Adarsh Library, Jaipur

Shobh Sayogh

Mitra Vimal · 2011/03

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परम प्रिय श्री प्रसित राय चौधरी को

"Great books not only record and interpret liſe for
us, but also console our griefs, expose our vices,
redeem our weaknesses."
Dayton Kohler
Story editor of 'MASTERPLOTS'

शुभ संयोग .

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पुलिस के एक योगागिरी पहाणी गुनी थी। वह यपना नाम प्रकट करना नहीं चाहते, इसलिण में भी यही उनका नाम गुप्त रखा । बगर हम बत ते शो में यह कहानी कमी न पान पाता। कलकत्ते में अनेक लोगों ने वह मकान देखा है। बारह-मंजिसा यह मकान दूर से दमाई पड़ता है। उस पूरे मकान में दफ्तर ही दफ्तर हैं। एक दिन मेरे उस पुलिस अधिकारी मित्र ने कहा- शायद आप नहीं जानते कि उस पतर पाले मकान के पीछे मितना सम्या इतिहास है। मेरे मित्र के रहने के ढंग से मुझे बड़ा याश्चर्य हवा । मैंने कहा-नहीं, मैं नहीं जानता । लेकिन वह वैसा इतिहास है ? सचमुच उतना बड़ा मकान शायद इस समय कसाते में यही एक है। मेरे सामने यह मकान बन कर तैयार हुआ था। लेकिन किसने उस माान को बनाया, कौन चसका मालिक है, उसका क्या परिचय है, यह सब लेकर मैंने कभी मापा- पच्ची नहीं की। करता भी नहीं, लेकिन यपने मित्र को बाउ मुन कर पड़ी निगाया हुई-आखिर उस मकान का क्या इतिहास है ? एक मकान बनने के पीछे कौन ऐसा इतिहास हो सकता है! मेरे मित्र ने पहा-यह याज से पचीस वर्ष पहने को घटना है । उस फेरा पे इन्वेस्टिगेशन का जिम्मा मुमको सौंपा गया था। इस भूमिका ने मेरा कौतूहम बड़ा दिया। मैं उस इतिहास को जानने के लिए अपने मित्र की तरफ देखने लगा। मेरी हालत देख कर मेरे पुलिस थधिकारी मित्र ने कहा-तो मुनो । यात्र से पचीस वर्ष पहले की बात है। १९६२ में डॉ. विधानचन्द्र राय की मृत्यु हुई थी। यह टगी पर्प की घटना है। मेरे पुलिस अधिकारी मित्र को उन्ही दिनों प्रोमोगन मिला था और वह करे पोस्ट पर पहुंचे थे। उसी समय उस बारह- मजिसे मकान का इतिहाम शुम्भ हुया पा। मेरे मित्र कहने सगे-सेक्नि यब वहाँ है वह उपमुन्दर वोग, वरणा चौधरी, कममा बोस, रामेश्याम वनवास, बत्रय बोस यौर विश्प योग ! इनमें कोई मी नहीं है । मेदिन एक वादमी है । टमी के दारे में बताऊंगा।

१०। शुभ संयोग उसी १६६२ की फरवरी में एक दिन जयसुन्दर वीस किसी समारोह में भाषण कर रहे थे। बहुत बड़ा हॉल खचाखच भरा हुआ था। लगभग एक हजार श्रोता मंत्रमुग्ध हो कर जयसुन्दर वावू का भाषण सुन रहे थे। जयसुन्दर वावू बड़े अच्छे वक्ता थे। इसलिए जब उन्होंने अपना भाषण समाप्त किया, उतना बड़ा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से देर तक गूंजने लगा। वह सबको नमस्कार कर कुर्सी पर बैठ गये। फिर थोड़ी देर बाद वह घर लौटने के लिए उठे। ज्यों ही जयसुन्दर वाबू उस भवन से बाहर निकले, किसी ने उनके कंधे पर हाथ रखा। - जयसुन्दर बाबू चौंक पड़े। जयसुन्दर वावू, यानी जयसुन्दर बोस ! वह बड़े मशहूर आदमी थे। आये दिन उन्हें किसी न किसी सभा या समारोह को सम्बोधित करना पड़ता था। इसलिए उनका बड़ा सम्मान था। कम से कम वह स्वयं ऐसा समझते थे । वह यह भी जानते थे कि लोग मेरा आदर करते हैं, मुझे सम्मान देते । समाज में मेरे समान यशस्वी पुरुष बहुत कम हैं । बड़ी सिफारिश करनी पड़ती है, बड़ा जोर लगाना पड़ता है, तब कहीं कोई मुझसे मिल सकता है। सिर्फ सम्मानित नहीं, जयसुन्दर वावू काम के आदमी थे। कहीं से कोई आये और वगैर कुछ कहे-सुने कंधे पर हाथ रखने का साहस करे, यह जयसुन्दर बावू क्यों, उनका कोई परिचित आदमी भी नहीं सोच सकता। लेकिन कैसे क्या हो गया, यह जयसुन्दर बाबू भी उस समय नहीं समझ सके । -कौन ? जयसुन्दर बाबू चौंक पड़े । शायद वह कुछ नाराज भी हुए । फिर जयसुन्दर बाबू ने पूछा-आप कौन हैं ? सड़क पर वहाँ अंधेरा था, इसलिए जयसुन्दर बाबू उस आदमी को नहीं पहचान सके । लेकिन वह आदमी किसी तरह विचलित न दिखाई पड़ा। उस अपरिचित आदमी ने पूछा-आप ही तो जयसुन्दर बाबू हैं ? जयसुन्दर बाबू ने कहा-जी हाँ, लेकिन आप कौन हैं ? उस आदमी ने कहा--मेरा परिचय जान कर क्या करेंगे? मैं आपको सिर्फ यह चिट्ठी पहुंचाने माया हूँ। -चिट्ठी ? किसकी चिट्ठी ? यह कह कर जयमुन्दर वाबू ने चिट्ठी लेने के लिए हाथ आगे किया । उस आदमी ने जेव से चिट्ठी निकाल कर जयसुन्दर वावू के हाथ में दी । जय- सुन्दर बाबू ने जेब से चश्मा निकाला और लिफाफे को फाड़ा । उसके बाद उन्होंने पन्न खोल कर पढ़ने की कोशिश की। लेकिन उतने अंधेरे में जयसुन्दर वा उस पत्र की एक लाइन भी नहीं पढ़ सके ।

शुभ योग । ११ फिर उन्होंने पूछा--किसने यह पत्र दिया है ? यह सवाल करके उन्होंने सिर उठाया, लेकिन वहां कोई दिखाई नही पड़ा। कहाँ गया यह ? उपमुन्दर बाबू को बड़ा आश्चर्य हुवा । पोड़ी देर पहले उन्होंने तेज रोशनी में खड़े हो कर भाषण किया था। समा उसी बहुत बड़े मकान के सभाकक्ष में हुई थी। वहीं दिन जैसा प्रकाश पा। फिर एकाएक अंधेरे में चले आने के कारण असमुन्दर बाबू की बाँखें ठीक से काम नहीं कर रही पी। फिर भाषण के दौरान तालियों को गडगडाहट मुनते-सुनते उनका दिमाग पकरा गया था। तालियां बजने पर कौन मक्ता खुश नहीं होता? इसलिए जयमुन्दर याबू भी खुश थे। हालांकि उस दिन पहली बार जयगुन्दर बाबू के भाषण के दौरान तालियां नही वी । जब से वह समाज में लोकप्रिय हुए, तभी से लोग उनका विचार मुन कर तालियां बजाने लगे थे। उस दिन बगर वह और कुछ देर बोलते तो और जालियां सुनने को मिलती। लेकिन वह ये काम के बारमी । सिर्फ भाषण करते रहने से उनका काम वैसे चलता? आखिर उनको पैसा भी वो कमाना था। सहक के उस पार जपमुन्दर वाबू को कार खड़ी पो । उन्होंने सोचा कि कार के अंदर की बत्ती जला कर चिट्ठी पढ़ सी पायेगी। ड्राइवर की सीट पर बैठा वेणीलाल मालिक को प्रतीक्षा कर रहा पा । मासिक को देखते हो ड्राइवर दरवाजा खोल कर याहर आमा और पोधे का दरवाजा खोल कर खड़ा हो गया। विना कुछ कहे जयसुन्दर याबू पोछे को सोट पर जा कर बैठ गये। उसके बाद कार के अंदर कपर की बत्ती जला कर जयसुन्दर बाबू ने कहा- घर चतो वेणी। कार चलने संगी। जयमुन्दर बाबू ने जेब से चिट्ठी निकाली। पहले तो अपसुन्दर वावू समझ न पाये थे कि यह विट्ठी किसको है। इसलिए चिट्टी खोलते ही उन्होंने लिखने वाले का नाम देख लिया। पही निशिकान्त था। निशिकान्त दास। चिट्ठी के नीचे लिखा नाम निशिकान्त दास पड़ते हो जयमुन्दर बाबू के बदन में मानो बाग लग गयी। उन्होंने मन ही मन वहा-बचानक उस कम्बस्त ने चिट्ठी भयो लिखो ? अगर कुछ कहना था तो खुद बाकर कह सरता था। ऐसा न कर उसने दूसरे के हाप चिट्ठी भेजी ! धेर, जयमुन्दर बाबू उस चिट्ठी को पढ़ने सगे- १२ ॥ शुग संयोग गानगर, चिट्ठी में नीचे गेरा नाम लिखा हुआ है। नाम देख पर भाप मुझे जरूर पह- पान गये होंगे। मैं जानता हूँ कि मेरा नाम देखते ही आपने तन-बदन में भाग लग जायेगी, लेकिन कोई उपाय नहीं है। आपके पारा चिट्ठी लिखे बिना और क्या कर सपता ? ने इस पत्र में जो कुछ लिखा है, उस पर यदि आपको विश्वास न हो तो आप रवयं मेरे घर मा फर मेरी हालत देख सकते हैं। इस समय कोई मापदनी नहीं है। इसलिए माप मुझे कम से कम दो लाख रुपये देने की कृपा करें। आप यह रुपया नहीं देंगे तो मैं बक्षी गुसीबत में पड़ जाऊंगा । आशा है कि सारी स्थिति राममा गर माग यह रुपया देने में विलम्ब नहीं करेंगे । मैं आपके रुपये के लिए प्रतीक्षा करूंगा। यदि आप यह सचित पारें कि पाव किस समय भापके पास जाने पर यह रपया मिल रापता है, तो मैं भी जा सकता हूँ। मैं भापफे घर भी आ रामाता बानो पर की प्रतीक्षा में हूँ। आप मेरा सादर नमस्कार स्वीकार करें। आपका रोवक निशिकान्त दास पर पा लेने के बाद जयसुन्दर बाबू ने कार के अंदर की बत्ती बुझा दी। फार भागती गयी। जयसुन्दर बाबु अपनी चिन्ता में डूबे रहे। फिर थोड़ी देर बाद यह मन ही रस वख्याये---साला ! हरामजादा ! राजगुप निशिकान्त बड़ा शैतान है । यह फिर पहले की तरह गुगे परेशान करना चाहता है। अब भी उसका लालच फम नहीं हुआ। गजे की बात है कि निशिकान्त ने पही पहली बार रणया नहीं मांगा। जिन्दगी गर पह रुपमा गांग-मांग कर जयसुन्दर वाचू को परेशान परता रहा । जयसुन्दर वायू ने सोचा था कि शायद अब यह कम्वरत थोमा पुरस्त हो चुका है। लेकिन नहीं, निशिकान्त अब भी उसी तरह है ! अब तो उसने दो लाख रुपये की मांग पर दी । मानो जगसुन्दर बाबू के पारा रुपये का पेड़ है और उसकी डालिग हिलाते ही रुपये टापाने लगेंगे। फिर कम्बरत ने पौस भी दी है। लेकिन रुपया गया इतना सस्ता है ? जगसुन्दर बाबू सोचते रहे। जगसुन्दर बाबू बहुत रुपये के मालिक बने थे, इसमें कोई सन्देह नहीं था। लेगिन रोग में पैसा नहीं हुआ था। उसके लिए उन्हें फम मशक्कत नहीं करनी पड़ी भी। भाग्य ने उनको गलेल पकट पार उनको पटाया था, तभी तो वह करोड़पति वा राके थे। हालांकि उसके लिए उन्होंने इनकम टैक्स की पोरी को थी और लोगों से काम ले गार उनको फम पैसा दिया था। इसी रुपया गामाने के पीछे उन्होंने पारिवारिका शान्तिको तिलांजलि दी थी। फसला से उनका किसी तरह का सम्बन्ध । नहीं था। इतना त्याग उन्होंने किसलिए किया या? उसी रुपये के लिए न ! यही रुपया कमाने के पीछे यह सब कुछ खो कर करोड़पति बने थे। फिर यह उतने रुपये के मालिक बने थे, तभी तो लोग उनकी उतनी इन्भत करते थे। सवको रुपये के बल पर जयमुन्दर पावू यश में करते थे। वो भी उनो पार आता था, वही वशीभूत होता पा। किसो सभा-समारोह में पा कर यह जो कुछ कहते थे, सोग मन लगा कर सुनते थे। तभी तो उनके भाषण के दौरान बालियां बजती थी । सोग कहते थे, जयमुन्दर बाबू मात्र पुरुष नहीं, महापुरुष है ! जयसुन्दर वावू जिससे भी मिलते थे, सो से बच्या व्यवहार करते थे। उनकी वाणी बड़ी मधुर यो । कोई भी काम पड़े, वह सबको चन्दा देते थे। यह समझते थे कि चांदी की जूती मार कर सबको काबू में किया जा साता है। हाँ, चाँदी को जूती मार फर जयसुन्दर बाबू सबको वश में करते थे। सब उनका उघार साये हुए थे। सब जान गये थे कि जयमुन्दर बाबू के बागे हाप फैलाने पर कुछ न कुछ मिल ही जाता है। उनके पास जाने पर रिसी को निरान नही लौटना पड़ता था। -वेणीलाल! पोछे मुड़े विना वेणीलाल ने पूछा-जी, गुझसे कुछ कह रहे हैं ? -बरा नन्दन स्ट्रीट चलो तो। वेणीलाल ने कार नन्दन स्ट्रीट को वरफ मोड़ लो। नन्दन स्ट्रीट के मकान में कमला रहती थी। उस दिन न जाने भयो जयमुन्दर बाबू ने नन्दन स्ट्रीट चलने के लिए वेणीलाल से कहा था । सम्भवत. निशिकान्त को चिट्ठी पा कर बचानक उन्हें फमला की बात याद आ गयी थी । यों तो उनका स्वमाव हमेशा बागे चलने का पा। कभी उन्होंने पीछे मुड़ कर देखना नही सीखा था। लेकिन निशिकान्त वह चिट्ठी पाने के वाद ही वह मानो पोछे की तरफ मुड़ कर देखने के लिए विवश हो गये थे। यह बहुत पहले की बात है। पसमुन्दर वा का प्रारम्भिक जीवन पा। उन दिनो कोई उनका नाम नहीं जानता था। बड़े बाजार में एक मारवाड़ी की कोठी में यह सिर्फ पन्द्रह रपये महीने पर खाता लिखने का काम करते थे।

गहीने में माम पन्द्रह रुपये ! उन दिनों की बात याद माने पर जयसुन्दर बाबू को हंसी भाती थी। बाद में उनके पर में जो लोग काम करते थे, उनको भी नहीं अधिक पेतन मिलता था। फिर दुर्गा पूजा पर बोगरा था । वोनरा का मतलब दो धोतियाँ और एक गगया । इसो भलाषा एक महीने की तनखाह अलग से मिलती थी। लेकिन एक समय था कि उसी पन्द्रह रपये में जयसुन्दर बाबू महीने भर फा पर्न पलाते थे । रहते थे चिसो भगीर पी बरसाती के नीचे । जो कुछ मिल जाता था, पही पा लेते थे । कभी-कभी सड़क यो नल से पानी पी पार दिन गुजार देते थे। फागी-फली पुलिरापाला उनको गगाता था। पुलिस से बग पार उनको जिन्दा रहना पड़ता था। राफ पर जो लोग रहते थे, पुलिसवाले उन पर शक करते थे। लेकिन महीने में पन्द्रह रुपये में फामरा किराये पर ले गर रहना उनके लिए सम्भव नहीं था। एक बार एक विलायती गुत्ते ने उनको पोसा लिया था। आखिर उस फुत्ते के गालिक की गुणा से उनकी जान बची थी। लेकिन यह किसी तरह निराश नहीं थे। यह भी अमीर बनने का सपना देखते थे। सपना देखते थे कि पालकत्ते में एक मकान का मालिक बन गया हूँ। सिर्फ मपान नहीं, फार भी मेरे पास है। जगशुन्दर बाबू को अच्छी तरह याद था कि एक बार एक भिखारी ने कुछ पाने के लिए गलती से उनके आगे हाथ फैलाया था। लेकिन उनकी शफल देख पार पह भिलारी रागापना गया था। फिर उसने हाथ हटा लिया था। लेकिन उस पटना रो जयसुन्दर वावू को बड़ा आघात लगा था। क्या ये भिखमंगे भी समझ पाते हैं कि फोन भमीर है और फोन गरीव ? गया उस भिखमंगे ने उनको भी भिरामंगा रामक लिया था? ऐसी अनेक पटनाएं घटी थीं। लेकिन वे पटनाएँ जयसुन्दर बाबू को निराश म पर राकी थीं। बल्कि उन घटनाओं ने उन्हें जीवन में तरक्की करने की प्रेरणा दी थी। लेकिन उस दिन जगसुन्दर बाबू ने अपने को बड़ा अपमानित महसूस किया था। उन्होंने उरा भिखारी को पास बुलाया था-सुन, इधर भा। उरा गितारी पो बड़ा भाश्चर्य हुगा था। पहले तो उसने जगसुन्दर बाबू की उपेक्षा की थी, इसलिए उनके बुलाने पर ध्यान नहीं दिया। जयसुन्दर बाबू ने फिर उस भिखारी को बुलाया था-सुन, इधर । पह गिपारी पास भागा तो जयसुन्दर बाबू ने जेब से एक रुपया निफाल कार उसके हाथ में ररा दिया था। है शुभ संयोग । १५ नकद एक रुपया पा कर उस मिखारी को पुश होना चाहिए था, लेकिन वह आश्चर्य से दाता को तरफ देखने लगा था। जयमुन्दर बाबू ने उससे कहा पा~मैं कोई मिवमंगा नही हूँ। समझ गया? मेरे कपड़े देव कर तू जैसा सोच रहा है, मैं वैसा नही हूँ। मेरे पास रपया है। रुपया न रहना उन दिनों जयमुन्दर बाबू को बड़ा अपमानजनक लगता था। बाद में भी अगर कभी किसी ने उनसे कहा कि आपके पास रुपया नही है तो उन्होंने अपने को अपमानित समझा। उनके लिए रुपया गौरव का प्रचोक था। उनके हिसाब से जिनके पास रुपया नहीं है, उनको इस संसार में जिंदा रहने का अधिकार नहीं है। लेकिन रुपया कमाना भी तो एक आर्ट है। जो रुपया कमाना जानता है, यह आर्टिस्ट है। जिस तरह सभी लोग गाना नहीं गा सकते, सभी लोग लेखक नहीं बन सकते, उसी तरह सभी सोग रपया नहीं कमा सकते। इसलिए जयगुन्दर बाबू ने बचपन से रपया कमाने की साधना को थी। संसार में सबसे धनी हैं राफेलर साहब । इसलिए राकफेलर साहब हो जयमुन्दर बाबू के बादर्श थे। राकफेलर साहब जब विरपन वप के थे, तभी यह करोड़ों हालर के मालिक बन गये थे। पन्दह रुपये मासिक वेतन पाने वाले जयसुन्दर वाबू उन्हीं दिनों राफेसर बनने का सपना देखते थे । फलकत्ते को सड़क से चलते समय वह दोनों तरफ बडे- बडे मकानों को देखा करते थे और सोचते थे कि एक दिन ऐसा ही बड़ा मकान मेरा भी होना चाहिए। जयमुन्दर बाबू को अच्छी तरह याद या कि एक दिन उन्होंने अपने मालिक राधेश्याम बाबू से कहा था-~अब पन्द्रह रुपये में खर्च चलना मुश्किल हो गया है। मेरी तनखाह दो रुपये बढ़ा दी जाय। राधेश्याम बाबू ने पूया पा-तुम्हे कितना मिलता है ? पपमुन्दर बाबू ने कहा था-बताया न, सिर्फ पन्द्रह रुपये। --पन्द्रह रपये में तुम्हारा खर्च नही चलता ? बड़े ताज्जुब की बात है। जपमुन्दर बाबू ने कहा था-घसता तो है, लेकिन वही मुश्किल से। ~कहाँ रहते हो? जयमुन्दर बाबू ने कहा पा-मेरे रहने का कोई पता नहीं है। --फिर भी इस समय कहाँ रहते हो? पूडामणि जी बगल में बैठे हुए थे। उन्होंने कहा था-जयमुन्दर सहक पर रहता है हजर। पुलिसवाले नही भगाते? जयमुन्दर बाबू ने कहा था- भगाते हैं हर । इसलिए अभी एक नयी जगह १६ || शुभ संयोग पर रहता हूँ। वहां मेरे जैसे बहुत से लोग पड़े रहते हैं। कोई किसी को नहीं -यह कहाँ ? -जी, आपने कालीघाट में काली जी का मंदिर देखा है ? ---हाँ-हाँ, देखा है। मैं प्रतिदिन काली मंदिर जाता हूँ। हर शनिवार को काली जी की पूजा करता हूँ। वहाँ तो तुम दिखाई नहीं पड़ते ? जयसुन्दर वाबू ने कहा था-मैं तो वहां रात को सोता हूँ। -कहां खाते हो? जयसुन्दर बाबू ने कहा था-मैं तो भात नहीं खाता हुजूर । । -क्या रोटी खाते हो? जयसुन्दर वाबू ने कहा था-हुजूर, रोटी के लिए पैसा कहाँ है ? -फिर क्या खाते हो ? सत्तू ? नहीं हुजूर, सत्तू पचा नहीं पाता। -फिर क्या खाते हो? -चूड़ा खाता हूँ हुजूर, चिड़वा । ऐल्यूमिनियम का कटोरा खरीद लिया है। उसी में सड़क के नल के पानी में चूड़ा भिगो कर गुड़ से खा लेता हूँ। फिर वह कटोरा धो कर एक पंडे को दुकान में रख देता हूँ। -कहाँ नहाते हो? -गंगा जी में। गंगा में नहाने पर कोई कुछ नहीं कहता और पैसा भी खर्च नहीं होता। जयसुन्दर वावू की वात सुन कर राधेश्याम वाबू को बड़ा आश्चर्य हुआ था। उन्होंने पूछा था-तुम बंगाली हो या मारवाड़ी ? -मैं बंगाली हूँ हुजूर । मेरा नाम है जयसुन्दर वोस । सब कुछ सुनने के बाद राधेश्याम बाबू गुस्सा करने के बदले खुश हुए थे। फिर उन्होंने कहा था-अगर तुम्हारा वेतन दो रुपये बढ़ा दूं तो उस रुपये से तुम क्या करोगे? हर महीने दो रुपये बचा कर रखूगा । इस तरह एक साल में चौवीस रुपये हो जायेंगे । एक साल बाद उस चौवीस रुपये से गमछा खरीद कर रोज छुट्टी के वाद फेरी करूंगा। राधेश्याम बाबू ने कहा था- ठीक है। इस महीने से तुम्हारी तनखाह दो रुपये बढ़ा दी गयी। अब तुम कुछ कर सकोगे। यह सुन कर जयसुन्दर वावू गद्गद हो गये थे। उन्होंने राधेश्याम वावू के पाँव छू पर दोनों हाथ सिर से लगाये थे। उनकी आंखों से झर-झर माँसू बहने लगे थे। में गुम संयोग । १७ राधेश्याम बाबू ने पूछा या-वों रो रहे हो? खुगो के मारे अपमुन्दर बाधू सस समय कोई नतर नहीं दे सके । रड, उनकी बांखों में अविरल यांसू बह चसे थे। रामेश्याम बाबू ने रहा पा-तुम क्यों रो रहे हो? रोगो मत। को मन । तुम्हारे पास सब कुछ होगा। देव नेना, तुन मी एक दिन दाउ बनोगे। पता है, मैं नो कमी तुम्हारी तरह गपैर था। बैठा तुम सोच रहे हो, वैसे मैं भी एक दिन सड़क पर खड़े हो र गमछा वेचारला पा) नाच कर ति दिन बाठ बाना नहाँ कना पावापा, उस दिन मेरे जिवामी मुझे घर में खाने नहीं देते थे। वानी में कम कमाई होने पर पर में ऐदी नहीं मिली। इसलिए तुम रोओ मत, तुम्हारे पास सब बुध होगा। मैं तुम्हारी तनखाह दत उसमे बढ़ा सकता है, लेकिन वैसा नहीं करूंगा। वैसा करले पर तुम बासनपद बन जाओगे। तातोर सहने को बात नहीं रहेगी। रि उक्नोर रहे दिना मोई तरक्की नहीं करता । तुम तो बंगालो हो । देगानिलों में एक पहावत है न--पष्ट ना करने केष्ट मेसे ना' । वष्ट किये बिना कृष्ण नहीं मिले। इसके बाद उस दिन और कोई बात नहीं हुई पो । रामेलान बाबू का रहीं से जहरी टेलीओन या गया था। उपमुन्दर बाबू रारेसान वादू के कमरे से निकल कर काने कान में मग गरे थे। धोठी के सूट से या पोंटने के बाद उन्होंने किसी तरफ पान नहीं दिया था। पोही देर बाद हाशि की उपमुन्दर बाबू के पास ग्रे ये दौर बोले थे- बंगाली बाबू, बापका भाग्य बड़ा बन्दा है। एक बार कहते हो बाकी तनसाह दो रुपये बढ़ गयो। बयमुन्दर बाबू को कोई उत्तर देते न बना पा । उस समय दो रपये में उनका क्या होता? उन्हें तो लाखों रुपये को जहरत पो ! कम से कम क्सकते में एक मकान, एक कार और बैंक में कई ला रपये हो आओ तो कोई बात थी। राधेश्याम बाबू को वा उस समय भी जयमुन्दर दाबू के कानों में गूंज रही पी-तुम्हारे पास सब कुछ होगा । सब कुछ होगा! जयमुन्दर दाबू ने पुरानी बातें याद को। उस समय उन्होंने सोचा पा-क्या सचमुच मेरे पास रपया होगा? बार में उनके पास बहुत रपया हुबा, लेग्नि उस समय वह विश्वास न कर सके ये कि कभी ऐसा होगा । उनको वित्त्वास नहीं हुवा या कि उनके पास राधेश्याम बाबू से अधिक दोलत होगी। उस दिन पयसुन्दर बाबू ने सूब मन लगा कर काम किया था। पांच बजे हो सब एक-एक कर दस्तर से निकल गये थे, लेकिन उस समय भी बयनुन्दर बा १८ शुभ संयोग अपने काम में डूबे हुए थे। दो रुपये तनखाह बड़ी थी, इसलिए यह बहुत खुश थे और उसी शुशी को कारण अपने काम के प्रति उनका उत्साह बढ़ गया था। तभी अचानक राधेश्याम बाबू अपने पामरे से बाहर निकाले थे। उस समय भी जगसुन्दर बानु को काम करते देख कर उन्हें वला आश्चर्य हुगा था। जयसुन्दर बाबू के पास जा कर उन्होंने पाहा था--यह गया ? सब लोग जा चुकी है और हैं गौर तुग भगी पण पाम कर रहे हो? जगसुन्दर बाबू ने कहा था-अभी इस खाते का थोड़ा काम बाकी है। गह सुन फर राधेश्याम बाबू मन ही मन बहुत गुण हुए। सुश हो कर रापेश्याम बाबू ने कहा- तुम एक बार मेरे कमरे में आना। इतना कह कर राधेश्याम वालु अपने कमरे में चले गये। पांच मिनट बाद जयसुन्दर बाबू राधेश्याम बाबू के कमरे में गये। राधेश्याम बाबु अपनी गुसी पर बैठे हुए थे । उन्होंने जगसुन्दर बाबू से भी गुर्सी पर बैठने के लिए कहा। जगसुन्दर बाबू धैठे तो राधेश्याम बाबू ने पाहा था-देखो जयसुन्दर, मैं मार- पाही हूँ। लेकिन तुम बंगाली हो । हम दोनों में बड़ा अन्तर भी है। फिर भी मैंने तुम्हारे अन्दर गारवादियों के बहुत से गुण से हैं। बहुत से बंगालियों से गेरी जान-पहचान है, लेकिन तुम उनके जैसे नहीं हो। गह सुन पर जगसुन्दर बाबू ने पहा था---ौं बहुत गरीब हूँ। गरीबों की कोई जात नहीं होती। अगर होती है तो गरीबों की जात अलग है। वे न मारवाड़ी है रन बंगाली। -इसी लिए तो तुमसे कहा कि तुम गुछ गर सगोगे। ---यह मापने गैरो गाहा कि मैं गुछ पर सांगा ? इस पर रागेश्याम वायू ने पाहा था-इसलिए कि मैं भी कभी तुम्हारी तरह गरीब था। ---मेरी तरह गरीब ? आप इतने गरीम थे? राधेश्याम बाबू ने कहा था--हो, तुमसे भी गरीब था । राजस्थान में मेरा पर था। मेरी मां के मर जाने गे वाद वाप ने दूसरी शादी की थी। मेरी सौतेली माँ मुझरो बहुत जलती थी। यह मुझे भरपेट खाना भी नहीं देती थी। मैं ज्यादा पद भी न राका था। इसलिए एक दिन किसी से पुछ कहे बिना घर से भाग कर पालक भा गया था। उन दिनों गालकत्ता ऐसा नहीं था। यहाँ भाने पो चाप पो साल मैंने बबाजार में भीरा मांगी थी। शव रामभा रहे हो न? ...-सीरा? आपने भीरा मांगी थी? -हो, यो पर इसी बड़ेवापार में भीरा मांगी थी। लोगों के सामने हाथ पेला MPURNA ।

शुभ संयोग] १९ फर भीख मांगी थी । अधिकतर सोग भीख नहीं देते थे। लेकिन कुछ लोग देते थे। हैरिसन रोड के मोड़ पर सड़े हो कर भी भीख मांगी थी। इसी तरह एक दिन शाम को एक सज्जन के बागे हाथ पैला पर खड़ा हो गया था। लेकिन उन सम्बन ने एकाएक मेरा हाथ पकड़ लिया था । मैंने धवड़ा कर जरा जोर से कहा था-आपने मेरा हाय क्यों पकड़ा ? बार कौन हैं? उस सज्जन ने मेरा हाथ नहीं छोड़ा और कहा-~बरे ! तू बेटा राधेश्याम मैं उस समय भी न पहचान सका था। फिर थोड़ी देर बाद पहचाना कि यह मेरे पिता थे। पिता जो मुझे पकड़ कर अपने घर ले गये । यहाँ मैंने अपनी सौतेली मां को देखा । मेरी एक बहन भो यो। मैं नहीं जानता था कि मेरे पिता जी राजस्थान छोड़ कर कलकत्ते या गये हैं। पिता जी ने पूछा-तू भीख क्यों मांग रहा पा? भीख मांगने तुझे शरम नही लगती? वह मकान पिता जी ने किराये पर ले रखा था। मैं यहीं रहने लगा। दो-चार दिन बाद पिता जी ने मुझसे कहा-अब तू कोई रोजगार कर । मैंने कहा-रोजगार करने के लिए शुरू में रपपा चाहिए । यह रपया मुझे कहाँ से मिलेगा? पिता जी ने कहा-रुपया मैं दूंगा। यह ले वीस रुपये । यह रपया मैंने तुझे उधार दिया। मुझे पिता बी से बीस रुपये उधार मिले। उसके बाद पिता बो ने कहा- इस रपये से गमछा खरीद ले । गमछा बेच कर रोज कम कम बाठ पाने कमाया कर । बगर रोज बाठ याने कमायेगा वो घर में खाने को मिलेगा। जिस दिन नहीं कमा पायेगा, उस दिन खाने को नही मिलेगा। जयमुन्दर बाबू बहे ध्यान से राधेश्याम बाबू की कहानी सुन रहे थे । राधे- श्याम बाबू जरा रके तो पयमुन्दर बाबू ने पूछा-फिर क्या हुवा ? -~-फिर मैंने गमछा बेचने का काम शुरू किया। किसी-किसी दिन मुझे एक रुपये का भी पायदा होने लगा। उस रपये से पेटीकोट, नाउन दौर जांधिया खरीद कर सड़क के किनारे खड़े हो कर बेचने लगा। उसके बाद तो बाज देख रहे हो । बितना बड़ा कारोबार कर लिया है ! इस कारोबार में कितने सोग कान पर हैं और कितने लोगों को रोजी-रोटो पल रही है !

२० ॥ शुभ संयोग । सफल व्यवसायी राधेश्याम बाबू की कहानी सुनते-सुनते बहुत देर हो गयी थी। रात हो चली थी। राधेश्याम बाबू का उस तरफ स्याल नहीं था, जयसुन्दर बाबू का भी नहीं। लेकिन घड़ी की तरफ निगाह जाते ही राधेश्याम बाबू चौंक पड़े। फिर खड़े हो कर राधेश्याम बाबू बोले- ठीक है । अगर तुम्हें रुपये की जरूरत पड़े तो मुझे बताना। मैं तुम्हें बहुत कम व्याज पर रुपया दूंगा। तुम हर महीने मुझे व्याज देते रहना । कहो तो अभी रुपये दं? -दीजिए। राधेश्याम बाबू ने जेब से वीस रुपये निकाल कर जयसुन्दर बाबू को दिये। उसी वीस रुपये की पूंजी से जयसुन्दर वाबू ने व्यवसाय शुरू किया था और उसी से वह इतने बड़े बने थे। लेकिन निशिकान्त ? ड्राइवर वेणीलाल ने अचानक कहा- हुजूर, नन्दन स्ट्रीट आ गया है। वेणीलाल की वात कानों में पड़ते ही जयसुन्दर वावू की चिन्ता का तार टूट कर चिन्न-भिन्न हो गया। कार रुक चुकी थी। जयसुन्दर बाबू कार से उतरने की तैयारी करने लगे। लेकिन वेणीलाल उसके पहले ही कार का दरवाजा खोल कर खड़ा हो गया था। जयसुन्दर वावू कार से निकल कर सामने वाले मकान की तरफ बढ़े। कमलाबाला वोस विवाह से पहले कमलाबाला सिंह थी। एक दिन माँ का हाथ पकड़ कर वह लाखों लोगों के साथ शरणार्थी बन कर भारत में आयी थी। एक देश से शरणार्थियों के दूसरे देश में जा कर बसने की घटना संसार के इति- हास में कोई नयी बात नहीं थी। प्राचीन काल से ऐसी घटना घटती आयी है। फिर भी उस दिन कमला की माँ रोते-रोते बेहाल हो गयी थी। उसने वेटी से फहा या मेरी सारी चिन्ता तेरे कारण है। इस पर कमला ने पूछा था-क्यों माँ, मेरे कारण आपको किस बात की चिन्ता है? मां ने कहा था-लोग कहते हैं कि यह कलकत्ता शहर बहुत बुरा है । कमला ने कहा था-होने दीजिए बहुत बुरा शहर । अगर हम बुरी नहीं बनेंगी तो शहर की बुराई क्या कर लेगी?

शुभ संयोग मो.तर पा.यह महर बहुत बुरा है। यहां हम जैसे गरीब लोग कैरी बच्चे रह सकते हैं ? क्या यहाँ हमें कोई बच्चा रहने देगा? पर्मला ने पहा पा-यों एवढ़ा रही हैं मां? बस देव नीजिए, मैं इसी हर में बच्छी बनी दूगी। कोई नी मेरा दुध दिमाई न मंगा। उन दिनों कमला को मां के गांव के कुछ लोग टानीगंज में ये । स्मासदा स्टेशन के प्लेटफार्म से मां-बेटी मोरे वहीं गली पौं। यहां गांव के लोगों के बीच पा कर ममता की मां का बर छ रन हुवा था। हिर किसी तरह रहने का इन्तान हो गया था। लेकिन खाने का केने इतबान होता? मेहनत-मजदूरी फिल दिना कोई खिलाने धाला नहीं पा । उस समय उस हालत में कोई किसी का सपो नहीं था। घिर सी मेहनत-मरदरी लिए एक दिन कमला की मां को सड़क पर निकलना पड़ा। एक उम्मन के घर कान निज मला! कान पर जाते समय मां कमला से कह देवी-बड़ी होशियारी से रहना देटी। वहीं बाहर मत निम्नना। इस पर वमता बोस्नि मां, बार क्यों बाहर निकल रही हैं ? बाप बदले में मी तो वा सकती हूँ। मां कहती- नहों बेटो, ऐसा नहीं हो सकता। तू बड़ी हो चली है, यह क्यों नहीं समतो? सहतियां दड़ी हो पाने पर रोक-टोक कहीं बा-सा नहीं सकती। हर सनप यही डर बना रहता है कि पता नहीं कब क्या हो जाय ! इसलिए तू कहो मत या देटी, कोई दात होगी तो मैं क्या कहेगी। फनता को मां लोगों के घर नोरनी का काम करतो पो। दोनों समय उन्हीं परों से वह नाउ नाडी पी । वह मात एक के लिए कार्य होता था, लेकिन वहीं मात मा-बेटी दाट वरतोदो। इसी तरह मां-बेटी दिन गुजार रही यों। लेकिन एक दिन एक मुदित हो गयी। बचानक कमता की मां वीमार पड़ गई। तिन दोनार पड़ने पर भी दो कान में नागा नहीं किया जा सकता !ीन शिजी को कार र लाहोर मार पड़ने से कमला को माँ को जिवनी तादीर पो, ससे ज्यादा तकनीक उसे यह सोच कर हो रही यो कि कान में नाला हो जायेगा। दरवाने पर से बनना करने गांव की एक औरत को बुला लायी। उन बौरत के वाले पर कामना की मां ने उससे कहा-दहन, तुम मेरा काम कर दोगी? बार बचानक मुझे दुद्वार वा गया। इस नुपेर पर न स्त्री ने कहा-मैं कैसे करूंगी दीदी ? मैं तो एक घर में २२ शुभ संयोग काम नहीं करती, सुबह-शाम पांच घरों में काम करती हूँ। अपना ही काम में पूरा नहीं कर पाती, तुम्हारा काम कैसे करूंगी? कमला की मां बोली-~और किसी से कह सकती हो ? और कोई है ? वह औरत वोली-अब इस समय किससे कहूँगी दोदो ? सब अपने-अपने काम से परेशान हैं-कौन मेरी बात सुनेगा ? कमला वहीं खड़ी थी, जहाँ वातचीत हो रही थी। उसने माँ से कहा- मैं चली जाऊँ माँ ? पता बता दो तो मैं जा सकती हूँ। कलकत्ते के इतिहास में वह भी बड़ा विचित्र समय था। पहले घरों में काम करने के लिए नौकरानी नहीं मिलती थी । लेकिन जिस दिन देश का विभाजन हुआ, उस दिन घरों में काम करने के लिए नौकरानियों की भीड़ लग गयी। वे घर-घर जा कर लोगों की खुशामद करने लगीं। बालीगंज लेक से वजवज में रेललाइन के उस पार तक और फिर टालीगंज, यादवपुर, गड़िया और नाकतला तक जहाँ भी खाली जगह मिली शरणार्थी बस गये। वे असहाय थे, निस्सम्वल थे, विवश थे । बाढ़ का पानी जिस तरह हहरा कर आता है, उसी तरह पूर्वी बंगाल से शरणार्थियों की भीड़ मायी थी। उन शरणार्थियों को कहाँ शरण दी जाती ? उनकी रोजी-रोटी का कैसे इन्तजाम होता? उन दिनों डॉ० विधानचन्द्र राय पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री थे। शरणाथियों ने जिन भूमिपतियों की भूमि पर कब्जा कर लिया था, उन भूमिपतियों ने शरणाथियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने की तैयारी की। लेकिन डॉ० विधानचन्द्र राय की सरकार आड़े आ गयो । जहाँ जिस जमीन पर शरणार्थी बसा था, सरकार ने उसको वहीं काविज रखा और उसे उस जमीन का पट्टा दे दिया। कलकत्ते के सम्पन्न घरों में नौकर-नौकरानी की कमी न रही। उसी के साथ शहर की बड़ी-बड़ी चौड़ी सड़कों के किनारे झोपड़ी डाल कर शरणार्थियों ने होटल और पान-सिगरेट आदि की दुकानें खोल ली। पूरा शहर ऐसी दुकानों से भर गया। मर्द लोग फुटपाथों पर दुकान लगा कर बैठ गये । उन दुकानों के लिए किसी तरह का किराया या टैक्स नहीं देना पड़ता था। जितनी सुविधा हो सकती थी, राज्य सरकार ने उन शरणार्थियों को दी। लेकिन कमला और कमला की माँ मोरत थी, इसलिए वे मर्दो की तरह फुटपाथ पर दुकान खोल कर नहीं बैठ सकी। कुछ राजनीतिक दल भी वाणकर्ता के रूप में लाल झंडा लिये आगे आये। उन राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता शरणार्थियों को समझाने लगे. आप लोग हमें वोट दे कर गद्दी पर बैठायें तो हम आपकी सभी समस्याओं को दूर करेंगे।

गुम सयोग २३ आप लोग हमारी पार्टी में नाम लिखा तो हम आप लोगों को इस सकट में करेंगे। फिर उन घरवार और जमीन-जायदाद छोड़ पर आये निराश्रित लोगों को से कर नयी राजनीति शुरु हो गयी! उसी समय दिल्ली को मसनद पर आसीन जवाहरलाल नेहरू बड़ी कृपा फरक घायुमार्ग से कलकत्ते आये। नेहरू जी ने उन शरणार्थियो से कहा-तुम लोग अपने घर लौट जायो। कलकत्ते में भीड़ मत बढ़ाओ। शरणार्थियों ने कहा-लेकिन पंजाब के लोगों को तो आपने जमीन-बापदाद दी है । उसी तरह हमें भी दोजिए । उन लोगो को आपने को सुविधाएं दी है, यही मुविधाएँ आप हमें क्यों नहीं देंगे? जवाहरलाल नेहरू ने कहा- वे लोग पंजाबी ठहरे थोर तुम लोग यंगाली हो। तुम लोग फिर अपने मुल्क लौट जाओगे, लेकिन पजावी वो लाहौर नहीं जायेंगे। - लेकिन अभी हम लोग क्या खायेंगे ? कैसे अपना पेट पालेंगे? जवाहरलाल बोले- हम तुम्हे कैश डोल देंगे। हर महीने हर आदमी को नकद रुपया मिलेगा। ऑकलैण्ड प्लेस मे तुम लोगों के लिए नया दपतर सोला गया है । वहाँ जाओगे और दस्तखत करके रुपया लोगे। -क्या इस तरह हम लोग जिन्दगी भर भिसारी बने रहेंगे ? पया भीख मांग कर हमें हमेशा दिन गुजारना होगा? जवाहरलाल नेहरू ने कहा-किसने कहा कि तुम लोग जिन्दगी मर मिसारी बने रहोगे ? पाकिस्तान से मेरा समझौता हो चुका है कि तुम लोग जब अपने घर लौटोगे, तुम्हे अपना परदुआर और जमीन-जायदाद वगैरह सब कुछ वापस मिल पायेगा। वहीं पाकिस्तान सरकार तुम्हारी देखभाल करेगी और तुम्हे बड़े आराम से रखेगी। मैंने तुम लोगों के बारे में बहुत सोचा है और अब भी सोच रहा हूँ। जिससे तुम लोग आराम से रहो, यही मैं हमेशा सोचता रहता हूँ। लाल झंडे पाले भी शरणापियों की बस्तियों में इन्ही बातों का मतलब लोगो को समझाते फिरे । उन लोगों ने शरणार्थियों से कहा- खबरदार! आप लोगों में से कोई न सोट जाय । जिन लोगों ने देश का बंटवारा किया है, उनको सजा मिलनी चाहिए। उनको सजा देने के लिए बाप संगठित हों, हम बापके साय हैं। जब हम गद्दी पर बैठेगे, तब इसका प्रतिकार होगा। बाने वाले दिनों के उस संघर्ष के लिए आप लोग वैयार हों और कहे-कांग्रेस मुदविाद !

- २४ । शुभ संयोग सभी शरणार्थी एक साथ चिल्ला पड़े--मुर्दावाद ! कमला उस दिन अपने घर के दरवाजे की आड़ से वही सब बातें सुन रही थी, लेकिन उनका मतलब समझ में नहीं आ रहा था। माँ ने पूछा-उधर कैसा शोरगुल हो रहा है ? कमला बोली-पता नहीं, कौन लोग हैं। -वे कौन हैं? -कैसे बताऊँ? जिनके लिए सभा हो रही थी, भाषण दिया जा रहा था, वहीं कुछ समझ न सके । वे लोग यह भी न जान सके कि क्यों उनकी ऐसी दुर्दशा हुई, क्यों उनको देश छोड़ना पड़ा, सव कुछ रहते हुए भी सर्वहारा वन कर क्यों उनको दूसरी जगह जा कर भिखारी बनना पड़ा, कौन उनके दोस्त हैं और कौन दुश्मन या कौन नेहरू है और कौन जिन्ना ? वे लोग सिर्फ इतना ही समझ सके कि जो दुख है, वह बना रहेगा । उसका प्रतिकार कभी नहीं हो सकता । रैडविलफ साहब का नाम तो सुनाई पड़ा, लेकिन वह कौन है और उसका क्या परिचय है, यह सब वह लोग नहीं जान सके। उसके बाद एक दिन कमला ने आ कर माँ से कहा--माँ, आपसे एक सज्जन मिलने आये हैं। -~-मुझसे कौन मिलने आया? कमला की माँ के आश्चर्य का ठिकाना न रहा । तब तक वह युवक सामने आ चुका था। उस युवक ने कहा-~माँ ! 'माँ' संवोधन सुनते ही कमला की माँ ने बड़े स्नेह से पूछा--तुम कौन हो वेटा? -- उस युवक ने कमला की माँ के पाँव छू कर प्रणाम किया। कमला की माँ वोलो-लेकिन वेटा, मैं तो तुम्हें पहचान न सकी। उस युवक ने कहा--आप मुझे कैसे पहचानेंगी? पहले तो कभी नहीं देखा। कमला मुझे जानती है। ----वह तुम्हें कैसे जानती है ? ~वह मेरे यहां काम करती है। फिर कमला को माँ की उत्सुकता बढ़ गयी। पूछा-~-तुम्हारा क्या नाम है वेटा? उस युवक ने कहा--जयसुन्दर बोस ।

गुम सांग २५
नन्दन स्ट्रीट में कमला का मकान था।हो पूजा के कमरे में उस समय
कीर्तन हो रहा था-
माधव, कत तोर करख बड़ाई।
उपमा वोहर कहब ककरा हम
कहित अधिक लजाई॥
जयों सिरिखंड सौरभ अति दुरलभ
तओं पुनि काठ कठोरे।
जों जगदीस निसाकर तों पुनि
एकहि पच्छ उजोरे ॥
फोर्तनिया कीर्तन कर रहे थे। उनके साथ दो सोग ढोल-मीरा बजा रहे थे।
उनके पीछे कमला राधाकृष्ण की मूर्ति की तरफ मुंह किये हाथ षोड़े बैठी थी।
आखें बंद पी। कीर्तन के ताल पर वह धीरे-धीरे सिर हिलाती जा रही थी।
तभी अचानक गिरि दौड़ता हुआ आया और बोला-माता षी, माता पी।
इस पुकार पर मानो कमला का ध्यान टूटा । उन्होंने पोधे मुह कर पूछा-
क्या है गिरि?
गिरि बोला-माता जी, मालिक याये हैं ।
--मालिक !
कमला को बड़ा आश्चर्य हुवा । यह सहसा समझ न सको कि अब क्या करे।
लेकिन जयमुन्दर बाबू तब तक जूता खटखटाते हुए वहाँ पहुँच गये।
जयसुन्दर बाबू को देख कर कमला खड़ी हो गयी। उसने पपसुन्दर यावू की
घरफ देखते हुए पूछा-आप ? बचानक ?
--पयों, नहीं आना चाहिए ?
कमला ने उस बात का उत्तर न दे कर कहा-चलिए, हम दूसरे कमरे में
जायं।
जयमुन्दर बाबू कमला का अनुसरण करते हुए चले और बोले- नाहक पवडा
गयी । क्या मैं जूता पहन कर तुम्हारे पूजा के कमरे में चला जाता?
कमला ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया।
२

२६ ॥ शुभ संयोग उसके बाद जयसुन्दर वाबू ने दोनों तरफ दीवारों में लगे महापुरुषों के चित्रों की तरफ देख कर कहा-वाह ! इस मकान को तो तुमने एकदम मन्दिर वना लिया है। एक साथ इतने महापुरुषों के चित्र एक जगह बड़ी मुश्किल से देखने को मिलते हैं। कमला ने इन बातों का जवाब देना आवश्यक नहीं समझा । वह चलती चली गयी और अन्त में एक कमरे में पहुंचने के बाद कमला बोली-अव बताइए, क्या कहना है ? जयसुन्दर वावू वोले-~-यह कैसे समझ गयी कि मुझको कुछ कहना है और इसी लिए मैं यहाँ भाया हूँ। अगर कुछ कहना न हो तो क्या मैं इस मकान में नहीं मा सकता? कमला बोली-क्यों नहीं आयेंगे? यह तो आपका ही मकान है। यहाँ जो कुछ देख रहे हैं, आपके पैसे से खरीदा गया है। कहना तो यह चाहिए कि इस मकान में रहने का मेरा ही कोई अधिकार नहीं है। जयसुन्दर वाबू ने कहा---क्यों ? क्यों ऐसी बात कह रही हो ? तुम मेरी पत्नी हो । मेरा मकान भी तुम्हारा ही मकान है। कमला बोली-मैं आपकी वात का विरोध नहीं करूंगी। लेकिन आप क्या कहने के लिए आये हैं, वही कहिए । जयसुन्दर वावू बोले-फिर वही निशिकान्त मेरे पीछे पड़ा है। कौन निशिकान्त ? --क्या तुम निशिकान्त को नहीं पहचानती ? कमला बोली-मैं आपके परिचितों को कैसे पहचान सकती हूँ? मैं तो आपके साथ एक मकान में नहीं रहती, इसलिए कैसे जानूंगी कि कब कौन आपके पास माता है ? जयसुन्दर वाबू बोले-~~-लेकिन हम तो हमेशा अलग-अलग नहीं रहते आये। कभी तो हम एक मकान में रहते थे। वह तो बहुत पहले की बात है। अब इतने दिनों बाद कैसे याद रह सकता है? जयसुन्दर वाबू ने कहा- लेकिन ठाकुर-देवता की बात होती तो शायद तुम्हें जरूर याद रहती। कमला बोली-आप ताना दे कर क्यों बात कर रहे हैं ? खैर, कीजिए, मैं कोई आपत्ति नहीं करूंगी। लेकिन यह तो बताइए कि ठाकुर-देवता ले कर न रहूं तो क्या ले कर रहूँ ? मुझे भी तो कोई सहारा चाहिए । आप काम के आदमी हैं । आपके पास काम की कमी नहीं है । लेकिन मेरे पास कौन-सा काम है ? - गुम सपोग | २७ जयमुन्दर वा बोले- -~-या तुमने कभी मेरे साप यपोग किया है ? --या बापने भो सहयोग किया है ? षयसुन्दर बाबू ने कहा--तुम तो नहीं समझती कि मेरे जिवन झमेले है। शुरू से अब तक मुझे कितना परियम करना पड़ रहा है । तुम हो सब कुछ पानती हो । रपया कमाना क्या इतना बागान है ? ममता बोली-लेकिन इतना रुपया ले कर आप क्या करेंगे? जयगुन्दर वाबू परा मुस्कराये। फिर योने-रपया न कमाने पर यह पो इतना खर्च है, कैसे पसता? यह षो तुमको इवने धाराम से रखा है, तुम रात-दिन कीर्तन सुन रही हो और पूजा कर रहो हो, इसके लिए रुपया खर्च नहीं होता? ये जो इतने साधु-महात्माओं के चित्र दीवार पर दांग रखे हैं, इसके लिए रुपया नहीं लगता? यह वो तुम्हारे रामकृष्ण परमहंस हैं, यह तो कोई नौकरी नहीं करते थे? रानी रायमणि के पारा यदि रपया न होता वो यह उतने साधु-महात्माओं को पैसे पालती ? वे से यह मन्दिर बनवातो? रानी रासमणि रपया न दैती रहतीं तो तुम्हारे रामप्णदेव क्या खाते? इस तरह हर काम में रुपया लगता है। इसलिए पया कमाना कोई शर्म की बात नहीं है। रुपये से घृणा करना भी ठीक नहीं है। कमला बोली-आप मार रामकृष्ण का नाम क्यों ले रहे हैं ? ऐसे महात्माओं का नाम लेना आपको शोमा नहीं देता। -कैसे शोभा देता? मैं खो रुपये के पीछे भागता है न ? किन रुपये के पीछे भागने वाले विहला के दान से जो मन्दिर बना है, उसमे रोग हजारो लोग पूजा करने आते है और सदमी-नारायण को मूर्ति को प्रगया करते हैं। यदि विहला रुपया न कमाडे और रूपये के पीछे न मागते तो क्या वैसा सम्भय होता? कमला बोली- अव यह सब वावें रहने दीजिए । बाप को पहने बाये हैं, पही कहिए। -वयों, क्यों वह सब बातें रहने ? क्या तुम नही जानती कि कभी मैं इसी कलकते की सड़क पर भीख मांगा करता था? राधेश्याम बाबू को कोने में सवेरे से शाम तक बहीखाता लिखता था और उसके बदले में हर महीने पन्द्रह रुपये पाता पा? यह नौकरी करने के बाद जो समय बचता था, सड़क पर पूम-पूम कर गमदा चेचा करता था? यह सब रिया या, तभी तो तुमसे शादी हो सको, इतना बड़ा मकान यन साग धौर अब सुम नौकर-नौकरानी से घर बाराम कर रही हो । सपा कमाया, प्रभो तो यह सव हो सका। काममा ने पहा-मैं गरीब घर की सड़की है। मुझे तामीक ठाने की बात २८ || शुभ संयोग -लेकिन वह आदत तो बहुत पहले थी । अव तो आराम कर रही हो ! कमला बोली-क्या आराम कर रही हूँ, यह तो भगवान ही जानते हैं। -भगवान तो मेरे बारे में भी जानते हैं। तुम्हारे और मेरे भगवान तो अलग-अलग नहीं हैं ? फिर हर अकल तो भगवान नहीं देते ? इसके लिए अपना दिमाग भी खर्च करना पड़ता है। मैंने अपना दिमाग लगाया था, बुद्धि से काम लिया था, तभी तुम आज रानी वन कर आराम कर रही हो । कमला बोली-दुहाई है ! आपका दिया इतना आराम मैं नहीं चाहती। यदि हो सके तो मुझे जरा शान्ति दें। ---अरे, तुम तो नासमझ की तरह बात करने लगी। रुपया ही तो शान्ति है ! आराम कहो या सुख, आनन्द कहो या शान्ति, रुपये के विना यह सब कुछ भी मिलना सम्भव नहीं है। कमला बोली-हाँ-हाँ, सम्भव है। आप भी मेरी तरह पूजा करें, एकान्त में थोड़ी देर ध्यान लगा कर बैठे रहें तो देखेंगे कि कितना सुख, शान्ति और आनन्द मिलता है जयसुन्दर वावू बोले-लेकिन उसके बाद? कमला जयसुन्दर बाबू के प्रश्न का मतलब न समझ सकी। उसने पूछा-उसके बाद क्या ? जयसुन्दर वाबू ने कहा-उसके बाद इस मकान का टैक्स कहाँ से दोगी? पूजा के उपचार खरीदने के लिए भी तो रुपया लगता है, कौन उसकी सप्लाई करेगा ? तुम्हारे यहाँ जो लोग कीर्तन करते हैं, क्या वे भूखों रह कर वैसा कर सकेंगे ? उनको कैसे खिलाभोगी? तुम्हारे स्वामी विवेकानन्द ने भी तो कहा है कि पेट खाली रहने पर धर्म भी नहीं होता। कमला बोली- मैंने कभी यह तो नहीं कहा कि रुपये की जरूरत नहीं है। -तुम तो हमेशा वही कहती आयी हो ! कमला ने कहा-आप गलत क्यों कहते हैं ? मैं कभी ऐसा नहीं कह सकती। मेरे बच्चे वाहर हास्टल में रह कर पढ़ते हैं। उनका खर्च अलग है। उसके लिए क्या मैंने कभी आपको रुपया कमाने से मना किया है ? जयसुन्दर वावू बोले-लेकिन उसी के लिए तो तुम हमेशा मुझसे लड़ती रही हो? -उसके लिए मैं कभी आपसे नहीं लड़ी। लेकिन आप तो चौबीस घंटे रुपये के पीछे पागल बने रहते हैं । रात को सोते समय भी सोचने लगते हैं कि कैसे इन- कम टैक्स देने से बचा जा सकता है। इनकम टैक्स को चोरी से कैसे अधिक कमाई शुभ संपौग | २६ हो सातो है । मैंने उसी के लिए आपको समझाना पाहा पा । और कोई बात नहीं थी। पसमुन्दर बाबू ने कहा--लेकिन रुपया कमाने के लिए सोचना नहीं पड़ेगा? रुपया कमाना होगा, रपये का सपना देखना होगा, रुपये का नाम पपना पड़ेगा, समी रुपया आयेगा। रुपया कोई मामूली चीज नहीं है। मैं रपये के बारे में नहीं होगा, रुपये के लिए मापा-पन्ची नही कहेगा और रुपया भाकर मेरे संदूष में भरता चला जायेगा, ऐसा कमी हो सकता है ? फिर परा रक फर जयमुन्दर यात्रु बोले-सर, छोड़ो। यह सब बाते सुनना शायद तुम्हे बच्या न लगता होगा । मैं वो दूसरी बात करने आया था। फमला बोली-मैं बापी रुपये की बात नहीं सुनना चाहती । यह सब या मुझसे न कहे। जयसुन्दर बाबू बोलेयव मैं समझ रहा हूँ कि तुम्हारे पारा न बाता तो अच्छा करता । पर की तरफ जा रहा था । बचानक न जाने क्या गूझा, वेणीलाल से कार मोड़ने के लिए कहा। कमला बोली-आप कभी नही यावे और आज अचानक से बाये, इसलिए पड़ा बारचर्य हो रहा है। -अभी दवाया न, यही निशिकान्त.... कमला जरा झझता फर बोली-अब पह सब मुनना मुझे अच्छा नहीं लगवा। फिर कौन कहाँ का निशिकान्त, मैं उसे पहचानती भी नहीं। इसलिए उसके बारे में सुन कर क्या करूंगी ? जयसुन्दर बाबू बोले-लेकिन उसने दो साख रुपये मांग कर चिट्ठी लिखी -पदि आपके पास हो तो देवोजिए दो लाख रुपये । रपये की ती कमी नही -लेकिन इस धरह प्यास हास कर उसने अब तक मुझसे कितना स्पया लिया है, पानी हो? कमला बोली-यदि बाप उसे रपपा न देना चाहते हो, धोन! यह पवाव सुन बर जयसुन्दर चाबू अभमाये। उन्होंने पहा-तुमसे बार करना भी एक बहमत है! --अगर मुझगे यान करना आपको अच्छा नहीं समता, सो इस पर में कों थामे ? यहाँ बाने के लिए हिराने वापसे महापा? रिसने वापको रसम परापी पी?

