेजाहुवाहै सो तु इस प्रकार पूर्वोक्त केश खैचनकरिके वेवश ऐसी मै जो हू ताहि बलात्कारसे प्राप्तकरे तो ताके अनंतर मै तेरा क्या करू अर्थात् कुछनहीं ॥८॥ तब ऋषि बोले के देवी करिके ऐसे कहाहुवा धूम्रलोचनअसुर वेग करिके देवीं जो है ताहि सन्मुख दौड़तामया ताके अनंतर वह अंबिका हुंकार करिकही ताहि भस्म कीमई ॥ ९ ॥ फिर धूम्रलोचन भस्म होनेके वाद क्रोधयुक्तहुई ऐसी जो असुरोकी सेना है नाहि तीखे बाणों करिके और शाग्य सहित कुठारोके संपात करिके अंबिका आच्छादन कतीभई ॥१०॥ ततोधुतसटकोपात्कृत्वानादंसुभैरवं ॥ पपातासुरसेनायांसिं- होदेव्यास्तुवाहनः ॥ ११ ॥ कांश्चित्करप्रहारेणदैत्यानास्ये नचापरान् । आक्रम्यचरणेनान्यानिजधानमहासुरान् ॥१२॥ केषांचित्पाटयामास नखैःकोष्ठानिकेसरी ॥ तथातलप्रहारेण शिरांसिकृतवान्पृथक।। १३ ॥ विच्छिन्नबाहुशिरस कृतास्ते- नतथापरे ॥ पपौचरुधिरकोष्ठादन्येषांधुतकेसरः॥ १४ ॥ क्षणेनतलंसर्वेक्षयनीतमहात्मना । तेनकेसरिणादेव्यावाहने नातिकोपिना ॥१५॥ टीका-तोके अनंतर क्रोधसे कंपाये हैं काँधेके केश जाने ऐसादेवीका (५६) सप्तशतीभाषाटीका। वाहन सिंह जयंकर गर्जना करिके असुरोंकी सेनाके विपे उछल कर पडता जया ॥११॥ फिर कितनेही जे दैत्य है तिन्है करके प्रहार कारकै मारता जया और कितनेहीजे है तिन्है मुखके प्रहार करिके मारतालया और कित- नेही ज अन्य है तिन्हें चरणके प्रहार करिके मारता भया ॥ १२ ॥ और कितनही दैत्योंका नखों करिके पेट फाडता भया और तिसी प्रकार कितनेही दैत्योंका शिर जे है तिन्हे चनपटके प्रहार करिके धडसे अलग कती भया । ॥ १३ ॥ फिर वा सिंहने और कितनेही हाथ शिर कटेहुवे करिदिये फिर कंपाय है कांधाके केश जाने ऐसा सिंह अन्य कितनेही दैत्योंका पेट फाड़ कर उनका पेटसे रुधिर पीतोभयो ॥ १४ ॥ अत्यंत कोषवाला ऐसा देवी- वाहन जो सिंह है ताने संपूर्ण धूम्रलोचनकी सेना जो है ताहि क्षणारकरिके नाशको प्राप्त कर दई ॥ १५ ॥ श्रुत्वातमसुरंदेव्यानिहतंधूम्रलोचनं ।।वलंचक्षयितंकृत्स्संदेवीके सरिणाततः॥ १६॥ चुकोपदैत्याधिपतिः शुभ प्रस्फुरिता- ताधरः।आज्ञापयामासचतौचंडमुंडौमहासुरौ।। १७ ॥ हे चं- डहेमुंडवलैबहुभिः परिवारितौ॥गच्छतंतत्रगत्वाचसासमानी- यतांलघु ॥ १८॥ केशेष्वाकृष्य बना वा यादवः संशयो युधितिदाशेषायुधैः सर्वैरसुरैर्विनिहन्यतां ॥ १९ ॥ तस्यां हतायांदुष्टायांसिंहेचविनिपातिते ॥ शीघ्रमागम्यतांववागृही- त्वातामथांविकाम् ॥ २० ॥ इतिमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिके मन्वंतरेदेवीमाहात्म्ये धूम्रलोचनवधोनामषष्ठोध्यायः ॥६॥ टीका-ताके अनंतर देवीने भस्म किया ऐसा धूम्रलोचन जो असुर है ताहि सुन करिके और देवीके सिंहनै संपूर्ण धूम्रलोचनका सैन्य नष्ट किया ताहि सुन करिके ॥ १६ ॥ क्रोधसे कंपाये है होठ जाने ऐसा दैत्येश्वर शुंभ. क्रोध क भया और चंड और मुंड ये जे महाअसुर है तिन्है आज्ञा देते अध्याय ७ . (५७) भयो ॥ १७ ॥ हे चंड हे मुंड तुम बहुतसी सेना करिके सहित जहां वह देवी विराजमान है तहां जावो वहां जाकर उस देवीको शीघ्र ल्यावो ॥३८॥ हे चंड मुंड सेनावो तुम केश खैचकर अथवा रस्सीसे बांधकर वा देगको मेरे समीप ल्यावो जो युद्ध प्रवृत्त हो जाय तिसके विषे लानेमें संदेह होय तो संपू- ण शस्त्रोंके प्रहार करिके ता देवीको सब जने मारो ॥ १९॥ ताकू मारेके वाद और सिंहको मारकर पृथ्वीमें गिरायेके वाद तुम शीघ्र आवो और जी- वती ल्यानेकी सामर्थ्य होय तो वा अंबिकाको रस्सीसे बांध और ग्रहणकर शीघ्र आवो ॥ २० ॥ इति मार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वंतरे देवीमाहात्म्ये धूम्रलोचनवधोनाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ ऋषिरुवाच ॥ आज्ञप्तास्तेततोदैत्याश्चंडमुंडपुरोगमाः ॥ चतुरंगबलोपेताययुरभ्युद्यतायुधाः ॥ १ ॥ ददृशुस्तेततो देवीमीपदासांव्यवस्थिताम् ॥ सिंहस्योपरिशैलेशृगेमहति. कांचने ॥२॥ तेंदृष्ट्वातांसमादातुमुद्यमंचकुरुद्यताः॥ आकृ. टचापासिघरास्तथान्येतत्समीपगाः ॥ ३ ॥ ततः कोपंच कारोच्चैरविकांतानरीन्प्रति ॥ कोपेनचास्यावदनंमषीवर्ण मभूत्तदा ।। ४ ॥ श्रुकुटीकुटिलात्तस्याललाटफलकाद्रुतं ।। कालीकरालवदनाविनिष्क्रांतासिपाशिनी ॥५॥ टीका-ताके अनंतर शुंभ करिके आज्ञा दियेहुए और उठाये है शस्त्र जिनोने और चतुरंगिणी सेनाकरिके युक्त और चंड मुंड हैं अगाडी चलने वाले जिनोंके ऐसे जे दैत्य ते भगवतीके पास जाते भये ॥ १ ॥ ताके अनंतर हिमालयकी सुवर्गमय शिखरकेविषे स्थित जो सिंह ताके ऊपर बैठी हुई और मंद है. हास्य जाको ऐसी जो देवी ताहि ते दैत्य देखते भये ॥२॥ फिर देख करिके ताके,अनंतर उद्युक्त हुवे ताहि ग्रहण करनेको उद्यम कर्तेमये कैसे हैं वे दैत्य बँचा है धनुष जिनोने ऐसे और.खड्न धारण करनेवाले ऐसे और तिसी प्रकार अन्य कितनेही अगवतीके पास जाते भये ॥ ३ ॥ ताके .

(५८) सप्तशतीभाषाटीका। अनंतर अंबिका तिन शत्रूनके प्रति अत्यंत कोप कत्र्ती भई तब कोपकरिके याको मुख स्याहीकी समान श्याम होतो भयो ॥ ४ ॥ ता समय अंबिकाको भृकुटोके चढानेते वाकों ऐसो जो ललाटरूपी पटल ताके सकाशते भयंकर है मुख जाको और खड़ पाश ए है हाथोंकेविषे जाकें ऐसी काली नाम कोई अन्य शक्ति निकसती भई अर्थात् प्रकट होती भई ॥ ५ ॥ विचित्रखदागधरानरमालाविभूषणा ॥ द्वीपिचर्मपरीधानाशु- कमांसातिभैरवा ॥६॥ अतिविस्तारवदनाजिह्वाललनभी- षणा ॥ निमगारक्तनयनानादापूरितदिङ्मुखा ॥ ७ ॥ सावेगेनाभिपतिताघातयन्तीमहासुरान् ॥ सैन्ये तत्रसुरारी णामभक्षयततदलम् ॥८॥ पाणिग्राहांकुशग्राहयोधवंटासम न्वितान्॥समादायैकहस्तेनमुखेचिक्षेपवारणान् ॥९॥तथैवयो- धंतुरगैरथंसारथिनासह निक्षिप्यवक्रेदशनैश्चर्वयंत्यतिभैरवं १०॥ टीका-कैसी है वह काली अनेक तरहके हैं चित्राम जाके ऐसा खट्टी- गको धारण करे ऐसी फिर कैसी है प्रेतोंके मुंडोंकी माला है आभूषण जाके ऐसी फिर कैसी है व्याघके चर्मका है वस्न जाके ऐसी फिर कैसी है हाडचर्म मात्र है शरीर नाका ऐसी यातेही अति भयंकर ऐसी ॥ ६ ॥ फिर कैसी है अत्यंत है विस्तार जाको ऐसो है मुख जाको फिर कैसी है जिव्हाके आस्वा- दन करने की जो इच्छा ताकरिकै भयंकर है फिर कैसी है गडे हुये हैं लाल नेत्र जाके फिर कैसी है सिंहनादकरिकै पूर्ण किये हैं दशों दिशावों के मध्य जाने ॥ ७ ॥ फिर वह काली तिस असुरोंकी सेनाकेविषे वेग करिकै पड़ती हुई महा असुर जे हैं तिन्हें मारतीहुई असुरोंकी सेना जो है ताहि भक्षण कनौं भई ॥ ८॥ और जे भाला लेकरिकै हाथियोंके पीछे चलनेवाले ऐसे जे हाथियों के शिक्षक हैं और जे हाथियोंको चलानेवाले महावत हैं और जे हाथियों के सवार योद्धा हैं और जे हाथियों के गलेमें बँधी हुई घंटा है तिन सब करिकै सहित जे हाथी हैं तिन्हें एक हाथ करिकै ग्रहण करि काली अध्याय ७ (५९.) मुंखकेविषे गेरती भई अर्थात् खाती भई ॥ ९ ॥ और तिस प्रकारही घोडो करिकै सहित जे योद्धा तिन्हें और सारथियोंकरिकै सहित जे रथ हैं तिन्हें मुखकेविषे गेर करि दातोंकरिकै मृत्यु जो है ताहि चर्वण करवाती भई ॥१०॥ एकंजग्राहकेशेषुग्रीवायामथचापरम् ॥ पादेनाक्रम्यचैवान्यमु- रसान्यमपोथंयत् ॥ ११ ॥ तैर्मुक्तानिचशस्त्राणिमहास्त्राणित- थासुरैः ॥ मुखेनजग्राहरुषादशनैर्मथितान्यपि ॥ १२ ॥ व- लिनांतलंसर्वमसुराणांदुरात्मनां ॥ ममभिक्षयच्चान्यान न्यांश्चाताडयत्तथा।। १३ ।। असिनानिहता केचित्केचित्खट्रां गताडिताः । जग्मुर्विनाशमसुरादंताग्राभिहतारणे ।। १४ ॥ क्षणेनतन्महासैन्यमसुराणांनिपातितं ॥ दृष्ट्वाचंडोभिदुद्रावता कालीमतिभीषणां ॥ १५॥ टीका-ताके अनंतर केशोकेविषे एक दानव जो है ताहि पकडती भई यांक अनंतर गलंकेविषे अन्य दानव जो है ताहि पकडतीभई और पैर क- रिके पकड एक दानव जो है ताहि मारतीभई और पेट पकडिके एक दानव जोहै ताहि मारतीभई ॥ ११॥ ता समय चंड मुंडसे आदि लेकर जे दानव है . तिन्होंने और तिसीप्रकार अन्य असुरोंने कालीके सन्मुख वाहें ऐसे खड्ग आदि लेकर जे शस्त्र और आनेयसे आदि लेकर जे बड़े अस् तिन्हे क्रोधसे मुख कारकै काली ग्रहण कर्तीमई और ग्रहण कारकै दातोंसे चूर्णितभी क- चोभई ॥ १२ ॥ फिर दुष्टहै अंतःकरण जिनोका और बलवान ऐसे जे चं- डमुंडसे आदि लेकर असुर तिनकी संपूर्ण सेना जो है नाहि काली नष्ट कर्ती भई ता सेनाके विषे कितने जे है तिन्हें भक्षण कर्तीगई और कितनेही जेहैं तिन्हें मारतीभई ॥ १३॥ फिर उस रणमें कितनेही असुर कालीने खड्नके प्रहारकारके मारे हुवे नाशको प्राप्त होतेभये और कितनेही खाटके पाये करिके ताटन कियेहुये विनाशको प्राप्त होताये और तिसी प्रकार दंतके अग्रभाग करिके ताडन कियेहुये विनाशको प्राप्त होतेभये ॥ १४॥ किर

(६०)
सप्तशतीक्षाषाटीका।
क्षणभर करिकै कालीने पृथ्वीमें गिराई ऐसी जो वह असुरोंकी महासेना है
ताहि देखकर अतिभयंकर जो काली है ताहि युद्ध करनेको चंड सन्मुख दौ-
डतो भयो ॥ १५॥
शरवर्महाभीमीमाक्षीतांमहासुरः ॥ छादयामासचक्रैश्चमुं
डःक्षिप्तःसहस्रशः ॥ १६॥ तानिचक्राण्यनेकानिविशमाना-
नितन्मुखं ॥ बभुर्यथार्कविबानिसुबहूनिघनोदरम् ॥ १७ ॥
ततोनहासातिरुषाभीमभैरवनादिनी ॥ कालीकरालवक्रां-
तर्दुदर्शदशनोज्ज्वला ॥ १८ ॥ उत्थायचमहासिंहदेवीचंडम-
धावत ॥ गृहीत्वाचास्यकेशेषुशिरस्तेनासिनाच्छिनत् ॥
॥ १९॥ छिन्नेशिगसदैत्येन्द्रश्वकेनादंसुभैरवं ॥ तेननादेनम-
हतात्रासितंभुवनत्रयं ॥२०॥
टीका-ताके अनंतर भयंकरहैं नेत्र जाके ऐसी जो कालीहै ताहि वा-
णोंकी वर्षा करिकै और मस्तक काटेहैं जिनो करिकै ऐसे जे हजार हजार
चक्र, तिनो करिके चंड आच्छादित कौभयो ॥ १६ ॥ फिर चंड करिके
चलायेगये जे अनेकचक्र ते कालीका मुख जोहै ताहि प्रवेश हुये शोभायमा-
न होते ये कैसे कि जैसे उत्पातकेविषे बहुत सूर्यके बिंब मेघका उदर जो
है ताहि प्रवेश होतेहुवे शोभायमान होतेहैं ॥ १७ ॥ फिर रणके उत्सवते
काली अत्यंत क्रोध करिके भयंकर जैसे होय तैसे हँसती भई काली कैसी
है भयंकर शब्द करे ऐसी फिर कैसीहै भयंकर जो मुख ताकेविषे दुःख क-
रिकै देखीजाय ऐसी जो डाढ तिन करिके उज्ज्वल अर्थात् श्वेतवत्प्रतीयमा-
न ऐसी॥ ३८॥ तोके अनंतर काली महाखड्न उठायकर रोष करिके चंडके
सन्मुख दौडती भई फिर चंडके केश बैंच करि तिस महाखड़से शिर काट-
तीभई ॥ १९ ॥ फिर देवी करिके शिर कटेसते तासमयही दैत्येंद्र चंड
महाभयंकर शब्द कतॊभयो तिस बडे भयंकर शब्द करिके तीनों लोक
त्रासको प्राप्तकिये ॥ २० ॥

अध्याय ७
(६१)
अथमुंडोभ्यधावत्तादृष्ट्वाचंडंनिपातितं ॥ तमप्यपातयद्भूमौ
खदांगाभिहतंरुषा ॥ २१ ॥ हतशेषततः सैन्यदृष्ट्वाचंडं
निपातितं ॥ मुंडंचसुमहावीर्यदिशोभेजेभयातुरम् ॥ २२॥
शिरश्चंडस्यकालीसागृहीत्वामुण्डमेवच।। प्राहप्रचंडाट्टहासमि
श्रमभ्येत्यचंडिकां ॥ २३ ॥ मयातवात्रोपहतोचण्डझुंडौ
महापशू ॥ युद्धयज्ञेस्वयंशुंभनिशुंभंचहनिष्यसि ॥ २४ ॥
ऋषिरुवाच ॥ तावानीतीततोदृष्ट्वाचंडमुंडौमहासुरौ ॥ उवाच
कालीकल्याणी ललितंचंडिकावचः॥ २५ ॥
टीका-याके अनंतर कालीने संग्रामकेविष गिराया ऐसा जो चण्डहै
ताहि देखकरिके मुंड कालीके सन्मुख दौडतो भयो फिर खदांग प्रहार करिके
ताडित ऐसा जो मुंडहै ताहिनी रोष करिकै पृथ्वीमें गिरातीभई ॥ २१ ॥
फिर मरेहुवे दानवोंसे बाकी रही ऐसी जो दानवोंकी सेनाहै सो देवीने संग्रामके
विषे गिराया ऐसा जो चंडहै ताहि और बडापराक्रमी मुंड जोहै ताहि देखकर
भयकरिके विह्वलहुई रणभूमिके - सकाशते निकस करिके दौडजातीभई
॥ २२ ॥ ताके अनंतर काली चंडका शिर जोहै ताहि और मुंडका शिर
जोहै ताहि ग्रहण कारकै और चंडिका जोहै ताहि प्राप्त होकर प्रगल्भ जो
आधिक हास ताकरिके मिलाहुवा जैसे तैसे बोलतीभई ॥ २३ ॥ हे चंडिके
इस युद्धरूपी यज्ञकेविष चंड और मुंड ये महापशू मैं ने तुलारे भेटकियेहैं
और देवगणकी प्रीतिके अर्थ शुंभ और निशुंभ जो दो पशुहैं तिन्हे तुमही
मारोगी ॥ २४ ॥ तब ऋषि बोले ताके अनंतर कालीकरिके लायेहुये जे
चंड मुंड महाअसुर हैं तिन्हे चंडिका देखकर काली जोहै ताहि मनोहर वचन
बोलती गई ॥ २५ ॥
देव्युवाच ॥ यस्माचंडंचमुंडंचगृहीत्वात्वमुपागता ॥ चामुं-
डेतिततोलोकेख्यातादेवीभविष्यसि ॥ २६॥ इति मार्कण्डे-
यपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरे देवीमाहात्म्येचण्डमुण्डवधोनाम
सप्तमोध्यायः ॥७॥