३० || शुभ संयोग जयसुन्दर बाबू वोले-तुम इस तरह बात करती हो, इसीलिए मैं अलग मकान में रहता हूँ ! -अच्छा करते हैं ! फिर आप क्यों आये ? मैंने तो आपको नहीं बुलाया ? मैं इस जिंदगी में कभी आपको बुलाऊंगी भी नहीं । इतना आप समझ लें। ~लेकिन मेरा रुपया पया तुम्हारा रुपया नहीं है ? कमला ने जरा ने स्वर में कहा नहीं, नहीं, कभी नहीं । मैं आपका रुपया ले कर स्वर्ग नहीं पहुंच जाऊंगी। इसलिए आप अपना रुपया किसको देंगे और किसको नहीं देंगे, इस संबंध में मुझसे सलाह-मशविरा करने की भी जरूरत नहीं है। मैं आपकी कौन होती हूँ ? आपको यह तो मालूम होगा कि मैंने आपसे शादी फरना नहीं चाहा था । आप ही चाहते थे और उसके लिए आपने मेरी मां को बार- बार समझाया था। जयसुन्दर बाबू बिगड़ गये। बोले----उस समय मैंने गलती की थी। यदि मैं उस समय जानता कि तुम्हारी ऐसी आदत है तो किसी को बार-बार न समझाता । अब मैं उसी का खामियाजा भुगत रहा हूँ। कमला बोली-वह गलती अब तो सुधार सकते हैं? जयसुन्दर बाबू ने पूछा-कैसे ? -क्यों ? अदालत में जा कर विवाह-विच्छेद का मुकदमा दायर कर सकते हैं। --आज तुम ऐसी बात कह रही हो ? कमला बोली -- क्यों न कहूँ ? यदि मैं आपको जी भर गाली देती तो शायद मेरा गुस्सा शान्त होता! जयसुन्दर बाबू बोले-अब तो ऐसा कहोगी । यदि मैं उस समय तुमसे शादी न करता तो इस समय तुम सड़क पर खड़ी हो कर भीख मांगती। वह भी न होता तो कोठे पर पहुंच जाती और चेहरे पर रंग पोत कर गाहक फंसाया करतो ! कमला बोली-फिर भी वह इससे बहुत अच्छा रहता । जयसुन्दर बाबू बोले-फुत्ते को पुचकारने से वह सिर पर चढ़ जाता है। तुम्हारा भी यही हाल है। फभी तो तुम सड़क की कुतिया जैसी थी, लेकिन मैंने तुम्हें वहां से उठा कर पलंग पर विठाया था। आज तुम उसका एहसान भी नहीं मानती! -~-वस पीजिए । चुप हो जाइए ! जयसुन्दर बाबू ने कहा-क्यों चुप हो जाऊँ ? किसी के डर से चुप हो जाऊँ ? लेकिन मैं किसी से गयों डरूं? पया तुम यही कहना चाहती हो कि तुमसे डरा करूं?

शुभ संयोग ! कमला योलो-बार क्यों बात का वढंगड़ बनाना चाहते है ! अव बार पह! से पाए। जयमुन्दर वायू बोले-हो-हो, बाऊँगा। मैं तुम्हारे यहां रहने के लिए नहीं वापा। कभी ऐसा सोचना मउ । मैं पा रहा हूँ, संकिन उसके पहसे तुम्हें सावधान कर देना चाहता हूं कि यब भी ढंग से बात करना सीखो। कमला ने कोई उत्तर नहीं दिया । यह चुपचाप सिर मुकाये खड़ी रही। जयमुन्दर बाबू भी एक दाग पुरचार धड़े रहे। उसके बाद वह दरखाने को तरफ बढ़े। कमसा भी जयमुन्दर वावू के साथ कमरे के बाहर निकली। कमरे के बाहर आते हो क्यमुन्दर वावू को कोतन का मधुर स्वर मनाई पड़ा। मेकिन उस समय उनको यह स्वर बड़ा कटु सगा। अचानक पयमुन्दर बाबू को न जाने क्या मूमा, वह मरान के बाहर जाने के लिए मुड़ कर भी रुक गये । फिर पह उस कमरे की तरफ बढ़े वहाँ कीर्तन हो रहा पा। वह पूजा का कमरा था और कमला यही मुबह-शाम पूजा करती थी। जयमुन्दर वाबू ता पहन कर ही सोधे पूजा के कमरे में पसे गरे । उसके बाद यह ना पहन कर हो कमसा की रापा-कृष्ण की मूर्ति पर सहावा सात जमाने सगे। कमला से रहा न गया। वह चीख पड़ी। चीख कर बोनी-क्या किया! हप थापने क्या किया ! आपने मेरे ठार को सात मारी? यह सारी घटना इतनी जी से घट गयी कि कोनिया और उसके सापी समझ न सके कि क्या हो गया। लेकिन इस घटना को बारस्मिस्या से उनका पीर्तन बंद हो गया। फिर जयसुन्दर वा पूजा के कमरे से कब निकल गये, मोई देख भी न पाया । यह जिस तरह बचानक उस कमरे में जा धमरे थे, उसी तरह पहां से निकल भी गये। जयमुन्दर बाबू के चसे पाने के बाद कममा को मानो होग वामा । यह रापा- कृष्ण की टूटी मूर्ति के टुकड़ों पर मानो माट पड़ी। दोनों हाथों में उन टुकड़ों को भर कर यह बस्ट स्वर में रहने सगी-हे भगवान, बार उनको मार। बाप उनका काराप दामा कर दें। यह सारा दोर मेरा है, मेरा है।

३२ ॥ शुभ संयोग H निशिकान्त दास जयसुन्दर वावू की जिन्दगी में कोई नया आदमी नहीं था। लेकिन वह बहुत पहले की बात थी। कहना चाहिए कि वह जयसुन्दर बाबू के जीवन का प्रारम्भ था। राधेश्याम बाबू की कोठी में रह कर जयसुन्दर बाबू ने वहीखाता लिखने का काम अच्छी तरह सीख लिया था। वहियों में मुनाफे की रकम को किस तरह घाटा दिखाया जा सकता है, यही विद्या उन्होंने पहले-पहल सीखी थी। कहना चाहिए कि वही उनके लिए ककहरा था। जिस समय जयसुन्दर वावू ने पहले-पहल अपना कारोवार शुरू किया था, उस समय वही अकेले मालिक थे और वही अकेले सेल्समैन । वही टाइपिस्ट थे और वही चपरासी। जयसुन्दर बाबू के लिए वह भी एक जमाना था। उनका आर्डर सप्लाई का काम था। चारों तरफ धूम-घूम कर उन्हें आर्डर लेना पड़ता था । यदि कोई कहता था कि मुझे बीस हार्स-पावर का इलेक्ट्रिक पम्प चाहिए तो जयसुन्दर वावू कहीं से घह पम्प खरीद कर उसे बेचते थे। ऐसे काम में उन्हें कुछ न कुछ कमीशन मिल ही जाता था। लेकिन कमीशन की यह रकम कभी एक जैसी नहीं रहती थी। तीस हजार रुपये का माल बेचने पर कभी-कभी जयसुन्दर बाबू को सिर्फ दस रुपये मिलते थे । वह बहुत कम कमीशन पर माल बेचते थे। ऐसा करने से कुछ ही महीनों में उनका बड़ा नाम हो गया। जो लोग उनको माल वेचते थे और जो उनसे माल खरीदते थे, दोनों उनसे खुश रहने लगे । व्यापारियों में उनकी साख बन गयो । साख बनने पर भी जयसुन्दर बाबू को फायदा बहुत कम होता था । किसी तरह उनका पेट भरता था और खर्च चलता था। पूजी राधेश्याम बाबू से उधार मिल जाती थी। उसके लिए राधेश्याम बाबू को बहुत कम व्याज देना पड़ता था। न जाने क्यों जयसुन्दर बाबू को राधेश्याम बाबू बहुत पसन्द करने लगे थे। एक वार राधेश्याम बाबू स्वयं जयसुन्दर बाबू के कार्यालय में आये थे । उस समय यह कार्यालय एक कमरे में था। राधेश्याम वाव ने उसी फमरे को घूम-फिर पार देखा था । टेविल-कुर्सियां लगा कर जयसुन्दर वावू ने अपने कार्यालय को बड़े ढंग से सजाया था। राधेश्याम वावू ने जयसुन्दर बाबू की कार्यकुशलता की बड़ी तारीफ की थी।

शुभ संयोग ३३ फिर राधेश्याम भावू नै पूया या-चिट्ठियों कोन लिखता है ? जयमुन्दर बाबू ने कहा था-मैं नियता हूँ। -दावर की सार-सफाई कौन करता है ? जपमुन्दर वाबू ने फिर कहा था--मैं करता है ? -इस कमरे का कितना किराया देना पड़ता है ? -पांच रपये। -इतना बड़ा कमरा पांच रुपये में कैसे मिल गया? जयमुन्दर बाबू ने कहा था- यह बड़ी विचित्र पहानी है राधेश्याम बाबू । क दिन मैं कही पैदल जा रहा था कि देखा, एक बुझिया सड़क पार कर रही है। किन तभी देखा कि एक यस बड़ी तेत्रो से आ रही है। पल भर भी दर करता । धुढ़िया उस बस की पोट में या जाती। लेकिन मैंने सपक कर उस बुड़िया को गे धकेल दिया। युढ़िया तो बच गयी, लेफिन वस का घसा खा कर में गिर ड़ा । उसके बाद मुझे याद है कि चारों तरफ से सोग दौड़ पड़े। लेकिन उसके द गया हुआ, मुझे याद नहीं पड़ता । फिर रब होरा वाया तो देखा कि असतान पहा हूँ। मेरे सिर पर पट्टी बंधी है और वह युड़िया मेरे सामने पड़ी है। उस युड़िया ने मुझसे पूछा-बय पैसा सग रहा है बेटा? मैंने भी पूछा--मैं अस्पताल में कैसे पा गया ? युड़िया योली-टा, अभी वोलो मत । तुम्हें अस्पताल में साया गया है। झे बचाने में तुम अपनी जान गंवाने सगे थे। राधेश्याम बाबू बड़े ध्यान से जयसुन्दर बाबू की कहानी सुनने लगे थे। जय- न्दर वावू जरा रके शो उन्होंने पूछा-फिर क्या हुवा --उसके बाद तीन महीने अस्पतास में रहा । फिर एक दिन यस्पताल से ही मल गयी। यह बुड़िया उस दिन आपी थी। उस दिन उसने मुझसे पूछा था- म कहाँ पाओगे ? तुम्हारा पर कहाँ है बेटा? मैंने कहा पा-मेरा कोई पर नहीं है। मेरी बात सुन कर युनिया को बड़ा बारचर्य हुवा था । पूछा पा-क्या कहते हो? कोई पर नही है ? पहा पाजी हो । मेरा पर नहीं है। मैं कातीपाट फे मन्दिर में रहता ? - -यहाँ तुम्हारा फोन है? मैंने महापा-मेरा कोई नहीं है। मैं उस मन्दिर के बाहर एक जगह पर --मां-बाप, भाई-बहन पा पाचा-चाची, कोई नहीं है ?

३४ | शुभ संयोग -जी हाँ, कोई नहीं है। -फिर अस्पताल से छूट कर कहाँ जानोगे ? -उसी कालीघाट के मन्दिर में। -~-वहाँ किसके पास रहते हो? मैंने कहा था-वहाँ किसी के पास नहीं रहता। वहाँ एक पंडे की पेड़े की दुकान में अपनी चटाई रख देता हूँ। उसी के साथ एक तकिया रहता है । वहीं जाऊंगा। इस पर बुढ़िया बोली थी-~-फिर तुम मेरे घर चलो वेटा ! मेरे घर में तुम्हारी देखभाल हो सकेगी और तुम माराम से रह सकोगे। राधेश्याम वाबू बड़े ध्यान से कहानी सुन रहे थे। उन्हें अंत तक सुनने की उत्सुकता थी। उन्होंने पूछा-~~-उसके बाद क्या हुआ ? तुम बुढ़िया के घर गये ? जयसुन्दर बाब ने कहा था-~-क्या करता ? गया। सोचा था, चल कर देखा तो जाय । जा कर देखा कि मकान काफी बड़ा है और वह भी एकदम सड़क पर । असल में वुढ़िया उस दिन पैदल गंगास्नान करने जा रही थी, तभी वह दुर्घटना घटी। मैंने उसे उस समय बचाया था। तभी वह मुझे उतना चाहने लगी थी। वह बुढ़िया विधवा थी। वहुत दिन पहले उसके पति की मृत्यु हो चुकी थी। फिर एक दिन उस बुढ़िया ने मुझसे पूछा-~-बेटा, तुम क्या करते हो ? मैंने कहा-~~मैं एक मारवाड़ी की कोठी में पन्द्रह रुपये महीने पर नौकरी करता । उसके बाद जो समय वचता है, सड़क पर धूम-घूम कर गमछा वेचता हूँ। उससे भी कुछ पैसा मिल जाता है। मेरी बात सुन कर उस बुढ़िया ने कहा-लेकिन सड़क पर घूम-घूम कर क्यों गमछा वेचते हो ? कहीं कोई दुकान नहीं खोल सकते ? मैंने कहा-~मुझे दुकान कहाँ मिलेगी? किराये पर दुकान लेने के लिए बहुत रुपया लगता है। उतना रुपया मुझे कहाँ से मिलेगा? मेरी बात सुन कर बुढ़िया बोली-वेटा, मेरे मकान में नीचे सड़क की तरफ जो फामरा है, तुम वहीं दुकान खोलो। उसी से लगा जो कमरा है, उसमें रहना । यहां गमछे की दुकान खूब चलेगी। मैंने पूछा-कितना किराया देना होगा ? बुढ़िया वोली-तुम्हें किराया नहीं देना पड़ेगा। तुमने अपनी जान जोखिम में डाल फर मुझे बचाया है और मैं तुमसे किराया लूगी ? मैंने कहा-आप किराया नहीं लेंगी तो मैं भी दुकान नहीं लूंगा। बुढ़िया बोली-ठोक है। जैसा तुम चाहोगे वैसा होगा। दे देना कुछ किराया। www गुम सपोग। ३५ मैंने कहा-मैं हर महीने आपको उस कमरे का पाच रपये किराया दिया कहेगा। फिर वही बात पक्की हो गयी। में पांच रुपये पर उस युढ़िया के घर में रहने लगा और यहीं गमछे की दुशान खोल ली। लेकिन गमया वेष कर ज्यादा पैसा नहीं बचा पाता था। -और साना? जयमुन्दर बाबू बोले- युड़िया जब तक जिन्दा थी, मैं उसी में साप पाना खाता पा । उस युढ़िया का इस दुनिया में कही कोई नहीं था। मैं ही उसके लिए सब कुछ था। राधेश्याम बाबू यह कहानी मुनवे-मुनवे उत्साहित हो चले थे। उन्होंने पूछा ---उसके बाद? -उसके बाद तो अब देख रहे हैं, मेरा स्वतंत्र व्यवसाय यन गया है। राधेश्याम बाबू ने उस दिन जयसुन्दर यावू को बड़ा उत्साह दिया था। पहा पा-बढ़त बच्छा। बहुत बन्या । तुमने बड़ा अच्छा किया है । मुझे बड़ी पुगी हुई है। जब भी जरूरत पड़े, मुझमे रूपया लेना। -रुपये की क्यों जरूरत पड़ेगी? इस पर राधेश्याम बाबू ने कहा पा-जिन्दगी भर गमधे की दुकान करोगे सो कैसे काम चलेगा ? तुमको हो और बड़ा बनना होगा । तुमको सो मासामान यनना है। लेकिन उसके लिए, यानी बड़े व्यापारी बनने के लिए तुम्हें पूंजो को जरूरत पड़ेगी। -लेकिन बाप तो मुझरो ब्याज सेंगे? इस पर राधेश्याम या ने उस दिन कहा था-हम मारवाड़ी हैं। हम ठी अपने बेटे से भी ध्यान लेते हैं । इसलिए तुम भी म्यान देना। -किस हिसाव से म्याज दूंगा? -अधिक नहीं देना पडेगा । मैं तुमसे दो रुपये सैकड़ा भ्यान सुंगा । जयमुन्दर बाबू ने कहा था लेकिन मैं ध्यान दे सांगा ? -क्यों नहीं दे सकोगे ? पर सिर पर मई मा रहता है उनम्मान देने की शुद चिन्ता रहती है । फिर म्याज का रपया जुटाने के लिए बामदनी याने का उपाप किया जाता है । अगर ऐसा न हो तो हर कोई सोचेगा कि रपया पमा कर बया कहंगा ? मुभगे म्यान पर रपया सोगे सोप्यार सहित बसमी राम पुराने के लिए तुम रातदिन मेहनत करोगे । उससे अधिक रपमा कमा सकोगे। साथ ही याप तुम्हारा य्पयसाय भी फोगा लेगा। फिर इसी तरह शुरआत हुई।

३६ ॥ शुभ संयोग जयमुन्दर वाबू ने गमछा बेचने से अपना काम शुरू किया और बाद में वह बहुत बड़े कारोबारी वन गये । उन्होंने चाय बगान खरीदा और वनस्पति का कार- खाना खोला। उनके कारखाने में सैकड़ों लोग काम करने लगे। लेकिन सब कुछ उसी मामूली गमछे से शुरू हुआ। फिर उसके बाद कहां गये राधेश्याम बाबू ? कहाँ गयी वह बुढ़िया मकान मालकिन ? लेकिन जयसुन्दर वाबू की फैक्ट्री के सुसज्जित कार्यालय में राधेश्याम बाव का बहुत बड़ा आयल पेंटिंग लग गया। जयसुन्दर बाबू जब भी उस कार्यालय में जाते, उस आयल पेंटिंग की तरफ देख कर मन ही मन राधेश्याम बाबू को प्रणाम करते। सिर्फ फैक्ट्री नहीं, जयसुन्दर वाबू के अपने मकान के ड्राइंग रूम में भी राधे- श्याम बाबू का उतना ही बड़ा आयल पेंटिंग था। वे दोनों पेंटिंग तैयार कराने में जयसुन्दर बाबू ने छः सौ रुपये खर्च किये थे। जयसुन्दर वावू ने जव गमछे की दुकान के बाद कपड़े की दुकान खोली थी, तब राधेश्याम बाबू ने उन्हें एक मुश्त दो हजार रुपये दिये थे । जयसुन्दर वावू को वह रुपया लेते समय वड़ा डर लगा था। एक साथ दो हजार रुपये। दो हजार रुपये उन दिनों कोई मामूली रकम नहीं थी। जयसुन्दर बाबू को बस यही चिन्ता पड़ी थी कि यह उधार कैसे चुकता होगा। उस समय तो उनको यही चिन्ता सताने लगी थी कि दो हजार रुपये का व्याज ही नियमित रूप से कैसे दिया जा सकेगा? व्याज के अलावा असली रकम भी थी। लेकिन गजब हो गया था । जयसुन्दर वाबू को सचमुच बड़ा आश्चर्य हुआ था। उनके जीवन की वह एक अद्भुत घटना थी। दो महीने के अन्दर जयसुन्दर बाबू का सारा कपड़ा बिक गया था। कंधे पर फपड़ा लाद कर उनको मुहल्ले-मुहल्ले में फेरी नहीं करनी पड़ी थी। पता न चला कि कब कहाँ से कौन लोग आये और धीरे-धीरे सारा कपड़ा खरीद ले गये। फिर एक दिन पूरा रुपया ले कर जयसुन्दर बाबू राधेश्याम बाबू की कोठी में पहुंचे थे। जयसुन्दर बाबू को देख कर राधेश्याम बाबू को बड़ा आश्चर्य हुआ था। राधे- श्याम बाबू उनकी तरफ देखने लगे थे। -क्या खबर है जयसुन्दर वाबू जयसुन्दर वाबू ने जेब से रुपया निकाल कर कहा था-~-आपका रुपया लाया । असली रकम के साथ व्याज भी है। कैसा रुपया? -- ?

शुभ संपोग 1 ३७ -~-यापने जो मुझे दो हजार रुपये उधार दिये पे, यही रपमा घोर उसका ब्याज। -अरे ! सारा कपड़ा विक गया? -को हो। -तब तो तुम्हें और कपड़ा परोदने के लिए रपया चाहिए? -जी हाँ ! वह तो चाहिए। ---यह रपया कहां से पायेगा? जयगुन्दर वायू ने कहा पा-यह तो मैंने नहीं सोचा। -तुम्हें सोचना चाहिए । मुनो, यत्र एक काम की बात बताऊँ । मैं महावन हूँ और तुम देनदार हो । महाजन का पूरा पैसा कमी नहीं सुकाना पाहिए । -आप मया कह रहे हैं ? -हो, मैं जो बता रहा हूँ, उसको सुनो। तुमने शायद महाश्न का पैसा चुकाने के लिए सस्ते में सारा माल बेचा है ? -पो हो, येषा है । मैं घबड़ा रहा था कि पाप कर्जा पुत्रा पाऊँगा कि नहीं। रामेश्याम बाबू ने कहा था-बही तो गमती भी है। एक दिन तुम भी महा- जन बन सको, इसकी कोशिश करनी चाहिए । इसके लिए तुम्हें जिन्दगी भर देन- पार बने रहना होगा। टाटा, विहमा का नाम सुना है ? जयसुन्दर बाबू ने पहा था- उनका नाम कौन नही पानवा ? राधेश्याम बाबू ने कहा था-सिर्फ टाटा, विमा नहीं । उनरी धरह बहुत से छोटे-मोटे टाटा, बिड़ला भी इस देश मे हैं । वे टाटा, बिड़ला जैसे बड़े सो नहीं है, लेकिन किसी से कम भी नहीं हैं । बानते हो, वे सभी देनदार हैं ? ये एक तरफ देनदार हैं तो दूसरी तरफ महाजन भी है । अंग्रेजी में इसीलिए दो शन्द है, रेविट और क्रेडिट । हरेक का डेविट है वो हरेक का क्रेडिट भी है । व्यापार करते हुए अगर तुम यह सोच सो कि तुम हमेशा क्रेडिट शी तरफ होगे, डेबिट की परफ नहीं, तो तुम कभी बड़े व्यापारी नहीं बन सकोगे। क्या तुम्हें पता है कि मैं भी देनदार हूँ? यह गुन कर पयसुन्दर बाबू को बड़ा वारपर्य हुआ था। पूया पा-बाप भी देनसर हैं ? राधेश्याम बाबू ने कहा पा-देनदार न होने पर मेरे पास इतना पैमागे वापा? पहले ठो जसमुन्दर याचू इस बात का मानव नही समझ सके थे, मेरिन पार में समा गये थे। गमम गये कि रिमी के जीवन में पि ३८ | शुभ संयोग - होता है, उसी तरह कारोबार में भी। डेविट और क्रेडिट हर क्षेत्र में है। ये दोनों ही बड़े अद्भुत हैं । जीवन भर के अनुभव में ये दोनों शब्द जितने महत्त्वपूर्ण उतने महत्त्वपूर्ण कोई भी दो शब्द किसी कोश में नहीं मिलते। जयसुन्दर वावू जव लौटने लगे थे, तव राधेश्याम बाबू ने उनसे कहा था- लो, अपना दो हजार रुपया ले जाओ । इस रुपये से फिर माल खरीदो। हाँ, ठीक समय पर मुझे दो परसेंट व्याज देते रहना । व्याज लछमी है। इसलिए उसको कभी इनकार नहीं करता। तुम भी कभी मत करना। तुम जिसको उधार पर माल दोगे, उससे चार परसेंट व्याज लेना । इस तरह तुम्हारे पास सैकड़ा दो रुपये वचेंगे। वही तुम्हारा मुनाफा होगा। फिर थोड़ा रुक कर राधेश्याम बाबू ने कहा था-और एक बात है। कभी किसी को धोखा मत देना। -धोखा नहीं दूंगा? हो । दूसरे को ठगोगे तो तुम्हारा अपना व्यवसाय चौपट होगा। तुम कहीं के नहीं रहोगे। इसलिए अच्छा कह कर खराव माल कभी मत वेचना । समझ गये। -लेकिन किसी को न ठगूंगा तो व्यापार में तरक्की कैसे करूंगा? इस पर राधेश्याम बाबू ने कहा था-यह तुम्हारा गलत ख्याल है । दूसरों को गोगे तो तुम्हारी दुकान चौपट होते देर न लगेगी। लेकिन मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ कि तुम कभी किसी को नहीं ठगोगे । ठगोगे सिर्फ सरकार को । धोखा दोगे तो सिर्फ गवर्नमेंट को। सरकार को जितना धोखा दोगे, उतनी जल्दी तरक्की । करोगे। -सरकार को धोखा दूंगा? -हाँ, सरकार को धोखा दोगे। अगर सरकार को न ठग सकोगे तो जिन्दगी में कभी तरक्की भी न कर पाओगे । -लेकिन सरकार को ठगने पर तो पुलिस मुझे पकड़ेगी। राधेश्याम बाबू ने कहा था-पुलिस को पता चलेगा, तभी तो वह पकड़ेगी। लेकिन उसे क्यों पता चलेगा? सरकार को ऐसे ठगना होगा कि उसे पता भी न चल पाये । देखो, मैं भी सरकार को ठगता है, लेकिन कोई मुझे पकड़ नहीं पाता। किसी व्यवसायी को कोई पकड़ नहीं पाता । फिर आखिरी दांव तो है ही। -~~-यह आखिरी दाँव क्या है ? राधेश्याम बाबू ने कहा था--यह आखिरी दाँव है धूस । रिश्वत पाने पर सव फा मुंह बंद हो जाता है। -लेकिन लोग मुझसे घूस क्यों लेंगे? - मुन संपोग! -नहीं । सेने शिरगणे वादमी के हाप में पूरा दोगे कि वे सोमना रितना मुक्तिम है, उतना ही मुलित है पूरा देना ! कार एक बार न देने से दंग या जाप सो तुम्हें मालामाल होने में देर न समेगी। तभी रायन्याम बाबू के कमरे में चुडामगि वा गरे पे वार मागे सोई पठ- पीठ न हो मसी पी। राश्यान वाढू ने सिकं वहा पा-ठोक है जयमुन्दर, मुम दौर रिसी दिन का पाना । मैं तुम्हें राव सममा दूंगा। न जाने क्यों जयमुन्दर वा के प्रति राधेश्याम बाबू के मन मे न पाने वेगा थाकर्षण पैदा हो गया पा। इसलिए उन्होंने चूडामगि जी के सामने उपमुन्दर बाबू को अधिक कुछ बताना नहीं पाहा । पपमुन्दर बाबू बाहर दरवाजे के पास बाये तो पूडामणि जी ने उनको पाड़ा। पूधा-मालिक से क्या बात हो रही थी बंगाली या जयमुन्दर वायू ने कहा पा–अरे, कोई खास बात नहीं थी। उस दिन यही रह कर जयसुन्दर बाबू राधेयाम बाबू फो कोठी से निाने थे। पपमुन्दर वायू ने जब अपना परतर शोना, ठभी उनको टाइपिस्ट पोषररस पड़ी। उस समय चिट्टी-पत्रो लिगने का काम बहुत यड़ गया था। बोले उनी यह सव काम नहीं हो पाता मा । शुरू में जब वे गमछा या घोबो-गाड़ी वैषा परते थे, तव पारा काम अरेने संभाग से थे। सकिन बाद में जयमुन्दर वाबू ने थाईर राप्लाई का नया फाम शुरू किया। यह काम शुरू करने पर उनको दस बगह दौडना पड़ता था। यह भी कमाने के बन्दर नहीं, याहर भी पाना होता था। बाज किसी मो रस भुवनेवर, परसों बम्बई खो फिर उसके बार मद्रास पाना पड़ता था। किसी को विलायती यायसर की परत पड़ती थी तो पिसी को पुराने ट्रान्य- पार्मर फो। यह सब माल निसके पास है, यह राय जयगुन्दर वायू पो ही देशना पड़ता पा । फिर हरेक का सेसिपियेशन से पर उसके पास दोना परवा पा, पो उसको खरीदना चाहता था । इस पाम में भाग-दौड फे बसाया बरावर पप्पाहार परना पड़ता पा। बार्डर सप्लाई का काम यो ममेले पापा। शादी तय कराने में जिस तरह सहो पाने और सहयो पाने दोनों को राजी करना पड़ता है, ज्यो तह बार सप्लाई के काम में खरीदार और विस्थान दोनों से बरावर निपटना परवा है। इसलिए षयमुन्दर यामू को एक मिनट परतर में बैठ र नाम पर मौ] नहीं मिमता था। इसलिए उस समय उनको एक ऐगे सामी पी परत पो, टाइप परने में बसाया पिढीपत्री भी सिरा से दौर बादर मे टेसी ४० ।। शुभ संयोग जिम्मेदारी के साथ वात भी कर ले। जयसुन्दर वायू को जब ऐसे आदमी की जरूरत थी, तभी वह कमला आयी थी। उस दिन जयसुन्दर बाबू अपने दपतर में बैठे अपने दपतर में बैठे हुए थे। तभी वहाँ गोल-मटोल चेहरे घाली वह लड़की पहुंची थी। जयसुन्दर बाबू ने उस लड़की की तरफ देख कर पूछा था-~~-चया चाहती हो? -आपके यहाँ कोई नौकरी मिलेगी ? उस नवयुवती की बात सुन कर जयसुन्दर बाबू को बड़ा आश्चर्य हुगा था। उन्होंने पूछा था--आप कहाँ से आ रही हैं ? -टालीगंज से। ~~~टालीगंज? टालीगंज में कहाँ से ? उस नवयुवती ने कहा था-आप वह जगह नहीं पहचान पायेंगे । टालीगंज को पीछे छोड़ कर काफी दूर जाना पड़ता है । वहाँ शरणार्थियों की एक कालोनी है । मैं वहीं रहती हूँ लेकिन आपको यह कैसे पता चला कि मेरे यहां नौकरी मिलेगी? इस पर उस लड़की ने कहा- मैं कई महीने से नौकरी की तलाश कर रही हूँ। इसके लिए मुझे विभिन्न दपतरों का चक्कर लगाना पड़ता है। इसी तरह किसी ने मुझसे कहा कि आपके यहां कोई जगह खाली है। -आपका क्वालिफिकेशन ? वह लड़की बोली-~~-ढाका में रहते समय चलास टेन तक पढ़ी थी। उसके बाद पिता जी चल बसे और फिर देश का बंटवारा हुमा। हमें सब कुछ छोड़ कर हिन्दुस्तान जाना पड़ा। उसके बाद बहुत दिन तक मां दूसरों के घर काम करती रहीं। इस तरह हमारा खर्च चलता रहा । फिर मैंने टाइपराइटिंग सीख ली। ~-टाइपराइटिंग जानती हो? तब तो बड़ा अच्छा हुआ। -जी हाँ, काम चलाक टाइपराइटिंग जानती हूँ। जयसुन्दर बाबू ने कहा- ठीक है । पहले मैं टाइपराइटिंग मशीन खरीद लू, उसके बाद तुम्हें बुला लूंगा। तुम मुझे अपना पता दे दो। मामला ने एक कागज पर अपना नाम-पता लिख दिया था। फिर दो दिन बाद जयसुन्दर बाबू ने सस्ते में एक पुरानी टाइपराइटिंग मशीन खरीद ली । बहुत दिनों से यह मशीन खरीदने की इच्छा थी, लेकिन टाइपिस्ट न होने से उन्होंने मशीन नहीं खरीदी थी। लेकिन बाहर से चिट्ठियां टाइप कराने में समय बहुत घरवाद हो रहा था। पेसा भी ज्यादा देना पड़ रहा था। मशीन खरीदने के बाद जयसुन्दर बाबू ने कमला को पाने के लिए पर लिख दिया। पत्र पा पार पामला आ गयी। JA- गुभ संयोग प्रयमुन्दर यावू ने कमला से पूछा-इस मौन पर पाम कर सौगों न? कमला ने कहा--कोई काम दीथिए । टाइप करके दे। एक पत्र देते हुए जयमुन्दर बाबू ने बहा-सो, इसी को साझा करो। कमला ने फटाफट वह पर टाइप कर दिया। जयगुन्दर बाबू ने टाइम किये हुए पत्र को अच्छी तरह देखा। फिर कहा-~-इसी में मेरा काम पस पायेगा । मेकिन विवनी हनशाह मिलने पर तुम अपना काम पता कोगी? कमला बोली- धमम हम परेशानी में हैं । इसलिए आप को उपदेंगे, में खुशी से सूगो। धर, इसी तरह कमला उस दिन असमुन्दर बाबू के महा टाइपिस्ट रप में भायी थी। रिन किसका भाग्य थच्या पा, पहा नही जा सकता। मायद पमना का ही माग्य अच्या या दौर ज्यो के भाग्य से पपमुन्दर यापू पर समो गोपा- दृष्टि हुई । बसमुन्दर बाबू का कारोवार दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करता गया। फिर तो यह कंकड़-पत्पर भी हाप में सेने संगे हो यह सोना बनने लगा। जयमुन्दर बाबू बमला पर अपने कार्यालय का भार गोप पर बाहर निकलते कार्यालय की चिन्ता नहीं करनी पड़ती पी। इधणे उनका बाहर का काम लंग से होने सगा। कार्यालय का सारा पाम कामता संमानतो थी । जयगुन्दर मात्र बाहर ही बाहर रहते थे। प्राय उनको कसा के बाहर जाना पड़ता था। दूसरे शहर का काम निपटा कर अयमुन्दर बाब अब कमाते सौटवे , अब देखते थे कि ममता ने सिर्फ टाइप का काम नहीं, बल्कि बहुत से यन्य नाम भी पूरे कर लिये हैं। मनी-बार से पो रुपया बावा पा, कमसा उपके एक-एक पैसे का हिसार अनेक बार ऐसा हुआ कि मसा पर नहीं लौट सरी । अयमुन्दर या के कार्यालय में कई पमरे थे! मला वहीं जो बातो पो और होटस से पाना था लेती थी। काम में कमला को लगन देश कर अपमुन्दर शापो का बाप होता था। वह पूर ये~-तुम पर नही गयी ? कमना रहती थी-वाइए, गे पाओवर में बहुत रपये से । यह सब रिसर निम्मे रथ पर पर बाजी? -~यों ? पो पहरेदार पहा मुहल्ले में पहरा देता है, मसे कहर सनीयो।

४० शुभ संयोग --- जिम्मेदारी के साथ वात भी कर ले। जयसुन्दर वावू को जव ऐसे मादमी की जरूरत थी, तभी वह कमला भायी थी। उस दिन जयसुन्दर बाबू अपने दफ्तर में बैठे हुए थे। तभी वहाँ गोल-मटोल चेहरे वाली वह लड़की पहुंची थी। जयसुन्दर वावू ने उस लड़की को तरफ देख कर पूछा था-क्या चाहती हो? आपके यहाँ कोई नौकरी मिलेगी ? उस नवयुवती की बात सुन कर जयसुन्दर वावू को बड़ा आश्चर्य हुआ था। उन्होंने पूछा था-~-आप कहाँ से आ रही हैं ? -टालीगंज से। -टालीगंज ? टालीगंज में कहां से ? उस नवयुवती ने कहा था-~~-आप वह जगह नहीं पहचान पायेंगे । टालीगंज को पीछे छोड़ कर काफी दूर जाना पड़ता है । वहाँ शरणार्थियों की एक कालोनी है । मैं वहीं रहती हूँ। लेकिन आपको यह कैसे पता चला कि मेरे यहां नौकरी मिलेगी ? इस पर उस लड़की ने कहा- मैं कई महोने से नौकरी की तलाश कर रही हूँ। इसके लिए मुझे विभिन्न दपतरों का चक्कर लगाना पड़ता है। इसी तरह किसी ने मुझसे कहा कि आपके यहाँ कोई जगह खाली है। -आपका क्वालिफिकेशन? वह लड़की बोली-~-ढाका में रहते समय क्लास टेन तक पढ़ी थी। उसके बाद पिता जी चल बसे और फिर देश का बंटवारा हुआ। हमें सब कुछ छोड़ कर हिन्दुस्तान आना पड़ा। उसके बाद बहुत दिन तक माँ दूसरों के घर काम करती रहीं। इस तरह हमारा खर्च चलता रहा । फिर मैंने टाइपराइटिंग सीख ली। -टाइपराइटिंग जानती हो ? तब तो बड़ा अच्छा हुमा । -जी हाँ, काम चलाऊ टाइपराइटिंग जानती हूँ। जयसुन्दर वावू ने कहा-ठोक है । पहले मैं टाइपराइटिंग मशीन खरीद लू, उसके बाद तुम्हें बुला लूंगा । तुम मुझे अपना पता दे दो। कमला ने एक कागज पर अपना नाम-पता लिख दिया था। फिर दो दिन बाद जयसुन्दर वाबू ने सस्ते में एक पुरानी टाइपराइटिंग मशीन खरीद ली। बहुत दिनों से यह मशीन खरीदने की इच्छा थी, लेकिन टाइपिस्टन होने से उन्होंने मशीन नहीं खरीदी थी। लेकिन बाहर से चिट्ठियां टाइप कराने में समय बहुत वरवाद हो रहा था। पैसा भी ज्यादा देना पड़ रहा था। मशीन खरीदने के बाद जयसुन्दर बाबू ने कमला को आने के लिए पत्र लिख दिया। पन पा कर कमलामा गयो। ।

। गुभ संयोग ४१ जयमुन्दर बाबू ने कमला से पूछा-इस मशीन पर माम पर सोगी न? कमला ने कहा-कोई काम दोजिए । टाइप करके दे। एक पत्र देते हुए जयमुन्दर याबू ने यहा-सो, इसी को टाक्ष करो। कमला ने फटाफट वह पत्र टाइप कर दिया। जयमुन्दर बाबू ने टाइप किये हुए पत्र को बन्छी तरह देखा। फिर कहा- इसी से मेरा काम चल जायेगा । लेकिन कितनी तनखाह मिसने पर तुम अपना काम चला सकोगी कमला बोली-इस समय हम परेशानी में हैं । इसलिए पाप पो बुध देंगे, मैं खुशी से सूंगी। खर, इसी तरह कमला उस दिन षयगुन्दर बाबू के यहाँ टाइपिस्ट के रूप में आयो पो। लेकिन किसका भाग्य अच्या था, कहा नहीं जा सकता । शायद फमना का ही भाग्य अच्छा था और उसी के भाग्य से षयसुन्दर बाबू पर सहमी की कृपा- दृष्टि हुई । जयसुन्दर बाबू का कारोबार दिन दूनी रात पौगुनी उन्नति परता गया। फिर तो यह कंकड़-पत्थर भी हाथ में लेने सगे धो यह सोना वनने सगा। जयसुन्दर बाबू कमला पर अपने कार्यालय का भार सौप कर बाहर निकलने थे। कार्यालय को चिन्ता नही करनी पड़ती थी। इससे उनका बाहर का काम दंग से होने लगा । कार्यालय का सारा काम कमला संभालती थी । जयगुन्दर मायू पाहर ही बाहर रहते थे । प्रायः उनको फसकते के बाहर जाना पड़ता था। दूसरे शहर का काम निपटा कर जयसुन्दर वायू जव समते बौटते थे, तब देखते थे कि कमला ने सिर्फ टाइप का काम नहीं, बल्कि बहुत से अन्य काम भी पूरे कर लिये हैं। मनी-आर्डर से खो रुपया बावा पा, कमसा उसके एक-एक पैसे का हिसाय रखती थी। अनेक बार ऐसा हुआ कि ममता पर नहीं लौट सकी । जपमुन्दर यावू के कार्यालय में कई कमरे थे ! कमला वहीं सो पाती थी और होटल से खाना खा लेती थी। काम में फमसा को सगन देख कर अपगुन्दर बाबू को बड़ा बाश्चर्य होता था। वह पूरते थे--तुम पर नहीं गयो ? कमला कहती पी-बताइए, वैसे पायो? दपतर में बहुत रपये रो थे। वह सब किसके जिम्मे रख कर घर जातो? -~-पयों ? जो पहरेदार यहाँ मुहल्ले में पहरा देता है, उससे कह कर वा परती थी। ३ ४२ ॥ शुभ संयोग -लेकिन रुपया? उतना रुपया मैं किसके जिम्मे करती? -पयों ? तुम अपने साथ रुपया ले जाती ? ? -~-पार्यालय का रुपया घर क्यों ले जाऊंगी ? -लेकिन घर में तुम्हारी मां धवला रही होंगी। गमला फहती थी-मां को बता कर आयी हूँ। मैं जानती थी कि आपके लौटने में दो-एक दिन की देर होगी। जयसुन्दर वायू कहते थे-पया बताऊं, उन लोगों ने माने नहीं दिया। पहले सो यही तय था कि मैं तीन दिन पहले पालकत्ते लोट माऊंगा। मुझे क्या पता था कि उन लोगों की पजह से इतनी देर हो जायेगी ? उसके बाद जगसुन्दर बाबू रोद प्रकट करते थे। पाहते थे - समझ नहीं पा रहा हूँ कि इस तरह कितने दिन चलेगा? जयसुन्दर वाबू कहने को तो ऐसा काहते थे, लेकिन जब भी वह बाहर जाते थे, उनके लौटने में देर होती थी। फिर जब भी ऐसा होता था, कमला अपने घर नहीं लोट पाती थी। एक दिन फिर जयसुन्दर बाबू ने कहा--समझ नहीं पाता कि इस तरह कितने दिन लेगा? कमला ने पूछा-या भापको घर में कोई नहीं है ? जयसुन्दर बाबू बोले-~-अपना फहने के लिए मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है। पगला समझ न पायी किया जवाब देगी। फिर जरा एक पर बोली-आप शादी कर लीजिए न । आपके मकान में फिराने पामरे खाली पड़े हैं ।। जयसुन्दर बाबू ने कहा-किससे शादी करूं ? कौन मुझे अपनी लड़की देगा? परा दुनिया में मेरा कोई नाम लेने पाला हो, तब तो? जराने बाद उन्होंने न जाने गया सोच फर पाहा--पया तुम भी करना पाहोगी? --में? भागसुन्दर वाचू ने कहा-हा-हां, तुम । मैं तुम्हारी बात कर रहा हूँ। क्या मेरी बात सुन कर तुम्हें पाश्चर्य हो रहा है ? लेकिन यह समझ लो कि मैं तुमसे गजामा नहीं कर रहा हूँ। अपनी धुन में पुराना पाह लेने के बाद जयसुन्दर यावू को निगाह कमला पर पो तो जगहोंने देखा कि ममता ने आरों मुफा ली है । उसको आँखों से आंसू वह रहे है।

शुभ संयोग । ४३ फिर उस दिन अयगुन्दर बाबू ने देर नही की पौ। बहसममा को शाप सिरे सोधे उसकी मां से उनसे टालीगंज याने मकान में जाकर मिले थे। उसके पहले जयसुन्दर वा कभी उपर नहीं गये थे। उन दिनों उस इलाके में पनी यस्ती नहीं यो । जहाँ-वह! लोग बसे थे, लेकिन यघिरतर जमीन पासो पड़ी पो बोर में माह मंसाइ उग थापे । फमला के विवाह का प्रस्ताव मुन कर पहले तो उसकी म विलास नर छको पी। उनकी भी बेटी की शादी होगी और नम बेटी का अपना घर होगा, उसकी मानो उन्होंने कभी कल्पना भी नही को थो। अपगुन्दर बाबू को उन दिनों की यावें अच्छी तरह याद यो । रिन ने बा होगमा पा, मह राव सोचने पर उनको मगवा माफि मानो वह सपना देश मनुष्य के मन में बव बावेग पाता है तब यह सोचने-समझने की शक्ति मानी सो देता है । वयमुन्दर बाबू का भी यही हाल हुआ था। उस समय उनको सणापा कि यह भाग नहीं, अनुराग है । उन्होंने माग को अनुराग राममने की गलती की थी और उसी गलती का खमियाजा उनको बाद में जिन्दगी मर भुगतना पड़ा था। बाद में जमगुन्दर बापू महमूरा करने सो पे कि उन्होंने शुरू में कममा को पहचानने में गसती की थी। जयगुन्दर दाबू मे पास कमला पत्नी के रूप में बायी तो उसने पहने ही अप- सुन्दर शायू को जता दिया कि सिर्फ मुझको अपने पास रखने काम न पगा, मेरी मां को भी मेरे छाप रखना होगा। नहीं तो मेरो मारहां देगी? यौन उनी देख-भाल करण? आवेग के कारण जयमुन्दर बायू को पहने इस बात का ध्यान नही कायरा या। लेकिन कमसा के लिए ऐसी मांग करना यस स्वाभाविक ही नहीं, व भी था। फिर दो-चार दिन बाद ही अपगुन्दर बापू समझ गये किसमसा और परी मां से उनका क्या संबंध है । पयमुन्दर बाबू ने पहने उस सबंध के बारे में उखनी गंभीरता से नहीं सोचा था। कमसा को मा, यानी जयमुन्दर शायू को साय ने उपमुन्दर बापू से पा-- बेटा, कमला तुम्हारे घर में वह बन कर बापी है। क्या व मी वह तुम्हारे तर में माम करेगी? यह सवाल सुन कर जयमुन्दर बायू थोड़ा समय मे पाये थे। उन्होंने बाद में समसा से पूछा क्या तुमने मोरो धरहा था? यह मुन पर कमसा ने पलट कर पूधा~मैंने ? मैं काम है?

४४ शुभ संयोग -तुम्हारी मां कह रही थीं कि तुम इस घर में बहू बन कर मायी हो, इस- लिए तुम पहले की तरह काम करना नहीं चाहती। कामला ने कहा था-आप मूठ कह रहे हैं। माँ कभी ऐसी बात नहीं कह सकती। यह उत्तर सुन कर जयवृन्दर बाबू को बहुत बुरा लगा था। जयसुन्दर वावू ने कहा था-फिर क्या मैं भूठ कह रहा हूँ ? अगर तुम मेरे दफ्तर में मेरे साथ काम नहीं करना चाहती तो मुझसे कह सकती थी। मां से क्यों कहने गयी? यह शादी के एकदम वाद की वात थी। उन दिनों जयसुन्दर वाबू का व्यापार तरक्की पर था। इसलिए उनका काम बहुत बढ़ गया था। कमला से उनके संबंध में कटुता भी उसी अनुपात में बढ़ती गयी थी। ठीक उसी समय निशिकान्त आया था। वही निशिकान्त दास । उन दिनों जयसुन्दर बाबू को आर्थिक स्थिति में तेजी से सुधार होने लगा था। चारों तरफ से उनको आर्डर मिलने लगा था। कार्यालय का काम संभालने के लिए उन्होंने कई लोगों को रख लिया था। कमला की जगह पुरुष टाइपिस्ट भी रखा गया था। दो वलर्क भी रखे गये थे। पहले की तरह जयसुन्दर बाबू को बाहर घूमना नहीं पड़ता था। कमला भी अपने घर के काम में व्यस्त रहने लगी थी। फिर भी जयसुन्दर वाबू अपना काम निपटा कर जब घर में जाते थे, रात फाफी ही जाती थी। घर में जाते ही जयसुन्दर वा कमला को आवाज देते थे-~~~अरी, कहाँ गयी - तुम? आवाज सुन कर कमला आती थी। कहती थी--क्या हो गया है ? क्यों वुला रहे हैं ? जयमुन्दर बाबू कहते थे-फिर कल एक पार्टी देनी पड़ेगी। कमला कहती थी-पार्टी ? फिर किसको डुवायेंगे ? इस पर जयसुन्दर वाबू कहते थे-क्या कहती हो? क्या किसी को अवाने के लिए में पार्टी देता है ?