(६२.). सप्तशतीभाषाटीका।
टीका-देवी बोली हे काली .. जिसकारणते चंड और मुंड जोहैं ताहि
ग्रहण कारकै तुम मैं जोहूं ताहि प्राप्तहुई हो तिसकारणते लोककेविषे तुम
चामुंडा इस नाम करिकै विख्यात देवी होगी ॥ २६ ॥ इति मार्कण्डेयपुराणे
सावर्णिकेमन्वंतरे देवीमाहात्म्ये चंडमुंडवधोनामसप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
ऋषिरुवाच॥चंडेचनिहतेदैत्येमुण्डेचविनिपातिते ॥ बहुलेषु
चसैन्येषुक्षयितेष्वसुरेश्वरः ॥ १॥ ततः कोपपराधीनचेताः
शुभः प्रतापवान्।उद्योगसर्वसैन्यानांदैत्यानामादिदेशह ॥२॥
अबसर्ववलदैत्या षडशोतिरुदायुधाः॥ कंबूनांचतुराशीतिर्नि
र्यान्तुस्वबलैर्वृताः॥३॥ कोटिवीयर्याणिपंचाशदसुराणांकुला-
निवै ॥ शतंकुलानिधूम्राणांनिर्गच्छन्तुममाज्ञया ॥ ४ ॥
कालकादौर्हदामौर्याः कालिकेयास्तथासुराः ॥ युद्धायसज्जा
निर्यातुआया त्वरितामम ॥६॥
टीका-तब ऋषि बोले कालीकरिकै चंड मारेगये संते और तिसी प्र-
कार मुंड मार पृथ्वीमें गिरायेसते और ताकरिकेही असंख्यात सेना नष्टहुये
सते ताके अनंतर कोप करिके परवशहै चित्त जाको और प्रतापी ऐसो असु-
रोंको ईश्वर जो शुभासुर सो दैत्योंकी संपूर्ण सेना ज़ेहै तिनको चंडिकाके पास
जाने रूपी उद्योग आज्ञा करतो भयो ॥ १ ॥ २ ॥ आज मेरी आज्ञा क-
रिकै छयासी जे तुम प्रधान दैत्य हो ते उठायेहै शस्त्र जिन्होंने ऐसे संपूर्ण अप-
नो चतुरंगिनी सेना जे हैं तिन करिकै युक्त हुवे देवीके साथ युद्ध करनेको
जावो और कंबुनाम जे दैत्यहँ तिनके चौराशी समूह भेद जे हैं ते अपनी से-
ना कारकै युक्तहुवे देवीके साथ युद्ध करनेको जावो ॥ ३॥ और कोटि
वीर्य नाम जे असुरोंके पंचाशकुल ते और धूम्र नाम असुरजे तिनके जे सौ-
कुल ते मेरी आज्ञा करिकै देवी के साथ युद्ध करनेको जावें ॥४॥और कालक
नामा जे असुर और दौ«द नामा जे असुर और मौर्यनामा जे असुर और
तिसीप्रकार कालकेयनामा जे असुर ते संपूर्ण मेरी आज्ञा करिके शीघ्र तैयार
होतेहुये देवीके साथ युद्ध करनेको जावो ॥ ५ ॥

अध्याय८. (६३). इत्याज्ञाप्यासुरपतिःशुम्भोभैरवशासनः ॥ निर्जगाममहासै- न्यसहस्रैर्बहुभिर्वृतः ॥ ६॥ आयातंचण्डिकादृष्ट्वातत्सैन्यम- तिभीषणम् ॥ ज्यास्वनैःपूरयामासधरणीगगनांतरम् ॥ ७ ॥ ससिंहोमहानादमतीवकृतवान्नृपं ॥ घण्टास्वनेनतन्नाद- मंबिकाचाप्ययत् ॥ ८॥ धनुयासिंहघण्टानांनादापूरित- दिङ्मुखा. ॥ निनादैर्भीषणैःकालीजिग्यविस्तारितानना ।। ॥९॥ तंनिनादमुपश्रुत्यदैत्यसन्यैश्चतुर्दिशम् ॥ देवीसिंह स्तथाकालीशरौवे परिवारिताः ॥१०॥ टीका-फिर भयंकर है शिक्षा जाकी ऐसा असुरपति शुंभ इस प्रकार असुर जे हैं तिन्हैं.आज्ञा देकर बड़ी है सेना हजारों जिनोकेविषे ऐसे बहुत दानवनकरिकै युक्तहुवा देवीके साथ युद्ध करनेको ज़ाता भया ॥ ६ ॥ ताके अनंतर चाडका. आताहुवा जो. शुंभ है ताहि और बाकी जो भयंकर सेना है ताहि देखकर धनुषको प्रत्यंचाके टंकार शब्दन करिकै आकाश पृथ्वीका मध्य जो है ताहि पूर्ण करतीभई ॥ ७ ॥ :. ताके अंनंतर हे नृप वह भगवतीका सिंहभी बडा शब्द कर्ता या फिर अं- बिका घंटाके शब्दकरिके सिंहके शब्दको बढ़ाती भई ॥ ८॥ फिर धनुपर्क प्रत्यंचाके और सिंह और घंटाः इन शब्दोंकरिकै पूर्ण किये हैं दिशावोंके मुख जाने और फाडा है मुख जाने ऐसी देवी तिन दैत्यनको जीतती भई॥९॥ ताके. अनंतर धनुषकी प्रत्यंचा सिंह घंटा इनका चारों दिशामें व्याप्त ऐसा शब्द सुनके दैत्यसेनानें देवी और सिंह और तिसी प्रकार काली ये सब बा- णोंके समूह करिकै रोक दिये ॥ १० ॥ एतस्मिन्नंतरभूपविनाशायसुरद्विषाम् ॥ भवायामरसिंहानाम- तिवीर्यवलान्विताः ॥ ११ ॥ ब्रह्मेशगुहविष्णूनांतथेंद्रस्य च शक्तयः॥शरीरेभ्योविनिष्क्रम्यतद्रुपैश्चण्डिकाययुः॥१२॥ यस्यदेवस्ययद्रूपंयथाभूषणवाहनम् ॥ तदेवहितच्छक्ति- (६४) सप्तशतीभाषाटीका। रसुरान्यो माययौ ॥ १३ ॥ हंसयुक्तविमानस्थासाक्षसूत्र- कमण्डलुः॥ आयाताब्रह्मणःशक्तिब्रह्माणीसाभिधीयते॥१४॥ माहेश्वरीवषारूढात्रिशूलवरधारिणी ॥ महाहिवलयाप्राप्ताच न्द्रलेखाविभूषणा ॥१६॥ टीका-और इस देवी दानवोंके संयामके होतेसंते मध्यमें दानवोंक विना- शके अर्थ और देवोंकी वृद्धिके अर्थ ब्रह्मा शिव स्वामी कार्तिक विष्णु तथा इंद्र इन सबकी सामर्थ्यरूपी.जे शक्ति हैं ते इनके शरीरोंते निकसकर अपने अपने देवोके समान रूपों करिकै चण्डिकाके समीप आतीभई ॥११॥१२॥ फिर जिस देवका जैसा रूप और जैसा भूषण और जैसा वाहन तिसी प्रकार तिस देवकी असुरोंते रणमें युद्ध करनेको देवीके पास आती भई ॥१३॥हंस- युक्त विमानमें बैठी हुई और स्फटिक मणियोंका माला पहरे हुये और कम- डलु लिये हुये ब्रह्माकी शक्ति युद्ध करनेको आती भई सो ब्रह्माणी इस नाम करिके कही जाती है ॥ १४ ॥ और माहेश्वरी शक्ति वृषाके ऊपर बैठीहुई और त्रिशूलको धारण किये हुवे और बडे सौका है कडा जाके अर्द्धचंद्र मस्तकमें आभूषण जाके ऐसी असुरोंके साथ युद्ध करनेको भगवतीके पास आती भई ॥ १५॥ कौमारीशक्तिहस्ताच मयूरवरवाहना योद्धुमभ्याययौदैत्या- नंबिकागुहरूपिणी ॥ १६ ॥ तथैववैष्णवीशक्तिर्गरुडोपरि- संस्थिता ॥ शंखचक्रगदाशार्ङ्गखगहस्ताभ्युपाययौ ॥१७॥ यज्ञेवाराहमतुलंरूपयाविभ्रतीहरः॥ शक्तिःसाप्याययौतत्रवा- राहीबिभ्रतीतनुम्॥१८॥नारसिंहीनृसिंहस्यविभ्रतीसदृशंवपुः। प्राप्तातत्रसटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः॥१९॥ वज्रहस्तातथैवैद्री गजराजोपरिस्थितां॥ प्राप्तासहस्रनयनायथाशकस्तथैवसा।।२०॥ टीका-फिर शाग्य है हाथमें जाके और श्रेष्ठ मयूर है.वाहन जाके और स्वामीकार्तिकके समानहै रूप जाके ऐसी कौमारी अंबिका दैत्योंके साथ युद्ध अध्याय ८ (६५) करनेको आतीभई ॥ १६॥ और तिसीप्रकार वैष्णवीशक्ति गरुड़के ऊपर बै- ठीहुई और शंख चक्र गदा शार्ङ्ग धनुष खड्ड ये शस्त्रहै हाथोंमे जाके ऐसी विष्णुकी समान वैष्णवीशक्ति उस रणमें असुरोंके साथ युद्ध करनेको आतीभई ॥ १७॥ फिर ताके अनंतर उपमा करिकै रहित विष्णुका वरा- हरूप जो है ताहि धारण क हुई जो प्रकट होतीभई सो शक्तिभी वराहका शरीर धारण कर्तीहुई रणमें आतीभई ॥ ३८॥ ताके अनंतर कांधेके केशरो- का जहां तहां ताडन करिकै दूर करे, नक्षत्रोंके समूह जाने ऐसी नृसिंहके समान शरीर धारण कर्तीहुई नारसिंही शक्ति असुरोंते रणमें युद्ध करनेको आतीभई ॥ १९ ॥ फिर तिसीप्रकार वजहै हाथमें जाके और ऐरावत हा- थीके ऊपर बैठीहुई और हजार, नेत्र नाके ऐसी ऐंद्री शक्ति रणमें प्राप्त होतीभई जैसा इंद्र तैसीही वह ॥ २० ॥ ततःपरिवृतस्ताभिरीशानोदेवशक्तिभिः ॥ हन्यतामसुराः शीघ्रममप्रीत्याहचंडिकाम्॥२१॥ ततोदेवीशरीरातुविनिष्का तातिभीपणाचंडिकाशक्तिरत्युग्राशिवाशतनिनादिनी ॥२२ साचाहधूम्रजटिलमीशानमपराजिता ॥ दूतत्वंगच्छभगव- पाशुंभनिशुंभयोः ॥२३ ॥ ब्रूहिशुंभनिशुंभचदानवावति गर्वितौ ॥ येचान्येदानवास्तत्रयुद्धायसमुपस्थिताः॥२४ ॥ त्रैलोक्यमिंद्रोलभतादेवा संतुहविर्भुजः ॥ यूयंप्रयातपातालं यदिजीवितुमिच्छथ ॥२५॥ टीका-ताके अनंतर तिन देव शक्तियों करिकै युक्त महेश मेरी प्रीति करिकै तुम असुरोंको जलदी मारो इस प्रकार चंडिकाको कहताभया ॥ २१ ॥ फिर ताके अनंतर चंडिका देवीके शरीरतेची अत्यंत भयंकर और अत्यंत उप स्वभाववाली और शेकडों गीदडियोंकरिकै सहित शब्द कतीहुई फिर चंडिकाशक्ति निकसतीभई ॥ २२ ॥ फिर शत्रुवों करिकै अपराजित वह भगवती धूम्र जटावाला शिव जोहै ताहि बोलतीभई सप्तशतीभाषाटीका। कि हे दूत तुम शुंग निशुंभके पास जावो ॥२३॥ तीन भुवनको जीतकर अ- त्यंत गर्वयुक्त जे शुंग निशुंभ दानव हैं तिन्हें और जे उनकी तरफ संघाममें शूरवीरपनाका गर्व करिकै युद्ध करनेकेवास्ते तैयार, तिन्हैं तुम यह हित कारी वचन कहो ॥ २४ ॥ इंद्र त्रिलोकी जोहै ताहि प्रानहो और इंद्रादिकं देव यज्ञोके विषे यथाभाग हविष जेहे तिन्हें भोजन करनेवालेहों और हे भुंगा दिक दैत्यो तुम साही जो जीनेको चाहतेहो तो पाताल जावो ॥ २५ ॥ बलावलेपादथचेद्भवतोयुद्धकांक्षिणः ॥ तदागच्छत तृप्यतुम च्छिवा:पिशितेनवः ॥ २६ ॥ यतोनियुक्तोदूत्येनतयादेव्या शिवःस्वयम् ॥ शिवदूतीतिलोकस्मिस्ततः साख्यातिमा गता ॥२७ ॥ तेपिश्रुत्वावचोदेव्या शख्यिातमहासुराः॥. अमर्षापूरिताजग्मुर्यत्रकात्यायनीस्थिता ॥२८॥ ततःप्रथ- समेवाग्रेशरशत्गृष्टिवृष्टिभिः॥ववर्षुरुद्धतामर्षास्तादेवीमम- रारयः॥२९॥ साचतान्प्रहितान्याणाञ्छूलशक्तिपरश्वधान।। चिच्छेदलीलयाध्मातधनुर्मुक्तैर्महेषुभिः॥३०॥ टीका-और जो बलके गर्वते तुम युद्धकी इच्छा कहो तो मेरे साथ युद्ध करने आवो फिर मेरा परिवार जे शृंगालहै ते तुलारे मांस करिकै तृप्तहो ॥ २६ ॥ जिसकारण ते देवीने दूताव करिकै शिव भेजाथा तिसकारणते इस लोकके विषे वह देवी शिवदूती इसनामको प्राप्तभई ॥ २७ ॥ फिर शुं- भादिक महाअसुरभी शिव करिकै कहा ऐसा देवीका संदेश सुनकै क्रोध क- रिकै भरेहुवे जहां कात्यायनी भगवती स्थित थी तहां आतेभये ॥ २८ ॥ ताके अनंतर देवताके शत्रु और बढाहै कोष जिनोके ऐसे- शुभादिक दानवः पहिलेही देवीके वक्षस्थलके विषे बाणोंके तथा पोलंडी लाठियोंके और ख- के प्रहारों करिके देवीको आच्छादित कभये ॥ २९ ॥ फिरः ताके अ- नंतर शुंभादिक असुरोंने चलाये ऐसे जे बाण और त्रिशूल और शक्ति और कुहाडे और जे संपूर्ण शस्त्र तिन्हें चंडिका बिन श्रम कारकै प्रत्यंचाकी

अध्याय ८
(६७)
टंकार करिकै शब्दायमान जो धनुप तासे छोडेहुवे तीखे बाण तिन करिकै
काटतीभई ॥ ३० ॥ ..
तस्याग्रतस्तथाकालीशूलपातविदारितान् ॥ खट्वांगपोथितां
श्वारीन्कुर्वतीव्यचरत्तदा॥३१॥ कमंडलुजलाक्षेपहतवीर्या
न्हतौजसः॥ ब्रह्माणीचाऽकरोच्छत्रून्येनयेनस्मधावति॥३२॥
माहेश्वरीत्रिशूलेनतथाचक्रेणवैष्णवी ॥ दैत्यानपानकौमारी
तथाशत्त्यातिकोपना ॥ ३३ ॥ऐंद्रीकुलिशपातेनशतशोदै-
त्यदानवाः ॥ पेतुर्विदारिताःपृथ्व्यांरुधिरौघप्रवर्षिणः॥३०॥
॥ तुंडप्रहारविध्वस्तादंष्ट्रायक्षतवक्षसः॥ वाराहमूान्यपतं
श्चक्रेणचविदारिताः ॥ ३५ ॥
टीका-तब संग्रामकालके विषे चंडिकाके आगे काली चंडिकाकी तरह
त्रिशूलके प्रहारों करिकै विदारित और खदांगके प्रहार करिकै असुरोंको नष्ट
कर्ती हुई रणमें विचरती भई ॥ ३१ ॥ और ब्रह्माणी आदि शक्ति जिस
जिस मार्ग करिकै असुरोंको साथ युद्ध करनेको जाती भई तहां तहां मार्गके
विषे कमंडलुके जलका प्रोक्षण करिकै नष्ट पराक्रम और नष्टतेज दैत्योंको
की भई ॥ ३२ ॥ फिर उस चंडिकाके आगे माहेश्वरी त्रिशूल करिके
वैष्णवी चक्र करिके और अति क्रोधयुक्त कौमारी शांग करिकै दैत्यनको
मारती भई ॥ ३३ ॥ और ऐंद्रीशक्तिके वज्रके प्रहार करिकै विदारित रुधिर
के समूहकी वर्षा कर्ने हुवे सैकडों दैत्य दानव पृथ्वीमें पडते भये ॥ ३४ ॥
और ता संग्रामके विषे वाराहमूर्ति शक्ति के मुखका प्रहार करिकै और उसकी
डाढोंकी लफनियो करिकै विदीर्ण है छाती जिनोकी और चक्रके प्रहार क-
रिकै विदारित ऐसे विध्वस्त हुवे दानव पृथ्वीमें पड़ते भये ॥ ३५ ॥
नखैर्विदारितांश्वान्यान्भक्षयंतीमहासुरान् ॥ नारसिंहीचचारा
जौनादापूर्णदिगंतरा ॥३६॥ चंडाहासैरसुराः शिवदूत्यभि
:. दूषिताः । पेतुःपृथिव्यांपतितांस्तांश्चखादाथसातदा॥३७॥