गुभ संयोग। ४५ -टुवाना नहीं तो और क्या है ? माप निसाो भी पार्टी देने है, यापी टुवाते हैं। जयमुन्दर या कहो ये-तुम तो बस इसी एक बात की रट सगाती रहती हो ! मैं तो अपने कारोबार के लिए पार्टी देवा हूँ। फिर उस पार्टी में वो जैसा घाना-पीना चाहता है, उसी को वैसा बिलावा-पिसाता है। —क्या हर बादमी वापसे शराय पोना चाहता है ? थाप हो तो अपना काम निकालने के लिए सबको शराब पिलाते हैं । इस तरह वे सोग बाकी मुट्ठी में या जाते हैं और बापको माल का भाईर देते हैं । इस पर जयसुन्दर बाबू कहते थे लेकिन यह काम क्या मैं थोमा करता है? अाजकल तो शराब पिलाये बिना कोई काम नहीं होता । बार्डर भी सराव पिसा कर ही मिलता है । मह तो तुम बच्छी तरह जानती हो। -लेकिन अब मुझसे यह सब पीने के लिए तो नहीं कहेंगे? इस पर अयमुन्दर बाबू कहते थे-शिष्टाचार के नाठे ऐसा पहना पड़ता है। तुम घर में रह कर भी परा सी नहीं पियोगी तो लोग क्या कहेंगे? इसके उतर में कमला कहती पो-मैं वापसे शादी करके ग पर में बागी हूँ। आप मुझरो यह सब काम नहीं करा साँगे । अगर आपको यही राव करना है तो बाजार से औरत साइए बोर उसी को अपनी पत्नी बना कर यह पव पोजिए। लेकिन वह पालाको रिसी ने पकड़ लो तो? कमसा कहती थी-वैसे कोई पकड़ सकेगा? उस पार औरस की मांग में भी सिंदूर भर दीजिए । अपनी पत्नी कह कर उसी का सबसे परिचय कराए। षयमुन्दर बाबू बहरे पे-सचमुच तुमसे शादी करके मुशिस में पड़ गया है। कमला महती पीजी नहीं । इसका सटा हुवा है। आपके घर में बाहर मेरी ही परेशानी बढ़ गयी है। -~-फिर तुमने मुझगे क्यों शादी परी? इस पर कमला कहती थी-जी नहीं । मैंने शादी नहीं की। शादी के लिए कोशिश बापकी तरफ से शुरू हुई थी । बल्कि गुरू में मैंने धातियो पो।स पर मापने कहा था कि मैं तुम्हारी मां को तुम्हारे पास रख दूंगा। तभी दो में राजी हुई पी। लेकिन उस समय मुझे क्या पता था कि मुभरी भाशेरने के पीछ बापका मह यभिप्राय था। जयमुन्दर पावू मानो पश्चात्ताप करते हुए पहले ये-उस समय मैंने सोचा पा कि मैं को कुछ कहूंगा, सुम करोगी। इस पर कमसा रहती थी-बाप कोपही है, मैं यही परखी है। गिर उग एक काम के लिए धाप मुझसे मत कहें । मुमसे वह नाम नहीं हो सोगा।

४६ ॥ शुभ संयोग - लेकिन यह तो वताओ कि मैं क्या करूं ? आजकल यही फैशन हो गया । कारोवार चलाने के लिए लोगों को शराब पिलानी पड़ती है। जो शराव नहीं पिलाता, उसका कारोबार नहीं चमकता। कमला कहती थी-मैंने कब मना किया है कि आप दूसरों को शराव मत पिलायें । बस, मैं नहीं पी सकती। -लेकिन भाजकल का वह नियम नहीं है। नियम है कि पार्टी में पति-पत्नी दोनों को मौजूद रहना पड़ेगा। दोनों को मिल कर अतिथियों का आदर-सत्कार करना पड़ेगा। -आपका कहना सही है। लेकिन जिसके घर में पत्नी नहीं है, वह क्या करता है? -~-वह अपने कारोवार से अधिक रुपया नहीं कमा सकता । उसका कारोबार धीरे-धीरे चौपट होने लगता है। इस पर कमला कहती थी लेकिन आप इतना रुपया ले कर क्या करेंगे? आपको कितने रुपये की जरूरत पड़ती है ? अब तो आपके पास काफी रुपया हो गया है- फिर भाप रुपये के पीछे क्यों हाय-हाय कर रहे हैं ? हमारे तो सिर्फ दो ही लड़के हैं। जयसुन्दर बाबू कहते थे.----रुपये के पीछे हाय-हाय करना क्या कभी खत्म होता है ? रुपया रहने पर ही तो मन में साहस रहता है। मैं रुपया कमाता हूँ, तभी तो तुम माराम से रहती हो । जव भी मन में होता है, गहने खरीदती हो। बच्चे अच्छी तरह पढ़-लिख रहे हैं । रुपया न रहता तो क्या यह सब होता? फिर जरा रुक कर जयसुन्दर बाबू कहते थे-रुपया न रहने पर कितनी तक- लीफ होती है, यह तो तुम नहीं जानती! मेरे जीवन में एक ऐसा समय था, जब कभी-कभी मुझे भोजन भी नसीब न होता था। राधेश्याम बाबू की कोठी में पन्द्रह रुपये की नौकरी करता था। उसी पन्द्रह रुपये में महीने भर का खर्च चलाता था। किराये पर कमरा भी न ले सका था और कालीघाट के मन्दिर में रात को पड़ा रहता था। फिर आज जो कुछ हुआ है, उसके पीछे राधेश्याम वावू की बहुत बड़ी दया है। उन दिनों में खाली समय में सड़क पर गमछे की फेरी करता था। उन्हों दिनों राधेश्याम बाबू ने मुझको बुला कर दो हजार रुपये दिये थे। उसी उधार की रकम से मैंने धोती-साड़ी का काम शुरू किया था। तभी से मुझ पर लक्ष्मी की कृपा होने लगी है। उसी के वाद तुम मेरे यहां टाइपिस्ट बनकर आयी। जयसुन्दर वाबू की आप-बीती सुनकर कमला कहती थी—यह सब तो मैं जानती हूँ। यह सुन कर जयसुन्दर बाबू कहते थे-हाँ, यह सब तो पहले भी बता चुका ।

- गुम संयोग ४० हूँ। लेकिन मात्र उहाँ तक पट्टेच सका है; वहाँ सा पहुंचने के बाद उन पुराने दिनों को बातें बार-बार कहने को मन करता है । वमी तो यह सब तुम्हें सुनाता हूँ। इस पर कमला पहती पी-सेनि एक ही दात बार-बार सुनना बन्दा नहीं समता। यसुन्दर याबू पहले ये-घर, एक बात तो समनने कोशिश करो। मेरा काया क्या तुम्हारा रुपया नहीं है ? बासिर में गिरे लिए इतना रपया कमाता हूँ ? तुम्हीं सोगों के लिए न? फिर अधिक से अधिक रपपा समाना गया बुरा है? कामता कहती पी-आप अपने लिए एपमा फमाठे हैं। बापको रुपमा कमाने का नगा लग गया है, इसीलिए बार कमाते हैं ! बार हमारे लिए क्या समाते होंगे? -हा-हो, क्यों नहीं ? यह सारा रपया लेकर मैं स्वर्ग पाऊंगान? इस पर कमना बिगड़ जाती पो। पहती पो-बार पानी लीस पाने पास रखें। इसके बाद जपसुन्दर वावू यही ज्यादा देर नहीं रक्त से। यहां से गाडे समय कमला से पहते थे- तुम बगर मेरी बात न मानो तो तुम्हारे साप रहने से फायदा ? तुम यानी मां के साय बमग रह सकती हो। फिर भी कमला कहती पो-यैक तो है। बाप हमारे अलग रहने या इन्य- बाम कर दीजिए न? इस पर जपसुन्दर बाबू रहते थे—तुम दोनो को बजग मशान में रहने की जरूरत नहीं है, मैं ही मुद बलग रहने का इन्तजाम कर सूंगा। इतना कह कर जयमुन्दर बाबू कमरे से निकल जान थे। सुरवात इसो सरह हुई पो। इसी तरह एक दिन पपगुन्दर बाबू नन्दन स्ट्रीट पाला मरान घोरपर फ्लैट में धसे गये थे। फिर नया प्लेट खरीदने में देर न सगी पो । उपगन्दर बाबू के पास रुपया पा, इससिर उनो रिस बात को चिन्ता दो? बमलेट में जाने का मतलब पा, धनग पर बसाना । उन्हीं दिनों वह निशिकान्त दाम का पचापा।

४६ ॥ शुभं संयोग -लेकिन यह तो बताओ कि मैं क्या करूं ? आजकल यही फैशन हो गया है । कारोबार चलाने के लिए लोगों को शराब पिलानी पड़ती है। जो शराब नहीं पिलाता, उसका कारोवार नहीं चमकता। कमला कहती थी-मैंने कब मना किया है कि आप दूसरों को शराब मत पिलायें। बस, मैं नहीं पी सकती। लेकिन आजकल का वह नियम नहीं है। नियम है कि पार्टी में पति-पत्नी दोनों को मौजूद रहना पड़ेगा। दोनों को मिल कर अतिथियों का आदर-सत्कार करना पड़ेगा। -आपका कहना सही है। लेकिन जिसके घर में पत्नी नहीं है, वह क्या करता है? —वह अपने कारोबार से अधिक रुपया नहीं कमा सकता । उसका कारोबार धीरे-धीरे चौपट होने लगता है। इस पर कमला कहती थी लेकिन आप इतना रुपया ले कर क्या करेंगे? आपको कितने रुपये की जरूरत पड़ती है ? अव तो आपके पास काफी रुपया हो गया है- फिर आप रुपये के पीछे क्यों हाय-हाय कर रहे हैं ? हमारे तो सिर्फ दो ही लड़के है। जयसुन्दर वावू कहते थे-रुपये के पीछे हाय-हाय करना क्या कभी खत्म होता है ? रुपया रहने पर ही तो मन में साहस रहता है। मैं रुपया कमाता हूँ, तभी तो तुम गाराम से रहती हो । जव भी मन में होता है, गहने खरीदती हो । बच्चे अच्छी तरह पढ़-लिख रहे हैं । रुपया न रहता तो क्या यह सव होता? फिर जरा रुक कर जयसुन्दर वावू कहते थे-रुपया न रहने पर कितनी तक-. लीफ होती है, यह तो तुम नहीं जानती! मेरे जीवन में एक ऐसा समय था, जब कभी-कभी मुझे भोजन भी नसीब न होता था। राधेश्याम वावू की कोठी में पन्द्रह पये की नौकरी करता था। उसी पन्द्रह रुपये में महीने भर का खर्च चलाता था। राये पर कमरा भी न ले सका था और कालीघाट के मन्दिर में रात को पड़ा हता था। फिर आज जो कुछ हुआ है, उसके पीछे राधेश्याम बाबू की बहुत बड़ी है। उन दिनों में खाली समय में सड़क पर गमछे की फेरी करता था। उन्हों हों राधेश्याम बाबू ने मुझको बुला कर दो हजार रुपये दिये थे। उसी उधार की न से मैंने घोती-साड़ी का काम शुरू किया था। तभी से मुझ पर लक्ष्मी की होने लगी है । उसी के वाद तुम मेरे यहाँ टाइपिस्ट बनकर आयी। जयसुन्दर बाबू की आप-बीती सुनकर कमला कहती थी-यह सब तो मैं . , यह सुन कर जयसुन्दर बाबू कहते थे-हां, यह सब तो पहले भी बता चलता , गुन संमोग 10 हूँ। सेक्नि बार उहाँ तक प?ष सका है। वहां तक पचने में कार न पुराने दिनों को वा बार-बार कहने को मन करता है। तभी तो यह सब तुम्हें मुनाता हूँ। इस पर बनमा कहती पो-सेरिन एक हो दान बार-बार सुनना बन्दा नहीं सगता। यसुन्दर बाबू कहाँ पे-खर, एक बात तो ममनने की योगिन रो। मेरा रुपया क्या तुम्हारा रपया नहीं है ? बाविर में रिम लिए इतना रपया कमाता है ? तुम्हीं लोगों के लिए न ? रिर यपिक से यधिक रपया कमाना पा फमला कहती थी-याप वपने लिए सपा कमाते हैं। वारपसारमाने का नशा लग गया है, इसीलिए माप समाते हैं ! बार हमारे लिए पापना होंगे? -हा-हो, क्यों नहीं ? यह सारा रुपया सेकर में स्वर्ग पाऊंगान? इस पर कममा विगढ़ बातो पो। कहती पो-बार करनी दोन पाने पास रखें। इसके बाद उपगुन्दर पावू वहाँ ज्यादा देर नहीं रहते थे। यहां से बावे समय कमला से पहले पे- तुम बगर मेरी बात न मानो तो तुम्हारे साप रहने से फायदा ? तुम करनी मां के साथ यसग रह सकती हो। फिर भी कमला बहती पो चैक तो है । बाप हमारे बसग रहने का इन्त- जाम कर दोषिए न? इस पर अपमुन्दर दावू पहने ये-तुम दोनों को बनग मकान में रहने की वरूरत नहीं है, मैं ही खुद बसग रहने का इन्तान पर मूंगा। इतना कह कर बयनुन्दर बाबू कमरे से निकन बावे थे। गुरुवात इसी तरह हुई पो। इसी तरह एक दिन उपमुन्दर बाबू नन्दन स्ट्रीट वारा मकान छोड़ कर फ्लैट में बसे गये थे। शिर नया प्लैट खरीदने में देर न सगी पौ। बन्दर वावू के पास रुपया था, इसलिए उनको रिस बात को चिन्ता पो बसलेट में जाने का मजला पा, बरग पर बसाना । उन्ही दिनों यह निशिरान्त दान का पचा पा।

४८ शुभ शुभ संयोग । जयसुन्दर वावू के दिमाग में हमेशा नया-नया कारोबार शुरू करने की बात आती थी। जब किसी का अच्छा समय आता है, तब वह जो कुछ चाहता है उसे मिल जाता है। तभी उस निशिकान्त ने आकर जयसुन्दर वाव के सामने एक नया प्रस्ताव रखा। जयसुन्दर बाबू ने पूछा-आपकी तारीफ? ? आगंतुक ने कहा- मुझे निशिकान्त दास कहते हैं। जयसुन्दर बाबू ने कहा-आप अपनी पूरी वात वताइए। -आपके पास तो हार्डवेयर का भी विजनेस है ? आप हमारी कम्पनी को माल की सप्लाई क्यों नहीं करते? जयसुन्दर वाबू ने कहा- मौका मिलेगा तो क्यों नहीं करूंगा? मेरा काम ही तो वही है। कितने का माल देना पड़ेगा? -यही समझ लीजिए कि दो लाख रुपये का। -लेकिन कैसे माल की सप्लाई करनी पड़ेगी ? --स्टील वैरल का । है आपके पास ? दे सकेंगे उसकी सप्लाई। जयसुन्दर बाबू ने पूछा-टेंडर देना पड़ेगा? निशिकान्त ने कहा-वह सब आप मुझ पर छोड़ दें। ~~~क्यों ? आप मेनिपुलेशन कर सकेंगे? ~~~-जरूर ! नहीं तो किसलिए कह रहा हूँ ? आपको आर्डर मिल जाय, बस । बाकी जिम्मा मेरा है। हमारे जो चेयरमैन हैं न, मेरे बड़े खास आदमी हैं । --टेंडर एप्रन्ड होने के बाद माल सप्लाई करने के लिए कितना समय देंगे? -यही समझ लें कि पांच महीने । जयसुन्दर वावू मन ही मन बहुत खुश हुए। उन्होंने हाथ बढ़ा कर घंटी वजायी। घंटी बजते ही चपरासी ने आकर सलाम किया । , -~-दो कप काफी लाओ काफी आयी। काफी का प्याला होंठों से लगाते हुए जयसुन्दर बाबू ने पूछा- आप इस कम्पनी से कैसे जुड़े हुए हैं ? -~-मैं इस कम्पनी का चीफ इंस्पेक्टर हूँ। जयमुन्दर वाबू बोले-फिर तो आप सारा माल चेक करने के बाद रिपोर्ट देंगे? -जी हाँ। -- ----फिर तो माल पास कराने में कोई रिस्क नहीं है ?

शुभ संयोग ! ४६ -जो नहीं । जरा भी रिस्क नहीं है । उस मामले में आप निशाखातिर रखें। जब तक मैं हूँ, कोई कुछ नहीं कर सकता। जयसुन्दर बाबू ने पूछा-लेकिन आप लोग तो अखबारों में विज्ञापन देंगे हो ? ---नाम के वास्ते वह तो देना ही पड़ेगा। आप उसके लिए परेशान न हों। लेकिन आपको दो काम करने पड़ेंगे -कैसे दो काम? -बचाता हूँ। पहला यह कि आपको पार्टी देनी पड़ेगी। --पार्टी का मतलब ? काकटेल पार्टी ? जी हां। हमारे चेयरमैन मिस्टर बनर्जी को उसमें बुलाना पड़ेगा। - लेकिन वह पार्टी किस बहाने दी जाय? - अरे, पार्टी देने, यानी खिलाने-पिलाने के लिए बहाने की क्या कमी है ? यही समझ लीजिए कि बाप लोगों की मैरिज एनिवर्सरी है या और कुछ । यह सुन कर जयमुन्दर बाबू कुछ गम्भीर हो गये। निशिकान्त ने यह भांप लिया और कहा--आप बचानक गम्भीर हो गये ? जयमुन्दर बाबू बोले-शादी को सालगिरह मनाने में जरा परेशानी है। वैसे समारोह में मेरी पत्नी को मौजूद रहना पड़ेगा, लेकिन इस समय उनकी तबीयत खराब चल रही है। वे उस पार्टी में शामिल नहीं हो सकेगी। -~~-फिर आप बेटे का वर्थ डे मनाइये या वैसा और कुछ कीजिए । --तेकिन मेरे बेटे दार्जिलिंग में रह कर पड़ते हैं। निशिकान्त बोला-फिर आप अपनी कम्पनी को सिलवर जुबली मनाइये। अगर आप पार्टी देना चाहेंगे तो कोई न कोई बहाना मिल जायेगा । र, सब बाद में सोचा जायेगा। फिर जयमुन्दर बाबू ने पूछा-आपको और शर्त क्या रहेगी ? निशिकान्त बोला-आपका दूसरा काम यह होगा कि मुझको कुछ -आपको क्या देना पड़ेगा? -देखिए, आपको दो लाख रुपये का बार्डर मिल रहा है। उसमें मेरा भी कोई शेयर बनता है । कम से कम फाइव परसेंट तो मिलना ही चाहिए । इसी तरह निशिकान्त ने फाइव परसेंट पर शुरू किया था। जयमुन्दर वावू को उन दिनों की बातें अच्छी वरह याद पौं। पहला बार्डर मिलने से पहले ही उन्होंने एक बड़े होटल में पार्टी दी थी। इस वरह शुरू में उनका कुछ पंसा खर्च हो गया था। मिस्टर बनर्जी उस कम्पनी के चेयरमैन थे। उन्हीं के हाथ में सब कुछ था। मालिक को बहुत बड़े उद्योगपति थे। वे वंगाली नहीं थे। सारे भारत में उनका कारोबार फैला हुआ था। यह कभी कलकत्ते में रहने थे, तो - ५० गुन योग कमी वन्बई में और कनी तमिलनाडु में। कलकत्ते में उनका जो विजनन था, उनके चेयरमैन ये निस्टर वनर्जी। निलर बनर्जी इंगलैंड ने विजनेस मैनेजमेंट पास करके बाये थे। बाद में उन्होंने कम्पनी नेक्रेटरशिप की परीक्षा भी दी थी। मीनिस्टर वनों ने उस पार्टी में हस कर कहा था-आप मुझे बिल्ली नत बचनुन्दर बाबू ने कहा था- आपने तो बस तीन पेग ली है, और एक-वी पंग लीजिए। नितर बनर्जी ने कहा था-दोपहर में तीन पेग ली है। एक जगह लंच था, इसलिए वहां नी पीना पड़ा। इसीलिए व पीने को नन नहीं कर रहा है। इस पर निमितान्त ने कहा था यह कैसे हो सकता है सर? आप हो के लिए यह पार्टी दी गयी है और बाप अगर हाय अनेट कर के रहेंगे तो सारा इंत- नान वकार नायगा । आप ही सर, आज हमारे चीफ है ! निशिकान्त की बात सुन कर निस्टर बनी हॉों में गुस्कराने लगे थे। -~ीक है, तिर हात दीजिए। नि एक बार हाफ ले कर निर बनर्जी को छुटकारा नहीं मिला। वह एक- एक कर कई बार हाक लेने चले गये। जब लगनग दर पंग दिन्को चन्ची, बनिस्टर बनर्जी की जवान लड़बड़ान बगी। उन्होंन सानो हल्लाते हुए निशिकान्त से पूछा-~-टोटल कितने निशि- निनिकान्त ने कहा-जनी व्या टोटल करना है दर, पात्र ही पंग तो हुए। निस्टर वनों ने लड़बड़ानी बवान में कहा-त्र? तुनने टोक से गिना है निरिक्षान्त बोला-जर, बार पी रहे हैं बार में उसका हिसाव नहीं लूंगा? वारने व्या निनिकान्त को मेवा समन लिया है कि वह भाउको दस पंग पिला कर पांच रहेगा और कारको मुमोदन ने डांगा? फिर तो यापक नाय उनका रहता ही देकार है। निरनिस्टर वनों ने जयमुन्दर वायु को तरफ देख कर कहा-मानत हैं। निरवीन, में पहले यह कद दाद-और नहीं पीता था। लेकिन जिस बार स्टेट्न गया था और वहां छः नहीन रहना पड़ा था, सी बार यह बादत पड़ी थी। क्रेने में सनद नहीं दीवजा था तो एक पत्र में बा कर के जाता था। फिर वहीं ग्लान ले कर लेनमा । तव में यह नादत पड़ी है। स पर उपन्दर बाबू ने कहा-कर, बाको कम्पनी के लिए बहुत म्हटना गुन संयोग! पड़ता है। इसलिए बार रात-दिन टैगन में रहते हैं। बार यमर रोग शेड़ी-सी पोनिया करें तो कोई नुक्सान नहीं होगा । दवा को खुराक को वह पिया करें दो रात को बच्छी नींद भी बायेगी और काम करने की क्षमता भी बढ़ेगी। फिर अपनी तरफ इशारा करके पयमुन्दर वाद ने कहा- मुझको दो देश रहे हैं । अपनी कम्पनी के लिए मुझे भी बहुत सुटना पड़ता है, लेकिन मैं कभी टापई नही होता । इसका कारण यही है कि मैं पेज रात को सोने से पहने निश्चित माना में अल्कोहल लेता हूँ। उसके बाद अप रक कर पूछा और एक बाधा दूसर? मिस्टर बनर्जी ने पूछा--कितने वो? अपने हाथ में पड़ी बंधी पी, लेकिन मिस्टर वनी को उसका स्याल नहीं था। जयसुन्दर बाबू बोले-~यमी सादा रात नहीं हुई है सर, दस दजे हैं। मिस्टर बनर्जी ने कहा-~-फिर ज्यादा मत दोरिए । यस, थापा का है। इसी तरह इस बार दो लाख रुपये के पैरल को ससाई कर यमुन्दर वा नै मोटी रकम कमायी पौ। फिर दूसरे ही दिन निशिकान्त वाया। बाडे हो जपणुन्दर बाबू से पूछा--- कहिए, कैसा रहा सर ? अब तो मेरी बात पर विस्वास हुवा ? जयसुन्दर दावू बोले-जी हां, बापके चेयरमैन दो बड़े बच्दै बादमी हैं । ~~~-fa मेरा पावना कर देंगे? उपयुन्दर बाबू ने कहा-लेक्नि वभी वमा ? पहले क्खबार में एपमेंट छी, मेरा टेंडर मंजूर हो बार मुझे सप्लाई का ठेका मिले उन दो? निशिकान्त ने कहा- देखिए सर, में वापको एक बात पहले से दवा देना चाहता हूँ। मैं जिस तरह गोटो लास करना जानता है, उसी तरह से चियाना भी । बापने तो शुरू में विश्वास ही नहीं करना चाहा था, लेकिन यर तो दे दिया किमिस्टर वनर्जी किस तरह मेरी मती में हैं ! वपमन्दर वाबू ने कहा~हो। फस तो मिस्टर बनर्जी सगमग वाण्ड पेग पी गये। निशिकान्त बोला-बापने तो देख लिया कि किस तरह पांच पंग मह कर उनको बारह पंग ह्विस्की पिला दी। लेक्नि मिस्टर वनी को घर तौटने में कोई परेशानी तो नहीं हुई ? -परेशानी दयो होगी? में उनको सोधे पर पहुँचा कर ही अपने घर सोटा पा। बाप पा समनते हैं कि मैं कोई कच्चा पास कहंगा? जयसुन्दर बाबू ने कहा- मेरो वह और भो तो सप्तापर है। क्या वे सभी मिस्टर बनर्जी को शराब पिलाने हैं ?

५२ || शुभ संयोग - क्यों नहीं पिलायेंगे ? लेकिन वताया न, मैं बीच में रहता हूँ। इसलिए हर कोई ना कर टांग नहीं अड़ा सकता। मैं इस कम्पनी का चीफ इंस्पेक्टर हूँ। मैं अगर माल पास न करूं तो चेयरमैन को चाहे कोई कितनी शराब पिलाये, कुछ नहीं कर सकता । इसलिए जिससे कुछ मिलेगा, मैं उसी का माल पास करूंगा। -क्या वे सब आपको कुछ नहीं देते ? -क्यों नहीं देते ? लेकिन बहुत कम देते हैं । इसीलिए मैं आपके पास आया हूँ। आप मुझे अच्छी रकम देते रहिए, मैं भी आपको सभी आर्डर दिलाता रहूंगा। जयसुन्दर वाबू ने पूछा-फिर इस समय आपको कितना देना पड़ेगा? निशिकान्त वोला-इस महीने में अभी तक बोहनी ही नहीं हुई। इसलिए कम से कम दो हजार रुपये दीजिए। इसके बाद जब आर्डर मिल जायेगा, तब वाकी रकम दे दीजिएगा। -लेकिन आर्डर न मिला तो? निशिकान्त वोला-जनाव, मैं आदमी पहचानता हूँ। मैं कभी आपको धोखा नहीं दे सकता। फिर जयसुन्दर वावू ने अधिक वातचीत में समय न गंवा कर निशिकान्त को पहले ही एक हजार रुपये दे दिये थे। उस समय इसी तरह झमेला खत्म हुआ था। लेकिन उसके बाद आश्चर्य हो गया था । जयसुन्दर बाबू को उतनी उम्मीद भी नहीं थी। लेकिन जब उनको दो लाख रुपये के बैरल का आर्डर मिला था, तब बड़ा आश्चर्य हुआ था। फिर उसके लिए निशिकान्त को दस हजार रुपये देने पड़े थे। जयसुन्दर वाबू को उस सप्लाई में पचास हजार रुपये का फायदा हुआ था। उस वार भी जयसुन्दर वावू नन्दन स्ट्रीट वाले मकान में जाकर कमला से मिले थे। गिरि ने आकर दरवाजा खोला तो जयसुन्दर वावू ने पूछा-तुम्हारी माता जी कहां हैं ? --माता जी पूजा कर रही हैं । गिरि ने क्या जवाब दिया, पूरा सुने बिना ही जयसुन्दर वावू अन्दर चले गये। लेफिन फमला उस समय पूजा कर रही थी। फब उसकी पूजा समाप्त होगी, कोई, ठिकाना नहीं था।

शुभ संयोग। ५३ घंटे भर के रहने के बाद जयमुन्दर वाढू लोटने लगे थे। कमला के लिए जैसे पूजा यो, वैसे उनके लिए उनका अपना काम था। हाप पर हाप घरे बैठे रहना उनके लिए सम्भव नहीं था। लेकिन तमी बचानक कमला कमरे में बापी। बाते ही उसने पूछा-बार कब आये? असमुन्दर बाबू बोले- काफी देर हो गया है। एक घंटा हो गया होगा। -~~-पा कोई खास बात है? -खास बात न रहने पर क्या नहीं बाना चाहिए ? कमला बोली-बाप ही ने मुझे अलग कर दिया है ! अलग कर देने पर फिर कौन सी बात रह सकती है? -मैंने तुम्हें अलग किया है, या तुमने मुझे अलग पर्नेट में रहने के लिए मजबूर कर दिया है? कमला ने कहा-वह तो आपने मुझे यहां छोड़ कर अलग रहने के लिए अलग पतंट खरीद लिपा ? मैंने तो आपसे अलग रहने के लिए नहीं कहा था? यह मकान भी आपका है और इस पर का खर्च भी वापके पैसे से चल रहा है । मैं तो इसमें कुछ भी नही हूँ। जयमुन्दर वावू बोले-तुम अगर रात-दिन पूजा पाठ ले कर रहोगी वो कौन मुझे देखेगा? कमला बोली- यह जो मैं पूरा करती हूँ, यह क्या अपने लिए ? बाप सबके भले के लिए मैं पूजा करती हूँ। जयसुन्दर बाबू बोले-बगर तुम मेरा भला चाही हो मेरो चाप सुनती। कमला बोली- यह तो बताइए कि मैंने यापकी कौन सी बात नहीं मुनी ? जयमुन्दर बापू चोले-~~-यह जो मैं काक्टेल पार्टी देता हूँ, उसमें कनी तुम शामिल हुई हो? कमला बोली-पहले तो शामिल होती थी, लेकिन आप मुझमे भी पीने के लिए कहते थे। मैंने वापसे बार-बार कहा था कि मुमसे वह सब पीने के लिए मत कहिए, लेकिन आपने कभी मेरी बात नहीं मानी। जयमुन्दर चावू बोले-~-वह सब पीना क्या इतना बुरा है ? अगर दुरा होता वो सरकार उन शराबों का कारोवार ही क्यो किसी को करने देती ? बभी कई दिन पहले की बात याद करो न । मैंने कितनी बार तुमसे कहा कि मेरी पार्टी में चलो, लेकिन तुम नहीं गयो। कमला दोलो-मैने तो वापसे कह दिया था कि में फंसी पार्टी में नहीं जागो। हमेशा से मैं वही कहती यायो हूँ। जयमुन्दर बाबू ने कहा-इसीलिए तो मुझे पलट किरये पर लेना पड़ा, ताकि अब से मैं अपने पसंट में पार्टी दे सक।

|| शुभ संयोग IT । -क्या इस बार फ्लैट में पार्टी दी थी ? -नहीं, होटल में दी थी। बहुत बड़े फाइवस्टार होटल में यह पार्टी हुई थी। लिए बहुत पैसा फालतू खर्च हुआ। लेकिन कोई बात नहीं, फायदा भी काफी । सारा खर्च निकालने के बाद भी लगभग पचास हजार रुपये मिले हैं। कमला ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। इस पर जयसुन्दर वावू ने कहा- अरे, तुम तो कुछ बोल नहीं रही हो ? -बताइए, क्या वोल? -तुम क्या बोलोगी, यह भी मुझे बताना पड़ेगा? क्या यह सुन कर तुम्हें खुशी नहीं हुई कि मैंने पचास हजार का फायदा किया है ? कमला बोली-वह तो आपका रुपया है। दूसरों को शराब पिला कर आपने वह रुपया कमाया है। उससे मेरा क्या ? --मेरा रुपया क्या तुम्हारा नहीं है ? कमला ने कहा-आप बार-बार रुपये की बात मत करें । आप स्वस्थ रहें, सकुशल रहें, शांति से रहें । आपके बच्चे भी उसी तरह रहें । मैं हर समय भगवान से यही प्रार्थना करती हूँ। -लेकिन सुख-शांति के लिए तो रुपये की जरूरत है ! कमला बोली-क्या मैंने कभी यह इनकार किया है ? ---अगर तुमने इनकार नहीं किया, तो पार्टी में क्यों नहीं गयो ? कमला ने कहा-कहने पर तो आप विश्वास नहीं करेंगे, फिर भी कह रही कि मेरा भगवान वह पसंद नहीं करता। जयसुन्दर वायू ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। वह कुर्सी पर बैठे थे-खड़े हो गये । वोले-तुमसे कोई वात करना भी जहमत है। हर बात में वस भगवान और भगवान । अव तुम अपने भगवान को लेकर पड़ी रहो, मैं चला। अगर तुम अपने भगवान को लेकर ही पड़ी रहना चाहती हो तो रहो, लेकिन मुझको भूलना पड़ेगा। यह कह कर जयसुन्दर वावू उसी तरह वहाँ से चले, जिस तरह आये थे। उसी के बाद से जयमुन्दर वाबू ने नन्दन स्ट्रीट जाना बन्द कर दिया था। उन्होंने तय कर लिया था कि अब कभी कमला के पास नहीं जाऊंगा। कमला से शुभ संयोग। ५५ कोई सम्बन्ध भी नहीं रखूगा । वस, हर महीने कमला के पास सया भेज कर अपना कतव्य पूरा करूंगा। सिर्फ एक पति का तंव्य नहीं, बल्कि एक पिता का कर्तव्य भी नियम से पूरा करता जाऊंगा। जयमुन्दर बाबू ने अपने बड़े बेटे का नाम रखा था-अश्य । छोटे बेटे का नाम रखा था-विजय। दोनों लड़के साल-डेढ़ साल छोटे-बड़े थे। शुरू-शुरू में जयमुन्दर वाबू कमला थोर इन दो बेटों के साथ बड़े वाराम से रहने लगे थे। पति-पत्नी और दो बेटे ! किसो का इससे सुखी परिवार बोर हो सकता था? उन दिनों जयसुन्दर बाबू भी बहुत रपया कमाने लगे थे। मानो रुपये की वर्षा होने लगी थी । कमला का मिजाज भी उतना चिड़चिड़ा नहीं था। हर वक्त उसके चेहरे पर हंसी रहती थी। कमला कहती यो-मैं अजय को डाक्टरी पढ़ाउंगी और विजय को इंजीनियरिंग। जयसुन्दर बाबू कहते थे- क्या मेरे व्यवसाय में उनको पाने नहीं दोगी? जव मैं बूढ़ा हो जाऊंगा, तब वे दोनों मेरे व्यवसाय को देखभाल नहीं करेंगे तो कौन करेगा? कमला कहती थी-वह बाप समझेगे ! लेकिन मैं अपने बेटों को आपके व्यवसाय में किसी तरह जाने नहीं दूंगी। - लेकिन मेरे व्यवसाय मे कौन-सी कमी है ? कमला कहती थी-आपके व्यवसाय में जितने फरेबियो और मक्कारो से साविका पड़ता है, उतना किसी और काम में नहीं । वैसे लोगों को संगत मे रहने पर मेरे बेटे बिगड जायेंगे ! -क्या हमेशा फरेवियों और मवकारो से मेरा सावका होता रहता है ? -और नहीं तो दया ? सिर्फ फरेवी और मक्कार नहीं, जितने सारे शराबियो और कवादियों के बीच आपको उठना-बैठना पड़ता है। वैसे लोगों का साथ करने पर वया मेरे लड़के दिगढ़ नही जायेंगे? जयमुन्दर बाबू कहते थे-फिर क्या तुम मुभको भी उसी तरह का समभती हो? -और नहीं तो क्या? आप क्या समझते हैं कि मैं आपको बहुत मसा समझती हूँ? पयमुन्दर बाबू पिर भी कमला की बात को हलके ढंग से लेते थे वो थे-क्यों लड़कों के सामने मुझे इस तरह गाली दे रही हो?

५६ || शुभ संयोग कमला कहती थी-मैंने कोई गाली नहीं दी। आप जो कुछ हैं, वही बता रही हूँ। इस समय वे लड़के छोटे हैं, इसलिए कुछ नहीं समझते । लेकिन जब वे बड़े होंगे, सब कुछ समझ जायेंगे। उस समय आप उनको क्या जवाब देंगे? स्कूल में उनको जो फुछ पढ़ाया जायेगा, वे पढ़ेंगे । मच्छी-अच्छी बातें पढ़ेंगे और सीखेंगे। लेकिन बड़े होकर, समझदार होकर देखेंगे कि जो कुछ पढ़ा है और सीखा है, आप उसके विपरीत हैं। यह सुन कर जयसुन्दर बाबू कमला की बातों को गम्भीरता से लेते थे और कहते थे-स्कूल में जो कुछ पढ़ेंगे वह तो पढ़ेंगे ही, लेकिन तुमसे जो कुछ पढ़ेंगे उसी को ज्यादा सीखेंगे। तुम्हारी ही बातों पर अधिक विश्वास करेंगे! इस पर कमला कहती थी-इसीलिए तो कहती हूँ कि आप उन बच्चों को कहीं बाहर किसी स्कूल में भरती कर दीजिए। दार्जिलिंग में भी बढ़िगा स्कूल है और देहरादून में भी। यहाँ रहने पर आपके बारे में उनकी धारणा बदल जायेगी। फिर उसी के बाद जयसुन्दर बाबू अजय और विजय को दार्जिलिंग के बोडिंग स्कूल में भरती कर आये थे। तभी से वे बच्चे माँ-बाप से दूर रहने लगे थे। वीच-बीच में कमला जा कर उनको देख आती थी। इसमें खर्च तो अधिक होता था, लेकिन उसकी कोई चिन्ता नहीं थी। जयसुन्दर बाबू उन दिनों धुआंधार धन कमाने लगे थे । इसलिए उस समय उनके लिए कलकत्ते के बाहर जाना सम्भव नहीं था। जाने पर उन्हीं का नुकसान होता । लेकिन फायदा यही हुआ कि वह अपने वेटों से दूर होते गये। यह सव जयसुन्दर बाबू के प्रारम्भिक जीवन की बातें हैं। उन दिनों जयसुन्दर वावू के जीवन में सफलता की शुरुआत थी। व्यवसाय से अच्छी मामदनी भी होने लगी थी। ज्यों-ज्यों उनकी आय बढ़ती जा रही थी, अधिक से अधिक रुपया कमाने का नशा भी बढ़ता जा रहा था। रुपया कमाने की जो भी तरकीव जो बताता था, जयसुन्दर वावू वही करते थे। अगर कोई फहता था कि शराब पीने पर रुपया मिलेगा, तो वह शराब पीने लगते थे । अगर फोई कहता था कि पैट-कोट पहन कर साहब बन जाने पर आमदनी बढ़ेगी तो पह वही करते थे । कलकत्तं के न्यू मार्केट में जा कर नयी-नयी साहबी पोशाक का आठर देते थे। यानी, जव जैसी जरूरत पड़ती थी, जयसुन्दर वायू वैसा करते थे। कभी किसी कांग्रेसी से काम पड़ता था तो जयसुन्दर वावू अपना उल्लू सीधा पारने के लिए यहाँ खद्दर पहन कर हो जाते थे। केवल शुरू-शुरू में नहीं, वह जिन्दगी भर यही करते थे। उनका हर काम रुपये से जुड़ा हुआ था। उन्होंने सोचा था कि पूरी जिन्दगी इसी तरह कट जायेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। . , मुभ संयोग । ५७ बुढ़ापे में पहुँच कर अयसुन्दर बाबू को अचानक पापा मिली । अपाना वाघा निशिकान्त की तरफ से बापी। निशिकान्त हो उनके लिए परेशानी कारण बन गया। लेकिन यह निशिकान्त से हार मानने को तैयार नहीं थे। शुरू से अनवरत संघर्ष कर उन्होंने धन-दौलत और इज्जत-श्रावरू धादि जो कुस कमाया था, उसे जीवन के अंतिम दिनों में एक बदना निशिकान्त पौपट कर दे, यह उनके लिए बरदाश्त के बाहर को बात थी। निशिकान्त में ऐसी हिम्मत कैसे हो सकती थी कि उनको प्रतिष्ठा के स्वर्ग-शिखर से उठा कर नीचे नरक की गन्दगी मे । पटक दे! इसलिए जयसुन्दर वावू ने सोचा था कि कमला को जा कर राम पुष यशाया जाय । निशिकान्त के पत्र ने उनको इतना विचलित कर दिया था किदिल तोमर कर किसी को वह सब बताये बिना वह अपने को हलका महमूरा नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने सोचा था कि कमला कम से कम मेरे दुस को रामक रापेगो । मुगोवा के समय कमला कम से कम धीरज बंधाने के लिए दो-पार शब्द पदेगी। इनसान माफ भी वो करता जानता है । जयमुन्दर मावू मान थे कि उन्हें गलत ढग से बहुत रुपया कमाया था। आयकर विभाग को साव का भूत मला था । जीवन के सायकाल में पहुंच कर यह स्वीकार करने लगे थे किया का पार नही था, जो धन कमाने के लिए उन्होंने नहीं किया था। फ्टिनं है कि की सम्पत्ति हड़प कर उनको भिखारिन बना कर छोड़ाया। बिदर ही अगदी बेटों को शराब पिला कर वरवाद किया था और नग्नी बना दगार लिखा कर खुद हड़प ली थी। यह सब चाहे और सिनो मह र अ गौर निशिकान्त को सूव पता था। कहना चाहिए कि जयसुन्दर बाबू ने जो बडूत घट कर पा निशिकान्त को भरपूर मदद थी। वहीं धन अपमुन्दर वाद् ने 'दब रट करनी' और किसी को कुछ पता भी न चल पाया था। यहां तक कि कना भी यह सब नही जानती थी। कमला यह नही जानती थी कि कैसे-कैसे विकदम से जयमुन्दर बाबू ने रुपया कमाया था, लेकिन वह यह तो जानती थी कि जयसुन्दर बाबू ने उसके लिए कितना रुपया खर्च किया था। लेकिन उसके लिए कमाता उनका जरा भी एहसान नहीं मानती थी । कमला अपने पूजापाठ में दिनरात व्यरत रहती थी। लेकिन उसके सड़कों की पढ़ाई के लिए जयसुन्दर पाबू ने हजारों रपये सर्प किये थे। उन सड़कों वो दार्जिलिंग में रख कर पाया था। एक दरममा पा और इंजीनियर। लेकिन इन सड़कों के लिए अशुगर भागे कैसे और पहा रो रुपया में लगाया ५८ || शुभ संयोग । - था, उससे कमला को कोई मतलब नहीं था। उसके लिए तो उसका पूजापाठ ही सब कुछ था। उसके बाहर उसने कभी कुछ सोचने-समझने की कोशिश नहीं की। कमला को मानो जयसुन्दर बाबू के सुख का हिस्सा लेना था और उसने लिया भी, लेकिन उनके दुख से उसे कोई मतलब नहीं था। जयसुन्दर वाबू के दोनों लड़के भी कुछ नहीं जानते थे । उनको किसी बात की कमी नहीं थी और उसी से वे सन्तुष्ट थे। हाँ, बड़े हो कर वे यही जान सके थे कि माँ और बाप अलग-अलग मकान में रहते हैं। अजय जब कुछ वड़ा हो गया था, उसने मां से पूछा था-माँ, पिताजी अलग मकान में क्यों रहते हैं ? इस पर कमला ने कहा था-तुम्हारे पिताजी के पास बहुत काम रहता है, इसलिए उनको इस घर में आने का समय नहीं मिलता। -पिताजी के पास चाहे जितना काम हो, लेकिन रात को तो उनको घर आना चाहिए। वेटे की बात सुन कर कमला ने कहा था-उनको मौका नहीं मिलता, इस- लिए नहीं आते । लेकिन उससे क्या, वही तो तुम लोगों के पढ़ने-लिखने और खाने- पीने का सारा खर्च देते हैं । यह मकान भी तो उन्हीं का है ! अजय ने कहा था-लेकिन यह कैसी बात है ! मेरे जितने साथी हैं, सबके मां-बाप एक मकान में रहते हैं । आप लोगों का यह कैसा विचित्र नियम है माँ ? कमला अपने बेटे के सवाल का जवाव सहसा न दे सकी थी। फिर भी उसने कहा था-यह सव ले कर तुम क्यों सोचते हो ? इस पर अजय ने कहा था-नहीं मां, मैं इसके बारे में पिताजी से पूडूंगा ! हार कर कहा था-पूछ सकते हो। लेकिन यह भी बता देती हूँ कि वह बड़े व्यस्त रहते हैं । ऐसी बात पूछने पर नाराज हो सकते हैं ! अजय और विजय कुछ दिनों की छुट्टी में कलकत्ता आते थे और छुट्टी खत्म होते हो फिर हास्टल लौट जाते थे। लेकिन उस दिन अजय अपनी बात पर अडिग था । उस दिन रात को जयसुन्दर बाबू बहुत देर करके घर लौटे थे। आये दिन वह उसी तरह देर से घर लौटते थे, क्योंकि शाम होने पर ही उनका असली काम शुरू होता था । तमाम लोगों से मिलना पड़ता था। आये दिन पार्टी रहती थी। यह सब काम दिन में कम ही हो पाता था। जयसुन्दर बाबू के लौटते ही उस रात नन्द ने कहा-आपसे मिलने के लिए एक बाबू बैठे हुए हैं। कौन है ? जयसुन्दर बाबू ने पूछा। . कमला ने शुभ संयोग ] ५६ -यह तो बता नही सकता। जयसुन्दर बाबू ने कहा-पता नही, इतनी रात को कौन मिलने बाया ! तूने कहा क्यों नहीं कि वावू घर में नहीं है ? फिर मैं घर पर किसी से मिलवा भी नहीं। नन्द बोला-मैंने कहा था। फिर भी उन्होंने कहा कि मैं इन्तजार कर रहा हूँ। दफ्तर में बैठे हुए हैं। -~-क्या नाम है उस वावू का? यह तो नहीं पूछा। -बरे, यह तो पूछना चाहिए कि कौन आया है ! इवना कह कर जयसुन्दर वावू नही रुके । वह सीधे अपने कार्यालय में चले गये । वह मन ही मन नाराज थे और आगन्तुक के सामने अपनी नाराजगी प्रकट भी करना चाहते थे। लेकिन आफिस रूम में पहुँच कर देखा कि अजय है। अजय को देखते ही जयमुन्दर दावू मानो सकपका गये। वोले-अरे, तुम हो ? खडे वयो हो गये, बैठो। क्या खबर है ? कब आये ? -परसों आया। -परसो आये ? ठीक-ठाक हो न? पढाई कैसी चल रही है ? रुपये की जरूरत है? -~-जी नहीं। आप तो नियम से रुपया भेजा करते हैं । रुपये के लिए हमें जरा भी असुविधा नहीं है। फिर? यह पूछ कर जयसुन्दर बाबू ने अजय की तरफ देखा तो उन पर मानो धड़ों पानी पड़ गया । क्या कोई जरूरत न हो तो वेटा बाप के पास नही मा सकता ? अजय थोड़ी देर चुप रहा। जयसुन्दर बाबू बोले---कुछ बोल नही रहे हो? तुम्हारी माँ कैसी हैं ? -ठीक हैं। ---तुम्हें कोई जरूरत नहीं है ? -जी। -~-बोलो न, क्या चाहिए? कुछ कहोगे तो ? अगर कुछ भी नहीं कहना है तो पाये क्यों ? इतनी रात को क्या कोई किसी के घर आता है ? क्या तुम नहीं जानते कि मैं हर समय कितना व्यस्त रहता हूँ ? क्या तुम्हारी मां ने तुमको यह सब नहीं बताया ? देखते नही, तुम लोग नन्दन स्ट्रीट में रहते हो और भी यहाँ जा नहीं पाता... इतनी देर बाद अजय ने खामोशी थोड़ी और कहा-वही तो हने ६० ॥ शुभ संयोग -~-क्या कहने आये हो? ---आप हमारे साथ एक मकान में क्यों नहीं रहते ? -अच्छा ! यह पूछ रहे हो? यह कह कर जयसुन्दर वाबू ने ठहाका लगाया। उसके बाद बोले-बेटा, मभी तुम बच्चे हो । पहले बड़े हो जागो और उसके वाद यह समझो कि दुनिया क्या है, फिर सब कुछ तुम्हारी समझ में आ जायेगा ! इस समय तुम दोनों सिर्फ मन लगा कर पढ़ो-लिखो, ताकि लायक वन सको। मैं जो इतना लटता हूँ, वह इसीलिए। मेरे पिता जी मेरे लिए एक पैसा नहीं छोड़ सके थे । इसलिए मुझे वड़ा कष्ट उठाना पड़ा था। इसी शहर में मेरा ऐसा समय बीता है, जब आये दिन मुझे भूखों रहना पड़ा। उसके बाद पन्द्रह रुपये महीने पर एक नौकरी मिली। एक मारवाड़ी की कोठी में वही-खाता लिखता था । वह नौकरी करते हुए शाम को सड़क पर धूम-घूम कर गमछा वेचता था । पन्द्रह रुपये की नौकरी और गमछे की फेरी, दोनों एक साथ करता रहा । उसके बाद उसी मारवाड़ी से, जिसके यहाँ नौकरी करता था, रुपया उधार ले कर साड़ी-धोती बेचने लगा। इस तरह मुझे आगे बढ़ना पड़ा था। यह सब तुम नहीं जानते, लेकिन तुम्हारी माँ जानती है । आज यह जो 'बोस एण्ड कम्पनी' देख रहे हो, इसके पीछे खटने और पिसने का लम्बा इतिहास है। इतना कह कर जयसुन्दर वाबू ने थोड़ा दम लिया। अजय बड़े आश्चर्य से पिताजी के जीवन-संघर्ष की कहानी सुनता रहा । थोड़ा रुक कर जयसुन्दर बाबू कहने लगे-मेरी बात सुन कर शायद तुम्हें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। बड़ा कष्ट उठा कर बड़ा बना हूँ। इसलिए मैं नहीं चाहता कि मैने जैसा कष्ट उठाया है, वैसा तुम दोनों भाइयों और तुम्हारी मां को उठाना पड़े । तुम लोगों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए भाज भी मैं इतना कष्ट उठा रहा हूँ। अजय कुछ कहने जा रहा था, लेकिन बाधा पड़ी। नन्द ने कमरे में आ कर कहा-~मालिक, निशिकान्त वावू आये हैं। -~-ठीक है। यहाँ ले आ। निशिकान्त आया तो जयसुन्दर बाबू ने अजय की तरफ देख कर कहा-अब वो तुमने सुन लिया अजय ? मेरो वातों को याद रखना। मैंने अपने जीवन में जो पुछ किया है, वह सब तुम लोगों को सुखी रखने के लिए। तुम दोनों भाई अपने जीवन में खूब बड़े बनो, सुखी रहो और दीर्घायु हो, यही मेरी कामना है। उसके बाद मैं तुम्हारी मां के साथ काशी में जा कर जीवन के अन्तिम दिन विताऊंगा। अब तो तुमने देख लिया कि मुझे कितना काम करना पड़ता है। दिन भर खुटने के शुभ संयोग । ६१ बाद रात को भी मुझे चैन नहीं मिलता। यब यह संज्जन आये हैं और इनमे व्यवसाय के सम्बन्ध में वाव करूंगा। फिर बप नहीं बैठा। वह उठ कर बाहर जाने लगा। जयमुन्दर बाबू ने कहा-बहुत रात हो गयी है, वैसे घर लौटोगे? अजय बोला-चस मिल गयो तो उसी से चला जाऊंगा, नहीं तो रिक्शा कर लूंगा। ---कहीं खिशा न मिला तो? --पैदल चला जाऊँगा। षयमुन्दर वावू वोले-उतनी दूर पैदल क्यों पाओगे ? मेरे पास कार है। भैरा ड्राइवर तुम्हे घर पहुँचा देगा। इतना कह कर जयसुन्दर वाबू ने हाइवर वेणीलाल को बुलाने के लिए नन्द से कहा । वेणीलान वाया तो जम्मुन्दर बाबू ने उसे यावश्यक निर्देश दिया। अजय वेणीताल के साथ बाहर निकला। यह सब भी न जाने कब को बाते है । उसके बाद कितना लम्बा समम वीता। उन दिनो बजय बोर विजय कितने छोटे थे। दार्जिलिंग में रह कर स्कूल में पढ़ते थे । वहाँ को पढ़ाई समाप्त कर एक ने हाक्टरी पढ़ो और दूसरे ने इंजीनियरो। उसके बाद एक अमरीका गया और दूसरा नौकरी ले कर मिडिल ईस्ट फिर जप- मुन्दर बाबू को बेटों की पढ़ाई का खर्च नहीं देना पड़ता पा। दोनो बेटे यात्मनिभर हो गये थे । वे भी अच्छी बाय करने सगे थे। देटों की तरफ से जयसुन्दर बाबू निश्चिन्त हो चुके थे। लेकिन कमला साम एक मकान में रहना उनके लिए सम्भव न हो सका था। बद अगर कोई जयसुन्दर वाबू से उनके बड़े बेटे अजय की तरह यह सवाल पूछ बैठे कि आप यब भी कमसा के साय एक मकान में क्यों नहीं रहते, तो वह क्या उत्तर देंगे? अचानक वेणीलाल ने कार रोक दी। कार रकते ही जयमुन्दर बाबू को चिन्ता का बार टूटा। वेणीलाल ने पूछा-कार गैरिज में कर दूँ ?