(६८) सप्तशतीभाषाटीका। इंतिमातृगणंक्रुद्धमर्दयंतमहासुरान् ॥ दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्ने शुर्देवारिसैनिकाः ॥ ३८ ॥ पलायनपरान्दृष्ट्वादैत्यान्मातृग- णार्दितान् ॥ योद्धमभ्याययोक्रुद्धोरक्तबीजोमहासुरः॥३९॥ रक्तविंदुर्यदाभूमौपतत्यस्यशरीरतः ॥ समुत्पततिमेदिन्यां तत्प्रमाणोमहासुरः॥४०॥ टीका-और सिंहनाद करिकै पूर्ण कियेहै दिशावोंके मध्य जाने ऐसी नारसिंही शक्ति नखों करिकै विदारित जे दानव तिन्है और अन्य जे महा असुर तिन्हें भक्षण कर्ती हुई संग्राममें विचरती गई ॥ ३६ फिर तासंग्रा- मके विषे शिवदूती शक्तिने भयंकर अट्टहासन करिकै मूर्छाको प्राप्त किये ऐसे जे दैत्य से पृथ्वीमें पडतेजये ताके अनंतर पृथ्वीमें पडेहुवे जे दैत्यहैं तिहें वह शिवदूती अक्षण कत्र्तीभई ॥ ३७॥ अनेक उपायों करिकै असुरोंको नष्ट कर्चाहुवा ऐसा क्रोधयुक्त हुवा ब्रह्माणी आदि शक्तियोंका जो समूह ताहि देखकर असुर डरपेहुवे भागि जाताये ॥३८॥ और ब्रह्माणीते आदि ले मा- तृगण करिकै पीडित और इसकारण तेही डरपे हुवे ऐसे जे दैत्य तिन्हें देख कर क्रोधयुक्त हुवा महाअसुर रक्तबीज देवी के साथ युद्ध करनेको आता भया ॥ ३९॥ फिर ता रणमें जब रक्तबीजके शरीरते रुधिरकी बिंदु पृथ्वीमें पड़ें तब पृथ्वीमें रक्तबीजके समान महाअसुर उत्पन्न होजाय ॥ ४० ॥ युयुधेसगदापाणिरिंद्रशत्त्यामहासुराततश्चैद्रीस्ववज्रेणरक्तवी जमताडयत् ॥४॥ कुलिशेनाहतस्याशुबहुसुनावशोणित।। समुत्तस्थुस्ततोयोधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः॥४२॥ यावंतः पतितास्तस्यशरीसद्रक्तबिंदवः ॥ तावंतःपुरुषाजातास्तद्वी र्यबलविक्रमाः॥४३॥ तेचापियुयुधुस्तत्रपुरुषारक्तसंभवाः।। समंमातृभिरत्युग्रंशस्त्रपातातिभीषणम् ॥४४॥ पुनश्चवज्रपाते . नक्षतमस्यशिरोयदा।ववाहरक्तंपुरुषास्ततोजातास्सहस्रशः॥४५ ३ अध्याय ८ (६९). टीका-फिर वह महाअसुर रक्तबीज गदा हाथमें लिये हुये ऐंद्रीशक्तिके साथ युद्ध कभिया ताके अनंतर ऐंद्रीशक्ति अपने वज़ करिकै रक्तबीजको ताडन कत्तीभई ॥४३॥ ता समय ऐंद्रीका वजके प्रहार करिकै ताडित जो रक्तबीज ताके शरीरते बहुत रुधिर पृथ्वीमें पडताभया ता रुधिरते रक्तबी- जके समान रूपवाले और समान पराक्रमवाले कई योधा उत्पन्न होतेभये४२ फिर जितना रुधिरका विंदु रक्तबीजका शरीरते पड़ा उतनाही संख्या रक्त- बीजके समान शूर वीर और पराक्रमी दैत्य उत्पन्न होतेभये ॥४३॥ फिर वे रक्तबीजके रुधिरते उत्पन्नहुवे जे दैत्यहें वेभी उस रणके विषे ब्रह्माणीते आदि ले जो मातृगण है ताके साथ दारुण जैसे होय तैसे और शस्त्रोंके प्रहार करिकै भयंकर जैसे होय वैसे युद्ध काये ॥४४॥ फिर ऐंद्रीशक्तिने किया जो वजाहार ता करिके इस रक्तबीजका शिर विदीर्ण होताया फिर उस शिरते रुधिर वहता भया फिर वा रुधिरके प्रवाहते हजारों दैत्य उत्पन्न होते भये ॥ ४५ ॥ वैष्णवीसमरेचैनंचक्रेणाभिजधानह । गदयाताडयामासऐंद्रीत मसुरेश्वरं ॥ ४६ ॥ वैष्णवीचक्रभिन्नस्यरुधिरत्रावसंभवैः ।। सहस्रशोजगद्व्याप्ततत्प्रमाणैर्महासुरैः ॥ ४७॥ शत्त्याजघा- नकौमारीवाराहीचतथासिना ॥ माहेश्वरीत्रिशूलेनरक्तबीजम- हासुरम् ॥४८॥ सचापिगदयादैत्य सर्वाएवाहनत्पृथक् ॥मातृः कोपसमाविष्टोरक्तवीजोमहासुरः॥४९॥तस्याहतस्यबहुधाश- क्तिशूलादिभिभुवि ॥ पपातयोवैरक्तौ स्तेनासञ्छतशोसुराः॥५० टीका-फिर उस रणमें वैष्णवीशक्ति रक्तबीजको चक्रके प्रहार करिके भारतीभई और पीछे यही असुर ऐंद्रीशक्तिके साथ युद्ध करनेको प्राप्तभया जब वैष्णवीशक्ति इस असुरको गदाके प्रहार करिके ताड़न कर्तीभई॥४६॥ फिर वैष्णवीशक्तिके चक्रप्रहार करिकै विदारित जो रक्तबीज तिसके रुधि- र का प्रवाहते उत्पन्न भये जे रक्तबीजके समानाकार हजारों महामुर तिन क- .. (७०) सप्तशतीभाषाटीका। रिके जगत् व्याप्त होतामया ॥४७॥ फिर उस संग्रामके विपे कौमारीशक्ति रक्तवीज जो है ताहि शांगके प्रहार करिके और तिसी प्रकार वाराहीशक्ति खगके प्रहार करिके और माहेश्वरी त्रिशूलके प्रहार करिकै ताड़न कती जई ॥४८॥ फिर वह महाअसुर रक्तबीज क्रोधयुक्त हुवा ब्रह्माणीते आदि लेकर जे संपूर्ण शक्ति हैं तिन्हें गदाके प्रहार करिके पृथक् पृथक् ताड़न कजिया ॥ ४९ ॥ फिर संग्रामके विपे शक्ति त्रिशूल इन आदि शस्त्रोंके प्रहार करिके ताड़ित हुवा जो रक्तबीज ताके शरीरते निकसा रुधिरका प्रवाह जो पृथ्वीमें पडता जया ता करिके कोटिन दैत्य उत्पन्न होतेनये ॥५०॥ तैश्चासुरासक्संभूतैरसुरैस्सकलंजगत् ॥ व्याप्तमासीत्ततोदेवा भयमाजग्मुरुत्तमम् ॥५१॥ तान्विषण्णान्सुरान्दृष्ट्वाचंडिका प्राहसत्वरा ॥ उवाचकालीचामुंडेविस्तीर्णवदनंकुरु ॥५२॥ मच्छस्त्रपातसंभूतानरक्तविदून्महासुरान् ॥ रक्तवीजात्प्रतीच्छ त्वंवक्रेणानेनवेगिना ॥ ५३ ॥ भक्षयंतीचररणेतदुत्पन्नान्म हासुरान् । एवमेषक्षयदैत्याक्षीणरक्तोगमिष्यति ॥ ६ ॥ भक्ष्यमाणास्त्वयाचोग्रानचोत्पत्स्यंतिचापरे। ऋषिरुवाच ।। इत्युक्त्वातांततोदेवीशूलेनाभिजधानतम् ॥ सुखेनकालीजगृ हेरक्तबीजस्यशोणितम् ॥ ५५ ॥ टीका-फिर ताके अनंतर रक्तबीजके रुधिरते उत्पन्न भये जे दैत्य तिन: करिकै सम्पूर्ण जगत् व्याप्त होताया तिस कारण ते देवता अधिक जय जो है ताहि प्राप्त होतेभये ॥ ५१.॥ फिर चंडिका अयशीत जे देव हैं तिन्हें देख : कर बोली हे देवो तुम मत डरपो फिर कालीको बोलतीभई कि हे चामुंडे तुम अपना मुख विस्तृत करो ॥५२॥ फिर बोली तुम अत्यंत वेगवाले विस्तृत मुख करिके मेरे शखों के प्रहारों करिके उत्पन्न जे रुधिरके बिंदु तिन्हें रक्त- बीजके शरीरते पीवो नहीं तो रक्तबिंदु पृथ्वीमें पडताही अन्य असुरनको उत्पन्न करदेगा ॥ ५३ ॥ और चामुंडे रक्तबीजका रुधिरते उत्पन्न भये जे

अध्याय
(७१)
महादैत्य तिन्है तुम अक्षण कर्तीहुई संग्राममें विचरो इसप्रकार यह दैत्य क्षीण
रक्त हुवा नाशको प्राप्त होजायगा और जे रक्तबीजके रुधिरते उत्पन्न भये
भयंकर दैत्य हैं ते तुलारे करिकै भक्षण कियेहुये नहीं उत्पन्न होंयगे ॥५४॥
तब ऋषि बोले कि हे सुरथराजन इसप्रकारसे चंडिका कालीके प्रति कह
कर त्रिशूलके प्रहार करिकै तिस रक्तबीजको ताडन कर्तीभई फिर रक्तबी-
जके रुधिरको काली मुख करिकै पीतीनई ॥ ५५ ॥
ततोसावाजघानाथगदयातनचंडिकाम् ॥ नचास्यावेदनांचके
गदापातोल्पिकामपि ॥५६॥ तस्याहतस्यदेहात्तुबहुमुखाव-
शोणितम् । यतस्ततस्तदक्केणचामुंडासंप्रतीच्छति ॥६॥
मुखेसमुद्गतायेस्यारक्तपातान्महासुराः ॥ तांश्चखादाथचामुं-
डापपौतस्यचशोणितम् ॥ ५८ ॥ देवीशूलेनचक्रेणवाणैर
सिभिरिष्टिभिः ॥ जघानरक्तवीजतंचामुंडापीतशोणितम् ॥
॥१९॥सपपातमहीपृष्ठेशस्त्रसंहतितोहतः॥नीरक्तश्चमहीपाल
रक्तबीजोमहासुरः॥६॥
टीका-ताके अनंतर तिस संग्राममें यह रक्तबीज दैत्य गदाके प्रहार क-
रिके चंडिका जो है ताहि ताडन कर्त्ताशया चंडिका परमानंदस्वरूप है याते
ताको गदाका प्रहार कुछभी वेदना नहीं कामया ॥५६॥ फिर चंडिकाके
शलों करिकै ताडित जो रक्तबीज ताके शरीरते जो बहुत रुधिर झरताभया
सो चामुंडा अपना मुख करिके पीतीभई ॥५७॥ फिर कालीके मुखमें रक्त-
बीजका रुधिर पडनेते उत्पन्न भये जे महाअसुर तिन्हें चामुंडा काली क्षण
कर्तीभई और रक्तबीजका रुधिर पीतीभई॥५८॥फिर चामुंडाने पियोहै रुधिर
जाको ऐसो जो रक्तबीज ताहि चंडिका त्रिशूलके प्रहार करिकै और चक्रके
प्रहार करिकै और बाणों के प्रहार करिकै और खड्गोंके प्रहार करिकै और
रिष्टियोंके प्रहार कारकै ताडन कर्तीभई॥५९॥फिर हे राजन शस्त्रोंकै समूहते
ताडित और रुधिररहित हुवा रक्तबीज मराहुवा पृथ्वीमें पडता भया ॥६०॥

.. (७२) सप्तशतीभाषाटीका। ततस्तेहर्षमतुलमवापुस्त्रिदशानृप। तेषांमातृगणोमत्तोननर्ता सुङ्मदोद्धतः॥६॥इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरे देवीमाहात्म्येरक्तबीजवधोनामाष्टमोध्यायः ॥ ८ ॥ टीका-हे सुरथ फिर रक्त बीजके वधके अनंतर संपूर्ण देव अपरिमित हर्षको प्राप्त होतेभये और रक्तबीजसे आदिले दैत्योंको रुधिर पानते मदोत्क- ट जो ब्रह्माणी ते आदिले मातृगणहैं सो मदोन्मत्त हुवा नाचतामया ॥६१॥ इति श्रीमार्कडेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरे देवीमाहात्म्येभाषाटीकायारक्तवीज- वधोनामअष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥ ॥ राजोवाच ॥ विचित्रमिदमाख्यातंभगवन्भवतामम ॥ देव्याश्चरितमाहात्म्यरक्तबीजवधाश्रितम् ॥ १ ॥ भूयश्चेच्छा- च्छाम्यहंश्रोतुरक्तबीजेनिपातिते ॥ चकारशुंभोयत्कर्मनिशुं भश्चातिकोपनः ॥२॥ ऋषिरुवाच ॥ चकारकोपमतुलंरक्त बीजेनिपातिते ॥ शुंभासुरोनिशुंभश्चहतेष्वन्येषुचाहवे ॥३॥ हन्यमानमहासैन्यं विलोक्यामर्षसुद्वहन् ॥ अभ्यधावनिशुंभो- थमुख्ययासुरसेनया ॥ ४॥ तस्यायतस्तथापृष्ठेपार्श्वयोश्चम हासुराः ॥ संदष्टौष्टपुटाकुद्धाहंतुदेवीमुपाययुः॥५॥ टीका-तब सुरथराजा बोलतेभये कि हे भगवन् आपने रक्तबीजके वधं विषयक यह देवीके चरित्रोका विचित्र माहात्म्य मेरेसे कहा॥१॥हेगवन् देवी ने रक्तबीजको पृथ्वीमें डाले सते क्रोधयुक्त हुये शुभ और निशुंभ फिर जो संग्राम लक्षण कर्म कर्ने भये सो आपते अधिक जैसे होय तैसे मै सुना चाहताहूँ॥२ तब ऋषि बोले कि हे राजन् देवीने रक्तबीजको मार पृथ्वीमें डालेसते और जे दैत्यहैं तिनको संघामके विषे मारेसते शुंनासुर और निशुंभ ये बडाक्रोध कर्ने भये॥३॥ताके अनंतर देवी कारकै हत अपनी सैन्यको देखकर क्रोधयु. क हुवा निशुंन अपनी मुख्य असुरोंकी सेनाकरि सहित देवीके सन्मुख दौ-. इवाभया ॥ ४ ॥ फिर वा निशुंभके अगाडी तथा पिछाडी और दाहिने वामे

अध्याय ९
(७३)
वर्तमान जे महाअसुर ते क्रोधयुक्त ओष्ठपुट चावते हुवे देवीको मारनेको
समीप प्राप्त होतेभये ॥ ५॥
आजगाममहावीर्य शुंभोपिस्ववलैर्वृतः॥निहंतुंचंडिकांकोपा-
त्कृत्वायुद्धंतुमातृभिः ॥ ६॥ ततोयुद्धमतीवासीद्देव्याः शुंभ
निशुंभयोः ॥ शरवर्षमतीवोमेधयोरिववर्षतोः ॥ ७ ॥
चच्छेदाऽस्ता छरांस्ताभ्यांचंडिकास्वशरोत्करैः ॥ ताड-
यामासचांगेपुशस्त्रौधैरसुरेश्वरौ ॥ ८॥ निशुंभोनिशितंखङ्गं
चर्मचादायसुप्रभं ॥ अताडयन्मूर्भिसिंहदेव्यावाहनमुत्तमम्॥
॥९॥ ताडितेवाहनेदेवीक्षुरप्रेणासिमुत्तमम् ॥ निशुंभस्या
शुचिच्छेदचर्मचाप्यष्टचंद्रकं ॥ १०॥
टीका-फिर ताके अनंतर शुंभी अपनी सेना कारकै युक्तहुवा ब्रह्माणी
आदि शक्तियोंते युद्ध करिके क्रोधते चंडिकाके मारनेको चंडिकाके समीप
प्राप्त होताया ॥ ६ ॥ ताके अनंतर अत्यंत भयंकर बाणोंकी मेघकीसी
तरह वर्पा कहुये जे शुंभ और निशुंभ दैत्यहै तिनका और भगवतीका पर
पर बडाही युद्ध होताया ॥ ७॥ फिर तिन शुंभनिशुंभ दैत्योंकरिकै छोडे
हुवे जे बाणहै तिन्हे चंडिका अपने बाणनके समूह करिके काटतीभई याके
अनंतर शुंग निशुंन जे हैं तिन्हे शस्त्रोंके समूह करिकै रोम रोमकेविषे ताडन
कानई ॥ ८॥ फिर निशुंभ तीखा और प्रकाशमान खड्ग और प्रकाशमा-
न ढाल लेकरके देवीवाहनसिंहके मस्तकमें ताडन कामया ॥ ९॥ फिर
निशुंभने देवीके वाहन सिंहसे ताडन कियेसते चंडिका क्षुरप्रमाण करिकै नि-
शुनका खड़ जोहै ताहि और आठहैं चंद्राकार लिखित जाकेविषे ऐसी
डाल जोहै ताहि काटतीमई ॥ १० ॥
छिन्नेचर्मणिखड्ड्रेचशक्तिंचिक्षेपप्लोसुरः ॥ तामप्यस्यद्विधाच
क्रेचक्रेणाभिमुखागतां ॥ ११ ॥ कोपाध्मातोनिशुंभोथशूलं
जग्राहदानवः॥आयातमुष्टिपातेनदेवोतचाप्यचूर्णयत्॥१२॥

(७४)
सप्तशतीभापाटीका।
अथादायगदांसोपिचिक्षेपचंडिकांप्रति ॥ सापिदेव्यास्त्रिशु-
लेनभिन्नाभस्मत्वमागता ॥ १३ ॥ ततःपरशुहस्तंतमायां
तैदैत्यपुंगवं ॥ आहत्यदेवीवाणौधैरपातयतभूतले ॥१॥
तस्मिन्निपतितेभूमौनिशुंभेभीमविक्रमे ॥ भ्रातर्यतीवसंक्रुद्धः
प्रययौहंतुमविकास् ॥ १६॥
टीका-फिर चंडिकाने निशुंभके खड्ड और ढाल काटेसते निशुंन देवीके
प्रति शक्ति शस्त्र फेकतामया फिर सन्मुख आवतीहुई याकी शक्तिकानी
चंडिका चक्र करिकै दो दूक कीबई ॥ १३ ॥ याके अनंतर अत्यंत को-
धयुक्त हुवा निशुंज देवीके प्रति त्रिशूल फेकतामया फिर आतेहुवे तिस त्रि-
शूलकाजी चंडिका मुष्टिके प्रहार करिकै चूर्ण कोंबई ॥ १२॥ याक अनं-
तर फिर निशुंनी गदा ग्रहण करिकै चंडिकाके प्रति फेकतामया फिर वह
गदानी देवीके अभिबीजगर्भ त्रिशूल करिकै खंडितहुई अस्मको प्राप्त हो-
तीभई ॥ १३ ॥ ताके अनंतर फरशी है हाथेमें जाके और दैत्योमें श्रेष्ठ ऐसा
आताहुवा निशुंभ जोहै ताहि चंडिका बाणोंके समूह करिकै ताडन कर पृ.
वीकेविषे गिरातीबई ॥ १४ ॥ फिर घोर है पराक्रम जाके विषे ऐसा वह
निशुन माता पृथ्वीमें पडेसते अत्यंत क्रोधयुक्त हुवा शुंज अंबिकाको मारने-
को शीघ्र जातोजयो ॥ १५॥
सरथस्थस्तथात्युच्चैयूँहीतपरमायुधैः ॥ भुजैरष्टाभिरतुलैा-
प्याशेषवभौनमः॥ १६॥तमायांतसमालोक्य देवीशंखमवा-
दयत् ॥ ज्याशब्दंचापिधनुषश्चकारातीवदुस्सहं ॥ १७ ॥
पूरयामासककुभोनिजघंटास्वनेनच ॥ समस्तदैत्यसैन्यानां
तेजोवधविधायिना ॥ १८॥ ततः सिंहोमहानादेस्त्याजितेभ-
महामदैः ॥ पूरयामासगगनंगांतथैवदिशोदश ॥ १९ ॥
ततःकालीसमुत्पत्यगगनक्ष्मामताडयत्॥कराभ्यांतन्निनादे-
नप्राक्स्वनास्तेतिरोहिताः॥२०॥

अध्याय ९ (७५) टीका-फिर वह शुभ रथमें स्थितहुवा मुद्रिका प्रकारकरिकै ग्रहण कि- येहैं उत्तम शस्त्र जिनोकेविपे ऐसी जे बडी ऊंचि अतुल आठपुजा तिनं करिकै संपूर्ण आकाशको व्याप्त करताता कालकेविषे शोभायमान होतोभयो ॥ १६ ॥ फिर तिसको आताहुवा देखिके देवी शंख बजातीचई और धनुष- की प्रत्यंचाका बडाही दुःसह शब्दभी कीमई ॥ १७ ॥ फिर चंडिका सं- पूर्ण असुरोंके सैन्यका तेजको नष्ट करनेवाला ऐसा अपनी घंटाका जो शब्द है ता करिकै दशोदिशाँको संवर्धमान कीभई ॥ १८॥ फिर ताके अनंतर दूर कियेहैं हाथियोंके महामद जिनोंने ऐसा जो कंठ गर्जनहै तिन कारकै सिंह आकाश जो है ताहि पूर्ण कर्लोभयो और तिसीप्रकार पृथ्वी और दशोदिशा तिन्हे पूर्ण कौभयो ॥ १९ ॥ फिर ताके अनंतर चामुंडा काली उछल क- रिकै हाथोस आकाश और पृथ्वी जोहै तिन्हें ताडन कौसई फिर या पृथ्वी और आकाशके ताडनके शब्द कारकै शंख प्रत्यंचा घंटा सिंह इनके जे शब्द थे ते आच्छादित होतेभये ॥ २० ॥ अट्टाट्टहासमशिवंशिवदूतीचकारह तैःशब्दैरसुरास्त्रेसु शुभः कोपंपरययौ ॥ २१ ॥ दुरात्मंस्तिष्ठतिष्ठेतिव्याजहारबि- कायदा॥ तदाजयेत्यभिहितदेवैराकाशसंस्थितैः ॥ २२ ॥ शुंभेनागत्ययाशक्तिर्मुक्ताज्वालातिभीपणा ॥ आयांतीवन्हि- कूटाभासानिरस्तामहोल्कया ॥ २३ ॥ सिंहनादेनशुंभस्य व्याप्तंलोकत्रयान्तरम्।। निर्यातनिःस्वनोपोरोजितवानवनीपते ॥ २४ ॥ शुंभमुक्ताञ्छरान्देवीशुभस्तत्प्रहिताञ्छरान् ॥ चिच्छेदस्वशरैरुप्रै शतशोथसहस्रशः ॥२५॥ टीका-और शिवदूती तासमय बडा कठोर अट्टाहास कत्तीभई फिर अट्टाहासते उत्पन्नाये जे शब्दहैं तिन कारकै असुर त्रासको प्राप्त होतेभये और शुंभ अत्यंत कोपको प्राप्त होतोभयो ॥ २१. ॥ फिर हे शुंगदुरात्मन् तू खडारहै खडारहै ऐसे संग्रामकेविष जब अंबिका कहतीमई तब आका- (७६) सप्तशतीभाषाटीका। शमें स्थितहुये देवोंने जय जय शब्द किया अर्थात हे अंबिके तुम शत्रुवोंका तिरस्कार करो इस प्रकारसे कहा ॥ २२ ॥ फिर शुंसने आकरिकै ज्वाला करिकै बढी भयंकर ऐसी शांग भगवतीके सन्मुख छोडी अमिके तुल्यहै कांति जाकी ऐसी आतीहुई शांगको अंबिका अपनी महोल्का शांग क- रिकै निरस्त कीमई ॥ २३ ॥ हे सुरथ तासमय शुभके कंठ गर्जन कारकै लोकत्रयका मध्य व्याप्त होता आया तोजी ताहि देवीको मारो मारो यह जो. शुंभके सैनिकनका शब्दहै सो शुभका शब्द जोहै ताहि तिरस्कृत कमिया ॥ २४ ॥ फिर ता संग्रामकेविषे देवी अपने उग्रबाणों करिकै सौ सौ हजार हजार शुंभके छोडेहुए जे बाणहैं तिन्हें काटतीमई और शुंज देवीके छोडेहुये जे बाणहैं तिन्हें अपने बाणों करिकै काटतामया ॥ २५ ॥ ततःसाचण्डिकाद्धाशूलेनाभिजघानतम् ॥ सतदाभिहतो भूमौमूच्छितोनिपपातह ॥२६॥ ततोनिशुंभःसंप्राप्यचेत नामात्तकार्मुकआजघानशरैर्दैवीकालीकेसरिणतथा ॥२७॥ पुनश्चकृत्वाबाहूनामयुतंदनुजेश्वरः ॥ चक्रायुतेनदितिज श्छादयामासचंडिकाम् ॥ २८ ॥ ततोभगवतीकुद्धादुर्गा दुर्गातिनाशिनी ॥ चिच्छेदतानिचक्राणिस्वशरैःसायकांच तान् ॥ २९ ॥ ततोनिशुंभोवेगेनगदामादायचंडिकाम् ॥ अभ्यधावतवैहंतुदैत्यसेनासमावृतः ॥३०॥ टीका-फिर शुंभको संयाममें अपने समान देखिके वह चंडिका क्रोध युक्त हुई त्रिशूलके प्रहार करिकै तिस दैत्यको ताडन कर्तीभई फिर वह शुभ त्रिशूलके प्रहार करिकै ताडित मूर्छित हुवा-पृथ्वीमें पड़ताक्षया ॥ २६ ॥ ताके अनंतर पहिले मूर्जाको प्राप्तहुवा निशुंभ चेतना जो है ताहि प्राप्त होकर ग्रहण कियोहै धनुष जाने ऐसा बाणों के प्रहार करिकै काली देवी जोहै ताहि. ताडन कर्ताभया और तिसी प्रकार सिंह जो है ताहि ताडन क भया॥२७॥ और तासमय फिर वह निशुंभ मायावी दशहजार भुजावाला बनिके चक्रके अध्याय ९ (७७) प्रहार करिकै चंडिका जोहै ताहि ताडन कहॊभयो ॥ २८ ॥ ताके अनंतर संकटमें पीडाको नष्ट करनेवाली ऐसी दुर्गा भगवती क्रोधयुक्क हुई अपने बाणों करिकै वा दैत्यके चक्र और बाण जे हैं तिन्हें काटतीभई ॥ २९ ॥ फिर ताके अनंतर निशुंग वेग करिकै गदा जो है ताहि ग्रहण करिकै दैत्य- नकी सेना करिकै युक्त हुवा चंडिका जो है ताहि मारनेको दौडताशया॥३०॥ तस्यापततएवाशुगदांचिच्छेदचंडिका ॥ खङ्गेनशितधारेण सचशूलंसमाददे ॥३१॥ शूलहस्तंसमायांतनिशुभममराई- नम् ।। हदिविव्याधशूलेनवेगाविद्धनचंडिका ॥ ३२ ॥ भिन्न- स्यतस्यशूलेनहृदयानिःसृतोपरः॥ महावलोमहावीर्यस्तिष्ठे- तिपुरुषोवदन ॥ ३३॥ तस्यनिष्कामबोदेवीप्रहस्यस्वनव- त्ततः॥ शिरश्चिच्छेदखङ्गेनततोसावपतद्धवि ॥३४॥ ततः सिंहश्चखादोगदंष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान् ॥ असुरांस्तांस्तथाका- लीशिवदूतीतथापरान् ॥ ३५ ॥ टीका-फिर आवाहवाही निशुसकी गदा जो है ताहि चंडिका तीखी धारवाले खड़ करिकै तत्काल काटतीभई फिर वह दानव त्रिशूल ग्रहण कों भयो॥३१॥ फिर त्रिशूल है हाथमें जिसके और देवतानको दुःख देनेवाला ऐसा आताहुवा निशुंभ जो है ताहि चंडिका वेगते फेकाहुवा जो त्रिशूल है ता करिके हृदयकेविष वींधती भई ॥ ३२ ॥ फिर त्रिशूलके प्रहार करिकै जिन्नहुवा जो निशुंभ है ताके हृदयते हे देवि तू कहां जायगी खडी रहै ऐसे कहताहुवा बड़ा पराक्रमी और बड़ा वीर अन्य पुरुष निकसताया ॥३३॥ फिर रेरे दुष्ट ! तू खडारह खडारहै मन्मयी मायाको प्राप्त होकर तू फिर मेरे- कोही मारनेको उद्युक्त हो रहाहै यातै मैं तेरेको अवहीं मारूंगी इसप्रकार हैं- सके निशुंभके हृदयते निकसता हुवा जो निशुंभका अवतार है ताको देवी ख- डुके प्रहार करिके शिर काटतीभई ताके अनंतर निशुंभ रणभूमिकेविषे पड़- तामया ।। ३४ ॥ ताके अनंतर उग्रदंष्ट्रानकरिकै संपिष्ट है ग्रीवा जिनोकी (७८) सप्तशतीभाषाटीका। ऐसे जे असुर हैं तिन्हें सिंह खाताभया और सिंह भक्षित असुरोंते अन्य जे असुर हैं तिन्हें काली भक्षण कौनई तिनोंसेभी अन्य जे हैं तिन्हें शिवदूती भक्षण कर्तीभई ॥ ३५ ॥ कौमारीशक्तिनिभिन्ना केचिन्नेशर्महासुराः॥ ब्रह्माणोमंत्रपूते नतोयेनान्यनिराकृताः ।। ३६ ॥ माहेश्वरीत्रिशूलेनभिन्नाः पेतुस्तथापरे ॥वाराहीतुंडवातेनकेचिचूर्णीकृताभुवि ॥३७॥ खंडखंडंचचक्रेणवैष्णव्यादानवाः कृताः॥ वज्रेणाद्रीहस्तान विमुक्तेनतथापरे ॥३८॥ केचिद्विनेशुरसुरा केचिन्नष्टामहाहः वात् ॥ भक्षिताश्चापरेकालीशिवदूतीमृगाधिपैः ॥ ३९ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिके मन्वंतरेदेवीमाहात्म्येनि शुभवधोनामनवमोऽध्यायः ॥९॥ टीका-और कितनेही महाअसुर कौमारीकी शक्तिके प्रहार करिकै छि- नभिन्न हुवे नाशको प्राप्त होतेाये और कितनेही अन्य असुर ब्रह्माणीके मंत्रते पवित्र जल करिकै नष्ट करिदिये ॥ ३६ ॥ और तिसीप्रकार अन्य कितनेही असुर माहेश्वरीके त्रिशूलके प्रहार करिकै मिन्नहुवे रणभूमिकेविषे पड़तेजये और कितनेही वाराहीशक्तिके मुखके प्रहार करिकै चूर्णितहुवे रण- भूमिकेविषे पड़तेभये ॥ ३७ ॥ फिर वैष्णवीशक्तिने चक्रके प्रहार करिकै खंडपनाको दानव प्राप्त करदिये और तिसीप्रकार कितनेही अन्य दानव ऐंद्री शक्तिके हस्ताय करिकै प्रेरित जो वज ताके प्रहार करिकै खंडितहुये नष्ट होतेभये ॥ ३८ ॥ फिर ता संग्रामकेविषे कितनेही तो असुर नष्ट होतेभये और कितनेही तिस संग्रामते डरपके . भागजातेभये और कितनेही असुर काली और शिवदूती और सिंह इनोने लक्षण किये ॥ ३९ ॥ इति मार्क- ण्डेयपुराणे सावर्णिकेमन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये निशुअवधोनाम नवमोध्यायः॥९॥ ऋषिरुवाच॥निशुंभनिहतंदृष्ट्वाभ्रातरंप्राणसंमितम् ॥ हन्यमा: नंबलचैवशुंभः क्रुद्धोब्रवीद्वचः॥१॥ बलावलेपाहुष्टत्वंमादु- अध्याय १० (७९) गैंगर्वमावह ।। अन्यासांबलमाश्रित्य युध्यसेयातिमानिनी॥२॥ देव्युवाच ॥ एकैवाहजगत्यत्रद्वितीयाकाममापरा ॥ पश्यै- तादुष्टमय्येवविशंत्योमद्विभूतयः॥३॥ ऋषिरुनाच॥ ततःसम स्तास्तादेव्योब्रह्माणीप्रमुखालयम् ॥ तस्यादेव्यास्तनौजग्मुरे कैवासीत्तदांबिका ॥४॥ देव्युवाच ॥ अहंविभूत्याबहुभिरिहरू- पैर्यदास्थिता ॥ तत्संहतमयकैवतिष्ठाम्याजौस्थिरोभव ॥६॥ टीका-तब ऋषि बोले कि हे सुरथराजन् फिर शुंभ प्राणों के समान देवी करिकै माराहुया ऐसा निशुंभ नाता जो है ताहि देखकर और अपनी सेना देवी करिके हन्यमान देखकर क्रोधयुक्त हुवा वचन बोलताया ॥ ३ ॥ हे दुर्गे दुष्टनी बलके संबंधसे तू गर्व मतकरे जो तू ब्रह्माणीआदि शक्तियोंका बल जो है ताहि आश्रय करिकै निरंतर अहंकारवाली हुई युद्ध कर्ती है सो सर्वथा दूसरेके बलका आश्रय लेकर युद्धकेविषे तेरेको गर्व करना अनु- चित है ॥ २॥ ताके अनंतर देवी बोलतीभई कि हे दुष्ट शुंभ इस जगत्के विषे परमात्मरूप एक मैहींहूँ मेरेते अन्य दूसरी कौन है अर्थात् कोई नहीं और ये जे ब्रह्माणी आदि लेकर मेरी विसूति हैं तिन्हें मेरे विषेही प्रवेश होतीहुई तू देख ॥ ३॥ तब ऋषि बोले कि हे सुरथराजन ताके अनंतर ब्रह्माणी है मुख्य जिनों के विषे ऐसी जे आठ शक्ति हैं वे सब तिस चंडि- काके शरीरमें ऐक्यको प्राप्त होतीभई अर्थात् लोन होतीभई तब एक अं-. बिका देवीही अद्वितीयं रहतीभई ॥ ४ ॥ फिर देवी बोलती भई हे शुभ मैं इस रणभूमिके विषे बहुत रूपों करिकै जो बहुत्व अंगीकार करा सो बहुत्व समेटलिया अब मैं एकही स्थितहूँ तू अब संग्रामकेविषे स्थिरहो ॥५॥ ऋषिरुवाच ॥ ततःप्रववृतेयुद्धदेव्याशुभस्यचोभयोः ॥ प- श्यतासर्वदेवानामसुराणांचदारुणम् ॥ ६॥ शरवर्षेःशितैः शस्त्रैस्तथान्चेश्चैवदारुणैः।। तयोर्युद्धमभूद्भूयः सर्वलोकभयंकर ॥७॥दिव्यान्यस्त्राणिशतशोमुमुचेयान्यथाविका ॥ वभंज सप्तशतीजापाटीका। तानिदैत्येंद्रस्तत्प्रतीवातकर्तृभिः ॥८॥ मुक्तानितेनचास्त्रा णिदिव्यानिपरमेश्वरी ॥ वभंजलीलयैवोगहुंकारोच्चारणादि- भिः॥९॥ ततश्शरशतैर्दैवीमाच्छादयत्तसोसुरः॥ सापितत्कु- पितादेवीधनुश्चिच्छेदचेषुभिः ॥ १० ॥ टीका-तब ऋषि बोले कि हे सुरथराजन् ताके अनंतर देवी और शुंन. इन दोनोंका परस्पर युद्ध प्रवृत्त होताया वह कैसा युद्धहुवा कि देखतेहुये संपूर्ण देव तिनको जे जयंकर ऐसा ॥ ६ ॥ फिर बाणोंकी वर्षा करिकै तीसे शस्त्रों करिकै और कठोर अखों करिकै शुंगका और देवीका संपूर्ण लोकको भय करनेवाला ऐसा बहुत युद्ध होतामया ॥ ७ ॥ योके अनंतर अंबिका शुधकेविषे जे सेंकडों दिव्याऽन्न छोडे तिन्हें तिनका विध्वंस करनेवाले अत्रों करिकै शुज काटतामया॥८॥ फिर शुंभने छोडे जे दिव्य अस्त्र हैं तिन्हें परमेश्वरी हुंकारोच्चारणादि करिकै विनापरिश्रम करिकेही काटतीनई ॥९॥ ताके अनंतर हजारों बाणों करिकै वह असुर देवी जो है ताहि आच्छादित कफ़ैजयो तित्तकारणते वह भगवती क्रोधयुक्त हुई वाणों करिकै शुंभको ध- नुष जो है ताहि काटतीभई ॥ १० ॥ छिन्नेधनुषिदैत्येंद्रस्तथाशक्तिमथाददे॥ चिच्छेददेवीचक्रेणता मप्यस्यकरेस्थिताम् ॥११॥ ततःखड्गमुपादायशतचंद्रंचभा. नुमत् ॥ अभ्यधावतताहंतुदैत्यानामधिपेश्वरः ॥ १२ ॥ तस्यापततएवाशुखङ्गचिच्छेदचंडिका ॥ धनुर्मुक्तैशितैर्बा- णैश्चर्मचार्ककरामलं ॥१३॥ अश्वांश्चपातयामासरथंसारथिना सह ॥ हताश्वःसतदादैत्यश्छिन्नधन्वाविसारथिः ॥ जग्राहमुद्ग- रंघोरमविकानिधनोद्यतः॥ १४॥ चिच्छेदापततस्तस्यसुद्गरं निशितैःशरैः। तथापिसोभ्यधावत्तांमुष्टिसुद्यम्यवेगवान्।।१५॥ टीका-फिर देवीने शुंभका धनुष काटे संते शुंन तिसीप्रकार शक्ति शस्त्र ग्रहण कर्नोनयो याके अनंतर देवी शुभके हाथमें स्थित जो शक्ति शस्त्रहै अध्याय १० (८१) ताहिबी चक्र करिके काटतीमई ॥११॥ ताके अनंतर दैत्योंके अधिप जे धूम्रलोचनादिक तिनका ईश्वर शुंभ खड्ग जो है ताहि ग्रहण कार- के और सौ है लिखेहुवे चंद्राकार जाके विषे और प्रकाशमान ऐसा जो ढालहै ताहि ग्रहण कारकै ता देवीके मारनेको दौडताभया ॥ १२॥ फिर आता- हुवा ही जो शुनहै ताका खड्ग जो है ताहि अत्यंत प्रकाशमान जो ढालह ताहि चंडिका धनुष करिकै छोडेहुवे जे तीखे बाणहैं तिन करिकै कारती भई ॥ १३॥ और अश्व जे हैं तिन्हैं और सारथि करिकै सहित जो रथहै ताहि चंडिका बाणों करिकै पृथ्वीमें गिरातीभई फिर मारेगयेहैं अश्व जाके और टूटगयाहै धनुष जाका और विगतहुवाहै सारथि जाका ऐसा वह शुभदै- त्य अंबिकाके मारनेमें उद्युतहुवा भयंकर मुद्र ग्रहण कर्तालया ॥ १४ ॥ फिर ताके अनंतर प्रहार करनेकी इच्छा काहुवा जो शुभ है ताका मुद्रर जोहै ताहि सो देवी तीखे बाणों करिकै काटतीभई तौसी मूका ऊंचा करि- कै शुंभ देवीके मारनेको दौडताभया ॥ १५॥ समुष्टिंपातयामासहृदयदैत्यपुंगवः ॥ देव्यास्तंचापिसादेवीत लेनोरस्यताडयत् ॥ १६॥ तलप्रहारामिहतोनिपपातमही- तले । सदैत्यराज सहसापुनरेवतथोत्थितः॥ १७॥ उत्पत्य चप्रगृह्योचैर्देवीगगनमास्थितः ॥ तत्रापिसानिराधारायुयुधेते नचंडिका ॥ १८॥ नियुद्धखेतदादैत्यश्चंडिकाचपरस्परम् ।। चक्रतुःप्रथमंसिद्धमुनिविस्मयकारकम्।१९।ततोनियुद्धंसुचि- रंकृत्वातेनांविकासह।उत्पात्यभ्रामयामासचिक्षेपधरणीतले २०॥ टीका-फिर वह दैत्यनमें श्रेष्ठ शुंभ देवीके हृदयकेविषे मुष्टिका प्रहार कामया फिर वह शुंन जोहै ताहिभी करतल करिकै वक्षस्थलकेविषे ताउन कतीभई ॥ १६ ॥ फिर वह दैत्यराज देवीके करतलके प्रहारकरिके ताडितहुवा महीतलकेविषे पडताभया फिर वह दैत्य वेग- करिके तिसी प्रकार संग्रामभूमिमें खडाहोतामया ॥ १७ ॥ फिर देवी जोहै ६ (८२) सप्तशतीभाषाटीका। ताहि ग्रहण करिके महीतलते उड़कर आकाशकेविषे स्थित होतामया तहांसी निराधार हुई भगवती तिस शुंभके साथ युद्धकौई ॥ १८ ॥ फिर तब आकाशमें आरोहण कालकेविषे शुंभ दैत्य और चंडिका ये पहिले सिद्ध और मुनि इनको विस्मय करनेवाला ऐसा परस्पर बाहुयुद्धं कमये ॥ १९ ॥ फिर अंबिका शुंभके साथ बहुत काल युद्ध कारकै ताके अनंतर शुंजका पैर पंकड उठाके नमातीभई पीछे श्नमा करिकै भगवती शुंग जोहै ता- हि पृथ्वीतलकेविषे फेकतीभई ॥ २० ॥ सक्षिप्तो धरणींप्राप्यमुष्टिमुद्यम्यवेगितः ॥ अभ्यधावतदुष्टा त्माचंडिकानिधनेच्छया ॥ २१ ॥ तमायांतंततोदेवीसर्वदै- त्यजनेश्वरम् ॥ जगत्यांपातयामासभित्त्वाशूलेनवक्षसि ॥२२॥ सगतासुम्पपातोयी देवीशूलाग्रविक्षतः ॥ चालयन्सकलां पृथ्वींसाधिद्वीपांसपर्वताम् ॥ २३॥ ततःप्रसन्नमखिलंहतेत- स्मिन्दुरात्मनि ॥ जगत्स्वास्थ्यमतीवापनिर्मलंचाभवनमः ॥ ॥२४॥उत्पातमेपास्सोल्कायेप्रागासंस्तेशमययुः ॥ सरितोमा र्गवाहिन्यस्तथाशुंभेनिपातिते ॥ २५ ॥ टीका-फिर आकाशते देवी करिकै फेकाहुवा दुष्टात्मा शुंभदैत्य पृथ्वी जोहै ताहि प्राप्त होकरिकै मुष्टि उठा करिकै चंडिकाको मारनेकी इच्छा करिकै दौडताभया ॥२१ ॥ फिर ताके अनंतर आताहुवा जो संपूर्ण दैत्यों- का ईश्वर शुभहै ताहि भगवती त्रिशूलके प्रहार करिकै वक्षस्थलमें वेधन करि पृथ्वीमें गिरातीभई ॥ २२ ॥ वह दैत्य देवीका त्रिशूलके अग्रभाग क- रिकै हन और गये प्राण जाके ऐसाहुवा पर्वतों कारकै और समुद्र द्वीपों का रिकै सात जो पृथ्वीहै ताहि चलायनान कर्ताहुवा पृथ्वीके विषे पडताभया ॥ २३ ॥ फिर देवीने तिस दुरात्मा शुंभको मारे संते ता कारणते संपूर्ण जगदप्रसन्न होतोभयो और फिर जगत् अत्यंत स्वस्थपनाको प्राप्त होतोभयो और आकाश निर्मल होतोयो ॥ २४ ॥ और ज्वाला कारकै सहित मे