६२ ॥ शुभ संयोग । - जयसुन्दर वायू कार से बाहर निकले । उसके बाद वह धीरे-धीरे सीढ़ी तय करते अपने मकान की ऊपरी मंजिल में जाने लगे। उस समय भी उनके कानों में कमला की बातें गूंज रही थीं। कुछ ही देर पहले कमला ने वह बातें कही थीं। कमला के घर में उस समय कीर्तन हो रहा था, जब जयसुन्दर वावू वहाँ गये थे । उस कीर्तन के पद भी उनके कानों में गूंज रहे थे। सचमुच, कमला को यह क्या हो गया है ? उस कीर्तन में उसे क्या रस मिला है ? जयसुन्दर वावू को उन दिनों की बात याद आयो जब कमला उनके पास नौकरी के लिए आयी थी। उस समय वह कितनी छोटी थी। सचमुच, क्या उम्र रही होगी उसकी ? उसके वाद नौकरी करते-करते एक दिन वह जयसुन्दर बाबू की पत्नी बन गयी। निशिकान्त के उस पत्र ने जयसुन्दर बाबू को अतीत की ओर मुड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। पता नहीं, किस आकर्षण से जयसुन्दर वाबू ने कमला से शादी की थी? अचानक नन्द का स्वर सुन कर जयसुन्दर वावू चौंक पड़े। -~-क्या है नन्द ? किसी ने टेलीफोन किया था ? -जी हाँ, एक आदमी ने टेलीफोन किया था। -कौन था? नन्द वोला-नाम तो नहीं बताया। -चया कहा? -पूछा कि आप घर में हैं कि नहीं। -तूने नाम क्यों नहीं पूछा? -पूछा था, लेकिन उन्होंने टेलीफोन रख दिया। जयसुन्दर बाबू अपने फ्लैट में चले गये । बहुत दिनों से वह उस फ्लैट में उसी तरह अकेले रह रहे थे । बाहर की कितनी ही घटनामों ने उन्हें विचलित किया था और अन्दर की कितनी ही घटनाओं ने विगलित । लेकिन वह सब घटनाएं उन्हें विशेष याद नहीं थीं। उन्हें बस इतना ही याद था कि जीवन के हानि-लाभ के जोड़-बाकी से जो हासिल हुआ था, वह था रुपया। वहुत रुपया उन्होंने कमाया था। जब जयसुन्दर वाबू को याद आया कि मेरे पास बहुत रुपया है, तभी उनको स्याल हुया कि निशिकान्त ने मौका समझ कर ही मेरे नाम यह पत्र भेजा है। तभी बाहर से नन्द की आवाज सुनाई पड़ी-मालिक, आपका खाना तैयार है।

अपनुन्दर वावु ने कहा- नहीं रे नन्द, बार खाना नहीं खाऊंगा । तू खा ले । करे की बनी बुन्न कर क्यमुन्दर बाबू लेट गये। बवेरा हो जानुन्दर बाबू को बड़ा बच्चा लगने लगा या । अधेरे में ठोक से सोचने का मौका मिला है। मनुष्य जब संकट में होता है, तभी शायद यह ठोक से अपने को देव पाता है। क्या जयनुन्दर बायु दर सबै ये? लेकिन वह तो कभी हरते नही थे । कभी किसी बात से डरने का भी नहीं ये ! उन्होंने सोचा, याखिर यह निशिकान्त क्या कर सकता है ? क्या वह पुलिस को खबर करके मुझे गिरफ्तार करायेगा? लेकिन सबूत क्या है कि पुलिस मुडे पडेगी? मैंने कभी कोई काम सबूत रख कर नहीं किया। जयमुन्दर बाबु रिविन्टरले ठे। बत्ती जलाने के लिए स्विच दवाया । कमरे में रोशनी भर मः। बारडोव खोल कर बादर वाढू ने कुरते को जेब से वह पर निकाला। फिर उस पत्र को पहा । बार-बार पढ़ा। कहीं निशिकान्त के नाम से किसी और ने वो पत्र नहीं निडा? लेकिन नहीं । बहुदा दादुनिशिकान्त की लिखावट को पहचानने थे। एक बार जपनुन्दर र लगाया कि इस चिट्ठी को लेकर पाने चला जाऊँ । थाने जा कर दहा मिचिट्ठी मिली है। या सीधे ही० सी० के पान जाऊ? हिप्टी कमिश्नर को बची टरह पहचानता हूँ। अच्छी जान-पहचान मी है । अनेक वार पार्टियों में उन साल है। बड़े मिलनसार हैं ! बपर डिप्टी कनिमरन अमिता कि क्या याप निशिकान्त दास को जानता है। टदा बदागा। जदा है रहना ठीक रहेगा, या नहीं जानता' ? दर ददु नै यही वताना निश्चय किया कि मैं निशिकान्त को निरन्तुन्दर दादू पुगिस के डिप्टी कमिश्नर से मन ही मन सवाल-जवात्र करणे - आनि निद्रिकान्त का क्या संबंध है ? क्या वह बोस एण्ट कम्पनी का पाटनर है? -पो नहीं, वैसा कोई पार्टनर नहीं है। मैं हम कम्पनी का एकमात्र. मालिक है । याता है, यह आदमी मुभ ग्रह मा या महा है। --क्ति दद्यकारण भाको हो रही बार उसको जानते होंग, बोंकि वह शादी मारता है।

६४ शुभ संयोग --हो सकता है कि उसे जानता हूँ। विजनेस में रह कर तमाम लोगों के सम्पर्क में आना पड़ता है, जिनमें से बहुतों को याद नहीं रख पाता। हो सकता है, यह निशिकान्त उन्हीं में से कोई हो । लेकिन उसकी हिम्मत तो देखिए । टेलीफोन नहीं किया, सोचे पत्र लिखा! एकदम ब्लैक एण्ड ह्वाइट में पत्र । उसने जरा भी नहीं सोचा कि यह पन पुलिस को दिखा सकता हूँ। -~-ठीक है। आप यह पत्र मेरे पास रहने दीजिए। जयसुन्दर वाबू ने सोचा, सचमुच पुलिस अगर मुझसे यह पत्र मांग कर अपने पास रख ले, तो? तो मैं क्या करूंगा? फिर निशिकान्त अगर अपने को बचाने के लिए मुझको मरवा डाले तो ? निशिकान्त जिस स्वभाव का आदमी है, वह सब कुछ कर सकता है ! फिर अगर वह मेरा खून न कराये तो पुलिस के पास मेरी सारी पोल-पट्टी खोल सकता है । उससे मेरी कलई खुल जायेगी और बड़ी वदनामी होगी। न जाने क्या-क्या सोचते रहे जयसुन्दर वावू । कलई खुल जाने का उन्हें बड़ा डर था । फिर तो सवको पता चल जायेगा कि जयसुन्दर बाबू की असलियत क्या है। अखबारों में उनका कच्चा चिट्ठा छपेगा तो क्या नाम छिपा रह जायेगा ? फिर तो उनकी वदनामी देश भर में फैल जायेगी। सब उनके कारनामों को जान जायेंगे। । जयगुन्दर बाबू को जानने वालों की कमी नहीं थी। कोई उनका मित्र था तो कोई प्रशंसक । लेकिन उनकी असली सूरत को देख कर सभी लोग हँसेंगे । उनमें से कुछ लोग टेलीफोन करके पूगे कि क्या माजरा है ? फिर जयसुन्दर बाबू किस- किस का मुंह बंद करते फिरेंगे और किस-किस की जवान रोकेंगे ? फिर तो मिट्टी खोद कर केंचुआ निकालने में सांप निकल आयेगा। तव क्या होगा? जयसुन्दर वाबू ने सोचा । जयसुन्दर वावू को राधेश्याम वावू का किस्सा याद आया। राधेश्याम बाबू जयसुन्दर बाबू के हितचिन्तक थे। उन्होंने अनेक बार रुपया दे कर जयसुन्दर वावू की मदद की थी। उन्हीं ने जयसुन्दर बाबू को रातों रात अमीर वनने का राज बताया था। लेकिन वही राधेश्याम बाबू बेमौत मारे गये थे । उन्हीं की कोठी में किसी ने उनकी हत्या कर दी थी। वह मामला पुलिस के रिकार्ड में दर्ज बहुत दिनों तक उसकी जांच-पड़ताल हुई थी। सिर्फ राधेश्याम बाबू की हत्या नहीं की गयी थी, बल्कि उनकी तिजोरी से कई लाख रुपये भी गायव किये गये थे। उसके बाद उस मामले की बहुत दिनों तक मलबारों में चर्चा हुई थी। बहुत से किस्से सामने आये थे। उन किस्सों को पढ़ हुआ था और शुभ संयोग ६५ कर देशभर के लोग राधेश्याम बाबू के नाम पर हंसे थे। फिर कोई नया सनसनीखेड मामला सामने आने पर राधेश्याम बाबू का मामला दव गया था। लेकिन मेरे मामले में क्या होगा ? जयसुन्दर वा सोचते रह । निशिकान्त को वो हर बात का पता है । जयसुन्दर बाबू के जीवन को बहुत सो ऐसी घटनाएं निशिकान्त जानता है, जो और कोई नहीं जानता । इसलिए निशिकान्त चाहे तो जयसुन्दर बाबू का सर्वनाश कर सकता है। उस बैरल वाली घटना से निशिकान्त का बागमन हुआ था। मामूली काक- टेल पार्टी देकर जससुन्दर बाबू ने हजारों रुपया कमाया था। उसी के बाद से निशिकान्त बराबर थाने लगा था। जयसुन्दर बाबू ने इसी तरह पार्टी दे-दे कर बोस एण्ड कम्पनी' की आमदनी दिन दूनी यऔर रात चौगुनी बढ़ायी थी। उन्होंने हर मार्डर में जो मुनाफा कमाया था, निशिकान्त ने उसमें से हिस्सा लिया था। यह हिस्सा पांच सौ रुपये से ले कर कमी-कभी दस हजार रुपये तक होता था । एक दिन निशिकान्त ने या कर कहा--सर, आज मैंने नौकरी छोड़ दी। यह सुन कर जयसुन्दर वावू को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा-यह क्या किया ? उतनी अच्छी नौकरी तुमने छोड़ दो ? निशिकान्त वोला-खाक अच्छी नौकरी थी ! आठ सौ रुपये को नौकरी को आप अच्छी नौकरी कह रहे है ? अगर मैं अपनी एनर्जी विजनेस में लगाऊँ वो रोज आठ सौ रुपये कमा सकता हूँ ! लेकिन एक बात है आप मेरी सहायता करेंगे न ? -मैं क्या सहायता करूंगा? निशिकान्त ने कहा- यह मैं आपको बाद में बताऊँगा। उसके काफी दिन बाद निशिकान्त आ धमका । बोला-सर, बड़ी अच्छी खबर है। किसी को कानो कान खबर न होने पाये। -~-पहले खबर तो बताओ । जयसुन्दर वाबू ने कहा । निशिकान्त ने बड़ी धीमी आवाज में मानो फुसफुसा कर कहा-एक लाख रुपये का एक मकान बड़े सस्ते में बिक रहा है। लैंगे ? जयसुन्दर बाबू बोले- मकान की कोई जरुरत नहीं है । फिर मकान ले कर क्या करूंगा? --अच्छा मुनाफा कमायेंगे, और क्या करेंगे? मकान के लिए कितना देना पड़ेगा? निशिकान्त बोला--यही समझ लीजिए कि वाठ-दस हबार । -~-बया कहते हो ? ठीक-ठीक मालूम है न? एक साख रुपये का मकान बाठ- दस हजार में कौन बेचेगा ? फिर तुम क्यों नहीं ले रहे हो ? । - ६६ || शुभ संयोग निशिकान्त ने कहा-मैं ? उतना रुपया मुझे कहाँ से मिलेगा? फिर उस मकान के लिए चार-छः दिन दौड़-धूप करनी पड़ी। निशिकान्त ने जो कुछ कहा था, सही था । वह एक विधवा का मकान था। विचौलिये वकील को कुछ खिलाना पड़ा । निशिकान्त ने भी कुछ खाया। लेकिन जो कुछ वचा, वह जयसुन्दर वावू को तिजोरी में गया। लेकिन बाद में कैसे क्या हो गया, यह जयमुन्दर वावू माज भी नहीं समझ पाते । उन्होंने इस पर बहुत सोचा, लेकिन कोई संगत कारण समझ में नहीं आया। उनको इतना ही याद है कि एक दिन वह विधवा उनके दफ्तर के सामने आ कर धाड़-मार कर रोने लगी थी। उसका उस तरह रोना सुन कर लोग जुट गये थे। रास्ते में भीड़ लग गयी थी। सबने उस विधवा बुढ़िया से पूछा था-क्या हुआ माई, क्यों रो रही हो ? लेकिन बहुत देर तक जयसुन्दर बाबू को वह दृश्य नहीं देखना पड़ा था । वोस एण्ड कम्पनी के दरवान ने पास के थाने में खवर की थी और एक कास्टेविल आ कर उस बुढ़िया को न जाने कहाँ ले गया था। कलकत्ते में अगर किसी के पास रुपया हो तो उसके लिए किसी का मकान हड़प लेना कोई मुश्किल काम नहीं है । तमाम गिरवी रखे मकान मिट्टी के मोल विकते रहते हैं । निशिकान्त वैसे मकानों का पता लगाता रहता था। ऐसे कितने मकानों और जमीन-जायदाद का पता निशिकान्त देता था। गिरवी रखे मकान या जमीन-जायदाद को छुड़ा कर खरीद लिया जाता था। वाद में उसी मकान या जमीन-जायदाद को ऊंचे दाम पर बेचा जाता था। जयसुन्दर बाबू को यह सब सलाह निशिकान्त हो देता था। फिर जयसुन्दर बाबू उस सलाह के मुताविक काम करते थे और रुपया देते थे। इस तरह जयसुन्दर बाबू ने बहुत कमाया था-लाखों रुपया कमाया था। निशिकान्त को उसमें से हिस्सा जरूर मिला था, लेकिन वह ऊँट के मुंह में जीरा जैसा था। सबसे भयानक और हृदय-विदारक घटना थी राधेश्याम बाबू की हत्या। दूसरों का खून चूसते-चूसते निशिकान्त खून का प्यासा बन गया था। एक दिन आधी रात को चोर की तरह निशिकान्त आ पहुंचा। -क्या बात है ? इतनी रात को ? जयसुन्दर बाबू उस समय धके-मारे सो गये थे । उनको जगाया गया था। निशिकान्त पसीने से तरबतर हो रहा था। उसकी हालत देख कर जयसुन्दर बाबू को बड़ा आश्चर्य हुआ था।

gettiman चारों तरफ एक निगाह अस कर निशिकारा मे रहा पापी जरूरत पड़ गयी है। ~रुपये को ? मितने रपये की हिरासिए बार पर गगी ! निशिकान्त बोला--पुलिस को देना पड़ेगा । रिमहा दो आरोप जायेगा। दो हजार रुपये दे कर जयसुन्दर मावू ने निशिकारा मो विदा किया। निशिकान्त भी रुपया मिलते ही चला गया। लेकिन दूसरे दिन सबेरे अखबार पढ़ते ही जयगुन्दर पार गो | again राधेश्याम बाबू की हत्या कर उनकी फोठी सूट सी भी 1 get fruी को frang न कर सकी यो। जांच चल रही थी। यह खबर पढ़ कर जयमुन्दर बाबू का मन गणाने गो का दो। फिर तीसरे दिन सबेरे भो अखबार में राधेश्याम बापू की दमाति खबर निकली । उस खबर में था कि पुलिस ने रामेश्याग बरपाल rastrit निशिकान्त दास नामक एक व्यक्ति को गिरणवार किया है। आज भी याद है कि यह खबर पढ़ते ही जयगुन्दर मावू पुरी ता गो थे । उनको यह सोच कर हर लगा था कि निशिकान्त कही गाने को न फंसा! फिर उसी दिन जयसुन्दर बाबू कसाता छोड़ कर गरे गये थे। लेकिन जाने से पहले जयगुन्दर बाबू ने एक काम पिया Ritam एक पलायंट के नाम एक खत डाल दिया था। रात में गीत निमा बारीख डाली गयी थी। अगर कभी उग मामले में अयगन्दा कामी या जाना पड़ता तो वह उस चिट्ठी को पेश कर ग्राषित करने frfanfaritram अगरवाल को हत्या हुई थी, उस दिन में कमाते में नहीं मा। क्लायंट के नाम वैमा सुन मंत्र कर अपगुन्दर बनाया। रावेश्याम अगरवास हत्याकांड के कारण अमुन्दा पाre fatuari थे, ना कुछ भी नहीं हुआ। दम्बई मा कर यह कम hirn देखते थे। एक दिन दर को किसान प्रसार दिन निमित्त दस को मिलतार किया है, ये amiricit है। मन की रिमी की हत्या नहीं है। यंग नहीं । इम दयान पर पुसिम को हारि.

६८ || शुभ संयोग महीना भर वम्बई में रहने के बाद जयसुन्दर वावू कलकत्ते लौट आये थे। उनके लौटने के बाद राधेश्याम वावू की हत्या का मामला सुनवाई के लिए अदालत में पहुंचा था। मुकदमे की सुनवाई के दौरान निशिकान्त पुलिस की हिरासत में ही था । उसे जमानत पर छोड़ा नहीं गया था। उसके बाद उसे दस साल कैद की सजा मिली थी। लेकिन वही निशिकान्त दास कब जेल से छूट कर आया, जयसुन्दर बाबू को इसका पता नहीं था। ये दस साल कव बीत गये, जयसुन्दर बाबू को स्याल ही न था। फिर उन्होंने मन ही मन हिसाव लगा कर देखा कि हाँ, दस बरस बीत चुके हैं ! फिर इतने दिनों बाद जेल से छूटते ही निशिकान्त दास ने उनको पत्र लिखा था! 1 -- थे। बोस एण्ड कम्पनी का आफिस रोज जैसे साढ़े दस बजे खुलता था, उस दिन भी वैसे सही समय पर खुला था । आफिस कोई खास बड़ा नहीं था। फिर भी एक आफिस में जो कुछ होना चाहिए, वह सब कुछ था । मैनेजर, क्लर्क, टाइपिस्ट और दरवान आदि सभी कर्मचारी थे। वे सब कर्मचारी वीस वर्षों से वहाँ काम कर रहे थे। हां, कुल मिला कर बीस वर्ष कम्पनी के मालिक थे जयसुन्दर बाबू । वह आयें, चाहे न आयें, दफ्तर के काम में फर्क पड़ने वाला नहीं था । वह जिस दिन अचानक चले आते थे, उस दिन जो चिट्ठियां रहती थीं, उन पर दस्तखत करते थे। फिर टाइपिस्ट को बुला कर फई चिट्ठियों के लिए डिवटेशन देते थे। उस दिन भी आफिस आते ही मैनेजर को रोज की तरह कुछ पत्र मिले । यह एक-एक कर उन पत्रों को उठा कर देखने लगे। पहला पत्र जवलपुर था और दूसरा मद्रास से । कई पत्र थे । मैनेजर सुशीतल बाबू हर पत्र को खोल फर पढ़ने लगे। सभी पत्र पुरानी पार्टियों के थे। अचानक एक पत्र पर निगाह पड़ते ही सुशीतल बाबू रुक गये । वह पत्र स्वयं मालिक ने, यानी जयसुन्दर वायू ने लिखा था । मुशीतल बाबू ने जल्दी-जल्दी लिफाफा फाड़ा । चर-चर की आवाज हुई। से आया ।

शुभ संयोग ६८ फिर पर निकाल कर क्षुशीतल वायू ने देखा कि उन्ही के नाम मिस्टर दोस_ पानी जयसुन्दर बाबू ने लिखा है। पता 'होटल सागर', पुरी का है । मिस्टर बो= ने वही से पत्र लिखा है। सुशोतल बाबू ने जरा जोर से निरापद को बुलाया। निरापद टाइपिस्ट था। मुशीतल वावू ने उसी से कहा-अरे निरापद, बड़े साहब पुरी गये हैं ! निरापद टाइप मशीन छोड़ कर मैनेजर साहब के पास आ गया । कहा-अचानक पुरी वयो चले गये सुशोतल बाबू दोले-क्यों गये, यह मैं कैसे बताऊँ ? चिट्ठी में बड़े साहब जो कुछ लिखा है, वही बता रहा हूँ। हर वार तो वह वता कर जाते हैं । इस वार शायद बताने का मौका नहीं मिला। फिर वो दफ्तर मर के लोग जान गये कि आज बडे साहब, यानी मिस्टर वोर नहीं आयेंगे। इसलिए बाराम से धीरे-धीरे काम करो। बन्दवाजी या हड़बई करने की जरूरत नहीं है । दस-पांच मिनट की देर होने पर बाज पोई डांटने वाल नही है । इस खबर से दफ्तर में मानो शान्ति था गयी। जिस दिन बड़े साहब नहीं आते, उस दिन कम्पनी के लोगों को बड़ा आराम मिलता है । उस दिन मुशीतल बाबू को भी बड़ा चैन रहता है। किसी के हुक्म को तामील नहीं करनी पड़ती। बड़े साहब का पत्र पढ़ लेने के बाद सुशीतल वावू ने दरवान को यावा दो-दुखमोचन, एक कप चाय लाओ, भैया। काम को जल्दी न रहने पर हर दफ्तर में चाय का दौर शुरू होता है। जयसुन्दर बाबू यह सब नहीं जानते, ऐसी बात नहीं थी। यह अच्छी तरह जानते थे कि कलकत्ते से हटते ही उनके दफ्तर के लोग काम में दिलाई करेंगे लेकिन वह भी तो एक काम था। रात भर नीद नही यापी यो । जयमुन्दर वाव दस मिनट भी सो न सके थे इसमें नीद का क्या कुमूर घा? जिन्दगी भर उन्हें न कैसा-वैसा झमेला झेलन पड़ा था। कंसी-कैसी मुसीवत उठानी पड़ी थी। जिन दिनों जयमुन्दर दाबू कालोपाट के काली मन्दिर में सोते थे, उन दिन वह रात को ठीक से सो नहीं पाते थे। बरसात के दिनों में तो कमी नहीं क्योकि पानो वरसते ही उसको बौछार से नींद खुल जाती थी। रात भर एक मिनट भो सो नहीं पाते थे। अब निशिकान्त के कारण जयमुन्दर बाबू सो नहीं पा रहे थे। सचमुच वह निशिकान्त भी एक आश्चर्य था। उसके लिए जयमुन्दर दावू ने क्या नहीं किय- ७०. शुभ संयोग था, लेकिन उसी ने उनको कितना कष्ट दिया। यदि शुरू से हिसाब किया जाय तो पता चलेगा कि कई वर्षों में उसने जयसुन्दर बाबू से एक लाख से अधिक रुपया लिया था। उसने आ कर जव भी हाथ फैलाया, जयसुन्दर वावू ने कुछ न कुछ दिया। कभी उसको खाली हाथ नहीं लौटाया। लेकिन सुशीतल वाबू ने कितनी वार जयसुन्दर वाबू से कहा है आप उस निशिकान्त को ज्यादा मुंह न लगाइए सर, वह आदमी ठीक नहीं है। इस पर जयसुन्दर वावू ने पूछा है-तुम्हें कैसे पता चला, सुशीतल ? किसी का चेहरा देख कर मैं बता सकता हूँ। सुशीतल ने कहा है । -~-फिर यह वतामो कि मैं कैसा आदमी हूँ ? सुशीतल बाबू ने कहा है-मैं आपका नमक खाता हूँ सर ! मैं तो आपका गुण ही गाऊँगा । मेरी बात रहने दीजिए। मालिक के बारे में कभी नौकर को अपने मन में बुरी धारणा नहीं बना लेनी चाहिए । सुशीतल वायू वगैरह कितने दिनों से जयसुन्दर वावू के आफिस में काम कर रहे थे, वे लोग क्यों उनकी निन्दा करेंगे? यदि बुराई करनी भी हो तो पीठ पीछे करेंगे । सामने कभी नहीं। सामने सभी जयसुन्दर बाबू की तारीफ करेंगे । लेकिन वे लोग निशिकान्त को सही पहचान सके थे। सुशीतल वायू ने और भी कहा था-देख लीजियेगा, वह कभी न कभी आपको चक्कर में डालेगा। अन्त तक सुशीतल बावू . की बात ही सही निकली। इसलिए उस दिन जय- सुन्दर बाबू खूब सबेरे ही घर से निकल पड़े थे। नन्द ने उनको देख लिया था और पूछा था--नहीं। तू किसी से कुछ मत कहना। -अगर कोई पूछे तो क्या कहूंगा? -अगर कोई तुझसे मेरे बारे में पूछता है तो बता देना कि मुझे कुछ नहीं मालूम। - उस समय दिन की रोशनी भी ठीक से नहीं निकली थी । कलकत्ता शहर का वह रुप जयसुन्दर बाबू ने बहुत दिनों से नहीं देखा था। पहले जब उनके सोने की जगह नहीं थी, खाने का ठिकाना नहीं था, तब उन्होंने शहर का वह रूप अनेक वार देखा था। जयमुन्दर वाबू निशकिान्त के मकान का पता भी ठीक से नहीं जानते थे। फिर वह थी भी तो बहुत दिन पहले की वात । उन दिनों वह भनेक वार अपनी कार से निशिकान्त को उसके घर के पास छोड़ गये थे। फिर वह अभी तक उसी मकान में है या नहीं, इसका भी क्या ठिकाना है । जयसुन्दर वावू ने सोचा। निशिकान्त के जेल जाने के बाद शायद उसके घरवालों ने वह मकान बदल - शुभ संयोग || ७१ दिया होगा । जयसुन्दर बाबू सोचते रहे। निशिकान्त के घर में कौन-कौन है, जयसुन्दर बाबू यह भी नही जानते थे। वह उतने दिनों वक निशिकान्त के सम्पर्क में रहे, लेकिन कभी उन्होंने यह सब जानने की कोशिश नहीं की। उसकी जरूरत भी नही पड़ी थी। निशिकान्त से उनका रुपये का सम्बन्ध था। निशिकान्त उनको रुपया ला कर देता था और वह उसको उसका हिस्सा देते थे। हिस्सा दे कर ही वह फुरसत पा जाते थे। जहां किसी से किसी का सम्बन्ध रुपये का होता है, वहां प्राणो के सम्बन्ध का सवाल ही नहीं उठता। किसी कम्पनी का मालिक क्या अपने हर कर्मचारी के घर का पता याद रखता है? वह वो सिर्फ उसी कर्मचारी के घर का पता जानता है, जिससे उसका व्यक्तिगत स्वार्थ जुड़ा होता है। निशिकान्त तो जयसुन्दर धावू की कम्पनी का कर्मचारी भी नही था। इसलिए निशिकान्त का पता जानने का सवाल भी नही उठता था। फिर भी उस समय ज्य- सुन्दर बाबू उसका मकान ढूंढने निकल पडे थे, क्योंकि उनका व्यक्तिगत स्वार्थ था। जयसुन्दर बाबू ने पहले ही एक टैक्सी कर ली थी। एक जगह पहुँच कर उन्होंने टैक्सीवाले से कहा-रुको ! रुको ! वह जगह जयसुन्दर बाबू को जानो-पहचानी लगी। बहुत दिन उसी सड़क के मोड़ पर उन्होंने अपनी कार से निशिकान्त को छोडा था। उसी जगह खडे हो कर उनको नमस्कार करने के वाद निशिकान्त अपने घर की तरफ चला गया था। टॅक्सी से उतर कर सामने एक आदमी को देखा तो जयसुन्दर बाबू ने उससे पूछा-भैया, निशिकान्त नाम का कोई आदमी यहाँ रहता है ? -निशिकान्त दास? यह कह कर वह आदमी जयसुन्दर वावू की तरफ देखता रहा। उसके बाद उसने पूछा- आप कहाँ से आ रहे हैं ? जयसुन्दर वावू को यह सवाल अच्छा नही लगा। फिर भी उन्होंने मन का गुस्सा मन में दबा कर कहा--श्याम बाजार से । इस उत्तर से भी उस आदमी को सन्तोप नही हुआ । उसने फिर पूछा-कितने दिनो से उससे आपकी मुलाकात नहीं हुई ? जयमुन्दर बाबू ने कहा-कई साल हो गये होंगे ? यह सुन कर उस आदमी ने कहा-अच्या ! इसीलिए। वह तो जेल काट रहा है। आपको पता न होगा। -जेल काट रहा है ? क्या किया था उसने ? उस आदमी ने कहा-बड़े बाजार के एक मारवाडी की हत्या के आरोप में पकड़ा गया था। फांसी हो जाती, लेकिन पुलिस को बहुत पैसा खिला कर वच गया ।

? टूटा है। ॥ -पुलिस को पैसा खिला कर ? कितना खिलाना पड़ा -यह सब वाहर का आदमी कैसे जान सकता है ? लेकिन सुनने में आया कि जिन्दगी भर की पूरी कमाई पुलिस की जेब में गयी है। एक कहावत है न, चोरी फा धन मोरी में जाय! वह आदमी अपनी बातों से रसिक भी लगा ! शायद निशिकान्त के बारे में वह बहुत कुछ जानता है । आखिर एक ही मुहल्ले का है न । जयसुन्दर वाबू ने सोचा। फिर भी उस मादमी को एक बात की जानकारी नहीं थी कि निशिकान्त जेल से जयमुन्दर बाबू ने पूछा- इस समय निशिकान्त के घर में कौन-कौन हैं ? उस आदमी ने कहा-यह तो नहीं जानता । आप स्वयं जा कर पता कर लें। जयसुन्दर बाबू ने किराया दे कर टैक्सी छोड़ दी। उसके बाद वह पैदल उस मकान की तरफ गये। वहुत पुराना मकान था। दीवार पर जगह-जगह पलस्तर उखड़ चुका था। बहुत दिनों से उस मकान की न मरम्मत हुई थी और न सफेदी । बाहर दरवाजे में वाला नहीं लगा था, इसलिए समझ में आया कि अंदर जरूर कोई है। जयसुन्दर वावू वाहर वाले दरवाजे की कुंडी खटखटाने लगे। बहुत देर कुंडी खटखटाने के बाद अन्दर से किसी पुरुप की आवाज सुनाई पड़ी -पौत? जयसुन्दर बाबू ने वाहर से पूछा-निशिकान्त दास हैं ? -~नहीं। विचित्र फर्कश स्वर था। लेकिन किसी ने दरवाजा खोलने का नाम नहीं लिया। मानो अन्दर से 'नहीं' कह देना ही उसके लिए काफी था । जयसुन्दर वावू ने फिर कहा-~-जरा दरवाजा खोलिए न । अन्दर से जवाव आया-~वताइए, क्या कहना है ? जयगुन्दर बाबू ने पूछा-निशिकान्त दास घर पर नहीं हैं तो कहां गये हैं ? -पुरी। -पुरी? जयमुन्दर वा वह छोटा सा जवाब पाकर सन्तोप न कर सके। उन्होंने पूछा -~~-कब गये हैं ? बहुत दिन हो गये। -पय लौटेंगे? । बन्दर से जवाब वाया-यह तो बता कर नहीं गये। - नाप फौन हैं ? नाप निशिकान्त वाबू के कौन हैं ?

गुम संयोग । ७३ ---यह सब जान कर आप क्या करेंगे? बात करने के ढंग पर जयमुन्दर दादू बिगड़ गये । उन्होंने सोचा कि यद यही पूटा जाय कि निशिकान्त कब जेल से छूटा है ? लेकिन नहीं, यह पूछने की जरूरत नहीं है । ऐसा सवाल करने पर पवाद देने वाला विगढ़ जायेगा। इससे मेरा काम बिगड़ जायेगा। इसलिए मीठा बोल कर सारी जानकारी लेनी होगी। जयमुन्दर वाबू ने सोचा। फिर उन्होंने पूछा- बाप नाराज क्यों हो रहे हैं ? दरवाजा खोलिए न ! अन्दर से उस आदमी ने कहा-मैं दरवाजा नहीं खोलूंगा। थापको जो कुछ करना हो, करें। जयसुन्दर वायू दोले- -आप तो गजब कर रहे हैं ! आप बाहर आयेंगे तो क्या मैं आपको खा जाऊँगा? मेरा नाम है जयसुन्दर बोस । मैं बोस एण्ड कम्पनी का मालिक हूं। कल निशिकान्त वाबू ने मुझे एक पत्र भेजा था। वही पर पा कर मैं मिलने पाया हूँ। निशिकान्त बाबू ने मुझे कल पत्र लिखा और तीन-चार दिन पहले वह पुरी भी चले गये, यह कैसे हो सकता है ? अब उस यादमी ने दरवाजा खोला। अपसुन्दर वायू अब उस आदमी को ठीक से देख सके। अधेड़ था। सिर के बाल खिचड़ी ये। एक दांत नही पा । पान खाने से दांत काले पड़ चुके थे। जयसुन्दर बाबू ने पूछा-श्राप निशिकान्त बाबू के कौन हैं ? उस आदमी ने कहा- मैं उनका कोई नही हूँ। मैं उनके काम-काज की देख- माल करता हूँ। -निशिकान्त वाचू की फैमिली कहाँ है ? उनको पत्नी और बाल-बच्चे पहाँ हैं ? क्या वे इस मकान में नहीं रहते ? उस आदमी ने कहा-बाबूजी का कहीं कोई नहीं है। जयसुन्दर बाबू ने पूछा-आपको ठीक से पता है न कि निशिकान्त बाबू पुरी गये हैं ? उस आदमी ने कहा-मुमको तो यही बता कर गये हैं। -~-क्या वह पुरी का पता दे गये हैं ? यानी, वहां किस होटल में ठहरे हैं, कुछ पता है? उस यादमी ने सिर हिला दिया। यानी, उसको यह सव मालूम नहीं था। जयसुन्दर वायू समझ गये कि उस आदमी से और कोई जानकारी नहीं मित सकती। फिर यहां खड़े हो कर समय नष्ट करने से फायदा ? जयसुन्दर वावू ने सोचा।

७४ | शुभ संयोग
उसके बाद वह वहीं नहीं रुके । वह वहां से चल कर सड़क पर आ गये । उसो
समय वहां से एक टैक्सी जा रही थी। उसी को बुला कर वह उसमें बैठ गये।
पुरी में होटल सागर' का बड़ा नाम है।
'होटल सागर' में जो भी हरता है, उसके मालिक के मादर-सत्कार से प्रसन्न
हो जाता है। वहां कौन क्या खायेगा, उसके लिए उसको सोचना नहीं पड़ता।
होटल के लोग ही आ कर पूछते हैं- मछली का मोल बायेंगे या मांस का सालन ?
हमारे यहाँ हर तरह का इंतजाम है। मगर शाकाहारी भोजन करना चाहेंगे तो
वह भी मिल जायेगा।
उस दिन सबेरे वाली ट्रेन से जो युवती आयी थी, उससे भी उन लोगों ने वही
सद पूछा था।
--मछली का मोल और भात खाऊँगी । इस युवती ने कहा था।
दोपहर में लंच के साथ दही और रात को डिनर में दूध
लेंगी त?
दे सकते हैं।
-~दूध न लेना चाहें तो पुडिंग भी ले सकती हैं। जैसी आपको इच्छा।
उस युवती ने कहा-ठीक है । दूध के बदले पुडिंग दे सकते हैं।
-जी हाँ। वही होगा। इस समय ब्रेकफास्ट में क्या लेंगी? रसगुल्ला,
गुलाबजामुन और चाय भेजें ?
झंगला कर यह कहे बिना कोई चारा नहीं था।
होटल वाले से जान छुड़ा कर उस युवती को मानो नैन मिला।
लेपिन थोड़ी देर बाद वह आदमी फिर आया । लम्बा ना रजिस्टर और कलम
ले कर वाया । उस युवती के सामने वह रजिस्टर रखते हुए उस आदमी ने कहा-
कृपा फरको बार यहां अपना नाम लिख दें
लिखने के लिए फलम उठा कर वह युवती रुक गयो। फिर उसने जल्दी-जल्दी
लिखा-वरुपा चौधरी।
-~पाही से वायी हैं?
~फलकते है।
-फिर वह भी यहां लिख दीजिए।
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गुम सयोग ७५ वरुणा ने यह भी लिख दिया। उसके बाद उसने एक घाना दिखा कर पूछा ---यहाँ क्या लिखूगो? -वहां लिखिर कि थाप कितने दिन पुरी में रहना चाहती हैं । वरुणा बोली-उसका तो अभी से कोई ठीक नहीं है। चार दिन भी यह सस्ती हूँ और बच्चा सगा तो पन्द्रह दिन भी। होटल वाले ने कहा-फिर वहां कुछ लिखने की जरूरत नहीं है । बाद में जब जाने सर्गेगी, तमो लिख देने से काम चल जायेगा। फिर इस कालम में लिडिर कि किस लिए पूरी यायी हैं। --किस लिए पुरी यायो ! घूमने के लिए, और क्या ? उस आदमी ने कहा-फिर वहां वही सिख दोगिए । वरुणा ने वही लिखा। सिखना पूरा होते ही उस यादमी ने फलम और रजिस्टर ले लिया। फिर पूया-आपका ब्रेकफास्ट तो इसी कमरे में लाऊंगा? -जी हां। वरुणा ने ज्यों कहा, यह यादमी बाहर चला गया । वरुणा जरा अकेले में रहना चाहती थी, लेकिन वैसा नहीं हो सका। वह जव से आयी थी, होटलवाला से परे- शान करने लगा था-आदर-सत्कार के नाम पर या बौपचारिकताएं पूरी करने के लिए। रात भर ट्रेन में बड़ी तकलीफ हुई थी। एक मिनट भी वरुणा सो न सकी थी। समुद्र के पास होटल होने के कारण समुद्र-गर्जन नुनाई पड़ रहा था। लेकिन अचानक वरणा को न जाने कैसा सन्देह हवा । यह समुद्र का मर्जन है या मेरे दित धड़कने की आवाज ? वरुणा ने सोचा । एक-दो बार उसे सगा कि वह यावार उसके वक्ष में से बा रही है। लेकिन दिल की धडकन क्या कानों से सुनाई पड़ती है ? फिर एकाएक उस आदमी के बाद ही वरुणा चौक पड़ी। उसके हाय पोट्रे में मिठाई को प्लेट और पानी का मिलास था। उसी के पास चाय का कप रखा था। वह सब टेबिल पर रख कर वह वादमी पाने लगा। वरुणा ने उसे रोका। कहा-जरा एक बाइए 1 में खा लेती हूं। याप यह सब लेते जाय । वार- वार आपको फष्ट करके यहाँ बाने की जरूरत नहीं है। रस यादमी ने कहा-नहीं-नहीं, कष्ट किम वात का वहन बी, यही तो मेरा काम है । बाप लोगों की सेवा करना मेरी ड्यूटी है। पिर भी वरुणा ने मटपट मिठाइयां खा कर पानी पी निया। उसके बाद उसने ठंडी चाय मुंह में उस सी। तब वहीं मानो मे छुटकारा मिना । .

७६ || शुभ संयोग कहा-जाइए । अव यहाँ माने की जरूरत नहीं है। नहाने के बाद मैं थोड़ी देर सो लूंगी। -दोपहर का भोजन कव करेंगी ? घरुणा बोली ~ यही साढ़े बारह या एक वजे । उसके पहले नहीं। प्लेट और कप ट्रे पर रख कर उस आदमी ने ट्रे उठा ली और कमरे के बाहर चला गया। जाते समय उसने फहा-~~-अगर किसी चीज को जरूरत पड़े तो मुझे बुलाइयेगा, बहन जी । मेरा नाम है किंकर । याद रहेगा न ? वरुणा बोली-~-ठीक है। अब आप जायं। -~-वस, मेरा नाम याद रखें किंकर, बुलाते ही मैं आ जाऊँगा । अच्छा चला। उसके नाते ही वरुणा ने दरवाजा बंद कर लिया। 'होटल सागर' दुमंजिले मकान में है। सोढ़ी ज्यादा चौड़ी नहीं, बल्कि ऊँची- ऊंची है। लेकिन बार-बार कपर-नीचे करते-करते किंकर को आदत पड़ गयी है। होटल का आफिस नीचे है। वहीं हिसाव को किताबें लिए मैनेजर बैठे रहते हैं। उसी कमरे में चीनी का बोरा, दाल का वोरा और चावल का बोरा रखा रहता । सभी कीमती सामान मैनेजर अपने कमरे में रखते हैं। इससे चोरी होने का राय नहीं रहता । जब जरूरत पड़ती है, रसोइया आ कर उनके सामने चावल, दाल या तेल नाप कर ले जाता है। असल में होटल सागर' के मैनेजर ही मालिक हैं । प्रोप्राइटर-कम-मैनेजर । पैसा दे कर मैनेजर रखने से होटल का काम नहीं चलता। इसलिए मैनेजर का काम शेखर बाबू स्वयं करते हैं। किंकर के दिखाई पड़ते ही शेखर बाबू ने उसे बुलाया-~षयों रे, बारह नवर रूम में नाश्ता दे माया ? -~~जी हाँ । फिकर बोला। शेखर बाबू ने एक किताब में न जाने क्या लिख लिया। हर कमरे में कौन गया सा रहा है, फब खा रहा है, फोन पर भा रहा है, यह सब कुछ शेखर वायू लिराते रहते हैं । यह हिसाव के बड़े पाबंद हैं और मुश्किल से उनके हिसाब में कभी गलतो होती है। - शुभ संयोग। ७७ बहुत दिन पहले अपना स्वास्थ्य सुधारने शेखर बावू पुरी वाये थे। यहां आ कर उनका गठिया ठीक हो गया था। उसके बाद जब वह घर सौट गये थे, सब फिर वह गठिया शुरू हो गया था। फिर वह जब भी पुरी आये, उनका गठिया टोक हुआ और घर लौटते हो यह रोग हो गया। कई बार ऐसा होने के बाद उन्होंने तप किया कि अब घर नहीं लौटूंगा। फिर शेखर बाबू इसी होटल में स्थायी रूप से रह गये । उसके बाद अब इस होटल के विकने की बात चली, उन्होंने इसे किस्त बांध कर खरीद लिया। तब से इस होटल को दिन पर दिन उन्नति होती गयो। बाद में शेखर वाबू ने होटल को वड़ा किया और कई नये कमरे बनवाये। कई कमरों को बड़ा बच्चा बनवाया गया। उनमें बड़े-बड़े सोग वा कर ठहरते हैं । उन कमरों का किराया कुछ अधिक है। लेकिन बड़े लोगों के ठहरने के लिए भी तो कोई जगह होनी चाहिए । बगर वैसी जगह न हो तो वे लोग कहाँ ठहरेंगे गरमी के दिनो में होटल सागर' के सभी कमरे भरे रहते हैं। कभी-कभी होटल खाली भी हो जाता है । लेकिन सबेरे जव पुरी एक्सप्रेस स्टेशन पर पहुंचती है, तब सभी होटलों के एजेण्टो के साप 'होटल सागर' का एजेंट भी पैसेंजर पकड़ने के लिए स्टेशन पहुंचता है । 'होटल सागर' के एजेंट का नाम है गुणेश्वर । शेखर वाबू गुणेश्वर को को हुए हैंडविल थमा देते हैं। प्लेटफार्म पर पुरी एक्सप्रेस के आने के बाद जब पैसेंजर उतने लगते हैं, गुणेश्वर सबको एक-एक हैंड- बिल देता है । उसी के साथ यह कहता जाता है- सर, एक बार हमारा 'होटल सागर' भी ट्राई करके देखें । हवा और रोशनी की कमी नहीं है । एकदम समुद्र पर है। कृपया एक बार जरूर ट्राई करें। चार्ज मी माडरेट है। घरुणा चौधरी भी जव पुरी स्टेशन के प्लेटफार्म पर ट्रेन से उतरी थी, गुणेश्वर ने उसे भी हैंडविल दिया था। वरुणा के साथ एक सज्जन भी थे। उस सजन से वरणा चौधरी ने पूछा पा-'होटल सागर' में व्हहं? --ठहरी । उस सजन ने कहा था। -और आप? उस सज्जन ने कहा था मेरे लिए क्यों परेशान होती हो? तुम होटल सागर' में जाओ, मैं कहीं और ठहर जाऊँगा । याद में तुम्हारे होटल मे जा कर तुमसे मिल लूंगा। इतना कह कर वह सजन अपना सामान लिये दूसरी तरफ चले गये थे। ।

७८ ॥ शुभ संयोग शेखर वाबू शायद ही कभी आराम करते हैं । उनको नींद भी मानो वहुत कम माती है । वीस वर्ष पहले पता नहीं कब उन्होंने यह होटल खरीदा था और तब से चावल-दाल-तेल-चीनी रखने के उसी कमरे में रहते आ रहे हैं। वहीं बैठे-बैठे वह रुपये-पैसे का हिसाव भी करते हैं । ये कई वर्ष उन्होंने उसी छोटे से कमरे में विता दिये । कब रात हुई और कब दिन हुआ, उनको मानो पता भी न चल पाया। वह सिर्फ इतना ही जान सके कि उनके पास बहुत रुपया हो गया है। रुपये का पहाड़ लग गया है। इसके अलावा शेखर वाबू यह भी जान सके कि कैसे-कैसे लोग कैसे-कैसे मक- सद से जिन्दगी बिता रहे हैं । कोई समुद्र देखने माया, लेकिन घंटे भर के लिए भी उसने समुद्र नहीं देखा और कमरे का दरवाजा बंद कर सारा समय बोतल पर बोतल शराब पीने में विता दिया। कोई अपनी पत्नी के साथ आया। प्रतिदिन उसने सपत्नीक जगन्नाथ मंदिर के दर्शन में ही सुबह, शाम और रात का अधिकांश समय विता दिया। प्रेमी-प्रेमिका की जोड़ी भी आयी। पति-पत्नी के रूप में यहाँ एकान्त में तीन दिन विता कर चौथे दिन वे कलकत्ते लौट गये । इससे शेखर बाबू को कोई नुकसान नहीं, बल्कि फायदा हुमा है । इस तरह हजारों लोग आये और उनके 'होटल सागर' में ठहरे। उनमें शायद ही कोई शेखर वावू को याद है। उस दिन शेखर बाबू ने देखा कि एक अपरचित व्यक्ति उनके होटल में आया । शेखर वाबू ने पूछा - किसको चाहते हैं ? उस व्यक्ति ने कहा--आपके होटल में वरुणा चौधरी आयी हुई हैं । वह किस नंबर में हैं ? खाता देख कर शेखर बाबू बोले-बारह नंबर कमरे में देखिए । दूसरी मंजिल । में है। नंबर पूछ कर व्यक्ति दूसरी मंजिल में चला गया। शेखर वावू ने फिर हिसाव को वही में मन लगाया। होटल का काम कच्चे माल का धंधा है । निगाह चूकी कि चोरी हुई । इसी चोरी से बचने के लिए शेखर वावू रात-दिन चावल-दाल-चीनी के वोरे और तेल- धी कनस्तर अगोरते रहते हैं। दिन निकलने से पहले ही शेखर बाबू को काम में जुट जाना पड़ता है। रात गुन सपोग! तीन बजे वह टठ जाते हैं । उस समय चाहे जितनी नींद बाये, विस्तर पर पड़े रहना सम्भव नहीं है । होटल के सभी दोर्डर सो कर उरलेन ने चाय मांगेंगे। रसोइया चीनी और चाय को पती मांगने यायेगा । शेखर बाबू अपने हाप से चीनी बोर चाय की पत्ती निकाल कर देते हैं। बाकल चीनी का दाम विना बढ़ गया है, चाय का रेट बढ़ाये बिना काम नहीं चलता। उसके बाद गुणेवर को वुवाना पड़ता है । गुफेवर को बुनाते हुए शेखर बाबू कहते हैं-अरे गुणश्वर, उठ जा! ठ जा! चार बज गये हैं । स्टेशन जाना है। जल्दी तैयार हो ले! गुणेवर झटपट विस्तर से उठ कर चाय पीने के लिए रसोईघर की तरफ पाता है। इघर शेखर वावू बन्दो मचावे रहते हैं—अब तुझे चाय पीने की जरूरत नहीं है । रास्ते में चाय पी लेना । यह ले, पैसा रख। दो-दो कमरे खाली पड़े हैं । इससे बहुत नुकसान हो रहा है । रोज दीस-चीन रपये करके चालीस रुपये का नुकसान मामूली बात नहीं है । याज गुपवर एकको बोर्डर साये तो वह नुकसान किसी हद तक पूरा हो सकता है । इस मंहगाई के जमाने में बीस सये भी कौन देता है ? गुणेश्वर रपे हुए हैडविल लेकर चला जाता है। वह जब स्टेशन पहुँचता है, तभी पुरी एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर बाती है । गुणेश्वर प्लेटचन र पा कर सट्टा हो गया । ठीक उसी जगह, जहाँ से यात्री वाहर बागे। एक-एक पैसेंजर कुत्तो के सिर पर वक्सा-विस्तर रख कर बागे बढ़ने लगेगा तो गुप्त्वर अपनी टी-रटायो बात कहेगा हमारे 'होटल सागर' में एक बार ट्राई करके देखें सर । होटल एक- दम समुद्र पर है । वृपया एक दार बहर ट्राई करें सर । माडरेट चार्ज है। वन्य सभी होटलों के एजेंट कवार में पडे है। उनके पास मी हैंडविल हैं। ये भी पैसेंबरों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश करेंगे। उसके बाद पड़े भी हैं। जो सोग तीर्य करने बाने हैं, उनकी तरस पंडों का ध्यान अधिक रहता है। यात्रियो की शक्ल देखने से पता चल जाता है कि कोन तीर्थ करने आया है और कौन नहीं। फिर जो लोग घूमने वाले हैं, दे होटल में ठहरते हैं । गुणेश्वर जैसे होटल के एडेंटों को निगाह उन पर अधिक रहती है। इठने में एक पैसेंजर ट्रेन से बाहर निकला तो गुणेश्वर उसकी तरफ वही। उस पैसेंजर के पास जा कर गुणेश्वर अपनी रटी-रटायी वात कहने - हमारे 'होटस सागर' को एक बार ट्राई करके देखें सर । हवा और रोयने । नहीं है। एक्दम समुद्र पर है सर। हमारे 'होटल सागर' को बर देखें । वार्ड भी माडरेट है।

-- ८०॥ शुभ संयोग जयसुन्दर बाबू के पास सिर्फ एक बड़ा सा सूटकेस था। वह उस समय वही सूटकेसं कुली के सिर पर रख रहे थे । गुणेश्वर को वात सुन कर उन्होंने पूछा- कौन सा होटल वताया? गुणेश्वर बोला-'होटल सागर' सर । जयसुन्दर वाबू ने पूछा--कैसा होटल है ? ठीक रहेगा न ? गुणेश्वर ने कहा--जी हां, बहुत ठीक रहेगा सर। अगर आपको होटल पसंद नहीं आता तो दूसरे होटल तक जाने में कितनी देर लगती है ? खाने का कैसा इन्तजाम है ? -आप जैसा कहेगे सर, वैसा दिया जायेगा। आप लोगों की सेवा करना ही हमारा काम है। फिर एक टैक्सी में सूटकेस रखा गया। जयसुन्दर वावू पीछे की सीट पर बैठ गये। गुणेश्वर के बताये रास्ते से टैक्सी चलने लगी। वह आगे की सीट पर ड्राइवर के पास बैठा था। जयसुन्दर वाबू टैक्सी में बैठे बाहर देखने लगे। सड़क पर अनगिनत लोग थे । जयसुन्दर वावू सबको अच्छी तरह देखने की कोशिश करने लगे। हो सकता है, अचानक निशिकान्त दिखाई पड़ जाय ! यह सोच कर जयसुन्दर वाबू को बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतनी जगह रहते निशिकान्त पुरी क्यों आया ? फिर सोचा, मेरे पते पर चिट्ठी भेजने के पहले ही क्या वह पुरी आया है ? लेकिन उसे पैसा कहाँ से मिला? यहाँ आ कर वह जरूर किसी होटल में ठहरा होगा ? हालांकि कलकत्ते में उसका अपना घर है। उसके घर पर जो आदमी मिला था, वह कौन है ? ट्रेन में भी जयसुन्दर वाबू यही सब सोचते हुए आये थे। निशिकान्त जेल से कर छूटा ? फिर जेल से छूट कर उसने रुपये का कहां से इन्तजाम किया ? जो भादमी दस वर्ष जेल काटता है, उसके पास रुपया होना सम्भव नहीं है ! हो सकता है कि उसने पहले ही बहुत रुपया इकट्ठा करके रखा था। लेकिन कहाँ रखा था ? बैंक में? फिर जयसुन्दर बाबू को याद आया था कि निशिकान्त बैंक में रुपया रखने वाला आदमी नहीं है । लेकिन उसने कम रुपया नहीं कमाया था। जयसुन्दर बाबू ने ही उसको कितना रुपय, दिया था। शायद उसने वह रुपया पूरा खर्च नहीं किया था और उसमें से कुछ बचा कर रखा था। फिर राधेश्याम अगरवाल की कोठी से जो कई लाख रुपये गायव हो गये थे, पुलिस वह रुपया वरामद न कर सकी थी। अंत तक एक सिगरे केस पुलिस के हाथ लगा था। फिर उसी सिगरेट केस - के मुसग पर निरिणाद पमा मया या । बहुप दिनों तक इन मुका: . !! जदिने मान्दरका सिकाट के कोद करे सवर दिक्षित से फळे ये । जामाचार बदले है. सभी देवर होता है। दही तो विस- कान्दन दुर्द बदीवार होने के विर को पकड़ा जाता तिलि. कान्ट के जय बरबोदवादनी पकड़े गये, बार में होती हो यी भी। लेकिन निगिन्द कानार बन्दा पा, इसलिए अन्त तक उसे फोसी से नही बदल में खड़े हो कर पुलिस के वकील ने निशिकान्त रो पहुत जिरह की जोडने बार-बार वह सिगरेट केरा निशिकान्त को दिखाया मा भार यह गिरेट केस आपका है ? यच्छी तरह दैगिए, फिर पताए । नियन्त जैसा वादमी भी वह सिगरेट पेस देख कर पहले पहा गया। रिसजिपरेट केस को अच्छी तरह देखने का पक्षाना कसं पहा वीन्हीं। दह सिगरेट केस मेरा नहीं है । -बार नहीं है तो इसमें आपका नाम पयों मृदा हवा? निशिकान्त की वह वात एकदम याद नही थी। रिनियिकान्त नै अपनी गलती को सुधारत हा का मानकर माद वापा । वह मेरा ही पुराना सिगरेट फेग है। mins विरेट कम चोरी चला गया था। दात को जिरह से उस दिन निशिकान्त पंगती चोरी, जालसाजी और मिलावट का प्रथा कान्त का दुस्साहस इतना बढ़ गया था कि अपने मायाददन मिनाई. करने लगा था। उसी सारवाही के दाम पर रोटी सी गलती हो गया था और नमी की माटी ।

- । - ८२ ॥ शुभ संयोग निशिकान्त कहेगा-यह तो वताइए कि मेरे कारण आप कितना रुपया कमी सके ? उस रुपये पर मेरा भी तो कोई हिस्सा बनता है ? जयसुन्दर वावू कहेंगे-~-कमाया तो क्या तुम मुझे डराते हुए पत्र लिखोगे ? तुम्हारी इतनी हिम्मत हो गयी ? इस पर निशिकान्त शायद चुप्पी साधे रहेगा। जयसुन्दर वाबू फिर कहेंगे-मैंने जो रुपया कमाया, क्या उसका हिस्सा तुम्हें नहीं मिला? क्या तुम नहीं जानते कि मुझसे तुम्हें कितना रुपया मिला है ? जव भी तुमने माँगा, मैंने दिया । जितना माँगा, उतना दिया। जब तुमने अपना मकान बनवाना चाहा था, तब भी तुमने कहा था कि मेरे पास रुपया नहीं है। उस समय मैंने तुम्हें कितना रुपया दिया था, क्या तुम्हें याद नहीं है ? इस पर निशिकान्त शायद कहेगा-~-सिर्फ एक मकान बनाने से चल जायेगा? क्या और भी खर्च नहीं हैं ? जिस समय मुझ पर मुकदमा चला था, उस समय कितना पैसा खर्च हुआ था, आपको पता है ? फिर मैं कोई नौकरी नहीं करता कि उस पैसे से मेरा खर्च चलता? ~~अगर तुम्हें रुपये की इतनी जरूरत पड़ी तो तुम सीधे मेरे पास क्यों नहीं चले आये ? वया रुपया मांगने पर मैं न देता? लेकिन तुमने धमकी भरा पत्र क्यों लिखा ? जानते हो, मैं वह पत्र पुलिस को दिखा कर तुम्हें गिरफ्तार करवा सकता हूँ? शायद इस पर निशिकान्त कहेगा- आपके भी बहुत से पत्र मेरे पास हैं । बहुत से सबूत भी हैं । मैं भी वह सव पुलिस को दिखा सकता हूँ। उससे मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा, बल्कि आपका नुकसान होगा। -~-क्या नुकसान होगा? निशिकान्त कहेगा- देखिए, आप मुझे डराने की कोशिश मत कीजिए । मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि आप कैसे इतने अमीर बने हैं ? मैं वह सब भंडाफोड़ कर दूंगा । आपने किस-किस की जायदाद हड़पी है, उसकी पूरी लिस्ट मेरे पास है। मैं जेल जाऊंगा, आप बच जायेगे, ऐसा नहीं हो सकता । आप यह समझ लीजिए कि मैं भी आपको जेल भेज सकता हूँ। लेकिन आप मुझे दो लाख रुपये दे देंगे तो मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगा। इस पर जयसुन्दर वाबू कहेंगे-देखो निशिकान्त, तुम एक बार जेल काट चुके हो । लगता है, फिर तुम जेल काटना चाहते हो ? अगर ऐसी बात है तो बताओ, में उसका भी इन्तजाम कर सकता अचानक नावाज होते ही जयसुन्दर वायू का सपना टूटा। गुणेश्वर बोला-आइए सर, उतर आइए । 'होटल सागर' मा गया है। .

जयसुन्दर बाबू ने टैक्सी का किराया दे दिया। गुणेश्वर ने जयसुन्दर बाबू का मूटकेस ले कर सोढी चढ़ते हुए कहा-आइए सर, ऊपर चले भाइए। जयसुन्दर बाबू भी सोढ़ी से अपर चढ़ने लगे। अन्दर वाले कमरे में बैठे शेखर वाबू हिसाब का खाता देख रहे थे । गुणेश्वर की आवाज पा कर उन्होंने सिर उठा कर देखा। शेखर बाबू को लगा कि गुणेश्वर मालदार पैसेंजर लाया है। है वो गुणेश्वर फाम का । शेखर वाबू ने सोचा । लेकिन पता नही, यह सज्जन कितने दिन रहेंगे। देखने से तो लगता है कि काम-काजी आदमी हैं, अधिक दिन नही रहेगे । ठीक है, न रहे । लेकिन एक बार जब आये हैं, तब अपने इप्ट-मित्रों से इसी होटल में ठहरने के लिए कहेगे। इनके दोस्त-अहबाब भी इन्ही की तरह मालदार होंगे। फिर एक बार जब आये है, तब दूसरी बार जरूर आयेगे। इस बार भले ही कम दिन रहे, लेकिन दूसरी बार ज्यादा दिन रहेगे । –ठाकुर । शेखर बावू ने रसोइये को आवाज दी । रसोइया आया। शेखर बाबू ने कहा-ठाकुर, बड़ा अच्छा कस्टमर आया है । अभी तक मार्डर नहीं मिला, लेकिन आज ढंग से तेल-मसाला दे कर खाना बनाना । कस्टमर को खुश होना चाहिए । समझ गये ? रसोइया बोला-फिर आज बाजार से बढ़िया मछली मंगवा दीजिए । अगर मोट बनाने को कहते हैं, तो जरा बढ़िया लाने को कहियेगा। फिर खाना तो ऐसा बना दूंगा कि यह सज्जन जब भी पुरी आयेंगे, यही ठहरेंगे। -यह रहा आपका कमरा हुजूर । गुणेश्वर एक कमरे का ताला खोल कर अन्दर गया। पीछे-पीछे जयसुन्दर बाबू भी गये । -यह देखिए, कितनी बड़ी खिड़की है। फिर यह दरवाजा खोल दीजिए, सामने बारजा है। यहाँ बैठ कर आप सुबह-शाम समुद्र देख सकेंगे। तड़के नीद खुलते ही यहाँ आ कर बैठ जाइए, सूर्योदय देख सकेंगे। देखिए, आरामकुर्सी लगी है। जयसुन्दर बाबू ने गुणेश्वर की वातो पर ध्यान नही दिया, लेकिन गुणेश्वर अपना काम करता रहा। गुणेश्वर ने उस कमरे से लगे वायरूम का दरवाजा खोल कर कहा-यह देखिए सर, जरा वाथरूम तो देख लीजिए। चौबीस घटे पानी रहता है। ऐसा साफ-सुथरा बाथरूम आपको पुरी के किसी भी होटल में नहीं मिलेगा। फिर गरम पानी के लिए कहेंगे तो वह भी मिल जायेगा।

८४ || शुभ संयोग जयसुन्दर वावू ने फिर भी गुणेश्वर की वातों पर ध्यान नहीं दिया। उनके दिमाग में वस निशिकान्त चक्कर काट रहा था। अचानक जयसुन्दर बाबू ने पूछा-सुनो, तुम्हारे यहाँ निशिकान्त दास नाम का कोई बोर्डर आया है ? गुणेश्वर होटल को तारीफ करने में मशगूल था। उसने जयसुन्दर बाबू की पूरी वात नहीं सुनी। पूछा-आपने क्या नाम बताया ? -निशिकान्त दास । गुणेश्वर ने जरा सोच कर कहा-निशिकान्त दास ? नहीं सर, इस नाम का कोई सज्जन इस समय होटल में नहीं है। जयसुन्दर बाबू ने पूछा-पहले कभी आया था ? गुणेश्वर बोला-फिर तो रजिस्टर देखना पड़ेगा सर । तुरंत वताना मुश्किल । माप कितने दिन पहले की बात कर रहे हैं ? रजिस्टर देख कर बता सकता हूँ जयसुन्दर वाबू बोले-नहीं, रहने दो। उसकी जरूरत नहीं है। -ब्रेकफास्ट में क्या लेंगे सर । जयसुन्दर बाबू खाने के लिए पुरी नहीं आये थे। इसलिए वोले-जो चाहो, लामो। गुणेश्वर कमरे के बाहर चला गया । जयसुन्दर वावू ने कुरता उतारते हुए खिड़की में से समुद्र की तरफ देखा । वाह ! समुद्र तो देखने में बड़ा अच्छा लग रहा है । क्या विशाल कारोबार शुरू कर दिया है उसने ! जयसुन्दर बाबू को अपने मन की प्रतिच्छवि उस समुद्र में देखने को मिली । उन्हीं के मन की तरह वह समुद्र अस्थिर था । नहीं, जयसुन्दर वावू के पास सौंदर्य देखने का समय नहीं था। नहा-धो कर उसी वक्त उनको निकलना था। एक-एक कर सभी होटलों में पता लगाना था कि किस होटल में निशिकान्त ठहरा था। इस छोर से उस छोर तक पुरी के समुद्र किनारे अनेक गलियाँ हैं । शहर के विभिन्न भागों से वे गलियां आ कर समुद्र की रेत में मिली हैं। उन गलियों में भी छोटे-छोटे बहुत से सस्ते होटल हैं। उन होटलों में भी कितने लोग ठहरते हैं। जिनके पास पैसा कम है, उनके लिए वही होटल अच्छे हैं ।

शुभ संयोग | ८५ शाम के धुंधलके में वरुणा निशिकान्त के साथ वैसे ही एक होटल में गयी। एक कमरे का ताला खोलने के बाद अन्दर वा कर निशिकान्त ने वरुणा से कहा-बैठो । उसो तखत पर बैठ जायो। कमरे में सिर्फ एक तखत, एक टेबिल और एक कुसौं यो। और कोई फर्नीचर नहीं था। निशिकान्त ने कहा-होटल में कमरा तो तुम्हे बढ़िया मिला है । वहां कोई परेशानी तो नहीं है ? धरुणा बोली-नही। -~-खाना कैसा देता है ? वरुणा ने कहा- ठीक ही देता है। - अब तुमसे जो कहा है, कर सकोगी न ? हर तो नही रही हो? जयसुन्दर वावू देखने में बड़ा गम्भीर और रोबीला लगता है, लेकिन यन्दर हो बन्दर बड़ा डरपोक है । असल में उसके पास बहुत रपया है, इसलिए बाहर से बड़ा रोबोला लगता है । लेकिन है वहा वैवकूफ । बड़ा कंजूस भी है । पली बहुत पैसा खर्च करती है, इसलिए उसे घर पर रख कर खुद अलग पलेंट में रहता है । यह सब तो तुमको पहले भी बता चुका हूँ। वोली, बताया है न? -हां, बवाया है। -वधाया है, लेकिन फिर इसलिए बता रहा हूँ कि तुम्हें अच्छी तरह पाद रहे। वरुणा बोली-मुझे और कुछ रपये दीजिए न। -पये ? पांच सौ स्पये तो तुम्हे पहले ही दे चुका हूं। पहले काम को पूरा करो, उसके बाद तुम्हे और पांच सौ रुपये दूंगा। कुल हजार रुपये हो तो तुम्हे देने हैं । फिर अगर तुम्हारे काम से खुश होता हूँ तो तुम्हें और पांच सौ रुपये दे सकता है। चनो, यह पांच रुपये देने का वादा करता हूँ। परुणा का चेहरा फिर मी उतरा हुआ देख कर निशिकान्ठ ने कहा- क्या हुवा ? मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा है ? इस पर वरुणा बोली-और कुछ रपये मिल जाते तो अच्छा होता। -~-वयों? वह पांच सौ रुपये से क्या किया? वरुणा बोली-वह स्पया खर्च हो गया है। -पांच सौ रुपये खर्च हो गये ? उतने रुपये किसमें वर्ष किये? वरुणा बोली-कुछ उधार या, बाते समय चुकठा किया। वो स्सया वचा, उससे मैंने यह साड़ी खरीदी। -तुम पर वैसा कर्ज था?

८६ | शुभ संयोग वरुणा बोली-वाह ! मेरे खर्च नहीं हैं ? मैं जिस मेस में रहती हूँ, वहाँ खाने का खर्च महीने में डेढ़ सौ रुपये पड़ता है। वह भी हम सब लड़कियां दाल-भात और साग-सब्जी खाती हैं, तब भी हरेक के पीछे इतना खर्च होता है। इससे ज्यादा हम कुछ भी नहीं खातीं। इसके अलावा सीट रेंट हरेक के लिए तीस रुपये है । यही हो गये हर महीने एक सौ अस्सी रुपये। फिर और भी तो सर्च हैं। इसलिए हर महीने बाकी वीस रुपये से पूरा नहीं पड़ता। उधार लेना पड़ता है। तव दूसरी लड़कियों से रुपया मांगती हूँ। -~-अभी तक कोई नौकरी नहीं मिल सकी? वरुणा बोली- आप तो नहीं जानते कि आजकल नौकरी मिलना कितना मुश्किल है ! जो लड़कियाँ नाज-नखरे करना जानती हैं, उन्हीं को नौकरी मिलती -- - -लेकिन तुमने तो कहा है कि बी० ए० पास हो ? वरुणा बोली-सिर्फ वी० ए० पास नहीं, स्टेनोग्राफर भी हूँ। -~-तब वो और अच्छा है । लेकिन तुम जैसी क्वालिफायड लड़की को नौकरी नहीं मिलती, यह कैसे विश्वास हो सकता है ? इसके अलावा तुम देखने में भी अच्छी हो ! वरुणा बोली-~-इससे क्या होता है ? नौकरी के लिए मैंने सभी दफ्तरों में दर- खास्त दी है । अखबार में विज्ञापन देख-देख कर कितनी जगह एप्लाई की है, लेकिन सिर्फ नाज-नखरे के बल पर मुझसे हजार गुना कम ववालिफिकेशन वाली लड़कियों को नौकरी मिल गयी। मुझमें नाज-नखरे नहीं हैं तो कैसे नौकरी मिलेगी ? फैशन भी मैं नहीं कर सकती। मेरी साड़ी की हालत नहीं देख रहे हैं ? मैंने इसी लिए कहा न, गुझे और कुछ रुपये दीजिए । यहां बाजार से दो साड़ियाँ खरीद लूं ! ऐसी साड़ी पहन कर जयसुन्दर वावू को कैसे मोह सकती हूँ ? -कितने रुपये चाहिए? वरुणा वोली-दो अच्छी साड़ियाँ और ब्लाउज खरीदने में ही दो सौ रुपये लग जायेंगे। फिर स्नो-पाउडर चाहिए ! उसके लिए भी पैसे की जरूरत है। निशिकान्त ने जेव से मनोवेग निकाला। कहा- ठीक है । अभी यह लो, वाद में और दूंगा। इतना कह कर निशिकान्त ने बैग से एक सौ रुपये के तीन नोट निकाले और गिन कर वरुणा के हाथ में दिये । फिर कहा-तीन सौ ही दिये । नोट गिन लो। वरुणा ने नोटों को गिन कर अपने वैग में रखा। कहा-ठीक है । अब मैं जा रही हूँ । वाजार जाना है। निशिकान्त बोला-इतनी जल्दी किस बात की? फिर तुम अकेली क्यों - शुभ संयोग बायोगी? मैं भी नुम्हारे बाप रा पाता हूँ । नयी वह पर क्या तुम दावार पहचान पायोगी? इपहरे कमी पुरो यानी नी नहीं ! दरमा बोली-रिक्शेवाले से कहने पर दही मुझे दावार से बायेगा। निशिकान्त दोना-पेकिन इनुनी जल्दी क्यों कर रही हो? क्या तुम्हारे पास साड़ी एकदन नहीं है? वरमा दोनी-है । लेकिन उपसुन्दर दादू को बच्छी लगे, ऐसी माड़ी नहीं है। बार तो मेरी हालत के बारे में जानते हैं । वमा यार मित्र ने मेरे बारे में वारने कुछ नहीं कहा? नितिान्त वोना-दरे, वह मेरा मित्र कहाँ है ? रिसी बनाने में सो वान-पहचान थी, दम ! दहा दिन दार बचानक उसने रास्ते में मुलाकात हो गयी। मैंने उसने कहा, मुझे कोई तहको दै सस्ते हो तो उसने पूधा, सड़की का करोगे? मैंने कहा, मेरे यहाँ नौररी करेगी । उद वह तुम्हें मेरे पास सापा। वरमा नै वहा-मैं उस समय समन न मी यी कि पैदा कान है। -तुमने अपने मन को किसी नहकों में तो नहीं कहा कि कैना कान है ? वरा दोनो -नहीं। मैंने उनमें जि इतना कहा है कि मैं एक नौकरी से कर पुरी जा रही हूँ। उस समय में भी नहीं जानती थी कि कैसी नौकरी है। वारने तो बाद में सब दताया। निशिकान्त वोना पड़ात्रो मत । स्निहाल यह कान तुन कर दो। सव वृष टोर-टाक हो पाया तो में भी एक वारिस होन कर के जाउंगा। तब करने वारिस में तुम्हें बच्छी वनवाह पर रख दूंगा। वरमा दोदो-वैदिर, बार मुझे क्य मी बच्ची तरह नहीं समझ पा रहे हैं, क्योंकि बाप नहीं जानते कि कितनी रोवों में में पता हूँ और घर ने किस हासन में कनकने वादी है। कनाते या वर क्लिने सोगों से समानित हुई बोर मुंह बंद कर वह सब दिन तह वरदान किया, यह सब मेरे बनावा कोई नहीं बानता? इस लिए बापन पत्र यह कान देना चाहा, बागा-पोछा नौ दिना में राजी हो गयी । यह नौकरी किये दिना मेरे लिए कोई चाय नहीं था! यह वह हर वरमा की कांडों से बांबू निम्न का। निनिकान्त दौल पड़ाया, तुम तो सचमुच ने नमो ! दिल को इतना कमजोर कर सोनी तो तुम यह काम नहीं हो पाया। इसके लिए दिन को कड़ा परना पड़ेगा । होटन में तुनको इस तरह रहना होगा कि जपसन्दर दादू यह समक जाय कि तुम बहुत बानाक-चतुर तड़को हो । नहीं दो नुन्हारो तरफ उनका मन के खिचेगा? 1-बार मुझे बता दौरिए कि क्या करना होगा? वरमा बोली- ॥ शुभ संयोग निशिकान्न बोला-कितनी बार बताऊंगा? -अगर वह हमारे होटल में न ठहरें? निशिकान्त ने कहा- उसके लिए तुम्हें सोचना नहीं है । मैंने गुणेश्वर को अलग बुला कर सब कुछ समझा दिया है । उसके हाथ पर दस रुपये का एक नोट भी रखा है । उसको बता दिया है कि कल वह सज्जन आयेगे। -आपको कैसे पता कि कल मायेंगे ? -कल ही आयेंगे। अगर किसी कारण से कल नहीं आये तो परसों जरूर आयेंगे। बिना आये वह रह नहीं सकते । मैंने सब बंदोवस्त कर रखा है। घरुणा वोली तो कल ही आयेंगे? निशिकान्त बोला-मुझको तो लगता है, फल ही आयेंगे । -मा कर अगर तीसरी मंजिल के किसी कमरे में ठहरते हैं ? निशिकान्त ने कहा--तुम क्या समझती हो कि मैंने उसका इंतजाम नहीं किया है ? ऐसा इंतजाम किया है कि उसे ठोक तुम्हारे बगल वाले कमरे में रखा जायेगा, ताकि माते-जाते तुमको देख सके । तुम हर ववत सज-धज कर रहना। समझ गयी, हर वक्त सज-धज कर रहना। वरुणा बोली-इसी लिए मभी बाजार जाना चाहती हूँ। सजने लायक साड़ी- ब्लाउज मेरे पास नहीं हैं । वढ़िया स्नो-पाउडर- क्रीम भी नहीं है। निशिफात बोला-चलो, मैं भी तुम्हारे साथ बाजार चलता हूँ। मैं देख- भाल कर अच्छी चीज तुम्हें खरीद दूंगा। वरणा बोली-लेकिन मुझे सचमुच बड़ा डर लग रहा है । निशिकान्त वोला-डर किस बात का ? एक मर्द को तुम अपनी मुट्ठी में नहीं ला सकती ? मर्द एक औरत से क्या चाहता है, एक औरत में कौन सी चीज देखने पर उसे अच्छा लगता है, यह सब क्या तुम नहीं जानती ? अगर नहीं जानती तो एक गौरत हो कर क्यों पैदा हुई थी ? लजा कर वरणा ने सिर नीचा कर लिया। निशिकान्त ने कहा-~~-क्या हुआ? सिर झुकाये क्यों खड़ी हो गयी ? जवाब दो। चेहरा ऊपर करो। चेहरा पर करने की कोशिश में वरुणा ने दोनों हाथों में चेहरा छिपा लिया। -देखो, इतना शरमाने से काम नहीं चलेगा। तुमने पांच सौ रुपये पेशगी ली है। अभी तुमको तीन सौ रुपये दिये । फिर भी तुम्हें शरम लग रही है ? वरुणा बोलो-~~ मुझसे न होगा लिपिकान्त वायू, मुझसे यह सब काम न होगा। निशिकान्त वोला-इतना आगे बढ कर मा पाइने से काम नहीं लेगा। - ? शुभ संयोग। ट्रेन के किराये में कितना खर्च हो गया है ! अभी होटल का कितना चार्ज देना होगा ! अब अगर तुम पीछे हट जाओगी तो मुझे यह रपया कौन देगा? -लेकिन मैंने पहले कभी ऐसा काम नहीं किया। निशिकान्त बोला--तुम्हारी इतनी उग्न हो गयी है, तुमने अभी तक किसी से प्यार नहीं किया? कभी किसी लड़के को नहीं चाहा ? वरुणा चुप रहो। निशिकान्त वोला- क्या सोच रही हो? जवाब दो। थोड़ी देर न जाने क्या सोच कर, वरुणा बोली-मुझे अपनी जिन्दगी में अभी a किसी से प्यार नहीं मिला। बचपन में मेरी मां मर गयी थी। उसके बाद वाप ने दूसरी शादी कर ली। सौतेली मां मुझे फूटी बाँखों देख नहीं सकती थी। बहुत सताती थी। जब मैं कुछ बडी हो गयो, तब किसी को कुछ बताये बिना कलकते चली आयो । उसके बाद उन लोगों से मेरा कोई सम्पर्क नहीं है। --तुम्हारे भाई-बहन नही हैं ? वरुणा धोली-सौतेले भाई-बहन हैं। उनसे भी कोई सम्बन्ध नहीं है। इस दुनिया में मैं एकदम अकेली हूँ। -फिर तुम पढ़-लिख कैसे गयो ? पैसा कहां से मिला ? कालेज में पढ़ने के लिए बहुत पैसा लगता है । वह किसने दिया ? वरुणा बोली-ट्यूशन करके मैंने अपनी पढ़ाई का खर्च निकाला है। सुबह- शाम-रात में लड़कियों को पढ़ाती हैं । उससे जो कुछ मिलता है, उसी से मैं मेस में रहने-खाने का खर्च चलाती हूँ। लेकिन ट्यूशन हर समय नहीं रहता। लड़कियों पास हो जाती हैं तो ट्यूशन बंद हो जाता है । तब फिर बेकार हो जाती हूँ। तभी परेशानी होती है। इतना कह कर वरुणा रुक गयी । फिर बोली-मुझ पर दया कीजिए। मुझे जाने दीजिए । यह काम मुझसे न हो सकेगा। निशिकान्त मुश्किल में पड़ गया । इतने दिनों तक सोच-समझ कर बनायो गयो योजना इस तरह विफल हो चली। बोला-नहीं । यह कहने से काम न चलेगा। तुमको यह काम करता ही पड़ेगा! --अगर पकड़ी गयी तो वह मुझे पुलिस के हवाले करेंगे। निशिकान्त बोला-क्यों घबड़ाती हो? मैं किस लिए हैं ? तुम क्यो इतना सोच रही हो? क्या तुम समझ रही हो कि तुम्हें मुसीबत में डाल कर खिसक जाऊंगा? मैं वैसा आदमी नही हूँ। तुम मुझे नही जानती, इसलिए इस तरह घबढ़ा रही हो । मैंने जब तुम्हे यह काम सोपा, तब सारी जिम्मेदारी मेरी ६ ६० ॥ शुभ संयोग देखो वरुणा, तुम डरो मत। मैं अलग होटल में रह रहा हूँ, लेकिन समझ लो कि मैं हर वक्त तुम्हारे पास हूँ। तुम्हारे होटल की हर खबर मुझे बराबर मिलती रहती है। वरुणा बोली-अगर वह मुझसे बोलना ही पसन्द न करें तो? -यह तो तुम पर निर्भर करता है। तुम उससे ऐसा व्यवहार करोगी कि वह लाख न चाहते हुए भी तुमसे वोलेगा । औरतों के मामले में जयसुन्दर वड़ा फमजोर है। समझती नहीं, इसी लिए वह अपनी पत्नी से अलग रहता है। देख लेना, तुम मगर उसकी तरफ देख कर एक बार मुस्करा दोगी तो वह तुम्हारे आगे- पीछे धूमने लगेगा। लेकिन तुम्हें भी ऐसा हाव-भाव दिखाना पड़ेगा कि मानो तुम उस पर लट्टू हो । उसके बाद फिल्मी ड्रामा करोगी । कभी तो फिल्म देखी होगी ? वरुणा बोली-नहीं। मैं फिल्म नहीं देखती। -क्या? तुम फिल्म नहीं देखती? वरुणा फिर बोली-नहीं। निशिकान्त को जरा आश्चर्य हुआ । मानो वह वरुणा की बात पर विश्वास न कर सका । पूछा-क्यों ? फिल्म क्यों नहीं देखतो ? आजकल तो सभी लड़कियाँ फिल्म देखती हैं। वरुणा बोली-हाँ । सभी लड़कियाँ देखती हैं। लेकिन मेरे पास इतना पैसा कहाँ कि फिल्म देखेंगी? -वलो, फिल्म नहीं देखती न सही, लेकिन उपन्यास तो पढ़ती होगी? वरुणा बोली-पिताजी मेरा उपन्यास पढ़ना पसन्द नहीं करते थे। निशिकान्त वोला~मैं तो तुमको ले कर परेशान हो गया वरुणा । अब तुम्हारी जगह किसी दूसरी लड़की को लाया भी नहीं जा सकता। इतना समय भी नहीं है। अब जो कुछ करना हो, तुम्ही करो। थोड़ा रुक कर फिर कहा--अब जैसे भी हो, तुम उसको अपनी मुट्ठी में करो। वस, इतना कर दो। घरुणा बोली- अगर मुझसे न हो सका तो? निशिकान्त वोला-तुम पहले से क्यों घबड़ाने लगी? कोशिश तो करके देखो। अगर न हो सके तो मैं बता दूंगा कि कैसे होगा। मैं तो यही हूँ। वस, तुम इतना याद रखो कि जयसुन्दर वा रुपये का वड़ा लालची है। तुम्हें उस लालची को अपने वश में करके उससे रुपया ऐंठना होगा । अचानक वाहर से किसी ने कमरे के दरवाजे की कुंडी खटखटायो । निशिकान्त ने नावाज दी-कौन ? --चाय लाऊं साहब " ?

शुभ संयोग १
निशिकान्त ने दरवाजा खोला।
वरुणा से पूछा-चाय पियोगी ?
-नहीं। वरणा बोली।
निशिकान्त बोला-ठोक है। हम यहां कुछ नहीं खायेगे । बाहर खा लेंगे।
होटल का बच्चा नौकर चला गया ।
निशिकान्त नै कुरखा पहन कर पूछा-आज दोपहर में क्या खाया? खाना
बढ़िया मिला था न?
वरुणा बोली-हाँ।
निशिकान्त बोला-चलो। तुम्हें क्या-क्या बहरत है, खरोद लो।
कमरे में ताला लगा कर निशिकान्त वरणा के साथ बाहर निकला।
जयमुन्दर बाबू जन्दी-जल्दी तैयार हो गये।
होटल का नौकर किंकर चाय-नाश्वा और मिठाइयां दे गयर !
लेकिन जयनुन्दर बाबू ज्यादा नहीं खा सके।
असल में जयपुन्दर बाबू खाने के लिए पुरी नही बाये थे। और न घूमने के
लिए । उस समय उनको दूसरी ही चिन्ता सताने लगी थी।
किंकर ने पूछा-बौर एक कप चाय दूं ?
-आपने तो मिठाई एक भी नहीं सो ? कुछ भी नहीं खाया? किंकर ने रि
कहा।
जयसुन्दर बाबू बोले-यमी सूख नहीं है।
यह कह कर जयमुन्दर बाबू उठे। फिर कमरे के बाहर वा मये।
किर बाहर खड़ा था।
बोला-दरवाजे में ताला लगा दें सर । ताता नगा कर चामी करने पास रख
दयन्दर वा ने वैसा ही किया।
उसके बाद जयसुन्दर वाळू सोड़ो कवर कर नीचे ला गये । नोचे ना कर उन्होंने
चारों तरफ निगाह दौड़ायो । लगा किसनो कनरों में दोर्डर हैं। लेकिन न
समय अधिकार बोर्डर वाहर थे । सम्भवतः वे समुद्र-स्नान करने गये थे।
सदर दरवाजे से बाहर निकलते ही समुद्री पवन के कने बा करक

६२ शुभ संयोग । । बाबू को मानो परेशान कर दिया । उन्होंने सीधे सामने की तरफ देखा । जितनी दूर निगाह गयी, केवल जल ही जल दिखाई पड़ा। इसके पहले जयसुन्दर वाबू कभी पुरी नहीं आये थे । शायद इस बार भी नहीं आते । लेकिन उसी निशिकान्त के कारण माना पड़ा। सारा काम-काज छोड़ कर निशिकान्त के चक्कर में यहाँ पाये । एक-एक बार हवा का झोंका आने लगा और उसी के संग महीन बालू जय- सुन्दर वावू के मुंह में भरने लगी। जयसुन्दर वाबू ने पीछे मुड़ कर देखा । समुद्र के किनारे-किनारे कतारों में मकान थे। देखने से लगा कि वे सब होटल हैं । सामने साइनबोर्ड लगा था । जयसुन्दर वाव आगे बढ़े जा रहे थे। उन्होंने सोचा, नहीं, लौट कर एकदम पीछे से शुरू किया जाय । जयमुन्दर बाबू एक होटल के सामने जा खड़े हुए। उसके बाद दरवाजे से अन्दर गये। सामने एक आदमी मिला तो जयसुन्दर वाबू ने पूछा- होटल के मैनेजर कहाँ मिलेंगे? उस आदमी ने कहा-बायें हाथ सीचे चले जायं । सामने मैनेजर मिल जायेगे। जयसुन्दर वाबू ने वही किया। वहां एक कमरे में टेविल के सामने एक सज्जन वैठे थे। वहीं जयसुन्दर बाबू गये। मैनेजर ने पूछा-बताइए, क्या चाहिए ? जयसुन्दर बाबू बोले-~~ मैं एक आदमी की तलाश कर रहा हूँ । ~-बताइए । किसको चाहिए ? क्या नाम है ? -निशिकान्त दास । मैं यह पता करने आया हूँ कि वह इस होटल में ठहरे हैं या नहीं? मैनेजर ने कहा--निशिकान्त दास ? बता सकते हैं, वह कब आये हैं ? -यह तो नहीं बता पाऊंगा। लेकिन इसी हफ्ते आये हैं । सही तारीख नहीं जानता। -आप बैठे । मैं देखता हूँ। यह कह कर मैनेजर रजिस्टर के पन्ने पलटने लगे। वड़ा भारी रजिस्टर था। कव कौन इस होटल में आया है, उसका पूरा रिकार्ड उस रजिस्टर में मौजूद था। लेकिन देर तक खोजने के बाद भी निशिकान्त नाम नहीं मिला। पूरा रजिस्टर ? --- । शुभ संयोग । ६३ देख लेने के बाद मैनेजर ने कहा-उस नाम का कोई आदमी इस होटल में नहीं आया है। जयसुन्दर बाबू कुर्सी पर बैठे थे । अब उठे । मैनेजर ने कहा--आप दूसरे होटल में पता कीजिए। जयसुन्दर बाबू छोटा सा नमस्कार कर बाहर निकले। समुद्र के किनारे उस समय अच्छी-खासी भीड़ थी। मजे की धूप निकल आयो थी। उसी के संग तेज हवा चल रही थी। तमाम लोग समुद्र-स्नान कर रहे थे। उनमें औरत-मर्द-बच्चे सभी थे। लेकिन पुरषो की संख्या अधिक थी । एक जगह कुछ मेम-साहब स्वीमिंग कॉस्टूम पहन कर तैरते हुए गहरे पानी में जा कर नहा रहे थे। फिर एक होटल सामने ही दिखाई पड़ा। जयसुन्दर बाबू रुक गये। उन्होंने साइनबोर्ड को अच्छी तरह पढ़ लिया। उसके बाद वह सीधे अन्दर गये। सामने एक सज्जन टेबिल पर खाता-बही सजाये बैठे थे। जयसुन्दर वाव उस सज्जन के पास गये। बोले-आपके होटल में निशिकान्त दास नाम का कोई है? --निशिकान्त दास ? जरा रुकिए । रजिस्टर देखना पड़ेगा। यह कह कर वह सज्जन होटल का रजिस्टर देखने लगे। फिर पूछा-बतायेंगे, यह निशिकान्त दास कब पुरी आये हैं ? जयसुन्दर वावू बोले-यह तो मही दता पाऊँगा । लेकिन इसी हफ्ते आये हैं । इसके पहले नहीं। मैनेजर ने रजिस्टर बद कर कहा~माफ कीजिए। उस नाम के कोई सज्जन हमारे यहां नही पाये । -अच्छा। नमस्कार। जयसुन्दर बाबू फिर उसी रास्ते से वाहर निकले। पैदल चलते-चलते जयसुन्दर बाबू थक चुके थे। बाहर धूप को तपन बढ़ने लगी थी। लेकिन समुद्री हवा भरपूर नमो रहने के कारण धूप की तपन बुरी नहीं लग रही थी। जयसुन्दर बाबू को बहुत दिनों से पैदल चलने की आदत नहीं थी। इस लिए उनको तकलीफ हो रही थी। लेकिन पहले वह कितना पैदल चलते थे। कालीघाट से पैदल चल कर बड़े बाजार में राधेश्याम अगरवाल की कोठी तक माते थे। राधेश्याम अगरवाल की बात याद आते ही जयसुन्दर बाबू को कलकत्ते की बार याद आयो। सचमुच इस ससार मे क्या-क्या नहीं होता है ! निशिकान्त ने उस राधेश्याम अगरवाल की हत्या कर दी । इस पाप का दह एक दिन निशिकान्त प ६४ || शुभ संयोग भोगना ही पड़ेगा। फिर दंड तो उसे मिला है। दस साल जेल काटना क्या कम है ? लेकिन नहीं, निशिकान्त के लिए वह कुछ भी नहीं है । उसे तो फाँसी से लटकाना चाहिए था। जयसुन्दर बाबू अपने जीवन के प्रारम्भ में जब तरक्की करने लगे थे, तभी घूमकेतु की तरह निशिकान्त का उदय हुआ था। जयसुन्दर वावू जो जीवन में एकाकी हो गये और उनकी गृहस्थी छिन्न-भिन्न हो गयी, इसके लिए कौन जिम्मेदार ? यही निशिकान्त न ! कहाँ चली गयी कमला और कहाँ चले गये अजय और विजय । जयसुन्दर बाबू सबसे अलग-थलग हो कर रह गये । यह सव तो निशिकान्त के परामर्श से हुआ। हालांकि उससे 'बोस एण्ड कम्पनी' की पूंजी बढ़ी और जयसुन्दर बाबू की गरीवी जीवन भर के लिए दूर हुई। उसी की बदौलत उनके पास मकान हुए और कारें हुई । उसी रुपये के कारण उन्हें कलकत्ते के धनी समाज में प्रवेश मिला। लेकिन निशिकान्त न आता, तब भी तो जयसुन्दर वाबू के पास रुपया होता । बाद में वही निशिकान्त उनके सर्वनाश के लिए साजिश करने लगा। फिर तो जयसुन्दर बाबू समझ गये कि जब तक निशिकान्त जिन्दा रहेगा, मुझे परेशान होना पड़ेगा । अव निशिकान्त को बरदाश्त नहीं किया जा सकता । भला-बुरा कोई न कोई फैसला करना ही पड़ेगा। इसी लिए सारा काम-काज छोड़ कर जयसुन्दर वाबू पुरी भाये थे। एक रिवशा सामने से आ रहा था। जयसुन्दर वावू एक किनारे हट कर खड़े हो गये। रिक्शा भी रुक गया । रिक्शावाले ने पूछा-मन्दिर जायेंगे वावू ? -मन्दिर? जयसुन्दर बाबू ने एक बार सोचा कि रिक्शा कर लें या नहीं। कहा- सब होटलों को घुमा कर दिखाने में कितना लोगे? -पांच रुपये लूंगा साव। -अच्छा, चलो। कह कर जयसुन्दर बाबू रिक्शे पर बैठ गये। रिक्शे पर बैठने से बड़ा आराम मिला । सूखी वालू पर जूता पहन कर चलने में बड़ी तकलीफ होती है। फिर पैदल चलने में समय भी नष्ट होता है। रिक्शा चला जा रहा था । जयसुन्दर वाबू चारों तरफ देखते जा रहे थे। चारों तरफ चमचमाती धूप थी जपतुन्दर बाबू ने सोचा, कलकत्ते में अब तक मेरे माफिस में मैनेजर सुशीतल याबू ने काम शुरू कर दिया होगा। दुसमोचन फाटक के पास स्टूल पर जरूर बैठा । ।

शुभ संयोग || ९५ होगा । बाज टाइपिस्ट निरापद के पास क्या काम होगा ? शायद यह बैठा-बैठा अखबार पढ़ रहा है। ये लोग कुछ भी काम नहीं करते । फिर भी इनको रखना पड़ता है। एक आफिस रखने के लिए इनको भी रखना जरूरी है । जयसुन्दर बाबू ने सोचा । आफिस न रखने पर लोग तरह-तरह का संदेह करते हैं । इतने रुपये का लेन-देन कैसे हो रहा है ? बाहर से जो रुपया बाता है, वह किसके नाम से आता है ? वह रुपया जयसुन्दर बाबू के नाम नही, उसी आफिस के नाम आता है । फिर इनकम टैक्स वालों को खर्च दिखाना पड़ता है। वाफिस न तो वह खर्च कैसे दिखाया - जाय? जयसुन्दर बाबू ने सोचा, निशिकान्त को जो रुपया देता था, उसको आफिस के खर्च मे दिखाया जाता था। उससे जयसुन्दर बाबू को भी सुविधा थी और निशिकान्त को भी। निशिकान्त ने जिन्दगी में कभी इनकम टैक्स नहीं दिया। लेकिन उसने हमेशा अच्छी आमदनी की। मकान की दलाली और खून कतल कर उसने जो पैसा कमाया, वह हमेशा काला होता रहा । वह रकम किसी भी हिसाब में दर्ज नहीं हुई। --साद, यह भी एक होटल है। जयसुन्दर बाबू रिक्शे से उतरे। फिर उस होटल के अन्दर गये । फिर निराश लौट आये। फिर रिक्शे पर बैठे। अब जयसुन्दर बाबू ने रिक्शेवाले से कहा-बस करो। अब होटल ले चलो। -कौन होटल बाबू ? -होटल सागर। रिक्शावाला जयसुन्दर बाबू को ले कर चलने लगा। जयमुन्दर बाबू रिक्शे पर बैठ कर निशिकान्त वारे में ही सोचते रहे । इसी निशिकान्त के कारण उनको अपना काम-काज छोड कर पुरी आना पडा । उन्होंने ज्य कर लिया कि निशिकान्त को पकडै बिना मैं कलकत्ते नही लौटूंगा। इससे मेरा चाहे जितना नुकसान हो जाय, वरदाश्त कर लूंगा।

६६ ॥ शुभ संयोग १ 'होटल सागर' के मालिक शेखर वावू का भाग्य बड़ा अच्छा है । बीस वर्ष पहले उन्होंने होटल का व्यवसाय शुरू किया था, जो आज तरक्की करते-करते इस हालत में पहुंचा है। शेखर बावू वस वैठे-बैठे वही-खाता देखते हिसाब जोड़ते रहते हैं । वह मन हो मन हिसाव लगाते हैं कि मेरे पास कितने रुपये हो गये हैं। मुनाफे की रकम को वह बैंक में नहीं डालते । उस रकम से वह अपनी पूंजी को बढ़ाते हैं । पहले होटल का मकान इकमंजिला था । वाद में उसे दुमंजिला बनाया गया। उसके बाद उसे तिमंजिला किया गया । होटल के कमरों में फर्नीचर भी बढ़े। उन पर नयी पालिश की गयी। उस दिन भी शेखर बाबू हिसाव का खाता देखने में व्यस्त थे। तभी उनको फुछ याद आया तो उन्होंने किंकर को बुलाया। किंकर आया तो शेखर वावू ने पूछा-वयों, बारह नंबर को वोर्डर अभी तक नहीं आयी? -आयी है मालिक । ---तो खाना क्यों नहीं खाया ? खाया है ? किंकर बोला-मैंने पूछा था। लेकिन बताया कि वाहर खा कर आयी हूँ। होटल में नहीं खाऊंगी। इतनी देर वाद शेखर बाबू को याद आया । हाँ ! दोपहर में एक आदमी माया था और वह महिला उसी के साथ निकली थी। किंकर वोला-शायद शहर में कुछ सामान खरीदने गयी थी। जव लौटी तव देखा कि उसके हाथ में साड़ी का पैकट है। शेखर वावू वोले-ठीक है। फिर उन्होंने पूछा-और ग्यारह नंबर कमरे के सज्जन ? जयसुन्दर न क्या उनका नाम है ? वह ? किंफार बोला-वह तो आज आते ही कपड़े बदल कर दोपहर में कहीं निकले थे। उन्होंने दोपहर में यहीं खाना खाया था। उसके बाद चाय पी कर निकले हैं। अभी तक नहीं लौटे। सिर्फ ग्यारह और बारह नंबर नहीं, वीस, इक्कीस, वाईस, पचीस, जितने . ?

शुभ संयोग । ६७ कमरे हैं, सबके बोर्डरों की खोज-खबर रखनी पड़ती है । शेखर वायू पी चारो वरफ निगाह रहती है । किसने खाया, किसने नहीं खाया, शेखर बाबू हर बात की जान- कारी करते रहते हैं। शेखर यावू किंकर से पूछा-वाछ कर ही रहे थे कि तभी उन्होंने देशा, ग्यारह नंबर के बोर्डर बाहर से आ रहे हैं । अरे, ग्यारह नंबर आ रहे हैं। पूछ लो किंकर, कब खाना खायेंगे ? शेसर बाबू ने किंकर से कहा। भाग कर जयसुन्दर वाबू के पास जा कर किंकर ने पूछा--पर, आपका पाना तैयार है। खायेंगे ? जयसुन्दर बाबू ने पीछे मुड़ कर कहा-ठीक है, लायो । मैं अभी आता हूँ। इवना कह कर जयमुन्दर बाबू सीढ़ी चढ़ने के बाद अपने ग्यारह नवर कमरे की तरफ बढ़े। बारह नंबर कमरा पार कर ग्यारह नंबर में जाना पड़ता है। बारह नबर कमरे के सामने से जाते समय जयमुन्दर बाबू को एक दृश्य दिखाई पड़ा । उस दृश्य मे कुछ तो आकर्षण था ही, क्योंकि पल भर के लिए उनके पवि क गये। यह लड़की, यानी बारह नंबर हम की बोर्डर, उस समम बाईने में थाना चहरा देख रही थी। उसकी पीठ दरवाजे की तरफ थी। लेकिन उसकी आँखें थचानक जयसुन्दर बाबू को वरफ देख कर मुक गयीं। जयसुन्दर बाबू ने भी सयोग से उस युवती की तरफ देवा । दोनो को ना मिली, लेकिन उस शीशे के माध्यम लेकिन जयसुन्दर बाबू के शिष्टवा-बोध को गवारा न हुआ तो उन्होंने थाखें फेर ली। फिर वह जिस तरह अपने कमरे की तरफ जा रहे थे, चलने चले गये । लेकिन उस पल भर में वह जो कुछ देख सके, उसी से समझ गये कि यह युवती देखने में अच्छी है। किर भी अयमुन्दर वा यह समझ न सके कि उस सड़की ने अपने पमरे थे, दरवाजे को भुला क्यों रम छोड़ा है ! सजे-धजे कोई बात नहीं, लेकिन दरवाया मृला रखे दिना दया सबा-घजा नही जा सकता? सोगों को दिखा परम तरह मेक-अर करना जयमुन्दर बाबू को यशोभनीय सणा। अपने कमरे के दरवाजे का वाला खोल कर पयमुन्दर बाबू बन्दर गये । उस बाद उन्होंने बत्ती बलायो। पिर जितनी देर में जयमुन्दर बाबू ने कपड़ा बदम लिया, उनुनी देर में विकर सौट वाया। जाने हो किंकर ने पहा-मुर, बापका धाना तैयार है। धमें।

। ९८ ॥ शुभ संयोग घूम-घूम कर जयसुन्दर बाबू थक गये थे। कई होटलों में जा कर उन्होंने निशिकान्त का पता लगाया था। उसी काम से वह दोपहर में निकले थे और शाम को भी । लेकिन निशिकान्त का कहों पता नहीं चला। कल रात को ट्रेन में ठीक से नींद नहीं आयी थी। इस लिए जयसुन्दर बाबू ने सोचा, आज अच्छी नींद आयेगी। खाना खा कर ही लेट जाऊंगा। थकावट के मारे जयसुन्दर वावू यह समझ न सके कि उन्होंने क्या खाया और यह कैसा लगा । सामने खाना परोसा गया था, इस लिए वह एक-एक चीज मुंह में डालने लगे। किंकर पास ही खड़ा था। उसने कहा-एक रोटी और लीजिए सर । महाराज, रोटी लाओ। जयसुन्दर वावू बोले- नहीं। यह कह कर जयसुन्दर वाब थाली छोड़ कर उठे । हाथ-मुंह धोने के बाद वह फिर सीढ़ी चढ़ कर दूसरी मंजिल में अपने कमरे की तरफ जाने लगे । अपने कमरे फी तरफ मुड़ते हो उनको वे आँखें याद आयो । लेकिन नहीं । जयसुन्दर बाबू ने देखा कि वारह नंबर कमरे का दरवाजा बंद है । शायद वह लड़की खाना खा कर सो गयी है। पुरी के होटल में अकेली ठहरी है । पाम हिम्मती नहीं है। जयसुन्दर बाबू के साथ ही साथ किंकर भी ऊपर माया । उसने जयसुन्दर वाबू के सामने हाथ बढ़ाया। ----नया है? -~-जी, पान है। जयसुन्दर बाबू ने कहा- लेकिन मैं तो पान नहीं खाता । किंकर जाने लगा। जयसुन्दर वायू ने एक बार उससे पूछना चाहा-बगल वाले कमरे में जो लड़को है, वह कौन है ? पूछना चाह कर भी जयसुन्दर वाबू ऐसा पूछ न सके। उनके बगल वाले कमरे में चाहे जो रहे, उसके बारे में उनको कोई कौतूहल नहीं रहना चाहिए । किकर रफ गया था। उसने पूछा-मुझसे कुछ कहेंगे? जयसुन्दर वावू बोले-नहीं। हां, एक बात है । गुझे कल सवेरे जरा जल्दी जगा देना । पूमने निकलूंगा। इतना कह कर जयसुन्दर बाबू ने दरवाजा बंद कर लिया।

आधी रात को न जाने कैसे शोरगुल से जयसुन्दर वाबू की नीद खुल गयी। इससे उन्हे बड़ा आश्चर्य लगा। इतनी रात को कौन शोर मचा रहे हैं ? किस वाव पर हो-हल्ला हो रहा है ? खिड़की खुली थी। बाहर से समुद्र की लहरों की उवाने वाली आवाज आ रही थी। लेकिन शोरगुल की आवाज के आगे वह बावाज मानो दबती गयी। नही। उधर ध्यान नहीं दूंगा । जयसुन्दर बाबू ने सोचा । सम्भवतः वह अपने मन को उथल-पुथल को बाहरी शोरगुल समझ बैठे थे। अपनी आदत के मुताविक जयसुन्दर बाबू ने आवाज दी-नन्द, इतना शोरगुल क्यो हो रहा है ? लेकिन नहीं। जयसुन्दर वावू को याद आया कि यह कलकत्ता नहीं है। यह वो पुरी है । महाँ नन्द कहां से आयेगा ? यहाँ नन्द होता तो उनके कमरे में पीने के लिए एक गिलास पानी रख देता ! फिर यह कलकत्ता होता तो क्या जयसुन्दर बाबू इतनी जल्दी सोने की तैयारी करते ? कलकत्ता होता तो उनके घर लौटते-लौटते रात के बारह या एक बज जाता। शाम को वहां उनका कोई न कोई काम रहता है । इसके अलावा यह कितने हो क्लबों के मेम्बर हैं । रोटरी से ले कर लायन्स-सभी अच्छे क्लबों में उनको जाना पड़ता है । अच्छे क्लवों से मतलब है रईसो के, अमीरों के । लेकिन थोड़ी ही देर बाद धम-धम आवाज होने लगी। फिर वो जयसुन्दर वाबू उठ कर बैठ गये। खिड़की खुली थी। जयसुन्दर बाबू ने खिड़की से बाहर देखा । अरे ! सवेरा हो गया ? आकाश मे इतनी रोशनी क्यों दिखाई पड़ रही है ? खिड़की के पास जा कर जयसुन्दर वाबू ने बाहर झांक कर अच्छी तरह देखा । सचमुच पूरब में मूरज निकला है। जयसुन्दर बाबू के उठने में बहुत देर हो गयी थी ! एक ही नीद में उन्होंने पूरी रात बिता दी थी। दरवाजा खोलते ही जयसुन्दर बाबू ने देखा कि किंकर खडा है । किंकर बोला-आपने तड़के ही जगा देने के लिए कहा था।

१०० ॥ शुभ संयोग —हाँ । बहुत अच्छा किया कि जगा दिया। मैं तो सोया पड़ा था। यह कह कर जयसुन्दर बाबू ने फिर दरवाजा बंद कर लिया। उसके बाद वह हाव-मुंह धो कर तैयार हुए। फिर कपड़े बदल कर कमरे से निकले। सवेरे घूमने निकलने का उद्देश्य यह था कि इसी बहाने अगर निशिकान्त से मुलाकात हो जाय तो बुरा क्या? जयसुन्दर वाबू ने सोचा कि अगर निशिकान्त पुरी आया है तो सबेरे जरूर टहलने निकलेगा । चाहे वह जिस होटल में ठहरा हो, सवेरे समुद्र किनारे तक जरूर जायेगा। बाहर से जो भी आता है, सवेरे समुद्र देखने जाता है । जयसुन्दर वाबू ने भी समुद्र किनारे टहलते रहने का निश्चय किया । अगर निशिकान्त दिखाई पड़ा तो उसे वहीं पकड़ा जा सकेगा। दूसरी मंजिल से नीचे जाते समय जयसुन्दर बाबू ने वारह नंबर कमरे की तरफ मुड़ कर देखा। उस समय भी बारह नंवर कमरे का दरवाजा बंद था। जयसुन्दर बाबू ने सोचा, लड़की खूब सो रही है। -चाय नहीं पियेंगे? किंकर चाय का कप लिये एकदम सामने आ पहुंचा। -आपको चाय देने जा रहा था। जयसुन्दर वाबू ने चाय का कप हाथ में लिया। देखा, उधर वाले कमरे में उस समय बहुत भीड़ थी। सब लोग वहाँ बैठ कर चाय पी रहे थे । शायद सभी लोग हवाखोरी के लिए निकलेंगे। समुद्र की साफ हवा सेहत के लिए अच्छी है । सिर्फ जयसुन्दर वाबू के उठने में देर हो गयी थी। भोजन-कक्ष में बैठ कर चाय पीने वालों में बहुत से लोग समुद्र में नहाने वाले थे । वहीं खड़े-खड़े जयसुन्दर वावू ने चाय खत्म की । उनको समुद्र में नहाना नहीं था । सेहत सुधारने के लिए भी वह नहीं आये थे। तीथे-भ्रमण भी उनका उद्देश्य नहीं था। वह तो निशिकान्त की खोज में आये थे। वह उद्देश्य सफल होते ही कलकत्ते लौट जायेंगे। इस तरह समय नष्ट करना उनके लिए सम्भव नहीं है। उनके पास बहुत काम है। कलकत्ते में उनके तमाम काम रुके पड़े हैं। चाय का कप रख कर जयसुन्दर बाबू निकले । मुंड के झंड विभिन्न उम्रों के औरत-मदों से समुद्र का किनारा भरा हुआ था। रेत उस समय चींटी लगी मिठाई की परात की तरह लग रही थी। जितनी दूर निगाह जाती थी, मनुष्य ही मनुष्य दिखाई पड़ते थे। जयसुन्दर बाबू धीरे-धीरे उन लोगों के सामने से गुजरने लगे। हर एक चेहरे को वह अच्छी तरह देखते जा रहे थे। लेकिन एक भी चेहरा निशिकान्त का नहीं था। सभी दूसरे लोग थे। - "M बहुत से लोग नमाने आये थे। फिर बहुत से लोग मुंह वाये जोर-जोर से सांस ले सभी लोग अपने फेफड़ों को स्वस्थ बनाना चाहते थे। जयसुन्दर बाबू ने सोचा, सचमुच इस दुनिया में कैसे-कैसे विचित्र लोग हैं। कोई स्वास्थ्य चाहता है तो कोई धन और कोई प्रतिष्ठा। इस दुनिया में किसी चीज की कमी होने पर काम नहीं चलता। सभी लोग सब कुछ चाहते हैं । बहुत से लोग जयसुन्दर बाबू की तरफ देख रहे थे । जयसुन्दर बाबू उनमें से किसी को नहीं जानते थे। उनके लिए यह बड़ी अच्छी बात थी कि कोई जान- पहचान का नहीं मिल रहा था। उन्होंने भी मन ही मन मनाया कि किसी परिचित से मुलाकात न हो जाय। घड़ी की तरफ देख कर जयसुन्दर बाबू रामझ गये कि दिन काफी बढ़ गया है । समुद्र की रेत पर टहलतेन्टहलवे न आने कब दो घंटे बीत गये हैं। पैर भी दुखने लगे थे । उन्होंने सोचा कि बस, और नहीं । अब लौटना पड़ेगा। रेत पर चलने से पांवो में ज्यादा दर्द होता है । सड़क पर चलना इससे थासान है। वह सड़क पर ना कर चलने लगे। बाबू, मदिर जायेंगे? एक झुड रिक्शेवाले सवारी को याशा में कतार बांधे खड़े थे । कल जो रिक्शावाला मिला था, बड़ा बच्या या । षयमुन्दर बाबू ने सोचा। जब से यह पुरी आये थे, सभी उन्म मच्या व्यवहार कर रहे थे। जयमुन्दर वाबू ने कहा-नही भैया, मैं मन्दिर नहीं जाऊँगा । मैं तो हवा- खोरी के लिए निकला हूँ। वात वो सही है । अयमुन्दर दाब क्यों मन्दिर जायेंगे? उन्हें किस बात का दुख है ? कौन सा पाप उन्होंने किया है । जो पाती है और दुखी हैं, वे मन्दिर जाय। जयमुन्दर वादू वो अपने जीवन में मुखी हैं । जममुन्दर वाबू सचमुच अपने जीवन में मुखी थे। उनके दोनों बेटे यान-याने क्षेत्र में प्रविष्ठित हो चुके थे । उनको पली भी याने टाकुर-देवता ले वर मुखी थी। वह भी अपनी 'वोट एण्ड कम्पनी' ले कर मरे में थे। उनको किसी बात को कमी नहीं की तो वह मन्दिर जा कर देव-दर्शन क्यों करते ? देवता में उनकी कोई मांग नहीं थी, कोई कामना भी नहीं। होटल लौट कर जपमुन्दर दादू ने घड़ी देखी ! ग्यारह वर गये थे। लेकिन होटल में कदम रखने ही वपन्दर बाबू चौंक पड़े। सोही से मार पाने लगे तो पुलिसवालों को देख कर वह स्क गरे। उन्हीं के कमरे के सामने मोड़ । । - क्या हुवा ? पुलिस क्यों वायो है ?