अध्याय ११
(८३)
शुभ मरे पहिले उत्पातके मेवथे वे शांतिको प्राप्त होतेभये देवीने शुंभको पृ-
ध्वी में गिरायेसते उत्पथते तिसीप्रकार मार्गवाहिनी नदिया होताई ॥ २५ ॥
ततोदेवगणास्सहर्षनिर्भरमानसाः ॥बभूवुनिहतेतस्मिन्गंध-
ललितंजगुमा२६॥अवादयंस्तथैवान्येननृतुश्चाप्सरोगणाः।।
ववुःपुण्यास्तथावातास्सुप्रभाभूदिवाकरः॥२७॥जज्वलुश्चाग्न-
यःशांता शांतदिग्जानितस्वनाः॥२८॥ इतिश्रीमा०पु०साव-
णिकमन्वंतरेदेवीमाहात्म्ये शुभवधोनामदशमोऽध्यायः॥१०॥
टोका-और वा दैत्यको देवीने मारेसते तिसकारणते हर्ष करिकै पूर्णहै
मन जिनके ऐसे देवगण होतेभये और गंधर्व मनोहर गातेभये ॥ २६ ॥ और
तासमय कितनेही अन्य गंधर्व वादिन बनातेभये और अप्सरावोंके गण नृत्य
कर्नेभये और तासमय शीतल मंद सुगंध पवन चलतेभये और तिसीप्रकार
सूर्य सुप्रभ होतामया ॥ २७ ॥ और आहवनीय अग्नि यज्ञनके निर्मल
जलती और दिशावॉकेविषे उत्पन्न ऐसे उत्सातको सूचन करनेवाले जे शब्द
ते शांत होनेभये ॥ २८ ॥ इति मार्कण्डेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरदेवीमाहा-
म्येभापाटीकायांशुंगवधोनामदशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
ऋषिरुवाच ॥ देव्याहतेतत्रमहासुरेंद्रेसेंद्राःसुरावन्हिपुरोगमा-
स्ताम्।। कात्यायनींतुष्टुवुरिष्टलाभादिकासिवकाजविकासि-
ताशाः॥१॥देवाउचुनादेविप्रपन्नार्तिहरेप्रसीदप्रसीदमातर्जगतो
खिलस्याप्रसीदविश्वेश्वरिपाहिविश्वंत्वमीश्वरीदेविचराचरस्य
॥२॥आधारभूताजगतस्त्वमेकामहीस्वरूपेणयतःस्थितासि।
अपांवरूपस्थितया त्वयैतदाप्यायतेकृत्स्नमलंध्यवीर्ये ॥३॥
त्ववैष्णवोशक्तिरनंतवीर्याविश्वस्यवीनं परमासिमाया ।। संमो
हितदेविसमस्तमेतत्त्ववेप्रसन्नाभुविमुक्तिहेतुः ॥ ४ ॥ विद्याः
समस्तास्तवदेविभेदा स्त्रियः समस्ताः सकलंजगच्च ॥ त्वयै
कयापूरितमंचतत्कातेस्तुतिःस्तव्यपरापरोक्तिः॥५॥

(८४). सप्तशवीभाषाटीका। टीका-फिर ऋषि बोले कि हे सुरथराजन् चंडिकाने संग्रामकेविषे शुं- आसुर मारेसंते अपने इष्टके लाजते प्रसन्नहै मुख जिनोंका ऐसे इंद्र करिके स- हित अमिते आदि लेकर जे देव ते तिस कात्यायनी जगवतीकी स्तुति कत्त- भये॥१॥तब देव भगवतीकी स्तुतिके उपयोगी वाक्य बोलतेभये हे शरणागतका दुःख हरनेवाली भगवती तुम प्रसन्नहो. हे संपूर्ण जगत्की माता तुम प्रसन्नहो हे विश्वश्वरि तुम प्रसन्नहो हे देवि तुम लक्ष्मीरूप करिकै जगत्की रक्षा करो और हे देवी तुम चराचर जगत्की व्यापकहो ॥ २ ॥ और हे देवी जा कार- गते तुम पृथ्वीरूप करिकै स्थितहो ताते जगत्का आधार रूप एक तुमहोहो अन्य नहीं और नहीं उलांच सकाजाय पराक्रम जाका ऐसी जलोंका स्वरूप करिके स्थित जो है भगवती तुमहो सो तुम करिकै संपूर्ण जगत् बढायाजा- ताहै ॥ ३ ॥ हे देवि तुम कैसीहो अनंतहै पराक्रम जाको ऐसीहै और वि- श्वका कारण माया तुमहीहो और जा करिकै अशेष जगत्की विष्णु पालना काहै ऐसी विष्णुकी सामर्थ्यलक्षण वैष्णवी शक्ति तुमही हो हे देवि तुलारी मायाने यह सम्पूर्ण जगत् मोहितकिया अर्थात् ममताके वशीभूत किया और तुम प्रसन्नहुई पृथ्वीकेविषे मुक्तिका कारण हो ॥ ४ ॥ और हे दोवि श्रुति स्मृति पुराण इनते आदि लेकर जे विद्या, वे तुलाराही अंशहैं और ब्रह्माणीते आदि लेकर जें संपूर्ण शक्तिहैं वे तुलाराही अंशहैं और संपूर्ण यह जगत् तुलारे करिकै पूर्ण है हे भगवति स्तुति और स्तुत्य इनके भेदमें स्तुति होती है हे भगवति एकत्वके विषे तुलारी क्या स्तुति करीजाय ॥ ५ ॥ सर्वभूतायदादेवीभुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ॥ त्वंस्तुतास्तुतयेका वाभवंतिपरमोक्तयः ॥ ६॥ सर्वस्यबुद्धिरूपेणजनस्यहदिसं स्थिते । स्वर्गापवर्गदेदेविनारायणिनमोस्तुते ॥७॥ कलाका ष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनी।। विश्वस्योपरतौशक्ते नाराय- णिनमोस्तुते।।८॥सर्वमंगलमांगल्येशिवेसर्वार्थसाधिकेशरण्ये त्र्यंबकेगौरिनारायणिनमोस्तुते ॥९॥ सृष्टिस्थितिविनाशानां- .