१०२ शुभ संयोग जयसुन्दर बाबू को देख कर शेखर बावू सामने आये। बोले-~~या गये ? आइए । देखिए, इधर क्या बवाल मचा है.। -~-क्या हो गया है ? शेखर बाबू होटल के मालिक हैं । इस लिए उन्हीं के चेहरे पर ज्यादा परे- शानी है। बोले-आप तो ग्यारह नंवर में रहते हैं । आपके बगल वाले कमरे में एक महिला रहती हैं । उनका नाम है वरुणा चौधरी। कल तो आपने उनको देखा होगा? ? . - वया जवाब दिया जाय, जयसुन्दर वावू समझ न सके। सिर्फ बोले-उस महिला के साथ क्या हुआ -अरे साहब, वही महिला जहर खा कर आत्महत्या करने चली थी। फिर पुलिस बुला कर दरवाजा तोड़ा गया । बताइए, झमेला कम है ? जयसुन्दर वाबू को कल की देखी वे दोनों आँखें याद आयीं। तभी उनको उस लड़की की दृष्टि न जाने क्यों अस्वाभाविक लगी थी। पूचा-बच गयी या चल बसी? शेखर वावू बोले-सवेरे से उसने दरवाजा नहीं खोला तो मुझे शक हुआ। तब मैंने फिकर से कहा तो वह दरवाजे पर दस्तक देने लगा। लेकिन तब भी दर- पाजा नहीं बुला । अंत में पुलिस को खबर करने के लिए कहा । सोचा, अगर दर- पाजा तोड़ना ही है तो पुलिसवाले ना कर अपने हाथ से तोड़ें। जयसुन्दर बाबू ने कहा-फिर क्या हुआ लेकिन शेखर बाबू इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सके । उधर से एक सज्जन गले में स्टेथिस्कोप लटकाये आ गये । शेखर वावू ने उस सज्जन से पूछा - कहिए डाक्टर साहब, कैसा देखा ? डाक्टर साहब बोले-ठीक है । अब घबड़ाने की कोई जरूरत नहीं है । नींद की गोलियां खायी थीं उस लड़की ने, लेकिन मात्रा कुछ अधिक हो गयी थी। और कोई बात नहीं। शेखर वाबू ने पूछा-वात कर रही है ? मुझे तो बड़ा डर लगा था। डाक्टर साहव बोले-उस लड़की ने खुद बताया कि नींद की गोलियां खायी ? थीं। -अब तो कोई खतरा नहीं है ? देखिए डाक्टर साहब, मैं होटल चला कर साता हूँ। नगर मेरे यहाँ कोई बोर्डर इस तरह मर जाय तो मेरे होटल को कितनी बदनामी होगी? होटल के तमाम वोर्डर ग्यारह नंवर कमरे में, जहां वह लड़की ठहरी थी, जा शुभ संयोग। १०३ कर जमा हो गये थे । डाक्टर साहब के निकल आते ही वे कमरे से निकले । दोनों पुलिसजन भी बाहर आये। शेखर बाबू ने डाक्टर साहब को आठ रुपये दिये। कहा-मैं तो बुरी तरह डर गया था डाक्टर साहब । अगर वह मर जाती तो मेरा सर्वनाश हो जाता। खैर, आज उसे खाने के लिए क्या दूंगा? डाक्टर साहब ने आठ रुपये जेब में डाल कर सोदी से नीचे उतरते हुए पूछा- यह महिला कोन है ? होटल में मोली क्यों आयो है ? क्या इसके साथ कोई नहीं है? घोखर बाबू बोले - लगता तो है कि इसके साथ कोई नहीं है । लेकिन आज इसे क्या खाने को दूंगा? डाक्टर साहब ने कहा- इस वक्त सालिड फुड न देना ही ठीक रहेगा । अभी एक गिलास गरम दूध दीजिए । और कुछ देने की जरूरत नहीं है। उसके बाद डाक्टर साहब ने शेखर बाबू को अलग बुला कर कहा---एक काम कीजिए । इन पुलिसवालो के हाथ में कुछ दे दीजिए । नही तो उस लड़की का चाहे जो हो, आपको विलावजह परेशान होना पडेगा। मेरी भी फजीहत होगी। अगर मामला आगे बढ़ा तो वोसियो वार कचहरी का चक्कर लगाना पडेगा। शेखर बावू ने कहा- आपने सही कहा । मैं पुलिसवालो को संभालता हूँ। यह कह कर शेखर बाबू ग्यारह नंबर कमरे की तरफ गये। जयसुन्दर बाबू भी उनके साथ चले। उस समय भी वहां लोगो की भीड़ जमा थी। सभी 'होटल सागर' के वोर्डर थे। यही दोनो सिपाही खडे थे । शेखर बाबू उन दोनो पुलिसवालो को बुला कर एक तरफ ले गये और बोले-- चलें सर ! मेरे याफिस में चलें। सदने समझ लिया कि याफिस में ले जा कर शेखर बाबू उन पुलिसवालों को उनका पावना दे देंगे। जयमुन्दर वावू ने मौका पा कर उस युवती की तरफ देखा। इतने में किंकर आ गया। शायद जयसुन्दर बाबू को देख कर ही वह आया। किंकर बोला-और जरा देर हो जाती वो सर्वनाश हो जाता सर, बहुत बच गये हैं । बगर वह मर जाती तो हमारे होटल की कितनी बदनामी होती। जयसुन्दर बाबू उस लड़की की तरफ देख रहे थे। चेहरा बड़ा गोरा है । उम्र वोस या ज्यादा से ज्यादा पचीस होगी । उससे अधिक नहीं। उसकी आँखों में उस समय भी नींद की खुमारी थी। किंकर बोला-देखिए सर, पहले हमारे होटल में कभी ऐसा नहीं हुआ ! यही । १०४ || शुभ संयोग पहला है। कितने ही लोग यहां बाते हैं, पांच-सात दिन रह कर चले जाते हैं। लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ। हमने तो सोचा था कि बचेंगी नहीं, मर जायेंगी। जयसुन्दर वा उस समय भी उस लड़की की तरफ एकटक देख रहे थे। किंकर की बातें शायद जयसुन्दर वाबू के कानों में नहीं गयीं। जयसुन्दर बाबू ने अचानक पूछा- इस लड़की के साथ कोई नहीं है ? किंकर वोला-जी नहीं। परसों एक सज्जन इनसे मिलने आये थे और यह उनके साथ बाहर गयी थीं। उसके बाद जब रात को लौटों तो हाथ में एक पैकेट था। -कौन मिलने आया था? किंकर वोला-यह तो नहीं बता सकता। -क्या उस सज्जन को खवर नहीं भिजवायी जा सकती? किंकर बोला-~-कैसे खबर भेजें, वताइए ? वह सज्जन कौन हैं, कहाँ रहते हैं, यह सब हम कुछ भी नहीं जानते । शेखर बावू फिर कमरे में आये । वह महिला कैसी है, यही देखने आये होंगे। जयसुन्दर बाबू की तरफ देख कर शेखर वाबू ने कहा- वताइए, कैसा झमेला है ! म होटल के धंधे के बारे में कह रहा हूँ। न जान, न पहचान, जो भी आता है, उसी को अपने यहाँ टिकाना पड़ता है । यह तो कहिए कि थोड़े में वच गये । कहीं फांसी लगा लेती तो हमारे ही हाथों में हथकड़ियां पड़तीं । अव आज रात भर में बढ़ई बुला कर इस दरवाजे की मरम्मत करानी पड़ेगी । सवेरे से मेरा कोई काम- काज न हो सका। कैसा-कैसा झमेला मेरे ही भाग्य से आता है ! तभी अचानक उस युवती ने आँखें खोली। धुंधली दृष्टि से वह सबको देखने लगी। शेखर बाबू ने उसके पास जा कर पूछा-अब आपको कैसा लग रहा है ? उस लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। वह उसी तरह मूनी आँखों से देखती रही। शेखर बाबू ने जयसुन्दर वावू की तरफ देख कर कहा- जानते हैं, नींद की पन्द्रह गोलियां एक साथ खा ली थों ! जयसुन्दर बाबू ने पूछा-आपको कैसे पता चला ? शेखर वाबू ने कहा-उन गोलियों की पत्नियाँ पुलिस ने आ कर ढूंढ़ निकाली। फर्श पर पड़ी थीं। मुफ्त में मुझे डाक्टर को आठ रुपये देने पड़े थोर पुलिसवालों को सौ रुपये। -~-पयों, पुलिस को क्यों सौ रुपये देने पड़े ? शेखर वायू बोले -वाह ! पुलिसवाले तो ऐसे ही मौके की ताक में रहते हैं।

शुभ संयोग । १०५ अगर उनको धूस न देता तो पता नही कितना झमेला भोगना पड़ता ! सब क्या होता? फिर यह खबर अखबार में छप जाती तो मेरे हो होटल को बदनामी होती। दूसरे होटलवाले तो यही चाहते हैं । अगर किसी वरह यह होटल वदनाम हो जाय वो उन्ही को फायदा है । आज के जमाने में कोई किसी का भला नहीं चाहता। प्रभी उस लड़की ने मानो कुछ कहना चाहा । शेखर बाबू ने उस लड़की तरफ देख कर पूछा-क्या चाहिए ? लेकिन यह लड़की कुछ न वोली। शायद उसके पास कहने लायक कुछ नहीं था। शेखर बाबू ने पूछा-पानी पियेंगी? उस सड़की ने सिर हिला दिया। जयसुन्दर बाबू बोले-ठहरिए । मेरे कमरे में पानी है । लाता हूँ। यह कह कर जयमुन्दर वाबू अपने कमरे से एक गिलास पानी ले आये और उस लड़की को पिलाने लगे । पानी पिलाते समय उसका चेहरा बायें हाथ से पामना पड़ा। जयसुन्दर वायू को उस लड़को का चेहरा बड़ा मुलायम लगा । आम तौर पर लड़कियों का चेहरा जिवना मुलायम होता है, उससे ज्यादा मुलायम । पानी पिलाते समय थोड़ा पानी गिरा। गिरा तो एकदम उस लड़की के गले पर गिरा। जयसुन्दर बाबू ने धोनी के खूट से पह पानी पोछ दिया । यह देख कर शेखर बाबू बोले-आप वयो तकलीफ कर रहे हैं सर? किंकर तो है, पिला देगा। उसके बाद किंकर की तरफ देख कर शेखर बाबू ने कहा--किंकर, खड़े क्यों हो? पानी पिला दोन। जयसुन्दर बाबू ने शेखर बाबू को वाटो पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने लड़की से पूछा-और पानी पियोगी ? फिर भी उस लड़की ने कुछ नहीं कहा। वह जयसुन्दर बाबू की तरफ एकटक देखती रही। जयसुन्दर बाबू ने फिर उस लड़की के मुंह में पानी डाला। वह पानी भी उस लड़की ने पी लिया। फिर उस लड़की की तरफ देख कर जयसुन्दर वाबू ने पूछा--अब कैसा लग उस लड़की ने सिर हिलाया। जयमुन्दर बाबू ने शेखर बाबू की तरफ देखा। ७ . ..२.०६ ॥ शुभ संयोग 4 : कहा-~-थोड़ा दूध दिया जाता तो ठीक रहता। कह कर जयसुन्दर वाबू ने जेब से दस रुपये का नोट निकाला। वह नोट किंकर की तरफ बढ़ाया और कहा-जरा चले जामो भैया, दूध ले आओ। : शेखर वावू बोले- लेकिन मापने क्यों रुपया दिया ? होटल में तो दूध है । . जयसुन्दर बाबू ने कहा-रहने दीजिए। यहाँ उसका कोई नहीं है। अगर हममें से कोई उसकी देखभाल न करे तो कौन करेगा? इसका कलकत्ते वाला पता आपके पास है ? शेखर बाबू बोले----कलकत्ते का पता कैसे रहेगा? हमारे पास किसी का पता नहीं रहता। -अगर रहता तो खबर भेजी जाती। तब तक किंकर न जाने कहाँ से दूध ले आया। जयसुन्दर बाबू ने किंकर से कहा-जरा गरम कर के नहीं लाये ? ठंडा दूध पिलाना ठीक न होगा। शेखर वाबू वोले-हाँ-हाँ, गरम दूध देना ठीक रहेगा । जाभो किंकर, गरम कर के लाओ। किंकर दूध गरम करने चला गया। शेखर वाबू बोले-उधर मेरा बहुत सारा काम पड़ा हुआ है। तीस-तीस बोर्डर खायेंगे, उसका इंतजाम करना होगा और तभी यह झमेला हो गया। अव वताइए, मैं अकेला किधर-किधर सम्भालू ? जयसुन्दर वावू ने शेखर बाबू से कहा-~-आप अपने काम से जाइए। मैं तो यहाँ हूँ। -लेकिन आपने भी अभी तक खाना नहीं खाया ! माप कब तक इसको ले कर पड़े रहेगे? जयसुन्दर वावू बोले-अगर कोई मरने लगे तो कौन खा सकता है ? कम से कम में तो नहीं खा सकता। यह पहले कुछ ठीक हो जाय तो मैं खाना खा लूगा । आप दूसरे वोर्डरों को खिला दीजिए, तब तक मैं यहीं हूँ। वाबू ने फिर कुछ नहीं कहा। वह अपने काम से कमरे के वाहर चले गये। तभी उस लड़को ने अचानक मांखें खोल कर जयसुन्दर वाबू को देखा। जयतुन्दर बाबू ने पूछा- अब कैसा महसूस कर रही हो ? इतनी देर बाद वह लड़की बोली। सिर हिला पर उसने कहा-~-ठीक हूँ। जयसुन्दर वाबू ने पूछा-गरम दूध पियोगी ? शेखर बाबू -- .शुभ संयोग । १०७ उस लड़की ने कहा--जी हां। ---तुम्हारे लिए दूध लाने गया है। गरम कर के ला रहा होगा। कलकत्ते में तुम्हारा कौन है, बता दो। मैं टेलीग्राम कर दूंगा। कौन है कलकत्ते में ? पता दे दो। कोई तो होगा। उस लड़की ने सिर हिलाया। कहा- नहीं। -कोई नहीं है ? मां-बाप या भाई-बहन कोई नही है ? -जी नहीं। -फिर ? फिर तुम क्या करने पुरी आयो हो ? उस लड़की ने कोई उत्तर नही दिया। जयसुन्दर बाबू बोले- क्या हुआ ? जवाब नहीं दे रहो हो ? यहाँ क्यों आयो हो ? धूमने ? -जी हो। -लेकिन तुमने नीद की गोलियां क्यों खायी ? कोई उत्तर न दे कर वह लड़की रोने लगी। जयसुन्दर बाबू समझ गये कि एक साथ इतने सवाल करने का यह समय नही है। इस लिए जयसुन्दर बाबू चुप हो गये। किकर गरम दूध लाया। आते ही उसने जयसुन्दर बाबू से कहा-आप जा कर खाना खा लें । बहुत देर हो गयी है । मैं इनको दूध पिला रहा हूँ। जयसुन्दर बाबू खाने के लिए नीचे गये । खाना खाते समय भी जयसुन्दर बाबू उस लड़की बारे में सोचने लगे। चया रहे थे, उधर उनका ध्यान ही नहीं था। शेखर वाबू जयसुन्दर बाबू के पास आ कर खडे हो गये । बोले-बताइए सर, अब क्या करना चाहिए? अचानक वह लड़की आत्महत्या करने क्यों चली थी ? अगर वह सचमुच मर जाती तो मैं क्या करता? मैं तो कही का न रहता। जयसुन्दर वाबू बोले- मैंने उससे पूछा था कि कलकत्ते में काकोर है, लेकिन उसने बताया कि कही कोई नहीं है। --तो क्या वह मेरे होटल का बिल भी नहीं कर जयसुन्दर वावु ने कहा- यह मैं कैसे दना मन्ट है, आप समझे। ।

१०८ शुभ संयोग शेखर बावू बोले-जी नहीं। मैं यों ही पूछ रहा हूँ। अगर बाद में उसने बताया कि मेरे पास पैसा नहीं है, तव क्या करूँगा? तव अगर उसे पुलिस के हवाले करता हूँ, तो भी लोग मुझे बदनाम करेंगे। जयसुन्दर वावू खाना खा चुके थे । उठ कर उन्होंने हाथ-मुंह धो लिया । उसके बाद ऊपर अपने कमरे में जाते समय जयसुन्दर बाबू ने पूछा-वह किस लिए पुरी आयो है, आपको कुछ पता है ? शेखर बाबू बोले- मैं कभी किसी से यह नहीं पूछता कि आप यहाँ किस लिए आये हैं । यह पूछना भी उचित नहीं है। कोई जगन्नाथ दर्शन करने आता है तो कोई घूमने । हां, अगर कोई बताता है तो सुन लेता हूँ। जव यह लड़की अकेली आयी थी, तभी मुझे संदेह हुआ था। लेकिन सोचा था कि शायद डाक्टर की सलाह पर जलवायु-परिवर्तन के लिए आयी है। शायद शेखर बावू और भी कुछ कहते, लेकिन जयसुन्दर बाबू रुके बिना ऊपर जाने के लिए सीढ़ी की तरफ बढ़े। निशिकान्त उस दिन अपने होटल में ही दिन भर था। वाहर कहीं नहीं निकला था। होटल छोटा था और सस्ता भी। दिन भर होटल में पड़े रहने से क्या होता, निशिकान्त का मन होटल सागर' में पड़ा था। निशिकान्त जिस होटल में ठहरा था, उसका कोई नाम नहीं था। बाहर कोई साइनबोर्ड भी नहीं दंगा था। यह भी कोई होटल है, वाहर से देख कर समझने का उपाय नहीं था। दिन भर निशिकान्त कहीं नहीं निकलता था । लेकिन दिन भर होटल के एक कमरे में बंद भी नहीं रहा जा सकता। फिर भी निशिकान्त रहता था। उसे तकलीफ होती थी, लेकिन कोई उपाय नहीं था। दिन भर होटल के कमरे में बंद रहने के बाद शाम हो जाने पर थोड़ी देर के लिए बाहर निकलता था। बाहर निकलने पर निशिकान्त बड़ी सावधानी बरतता था। जिधर रोशनी शुभ संयोग ! १०६ रहती थी, उपर वह नहीं जाता था। विघर जाने पर किसी का चेहरा नहीं दिखाई पड़ता, निशिकान्त उधर ही थोड़ा टहल वाता था। उस दिन समुद्र के किनारे चलते-चत्तवे निशिकान्त एकदम 'होटल सागर' के सामने पहुंच गया। वहां समुद्र की लहरें बा कर टूट रही थीं, वही सड़े हो कर वह 'होटल सागर' की तरफ देखता रहा । -~-बरे, विपिन बाबू ! बाप कव याये ? --वस, परसों वाया। -कहां ठहरे हैं ? -इसी 'होटल सागर' में । और बाप? -मैं तो 'विक्टोरिया' में व्हरा हूँ। 'होटल सागर' में खाने-पीने का कैसा इन्तजाम है? ये बातें निशिकान्त के कानों में पड़ी। टहलने निकल कर दो परिचित व्यक्तियों की मुलाकात हो गयी थी। दोनों कलकते के थे। उनकी बातों से इसका पता चला। निशिकान्त अंधेरे में खड़े हो कर दोनों की बातें सुनता रहा। --आज हमारे होटल में बड़ा बवाल हो गया। -क्या हुया -एक लड़की यात्महत्या करने चली पो। -अरे ! फिर? बच गयी? -हां । सुना कि नीद को पन्द्रह गोलियां खा ली थी। फिर डाक्टर आया, पुलिस वायी और बड़ा झमेला हुआ । आखिर डाक्टर की दवा से वह लड़की बच गयी। -क्या उस लड़की के साथ कोई नहीं था? -नहीं। बात करते-करते दोनों सज्जन आगे निकल गये। फिर निशिकान्त उनकी बातें नहीं सुन सका। निशिकान्त देर तक वहीं खड़े हो कर सोचता रहा । फिर तो मैंने वरणा से जो कुछ कहा था, उसने वही किया। घरुणा पहले जरा हर गयी थी। कहा या--एक साथ उतनी गोलियां खाने पर कही मर न बाऊँ ? निशिकान्त ने कहा था-मर कसे वायोगी? वगर मर ही पायोगी तो ये गोलियां खाने के लिए क्यों कहता? क्या तुमने पहले कभी नींद की गोली नहीं खायी? ? - ११० || शुभ संयोग वरुणा ने कहा था- नहीं । निशिकान्त ने कहा था-अरे ! आजकल तो नींद की गोलियाँ सभी खाते हैं। जैसा जमाना पड़ा है, उससे नींद को गोलियाँ खाये बिना कैसे काम चल सकता है ? -किस लिए नींद की गोली खाते हैं ? निशिकान्त ने कहा था-मन की जलन मिटाने के लिए। --केसी जलन ? निशिकान्त ने कहा था--आज लोगों के मन में जलन वया कम है ? यही तुम अपनी बात देखो न । तुम्हारी इतनी उम्र हो गयी, लेकिन शादी नहीं हुई और न तुम्हें कोई नौकरी मिली । सिर्फ ट्यूशन करके तुम अपना खर्च चलाती हो । फिर भी मेस में रहने-खाने का खर्च पूरा करने के लिए तुम्हें उधार लेना. पड़ता है। अगर पैसे की जरूरत न पड़ती तो तुम क्या यह काम करने के लिए तैयार होती? वरुणा समझ न पायी कि क्या उत्तर देगी। इसलिए वह चुपचाप निशिकान्त की वातें सुनती रही। निशिकान्त ने फिर कहा था-तुम क्या समझ रही हो कि ऐसी लड़की तुम्ही एक हो? और कोई नहीं है ? हजारों, लाखों लड़कियाँ तुम्हारी तरह हैं ? फिर दूसरी तरह के लोग भी हैं। इस संसार में ऐसे भी लोग हैं, जिनके पास रुपये की कमी नहीं है । वे खुद भी नहीं जानते कि उनके पास कितने रुपये हैं । तुम नहीं जानती कि उन लोगों को कितना कष्ट है । -उनको क्या कष्ट है ? -वाह ! वहुत रुपये रहने में कप्ट नहीं है ? रुपये की चिन्ता से उन्हें रात को नींद नहीं आती। इसलिए उनको भी नींद की गोलियाँ लेनी पड़ती हैं । तुम नहीं जानती, जयसुन्दर बाबू भी नींद की गोलियाँ खाते हैं। यह सब बातें वरुणा के लिए नयी थीं। सब कुछ सुन कर वरुणा ने कहा था-लेकिन नींद की गोलियां खा कर उनको कैसे मुट्ठी में फरूंगी, यह नहीं समझ पा रही हूँ। --तुम मेरी आसान सी योजना नहीं समझ सकी ? जयसुन्दर बाबू के कमरे के बगल में तुम्हारा कमरा है । जब तुम नींद की गोलियां खा कर खूब सोती रहोगी, तब होटल के लोग समझेंगे कि तुमने आत्महत्या कर ली है। वे तुम्हारे फमरे का दरवाजा तोड़ कर अन्दर घुसेगे । फिर.जयसुन्दर बाबू भी तुम्हारे कमरे में आयेंगे । तव तक तुम्हारी गहरी नींद खुल जायेगी और लोग समझेगे कि तुम बच गयी। फिर जयनुन्दर वावू तुमसे पूगे कि तुम क्यों आत्महत्या करने लगी घी ? तव तुम अपने दुख-दर्द के बारे में वतामोगी । तुम कहोगी कि मेरा कोई: नहीं है । मैं बहुत गरीव है। एक-एक पैसे के लिए परेशान रहती हूं। ?

निशिकान्त ने वरुणा को समझाते हुए मा-या चितुम ऐसा नाटक करोगी कि मानो आत्महत्या करने के अलावा तुम्हारे लिए कोई चारा नहीं है । समझ गयो ? लेकिन मैं क्यों आत्महत्या करने गयी, इसका क्या जवाब दूंगी? -~-कोई जवाब नहीं देना पड़ेगा । तुम केवल रोती रहोगी। फिर देखोगी कि जयमुन्दर बाबू के मन में तुम्हारे प्रति दया थायेगी । फिर तो बड़ी यासानी से काम बन जायेगा । देख लेना, मैं जैसा कह रहा हूँ, ठीक वैसा होगा । मैं तो जयमुन्दर वाबू को पहचानता हूँ। अगर तुम उनको अपनी मुट्ठी में कर लोगी वो कभी तुम्हें रुपये की कमी नहीं रहेगी। निशिकान्त की पूरी बातें सुन लेने के बाद वरुणा योड़ी देर न जाने क्या सोचती रही थी। उसके बाद कहा या--फिर भी मुझे बड़ा डर लग रहा है। निशिकान्त ने कहा था-डरने की कोई बात नहीं। मैं तो हूँ। फिर जब भी कोई परेशानी हो, तुम मेरे पास चली माना । मैं तुम्हे अकल बना दूंगा। अब निश्चिन्त हो कर जायो। दो साड़ियां और नींद को गोलियो निशिकान्त ने ही खरोद दी थी। फिर उसने वह सब वरुणा को दे कर उसे एक रिवरो मे विठा दिया था। विशेकाले से कहा था-बहन जी को 'होटल सागर' तक पहुंचा दो। 'समुद्र के किनारे उन लोगों की वा मुन कर निशिकान्त जरा निश्चिन्त हुआ। सोचा, वरुणा ने अपनी बात रखी है ! जब उसने नोद की गोलियो खायो है, पुलिस आयी है और दरवाजा तोड़ा गया है, तब सबने यही समझा होगा कि वह लड़की बहुत दुखी है । वेसहारा है। इसी लिए उसने आत्महत्या कर मुक्ति पाना चाहा या। निशिकान्त समुद्र के किनारे उसी जगह खडे हो कर 'होटल सार' को टर देखने लगा। 'होटल सागर' की दूसरी मंजिल मे ग्यारह नबर कमरे में और में बारह नंबर कमरा था ! ग्यारह नबर में जयसुन्दर बाबू टहो रेल नंबर में वरणा चौधरी ठहरी थो। ग्यारह नवर की निशिकान्त समझ गया कि जयमुन्दर वावू इस समय पर के कमरे में रोशनी थी। हे जगनाथ ! हे प्रभु ! मेरो योजना र कर मन ही मन इस जगत् के नाम को स्मरण free ११२ ।। शुभ संयोग सामने से एक रिवशा जा रहा था। उसको बुला कर निशिकान्त उस पर बैठ गया। वोला-स्वर्गद्वार चलो। कई दिनों से जयसुन्दर वाबू वाहर नहीं निकल पा रहे थे। शेखर बाबू उस दिन कह रहे थे-आप थे, इसलिए मुझे बड़ा सहारा मिला। नहीं तो मैं किस तरह डर गया था, क्या बताऊँ । जयसुन्दर वावू बोले-अव तो -अब तो बहुत ठीक है। शेखर वावू ने फिर पूछा—कब कलकत्ते लौटेगो, कुछ बताया है ? जयसुन्दर वाबू को यह बात अच्छी नहीं लगी। वोले-आप अपने रुपये के बारे में सोच रहे हैं ? उसके लिए आपने जो खर्च किया है, वह मैं आपको दे देता हूँ। यह लीजिए। शेखर बाबू ने अपनी गलती सुधार कर कहा-जी नहीं। मैं वह नहीं कह रहा हूँ। जयसुन्दर वावू बोले- मैं भी वह नहीं कह रहा हूँ। मैं यह कह रहा हूँ कि यह आपका व्यवसाय है। आपने पुलिस को रिश्वत दी है, डाक्टर को फीस दी है और दूध के लिए कितना खर्च किया है, वही सव मैं आपको दे रहा हूँ। यह दो सौ रुपये आप रख लीजिए । बाद में पूरा हिसाव हो जायेगा कि कितना खर्च हुआ है। अब बारह नवर के लिए जो कुछ खर्च होगा, उसका विल आप मेरे नाम बनायेंगे। यह कह कर जयसुन्दर वावू शेखर वावू के टेविल पर सौ रुपये के दो नोट रख कर ऊपर चले गये। वरुणा उस समय बिस्तर पर चुपचाप बैठी थी। जयसुन्दर बाबू सीधे वरुणा के कमरे में जा कर कुर्सी पर बैठ गये । फिर पूछा-खाना खाया है ? वरुणा ने सिर हिलाया। वोली-जी हां। -आज क्या खाने को दिया था? घरणा बोली-मुर्गे की करी और भात ।

गुम पयाग॥१३ -अच्छा लगा ? मैंने मैनेजर से कह दिया है कि रोज तुम्हें मुर्गा दिया जाय । मेने और भी कह दिया है कि तुम्हारे रहने-खाने के लिए जो कुछ खर्च होगा, उसका विल मेरे नाम से बनेगा। डाक्टर को फीस, पुलिस को रिश्वत और दरवाजे की मरम्मत का खर्च भी मैं दूंगा। घरुणा बोली- मेरे कारण आपका बहुत पैसा खर्च हो गया । बापका कर्ज कैसे चुका पाऊँगी, समझ नहीं पा रही हूँ। जयसुन्दर बाबू बोले-फिर वही सब कह रही हो? जानती हो, मुझे यह सब सुनना अच्छा नही लगता। लेकिन मैं आपकी कौन होती हूँ आप मेरे लिए इतना पैसा खर्च करेंगे? जयसुन्दर बावू बोले- एक इनसान अगर दूसरे इनसान की जरूरत पर कुछ खर्च न करे तो यह पैसा कमाना किस लिए है ? इनसान क्या सिर्फ अपने लिए जिन्दा रहता है ? समाज या मनुष्य के प्रति क्या उसका कोई कर्तव्य नहीं है ? वरुणा वोली- मेरे लिए कोई कुछ करता है तो मुझे रुलाई आती है । जयमुन्दर वावू ने पूछा-क्या कभी किसी ने तुम्हारे लिए कुछ नहीं किया ? वरुणा बोलो-कौन करेगा भला ? इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है। -~-क्या कहती हो? तुम्हारे मां-बाप और भाई-बहन ? क्या उन लोगों ने मी तुम्हारे लिए कुछ नही किया ? वरुणा बोली-अगर कोई रहता तो मुझे किस बात को चिंता होती ? अगर मेरा अपना कोई होता तो क्या मैं जहर खा कर आत्महत्या करना चाहती ? जयसुन्दर बाबू ने पूछा-फिर तुम पुरी क्यों आयो ? यहाँ कौन सा काम पड़ गया? क्या जवाब देगी, वरुणा समझ न पायी। इस सवाल का जवाब निशिकान्त ने उसे नही बताया था। जयमुन्दर बाबू ने फिर कहा-चुप क्यों हो गयो ? क्या बताने में संकोच हो फिर वरुणा ने अपने मन में एक उत्तर गढ़ कर कहा-नौकरी की कोशिश में पुरी आयी थी। -नौकरी की कोशिश कलकत्ते में न कर पुरी चली बायो? कलकत्ते की तुलना में यह तो छोटा शहर है। -जी हो । अखबार में विज्ञापन देख कर अप्लिकेशन भेजा था । -कैसी नौकरी? -गल्स में टीचर को नौकरी । यहाँ या फर उन लोगों लेकिन नौकरी नहीं मिली । मैं वी. ए. पास हूँ। उन लोगों ने जो ११४ ] शुभ संयोग मांगी थीं, सब मुझमें हैं ! मैंने सोचा था कि नौकरी मिल जायेगी। लेकिन इंटरव्यू में उन लोगों ने मुझे रिजेक्ट कर दिया। जयसुन्दर बाबू बोले-फिर उसी दुख से तुम आत्महत्या करने चली ? तुम तो बड़ी सेंटिमेंटल लड़की हो। वरुणा बोली-~-आप अगर मेरी स्थिति में होते तो आप भी आत्महत्या करने की बात सोचते । मेरे पास इतना रुपया नहीं है कि कलकत्ते लौट जाऊं। आप शायद विश्वास नहीं करेंगे, लेकिन मेरे पास एक पैसा नहीं है। यह कहते-कहते वरुणा फफक-फफक कर रोने लगी। जयसुन्दर बाबू ने कहा-रोमो मत । रोओ मत । होटल में किसी को यह पता चल जाय तो पता नहीं वह क्या सोचे ! रोते हुए वरुणा ने कहा--आपने मुझे क्यों वचा लिया? बताइए, आपने क्यों बचा लिया? मैंने आपका कौन सा अहित किया है ? जयमुन्दर वावू बोले---फिर रो रही हो ? चुप हो जाओ। मेरी भी पहले क्या हालत थी, सुनोगी तो तुम्हें आश्चर्य होगा। मेरी भी हालत तुम्हारी जैसी थी। नौकरी नहीं थी। वेरोजगार था। किराये पर कमरा लेने के लिए पैसा नहीं था। कालीघाट के काली मन्दिर के चबूतरे पर रात को सोता था। गंगा में नहाता था और सड़क पर गमछा वेचा करता था। वरुणा मन लगा कर जयसुन्दर वावू की बातें सुन रही थी। जयसुन्दर बाबू कहने लगे--अव जरा सोचो कि उस समय मेरी क्या दशा थी। सोच सकती हो कि उतने बड़े शहर कलकत्ते में मेरी सहायता करने वाला कोई नहीं था । अक्सर में अकेले में रोया करता था । तुम्हारी तरह एक दिन मैं भी आत्महत्या करने चला था। वरुणा को बड़ा आश्चर्य हुआ यह सुन कर और उसके मुंह से निकला-आप भी? -~-हाँ मैं | आज तुम देख रही हो कि मैं बहुत अमीर हूं, लेकिन उस समय मैं भी नहीं सोच सका था कि कभी मेरी हालत सुधरेगी । वरुणा बोली-----फिर भी आपकी बात अलग है । आप मर्द हैं । लेकिन मैं ? मैं तो औरत पैदा हुई हूँ। क्या कभी मेरे भाग्य में सुख होगा? जयसुन्दर बाबू बोले-~-निराश वयों होती हो ? निराश होना ही पाप है। मैंने अपने जीवन में सिर्फ इतना सीखा है कि किसी भी हालत में मनुष्य को निराश नहीं होना चाहिए । वह दिन जरूर आयेगा जब तुम्हारा विवाह होगा, अपना घर होगा और भाग्य में है तो तुम भी समाज में सिर ऊंचा करके खड़ी हो सकोगी। उस समय शायद तुम मुझे पहचान भी न पाओगी। ?

शुभ संयोग । ११५ वरुणा वोली-~-आप क्या कह रहे हैं ? मैं इस जीवन में कमी आएको मूल नहीं सकती। जयमुन्दर वावू बोले-मुसीबत में पड़ने पर सभी ऐसा कहते हैं, लेकिन बच्चे दिन आने पर किसी को नहीं पहचान पाते । लोग अपने हमददौ को भूल जाते हैं । वरुणा बोली-आप विश्वास कीजिए, मैं आपको कभी भूल नहीं सकती। जयमुन्दर बाबू बोने-मैं तुम्हारी बात नहीं कर रहा है। लेकिन ऐसा होता है । भव रही मेरी बात । मेरी मुसीबत में जिसने भी मेरी मदद की, मैं उसको अभी तक नही भूल सका। फिर जरा रुक कर जयसुन्दर बाबू बोले-~~-अब तुम लेट जाओ। मैं अपने कमरे में जाऊंगा। वरणा बोली- मुझे आराम करने की जरूरत नहीं है। जयमुन्दर बाबू बोले-~-ठीक है । मैं बाद में आ जाऊंगा। इस समय मेरा एक काम है। वरुणा वोली-क्या आप किसी काम से पुरी आये हैं ? जयमुन्दर बाबू कुर्सी छोड़ कर खड़े हो गये थे । बोले- हाँ । जिस तरह तुम नौकरी के लिए इटरव्यू देने यहाँ आयो थी, उसी वरह मैं भी एक काम से आया हूँ। नहीं तो मेरे पास इतना समय नहीं है कि यहाँ घूमने आऊ । कलकत्ते में मेरा बहुत काम पड़ा हुआ है । रोकिन एक आदमी को तलाश में मुझे आना ही पड़ा। --आप किसी को खोजने यहाँ आये है ? जयमुन्दर वावू वोले-~हो । वह आदमी बड़ा शैतान है । उसका नाम निशि- कान्त है। वह मेरा सर्वनाश करना चाहता है। सबके सामने वह मुझे अपमानित करना चाहता है। मुझे पता चला है कि वह पुरी आया हुआ है। इसी लिए हर होटल में उसे खोजता फिर रहा हूँ। खून करने के आरोप में उस पर मुकदमा चला था । मारोप सिद्ध होने पर उसे जेल जाना पड़ा था। इतने दिनो बाद यह जेल से छूटा है। जेल से छूटते ही उसने मुझे एक पत्र लिखा है। उस पत्र में उसने मुझे धमकी दी है। वरुणा ने पूछा- क्यों ? उसने आपको धमको क्यों दी है ? -इसका क्या कारण बताऊँ ? इस दुनिया में बुरे लोगों की कमी नहीं है। यह भी उन्ही की तरह बुरा है। लेकिन तुम सोच भी नहीं सकती मैंने उसका कितना उपकार किया है। वरणा बोली- समझ गयी । आप जैसे सज्जन का भी शत्रु होता है। जयसुन्दर बाबू बोले- इस शत्रुता का कारण सम्भवत यही है कि मैं एक ११६ ।। शुभ संयोग । - कंगाल से अमीर बना हूं। शायद यही मेरा बहुत बड़ा अपराध है । लेकिन उसके लिए मैंने रातदिन कितनी मेहनत की है और कितना पसीना बहाया है, उसका पता कोई नहीं रखता। तुम सोच रही हो कि इस दुनिया में तुम्हीं को दुख है। तुम अगर यह जानती कि मैंने कितना दुख सहा है तो शायद ऐसा न सोचती। वरुणा बोली-~~-मुझे माफ कर दीजिए। --क्यों ? इसमें मेरे पास माफी मांगने की कौन सी वात हुई ? तुमने मेरा फोन सा नुकसान किया है कि मुझसे माफी मांग रही हो ? वरुणा बोली-काश, मैं भी आपका कोई उपकार कर पाती ! जयसुन्दर बाबू बोले-~~-ऐसा क्यों सोच रही हो? मेरे पास किस बात की कमी है कि तुम मेरा उपकार करोगी? फिर मैं किसी से उपकार लेना पसन्द भी नहीं करता । इसलिए मेरे जीवन में सिर्फ एक आदमी ने मेरा उपकार किया है। हैं वह एक मारवाड़ी सज्जन हैं । जब मैं कंगाल था, तब उन्होंने मेरा उप- कार किया था। उन्होंने मुझे सिखाया था कि जीवन में कैसे उन्नति की जाती उनका नाम है राधेश्याम अगरवाल । इस निशिकान्त ने उन्हीं की हत्या की है। -अरे ! -हाँ । मेरे पास उसका सबूत है । लेकिन इस निशिकान्त का भाग्य वड़ा अच्छा है कि उस अपराध के लिए उसे फांसी से लटकना नहीं पड़ा । निशिकान्त को सन्देह का लाभ मिला था । इसलिए फांसी न हो कर दस वर्ष जेल काटने की सजा हुई थी। इसी शैतान निशिकान्त को ढूंढ़ निकालने के लिए मैं पुरी आया हूँ। वरुणा बोली-फिर मैं आपसे बैठने के लिए नहीं कहूंगी। आप अपना काम कीजिए। मैं यह नहीं समझ सकी थी कि आपके लिए इतनी बड़ी समस्या है ! जयसुन्दर बाबू बोले- मैं भी पहले तुम्हारी तरह सोचता था कि जिसके पास पैसा नहीं है, उसी को कप्ट उठाना पड़ता है और जिसके पास पैसा है, उसे कोई फप्ट नहीं रहता । लेकिन अव देख रहा हूँ कि ठीक इसका उलटा है। तुम तो जानती हो कि इस संसार में मेरा कोई नहीं है । अपना कहने के लिए जो लोग हैं भी, उन सवने मुझे त्याग दिया है। -इसका क्या मतलब? जयसुन्दर वायू बोले- यह तुमको और किसी दिन बताऊंगा। अभी मैं चल रहा हूँ। दिन की रोशनी रहते-रहते उस शैतान को ढूंढ़ निकालने की कोशिश फलंगा। रात हो जाने पर, यानी अंधेरे में वह कहां मिलेगा ? दाना कह कर जयसुन्दर वायू कमरे से निकल गये।

काने कमरे में जा कर कपड़े ददलने के दाद पपमुन्दर बाबू सौढ़ी से नीचे
नोवे गैडर वादू अपने दिल के सान्ने के थे। टेबिल पर ररिस्टर रमा
अपमुन्दर वाचू को देख कर खर वाबू ने कहा-घूमने चले ?
-जो हो । जरा धून बा । वपनुन्दर बाबू बोले ।
-दारह नंदर की लड़की इस समय देती है ?
जयसुन्दर वावु दोले-पहले से बहुत टोक है। कभी तक तो सी के कमरे
में बैठा था। बद तो ठीक से बात कर रही है।
शेखर दावू ने पूछा-सेक्नि वानहत्या करने क्यों चतो पो, वापको कुछ
दताया?
घपमुन्दर दाबू ने कहा-विउ कारण से दोर लोग बालहत्या करने सगने
हैं, उसी कारण से । यानी, हिप्रेशन से । निराशा के कारण सबके मन की वैसी
स्थिति हो सकती है।
-उसका कोन है, कुछ दवाया?
असमुन्दर बाबू बोले-उसने तो कहा कि कोई नहीं है । मैंने उसे बहुत
समझाया कि पवड़ाने से काम नहीं चलता । खर, वित बाप उसके नाम से मत
बनाइए । उसका सारा खर्च में दूंगा।
मह कह कर जपमुन्दर वाबू चले गये। उनके पांव समुद्र की तरफ पल
पड़े।
1
बहुत सबेरा पा । रात को अंधियारी दस घंटी हो यो ।
निशिकान्त दास उस समय भी देखबर सो रहा था। उसके होटल में शायद
समी लोग उस समय सो रहे थे। सिर्फ होटल का मालिक उस समय विस्तर छोड़
कर उठाया।
नौकर-चाकर भी एक-दो उठे थे । वे होटल में ठहरे लोगों के लिए चाय
बनाने में व्यस्त थे।
तभी निशिकान्त के कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई।
मटपट उठ कर दरवाजा खोलते ही निशिकान्त ने देखा कि वरुणा है।

११८ ] शुभ संयोग न? - -~-अरे! तुम ? इतने सबेरे कैसे मा गयो ? वरुणा कुर्सी पर बैठी। फिर वोली- मैं अभी चली जाऊंगी। निशिकान्त ने पूछा--सब ठीक वरुणा ने धीमे स्वर में कहा-आपने जैसा कहा था, मैंने ठीक वैसा किया था। ~मैंने सुना है। --आपने कैसे सुना? -~~-मैं तुम्हारे होटल के सामने गया था। उस समय वहाँ समुद्र के किनारे दो आदमी वात कर रहे थे । वे तुम्हारे ही बारे में बता रहे थे । आखिर तुम्हारे कमरे का दरवाजा तोड़ना पड़ा ? वरुणा बोली-मैं तो एकदम बेहोश हो गयी थी। पुलिस और डाक्टर तक को बुलाना पड़ा था। होटल का मैनेजर वहुत डर गया था। फिर कहीं होटल को बदनामी न हो, इस लिए पुलिस को घूस दे कर उसने मेरे मामले को रफा-दफा कराया। ---उसके बाद ? जयसुन्दर बाबू तुम्हारे कमरे में आये थे ? -हो । वही तो बताने आयी हूँ। पुलिस को जो घूस और डाक्टर को जो फीस दी गयो, यह सब रुपया तो उन्हीं ने दिया। अब वह मेरे कमरे में बराबर आ रहे हैं । मुझसे कह रहे हैं कि घबड़ाओ मत, तुम्हारा सारा खर्च मैं दूंगा। -उसके बाद? -उसके बाद मुझसे पूछा कि किस लिए मैं पुरी भायी हूँ। इसका जवाब मैंने अपने मन में गढ़ कर दिया है। मैंने कहा कि एक नौकरी के सिलसिले में इंटरव्यू देने आयी थी। लेकिन वह नौकरी नहीं मिली तो मैं आत्महत्या करने चली थी। सब कुछ सुन कर निशिकान्त खुश हुआ। वोला-वाह ! तुम तो बहुत बुद्धि रखती हो । अब मैं समझ गया कि यह काम तुम कर सकोगो । अब मैं जैसा कहूंगा, वैसा करोगी तो तुम्हें बहुत रुपये दूंगा। वरुणा ने पूछा-कितने रुपये देंगे? -एक हजार रुपये तो तुम्हें दूंगा ही। उसके लिए वादा किया है । अब तुम मुझे वह दो लाख रुपये दिला दो तो मैंने जो वादा किया है, उसका दूना दूंगा। इसके लिए फिर वादा कर रहा हूँ। लेकिन तुम्हें बहुत होशियार हो कर आगे बढ़ना पडेगा । यह आदमी भी कम होशियार नहीं है ।

शुम संयोग । ११६ लेकिन मैं आपको कैसे दो लाख रुपये दिला पाऊंगी, समझ नहीं पा निशिकान्त चौला-- अरे, तुम प्यार का नाटक नही कर पाओगे? पहले तुम ऐसा हाव-माव करोगी कि वह तुम्हारे प्यार के समुन्दर में गोते लगाने लगेगा। तब तुम उससे जो कुछ मांगोगी, वही वह दंगा ! उसके पास अकूत पैसा है, लेकिन अपनी पत्नी से उसका कोई रिश्ता नहीं है। वैसे मादमी को मतवाला बनाने में कितनी देर लगती है ? उसके बेटे भी उसके साथ नहीं रहते । -लेकिन उनसे रुपया कैसे मांगूंगी? निशिकान्त बोला-रुपया न मांग सको तो गहने मांगना । होरे-जवाहरात के जड़ाऊ गहने । यह भी न हो वो कार मांगना । मुन फर वरुणा को वहा याश्चर्य हुआ। उसके मुंह से निकला-कार? निशिकान्त बोला-हो-हो, कार । वह चाहे तो एक नहीं, तुम्हे दस कारें दे सकता है। बस, उससे लेने को तरकीव आनी चाहिए। वरुणा बोनी-लेकिन बाप चाहे जो कहें, उस सजन का दिल बहुत बड़ा -~-कैसे उसके दिल की थाह लगा ली? वरुणा बोली-मैं तो उनकी कोई नहीं हूँ, फिर भी वह मेरे लिए कितना खर्च कर रहे हैं। मुझे स्पेशल खाना देने के लिए होटल के मैनेजर से कह रखा है। उसका पूरा खर्च वही देंगे । मला, दूसरे के लिए कौन इतना करता है ? निशिकान्त वोला-तुम उससे पूछना तो कि पुरी किस लिए आया है ? -मैंने पूरा था। -क्या कहा उसने ? -उन्होंने कहा कि मैं एक आदमी की तलाश में आया हूँ। -किसकी तलाश में आया है ? वरुणा बोनी-आपको। ---मेरो? तुमको मेरा नाम बताया है ? -~-हो। उन्होंने कहा कि निशिकान्त दास नाम का एक यादमी पुरी माया हुला है । मैं उसी को ढूंढने आया हूँ। एक-एक होटल में जा कर उसका पता लगा रहा हूँ। उन्होंने यह भी कहा कि आप एक आदमी की हत्या के यभियोग में दस वर्ष जेल काट कर बाये हैं । आपने जिस आदमी का सून किया था, उसका नाम है रामेश्याम अग्रवाना -यह सब बकवास है । वह चाहता है कि तुम मुझसे नफरत करने लगी। मेरा कोई काम न करो। वह इसी तरह मुझे चारों तरफ बदनाम करता फिर रहा - १२० ।। शुभ संयोग । अगर मैंने किसी का खून किया है तो मेरी फांसी क्यों नहीं हो गयी ? हां, एक आदमी ने मुझे उस मामले में फंसा दिया था, जिससे जेल जाना पड़ा था। वरुणा बोली- लेकिन उन्होंने तो कहा कि खून आपने किया था और उनके पास इसका प्रमाण है। ~ अगर प्रमाण है तो उस समय कोर्ट में प्रोड्यूस कर सकते थे। असल में मैंने जो तुमसे कहा है, वह सही है। वह एक नंवर का शैतान है। अगर ऐसा नहीं है तो उसकी पत्नी उसके साथ क्यों नहीं रहती ? उसके दोनों बेटे बाप को छोड़ कर विदेश में क्यों रह रहे हैं ? उसके घरवाले ही उससे नफरत करते हैं । अगर वह सचमुच भला होता तो और चार भले लोगों की तरह घर-गृहस्थी करता। वह ऐसा क्यों नहीं करता? वरुणा कुछ न बोली, चुप रहो । निशिकान्त बोला--तुम उसकी बातों में हगिंज मत आना, समझ गयी ? मैं सिर्फ तुम्हारे भरोसे यह काम कर रहा हूँ। तुम्हारे लिए अव तक मेरा बहुत रुपया खर्च हो चुका है। तुम्हारे ट्रेन के किराये से ले कर तुम्हें साड़ी खरीद देने तक मेरे बहुत से रुपये निकल गये हैं। वह सब रुपया निकल माना चाहिए। बस, इसका ख्याल रखना। वरुणा बोली- लेकिन आपका रुपया कैसे निकल आयेगा, यह तो मैं नहीं समझ पा रही हूँ। निशिकान्त वोला-सिर्फ मेरा रुपया निकालना नहीं, उससे दो लाख रुपया भी खींचना होगा। जरूरत पड़ेगी तो तुम उसके साथ लेटोगी! परुणा चौंक पड़ी। वोली-~यह आप क्या कह रहे हैं ? निशिकान्त बोला--तुम चौंक क्यों रही हो? मैंने कोई गलत नहीं कहा ! इस जमाने में लोग रुपये के लिए सब कुछ कर रहे हैं और तुम इतना नहीं कर सकोगी? अगर न कर सकोगी तो समझ लो कि जिन्दगी भर तुम्हें गरीव रहना पड़ेगा। कभी तुम्हारा दुख दूर नहीं होगा। अगर तुम किसी माफिस में नौकरी करतो तो भी बड़े साहब को खुश करने के लिए सब कुछ करना पड़ता । वरुणा ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। निशिकान्त उसके चेहरे की तरफ देख कर समझ गया कि यह डर रही है। इसलिए निशिकान्त बोला-तुम डरो नहीं। इसमें डरने की कोई बात नहीं है। फिर मैं तो हूँ। लेकिन वरुणा रोने लगी। वह बोली-दया करके आप मुझे कलकत्ते वापस भेज दीजिए। अगर आप शुभ संयोग । १२१ ले बताते कि मुझको यह सब काम करना पड़ेगा तो मैं हगिज आपके साथ न आती। मुझे ट्रेन का किराया दे दीजिए, मैं कलकत्ते लौट जाऊँगी। निशिकान्त वोला-लेकिन यहां तक आ कर नहीं लौटा जा सकता। अगर तुम लौटना चाहोगी तो मैं तुम्हे लौटने नहीं दूंगा। जैसे भो हो, इस काम को पूरा करना पडेगा । इस काम को पूरा किये बिना तुम भाग नहीं सकती। भराये हुर स्वर में वरुणा वोलो-मैं यह सोच भी न पायी थी कि मुझे एक असहाय लड़को पा कर इस तरह धमकी देंगे। इतना कह कर वरुणा उठी। बोली-अच्छा, मैं जा रही हूं। होटल से निकल कर वरुणा सड़क पर आ गयी। उस समय ठीक से सवेरा हुआ था। गली से दो-चार लोग आने-जाने लगे थे। वरुणा जब निशिकान्त के होटल में आ रही थी, उस समय चारो तरफ हलका अंधेरा था। वह अपने कमरे में ताला लगा कर निकल पड़ी थी। उसने सोचा, अब शायद होटल के लोग मुझे ढूंढने लगे होंगे। जो लड़की अभी नीद की गोलियो खा कर आत्महत्या करने चली थी, वह अगर सबेरे-सवेरे किसी को कुछ बताये बिना होटल से गायब हो जाय तो लोगो को चिंता होना स्वाभाविक है। गली से निकल कर वरुणा फिर समुद्र के किनारे आयी तो उसे लोगो की भीड़ दिखाई पड़ी। जो लोग स्वास्थ्य सुधारने आये थे, वे नींद से जगते ही समुद्र के किनारे हवाखोरी के लिए आ पहुंचे थे। वरुणा धीरे-धीरे अपने होटल की तरफ चलने लगी। उसे लगा कि इस विराट विश्व ब्रह्माण्ड में वह एकदम अकेली है। सचमुच उसका कोई नहीं था। लोगों के मां-बाप और भाई-बहन रहते हैं, लेकिन उसके सभी कोई रहते हुए कोई नहीं था। सचमुच ऐसा समय था, जब वास उससे बहुत प्यार करते थे। बाप कहते थे--अच्छे से अच्छा लड़का देख कर मैं वरुणा का ब्याह करूंगा। मां कहती थो-अभी मैं उसकी शादी नहीं करूंगी । अाजकल इतनी कम उग्न में किसी की शादी नही हो रही है। कहाँ वह दिलदारपुर है और कहाँ यह पुरी! दिलदारपुर में वरुणा उन दिनों स्खूल में पढ़ती थी। तभी एक दिन एक सज्जन 5 थे। १२२ ॥ शुभ संयोग ने उसे देख लिया था। वरुणा उस सज्जन को नहीं पहचानती थी । वह बड़ी अच्छी धोत्री और कुरता पहने हुए थे। उस सज्जन को देख कर वरुणा को लगा था कि वह किसी दूसरे गाँव के हैं। न जाने किस कारण से दिलदारपुर आये थे। वरुणा को रास्ते में रोक कर उस सज्जन ने पूछा था-बच्ची, तुम्हारा क्या नाम है? झिझकते हुए वरुणा ने अपना नाम बताया था-वरुणा । -वरुणा क्या? फिर वरुणा ने धीरे से कहा था-वरुणा चौधरी। -~-तुम लोग ब्राह्मण हो या कायस्थ ? ~-कायस्थ । इतना पूछ कर ही वह सज्जन चुप नहीं हुए फिर पूछा था-तुम्हारा घर कहाँ है ? -~-दक्षिणपाड़ा में। उसके बाद वरुणा के पिता का नाम मालूम कर वह सज्जन वरुणा के घर आये थे। वरुणा घर लौट आयी तो थोड़ी देर बाद वह सज्जन भी आ गये । उस सज्जन को अपरिचित देख कर वरुणा के पिता ने उनको बड़े आदर से विठाया। कमरे में बैठने के बाद उस सज्जन ने कहा-मैं अपने किसी काम से आपके दिलदारपुर में आया था। रास्ते में देखा कि आपकी बेटी स्कूल से लौट रही है। अव आपसे मेरा एक प्रस्ताव है चौधरी वावू । वरुणा के वाप उस सज्जन की बात सुन कर आश्चर्य में पड़ गये। बोले-मापका परिचय ? उस सज्जन ने कहा-मेरा नाम है भूदेवभूपण घोपराय । कभी हमारी जमों- दारी थी, लेकिन अव तो वह सब सरकार ने ले लिया है। घरुणा के बाप बोले-~मेरा बड़ा सौभाग्य है कि आपने इस गरीब की कुटिया में कदम रखा। उस सज्जन ने कहा-मैं अपने बेटे के लिए आपकी बेटी को मांगने आया हूँ। आप हमारी जाति के हैं। और भी क्या-क्या वात हुई, वरुणा सुनना चाहती थी, लेकिन माँ ने मा कर उसे टोका--तू दरवाजे को भाड़ में खड़ी हो कर क्या सुन रही है । हट यहाँ से । उसके बाद बाप घर के अन्दर आये। मां से बोले-~-सुनती हो । कमलपुर के जमींदार भूदेवभूषण घोपराय आये हुए है । उन्होंने हमारी बेटी को देख कर पसन्द किया है। वह अपने इपालौते बेटे से ।

सुन संपोग। १२३ हमारी वरणा का ब्याह करना चाहते हैं । दवाबी, उनको क्या पवाद हूँ? मह मुन कर मां बोली- क्या कहते हैं ? घरणा तो कनो वच्ची है। सो क्या शादी करेंगे? उन्होंने हमारी बेटी को मे देवा? बार वोले-वरणा स्कूल से लौट रही पी, तमी उन्होंने देख लिया था। फिर हमारा मकान ढूंढते हुए वाये । बगर वस्गा की शादी करना चाहती हो तो वोसो। ऐसा लड़का रि नहीं मिलेगा। सेकिन मां ने विरोध किया-बार पागल हो गरें हैं क्या? वैसा तहका क्यों नहीं मिलेगा? बेटी क्या हमारे लिए योग हो गयो है ? वरुणा ने उन दिनों की बात याद करें। यंत तक वह सज्जन निराश हो कर लौट गये थे। उसके बाद वह दोबारा नहीं पाये। लेकिन इसके बाद वो पुषहवा, वरमा ने कनो उसको कल्पना नहीं की थी। धीरे-धीरे वरणा ने स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली। वह मैट्रिक पास कर गयो तो उसे कालेज में पढ़ाने की बात चदी। बाप बोरे-अब वरुणा को बागे पढ़ाने को बहरत नहीं है । वह उसकी शादी कर देनी चाहिए। वरुणा को मां वोजी-चो नहीं । मैं उसे कालेज में पड़ागी । मैं खुद पड़ न सकी तो मुझे बड़ा वाली है । कालेज में पढ़ा कर उने वी० ए० पान करा- ऊंगी। उन दिनों शहर के कार में पढ़ने के लिए सड़कियों को होटल में रहना पड़ता था। उसने बहुत पैजा गया था। फिर मी मां बोली-बहुत पैसा लगेगा तो क्या हवा? मैं बाना पेट खा कर वरुणा को पड़ाऊंगो । वह जहर वी० ए० पास करेगी। फिर वरना पड़ने के लिए शहर गयो । होस्टर का मतलब कई वन्य लड़कियों के साथ रहना या। वे सड़कियां एक साय खाती पी, सोतो यो वौर पढ़ती थी। हर काम एक साप करना पड़ता था। रि होस्टल में कुन्ती दी से परिचय हुवा । कुन्ती सेन । कुन्ती दो से वरमा को बड़ी दोस्ती हो गयी । वरुणा कुन्ती दी के साथ एक कमरे में रहती थी। कुन्ती दी की विश्वा मां गांव में रहती थी। वपना कहने के दिर कुन्ती दी का और कोई नहीं था। कुन्ती दो वरणा से दो लास पर पहढी पी। उसके भर से रुपया नहीं जाता था । नदियों को ट्युसन पढ़ा कर जो पैसा मिलता था, उसी से कुन्ती दी अपना वर्च चलाती थी। उसी पैसे से कुछ बचा कर वह मा को भी भेजती यो।

-- १२४ || शुभ संयोग वही कुन्ती कहती थी यहाँ की परीक्षा पास कर मैं कलकत्ते जाऊंगी। तू मेरे साथ चलेगी? घरुणा कहती थी--पिता जी क्या मुझे कलकत्ते जाने देंगे? अगर देंगे तो जलर जाऊंगी। लेकिन कलकत्ते जा कर क्या करूंगी? कुन्ती दो कहती थी--मैं तो नौकरी करूँगी। आजकल कलकत्ते में यहाँ की बहुत सी लड़कियां नौकरी करती हैं। -कौन आपको नौकरी दिलायेगा? --मैं खुद एक-एक आफिस में जा कर नौकरी ढूंढ़ लूंगी। यहां रहने पर कोई नौकरी नहीं मिलेगी। हमारे कालेज की बहुत सी लड़कियाँ इस समय कलकत्ते में नौकरी कर रही हैं। वरुणा ने पूछा था लेकिन आप कहाँ रहेंगी? -क्यों, लेडीज मेस है। वरुणा कहती थी लेकिन मेरी माँ मुझे नौकरी नहीं करने देंगी। उन दिनों की बातें याद कर वरुणा को बड़ा आश्चर्य लगा । उसने कैसा कैसा सपना देखा था। उसको आँखों में कितनी आशाएँ थीं । कुन्ती दी भी उससे कितना प्यार करती थी। लेकिन एक दिन वह सब न जाने अचानक कहाँ गायब हो गया। वरुणा बी० ए० की परीक्षा देने वाली थी। कुन्ती दी कलकत्ते चली गयी । जाते समय उसने कहा-वरुणा, कलकत्ते से तुझे चिट्ठी लिखूगी, लेकिन जवाब जरूर देना। तभी एक दिन अचानक वरुणा के घर से पिताजी का पन आया, मां का देहान्त हो गया है। वरुणा ने उन दिनों की बातें याद की। पिताजी का पत्र पाते ही वरुणा की आँखों के आगे मानो अंधेरा छा गया था। माँ की मृत्यु का समाचार उसने न जाने किस तरह सह लिया था ! उसे ले जाने के लिए पिताजी होस्टल में आये । उसका रोना देख कर पिताजी भी रोये। उसके बाद रोते-रोते वाप-बेटी दोनों दिलदारपुर गये । मां का श्राद्धकर्म सम्पन्न हुआ । वहाँ पाई दिन रोते-रोते वरुणा की आँखें सूज गयी थीं। बेटी को रोते देख कर वाप कहते थे-रो मत बेटा । तुझे रोते देख कर मुझे भी रलाई आती है। वरणा कहती थी-अब मैं कालेज में नहीं जाऊंगी पिताजी। -~-क्यों री? क्या हो गया? नहीं पढ़ेगी ? वरुणा कहती थी-आप अकेले यहां कैसे रहेंगे ? सचमुच मां जब तक थी, घर कितना भरा-भरा लगता था। सिर्फ एक मा ।

शुभ संयोग । १२५ की कमी से सारा पर मानी मूना हो गया था । कमी-कमी वरणा मां को सपने में देखती थी। लेकिन एक दिन पिताजी उसे समना-बुना कर कालेज के हॉस्टल में रखकाये। बोले-धबड़ाना मत । दोन-चीच में था कर तुझे देख जाया करूंगा। वरुणा का मन नहीं लदास न हो जाय, इसलिए तौटते समय बाप ने से वत समभाया। बोले-रो मत । तू मेरे लिए परेशान मत हो। तू परीक्षा में पास हो ले तो वा कर तुझे ले जाऊंगा। यह कह कर वरुणा के वार चले गये। ठीक उसी के बाद वरमा के वीवन में वह दुर्घटना घटी। वरुणा के बाप ने दूसरी शादी कर ली। शुरू-शुरू में नयी मां वरुणा को न जाने कैसी लगती थी। वह पहले पाली मां को तरह नहीं यो । वह तो दर हुकम करना जानती थी। मगर वह वरुणा को एक मिनट भी बैठी देख लेतो थो, वो फौरन हुक्न परती थीकमरे में चरा माडू क्यों नहीं लगा देती? सुपचास देवे क्यों है ? वरुणा को अपनी मां ने कभी वरुणा को काम करने नहीं दिया था । वगर वदना कमी कोई कान करने सगती पो तो मां मना करती थी। लेक्नि नयी मां दूसरी तरह को यो । बगर वरुणा एक मिनट नी चुपचाप बैठ जाती थी, तो नयी मां उस पर दुनिया भर का काम लाद देती थी। पहली मां एकदम दूबरो वरह की थी । वरुणा कोई काम करना चाहती थी तो मां कहती यो-तुम पढ़ना-लिखना ले कर रहो वरुणा, मैं सारा काम कर सूंगी। एक दिन कुन्ती दी का पत्र बापा । नयी मां ने वह पत्र देख लिया । पूछा-तेरे नाम किसको चिट्ठी वायो ? किसने तुझे चिट्ठी लिखी, दिखा। नयी मां को पढ़ना नहीं पाता या । उसने वरुणा से वह पत्र ले कर वरुणा के बाप को जा कर दिखाया। कहा-देखिए, अभी से आपकी बेटी को कौन चिट्ठी लिखने लगा है ! पड़ कर देखिए रिसको चिट्ठी है । पनी लाडली वेदी की करतूत खुद करनी बांडों से देख मीजिए। मैं कहूंगी तो बाप विश्वास नहीं करेंगे। वाप ने यह पत्र पढ़ कर कहा-यह चिट्ठी उसको सहेली को है । यह सड़की उसके साप कालेज में पढ़ती थी। वसनी सहेली को खत लिखा है। फिर भी नयी मां के मन से सन्देह दूर नहीं होता था। वरणा एक मिनट लिए खिड़की के पास जा कर खड़ी हो जाती पोतो १२६ || शुभ संयोग नयी मां फौरन उसके बाप से जा कर कहती थी- सुन लीजिए, आपकी बेटी आजकल क्या करने लगी है। वाप आश्चर्य में पड़ जाते थे कि पता नहीं वरुणा ने क्या कर लिया है। पूछते थे~-वरुणा क्या करने लगी है ? -~~-अभी थोड़ी देर पहले आपकी लाडली खिड़की से एक लड़के को इशारा कर रही थी। इस पर वरुणा के बाप कहते थे-वया कहती हो? वरुणा वैसा नहीं कर सकती। यह सुन कर नयो मां कहती थी--तो मैं भूठ कह रही हूँ ? सारा दोप मेरा है और भापकी लाडली बेटी में कोई दोष नहीं है । वह एकदम सती अनसुइया एक दिन वरुणा को अलग बुला कर उसके वाप ने उससे कहा-~~-क्यों री, तेरी नयो मां तुझसे जलती है ? वरुणा चुपचाप खड़ी रही । उसकी आँखें चलछला आयीं। लेकिन उसने एक भी शब्द नहीं पाहा। बाप बोले-बुरा मत मान वरुणा, तेरा कोई दोप नहीं है। सारा दोष मेरा है । शायद मैंने दूसरी शादी करके गलती की है । लेकिन क्या करता, वता? उस समय तो ऐसा हो गया था कि घर की देखभाल करने वाला कोई नहीं था । कौन खाना बनाता और कौन साफ-सफाई करता? गाँव में अच्छा नौकर भी नहीं मिलता। यही सव सोच कर शादी की थी। उस समय मुझे क्या पता था कि उसका यह परिणाम होगा। उसके कुछ दिन वाद नयी माँ माँ बनी । वरुणा के भाई हुआ । नयी मां उस समय सौरी में थी। गृहस्थी का सारा भार वरुणा पर आ पड़ा। लेकिन उससे वरुणा को कोई कष्ट नहीं था। उरो तो कष्ट तव होता था, जब सौरी से उसकी नयी माँ उसे खरी-खोटी सुनाती थी। खाना खाते-खाते नयी मां चीखने लगती थी। कहती थी--अजी जल्दी आइए । देखिए, आपकी लाडली बेटी ने क्या सर्वनाश किया है ! चिल्लाहट सुन पर वरुणा के वाप दौड़ते हुए सौरी के सामने पहुंच जाते थे । पूछते थे-~~-क्यों ? क्या हो गया है ? नयी मां थाली की ओर इशारा करके कहती थी-जरा देखिए न ! आपकी बेटी ने सब्जी में कितना तेल डाला है । सारा तेल सब्जी बनाने में खर्च कर दिया होगा । खैर, मेरा यया ! आपका पैसा खराव हो रहा है, मैं क्यों यह सब कह कर अपनी जवान खराव कर ? आपकी बेटी और आपका पैसा, आप समझे। मैं आप ! शुभ संयोग || १२७ लोगों के बीच में बोलने वाली कौन होती हूं ? मैं तो दूसरे के घर यहाँ आयी हूँ। इस पर बाप कहते थे-मैंने भी तो वह सञ्जी खायी, लेकिन मुझे उसमें अधिक तेल नहीं लगा। नयी मां कहती यो—क्यों लगेगा? आपको बेटी ने सब्जी बनायी है तो मापको क्यों उसमें अधिक तेल जान पड़ेगा? मैं तो पराये घर से बायो हूँ। मैं इस घर की कोई नही हूँ। अगर आपके मन में यही था तो आप मुझे क्यों इस घर में ले आये ? किसने भापको कसम धरायी थी कि शादी कर लीजिए ? फिर नयी मां सौरी में बैठ कर रोने लगी थी। रोते हुए अपनी मां को पुकार कर कहती थो-हाय अम्मा ! आ कर देख लो कि तुम्हारी बेटी की क्या दुर्गत हो रही है ! देख लो कि तुमने मुझे कैसे यादमी के हाथो में सौंप दिया है । तुमने मेरे मुंह में नमक ढूंस कर मुझे मार क्यों नहीं डाला? तुमने मेरा गला दबा कर मुझे तालाब में डुवो क्यों नहीं दिया ? तुमने मुझे जिन्दा रख कर क्यो यह वैर निकाला? कहाँ दिलदारपुर था और पता नहीं किस गांव में वरुणा को नयी मां की मां थी ! वहाँ से वह माँ कैसे अपनी दुखिया बेटी की बातें सुन सकती थी ? फिर भी नयी मां का चीखना-चिल्लाना बदस्तूर जारी रहता था। यह एक दिन की बात नहीं थी । रोज ऐसा होता था। फिर क्या सरसों का तेल ही था ? कभी चीनी ले कर भी बात का बतंगड़ बन जाता था। चाय का एक बूंट मुंह में लेते हो नयी मां पूरी चाय नाली में गिरा देती थी। कहती थी~~-चाय है या शरबत ? चीनी डाल-डाल कर एकदम शरबत बना दिया है ! अगर वरुणा के बाप भी उस समय चाय पी रहे होते थे तो कहते थे-कहाँ ? मुझे तो अधिक चौनी नही लग रही है ! इस पर नयी मां कहती थी—आपको क्यो अधिक चीनी लगेगी? यह तो मेरी जवान का दोष है। अब से मैं अपनी चाय खुद बना लिया करूंगी । बाप दोनों बाप-बेटी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहिए । वाप ने एक दिन को वेटी अलग चुलाया । कहा-वरुणा बेटा, बुरा मत मान । तू तो अपनी मां को जानती है। वह चाहे जो कहे, उधर ध्यान मत देना । अब सोचता हूँ कि उस बार जब कमलपुर । के भूदेव बाबू तेरी शादी का रिश्ता ले कर आये थे, तब उनको लौटा न देता तो १२८ || शुभ संयोग अच्या करता । वह शादी हो जाती तो तेरा भी भला होता और मुझे भी सुख मिलता। उसके बाद साल भर. वीतते न बीतते वरुणा के और एक भाई हुमा । खटते- खटते वरुणा हलाकान हो गयी। घर के रोज के काम-काज के साथ नये काम- काज भी बढ़ गये। नयी मां के बड़े बच्चे को नहलाने, खिलाने और सुलाने के अलावा उस नखरे वाली औरत की सेवा-टहल करना था। वरुणा दुरी तरह परे- शान हो गयी । ऊपर से वात-बात पर उसे ताना सुनने को मिलता था। उसी समय कुन्ती दी का एक पत्र आया। कुन्ती दी ने लिखा था--दो दिन की छुट्टी पर गांव जाऊंगी। हो सके तो मिल लेना। वरुणा ने यह वह पत्र पा कर मन ही मन तय कर किया कि बस ! अब नहीं। इस अवसर को हाथ के निकलने नहीं दूंगी। फिर तो वरुणा ने उसी तरह काम किया। कुन्ती दी भी वरुणा को देख कर आश्चर्य में पड़ गयी थी। कहा-अरी तू ? इतने सवेरे कहाँ से आ गयी ? वरुणा बोली- मैं आपके साथ कलकत्ते जाऊंगी कुन्ती दी। बड़ी मुसीबत में मुझे बचा लीजिए। कुन्ती दी बोली-बाप को बता कर आयी है न ? वरुणा वोली-बताती तो आने क्यों देते ? मुझे भाप कलकत्ते ले चलें। आपके पांवों पड़ती हूँ कुन्दी दी, मुझे अपने साथ ले जायें। घर में रहूँगी तो मर जाऊंगी। कुन्ती दी वोली-अगर तेरे पिताजी पुलिस में खबर कर दें तो? वरुणा बोली-पुलिस मेरा क्या करेगी ? अव तो मैं बड़ी हो गयी हूँ। मैं कहूंगी कि मैं अपनी इच्छा से कलकत्ते आयी हूँ। यहीं नौकरी करूंगी। अन्त तक वही हुआ। कुन्ती दी के साथ वरुणा कलकत्ते चली आयी। पास में एक पैसा नहीं था। घुन्ती दी ने रेलगाड़ी के टिकट का पैसा दिया । वरुणा अक्लमंदी कर अपने साथ दो-तीन साड़ियां और ब्लाउज ले आयी थी। वही ले कर वह डी० एल० राय स्ट्रीट चीज मेस में पहुँच गयी। उस मेस में बहुत सी लड़कियाँ थीं। अधिकतर - शुभ संयोग १२ वरणा दोनी–मुझे कलकत्ता घूम कर देने की इच्छा नहीं है। बाप कहीं मेरी नौकरी लगा दीजिए। कुन्ती दी वौरी नौकरी पाना इतना बाजान नहीं है । उसके लिए दत दिन चक्कर लगाना पड़ेगा । मैं थाने यारिस में कोशिश कर रही हैं। लेकिन लगता है कि नहीं होगा। जब तक वहीं नौरी नहीं लगती, तू मड़कियों को पढ़ाया कर। मैं तेरे लिए ट्यूधन जुगाड़ कर दूंगी। वरुणा बोली- याप वो कान दिलायेंगी, मैं यही कहेंगी। बहुत कोचिरा करने के दावद वरुणा को कहीं नौकरी नहीं मिली । लेकिन दो ट्यूगन मिल गये । पन्द्रह-पन्द्रह रुपये के ट्यूशन थे । महीने में तीन सपे मिलने लगे। वह नी क्या क्न था? शुरू में कई दिन मेस का खर्च कुन्ती दी ने दिया । वरुणा ने सोचा कि धीरे- धीरे फुन्नी दी का पैसा चुकता कर दूंगी। सिर्फ मेत्र में रहने-खाने का खर्च नहीं था । तेल-साबुन-गमछा बादि के लिए भी पैसे की परत यो। एक दिन सड़क पर चलने सनम चपल फट गये। चपल हाय में दिये चलने में वरुणा को बहुत शरम लगी । लेकिन कोई उपाय नहीं था। फिर भी वरणा को कलकत्ता दिलदारपुर ने नहीं यच्दा नगा । यहां कम से कम बात-बात पर ताना देने वाला कोई नहीं था। रात को वरणा ने कुन्ती दी से कहा-यात्र मेरे चमन फट गये कुन्नी दी। -~-वनदा क्यों नहीं लिया ? रास्ते में कितने मोची बैठे रहने हैं। घरुणा बोनी-दनवा लिया है। लेकिन यव वह नहीं चलेगा। नया खरीदना पड़ेगा। दूसरे महीने दरमा नै सात सये दे कर एक वोड़ा नया चप्पच दरीदा। लेकिन कुन्ती दी को मेंस का खर्च कम दिसा । उसके बाद वरूगा ने सुद एक ट्यूगन जुदा लिया। इस दयूयन से पैसा कुछ ज्यादा मिलने वाला था। यह यूरान तीस रुपये का था। लेकिन उससे क्या होता? एक यात्रा की शादी हो गयी। फुन्ती दो याग्नि से सौटती तो यरमा उससे पूछता-वहीं रिसी नौकरी का पता चला कुन्दी दी? प्रतिदिन कुन्ती दी उसे निरागारनक समाचार मुनाती । कमी-कमी वरुणा स्वयं दोपहर को निकल पड़ती यो। दारों का चक्कर सगाती थी। कभी-कभी बसवार में विज्ञापन देख पर दरखास्त भेजती थे।दर- खास्त मेजने बाद उत्तर की बाया में दिन, फिर महीना निती रहती थी। सेकिन उत्तर कमी नहीं याता था।

१३० ॥ शुग संयोग उरा लखोज गेस में सिर्फ गन्ती दी अपोली नहीं रहती थी। और भी भनेका खियां रहती थीं-पोफाली थी, विजया दी भोर मानसी दी आदि । उनमें कुछ काम उग्र पी थी तो गुध अधिपा उग्न की। घरणा ने नौकरी के लिए सबसे पह रखा था। उनमें कोई टाइपिस्ट थी, तो कोई टेलीफोन आपरेटर और कोई वलर्क । खाना सागर राव जल्दी-गल्दी पातर पली जाती थीं। जव चे राव लोटने लगती थी, तव परणा पैदल ट्यूशन पढ़ाने निकलती थी। ठीक उसी समय पह बुरा समाचार सुनने को मिला। पुन्ती थी का तबादला हो गया था और यह बहुत जल्दी जयपुर जाने वाली थी। । यह सबर मुन कर पराणा रो पड़ी। बोली-~-अब गया होगा पुन्ती दी ? मैं पाहाँ रहेंगी ? किसके पास रहूँगी ? फोन गुम देगा? गुन्ती पी बोली---गयों घवटा रही है? तु यहाँ जिस तरह रह रही है, रहेगी और जो गुच कर रही है, फरेगी। यहाँ तो राव तेरी दीदी हैं । फिर यहाँ कोई नौकरी गिलेगी तो तुभे, चिट्ठी लिसंगी। फिर तू वहीं पली भाना। परुणा बोली-लेकिन मापने जो अब तक मुझे पांच सौ रुपया दिया है, उसका गगा होगा? गुन्ती यो चोली-~-जब तुगे नौकरी मिल जायेगी, दे देना । मैं तो गभी तुझसे रुपया नहीं मांग रही है। घरणा ने उन दिनों की बातें याद पी। राप जिस दिन गुन्ती दी गालगत्ता छोड़ कर चली गयी, वरणा बहुत रोयी थी। उसका यह रोना रमना नहीं पा रहा था। पुन्ती पीने परणा को छाती रो लिपटा कर माश्वासन दिया था। पहा था-रो गत ! जब मैंने तेरा जिम्मा लिया है, तब यह जिम्मेदारी जरूर निभाजगी । तेरे लिए कुछ न गुष जरूर करूंगी। जरा भाश्वासन से पाणा को अपने मन में बड़ा बल मिला था। गुन्ती दी गली गगी। पाणा प्रतिदिन कुन्ती भी फे पन की प्रतीक्षा गरती रही । लेकिन कितने दिन बीत गये, पुन्ती दी का कोई पर नहीं आया। उन्हीं दिनों शेफाली भी एक मादमी को वएणा के पास ले आयी। मकान मालिक का एक भादगी हर महीने किराया लेने भाता था। यह वही आदमी था। इराको वगणा ने भनेक बार देखा था। यौपाली यी ने कहा-गोगारी गरेगी धरणा?

शुभ संयोग । १३१ नौकरी का नाम सुन कर वरुणा खिल गयो। उसे मानो आसमान का चांद मिल गया। कहा-कहां है नौकरी शेफाली दी? मैं तो नौकरी खोप्रते-खोजते परेशान हो गयी। वह आदमी शेफाली दो के साथ याया था। शेफाली दी ने उस आदमी का परिचय देते हुए कहा-इनको तो पहचानती है परुणा? यह नरेन वावू हैं। हमारे मकान मालिक के लड़के । इनको एक लड़की की जरुरत है। नरेन वाबू ने पहले बरुणा को अच्छी तरह देख लिया । फिर कहा-लेकिन यह नौकरी यहां नही, पुरी में है। पुरी तो जानती हैं ? कम से कम नाम तो जरूर सुना होगा? यही आपको जाना पड़ेगा । जायेंगी? वरुणा क्या कहती! उस समय अगर कोई उससे नरक जाने के लिए भी कहता तो वह सहर्षे तैयार हो जाती। बोली-कब जाना पडेगा? फिर दो-चार बातें हुई। उसी दिन शाम को नरेन वाव एक सज्जन को मेस में ले आये। उस सज्जत ने अपना नाम बताया-निशिकान्त दास । वरुणा को निशिकान्त दास की बातचीत अच्छी लगी। निशिकान्त दास बोला-मुझे आप ही जैसी एक लड़की की तलाश थी । वरुणा ने सिर्फ पूछा-पुरी में मुझको क्या करना पड़ेगा? निशिकान्त दास बोला-वह सब मैं बाद में आपको बता दूंगा। पहले आप यह तो बतायें कि जाने के लिए तैयार हैं या नहीं? --कब चलना होगा? निशिकान्त दास बोला-आज चलना चाहें तो आज चल सकती हैं, नहीं तो कल । वेतन के बारे में बता दूं। देवन आपको अच्छा दिया जायेगा। --लेकिन मुझको तो इसी वक्त रुपये को जरूरत है। ट्रेन भाड़े का पैसा भी मेरे पास नहीं है । पहले कुछ पैसा मिल सकता है ? -~-वताइए, कितना चाहिए । ट्रेन के किराये के बारे में आप चिन्ता न करें। मैं तो आपको अपने साथ ले जाऊंगा । वह सब जिम्मा मेरा है । आपको कितना धाहिए, वताइए। घरुणा समझ न पायी कि उसे कितना रुपया चाहिए। अंत में सोच कर कहा-यही समझ लीजिए कि दो सो रुपये।

१३२ ।। शुभ संयोग निशिकान्त दास ने दस रुपये के वीस नोट निकाल कर वरणा के हाथ पर रख दिये। वरुणा को एक साथ कभी उतने रुपये नहीं मिले थे। रुपये हाथ में ले कर वरुणा ने शेफाली दी की तरफ देखा। शेफाली दी ने उसकी हिम्मत बंधाते हुए कहा हाँ-हाँ, चली जा । इस समय तू कोई नौकरी नहीं कर रही है। इसलिए छोटा-मोटा जो भी काम मिले कर ले । फिर जब अच्छी नौकरी लग जायेगी, तब यहाँ चली आयेगी। हम सब तो हैं ही। फिर निशिकान्त दास की तरफ देख कर शेफाली दी ने कहा-वरुणा बड़ी सीधी लड़की है । आप उसका जरा ख्याल रखियेगा। निशिकान्त दास वोला-यह बताने की जरूरत नहीं है। -~-उसे कितनी तनखाह देंगे? निशिकान्त दास ने कहा-आजकल तीन सौ रुपये से कम में किसी का नहीं चलता । फिर आप कहेंगी तो छः महीने बाद चार सौ रुपये कर दूंगा। तो वही बात पक्की रही। फिर निशिकान्त दास एक दिन वरुणा को साथ लिये ट्रेन में बैठ गया । उस समय तक वरुणा कुछ भी न समझ सकी थी। लेकिन ट्रेन चल देने के बाद वह समझ सकी। वह समझ सकी कि उसे कौन सा काम करना पड़ेगा। किसी एक अमीर को फंसा कर, वहका-फुसला कर अपनी मुट्ठी में करना और उससे रुपया ऐंठना होगा। यही वरुणा का काम था! अपने काम के बारे में सुन कर पहले तो वरुणा धवड़ा गयी थी। कहा था-आपने यह सब पहले क्यों नहीं बताया था ? पहले यह सव मालूम होता तो मैं हगिज आपको नौकरी न करती। निशिकान्त दास ने कहा था-इतना आगे बढ़ कर तुम पीछे हटने की बात कर रही हो? पता है, तुम्हारे लिए मेरे कितने रुपये खर्च हो गये हैं ? अब वह रुपये कौन वापस करेगा? वरुणा ने कहा था-~-फिर नाप मुझे यहीं उतर जाने दीजिए । मैं लौट जाऊंगी। निशिकान्त दास ने कहा था-पागलपन मत करो। मैं तुम्हें एक हजार रुपये दूंगा। पहले तुम मेरा काम निकाल दो। उसके बाद कहोगी तो एक हजार रुपये और दे दूंगा । कुल दो हजार रुपये मिलेंगे । अव ठंडे दिमाग से सोच लो। दो हजार रुपये ! वरुणा जैसी लड़की के लिए दो हजार रुपये का लालच संभालना मुश्किल था। -- ।

कहाँ वह दिलदारपुर था, जहां से एक दिन वह भाग कलकत्ते आयी थी। उसे उस समय सिर्फ कुन्ती दी का सहारो- योगे वह कुन्ती हा भी उसे कलकत्ते छोड़ कर जयपुर चली गयी। अपने भाग्य के बारे में सोच कर वरुणा को बड़ा गुस्सा आया। एक दिन कमलपुर के जमीदार भूदेवभूपण घोपराय ने अपने बेटे के साथ उसका व्याह करना चाहा था। भूदेव बाबू ने उसके बाप को कितना समझाया था। उस समय अगर वहां उसकी शादी हो जाती तो आज यह गंदा काम न करना पड़ता। गंदा काम हो तो है ! वरुणा ने सोचा । जयसुन्दर बाबू तो आदमी बुरे नहीं हैं। कहाँ घरुणा आयो यो जयमुन्दर वावू को मुट्ठी में करके रपया ऐंठने, लेकिन वह खुद उनकी मुट्ठी में हो गयो । जयसुन्दर बाबू को भी अपने जीवन में कम दुख नहीं मिला था। पली के रहते हुए उससे उनका कोई सम्बन्ध नहीं था। दो-दो बेटे थे। लेकिन उनसे भी उनका कोई सम्पर्क नहीं था। उनका भी जोवन बड़ा विचित्र था। फिर वरुणा से उनका क्या अन्तर था? समुद्र के किनारे से रास्ता था। उसी रास्ते से चलते हुए वरुणा अपने पूरे जीवन की परिक्रमा करके लोट आयो । उसने सोचा, अब क्या करना चाहिए ? किसी को कुछ बताये बिना यहां से भाग चलू ? लेकिन भाग कर कहाँ जाऊँगो ? मान लिया जाय कि ट्रेन का किराया जयसुन्दर बाबू से मिल जायेगा । लेकिन मुझ पर तो बहुतो का बहुत कर्ज लदा हुआ है । उसके साथ जयमुन्दर बाबू का फर्ज भी जुड़ जायेगा। वरुणा सोचती रही । लेकिन कलकते जा कर कहां ठहरूँगो ? वया फिर डी० एल. राय स्ट्रीट वाले उसी लेडीज मेस में जाऊँगी? लेकिन वहाँ मेरा अपना कौन है ? शेफाली दी, विजया दो और मानसी दो बादि वो मेरी कोई नहीं हैं ? एक अपनी थी कुन्ती दी । लेकिन तबादचा हो कर जयपुर जाने के बाद वह भी मुझे एकदम भूल गयी है । एक चिट्ठी तक नहीं दी। समुद्र की लहरें वार-वार आ कर वरुणा के पौधो को छू रही थी। तभी अचानक वस्णा ने देखा कि समुद्र के किनारे एक जगह बहुत भीड़ है। क्या वहां मछुए मदली मार रहे हैं ? वरुणा ने सोचा । लेकिन तभी उसने देखा कि उस भीड मे पुलिसवाले भी है। आखिर यहां क्या हो गया है ? घरणा बहुत जल्दी-जल्दी उसो भीड की तरफ चली। लेकिन उस मोड में धंसना सम्भव नहीं था। गोला बना कर लोग खडे थे। एक महिला भीड़ के किनारे खड़ी हो कर अदर झांकने की कोशिश कर रही थी।

१३४ | शुभ संयोग वरुणा ने उसी महिला से पूछा-यहाँ इतनी भीड़ क्यों है ? वह महिला बोली-मैं भी कुछ नहीं जानती । सुना कि कोई समुद्र में डूब कर मरा है। वरुणा वोली-अरे ! साथ में नुलिया नहीं था ? क्या पता? फिर बड़ी कोशिश करके घरुणा ने अन्दर धंस कर देखने की कोशिश की। देखा कि एक महिला रेत पर पड़ी हुई है। सम्भवतः मर गयी है। उससे लिपट कर एक आदमी रो रहा है। रेत पर पड़ी महिला में प्राण का कोई लक्षण नहीं था । शायद उसके वचने की कोई उम्मीद नहीं थी। सब लोग यही पूछ रहे थे कि उस महिला को क्या हुआ है ? लेकिन कोई सही जवाब नहीं दे पा रहा था। वरुणा ने सोचा, क्या उस महिला का अपना कहने को कोई नहीं है ? वह समुद्र में क्यों डूब गयो ? समुद्र में तो कोई नहीं इवता ! क्या उसके साथ नुलिया नहीं था? सब लोग यही सवाल कर रहे थे। लेकिन वरुणा का किसी तरफ ध्यान नहीं था। किसी की कोई बात उसके कानों में नहीं पढ़ रही थी। वह मानो उस शव के साथ एकाकार हो गयी थी। उसको लगा कि वह महिला कोई और नहीं, बल्कि वह स्वयं है और उस रेत पर पड़ी हुई है। फिर तो वरुणा मानो अपने निढाल शरीर की तरफ एकटक देखने लगी। उसका सारा दुख-दर्द मानो रूप धर कर ढेर हो गया था। क्या उस महिला ने भात्महत्या की है। नया पता ! अब तो कोई उसके मन की बात को जान नहीं सकता। कभी किसी के लिए जानना भी सम्भव नहीं है। एक बार जो चला जाता है, उसे लौट कर आने का कोई अधिकार नहीं रहता। उसके चले जाने के साथ ही उसको चिन्ता-भावना और दुख-दर्द सब कुछ मिट जाता है । वरुणा ने सोचा, यही तो अच्छा है ! अव तो नौकरी खोजने की जहमत नहीं है। चप्पल फट जाने पर उसकी मरम्मत के लिए पैसे की चिन्ता नहीं करनी पड़ती। हो-हां, यही तो अच्छा है ! --अरे, तुम यहाँ हो? किसी की भावाज कानों में पड़ते ही मानो वरुणा का ध्यान टूटा। --एया हो गया तुम्हें ? उस तरह यया देख रही हो? यया तुम मुझे पहचान नहीं पा रही हो? वरुणा ने सिर्फ पूया-अच्छा वह स्त्री समुद्र में डूब गयी थी या उसने आत्म- हत्या की है?

शुभ संयोग । १३५ जयसुन्दर बाबू वरुणा का हाथ पकड़ उसे भीड के बाहर ले आये। बौने-एकदम तडके मुंह-अंधेरे तुम कहाँ चली गयी थी? भीड़ के बाहर आते ही वरुणा ने देखा कि एक एम्बुलेंस वैन बा कर खड़ा हुआ । उसके बाद उसमें लोग नीचे उतरे और उस स्त्री को स्ट्रेचर में लिटा कर उस एम्बुलेंस वैन में ले गये। घरुणा ने जयसुन्दर बाबू से पूछा-वया वे लोग उस स्त्री को अस्पताल ले जा ? जयसुन्दर बाबू बोले-हो । -~वह समुद्र में डूब गयी थी या उसने आत्महत्या की है ? जयसुन्दर बाबू करुणा का हाथ पकड़ कर उसे दूर ले गये। फिर पूछा--सवेरे-सवेरे तुम कहां निकल गयी थी? वरुणा दोली-आपसे एक अनुरोध करूं? -~-करीन! वरुणा बोली- आप यहाँ से चले जाइए। -~~मैं ? पुरी से चला जाऊँगा ? -जी हाँ। -~-वयो ? तुम ऐसा क्यो कह रही हो ? मैं वो निशिकान्त को ढूंदने आया हूँ। जब तक वह मिल नहीं जाता, मैं कैसे लौट सकता हूँ ? वह तो मेरा सर्वनाश किये बिना नही मालेगा! मैं यही उससे एक निपटारा करना चाहता हूँ। जानती हो, उसी ने मेरी पत्नी से मेरा सम्बन्ध-विच्छेद कराया । उसी के कारण आज मेरे पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है । उसो ने मुझसे सबसे पहले काकटेल पार्टी देने के लिए कहा था। कहा था कि कारुटेल पार्टी देने पर मुझे अच्छे अच्छे कट्रैक्ट मिलेंगे। उसी ने मुझसे कहा था कि आप अपने घर मे काकटेल पार्टी दीजिए और उसमें अपनी पत्नी को शामिल कीजिए। मेरी पली इस पर राजी नहीं हुई थी। इसी लिए मैं उसे छोड़ कर अलग मकान में रहने लगा था । परुणा समझ न सकी। पूछा-यह काकटेल पार्टी क्या है ? --कारदेस पार्टी का मतलब है शराब पीने की पार्टी। फिर उसी निशिकान्त के कहने पर मैं बाजारू औरत को अपनी पत्नी बना कर घर पर काकटेल पार्टी देने लगा । उससे मुझे सचच टेके मिले और बहुत रपया मिला, लेकिन उसके बदले मैंने सब कुछ खो दिया। मैंने अपना मुख खोया, रात को नीद खोयो, परिवार खोया और बच्चों को खो दिया और अब वह मुझको हो तबाह करना चाहता है। इसके लिए उसने मुझे खत लिखा है। खत में लिखा है कि उसे दो लाख रुपये देने १३४ | शुभ संयोग समुद्र में क्यों वरुणा ने ती महिला से पूछा-यहाँ इतनी भीड़ क्यों है ? वह महिला बोली-में भी कुछ नहीं जानती । सुना कि कोई समुद्र में डूव कर मरा है। वरुणा वोली-बरे! साथ में नुलिया नहीं था ? -~-क्या पता? फिर बड़ी कोशिश करके वरुणा ने अन्दर घस कर देखने की कोशिश की। देखा कि एक महिला रेत पर पड़ी हुई है। सम्भवतः मर गयो है। उससे लिपट कर एक आदमी रो रहा है। रेत पर पड़ी महिला में प्राण का कोई लक्षण नहीं था । शायद उसके वचने की कोई उम्मीद नहीं थी। सब लोग यही पूछ रहे थे कि उस महिला को क्या हुआ है ? लेकिन कोई सही जवाब नहीं दे पा रहा था। वरुणा ने सोचा, वया उस महिला का अपना कहने को कोई नहीं है ? वह गयी? समुद्र में तो कोई नहीं डूबता! क्या उसके साथ नुलिया नहीं था? सव लोग यही सवाल कर रहे थे। लेकिन वरुणा का किसी तरफ ध्यान नहीं था। किसी को कोई बात उसके कानों में नहीं पड़ रही थी। वह मानो उस शव के साथ एकाकार हो गयी थी। उसको लगा कि वह महिला कोई और नहीं, बल्कि वह स्वयं है और उस रेत पर पड़ी हुई है। फिर तो वरुणा मानो अपने निढाल शरीर की तरफ एकटक देखने लगी। उसफा सारा दुख-दर्द मानो रूप धर कर ढेर हो गया था। क्या उस महिला ने आत्महत्या की है। क्या पता! अव तो कोई उसके मन की बात को जान नहीं सकता। कभी किसी के लिए जानना भी सम्भव नहीं है। एक बार जो चला जाता है, उसे लौट कर आने का कोई अधिकार नहीं रहता। उसके चले जाने के साथ ही उसको चिन्ता-भावना और दुख-दर्द सब कुछ मिट जाता है । वरुणा ने सोचा, वही तो अच्छा है ! अब तो नौकरी खोजने की जहमत नहीं है। चप्पल फट जाने पर उसकी मरम्मत के लिए पैसे की चिन्ता नहीं करनी पड़ती। हां-हाँ, यही तो मच्या है ! --अरे, तुम यहां हो? किसी की मावाज कानों में पड़ते ही मानो वरुणा का ध्यान टूटा। -~-स्या हो गया तुम्हें ? उस तरह क्या देख रही हो? क्या तुम मुझे पहचान नहीं पा रही हो? वरुणा ने सिर्फ पूछा-मच्या वह स्त्री समुद्र में डूब गयी थी या उसने आत्म- हत्या की है? ?

अपना""" जयमुन्दर वाबू वरुणा का हाथ पकड़ उसे भीड़ के बाहर ले याये । बोने -एकदम तड़के मुंह-अंधेरे तुम कहाँ चली गयो यो ? भीड़ के बाहर आते ही वरुणा ने देखा कि एक एम्बुलेंस वैन बा कर खड़ा हुआ। उसके बाद उसमें से दो लोग नीचे उतरें और उस स्त्री को स्ट्रेचर में लिदा कर उस एम्बुलेंस वैन में ले गये। घरुणा ने जयसुन्दर बाबू से पूछा-क्या वे लोग उस स्त्री को बसताल ले जा रहे हैं? जयसुन्दर वावू वोले- हां। -वह समुद्र में डूब गयी थी या उसने आत्महत्या को है ? जयसुन्दर बाबू वरुणा का हाथ पकड़ कर उसे दूर ले गये। फिर पूया-सवेरे-सवेरे तुम कहां निकल गयो यो ? घरुणा वोली-आपसे एक अनुरोध करू ? -करोन! धरणा बोली-आप यहाँ से चले जाइए। -मैं ? पुरी से चला जाऊंगा? -जी हां। ---वयों ? तुम ऐसा क्यों कह रही हो ? मैं तो निशिकान्त को ढूंढ़ने आया हूँ। जब तक वह मिल नहीं जाता, मैं कैसे लौट सकता हूँ? वह तो मेरा सर्वनाश किये विना नहीं मानेगा! मैं यही उससे एक निपटारा करना चाहता हूँ। जानती हो, उसी ने मेरी पत्नी से मेरा सम्बन्ध-विच्छेद कराया है। उसी के कारण आज मेरे पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नही है । उसी ने मुझसे सबसे पहले काकटेल पार्टी देने के लिए कहा था। कहा था कि काकटेल पार्टी देने पर मुझे अच्छे-अच्छे कट्रैक्ट मिलेंगे। उसी ने मुझसे कहा था कि आप अपने घर में काकटेल पार्टी दीजिए और उसमें अपनी पत्नी को शामिल कीजिए। मेरी पत्नी इस पर राजी नहीं हुई थी। इसी लिए मैं उसे छोड़ कर अलग मकान में रहने लगा था। वरुणा समझ न सकी। पूछा-यह काकटेल पार्टी क्या है ? -~-काकटेल पार्टी का मतलब है शराब पीने की पार्टी । फिर उसी निशिकान्त के कहने पर में बाजारू औरत को अपनी पत्नी बना कर घर पर काकटेल पार्टी देने लगा। उससे मुझे सचमुच ठेके मिले और बहुत रुपया मिला, लेकिन उसके वदने मैंने सब कुछ खो दिया। मैंने अपना सुख खोया, रात को नीद सोपी, परिसर खोया और बच्चो को खो दिया और अब वह मुझको हो तबाह करना चाहा है। इसके लिए उसने मुझे खत लिखा है। खत में लिखा है कि उने दोन सं १३६ ।। शुभ संयोग पढ़ेंगे । अगर मैं न हूँ तो वह मेरा सर्वनाश करेगा। इस तरह उसने धमकी दी है। इतना वा वह दौतान है ! उसके बाद वरुणा की तरफ देख कर कहा--तुम्हारी आँखें कैसे लाल हो गयीं? वरुणा बोली-इसी लिए तो कह रही हूँ कि आप यहाँ से कलकत्ते चले जाइए। -लेकिन तुमने यह तो नहीं बताया कि तुम्हारी गौखें कैसे लाल हो गयीं ? कल रात एकदम सो न सकी। वयों? वरुणा वोली-आपके बारे में सोच कर। मेरे बारे में सोच कर ? मेरे बारे में क्यों सोचने लगी ? वरुणा बोली-मेरे मन में बस यही होने लगा कि मुझसे आपका कोई नुक- सान होगा। बताइए, आप यहाँ से कब जायेंगे ? जयसुन्दर बाबू बोले-तुमसे मेरा क्या नुकसान होगा? वरुणा बोली-~-जी हाँ । विश्वास कीजिए। मेरे साथ रहने पर भापका नुक- सान होगा। -लेकिन क्यों ? तुम्हारे साथ रहने पर यों मेरा नुकसान होगा, यह तो बताओगी? वरुणा बोली----यह नहीं बता सकती । कल रात भर में बुरे सपने देखती रही, इसलिए कह रही । आप यहाँ से चले जाइए। -और तुम -~-मैं यहीं रहूँगी। आप मुझे भूल जाइए। मुझे याद रखने पर आपको नुक- सान होगा। लेकिन भापका कोई नुकसान हो, यह मुझसे बर्दाश्त न होगा। मेरा चाहे जो हो जाय, आप उसकी चिन्ता मत कीजिए। - लेकिन तुम्हारे पास इस समय रुपया-पैसा नहीं है, तुम अपना खर्च कैसे चलामोगी ? होटल का चार्ज देना पड़ेगा। लौटते समय ट्रेन का किराया लगेगा। इन सारे खचों के लिए तुम्हें पैसा कहाँ से मिलेगा? वरुणा वोली-~-आप मेरी चिन्ता मत कीजिए। जो होना है, होगा | आप यह सब सोच कर क्यों परेशान होते हैं ? मैं आपकी कौन हूँ? --मैं तुम्हारे लिए रुपये का प्रवन्ध करूंगा। मैंने तो कहा है कि मेरे पास बहुत रुपया है । मैं अपने साथ चेक-बुक लेता माया हूँ। परणा बोली-लेकिन रुपया दे कर वया मनुष्य का सारा दुख दूर किया जा सकता है ? में एक दिन पर छोड़ कर कलकते भाग आयी थी। क्या वह सिर्फ रुपये के लिए ? विश्वास कीजिए-नहीं ! मेरी सौतेली मां मुझसे जलती थी.। क्या ?