अध्याय ११ (८५) शक्तिभूतेसनातनि।।गुणाश्रयेगुणमयेनारायणिनमोस्तुते ॥१०॥ टीका-फिर हे भगवति भुक्तिमुक्तिकी देनेवाली तुम विश्वरूपहो इस प्रकारसे जब तुम स्तुति कीगई तब तुमारी स्तुतिके अर्थ कौनसी श्रेष्ठ उ- क्तियां हैं कि जिन करिकै तुम स्तुति कीजातीहो अर्थात् नहीं ॥६॥हे देवि संपूर्ण प्राणियोंके हृदयकेविपे स्थितहै स्वर्ग मोक्षकी देनेवाली हे नारायणि तेरे अर्थ नमस्कार है ॥ ७ ॥ क्षण मुहूर्त अहोरात्र पक्ष मास ऋतु अयन संवत्सर इन आदि कालरूप करिकै मनुष्यादिकनको बाल्य तरुण वृद्ध अ- वस्था. देनेवाली तिसी प्रकार संसारके अन्तमें रुद्ररूप ऐसी हे नारायणि तेरे अर्थ नमस्कार है.॥ ८॥ और हे सर्व मंगलोंका मंगलरूप हे कल्याण करने- वाली हे शरणागतवत्सल हे त्रिनेत्रे हे गौरि हे नारायणि तेरे अर्थ नमस्कार है ॥ ९ ॥ और जगत्का रचना पालन और संहार इनको करनेवाली हे शक्तिरूप और हे सनातनि हे. गुणनका आश्रय हे गुणमयि हे नारायणि तेरे अर्थ नमस्कार है ॥ १० ॥ शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ॥ सर्वस्यातिहरेदेविनारा- यणिनमोस्तुते।।११।।हंसयुक्तविमानस्थेब्रह्माणीरूपधारिणि।। कौशांभाक्षरिकेदेविनारायणिनमोस्तुते॥. १२॥ त्रिशूलचंद्रा- हिंधरैमहावृपभवाहिनि ॥ माहेश्वरीस्वरूपेणनारायणिनमो- स्तुते ॥ १३॥ मयूरकुक्कुटवृतमहाशक्तिधरेनघे ॥ कौमारी रूपसंस्थाननारायणिनमोस्तुते ॥ १४॥ शंखचक्रगदाशाङ्ग- गृहीतपरमायुधे॥ प्रसीदवैष्णवीरूपेनारायणिनमोस्तुते॥१६॥ टीका-हे शरणागत ऐसे गरीब और दुःखीओंको दुःखोते रक्षा करने में तत्पर हे सर्वलोकका दुःख हरनेवाली हे नारायणि तेरे अर्थ नमस्का- रहै ॥ ११॥ हे. हंसयुक्त विमानमें स्थित ब्रह्माणीका रूप धारण करने वाली और. हे कुशोदकका शत्रुवोंपर सेचन करनेवाली हे नारायणि तेरे अर्थ नमस्कार है .. .. १२॥ और माहेश्वरी स्वरूप करिकै हे त्रिशूल. - (८६.) सप्तशतीभाषाटीका। चंद्रको धारण करनेवाली हे महावृषभवाहिनि हे नारायणि तेरे अर्थ नम- स्कारहै. ॥ १३ ॥ मयूर और कुक्कुट इन करिकै युक्त और महाशक्ति को धारण करनेवाली और पापों करिकै रहित और कुमारशक्तिकासाहै शरीरका अवयव जाके ऐसी जो नारायणि तुमहो सो तुलारे अर्थ नमस्का- रहै ॥ १४ ॥ और शंख चक्र गदा शाङ्ग धनुष येग्रहण किये हैं परम आ- युध जाने ऐसी वैष्णवीरूप हे नारायणि तुम प्रसन्नहो तुमारे अर्थ न- मस्कारहै ॥ १५॥ गृहीतोग्रमहाचक्रेदंष्ट्रोद्धतवसुंधरे।वराहरूपिणिशिवनारायणि नमोस्तुते ॥ १६॥ नृसिंहरूपेणोणहंतुदैत्यान्कृतोद्यमे ॥ त्रैलोक्यत्राणसहितेनारायणिनमोस्तुते ॥ १७ ॥ किरीटिनि महावज्रेसहस्रनयनोज्ज्वले ॥ वृत्रप्राणहरे चैंद्रिनारायणिनमो- स्तुते॥ १८॥ शिवदूतीस्वरूपेणहतदैत्येमहाबले ॥ घोररूपे महारावेनारायणिनमोस्तुते॥ १९ ॥ दंष्ट्राकरालवदनेशिरो मालाविभूषणे ॥ चामुंडेमुंडमथनेनारायणिनमोस्तुते॥२०॥ टीका-और ग्रहण कियोहै उग्रंचक जाने और दंष्ट्रावों करिकै उठाई है पृथ्वी जाने और वराहके रूपको धारण करनेवाली और कल्याणरूपिणी ऐसी जो हे नारायणि तुमहो तुमारे अर्थ नमस्कारहै ॥ १६ ॥ और उम्र जो नृसिंह रूपहै ता करिकै दैत्य जेहे तिन्हें मारनेको कियोहै उद्यम जाने और त्रैलोक्यकी रक्षा करिकै सहित ऐसी जो हे नारायणि तुमहो तुलारे अर्थ. नमस्कारहै ॥ १७ ॥ और मुकुटको धारण करनेवाली और बडाहै वज जिसका और हजार नेत्र जेहैं तिन केरिकै प्रकाशमान और वृत्रासुरका प्राण हरनेवाली ऐसी ऐंद्रीशक्तिरूप जो हे नारायणि तुमहो सो तुलारे अर्थ नमस्कार है ॥ १८॥ और शिवदूती स्वरूप कारकै माराहै दैत्योंका महासैन्य जाने. और घोरहै रूप जाको और बडाहै शब्द जाका ऐसी जो हेनारायणि तुमहो तुझारे अर्थ नमस्कारहै ॥ १९॥ और दंष्ट्रावोंकारकै भयंकरहै मुख जाको

'. अध्याय ११
(८७)
और नरमुंडोंकी मालाकाहै आभूषण जिसके ऐसी चंडमुंडको मारनेवाली
चामुंडारूप जो हेनारायणि तुमहो सो तुलारे अर्थ नमस्कारहै ॥ २० ॥
लक्ष्मिलज्जेमहाविद्यश्रद्धेपुष्टेस्वधेध्रुवे ॥ महारा।महामाये
नारायणिनमोस्तुते ॥ २१ ॥ मेघेसरस्वतिवरेभूतिवाप्रवि
तामसि ॥ नियतत्वंप्रसीदेशेनारायणिनमोस्तुते ॥ २२ ॥
सर्वतःपाणिपादांतेसर्वतोक्षिशिरोमुखे ॥ सर्वतःश्रवणघ्राणे
नारायणि नमोस्तुते ॥ २३ ॥ सर्वस्वरूपेसर्वेसर्वशक्तिस
मन्विते ॥ भयेभ्यस्त्राहिनोदेविदुर्गेदेविनमोस्तुते ॥ २४ ॥
एतत्तेवदनसौम्यलोचनत्रयभूषितम् ॥ पातुनः सर्वभीतिभ्यः
कात्यायनि नमोस्तुते ॥ २५ ॥
टीका और लक्ष्मी लज्जा महाविद्या श्रद्धा पुष्टि स्वधा ध्रुवा महारात्रि
महामाया इनरूप जो हे नारायणि तुमहो सो तुलारे अर्थ नमस्कार है ॥२३॥
और मेधारूप सरस्वतीरूप और श्रेष्ठ ऐश्वर्यरूप कृष्णकी भगिनीरूप और
तामसी शतिरूप और अदृष्टरूप और समर्थ ऐसीजो हे नारायणि तुमहो से
प्रसन्नहो तुझारे. अर्थ नमस्कारहै ॥ २२ ॥ और चारो तरफहैं हाथ पैर
अवयव जाके और चौतरफ, नेत्र और शिर और मुख जाके और चौतरफहै
कान और नाक जाके ऐसी जो हे नारायणि तुमहो सो तुलारे अर्थ नमस्का-
॥ २३ ॥ और संपूर्ण जगत है स्वरूप जाको और सबकी स्वामिनी और
संपूर्ण शक्तियों कारकै समन्वित ऐसी जो हेदेवि तुमहो सो भयोते हमारी
रक्षा करो हे दुर्गेदेषि तुलारे अर्थ नमस्कारहो. ॥२४॥ और तीन नेत्रों करिकै
अलंकत जो तुझारा यह सुंदर मुखहै सो संपूर्णमयोंते हमारी रक्षाकरो
हेकात्यायनि तुझारे अर्थ नमस्कारहो ॥ २५ ॥
ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम् ॥ त्रिशूलंपातुनोभीते
भद्रकालिनमोस्तुते ॥ २६ ॥ हिनस्तिदैत्यतेजांसिस्वनेना-
पूर्ययाजगत् ॥ साटापातुनोदेविपापेभ्योनःसुतानिव ॥२७॥

(८८) सप्तशतीभाषाटीका। असुरासंग्वसापकचर्चितस्तेकरोज्ज्वलः ॥ शुभायखगोभवतु चंडिकेत्वनितावयम् ॥२८॥रोगानशेषानपहंसितुष्टाददासि कामान्सकलानभीष्टान् ॥ त्वामाश्रितानांनविपन्नराणांत्वामा- श्रिताह्याश्रयतांप्रयांति॥२९ ॥ एतत्कृतंयत्कदनं त्वयाद्यधर्म द्विषादेविमहासुराणाम् ॥ रूपैरनेकैर्वहुधात्ममूर्तिकृत्वाऽम्बि- केतत्प्रकरोतिकान्या॥३०॥ टीका-और ज्वालावों करिकै उच्च और बड़ा भयंकर और संपूर्ण अ- सुरोंका हिंसक ऐसा जो हे भद्रकालि तुलारा त्रिशूलहै सो हमारी भयते रक्षा करो तुलारे अर्थ नमस्कार हो ॥ २६ ॥ और जो तुलारी घंटा अपना शब्द करिकै जगत् जो है ताहि पूर्ण कर दैत्यनके तेज जे हैं तिन्हें नष्ट कर्तीभई सो तुलारी घंटा पापोते पुत्रोंकीसी तरह हमारी रक्षा करो ॥ २७ ॥ और असुरोंका रुधिर और मेद रूप जो कीच ता करिकै व्याप्त ऐसे तुल्लारे हाथमें जो उज्वल खड्न सो जगत्का और हमारे कल्याणके अर्थहो हे चंडिके हम तुझे प्रणाम कर्वे हैं ॥ २८ ॥ और हे भगवती तुम आराधन करिकै प्रसन्न हुई तुलारे आश्रित जे मनुष्य हैं तिनका संपूर्ण रोग नष्ट कीहो और ति- नको संपूर्ण मनोवांछित अर्थ देतीहो और हे देवी तुलारे आश्रित जे नर हैं तिनके विपत्ति नहींहै और तुलारे आश्रित जे नरहैं वे तुलारी कपाते राजत्व देवत्व पदवीको प्राप्त होते हैं ॥ २९ ॥ फिर हे देवी इससमय ब्रह्माणीते आदि अनेक रूपों करिकै बहुत प्रकारकी. अपनी मूर्ति जो है ताहि करिकै धर्मके द्वेषी ऐसे असुर जे हैं तिनका जो नाश यह तुमने किया सो यह असु- रोका नाश तुझारेते अन्य स्त्री कौन करनेको समर्थहै अर्थात् कोई नहीं॥३०॥ विद्यामुशास्त्रेषुविवेकदीपेष्वायेषुवाक्येषुचकात्वदन्या ॥ मम त्वगतेंतिमहांधकारविभ्रामयस्येतदतीवविश्वम्॥३१॥ रक्षा- सियत्रोग्रविषाश्चनांगायचारयोदस्युवलानियत्र ॥ दावानलो यत्रतथाब्धिमध्येतत्रस्थितात्वंपरिपासिविश्वम् ॥३२॥ वि-

अध्याय ११
(८९)
श्वेश्वरीत्वंपरिपासिविश्वविश्वात्मिकाधारयसीतिविश्वम् ॥
विश्वेशवंद्याभवतीभवंतिविश्वाश्रयायेत्वयिभक्तिनम्राः३३दे-
विप्रसीदपरिपालयनोऽरिभीतेनित्यंयथासुरवधादधुनैवसद्यः।।
पापानिसर्वजगतांप्रशमनयाशुउत्पातपाकजनितांश्चमहोपस-
गान् ॥ ३४ ॥ प्रणतानांप्रसीदत्वंदेविविश्वातिहारिणि ॥
त्रैलोक्यवासिनामीडयेलोकानावरदाभव ॥ ३८ ॥
टीका-और हे देवि आन्वीक्षिकीते आदिले चतुर्दश विद्याके होतेसेतं
और ज्ञानके प्रकाशक मनुस्मृत्यादिक धर्मशास्त्रोके होतेसंते और आदि वा-
क्योंके होतेसते अर्थात् वैदिक पुराणोंके होतेसंते बढा है अंधकार जाके
विषे ऐसा ममतारूपी जो गर्जहै ताके विषे यह विश्व जो हैं ताहि तुम नमाती
हो सो तुमते अन्य देवी कौनहै अर्थात् कोई नहीं ॥ ३१ ॥ और हे देवि
जहां दैत्यहै और जहां उग्रविष जिनोमें ऐसे सपहें और जहां शत्रुहैं और
जहां चोरोंके समूह हैं और तिसीप्रकार जहां समुद्रके विषे दावानल अमिहैं
तहां पड़ेहुये जे मनुष्य, तिनकी तुम सर्वत्र स्मरण करीहुई तहां तहां स्थित
हुई रक्षा काहो ॥३२॥ और हे देवि तुम विश्वेश्वरीहो याते विश्वकी रक्षा
कहो और तुम विश्वात्मिकाहो याते विश्वको धारण कत्तीहो और ब्रह्मा-
दिक जे हैं तिन करिकैनी तुम स्तुति करने योग्य हो और हे भगवती जे तु-
सारे विपे भक्ति करिकै नम्र हैं वे जगत्के धारण करनेवाले हैं ॥ ३३॥ और
हे देवि तुम हमारे ऊपर प्रसन्न होवो जैसे शुंभासुरके वधते हमारी पालना करी
तिसीप्रकार अगाडी होनेवाले शत्रुमयते नित्य हमारी रक्षा करो और संपूर्ण
जगत्के पाप जे हैं तिन्हें शीघ्र नाशको प्राप्त करों और उत्पादनका फल दान
काल करिकै उत्पन्न भये जे उपद्रव तिन्हें शीघ्र नाशको प्राप्त करो॥ ३४ ॥
हे विश्वका दुःख हरनेवाली शक्ति करिकै नम्र जे हैं तिनके ऊपर प्रसन्नहो
हे त्रैलोक्यवासियों करिके स्तुति करने योग्य देवि. तुम लोकोंको मनोवांछित
वरदान देनेवाली होवों ॥ ३९ ॥

।
(९०) सप्तशतीभाषाटीका।
देव्युवाच ॥ वरदाहंसुरगणावरंयमनसेच्छथ ॥ तंवृणुध्वंप्रय-
च्छामिजगतामुपकारकम् ॥३६॥ देवाउचुः॥ सर्वचाधाम-
शमनत्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ॥ एवमेतत्त्वयाकार्यमस्मद्वरि-
विनाशनम् ॥ ३७॥ देव्युवाच ॥ वैवस्वतेंतरे प्राप्तेअष्टावि-
शतिमेयुगे ॥शुभोनिशुंभश्चैवान्यावुत्पत्स्यतेमहासुरौ॥३८॥
नंदगोपगृहेजातायशोदागर्भसंभवा ॥ ततस्तौनाशयिष्यामि
विंध्याचलनिवासिनी ॥ ३९ ॥ पुनरप्यतिरौद्रेणरूपेणपृ-
थिवीतले ॥ अवतीर्यहनिष्यामिप्रचित्तांश्चदानवान् ॥ ४०॥
टीका-तब देवी बोलतीभई कि हे देवगणो मैं तुलारेको वरदान देनेवाली
सो जो तुम जगतको उपकार करनेवाला वर मन करिकै इच्छा कर्ने हो
सो मांगो मैं दूंगी ॥ ३६ ॥ तब देव बोलतेभये हे संपूर्ण त्रैलोक्यकी स्वा-
मिनी तुझें त्रैलोक्यके संपूर्ण दुःखका विनाश करना योग्य है और ऐसेही
जगत्का उपकारक जो हमारे वैरियोंका विनाशहै सो करना योग्यहै ॥ ३७॥
तब देवी बोलतीभई हे देवो तुम श्रवण करो मैंने जगत्के उपकारके अर्थ ये
पराक्रम किये अब फिर वैवस्वत मन्वन्तरके मध्यमें आनेवाली अठाईसवी
युगचौकडी प्राप्त होतेसंते अर्थात् द्वापर कलियुगकी संधिक विषे अन्य शुंज
और निशुंभ ये दो महाअसुर उत्पन्न होंगे ॥ ३८ ॥ ताके अनंतर नंद गो-
पिका गृहके विषे उत्पन्न भई यशोदाके गर्भते है जन्म जाको ऐसी मैं विंध्या
चलके विषे निवास कर्तीहुई तिन दोनों शुंभ और निशुंभ दैत्योंको नष्ट क-
रूंगी ॥ ३९ ॥ फिर उसी अहाईसवी चौकडीमें द्वापरके अनन्तर कलियुगके
विषे बड़ा भयंकर रूप करिके फिरभी पृथ्वीतलमें अवतार लेकर वैप्रचित्ति
नाम जे दानवहैं तिन्हें मारूंगी ॥ ४० ॥
भक्षयंत्याश्चतानुग्रान्वैप्रचित्तान्महासुरान् ॥ रक्तादंताभवि-
प्यंतिदाडिमीकुसुमोपमा॥४॥ ततोमदेिवता स्वर्गेमर्त्यलो-
केंचमानवाः॥स्तुवंतोव्याहरिष्यंतिसततरक्तदंतिकाम् ॥४२॥

अध्याय ११ (९१) भूयश्वशतवार्षिक्यामनावृष्टयामनभसि ॥ मुनिभिः संस्तुता भूमोसंभविष्याम्ययोनिजा ॥४३॥ ततःशतेननत्राणांनिरो क्षिष्यामियन्सुनीन् ॥ कीर्तयिष्यंतिमनुजा शताक्षीमितिमा ततः॥४४॥ ततोहमखिलंलोकमात्मदेहसमुद्भवः॥ भरिष्या मिसुराःशाकैरावृष्टेःप्राणधारकैः ॥ ४५ ॥ टीका-और वैपचित्तिनाम उग्र महाअसुर जे हैं तिन्है भक्षण कीहुई का मेरा दांडयूके पुष्पके समान रक्तदांत होयगे ॥४१॥ ताकारणते स्वर्ग- लोकके विषे देवता और भूलोकके विषे मनुष्य ये मेरी निरंतर स्तुति कर्ते- हुवे मेरेको रक्तदंतिका नाम करिके कहेंगे ॥ ४२ ॥ फिर शतवर्षपर्यन्त वर्षा नहींहोने करिके नदी तडागादिकमेंनी जल नहींहोतेसते मुनियों करिकै स्तुति करीहुई अयोनिज प्रकट हूँगी ॥४३॥ ताके अनंतर शत नेत्रन कारकै मुनि जेहैं तिन्हे मैं देगी ताकारणते मनुष्य मेरेको शताक्षी कहेंगे ॥ ४४ ॥ ताके अनंतर संपूर्ण लोक जो है ताहि अपने शरीरते उत्पद्यमान और वृष्टि होनेतक प्राणोंके धारक ऐसे जे शाकहें तिनकारकै मैं पोषण करूंगी॥४५॥ शाकंभरीतिविख्याति तदायास्याम्यहंभुवि ॥ तत्रैवचवधि- ष्यामिदुर्गमाख्यमहासुरम् ॥ ४६॥ पुनश्चाईयदाभीमरूपं कृत्वाहिमाचले॥रक्षांसिभक्षयिष्यामिमुनीनांत्राणकारणात्।। ॥४७॥तदामांसुनयःसर्वेस्तोष्यंत्यानम्रमूर्तयः॥ भीमादेवीति विख्यातंतन्मेनामभविष्यति ॥ १८॥ यदारुणाख्यत्रैलोक्ये महावाधांकरिष्यति ॥ तदाहंभ्रामररूपंकृत्वासंख्येयषट्पदम् ॥४९॥ त्रैलोक्यस्यहितार्थायवाधिष्यामिमहासुरम् ॥ भ्रा- मरीतिचमालोकास्तदास्तोष्यतिसर्वतः ॥५०॥ टीका-तब पृथ्वीके विषे मैं शाकंभरी यह जो संज्ञाहै.ताहि प्राप्तहूँगी फिर तहाँही दुर्गनामा जो महाअसुरहै ताहि मारूंगी ॥ ४६ ॥ और हेदेवो फिरभी जब मैं हिमाचलके विषे घोररूप कारकै मुनि जोहैं तिनकी रक्षाके (९२) सप्तशतीनापाटीका। कारणते राक्षस जेहैं तिन्हैं भक्षण करूंगी ॥ ४७ ॥ तवं आसमन्तात् नम्र है मूर्ति जिनोंकी ऐसे वसिष्ठादिक मुनि मेरी स्तुति करेंगे और ताकारणते भीमादेवी यह विख्यात मेरा नाम होगा ॥४८॥ और हे देवो त्रिलोकीके विषे जब अरुणेनामा महासुर बडी पीडा करेगो तब मैं असंख्येय हैं मर जाके. विषे ऐमो नामररूप जोहै ताहि कारकै त्रिलोकीके हितके अर्थ अ- रुणासुर जोहै ताहि मारूंगी तब लोक सर्वत्र भामरीनाम करिकै मेरी स्तुति करेंगे ॥ ४९ ॥ ५० ॥ इत्थंयदायदावाधादानवोत्थाभविष्यति ॥ तदातदावतीर्याह करिष्याम्यरिसंक्षयम् ॥५१॥ इतिश्रीमार्कडेयपुराणेसावर्णिके मन्वंतरेदेवीमाहात्म्ये नारायणीस्तुतिन मैकादशोऽध्यायः॥१३॥ टीका-और हे देवो जब जब लोकोंको दानवोंते पीडा उत्पन्न होगी तब तब अवतार लेकर शत्रुवोंका नाश करूंगी ॥ ५१ ॥ इति श्रीमार्कण्डे यपुराणे सावर्णिके मन्वंतरेदेवीमाहात्म्ये टीकायां नारायणीस्तुति मकादशो ऽध्यायः॥ ११॥ देव्युवाच ॥ एभिःस्तवैश्चमांनित्यस्तोष्यतेयःसमाहितः ॥ तस्याहंसकलांबाधांनाशयिष्याम्यसंशयम् ॥ १॥ मधुकै- टभनाशंचमहिषासुरवातनम् ॥ कीर्तयिष्यंतियेतद्वधंशुंभ निशुंभयोः॥२ ॥ अष्टम्यांचचतुर्दश्यांनवम्यांचैकचेतसः।। स्तोष्यंतिचैवयेभक्त्यामममाहात्म्यमुत्तमम् ॥३॥ नतेषांदु- कृतंकिंचिदुष्कृतोत्थानचापदः॥ भविष्यतिनदारिद्रयंनचै- वेष्टवियोजनम् ॥ ४॥ शत्रुतोनभयंतस्यदस्युतोवानराजतः॥ नशस्त्रानलतोयौषात्कदाचित्संभविष्यति ॥६॥ टीका-फिरनी देवी बोलतीनई कि हे देवो इन स्तोत्रों करिकै एकाय- चित्त हुवा जो कोई नित्यं मेरी स्तुति करेगा तिसकी निस्संदेह संपूर्ण बाधा मैं नष्टकरूंगी ॥3॥ और मधुकैटभका है नाश जाके विष और महिषासुर अध्याय-१२ (९३) का-धात जाके विषे और तिसीप्रकार शुंभ निशुंभका है वधप्रतिपादन जाके विषे ऐसे जो मेरो उत्तम माहात्म्य ताहि अष्टमी और चतुर्दशी और नवमी इन तिथियोंके विषे जे कोई पुरुष एकाग्र चित्तहुवे भक्ति करिकै सुनेंगे अथवा पाठ करेंगे तिनका संपूर्ण पाप नष्टहोगा और पापोते उठी जे आपत्ति है वे सब नष्ट होगी और तिनके कभी दरिद्रता नहींहोगी और कभी पुत्र धनादिकोंते वियोग नहींहोगा ॥ २॥ ३ ॥ ४ ॥ और तिनको शत्रुते और चोरते और राजते कमी भय नहीं होगा और शस्त्रते और अमिते और जलके प्रवाहते कमी तिन्होंका धात नहीं होनेका ॥ ५॥. तस्मान्ममैतन्माहात्म्यपठितव्यसमाहितैः।। श्रोतव्यंचसदाभ- त्यापरंस्वस्त्ययनमहत्॥६॥ उपसर्गानशेषांस्तुमहामा- रीसमुद्भवान् ।। तथात्रिविधमुत्पातमाहात्म्यशमयेन्मम ॥७॥ यत्रैतत्पठ्यतेसम्यनित्यमायतनेमम ॥ सदानतद्धिमोक्ष्या- मिसांनिध्यंतत्रमेस्थितम् ॥ ८॥ बलिप्रदानेपूजायामग्निकार्य महोत्सवे ॥ सवैममैतचरितमुच्चार्यश्राव्यमेवच ॥९॥ जा- नताजानतावापिवलिंपूजांतथाकृताम् ॥ .प्रतीक्षिष्याम्यहंप्री- त्यावह्निदोमंतथाकृतम् ॥ १०॥ टीका-ताकारणते एकाग्रचित्त पुरुषोंको प्रकृष्ट कल्याणकारक पूज- नीय ऐसा मेरा माहात्स्य जोहै सो भक्ति करिकै सदा श्रवण करने योग्यहै ॥६॥ और मेरा माहात्म्य जोहै ताहि श्रवण कर्नेहुये और पठन कत्तेहुये जे पुरुषहैं तिनके महामारीते उत्पन्न भये जे संपूर्ण उपद्रव तिन्हें मेरा माहात्म्य दूर करेहै और तिसीप्रकार अध्यात्म अधिभूत आधिदैव अर्थात् शरीरोत्पन्न व्याध्यादिक और प्रेतादिज़नित अयानमादिक और देवकत दारिद्रयादिक ये तीन प्रकारको जो उत्पातहै ताहि मेरा माहात्म्य दूर करैहै ॥ ७ ॥ और • जहां मेरे मंदिरके विषे मेरा माहात्म्य पुरुषों करिके शुद्धरीविसे पढाजाताहै उस स्थानको मैं नहीं छोड़ोगी और उस गृहके विषे मेरा सांनिध्य

(९४)
सप्तशतीभाषादीका।
स्थितहै।८॥और महानवमी इत्यादिक तिथियोंके विष छाग मेपादि पशुवों
कारकै जो देवनिमित्तक बलिदान तासमयके विषे और हवनकालके विषे
और पुत्रजन्मविवाहादिक महोत्सवोंके विष संपूर्ण मेरा माहात्म्य
मनुष्योंके पढने योग्यहै और श्रवण करने योग्यहै ॥ ९ ॥ और ता प्रकार
करिके गुरूपदिष्ट कर्त्तव्यता जोहै ताहि जानता और नहीं जानता जो शक्ति-
मान् पुरुषहै ता कारकै किया जो बलिदान और पूजा और तिसीप्रकार अ-
मिक विषे तिलमध्वादिक हवन तिन्हे मैं प्रीतिकारकै स्वीकार करूंगी ॥३०
शरत्कालेमहापूजाक्रियतेयाचवार्षिकी । तस्यांममैतन्माहा-
त्म्यश्रुत्वाभक्तिसमन्वितः॥ ११॥ सर्ववाधाविनिर्मुक्तोधनधा-
न्यसुतान्वितः॥ मनुष्योमत्प्रसादेनभविष्यतिनसंशयः॥१२॥
श्रुत्वाममैतन्माहात्म्यंतथाचोत्पत्तय शुभाः । पराक्रमंचयुद्धे-
पुजायतेनिर्भयापुमान्।। १३॥ रिपव संक्षयंयांतिकल्याणचो-
पपद्यते ॥ नंदतेचकुलंपुंसांमाहात्म्यंममशृण्वताम् ॥ १४ ॥
शांतिकर्मणिसर्वत्रतथादुःस्वप्नदर्शने ॥ ग्रहपीडासुचोग्रासु
माहात्म्यंशृणुयान्मम ॥ १५॥
टोका-जो आश्विनशुक्लप्रतिपदाते लेकर शरत्कालके विषे महापूजा क-
रोजाती और जो चैत्रशुक्ल प्रतिपदाते लेकर वार्षिकी पूजा करीजातीहै ताके
विष मेरा यहजो चरित्रत्रयलक्षणमाहात्म्यहै ताहि भक्तियुक्त हुवा मनुष्य
सुनकर मेरी कपाते संपूर्ण बाधा करिकै विनिर्मुक्त और धन धान्य सुत करिव
युक्तहोगा इसमें संदेह नहीं ॥ ११॥ १२ ॥ और मेरा यह माहात्म्य जोहै
ताहि गुरुते सुनकर और तिसीप्रकार जगत्का अत्युदय करनेवाली ब्रह्माण्या
दि शक्तिरूप जे मेरी उत्पत्तिहैं तिन्हैं और मेरे वीरपराक्रम जे हैं तिने
सुनकर पुरुष युद्धनके विषे निर्भय होताहै ॥ १३ ॥ और मेरा माहाल्य
जोहै ताहि सुनतेहुवे ने पुरुषहैं तिनके शत्रु नाशको प्राप्त होतेहैं और तिनक
मंगल उत्सन्न होताहै और तिनका कुल समृद्धिको प्राप्त होताहै ॥ १४ ॥

अध्याय १२ (९५) और उपद्रवोका संपूर्ण शांतिकर्मके विषे और निसीप्रकार दुष्टस्वम दीखने में और बहुत अनिष्ट ग्रहों करिके जे पीडाहै तिनमें पुरुष मेरा माहात्म्य जो है ताहि सुनें ॥ १५ ॥ उपसर्गाःशमयांतिग्रहपीडाश्चदारुणाः॥दुःस्वप्नंचनृभिदृष्टंसु- स्वप्ननुपजायते ॥ १६॥ बालग्रहाभिभूतानांवालानांशांति- कारकम् ॥ संघातभेदेचनृणांमैत्रीकरणमुत्तमम् ॥ १७॥ दुर्व- त्तानामशेषाणांवलहानिकरंपरम् ॥ रक्षोभूतपिशाचानांपठना देवनाशनम् ॥१८॥ सममैतन्माहात्म्यममसन्निधिकारकम्।। सर्वकृत्वमेतदादिमध्यावसानलक्षणं ॥ १९॥ पशुपुष्पार्घधू- पैश्चगंधदीपस्तथोत्तमैः ॥ विप्राणांभोजनहाँमैः प्रेक्षणीयरह- निशम् ॥२०॥ टोका-फिर मेरे माहात्म्यके श्रवणने उपद्रव शांतिको प्राप्त होताहै और शनि आदि ग्रहों करिकै जे कठोर पीडा हैं वे शांत होतीहैं और मनुष्योंने देखा जो खोटा स्वम है सो श्रेष्ठस्वम होताहै ॥ १६ ॥ और श्मशानमें रहने- वाले ऐसे पूतनाते आदि लेकर जे बालग्रह तिन करिकै पीडित जे बालक तिनके मेग माहात्म्यश्रवण शांतिका कारणहै और एक कार्य करनेवाले पुरु- पोंके समूहमें भेद होतेसंते मेरा माहात्म्यका श्रवणही उत्तम मैत्रीका साधन है ॥ १७ ॥ फिर मेरा माहात्म्य कैसाहै कि संपूर्ण दुष्टोंके बलकी हानि कर- नेवाला और पठनमात्रते रक्षो भूत पिशाच इनको दूर करनेवाला ॥ ३८ ॥ और सर्व कत्लं एतद इसप्रकार आदि मध्य अंतमें है चिन्ह जाके विषे ऐसा मेरा यह संपूर्ण माहात्म्य मनुष्यको मेरे समीप प्राप्त करनेवालाहै ॥१९॥ और पशु पुष्प अर्घ्य और धूप इन करिकै और गंध दीप इन कारकै और तिसीप्रकार ब्राह्मणोंको तरह तरहके उत्तम जिमानो करिकै और हवनोंक- रिकै और तिसीप्रकार हरवखत नृत्य गीतादिकनकरिकै ॥ २० ॥ अन्यैश्वविविधैोगप्रदानैर्वत्सरेणया ॥प्रीतिमें क्रियतेसास्मि- (९६) सप्तशतीभाषाटीका। न सकृदुचरितेश्रुते ॥ २१ ॥ श्रुतंहरातिपापानितथारोग्य प्रयच्छति ॥रक्षांकरोतिभूतेभ्योजन्मनांकीर्तनमम ॥२२॥ युद्धेषुचरितंयन्मेदुष्टदैत्यनिबर्हणम् ॥ . तस्मिन्छुतेवैरिकृतं भयंपुंसांनजायते ॥ २३॥ युष्माभिःस्तुतयोयाश्चयाश्चब्रह्म- र्षिभिः कृताः॥ ब्रह्मणाचकृतायास्ता प्रयच्छतुशुभांगतिम् ॥ ॥ २४ ॥ अरण्येप्रांतरेवापदावाग्निपरिवारितः ॥ दस्युभिर्वा वृतःशून्यगृहीतोवापिशत्रुभिः॥२५॥सिंहव्याघ्रानुयातोवावने वावनहस्तिभिः ॥ राज्ञाकुद्धेनचाज्ञप्तोवध्योबंधगतोपिवा ॥ ॥२६॥ आपूर्णितोवावातेनस्थितःपोतेमहार्णवे॥ पतत्सुचापि शस्त्रेषुसंग्रामेभृशदारुणे॥२७॥ सर्वाबाधासुघोरासुवेदनाभ्य दितोपिवा ।। स्मरन्ममैतचरितनरोमुच्येतसंकटात्॥२८॥ टीका-और तिसीप्रकार तरह तरहके अन्य लोगों करिकै और तिमी- प्रकार मेरी प्रीतिके अर्थ दानों करिकै जो संपूर्ण कामनाको देनेवाली प्रीति करी जातीहै सो प्रीति एकवार :उच्चारण किया और श्रवण किया जो मेरा माहात्म्य है ताके विषे भक्तिकरिके भक्तोंने करीजातीहै। ॥ २१ ॥ फिर श्रवण कियाहुवा मेरा माहात्म्य पाप जे हैं तिन्है दूरकर्ताहै और तिसीप्रकार सेवन करनेवालोंको आरोग्य देताहै और मेरे जे ब्रह्माणी आदि रूप करिके प्रादुर्भाव है तिनका जो कीर्तन सो भक्तोंकी भूत पिशा- चादिकनसे रक्षा कर्ताहै ॥ २२ ॥ और मेरा जो दुष्ट दैत्यनको हनन करने- वाला चरित्र होताच्या ताके श्रवण,करेसते अवण करनेवाले पुरुषोंको.युद्ध- नके विषे वैरि करिके भय नहीं होताहै ॥ २३ ॥ और हे देवो जे तुमने मेरी स्तुति करीहै और ताके पहिले सुमेधा मार्कण्डेय इत्यादि ब्रह्मर्षियोंने जे मेरी स्तुति करीहै और मधु और कैटा. इन दैत्योंके भयते ब्रह्माने जे मेरी स्तुति करी है वे स्तुति मनुष्यों करिके पढीहुई मनुष्य जे हैं तिनके अर्थ शुभगति जो है ताहि देगी ॥ २४ ॥ अरण्यके विषे जो वर्तमान और तिसीप्रकार म::