यह भी रुपये के लिए ? मैं कहूंगो-नही ! फिर बार मेरे लिए रूप का इंतवान क्यों करेंगे? इसके अलावा आप यह क्यों नहीं समझते कि में यातका नुक्सान कर सकती हूँ। जयसुन्दर बाबू को बड़ा आश्चर्य हुवा। बोले--तुम मेरा अहित कर सकती हो? तुम क्या कह रही हो ? वरुणा वोली-जी हां। कर सकती हूँ। हर यौरत हर मर्द का हर तरह से अहित कर सकती है। एक औरत में इतनी क्षमता होती है। जयसुन्दर वाबू बोले-तुम मेरा बुरा करोगी, यह वो मैं सोच भी नहीं सकता! घरुणा बोली-आप मुझ पर इतना विश्वास न करें। जयसुन्दर बाबू बोले-आज तुमको क्या हो गया है, यह तो बताओ। तुम यह सब क्या कह रही हो? मेरे हित-अहित, लाभ-हानि और भले-बुरे की बात तुम्हारे दिमाग में क्यो आयो ? वरुणा बोली-अभी वह जो स्रो रेत पर मरी पड़ी थी, उसी को देख कर मुझे अपनी बात याद आने लगी। -अभी उस दिन तुम भी तो नीद की गोलियां खा कर आत्महत्या करने लगी यो । तुम्हे किस बात का दुख है ? वरुणा बोली । इस समय मुझे अपने लिए नहीं, आपके लिए दुख है । पहले मुझे अपने लिए दुख था, लेकिन अब नहीं है। -इसका मतलब? -इसका मतलब बाद में वतार्केगी। बात करते हुए दोनों 'होटल सागर' के सामने पहुंच गये थे। होटल के सामने पहुँच कर दोनों ने चुप्पी साध ली और चुपचाप होटल के अन्दर चले गये। उस दिन अचानक आधी रात को निशिकान्त दास वरुणा के कमरे में या पहुंचा। घरुणा निशिकान्त दास को देख कर चौंक पड़ी। आखिर यह निशिकान्त दास मेरे कमरे में कैसे आया ? वरुणा ने सोचा । दिन मर वरुणा ने कुछ नहीं खाया था। किंकर ने आ कर अनेक बार पूरा -क्या कुछ भी नहीं खायेंगी? वरणा ने सिर्फ कहा-नही। जयमुन्दर बाबू ने भी पूछा-क्या आज तुम कुछ नही खाओगी? वरुणा बोली-आज कुछ भी खाने को मन नही कर रहा है। ६ - 4.

१३८ || शुभ संयोग ? -~-क्यों ऐसा हुआ ? क्या हो गया है ? वरुणा ने कहा-सवेरे समुद्र किनारे उस मरी हुई औरत को देखने के बाद से मुझे न जाने क्यों मचली आ रही है। जयसुन्दर वाबू ने फिर कुछ खाने के लिए नहीं कहा था। सिर्फ कहा था--तव कुछ मत खाओ। शाम को सब लोग जब घूमने निकल गये थे, तभी वरुणा थोड़ी देर के लिए वाहर निकली थी। उसके बाद वह अपने कमरे में लौट आयी थी और दरवाजा बंद कर लेट गयी थी। वरुणा को बार-बार उस स्त्री का चेहरा याद आ रहा था। सवेरे-सवेरे उसने उस चेहरे को देखा था। उस चेहरे पर कोई भाषा नहीं थी और न दिखाई पड़ने वाली कोई सुन्दरता । वरुणा के मन में प्रश्न जगा था, क्या मरने के बाद मनुष्य का कुछ भी शेप नहीं रहता? मन ? शरीर मर जाने पर क्या मन भी मर जाता है ? क्या उस स्त्री को जब एम्बुलेन्स वैन से ले जाया जा रहा था, तब उसे कुछ भी पता नहीं चला था? । मन ही मन वरुणा ने कहा, कुन्ती दी ! तुम मुझे क्षमा करना । तुमसे पांच सौ रुपये लिये थे, लेकिन वह कभी लौटा न सकी । मैं जानती हूँ कि तुम मुझसे प्यार करती थी। तुमसे मुझे जितना प्यार मिला, उतना किसी से नहीं मिला। यहां तक कि मेरे वाप ने कभी मुझसे उतना प्यार नहीं किया ! तुम्हारे पांच सौ रुपये नहीं लौटा सकी और ऋणी रह गयो, कुन्ती दी ! बताओ, क्या कहँ ? भाग्य ने मुझे ऐसी नौकरी दिलायी, जैसी मैंने कभी नहीं चाही थी। फिर भी मैं नौकरी चाहती थी और तुमसे भी कितनी बार कहा था, कुन्ती दी ! लेकिन किसी ने मुझे नौकरी नहीं दी। तुम भी जयपुर जा कर मुझे भूल गयी। बताओ, फिर मैं क्या फरती ? लेकिन मैंने कोई दोष नहीं किया। किसी के प्रति मेरे मन में दुर्भावना नहीं है । मेरी सौतेली माँ जो मुझसे दुर्व्यवहार करती थी, उसमें मेरा क्या दोप था? तुम्हीं बतामो, कुन्ती दी ! -~-अरे, आप? निशिकान्त दास का चेहरा बड़ा गम्भोर लगा। -आप मेरे कमरे में कैसे माये ? मैं तो दरवाजा बंद करके सोयी थी ? निशिकान्त दास व्हाका लगा कर हंसने लगा। बोला-बाहर से दरवाजा खोलने की तरकीय मैं जानता हूँ। क्या तुम यह सोचती हो कि दरवाजे में सिटकिनी लगा कर मुझसे बच जाभोगी ? जानती हो, तुम्हारे लिए मैंने कितना पैसा खर्च किया है ? तुमको पुरी लाने में कितना पैसा ?

शुभ सपाग || १२६ खर्च हुआ है ? यह सब तुमने याद नही किया और इस तरह बदला चुकाया? वरुणा बोली-मैंने कितनी बार कहा है कि मुझसे यह काम न होगा । मुझे जाने दीजिए। निशिकान्त दास बोला-फिर तुम मुझे नहीं पहचान सकी । मैं जो सोचता है, वही करता हूँ। मेरी इज्या के विरुद्ध अगर कोई कुछ करता है तो मैं उसे माफ नही करता। मैंने सोचा था कि राधेश्याम अगरवाल को मार डालूंगा और यही किया । तुम शायद नही जानती कि मेरे कारण ही जयसुन्दर बाबू बाज इतना अमोर वना है । मुझसे तुम किसी तरह पोछा नहीं छुड़ा सकती। मैंने जो काम तुम्हें सौंपा है, वह तुम्हें करना ही पड़ेगा। अगर नही करोगी तो.... वरुणा बोली-नहीं करूंगी वो क्या मुझे मार डालेंगे? मुझे एक गरीव लडको पा कर धमकी दे रहे है ? -~वह वो जो करूंगा तुम देख लोगी? लेकिन उसके पहले यह तो बताओ कि जयसुन्दर वाबू पर क्यों इतनी दया दिखाने लगी ? -दया? --दया नहीं तो क्या ? क्या तुम समझतो हो कि मैं कुछ नही जानता? परुणा बोली-मैंने तो सिर्फ दया दिखाने का बहाना किया है । आपने तो वही करने के लिए कहा था। निशिकान्त दास बोला-लेकिन तुमने जो किया, वह तो दया दिखाने का बहाना नहीं है । बहाना करते-करते तुम सचमुच उस भादमी पर दया दिखाने लगी हो। उस दौतान से सचमुच प्यार करने लगी हो । तुमने उससे मेरे बारे में सव कुछ कह दिया है । तुमको किसलिए पुरी लाया है, तुमने यह भी उसको बता दिया है। --आप गलत समझ रहे है। निशिकान्त दास अधिक कठोर दिखाई पड़ा । उतनी ही कठोरता से उसने कहा-देखो, तुम मेरी नौकरानी हो ! -मैं आपको नौकरानी हूँ? --नौकरानी नहीं तो और क्या हो? मेरी नौकरी कर रही हो, इसलिए नौकरानी हो। नौकरी से ही नौकर और नौकरानी शब्द बने है। इसलिए मैं जो हुक्स करूंगा, तुम वही करोगी। अगर नही करोगी तो उसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। -~-याप फिर धमकी दे रहे हैं ? निशिकान्त दास बोला-धमकी देने का मुझे अधिकार है । मैं जो कुछ करने को कहूँगा, तुम उसका उलटा करोगी और मैं धमकी नहीं दूंगा? तुम काम करोगी ।

१४०॥ गुन संयोग ? । चौर रपया लोगो, तुमने मेरा इतना ही सम्बन्ध है। वरणा बोली--फिर वह सम्बन्ध माज ही खत्म हुना, समझ लीजिए। -इसका मतलव? -इसका मतलब यही है कि अब में नापका काम नहीं कहेगी। काम नहीं करोगी तो खायोगी क्या ? तुम पर पांच सौ रुपये का कर्ज चढ़ा हुआ है । कलकत्ते के डी० एल० राय स्ट्रीट वाले मेस को तुम कहाँ से पैसा दोगी? वह सब छोड़ो। अभी तुम पुरी से कलकत्ते कैसे लौटोगी ? ट्रेन का किराया कौन देगा ? फिर तुम्हारे बौर भी खर्च हैं । उनके लिए पैसा कहाँ से बायेगा? काम कैसे नहीं करोगी? यह कहते-कहते निशिकान्त दास जरा रका। हाँ। निशिकान्त दास की एक भी वात गलत नहीं थी। लेकिन वरणा को भी किसी की परवाह नहीं थी । वह एकदम लापरवाह हो चली थी। तवकी गिरफ्त से निकल चली थी। सिर्फ कुन्ती दी को याद वरुणा को सताने लगी। -~-कुन्ती दी, तुम मुझे माफ कर देना । बब मैं कभी किसी जरूरत से तुम्हारे पास नहीं जाऊंगी । अब मुझे न नौकरी की जरूरत है और न रुपये की। किसी के प्यार की भी जरूरत नहीं है। अचानक वरुणा को सौतेली माँ को याद आयो। ऐसे ही दिन में और ऐसी ही रात को शत्रु-मित्र और आत्मीय-अनात्मीय सबकी याद माती है। ऐसे ही समय सब सामने मा कर खड़े हो जाते हैं। उस बार नींद की पन्द्रह गोलियाँ खाने से कोई काम नहीं हुया था तो क्या इस वार पचास गोलियां चाने पर भी कोई काम न होगा? सवेरे समुद्र की रेत पर जो स्त्री निढाल पड़ी थी, उसका चेहरा भी याद वाया । वरुणा ने उस चहरे की मानी अपनी बांखों के आगे देखा । फिर वरणा ने सोचा, क्या मेरा चेहरा भी वैसा दिखाई पड़ेगा ? क्या मेरे लिए भी एम्बुलेन्स वैन मायेगा? क्या मुझे भी अस्पताल ले जाया जायेगा? फिर धरणा ने सामने देखा तो कोई न दिखाई पड़ा। निशिकान्त दास जिस तरह दबे पांव आया था, उसी तरह न जाने कब चला गया था। चरणा को निशिकान्त दास के चले जाने का पता भी न चल पाया था। हो सकता है, निशिकान्त दास बाया ही न हो। ऐसे समय मनुष्य को न जाने क्या-क्या दिखाई पड़ने लगता है ! ।

गा." 'होटल सागर' में फिर सबेरा हवा । शेखर बाबू फिर रात तीन बरे विस्तर से उठे। उसी समय उठ कर वह सदको चुसाते हैं । तब रसोइया उठता है । भट्ठी में बाग पड़ती है। नौकर-चाकर तैयार हो जाते हैं । हर कमरे में बोर्डर को जगा कर पाय दी जाती है । गरम चाय कहीं ठंही न हो जाय । चाय ठंही हो पाने पर 'होटल सागर की बदनामी होगी। -ग्यारह नंबर में चाय गयी है ? -सात नंवर में? -हो । हर नंबर में चार पहुंच गयो । सिर्फ वारह नंबर वाली लड़की ने दरवाजा नहीं खोला । न खोले ! गुणेश्वर ! गुणश्वर ! शेखर वाढू ने गुणश्वर को भी पगा दिया था। चाय पी कर गुणेश्वर भागा-भागा स्टेशन चला गया था ! पुरी एक्सप्रेस याने से पहले ही वह स्टेशन पहुंच गया था। फिर वह एक्सप्रेस ट्रेन यायी योर स्टेशन में का कर उसका यका-मादा इंजन मानो जोर-जोर से हांफने लगा । ट्रेन के हिब्बों से निकल कर पैसेंजर प्लेटफार्म के फाटक की तरफ आने सगे। गुणेश्वर ठीक उसी पगह खड़ा था। हर पैसेंजर की तरफ देख कर कह रहा पा-कृपया 'होटल सागर' में ठहरें। हवा और रोगनी की कमी नहीं है । भोजन भी साजवाब मिलता है । एकदम समुद्र पर 'होटल सागर' है। कृपया एक वार ट्राई कीजिए। पुसी के सिर पर सामान रख फर पैसेंजर चले आ रहे थे। गुणेश्वर की बाठ कोई सुन रहा था और कोई नहीं भी मुन रहा था । लेकिन सभी चले आ रहे थे थोर फाटक से निकल रहे थे। उसी सबेरे जयमुन्दर वाव चाय पी कर निकल पड़े। रोज की तरह समुद्र के किनारे लोगों की भीड़ थी। जपमुन्दर वाबू एक-एक कर सबके चेहरे की तरफ देखने लगे। लेकिन निशिकान्त दास कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा था। एक-एक कर सभी चेहरे देख सिये गये।

। ! ? १४४ ॥ शुभ संयोग लाश को देख कर वह न जाने क्यों परेशान हो गयी थी। उसने बार-बार पूछा था --वह समुद्र में डूब गयी थी या उसने आत्महत्या कर ली है ? आश्चर्य है ! उस समय भी जयसुन्दर वावू कुछ नहीं समझ सके थे। लेकिन मेरे नाम वरुणा ने कैसी चिट्ठी लिखी है ? जयसुन्दर वाबू ने सोचा। वरुणा से जान-पहचान ही कितने दिन की थी? जो थोड़ी-बहुत बातचीत हुई थी, उससे किसी को जाना-पहचाना नहीं जा सकता। लेकिन उस लड़की के पास पैसा नहीं था। नौकरी के सिलसिले में यहाँ इंटरव्यू देने भायी थी। सोचा था कि नोकरी मिल जायेगी। लेकिन नौकरी नहीं मिली। क्या उसी निराशा से उसने आत्महत्या कर ली ? हालांकि उसने बहुत बातें बतायी थीं। जयसुन्दर बाबू को एक-एक कर वे सब बातें याद आने लगों। घर में उसको सौतेली मां थी। सौतेली मां उसे बहुत परेशान करती थी। सौतेली मां से छुटकारा पाने के लिए वह नौकरी की तलाश में कलकत्ते आयी थी! लेकिन कलकत्ते में उसे नौकरी नहीं मिली। नौकरी तो बहुतों को नहीं मिलती, लेकिन कोई मात्महत्या नहीं करता ! फिर क्या आत्महत्या करने का कारण वरुणा ने अपने पत्र में लिख छोड़ा है ? लेकिन पुलिस अधिकारी के पास रुकने का समय नहीं था। वरुणा को उठा कर एम्बुलेंस में रखा गया। आगे-आगे एम्बुलेंस वैन चला और उसके पीछे पुलिस की गाड़ी चली। जयमुन्दर वावू पुलिस की गाड़ी में बैठे थे। होटल से निकल कर जयसुन्दर बाबू जव चलने लगे थे, शेखर बाबू भागे-भागे उनके पास आये थे। वोले थे-~~सर ! माप जा रहे हैं ? अव मेरा क्या होगा? आपने देखा तो, मैंने कितना पैसा खर्च किया ? जयसुन्दर वाबू ने कहा था-मैं मर तो नहीं जा रहा हूँ ? आप क्यों परेशान हो रहे हैं ? अगर मैं न भी रहूँ तो कलकत्ते का पता है। फलकते में मेरी पत्नी है, मेरी कम्पनी है, आपका सारा पैसा वह भी चुकता कर सकती है। आप परेशान न हों। उसके बाद पुलिस को गाढ़ी धुआं छोड़ कर चलने लगी थी। शेखर वावू वहीं दो मिनट विमूढ़ से खड़े थे। होटल के दो-चार बोर्डर भी उनके साथ खड़े थे। उन लोगों ने शेखर बाबू से पूछा-ग्यारह नम्बर वाले सज्जन को पुलिस बयों पकड़ ले गयी ? क्या उनसे उस लड़की का कोई सम्बन्ध था? झला कर शेखर बाबू बोले-~या पता! अव मुझे अच्छा सवक मिल गया है । अब किसो अकेली औरत को होटल में ठहरने नहीं दूंगा। शादी-ब्याह नहीं ?

शुभ योग 1 १४५ किया था, लेकिन पुरी में क्यो मरने पापो, क्या बताऊँ? उस सज्जन ने फिर पूछा-उस लड़को ने चिट्ठी में क्या लिया है? ---खाक लिखा है! शेखर बाबू चिढ़ गये। उनको उस समय कितने लोगों के पाने का राजाम करना था। फिर उन लोगों के हजार नपरे थे! यह राव भी शेषर या को संभालना पड़ता था। लेकिन उनकी मदद करने वाला कोई नहीं था। फिर एक- एक चीज का हिसाव रखना था ! अपने टेविल की तरफ जाते हुए शेखर बाबू ने कहा-पता नहीं उस निली में क्या लिखा है ! पुलिस ने वह चिट्ठी मुझे कहाँ दिखायी? यह तो अपने बाप से गयी है। वड़बड़ाते हुए शेखर बाबू अपनी कुर्सी पर बैठे। फिर हिसाब का खावा कर देखते हुए भी बड़बड़ाते रहे। अस्पताल में बहुत समय लगा। लेकिन वरुणा उस समय सारे कर्ज-उधार और पाहने पाने की सीमा पार कर कही और जा चुकी थी। उसे बचाने का कोई उपाय नहीं पा। एक दिन उसने नौकरी चाही थी, नेह-प्यार पाहा था और दुनिया के लोगों से शान्ति पाही पी, लेकिन अब वह सब मरंग-मांग कर दूसरों को परेशान करने यानी यही मही पौ। उसे अपने जीवन में क्या मिला था, अगर कोई इसका जोड लगाये वो देगा पायेगा कि वह सिर्फ शून्य अलावा कुछ नहीं है। सिर्फ शून्य और शून्य ! शून्य बैंक ही घरुणा के जीवन मा मूलधन था। पपीरा बरसों की अपनी जिन्दगी में उसे केवल शून्यता ही हाथ लगी। यूपता का हाहा- कार ही उसका बोक्न था। मामूली भोजन-याजन पाने के बदले वह धर कृष देने को तैयार पी, फिर भी उसे शून्य हो मिला। लेकिन पुलिस उतनी आसानी से छोड़ने वाली नहीं थी। अब वरुणा का पोस्ट मार्टम करो! उसे चीरपर मैं से पानी। पढ़ी दरी से जा कर उसके मन को देखने को बरत नहीं है। सिर्फ उपसे गरीर को देखो। चौर-फाड़ कर वोटी-बोटी कर के देखो। टेखो कि उसने पाल-भाव-गुम्नी फे धमाया बौर क्या खाया था। मगर जहर खाया था तो वह बैगा था, उसकी मी देगा। 1 १४६ ।। शुभ संयोग फिर यह भी देखो कि उसने खुद जहर खाया था, या किसी ने उसे खिलाया था ? अगर किसी ने उसे जहर दिया है तो उसे ढूंढ निकालो। फिर पता लगाओ कि उसने क्यों जहर दिया ? अस्पताल और थाने में जयसुन्दर वाबू ने पूरा दिन विताया । जयसुन्दर वावू थाने में आये तो मो० सी० ने उनसे पूछा-~-आप कितने दिनों से उस लड़की को जानते थे ? -वस, छ:-सात दिनों से । जयसुन्दर बाबू बोले । -आपने क्या उस लड़की को पहले कभी देखा था, या पुरी में आ कर पहली । वार देखा? . -- -बस, पुरी आने के बाद देखा था। -क्या आप कुछ बता सकते हैं कि उसने क्यों आत्महत्या की? जयसुन्दर वाबू बोले-~-मुझे लगता है कि मेंटल डिप्रेशन और निराशा के कारण उसने ऐसा किया है। -निराशा किस बात की थी? -~~-उसने कहा था कि यहाँ किसी नौकरी के लिए इंटरव्यू देने आयी थी। लेकिन वह नौकरी नहीं लगी । शायद उसी कारण से बहुत निराश थी। कल एक महिला समुद्र में डूब कर मरी थी। उसने उसकी लाश देखी थी। लाश देखने के बाद वह बहुत विचलित हो पड़ी थी। -मापने उससे कब आखिरी बार बात की थी? वही काल सवेरे । कल सबेरे में समुद्र किनारे टहलने गया था। उस समय यह टहल कर लौट रही थी। जहाँ उस स्त्री की लाश पड़ी थी और भीड़ लगी थी, वहीं उससे मुलाकात हो गयी थी। फिर हम एक साथ बात करते हुए लौटे थे। -उसने जो जहर खाया, वह कहाँ से मिला ? उसके बारे में मापका क्या अनुमान है ? --उसके बारे में मैं कुछ भी नहीं बता पाऊंगा। लेकिन होटल के नौकर किंकर से सुना है कि शाम को वह थोड़ी देर के लिए बाहर निकली थी । हो सफता है, उसी समय वह जहर खरीद लायी थी। पहले भी तो वह नींद की गोलियां खा कर आत्महत्या करने चली थी? -जी हाँ । लेकिन उस समय उससे मेरा परिचय नहीं था। -अच्छा, आप निशिकान्त दास नाम के किसी व्यक्ति को जानते हैं ? जयसुन्दर वाबू का कलेजा धक से हो गया । अचानक लगा कि उनका दम धुट चला है । उनको सांस लेने में तकलीफ होने लगी। बोले--एक गिलास पानी मिलेगा? । WER मुन गंपोष! १४७ पानी बारा । पाने के दार दमुन्दर दाद की तकदीर म्यादा बढ़ गये। दिर वह दोने-ची नहीं। तद यो० मी० ने चयनुन्दर दादू को एक पत्र दिखाया। वोले-पह देखिए । यह पत्र वाला चौधरी का नान छोड़ की है। देखिर, इसी में निनिशान दान के दारे में निदा है। कार निन्ति दाज को जानते हैं ? उपमुन्दर दाबू ने उस पत्र को देखा। रिक्हा-यह पत्र मुझे देंगे? यो० सी० दोने-वो नहीं। इन्वेस्टिगेगन के विर की पहल पहे। इसनिर वह पत्र यापकी नहीं दिखा पा सकता। नेकिन उस पत्र को रिखना पड़ा, उसी में उपनुन्दर दादु के दिन का दर्द बढ़ गया। रिनको भगा कि दन घटता जा रहा है। यो० सी० ने फिर पूछा-बार निकिन्न दान को नहीं जानते ? उपमुन्दर दादु चुसी साधे रहे । उनने कोई बवाद देने न बना। यो० मी० ने रि पूछा-क्या हुआ? यार मेरे सदाब का बवाद को नहीं दे रहे हैं ? दवाइए, बस निरिकन्त दान को नहीं जानते ? लेकिन उस समय उपनुन्दर दादू की शारीरिक स्थिति वाद देने लायक नहीं यो। कौन जवाब देता? पाने में ही दन माने का दर्द रि बढ़ गया। चक्कर याने सगा। उनसे चारों तरफ घरा दिखाई पड़ने रमाउनको नमानिकों से कुछ नहीं दिखाई पड़ रहा है। मुखर रोन मोर में साढ़े तीन-चार वने क बाठाया। उसके बाद चाय पी कर स्टेशन की तरफ नागवा या । रेफिन उस दिन वह बौर बल्दी उ मला और चाप निचे दिना निरन पड़ा। सो रेलवे स्टेशन को तरस पाना चाहिए, लेकिन वह घर न वा कर सारे पन्छिन तर माग्ने रगा। उस समय भी निशिकान्त पड़ा पड़ा मो रहा था। साढ़े चार-पांच बजे से पहले वह छ नहीं पाता था। तनी होटन के दरवाजे पर दस्तक हुई। -निनिकान्त वाद है ?

१४८ || शुभ संयोग कह कर होटल के एक आदमी ने निशिकान्त दास को बुला दिया। गुणेश्वर को देख कर निशिकान्त उसे सीवे अपने कमरे में ले गया। फिर निशिकान्त ने कमरे का दरवाजा भी बंद कर लिया । -सर ! सर्वनाश हो गया है । गुणेश्वर बोला । निशिकान्त ने होंठों पर उंगली रख कर कहा-चिल्लाओ मत ! बहुत धीरे- धीरे बोलो, नहीं तो कोई सुन लेगा । क्या सर्वनाश हो गया ? गुणेश्वर ने कहा-मापको उस लड़की ने कल सचमुच आत्महत्या कर ली है। -कब? -कल दोपहर में उसके कमरे का दरवाजा तोड़ कर देखा गया कि वह बेहोश पड़ी है। फिर पुलिस आयी और डाक्टर भाया । उसके बाद उसे अस्पताल भेजा गया। बाद में सुना कि वह लड़की पहले ही मर चुकी थी। पुलिस मापको खोज रही है। -लेकिन मैंने क्या किया है ? गुणेश्वर बोला--यह तो मैं नहीं जानता। लेकिन वह लड़की एक चिट्ठी लिख कर गयी है। पता चला कि उसमें गापका नाम है। अब आप यहां से चले जाइए सर ! अभी निकल जाइए। निशिकान्त ने थोड़ी देर न जाने क्या सोच लिया। उसके बाद कहा-अभी जाना पड़ेगा? -जी। अभी । इसी वक्त! -उस लड़की ने मेरे बारे में पत्र में क्या लिखा है ? क्या मेरी बुराई की है ? यह सब मैं कुछ नहीं जानता। मैनेजर साहब कह रहे थे कि उस पत्र में यह लिखा है कि उस लड़की को आप ही यहां लाये हैं। ----उसने ऐसा लिखा है ? --मैनेजर साहब ने भी पूरा पत्र नहीं पढ़ा है। वह सिर्फ एक नजर उस पत्र फो देख सके थे। उसके बाद तो पुलिस मा कर वह पत्र ले गयी। उस लड़की को भी स्ट्रेचर पर लाद कर अपस्ताल ले जाया गया। निशिकान्त दास ने पूछा-~और ग्यारह नम्बर के जयसुन्दर वाबू -उनका भी नाम उस चिट्ठी में है। पुलिस अपनी गाड़ी से उनको भी थाने ले गयी थी। वह भी दिन भर खाना नहीं खा सके थे। उनकी भी तबियत ठीक नहीं है। थाने से लौट कर वह चुपचाप अपने कमरे में लेट गये थे । रात को भी उन्होंने कुछ नहीं खाया था । डाक्टर उनको देखने आये थे। दवा दे गये हैं । लेकिन आप देर न करें। तुरन्त यहाँ से चले जाइए। निशिकान्त दास बोला-अभी तो कोई गाड़ी नहीं है । जाऊंगा कैसे ? •v ।

गुम संयोग [ १४६ –यार कटक चले वार्य । कटक के लिए ट्रेन मिल जाये। फिर परास्त कर गुणखर वोवा-सर ! मेरा सवा? निशिकान्त दास ने चैव से दस सौ का नोट निकाल कर गुगंबर की तरफ बढ़ाया। -सर, सिर्फ दस रपये? -पहले भी तो तुम्हें दौस रपये दिये थे। और कितना दूंगा?हिर बप पुरी याऊँगा, तब तुम्हें खुश कर दूंगा। बभी वही ले कर खुशी करो। मेरे बारे में किसी से कुछ मत कहना । बच्चा। वायो। गुपेखर के चले जाने के बाद निशिकान्त चटपर तैयार हो गया। उसे उसी वक्त होटल छोड़ कर चले जाना था। निशिकान्त नै सोचा, वरुणा खुद भी मरी और मुझे भी मुर्दा बना गयो । मुक्त में ढेर सारे रुपये की वरवादी हो गयो। ठोक है। मौका फिर मिलेगा। एक हो वाली में हार-जीत का फैसला नहीं होता। अव कलकत्ते चौट कर उसे समझ लंगा। जयवृन्दर बाबू को मैं किसी तरह माफ नहीं कर सकता। निविकान्त मन हो मन बड़बड़ाता रहा । आज तक मैं कमो जिन्दगी में नहीं हारा । हारने के लिए मैं इस दुनिया में पैदा नहीं हुवा। मैंने दम दरस जैल काटी है। उन दस वरमों में रोष हर पड़ी सिर्फ अपमुन्दर वावू को तबाहो मनाता रहा हूँ। मैं खुद बचीक करूंगा यऔर उपमुन्दर वाबू बाराम करेंगे, ऐसा नहीं हो सकता। यहां थाने के वार मो मेरा बहुत पैसा खर्च हुवा है। न्याज-दर-व्याज वह सव वसूलना पड़ेगा। निशिकान्त दास जिस समय स्टेशन पहूँचा, देन टूटने मानो यो । वह हड़बड़ा कर एक डच्चे में चढ़ गया। ठीक उसके एक घंटे बाद पुलिस उस होटल में पहुँचौ, वहां निशिकान्त ठहरा था। -यहां निशिकान्त दान है ? पुलिस देख कर होटल के लोग पकड़ा गये । मैनेजर वैचारा गरोव था। समुद्र के किनारे खुली जगह पर होटल खोलने सापक पैसा उसके पास नहीं था। इसलिए उसने एक मनी के नुक्कड़ पर होटन खोला पा । जो सस्ते होटल में ठहरना चाहते थे, वे उस होटल में व्हरने थे। पुलिस एकदम होटल के कन्दर पती बायो। चारों तरफ देख कर दारोगा को बड़ा बारचर्य हुवा । ऐसे होटल में भी यादमी व्हरता है ! दारोगा ने एक बादमी से कहा-मालिक को चुनावो। लेकिन होटल का मालिक कहो या?

१५० ।। शुभ संयोग । m दारोगा के दुलाने पर मैनेजर हाथ जोड़े सामने आ कर खड़ा हो गया। वोला--आज्ञा कीजिए हुजूर । -~~~-यहाँ निशिकान्त दास नाम का कोई है ? मैनेजर तो डर के मारे कांपने लगा था। बोला-हाँ हुजूर, थे। लेकिन वह तो चले गये हैं। -कब गया? -अभी एक घंटा पहले हुजूर ! -कहां गया है ? मैनेजर बोला-यह तो नहीं पूछा हुजूर! -और कुछ बताया था ? -नहीं हुजूर दारोगा समझ गये कि पंछी उड़ गया है। वह अपने दल-बल के साथ चले गये। । ठीक उसी वक्त लोकल ट्रेन कटक स्टेशन पहुंची। प्लेटफार्म पर ट्रेन रुकते ही पैसेंजर उतरने लगे। यह ट्रेन यहीं खत्म होती है। निशिकान्त दास भी ट्रेन से उतरा । उसके हाथ में सिर्फ एक सूटकेस था। गेट पर टिकट दिखा कर वह बाहर निकला और एक रिक्शे पर बैठ गया। रिक्शेवाले ने पूछा- कहाँ जायेगे बाबू निशिकान्त दास बोला-होटल । -किस होटल में बाबू ? निशिकान्त दास बोला-किसी भी होटल में । फिर शाम को एक्सप्रेस पकड़नी थी। कलकत्ता एक्सप्रेस । रिक्शा धीरे-धीरे शहर की तरफ चला। ? कलकत्ते के नन्दन स्ट्रीट वाले मकान में उस समय कीर्तन हो रहा था। सबेरे जब कनला पूजा करने बैठती है, तब एक बार कीर्तन होता है। दोपहर में घर का काम-काज करना पड़ता है। उसके बाद संध्यारती होती है। उस समय भी कीर्तन होता है। दिन भर कमला का यही काम है।

शुभ संयोग ॥ १५१ गिरि चन्दन घिसने बैठ जाता है । सबेरे उठते ही उसका वही काम है। उसी समय माली आ कर फूल दे जाता है। उसके साथ माहवारी हिसाब है। फिर फन काटने पड़ते हैं। जिस मौसम में जो फल मिलते हैं, वही आते हैं। जैसे, केला, संतरा, ईख आदि । गिरि ही फल काटता है। उसी समय कमला नहा लेती है। उसके बाद वह टसर की साड़ी पहन कर पूजा के कमरे में जाती है। गिरि पहले से पूजा के उपचार नैवेद्य आदि सजा कर रख देता है। पुरोहित ठीक समय पर आ जाते हैं। दो कीर्तनिया भी मजीरा आदि लिये उसी समय आ पहुँचते हैं। कीर्वनिया गाने लगते हैं- कत चतुरानन मरि मरि जाएत न तुम आदि अवसाना। वोहि जनमि पुनु तोहि समाएत सागर लहरि समाना॥ भनइ विद्यापति सेप समन भय तुम बिनु गति नहि आरा। तोहे अनायक नाथ कहाओसि तारन तोहारा ॥ झांझ-मजीरे की ध्वनि के साथ मुमधुर पदावतो कीर्तन से मकान गूंज उठवा है। उस समय कमला भावविभोर हो जाती है । वह भूल जाती है कि वचपन से उसने कितना कष्ट उठाया है। वह गृहदेवता राधाकृष्ण की मूर्ति के साथ मानो एकात्म हो जाती है। उस समय कमला को बाहर की कोई बात याद नहीं रहती। वह अपने पति और दो पुत्रों को भूल जाती है । वह अपने बेटो को कभी अपने पास नही पा सकी। दोनों ने घर से दूर रह कर पढ़ाई की और बाद में अच्छी नौकरी ले कर विदेश चले गये । फिर दोनों ही वहां बस गये। उसके बाद वचे पति । एक स्त्री के लिए पति सबसे निकट का होता है । लेकिन कमला जयसुन्दर वावू को ठीक से याद भी नहीं कर पाती ! उसकी आँखो के भागे और मन के आगे राधाकृष्ण को युगल मूर्ति ही सजीव हो उठती है। उस दिन भी कीर्तन चल रहा था। तभी अचानक तालों को संगति टूटी। गिरि ने बा कर कहा-मां, आफिस से बड़े बाबू आये हैं। आफ्सि से ? बडे बाबू ? वैसा आफिस ? कौन दहे बड़े बाबू को देके में बैठा कर गिरि कमला को खबर करने पहुंचा था। वा?

१५२ | शुभ संयोग - चूंघट काढ़ कर कमला वैठके में गयी। 'बोस एंड कम्पनी' के बड़े बाबू सुशीतल बाबू को बाहर से ही कीर्तन की सुम- धुर ध्वनि सुनाई पड़ने लगी थी। सुशीतल बाबू कभी नन्दन स्ट्रीट वाले मकान में नहीं आये थे। उसकी जरूरत भी नहीं पड़ती थी। लेकिन वह इतना जानते थे कि किस मकान में जयसुन्दर वावू की पली रहती है। उस दिन सुशीतल वाबू को विवश हो कर माना पड़ा। -मां, आप मुझे नहीं पहचानतीं । मैं 'वोस एंड कम्पनी' के दफ्तर का बड़ा वाबू हूँ। मेरा नाम है सुशीतल दत्त । मैं अट्ठारह वर्षों से इस दफ्तर में काम कर रहा हूँ। इसलिए मैंने आपको मां कहा । आप मेरी माँ जैसी हैं। मुझे आप न कहें। कमला सुशीतल वावू की वातें सुन रही थी। बोली-चोलो, क्या कहने आये हो ? सुशीतल वायू वोले-आप तो जानती होंगी कि कई दिन पहले मिस्टर बोस पुरी गये थे। कमला बोली-~नहीं। मैं नहीं जानती। -पुरी से मुझे अभी एक टेलीग्राम मिला । उसमें लिखा है कि पुरी में मिस्टर वोस बहुत अस्वस्थ हैं । उन्होंने आपसे अविलम्ब पुरी जाने के लिए कहा है। किसने टेलीग्नाम किया है ? सुशीतल बाबू बोले-~-पुरी के 'होटल सागर' से वहाँ के मैनेजर ने । कमला न जाने नया सोचने लगी। सुशीतल वाबू फिर वोले- आप चलेंगी न ? कमला बोली-लेकिन मैं कैसे जा सकती हूँ? सुशीतल बाबू ने कहा-आप यदि कहें तो मैं आपको ले जा सकता । रात के आठ बजे ट्रेन है। आपकी आज्ञा हो तो मैं दो टिकट खरीदने के लिए आदमी भेजूंगा । जरूर उनकी तबीयत बहुत ज्यादा खराव है, नहीं तो वहां से टेलीग्राम क्यों आयेगा? -ठीक है, टिकट खरीदवा लो। मैं शाम को सात बजे तक तैयार हो कर तुम्हारा इंतजार करूंगी। फिर सुशीतल बाबू वहाँ नहीं रुके। बोले--मच्या मां, मैं चलूं। फमला के पांव छूकर सुशीतल वायू ने हाथ माथे से लगाया । उसके बाद वह बाहर निकल गये। ।

शुभ संयोग ॥ १५३ पुरी के 'होटल सागर' के ग्यारह नवर कमरे में उस समय जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष चल रहा था। डाक्टर इंजेक्शन लगा कर गये । खाने की दवा भी दे गये। लेकिन होटल में कौन जयसुन्दर बाबू को दवा खिलाता और उनकी देख- भाल करता? डाक्टर ने ही नर्स का इतजाम कर दिया था। एक नस दिन में रहती थी और दूसरी रात में । यह सब इंतजाम करने शेखर बाबू का बड़ा पैसा खर्च हो रहा था। झमेला भी कम नहीं था। शेखर बाबू ने बार-बार कहा-आप कलकते का पता दीजिए । मैं टेलीग्राम कर दूंगा। बार-बार कहने पर जयमुन्दर वाबू ने किसी तरह पता बताया था और शेखर बाबू ने लिख लिया था। उसके बाद शेखर वाबू ने कलकत्ते के पते पर टेलीग्राम कर दिया था। इस झमेले से शेखर बाबू कम परेशान नहीं थे। वह मन ही मन बडबड़ाते थे—अगर पुरी में ही मरना है तो किसी और होटल में कोई क्यों नहीं जाता ! मेरे होटल में क्या रखा है ? पुरी में सिर्फ यही एक होटल नहीं है। तमाम होटल हैं। उसके बाद पुलिस का झमेला। पुलिस के लोग कई दिनों से शेखर बाबू के पास आने लगे थे। आ कर वे एक ही सवाल करते थे यहाँ निशिकान्त दास नाम का कोई याता था शेखर बाबू कहते थे-कौन निशिकान्त दास ? हमारे यहाँ इस नाम का कभी कोई आदमी नही आया । फिर जो लोग ठहरते हैं, उनसे कब कौन मिलने माता ई. हमें पता भी नहीं चल पाता ! बात सही थी। पुलिस को यह बात मालूम भी थी। लेकिन उस सड़की के पत्र ने झमेला किया था । उसमें निशिकान्त दास का नाम था। शेखर बाबू कहते थे-वह लड़को को चिट्ठी में सब कुछ लिख कर गयी है। फर आप लोग क्यों परेशान हो रहे हैं ? ? ।

१५४ ॥ शुभ संयोग पुलिस वाले कहते थे--इसी लिए तो हम निशिकान्त दास को ढूंढ़ रहे हैं। और हमारे यहाँ जो ग्यारह नंवर के वोर्डर हैं, उनके बारे में उस लड़की -- ने कुछ नहीं लिखा है ? -लिखा है। लेकिन ग्यारह नंबर के वोर्डर तो इस समय वेहोश पड़े हैं। उनसे क्या पूछताछ करेंगे ? वह तो कोई जवाब नहीं दे सकेंगे। आपने तो कलकते टेलीग्राम कर दिया है ? वहां से लोग आ जायें, तब उनसे पूछा जायेगा । शायद तव पता चले। दूसरे ही दिन सवेरे एक सज्जन एक महिला को साथ लिये पुरी स्टेशन पर ट्रेन से उतरे। रोज की तरह गुणेश्वर उस दिन भी प्लैटफार्म पर खड़े हो कर अपनी रटी- रटायी वात कहता जा रहा था---एक बार हमारे 'होटल सागर' को जबर ट्राई कीजिए तर ! हवा और रोशनी की कमी नहीं है । भोजन मनपसंद मिलेगा । एक वार 'होटल सागर' को जरूर ट्राई कीजिए सर ! सुशीतल वाबू ने गुणेश्वर के पास आ कर पूछा-तुम 'होटल सागर' के आदमी हो? गुणेश्वर बोला-जी सर! ---तुम्हारे होटल में जयसुन्दर वाबू हैं ? जयसुन्दर बोस ? ----जी हां, हैं। लेकिन इस समय मिस्टर वोस वीमार हैं सर ! सुशीतल वावू वोले-हम उन्हीं को देखने के लिए कलकत्ते से आये हैं । गुणेश्वर बोला- चलें सर, मैं आप लोगों को ले चलता हूँ। चलें। यह कह कर गुणेश्वर आगे-आगे चलने लगा। । संसार में प्रतिदिन जिदा रह कर मैंने क्या चाहा था ? क्या चाहा था, यह सोचने पर हमें बहुत दूर नतीत में लौट जाना पड़ता है।

मुन मोल इची सवाद में उपमुन्दर बाबू का सान्ना हमा दन्हें भी दरवीत की वाने पार बापी। एक छोटा सा मकान, छोटा परिवार और मोरन-वन का सामान्य प्रदन्ध हो वो वपन्दर दादू ने चाहा था। रि नोरन-दसरा प्रदत्य बले के दिर न्हें रस की वस्त पड़ी। रिसपा करते-करते सदे का नया रामा। रिमी नगे ने ददाता-विना सपा कमा रहे हो, वह का नहीं है। उसडे कान नहीं चोगा। तुम्हें बौर माता पा चाहिर । मी ज्यादा रूप के जिर तुम याने घर में काटन पार्टी दो । वह जो निशिव यात्रा है, वही तुन्हें वधि में वधिक सया कमाने का रास्ता दना देगा । वह यस्तावा है, महमत देखो। वह बच्चा भी हो सकता है और दुरा नी । तुन रिसी तरफ ध्यान मन दो।मी के वा राने पर चने चन पायो । वही शान करो, खिने दक्षिक से दधिक रूपा लि। घोषित करो वो तुम ये एक दिन पोत्साम यगरवाद बन सकोगे। यंत तक बपन्दर दाबु राधेश्यान बारवान बने थे। लेकिन उसके बाद? उसके बाद दी फोपिय करते-करते उपमुन्दर वाढू ने कानी पनी कमला कोमो दिया । दोनों बेटों को भी होना पड़ा। इसके बाद निमित्रान्त दान का यह पत्र याया । वही पर घोर संन्ट का कारण दना । रि जी पत्र के मरने को मुलन्चने में दाप्ड नंबर को वह सड़की उनके जीवन में या कर वन मनी । लेकिन उस समय अपमुन्दर दाबू को क्या तापा कि वह सड़की काने सर्वनायके साद-गाय उनका भी नाम करेगी! ---कौन? वरा देर के दिर चेचना लोग तो वपन्दर दाबू ने कावें होती दौर में एक क्षण वाद का मुंदनी। कमला कई प से समुन्दर बाबू के पास दो पो। बदमुन्दर बाबु गायर साना देख रहे थे। वादयाह बोरगवेद ने नो मापद बीवन के बतिम क्षों मेंका साना देशा पारिन्दगी मर दह मो साना देखते रहे। हिन्दुस्तान में उनको दारमान और ले, जिन्दगी भर वह दम नही माना देखते रहे। जीवन में बनिन दिनों में उन्होंने लिखा पा-बब मुदा पान बाने का समय हो गया है। खुद के पात्र वा कर मैं क्या मिल दूंगा? क्या वाव दूंच? हो । वमन्दर दाबू के सामने मौ वही सवान या! नावान के पास का पशव दूंगा?

१५६ ॥ शुभ संयोग कमला जयसुन्दर बाबू के चेहरे पर मुकी। -तुम मायो हो कमला? कमला के मुंह से कोई बात नहीं फुरी । वह जयसुन्दर बाबू के चेहरे की तरफ एकादया देखती रही। । । उसी समय और एक सज्जन थाने में पहुँचे । उनको देखने से लगा कि वह गांव से आये थे। मो० सी० ने पूछा-आप क्या चाहते हैं ? कहाँ से आ रहे हैं ? -मैं बहुत दूर से आ रहा हूँ। मेरा घर दिलदारपुर में है। -दिलदारपुर कहाँ है ? -- फलफत्ते से चौदह मील दूर देहात में । स्टेशन में उतर कर अब भी पांच कोरा पैदल चल कर वहां तक जाना पड़ता है । मेरी एक बेटी थी। वह कलकत्ते चली आयी थी। वह भी छः वर्ष पहले की बात है। मैंने सुना था कि वह फलकत्ते में डी० एल० राय स्ट्रीट के एक लेडीग मेस में रहती है । मैं अपनी बेटी फी पोज में यहां गया था। वहां एक लड़की ने बताया कि वह नौकरी ले कर पुरी चली गयी है। लेकिन मेरी बेटी किस दफ्तर में काम करती है, यह वह लड़की नहीं बता सकी । मैं उसी की खोज में पुरी आया हूँ ? भगर माप लोग उसका पता बता सकें तो बड़ी सुशी होगी। -इतने दिनों बाद अपनी बेटी की खोज में माये हैं ? पहले क्यों नहीं आये? उरा राज्जन ने याहा--पहले अपनी बेटी की खोज नहीं की, इसके पीछे कारण है । गेरी पहली पत्नी को मृत्यु यो बाद मैंने दूसरी शादी की थी। मेरी दूसरी पत्नी अपनी सौतेली बेटी को बहुत परेशान करती थी। जब पता चला कि मेरी बेटी फलकत्ते में रह पर नौकरी करती है तो सोचा कि ठीक है, वह वहीं रहे । अव मेरी दूसरी पत्नी भी चल बसी है। इसलिए सोचा कि अब मेरी बेटी घर लौट सकती है। अब मैंने उसकी शादी भी तय कर ली है। इसलिए उसे ले जाने के लिए आया हूँ। -पया नापकी बेटी का नाम परुणा चौधरी है ? -~-जी हाँ। आपने ठीक समझा है। यही मेरी लड़की है। मेरा नाम है निशीपभूषण चौधरी।

शुभ योग । १५७ इतनी देर बाद ओ०सी० बोले- आप बैठे। फिर मो० सी० ने लोहे की आलमारी का ताला खोल फर एक फाइस निकाली । फाइल से एक चिट्ठी निकाल फर उन्होंने कहा-यह चिट्ठी पहिए। निशीय बाबू उस चिट्ठी को पढ़ने लगे-- परम आदरणीय, यापको जब यह चिट्ठी मिलेगी, मैं इस दुनिया में नहीं रहेंगी । मैंने रिखने कष्ट में ये कई वर्ष बिताये, यह सिर्फ मैं हो पानती है और कोई नहीं जानता । आप शायद नहीं जानते, लेकिन निशिकान्त दास ही मुझे यहाँ साया था । थारी दो लाख रुपये पाने के लिए उसने मुझे थापके पोये मगाया था। मैं भूखों मर ही थी, इसलिए रूपये के लिए इस काम को स्वीकार किया था। मैंने जो वापरो पाहा था कि नौकरी के लिए इंटरव्यू देने यहां आयी थी, वह सरासर भूल पास थार पर जादू डाल कर आपको मुट्ठी में कर लेना ही मेरा काम पार किन था सम्पर्क में थाने के बाद मैंने जाना कि याप भी मेरी तरह इसी हैं । इगलिए आपको नुकसान पहुँचाना मेरे मन को गवारा नहीं था। निशिकान्त पार पूरी में हो है । वह कुचीगाही के एक होटल में रहा है । पहले पो मैंने यात्महत्या करने का नाटक किया था, उसके लिए उसी ने नींद की गोलियांवरीत दीपों। ग संसार में मेरा अपना कोई नहीं है। फिर भी वाप, सौतेसी मो यौर कई मौन भाई हैं । सौतेली मां के कारण वाप भी मुझसे दूर हो चले थे। मेरे मरने पर उन सबको शान्ति मिलेगी। इस हालत में मेरे लिए मरने के. यमावा और कोई उपाय नहीं है । इसलिए मैं मर रही हूँ । यार मुझे जर मामा करेंगे। परना चौधरी निनीय बाबू के हाय परपर कांपने लगे । टन हायों में चिट्टी हट कर कर्म पर गिरी । वह रोने नगे । रोते हुए दौरे में दानी बेटी की शादी की दर चुका था। बो० सी० वोने-दब क्या करेंगे, पर मोट बार बाड़ी दैठी को हम श्मशान में इला भी बाये हैं। 'हॉटन माद नंबर रनों में निपट कर मुटद बाहर पढ़े ५८ || शुभ संयोग शेखर बाबू ने सिर उठा कर कहा-क्या हुआ ? जयसुन्दर वावू अब कैसे हैं ? सुशीतल वायू के मुंह से बस छोटा सा एक शब्द निकला खतम ! कमला को शायद उस समय भी विश्वास नहीं हुआ था। वह उस समय भी जयसुन्दर वाबू के चेहरे की तरफ एकटक देखे जा रही थी। उसके मन में उस मय भी विद्यापति का एक पद गूंज रहा था- - मधुपुर मोहन गेल रे मोरा विहरत आती। गोपी सकल विसरलन्हि रे जत छलि अहिवाती॥ सूतलि छलहुँ अपन घर रे गेलहुँ सपनाई। फरसएं छुटल परसमनि रे कमोन लेल अपनाई॥ उस समय कमला को लगा कि वह सानो नन्दन स्ट्रीट के उसी मकान में राधाकृष्ण की मूर्ति के सामने बैठो हुई है और उसके पीछे बैठे कोर्तनिया कीर्तन कर रहे हैं। हरि मथुरापुरी चले गये और देखते-देखते गोकुल में अंधेरा छा गया। कमला को दुनिया भी सुनी हो गयी । जयसुन्दर वाबू के जीवन भर का कुल जोड़ शून्य के सिवा और कुछ नहीं है । कम से कम कमला को यह लगा। भी पूछा-उसके बाद क्या हुमा ? मेरे पुलिस अधिकारी मित्र ने कहा-वह तो आपको बताया । माज वीस साल बाद कहां है वह जयसुन्दर बोस और कहाँ है वह वरुणा चौधरी? कहां है वह फमला बोस और कहां वह राधेश्याम अगरवाल ? अजय बोस और विजय बोस दो भाई भी बाज न जाने कहाँ हैं ? सुनने में आता है कि एक भाई अमरीका में है और दूसरा जर्मनी में । एका-एक मेमसाहव से शादी कर दोनों इंडिया को भूल चुके हैं । शायद वे वहां सुख-शांति से घर-गृहस्थी कर रहे हैं। उनमें से किसी का पता भी याद नहीं है। लेकिन उस सारे इतिहास का साक्षी बना वह मकान माज भी खड़ा । उस बारह मंजिले मकान में न जाने कितने दपतर हैं और उन दफ्तरों में शुभ संयोग | १५६ सैकड़ों कर्मचारी काम करते हैं। मकान मालिक को उम सकान से हर महीने सग- भग छः लाख रुपये किराये मिलते हैं। -~छ: लाख रुपये ? और यह भी हर महीने ? -~हो । हर महीने नहीं तो क्या हर साल? पूधा-उसका मालिक कौन है ? मेरे मित्र ने कहा-वही बताने के लिए तो यह कहानी मुनायो । शायद इसी को संयोग कहरे हैं । यह संयोग कभी शुभ होता है तो करो यशुम । लेकिन इस मामले में कहना पड़ेगा कि संयोग शुभ ही था। नहीं तो उतना बड़ा मकान और उससे रतनी बामदनी किसके भाग्य में होती है ? मैंने फिर पूछा-कौन उसका मालिक है? मेरे मित्र ने कहा-एक बंगालो हो । -उनका क्या नाम है? --मेरे मित्र ने कहा-मिस्टर एन० के० दास । -~-मतलब? पूरा नाम क्या है ? मित्र ने कहा- निशिकान्त दास ।

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शुभ संयोग । १५६ सैकड़ो कर्मचारी काम करते हैं । मकान मालिक को उस सकान से हर महीने लग- भग छः लाख रुपये किराये मिलते हैं। ~लाख रुपये ? और वह भी हर महीने ? -हो। हर महीने नहीं तो क्या हर साल? पूछा-~~उसका मालिक कौन है ? मेरे मित्र ने कहा-वही बताने के लिए तो यह कहानी सुनायी । शायद इसी को संयोग कहते है । यह संयोग कभी शुभ होता है तो कभी अशुभ । लेकिन इस मामले में कहना पड़ेगा कि सयोग शुभ ही था। नहीं तो उतना बड़ा मकान और उससे उतनी आमदनी किसके भाग्य में होती है ? मैंने फिर पूछा- कौन उसका मालिक है ? मेरे मित्र ने कहा--एक बंगाली हो। --उनका क्या नाम है ? --मेरे मित्र ने कहा-मिस्टर एन० के० दास । -~-मतलब ? पूरा नाम क्या है? मित्र ने कहा-निशिकान्त दास ।

Shobh Sayogh

Author
Mitra Vimal
Title
Shobh Sayogh
File name
Shobh Sayogh
Text
OCR done
Citation
1958
Published
2011/03
Publisher
Ellahabad,look Bharti Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
166
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
General
DLI number
552093
Barcode
4990010032820.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
2KLHrM7cnAN
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