अध्याय १२ नुष्योंकरिकैशून्य मार्गके विषे वर्तमान और तिसीप्रकार दावाग्नि करिकै चौतरफ रुकाहुवा और तिसीप्रकार चौरों करिकै रोकाहुवा और तिसी प्रकार उद्यान में शत्रुवों करिकै ग्रहण कियाहुवा वनमें मारनेको सिंह भगेरो करिकै अनुयातहुवा और तिसीप्रकार हाथियों करिकै मारनेको पीछे दौडा गया हुआ और कोषयुक्त राजाने यह मारने योग्यहै इसप्रकार आज्ञा दिया हुवानी और तिसीप्रकार कैदीखानामें प्राप्तहुवा और तिसीप्रकार समुद्रके विपे नौकामें स्थित पवन करिकै व्याकुल हुवा और बडे भयंकर संग्रामके विपे शवोंके पडतेसतेभी वर्तमानहुवा और तिसीप्रकार सम्पूर्ण वेदना जे हैं तिनके विपे तिस दुःखका अनुमयोंके विषे वर्तमान जो मनुष्य सो मेरा यह माहात्म्य जो है ताहि स्मरण करताहुवा संकटने छूटजाय२५।२६।२७॥२८॥ ममप्रभावात्सिंहाबादस्यवोवैरिणस्तथा ॥ दूरादेवपलायंते स्मरतश्चरितमम॥२९॥ऋषिरुवाच॥ इत्युक्त्तासाभगवतीचंडि काचंडविक्रमा॥ पश्यतामेवदेवानांतत्रैवांतरधीयत ॥३०॥ टीका-और मेरे प्रभावते सिंह व्याघादिक और चौर और तिसीप्रकार . शत्रु ये सब मेरा चरित्र स्मरण कर्ताहुवा जो पुरुष है वासकासते डरपके भाग जाते हैं ॥ २९ ॥ तब ऋषि बोले हे सुस्थराजन् प्रचंड है पराक्रम जाको ऐसी चंडिका देवतावोंके प्रति इस प्रकार कहकर देवतावोंके देखतेहुवेंही तहां अंतर्धान होतीलई ॥ ३० ॥ तेपिदेव्यानिरातकाःस्वाधिकारान्यथापुरा ॥ यज्ञभागभुजः सर्वेचक्रुर्विनिहतारयः ॥३१ ॥ दैत्याश्चदेव्यानिहतेशुभेदे- वरिपौयुधि॥ जगद्विध्वंसंकेतस्मिन्महोतुलविक्रमे।निशुंभे चमहावीर्यशेषाःपातालमाययुः ॥ ३२ ॥ एवंभगवतीदेवीसा.. नित्यापिपुनःपुनः संभूयकुरुतेभूपनगतःपरिपालनम्।।३३।। तयैतन्मोझतेविश्वसैवविश्वप्रसूयते ॥ सायाचिताचविज्ञान तुष्टाऋद्धिप्रयच्छति ॥३४॥ व्याप्तंतयैतत्सकलंब्रह्मांडमनुजे- . (९९) सप्तशतीजापाटीका। श्वर ॥ महाकाल्यामहाकालेमहामारीस्वरूपया ॥ ३५ ॥ टीका-फिर ताके अनंतर देवी करिके मारेगयेहैं शत्रु जिनोंके ऐसे वे देवजी जैसे पहिले निर्भयथे तिसीप्रकार निर्भयहुवे यज्ञोंके भाग भोगतेहुये अ. पने जे अधिकार अर्थात् व्यापार तिन्हे कर्तेभये॥३१॥ फिर हे राजन् देवीने जगत्का विध्वंस करनेवाला देवतावोंके प्रबलशत्रु शुंभको युद्धके विषे मारेस- ते और निशुंभको मारेसंते फिर शेपदैत्य भयभीत हो पातालको भागजाते भये ॥ ३२ ॥ हेराजन भगवती नित्यत्तीहै परंतु इसप्रकार वारंवार अवतार लेकर जगत्का परिपालन कर्तीहै ॥ ३३ ॥ और तिसी करिकै यह जगत् रचाजाताहै और तिसी करिकै मोहानाताहै. सो जगवती भक्तोंकरिकै प्रा. र्थितहुई भक्तोंके प्रति ज्ञान देतीहै और प्रसन्नहुई संपत्ति देतीहै ॥ ३४ ॥ फिर हेराजन् महामारीस्वरूप जो महाकालीहै ता करिकै प्रलयकालके विषे-यह संपूर्ण ब्रह्मांड व्याप्त होताहै ॥ ३५ ॥ सैवकालेमहामारीसैवसृष्टिर्भवत्यजा। स्थितिंकरोतिभूतानांस वकालेसनातनी॥३६॥ भवकालेनृणांसैवलक्ष्मीर्वृद्धिप्रदागृहे। सैवाभावतथालक्ष्मीविनाशायोपजायते ॥ ३७॥ स्तुतासंपू- जितापुष्पैधूपगंधादिभिस्तथा ॥ ददातिवित्तंपुत्रांश्चमतिधर्मे गतिशुभाम्॥३८॥इति मार्कडेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरेदेव्या श्चरितमाहात्म्यं भगवतीवाक्यनामद्वादशोध्यायः ॥ १२॥ टीका-और वह नित्य भगवती प्रलयकालके विषे महामारी कहीजा- तीहै और सृष्टिकालमें सर्गशक्ति कही जातीहै और वही जगत्का पालन कर्तीहै याते पालनशक्ति कहीजातीहै ॥ ३६ ॥ और वही मनुष्यों के घरो- मे संपत्तिकालके विषे लक्ष्मीके वृद्धिको देनेवालीहै फिर वही आपत्कालके विषे लक्ष्मीका नाशके अर्थ अलक्ष्मी होजातीहै ॥ ३७॥ और हेराजन् वह भगवती मनुष्यों करिकै स्तुति करीहुई और तिसीप्रकार पुष्प गंध धूप इत्या- दकों करिकै पूजितहुई तिन भक्त मनुष्योंके अर्थ धन और पुत्र और धर्म अध्याय १३ (९९) के विपे श्रेष्ठ बुद्धि और शुभगति ये सर्ववस्तु देतीहै ॥ ३८ ॥ इति श्रीमा- कंडेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरे देवीमाहाल्ये भाषा कायांद्वादशोध्यायः॥१२॥ ऋपिरुवाच ॥ एतत्तेकथितंभूपदेवीमाहात्म्यमुत्तमम् ॥ एवंप्रभावासादेवीययेदंधार्यतेजगत् ॥ विद्यातथैवक्रियते भगवद्विष्णुमायया ॥१॥ तथात्वमेषवैश्यश्चतथैवान्येविवे- किनामोह्यतेमोहिताश्चैवमोहमेष्यतिचापरे॥२॥ तामुपैहि महाराजशरणंपरमेश्वरीम्।।आराधितासैवनृणांभोगस्वर्गापवर्ग दा ॥ ६ ॥ मार्कंडेयउवाच ॥ इतितस्यवचःश्रुत्वामुरथः सनराधिपः ॥ प्रणिपत्यमहाभागंतमूर्पिसंशितव्रतम् ॥ ४॥ निर्विण्णोतिममत्वेनराज्यापहरणेनच ॥ जगामसद्यस्तपसे सचवैश्योमहामुने ॥५॥ टीका-फिर ऋषि बोलतेभये हेसुरथराजन् तुलारे अर्थ सर्ववस्तुका साधन देवीका श्रेष्ठ माहात्म्य कहा सो देवी ऐसी है के जा करिकै यथायो- ग्य कालके विषे यह जगत् रचाजाताहै और पालन कियाजाताहै और संहार कियाजाताहै ॥ ३ ॥ और तिस प्रकार भगवद्विष्णुकी माया चंडिका करिकेही ज्ञान उत्पादन कियाजाताहै और ताकरिकै तुम और यह वैश्य और किसी प्रकार अन्य जे विवेकी, ते सब मोहेजातेहैं और मोहितहैं और मोहकों प्राप्त होंगे ॥ २॥ हेराजन् ऐसी भगवतीकी तुम शरण प्राप्तहो वही भगवती मनुष्यों करिकै आराधन करीहुई मनुष्योंको भोग और स्वर्ग और मोक्ष देनेवालीहै ॥३॥ तब मार्कण्डेयऋषि बोलतेभये कि हे जैमिने इस प्र- कार सुमेधाऋषिका वचन सुनकर सुरथ राजा संपादन कियोहै व्रत जाने ऐसा महाभाग सुमेधाऋपि जोहै नाहि प्रणाम करिकै पुत्र मित्र कलत्रादिनमें अति मोह करिके और शत्रुवों करिके राज्यके हरनेसे दुःखितहुवा तपके अर्थ वनको जातामया और तिसीप्रकार वह वैश्यमी जातामया ॥४॥५॥ संदर्शनार्थमंवायानदीपुलिनमास्थितः ॥ सचवैश्यस्तपस्ते (१००) सप्तशतीमापाटीका। पेदेवीसूक्तं परंजपत् ॥ ६॥ तौतस्मिन्पुलिनेदेव्याःकृत्वामू- तिमहीमयीस् । अर्हणांचऋतुस्तस्याःपुष्पधूपाग्नितर्पणैः॥७॥ निराहारौयताहारीतन्मनस्कौप्तमाहितौ ॥ ददतुस्तौवलिंचैव निजगात्रास्युक्षितम् ॥८॥ एवंसमाराधयतोनिभिर्वषैर्यतात्म नोः॥परितुष्टाजगद्धात्रीप्रत्यक्षपाहचंडिका ॥ ९ ॥ देव्यु- वाच ॥यत्मार्थ्यतेत्वयाभूपत्वयाचकुलनंदनमित्तस्तत्प्राप्यता सर्वपरितुष्टाददामितत् ॥१०॥ टीका-फिर वहां जाके देवीको प्रत्यक्ष करनेके वास्ते नदी के तटपर सु- रथराजा और वैश्य देवीसूक्त जपता हुवा, तप कर्तेभये ॥ ६ ॥ फिर वे तिस तटके विषे भगवतीको मृन्मयी मूर्ति बनाके पुष्प धूप होम तर्पण इन करिकै तिसकी पूजा कर्वेशये ॥ ७ ॥ फिर हविष्य भोजन करनेवाले और निवृत्त किया है विपयोंते मन जिनोंने और ताके विषेही ध्यान करनेको है मन जि- नोंका और सावधान ऐसे जे सुरथराजा और वैश्य वे भगवतीके अर्थ अपने शरीरके मांसकी बलि देतेभये ॥८॥ इसपकार भगवतीके विषे मन लगाये तीन वर्षांकरिके भगवतीका सम्यक् प्रकार आराधनं कर्ते जे सुरथराजा. और समाधिनामा वैश्य तिनके तप करिकै प्रसन्न हुई जगतोंका धारण कर- नेवाली चंडिका प्रत्यक्ष होकर बोलतीभई ॥ ९ ॥ देवी बोलतीभई कि हे. सुरथराजन् और हे समाधि वैश्य जो तुम याचना कर्तहो सो संपूर्ण वस्तु मे- रेते प्राप्तहो मैं प्रसन्नहुई सब वस्तु दूंगी ॥ १० ॥ मार्कंडेयउवाच ॥ ततोषपोराज्यमविभ्रंश्यन्यजन्मनि ॥ अत्रैवचनिजराज्यंहतशत्रुवलंबलात् ॥ ११ ॥ सोपिवैश्यस्त तोज्ञानवनिर्विण्णमानसः ॥ममेत्यहमितिप्राज्ञ संगविच्युति- कारकम् ॥ १२ ॥ देव्युवाच ॥ स्वल्परहोभिर्नृपतेस्वरा- ज्यंप्राप्स्यतेभवान् ॥ हत्वारिपूनस्वलितंतवतत्रभविष्यति॥ ॥ १३॥ मृतश्चभूयःसंप्राप्यजन्मदेवाद्विवस्वतः ॥ साव अध्याय १३ १०१) र्णिकोनाममनुर्भवान विभविष्यति ।। १४ ॥ वैश्यवर्यत्वया- यश्चवरोस्मत्तोभिवांच्छितः ॥ तंप्रयच्छामिसंसिद्धयतवज्ञानं भविष्यति॥ १॥ टीका-तब मार्कण्डेय ऋषि बोले हे जैमिने ताके अनंतर सुरथराना अगले जन्मके विषे भगवतीके सकाशते अचल राज्य मांगतोभयो और फिर इसी अपने नगरके विषे नष्ट हुवाहै शत्रुबल जाके विषे ऐसो अपनो राज्य मांगतो भयो ॥११॥ ताके अनंतर फिर वह बुद्धिमान् वैश्यनी संसारके दुःखों करिकै उद्विग्नचित्तहुवा यह धनादि मेरा है और इनका मैं स्वामी हूँ इसप्रकारके अध्यास करिकै उत्पन्न जो संग हैताको नष्ट करनेवालो ऐसो ज्ञान भगवतीके सकाशते मांगतोभयो ॥ १२॥ फिर देवी बोलती गई कि हे सुरथ राजन थोडेसे दिनो करिके शत्रुको मार तुम अपने राज्यको प्राप्त होंगे फिर तहां तुलारा अचल राज्य होगा ॥ १३॥ और मरता ही फिर सूर्यके सकाशते सवर्णांके विषे जन्म लेकर पृथ्वीके विषे तू सावर्णिनामा मनु होगा ॥१४॥ और हे वैश्यवर्य तुमने जो मेरेसे वरदान मांगा तांहि परमरूपकी प्राप्तिके अर्थ देती हूं तेरेको ज्ञान होगा ॥ १५ ॥ मार्कंडेयउवाच ॥ इतिदत्वातयोर्दैवीयथाभिलषितंवरम् ॥ बभूवांतर्हितासद्योभत्त्याताभ्यामभिष्टुता ॥ १६॥ एवंदेव्या वरंलब्ध्वासुरथाक्षत्रियर्षभः॥ सूर्याजन्मसमासाद्यसावणिर्भवि तामनुः॥ १७ ॥ इतिश्रीमाकैडेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरेदेवी माहात्म्ये सुरथवैश्ययोर्वरप्रदाननामत्रयोदशोध्यायः ॥१३॥ टीका-तब मार्कडेयपि बोलतेभये कि हे जैमिने तिनोकरिके भक्तिते स्तुति किईहुई देवी इसप्रकार सुरथराजाको और समाधिवैश्यको जैसा वां- छितथा वैसा वर देकर उसी बखत अंतर्धान होतीनई ॥ १६ ॥ इसप्र- कार क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ सुरथराजा भगवतीके सकाशते वरको प्राप्तहोकर ताके (१०२) सप्तशतीभाषाटीका। अनंतर सूर्यके सकाशते सवर्णामें जन्मको प्राप्त होकर सावर्णिनामा मनु होगा ॥ १७॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरदेवीमाहात्स्येमापाटीकायां त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३॥ राठदेशांतर्गतलघुजवणायचाख्यग्रामनिवासिनाश्रीमत्पण्डितबदरीप्रसादा- मजेनपण्डितमनीरामशर्मणामुंबापुर्य्याम् खशरखगक्ष्मामितेवत्सरेसप्तशत्या. भाषाटीकानिर्मिता॥ इदं पुस्तकं श्रीकृष्णदासात्मजखेमराजेन मुंबय्यां स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर" मुद्रणालये मुद्रयित्वा प्रकाशितम् । शके १८१५ संवत् १९५० पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना-मुम् ई. ई.

श्रीः॥ वाल्मीकीय रामायण. श्रीवाल्मीकीय रामायण २४००० ग्रंथका सरल सुबोध ब्रज- भाषाटीका बनवाकर छापके तैयारहै जिसके बीचमें मूल और नी- चेऊपरभाषाटीकाहै.और एक वाल्मीकीय रामायणका भाषावार्तिक छपाहै. जिसमें मूलके अनुसार यथावत्भाषा करके मूल श्लोकोंके अंकभी लगादिये गयेहैं.-रामायणकी कथापढनेवालोंको पुराण वांचनमें बहुत उपयोगी होगा.-जिन महाशयोंको लेना होवे २५ रु. भेजदेनेसे भाषाटीकासहित इस पुस्तकको अपने स्थानपर पासकेंगे और भाषावातिकको १० रु० भेजनेसें पासकेंगे महाशयहो! इस अलभ्यलाभको शीघ्रताकरिये. इसके सबकाण्ड (बाल, अयोध्या, आरण्य, किष्किंधा, सुन्दर, युद्ध और उत्तर) ए सातहीकांड और रामायणमाहात्म्य भी भाषाटीका सहित छपेहुए तैयार हैं। जिनकी इच्छा हो मँगालीजिये. श्रीमद्गोस्वामितुलसीदासकृत(सटीक) रामायण। सम्पूर्ण दोहा, चौपाई, सोरठा, और छंदों व क्षेपकोंका अर्थ अ- क्षरार्थ सुमनोहर ललित और सुगम शब्दोंमें श्रुतिस्मृति पुराणोंके दृष्टान्त देकर किया गयाहै.माहात्म्य तुलसीदासजोका जीवनचरित, रामवनवास तिथिपत्र, तथा अष्टम रामाश्वमेध लवकुश कांडभी सम्मिलित किया गयाहै इसके सिवाय कठिन २ शन्दोंका कोषभी लगायागयाहै और फोटूग्राफानुसार उत्तम २ चित्रभी डाले गये हैं देखते ही चित्तः प्रसन्न होजायगा सोनहरी चित्रित जिल्द बंधी कीमत ८० है. श्रीमद्भागवत संस्कृत तथा भाषाटीकासहित । श्रीवेदव्यासप्रणीत श्रीमद्भागवत सबसे कठिनहै और इसका प्रचार भरतखण्डमें सबसे अधिक है यह ग्रंथ क्लिष्टताके कारण सर्व . जाहिरात. साधारण लोकोंको टीका होनेपरभी अच्छी रीतिसे समझना कठिन था कोई २ स्थलमें बडे २ पण्डितोंकीभी बुद्धि चक्करमें उडजाती थी इसलिये विना संस्कृत पढे सर्व साधारण पंडित व स्वल्प विद्या जाननेवाले भगवत्भक्तोंके लाभार्थ संस्कृतमूल व अतिप्रिय ब्रजभाषा टीकासहित जोकि हिन्दी भाषाओंमें शिरोमणि और मान नीयहै उसी भाषामें टीका बनवाकर प्रथमावृत्ती छपायाथा ओ बहु- तही जल्दी हाथोंहाथ विकगई फिर द्वितीयावृत्ति भी विकगई अब इस्की तृतीयावृत्ती द्वितीयावृत्तीकी अपेक्षा अच्छी तरह शुद्ध कर- वाके मोटे अक्षरमें छपायाहै और भक्तिज्ञानमार्गी ५०० अतीवमनो- हर दृष्टांत दिये हैं कागज विलायती वढिया लगायाहै माहात्म्य षष्टाध्यायी भाषाटीका सहित इस्के साथही है प्रथमावृत्तीमें मूल्य १५ रूपया था इस. आवृत्तीमें केवल १२ बाराही रुपया रक्खाहै. मनुस्मृति संस्कृत तथा भाषाटीका सहित । यह अपूर्व धर्मशास्त्रका ग्रंथ हमारे यहां बहुतही सुंदर रीतिसे छप्पाहै भाषा अत्यंत सरल और सुललित कीगईहै, अन्वयार्थभी किया गयाहै तिसपर कीमत सर्व साधारणके सुगमार्थ केवल ३रु. रक्खोहै. शाक्तप्रमोद। यह ग्रंथमें दशों महाविद्याओंका पंचांग और पांचों पंचायन दे- वताओंका पंचाग सविस्तर है, यह अलभ्य और परमगोप्य ग्रंथ है. शाक्तलोगोंने अवश्य संग्रह करने योग्य है. की०५ पांच रुपये, पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाना-बम्बई.

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Durgasaptshatee

Author
Khemraj Shreekrishandas
Title
Durgasaptshatee
File name
Durgasaptshatee
Text
OCR done
Citation
1893
Published
2009/09
Publisher
Mumbai
Language
Sanskrit
Pages
134
Library
Sanmati Library, Jaipur
DLI number
322446
Barcode
99999990252920.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
2JojuSbG0LF
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